1. Dhvanyaloka Traravati Vyakhya Ram Sagar Tripathi MLBD (Third and fourth Udyota) 1972
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प्रानन्दवर्धनाचार्यंविरचित:
ध्वन्यालोक:
श्रीमदभिनवगुप्त-विरचित 'लोचन' व्याख्यासहित: सम्पूर्णान् हिन्दीभाषानुवादेन
तारावतीसमाख्यया व्याख्यया च परिगतः
तृतीय एवं चतुर्थ उद्योत:
व्याख्याकार:
डॉ० रामसागर त्रिपाठी
मोती लाल बनारसी दास
दिल्ली
वाराणसी
पटना
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आनन्दवर्धनाचार्यविरचितः
ध्वन्यालोकः
श्रीमदभिनवगुप्त-विरचित 'लोचन' व्याख्यासहितः सम्पूर्णेन हिन्दीभाषानुवादेन
तारावतीसमास्यया व्याख्यया च परिगतः
व्याख्याकारः
डॉ॰ रामसागर त्रिपाठी
तृतीय एवं चतुर्थ उद्योतः
मोतीलाल बनारसीदास
दिल्ली :: वाराणसी :: पटना
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© मोती लाल बना र सी दा स
भारतीय संस्कृति साहित्य के प्रमुख प्रकाशक एवं पुस्तक विक्रेता
मुख्य कार्यालय : बंग्लो रोड, जवाहरनगर, दिल्ली-७
शाखाएँ : चौक, वाराणसी-१ (उ० प्र०)
अशोक राजपथ, पटना-४ (बिहार)
प्रथम संस्करण : वाराणसी १९६३
द्वितीय परिवर्धित संस्करण : वाराणसी १९८१
मूल्य : रु० ३५ (अजिल्द)
रु० ५० (सजिल्द)
भारत सरकार द्वारा उपलब्ध कराये गये
रियायती मूल्य के कागज पर मुद्रित
श्री नरेन्द्र प्रकाश जैन, मोतीलाल बनारसीदास, बंग्लो रोड,
जवाहरनगर, दिल्ली-७ द्वारा प्रकाशित तथा
वर्धमान मुद्रणालय, जवाहरनगर कालोनी, वाराणसी द्वारा मुद्रित ।
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ध्वन्यालोकः
・・
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वक्तव्य
ध्वन्यालोक का उत्तरार्ध पाठकों की सेवा में प्रस्तुत करते हुए अतीव हर्ष का अनुभव हो रहा है। इस खंड में तृतीय और चतुर्थ, ये दो उद्योत सन्निविष्ट किये गये हैं। तृतीय उद्योत कलेबर में जितना विशाल है विपय-वस्तु की दृष्टि से उतना ही उपयोगी तथा महत्त्वपूर्ण भी है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि इस उद्योत में लेखक ने ध्वनिसम्बन्धी अनेक आवश्यक शब्दों का समाशान करने की चेष्टा की है। उद्योत का प्रारम्भ व्यंजक निरूपण से होता है। अविवक्षितवाच्य, विवक्षितान्यपरवाच्य, संलक्ष्यक्रम, असंलक्ष्यक्रम, शब्दशक्तिमूलक, अर्थशक्तिमूलक सभी प्रकार के ध्वनिभेदों के व्यंजकों पर इसमें प्रकाश डाला गया है, साथ ही रसव्यंजना के व्यंजक तत्त्वों पर अधिक विस्तार से विचार किया गया है और संघटना, रीति और गुण का रस से क्या सम्बन्ध है इस विषय में मतभेद प्रदर्शनपूर्वक तत्त्वनिर्णय की चेष्टा की गई है। इसी प्रसंग में काव्यभेदों पर भी विचार किया गया है जिसके साथ ही औचित्य सम्प्रदाय के बीज भी अन्तर्निहित हो गये हैं। प्रबन्ध के द्वारा रसव्यंजना के प्रसंग में कथा-परोक्षा तथा उसका औचित्य, इतिवृत्त तथा कलपन का योग, अवसर के अनुकूल उद्दीपन और प्रशमन इत्यादि विषयों का भी यथेष्ट समावेश किया गया है। इसके अतिरिक्त रसविरोध तथा विरोध-परिहार पर भी स्वतन्त्ररूप से विचार किया गया है। विरोध के प्रसंग में ही वृत्तियों का परिजय भी दिया गया है। दूसरे महत्त्वपूर्ण विषय हैं शान्तरस की सत्ता की सिद्धि वाच्य-वाचक विचार, रस की संलक्ष्यक्रमता, गुणीभूतव्यंग्य का महत्त्व और उपयोग तथा काव्य में उसका स्थान, प्राधान्याप्राधान्यविवेचन की आवश्यकता, चित्रकाव्य, अलंकार सम्प्रदाय का ध्वनिसम्प्रदाय से सम्बन्ध, वक्रोक्ति, अलंकार और ध्वनि, वृत्तिविवेचन तथा विभिन्न वृत्तियों का एकीकरण और ध्वनि विरोधी मतों की परीक्षा। ध्वन्यालोक केवल ध्वनि-संस्थापनपरक ग्रन्थ ही नहीं है अपितु प्राक्तन सभी विचारधाराओं को एक-सूत्र में अनुस्यूत करता है। इस दृष्टि से प्रस्तुत उद्योत सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है और इसमें प्राक्तन सभी विचारधाराओं का ध्वनिमान्यता के साथ सामंजस्य स्थापित किया गया है। केवल पूर्ववर्ती ही नहीं अपितु उत्तरवर्ती औचित्य और वक्रोक्ति सम्प्रदायों का भी प्रेरणा-स्रोत यही उद्योत है। इसमें व्यंजना का भी सबल प्रतिपादन कर दिया गया है।
चतुर्थ उद्योत उपसंहारात्मक है। इसका प्रारम्भ ध्वनि और गुणीभूतव्यंग्य के उपयोग से होता है जिससे काव्य में अनन्तता तथा नवीनता आ जाती है। रसध्वनि फिर भी सर्वाधिक प्रधान होती है और जहाँ अनेक रसों का उपादान किया जाता है वहाँ एक रस को अङ्गी बनाना भी अत्यावश्यक बतलाया गया है। इस प्रसंग में रामायण तथा महाभारत के अङ्गी रसों पर विस्तारपूर्वक दृष्टिपात किया गया है। काव्य में अचिरुण वस्तु से ही नवीनता आती है। इस दिशा में सर्वाधिक उपयोग कवि-प्रतिभा का होता है। व्यङ्ग्यार्थ से ही नहीं और न केवल व्यंजना वृत्ति के उपयोग से अपितु वाच्य-वाचक भाव में भी काव्य अनन्तता
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का प्रयोजक हो जाता है। अवस्थादि भेद भी क्षुण अर्थ को नवीनता प्रदान करने वाले होते हैं। दो कवियों के भाव प्रायः मेल खा जाते हैं। किन्तु सर्वत्र अपहरण का ही आरोप समीचीन नहीं होता। इस दृष्टि से संवाद (मेल) का वर्गीकरण किया गया है और सदोषता निष्पता पर निर्णय्यों दिया गया है।
उपयुक्त निर्देशों से प्रकट होता है कि प्रस्तुत खंड ध्वनि के छात्र के लिए अनिवार्य रूप से उपयोगी है। विशेष रूप से तृतीय उद्योत तो काव्यशास्त्र के प्रत्येक छात्र के लिए अनिवार्य आवश्यकता है। डाॅ० नगेन्द्र प्रस्तुत कृति के प्रेरणा केन्द्र तो रहे ही हैं उन्होंने आमुख लिखकर भी अनुग्रहीत किया है, इसके लिए आभार प्रदर्शित कर मैं उनकी सतत प्राप्य अनुकम्पा का मूल्यांकन नहीं करूँगा। इसके प्रस्तुत करने में मुझे अपने पुत्रों श्री योगेश्वर त्रिपाठी और श्रीज्ञानेश्वर त्रिपाठीसे यथेष्ट सहायता मिली है। उन्होंने प्रेस कापी तैयार करने, मूल से मिलाने, विषय सूची तैयार करने और वर्णानुक्रमणी बनाने का बहुत ही श्रमसाध्य कार्य सम्पादित किया है। प्रेस कापी तैयार करने और मूल से मिलाने में मेरे अनुज श्री रामशरण त्रिपाठी से भी मुझे पर्याप्त सहायता मिली है। मैं 'मोतिलाल बनारसीदास' प्रकाशन के अधिष्ठाता श्री सुन्दरलाल जैन को अन्तस्तल से अभारी हूँ। जिन्होंने मेरे श्रम को प्रकाश में लाने की उदारता दिखलाकर कृतार्थ किया है और इसका सर्वाधिक श्रेय श्री किशोरचन्द्र जी जैन को दिया जा सकता है जिनकी देख-रेख में मुद्रण कार्य सम्पादित किया गया है। श्री जनार्दन जी पाण्डेय का आभार प्रदर्शित न करना भी एक कृतघ्नता होगी जिन्होंने प्रूफ देखने का स्वयं भार वहन कर पुस्तक के शीघ्र प्रकाशन में स्तुत्य सहयोग प्रदान किया है। पुस्तक बनारस में मुद्रित हुई और दिल्ली में उसका प्रूफ देखने में अनावश्यक विलम्ब हो जाता। ऐसी दशा में मुद्रण की कतिपय अशुद्धियों का रह जाना स्वाभाविक ही है। उदाहरण के लिए अभिनवगुप्त के गुरु का नाम भट्टेन्द्र राज है किन्तु पूर्वर्ध के प्राक्कथन के ९ वें पृष्ठ पर महेन्द्रराज छप गया है। आशा है कि सहृदय पाठक ऐसे स्थलों को विवेकपूर्वक स्वयं सम्हाल लेंगे।
अन्त में पाठकों की सेवा में कालिदास का निम्नलिखित पद्य निवेदित कर मैं पाठकों से त्रुटियों के लिए क्षमा प्रार्थना करूँगा :
यद्यत् साधु न चित्रे स्यात्क्रियते तत्तदन्यथा । तथापि तस्याः लावण्यं रेखया किचिदङ्कितम् ॥
श्रात द्वितीया संवत् २०२० रामसागर त्रिपाठी
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समर्पण
वल्सलता-प्रतिमूर्ति स्नेहमयी जननी
श्रीमती फूलमती देवी की
दिवंगत आत्मा के परितोष के निमित्त
यह अभिनव तारावती
सादर समर्पित है ।
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विषय-सूची
वृतीय उद्योत
१.
लोचनकार का मज़्ज़लाचरण
१
२.
द्वितीय उद्योत से विषय वस्तु की सङ्ङ्ति
३
३.
प्रथम कारिका में 'च' की योजना और उसका आशय
५
४.
अविवक्षितवाच्य के भेद अत्यन्ततिरसकृतवाच्य का पद प्रकाश्यत्व
६
५.
अर्थान्तरसङ्क्रमित वाच्य की पदप्रकाश्यता
९
६.
दूसरा उदाहरण
१२
७.
अत्यान्ततिरसकृतवाच्य की वाक्यप्रकाश्यता
१४
८.
अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य की वाक्यप्रकाश्यता
१६
९.
विवक्षितवाच्य के शब्दशक्त्युद्भव की पद प्रकाश्यता
१९
१०.
शब्दशक्त्युद्भव की वाक्यप्रकाश्यता
२१
११.
कविप्रौढोक्ति सिद्ध की पदप्रकाश्यता
२३
१२.
उक्त भेद की वाक्यप्रकाश्यता
२५
१३.
कविनिबद्धवक्त्रप्रौढोक्तिमात्र निष्पन्न शरीर नामक कल्पित भेद की पद-वाक्यप्रकाश्यता
२५
१४.
स्वतः सम्भवी भेद की पदप्रकाश्यता
२६
१५.
स्वतः सम्भवी भेद की वाक्यप्रकाश्यता
२७
१६.
ध्वनि की पदप्रकाश्यता पर शङ्का और उसका समाधान
२९
१७.
असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य की व्यञ्जकता का उपक्रम
३३
१८.
वर्णों की व्यञ्जकता का समर्थन
३५
१९.
इस विषय में सङ्ङीत शास्त्र का उदाहरण
३७
२०.
पद से अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य का द्योतन
४३
२१.
पद के द्वारा द्योतकता पर विवाद
४३
२२.
पदांश के द्वारा असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य का द्योतन
४५
२३.
'असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यो ध्वनि:' के सामानाधिकरण्य पर विचार
४७
२४.
वाक्यरूप शुद्ध असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि
४७
२५.
अलङ्कारोत्तरसङ्कीर्ण वाक्यरूप अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि
४९
२६.
संघटना के द्वारा रस ध्वनित होने का उपक्रम
५१
२७.
रीतियों का संक्षिप्त दिग्दर्शन
४८
२८.
आनन्दवर्धन की रीति-विषयक धारणा और वैकल्पिक पक्षों पर विचार
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२९.
संघटना की रसघुरूजकता पर विचार
३०.
वैकल्पिक पक्षों की उद्द्रावना का प्रयोजन
३१.
संघटनाश्रितत्व पर विचार
३२.
गुणों के आश्रय पर विचार
३३.
इस दृष्टि से गुण और अलङ्कार का भेद
३४.
गुण संघटना के ऐक्य पर विचार
३५.
रसाभिव्यञ्जन में संघटना का अनिश्चय
३६.
दूसरा पक्ष और दोनों का ऐक्य
३७.
उत्तम देवताविषयक प्रस्तुत्झार में अनौचित्य
३८.
एकत्व पक्ष में औचित्य के दूसरे नियामक
३९.
वक्ता और वाक्य के भेदोपभेद
४०.
उक्त भेदों का औचित्य
४१.
रस पर आधारित संघटना
४२.
प्रस्तुत पक्ष का उपसंहार
४३.
संघटना में विषयाश्रय का औचित्य
४४.
प्रस्तुत प्रस्तुत्झ में काव्यभेदों पर विचार
४५.
मुक्तक में संघटना का औचित्य
४६.
सन्दानितक इत्यादि में संघटना का औचित्य
४७.
विषयाश्रित संघटना के औचित्य का उपसंहार
४८.
प्रबन्ध के द्वारा रस की व्यङ्जना
४९.
कथा परिक्षा में विभावौचित्य
५०.
भावौचित्य तथा प्रकृतियाँ
५१.
लोकोत्तर कृत्यों के औचित्य पर विचार
५२.
प्रख्यात वृत्त के उपादान का औचित्य
५३.
विनेय व्यक्तियों की प्रतीति रक्षा की आवश्यकता
५४.
रति इत्यादि में प्रबल्यौचित्य पर विचार
५५.
उपसंहार
५६.
अध्ययन और प्रतिभा का उपयोग
५९.
सिद्धरस काव्यों में स्वेच्छा सन्निवेश का निषेध
' में रसानुकूल परिवर्तन
पर्यादा पालन के लिये काव्यक्रिया का निषेध
विधिग्न रूप और काव्यद्रषिता की उत्कृष्टता
रे का विवेचन
मन्त्रियों में अन्तर्भाव
करण
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६४
शास्त्र स्थिति सम्पादनेच्छा का निषेध और बेणीसंहार का उदाहरण
६५
अवसर के अनुकूल उद्दीपन और प्रशमन
६६
अंगी रस के अनुसंधान की आवश्यकता और तापस वत्सराज का उदाहरण
६७
रसानुकूल अलंकार योजना
६८
प्रबन्ध से अनुरणनात्मक ध्वनि के द्वारा रस व्यञ्जना
६९
इस विषय में दीधितिकार की योजना की समीक्षा
७०
उक्त विषय में मधुमथन-विजयकार का उदाहरण
७१
विषमबाण लीला से उदाहरण
७२
महाभारत से उदाहरण
७३
रसध्वनि के व्यञ्जकों पर सूक्ष्म विचार
७४
सुप्त इत्यादि की व्यञ्जकता का उदाहरण
७५
दूसरा उदाहरण
७६
सुबन्त की व्यञ्जकता का उदाहरण
७७
तिङन्त से व्यङ्ग्य का उदाहरण
७८
सम्बन्ध की व्यञ्जकता का उदाहरण
७९
तद्धित की व्यञ्जकता का उदाहरण
८०
समास वृत्ति की व्यञ्जकता
८१
निपात इत्यादि की व्यञ्जकता
८२
निपात की व्यञ्जकता का दूसरा उदाहरण
८३
उपसर्गकी व्यञ्जकता
८४
उपसर्ग इत्यादि की अनेकता की व्यञ्जकता
८५
निपातों की व्यञ्जकता
८६
पादपौनरुक्त्य की व्यञ्जकता
८७
वाक्य इत्यादि के पौनरुक्त्य की व्यञ्जकता
८८
काल की व्यञ्जकता
८९
सर्वनाम की व्यञ्जकता
९०
वाचकत्व के अभाव में भी व्यञ्जकता का प्रतिपादन
९१
शृङ्गारेतर विषयों में शृङ्गार परक वर्णों से चारुता निष्पादन
९२
सहृदय संवेदन सिद्धि में व्यञ्जना की आवश्यकता
९३
रस विरोध का उपक्रम
९४
रसाभिव्यञ्जक तत्त्वों का विलोम और विरोधी तत्त्व
९५
रस विरोध पर सामान्य दृष्टिपात
९६
विप्रकृष्ट वस्तु का विस्तार पूर्वक वर्णन
९७
अकाण्ड विच्छेद
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98
विना अवसर के विस्तार
99
पुनः पुनः दीपन
100
वृत्तियों का अनौचित्य
101
विरोध परिहार का उपक्रम
102
विरोध परिहार की शर्तें
103
शृङ्गार में करुणरस के संचारी भावों के समावेश पर विचार
104
शृङ्गार रस में मरण के वर्णन पर विचार
105
विरोधी रस की प्रकृत रस पोषकता के तीन रूप
106
विरोधी रसों का प्रकृत रस में समावेश
107
रस के विषय में विधि और अनुवाद शब्दों का आशय
108
विरोध के स्थलों का निरूपण
109
विरोधियों के अभिनय पर विचार
110
विरोध परिहार के अन्य प्रकार
111
रस को अंगी बनाने का निर्देश
112
रस के अंगांगिभाव का औचित्य
113
नाट्य वस्तु की संक्षिप्त रूप रेखा
114
अविरोधी रसों का विवेचन
115
विरोधी रसों का विवेचन
116
युक्ति पूर्वक रस विरोध परिहार का निर्देश
117
विरोध परिहार के तीन प्रकारों की व्याख्या
118
दो रसों के परस्पर समावेश के अन्य प्रकार
119
रसों के अङ्गाङ्गी भाव के द्वारा विरोध-परिहार
120
एकाश्रय के विभिन्नाश्रय में करदेने पर विरोध परिहार
121
नैरन्तर्य में रसान्तर व्यवधान का निर्देश
122
इस विषय में नागानन्द का उदाहरण
123
शान्त रस विषयक प्रश्नोत्तर
124
एक वाक्य में भी व्यवधान में विरोध निवृत्ति
125
रस विरोध की दृष्टि से शृङ्गार रस में विशेष सावधानता की आवश्यकता
126
अन्य रसों में शृङ्गार का समावेश
127
काव्य का जायासमितत्व
128
रस विरोध का उपसंहार
129
रस प्रकरण में वाच्य वाचक पर विचार की आवश्यकता और औचित्य का निर्देश
130
इस प्रसङ्ग में द्विविध वृत्तियों का निरूपण
131
इतिवृत्त और रस का सम्बन्ध
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१३२.
रसप्रतीति में क्रमकल्पना पर विचार
१३३.
रसप्रतीति में क्रम की संलक्ष्यता
१३४.
व्यञ्जना वृत्ति पर पुनः विचार का उपक्रम
वैय्याकरणों और मीमांसकों की विप्रतिपत्ति (३००) कुमारिल भट्ट के कथन का आशय (३०२) प्राभाकर ध्वनन वादियों का मत (३०२) वैय्याकरणों के स्फोटवाद का आशय (३०२)
१३५.
पूर्वपक्ष की आलोचना और स्वमत स्थापन
१३६.
तात्पर्य वृत्ति से निबर्ह न हो सकने का प्रतिपादन
१३७.
पदार्थ-वाक्यार्थ न्याय तथा प्रदीप-घटन्याय
१३८.
'यत्परः शब्दः स शब्दार्थः' की विशेष मीमांसा
१३९.
लक्षणा और व्यञ्जना का स्वरूप भेद
१४०.
विषय भेद
१४१.
व्यञ्जकत्व का अभिधा और गुणवृत्ति दोनों से भेद
१४२.
लक्षणा और व्यञ्जना के भेद पर पुनः दृष्टिपात
१४३.
व्यञ्जना वृत्ति को सिद्ध करने के लिए अन्य हेतु
१४४.
उक्त विषयों में अनुमान पद्धति पर संक्षिप्त दृष्टिपात
१४५.
विभिन्न दर्शनों में व्यञ्जना वृत्ति के स्वीकार की आवश्यकता
मीमांसकों के मत में व्यञ्जना व्यापार की आवश्यकता (३४५) वैय्याकरणों के मत में व्यञ्जना व्यापार की आवश्यकता (३५४) नैय्यायिकों के मत में व्यञ्जना व्यापार की आवश्यकता (३५५) व्यञ्जना की अनुमान-गतार्थता का निराकरण (३६०)
१४६.
गुणीभूतव्यङ्ग्य
परिचय (३७८) अत्यन्ततिरसकृत वाच्य का गुणीभाव (३७९) वाच्यार्थ के तिरस्कृत न होने पर गुणीभाव (३८२) उक्ति के द्वारा कथन में गुणीभाव (३८२) रस इत्यादि दूसरे तत्वों का गुणीभाव (३८३) विभिन्न तत्वों के गुणीभूत होने के रूप (३८३) गुणीभूतव्यङ्ग्य का महत्व (३८५) वक्रोक्ति और गुणीभूतव्यङ्ग्य के द्वारा अलङ्कार वर्ग में सौन्दर्य का आधान (३९१) वक्रोक्ति और गुणीभूतव्यङ्ग्य (३९५) अतिशयोकित से भिन्न अन्य अलङ्कारों में व्यञ्जना का योग (४००) अलङ्कारों को कृतार्थ करने के गुणीभूतव्यङ्ग्य के तीन प्रकार (४०१) गुणीभूतव्यङ्ग्य की अलङ्कारों में अनिवार्यता (४०६) गुणीभूतव्यङ्ग्य से ही सभी अलङ्कारों की गतार्थता (४०८) गुणीभूतव्यङ्ग्य का लक्षण (४१०) ध्वनिनिष्पन्द का अर्थ (४११)
१४७.
प्रतीयमान अर्थ की महत्ता
१४८.
गुणीभूतव्यङ्ग्य का दूसरा प्रकार-काव्याक्षिप्त गुणीभूतव्यङ्ग्य
Page 15
१४९.
क्या काकु ध्वनि हो सकता है ?
१५०.
काकु व्यञ्जना का दूसरा उदाहरण
१५१.
काकु व्यञ्जना गुणीभाव को कैसे धारण करती है
१५२.
गुणीभूतव्यङ्ग्य के क्षेत्र में ध्वनि संयोजना की चेष्टा का निषेध
१५३.
गुणीभूतव्यङ्गघ का पर्यवसान भी ध्वनि में ही होता है
१५४.
गुणीभूतव्यङ्ग्य को अर्थान्तर संक्रमित वाच्य क्यों नहीं कहते
१५५.
गुणीभूतव्यङ्ग्य का ध्वनि वाच्य विषय
१५६.
प्राधान्याप्राधान्य विवेचन का महत्व 'लावण्यद्रवविणययो न गणित:' की व्याख्या और उसमें व्याजस्तुति की सम्भावना (४३१) इस पद्य में अप्रस्तुतप्रशंसा का समर्थन (४४२) अप्रस्तुतप्रशंसा के विभिन्न रूप (४४८)
१५७.
चित्र काव्य स्वरूप, नामकरण और भेद (४५७) चित्र काव्य और भावपक्ष (४५९) चित्र काव्य के निरूपण की अनिवर्यक्ता (४६२) काव्य में शब्दों की परिवर्तननीयता का आशय (४६३)
१५८.
काव्य में अचेतन वस्तु के समावेश का प्रकार
१५९.
कवि का महत्व
१६०.
ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य के विवेचन का उपसंहार
१६१.
ध्वनि की अनन्वता और उसके भेदोपभेदों का विचार
१६२.
लोचन और काव्यप्रकाश की गणना प्रक्रिया
१६३.
साहित्य दर्पण की गणना प्रक्रिया
१६४.
आलोक में संसृष्टि और सङ्कर का दिग्दर्शन
१६५.
संसृष्टि
१६६.
गुणीभूतव्यङ्ग्य से सङ्कर और संसृष्टि
१६७.
प्रधानता और गुणीभाव पर विचार
१६८.
ध्वनि की गुणीभूतव्यङ्ग्य से संसृष्टि
१६९.
अलङ्कारों से सङ्कर और संसृष्टि विभिन्न प्रकार के सङ्कर और संसृष्टि का साधारण निर्देश (४९१) अन्य भेदों से रसध्वनि के सङ्कर का एक उदाहरण (४९५) वाच्यालङ्कार की ध्वनि से संसृष्टि (५००)
१७०.
संसृष्टि और सङ्कीर्ण भेदों का सङ्कर और संसृष्टि
१७१.
ध्वनिभेदों की अपरिमिति का उपसंहार
१७२.
काव्य के मूल तत्व के रूप में रीतियों का प्रवर्तन और ध्वनि
१७३.
रीतियों का संक्षिप्त परिचय
Page 16
१७४.
वृत्तियाँ ओर ध्वनि
१७५.
वृत्तियों का संक्षिप्त परिचय
१७६.
रीतियों ओर वृत्तियों में ध्वनि के अन्तर्भाव का उपसंहार
१७७.
अशक्य वक्तव्यत्व पक्ष का खण्डन
१७८.
अनिर्वच्य पक्ष का उपसंहार
१७९.
लोचन के समापनश्लोक
चतुर्थ-उद्योत
१८०.
लोचन का मङ्गलाचरण
१८१.
तृतीय उद्योत से सङ्गति तथा ध्वनि निरूपण का प्रयोजनांतर
१८२.
पुरानी उक्ति में ही ध्वनि के द्वारा नवीनता का सञ्चार
१८३.
अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य के कारण नवीनता का उदाहरण
१८४.
अर्थान्तर सङ्क्रमितवाच्य के कारण नवीनता का उदाहरण
१८५.
विवक्षितान्यपरवाच्य से नवीनता का उदाहरण
१८६.
ध्वनिमार्ग से काव्य की अनन्तता का प्रतिपादन
१८७.
रस परिग्रह से पुराने अर्थों में नवीनता का शब्दशक्त्युद्भव
१८८.
अनुरणन रूप ध्वनि के भेदों से काव्य में नवीनता लाने का उदाहरण
१८९.
अर्थशक्तिमूलक ध्वनि से नवीनता के उदाहरण
१९०.
रसध्वनि की प्रहाणता
१९१.
रामायण तथा महाभारत में अंगीरस का विवेचन
१९२.
उक्त विषय में निष्कर्ष
१९३.
अंगी रस के विवेचन की आवश्यकता
१९४.
रचना के रसप्रवण होने पर अलङ्कार के अभाव में भी काव्य उपादेय हो जाता है, इस बात का उदाहरण
१९५.
अक्षुण्ण वस्तु से रस की पुष्टि
१९६.
गुणीभूतव्यङ्ग्य में प्रतिभा की अनन्तता और नवीनता
१९७.
प्रस्तुत प्रकरण का उपसंहार
१९८.
प्रतिभा के गुण से काव्य में अनन्तता
१९९.
वाच्यार्थ की अपेक्षा भी काव्य में नवीनता
२००.
अवस्था भेद इत्यादि का विवेचन
२०१.
उक्त विषय में प्रश्न
२०२.
प्रत्येक दार्शनिक की दृष्टि में शब्द का विशिष्ट अर्थ ही मानना पड़ेगा
२०३.
काव्य की अनन्तता में उक्ति वैचित्र्य का योग
२०४.
काव्य की अनन्तता का उपसंहार
Page 17
२०५
काव्यों में कवियों के भाव मिल जाने का हेतु
५९७
२०६
दो कवियों के भावों में मेल के प्रकार
५९७
२०७
प्रकारों की उपादेयता पर विचार
६०१
२०८
पूर्वस्थिति का अनुकायी भी काव्य आत्मतत्व के भिन्न होने पर सदोष नहीं माना जा सकता
६०३
२०९
वस्तु योजना के मेल में तो दोष होता ही नहीं
६०५
२१०
प्रस्तुत प्रकरण का उपसंहार
६०८
२११
कवियों को निडर होकर कविता करने का उपदेश
६१०
२१२
उपसंहारात्मक कारिकाओं में ग्रंथ के विषय इत्यादि का उल्लेख
६१२
२१३
आनन्दवर्धन नाम पर विशेष प्रकाश
६१५
२१४
लोचन के उपसंहारात्मक पद्य
६१६
२१५
अन्त में मंगलाचरण
६१७
२१६
लोचन की विशेषता
६१७
२१७
अपनी गुरु परम्परा का निर्देश
६१८
२१८
सज्जन प्रशंसा तथा दुर्जन निंदा
६१८
२१९
शिवपर विश्वास और सब कुछ शिवमय होने की प्रशंसा
६१८
Page 18
३
तृतीय उद्योतः
ध्वन्यालोकः
एवं शब्दान्तरमुखेन ध्वने: प्रदर्शिते सुप्रसिद्धे स्वरूपे तद्व्यंग्यार्थकसाम्यमुखेन तत्कारियते—
३
तृतीय उद्योतः
१
अविवक्षितवाच्यस्य तदन्यस्यातुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य व ध्वने:
(अनु०) इस प्रकार व्यञ्जक-मुख से भेदोपभेदों सहित ध्वनि के स्वरूप को दिखला दिये जाने पर अब व्यञ्जक-मुख से यह दिखला रहे हैं :— 'अविवक्षितवाच्य के ध्वनि का प्रकाशन पद और वाक्य से होता है उससे भिन्न अनुरणन-रूप व्यङ्ग्य ध्वनि का प्रकाशन भी पद और वाक्य से ही होता है' ॥ १ ॥
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तृतीय उद्योतः
लोचनम्
स्मरामि स्मरसंहारलीलापाटवशालिनम् । प्रसह्य शम्भोर्देहार्ध हरन्तीं परमेश्वर्रीम् ॥
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तृतीय उद्योतः
उद्योतान्तरसङ्घति कतुं माह वृत्तिकार:—एवमित्यादि । तत्र वाच्यमुखेन तावदविवक्षितवाच्यादयो भेदा:; वाच्यैरच यद्यपि व्यञ्जक एव । यथोक्तम्—'यत्रार्थ: शब्दो वे'ति । तत्र च व्यञ्जककमुखेनापि भेद उक्त:, तथापि स वाच्योऽर्थो व्यङ्ग्यमुखेनैव भिद्यते । तथा ह्यविवक्षितो वाच्यो व्यङ्ग्येन न्यग्भावित:, विवक्षितान्यपर वाच्य इति व्यङ्ग्यार्थप्रवण एवोच्यते । इत्येवं मूलभेदयोरेव यथास्वमवान्तर्भेदसहितयोरव्यञ्जक-रूपो योड्य: सु व्यङ्ग्यमुखप्रेक्षिताशरणतयैव भेदमात्रादर्शति । अत एव—व्यङ्ग्य-मुखेनैति । किन्तु यदप्यर्थो व्यञ्जकस्थापि व्यङ्ग्यतायोग्योऽपि भवतीति, शब्दस्तु न कदाचिदपि व्यङ्ग्य: अपि तु व्यञ्जक एवेति । तदाह—'व्यञ्जककमुखेनैति । न च वाच्यस्याविवक्षितादिरूपेण यो भेदस्तत्र सर्वथैव व्यञ्जकत्वं नास्तीति पुन: शब्देनाह । व्यञ्जककमुखेनापि भेद: सर्वथैव न न प्रकाशित: किन्तु प्रकाशतोऽप्यधुना पुन: व्यञ्जक-मुखेन । तथाहि व्यञ्जयमुप्रेक्षितया विना पदं वाक्यं वर्णा: पदभाग: सन्ध्युट्टना महा-वाक्यमिति स्वरूपत एव व्यञ्जकानां भेद:, न चैषामर्थवत्त्वकदाचिदपि व्यङ्ग्यता सम्भवतीति व्यञ्जकैकनयतां स्वरूपं यत्तन्मुखेन भेद: प्रकाश्यते इति तात्पर्यम् ।
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तृतीय उद्योतः
यस्तु व्याचष्टे—'व्यञ्जनानां वस्त्वलङ्काररसानां मुखेन इति' स एवं प्रष्टव्य:— एतत्तावत्त्विभेदत्वं न कारकाकारण कृतम् । वृत्तिकारण तु दर्शितम् । न चदानों वृत्तिकारो भेदप्रकटनं करोति । ततश्चेदं कृतमिदं क्रियत इति कर्तृ भेदे का सङ्घति ? न चैतावता सकलप्राक्तनग्रन्थसङ्घति: कृता भवति । अविवक्षितवाच्यादीनामपि प्रकाराणां दर्शितत्वादित्यलं निजपूज्यजनस गोत्रै: साकं विवादेन ।
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(लो० अनु०) 'कामदेव के संहार की लीला की चतुरता से शोभित होनेवाले शंकर की आधे देह को बलात् हरनेवाली परमेश्वरी को मैं स्मरण करता हूँ । दूसरे उद्योत की सङ्घत्ति करने के लिये वृत्तिकार कहते हैं—‘इस प्रकार’ इत्यादि । उसमें वाच्यमुख से तो अविवक्षितवाच्य इत्यादि भेद (होते हैं) और वाच्य यद्यपि व्यङ्ग्यक ही होता है । जैसा कहा गया है—‘जहाँ अर्थ अथवा शब्द’ इत्यादि । इससे व्यङ्गक-मुख से भी भेद कह दिया गया । तथापि वह वाच्य अर्थ व्यङ्गक-मुख के द्वारा भेद को प्राप्त होता है । वह इस प्रकार—अविवक्षितवाच्य व्यङ्ग्यक के द्वारा नीचा कर दिया जाता है । विवक्षितान्य-परवाच्य यह व्यङ्ग्यार्थ-प्रकाशन ही कहा जाता है । इस प्रकार अपनी सत्ता के अनुसार अवान्तर भेद सहित मूल भेदों का ही व्यङ्गकरूप जो अर्थ वह व्यङ्ग्यमुखप्रेक्षणरूप अशरणता से ही भेद को प्राप्त कर लेता है । अत एव कहते हैं—‘व्यङ्ग्यमुख के द्वारा’ यह । और भी यद्यपि अर्थ व्यङ्ग्यक ( होता है) तथापि वह व्यङ्ग्यकता के योग्य भी होता है, अतः शब्द तो कभी व्यङ्ग्य नहीं होता अपितु अर्थ ही व्यङ्ग्यक होता है । वह कहते हैं—‘व्यङ्गक-मुख से’ । पुनः शब्द से यह कहते हैं कि वाच्य के अविवक्षितवाच्य इत्यादि रूपोंमें जो भेद वहाँ सर्वथा व्यङ्ग्यकस्व नहीं होता यह बात नहीं हैं । व्यङ्गक-मुख से भी भेद सर्वथा प्रकाशित नहीं किया यह बात नहीं । किन्तु प्रकाशित भी इस समय शुद्ध व्यङ्ग्यक-मुखसे (प्रकाशित किया जा रहा है । ) वह इस प्रकार व्यङ्ग्यमुख-प्रेक्षण के बिना पद, वाक्य, वर्ण, पदभाग सङ्घटना महावाक्य के स्वरूप से ही व्यङ्ग्यकों के भेद हैं । इनकी अर्थ के समान व्यङ्ग्यता कभी सम्भव नहीं है । इस प्रकार एकमात्र व्यङ्ग्यक में नियत जो स्वरूप है उसके दृष्टिकोण से भेद प्रकाशित किया जा रहा है, यह तात्पर्य है ।
जिसने तो व्याख्या को—‘व्यङ्ग्य अर्थात् वस्तु, अलङ्कार और रस के मुख से’ उसे यह पूछा जाना चाहिये—ये तीन भेद कारिकाकार ने नहीं किये, वृत्तिकार ने तो दिखला दिये । इस समय वृत्तिकार भेदों का प्रकटन नहीं कर रहे हैं । अतः ‘यह किया’ ‘यह कर रहे हैं’ यह कर्ता के भेद में कैसे संगत होता है । यह नहीं कहा जा सकता कि इतने से सभी पुराने ग्रन्थ्यों की संगति की हुई हो जाती है । क्योंकि अविवक्षितवाच्य इत्यादि प्रभेदों को भी दिखलाया जा चुका है । बस अपने पूज्यजनों के सगोत्रों से विवाद करने की आवश्यकता नहीं ।
तारावती तृतीय उद्योत के प्रारम्भ में लोचनकार ने पुनः मङ्झलाचरण किया है । यह भी ग्रन्थ का मध्यगत मङ्झलाचरण ही है और बार-बार किया हुआ मङ्झलाचरण विशेष रूप से मङ्झल-प्रवण होता है । यहां पर लोचनकार ने अपने सम्प्रदाय के अनुसार भगवती पार्वती का स्मरण किया है । लोचनकार कह रहे हैं—‘भगवान् शंकरजी बड़े ही निपुण हैं । उन्होंने खेल-खेल में ही कामदेव के संहार की लीला दिखला दी । उन अत्यन्त समर्थ तथा निपुण भगवान् शंकर के आधे शरीर को भगवती पार्वती ने बलात् हर लिया और भगवान् शंकर कुछ कर भी न सके । इस प्रकार भगवती पार्वती भगवान् शंकर की अपेक्षा कहीं अधिक निपुण तथा समर्थ है । इसीलिये वे परम ईश्वरी हैं । उन भगवती पार्वती के ऐश्वर्य का क्या
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तृतीय उद्योत:
कहना जिन्होंने योगेश्वर भगवान् शंकर के हृदय में भी सरसता का सम्पादन कर दिया । मैं इस तृतीय उद्योत के प्रारम्भ में उन परम ईश्वरी भगवती पार्वती जी का स्मरण करता हूँ । यहाँ पर कविप्रतिभा की झोर भी संकेत किया गया है जो कि नीरस से नीरस हृदय में भी सरसता का सम्पादन कर देती है ।
द्वितीय उद्योत में व्यञ्जक के रूप में ध्वनि के स्वरूप का भी निरूपण किया जा चुका और उसके भेद भी दिखलाये जा चुके । अब पुनः व्यञ्जक के रूपमें स्वरूप और भेद दिखलाये जा रहे हैं । ( प्रश्न ) द्वितीय उद्योत में व्यञ्जक्य के भेदों के साथ वाच्य के भी अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य नामक दो भेद दिखलाये थे । यह भी प्रथम उद्योत में ही बतलाया जा चुका है कि वाच्यार्थ व्यञ्जक होते हैं । जैसा कि प्रथम उद्योत की 'यत्रार्थ: शब्दो वा' इस कारिका से स्पष्ट है । अतएव वाच्य के भेद करने के साथ हो व्यञ्जक के भी भेद हो गये । फिर यह कथन किस प्रकार सङ्गत हो सकता है कि द्वितीय उद्योत में व्यञ्जक्य के भेद दिखलाये गये थे और इस तृतीय उद्योत में व्यञ्जक्य के भेद दिखलाये जावेंगे ? (उत्तर) पहली बात तो यह है कि अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य ये दोनों वाच्यार्थ के भेद नहीं हैं किन्तु व्यञ्जक्य के ही भेद हैं—एक व्यञ्जक्य ऐसा होता है जिसमें वाच्यार्थ की विवक्षा होती है और दूसरा व्यञ्जक्य वह होता है जिसमें वाच्यार्थ की विवक्षा नहीं होती । इस प्रकार ये व्यञ्जक्य के ही भेद हैं वाच्यार्थ के नहीं । अविवक्षितवाच्य शब्द का अर्थ है—जिसमें वाच्य को अविवक्षित कर दिया जावे अर्थात् व्यञ्जक्य के द्वारा नीचा कर दिया जावे । इसी प्रकार विवक्षितान्यपरवाच्य शब्द का अर्थ है जिसमें वाच्य की विवक्षा अन्यपरक रूपमें हो अर्थात् वाच्यार्थ व्यञ्जक चपरक हो । इस प्रकार अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य ये दोनों भेद व्यञ्जक्य के ही हैं । यह और बात है कि अपने विस्तार के अनुसार व्यञ्जक्य के मूलभेद और अवान्तर भेदों के दिखलाने के प्रसंग में व्यञ्जक्यरूप वाच्यार्थ के भी भेद हो जाते हैं । किन्तु ये भेद सर्वथा व्यङ्ग्यार्थ के ही मुख्यापेक्षी हैं और स्वतः नहीं किन्तु व्यञ्जक्य के अधीन होकर ही इन्हें भेदरूपता को प्राप्त कर लेना पड़ता है । मानो इस क्रिया में अपने भेदोपभेद कराने के लिये वाच्यार्थ को पराधीन हो जाना पड़ता है । दूसरी बात यह है कि व्यञ्जक्य एक तो अर्थ होता है और दूसरा शब्द । अर्थ में व्यङ्ग्य हो सकने की भी योग्यता होती है । आशय यह है कि अर्थ केवल वाच्यार्थ के रूप में ही व्यञ्जक होता हो ऐसी बात नहीं है किन्तु व्यङ्ग्य अर्थ भी दूसरे व्यङ्ग्य अर्थ का व्यञ्जक होता है । एक ही अर्थ एक स्थान पर वाच्य होता है और दूसरे स्थान पर व्यङ्ग्य हो जाता है । इस प्रकार अर्थ में व्यङ्ग्य होने की क्षमता होती है शब्द में नहीं । शब्द कभी भी व्यङ्ग्य नहीं होता अपितु व्यञ्जक ही होता है । इसीलिये वृत्तिकार ने कहा है कि व्यङ्ग्य-मुख से भेद दिखलाये जा चुके अब व्यञ्जक-मुख से भेद दिखलाये जा रहे हैं । इस अवतरण का आशय यह है कि जिसमें व्यङ्ग्य हो सकने की क्षमता होती है उसके भेद द्वितीय उद्योत में दिखलाये जा चुके , अब उसके भेद दिखलाये जा रहे हैं जो केवल व्यञ्जक ही होता है व्यङ्ग्य कभी नहीं हो सकता । आशय यह है कि यह बात नहीं है कि द्वितीय उद्योत में व्यञ्जक्य के रूप में ध्वनि के भेद किये ही नहीं गये थे । यद्यपि वाच्यात्मक व्यञ्जक के भी भेद किये जा चुके हैं किन्तु अब शुद्ध व्यञ्जक के
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ही भेद किये जा रहे हैं। पद, वाक्य, वर्ण, पद भाग, सटु्टना और महावाक्य ये स्वरूप से से ही व्यंजक होते हैं। अर्थ के समान ये कभी व्यंजक और कभी व्यंग्य नहीं होते। अतएव यहाँ पर यही तात्पर्य है कि जो स्वरूप केवल व्यंजक के रूप में ही नियत है; उसको दृष्टिगत रखते हुए ध्वनि के भेदोपभेदों का निरूपण किया जा रहा है।
कतिपय विद्वानों ने 'व्यंग्य के रूप में ध्वनि के भेद दिखलाये जा चुके हैं' इस वाक्य का यह अर्थ किया है कि व्यंग्य अर्थात् वस्तु अलंकार और रस रूप में ध्वनि के भेद दिखलाये जा चुके हैं। किन्तु अलंकार और रस के रूप में भेद वस्तुतः आनन्दवर्धन ने दिखलाये हैं कारिकाकार ( ध्वनिकार ) ने ये भेद नहीं किये। अतएव कारिका के लिये इस अवतरण की संगति किसी प्रकार भी नहीं हो सकती। क्योंकि कारिका का कर्ता दूसरा है और भेदों का कर्ता दूसरा। कतु भेद होने पर 'हम यह कर चुके और अब हमें यह करना है' इस ग्रन्थ की संगति नहीं हो सकती। यहाँ भी नहीं कहा जा सकता कि सभी पुराने ग्रन्थों की संगति के लिये यह अवतरण दिया गया है क्योंकि दूसरे उद्योत में वस्तु इत्यादि भेदों के अतिरिक्त अविवक्षितवाच्य इत्यादि भेद भी दिखलाये गये हैं। मैं समझता हूँ कि ग्रन्थ की संगति के लिये इतना कहना पर्याप्त है। अपने पूजनीय व्यक्तियों के समक्ष उच्च आालोचना करना ठीक नहीं। ( सम्भवतः अभिनव गुप्त के गुरुजनों में किसी ने अथवा तत्समकक्ष किसी आचार्य ने ग्रन्थ की इस प्रकार संगति लगाई होगी। इसलिये अभिनवगुस ने उनके लिये 'निजपूज्यजनस गोत्रे:' यह विशेषण दिया। यहाँ पर लोचनकार का कहना यही है कि द्वितीय उद्योत में अर्थ के रूप में ध्वनि के भेद दिखलाये गये थे जो कि कभी व्यंग्य भी हो सकता है। किन्तु इस उद्योत में वर्ण इत्यादि के रूप में भेद दिखलाये जा रहे हैं जो केवल व्यंजक ही होते हैं ( व्यंग्य कभी नहीं होते )।
(ध्वन्यालोके)—अविवक्षितवाच्यस्यात्यन्ततिरसकृतवाच्यस्य च प्रभेदे प्रवक्ष्यमाणता यथा महर्षेर्व्यासस्य—'सप्तैताः समिधः श्रियः', यथा वा कालिदासस्य—'कः सन्नद्धे विरतमविधुरां नाक्रुतीनां मधुराणां' एतेषूदाहरणेषु 'समिध' इति 'सन्नद्ध' इति 'मधुराणा' मिति च पदवाक्तिव्यञ्जकत्वाभिप्रायेणैव कृतानि।
(अनु०)—अविवक्षितवाच्य के उपभेद अत्यन्ततिरसकृतवाच्य के पद के द्वारा प्रकाशित होने के उदाहरण जैसे भगवान् व्यास का—'यह सम्पत्ति की सात समिधायें होती हैं।' अथवा कालिदास का—'तुम्हारे (मेघ के) सन्नद्ध होने पर विरह-विघ्नुर प्रियतमा की कौन उपेक्षा कर सकता है ?' अथवा 'मधुर आकृतियों के लिये क्या आभूषण नहीं होता ?' इन उदाहरणों में 'समिध' शब्द 'सन्नद्ध' शब्द और 'मधुर' यह शब्द व्यञ्जना कत्न्व के अभिप्राय से ही प्रयुक्त किये गये हैं।
(लो०)—चकारः कारिकायां यथासंख्यशङ्कानिवृत्यर्थः। तेन विवक्षितवाच्यो द्विप्रभेदोऽपि प्रत्येकं पदवाक्यप्रकाश इति द्विधा। तदन्यस्य विवक्षिताभिधेयस्य सम्बन्धी यो भेदः क्रमद्योत्यो नाम स्वभेदसहितः सोऽपि प्रत्येकं द्विधैव। अनुरणनेन रूपं रूपण-
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तृतीय उद्योतः
सादृश्यं तस्य तादृग्यदृचं यत्न्रयेत्यर्थः। महर्षेरित्यनेन तदनुरन्धत्ते यत्न्रागुक्कम्, अथ च रामायणमहाभारतप्रभृतिषु लक्ष्ये दृश्यते इति।
कारिका में ‘च’ यथासंख्य की शद्धा की निवृत्ति के लिये है। इससे दो प्रकार का भी अविवक्षितवाच्य प्रत्येक पद और वाक्य द्वारा प्रकाशित (होकर) दो प्रकार का (होता है)। उससे भिन्न विवक्षिताभिधेय सम्बन्धी जो भेद क्रमद्योत्थ नामवाला अपने प्रभेद के सहित, वह भी दो प्रकार का होता है।
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तृतीय उद्योतः
धृति: क्षमा दया शौचं कारुण्यं वागनिष्ठुर। मित्राणां चानभिद्रोह: सम्पत्ति: समिध: श्रिय:॥
कहा है कि रामायण महाभारत प्रभृति लक्ष्ये में देखा जाता है, यह। 'धृति क्षमा, दया, शौच, कारुण्य, अनिष्ठुरवाणी और मित्रों से द्रोह न करना ये सम्पत्ति की ७ समिधायें हैं।'
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तृतीय उद्योतः
समिच्छब्दस्यात्र सर्वथा तिरस्कार: असम्भवात्। समिच्छब्देन च व्यङ्ग्योऽर्थोऽन्यानपेक्षलक्ष्यमुद्घोपनक्षमत्वं सम्पन्नां वक्त्रभिप्रेतं ध्वनितम्। यद्यपि ‘निःश्वासान्ध इवादर्श:’ इत्याद्युदाहरणादप्ययमर्थो लभ्यते तथापि प्रसङ्गादबहुलक्ष्यव्यापित्वं दर्शयितुमुदाहरणान्तराण्युक्तानि। अत्र च वाच्यस्यात्यन्ततिरस्कार: पूर्वोक्तमनुसरति युक्त:।
यहां ‘समिध’ शब्द के अर्थ का सर्वथा त्याग हो जाता है क्योंकि असम्भव है। समिध् शब्द के द्वारा व्यंग्यार्थ (निकलता है) अन्य की बिना अपेक्षा किये हुये सातों की लक्ष्मी के उद्दीपन की क्षमता जो वक्ता को अभिप्रेत है ध्वनित की गई है।
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तृतीय उद्योतः
अत्र च वाच्यस्यात्यन्ततिरस्कार: पूर्वोक्तमनुसरति युक्त:। पुनरुक्ते: किं योजनीय: किं पुनरुक्तेन। सन्नद्धपदेन चात्रासंभवत्वार्थेनोद्यतत्वं लक्ष्यते वक्त्रभिप्रेता निष्करणत्वाप्रतिकार्यत्वापेक्षापूर्वककारित्वादयो ध्वन्यन्ते। तथैव मधुर-शब्देन सर्वविषयरंजकत्वतर्पकत्वादिकं लक्ष्यते सातिशयाभिलाषविषयत्वं नात्राश्चर्यंयमिति वक्त्रभिप्रेतो ध्वन्यते।
यहां पर वाच्य का अत्यन्त तिरस्कार पूर्वोक्त का अनुसरण करके यojit कर लिया जाना चाहिये पुनरुक्त की क्या आवश्यकता ? यहां पर असम्भव स्वार्थवाले और उद्यतत्व को लक्षित करानेवाले सन्नद्ध पद से वक्ता के अभिप्रेत निष्करणत्व अप्रतिकार्यस्व और अपेक्षापूर्वककारित्व इत्यादि ध्वनित किये जाते हैं।
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तृतीय उद्योतः
उसी प्रकार सर्वविषयरंजकत्व तर्पकत्व इत्यादि को लक्षित करानेवाले मधुर शब्द से वक्ता का अभिमत अतिशयतापूर्णं अभिलाषविषयत्व इस विषय में आश्चर्यजनक नहीं हैं यह ध्वनित करता है।
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तृतीय उद्योतः
तारावती—कारिका का आशय यह है—‘अविवक्षितवाच्य नामक ध्वनि पद और वाक्य से प्रकाशित होती है और उससे भिन्न अनुरणनरूप व्यङ्गचच्वनि भी पद और वाक्य से
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६ ध्वन्यालोके प्रकाशित होती है।' इस कारिका में 'च' 'और' शब्द का प्रयोग यथासंख्य की शड्खला की निवृत्ति के लिये किया गया है। आशय यह है कि यहाँ पर 'और' शब्द का प्रयोग इसलिये किया गया है जिससे यह ज्ञात हो सके कि अविवक्षितवाच्य और अनुरणनरूप व्यंजक दोनों प्रकार की ध्वनियों के व्यंजक पद और वाक्य दोनों होते हैं। यदि यह कहा जाता है कि अविवक्षितवाच्य और अनुरणनरूप व्यंजक ध्वनि पद और वाक्य के द्वारा प्रकाशित होती है, तो कथनभेद उसका आशय यह हो जाता है कि अविवक्षितवाच्य ध्वनि पद के द्वारा प्रकाशित होती है और अनुरणनरूप व्यंजकध्वनि वाक्य के द्वारा प्रकाशित होती है। इस प्रकार अविवक्षितवाच्य के दोनों भेदों में प्रत्येक के दो भाग होते हैं पदप्रकाश्य और वाक्यप्रकाश्य। उससे भिन्न अर्थात् विवक्षितवाच्य से सम्बन्ध रखनेवाला जो भेद है जो कि क्रमवाच्य कहलाता है अपने भेदों के सहित उसके भी (प्रत्येक के) दो भेद होते हैं। उसे अनुरणनरूप कहते हैं। अनुरणनरूप शब्द का अर्थ है अनुरणन से जिसके रूपण या स्वरूप की समानता है। अर्थात् जिस प्रकार पहले घण्टानाद सुनाई पड़ता है और बाद में प्रतिध्वनि, इसी प्रकार जिसमें पहले वाच्यार्थ की प्रतीति होती है और बाद में प्रतिध्वनि के समान व्यंग्यार्थ प्रतीत होता है। अविवक्षितवाच्य का पहला भेद है अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य। उसके दो भेद बतलाये गये हैं पदप्रकाश्य और वाक्यप्रकाश्य। अविवक्षितवाच्य के उपभेद अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य की पदप्रकाश्यता का उदाहरण जैसे महर्षि व्यास का श्लोक—यहाँ पर महर्षि शब्द से उसी का अनुसन्धान किया जाता है जो कि पहले कहा गया था कि रामायण महाभारत प्रभृति लक्ष्यों में इसकी सत्ता पाई जाती है। व्यास के श्लोक का अर्थ यह है—
'धैर्यं, क्षमा, दया, शौच, कारुण्य, अनिष्ठुर वाणी और मित्रों से द्रोह न करना ये सम्पत्ति की सात समिधायें हैं।'
समिधा शब्द के अर्थ का यहाँ पर सर्वथा परित्याग हो जाता है क्योंकि समिधायें आग की होती हैं लक्ष्मी की समिधाओं का होना असम्भव है। अतएव 'समिधा' शब्द के अर्थ का बाघ हो जाता है और उससे लक्ष्यार्थ निकलता है 'बढ़ानेवाली।' लक्षणा का प्रयोजन यह प्रकट करना है कि 'ये सातों गुण लक्ष्मी को स्वतः बढ़ाते हैं, इन्हें इस कार्य के लिये किसी बाह्य सहायता की अपेक्षा नहीं होती।' (समिधायें अग्नि को स्वतः बढ़ाती हैं—उनहें किसी अन्य पदार्थ की अपेक्षा नहीं होती।) यही ध्वनि है। यद्यपि 'निःश्वासान्ध इवादर्शः' इत्यादि उदाहरण से भी इस अर्थ की उपलब्धि हो जाती है। अर्थात् यह उदाहरण भी अविवक्षितवाच्य के उपभेद अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य की पद-प्रकाश्यता का हो सकता है। तथापि दूसरा उदाहरण प्रसंगानुकूल यह सिद्ध करने के लिये दिया गया है कि 'अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य के एक नहीं अनेक उदाहरण हो सकते हैं। यह तथा दूसरे उपभेद अनेक लक्ष्यों में व्याप्त हैं।'
यहाँ पर वाच्य का अत्यन्त तिरस्कार किस प्रकार होता है। इसकी योजना पहले के समान कर लेनी चाहिये। बार-बार एक ही बात के पिष्टपेषण की क्या आवश्यकता? (यहाँ पर यद्यपि उपमा भी अभिव्यक्त होती है—'जिस प्रकार शुष्क इन्धन अग्नि को प्रदीप्त करता है उसी प्रकार धृति इत्यादि गुण लक्ष्मी को प्रदीप्त करते हैं।' तथापि पहले यहाँ पर सारोपा लक्षण
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तृतीय उद्योतः
ही होती है और समिध् शब्द के लक्ष्मी के साथ बाधित होने के कारण उससे लक्ष्यार्थ निकलता है ‘बढ़ानेवाले’ और उससे व्यंग्यार्थ निकलता है कि घृति इत्यादि गुण लक्ष्मी को इतना अधिक बढ़ाते हैं जितना कोई और वस्तु नहीं बढ़ाती। इस प्रकार यह उदाहरण अत्यन्ततिरसकृतवाच्य ध्वनि का ही है। उपमादि ध्वनि का नहीं। यहाँ पर इन्धन अर्थ की सर्वथा अविवक्षा भी स्पष्ट है और कार्यार्थप्रतीति के लिये केवल समिध् शब्द का पर्याप्त होना भी स्पष्ट ही है। अतः यह पदगत अत्यन्ततिरसकृतवाच्य अविवक्षितवाच्य ध्वनि है।
ही होती है और समिध् शब्द के लक्ष्मी के साथ बाधित होने के कारण उससे लक्ष्यार्थ निकलता है ‘बढ़ानेवाले’ और उससे व्यंग्यार्थ निकलता है कि घृति इत्यादि गुण लक्ष्मी को इतना अधिक बढ़ाते हैं जितना कोई और वस्तु नहीं बढ़ाती। इस प्रकार यह उदाहरण अत्यन्ततिरसकृतवाच्य ध्वनि का ही है। उपमादि ध्वनि का नहीं। यहाँ पर इन्धन अर्थ की सर्वथा अविवक्षा भी स्पष्ट है और कार्यार्थप्रतीति के लिये केवल समिध् शब्द का पर्याप्त होना भी स्पष्ट ही है। अतः यह पदगत अत्यन्ततिरसकृतवाच्य अविवक्षितवाच्य ध्वनि है।
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तृतीय उद्योतः
इसी का दूसरा उदाहरण जैसे कालिदास के मेघदूत में यक्ष मेघ से कह रहा है— ‘जब तुम पवनपदवी पर आरूढ़ होकर आगे बढ़ोगे तब परदेशियों की वे ललनायें, जो कि स्नान ( ऋतुस्नान ) कर अपने केशों को सुखा रही होंगी, विश्वास के कारण अपने प्रियतमों के लौटने की आशंसाकरोती हुई तुम्हारी ओर सतृष्ण दृष्टि से देखेंगी। क्योंकि जब तुम सन्नद्ध हो रहे हो तब अपनी वियोग-विधुर प्रियतमा की कौन उपेक्षा कर सकता है ? यदि वह मेरे ही समान पराधीन वृत्तिवाला न हो ।’ यहाँ पर सन्नद्ध शब्द को लोजिये यह शब्द समुपासग नञ् से कृत प्रत्यय होकर बना है। ‘न सन्नद्धः’ का अर्थ होता है ‘कवच पोहनना’। इसीलिये अमरकोष में लिखा है ‘सन्नद्धो वीर्यवान् सज्जो दंस्यितः’ मेघ का कवच पहिन सकना स्वार्थ में बाधित है। अतः उसका लक्ष्यार्थ निकलता है ‘उद्यत होना’। इससे प्रयोजन के रूप में व्यंग्यार्थ निकलता है कि ‘जब तुम वियोगियों पर प्रहार करते हो तब तुम्हारे अन्दर करुणा बिल्कुल ही नहीं रहती, न साधारण व्यक्ति की इतनी शक्ति होती है कि वह तुम्हारा प्रतीकार कर सके और न तुम सूझबूझ के साथ प्रहार करते हो ।’ ( जो व्यक्ति वियोगियों पर प्रहार करने के लिये कवच धारण कर सिपाही बनकर आता है उसमें सिपाहियों की विशेषतायें होनी ही चाहिये। इसीलिये निष्कारणत्व इत्यादि की व्यञ्जना यहाँ पर होती है। ) यही कहना वक्ता को अभीष्ट है और इसी अर्थ के प्रयत्न के लिये वक्ता ने बाधित शब्द सन्नद्ध का प्रयोग किया है। यहाँ पर कवच धारण करने के अर्थ का सर्वथा परित्याग हो जाता है। अतएव यहाँ पर शब्दव्यंग्य अत्यन्ततिरसकृतवाच्य ध्वनि है।
इसी का दूसरा उदाहरण जैसे कालिदास के मेघदूत में यक्ष मेघ से कह रहा है— ‘जब तुम पवनपदवी पर आरूढ़ होकर आगे बढ़ोगे तब परदेशियों की वे ललनायें, जो कि स्नान ( ऋतुस्नान ) कर अपने केशों को सुखा रही होंगी, विश्वास के कारण अपने प्रियतमों के लौटने की आशंसाकरोती हुई तुम्हारी ओर सतृष्ण दृष्टि से देखेंगी। क्योंकि जब तुम सन्नद्ध हो रहे हो तब अपनी वियोग-विधुर प्रियतमा की कौन उपेक्षा कर सकता है ? यदि वह मेरे ही समान पराधीन वृत्तिवाला न हो ।’ यहाँ पर सन्नद्ध शब्द को लोजिये यह शब्द समुपासग नञ् से कृत प्रत्यय होकर बना है। ‘न सन्नद्धः’ का अर्थ होता है ‘कवच पोहनना’। इसीलिये अमरकोष में लिखा है ‘सन्नद्धो वीर्यवान् सज्जो दंस्यितः’ मेघ का कवच पहिन सकना स्वार्थ में बाधित है। अतः उसका लक्ष्यार्थ निकलता है ‘उद्यत होना’। इससे प्रयोजन के रूप में व्यंग्यार्थ निकलता है कि ‘जब तुम वियोगियों पर प्रहार करते हो तब तुम्हारे अन्दर करुणा बिल्कुल ही नहीं रहती, न साधारण व्यक्ति की इतनी शक्ति होती है कि वह तुम्हारा प्रतीकार कर सके और न तुम सूझबूझ के साथ प्रहार करते हो ।’ ( जो व्यक्ति वियोगियों पर प्रहार करने के लिये कवच धारण कर सिपाही बनकर आता है उसमें सिपाहियों की विशेषतायें होनी ही चाहिये। इसीलिये निष्कारणत्व इत्यादि की व्यञ्जना यहाँ पर होती है। ) यही कहना वक्ता को अभीष्ट है और इसी अर्थ के प्रयत्न के लिये वक्ता ने बाधित शब्द सन्नद्ध का प्रयोग किया है। यहाँ पर कवच धारण करने के अर्थ का सर्वथा परित्याग हो जाता है। अतएव यहाँ पर शब्दव्यंग्य अत्यन्ततिरसकृतवाच्य ध्वनि है।
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तृतीय उद्योतः
तीसरा उदाहरण जैसे कालिदास ने ही अभिज्ञान शाकुन्तल में दुष्यन्त के द्वारा शकुन्तला का वर्णन कराते हुए लिखा है—‘सिवार में फँसा हुआ भी कमल अत्यन्त रमणीय होता है; चन्द्रमाका मलिन भी चित्त शोभा को ही बढ़ाता है, यह कुरूप वल्कल से भी अधिक मनोज्ञ मालूम पड़ रही है। यहाँ आकृति को मधुर कहा गया है। मधुर एक रस होता है, जो गुड़, शक्कर, शहद इत्यादि में तो सम्भव है पर आकृति मधुर नहीं हो सकती। अतः यह शब्द बाधित होकर सभी को अनुरञ्जित करना, तुष्ट करना इत्यादि धर्म को लक्षित कराता है। उसीसे व्यंग्यार्थ निकलता है कि शकुन्तला का रूप यदि बहुत बड़ी-चढ़ी अभिलाषा का विषय बन जावे तो इसमें आश्चर्य की बात कुछ नहीं है। यही ध्वनि है। यह ध्वनि ‘मधुर’ इस पद से निकलती है, अतः पदगत अत्यन्ततिरसकृतवाच्य ध्वनि है। क्योंकि मधुर शब्द के वास्तविक अर्थ मधुर रस का सर्वथा परित्याग हो जाता है।
तीसरा उदाहरण जैसे कालिदास ने ही अभिज्ञान शाकुन्तल में दुष्यन्त के द्वारा शकुन्तला का वर्णन कराते हुए लिखा है—‘सिवार में फँसा हुआ भी कमल अत्यन्त रमणीय होता है; चन्द्रमाका मलिन भी चित्त शोभा को ही बढ़ाता है, यह कुरूप वल्कल से भी अधिक मनोज्ञ मालूम पड़ रही है। यहाँ आकृति को मधुर कहा गया है। मधुर एक रस होता है, जो गुड़, शक्कर, शहद इत्यादि में तो सम्भव है पर आकृति मधुर नहीं हो सकती। अतः यह शब्द बाधित होकर सभी को अनुरञ्जित करना, तुष्ट करना इत्यादि धर्म को लक्षित कराता है। उसीसे व्यंग्यार्थ निकलता है कि शकुन्तला का रूप यदि बहुत बड़ी-चढ़ी अभिलाषा का विषय बन जावे तो इसमें आश्चर्य की बात कुछ नहीं है। यही ध्वनि है। यह ध्वनि ‘मधुर’ इस पद से निकलती है, अतः पदगत अत्यन्ततिरसकृतवाच्य ध्वनि है। क्योंकि मधुर शब्द के वास्तविक अर्थ मधुर रस का सर्वथा परित्याग हो जाता है।
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(ध्वन्यालोकः)-तस्यैवार्थान्तरसङ्क्रमितवाच्ये यथा—‘रामेण प्रियजीवितेन तु कृतं प्रेम्णः प्रिये नोचितम्’। अत्र रामेणेत्येतत्पदं साहसैकरसत्नादि व्यङ्ग्याभिसङ्क्रमितवाच्यं व्यञ्जकम्।
( अनु० ) उसी का अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य में जैसे—‘हे प्रिये जीवन को प्रिय समझनेवाले राम ने प्रेम के अनुयुक्त कार्य नहीं किया’। यहाँ पर ‘राम ने’ इस पद के वाच्यार्थ का संक्रमण साहसैकरसत्व इत्यादि व्यङ्ग्यार्थ में हो जाता है ( अतः यह पद ) व्यञ्जक है।
(लो०) तस्यैवेतत् । अविवक्षितवाच्यस्य यो द्वितीयो भेदस्तस्येत्यर्थः । प्रत्याख्यानरुष्टः कृतं समुचितं कूरेग ते रक्षसा । सोढं तच्च तथा त्वया कुलजनो धत्ते यथोच्चैः शिरः। व्यर्थं सम्प्रति विभ्रता धनुरिदं त्वद्रचापः साक्षिणा’ ॥ इति ।
रक्षःस्वभावादेव यः क्रोधनतिलङ्घ्यशासनत्वदूषिततया च प्रसह्य निराक्रियमााणः क्रोधान्निः तस्येत्यतद्विशिष्टवृत्तिसमुचिततमनुष्टान यन్మूढकतनं नो मान्योडपि कश्चिन्ममाङ्ग लड्यिष्यत इति । त इति यथा तादृगपि तथा न गणितस्त्वास्तवेत्यर्थः । तदपि तथा अविकारेणोत्सवापत्तिबुद्धया नेत्रविस्फारतामुखप्रसाददिलक्ष्यमाणया सोढम् । यथा येन प्रकारेण कुलजन इति यः कश्चित्पामरप्रायोडपि कुलवधूशब्दवाच्यः उच्चैः शिरो धत्ते एंवविधाः किल वयं कुलवध्वो भवाम इति । अथ च शिरःकर्तनावसरे त्वया शीघ्रं कृत्यतामिति तथा सोढं तथोच्चैः शिरो धृतं यथान्योडपि कुलस्त्रीणां उच्चैः शिरो धत्ते नित्यप्रवृत्ततया । एवं रावणस्य तव च समुचितकारितवं निर्गूढम् । मम पुनः सर्वमेवानुचितं पर्यवसितम् । तथाहि राज्यनिर्वासनादि निरवकाशीकृतधनुर्यापारस्यापि कलत्रमात्ररक्षणप्रयोजनमपि यच्चापमभूत्तत्संप्रति त्वव्यरक्षितव्यव्यपनन्नायामेव निष्प्रयोजनम्, तथापि च तद्वारयामि । तन्नूनां निजजीवितरक्षैवास्य प्रयोजनत्वेन सम्भाव्यते । न चैतद् युक्तम् । रामेणेति । ‘सम्साहसरसत्नसत्यसंघत्वोचितकारितवादिगडयधर्मान्तरपरिणतिनेत्यर्थः । ‘कापुरुषादि धर्मपरिग्रहस्त्वादिशब्ददात्’ इति यदव्याख्यातम्, तदसत्, कापुरुषस्य होतदेव प्रत्युतोचितं स्यात् । प्रिय इति शब्दमात्रमेवेतदिदानीं संवृत्तम् । प्रियशब्दस्य प्रवृत्तिनिमित्तं यत्प्रेमनाम तदन्वेष्टव्यतया सकृद्दर्शितमिति शोकालम्बनोद्दीपनविभावयोगात्मक-रुणरसो रामस्य स्फुटीकृत इति ।
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३
तृतीय उद्योतः
राक्षस स्वभाव से ही जो क्रूर ( है और ) अधिक अनुल्लंघनीय शासन की दुर्मदता के कारण बलात् निराकरण किया हुआ क्रोध से अन्धा ( हो गया ) ( यह ) जो कि तुम्हारा सिर काटना उसका तो अपनी चित्तवृत्ति के अनुकूल ही अनुष्ठान है और भी कोई मेरी आज्ञा का उल्लंघन न कर बैठे । पुनः अथवा जिससे उस प्रकार को भी उसके ( सीता के ) द्वारा नहीं गिना गया इस प्रकार का तुम्हारा । उसको भी उस प्रकार अर्थात् विकाररहित तथा उत्सव की प्राप्ति की बुद्धि से नेत्रविस्फारण तथा मुखप्रसाद इत्यादि के द्वारा लक्षित होनेवाली ने सह लिया । जिससे अर्थात् जिस प्रकार से कोई पामरप्राय कुलवती भी कुलवधू शब्द की वाच्य हो जाती है । ‘ऊँचा सिर धारण करती है’ कि इस प्रकार की हम कुलवती हैं । और भी सिर काटने के अवसर पर तुमने ‘शीघ्र ही काटो’ इस आशय से सिर ऊँचा कर लिया जिससे निश्चय प्रवृत्त होने के कारण अन्य भी कुल स्त्रियाँ ऊँचा सिर धारण कर लेती हैं । इस प्रकार रावण का और तुम्हारा समुचितकारित्व असंदिग्ध है । मेरा तो फिर सब कुछ अनुचित हो परिणाम निकला । वह इस प्रकार राज्यनिर्वासन इत्यादि के कारण निरवकाश किये हुए धनुर्यापारवाले भी ( मेरा ) जो धनुष कलत्र-रक्षण प्रयोजनमात्र था इस समय तुम्हारे अरणक्षित रूप में मारे जाने पर निष्प्रयोजन रह गया । तथापि उसे धारण कर रहा हूँ । अतः निःसंदेह अपने जीवन की रक्षा ही इसके प्रयोजन के रूप में सम्भावित की जा सकती है । यह उचित नहीं है । ‘राम के द्वारा’ अर्थात् समानरूप में साहसरसत्त्व, सत्यसन्धतत्व और उचितकारित्व इत्यादि दूसरे धर्मों में परिणत ( राम के द्वारा ) । ‘आदि शब्द से कायर इत्यादि धर्म परिग्रह हो जाता है’ यह व्याख्या जो की गई है—वह ठीक नहीं है क्योंकि प्रत्युत कायर के लिये तो यही उचित होता । ‘प्रिय’ यह इस समय शब्दमात्र ही हो गया । प्रिय शब्द का जो प्रवृत्तिनिमित्त प्रेम वह भी अनौचित्य से कलंकित है । इस प्रकार शोक के आलम्बन और उद्दीपन विभाव योग से राम का करुण रस स्पष्ट कर दिया गया है यह ।
तारावती—अविवक्षितवाच्य के अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य नामक भेद की पदप्रकाश्यता का उदाहरण— रावण ने राम को निराश और युद्ध से विरत करने के लिये माया के द्वारा सीता की मूर्ति बनवाकर ( मेघनाद के द्वारा ) उसका सिर कटवा लिया । श्री रामचन्द्रजी सीताजी को वस्तुतः मरी हुई जानकर उनके वियोग में विलाप करते हुए कह रहे हैं—‘कूर राक्षस ने तुम्हारे द्वारा प्रत्याख्यात होकर क्रोध में भरकर वही किया जो उसके लिये उचित था । तुमने भी उसको उसी प्रकार सह लिया जिससे कुलजनों का सिर ऊँचा हो जाता है । हे प्रिये इस समय तुम्हारी आपत्ति को साक्षी के रूप में देखते हुए इस धनुष को व्यर्थ ही धारण करने वाले राम ने, जिसको अपना ‘जीवन ही’ प्यारा है, प्रेम के योग्य कार्य नहीं कर पाया ।’ रावण राक्षस होने के कारण स्वभावतः क्रूर है, वह एक बुरे मद से भरा हुआ है कि कोई भी उसके शासन का उल्लंघन नहीं कर सकता । अतएव जब उसका बलात् निराकरण किया गया तब उसका क्रोधान्ध हो जाना स्वाभाविक ही था । उसके लिये
यह उचित था । तुमने भी उसके शासन को सहन कर लिया, यह भी उचित था क्योंकि कुलीन स्त्रियाँ ऐसा ही करती हैं । मेरी तो सब बातें ही अनुचित हुई—रावण का राज्य से निर्वासित किया जाना, मेरा धनुष केवल पत्नी-रक्षा के लिये रह जाना और अब तुम्हारे मारे जाने से उसका निष्प्रयोजन हो जाना । अब तो केवल अपने प्राणों की रक्षा के लिये ही मैं उसे धारण किये हुए हूँ । यह भी उचित नहीं है । यहाँ यह नहीं कहा गया है कि यह सब राम के द्वारा हुआ, क्योंकि राम में साहस, सत्यनिष्ठा आदि गुण हैं । कुछ लोगों ने यहाँ ‘आदि’ शब्द से कायरता आदि का ग्रहण किया है, पर यह ठीक नहीं है । यहाँ तो ‘प्रिय’ शब्द का प्रयोग ही व्यर्थ-सा लगता है, क्योंकि प्रिय शब्द का कारणभूत प्रेम भी यहाँ अनुचित ही है । इस प्रकार शोक के आलम्बन और उद्दीपन विभावों के द्वारा राम का करुण रस प्रकट किया गया है ।
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यह बात अपनी चित्तवृत्ति के अनुकूल हो थी कि उसने सिर काट लिया जिससे फिर कभी कोई उसकी आज्ञा के उल्लंघन करने का साहस न कर बैठे। उसने आज्ञा का उल्लंघन करनेवाली सीता का सिर काटकर अपनी कूरता का निर्वाह कर दिया। 'तुम्हारा सिर काट लिया' में 'तुम्हारा' शब्द से व्यक्त होता है कि तुम इतनी महान् हो कि उतने प्रभावशाली तथा क्रूर रावण को भी कुछ नहीं समझा। इतनी महत्त्वशालिनी तुम्हारा भी सिर रावण ने काट ही लिया। उस आपत्ति को भी सीता ने उत्सव समझकर आनन्दपूर्वक सहन कर लिया। नेत्र विस्फारण और मुख की प्रसन्नता से यह बात प्रकट हो रही थी कि सिर कटे जाने के अवसर पर भी सीता जी के चित्त में आनन्द था। सीता जी के कर्तव्य-पालन में इतनी उच्चता थी कि दूसरी पामर भी कुलबधुओं का सिर स्वाभिमान से ऊँचा हो जाता है। कुलबधुओं में ही यह शक्ति है कि वे कर्तव्य-पालन के लिए अपना सिर भी दे देती हैं। दूसरा आशय यह है कि सिर काटने के अवसर पर सीताजी ने अपना सिर इस मन्तव्य से ऊँचा कर दिया कि 'शीघ्र काटो'। नित्य ही कुलबधुओं के सामने कर्तव्य-पालन तथा सतीत्व-रक्षा की दिशा में सिर कटवाने का अवसर आता है और वे सीता के उदाहरण से ही अपनी सिर ऊँचा कर देती हैं। इस प्रकार रावण ने अपनी कूरता का कर्तव्य का निर्वाह कर दिया और सीता ने अपने पातिव्रत्य धर्म को निभा दिया। किन्तु राम के लिये तो सभी कुछ अनुचित ही रहा। राज्य से निर्वासित हो जाने इत्यादि के बाद धनुष के कार्यों का अवसर जाता ही रहा था। केवल उसका एक ही प्रयोजन रह गया था कि पत्नी की रक्षा की जाती। जब पत्नी का सिर काटा गया तब राम उस दृश्य को एक साक्षी के समान ही देखते रह गये, कोई भी प्रतीकार न कर सके। बिना ही रक्षा के सीता जी के मर जाने पर धनुष का पत्नी-रक्षा रूप प्रयोजन भी जाता रहा। फिर भी राम धनुष को धारण किये हुए हैं जिसका एक मात्र यही प्रयोजन हो सकता है कि वे अपने शरीर की रक्षा करें। राम को अपना जीवन प्यारा है, जो बात उचित नहीं है।
यहाँ पर कहनेवाले राम हैं। अतः उन्हें कहना चाहिए कि 'मैंने अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर पाया। राम का स्वयं ही कहना कि 'राम ने अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर पाया' किसी प्रकार भी सङ्गत नहीं होता। अतएव उसका बाघ हो जाता है। उससे एक अर्थ यह निकलता है कि—'उन राम ने अपना कर्तव्य पालन नहीं कर पाया जिनमें साहस के प्रति रस है, जो सत्य प्रतिज्ञावाले हैं और जो सर्वदा उचित कार्य ही करते हैं। उन राम ने भी अपना कर्तव्य पालन नहीं कर पाया। यह बात अनुचित हुई। इस प्रकार राम शब्द का वाच्यार्थ व्यंग्य धर्मों में परिणत होकर ही अपना अर्थ देता है। राम शब्द के वाच्यार्थ का भी सर्वथा परित्याग नहीं होता क्योंकि वस्तुतः राम धनुष धारण किये हुए ही हैं। इस प्रकार यहाँ पर राम शब्द की व्यंग्य धर्मान्तर परिणति अर्थ ल लिया जाता है। अतएव यहाँ पर अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य ध्वनि है जो कि पद के द्वारा प्रकाशित होती है। कुछ लोगों ने यहाँ कायरता इत्यादि व्यंग्य धर्मों में संक्रान्तवाच्य की व्याख्या की है। (प्रदीपकार ने लिखा है—'जो राम कायर हैं उन्होंने............' चक्रवर्ती ने लिखा है—
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तृतीय
उद्योत:
'जो राम छलपूर्ण स्नेह करनेवाले हैं।' भट्ट गोपाल ने लिखा है—'जो राम पुरुषार्थ से विमुख है।' किन्तु ये व्याख्याएँं ठीक नहीं हैं। क्योंकि यदि राम में कार्यता इत्यादि धर्मों को स्वीकार कर लिया जावे तो रक्षा न कर सकने में अनुचित क्या हो? यहाँ पर आाशय यही है कि जिन राम में साहस है, शौर्य है, सत्यसन्धत्व है उन राम ने भी अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर पाया यह बात अनुचित हुई। अतएव यहाँ पर साहस इत्यादि धर्मों की ही व्याख्या करनी चाहिए। राम का सीता के लिए 'प्रिये' सम्बोधन तो अब शब्दमात्र ही रह गया। प्रिय का प्रवृत्तिनिमित्त प्रेम होता है। प्रिय वही होता है जिसमें प्रेम हो और वह उसका निर्वाह भी कर सके। राम का प्रेम अनौचित्य से कलङ्कित हो गया है। इस प्रकार यहाँ शोक के आलम्बन और उद्दीपन विभाव के योग से राम का करुण रस स्फुट कर दिया गया है।
तृतीय
उद्योत:
(ध्वन्यो०) यथा वा— एमेअ जणो तिस्सा देउ कवोलोपमाइ ससिबिम्बम् । परमत्यविचारे उण चन्दो चन्दो वि० वराओ ॥ अत्र द्वितीयइचन्द्रशब्दोऽर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यः ।
( अनु० ) अथवा जैसे— 'यों ही लोग उसके कपोल की उपमा में चन्द्रबिम्ब को दिया करते हैं। वास्तविक विचार करने पर बेचारा चन्द्र चन्द्र जैसा ही है।' यहाँ पर दूसरा चन्द्र शब्द अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य है। (लो०)—एमेअ इति । एवमेव जनस्तस्या ददाति कपोलोपमायां शशिबिम्बम् । परमार्थविचारे पुनरिचन्द्रश्चन्द्र इव वार्ताकः॥ (इति छाया) एवमेवेति स्वयमविवेकान्धतया । जन इति लोकप्रसिद्धगतागतिकतामात्रशरणः । तस्या इत्याधारगुणगणमहाग्रवपुः । कपोलोपमायामिति निर्व्याजलावण्यसर्वस्वभूतमुखमध्यवर्ति प्रधानभूतकपोलस्योपमायां प्रत्युत तदधिकवस्तुकर्तव्यं ततो दुर्निकृष्टं शशिबिम्बं कलङ्कद्वयाजर्जर्रीकृतम् । एवं यद्यपि गडुरिकाप्रवाहपतितो लोकः;, तथापि परीक्षकाः परीक्शन्ते तद्राकः कृपणकभाजनं यश्चन्द्र इति प्रसिद्धः स चन्द्र एव क्षयित्वविलासशून्यत्वमलिनत्वधर्मान्तरसङ्क्रान्तो योऽर्थः । अत्र च यथा व्यक्त्यधर्मान्तरसङ्क्रान्तिसतथा पूर्वोक्तमनुसन्धेयम् । एवमुक्तरत्रापि ।
तृतीय
उद्योत:
(अनु०) 'एमेअ' यह :— 'यों ही' 'लोग उसके कपोलों की उपमा में यों ही चन्द्रबिम्ब को दे दिया करते हैं। पुनः वास्तविक विचार करने पर तो बेचारा चन्द्र चन्द्र ही है।' यों ही अर्थात् स्वयं अविवेक से अन्धा होने के कारण । 'जन' का अर्थ है लोक में प्रसिद्ध केवल गतानुगतिकता का सहारा लेनेवाला । उसका असाधारण गुणगणों से महान् शरीरवाले का । 'कपोल की उपमा में' अर्थात् बिना बनावट के लावण्यसर्वस्वभूत मुख के
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मध्यवर्ती प्रधानभूत कपोल की उपमा में प्रत्युत उससे अधिक वस्तु की जानी चाहिए उससे दूर गिरा हुआ शशिबिम्ब कलंक के व्याज से कुण्ठिल कर दिया गया है। इस प्रकार यद्यपि भेड़ाचाल के प्रवाह में लोक पड़ा हुआ है तथापि परीक्षक यदि परीक्षा करें तो एकमात्र कृपापात्र जो चन्द्र नाम से प्रसिद्ध है वह चन्द्र ही है। अर्थात् क्षयितत्व, विलासशून्यत्व, मलिनत्व इत्यादि उसके धर्मों में संक्रान्त जो अर्थ (पैसा जहाँ है)। यहाँ पर जिस प्रकार व्यङ्ग्यधर्मान्तर की संक्रान्ति होती है वैसा पहले कहे हुए के समान समझ लिया जाना चाहिए। ऐसा ही आगे भी।
तारावती—दूसरा उदाहरण— (उस नायिका) के कपोलों की उपमा में लोग यों ही चन्द्रबिम्ब का उल्लेख कर दिया करते हैं। वास्तविक रूप में विचार करने पर बेचारा चन्द्र, चन्द्र ही है। 'यों ही' से व्यङ्ग्यना निकलती है कि लोग प्रायः अज्ञान से अन्धे हैं वे अधिकतर बिना सोचे समझे ही बात किया करते हैं। 'लोग' कहने का आशय यह है कि सर्वसाधारण व्यक्तियों का केवल यहीं सहारा होता है कि वे लोकप्रसिद्ध गतानुगतिकता के आधार पर बात किया करें सामान्यतया जैसा प्रसिद्ध होता है लोग वैसी ही बात किया करते हैं। छानबीन कर बोलना सर्वसाधारण के वश की बात नहीं। 'उसके' का आशय यह है कि उस नायिका का शरीर असाधारण गुणों के कारण अत्यन्त महत्वपूर्ण है। कपोल की उपमा में कहने का आशय यह है कि नायिका स्वयं ही लावण्यमयी है उसे लावण्य के लिये प्रसाधनों की भी आवश्यकता नहीं होती। उस लावण्य का सर्वस्वमूत है उसका मुख और उस मुख के मध्य में भी कपोलतल ही सबसे अधिक प्रधान हैं। उन कपोलों की उपमा में कोई ऐसी वस्तु लानी चाहिए जो उनकी अपेक्षा अधिक हो। शशिबिम्ब तो उसकी अपेक्षा कहीं अधिक निकृष्ट है और कलङ्क के बहाने से वह और अधिक निकृष्ट बना दिया गया है। इस प्रकार यद्यपि भेड़ाचाल का अनुसरण करते हुए संसार नायिका के कपोलतलों को चन्द्र की उपमा दे देता है तथापि यदि परीक्षक लोग परीक्षा करें तो बेचारा चन्द्रमात्र दया का पात्र बन जाता है। क्योंकि जो प्रसिद्ध चन्द्रमात्र है वह आखिर है तो चन्द्रमात्र ही। यहाँ पर दूसरे चन्द्र शब्द में उसके धर्मों का सङ्क्रमण हो जाता है, वे धर्म हैं—चन्द्रमात्र क्षयी है, विलासशून्य है, मलिन है इत्यादि। इन धर्मों से संक्रान्त होकर जो अर्थ आता है वही यहाँ पर दूसरे चन्द्र शब्द का अर्थ हो जाता है। यहाँ पर वाच्यातिरिक्त दूसरे व्यङ्ग्यधर्मों की संक्रान्ति किस प्रकार होती है इसकी व्याख्या पहले (दूसरे उद्योत के प्रारम्भ में) की जा चुकी है। उसी के अनुसार यहाँ भी समझ लेना चाहिए। इसी प्रकार आगे के उदाहरणों में भी समझ लेना चाहिए।
(ध्वन्या०)—अविवक्षितवाच्यस्यत्यन्ततिरस्कृतवाच्यस्य प्रमेदे वाक्यप्रकाश्यतया निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाप्रति भूतानि सा निशा परयतो मुनेः॥
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तृतीय उद्योत:
अनेन हि वाक्येन निशार्थो न च जागरणार्थः। किमत्र विवक्षितम् ? किं तर्हि ? तत्वज्ञानावहितत्वमतत्वप्रवणमुखत्वं च मुने: प्रतिपाद्यत इति तिरस्कृतवाच्यस्यास्य व्यङ्ग्यत्वम् ।
(अनु०) -अभिवक्षितवाच्य के उपभेद अत्यन्ततिरस्कृतवाक्य की वाक्यप्रकाश्यता का उदाहरण जैसे—
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तृतीय उद्योत:
'जो सब प्राणियों के लिये रात्रि है उसमें संयमी जागता है । जिसमें प्राणी जागते हैं वह देखनेवाले मुनि के लिये रात्रि है ।'
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तृतीय उद्योत:
निस्सन्देह इस वाक्य से न तो निशा का कोई अर्थ और न जागरण का कोई अर्थ विवक्षित है । तो क्या ? मुनि का तत्वज्ञान में अवहित होना और अतत्त्व से पराड्मुख होना प्रतिपादित किया जाता है । इस प्रकार यह तिरस्कृतवाच्य व्यङ्ग्य हो जाता है ।
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तृतीय उद्योत:
(लो०)—एवं प्रथमभेदस्य द्वापि प्रकारौ पदप्रकाशकत्वेनोदाहृत्य वाक्यप्रकाशकत्वेनोदाहरति—या निशेषित । विवक्षित इति । तेन न्यक्क्तेन न करिचदुपदेश्यं प्रत्युपदर्श: सिद्ध्यति । निशायां जागर्ति—निशायां जागरितव्यमनेनात्र रात्रिवदासीतस्यां मतिकिमनेनोद्यतेन । तस्माद्वाधिततत्स्वार्थमेतद्वाक्यं संयमिनो लोकोत्तरत लक्षणेन निमित्तेन तत्वदृष्टाववस्थानं मिथ्यादृष्टौ च पराड्मुखत्वं ध्वनति । सर्वशब्दार्थस्य चापेक्षिकतयाप्युपपद्यमानत्वेन न सर्वशब्दस्यान्यथानुपपत्त्याद्यमर्ये आक्षेपो मत्वव्यः । सर्वेषां ब्रह्मादिस्थावरान्तानां चतुर्दशानामपि भूतानां या निशा व्यामोहजननी तत्वदृष्टेस्तस्यां संयमी जागर्ति कथमियं ह्येयति । न तु विपयवर्जनमात्रादेव संयमीति यावत् । यदि वा सर्वभूतनिशायां मोहिन्यां जागर्ति कथमियं ह्येयति । यस्यां तु मिथ्यादृष्टौ सर्वाणि भूतानि जाग्रति अतिशयेन सुप्रबुद्धरूपाणि सा तस्य रात्रिरप्रबोधविषय: । तस्यां हि चेष्टायां नासौ प्रबुद्ध: । एवमेव लोकोत्तराचारव्यवस्थित: प्रयत्नि मन्यते चु । तस्यैवान्तर्बहिष्करणवृत्तिरसंचरितार्था । अन्यस्तु न च मन्यत इति । तत्वदृष्टिपरेण भाव्यमिति तात्पर्यम् । एवं च पश्यत इत्यपि मुनेः इतिपि च न स्वार्थमात्रविश्रान्तम् । अपि तु व्यङ्ग्य एव विश्राम्यति । यत्तच्छब्दयोश्च न स्वतन्त्रार्थते त्ति सर्व एवायमाक्ष्यातसहाय: पदसमूहो व्यङ्ग्यपर: । तदाह—अनेन हि वाक्येनैति । प्रतिपाद्यत इति ध्वन्यत इत्यर्थ: ।
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तृतीय उद्योत:
(अनु०)—इस प्रकार प्रथम भेद के दोनों प्रकारों के पदप्रकाश्य रूप में उदाहरण देकर वाक्यप्रकाश्य के रूप में उदाहरण देते हैं—'जो रात्रि' । 'कहा गया है' यह ! इस कहे हुए से उपदेश योग्य व्यक्ति के प्रति कोई उपदेश सिद्ध नहीं होता । रात में जागना चाहिये अज्ञातरात्रि के समान रहना चाहिये इस कथन से क्या ? इससे बाधितस्वार्थवाला वह वाक्य संयमी के लोकोत्तरता लक्षण निमित्त से तत्वदृष्टि में अवधान और मिथ्यादृष्टि से पराड्मुखत्व को ध्वनित करता है । सर्वशब्द के अर्थ की सापेक्षिक रूप में भी उपपत्ति हो जाती है अतः यह नहीं मानना चाहिये कि सर्वशब्द की अन्यथानुपपत्ति से इस अर्थ का आक्षेप हो जाता है ।
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से लेकर स्थावर पर्यन्त समस्त १४ भूतों की जो रात्रि अर्थात् व्यामोह को उत्पन्न करनेवाली तत्वदृष्टि, उसमें संयमी जागृत रहता है कि यह कैसे प्राप्त हो ? अर्थात् केवल विषय-वर्जन से ही कोई संयमी नहीं हो जाता । अथवा सब भूतों की मोहिनी रात्रि में जागता है कि यह कैसे छोड़ी जावे । जिस मिथ्यादृष्टि में तो सब प्राणी सुप्तबुद्धि रूप में जागते हैं वह उसकी रात्रि अर्थात् प्रबोध का अविषय होता है । उस चेष्टा में वह बुद्ध नहीं होता । लोकोत्तर आचार में प्रवृत्त (व्यक्त) इसी प्रकार का देखता है और मानता है । तात्पर्य यह है कि तत्वदृष्टिपरायण होना चाहिए । इस प्रकार 'देखनेवाले' यह और 'मुनि' यह भी स्वार्थ-विश्रान्त नहीं है । अपितु वाक्यशेष में ही विश्रान्त होता है । 'यतु' और 'तत्' शब्दों की स्वतन्त्रार्थता नहीं होती । इस प्रकार क्रिया की सहायता से युक्त यह सब वाक्य वयंग्यपरक है । वही कहते हैं—'इस वाक्य में' प्रतिपादित किया जाता है अर्थात् ध्वनित किया जाता है ।
तारावती—(३) ध्वनि का प्रथम भेद है अविवक्षितवाच्य । उसके दो भेद होते हैं अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य और अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य । इन दोनों प्रकारों में पद के प्रकाशकत्व के उदाहरण दे दिये गये अब वाक्य के प्रकाशकत्व के उदाहरण दिये जा रहे हैं । ( यहाँ पर लोचनकार ने पदप्रकाशकत्व और वाक्यप्रकाशकत्व इन शब्दों का प्रयोग किया है । प्रकाशक वास्तव में पद और वाक्य ही होते हैं, ध्वनिभेद तो प्रकाश्य होते हैं । अतः यहाँ पर ठीक प्रयोग होगा—'पदप्रकाश्यत्वेन' और 'वाक्यप्रकाश्यत्वेन' । सम्भवतः यह मुद्रण प्रमाद हो । किन्तु यदि स्थित का समर्थन करना हो तो यह अर्थ करना चाहिये—'पद की प्रकाशकता को दिखलाने के रूप में दोनों भेदों के उदाहरण दे दिये, अब वाक्य की प्रकाशकता को दिखलाते हुये लेखक उदाहरण दे रहा है ।')
'जो सब प्राणियों के लिए रात है उसी में संयमी व्यक्ति जागता है और जिसमें संसारी लोग जागते हैं वह ज्ञानवान् मुनि के लिये रात होती है ।'
यह भगवान् कृष्ण गीता में अर्जुन को उपदेश देते हुए कह रहे हैं । यदि इसमें रात तथा जागने का यथार्थश्रुत अर्थ लिया जावे तो उपदेश के प्रति कोई उपदेश ही सिद्ध न हो । इस उपदेश का क्या आशय कि रात्रि में जागना चाहिए तथा दिन में रात्रि के समान रहना चाहिये । इस प्रकार इस वाक्य के वाच्यार्थ का बाध हो जाता है और रात्रि का लक्ष्यार्थ हो जाता है । मिथ्यादृष्टि और जागने का लक्ष्यार्थ हो जाता है । तत्वदृष्टि । इस लक्षणा में निमित्त है संयमी व्यक्ति की लोकोत्तरता । इससे व्युत्पत्ति निकलती है कि संयमी भी आजाते हैं फिर उनका 'रात में जागना' कहमा अनुपपन्न हो जाता है । अतः सर्व शब्द की उत्पत्ति के लिये अर्थापत्ति से उक्त अर्थ प्राप्त हो सकता है उसके लिये लक्षणामूल व्यञ्जना की आवश्यकता नहीं किन्तु इसका उत्तर यह है कि सर्व शब्द आपेक्षिक रूप में भी उत्पन्न हो जाता है । एक ओर हैं सब प्राणी और दूसरी ओर हैं संयमी । 'संयमी से भिन्न सभी व्यक्तियों के लिये जो रात है उसमें संयमी व्यक्ति जागता है' यह अर्थ करने से अनुपपत्ति
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तृतीय
उद्योत:
नहीं होती। अतः उक्त अर्थ आक्षेपगम्य नहीं हो सकता। उसके लिये लक्षणामूल व्यंजना ही माननी पड़ती है। आशय यह है कि ब्रह्म से लेकर स्थावर पर्यन्त १४ प्रकार के प्राणियों के लिये जो रात्रि अर्थात् व्यामोह उत्पन्न करनेवाली तत्त्व दृष्टि है उसमें संयमी जागता है कि यह तत्त्वदृष्टि कैसे प्राप्त हो सके। आशय यह है कि संयमी बनने के लिये केवल इतना ही आवश्यक नहीं है कि विषय-वासनाओं का परित्याग कर दिया जावे। उसके लिये यह भी आवश्यक है कि तत्त्वदृष्टि के प्रति जागरूक रहा जावे और अतत्त्वदृष्टि के प्रति उदासीनता रहे। अथवा यहाँ पर यह अर्थ हो सकता है कि सब प्राणियों को मोहित करनेवाली जो रात्रि अर्थात् मिथ्यादृष्टि है उसके प्रति संयमी व्यक्ति जागरूक रहता है कि इसका परित्याग कैसे किया जा सके। जिस मिथ्या दृष्टि के प्रति सभी प्राणी जागते हैं अर्थात् उसके स्वीकार करने तथा उपभोग करने में अत्यन्त ही प्रबुद्ध अर्थात् सावधान रहते हैं कि कहीं कोई वस्तु उपभोग से छूट न जावे वह मिथ्यादृष्टि संयमी के प्रबोध का विषय नहीं होती। मिथ्यादृष्टि की चेष्टाओं में संयमी व्यक्ति प्रबुद्ध नही होता। लोकोत्तर आचरण में व्यवस्थित ( संयमी व्यक्ति ) ऐसा ही समझता है और ऐसा ही मानता है। उसी को अन्तःकरण की वृत्ति चरितार्थ होती है, जोर, जैसी की बाह्य इन्द्रियों की वृत्ति चरितार्थ होती है। दूसरे लोग न तो देखते ही हैं और न मानते ही हैं। तात्पर्य यह है कि तत्त्वदृष्टिपरायण होना चाहिये। उसी प्रकार 'देखनेवाले' और 'मुनि के' इन दोनों शब्दों का भी पर्यवसान स्वार्थ में ही नहीं होता है। ( 'पश्यतः' 'देखनेवाले' का लक्ष्यार्थ है 'तत्त्वदृष्टि तथा मिथ्यादृष्टि को समझनेवाला और मुनि का अर्थ — संयमी तथा मननशील कोई भी व्यक्ति ) इन दोनों शब्दों के अर्थों का पर्यवसान पूर्वोक्त व्यञ्ज्यार्थ में ही होता है। इस प्रकार पूरे वाक्य में 'यत्' और 'तत्' शब्द ही छूट जाते हैं। इनका स्वतन्त्र अर्थ नहीं होता। अतएव क्रिया के सहित पूरा पदसमूहरूप वाक्य व्यञ्ज्यार्थपरक हो है। इसीलिये वृत्तिकार ने लिखा है कि 'इस वाक्य के द्वारा रात्रि का या जागने का कोई अर्थ विवक्षित नहीं है'। 'मुनि के तत्त्वज्ञान के प्रति अत्र हित होने और अन्ततत्त्व की ओर से पराड्मुख होने का प्रतिपादन किया जाता है'। यहाँ पर प्रतिपादन किया जाता है कहने का अर्थ है ध्वनित किया जाता है।
(ध्वन्या०)—तस्यैवर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यस्य वाक्यप्रकाश्यता यथा— विसमइओ काण विण काण विआलेह अमिआणिम्माओ। काण वि विसासिअओ काण विअविसामओ कालो॥ ( विषमस्थितः केषामपि केषामपि प्रयात्यमृतनिर्माणः । केषामपि विश्रामयति केषामप्यविषामृतः कालः ॥ इति छाया ।)
अत्र हि वाच्यो विषामृतशब्दाभ्यां द्वैखुल्यरूपसङ्क्रमितवाच्यस्य व्यङ्ग्यत्वम्। इत्यर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यस्य व्यञ्जकत्वम्।
(अनु०) उदीके ( अवान्तर-भेद ) अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य की वाक्यप्रकाश्यता का उदाहरण—
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'किसी के लिये समय विषमय होता है; किसी के लिये अमृत निर्माणवाला होता है, किसी के लिये विषामृतमय और किसी के लिये अविषामृतमय होता है ।' निस्सन्देह इस वाक्य में विष और अमृत शब्दों के द्वारा व्यवहार किया गया है जिनके वाच्यार्थों का संक्रमण सुख और दुःख में हो गया है । अतएव यह अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य का व्यंजक है ।
(लो०)-विषमयितो विषमयतां प्राप्तः। केषांचिददुष्टकृतिनामतिविवेकिनां वा । केषांचिन्निमर्शकर्मणां विवेकवतां वा विषामृतमयः केषामपि मूढप्रायाणां धाराप्राप्तयोगभूमिकारूढानां वा अविषामृतमयः कालोऽतिक्रान्तीतिवती सम्बन्धः । विषामृतपदे च लावण्यादिशब्दवन्निरूढलक्षणारूपतया सुखदुःखसाधनयोरवत्ते । यथा विषं निम्बममृतं कपित्थमिति । न चात्र सुखदुःखसाधने तन्मात्रविश्रान्ते, अपि तु स्वकर्तृगुसुखदुःखपर्यवसिते । न च ते साधने सर्वथा न विवक्षिते । निस्साधनयोरस्योर्भावात् । तदाह—सङ्क्रमितवाच्याभ्यामिति । केषांचिददिति चास्य विशेषे सङ्क्रान्तिः । अतिक्रान्तीतिवस्य च क्रियामात्रसङ्क्रान्तिः । काल इत्यस्य च सर्वत्रव्यवहारसङ्क्रान्तिः । उपलक्षणार्थेन्तु विषामृतग्रहणमात्रसङ्क्रमणं वृत्तिकृता व्याख्यातम् तदाह—वाक्य इति ।
(अनु०)—'विषमयित' अर्थात् विषमता को प्राप् । कुछ का अर्थात् पापियों अथवा अतिविवेकियों का । कुछ का अर्थात् पुण्यात्माओं का अथवा अत्यन्त विवेकियों का अमृत की रचनावाला व्यतीत होता है । मिले हुये कर्मवाले अथवा ज्ञान और अज्ञानवाले कुछ लोगों का ( समय ) विष और अमृतमय होता है । मूढप्राय अथवा धारा से प्राप्त योगभूमिका पर आरूढ कुछ लोगों का काल विष और अमृतमयता से रहित व्यतीत होता है, यह सम्बन्ध है । विष और अमृत पद लावण्य इत्यादि शब्द के समान निरूढ लक्षणारूप होने से सुख और दुःख के साधन में वर्तमान रहते हैं । जैसे नीम विष है और कैथा अमृत है । यहाँ पर सुख और दुःख के साधन स्वमात्रान्तविश्रान्त नहीं हैं । अपितु अपने द्वारा किये गये यत्न से सुख और दुःख में पर्यवसित होते हैं । उन साधनों की विवक्षा सर्वथा नहीं होती यह बात नहीं क्योंकि निस्साधन तो वे हो ही नहीं सकते । वह कहते हैं—'सङ्क्रमित वाच्यों से' यह । किसी का संक्रमण विशेष में हो जाता है । अतिक्रान्त होता है का क्रियामात्र में सङ्क्रमण हो जाता है और 'काल' इसका सङ्क्रमण सब व्यवहारों में हो जाता है । उपलक्षण के लिये तो विष और अमृत शब्दों के संक्रमण की व्याख्या वृत्तिकार ने कर दी । वह कहते हैं—'वाक्य में' यह ।
तारावती—(४) अविवक्षितवाच्य के भेद अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य की वाक्यप्रकाश्यता का उदाहरण-- 'किन्हीं लोगों का समय विषमय व्यतीत होता है, दूसरे लोगों के लिये समय का परिपाक अमृतमय होता है, और लोगों के लिये विष और अमृत से युक्त होता है तथा दूसरों के लिये न विषमय ही होता है न अमृतमय ही ।'
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तृतीय
उद्योत:
यहाँ पर विष और अमृत शब्दों का अर्थ सुख और दुःख में संक्रान्त हो गया है। इस प्रकार इस वाक्य का अर्थ हो जाता है—‘पापियों का समय दुःखमय ही होता है और अत्यन्त ज्ञानीजनों का समय भी दुःखमय ही होता है (क्योंकि पापी पाप का फल भोगते हैं और ज्ञानियों के लिए स्वयं संसार ही दुःखमय होता है ।) जो धर्मात्मा हैं या जो अत्यन्त अज्ञानी हैं उनका समय सुखमय व्यतीत होता है। जो लोग न तो बहुत पापों ही हैं और न बहुत पुण्यात्मा ही हैं अथवा जो न तो पूर्ण ज्ञानी ही हैं और न बहुत अज्ञानी ही हैं उनका समय दुःख और सुख से मिला हुआ व्यतीत होता है। इसके प्रतिकूल जो अत्यन्त मूढ़ हैं अथवा जो योग की पूरी भूमिका को प्राप्त कर चुके हैं उनका समय न तो दुःखमय ही होता है न सुखमय ही। मूढ़ लोग सुख और दुःख के अनुभव की क्षमता ही नहीं रखते और योगी लोगों को अनुभव होता ही नहीं है।
लावण्य इत्यादि शब्दों के समान विष और अमृत इन शब्दों की दुःख और सुख में निरूढा लक्षणा है। जैसे नीम विष होता है, कपित्थ अमृत होता है। अन्तर यह है कि ‘नीम विष होता है और कपित्थ अमृत होता है’ इस वाक्य में दुःख और सुख के साधन में लक्षणा होती है, किन्तु प्रस्तुत उदाहरण ‘किन्हीं लोगों का अमृतमय हो’ में लक्षण का पर्यवसान स्वसाध्य सुख और दुःख में होता है। साथ में उन साधनों का अन्वय विलकुल न होता हो ऐसी बात नहीं है। साधनों का भी अन्वय साथ में हो ही जाता है। क्योंकि बिना साधन के साध्य हो ही नहीं सकता। सुख और दुःख के साधन के रूप में अमृत और विष का भी अन्वय हो जाता है इसलिये यह अत्यन्ततिरसृक्तवाच्य का उदाहरण न होकर अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य का उदाहरण है। इसीलिये वृत्तिकार ने लिखा है कि विष और अमृत के वाच्यार्थों का संक्रमण सुख और दुःखमें हो जाता है। जिस प्रकार विष और अमृत की लक्षणा दुःख और सुख में होती है उसी प्रकार ‘कुछ लोगों का’ की लक्षणा पापी इत्यादिकों में होती है। ‘व्यतीत होता है’ की लक्षणा, जीवन की सभी क्रियाओं में हो जाती है तथा ‘काल’ की लक्षणा सभी व्यवहारों में हो जाती है। इस प्रकार यह अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य की वाक्यप्रकाश्यता का उदाहरण है। वृत्तिकार ने केवल विष और अमृत के वाच्यार्थों के संक्रमण की व्याख्या की है। वस्तुतः इस पद्य की क्रिया, काल तथा सर्वनाम इत्यादि के अर्थों का भी अर्थान्तर में संक्रमण हो जाता है। वृत्तिकार की विष और अमृत शब्दों के वाच्यार्थ की अर्थान्तरसंक्रमणपरक व्याख्या उपलक्षणमात्र है। इसीलिये वृत्तिकार ने लिखा है कि ‘वाक्य में’ व्यज्यतेकता है। (यहाँ पर द्वितीय वृत्तिकार ने लिखा है कि विष और अमृत शब्दों का सुख और दुःख के अर्थों में निरूढ लक्षणा के रूप में प्रयोग नहीं होता। अतएव यहाँ पर अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य न मानकर अत्यन्ततिरसृक्तवाच्य मानना चाहिये। किन्तु शब्दों के अर्थ को संकोचविस्तार प्रायः होता ही रहता है। सम्भव है आनन्दवर्धन तथा अभिनवगुप्त के समय में विष और अमृत का इस प्रकार का प्रयोग होता रहा हो। इस दृष्टि से यह उदाहरण असंगत नहीं है। दूसरी बात यह है कि यदि विष और अमृत शब्दों की निरूढालक्षणापरक व्याख्या न भी की जावे तो भी विष और अमृत शब्दों की लक्षणा दुःखदायक वस्तुओं में तथा सुखदायक वस्तुओं में हो जावेगी।
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समावेश भी दुःखदायक और सुखदायक वस्तुओं में है ही । ऐसी दशा में ‘काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्’ के समान यहाँ पर भी उपादान लक्षणा ही होगी लक्षणलक्षणा नहीं । अतएव यहाँ पर अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य न होकर पर्यायान्तरसंक्रमितवाच्य ही होगा । दीधितिकार ने लिखा है कि पीयूषवर्ष का ‘कदली कदली करभः करभः करिराजकरः करिराजकरः’ यह वाक्य अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य का ठीक उदाहरण होगा किन्तु यहाँ पर ‘अस्ति’ का अध्याहार करने से ‘कदली अस्ति’ इत्यादि पृथक् वाक्य बन जाते हैं और इनमें व्यंग्यार्थ केवल पदद्योतक्य ही रह जाता है । इसीलिए काव्यप्रकाशकार ने ‘जिसके मित्र मित्र हैं, शत्रु शत्रु हैं और कृपाभाजन कृपाभाजन हैं’ वही वास्तव में उत्पन्न हुआ है और वही वास्तव में जीवित है ।’ यह उदाहरण पदद्योतक्य अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य का दिया है । वस्तुतः वाक्य व्यङ्ग्य अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य का काव्यप्रकाशकार का दिया हुआ यह उदाहरण अधिक समीचीन होगा—विद्वानों की सभा में जाननेवाले किसी व्यक्ति के प्रति कोई आप्त कह रहा है—‘मैं तुमसे कह रहा हूँ कि यहाँ विद्वानों का समुदाय एकत्र है । अतएव तुम्हें अपनी बुद्धि को ठीक रखकर सावधानतापूर्वक वहाँ स्थित होना चाहिये ।’ यहाँ पर ( १ )‘मैं तुमसे कह रहा हूँ’ यह वाक्य अनुपस्थित है । क्योंकि बात कह देने से मालूम पड़ सकता है कि उसे बात कह दी । अतः इसकी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती और ‘मैं तुमसे कह रहा हूँ’ इसका बाघ हो जाता है । उससे दूसरा लक्ष्यार्थ निकलता है ‘मैं तुम्हें उपदेश दे रहा हूँ ।’ ( २ ) जब विद्वान् लोग सामने हों हैं तब इसकी भी आवश्यकता नहीं रह जाती कि ‘यहाँ पर विद्वानों का समुदाय एकत्र है ।’ इस प्रकार इसका बाध होकर लक्ष्यार्थ निकलता है कि ‘यहाँ जो विद्वान् आये हैं वे सर्वशास्त्रविशारद हैं’ ( ३ ) इसी प्रकार जब बुद्धि का सहारा सर्वदा लिया ही जाता है तब बुद्धि का सहारा लेने का परामर्श व्यर्थ ही हो जाता है । इससे बाध होकर लक्ष्यार्थ निकलता है कि ‘तुम अपनी बुद्धि को प्रमाणों के आधीन ठीक रख्खो’ इस सबके यह व व्यङ्ग्यार्थ निकलता है कि—‘इस स्थानपर ऐसे ऐसे विद्वान् एकत्र हुए हैं जो सब शास्त्रों में निष्णात हैं और उनके सामने अपनी बात को प्रमाणों से सिद्ध कर सकने अत्यन्त दुर्बल है । तुम भली भाँति अपनी बुद्धि को ठीक रख्खो और जो भी बात कहो वह प्रमाण से भरी हुई हो । यह तुम्हारे लिये मेरी शिक्षा है । यदि तुम मेरा कहना मानोगे तो तुम्हारा हित होगा नहीं तो तुम उपहास के योग्य हो जाओगे ।’
( ध्वन्यालोके)—विवक्षिताभिधेयस्यान्तरनिरूपणरूपस्य शब्दशक्त्युद्भववे प्रभेदे पदप्रकाश्यता यथा—
प्रातः घनेरर्थजनस्य वाच्छां दैवेन सृष्टो यद्वि नाम नास्मि ।
पथि प्रसन्नाम्बुधरस्तद्गः कूपोदधवा किन्न जडः कृटोदरम् ।।
अत्र हि जड इति पदं निर्विच्चनेन वक्त्रात्मसममानाशिकरणतया प्रयुक्तमनुरण-
नरुपतया कूपसममानाशिकरणतां स्वशक्ल्या प्रतिपद्यते ।
(अनु०) विवक्षितवाच्य के भेद अनुरणनरूप व्यंग्य के उपभेद शब्दशक्त्युद्भव की पदप्रकाश्यता का उदाहरण—
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तृतीय
उद्योत:
‘धनों से याचकों की आकांक्षा को पूरा करने के लिये यदि देव के द्वारा मैं उत्पन्न नहीं किया गया हूँ तो मार्ग में निर्मल जल को धारण करनेवाला तड़ाग अथवा जड़ कूप ही क्यों नहीं बना दिया गया हूँ ? यहाँ पर निर्विण्ण वक्ता के द्वारा अपने समानाधिकरण के रूप में प्रयोग किया गया ‘जड़’ यह शब्द अनुरणनरूप में अपनी शक्ति से कूप के समानाधिकरणत्व को प्राप्त हो जाता है ।
तृतीय
उद्योत:
(लो०)
एवं कारिकाप्रथमार्थलक्षिताश्चतुरः प्रकारानुदाहृत्य द्वितीयकारिकार्धस्वीकृतान् षडन्यान् प्रकारान् कमेणोदाहरति-विवक्षिताभिधेयस्यैवादिना । प्रातुमिति पुरयितुम् । धनैरति बहुवचनं यो येनार्थी तस्य तेनति सूचनार्थम् । अत एवंाथिग्रहणम् । जनस्येति बाहुल्येन हि लोको धनार्थी, न तु गुणैरुपकारार्थी । दैवेनeti । अशक्यपर्यनुयोगेनैवार्थः । अस्मीति । अन्यो हि तावद्वश्यं कश्चित् सृष्टो न त्वह्मिति निवेदः । प्रसन्नं लोकोपयोगि अम्बु धारयतीति । कूपोदथ्वेति । लोकैरप्यलच्यमाण इत्यर्थः । आत्मसमानाधिकरणतयeti जड़ः किंकर्तव्यतामूढ इत्यर्थः । अथ च कूपो जडोऽर्थता कस्मादूशोत्यसम्भवद्वच इति । अत एवं जड़ः शीतलो निवेदसन्तापरोहितः । तथा जड़ः शीतलजलयोगितया परोपकारसमर्थः । अनेन तृतीयार्थेनायं जडशब्दस्टाकार्थेन पुनरुक्तसम्बन्ध इत्यभिप्रायेणाह—कूपसमानाधिकरणतामिति । स्वशक्त्यeti शब्दशक्त्युद्भवद्वतं योजयति।
तृतीय
उद्योत:
(अनु०)
इस प्रकार कारिका के प्रथमार्थ में लक्षित चार प्रकारों का उदाहरण देकर द्वितीय कारिकार्थ में स्वीकृत छः अन्य प्रकारों के क्रमशः उदाहरण दिये जा रहे हैं—‘विवक्षिताभिधेय का’ इत्यादि के द्वारा । ‘प्रातुम्’ का अर्थ है पूरा करने के लिये । ‘धने:’ में बहुवचन ‘जो जिसका प्रार्थी है उसका उसके द्वारा’ यह सूचित करने के लिये । अतएव अर्थी शब्द का प्रयोग किया है । ‘जन का’ इसका व्युत्पत्त्यर्थ है—बहुलता से लोक धन का अर्थी होता है गुणों से उपकार का अर्थी नहीं ‘दैव के द्वारा’ यह । अर्थात जिससे भलीभाँति प्रश्न किया ही नहीं जा सकता । मैं यह । अन्य कोई इस प्रकार का अवश्य उत्पन्न किया गया है, मैं नहीं, यही निवेदन है । प्रसन्न अर्थात् लोकोपयोगी जल को जो धारण करता है । ‘अथवा कूप’ । अर्थात् लोक के द्वारा न देखा जाता हुआ । ‘आत्मसमानाधिकरण के रूप में’ यह ‘जड़’ अर्थात् जिसका यह विवेक ही न हो कि किसकी प्रार्थना किस प्रकार की है । अतएव जड़ अर्थात् शीतल अर्थात् निवेदसन्ताप रहित । उसी प्रकार जड़ अर्थात् शीतल जल से संयुक्त न होने से परोपकारसमर्थ । इस तृतीय अर्थ के द्वारा यह जड़ शब्द तड़ाग के अर्थ के साथ पुनरुक्तसम्बन्धवाला है इस अभिप्राय से कहते हैं—‘कूपसमानाधिकरणता को’ । ‘अपनी शक्ति से’ यह शब्दशक्त्युद्भव को योजित करता है ।
तृतीय
उद्योत:
तारावती
प्रथम कारिका के प्रथम दल में अविवक्षितवाच्य के दो भेद बतलाये गये थे—पदप्रकाश्य और वाक्यप्रकाश्य । अविवक्षित तवाच्य के पूर्वोक्त दोनों भेदों के साथ इन दोनों भेदों को गुणित करने पर इसके चार भेद हो जाते हैं—पदप्रकाश्य अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य,
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पदप्रकाश्य अर्थान्तरसंंक्रमितवाच्य, वाक्यप्रकाश्य अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य और वाक्यप्रकाश्य अर्थान्तरसंंक्रमितवाच्य। यहाँ तक इन चारों भेदों की व्याख्या की जा चुकी और उनके उदाहरण दिये जा चुके। अब कारिका के उत्तरार्ध की व्याख्या प्रारम्भ की जाती है। इसमें कहा गया है कि विवक्षितान्यपरवाच्य का उपभेद अनुरणनरूप्यदृश्य भी पद और वाक्य के द्वारा प्रकाशित होता है। इसके छह भेद होते हैं जिनके उदाहरण नीचे दिये जा रहे हैं—
(४) विवक्षितवाच्य के अनुरणरूप व्यंग्य (संलक्ष्य क्रमव्यंग्य) में शब्दशक्त्युद्भव की पदप्रकाश्यता का उदाहरण—
'यदि मैं देव के द्वारा धन से याचक-जनों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए नहीं पैदा किया गया तो मार्ग में निर्मल जल को धारण करनेवाला तड़ाग, कुआँ या जड़ ही क्यों नहीं बना दिया गया?'
यहाँ पर 'प्राप्तु' धातु का प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ है पूरा करना। इससे व्यंग्यार्थ निकलता है कि वक्ता तब तक सन्तुष्ट नहीं होना चाहता जब तक वह याचकों को उतना न दे दे जितना याचक चाहते हों। ( प्राप्तु के 'तुमुन्' प्रत्यय का व्यंग्यार्थ है कि वक्ता अपने जन्म की सफलता इसी में समझता है कि वह याचकों की आकांक्षा पूरी कर सके।) 'धनों से' में बहुवचन से सूचित होता है कि जो व्यक्ति जो भी चाहता हो उसको वही मिलना चाहिए। अर्थी या याचक शब्द के ग्रहण का भी यही आशय है। 'याचक-जन' में 'जन' शब्द का व्यंग्यार्थ यह है कि अधिकतर लोग धन की आकांक्षा ही रखते हैं, गुणों के द्वारा उपकृत होने की इच्छा बहुत कम लोगों को होती है। 'देव के द्वारा' को व्यंजना यह है कि देव सर्वथा स्वतन्त्र होता है वह दृष्टिगोचर भी नहीं होता। उसने मुझे जैसा बना दिया है मुझे वैसा ही स्वीकार करना पड़ेगा। मैं उससे किसी प्रकार का कोई शिकवा भी नहीं कर सकता। 'अस्मि' 'हूँ' में उत्तमपुरुष तथा एक वचन का व्यंग्यार्थ यह है कि परमात्मा ने ऐसा मुझे नहीं बनाया और लोगों को बनाया है। तड़ाग निर्मल अर्थात् लोकोपयोगी जल को धारण करता है जिससे वह निरन्तर लोक की आकांक्षा पूरी करता रहता है। (इस वाक्य के द्वारा लोचनकार ने तड़ाग से 'अम्बुधर' की व्युत्पत्ति नहीं है जैसा कि कुछ लोगों ने समझा है)। 'अथवा कूप' की व्यंजना यह है कि या तो मैं लोक का उपकार कर सकता या लोक के द्वारा मैं देखा ही न जा सकता
वक्ता इस बात से बहुत विरक्त हो गया है कि लोक तो उससे धन की अभिलाषा रखता है किन्तु उसमें इतनी शक्ति नहीं है कि वह उनकी आकांक्षा पूरी कर सके। अतएव उसने अपने लिए जड़ शब्द का प्रयोग किया है। जो कि वक्ता के समान-धिकरण होने के कारण उससे 'जड़त्व के अभेद' का परिचायक है। (जहाँ प्रतिपदिकार्थ प्रथमा विभक्ति होती है वहाँ दोनों शब्दों में अभेद के अतिरिक्त अन्य कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता।) इस प्रकार वाच्यार्थ का पर्यवसान वक्ता और जड़ के समानाधिकरण में ही हो जाता है। इसके बाद 'जड़' शब्द के अर्थ के बल पर अनुरणनरूप में कूप से भी समानाधिकरण व्याप्त होता है। जड़ शब्द के तीन अर्थ हो सकते हैं—(१) किंकर्तव्य-
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३
तृतीय उद्योतः
विमूढ़ (२) शीतल और (३) जल से युक्त । वक्ता और कूप का इन तीनों अर्थों के बल पर सामानाधिकरण्य इस प्रकार होगा—(१) जिस प्रकार अचेतन होने के कारण कुआँ अपने कर्तव्य को समझ नहीं सकताक्योंकि उसे इस बात का ज्ञान ही नहीं हो पाता कि किसकी क्या याचना है उसी प्रकार वक्ता भी ज्ञानशून्य बन जाने की कामना कर रहा है जिससे न तो याचकों की याचना का अनुभव ही हो ओर न उसके कारण वेदना ही उत्पन्न हो । (२) कूप सदा शीतल रहता है उसे निर्वेद और सन्ताप का अनुभव ही नहीं होता । उसी प्रकार वक्ता भी कामना करता है कि वह सदा शीतल रहे और उसे निर्वेद तथा सन्ताप का अनुभव ही न हो । (३) जिस प्रकार शीतल जल से युक्त होने के कारण कुआँ परोपकार करने में लगा रहता है उसी प्रकार वक्ता भी कामना कर रहा है कि वह भी धन से सम्पन्न हो, जिससे वह भी दूसरों का उपकार कर सके । यद्यपि इस 'जड' शब्द का अन्वय तड़ाग के साथ भी हो सकता है । किन्तु उसका तीसरे अर्थ के साथ सम्बन्ध उचित प्रतीत नहीं होता । क्योंकि तड़ाग के लिये 'निर्मल जल धारण करने वाला' यह विशेषण दिया ही जा चुका है । अतएव जड के तीसरे अर्थ के साथ उसकी पुनरुक्ति की सम्भावना हो जाती है । अतः 'जड' शब्द का कूप के साथ ही सम्बन्ध ध्वनित होता है । इसीलिये कूपसामानाधिकरणता बतलाई है । इस प्रकार यहाँ पर जड शब्द से प्रकाशित होनेवाली शब्दशक्त्युद्भवध्वनि है । 'अपनी शक्ति से कूपसमानाधिकरणता को प्राप्त हो जाता है' में अपनी शक्ति से कहने का अर्थ है शब्दशक्त्युद्भवत्व के द्वारा ।
३
तृतीय उद्योतः
( ध्वन्या० )—तस्यैव वाक्यप्रकाशता यथा हर्षचरिते सिंहनादवाक्येषु 'वृत्तेऽस्मिन्महाप्रलये धरणीधारणायाधुना त्वं शेषः ।' एतद्वि वाक्यमनुरणनरूपमर्थान्तरं शब्दशक्त्या स्फुटमेव प्रकाशयति ।
( अनु० ) उसी की वाक्यप्रकाश्यता जैसे हर्षचरित में सिंहनाद के वाक्यों में—'इस महाप्रलय के हो जाने पर पृथ्वी को धारण करने के लिए तुम शेष हो ।' यह वाक्य निस्सन्देह अनुरणनरूप अर्थान्तर को स्फुट रूप में शब्दशक्ति के द्वारा प्रकाशित करता है ।
३
तृतीय उद्योतः
( लो० )—महाप्रलय इति । महस्य उत्सवस्य आसन्नताप्रलयो यत्र तादृशि शोककारणभूते वृत्ते धरण्या राज्यधुराया धारणायाश्वासनाय त्वं शेषः शिष्यमाणः । इतोयता पूर्णे वाक्यार्थे कल्पावसाने भूपीठभारोद्धरणक्षम एको नागराज एवं दिगदन्तप्रभृतिष्वपि प्रलयेऽविशिष्टव्युत्पत्त्यन्तरम् ।
( अनु० ) 'महाप्रलय' यह मह अर्थात् उत्सव का चारों ओर से जहाँ प्रलय उस प्रकार के शोककारणभूत वृत्त में धरणी अर्थात् राजधुर के धारण करने के लिये अर्थात् आश्वासन के लिये तुम शेष अर्थात् बचे हुये हो । इस इतने वाक्यार्थ के पूर्ण हो जाने पर दूसरा अर्थ यह ( आ जाता है )—कल्पावसान में दिग्गज इत्यादि के प्रलय हो जाने पर भी भूपीठभार के उद्वहन में समर्थ केवल नागराज ही है ।
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तारावती-( २ ) उसी शब्दशक्त्युन्मीलित ध्वनि की वाक्यप्रकाश्यता का उदाहरण जैसे—बाण रचित हर्षचरित में प्रभाकर वर्धन की भी मृत्यु हो चुकी है और राज्यवर्धन को भी गौडाधिप ने मिथ्या विश्वासों से जाल में फँसाकर एकान्त में मार डाला है। उस समय हर्ष का सेनापति हर्ष को समझाते हुये कह रहा है कि—‘इस महाप्रलय के हो जाने पर पृथ्वी को धारण करने के लिये तुम शेष हो।’ इस वाक्य का वाच्यार्थ ‘इस’ शब्द के प्रयोग के कारण प्राकरणिक अर्थ में नियन्नित हो जाता है। वाच्यार्थ इस प्रकार है—‘इस मह अर्थात् उत्सव के आप्रलय अर्थात् चारों ओर से पूर्ण प्रलय के उपस्थित होने पर केवल तुम्हीं शेष बचे हुये हो जो पृथ्वी की मर्यादा को अथवा राज्यधुर को स्थिर रख सकते हो।’ (क्योंकि राज्य का भार संभालनेवाले तुम्हारे पिता तथा बड़े भाई दोनों का मरण हो चुका है जिससे राज्य का आनन्दोत्सव पूर्णरूप से समाप्त हो गया।) इसके बाद महाप्रलय तथा शेष शब्दों के बल पर दूसरा अर्थ निकलता है। इन दोनों अर्थों का उपमानोपमेय भाव हो जाता है। ‘जिस प्रकार महाप्रलय होने पर पृथ्वी को धारण करने वाले वाराह शूकर इत्यादि सभी नष्ट हो जाते हैं, उस समय केवल शेष नाग ही पृथ्वी को धारण कर सकता है, उसी प्रकार उत्सव को समाप्त करनेवाले अपने पूर्वजों के महानाश के उपस्थित होने पर केवल तुम्हीं शेष रह गये हो जिन पर पृथ्वी की रक्षा के लिये विश्वास किया जा सकता है। इस प्रकार यहां पर सम्पूर्ण वाक्य से अनुरणननयाय से शब्दशक्तिमूलक ध्वनि निकलती है, यह बात स्पष्ट ही है।
( ध्वन्या० )-अस्यैव कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्ठपदार्थशक्त्युन्मीलितवै प्रभेदे पदप्रकाश्यता यथा हरिविजये— चूडामणिप्रसरमहघनघणमहर्षिसुरामोऽम् । असमपिपाँ वि रहिँ कुसुमसरेण महुमासलच्छमुहुम् ॥ अत्र ह्वासर्मपिततमपोल्लयेतदवस्थाविधायिपदर्मर्थशक्ल्या कुसुमशरस्य बलात्कारं प्रकाशयति ।
(अनु०) इसी (विवक्षितान्यपरवाच्य) के उपभेद कविप्रौढोक्तिमात्र निष्ठपन्न शरीर की पदप्रकाश्यता का उदाहरण जैसे हरिविजय में— ‘बहुमूल्य महोत्सव के प्रसार के कारण मनोहर सुरामोदवाले आम्रमञ्जरी के आभूषणों से युक्त वसन्त मास की लक्ष्मी के मुख को कामदेव ने बिना किसी के प्रदान किए हुए स्वयं ग्रहण कर लिया।’ यहां पर ‘बिना दिये हुए ही कामदेव ने मधुमासलक्ष्मी के मुख को ग्रहण कर लिया’ में बिना दिये हुए यह अवस्था का कहनेवाला पद अर्थशक्ति से कामदेव के बलात्कार को प्रकाशित करता है।
(लो०)—चूताडूरवतंसं क्षणप्रसरमहर्घमनोहरसुरामोदम् । महाघ्रेण उत्सवप्रसरेण मनोहरसुरस्य मन्मथदेवस्य आमोदश्चमत्कारो यत्र तत् ।
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तृतीय
उद्योतः
अत्र महाघंशब्दस्य परनिपातः;, प्राकृत नियमाभावात् । क्षण इत्युत्सवः । असम्पितमपि गृहीतं कुसुमसरेण मधुमासलक्ष्मीमुखम् । मुखं प्रारम्भो वक्त्रं च । तच्च सुरामोदयुक्तं भवति । मध्वारम्भे कामश्चित्तवृत्तिमाक्षिपतीत्येवानयमर्थः कविप्रौढोक्त्यार्थान्तरव्यञ्जकः सम्पादितः ।
(अनु०) 'बहुमूल्य उत्सव के प्रसार से मनोहर सुरामोदवाले आम्रमञ्जरी के आभूषण से युक्त' महाघ उत्सव के विस्तार से मनोहर सुर अर्थात् मनमथ देव का आमोद अर्थात् चमत्कार जिसमे विद्यमान हो वह । यहाँ महाघं शब्द का परनिपात (हो जाता है) क्योंकि प्राकृत मे नियम नही होता । 'क्षण' का अर्थ है उत्सव । 'कुसुमशर ने बिना ही दिये मधुमास-लक्ष्मी का मुख पकड़ लिया ।' मुख अर्थात् प्रारम्भ और वक्त्र । वह भी सुरा के आमोद से युक्त होता है । 'वसन्त के प्रारम्भ मे काम चित्तवृत्ति को आक्षिप्त कर देता है' यह इतना अर्थ कविप्रौढोक्त से अर्थान्तर का व्यञ्जक कर दिया गया है ।
तृतीय
उद्योतः
३
तारावती --( ३ ) इसी संलक्ष्यक्रमगद्यग्रन्थ मे अर्थशक्त्युद्भव के कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीर नामक भेद की पदप्रकाश्यता का उदाहरण— 'बहुमूल्य महोत्सव के प्रसार के कारण मनोहर सुरामोदवाले आम्रमञ्जरी के आभूषणों से युक्त वसन्त मास की लक्ष्मी के मुख को कामदेव ने बिना किसी के प्रदान किये हुए स्वयं ही ग्रहण कर लिया ।' यहाँ पर 'क्षणप्रसर महाघमनोहर सुरामोदम्' का अर्थ है महाघ अर्थात् बहुमूल्य बहुत बड़े उत्सव के द्वारा 'मनोहर सुर' अर्थात् कामदेव का आमोद अर्थात् चमत्कार जहाँ विद्यमान हैं । महाघं शब्द के 'क्षणप्रसर' शब्द का विशेषण है । अतः यहाँ पर महाघ का पूर्व प्रयोग होकर 'महाघक्षणप्रसर' यह रूप होना चाहिए । किन्तु प्राकृत मे पूर्वनिपात का ऐसा कोई हठ नियम नही है । क्षण शब्द का अर्थ है उत्सव । 'मनोहरसुरामोद' शब्द के दो अर्थ है (१) जिसमे मनोहर सुर कामदेव का आमोद अर्थात् चमत्कार विद्यमान हो और (२) जो मनोहर सुरा की गन्ध से युक्त हो । इसी प्रकार मुख शब्द के भी दो अर्थ है— प्रारम्भ और मुख । वसन्त के प्रारम्भ मे कामदेव का चमत्कार विद्यमान होता है और नायिका के मुख मे मदिरा की सुगन्ध आ रही है । इस वाक्य का केवल यही अर्थ है कि वसन्त के प्रारम्भ मे चित्त मे कामदेव का जागरण हो जाता है । यहाँ पर कामदेव का मधुमासलक्ष्मी के मुख को पकड़ लेना एक कविकल्पित वस्तु है । मधुमासलक्ष्मी ने मुख समर्पित नही किया है फिर भी कामदेव ने पकड़ लिया है । इससे नायिका की नवोढ़ा दशा की अभिव्यक्ति होती है । और नायक (कामदेव) पर हठी कामुक के व्यवहार का समारोप हो आता है । इस कविकल्पित वस्तु से नायक के नायिका पर बलात्कार की ध्वनि निकलती है । इस ध्वनि मे 'बिना किसी के दिये हुये' इस पद का
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अर्थ ही व्यञ्जक हैं । अतएव यहाँ पर कविप्रौढोक्तिसिद्ध वस्तु से पद से प्रकाशित होनेवाली अर्थशक्तिमूलक ध्वनि है ।
( ध्वन्या० )—अत्रैव प्रभेदे वाक्यप्रकाइयता यथोत्तम् प्राक्—‘सज्जेहि सुरहिमासो’ इत्यादि । अत्र ‘सज्जयति सुरभिमासो न तद्वदर्पयतनड्नाय शरात—नित्ययं वाक्यार्थः कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरो मनमथोन्माथमदनावस्थां वसन्तसमयस्य सूचयति ।
(अनु०) इसी में (विवक्षितवाच्य के) उपभेद (कविप्रौढोक्तिनिष्पन्नशरीर) की वाक्यप्रकाश्यता जैसा पहले उदाहरण दिया गया है—‘सज्जेहि सुरहिमासो’ इत्यादि । यहाँ पर 'वसन्तमास बाण तैयार कर रहा है; किन्तु कामदेव को प्रदान नहीं कर रहा है' यह वाक्यार्थ कविप्रौढोक्तिनिष्पन्नशरीर है और वसन्तसमय की (को हुई) कामदेव द्वारा उन्माथन और मदन की अवस्था को सूचित करता है ।
(लो०)—अत्र कविनिबद्धवस्तुप्रौढोक्तिशरीरार्थशक्त्युद्भवे पदवाक्यप्रकाशतायामुदाहरणद्वयं । प्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरः सम्भवी स्वतः । इतः प्राच्यकोरिकायं इत्यतैवोदाहृतत्वं भवेदित्यभिप्रायेण । तत्र पदप्रकाशता यथा—
सत्यं मनोरमा: कामा: सत्यं रम्या विभूतय: । किन्तु मत्ताझनापाझ्भझलोलं हि जीवितम् ॥
इत्यत्र कविना यो विरागी वक्ता निबद्धस्तत् शक्तिप्रौढोक्त्या जीवितशब्दोऽथंमूलतयेदं ध्वनयति—सर्व एवामी कामा विभूतयश्च स्वजीवितमात्रोपयोगिनः, तदभावे हि सद्योऽपि तैरसत्पात्यते, तदेव च जीवितं प्राणधारणरूपत्वात्प्राणवृत्तेश्चाच्चल्यादनास्थापदममिति विषयेऽपि वराकेषु, किं दोषोद्भोषणदैन्येन निजमेव जीवितमुपालभ्यम्, तदपि च निसर्गचञ्चलमिति न सापराधमिल्येतावता गाढं वैराग्यमिति वाक्यप्रकाशता यथा ‘शिखरिणी’त्यादौ ।
(अनु०) यहाँ पर कविनिबद्धवस्तु-प्रौढोक्तिशरीर अर्थशक्त्युद्भवे में पद और वाक्य द्वारा प्रकाश्यता के अन्तर्गत दो उदाहरण नहीं दिये । 'प्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्न शरीर और स्वतः सम्भवी' इस प्राच्य कारिका का इतने से ही उदाहृतत्व हो जावे इस अभिप्राय से । उसमें पदप्रकाश्यता जैसे—
‘काम सन्मुच मनोरम (होते हैं) विभूतियाँ भी सन्मुच रमणीय होती हैं किन्तु मत्त भ्रूणनाओं के अपाझ्भल के समान जीवन चञ्चल है ।’
यहाँ पर कवि ने जो विरागी वक्ता निबद्ध किया है उसकी प्रौढोक्ति से अर्थशक्तिमूलतया 'जीवित' शब्द यह ध्वनित करता है—ये सभी कामनायें और विभूतियाँ स्वजीवन मात्र की उपयोगिनी हैं उसके अभाव में निःसन्देह होते हुए भी वे न होने का रूप ही प्राप्त कर लिया करती हैं । वही जीवन प्राणधारण रूप होने से और प्राणवृत्ति की चञ्चलता से धास्था
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३
तृतीय उद्योतः
का स्थान नहीं है । इस प्रकार बेचारे विषयों के दोषोद्भोषण के दौर्जन्य से क्या अपने ही जीवन को उपालम्भ देना चाहिए । वह भी स्वभाव चञ्चल है । इस प्रकार वह भी अपराधी नहीं इतने से गाढ़ वैराग्य ध्वनित होता है । वाक्यप्रकाश्यता जैसे—‘शिखरिणी’ इत्यादि !
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तृतीय उद्योतः
तारावती—इसी कविप्रौढोक्तिनिष्पन्नशरीर नामक भेद की वाक्यप्रकाश्यता का उदाहरण जैसे—द्वितीय उद्योत में एक उदाहरण दिया गया था—‘वसन्त अभिनव आम्रमञ्जरी इत्यादि अनङ्ग के शरों को सज्जित कर रहा है किन्तु दे नहीं रहा है । ये अनङ्गशर नवीन पल्लव और पत्रों को देनेवाले हैं और इनके मुखों का लक्ष्य युवतियों का समूह हो है ।’ वहाँ बतलाया जा चुका है कि ‘वसन्त केवल कामदेव के बाणों को तैयार ही कर रहा है अभी दे नहीं रहा है’ । इस कविप्रौढोक्तिसिद्ध वस्तु से वसन्तरसमय में कामदेव की क्रमशः प्रगाढ़ावस्था ध्वनित होती है । यह ध्वनि समस्त वाक्य से निकलती है । अतएव यहाँ पर कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिनिष्पन्नशरीर नामक भेद की पदप्रकाश्यता और वाक्यप्रकाश्यता के दो भेद नहीं दिये गये हैं । यथासम्भव इसका कारण यह हो सकता है कि ‘प्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरः सम्भवी स्वतः’ । इस प्राचीनों की कारिका में अर्थशक्त्युद्भव ध्वनि के मूलभेद दो ही माने गये हैं—(१) प्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीर और (२) स्वतःसम्भवी । इसी आधार पर यहाँ पर केवल दो भेदों के उदाहरण दिये गये हैं । किन्तु इस अर्थशक्त्युद्भव ध्वनि का कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध नामक एक भेद और होता है । उसके दोनों उदाहरण इस प्रकार दिये जा सकते हैं—
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तृतीय उद्योतः
( क ) कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध नामक भेद में पदप्रकाश्यता का उदाहरण—
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तृतीय उद्योतः
'सच यह है कि काम्य वस्तुयें मनोरम होतीं हैं, यह भी सच है कि सम्पत्तियाँ भी मनोहर होती हैं, किन्तु जीवन तो मत्त अगनाओं के अपांगों के भंग के समान चञ्चल है ।’ यहाँ पर विरागी व्यक्ति एक कविनिबद्ध वक्ता है । ‘जीवन अंगनाओं के अपांगभंग के समान चञ्चल है’ यह उसी विरागी व्यक्ति की प्रौढोक्ति है । उससे अर्थशक्ति से यह ध्वनि निकलती है—‘जितनी भी सांसारिक कामनायें और विभूतियाँ हो सकती हैं उनका एकमात्र उपयोग जीवन के लिये ही है । जीवन न होने पर उनका रहना भी न रहने के समान हो जाता है । प्राणों का धारण करना ही जीवन है और प्राणवृत्ति चञ्चल होती है । अतएव जीवन का कोई विश्वास नहीं किया जा सकता । फिर बेचारे दोषों के उद्धोषण का दौर्जन्य ही क्यों दिखलाया जाये ? अपने जीवन को ही दोष देना चाहिए । अथवा वह जीवन भी स्वाभाविक रूप में चञ्चल है । अतः उसका भी क्या अपराध ? यही कारण है कि जीवन के प्रति प्रगाढ़ वैराग्य उत्पन्न हो जाता है । यहाँ पर यह ध्वनि जीवित शब्द से निकलती है । अतएव कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध वस्तु से पदशक्त्युद्भवध्वनि का यह उदाहरण है ।
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तृतीय उद्योतः
( ख ) उसी की वाक्यप्रकाश्यता का उदाहरण—जैसे पहले आया हुआ उदाहरण ‘शिखरिणी क् व नु नाम—’ इत्यादि पद्य । इसमें रसिक व्यक्ति कविनिबद्धवक्ता है । विम्बफल का
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तपस्या करना केबल उसी कविनिबद्धवक्ता की प्रौढोक्तिसिद्ध वस्तु है। उससे उस व्यक्ति की अधरचुम्बन विषयक अभिलाषा ध्वनित होती है। अतएव यह कविनिबद्धवक्तृ-प्रौढोक्तिसिद्ध वस्तु से वाक्यप्रकाश्य ध्वनि का उदाहरण है।
स्वतः सम्भाविशरीरार्थंशक्त्युद्भवे प्रमेे पदप्रकाशता यथा—
वारणअ हस्तिदन्ता कुरता अथ्याण वाधाकिता अ । जाव लुलिआलअमुही घरअम्म परिसक्कए सुह्धा ।। atra लुलितालकमुखीयेतपदं व्याधवध्वा: स्वतःसम्भावितशरीरार्थंशक्त्या सुरतक्रीडासक्ति सूचयन्स्तवकस्य भर्तुः सततसम्भोगक्षामातां प्रकाशयति ।
(अनु०) स्वतः सम्भवी शरीर अर्थशक्त्युद्भव नामक उपमेद में पदप्रकाश्यता का उदाहरण—
'हे व्यापारी ! हमारे घर में हस्तिदांत और व्याघ्रचर्म तब तक कहाँ जब तक कि चूर्णकुन्तल से सुशोभित मुखवाली हमारी पुत्रवधू घर में विलास के साथ घूम रही है ।'
यहाँ पर 'लुलितालकमुखी' यह पद स्वतः सम्भावित शरीरीवाली अर्थशक्ति से व्याधवधू की सुरतक्रीडासक्ति को सूचित करते हुये उसके पति की निरन्तर सम्भोगजन्य क्षीणता को प्रकाशित करता है।
यावल्लुलितालकमुखी गृहे परिष्वककते स्नुषा । इति छाया । सविभ्रमं चडक्रमयते । अत्र लुलितेत स्वरूपमात्रेण विशेषणमवलसितया च हस्तिदन्ताद्यपाहरणं सम्भाव्यमिति वाक्यार्थस्तावत्प्रव न काचिदनुपपत्ति: ।
(लो०)—वाणिजक हस्तिदन्ता: कुतोऽस्माकं व्याघ्रकृत्तयरच । (अनु०) 'ऐ बनिये (व्यापारी) कहाँ से हमारे (यहाँ) हस्तिदांत और व्याघ्रचर्म जब तक मुख पर केशों को छिटकाये हमारी पुत्रवधू घरमें विचरण कर रही हैं। विलासपूर्वक इधर-उधर घूम रही है। यहाँ लुलित इत्यादि विशेषण स्वरूप से और अवलिप्त के गर्व (तथा प्रमाद) से हस्तिदन्त इत्यादि के आहरण की सम्भावना की जा सकती है। अतः वाक्यार्थ के उतने से ही (विरत हो जानेपर) कोई अनुपपत्ति नहीं होती।
तारावती—(५) अनुरणनरूप व्यञ्जन में स्वतः सम्भवी भेद की पदप्रकाश्यता का उदाहरण—किसी व्यापारी ने किसी वृद्ध व्याघ से हाथी दांत और व्याघ्रचर्म को देने के लिये कहा, इसपर वह वृद्ध व्याध कहने लगा—
'हे वणिक् ? जब तक हमारे घर में हमारी पुत्रवधू अपने मुख पर केशों को फहराती हुई घूम रही है तब तक हमारे घर में कहाँ से हाथी दांत आये और कहाँ से व्याघ्रचर्म आया ? यहाँ पर व्याघवधू का अपने मुख पर केशों को फहराते हुये घूमना वाच्य वस्तु है जो कि लोक में स्वतः सम्भव है। इससे अर्थशक्ति से यह ध्वनित होता है कि व्याघ का पुत्र अपनी पत्नी के सौन्दर्य पर रीझकर उसके विलासों को देखता रहता है और सहवास में ही अपना मन लगाये रहता है जिससे वधू के केश निरन्तर छूटे रहते हैं तथा मुखपर मंडराते रहते हैं।
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तृतीय
उद्योत:
व्याघ्र का पुत्र निरन्तर सम्भोग के कारण अत्यत क्षीण हो गया है और वह हाथियों और बाघों को ही मार सकता है जिससे घर में हाथीदांत और व्याघ्रचर्म मिल सके। केशों का छूटे रहना और मुख पर मंडराना यह विशेषण स्वरुपमात्र ( स्वभावोक्ति के रूप में ) भी हो सकता है और हाथीदांत इत्यादि का न लाना प्रमाद से भी सम्भव है । अतएव वाच्यार्थ की विश्रान्ति इतने में ही हो जाती है और इसमें कोई अनुपपत्ति नहीं रह जाती । अतः संभोगक्षामता इत्यादि व्याजःञ्च ही है। इस प्रकार यहाँ पर स्वतःसम्भवी वस्तु से पदप्रकाश्य अर्थशक्तिमूलक ध्वनि निकलती है ।
तृतीय
उद्योत:
(ध्वन्यो)——तस्यैव वाच्यप्रकाशता यथा——
तृतीय
उद्योत:
सिहिपिच्छकर्णऊरा बहुआ वाहस्य गविररी भमइ । मुत्ताफलरइअवसाहणाणं मज्झे सवत्तीणमु ।।
तृतीय
उद्योत:
अनेनापि वाच्येन व्याघ्रवध्वा: शिखिपिच्छकर्णपूर्णाया नवपरिणीताया: कस्याचिच्चसौभाग्यातिशय: प्रकाश्यते । तत्संभोगैकतत्स मयूरमात्रमारणसमर्थ: पतिर्यात इत्यर्थप्रकाशनात् । तदन्यासां चिरपरिणीतानां मुक्ताफलरचितप्रसाधनानां दौर्भाग्यतिशय: व्याघ्रयते: ।।तत्संभोगकाले स एव व्याघ्र: करिवरवधव्यापारसमर्थ आसोदित्यर्थप्रकाशनात् ।
(अनु०) उसी की वाच्यप्रकाश्यता जैसे—— 'मयूर पिछ्छ के कर्णपूर को धारण किये हुये व्याघ्र की बहू मुक्ताफल के द्वारा प्रसाधन को बनाये हुये सपत्नियों के बीच में गर्व के साथ घूम रही है ।'
तृतीय
उद्योत:
इस वाक्य के द्वारा भी किसी नवपरिणीता, मयूरपिच्छ का कर्णपूर धारण करनेवाली, व्याघ्रवधू के सौभाग्य की अधिकता प्रकाशित की जाती है । क्योंकि इससे यह अर्थ प्रकाशित होता है कि एकमात्र उसके सम्भोग में ही लगा हुआ पति केवल मयूर मारने की शक्तिवाला बन गया । उसके भिन्न मुक्ताफल का प्रसाधन करनेवाली चिरपरिणीता सौतों के दुर्भाग्य की अधिकता प्रकट होती है । क्योंकि इससे यह अर्थ निकलता है कि उनके सम्भोग काल में वही व्याघ्र बड़े बड़े हाथियों के बंध के कार्य में समर्थ था ।
तृतीय
उद्योत:
(लो०)—सिहिपिच्छेति । पूर्वमेव योजिता गाथा ।
तृतीय
उद्योत:
(अनु०) 'शिखि पिछ्छ' इति । इस गाथा की योजना तो पहले ही की जा चुकी ।
तृतीय
उद्योत:
तारावती——( ६ ) उसी स्वतः सम्भवी भेद की वाक्यप्रकाश्यता का उदाहरण——
तृतीय
उद्योत:
'मयरपिच्छ के कर्णाभरण बनाये हुये व्याघ्र की तनु मुक्ताफलों के आभूषणों को धारण करनेवाली अपनी सौतों के मध्य में अभिमानपूर्वक घूम रही है ।'
तृतीय
उद्योत:
इस गाथा की योजना पहले की जा चुकी है । इस वाक्य से भी मयूरपिच्छ का कर्ण-भरण धारण करने वाली नव परिणीता व्याघ्रवधू के सौभाग्य की अधिकता ध्वनित होती है । क्योंकि इससे यह प्रकट होता है कि उस नवपरिणीता वधू के संभोग का आनन्द लेने के कारण उसके पति में केवल इतनी ही शक्ति रह गई है कि वह मयूरों को मार सके । उसकी बहुत
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दिनों की याही हुई सौतों को यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हुवा था । उस समय उसका पति उन सब सौत्नियों में इतना अधिक अनुरक्त नहीं हुवा था और उसमें हाथियों के मारने की शक्ति बनी रही थी । वह हाथियों को मारकर मुक्ताफ़ल लाकर दिया करता था । अतएव यद्यपि नायिका की सौत्नियां मुक्ताफ़ल धारण किये हुये हैं और नायिका को मयूरापिच्छ ही मिल सके हैं किन्तु फिर भी नायिका का सौभाग्य प्रकट होता है और सौत्नियों का दुर्भाग्य प्रकट होता है । नायिका का मयूरापिच्छ धारण करना और सौतों में अभिमानपूर्वक घूमना स्वतः सम्भवी वस्तु है । उससे नायिका के सौभाग्य रूप में वाक्यप्रकाश्यध्वनि निकलती है ।
( ध्वन्य० ) ननु ध्वनि: काव्यविशेष इत्युक्तं तत्कथं तस्य पदप्रकाश्यता । काव्यविशेषो हि विशिष्टार्थप्रतिपत्तिहेतुः शब्दसन्दर्भविशेषः । तद्द्वारवच पदप्रकाश्यत्वे नोपपद्यते । पदानाں स्मारकत्वेनावाचकत्वात् । उच्यते—स्यादेष दोषः यदि वाचकत्वं प्रयोजकं ध्वनिव्यवहारे स्वातन्त्र्येण । न त्वेवम् । तस्य व्यङ्ग्यक्त्वेन व्यवस्थानात् । किन्तु काव्यानां शरोराणामिव संस्थाविशेषावच्छिन्नसमुदायस्यापि चारुत्वप्रतौति-रत्नघटिततिरेकाभ्यां भागेभु कल्प्यत इति पदानाामपि व्यङ्ग्यक्त्वमुखेन व्यवस्थितो ध्वनिव्यवहारो न विरोघी ।
(अनु०) (प्रश्न) एक विशेष प्रकार का काव्य ध्वनि बतलाई गई है फिर उसका पद के द्वारा प्रकाशित होना कैसे हो सकता है ? निस्सन्देह विशेष प्रकार के अर्थ की प्रतिपत्ति में कारण विशेष प्रकार का शब्द-सन्दर्भ ही विशेष प्रकार का काव्य होता है । पदप्रकाश्य में उसका होना सिद्ध नहीं होता । क्योंकि स्मारक होने के कारण पद वाचक नहीं होते । (इसके) उत्तर में कहा जा रहा है—यह दोष होता यदि वाचकत्व ध्वनि-व्यवहार में प्रयोजक होता । किन्तु ऐसा नहीं है । उसकी व्यवस्था तो व्यङ्ग्यक्त्व के द्वारा होती है । दूसरी बात यह है कि शरोरों के समान काव्यों की भी चारुत्वप्रतीति विशेष प्रकार के अवयवसंस्थान से घटित समुदाय के द्वारा ही यद्यपि सिद्ध होती है तथापि अन्वय-व्यतिरेक से भागों में कल्पना कर ली जाती है । इस प्रकार व्यङ्ग्यक्त्व के द्वारा व्यवस्थित पदों का ध्वनिव्यवहार व्यवस्थित नहीं है ।
( लो० )—नन्वति । समुदाय एव ध्वनिरित्यत्र पक्षे चोद्यमेतत् । तद्द्वारवच्चेति । काव्यविशेषत्वमित्यर्थः । अवाचकत्वादिति यद्युक्तं सोऽ्यमप्रयोजको हेतुरिति छलेन तावद्दर्शयति—स्यादेष दोष इति । एवं छलेन परिहृत्य वस्तुतस्तेनापि परिहरति-किंचेदिति । यदि परो बूयात्—न मया अवाचकत्वं ध्वनिव्यवहारे हेतुकृतं किंतु काव्यं चानाकाङ्क्षप्रतिपत्तिकारि वाक्यं न पदमिति तत्राह—सत्यमेवेति । तथापि पदं न ध्वनिरित्यस्माभिरुक्तम् अपि तु समुदाय एव, तथा च पदप्रकाशो ध्वनिरिति प्रकाशापदेनोक्तम् । ननु पदस्य तत्र तथाविधं सामर्थ्यमिति कुतोऽखण्ड एव प्रतीतिक्रम इत्याशङ्क्याह काव्यानामिति । उक्तं हि प्रागिवेकेकाले विभागोपदेश इति ।
(अनु०) 'ननु' इति । समुदाय में ही ध्वनि होती है इस पक्ष में यह प्रश्न उठता है । 'तद्द्वारव' इति । अर्थात् काव्यविशेषत्व । 'अवाचक होने से' जो कहा यह अप्रयोजक हेतु है
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तृतीय उद्योतः
यह छल से दिखलाते हैं-'यह दोष होता' इत्यादि । इस प्रकार छल से परिहार करके वस्तुवृत्त से भी परिहार कर रहे हैं-'किञ्च'-यदि दूसरा कहे कि 'मैंने अवाचकत्व को ध्वनि के अभाव में हेतु नहीं बनाया किन्तु यह कहा है कि काव्य ध्वनि है और काव्य आकांक्षारहित प्रतिपत्ति करानेवाला वाक्य होता है पद नहीं' इस विषय में कहते हैं— यह सच है, तथापि हमलोगों ने यह नहीं कहा कि पद ध्वनि है । अपितु समुदाय ही ( ध्वनि है । ) इसीलिये 'ध्वनि पदप्रकाश होता है' यह प्रकाश शब्द के द्वारा कहा है । 'यदि वहाँ पर पद का इस प्रकार का सामर्थ्य है तो अखण्ड प्रतीतिक्रम जिस प्रकार हंगा?' यह शङ्का करके कहते हैं—'काव्यों का' यह । निःसन्देह पहले ही कहा गया है कि विवेकाल में विभाग का उपदेश होता है ।
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तृतीय उद्योतः
तारावती—( ऊपर वाक्यप्रकाश्य तथा पदप्रकाश्य ध्वनि भेदों के उदाहरण दिये गये । यहाँ पर अब यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि ध्वनि पदसमूह में रहती है और समूह की बोधक ही होती है । फिर यह कहना किस प्रकार सङ्गत हो सकता है कि ध्वनि एक पद के द्वारा प्रकाशित होती है ? )
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तृतीय उद्योतः
( प्रश्न ) आपने यह बतलाया है कि वाचक, वाच्य और व्यङ्गच के समुदायको ध्वनि कहते हैं । यह एक विशेष प्रकार का काव्य होता है । काव्य एक विशेष प्रकार के शब्दों के समूह को कहते हैं, जो विशेष प्रकार के अर्थ की प्रतिपत्ति करानेवाला होता है । दूसरी ओर आप कह रहे हैं कि ध्वनि शब्द के द्वारा प्रकाशित होती है । यदि ध्वनि का शब्द के द्वारा प्रकाशित होना मान लिया जावे तो शब्दसमूह के द्वारा सत्ता में आनेवाला काव्यत्व ध्वनि में किस प्रकार सिद्ध हो सकेगा ? पद केवल स्मारक होते हैं वाचक नहीं होते । फिर ध्वनि का पदप्रकाश्यत्व किस प्रकार सङ्गत हो सकता है ? यह प्रश्न इस पक्ष को मानकर किया गया है कि ध्वनि समुदाय को कहते हैं । पहले ध्वनि के अनेक अर्थ बतलाये थे और यह सिद्धान्तित किया था कि ध्वनि सभी के समूह को कहते हैं । ( उत्तर ) सिद्धान्ती ने यहाँ पर दो उत्तर दिये हैं—एक तो पूर्वपक्षी को निस्तुत्तर करने के लिए उसकी बात काटने के मन्तव्य से छल-पूर्वक दिया गया है जिससे सिद्धान्त की बात छिपा लो गई है । प्रश्नकर्त्ता के प्रश्न का सारांश यह था कि ध्वनि पद के द्वारा इसलिए प्रतीत नहीं हो सकती कि पद वाचक नहीं होते ।
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तृतीय उद्योतः
( सिद्धान्ततः ) वाक्यस्फोट ही मुख्य होता है । जिस प्रकार शब्द में प्रत्येक अक्षर का कोई अर्थ नहीं होता उसी प्रकार वाक्य में प्रत्येक शब्द का कोई अर्थ नहीं होता ।) वैैयाकरणों का सिद्धान्त है कि जिस प्रकार 'घट' शब्द में 'घ' का पृथक् कोई अर्थ नहीं है उसी प्रकार 'घटो भवति' में 'घट' शब्द का भी कोई अर्थ नहीं है । सम्पूर्ण वाक्य का ही अर्थ होता है किन्तु समस्त वाक्यों का अर्थ बतला सकना असम्भव हैं इसीलिए वाक्यगत पदों की कल्पना कर लो जाती है और पदों में भी वर्णों की कल्पना कर लो जाती है । यही बात वैैयाकरण-भूषणसार की निम्नलिखित कारिका में कही गई है :—
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तृतीय उद्योतः
पदे न वर्णा विद्यन्ते वर्णेष्ववयवा न च । वाक्यात्पदानामत्यन्तं प्रविवेको न कश्चन ॥
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अर्थात् पद में वर्ण नहीं होते जैसे 'ए' 'ओ' इत्यादि वर्णों में 'अ + इ' 'अ + उ' इत्यादि अवयव पारमार्थिक नहीं होते । वाक्य से पदों का कोई भी पृथक् विवेक ( भेद ) नहीं होता ।
वैयाकरण 'भवति' इत्यादि शब्दों में 'भू + अ + ति' इत्यादि विभाजन कल्पित उपाय मात्र मानते हैं :
उपाया: शिक्षमाणानां बालानामुपलालनाः । असत्ये वस्तुनि स्थितत्वात् ततः सत्यं समीहते ॥
शिक्षण प्राप्त करनेवाले बालकों के लिए व्याकरण के उपाय लालनमात्र हैं । ( जैसे खेल में बालक ) असत्य मार्ग पर स्थित होकर फिर सत्य की आकांक्षा करता है ।
उत्तरपक्षी का कहना है कि यह सच है कि पद अवाचक होते हैं किन्तु ध्वनि का प्रयोजक वाचकत्व होता भी तो नहीं । ध्वनि का प्रयोजक तो व्यंजकत्व होता है । यदि व्यंजकता विद्यमान है तो पद वाचक हों या न हों ध्वनि तो हो ही सकती है । इस प्रकार छलपूर्वक उत्तर देकर वस्तुवृत्त के द्वारा अर्थात् वास्तविकता को प्रकट करते हुए उत्तर दिया जा रहा है ।
उक्त उत्तर पर प्रश्नकर्ता कह सकता है कि मेरा आशय यह नहीं है कि पद इसीलिए ध्वनित नहीं कर सकता कि वह वाचक नहीं होता किन्तु मेरा कहने का आशय यह है कि ध्वनि काव्य को कहते हैं । काव्य एक ऐसे पदसमूहरूप वाक्य को कहते हैं जिसमें आकांक्षा विद्यमान न रह जावे अर्थात् जिससे पूर्ण अर्थ की प्रतोति हो सके । पद अकेला काव्य नहीं हो सकता । ( प्रश्न ) जब पद काव्य नहीं हो सकता तब पद ध्वनि कैसे हो सकता है ?
(उत्तर) मैं यह नहीं कहता कि पद ध्वनि या काव्य होता है । मैं ध्वनि तो समुदाय को ही मानता हूँ किन्तु मेरा कहना यह है कि ध्वनि पद के द्वारा प्रकाशित हुआ करती है । इसलिए प्रकाश शब्द का विशेष रूप से प्रयोग किया गया है । समुदाय में होते हुए भी ध्वनि पद के द्वारा प्रकाशित तो हो ही सकती है ।
( प्रश्न ) जब ध्वनि पद के द्वारा प्रकाशित हो सकती है तो शेष काव्य वाक्य से उसका क्या सम्बन्ध रह जाता है ? उमी पद को काव्य क्यों नहीं मान लिया जाता ? अखण्ड वाक्य को काव्य क्यों कहा जाता है ?
( उत्तर ) यह पहले ही बतलाया जा चुका है कि काव्य एक शरीर है । शब्द इत्यादि उसके अङ्ग होते हैं । जिस प्रकार यद्यपि शरीर में चारुता की प्रतीति विशेष प्रकार के सन्निवेश से युक्त समुदाय के द्वारा ही हो सकती है तथापि शरीर में कोई एक विशेष अवयव ऐसा प्रतीत होता है जिसके होने से चारुता की प्रतीति होती है और न होने से चारुता की प्रतीति नहीं होती । अतएव उस व्यक्ति के सौन्दर्य की कल्पना उसी अङ्ग में कर ली जाती है । उसी प्रकार काव्य में भी चारुता सम्पूर्ण वाक्य में ही होती है किन्तु उसमें हेतु किसी एक पद की उपस्थिति ही हो जाती है । अतएव व्यंजकत्व के द्वारा पदों के लिये भी ध्वनि शब्द का व्यवहार किया जा सकता है । उसमें कोई विरोध नहीं आता ।
अनिष्टस्य श्रुतियन्धदापादयति दुष्टताम् । श्रुतिदुष्टस्यापि व्यक्तं तद्विशिष्टश्रुतिगुणम् ॥
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तृतीय उद्योत:
पदानां स्मारकत्वेऽपि पदमात्रावभासिनः । तेन ध्वने: प्रभेदेषु सर्वेष्वेवास्ति रम्यता ॥ विच्छित्तिशोभिनैकेन भूषणेनैव कामिनी । पद्धत्योत्पेन सुकवीनां भाति भरती ॥
इति परिकरश्लोका: (अनु०) श्रुतिदुष्ट इत्यादि दोषों में अनिष्ट का श्रवण जिस प्रकार दुष्टता का सम्पादन करता है उसी प्रकार इष्टतस्मरण गुण का सम्पादन कर सकता है ।।१।। 'इस कारण पदों के स्मारक होते हुए भी केवल पद से प्रकाशित होनेवाली ध्वनि के सभी भेदों में रमणीयता होती है ।।२।। 'जिस प्रकार विच्छित्ति के द्वारा शोभित होनेवाले एक ही भूषण से कोई कामिनी शोभित होने लगती है उसी प्रकार पद के द्वारा श्रोतव्य ध्वनि से अच्छे कवि की वाणी शोभित होती है ।।३।। ये परिकर इलोक हैं ।
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तृतीय उद्योत:
(लो०)-ननु भागेषु पदरूपेषु कर्थं सा चारुत्वप्रतीतिरप्यतुं शक्या ? तानि हि स्मारकाण्येव । ततः किम् ? मनोहारिव्यंग्यार्थस्मारकत्वाद्वा चारुत्वप्रतीतिनिबन्धनत्वं केन वार्यते ? यथा श्रुतिदुष्टतां पेलवादिपदानामसभ्यपेलाद्यर्थं प्रति न वाचकत्वम् । अपि तु स्मारकत्वम् । तद्रश्रुच्च चारुस्वरूपं काव्यं श्रुतिदुष्टम् । तच्च श्रुतिदुष्टत्वमन्वयव्यतिरेकाभ्यां भागेषु व्यवस्थाप्यते तथा प्रकृतेऽपि तदाह— अनिष्टार्थस्मारकस्यैवार्थः । दुष्टतामित्यचारुत्वम् । एवं दृष्टान्तमभिधाय पादत्रयेण तुर्थेण दार्ष्टान्तिकार्थ उक्तः। अधुनोपसंहरति—पदानामिति । यत एवमिष्टस्मृतिहेतुना सर्वेषु प्रकारेषु निरुपितस्य पदमात्रावभासिनोदपि पदप्रकाशस्यापि ध्वने रम्यतास्ति स्मारकत्वेऽपि पदानामिति समन्वयः । अपिशब्दः काकाक्षिन्यायेनोभयत्रापि सम्बध्यते । अधुना चारुत्वप्रतीतौ पदानमन्वयव्यतिरिरेकौ दर्शयति—विच्छित्तीति ॥
(अनु०) (प्रश्न) पदरूप भागों में उस चारुत्वप्रतीति का आरोप कैसे किया जा सकता है ? (उत्तर) इससे क्या ? मनोहर व्यंग्यार्थ को स्मरण कराने के कारण निःसंदेह वे चारुत्वप्रतीति में निबन्धन होते हैं । इसको कौन रोक सकता है ? जैसे श्रुतिदुष्ट 'पेलव' इत्यादि पदों में असभ्य 'पेल' इत्यादि अर्थ के प्रति वाचकत्व नहीं होता । अपितु स्मारकत्व ही होता है । उसके वश से चारुस्वरूप काव्य श्रुतिदुष्ट होता है और वह श्रुतिदुष्टत्व अन्वय-व्यतिरेक से भागों में स्थापित किया जाता है वैसा प्रकार में भी है । वही कहते हैं—'अनिष्ट का' अर्थात् अनिष्ट अर्थ के स्मारक का । दुष्टता का अर्थ है अचारुत्व । गुण का अर्थ है चारुत्व । तीन पदों से दृष्टान्त कहकर चौथे से दार्ष्टान्तिक अर्थ कहा है । अब उपसंहार करते हैं—'पदों का' यह । क्योंकि इस प्रकार की इष्ट स्मृति चारुत्व को धारण करती है । इस हेतु से सभी प्रकारों में निरुपित तथा पदमात्र से अवभासित होनेवाले भी अर्थात्
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पदप्रकाश्य भी ध्वनि की सस्यता पदों के स्मारक होते हुए भी होती है, यह समन्वय है । अपिशब्द कौवे की आँख के न्याय से दोनों ओर सम्बद्ध हो जाता है । इस समय चारुत्वप्रतीति में पद के अन्वय-व्यतिरेक कां दिखलाते हैं —‘विच्छित्ति’ इत्यादि ॥१॥
तारावती-(प्रश्न) पदरूप भागों में उस चारुता की प्रतीति का आरोप हो ही किस प्रकार सकता है ? पद तो केवल अर्थ के स्मारक होते हैं । (उत्तर) पद अर्थ के स्मारक होते हैं इससे क्या हुआ ? वे मनोहर व्यंग्यार्थ का स्मरण कराते हैं । अतएव वे चारुताप्रतीति में कारण होते हैं । इस बात में किस को आपत्ति हो सकती है ? उदाहरण के लिये श्रुतिदुष्ट पेलव शब्द को लीजिये । यह शब्द कोमल अर्थ का वाचक है, अस्म्य पेलव (वृषण) का वाचक नहीं है, केवल उस अर्थ का स्मरण करा देता है । इसी स्मरण करा देने के कारण ही सुन्दर रूपवाला यह काव्य श्रुतिदुष्ट दोष से दूषित हो गया है । जहाँ पर इस प्रकार के अस्म्य अर्थ के स्मारक भाग होते हैं वहाँ पर श्रुतिदुष्ट इत्यादि दोष होते हैं, जहाँ पर इस प्रकार के भाग नहीं होते वहाँ पर ये दोष भी नहीं होते । इस प्रकार अन्वय-व्यतिरेक से श्रुतिदुष्ट इत्यादि दोष भागों में ही माने जाते हैं । इसी प्रकार अन्वय-व्यतिरेक के नियम से ही चारुता की प्रतीति में हेतुता भी भागों में ही मानी जाती है । यही बात इस परिकर श्लोक में कही गई है—
जिस प्रकार श्रुतिदुष्ट इत्यादि दोषों में अनिष्ट का श्रवण दुष्टता का आपादन करता है उसी प्रकार इष्ट का स्मरण गुण का स्पष्ट रूप में आपादन करता है । ‘अनिष्ट का श्रवण’ शब्द में अनिष्ट शब्द का अर्थ है अनिष्ट का स्मरण कराने वाला शब्द । दुष्टता का अर्थ है अचारुता । गुण का अर्थ है चारुता । इस प्रकार तीन चरणों में दृष्टान्त कहा और चौथे चरण में दाष्टान्तिक कह दिया । अब दूसरे श्लोक में उपसंहार कर रहे हैं—
‘अतएव यद्यपि पद स्मारक होते हैं, तथापि केवल पद से प्रकाशित होनेवाले ध्वनि के समस्त उपभेदों में रमणीयता विद्यमान रहती ही है ।’ क्योंकि इष्ट का स्मरण चारुता का आवाहन करनेवाला होता है । इसी कारण केवल पद के द्वारा अवभासित होनेवाले भी ध्वनि के उन समस्त उपभेदों में जिनका निरूपण पहले किया जा चुका है रमणीयता विद्यमान रहती ही है । यद्यपि पद होते स्मारक ही हैं । इस कारिका का समन्वय इसी रूप में करना चाहिये । कारिका में आया हुआ अपि शब्द उसी प्रकार दोनों ओर लग जाता है जिस प्रकार कौवे की दोनों आँखों में एक ही पुतली घूमती रहती है । इस प्रकार ‘अपि’ शब्द का ‘स्मारकत्व’ के साथ भी अन्वय होता है और ‘पदमा-त्रावभासिनः’ के साथ भी । अब तृतीय श्लोक में चारुत्वप्रतीति में पद का अन्वय-व्यतिरेक दिखलाया जा रहा है—
‘जैसे किसी कामिनी का कोई एक ही आभूषण ऐसा होता है जो कि सबसे पृथग्भूत होकर शोभा का परिपोष किया करता है और उससे कामिनी का सारा शरीर जगमगा उठता है किन्तु उस भूषण की शोभा सर्वोपरि अवगत होती रहती है उसी प्रकार कवि की भारती में भी कोई एक पद ही इतना अच्छा होता है कि वह विच्छित्त्यन्तवि-
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तृतीय उद्योत:
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वाक्ये संघटनयादृश्र स प्रबन्धेऽपि दीप्यते ॥ २ ॥
(अनु०) जोकि असंललक्ष्य क्रमव्यङ्ग्य ध्वनि होती है वह वर्ण पद इत्यादि में वाक्य में संघटना में और प्रबन्ध में भी दीप्त होती है ॥ २ ॥ (लो०)—एवं कारिकां व्याख्याय तदसङ्गृहीतमललक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य' प्रपञ्चयितुमाह -यस्त्विति । तुशब्दः पूर्वमेदेभ्योऽस्य विशेषोक्तः। वर्णसमुदायश्च पदम् । तत्समुदायो वाक्यम् । सङ्घटना पदगता वाक्यगता च । सङ्घटनितवाक्यसमुदायः प्रबन्धः इत्यभिप्रायेण वर्णादीनां यथाक्रममुपादानम् । आदिशब्देन पदैकदेशपदद्वितयादीनां ग्रहणम् । ससम्या निमित्तत्वमुक्तम् । दीप्यतेऽवभासते सकलकाव्यावभासकतयेति पूर्ववत्काव्यविशेषत्वं समीर्ततम् ॥ २॥ (अनु०) इस प्रकार कारिका की व्याख्या करके उसके द्वारा असंगृहीत असंललक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य को प्रपञ्चित करने के लिये कहते हैं—'यस्त्विति । तु शब्दः पूर्वमेदेभ्योऽस्य विशेषोक्तः है । वर्णसमुदाय को पद कहते हैं, उसके समुदाय को वाक्य कहते हैं । सङ्घटना पदगत भी होती है और वाक्यगत भी । सङ्घटित वाक्यसमुदाय को प्रबन्ध कहते हैं । इस अभिप्राय से वर्णों का यथाक्रम उल्लेख किया गया है । आदि शब्द से पद के एक देश, दो पद इत्यादि का ग्रहण होता है । ससम्या से निमित्तत्व कहा गया है । सकल काव्य के अवभासक के रूप में दीप्त किया जाता है अर्थात् अवभासित किया जाता है; इस प्रकार पूर्ववत् काव्य-विशेष का समर्थन कर दिया गया है ॥ २ ॥
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तृतीय उद्योत:
असंललक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य की व्यञ्जकता का उपक्रम तारावती—उपर प्रथम कारिका की व्याख्या की गई । इस कारिका से अविवक्षितवाच्य ध्वनि के उपमेदों और विवक्षितवाच्य के असंललक्ष्यक्रम-व्यङ्ग्य के उपमेदों की व्याख्यता का निरूपण कर दिया गया कि ये सब ध्वनियाँ पद और वाक्य से अभिव्यक्त होती हैं । अब ध्वनि के उपमेदों में शेष रह जाता है, असंललक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य विवक्षितानन्यपरवाच्य नामक उपमेद । उसके व्यञ्जक तत्त्वों को दूसरी कारिका में विस्तारपूर्वक बतलाया जा रहा है— 'जो कि असंललक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यच नामक ध्वनिभेद है वह तो वर्ण और पद इत्यादि में तथा वाक्य में, संघटना में और प्रबन्ध में भी दीप्त होता है ।' यहाँ पर 'तो' का अर्थ यह है कि असंललक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यच से भिन्न जिन ध्वनिभेदों का पहली कारिका में उल्लेख किया गया था उन भेदों से इसमें कुछ विलक्षणता होती है । यहाँ पर व्यञ्जकतत्त्वों का क्रम एक विशेष मन्तव्य से रखा गया है—असंललक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यच का सबसे छोटा व्यञ्जक वर्ण होता है । इसीलिये वर्ण का उल्लेख सबसे पहले किया गया है । वर्णसमुदाय को पद कहते हैं, पदसमुदाय को वाक्य कहते हैं । अतएव वर्ण के बाद पद और पद के बाद वाक्य का उल्लेख किया गया है । संघटना दो प्रकार की होती है पदगत और वाक्यगत । अतएव संघटना का उसके बाद उल्लेख है । संघटित वाक्यसमूह ही प्रबन्ध कहलाता है । इसी अभिप्राय से वर्ण इत्यादि का यथाक्रम उल्लेख हुआ है । 'पद इत्यादि में' पद इत्यादि का आशय यहु है कि असंललक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यच की
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(ध्वन्यालोके)—तत्र वर्णानामनर्थकत्वाद्व्यङ्कत्ववमर्थवैचित्र्याशङ्क्येदमुख्यते— शषौ सरेफसंयोगो टकाररुचापि भूससा । विरोधिनः स्यु: शृङ्गारे तेन वर्णा रसच्युतः ॥ ३ ॥ त एवं तु निवेष्टव्यौ बीभत्सादौ रसे यदा । सदास्तां दीप्यतैयेव तेन वर्णा रसच्युतः ॥ ४ ॥
अभिव्यक्ति पद के एकदेश, दो पद इत्यादि से भी होती है। 'पदादिषु' में सप्तमी निमित्त में है। अर्थात् वर्ण पद इत्यादि असंललक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि में निमित्त होते हैं। 'दीप्यते' का अर्थ है अवभासित होता है। अवभासित कहने का आशय यह है कि वर्ण इत्यादि एक देश में स्थित होकर नवीन विच्छित्ति के साथ ध्वनि का प्रत्यायन कराते हुये समस्त काव्य को अवभासित कर देते हैं। इस प्रकार पहले जैसे पद की अवभासकता के द्वारा काव्यविशेष का समर्थन किया गया था उसी प्रकार यहाँ पर वर्ण इत्यादि की अवभासकता का समर्थन हो गया ॥ २ ॥ (अनु०) उसमें वर्णों के अनर्थक होने के कारण व्यङ्गक्ता असम्भव है। यह शंका करके कहा जा रहा है— अधिक संख्या में 'श्' और 'ष्' 'रेफ' के अधिक संयोग से युक्त वर्ण, टकार की अधिकता, ये शृङ्गार में विरोधी होते हैं। अत एवं वर्ण रस को प्रवाहित करनेवाले होते हैं ॥ ३ ॥ वे ही जब बीभत्स इत्यादि रस में निविष्ट किये जाते हैं तब उसको दीप्त करते ही हैं। अतः वर्ण रस के प्रकट करनेवाले होते हैं ॥ ४ ॥ दो श्लोकों के द्वारा अन्वय-व्यतिरेक से वर्णों की द्योतकता दिखाई गई है। (लो०)—भूयसेति प्रत्येकमभिसंबध्यते। तेन शकारो भूयसेत्यादि व्याख्यात- व्यम् । रेफप्रधानसंयोग: कर्हेन्द्र इत्यादि: । विरोधिन इति । पुरुषावृत्तिविरोधिनी शृङ्गारस्य यतस्ते वर्णा भूयसा प्रयुज्य- माना न रसांशच्योतन्ति तस्मै । यदि वा तेन शृङ्गारविरोधित्वेन हेतुना वर्णा शषा- दयो रसाच्छृङ्गाराच्च्यवन्ते तं न व्यज्जयन्तीति व्यतिरेक उक्तः । अन्वयमाह—त एवं तात्पर्येण व्याचष्टे—इलोकद्वयेनैति। यथासंख्यप्रसङ्गेऽपरिहारार्थ श्लोकावस्यामिति लक्षणे शाषादिप्रयोग: सुकवित्वमभिवाञ्छता न कर्तव्य इत्येवं फलत्वादुपदिशास्य कारिकाकारेण पूर्वं व्यतिरेक उक्तो द्वितीयेनान्वयः । अस्मिन् विषये शृङ्गार- लक्षणे शाषादिप्रयोग: सुकवित्वमभिवाञ्छता न कर्तव्य इत्येवं फलत्वादुपदेशास्य कारिकाकारेण पूर्वं व्यतिरेक उक्तो द्वितीयेनान्वयः । अस्मिन् विषये शृङ्गार- कारिकाकारेण पूर्वं व्यतिरेक उक्तः । न च सर्वथा न कर्तव्योऽपि तु बीभत्सादि कर्तव्य एवेतिपश्चादन्वयः । पूर्तिकारण त्वन्वयपूर्वको व्यतिरेक इति शैलीमनुसर्तुंमन्वयः पूर्वमुपात्तः ।
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तृतीय उद्योतः
एतदुक्तं भवति—यद्यपि विभावानुभावव्यभिचारिप्रतीतिसम्पदेव रसास्वादे निबन्धनम्। तथापि विशिष्टश्रुतिकशब्दसमर्थ्यम्ानास्ते विभावादयस्तथा भवन्तीति स्वसंवित्तिसिद्धमः। तेन वर्णनात्पि श्रुतिसमयोपलब्ध्यम्ानार्थनपेक्ष्यपि श्रोत्रैकग्राह्यो मूढपुरुषात्मा स्वभावो रसास्वादे सहकार्येव। अत एव च सहकारितामेवाभिधातुं निमित्तसप्तमी कृतात वर्णपदादिष्विति। न तु वर्णैरेअ रसाभिव्यक्ति:, विभावादिसंयोगाद्धि रसनिष्पत्तिरित्युच्यते बहुशः। श्रोत्रग्राह्यादिप च स्वभावो रसोनिष्पन्ने व्याप्त्रिप्रयत एव, अपदगीतध्वनिवत् पुष्करवाद्यनियमितविशिष्टजातिकरणग्राण्यानुकरणशब्दवच्च।
(अनु०) ‘भूयसा’ इसका अभिसम्बन्ध प्रत्येक के साथ होता है। इसलिए ‘शकार अधिकता से’ इत्यादि व्याख्या की जानी चाहिये। रेफप्रधान संयोग-‘कं हृं’ इत्यादि। ‘विरोधी का’ यह परुषा वृत्ति शृङ्गार की विरोधिनी है। क्योंकि वे वर्ण अधिकता से प्रयोग किये हुये रस को ह्वित नहीं करते। अथवा शृङ्गारविरोधित्व हेतु से श ष इत्यादि वर्ण शृङ्गार से च्युत हो जाते हैं अर्थात् उसको व्यक्त नहीं करते। यह व्यतिरेक कहा गया है। अन्वय कहते हैं—‘वे ही तो’ यह। ‘हा’ इत्यादि। ‘उसको’ अर्थात् बीभत्स इत्यादि रस को। ‘दीप्त करते हैं’ अर्थात् उद्दीप्त करते हैं। दो कारिकाओं की तात्पर्य के द्वारा व्याख्या करते हैं—‘दो श्लोकों के द्वारा’ यह। यथासंख्या के प्रसंग के परिहार के लिये ‘श्लोकाभ्याम्’ यह नहीं लिखा। पूर्वश्लोक से व्यतिरेक कहा। द्वितीय से अन्वय। शृङ्गार लक्षण इस विषय में ष श इत्यादि प्रयोग सुकवित्व की इच्छा करनेवाले के द्वारा नहीं किया जाना चाहिये। उपदेश के इसो फल के कारण कारिकाकार ने पहले व्यतिरेक कहा। वह सर्वथा नहीं किया जाना चाहिये यह नहीं अपितु बीभत्स इत्यादि में किया ही जाना चाहिये यह वाद में अन्वय (कहा गया है)। वृत्तिकार ने तो अन्वयपूर्वक व्यतिरेक इस शैली का अनुसरण करने के लिये अन्वय का उपादान किया है यह बात कही हुयी है—यद्यपि विभाव अनुभव और व्यभिचारी भाव की प्रतीति की सम्पत्ति ही रसास्वादन में हेतु है। तथापि यह तो स्वसंवेदन सिद्ध है कि विशिष्ट श्रुतिवाले शब्दों से समर्थित किये जाते हुये वे विभाव इत्यादि जैसे हो जाते हैं। इससे वर्णों के भी सुनने के समय में उपलक्षित किये जाते हुये अर्थ को बिना ही अपेक्षा किये हुये भी केवल श्रोत्र से ही ग्रहण करने योग्य मूढ-पुरुष इत्यादि आत्मावाला स्वभाव रसास्वाद में सहकारी ही होता है। और इसीलिये सहकारिता को कहने के लिये ‘वर्ण पद इत्यादि में’ इसमें निमित्त सप्तमी की गई है। वर्णों से ही रसाभिव्यक्ति नहीं होती, विभाव इत्यादि के संयोग से ही रस की निष्पत्ति होती है यह बहुत बार कहा जा चुका है। केवल श्रोत्र के द्वारा ग्राह्य भी स्वभाव रसास्वादन को व्यक्त कर ही लेता है जैसे अपद गीतध्वनि और पुष्कर वाद्य से नियमित विशिष्ट जाति करण ध्वान इत्यादि के अनुकरण शब्द।
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तृतीय उद्योतः
तारावती—अब यहाँ पर यह शङ्का उत्पन्न होती है कि वर्ण तो सर्वथा निरर्थक होते हैं वे असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य के द्योतक किस प्रकार हो सकते हैं? इसका उत्तर निम्नलिखित दो कारिकाओं में दिया जा रहा है—
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'अधिक संख्या में ष और ष का प्रयोग, रेफ के संयोग से युक्त वर्ण, टकार ये शृङ्गार रस में विरोधी होते हैं । अत एव वर्ण रस को प्रवाहित करनेवाले वे ही जब बीभत्स इत्यादि रस में निविष्ट किये जाते हैं तब उसको दीप्त ही करते हैं। अत एव वर्ण रस को प्रवाहित करनेवाले होते हैं ।
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इन दो कारिका-वाक्यों में अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा वर्णों की व्योतकता सिद्ध की गई है ।
'अतिसंख्या' (अधिकता में) 'ष' का प्रयोग, अधिकता से 'श' का प्रयोग इत्यादि वर्ण शृङ्गार रस को प्रवाहित करनेवाले नहीं होते । यही व्याख्या करनी चाहिये । (दीर्घतिकार ने 'सरेफसंयोगो' यह पाठ माना कर 'र' के संयोग के साथ 'ष' और 'श' शृङ्गाररसोपघातक होते हैं यह अर्थ किया है । किन्तु यह अर्थ ठीक नहीं है । क्योंकि रेफ का बहुलता से किसी वर्ण के साथ संयोग शृङ्गार का उपघातक होता ही है ।) 'सरेफसंयोग' का अर्थ है रेफप्रधान संयोग जैसे कं हं दृं इत्यादि । ये वर्ण शृङ्गार रस के विरोधी हैं कहने का आशय यही है कि परुषा वृत्ति शृङ्गार रस की विरोधिनी होती है । (भट्टोद्भट ने परुषा वृत्ति की परिभाषा ही यह की है कि 'ष और श, रेफ संयोग तथा ट वर्ग से संयुक्त की हुई वृत्ति को परुषा वृत्ति कहते हैं ।') कारिका में 'रसंघात' शब्द का प्रयोग किया गया है । इसका व्याख्या दो प्रकार से की जा सकती है—(१) रस को च्युत या क्षरित करनेवाले । क्योंकि बाहुल्य से 'ष' इत्यादि का प्रयोग शृङ्गार रस को क्षरित नहीं करता अतः सिद्ध होता है कि वर्ण रस को प्रवाहित करनेवाले होते हैं । अथवा (२) उस शृङ्गारविरोधी हेतु से 'ष' इत्यादि वर्ण शृङ्गार रस से च्युत हो जाते हैं अर्थात् उसे अभिव्यक्त नहीं करते, इससे सिद्ध होता है कि वर्ण रस के अभिव्यंजन में निमित्त होते हैं । तीसरी कारिका में व्यतिरेक के द्वारा साध्य सिद्धि की गई है । व्यतिरेकी हेतु का स्वरूप यह होगा—'जहाँ पर रस के अविरोधी वर्णों का अभाव होता है (और विरोधी वर्णों की सत्ता होती है) वहाँ पर रस का भी अभाव होता है । जैसे शृङ्गार रस के विरोधी 'ष' इत्यादि के बहुल प्रयोग से रस च्युत या क्षरित नहीं होता अथवा वह काव्य रस से च्युत हो जाता है । इससे सिद्ध होता है कि वर्ण रस के व्यञ्जक होते हैं । इस प्रकार तीसरी कारिका में व्यतिरेकी हेतु दिखलाकर चौथी कारिका में अन्वय दिखलाया जा रहा है—अन्वयव्याप्ति का रूप यह है—'जहाँ रस के अविरोधी वर्ण होते हैं वहाँ रस च्युत या क्षरित होता है । जैसे बीभत्स इत्यादि कठोर रसों के अविरोधी वहाँ बीभत्स इत्यादि रस अभिव्यक्त होता है । इससे सिद्ध होता है कि वर्ण रस के व्यञ्जक होते हैं । 'वे ही वर्ण' अर्थात् 'ष' इत्यादि । 'उसको' अर्थात् बीभत्स इत्यादि को । 'दीप्त करते हैं' अर्थात् द्योतित करते हैं ।
वृत्तिकार ने उक्त कारिकाओं का तात्पर्य इस प्रकार लिखा है कि—'श्लोकद्वय से अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा वर्णों की द्योतकता दिखलाई गई है ।' यहाँ पर वृत्तिकार ने 'दो श्लोकों के द्वारा' न लिखकर 'श्लोकद्वय के द्वारा' यह लिखा है । इसका कारण यह है कि यदि 'दो श्लोकों से अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा' यह लिखा होता तो इसका अर्थ यह हो सकता
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तृतीय उद्योतः
था कि प्रथम इलोक में अन्वय दिखलाया गया है और दूसरे इलोक में व्यतिरेक । इसीलिये 'इलोकद्वय' शब्द का प्रयोग किया गया है जिससे उक्त दोष नहीं आता । वास्तविकता इससे विपरीत है । वस्तुतः पहली कारिका में व्यतिरेक बतलाया गया है और दूसरी में अन्वय । परम्परानुसार पहले अन्वय दिखला कर ही व्यतिरेक दिखलाया जाना चाहिये । किन्तु कारिकाकार ने यह परिवर्तन इसीलिये कर दिया है कि कारिका लिखने का प्रयोजन यह उपदेश देना है कि यदि सुकवि बनने की इच्छा हो तो इस श्रृंगार रस के क्षेत्र में श ष इत्यादि का प्रयोग नहीं करना चाहिये। यही उपदेश देने के लिये कारिकाकार ने पहले व्यतिरेक बतलाया है । फिर अन्वय यह दिखलाने के लिये बतलाया है कि इस कथन का आशय यह नहीं है कि श ष इत्यादि का प्रयोग कहीं करना ही नहीं चाहिये, अपितु बीभत्स इत्यादि में इन वर्णों का प्रयोग करना ही चाहिये । वृत्तिकार ने स्वाभाविक वृत्ति का अनुसरण करने के लिये पहले अन्वय शब्द का प्रयोग किया और बाद में व्यतिरेक का ।
था कि प्रथम इलोक में अन्वय दिखलाया गया है और दूसरे इलोक में व्यतिरेक । इसीलिये 'इलोकद्वय' शब्द का प्रयोग किया गया है जिससे उक्त दोष नहीं आता । वास्तविकता इससे विपरीत है । वस्तुतः पहली कारिका में व्यतिरेक बतलाया गया है और दूसरी में अन्वय । परम्परानुसार पहले अन्वय दिखला कर ही व्यतिरेक दिखलाया जाना चाहिये । किन्तु कारिकाकार ने यह परिवर्तन इसीलिये कर दिया है कि कारिका लिखने का प्रयोजन यह उपदेश देना है कि यदि सुकवि बनने की इच्छा हो तो इस श्रृंगार रस के क्षेत्र में श ष इत्यादि का प्रयोग नहीं करना चाहिये। यही उपदेश देने के लिये कारिकाकार ने पहले व्यतिरेक बतलाया है । फिर अन्वय यह दिखलाने के लिये बतलाया है कि इस कथन का आशय यह नहीं है कि श ष इत्यादि का प्रयोग कहीं करना ही नहीं चाहिये, अपितु बीभत्स इत्यादि में इन वर्णों का प्रयोग करना ही चाहिये । वृत्तिकार ने स्वाभाविक वृत्ति का अनुसरण करने के लिये पहले अन्वय शब्द का प्रयोग किया और बाद में व्यतिरेक का ।
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तृतीय उद्योतः
यहाँ पर कहने का आशय यह है कि यद्यपि रसास्वाद में विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव की प्रतीति की कारण होती है तथापि वह स्वादन सिद्ध ही है । वह इस प्रकार की श्रुतिवाले शब्दों से जब विभाव इत्यादि का समर्थन होता है तब वे काव्य-रस के विशेष रूप से पोषक होते हैं । यही कारण है कि जब वर्ण श्रवण-गोचर होते हैं उस समय वर्ण तो उपलक्षित हो जाते हैं किन्तु उनका अर्थ श्रोत्र ज्ञात नहीं होता । उस समय जिन कोमल या कठोर वर्णों के कानो से प्रत्यक्ष किया जाता है वे बिना ही अर्थ की अपेक्षा किये हुये रसास्वादन के सहकारी हो जाते हैं । अर्थात् यह ज्ञात हो जाता है कि अमुक स्थान पर अमुक रस है । इसी सहकारिता के अर्थ को प्रकट करने के लिये कारिका में निमित्तसप्तमी का प्रयोग किया गया है—'वर्णपदादिषु' । आशय यह है कि वर्णों से रस-निष्पत्ति नहीं होती, वर्ण तो रस-निष्पत्ति में निमित्त मात्र होते हैं । रसनिष्पत्ति के लिये विभावादिसंयोग की अपेक्षा होती है यह कई बार बतलाया जा चुका है । किन्तु वर्णों का कोमल या कठोर रूप से अपना भी एक स्वभाव होता है जिसका ग्रहण केवल श्रोत्र से ही होता है । वह स्वभाव भी रस के अभिव्यञ्जन को व्याप्त कर लेता है । जिस प्रकार ऐसे गाने को सुनकर जिसमें पद विद्धमान न हो अथवा ढोल इत्यादि वाद्यों के लिये नियमित विशिष्ट प्रकार के जाति और करण ग्रहण इत्यादि के अनुकरण को सुनकर यह प्रतीत हो जाता है कि अमुक गान अमुक रस सम्बन्धी है उसी प्रकार अक्षरों के माधुर्य इत्यादि के आधार पर बिना ही अर्थ जाने इतना मालूम पड़ जाता है कि अमुक पद्य अमुक रस प्रवण है । अतः एवं वर्णों की अभिव्यञ्जकता सर्वथा अक्षुण्ण है ।
यहाँ पर कहने का आशय यह है कि यद्यपि रसास्वाद में विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव की प्रतीति की कारण होती है तथापि वह स्वादन सिद्ध ही है । वह इस प्रकार की श्रुतिवाले शब्दों से जब विभाव इत्यादि का समर्थन होता है तब वे काव्य-रस के विशेष रूप से पोषक होते हैं । यही कारण है कि जब वर्ण श्रवण-गोचर होते हैं उस समय वर्ण तो उपलक्षित हो जाते हैं किन्तु उनका अर्थ श्रोत्र ज्ञात नहीं होता । उस समय जिन कोमल या कठोर वर्णों के कानो से प्रत्यक्ष किया जाता है वे बिना ही अर्थ की अपेक्षा किये हुये रसास्वादन के सहकारी हो जाते हैं । अर्थात् यह ज्ञात हो जाता है कि अमुक स्थान पर अमुक रस है । इसी सहकारिता के अर्थ को प्रकट करने के लिये कारिका में निमित्तसप्तमी का प्रयोग किया गया है—'वर्णपदादिषु' । आशय यह है कि वर्णों से रस-निष्पत्ति नहीं होती, वर्ण तो रस-निष्पत्ति में निमित्त मात्र होते हैं । रसनिष्पत्ति के लिये विभावादिसंयोग की अपेक्षा होती है यह कई बार बतलाया जा चुका है । किन्तु वर्णों का कोमल या कठोर रूप से अपना भी एक स्वभाव होता है जिसका ग्रहण केवल श्रोत्र से ही होता है । वह स्वभाव भी रस के अभिव्यञ्जन को व्याप्त कर लेता है । जिस प्रकार ऐसे गाने को सुनकर जिसमें पद विद्धमान न हो अथवा ढोल इत्यादि वाद्यों के लिये नियमित विशिष्ट प्रकार के जाति और करण ग्रहण इत्यादि के अनुकरण को सुनकर यह प्रतीत हो जाता है कि अमुक गान अमुक रस सम्बन्धी है उसी प्रकार अक्षरों के माधुर्य इत्यादि के आधार पर बिना ही अर्थ जाने इतना मालूम पड़ जाता है कि अमुक पद्य अमुक रस प्रवण है । अतः एवं वर्णों की अभिव्यञ्जकता सर्वथा अक्षुण्ण है ।
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संगीतशास्त्र का उदाहरण
संगीतशास्त्र का उदाहरण
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[ ऊपर वर्णों की रसाभिव्यञ्जकता सिद्ध करने के लिये संगीत शास्त्र के कुछ उदाहरण दिये गये हैं । यहाँ पर अनुमान की प्रक्रिया इस प्रकार होगी—वर्ण, रस के अभिव्यञ्जक होते हैं, क्योंकि अर्थ इत्यादि इतर तत्त्व की बिना ही अपेक्षा किये हुये रस-प्रत्यायन करा देते हैं, जैसे अपदगीत श्वानि या पुष्करवादनियमित्त जाति करण ग्रहण इत्यादि के अनुकरण शब्द ।
[ ऊपर वर्णों की रसाभिव्यञ्जकता सिद्ध करने के लिये संगीत शास्त्र के कुछ उदाहरण दिये गये हैं । यहाँ पर अनुमान की प्रक्रिया इस प्रकार होगी—वर्ण, रस के अभिव्यञ्जक होते हैं, क्योंकि अर्थ इत्यादि इतर तत्त्व की बिना ही अपेक्षा किये हुये रस-प्रत्यायन करा देते हैं, जैसे अपदगीत श्वानि या पुष्करवादनियमित्त जाति करण ग्रहण इत्यादि के अनुकरण शब्द ।
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व्याप्ति यह होगी—जो तत्त्व अर्थ इत्यादि इतर तत्त्व की बिना ही अपेक्षा किये हुए रसप्रत्यायन करा देते हैं वे रस के अभिव्यंजक होते हैं। अपदगीत ध्वनि इत्यादि तत्त्व अर्थ इत्यादि इतर तत्त्व की बिना ही अपेक्षा किये हुये रसप्रत्यायन करा देते हैं अतः वे रस के अभिव्यंजक माने जाते हैं, इसी प्रकार वर्ण भी अर्थ इत्यादि इतर तत्त्वों की बिना ही अपेक्षा किये रस का प्रत्यायन करा देते हैं अतः वे भी रसाभिव्यंजक होते हैं।
संगीत शास्त्र की रचना स्वरों के आधार पर हुई है। स्वर की परिभाषा यह है :—
श्रुत्यनन्तरभावी यः सुस्निग्धोञ्जुरणनात्मकः । स्वतो रक्षयति श्रोतुश्चित्तं स स्वर उच्यते ॥
अर्थात् ‘श्रुति के बाद उत्पन्न होनेवाली अनुरणनात्मक जो सुस्निग्ध ध्वनि होती है और जो बिना किसी अपेक्षा के स्वतः सुननेवाले के चित्त को अनुरंजित कर देती है उसे स्वर कहते हैं।
इससे स्पष्ट है कि स्वरों का निर्माण श्रुतियों से होता है। श्रुति की परिभाषा यह दी हुई है :—
प्रथमश्रवणाच्छ्रुतः श्रूयते ह्रस्वमात्रकः । सा श्रुतिः सम्प्रतीयेत स्वरावयवलक्षणा ॥
'जब हम पहले किसी शब्द को सुनते हैं तब वह केवल ह्रस्व हो सुनाई देता है। इस श्रुतिगोचर होनेवाली ध्वनि को श्रुति कहते हैं, इसका लक्षण है स्वर का अवयव होना ।' एक दूसरे ग्रन्थ में श्रुति का यह लक्षण दिया हुआ है :—
नित्यं गीतोपयोगित्वमभिज्ञैश्च मप्यतें । लक्षणं प्रोक्तं सुप्रयोज्यत्वं संगीतश्रुतिलक्षणम् ॥
'जो संगीत के लिये नित्य उपयोगी हो और जो प्रतितिगोचर किये जाने के योग्य हो तथा जिसकी निरूपण प्रयाप्त रूप में लक्ष्य की दृष्टि से किया गया हो यह संगीत-श्रुति का लक्षण है ।'
ऊपर की परिभाषाओं से स्पष्ट है कि प्रथम श्रुतिगोचर होनेवाली ध्वनि को संगीत में श्रुति कहते हैं। इन श्रुतियों के विभिन्न प्रकार के संयोग से स्वर बनते हैं। श्रुतियाँ तो साधारण ध्वनि हैं, किन्तु जब उनकी अनुरणनात्मक (प्रतिध्वनि रूप) आवृत्ति इस रूप में की जाती है कि उनमें सुस्निग्धता उत्पन्न हो जाती है तथा श्रोता को अनुरंजित करने की शक्ति आ जाती है तब उसे स्वर कहने लगते हैं। 'स्व' का अर्थ है स्वपद और 'र' का अर्थ है अनुरंजन करना। अर्थात् जब श्रुतियों का विभिन्न प्रकार का संयोग अनुरंजन योग्य बन जाता है तब उसे स्वर कहते हैं। विभिन्न स्वरों के लिये श्रुतियों की विभिन्न संख्या भी नियत है जो इस प्रकार है :—
चतुश्चतुश्चतुश्चैव षड्जमध्यमपञ्चमाः । द्वे द्वे निषादगान्धारौ त्रिस्री ऋषभधैवतौ ॥
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3
तृतीय उद्योतः
'षड्ज मध्यम और पञ्चम में चार-चार श्रुतियाँ होती हैं, निषाद और गान्धार में दो-दो तथा ऋषभ और धैवत में तीन-तीन श्रुतियाँ होती हैं ।' षड्ज और पञ्चम को छोड़कर अन्य स्वर दो-दो प्रकार के होते हैं—प्राकृत ( कोमल ) और विकृत (वैकृत)। इसी दृष्टि से लोचनकार ने लिखा है कि वर्णों का भी कोमल कठोरात्मक एक विशेष प्रकार का स्वभाव होता है जो अर्थ की अपेक्षा नहीं करता तथा उनकी श्रुति-समय के द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। ये वर्ण रसास्वादन में सहकारी होते ही हैं। वर्ण संगीतशास्त्र में चार प्रकार के माने जाते हैं—स्थायी, आरोही, अवरोही, और सञ्चारी। आशय यह है कि जब कोई व्यक्ति संगीत स्वरों का ही प्रयोग करता है और उसमें स्पष्ट शब्दों का प्रयोग नहीं होता उस समय भी काकु और ध्वनि के आश्रय से हर्ष, खेद, शोक, निर्वेद इत्यादि की प्रतीति हो ही जाती है। इसी प्रकार विभिन्न वर्णों के प्रयोग से भी रसाभिव्यक्ति होती है।
लोचनकार ने दूसरे उदाहरण दिये हैं जाति, करण और घ्राण के। जाति संगीत की कोटियों को कहते हैं जिनका विस्तृत विवेचन भरत के नाट्यशास्त्र में आतोद्यविधान के प्रकरण में किया गया है। संगीत में इस प्रकार का क्रम माना जाता है—श्रुतियोंसे स्वर, स्वर से ग्राम और ग्राम से मूर्छनाओं की उत्पत्ति होती है। ग्राम की परिभाषा यह है :—
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तृतीय उद्योतः
यथा कुडुम्बिनः सर्वैड्यैकीभूता वसन्त हि । तथा स्वराणां सन्दोहो ग्राम इत्यभिधीयते ।। ससस्वरास्तयो ग्रामाः मूर्छनाश्चैकविंशति ।
एक स्वर से आरम्भ करके क्रमशः सातवें स्वर तक आरोह करने के पश्चात् उसी मार्ग से अवरोह करने को मूर्छना कहते हैं। हर एक ग्राम में हर एक स्वर से आरम्भ करने पर एक ग्राम में सात मूर्छनायें सम्पन्न हो जाती हैं। तीन ग्रामों के आधार पर इन मूर्छनाओं की संख्या २१ मानी जाती है। वादी और संवादी में विभिन्नता होने पर भी एक ही मूर्छना से उत्पन्न रागों में कई लक्षण एक ही प्रकार के होते हैं। उन लक्षणों में न्यासस्वर प्रधान हैं। ससस्वरों में किसी भी एक स्वर को न्यास रूप में ग्रहण करनेवाली जाति की उत्पत्ति हो सकती है। जिस जाति में षड्जन्यास स्वर होता है उसका नाम षाड्जी है।
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तृतीय उद्योतः
इसी प्रकार आर्षभी गान्धारी इत्यादि जातियाँ बन जाती हैं। इनका विस्तृत विवेचन संगीत के ग्रन्थों में किया गया है। जब इनका नियमन वाद्यों के द्वारा होता है तब पद और अर्थ न होते हुये भी रसाभिव्यक्ति हो जाती है। संगीतज्ञों में आज भरत की जाति-ज्ञान प्रचलित नहीं हैं किन्तु इसमें सन्देह नहीं कि उनकी मूर्छना-पद्धति ने भारतीय संगीत को निश्चितात्मक रूपसे प्रभावित किया होगा। भरत-वर्णित श्रुति स्वर ग्राम और मूर्छना से जातियों का निकट का सम्बन्ध है। भरत ने १८ जातियों का विवेचन तो किया है किन्तु नाट्यशास्त्र में जाति का स्वरूप तथा उसकी व्युत्पत्तिमूलक व्याख्या कहीं नहीं दी गई हैं।
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व्युत्पत्तिमूलक व्याख्या दी गई है। (१) श्रुति और प्रबन्धि के समूह से जो जन्म पाती है वह जाति है। (२) सब रागों के जन्म का जो हेतु है उसे जाति कहते हैं। (३) रस की प्रतीति या जन्म जिसके द्वारा होता है उसे जाति कहते हैं। मूर्छना और जाति में अन्तर यह है कि मूर्छना स्वरसंघ का ढाँच मात्र होती हैं किन्तु जाति से राग तथा रस की निष्पत्ति होती है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि बिना ही पद पदार्थ की प्रतीति के जाति रसनिष्पत्ति में कारण होती है।
जिस प्रकार वाचिक अभिनय में संगीत का उपयोग होता है उसी प्रकार आंगिक अभिनय में करण और अंगहार का प्रयोग किया जाता है। विभिन्न रसों के अनुकूल अङ्गों की स्थापना करण कहलाती है। इन्हीं करणों से अङ्गहार बनते हैं। इनमें पदसंचार हस्तसंचार इत्यादि पर विचार किया जाता है। इस प्रकार नेत्र-संचालन, भू-संचालन, कर-व्यवस्था इत्यादि से भावाभिनय किया ही जाता है। वहाँ शब्द न होते हुये भी भावानुभूति हो जाती है। इसी प्रकार पद पदार्थों के अवगमन के अभाव में भी भावानुभूति हो सकती है। यहाँ पर ग्रंथ का अर्थ अधिक स्पष्ट नहीं। भरतमुनि ने जहाँ इतर अंगों के अभिनय का विवेचन किया है वहाँ ग्रंथ के अभिनय का विवेचन नहीं किया। समस्तवः लोचनकारनेन ग्रंथ शब्द से यहाँ पर नासाकर्म की ओर संकेत किया होगा। भरतमुनि ने अष्टम अध्याय में नासिका का ६ प्रकार का विनियोग बतलाया है तथा विस्तारपूर्वक इस बात का प्रतिपादन किया है कि निर्वेद औत्सुक्य चिन्ता इत्यादि विभिन्न भावों के अभिनय में नासिका की किस प्रकार की स्थिति होनी चाहिए। वहाँ पर सारांश यही है कि बिना शब्द और अर्थ के भी रसाभिव्यक्ति हो सकती है। अतः वर्णों को रसाभिव्यञ्जक मानने में तो अनुपपत्ति होनी ही नहीं चाहिए। कहों कहीं ग्रंथ शब्द के स्थान पर ‘प्रभाव’ यह पाठ पाया जाता है—‘करणप्रभावादनुहार-शब्दवत्’। यह पाठ कुछ अधिक संगत प्रतीत होता है क्योंकि इसमें करणों के प्रभावाभिनय का स्पष्ट उल्लेख किया गया है।
विविध वर्णों की रसाभिव्यक्तक्ता पर रसगङ्गाधर तथा वक्रोक्तिजीवित इत्यादि ग्रन्थों में विस्तृत प्रकाश डाला गया है। वहीं देखना चाहिए।
पदे चालाक्ष्य क्रमस्म्य द्योतनं यथा— उत्क्षिप्तनी भयपरिस्खलितां शुका न्ता ते लोचने प्रतिदिशं विषुरे क्षिपन्तो । कृरण दारुणतया सहसैव दग्धा धूमायितेन दहनेन न वीक्षितासि ।।
(ध्वन्यो०)—पद में अलक्ष्य क्रमव्यङ्ग्य का द्योतन जैसे— ‘काँपनेवाली तथा भय के कारण स्वलित वस्त्र के छोरवाली और उन विधुर नेत्रों को प्रत्येक दिशा में दौड़ानेवाली (वह वासवदत्ता) कुर तथा धूम्र के कारण अन्धी अमिन के द्वारा देखी नहीं गई अपितु अपनी दारुणता के कारण सहसा जला डाली गई।’
यहाँ पर निस्सन्देह ‘ते’ (उन) यह पद सहृदयों के लिये स्फुटतया रसमय के रूप में अवभासित होता है।
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तृतीय
उद्योतः
(लो०)—पदे चेति । पदे च सतीत्यर्थः । तेन च रसप्रतीतिरविभावादेरेव । ते विभावादयो यदा विशिष्टेन केनापि पदेनार्प्यमाणा रसचमत्कारविधायिनो भवन्ति तदा पदस्यैवासौ महिमा सम्प्र्यंत इति भावः ।
(अनु०) ‘और पद में’ अर्थात् पद के होने पर । इससे रसप्रतीति विभाव इत्यादि से ही होती है । भाव यह है कि वे विभाव इत्यादि जब किन्हीं विशिष्ट पदों से अर्पण किये जाते हुये रसचमत्कार-विधायक होते हैं तब पद की ही यह महिमा सम्प्रित को जाती है ।
तृतीय
उद्योतः
वासवदत्तादाहाहाकरणनप्रबुद्धशोकनिर्भरस्य वत्सराजस्येदं परिदेवीत-वचनम् । तत्र च शोको नामेष्टजनविनाशप्रभव इति तस्य जन्तुस्य ये भ्रूक्षेपकटाक्षप्रभृतयः पूर्वं रतिभाववतामवलम्बन्ते स्म त एवात्यन्तविनष्टाः: सन्त इदानीन् स्मृतिगोचरतया निरपेक्षभावत्वप्राणं करुणरस-मुद्दीपयन्तीति स्थितम् । ते लोचने इति । तच्छब्द-स्तल्लोचनगतस्वसंवेद्याव्यपदेश्यानन्तगुणगणस्मरणाकारद्योतको रसस्यासाधारणनिमित्त-तां प्राप्तः । तेन यत्केनचिच्छोदितं परिहृतं च तन्मध्यैव । तथा हि चोद्यम् —प्रकान्त-परामर्शकस्य तच्च्छब्दस्य कर्थमियति सामर्थ्यमिति । उत्तरं च—रसाविष्टोऽत्र परामृश्यते तदुभयमनुत्थानोपहतं । यत्र ह्यानुरूप्यम-नधर्मान्तर-साहित्यियोग्यधर्मयोगित्वं वस्तुनो यच्छब्देनाभिधाय तद्बुद्धिरस्थ-धर्मान्तर-साहित्यं तच्छब्देन निर्वाच्यते—
यहां नि:सन्देह यह । वासवदत्ता के दहन के सुनने से प्रबुद्ध शोक से भरे हुये वत्सराज का यह विलाप-वचन है । वहाँ शोक इष्टजन-विनाश से उत्पन्न हुआ है इसलिये उस व्यक्ति के जो भ्रूक्षेप कटाक्ष इत्यादि पहले रतिभाव की विभावता का अवलम्बन लेते थे वे ही अत्यन्त विनष्ट होते हुये इस समय स्मृतिगोचर होने के कारण ऐसे करुण रस को उद्दीस करते है जिसका प्राण है निरपेक्षभाव, यह स्थिति है । ‘वे लोचन’ में ‘वे’ शब्द उन लोचनों में विद्यमान स्वसंवेद्य तथा अवर्णनीय अनन्त गुणगणों के स्मरणाकार के द्योतक होकर रस की असाधारण निमित्तत्ता को प्राप्त हुआ है । इससे जो किसी ने प्रश्न किया और उत्तर दिया वह मिथ्या ही है । वह प्रश्न इस प्रकार है—प्रकान्तपरामर्शक तत् शब्द की इतनी शक्ति कैसे ?
तृतीय
उद्योतः
यत्तदोनित्यसम्बन्धत्वं मिति; तत्र पूर्वप्रकान्तपरामृश्यक्त्वं तच्छब्दस्य । यत्र पूर्णानिमित्तोपनत- स्मरणविशेषाकारसूचकत्वं तच्छब्दस्य ‘स घट’ इत्यादि यथा तत्र का परामर्शकत्वहेतु-य्यास्तामलोकपरामृशंहैं: पण्डितसम्मन्यैः सह विवादेन । उत्कर्षमिपनीतयादिना तदीयभयानुभावोत्रेक्षणं । मयानिर्वाहितप्रतीकारमिति शोकावेशस्य विभावः । ते इति इति सातिशयवि-भ्रमैकातनरूपे अपि लोचने विधुरे कान्त-श्रीकतया निलक्शे क्षिपन्ती कस्वाताक्वासावार्यपुत्र इति तयोलोचनयोस्तादृशी चाव-स्थैति सुतरां शोकोद्दीपनम् । कुरेति तस्यायं स्वभाव एव । किं कुरुतां तथापि च धूमेनान्धीकृते द्रष्टुम्समर्थ इति तु स विवेकस्येदृशानुचितकारित्वं सम्भाव्यते, इति स्मयमाने तदीयं ‘सन्दीपनिमित्तानी’ सातिशयशोकावेशविभावतां प्राप्तामिति । तैः शब्द इति सर्वोऽयमरथो निर्व्यूढः । एवं तत्र तत्र व्याख्यातव्यम् ।
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और उत्तर—यहाँ पर दाशरथि रसाविष्ट है। ये दोनों (प्रश्न और उत्तर) अनुष्ठान से ही उपहत हैं। जहाँ वस्तु की वाद में उद्दिष्ट किये जानेवाले दूसरे धर्म के साहित्य के योग्य धर्म की संयुक्तता 'यत्' शब्द के द्वारा कहकर उस बुद्धिस्थ दूसरे धर्म के साहित्य को तत् शब्द के द्वारा कहा जाता है।
यहाँ पर दाशरथि रसाविष्ट है। ये दोनों (प्रश्न और उत्तर) अनुष्ठान से ही उपहत हैं। जहाँ वस्तु की वाद में उद्दिष्ट किये जानेवाले दूसरे धर्म के साहित्य के योग्य धर्म की संयुक्तता 'यत्' शब्द के द्वारा कहकर उस बुद्धिस्थ दूसरे धर्म के साहित्य को तत् शब्द के द्वारा कहा जाता है।
जहाँ कहा जाता है—'यत् और तत् का नियत सम्बन्ध होता है' वहाँ पर तत् शब्द का पूर्वप्रकान्तपरामर्शकत्व हुआ करता है। जहाँ पर तो तत् शब्द का निमित्त से आये हुये आकार-विशेष का सूचकत्व होता है जैसे 'वह घड़ा' इत्यादि में, वहाँ परामर्शकत्व की बात ही क्या ? बस, असत्य परामर्श देनेवाले अपने को पण्डित समझनेवाले लोगों से अधिक विवाद की आवश्यकता नहीं।
उत्कम्पिनी इत्यादि के द्वारा उसके भय के अनुभव की उत्प्रेक्षा की गई है। 'मेरे द्वारा जिसके प्रतिकार का निर्वाह नहीं किया जा सका' यह शोकावेग का विभाव है। 'वे' अर्थात् सातिशय विलास का जो एकमात्र आयतन है इस प्रकार के रुपवाले भी विधुर नेत्रों को भयातिरेक से विना ही लक्ष्य के इधर-उधर डालती हुई कि 'कौन रक्षक है' 'कहाँ आर्यपुत्र हैं' उन नेत्रों की वैसी अवस्था नितान्त रूप में शोक का उद्दीपन है। 'कूर के द्वारा' उसका यह स्वभाव ही है। क्या किया जावे ? तथापि धूम से स्तब्ध किया हुआ, देखने में असमर्थ, विवेकशील के इस प्रकार के अनुचितकारित्व की सम्भावना नहीं की जा सकती। इस प्रकार स्मरण किया हुआ उसका सौन्दर्य इस समय पर शोकावेश की सातिशयविभावता को प्रास हुआ है। 'वे' इस शब्द के होने पर यह सारा अर्थ पूरा हो जाता है। इसी प्रकार विभिन्न स्थलों पर व्याख्या कर ली जानी चाहिये।
तारावती—पद में भी अलंक्ष्यक्रमव्यंग्य का द्योतन होता है। यहाँ पर 'पद में' यह ससमी विभक्ति, भावलक्षण सति ससमी है। इसका अर्थ होता है 'पद के होने पर'। इससे यह सिद्ध होता है कि रस की प्रतीति विभाव इत्यादि से ही होती है। वे विभाव इत्यादि जब किसी विशिष्ट पद के द्वारा समर्थित किये जाते हैं और इस प्रकार रस के चमत्कारविधायक बन जाते हैं तब रस की चमत्कृति का श्रेय उस पद को ही दिया जाता है और पद की ही यह महिमा मानी जाती है। अब पद के द्वारा असंलक्ष्यक्रम व्यंग्य के द्योतन का उदाहरण लीजिये—
महाराज उदयन शिकार खेलने गये थे। मन्त्रियों ने राजनीति की आवश्यकता के अनुसार वासवदत्ता को छिपा दिया और लावाणक नगरमें आग लगा दी तथा महाराज के लौटने पर उन्हें यह समाचार दे दिया कि वासवदत्ता जलकर मर गई। यह सुनकर महाराज उदयन विलाप करते हुये कह रहे हैं—
'जिस समय तुम्हें आग ने जलाया उस समय तुम कांप रही होगी, तुम्हारा बभ्रु शय के कारण नीचे सरक गया होगा (अस्त-व्यस्त हो गया होगा) तुम्हारे वे नेत्र
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३
तृतीय उद्योतः
व्याकुल हो गये होंगे और उनको तुम चारों ओर (सहायता के लिये या मेरे दर्शन के लिये) दौड़ा रही होगी। आग अत्यन्त क्रूर थी। उसने अपनी दारुणता के साथ तुम्हें जला डाला वह नि:संदेह धुयें के कारण अन्धी हो गई थी जिससे उसने तुम्हें देख नहीं पाया। (नहीं तो तुम्हारे सौन्दर्य पर रीझ कर वह तुम्हें कदापि न जलाती।)
वासवदत्ता के दाह को सुनकर वत्सराज का शोक एकदम जाग्रत हो गया है और उनका हृदय उस शोक से भरा हुआ है। उस समय विलाप करते हुये वे ये शब्द कह रहे हैं। उसमें शोक इष्टजन (वासवदत्ता) के विनाश से उत्पन्न हुआ है। अतएव उस वासवदत्ता के जो भूक्षेप कटाक्ष इत्यादि पहले सम्भोगशृङ्गार की विभावरूपता (उद्दीपनरूपता) को धारण करते थे वे ही अब अत्यन्त विनष्ट हो गये हैं और इस समय पर स्मृतिगोचर होने के कारण उस करुण रस का उद्दीपन कर रहे हैं जिस करुण रस का प्राण है निरपेक्षभावारव अर्थात् अनु- भूत वस्तु की प्राप्ति की आशा न रहना। यही यहाँ पर स्थित है। यहाँ पर 'ते लोचन' (वे नेत्र) में 'वे' शब्द लोचनगत गुणगणों के स्मरण स्वरूप का अभिज्ञज्ञक है।
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तृतीय उद्योतः
जिनको रमणीयता केवल स्वसंवेदन सिद्ध हो सकती है उनके वर्णन नहा किया जा सकता। इस प्रकार 'वे' शब्द रसका असाधारण निमित्त बन गया है। यहाँ पर किसी ने जो प्रश्नोत्तर लिखे हैं वे मिथ्या ही हैं। प्रश्न इस प्रकार है—(प्रश्न) 'वह' सर्वनाम अथवा सङ्केतवाचक विशेष प्रसिद्धि का परामर्शक होता है। उसमें इतनी शक्ति कहाँ से आ गई कि वह इतने बड़े अर्थ को प्रकट कर सके? इस प्रश्न का उत्तर यह दिया है (उत्तर) यहाँ पर 'वे लोचन' में 'वे' इस सङ्केतवाचक विशेषण का प्रयोग वक्ता ने लोचन के गुणगणों को अपनी बुद्धि में रखकर रसावेश के साथ किया है और श्रोता को भी उसकी प्रतीति उसी रूप में होती है। अतएव यहाँ पर प्रसिद्धि का परामर्श साधारण रूप में नहीं होता अपितु रसावेश के साथ होता है। ये दोनों प्रश्नोत्तर असङ्गत हैं। कारण यह है न तो यह प्रश्न ही उठता है और न इसका उत्तर ही समीचीन है। 'वह' शब्द प्रसिद्ध या प्रकान्त का परामर्शक वहीं पर होता है जहाँ पर पहले 'जो' शब्द के द्वारा किसी वस्तु में किसी ऐसे धर्म का योग होना बतलाया जा चुका हो जो कि बाद में निर्दिष्ट किये जानेवाले किसी दूसरे धर्म के साथ रहने की योग्यता रखता हो और बाद में 'वह' (तत्) शब्द के द्वारा उस बुद्धिस्थ दूसरे धर्म के साथ का निर्वचन कर दिया जावे।
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तृतीय उद्योतः
जैसे 'जो पुरुष विद्वान् है वह पूज्य है'। इस वाक्य में पहले पुरुष के अन्दर विदत्त्व धर्म का योग बतलाया गया है। इस विदत्त्व धर्म में एक दूसरे बुद्धिस्थ धर्म का निर्वचन भी कर दिया गया है। ऐसे ही स्थान पर 'तत्' शब्द प्रसिद्ध या प्रकान्त का परामर्शक होता है। जहाँ यह कहा जाता है कि यत् और तत् का नित्य सम्बन्ध हुआ करता है' वहाँ पर तत् शब्द पूर्व प्रकान्त का परामर्शक होता है।
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तृतीय उद्योतः
इसके प्रतिकूल जहाँ पर तत् शब्द किसी निमित्तवश प्राप्त हुये स्मरण के द्वारा किसी विशेष आकार का सूचक होता है जैसे 'वह घड़ा' इत्यादि में, वहाँ पर तत् शब्द के प्रकाशपरामर्शकत्व की बात ही कैसे उठ सकती है? बस इतना पर्याप्त है, मैं उन पण्डितन्मन्यो से अधिक विवाद की आवश्यकता नहीं समझता, जो झूठा परामर्श दिया करते हैं।
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'काँपनेबालो' इस विशेषण से वासवदत्ता के भय के अनुभव की कल्पना की गई है। 'मैं उस भय का प्रतीकार नहीं कर सका' इसीलिये यह उनके शोकावेग का उद्दीपक है । 'वे नेत्र' में 'वे' का अर्थ है कि जिन नेत्रों में विलास अत्यधिक मात्रा में निवास किया करता था, असहाय होकर वे भी व्याकुल हो गये और उस समय वे नेत्र अत्यन्त भय के कारण चारों ओर बिना ही लक्ष्य के इसलिये पड़ रहे थे कि 'कौन हमारा रक्षक था जावे' 'आर्यपुत्र कहाँ मिल जावे' । नेत्रों की इस प्रकार की दुर्दशा शोक को उद्दीप्त करती है। कूर होना तो अग्नि का स्वभाव ही है, इस विषय में किया ही क्या जा सकता है। किन्तु कोई भी सहृदय व्यक्ति इस प्रकार के सौन्दर्य को जान-बूझकर नष्ट नहीं कर सकता था। अग्निदेव ने उसे इसीलिए नष्ट कर दिया कि धुएँ के कारण उसकी आँखें अन्धी हो गई थीं। यदि उसने वासवदत्ता का सौन्दर्य देख पाया होता तो ऐसा अनुचित कार्य करने की सम्भावना उससे कभी नहीं हो सकती थी। इस प्रकार यहाँ पर वासवदत्ता के सौन्दर्य का स्मरण शोकावेग के आधिक्य को प्रकट करते हुए शोक का उद्दीपन विभाव बन गया है। यह सारा अर्थ 'वे' इस शब्द के होने पर ही पुष्ट होता है। इसी प्रकार की व्याख्या विभिन्न स्थानों पर करनी चाहिए।
(ध्वन्या०)—पदावयवेन द्योतनं यथा— बोडायोगान्नतवदनया सन्निधाने गुरुणाम् बद्धोत्कम्पं कुचकलशयोरन्योन्तर्निगृह्य । तिष्ठेत्युक्तं किंइव न तया पत्सुमुत्र्र्ज्य बाष्पं मध्येsसृकृशकितहरिणीहारिनेत्रत्रिभागः ॥
इत्यत्र त्रिभाग-शब्दः (अनु०) पदावयव के द्वारा द्योतन जैसे :—गुरुओं के सन्निकट लज्जा के योग से नीचे को मुख किये हुये, कुचकलशों में कम्पन उत्पन्न करनेवाले मध्य को अनदेखा ही रोके हुये उसने जो कि आँसू गिराकर चञ्चल हरिणी के समान आकर्षक नेत्र के तिहाई भाग को मेरी ओर गड़ा दिया; तो क्या उसने यह नहीं कह दिया कि रको (मत जाओ)। यहाँ पर त्रिभाग शब्द
(लोचन)—त्रिभागशब्द इति । गुरजनमवधीर्योऽपि सा मां यथा तथापि साभि-लाषमन्युर्दैन्यगर्वमन्तरं विलोकितवतीतेवं स्मरणेन परस्परहेतुकत्वप्राणप्रवासविप्रलम्भोद्दीपनविग्र-लम्बोद्दीपनं त्रिभागशब्दसन्निधौ स्फुटं भातिेति ।
(अनु०) 'त्रिभाग शब्द'। गुरुजनों की अवधीरणा करके भी उसने मुझे जैसे तैसे, अभिलाष, मन्यु, दीनता और गर्व के साथ मन्थर दृष्टि से देखा इस प्रकार स्मरण करने मे परस्पर हेतुता ही जिसका प्राण है इस प्रकार के प्रवास-विप्रलम्भ का उद्दीपन त्रिभाग शब्द के निकट स्फुट प्रतीत होता है।
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-विमर्श-इसी प्रकार की पदार्थ के द्वारा असंल्लक्ष्यक्रमव्यङ्गच (रस) के ध्वनित होने का उदाहरण—
पदांश के द्वारा असंल्लक्ष्यक्रमव्यङ्गच (रस) के ध्वनित होने का उदाहरण—
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पदांश के द्वारा असंल्लक्ष्यक्रमव्यङ्गच (रस) के ध्वनित होने का उदाहरण—
कोई नायक प्रवास के लिए प्रस्तुत था। उस समय नायिका ने उसकी ओर देखकर जो चेष्टायें की हैं उनका वर्णन वह अपने अन्तरङ्ग मित्र से कर रहा है—
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उद्योत:
‘एक तो उसका स्वभाव ही लज्जाशील है। हमारा वह उस समय गुरुजनों के पास बैठी थी। मेरे प्रस्थान के विचार से उसके हृदय में मन्यु की एक आँधी सी उठ रही थी जिससे उसके श्वास प्रश्वास विशेष तीत्र होकर उसके कुचकलशों को क़म्पा देते थे। वह अपने उस मन्यु को अपने अन्दर ही रोके हुये थी और मुझे रोकने के लिए न कुछ कह सकती थी और न मेरे प्रस्थानजन्य शोक से भरे हुये रोष को प्रकट ही कर सकती थी। आँसू गिरा रही थी; उसके नेत्र चञ्चल हरिणी के समान बड़े ही आकर्षक मालूम पड़ रहे थे। उन नेत्रों के एक तिहाई भाग को उसने मेरी ओर ऐसा गड़ा दिया कि उसने मानों यह कह ही दिया कि तुम मत जाओ’
यहां पर ‘चकितहरिणी हरिनेत्रत्रिभाग’ एक पद है। उसका एक अंश है त्रिभाग शब्द। इससे सिद्ध होता है कि उसने पूरी निगाह से नायक की ओर नहीं देखा अपितु नेत्र के तृतीय भाग से तिरछी चितवन के द्वारा देखा। इस त्रिभाग शब्द से अभिलाषा, मन्यु, दैन्य और गर्व अभिव्यक्त होता है। ‘गुरुजनों की अवधारणा करके भी उसने मेरी ओर जैसे तैसे अभिलाषा मन्यु दैन्य और गर्व के कारण मन्थर दृष्टि से देखा’ इस प्रकार स्मरण करने से त्रिभाग शब्द की निकटता में प्रवास विप्रलम्भ का उद्दीपन स्फुट रूप में प्रतीत होता है। इस प्रवास विप्रलम्भ का प्राण है परस्पर आस्थाबन्ध। नायिका का प्रेममय आस्थाबन्ध नेत्र के त्रिभाग से देखने के कारण अभिव्यक्त होता है और नायक का आस्थाबन्ध उस चितवन के स्मरण से व्यक्त होता है। इस प्रकार यहां पर विप्रलम्भ शृङ्गार की ध्वनि में त्रिभाग यह पदांश ही निमित्त है।
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(ध्वन्याल०)—वाक्यार्थप्रश्रालक्ष्यक्रमध्वनिः शुद्धोऽलङ्कारसङ्कीर्णश्चेति द्विधा मतः। तत्र शुद्धस्योदाहरणं यथा रामाभ्युदये—‘कृतककुपितैः’ इत्यादि श्लोकः। एतद् द्वि वाक्यं परस्परानुरागं परिपोषप्राप्तं प्रदर्शयत् सर्वत एव परं रसत्वं प्रकाशयति।
(अनु०)—वाक्यरूप असंल्लक्ष्यक्रमव्यङ्गच ध्वनि दो प्रकार की मानी गई है शुद्ध और अलङ्कारसङ्कीर्ण। उनमें शुद्ध का उदाहरण जैसे रामाभ्युदय में ‘कृतककुपितैः’ इत्यादि श्लोक। यह वाक्य निस्सन्देह परिपोष को प्राप्त परस्पर अनुराग को प्रदर्शित करते हुये चारों ओर से रसतत्व को प्रकाशित करता है।
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(लो०)—वाक्यरूपत्वमुच्यते। प्रथमानिर्देशेनाव्यतिरेकनिर्देशस्यायमभिप्रायः। वर्ण-पदतद्रागादिषु सत्व्वेवालङ्कारक्रमो व्यङ्गचो निर्भासते, विभावादिसंये प्राणत्वात्। तेन वर्णादीनां निमित्तत्वमात्र मेव। वाक्यं तु ध्वनेर लक्षणक्रमस्य न निमित्ततामात्रेण वर्ण्यवदुपकारि, किन्तु समग्रविभावादि प्रतिपत्ति-
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व्यापृतत्वात् रसादिमयमेव तन्निर्भरासित इति वाक्य इत्येतत्कारिकायां न निमित्तासम्भमात्रम् अपि त्वन्नन्यत्र भावविषयार्थमपैति । शुद्ध इत्यर्थालङ्कारेण केनाव्यसंमिश्रः । कृतककुपितैर्वीक्ष्यपाम्भोभिः सदैन्यविलोकितैः— वृन्दमपि गता यस्य प्रीत्या धृतापि तथाम्बया । नवजलधरश्यामा पश्यन्त्यश्रु भवन्तीं विनाऽकठिनहृदयो जीव्येव प्रिये स तव प्रियः ॥
(अनु०) और वाक्यरूप यहाँ प्रथमा निर्देश के द्वारा अभेदबोध का यह अभिप्राय है—वर्ण, पद और पदांश के होते हुये ही अलक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य निर्भरित होता हुया भी समस्त काव्यव्यापक ही शोभित होता है क्योंकि उसका प्राण विभाव इत्यादि का संयोग है । इससे वर्ण इत्यादि की निमित्तत्वमात्रता ही है । वाक्य तो वर्ण इत्यादि के समान अलक्ष्यक्रम ध्वनि का केवल निमित्तता से ही उपकार करनेवाला नहीं होता । किन्तु समग्र विभाव इत्यादि की प्रतिपत्ति में लगे होने से वह रसादिमय ही शोभित होता है । इस प्रकार कारिका में 'वाक्ये' यह निमित्तसप्तमी ही नहीं है अपितु अन्यत्र सम्भवव न होना रूप विषय के अर्थवाला भी है । शुद्ध का अर्थ है किसी अर्थालङ्कार से असंमिश्र । 'बनावटी कोपों से आँसुओं से और दैन्यपूर्ण अवलोकनों से माता द्वारा रोकी हुई भी जिसकी प्रीति से वन को भी गई कठिन हृदयवाला वह तुम्हारा प्रिय तुम्हारे वियोग में नव जलघरों से श्याम दिशाओं को देखते हुये जीवित ही है ।'
अत्र तथा तैस्तैः प्रकारैर्मात्रा धृतमप्यनुरागपरवश्वेन गुरुवचनोल्लङ्घनमपि उक्तः । प्रिये प्रिय इति परस्परजीवितसर्वस्वाभिमानात्मकौ रतिस्थायिभाव उक्तः । नवजलधरशैल्यसोद्भूत्पूर्वांश्रुण्यजलदालोकनं विप्रलम्भोद्दोपनविभावत्वेनोक्तम् । जीवत्येवेति सापेक्षभावता एककारेण करुणावकाशानिराकरणायोक्ता । सर्वत्र एवेति । नात्रान्यतमस्य पदस्याधिकं शृङ्गारात्तकत्वम् । रसतत्त्वमिति । विप्रलम्भशृङ्गारात्मकत्वम् ।
यहाँ पर उस प्रकार विभिन्न उपायों से माता द्वारा रोकी हुई भी अनुराग की परवशता से तुमने गुरुवचन का उल्लङ्घन भी किया । 'हे प्रिये ।' 'हे प्रिय' इससे परस्पर जीवित-सर्वस्वाभिमानात्मक रतिस्थायिभाव कहा गया है । 'नवजलधर...' से पहले न सहे हुये मेघ वर्षा से अवलोकन विप्रलम्भ के उद्दीपन विभाव के रूप में कहा गया है । 'जीवित ही है' में सापेक्षभावता (एक दूसरे की अपेक्षा करते हुये जीवित रहने की सत्ता) 'ही' के प्रयोग से करुण रस के अवकाश के निराकरण के लिए कहीं गई है । 'चारों ओर से ही' अर्थात् यहाँ पर किसी एक पद की रसाभिव्यक्ति में कुछ भी अधिक हेतुत्व नहीं है । 'रसतत्त्व' अर्थात् विप्रलम्भ-शृङ्गारात्मकत्व ।
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तृतीय
उद्योत:
'असंलक्ष्यक्रमव्यंग्यो ध्वनि:' के समानाधिकरण्य पर विचार
तारावती—'वाक्य रूप असंलक्ष्य क्रम व्यंग्य ध्वनि दो प्रकार की होती है—शुद्ध और अलंकारसंकरीर्ण ।' वृत्तिकार के इस वाक्य में 'वाक्यरूप' में भी प्रथमा का निर्देश किया गया है। 'अलंक्ष्य क्रमव्यंग्यो ध्वनि:' इसमें भी प्रथमा निर्देश किया गया है। इस प्रकार इन दोनों शब्दों में समानाधिकरण्य है। 'दो प्रतिपाद्यार्थों का अभेद के अतिरिक्त अन्य कोई सम्बन्ध नहीं होता' इस नियम के अनुसार 'वाक्यरूप' तथा 'अलंक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि' इन दोनों शब्दों में अभेद-सम्बन्ध की स्थापना हो जाती है। इस प्रथमा निर्देश तथा अभेद-सम्बन्ध के निर्देश का अभिप्राय यह है—'यद्यपि वर्ण, पद और पद का भाग इनके होने पर ही अलंक्ष्य-क्रमव्यंग निर्भासित हुआ करता है तथापि उसका निर्भास समस्त वाक्य में व्यापक रूप में ही होता है। कारण यह है कि अलंक्ष्यक्रमव्यंगस्य का प्राण है विभाव इत्यादि का संयोग । अत एव रसनिष्पत्ति समस्त काव्य में होती है; वर्ण इत्यादि निमित्तमात्र हो जाते हैं। किन्तु वाक्य के विषय में यह बात नहीं है। वाक्य वर्ण इत्यादि के समान अलंक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि का उपकरण केवल निमित्तमात्र होकर के ही नहीं होता अपितु समग्र विभावादि की प्रतिपत्ति में लगा रहता है। अत एव वाक्य रसादिमय ही निर्भासित होता है। (आशय यह है कि वर्ण पद इत्यादि रस की पूरी सामग्री नहीं जुटा पाते। रस की पूरी सामग्री तो काव्य के दूसरे भागों से प्राप्त होती है वर्ण इत्यादि उस अभिव्यक्त रस में एक विशेष चमत्कार उत्पन्न कर देते हैं। इसके प्रतिकूल जहाँ वाक्य व्यञ्जक होता है वहाँ रस की सामग्री अन्यत्र से नहीं आती अपितु वाक्य ही सारी सामग्री जुटा देता है। इस प्रकार वाक्य अलंक्ष्यक्रमव्यंग्य से अभिन्न होता है। यही प्रथमा तथा अभेद निर्देश का आशय है।) कारिका में 'वर्णपदादिषु' की सप्तमी को निमित्तसप्तमी बतलाया था किन्तु 'वाक्य' इसमें केवल निमित्तसप्तमी नहीं है अपितु इसका आशय ऐसे विषय से भी है जो अन्यत्र सम्भव न हो। (अर्थात् 'वाक्य' इस शब्द में सप्तमी निमित्तसप्तमी नहीं है अपितु विषयसप्तमी है।)
तृतीय
उद्योत:
वाक्यरूप शुद्ध असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि
(अ) शुद्ध का अर्थ है किसी भी अर्थालंकार से न मिला हुआ। इसका उदाहरण जैसे रामाश्रय काव्य का यह पद्य—' बनावटि कोपों के द्वारा, अश्रुजलों के द्वारा और दैन्यपूर्ण अवलोकनों के द्वारा माता के द्वारा रोकी हुई भी जिसके प्रेम से तुम वन को चली आई थी, हे प्रिये ! वही तुम्हारा कठोर हृदयवाला प्रियतम इस समय नवीन जलघरों के कारण श्यामायमान दिशाओं को देखते हुए भी तुम्हारे अभाव में भी जीवन धारण किये हुये है' । 'यद्यपि विभिन्न उपायों से माता ने वन जाने से रोका तथापि तुम न मानीं और मेरे साथ वन को चली ही आई। इस प्रकार तुमने अनुरागपरवशता में गुरु वचनों का उल्लंघन भी कर दिया। अत एव ऐसी प्रेमिका के वियोग में नायक को प्राण छोड़ देने चाहिए थे किन्तु नायक नवजलधररूप उद्दीपनो के होते हुये भी सब कुछ सह रहा है और अपने प्राण नहीं छोड़ता। इस प्रकार यह वाक्य नायक-नायिका के प्रेम की परिपुष्ट अवस्था को दिखलाते हुये
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सभी ओर से पूर्णरूप से विप्रलम्भ शृंगार को प्रकट करता है। इस ध्वनि में किसी एक शब्द की प्रधानता नहीं है। प्रिय शब्द में एक दूसरे के जीवन सर्वस्व होने का अभिमान छिपा ही रहता है। अतएव 'प्रिये' इस सम्बोधन तथा 'प्रिय' इस क्रिया से रति स्थायीभाव प्रकट किया गया है। नवीन जलधर इत्यादि शब्दों का आशय यह है कि मेघ उठ रहे हैं जिनका सहन कर सकना सर्वथा असम्भव है और जिनको पहले कभी सहन किया भी नहीं गया है। यह विप्रलम्भ शृंगार का उद्दीपन विभाव है। 'जीवन धारण किये हुये ही हैं' यह सापेक्ष-भाव का शब्द है जिससे नायिका के भी जीवित होने की संभावना पाई जाती है। अतएव आलम्बन वच्चेद न होने के कारण यहाँ पर करुण रस को अवकाश नहीं रहता किन्तु विप्रलम्भ शृंगार ही पुष्ट हो जाता है।
(ध्वन्यालोके)—अलङ्कारान्तरसङ्कीर्णों यथा—'स्मरणवनदीपूरेरणोढा:' इत्यादि इलोकः। अत्र हि रूपकेण यथोक्तव्यङ्गयानुगतेऽन प्रसाधिते रसः सुतरामभिव्यज्यते। (अनु०) अलङ्कारान्तरसङ्कीर्णों जैसे 'स्मरणवनदीपूरेरणोढा:' इत्यादि श्लोक। यहाँ पर व्यञ्जक के बतलाये हुये लक्षणों का अनुसरण करनेवाले रूपक के द्वारा उपस्कृत होकर रस ठीक रूप में अभिव्यक्त होता है।
(लो०)—स्मरणवनदीपूरेरणोढा: पुनर्गुणैरस्तुभिः यदपि विध्रुता: तिष्ठत्यारादपूर्णमनोरस्था। तदपि लिखितप्रश्रयरङ्गै: परस्परमुन्त्रमुखा: नयननलिनी नालान्ति पिबन्ति रसं प्रिया:॥
स्मर एव नवनीदीपुरः प्रावृष्ण्यप्रवाहः सरभसमेव प्रवृद्धत्वात् तेनोढा: परस्परासम्मुख्यबुद्धिपूर्वमेव नीता: अनन्तरगुरुकाः इवश्रूप्रभृतय एव सेतवः इच्छाप्रसररोधकत्वात् । अथ च गुरुरेवड्ढ्या: सेतवस्ते: विध्रुता: प्रतिहतेच्छा: । अत एवापूर्णमनोरथास्तिष्ठन्ति । तथापि परस्परोन्मुखतालक्षणेनानन्योन्यतादात्म्येन स्वदेहे सकलवृत्तिनिरोधाल्लिखितप्रायैरिवैरड्ढैरनेत्रनयनेव नलिनी नालान्ति तैरानीतं रसं परस्पराभिलाषलक्षणमस्वादयन्त्ति परस्पराभिलाषात्मककुध्र्टच्हटामिश्रीकारयु क्त्यापि कालमतीवाहरन्तीति॥
ननु नात्र रूपकं निर्जूढ़ं हंसरक्वाकादिरूपेण नायकयुगलस्यारूपपितत्वात् । ते हि हंसाद्या: एकनलिनी नालान्त सलिलपानक्रीडदिषूचिताः । इत्याशड्क्याह—यथोक्त-व्यङ्ककेति । उक्तं हि पूर्वं 'विवक्षातात्पर्यवचने' इत्यादौ 'नातिनिर्वहणैपिता' इति । प्रसाधित इति । विभावादिभूषणद्वारेण रसोडपि प्रसाधित इत्यर्थः॥३, ४॥
(अनु०) 'कामदेवरूपी नदी के प्रवाह से लाये हुये फिर भी जो कि गुरुरूपी सेतु के द्वारा विशेषरूप से रोके हुये अतएव निकट ही अपूर्णमनोरथ वाले बैठे हुये हैं, फिर भी लिखे हुये जैसे अञ्जों से एक दूसरे की ओर उन्मुख प्यारे व्यक्ति नेत्रकमलिनी की नाल से लाये हुये रस का पान कर रहे हैं।' रूपक के द्वारा कामदेव ही हैं नवीन नदी का पूर अर्थात् वर्षाकाल का प्रवाह, सहसा बढ़े होने के कारण उसके द्वारा बहाकर लाये हुये अर्थात् बिना ही बुद्धि के एक दूसरे की सम्मुख किये गये ही हैं।
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तृतीय उद्योत:
खता को प्राप्त किये हुए । बाद में गुरु अर्थात् सास इत्यादि ही सेतु हैं क्योंकि इच्छा के प्रसार को रोकने वाले हैं । और भी गुरु अर्थात् अलंघ्य सेतु उनके द्वारा रोके हुए अर्थात् प्रतिहत इच्छावाले; अत एव अपूर्ण मनोरथवाले स्थित हैं । तथापि परस्पर उन्मुखतावाले एक दूसरे के तादात्म्य से अपने शरीर में समस्तवृत्तियों के निरोध से लिखितप्राय अञ्जनों से नयन ही हैं कमलिनी नाल, उनके द्वारा लाये हुए परस्पर अभिलाष लक्षणवाले रस को आस्वादित कर रहे हैं—परस्पर अभिलाषात्मक दृष्टि छटाओं के मिलाने की युक्ति से कालयापन कर रहे हैं ।
(प्रश्न) यहाँ पर रूपक पूरा नहीं किया गया है क्योंकि नायक-युग्म का हंस चक्रवाक इत्यादि रूप में आरोप नहीं किया गया है । निःसंदेह वे हंस इत्यादि एक कमलिनीनाल से लाये हुए जलपान की क्रोड़ा में अभ्यस्त हैं यह शङ्का करके (उत्तर) देते हैं—'यथोक्त व्यंजक' यह । 'विवक्षा तत्परत्वेन' इत्यादि में पहले कहा गया था कि अत्यन्त निर्वाह की इच्छा नहीं होनी चाहिए । 'प्रसाधित' यह । अर्थात् विभाव इत्यादि के द्वारा रस भी विभूषित किया गया है ।।३, ४।। अलङ्कारसङ्कीर्ण वाक्यरूप असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि तारावती--(आ) अलङ्कारान्तरसङ्कीर्ण वाक्य रूप असललक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य का उदाहरण— 'कामदेवरूपी नवीन नदी के प्रवाह के द्वारा बहाकर लाये हुए, गुरु रूपी सेतु के द्वारा रोके हुए अपूर्ण मनोरथवाले जो प्रेमीजन दुःख के साथ निकट ही बैठे हुए हैं और जो लिखे हुए से अञ्जनों के द्वारा एक दूसरे की ओर उन्मुख प्रतीत हो रहे हैं वे नयनरूपी नलिनी की नाल से लाये हुए रस का पान कर रहे हैं ।' आशय यह है कि यद्यपि उनको सहवास-सुख प्राप्त नहीं हो रहा है तथापि वे प्रेमीजन परस्पर प्रेमपूर्ण अवलोकन के द्वारा ही अपना समय बिता रहे हैं । यहाँ पर कामदेव पर नवीन नदी की धारा का आरोप किया गया है, गुरुजनों पर सेतु का और नेत्रों पर कमलिनी नाल का आरोप किया गया है । अतः यह रूपक अलङ्कार है । इसके द्वारा प्रसाधित होकर रस भली भाँति अभिव्यक्त होता है । कामदेव को नवीन-नदीपूर कहा गया है नदीपूर का अर्थ है वर्षा का प्रथम प्रवाह । जब वर्षा का प्रथम प्रवाह आता है तब क्योंकि वह एकदम बढ़ा होता है अतः तृणलता इत्यादि जिस किसी वस्तु को पाता है बलात् बहाये लिये चला जाता है । इसी प्रकार कामदेव के इस नवीन प्रवाह में भी प्रेमीजन बलात् बहते हुए चले गये हैं, उनमें एक दूसरे की ओर प्रवृत्ति बुद्धिपूर्वक उत्पन्न नहीं हुई है । बाद में जैसे धारा के साथ बहनेवाले तृण इत्यादि को कोई सेतु बीच में पड़कर रोक देता है और आगे नहीं बढ़ने देता उसी प्रकार सास इत्यादि गुरुजन सेतु हैं क्योंकि वे इच्छा के प्रसार को रोकनेवाले हैं । अथवा 'गुरुसेतु' का अर्थ बड़े सेतु भी किया जा सकता है जिनका उल्लङ्घन करना अशक्य है । उनके द्वारा रोके हुए हैं अर्थात्
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उनकी इच्छाओं को प्रतिहत कर दिया गया है इसीलिए वे अपूर्ण मनोरथ होकर बैठे हुए हैं । इससे ज्ञात होता है कि उनमें एक दूसरे की एकरूपता उत्पन्न हो गई है । देहु की सारी वृत्ति निरुद्ध हो गई है यह इस बात से ज्ञात होता है कि उनके अङ्ग चित्र लिखे हुए के समान बिल्कुल निरुद्ध हो गये हैं । उनके नेत्र ही कमलिनी की नाल हैं । उनके द्वारा लाये हुए परस्पर अभिलाषापूर्ण दृष्टिच्छटा रूपी रस का आस्वाद ले रहे हैं । आशय यह है कि अपनी अनुरागपूर्ण दृष्टि की छटा के मिश्रण की युक्ति से ही अपना समय बिता रहे हैं ।
(प्रश्न) यहाँ पर रूपक निर्वहण (पूर्णता) को प्राप्त नहीं हुआ है क्योंकि नायक और नायिका पर हुंसमिथुन चक्रवाक इत्यादि आरोप नहीं किया गया है । निःसंदेह वे हुंस इत्यादि एक कमलिनी की नाल से लाये हुए जलपान की क्रीडा इत्यादि में अभ्यस्त होते ही हैं । इस प्रकार नायक और नायिका पर हुंसमिथुन का बिना आरोप किये रूपक में पूर्णता किस प्रकार आसक्ति है ? बिना पूर्णता के रूपक रस का परिपोषक और अलङ्कार किस प्रकार हो सकता है ?
(उत्तर) यह ‘विवक्षातत्परत्वेन’ इत्यादि कारिकाओं में रस में अलङ्कार प्रयोग की प्रक्रिया पर विचार करने के प्रकरण में पहले ही बतलाया जा चुका है कि वही अलङ्कार रस का पोषक होता है जिसके अत्यन्त निर्वहण की ओर कवि का ध्यान न हो (नहीं तो अलङ्कार प्रधान हो जाता है) । इसी बात को प्रकट करने के लिए वृत्तिकार ने लिखा है कि अलङ्कार्य अलङ्कार की बतलाई हुई प्रक्रिया का अनुसरण करते हुए यहाँ रूपक रस का पोषक हो रहा है । रूपक के द्वारा रस प्रसाधित किया गया है, कहने का आशय यह है कि रूपक विभाव इत्यादि को आभासित करते हुए रस का भी आभासित करनेवाला बन गया है ।
(ध्वन्य०)—अलक्ष्यक्रमगम्येन सङ्कटनया भासते ध्वनिरनिर्युक्तं तत्र सङ्ङ्टनास्वरूपमेव तावत्प्रतीयते— वसुधा वसुधादानैरसमासा समासेन मध्यमेन च भूषिता । तथा वीर्यसमासेति त्रिधा सङ्कटनेदिता ॥५१॥
(अनु०) अलक्ष्यक्रमगम्यच ध्वनि सङ्कटना में भासित होती है । यह कहा गया है । उसमें सङ्कटना स्वरूप का ही पहले निरूपण किया जा रहा है— ‘समास-रहित, मध्यम समास से भूषित तथा दीर्घ समासवाली तीन प्रकार की सङ्कटना बतलाई जाती है ।॥५१॥’
(लो०)—सङ्कटनायामिति भावे प्रत्ययः, वर्णादिवच्च निमित्तमात्रे सप्तमी । उक्तमिति निरूप्यते इति गुणेभ्यो विविक्ततया विचार्यंत इति यावत् ।
(अनु०) 'सङ्कटना में' यह भाव में प्रत्यय है, वर्ण इत्यादि के समान केवल निमित्त में सप्तमी है । 'कथित हुआ है' अर्थात् 'निरूपित किया जाता है' अर्थात् गुणों से पृथक् रूप में विचार किया जाता है ।
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तृतीय उद्योत:
संघटना द्वारा रस के ध्वनित होने का उपाय
तारावती—दूसरी कारिका में कहा गया था कि 'अलक्ष्यक्रमगयृङ्गय ध्वनि संघटना में भासित होती है ।' इस पर विचार करने के पहले कि संघटना किस प्रकार रस को अभिव्यक्त करती है, संघटना के स्वरूप पर प्रकाश डाल लेना उचित प्रतीत होता है । संघटना शब्द में सम उपसर्ग 'घट्' धातु से ल्युट् प्रत्यय होता है । यह भावार्थक प्रत्यय है । जिस प्रकार वर्ण इत्यादि में निमित्तसप्तमी मानकर व्याख्या की गई थी उसी प्रकार 'संघटनायाम्' में भी निमित्त सप्तमी ही है । अर्थात् संघटना भी वर्ण इत्यादि के समान रस इत्यादि की अभिव्यंजना में निमित्त ही होती है । ' कहा गया था' का आशय है द्वितीय कारिका में कहा गया था कि संघटना भी अभिव्यंजक होती है । 'निरूपण किया जा रहा है' कहने का आशय यह है कि यह विचार किया जा रहा है कि गुणों से संघटना में क्या भेद होता है?
तृतीय उद्योत:
रीतियों का संक्षिप्त दिग्दर्शन
[यहां पर आनन्दवर्धन ने संघटना शब्द का प्रयोग रीति के अर्थ में किया है । अब यह विचार उठाया जा रहा है कि संघटना या रीति किस प्रकार रस के अभिव्यंजन में सहायक होती है ? रीति सम्प्रदाय का विस्तृत परिचय तृतीय उद्योत के अन्त में टिप्पणी के रूप में दिया जावेगा । यहां पर आवश्यकतानुसार संक्षिप्त परिचय प्राप्त कर लेना उचित होगा । वैसे तो शैली व्यक्तिसापेक्षिणी होती है और प्रत्येक कलाकार के अनुसार इसमें कुछ न कुछ विशेषता अवश्य रहती है तथापि एक प्रदेश के व्यक्तियों में कुछ न कुछ साम्य रहता ही है । यह बात केवल काव्यशैली के क्षेत्र के ही नहीं लागू है अपितु मानव-साधना के प्रत्येक क्षेत्र में इसकी सत्ता पाई जाती है । इसी आधार पर हम कहते हैं कि पंजाबी लोगों की अमुक प्रथा है, बंगालियों की अमुक परम्परा है; दक्षिणात्यों की विचारधारा इस प्रकार होती है, अंग्रेज लोग वीर होते हैं इत्यादि । यदि इसी प्रकार देश-भेद के आधार पर काव्यशैलियों की व्याख्या की जावे तो देश-भेद की अनुगता के आधार पर काव्यशैलियां भी असीमित हो जावेंगी । किन्तु विभिन्न देशों की विभिन्न परम्पराओं में भी साम्य के बीज खोजे जा सकते हैं और इसी आधार पर उनका एक नामकरण कर दिया जाता है ।
तृतीय उद्योत:
सर्व प्रथम काव्यशैलियों का विचार दण्डी ने किया । उन्होंने समस्त काव्यक्षेत्र को दो भागों में विभाजित कर दिया एक तो विदर्भ का मार्ग और दूसरा गौड या बंगाल का मार्ग। शैली के लिए उन्होंने प्रयोग भी मार्ग शब्द का ही किया । दण्डी ने शैली के अन्दर केवल वर्णविन्यास पर ही विचार नहीं किया अपितु प्रत्येक क्षेत्र में दोनों शैलियों का अन्तर दिखलाया । इसके बाद देश-भेद के आधार पर रीतियों का विचार आचार्य वामन ने किया । उन्होंने ही सबसे पहले रीति शब्द का प्रयोग किया । उन्होंने दण्डी के द्विविध मार्गों में एक तीसरा और जोड़कर रीतियों की संख्या तीन कर दी—वैदर्भी, गौडी और पांचाली । वामन ने गुणात्मक पदरचना का नाम रीति रखकर गुण और रीति दोनों के सम्बन्ध की ओर इशारा किया और विभिन्न रीतियों की परिभाषा में भी गुणों का उल्लेख किया । इस प्रकार वामन के मत में रीति और गुण का अनिवार्य सम्बन्ध है । आचार्य वामन ही रीति सम्प्रदाय
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के प्रतिष्ठापक और उसके सबसे बड़े आचार्य माने जाते हैं। उन्होंने रीति को काव्य की आत्मा माना और तीनों रीतियों की परिभाषयें इस प्रकार दीं-- 'जिसमें दोष की मात्राों का बिल्कुल स्पर्श न हो, जो कि समस्त गुणों से गुम्फित हो और जिसका वर्णन के स्वर का सौभाग्य प्राप्त हो उसे वैदर्भी रीति कहते हैं। 'जिसमें शिथिलता के भाव का प्रवेश हो, जो पुरानी छाया से युक्त हो और मधुर तथा सुकुमार हो उसे कवि लोग पाञ्चाली रीति कहते हैं। 'जिसमें समासगर्भित अत्यन्त उत्कट पद हों जो ओज और कान्ति से समन्वित हो, रीति के निपुण वेत्ता उसे गौड़ी रीति कहते हैं।'
यही तीन रीतियाँ वामन ने मानी हैं। रुद्रट ने चार रीतियाँ स्वीकार कीं। इन्हीं से मिलती जुलती उपनागरिक, परुषा और कोमला ये तीन वृत्तियाँ भी हैं। आनन्दवर्धन ने रीति को संघटना इस नाम से अभिहित किया है। इन्होंने यहां पर विस्तार पूर्वक रीतियों के स्वरूप का विवेचन करते हुए दो प्रश्नों पर प्रमुख रूप से प्रकाश डाला है—रीति और गुण का क्या सम्बन्ध है ? रीतियां रस की अभिव्यंजक किस प्रकार होती हैं ?
आनन्दवर्धन ने भी अपने प्राचीनों की मान्यता के आधार पर रीति या संघटना तीन ही प्रकार की मानी हैं—(१) समासरहित संघटना (२) मध्यम समास से भूषित संघटना और (३) दीर्घ समास से युक्त संघटना : प्रथम प्रकार की संघटना को हम वैदर्भी रीति कह सकते हैं; दूसरे प्रकार की संघटना को पाञ्चाली और तीसरे प्रकार की संघटना को गौड़ी यह नाम दिया जा सकता है। संघटनाओं के इन भेदों का पांचवीं कारिका में केवल अनुवाद कर दिया गया है। इसके बाद छठवीं कारिका में गुण और संघटना तथा संघटना और रस के सम्बन्ध पर विचार प्रारम्भ कर दिया गया है। गुण और संघटना का परस्पर क्या सम्बन्ध है ? इस विषय में दो बातें कही जा सकती हैं—(१) गुण और संघटना दोनों एक ही वस्तुयें हैं—गुणों का ही दूसरा नाम संघटना रख दिया गया है। (२) ये दोनों एक दूसरे से भिन्न हैं।
यदि दूसरा पक्ष माना जावे तो एक प्रश्न यह उठता है कि क्या संघटना गुणों के आश्रित रहती है या गुण संघटना के आश्रित रहते हैं ? इस प्रकार संघटना और गुणों के सम्बन्ध के विषय में तीन मतें हो गयीं (१) गुण और संघटना दोनों एक ही चीजें हैं—इनमें कोई भेद नहीं। (२) संघटना गुणों पर आश्रित रहती है। (३) गुण संघटना पर आश्रित रहते हैं। यह तो हुई संघटना और गुणों के परस्पर सम्बन्धविषयक वैकल्पिक पक्षों की बात। दूसरा प्रश्न यह है कि संघटना और रस का परस्पर क्या सम्बन्ध है ?
इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि संघटना अभिव्यंजक होती है और रस अभिव्यज्य होते हैं। छठवीं कारिका में कहा गया है कि 'संघटना माधुर्य इत्यादि गुणों का आश्रय लेकर रसों को अभिव्यक्त करती है।' संघटना और गुणों के परस्पर सम्बन्ध विषयक तीनों वैकल्पिक पक्षों को लेकर प्रस्तुत कारिका की व्याख्या इस प्रकार होगी—(१) यदि यह मानें कि संघटना और गुण दोनों एक ही चीजें हैं तो इस कारिका का अर्थ होगा—संघटना इन गुणों का आश्रय लेकर रसों को अभिव्यक्त किया करती है—जो गुण संघटना की आत्मा हैं। यद्यपि संघटना और गुण दोनों एक ही वस्तुयें हैं तथापि देखा जाता है कि विचारक लोग विचार के निमित्त एक ही वस्तु के स्वभाव में भेद की कल्पना
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तृतीय
उद्योत:
कर लिया करते हैं। इसी काल्पनिक भेद को लेकर कह दिया गया है कि संघटना गुणों का आश्रय लेकर रसों को अभिव्यक्त करती है। (२) गुण संघटना के अधीन रहते हैं। इस पक्ष को लेकर इस कारिका का अर्थ होगा—‘संघटना ऐसे गुणों का आश्रय लेकर रसों की व्यंजना करती है जो गुण संघटना के आधेय होते हैं। (३) भेदवाद में इस पक्ष को लेकर कि संघटना गुणों के अधीन रहती है। इस कारिका का अर्थ होगा—‘संघटना ऐसे गुणों का आश्रय लेकर रसों को अभिव्यक्त करती है जिन गुणों के वह अधीन रहा करती है। यही आनन्दवर्धन के विवेचन का सार है। (ध्वन्या०)—तां केवलमनूदेमुच्यते--गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती माधुर्यादीन् व्यनक्ति सा। सा संघटना रसादीन् व्यनक्ति गुणानाश्रित्य तिष्ठन्तीति। अत्र च विकल्प्यं गुणानां संघटनाव्यतिरेको वा। व्यतिरेकेऽपि द्वयो गतिः गुणाश्रया संघटना संघटनाश्रया वा गुणा इति। तत्रैकपक्षे संघटनाश्रयगुणपक्षे च गुणनात्मभूतानाधेय-भूतान् वाभिधया निःश्रुत्यतां संघटना रसादीन् व्यनक्तीत्यवर्थः। अथवा तु नानात्वपक्षे गुणाश्रयसंघटनापक्षः तदा गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती गुणपरतन्त्रस्वभावा न तु गुणरूपैवेत्यर्थः।
तृतीय
उद्योत:
(अनु०) उसका केवल अनुवाद कर यह कहा जा रहा है—‘माधुर्य इत्यादि गुणों का आश्रय लेकर स्थित होनेवाली वह (संघटना) रसों को अभिव्यक्त करती है।’ वह संघटना गुणों का आश्रय लेकर स्थित होती हुई रसादियों को अभिव्यक्त करती है। यहाँ पर विकल्प करने योग्य यह है कि—गुण और संघटना दोनों की एकरूपता है या भेद है? भेद होने पर भी दो अवस्थाएँ हो सकती हैं—गुण के अधीन संघटना हो या संघटना के अधीन गुण हों। उनमें एकता के पक्ष में संघटना के अधीन गुण इस पक्ष में यह अर्थ होता है—अपनी आत्मा के रूप में स्थित गुणों या अपने आधेयभूत गुणों का आश्रय लेकर स्थित होनेवाली संघटना रसादिकों को अभिव्यक्त किया करती है। जबकि गुण और संघटना के नानात्व पक्ष में संघटना गुणों के अधीन रहती है। यह पक्ष मानें तो अर्थ होगा—गुणों का आश्रय लेकर स्थित होनेवाली अर्थात् गुणों के परतन्त्र स्वभाववाली, गुणरूप ही नहीं।
तृतीय
उद्योत:
(लो०)—रसादिनिति कारिकायां द्वितीयार्थस्यादायं पदम्। ‘रसांस्तन्निय मे हेतुरौचित्यं वक्तृवाच्ययोः’ इति कारिकार्थम्। बहुवचननादावर्थः संगृहीत इति दर्शयति--रसादीनिति। अत्र चैति--अस्मिन्नेव कारिकार्थे। विकल्पेनैदमर्थजातं कल्पयितुं व्याख्यातुं शक्यम्, किः तदाह--गुणाना-मिति। त्रयः पक्षाः ये सम्भाव्यन्ते ते व्याख्यातुं शक्याः। इति। आत्मभूतानिति। स्वभावस्य कल्पनया प्रतिपादनार्थं प्रदर्शितभेदस्य स्वाश्रय-वाचोयुक्तिदं श्यते शिशपाश्रयमिति। वृक्षत्वमिति। आधेयभूतानिति। संघटनाया धर्मा
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गुणा इति भट्टोद्भटादयः। धर्मश्च धर्म्याश्रिता इति प्रसिद्धो मार्गः। गुणपरतन्त्रेति।
अत्र नाधाराधेयभाव आश्रयार्थः। न हि गुणेषु संघटना तिष्ठतीति। तेन राजाश्रयः प्रकृतिवर्ग एवात्र यथा राजाश्रयौचित्येनामात्यादिप्रकृतय इत्ययमर्थः, एवं गुणेषु परतन्त्रस्वभावा तदायतता तन्मुखप्रेक्षिणी संघटनेऽयमर्थो लभ्यत इति भावः।
अनु०—‘रसान्’ यह कारिका में द्वितीयार्थ का प्रथम पद है। ‘रसांस्वन्नियमे हेतुरौचित्यं वस्तुत्ववाच्ययोः’ यह कारिका का आधा भाग है।
बहुवचन से आदे का अर्थ संग्रहीत कर लिया गया है, यह दिखलाते है ‘रस इत्यादि का’ यह। ‘यहां पर’ अर्थात् उसी कारिका के आधे भाग में। विकल्प से इस अर्थसमूह की कल्पना अर्थात् व्याख्या की जा सकती है—वह क्या है यह कहते हैं—‘गुणों का’ यह। तीन पक्ष, जिनकी सम्भावना की जाती है उनकी व्याख्या की जा सकती है। किस प्रकार ? यह कहते हैं—‘उसमें एक्यपक्ष में’ इत्यादि। ‘आत्मभूतों का’। स्वभाव के प्रति-पादन के लिये कल्पना के द्वारा कथन देखा जाता है शिशपा के आश्रयवाला वृक्ष। ‘आश्रेयभूतों को’ संघटना के आश्रित गुण होते है यह भट्टोद्भट इत्यादि कहते हैं। धर्मं धर्मी के आश्रित होते हैं यह प्रसिद्ध मार्ग है। ‘गुणपरतन्त्र’ इति। यहां पर आधाराधेय भाव आश्रय का अर्थ नही है। ‘गुणा में संघटना रहती’ नही है। उससे राजाश्रय प्रकृतिवर्गं इसमें जैसे राजाश्रय के औचित्य से अमात्य इत्यादि प्रकृतियां यह अर्थ होता है इसील प्रकार गुणों से परतन्त्र स्वभाववाली उसके आधीन अर्थात् उसके मुख को देखनेवाली संघटना यह अर्थ प्राप्त होता है, यह भाव है।
तारावती—छठी कारिका की व्याख्या आनन्दवर्धन ने दो खण्डों में की है—प्रथम खण्ड में कारिका का प्रथम दल और द्वितीय दल का प्रथम च्छब्द रखा गया है। ‘रसान्’ यह छठी कारिका के द्वितीय दल का प्रथम शब्द है। पूरा द्वितीय दल इस प्रकार है—‘रसांस्वन्नियमे हेतुरौचित्यं वस्तुत्ववाच्ययोः’।
इस कारिका में ‘रसान्’ यह बहुवचनान्त पाठ है। इस बहुवचन का अर्थ—संघटना रसों का भी अभिव्यक्त करता है और भाव रसभाव भावाभास इत्यादि रसवर्गों के दूसरे असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यों को भी अभिव्यक्त करता है। इसी मतव्य से वृत्तिकार ने ‘रसान्’ की व्याख्या करते हुये ‘रस इत्यादिकों को’ यह लिखा है। ‘यहां पर विकल्प्य यह है’ इस वाक्य में ‘यहां पर’ का अर्थ है इस आधी कारिका में। विकल्प्य का अर्थ है विकल्प से इस अर्थ समूह की कल्पना की जा सकती है अथवा व्याख्या की जा सकती है। वह अर्थसमूह क्या है ?—गुण और संघटना की एकता या भेद, और भेद में भी गुणाश्रित संघटना या संघटनाश्रित गुण ये तीन पक्ष हैं जिनकी सम्भावना की जा सकती है। इन तीनों पक्षों के आधार पर कारिका की व्याख्या की जा सकती है। किस प्रकार? इसका उत्तर दे रहे हैं—एक्य पक्ष में आत्मभूत गुणों का आश्रय लेकर स्थित होनेवाली संघटना, यह अर्थ किया जा सकता है। यहां पर प्रश्न उठता है, कि जब गुण और संघटना एक ही वस्तु है तब संघटना गुणों का आश्रय लेती है इस कथन का क्या अर्थ होगा ? इसका उत्तर यह है—प्रायः देखा जाता है कि किसी बात को समझाने के लिये किसी के
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तृतीय उद्योत:
स्वभाव में भेद की कल्पना कर ली जाती है और उस दिखलाये हुये भेद में यह कह दिया जाता है कि अमुक वस्तु अमुक के आश्रित है। उदाहरण के लिये शिशपा और वृक्षत्व में भेद नहीं है फिर भी कह दिया जाता है कि वृक्षत्व शिशपा में रहता है। दूसरा पक्ष है भेद का। इस भेदभाव में यदि संघटना के आश्रित गुण रहते हैं यह पक्ष माना जाता है तब उस पक्ष में इस कारिका का अर्थ होगा—संघटना ऐसे गुणों का आश्रय लेकर रसों को अभिव्यक्त करती है जो कि संघटना के आधेयभूत होते हैं। मट्टोद्भट इत्यादि ने लिखा है कि गुण संघटना के धर्म होते हैं। यह तो प्रसिद्ध मार्ग ही है कि धर्म धर्मी के आश्रित रहा करते हैं। यदि तीसरे पक्ष के अनुसार यह माना जावे कि संघटना गुण के आश्रित रहती है। तब उस पक्ष में इस कारिका का अर्थ होगा—संघटना जो कि गुणों का आश्रय लेकर स्थित होती है अर्थात् जिसका स्वभाव गुणों से पराधीन होता है तथा जो गुण रूप ही नहीं होती वह संघटना रसों को अभिव्यक्त करती है। 'गुण से पराधीन' कहने का आशय यह है कि 'गुण के आश्रित संघटना होती है' इस वाक्य में आश्रय का अर्थ आधार आधेयभाव नहीं है क्योंकि गुणों में संघटना रहती नहीं है। अपितु यहाँ पर आश्रय का प्रयोग उसी प्रकार का है जिस प्रकार का प्रयोग 'प्रकृतिवर्ग राजा के आश्रय में रहता है' यह है। 'राजाश्रित भृत्य वर्ग' का अर्थ है राजा के आश्रय के आधिपत्य से अमात्य इत्यादि प्रकृति होती है उसी प्रकार गुणों में परतन्त्र स्वभाववाली अर्थात् गुणों के आश्रित या गुणमुखप्रेक्षिणी संघटना होती है, यह अर्थ प्राप्त हो जाता है।
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तृतीय उद्योत:
(ध्वन्या०)—कि पुनरेवं विकल्पनस्य प्रयोजनमिति ? अभिधीयते—यदि गुणाः संघटनै चेत्येकं तत्वं, संघटनाश्रया वा गुणाः; तदा संघटनाया इव गुणानामनियतविषयत्वप्रसङ्गः। गुणानां हि माधुर्यप्रसादप्रकर्ष; करुणाद्भुतादिविषयमोजः। माधुर्यप्रसादौ रसभावतदाभासविषयावेवेति विषयनियमो व्यवस्थितः। संघटनासु स विघट्टते ।
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तृतीय उद्योत:
तथा हि 'शृङ्गारेऽपि दीर्घसमासा ह्रद्यते रौद्रादिविषयसमासा चेति । शृङ्गारे दीर्घसमासा यथा—'मन्दारकुसुमैरपि किञ्चिदुपरितालका' इति । यथा वा--अनवरतनयनजलनिपतनपरिमुषितपात्रलेखं करतलनिषण्णमबले वदनमिदं कं न तालयति ॥ इत्यादि । तथा रौद्रादिविषयसमासा दृश्यते । यथा—'यो यः शस्त्रं बिभर्ति इत्यादौ । तथा 'स्वभुजगुरुमद:' इत्यादौ ।
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तृतीय उद्योत:
तस्मान्न संघटनास्वरूपा न च संघटनाश्रया गुणाः ।
(अनु०) फिर इस कल्प का प्रयोजन क्या है ? बताया जा रहा है—यदि गुण और संघटना दोनों एक तत्व हैं अथवा संघटना के आधीन गुण रहते हैं तो संघटना के समान गुणों में भी अनियतविषयता आ जाने का दोष होगा। निस्सन्देह गुणों में माधुर्य और प्रसाद की अधिकता करुण और अद्भुत इत्यादि ही होते हैं। माधुर्य ओर प्रसाद का विषय रस भाव तथा उनके आभास ही होते हैं। इस प्रकार गुणों के विषयका नियम व्यवस्थित है। संघटनाओं में वह विघटित होता है।
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वह इस प्रकार—शृंगार में भी दीर्घसमासवाली संघटना देखी जाती है। और रौद्र इत्यादि में भी समासरहित संघटना होती है। उसमें शृंगार में दीर्घ समास जैसे—‘मन्दारपुष्परेणु से पिक्जरित अलकोंवाली’ अथवा—
‘निरन्तर नयनजल निपतन से नष्टपटत्ररचनावाला, करतल पर निषण्ण तुम्हारा बदन हे अबले किसे सन्तप्त नहीं करेगा।’
इत्यादि में। तथा रौद्र इत्यादि में भी समासरहित संघटना देखी जाती है जैसे—‘यो यः शस्त्रं बिभर्ति स्वभुजगुरुमदः’ इत्यादि। अतएव न गुण संघटना का स्वरूप है न संघटना पर आश्रित।
(लो०)—सङ्घटनाया इवेतित। प्रथमपक्षे तादात्म्येन समानयोगक्षेमत्वादितरत्तु धर्मत्वेनैति भावः। भवतत्त्वनियतविषयतयैताश्रृङ्गार—गुणानां होती। हि शब्दस्तु—शब्दार्थे। नत्वेवमुपपद्यते त्व न्यायबलादिव्यर्थः। स इति योग्यं गुणेष्वनियम उक्तोजसावित्यर्थः।
तथात्वे लक्ष्यदर्शनमेव हेतुत्वेनाह—तथाहि। इत्युक्तम्। दर्शन—स्थलमुदाहरणमासूत्रयाह—तत्रैव। नात्र शृंगारः कार्चिद्विशेषो द्वितीयमुदाहरण—माह—यथा वेति। एषा हि प्रणयकुपितनायिकाप्रसादनायोक्तितन्नायिकस्येति। तस्माद्विति। नैतद्रयास्यानद्रयां कारिकायां युक्ततमिति यावत्।
(अनु०)—‘संघटना के समान’। यह भाव है कि प्रथम पक्ष में तादात्म्य के कारण उनका योग-क्षेम समान होता है इसलिये तथा अन्यत्र धर्म के कारण। ‘अनियत विषयता हो’ यह शंका करके कहते हैं—‘निःसन्देह गुणों का’। यहाँ ‘हि’ शब्द ‘तु’ शब्द के अर्थ में है।
यह सिद्ध तो नहीं होता किन्तु न्याय के बल पर आ जाता है। ‘वह’ अर्थात् जो यह गुणों के लिये नियम बतलाया गया है वह
ऐसा होने पर लक्ष्यदर्शन को ही हेतु के रूप में कहते हैं—‘तथाहि’ इत्यादि। ‘देखा जाता है’ इस कहे हुये दर्शनस्थान उदाहरण को दिखलाते हैं—‘वहाँ पर’ यहाँ पर कोई शृङ्गार नहीं है यह शङ्का करके दूसरा उदाहरण देते हैं—‘अथवा जैसे।’ यह प्रणयकुपिता नायिका के प्रसाद के लिये नायक की उक्ति है। ‘इससे’ अर्थात् ये दोनों व्याख्यान कारिका में उचित नहीं हैं।
वैकल्पिक पक्षों की उद्भावना का प्रयोजन
तारावती—अब प्रश्न उठता है कि इन वैकल्पिक पक्षों का विवेचन करने से लाभ क्या है ? इसी पर प्रस्तुत प्रकरण में विचार किया जा रहा है। पहला पक्ष लीजिये ‘गुण और संघटना एक ही हैं या इनका तादात्म्य है’ ऐसी दशा में इन दोनों का योगक्षेम एक सा ही होगा।
जो बात संघटना में होगी वह बात गुणों में भी होगी। यदि दूसरा पक्ष लिया जावे अर्थात् यह स्वीकार किया जावे कि गुण संघटन के आधीन होते हैं तो गुणों को धर्म मानना पड़ेगा और
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तृतीय
उद्योत:
संघटना को धर्मी । धर्मी की विशेषतायें धर्म में भी होना अनिवार्य है । ऐसी दशा में भी जो विशेषता संघटना में हो वही गुणों में आ जावेगी । संघटना का विषय नहीं होता । असमासा, मध्यमसमासा और दीर्घसमासा तीनों प्रकार की संघटना कोमल और कठोर दोनों प्रकार के रसों को अभिव्यक्त करती है । यही बात गुणों में आ जावेगी । अर्थात् माधुर्य और ओज दोनों गुण दोनों प्रकार के रसों के अभिव्यंजक माने जाने लगेंगे । अत एव उक्त दोनों पक्षों को मानने पर गुणों का विषय भी अनियत हो जावेगा । (प्रश्न) यदि गुणों का विषय भी अनियत हो ही जावे तो इसमें दोष क्या है ? (उत्तर) इसमें तो सन्देह नहीं कि गुणों का विषय नियत होता है । माधुर्य और प्रसाद का प्रकर्य करुण तथा विप्रलम्भ शृङ्गार के विषय में ही होता है । ओज का प्रकर्य रौद्र और अद्भुत इत्यादि के विषय में ही होता है । माधुर्यं और प्रसाद रस और रसाभास, भावाभास इत्यादि के विषय में ही होते हैं । कहने का आशय यह है कि गुणों का विषयनियम व्यवस्थित है । यहाँ पर 'गुणानां हि' में हि शब्द का अर्थ है 'तु' अर्थात् गुणों का तो विषयनियम व्यवस्थित है । यह बात तकि के बल पर सिद्ध नहीं की जाती किन्तु अनेक लक्ष्यों पर विचार करने से सामान्य न्याय के बल पर स्वतः यह निष्कर्ष निकल आता है । गुणों में जो विषय की व्यवस्था बतलाई गई है संघटना में उसका ब्यभिचार मिलता है अर्थात् संघटना में विषय की व्यवस्था ठीक रूप में लागू नहीं होती । संघटना में विषय-व्यवस्था किस प्रकार विघटित हो जाती है इसमें तर्क के रूप में लक्ष्य ही दिखलाये जा रहे हैं जहाँ यह व्यवस्था लागू नहीं होती । वह इस प्रकार कि नियमानुकूल शृंगार रस में समास नहीं होने चाहिये । और रौद्र इत्यादि रसों में लम्बे समास होने चाहिये । किन्तु देखा जाता है कि कहीं-कहीं शृङ्गार रस में लम्बे समास होते हैं और रौद्र रस में समास होते ही नहीं । 'देखे जाते' हैं यह कहा गया था । अब जिन उदाहरणों में देखे जाते हैं उन स्थानों को सूत्ररूप में बतलाया जा रहा है । उसमें शृङ्गार रस में दीर्घ समास का उदाहरण जैसे 'मन्दारकुसुमरेणुपिञ्जरितालक' में दीर्घ समास है । इसका अर्थ कि 'मन्दार पुष्प की धूल से नायिका के अलक पिजर वर्ण के हो गये थे' यह शृंगार रस है । इस वाक्य में शृंगार रस की आलम्बनभूत नायिका के केशपाश के सौन्दर्य की प्रशंसा की गई है । अतः यह शृंगार रस है और इसमें दीर्घ समास विद्यमान ही है । अतः यह नहीं कहा जा सकता कि संघटना का विषय नियत होता है । इस पर कोई कह सकता है कि प्रस्तुत वाक्य में भले ही नायिका के सौन्दर्य की प्रशंसा की गई हो किन्तु केवल इतने से वाक्य से ही शृङ्गार रस की कोई प्रतीति तो होती नहीं । शृंगार रस की पूर्ण प्रतीति के निमित्त पूरे प्रसङ्ग के सामने होने की आवश्यक्ता है । अतः इस वाक्य से ही यह सिद्ध नहीं किया जा सकता कि संघटना का विषय नियत नहीं होता । इस पर वृत्तिकार दूसरा उदाहरण दे रहे हैं—'अनवरत ... ... तापयति' ।
संघटना को धर्मी । धर्मी की विशेषतायें धर्म में भी होना अनिवार्य है । ऐसी दशा में भी जो विशेषता संघटना में हो वही गुणों में आ जावेगी । संघटना का विषय नहीं होता । असमासा, मध्यमसमासा और दीर्घसमासा तीनों प्रकार की संघटना कोमल और कठोर दोनों प्रकार के रसों को अभिव्यक्त करती है । यही बात गुणों में आ जावेगी । अर्थात् माधुर्य और ओज दोनों गुण दोनों प्रकार के रसों के अभिव्यंजक माने जाने लगेंगे । अत एव उक्त दोनों पक्षों को मानने पर गुणों का विषय भी अनियत हो जावेगा । (प्रश्न) यदि गुणों का विषय भी अनियत हो ही जावे तो इसमें दोष क्या है ? (उत्तर) इसमें तो सन्देह नहीं कि गुणों का विषय नियत होता है । माधुर्य और प्रसाद का प्रकर्य करुण तथा विप्रलम्भ शृङ्गार के विषय में ही होता है । ओज का प्रकर्य रौद्र और अद्भुत इत्यादि के विषय में ही होता है । माधुर्यं और प्रसाद रस और रसाभास, भावाभास इत्यादि के विषय में ही होते हैं । कहने का आशय यह है कि गुणों का विषयनियम व्यवस्थित है । यहाँ पर 'गुणानां हि' में हि शब्द का अर्थ है 'तु' अर्थात् गुणों का तो विषयनियम व्यवस्थित है । यह बात तकि के बल पर सिद्ध नहीं की जाती किन्तु अनेक लक्ष्यों पर विचार करने से सामान्य न्याय के बल पर स्वतः यह निष्कर्ष निकल आता है । गुणों में जो विषय की व्यवस्था बतलाई गई है संघटना में उसका ब्यभिचार मिलता है अर्थात् संघटना में विषय की व्यवस्था ठीक रूप में लागू नहीं होती । संघटना में विषय-व्यवस्था किस प्रकार विघटित हो जाती है इसमें तर्क के रूप में लक्ष्य ही दिखलाये जा रहे हैं जहाँ यह व्यवस्था लागू नहीं होती । वह इस प्रकार कि नियमानुकूल शृंगार रस में समास नहीं होने चाहिये । और रौद्र इत्यादि रसों में लम्बे समास होने चाहिये । किन्तु देखा जाता है कि कहीं-कहीं शृङ्गार रस में लम्बे समास होते हैं और रौद्र रस में समास होते ही नहीं । 'देखे जाते' हैं यह कहा गया था । अब जिन उदाहरणों में देखे जाते हैं उन स्थानों को सूत्ररूप में बतलाया जा रहा है । उसमें शृङ्गार रस में दीर्घ समास का उदाहरण जैसे 'मन्दारकुसुमरेणुपिञ्जरितालक' में दीर्घ समास है । इसका अर्थ कि 'मन्दार पुष्प की धूल से नायिका के अलक पिजर वर्ण के हो गये थे' यह शृंगार रस है । इस वाक्य में शृंगार रस की आलम्बनभूत नायिका के केशपाश के सौन्दर्य की प्रशंसा की गई है । अतः यह शृंगार रस है और इसमें दीर्घ समास विद्यमान ही है । अतः यह नहीं कहा जा सकता कि संघटना का विषय नियत होता है । इस पर कोई कह सकता है कि प्रस्तुत वाक्य में भले ही नायिका के सौन्दर्य की प्रशंसा की गई हो किन्तु केवल इतने से वाक्य से ही शृङ्गार रस की कोई प्रतीति तो होती नहीं । शृंगार रस की पूर्ण प्रतीति के निमित्त पूरे प्रसङ्ग के सामने होने की आवश्यक्ता है । अतः इस वाक्य से ही यह सिद्ध नहीं किया जा सकता कि संघटना का विषय नियत नहीं होता । इस पर वृत्तिकार दूसरा उदाहरण दे रहे हैं—'अनवरत ... ... तापयति' ।
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व्यक्ति होती है। नियमनुकूल सबसे अधिक समास रहित संघटना विप्रलम्भ श्रृंगार में ही होनी चाहिये। यहाँ पर दीर्घ समास होते हुये भी विप्रलम्भ की अभिव्यक्ति हो जाती है। अतः यह नहीं कहा जा सकता कि समास रहित संघटना ही विप्रलम्भ श्रृंगार की व्यंजना करती है। दूसरी व्यवस्था यह है कि दीर्घसमासा संघटना रौद्र इत्यादि रस को अभिव्यक्त करती है। किन्तु इस नियम का भी व्यभिचार देखा जाता है। 'यो यः शस्त्रं बिभर्ति स्वभुजमहमः पाण्डवांरान् वधूनाम्' इत्यादि वेणीसंहार को 'पथि' कुपित भीमसेन की द्युति है। यहाँ पर समास बिल्कुल नहीं किया गया है और समास का न करना ही रौद्र रस का विशेष रूप से अभिव्यंजक हो रहा है। अतः यह सिद्ध हो गया कि संघटना का विषय नियत नहीं होता किन्तु गुणों का विषय नियत होता है। अतएव यदि संघटना और गुणों की एकता मानी जावेगी या संघटना के आश्रितगुण माने जावेंगे तो यह दोष होगा कि संघटना का धर्म गुणों में भी मानना पड़ेगा और गुणों को भी अनियत विषय ही माना जाने लगेगा। इस प्रकार ये दोनों पक्ष ठीक नहीं हैं और न उनके अनुसार की हुई कारिका की व्याख्या ही ठीक है।
ननु यदि संघटना गुणानां नाश्रयस्तत्रकिमालम्बनैः परिकल्पनताम्। उच्चते प्रतिपादितमेवास्मालम्बनं तदनवलम्बनत्वे तु गुणाः स्मृताः॥अङ्गणिश्ततास्वलङ्कारैर्मन्तव्याः कटकादिवत्॥
(अनु०) (प्रश्न) यदि संघटना गुणों का आश्रय नहीं होती तो फिर उनके किस आलम्बन की कल्पना की जावे? (उत्तर) कहा जा रहा है—चूँके आलम्बन का प्रतिपादन तो पहले हो किया जा चुका है—'उस अङ्गी अर्थ (रस) का जो अवलम्बन लेते हैं वे गुण माने जाते हैं। कटक इत्यादि के समान अलङ्कार अङ्गाश्रित माने जाने चाहिये। (लो०)—किमालम्बना इति। शब्दार्थालम्बनत्वे हि तदलङ्कारेभ्यः को विशेष इत्युक्तभावः। प्रतिपादितमेवेति। अस्मिन्नूलकृतेऽत्यर्थः॥(अनु०)—'किस सहारे से' भाव यह है कि शब्द और अर्थ का सहारा होने से उनके अलङ्कारों से क्या विशेषता है? 'प्रतिपादित हो किया गया है' अर्थात् हमारे मूलाकार के द्वारा।
गुणों के आश्रय पर विचार तारावती—(प्रश्न) यदि संघटना गुणों का आश्रय नहीं है तो गुणों के किस आश्रय की कल्पना की जावे? प्रश्नकर्ता का आशय यह है कि गुण निराश्रय तो हो ही नहीं सकते, इनका कोई न कोई आधार तो मानना ही पड़ेगा। आधार के रूप में तीन ही तत्त्व माने जा सकते हैं शब्द, अर्थ और संघटना। शब्द और अर्थ गुणों का आश्रय माने नहीं जा सकते क्योंकि प्राचीनों ने कह दिया है कि यदि शब्द और अर्थ गुणों का आश्रय माने जावेंगे तो शब्दालङ्कार और अर्थालङ्कार से गुणों में भेद क्या रह जावेगा? आश्रय यह है कि शब्दाश्रित काव्य तत्त्व शब्दालङ्कार कहलाते हैं, अर्थाश्रित काव्यतत्त्व अर्थालङ्कार कहलाते हैं। अब संघटना ही शेष रह जाती है जो कि गुणों का आश्रय मानी जा सकती है। यदि आप संघटना को भी गुणों का आश्रय नहीं मानेंगे तो फिर गुणों का दूसरा आश्रय रह क्या जावेगा?
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तृतीय उद्योत:
( उत्तर ) इस शङ्का का समाधान तो हमारे मूल-कार ( कारिकाकार ) ने ही दे दिया है — ‘उस अज्ञी अर्थ (रस) का जो आश्रय लेते हैं वे गुण माने गये हैं। कटक इत्यादि के समान अलङ्कार अज्ञाश्रित माने जाने चाहिये ।’ आशय यह है कि अलङ्कारों का आश्रय शब्द और अर्थ होते हैं और गुणों का आश्रय रस होते हैं। अतः संघटनागत गुणों का आश्रय नहीं मानी जा सकती।
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(ध्वन्या०)—अथवा भवन्तु शब्दाश्रया एव गुणा:; न चैषामनुप्रासादितुल्यत्वम् । यस्मादनुप्रासादयोऽपेक्षितशब्दधर्मा एव प्रतिपादिता: । गुणास्तु व्यङ्ग्यार्थविशेषाव-भासिवाच्यप्रतिपादनसमर्थशब्दधर्मा एव । शब्दधर्मत्वं चैषामनाश्रयत्वेऽपि शारीरा-श्रयत्वमिव शौर्यादीनाम् ।
(अनु०) अथवा शब्दाश्रय ही गुण हों। इनका अनुप्रासादितुल्यत्व नहीं हो सकता। क्योंकि अनुप्रास इत्यादि शब्द के अर्थ की अपेक्षा न करनेवाले धर्म ही हैं यह प्रतिपादित किया जा चुका है। गुण तो विशेष व्यङ्गच्य के द्वारा अवभासित होनेवाले वाच्यार्थ के प्रतिपादन में समर्थ शब्दधर्म ही हैं। इनकी शब्दधर्मता शौर्य इत्यादि के शारीराश्रयत्व के समान दूसरे का आश्रय होते हुये भी मानी जातो है।
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(लो०)—अथवेतित । न ह्यौ काश्रितत्वादेक्यं, रूपस्य संयोगस्य चैक्यप्रसङ्गात् । संयोगे द्वितीयमपेक्ष्यमपि चेत् । इहापि व्यङ्ग्योपकारकवाच्यापेक्ष्यस्त्येवेतिसमानम् । न चायं मम स्थितः पक्ष:, अपितु भवत्पक्षामविवेकिनामभिप्रायणापि शब्दधर्मत्वं शौर्य-दीनामिव शरीरत्वम्। अविवेकी हि औपचारिकत्वविभागं विवेक्तुमसमर्थ: । तथापि न कश्चिद्धोष इत्येवं परमेतदुक्तमित्येतद्—शब्दधर्मत्वमिति । अन्याश्रयत्वेऽपि इति ।
(अनु०)—‘अथवा’ । एक में आश्रित होने के कारण एकता नहीं कही जा सकती क्योंकि रूप और संयोग की भी एकता प्रसक्त हो जावेगी। यदि कहो कि 'संयोग में दूसरे की अपेक्षा होती है'— तो यहां पर भी व्यङ्ग्यच के उपकारक वाच्य की अपेक्षा है ही इस प्रकार यह पहले के समान है। यह मेरा पक्ष स्थित नहीं है, अपितु अविवेकियों के अभिप्राय से भी शौर्य इत्यादि के शरीरधर्म के समान इनका शब्दधर्मत्व मान लिया जावे । निःसन्देह अविवेकी औपचारिक-कव् ( गौणत्व ) का विमेद करने में असमर्थ होता है। तथापि कोई दोष नहीं है इस आशय से यह कहा है यह कहते हैं—‘शब्दधर्मत्व’ इत्यादि । ‘अन्याश्रयत्व में भी’ अर्थात् आत्मनिष्ठत्व में भी ।
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इस दृष्टि से गुण और अलङ्कार का भेद
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तारावती—अथवा गुणों को शब्द के आश्रय में रहनेवाला भी माना जा सकता है ।
(प्रश्न) यदि गुण शब्दाश्रित ही होते हैं तो वे अनुप्रास इत्यादि के समान क्यों नहीं हो जाते ? (उत्तर) अनुप्रास इत्यादि शब्द का ऐसा धर्म होते हैं जिनमें अर्थ की अपेक्षा नहीं होती यह बता पहले ही बतलाई जा चुकी है। इसके प्रतिकूल गुण शब्द का ऐसा धर्म होते हैं जो व्यङ्ग्यार्थ को प्रकट करनेवाले वाच्यार्थ के प्रतिपादन में समर्थ हों । (प्रश्न) गुण भी शब्दाश्रित होते हैं और अनुप्रास इत्यादि भी शब्दाश्रित ही होते हैं फिर एकाश्रय होने के कारण दोनों की तुल्यता
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क्यों नहीं हो जातो ? ( उत्तर ) एकाश्रय में रहने के कारण कभी दो वस्तुयें एक नहीं हो जातीं । यदि एकाश्रय में रहने के कारण दो वस्तुयें एक हो जाती हैं तो रूप और संयोग भी एक हो जावेंगे । क्योंकि एक ही द्रव्य कटक इत्यादि में रूप भी रहता है और संयोग भी । ( प्रश्न ) संयोग को दूसरे पदार्थ की अपेक्षा होती है रूप को नहीं, फिर दोनों एक कैसे हो सकते हैं । ( उत्तर ) यहाँ पर भी तो गुण को शब्द के अतिरिक्त व्यङ्गघ के उपकारक वाच्य की अपेक्षा होती है । यह बात दोनों में एक सी ही है । यहाँ पर ध्यान रखने की बात यह है कि गुण शब्दाश्रित नहीं होते फिर भी शब्द के आश्रित उसी प्रकार कहे जाते हैं जिस प्रकार शौर्य इत्यादि शरीर के धर्म नहीं होते वे आत्मा के धर्म होते हैं किन्तु कहे शरीर के धर्म जाते है । आशय यह है कि गुणों का शब्दधर्म होना मुख्य पक्ष नहीं है किन्तु जिस प्रकार अविवेकी लोग शौर्य इत्यादि को शरीर का धर्म न होते हुये भी शरीर का धर्म कहने लगते हैं ( उसे ज्ञानी लोग भी औपचारिक या लाक्षणिक प्रयोग मानकर सहन कर लेते हैं । ) उसी प्रकार यदि कोई अविवेकी चाहे तो गुणों को शब्दों का धर्म कह सकता है । क्योंकि अविवेकी वही होता है जो औपचारिक का भेद न कर सके अर्थात् यह न जान सके कि मुख्य क्या है और गौण क्या है ? मुख्य पक्ष यही है कि गुण आत्मभूत रस के धर्म होते हैं । किन्तु यदि कोई उन्हें शब्दधर्म भी मानता है तो औपचारिक प्रयोग मानकर उसमें भी कोई दोष नहीं आता । इसी आशय से वृत्तिकार ने लिखा है कि 'अन्याश्रित होते हुए भी जिस प्रकार शौर्य इत्यादि शरीर के आश्रित कहे जाते हैं उसी प्रकार गुण भी शब्दधर्म कहे जाते हैं ।' यहाँ पर अन्याश्रित का अर्थ है आत्मनिष्ठ । अर्थात जैसे आत्मनिष्ठ होते हुये भी शौर्य इत्यादि शरीर का धर्म कहे जाते हैं उसी प्रकार रसरूप आत्मनिष्ठ होते हुये भी गुण शब्दधर्म कहे जाते हैं ।
ननु यदि शब्दाश्रया गुणास्तत्सङ्घटनारूपत्वं तदाश्रयत्वं वा तेषां प्राप्तमेव न ह्यसङ्घटिता: शब्दा अर्थविशेषप्रतिपादनसामर्थ्यदाश्रया भवन्ति । नैवं वर्णपदव्यङ्गघच्यवस्थासु रसादीनां प्रतिपादितत्वात् ।
(ध्वन्या०)—ननु यदि शब्दाश्रया गुणास्तत्सङ्घटनारूपत्वं तदाश्रयत्वं वा तेषां प्राप्तमेव न ह्यसङ्घटिता: शब्दा अर्थविशेषप्रतिपादनसामर्थ्यदाश्रया भवन्ति । नैवं वर्णपदव्यङ्गघच्यवस्थासु रसादीनां प्रतिपादितत्वात् ।
(अनु०)—(प्रश्न) यदि गुण शब्दाश्रय होते हैं तो उनका सङ्घटनारूपत्व अथवा सङ्घटनाश्रयत्व प्राप्त ही हो गया । निस्सन्देह असङ्घटित शब्द वाचक न होते के कारण अर्थविशेष के द्वारा प्रतिपाद्य रस इत्यादि के आश्रित गुणों के कभी आश्रय नहीं होते । ( उत्तर ) यह बात नहीं है । क्योंकि इस बात का प्रतिपादन किया ही जा चुका है कि रस इत्यादि की व्यञ्जना वर्णं और पद इत्यादि से होती है
(अनु०)—(प्रश्न) यदि गुण शब्दाश्रय होते हैं तो उनका सङ्घटनारूपत्व अथवा सङ्घटनाश्रयत्व प्राप्त ही हो गया । निस्सन्देह असङ्घटित शब्द वाचक न होते के कारण अर्थविशेष के द्वारा प्रतिपाद्य रस इत्यादि के आश्रित गुणों के कभी आश्रय नहीं होते । ( उत्तर ) यह बात नहीं है । क्योंकि इस बात का प्रतिपादन किया ही जा चुका है कि रस इत्यादि की व्यञ्जना वर्णं और पद इत्यादि से होती है
(लो०)—शब्दाश्रया इति । उपचारेण यदि शब्देषु गुणास्तदेवं---शृङ्गारादि रसाभिव्यञ्जकवाच्यप्रतिपादनसामर्थ्यमेव शब्दस्य माधुर्यम् । तच्च शब्दगतं विशिष्टघटनयैव लभ्यते । अथ सङ्घटनात्व न व्यतिरिच्यते काचित्, अपितु सङ्घटनैव शब्दा: तदाश्रितत्वं तत्तसामर्थ्यमिति सङ्घटनाश्रितमेवेत्युक्तं तात्पर्यम् । ननु शब्दधर्मत्वं शब्दैकात्मकत्वं वा तावतस्तु, किमयं मध्ये सङ्घटनानुप्रवेश इत्याशङ्क्य स एव पूर्वपक्षवाद्याह—न हीति । अर्थविशेषैर् तु पदान्तरनिरपेक्षगृहीतपदवाच्य: सामान्य: प्रतिपाद्या व्यङ्गघा ये रसभावतदाभासतत्प्रशमास्तदाश्रितानां मुख्यतन्निष्ठानां गुणानामसङ्घटिता शब्दा न भवन्त्युपचारेणापीति भाव: ।
(लो०)—शब्दाश्रया इति । उपचारेण यदि शब्देषु गुणास्तदेवं---शृङ्गारादि रसाभिव्यञ्जकवाच्यप्रतिपादनसामर्थ्यमेव शब्दस्य माधुर्यम् । तच्च शब्दगतं विशिष्टघटनयैव लभ्यते । अथ सङ्घटनात्व न व्यतिरिच्यते काचित्, अपितु सङ्घटनैव शब्दा: तदाश्रितत्वं तत्तसामर्थ्यमिति सङ्घटनाश्रितमेवेत्युक्तं तात्पर्यम् । ननु शब्दधर्मत्वं शब्दैकात्मकत्वं वा तावतस्तु, किमयं मध्ये सङ्घटनानुप्रवेश इत्याशङ्क्य स एव पूर्वपक्षवाद्याह—न हीति । अर्थविशेषैर् तु पदान्तरनिरपेक्षगृहीतपदवाच्य: सामान्य: प्रतिपाद्या व्यङ्गघा ये रसभावतदाभासतत्प्रशमास्तदाश्रितानां मुख्यतन्निष्ठानां गुणानामसङ्घटिता शब्दा न भवन्त्युपचारेणापीति भाव: ।
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तृतीय
उद्योत:
हेतुः—अवाचकत्वादिति । न ह्यसड्ढुट्टिता व्यञ्ज्योपयोगिनिराकाड्क्षरूपवाच्यमाहु-
हेतुः—अवाचकत्वादिति । न ह्यसड्ढुट्टिता व्यञ्ज्योपयोगिनिराकाड्क्षरूपवाच्यमाहु-
तृतीय
उद्योत:
र्थः । एतत्परिहरति—नैवमिति । वर्णव्यञ्ज्यो हि यावद्रस उक्तस्तावदवाचक-
र्थः । एतत्परिहरति—नैवमिति । वर्णव्यञ्ज्यो हि यावद्रस उक्तस्तावदवाचक-
तृतीय
उद्योत:
स्यापि पदस्य श्रवणमात्रावसेयेन स्वसोभायेन वर्णवदेव यद्रसाभिव्यक्तिहेतुत्वं स्फुटमेव लभ्यत इति तदेव माधुर्यादिति किं सड्ढुट्टनया । तथा च पदव्यञ्ज्यो यावद्रसविनिर्खत-
स्यापि पदस्य श्रवणमात्रावसेयेन स्वसोभायेन वर्णवदेव यद्रसाभिव्यक्तिहेतुत्वं स्फुटमेव लभ्यत इति तदेव माधुर्यादिति किं सड्ढुट्टनया । तथा च पदव्यञ्ज्यो यावद्रसविनिर्खत-
तृतीय
उद्योत:
स्तावच्छुद्धस्यापि पदस्य स्वार्थस्मारकत्वेनापि रसाभिव्यक्तियोग्यार्थावभासकत्वमेव माधुर्यादितीति तत्रापि कः सङ्घटनाया उपयोगः ?
स्तावच्छुद्धस्यापि पदस्य स्वार्थस्मारकत्वेनापि रसाभिव्यक्तियोग्यार्थावभासकत्वमेव माधुर्यादितीति तत्रापि कः सङ्घटनाया उपयोगः ?
तृतीय
उद्योत:
(अनु०)
(अनु०)—‘शब्दाश्रय’ इत्यादि । उपचार से यदि शब्दों में गुण होते हैं तो यह तात्पर्य
(अनु०)—‘शब्दाश्रय’ इत्यादि । उपचार से यदि शब्दों में गुण होते हैं तो यह तात्पर्य
तृतीय
उद्योत:
है—सङ्घटनारसाभिव्यञ्जक वाच्यप्रतिपादन सामर्थ्य ही शब्द का माधुर्य है । और शब्दगत वह (माधुर्य) विशिष्ट सङ्घटना से ही प्राप्त होता है, यदि कहो कि सङ्घटना कोई व्यतिरिक्त वस्तु नहीं है अपितु सङ्घटित शब्द ही (सङ्घटना है) तात्पर्य यह है कि उन (सङ्घटित शब्दों) के आश्रित
है—सङ्घटनारसाभिव्यञ्जक वाच्यप्रतिपादन सामर्थ्य ही शब्द का माधुर्य है । और शब्दगत वह (माधुर्य) विशिष्ट सङ्घटना से ही प्राप्त होता है, यदि कहो कि सङ्घटना कोई व्यतिरिक्त वस्तु नहीं है अपितु सङ्घटित शब्द ही (सङ्घटना है) तात्पर्य यह है कि उन (सङ्घटित शब्दों) के आश्रित
तृतीय
उद्योत:
वह पूर्वोक्त सामर्थ्य सङ्घटनाश्रित ही है यह बात कही हुई हो जाती है ।
वह पूर्वोक्त सामर्थ्य सङ्घटनाश्रित ही है यह बात कही हुई हो जाती है ।
तृतीय
उद्योत:
‘शब्दधर्मत्व अथवा शब्दैकाश्रयत्व’ उतने से ही (गुणों के शब्दाश्रयत्व से ही) सिद्ध हो
‘शब्दधर्मत्व अथवा शब्दैकाश्रयत्व’ उतने से ही (गुणों के शब्दाश्रयत्व से ही) सिद्ध हो
तृतीय
उद्योत:
जावें यह बीच में सङ्घटना का क्या अनुप्रवेश ?’ यह शङ्का करके वही पूर्वपक्षवादी कहता है-
जावें यह बीच में सङ्घटना का क्या अनुप्रवेश ?’ यह शङ्का करके वही पूर्वपक्षवादी कहता है-
तृतीय
उद्योत:
‘नहि’ इत्यादि । भाव यह है कि पदाश्रयरूपैक शुद्ध पद वाच्य सामग्रियों है, वहाँ नहीं
‘नहि’ इत्यादि । भाव यह है कि पदाश्रयरूपैक शुद्ध पद वाच्य सामग्रियों है, वहाँ नहीं
तृतीय
उद्योत:
अपितु अर्थविशेषों के द्वारा रस, भाव, उनके आभास और उनके प्रथम ये जो व्यञ्जक, उनके
अपितु अर्थविशेषों के द्वारा रस, भाव, उनके आभास और उनके प्रथम ये जो व्यञ्जक, उनके
तृतीय
उद्योत:
आश्रित अर्थात् मुख्य रूप से उनमें रहनेवाले गुणों के आश्रय असङ्घटित शब्द उपचार के द्वारा
आश्रित अर्थात् मुख्य रूप से उनमें रहनेवाले गुणों के आश्रय असङ्घटित शब्द उपचार के द्वारा
तृतीय
उद्योत:
भी नहीं हो सकते । इसमें हेतु है—‘अवाचकत्व के कारण’ । निस्सन्देह असङ्घटित (शब्द)
भी नहीं हो सकते । इसमें हेतु है—‘अवाचकत्व के कारण’ । निस्सन्देह असङ्घटित (शब्द)
तृतीय
उद्योत:
व्यञ्ज्योपयोगी निराकाङ्क्षा रूप वाच्य को नहीं कहते । इसका उत्तर देते हैं—‘ऐसा नहीं
व्यञ्ज्योपयोगी निराकाङ्क्षा रूप वाच्य को नहीं कहते । इसका उत्तर देते हैं—‘ऐसा नहीं
तृतीय
उद्योत:
है—’ क्योंकि जब वर्णव्यञ्जक्य रस बतलाया गया है तब अवाचक भी पद के श्रवणमात्र से
है—’ क्योंकि जब वर्णव्यञ्जक्य रस बतलाया गया है तब अवाचक भी पद के श्रवणमात्र से
तृतीय
उद्योत:
ज्ञान होने योग्य अपने सौभाग्य से वर्ण के समान ही जो रसाभिव्यक्तिक हेतुत्व स्पष्ट ही उपलब्ध
ज्ञान होने योग्य अपने सौभाग्य से वर्ण के समान ही जो रसाभिव्यक्तिक हेतुत्व स्पष्ट ही उपलब्ध
तृतीय
उद्योत:
होता है वही माधुर्य इत्यादि हैं । सङ्घटना की क्या आवश्यकता ? और भी जब पदव्यञ्जक्य
होता है वही माधुर्य इत्यादि हैं । सङ्घटना की क्या आवश्यकता ? और भी जब पदव्यञ्जक्य
तृतीय
उद्योत:
भी ध्वनि कही गई है तो शुद्ध भी पद के स्वार्थस्मारकत्व के द्वारा भी रसाभिव्यक्तिक के योग्य
भी ध्वनि कही गई है तो शुद्ध भी पद के स्वार्थस्मारकत्व के द्वारा भी रसाभिव्यक्तिक के योग्य
तृतीय
उद्योत:
अर्थ का अवभासन करना माधुर्य इत्यादि है, उसमें भी सङ्घटना का क्या उपयोग ?
अर्थ का अवभासन करना माधुर्य इत्यादि है, उसमें भी सङ्घटना का क्या उपयोग ?
तृतीय
उद्योत:
तारावती—(प्रश्न)
तारावती—(प्रश्न) यदि गुण शब्दाश्रित होते हैं तो उनका सङ्घटनारूपैक या सङ्घट-
तारावती—(प्रश्न) यदि गुण शब्दाश्रित होते हैं तो उनका सङ्घटनारूपैक या सङ्घट-
तृतीय
उद्योत:
नाश्रयत्व स्वभावतः सिद्ध हो गया । आशाय है कि जब आप यह कहते हैं कि शब्दों में गुणों
नाश्रयत्व स्वभावतः सिद्ध हो गया । आशाय है कि जब आप यह कहते हैं कि शब्दों में गुणों
तृतीय
उद्योत:
का औपचारिक प्रयोग होता है तब उसका तात्पर्य यही माना जा सकता है कि शब्द की
का औपचारिक प्रयोग होता है तब उसका तात्पर्य यही माना जा सकता है कि शब्द की
तृतीय
उद्योत:
मधुरता शब्दों के उस सामर्थ्य को ही कहते हैं जिसके द्वारा ऐसे वाच्यार्थ का प्रतिपादन किया
मधुरता शब्दों के उस सामर्थ्य को ही कहते हैं जिसके द्वारा ऐसे वाच्यार्थ का प्रतिपादन किया
तृतीय
उद्योत:
जा सके जो कि शृङ्गार इत्यादि रसों का अभिव्यञ्जक हो । यदि शब्दों में इस प्रकार के
जा सके जो कि शृङ्गार इत्यादि रसों का अभिव्यञ्जक हो । यदि शब्दों में इस प्रकार के
तृतीय
उद्योत:
वाच्यार्थ को प्रकट करने की शक्ति नहीं होती तो वहाँ पर शब्दों का माधुर्य भी नहीं माना
वाच्यार्थ को प्रकट करने की शक्ति नहीं होती तो वहाँ पर शब्दों का माधुर्य भी नहीं माना
तृतीय
उद्योत:
जा सकता । शब्द के अन्दर वाच्यार्थ को कहने की शक्ति सङ्घटना के द्वारा ही आती है ।
जा सकता । शब्द के अन्दर वाच्यार्थ को कहने की शक्ति सङ्घटना के द्वारा ही आती है ।
तृतीय
उद्योत:
क्योंकि सङ्घटना कोई पृथक् वस्तु तो है नहीं अपितु सङ्घटित शब्दों को ही सङ्घटना कहते हैं ।
क्योंकि सङ्घटना कोई पृथक् वस्तु तो है नहीं अपितु सङ्घटित शब्दों को ही सङ्घटना कहते हैं ।
तृतीय
उद्योत:
शब्दों में व्यङ्ग्यार्थाभिव्यञ्जक वाच्यार्थ का तात्पर्य यही है सङ्घटनाश्रित सामर्थ्य । (प्रतिप्रश्न)
शब्दों में व्यङ्ग्यार्थाभिव्यञ्जक वाच्यार्थ का तात्पर्य यही है सङ्घटनाश्रित सामर्थ्य । (प्रतिप्रश्न)
तृतीय
उद्योत:
प्रश्नकर्ता की इस स्थापना पर कि गुणों का शब्दाश्रितत्व और सङ्घटनाश्रितत्व दोनों एक ही
प्रश्नकर्ता की इस स्थापना पर कि गुणों का शब्दाश्रितत्व और सङ्घटनाश्रितत्व दोनों एक ही
तृतीय
उद्योत:
वस्तु हैं अतः या तो सुङ्घटना और गुण एक ही तत्व हैं या गुण सङ्घटना के आधीन रह
वस्तु हैं अतः या तो सुङ्घटना और गुण एक ही तत्व हैं या गुण सङ्घटना के आधीन रह
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६२ | ध्वन्यालोके करते हैं--एक प्रश्न और उत्पन्न होता है ।) गुणों को हम शब्दधर्म मान सकते हैं या शब्द-श्रित मान सकते हैं । यह बीच में सङ्घटना क्यों सम्मिलित की जा रही है ? (प्रतिपक्षी) (उक्त प्रतिप्रश्न के उत्तर में प्रतिपक्षी अपने प्रश्न को और अधिक दृढ़ता तथा स्पष्टता के साथ प्रस्तुत कर रहा है ।) 'रसों की निष्पत्ति विशेष प्रकार के वाच्यार्थ द्वारा होती है । वे रस ही गुणों का आश्रय होते हैं । अतः रसों पर आश्रित रहनेवाले गुण कभी भी असङ्घटित शब्दों को अपने आश्रय के रूप में स्वीकार नहीं कर सकते । क्योंकि गुणों का आश्रय वे ही शब्द होते हैं जिनमें वाच्यार्थ का पर्यवसान होकर रसनिष्पत्ति की भूमिका सम्पन्न हो सके । वाच्यार्थ का पर्यवसान कभी भी असङ्घटित शब्दों में नहीं होता । अतः गुणों के आश्रय भी असङ्घटित शब्द नहीं हो सकते । प्रतिपक्षी का मन्तव्य यह है कि रस, भाव, रसाभास, भावाभास, भावप्रशम इत्यादि सर्वदा व्यङ्ग्य ही होते हैं । इनकी व्यञ्जना विशेष प्रकार के अर्थों से ही होती है । (उस विशेष अर्थ को कहनेवाले सङ्घटित तथा साकांक्ष पद ही होते हैं ।) रस इत्यादि की व्यञ्जना ऐसे शब्दों से भी नहीं होती जिनकी दूसरे पदों की अपेक्षा बिल्कुल न हो । जिनको केवल शुद्ध पद की संज्ञा प्रदान की जा सके और जो सामान्य रूप में अर्थ के बोधक हों अर्थात् जो केवल पदमात्र के अर्थ के परिचायक हों । इस प्रकार के व्यञ्ज्यार्थ को अभिव्यञ्जित करनेवाले वाचक शब्दों के आश्रित हो गुण मुख्य रूप में माने जाते हैं । इस प्रकार उन शब्दों में रहनेवाले गुणों के आश्रय असङ्घटित शब्द उपचार से भी नहीं होते । उपचार से भी असङ्घटित शब्दों के गुणों के आश्रय न होने का हेतु है उन शब्दों का वाचक न होना । इसका अर्थ यह है कि असङ्घटित शब्द व्यञ्जकपयोगी निराकांक्ष वाच्यार्थ को कभी प्रकट नहीं कर सकते । इस प्रकार शब्दसङ्घटना को या तो गुणों से अभिन्न मानना चाहिये या गुणों का आश्रय मानना चाहिये । (प्रतिपक्षी की इस लम्बी-चौड़ी स्थापना का सार यही है कि सङ्घटित शब्द ही वाचक होकर व्यङ्ग्य रस की अभिव्यक्ति में निमित्त होते हैं और वे ही गुणों का आश्रय-औपचारिक रूप में ही सही, माने जाते हैं । सङ्घटित शब्द न वाचक होते हैं न व्यञ्जक । अतः गुण शब्दधर्म होते हैं कहने का स्पष्ट अर्थ यही है कि गुण और सङ्घटना या तो एक ही वस्तु हैं या गुण सङ्घटना के आश्रित रहते हैं ।) अब इसका उत्तर दिया जा रहा है । (उत्तर)-जब यह सिद्ध ही किया जा चुका कि वर्णों और पद से भी रस इत्यादि की व्यञ्जना होती है तब सङ्घटना निरपेक्ष गुणों के द्वारा रसाभिव्यक्ति के मानने में आपत्ति ही क्या रह गई ? वर्ण के द्वारा रसाभिव्यक्ति मानने से यह सिद्ध हो जाता है कि व्यञ्जक्यार्थप्रतीति में अर्थ की बिल्कुल अपेक्षा नहीं होती और पद के द्वारा रसाभिव्यक्ति के सिद्धान्त से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि पदान्तरनिरपेक्ष केवल स्वार्थ का बोधक भी पद अभिव्यञ्जक होता है । जब केवल वर्ण के द्वारा रसाभिव्यक्ति अभ्युक्त को जा चुकी तब यह स्पष्ट हो जाता है कि वह अबाचक पद जो रसाभिव्यक्ति में हेतु हो जाता है जिसका सौभाग्य वर्ण के समान श्रवणमात्र से ज्ञात हो रहा हो। वही पद माधुर्य गुण की सीमा में आता है उसके लिये सङ्घटना की क्या आवश्यकता ? इसी प्रकार जब पद को भी ध्वनि का अभिव्यञ्जक माना जा चुका है तब शुद्ध भी पद अपने अर्थ का स्मरण कराते हुये रस की अभिव्यक्ति के योग्य अर्थ को प्रकट कर देता है और उसी को माधुर्य इत्यादि गुणों के नाम
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३
तृतीय उद्योत;
से पुकारने लगते हैं उसमें भी सङ्घटना का क्या उपयोग ? (उक्त विस्तृत विवेचन का निष्कर्ष यह है—(१) गुणों का आश्रय मुख्य रूप में रस ही होते हैं किन्तु औपचारिक रूप में उन्हें शब्दाश्रित भी माना जा सकता है। (२) गुणों का आश्रय बनने के लिये इस बात की आवश्यकता नहीं कि शब्द सङ्घटित ही हों, वर्ण और पद के समान असङ्घटित पद भी रसाभिव्यक्ति में हेतु हो सकते हैं और वे ही माधुर्य इत्यादि गुणों के नाम से पुकारे जा सकते हैं। (३) इस प्रकार वामन का यह मत ठीक नहीं है कि गुण सङ्घटना पर आधारित होते हैं।
३
तृतीय उद्योत;
अभ्युपगते वा वाक्यव्यज्ज्यचत्वे रसादीनां न नियता काचित् संघटना तेषामाश्रयत्वं प्रतिपद्यत इत्यनियतसंघटनाशब्दा एव गुणानां व्यज्ज्यविशेषानुगता आश्रया:
(ध्वन्य०)—अभ्युपगते वा वाक्यव्यज्ज्यत्वे रसादीनां न नियता काचित् संघटना तेषामाश्रयत्वं प्रतिपद्यत इत्यनियतसंघटनाशब्दा एव गुणानां व्यज्ज्यविशेषानुगता आश्रया:। (अनु०)—रस इत्यादि की वाक्यव्यज्ज्यता के अङ्गीकार कर लेने पर भी कोई भी निश्चित संघटना उनके आश्रयत्व को प्राप्त नहीं होती। अतएव अनियत संघटनावाले शब्द ही विशेष प्रकार के व्यज्ज्यच से अनुपत होकर गुणों का आश्रय हो जाते हैं।
३
तृतीय उद्योत;
ननु वाक्यव्यज्ज्ये ध्वनौ तर्हावश्यमनुप्रवेष्टव्यगु सङ्घटनया स्वसौन्दर्यं वाच्यसौन्दर्यं वा तथा विना कुत इत्याशङ्क्याह—अभ्युपगते इति। वाक्यव्यज्ज्यत्वेऽपि तयो: सन्निधानं प्रत्याचक्ष्महे। किन्तु माधुर्यस्य न नियता सङ्घटना आश्रयो वा स्वरूपं वा तथा विना वर्णपदव्यज्ज्ये रसादौ भावान्नमाधुर्यादि: वाक्यव्यज्ज्योऽपि तादृशीसङ्घटनां विहायापि वाक्यस्य तद्रसव्यक्तावप्रयोजकति। तस्मादौपचारिकत्वेऽपि शब्दाश्रया एव गुणा: इत्युपसंहरति—शब्दा एवेति।
(लो०)—ननु वाक्यव्यज्ज्ये ध्वनौ तर्हावश्यमनुप्रवेष्टव्यगु सङ्घटनया स्वसौन्दर्यं वाच्यसौन्दर्यं वा तथा विना कुत इत्याशङ्क्याह—अभ्युपगते इति। वाक्यव्यज्ज्यत्वेऽपि तयो: सन्निधानं प्रत्याचक्ष्महे। किन्तु माधुर्यस्य न नियता सङ्घटना आश्रयो वा स्वरूपं वा तथा विना वर्णपदव्यज्ज्ये रसादौ भावान्नमाधुर्यादि: वाक्यव्यज्ज्योऽपि तादृशीसङ्घटनां विहायापि वाक्यस्य तद्रसव्यक्तावप्रयोजकति। तस्मादौपचारिकत्वेऽपि शब्दाश्रया एव गुणा: इत्युपसंहरति—शब्दा एवेति। (अनु०)—‘तो वाक्यव्यज्ज्य ध्वनि में अवश्य ही संघटना को प्रविष्ट होना चाहिये, स्वसौन्दर्य या वाच्यसौन्दर्य उसके बिना कैसे ?’ यह शङ्का करके कहते हैं—‘अभ्युपगते इति।’
३
तृतीय उद्योत;
वाक्यव्यज्ज्यत्व में भी यह योजना की जानी चाहिये। यह बात कही गई है—संघटना उसमें प्रवेश करे, उसकी निकटता का हम प्रत्यक्षान नहीं करते। किन्तु नियत संघटना न माधुर्य का आश्रय है और न स्वरूप। क्योंकि उसके बिना वर्णपदव्यज्ज्य रस इत्यादि में भी माधुर्य इत्यादि होता है। वाक्यव्यज्ज्य में भी वाक्य की उस प्रकार की संघटना को छोड़कर भी वाक्य के उस रस को व्यक्तक होने के कारण सन्निहित भी संघटना रसाभिव्यक्ति में प्रयोजिका नहीं होती। इसलिये औपचारिकत्व में भी शब्दाश्रय ही गुण होते हैं। यह उपसंहार कर रहे हैं—‘शब्द ही ।’
३
तृतीय उद्योत;
रसाभिव्यक्तिजनन में संघटना का अनिश्चय तारावती—(प्रश्न) पदव्यज्ज्यध्वनि में सङ्घटना न भी मानें तब भी वाक्य से व्यक्त होनेवाली रसध्वनि में सङ्घटना का प्रयोग होना ही चाहिये। बिना सङ्घटना के वाक्य में अपना सौन्दर्य किस प्रकार हो सकता है और वाच्यार्थ का भी सौन्दर्य किस प्रकार हो सकता है ? (उत्तर) रसध्वनि की वाक्य से अभिव्यक्ति मानने पर भी कोई निश्चित सङ्घटना रसदकों का आश्रय नहीं बनती। अत एवं ऐसे शब्द जिनकी कोई सङ्घटना नियत न हो जब
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किसी विशेष प्रकार के व्यङ्ग्य का अनुगमन करते हैं तब वे शब्द ही गुणों का आश्रय हो जाते हैं। यहां पर 'अभ्युपगते वा वाक्यव्यङ्गचत्वे' में 'वा' का प्रयोग 'अपि' के अर्थ में हुआ है। इसलिए यहां पर अर्थ किया गया है 'वाक्यव्यङ्ग्यत्व के स्वीकार कर लेने पर भी'। आशय यह है कि हम वाक्य में सङ्घटना का तो खण्डन करते हो नहीं। वाक्य में सङ्घटना सन्निहित रहे; उसके सन्निधान में हमें कोई आपत्ति नहीं। किन्तु कोई भी निश्चित सङ्घटना न तो माधुर्य का आश्रय होती है और न उसका स्वरूप ही होती है। क्योंकि जब कि बिना सङ्घटना के वर्ण और पद से व्यक्त होनेवाले रस इत्यादि में माधुर्य इत्यादि देखा जाता है तथा वाक्य के द्वारा व्यक्त होनेवाले रस इत्यादि में भी उस प्रकार की सङ्घटना को छोड़कर अन्य प्रकार से भी वाक्य को सञ्चरित कर देने पर भी वह वाक्य उसी रस को अभिव्यक्त करता ही रहता है; इससे मानना पड़ेगा कि सन्निहित भी सङ्घटना रसाभिव्यक्ति में प्रयोजिका नहीं होती। अत एव मानना ही पड़ेगा कि गौण प्रयोग होते हुए भी गुण शब्द के आश्रित ही होते हैं। इसीलिये वृत्तिकार ने उपसंहार करते हुए लिखा हैं कि 'शब्द ही विशेष प्रकार के व्यङ्गच से अनुपगत होकर गुणों का आश्रय बनते हैं'। (इस विवेचन का आशय यही है कि वर्ण और पद के द्वारा अभिव्यक्त होनेवाली रसध्वनि में सङ्घटना का प्रश्न उठता ही नहीं। वाक्यव्यङ्गच रसध्वनि में सङ्घटना विद्यमान होती है। किन्तु वह अभिव्यक्तता की प्रयोजिका नहीं होती क्योंकि यदि वाक्य की सङ्घटना को बदल कर उस वाक्य को अन्य प्रकार से सङ्घटना को बदल कर उस वाक्य को अन्य प्रकार से सङ्घटित कर दिया जावे तो भी रसध्वनि बनी ही रहती है। इससे निष्कर्ष यह निकलता है कि असङ्घटित शब्द ही गुणों का आश्रय होते हैं।)
(ध्वन्य०)-ननु माधुर्ये यदि नाम्नामुच्यते तदुच्यताम्; ओजः पुनः कथं- नियतसङ्घटनाशब्दाश्रयत्वम्। न ह्यसमासा सङ्घटना कदाचिदोजस आश्रयतां प्रतिपद्यते। उच्यते यदि न प्रसिद्धिमात्रप्रहृष्टचितस्तदत्रापि न न बूमः। ओजः कथं- समासा सङ्घटना नास्त्य:? यतो रौद्रादीन् हि प्रकाशयति: काव्यस्य दीप्तिरोज इति प्राक्प्रतिपादितम्। तच्चौजो यद्यसमासायामपि सङ्घटनायां स्यात्तत्को दोषो भवेत्। न नादार्क्ष्यं सहृदयहृदयसञ्चारिमत्वात्। तस्मादनियतसङ्घटनाशब्दाश्रयत्वं गुणानां न काचित् क्षति:। तस्मां तु चक्रुरादीनामिव यथास्वं विषयानियमितस्य न कदाचिद्वय- मिचारः। तस्मादनये गुणा अन्याः च सङ्घटनाः। न च सङ्घटनाश्रिता गुणा इत्येकं दर्शनम्।
(अनु०) (प्रश्न) यदि माधुर्य के विषय में ऐसा कहा जाता है तो कहा जावे किस प्रकार अनियत सङ्घटनावाले शब्द ओज के आश्रय हो सकते हैं? समासरहित सङ्घटना कभी ओज के आश्रयत्व को प्राप्त नहीं हो सकती। इस पर कहा जा रहा है-यदि प्रसिद्धिमात्र के ग्रहण का दोष चित्त में न उत्पन्न हो गया हो तो वहां पर भी हम 'न' नहीं कह सकते ( अर्थात् यह नहीं कह सकते कि असमासा सङ्घटना से ओज की अभिव्यक्ति नहीं होती। ) असमासा सङ्घटना भोज का आश्रय क्यों नहीं हो सकती? क्योंकि रौद्र इत्यादि को प्रकाशित करनेवाली दीप्ति को निस्सन्देह ओज कहते हैं यह पहले ही प्रतिपादित किया जा चुका है।
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तृतीय उद्योत:
वह ओज यदि असमासा संघटना में भी हो तो क्या दोष आजाएगा। यहाँ पर अचारुता सहृदयसंवेद्य है ही नहीं। अतएव गुणों का आश्रय अनियत संघटना को मानने पर कोई दोष नहीं आता। चक्षु इत्यादि के समान उन गुणों का स्वरुप सर्वदा विषय के द्वारा नियमित होता है और उसमें कभी व्यभिचार नहीं आता। इस प्रकार यह सिद्ध हो गया कि गुण अन्य वस्तु हैं और संघटना अन्य वस्तु। संघटना के आश्रित गुण नहीं होते यह एक सिद्धान्त हुया।
(लो०)—निर्वति। वाक्यग्यज्झृङ्गध्वन्याभिप्रायेण मन्तव्यामिति केचित्। वयं तु बूमः—वर्णपदवयज्झृङ्गेडप्योजसि रौद्रादिस्वभावे वर्णपदानामेकाकिनां स्वसौन्दर्यमपि न तादृगुणमोलति तावद्यावत्तानि संघटनाडीनानि न कृतानिति सामन्येनैवं पूर्वपक्ष इति। प्रकाशयति इति। ‘लक्षणहेतवोः’ इति शात् प्रत्ययः। रौद्रादि प्रकाशनालङ्ग्यमानोज इति भावः। न चेति। चशब्दो हेतौ। यस्मात् ‘यो यः शास्त्र’ इत्यादौ नाचारुत्वं प्रतिभाति तस्मादित्यर्थः। तेषां द्विति। गुणानां यथास्वमिति ‘शृङ्गार एव परमो मनःप्रह्लादनो रसः’ इत्यादिना च विषय नियम उक्त एव।
(अनु०)—‘ननु इति।’ कुछ लोग यह कहते हैं कि वाक्य व्यज्झृङ्ग ध्वनि के अभिप्राय से यह माना जाना चाहिये। हम तो कहते हैं—वर्ण पद व्यज्झृङ्ग भी रौद्र इत्यादि स्वभाववाले ओज में एकाकी वर्ण तथा पदों का स्वसौन्दर्य भी उतना तब तक नहीं होता जब तक संघटना से अभ्ज्ञित न किये गये हों इस प्रकार सामान्यरूप से ही यह पूर्वपक्ष है। ‘प्रकाशित करते हैं’ ‘लक्षण हेतवोः’ के शात् प्रत्ययः। रौद्रादि प्रकाशनालङ्ग्यमानोज इति भावः। न चेति। चशब्दो हेतौ। यस्मात् ‘यो यः शास्त्र’ इत्यादौ नाचारुत्वं प्रतिभाति तस्मादित्यर्थः। तेषां द्विति। गुणानां यथास्वमिति ‘शृङ्गार एव परमो मनःप्रह्लादनो रसः’ इत्यादिना च विषय नियम उक्त एव।
Some people say that it should be considered with the intention of vyañgya dhvani. We say that even if the vyañgya is related to the raudra etc. nature of Oja, the beauty of individual letters and words is not as much until they are arranged in a structure. This is the general view of the पूर्वपक्ष. The word 'प्रकाशित' is used in the sense of 'लक्षण हेतवोः'. The meaning is that the raudra etc. are manifested. The word 'न' is used as a reason. The meaning is that since the lack of beauty is not perceived in 'यो यः शास्त्र' etc., therefore... The word 'तेषां' refers to the gunas. The rule of the subject is stated in 'शृङ्गार एव परमो मनःप्रह्लादनो रसः' etc.
अर्थात् ओज रौद्र इत्यादि के प्रकाशन से भलौभांति लक्षित होता है। ‘न च’ इति। ‘च’ शब्द हेतु में हैं। अर्थात् क्योंकि ‘यो यः शास्त्र’ इत्यादि में अचारुता प्रतीत नहीं होती इसलिये ‘उनका तो’ अर्थात गुणों का। ‘यथास्वम्’ इति। ‘शृङ्गार ही मनका परम प्रह्लादन रस है’ इसके द्वारा विषयालङ्गन कह ही दिया गया है।
That is, Oja is well manifested by the manifestation of Raudra etc. The word 'न च' is used, where 'च' is used as a reason. The meaning is that since the lack of beauty is not perceived in 'यो यः शास्त्र' etc., therefore... The word 'उनका तो' refers to the gunas. The word 'यथास्वम्' indicates that the subject is explained in 'शृङ्गार ही मनका परम प्रह्लादन रस है'.
तारावती—(प्रश्न) यदि आप माधुर्य के विषय में यह बात कहना चाहें तो कह भी सकते हैं। (क्योंकि शृङ्गार की व्यञ्जना अधिकतर तो समासरहित संघटना से ही होती हैं; किन्तु कभी-कभी दीर्घसमासवाली संघटना से भी शृङ्गार रस की अभिव्यक्ति हो जाती हैं। अतः माधुर्य गुण के विषय में संघटना के नियत होने का नियम नहीं रहा।) किन्तु ओज गुण के लिये आप यह किस प्रकार कह सकते हैं कि ओज ऐसे शब्दों के अधीन रहता है जिनकी संघटना नियत नहीं होती?
Taravati - (Question) If you want to say this about the subject of Madhura, then you can say it. (Because the expression of Shringara is mostly done through asamasa structure; but sometimes it is also expressed through long samasa structure. Therefore, the rule of Madhura guna being dependent on the structure is not fixed.) But how can you say that Oja guna is dependent on words whose structure is not fixed?
किन्हीं लोगों ने (चन्द्राकार ने) माना है कि यह पूर्वपक्ष वाक्यग्यज्झृङ्ग रस इत्यादि के विषय में ही है। (क्योंकि संघटना वाक्य में ही सम्भव है।) इस पर हमारा (लोचन-कार का) कहना—यह है कि यह बात आप केवल वाक्य-व्यज्झृङ्ग ध्वनि के विषय में ही नहीं कह सकते किन्तु यह बात आप वर्ण और पद व्यज्झृङ्ग ध्वनि के विषय में भी कह सकते हैं। कारण यह है कि रौद्रादि स्वभाववाला ओज गुण जहाँ पर वर्ण या पद के द्वारा प्रकाशित होगा वहाँ पर अकेला वर्ण या अकेला पद किसी प्रकार भी
Some people (Chandrakaar) have considered that this पूर्वपक्ष is only related to the vyañgya rasa etc. of the sentence. (Because the structure is possible only in the sentence.) Our (Lochana-kaar's) response to this is - You cannot say this only about the vyañgya dhvani of the sentence, but you can also say this about the vyañgya dhvani of the letter and word. The reason is that where the Oja guna of Raudra etc. nature is manifested by a letter or word, there, a single letter or a single word cannot be of any type.
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अपनी उतनी सुन्दरता प्रकट नहीं कर सकेगा जितनी सङ्घटना से अधिष्ठित होकर कर सकेगा। आशय यह है कि ओजोगुण सर्वदा सङ्घटना के ही आश्रित होता है वह माधुर्य इत्यादि के समान कभी सङ्घटना से पृथक् रह ही नहीं सकता। इस प्रकार यह पूर्वपक्ष सामान्यतया ओजोगुण के विषय में ही है केवल वाक्यरचयात्मक रसघवनी के विषय में नहीं। ( उत्तर ) यदि प्रसिद्धिमात्र को मानने का दोष चित्त में उत्पन्न न हो गया हो तो इसका उत्तर भी नहीं दिया जा सकता यह बात नहीं। ( आशय यह है कि यह बात प्रसिद्ध हो गई है कि ओजोगुण में दीर्घ समास का होना अनिवार्य है। प्रतिपक्षी केवल उसी प्रसिद्धि को लेकर अपनी बात पर डटा हुआ है और जैसे-तैसे उस पुरानी बात को सिद्ध करना चाहता है। किन्तु विचार उन्मुक्त होने चाहिये। पुरानी लकीर का फ़कीर होना भी एक दोष है। यदि दोष को छोड़ दिया जावे तो सरलता-वसमासा सुङ्घटना ओज को प्रकाशित क्यों नहीं कर सकती? यह पहले ही बतलाया जा चुका है कि रौद्र इत्यादि रसों को प्रकाशित करनेवाली दीप्ति को ओज कहते हैं। यहाँ पर 'प्रकाशयत:' इस शब्द में शतृप्रत्यय 'लक्षणहेतु:' इस पाणिनिसूत्र से हुआ है। इसका अर्थ यह है कि रौद्र इत्यादि के प्रकाशन से ही ओज लक्षित होता है। यदि वह ओज समास रहित सङ्घटना के द्वारा भी हो तो क्या दोष हो जावेगा? 'यो यः शस्त्रं विभर्ति स्वभ्जगुमद:' इत्यादि पद्य में कोई अचारता तो प्रतीत नहीं होती। अत एवं यदि गुणों को असंलक्ष्यित शब्दों के आश्रित मानें तब भी कोई दोष नहीं होता। गुणों के विषय तो उसी प्रकार नियत हैं जिस प्रकार इन्द्रियों के विषय नियत होते हैं। जैसे इन्द्रियों के विषयों में कभी व्यभिचार नहीं आता उसी प्रकार गुणों के विषयों में भी कभी व्यभिचार नहीं आता। ( आशय यह है कि जिस प्रकार नेत्र का विषय है रूप ओर कान का विषय है शब्द। ये विषय नियत हैं। कभी ऐसा नहीं हो सकता कि कानों का कार्य आँख करने लगे और आँख के विषय रूप को कान देखने लगे। इसी प्रकार गुणों का विषय व्यवस्थित है। माधुर्य का स्थान ओज नहीं ले सकता और ओज का स्थान माधुर्य नहीं ले सकता।) इन गुणों का अपना क्षेत्र नियत होता है यह बात—'शृङ्गार एव पर:' प्रह्लादनो रस:' इत्यादि कारिकाओं में कह दी गई है और वहाँ पर गुणों के विषय नियत कर दिये गये हैं। अत एवं गुण अन्य होते हैं और सङ्घटना अन्य होती है। गुण सङ्घटनाओं के आश्रित भी नहीं होते। यह हुआ एक पक्ष।
यत्कृत्स्नम्—‘सङ्घटनावद्गुणानामप्यनियतविषयत्वं प्राप्त्योत्पत्ति लक्षणे व्यभिचारदर्शनात्’ इति । तत्राप्येतदुच्यते—पत्र लक्ष्ये परिकल्पितविषयव्यभिचारस्तु दृश्यतेवास्तु । कथमाचार्यैस्तादृशे विषये सहृदयानां नावभातोति चेत् ? कविवशक्तितिरोहितत्वाद् द्विविधो हि दोष:—कवेरवशक्तितत्कृतोऽकृतश्च । तत्राव्युत्पत्तिकृतो दोष: शक्तितिरस्कृतत्वात्कदाचिन्न लक्ष्यते ।
(ध्वन्यालो०) अथवा सङ्घटनारूपा एव गुणा: यत्कृत्स्नम्—‘सङ्घटनावद्गुणानामप्यनियतविषयत्वं प्राप्त्योत्पत्ति लक्षणे व्यभिचारदर्शनात्’ इति । तत्राप्येतदुच्यते—पत्र लक्ष्ये परिकल्पितविषयव्यभिचारस्तु दृश्यतेवास्तु । कथमाचार्यैस्तादृशे विषये सहृदयानां नावभातोति चेत् ? कविवशक्तितिरोहितत्वाद् द्विविधो हि दोष:—कवेरवशक्तितत्कृतोऽकृतश्च । तत्राव्युत्पत्तिकृतो दोष: शक्तितिरस्कृतत्वात्कदाचिन्न लक्ष्यते । यस्तु शक्तिकृतो दोष: स स्फुटित प्रतीयते । परिकरश्लोकैश्चात्र—
(अनु०) अथवा सङ्घटनारूप ही गुण होते हैं। जो कि यह कहा गया था कि ‘सङ्घटना के समान गुणों की भी अनियतविषयता प्राप्त हो जावेगी क्योंकि लक्ष्य में व्यभिचार देखा जाता है।’ उस पर यह कहा जा रहा है कि जिस लक्ष्य में परिकल्पित विषय का व्यभिचार देखा जाता है।
उस पर यह कहा जा रहा है कि जिस लक्ष्य में परिकल्पित विषय का व्यभिचार देखा जाता है।
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तृतीय
उद्योत:
चार देखा जाय उसको विरूप ही मान लिया माना चाहिये। उस प्रकार के विषय में सहृदयों को अचारुत्व का अवभास क्यों नहीं होता? इसका उत्तर यह है कि वहाँ पर अचारुत्व कवि-शक्ति से तिरोहित हो जाती है। दो प्रकार का दोष होता है—कवि की अव्युत्पत्ति से उत्पन्न और कवि की अशक्ति से उत्पन्न। उसमें अव्युत्पत्तिकृत दोष कभी-कभी कवि की शक्ति से तिरोहित होकर प्रतीत नहीं होता। किन्तु अशक्त कृत दोष तो स्पष्ट ही प्रतीत हो जाता है। इस विषय में एक परिकर श्लोक भी है—
लो०
अथ वेति। रसाभिव्यक्तावेतदेव सामर्थ्यं शब्दानां यत्तथा तथा संघटनात्मकत्वमिति भावः।
अनु०
'अथवा' यह। भाव यह है कि रसाभिव्यक्ति में शब्दों का इतना ही सामर्थ्य है कि उस प्रकार से संघटित कर दिये जावें।
दूसरा पक्ष और दोनों का ऐक्य
तारावती—(२) दूसरे मत के अनुसार सङ्घटना और गुण दोनों एक ही वस्तु हैं। गुण सङ्घटना का रूप हो होते हैं। आशय यह है कि रसाभिव्यक्ति में शब्दों की यही सामर्थ्य है कि शब्द विभिन्न रूप में संघटित हों तभी वे रसाभिव्यञ्जक हो सकते हैं। विरोधियों की ओर से जो यह कहा गया था कि यदि सङ्घटना और गुण एक ही होते हैं तो जिस प्रकार सङ्घटना का विषय नियत नहीं होता उसी प्रकार गुणों में भी अनियतविषयता आ जावेगी। किन्तु वास्तव में ऐसा नहीं होता अपितु लक्ष्य में इसका अपवाद देखा जाता है। इत्यादि। इस पर मेरा उत्तर यह है कि संघटना का भी विषय नियत होता है और गुणों का भी। जहाँ कहीं कल्पित विषय में व्यवमिचार देखा जावे वहाँ कमी ही समझी जानी चाहिये? इस प्रकार के विषय में सहृदयों को अचारुत्व का आभास क्यों नहीं मिलता? इसका उत्तर यही है कि ऐसे स्थानों पर दोष कवि की शक्ति से तिरोहित हो जाता है। दोष दो प्रकार का होता है—(१) व्युत्पत्ति की कमी से होनेवाला और (२) शक्ति की कमी से होनेवाला। शक्ति उस प्रतिभा को कहते हैं जिससे कवि में वर्णनीय वस्तु के विषय में नवीनरूप में उल्लेख करने की क्षमता आ जाती है और व्युत्पत्ति निपुणता को कहते हैं जिससे वर्णनीय वस्तु के उपयोग में आनेवाली समस्त वस्तु के परावपर्य के परामर्श करने की योग्यता उत्पन्न हो। व्युत्पत्ति की कमी से जो दोष उत्पन्न होता है वह शक्ति से तिरस्कृत होकर कभी-कभी लक्षित नहीं होता; किन्तु जो दोष शक्ति की कमी से उत्पन्न होता है वह एकदम लक्षित हो जाया करता है। यही बात एक प्रसिद्ध श्लोक में कही गई :-
ध्वन्या०
अव्युत्पत्तिकृतो दोषः शक्त्या संव्रियते कवे:। यस्यासौ कवितास्थस्य स एव हृदि भाषते।
तथाहि
महाकवीनामप्यसमदर्शिताविषयकप्रतिभासंहृतानुप्रासबन्धनाद्धृानौ-चित्र्यं शक्तितिरस्कृतत्वात् ग्राम्यत्वेन न प्रतिभासते। यथा कुमारसम्भवे देवीसम्भोग-वर्णनम्।
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एवमादौ विषये यथौचित्य्यागस्तथा दर्शितमेवाग्रे । शक्तिततिरसकृतत्वं चान्वपघ्यतिरेकाभ्यामवसीयते । तथा हि शक्तितरहितेन कविना एवंविधे विषये शृङ्गार उपनिबध्यमानः स्फुटमेव दोषत्वेन प्रतिबासते । नन्वस्मिन् पक्षे 'यो यः शास्त्रं बिभर्ति' इत्यादौ किमचारुत्वम् ? अप्रतीमासु नामवारोप्यामः ।
(अनु०) 'अग्युप्रकृतदोष कविशक्ति से संवृत हो जाता है; किन्तु जो उसका अशक्तिकृत दोष होता है वह श्लोक्र ही अवभासित होने लगता है ।' वह इस प्रकार—महाकवियों को भी उत्तमदेवाविषयक प्रसिद्ध सम्भोगशृङ्गार के निबन्धन इत्यादि का अनौचित्य शक्ति के द्वारा तिरस्कृत होने के कारण ग्राम्यत्व के रूप में प्रतिबासित नहीं होता । जैसे कुमारसम्भव में देवी का सम्भोगवर्णन । इत्यादि विषय में जिस प्रकार औचित्य का त्याग नहीं होता वैसा आगे दिखलाया ही गया है । शक्तितिरसकृतत्व का निर्णय अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा होता है । वह इस प्रकार कि शक्तिरहित कवि के द्वारा इस प्रकार के विषय में निबद्ध किया हुआ शृङ्गार इत्यादि में क्या अचारुता है ? (उत्तर) हम तो प्रतीत न होनेवाली 'अचारुता का ही आरोप करते हैं ।
(लो०)—शक्तिः प्रतिभानं वर्णनीयवस्तूपरिज्ञानोल्लेखशालित्वम् । व्युत्पत्ति-स्तदुपयोगिसमस्तवस्तुपरवपर्यपरामर्शकौशलम् । तस्येति कवे: । 'अनौचित्यमिति । आस्वादयितॄणां यः चमत्काराविघातस्तदेव रससर्वस्वम्, आस्वादयत्त्त्वात् । उत्तमदेवतासम्भोगपरामर्शो च पितॄसम्भोग इव लज्जाजडादिना करचमत्कारावकाश इत्यर्थः । शक्तिततिरसकृतत्वादिति । सम्भोगोऽपि ह्यासौ वर्णितस्तथा प्रतिभानवता कविना यथा तथैव विश्रान्ते हृदये पूर्वापरपरामर्श कतुं न ददाति यथा निर्योजपराक्रमस्य पुरुष-स्याविष्येऽपि युद्धचमानस्य तावत्स्मिन्नवसरेऽ साधुवादो वीतौर्यते न तु पूर्वापरपरामर्श-दर्शितमवेतिः । कारिकाकारेणैति भूतप्रत्ययः । वच्यते हि 'अनौचित्यादृतेनाल्य-द्रसभङ्गस्य कारणम्' इत्यादि । अप्रतीमासु नामवारोप्याम इति पूर्वापरपरामर्शविवेकशालि-भिरप्यत्यर्थः ।
(अनु०)—शक्ति अर्थात् प्रतिभा अर्थात् वर्णनीय वस्तु के विषय में नूतन उल्लेखशाली होना । व्युत्पत्ति अर्थात् उसमें उपयोगी समस्त वस्तु के पूर्वापर पर्य परामर्श की कुशलता । उसका अर्थात् कवि का । 'अनौचित्य' अर्थ यह है कि आस्वाद करनेवालों के चमत्कार का विघात न होना वही रस का सर्वस्व है क्योंकि आस्वाद के आधीन होता है । उत्तमदेवता के सम्भोग के परामर्श में पिता के सम्भोग के समान लज्जा और आतड इत्यादि से चमत्कार का अवकाश ही क्या है ? 'शक्तितिरसकृत होने से'—यह सम्भोग भी प्रतिभाशाली कवि के द्वारा ऐसा वर्णित किया गया है जैसे उसी में विश्रान्त हृदय पूर्वापर्य परामर्श करते नहीं देता जैसे व्याजारहित पराक्रमवाले तथा निबना अवसर युद्ध करनेवाले पुरुष को उस अवसर पर साधुवाद दे दिया जाता है किन्तु पूर्वापर्य परामर्श में नहीं, वैसा ही यहाँ पर भी है, यह भाव है ।
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३
तृतीय उद्योतः
'दिखलाया ही है' यह कारिकाकार ने अतः सूत्र अर्थ में प्रत्यय (क्त) है । निस्सन्देह कहेंगे—'अनौचित्य के अतिरिक्त रसभङ्ग का कोई कारण नहीं' इत्यादि । 'अप्रतीमान नहीं' अर्थात् पूर्वापर विवेकशालियों के द्वारा भी ।
तारावती—'अयुक्तिपत्ति से होनेवाला दोष कवि की शक्ति से संवृत हो जाता है; किन्तु अशक्ति से उत्पन्न दोष शीघ्र ही प्रकट हो जाया करता है ।'
३
तृतीय उद्योतः
उत्तमदेवता विषयकं शृङ्गारमनौचित्यम्
उदाहरण के लिये एक सामान्य नियम है कि उत्तम देवता के विषय में सम्भोगवर्णन अनुचित हुआ करता है । किन्तु महाकवियों ने जहाँ उत्तम देवताविषयक सम्भोगशृङ्गार का वर्णन किया है वहाँ न तो अनुचित ही मालूम पड़ता है और न उसमें प्राम्यता ही आती है । कुमारसम्भवम् में देवी का सम्भोगवर्णन भी इसी प्रकार का है । उसमें अनौचित्य का प्रतिबिम्ब नहीं होता । इसमें यही प्रमाण है कि आस्वाद लेनेवालों को चमत्कार के विघात की यहाँ पर प्रतीति नहीं होती । यही एक सबसे बड़ा प्रमाण है; क्योंकि रसका सर्वस्व आस्वाद के ही आघीन हुआ करता है । जहाँ कहीं उत्तम देवता के सम्भोग शृङ्गार का विस्तृत निवन्धन उपस्थित किया जाता है वहाँ माता-पिता के सम्भोग के समान लज्जा और आतंक इत्यादि को उत्पन्न करनेवाला होता है । अतः उसमें चमत्कार की अवकाश ही कहाँ होता है ? 'शक्ति से तिरस्कृत होने के कारण' कहने का आशय यह है कि प्रतिबिम्बशाली कवि (कालिदास) ने शिवपार्वती के सम्भोग का वर्णन इतनी निपुणता से किया है कि सहृदयों का हृदय उसी वर्णन में विश्रान्त होकर रह जाता है और पाठकों को अवकाश ही प्राप्त नहीं होता कि वे पूर्वापर्य का परामर्श कर सकें तथा उसके अनौचित्य पर ध्यान दे सकें । जैसे—यदि कोई पराक्रमशाली व्यक्ति किसी अनुचित पक्ष को लेकर युद्ध कर रहा हो तो भी उस अवसर पर एकबार साधुवाद निकल ही जाता है । पूर्वापर्य के परामर्श में वह बात नहीं होती । वैसा ही यहाँ पर समझना चाहिये । इस प्रकार के विषयों में जिस प्रकार औचित्य का त्याग नहीं होता—उसकी व्याख्या आगे कर दी गई है । यहाँ पर वृत्तिकार ने 'कर दी गई है' इस भूतकाल का प्रयोग किया है जब कि 'की जावेगी' इस भविष्यत्काल का प्रयोग होना चाहिये ।
३
तृतीय उद्योतः
भूतकाल का प्रयोग करने का कारण यह है कि कारिकाकार ने तो पहले ही व्याख्या कर दी थी । वृत्तिग्रन्थ का प्रणयन बाद में हुआ । ध्वनिकार ने कारिकायें पहले बनाई थीं । अतः कारिका के प्राक्तनत्व को लेकर यहाँ पर भूतकाल का प्रयोग कर दिया गया है । आगे चल कर कारिका आवेगी—'औचित्याद्दृते नान्यद्रसभङ्गस्य कारणम् ।' वहीं पर बतलाया जावेगा कि ऐसे विषयों में औचित्य का त्याग क्यों नहीं होता ? अन्वय-व्यतिरेक से इस बात का निश्चय किया जाता है कि कहाँ पर अनौचित्य शक्ति के द्वारा तिरस्कृत हुआ है, कहाँ पर नहीं । वह इस प्रकार कि यदि शक्तिहीन कवि उत्तमदेवता के विषय में शृङ्गार रस का उपनिबन्धन करने लगे तो वहाँ पर स्फुट रूप में दोष मालूम पड़ने लगेगा । (अन्वय इस प्रकार होगा—'जहाँ अच्छा कवि वर्णन करता है वहाँ अदोषता होती है ।' व्यतिरेक इस प्रकार होगा—'जहाँ कवि अच्छा नहीं होता वहाँ अदोषता भी नहीं होती ।' यहाँ पर ग्रन्थकार का आशय यह है कि कविवर कालिदास ने इतनी प्रौढ़ता के साथ भगवती पार्वती के सम्भोग शृङ्गार का वर्णन
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किया है कि जब हम उसे पढ़ने लगते हैं तब काव्य की प्रौढ़ता में इतने निमग्न हो जाते हैं कि हमें ध्यान ही नहीं रहता कि हम उत्तमदेवताविषयक सृङ्गार का आस्वादन कर रहे हैं। जब हमें कोई विशेष रूप से स्मरण दिलाता है कि यह वर्णन तो उत्तमदेवता के विषय में है अतः माता पिता के सम्भोगवर्णन के समान सर्वत्र अनुचित है तब हमारा ध्यान उस ओर जाता है। इस प्रकार काव्य का अनौचित्य कवि की शक्ति से दब जाया करता है। यही बात सङ्घटना के विषय में समझनी चाहिए। नियमनुकूल श्रृङ्गार में असमासा सङ्घटना होनी चाहिए, रौद्र रस में दीर्घसमासा सङ्घटना ही होनी चाहिए। जहाँ इस नियम का अतिक्रमण किया जाता है वहाँ अनौचित्य तो होता है, किन्तु कवि की प्रतिभा के प्रभाव से वह अनौचित्य लक्षित नहीं होता। (प्रश्न) इस पक्ष में 'यो यः शास्त्रं बिर्भर्ति' इस पद्य में क्या अचारता है? (उत्तर) यहाँ पर कोई न कोई अचारता तो है ही; किन्तु वह कविप्रतिभा से ऐसी दब गयी है कि पूर्वपर विवेचन का विवेक रखने वाले भी उसे जान नहीं पाते। यदि हम इस पक्ष को सिद्ध करना चाहते हैं कि सङ्घटना और गुण एक ही हैं या सङ्घटनाश्रित गुण होते हैं तो 'यो यः शास्त्रं बिर्भर्ति' में ऐसी अचारता का आरोप करना ही पड़ेगा जो प्रतिभातत्क्षर नहीं हो रही है। (किन्तु यह अच्छी बात नहीं है कि एक ठोक निर्दिष्ट पद्य को हम बलात् केवल इसलिए दोषित कहें कि हमें एक अपने पक्ष सिद्ध करना है और वह दोष भी ऐसा है जो किसी की भी समझ में नहीं आता।)
(ध्वन्या०)—तस्माद् गुणव्यतिरिक्तत्वे गुणरूपत्वे च सङ्घटनाया अन्यः कश्चिन्नियमहेतुरुच्यते—
(अनु०) अतः एवं सङ्घटना के गुणों के व्यतिरिक्त होने पर अथवा गुणरूप होने पर नियम का कोई और हेतु कहा जाना चाहिए। अतः कहा जा रहा है—
६
तन्नियमें हेतुरौचित्यं वक्तृवाच्ययोः ।। ६ ।।
'उसके नियम में वक्ता और वाच्य का औचित्य हेतु होता है' ।। ६ ।।
(लो०)—गुणव्यतिरिकत्व इति । व्यतिरेकपक्षे हि संघटनाया नियमहेतुरेव नास्ति । एक्यपक्षेऽपि रसादि नियमहेतुरतद्योः । तन्नियम इति कारिकावशेषः । कथां नयति स्वकर्तव्यतया भावमिति कथानायको यो निर्वहणे फलभागी ।
(अनु०) 'गुणव्यतिरिकत्व में' व्यतिरेकपक्ष में सङ्घटना का नियमहेतु ही नहीं होता, ऐक्य पक्ष में भी रस नियम का हेतु नहीं होता। अतः अन्य कहना चाहिए। 'तन्नियम' यह कारिका का अवशेष अंश है। कथा को अपने कर्तव्य के अङ्ग भाग के रूप में ले चलता है वह कथानायक (होता है) अर्थात् निर्वहण में फलभागी ।
तारावती—अतः एवं यदि आपको इस बात का आग्रह ही है कि सङ्घटना और गुण की एकता या व्यतिरेक में सङ्घटनाश्रितत्व सिद्ध हो जावे तो औचित्य का नियामक रस को न मानकर किसी दूसरे तत्व को मानना पड़ेगा। क्योंकि यदि सङ्घटना और गुण दोनों पृथक्-पृथक् तत्व हैं तब तो नियम का कोई हेतु है ही नहीं और अभेद पक्ष में भी रस नियम का
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तृतीय उद्योत:
६
वक्ता और वाच्य का औचित्य सङ्घटना के नियम में हेतु होता है’॥ ६॥
हेतु नहीं हो सकता। इसीलिए औचित्य का नियामक कोई दूसरा तत्व मानना पड़ेगा। अतः छठी कारिका के उत्तरार्ध से औचित्य के दूसरे निमित्तों पर प्रकाश डाला जा रहा है—‘वक्ता और वाच्य का औचित्य सङ्घटना के नियम में हेतु होता है’॥ ६॥ 'तत्रियम' इत्यादि भाग छठी कारिका का शेष अंश है।
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तृतीय उद्योत:
तत्र वक्ता कविः क्विनिबद्धो वा, क्विनिबद्धइवचापि रसभावरहितो (ध्वन्यालोके)-तत्र वक्ता कविः क्विनिबद्धो वा, क्विनिबद्धइवचापि रसभावरहितो रसभावसमन्वितो वा, रसोदपि कथानायकाश्रयस्तद्विपक्षाश्रयो वा। कथानायकस्यच-घीरोदात्तादिविभेदभिन्नः पूर्वस्तदनन्तरो वेति विकल्पा:। वाच्यं च ध्वन्यात्मकं रसाभासाङ्गं वा, अभिनेयार्थमभिनेयार्थ वा, उत्तमप्रकृत्याश्रयं तदितराश्रयं वेति बहु-प्रकारम्। तत्र यदा कविरपगतरसभावो वक्ता तदा रचनायाः कामचारः। यदापि क्विनिबद्धो वक्ता रसभावरहितस्तदा स एव। यदा तु कवि: क्विनिबद्धो वा वक्ता रसभावसमन्वितो रसस्थ प्रधानाश्रितत्वाद् ध्वन्यात्मकस्तदा नियमेनैव तत्रासमास-मध्यसमासे एव सङ्घटने।
(अनु०) उसमें वक्ता या तो कवि होता है या कविनिबद्ध कोई पात्र। कविनिबद्ध भी या तो रसभाव से रहित होता है या रसभावसमन्वित। रस भी कथानायक के आश्रित होता है या उसके विपक्ष के आश्रित। कथानायक भी धीरोदात्त इत्यादि भेद से भिन्न प्रथम होता है या उसके बाद का—यह भी विकल्प हैं। वाच्य भी ध्वन्यात्मक रस का अङ्ग होता है या रसाभासाङ्ग, वाच्य अभिनेयार्थ होता है या अनभिनेयार्थ, उत्तम प्रकृत्याश्रय होता है या तदितर प्रकृत्याश्रय—इस प्रकार वाच्य बहुत प्रकार का होता है। उसमें यदि कवि रसभाववरहित वक्ता है तब रचना में स्वेच्छाचार होता है और जब कविनिबद्ध वक्ता रसभाववरहित होता है तब भी वही बात होती है। इसके प्रतिकूल जब कवि या कविनिबद्ध वक्ता नियम से ‘रसभाव’ से युक्त हों और रस प्रधानाश्रित होने के कारण ध्वनि का आत्मभूत ही हो तब नियम से ही असमास या मध्यसमासवाली सङ्घटना ही (अपेक्षित होती है)।
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तृतीय उद्योत:
(लो०)—घीरादात्तादिति। धर्मयुद्धवीरप्रधानो धीरोदात्तः, वीररौद्रप्रधानो धीरललितः, दानधर्मवीरशान्तप्रधानो धीरप्रशान्त इति चत्वारो नायका: क्रमेण सात्वत्यारभटीकैशिकीभारतीलक्षणवृत्तिप्रधानाः। पूर्वः कथानायकस्तदनन्तर उपनायकः। विकल्पा इति वक्तृभेदा इत्यर्थः। वाच्यमिति। ध्वन्यात्मा ध्वनिस्वभावो यो रसस्तस्याङ्गं व्यङ्ग्यममिल्यर्थः। अभिनेयो वागङ्गसत्वाहङ्गैराभिमुख्येन साक्षात्कारप्रायो नियोज्यो व्यङ्ग्यरूपो ध्वनिस्व-भावो यस्माद् वाच्यात्, स एव हि काव्यार्थ इत्युच्यते। तस्यैव चाभिनयेन योगः। यदाह मुनि:—‘वागङ्गरसोपेतानां काव्यार्थानु भावयन्ति’ इत्यादि। तत्र रसाभिनेयार्थमित्येकतया तद्भावादिरूपतया वाच्यार्थोडभिनीय इति योज्यम्। यथान्यै:। तदितरेऽति। मध्यमप्रकृत्याश्रयमधमप्रकृत्याश्रयञ्चेत्यर्थः। एवं वक्तृभेदान् वाच्यभेदांश्चाभिधाय तदुगतमौचित्यं नियामकमाह—तत्रैति।
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रचनाया इति संघटनाया:। रसभावहीनोडनवष्टस्ततपासादिरुदासीनोडपीति-वृत्ताद्भुतया यद्यपि प्रधानरसानुराग्येव, तथापि तावति रसादिहीन इत्युक्ततम् । स एवेति कामचार:। एवं शुद्धवक्त्रौचित्यं विचार्य वाच्यौचित्येन सह तदेवाह—यदा त्वति । कविर्यदपि रसाविष्ट एव वक्ता युक्त:। अन्यथा 'स एव वीतरागश्चेत्' इति स्थित्या तीरसमेव काव्यं स्यात्। तथापि यदा यमकादिचित्रदर्शनप्रधानोडसो तटस्थ:। रसभव ध्वनिवाल्मवृत एव न तु रसवदलङ्कारप्राय:। तदसमासौमध्यसमास एव संघटने, अन्यथा तु दीर्घसमासापोत्येव योञ्जयम्। तेन नियमशब्दस्य द्वयोश्चैवकारयो: पौनरुक्त्यमनतशङ्क्यम्
(अनु०) धीरोदात्त इत्यादि । धर्म और युद्ध वीर प्रधान धीरोदात्त ( होता है ) वीर और रौद्र प्रधान धीरोद्धत (होता है)। वीर शृङ्गार प्रधान धीरललित (होता हैं) दानवीर, धर्मवीर और शान्त प्रधान धीरशान्त (होता है)। इस प्रकार चार नायक क्रमश: सात्वती, आरभटी, कैशिकी और भारती नामक वृत्तियों में प्रधान होते हैं। पहला कथानायक और उसके बाद का उपनायक (होता है)। 'विकल्प' अर्थात् वक्ता के भेद । 'वाच्य यह' ध्वन्यात्मक अर्थात् ध्वनिस्वभाववाला जो रस उसका अज्ञ अर्थात् व्यङ्गचक । अभिनय अर्थात् वाणी अज्ञ सत्व और आहार्य के द्वारा आभिमुख्य अर्थात् साक्षात्कार की ओर ले जाया जानेबाला व्यङ्गचरूप अर्थात् ध्वनिस्वभाव वाला है अर्थ जिसका वह अभिनेयार्थ अर्थात् वाच्य । वही काव्यार्थ कहा जाता है। उसी का अभिनय से योग होता है। जैसा कि मुनि कहते हैं—'वाणी अज्ञ और सत्व से उपेत काव्यार्थी को मावित करते हैं' इत्यादि विभिन्न स्थानों पर । रसाभिनय में अवश्यकर्तव्यता के रूप में तो उसके विभावादि-रुपता के कारण वाच्य अर्थ अभिनीत किया जाता है इसलिये वाच्य अभिनेयार्थ है यह्ही अधिक उपयुक्त कथन है। यहां पर व्यपदेशद्वय की व्याख्या नहीं की जानी चाहिये जैसी औरों ने की हैं। 'उससे भिन्न' मध्यमप्रकृत्याश्रय और अधमप्रकृत्याश्रय । इस प्रकार वक्ता के भेदों और वाच्य के भेदों को कहकर तद्गत औचित्य के नियामक को कहते हैं—'वहाँ पर' । रचना का अर्थात् संघटना का । रसभावहीन तपस इत्यादि उदासीन भी इतिवृत्ताद्भुत होने के कारण प्रधान रस का अनुयायी ही होता है तथापि उतने में रसभावहीन यह कह दिया गया । 'वही' अर्थात् कामचार । इस प्रकार वक्ता के शुद्ध औचित्य पर विचार कर वाच्यौचित्य के साथ उसौ को कहते हैं—'जब तो' । कवि का यद्यपि रसाविष्ट वक्ता होना ही उचित है, नहीं तो 'यदि वह वीतराग हो' इत्यादि स्थिति से काव्य नीरस ही हो जावेगा। तथापि जब यह (कवि) यमक इत्यादि चित्र-दर्शन प्रधान होता है तब रसमावविहीन कहा गया है। नियमपूर्वक वक्ता रसभाव इत्यादि से समन्वित ही होना चाहिये, किसी प्रकार भी तटस्थ नहीं । रस भी ध्वन्यात्मकभूत ही होना चाहिये रसवदलङ्कारप्राय नहीं । तब असमासा और मध्यसमासा ही संघटनाएं (होती हैं), अन्यथा तो दीर्घसमासा भी हो सकती हैं—इस प्रकार की योजना करनी चाहिये । इससे नियम शब्द और दोनों एवकारों के पौनरुक्त्य की शङ्का नहीं करनी चाहिये ।
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वक्ता और वाच्य के भेदोपभेद
वक्ता और वाच्य के औचित्य के आधार पर सङ्घटना के नियमों पर विचार करने के पहले सङ्घटना के दृष्टिकोण से वक्ता और वाच्य के भेदोपभेद कर लेना उचित प्रतीत होता है। उसमें वक्ता दो प्रकार का हो सकता है या तो कवि या कविनिबद्ध कोई पात्र। कविनिबद्धपात्र भी दो प्रकार का हो सकता है रस और भाव से रहित तथा रस और भाव से युक्त। रस भाव युक्त वक्ता भी दो प्रकार का हो सकता है कथानायक के आश्रित रस से युक्त और कथानायक के विरोधी व्यक्ति में रहनेवाले रस से युक्त। ('कथानायक' शब्द कथा उपपद निष्ठातु से कर्त्ता के अर्थ में ण्वुल् प्रत्यय होकर बना है।) इस कथानायक शब्द का अर्थ होता है कथा को अपने कर्तव्य का अङ्गभूत बनानेवाला व्यक्ति जो कि निर्वहण में फल का भागी हो। कथानायक के धीरोदात्त इत्यादि भेद होते हैं। नायक चार प्रकार का होता है—(१) धीरोदात्त उसे कहते हैं जिसमें धर्मवीर तथा युद्धवीर की प्रधानता हो। (२) धीरोदत्त उसे कहते हैं जिसमें वीररस और रौद्र रस की प्रधानता हो। (३) धीरललित उसे कहते हैं जिसमें वीररस और शृङ्गार रस की प्रधानता हो। (४) धीरप्रशान्त उसे कहते हैं जिसमें दानवीर, धर्मवीर और शान्तरस की प्रधानता हो। इन चारों नायकों में क्रमशः सावित्री, आरभटी, कौशिकी और भारती नामक वृत्तियाँ की प्रधानता होती है। (इनके लक्षण अन्यत्र दिये गये हैं वहाँ देखना चाहिए। शृङ्गाररस के नायक चार प्रकार के होते हैं अनुकूल, दक्षिण, शठ और धूर्त। इनमें प्रत्येक के तीन तीन भेद होते हैं उत्तम, मध्यम और अधम। इनके भी लक्षण रसशास्त्रीय ग्रन्थों में दिये गये हैं, वहीं देखना चाहिये।) यह नायक भी दो प्रकार का होता है—या तो पहला या बाद का। पहला कथानायक होता है और बाद का उपनायक होता है। (यहाँ या तो कथानायक के अनुकूल हो सकता है या विरोधी। अनुकूल होगा तो अनु नायक या उपनायक कहलावेगा और प्रतिकूल होगा तो प्रतिनायक।) नायकभेद के यही विकल्प है अर्थात् वक्ता के यही भेद हैं।
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इसी भाँति वाच्य भी कई प्रकार का होता है। एक तो ऐसा वाच्य जो ध्वनिस्वभाववाले रस का अङ्गीक अर्थात् व्यङ्ग्य हो, दूसरा ऐसा वाच्य जो रसाभास का व्यङ्ग्य हो। वाच्यार्थ के पुनः दो भेद होते हैं अभिनेयार्थ और अनभिनेयार्थ। इनके अतिरिक्त उसके दो भेद और होते हैं उत्तम प्रकृति का आश्रय लेनेवाला वाच्यार्थ और उससे भिन्न प्रकृति का आश्रय लेनेवाला वाच्यार्थ। इस प्रकार वाच्यार्थ के बहुत से प्रयोग होते हैं। यहाँ पर अभिनेयार्थ शब्द का अर्थ समझ लेना चाहिये। यह शब्द वाच्यार्थ का विशेषण है और इसमें बहुव्रीहि समास है। इस प्रकार इसका व्युत्पत्तिलब्ध अर्थ यह होगा—'अभिनय है अर्थ जिसका' अर्थात् अभिनेयार्थवाच्य उसे कहते हैं जिस वाच्यार्थ का अर्थ अभिनेय हो। अभिनेय शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है अभि + नय। 'अभि' का अर्थ है सामने और 'नय' का अर्थ है ले आना। आशय यह है कि जिस वाच्यार्थ का अर्थ दर्शकों के सामने ले आया जावे उसे अभिनेयार्थ वाच्य कहते हैं। कोई भी अर्थ चार प्रकार के अनुभवों के द्वारा सामने लाया जाता है—वाचिक, आङ्गिक, सात्त्विक और आहार्य। इनके द्वारा सामने लाया जानेवाला या प्रत्यक्ष कराया जानेवाला अर्थ व्यङ्ग्यार्थ ही होता है जिसका स्वभाव ध्वन्यात्मक हो अर्थात् जिस व्यङ्ग्यार्थ में ध्वनिरूपता को धारण करने की क्षमता हो।
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अत एव अभिनेयार्थ वाच्यार्थ का निष्कृष्ट अर्थ यह हुआ कि जिस वाच्यार्थ के द्वारा अभिव्यक्त होनेवाला ध्वनि के स्वभाववाला व्यङ्गच्यार्थ वाचिक, आङ्गिक, सात्विक और आहार्य इन चार प्रकार के अनुभावों के द्वारा प्रत्यक्ष रूप में ( दर्शनीयरूप में ) सामने लाया जावे उस वाच्यार्थ को अभिनेयार्थ कहते हैं । उसी व्यङ्ग्यार्थ की संज्ञा काव्यार्थ भी होती है और उसी व्यङ्ग्यार्थ का अभिनय से योग भी होता है । भरत मुनि ने विभिन्न स्थानों पर सङ्केत दिया है कि अभिनेय व्यङ्ग्यार्थ को ही वाच्यार्थ होता है । जैसाकि उन्होंने भावों की परिभाषा लिखते हुये लिखा है—“वाणी अङ्ग और सत्त्व से युक्त काव्यार्थों को ये भावित करते हैं ।' अब प्रश्न यह उठता है कि क्या वाच्यार्थ का योग अभिनय से सर्वथा नहीं होगा ? इसका उत्तर यह है कि होता है इसी रूप में है कि रस अथवा भाव का अभिनय तब तक सम्भव नहीं हो सकता जब तक कि रस के विभाव इत्यादि का भी अभिनय न किया जावे । इस प्रकार रसाभिनय के लिये विभाव इत्यादि के रूप में वाच्य का अभिनय भी अपरिहार्य ही है; अत एव वाच्यार्थ का भी अभिनय किया ही जाता है । यहाँ पर सारांश यह है कि यद्यपि वाच्यार्थ का भी अभिनय से योग होता है तथापि वाच्यार्थ को अभिनेयार्थ इसीलिये कहते हैं कि वाच्यार्थ के अर्थ ( व्यङ्ग्यार्थ ) का अभिनय किया जाता है—यही व्याख्या करनी चाहिए; क्योंकि यही अधिक उचित तर्क है, अर्थात् बहुविघ्नता का अर्थ इस व्याख्या में ठीक बैठता है । कुछ लोगों ने ( चन्द्रिकाकार ने ) यह अर्थ किया है कि 'अभिनेय है अर्थ अर्थात् वाच्यार्थ जिसका' इस प्रकार की व्याख्या करने में दोष यह आता है कि 'जिस वाच्यार्थ का वाच्यार्थ अभिनेय है' इस अर्थ का क्या अभिप्राय होगा ? 'वाच्यार्थ का वाच्यार्थ' कहने का क्या अभिप्राय ? इसका उत्तर चन्द्रिकाकार ने यह दिया है कि यहाँ पर व्यपदेशिवद्भाव से भेद की कल्पना कर ली जावेगी अर्थात् व्याख्याता लोग किसी एक ही वस्तु में भेद की कल्पना कर उसे समझाया करते हैं । जैसे 'राहु का शिर' यद्यपि 'राहु' वास्तव में शिर को ही कहते हैं; राहु और शिर दोनों एक ही वस्तु हैं फिर भी समझाने के लिये भेदकल्पना की गई है । इसी प्रकार 'वाच्यार्थ का वाच्यार्थ' इसमें भी भेद की कल्पना कर लेनी चाहिये । किन्तु यह व्याख्या ठीक नहीं है । ( क्योंकि एक तो व्यपदेशिवद्भाव अगतिकगति है, दूसरे अभिनय भाव इत्यादि का ही होता है । अतः जब व्यङ्ग्यार्थ के अभिनयपरक अर्थ करने से सन्दर्भ ठीक बैठ जाता है तब व्यपदेशिवद्भावपरक व्याख्या करना ठीक नहीं । ) 'वाच्य के दो और भेद होते हैं— उत्तम प्रकृति के आश्रित और उससे भिन्न के आश्रित ।' यहाँ पर उससे भिन्न का आशय है मध्यम प्रकृति के आश्रित या अधम प्रकृति के आश्रित ।
उक्त भेदों का औचित्य
इस प्रकार वक्ता के भेदों और वाच्य के भेदों का अभिधान कर दिया गया। अब उनके औचित्य के नियामक पर विचार किया जा रहा है—“जब कवि में रस भाव इत्यादि का समावेश न हो तथा कवि ही वक्ता हो तब स्वेच्छानुसार रचना किसी प्रकार की भी हो सकती है अर्थात् उसमें संघटना का कोई विशेष नियम नहीं है ।' 'कवि रसभावहीन वक्ता हो' में रसभावहीन का आशय यह है कि जब कवि में किसी प्रकार के रस भाव इत्यादि का समावेश न हुआ हो । ( उदाहरण के लिये सूर तुलसी इत्यादि ने भक्ति-परक काव्य लिखा है
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और उनमें भक्तिका आवेश भी था। किन्तु कुछ ऐसे कवियों ने भी भक्ति-परक रचनायें की हैं जिनमें वस्तुतः भक्तिभावना विद्यमान नहीं थी। अथवा भक्त कवियों को भी प्रकरण वश ऐसे रसों का अभिव्यञ्जन करना पड़ा है जिनमें उनकी अन्तरात्मा आनन्द नहीं लेती थी। ऐसे अवसर पर यदि कवि में रस का अभिनिवेश न हो तो उसे अधिकार है कि वह संघटना के किसी भी प्रकार को अपना सकता है। आशय यह है कि कुछ तो प्रकरण ऐसे होते हैं जिनको कवि पूर्ण तन्मयता के साथ लिखता है और उनका प्रभाव पाठकों या दर्शकों पर भी जमाना चाहता है तथा कुछ प्रकरण ऐसे होते हैं जिनको कवि प्रकरण-वश लिखता तो है किन्तु उसका पूर्ण अभिनिवेश उसमें नहीं होता। यदि कवि इस प्रकार प्रकरण को चलते हुये रूप में लिख रहा हो तो उसे अधिकार है कि चाहे जैसी शैली अपना सकता है। रसभाव-हीन का अर्थ है रसाभिनिवेश से रहित तपस्वी इत्यादि कोई उदासीन कवि। यद्यपि इस प्रकार का भी इतिवृत्त काव्य का अंग होने के कारण प्रधान रस का अनुयायी होता है (अतः उसे रसभावहीन कवि नहीं कह सकते) तथापि उतने अंश में अर्थात् अप्रधान रस में वह रस-भावहीन होता ही है इसीलिये उसे रसभावहीन कहा गया है।
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(उदाहरण के लिये सूर का प्रधान अभिनिवेश भक्ति रसों के लिखने में है। प्रसिद्ध-वध उत्तमर्णे, श्राघस्तु-वध इत्यादि में कठोररस-परक भी रचना की है तथापि उसमें उनका पूर्ण अभिनिवेश नहीं था। अतः यद्यपि सूर सहृदयशिरोमणि कहे जाते हैं तथापि कठोर रसों के विषय में वे रसभावहीन ही कहे जावेंगे और यदि उस प्रकार की रचना में उन्होंने संघटना के औचित्य का उल्लंघन किया होगा तो वह आलोचकों की उपेक्षा का ही विषय होगा। किन्तु तुलसी के विषय में यह बात नहीं कही जा सकती, क्योंकि उनका अभिनिवेश प्रायः सभी प्रकार के काव्य के विषय में था।) इसी प्रकार जब कविनिबद्ध वक्ता रसभाव रहित हो तब वही बात अर्थात् रचना स्वेच्छानुसार कैसी भी हो सकती है। यहां तक शुद्ध वक्ता के दृष्टिकोण से संघटना के औचित्य का विचार कर दिया गया है। अब वाच्यार्थ के औचित्य के साथ वक्ता के औचित्य पर विचार किया जा रहा है—‘जब कवि या कविनिबद्ध वक्ता नियम से रस और भाव से युक्त हो और रस प्रधान में आश्रित होने के कारण ध्वनि की आत्मा के रूप में ही स्थित हो तब संघटना असमास या मध्यसमास वाली ही होती है। किन्तु करुण और विप्रलम्भ श्रृंगार में संघटना समाससरहित ही होती है।'
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रस पर आधारित संघटना यद्यपि कवि का सवंदा रसाविष्ट वक्ता होना ही उचित है। नहीं तो जैसा कि कहा गया है ‘यदि कवि वीतराग हो तो सारा काव्य नीरस हो जावेगा’ इसके अनुसार काव्य में नीरसता आ जावेगी। तथापि कभी-कभी कवि का अभिनिवेश प्रधानतया रसोन्मुख न होकर यमक इत्यादि अथवा चित्रकाव्यप्रदर्शनपरक हो जाता है उसी दशा में कवि रसभाव-हीन कहा जाता है। (इसके अतिरिक्त कवि अपने प्रधान रस से भिन्न जब ऐसे विषय में लिखने लगता है जिसका उससे चलता हुआ वर्णन करना है तब भी वह रसभावाभिनिवेश हीन ही कहा जाता है। आलोकार ने ‘यदा तु कवि……संघटने’ इस वाक्य के अन्त में लिखा है ‘नियमेनैव तत्रासमासे एव संघटने’ इस वाक्य का सीधा अर्थ यह होगा—नियम से ही
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विरोधिनश्च सर्वत्रमनुसंहर्तव्या: |
असमास या मध्यसमास ही संघटनायें होती हैं। यहाँ पर तो एक नियम शब्द दूसरे दो बार 'ही' ( एव ) का प्रयोग पुनरुक्त हो जाते हैं और इनका कोई उपयोग नहीं रहता। अतः इस पुनरुक्ति को दूर करने के लिए इन शब्दों को वाक्य में विभिन्न स्थानों पर जोड़ देना चाहिए। नियम का अन्वय वक्ता से करना चाहिए अर्थात् जो वक्ता नियमपूर्वक रसभाव से युक्त हो अर्थात् किसी प्रकार भी तटस्थ न हो। प्रथम 'एव' शब्द को ध्वन्यातमभूत के साथ जोड़ना चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ कि रस ध्वन्यास्पद ही हो, किसी प्रकार भी रसवदलङ्कारप्राय न हो। दूसरा 'एव' अपने ठीक स्थान पर ( प्रयोग के स्थान पर) लग जाता है। उसका अर्थ हो जाता है—तब संघटना असमास या मध्यसमासवाली ही होती है नहीं तो दीर्घसमासवाली भी हो सकती है। इसी प्रकार की योजना करनी चाहिये जिससे नियम शब्द तथा दोनों 'एव' शब्दों की पुनरुक्ति की आशङ्का न की जा सके।
कथं चेदुच्यते—रसो यदा प्राधान्येन प्रतिपाद्यस्तदा तत्प्रतौतौ व्यवधायकविरोधिनश्च सर्वत्रमनुसंहर्तव्याः | एवं च दीर्घसमासा सङ्घटना समासानामनेकप्रकारसम्भावनया कदाचिद्रसप्रतीति व्यवधातातीति तस्यां नाट्यन्तरमभिनिवेशः शोभते। विशेषतोऽभिनेयार्थे काव्ये।
( ध्वन्य० ) करुणविप्रलम्भयोस्त्वसमासैव सङ्घटना ।
ततोज्ञेयत्र च विशेषतः करुणविप्रलम्भयोर्ज्ञेयः। तयोर्हि सुकुमारतरत्वात्स्वल्पायामपि शब्दार्थयोः प्रतीतिमन्थरीभवति। रसान्तरे पुनः प्रतिपाद्ये रौद्रादौ मध्यसमासा सङ्घटना कदाचिद्विरोधितया उपेक्ष्यते न तु दीर्घसमासापि वा तदाक्षेपविनाभाविरसौचितवाच्यापेक्षया न विगुणा भवतोति सापि नाट्यन्तं परिहार्या। सर्वासु च सङ्घटनासु प्रसादाद्यो गुणो व्याप्नो। स हि सर्वत्रसाधारणः सर्वसङ्घटनासाधारणइच्युक्तम्। प्रसादातिशयेऽपि सङ्घटनाकरणविप्रलम्भाभ्यां न ध्वननकृत्। तदपरित्यागे च मध्यसमासापि न न प्रकाशयति। तस्मात्स्वन्त्र प्रसादोज्नुसर्तव्यः।
( अनु० ) करुण और विप्रलम्भ में तो असमासा संघटना ही होती है। किस प्रकार ? यदि यह कहो तो कहा जा रहा है—जब प्रधानतया रस का प्रतिपादन करना हो तब उसकी प्रतीति में व्यवधान डालनेवालों तथा विरोधियों का सभी प्रकार से परिहार करना चाहिये। और इस प्रकार समासों की अनेक प्रकार की सम्भावना के कारण दीर्घसमासा संघटना कदाचित् रसप्रतीति में व्यवधान भी उपस्थित कर देती है। अतः उस दीर्घसमास में अत्यन्त आग्रह शोभित नहीं होता है। विशेष रूप से अभिनेयार्थ काव्य में उससे भिन्न ( श्रव्य काव्य में ) विशेष रूप से करुण और विप्रलम्भ श्रृंगार में। उक्त दोनों के अधिक सुकुमार होने के कारण थोड़ी भी अस्वच्छता में शब्द और अर्थ की प्रतीति मन्थर हो जाती है। पुनः रौद्र इत्यादि दूसरे रस के प्रतिपादनीय होने पर मध्यमसमासवाली संघटना अथवा कदाचित् घोरोदात नायक से सम्बन्ध रखनेवाले क्रिया-कलाप का आक्षेप लेने से दीर्घसमास भी उस वाच्य की अपेक्षा करने के कारण जो ऐसे रस के अनुकूल हो जिस ( रस का ) आक्षेप बिना दीर्घसमास के हो ही न सके, गुणहीन नहीं होता अतः एव उसका भी अत्यन्त परिहार नहीं होना
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चाहिये। ( जहाँ वाच्य बिना दीर्घ समास के रस को अभिव्यक्त ही न कर सके वहाँ दीर्घ-समास विगुण नहीं होता। अतः उसका भी परित्याग करना उचित नहीं है। ) सब प्रकार की सङ्घटनाओं में प्रसाद नामक गुण व्यापक होता है। यह बतलाया जा चुका है कि वह सभी रसों में साधारण होता है तथा सभी सङ्घटनाओं में भी साधारण होता है। प्रसाद गुण का अतिक्रमण करने पर समासरहित सङ्घटना भी करुण तथा विप्रलम्भ शृंगार को अभिव्यक्त नहीं करती। प्रसाद गुण के परित्याग न करने पर मध्यम समासवाली सङ्घटना भी (कोमल रसों को) प्रकाशित न करे—ऐसा नहीं होता। अतः सर्वत्र प्रसाद गुण का अनुसरण करना चाहिए। (लो०)—कथंमिति चेदिति। किं धर्मसूत्रकारवचनमेतदिति भावः। उच्यते इति। न्यायोपपश्येतव्यर्थः। तत्प्रतीताविति। तदास्वादे ये व्यवधायक आस्वादविच्छेद्रुपा विरोधिनश्च तद्विपरीतास्वादमया इत्यर्थः। अनेकप्रकाराः सम्भाव्यते सङ्घटना तु सम्भावनया प्रयोक्त्रित्री द्वे निच्छौ। विशेषतोऽभिनेयार्थेति। अन्रुटितेन व्यङ्ग्येन तावत्समासार्थोऽभिनयो न शक्यः कर्तुम्। काक्वाद्योऽनन्तरप्रसङ्गानादयश्च। तत्र दुष्प्रयोगो बहुत्तर-सन्देहप्रसरा च तत्र प्रतिपत्त्र नाट्येडनुरूपा स्यात्। प्रत्यक्षरूपत्वात्तस्या इति भावः। अन्यत्र चेति। अनभिनेयार्थेऽपि। मन्थरोभवतोति। आस्वादो विच्छिन्नतत्वात्प्रतिहन्यत इत्यर्थः। तस्या दीर्घसमाससङ्घटनाया य आक्षेपस्तेन बिना यो न भवति व्यङ्ग्य-भिध्यङ्कजकतयोपादीममानो वाच्यस्तस्य यासावपेक्षा दीर्घसमाससङ्घटनां प्रति स अवैगुण्य हेतुः। नायकस्यापि व्यापार इति यद्वाच्यमर्थं तत्र श्लिष्यत इवेत्यलम्।
चाहिए (जहाँ वाच्य बिना दीर्घ समास के रस को अभिव्यक्त ही न कर सके वहाँ दीर्घ-समास विगुण नहीं होता। अतः उसका भी परित्याग करना उचित नहीं है।) सब प्रकार की सङ्घटनाओं में प्रसाद नामक गुण व्यापक होता है। यह बतलाया जा चुका है कि वह सभी रसों में साधारण होता है तथा सभी सङ्घटनाओं में भी साधारण होता है। प्रसाद गुण का अतिक्रमण करने पर समासरहित सङ्घटना भी करुण तथा विप्रलम्भ शृंगार को अभिव्यक्त नहीं करती। प्रसाद गुण के परित्याग न करने पर मध्यम समासवाली सङ्घटना भी (कोमल रसों को) प्रकाशित न करे—ऐसा नहीं होता। अतः सर्वत्र प्रसाद गुण का अनुसरण करना चाहिए। (लो.)—कथंमिति चेदिति। किं धर्मसूत्रकारवचनमेतदिति भावः। उच्यते इति। न्यायोपपश्येतव्यर्थः। तत्प्रतीताविति। तदास्वादे ये व्यवधायक आस्वादविच्छेद्रुपा विरोधिनश्च तद्विपरीतास्वादमया इत्यर्थः। अनेक प्रकार की सम्भावना की जाती है और सङ्घटना तो सम्भावना में प्रयोजिका होती है इस प्रकार दो निच्छु (किये गये हैं।) विशेषरूप से अभिनेयार्थ में। अन्रुटितेन व्यङ्ग्येन तावत्समासार्थोऽभिनयो न शक्यः कर्तुम्। काक्वाद्योऽनन्तरप्रसङ्गानादयश्च। तत्र दुष्प्रयोगो बहुत्तर-सन्देहप्रसरा च तत्र प्रतिपत्त्र नाट्येडनुरूपा स्यात्। प्रत्यक्षरूपत्वात्तस्या इति भावः। अन्यत्र चेति। अनभिनेयार्थेऽपि। मन्थरोभवतोति। आस्वादो विच्छिन्नतत्वात्प्रतिहन्यत इत्यर्थः। तस्या दीर्घसमाससङ्घटनाया य आक्षेपस्तेन बिना यो न भवति व्यङ्ग्य-भिध्यङ्कजकतयोपादीममानो वाच्यस्तस्य यासावपेक्षा दीर्घसमाससङ्घटनां प्रति स अवैगुण्य हेतुः। नायकस्यापि व्यापार इति यद्वाच्यमर्थं तत्र श्लिष्यत इवेत्यलम्। व्याप्तो। या काचित्सङ्घटना सा तथा कर्तव्या। यथा वाच्ये झटिति भवति प्रतीतिरिति यावत्। उक्तमिति। ‘सम्पर्कतवं काव्यस्य यत्नु’ इत्यादिना। न व्यन-क्तोति। व्यङ्ग्यकस्य स्ववाच्यस्यैवप्रत्ययानादिति भावः। तदुक्ते। प्रसादस्यापरित्यागे अभीष्टत्वाद्रार्थे। स्वकर्णठन्यायेन व्यतिरेकावुकू।
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आक्षेप अर्थात् व्यापार जो यह क्याख्या की गई वह ( हृदय में ) जमती ही नहीं बस इतना पर्याप्त है ।
'व्यापी' यह । आक्षय यह है कि जो कोई भी सङ्घटना हो वह ऐसी की जानी चाहिये जिससे वाच्य में शोभ्र ही प्रतीति हो जावे । 'कहा गया है' 'काव्य का ( सभी रसों के प्रति ) जो समर्पकत्व' इत्यादि के द्वारा । 'व्यक्त नहीं करता है' । भाव यह है कि क्योंकि व्यञ्जक अपने वाच्य का ही प्रत्यायन नहीं कराता । 'वह' यहाँ प्रसाद के अपरित्याग में अभीष्ट होने के कारण, इस विषय में स्वकण्ठ से अन्वय-व्यतिरेक कह दिये गये हैं ।
तारावती—' करुण तथा विप्रलम्भ शृङ्गार में सङ्घटना समासहीन होनी चाहिये । (प्रश्न) यह कैसे ? क्या यह धर्मशास्त्र का वचन जोकि इसका निर्देश मानना अनिवार्य हो ?
(उत्तर) यह बात तो न्यायानुकूल हो सिद्ध हो जाती है जब प्रधनितया रस का प्रतिपादन किया जा रहा हो तब उसकी प्रतीति में व्यवधान हो अर्थात् जो तत्त्व रसास्वादन में विघ्नकारक हों अथवा विरोधी हों अर्थात् उससे विपरीत आस्वादको उत्पन्न करने वाले हों उनका तो पूर्ण रूप में परित्याग ही करना चाहिये । अब ऐसी सङ्घटना की बात लीजिये जिसमें लम्बे समास किये गये हों । समास में अनेक प्रकार की सम्भावना की जा सकती है ( जैसे 'लोकनाथ' शब्द में बहुव्रीहि भी हो सकता है, कर्मधारय भी और मध्यमपदलोपी समास भी । ) अतः कभी-कभी वाच्यार्थ के निर्णय में विवेचन करना पड़ सकता है जिससे रस की प्रतीति में एक व्यवधान उपस्थित हो सकता है ।
यह बात विशेष रूप से लम्बे समासों में होती है । अतः लम्बे समासों का अधिक आग्रह अच्छा नहीं लगता । यहाँ पर सम्भावना शब्द सम् उपसर्ग भू आतु से दो बार णिच् प्रत्यय होकर सञ्ज्ञा अर्थ में ल्युट् प्रत्यय होने से बना है । एक णिच् के बाद जब दुबारा णिच् प्रत्यय होता है तब एक णिच् का लोप हो जाता है । दो बार णिच् होने से यह अर्थ हो जावेगा—
समास में अनेक प्रकार सम्भव होते हैं, कोई परिशीलक व्यक्ति उनकी सम्भावना करता है और उसकी सम्भावना में प्रयत्निक होती है सङ्घटना । इस प्रकार दीर्घसमासगर्भित सङ्घटना में अनेक प्रकार की सम्भावना से वाच्यार्थ व्यवहित हो जाता है और उसे रसप्रतीति भी व्यवहित हो जाती है । यह बात विशेष रूप से ऐसे काव्य में होती है जोकि अभिनय के लिये लिखा गया हो ।
कारण यह है कि दृश्य काव्य अभिनय के मन्त्रण से लिखा जाता है और नट लोग उस काव्य का अभिनय कर उसका प्रत्यक्षीकरण पाठकों के सामने करते हैं । यदि अभिनेय काव्य में लम्बे समास दिये तो उस समासगर्भित वाक्य का अभिनय बिना वाक्य को तोड़े हुए सम्भव नहीं होता ।
ऐसी दशा में व्यञ्जक्यार्थ भी टूट-टूट कर ही परिशीलकों के सामने आता है । जिससे रसप्रतीति में विघ्न पड़ता है । दूसरी बात यह है कि अभिनय में अभिनेता को विशेष प्रकार की कण्ठध्वनि बनाकर (काकु के द्वारा) किसी शब्द या वाक्य का उच्चारण करना पड़ता है ।
यदि लम्बे समास हुए तो कण्ठध्वनि किस प्रकार बनाई जा सकेगी ? इसी प्रकार अभिनय में बीच-बीच में जनता के अनुरंजन के लिये गाने भी होते हैं । यदि गानों में लम्बे समास हुए तो उनका स्वर-संयोग किस प्रकार ठीक किया जा सकेगा ?
आक्षय यह है कि उस अभिनेय काव्य में ऐसी प्रतिपत्ति जिसका प्रयोग ( अभिनय ) कठिनाई से किया जा सके तथा जो सन्देह को बहुत अधिक प्रसार देनेवाली हो नाट्य के अनुकूल नहीं होती । क्योंकि उसमें तो नाट्यप्रतीति प्रत्यक्षरूपिणी ही होती है ।
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होती है। दूसरे स्थान पर अर्थात ऐसे काव्य में जिसका प्रयोजन अभिनय न हो विशेषरूप से दीर्घसमास के परित्याग का ध्यान करुणरस तथा विप्रलम्भशृङ्गार में रखना चाहिये। क्योंकि निस्सन्देह ये दोनों रस अन्य रसों की अपेक्षा अधिक सुकुमार होते हैं। अतः इनमें यदि स्वल्प भी अस्वच्छता आती है तो शब्द और अर्थ की प्रतीति मन्द पड़ जाती है। जिससे आस्वादन में विघ्न पड़ जाता है और उसकी क्रिया ही नष्ट हो जाती है। यदि दूसरे रौद्र इत्यादि रसों का प्रतिपादन करना हो तो मध्यमसमासा संघटना भी गुणहीन नहीं होती। और यदि कदाचित् उन रौद्रादि रसों में घोरोद्धत नामक से सम्बद्ध व्यापार का आश्रय लिया जावे तो ऐसी दशा में दीर्घसमासा संघटना भी बुरी नहीं होती। दीर्घसमासा संघटना बहुधा पर भी अनुचित नहीं होती जहाँ पर दीर्घसमासा संघटना में अनुपपत्ति के कारण नवीन अर्थ की योजना कर ली जाती हो तथा उस नवीन अर्थ की योजना के अभाव में वाच्यार्थ अपने व्यङ्ग्यार्थ को अभिव्यक्त ही न कर सके। इस प्रकार रस को अभिव्यंजना के लिये जिस वाच्यार्थ जा उपादान किया जावे उस वाच्यार्थ को यदि दीर्घसमासघटित संघटना की अपेक्षा हो तो वहाँ पर दीर्घसमास के अभाव में रौद्रादि रस की अभिव्यक्ति हो ही नहीं सकती और अभिव्यंजक वाच्यार्थ को उस दीर्घसमास की अपेक्षा होती है। वृत्तिकार ने इन शब्दों का प्रयोग किया है—‘उसके आकार्षेप के बिना न होनेवाले रस में उचित वाच्य की अपेक्षा होने के कारण दीर्घसमासा संघटना दूषित नहीं होती।’ कुछ लोगों ने ‘उसके आकार्षेप’ का अर्थ किया है नायक का आकार्षेप, किन्तु यह व्याख्या संगत नहीं होती। यहाँ पर ठीक व्याख्या यही है कि जहाँ पर रसाभिव्यक्ति के लिये दीर्घसमासावाली संघटना का आकार्षेप अनिवार्य हो और उसके बिना वाच्यार्थ रसाभिव्यक्त कर ही न सके, वहाँ पर चूँकि वाच्यार्थ रसाभिव्यक्ति के लिये दीर्घसमासा संघटना की अपेक्षा रखता है, अतः दीर्घसमासा संघटना ऐसे स्थान पर दूषित नहीं होती। इतना कहना पर्याप्त है अधिक की क्या आवश्यकता ?
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तृतीय उद्योतः
(ध्वन्यो०)—अत एव च ‘यो यः शास्त्रं बिर्भाति’ इत्यादौ यद्योजः; स्थितिनर्नेष्यते तत्प्रसादाख्य एव गुणो न माधुर्यम् । न चाचार्यवम्, अभिप्रेतरसप्रकाशनात् । तस्माद गुणाव्यतिरिक्तत्वे गुणवयतिरिक्तत्वे वा संघटनाया यथोक्तोद्दश्यविषयत्वानियमौष्तात् तस्या अपि रसाभिव्यक्तिनिमित्तभूताया योड्यमनन्तरोक्तो नियमहेतुः । स एव गुणानां नियततो विषय इति गुणाश्रयेण व्यवस्थानेप्यविरुद्धम् ।
(ध्वन्यो०)—अत एव च ‘यो यः शास्त्रं बिर्भाति’ इत्यादौ यद्योजः; स्थितिनर्नेष्यते तत्प्रसादाख्य एव गुणो न माधुर्यम् । न चाचार्यवम्, अभिप्रेतरसप्रकाशनात् । तस्माद गुणाव्यतिरिक्तत्वे गुणवयतिरिक्तत्वे वा संघटनाया यथोक्तोद्दश्यविषयत्वानियमौष्तात् तस्या अपि रसाभिव्यक्तिनिमित्तभूताया योड्यमनन्तरोक्तो नियमहेतुः । स एव गुणानां नियततो विषय इति गुणाश्रयेण व्यवस्थानेप्यविरुद्धम् ।
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तृतीय उद्योतः
(अनु०) अत एव ‘यो यः शास्त्रं बिर्भाति’ इत्यादि में यदि ओज की स्थिति का मानना अभीष्ट न हो तो वहाँ पर प्रसाद नामक गुण ही माना जाना चाहिये, माधुर्य नहीं। वहाँ अच्छता नहीं आती; क्योंकि उससे अभिप्रेत रस प्रकाशित हो जाता है। अतः चाहे संघटना को गुणों से अभिन्न मानें चाहे भिन्न, बतलाये हुए औचित्य के कारण विषय नियम होता है अतः संघटना में रस की व्यञ्जकता होती है। रस की अभिव्यक्ति में निमित्तभूत उस संघटना का जो अभी नियमहेतु बतलाया गया है वही गुणों का भी नियत विषय है, अतः गुणों के आश्रय से संघटना की व्यवस्था करना भी विरुद्ध नहीं है।
(अनु०) अत एव ‘यो यः शास्त्रं बिर्भाति’ इत्यादि में यदि ओज की स्थिति का मानना अभीष्ट न हो तो वहाँ पर प्रसाद नामक गुण ही माना जाना चाहिये, माधुर्य नहीं। वहाँ अच्छता नहीं आती; क्योंकि उससे अभिप्रेत रस प्रकाशित हो जाता है। अतः चाहे संघटना को गुणों से अभिन्न मानें चाहे भिन्न, बतलाये हुए औचित्य के कारण विषय नियम होता है अतः संघटना में रस की व्यञ्जकता होती है। रस की अभिव्यक्ति में निमित्तभूत उस संघटना का जो अभी नियमहेतु बतलाया गया है वही गुणों का भी नियत विषय है, अतः गुणों के आश्रय से संघटना की व्यवस्था करना भी विरुद्ध नहीं है।
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तृतीय उद्योतः
(लो०)—न माधुर्यस्मिति । ओजोमाधुर्ययोर्ह्रन्योडन्याभावरूपत्वं प्राहिनिरूपितमिति तयोः संघटनान्तं श्रुतिबाध्य इति भावः । अभिप्रेतेति । प्रसादेनैव स रसः
(लो०)—न माधुर्यस्मिति । ओजोमाधुर्ययोर्ह्रन्योडन्याभावरूपत्वं प्राहिनिरूपितमिति तयोः संघटनान्तं श्रुतिबाध्य इति भावः । अभिप्रेतेति । प्रसादेनैव स रसः
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५, ६
प्रकाशितः न न प्रकाशित इत्यर्थः। तस्मादिति। यदि गुणाः संघटनकरूपास्तस्थापि गुणनियम एव संघटनाया नियमः। गुणाधीनसंघटनापक्षेऽप्येवम्। संघटनाश्रयगुणपक्षेऽपि संघटनाया नियामकत्वेन यदृक्त्ववाच्यौचित्यं हेतुत्वेनोक्तम् तद् गुणानामपि नियमहेतुरिति पक्षत्रयेडपि न किश्चिद्विप्लव इति तात्पर्यम्
अनु० 'माधुर्य नहीं' अर्थात् ओज और माधुर्य का अन्योन्याभावरूपतत्व पहले ही निरूपित कर दिया गया, इस प्रकार उनका संकर व्यङ्ग्यन ध्वनितिबाह्य है। 'अभिप्रेत' अर्थात् प्रसाद के द्वारा ही वह रस प्रकाशित कर दिया गया, प्रकाशित न कर दिया गया हो ऐसी बात नहीं। 'इससे' यदि गुण और संघटना एक रूप है तथापि गुण का नियम ही संघटना का नियम है, गुण के आधीन संघटना पक्ष में भी यही है। संघटनाश्रय गुण पक्ष में भी संघटना के नियामक होने के कारण जो वक्ता और वाच्य का औचित्य हेतु के रूप में बतलाया गया है वह गुणों का भी नियमहेतु होता है—इस प्रकार तीनों पक्षों में कोई विप्लव नहीं है यह तात्पर्य है।
प्रस्तुत विषय का उपसंहार
तारावती—सभी प्रकार की संघटनाओं में प्रसाद नामक गुण व्यापक होता है, अर्थात् कोई भी किसी प्रकार की भी संघटना हो उसको ऐसे रूप में बनाना चाहिये जिससे वाच्य के विषय में एकदम प्रतीत हो जावे। यह तो पहले बतलाया ही जा चुका है कि प्रसाद नामक गुण साधारणतया सभी रसों में आता है और सभी संघटनाओं में सामान्तया अपेक्षित होता है। यह बात 'सम्पकत्वं काव्यस्य यस्तु सर्वरसास्न प्रतिः' इत्यादि कारिका में कही गई है। यदि प्रसाद गुण का अतिक्रमण कर दिया जावे तो समासरहित संघटना भी करुणरस तथाः विप्रलम्भशृङ्गार को अभिव्यक्त नहीं कर सकती; क्योंकि वाच्यार्थ व्यङ्गयक होता है और प्रसाद गुण के अभाव में उस वाच्यार्थ का ही प्रत्ययान नहीं हो सकता। यदि प्रसाद गुण का परित्याग न किया गया हो तो मध्यमसमासवाली संघटना भी करुणरस तथा विप्रलम्भशृङ्गार को अभिव्यक्त नहीं कर सकती—यह बात नहीं है; अतः सर्वत्र प्रसाद गुण का अनुसरण करना चाहिये। इसीलिये यद्यपि 'यो यः शास्त्रं विभर्ति' इत्यादि पद्य रौद्ररसपरक है, किन्तु इसमें समास नहीं किया गया है। इस समास न करने के कारण यदि इसे हम ओज के अन्दर सन्निविष्ट नहीं करना चाहते तो भी माधुर्य में सन्निविष्ट नहीं कर सकते। इसे हम प्रसाद गुण के अन्दर ही सन्निविष्ट करेंगे। आशय यह है कि यहां पर वाच्यार्थ तो उद्देत है और संघटना समास न करने के कारण माधुर्यप्रबण है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि यहां पर ओज और माधुर्य का सङ्कर है। किन्तु पहले इस बात का निरूपण किया जा चुका है कि ओज के अभाव को माधुर्य कहते हैं और माधुर्य संघटना के अभाव को ओज कहते हैं। इस प्रकार ये दोनों एक दूसरे के अभावरूप ही होते हैं। अतः इनका सङ्कर तो श्रवणगोचर भी नहीं हो सकता। यहां पर यह नहीं कहा जा सकता कि ओजस्विनी संघटना के अभाव में 'यो यः शास्त्रं विभर्ति' इत्यादि में अचाहता आ गई है। कारण यह है कि यहां पर प्रसाद गुण ही रौद्ररस के प्रकाशन से ओज का कार्य कर देता है। वह रौद्र को प्रकाशन नहीं करता। ऐसी बात नहीं है। अतः चाहे हम संघटना को गुणों के साथ अभिन्न मानें या भिन्न मानें जो ऊपर औचित्य का
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नियम बतलाया गया है उसके अनुसार उनके विषय का नियम है ही। अतः संघटना भी रस की व्यञ्जक होती है। इसी प्रकार गुणों के आधीन संघटना की व्यवस्था भी विरुद्ध नहीं है; क्योंकि संघटना रस में निमित्त होती है और जो उसके नियमहेतु अभी बतलाये गये हैं वे गुणों के भी निश्चित विषय हो सकते हैं। आशय यह है कि यदि गुण और संघटना दोनों को एक ही मानें तो गुण के नियम संघटना में भी लागू हो सकते हैं। यदि गुणों के आधीन संघटना को मानें तो भी यही बात होगी अर्थात् गुणों के ही नियम संघटना में भी लागू हो जावेंगे। यदि संघटना के आधीन गुणों को मानें तो संघटना नियामक होगी। ऐसी दशा में वक्ता और बोद्धव्य का जो औचित्य संघटना में हेतु के रूप में बतलाया गया है वह गुणों का भी नियमहेतु हो सकता है। इस प्रकार तीनों ही पक्षों में किसी प्रकार का कोई विरोध नहीं आता। ११५, ६॥
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११५, ६
(ध्वन्यो०)--विषयाश्रयमप्यनौचित्यं तां नियच्छति।१७। काव्यप्रभेदाश्रयत: स्थिता भेदवती हि सा।१७। वक्तृवाच्यगतौचित्ये सत्यपि विषयाश्रयस्यैवौचित्यं मुख्यकतां नियच्छति। यतः काव्यस्य प्रभेदा मुक्तकं सन्दानितकविशेषक-कलापककुलकानि। पर्यायबन्ध: परिकथा खण्डकथासकलकथे सर्गबन्धोऽभिनेयार्थ-माध्यायिकाकथे इत्येवमादय:। तदाश्रयेणापि संघटना विशेषवती भवति। (अनु०) 'एक दूसरे प्रकार का विषय के आधीन औचित्य भी उस संघटना को नियत्न करता है। क्योंकि काव्य के अवान्तर भेदों का आश्रय लेकर वह संघटना भेदवाली स्थित होती है। वक्ता और वाच्य में रहनेवाले औचित्य के होते हुए भी विषय के आधीन एक दूसरा औचित्य भी संघटना को नियन्त्रित करता है। क्योंकि काव्य के भेद हैं संस्कृत प्राकृत और अपभ्रंश में निबद्ध मुक्तक, सन्दानितक, विशेषक, कलापक और कुलक। पर्यायबन्ध, परिकथा, खण्डकथा, और सकलकथा, सर्गबन्ध, अभिनेयार्थ, आख्यायिका और कथा। इनके आश्रय से भी संघटना विशेषतावाली हो जाती है।
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(लो०)--नियमकान्तरमप्यस्तीतस्याह--विषयाश्रयमिति। विषयशब्देन संघात-विशेष उक्तः। यथा हि सेनाद्यात्मकसंघातनिवेशी पुरुष: कतरोज्ज्वलतदौचित्यादनुगुण-तयैवास्ते, तथा काव्यवाक्यस्यपि संघातविशेषात्मकसन्दानितकादिमध्यानिविष्टं तदौ-चित्येन वर्तते। मुक्तकं तु विषयशब्देन यदुक्तं तत्संघाताभावेन स्वातन्त्र्यमात्रं प्रदर्श-यितुं स्वप्रतिष्ठितमाकाशमिति यथा। अपिशब्देनैदमाह--सत्यपि वक्तृवाच्यौचित्ये विषयौचित्यं केवलं तारतम्यभेदमात्रव्याप्यम्, न तु विषयौचित्येन वक्तृवाच्यौचित्यं निवार्यत इति। मुक्तककमिति। मुक्तमन्येनानालिङ्गितं तस्य संज्ञायां कनू। तेन स्वत-न्त्रतया परिसमाप्तनिराकाङ्क्षार्थमपि प्रबन्धमध्येर्वति न मुक्तकत्वयुच्यते। मुक्तकस्यैव विशेषणं संस्कृतेत्यादि। क्रमभावित्वात्थैव निर्देशः। द्वाभ्यां क्रियासमासौ सन्दानित-कम्। त्रिभिर्विशेषकम्। चतुर्भिः कलापकम्। पञ्चप्रभृतिभिः कुलकम्। इति क्रिया-
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समासिकृता भेदा इति द्रन्द्वेन निर्दिष्टा। अवान्तर क्रियासमाप्तावपि वसन्तवर्णनादिरेक वर्णनीयोददेश्येन प्रवृत्तः पर्यायबन्धः एकं धर्ममुपिपुरुषार्थमुद्दिश्य प्रकारवैचित्र्येणानन्त वृत्तान्तवर्णनप्रकारा परिकथा। एकदेशवर्णना खण्डकथा। समस्तफलान्तेतिवृत्तावर्णना सकलकथा। द्र्योरपि प्रकृतप्रसिद्धत्वाद् द्रन्द्वेन निर्देशः। पूर्वेषां तु मुक्तकादीनां भाषायामनियमः। महाकाव्यरूपः पुरुषार्थफलः समस्तवस्तुवर्णनाप्रबन्धः सर्गबन्धः संस्कृत एव। अभिनेयार्थं दशरूपकं नाटिकाट्रोटकरासकप्रकरणिकाद्यवान्तरप्रपञ्च सहितमनेक भाषाभाष्याव्यामिश्रश्रृङ्गारम्। आख्यायिकोच्छ्वासादिरा वक्त्रापरवक्त्रादिना च युक्ता। कथा तद्विरहिता। उभयोरपि गद्यबन्धस्वरूपतया द्रन्द्वेन निर्देशः। आदिग्रहणाच्चम्पूः यथाह दण्डी—‘गद्यपद्यमयी चम्पूः’ इति।
(अनु०) दूसरा नियामक भी है यह कहते हैं—‘विषयाश्रयः’ इत्यादि। विषय शब्द से विशेष प्रकार का संघात बतलाया गया है। जिस प्रकार निश्चितदेह सेना इत्यादि आात्मक संघात में निश्चित कातर पुरुष भी उसके औचित्य से अनुपगुणरूप में ही रहता है उसी प्रकार काव्य वाक्य भी काव्यविशेषात्मक सन्दानितक इत्यादि के मध्य में निश्चित होकर उसके औचित्य से वर्तमान रहता है। मुक्तक तो विषय शब्द से जो कहा गया है उसके संघात के अभाव के कारण केवल स्वातन्त्र्य्य को प्रदर्शित करने के लिये (यहाँ पर आया है) जैसे स्वप्रतिष्ठित आकाश। ‘अपि’ शब्द से यह कहते हैं—वक्ता और वाच्य के औचित्य के होते हुये भी विषय का औचित्य केवल तारतम्य के भेद से प्राप्त है; विषयौचित्य के द्वारा वक्ता और वाच्य का औचित्य निवारित नहीं किया जाता। ‘मुक्तक’ मुक्त अर्थात् अन्य से अनालिङ्गित उसका संज्ञा में कन्। इससे स्वातन्त्र्यरूप में परिसमाप्त तथा निराकोक्ष अर्थवाला प्रबन्धमध्यवर्ती मुक्तक यह नहीं कहा जाता। मुक्तक का ही विशेषण है संस्कृत इत्यादि। क्रमभावी होने के कारण वैसा ही निर्देश है। दो से क्रिया की समाप्ति में सन्दानितक, तीन से विशेषक, चार से कलापक, पाँच इत्यादि से कुलक। ये क्रियासमाप्ति के द्वारा किये हुये भेद हैं इस प्रकार द्रन्द्ध से निर्देश किया गया है। अवान्तर क्रियासमाप्ति में भी वसन्तवर्णन इत्यादि एक उद्देश्य से प्रवृत्त पर्यायबन्ध (कहलाता है)। धर्म इत्यादि एक पुरुषार्थ के उद्देश्य से प्रकारवैचित्र्य्य से अननत वृत्तान्त वर्णन के प्रकार परिकथा (कहलाते हैं)। एकदेश का वर्णन खण्डकथा। अन्त में फलो वाले समस्त इति वृत्त का वर्णन सकलकथा। दोनों के प्रकृत में प्रसिद्ध होने के कारण द्रन्द्ध का निर्देश किया गया है। पहले के मुक्तक इत्यादि का भाषा में नियम नहीं हैं। महाकाव्यरूप पुरुषार्थ फलवाला समस्तवस्तु वर्णनपरक प्रबन्ध सर्गबन्ध संस्कृत में ही (होता है)। अभिनेयार्थ दशरूपक ‘नाटिका ट्रोटक, रासक, प्रकरणिक इत्यादि’ अवान्तर प्रपञ्च सहित अनेक भाषा से मिले हुए श्टृङ्गारम् (होता है)। आख्यायिका उच्छ्वास इत्यादि से और वक्त्र तथा अपवक्त्र इत्यादि से युक्त होती है। कथा उससे रहित होती है। दोनों के गद्यबन्धस्वरूप होने के कारण द्रन्द्ध से निर्देश किया गया है। आदि ग्रहण से चम्पू। जैसा दण्डी कहते हैं—‘गद्यपद्यमयी चम्पूः’ यह।
संघटना में विषयाश्रय का औचित्य
तारावती—अब यह बतलाया जा रहा है कि संघटना के दूसरे भी नियामक हैं—‘एक
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दूसरे प्रकार का भी औचित्य होता है जो कि सङ्घटना को नियान्त्रित करता है। काव्य के भेदोपभेदों के आधार पर सङ्घटना में भी भेद हो जाया करता है । विषय शब्द का अर्थ है एक प्रकार का सङ्घात या समूह। जिस प्रकार एक कायर मनुष्य भी सेना इत्यादि रूप समूह के अन्दर पहुँच कर सेना के औचित्य से उसी प्रकार के गणोंवाला हो जाता है, उसी प्रकार काव्यवाक्य भी सन्दानितक इत्यादि विशेष प्रकार के समूह में पड़कर उसी के औचित्य का अनुसरण करने लगता है। मुक्तक में कोई समूह नहीं होता किन्तु उसके लिये विषय शब्द का प्रयोग कर दिया गया है। यह इस बात को प्रकट करने के लिये किया गया है कि मुक्तक स्वतन्त्र होता है इसमें कोई समूह नहीं होता। जैसे यदि कोई यह प्रश्न करे कि पृथ्वी इत्यादि चार तो आकाश में स्थित है और आकाश कहाँ स्थित है? तो इसका उत्तर यही होगा कि आकाश अपने में ही स्थित है। यही बात मुक्तक के विषय में भी समझनी चाहिये। उपर्युक्त कारिका में 'भी' शब्द का प्रयोग किया गया है, इसका आशय यह है कि इस विषयाश्रित औचित्य से पूर्वोक्त वक्तृवाच्य का औचित्य निवृत्त नहीं होता, उसमें केवल तारतम्य का अन्तर हो जाता है। आशय यह है कि वक्तृ-वचन औचित्य और वाच्यगत औचित्य रसाभिव्यक्ति के लिये अनिवार्य हैं। इसके अतिरिक्त विषयगत औचित्य का जितना अधिक निर्वाह किया जाता है उतनी अधिक चारुता उस काव्य में बढ़ जाती है।
प्रस्तुत प्रसंग में काव्यभेदों पर विचार किया जा रहा है। (यहाँ पर विषय का अर्थ काव्य का स्वरूप या काव्य का भेद है। अतः विषयगत औचित्य पर प्रकाश डालने से पहले लेखक काव्य के भेदोपभेदों का संक्षिप्त परिचय दे रहा है।) काव्य का सबसे छोटा भेद मुक्तक होता है। यह संस्कृत प्राकृत और अपभ्रंश में निबद्ध किया जाता है। मुक्तक शब्द मुक्त शब्द से संज्ञा में कन् प्रत्यय होकर बना है। मुक्त शब्द का अर्थ है जिसका आलिङ्गन कोई दूसरा न कर रहा हो अर्थात् यदि केवल एक पद्य परतन्त्र निरपेक्ष भाव से अर्थसमाप्ति में पर्याप्त हो तो उसे मुक्तक कहते हैं। मुक्तक के अर्थ में ही यह बात आ जाती है कि वही पद्य मुक्तक हो सकता है जिसका आलिङ्गन कोई दूसरा पद्य न कर रहा हो। इसीलिये यदि प्रबन्ध के अन्दर कोई ऐसा पद्य आजावे जिसका अर्थ पूर्णतया उस पद्य में ही समाप्त हो रहा हो और उसे अर्थ-समाप्ति के लिये किसी अन्य की आकांक्षा न हो तो भी उसे मुक्तक नहीं कहेंगे। (क्योंकि अर्थसमाप्ति में स्वतन्त्र होते हुए भी उसका आलिङ्गन तो दूसरे पद्यों से हो ही रहा है। इस पर दीधितिकार ने लिखा है—'यह कहना ठीक नहीं है कि प्रबन्धान्तर्गत स्वतन्त्र पद्यों को मुक्तक नहीं कहते क्योंकि यद्यपि अनन्ततः उन्हें पद्यान्तर की अपेक्षा होती है तथापि शनैरशैः वे स्वतन्त्र रूप में शब्द प्रतीति तो उत्पन्न ही कर देते हैं और कहीं कहीं रसास्वादपर्यन्त उनमें स्वतन्त्र सत्ता पाई जाती है, अतः मुक्तकत्व की स्वीकृति के लिये कोई बाधा नहीं है।' किन्तु वास्तविकता यह है कि प्रबन्धान्तर्वर्ती पद्यों में अर्थ की परिसमाप्ति स्वतन्त्र होती ही नहीं। प्रबन्ध के कारण पाठक की एक भावना बन जाती है और एक प्रकार की विचारधारा से पाठक ओतप्रोत हो जाता है। जब कोई भी स्वतन्त्र पद्य प्रबन्ध के अन्दर आ जाता है तब प्रबन्ध से प्राप्त विचारधारा
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तथा भावना के प्रकाश में ही हम उस पद्ध को भी देखते हैं और उसी वातावरण में हम उसका आस्वादन भी करते हैं । उदाहरण के लिये तुलसी का निम्नलिखित दोहा लीजिये-तुलसी जसि भवितव्यता तैसी मिले सहाय । आपु न आवै ताहि पै ताहि तहाँ लै जाय ॥
यह दोहा दोहावली में भी आया है और रामचरितमानस में भी । दोहावली में इसकी स्वतन्त्र सत्ता है और गीतिनिबन्ध के अतिरिक्त यहाँ और कुछ नहीं मालूम पड़ता । किन्तु जब हम रामचरितमानस में इसे पढ़ते हैं तो प्रतापभानुका अतीत, उसका देववश कपटमुनि के आश्रम में पहुँचना और भविष्य की उसकी विनाश की भूमिका-ये सारी बातें हमारी आँखों के सामने नाच उठती हैं । तथा इस दोहे में कही हुई नीति सूक्ति के अतिरिक्त बहुत बड़ा प्रसंग और तज्जन्य निर्वेद हमारे आस्वादन निमित्त हो जाता है । अतः यह दोहा वहाँ पर अपनी स्वतन्त्र सत्ता खो देता है । अतः मुक्तक कहलाने का अधिकारी नहीं रहता । हम अनेक प्रकार के सिनेमा के गीत सुना करते हैं किन्तु वातावरण के प्रकाश में जब अभिनय के साथ वह गीत हमें सिनेमाघर में सुनाया जाता है तब उसका प्रभाव और ही प्रकार का होता है ।
अतः प्रबन्धान्तर्वर्ती स्वतन्त्र पद्य को मुक्तक नहीं कह सकते । यहाँ पर यह भी ध्यान रखना चाहिये कि प्रगीत आचार्य प्रबन्धान्तर्वर्ती परिसमाप्तार्थ पद्य को ही मुक्तक कहा करते थे । इसीलिये उन्होंने मुक्तक की पृथक् परिभाषा लिखने की आवश्यकता नहीं समझी थी । 'सर्गबन्धांशरुपतवादुक्तवस्तुव्यवस्थितः' इसील मान्यता का खण्डन यहाँ पर अभिनवगुप्त ने किया है । अग्निपुराण में मुक्तक की यह परिभाषा दी हुई है-'मुक्तक एक ही श्लोक को कहते हैं जो सज्जनों को चमत्कृत करने में समर्थ हो ।' 'संस्कृत प्राकृत और अपभ्रंशा से निबद्ध' यह विशेषण मुक्तक का ही है । ( क्योंकि दोनों में प्रयमान्त का निर्देश है । ) इन भाषाओं की उत्पत्ति के आधार पर इनका क्रम रखा गया है । संस्कृत से प्राकृत उत्पन्न हुई है, प्राकृत से अपभ्रंशा । ( इनका संक्षिप्त परिचय काव्यादर्श में दण्डी ने दिया है । ) मुक्तक काव्य इन तीनों भाषाओं में लिखे जाते थे । यह तो स्वतन्त्र पद्य की बात हुई । कभी-कभी कई पद्यों में एक ही क्रिया होती है, अतः क्रिया की एकता के आधार पर काव्य के ४ भेद किये गये हैं-( १ ) यदि दो पद्यों में क्रिया समाप्त हो तो उसे सन्दानितक कहते हैं ( उसी को मुक्तक भी कहते हैं ) ( २ ) यदि तीन पद्यों में क्रिया समाप्त हो तो उसे विशेषक कहते हैं । ( ३ ) यदि चार पद्यों में क्रिया की परिसमाप्ति हो तो उसे कलापक कहते हैं । ( ४ ) यदि पांच या पांच से अधिक पद्यों में क्रिया की समाप्ति हो तो उसे कुलक कहते हैं ।
इन चारों भेदों में वृत्तिकार ने द्वन्द्व समास का योग किया है । इसका आशय यह है कि ये भेद ईस आधार पर किये गये हैं कि इनमें कई पद्यों में एक ही क्रिया का प्रयोग होता है । ( ये चारों प्रकार भी सभी भाषाओं में मिलते हैं । इसीलिये लोचनकार ने लिखा है कि मुक्तक इत्यादि का भाषा में कोई नियम नहीं है । हेमचन्द्र ने भी यहाँ कहा है कि ये सब भेद सभी भाषाओं में होते हैं । ) अब उन भेदों का उल्लेख किया जाता है जो अनेक वाक्यों का समूह होते हैं तथा जिनका कलेवर अपेक्षाकृत विस्तृत होता है । पर्यायबन्ध उसे कहते हैं जिसमें यद्यपि अवान्तर क्रियायें समाप्त हो जाती हैं परन्तु उनका उद्देश्य वसन्त इत्यादि किसी एक वस्तु
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का वर्णन ही होता है। (आधुनिक काल की अनेक कविताएँ इसी नाम से अभिहित की जा सकती हैं।) परिकथा उसे कहते हैं जिसमें धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों में किसी एक को लेकर (अथवा इन्हीं से सम्बद्ध किसी तत्व को लेकर) अनेक प्रकारों के द्वारा अनेक वृत्तान्तों का वर्णन किया जावे। कथा के एक भाग का वर्णन खंडकथा कहलाती है। (इसे ही खंडकाव्य भी कह सकते हैं। साहित्यदर्पण में खंड काव्य की परिभाषा इस प्रकार लिखी है—‘खंडकाव्य उसे कहते हैं जो काव्य के एकदेश का अनुसरण करनेवाला हो।’ सकलकथा उसे कहते हैं जिसमें अनेक इतिवृत्तों का वर्णन किया जावे और वे समस्त इतिवृत्त फलपर्यन्त दौड़नेवाले हों। वृत्तिकार ने खंडकथा और सकलकथा इन दोनों में द्वन्द्व समास का निर्देश किया है। इसका आशय यह है कि ये दोनों भेद प्राकृत में ही प्रसिद्ध थे। इनसे पहले जितने भी मुक्तक इत्यादि भेद बतलाये गये हैं उनका भाषा में कोई नियम नहीं है। सर्गबन्ध उसे कहते हैं जो कि महाकाव्य रूप हो, कोई भी पुरुषार्थ जिसका फल हो और जिससे प्रबन्धात्मक रूप में सम्पूर्ण जीवनवृत्त का वर्णन किया गया हो। (इसके विस्तृत लक्षण साहित्यदर्पण में दिये हुए हैं वहीं देखना चाहिये।) सर्गबन्ध (महाकाव्य) केवल संस्कृत में ही लिखा जाता है। कुछ काव्य अभिनय के सस्त्तव्य से लिखे जाते हैं। (ये दृश्यकाव्य कहलाते हैं।) इनके भेद हैं—दशरूपक (नाटक, प्रकरण, भाण, व्यायोग, समवकार, डिम, ईहामृग, भटृ, वीथी और प्रहसन। इनका विस्तृत परिचय साहित्यदर्पण में देखना चाहिये।) इन दश रूपकों का अवान्तर विस्तार भी होता है, जैसे—नाटिका, त्रोटक, रासक, प्रकरणिक इत्यादि। (ये उपरूपक कहलाते हैं। इनके १८ भेद हैं—नाटिका, त्रोटक, गोष्ट्री, सट्टक, नाट्यरासक, प्रस्थान, उल्लाप्य, काव्यप्रे ्हण, रासक, संलापक. श्रीगदित, शिल्पक, विलासिका, दुर्मल्लिका, प्रकरणी, हल्लीश ओर भाणिका। इनके भी लक्षण साहित्यदर्पण में दिये गये हैं।) ये दशरूपक तथा उनका समस्त अवान्तर प्रपञ्च अभिनेयार्थ काव्य होता है। इसका स्वरूप अनेक भाषाओं से मिला हुआ रहता है। (नाटक इत्यादि में किसकी क्या भाषा होनी चाहिये इसका विस्तृत विवेचन नाट्यशास्त्र के विभिन्न ग्रन्थों में किया गया है। वहीं देखना चाहिये।) अब गद्य काव्यों को लीजिये—प्रधानतया इसके दो भेद होते हैं—आख्यायिका और कथा। आख्यायिका उसे कहते हैं जिसका विभाजन उच्च्वास इत्यादि के द्वारा किया गया हो तथा उसमें वक्त्र तथा अपवक्त्र का समावेश हो। कथा उसे कहते हैं जिसमें ये दोनों बातें नहीं अर्थात् न तो उसका विभाजन उच्च्वास इत्यादि के द्वारा हो ओर न वक्त्र तथा अपवक्त्र का प्रयोग हो। (साहित्यदर्पण में इनका विशेष परिचय दिया गया है। अग्निपुराण में गद्य काव्य के पांच भेद किये गये हैं—‘आख्यायिका, कथा, खंडकथा, परिकथा और कथानिका’ इनके लक्षण भी वहीं पर दिये गये हैं।) वृत्तिकार ने आख्यायिका तथा कथा में द्वन्द्व का निर्देश किया है। इसका कारण यह है कि ये दोनों ही गद्यबन्ध रूप में होते हैं। वृत्तिकार ने ‘इत्यादि’ शब्द का प्रयोग किया है। इस इत्यादि से चम्पू का ग्रहण हो जाता है। जैसा कि दण्डी ने कहा है—‘गद्यपद्यमय काव्य को चम्पू कहते हैं।’ (आदि ग्रहण से ही उन अनेक प्रकारों का भी समावेश हो जाता है जो कि अभिनव गुप्त के बाद प्रकाश में आये और आधुनिक काल तक अनेक प्रकार के काव्यभेदों की कल्पना की जाती रही है उन सबका समावेश भी इसी इत्यादि शब्द के
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द्वारा हो जाता है तथा जो प्रकार भविष्य में भी प्रवर्तित किये जावेंगे उन सबका यहीं समावेश समझा जाना चाहिये। इन भेदोपभेदों के आधीन भी संघटना में विशेषता आ जाती है।
तत्र मुक्तकेषु रसबन्धाभिनिवेशिन: क्वेस्तदाश्रयमौचित्यम्। अनन्यत्र कामचार:। मुक्तकेषु प्रबन्धेषिव च रसबन्धाभिनिवेशिन: क्वयिर्ह्रयन्ते। यथाह्युमारकस्य क्ववेमुक्तकाः शृङ्गाररसस्यन्दनः प्रबन्धायमानाः प्रसिद्धा एव।
(ध्वन्य०)--तत्र मुक्तकेषु रसबन्धाभिनिवेशन: क्वेस्तदाश्रयमौचित्यम्। अनन्यत्र कामचार:। मुक्तकेषु प्रबन्धेषिव च रसबन्धाभिनिवेशिन: क्वयिर्ह्रयन्ते। यथाह्युमारकस्य क्ववेमुक्तकाः शृङ्गाररसस्यन्दनः प्रबन्धायमानाः प्रसिद्धा एव। (अनु०) उनमें मुक्तकों में रसबन्धाभिनिवेशी कवि का उसी के आश्रित औचित्य होता है और वह दिखलाया ही जा चुका है। अन्यत्र कवि को स्वतन्त्रता होती है कि वह यथेच्छ रचना कर सकता है। निस्सन्देह प्रबन्धों के समान मुक्तकों में भी रसबन्धाभिनिवेशी कवि देखे जाते हैं। जैसे अमरुक कवि के शृङ्गार रस को प्रवाहित करनेवाले मुक्तक प्रबन्धरूपता को धारण करनेवाली प्रसिद्ध ही है।
येन तदायोरो रसः स्यादिव्याशङ्कयाह—मुक्तकेऽप्विति। अमरुकस्यैवत्। कथमपि कृतप्रत्यपत्तौ प्रिये स्वलितोत्तरे विरहकुशया कृतवा व्याजप्रकल्पितमर्शतम्। असहन्सखोत्रप्राप्तिं विशादयादृश सम्भ्रमममुं विवलितदृशा शून्ये गेहे समुच्च्रुवसितं ततः॥
(लो०)—अन्यत्रेति रसबन्धादनभिनिवेशे। ननु मुक्तके विभावादिसंघटना कथम् येन तदायोरो रसः स्यादिव्याशङ्कयाह—मुक्तकेऽप्विति। अमरुकस्यैवत्। कथमपि कृतप्रत्यपत्तौ प्रिये स्वलितोत्तरे विरहकुशया कृतवा व्याजप्रकल्पितमर्शतम्। असहन्सखोत्रप्राप्तिं विशादयादृश सम्भ्रमममुं विवलितदृशा शून्ये गेहे समुच्च्रुवसितं ततः॥ (अनु०) 'अन्यत्र' अर्थात् रसबन्ध का अभिनिवेश न होने पर। 'मुक्तक में विभाव इत्यादि की संघटना कैसे जिससे उसके आधीन रस हो ?' यह शङ्का करके कहते हैं—'मुक्तकों में' यह। जैसे अमरुक का—
'किसी न किसी प्रकार प्रियतम के लौटने पर तथा स्वलित उत्तरवाला हो जाने पर विरहकुश (नायिका ने) बहाने से न सुनने की कल्पना करके समस्तमपूर्वक असहिष्णु सखी की श्रोत्रप्राप्ति की आशङ्का करके शून्यघर में दृष्टि घुमाकर फिर गहरी श्वास ली ।' यहाँ पर श्लोक में स्कुट ही विभाव इत्यादि सम्पत्ति की प्रतिति होती है।
मुक्तक में संघटना का औचित्य तारावती—ऊपर काव्य के भेदोपभेदों का दिग्दर्शन कराया गया है। अब इनके औचित्य पर विचार किया जा रहा है। सर्वप्रथम मुक्तक को लीजिए। यदि मुक्तक की रचना करनेवाले कवि में रसको निबद्ध करने का आग्रह हो तो कवि को उन्हीं सब औचित्यों का पालन करना चाहिए जिनका विवेचन पहले किया जा चुका है। मुक्तक के क्षेत्र में भी रस के अनुकूल औचित्य तथा वक्ता और वाच्य पर आश्रित औचित्य उसी रूप में होते हैं। अन्यत्र
अर्थात् यदि मुक्तक रचना करनेवाले कवि को रसबन्धन करना अभीष्ट न हो तो कवि चाहे जिस प्रकार की संघटना का प्रयोग कर सकता है। (प्रश्न) रसनिष्पत्ति के लिए विभाव इत्यादि की संघटना अनिवार्य होती है। मुक्तक के छोटे से कलेवर में विभाव इत्यादि की संघटना हो सके यह सम्भव ही किस प्रकार है ? इसी प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं—(उत्तर) प्रायः देखा जाता है कि जिस प्रकार कवियों का अभिनिवेश रसमय प्रबन्ध रचना में होता है
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उसी प्रकार मुक्तकों में भी हुआ करता है। उदाहरण के लिए अमरुक के मुक्तक शृङ्गार रस को प्रवाहित करनेवाले हैं और यह प्रसिद्ध है कि उनमें प्रबन्ध के जैसे तत्त्व विद्वमान हैं। (कहा ही जाता है कि 'अमरुक का एक पद्य सौ प्रबन्धों के समान है।') उदाहरण के लिए अमरुक का एक पद्य लीजिए—
'जब प्रियतम किसी न किसी प्रकार लौटकर आया और उससे संयोगवश गोत्रस्खलन हो गया, उसे समय विरह के कारण कुश नायिका ने बहाने से यह प्रकट किया कि उसने उस गोत्रस्खलन को सुन नहीं पाया। उस समय उसे यह आभास हुई कि कहीं असहनशील सखी ने सुन तो नहीं लिया। अत एव उसने सम्भ्रम पूर्वक शून्य घर में अपनी दृष्टि घुमाई और फिर गहरी श्वास ली।'
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इस पद्य में स्पष्ट रूप से विभाव इत्यादि रस की सारी सामग्री पाई जाती है। (नायक आलम्बन है; उसका किसी न किसी प्रकार घर आना, गोत्रस्खलन इत्यादि उद्दीपन है; अनसुना करना, शून्य घर में चारों ओर दृष्टि घुमाना और गहरी श्वास लेना इत्यादि अनुभव है; सलनि, शङ्का, असूया, त्रास, वितर्क, दैन्य इत्यादि सञ्चारी भाव हैं; इनसे पुष्ट होकर रति स्थायिभाव ने शृङ्गार रस का रूप धारण किया है। इस प्रकार एक पद्य में ही रस की सारी सामग्री उपलब्ध हो रही है।)
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(ध्वन्यो०)—सन्दानितकाविषु विकटबन्धनौचित्यसमध्यमसमासाददीर्घसमासे- रेव रचने। प्रबन्धाश्रयेषु यथोक्तप्रबन्धौचित्यमेवानुसर्तव्यम्। पर्यायबन्धे पुनरसमा- समासे एव संघटने। कदाचिदर्थतश्चित्याश्रयेण दीर्घसमासायामपि संघटनायां परुषा ग्राम्या च वृत्ति: परिहर्तव्या। परिकथायां कामचार:। तत्रेतिवृत्तमात्रोपन्यासेन नाट्यन्तरसम्बन्धाभिनिवेशात्। खण्डकथासकलकथयोसतु प्राकृतप्रसिद्धयो: कुल- कादिनिबन्धनभूयस्त्वाद्घिसमासायामपि न विरोध:। वृत्त्योचित्यं तु यथारसमनुसर्त- व्यम्। सर्गबन्धे तु रसतात्पर्ये यथारसमौचित्यमन्यथा तु कामचार:; द्वयोरपि मार्गयो: सर्गबन्धौविधायिनां दर्शितातत्पर्ये साधीय:। अभिनयार्थ तु सर्वथा रसबन्धाभिन- वेश: कार्य:। आख्यायिकाकथयोसतु गद्यनिबन्धनबाहुल्याद् गद्ये च छन्दोवन्धभिन्न- प्रस्थानत्वाद्विह नियमे हेतुरक्तपूर्वजल्पि मनाक्क्रियाले
(अनु०) सन्दानितक इत्यादि में तो विकट निबन्ध के औचित्य के कारण मध्यमसमास और दीर्घसमास घटित रचनाएँ ही उपयुक्त हैं। यदि ये प्रबन्ध के आश्रित हों तो पहले कहे हुये प्रबन्ध के औचित्य का ही अनुसरण करना चाहिए। पर्यायबन्ध में तो असमास और मध्य- समास परक संघटनायें ही ठीक हैं। यदि कदाचित् अर्थ के औचित्य का आश्रय लेकर दीर्घ- समासा संघटना का उपयोग करना पड़े तो परुषा और ग्राम्या वृत्तियों का तो परित्याग कर ही देना चाहिए। परिकथा में इच्छानुसार कैसी भी संघटना हो सकती है। क्योंकि उसमें इतिवृत्त मात्र का उपन्यास किया जाता है और रस के सम्बन्ध का अधिक अभिनिवेश नहीं होता। प्राकृत में प्रसिद्ध खण्डकथा और सकलकथाओं में तो कुलक इत्यादि के निबन्धन की अधिकता होने के कारण दीर्घसमासा संघटना में भी कोई विरोध नहीं आता। वृत्ति के औचित्य का अनुसरण तो रस के अनुसार करना चाहिए। रस के तात्पर्य से लिखे हुये सर्गबन्ध में
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रस के अनुकूल औचित्य का पालन करना चाहिये नहीं तो इच्छानुसार चाहे जैसी संघटना का प्रयोग किया जा सकता है । सर्गबन्ध लिखनेवालों की प्रवृत्ति दोनों प्रकार के मार्गों में देखी जाती है; किन्तु रसतात्पर्य से लिखना अधिक अच्छा है । अभिनेयार्थ काव्यों में सब प्रकार से रसबन्ध में ही आग्रह रखना चाहिए । आख्यायिका और कथा में गद्य निबन्धन की बहुलता होती है और गद्य का मार्म छन्दोबन्ध से भिन्न हुआ करता है । अतः इस विषय में नियमों में हेतु यद्यपि पहले नहीं बनाये गये थे तथापि यहाँ पर संक्षेप में बनाये जा रहे हैं—
(लो०)—विकटादति । असमासायां हि संघटनायां मन्थररूपा प्रतीति: साकाङ्क्षा सती चिरेण क्रियापदं दूरवर्त्यनुदावन्ती वाच्यप्रतीतावेव विश्रान्ता सती न रसतत्वचर्वणायोग्या स्यादिति भाव: । प्रबन्धाश्रयेष्वपि । सन्दानितकादिषु कुलकान्तेषु । यदि वा प्रबन्धेऽपि मुक्तकस्यास्तु सन्द्राव: । पूर्वोपरनिरपेक्षेपि हि येन रसचर्वणा क्रियते तदेव मुक्तकं । यथा ‘त्वामालिख्य प्रणयकुपिताम्’ इत्यादि श्लोक: । कदाचिदिति । रौद्रादिविषये । नाट्यन्तरमिति । रसबन्धे यो नाट्यन्तमभिनवेशस्तस्मादिति सङ्क्राति: वृत्त्यौचित्यमिति । पुरुषोपनागरिकग्राम्याणां वृत्तीनामौचित्यं यथाप्रबन्धं यथारसं च । अन्यथेति । कथामात्रतात्पर्ये वृत्तिष्वपि कामचार: । द्वयोरपि सममी । कथातात्पर्ये सर्गबन्धो यथा भट्टिजयन्तकस्य काम्बरीकथासारमु । रसतात्पर्यं यथा रघुवंशादि । अन्ये तु संस्कृतप्राकृतयोर्द्वयोरिति व्याचक्षते । तत्र तु रसतात्पर्यं साधीय इति युक्तं तत्तिकमपेक्ष्येति नेयार्थ स्यात् ॥७१॥
(लो०)—‘विकट’ इत्यादि । असमासा संघटना में मन्थररूपिणी प्रतीति साकाङ्क्ष होते हुये दूरवर्ती क्रिया-पद तक देख कर अनुदावन करती हुई वाच्यप्रतीति में ही विश्रान्त होती हुई रस-तत्व की चर्वणा के योग्य हो ही न सके यह भाव है । ‘प्रबन्धाश्रयेष्व’ यह । सन्दानितक आदि में कुलक पर्यन्त । अथवा प्रबन्ध में भी मुक्तक की सत्ता मान ली जाए । पूर्वोपरनिरपेक्ष जिस (पद्य) से रस चर्वणा की जाती है वही मुक्तक (होता) है । जैसे—‘प्रणयकुपिता तुम्हें लिखकर’ इत्यादि (मेघदूत का) श्लोक । ‘कदाचित्’ अर्थात् रौद्र इत्यादि के विषय में । ‘अत्यान्त नहीं….’ (यहाँ पर) सङ्क्रति इस प्रकार है—‘रसबन्ध में जो अत्यन्त अभिनिवेश नहीं उसके कारण’ । ‘वृत्तिका औचित्य ….’ पुरुष, उपनागरिक और ग्राम्या इन वृत्तियों का औचित्य प्रबन्ध के अनुसार और रस के अनुसार । ‘अन्यथा’ यह । कथा मात्र तात्पर्य में वृत्तियों में भी कामचार (स्वेच्छा व्यवहार) ही है । ‘दोनों में भी’ यह सप्तमी है । कथातात्पर्य में सर्गबन्ध, जैसे भट्टिजयन्त का काम्बरीकथासार । रसतात्पर्यवाला, जैसे रघुवंश इत्यादि । दूसरे लोग तो ‘संस्कृत और प्राकृत इन दोनों में’ यह व्याख्या करते हैं । उसमें तो ‘रसतात्पर्य अधिक अच्छा होता है । यह जो कहा गया है वह किस अपेक्षा से ?’ यह नेयार्थ हो जावेगा ॥७१॥
सन्दानितक इत्यादिषु संघटनाया औचित्यं तारावती—सन्दानितक इत्यादिषु तु विकट निबन्धनं हि उचितं भवति, अत एव तस्मिन् संघटना या तु मध्यसमासवाली बोनी चाहिए या दीर्घसमासवाली । क्योंकि सन्दानितक
सन्दानितक इत्यादि में संघटना का औचित्य तारावती—सन्दानितक इत्यादि में तो विकट निबन्धन ही उचित होता है, अत एव उसमें संघटना या तो मध्यसमासवाली होनी चाहिए या दीर्घसमासवाली । क्योंकि सन्दानितक
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इत्यादि में कई पद्यों में एक ही क्रिया होती है। यदि उसमें समास नहीं किया जावेगा तो शब्दों की संख्या बहुत बढ़ जावेगी, प्रतीति बहुत ही मन्द होगी, प्रत्येक प्रतीतिगोचर होनेवाले शब्द को बहुत देर तक साकांक्ष रहना पड़ेगा। क्रिया बहुत दूर पड़ जावेगी और उस क्रिया तक प्रत्येक प्रतीति को बड़ी लम्बी और बड़ी देर की दौड़ लगानी पड़ेगी। (कभी-कभी तो शब्दों का इतना व्यवधान हो जावेगा कि किसी एक पद के प्रतीतिगोचर होने पर पहले के पद दृष्टि से ओझल भी हो जावेंगे)। इस प्रकार जैसे-तैसे मन्ददगति से आगे बढ़नेवाली प्रतीति वाच्यार्थ के प्रत्यायन में ही विश्रान्त हो जावेगी और रससत्व के चर्वण करने के योग्य नहीं हो सकेगी। अतः सन्धानितक इत्यादि में दीर्घसमास या कम से कम मध्यसमास ही अधिक उचित होता है। यदि सन्धानितक से लेकर कुलकपर्यन्त काव्यभेद प्रबन्ध के अन्दर आवें तो प्रबन्ध के बतलाते हुये औचित्य का ही पालन करना चाहिये। अथवा यहां पर यह भी अर्थ किया जा सकता है कि यदि मुक्तक से लेकर कुलक तक काव्यभेद प्रबन्ध के अन्दर आवें तो प्रबन्ध के औचित्य का पालन किया जाना चाहिए। कारण यह है कि प्रबन्ध में भी मुक्तक की सत्ता मानो जा सकती है, मुक्तक उसे ही कहते हैं जिसमें पूर्वापर की अपेक्षा न करते हुये एक पद्य के द्वारा ही रस-चर्वणा की जावे। यदि ऐसा पद्य प्रबन्ध के अन्दर भी आता है, तो मुक्तक की संज्ञा प्राप्त कर सकता है। जैसे मेघदूत में यक्ष मेघ के द्वारा अपनी पत्नी को सन्देश भेज रहा है- 'मैं धातुओं की, लाली से शिलाओं के ऊपर तुम्हारा उस समय का चित्र बनाता हूँ जब तुम प्रणय में ही कुपित हो जाया करती थीं। फिर मैं तुम्हें मनाने के लिए अपने को तुम्हारे चरणों में गिरा हुआ जैसे ही चित्रित करना चाहता हूँ कि एकदम बढ़े हुए आँसुओं से मेरी दृष्टि भर आती है। कूर विधाता हमारे तुम्हारे सङ्घम को उस चित्र में भी देखना सहन नहीं करता।' यहाँ पर एक ही पद्य में रस की सारी सामग्री उपस्थित हो गयी है। यद्यपि यह पद्य मेघदूत के प्रबन्ध के मध्य में आया है, तथापि यदि चाहें तो इसे हम मुक्तक कह सकते हैं। (पहले लोचनकार ने प्रबन्धान्तर्वर्ती स्वतःपर्यवसित पद्य की मुक्तक संज्ञा का निषेध किया था। यहाँ पर उसका समर्थन कर दिया। किन्तु यह मुख्य पक्ष नहीं है। एक तो 'प्रबन्धाश्रयेऽपि' में सप्तमी का बहुवचन है और उससे निकटवर्ती 'सन्धानितकादिषु' का ही योग हो सकता है मुक्तक का नहीं। दूसरी बात यह है कि लोचनकार ने 'यदि वा' लिखकर अरुचिपूर्ण पक्ष की व्याख्या की है। 'यदि वा' का आशय यहॉं है कि 'यदि दुर्जनतोषन्याय से
इत्यादि में कई पद्यों में एक ही क्रिया होती है। यदि उसमें समास नहीं किया जावेगा तो शब्दों की संख्या बहुत बढ़ जावेगी, प्रतीति बहुत ही मन्द होगी, प्रत्येक प्रतीतिगोचर होनेवाले शब्द को बहुत देर तक साकांक्ष रहना पड़ेगा। क्रिया बहुत दूर पड़ जावेगी और उस क्रिया तक प्रत्येक प्रतीति को बड़ी लम्बी और बड़ी देर की दौड़ लगानी पड़ेगी। (कभी-कभी तो शब्दों का इतना व्यवधान हो जावेगा कि किसी एक पद के प्रतीतिगोचर होने पर पहले के पद दृष्टि से ओझल भी हो जावेंगे)। इस प्रकार जैसे-तैसे मन्ददगति से आगे बढ़नेवाली प्रतीति वाच्यार्थ के प्रत्यायन में ही विश्रान्त हो जावेगी और रससत्व के चर्वण करने के योग्य नहीं हो सकेगी। अतः सन्धानितक इत्यादि में दीर्घसमास या कम से कम मध्यसमास ही अधिक उचित होता है। यदि सन्धानितक से लेकर कुलकपर्यन्त काव्यभेद प्रबन्ध के अन्दर आवें तो प्रबन्ध के बतलाते हुये औचित्य का ही पालन करना चाहिये। अथवा यहां पर यह भी अर्थ किया जा सकता है कि यदि मुक्तक से लेकर कुलक तक काव्यभेद प्रबन्ध के अन्दर आवें तो प्रबन्ध के औचित्य का पालन किया जाना चाहिए। कारण यह है कि प्रबन्ध में भी मुक्तक की सत्ता मानो जा सकती है, मुक्तक उसे ही कहते हैं जिसमें पूर्वापर की अपेक्षा न करते हुये एक पद्य के द्वारा ही रस-चर्वणा की जावे। यदि ऐसा पद्य प्रबन्ध के अन्दर भी आता है, तो मुक्तक की संज्ञा प्राप्त कर सकता है। जैसे मेघदूत में यक्ष मेघ के द्वारा अपनी पत्नी को सन्देश भेज रहा है- 'मैं धातुओं की, लाली से शिलाओं के ऊपर तुम्हारा उस समय का चित्र बनाता हूँ जब तुम प्रणय में ही कुपित हो जाया करती थीं। फिर मैं तुम्हें मनाने के लिए अपने को तुम्हारे चरणों में गिरा हुआ जैसे ही चित्रित करना चाहता हूँ कि एकदम बढ़े हुए आँसुओं से मेरी दृष्टि भर आती है। कूर विधाता हमारे तुम्हारे सङ्घम को उस चित्र में भी देखना सहन नहीं करता।' यहाँ पर एक ही पद्य में रस की सारी सामग्री उपस्थित हो गयी है। यद्यपि यह पद्य मेघदूत के प्रबन्ध के मध्य में आया है, तथापि यदि चाहें तो इसे हम मुक्तक कह सकते हैं। (पहले लोचनकार ने प्रबन्धान्तर्वर्ती स्वतःपर्यवसित पद्य की मुक्तक संज्ञा का निषेध किया था। यहाँ पर उसका समर्थन कर दिया। किन्तु यह मुख्य पक्ष नहीं है। एक तो 'प्रबन्धाश्रयेऽपि' में सप्तमी का बहुवचन है और उससे निकटवर्ती 'सन्धानितकादिषु' का ही योग हो सकता है मुक्तक का नहीं। दूसरी बात यह है कि लोचनकार ने 'यदि वा' लिखकर अरुचिपूर्ण पक्ष की व्याख्या की है। 'यदि वा' का आशय यहॉं है कि 'यदि दुर्जनतोषन्याय से
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किया जा सकता है; क्योंकि उसमें प्रधानतया इतिवृत्त का प्रस्तुत करना ही अभीष्ट होता है, अतः उसमें रसबन्ध का अत्यन्त अभिनिवेश नहीं होता है । खंडकथा तथा सकलकथा ये दोनों प्रकार प्राकृत में ही प्रसिद्ध हैं और उनमें कुलक इत्यादि का नियमबन्धन बहुत अधिक पाया जाता है । अतः उसमें दीर्घसंमास करने में भी कोई विरोध नहीं आता । किन्तु उनमें वृत्ति के औचित्य का पालन रस के अनुसार करना चाहिए । आशय यह है कि परुषा, उपनागरिका और ग्राम्या इन तीनों वृत्तियों का औचित्य प्रबन्ध के अनुसार तथा रस के अनुसार होता है । यदि सर्गबन्ध (महाकाव्य) रस के मन्तव्य से लिखा गया हो तो रस के अनुकूल ही उसमें औचित्य का पालन करना चाहिए । यदि सर्गबन्ध (महाकाव्य) का प्रणयन केवल कथा के मन्तव्य से हो तो चाहे जैसी संघटना का प्रयोग किया जा सकता है । यदि केवल कथा के तात्पर्य से सर्गबन्ध लिखना अभीष्ट हो तो वृत्तियों के प्रयोग में भी स्वेच्छाचारिता अपनाई जा सकती है । सर्गबन्ध लिखने वालों की प्रवृत्ति दोनों ही मार्गों में देखी जाती है, किन्तु रस-तात्पर्य से लिखना अधिक अच्छा है । 'द्रयोः मार्गयोः' में स्पष्टतया विभक्त है, अतः दोनों ही मार्गों में यह अर्थ किया गया है । आशय यह है कि सर्गबन्धकाव्य रसतात्पर्य से भी लिखा जाता है और कथा मात्रतात्पर्य से भी । कथा-तात्पर्य से लिखा हुआ सर्गबन्ध जैसे भट्टि-जयन्तक का 'कादम्बरी-कथासार' और रसतात्पर्य से लिखा हुआ जैसे रघुवंश इत्यादि । कुछ लोगों ने 'दोनों मार्गों में' इस वाक्य का अर्थ किया है संस्कृत और प्राकृत दोनों में सर्गबन्ध लिखा जाता है । किन्तु यह अर्थ करने में जो यह कहा गया है कि 'किन्तु रसतात्पर्य से लिखना अधिक अच्छा है ।' इस वाक्य की क्या संगति होगी ? और इसका क्या उत्तर दिया जावेगा कि किसकी अपेक्षा रसतात्पर्य से लिखना अधिक अच्छा होता है ? इस प्रकार यहाँ पर 'नेयार्थ' दोष होगा । अतः 'दोनों मार्गों में' का अर्थ 'रस तात्पर्य तथा कथा मात्र तात्पर्य इन दोनों मार्गों में' यह करना चाहिए । अभिनेयार्थ काव्य में तो सर्वथा रसबन्ध में ही अभिनिवेश करना चाहिए अर्थात् उसमें रसमय रचना के औचित्य का पालन करना चाहिए ।
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एतदर्थोक्तमौचित्यमेव तस्या नियामकम् । सर्वत्र गद्यबन्धेपि छन्दोनियमवर्जिते ॥७८॥
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यदेतदौचित्यं वक्तृवाच्यगतं संघटनाया नियामकमुक्तमतेदेव गद्ये छन्दो- नियमवर्जितेऽपि विषयापेक्षणियमहेतु । तथा ह्यात्रापि यदा कविः कविनिबद्धो वा वक्ता रसभावसमन्विते तु वक्तरि पूर्वोक्तमेवानुसर्तव्यम् । तत्रापि च विषयौचित्यमेव । नाख्यायिकायां तु भूम्ना मध्यमसमास-दीर्घसमासे एव संघटने । गद्यस्य विकटबन्धैराश्रयेण छायावत्त्वात् । तत्र च तस्य सतत्त्वम् । कथायां तु विकटबन्धप्राचुर्येऽपि गद्यस्य रसबन्धोक्तमौचित्यमनुसर्तव्यम् ।
यह जैसा कि औचित्य बताया गया है यह छन्दोनियम से रहित गद्यबन्ध में भी सर्वत्र उस (संघटना) का नियामक होता है । यह जो वक्तृगत तथा वाच्यगत औचित्य संघटना का नियामक बताया गया है यहाँ छन्दोनियम से रहित गद्यबन्ध में भी विषय की अपेक्षा करते हुए यह नियम में हेतु होता है । वह इस प्रकार-- यहाँ भी जब कवि अथवा कवि द्वारा बद्ध वक्ता रसभाव से समन्वित होता है तब उसमें पूर्वोक्त का ही अनुसरण करना चाहिए । उसमें भी विषय का औचित्य ही होता है । आख्यायिका में तो अधिकतर मध्यम समास तथा दीर्घ समास वाली संघटना ही होती है । गद्य में विकटबन्धों के आश्रय से ही छाया का भाव रहता है । उसमें उसका सत्त्व होता है । कथा में तो विकटबन्ध के प्राचुर्य में भी गद्य में रसबन्ध के अनुसार औचित्य का अनुसरण करना चाहिए ।
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रसबन्धोक्तमौचित्यं भाति सर्वत्र संश्रिता । रचना विषयापेक्षं तत्तु किचिद्विभेदवत् ॥९॥ अथवा पद्यवद् गद्यबन्धेऽपि रसबन्धोक्तमौचित्यं संश्रिता रचना भवति । तत् विषयापेक्षं किचिद्विभेदवद्भवति, न तु सर्वाकारम् ।
इस प्रकार—जब कवि या कविनिबद्ध वक्ता रसभावरहित हो तो यथेच्छ संघटना होती है । वक्ता के रसभावसमन्वित होने पर पहले बतलाये हुये औचित्य का अनुसरण करना चाहिये । उसमें भी विषयानुरूप ही औचित्य होता है । आख्यायिका में तो अधिकता के साथ मध्यम समास या दीर्घसमासवाली संघटना ही होती है; क्योंकि गद्य में छायावत्ता विकटबन्ध के आश्रय से ही आती है । क्योंकि उसमें उसकी अधिकता आ जाती है । कथा में तो विकटबन्ध प्रचुरता होते हुये भी गद्य के रसबन्ध में कहे हुये औचित्य का ही अनुसरण करना चाहिये । (लो०)--विषयापेक्षिमिति । गद्यबन्धस्य भेदा एव विषयत्वेनानुमन्तव्या: । (अनु०) ‘विषयापेक्ष’ यह । गद्यबन्ध के भेद ही विषय के रूप में पाये जाने चाहिये ॥८॥ तारावती—आख्यायिका और कथा इन दोनों प्रकार के काव्यों में गद्य के निबन्धन का बाहुल्य होता है । गद्य का मार्ग छन्दोबद्ध रचना से सर्वथा भिन्न हुआ करता है । किन्तु इस दिशा में नियमपालन के कौन-कौन से हेतु होने चाहिये—इसका निर्धारण किसी भी आचार्य ने अभी तक नहीं किया है । यहाँ पर मैं भी बहुत ही संक्षेप में प्रकाश डाल रहा हूँ । यह दृष्टान्तमात्र है । इसी के आधार पर हमारे तत्व भी समझ लिये जाने चाहिये । ‘ऊपर जिस औचित्य का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है वह जिस प्रकार छन्दोबद्ध रचना के क्षेत्र में संघटना का नियामक होता है उसी प्रकार छन्दोबद्ध के नियमों से रहित गद्यबन्ध में भी उस संघटना का नियामक होता है । संघटना के नियामक के रूप में जिन वक्तृगत तथा वाच्यगत औचित्यों का निरूपण पहले किया जा चुका है यही औचित्य छन्दोग्यवस्था से रहित गद्य में भी विषय की अपेक्षा करते हुये नियम में हेतु होता है । यहाँ पर विषय शब्द से गद्य बन्ध के भेदों का ग्रहण किया जाना चाहिये । आशय यह है कि पद्य और गद्य में एक से ही औचित्यों का पालन किया जाता है किन्तु गद्य में माध्यम के रूप में स्वीकृत गद्य के प्रकार के आधार की भी अपेक्षा जिसमें रहती अवश्य है । वह इस प्रकार कि पद्य के समान गद्य में भी कवि या कविनिबद्ध वक्ता रस और भाव से रहित हो तो स्वेच्छानुसार किसी भी प्रकार की संघटना का पालन किया जा सकता है । यदि वक्ता रसभाव से युक्त हो तो पहले बतलाये हुये औचित्यों का अनुसरण ही करना चाहिये । उनमें भी प्रधानतया विषय के औचित्य-पालन का आग्रह होना चाहिये । आख्यायिका में प्रचुरता से मध्यसमास और दीर्घसमास वाली संघटनायें ही होनी चाहिये । क्योंकि गद्य में छाया अर्थात् काव्य-सौन्दर्य विकटबन्ध के आश्रय से हो आता है । क्योंकि विकटबन्ध के कारण गद्य में काव्य सौन्दर्य अधिक प्रकृष्ट कोटि का हो जाता है । कथा में यद्यपि विकटबन्ध की प्रनुरता अपेक्षित होती है तथापि उसमें रसबन्ध में कहे हुये औचित्य का ही अनुसरण करना चाहिये ॥
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प्यतिदीर्घंसमासा रचना न विप्रलम्भशृङ्गारकरुणयोराक्ष्यायिकायामपि शोभते । नाटकादावप्यसमासैव संघटना । रौद्रवीरादिवर्णने विषयापेक्षं स्वौचित्यं प्रमाणतोपकृष्यते प्रकृष्टते च । तथा ह्याक्ष्यायिकायां नाट्यन्तमसामासा स्वविषयेऽपि नाटकादौ नातिदीर्घंसमासा चैति संघटनाया विप्रतिपत्तिः ।
(अनु०) 'रचना' रसबन्ध में कहे हुये औचित्य का आश्रय लेकर ही सर्वत्र शोभित होती है । किन्तु विषय की अपेक्षा करने हुये यह (औचित्य) भेदवाला हो जाता है । अथवा पद्य के समान गद्यबन्ध में भी रचना रसबन्ध में कहे हुये औचित्य का सर्वत्र सहारा लेनेवाली होती है । वह तो विषय की अपेक्षा से कुछ विशेषतावाला हो जाता है, पूर्णरूप में नहीं । वह इस प्रकार—गद्यबन्ध में भी अत्यन्त दीर्घसमाससमग्रचित रचना विप्रलम्भ शृङ्गार तथा करुण रसों में आख्यायिका में भी शोभित नहीं होती । नाटक इत्यादि में असमासा संचटना ही होती है । रौद्र वीर इत्यादि के वर्णन में औचित्य विषय की अपेक्षा करते हुये प्रमाण में घट भी जाता है और बढ भी जाता है । वह इस प्रकार की आख्यायिका में अपने विषय में भी अत्यन्त समासहीन संघटनां नहीं होनी चाहिये । नाटक इत्यादि में अत्यन्त दीर्घ समास वाली नहीं होनी चाहिये । इस प्रकार संघटना की दिशा का अनुसरण करना चाहिये ।
(लो०)—स्थितपक्षं तु दर्शयति—रसबन्धोक्तमिति । वृत्तौ वा शब्दोऽस्यैव पक्षस्य स्थितिद्योतकः । यथा— स्थितयो नरपतेर्वंशोर्हीविषं युक्त्या निषेवितम् । स्वार्थाय यदि वा दुःखसम्भारायैव केवलम् ॥ इति । रचना सङ्घटना । तर्हिं विषयौचित्यं सर्वथैव त्यक्तं नेय्याह—तदेव रसौचित्यं विषयं सहकारितयापेक्ष्य किश्चित्प्रभेदोद्भवान्तरं वैचित्र्यं सम्पादयत्वेन तादृशं भवति । एतद्व्याचष्टे—तद्विति । सर्वाकारमिति । क्रियाविशेषणम् । असमासैवेतिति शेषः । तथा हि वाक्याभिनयलक्षणे 'चूर्णपादैः प्रसन्नैः' इत्यादि मुनिरभ्यधात् । अत्रापवादमाह—न चेति । नाटकादाविति स्वविषयेऽपि समबन्धः ।
(अनु०)—स्थित पक्ष को तो दिखला रहे हैं—'रसबन्धोक्त....' इत्यादि । और वृत्ति में 'वा' शब्द इसी पक्ष की स्थिति का चोतक है । जैसे— 'स्त्रियाँ, राजा, अग्नि, विष ये युक्ति के साथ सेवन किये हुये या तो स्वार्थ साधन के लिये या केवल दुःखसम्भार के लिये ही (होते हैं) । रचना अर्थात् संघटना 'तो क्या विषय का औचित्य सर्वथा ही छोड़ दिया गया ? कहते हैं—नहीं । वही रस का औचित्य विषय की सहकारी के रूप में अपेक्षा करके—कुछ भेद अर्थात् अवान्तर वैचित्र्य सम्पाद्य के रूप में जिसमे विचमान है इस प्रकार का हो जाता है । इसकी व्याख्या करते हैं—'वह तो' यह 'सर्वाकारम्' यह क्रियाविशेषण है । 'असमासैव' इति शेष है । वह इस प्रकार वाक्याभिनय के लक्षण में मुनि ने कहा—'प्रसन्न चूर्णपादों से....' इत्यादि । उसमें अपवाद कहते हैं—'न च' इत्यादि । 'नाटक इत्यादि में' अपने विषय में भी यह सम्बन्ध है ।
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३
तृतीय उद्योतः
विषयाश्रित संघटना का उपसंहार
३
तृतीय उद्योतः
तारावती—यहाँ तक विषयाश्रित संघटना के औचित्य पर विचार कर चुकने के बाद जो निष्कर्ष निकलता है और उससे जो सिद्धान्तपक्ष बनता है उसका अभिधान ९वीं कारिका में किया जा रहा है—‘रचना सर्वत्र रसबन्ध के योग्य औचित्य का आश्रय लेकर शोभित होती है, किन्तु विषय की अपेक्षा से उसमें कुछ भेद हो जाता है ॥९॥
३
तृतीय उद्योतः
अथवा पद्य के समान गद्य में भी रसबन्ध के लिये कहे हुये औचित्य का आश्रय लेकर रचना सर्वत्र शोभित होती है । वृत्तिकार द्वारा प्रयोग किया हुआ ‘वा’ (अथवा) शब्द यहाँ पर विकल्पार्थक नहीं है, किन्तु इसी पक्ष की मुख्यता को सिद्ध करता है । कभी-कभी अथवा शब्द मुख्य पद का द्योतक भी होता है । जैसे—‘स्त्रियाँ, राजा, अग्नि और विष युक्ति से सेवन किये जाने पर स्वार्थसाधन के लिये होते हैं अथवा केवल दुःखसंभाचार के लिये ही होते हैं ।’ यहाँ पर ‘अथवा’ शब्द मुख्य पक्ष का ही द्योतक है।
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तृतीय उद्योतः
इस कारिका में रचना शब्द का अर्थ है संघटना । आश्रय यह है कि रसबन्ध में कहे हुये औचित्य का आश्रय लेने वाली संघटना ही सर्वत्र शोभित होती है । तब प्रश्न यह उठता है कि क्या इस सिद्धान्तनिरूपण में विषय के औचित्य का सर्वथा प्रत्याख्यान कर दिया गया है ? उत्तर है—नहीं । किन्तु वही रस का औचित्य सहकारिता के रूप में विषय के औचित्य की अपेक्षा करता है और इस प्रकार उस रसौचित्य में ही विषयौचित्य के आधार पर कुछ विभेद अर्थात् अवान्तर वचिचित्रय हो जाता है । इस वचिचित्रय का सम्पादक विषय का औचित्य होता है और सम्पाद्य वचिचित्रय होता है जो कि रसौचित्य में हुआ करता है । आशय यह है कि रसौचित्य ही मुख्य होता है, काव्य-प्रकारों से उसमें कुछ विलक्षणता आ जाती है । इसी बात को वृत्तिकार ने इस प्रकार कहा है—‘वह तो विषय की अपेक्षा कुछ विशेषता वाला हो जाता है । सर्वाकार नहीं ।’ यहाँ पर सर्वाकार यह क्रियाविशेषण है । आशय यह है कि विषय का औचित्य रस के औचित्य में विशेषता उत्पन्न अवश्य करता है; किन्तु वह विशेषता परिमाण में बहुत थोड़ी होती है, पूर्ण रूप से नहीं होती । यदि विषय के आधार पर रसौचित्य में पूरी विशेषता ही आ जावे तो रसौचित्य का महत्व ही क्या रहे और रसौचित्य को प्राधान्यता ही किस प्रकार दी जा‧सके ? इसको इस प्रकार समझिये—गद्यबन्ध में नियमानुकूल अदीर्घ समास वाली रचना ही शोभित होती है ।
३
तृतीय उद्योतः
यदि आख्यायिका भी लिखी जा रही हो, किन्तु उसमें विप्रलम्भ श्रृङ्गार अथवा करुण रस प्रतिपाद्य हों तो आख्यायिका में भी दीर्घसमासा संघटना अधिक अच्छी नहीं मालूम पड़ेगी । आशय यह है कि रस का औचित्य ही प्रमुख रूप में प्रयोजनीय होता है । नाटक इत्यादि में भी सर्वत्र असमासा रचना ही होनी चाहिये, क्योंकि मुनि ने वाक्याभिनय के लक्षण में लिखा है—‘पृथक्-पृथक् स्पष्ट शब्दों के द्वारा अभिनय करना चाहिये ।’ तथापि कहीं नाटक में समास किये ही न जावें यह बात नहीं है । रौद्र इत्यादि के अभिनय में नाटक में भी
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सामास का प्रयोग किया जा सकता है। रौद्र वीर इत्यादि के वर्णन में औचित्य विषय की विशेषता के आधार पर प्रमाण में घट भी जाता है और बढ़ भी जाता है। वह इस प्रकार—यदि आख्यायिका में रौद्र इत्यादि रस लिखे जा रहे हों तो बिल्कुल ही समासरहित रचना नहीं होगी और उसमें बड़े समासों का प्रयोग किया जावेगा। इसके प्रतिकूल यदि नाटक में दीर्घ समास का विषय भी आ जावे तो भी अत्यन्त दीर्घ समासों का उसमें प्रयोग नहीं होगा। इस प्रकार संघटना का विशदर्शन करा दिया गया है। इसी का अनुसरण करना चाहिये।
९
तादृौ प्रकाशमानः प्रसिद्ध एव। तस्य तु यथा प्रकाशनं तत्स्वतिपाद्यते—विभावभावानुभावसञ्चारिभिश्चारुणः। विधिः कथाशरीरस्य वृत्तस्योत्प्रेक्षितस्य वा। इतिवृत्तवशायातां त्यकत्ववानुगुणां स्थितिम्। उपेक्षितव्यपन्तराभीष्टरसौचितकथोन्नयः। सन्धिसन्धिसङ्घटनं रसाभिव्यक्तिपेशलया। न तु केवलया शास्त्रस्थितिसम्पादनेच्छया। उद्दोपनप्रशमने यथावसरमनन्तरा रसस्यार्थवृध्दिविघातेऽनुसन्धानमप्तम्। अलङ्कृतीनां शक्त्यप्यनुरूप्येण योजनम्। प्रबन्धस्य रसादीनां व्यञ्जकत्वे निबन्धनम्॥
(ध्वन्यो०)—इदानोमलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यो ध्वनिः प्रबन्धात्मा रामायणमहाभार-(ध्वन्यो०)—इदानोमलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यो ध्वनिः प्रबन्धात्मा रामायणमहाभार-तादृौ प्रकाशमानः प्रसिद्ध एव। तस्य तु यथा प्रकाशनं तत्स्वतिपाद्यते—विभावभावानुभावसञ्चारिभिश्चारुणः। विधिः कथाशरीरस्य वृत्तस्योत्प्रेक्षितस्य वा। इतिवृत्तवशायातां त्यकत्ववानुगुणां स्थितिम्। उपेक्षितव्यपन्तराभीष्टरसौचितकथोन्नयः। सन्धिसन्धिसङ्घटनं रसाभिव्यक्तिपेशलया। न तु केवलया शास्त्रस्थितिसम्पादनेच्छया। उद्दोपनप्रशमने यथावसरमनन्तरा रसस्यार्थवृध्दिविघातेऽनुसन्धानमप्तम्। अलङ्कृतीनां शक्त्यप्यनुरूप्येण योजनम्। प्रबन्धस्य रसादीनां व्यञ्जकत्वे निबन्धनम्॥
१०
विधिः कथाशरीरस्य वृत्तस्योत्प्रेक्षितस्य वा॥
(अनु०) प्रबन्धात्मक अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि रामायण महाभारत इत्यादि में प्रकाशित होती हुई प्रसिद्ध ही है। उसका जैसे प्रकाशन होता है अब उसका प्रतिपादन किया जा रहा है—‘विभाव, भाव, अनुभव और संचारी भाव के औचित्य से युक्त घटित या केवल कविकल्पित कथा के शरीर का विधान (पहला हेतु है)।
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इतिवृत्तवशायातां त्यकत्ववानुगुणां स्थितिम्॥
‘इतिवृत्त के कारण आई हुई अनुकूल स्थिति को छोड़कर उत्क्रेक्षा करके भी धन्य अभिष्ट रस के योग्य कथा का उन्नयन करना (दूसरा हेतु है)।
१२
न तु केवलया शास्त्रस्थितिसम्पादनेच्छया॥
‘केवल शास्त्रीय मर्यादा’ परिपालन की दृष्टि से ही नहीं, अपितु रसव्यञ्जना के उपयोग की दृष्टि से सन्धि तथा सन्धि के अङ्गों की संघटना करना (प्रबन्धव्यञ्जकता का तीसरा हेतु है)।
१३
उद्दोपनप्रशमने यथावसरमनन्तरा रसस्यार्थवृध्दिविघातेऽनुसन्धानमप्तम्॥
मध्य में अवसर के अनुकूल रस का उद्दीपन तथा प्रशमन करना तथा प्रबन्ध के आरम्भ से अवसानपर्यन्त अङ्गी रस का अनुसन्धान करना (प्रबन्धव्यञ्जकता का चौथा हेतु है)।
१४
अलङ्कृतीनां शक्त्यप्यनुरूप्येण योजनम्। प्रबन्धस्य रसादीनां व्यञ्जकत्वे निबन्धनम्॥
(अलङ्कारयोजना की) शक्ति होते हुए भी रस की अनुरूपता का ध्यान रखते हुए ही अलङ्कारों की योजना करना (प्रबन्धव्यञ्जकता का पञ्चम हेतु है)। (यही पक्ष) प्रबन्ध की रस इत्यादि के प्रति व्यञ्जकता में निबन्धन है।
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तृतीय
उद्योत
(लो०) एवं संघटनायां चालच्यक्रमो दीप्यत इति निरीतिम् । प्रबन्धे दीप्यत इति तु निर्विवादसिद्धोऽयमर्थ इति नात्र वक्तव्यं किञ्चिदस्ति । केवलं कविशहृदयानां व्युत्पादयितुं रसवद्भने यतिकर्तव्यता प्रबन्धस्य सा निरूप्येताश्रयेनाह--इदानीमिति । इदानीं तत्प्रकारजातं प्रतिपद्यत इति सम्बन्धः ।
(अनु०) इस प्रकार संघटना में अलंकार दीप्त होता है यह निर्णय कर दिया गया । प्रबन्ध में दीप्त होता है यह निर्विवाद सिद्ध अर्थ (है) अतः इस विषय में कुछ भी कहना नहीं है । केवल कविशहृदयों को व्युत्पन्न करने के लिये प्रबन्ध की जो इतिकर्तव्यता है इसका निरूपण किया जाना चाहिये इस आशय से कहते हैं 'इस समय' यहाँ । इस समय उसके प्रकार समूह का प्रतिपादन किया जा रहा है यह सम्बन्ध है ।
तारावती--ऊपर यह निर्णय कर दिया गया कि संघटना के द्वारा अलंकार व्यंग्य दीप्त होता है । 'प्रबन्ध अलंकार व्यंग्य का व्यंजक होता है' इसमें किसी को सन्देह हो ही नहीं सकता ।
यहाँ तक इस बात की पूर्ण व्याख्या की जा चुकी है कि संघटना के द्वारा असंलंकार व्यंग्य की व्यंजना होती है । अब प्रबन्ध के द्वारा असंलंकार व्यंग्य की व्यंजना पर विचार करना है । यह विचार दो प्रकार से किया जा सकता है--एक तो यह सिद्ध करना कि प्रबन्ध के द्वारा भी व्यंजना हो सकती है । किन्तु इस विषय में किसी को विप्रतिपत्ति है ही नहीं । अतः स्वतःसिद्ध तथा सर्वजन-सम्मव विषय को सिद्ध करने के लिये तर्क देना व्यर्थ ही है । इसीलिये ध्वनिकार ने यहाँ पर प्रबन्ध की व्यंजकता के लिये तर्क नहीं दिये हैं । दूसरा तत्व है यह बतलाना कि वे कौन सी विशेषतायें हैं जिनसे प्रबन्ध व्यंजक होता है । यहाँ पर इसी बात की व्याख्या की जा रही है । कारिकाकार ने प्रबन्ध को व्यंजक बनाने की दृष्टि से पाँच बातों पर ध्यान रखने की आवश्यकता पर बल दिया है । इसके लिये पाँच कारिकायें लिखी गई हैं । प्रथम चार कारिकाओं में प्रत्येक में एक तत्व का निर्देश किया गया है । पाँचवीं कारिका के पूर्वार्ध में पाँचवाँ तत्व निर्दिष्ट है और उत्तरार्ध में उपसंहार है । ये पाँचों प्रकार अक्र्रम नहीं हैं किन्तु क्रमबद्ध ही हैं । अर्थात् पहले प्रथम तत्व का ध्यान रखना चाहिये फिर दूसरे का, फिर तीसरे का । इसी क्रम से इन तत्वों का ध्यान रखना चाहिये । पाँचों प्रकार क्रमशः ये हैं (१) सर्वप्रथम कथानक के कलेवर की रचना पर ध्यान देना चाहिये । कथानक चाहे घटित हुआ हो अर्थात् प्रमाणप्रसिद्ध कोई घटना हो या केवल कल्पनाप्रसूत हो, दोनों प्रकार के कथानकों में विभाव, भाव, अनुभव और सञ्चारी भाव के औचित्य का सर्वथा ध्यान रहना चाहिये; क्योंकि इससे कथानक की शोभा बढ़ जाती है ।
(यहाँ पर भाव का अर्थ है 'अपरिपुष्ट स्थायी; क्योंकि सञ्चारी का पूथक् उपादान किया ही गया है और परिपुष्ट स्थायी भाव न रह कर रस बन जाता है । यदि इनका औचित्य कथा-नक में न हो तो वह कथानक दूषित माना जाता है । इसीलिये विभाव और अनुभव की कष्ट कल्पना, रस के विरोधी तत्वों का उपादान तथा दूसरे प्रकार के अर्थानौचित्य रसदोष के अन्दर आते हैं । (२) यदि पुराणप्रसिद्ध घटना का उपादान किया गया हो और उसमें
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कोई ऐसी स्थिति आ जाये जो प्रस्तुत रस के अनुकूल न हो तो उसका परित्याग कर देना चाहिये या मध्य में भी कल्पना के द्वारा अभीष्ट रस के अनुकूल कथा का उद्भावन कर लेना चाहिये । (आशय यह है कि यदि प्रसिद्ध कथानक में रसचर्वणा के लिये अनावश्यक कोई अधिक तत्त्व हो तो उसका परित्याग कर देना चाहिये । और यदि कोई विरोधी तत्त्व हो तो उसको तो कहना ही नहीं चाहिये । यदि उसके बिना कथानक का निर्वाह न हो रहा हो तो उसको ऐसे रूप में बदल देना चाहिये जिससे वह रस के अनुकूल बन जावे ।) (३) कथा-नक की रचना के लिये जिन सन्धियों तथा सन्ध्यङ्गों का शास्त्र में निरूपण किया गया है उनका पालन करना चाहिये । किन्तु यह ध्यान रखना चाहिये कि यदि उनका पालन रस-व्याख्याना के अनुकूल हो और उनसे रसाभिव्यक्ति में सहायता मिल रही हो तभी उनका पालन करना चाहिये, केवल इस दृष्टि से ही उनका पालन नहीं करना चाहिये कि शास्त्र में उनका प्रतिपादन किया गया है और शास्त्रीय मर्यादा की रक्षा करनी ही है । (शास्त्र में इन अङ्गों का उल्लेख इसीलिये किया गया है कि इनके अनुसार कथानक संघटित करने से रसव्यञ्जना सुन्दर बन पड़ती है । यदि इनके पालन करने से रस व्यञ्जना से कोई सहायता न मिले अथवा रस में व्याघात उपस्थित हो तो इनके पालन करने की आवश्यकता नहीं है ।) (४) कथानक के बीच में आवश्यकतानुसार रस का उद्दीपन और प्रशमन होना चाहिये । अर्थात् इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि जहाँ आवश्यकता हो वहाँ रस को तीव्रता प्रदान कर दी जावे और जहाँ रस के प्रशान्त कर देने से रस की पुष्टि होना सम्भव हो वहाँ पर उसे प्रशान्त कर देना चाहिये । यदि उसकी विश्रान्ति प्रारम्भ हो गई हो तो उसका अनुसन्धान कर लेना चाहिये । (दीधितिकार ने यहाँ पर दो पृथक्-पृथक् तत्त्व माने हैं—एक तो रसका उद्दीपन और प्रशम तथा दूसरा अन्त में आभास रस का अनुसन्धान । यह व्याख्या लोचन के विरुद्ध होने से त्याज्य है ।) (५) कवि अलङ्कारयोजना में कितना ही निपुण क्यों न हो उसे रसानुकूल ही अलङ्कार-योजना करनी चाहिये । रस इत्यादि के प्रति प्रवन्ध की व्यञ्जकता के ये ही ५ निबन्धन हैं । इन पाँचों प्रकारों को संक्षेप में इस प्रकार कहा जा सकता है—कथापरीक्षा, अधिकतासम्पादन, रस की फलप्राप्ति रजाना, रस के प्रति जागरूक रहना, उचित विभाव इत्यादि के वर्णन में अलङ्कार के औचित्य का ध्यान रखना । अब इन्हीं पाँचों की क्रमशः व्याख्या की जा रही है—
(ध्वन्यालोके)—प्रबन्धोज्ज्वल रसादीनां व्यञ्जक इत्युक्तं तस्य व्यञ्जकत्वे निबन्धनम् । प्रथमं तावद्भावाभानुभावसञ्चारिचारुणः कथाकारोरसस्य विधिर्यथापार्थं प्रति-पिपादयिषितरसभङ्ग्यापेक्षया य उचितो विभावो भावोऽनुभावः सञ्चारी वा तदौचित्यचारुणः कथाशरीरस्य विधिव्यञ्जकत्वे निबन्धनमेकम् । तत्र विभावोचित्यं तावत्प्रसिद्धम् ।
(अनु०) प्रवन्ध भी रस इत्यादि का व्यञ्जक (होता है) यह कहा गया है । उसकी व्यञ्जकता में निबन्धन (यह है) । सर्वप्रथम विभाव, भाव (स्थायी भाव) अनुभाव और सञ्चारी भाव के औचित्य से सुन्दर प्रतीत होनेवाले कथाशरीर का विधान अर्थात् ठीक रूप में प्रतिपादन के लिये अभीष्ट रस और भाव इत्यादि की अपेक्षा से जो उचित विभाव भाव
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तृतीय
उद्योत:
अनुभाव और सञ्चारी भाव हो उसके औचित्य से सुन्दर मालूम पड़नेवाले कथाशरीर का विधान व्यञ्जकता में निबन्धन होता है यह एक है। उनमें विभावौचित्य तो प्रसिद्ध ही है। (लो०) प्रथमं तावदिति। प्रबन्धस्य व्यञ्जकत्वे ये प्रकास्ते क्रमेणैवोपयोगिनः। पूर्वं हि कथापरीक्षा। तत्राधिकावापः फलपर्यन्तततानयनमू, रसं प्रति जागरणं तदुचितविभावादिवर्णनेड्ड्ड्डरौचित्यमिति। तत्क्रमेण पञ्चकं व्याचष्टे—विभावेत्यादिना। तदौचित्येति। शृङ्गारवर्णनेच्छुना तादृशी कथा संश्रयणीय। यस्यामृतुमाल्यादिदेविभावस्य लीलादेरनुभावस्य हर्षधृत्यादेः सञ्चारिणः स्फुट एव सन्निवेश इत्यर्थः। प्रसिद्धमिति। लोके भरतशास्त्रे च। व्यापार इति। तद्विषयोत्साहोपलक्षणमेतत्। स्थाय्य चित्यं हि व्याख्येयत्वेनोपकान्तं नानुभाविचित्यम्। सौष्ठवभृदुपोपैति। वर्णनानामहिम्नेत्यर्थः। तत्र त्वति। नीरसत्वे।
(अनु०) ‘प्रथमं तावत्’ प्रबन्ध की व्यञ्जकता में जो प्रकार हैं वे क्रमशः ही उपयोगी होते हैं। पहले कथापरीक्षा, उसमें अधिकता की प्राप्ति, फलपर्यन्त ले जाना, रस के प्रति जागरण और उसके लिये उचित विभाव इत्यादि के वर्णन में अलङ्कारों का औचित्य (ये पाँच प्रकार हैं) इसी क्रम से इस पञ्चक की व्याख्या कर रहे हैं—विभाव इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा। ‘तदौचित्यम्’ शृङ्गार वर्णन के इच्छुक द्वारा उस प्रकार की कथा का आश्रय लिया जाना चाहिये जिसमें ऋतु माल्य इत्यादि विभाव की लीला इत्यादि अनुभव की और हर्ष धृति इत्यादि सञ्चारी की स्फुट ही सन्निवेशना हो यही अर्थ है। ‘प्रसिद्धम्’ यह लोक में और भरतशास्त्र में। ‘व्यापार’ यह। तद्विषयक उत्साह का उपलक्षण है। क्योंकि वर्णनीय के रूप में स्थाय्यौचित्य का उपक्रम किया गया है। अनुभावौचित्य का नहीं। ‘सुन्दरता से युक्त भी’ अर्थात् वर्णन की महिमा से। ‘वहां पर तो’ अर्थात् नीरसत्व में।
तृतीय
उद्योत:
तारावती—(१) सर्वप्रथम कथापरीक्षा को लीजिये। कथा ऐतिहासिक भी हो सकती है, पौराणिक भी और सर्वथा काल्पनिक भी। किन्तु सभी प्रकार के कथानकों में इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि उसमें रस के जिन तत्त्वों का निबन्धन किया जाये वे सर्वथा उचित ही होने चाहिये। उदाहरण के लिये यदि शृङ्गाररससमय रचना करनी है तो उसके अनुकूल ही परिस्थिति का निर्माण करना होगा। शृङ्गाररससमय रचना के लिये कवि को ऐसी कथा का आश्रय लेना चाहिये जिसमें स्पष्ट रूप में ऋतु, माला इत्यादि का वर्णन सन्निहित हो, जिस में लीला इत्यादि अनुभवों के वर्णन का पर्याप्त अवसर हो और हर्ष, धृति, इत्यादि सञ्चारिभाव स्पष्ट रूप में प्रतीत हो रहे हों। रसोपकरणों के औचित्य का यही अभिप्राय है। इस औचित्य को हम कई भागों में विभाजित कर सकते हैं—विभावौचित्य, भावौचित्य, अनुभावौचित्य और सञ्चार्यौचित्य। विभावौचित्य लोक में भी प्रसिद्ध है और भरत इत्यादि आचार्यों ने निरूपण भी विशेष रूप में कर दिया है। (यह बात लोकसिद्ध है कि कौन से विभाव उचित होते हैं? कौन से अनुचित? उदाहरण के लिये कुछ प्रेम उचित माने जाते हैं और कुछ उचित नहीं होते। कहीं क्रोध प्रशंसनीय होता है कहीं निन्दनीय। इसी प्रकार अन्य भावों के विषय में भी समझना चाहिये।) भरत मुनि ने नाट्य को त्रैलोक्या-
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नुकृति कहा है तथा उसे घरोदाताद्यावस्थानुकृति बतलाया है। भरत के मत में नाट्य लोकधर्मी होता है और लोकप्रवृत्ति के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के प्रादेशिक राष्ट्रीय तथा जातीय चरित्रों का अध्ययन कार्य कलाप और वाक्यादि की दृष्टि से किया गया है। प्रकृति के अन्दर विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों, मस्तिष्कों और स्वभावों का वर्णन किया गया है। तथा उनको रसानुकूल रखने का आदेश दिया गया है। भरत का कहना है
एतद्विमर्शनं नार्या आके शादानखावधि।
यथा भावरसावस्थं विज्ञानेनैव प्रयोजयेत्॥
अर्थात् केश से नख तक यह स्त्री का विभूषण है। इस प्रकार इनको जानकर भाव और रस की अवस्था के अनुसार इनका प्रयोग करना चाहिये। किन्तु प्रकृतियों और प्रवृत्तियों की इयत्ता नहीं हो सकती। भरत ने कहा है कि प्रकृतियाँ नाना शील वाली होती हैं, शील में ही नाट्य की प्रतिष्ठा होती है। लोकसिद्ध ही सिद्ध माना जाता है; शास्त्र लोकस्वभाव से उद्भूत होता है; अतः नाट्यप्रयोग में लोक ही प्रमाण है। जो शास्त्र है, जो धर्मं है जो शिल्प है, जो क्रियायें हैं; लोकधर्म द्वारा संचालित होने पर ही वे नाट्य संज्ञा की अधिकाधिक होती हैं।
स्थावर और चर लोक का शास्त्र के द्वारा इयत्ता के रूप में निर्णय कर सकना असम्भव है; मैंने जो नहीं कहा वह भी लोक से ही समझ लिया जाना चाहिये। इस प्रकार भरत लोक के औचित्य को प्रमुखता देते हैं। वस्तुतः धर्मं और अधर्में तथा उचित और अनुचित की भावना प्रत्येक समझदार व्यक्ति के हृदय में स्वतः होती है। अतः लोकप्रवृत्त व्यक्ति अपनी अन्तरात्मा से ही उचित-अनुचित का निर्णय कर लेता है। शास्त्रकार केवल दिग्दर्शन कराते हैं। साहित्यदर्पणकार ने विभावानौचित्य का दिग्दर्शन इस प्रकार कराया है-‘उपनायकविषयं, मुनि गुरुपत्न्य् इत्यादि के प्रति विद्विमान तथा अनुभयनिष्ठरन्ति
और प्रतिनायकनिष्ठ तथा अधम पात्र तिर्यङ् इत्यादि के प्रति श्रृंगार में अनौचित्य होता है। गुरु इत्यादि के प्रति कोप, हीननिष्ठ शान्त, गुरु इत्यादि को आलम्बन बनाकर हास्य, ब्रह्मावध इत्यादि के लिये उत्साह, अधम पात्रगत वीर और उत्तम पात्रगत भयानक ये अनुचित होते हैं तथा ऐसे दूसरे स्थलों पर भी समझना चाहिये।’ इसी प्रकार उद्दीपन के औचित्य का भी दिग्दर्शन कराया जा सकता है।
आशय यह है कि रसनिष्पत्ति के लिये यह् भी कथा नक ऐसी चुनी जाना चाहिये जो सहृदयों को अनुचित प्रतीत न हो और जिस व्यक्ति के प्रति जो भाव दिखलाया गया हो उस के पात्र रसाभास उत्पन्न न करें और न परस्थितियाँ ही सहृदयों में खिंचाव उत्पन्न करने वाली हों
(ध्वन्यालोक)—भावौचित्यं तु प्रकृत्यौचित्यात्।
प्रकृतिहृदयं तन्मध्यमाधमभावेन दिव्यमानुषादिभावेन च विभेदिनी। तां यथायथमनुसृत्यासदृशोः: स्थायी भाव उपनिबध्यमान औचित्यभारभवति।
अन्यथा तु केवलमानुषाश्रयेण दिव्यस्य केवलदिव्याश्रयेण वा केवलमानुष्योद्देशाहदाय उपनिबध्यमाना अनौचित्यं भवन्ति।
तथा च केवलमानुषस्य राजादेवर्णने समासङ्कलड्घनादिलक्षणा व्यापारा उपनिबध्यमाना: सौष्ठववृत्तौडपि नीरसाः एवं नियमेन भवन्ति, न तु क्वतुचित्यमेव हेतुः।
(अनु०) भाव का औचित्य तो प्रकृति के औचित्य से (होता है)। प्रकृति निस्सन्देह
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तृतीय
उद्योत:
उत्तम मध्यम और अधम भावसे तथा दिव्य मानुष इत्यादि भाव से विभेदवाली (हो जाती है)। उसको ठीक रूप में अनुसरण करते हुए उपनिबद्ध किया हुआ असंकीर्ण स्थायी भाव औचित्यवाला हो जाता है। नहीं तो केवल मानव के आश्रय से दिव्य के और केवल दिव्य के आश्रय से केवल मनुष्य के उपनिबद्ध किये हुये उत्साह इत्यादि अनुचित होते हैं। अत एवं राजा इत्यादि केवल मानव के वर्णन में सातों समुद्रों के लंघन इत्यादि रूप व्यापार उपनिबद्ध किये हुये सुदरता से भरे हुये भी नियमत: नीरस ही होते हैं। उसमें अनौचित्य ही हेतु है।
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तारावती—ऊपर विभावौचित्य का वर्णन किया गया है। कथानक के औचित्य को कल्पना में कवि को जिस दूसरे तत्व का विचार करना है वह है भावौचित्य (वैसे तो भावोचित्य में विभावों का औचित्य भी प्रयोजनीय होता ही है तथापि भावौचित्य के लिये कतिपय अतिरिक्त तत्व भी आवश्यक होते हैं।) भाव का औचित्य प्रकृतियों के औचित्य पर आधृत होता है। प्रकृतियों का विभाजन दो प्रकार से किया जा सकता है—प्रथम भेदकल्पना के अनुसार प्रकृतियाँ तीन प्रकार की होती हैं—उत्तम, मध्यम और अधम। द्वितीय उपमेद कल्पना के अनुसार उसके तीन भेद होते हैं दिव्य, अदिव्य ओर दिव्यादिव्य।
तृतीय
उद्योत:
समान परिस्थिति में प्रकृतिभेद के आधार पर भावना का भेद भी हो जाता है। एक ही परिस्थिति में उत्तम प्रकृतिवाले व्यक्ति के हृदय में जैसी भावनायें उठेंगी अधम प्रकृतिवाले व्यक्ति के हृदय में सर्वथा उससे विपरीत भावनायें होंगी। अतः: भावाभिव्यक्ति में प्रकृति का सर्वथा ध्यान रखना चाहिये अन्यथा प्रकृतिविपर्यय दोष के कारण रसाभिव्यक्ति अकलुष नहीं हो सकती। (साहित्यदर्पण ने प्रकृति-भेद के विषय में लिखा है कि—प्रकृतियाँ तीन प्रकार की होती हैं—दिव्य अर्थात देवताओं की प्रकृति, अदिव्य अर्थात मानव इत्यादि की प्रकृति और दिव्यादिव्य अर्थात महापुरुषों की प्रकृति जो कुछ देवता और कुछ मनुष्यत्व की ओर झुकी हुई होती है। उनके घोरोदात्त इत्यादि भेद होते हैं, उनके भी उत्तम मध्यम और अधम ये भेद होते हैं। उसमें जो जिस प्रकार का हो उसका उसी रूप में वर्णन करना प्रकृतिविपर्यय दोष कहलाता है।
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उद्योत:
जैसे कुमारसम्भव में उत्तम देवता पार्वती और परमेश्वर का सम्भोगवर्णन के समान अत्यन्त अनुचित है यह कुछ लोग कहते हैं।) उस प्रकृति का यदि ठीक रूप में अनुसरण किया जावे और उसके माध्यम से स्थायी भाव का उपनिबन्धन इस रूप में किया जावे कि वह किसी विरोधी भाव से सङ्कीर्ण न हो और न किसी अनुकूल अथवा उदासीन भाव के प्रति गौण हो रहा हो वह स्थायी भाव ही औचित्यशाली कहा जा सकता है। इसके प्रतिकूल यदि प्रकृति का उलटफेर हो जाता है जैसे देवों के जो उत्साह इत्यादि भाव होते हैं। उनको केवल मानव के आश्रय से वर्णन किया जावे अथवा जो उत्साह इत्यादि भाव केवल मानव के हो सकते हैं उनका आश्रय केवल देवताओं को बनाया जावे तो इस प्रकार के उत्साह इत्यादि के उपनिबन्धन अनुचित होते हैं।
तृतीय
उद्योत:
(केवल मानव और केवल देव का अर्थ है कि जो पाण्डव इत्यादि देवों और मानवों की मिश्रित प्रकृति के होते हैं उनके आश्रय में दिव्य या मानुष किसी प्रकार के औचित्य का पालन किया जा सकता है।)
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उनके वर्णन के प्रसङ्ग में सातों समुद्रों को लाँघ जाने इत्यादि 'कार्यों का' उपनिबन्धन किया जाता है तो वह उपनिबन्धन (कलात्मक दृष्टि से) कितना ही अच्छा क्यों न हो किन्तु नियमितः नीरस हो जाता है। इस नीरसता का कारण अनौचित्य ही होता है। यहाँ पर 'कार्यों का उपनिबन्धन' अनुचित बताया गया है। रसप्रकरण में कार्य या व्यापार को सर्वदा अनुभव कहा जाता है। किन्तु यहाँ पर भाव के औचित्य का प्रकरण है अनुभव के औचित्य का नहीं। अतः व्यापार शब्द का अर्थ करना चाहिये सात समुद्रों के लाँघ जाने इत्यादि कार्यों से उपलक्षित उत्साह इत्यादि।
(ध्वन्य०)—ननु नागलोकगमनाद्यः सातवाहनप्रभृतिनां श्रूयन्ते, तदलोक- सामान्यप्रभावातिशयवर्णने किमनौचित्यं सर्वोर्वीभरणक्षमाणां क्षमाभुजामिति ? नैतदस्ति, न वयं भूयोड यत् प्रभावातिशयवर्णनमनुचितं रञ्जाम, किन्तु केवलमनुष्य- ध्येयण योत्पाद्यवस्तुकया क्रियते तस्यां दिव्यमौचित्यं न योजनीयम् । दिव्यमानुष्यायां तु कथायामुभयौचित्ययोजनमविरुद्धमेव । यथा पाण्डवाविकथायाम् । सातवाहनाविषु तु येषु यावदपदानं श्रूयते तेषु तावन्मात्रमनुगम्यमानमनुगुणत्वेन प्रतिबलते । व्यक्तिरिक्तं तु तेषामेवपनिबध्यमानमनुचितम् । तदयमत्र परमार्थः—
अनौचित्यादृते नान्यप्रसभदूष्य कारणम् । प्रस्तुतौचित्यबन्धस्तु रसस्योपनिषत्परा ॥
(अनु०) (प्रश्न) निस्सन्देह सातवाहन इत्यादि (राजाओं) के नागलोकगमन इत्यादि (लोकोत्तर कार्य) सुने जाते हैं; अतः समस्त पृथ्वी के भरण-पोषण में समर्थ पृथ्वी का भोग करनेवाले (राजाओं) के अलौकसामान्य प्रभावातिशय वर्णन करने में क्या अनौचित्य है ?
(उत्तर) यह न्रप्त्रीं है। हम यह नहीं कहते कि राजाओं का प्रभावातिशय वर्णन अनुचित होता है; किन्तु केवल मनुष्य के आश्रय से जो उत्पाद्यवस्तु की कथा की जाती है उसमें दिव्य औचित्य की योजना नहीं करनी चाहिये। दिव्य-मनुष्य (दोनों प्रकृतिवाली) के आश्रय से की हुई कथा में दोनों के औचित्य की योजना अविरुद्ध हो है। जैसे पाण्डु इत्यादि की कथा में। सातवाहन इत्यादि में तो जितना कर्मवृत्त सुना जाता है केवल उतने का अनुकरण करना गुणों की अनु- कल्पना के अनुसार प्रतिबिंबित हो जाता है। तो यह यहाँ पर सारार्थ है—
'अनौचित्य को छोड़कर रससंग का और कारण नहीं होता। प्रसिद्ध औचित्य का उपनिबन्धन रस की सबसे बड़ी परा विद्या है।'
(लो०)—व्यतिरिक्तं हि वक्ति । अधिकिमत्यर्थः ।
(अनु०)—'व्यतिरिक्त तो' यह अर्थात् अधिक
तारावती—यहाँ पर यह प्रश्न उपस्तित होता है कि राजा लोग सर्वसाधारण जनता के समान सीमित शक्ति वाले तो होते नहीं उनमें लोकोत्तर शक्ति होती है। वे समस्त पृथ्वी के रक्षण करने की शक्ति रखते हैं और भूमि का भोग भी करते हैं। यदि उनके आश्रय से अलौकसामान्य प्रभाव की अतिशयता का वर्णन करें तो क्या अनुचित होगा ? उदाहरण के लिये सातवाहन इत्यादि का नागलोकगमन इत्यादि सुना जाता है। (विक्रम की द्वितीय
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शताब्दी के आस पास सातवाहन नामक राजा कुंतल राज्य में हुआ था। इसकी राजधानी प्रतिष्ठान (वर्तमान पैठान) में थी। इन्हीं का चलाया हुआ शाक संवत् है और इन्होंने ने प्रसिद्ध मुक्तक कोश गाथासप्तशती की रचना की थी। ये अपने दान मान और ऐश्वर्य के कारण जनसाधारण में अलौकिक शक्तिसंपन्न माने जाने लगे थे। ऐसे व्यक्तियों के विषय में किंवदंतियाँ प्रायः चल पड़ती हैं। सम्भवतः: इनके विषय में भी पातालगमन जैसी किंवदन्तियाँ चल पड़ी हों और वे आनन्ददायकन के समय तक तथा उसके बाद तक प्रसिद्ध रही हों। विक्रमादित्य के विषय में ऐसी ही किंवदन्तियाँ आज भी प्रसिद्ध हैं। यह भी सम्भव है कि ये कोई दूसरे सातवाहन हों 1) आशय यह है कि राजाओं के लोकोत्तर कृत्य सम्भव है अतः उनके प्रभाव की अधिकता का वर्णन क्यों अनुचित कहा जावेगा ? (उत्तर) इस प्रश्न का उत्तर यह है कि जो कुछ प्रतिष्ठी ने कहा है वह वास्तव में ठीक नहीं है। हमारे कहने का आशय यह नहीं है कि राजाओं के प्रभाव की अधिकता का वर्णन नहीं करना चाहिये। सामान्य जनो की अपेक्षा राजा में प्रभाव की जितनी अधिकता सम्भव हो सकती है उसका वर्णन करना होप नहीं कहा जा सकता, अतः उसका तो वर्णन करना ही चाहिये। किन्तु यह ध्यान रखना चाहिये कि कथायेंँ दो प्रकार की होती हैं एक तो लोक में परम्परागत रूप में प्रसिद्ध और दूसरी कल्पनिक। परम्पराप्राप्त कथाओं के समान कल्पित कथाओं के प्रति सर्वसाधारण की भावना पहले से ही बनी नहीं रहती। अतः यदि ऐसी कल्पित कथा को लेकर नाट्य या काव्य की रचना की जावे उसके पात्र सर्वथा लौकिक तथा अप्रसिद्ध हों और उनके विषय में सर्वसाधारण को कोई पुरानी धारणा बनी हुई न हो तो उनके चित्रण में मानव औचित्य का ध्यान रखना चाहिये, दिव्य औचित्य की योजना उनके साथ नहीं करनी चाहिये। प्रसिद्ध कथा में कुछ पात्र ऐसे होते हैं जो होते तो हैं वस्तुतः लौकिक, किन्तु उनके साथ परम्परागत रूप में दिव्यता जुड़ जाती है, उन्हें हम दिव्यादिव्य प्रकृति का नायक कह सकते हैं, उनके चरित्रों में दिव्य और अदिव्य दोनों प्रकार की प्रकृतियों की योजना विरुद्ध नहीं कही जा सकती। जैसे पाण्डव इत्यादि के चरित्र। (मूल में पांडवदि लिखा है। ज्ञात होता है ‘पांडवादि’ में ड के नीचे हलन्त पाठ की भ्रष्टता के कारण आ गया है। क्योंकि पांडु की कथा में किसी लोकोत्तर कृत्य का वर्णन नहीं है। पाण्डवों की कथा सभी लोकोत्तर कृत्यों से भरी हुई है।) इसमें भी इतना ध्यान रखना चाहिये कि प्रसिद्ध दिव्यादिव्य प्रकृति
वाले राजाओं के लोकोत्तर कृत्यों की जो सीमा लोक में प्रतिष्ठित हो चुकी हो यदि उतने तक का ही अनुगमन किया जाता है तो वह अनुगमन रस के अनुकूल नहीं होता है। यदि लोकप्रतिष्ठा का अतिक्रमण करके उससे अधिक का वर्णन किया जावे तो वह अनुगमन रस के अनुकूल नहीं होता है। यदि लोकप्रतिष्ठा का अतिक्रमण करके उससे अधिक का वर्णन किया जावे तो वह सर्वथा अनुचित हो होता है। यहाँ पर सारांश इतना ही है— ‘अनौचित्य को छोड़कर रसभंग का और कोई कारण नहीं होता। प्रसिद्ध औचित्य का निबन्धन रस की सबसे बड़ी उपनिषद् है।’ (उपनिषद् शब्द के दो अर्थ होते हैं—परा विद्या और निकट पहुँचना। आशय यह है कि औचित्य का निबन्धन रस की परा विद्या है और रसनिष्पत्ति के सबसे अधिक निकट पहुँचना भी औचित्य का उपनिबन्धन ही है।)
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(ध्वन्या०)—अत्र एव च भरते प्रथ्यातवस्तुविषयत्वं प्रथ्यातोदात्तनायकत्वं च नाटकस्यावश्यकतव्यतयोपन्यस्तम् । तेन हि नायकौचित्यानौचित्यविषये कविनं व्यामुह्यति । यस्तूत्पाद्यवस्तु नाटकादि कुर्वीतस्यानुप्रसिद्धानुचितनायकस्वभाववर्णने महान् प्रमादः ।
(अनु०) अत्र एव भरत में नाटक का प्रख्यात वस्तुविषयत्व और प्रख्यात उदात्तनायकत्व आवश्यकतव्यता के रूप में रखा गया है । इससे नायक के औचित्य अनौचित्य के विषय में कवि व्यामोह में नहीं पड़ता । और जो नाटक को उत्पाद्य (कल्पित) वस्तु वाला बनावे उससे अप्रसिद्ध और अनुचित नायक के स्वभाववर्णन में बहुत बडे़ प्रमाद की सम्भावना है । (लो०)—एतदुक्तं भवति-यत्र विनेयानां प्रतीतिखण्डना न जायते ताहग् वर्णनीयरम् । तत्र केवलमनुष्यस्य एकपदे सामान्यवल्गनमसम्भाव्यममानतयानृतमिति हृदये स्फुरदुपदेशस्य चतुर्वर्गोपायस्याद्यलीकतां बुद्धौ निवेशयति । रामादेसतु तथाविधर्मपि चरितं पूर्वप्रसिद्धिपरम्परोपचितसमप्रत्युपचारढमसलयतया न चकासति। अत एव तस्यापि यदा प्रभावान्तरमुख्रेध्यते तदा तादृशमेव । न त्वसं भावानापदं वर्णनीयमिति । तेन भवति । प्रख्यातोदात्तनायकवस्तुत्वेन व्यामुह्यतीति । किक वर्णनीयमिति । यस्त्वस्ति कवि: महान् प्रमाद इति । तेनोत्पाद्यवस्तु नाटकादि न चिरूपितं मुनिनिरूपिते न कर्तव्यमिति तात्पर्यम् । आदिशब्द: प्रकारे, हिमादेः प्रसिद्धदेवचरितस्य सङ्ग्रहार्थः । अन्यस्तु—उपलक्षणमुक्तो बहुधीरहिति प्रकरणम्रोकतमित्ययाह । 'नाटिकादि' इति वा पाठः । तत्रादिग्रहणं प्रकारसूचकम्, तेन मुनिनिरूपिते नाटकयोगादुत्पाद्यं वस्तु नायको नृपति:' इत्यत्र यथासंख्येन प्रख्यातोदात्तनृपतिनायकत्वं बोद्धव्यमिति भावः
(अनु०) (यहाँ पर) यह कहा गया है--जहाँ उपदेश दिये जानेवाले (सहृदय व्यक्तियों) की प्रतीति का खण्डन हो रहा हो उस प्रकार की वस्तु का वर्णन करना चाहिए । उसमें केवल मानव का अकस्मात् सातों समुद्रों का लांघ जाना असम्भव होने से असत्य है । यह उपदेश्य (उपदेश के योग्य) व्यक्ति के हृदय में स्फुरित होते हुए बुद्धि में चतुर्वर्ग फलप्राप्ति के उपाय को भी असत्यता को निहित कर देता है । राम इत्यादि का तो उस प्रकार का भी चरित्र पूर्वप्रसिद्ध-परम्परा से बढ़े हुए विश्वास के कारण (हृदय पर) चढ़ा हुआ असत्य के रूप में प्रकाशित नहीं होता । अत एव जब उनके भी दूसरे प्रभाव की कल्पना की जाती है तब वैसा ही होता है । आशय यह है कि असम्भावना के स्थान का वर्णन नहीं करना चाहिए । 'इतसे निस्सन्देह' अर्थात प्रख्यात उदात्त नायक विषयक वस्तु होने से । 'व्यामोहित होता है' अर्थात क्या वर्णन करूँ यह (व्यामोह) । 'जो' अर्थात कवि । 'बहुत बड़ा प्रमाद' इसलिए उत्पाद्य वस्तु वाले नाटक इत्यादि का मुनि ने निरूपण नहीं किया है अतः उन्हें नहीं करना चाहिए यह तात्पर्य है । 'आदि' शब्द प्रकारार्थक है (यह) हिम इत्यादि प्रसिद्ध देवचरित के संग्रह के लिए (लिखा गया है ।)
दूसरा तो 'उक्त बहुधीरहिति उपलक्षण है इसलिए प्रकरण यहाँ पर कहा गया है' यह कहता है । अथवा 'नाटिकादि' यह पाठ है । उसमें आदिग्रहण प्रकारसूचक है । इससे मुनि के
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द्वारा निरूपित नाटिकालक्षण में 'प्रकरण और नाटक के योग से उत्पाद्य वस्तु और नायक नृपति होता है' यहाँ पर क्रम का अनुसरण करते हुए प्रख्यात उदात्त नृपति नायक समझा जाना चाहिए—यह भाव है।
प्रख्यातवृत्त के उत्पादन का औचित्य तारावती—भरतमुनि ने नाटक के अन्दर प्रख्यात वस्तु का कथानक के रूप में उपादान करना और इतिहास प्रसिद्ध व्यक्ति को नाटक का नायक बनाना कवि का अनिवार्य कर्तव्य माना है ! इसका कारण ही यह है कि प्रसिद्ध कथानक के पात्रों के चरित्र तथा उनकी शक्ति की सीमा कवि के सामने सर्वदा सन्निहित रहती है, अतः कवि उनका चित्रण करने में व्यामोह में नहीं पड़ता और पाठकों की भी उनके पात्रों के विषय में एक भावना बनी रहती है, अतः पाठक न तो उनकी सम्भावना में सन्देह करते हैं और न उनका आस्वादन ही प्रतिहत होता है। इसके प्रतिकूल काल्पनिक नाटकादि की रचना में कवि को किसी पात्र के चरित्र की कल्पना स्वयं करनी पड़ती है और परिशीलक जब उस नई घटना को पढ़ता है या उसका अभिनय देखता है तब किसी विशिष्ट पात्र के विषय में उसकी धारणा चित्रण के अनुकूल बन जाती है! न तो कवि के मस्तिष्क में उस नवीन पात्र के विषय में कोई धारणा बँधी-मूल होती है और न पाठकों के सामने उनका कोई चरित्र स्पष्ट होता है। ऐसी दशा में यह बहुत सम्भव है कि कवि स्वकल्पित चरित्र के ठीक ठीक निर्वाह करने में भूल कर जावे। वहाँ कवि को विशेष रूप से चरित्रचित्रण में जागरूक रहना पड़ता है। यदि वहाँ पात्र के चरित्र चित्रण में कवि प्रकृति के औचित्य का पालन करने में समर्थ हो जाता है तो भावौचित्य के कारण प्रबन्ध रसाभिव्यंजन में समर्थ होता है।
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विनेय व्यक्तियों की प्रतीतिरक्षा की आवश्यकता ऊपर जो कुछ कहा गया है उसका सार यही है कि कवि को सर्वदा ऐसा वर्णन करना चाहिये जिससे विनेय व्यक्तियों की प्रतीति का खण्डन न हो (आशय यह है कि काव्य का प्रमुख प्रयोजन होता है सुुमार प्रकृति के राजकुमार इत्यादि को ठीक मार्ग पर ले आना जावे। यह तभी सम्भव है जब कि उनके हृदय में असत्यता का प्रतिभास न हो। यदि नाटकादि में ऐसा वातावरण उत्पन्न किया जाता है जिसको विनेय व्यक्ति सत्य समझने लगते हैं तभी उनकी आस्था जमती है और तभी वे उपदेश को ग्रहण कर सकते हैं।) अब मान लीजिये कोई ऐसा पात्र है जो शुद्ध मानव की सीमा से पार नहीं जा सकता, यदि एकदम उसका सातों समुद्रों का लांघ जाना दिखला दिया जावेगा तो सहृदयों के हृदयों में असम्भवनीयताजन्य असत्यता स्फुरित होने लगेगी और जिस चतुर्वर्ग के उपाय का उपदेश देना कवि को अभीष्ट होता है असम्भव प्रकृति उस उपाय के मिथ्याभाव को बुद्धि में निहित कर देती है (जिससे कवि का अभीष्ट सिद्ध नहीं होता।) राम इत्यादि का, तो यदि वैसा भी चरित्र चित्रित किया जावे अर्थात् समुद्र पर पस्थरों को तैराना, एक बाण से समुद्र को क्षुब्ध कर देना इत्यादि असम्भव घटनाओं को यदि राम इत्यादि पात्रों के विषय में दिखलाया जावे तो पूर्वप्रसिद्धि की परम्परा से बढ़े हुये विश्वास के हृदय पर जमें होने के कारण ये घटनायें असत्य के रूप में प्रतीत नहीं होतीं। अत एव यदि उन राम इत्यादि के भी प्रसिद्ध से भिन्न
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दूसरे प्रकार के प्रभावों का वर्णन किया जावे तो उनकी भी वही दशा होगी। सारांश यह है कि असम्भव का वर्णन नहीं करना चाहिये। (आचार्य शुक्ल ने लिखा है कि आजकल या तो नवीनता की झोंक में या पुरातन के खंडन करने की मिथ्या वीर भावना से कुछ कवि प्राचीन प्रतिष्ठित चरित्रों में गड़बड़ किया करते हैं। कोई मेघनाद को नायक बनाते हुए देखा जाता है कोई दूसरी प्रकार की कल्पनाओं से प्राचीन चरित्रों की बुद्धिमत्ता प्रतिपादित करते हैं। आचार्य शुक्ल के अनुसार नवीन कल्पना के लिये अपरिमित अवकाश होने हुए भी यह सरस्वती के मन्दिर को व्यर्थ कलंकित करना है।) भरत मुनि का आशय यही है कि प्रख्यात और उदात्त नायक विषयक वस्तु होने से कवि इस व्यामोह में नहीं पड़ता कि क्या वर्णन करना चाहिये या क्या नहीं करना चाहिये। यहाँ पर कहा गया है कि जो उत्पाद्य वस्तु वाले नाटक इत्यादि की रचना न करे उससे अप्रसिद्ध अनुनचित नायक के स्वभाववर्णन में बहुत बड़े प्रमाद की सम्भावना रहती है। इसमें यह प्रश्न उठता है कि नाटक तो कल्पित वस्तु वाला होता ही नहीं फिर यह क्यों कहा गया कि 'जो कल्पित वस्तु वाले नाटक की रचना करे'? अतः इस प्रश्न का उत्तर देने के लिये इस सन्दर्भ की व्याख्या इस प्रकार की गई है कि यदि नाटक भी कल्पित विषय वाला रखा जावे तो कवि से बहुत बड़े प्रमाद हो जाने की सम्भावना हो सकती है। इसीलिए उत्पाद्य वस्तु वाले नाटक इत्यादि की रचना नहीं करनी चाहिये। और इसीलिये मुनि ने नाटक को उत्पाद्य वस्तु को लेकर लिखने का आदेश नहीं दिया है और न उसका निरूपण ही किया है। 'नाटकादि' में आदि शब्द प्रकारवाचक है अर्थात् नाटक के ढंग पर ही लिखे हुए और भी अभिनेय काव्य जिनमें प्रख्यात वस्तु को नाटघ वस्तु के रूप में ग्रहण किया जावे। इससे डिम इत्यादि का संग्रह हो जाता है जिसमें प्रसिद्ध देवचरित को नाटघ वस्तु के रूप में ग्रहण किया जाता है। (नाटघ शास्त्र में रूपक के दस भेद किये गये हैं—नाटक, प्रकरण, भाण, व्यायोग, समवकार, डिम, ईहामृग, अंक, वीथी और प्रहसन। इसी प्रकार १८ उपरूपक होते हैं। इनमें कुछ रूपक और उपरूपक प्रख्यात वस्तु को लेकर चलते हैं और कुछ कल्पित वृत्त को लेकर। नाटक प्रथम प्रकार का रूपक होता है जिसमें प्रख्यात वृत्त का आश्रय लिया जाता है। लोचन के अनुसार यहाँ पर वृत्तिकार (आनन्दवर्धन) ने जो 'नाटकादि' की कल्पित वृत्तता में कवि के महान् प्रमाद की सम्भावना का उल्लेख किया है उसका आशय यह है कि यदि प्रख्यात वृत्त पर आश्रित नाटक इत्यादि को कल्पितवस्तुविषयक माना गया होता तो कवि के महान् प्रमाद की सम्भावना थी, इसीलिये भरतमुनि ने नाटक इत्यादि को कल्पित वृत्त-गत माना नहीं और उसकी रचना करनी भी नहीं चाहिये। कुछ लोग 'नाटकादि' शब्द की व्याख्या इस प्रकार करते हैं—इस शब्द में बहुव्रीहि है, यह बहुब्रीहि उपलक्षणपरक हो जाता है। (उपलक्षण का अर्थ है एक भाग के ग्रहण करने पर सम्पूर्ण का ज्ञान हो जाना। यहाँ नाटक शब्द के ग्रहण से सभी रूपकों और उपरूपकों का ग्रहण हो जाना उपलक्षण है।) अतः नाटकादि के द्वारा प्रकरण इत्यादि कल्पितवस्तुपरक रूपकों का ग्रहण हो जाता है। इस अवस्था में आनन्दवर्धन के उक्त कथन का यही आशय है कि जिन प्रकरणादिकों में वस्तु उत्पन्न होती है उनमें प्रमाद हो जाना अधिक सम्भव है। अथवा यहाँ पर 'नाटकादि' यह पाठ न मानकर 'नाटिकादि' यह पाठ मानना चाहिये। यहाँ
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पर 'आदि' का ग्रहण प्रकार का सूचक है। अर्थात् 'जिस प्रकार की नाटिका होती है उस प्रकार के रूपकों में...' इत्यादि। मुनि ने नाटिका का लक्षण यह लिखा है—(नाटिका में) प्रकरण और नाटक के योग से उत्पन्न वस्तु और नायक राजा होता है। यहाँ पर यथासंख्य अर्थात् क्रम के अनुसार व्याख्या करनी चाहिये। अर्थात् नाटिका में प्रकरण और नाटक दोनों के तत्व मिले रहते हैं—प्रकरण के अनुसार वस्तु उत्पन्न होती है और नाटक के अनुसार उदात्त चरित्रवाला कोई प्रसिद्ध राजा नायक होता है। आशय यह है कि नाटिका की वस्तु भी कल्पित ही होती है और उसी को लेकर आनन्दवर्धन ने लिख दिया है कि कल्पित वस्तु वाली नाटिका इत्यादि में प्रमाद का हो जाना बहुत स्वाभाविक है। (साहित्यदर्पण में नाटिका का लक्षण यह लिखा है—'नाटिका कल्पित वृत्त वाली, अधिकतर स्त्रीपात्रों से युक्त, चार अङ्कों वाली होती है। इसमें प्रसिद्ध धीरललित राजा नायक होता है।' आशय यह है कि नाटिका में किसी प्रसिद्ध नायक का कल्पित चरित्र रहता है।)
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(ध्वन्या०)—ननु यदुत्साहादिविभाववर्णने कथाश्रयविषयानुषङ्गादौचित्यपरীক্ষा क्रियते तत्र किं तु प्रयोजनम् ? रतिहि भारतवर्षोचितनेव व्यवहारेण दिव्यानामपि वर्णनेऽधैति स्थितिः, नैवम्; तत्रौचित्येनोक्तमप्रकृतेः शृङ्गारोपनिबन्धने का भवेल्लोपहास्यता ? त्रिविधं प्रत्यौचित्यं भारतो वर्षदृश्यसति शृङ्गारविषयम्। यत्कु दिव्यमौचित्यं तत्कत्रानुपकारकमेवेति चेत्—न वयं दिव्यमौचित्यं शृङ्गाराविषयकन्यत्कचिद् वृण्मः। कि तर्हि ? भारतवर्षविषये यथोक्तमनायकेषु राजादिषु शृङ्गारोपनिबन्धस्तथा दिव्योऽपि शोभते। न च राजादिषु प्रसिद्धप्रायं शृङ्गारोपनिबन्धनं प्रसिद्धं नाटकादौ; तथैव देवेषु तत्परिहृतत्वम्। नाटकादेरभिनेयत्वादभिनयस्य च सम्भोगाश्रृङ्गारविषयस्यासम्बन्धात्तत्र परिहार इति चेत्, न; यदभिनयेऽप्येवंविषयस्यासम्ब्यता तत्काव्यस्यैवंविषयस्य सा केन निवार्यते ? तस्मादभिनेयार्थेऽनभिनेयार्थे वा काव्ये यदुत्तमप्रकृतौ राजादेश्च प्रकृतिभिन्नायिकाभिः सह प्रायसम्भोगवर्णनं तत्पात्रोः सम्भोगवर्णनमिव सुत्ररामसम्भम्। तथैवोत्तमदेवताविषयम्।
(अनु०) (प्रश्न) यदि उत्साह इत्यादि के वर्णन में दिव्य, मानुष इत्यादि के औचित्य की परीक्षा की जाती है तो की जाये, रति इत्यादि में तो उससे क्या प्रयोजन ? स्थिति यह है कि रति भारतवर्षोचित व्यवहार से ही दिव्यों की भी वर्णित की जानी चाहिये। (उत्तर) ऐसा नहीं है। वहाँ औचित्य के अतिक्रमण से तो दोष होता ही है। वह इस प्रकार कि अधम प्रकृति के औचित्य से उत्तम प्रकृति के शृङ्गारोपनिबन्धन में क्या उपहास्यता न होगी ? शृङ्गार के विषय में भारत में भी तीन प्रकार की प्रकृतियों का औचित्य है। यदि कहो कि जो (अतिरिक्त) दिव्य औचित्य है वह तो इस विषय में अनुपकारक ही है तो (इसका उत्तर यह है कि) हम शृङ्गारविषयक दिव्य औचित्य कुछ और नहीं बतलाते। तो क्या ? भारतवर्ष के विषय में जैसा कि उत्तम नायक राजा इत्यादि के (विषय में) शृङ्गार का उपनिबन्धन होता है वैसा (ही) देवों के आश्रय से भी शोभित होता है। नाटक इत्यादि में राजा इत्यादि
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के विषय में प्राम्य शृङ्गार का भी उपनिबन्धन प्रसिद्ध नहीं है उसी प्रकार देवों के विषय में भी उसका त्याग करना चाहिए। (यदि कहो कि) नाटक इत्यादि के अभिनेय होने से और संशोगशृङ्गारविषयक अभिनय के असम्य होने से उसका परिहार (किया जाता है) तो (इसका उत्तर यह है कि) यह बात नहीं है। यदि इस विषय के अभिनय में असम्यता है तो इस विषय के काव्य में उसे (असम्यता को) कौन रोक लेगा ? अतः अभिने्य अर्थ या अभिनय भिन्न अर्थवाले काव्य में जो उत्तम प्रकृतिवाले राजा इत्यादि का उत्तम प्रकृतिवाली नायिकाओं के साथ प्राम्य सम्भोग का वर्णन वह माता पिता के सम्भोग वर्णन के समान नितान्त असम्य है और उसी प्रकार उत्तम देवताओं के विषय में भी।
तारावती—ऊपर बतलाया है कि प्रकृतियों के औचित्य का पालन भावौचित्य में हेतु होता है। यहाँ यह प्रश्न उपस्थित होता है कि उत्साह इत्यादि के वर्णन में तो दिव्य मानव इत्यादि प्रकृतियों के भेद की परीक्षा सङ्क्त कहीं जा सकती है—देवों में उत्साह का परिमाण मानवों की अपेक्षा भिन्न अवश्य होता है। अतः उत्साह इत्यादि के क्षेत्र में दिव्य मानव इत्यादि औचित्यों की परीक्षा यदि कोई करता है तो किया करे, इसमें किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। किन्तु रति इत्यादि में उस परीक्षा का क्या प्रयोजन ? सम्भोग इत्यादि जैसे देवों में होते हैं वैसे ही मानवों में भी होते हैं। यदि कोई कोई कवि भारतीय व्यक्तियों के प्रेम के औचित्य के आधार पर दिव्य प्रेम का भी वर्णन करता है तो उसमें अनौचित्य क्या होगा ? आशय यह है कि प्रेम तो सभी का एक-सा होता है उसमें औचित्य-भेद का क्या अर्थ ? इसका उत्तर यह है यह कथन ठीक नहीं है। यदि प्रेम के क्षेत्र में भी औचित्य का अतिक्रमण किया जाता है तो उसमें भी दोष होगा। वह इस प्रकार—यदि अधम प्रवृत्त वलि व्यक्तियों के औचित्य का प्रयोग उत्तम प्रकृति वाले व्यक्तियों के शृङ्गारोपनिबन्धन में किया जावेगा तो वह अवश्य ही उपहासनीय होगा। (भरतमुनि ने उत्तम और मध्यम व्यक्तियों की रति भाव के द्वारा मानवी है और नीचों की सम्भ्रम के द्वारा।)
स्वयं भारतवर्ष में ही शृङ्गार के विषय में उत्तम मध्यम और अधम प्रकृति के अनुसार औचित्य का विचार किया ही जाता है। अतः यह नहीं कहा जा सकता कि प्रकल्यौचित्य का विचार उत्साह इत्यादि में ही किया जाना चाहिये, शृङ्गार इत्यादि में नहीं। यहाँ पर कोई विचारक यह भी कह सकता है कि शृङ्गार के विषय में उत्तम मध्यम इत्यादि प्रकृतियाँ ही प्रयोजक होती हैं—प्रकृतियों का दिव्य, अदिव्य यह विभाजन इस दिशा में अकिञ्चित्कर है। किन्तु यह वास्तविकता नहीं है। शृङ्गार की दृष्टि से दिव्य औचित्य और कुछ नहीं है और न हम उसे कोई पृथक् तत्त्व कहते ही हैं। तो फिर है क्या ? भारतवर्ष के विषय में एक प्रकार का प्रकल्यौचित्य नहीं होता अपितु उत्तम, मध्यम और अधम इन तीन प्रकारों का औचित्य माना जाता है। यदि देवताओं के शृङ्गार का वर्णन करना हो तो भारतवर्ष के उत्तम राजा इत्यादि के लिये जिस प्रकार के औचित्य का पालन किया जाता है और उनकी रति को जिस प्रकार का वर्णन किया जाता है उसी प्रकार का वर्णन दिव्य पात्रों का भी करना चाहिये। राजा इत्यादि
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के विषय में प्रसिद्ध ग्राम्य शृङ्गार का उपनिबन्धन नाटक इत्यादि में प्रसिद्ध नहीं है। ( नाटक में दस्तच्छेद्य, नखच्छेद्य तथा अन्य लज्जाजनक तत्त्वों का समावेश नाट्यशास्त्र के अनुसार भी वर्जित है और व्यवहार में भी नाटक में वैसा प्रयोग नहीं किया जाता ।) यहाँ पर पूर्वपक्षी यह कह सकता है कि नाटक की तो बात ही और है। नाटक में अभिनय किया जाता है; सम्भोग का अभिनय अत्यन्त असम्यता प्रकट करने वाला होगा । अतः सम्भोग का अभिनय नहीं किया जाता। किन्तु श्रव्य काव्य का प्रयोजन तो अभिनय होता नहीं है अतः श्रव्य काव्य में इस प्रकार के अनौचित्य का परित्याग क्यों किया जाना चाहिये ?
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(उत्तर) यदि अभिनय में इस ग्राम्य शृङ्गार को सहन नहीं किया जा सकता तो श्रव्य काव्य में इस प्रकार के अनौचित्य का निवारण किस प्रकार तथा किसके द्वारा किया जा सकता है ? आशय यह है कि अभिनय में जिस प्रकार असभ्य व्यवहार चित्तसङ्घोच उत्पन्न करता है उसी प्रकार असभ्य व्यवहार का वर्णन सुनकर भी चित्तसङ्घोच होता ही है। अतः काव्य चाहे अभिनेय हो चाहे अनभिनेय, श्रव्य हो अथवा पाठ्य दोनों प्रकार के काव्यों में उत्तम प्रकृतिवाले राजा इत्यादि का उत्तम प्रकृतिवाली नागिकाओं के साथ ग्राम्य सम्भोग का वर्णन उसी प्रकार अनुचित है जिस प्रकार माता-पिता का सम्भोगवर्णन अनुचित हुआ करता है। यह तो सर्वथा अनुचित ही है। ( यही व्यवस्था दिव्य शृङ्गारे के विषय में भी स्थापित की जा सकती है।) उत्तम देवताओं के विषय में भी ग्राम्य सम्भोग वर्णन अनुचित ही होता है। ( आशय यह है कि दिव्य अदिव्य इत्यादि प्रकृतियों का विचार शृङ्गार के क्षेत्र में भी किया ही जाता है।)
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उद्योतः
न च सम्भोगशृङ्गारस्य सुरतलक्षण एवैकः प्रकारः; यावदन्येऽपि प्रभेदाः परस्परप्रेमदर्शनादयः सम्भवन्ति, ते कस्मादुक्तमप्रकृतिविषये न वर्ण्यन्ते ? तस्मादुत्साहवद्रतावापि प्रकृत्यौचित्यमनुसर्तव्यम्। तथैव विश्रयादिषु । यद्वेवंविधे विषये महाकवीनामध्यसम्यक्कारिता लक्ष्ये इत्यते स दोष एव । स तु शक्तितिरसकृतत्वात्तेषां न लक्ष्यते इत्युक्तमेव ।
(ध्वन्य०)—न च सम्भोगशृङ्गारस्य सुरतलक्षण एवैकः प्रकारः; यावदन्येऽपि प्रभेदाः परस्परप्रेमदर्शनादयः सम्भवन्ति, ते कस्मादुक्तमप्रकृतिविषये न वर्ण्यन्ते ? तस्मादुत्साहवद्रतावापि प्रकृत्यौचित्यमनुसर्तव्यम्। तथैव विश्रयादिषु । यद्वेवंविधे विषये महाकवीनामध्यसम्यक्कारिता लक्ष्ये इत्यते स दोष एव । स तु शक्तितिरसकृतत्वात्तेषां न लक्ष्यते इत्युक्तमेव ।
तृतीय
उद्योतः
इत्यचच्यते—भरतादिविरचितां सिसृक्षुर्वर्तमानेऽन महाकविप्रबन्धांश्च पर्यालोचयता स्वप्रतिभां चानुसरता कविनावहितचेतसा भूत्या विभावादि-चित्र्यशृङ्गपरित्यागे परं प्रपत्तव्यो विधेयः । औचित्यवतः कथाशरीरस्य वृत्तस्योत्प्रेक्षित-तस्य वा ग्रहो व्यञ्जक इत्थंननत्तनं प्रतिपादयति—यदिहासादिषु कथासु रसवतीषु विविधासु सतीष्वपि यत्तत्र विभावाद्यौचित्यवत् कथाशरीरं तदेव ग्राह्यं, नेतरत् । वृत्तादपि च कथाशरीरादुत्प्रेक्षिते विशेषतः प्रयत्नवता भविष्यम् । तत्र ह्यनवधानात् स्वलताः कवेरगुप्तपत्तिसम्भावना महती भवति । परिकरश्लोकश्छात्र—
इत्यचच्यते—भरतादिविरचितां सिसृक्षुर्वर्तमानेऽन महाकविप्रबन्धांश्च पर्यालोचयता स्वप्रतिभां चानुसरता कविनावहितचेतसा भूत्या विभावादि-चित्र्यशृङ्गपरित्यागे परं प्रपत्तव्यो विधेयः । औचित्यवतः कथाशरीरस्य वृत्तस्योत्प्रेक्षित-तस्य वा ग्रहो व्यञ्जक इत्थंननत्तनं प्रतिपादयति—यदिहासादिषु कथासु रसवतीषु विविधासु सतीष्वपि यत्तत्र विभावाद्यौचित्यवत् कथाशरीरं तदेव ग्राह्यं, नेतरत् । वृत्तादपि च कथाशरीरादुत्प्रेक्षिते विशेषतः प्रयत्नवता भविष्यम् । तत्र ह्यनवधानात् स्वलताः कवेरगुप्तपत्तिसम्भावना महती भवति । परिकरश्लोकश्छात्र—
तृतीय
उद्योतः
कथाशरीरमुत्पाद्य वस्तु काव्यं तथैव च । यथा रसमयं सर्वमेव तत्प्रतिभासते ॥ 'पुष्टिः'
कथाशरीरमुत्पाद्य वस्तु काव्यं तथैव च । यथा रसमयं सर्वमेव तत्प्रतिभासते ॥ 'पुष्टिः'
तृतीय
उद्योतः
(अनु०)—सम्भोग शृङ्गार का सुरत रूप एक ही प्रकार नहीं होता ( उसके ) परस्पर प्रेमपूर्वक दर्शन इत्यादि और भी भेदोपभेद हो सकते हैं, उत्तम प्रकृति के विषय में उनका वर्णन क्यों नहीं किया जाता ? अतः उत्साह के समान रति में भी प्रकृति के औचित्य का
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अनुसरण करना चाहिये । उसी प्रकार विस्मय आदि में भी । जो कि इस प्रकार के विषय में महाकवियों के भी बिना सोचे-समझे ( रचना ) करने की ( प्रवृत्ति ) देखी जाती है वह दोष ही है । यह पहले ही कहा जा चुका है कि शक्ति से तिरस्कृत होने के कारण वह (दोष) लक्षित नहीं होता । अनौचित्य तो भरत में प्रसिद्ध ही है । इतना तो कहा जा रहा है—भरत इत्यादि विरचित स्थिति का अनुसरण करते हुये, महाकवियों के प्रबन्धों की पर्यालोचना करते हुये और अपनी प्रतिभा का अनुसरण करते हुये कवि को सवधानचित्त होकर विभाव इत्यादि के औचित्य के अंश को बचाने का बहुत बडा प्रयत्न करना चाहिये । औचित्यवान् घटित या कल्पित कथाशरीर का ग्रहण यथाक हो होता है इससे यह प्रतिपादन करते हैं—कि इतिहास में आदि में विभिन्न प्रकार की रसमयी कथाओं के होते हुए भी जो उसमें विभाव इत्यादि के औचित्यवाला कथाशरीर हो उसी को ग्रहण करना चाहिये, दूसरे को नहीं । घटित कथाशरीर से भी अधिक प्रयत्न कल्पित कथाशरीर (के निष्पादन ) में करना चाहिये । वहाँ पर ध्यान न देने से कवि की बहुत बडी अग्युत्पत्ति की सम्भावना हो जाती है । इस विषय में एक परिकर श्लोक भी है—
'उत्पाद्यवस्तु कथाशरीर को उन उन प्रकारों से बनाना चाहिये जिससे वह सब रसमय ही प्रतीत होने लगे । (लो०)—कथं तर्हि सम्भोगशृङ्गारः कविना निबध्यतामित्याशङ्क्याह—न चेतित तथ्यवेतित । मुनिनापि स्थाने प्रकृत्यचित्यमेव विभावानुभावादिषु बहु तरण प्रमा- णीकृतम् स्थैय्योऽस्थैय्योमध्यमाधमानां नीचानां सम्भ्रमेण' इत्यादि वदता । इत्यत्वति । लक्षणज्ञत्वं लक्ष्यपरिशीलनमदृष्टप्रसादोदितस्वप्रतिभाशालित्वं चानुसर्तव्यमिति संक्षेपः ।
रसवतीष्वलक्षणादरेऽप्तमी । रसवत्वं चाविवेककजनाभिमानाभिप्रायेण मन्तव्यम् । विभावादौचित्येन हि विना का रसवत्ता । कवे रिति । न हि तत्रेतिहास- वशादेव मया निबद्धमिति यात्युत्तरमपि सम्भवति ।
(अनु०) तो कवि के द्वारा सम्भोग शृङ्गार कैसे निबद्ध किया जावे यह शङ्का करके कहते हैं—‘और नहीं’ यह । ‘उसी प्रकार से’ यह । मुनि ने भी विभाव अनुभव इत्यादि में स्थान-स्थान पर प्रकृत्यौचित्य ही बहुत अधिक प्रमाणित किया है—‘उत्तम और मध्यम का स्थैर्य के द्वारा तथा नीचों का अपसर्पण के द्वारा’ यह कहते हुए । ‘इतना तो’ लक्षण का जानना, लक्ष्य का परिशीलन करना, अदृष्ट और प्रसादन से उत्पन्न अपनी प्रतिभा से युक्त होना—इनका अनुसरण करना चाहिये यह संक्षेप है । ‘रसवतीषु’ में अनादर में सप्तमी है और रसवत्व तो अविवेकक जनों के अभिमान के अभिप्राय से माना जाना चाहिये । विभाव इत्यादि के औचित्य के बिना रसवत्ता ही क्या ? ‘कवि का’ यह । यहाँ पर इतिहास के कारण ही मैंने ऐसा निबद्ध कर दिया है—यह असम्भव नहीं है ।
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३
तृतीय उद्योतः
तारावती—यहाँ प्रश्न यह उठता है कि यदि सम्भोगवर्णन असभ्य है तो उसका वर्णन तो काव्य के क्षेत्र से बाहर ही हो जायेगा, नहीं तो उसका वर्णन किया ही किस प्रकार जासकेगा ? ( उत्तर ) सम्भोग शृङ्गार का केवल सुरतरूप एक ही प्रकार तो नहीं है; किन्तु उसके और भी बहुत से प्रकार हो सकते हैं जैसे प्रेमपूर्वक एक दूसरे को देखना ( मिलना, बातचीत करना) इत्यादि । उत्तम प्रकृतिवालों के विषय में यदि इन शालीन प्रेमचेष्टाओं का वर्णन किया जावे तो उसमें दोष क्या होगा ? इस समस्त कथन का निष्कर्ष यह है कि जिस प्रकार उत्साह इत्यादि में प्रकृति के औचित्य का विचार आवश्यक होता है उसी प्रकार रति में भी प्रकृति के औचित्य का अनुवर्तन अपरिहार्य ही है । मुनि ने विभिन्न प्रकारों में विभाव अनुभाव इत्यादि के वर्णन के प्रसङ्ग में प्रकृति के औचित्य का बहुत अधिक विवेचन किया है और प्रमाणित भी कर दिया है, जैसे प्रेमप्रसङ्ग में—उत्तम और मध्यम के आश्रय से जिस प्रेम को काव्यविषय बनाया जावे उसमें स्थिरता होनी चाहिये, नीचों के प्रसङ्ग में सम्भ्रम होना चाहिये इत्यादि । यही बात विस्मय इत्यादि के विषय में भी गतार्थं होती है (अपनी प्रकृति के अनुसार कुछ लोगों का विस्मय परमानन्द में अधिक होता है, कुछ का कम, कोई विस्मय को एकदम प्रकट करने लगता है और कोई गम्भीरता से अपनी आकृति को छिपाये रहता है । यह सब प्रकृत्यौचित्य ही है ।) यहाँ यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि इस विषय में महाकवियों ने भी सूझबूझ से काम नहीं लिया है ( कालिदास ने भी शङ्कर-पार्वती के सम्भोग का वर्णन कर ही दिया है ।) उसकी क्या व्यवस्था होगी ? इसका उत्तर यह है कि महाकवियों का वह विवेक-शून्य कार्य दोष ही माना जावेगा । यह पहले ही कहा जा चुका है कि उसमें ऐसी कलात्मक प्रौढ़ता विद्यमान रहती है जिससे उस अनौचित्य का तिरस्कार हो जाता है और परिशीलकों के सामने वह दोष के रूप में नहीं आता । अनुभाव का औचित्य तो भरत इत्यादि में प्रसिद्ध ही है । ( नाटच में अनुभाव का औचित्य तो भरत ने विभिन्न भावों का विभिन्न रूप में अभिनय दिखलाया है यह सब अनुभावौचित्य ही है । यहाँ पर सञ्चारियों के औचित्य का उल्लेख नहीं किया । उसको भी उसी प्रकार समझ लेना चाहिये जिस प्रकार दूसरे औचित्य बतलाये गये हैं । अनुभावौचित्य का उदाहरण यह होगा कि यदि कोई व्यक्ति शोक का अभिनय मुख-विकास के द्वारा करे अथवा क्रोध की परिस्थिति में गम्भीरता धारण करे तो यह अनुचित होगा । इसी प्रकार यदि कोई नायिका किसी कामी द्वारा सम्बाधित किये जाने पर क्रोधजन्य उद्धिग्नता का हर्षपूर्ण मुद्रा में अभिनय करे तो यह भी अनुचित ही होगा ! सञ्चारियों का औचित्य जैसे वेश्यागत लज्जा और कुलवती की लज्जाहीनता अनुचित कही जावेगी । इसी प्रकार उत्तम प्रकृतिवालों में जो लज्जाशीलता होगी वह अधम प्रकृतिवालों में नहीं होगी । इस प्रकार उस परिस्थिति में भी भाव का तारतम्य होगा ही । इन सब औचित्यों का निर्वाह करते हुए कथाशरीर की रचना करना प्रबन्धौचित्य का प्रथम रूप है ।)
उपसंहार
ऊपर कथाशरीर के विधान में परिपालनीय औचित्यों का दिग्दर्शन कराया गया है ! उपसंहार के रूप में इतना कहा जा सकता है—कथाविधान में तीन तत्वों का प्राधान्य
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अनुसरण किया जाना चाहिये—लक्षणज्ञान, लक्षणपरिशीलन और अपनी प्रतिभा।
१—भरत इत्यादि लक्षणशास्त्रकारों ने विस्तारपूर्वक नाट्यवस्तु रचना पर विचार किया है। उन्होंने अपने ग्रन्थों में जिस स्थिति का विवेचन किया है उसका पूर्णरूप में अनुसरण करना चाहिये। (इसी प्रकार वात्स्यायन मुनि इत्यादि ने जिन विभिन्न परिस्थितियों और तज्जन्य मनोविकारों का विस्तृत विवेचन किया है उसका भी पालन करना चाहिये और साथ ही लोकवृत्त को भी देखना चाहिये। क्योंकि शास्त्रकार दर्शनमात्र कराते हैं; औचित्य का पूर्ण परिचय तो लोक से ही मिलता है।)
अध्ययन और प्रतिभा का उपयोग
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महाकवियों के बनाये हुये प्रबन्धों का मनोयोगपूर्वक अध्ययन करना चाहिये और उनकी पर्यालोचना करनी चाहिये।
अर्थात् यह देखना चाहिये कि महाकवियों ने कथा का उपादान किस प्रकार किया है और उसको संघटना का निर्वाह भी किस प्रकार किया है? इससे कथाशरीर के निर्माण में निपुणता आ जाती है।
३
कवि को अपनी प्रतिभा का अनुसरण भी करना चाहिये।
प्रतिभा का उदय अदृष्ट अर्थात् सुक्त और प्रसाद अर्थात् देवता की कृपा हृपा करता है। इस प्रतिभा के बल पर अनुचित के निराकरण के लिये नवीन अर्थ और उसके योग्य नवीन शब्दों का स्फुरण होता है। प्रतिभा के द्वारा उच्चिष्ट कथाभागों की संघटना और अनुचित भागों का त्याग या उचित रूप में परिवर्तन कथाशरीर के निर्माण के लिये अत्यन्त आवश्यक है। कवि को चाहिये कि अपने मन को भलीभाँति अवधान से युक्त बनाकर उत्त तत्वों की सहायता से विभाव इत्यादि में जो औचित्यभ्रंश हो जाता है उसके निराकरण का बहुत बड़ा प्रयत्न करे। 'वटित या उत्प्रेक्षित औचितयुक्त कथाशरीर का ग्रहण व्युत्क्जक होता है।' इस कथन से यह प्रतिपादित किया गया है कि—चाहे इतिहास इत्यादि में विविध प्रकार की रसमयी कथायें भरी पड़ी हों, किन्तु काव्यवस्तु के लिये ऐसे कथाशरीर का ही उपादान किया जाना चाहिये जिसमें विभाव इत्यादि का औचित्य विद्यमान हो।
उससे भिन्न (अनौचित्य वाला) कथा-शरीर काव्य वस्तु के रूप में नहीं ग्रहण किया जाना चाहिये। 'रसवती कथाओं में' यहाँ पर ससम्भी अनादर के अर्थ में है। अर्थात् इतिहास आदि में भरी हुई रसवती कथाओं का अनादर (उपेक्षा) करके केवल विभाव इत्यादि के औचित्य वाली कथायें ही ग्रहण की जानी चाहिये। वस्तुतः कथाओं में रसवत्ता तो विभाव इत्यादि के औचित्य से ही आती है। जिन कथाओं में इस प्रकार का औचित्य विद्यमान नहीं होता उनमें रसवत्ता ही क्या? किन्तु फिर भी अविवेकी जन उन कथाओं में भी रसवत्ता का अभिमान कर सकते हैं। इसीलिये उन कथाओं को भी रसवती कह दिया गया है जिनमें औचित्य नहीं होता और उनके अनादर के लिये ससम्भी विभक्ति का प्रयोग कर दिया गया है। यह तो इतिहास प्रसिद्ध कथा की बात हुई। कल्पनिक कथाओं में उससे भी अधिक ध्यान रखने की आवश्यकता होती है। यदि कवि उस प्रकार की कल्पित (वटित) कथाओं में रसवत्ता रखता है तो उसके स्खलन की सम्भावना बहुत अधिक रहती है कथा की संघटना लापरवाही से करे
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तृतीय उद्योतः
जिससे कवि अन्युत्पत्ति के लाञ्छन से ग्रस्त हो सकता है। क्योंकि यदि कल्पित कथा में किसी प्रकार की रसविरुद्धता क्लुषता आ जाती है तो कवि को यह बहाना करने का भी अवसर नहीं रहता कि मैंने इतिहास के अनुरोध से ऐसा लिख दिया। यद्यपि यह बहाना है असमीचीन हो; क्योंकि कवि को रसानुकूल परिवर्तन करने की छूट तो रहती ही है। इसी विषय में यह एक प्रसिद्ध इलोक है—
तृतीय उद्योतः
उत्पाद्य वस्तु विषयक कथाशरीर की संघटना इस रूप में की जानी चाहिए कि कथा का प्रत्येक भाग रसमय हो प्रतीत हो।'
(ध्वन्यालोके)—तत्र चाभुपायः सम्यग्विभावादौचित्यानुसरणम्। तच्च दर्शितमेव।
तृतीय उद्योतः
सन्ति सिद्धरसप्रख्या ये च रामायणादयः ।
कथाश्रया न तैर्योंज्या स्वेच्छा रसविरोधिनी ।
तृतीय उद्योतः
तेषु हि कथाश्रयेषु तावत्स्वेच्छैव न योज्या । यदुक्तम्—‘कथामार्गे न ज्ञानोदयविक्रमः’ । स्वेच्छापि यद् योज्या तद्रसविरोधिनी न योज्या ।
इदमपि प्रबन्धस्य रसव्यञ्जकत्वे निबन्धनम् । इतिवृत्तवशायातां कथाश्रित्- सानु गुणां सिथ्यात त्यक्त्वा पुनरुत्प्रेक्ष्याद्यनन्तराभीष्टरसोत्कर्षकथोन्नयो विघेयः
तृतीय उद्योतः
यथा कालिदासप्रबन्धेषु । यथा च सर्वसेनरचते हरिविजये । यथा च मदीय एवाजुर्न- चरिते महाकाव्ये ।
(अनु०) उसमें उपाय है कि सम्यक् रूप में विभाव इत्यादि के औचित्य का अनुसरण करना। और वह दिखला ही दिया गया है। और भी—
तृतीय उद्योतः
'सिद्ध रसों से प्रसिद्ध प्राप्त करनेवाले जो रामायणादि कथाश्रय ( प्रबन्ध ) हैं उनके साथ रसविरोधिनी स्वेच्छा की योजना नहीं करनी चाहिये ।'
तृतीय उद्योतः
उन कथाश्रित (प्रबन्धों) में तो स्वेच्छा का योग करना ही नहीं चाहिए। जैसा कि कहा गया है—कथामार्ग में स्वल्प भी अतिक्रम नहीं होना चाहिए। यदि स्वेच्छा का भी योग करना हो तो रसविरोधिनी स्वेच्छा का योग नहीं करना चाहिए।
तृतीय उद्योतः
प्रबन्ध की रसव्यञ्जकता में यह दूसरा निबन्धन है कि इतिवृत्तवश आई हुई कथा की उन्नयन कर लेना चाहिए। जैसा कालिदास के प्रबन्धों में या जैसे सर्वसेनरचित हरिविजय में या मेरे ही अर्जुनचरित महाकाव्य में।
तृतीय उद्योतः
(लो०)—तत्र चेति । रसमयत्वसम्पादने । सिद्धः: आस्वादमात्रशेषो न तु भाव- नीप्सो रसो हि तत्; कथानिमित्ताश्रया इति इतिहासः; तद्विरहितिहासार्थः सह स्वेच्छा न योज्या । योज्या । कथद्विच्छद् वा यदि योज्यते तत्तप्रसिद्धरसविरुद्धा न योज्या । यथा रामस्य
तृतीय उद्योतः
धीरललितत्वयोजनैन नाटिकानायकत्वं कश्चिच्चरुर्यादिति त्वद्यन्तासमञ्जसम् । यदुक्त- मिति । रामाभ्युदये यशोवर्मा—‘स्थितमिति यथा शय्यामू’ । कालिदासेति ।
व्याचष्टे—तेष्विति सम्प्रम्या । स्वेच्छा तेषु न कथद्विच्छद् वा यदि योज्यते तत्तप्रसिद्धरसविरुद्धा न योज्या ।
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रघुवंशेज्जादीनां राज्ञां विवाहादिवर्णनं नेतिहासेषु निरूपितम् । हरिविजये कान्तानुनयाज्ञल्त्वेन पारिजातहरणादिनिरुपितमितिहासेष्वदृष्टमप । तथार्जुनचरितेऽर्जुनस्य पातालविजयादिर्वणतमितिहासाप्रसिद्धम्
(अनु०)—‘और उसमें’ अर्थात् रसमयता के सम्पादन में । ‘सिद्ध’ यहां सिद्ध अर्थात् आस्वाद मात्र रूप में अवशिष्ट तथा भावना के योग्य नहीं है रस जिनमें । कथा के आश्रय अर्थात् इतिहास । उन इतिहासों के साथ अपनी इच्छा का योग नहीं करना चाहिये । यहां ‘साथ’ का अर्थ है विषयविषयिभाव इसलिये ‘उनमें’ इस सममी के द्वारा व्याख्या की है । स्वेच्छा उनमें नहीं जोड़ी जानी चाहिये । यदि कथा(श्रित) जोड़ी जानी चाहिये तो उन उन प्रसिद्ध रसों के विरुद्ध नहीं जोड़ी जानी चाहिये । जैसे कोई राम के धीरललितत्व की योजना के द्वारा (उन्हें) नाटिका का नायकत्व (प्रदान) करे तो यह अत्यन्त असमीचीन होगा । ‘जैसा कहा गया है’—रामाभ्युदय में यशोवर्मा के द्वारा—
‘स्थित’ यहां । कथायोजन के अनुसार ‘कालिदास इत्यादि’ रघुवंश में अज इत्यादि का वर्णन इतिहासों में निरूपित नहीं किया गया है । हरिविजय में कान्ता के अनुयाय के अर्थ रूप में पारिजातहरण इत्यादि इतिहासों में न देखे हुए (कथानक) का निरूपण किया गया है । उसी प्रकार अर्जुनचरित में अर्जुन के पातालविजय इत्यादि का वर्णन इतिहास मे प्रसिद्ध नहीं है ।
सिद्धरस काव्यों में स्वेच्छासननिवेश का निषेध तारावती—सभी कुछ रसमय बना देने का उपाय है विभाव इत्यादि के औचित्य का पालन करना जिसका विस्तृत परिचय पिछले पृष्ठों पर दिया जा चुका है । और भी—
‘कथा को लेकर लिखे हुये रामायण इत्यादि जो प्रबन्ध सिद्ध रस वाले तथा प्रतिष्ठित हैं उनमें रसविरोधिनी स्वेच्छा का प्रयोग नहीं करना चाहिये ।’
रस की दो अवस्थायें होती हैं सिद्ध और साध्य । सिद्ध रस वह होता है जिसका आस्वादनमात्र ही अवशिष्ट रह गया हो और भावना के द्वारा जिसमें आस्वादनीयता उत्पन्न करने की आवश्यकता न हो । रामायण इत्यादि सिद्धरस काव्य हैं । उनमें भावना के द्वारा आस्वादनीयता सम्पादित करने की आवश्यकता नहीं (प्रख्या शब्द का अर्थ है तुल्य अर्थात् जिस प्रकार लोक में कोई पदार्थ पूर्णरूप से तैयार करके रख दिया जावे, उसका रस पूर्णतया निष्पन्न हो चुका हो केवल आस्वादन ही शेष हो । इसी प्रकार के रामायण इत्यादि सिद्धरस काव्य हैं । उनका भी आस्वादन लिया जा सकता है उनमें अपनी नवीन भावना के समावेश से रसनयिता उत्पन्न करने की चेष्टा व्यर्थ है ।) ‘तथा’ यह तृतीया है जो कि ‘साथ’ के अर्थ में हुई है अर्थात् उनके साथ । अर्थात् उस इतिहासार्थ के साथ अपनी इच्छा की योजना नहीं करनी चाहिए । यहां पर ‘साथ’ का अर्थ विषयविषयिभाव है । (अधिकरण के चार अर्थों में ‘वैषयिक’ अर्थ एक है जिसमें सप्तमी हुवा करती है । अतः यहां पर विषय-विषयिभाव में सप्तमी हो गई है ।) इसीलिए वृत्ति में इसकी व्याख्या में ‘उनमें’ इस सप्तमी का प्रयोग किया गया है । इसका सार यही है कि कथा(श्रित) काव्यों में प्रथम तो अपनी इच्छा का उपयोग करता ही नहीं चाहिए जैसे कि रामाभ्युदय में यशोवर्मा के द्वारा कहा गया है कि ‘कथामार्ग
में थोड़ा सा भी अतिक्रमण नहीं होना चाहिए । और यदि इच्छा का उपयोग करना ही हो तो
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तृतीय उद्योत:
इच्छा रसानुकूल ही होनी चाहिए; विभिन्न प्रकृत रसों के विपरीत तो इच्छा का कभी प्रयोग करना ही नहीं चाहिए। उदाहरण के लिए राम की धीरोदात्तता प्रसिद्ध है। यदि कोई कवि स्वेच्छा से राम को धीरललित बनाकर उनके जीवन को शृङ्गारमय चित्रित कर दे और उन्हें नाटिका का नायक बना दे तो यह बहुत ही अनुचित बात होगी। (इसके प्रतिकूल कृष्ण में धीरोदात्तता के साथ धीरललित्य का योग अनुचित नहीं कहा जा सकता।)
वृत्तिकार ने 'कथामार्गे न चातिक्रम:' को उद्धृत किया है। यह एक प्रसिद्ध पद्य के दूसरे चरण का अन्तिम खण्ड है। पद्य यह है— औचित्यं वसां प्रकृत्यनुगतं सर्वत्र पात्रोचिता, पुष्टिः स्वश्रेय रसस्य च कथामार्गे न चातिक्रमः। बुद्धिः प्रस्तुतसंबन्धकविधो प्रौढिश्च शब्दार्थयोः, विदग्धता परिभाव्यतामवहितैरेतैदेवे वास्तु नः॥ ('प्रकृतियों के अनुकूल वाणी का औचित्य, सर्वत्र पात्रानुकूल तथा अपने अवसर पर रस की पुष्टि, कथामार्ग का अतिक्रमण न करना, प्रस्तुत की सामग्री कल्पना में शुद्धि और शब्द तथा अर्थ की प्रौढता, ध्यान देकर विद्वान लोग परिभावन करें बस, यह इतना ही हमें चाहिए।') यह पद्य भोज के शृङ्गारप्रकाश में दिया है। इसके दूसरे चरण का अन्तिम भाग 'कथामार्गे न चातिक्रम:' आनन्दवर्धन ने उद्धृत किया है और इस पर टिप्पणी करते हुए लोचनकार ने लिखा है कि यह भाग यशोवर्मा के रामाभ्युदय से लिया गया है। डा० राघवन के अनुसार यही एक ऐसा प्रमाण है जिससे यह प्रकट होता है कि यह पद्य यशोवर्मा के रामाभ्युदय में आया है। यह पुस्तक इस समय उपलब्ध नहीं होती। ईश्वरी की अष्टम शती के प्रथमार्थ में यशोवर्मा कन्नौज के राजा थे और उनके आश्रय में ही प्रसिद्ध नाटककार भवभूति भी रचना करते थे। भवभूति ने अपने नाटकों की प्रस्तावना में कुछ आलोचनाशास्त्र सम्बन्धी पद्य लिखे हैं। प्रस्तुत पद्य की विचारधारा अभिनवगुप्त के उन पद्यों से मेल खाती है। ज्ञात होता है कि प्रस्तुत पद्य भी रामाभ्युदय की प्रस्तावना में ही लिखा गया होगा। लोचन में 'जैसा कहा गया है' का उदाहरण देकर 'रामाभ्युदये यशोवर्मणा' इन शब्दों के बाद 'स्थितमिति यथाश्रय्याम' यह लिखा है और इन शब्दों को उदाहरण चिह्न से चिह्नित कर दिया गया है। यहां पर इन शब्दों का कोई सम्बन्ध समझ में नहीं आता। उदाहरणचिह्न से ऐसा ज्ञात होता है कि ये शब्द भी रामाभ्युदय के ही हैं। किन्तु रामाभ्युदय के उपलब्ध न होने से इस विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता। सम्भव है प्रस्तुत पद्य से पृथक् ये शब्द रामाभ्युदय में पहले आये हों। फिर भी केवल इतने शब्दों से अर्थ की संगति लगा सकना दुस्साध्य है। दूसरी बात यह हो सकती है कि यहां पर उदाहरणचिह्न लेखक के प्रमाद से लग गया हो और यहां पर 'स्थितमिति' के स्थान पर 'स्थिता मिति' यह पाठ हो। ऐसी दशा में 'स्थितां त्यक्त्वा' के 'स्थिति' शब्द का यह प्रतीक निर्देश हो सकता है। डा० राघवन ने यही सम्भव माना है, और यही पाठ सबसे अधिक शुद्ध प्रतीत होता है। ऐसी दशा में 'स्थितिमिति यथा श्याम्' यह भाग प्रबन्ध के दूसरे औचित्य की व्याख्या करने वाला सिद्ध होता है। ('स्थिति' का अर्थ है कथा की योजना।)
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(ध्वन्या०) कविना काव्यमुपनिबन्धनता सर्वात्मना रसपरतन्त्रेण भवितव्यम् । तत्रेतिवृत्ते यदि रसानुगुणां स्यर्थात परयेतदेमां भङ्गक्त्वापि स्वतन्त्रतया रसानुगुणं कथान्तरमुत्पादयेत् । नहि कवेरितिवृत्तमात्रनिर्वाहिणि किञ्चिल्लप्रयोजनम्; इतिहासादेव तत्सिद्धेः ।
(अनु०) काव्य का उपनिबन्धन करनेवाले कवि को पूरी आत्मा से रसपरतन्त्र होना चाहिए । उसमें यदि इतिवृत्त में रस के प्रतिकूल स्थिति देखे तो इसे तोड़कर भी स्वतन्त्र रूप में रस के अनुकूल दूसरी कथा का सृजन कर ले । केवल इतिवृत्त के निर्वाह से कविग का कोई प्रयोजन नहीं; क्योंकि उसकी सिद्धि इतिहास से हो जाती है । (लो०)—एतदेव युक्ततमित्याह—कविनेतिः । (अनु०)—यही ठीक है यह कहते हैं—‘कवि के द्वारा’ यह ।
तारावती—प्रबन्ध की रसाभिव्यंजकता का दूसरा निबन्धन यह है कि यदि इतिवृत्त के कारण कथा की कोई ऐसी योजना सामने आ जाये जो रस के अनुकूल न हो तो उस योजना को छोड़कर पुनः नई कल्पना करके अभीष्ट रस के अनुकूल कथा का उन्नयन कर लेना चाहिए । जैसा कि कालिदास के प्रबन्धों में किया गया है । उदाहरण के लिए अज इत्यादि राजाओं के विवाह का वर्णन इतिहासग्रन्थों में निरूपित नहीं किया गया है, किन्तु कालिदास ने रघुवंश में इसका वर्णन किया है । (इसी प्रकार दुर्वासा के शाप की कल्पना कालिदास ने रसानुगुणता की दृष्टि से ही की है) और अपने नाटकों में दूसरे परिवर्तन भी इस प्रकार कर लिए हैं कि पात्रों के आदर्श-परिवर्तित न करते हुए भी सदोष परिस्थितियों का सर्वथा निराकरण कर दिया है । तुलसीदास ने कैकेयी के दोषपरिमार्जन के लिए सरस्वती का उनकी जवाव पर बैठ जाना लिखा है । परशुरामजी राम को बारात से लौटने के अवसर पर मार्ग में मिले थे— अनेक रामकथा काव्यों में ऐसा ही वर्णन मिलता है । किन्तु राम के अस्त्रयुदय का उत्कर्ष दिखलाने के लिए तुलसी उनको समस्त राजाओं के सामने ही धनुष-यज्ञ की रङ्गशाला में लाये हैं । विदेहराज की प्रतिज्ञा थी कि जो धनुष की प्रत्यञ्चा चढ़ा देगा उसी से सीता का विवाह हो जायेगा । राम ने प्रत्यञ्चा चढ़ाने में धनुष को तोड़ भी दिया; यह प्रतिज्ञापूर्ति नहीं थी किन्तु राम के चरित्र का एक दोष था जिसके निराकरण के लिए तुलसी ने धनुष तोड़ने की ही प्रतिज्ञा कराई है । इसी प्रकार सर्वसेनरचित हरिविजय में प्रियतमा सत्यभामा के अनुनय के अज्ञ होने के कारण पारिजातहरण इत्यादि का निरूपण कर दिया गया है, जो कि ऐतिहासिक कथाओं में नहीं देखा गया । स्वयं आनन्दवर्धन ने अर्जुनचरित नामक एक महाकाव्य लिखा था । इस नाटक में अर्जुन के पाताल-विजय इत्यादि का वर्णन किया गया है जो कि इतिहास में प्रसिद्ध नहीं है । यही ठीक भी है । काव्यरचना में कवि को सर्वथा रस के आधीन रहना चाहिए । यदि इतिवृत्त में कोई प्रतिकूल परिस्थिति दिखाई पड़े तो उसे सर्वथा भंग कर दे और स्वतन्त्रतापूर्वक किसी दूसरी ऐसी कथा की कल्पना कर ले जो प्रकृत रस के अनुकूल हो । काव्य का फल कवि की दृष्टि से यही है कि उसे महाकवि का पद प्राप्त हो जाये और सहृदय की दृष्टि से उसका प्रयोजन है अनुरंजन के साथ उपदेश प्राप्त होना । ये प्रयोजन कथामात्र के निर्वाह से तो सिद्ध नहीं हो सकते । क्योंकि जो प्रयोजन किसी अन्य
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तृतीय
उद्योतः
उपाय से सिद्ध हो जाता है उसके लिये नवीन साधन की कल्पना नहीं की जाती। इतिवृत्त का निर्वाह तो इतिहास इत्यादि से ही हो जाता है, उसके लिये काव्य का उपादान अनावश्यक है। अतः यदि इतिवृत्त रसनिष्पत्ति का उपघातक हो तो उसे छोड़कर नई कल्पना द्वारा उसे ठीक कर लेना चाहिये।
तृतीय
उद्योतः
(ध्वन्यालोक) रसादिव्यञ्जकत्वे प्रबन्धस्य चेदमुख्यं मुख्यं निबन्धनं, यत्सन्धीनां मुखप्रतिमुखगर्भविमर्शनिर्वहणाभिधानां तदङ्गानां चोपक्षेपादीनां घटनं रसाभिव्यक्तिपक्षया, यथा रत्नावल्याम्। न तु केवलं शास्त्रसस्थितिसम्पादनेच्छया, यथा वेणीसंहारे विलासाद्यस्य प्रतिमुखसन्ध्यङ्गस्य घटनम्।
(अनु०) रस इत्यादि के व्यञ्जकत्व में प्रबन्ध का यह दूसरा मुख्य निबन्धन है कि मुख प्रतिमुख गर्भ विमर्श और निर्वहण नामवाली सन्धियों का और उपक्षेप इत्यादि उनके अंगों का रसाभिव्यक्ति की अपेक्षा करते हुये संघटन, जैसे रत्नावली में। केवल शास्त्रस्थिति सम्पादन की इच्छा से तो नहीं, जैसे वेणी संहार में विलास नामक प्रतिमुखसन्धि के अंग की घटना प्रकट रस के प्रतिकूल होते हुये भी सत के अनुसरणमात्र की इच्छा से की गई है।
तृतीय
उद्योतः
(लो०) सन्धोनामिति। इह प्रभुसम्मिततेभ्यः श्रुतिस्मृतिप्रभृतिभ्यः कर्तव्यमिदमित्यज्ञानमात्रपरमार्थेभ्यः शास्त्रेभ्यो ये न व्युत्पत्ताः, न चाङ्गस्येदं वृत्तमुश्मात्कर्मण इत्येवं युक्तियुक्तकर्मफलसम्बन्धप्रकटनकारिभ्यो मित्रमसमितेभ्य इत्यासशास्त्रेभ्यो लब्धव्युत्पत्तयः, अथ चाङ्गस्य युक्तिपादाः प्रजार्थसम्पादनयोग्यताकान्ताः राजपुत्रप्रायैः
(लो०) सन्धोनामिति। इह प्रभुसम्मिततेभ्यः श्रुतिस्मृतिप्रभृतिभ्यः कर्तव्यमिदमित्यज्ञानमात्रपरमार्थेभ्यः शास्त्रेभ्यो ये न व्युत्पत्ताः, न चाङ्गस्येदं वृत्तमुश्मात्कर्मण इत्येवं युक्तियुक्तकर्मफलसम्बन्धप्रकटनकारिभ्यो मित्रमसमितेभ्य इत्यासशास्त्रेभ्यो लब्धव्युत्पत्तयः, अथ चाङ्गस्य युक्तिपादाः प्रजार्थसम्पादनयोग्यताकान्ताः राजपुत्रप्रायैः
तृतीय
उद्योतः
स्तेषां हृदयानुप्रवेशमुखेन चतुर्वर्गोपायैयुरुपप्तिराधेया। हृदयानुप्रवेशश्च रसास्वादमय एव। स च रसरचतुर्गोपायव्युत्पत्तिनान्तरीयकविभावादिसंयोगप्रसादोपनत इत्येवं रसाचितविभावाद्युपनिबन्धे रसास्वादवैदग्ध्यमेव स्वरसभाविन्या व्युत्पत्तौ प्रयोजक-मिति प्रतीयते प्राज्ञैः।
स्तेषां हृदयानुप्रवेशमुखेन चतुर्वर्गोपायैयुरुपप्तिराधेया। हृदयानुप्रवेशश्च रसास्वादमय एव। स च रसरचतुर्गोपायव्युत्पत्तिनान्तरीयकविभावादिसंयोगप्रसादोपनत इत्येवं रसाचितविभावाद्युपनिबन्धे रसास्वादवैदग्ध्यमेव स्वरसभाविन्या व्युत्पत्तौ प्रयोजक-मिति प्रतीयते प्राज्ञैः।
तृतीय
उद्योतः
न चैते प्रीतिव्युत्पत्ती भिन्नरूपे एव, द्व्योरप्येकविषयत्वात्। विभावादौचित्यमेव हि सत्यतः प्रीतिनिदानमित्यसकृद्वोचाम विभावादीनां तद्रसचितानां यथास्वरूपवेदनं फलपर्यन्तीभूततया व्युत्पत्तिरित्युच्यते। फलं च नाम यददृष्टश्रद्धादेवताप्रसादनयतो वा जायते। न च तदुपदेश्यम्,
न चैते प्रीतिव्युत्पत्ती भिन्नरूपे एव, द्व्योरप्येकविषयत्वात्। विभावादौचित्यमेव हि सत्यतः प्रीतिनिदानमित्यसकृद्वोचाम विभावादीनां तद्रसचितानां यथास्वरूपवेदनं फलपर्यन्तीभूततया व्युत्पत्तिरित्युच्यते। फलं च नाम यददृष्टश्रद्धादेवताप्रसादनयतो वा जायते। न च तदुपदेश्यम्,
तृतीय
उद्योतः
तत उपाये व्युत्पत्तियोगात्। तेनोपायक्रमेण प्रवृत्तस्य सिद्धिः, अनुपायधारेण प्रवृत्तस्य नाश इत्येवं नायकप्रतिनायकगतत्वेनार्थोपायौ व्युत्पत्तिः कार्यी। उपायश्च कर्तृश्रीमाणः पञ्चावस्था भजते।
तत उपाये व्युत्पत्तियोगात्। तेनोपायक्रमेण प्रवृत्तस्य सिद्धिः, अनुपायधारेण प्रवृत्तस्य नाश इत्येवं नायकप्रतिनायकगतत्वेनार्थोपायौ व्युत्पत्तिः कार्यी। उपायश्च कर्तृश्रीमाणः पञ्चावस्था भजते।
तृतीय
उद्योतः
तद्यथा—स्वरूपं, स्वरूपात्किन्चिदुच्छूनतां, कार्यसम्पादनयोग्यताम्, प्रतिबन्धोपरिपातेनाशङ्क्यमानतां, निवृत्तप्रतिपक्षतायां बाधकबाधनेन सुहृदफलपर्यन्तताम्। एवमार्तिसहिष्णूनां विप्रलम्भभीरुणां प्रक्षेपपूर्वकारणात तदेव कारणोपादानम्।
तद्यथा—स्वरूपं, स्वरूपात्किन्चिदुच्छूनतां, कार्यसम्पादनयोग्यताम्, प्रतिबन्धोपरिपातेनाशङ्क्यमानतां, निवृत्तप्रतिपक्षतायां बाधकबाधनेन सुहृदफलपर्यन्तताम्। एवमार्तिसहिष्णूनां विप्रलम्भभीरुणां प्रक्षेपपूर्वकारणात तदेव कारणोपादानम्।
तृतीय
उद्योतः
ता एवंविधाः पञ्चावस्थाः कारणगता मुनिनोक्ता:— संसाध्ये फलन्योगे तु व्यापारः कारणस्य यः। तस्यानुपूर्व्या विशेया: पञ्चावस्थाः प्रयोक्तृभिः॥
ता एवंविधाः पञ्चावस्थाः कारणगता मुनिनोक्ता:— संसाध्ये फलन्योगे तु व्यापारः कारणस्य यः। तस्यानुपूर्व्या विशेया: पञ्चावस्थाः प्रयोक्तृभिः॥
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प्रारम्भरच प्रयत्नरच तथा प्राप्तेरच सम्भवः । नियनता च फलप्राप्तिः फलयोगरच पञ्चमः ॥ इति ॥
एवं या एताः कारणस्यावस्थास्तत्सम्पादकं यत्कर्तुंरितिवृत्तं पञ्चधा विभक्तम् । त एव मुख्यप्रतिमुखगर्भभाविमर्शनिर्वहणाख्या अन्वर्थनानामः पञ्च सन्धय इति वृत्तखण्डाः सन्धीयन्त इति कृत्वा । तेषामपि सन्धीनां ‘स्वानिर्वाह्यं’ प्रति तथा क्रमदर्शनाद्वान्तरभिन्ना इतिवृत्तभागाः सन्ध्यज्ञानि ‘उपक्षेपः परिकरः परिन्यासो विलोचनम्’ इत्याद्यादीनि अर्थप्रकृत्योड्टवैन्तर्भूतानि । तथा हि स्वायत्तसिद्धे बोजं बिन्दुः कार्यमिति तत्रः । बीजेन सर्वव्यापारा बिन्दुनानुसन्धानं कार्येण निर्वाहः सन्ध्यज्ञानप्रार्थनानव्यवसायरूपा ह्यतास्त्रोजैः सम्पाद्ये कर्तुं प्रकृतया स्वभावविशेषा । सचिवायत्तसिद्धौ तु तदर्थमेव वा स्वार्थमेव वा स्वार्थमपि वा प्रवृत्तत्वेन प्रकृष्टत्वप्रसिद्धत्वाभ्यां प्रकरिपतकाग्यपदेयतयोभयप्रकारसम्बन्धी व्यापारीविशेषः प्रकरोपतकाशब्दाभ्यामुक्त इति । एवं प्रस्तुतफलनिर्वहणान्तस्याधिकारकस्य वृत्तस्य पञ्चससन्धितत्वं पूर्णसन्ध्यजृम्भता च सर्वजनव्युत्पत्तिदायिनी निवन्धनीया । प्रसङ्गिके त्वितिवृत्ते नायं नियम इत्युक्तम्—
प्रासङ्गिके परार्थत्वान्न ह्येष नियमो भवेत् । इति मुनिना । एवं स्थिते रत्नावल्या धीरललितस्य नायकस्य धर्माविरुद्धसम्भोगसेवायामनौचित्याभावात् प्रयुक्तो न निस्सुखः स्वादिति श्लाघ्यत्वात् पृथ्वीराज्यमहाफलान्तरानुबन्धकन्थालाभफलोदेेशन प्रस्तावनोपक्रमे पञ्चापि सन्ध्योऽवस्थापञ्चकसहिता समुचितसन्ध्यजृम्भपरिपूर्णा अर्थप्रकृतियुक्ता दर्शिता एव । ‘प्रारम्भेऽस्मिन् स्वामिनो वृद्धिहेतोः’ इति हि बोजादेव प्रभृति ‘विश्रान्तविग्रहकथः’ इति ‘राज्यं निर्जितशत्रु’ इति च वचोभिः ‘उपभोगसेवावसरौजस्म’ इत्युपक्षेपोऽपातप्रभृति हि निरूपितम् । एतत्तु समस्तसन्ध्यजृम्भरूपं तत्पाठपृष्ठे प्रदर्श्यमानमतितमां ग्रन्थगौरवमावहति । प्रत्येकं तु प्रदर्श्यमाने पूर्वापरानुसन्धानवन्ध्यतया केवलं संमोहदायि भवतीति न विततम् । अस्यार्थस्य यत्नाद्वेधेयस्वेनेष्टत्वात् स्वकण्ठेन यो व्यतिरेक उक्तो ‘न तु केवलया’ इति तस्योदाहरणम्—न त्वति । केवलशब्दमिच्छाशब्दं च प्रयुञ्जानस्य यमाचार्यः—
भरतमुनिना सन्ध्यज्ञानां रसाढूत्पत्तिप्रकारस्योत्पादनमेव प्रयोजनमुक्तम् । न तु पूर्ववद्वदृष्टसम्पादनं वा विघ्नादिवारणं वा । यथोक्तम्— ‘इष्टस्यार्थस्य रचना वृत्तान्तस्यापकर्षयः । रागप्राप्तिः प्रयोक्तुः गुह्यानां चाव गूहनम् ॥ आश्चर्यवदभिख्यानं प्रकाशनम् । अद्भुतानां षड्विधं ह्यतद् दृष्टे शास्त्रे प्रयोजनम् ॥’ इति ।
ततश्च— ‘समीहा रतिभोगार्था विलासः परिकरीकृतः । इति प्रतिमुखसन्ध्यजृम्भविलासलक्षणे । रतिभोगशब्द आधिकारिकरसरस्थायिभावोपवास्यङ्काविमावाद्युपलक्षणार्थत्व प्रयुक्तः, यथा तत्र नारङ्गतयैव । प्रकृतो ह्यत्र वीररसः ।
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३
तृतीय उद्योतः
(अनु०) ‘सन्धियों का’ यह । यहाँ पर ‘यह करना चाहिये’ इस आज्ञामात्र परम अर्थवाले श्रुति स्मृति इत्यादि शास्त्रों से जो व्युत्पन्न नहीं हैं और नहीँ ही ‘यह इनकी बात अमुक कर्म से हुई’ इस युक्तियुक्त कर्मफलसम्बन्ध को प्रकट करनेवाले मित्रसम्प्रत् इतिहासशास्त्रोंसे व्युत्पत्ति को प्राप्त करनेवाले हैं और प्रजा के प्रयोजनसम्पादन की योग्यता से आक्रान्त जो राजपुत्र अवश्य व्युत्पन्न करने ही हैं । उनके अंदर हृदय में प्रवेश के माध्यम से व्युत्पत्ति को साधकतम करना चाहिये ।
और हृदयानुप्रवेश रसास्वादमय ही होता है । और वह रस चतुर्वर्ग में उपायभूते व्युत्पत्ति के लिये अनिवार्य विभाव इत्यादि के संयोग की कृपा से प्रास हुया है । इस प्रकार रस के योग्य विभाव इत्यादि के उपनिबन्धन में रसास्वाद की विवक्षा ही परिणमामरूप में होनेवाली व्युत्पत्ति में प्रयोजिका है इस प्रकार प्रीति ही व्युत्पत्ति की प्रयोजिका है । रस प्रीत्यात्मक होता है, वही नाटच है और नाट्य ही वेद है यह हमारे उपाध्याय (का कथन है)। ये दोनों प्रीति और व्युत्पत्ति मिल्न रूपवाली नहीं हैं; क्योंकि दोनों का विषय एक है । यह हमने कई बार कहा है कि विभाव इत्यादि का औचित्य ही सचमुच प्रीति का निदान है । विभिन्न रसों के योग्य विभाव इत्यादि का फलप्राप्तिपयन्त ठींक स्वरूपज्ञान व्युत्पत्ति कहा जाता है । और फल अदृष्टवश देवताप्रसाद से अथवा अन्य कारण से उत्पन्न होता है वह उपदेश देने योग्य नहीं होता; क्योंकि उससे उपाय में कोई व्युत्पत्ति होने का योग नहीं होता । इससे उपाय क्रम से प्रवृत्ति की सिद्धि और अनुपाय द्वारा प्रवृत्त का नाश इस प्रकार नायक और प्रतिनायक गत अर्थ और अनर्थ की व्युत्पत्ति करा दी जानी चाहिये । कर्ता के द्वारा आश्रय लिये जाने पर उपाय पाँच अवस्थाओं को प्राप्त कर लेता है । वह इस प्रकार—स्वरूप, स्वरूप का कुछ परिपोष, कार्य सम्पादन की योग्यता, प्रतिबन्ध के आ पड़ने से आशंका, प्रतिपक्ष के निवृत्त हो जाने पर बाधक के बाधन द्वारा सुदृढ़ फलपर्यन्तता । इस प्रकार कष्ट को सहन करनेवाले (लोगों का) इस प्रकार कारण का उपादान होता है । ये कारणगत पाँच अवस्थायें मुनी ने कहो हैं—
३
तृतीय उद्योतः
‘फल योग के सिद्ध किये जाने में कारण का जो व्यापार उसकी अनुपूर्वी से प्रयोक्ताओं के द्वारा पाँच अवस्थायें ज्ञात की जानी जाहिये । प्रारम्भ, प्रयत्न तथा प्राप्ति के हेतु की सम्भावना, फलप्राप्ति का नियत होना और पाँचवाँ फलयोग ।’
इस प्रकार जो कार्य की अवस्थायें हैं उनका सम्पादन करनेवाला जो कर्ता का इतिवृत्त पाँच भागों में विभक्त किया गया है वही मुख, प्रतिमुख, गर्भ, अवमर्श और निर्वहण नामक अनर्थ संज्ञावाली पाँच सन्धियाँ अर्थात् इतिवृत्तखण्ड (होती हैं) ‘जिनका सन्धान किया जाता है’ इस व्युत्पत्ति के आधार पर । उनके सन्धियों का भी अपने निर्वाह (फल) के प्रति उस प्रकार के क्रम के देखे जाने अवान्तरभिन्न इतिवृत्तभाग (होते हैं ।) सन्धि के अङ्ग हैं—उपक्षेप, परिकर, परिन्यास, विलोमन इत्यादि । अर्थप्रकृतियाँ भी इन्हीं में अन्तर्भूत (हो जाती है ।) वह इस प्रकार—स्वायत्तसिद्धि-वाले (नायक) के लिये बीज, विन्दु और कार्य ये तीन । बीज से सभो व्यापार, विन्दु से अनुसन्धान और कार्य से निर्वाह; सन्दर्शन प्रार्थना और व्यवसाय रुपवाली ये तीन अर्थ अर्थात्
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सम्पादनीय में कर्ता की प्रकृति अर्थात् स्वभावविशेष । सचिवायतत्सिद्धि में तो सचिव का उसके लिये ही अथवा अपने लिये ही अथवा अपने लिये भी प्रवृत्त होने से प्रकीर्ण और प्रसिद्ध रूपों में होने से प्रकरी और पताका इस नामकरण से दोनों प्रकारों का सम्बन्ध व्यापारविशेष प्रकरी और पताका शब्दों से कहा गया है । इस प्रकार प्रस्तुत फल के निर्वाहपर्यन्त आचारिक वृत्त की पाँच सन्धियों का होना और पूर्ण सन्धियों का अङ्ग होना सभी व्यक्तियों को व्युत्पत्ति देनेवाला निश्चित किया जाना चाहिये । कहा गया है कि प्रासङ्गिक इतिवृत्त में 'यह नियम नहीं है—
'प्रासङ्गिक में पदार्थ होने के कारण यह नियम नहीं होता ।'
यह मुनि के द्वारा । ऐसी स्थिति में घीरलक्षित नायक का सम्भोग सेवन में अनौचित्य न होने से प्रत्युत 'सुबरहित नहीं होना चाहिये' इस (नियम से) प्राशंसनीय होने के कारण पृथ्वी के राज्यरूप महाफल के अनुकूल कन्यालाभ के उद्देश्य से प्रस्तावना के उपक्रम में पाँचों सन्धियाँ पाँचों अवस्थाओं के साथ, समुचित सन्ध्यङ्गों से परिपूर्ण और अर्थप्रकृतियों से युक्त दिखलाई हो गई हैं । 'स्वामी के वृद्धिहेतु इसके प्रारम्भ करने पर' इस वीज से ही लेकर 'जिसमे विग्रह की कथा शान्त हो गई है' तथा 'शत्रुओं से जीता हुआ राज्य' इन वचनों में 'यह उपयोग सेवा का अवसर है' इन शब्दों से उपकथप से ही लेकर निपुण किया गया है । यह गूढ़ समस्त सन्ध्यङ्गों का स्वरूप उसके पाठ के आधार पर दिखलाया जाने पर अत्यन्त गहनगौरव को धारण कर लेगा । प्रत्येक रूप में दिखलाये जानपर पूर्वापर अनुसन्धान में व्यघ्न होने के कारण केवल सम्मोहदायक होगा । अतः विस्तृत रूप में नहीं दिखलाया ।
अर्थ के यत्नपूर्वक अवधान देने योग्य होने से स्वकण्ठ से जो व्यतिरेक 'केवल (शास्त्रस्थितिसम्पादन को इच्छा) से नहीं' इन शब्दों से कहा गया उसका उदाहरण देते हैं—'न तु' इत्यादि ।
'केवल' शब्द और 'इच्छा' शब्द को प्रयुक्त करने वाले का आशय यह है—भरतमुनि ने सन्ध्यङ्गों के रसाश्रित इतिवृत्त का प्राशस्त्योपादान ही प्रयोजन कहा है । पूर्वरङ्ग के समान अदृष्टसम्पादन या विघ्न इत्यादि का वारण नहीं । जैसा कहा गया है—
'दृष्ट अर्थ की रचना, वक्तृता की अपेक्षीण न होना, प्रयोग की रागप्राप्ति, गोपनीयों का गोपन, चमत्कारकारक कथन और प्रकाशनीयों का प्रकाशन—शास्त्र में अङ्गों का यह छः प्रकार प्रयोजन देखा गया है ।'
इसके बाद—
'रतिभोग के प्रयोजनवाली इच्छा को विलास कहते हैं ।'
यह प्रतिमुख सन्धि के अङ्ग विलास के लक्षण में कहा गया है । रतिभोग शब्द आधिकारिक रस के स्थायो भाव के उपयुक्त विभाव इत्यादि के उपलक्षण के रूप में प्रयुक्त किया गया है; (वेणीसंहारकार ने) ठीक तत्व को प्राप्त नहीं कर पाया । यहाँ पर प्रकृत चोररस है ।
शास्त्रमर्यादा पालन के लिये काव्यक्रिया का निषेध
तारावती—अब प्रबन्ध की रसाभिव्यञ्जकता का तीसरा तत्व लीजिये—प्रबन्ध की रसाभिव्यञ्जकता में यह एक अन्य प्रमुख नियमन है कि काव्यशास्त्र में रचना के विषय में जो सिद्धान्त तथा मानदण्ड स्थापित किये गये हैं, उनको मानना तो चाहिये और उनका पालन भी करना चाहिये किन्तु शास्त्रमर्यादापालन कभी भी लक्ष्य नहीं होना चाहिये । यदि उन व्यवस्थाओं से
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तृतीय उद्योतः
रसाभिव्यक्तिमें सहायता मिलती हो तो उनका पालन करना ठीक है, अन्यथा नहीं। (शास्त्रकार उन सम्भव उपायों का निरूपण किया करते हैं जिनसे अधिक से अधिक रस-निष्पत्ति हो सके; फिर परिस्थितियों की वैचित्रयता अवशिष्ट ही रह जाती है जिसका इत्यत्याप्रकटयन तथा परिगणन अशक्य है। अतः कलाकार का यह कर्तव्य है कि शास्त्रीय व्यवस्थाओं से उपकृत होते हुए भी वैचित्रयता पर विचार करके ही उनकी संयोजना करे।)
शिक्षा के विभिन्नरूप और काव्यक्रिया की उत्कृष्टतालोकव्यवस्था के लिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि राजपुत्र इत्यादि जिन व्यक्तियों से समाज स्वार्थसाधन की अपेक्षा करता है और जिनका प्रजा के प्रयोजनसम्पादन की योग्यता से युक्त होना अत्यावश्यक होता है उनको कर्तव्य की शिक्षा दी जावे। इसका एक उपाय है वेद और शास्त्रों द्वारा उनको उनका कर्तव्य बतलाना। किन्तु वेद शास्त्र इत्यादि समस्त उपदेशप्रधान शास्त्रों का परम अर्थ होता है ‘ऐसा करना चाहिये’—यह आज्ञामात्र प्रदान करना। (किन्तु आज्ञा का अनुवर्तन सरल नहीं होता, एक तो तुच्छ वृत्तियाँ बलात् कुपथगामिनी बना देती हैं और शास्त्रमर्यादा दूर ही रख्खी रह जाती है, दूसरे अपने को बुद्धिमान समझने और दूसरे की आज्ञा का पालन करने में हीनभाव अनुभव करने को मनुष्य को दुबलता। राजपुत्र इत्यादि को शास्त्र की आज्ञा का पालन करने से रोकती रहती है और इस उपाय से बहुत कम इन्द्रियजयजी लोग ही कर्तव्य-पालन की ओर अग्रसर हो सकते हैं) सामान्यतः राजपुत्र इत्यादि को वेदशास्त्र के विधान से कर्तव्यज्ञान नहीं होता। दूसरा उपाय है इतिहास और दर्शनशास्त्रों से व्युत्पत्ति उत्पन्न करना। इनका निर्देश मित्रसम্মित उपदेश जैसा होता है। इनका कार्य होता है यह ज्ञान करा देना कि अमुक व्यक्ति की अमुक दशा अमुक कर्म्म से हुई है। इस प्रकार युक्तियुक्त कर्म्म तथा मूल सम्बन्ध को प्रकट करनेवाले इतिहास तथा दर्शनशास्त्र के वाक्य मित्रसम्मित उपदेश जैसे होते हैं। उनसे भी राजपुत्रादिकों को व्युत्पत्ति की प्राप्ति नहीं होती। (कारण यह है कि जिस प्रकार राजसम्मत वेदशास्त्र वाक्यों का राजा के आदेश के समान अपना अपमान समझकर प्रत्याख्यान किया जा सकता है और उसके प्रतिकूल आन्दोलन इत्यादि किया जा सकता है उसी प्रकार इतिहास पुराण दर्शन इत्यादि मित्रसम्मित वचनो को मित्र की सम्मति के समान ठुकराया जा सकता है।) उन राजपुत्रादिकों को कर्तव्य का उपदेश देना अनिवार्य होता है और वेद-शास्त्रादि तथा इतिहास-पुराणादि के वचन अक्षरशः हो जाते हैं तब उनके चन्दर हृदय में प्रवेश के द्वारा चतुर्वर्ग के उपायों की व्युत्पत्ति (योग्यता) का आधान करना उचित होता है। हृदय में प्रवेश रसास्वादमय ही होता है तथा आनन्द-साधना ही उसमें प्रधान होती है। (इसीलिये काव्यप्रकाशकार ने रसास्वादमय काव्य को कान्तासम्मित उपदेश कहा है।) आनन्दसाधना या रसास्वाद विभाव, अनुभाव और सञ्चारी भाव के संयोग से ही प्राप्त होता है और वह विभावादि संयोग जब तक सम्पन्न नहीं होता तब तक चतुर्वर्ग की व्युत्पत्ति भी नहीं हो सकती। इस प्रकार विभावादिसंयोग चतुर्वर्गव्युत्पत्ति में अवश्यम्भावी होता है और विभावादिसंयोग रसास्वादन का भी प्रवर्त्तक होता है। इस प्रकार रसास्वादन के योग्य विभाव इत्यादि का जब उपनिबन्धन किया जाता है तब उसका परिशीलन करनेवाला मनो विवश होकर रसास्वादन करने लगता है। विभावादिसंयोग के
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परिशीलन से हमारे हृदय में बलात् रसास्वादन की प्रवृत्ति हो जाती है ओर न चाहते हुये भी हम आनन्दानुभव करने लगते हैं। उसी आनन्दसाधना के साथ परिणाम स्वरूप बाद में व्युत्पत्ति का अवगम होता है, उस व्युत्पत्ति में रसास्वादन ही प्रवर्तक का रूप धारण करता है। इस प्रकार व्युत्पत्ति की प्रयोजिका भी प्रीति ही होती है। रस की आत्मा प्रीति ही है, उसी को नाट्य कहते हैं और नाट्य ही वेद कहलाता है। आशय यह है कि कवि को विभावादि की संयोजना करनी पड़ती है। जिससे स्वाभाविक रूप में आस्वादन प्रवृत्त हो जाता है; काव्यरसास्वादन के साथ ही अनुषङ्गिक रूप में धर्मादि चतुर्वर्ग की व्युत्पत्ति भी हो जाती है; उस व्युत्पत्ति की प्रयोजिका प्रीति होती है। राजपुत्र इत्यादि विनय व्यक्ति जब विभाव इत्यादि का परिशीलन करते हैं तब कवि अनायास ही उनके हृदय में प्रवृष्ट होकर रससञ्चार करता है और वे परवश-से होकर उस रस का आस्वादन करने के लिये बाध्य हो जाते हैं। उसके साथ ही उनके अदर उचित-अनुचित कर्तव्याकर्तव्य की व्युत्पत्ति भी उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार व्युत्पत्ति को उत्पन्न करनेवाली प्रीति ही होती है। (क्योंकि विनेय व्यक्ति रस के माध्यम से सम्पादित व्युत्पत्ति को ग्रहण करने के लिये बाध्य होता है अतः व्युत्पत्तिसम्पादन का यह प्रकार वेदादि तथा पुराणादि दोनों साधनों से अधिक अच्छा होता है।) प्रीति और व्युत्पत्ति भिन्न रूपवाली नहीं होती; क्योंकि दोनों का विषय एक ही होता है। यह तो हम कई बार बतला चुके हैं कि वास्तव में प्रीति का मूलकारण विभाव इत्यादि का औचित्य ही है। व्युत्पत्ति भी कोई अन्य वस्तु नहीं है अपितु विभिन्न रसों में जो विभाव इत्यादि उचित होते हैं उनके स्वरूप को ठीक-ठीक समझना और उन समस्त उपकरणों को फलपर्यन्त ले जाना ही व्युत्पत्ति कहलाता है। विभावादि का परिपोष ही रसरूपता में परिणत होता है, अतः प्रीति और व्युत्पत्ति दोनों का रूप भिन्न नहीं होता। अब काव्य द्वारा सम्पादनीय फल के विषय में विचार कर लेना चाहिये। लोक में फल अनेक साधनों से प्राप्त हो सकता है। कभी फल भाग्यवश ही प्राप्त हो जाता है; कभी देवाराधन से देवताओं की कृपा के रूप में फलप्राप्ति होती है; कभी अन्य कोई साधन उपस्थत हो जाता है (जैसे किसी मित्र की सांयोगिक सहायता आदि।) ये समस्त फल काव्य के विषय नहीं होते और न कवि का उद्देश्य इस प्रकार के फल का उपदेश देना ही होता है, क्योंकि यह कि, जैसे कि बतलाया जा चुका है, काव्य का प्रमुख प्रयोजन होता है विनेय व्यक्तियों को सन्मार्ग का उपदेश देना जिससे वे उचित मार्ग को समझ सकें। भाग्य इत्यादि से जो फलप्राप्ति होती है उससे किसी प्रकार के साधन की शिक्षा नहीं मिलती। अतः ऐसी व्युत्पत्ति का उपदेश देना चाहिये कि जो व्यक्ति ठीक उपायों का क्रमबद्ध रूप में आश्रय लेता है उसे सफलता मिल सकती है और जो व्यक्ति ऐसे उपायों का सहारा लेता है, जो सफलता में कारण नहीं हो सकते, उसका नाश हो जाता है। नायक में उपाय दिखला कर उसकी सफलता दिखलाई जानी चाहिये और प्रतिनायक में मिथ्या उपाय दिखलाकर उनसे उद्भूत अनर्थ दिखलाये जाने चाहिये। इससे परिशीलकों को उचित तथा अनुचित उपायों की व्युत्पत्ति हो जाती है। (यहाँ पर बतलाया गया है कि देवाराधन से उद्भूत फल काव्य का विषय नहीं होता। इसके प्रतिकूल कुछ काव्यों में देताताप्रसाद से सफलता होती हुई दिखलाई जाती हैं। यहाँ पर यह समझ लेना चाहिये कि
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तृतीय उद्योत:
यदि कोई व्यक्ति माला जपते हुये ही सफलता प्राप्त कर ले उस प्रकार का फल काव्य का विषय नहीं होता । यही आचार्य का आशय है । आस्तिकता स्वयं एक सन्मार्ग है । यदि कोई गुणवान् व्यक्ति अन्यायों से पराहत होकर अच्छे मार्ग को न छोड़ते हुये भगवत्सहायता को भी प्राप्त कर लेता है तो उसका निषेध करना आचार्य का लक्ष्य नहीं है ।
कर्ता जिस उपाय का आश्रय लेता है वह पाँच अवस्थाओं में विभक्त किया जाता है । वे पाँच अवस्थायें हैं (१) सर्वप्रथम उपाय का स्वरूप प्रदर्शित करना अर्थात् यह निर्देश करना कि अमुक उपाय अमुक कार्य के साधन में प्रयुक्त किया गया है । (२) स्वरूप से कुछ आगे बढ़ना अर्थात् उपाय का कार्यसाधन की दिशा में परिपोष । (३) उपाय में कार्यसम्पादन की योग्यता का प्रदर्शन । (४) प्रतिबन्धक के आ जाने से जहाँ कार्यसिद्धि सन्दिग्ध हो जावे और (५) प्रतिपक्ष के निवृत्त हो जाने पर बाधन के बाधक के द्वारा सुदृढ़ फल पर्यन्त (बीज को ले जाना ।) (लोचन के प्रस्तुत पाठ से यही अवस्थाये सिद्ध होती हैं । किन्तु इस व्याख्या से पाँचों सन्धियों की सङ्ज्ज्ञति ठीक नहीं बैठती । उक्त विभाजन के अनुसार तृतीय अवस्था में कार्यसम्पादन की योग्यता और चतुर्थ अवस्था में साधनासिद्धि का सन्दिग्ध होना सिद्ध होता है । जबकि काव्यशास्त्रीय विवेचन के अनुसार तृतीय सन्धि में ही कार्यसिद्धि की सन्दिग्धता प्रस्तुत की जानी चाहिये । इसी प्रकार उपर्युक्त विभाजन में सफलता का निश्चय यह चौथी अवस्था और सफलता की प्राप्ति-इन दोनों को एक कर दिया गया है जो कि प्रसिद्धविभाजन के प्रतिकूल भी है और तर्कसङ्ज्ञत नहीं है । प्रतापरुद्रीय में इस प्रकार व्याख्या की गई है—प्रथम अवस्था में स्वरूप का कुछ आगे बढ़ना, द्वितीय अवस्था में कार्यसम्पादन की योग्यता, तृतीय अवस्था में प्रतिबन्धक की उपस्थिति से फल का सन्दिग्ध होना, चतुर्थ में प्रतिबन्धक की निवृत्ति से कार्य का निश्चय और पञ्चम में बाधक के बाधन के द्वारा सुदृढ़ फल पर्यन्तता । यह विभाजन प्रसिद्धि के अनुकूल भी है और तर्कसङ्ज्ञत भी । इसमें 'स्वरूपम्' यह सामान्य शब्द रखा गया है, 'स्वरूपात् किश्चित्-वृद्ध्यनन्तरम्' यह प्रथम अवस्था मानी गई है । 'निवृत्तप्रतिपक्षतायाम्' के बाद 'कार्यस्य निश्चयावस्थाम्' इतना और जोड़ कर चतुर्थ अवस्था मानी जा सकती है और 'सुदृढ़ फल पर्यन्तता' यह पञ्चम अवस्था । थर्म तथा विधनों को सहन करनेवाले, कार्य की असफलता से भयभीत तथा समझ-बूझकर काम करनेवालों का कारणों का उपादान इसी प्रकार का हुआ करता है । वे कारण में रहनेवाली ५ प्रकार की अवस्थायें मुनि ने इस प्रकार कही हैं—
'कारण का फल से योग (काव्य और नाट्य में) साध्य होता है । उसमें कारण का जो व्यापार होता है, प्रयोक्ता लोगों को चाहिये कि आनुपूर्वी अर्थात् क्रमिकता के द्वारा पाँच अवस्थाओं को समझ लें । प्रारम्भ, प्रयत्न, प्राप्ति की सम्भावना (अथवा असम्भावना) नियतफल-प्राप्ति और पाँचवीं फल योग (ये क्रमशः ५ अवस्थायें होती हैं) ।
इस प्रकार जो ये ५ कारण की अवस्थायें हैं उनका सम्पादनकर्ता का इतिवृत्त होता है । वह इतिवृत्त ५ भागों में विभक्त किया गया है । इन भागों को ५ सन्धियों के नाम से अभिहित किया जाता है । (सन्धि शब्द सम् उपसर्ग 'धा' धातु से कर्म में 'कि' प्रत्यय होकर बना है ।)
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१२२ ध्वन्यालोके बना है । इस व्युत्पत्ति के अनुसार इसका अर्थ होगा जिनका सन्धान किया जावे उन्हें सन्धि कहते हैं । सन्धान इतिवृत्त का किया जाता है । अतः इतिवृत्त-खण्डों को सन्धि कहते हैं । इन पाँच सन्धियों के नाम हैं—मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श और निर्वहण । ये अन्वर्थ संज्ञायें हैं अर्थात् इनकी परिभाषा शब्दार्थ से ही अवगत हो जाती है । (मुख का अर्थ है प्रारम्भ । अतः प्रारम्भ में बीज की उत्पत्ति को मुखसन्धि कहते हैं । प्रतिमुख शब्द का अर्थ है जिसमें प्रतिष्ठित किया जावे या आगे बढाया जावे अथवा मुख के प्रतिकूल बढा जावे । प्रतिमुखसन्धि में एक तो मुखसन्धि के निर्दिष्ट बीज को आगे बढाया जाता है दूसरे प्रयत्न के प्रारम्भ होने से कभी बीज प्रकट रहता है कभी अप्रकट । यह स्थिति मुख के प्रतिकूल होती है क्योंकि मुखसन्धि में बीज प्रकट ही रहता है । गर्भ शब्द 'भू' धातु से भन् प्रत्यय होकर बनता है जिसका अर्थ है निगरण कर लेना गुप्त कर लेना या कृषि में छिपा लेना । इस सन्धि में बीज गर्भित हो जाता है अतः इसे गर्भसन्धि कहते हैं । विमर्श शब्द में 'वि' उपर्सर्ग का अर्थ है छानवीन अतः जहाँ छानवीन से बीज का परिज्ञान हो और छानबीन से ही सफलता भी प्रतीत हो वहाँ विमर्शसन्धि होती है । निर्वहण का अर्थ है निर्वाह । इसमें बीज का निर्वाह कर दिया जाता है अतः इसे निर्वहणसन्धि कहते हैं । इस प्रकार सन्धियों की ये अन्वर्थ संज्ञायें हैं । इन सन्धियों के द्वारा फल का निर्वाह किया जाता है । उस निर्वाह्य फल के प्रति इन सन्धियों में एक-एक के अन्दर अवान्तर क्रम भी देखा जाता है । अतः इन सन्धियों के अवान्तर भेद के रूप में भी इतिवृत्त के टुकडे कर लिये जाते हैं । सन्धियों के इन अवान्तर भेदों को सन्ध्यङ्ग कहते हैं । वे हैं—उपक्षेप, परिकर, परिन्यास, विलोमन इत्यादि । (मुखसन्धि के उपक्षेप इत्यादि १२ भेद होते हैं । प्रतिमुख के विलास इत्यादि १३ भेद होते हैं । गर्भ सन्धि के अमृताहरण इत्यादि १२ भेद होते हैं । विमर्श के अपवाद, संफेट इत्यादि १३ भेद होते हैं और निर्वहण के सन्धिमे विवोध ग्रंथन इत्यादि १४ भेद होते हैं । इनके लक्षण और उदाहरण नाट्यशास्त्र के ग्रन्थों में विस्तारपूर्वक दिये हुए हैं । इनको वहीं देखना चाहिये । अप्रासङ्गिक विस्तार-भय से यहाँ पर विवेचन नहीं किया जा रहा है ।)
अर्थप्रकृतियों का सन्धियों में अन्तर्भाव अर्थप्रकृतियों का अन्तर्भाव भी इन्हीं में हो जाता है । वह इस प्रकार—नायक तीन प्रकार का होता है—स्वायत्तसिद्धि, सचिवायत्तसिद्धि और उद्यायतत्सिद्धि । स्वायत्तसिद्धिवाला नायक वह होता है जिस की सफलता स्वयं उसके हाथ में हो । इस प्रकार के नायक की अर्थप्रकृतियाँ तीन होती हैं—बीज, विन्दु और कार्य । अर्थप्रकृति शब्द का अर्थ है प्रयोजन की सिद्धि में हेतु । स्वायत्तसिद्धि वाले नायक को यही तीन अर्थ प्रकृतियाँ बतलाई गई हैं । बीज का अर्थ है सभी व्यापार । विन्दु का अर्थ है अनुसन्धान और कार्य का अर्थ है निर्वाह । बीज का रूप है सन्दर्शन अर्थात् निर्देश । (कार्य को सिद्ध करने वाला जो हेतु प्रारम्भ में बहुत ही स्वल्प मात्रा में निर्दिष्ट किया गया हो और जिसका नाटक के अपि्रम भाग में विशेष विस्तार होने वाला हो उसे बीज कहते हैं । प्रारम्भ में बीज बहुत छोटा होता है और बाद में विस्तृत होकर वृक्ष का रूप धारण कर लेता है उसी प्रकार नाट्यबीज प्रारम्भ में बहुत संक्षिप्त होता है किन्तु बाद में अनेक प्रकार से विस्तृत होकर नाटक इत्यादि का रूप धारण कर लेता है ।) विन्दु सम्प्रार्थना रूप होता है । इसमें बीज को फल से मिलाने की सम्प्रार्थना या आकांक्षा
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तृतीय
उद्योतः
की जाती है । (जिस प्रकार तालबिन्दु जल में बहुत प्रकार से फैल जाता है उसी प्रकार नादच-बिन्दु भी अग्निम कथाभाग में फैलता जाता है । नाटक में प्रायः छोटे-छोटे प्रयोजन होते हैं और इनकी पूर्ति भी थोड़ी-थोड़ी दूर पर होती चलती है तब कथा भाग रुकता-सा जान पड़ता है, वहाँ पर कोई ऐसा तत्व (Point) आ जाता है जो कथाभाग को आगे बढ़ा देता है यही बिन्दु कहलाता है ।) कार्य का रूप होता है व्यवसाय । (कार्य नाट्यफल को कहते हैं यह फल धर्म, अर्थ और काम इन तीनों में कोई एक दो या तीन हो सकते हैं । इस फल को सिद्ध करने के लिये जो व्यवसाय किया जाता है उसे ही कार्य कहते हैं ।) इस प्रकार ये तीन अर्थ अर्थात् सम्पादनीय (कार्य) में कर्ता की प्रकृतियाँ अर्थात् विशेष स्वभाव होते हैं । यह तो हुई स्वायत्त-सिद्धिवाले नायक की बात । जब सचिवायत्तसिद्धि को लीजिये । सचिवायत्तसिद्धि में सचिव या तो उस राजा के लिये ही प्रवृत्त होता है, या अपने लिये ही अथवा अपने लिये भी (अर्थात् दोनों के लिये) प्रवृत्त होता है । अतः उसका कार्य या तो प्रकर्ण (अर्थात् सज्जन से युक्त फेंका हुआ या कथा में मिलाया हुआ) होता है या प्रसिद्ध । यदि प्रकर्ण होता है तो उसे प्रकरी कहते हैं और यदि प्रसिद्ध होता है तो उसे पताका कहते हैं । इस प्रकार आधिकारिक कथावस्तु में प्रारम्भ से प्रस्तुत फल के निर्वहण पर्यन्त पाँचों सन्धियाँ और सभी सन्धियों के अङ्ग इस प्रकार निबद्ध किये जाने चाहिये जिससे सभी व्यक्तियों को व्युत्पत्ति प्राप्त हो सके । किन्तु यह नियम प्रासङ्गिक इतिवृत्त में नहीं लागू होता । यह बात मुनि ने कही है—
'प्रासङ्गिक में परार्थ होने के कारण यह नियम नहीं लगता ।'
तृतीय
उद्योतः
उपर नाट्यरचना में इतिवृत्त के निर्वाह का संक्षिप्त दिग्दर्शन कराया गया है । अब रत्नावली का उदाहरण लीजिये । रत्नावली के नायक हैं वत्सराज उदयन । सम्भोग का सेवन घोरललित नायक का अवच्छेदक धर्म है । अतः ऐसे सम्भोग का सेवन जो धर्म के विरुद्ध नहीं है (घोरललित नायक के (लिये) अनुचित नहीं कहा जा सकता । किन्तु जीवन में धर्म, अर्थ और काम का सन्तुलन और अविरोध ऐहलौकिक और पारलौकिक सुख का एकमात्र साधन है । (जीवन में धर्म के साथ अर्थ और काम का भी उतना ही महत्व है ।) धर्मशास्त्र का नियम है कि 'जीवन सुख रहित नहीं होना चाहिये ।' इस नियम के अनुसार वत्सराज का शृङ्गार सेवन अनुचित नहीं कहा जा सकता । उनका वह शृङ्गारसेवन श्लाघ्य ही है । एक तो उसमें कन्यारत्न की प्राप्ति एक बहुत बड़ा फल है दूसरे पृथ्वी के राज्य की प्राप्ति का एक दूसरा बहुत बड़ा लाभ और सम्मिलित है । उसी उद्देश्य से नाटक की प्रवृत्ति हुई है । उसमें प्रस्तावना के उपक्रम में (बीज को प्रस्तुत कर उसको क्रमबद्धता के साथ फलपर्यन्त ले जाने में) पाँचों कार्यावस्था और पाँचों अर्थ प्रकृतियों के संयोग से पाँचों सन्धियाँ दिखलाई गई हैं और जहाँ तक सम्भव हो सका है उन सन्धियों के अङ्ग भी दिखलाये गये हैं । 'यह कार्य स्वामी की वृद्धि के लिये प्रारम्भ किया गया'...... इस कथन में बीज सन्निहित है; 'विप्रह की कथा शान्त हो गई.....' 'राज्य में शत्रु जीत लिये गये' इत्यादि वचनों के द्वारा 'यह उपभोग सेवा का अवसर है' यहाँ से मुखसन्धि के उपक्शेप नामक (प्रथम) अङ्ग से ही प्रारम्भ करके सभी प्रकार की सन्धियों और अधिक से अधिक सन्ध्यङ्गों को दिखलाया गया है । यदि
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१२४ ध्वन्यालोके रत्नावली के पाठ के आधार पर सभी उदाहरण देकर नाट्यशास्त्र के सभी सन्ध्यङ्गों को समझाया जावे तो व्यर्थ ही ग्रन्थ का अत्यन्त विस्तार हो जावेगा । यदि प्रत्येक सन्धि के एक-आघ उदाहरण देकर सन्तोष किया जावे तो पाठक व्यर्थ में ही भ्रम में पड़ जावेगा । इसलिये मैं यहाँ पर इनको विस्तार के साथ नहीं समझा रहा हूँ । (दशरूपक इत्यादि नाट्य शास्त्रीय ग्रन्थों में अधिकतर रत्नावली से ही उदाहरण दिये गये हैं । अतः वहीं देखना चाहिये ।)
शास्त्रस्थितिसम्पादनेच्छा निषेध और वेधीसंहार का उदाहरण
यहां पर कहने का मन्तव्य यही है कि जिस प्रकार रत्नावली में सन्धि और सन्ध्यङ्गों का निर्वाह प्रकृति के औचित्य और रस की मर्यादा को ध्यान में रखकर किया गया है उसी प्रकार यदि इन अंगों का समावेश किया जाता है तब तो प्रबन्ध रसाभिव्यञ्जक होता है । यदि इसके प्रतिकूल रस और प्रकृतियों का विचार छोड़कर केवल शास्त्रमर्यादापरिपालन के लिये ही इन सबके सन्निवेश की चेष्टा की जाती है और उसमें केवल शास्त्रस्थितिसम्पादन की इच्छा ही प्रयोजक होती है वह प्रबन्ध रसाभिव्यञ्जक करके केवल रससंघ का ही साधन बन जाता है शास्त्रमर्यादापालन करते न करने का प्रश्न इतना महत्वपूर्ण है कि इसका यत्नपूर्वक ध्यान अभीष्ट होता है । इसलिये ध्वनिकार ने नियम भी बतलाया और उसके अभाव के स्थान का भी निर्देश इन शब्दों में किया कि 'केवल शास्त्रस्थितिसम्पादन की इच्छा से सन्धि तथा सन्ध्यङ्गों का पालन नहीं करना चाहिये ।' तथा आलोककारने जहां नियम का उदाहरण दिया वहां व्यतिरेक का भी उदाहरण दिया है : 'केवल शास्त्रस्थिति सम्पादन की इच्छा से नहीं'
इस वाक्य में केवल शाब्द और इच्छा के प्रयोग का आशय यह है—शास्त्रों में प्रायः समस्त विधियां दो प्रकार की होती हैं । एक तो कर्मकाण्डस्तर की, जिनका पालन करना अनिवार्य होता है । (जैसे गोरोखपूरन के नवग्रह इत्यादि के लिये जितनी शास्त्रीय विधि होती है उसका अनिवार्य रूपमें पालन किया जाता है ।) भरतमुनि ने पूर्वरङ्ग का इसी प्रकार का विधान किया है जिसका फल होता है अदृष्टसम्पादन और विघ्न इत्यादि का निवारण । अतः पूर्व-रङ्ग की समस्त विधि अनिवार्य हैं । दूसरे प्रकार की विधि ऐसी होती है जिसके पालन के लिये प्रयोक्का स्वतन्त्र होता है । उन विधियों की शास्त्र में चर्चा इसीलिये की जाती है कि वे कुछ ऐसे तत्त्व होते हैं जिनके आधार पर गुणावगुणों की परीक्षा तथा विचार किया जा सकता है और सामन्यतः । उनका पालन श्रेयस्कर होता है । (जैसे धर्मशास्त्रों में विस्तारपूर्वक विचार किया गया है कि कैसी कन्या से विवाह करना चाहिये । यदि उन बतलाये हुये गुणों में कुछ व्यक्तिगत परिस्थिति के अनुकूल न हों तो उनका पालन नहीं करना चाहिये । शास्त्र-कार का वहां यही आशय होता है कि ऐसा करना प्रशस्त होता है ।) भरतमुनि द्वारा बतलाई हुई सन्धि और सन्ध्यङ्गों की विधि पूर्वरङ्ग के समान अनिवार्य नहीं, अपितु रसाभिव्यक्तिवृत्त में प्राशस्त्य का सम्पादन करनेवाली ही है । यह बात भरतमुनि ने स्वयं कहो है—
'शास्त्र में ऋज्जनों का यह छः प्रकार का प्रयोजन देखा गया है । इष्ट अर्थ की रचना, वृत्तान्त का क्षीण न होना, अभिनयदर्शन से सामाजिकों के मनोरञ्जन की समृद्धि, गोपनीय तत्वों का गोपन, चमत्कार कारक कथन और प्रकाशनीय तत्वों का प्रकाशन ।'
यदि ये अभीष्ट सिद्ध न हो रहे हों प्रस्तुत बन्धों से रस में व्याप्ति उत्पन्न हो रहा
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३
तृतीय उद्योतः
हो तो शास्त्रमर्यादापालन के लिये ही काव्य या नाट्य में उनका समावेश नहीं करना चाहिये। जैसा कि वेणीसंहार में किया गया है। वेणीसंहार में अनेक वीरों का संक्षय उपस्थित है; महाभारत का युद्ध होने जा रहा है उसी प्रसङ्ग के अन्दर दुर्योधन अन्तःपुर में जाते हैं और वहाँ उनका भानुमती से शृङ्गार का विस्तार वर्णित किया जाने लगता है। कवि ने यह सब अप्रस्तुत तथा अवसर के प्रतिकूल इसलिये किया है कि उसे प्रस्तुतमुखसन्धि के अङ्ग विलास की पूर्ति करनी है। विलास की भरतमुनि ने यह परिभाषा दी है—‘रतिभोग के प्रयोजनवाली इच्छा को विलास कहा जाता है।’
३
तृतीय उद्योतः
वस्तुतः वेणीसंहार के लेखक भट्टनारायण ने इस प्रकरण का ठीक अर्थ समझ नहीं पाया है। यहाँ पर ‘रतिभोग के प्रयोजनवाली इच्छा’ का यथाश्रुत अर्थ नहीं है, अपितु यह शब्द उपलक्षणपरक है। अतः इसका अर्थ हो जाता है—जिस रस का आधिकारिक के रूप में उपादान किया गया हो उसका स्थायिभाव। अतः शृङ्गार का प्रयोजन रतिभोग की इच्छा है और वीररस का प्रयोजन उत्साह की इच्छा है। वेणीसंहार में वीररस प्रकृत है अतः विलास पुष्टि के लिये रतिभोगेच्छा का नहीं अपितु उत्साहेच्छा का विस्तार किया जाना चाहिये।
३
तृतीय उद्योतः
इदं चापरं प्रबन्धस्य रसवृत्तिकत्वे निमित्तं यदुद्धोपप्रशमने यथावसरमनन्तरा रसस्य यथा रत्नावल्यामेव
(ध्वन्या०)—इदं चापरं प्रबन्धस्य रसवृत्तिकत्वे निमित्तं यदुद्धोपप्रशमने यथावसरमनन्तरा रसस्य यथा रत्नावल्यामेव
३
तृतीय उद्योतः
(अनु०) यह दूसरा प्रबन्ध की रसवृत्तिकता में निमित्त है कि अवसर के अनुसार रस के बीच में उद्दीपन और प्रशमन (होने चाहिये)। जैसे रत्नावली में ही।
३
तृतीय उद्योतः
(लो०)—उद्दीपन इति। उद्दीपनं विभावादिपरिपूरण्या। यथा ‘अयं स राआ उदयणो त्ति’ इत्यादि सागरिकया। प्रशमनं वासवदत्तातः पलायने। पुनरुद्दीपनं चित्रफलकोलेखे। प्रशमनं सुसङ्गताप्रवेशे इत्यादि। गाढं ध्यानवरतपरिमृदितो रसः सुकुमारमालतीकुसुमवज्ज्घाटित्येव म्लानिमवलम्बते। विशेषतस्तु शृङ्गारः। यदाह मुनिः—
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तृतीय उद्योतः
यद्वारामाभिनिवेशितं यतश्च विनिवायर्ते । दुःलंभत्वं यतो नार्याः कामिनः सा परा रतिः ॥
यद्वारामाभिनिवेशितं यतश्च विनिवायर्ते । दुःलंभत्वं यतो नार्याः कामिनः सा परा रतिः ॥ इति।
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तृतीय उद्योतः
वीररसादावपि यथावसरमुद्दीपनप्रशमनाभ्यां विना झटित्येवाद्भुतफलकल्पे साध्ये लब्धे प्रकटीचिकीर्षित उपायोपेयभावो न प्रदर्शित एव स्यात् ।
वीररसादावपि यथावसरमुद्दीपनप्रशमनाभ्यां विना झटित्येवाद्भुतफलकल्पे साध्ये लब्धे प्रकटीचिकीर्षित उपायोपेयभावो न प्रदर्शित एव स्यात् ।
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तृतीय उद्योतः
‘उद्दीपन’ यह। यह विभावादि परिपूर्ण के द्वारा उद्दीपन जैसे सागरिका का ‘यह वह राजा उदयन है’ इत्यादि। प्रशमन जैसे वासवदत्ता से पलायन में। फिर उद्दीपन जैसे चित्रफलक के उल्लेख में। प्रशमन सुसङ्गता के प्रवेश में इत्यादि। गाढरूप में निरन्तर ध्यान में मग्न हुआ रसकुमार मालती कुसुम के समान शीघ्र ही मलिनता को प्राप्त हो जावे और विशेषरूप में शृङ्गार। जैसा कि मुनि ने कहा—
३
तृतीय उद्योतः
‘जो कि विपरीत अभिनिवेश होता है, जो कि मना किया जाता है जो कि नारी दुलर्भ होती है कामियों की वह बहुत बड़ी रीति है ।’
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वीररस इत्यादि में भी अवसर के अनुसार उद्दीपन और प्रशमन के बिना शीघ्र ही अद्भुत फल के समान साध्य के प्राप्त हो जाने पर जिस उपायोपेयभाव के प्रकट करने की इच्छा है वह प्रदर्शित हो ही नहीं सकता।
तारावती—प्रबन्ध की रसव्यंजकता का चौथा निमित्त है अवसर को समझकर बीच-बीच में रसको उद्ददीप्त करना और बीच-बीच में शान्त करना। जो आधिकारिक रस प्रकान्त किया गया हो उसको निरन्तर प्रगाढ़ रूप में परिपुष्ट करते रहने की चेष्टा नहीं करनी चाहिये। रस को बीच-बीच में उद्द्दीप्त करने का अर्थ है उसमें उचित भाव इत्यादि की पूर्ण योजना करते हुये प्रकाशित करना (प्रशमन का अर्थ है उसको विरष्ठित कर आस्वाद की धारा को विच्छिन्न कर देना) इसका भी उदाहरण रत्नावली से ही दिया जा सकता है।
रत्नावली में मदनपूजन के अवसर पर उदयन का नाम सुनकर सागरिका कहती है कि ‘ये वही राजा उदयन है’। यहाँ पर सागरिका की शृंगारभावना उद्ददीप्त होती है फिर वासवदत्ता के भय से जब सागरिका भागने लगती है तब उस भावना का प्रशमन हो जाता है। फिर चित्रफलक के उल्लेख में उस भावना का पुनः उद्ददीपन होता है; सागरिका का तन्मयतापूर्वक राजा का चित्रचित्रण, सखी के सामने कामदेव के चित्र बनाने का बहाना, सखी का निकट ही रति के रूप में सागरिकानामधारिणी रत्नावली का चित्र बना देना, वानर के सम्भ्रम से चित्र को छूट जाना और वह राजा द्वारा प्राप्त करना इत्यादि समस्त प्रकरण में पुनः शृंगारभावना का उद्ददीपन होता है पुनः वासवदत्ता की सखी सुसंगता के प्रवेश करने पर इस भावना का प्रशमन हो जाता है।
(फिर सागरिका की सखी से संकेतस्थान नियत करने में शृंगारभावना की उद्ददीप्ति और सागरिका के वेश में वासवदत्ता के आ जाने से उस भावना का प्रशमन, यही क्रम चलता रहता है।) इस प्रकार ठीक अवसर पर उद्ददीपन और ठीक अवसर पर प्रशमन होने से शृंगार रस के अन्दर औरसता नहीं आने पाती और बार-बार उद्ददीप्त तथा प्रशान्त होकर शृंगारभावना परिपोषकों का अनुरंजन करने में सर्वथा समर्थ हो जाती है।
यदि एक ही रस का निरन्तर परिपोषण किया जावे तो वह उसी प्रकार मलिन हो सकता है जैसे सुकुमार मालती का पुष्प निरन्तर मसलने से मलिन हो जाती है। यह बात शृंगार के विषय में विशेष रूप से कही जा सकती है; क्योंकि शृंगार में तो प्रच्छादनपूर्वक निर्वाह ही आनन्ददायक होता है।
मुनि ने कहा है—‘स्त्रियों की वामाचरण की अभिलाषा होती है अर्थात् स्त्रियों को यह सामान्य प्रवृत्ति होती है जो व्यक्ति या वस्तु उन्हें सर्वाधिक प्रिय होती है उसके प्रेम को वे सहसा प्रकट नहीं करती, प्रत्युत उसके प्रति वे अधिक से अधिक विपरीत आचरण करती हैं।
दूसरी बात यह है कि स्त्रियों का मिलना जुलना समाज में ठीक नहीं माना जाता और सामान্যতया उसका निवारण किया जाता है। स्त्रियाँ प्रायः सुलभ नहीं होतीं। कामियों के लिये रति की सबसे बड़ी भूमिका यही है।’
नीररस में भी अवसर के अनुसार उद्ददीप्त और प्रशमित करना ही पड़ता है। यदि ऐसा न किया जावे और एक बार के उद्योग में ही सफलता मिल जावे तो वह सफलता ऐसी
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तृतीय
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पुनरारदधविधान्ते रसस्याऽऽज्जनोदनुसन्धिषु । यथा तापसवत्सराजे ।
ही होगी जैसे इन्द्रजाल इत्यादि में कोई कार्य दिखला दिया जाता है तथा उसका हेतु दर्शकों की समझ में नहीं आता । ऐसी दशा में कवि का यह दिखलाने का अभिप्राय कभी सिद्ध नहीं हो सकता कि अमुक उपाय से अमुक फल की सिद्धि हुई । (ध्वन्या०) पुनरारदधविधान्ते रसस्याऽऽज्जनोदनुसन्धिषु । यथा तापसवत्सराजे । प्रबन्धविशेषस्य नाटकादि रसव्यक्तिनिमित्तमिदं चापरनवगन्तव्यं यदलङ्कृतोभिः शक्तावप्यानुरूप्येण योजनम् । शक्तो हि कविः कदाचिदलङ्कारनिबन्धने तदाक्षिप्ततैयैवानपेक्षित्रसबन्धः प्रबन्धमारभते, तदुपदेशार्थमिदमुक्तम् । हृश्यन्ते च कवयोलङ्कारनिबन्धनैकरसा अनपेक्षित्रसाः प्रबन्धेषु । (अनु०)—पुनः जिसका विश्राम आरम्भ हो गया हो उस अङ्गी रस का पुनः अनुसन्धान करना जैसे तापसवत्सराज में । नाटक इत्यादि विशेष प्रकार के प्रबन्ध का रसाभिव्यक्ति में निमित्त यह दूसरा (तत्त्व) समझा जाना चाहिये कि शक्ति होते हुए भी (रस) अनुरूपता के साथ अलङ्कारों की योजना (की जावे)। समर्थ कवि जिस समय कभी अलङ्कारनिबन्धन के अवसर पर केवल उसी में अपना मन लगाकर तथा तल्लीन होकर प्रबन्ध का प्रारम्भ करता है उसके उपदेश के लिये यह कहा गया है । प्रबन्धकाव्यों में केवल अलङ्कारनिबन्धन में ही आनन्द लेनेवाले तथा रस की अपेक्षा न करनेवाले कवि देखे जाते हैं । (लो०) पुनरिति । इत्यत्रवृत्तान्तवच्छेदो यस्स स तथा । रसस्येति । रसाङ्गभूतस्य कस्यापि वस्तु । तापसवत्सराजे हि वासवदत्ताविषयो जीवितसर्वस्वाभिमानात्मा । प्रबन्धस्तद्विभावाद्यौचित्यात्करण विप्रलम्भादिभूमिका गृहीणन् समस्तेतिवृत्तव्यापी । राज्यप्रत्यापत्या हि सचिवनीतिमहिमोपनतया तदङ्गतपात्रावतारनतया प्राण्यमानरूपा परमामभिलष्णीयतमतां प्राप्ता वासवदत्ताधिगतिरेव तत् फलम् । निर्वहण इह ‘प्राप्ता देवी भूतधात्री च भूयः सम्बन्धोभूदुदार्शकेन’ इत्येवं देवीलाभप्राधान्यानिर्वाहितम् । इयति चेतिवृत्तवैचित्र्यचिते भित्तिस्थानीयो वासवदत्ताप्रेमबन्धः प्रथममन्त्रारम्भात्प्रभृति पद्मावतीविवाहादौ, तस्यैव वासवदत्ताविषयः प्रेमबन्धः काव्यशादृश्यमानविच्छेदोऽप्यनुसहितः । तथा हि प्रथमे तावदृ दृश्टं स एवोपनिबद्धः ‘तद्धस्तेन्दुविलोकनेन दिवसो नो नः प्रदोषस्तथा तद्गोष्ठश्चैव’ इत्यादिना ‘बद्धोत्कण्ठमिदं मनः किमथ वा प्रेमसमाप्तोत्सवम्’ इत्यन्तेन । द्वितीयेऽपि ‘दृष्टिनर्नामृतवर्षिणी स्मितमधुप्रस्रन्दि वक्त्रं न किमु’ इत्यादिना स एव विच्छिन्नोऽप्यनुसहितः ।
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तृतीयोद्घाटन— सवेपु ज्वलितेषु वेइस्मु भयादालीजने विद्रुते, श्वासोऽत्कम्पविहस्तया प्रतिपदं देव्या पतन्या तथा । ह्ना नाथेति मुहुः प्रलापपरया दर्ग्घं विलाक्या तया, शान्तेनापि वयं तु तेन दहननाद्यापि दह्यामहे ॥
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इत्यादिना । चतुर्थेऽपि— देवीस्वीकृतमानसस्य नियतं स्वप्नायमानस्य मे, तद्गोत्रग्रहणादियन् सुवदना यायात्कथं न व्यथाम् । इत्थं यन्नत्रणया कथंकथमपि क्षोणा निशा जागतो, दाक्षिण्योपहतेन सा प्रियतमा स्वप्नेऽपि नासादिता ॥ इत्यादिना । पञ्चमेऽपि समागमप्रत्यजाया करुणे निवृत्ते विप्रलम्भेऽपि— तथाभूते तस्मिन् मुनिवचसि जाताग्निस मयि, प्रयत्नान्तर्गूढां हृदयमुपगता मे प्रियतमा । प्रसीदेति प्रोक्ता न खलु कुपितेयुक्तिमधुरम्, समुद्धिन्ना पीतैर्नयसलिले: स्थास्यति पुनः ॥ इत्यादिना । षष्ठेऽपि— 'त्वत्सम्प्राप्तिविलोलभितेन सच्चिवैः प्राणा मया धारिताः' इत्यादिना । alङ्कृतिनापि यत् योजनापेक्षया कर्मणि षष्ठी । हृयते चेत् । यथास्वप्नवासव- दत्ताख्ये नाटके— स्वच्छन्दपद्मकपाटं नयनद्वारं स्वरूपटेन । उद्घाटय सा प्रविष्टा हृदयगृहं मे नृपतनूजा ॥ इति ॥११४॥
(अनु०)—'पुनः' यह । इतिवृत्तवश जिसकी विश्रान्ति अर्थात् विच्छेद आरम्भ किया गया हो अर्थात् केवल आशङ्का का विषय ही बना हो सर्वथा उपनत न हृथा हो उस प्रकार से । 'रस का यह' । आशय यह है कि रस के अङ्गभूत किसी भी तत्व का । निस्सन्देह तापसवत्सराज में वासवदत्ताविषयक, जीवीतसर्वस्वाभिमानात्मक प्रेमबन्धन उन विभावों के औचित्य से करुण विप्रलम्भ की भूमिकाओं को ग्रहण करते हुये समस्त इतिवृत्त में व्यापक है । सचिवनीति की महिमा से आई हुई उसके अङ्गभूत पचावती के लाभ से अनुगत राज्य की पुनः प्राप्ति से अनुगणित होनेवाली और परम अभिलषणीयता को प्राप्त वासवदत्ता की प्राप्ति ही वहाँ पर फल है । निर्वहण में निस्सन्देह 'प्राणियों की रक्षा करनेवाली देवी पुनः प्राप्त हो गई और दैवोक के साथ सम्बन्ध हो गया' इस प्रकार देवोचित लाभ के प्राधान्य को निर्वाह कर दिया गया । और इतने इतिवृत्त के वैचित्र्यरुपी चित्र में वासवदत्ता का प्रेमबन्ध मित्तिस्थानीय है क्योंकि प्रथम मन्त्रणा से प्रारम्भ कर पचावती के विवाह इत्यादि में उसो की क्रिया (दृष्टिगत होती है) । इससे वही वासवदत्ताविषयक उस प्रेमबन्धन का, जिसके विच्छेद की कथा के कारण आशङ्का हो रही थी, अनुसन्धान कर लिया गया । वह इस प्रकार—पहले अङ्क में तो स्पष्ट रूप में ही उपनिबद्ध किया गया है—'उसके मुखचन्द्र के अवलोकन के द्वारा दिन और उसकी गोठी से ही प्रदोष बिताया' यहाँ से 'क्यों मेरा मन उत्कण्ठा से भरा है अथवा प्रेम असमाप्त उत्सव वाला है' । यहाँ तक 'क्या दृष्टि अमृत की वरसानेवाली नहीं है? क्यों मुख मुस्कुराहट रूप मधु को प्रवाहित करनेवाला नहीं है?' इत्यादि से उसी विच्छेद का अनुसन्धान कर लिया गया । तीसरे
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३
तृतीय उद्योतः
'सर्वत्र भवनों के प्रज्वलित होने पर भय से सखियों के भागने लगने पर निःश्वास कम्प और घबराहट से भरी हुई और उस प्रकार प्रतिपद गिरती हुई 'हाय नाथ' ईन शब्दों के साथ बार-बार प्रलाप में लगी हुई वह बेचारी देवी जल गई । किन्तु शान्त भी उस अग्नि से हम तो आज भी जले जा रहे हैं ।' इत्यादि के द्वारा । चतुर्थ में भी—
३
तृतीय उद्योतः
'देवो के द्वारा मेरा मन स्वीकार कर लिया गया है (अतःः) निश्चितरूप से स्वप्न देखने लगने पर उसके नाम का ग्रहण करने से यह सुमुखी (पद्मावती) क्यों व्यथा को प्राप्त न होगी । इस प्रकार यन्त्रणापूर्वक जैसे-तैसे जागते हुये रात बीत गई दक्षिण्य के द्वारा अपहत मैं उस प्रियतता को स्वप्न में भी प्राप्त नहीं कर पाया ।' इत्यादि के द्वारा । पञ्चम में भी समागम की प्रत्याशा से करण के निवृत्त हो जाने पर और विप्रलम्भ के अंकुरित होने पर—
३
तृतीय उद्योतः
'मुनि वचन के उस प्रकार (सम्पन्न) हो जाने पर, मेरे अपराध करने पर प्रयत्नपूर्वक अन्दर छिपाये हुये क्रोध को प्राप्त हुई मेरी प्रियतमा 'प्रसन्न हो' यह कहो हुई 'मैं निस्सन्देह कुपित नहीं हूँ' यह मधुर उक्ति में कहकर छिपे हुये नयनजल के साथ पुनः स्थित होगी (अथवा नेत्रजल के द्वारा प्रकाशित प्रेम वाली स्थित होगी ।') इत्यादि के द्वारा । षष्ठे में भी—
३
तृतीय उद्योतः
'सचिवों ने तुम्हारी समप्राप्ति का लोभ दिखला कर मुझसे प्राण धारण करवाये ।' इत्यादि के द्वारा । 'अलंकृतीनाम्' इसमें योजना की दृष्टि से कर्म में पष्ठी हो जाती है 'और देखे जाते है' यह । जैसे स्वप्नवासवदत्ता नामक नाटक में—
३
तृतीय उद्योतः
'भलीभांति जडे हुये फलकरूषि किवाडोंवाले नेत्रद्वार को सौन्दयरूपी ताडन के द्वारा खोलकर वह राजकुमारी हर्षपूर्वणी घर में प्रविष्ट हो गई ।'।३।।
३
तृतीय उद्योतः
अङ्गीरस के अनुसन्धान की आवश्यकता और तापसवत्सराज का उदाहरण तारावती—कवि को प्रबन्धयोजना में जिस दूसरे तत्व का ध्यान रखना पडता है वह यह है कि यदि अंगीरस का विच्छेद प्रारम्भ हो गया हो तो उसका पुनः अनुसन्धान कर लेना चाहिये । आशय यह है कि अङ्गी रस कमी बहुत समय के लिये दृष्टि से ओझल नहीं होना चाहिये । यदि इतिकत्तु का निर्वाह करने के लिये अङ्गीरस को बहुत समय तक छोड देना अनिवार्य हो जावे तो बीच-बीच में उसका अनुसन्धान करते चलना चाहिये । 'विच्छेद आरम्भ हो गया हो' का आशय यह है कि जिस समय कथाप्रवाह में अंगोरस के विच्छेद की आशंका उत्पन्न हो जावे उस समय उसका अनुसन्धान कर लेना चाहिये उसका सर्वथा तिरोभाव तो होने ही नहीं देना चाहिये । 'रस का अनुसन्धान कर लेना चाहिये' में रस के अंगभूत किसी तत्व का, अर्थात् यह आवश्यक नहीं है कि सर्वत्र अंगी रस का पूरा परिपोष ही किया जावे । रस के विभाव इत्यादि किसी तत्व का उल्लेख ही पर्याप्त होता है । उदाहरण के लिये 'तापसवत्सराज' नामक नाटक को लीजिये (दोधिति-
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कार ने लिखा है कि 'तापसवत्सराज' नामक नाटक उपलब्ध नहीं होता, किन्तु सुना जाता है कि यह नाटक विन्ध्याचल के पास के किसी गाँव में मिला है । बालप्रियाकार ने तापसवत्सराज के अनुपलब्ध होने की बात नहीं लिखी है, प्रत्युत लोचन में जिन श्लोकों का संकेत किया गया है उन श्लोकों के पूरे-पूरे भाग मूल पुस्तक के आधार पर लिख दिये हैं । इससे सिद्ध होता है कि सम्भवतः: बालप्रियाकार को यह पुस्तक देखने को मिल गई होगी । प्रतीत होता है कि यह नाटक भासरचित 'स्वप्नवासवदत्तम्' के आधार पर लिखा गया होगा । इस नाटक में वासवदत्ता के प्रति प्रेमबन्धन समस्त इतिवृत्त में व्यापक है । इस प्रेमबन्धन की आत्मा है दोनों का एक दूसरे को जीवनसर्वस्व मानना । (कूटनीतिक कारणों से जब मन्त्री लोग वासवदत्ता को छिपाकर उसके आग में जलकर मर जाने की घोषणा कर देते हैं उस समय) उन विभावों के औचित्य से (अनुकूल परिस्थितियों को प्राप्त कर) वह वासवदत्ता के प्रति प्रेमबन्ध करुण विप्रलम्भ का रूप धारण कर लेता है । (विप्रलम्भ श्रृङ्गार और करुण दोनों वेदनाप्रधान रस हैं । इनमें भेद यह है कि यदि आलम्बन का विच्छेद न हो गया हो और दोनों के पुनः सम्मिलन की आशा बनी हुई हो तो विप्रलम्भ श्रृङ्गार होता है, यदि मरण हो गया हो और पुनः सम्मिलन की आशा शेष न हो तो उस अवस्था में जो दुःख होता है वह करुण रस कहलाता है । यदि मरण के बाद पुनः सम्मिलन की आशा बनी हुई हो जैसा कि दैवी शक्ति के प्रभाव से प्रायः सम्भव हो सकता है तो वहाँ पर करुण विप्रलम्भ होता है । वासवदत्ता के मरण के समाचार से वस्तुतः उदयन का करुण रस है करुणविप्रलम्भ नहीं; क्योंकि पुनः सम्मिलन की आशा उदयन को नहीं है । किन्तु एक तो पाठकों को पुनः सम्मिलन की आशा बनी हुई है जिससे वे उस दुःख को करुण विप्रलम्भ समझकर ही आस्वादित करते हैं, दूसरे स्वप्नदर्शन इत्यादि घटनाओं से वासवदत्ता के पुनः मिलन की क्षीण आशा उदयन के हृदय में भी कभी-कभी जागृत होती रहती है । इसीलिये यहाँ पर उदयन के दुःख को करुण विप्रलम्भ कहा गया है करुण रस नहीं । इस प्रकार वासवदत्ता का बढ़ा-चढ़ा प्रेमबन्धन करुण विप्रलम्भ इत्यादि की अथवा करुण इत्यादि की और विप्रलम्भ इत्यादि की भूमिकाओं को ग्रहण करते हुए समस्त इतिवृत्त में व्याप्त है । (अद्भुत रस की दूसरी विशेषता यह होती है कि अन्त में उसका फल से योग करा दिया जावे ।) तापसवत्सराज का फल ही है वासवदत्ता की प्राप्ति । साथ ही मन्त्रियों की नीति की महिमा से राज्य की पुनः प्राप्ति हो जाती है और साथ ही उसमें अद्भुत पचावती का लाभ भी सम्मिलित है । इस प्रकार वासवदत्ता की प्राप्ति में प्राणों का सञ्जार करनेवाली है राज्य की पुनः प्राप्ति और साथ में पचावती का लाभ । इन सब फलों में देवी वासवदत्ता की प्राप्ति ही प्रधान है क्योंकि 'प्राणियों की रक्षा करनेवाली देवी पुनः प्राप्त हो गई और दर्शक से सम्बन्ध हो गया ।' इन शब्दों में निर्वहण में देवी के लाभ का ही निर्वाह किया गया है । यह इतिवृत्त का वैचित्र्य एक इतना बड़ा (विशाल) चित्र है जिसमें फलक का काम देता है वासवदत्ता का प्रेमबन्ध । क्योंकि जब सर्वप्रथम मन्त्रियों में आपस में मन्त्रणा होती है वहाँ से लेकर पचावती के विवाह इत्यादि में उड़ी वासवदत्ता के प्रेमबन्धन की क्रिया ही (दिखाई देती है ।) जब कथा आगे बढ़ती है और दूसरे इतिवृत्त खण्डों का विस्तार होने लगता है तब ऐसी सम्भावना उत्पन्न हो जाती है कि वह प्रमुख
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३
तृतीय उद्योतः
तद्वक्त्रेन्दुविलोकनेन दिवसो नीताः प्रदोषस्तथा, तद्गोष्ठश्रैव निशापि मन्थरकृतोत्साहैस्तद्भापर्णैः । तां स्मृत्वैव मार्गदत्तनयनां दृष्ट्वा प्रवृत्तस्य मे, बद्धोत्कण्ठमिदं मनः किमथ वा प्रेमसमासोऽत्सवम् ॥
'मैंने अपने दिन वासवदत्ता के मुख कमल के अवलोकन के द्वारा विताये हैं, अपने सन्ध्या काल वासवदत्ता से बात-चीत का आनन्द लेते हुये विताये हैं। वह वासवदत्ता कामवासनाजन्य आनन्दातिरेक में भरकर उत्साह के साथ अपने अङ्ग अपित किया करती थी; मैं उन्हीं आनन्दानुभावों में अपनी रात्रियाँ विताया करता था । इस प्रकार उसके सहवास में कोई कमी नहीं रह गई ओर मैं भरपूर आनन्द लेता रहा हूँ । फिर भी इस समय वह मार्ग में निगाह गड़ाये बैठी होगी और उसको देखने के लिये मेरे इस मन में पूरी उत्कण्ठा भरी हुई है, न जाने यह क्या बात है, अथवा प्रेम का उत्सव तो कभी समाप्त ही नहीं होता है ।' सम्भवतः उदयन ने ये शब्द मृगया से लौटने के अवसर पर कहे हैं । द्वितीय में भी राजा वासवदत्ता की याद करते हैं । यहां पर भी पद्य का एक ही चरण दिया गया है । बालप्रिया के अनुसार पूरा पद्य इस प्रकार होगा ।
३
तृतीय उद्योतः
दृष्टिनिमितविषणया स्मितमधुप्रस्यन्दि वक्त्रं नो ध्यविंद हृदयं न चन्दनरसस्पर्शान्न चाद्वानि वा । कस्यिन्न लब्धपदेन ते कृतमिदं कूरेरण पीताम्बिना, नूनं वज्रमयोऽन्य एव दहनस्तस्येदमचेष्टितम् ॥
'क्या तुम्हारी दृष्टि अमृत बरसानेवाली नहीं थी ? क्या तुम्हारा मुख मुस्कराहट रूपी मधु को क्षरित नहीं करता था ? क्या तुम्हारे हृदय का ऊपरी भाग शीतल नहीं था अथवा क्या तुम्हारे अङ्ग चन्दन रस के जैसे शीतल स्पर्शवाले नहीं थे? आशय यह है कि तुम्हारे सभी अङ्ग इस प्रकार के थे कि अग्नि उन्हें जला ही नहीं सकती थी । नेत्रों में अमृत भरा था, मुख स्मित का मधु बरसाता था, हृदय शीतल था और सारे अङ्ग चन्दनरस से लिप्त जैसे थे । न जाने किस अंग में पैर जमाकर अग्नि ने यह कर डाला ? तुम क्रूर अग्नि के द्वारा पी ही ली गई । निस्सन्देह यह वज्र की बनी हुई कोई दूसरी ही आग होगी जिसका यह कार्य हुआ है। साधारण आग की इतनी शक्ति ही नहीं थी कि तुम्हारे मधुर अंगों को जला सकती ।'
३
तृतीय उद्योतः
फिर तृतीय अङ्क में भी स्मरण करते हैं—
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'जिस समय सारे भवन चारों ओर से जलने लगे होंगे और भय के कारण सारी सखियाँ इधर उधर भागने लगी होंगी उस समय वह देवी (वासवदत्ता) घबराई होगी, उसकी गहरी साँसें चलने लगी होंगी, वह काँपने लगी होगी और प्रतिपद गिर रही होगी। 'हाय नाथ !' यह बार बार कहती हुई विलाप कर रही होगी। वह बेचारी इसी प्रकार जल गई होगी। आग अब यद्यपि शान्त हो गई है किन्तु उस आग से हम आज भी जले जा रहे है।'
चतुर्थ अद्ध में पुनः स्मरण करते हैं—
'मेरे मन को देवी ने स्वीकार कर लिया हैं' यदि मैं सो गया तो निश्चित रूप से मैं देवी वासवदत्ता को स्वप्न में अवश्य देखूँगा और उसका नाम लेकर बड़-बड़ाने लगूँगा जिससे सुन्दर मुखवाली यह पचावती अवश्य व्यथित हो जावेगी, इस प्रकार यन्त्रणा के साथ जगते हुये ही जैसे-तैसे रात बीत गई। मैं दाक्षिण्य के द्वारा ऐसा मारा गया हूँ कि प्रियतमा मुझे स्वप्न में भी प्राप्त नहीं होती।'
पञ्चम में जब समागम की प्रत्याशा उत्पन्न हो जाती है और करुणरस निवृत्त हो जाता है तथा शुद्ध विप्रलम्भ अंकुरित हो जाता है, तब उदयन कहते हैं—
'मुनि ने जो कुछ कहा है वह जब उस(वासवदत्ता) रूप में चोटित हो जावेगी (सम्भवतः; मुनि ने पुनः सम्मिलन की भविष्यवाणी की होगी) अर्थात् जब मुनि के कथनानुसार मेरा वासवदत्ता से पुनः सम्मिलन हो जावेगा तब पुनः यह स्थिति आवेगी कि मैं अपराध करूँगा और मेरी प्रियतमा प्रयत्नपूर्वक अपने क्रोध को छिपाये हुये होगी। जब मैं कहूँगा कि 'प्रसन्न हो जाओ' तब वह मधुर स्वर में कहेगी कि 'मैं क्रुपित नहीं हूँ'। वह आँसुओं को पी गई होगी तथा उन आँसुओं से भरी हुई होगी और पुनः इस रूप में स्थित होगी।' (कहीं कहीं 'समृद्धद्रिस्प्रेति:' यह पाठ भी देखा जाता है। इसका अर्थ है—नेत्रजल से उसका प्रेम प्रकट हो रहा होगा।)
तवहृदयप्राप्तविलोभितेन सचिवैः प्राणा मया भारिता;, तन्मात्रावष्टम्भजजः शररकुमिदं नैवासित निस्सनेहता । आसांनोडवसरस्त्वानुगमने जाता धृति; किंस्वयमु, खेदो यच्च तवानुगं न हृदयं तस्मिन क्षणे दारुणम् ।।
पष्ट अद्ध में भी राजा ने कहा है—(यहाँ पर भी लोचनकारने केवल प्रथम चरण ही उद्धृत किया है। बालप्रिय के भ्रानुसार पूरा पाठ यह होगा—
तवहृदयप्राप्तविलोभितेन सचिवैः प्राणा मया भारिता;, तन्मात्रावष्टम्भजजः शररकुमिदं नैवासित निस्सनेहता । आसांनोडवसरस्त्वानुगमने जाता धृति; किंस्वयमु, खेदो यच्च तवानुगं न हृदयं तस्मिन क्षणे दारुणम् ।।
'तुम्हारी प्राप्ति का लोभ दिखाकर मन्त्रियों ने मेरे प्राण बचाए । उसकी को ठीक मान कर मैंने इस तुच्छ शरीर का परित्याग नहीं किया। अतः यह मेरी स्नेहहीनता नहीं कही जा सकती। जब तुम्हारे पीछे जाने का अवसर निकट आया। तब मुझे घे यँ उत्पन्न हो गया क्योंकि उस समय मुझे तुम्हारे पुनः मिलने की सम्भावना हो गई थी। किन्तु खेद की बात यह है कि मेरा यह दारुणहृदय उस समय तुम्हारा अनुगामी नहीं बन गया। (आशय यह है कि मैं तुम्हारे वियोग में मर नहीं गया यह कोई आश्चर्य की बात नहीं; क्योंकि मुझे मन्त्रियों से
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३
तृतीय उद्योतः
तुम्हारे पुनः सम्मिलन का आश्वासन प्राप्त हो गया था, किन्तु मेरा हृदय आश्वासन मिलने के समय तक हका रहा, विदीर्ण नहीं हो गया। इस प्रकार कथाप्रसंग में यद्यपि अंगी रस विच्छिन्न हो गया था, किन्तु कवि ने प्रत्येक स्थल में उसका अनुसन्धान कर लिया है जिससे वह रस पाठकों की दृष्टि से ओझल नहीं होता।
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तृतीय उद्योतः
रसानुकूल अलंकार योजना
३
तृतीय उद्योतः
अब अलङ्कार योजना को लीजिये। कुछ कवि इतने प्रतिभाशाली तथा कल्पनाशील होते हैं कि उनकी बुद्धि में अलङ्कार स्फुरित होते ही चले जाते हैं। नाटक इत्यादि प्रबन्धों की रसाभिव्यञ्जकता का यह एक अन्य निमित्त है कि कवि अलङ्कारयोजना में कितना ही समर्थ क्यों न हो उसे अलङ्कारयोजना करने में रस की अनुरूपता का ध्यान अवश्य रखना चाहिये। समर्थ कवि निस्सन्देह कभी-कभी अपनी रचना करने में केवल अलङ्कारयोजना पर ही ध्यान केन्द्रित रखता है और उसी आधार पर प्रबन्ध लिख डालता है तथा रस की सर्वथा उपेक्षा कर देता है। उनको उपदेश देने के लिये ही यह कहा गया है। (जो कवि स्वयं रस की दृष्टि से ही अलङ्कारों का निबन्धन करते हैं उनकी तो कोई बात ही नहीं)। ऐसे भी कवि देखे जाते हैं जो अपने प्रबन्धकाव्यों में केवल अलङ्कारयोजना में ही आनन्द लेते हैं और रस की सर्वथा उपेक्षा कर देते हैं। जैसे स्वप्नवासवदत्तम् के इस कथन में—
३
तृतीय उद्योतः
'मेरे नेत्ररूपी दरवाजे पर पलकरूपी किवाड़ भली भाँति जड़े हुये थे। वह राजकुमारी सोन्दर्यरूपी ताड़न से (उसे खोलकर) मेरे हृदयरूपी घर में प्रविष्ट हो गई।'
३
तृतीय उद्योतः
(यह कथन केवल रूपक के व्यसन से ही लिखा गया है।) इसमें रसपरिपोष में सहायक केवल इतना अंश है कि ‘राजकुमारी मेरे हृदयरूपी घर में नेत्र द्वार से प्रविष्ट हो गई।' शेष अलङ्कार अनावश्यक है। इस दोष से महाकवि भी बचते हुये नहीं दिखाई देते। हिन्दी के कतिपय मृदुभाषी कवियों ने भी कहीं-कहीं रूपक को अनावश्यक रूप में इतना अधिक बढ़ा दिया है कि वह प्रकृत रस का सहायक न होकर अलङ्कार मात्र रह गया है। माघ, किरात इत्यादि में अलङ्कारों के व्यसन से ही प्रकृत कथा की उपेक्षा कर अप्रकृत पर्वतवर्णन इत्यादि का विस्तार किया गया है। नैषध में भी केवल उक्तिचमत्कार के मन्तव्य से ही कई स्थानों पर अनावश्यक विस्तार दिया गया है। ऐसे प्रबन्ध, रस की उपेक्षा के कारण, प्रशस्त नहीं कहे जा सकते।
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तृतीय उद्योतः
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किन्तु — अनुस्वानोपमात्मापि प्रभेदो य उदाहृतः । ध्वनरेरस्या प्रबन्धेषु भाषते सोऽपि केशुचित् ॥
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तृतीय उद्योतः
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(अनु०) और भी— लो०—न केवलं प्रबन्धेन साक्षादव्यङ्ग्यो रसो यावत्पारम्पर्येणापीति दर्शयितुम्- पक्रमते-किन्त्रेति । अनुस्वानोपमः शब्दशक्तिमूलोऽर्थशक्तिमूलेऽपि, यो ध्वने: प्रभेद उदा- हृतः सः केपुचित्प्रबन्धेषु निमित्तभूतेषु व्यङ्ग्यकेषु सत्सु व्यङ्ग्यतया स्थितः सन् । अस्येति
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रसादिध्वने: प्रकृतस्य भाषते व्यञ्जकतयैति शेष:। वृत्तिग्रन्थोडप्येवमेव योग्य:। अथ वानुस्वानोपम: प्रभेद उदाहरणतो य: प्रबन्धेषु भाषते अस्यापि 'व्यत्योडलक्ष्यक्रम: क्वचिच्त्' इत्युत्तरश्लोकेन कारिकारूप्यो: सङ्त्ति:
(अनु०) प्रबन्ध से केवल साक्षात् रस व्यञ्ज्य नहीं होता अपितु परम्परा के द्वारा भी यह दिखलाने के लिये उपक्रम करते हैं—‘किच’ यह । अनुस्वानोपम का अर्थ है शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्तिमूल जो ध्वनि का उपमेय उदाहरण किया गया है वह निमित्तमूत कुछ व्यञ्जक प्रबन्धों के होते हुये व्यञ्जक रूप में स्थित ‘इसका’ अर्थात् प्रकृत रसध्वनि का व्यञ्जक के रूप में भाषित होता है । यहाँ पर ‘व्यञ्जकतया’ यह शेष है ।
वृत्तिग्रन्थ की योजना भी इसी प्रकार करनी चाहिये । अथवा अनुस्वानोपम जो बतलाया हुआ प्रभेद कुछ प्रबन्धों में भाषित होता है इसका भी ‘व्यत्य कहों-कहीं अलक्ष्य क्रम होता है’ इस बाद वाले श्लोक से कारिका और वृत्ति की सङ्त्ति हो जाती है ।
प्रबन्ध से अनुरणनात्मक ध्वनि के द्वारा रसव्यञ्जना (ऊपर १४वीं कारिका तक व्यञ्जकों का परिचय दिया जा चुका । सर्वप्रथम अविवक्षित वाच्य के व्यञ्जक बतलाये गये, फिर विवक्षितान्यपरवाच्य संल्लक्ष्यक्रम व्यञ्ज्य के व्यञ्जक बतलाये गये और अन्त में असल्लक्ष्यक्रम व्यञ्ज्य रसध्वनि के व्यञ्जक वर्ण से लेकर प्रबन्ध तक बता दिये गये । अब १५वीं कारिका में यह बतलाया गया है कि प्रबन्ध भी संल्लक्ष्यक्रम अनुरणनरूप व्यञ्ज्य का भी व्यञ्जक होता है । इसके बाद १६वीं कारिका में असंल्लक्ष्यक्रम व्यञ्ज्य के व्यञ्जक बतलाये गये हैं । यहाँ पर एक प्रश्न यह उपस्थित होता है कि जब १४वीं कारिका में रसध्वनि के व्यञ्जक बतलाये गये और १६वीं कारिका में भी रसध्वनि के व्यञ्जकों का ही निरूपण किया गया तो फिर १५वीं कारिका में संल्लक्ष्यक्रम के व्यञ्जकों का निरूपण करने में क्या तर्क है ? अतः इसकी सङ्त्ति के लिये लोचनकार ने इस १५वीं कारिका को भी रसध्वनिविषयक ही माना है और यह दिखलाया है कि १४वीं कारिका तक प्रत्यक्ष रसव्यञ्जक लिखे गये हैं तथा १५वीं और सोलहवीं कारिकाओं में परम्परा के द्वारा व्यञ्जक दिखलाये गये हैं ।)
प्रबन्ध के द्वारा साक्षात् रसाभिव्यक्ति तो होती ही है परम्परा के द्वारा भी प्रबन्ध रस का अभिव्यञ्जक होता है । इसी बात को दिखलाने के लिये आलोककार ने १५वीं कारिका का उपक्रम दिया है ‘किच’ । जिसका अर्थ है केवल इतना ही नहीं किन्तु और भी अर्थात् प्रबन्ध साक्षात् ही रस का व्यञ्जक नहीं होता किन्तु परम्परा से भी होता है । इस पक्ष में कारिका का अर्थ इस प्रकार होगा—‘अनुस्वानोपम’ अर्थात् अनुरणनरूप संल्लक्ष्यक्रम शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्तिमूल जो ध्वनि का प्रभेद कहा गया है वह निमित्तभूत व्यञ्जक प्रबन्धों के होते हुये व्यञ्ज्य के रूप में स्थित होकर ‘इस’ अर्थात् प्रकृत रसादि ध्वनि के व्यञ्जक के रूप में शोभित होता है । (इसको इस प्रकार समझिये—‘प्रबन्धेषु’ में निमित्तसप्तमी है अर्थात् प्रबन्ध शब्दशक्तिमूलक और अर्थशक्तिमूलक संल्लक्ष्यक्रम व्यञ्ज्यध्वनियों की व्यञ्जकता में निमित्त अर्थात् व्यञ्जक होते हैं । इस प्रकार संल्लक्ष्यक्रम व्यञ्ज्यचध्वनियाँ व्यञ्ज्यच होती हैं । वे व्यञ्ज्यचध्वनियाँ प्रकृत रसध्वनि को व्यञ्जक भी होती हैं । इस प्रकार प्रबन्ध से व्यतिरेक होकर संल्लक्ष्यक्रम व्यञ्ज्यचध्वनियाँ रस को चवनित करती हैं—यह अर्थ करने में ‘ध्वने:' और ‘अस्य’ इन दोनों
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३
तृतीय उद्योत:
शब्दों का विशेषणविशेष्यभाव न मानकर पृथक्-पृथक् योजना करनी चाहिये और 'व्यञ्जच-तथा स्थित:' तथा 'व्यञ्जकतया' इन शब्दों का अध्याहार कर लेना चाहिये। इस कारिका का अन्वय इस प्रकार करना चाहिये — 'ध्वने: अनुस्वानोपमात्मा य: प्रभेद उदाहरणतः स: केषुचित् प्रबन्धेषु (अभिव्यञ्जननिमित्तेषु सत्सु) व्यञ्जचतया स्थित: अस्य (प्रकृतस्य रसादिध्वने:) व्यञ्जकतया आस्ते ।' इसी प्रकार वृत्ति ग्रन्थ की भी योजना करनी चाहिये। (वृत्तिप्रन्थ इस प्रकार है— 'इस विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि का जो अनुरणनरूप व्यङ्ग्य नामक दो प्रकार का प्रभेद कहा गया है वह भी कुछ प्रबन्धों में द्योतित होता है ।' यहां 'प्रबन्धों में' को इस प्रकार कर लेना चाहिये— 'प्रबन्धों को व्यञ्जक के रूप में निमित्त मान कर स्वयं व्यङ्ग्य होकर रस के व्यञ्जक के रूप में शोभित होता है ।) अथवा इस कारिका को अग्निम कारिका से मिलाकर अर्थ करना चाहिये— 'अग्निम कारिका के इन शब्दों को कि 'अलक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य होता है' इस कारिका में लाना चाहिये और अर्थ इस प्रकार करना चाहिये— 'इस ध्वनि का जो बतलाया हुआ अनुस्वानोपम प्रभेद प्रबन्धों में शोभित होता है कहीं उसका भी व्यङ्ग्य अलक्ष्यक्रम हुआ करता है ।' इस प्रकार अग्निम कारिका से मिलाकर इस कारिका और वृत्ति की सङ्ङति बैठानी चाहिये ।
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तृतीय उद्योत:
(ध्वन्यो०) अस्य विवक्षितान्यपरवाच्यस्य ध्वनेरनुरणननरूपव्यङ्ग्यचोदपि य: प्रभेद उदाहरणतो हि प्रकरण: सोऽपि प्रबन्धेषु केषुचिद्द्योतते ।
उदाहरण— मधुमथनविजये पाण्ड्व-जन्योक्तिषु । यथा वा ममैव कामदेवस्य सहचरसमागमे विषमवाणलीलायाम् ।
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तृतीय उद्योत:
यथा च गृध्रगोमायुसंवादादौ महाभारते ।
(अनु०) इस विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि का जो अनुरणनरूप व्यङ्ग्य प्रभेद भी दो प्रकार का बतलाया गया है वह भी कुछ प्रबन्धों में द्योतित होता है । वह जैसे— मधुमथनविजय में पांचजन्य की उक्तियों में; अथवा मेरी ही विषमवाणलीला में कामदेव का सहचर से समागम होने पर । और जैसे महाभारत में गृध्रगोमायुसंवाद इत्यादि में ।
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तृतीय उद्योत:
(लो०)— एतदुक्तं भवति— प्रबन्धेषु कदाचिदनुरणनरूपव्यङ्गयो ध्वनिः साक्षाद्-व्यज्यते स तु रसादिध्वनौ पर्यवस्यतीति ।
यदि तु स्पष्टमेव व्याख्यायते ग्रन्थस्य पूर्वो-त्तरस्यलक्ष्यक्रमविषयस्य मध्ये तदा ग्रन्थोऽयमसङ्गत: स्यात् । नीरसत्वं च पाञ्चजन्योक्त्यादीनामुक्तं स्यादित्यलम् ।
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तृतीय उद्योत:
लीलादाढा शुष्योढासअलमहिमण्डलसरिच्चअ अज्ज्झिम । कीसमसुणालाहरतुज्जाइ अज्ज्झिम् ।। इत्यादय: पाञ्चजन्योक्तयो रुक्मिणीपित्रृकुलवध्वामुद्देशेनाप्रतिबद्धनिमित्ताभिप्राय-मभिव्यञ्जयन्ति ।
सोऽभिव्यक्त: प्रकृतरसस्वरूपपर्यवसायी । सहचर: वसन्ततिलकानिलादयस्ते: सह समागमे । इ मिअवहडिवारोणिरडुसो अविवेअरहिओ वि । सविण वि तुममिम्म पुणोवन्ति अ अतन्ति पंसुसिम्म ।।
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इत्यादयो यौवनस्योक्तयस्ततस्तन्निजस्वभावव्यञ्जिका:, स स्वभाव: प्रकृतरसपर्यवसायी ।
यथा चेत् । रमशानावतीर्णं पुत्रदाराहार्तमुद्योगिनं जनं विप्रलब्धुं गृध्रो दिवा शवशरीरभक्षणार्थी शीघ्रमेवापसरत यूयमित्याह ।
अलं स्थित्वा इमशानेऽस्मिन् गृध्रगोमायूयुजूले । कड्कडोलिबहुलेऽरे सर्वप्राणिभयङ्करे ॥
न चेह जीवित: करिच्च्कालधर्ममुपागत: । प्रियो वा यदि वा द्वेष्य: प्राणिनां गतिरीदृशी ॥
इत्याद्यवोचत् । गोमायुस्तु निशोदयावधि अमो तिष्ठन्तु, ततो गृध्रादपहृत्याहं भक्षयिष्यामित्यभिप्रायेणावोचत्—
आदित्योदयं स्थितो मूढ: स्नेहं कुरुत साम्प्रतम् । बहुविध्नो मूढोऽतोंग्यां जीवेपि कदाचन ॥
अमुं कनकवर्णाभि: बालमप्राप्यौवनम् । गृध्रव्यातिप्तकं बालस्तथैवोदयविश्रुता: ॥
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इत्यादि । स चाभिप्रायो व्यक्त: शान्तरस एवं परिणिष्ठिततां प्राप्त: ।।१९५।।
(अनु.) यहाँ पर यह बात कही गई है—प्रबन्ध से कदाचित् अनुरणनरूप व्यङ्ग्यचध्वनि साक्षात् व्यक्त होती है, वह तो रस इत्यादि ध्वनियों में पर्यवसित होती है । यदि इसकी स्पष्ट ही व्याख्या की जावे तो अलङ्कार्यविषयक पूर्वोत्तर ग्रन्थ के मध्य में यह ग्रन्थ असङ्गत हो जावेगा और पाञ्चजन्य इत्यादि की उक्तियों का नीरसत्व भी कहा हुया हो जावेगा बस इतना कहना पर्याप्त है ।
'लीला से दाढ़ के अग्रभाग में समस्त महीमण्डल को उठानेवाले तुम्हारे ही अज्ञ में आज मृणाल का आभरण भी क्यों गुरु हो रहा है ?'
इत्यादि पाञ्चजन्य की उक्तियाँ रुक्मिणी के द्वारा विप्रलब्ध भगवान् वासुदेव के आशय से प्रतिबेदनरूप अभिप्राय को अभिव्यक्त करती हैं । वह अभिव्यक्त होकर प्रकृत रस के स्वरूप में पर्यवसित होता है
वसन्त यौवन मलयानिल इत्यादि । उनके साथ समागम में ।
'मैं मर्यादा का अतिक्रमण करनेवाला, निरंकुश और विवेकरहित हो जाता हूँ । किन्तु तुम्हारी भक्ति को स्वप्न में भी स्मरण नहीं करता हूँ ।'
इत्यादि यौवन की उक्तियाँ अपने भिन्न-भिन्न स्वभावों की व्यञ्जना करनेवाली हैं । उस स्वभाव का पर्यवसान प्रकृत रस में होता है ।
'और जैसे' यह यहाँ इमशान में आये हुये पुत्रदार के लिये उद्योग करनेवाले व्यक्ति को ठगने के लिये दिन में शवशरीर के भक्षण करने की इच्छावाला गृध्र 'आप लोग शीघ्र चले जावें' यह कहता है ।
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तृतीय उद्योतः
'गृध्र और सृगालों (आदि) से घिरे हुये कङ्कालों से घने, घोर और सब प्राणियों को भय देनेवाले इस श्मशान में स्थित होने की आवश्यकता नहीं है । कालधर्म (मरण) को प्राप्त हुवा कोई भी चाहे वह प्रिय हो या अप्रिय यहाँ जीवित नहीं हुवा । प्राणियों की गति ही ऐसी है ।' इत्यादि कहा । सृगाल ने तो 'ये निशा के उदयपर्यन्त स्थित रहें, तब गृध्र से छीनकर मैं खा लूँगा' इस अभिप्राय से कहा— 'हे मूर्खों ! यह सूर्य स्थित है, इस समय स्नेह कर लो । यह मुहूर्त बहुत विघ्नों वाला है, सम्भवतः जी भी जावे । सोने के समान वर्णवाले, यौवन को न प्राप्त हुये इस बालक को हे बचपन करनेवालो ! गृध्र के कहने से ही शक्कुारहित हो कर कैसे छोड़ दोगे ?' इत्यादि । और यह व्यङ्ग्य अभिप्राय शान्त रस में ही पूर्णं स्थिरता को प्राप्त हुवा है ॥ १५ ॥
३
तृतीय उद्योतः
तारावती—यहाँ पर यह बात कही गई है कि प्रबन्ध से कदाचित् अनुरणनरूप व्यङ्गचध्वनि साक्षात् व्यकत होती है और उसका पर्यवसान रस इत्यादि की ध्वनि में होता है । यद्यपि यह कारिका का सीधा अर्थ नहीं है, कारिका का सीधा अर्थ केवल यह बतलाना है कि प्रबन्ध से संल्लक्ष्यक्रम की भी व्यञ्जना होती है, तथापि कारिका को तोड़कर तथा घुमा-फिरा कर यह अर्थ करना पड़ता है । वस्तुतः यह अर्थ करना सर्वथा अनिवार्य है । क्योंकि यथाथुत व्याख्या करने पर यह प्रन्थ अलक्ष्यक्रम के प्रकरण के मध्य में पड़ जावेगा । पहले भी अलक्ष्यक्रम के व्यञ्जक बतलाये गये हैं और बाद की कारिका में भी वही प्रकरण चलेगा । बीच में संल्लक्ष्यक्रम का आ जाना असङ्गत हो जावेगा और पांचजन्य इत्यादि की उक्तियों का नीरसत्व सिद्ध हो जावेगा जो कि एक दोष होगा ।
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तृतीय उद्योतः
इस विषय में दीधितिकार की योजना की समीक्षा
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तृतीय उद्योतः
[दीधितिकार ने उक्त लोचन का आशय लिखकर अपनी अरुचि प्रदर्शित को है । दीधितिकार का सार यह है—“कुछ लोग 'द्योत्य लक्ष्य क्रमः क्वचिदपि' को लक्ष्य क्रमपरक मान-कर पुनरुक्ति की शंका करते हैं, पांचजन्य इत्यादि की उक्तियों में नीरसता आ जाने का दोष बतलाते हैं और अलक्ष्यक्रम के प्रकरण में संल्लक्ष्यक्रम के आ जाने का दोष भी बतलाते हैं तथा इन दोषों को दूर करने के लिये कारिका को परम्परा से अलक्ष्यक्रमपरक सिद्ध कर देते हैं । यहाँ पर विचार करना यह है कि अग्निम कारिका में 'अलक्ष्यक्रम:' यही पाठ है, अतः यहीं पुनरुक्ति दोष नहीं आता । क्योंकि यह कारिका लक्ष्य क्रम के विषय में है और अगली कारिका अलक्ष्यक्रम के विषय में । पांचजन्य इत्यादि की उक्तियों में नीरसता भी प्रकट्त नहीं होती । क्योंकि वहाँ पर वस्तुरूप संल्लक्ष्यक्रम के कथन से रसरूप अलक्ष्यक्रम का प्रतिषेध नहीं हो जाता । प्रकरण की असङ्गति भी नहीं आती । क्योंकि रस प्रबन्धच्योत्प्य होता है, उसके बाद 'संल्लक्ष्यक्रम भी प्रबन्धच्योत्प्य होता है' इस कथन की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती, अतः उसका कथन भी प्राकरणिक ही हो जाता है । अतः ग्रन्थ की अन्यथायोजना ठीक नहीं ।
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इसलिये काव्यप्रकाश में प्रबन्ध की व्यंजकता में गृध्रगोमायु-संवाद का ही उदाहरण दिया गया है।
दीधितिकार के उक्त कथन पर यदि विचार किया जावे तो ज्ञात होगा कि लोचन में पुनरुक्ति का दोष तो दिया ही नहीं गया है। दीधितिकार ने यह उल्लेख नहीं किया कि पुनरुक्ति की बात किसने कही है। इतना तो स्पष्ट हो है कि लोचन में कहीं भी पुनरुक्ति दोष नहीं बतलाया गया है। यही दोष तो दोषों की बात है। उनमें सबसे बड़ी आपत्ति तो लोचन में यही उठाई गई है कि असंललक्ष्य क्रम के मध्य में यह प्रकरणान्तर कैसे हो गया ?
इस पर दोषितिकार का उत्तर है कि प्रबन्ध की व्यंजकता का प्रकरण है अतः अप्राकरणिक होने का दोष नहीं आ सकता। किन्तु इस तृतीय उद्योत में इस रूप में प्रकरण नहीं चलाये गये हैं कि शब्द किनका व्यंजक होता है, वाक्य किनका व्यंजक होता है इत्यादि। अपितु प्रकरण इस प्रकार के है कि अविवक्षित वाच्य के व्यंजक कौन-कौन होते हैं इत्यादि। पहले अविवक्षित वाच्य के व्यंजक दिखलाये गये, फिर संलक्ष्य क्रम के ओर अब असंलक्ष्य क्रम रस ध्वनि के व्याख्यको का प्रकरण १६वीं कारिका तक चलता है फिर १५वीं कारिका बीच में संलक्ष्य क्रम व्यञ्जक के व्यंजक बतलाने के लिये क्यों लिखी गई ? यह असङ्गति स्पष्ट है।
पाञ्चजन्य इत्यादि की उक्तियों की नीरसता का जो दोष दिया गया है उसमें भी लोचनकार का आशय यही है कि वस्तुतः वहाँ पर भी रस विद्यमान होता ही है, अतः वहाँ पर व्यञ्जक वस्तु को रस का व्यञ्जक मान लेने से प्रकरण को असङ्गति जाती रहती है। अतः यहाँ पर लोचनकार की व्याख्या ही ठीक है कि १४वीं कारिका तक रस के उन व्याख्यानों का उल्लेख किया गया जो रस को साक्षात् व्यक्त कर देते हैं। अब १५वीं और १६वीं कारिका में ऐसे व्यञ्जक दिखलाये जा रहे हैं जो स्वयं वस्तु की व्याख्याना करते हैं और वह व्यक्त हुई वस्तु रस की व्यञ्जक होती है।
इस प्रकार ये तत्त्व साक्षात् नहीं अपितु परम्परा से रस के व्यञ्जक होते हैं। इनमें सुप्तिड़ वचन इत्यादि अनेक तत्त्व आ जाते हैं। किन्तु पहले प्रबन्ध की व्यंजकता का निरूपण इसलिए किया गया है कि साक्षात् रसव्यञ्जकों में अन्त में प्रबन्ध की व्यञ्जकता ही आई थी। अतः इस प्रकरण के उसी प्रबन्ध से प्रारम्भ करने में पूर्वापर की सङ्गति बैठ जाती है।
मधुमथनविजय से उदाहरण
प्रबन्ध की परम्परा से आलोककार ने रसव्यञ्जकता के तीन उदाहरण दिये हैं—(१) मधुमथनविजय नामक काव्य में पाञ्चजन्य की उक्तियों में (यहाँ पर लोचन में मधुमथनविजय का एक पद्य उद्धृत किया गया है जिसकी संस्कृत छाया इस प्रकार होगी—
लीलादष्ट्रोदूतसकलमहिमंडलस्यव्वावाह क्ष्मामृणालाभरणमपि तव गुरुभवत्यग्रे ॥
मधुमथनविजय के प्रस्तुत पद्य का अर्थ यह है कि हे भगवान् आप ने (वाराहावतार में) खेल खेल में हो अपनी दाढ़ की नोक पर समस्त पृथ्वीमंडल को धारण कर लिया। न जाने क्यों उन्हीं आप के लिये आज मृणाल का आभूषण भी भारी हो रहा है ?
इस प्रबन्धगत पद्य से व्यक्त होता है कि भगवान् कृष्ण रुक्मिणी के वियोगी हैं उनकी रुक्मिणी को प्राप्त करने की उत्कट अभिलाषा है। उसी अभिलाषा को यह वक्ता प्रकट कर रहा है।
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तृतीय उद्योतः
विपमबाणलीला से उदाहरण
(२) दूसरा उदाहरण आनन्दवर्धन की लिखी हुई विपमबाणलीला से दिया गया है। इसमें कामदेव का अपने वसन्त, यौवन, मृगयादिल इत्यादि महन्तरों से मिलना दिखलाया गया है। यौवन की उक्ति यहाँ पर उद्धृत की गई है। इसको संस्कृत छाया इस प्रकार होगी— भवाम्यपहस्ततरेखो निरंकुशोऽस्य विवेकहरितोऽसि । स्वप्नेऽपि तव पुनर्भक्ति न प्रस्मरामि ॥ 'मैं मर्यादा का अतिक्रमण करनेवाला हो जाता हूँ, निरंकुश हो जाता हूँ और विवेक-रहित भी हो जाता हूँ। और फिर स्वप्न में भी तुम्हारी (कामदेव की) भक्ति को विस्मृत नहीं करता हूँ ।' यहाँ पर यौवन की इन उक्तियों से यौवन के विभिन्न स्वभावों की अभिव्यञ्जना होती है जैसे यौवन के उत्कट होने पर लोकमर्यादा का सर्वथा प्रत्याख्यान कर कामदेव का ही अनुसरण किया जाता है। इत्यादि (यह स्वभाववयञ्जना वस्तुध्वनि कही जा सकती है।) इसका पर्यवसान प्रकृत शृंगार रस में होता है।
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तृतीय उद्योतः
(३) तीसरा उदाहरण महाभारत से उदाहरण
महाभारत से दिया गया है। (यह उदाहरण काव्यप्रकाश में प्रबन्ध से वस्तुव्यञ्जना के उदाहरण के रूप में उद्धृत किया गया है। यहाँ पर भी प्रबन्ध से रसपर्यवसायी वस्तुव्यञ्जना ही दिखलाई गई है। महाभारत में शान्तिपर्व के अन्तर्गत आपद्धर्मपर्व में गृध्र और गोमायु का संवाद आया है ।) कुछ नागरिक एक मृत बालक के शव का विसर्जन करने आये हैं । (लोचन में 'जलाने आये हैं' यह लिखा है । यह ठीक नहीं है । एक तो छोटे बालकों के शव जलाये नहीं जाते दूसरे जला देने पर गृध्र या गोमायु को खाने की आशा ही क्या रह जावेगी ? अत: विसर्जन करने आये हैं यही अर्थ करना चाहिये ।) वे मोह के कारण उस बालक को जल्दी छोड़ नहीं रहे हैं। उनको देखकर एक गृध्र कह रहा है— 'इस श्मशान में गृध्र जैसे मांसाहारी भयानक पक्षी और सियार जैसे भयानक मांसाहारी पशु भरे पड़े हैं । चारों और हड्डियों के कंकाल बहुतायत से दिखाई पड़ रहे हैं । यह स्थान बड़ा ही घोर और सब प्राणियों को भय देने वाला है । यहाँ तुम्हारा रहना अच्छा नहीं । संसार की गति ही ऐसी है। यहाँ जो कोई भी मृत्यु को प्राप्त हो जाता है चाहे वह कितना ही प्यारा अथवा कैसा ही हेय हो कभी भी पुनः जीवित नहीं हो सकता यह तो सभी प्राणियों को गति है । इसलिये कभी मोह में पड़कर अधिक शोक नहीं करना चाहिये । अत एव तुम भी संसार की इसी दशा को देखते हुए मोह छोड़कर लौट जाओ।' इस प्रबन्ध में वर्ण्य विषय एकवस्तु है और उससे एक दूसरी वस्तु ध्वनित होती है कि गृध्र यह प्रयत्न कर रहा है कि किसी प्रकार ये लोग बालक के शव को छोड़कर जल्दी ही घर को लौट जायें तो मैं इसे खा लूँ। यदि मोह और शोक में कहीं इन लोगों को काफी देर हो गई और सूर्य अस्त हो गया तो मैं इस बालक को न खा सकूँगा क्योंकि मेरी गति
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दिन में ही है; अतः रात हो जाने पर यह शव मेरे हाथ से निकल जायेगा। इसीलिये वह उन सब व्यक्तियों को जल्दी ही घर लौट जाने की सम्मति दे रहा है। (इसको सुन कर वे सब लोग लौटने के लिये उद्यत हो जाते हैं) तब सियार उनसे कहता है—
'तुम लोग तो हमें बड़े ही मूर्ख मालूम पड़ रहे हो। अभी तो यह सूर्य स्थित हैं (जब इतना दिन शेष है तब हिंसक वन्य पशुओं का भय ही क्या ?) एक बात और है— यह समय बहुत अधिक विध्वनों से भरा हुआ है। (यह समय ऐसा है; जबकि बहुत से राक्षस भूत प्रेत पिशाच इत्यादि मारे मारे फिरते हैं। सम्भव है कि किसी राक्षस इत्यादि के आवेश के कारण इसकी मृत्यु हुई हो। यदि यह बात हो तो) यह भी सम्भव है कि इस अवसर के टल जाने के बाद (राक्षस इत्यादि की बाधा के शान्त हो जाने पर) यह जी ही उठे। देखो इस बालक का रंग कैसा सोने के समान चमचमा रहा है। (अभी इसका वर्ण बिलकुल नहीं बिगड़ा है और न इसके अन्दर कोई मृत्यु का चिह्न मालूम पड़ रहा है।) यह अभी बालक ही तो है ! अभी इसकी जवानी भी तो नहीं आई है, कैसा सुन्दर बालक है ! तुम लोग तो मुझे बिलकुल मूर्ख मालूम पड़ रहे हो जो केवल गृद्ध के कहने से ही ऐसे सुन्दर बालक को छोड़ कर चले जाना चाहते हो। और तुम्हें इसके छोड़ने से बिलकुल शङ्का नहीं हो रही है !'
यह गोमायु का कथन भी एक वस्तु है। इससे एक दूसरी वस्तु ध्वनित होती है कि सियार दिन में तो उस बालक का मांस खा नहीं सकता क्योंकि उसे पड़ोस में ही स्थित गृद्ध से भय है। वह यह चाहता है कि "यदि कहीं सूर्यास्त पर्यन्त शव के सम्बन्धी लोग रुक जावें तो रात हो जाने पर गृद्ध को दिखाई ही न पड़ेगा और उस शव-मांस को खाने की गृद्ध की कुछ भी शक्ति न रह जावेगी। तब मैं स्वच्छन्दतापूर्वक उसका मांस खा सकूँगा !" इसलिए वह उन मनुष्यों को श्मशान से लौटने से रोक रहा है और उनसे बालक के सौन्दर्य की प्रशंसा कर तथा उसके पुनः जीवित होने की सम्भावना प्रकट कर यही प्रयत्न कर रहा है कि वे इतने समय तक रुकें रहें कि सूर्य अस्त हो जावे।
यह अभिप्राय व्यक्त होकर शान्त रस में ही परिपूर्णता को प्राप्त होता है। इस प्रकार प्रबन्ध वस्तु की व्यञ्जना के द्वारा रस का व्यञ्जक हो जाता है।
१९५
(ध्वन्या०) सुमिडवचनसम्बन्धवैस्तथा कारकशक्तिभिः ।
१९६
कृततदितसमासैश्च व्यत्पत्त्या । अलक्ष्यक्रमो ध्वनेरात्मा रसादिः सुबिवक्षितः ।
विशेषे: कारकशक्तिभिः कृतृशेषैस्तद्वितसमासैश्च । वचने त्रियातोपसर्ग-कालादिभिः प्रयुक्तैरविभज्यमानो दृश्यते ।
(अनु०) सुप्तिङ्वचन, सम्बन्ध, कारकशक्तित, कृत्, तद्धित और समास से कहीन अलक्ष्यक्रम ध्वनि होती है।
१९६
ध्वनि की आत्मा अलक्ष्यक्रम रस इत्यादि सुप्ति की विशेषताओं से, तिङ् की विशेषताओं से, वचन की विशेषताओं से, कारकशक्तियों से, कृत्प्रत्यय की विशेषताओं से, तद्धित
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३
तृतीय उद्योतः
की विशेषताओं से और समासों से (व्यक्त होता है ।) ‘च’ शब्द से प्रयोग किये हुये निपात, उपसर्ग और काल इत्यादि से अभिव्यक्त होता हुआ देखा जाता है । (लो०)—एवमलक्ष्यक्रमग्य्द्र्घस्य रसादिध्वनैरेयदपि वर्णैः: प्रभृति प्रबन्धपर्यन्ते व्यज्जकवर्गे निरुपिते तु निरुपणीयान्तरमवशिष्यते तथापि, कविसहृदयानां शिक्षां दातुं पुनरपि सूक्ष्मदृशान्वयतिरेकावाश्रित्य व्यज्जकवर्गमाह—सुमिडि्डतादि । वयं हि तद्व्यतिरेकावलोकनानन्तरं सवृत्तिकं वाक्यं बुद्ध्यामहे । सुबादीनां योगनुप्रासमपि भासते वक्त्र-भिप्रायादिरूप: अस्यापि सुबादिभिरव्यक्तवत्सयानुस्वानोपमस्यैकमव्य्घो द्योत: । क्वचिद्विति । पूर्वकारिकया सह संमीयलय सङ्घत्तिरिति । सर्वत्र हि सुबादीनामभिप्राय-विशेषाभिव्यज्जकत्वमेव । उदाहरणे स त्वभिव्यक्तौडभिप्रायो यथास्वं विभावादिरूपताद्वारेण रसादीन्व्यानक्ति । एतदुक्तं भवति—वर्णादिभि: प्रबन्धान्तै: साक्षाद्धा रसोऽभिव्यज्यते विभावादि-प्रतिपादनद्वारेण यदि वा विभावादिव्यज्जजनद्वारेण परम्परयैव तत् तु बन्धस्यैतत्परम्परया व्यज्जकत्वं प्रसङ्गादादावुक्तम् । अधुना तु वर्णपदादीनामुच्यते इति । तेन वृत्तावपि ‘अभिव्यज्यमानो दृश्यते’ इति । व्यज्जकत्वं दृश्यत इत्यादौ च वाक्यशेषोड्याहार्य: विभावादिव्यज्जजनद्वारतया पारम्पर्येणैतद्वयप: ।
(अनु०) इस प्रकार अलक्ष्यक्रम व्यंग्य रस इत्यादि की ध्वनि के यद्यपि वर्णों से लेकर प्रबन्धपर्यन्त व्यज्जकवर्ग के निरुपित कर दिये जाने पर अन्य कुछ निरुपण करने योग्य शेष नहीं रह जाता है तथापि कवि और सहृदयों को शिक्षा देने के लिये फिर भी सूक्ष्म दृष्टि से अन्वयव्यतिरेक का आश्रय लेकर व्यज्जकवर्ग को कहते हैं—‘सु’ तिङ् इत्यादि । हम तो इस प्रकार सवृत्तिक वाक्य को समझते हैं । ‘सु’ इत्यादि के साथ जो अनुस्वानोपम (ध्वनि) वक्ता के अभिप्रायरूप में भासित होती है व्यक्त अनुस्वानोपम इस ध्वनि का भी अलक्ष्यक्रम द्योत होता है । ‘कहीं’ यह पूर्व कारिका से मिलाकर संगति होती है । सु इत्यादि का सर्वत्र अभिप्राय विशेष व्यज्जकत्व ही होता है । उदाहरण में वह अभिव्यक्त अभिप्राय अपनी शक्ति के अनुसार विभाव इत्यादि की रूपता के द्वारा रस इत्यादि को व्यक्त करता है । यहाँ यह कहा गया हैं—वर्ण आदि से प्रबन्धपर्यन्त के द्वारा विभाव इत्यादि के प्रतिपादन के माध्यम से या तो साक्षात् रस अभिव्यक्त होता है या विभाव इत्यादि की व्यञ्जना के द्वारा परम्परा से । उसमें प्रबन्ध का रस की परम्परा से व्यज्जकत्व प्रसंगवश पहले कह दिया । इस समय तो वर्ण इत्यादि का कहा जा रहा है । इससे वृत्ति में भी ‘अभिव्यक्त होता हुआ देखा जाता है’ ‘व्यज्जकत्व देखा जाता है’ इत्यादि में ‘विभाव इत्यादि के व्यञ्जन के माध्यम के रूप में परम्परा से’ इस प्रकार के वाक्यशेष का अध्याहार कर लेना चाहिये ।
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तृतीय उद्योतः
तारावती—प्रस्तुत ग्रन्थ के उपक्रम में ध्वनि का स्वरूप बतलाने की प्रतिज्ञा की थी । प्रथम उद्योत में विप्रतिपत्तियों, उनपर विचार और ध्वनि का सामान्य स्वरूप बतला दिया गया । द्वितीय उद्योत में व्यंग्यार्थ की दृष्टि से ध्वनि के स्वरूप पर विचार किया गया । तृतीय
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उद्योत में अविवक्षितवाच्य विवक्षितान्यपरवाच्य, अनुरणनरूप तथा असंललक्ष्य क्रम व्यंग्य इत्यादि सभी के व्यञ्जकों का निरूपण कर दिया गया और यह बता दिया गया कि वणों से लेकर प्रबन्धपर्यन्त विभिन्न तत्त्व किस प्रकार असंललक्ष्यक्रम व्यंग्य रसादि के व्यञ्जक होते हैं। इस प्रकार अब कुछ निरूपण करने योग्य नहीं रह गया तथापि कवियों और सहृदयों को शिक्षा देने के लिये नायक वणों पर पुनः सूक्ष्म दृष्टि से विचार किया जा रहा है जिसमें अन्वय-व्यतिरेक का सहारा लिया जावेगा। अर्थात कोई विशेष तत्त्व किस प्रकार व्यञ्जक होता है और किस प्रकार व्यञ्जक नहीं होता—इसी आशय से यह १६वीं कारिका लिखी गई है। इसका आशय यह है कि ध्वनि की आत्मा अलक्ष्यक्रम रस इत्यादि की अभिव्यक्ति कहीं-कहीं सुप् अर्थात शब्दविभक्तियों, तिङ् अर्थात क्रियाविभक्तियों, वचन की विशेषताओं, सम्बन्ध की विशेषताओं, कारकशक्तियों, कृत्प्रत्ययों, तद्धितप्रत्ययों और समासगत विशेषताओं के द्वारा भी होती है। कारिका में 'च' शब्द का प्रयोग किया है। इसका आशय यह है कि विशेष रूप में प्रयोग किये जाने पर निपात, उपसर्ग और काल इत्यादि के द्वारा भी अलक्ष्यक्रम की अभिव्यक्ति होती है। यहाँ पर लोचनकार ने कहा कि हम तो इसके बाद वृत्ति के सहित वाक्य को समझते हैं। इसका आशय यह है कि पिछली कारिका में इस कारिका को जोड़कर अर्थ करना चाहिये। पिछली कारिका की क्रिया 'भासते' के सुप् इत्यादि तृतीयान्त करण हैं और उस कारिका के 'अस्य ध्वने:' इस शब्द का 'द्योत्य:' इस शब्द से सम्बन्ध हो जाता है। इस प्रकार दोनों कारिकाओं को मिलाकर यह अर्थ होगा—कहा हुआ अनुस्वानोपमात्मक जो प्रभेद कुछ प्रबन्धों में तथा कहीं-कहीं सुप् इत्यादि के द्वारा भासित होता है इस ध्वनि का द्योत्य अलक्ष्यक्रम होता है। जहाँ तक इस कारिका का सम्बन्ध है इसका आशय यही है कि सुप् इत्यादि के द्वारा जो अनुस्वानोपम ध्वनि भासित होती है और जो वाक्य के अभिप्राय इत्यादि के रूप में होती है सुप् इत्यादि के द्वारा अभिव्यक्त अनुस्वानोपम इस ध्वनि का भी अलक्ष्यक्रम व्यंग्य द्योतय होता है। आशय यह है कि सर्वत्र सुप् इत्यादि विशेष अभिप्राय के ही व्यञ्जक होते हैं। किन्तु प्रस्तुत कारिका के उदाहरण के क्षेत्र में वे स्थल आते हैं जहाँ विशेष प्रकार का अभिप्राय व्यक्त होकर अपनी सत्ता प्रकरण और आवश्यकता के अनुसार पहले विभाव इत्यादि रूपता को प्राप्त होता है। और फिर उसी विभावादिरूपता के द्वारा रस इत्यादि को व्यक्त करता है।
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तृतीय उद्योतः
है । अतः वृत्ति में भी जहाँ पर यह आया है कि ‘अभिव्यक्त होते हुये देखा जाता है’ वहाँ पर विभाव इत्यादि की अभिव्यक्तता के द्वारा’ यह जोड़ देना चाहिये और जहाँ पर यह आया है कि ‘व्यङ्गचकत्व देखा जाता है’ वहाँ पर ‘परम्परा के द्वारा’ इस वाक्यशेष का अध्याहार कर लेना चाहिये ।
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तृतीय उद्योतः
(ध्वन्य०)—यथा— न्यक्कारी ह्यवशेषे तु यदरयस्तत्रैव तापसः । सोडप्यत्रैव निहन्ति राक्षसकुलं जीवत्यहो रावणः ।। धिक्-धिक् शुष्कजितं प्रबोधितवता किं कुम्भकर्णेन वा स्वर्गप्राप्तिकवलीलुठतनृवृचोच्चूनैः ।
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किमेभिर्मुंजैः ।। अत्र हि इलोके भूयसा सर्वेषामप्येषां स्फुटमेव व्यङ्ग्यत्वं हृश्यते । तत्र ‘मे यदय’ इतनेन सुप्रसंबन्धवचनानामभिव्यङ्गचकत्वम् । ‘तत्रैव तापसः’ इत्यत्र तद्धितनिपातयोः । ‘सोडप्यत्रैव निहन्ति राक्षसकुलं जीवत्यहो रावणः’ इत्यत्र तिङ्ङतकारशक्तीनाम् । ‘धिक्-धिक् शुष्कजितम्’ इत्यादौ इलोकाधे कृतद्धिततसमासोपसर्गार्णाम् ।
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तृतीय उद्योतः
एवंविधस्य व्यङ्ग्यचकत्वे च घटमानेः काव्यस्य सर्वाङ्गशायिनो बन्धच्छायाः समुन्मीलति । यत्र हि व्यङ्ग्यावभासिनः पदस्यैकस्यैव तावद्विभाव्यवस्त्रापि काव्ये कापि बन्धच्छाया, किमुत यत्र तेऽपि बहूनां समवायः । यथात्रानन्तरोवितश्लोके । अत्र हि रावण इत्यस्मिन् पदेऽर्थान्तरसंक्रमितवाच्येन ध्वनिप्रभेदेनालङ्कृतेऽपि पुनरनन्तरो-क्तानां व्यङ्ग्यप्रकाराणामूर्जनम् । दृश्यन्ते च महात्मनां प्रतिभाविशेषभाजां बाहु-ल्येनैवविधा बन्धप्रकाराः ।
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तृतीय उद्योतः
(अनु०) जैसे— ‘निस्सन्देह यह धिक्कार है कि मेरे शत्रु, उनमें भी यह तपस, वह भी यहीं राक्षस कुल को मारता है, आश्र्चर्य है कि रावण जीवित है । इन्द्रजित (मेघनाद) को धिक्कार है, प्रबोध को प्राप्त होनेवाले कुम्भकर्ण से भी क्या ? स्वर्गरूपी छोटे से ग्राम को नष्ट करने में वृथा फूली हुई इन भुजाओं से भी क्या ?’
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तृतीय उद्योतः
निस्सन्देह इस इलोक में अधिकता से इन सभी का स्फुट व्यङ्ग्यत्व दिखाई देता है । उसमें ‘मेरे शत्रु’ इससे रूप सम्बन्ध और वचन की अभिव्यङ्गचकता है । ‘उसमें भी यह तपस’ इसमें तद्धित और निपात की । ‘वह भी यहीं राक्षस कुल को मारता है, आश्र्चर्य है कि फिर भी रावण जीवित है’ तहाँ तिङ् और कारक की शक्तियों की (व्यञ्जकता है ।) ‘इन्द्रजित को धिक्कार धिक्कार’ इत्यादि आधे श्लोक में कृत्प्रत्यय तद्धित प्रत्यय समास और उपसर्गों की (व्यञ्जकता है ।)
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व्यञ्जकों की अधिकता के सन्निहित किये जाने पर इस प्रकार के काव्य की बन्धन की छाया सब को अतिक्रमण करनेवाली (होकर) प्रकट होती है । निस्सन्देह जहाँ व्यञ्जक को अवभासित करनेवाले एक ही पद का आविर्भाव हो वहाँ पर भी काव्य में कोई अपूर्व बन्ध की छाया होती है, उसका तो कहना ही क्या जहाँ उन बहुतों का समूह हो । जैसा कि यहाँ अभी उदाहरण दिये इलोक में । यहाँ निस्सन्देह ‘रावण’ इस पद में ध्वनि के
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अवान्तर भेद अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य के द्वारा अलंकृत होने पर भी पुनः अभिहित हुये व्यंजकप्रकारों का भी उद्धासन होता है। विशेष प्रतिभा को प्राप्त करनेवाले महात्माओं के इस प्रकार के बन्धनप्रकार बहुत अधिक देखे जाते हैं। (लो०)-'ममारय' इति। मम शत्रुसदृशावो नोचित इति सम्बन्धानुचित्यं क्रोधविभावं व्यनक्ति अरयः इति बहुवचनम्। तपो विद्यते यस्मिन् इति पौरुषकथाहीनत्वं तद्धितेन मत्स्वर्य्ये नाभिव्यक्तम्। तत् + आपिशब्देन निपातसमुदायेनात्यन्तासम्भावनीयत्वम्। मत्कर्तृकं यदि जीवनक्रिया तदा हननक्रिया तावदानुचिता। तस्यां च स कर्ता अपिशब्देन मनुष्यमात्रकम्। अतद्वेति। मदधिष्ठितो देशोऽधिकरणम्, निःशेषेण हन्यमानतया राक्षसबलं च कर्मेति तदिदंसम्भाव्यमानमुपनतमिति पुरुषकारासम्पत्तिदर्शनेन तिड्डुरकशक्तिप्रतिपादकैश्च शब्दैः। रावण इति त्वर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यं पूर्वमेव व्याख्यातम्। धिङ्घिग्गति निपातस्य स्वपौरुषानुस्मरणं प्रति व्यञ्जकत्वम्। स्वार्थिकतद्धितप्रयोगस्य स्त्रीप्रत्ययसहितस्याभिमानास्पदत्वं प्रति, विलुण्ठनशब्दे विरोषदस्य निर्दयावासकत्वं प्रति व्यञ्जकत्वम्। वृथाशब्दस्य निपातस्य स्वात्मपौरुषनिन्दां प्रति व्यञ्जकत्वात्। भुजेति बहुवचनेन प्रत्युत भारमात्रमेदिति व्यज्यते। तेन तिलशस्त्लशोऽपि विभज्यमानैष्ट्र श्लोके सर्व एवांशो व्यञ्जकत्वेन भाति इति किमन्यत्। एकस्य पदस्यैतदुक्तं तदुदाहृतंयथात्रैति।
(अनु०) 'मेरे शत्रु' यह । मेरे शत्रुओं का होना उचित नहीं है यह सम्बन्ध का अनौचित्य क्रोध के विभाव को अभिव्यक्त करता है 'अरयः' यह बहुवचन । 'तप विद्मान है जिसका' यह पौरुष की बात-चीत का होना मत्सरयीय तद्धित से व्यक्त हुआ । 'तत्+आपि' (उसमें भी) इस निपातसमुदाय से अत्यन्त असम्भवता (प्रकट होती है ।) यदि मेरी की हुई जीवन क्रिया तो हनन की क्रिया तो अनुचित है । उसमें भी वह कर्ता है— 'भोः' शब्द से केवल तुच्छ मनुष्य की (अभिव्यक्त होती है) 'यहाँ पर' यह । मेरे द्वारा अधिष्ठित देश परिपूर्णरूप से मारे जाने का अधिकरण है । और 'राक्षसबल' यह कर्म है । इस प्रकार यह असम्भव बात प्राप्त हुई है इस प्रकार 'तिड्' तथा कारककारकित प्रतिपादक शब्दों से पुरुषार्थ की असम्पत्ति ध्वनित होती है । 'रावण' इस अर्थान्तरसंक्रमित वाच्यत्व की पहले ही व्याख्या की जा चुकी है । 'धिक् धिक्' इस निपात की (व्यञ्जकत्व) स्वपौरुषानुसरण के प्रति व्यञ्जकता है । स्वार्थिक तद्धित प्रयोग की अबहुमानास्पदत्व के प्रति व्यञ्जकता है । 'विलुण्ठन' शब्द में 'वि' शब्द की विनष्ट करने के प्रति व्यञ्जकता है । निपात 'वृथा' शब्द की आत्मपौरुष निन्दा के प्रति व्यञ्जकता है । 'भुजाओं में' बहुवचन के द्वारा व्यक्त होता है कि प्रत्युत ये भारमात्र ही हैं। इससे तिल तिल करके इस श्लोक के विभक्त करने पर सभी अंश व्यञ्जकत्व के रूप में शोभित होते हैं । अधिक कहने से क्या ? इस अर्थ के दिखलाने का फल दिखलाते हैं—'इस प्रकार यह' 'एक पद का' जो यह कहा उसका उदाहरण दे रहे हैं—'जैसे यहाँ पर' यह ।
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तृतीय उद्योतः
सुप् इत्यादि की व्यञ्जकता का उदाहरण हनुमन्नाटक के १४ वें अंक से लिया गया है। रामरावण्युद्ध चल रहा है। रावण वीर दर्प में उन्मत्त हैं। किन्तु राम के शौर्य को देखकर कह रहा है—
यह उदाहरण हनुमन्नाटक के १४ वें अंक से लिया गया है। रामरावण्युद्ध चल रहा है। रावण वीर दर्प में उन्मत्त हैं। किन्तु राम के शौर्य को देखकर कह रहा है—
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तृतीय उद्योतः
‘यही तिरस्कार है कि मेरे शत्रु हों, उसमें भी यह तपस् ? वह भी यहीं पर राक्षस कुल को मार रहा है, आश्चर्य है कि रावण जीवित है ! इन्द्र को जीतनेवाले (मेघनाद) को धिक्कार है, प्रबोध को प्राप्त होनेवाले कुम्भकर्ण से भी क्या ? अथवा स्वर्ग जैसे तुच्छगर्व को नष्ट करने में वृथा फूली हुई इन भुजाओं से भी क्या ?’
इस श्लोक में इन सभी का बहुत अधिक मात्रा में स्पष्ट ही व्यञ्जकत्व देखा जाता है। वह इस प्रकार—‘मेरे शत्रु हों’ में विभक्ति, सम्बन्ध और वचन अभिव्यञ्जक है। ‘मेरे’ एकवचनवाचक विसंक्त की व्यञ्जना है कि मैं जगत् का एक वीर हूँ, विश्वविजय के लिये मुझे किसी अन्य की अपेक्षा नहीं। ‘मेरे’ भी शत्रु बने रहें यह अद्भुत भी है और अनुचित भी। ‘मेरे’ में सम्बन्ध कारक है, इसका व्यङ्ग्यार्थ यह है कि मेरा कोई भी शत्रु विद्यमान रहे जिससे मेरा वध्य और घातक भाव का सम्बन्ध हो ऐसा सम्भव ही नहीं है क्योंकि मुझसे शत्रुता करके कभी कोई जीवित बचा ही नहीं। ‘शत्रु हों’ में बहुवचन का व्यङ्ग्यार्थ यह है कि मेरे एक भी शत्रु का रह सकना आश्चर्यजनक है फिर बहुत से शत्रुओं का तो कहना ही क्या ? इस प्रकार विभक्तिसम्बन्ध और वचनसम्बन्ध के अनौचित्य की व्यञ्जना करते हुये क्रोध के विभाव को व्यक्त करते हैं। ‘उसमें भी यह तपस्’ यहां पर तद्धित और निपात व्यञ्जक हैं। ‘तापस्’ में तद्धित अण् प्रत्यय और ‘अपि’ (भी) यह निपात है। तपस में अण् मसर्वर्थीय है, अतः इसका अर्थ है कि तप जिसके अन्दर विद्यमान हो। इससे व्यञ्जना निकलती है कि ऐसे शत्रु जिनके पौरुष की बातचीत भी सम्भव न हो। मैं यदि जीवित हूँ तो शत्रुओं द्वारा मेरे वर्ग का संहार अनुचित है और उस संहार का कर्ता भी वह। यहां ‘भी’ शब्द की व्यञ्जना है केवल ‘तुच्छ मनुष्य’। ‘वह यहीं पर राक्षस कुल को मारता है’ और आश्चर्य है कि रावण जीवित है’ यहां पर तिङ् और कारक शक्तियां व्यञ्जक हैं। ‘मारता है’ और जीवित है’ की क्रियाविभक्तियां व्यञ्जक है, ‘यहीं पर’ का अधिकरण कारक और ‘राक्षस कुल को’ का कर्म कारक ये कारक शक्तियां व्यञ्जक हैं। ‘यहीं पर’ का अर्थ है जहां मैं विद्यमान हूँ और मेरा एकछत्र प्रभुत्व है। ‘निहन्ति’ में ‘निः’ उपसर्ग से व्यक्त होता है कि निःशेष रूप में राक्षसों का संहार कर रहे हैं। ‘राक्षसकुलम्’ में कर्म कारक से व्यञ्जना निकलती है कि समस्त राक्षस वंश का संहार ही भगवान् राम की संहारक्रिया का लक्ष्य है। ‘रावण’ शब्द में अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य की पहले ही व्याख्या की जा चुकी है। अर्थात् रावण का स्वयं ही रावण कहना वाधित होकर अनुपम पराक्रमशालित्व इत्यादि गुणों को अभिव्यक्त करता है। इसी प्रकार ‘एव’ ‘जीव द्वात्’ ‘अहो’ यह अव्यय ये भी व्यञ्जक हो सकते हैं। समष्टि में इसका व्यङ्ग्यार्थ यह होगा कि रावण अद्वितीय पराक्रमी तथा समस्त जगद्विजेता है। यही आश्चर्य कि उस रावण का भी कोई शत्रु होकर बना रहे। यदि वह शत्रु अकेला हो तो भी कुछ समझ में आसक्त है किन्तु बहुत बड़ी संख्या में शत्रु विद्यमान हों यह और भी आश्चर्य—
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ध्वन्यालोके
जनक है वे शत्रु भी यदि कहीं दूर प्रदेश में स्थित हों जहाँ रावण विद्यमान न हो तो भी कोई बात है किन्तु यहाँ ये राम इत्यादि शत्रु तो ऐसे प्रदेश में स्थित हैं जहाँ रावण विद्यमान ही नहीं है अपितु उसका पूर्णप्रभुत्व है फिर स्थित होते हुये यदि चुप रहें तो भी कुशल है किन्तु ये तो क्रियाशील ही नहीं किन्तु संहार कर रहे हैं; फिर किसी एक का मारा जाना भी बड़ी बात नहीं ये तो समस्त राक्षस वंश के विनाश पर ही उतारू हैं। शत्रु भी यदि कोई वीर हो तो भी एक बात है किन्तु यहाँ तो बेचारा तपस्वी है यदि परम पराक्रमी के रूप में प्रसिद्ध मैं मर गया होता और तब यह सब कुछ होता तो इतना बड़ा आश्चर्य नहीं होता किन्तु सबसे बड़ी आश्चर्य की बात तो यही है कि रावण अब तक जीवित है। (केवल मेरा पराक्रम ही व्यर्थ नहीं हो रहा है अपितु दूसरे भी परमपराक्रमी महावीरों का पराक्रम व्यर्थ ही जा रहा है)। धिक्-धिक् इस निपात (तथा इसकी वीप्सा) से परम गर्हणीयता की व्यंजना कता होती है। शक्रजित् अर्थात् शक्र को जीतनेवाला इस उपपद समास से व्यक्त होता है कि मेघनाद का शत्रु को जीत लेना तो एक कल्पित कथा सी जान पड़ती है। (शक्र शब्द ‘शक्’ धातु से रम् प्रत्यय होकर बनता है इसका अर्थ है जो शत्रुओं को जीतने में समर्थ हो’)
मेघनाद ने ऐसे शत्रु को भी अनायास ही जीत लिया अतः राम को जीतना तो उसके लिये बड़ी बात ही नहीं थी। किन्तु उस मेघनाद की शक्ति भी कुठित हो गई। यह व्यञ्जना उपपद समास तथा ‘उसके साथ बुद्धि’ इस कृदन्त प्रत्यय से निकलती है। (प्रबोधितवता में ‘प्र’ उपसर्ग ‘बुध्’ धातु से णिच् प्रत्यय होकर बतवत् प्रत्यय होता है। ‘प्र’ का अर्थ है प्रकाश णिच् का अर्थ है प्रेरणा और क्तवतु का अर्थ है भूत काल इससे व्यञ्जना निकलती है कि कुम्भकर्ण से बड़ी आशा थी; उन्हें जगाने के लिये बहुत अधिक उद्योग किया गया, वे जागे भी किन्तु उन्होंने कर क्या लिया। अब तो उनकी आशा और उठकर उनके पराक्रम सब अतीत की कथा बन गये हैं। मेघनाद और कुम्भकर्ण की आशा तो दूर की बात रही मैं ही क्या कर पाया। शत्रुजित् के द्विप्र प्रत्ययान्त उपपद समास के साथ ‘स्वर्ग’ ही ग्रामटिका यह कर्मधारय समास भी व्यञ्जक है। ग्रामटिका में स्वार्थिक तद्धित प्रयोग है। ग्रामटिका में अल्प अर्थ में तद्धित ‘टिकच्’ प्रत्यय हो जाता है। इसका अर्थ है तुच्छ ग्राम) इससे व्यञ्जना निकलती है कि मैं स्वर्ग को एक तुच्छ गाँव के समान बड़ा बना लिया था और सरलता से जीत लिया था और उसके अभिमान से मेरी भुजाएँ फूली हुई थीं; किन्तु यह सब अभिमान व्यर्थ ही था। जब से साधारण तपस्वी मेरे सामने ही मेरे वंश का नाश कर रहे हैं तब स्वर्ग जैसे तुच्छ ग्राम के जीत लेने का क्या दर्प। ‘विलुठन’ शब्द से ‘वि’ उपसर्ग की व्यञ्जना है निर्दयता पूर्वक नष्ट भ्रष्ट करना। ‘वृथा’ इस निपात की व्यञ्जना है अपने पौत्रष की निन्दा। ‘भुजाओं से’ में बहुवचन से व्यक्त होता है इनमें कोई शक्ति नहीं ये मेरी भुजाएँ तो भाररूप हो हैं। अधिक कहने की क्या आवश्यकता यदि इस पद्य को तिल-तिल करके तोड़़ा जावे तो इसका सभ अंश व्यञ्जक के रूप में प्रकाशित होता है। (यहाँ पर प्रकृति, प्रत्यय, अव्यय इत्यादि प्रत्येक तत्व व्यञ्जक हो है। ऊपर दिग्दर्शन मात्र कराया गया है।)
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३
तृतीय उद्योत:
जब व्यञ्जकों की संख्या अधिक होगी तो व्यंग्यों की संख्या भी असीमित हो जावेगी। व्यंग्यों का सौष्ठव हो सौन्दर्य का एकमात्र निदान होता है। यदि व्यंग्य को अवभासित करनेवाले किसी एकपद का प्रत्यक्षीकरण हो जावे तो वहाँ पर भी काव्य का संघटनासौन्दर्य प्रत्यक्ष सिद्ध हो जाता है फिर जहाँ इस प्रकार के सौन्दर्याधायक व्यञ्जकों की भरमार हो और प्रत्येक पद तथा उस पद का प्रत्येक खण्ड नवीन चाक्षुषता लिये हुये हो वहाँ के सौन्दर्य का तो कहना ही क्या। उदाहरण के लिये अभी उद्धृत किये हुये 'न्यङ्कारो ह्यमिमेव' इत्यादि पद्य में प्रधान व्यंग्यार्थ है 'रावण' पद से अभिव्यक्त होनेवाला अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य। ('रावण' पद वाधित होकर धर्मान्तर परिणत 'रावण' को अभिव्यक्त करता है।) उस अर्थान्तर संक्रमित वाच्य का सौन्दर्य उन समस्त व्यञ्जकों के व्यंग्यार्थों के द्वारा बट जाता है जिन पर पिछले पृष्ठों में विस्तृत प्रकाश डाला गया है।
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तृतीय उद्योत:
यथा महर्षिव्यासस्य— अतिक्रान्तसुखा: काला: प्रत्युपस्थितदारुणा: । इव: इव: पापोयदिवसा पृथवी गतयौवनना ॥ अत्र हि कृतद्वितवचनैरलक्ष्यक्रममव्यङ्ग्यै:, 'पृथिवी गतयौवना' इत्यनेन वाच्य- ध्वनि: प्रकाशित: ।
यथा महर्षि व्यास का— 'जिसमें सुख अतिक्रान्त हो गये हैं और दारुण (दुःख) विपरीत रूप में उपस्थित हैं इस प्रकार के काल और कल (उत्तरोत्तर) अधिक पापियों के दिनों वाली गतयौवना पृथवी है।' यहाँ पर निस्सन्देह कृतप्रत्यय, तद्धितप्रत्यय और वचन से 'गतयौवनना पृथिवी' से अत्यन्त तिरस्कृत वाच्य ध्वनि प्रकाशित की गई है।
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तृतीय उद्योत:
इति, सर्वे पदे न तु सुखं प्रतिवर्तमानाः स कोऽपि काललेशो न हि तत्रापि कवलयति इत्यथ: । प्रतिपन्नव्यतिरेकानु- वृत्तानि प्रत्यवर्तमानानि तथा दूरभावीनीप प्रत्युपस्थितानि निकटतया वर्तमानानि भवन्ति दारुणानि दुःखानि येषु ते । दुःखं बहुप्रकारमेव प्रतिवर्तमानाः सर्वे कालांशा इत्यनेन कालस्य तावन्निवेदमभिव्यङ्ग्यत: शान्तरसव्यङ्ग्य कतिपय ।
(अनु.) बीता हुआ, कभी वर्तमानता का अवलम्बन लेनेवाला नहीं है सुख जिनमें ऐसे काल, सभी (काल) सुख के प्रति वर्तमान कोई एक भी काल का लेश नहीं यह अर्थ है। विपरीत वृत्तानि प्रत्यवर्तमानानि तथा दूरभावीनीप प्रत्युपस्थितानि निकटतया वर्तमानानि भवन्ति दारुणानि दुःखानि येषु ते। दुःखं बहुप्रकारमेव प्रतिवर्तमानाः सर्वे कालांशा इत्यनेन कालस्य तावन्निवेदमभिव्यङ्गयत: शान्तरसव्यङ्गय कतिपय।
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रूप में उपस्थित बीते हुए और पुनः लौटकर आनेवाले तथा भविष्य में अति दूर होनेवाले भी प्रत्युपस्थित अर्थात् निकटता से वर्तमान हो जाते हैं दारुण अर्थात् दुःख जिनमें । सभी प्रकार के कालांश बहुत प्रकार के दुःखों को लौट रहे हैं । इस कथन के द्वारा निर्वेद को अभिव्यक्त करनेवाले काल की शान्तरसव्यञ्जकता (सिद्ध हो जाती है) । देश की भी बतलाते हैं— पृथिवी कुल-कल अर्थात् प्रातः-प्रातः अर्थात् एक दिन से दूसरे दिन पापीय दिनवाले अर्थात् अत्यन्त पापियों से सम्बन्धित जिसके दिनों के स्वामी हैं, इस प्रकार की हो गई है । स्वभाव से ही काल दुःखमय है उसमें भी अत्यन्त पापी लोगों के स्वामित्ववाले पृथ्वीरूप देश की दुरातमता से विशेष रूप से दुःखमय (हो गया है) यह अर्थ है । वह इस प्रकार कल कल अर्थात् एक दिन से दूसरे दिन गतयौवन वृद्धा स्त्री के समान यौवन के गत हो जाने से जिसके सम्भोग की सम्भावना नहीं की जा सकती जो जो दिन आता है वह-वह पहले की अपेक्षा निकृष्ट होने के कारण अधिक पापवाला है । अथवा यह शब्द ईयसुन् अन्तवाला मुनि ने प्रयुक्त किया है अथवा णिजन्त है । 'अत्यन्त' यह भाव यह है कि वह भी प्रकार इसी की अंमता को प्राप्त होता ।
तारावती—यह नहीं समझना चाहिये कि प्रत्येक पद को व्यञ्जक बनाकर कविता करना असम्भव है । विशेष प्रतिभाशाली महात्माओं के इस प्रकार के बन्धनप्रकार प्रायः देखे जाते हैं । एक उदाहरण लीजिये—महर्षि वेद व्यास ने बुरे समय के आ जाने का वर्णन करते हुए हुये लिखा है—
'ये ऐसे समय हैं जब कि सुख व्यतीत हो चुका है, दारुण ( दुःख ) प्रतिकूल रूप में उपस्थित है, पृथिवी का यौवन व्यतीत हो चुका है और जो भी दिन आता है वह पहले की अपेक्षा अधिक पापियों से अधिकृत होता जाता है ।'
दूसरा उदाहरण यौवन किसी स्त्री का ही समाप्त होता है; पृथ्वी को यौवनसमासि बाधित हो जाती है और उससे लक्षयार्थ निकलता है—उपभोग के अयोग्य होना । उससे व्यञ्ज्यार्थ के रूप में पृथिवीगत अनेक हीनतायें प्रतिभासित होती हैं । यौवन का अर्थ बिल्कुल छूट जाता है अतः यह अत्यन्त तिरस्कृत वाच्य ध्वनि हुई । इस ध्वनि को सान्दिग्धप्रकर्ष कुतप्रत्यय (कृतप्रत्यय तीन शब्दों में है—अतिक्रान्त, प्रत्युपस्थित और गत शब्दों में क्त प्रत्यय) अतिक्रान्त में क्तप्रत्यय भूतकालार्थक है इससे व्याख्याना होती है कि यह काल ऐसा है जिसमें सुख सर्वथा व्यतीत हो गया है किसी प्रकार भी वर्तमान नहीं है ! इससे काल की अत्यन्त भीषणता व्यक्त होती है । 'प्रत्युपस्थित' शब्द में भी भूतकालार्थक 'क्त' प्रत्यय है, इसकी व्याख्यज्ञना यह है कि दारुण परिस्थितियाँ कुछ पहले से ही आई हुई हैं । अतः उनके वर्तमान होने में किसी प्रकार की शङ्का नहीं रह गई । विगत भीषण परिस्थितियाँ लौट आई हैं और जिन भीषणताओं की बहुत समय बाद आने की सम्भावना थी वे अभी आ गई हैं और निकट ही वर्तमान रूप में मालूम पड़ती हैं । इस प्रकार वक्त प्रत्यय से व्यक्त होता है कि एक तो इनका आना सन्दिग्ध नहीं रहा दूसरे इनका निराकरण भी अशक्य प्रतीत होता है । ( 'गत'
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तृतीय
उद्योतः
में वत प्रत्यय से यहीं व्यक्त होता है कि पृथिवी का यौवन व्यतीत ही हो गया अब उसके पुनरावर्त्तन की कोई आशा नहीं । अतः पृथिवी निःसार है और सर्वथा परित्याग के योग्य है । तद्धित प्रत्यय 'पापीय्' में 'छ' है इसका अर्थ है पापियों से सम्बन्ध रखनेवाले । इस प्रत्ययसे व्युत्पन्ना निकलती है कि अब इन दोनों पर अधिकार पापियों का ही रह गया है । भले आदमियों की तो बात पूछनेवाला भी कोई नहीं। स्वभाव से ही काल दुःखमय है उसमें भी देखे जाते बुराई और आधिक्य बढ़ गयी है कि पृथिवी के सभी शासक पापी ही हो गये हैं। अतः यह समय और अधिक दुःखदायक हो गया है। वहु इस प्रकार कि जैसे किसी वृद्धा स्त्री का जो भी दिन आता है वह पिछले दिन की अपेक्षा उसे और अधिक यौवनशून्य बना देता है, उसके अन्दर आकर्षणकता, सम्भोग की सम्भावना इत्यादि सभी कुछ प्रतिदिन क्षीण होते जाते हैं । इसी प्रकार पृथवी का जो भी दिन बीत रहा है वह पहले की अपेक्षा अधिक निकृष्ट ही होता है । जिससे न पृथिवी में कोई आकर्षण रह गया है और न वह सम्भोगयोग्य ही रह गयी है । 'पापीय्' में ईयसुन् प्रत्यय भी माना जा सकता है जिसका अर्थ होता है अपेक्षाकृत अधिक पापी ।
तृतीय
उद्योतः
ऐसी दशा में यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि इसका शुद्धरूप 'पापीयोदिवसा:' होगा, 'स' का लोप कैसे हो गया ? इसका उत्तर यह है कि यह मुनि का प्रयोग है अतः 'स' का लोप आर्ष है । अथवा ईयसुन् प्रत्यय करके नामधातु का णिच् प्रत्यय कर दिया जावे । 'जो लोगों को 'पापीयः' बनाता है उसके लिये णिच् होकर क्रिया होगी 'पापीयति' फिर कर्त्ता में अच् प्रत्यय करके ति और णिच् का लोप करके 'पापीय' यह अदन्त शब्द बन सकता है इस प्रकार कृत्प्रत्यय और तद्धित प्रत्यय की व्युत्पत्तिदिखला दी गई । 'काला:' में बहुवचन से व्यक्त होता है कि काल का कोई भी अंश सुखमय नहीं रहा सभी कालांश दारुण व्याधियों के देने वाले बन गये हैं । इस प्रकार प्रथम पंक्ति में काल की भीषणता बतलाई है और दूसरी पंक्ति में स्थान की अस्पृहणीयता। जब देश और काल दोनों विपरीत हैं तब ममत्व ही किससे किया जावे ? इस प्रकार असंलल्यक्रम व्यंग्य शान्त रस यहाँ पर ध्वनित होता है और उसका अङ्ग बन गयी है 'गतयौवना' की अत्यन्त तिरस्कृत वाच्यव्यंग्यत्ता ।
तृतीय
उद्योतः
(ध्वन्या०)—एषां च सुबादीनामेकशः समुदितानां च व्यङ्जकत्वं महाकवीनां प्रबन्धेषु प्रायेण हृदयते । सुबन्तस्य व्यज्जकत्वं यथा—
तृतीय
उद्योतः
तालैः शिख्जावलयसुभगैः कान्तया नतितो मेऽयामध्यास्ते दिवसविगमे नीलकण्ठः सुहृद् वः ॥
तृतीय
उद्योतः
तिडन्तस्य यथा—
तृतीय
उद्योतः
अवसर रोऊं चिअ णिम्मिआइं मा पुंसि मे हआच्छोइं । दंसणमेत्तुमभत्तोहि जइहि हिअअं तुह ण पआमस् ॥
तृतीय
उद्योतः
(अनु०) इन सुप् इत्यादिकों का एक एक रूप में (पृथकू पृथक् ) और समुदाय के रूप में व्यज्जकत्व महाकवियों के प्रबन्धों में प्रायः देखा जाता है । सुबन्त का व्यज्जकत्व जैसे—
तृतीय
उद्योतः
'झङ्कार से परिपूर्ण वलयों से सुन्दर मालूम पड़नेवाली तालियों द्वारा मेरी प्रियतमा द्वारा नचाया हुवा तुम्हारा मित्र नीलकण्ठ दिवस के अन्त में जिसके ऊपर बैठता है ।'
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तिड्न्त का जैसे—
'दूर हटो; रोने के लिये ही निर्मित मेरे इन हत नेत्रों को विकसित मत करो जिन्होंने दर्शनमात्र से हो उन्मत्त होकर तुम्हारे हृदय को भी नहीं जाना ।'
(लो०)—सुबन्तस्येति । समुद्धितत्वे तूदाहरणं दत्तं व्यस्तत्वे चोच्यत इति भावः । तालैरिति बहुवचनमनेकविधं वैदग्ध्यं ध्वनतु विप्रलम्भोदीपकतामेति ।
अपसर रोदितुमेव निमिते मा पंसय हते अक्षिणी मे । दर्शानमात्रोनमत्ताभ्यां याभ्यां तव हृदयमेव रुपं न ज्ञातम् ॥
उन्मत्तो हि न किंचिज्जानातीति न कस्याप्यत्रापराधः । दैवेनैवमेव निर्माणं कृतमिति । अपसर मा वृथा प्रयांसं कार्षीः दैवेस्य विपरिवर्तंयितुमशक्यत्वादिति तिड्न्तो व्यञ्जकः तदनुगृहीतानी पदान्तराण्यपीति भावः ।
(अनु०) 'सुबन्त का' यह समुदित होने पर तो उदाहरण दे दिया गया, पृथक् होने पर दिया जा रहा है यह भाव है । 'तालैः' में बहुवचन अनेक प्रकार के वैदग्ध्य को ध्वनित करते हुये विप्रलम्भ की उद्दीपकता को प्राप्त होता है । (उदाहृत श्लोक की छाया संस्कृत में दी गई है ।)
उन्मत्त निस्सन्देह कुछ नहीं जानता; अतः यहां पर किसी का अपराध नहीं है । दैव ने ही इस प्रकार का निर्माण किया है । 'हटो; व्यर्थ में प्रयास मत मरो; क्योंकि दैव का बदलना अशक्य है ।' इस प्रकार तिड्न्त व्यञ्जक है और उससे अनुगृहीत और पद भी व्यञ्जक हैं ।
सुबन्त की व्यञ्जकता का उदाहरण
तारावती—प्रस्तुत कारिका में सुप् इत्यादि की व्याख्या बतलाई गई है । यह व्याख्या दोनों प्रकार की हो सकती है—समुदित रूप में मिलकर सभी की एक साथ व्यञ्जकता और इनकी पृथक् व्यञ्जकता । सुप् इत्यादि की व्यञ्जकता के प्रायः दोनों रूप प्रबन्ध काव्यों में देखे जाते हैं । सामूहिक रूप में व्यञ्जकता के उदाहरण पिछले प्रकरण में दिये जा चुके हैं । अब पृथक् पृथक् तत्वों की व्यञ्जकता बतलाई जा रही है । सुबन्त की व्यञ्जकता का उदाहरण मेघदूत से दिया गया है । पूरा पद्य इस प्रकार है—
तनमध्ये च स्फटिकफलका काञ्चनी वासयष्टिः
मूले बद्धा मणिभिरनतिप्रौढवंशप्रकाशैः ।
तालैः शिख्जावलयसुभगः कान्तया नर्तितो मे
यामध्यास्ते दिवसविगमे नीलकण्ठः सुहृदः ॥
'यक्ष मेघ को अपने घर की पहिचान बतलाते हुये कह रहा है कि—( मेरे दरवाजे पर माघवी का मण्डप है जिसके चारों ओर कुरवक का घेरा बना हुआ है, उसके समीप ही लाल अशोक और वकुल के वृक्ष खड़े हैं ।) उन दोनों वृक्षों के मध्य में सोने की वासयष्टि ( एक प्रकार की छतरी जिस पर पालतू पक्षी रहा करते हैं ।) है जिसका ऊपरी फलक स्फटिक मणि का बना हुआ है और नीचे की ओर प्रौढ़ वंशों के समान चमकने वाली मणियां जड़ी हुई हैं । दिन के व्यतीत होने पर ( सायं काल में ) तुम्हारा मित्र मयूर उस वासयष्टि
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तृतीय उद्योतः
पर आकर बैठता है। यह वही मयूर है जिसको मेरी प्रियतमा तालियाँ बजा-बजाकर नचाया करती है जो तालियाँ खड़्ड़ार करनेवाले वलयों से बहुत ही सुन्दर मालूम पड़ती हैं। यहाँ पर सुबन्तपद 'तालः' तृतीया का बहुवचन है जिससे ध्वनित होता है कि 'मेरी प्रियतमा अनेक प्रकार से ताल बजा लेती है, वह विलास नृत्य और सङ्गीत में बहुत निपुण है।' यह व्यञ्जना आलम्बन के गुणों का स्मरण कराने का कारण vipralambha का उद्दीपन करती है। इस प्रकार सुबन्त से वस्तुव्यञ्जना के द्वारा रसध्वनि होती है।
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तृतीय उद्योतः
तिडन्त से व्यञ्जना का उदाहरण किसी नायक ने अपराध किया है; नायिका रो रही है, नायक उसे मनाना चाहता है; इस पर नायिका कहती है— 'तुम यहाँ से चले जाओ; भगवान् ने मेरी हतभागिनी आँखें रोने के लिये ही बनाई हैं अतः तुम इन्हें बढ़ाने की चेष्टा मत करो। ये आँखें तुम्हारे दर्शनमात्र से उन्मत्त हो गई और इन्होंने तुम्हारे हृदय को नहीं जान पाया।'
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तृतीय उद्योतः
आशय यह है कि नायिका कह रही है कि मेरी आँखों का ऐसा भाग्य कहाँ कि अपने प्रियतम के तुष्टिकारक मुख के अवलोकन का आनन्द ले सकें। परमात्मा ने तो इनके भाग्य में रोना ही दिया है। सबसे बड़ा अपराध तो इनका यही था कि इन्होंने तुम्हारे बाह्य रूप को ही देखा और उन्मत्त हो गये; इन्होंने तुम्हारे कपटी हृदय को नहीं देखा। जो उन्मत्त हो जाता है वह निस्सन्देह कुछ समझ ही नहीं पाता। अतः रूप पर उन्मत्त होकर मैंने जो कुछ किया उसमें अपराध किसका है ? परमात्मा ने ही ऐसी रचना कर दी थी। यहाँ 'दूर हटो' यह क्रिया है। इससे व्यञ्जना निकलती है कि 'तुम्हारा मुझे मनाने की चेष्टा करना व्यर्थ है; जब दैव ने ही ऐसा विधान कर दिया तो उसे बदल कौन सकता है ?'
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तृतीय उद्योतः
इस व्यञ्जना के द्वारा नायिका नायक से अपनी हृदयवेदना निवेदित कर उसके हृदय में सद्भावना जगाना चाहती है। इस प्रकार यहाँ तिडन्त व्यञ्जना है, और उसके साथ दूसरे शब्द भी व्यञ्जक हैं। ('अप' (ही) शब्द से व्यञ्जना निकलती है कि तुम्हारी अनुयायिनी होने का यही फल मिला कि मुझे जीवन भर रोना पड़ेगा। 'हतभागी नेत्र' से सौभाग्य का अभाव और 'तुम्हारे हृदय को नहीं देखा' में हृदय शब्द से नायक की दुष्टता व्यक्त होती है।)
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मा पन्थं रुन्धियो अवेहि बालक अहोसि अहिरियो । अम्हे णिरिच्छाओ सुणघरं रविक्खदव्वं णो ॥ सम्बन्धस्य यथा— अण्णत्त वच्च वालअ ण्णअन्ति किं सण पुलोएसि एस । मो जाइअभीरुअआण तडं विणा होई कः ।
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तृतीय उद्योतः
कृतकप्रयोगेषु प्राकृतेषु तद्वितविषये व्यङ्ग्यकत्वमवेद्यत एव । अवज्ञातिशये समासानां च वृत्त्यौचित्येन विनियोजने ।
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(अनु०) अथवा जैसे—
'अरे अपढ़ बालक ! दूर हटो, मेरे मार्ग को मत रोको, आश्चर्य है कि तुम निलंज्ज हो; हम परतन्त्र हैं क्योंकि हमें शून्य घर की रक्षा करनी है।'
सम्बन्ध का जैसे—
'हे बालक ! दूर जाओ। स्नान करती हुई मुझे देख रहे हो यह क्या बात है ? पत्नियों से डरनेवाले के लिए (यह) टट्टी नहीं है ।'
जहाँ 'क' का प्रयोग किया गया हो वहाँ प्राकृत में तद्धित के विषय में व्यञ्जकत्व कहा ही जाता है। अवज्ञा की अधिकता में 'क' प्रत्यय होता है। समासों का व्यञ्जकत्व वृत्ति के औचित्य के द्वारा विनियोजन में होता है।
(लो०)—मा पन्थानं रुध: अपेहि बालक अप्रौढ अहो असि अह्तीक: ।
वयं परतन्त्रा यतः शून्यगृहं मामकं रक्षणीयं वर्तते ।।
इत्यत्रापेहीति तिड्नतमिदं ध्वनति—तवं तावदप्रौढो लोकमध्ये यदेवं प्रकाशयसि ।
अस्ति तु सड्ङेतस्थानं शून्यगृहं तत्रैवागन्तव्यमिति ।
'अनन्यत्र व्रज बालक' अप्रौढबुद्धे स्नान्तीं मां किं प्रकर्षेणालोकयस्येतत् ।
भो इति सोल्लुठ्ठमाहानम् । जायाभीरुकाणां सम्बन्धि तत्मेव न भवति ।
अत्र जायातो ये भीरवस्तेषामेतत्स्थानमिति दूरापेतः सम्बन्ध इत्यनेन सम्बन्धेनेष्टरीतिशयः प्रच्छन्नकामिन्याभिव्यक्तः ।
कृतकेति । 'क'ग्रहणं तद्धितोपलक्षणार्थम् । कृतः कप्रत्ययप्रयोगो येषु काव्यवाक्येषु यथा जायाभीरुकाणामिति ।
ये ह्यरसंषा धर्मंपत्नीषु प्रेमपरतन्त्रास्तेष्यो कीडन्यो जगति कुत्सितः स्यादिति कप्रत्ययोगविज्ञातिशयोत्कः ।
समासानां चेति । केवलानामेव व्यञ्जकत्वमावेद्यत इति सम्बन्धः
(अनु०) (गाथा का अनुवाद वृत्ति के अनुवाद में दिया गया है।)
यहाँ पर 'दूर हटो' यह तिड्न्त यह ध्वनित करता है—'तुम तो प्रौढ नहीं हो जो लोक के मध्य में इस प्रकार प्रकाशित करते हो । सुना घर सम्बक्त स्थान तो है, वहीं तुम्हें आ जाना चाहिए ।'
'हे बालक ! अर्थात् अपढ़ बुद्धिवाले अन्यत्र जाओ । स्नान करती हुई मुझको प्रकर्ष के साथ (घूर घूर कर) क्या देख रहे हो? 'ओ' (अरे) यह सम्बोधन अपमान के सहित है ।
पत्नियों से डरनेवालों से सम्बन्धित टट्टी ही नहीं होता। यहाँ पर 'जाया' से जो डरे हुए हैं उनका यह स्थान यह सम्बन्ध बहुत दूर चला गया' इस सम्बन्ध से प्रच्छन्न कामिनी के द्वारा ईर्ष्या की अधिकता अभिव्यक्त की गई। 'कृतक' में 'क' का ग्रहण तद्धित के उपलक्षण के लिए है । किया गया है 'क' प्रत्यय का प्रयोग जिन काव्यवाक्यों में जैसे 'जायाभीरुकाणाम्' में जो रसज्ञ नहीं हैं और धम्पत्नियों के प्रेम के अधीन हैं उनसे अधिक कुत्सित कौन होगा ? इस प्रकार के प्रत्यय अवज्ञा की अधिकता का द्योतक है। 'समासों का' अर्थात् केवल (समासों) का व्यञ्जकत्व निवेदित किया जा रहा है ।
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तृतीय उद्योतः
तारावती—अथवा तिडन्त की व्यञ्जकता का दूसरा उदाहरण—किसी नायक ने किसी नायिका को मार्ग में घेरा है। नायिका संकेतस्थल का निर्देश करती हुई कह रही है—‘तुम्हारी चेष्टायें तो बालकों जैसी हैं; तुम सामने से हट जाओ। तुम तो बिल्कुल निर्लज्ज हो। लोग तुम्हारी चेष्टाओं को देख रहे हैं और तुम्हें लोकनिन्दा का भी भय नहीं लगता। मैं तुम्हारी तरह बाला और स्वतन्त्र थोड़ी ही हूँ। मेरा घर सुना पड़ा है और मुझे उसकी रखवाली करनी है।’
यहां पर दूर ‘हट जाओ’ यह तिडन्त (क्रिया) पद है। इससे व्यञ्जना निकलती है कि—‘तुम प्रौढ़ नहीं हो जो लोक में इस प्रकार प्रच्छन्न प्रेम को प्रकाशित कर रहे हो। मेरा घर सुना पड़ा है जो कि संकेत स्थान है वहीं आ जाना।’
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तृतीय उद्योतः
सम्बन्ध की व्यञ्जकता का उदाहरणकोई नायिका किसी विवाहित पुरुष से प्रेम करती है और वह नायक भी नायिका को चाहता है। किन्तु अपनी पत्नी के सामने वह उस नायिका से प्रेम करते हुए डरता है। नायिका चाहती है कि वह अपनी पत्नी की उपेक्षा कर और उसे अपमानित कर नायिका से प्रेम करे। इस समय नायिका सरोवर तट पर अकेले में स्नान कर रही है और नायक उसे देख रहा है। नायिका ताने के साथ कह रही है—‘अरे लड़के ! (अप्रौढ़ बुद्धिवाले) कहीं और जाओ। मैं स्नान कर रही हूँ मुझे क्या देख रहे हो ? जो लोग अपनी स्त्रियों से डरते हैं उनके लिए यह तट नहीं है।’
आशय यह है कि मैं ऐसा प्रेम पसन्द नहीं करती कि तुम वहाँ सामने तो डर जाओ और यहाँ छिप छिप कर मुझे देखो। यदि प्रेम करना है तो तुम्हे खुलकर प्रेम करना चाहिए। यहां पर ‘भोः’ (अरे) यह सम्बोधन का शब्द अपमानजनक रूप में प्रयुक्त किया गया है। यहां पर ‘जो अपनी पत्नी से डरे हुए हैं उनका यह तट नहीं है’ इसमें ‘उनका तट’ यह सम्बन्ध सर्वथा असम्भव है। (यदि तुम वहाँ नहीं बोलते तो यहां भी बात नहीं कर सकते।)
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तृतीय उद्योतः
इस प्रकार सम्बन्धवशती से ईर्ष्या की अधिकता अभिव्यक्त होती है।तद्धित की व्यञ्जकता का उदाहरणप्राकृत भाषाओं में जहाँ ‘क’ प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है वहां तद्धित के विषय में व्यञ्जकता प्रसिद्ध ही है। ‘क’ प्रत्यय अधिक अनादर के अर्थ में होता है। ‘क’ का ग्रहण दूसरे तद्धित प्रत्ययों का उपलक्षण है। अर्थात् जिस प्रकार ‘क’ प्रत्यय व्यञ्जक हो सकता है उसी प्रकार अन्य तद्धित प्रत्यय भी व्यञ्जक हो सकते हैं। ‘क’ प्रत्यय का उदाहरण है—‘जायाभीरोषणाम्’ यहां ‘भीरु’ शब्द से ‘क’ प्रत्यय किया गया है जो अवज्ञातिशय अर्थ में होता है।
इसका व्यङ्ग्यार्थ है कि जो रसज्ञ नहीं होते और धर्मपत्नी के प्रेम के अधीन होते हैं उनसे निकृष्ट संसार में और कौन हो सकता है ? (यहां जाया शब्द का व्यङ्ग्यार्थ है कि तुम्हारी पत्नी में न सौन्दर्य है और न आकर्षण उससे सन्तान पैदा करने का उपयोग भले ही हो, सरसता और सहृदयता की आशा तो हो ही नहीं सकती। फिर भी तुम उससे डरते हो यह तुम्हारी हृदयहीनता है जो कि तुम मेरे रूपसौन्दर्य की आकर्षकता की भी उसके डर से
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उपेक्षा कर देते हो। यही हीनता, अरसिकता और अज्ञान ‘बालक’ इस सम्बोधन से व्यक्त होते हैं। भय अनौचित्य की सीमा तक पहुँच गया है, जो बहुत ही बुरा है। अतः तुमसे यह आशा ही नहीं की जा सकती कि मैं तुमसे अपना सम्बन्ध करूँ और बाद में डर कर तुम मेरा साथ नहीं छोड़ जाओगे। ये सब व्यंजनायें कृत्सार्थक प्रयत्न तथा सम्बन्धानौचित्य के कारण निकलती हैं।
समासवत्ति की व्यंजकता
समास भी वृत्ति के औचित्य के साथ विनियुक्त करने पर व्यंजक होते हैं। यहाँ केवल समासों की व्यंजकता का ही कथन किया गया है। (यह पहले ही बतलाया जा चुका है कि उपनागरिका इत्यादि वृत्तियों का निर्णय समास के आधार पर भी होता है। ये वृत्तियाँ वीर रौद्र शृंगार इत्यादि की व्यंजना करती हैं। इस प्रकार केवल समासों की व्यंजकता का पहले ही प्रतिपादन किया जा चुका, अतः यहाँ पर उनके उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं है।)
निपातानां व्यज्जक्तवं यथा— अयसेपदे तथा वियोगः प्रियया चोपनतश्चुदुस्सहो मे। नवतारो रोषाद्यहोभिरंसवितव्यं च निरातपार्थरम्यैः॥ इत्यत्र चशब्दः। यथा वा— मुहुरड्गुलिसंवृताधरोष्ठं प्रतिषेधाक्षरविकलवाभिरामम्। mुखमंसविवृतिपक्ष्मलाक्ष्या: कथमप्युपस्मितं न चुम्बितं तु॥
अत्र तुशब्दः। निपातानां प्रसिद्धमपोहं चोतकत्वं रसापेक्षयोक्कमिति द्रष्टव्यम्। (अनु०) निपातों का व्यज्जक्तव जैसे— ‘उस प्रियतमा से सुदुस्सह वियोग एकदम आ पड़ा और नवीन जलघरों के उदय से दिन भी आतपभाव से रमणीय हो जावेंगे।’ यहाँ पर ‘च’ (और) शब्द। अथवा जैसे— ‘बार बार अञ्जुलि से रोके हुए अधरोष्ठवाले, प्रतिषेध के अक्षरों की विकलवता के कारण अभिराम, कन्धे की ओर घूमे हुए उस सुन्दर पक्ष्म-युक्त नेभोंवाली (शकुन्तला) के मुख को जैसे तैसे ऊपर को उठाया किन्तु चूम तो नहीं पाया।’ यहाँ पर ‘तु’ (तो) शब्द। निपातों का प्रसिद्ध भी व्योतकत्व यहाँ पर रस की अपेक्षा से कहा गया है।
(लो०)—च शब्द इति जातावेकवचनम्। द्वौ च शब्दावेवमाहुतुः—काकताली- यन्यायेन गण्डस्योपरि स्फोट इति वतद्वियोगश्च वर्षासमयश्च सम्मुपनती एतदलं प्राण- हरणाय। अत एव रसापदेन सुतरामुद्दीपनविभावत्वमुक्तम्। तुशब्द इति। परचात्तापसचकसस्न तावन्मात्रपरिच्छिन्नस्नेहलामेनापि कृतकृत्यता स्यादिति ध्वनतीति भावः।
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प्रसिद्धमपीति । वैयाकरणादिगृहेषु हि प्राक्प्रयोगस्वातन्त्र्यप्रयोगाभावात् पष्ठघाद्यश्रवणाल्लिङ्गसंख्याविरहाच्च वाचकवैलक्षण्येन ध्वोतका निपाता इत्युद्दोष्यत एवेति भावः ।
अनु० ‘च शब्द’ यह । जाति में एकवचन है । दो ‘च’ शब्द यह कहते हैं—काकतालीय न्याय से फोड़े पर (दूसरा) फोड़ा इसके समान उसका वियोग और वर्षा समय एक साथ आये । यह प्राणहरण के लिए पर्याप्त है । अत एव ‘रस्य’ शब्द से उद्दीपन विभावत्व तो कह ही दिया गया । ‘तु शब्द’ यह, भाव यह है कि पश्चात्तापसूचक होते हुए केवल उतने परिछुम्बन की प्राप्ति से ही कृतकृत्यता हो जाती यह ध्वनित करता है । ‘प्रसिद्ध अपि’ यह । भाव यह है वैैयाकरणों के घरों में निस्सन्देह पहले प्रयोगस्वातन्त्रय प्रयो का अभाव, षष्ठी इत्यादि का आश्रयण और लिङ्गसंख्या का अभाव इन (कारणों) से वाचक की विलक्षणता से निपात ध्वोतक हैं यह घोषित किया ही जाता है ।
तारावती—यहाँ तक उन व्यंजकों का परिचय दिया जा चुका जिनका उल्लेख कारिका में किया गया था । कारिका में ‘च’ शब्द का भी प्रयोग किया गया है । अतः उससे निपात इत्यादि दूसरे तत्वों का भी उपादान हो जाता है । अब उनकी व्याख्या की जा रही है ।
विक्रमोर्वशीय में राजा पुरुरवा उर्वशी के साथ गन्धमादन पर्वत पर विहार करने गये है । वहाँ गोत्रस्खलन के कारण उर्वशी रुष्ट होकर कुमारवन में चली गई जिसमें किसी भी स्त्री का जाना निषिद्ध था और उसके लिए यह नियम बना हुआ था कि यदि कोई स्त्री नियम का अतिक्रमण करके उस वन में चली जाय तो वह लता बन जाती है । उर्वशी भी लता बन गई । राजा उसके वियोग में विलाप करते हुए घूम रहे हैं वे उसी अवसर पर कह रहे हैं—
'उस प्रियतमा से यह अत्यन्त असह्य वियोग एकदम आ पड़ा और नवीन जलधरों के उदय से घूपरहित हो जाने के कारण दिन अधिक रमणीय हो जाने चाहिए ।'
इस पद्य में दो बार ‘च’ शब्द आया है ‘चोपनत:’ ‘भवितव्यं च’ इन दोनों चकारों के लिए एक साथ ही वृत्ति में ‘च शब्द’ कहकर निर्देश किया गया है । यहाँ पर एकवचन जाति के अर्थ में हुवा है इससे एकवचन से दोनों चकारों का ग्रहण हो जाता है । ‘च’ यह निपात है । इन दोनों ‘च’ शब्दों से व्यंजना होती है—जैसा फोड़े पर दूसरा घाव हो जावे उसी प्रकार काकतालीय न्याय से अर्थात् संयोगवश प्रियतमा का वियोग और वर्षाकाल एक साथ आये हैं । इससे मेघों की अत्यन्त उद्दीपकता, उनसे मलिन दिवसों के यापन करने की कठिनता और विरहवेदना की असह्यता का उत्कर्ष ध्वनित होता है । आशय यह है यह संयोग हमारे प्राण लेने के लिए पर्याप्त है । (यदि कुछ व्यवधान से उद्ददीपक मेघ आये होते तो उनको सह
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लिया गया होता और वे अधिक पीड़ित नहीं करते !) इसीलिए 'रम्य' शब्द से उद्दीपकता ठीक ठीक बतला दी गई हैं। निपात की व्यंजकता का दूसरा उदाहरण अभिज्ञानशाकुन्तल से दिया गया है । राजा का शकुन्तला से एकान्त सम्भिलन हो चुका है । गौतमी के आ जाने से शकुन्तला राजा को छोड़ कर चली गई है तथा उनका सहवास नहीं हो सका है । राजा पश्चात्ताप करते हुए कह रहे हैं
'शकुन्तला बार बार अपनी अंगुलियों से अपने अधरोष्ठ को छिपाने का प्रयत्न करती थी ( जिससे मैं उसका चुम्बन न कर सकूँ । बार बार मना करने के जो शब्द उसके मुख से निकलते थे और जिनके कारण उसकी व्याकुलता अभिव्यक्त हो रही थी उनसे उसका मुख बड़ा ही सुन्दर प्रतीत होता था । चुम्बन को बचाने के लिये उसने अपना मुख कन्धे की ओर घुमा लिया था । उसके नेत्रलोमों से युक्त नेत्र बड़े ही सुन्दर प्रतीत हो रहे थे । मैंने उसके मुख को ऊपर को उठाया किन्तु चुम्बन तो नहीं कर पाया ।'
यहां पर 'तो' शब्द पश्चात्ताप का सूचक है और उससे ध्वनित होता है कि यदि और कुछ न सही उतना भर मुझे चुम्बन ही मिल जाता तो मैं कृतकृत्य हो जाता । ('चूम तो नहीं पाया' की व्यञ्जना यह है कि मैंने समीह कुछ प्रयत्न कर लिया किन्तु उसका चुम्बन नहीं ले सका, वस्तुतः उसका चुम्बन सरल नहीं है ।) यहां पर एक प्रश्न यह उपस्थित होता है कि वैयाकरणों के मत में निपातों का कोई अर्थ नहीं होता है । इन लोगों का मत है कि उपसर्ग और निपात किसी अर्थ के वाचक नहीं होते किन्तु द्योतक (व्यञ्जक) होते हैं । उदाहरण के लिये 'अनुभवति' में 'अनु' का कोई अर्थ नहीं है । 'भवति' में ही 'अनुभव' इत्यादि सभी अर्थ सन्निहित हैं । 'अनु' का प्रयोग उस सन्निहित अर्थ को अभिव्यक्तमात्र कर देता है । यही निपातों के विषय में भी कहा जा सकता है । वैयाकरण लोग इनके वाचक न होने के कई कारण बतलाते हैं— (१) वाचक शब्दों के प्रयोग का कोई नियम नहीं होता । 'घटम् आनय' 'आनय घटम्' इत्यादि किसी रूप में प्रयोग किया जा सकता है, किन्तु 'प्र' इत्यादि उपसर्गों और 'च' इत्यादि निपातों का स्थान नियत होता है । उपसर्गों का प्रयोग नियमितः धातुओं के पहले ही होता है । (२) वाचक शब्दों का स्वतन्त्र प्रयोग हुआ करता है किन्तु उपसर्ग और निपातों का प्रयोग दूसरे शब्दों में जुड़कर ही होता है । 'प्र' 'अनु' इत्यादि का एकाकी होने पर कोई अर्थ नहीं होता और न इनका प्रयोग ही हो सकता है । (३) वाचक शब्दों के साथ सम्बन्ध इत्यादि में षष्ठी का प्रयोग होता है जैसे—'देवस्य पुत्रः' इत्यादि; किन्तु 'इव' इत्यादि निपातों के साथ सम्बन्ध इत्यादि में षष्ठी इत्यादि का भी प्रयोग नहीं होता । (४) वाचक शब्दों के लिङ्ग संख्या इत्यादि का योग नहीं होता । इन कारणों से उपसर्गों और निपातों में अन्य वाचकों से विलक्षणता होती है । अतः उपसर्ग और निपात वाचक नहीं किन्तु द्योतक ही माने जाते हैं । फिर इनकी द्योतकता का पृथक् प्रतिपादन करने का क्या प्रयोजन ? इसका उत्तर यह है कि यद्यपि इनका द्योतकत्व वैयाकरणों में प्रसिद्ध है तथापि यहां पर पृथक् उल्लेख रस इत्यादि की दृष्टि से किया गया
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तृतीय
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है। आशय यह है कि उपसर्ग और निपात सामान्यतया द्योतक तो होते ही हैं वे रस इत्यादि के भी व्यञ्जक होते हैं।
(ध्वन्य०) उपसर्गाणां व्यञ्जकत्वं यथा— नीवाराः शुक्तगर्भकोटरमुखभ्रष्टास्तरूणामधः प्रसाधिताः पयोधरदुग्धसुधाफलभिः मृद्यन्त इवोप्लाः। विश्वासोपगमादभिलषितयः शब्दं सहर्त्ती मृगास्तोयाधारपथैरपि वल्कलशिखानिष्यन्दनदलैरलंकृताः॥ इत्यादौ। द्वित्राणां चोपसर्गाणामेकत्र पदे यः प्रयोगः सोऽपि रसादिव्यक्त्यनुगुणतयैव निर्दोषः। यथा—‘प्रभ्रष्टयुत्तरोरीयर्ति समसी समुद्रीक्ष्य वीतावलीनद्रागजन्तून्’ इत्यादौ। यथा वा ‘मनुष्यवृत्या समुपाचरन्तम्’ इत्यादौ।
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(अनु०) उपसर्गों की व्यञ्जकता जैसे— ‘शुकों से युक्त कोटरों के मुख से गिरे हुये नीवार वृक्षों के नीचे (पड़े हैं)। कहीं इक्षुदी के फलों को फोड़नेवाले चिकने उपल दिखाई ही पड़ रहे हैं, विश्वास के उत्पन्न हो जाने से सकलनरहित गतिवाले मृग शब्द को सहते हैं और जलों के आधार के मार्ग वल्कल शिखाओं के प्रवाह की रेखाओं से अलंकृत हैं’ इत्यादि में। दो तीन उपसर्गों का एक पद में जो प्रयोग वह भी रसाभिव्यक्तिके अनुगुण होने से ही निर्दोष होता है। जैसे—‘उत्तर की प्रभा के समान अन्थकार के प्रभ्रष्ट होने पर शीघ्र ही वीत वावरणवाले जन्तुओं को देखकर…….’ इत्यादि में। अथवा जैसे ‘मनुष्य की वृत्ति से ठीक आचरण करनेवाले को…….’ इत्यादि में।
(लो०)—प्रकर्षेण स्निग्धा इति प्रशब्दः प्रकर्षं द्योतयन्निङुदीफलानां सरसत्व-माचक्षाण आश्रमस्य सौन्दर्यमातिशयं ध्वनति। ‘तापसस्य फलविषयोरभिलाषातिरेको ध्वन्यते’ इति तु असत्। अभिज्ञानशाकुन्तले हि राज्ञ इयमकिञ्चन् तापसस्येत्यलमु। द्वित्राण-मित्यनेनाधिक्यं निरस्यति। सम्यगुच्यतेविशेषणेक्षितत्वे भगवतः कृपातिशययोगोभिव्यक्तः। मनुष्यवृत्या समुपाचरन्तं स्वबुद्धिसामान्यक्तानुमानाः। योगीश्वरैरप्यसुबोधमीश त्वां बोद्धुमिच्छन्ल्यबुधाः स्वतकः॥ सम्यग्भूतमुपाशृकुलवा आसमान्ताच्चरन्तमित्यनेन लोकानुजोऽघृक्षातिशयस्ततदाचरतः परमेश्वरस्य ध्वनितः।
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(अनु०) ‘प्रकर्ष के साथ स्निग्ध’ इसमें ‘प्र’ शब्द प्रकर्ष को द्योतित करते हुये इक्षुदी फलों की सरसता बतलाते हुये आश्रम के सौन्दर्य के आधिक्य को ध्वनित करता है। ‘तापस की फलविषयक अश्रिलाषातिशयता को प्रकट करता है’ यह कहना तो ठीक नहीं। अभिज्ञान-शाकुन्तल में यह राजा की उत्पत्ति है तपस्वी की नहीं। वह इतना परिश्रम है। ‘हो तोन’ कहने से अधिक का निराकरण करते हैं। ठीक रूप में अधिकता से विशेष रूप में देखने में भगवान् की कृपा की अधिकता अभिव्यक्त होती है।
‘हे ईश ! अपनी सामान्य बुद्धि के आधार पर अनुमान करनेवाले मूर्ख लोग मनुष्य
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वृत्ति मे आचरण करनेवाले, योगीश्वरों के द्वारा भी सरलतापूर्वक न समझे जाने योग्य आपको अपने तकों से जानना चाहते हैं।
ठीक रूप में छिपकर ‘आ’ अर्थात् चारों ओर से चरण (विचरण) करनेवाले इससे लोक के प्रति विभिन्न् कार्यों को करनेवाले भगवान् के अनुग्रह की अतिशयता ध्वनित होती है ।
तारावती—उपसर्गो की व्यञ्जकता का उदाहरण—जैसे अभिज्ञानशाकुन्तल में मृगयाविहार के प्रसंग में राजा तपोवन के निकट जाकर अपने साथी को बतला रहे हैं कि यह प्रदेश बिना कहे तपोवन का प्रदेश ज्ञात हो रहा है।
वृक्षों के नीचे नीवार धान्य कण बिखरे पड़े हैं जिनको वृक्षों के कोटरों में बैठे हुये तोतों ने कुतर-कुतर कर खा डाला है।
(मुनी लोग अपने जीवननिर्वाह के लिये नीवार बो लेते हैं । अतः नीवार-कण आश्रम के निकट ही सम्भव हैं ।) कहीं-कहीं इक्षुदी फल पीसनेवाले बहुत अधिक चिकने पत्थर दिखाई पड़ रहे हैं।
(मुनी लोग इक्षुदी फलों को पीस पीस कर अपने तेल का काम चलाया करते हैं । वे इक्षुदी फलों को तोड़ कर उनको पत्थर से पीस लेते हैं । अतः इस प्रकार के चिकने पत्थर आश्रम के निकट ही मिल सकते हैं ।) रथ का घर्षण रुका हो रहा है किन्तु हिरणों को विश्वास हो गया है कि आश्रम के निकट उन्हें कोई मारेगा नहीं ।
अतः वे शब्द की परवाह नहीं करते तथा किसी भय के होने पर भी अपनी चाल में अन्तर नहीं भरने देते (भागते नहीं)।
कहीं-कहीं जलाशय बने हैं, उन जलाशयों को जाननेवाले मार्गों पर वल्कल वस्त्रों के छोर से निकली हुई जलधारा को रेखायें बनी हैं
(जिससे ज्ञात होता है कि जलाशयों में स्नान कर मुनी लोग इन मार्गों से निकलते होंगे और उनके वल्कल-छोरों से जल बहता जाता होगा जिसकी रेखायें मार्गों में बन गई हैं ।
इन बातों से ज्ञात होता है कि हम आश्रम के निकट हैं । यहाँ पर ‘प्रस्निग्ध’ शब्द में ‘प्र’ उपसर्ग का अर्थ है प्रकर्ष, इससे व्यज्यना होता है कि यहाँ के इक्षुदी फल बहुत ही चिकने हैं और उनमें तेल बहुत अधिक निकलता है जिससे उनके पीसनेवाले पत्थर डूब गये हैं ।
अतः यह स्थान बहुत ही सुन्दर हैं । कुछ लोगों ने यहाँ पर तपस्वी लोग विशेष फल की अभिलाषा से खूब तेल निकाल निकाल कर अपने बालों को चिकना किया करते हैं यह व्यञ्जना होती है ।
किन्तु यह व्याख्या ठीक नहीं; क्योंकि अभिज्ञान शाकुन्तल में यह कथन राजा का है न तपस्वी का ।
(आशय यह है कि ‘प्र’ उपसर्ग आश्रम के प्रति अनुराग की अधिकता को व्यक्त करते हुये शान्तरस में पर्यवसित होता है ।)
उपसर्ग इत्यादि की अनेकता की व्यञ्जना—कहीं कहीं एक ही पद में दो तीन उपसर्गों का प्रयोग देखा जाता है ।
यह प्रयोग भी दोषरहित तभी माना जा सकता है जब वह रसाभिव्यक्ति के अनुकूल होता है । जैसे सूर्यशातक में मयूर कवि ने सूर्य की प्रशंसा करते हुये लिखा है—
जब सूर्य ने देखा कि जो अन्धकार उत्तरायवस्त्र के समान समस्त जन्तुओं को ढके हुये था वह एकदम हटा गया और समस्त जन्तु आवरणरहित हो गये
(तब उसने किरणों को तन्तुओं के रूप में फला कर उन सबको मानो आवरण दे दिया)
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तृतीय उद्योतः
यहाँ पर ‘देखकर’ के लिये ‘समुद्रीक्ष्य’ का प्रयोग किया गया है। इसमें ‘सम्’ ‘उत्’ और ‘वि’ ये तीन उपसर्ग हैं; ‘सम्’ का अर्थ है भलीभाँति, ‘उत्’ का अर्थ है उच्चता के साथ और ‘वि’ का अर्थ है विशेषरूप से। इस प्रकार सूर्य के भलीभाँति, उच्चता-पूर्वक और विशेष रूप से प्राणियों को देखने में भगवान् सूर्य की कृपा की अधिकता व्यक्त होती है कि भगवान सूर्य प्राणियों से इतना प्रेम करते हैं कि उन्होंने प्राणियों को बहुत ही ध्यान से देखा है। दूसरा उदाहरण—
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‘अपनी सामान्य बुद्धि से ही अनुमान करनेवाले मूर्ख लोग मनुष्य वृत्ति से विचरण करनेवाले योगीश्वरों के द्वारा भी भलीभाँति न जानने योग्य तुझ ईश को अपने तकों से जानना चाहते हैं।’ यहाँ पर विचरण के लिये ‘समुपाचरन्तम्’ यह प्रयोग किया गया है। ‘सम्’ का अर्थ है भलीभाँति, ‘उप’ का अर्थ है ‘गुप्त रूप में’ और ‘आ’ का अर्थ है चारों ओर। इससे ध्वनित होता है कि भगवान् व्यामोहरहित होकर, लोककल्याण के लिये सर्वत्र विचरण करते हैं। वे जिस रूपमें विचरण करते हैं वह उनका रूप गुप्त अतः दुर्ज्ञेय होता है। इससे विभिन्न कार्यों को करनेवाले भगवान् की लोकानुग्रहेच्छा की अधिकता ध्वनित होती है।
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तृतीय उद्योतः
ये जीवन्ति न मान्ति ये स्वपुष्पि प्रीत्या प्रणुद्यन्ति च । प्रस्यन्दिप्रमदाश्रवः पुलकिता दृष्टे गुणैर्युज्जते । हा धिकष्टमहो क्व यामि शरणं तेषां जनानां कृते नीतानां प्रलयं रठेन विधिना साधुर्दिषः पुष्यता ॥
(ध्वन्या०)—निपातानामपि तथैव । यथा ‘अहो बतासि स्पृहणीयवीर्यः’ इत्यादौ। यथा वा—
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(अनु०) निपातों का भी उसी प्रकार (व्यञ्जकत्व होता है)। जैसे ‘अहो आश्चर्य है कि तुम स्पृहणीय पराक्रम वाले हो ।’ इत्यादि में; अथवा जैसे— ‘किसी ऊर्जित अर्थात् महाश्वाली व्यक्ति को देखने पर जो जीवित होते हैं, जो अपने शरीर में फूले नहीं समाते, जो प्रेम के साथ नाचने लगते हैं जिनके आनन्दाश्रु प्रवाहित होने लगते हैं जिनका शरीर रोमांचित होने लगता है—हाय, धिक्कार है कष्ट की बात है आश्चर्य की बात है कि सज्जनों के विरोधियों का पोषण करनेवाले दुष्ट दैव के द्वारा सर्वथा प्रलय को प्राप्त किये हुये उन (लोगों) के लिये मैं किसकी शरण जाऊँ ?’ इत्यादि में।
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तृतीय उद्योतः
(लो०)—तथैवेत । रसव्यञ्जकत्वेन द्वित्राणामपि प्रयोगो निर्दोष इत्यर्थः। क्लाघातिशयो निर्वेदातिशयश्चाहो बतासि निपातौ ध्वनयतः ।
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तृतीय उद्योतः
(अनु०) ‘उसी प्रकार’ यह। अर्थात् रस की व्यञ्जकता में दो तीन का भी प्रयोग निर्दोष होता है। ‘अहो बत’ यह और ‘हा धिक्’ यह श्लाघातिशय और निर्वेदातिशय को ध्वनित करता है।
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निपातों को व्यंजकता
तारावती-जो बात उपसर्गों के विषय में कही गई है वह निपातों के विषय में भी लागू होती है। अर्थात् रसव्यंजक के रूप में यदि दो तीन उपसर्गों का प्रयोग किया जावे तो उसमें दोष नहीं होता। जैसे 'अहो बत ! तुम स्पृहणीय पराक्रमवाले हो।' यहाँ पर 'अहो' और 'बत' ये दो निपात प्रयुक्त किये गये हैं जिनसे प्रशंसा की अधिकता ध्वनित होती है। दूसरा उदाहरण-
यद्वृत्तमाहितमतिर्बहुचाटुगर्भं कार्योन्मुखः खलजनः कृतकं ब्रवीति । तत्साध्वो न न विदन्ति विदन्ति किन्तु कतुं वृथा प्रणयमस्य न पारयन्ति ॥
'कुछ लोग इतने सज्जन होते हैं कि जब वे किसी ऊर्जस्वी गुणवान् व्यक्ति को देखते हैं तो जी उठते हैं, अपने अंगों में नहीं समाते, आनन्दित हो जाते हैं, उनके आनन्दाश्रु एकदम प्रवाहित होने लगते हैं और वे रोमांचित हो जाते हैं; किन्तु चिल्लार है, अत्यन्त खेद की बात है कि तुष्ट दैव ऐसे लोगों का बिलकुल नाश कर देता है और सज्जनों से द्रोह करनेवालों को पुष्ट करता है। जब देव ही सज्जनों का घातक है तब हम उनके त्राण के लिये अतिरिक्त किस की शरण जावें ?'
यहाँ पर 'हा' 'धिक्' ये दो निपात एक साथ आये हैं; इनसे विधि के प्रति असूया और लोक की विपरीत प्रवृत्ति की निन्दा की व्यंजना से निर्वेद की अधिकता ध्वनित होती है।
(ध्वन्या०)-पदपौनरुक्त्यं च व्यञ्जकत्वापेक्षयैव कदाचित्प्रयुज्यमानं शोभामावहति । यथा-
यद्वृत्तनाहितमतिर्बहुचाटुगर्भं कार्योन्मुखः खलजनः कृतकं ब्रवीति । तत्साध्वो न न विदन्ति विदन्ति किन्तु कतुं वृथा प्रणयमस्य न पारयन्ति ॥
इत्यादौ ।
(अनु०) पदपौनरुक्त्य तो कभी व्यञ्जकत्व की अपेक्षा से हो प्रयुक्त किया हुआ शोभा को धारण करता है। जैसे-
'जो कि वृत्तान्त में अपने मन को लगाये हुये कार्य की ओर उन्मुख दुष्ट लोग बहुत सी खुशामद की बातों से भरी हुई बनावटी बातें किया करते हैं, उसको सज्जन लोग नहीं जानते ऐसा नहीं है अपितु जानते हैं किन्तु इसके प्रणय को व्यर्थ करने में समर्थ नहीं होते ।' इत्यादि में।
(लो०)-प्रसज्जात्पौनरुक्त्यान्तरमपि व्यञ्जकत्वमित्याह-पदपौनरुक्ल्यमिति । पदग्रहणं वाक्यादेरपि यथासम्भवमुपलक्षणम् । विदन्तीति । त एव हि सर्वं विदन्ति सुतरामिति ध्वन्यते । वाक्यपौनरुक्ल्यं यथा-'पश्य द्वीपादन्यास्मादपि' इति वचनानन्तरं 'कः सन्देहः द्वीपादन्यास्मादपि' इत्याननेप्सितप्राप्तिप्रस्ताविरवघ्नतैव ध्वन्यते 'किं किमु ? स्वस्था भवन्ति मयि जीवति' इत्याननेप्सितिशयः । 'सर्वक्षतितभूतां नाथ दृष्टा सर्वाङ्गसुन्दरी'
इत्युन्मादातिशयः । (अनु०) प्रसङ्गवश दूसरे व्यञ्जक पौनरुक्ल्य को कहते हैं—'पदपौनरुक्ल्य' यह। पदग्रहण वाक्य आदि का भी यथासम्भव वाक्य इत्यादि का भी उपलक्षण है। 'जानते हैं !' वहाँ सब भली भाँति जानते हैं यह ध्वनित होता है। वाक्यपौनरुक्ल्य जैसे—'देखो दूसरे द्वीप से भी' इन वचनों के बाद 'क्या सन्देहः द्वीपादन्यास्मादपि' यहाँ अनभिप्रेत प्राप्ति का प्रकर्ष ध्वनित होता है 'क्या किमु ? स्वस्था भवन्ति मयि जीवति' यहाँ अनभिप्रेत अतिशयः । 'सर्वक्षतितभूतां नाथ दृष्टा सर्वाङ्गसुन्दरी'
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तृतीय उद्योतः
सन्देह है दूसरे दीप से भी' इससे इष्ट की विघ्नरहित ही प्राप्ति ध्वनित होती है। 'क्या मेरे जीवित रहते धातंराष्ट्र स्वस्थ हों' इससे अमर्ष की अधिकता। 'समस्त पर्वतों के स्वामी ! क्या तुमने सर्वाङ्गसुन्दरी को देखा है ?' इससे उन्माद की अधिकता।
पदपौनरुक्त्य की व्यञ्जकता
तृतीय उद्योतः
तारावती—यहाँ पर यह बतलाया गया है कि सुप्तं तिष्ठेत्यादि तो व्यञ्जक होते ही हैं कभी कभी एक साथ दो दो तीन उपसर्ग निपात इत्यादि आजाते हैं; उनका दो तीन बार प्रयोग भी व्यञ्जक हो सकता है। केवल कारिका में आये हुये तत्त्व ही दो बार कहे जाने पर व्यञ्जक नहीं होते अपितु शब्द इत्यादि भी व्यञ्जक हो जाते हैं। पुनरुक्ति भी व्यञ्जक हो सकती है इस प्रसंग से दूसरी पुनरुक्तियों की व्यञ्जकता का भी निर्देश किया जा रहा है कि यदि पदपौनरुक्त्य का व्यञ्जकत्व की दृष्टि से प्रयोग किया गया हो तभी वह शोभा को धारण करती है।
तृतीय उद्योतः
यह है कि वैसे पुनरुक्ति तो दोष ही होती है, किन्तु यदि व्यञ्जकत्व की दृष्टि से उसका प्रयोग किया जावे तो वह रसापकर्ष के स्थान पर रसोत्कर्ष ही करती है। यही बात साहित्यदर्पण में बतलाये हुये विहित के अनुवाद इत्यादि स्थलों के विषय में कही जा सकती है।
तृतीय उद्योतः
पद के पौन-रुकत्य से व्यंजना का उदाहरण—'दुष्ट लोग वञ्चना को अपने मन में रख्खे हुये और स्वार्थ साधन को ही अपना लक्ष्य समझते हुये जो कि चाटुकैरिता से भरी हुई बहुत सी बनावटी बातें किया करते हैं उनको सज्जन लोग जान नहीं जाते ऐसा नहीं हैं, वे जान जाते हैं; किन्तु फिर भी (अपनी सज्जनता के कारण) उनमें इतनी शक्ति ही नहीं होती कि वे दुष्टों की असत्यरचना को व्यर्थ कर सकें।'
तृतीय उद्योतः
यहाँ पर 'नहीं जान जाते ऐसा नहीं' इस कथन से ही दृढ़ता आ जाती है क्योंकि दो बार 'न' का प्रयोग प्रकृत अर्थ को दृढ़ कर देता है। तथापि पुनः 'जानते हैं' यह कह दिया गया है। इस पुनरुक्ति से व्यंजना निकलती है कि और कोई जाने या न जाने सज्जनों में इतनी निपुणता होती है कि ठोक ठोक तो वे ही जान पाते हैं।
तृतीय उद्योतः
वाक्य इत्यादि के पौनरुक्त्य की व्यञ्जकता
यहाँ पर 'पद-पौनरुक्त्य' यह उपलक्षणपरक है, इससे वाक्य इत्यादि के पौनरुक्त्य में भी व्यञ्जकता सिद्ध हो जाती है।
तृतीय उद्योतः
वाक्य-पौनरुक्त्य में व्यञ्जकता का उदाहरण—(१) रत्नावली में सूत्रधार कहता है—'दूसरे दीप से भी, समुद्र के मध्य से भी, दिशा के छोर से भी अभिमुख विधाता उसे सन्निहित कर देता है।' सूत्रधार के इस कथन को लेकर 'क्या सन्देह है ? दूसरे दीप से भी' इत्यादि वाक्य को कहते हुये पात्रप्रवेश होता है।
तृतीय उद्योतः
वाक्य के इस पौनरुक्त्य से ध्वनित होता है कि अभीष्ट की प्राप्ति विना विध्न के ही हो जावेगी। (रत्नावली का प्रवहण भंग, पुनः व्यापारियों के हाथ में पड़ना, सागरिका के रूप में उदयन के अन्तःपुर में निवास इत्यादि ऐसी घटनायें थीं जिनको अनुकूल विधाता ने स्वयं सन्निहित कर दिया और रत्नावली के रूप में अभीष्ट प्राप्ति होकर ही रही।)
तृतीय उद्योतः
११
(२) वेणीसंहार में भीमसेन बार-बार यह वाक्य बोलते हैं कि 'मेरे जीवित रहते धृतराष्ट्र के पुत्र स्वस्थ हों।' इस वाक्य से भीमसेन के क्रोध की अधिकता ध्वनित होती है। (३) विक्रमोर्वशीय में उर्वशी के लतारूप में परिणत हो जाने पर राजा पर्वत से पूछते हैं—'हे समस्त पर्वतों के स्वामी !
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क्या तुमने इस वन के अन्दर मेरे द्वारा वियुक्त सर्वाङ्गसुन्दरी रमणी को देखा है ?': 'देखा' की प्रतिध्वनि सुनकर फिर वही कहते हैं । यहां वाक्य का पुनः कहना राजा के उन्माद की अधिकता को ध्वनित करता है ।
(ध्वन्याः०) कालस्य व्यञ्जकत्वं यथा—
समविसमणिविसेसा समन्तओ मन्दमन्दसंवार । अइरा होहिन्ति पहा मणोरहाणं पि दुल्लड्घ्या ।।
[समविसमणिविसेसा: समन्तत: मन्दमन्दसञ्चारा: । अचिराद्रय: विषय्यन्ति पन्थानो मनोरथानामपि दुल्लङ्घ्या: ॥ इति छाया]
अत्र ह्यविरलाद्रिविषयन्ति पन्थान इत्यत्र भविष्यन्तीत्यस्मिन् पदे प्रत्येकं काल-विशेषाभिधायो रसपरिपोषहेतु: प्रकाशते । अयं हि गाथार्थ: प्रवासविप्रलम्भशृङ्गार-विभावतया विभाव्यमानो रसवान् ।
यहां 'भविष्यन्ती' इस पद में प्रत्येक काल-विशेष का वर्णन रस को पुष्ट करने के लिए किया गया है । यह गाथा का अर्थ प्रवास विप्रलंभ शृंगार के विभाव के रूप में विभावित किया जाने पर रस-युक्त होता है ।
यथात्र प्रत्ययांशो व्यञ्जकस्तथा क्वचिद्वृत्त्यंशोऽपि हृद्यते । यथा— तदगेहं नतभित्ति मन्दिरमसं लङ्घावगाहं दिव: सा धेनुरञ्जती चरन्ति करिणामेता: घना: घटा: । स क्षुद्रो मुसलध्वनि: कलमिदं सङ्कीर्त्यतां योषिता- मात्र इलोके दिवसैरित्यस्मिन् पदे प्रकृत्यंशोऽपि चोतक: ।
जैसे यहां पर प्रत्यय का अंश व्यंजक है उसी प्रकार कहीं वृत्ति का अंश भी हृदय को आकर्षित करता है । जैसे— यह झुकी दीवारोंवाला वह घर और आकाश में अवकाश पानेवाला यह (विशाल) भवन । वह बूढ़ी गाय और ये बादलों के समान हाथियों की घटायें । वह तुच्छ मूसल का शब्द और यह स्त्रियों का मधुर संगीत । आश्चर्य है कि यह ब्राह्मण दिनों में ही इतनी बड़ी भूमिका पर पहुँचा दिया गया । यहां इलोके 'दिनों में ही' इस पद में प्रकृति का अंश भी चोतक है ।
सर्वनाम्नां च व्यञ्जकत्वं यथानन्तरोक्ते इलोके । अत्र च सर्वनाम्नामेव व्यञ्ज-कत्वं हृदि व्यवस्थाप्य कविना क्वचिद्व्यतिरेकदृष्टान्तप्रयोगो न कृत: ।
सर्वनामों की व्यंजकता जैसे—अगले श्लोक में । यहां पर सर्वनामों की ही व्यंजकता हृदय में स्थापित करके कवि ने कहीं-कहीं व्यतिरेक दृष्टांत का प्रयोग नहीं किया है ।
अनया दिशा सहृदयैरप्योदपि व्यञ्जककविशेषा: स्वयमुपलक्ष्यणोया: । एतच्च सर्वपदवाक्यरचनाद्योतनोक्येव गतार्थमपि वैचित्र्येण व्युत्पत्तये पुनरुक्तम् ।
(अनु०) काल की व्यञ्जकता जैसे— 'सम और विषम में विशेषतारहित, चारों ओर मन्द मन्द विचरणवाले मार्ग क्षणभर में मनोरथों द्वारा भी अलङ्घनीय हो जावेंगे ।' यहां पर निस्सन्देह 'सोच ही मार्ग हो जावेंगे' यहां पर 'हो जावेंगे' इस पद में कालविशेष का अभिधान करनेवाला रसपरिपोष हेतु प्रत्यय प्रकाशित होता है । निस्सन्देह यह गाथा का अर्थ प्रवास विप्रलम्भ शृङ्गार के विभाव के रूप में विभावित किये जाने पर रस-वाला होता है ।
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३
तृतीय उद्योतः
और सर्वनामों का व्यंजकत्व जैसे अभी उदाहरण दिये हुए श्लोक में। यहाँ पर सर्वनामों के व्यंजकत्व को ही हृदय में रखकर कवि ने ‘तद्’ इत्यादि शब्दों का प्रयोग नहीं किया।
३
तृतीय उद्योतः
इस दिशा से सहृदयों द्वारा और भी व्यंजक विशेष स्वयं समझ लिए जाने चाहिए। यह सब पद वाच्य और रजना द्वारा चमत्कार को नक्ति से ही ग्रहाथं भी वाच्यार्थ के साथ व्युत्पत्ति के लिए पुनः कहा गया।
३
तृतीय उद्योतः
(लो०)—कालस्येति। तिङन्तपदानुप्रविष्टस्यात्यर्थंकलापस्य कारककालसंख्यो-पग्रहरूपस्य मध्येऽन्वयव्यतिरेकाभ्यां सूक्ष्मदृशा भागगतं अपि व्यंजकत्वं विचार्यमिति भावः।
३
तृतीय उद्योतः
रसपरिपोषेति। उत्प्रेक्ष्यमाणो वर्षासमयः कम्पकारी कमृत वर्तमान इति ध्वन्यते। अंशांशिकप्रसङ्गादेवाह—यथात्रेति। दिवसार्थो ह्रस्वाल्पन्तासम्भाव्यमानता-मस्यार्थस्य ध्वनति।
'रसपरिपोष' यह। उत्प्रेक्षा किया हुआ वर्षा समय कम्पन पैदा करनेवाला है वर्तमान का तो कहना ही क्या ? यह ध्वनित किया जाता है। अंशांशों के प्रसङ्ग से ही कहते हैं—‘जैसे यहाँ’। दिवस का अर्थ यहाँ पर इस अर्थ की अत्यन्त असम्भाव्यमानता को बतलाता है।
३
तृतीय उद्योतः
सर्वनाम्नां चेतित प्रह्यङ्गस्य चेत्यार्थः। तेन प्रकृत्यङ्गसंभूय सर्वनाम्नामध्यवृत्तिकं दूश्यत इत्युक्तं भवतीति न पौनरुक्त्यम्। तथाहि—तदिति पदं नतभित्तीलेतत्प्रकृत्यंश-शसहायं समस्तामझलिनिधानभूतां मूषकाद्याकोर्णतां ध्वनति। तदिति हि केवलमुख्य-माने समुत्कर्षोतिशयोत्पि सम्भाव्यते। न च नतभित्तीशब्देनाप्यते दौर्भाग्यायाततत्व-
'सर्वनामों का' यह। अर्थात् प्रकृति के अंश का भी। इससे प्रकृति अंश से मिलकर सर्वनाम व्यंजक देखा जाता है यह बात कही हुई हो जाती है अतः पुनरुक्ति दोष नहीं आता। वह इस प्रकार—'तत्' यह शब्द 'नतभित्ति' इस प्रकृति-ांश की सहायता के साथ समस्त
३
तृतीय उद्योतः
सूचका विशेषो उक्तः एवं सा धेनुरिल्यादावपि योज्यसम्। एवंविधे च विषये स्मरण-द्याकारद्योतकता तच्छब्दस्य। न तु यच्छब्दसम्बद्धतैत्युक्तं प्राक्। अत एवात्र तदिदं-शब्दादिना स्मृत्यनुभवयोर्गत्यान्तविरुद्धविषयतासूचनैनाश्चर्यविभावता योजिता। तदिदं-शब्दाद्यभावे तु सर्वमसंगतं स्यादिति तदिदमंशयोरेव प्राणत्वं योज्यम्। एतच्च द्विशः-
सूचक का विशेष उक्ता है। एवं 'सा धेनु:' इत्यादि में भी योजनीय है। एवंविधे च विषये स्मरण-व्याकारद्योतकता तच्छब्दस्य। न तु यच्छब्दसम्बद्धतैत्युक्तं प्राक्। अत एवात्र तदिदं-शब्दादिना स्मृत्यनुभवयोर्गत्यान्तविरुद्धविषयतासूचनैनाश्चर्यविभावता योजिता। तदिदं-शब्दाद्यभावे तु सर्वमसंगतं स्यादिति तदिदमंशयोरेव प्राणत्वं योज्यम्।
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तृतीय उद्योतः
सामस्यं त्रिशः सामस्त्यमिति व्यञ्जककमित्युपलक्षणपरम्। तेन लोष्टप्रस्तारनरयायेनान्तवाच्यत्व्यमुक्तम्। येहिर्व्यतन्यानुप्राप्ति।
एतच्च द्विशः सामस्यं त्रिशः सामस्त्यमिति व्यञ्जककमित्युपलक्षणपरम्। तेन लोष्टप्रस्तारनरयायेनान्तवाच्यत्व्यमुक्तम्।
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तृतीय उद्योतः
अतिविक्षिप्ततया शिष्यबुद्धिसमाधानं न भवेदित्यभिप्रायेण सङ्क्षिपति—एतच्चेति। वितत्याभिधानेपि प्रयोजनं स्मारयति—वाच्यवैचित्र्येणेति।
(अनु०) ‘काल का’ यह। भाव यह है कि तिङन्त पद में अनुप्रविष्ट, कारक काल संख्या वाच्य रूप अर्थकलाप के मध्य में भी अन्वय-व्यतिरेक से सूक्ष्म दृष्टि से भाग में रहनेवाले व्यंजकत्व का भी विचार करना चाहिए।
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अमंगल के निधानरूप मूषक इत्यादि की आक्रोषर्णता को ध्वनित करता है। केवल 'तत्' यह कहे जाने पर उत्कर्ष की अधिकता भी सम्भावित की जा सकती है। 'नतमित्त' शब्द से ही दौर्भाग्य की अधिकता की सूचक ये विशेषतायें नहीं कही गई होतीं। इसी प्रकार 'वह गाय' इत्यादि में भी योजना कर ली जानी चाहिए। और इस प्रकार के विषय में 'तत्' शब्द की स्मरण के आकार की व्योतकता होती है। यत्न-शब्दसम्बद्धता नहीं होती। यह पहले कहा जा चुका है। अत एव यहाँ पर 'तत्' 'इदम्' शब्द इत्यादि से स्मृति और अनुभव की अत्यन्त विरुद्धविषयता की सूचना के द्वारा आश्चर्य की विभावना योजित की गई है। 'तत्' और 'इदम्' इत्यादि शब्दों के अभाव में तो सब असज्जत हो जाता, अतः 'तत्' और 'इदम्' शब्दों में ही प्राणत्व को योजना करनी चाहिए। और यह दो दो से समस्तता और तीन तीन से समस्तता यह उपलक्षणपरक है। इससे लोष्टप्रस्तारण्याय से अनन्त वैचित्र्य कहा गया है। जैसा कि कहेंगे कि 'ध्वन्य भी' इत्यादि ।
अत्यन्त विखित्स (बिखरा हुआ) होने के कारण शिष्य-बुद्धि का समाध्यान नहीं होगा इस अभिप्राय से संक्षेप करते हैं—'और यह ।' फैलाकर कहने में भी प्रयोजन का स्मरण कराते हैं—'वैचित्र्य से' यह।
तिड्न्त के अर्थसमूह में कारक, काल, संख्या, उपग्रह (कर्तृवाच्यता कर्मवाच्यता) ये सब आ जाते हैं, तिङन्त पद के अन्दर इन सबका अनुप्रवेश हो जाता है। इनमें प्रत्येकपर यदि अन्वय और व्यतिरेक की दृष्टि से सूक्ष्मतया विचार किया जावे अर्थात् यह देखा जावे कि कौन अर्थ किस शब्द के होने पर व्यकत होता है और उसके हटाने पर हट जाता है तो भागों में रहनेवाला व्यङ्गकत्व भी अनुभवगोचर हो जावेगा। उदाहरण के लिये काल की व्यञ्जकता को लीजिये। कोई नायक परदेश को जा रहा है, वर्षाकाल सन्निकट है। नायिका उससे कह रही है—
शीघ्र ही वर्षाकाल आ जावेगा समान तथा लुंचे नीचे सभी प्रदेश पानी भर जाने से एक जैसे हो जावेंगे। चारों ओर पिछ्छलता आ जाने से इनमें सञ्चरण बहुत ही मन्द हो जावेगा। शीघ्र ही मार्ग मनोरथों के लिए भी दुर्लङ्घ्य हो जावेंगे।
आशय यह है कि हे प्रियतम ! आप तो परदेश जा रहे हैं, एक तो वर्षा का उद्द्दीपन काल आयेगा, दूसरे हमारे लिए सन्देश भेजना भी कठिन हो जावेगा। अतः मेरी प्राणरक्षा के लिए तुम्हें ऐसे समय में परदेश नहीं जाना चाहिए। यहाँ पर 'शीघ्र ही हो जावेगा' इस भविष्यत्काल का प्रयोग किया गया है यहाँ पर भविष्यत् में सय प्रत्यय भविष्यत्काल का वाचक है। जिससे व्यञजना निकलती है 'जब मैं वर्षाकाल की कल्पना करती हूँ तब भी मेरा शरीर काँप उठता है फिर जब वर्षाकाल वर्तमान होगा तब मेरी क्या दशा होगी यह तो कहना ही कठिन है।' यह व्यञजना यहाँ पर रस की परम परिपोषक हो जाती है। जब हम इस गाथा के अर्थ को विप्रलम्भ शृङ्गार के विभाव के रूप में समझते हैं तब यह रसमय हो जाता है। इस प्रकार तिङन्त इत्यादि के अवान्तर भाग भी व्यञ्जक होते हैं।
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तृतीय उद्योतः
प्रकृत्यंश की व्यञ्जकता
यहां प्रकरण अंशांश की व्यञ्जकता का चल रहा है। इसी प्रसङ्ग में यह भी समझ लिया जाना चाहिए कि जिस प्रकार प्रत्यय रूप अंश व्यञ्जक होता है उसी प्रकार प्रकृतिरूप अंश भी व्यञ्जक हो सकता है। अर्थात् पूरा पद तो व्यञ्जक होता ही है दोनों पदांश (प्रकृति और प्रत्यय) व्यञ्जक होते हैं। उदाहरण—
'आश्चर्य है कि यह ब्राह्मण (सुदामा कुछ) दिनों में ही इतना अधिक उन्नति की पराकाष्ठा को पहुंचा दिया गया। वह झुकी दीवारोंवाला घर और ये आकाश चूमनेवाले विशाल भवन, वह बुढ़ढी गाय और ये हाथियों की घनघोर घटायें, वह मूसल का तुच्छ शब्द और यह स्त्रियों का ललित सङ्गीत। आश्चर्य है कि कितना बड़ा अंतर हो गया है।'
यहां पर 'दिवसै:' शब्द की प्रकृति है 'दिवस'। इससे व्यंजना होती है कि इस ब्राह्मण को इतनी अधिक उन्नति करने में न वर्ष लगे न महीने। कुछ ही दिनों में यह सब हो गया। एक तो इतना बड़ा परिवर्तन ही आश्चर्यजनक है, दूसरी बात यह है कि यह सब दिनों में ही सम्पन्न हो जावे, वर्षों की तो बात ही दूर रही महीने भी न लगे यह तो सर्वथा अत्यन्त असम्भव है। इस प्रकार 'दिवस' इस प्रकृति (शब्द) का अर्थ वस्तु की अत्यन्त असम्भवनीयता को ध्वनित करता है।
सर्वनाम की व्यञ्जकता
सामान्य प्रकृतियों में तो व्यञ्जकता होती है, 'सर्वनाम' रूप प्रकृति में व्यञ्जकता विशेष रूप से होती है। यहां यह शंका हो सकती है कि जब प्रकृतिरूप अंश में व्यञ्जकता बतला दी तब सर्वनाम में पृथग्भूत व्यञ्जकता बतलाने में पौनरुक्त्य दोष है। इसका उत्तर यह है कि सर्वनाम सामान्य प्रकृति से मिलकर (भिन्न) व्यञ्जक होता है। (सामान्य सर्वनाम भी व्यञ्जक हो सकता है इसके उदाहरण अन्यत्र दिये गये हैं।) इसीलिये पौनरुक्त्य नहीं होता। उदाहरण के लिये प्रस्तुत 'तद्गेहं नतभित्ति' इत्यादि पद्य को ही लीजिये— 'वह घर' यहां 'वह' इस सर्वनाम से घर की जीर्ण-शीर्णता और बहुत ही निकृष्टता व्यक्त होती है। किन्तु केवल 'वह' की व्यंजना उत्कृष्टतापरक भी हो सकती है। इसीलिये 'नतभित्ति' (झुकी हुई दीवालोंवाला) इस शब्द का प्रयोग किया गया। अब इस 'नतभित्ति' शब्द के सहकार में 'तत्' की व्यंजना से दैन्याद्भुतिशय का ख्यापन हो जाता है। यदि केवल 'नतभित्ति' शब्द का प्रयोग किया गया होता 'तत्' यह सर्वनाम न होता तो उस घर के समस्त दैन्य का आयतन होने की सूचना नहीं मिलती। इसी प्रकार 'वह गाय' 'मूसल की वह क्षुद्र ध्वनि' इत्यादि में भी समझा जाना चाहिए। 'यत्' और 'तत्' शब्द का नित्य सम्बन्ध हुआ करता है किन्तु 'ते लोचने प्रतिदिशं विधुरे क्षिप्ती' में जैसा बतलाया जा चुका है ऐसे अवसरों पर 'तत्' शब्द को यत् शब्द की अपेक्षा नहीं होती अपितु 'तत्' शब्द स्मरण के आकार का द्योतक होता है। 'वह घर' 'वह गाय' 'वह क्षुद्र मूसलघ्वनि' से सुदामा के अतीत दैन्य की अधिकता व्यक्त की गई और 'इदम्' शब्द अनुभव का वाचक है।
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गगनचुम्बी भवन' 'यह हाथियों की घनघोर घटायें' 'यह रमणियों का कलमधुर संगीत' ये अनुभव गोचर है । स्मृति और अनुभव में अत्यन्त विरुद्ध विषयता को सूचित किया जा रहा है जिससे आश्चर्य के विभाव की योजना की गई है । यदि 'तत्' और 'इदम्' शब्द न होते तो सभी कुछ असंगत हो जाता । अतः यहाँ पर काव्य सौन्दर्य का प्राण यही 'तत्' और 'इदम्' अंश ही है । प्रस्तुत ग्रन्थ की योजना इसी प्रकार करनी चाहिये । यहाँ पर प्रकृतियों और संज्ञाओं को मिलाकर जो व्यंजकता दिखाई गई है वह एक उपलक्षणपरक शब्द है जिससे निष्कर्ष निकलता है कि व्यंजकत्व में परिपूर्णता दो दो करके भी आ सकती है तीन तीन करके भी आ सकती है । यह तो सिद्ध ही है कि यहाँ पर कवि ने संज्ञाओं का प्रयोग व्यंजक के रूप में किया है । यदि कवि का लक्ष्य संज्ञाओं के द्वारा व्यंजना करना न होता तो कवि संज्ञाओं का प्रयोग न कर वैचित्र्य दिखलाने के लिये--'कहाँ तो झुकी दीवालों वाला घर और कहाँ विशाल भवन' इस प्रकार 'कहाँ तो' इन शब्दों का प्रयोग करता । इनका प्रयोग न कर संज्ञाओं का प्रयोग किया गया है इससे यही सिद्ध होता है कि कवि संज्ञा का प्रयोग व्यंजक के रूप में कर रहा है और दो दो शब्द मिलकर पूर्ण व्यंजक बनते हैं ।
यदि इस प्रकार दो दो तीन तीन को मिलाकर व्यंजक माना जावे और एक दूसरे से उनके संकर्य की विवेचना की जावे तो लोष्टप्रस्तार के द्वारा व्यंजकों की संख्या अनन्त हो जावेगी और उनकी विशेषताओं की भी कोई सीमा न रहेगी । अतः यहाँ मार्गमात्र दिखलाया गया है । समस्त व्यंजकों का उल्लेख सर्वथा असम्भव है । सहृदयों को चाहिये कि वे इसी प्रकार अन्य व्यंजकों की स्वयं कल्पना कर लें । यहाँ पर यह विषय बहुत ही विखर गया है । अतः सम्भव है कि शिष्यों को कुछ व्यामोह हो जावे और वे ठीक रूप में उसको हृदयंगम न सकें इसीलिये अन्त में संक्षेप में बतला दिया गया है कि यह सब पद वाक्य और रचना के द्योतन के कथन से ही गतार्थ तथा अपनी विचित्रताओं के साथ ठीक रूप में समझ में आ जावे इसलिये पुनः कथन कर दिया गया । (आशय यह है कि पिछली कारिकाओं में पद इत्यादि की व्यंजकता बतलाई जा चुकी थी । पद के अन्दर ही उसके विभिन्न अवयव सुप्त तद् इत्यादि भी आ जाते हैं । किन्तु इतने से बात स्पष्ट नहीं होती थी अतः स्पष्ट करने के मन्तव्य से 'मुसिफ़' इत्यादि प्रस्तुत कारिका लिखी गई है ।)
ननु चार्थसामर्थ्याक्षिप्तया रसादय इयुक्तम्, तथा च सुवादीनां व्यरुजकत्ववैत्रियकथनमनन्वितमतेव ।
उक्तमत्र पदनां व्यज्जकत्वोक्तिव्यवसरे । किन्वार्थ-विशेषाक्षेप्यत्वेपी रसादीनां तेषामर्थविशेषणां व्यज्जकशब्दाविनाभावित्वाव्याप्त्या-प्रदर्शितं व्यज्जकस्वरूपपरिज्ञानं विभज्योपयुक्त एव ।
शब्दविशेषणां चात्र यत्न च चारुत्वं यदृद्भागेनोपदर्शितं तदपि तेषां व्यज्जकत्वेनावस्थितमित्यवगन्तव्यम् । यत्रापि तत्सम्प्रति न प्रतिभासते तत्रापि व्यज्जके रचनान्तरे यदृष्टं सौष्ठवं तेषां प्रवाहपतितानां तदेवाश्यादिसादुपोद्बूतानामप्यवभासत इत्यवसातव्यम् ।
कोड्न्यथा तुल्ये वाचकत्वे शब्दानां चारुत्वाविषयः स्यात् ? अन्य एवासौ सहृदयसंवेद्य इति चेत् किं रसभावानपेक्षया-
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तृतीय
उद्योतः
स्थितसमयविशेषाभिज्ञत्वम् ? उत रसभावादिमयकाव्यस्वरूपपरिज्ञाननैपुण्ण्यम् ? पूर्वस्मिन् पक्षे तथाविधसहृदयव्यवस्थापितानां शब्दविशेषाणां चारुत्वनियमो न स्यात् । पुनः समयान्तरेणान्यथापि व्यवस्थापनसम्भवात् । द्वितीयेऽस्मस्तु पक्षे रसज्ञतैव सहृदयत्वमिति । तथाविधे: सहृदयै: संवेद्यो रसादिसम्पर्णसामर्थ्यमेव नैसर्गिकं शब्दानां विशेष इति व्यङ्जकत्वाश्रितं तथा मुख्यं चारुत्वम् । वाचकत्वाश्रयणान्तु प्रसाद एवार्थापेक्षयां त्वनुप्रासादिरेव ।
(अनु०) (प्रश्न) यह कहा गया है कि रस इत्यादि अर्थसामर्थ्य से आक्षेप करने योग्य होते हैं । अतः सुप् इत्यादि का व्यङ्जकत्व वैचित्र्यकथन-अनुचित ही है । (उत्तर) इस (ग्रन्थ) में (ही) पदों के व्यङ्जकत्व के कथन के अवसर पर कहा गया है । (इस प्रश्न का उत्तर दिया जा चुका है ।) दूसरी बात यह है कि रस इत्यादि के अर्थविशेष के द्वारा आक्षेप करने योग्य होने पर भी उन अर्थविशेषों के व्यञ्जक शब्दों के बिना न हो सकने के कारण जैसा दिखलाया गया है वैसे व्यङ्ग्यस्वरूप का परिज्ञान विभक्त करके उपयुक्त हो ही जाता है । और जो शब्दविशेषों का नापित् विमर्शक करके अन्यत्र दिखलाया गया है वह भी उनके व्यङ्जकत्व से ही अवस्थित होता है—यह समझना चाहिये । जहाँ पर वह इस समय प्रतिभासित नहीं होता वहाँ पर भी दूसरी व्यञ्जक रचना में जो सौष्ठव देखा गया प्रवाहपतित अपोद्रूवत उन (शब्दों) का अम्यासवश वही अवभासित होता है यह समझना चाहिये । अन्यथा वाचकत्व के समान होने पर शब्दों की चारुताविषयक विशेषता क्या हो ? यदि कहो यह (विशेषता) और ही सहृदयसंवेद्य होती है तो यह सहृदयता क्या वस्तु है ? क्या रस और भाव की अपेक्षा न करते हुये काव्याश्रित संकेतविशेष का ज्ञान ? अथवा रस-भावादिमय काव्यस्वरूप के परिज्ञान की निपुणता ? पहले पक्ष में उस प्रकार के सहृदयों द्वारा व्यवस्थापित शब्दविशेषों का चारुत्वनियम (सिद्ध) नहीं होगा । क्योंकि दूसरे संकेतों के द्वारा अन्यथा भी व्यवस्थापन की सम्भावना की जा सकती है । दूसरे पक्ष में तो रसज्ञता ही सहृदयत्व है । उस प्रकार के सहृदयों के द्वारा संवेद्य रसादि सम्पर्ण का नैसर्गिक सामर्थ्य ही शब्दों की विशेषता होती है । इस प्रकार व्यञ्जकत्व के आश्रित ही उनका मुख्य चारुत्व होता है । वाचकत्व का आश्रय लेनेवाले उन शब्दों के अर्थ की अपेक्षा करने पर प्रसाद ही उनकी विशोषता है । अर्थ की अपेक्षा न करने पर तो अनुप्रास इत्यादि ही ।
(लो०) नन्विति । पूर्वनिर्णीतमध्येतदविस्मरणार्थमधिकरणार्थं चाक्षिस्सम् । उक्तमत्त्रेति । न वाचकत्वं ध्वनिव्यवहारोपयोगी येनावाचकस्य व्यङ्जकत्वं न स्यादिति प्राग्वाक्कम् । ननु न गतादिवद्रसादिभिव्यङ्ग्यत्वेऽपि शब्दस्य तत्र व्यापारो- स्त्येव; स च व्यङ्गजनात्मैवति भाव; । एतच्चास्माभिः प्रथमोद्योते निर्णयतचरम् । न चेदम्स्माभिरपूर्वमुक्तमित्याह—शब्दविशेषाणां चेति । अन्यत्रेति । भामहादिविवरणे । रक्चन्दनदनादयः शब्दा: शृङ्गारे चारवो बीभत्से तुचारव इति रसकृत्
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यत्रापोति । सक्चन्दनादिशब्दानां तदानीन् शृङ्गारादिव्यञ्जकत्वाभावेऽपि व्यञ्जकत्वशक्तेभूयसा दर्शना्तदधिवाससुन्दरीभूतमर्थ प्रतिपादयितुं सामर्थ्यमस्ति । तथा हि-‘तटी तारं ताम्यति’ इत्यत्र तटशब्दस्य पुंस्त्वनपुंसकत्वे अनादृत्य स्त्रीत्वमेवाश्रितं सहृदयैः ‘स्त्रीति नामापि मधुरम्’ इति कुत्वा । यथा वास्मदुपाध्यायविद्वत्कविशहृदयचक्रवर्त्तिनो भट्टेन्दुराजस्य—
स्याद्वा किं कपोलतलकोमलकान्तिरिन्दुः ॥
अत्र हीन्दीवरविस्मयसहहृदिलासनामपरिणामकोमलादयः शब्दाः शृङ्गाराभिव्यञ्जनदृष्टशक्तियोजद्र सौन्दर्यमावहन्ति ।
अवश्यं चैतद्वगन्तव्यमित्याह—कोऽन्यस्येति । असंवेद्यास्तावदसौ न नक्त इत्याशयेनाह—सहृदयैति पुनरिति । अनियन्त्रितपुरुषेच्छागतो हि समयः कथं नियतः स्यात् ।
यहाँ पर 'नक्त' इत्यादि शब्दों का उस समय शृंगार इत्यादि के व्यञ्जकत्व के अभाव में भी व्यञ्जकत्व शक्ति के बहुत अधिक देखने से उसके अधिवास के कारण अधिक सुन्दरता को प्राप्त अर्थ को प्रतिपादित करने के लिये शक्ति है । वह इस प्रकार—‘तटी तारं ताम्यति’ यहाँ पर तट शब्द के पुंस्त्व और नपुंसकत्व का अनादर करके ‘स्त्री यह नाम भी मधुर है’ यह समझ कर सहृदयों के द्वारा स्त्रीत्व का ही आश्रय लिया गया । अथवा जैसे हमारे उपाध्याय विद्वत्कविशहृदयचक्रवर्त्तिनो भट्टेन्दुराजस्य—
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मुख्यं चारुत्वमति । विशेष इति पूर्वेण सम्बन्धः । अर्थापिक्षायामिति । वाच्यपेक्षयामित्यर्थः । अनुप्रासादिरेवेति । शब्दान्तरेण सह या रचना तदपेक्षयोसौ विशेष इत्यर्थः । आदिग्रहणाच्छब्दगुणालङ्काराणां संग्रहः । अत एव रचनाया प्रसादेन चारुत्वेन चोपबृंहिता एव शब्दाः काव्ये योग्याः इति तात्पर्यम् ॥११५, ११६॥
(अनु०) ‘ननु’ यह पूर्वनिर्णीत भी यह विस्मरण न होने के लिये और अधिक कहने के लिये आक्षिप्त किया गया है । ‘यहीं यह कहा गया’ वाचकत्व ध्वनिव्यवहार का उपयोगी नहीं है जिससे अवाचक का व्यञ्जकत्व न हो यह पहले ही कहा जा चुका है । भाव यह है गीत इत्यादि के समान शब्द के रसाभिव्यञ्जकत्व में भी वहाँ पर व्यञ्जकत्व नहीं हो होता ऐसा नहीं है और वह व्यञ्जनात्मक ही होता है । यह हमने प्रथम उद्योत में प्रायः निश्चित ही कर दिया है । यह हमने कुछ अपूर्व नहीं कहा यह कहते हैं—‘शब्द विशेषों का’ यह । ‘अन्यत्र’ भामह विवरण में । ‘विभाग से, रस चन्दन इत्यादि शब्द शृंगार में सुन्दर और बीभत्स में असुन्दर होते हैं यह रसकृत विभाग ही है । रस के प्रति शब्द का व्यञ्जकत्व ही है यह पहले कहा जा चुका ।
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तृतीय उद्योतः
करे, यदि इसके विलास एकमात्र मित्र बन जावें तथापि वह चन्द्रमाक्या कपोलतल के समान कोमल कान्तिवाला हो सकेगा ?'
यहाँ निस्सन्देह इन्दीवर, लक्ष्म, विस्मय, सुहृत्, विलास, नाम, परिणाम, कोमल इत्यादि शब्द जिनकी शक्ति प्रगूढ़ार रसके अभिव्यंजन में देखी जा चुकी है यहाँ परम सौन्दर्य को धारण करते हैं। और यह अवश्य ही समझना चाहिये यह कहते हैं— 'अन्यथा क्या ?' 'असंवृत् तो वह नहीं ठीक है इस आशय से कहते हैं— 'सहृदय' इत्यादि 'पुनः' यह पुरुष को अनियन्त्रित इच्छा के आधीन संकेत नियत कैसे हो सकता है। 'मुख्यचारुत्व' इसका सम्बन्ध पहले आये हुये विशेष शब्द से है। अर्थ की अपेक्षा में अर्थात् वाच्य की अपेक्षा में। 'अनुप्रासादि ही' दूसरे शब्दों के साथ जो रचना उनकी दृष्टि से वह विशेषता है यह अर्थ है। 'आदि' शब्द के ग्रहण से शब्द गुण और अलङ्कारों का संग्रह हो जाता है। अतः एव रचना के द्वारा प्रसाद और चारुत्व से उपकृत शब्दों की ही काव्य में योजना करनी चाहिये।
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तृतीय उद्योतः
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वाचकत्व के अभाव में भी व्यज्जकता का प्रतिपादन तारावती—यहाँ पर एक प्रश्न यह उपस्थित होता है कि व्यंग्यार्थ या तो अभिधेयार्थमूलक होता है या लक्षणार्थमूलक। लक्ष्यार्थ भी अभिधा की पuc्छभूत ही होती है। अतः यह सिद्ध हो जाता है कि रस इत्यादि जितने भी व्यंग्यार्थ होते हैं उन सबका उद्गम सर्वदा वाच्यार्थ से ही होता है और वाच्यार्थ में ही रस इत्यादि का आक्षेप किया जा सकता है। इसका आशय यही है कि जहाँ कहीं वाच्यार्थ होगा वहीं व्यंजना हो सकेगी, जहाँ वाच्यार्थी नहीं होगा वहाँ व्यंजना हो ही नहीं सकेगी। अर्थ सम्पूर्ण पद का होता है उसके किसी अंश का नहीं। सुप् इत्यादि पदांश हैं पूर्ण पद नहीं। अतः जब सुप् इत्यादि में वाच्यार्थ ही नहीं होता तो उससे व्यंजना किस प्रकार हो सकती है और सुप् इत्यादि को रसाभिव्यन्जक किस प्रकार माना जा सकता है ? प्रश्नकर्ता का आशय यह है कि सुप् इत्यादि का व्यज्जकत्व वाच्यत्व प्रतिपादन असंगत ही है। यद्यपि इस प्रश्न का उत्तर पदों की व्यंजकता के निरूपण के अवसर पर दिया जा चुका है तथापि यहाँ पर प्रश्न दो मन्तव्यों से पुनः उठाया है। एक तो इस मन्तव्य से कि पाठक पहले कही हुई बात को भूल न जावे, दूसरे यह कि उसी प्रतिपादन में कुछ अधिक कहना है। (पदों की व्यंजकता के निरूपण के अवसर पर यह प्रश्न उठाया गया था कि वस्तुतः वाक्य सार्थक होते हैं, वाक्यगत पद उसी प्रकार निरर्थक होते हैं जिस प्रकार पदगत वर्ण निरर्थक होते हैं। अतः पदों की व्यंजकता सिद्ध नहीं होती।) वहाँ पर बतलाया जा चुका है कि व्यंजक होने के लिए वाचक होना अनिवार्य नहीं हैं। जिस प्रकार गीत इत्यादि रस के व्यंजक होते हैं उसी प्रकार (अर्थनिरपेक्ष) शब्द का व्यापार रसाभिव्यन्जन में न हो ऐसी बात नहीं है। इसका निरूपण प्रथम उद्योत में हो किया जा चुका है। शब्द की व्यापार व्यञ्जना के आतरिक्त और कुछ नहीं होता। जब केवल वर्ण माधुर्य इत्यादि गुणों की व्यञ्जना करते हैं तब केवल वर्णरूप सुप् इत्यादि रस की व्यंजना क्यों नहीं कर सकते ? दूसरी बात यह है कि कहीं कहीं अर्थविशेष के द्वारा भी रस इत्यादि की अभिव्यक्ति होती है, वे वाच्यार्थविशेष किन्हीं विशेष शब्दों के द्वारा ही। अभिहित किये जा
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सकते हैं। जब तक उन विशेष शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाता तब तक वे विशेष अर्थ भी निष्पन्न नहीं हो पाते और न रस इत्यादि की व्यंजना ही कर सकते हैं। इससे यह सिद्ध ही हो जाता है कि जहाँ अर्थ से रसादि की व्यंजना होती है वहाँ भी शब्द निमित्त अवश्य होता है। अतः शब्द को तोड़ कर उसके पृथक् पृथक् अवयवों में जो व्यंजक के स्वरूप (व्यंजकता) का परिज्ञान कराया गया है वह भी सङ्जत ही हो जाता है। यह बात हम कोई नई नहीं कह रहे हैं। सामान्य विवेचन में (उद्भट) ने विशेष शब्दों की चाचता-अचाहता का निरूपण विभाग के साथ किया है (शब्द-खण्डों की चाचता-अचाहता का निरूपण किया है)। यह चाचता अचाहता का निष्पन तभी सङ्जत होता है जब कि शब्दों और शब्दखण्डों में व्यंजकता स्वीकार कर ली जावे। रुक्, चन्दन इत्यादि शब्द शृङ्गार में चानु होते हैं और बीभत्स में अचानु होते हैं। यह विभाग रस की दृष्टि से ही किया जा सकता है। रस की दृष्टि से भी यह विभाजन तभी सङ्गत हो सकता है जब कि अर्थनिरपेक्ष शब्द की व्यंजकता मान ली जावे। इन सबका विस्तारपूर्वक निरूपण पहले किया जा चुका है। (आशय यही है कि जहाँ कहीं अर्थमूलक व्यंजना होती है वहाँ भी शब्द का सहकार अनिवार्य होता है और जहाँ शब्दमूलक व्यंजना होती है वहाँ तो शब्द में कारणता होती ही है।)
शब्दारोतर विषयों में शब्दशक्तिमूलक वर्णनों से रचना निष्पादन यहाँ पर एक प्रश्न यह भी विचारणीय है कि वहाँ तो ठीक है। जहाँ शृङ्गारपरक रचना होती है वहाँ शब्द शृङ्गार के व्यंजक होते हैं। किन्तु कुछ स्थान ऐसे भी होते हैं जहाँ शृङ्गार की अभिव्यंजना नहीं होती, कितु शृङ्गारपरक शब्दों के प्रयोग से चाचता वहाँ पर भी आ जाती है। रसाभिव्यंजना वहाँ पर चाचता में निमित्त नहीं हो सकती तो फिर चाचता में निमित्त दूसरा तत्त्व क्या माना जा सकता है ? वही तत्त्व शृङ्गार स्थल में भी क्यों निमित्त नहीं माना जा सकता ? उसके लिये व्यंजना को निमित्त मानने की क्या आवश्यकता ? इसका उत्तर यह है कि जहाँ इसकी अभिव्यक्ति नहीं होती वहाँ भी चाचता में हेतु व्यंजना ही होती है। होता ऐसा है कि हम प्रायः शृङ्गाररसभय्य रचनायें पढ़ते रहते हैं और तदनुकूल रसाभिव्यंजनजन्य शब्द-सौष्ठव का आस्वादन करते रहते हैं। इससे हमारी अन्तरात्मा में एक भावना बन जाती है कि उन शब्दों में सौष्ठव विद्यमान है। यह सौष्ठव का परिज्ञान व्यंजना के कारण ही होता है। फिर जब हम किसी ऐसी रचना को देखते हैं जहाँ उन शब्दों से किसी विशेष प्रकार के रस की अभिव्यक्ति नहीं होती वहाँ अभ्यास, वासना और संस्कारवश उन शब्दों में सौष्ठव की प्रतीति होती ही रहती है। अतः सिद्ध है कि व्यंजनाजन्य सौष्ठवप्रतीति ही संस्कारवश उन स्थलों पर भी अवभासित होती रहती है। जहाँ उन शब्दों से व्यंजना नहीं होती। उस अवभास में भी मूलभूत व्यंजना ही निमित्त होती है। उदाहरण के लिये तट शब्द पुलि्लङ्ग भी है, स्त्रीलिङ्ग भी है और नपुंसकलिङ्ग भी। 'तट', 'टटी' और 'टटम' तीनों शब्दों का समानार्थक प्रयोग होता है। 'टटी अत्यधिक पीड़ित (विदीर्ण) हो रही है' यहाँ पर तट शब्द के पुल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग का अनादर करके स्त्रीलिङ्ग का प्रयोग किया गया है, कारण यह है कि 'स्त्री यह नाम भी मधुर होता है' इस उक्ति के आधार पर यद्यपि यहाँ पर माधुर्य की कोई अभिव्यंजना नहीं होती। तथापि संस्कारवश तट शब्द के स्त्रीलिङ्ग
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तृतीय
उद्योत:
रूप में पुंलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग की अपेक्षा कुछ विशेष सौष्ठव आ ही गया है । इसीलिये सहृदय कवि ने यहाँ पर स्त्रीलिंग रूप का ही प्रयोग किया है । दूसरा उदाहरण जैसे अभिनवगुप्त के उपाध्याय विद्वद्रत्नसहृदयचक्रवर्ती उत्पल राजदेव का पद—
'जब चन्द्र इन्दीवर के समान कान्तिवाले चिह्न (कलङ्क) को न धारण करे, जब उसमें विस्मय के एकमात्र सहचर विलास भी उत्पन्न हो जावें तो भी पुण्य परिणा वश वह चन्द्र क्या कपोलतल के समान कोमल कान्तिवाला हो सकता है ?'
यहाँ पर कलङ्क को इन्दीवरवत् बतलाया गया है । यद्यपि यहाँ कोई माधुर्यभाव की व्यंजना नहीं होती तथापि 'इन्दीवर' शब्द में संस्कार जन्य माधुर्यव्यञ्जनक्षमता विद्यमान है ही । उसी के कारण यहाँ पर सौष्ठव का प्रतिभास होता अवश्य है । इसी प्रकार लक्ष्य, विस्मय, सुहृत्, विलास, नाम, परिणाम, कोमल इत्यादि शब्दों के विषय में भी समझा जाना चाहिये । इनसे सौष्ठव का प्रतिभास इसीलिये होता है कि प्रथ्वीर रस क्षेत्र में इनकी माधुर्याभिव्यंजन की शक्ति देखी जा चुकी है । यह तो मानना ही पड़ेगा क्योंकि यदि यह नहीं माना जावेगा तो शब्दवाचकता तो सभी अर्थों में एक जैसी होती है फिर किसी विशेष अव-
Here, the blemish is described as 'Indivara'. Although there is no expression of sweetness here, the word 'Indivara' has the capacity to convey sweetness due to its cultural association. It is due to this that the beauty is reflected here. Similarly, it should be understood about words like 'Lakṣya', 'Vismaya', 'Suhṛt', 'Vilāsa', 'Nāma', 'Pariṇāma', 'Komal' etc. These words convey beauty because their power to express sweetness has been observed in the realm of 'Prithvī' rasa. It has to be accepted because if it is not accepted, then the indicative power of words would be the same in all meanings, and there would be no basis for assuming any special charm in any particular word.
सर पर किसी विशेष शब्द में विशेष चारुता के मानने का क्या आधार होगा ?
सहृदय संवेदनसिद्धि में व्यञ्जना की आवश्यकता
यहाँ पर यह कहा जा सकता है कि सौष्ठव के प्रतिभास के लिये व्यञ्जना को घसीटने से क्या लाभ ? यह कोई अन्य ही तत्त्व है जो कि सहृदयसंवेदनासिद्ध कहा जा सकता है (अर्थात् इस तत्त्व को सिद्ध करने के लिये कोई अन्य प्रमाण नहीं दिया जा सकता क्योंकि यह अनिर्वाच्य होता है । इसके लिये तो यही कहा जा सकता है कि यह सहृदयसंवेद्य है ।) इसके उत्तर में निवेदन है कि यहाँ पर पूर्वपक्षी ने दो शब्दों का प्रयोग किया है संवेदन और सहृदय । इनमें संवेदना पर तो हमें कोई आपत्ति नहीं । कोई भी सौष्ठव-सम्पादक तत्त्व असंवेद्य तो हो ही नहीं सकता । अब रही सहृदयता की बात । आप सहृदयता किसे कहते हैं ? क्या काव्यगत ऐसे विशेष संकेत का समझना ही सहृदयत्व कहलाता है जिसमें रस, भाव इत्यादि की कोई अपेक्षा न हो ? अथवा रसादिमय काव्यस्वरूप के परिज्ञान की निपुणता ही सहृदयत्व की प्रयोजिका होती है ?
Here, it can be said that for the reflection of beauty, what is the use of dragging out 'vyajana'? It is some other element that can be called 'sahṛdayasaṃvedanasiddha' (i.e., this element cannot be proved by any other evidence because it is inexpressible. For this, it can only be said that it is perceived by the 'sahṛdaya'). In response to this, it is submitted that here the opponent has used two words - 'saṃvedana' and 'sahṛdaya'. We have no objection to 'saṃvedana'. Any factor that contributes to beauty cannot be imperceptible. Now, the question is about 'sahṛdayatā'. What do you call 'sahṛdayatā'? Is it the understanding of some special indication in poetry, which does not require any expectation of 'rasa', 'bhava', etc.? Or is it the proficiency in understanding the nature of 'rasa'-laden poetry that is the cause of 'sahṛdayatā'?
(सहृदय शब्द के ये ही अभिप्राय सम्भव हैं ।) यदि प्रथम पक्ष के अनुसा यह मानें कि सहृदय बनने के लिये रस, भाव इत्यादि के परिज्ञान की कोई अपेक्षा नहीं होती; काव्य के शब्द नवीन अर्थ देते हैं उन अर्थों को पहिचानना ही सहृदयत्व है तो इस पर मेरा कहना यह है—कि यदि रस इत्यादि से अनभिज्ञ को ही सहृदय माना जावेगा तो उनके द्वारा शब्दों की जो भी व्यवस्था की जावेगी कि अमुक शब्द चाहे अमुक शब्द अच्छा है वह व्यवस्था नियमित नहीं हो सकेगी क्योंकि दूसरे सहृदय आकर दूसरे प्रकार की व्यवस्था कर देंगे । आशङ्का यह है कि यदि व्यक्तियों की इच्छा को ही नियामक माना जावेगा तो संसार में एक प्रकार के तो व्यक्ति होते नहीं और न उनकी इच्छायें ही नियमित होती हैं । अतः एक ही शब्द को कुछ लोग चाह कहेंगे दूसरे लोग अच्छा । ऐसी दशा में कोई व्यवस्था नहीं बन सकेगी अतः यह मानना ही पड़ेगा कि चारुता का नियामक वस्तुतः रस इत्यादि ही होता है क्योंकि वही अद्वितीय आस्वाद का प्रवर्तक होता है । अतः रस की
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दृष्टि से जो भी व्यवस्था की जावेगी वह स्थिर हो जावेगी, उसमें मनमानी व्यवस्था के लिये अवसर नहीं रहेगा। यदि रसभावादि दृष्टि सहृदयता की व्यवस्थापक मानी जाती है तो सहृदयता का अर्थ ही हुआ रसज्ञता। अतः 'सहृदयसंवेद्य शब्दाविशेष' का अर्थ यह हुआ कि—रस और भाव इत्यादि को समर्पण करने की स्वाभाविक शक्ति ही शब्दों की विशेषता होती है जिसको सहृदय ही परख पाते हैं। अतः मुख्य चारुत्व व्यंजकत्व पर ही अवलम्बित होती है। यदि शब्दों को वाचकता तक ही सीमित रखना हो तो उनकी दो परिस्थितियाँ हो सकती हैं एक तो अर्थ की अपेक्षा करते हुये चारुत्व का निरूपण किया जावे दूसरे अर्थ की अपेक्षा न करते हुये चारुत्व का निरूपण किया जावे। यदि अर्थ की अपेक्षा करते हुये चारुत्व का निरूपण करना ही तो उसकी सबसे बड़ी विशेषता प्रसाद गुण ही होगी अर्थात् वहाँ शब्द-प्रयोग का मन्तव्य अपना अभिप्राय दूसरे को समझा देना मात्र होता है। यह प्रयोजन जिस शब्द के प्रयोग से सबसे अधिक सिद्ध हो जावे वही शब्द उस अर्थ के प्रति विशिष्ट माना जावेगा और शब्द को सबसे बड़ी विशेषता मानी जावेगी अर्थ का एकदम प्रत्यायन करा देना। यह विशेषता आपेक्षिक ही मानी जा सकती है—यदि वही अर्थ दूसरे शब्दों से कहे जाने पर उतनी शीघ्रता से अर्थ न प्रकट करे तो जिन शब्दों से अर्थ एकदम प्रकट हो जावे उन शब्दों में अर्थ को प्रकट करने की विशेषता ही मानी जावेगी। यदि सौष्ठव का प्रत्यायन वाच्यार्थ की दृष्टि से न करना हो तो शब्दों का सौष्ठव अनुप्रास इत्यादि की संज्ञा का अधिकारी होगा। इसमें भी आपेक्षिक सौष्ठव ही रहता है। यदि दूसरे शब्दों का उसी अर्थ में प्रयोग करने पर अनुप्रास इत्यादि की निष्पत्ति न हो तो अनुप्रास निष्पादन ही प्रयुक्त शब्दों की विशेषता होगी। अनुप्रास आदि में आदि शब्द से शब्दगुणों और शब्दालङ्कारों का संग्रह हो जाता है। तात्पर्य यह है कि ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिये जो रचना प्रसाद और चारुत्व के द्वारा उपबृंहित हो। (सारांश यह है कि मुख्य रूप में व्यंजना की दृष्टि से सौष्ठवपूर्ण शब्दों का प्रयोग करना चाहिये। यदि व्यंजनाजान्य सौष्ठव अपेक्षित न हो तो वाच्यार्थ की दृष्टि से अथवा स्वयं वाचक शब्द की दृष्टि के सौष्ठव पर विचार कर शब्दों का प्रयोग करना चाहिये।) ॥ ११५, ११६॥
(ध्वन्यो)——एवं रसादीनां व्यञ्जकस्वरूपमभिधाय तेषामेव विरोधिरूपं लक्षयितुमिदमुपक्रम्यते——
प्रबन्धे मुक्तके वापि रसादीन् बन्धुमिच्छता । यत्नः कार्यः सुमतिना परिहारेऽपि विरोधिनाम् ॥१७॥
प्रबन्धे मुक्तके वापि रसभावनिबन्धनं प्रत्याहतमना कविर्विरोधपरिहारेऽपि परं यत्नमादधीत । अन्यथा स्वव्यरससमय: इलोक एकोऽपि सम्पद्य न सम्पद्यते ।
(अनु.) इस प्रकार रस इत्यादि के व्यञ्जकों को कह कर उन्हीं के विरोधियों के स्वरूप को बतलाने के लिये उपक्रम किया जा रहा है—— 'प्रबन्ध अथवा मुक्तक में रस इत्यादि के निबन्धन की इच्छा करने वाले बुद्धिमान् व्यक्ति को विधियों के परिहार में यत्न करना चाहिये।'
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तृतीय उद्योत:
प्रबन्ध अथवा मुक्तक में भी रसभावनिबन्धन के प्रति आहूत मन बाला कवि विरोधपरिहार में परम प्रयत्न को भली भाँति धारण करे । नहीं तो इसका एक भी श्लोक रसमय सम्पन्न नहीं होता ।
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(लो०)—रसादीनां यद्यच्युतकं वर्णपदादिप्रबन्धान्तं तस्य स्वरूपमभिधायेतित सम्बन्धः । उपक्रम्यत इति । विरोधिनामपि लक्षणकरणे प्रयोजनमुख्यते शक्यहानत्वमनया नाम कारिकया । लक्षणं तु विरोधिरससम्बन्धीयादिना भविष्यतीत्यर्थः ।
रस इत्यादिकों का जो व्यंजक-वर्ण, पद से लेकर प्रबन्धपर्यन्त उसका स्वरूप कहु कर यह सम्बन्ध है । 'उपक्रम किया जा रहा है' यह । इस कारिका से विरोधियों के भी लक्षण करने में शक्यहानरूप प्रयोजन बतलाया जा रहा है । लक्षण तो 'विरोधिरससम्बन्ध इत्यादि से हो जावेगा यह अर्थ है ।
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तारावती—उपर १६ वीं कारिकापर्यन्त व्यंजक तत्वों पर विचार किया गया और यह बताया गया है कि ध्वनियों के विभिन्न भेद वर्ण से लेकर प्रबन्धपर्यन्त किस किस रूप में अभिव्यक्त होते हैं । १८ वीं कारिका से इस बात पर विचार किया जावेगा कि रसविरोध किसे कहते हैं । १८ वीं और १९ वीं कारिकाओं में रसविरोध के स्वरूप पर विचार किया जावेगा । प्रस्तुत १७ वीं कारिका में यह विचार किया गया है कि यहाँ पर रसविरोध का प्रकरण लिखने का प्रयोजन क्या है ?। वस्तुतः इस प्रकरण का प्रयोजन यही है कि पाठकगण यह समझ जावें कि जो रसविरोधी तत्त्व हैं उनका परिहार भी सम्भव है । इसीलिये सर्वप्रथम विरोधस्थलों को दिखलाकर बाद में परिहार का प्रकार दिखलाया गया है । प्रस्तुत कारिका में कहा गया है कि चाहे जिस प्रकार की रचना में प्रवृत्त हो चाहे वह प्रबन्धकाव्य लिख रहा हो चाहे मुक्तक यदि उसके मन में रस निबन्धन की कामना विद्यमान है तो उसे इस बात के लिये अत्यन्त सावधान तथा जागरूक रहना चाहिये कि उसके अभीष्ट रस में विरोधी रस का रंचमात्र भी समावेश न हो पावे । यदि वह यह ध्यान नहीं रख्खेगा तो उसका एक पद भी रसमय नहीं हो सकेगा ।
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(ध्वन्या०)—काव्य पुनस्तानि विरोधीनि यानि यत्नतः कवेः परिहर्तव्यानि-
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विरोधरससम्बन्धिविभावादिपरिप्रहः । बिस्तरेगान्वितस्य्याप वस्तुनोदन्यस्य वर्णनम् ।। अकाण्ड एव विच्छित्तिरकाण्डे च प्रकारानम् । परिपोषं गतस्यापि पौनःपुन्येन दोपनम् ।।
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रसस्य स्याद्विरोधाय वृत्त्यनौचित्यमेव च । प्रस्तुतरसापेक्षया विरोधी यो रसस्तस्य सम्बन्धना विभावभावानु-भावानां परिग्रहो रसविरोधहेतुकः सम्भवनीयः । तत्र विरोधिरसविभावपरिग्रहो यथा ज्ञानतरसविभावेषु तद्विद्वभावतयैव निरूपितेष्वनन्तरमेव शृङ्गारादिविभाववर्णने । यथा प्रियं प्रति प्रणयकलहकुपितासु कामिनीषु वैराग्यकथा-
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भिरनुनये। विरोधिरसानुभावरिग्रहो यथा प्रणयकुपितायां प्रियायामप्रसीदन्त्यां नायकस्य कोपावेशविवशस्य रौद्रानुभाववर्णने॥
(अनु०) फिर वे विरोधी हैं कौन जो यत्नपूर्वक कवि के परिहरणीय हैं यह कहा जा रहा है— 'विरोधी रस सम्बन्धी विभाव इत्यादि का परिग्रह आंवित भी अन्य वस्तु का विस्तारपूर्वक वर्णन, बिना अवसर विच्छेद और बिना अवसर के प्रकाशन, परिपोष को प्राप्त भी (रस) का बार-बार दीपन और वृत्तियों का अनौचित्य रस विरोध के लिये होता है॥१८, १९॥ प्रस्तुत रस की दृष्टि से विरोधी जो रस उसके सम्बन्धी विभाव भाव और अनुभावों का परिग्रह रसविरोध के हेतु के रूप में सम्भावित किया जाना चाहिये। उसमें विरोधी रस के विभाव का परिग्रह जैसे शान्त रस के विभावों में उसके विभाव के रूप में निरुपित किये जाने पर बाद में ही शृङ्गार इत्यादि का विभाव वर्णन करने में। विरोधी रस के भावों के परिग्रह का उदाहरण जैसे प्रिय के प्रति प्रणय कलह में कुपित कामिनियों के विषय में वैराग्य की बातचीत से अनुनय करने में। विरोधी रस के अनुभावों के परिग्रह का उदाहरण जैसे प्रणय कुपित तथा प्रस्तुत न होनिहार्लो नायिका के कोपावेशविवश नायक के रौद्र रस के अनुभावों के वर्णन करने में॥ (लो०) ननु 'विभावभावानुभावसचिवैश्चित्यचारुण:' इति यदुक्तं तत् एवं व्यतिरेकेणैतदण्यगंस्यते, मैनस्; व्यतिरेकेण हि तदभावमात्रं प्रतीयते न तु तद्रु- द्धम्। तदभावमात्रं च न तथा दूषकं यथा तद्रुद्धम्। पथ्यानुपयोगो हि न तथा व्याधि जनयति यथादपथ्योपयोगः:। तदाह—यत्नत इति। विभावेत्यादिना श्लोकेन यदुक्तं तद्रुद्धं विरोधीत्यादिनार्धश्लोकेन। इतिवृत्तेत्यादिना श्लोकद्वयेन यदुक्तं तद्रुद्धं विस्तारेणेत्यर्धश्लोकेन। उद्दिपनेत्यर्धश्लोकावतस्य विरुद्धं अकाण्ड इत्यर्ध- श्लोकेन। रसस्येत्यर्धश्लोकौकतस्य विरुद्धं परिपोषं गतस्येत्यर्धश्लोकेन। 'अलङ्कृतीन- मित्यनने यदुक्तं तद्रुद्धमन्यदापे च विरुद्ध वृत्त्यनौचित्यमत्यनन। एतदक्रमं व्याचष्टे—प्रस्तुतरसापेक्ष्येत्यादिना। हास्यशृङ्गारोर्वोर्विरोधसुतयो रौद्रकरुणयोर्भया- कबीभत्सयोर्नं विभावविरोध इत्यभिप्रायेण शान्तशृङ्गारावुपन्यासतो, प्रशमरागयो- विरोधात्। विरोधिनो रसस्य यो भावो व्यभिचारी तस्य परिग्रह:, विरोधिनस्तु यः स्थायी स्थायित्वात् तत्परिग्रहोजसम्भावनीय एव तदनुत्थानप्रसङ्गात्। व्यभिचारितया तु परिग्रहो भवत्येव। अतएव सामान्येन भावग्रहणम्। वैराग्यकथाभिरिति। वैराग्य- शब्देन निर्वेद: शान्तस्य यः स्थायी स उक्तः। यथा 'प्रसादे वत्सव प्रियं मुदं सन्त्यज रुषम्' इत्याद्युपक्रम्यार्थान्तरन्यासो 'न मुग्धे प्रत्येतुं प्रभवति गतः कालहरिण:' इति। मनागपि निर्वेदानुपवेशे सति रतौ विच्छेद:। ज्ञातविषयसतत्त्वचो हि जीवितसर्वस्वाभिमानं कथं भजन्ते। न हि ज्ञातशुक्तिकारजततत्त्वस्तदुपादेयोधीय भजन्ते ऋते संवृतिमात्रात्। कथाभिरिति बहुवचनं शान्तरसस्य व्यभिचारिणो धृतिमतिप्रभृतीन् संग्रूह्ह् णाति॥
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(अनु०) (प्रश्न) ‘विभावभावानुभावसंचयैश्चित्यचारुणः’ यह जो कहा गया । उसी से व्यतिरेक मुख से यह भी ज्ञात हो जायेगा। (उत्तर) ऐसा नहीं । व्यतिरेक से उसका अभावमात्र प्रतीत होता है विरुद्ध नहीं । केवल उसका अभाव वैसा दूषक नहीं है जैसा विरुद्ध । पथ्य का अनुपयोग उतना व्याधि को नहीं उत्पन्न करता जितना अपथ्य का उपयोग । वह कहते हैं— ‘यत्न से’ ‘विभावभावानुभाव’ इत्यादि श्लोक से जो कहा गया उसका विरोधी ‘विरोधी’ इत्यादि आघे श्लोक से कहते हैं । ‘इतिवृत्ति’ इत्यादि दो श्लोकों में जो कहा गया उसके विरुद्ध ‘विस्तारण—’ इस आघे श्लोक से कहते हैं । ‘उद्ददीपन’ इत्यादि आघे श्लोक में कहे हुये का विरुद्ध ‘अकाण्ड’ इस आघे श्लोक से । ‘रसस्य’ इस आघे श्लोक में कहे हुये के विरुद्ध ‘परिपोषं गतस्य’ इस आघे श्लोक के द्वारा । ‘अलंकृतिनाम्’ इस श्लोक से जो कहा गया उसके विरुद्ध तथा और भी विरुद्ध ‘वृत्त्यनौचित्य’ इसके द्वारा । इसकी क्रमशः व्याख्या की जा रही है— ‘प्रस्तुत रस’ इत्यादि के द्वारा । हास्य और श्रृंगार का, वीर और अद्भुत का रौद्र और करुण का भयानक और बीभत्स का विभावविरोध नहीं है इस अभिप्राय से शान्त और श्रृंगार को उपन्यासत किया गया है क्योंकि प्रशम और राग का विरोध है । विरोधी रस का जो भाव अर्थात् व्यभिचारी उसका परिग्रह; विरोधी का जो स्थायी, स्थायी के रूप में उसका परिग्रह ही असम्भव है क्योंकि उसके उद्भान का प्रसंग ही नहीं आता । व्यभिचारी के रूप में तो उसका परिग्रह हो ही जाता है । इसीलिये सामान्यतया भाव शब्द का उपादान किया गया है ‘वैराग्य की बातों के द्वारा’ यहाँ वैराग्य शब्द से शान्त का जो स्थायी निर्वेद वह कहा गया है । जैसे— ‘प्रसन्नता में वर्त्मान होओ, आनन्द प्रकट करो और क्रोध छोड़ दो’ यह उपक्रम करके— ‘हे मृगे ! वीता हुआ कालहरिण पुनः आने में समर्थ नहीं होता ।’ यहाँ थोड़े भी निर्वेद के अनुप्रवेश में रति का विच्छेद हो जाता है । विषयों के वास्तविक तत्व को जाननेवाला व्यक्त निस्सन्देह जीवनसर्वस्व के अभिमान को किस प्रकार प्राप्त होवे । मुक्ति और रजत के तत्व को जाननेवाला एकमात्र संवृति को छोड़कर उसके उपादान की बुद्धि को प्राप्त नहीं होता । ‘कषायः’ का बहुवचन शान्त रस के व्यभिचारी वृत्ति, मति इत्यादि का संग्रह कर लेता है
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तारावती—अब इस विषय में विचार किया जा रहा है कि जिन विरोधियों का परित्याग करना कवि का कर्तव्य है वे विरोधी ही कौन ? वस्तुतः प्रबन्ध की रसाभिव्यंजकता के अवसर पर विस्तारपूर्वक उन तत्त्वों पर विचार किया जा चुका है जो रस के अभिव्यंजक होते हैं । इससे अर्थातः सिद्ध हो जाता है कि उन तत्त्वों का अभाव रसविरोधी होता है । अतः यह प्रश्न किया जा सकता है कि जब पूर्वोक्त तत्त्वों के व्यतिरेक के द्वारा ही विरोधी तत्त्व भी अवगत हो सकते हैं तब पृथक् रूप में विरोधियों का प्रकरण लिखने की क्या आवश्यकता ? किन्तु इसका उत्तर स्पष्ट है । व्यतिरेक से अनुकूल का अभाव ही व्याप्त होता है । स्वतःसिद्ध विरोधियों का समावेश व्यतिरेक में नहीं होता । दोष दोनों प्रकार से उत्पन्न होता है अनुकूल परिस्थितियों का प्रयोग न करने से और विरोधियों का समावेश करने से । किन्तु अनुकूल के समावेश न करने से दोष इतना तीव्र नहीं होता जितना विपरीत परिस्थितियों के प्रयोग
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से । पथ्य का अनुपयोग व्याधि को उतना अधिक नहीं बढ़ाता जितना कुपथ्य का सेवन । इसलिये यहाँ पर कहा गया है कि विरोधियों के परिहार में बहुत अधिक प्रयत्न की आवश्यकता होती है । इस दिशा में बहुत अधिक जागरूक रहना चाहिये । पहले १० से १४ तक कारिकाओं में बतलाया जा चुका है कि रस के व्यंजक कौन से तत्त्व होते हैं । उनके प्रतिकूल तत्त्व स्वभावतः रसविरोधी होते हैं । उनको क्रमशः इस प्रकार समझना चाहिये—(१) (क) घटित या कल्पित काव्यशरीर का इस रूप में सम्पादन करना कि उसमें विभाव, भाव अनुभाव और संचारी भावों के औचित्य से सौष्ठव आ गया हो रस का व्यंजक होता है । (ख) इसके प्रतिकूल विरोधी रस से सम्बद्ध विभाव इत्यादि का ग्रहण करना रसविरोधी होता है ।
(२) (क) इतिवृत्तवश थाई हुई प्रतिकूल स्थिति को छोड़कर कल्पना से मध्य में ऐसी कथा का उन्नयन कर लेना जो रस के अनुकूल हो तथा केवल शास्त्रस्थिति-सम्पादन की इच्छा से न हो अपितु रसाभिव्यक्त की दृष्टि से सन्धि तथा सन्ध्यंगों की संघटना रसाभिव्यंजक होती है । (ख) इसके प्रतिकूल सम्बन्ध भी किसी अन्य वस्तु का अत्यन्त विस्तार से वर्णन करना प्रकृत रस का उपघातक होता है । (३) (क) मध्य में अवसर के अनुकूल उद्दीपन और प्रशमन रस के व्यंजक होते हैं । (ख) इसके प्रतिकूल बिना अवसर के विच्छेद और बिना अवसर के प्रकाशन रस के विरोधी होते हैं । (४) (क) जिस अंगी रस का विश्राम प्रसक्त हो गया उसका अनुसंधान करते चलना रस-साधना में उपकारक होता है । (ख) इसके प्रतिकूल परिपोषक को प्राप्त भी रस का बार-बार उद्दीपन रसविरोधी होता है । (५) (क) अलंकारों की रसानुरूप योजना रस के लिये सातत्य होती है । (ख) इसके प्रतिकूल वृत्तियों का अनौचित्य रसविरोधी होता है । प्रस्तुत प्रकरण में इन पाँचों की यथाक्रम व्याख्या की जावेगी ।
[प्रस्तुत प्रकरण को समझने के लिये रस-विरोध पर संक्षिप्त प्रकाश डाल लेना आवश्यक प्रतीत होता है। कुछ रस परस्पर विरोधी होते हैं कुछ अविरोधी । साहित्यदर्पण में विरोधी रसों का इस प्रकार परिगणन किया गया है—(१) शृङ्गार रस के विरोधी होते हैं करुण, बीभत्स, रौद्र, वीर और भयानक । (२) करुण के विरोधी होते हैं हास्य शृङ्गार । (३) वीर रस का विरोध भयानक और शान्त के साथ होता है । (४) वीर, शृङ्गार, रौद्र, हास्य और भयानक के साथ शान्त का विरोध होता है । (५) हास्य के विरोधी भयानक और करुण होते हैं । (६) रौद्र के विरोधी हास्य शृङ्गार और भयानक रस होते हैं । (७) भयानक के विरोधी शृङ्गार, वीर, रौद्र, हास्य और शान्त होते हैं । (८) बीभत्स का विरोधी शृङ्गार होता है । इनके विरोध और अविरोध की व्यवस्था पर भी आचार्यों ने विचार किया है । पण्डितराज ने लिखा है कि विरोध दो प्रकार का होता है—स्थितिविरोध और ज्ञानविरोध । साहित्यदर्पणकार ने विरोध और अविरोध की व्यवस्था पर इस प्रकार प्रकाश डाला है—'रसों के विरोध और अविरोध की अवस्था तीन प्रकार की होती है—
(१) किन्हीं दो रसों का विरोध आलम्बन की एकता में होता है अर्थात् एक ही व्यक्ति के प्रति विरोधी रसों का प्रतिपादन दूषित होता है, यदि विभिन्न व्यक्तियों के प्रति उन रसों का प्रतिपादन किया जावे तो दोष नहीं होता । (२) जैसे वीर और शृङ्गार आलम्बन की
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एकता में विरोधी होते हैं। जिस व्यक्ति के प्रति रति हो और उसी को जीतने तथा पराभूत करने की इच्छा का वर्णन किया जावे यह विरोध होगा। किन्तु सीता के प्रति रति और रावण के प्रति विजय की इच्छा का वर्णन तो हो ही सकता है। (२ किन्हीं दो रसों का विरोध आश्रय की एकता में होता है अर्थात् एक ही व्यक्ति के हृदय में दो विरोधी भावों का वर्णन दूषित होता है। जैसे एक ही व्यक्ति में उत्साह और भय इन दोनों तत्त्वों का वर्णन दूषित होता है किन्तु राम में उत्साह और रावण में भय का वर्णन दूषित नहीं होता। (३) किन्हीं दो रसों का विरोध नैरन्तर्य में होता है। वीर और शृंगार का विरोध आलम्बन की एकता में होता है। इसी प्रकार सम्भोग शृंगार का विरोध हास्य, रौद्र और बीभत्स से तथा विप्रलम्भ का विरोध वीर करुण और रौद्र से आलम्बन की एकता में ही होता है। वीर और भयानक का विरोध आलम्बन की एकता में और आश्रय की एकता में होता है। शान्त और शृंगार का विरोध नैरन्तर्य और विभाव की एकता में होता है। बीभत्स अद्भुत और रौद्र से, शृंगार का अद्भुत से और भयानक का बीभत्स से विरोध तीनों प्रकार से होता है। इसी प्रकार अन्य स्थानों के विषय में भी समझ लेना चाहिये। अब रसविरोध की प्रथम स्थिति पर विचार कीजिये—जहाँ प्रस्तुत रस की दृष्टि से विरोधी रस के उपकरणों का उपादान किया जावे वहाँ पर रसविरोध होता है। (रसगंगाधरकार का कहना है कि रसविरोध शब्द में रस का अर्थ है उसकी उपाधि स्थायी भाव क्योंकि रस तो सामाजिक की चित्तवृत्ति में होता है नायक इत्यादि में नहीं होता। दूसरी बात यह है कि रस अद्वितीयानन्दमय होता है, उसमें विरोध असम्भव है। विरोध के विषय में रसगंगाधरकार का कहना है कि यदि प्रकृत रस के विरोधी रसांगों का निबन्धन किया जावेगा तो विरोधी प्रकृत रसका बाध कर लेगा अथवा दोनों उसी प्रकार नष्ट हो जावेंगे जैसे सुन्द और उपसुन्द परस्पर लड़कर दोनों नष्ट हो गये।) रस के उपकरण तीन होते हैं विभाव, भाव, और अनुभाव। इन तीनों का उपादान नहीं करना चाहिये। उदाहरण के लिये यदि शांत रस के विभावों का शांतरस के विभावों के रूप में ही वर्णन किया गया हो और उसके तत्काल बाद शृंगार रस के विभावों का वर्णन प्रारम्भ कर दिया जावे तो विरोधी रस के विभाव परिग्रह का दोष होगा। (पहले बतलाया जा चुका है कि हास्य और शृंगार, वीर और अद्भुत, रौद्र और करुण, भयानक और बीभत्स इनके विभावों का विरोध नहीं होता। इन रसों का विरोध तभी होता है जब एक ही आलम्बन के प्रति दोनों भाव हों। यदि हास्य और शृंगार के पृथक-पृथक आलम्बनों का एक साथ वर्णन किया जावेगा तो दोष नहीं होगा। एक में रौद्र और दूसरों में करुण का होना तो स्वाभाविक ही है।) इसीलिए यहाँ पर विभाव विरोध में शान्त और शृंगार का उदाहरण दिया गया है। श्रम और रति एक दूसरे के विरोधी होते हैं। श्रम का वर्णन करते-करते यदि कोई कवि रति के विभावों का उपादान कर ले तो यह दोष ही होगा। यह तो हुई विरोधी रस के विभावों के उपादान की बात। अब विरोधी रस के उपादान को लीजिये—भाव शब्द का अर्थ है व्यभिचारी भाव और स्थायी भाव। यहाँ पर भाव शब्द से तात्पर्य व्यभिचारी भाव से ही है स्थायी भाव से नहीं। क्योंकि यदि विरोधी रस के स्थायी भाव का उपादान किया
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जावेगा और उसका परिपोष भी स्थायी भाव के ही रूप में किया जावेगा तो प्रकृत रस तो समाप्त ही हो जावेगा और उसके स्थान पर विरोधी रस सत्ता में आ जावेगा । अतः विरोधी रस के सञ्चारी भावों के रूप में उपादान दोष होता है । यदि स्थायी भावों का भी उपादान व्यभिचारी भावों के रूप में किया जावेगा तो उनका उपादान भी दोष होगा । इसीलिए सामान्यतया भावों के विरोधी होने की बात कह दी गई है । उदाहरण के लिए प्रणयकुपिता नायिकाओं को मनाने के लिए कोई वैराग्य की कथायें करने लगे । वैराग्य (निर्वेद) यद्यपि शांत रस का स्थायी भाव है किन्तु जब मानिनी के अनुनय के प्रसंग में उसका उपादान किया जावेगा तब वह व्यभिचारी भाव के रूप में आवेगा । उदाहरण के लिए चन्द्रकवि के निम्नलिखित पद्य को लीजिये—
प्रसादे वर्तस्व प्रकटय मुधुं सन्त्यज रुषं, प्रिये शृणु त्याग्यनुरागमृतमिव ते सिञ्चतु वचः । निधानं सौख्यानां क्षणमभिमुखं स्थापय मुखं, न मुग्धे प्रत्येतुं प्रभवति गतः कालहरिणः ॥
( प्रसन्नता में वर्त्तमान होओो, आनन्द् प्रकट करो, क्रोध छोड़ दो, हे प्रिये मेरे सूखते हुए अंगों को तुम्हारे वचन अमृत के समान सींचने लगें, सुखों के निधान अपने मुख को अभिमुख स्थापित करो, हे मुग्धे ! गया हुआ कालरूपी हरिण पुनः आ ही नहीं सकता । ) यहाँ मानिनी के प्रसादन के लिए उक्त शब्दों का प्रयोग किया गया है । किन्तु शान्तिम पंक्ति में जो अर्थान्तरन्यास का प्रयोग किया गया है वह ज्ञानतत्स्परक है । इस प्रकार शृंगार के भाव के अन्दर शाम का सञ्चारी के रूप में उपादान कर दिया गया है जो कि शृङ्गार का विरोधी है । अतः यह दोष है । (यदि शृंगार में निर्वेद का थोड़ा सा भी प्रवेश कर दिया जावे तो रति का तो विच्छेद हो ही जाता है क्योंकि जिस व्यक्ति को संसार की नश्वरता का पता है जो विषय वासनाओं की अङ्कचिल्लकता तथा तुच्छत्ता जान लेगा वह विषयों के सेवन में क्यों प्रवृत्त होगा ?
जो समस्त स्थावर जंगम जगत् को ब्रह्ममय जानता है वह अपने प्रेमी को जीवित सर्वस्व कैसे मान सकता है ? जब कि माया का संवर्र्ण विमोहन हो ? वेदान्त में केवल ब्रह्मतत्त्व ही सत्य माना जाता है, जगत् उसी प्रकार मिथ्या माना जाता है जैसे स्वप्न में देखे हुए दृश्य मिथ्या होते हैं और जिस प्रकार जाग जाने के बाद स्वप्न का बाध हो जाता है उसी प्रकार जगत् रूप दृर्थ स्वप्न का बाध ब्रह्मज्ञान से हो जाता है । सत्य ब्रह्म में मिथ्या जगत् की प्रतीति मायाजन्य होती है । इसके लिए अधिकतर दो दृष्टान्त दिये जाते हैं—रज्जु में सर्प का भान और शुक्ति में रजत का भान । जो व्यक्ति रजत को जानता है जब वह रजत की चमक शुक्ति में देखता है तब अज्ञान के कारण शुक्ति को रजत कहने लगता है और सत्य रूप में तब तक शुक्ति को रजत ही कहता जाता है जब तक उसे सत्य ज्ञान नहीं करा दिया जाता । इसी प्रकार ब्रह्म में जगत् का सत्य रूप में भान होता है । इस भान में कारण है माया । माया की दो शक्तियाँ होती हैं—आवरण और विक्षेप । आवरणशक्ति के द्वारा वास्तविक तत्व संवृत हो जाता है और विक्षेपशक्ति के द्वारा मिथ्या तत्व प्रतिबिम्बित होने
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लगता है। जब तक शुक्ति का वास्तविक तत्व आवृत अथवा संवृत न हो जावे और विशेष शक्ति से उसमें रजत का भाव न होने लगे तब तक कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसको शुक्ति और रजत दोनों का ज्ञान हो शुक्ति की ओर रजत बुद्धि से अपना हाथ बढ़ा ही नहीं सकता। इसी प्रकार जब तक ब्रह्मतस्व का संवर्रण और जगत् तत्व का विक्षेप न हो जावे तब तक जगत को सत्य मानकर व्यवहार के लिए कोई व्यक्ति उसका उपादान कर ही नहीं सकता। यही बात प्रस्तुत प्रसंग में समझी जानी चाहिए। जो व्यक्ति संसार की असारता को समझता है वह किसी अन्य व्यक्ति को तब तक अपना जीवीतसर्वस्व कैसे मान सकता है। जब तक उसकी असारता-बुद्धि का संवर्रण और जीवीतसर्वस्व भावना का स्फुरण न हो जावे। ऐसी दशा में उक्त प्रसंग सदोष ही कहा जायेगा। 'कथाओं के द्वारा' इस बहुवचन से धृति मति इत्यादि दूसरे संचारियों का समावेश हो जाता है। विरोधी रस के अनुभवों के उपादान में भी दोष होता है। जैसे यदि नायक के प्रयत्न करने पर भी प्रणयकुपिता मानिनी प्रसन्न न हो तो नायक कोप के आवेश से विवश होकर नायिका को मारने पीटने लगे। मारना पीटना रौद्र रस का अनुभव है। रौद्र रस श्रृंगार का विरोधी है। अतः श्रृंगार में रौद्र के अनुभव का वर्णन दोष होगा।
(ध्वन्या०) अयं चान्यो रसभङ्गहेतुर्यमुप्रस्तुतरसापेक्षया वस्तुनोऽन्यस्य कथनादनिष्टापत्तिः। यथा विप्रलम्भशृङ्गारे नायकस्य कस्यचिद्वर्णनंयिति सुप्रसिद्धेऽपि कवे्येऽकाव्यालङ्कारनिबन्धनरसिकतया महता प्रबन्धेन पर्वतादिवर्णने ।
(अनु०) यह दूसरा रसभङ्गहेतु है कि प्रस्तुत रस की अपेक्षा किसी न किसी प्रकार अन्वित भी अन्य वस्तु का विशेष रूप में कथन करना। जैसे किसी नायक के विप्रलम्भ शृङ्गार के वर्णन के उपक्रम होने पर यमक इत्यादि की अलङ्कारों की रसिक्ता के कारण बहुत बड़े प्रबन्ध के द्वारा पर्वत इत्यादि के वर्णन में।
(लो०)—नन्वनयदनुनमत्तः कर्थं वर्ण्येत, किमुत विस्तरत इत्याह—कथचिद्-निवर्त्स्यति।
(अनु०) अनुमत्त कौन व्यक्ति अन्य का वर्णन करेगा, विस्तार से तो कहना ही क्या ? इसपर कहते हैं—किसी प्रकार अन्वित।
तारावती—रसभङ्ग का दूसरा हेतु यह होता है कि कोई वस्तु प्रकृत वस्तु से सम्बद्ध तो है किन्तु उनका सम्बन्ध बहुत ही कठिनाई से स्थापित किया जा सकता है। प्रकृत रस की अपेक्षा उस वस्तु का अधिक विस्तार से वर्णन करना दोष माना जाता है और उससे रसभङ्ग हो जाता है। जो वस्तु सर्वथा असम्बद्ध है उसका वर्णन तो कोई उन्मत्त व्यक्ति ही करेगा किन्तु सम्बद्ध वस्तु का भी अधिक विस्तार से वर्णन दोष ही होता है। (सङ्गीत ने अंग रस को अंगी रस से अधिक महत्व देने में रसाभास माना है। शारदातनय इत्यादि दूसरे आचार्यों की भी कुछ ऐसी ही सम्मति है। काव्यप्रकाशकारने भी रसदोष-प्रकरण में 'अङ्गिनोऽनुसन्धानम्' ...... तथा 'अनङ्गस्याभिधानम्'—ये दोष माने हैं। साहित्यदर्पणकारने भी रसदोष लिखा है— 'अङ्गिनोऽनुसन्धानमनङ्गस्य च कीर्तनम्'। रसमङ्गाधर में इस तत्व का कई खण्डों में प्रतिपादन
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किया गया है—‘समन बलवाले, अधिक बलवाले या प्रतिकूल रसों का निवन्धन प्रकृत रस का विरोधी होने से दोष होता है ।’ ‘इसी प्रकार अपघान प्रतिनायक इत्यादि के नाना प्रकार के चरित्रों का और अनेक प्रकार की सम्पत्ति का नायक के उन तत्त्वों की अपेक्षा अधिक का वर्णन नहीं करना चाहिए । क्योंकि ऐसा करने पर वर्णन के लिये अभीष्ट नायक का उत्कर्ष सिद्ध नहीं होगा और तत्प्रयुक्त रसपरिपोष भी नहीं हो सकेगा । अतः प्रतिनायक के चरित्र का उतना ही वर्णन करना चाहिए जितना नायक के चरित्रोदृर्ष में सहायक हो । यदि प्रतिनायक का अधिक उत्कर्ष दिखला दिया जावेगा तो किसी विषबाण से शवर द्वारा महाराज के मारे जाने के समान नायक का विजय सांयोगिक ही रह जावेगा और प्रतिनायक का चरित्र नायक के उत्कर्ष में हेतुभूत नहीं हो सकेगा ।’ ‘इसी प्रकार ‘प्रकृत रस की अनुपकारक वस्तु का भी वर्णन प्रकृत रस के विराम में हेतु होने के कारण दोष होता है ।’ जैसे किसी नायक के विप्रलम्भ शृंगार का वर्णन प्रारम्भ किया गया हो और कवि यमक इत्यादि अलंकारों का विशेष प्रेमी होने के कारण उस विप्रलम्भ का वर्णन छोड़कर पर्वत इत्यादि का वर्णन करने लगे । (विप्रलम्भ शृंगार में पर्वत इत्यादि की रमणीयता भी उद्दीपन विभाव के अन्दर आ सकती है । यदि कवि इतने ही सम्बन्ध को लेकर विप्रलम्भ शृंगार को छोड़कर पर्वत इत्यादि वर्णन में प्रवृत्त हो जावे तो वह दोष ही होगा । पहले कहा जा चुका है : यमक इत्यादि का निवन्धन विप्रलम्भ शृंगार में विशेष रूप से विघ्न उत्पन्न करता है । अप्रकृत-वर्णन के उदाहरण के रूप में किरातार्जुनीय का वह प्रकरण उपस्थित किया जा सकता है—जब अर्जुन तपस्या करने जाते हैं और उनकी तपस्या में विघ्न डालने के लिये किन्नर, गन्धर्व और अप्सरायें भेजी जाती हैं । कवि वर्णन के प्रलोभन में पड़कर पर्वत, ऋतु, जलक्रिडा इत्यादि के वर्णन में ऐसा लगता है कि प्रकृत वर्णन दृष्टि से सर्वथा तिरोहित हो जाता है । इसी प्रकार शिशुपालवध में भगवान् कृष्ण युधिष्ठिर के यज्ञ में भाग लेने जा रहे हैं । जहाँ उन्हें शिशुपाल का वध करना है । कवि वर्णन के व्यामोह में इतना अधिक पड़ जाता है कि कृष्ण के मार्गवर्णन के प्रसंग में रैवतक पर्वत, शरद् ऋतु, जलक्रोडा, सन्ध्या, रात्रि, प्रभात इत्यादि के वर्णन में आठ, नौ सर्ग लगा देता है तथा पाठक सर्वथा भूल जाता है कि कथा कहाँ जा रही है । इस प्रकार के वर्णन सर्वथा सदोष होते हैं । अप्रासंगिक का थोड़ा बहुत वर्णन सह्य हो सकता है किन्तु इतना अधिक विस्तार अनुचित ही कहा जावेगा ।)
(ध्वन्यालोके) अयं चापरो रसभङ्गहेतुरवगन्तव्यो यदकाण्ड एव विच्छित्तिः रसस्याकाण्ड एव च प्रकाशनम् । तत्रावसरे विरामो रसस्य यथा नायकस्य कस्यचित्परिपोषपदवीं प्राप्ते शृंगारे विदिते च परस्परानुरागे समागमोपायचिन्त्तोचितं व्यवहारमृत्सृज्य स्वतन्त्रतया व्यापारान्तर-वर्णने । अनवसरे च प्रकाशनं रसस्य यथा प्रवृत्ते प्रवृत्तिविविधवैरषड्रक्षये कल्प-सङ्कयकल्पे सङ्ग्रामे रामदेवप्रायस्यापि तावन्नायकस्योपकान्तविप्रलम्भशृङ्गारस्य निमित्तुचित्संलक्ष्यते न चाविधेय विषयद्वैध्र्यामोहितत्वं हितत्वं कथापुरुषस्य परिहारो यतो रसबन्ध एव कवे: प्राधान्येन प्रवृत्तिनिबन्धनम्
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युक्तम् । इतिवृत्तवर्णनं तदुपाय एवेत्युक्तं प्राक्—‘आलोकार्थीं यथा दीपशिखां यत्नवान् जनः’ इत्यादिना । अत एव चेतिवृत्तमात्रवर्णनप्राधान्ये सति यद्ज्जड्भावोपरहितरसभावनिबन्धेन च कवोनामेवंविधानि सकलितानि भवन्ति यत्नोद्यमाभिरबन्धो न ध्वनिप्रतिपादनमात्राभिनिवेशेन ।
(अनु०) यह दूसरा रसभंग समझा जाना चाहिए कि बिना अवसर रस का विच्छेद और विना अवसर प्रकाशन । उनमें बिना अवसर इसका विराम जैसे किसी नायक के किसी स्पृहणीय समागम वाली नायिका के साथ शृङ्गार के बहुत बड़ी परिपोष पदवी को प्राप्त हो जाने पर और परस्पर अनुराग के विदित हो जाने पर समागमोपाय की चिन्ता के योग्य व्यवहार को छोड़कर स्वतन्त्ररूप में दूसरे व्यापारों का वर्णन करने में । बिना अवसर के रस का प्रकाशन जैसे जिस संग्राम में अनेक वीरों का संक्षय प्रारम्भ हो गया हो और जो कल्पनाश के समान उपस्थित हो उस संग्राम के प्रारम्भ हो जाने पर रामदेव के समान भी किसी नायक का, जिसका विप्रलम्भ शृङ्गार प्रारम्भ न किया हो, किसी उचित निमित्त के बिना ही शृङ्गार में प्रवेश के वर्णन में । इस प्रकार के विषयों में कथा पुरुष का दैवग्यामोहितत्व परिहार ठीक नहीं है क्योंकि कवि का प्रवृत्तिनिमित्त प्रधानतया रसबन्धन हो होता है । यह पहले ही कहा जा चुका है कि इतिवृत्तवर्णन तो उसका उपायमात्र है—जैसे ‘प्रकाश की इच्छा करनेवाला व्यक्ति दीपशिखा में यत्नवान् होता है’ इत्यादि के द्वारा । और इसलिये केवल इतिवृत्तवर्णन की प्रधानता होने पर अलङ्कार-भाव-रहित रसभाव के निबन्धन के द्वारा कवियों के इस प्रकार के सकलित हो जाते हैं । इसलिये रसभाव इत्यादि रूप व्यंग्यतात्पर्य ही इनका उचित है । इसलिये हमने यत्न आरम्भ किया है, केवल ध्वनि-प्रतिपादन के आग्रह से नहीं ।
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(लो०) काव्यारामरतेरिति । यथा वत्सराजचरिते चतुर्थेऽङ्के —रत्नावलीनामधेयमण्मयगृहं, णतो विजयवर्मवृत्तान्तवर्णनेन । अपि तावदति शब्दाभ्यां दुर्योधनादेस्तद्वर्णनं दूरापास्तमिति वेणीसंहारे द्वितीयाङ्कमेवोदाहरणत्वेन ध्वनित । अत एव वक्ष्यति स्येति प्रतिनायकस्येति यावत् । अत एव चेतिवृत्तमात्रवर्णनप्राधान्ये सति यद्ज्जड्भावरहितानामविचारितगुणप्रधानभावानां रसभावानां निबन्धनं तन्निमित्तानि सकलितानि सर्वे दोषा इत्यर्थः । न ध्वनिप्रतिपादनमात्रेति । वृद्धव्यासोऽर्थो वा भवतु वा भूत्कथात्राभिनिवेशः? कावदन्तपरिक्षाप्रायमेव तत्त्वादिति भावः ।
(अनु०) ‘दूसरे व्यापार का’ । जैसे वत्सराज चरित चतुर्थ अङ्क में रत्नावली का नाम भी न लेने वाले विजयवर्मा के वृत्तान्त वर्णन में । ‘अपि तावत्’ इन शब्दों से दुर्योधन इत्यादि का वह वर्णन दूर से ही परित्यक्त है । इस प्रकार वेणीसंहार का द्वितीय अङ्क ही उदाहरण के रूप में उदाहृत है ।
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में ध्वनित करता है। इसीलिए कहेंगे—‘दैवव्यामोहितत्व’। पहिले तो सन्ध्याधन के अभिप्राय से प्रत्युदाहरण दे दिया। ‘कथापुरुष का’ अर्थात् प्रतिनायक का। ‘इसीलिये’ यह। क्योंकि रसबन्धन ही कवि के व्यापार का मुख्य विषय है। इतिवृत्तमात्र वर्णन के प्रधान होने पर जो अङ्गाङ्गिभावरहित अर्थात् गौण और प्रधान भाव का बिना विचार किये हुए रसों और भावों का निवन्धनं तत्रिमित्त स्कालित ही सब दोष (होते हैं) यह अर्थ है। ‘ध्वनिप्रतिपादनमात्र’ यह। व्यङ्ग्य अर्थ हो या न हो उसमें क्या अभिनिवेश ? वह कारकदन्तपरীক্ষा के समान ही होगा यह भाव है।
अकाण्ड विच्छेद
तारावती—रसभंग का तीसरा हेतु यह होता है कि रस को ऐसे स्थान पर छोड़ देना जहाँ उसका छोड़ना उचित न हो और पाठक को रसविच्छेदजन्य अतृप्ति तथा खेद का अनुभव होता रहे। इसी प्रकार रस का ऐसे स्थान पर प्रकाशित करना जहाँ उसका प्रकाशन उचित न हो दोष ही कहा जायेगा। (काव्यप्रकाश—‘अकाण्डे प्रयत्नच्छेदो’। साहित्यदर्पण—‘अकाण्डे प्रयत्नच्छेदो’। रसगङ्गाधर—‘विमिन्नरसों का प्रस्तुतानुप्रेक्षा के अयोग्य स्थान पर प्रस्ताव और विच्छेद के अयोग्य स्थान पर विच्छेद। जैसे सन्ध्यावन्दन देवयजन इत्यादि धर्म वर्णन के प्रसंग में किसी कामिनी के साथ किसी कामुक के अनुरागवर्णन में और जैसे—महाभारत में दुर्योधन प्रतिज्ञाओं के उपस्थित होते पर और मरुम्भेदी वचनों के बोलने पर नायक का सन्ध्यावन्दन करना इत्यादि’। बिना अवसर के रसविराम का उदाहरण जैसे—यदि किसी नायक के हृदय में किसी नायिका के समागम की स्पृहा उत्पन्न हो गई हो, शृङ्गार रसपरिपोष पदवी को प्राप्त हो गया हो और एक दूसरे का अनुराग प्रकट हो चुका हो क्योंकि रति के उभयनिष्ठ हुए बिना शृङ्गार का पूर्ण परिपोष कहा ही नहीं जा सकता। आशय यह है कि शृङ्गार रस पूर्वराग के रूप में स्थित हो ऐसी दशा में उचित व्यवहार यही हो सकता है कि समागम-उपाय सोचा जावे—हूतीसम्प्रेषण, पत्रलेखन, संकेत-निर्धारण इत्यादि की चेष्टा की जावे—किन्तु इसके प्रतिकूल यदि कोई कवि इन व्यवहारों को छोड़कर दूसरे कायों का विस्तारपूर्वक वर्णन करने लगे तो यह दोष होगा। जैसे ‘तापसवत्सराज’ में रत्नावली और उदयन के पूर्वराग उत्पन्न हो जाने के बाद चतुर्थ अङ्क में विजयवर्मी
के वृत्तान्त का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है, विजयवर्मी रत्नावली का नाम तक नहीं लेते इस प्रकार प्रकृत रस में उदयन और रत्नावली के अनुराग का अतिक्रमण कर तथा उसको बीच में ही छोड़कर दूसरे कायग्यापारों का वर्णन प्रारम्भ कर दिया गया है। यह बिना अवसर के रस को छोड़ देने में दोष की व्याख्या की गई है।
बिना अवसर के विस्तार
दूसरा दोष तब होता है जब रस का बिना अवसर के विस्तार किया जाता है। उदाहरण के लिए—जबकि महासमर का प्रारम्भ हो चुका हो, अनेक वीरों का संक्षय भी प्रवृत्त हो और प्रलय का दृश्य उपस्थित हो उस समय नायक की शृङ्गार चेष्टाओं का वर्णन किया जाने लगे तो यह शृङ्गार का बिना अवसर विस्तार अत्यन्त अनुचित होगा। फिर नायक चाहे रामदेव के समान हो क्यों न हो यदि उसके विप्रलम्भ शृङ्गार का उपक्रम नहीं किया गया होगा और शृङ्गार चेष्टाओं का कोई कारण भी
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तृतीय उद्योतः
उपस्थित नहीं होगा तो उस दशा में उस नायक का शृङ्गार चेष्टाओं का वर्णन सर्वथा अनुचित ही कहा जावेगा। 'रामदेव जैसे का भी' यहाँ पर 'भी' कहने का आशय यह है कि भगवान् राम के लिए युद्ध तो एक साधारण सी बात है; उनके भृकुटि-विलास से ही सारी सृष्टि का लय हो सकता है। उनके लिए युद्ध की चिन्ता क्या ? अतः युद्ध की विभीषिका से चिन्तित होना और आमोद प्रमोद में न पड़ना उनके लिए कोई अनिवार्य बात नहीं। किन्तु उन राम के विषय में भी यदि महान् वीरों के संक्षय के अवसर पर शृङ्गारकीडा का वर्णन किया जावे तो वह भी अनुचित हो होगा। फिर दुर्योधन इत्यादि के विषय में तो कहना ही क्या ? उनके विषय में शृङ्गार का विस्तार तो अनुचित होगा ही। वेणीसंहार के द्वितीय अंक में दुर्योधन का शृङ्गारप्रदर्शन इसी का उदाहरण है। 'रामदेव जैसे का भी' कहने से उसी उदाहरण की व्यंजना होती है। हाँ यदि विप्रलम्भ का उपक्रम हो या शृङ्गारप्रथन का कोई निमित्त उपस्थित हो तो इस प्रकार के वर्णन का अनौचित्य दूर हो सकता है। यहाँ यह तर्क प्रस्तुत किया जा सकता है कि इस प्रकार के विषय में प्रतिनायक के शृङ्गार-विस्तार के द्वारा लेखक का मन्तव्य यह व्यक्त करना होता है कि 'प्रतिनायक की वद्धि ही दैववश मारी गई थी। अतः ऐसे अवसरों पर भी जब कि उसे सतर्क होकर चलना चाहिए था वह व्यर्थ की शृङ्गार चेष्टाओं में लगा हुआ था, फिर उसका विनाश क्यों न होता ?' किन्तु यह समाधान ठीक नहीं, क्योंकि कवि का प्रधान प्रवृत्ति-निमित्त रसबन्धन ही होता है यही कहना ठीक है। इतिवृत्तवर्णन तो एक उपायमात्र होता है जैसा कि प्रथम उद्योत में कहा जा चुका है—'जिस प्रकार आलोक का इच्छुक व्यक्ति दीपशिखा में यत्नवान् होता है।...' इत्यादि। वेणीसंहार के द्वितीय अंक में दुर्योधन के शृङ्गारप्रथन का उदाहरण पहले भी आ चुका है किन्तु यहाँ पर सन्ध्यंग की पूर्ति के लिए कथा-भाग के समावेश को अनुचित बतलाने के उदाहरण के रूप में दुर्योधन और भानुमती के शृङ्गारप्रथन का उल्लेख किया गया था और यहाँ पर बिनाअवसर के शृङ्गारप्रथन के प्रसंग में 'रामदेव जैसे का भी' इस 'भी' शब्द से उसकी व्यंजना की गई है। अतः विषयभेद होने से यहाँ पर पुनरुक्ति नहीं हैं। यहाँ पर 'कथापुरुष का दैवव्यामोहितत्व' में कथापुरुष का अभिप्राय है प्रतिनायक, प्रधान नायक नहीं; क्योंकि प्रधान नायक तो सफलता की ओर ही अग्रसर होता है। उसका दैवव्यामोहित होकर कार्य बिगाड़ लेना उचित नहीं। रसनिबन्धन ही कवि का प्रधान कार्य क्षेत्र होता है। यदि कवि ऐसा काव्य लिख रहा है जिसमें केवल इतिवृत्त की प्रधानता हो तो वह कभी कभी अपने काव्य को ग्राह्य बनाने के मन्तव्य से उसमें रसभाव इत्यादि की संयोजना करता चलता है—उस निबन्धन में न वह अनुवन्ध रसभावों के अङ्गाङ्गभाव का ध्यान रखता है और न उनके गौण तथा प्रधान होने की ही कोई परवा करता है। इस कारण रसभावनिबन्धन के क्षेत्र में पद पद पर उसके प्रमाद-स्वलित होते हैं और वे ही सब दोष हो जाते हैं। अतः समस्त प्रबन्धों का तात्पर्य एकमात्र रस और भाव इत्यादि ही होना चाहिये और उसमें आनेवाले दोषों को बचाना चाहिये यह दिखाने के लिये ही हमने प्रस्तुत प्रकरण प्रारम्भ किया है, हमारा अभिनिवेश केवल ध्वनि का प्रतिपादन करना ही नहीं है। आशय यह है कि यहाँ पर कोई प्रस्तुत प्रकरण को ध्वनि से
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असम्बद्ध कहकर अप्रासंगिकता का दोषारोपण कर सकता है। उस पर आनन्दवर्धन का कहना है कि इस प्रकरण को लिखने का हमारा मन्तव्य उन त्रुटियों की ओर संकेत करना है जो रसभावनिबन्धन में प्रायः कवियों से हो जाती हैं। इसका ध्वनि से भी सम्बन्ध है। किन्तु केवल ध्वनि का प्रतिपादन ही प्रस्तुत प्रकरण का मन्तव्य नहीं है। आशय यह है कि उस प्रकार के इतिवृत्तात्मक काव्य में ध्वनि हो या न हो इसमें हमारा क्या आग्रह? वह तो कावदन्त परीक्षा के समान सर्वथा व्यर्थ ही है।
(ध्वन्या०) पुनःश्रायमन्यो रसभङ्गहेतुरवधारणीयो यत्परिपोषपुष्टतस्यापि रसस्य पौनः पुन्येन दीपनम्। उपयुक्तो हि रसः स्वसामग्रीलब्धपरिपोषः पुनः पुनः परामृश्य-माणः परिम्लानकुसुमकल्पः कल्पते।
(अनु०) फिर यह दूसरा रसभंग हेतु समझ लिया जाना चाहिये जो कि परिपोष को प्राप्त भी रस का पुनः पुनः दीपन। निस्सन्देह अपनी सामग्री से परिपोष को प्राप्त होनेवाला उपयुक्त रस बार-बार परामर्श किये जाने पर अत्यन्त मलिनकुसुम के समान कल्पित होता है।
पुनः पुनः दीपन
तारावती—दूसरा रसभङ्गहेतु यह समझना चाहिये कि कोई रस विभाव, अनुभाव और सञ्चारी भावों की उचित सामग्री के बल पर पूर्णतया परिपोष को प्राप्त हो गया हो फिर भी उसका पुनः पुनः दीपन किया जाये। यदि किसी उचित रस के परिपुष्ट हो जाने के बाद भी उसका उपयोग किया जा रहा हो और उस समय उसका बार-बार परामर्श किया जावे तो मसले हुये पुष्पों के समान उसमें मलिनता आ जाती है। जैसे कुमारसम्भव में रतिविलाप के अवसर पर कवि बार बार कहता चलता है कि ‘रति विलाप करने लगी’ ‘रति छाती पीट कर रोने लगी’ इत्यादि। इस प्रकार बार बार मसलेने से पुष्प के समान रस मलिन पड़ जाता है और सहृदयों को उस ओर से विराग हो जाता है।
(ध्वन्या०) तथा वृत्ताव्यवहारस्य यदनौचित्यं तदपि रसभङ्गहेतुरेव। यथा नायकं प्रति नायिकाया: कस्याश्र्चिदुचितां भजिमन्तरेण स्वयं सम्भोगाभिलाषकथने। यद्वा वृत्तौ भरतप्रसिद्धानां केशिक्यादीनां काव्यालङ्कारप्रसिद्धानामुपनागरिकाद्यतानां वा यदनौचित्यं विषयेऽनिबन्धनं तदपि रसभङ्गहेतुः। एकेषां रसविरोधिनामनुयोगेषां चानया विश्रा स्वयमुप्रेक्षितानां परिहारेऽपि सत्कविविरहितैरभवितव्यम्।
परिकरालोकाशास्त्र—मुख्यया व्यापारविषया: सुकवीनां रसावयः । तेषां निवन्धने भाव्यं तैः सदैवाप्रमादिभिः ॥ नोरसस्तु प्रभन्धो यः सोऽप्यशाब्दो महान् कवे: । स तेनाकविरेव स्याद्येनास्मृतलक्षणः ॥ पूर्वं विशिष्टलिङ्गिः कवयः प्राप्नुवन्तं यः । तन्नु समाश्रित्य न त्याज्या नीतिरेषा मनीषिणा ॥ वाल्मीकिव्यासमहूयाश्रये प्रथ्याता: कवेश्वराः । तद्भिप्रायबाह्योऽप्योयं नास्माभिरिदंशतो नयः ॥ इति ।
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तृतीय
उद्योतः
(अनु०)—उसी प्रकार वृत्ति अर्थात् व्यवहार का जो अनौचित्य वह भी रसमङ्झहेतु ही होता है जैसे किसी नायक के प्रति किसी नायिका का उचित भत्स्ना के बिना स्वयं सम्भोग की अभिलाषा के कथन करने में । अथवा भरतप्रसिद्ध कैशिकी इत्यादि वृत्तियों या दूसरे शालङ्कारिकों में प्रसिद्ध उपनागरिका इत्यादि का जो अनौचित्य अर्थात् अविषय में योजना वह भी रसमङ्झहेतु ही होता है । इस प्रकार इन रसविरोधियों और इसी दिशा में स्वयं कल्पित किये हुये दूसरे ( रसविरोधों) का परिहार करने में अच्छे कवियों को सावधान रहना चाहिये । और यहाँ परिकार श्लोक है—
तृतीय
उद्योतः
'अच्छे कवियों के मुख्य व्यापार विषय रस इत्यादि होते हैं । उनके निबन्धन में उनको सर्वदा अप्रमत्त होना चाहिये ।'
तृतीय
उद्योतः
'जो नीरस प्रवन्ध वह कवि की महान् अपशब्द है । इससे वह दूसरों के द्वारा न याद किये जाते लक्षणवाला अकवि ही होता है ।'
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उद्योतः
'कीर्ति को प्राप्त करनेवाले पुराने कवि (यदि) विषयभूष्लल वाणीवाले (हो गये हों) तो उनका सहारा लेकर मनीषी को यह नीति नहीं छोड़नी चाहिये ।'
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उद्योतः
'वाल्मीकि न्याय से प्रतीत जो प्रवीणतम् कवेश्वर हो गये हैं हमनें 'उनके अभिप्राय से बाह्य यह मार्ग नहीं दिखलाया है ।'
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उद्योतः
१९१
(लो०)—वृत्यनौचित्यमेव चेति बहुधा व्याचष्टे तदपोऽननेन कारिकागतं व्याचष्टे । रसमङ्झहेतुरेव इत्यनेनेकाकारस्य कारिकागतस्य भिन्नक्रमत्वमुक्तं । रसस्य विरोधायैवेत्यर्थः । नायकं प्रतीति । नायकस्य हि धीरोदात्तादिमेदेऽभिन्नस्य सर्वथा वीररसानुवेधेन भवितव्यमिति तं प्रति कातरपुरुषोचितमधैर्य्ययोजना दुष्टमेव । तेषामिति रसादीनां तैरिति सुकविविभिः। सोडपशब्द इति दुर्यंश इत्यर्थः । ननु कालिदासः परिपोषं गतस्यापि करुणस्य रतिविलासेषु पुनःपुन्येन दीपनमकार्षीत्, तत्कथं रसविरोधिनां परिहारोक्तिरभविति शङ्कायाम्—पूर्वमिति । न हि वशिष्ठादिशः कथञ्चिदपि स्मृतिमार्गस्यवक्तस्तद्वयमपि तथा त्यजामः । अचिन्त्यहेतुकत्वादुपरिचरितानामिति भावः । 'इति' शब्देन परिकरश्लोकसमाप्ति सूचयति ॥१९१॥
(अनु०) 'वृत्यनौचित्य भी' इसकी बहुधा व्याख्या को है । 'वह भी' से कारिका में आये हुये 'च' शब्द की व्याख्या करते हैं । 'रसमङ्झहेतु ही' इसके द्वारा कारिका में आये हुये 'एव' शब्द का श्लिष्टाक्रमत्व कहा गया है । अर्थात् रस के विरोध के लिये ही। 'नायक के प्रति' धीरोदात्तादिमेद से भिन्न नायक में निस्सन्देह वीररसनुवेध ही होना चाहिये अतः उसके प्रति कातर पुरुष के योग्य अधैर्य्य की योजना दुष्टित हो है । 'उनका' अर्थात् रस इत्यादि का । 'उनके द्वारा' अर्थात् अच्छे कवियों के द्वारा । 'वह अपशब्द है' अर्थात् अपयश हैं । ( प्रश्न ) कालिदास ने परिपोष को प्राप्त हुये भी करुण रस का रतिविलासों में पुनः पुनः दीपन किया है तो यह रसविरोधियों का परिहार का आग्रह कौन ? यह शङ्का कर के कहते हैं—'पहले के' यह ।
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किसी न किसी प्रकार वशिष्ठ इत्यादि ने यदि स्मृतिमार्ग छोड़ दिया तो उन्हीं के समान हम भी छोड़ें। क्योंकि ऊपर के चरित्रों का हेतु समझ में नहीं आता। यह भाव है। इति शब्द से परिकर श्लोकों की समासि को सूचना देते हैं।
वृत्तियों का औचित्य
तारावती—वृत्त का अनौचित्य एक दूसरा तत्व है जो रसभंग में हेतु ही होता है। वृत्ति के अनौचित्य के यहाँ पर तीन अर्थ हैं—१—वृत्ति अर्थात् कथन का अनौचित्य। उदाहरण के लिये सामान्यतः कोई नायिका किसी पुरुष के सामने अपनी सम्भोग की अभिलाषा हरण के लिये सामान्यतः प्रकट नहीं करती। प्रेमप्रवृत्ति सर्वप्रथम शब्दों द्वारा प्रकट करना पुरुष का काम है। यदि नायिका प्रेम प्रकट करना चाहती है तो वह विलासचेष्टाओं और संकेतों के द्वारा अपना कार्य पूरा करती है। इस सामान्य व्यवहार का अतिक्रमण कर यदि किसी नायक के प्रति नायिका के सम्भोगाभिलाष का कथन कराया जावे और संकेतों तथा विलासचेष्टाओं का माध्यम न स्वीकार किया जावे तो यह व्यवहार का अनौचित्य होगा।
२—इस विषय का दूसरा उदाहरण यह हो सकता है कि नायक के धीरोदात्त इत्यादि भेद किये गये हैं; धीरोदात्तता इत्यादि नायक में तभी आती है जब कि उसके अंदर वीररस का अनुवेध हो। इसके प्रतिकूल यदि धीरोदात्त इत्यादि में कातर पुरुष के योग्य अर्थों दिखलाया जावे तो वह व्यवहार का अनौचित्य होगा और वह दोष ही होगा।
२—भरत मुनि ने जिन कैशिकी इत्यादि वृत्तियों का उल्लेख किया है उनकी यथास्थान योजना रसाभिव्यक्ति में हेतु होती है। किन्तु इसके प्रतिकूल उनका अनौचित्य रसभंग में हेतु होता है। अनौचित्य का यहाँ पर अर्थ है जहाँ कैशिकी इत्यादि वृत्तियों की योजना नहीं करनी चाहिये वहाँ उनकी योजना करना।
३—उद्भट इत्यादि दूसरे आलङ्कारिकों ने जिन उपनागरिका इत्यादि वृत्तियों का निरूपण किया है उनकी अवकाश में योजना भी रसभंग में हेतु होती है। (वृत्तियों का विस्तृत परिचय ३२वीं कारिका की व्याख्या में दिया जावेगा।)
१९वीं कारिका का उत्तरार्ध इस प्रकार है—‘रसस्य स्यादिरोघाय वृत्त्यनौचित्यमेव वा’ यहाँ पर ‘एव’ शब्द ‘वृत्त्यनौचित्य’ के बाद जुड़ा है। किन्तु व्याख्या करने में इसकी योजना ‘विरोधाय’ के साथ कर लेनी चाहिये। इसका अर्थ यह है कि कारिकाओं में कहे हुये तत्व रसविरोध के लिये ही होते हैं। इसी बात को प्रकट करने के लिये आनन्दवर्धन ने ‘एव’ शब्द को ‘समग्रहेतुः’ के साथ लगाया है।
प्रकार जिन विरोधी तत्वों का उल्लेख प्रस्तुत कारिकाओं में किया गया है उनका परित्याग करने के लिये अच्छे कवियों को सदा प्रयत्नशील रहना चाहिये। इसी दिशा में दूसरे रसविरोधियों की स्वयं कल्पना कर लेनी चाहिये और उनका परिहार करने की भी चेष्टा करनी चाहिये।
इस विषय में निम्नलिखित कतिपय परिकर श्लोक भी प्रसिद्ध हैं—‘अच्छे कवियों का मुख्य व्यापार विषय रस इत्यादि ही होते हैं अर्थात् सत्कवियों की क्रियाशीलता का सबसे बड़ा फल यहीं है कि रस इत्यादि की अभिव्यक्ति हो जावे। अतः उन अच्छे कवियों का सबसे बड़ा कर्तव्य यही है कि रस इत्यादि के निबन्धन में कभी प्रमाद न करें।’
‘रस-रहित प्रवन्ध-रचना कवि का बहुत बड़ा अपमान है। अर्थात् कवि का सबसे बड़ा
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तृतीय उद्योतः
अपयश यही है कि रसहीन प्रबन्ध की रचना करे। ( 'नीरस प्रबन्ध कवि का सबसे बडा अपयश है' इस वाक्य में 'आयुघृतं तुम्' के समान जन्यजनक भाव में लक्षणा है अर्थात् नीरस काव्य कवि के अपयश का सबसे बडा जनक होता है । ) इससे तो अच्छा यही है कि वह कवि ही न बने जिससे उसके नाम को कोई याद हो न करे । ' ( यदि नीरस काव्य लिखनेवाले कवि का कोई नाम लेता हो तो उसकी निन्दा ही करेगा । अतः अच्छा तो यही है कि वह कवि ही न बने और न कोई उसका नाम ही स्मरण करे । )
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तृतीय उद्योतः
(प्रश्न) कालिदास ने रतिविलासों में परिपोष को प्राप्त भी करुण-रस का पुनः पुनः दीपन किया है । इस प्रकार महाकवियों के भी ये रस-दोष देखे ही जाते हैं । ( वेणीसंहार इत्यादि के दोष दिखलाये ही जा चुके हैं । ) फिर आज-कल के कवियों पर यह अधिक जोर क्यों दिया जा रहा है कि रसविरोध का परिहार करना ही चाहिये ? जब महाकवि भी इस प्रकार की त्रुटियाँ करते हैं तब आजकल के सामान्य कवियों से यदि ऐसी ही भूलें हों तो क्या आश्चर्य ?
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तृतीय उद्योतः
( उत्तर ) 'पुराने कवियों की वाणी स्वच्छन्दतापूर्वक प्रवृत्त होती थी; उनको यश प्राप्त हो गया था । अतः यदि उनसे कहीं भूल हो गई हो तो उसका सहारा लेकर किसी मनीषी को रसविरोध की परिहारसम्बन्धिनी इस नीति का परित्याग नहीं करना चाहिये ।' आशय यह है कि महाकवियों को त्रुटियाँ उनकी महत्वता में ही ढँक जाती हैं । उनका सहारा लेकर साधारण व्यक्ति यदि वैसी भूलें करने लगे तो उसको त्राण प्राप्त नहीं हो सकता ।
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तृतीय उद्योतः
( महाभाष्यकार ने भी लिखा है कि पूर्व व्यक्ति अशुद्ध शब्द बोलकर दूषित हो जाता है किन्तु जो विशेष विद्वान् होता है उसको अपनी विद्वत्ता का सहारा मिल जाता है और पाठकों का ध्यान महापाण्डित्यों की सामान्य त्रुटियों की ओर नहीं जाता । ) उदाहरण के लिये वशिष्ठ इत्यादि धर्मशास्त्र के महान् आचार्य तथा प्रतिष्ठित ऋषि थे । यदि उन्होंने कहीं धर्म-मार्ग की अवहेलना कर दी हो तो साधारण जन का यह कर्तव्य नहीं है कि उन महान् ऋषियों का अनुसरण लेकर धर्म-मार्ग का परित्याग करने लगे । महान् लोगों के चरित्र लोकोत्तर होते हैं । सामान्य व्यक्ति उनके हेतु की कल्पना भी नहीं कर सकता । अतः उनके अनुकरण पर न तो नीति-मार्ग का ही परित्याग करना चाहिये और न कला-जगत् में निश्चित सिद्धान्तों और मान्यताओं का ही अतिक्रमण करना चाहिये ।
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तृतीय उद्योतः
(प्रश्न) रसविरोध तथा रसदोष के विषय में आपने जो मान्यतायें स्थापित की हैं उनमें प्रमाण क्या है ? क्या आपके कथन से ही इन मान्यताओं पर विश्वास कर बन्धन स्वीकार कर लिया जाये ?
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तृतीय उद्योतः
उत्तर—'बहुत से प्रथ्यात कवीश्वर साहित्य-जगत् में प्रतिष्ठित हैं जिनमें व्यास और वाल्मीकि मुख्य हैं । उनके काव्यों का अध्ययन करने से स्पष्ट प्रतीत होता है कि हमने जो मान्यतायें निर्धारित की हैं वे सब इन मूर्धन्य कवियों को मान्य हैं और उनका अभिप्राय भी इन मान्यताओं के पक्ष में ही है । अतः हमने कोई बात मनमानी नहीं कही है'
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विवक्षिते रसे लब्धप्रतिष्ठे तु विरोधिनाम् । बाध्यानामङ्गभावं वा प्रामाणामुक्तिरचचला ॥१९॥
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बाध्यानामङ्गभावं वा प्रामाणामुक्तिरचचला ।
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स्वसामप्रचां लब्धपरिपोषे तु विवक्षिते रसे विरोधिनां विरोधिरसाझ्ञानां बाध्यता नामड्भावं वा प्राप्नुयातां सतामुक्तितरदोषः । बाध्यत्वं हि विरोधिनां शक्याभिभवत्वे सति नान्यथा । तथा च तेषां युक्तिः प्रस्तुतरसपरिपोषायैव सम्पद्यते । अझभावं प्राप्नुयातां च तेषां विरोधित्वमेव निवर्तते । अझभावप्राप्तिह तेषां स्वाभाविकी समारोपकृता वा । तत्र येषां नैसर्गिकी तेषां तद्वुक्तिविरोध एव । यथा विप्रलम्भशृङ्गार तद्रूपनामेवादोषो नाटकज्ञनानाम् । तद्रूपत्वे च सम्भवत्यपि मरणस्योपन्यासो न ज्यायान् । आश्रयविच्छेदे रसस्याल्यान्तविच्छेदप्राप्तेः।
(अनु०) 'विवक्षित रस के लब्धप्रतिष्ठ हो जाने पर तो बाध्य अथवा अझभाव को प्राप्त विरोधियों की उक्ति दोषरहित होती है । विवक्षित रस के अपनी सामग्री से परिपोष को प्राप्त हो जाने पर विरोधियों की अर्थात् विरोधी रसादोंन की बाध्य अथवा अझभाव को प्राप्त होने पर उक्ति दोषरहित होती है । विरोधियों का बाध्यत्व अभिभव के शक्य होने पर ही होता है; अन्यथा नहीं । अतः एव उनका कथन प्रस्तुत रस के परिपोष के लिये ही हो जाता है । अझभाव को प्राप्त होने पर उनका विरोध ही निवृत्त हो जाता है । उनकी अझभावप्राप्ति या तो स्वाभाविक होती है या आरोपकृत होती है । उसमें जिनकी नैसर्गिक ( अझभावप्राप्ति ) होती है उनकी उक्ति में तो अविरोध ही होता है । जैसे विप्रलम्भ शृङ्गार में उसके अङ्ग व्याधि इत्यादि का और उन ( व्याधि आदि ) का उस ( शृङ्गार ) के अङ्गों का ही अदोष होता है अतदङ्गों का नहीं । तद्रूपता के सम्भव होने पर भी मरण का उपन्यास ठीक नहीं । क्योंकि आश्रय के विच्छेद में रस का सर्वथा विच्छेद प्रासक्त हो जाता है ।
(लो०) एवं विरोधिनां परिहारेः सामान्येनोक्ते प्रतिप्रसङ्गं नियतविषयमाह—विवक्षित इति । बाध्यता नामिति । बाध्यत्वाभिप्रायेणोक्त्वाभिप्रायेण वेत्यर्थः । अच्छला निर्दोषत्वर्थः । बाध्यत्वामित्यभिप्रायमभ्यथवा व्याचष्टे, तत्र प्रथमं स्वभाविकप्रकारं निरूपयति—तद्रूपनामिति । निरपेक्षभावतया सापेक्षभावविप्रलम्भशृङ्गारविरोधिन्यपि करुणे ये व्याध्यादयस्त्वङ्गत्वेन दृष्टाः तेऽप्यङ्गी भवन्त्येव त एव च भवन्त्येव नापि त एवेति । अतदङ्गानामिति । यथालस्यौदास्यजुगुप्सा नामित्यर्थः । तद्रूपत्वे चेति । 'सर्व एव शृङ्गारे व्यभिचारिणः' इत्युक्तत्वादिति भावः । आश्रयस्य स्त्रीपुरुषान्यतरस्याधिष्ठानस्यापाये रतिरेवोच्छिद्येत तस्या जीवितसर्वस्वाभिमानरूपत्वेनोभयाभिष्ठानत्वात् ।
(अनु०) इस प्रकार सामान्य रूप में विरोधियों के परिहार कह दिये जाने पर निश्चित विषयवाले प्रतिप्रसव ( विपरीतनिदोषपात ) कहते हैं—विवक्षित इत्यादि । 'बाध्यतानाम्' यह । बाध्यत्व के अभिप्राय से अथवा अझत्व के अभिप्राय से । अच्छला का अर्थ है निर्दोष । बाध्यत्वाम् की व्याख्या करते हैं—तत्र प्रथमं स्वभाविकप्रकारं निरुपयति—तद्रूपनामिति । निरपेक्षभावतया सापेक्षभावविप्रलम्भशृङ्गारविरोधिन्यपि करुणे ये व्याध्यादयस्त्वङ्गत्वेन दृष्टाः तेऽप्यङ्गी भवन्त्येव त एव च भवन्त्येव नापि त एवेति । अतदङ्गानामिति । यथालस्यौदास्यजुगुप्सा नामित्यर्थः । तद्रूपत्वे चेति । 'सर्व एव शृङ्गारे व्यभिचारिणः' इत्युक्तत्वादिति भावः । आश्रयस्य स्त्रीपुरुषान्यतरस्याधिष्ठानस्यापाये रतिरेवोच्छिद्येत तस्या जीवितसर्वस्वाभिमानरूपत्वेनोभयाभिष्ठानत्वात् ।
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बाध्रयस्व के अभिप्राय की व्याख्या करते हैं—‘बाध्रयस्व हि’ इत्यादि । अज्ञभाव के अभिप्राय को दो प्रकार से कहते हैं, उसमें प्रथम स्वाभाविक प्रकार का निरूपण करते हैं—‘उसके अंगों का’ यह । सापेक्ष भाव में होनेवाले विप्रलम्भ शृङ्गार के निरपेक्ष भाव में होने के कारण विरोधी भी करुण में जो व्याधि इत्यादि सर्वथा अंग के रूप में देखे गये हैं उनका यह (आश्रय है)। वे निस्सन्देह करुण में होते ही हैं और वे ही होते हैं । शृङ्गार में तो होते ही हैं और वे ही नहीं (होते)। ‘अतद्ज्ञानाम्’ इति । अर्थात् जैसे आलस्य ओग्रण और जुगुप्सा का ।’ और उसके शत्रुओं ‘का’ यह । भाव यह है कि क्योंकि यह कहा गया है कि ‘शृङ्गार में भी व्यभिचारी होते हैं । आश्रय का अर्थात् अधिष्ठानरूप स्त्री पुरुष दो में एक का विनाश हो जाने पर रति ही उच्छिन्न हो जावे । क्योंकि वह (रति) जीवितसर्वस्वाभिमानरूप होने के कारण उभयनिष्ठ होती है ।
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तृतीय उद्योतः
विरोध परिहार का उपक्रम
तारावती—ऊपर रसविरोधी तत्वों का उल्लेख सामान्यरूप में किया जा चुका । अब उन तत्वों का परिचय दिया जावेगा जिनमें विरोधी तत्व विरोधी न रहकर पोषक के रूप में परिणत हो जाते हैं—
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तृतीय उद्योतः
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‘कवि जिस रस की अभिव्यक्ति करना चाहता है यदि वह रस प्रतिष्ठा को प्राप्त हो गया हो और उसका विरोधी रस या तो बाध्य रूप में आवे अथवा विवक्षित रस का अङ्ग बन कर आवे तो इस प्रकार के विरोधी रस का उपादान सदोष नहीं कहा जा सकता’ ॥२०॥
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तृतीय उद्योतः
विरोध परिहार की शर्तें
रस की विभाव इत्यादि सामग्री रस का पोषक तत्व होती है । विरोधी रस के उपादान में विरोध को दूर करने की पहली शर्त यह है कि मुख्य रस की सामग्री में किसी प्रकार की कमी न रह जावे और उस सामग्री से मुख्य रस का पूर्णरूप में परिपोष हो जावे । दूसरी शर्त यह है कि मुख्य रस के जिस विरोधी रस का उपादान किया गया हो वह अपनी दुर्बलता के कारण बाध्य हो जावे अर्थात् मुख्य रस अपने विरोधी को अपनी दुर्बलता के कारण अपनी शक्ति से दबा ले अथवा विरोधी रस मुख्य रस का अङ्ग बन जावे ऐसी दशा में विरोधी रस तथा उसके अङ्गों का उपादान दोष नहीं होता । कोई भी रस अपने विरोधियों का बाध तो तभी कर सकता है जब उसमें इतनी शक्ति हो कि वह विरोधी को दबा सके, अन्यथा एक रस दूसरे का बाध नहीं कर सकता । एक रस में दूसरे को दबाने की शक्ति तभी आती है जब दबानेवाले रस की सामग्री पूर्ण हो और वह परिपोष को प्राप्त हो गया हो तथा दबने वाले रस की सामग्री न्यून हो और वह परिपोष को भी न प्राप्त हुआ हो । इस प्रकार जब मुख्य रस अमुख्य रस को दबा लेता है तब अमुख्य रस मुख्य रस का परिपोषक ही हो जाता है । (जैसे छात्र पर विजय प्राप्त कर लेने पर ही किसी नायक की वास्तविक शोभा होती है उसी प्रकार विरोधी रस को दबा कर अपने आधीन कर लेने से ही मुख्य रस की शोभा बढ़ती है और इस प्रकार वह परिपुष्ट होता है ।) यह तो हुई बाध्य होनेपर । विरोधी रस के समावेश में निर्दोषिता की बात । कोई विरोधी रस मुख्य रस का पोषक उस समय भी हो जाता है जब कि वह मुख्य
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रस का अङ्ग बन जावे । इस प्रकार भी विरोधी रस के समावेश में दोष-राहिल्य आ जाता है । एक रस दूसरे का अङ्ग दो रूपों में बनता है या तो उसमें अङ्ग बन जाने की स्वाभाविक योग्यता हो या उस पर अङ्गभाव का आरोप कर दिया जावे । उसमें जो रस या उसके अङ्ग स्वाभाविक रूप में अङ्ग हो जाते हैं उनके कथन में तो विरोध का प्रश्न ही नहीं उठता । उदाहरण के लिये काव्यशास्त्र में निवेद इत्यादि ३३ सञ्चारी माने जाते हैं । उनमें २९ सञ्चारी तो शृङ्गार रस में हो ही सकते हैं। उद्वेगता, मरण, आलस्य और जुगुप्सा ये चार सञ्चारी परवर्ती आचार्यों के मत में शृङ्गार में नहीं होते । भरत ने केवल तीन सञ्चारियों का शृङ्गार में निषेध किया है आलस्य औग्रप और जुगुप्सा । भरत ने मरण का निपेध शृङ्गार में नहीं किया है । इस प्रकार तीन या चार सञ्चारी शृङ्गार में नहीं होते शेष २९ सञ्चारी शृङ्गार में होते हैं । शृङ्गार का विरोधी है करुण ।
(ध्वन्यो०) करुणस्य तु तथाविधे विषये परिपोषो भाव्यत इति चेत्, न; तस्याप्रस्तुतत्वात्, प्रस्तुतस्य च विच्छेदात् । यत्र तु करुणरसस्यैव काव्यार्थत्वं तत्राविरोध: । शृङ्गारे वा मरणस्यावीचिकालप्रत्यायत्तसम्भवे कदाचिदुपनिबन्धो नात्यन्तविरोधी । दीर्घकालप्रत्यापत्तौ तु तस्याऽन्तरा प्रवाहविच्छेद एवेत्यविविधेति वृत्तोपनिबन्धनं रसबन्धप्रधानत्वेन काव्यनो परिहत्यव्यम् ।
तत्र लब्धप्रतिष्ठे तु विवक्षिते रसे विरोधिरसाङ्गतानां बाध्यत्वेनोक्तावदोषो यथा—
यथा वा पुण्डरीकस्य महाश्वेतां प्रति प्रवृत्तनिर्माणानुरागस्य द्वितीयमुनिकुमारो-पदेशवर्णने ।
(अनु०) यदि कहो कि इस प्रकार के विषय में करुण का परिपोष हो जावेगा तो ऐसा नहीं होगा; क्योंकि वह प्रस्तुत नहीं है और प्रस्तुत का विच्छेद हो चुका है । जहाँ करुण का ही काव्यार्थत्व हो वहाँ विरोध नहीं होता । अथवा शृङ्गार में मरण के शोक में ही प्रत्यावर्त्तन सम्भव होने पर कदाचित् उपनिबन्धन अत्यन्त विरोधी नहीं होता । अधिक समय में प्रत्यावर्त्तन होने पर उसका मध्य में प्रवाहविच्छेद हो ही जाता है अतः रसबन्ध को प्रधान बनाकर चलनेवाले कवि के द्वारा इस प्रकार के इतिवृत्त का उपनिबन्धन छोड़ ही दिया जाना चाहिये । उसमें विवक्षित रस के लब्धप्रतिष्ठ हो जाने पर विरोधी रसाङ्गों के बाध्यत्व के रूप में कथन में अदोष जैसे—
'कहाँ तो दुष्कृत्या और कहाँ शशाङ्क (चन्द्र) का वंश ? एक बार वह पुनः दिखलाई पड़ जाती है ! हमारी शास्त्र तो दोषों की शान्ति के लिये होना चाहिये ! अश्रु है कि उसका मुख क्रोध में भी कमनीय प्रतीत होता है । कल्मषरहित कुशल बुद्धिवाले क्या कहेंगे ? वह तो
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तृतीय उद्योतः
स्वप्न में भी दुर्लभ है। हे चित्त ! स्वस्थ हो जाओ। न जाने कौन धन्य युवक उसका अघर-पान करेगा !
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तृतीय उद्योतः
अथवा जैसे महाश्वेता के प्रति निर्भर अनुराग के प्रारम्भ होने पर पुण्डरोह के लिये दूसरें मुनिकुमार के उपदेश-वर्णन में ।
(लो०) प्रस्तुतस्येतिः । विप्रलम्भस्येत्यर्थः । काव्यार्थस्त्वमिति । प्रस्तुतत्वमित्यर्थः । नन्वेवं सर्व एव व्यभिचारिण इति कुतोऽतिशयः । श्रृङ्गार वक्ति । अनेकार्थ-काले यदि मरणे विश्रान्तिपदबन्ध एव नोत्पद्यते तत्रास्य व्यभिचारित्वम् । कदाचिदिति । यत्र तादृशं भङ्गि वटित्य तु सुकवे: कौशलं भवति यथा—
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तृतीय उद्योतः
तीर्थं तयव्यकिरभवै जह्नुकन्या सरस्वो-द्देन्यासादमरगणनालेश्यमासाद्य सख: । पूर्वाकाराधिवचतुरया संगत: कान्तयासौ लीलागारेष्वरमत पुनर्नन्दनाद्यान्तरेषु ॥
अत्र स्फुटैव रत्यझता मरणस्य । अत एव सुकविना मरणे पदबन्धमात्रं न कृतम् । अनूद्यमानत्वेनैव निवन्धनात् । पदबन्धनिवेशो तु सर्वथा शोकोदय एवापर-मितकालप्रत्यापत्तिलाभेऽपि ।
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तृतीय उद्योतः
अथ दूरपरामर्शकसाहृदयसामाजिकाभिप्रायेण मरणस्यादिर्घकालप्रत्यापत्तिरेज-तोच्यते, हन्त तापसवत्सराजेडपि योगन्धरायणादिनीतिमार्गिकर्णनन संस्कृतमतीनाम् वासवदत्तामरणबुद्रेरेवाभिवातात करुणस्य नामापि न स्यादित्यलमवान्तरेण बहुना । तस्माददीर्घकालात्र पदबन्धलाभ एवेति मन्तव्यम् । एवं नैसर्गिकाडडहता व्याख्याता । समारोपितत्वे तद्धितोरीतेय्यलङ्घ्यत्वात् स्वकण्ठेन न व्याख्यात ।
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तृतीय उद्योतः
एवं प्रकारत्रयं व्याख्याय क्रमेणोदाहरति-तत्रेत्यादिना । क्वाकार्यमिति । वितर्क औत्सुक्येन, मति: स्मृत्या, शङ्का दैन्येन, धृतिश्छेद्या च बाध्यते । एतच्च द्वितीयोद्योतारम्भ एवोक्तमस्माभिः ।
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तृतीय उद्योतः
द्वितीयेति । विपक्षीभूतवै राज्यविभावाद्यवधारणेऽपि ह्यशक्यविच्छेदत्वे न दादृच्-मेवानुरागस्योक्तं भवतीति भावः ।
(अनु०) 'प्रस्तुत का' यह । अर्थात् विप्रलम्भ का । 'काव्यार्थस्त्व' यह । अर्थात् प्रस्तुतत्व । (प्रश्न) इस प्रकार सभी व्यभिचारी होते हैं, यह बात क़ट जाती है । यह शङ्का करके कहते हैं— 'अथवा शृङ्गार में' यह । अदोर्घ कालवाले मरण में जहाँ विश्राम शब्द का प्रयोग ही सिद्ध नहीं होता वहाँ यह व्यभिचारी होता है । 'कदाचित्' यह । यदि उस प्रकार की भङ्गिमा को घटित करने का कवि का कौशल होता है । जैसे—
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तृतीय उद्योतः
जलत्की और सरस्वती के जल-समिलन से उत्पन्न तीर्थ में शरीर त्यागने से अमर गणना के आलेख्य को शीघ्र ही प्राप्त होकर पहले आकार की अपेक्षा अधिक चतुर कान्ता से संगत होकर वे (अज) नन्दन के अन्दर लीलागारों में रमण करने लगे ।
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तृतीय उद्योतः
यहाँ पर स्पष्ट ही मरण रति का अंग हो रहा है । इसीलिये कवि ने मरण में पद-बन्धनमात्र (भी) नहीं किया । क्योंकि अनुवाद के रूप में हो उसका उपनिबन्धन किया गया है ।
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पदबन्ध के निवेश में तो अत्यन्त परिमित काल में ही पुनः प्राप्त हो जाने पर भी सर्वथा शोक का उदय ही हो जावेगा । यदि दूर का परामर्श करनेवाले सहृदय सामाजिकों के अभिप्राय से मरण की अदीर्घकालीन प्रत्यापत्ति का अंग होना स्वीकार किया जाता है तब तो ‘तापस्वत्सराज’ में भी योगन्धरायण इत्यादि के नीतिमार्ग को सुनने से संस्कृत बुद्धिवाले (सहृदयों) में वासवदत्ता के मरण की बुद्धि न होने से करुण का तो नाम भी नहीं होगा । बस ! अबान्तर अधिक विस्तार की क्या आवश्यकता ? अतः यहाँ दीर्घकालता तो पदबन्ध के लाभ में ही समझी जानी चाहिये । इस प्रकार नैसर्गिक अंगता की व्याख्या की गई । समारोपित होने पर उसके विपरीत होती है; अतः अर्थ प्राप्त होने के कारण स्वकण्ठ से व्याख्या नहीं की ।
इस भाँति तीनों प्रकारों की व्याख्या करके क्रमशः उदाहरण देते हैं— ‘वहाँ पर’ इत्यादि के द्वारा । ‘कहाँ तो अकाय’ यहाँ वितर्क औत्सुक्य से, मति स्मृति से, शंका दैन्य से और धृति चिन्ता से बाधित की जाती है । और यह हमने द्वितीय उद्योत के आरम्भ में ही कह दिया है ।
‘द्वितीय’ यह । भाव यह है : कि विपक्ष रूप में स्थित वैराग्य के विभाव इत्यादि के अवधारण में भी विच्छेद के अशक्य होने से अनुराग की दृढ़ता ही कही हुई होती है ।
शृंगार में करुण रस के संचारी भावों के समावेश पर विचार तारावती—आलम्बन के एक होने पर शृंगार और करुण का विरोध होता है । करुण रस के व्यभिचारी भाव निर्वेद, मोह, अपस्मार, व्याधि, ग्लानि, स्मृति, श्रम, विषाद, जड़ता, उन्माद और चिन्ता इत्यादि होते हैं । इस प्रकार व्याधि इत्यादि सञ्चारियों की स्थिति दो प्रकार की हो गई—एक तो व्याधि-इत्यादि शृंगार के सञ्चारी भाव के रूप में आते हैं दूसरे ये शृंगार के विरोधी करुण में आते हैं । शृंगार और करुण का विरोध है इसमें तो सन्देह हो ही नहीं सकता । क्योंकि शृंगार रस ( विप्रलम्भ शृंगार ) सापेक्ष भाव में होता है और करुण निरपेक्ष भाव में । आशय यह है : कि जहाँ आलम्बन के विद्यमान होने का निश्चय होने से पुनर्मिलन की अपेक्षा बनी रहे वहाँ विप्रलम्भ शृंगार होता है और जहाँ मरण के निश्चित होने से पुनर्मिलन की अपेक्षा समाप्त ही हो जाये वहाँ करुण होता है । सापेक्ष भाव और निरपेक्ष भाव में विरोध होता है । अतः एव करुण के व्यभिचारी भाव व्याधि इत्यादि शृंगार के विरोधी सिद्ध हुये । इन व्याधि इत्यादि सञ्चारियों का प्रयोग शृंगार में भी होता ही है ( क्योंकि व्याधि इत्यादि को तो काम दशाओं में गिनाया गया है । ) अतः शृंगार रस के अंग के रूप में यदि व्याधि इत्यादि का प्रयोग किया जाता है तो दोष नहीं होता । इसके प्रतिकूल यदि ( इन व्याधि इत्यादि का करुण के अंग के रूप में अथवा ) उन उप्रता इत्यादि सञ्चारियों का, जो शृंगार के अंग नहीं बन सकते, उपनिबन्धन किया जाता है तो वह दोष होता है । क्योंकि व्याधि इत्यादि के विषय में ये नियम बनाये जा सकते हैं— ( १ ) व्याधि इत्यादि करुण में होते ही हैं । ( २ ) करुण में व्याधि इत्यादि ही होते हैं । ( ३ ) शृंगार में व्याधि इत्यादि होते ही हैं । ( ४ ) शृंगार में केवल व्याधि इत्यादि ही नहीं होते । इस प्रकार यदि शृंगार के अंग के रूप में व्याधि इत्यादि विरोधी
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तृतीय
उद्योतः
करुण के अंगों का उपनिबन्धन किया जाता है तो वह दोष नहीं होता । यदि व्याधि इत्यादि का करुण के अंग में उपनिबन्धन किया जाता है या उप्रता इत्यादि शृङ्गारविरोधी अंगों का उपनिबन्धन किया जाता है तो वह दोष होता है । एक सिद्धान्त यह भी है कि शृङ्गार में सभी सञ्चारी होते हैं । ( शृङ्गार में उप्रता आलस्य, जुगुप्सा और इस सञ्चारियों का निषेध किया गया है । आलस्य के प्रति उप्रता निषिद्ध है, किन्तु सपत्नी के प्रति उप्रता शृङ्गार का पोषण ही करती है । आलस्य प्रेम-व्यवहार में निषिद्ध है, किन्तु रति-जन्य आलस्य शृङ्गार का पोषक होता है । आलस्य के प्रति जुगुप्सा निषिद्ध है, किन्तु पतिनायक अथवा सपत्नी के प्रति जुगुप्सा दूषित नहीं होती । इस प्रकार प्रायः सभी सञ्चारी शृङ्गार के सम्बन्ध में प्रयुक्त किये जा सकते हैं । )
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शृङ्गार में मरण के वर्णन पर विचार
तृतीय
उद्योतः
उक्त प्रकार से यदि विरोधी उप्रता इत्यादि सञ्चारियों का शृङ्गार में उपादान सम्भव हो तो भी मरण का उपन्यास श्रेयस्कर नहीं कहा जा सकता । क्योंकि जब आश्रय ही नहीं रहेगा तब शृङ्गार का तो अत्यन्त विच्छेद हो जावेगा । अतः मरण का वर्णन शृङ्गार की किसी भी अवस्था में अनुचित नहीं पड़ता । शृङ्गार का स्थायी भाव है रति, रति तब होती है तब स्त्री पुरुष दोनों एक दूसरे को जीवनसर्वस्व मानने लगें । इस प्रकार रति उभय-निष्ठ होती है । अतः रति के आश्रय स्त्री पुरुष दोनों होते हैं । यदि इनमें से एक का भी मरण हो गया तो रति ही उच्छिन्न हो जावेगी । यहाँ पर यह कहा जा सकता है कि शृङ्गार का न सही, मरण के बाद करुण का तो परिपोष हो जावेगा । किन्तु यह कहना ठीक नहीं है । इस प्रकार के प्रकरण में सहृदयों की प्रवृत्ति शृङ्गार का आस्वादन करने के लिये होती है करुण के आस्वादन के लिये नहीं । अतः प्रस्तुत शृङ्गार रस ही है करुण नहीं । प्रस्तुत का विच्छेद दोष होगा ही । जहाँ पर करुण ही प्रस्तुत होता है तथा वही का कार्यप्रवृत्ति का प्रयोजक होता है तथा उसी का आस्वादन करने के लिये सहृदयों को प्रवृत्त किया जाता है वहाँ मरण का वर्णन सदोष नहीं कहा जा सकता है । यहाँ पर पूछा जा सकता है कि जब मरण का वर्णन शृङ्गार में निषिद्ध ही हैं तब यह कहने का क्या आशय कि शृङ्गार में सभी सञ्चारी होते हैं ? इसका उत्तर यह है कि विशेष अवस्थाओं में मरण भी शृङ्गार का पोषक होता है । यदि मरण के बाद शोक ही पुनःसंमिलन की सम्भावना उत्पन्न हो जावे तो कदाचित् उसका उपनिबन्धन अधिक सदोष नहीं माना जा सकता । मरण के बाद पुनः प्रत्यापत्ति का वर्णन इतना शोघ्र होना चाहिये कि पात्रों और दर्शकों की बुद्धि में रति का विच्छेद न होने पावे और न उनके हृदय में शृङ्गार की प्रतीति ही विश्रान्त हो सके । किन्तु इसमें शर्त यह है कि कवि के अन्दर इतनी कुशलता होनी चाहिये कि वह वस्तु की सन्धुट्टना ऐसे रूप में कर दे जिससे शृङ्गार की बुद्धि का विच्छेद न होने पावे । उदाहरण के लिये रघुवंश में अज की म्रित्यु का वर्णन करते हुये महाकवि कालिदास ने लिखा है कि अपने दीर्घ रोग से परितप्त होकर अज ने प्रायोपवेशन प्रारम्भ कर दिया तब—
तृतीय
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‘जहाँ पर भगवती जाह्नवी और सरयू जैसी पवित्र नदियों का जल एक दूसरे से मिलता है और इसीलिये जहाँ पर तीर्थ बन गया है वहाँ पर शरीर का न्यास करने से अज
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को शीघ्र ही अमरों में गणना प्राप्त हो गई। उधर इन्दुमती भी अपने लौकिक रूप से अधिक सुन्दर रूप धारण कर वहीं आई। अपनी उस प्रियसी से मिलकर अज, नन्दन उद्यान के अदर बने हुए कीडागृहों में विहार करने लगे।
यहां पर अज की मृत्यु उनके प्रेयसीसम्मिलन और सम्भोग श्टृङ्गार में हेतु होने से रति का अङ्ग है। यह बात स्पष्ट ही है। यहां पर ध्यान देनेवाली बात यह है कि आठ वर्ष पूर्व इन्दुमती की मृत्यु हो चुकी है और प्रियतमा के शोक में अज का विलाप करुणरसपरक ही है। क्योंकि परस्पर जीवितसर्वस्व माननेवालों में एक की तो मृत्यु हो चुकी है। अतः दूसरे को भी जीवितसर्वस्व होने का अधिकारी कोई दिखाई नहीं देता। अतएव अष्टम सर्ग का अजविलाप सर्वथा करुणरसपरक ही है। उसी शोक से अभिभूत होकर अज भी रोगग्रस्त हो जाते हैं और अन्त में व्याधि के अतिचिकित्स्य हो जाने पर अपने पुत्र दशरथ को राज्य-भार सौंप कर अनशन करते हुए प्राणों का त्याग कर देते हैं। इस प्रकार यह सारा वर्णन विप्रलम्भ-श्टृङ्गारपरक न होकर करुणरसपरक ही है। किन्तु मरने के पहले लिखा गया है कि यद्यपि अज का वह रोग वैद्यों से असाध्य तथा प्राणान्तक हेतु था तथापि प्रियतमा के पीछे जाने में शीघ्रता कराने के कारण अज ने उस रोग को लाभ ही समझा। इन शब्दों के द्वारा कालिदास ने मरण के द्वारा समिमलन की आशा प्रत्युज्जीवित कर दी है। इसके बाद ही अज की मृत्यु और उसके बाद प्रियतमा के साहचर्य की प्राप्ति का वर्णन किया गया है। प्रस्तुत प्रकरण यह है कि जहां दो में किसी एक की मृत्यु हो जाने पर आलम्बनविच्छेद हो जाने से रसविच्छेद की सम्भावना उत्पन्न हो जावे वहां प्रत्युज्जीवन के भी तत्काल दिखला दिये जाने पर रसविच्छेद नहीं होता। इस प्रकरण में रघुवंश का जो पद्य उदाहृत किया गया है वह ठीक नहीं बैठता। क्योंकि एक की मृत्यु तो बहुत पहले हो चुकी है, यहां दूसरे की मृत्यु के बाद स्वर्ग में दोनों के पुनः समागम का वर्णन किया गया है। अतः करुण के बाद श्टृङ्गार के तत्त्व दिखलाए हैं। पर आचार्यों का अभिप्राय केवल इतना ही है कि मरण भी श्टृङ्गार का उपकरण हो सकता है। इसी का यह उदाहरण है, सम्पूर्ण प्रकरण का उदाहरण नहीं। इस प्रकरण का ठीक उदाहरण होगा कादम्बरी का 'महाश्वेतावृत्तान्त'।
महाश्वेता कपिलल की अभ्यर्थना पर अपने प्रियतम पुण्डरीक से मिलने चलती हैं। पुण्डरीक का वियोगव्यथा से देहावसान हो चुका है। महाश्वेता का विप्रलम्भ भली-भांति करुणरूपता धारण कर सका है कि इतने में ही चन्द्रमण्डल से एक व्यक्ति निकल कर पुण्डरीक के शव को उठा ले जाता है और आकाशवाणी होती है कि महाश्वेता का पुण्डरीक से इसी शरीर में सम्मिलन होगा। इस आकाशवाणी के बाद विदेशगमन के समान पुनः सम्मिलन की आशा में विप्रलम्भ सुरक्षित रहता है। ( कितने ही आचार्यों ने इस प्रकार को पुष्टक ही करुणविप्रलम्भ की संज्ञा प्रदान की है। ) मरण को श्टृङ्गार रस का अङ्ग बनाने के मन्तव्य से ही महाकवि कालिदास ने ऐसे किसी भी शब्द का प्रयोग नहीं किया जिससे मरण की स्पष्ट प्रतीति हो और श्टृङ्गार की बुद्धि का विच्छेद हो जावे। यहां पर मरण के लिए 'देहन्यास' शब्द का प्रयोग किया गया है जो कि मरण का अनुवादमात्र है। अनुवाद के रूप में मरण का उल्लेख इसीलिए किया गया है कि श्टृङ्गारनुकूल बुद्धि का व्यवच्छेद न होने पावे। यदि मरणपरक किसी ऐसे पदबन्ध का प्रयोग कर
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तृतीय उद्योतः
दिया जाता है जिससे बुद्धि का व्यवच्छेद हो जाने की सम्भावना हो तब चाहे कितना ही शोध प्रत्युज्जीवन का वर्णन कर दिया जावे किन्तु शोक का उदय तो हो ही जाता है। यदि प्रत्युज्जीवन का बहुत समय बाद वर्णन किया जाता है तो बीच में शृङ्गार रस के प्रवाह का विच्छेद हो ही जाता है। अतः यदि कवि प्रधान रूप में शृङ्गाररस बन्ध के लिए प्रवृत्त हुआ हो तो उसे ऐसे इतिवृत्त का परित्याग ही करना चाहिए जिससे शृङ्गार रस की भावना के विच्छिन्न होने की सम्भावना हो। यहाँ पर प्रवाहविच्छेद होने देने का आशय यही है कि कवि को किसी ऐसे शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए जिससे प्रसङ्गागत रसबुद्धि विच्छिन्न हो जावे।
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कुछ लोगों ने अदीर्घकाल प्रत्यायत्ति इत्यादि ग्रन्थ की व्याख्या इस प्रकार की है—‘मरण की प्रत्यापत्ति में जहाँ शोध ही प्रत्युज्जीवन की सम्भावना होती है वहाँ मरण शृङ्गार का अङ्ग बन जाता है और यह शोध ही प्रत्युज्जीवन की सम्भावना सामाजिक की दृष्टि से होती है। सहृदय सामाजिक दूर की बात को समझ लेता है। अतः वर्णन इस प्रकार का होना चाहिए कि सहृदय सामाजिक की शृङ्गाररसात्मक बुद्धि में विच्छेद न होने पावे और उसे मरण के बाद शीघ्र ही पुनरुज्जीवन की सम्भावना अवभासित हो जावे।’
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तृतीय उद्योतः
किन्तु यह व्याख्या ठीक नहीं है तापसवत्सराज में योगन्धरायण के नीतिमार्ग को सहृदय पाठक सुनते ही हैं और पाठकों की बुद्धि उससे संस्कृत हो ही जाती है। अतः पाठकों को यह ज्ञात ही रहता है कि अभी वासवदत्ता मरी नहीं है—राजा मिथ्या प्रचार पर विश्वास करने के कारण भ्रम में है। अतः वहाँ पर करुण का नाम भी नहीं होगा।
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तृतीय उद्योतः
किन्तु पाठक करुण रस का आस्वादन करते ही हैं। बस इतना इस मान्यता के प्रतिकूल कहना काफ़ी है। अधिक आवान्तर वस्तु के विस्तार की क्या आवश्यकता ? अतः यहाँ पर निष्कर्ष यह निकलता है कि जहाँ ऐसे शब्दों का प्रयोग कर दिया जाता है जिनसे बुद्धि-विच्छेद हो सके तब बुद्धिविच्छेद हो जाता है और जब ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाता तब बुद्धिविच्छेद नहीं होता।
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तृतीय उद्योतः
अतः दीर्घकल्पना कवि की वाणी पर आधारित होती है समय पर नहीं। इसे प्रकार इसे बात को व्युत्पत्ति की जो चूक है कि जो रस या रसाढ्य विरोधी रस में भी होते हैं और प्रकृत रस के परिपोषक हो सकते हैं उनको किस प्रकार प्रकृत रस का अङ्ग बनाया जाता है। दूसरे प्रकार के वे रस या रसाढ्य होते हैं जो प्रकृत रस में कभी आते ही नहीं। वे सर्वदा प्रकृत रस के विरोधी ही होते हैं। उनको भी कवि अपनी वाणी की कुशलता से प्रकृत रस का अङ्ग बना देता है।
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इस विषय में कुछ अधिक कहना नहीं है। जो कुछ स्वाभाविक रसाङ्गों की अङ्गता के विषय में कहा गया था उसके विपरीत सर्वथा विरुद्ध रसाङ्गों के विषय में समझना चाहिए। (स्वाभाविक रसाङ्गों के विषय में कहा गया था कि वे प्रकृत रस के अङ्ग होकर ही उसका पोषण करते हैं। इसके विपरीत आरोरसाङ्गों के विषय में कहा जा सकता है कि वे विरोधी रस के रसाङ्ग होकर ही प्रकृत रस का परिपोष करते हैं।)
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तृतीय उद्योतः
(ध्वन्या०)—स्वभावविरुद्धभावप्राप्तावदोषो यथा—
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तृतीय उद्योतः
श्रमिमरतिमलसहृदयतां प्रलयं मूर्छां तमः शरीरसादम् । मरणं च जलदभुजगं प्रसह्य कुर्वते विषं वियोगिनीनाम् ॥
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इत्यादौ। समारोपितायामप्यविरोधो यथा 'पाण्डुक्षामम्' इत्यादौ। यथा वा 'कोपात्कोमललोलबाहुलतिकापाशेन' इत्यादौ।
(अनु०) स्वाभाविक अज्ञभावप्राप्ति में अदोष जैसे— 'मेघरूपी भुजङ्गम से उत्पन्न विष (जलरूपी गरल) वियोगिनियों के लिये चक्कर, अरति, आलस्यपूर्ण हृदयता, चेतना ज्ञान का अभाव, मूर्च्छा, अन्धकार (मोह) शरीर का अवसाद और मरण उत्पन्न करता है।' इत्यादि में। समारोपित अज्ञता में भी अविरोध जैसे— 'पाण्डुक्षामं वदनम्' इत्यादि में। अथवा जैसे 'कोपात्कोमललोलबाहुलतिकापाशेन' इत्यादि में।
(लो०)—समारोपितायामिति। अज्ञभावप्राप्ताविति भावः। पाण्डुक्षामं वक्त्रं हृदयं सरसं तवासं च वपुः। आवेदयति नितान्तं क्षेत्रियोगां सखि हृदतः॥
अत्र करुणोचितो व्याधिः श्लेषभङ्ग्या स्थापितः। कोपादिपि बध्वेति हन्यत इति रौद्रानुभावानां श्लेषबलादारोपितानां तदनिर्वाहदेवाज्ज्ञत्वम्। तच्च पूर्वमेवोक्तं 'नातिनिर्वहणैपिता' इत्यत्रान्तरे।
(अनु०) समारोपिता में 'अङ्गभाव प्राप्त में' इतना जोर है। 'हे सखि तुम्हारा पाण्डु और क्षीण मुख, सरस हृदय और अलस शरीर तुम्हारे हृदय के अन्दर असाध्य रोग की सूचना देते हैं।'
यहाँ करुण के योग्य व्याधि श्लेष की भङ्गिमा से स्थापित की गई है। 'कोप से' यह 'बाँधकर' यह और 'मारा जाता है' यह इन रूपकों के बल पर आरोपित अनुभवों का रूपक के निर्वहण करने से अङ्गत्व हो जाता है। वह पहले ही कहा गया है 'अत्यन्त निर्वहण की इच्छा न होना' इसके बीच में
तारावती—इस प्रकार किसी विरोधी रस या रसांग के प्रकृत रस के पोषक होने के तीन रूप हो सकते हैं—(१) यदि विरोधी का बाध कर दिया जावे, (२) यदि कोई तत्व विरोधी रस में सम्भव हो और प्रकृत रस में भी सम्भव हो तो उस तत्व का विरोध के अंग के रूप में उपादान न कर प्रकृत रस के अंग के रूप में ही उपादान किया जावे और (३) सर्वथा विरोधी रस-तत्व का प्रकृत रस पर आरोपकर उसे प्रकृत रस का अंग बना दिया जावे। अब क्रमशः इन तीनों के उदाहरण दिये जा रहे हैं।
उक्त तीनों रूपों के साथ यह शर्त अनिवार्य है कि प्रकृत रस का पूर्ण परिपाक हो जाना चाहिए। तभी वह या तो दूसरे रस का बाध करता है या उसे अपना अंग बनाता है। (१) जब विरोधी रस बाध्य रूप में निबद्ध किया जाता है उसका उदाहरण जैसे 'क्ववाकायं शाश्वलक्षणमः.........' इत्यादि पद्य जो कि द्वितीय उद्योत में भाववशवर्तता के उदाहरण के रूप में लोचन में उद्धृत किया जा चुका है और वहीं उसकी व्याख्या भी की जा चुकी है। वहाँ पर प्रकृत रस शृङ्गार है। उसके व्यभिचारी भाव औत्सुक्य, स्मृति, दैन्य तथा चिन्ता की अभिव्यक्ति होती है। साथ ही शृङ्गार के विरोधी शान्त रस के व्यभिचारी वितर्क, मति, शंका, और धृति की भी अभिव्यक्ति होती है। वितर्क का बाध औत्सुक्य द्वारा होता है।
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३
तृतीय उद्योतः
इसी प्रकार मति का स्मृति के द्वारा, शङ्का का दैन्य के द्वारा और वृत्ति का चिन्ता के द्वारा बाध हो जाता है। पर्यवसान में चिन्ता में ही विश्रान्ति होती है। इस प्रकार शृङ्गार रस का पूर्ण परिपाक हो जाता है। विरोधी रस के व्यभिचारी वितर्क इत्यादि का सर्वथा बाध हो जाता है। अतः (विजित शत्रु के समान) वे व्यभिचारी (विजेता) शृङ्गार को पुष्ट ही करते हैं।
इसी प्रकार मति का स्मृति के द्वारा, शङ्का का दैन्य के द्वारा और वृत्ति का चिन्ता के द्वारा बाध हो जाता है। पर्यवसान में चिन्ता में ही विश्रान्ति होती है। इस प्रकार शृङ्गार रस का पूर्ण परिपाक हो जाता है। विरोधी रस के व्यभिचारी वितर्क इत्यादि का सर्वथा बाध हो जाता है। अतः (विजित शत्रु के समान) वे व्यभिचारी (विजेता) शृङ्गार को पुष्ट ही करते हैं।
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तृतीय उद्योतः
अथवा दूसरा उदाहरण जैसे कादम्बरी में अच्छोद सरोवर के निकट महाश्वेता को पुण्डरीक का प्रथम दर्शन हो गया और पुण्डरीक ने सुगन्धित मधुजरी तथा महाश्वेता ने एकावली एक दूसरे को प्रणय-निवेदन के सकेंत के रूप में प्रदान कर दी। यहीं से परस्पर सहृदय सर्वस्वाभिमान रूप रति दोनों के हृदयों में जाग्रत हो गई। पुण्डरीक की विरहवेदनाके अपनोदन के मन्त्रत्व से उसके सहचर कपिञ्जल ने वैराग्य का उपदेश दिया। वह वैराग्य का उपदेश शृङ्गार के प्रसंग में आया था। यह विरोधी रस का समावेश था। किन्तु उस विरोधी रस का बाध कर शृङ्गार ही प्रमुख बन गया और वह विरोधी रस (शान्त) शृङ्गार के परिपोषक के रूप में ही परिणत हो गया। शान्त रस की शृङ्गार-परिपोषक के रूप में परिणति इस प्रकार हुई कि उससे यह सिद्ध हो गया कि यद्यपि विरोधी वैराग्य के विभाव इत्यादि का अवधारण किया गया तथापि अनुराग इतना दृढ़ था कि वैराग्य की कथाओं से भी उसका उपशम नहीं हो सका। इस प्रकार अनुराग की दृढ़ता को सिद्ध करना ही शान्त रस के उपादान का प्रयोजन है। अतः यहां पर शान्त का शृङ्गार में समावेश दोष नहीं अपितु गुण ही है।
अथवा दूसरा उदाहरण जैसे कादम्बरी में अच्छोद सरोवर के निकट महाश्वेता को पुण्डरीक का प्रथम दर्शन हो गया और पुण्डरीक ने सुगन्धित मधुजरी तथा महाश्वेता ने एकावली एक दूसरे को प्रणय-निवेदन के सकेंत के रूप में प्रदान कर दी। यहीं से परस्पर सहृदय सर्वस्वाभिमान रूप रति दोनों के हृदयों में जाग्रत हो गई। पुण्डरीक की विरहवेदनाके अपनोदन के मन्त्रत्व से उसके सहचर कपिञ्जल ने वैराग्य का उपदेश दिया। वह वैराग्य का उपदेश शृङ्गार के प्रसंग में आया था। यह विरोधी रस का समावेश था। किन्तु उस विरोधी रस का बाध कर शृङ्गार ही प्रमुख बन गया और वह विरोधी रस (शान्त) शृङ्गार के परिपोषक के रूप में ही परिणत हो गया। शान्त रस की शृङ्गार-परिपोषक के रूप में परिणति इस प्रकार हुई कि उससे यह सिद्ध हो गया कि यद्यपि विरोधी वैराग्य के विभाव इत्यादि का अवधारण किया गया तथापि अनुराग इतना दृढ़ था कि वैराग्य की कथाओं से भी उसका उपशम नहीं हो सका। इस प्रकार अनुराग की दृढ़ता को सिद्ध करना ही शान्त रस के उपादान का प्रयोजन है। अतः यहां पर शान्त का शृङ्गार में समावेश दोष नहीं अपितु गुण ही है।
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तृतीय उद्योतः
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(२) स्वाभाविक रूप में अंगभाव प्राप्ति में दोष न होने का उदाहरण जैसे—
(२) स्वाभाविक रूप में अंगभाव प्राप्ति में दोष न होने का उदाहरण जैसे—
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तृतीय उद्योतः
'जलदरूपी भुजंगम से उद्भूत विष (जल और गरल) वियोगिनियों के लिये बलात् चक्कर, अरति, हृदय में आलस्य, चेष्टाशून्यता, अन्धकार, शरीरका टूटना और मरण उत्पन्न कर रहा है।'
'जलदरूपी भुजंगम से उद्भूत विष (जल और गरल) वियोगिनियों के लिये बलात् चक्कर, अरति, हृदय में आलस्य, चेष्टाशून्यता, अन्धकार, शरीरका टूटना और मरण उत्पन्न कर रहा है।'
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तृतीय उद्योतः
उद्दीपन होने के कारण वर्षा का जल वियोगिनियों के लिये सर्प-विष जैसा ही है। जल की वर्षा करनेवाले काले बादल काले सापों के समान हैं। विष शब्द के दो अर्थ हैं—जल और गरल। अतः बादलों से छोड़ा हुआ जल सर्पों से छोड़े हुए विष के समान है। जिस प्रकार सर्पों के विष के प्रभाव से चक्कर आने लगते हैं, संसार की सारी वस्तुएँ अच्छी नहीं लगतीं, शरीर ढीला पड़ जाता है, चेष्टा शक्ति जाती रहती है, मूर्च्छा आने लगती है, शरीर टूटने लगता है, आँखों के सामने अन्धेरा छा जाता है। यही सब बातें वर्षा में वियोगिनियों के लिये होती हैं। यहाँ पर प्रस्तुत रस है विप्रलम्भ शृङ्गार। उसके विरोधी करुण के अंगभ्रमी इत्यादि हैं। किन्तु ये भ्रम इत्यादि विप्रलम्भ के भी स्वाभाविक रूप में अंग बनने की क्षमता रखते हैं। अतः एव कवि ने इसको स्वाभाविक रूप में ही विप्रलम्भ का अंग बना दिया है।
उद्दीपन होने के कारण वर्षा का जल वियोगिनियों के लिये सर्प-विष जैसा ही है। जल की वर्षा करनेवाले काले बादल काले सापों के समान हैं। विष शब्द के दो अर्थ हैं—जल और गरल। अतः बादलों से छोड़ा हुआ जल सर्पों से छोड़े हुए विष के समान है। जिस प्रकार सर्पों के विष के प्रभाव से चक्कर आने लगते हैं, संसार की सारी वस्तुएँ अच्छी नहीं लगतीं, शरीर ढीला पड़ जाता है, चेष्टा शक्ति जाती रहती है, मूर्च्छा आने लगती है, शरीर टूटने लगता है, आँखों के सामने अन्धेरा छा जाता है। यही सब बातें वर्षा में वियोगिनियों के लिये होती हैं। यहाँ पर प्रस्तुत रस है विप्रलम्भ शृङ्गार। उसके विरोधी करुण के अंगभ्रमी इत्यादि हैं। किन्तु ये भ्रम इत्यादि विप्रलम्भ के भी स्वाभाविक रूप में अंग बनने की क्षमता रखते हैं। अतः एव कवि ने इसको स्वाभाविक रूप में ही विप्रलम्भ का अंग बना दिया है।
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तृतीय उद्योतः
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(३) तीसरा प्रकार है ऐसे विरोधियों को प्रकृति पर आरोपितर उनको अंगप्राप्ति प्रदान करना जो स्वाभाविक रूप में अंग नहीं बन सकते। इसका उदाहरण—
(३) तीसरा प्रकार है ऐसे विरोधियों को प्रकृति पर आरोपितर उनको अंगप्राप्ति प्रदान करना जो स्वाभाविक रूप में अंग नहीं बन सकते। इसका उदाहरण—
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तृतीय उद्योतः
हे सखि ! तुम्हारा मुख पीला तथा क्षीण पड़ गया है; हृदय सरलता से भरा हुआ है और शरीर आलस्य से परिपूर्ण है, ये सब बातें बतलाती हैं कि तुम्हारे हृदय के अन्दर ऐसा रोग घुस गया है जिसकी चिकित्सा दूसरे ही शरीर में सम्भव है।
हे सखि ! तुम्हारा मुख पीला तथा क्षीण पड़ गया है; हृदय सरलता से भरा हुआ है और शरीर आलस्य से परिपूर्ण है, ये सब बातें बतलाती हैं कि तुम्हारे हृदय के अन्दर ऐसा रोग घुस गया है जिसकी चिकित्सा दूसरे ही शरीर में सम्भव है।
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यहाँ पर रोग का अन्तःकरण में प्रविष्ट हो जाना, मुख का पीला पड़ जाना इत्यादि विरोधी रस करुण के अंग हैं और अर्थ श्लेष की भंगिमा से अर्थात् ऐसे अनुभवों से जो उभयत्र सम्भव हैं इनका आरोप शृंगार पर किया गया है । आरोप कर देने से इनका विरोध जाता रहा है । (यह उदाहरण काव्यप्रकाश में भी आया है । काव्यप्रकाशकार ने लिखा है कि चेहरे का पीला पड़ना इत्यादि करुण के ही अंग (अनुभाव) नहीं होते अपितु शृंगार के भी अंग हो सकते हैं । अतः इनका कथन विरुद्ध नहीं माना जा सकता । काव्यप्रकाशकार की यह मत समीचीन ही प्रतीत होता है क्योंकि भरत ने भी व्याधि को केवल करुण का ही नहीं अपितु शृंगार का भी अंग माना है । सम्भवतः इसी अरुचि के कारण ध्वनिकार ने दूसरा उदाहरण दिया हैं । दूसरा उदाहरण जैसे—'कोपात्कोमललोलबाहुलतिका' इत्यादि । इस पद्य की विस्तृत व्याख्या पहले की जा चुकी है । वहाँ पर यह कहा गया था कि वही अलंकार रस का पोषक होता है जिसके निर्वहण की इच्छा दृष्टिगत न हो रही हो । इसी मान्यता के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत पद्य को उद्धृत किया गया था यहाँ पर इसको उद्धृत करने का आशय यह है कि 'कोप से', 'बाँध कर' और 'मारा जाता है' ये ऐसे तत्त्व हैं जो शृंगार में नहीं उसके विरोधी रौद्र में ही सम्भव हैं । इसमें बाहुलतिका पर बन्धनपाशों का आरोप किया गया है; किन्तु बधू इत्यादि पर व्याधि इत्यादि का आरोप नहीं किया गया । रूपक के अनिवृ्यंड रहने से रौद्र का पूर्ण परिपाक नहीं हो सका है । इसके प्रतिकूल प्रकृत शृंगार का पूरा परिपाक हो गया है । इसलिये शृंगार का अंग होकर ही रूपक आया है और रूपक के बलपर विरोधी का प्रकृत पर आरोप करने का यह ठीक उदाहरण है ।
इयं चाङ्गभावप्राप्तिरन्यस्य यदाधिकारीकृतत्वात् प्रधान एकस्मिन् वाक्यार्थे रस्योर्भावयोर्या परस्परविरोधिनोरङ्गाङ्गभावमन्य तस्यामपि न दोषः । यथोक्तम्—'क्षीणो हस्तावलग्नः' इत्यादौ । कथम् तत्र विरोध इति चेत्—द्वयोरपि तयोरन्यपरत्वेन व्यवस्थाने तु । अन्यपरत्वेऽपि विरोधिनोः कथं विरोधनिवृत्तिरिति चेत्—विधघो विरुद्धसमावेशस्य दृष्टत्वं नानुवादे ।
(ध्वन्या०) इयं चाङ्गभावप्राप्तिरन्यस्य यदाधिकारीकृतत्वात् प्रधान एकस्मिन् वाक्यार्थे रस्योर्भावयोर्या परस्परविरोधिनोरङ्गाङ्गभावमन्य तस्यामपि न दोषः । यथोक्तम्—'क्षीणो हस्तावलग्नः' इत्यादौ । कथम् तत्र विरोध इति चेत्—द्वयोरपि तयोरन्यपरत्वेन व्यवस्थाने तु । अन्यपरत्वेऽपि विरोधिनोः कथं विरोधनिवृत्तिरिति चेत्—विधघो विरुद्धसमावेशस्य दृष्टत्वं नानुवादे । यथा—
एहि गच्छ पतोत्तिष्ठ वद मौनं समाचर । एकमाश्रयगृह्णीषे क्रोशन्ति ध्वनिनोऽर्थसि: ॥
एहि गच्छ पतोत्तिष्ठ वद मौनं समाचर । एकमाश्रयगृह्णीषे क्रोशन्ति ध्वनिनोऽर्थसि: ॥ इत्यादौ । अत्र हि विधिप्रतिषेधयोगुरूयमानस्वेन समावेशे न विरोधस्तथे-हापि भविष्यति ।
(अनु०) और यह अङ्गभावप्राप्ति दूसरी है जो कि आधिकारिक होने से किसी एक प्रधान वाक्यार्थ में परस्पर विरोधी दो रसों या दो भावों की अङ्गभावप्राप्ति हो जाती है उसमें भी दोष नहीं होता । जैसे। कि कहा गया है—'क्षीणो हस्तावलग्नः' इत्यादि में । यदि कहो कि वहाँ अविरोध कैसे होता है तो (इसका उत्तर यह है कि) क्योंकि उन दोनों को अन्यपरक के रूप में ही व्यवस्थित किया जाता है । यदि कहो अन्यपरक होने पर भी विरोधियों की
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तृतीय
उद्योतः
विरोधनिवृत्ति किस प्रकार होती है तो उस पर कहते हैं—विरोधों का समावेश विधि में दुष्ट होता है अनुवाद में नहीं। जैसे—‘आओ, जाओ, गिरो, उठो, कहो, चुप रहो इस प्रकार आशारूपी ग्रह से ग्रस्त याचकों के साथ धनी लोग क्रिडा करते हैं।’ इत्यादि में। यहाँ निस्सन्देह विधि और निषेध के अनुवादरूप होने के कारण विरोध नहीं है उसी प्रकार यहाँ पर भी हो जावेगा। निस्सन्देह इस श्लोक में ईश्वर्य्विप्रलम्भ और करुण इन दो वस्तुओं का विधेयमानत्व नहीं है। क्योंकि त्रिपुराराति के प्रभावातिशय के वाक्यार्थ होने के कारण उसके अङ्ग के रूप में उन दोनों की व्यवस्था होती है। (लो०) अन्येति। चतुर्थोडयं प्रकार इत्यर्थः। पूर्वं हि विरोधिनः प्रस्तुतरसान्तरेऽड्डभाव तोक्का, अधुना तु द्वयोरविरोधिनोरस्त्वन्तरेड्डभाव इति शेषः। क्षिप्त इति। व्याख्यातमेतत्—‘प्रधानेन्यात्न वाक्यार्थे’ इत्यत्र। नन्वन्यपरत्वेऽपि स्वभावो न निवर्त्तते, स्वभावकृत एव च विरोध इत्यभिप्रायेणाह—अन्यपरत्वेऽपि इति। विरोधिनोरिति। तत्वभावयोरिति हेतुत्वाभिप्रायेण विशेषणम्। उच्चयत इति। अयं भावः—सामग्रीविशेषपतितत्वेन भावानां विरोधाविरोधौ न स्वभावमात्रनिबन्धनौ शीतोत्पणयोरपि विरोधभावात्। विषमाविति। तदेव कुरु मा कार्षीःरिति यथा। विधिशब्देनात्रैकदा प्राधान्यमुच्यते। अत एवातिरात्रे षोडशिनं गृह्णन्ति न गृहीतं नन्तीति विरुद्धविरुद्धविकल्पपर्यवसायीति वाक्यविदः। अनुवाद इति। अङ्गतायामित्यर्थः।
विरोधनिवृत्ति किस प्रकार होती है तो उस पर कहते हैं—विरोधों का समावेश विधि में दुष्ट होता है अनुवाद में नहीं। जैसे—‘आओ, जाओ, गिरो, उठो, कहो, चुप रहो इस प्रकार आशारूपी ग्रह से ग्रस्त याचकों के साथ धनी लोग क्रिडा करते हैं।’ इत्यादि में। यहाँ निस्सन्देह विधि और निषेध के अनुवादरूप होने के कारण विरोध नहीं है उसी प्रकार यहाँ पर भी हो जावेगा। निस्सन्देह इस श्लोक में ईश्वर्य्विप्रलम्भ और करुण इन दो वस्तुओं का विधेयमानत्व नहीं है। क्योंकि त्रिपुराराति के प्रभावातिशय के वाक्यार्थ होने के कारण उसके अङ्ग के रूप में उन दोनों की व्यवस्था होती है। (लो०) अन्येति। चतुर्थोडयं प्रकार इत्यर्थः। पूर्वं हि विरोधिनः प्रस्तुतरसान्तरेऽड्डभाव तोक्का, अधुना तु द्वयोरविरोधिनोरस्त्वन्तरेड्डभाव इति शेषः। क्षिप्त इति। व्याख्यातमेतत्—‘प्रधानेन्यात्न वाक्यार्थे’ इत्यत्र। नन्वन्यपरत्वेऽपि स्वभावो न निवर्त्तते, स्वभावकृत एव च विरोध इत्यभिप्रायेणाह—अन्यपरत्वेऽपि इति। विरोधिनोरिति। तत्वभावयोरिति हेतुत्वाभिप्रायेण विशेषणम्। उच्चयत इति। अयं भावः—सामग्रीविशेषपतितत्वेन भावानां विरोधाविरोधौ न स्वभावमात्रनिबन्धनौ शीतोत्पणयोरपि विरोधभावात्। विषमाविति। तदेव कुरु मा कार्षीःरिति यथा। विधिशब्देनात्रैकदा प्राधान्यमुच्यते। अत एवातिरात्रे षोडशिनं गृह्णन्ति न गृहीतं नन्तीति विरुद्धविरुद्धविकल्पपर्यवसायीति वाक्यविदः। अनुवाद इति। अङ्गतायामित्यर्थः। क्रीडाड्डत्वेन ह्यात्र विरुद्धनामर्थानामभिधानमिति राजनिकटव्यवस्थिताततायी-द्वयन्यायेन विरुद्धानामध्यनमुख्यप्रेक्षितापरतन्त्रीकृतानां श्रौतेन क्रमेण स्वात्मपरामर्शो-प्रविश्राम्यताम्, का कथा परस्परुपचिन्तां येन विरोधः स्यात्। केवलं विरुद्धत्व-दरुणाधिकरणस्थित्या यो वाक्यीय एषां पाश्चात्यः सम्बन्धः सम्भाव्यते स विघटताम्। (अनु०) ‘अन्या’ यहाँ। अर्थात् यह चौथा प्रकार है। पहले निस्सन्देह विरोधी की प्रस्तुत दूसरे रस में अङ्गता कही गई, अब तो दोनों विरोधियों का दूसरी वस्तु में अङ्गभाव बतलाया जा रहा है’ यह शेष है। ‘क्षिप्त’ यह। इसको व्याख्या ‘प्रधानेन्यात्न वाक्यार्थे’.......। इस कारिका में की जा चुकी है। ‘अन्यपरसत्व में भी स्वभाव निवृत्त नहीं होता और विरोध स्वभाव-कृत ही होता है’, इस अभिप्राय से प्रश्न करके कहते हैं—‘अन्यपरत्व में भी भो’ इत्यादि । ‘विरोधियों का’ यह। विरुद्ध स्वभाववालों का इस हेतुत्व के अभिप्राय से विशेषण है। ‘कहा जा रहा है’ यह। भाव यह है कि विशेष सामग्री में पड़े हुए भावों का ही विरोध या अविरोध होता है; केवल स्वभाव के ही आशीत नहीं होता। क्योंकि शीत और उष्ण का भी विरोध नहीं होता। ‘विधि’ में यह। जैसे ‘वही करो’ इसमें। विधि शब्द से यहाँ पर एकसमय प्रधानी कहा जा रहा है व्रत एव अतिरात्रे षोडशी को ग्रहण करते हैं नहिं ग्रहण करते हैं यह विरुद्धविरुद्ध विकल्प में पर्यवसित होती है यह वाक्यज्ञों का मत है। ‘अनुवाद में यह’। यहाँ पर निस्सन्देह क्रिडा के अंग के रूप में विरुद्ध भी अर्थों का अभिघान किया गया है इस प्रकार राजा के निकट बैठे हुये दो आततायियों के न्याय से विरुद्ध भी अन्यमुखप्रेक्षी
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होने के कारण परतन्त्र किये हुये श्रुतिक्रम से अपने परामर्श में भी विश्राम न पानेवाले (तत्त्वों का क्रीडा में अंग के रूप में अन्वय होता है १) परस्पर रूप चिन्ता के विषय में तो कहना ही क्या 'जिससे विरोध हो । विरोध होने के कारण केवल अरुणाधिकारणस्थिति से जो इसके बाद वाक्यीय सम्बन्ध की सम्भावना की जाती है वह विच्छटित हो जावेगी ।
तारावती—ऊपर उन तीन प्रकारों का वर्णन किया जा चका जिनमें एक विरोधी रस दूसरे प्रकृत रस का अङ्ग हो सकता है और उस विरोधी का प्रकृत के साथ सन्निवेश दूषित नहीं माना जाता । इनके अतिरिक्त एक चौथा प्रकार और होता है । पूर्वोक्त तीन प्रकारों से इस चौथे प्रकार में भेद यह होता है कि पूर्वोक्त तीन प्रकारों में विरोधी रस प्रकृत का पोषक किस प्रकार होता है यह दिखलाया गया है । इस चौथे प्रकार में यह दिखलाया जा रहा है कि दो परस्पर विरोधी रस प्रकृत रस में सन्निविष्ट किस प्रकार होते हैं । वह प्रकार यह है कि यदि आधिकारिक होने के कारण एक वाक्यार्थ (रस) प्रधान हो और परस्पर विरोधी दो रस या भाव उस एक आधिकारिक की ही पुष्टि कर रहे हों तो उन दोनों के अङ्गरूपता धारण करने में भी कोई दोष नहीं होता ।
आशय यह है कि विरोधमूलकदोष तो तभी हो सकता है जब दो विरोधी परस्पर सम्बद्ध हों । जहाँ विरोधियों का परस्पर सम्बन्ध ही नहीं होता, उनमें प्रत्येक किसी दूसरे को पुष्ट करता है वहाँ न तो उनका विरोध ही होता है और न विरोधमूलक दोष ही वहाँ पर होता है । जब दोनों पृथक् प्रस्तुत रस का परिपोषण कर देते हैं फिर यदि वे सम्बद्ध भी होते हैं तो भी उनका विरोध अकिञ्चित्कर होता है । यह तो हो ही सकता है कि दो विरोधी राजा किसी तीसरे अपने से बड़े राजा के हितसाधक हों । उदाहरण के लिए 'क्षीणो हस्ताबलग्रन्थि:' इत्यादि अमरुक के पद्य को लीजिए । इसकी व्याख्या 'प्रधानेन्द्यन्वय वाक्यार्थे—' इस कारिका में की जा चुकी है । यहाँ पर प्रधानीभूत वाक्यार्थ है—त्रिपुरारि का प्रभावातिशय और उसके अङ्ग हैं करुण तथा श्रृङ्गार । ये दोनों परस्पर विरोधी रस हैं
किन्तु दोनों ही भगवान् शंकर के प्रभाव की अधिकता को ख्यातिप्त करने में सहयोग देते हैं । अतः दोनों का परस्पर समावेश दूषित नहीं माना जा सकता । यहाँ पर यह प्रश्न किया जा सकता है कि जो सर्वथा विरोधी होते हैं उनके विरोध की निवृत्ति हो ही किस प्रकार सकती है ? इसका उत्तर यह है कि उक्त स्थल पर विरोधी रस स्वतन्त्र नहीं होते । अतः वे अपने विरोध का निर्वाह भी नहीं कर सकते । वे अन्य परक होते हैं और स्वयं विरोधी होते हुए भी विरोध का पालन नहीं कर सकते और दोनों ही स्वामी का कार्य बनाते ही हैं ।
इस पर यह पूछा जा सकता है कि विरोधी अनुचर अपने स्वामी का ही कार्य बनाते हैं, स्वयं तो मित्र नहीं बन जाते । अन्यपरक होते हुए भी किसी का स्वभाव तो कहीं नहीं चला जाता । विरोध में कारण तो स्वभाव ही होता है । ऐसी दशा में उनकी विरोधनिवृत्ति की बात करना कैसे संगत हो सकता है ? यहाँ पर मूल में जो 'विरोधिनो:' यह विशेषण दिया गया है उसका अर्थ है विरोधी स्वभाववाला होना । यह विशेषण हेतुगर्भित है । अर्थात् क्योंकि उनका स्वभाव ही विरोध रखना है तो वे अन्यपरक होकर भी विरोध की परिपाटी कैसे कर सकते हैं ? इसका उत्तर यह है कि विधि में विरोधी का समावेश दूषित होता है, अनुवाद में नहीं ।
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तृतीय उद्योत:
प्रकार समझिये—यह समझना ठीक नहीं है कि दो विरोधियों के विरोध का आधार केवल स्वभाव ही होता है । दो वस्तुओं का विरोध या अविरोध स्वभाव के आधार पर भी होता है और विशेष प्रकार की सामग्री में पड़ना भी उनके विरोध या अविरोध का आधार होता है । उदाहरण के लिए शीतस्पर्शी और उष्णस्पर्शी में परस्पर विरोध है । यह स्वाभाविक विरोध इस रूप में होता है कि शीतस्पर्शी और उष्णस्पर्शी दोनों एक अधिकरण में नहीं रह सकते । इसी प्रकार शीतस्पर्शी या उष्णस्पर्शी द्रव्यत्व के साथ या रूप इत्यादि गुणों के साथ एक अधिकरण में रह सकता है । यह उसका स्वाभाविक अविरोध है । इसी प्रकार शीतस्पर्शी से उत्पन्न होनेवाले द्रव्य में उष्णस्पर्शी की उत्पत्ति प्रतिवद्ध हो जाती है यह उसका द्रव्यविशेष में सन्निविष्ट होने से विरोध का उदाहरण है । इसी प्रकार शीतस्पर्शी और उष्णस्पर्शी का सामग्री सन्निवेश-जन्य अविरोध वहाँ पर हो सकता है जो द्रव्य शीत तथा उष्ण दोनों प्रकार के उपकरणों से बनाया जाता हो । आशय यही है कि भावों का विरोध या अविरोध सामग्रीविशेष से संयुक्त होने के कारण होता है, शीत और उष्ण के समान केवल स्वभाव से ही उनका विरोध या अविरोध नहीं होता । वाक्य में दो भाग होते हैं—एक तो ज्ञात तत्त्व जिसके विषय में कोई बात कही जाती है, उसे वाक्य का उद्देश्य अथवा अनुवाद भाग कहते हैं । दूसरा अंश होता है अज्ञात अंश जो कि बतलाया जाता है, उसे विधि अंश अथवा विधेय अंश कहते हैं । विधेय में विरोधियों का समावेश दूषित होता है उद्देश्य में नहीं । क्योंकि दो विरोधी कार्य एक साथ किये ही नहीं जा सकते किन्तु दो विरोधियों से सम्बन्ध रखने वाला कोई अन्य कार्य तो किया ही जा सकता है । उदाहरण के लिये—'यह कार्य करो' 'मत करो' इन दो विरोधी आदेशों का पालन नहीं किया जा सकता क्योंकि इन दोनों में विषय में ही विरोध है । किन्तु विधेय में विरोध के विषय में इतना और समझ लेना चाहिए कि विरोधी विधेयों का समावेश वहीं पर दूषित होता है जहाँ एक ही स्थान पर एक ही समय में दो विरोधियों की प्रथानता बतलाई जाती है । यदि कहीं शास्त्र में इस प्रकार के परस्पर विरुद्ध तत्त्वों का एक साथ विधान होता है तो उनका एक ही में समावेश नहीं हो सकता अपितु उनका पर्यवसान विकल्प में होता है । उदाहरण के लिये ज्योतिष्टोम यज्ञ का विधान स्वर्ग के उद्देश्य से किया गया है ।
प्रकार समझिये—यह समझना ठीक नहीं है कि दो विरोधियों के विरोध का आधार केवल स्वभाव ही होता है । दो वस्तुओं का विरोध या अविरोध स्वभाव के आधार पर भी होता है और विशेष प्रकार की सामग्री में पड़ना भी उनके विरोध या अविरोध का आधार होता है । उदाहरण के लिए शीतस्पर्शी और उष्णस्पर्शी में परस्पर विरोध है । यह स्वाभाविक विरोध इस रूप में होता है कि शीतस्पर्शी और उष्णस्पर्शी दोनों एक अधिकरण में नहीं रह सकते । इसी प्रकार शीतस्पर्शी या उष्णस्पर्शी द्रव्यत्व के साथ या रूप इत्यादि गुणों के साथ एक अधिकरण में रह सकता है । यह उसका स्वाभाविक अविरोध है । इसी प्रकार शीतस्पर्शी से उत्पन्न होनेवाले द्रव्य में उष्णस्पर्शी की उत्पत्ति प्रतिवद्ध हो जाती है यह उसका द्रव्यविशेष में सन्निविष्ट होने से विरोध का उदाहरण है । इसी प्रकार शीतस्पर्शी और उष्णस्पर्शी का सामग्री सन्निवेश-जन्य अविरोध वहाँ पर हो सकता है जो द्रव्य शीत तथा उष्ण दोनों प्रकार के उपकरणों से बनाया जाता हो । आशय यही है कि भावों का विरोध या अविरोध सामग्रीविशेष से संयुक्त होने के कारण होता है, शीत और उष्ण के समान केवल स्वभाव से ही उनका विरोध या अविरोध नहीं होता । वाक्य में दो भाग होते हैं—एक तो ज्ञात तत्त्व जिसके विषय में कोई बात कही जाती है, उसे वाक्य का उद्देश्य अथवा अनुवाद भाग कहते हैं । दूसरा अंश होता है अज्ञात अंश जो कि बतलाया जाता है, उसे विधि अंश अथवा विधेय अंश कहते हैं । विधेय में विरोधियों का समावेश दूषित होता है उद्देश्य में नहीं । क्योंकि दो विरोधी कार्य एक साथ किये ही नहीं जा सकते किन्तु दो विरोधियों से सम्बन्ध रखने वाला कोई अन्य कार्य तो किया ही जा सकता है । उदाहरण के लिये—'यह कार्य करो' 'मत करो' इन दो विरोधी आदेशों का पालन नहीं किया जा सकता क्योंकि इन दोनों में विषय में ही विरोध है । किन्तु विधेय में विरोध के विषय में इतना और समझ लेना चाहिए कि विरोधी विधेयों का समावेश वहीं पर दूषित होता है जहाँ एक ही स्थान पर एक ही समय में दो विरोधियों की प्रथानता बतलाई जाती है । यदि कहीं शास्त्र में इस प्रकार के परस्पर विरुद्ध तत्त्वों का एक साथ विधान होता है तो उनका एक ही में समावेश नहीं हो सकता अपितु उनका पर्यवसान विकल्प में होता है । उदाहरण के लिये ज्योतिष्टोम यज्ञ का विधान स्वर्ग के उद्देश्य से किया गया है ।
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तृतीय उद्योत:
ज्योतिष्टोम में १२ स्तोत्र आते हैं । इन स्तोत्रों का विभिन्न क्रम से गान किया जाता है । अन्त में जो स्तोत्र आता है उसी के आधार पर ज्योतिष्टोम का भेद किया जाता है । इस भाँति ज्योतिष्टोम चार प्रकार का हो जाता है—अग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी और अतिरात्र । ज्योतिष्टोम यज्ञों में सोम को रखने लिये जिस पात्र को काम में लाया जाता है उसे 'षोडशी' कहते हैं । ज्योतिष्टोम के प्रकरण में लिखा हुआ है कि—'अतिरात्र (नामक ज्योतिष्टोम के प्रकार) में षोडशी को ग्रहण करता है ।' फिर लिखा है कि—'अतिरात्र में षोडशी को ग्रहण नहीं करता है ।' इस प्रकार अतिरात्र के विषय में दो विरुद्ध विधान पाये जाते हैं । शास्त्र-विधि व्यर्थ तो हो ही नहीं सकती । अतः दोनों की चरितार्थता के लिये विकल्प में अर्थ का पर्यवसान हो जाता है । दोनों काम एक साथ नहीं हो सकते । अतः विकल्पपरक अर्थ करना पड़ता है । आशय यह है कि अतिरात्र में षोडशी को ग्रहण न करने
ज्योतिष्टोम में १२ स्तोत्र आते हैं । इन स्तोत्रों का विभिन्न क्रम से गान किया जाता है । अन्त में जो स्तोत्र आता है उसी के आधार पर ज्योतिष्टोम का भेद किया जाता है । इस भाँति ज्योतिष्टोम चार प्रकार का हो जाता है—अग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी और अतिरात्र । ज्योतिष्टोम यज्ञों में सोम को रखने लिये जिस पात्र को काम में लाया जाता है उसे 'षोडशी' कहते हैं । ज्योतिष्टोम के प्रकरण में लिखा हुआ है कि—'अतिरात्र (नामक ज्योतिष्टोम के प्रकार) में षोडशी को ग्रहण करता है ।' फिर लिखा है कि—'अतिरात्र में षोडशी को ग्रहण नहीं करता है ।' इस प्रकार अतिरात्र के विषय में दो विरुद्ध विधान पाये जाते हैं । शास्त्र-विधि व्यर्थ तो हो ही नहीं सकती । अतः दोनों की चरितार्थता के लिये विकल्प में अर्थ का पर्यवसान हो जाता है । दोनों काम एक साथ नहीं हो सकते । अतः विकल्पपरक अर्थ करना पड़ता है । आशय यह है कि अतिरात्र में षोडशी को ग्रहण न करने
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का दोष नहीं होता । क्योंकि न ग्रहण करने की विधि भी मौजूद है । इस प्रकार विघेय में दो विरोधियों की समान कोटि की प्रथानता दूषित होती है । ऊपर विघेय में दो विरोधियों के समावेश में सदोषता का परिचय दिया गया है । अब उद्देदश्य में विरोधियों के समावेश में दोष नहीं होता यहु बतलाया जा रहा है । निम्नलिखित उदाहरण लीजिये—
'आशा रूपी ग्रह से ग्रस्त याचकों से घेनी लोग इस प्रकार क्रिडा करते हैं कि— आओ-जाओ, उठो गिरो, बोलो-चुप रहो इत्यादि ।' आशय यह है कि घनी लोगों का याचकों को अपनी क्रिडा का साधन बनाना एक सामान्य स्वभाव होता है । कभी वे उनसे कहते हैं आओ, कभी जाओ, कभी कहते हैं उठो और कभी कहते हैं गिरो, कभी कहते हैं बोलो और कभी कहते हैं चुप रहो । यह सब उनका खिलवाड ही होता है । वे जैसा चाहते हैं वैसों ही आज्ञा देते हैं और चूकि याचक आशारूपी ग्रह से ग्रस्त हुये होते हैं, अतः जैसा कुछ उनसे कहा जाता है वैसा उन्हें पालन करना पडता है ।
यहाँ पर 'आओ', 'जाओ' 'गिरो' 'उठो' 'बोलो' 'चुप रहो' ये सब परस्पर विरुद्धार्थक शब्द हैं । किन्तु ये सब अनुवाद ही हैं क्योंकि धनियों की भावना का इनमें अनुवाद किया गया है । विघेय है क्रिडा करना । क्रिडारूप विघेय के ये सब परस्पर विरोधी तत्व अंग बनकर आये हैं । अतः विरोधियों का एकत्र समावेश यहाँ पर दोष नहीं है । यह ऐसे ही होता है जैसे दो विरोधी एक दूसरे के प्राण लेने पर उतारू हों किन्तु जब वे राजा के निकट पहुँचते हैं तब एक दूसरे के साथ चुपचाप बैठ जाते हैं, वहाँ वे अन्यमुखप्रेक्षी होते हैं इसीलिये उनको स्वतन्त्रता जाती रहती है । इसी प्रकार यहाँ पर भी 'आओ' 'जाओ' इत्यादि परस्पर विरोधी तत्व 'क्रिडा' रूप विघेय के मुखप्रेक्षी हैं । अतः ये उसके आधीन हो गये हैं । जब हम इनको सुनते हैं तब सुनने के क्रम से ही इनके अर्थ का परामर्श होता जाता है । किन्तु क्योंकि ये दूसरे अर्थ के साधक के रूप में आये हैं, अतः इनका विश्राम अपने शाब्दिक अर्थ में ही नहीं होता अपितु ये क्रिडा का अंग बन जाते हैं । इनके परस्पर स्वभाव चिन्तन का तो प्रश्न ही नहीं उठता, अतः इनका विरोध भी नहीं होता । क्योंकि विरोध तो तब ही होता है जब परस्पर स्वरूप का चिन्तन किया जावे । केवल इतना अन्तर अवश्य पड जाता है कि साधारण वाक्यों में समस्त उहेय पहले तो विघेय का प्रतिपादन करते हैं और बाद में स्वयं परस्पर संयुक्त हो जाते हैं । उदाहरण के लिये ज्योतिष्टोम प्रकरण में अरुणाधकरण आता है । वहाँ एक श्रुति-वाक्य है—'अरुणा, पिङ्गलाक्षी, एक वर्षवाली के द्वारा सोमको खरीदता है ।'
अर्थात् सोम को एक वर्ष की गाय से खरीदना चाहिये । जिसका रंग लाल हो और आँखें पीली हों । मीमांसकों के मत में शाब्दबोध में भावना प्रधान रहती है । 'अरुणया' 'पिङ्गलाक्ष्या' और 'एकहायन्या' इन तीनों शब्दों में करण में तृतीया है । अतः क्रमरूप आख्यात (क्रिया) जन्य भावना के साथ इनका अन्वय करण के रूप में पृथक्-पृथक् होता है । बाद में इनका परस्पर भी सम्बन्ध हो जाता है । 'अरुणत्व' और 'पिङ्गलाक्षत्व' ये गुण हैं और 'एकहायनत्व' यह द्रव्य । द्रव्य और गुण का विरोध नहीं होता । अतः इन सब के पृथक्-पृथक् क्रम रूप भावना
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तृतीय उद्योत:
न च रसेषु विध्यनुवादव्यवहारो नास्तीति शङ्क्यं वक्तुं, तेषां वाक्यार्थत्वेनास्युपगमात् वाक्यार्थस्य वाच्यस्य च यो विध्यनुवादौ तौ तदक्षिमानां रसानां केन वार्थते। यैर्वा साक्षात्काव्यार्थता रसादीनां नाम्युपगम्यते तैस्तेषां तन्निमित्तता तावद्वश्यमभ्युपगन्तव्या। तथाप्यत्र इलोके न विरोधः। यस्मादन्यद्रूपमान्निर्मित्तोभयरसवस्तुसहकारित्वं विधीयमानांशाद्वाविशेषप्रतीतिरुपद्यते। तत्तत्र न काचिद्विरोधः। दृश्यते हि विरुद्धोभयसहकारित्वं कारणात्कार्यविशेषोत्पत्तौ। विरुद्धफलोत्पादनहेतुत्वं हि युगपदेकस्य कारणस्य विरुद्धं न तु विरुद्धोभयसहकारित्वम्। एवंविधविरुद्धपदार्थविषयः कथमन्यः प्रयोक्तव्य इति चेत् अनूद्यमानैवंविधवाच्यविषये या वार्ता सात्रापि भविष्यति। एवंविध्यनुवादनयाश्रयेणात्र इलोके परिहृतस्तावद्विरोधः।
रसों में विधि और अनुवाद का व्यवहार नहीं होता यह नहीं कहा जा सकता क्योंकि उन (रसादिकों) को वाक्यार्थ के रूप में माना गया है। वाच्यार्थ के और वाच्य के जो विधि और अनुवाद उनका उस (वाच्य) के द्वारा आक्रान्त होनेवाले रसों के विषय में निवारण कौन कर सकता है? अथवा जो लोग रस इत्यादिकों की साक्षात्काव्यार्थता को स्वीकार नहीं कर सकते हैं। उनको रसों की तन्निमित्तता (वाच्यनिमित्तता) अवश्य माननी पड़ेगी तथापि यहां पर श्लोक में विरोध नहीं है क्योंकि भावविशेष की प्रतीति ऐसे विधीयमानांश से उत्पन्न होती है जिसमें अनुवाद किये जानेवाले अंशों को निमित्त मानकर उत्पन्न होनेवाली दोनों प्रकार की रसवस्तु सहकारी के रूप में रहती है। निस्सन्देह दोनों विरोधी सहकारी कारणों से कार्यविशेष की उत्पत्ति देखी है। एक कारण का विरुद्धफलोत्पादन में हेतु बनना विरुद्ध होता है; दोनों विरोधियों का सहकारी होना विरुद्ध नहीं होता। यदि कहो कि इस प्रकार के विरुद्ध पदार्थों के विषय में अभिनय का प्रयोग कैसे किया जावे तो अनुवाद किये जानेवाले इस प्रकार के वाच्य के विषय में जो बात होगी वह यहां भी हो जावेगी। इस विधि और अनुवाद के आश्रय से यहां विरोध परिहार हो गया।
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च रस एव काव्यवाक्यार्थं इत्युक्तम् । तेनामुख्यतया यत्र सोऽर्थस्तत्रानूद्यमानत्वं रसस्यापि युक्तम् । यदि वानूद्यमानविभावादिसाक्षिप्त्वाबधस्यानूद्यमानता तदाह—वाक्यार्थस्यपेति । यदि वा माभूदनूद्यमानतया विरुद्धयो रसयोः समावेशः, सहकारितया तु भविष्यतीति सर्वथा विरुद्धयुक्तियुक्तोद्ड्राढ्डिभावो नात्र प्रयासः कश्चिद्दिति दर्शयति यैवैति । तन्निमित्तमिति । काव्यार्थो विभावादिनिमित्तं येषां रसादीनां ते तथा तेषां भाव्यत्तथा । अनूद्यमाना ये हेत्वादयः तमूदूभूतां विभावाद्यमस्तन्निमित्तं यदुभयं करुणविप्रलम्सात्मकं रसवस्तु रससजातीयं तत्सहकारि यस्य विधीयमानस्य शृङ्गारवह्निर्जनितदुरितदाहलक्षणस्य तस्माद्भावविशेषे प्रेयोल्डारविषये भगवत्प्रभावातिशयलक्षणे प्रतीतिरितिस्नृद्धति । विरुद्धं यदुभयं वारितेजोगतं शीतोष्णं तत्सहकारि यस्मिन् तण्डुलादे कारणस्य तस्मात्कार्यविवोषस्य कोमलभक्तकरणलक्षणस्योत्पत्तिदृश्यते । सर्वत्र हेत्थमेव कार्यकारणभावो बीजाङ्कुरादौ नान्यथा ।
होता है । रस का वाच्यत्व तो तुमने ही सहन नहीं किया, यह शङ्का कर उत्तर देते हैं— 'ऐसा नहीं' यह । विधि और अनुवाद प्रधान और अप्रधान मात्र से सम्पन्न किये जाते हैं और वे व्यंग्यचता में होते ही हैं यह भाव है । यह कहा गया है कि मुख्य रूप में रस ही काव्य वाक्यार्थ होता है । इससे अमुख्य रूप में जहाँ वह अर्थ हो वहाँ रस की अनुवाद—रूपता होती है । वह कहते हैं—'वाक्यार्थ का' यह । अथवा अनुवाद रूप में विरुद्ध रसों का समावेश न हो सहकारो के रूप में तो हो जावेगा इस प्रकार विरोधों का अंगागिभाव सर्वथा उचित ही है; इस विषय में कोई प्रयत्न अपेक्षित नहीं यह दिखलाते हैं— 'अथवा जिनके द्वारा' यह । 'तन्निमित्ता' यह । वे अर्थात् काव्यार्थ विभाव इत्यादि निमित्त हैं जिन रसादिकों के वे उस प्रकार के अर्थत 'तन्निमित्त' होते हैं । उनकी भाववाचक संज्ञा है तन्निमितत्ता ।
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तृतीय उद्योत:
'अनूद्यमानांग'..........'प्रतीति:' इसका आशय यह है कि अनूद्यमान जो हस्तक्षेप इत्यादि रसांगभूत विभावादि तन्निमित्तक जो करुण विप्रलंभात्मक उद्भय रूप रसवस्तु अर्थात् रससजातीय वह सहकारी (होता है) शंकरजी की शराग्निन से उत्पन्न दुरितदाहरूप जिस विधेयमान का उससे भाव विशेष में अर्थात् भगवत्प्रभावातिशय रूप प्रेयोलंकार के विषय में प्रीति होती है यह संगति है । विरुद्ध जो उभयात्मक जल तथा तेजस्वत् शीतोष्ण वे सहकारी होते हैं जिस तण्डुलादि कारण के उससे कोमल भात के करण रूप कार्य विशेष की उत्पत्ति होती है । सर्वत्र बीजांकुर इत्यादि में इसी प्रकार का कार्य-कारण भाव होता है; अन्यथा नहीं । ( प्रश्न ) तो विरोध सर्वत्र अकिञ्चित्कर होगा यह शङ्का करके ( उत्तर रूप में ) कहते हैं-'विरुद्ध फल इत्यादि' इसीलिये कहते हैं—( प्रश्न ) अभिनयार्थक काव्य में इस प्रकार का वाच्य हो तब यदि समस्ताभिनय किया जाये तो विरुद्ध विषय का एक साथ किस प्रकार अभिनय किया जा सकता है यह शङ्का करते हुए कहते हैं—'इस प्रकार' यह । इसका परिहार करते हैं—'अनूद्यमान' यह । अनुवाद किया जानेवाला विरुद्ध आकार का इस प्रकार का वाच्य जहाँ पर हो उस का 'आओ, जाओ, गिरो, उठो' इत्यादि जो विषय उसमें जो बात ( होती है ) वह यहाँ पर भी ( हो जावेगी ) ।
तृतीय उद्योत:
यह कहा गया है—'शिप्रो हत्स्तावलम्ब:' इत्यादि में प्रहस्तादि के भागते हुए इत्यादि के उपपादनक्रम से प्राकरणिक अर्थ दिखलाया जाना चाहिये । यद्यपि यहाँ पर करुण भी परांग ही है तथापि विप्रलम्भ की अपेक्षा उसकी प्राकरणिकता निकट है क्योंकि महेश्वर के प्रभाव के प्रति उसका उपयोग होता है और 'कामिनो के समान' इस उत्प्रेक्षा और उपमा के वल पर आया हुआ विप्रलम्भ तो दूर है । इस प्रकार 'साक्षान्नेत्रोत्पलाभ:' यहाँ तक प्रधानतया करुण के उपयोगी अभिनय के क्रम से और करुण के सादृश्य के कारण लेशमात्र विप्रलम्भ की सूचना करके (अभिनय किया गया है ।) यद्यपि 'कामिनो के समान' यहाँ पर प्रणयकोप के योग्य अभिनय किया गया गया है तथापि उससे प्रतीममान भी यह विप्रलम्भ शीघ्र बाद में ही 'वह पाप को जलावे' इसके अभिनय किये जाने पर जोरदार अभिनय से समर्पित जो भगवान् का प्रभाव उसकी अंगता में पर्यवसित होती है । इस प्रकार कोई विरोध नहीं है । इस विरोध-परिहार का उपसंहार करते हैं—'इस प्रकार' यह ।
तृतीय उद्योत:
तारावती—(प्रश्न) विधि और अनुवाद (उद्देश्य और विषयेय) ये दोनों शब्द वाक्यार्थबोध में प्रयुक्त किये जाते हैं और इनका विशेष प्रयोग मीमांसा दर्शन में होता है। जो प्रधान रूप में वाच्य हो उसे विधि कहते हैं और जो अप्रधान रूप में वाच्य हो उसे अनुवाद कहते हैं । विधि और अनुवाद की यही परिभाषा है । आप स्वयं ही इस बात को सहन नहीं करते कि रस कभी भी वाच्य हो सकता है । जब रस कभी वाच्य होता ही नहीं तब रस में विधि और अनुवाद शब्दों का प्रयोग कहाँ उचित कहा जा सकता है ? ये दोनों शब्द वाच्यार्थविषयक ही हैं । (उत्तर) विधि और अनुवाद का प्रयोजक तत्त्व केवल यही है कि उनमें प्रधानता और अप्रधानता का विचार किया जाये और जो प्रधान हो उसे विधि तथा जो अप्रधान हो उसे अनुवाद कह दिया जाये । विधि और अनुवाद होने के लिये ऐसा कोई नियम नहीं है कि ये दोनों वाच्य में ही होते हैं । अतः यह नहीं कहा जा सकता कि वाच्य न होने से रसों के विषय में विधि और अनुवाद इन शब्दों का प्रयोग नहीं किया जा सकता । वाक्यार्थ दोनों हो सकते
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हैं—वाच्यार्थ भी और व्यङ्ग्यार्थ भी । यदि वाच्यार्थ के विषय में विधि और अनुवाद का प्रयोग किया जा सकता है तो व्यङ्ग्यार्थ रस के विषय में भी वह प्रयोग क्यों नहीं हो सकता ? यह पहले ही बतलाया जा चुका है कि मुख्य रूप में रस ही वाक्य का अर्थ होता है क्योंकि तात्पर्य का पर्यवसान रस में ही होता है । अतः यह ठीक ही है कि जहाँ रसरूप पर्यवसित अर्थ मुख्य न हो वहाँ रस भी अनुवादरूपता को धारण कर सकता है यह उचित ही है । आशय यह है कि रस भी वाक्यार्थ होता है अतः रस के विषय में भी गुण मुख्य यह व्यङ्ग्यार्थ अथवा विधि और अनुवाद यह व्यवहार उचित ही कहा जा सकता है । (यहाँ पर यह प्रश्न हो सकता है कि यह बात सर्वसममत नहीं है कि काव्यवाच्यो द्वारा रसों का ही प्रतिपादन होता है और इसीलिये रस ही मुख्य वाक्यार्थ होते हैं ऐसी दशा में रसों के विषय में विधि और अनुवाद के प्रतिपादन की क्या व्यवस्था होगी? इसी प्रश्न का उत्तर देने के लिये पक्षान्तरों की व्याख्या की जा रही है ।) अथवा यहाँ पर यह समझना चाहिये कि रसों का आक्षेप विभाव इत्यादि से होता है । यदि विभाव इत्यादि अनुचित हों तो रसों को अनूदित मानने में भी कोई विप्रतिपत्ति नहीं हो सकती । जब रसों का आक्षेप वाक्यार्थ और वाच्य के द्वारा होता है तब उन आक्षेप करनेवाले तत्त्वों में जो विधि और अनुवादरूपता रहती है वह यदि आक्षेप्य रस इत्यादि में भी आ जावे तो उसका निवारण कौन कर लेगा ? (यहाँ पर द्वितीयतिकार ने लिखा है कि 'चकार' अर्थात् 'वाक्यार्थ और वाच्य' में 'और' का प्रयोग प्रकृतिस्थ मालूम पड़ता है क्योंकि उसके अर्थ का यहाँ पर अन्वय नहीं होता अतः उस 'और' की विवक्षा नहीं होती । सम्भवतः द्वितीयतिकार का मन्तव्य यहाँ पर यह है कि वाक्यार्थ या तो रस हो सकता है या वाच्यार्थ । रस से यहाँ अभिप्राय हो ही नहीं सकता क्योंकि यहाँ पर रस के आक्षेप करनेवाले तत्त्वों का उल्लेख किया गया है । यदि वाच्यार्थ ही यहाँ पर अभिप्रेत है तो वाक्यार्थ ही वाच्य होता है । अतः वाक्यार्थ और वाच्य कहने का क्या अभिप्राय ? किन्तु यहाँ पर यह ध्यान रखना चाहिये कि न तो वाच्य केवल वाक्यार्थ ही होता है और न केवल वाक्यार्थ रस का आक्षेप करनेवाला होता है वाच्य पदार्थ के द्वारा भी रस का आक्षेप हो ही जाता है । यहाँ पर आचार्य का मन्तव्य यही है कि रस का आक्षेप चाहे वाक्यार्थ के द्वारा हुआ हो चाहे किसी दूसरे वाच्यार्थ के द्वारा, आक्षेपक तत्त्वों में रहनेवाला विधि और अनुवाद का व्यवहार रस के विषय में भी घटित हो ही सकता है ।) अथवा यदि आप इस बात को नहीं मानना चाहते कि अनुवादरूप होने के कारण विरुद्ध रसों का समावेश दूषित नहीं होता तो न मानिये, यह तो आप मानेंगे ही कि सहकारी होने के कारण रस के विषय में विधि और अनुवाद इन शब्दों का व्यवहार अनुचित नहीं कहा जा सकता । अतः सर्वथा विरुद्धों का अंगाङ्गिभाव उचित ही है इस विषय में प्रयास (जवरदस्ती) कोई नहीं किया जा रहा है । जो लोग यह नहीं मानते कि रस साक्षात् काव्यार्थ होते हैं वे इतना मानेंगे ही कि साक्षात् काव्यार्थ विभाव इत्यादि वाच्यार्थ ही होते हैं और उन वाच्यार्थों द्वारा रस इत्यादि का आक्षेप होता है । इस प्रकार यह सिद्ध हो गया कि उनको इतना तो मानना पड़ेगा कि काव्यार्थ विभाव इत्यादि रस में निमित्त होते हैं । ऐसी दशा में भी प्रस्तुत पद 'क्षितो हस्तावलग्नः' इत्यादि में कोई विरोध नहीं आता । इस पद में त्रिपुरासुर आलम्बन
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तृतीय उद्योतः
है, त्रिपुर-युवतियां आश्रय है और उनके द्वारा हाथ से क्षिस कर देना इत्यादि अनुभव है। ये जो रसांगभूत विभाव इत्यादि हैं उनको निमित्त मानकर करुण और विप्रलम्भ इन दोनों रसों की अभिव्यक्ति होती है। ये दोनों ही रसरूप वस्तु हैं अर्थात् ध्वनिरूप पूर्ण रस नहीं अपितु दूसरे तत्व को पुष्ट करनेवाले रस-सजातीय तत्व हैं। शम्भु की शराग्नि से जो दूषित-दाह होता है वही विधीयमान अंश है। उस विधीयमान अंश के ये दोनों करुण और विप्रलम्भ रस सहकारी हो जाते हैं। उस विधीयमान अंश से एक विशेष भाव में, जोकि भगवान् के प्रभावातिशय रूप में प्रयोलड्कार कहा जा सकता है, प्रतीति हो जाती है। यही इस ग्रन्थ की संगति है। आशय यह है कि हेत्वादि वाच्यसामग्री से करुण और विप्रलम्भ इन दोनों की मिश्रित प्रतीति होती है जो कि भगवान् के प्रभावातिशय को पुष्ट करने के कारण उसकी सहकारिणी है। भगवान् का प्रभावातिशय प्रयोज्यड्कार के क्षेत्र में आ जाता है। (यहाँ पर दीपितिकार ने लिखा है- ‘लोचनकार ने जिस प्रयोलड्कार को समझता है वह यहाँ पर नहीं होता, क्योंकि शिवविषयक रति भाव की ही यहाँ सभी ओर से प्रधानता है और प्रयोलड्कार वहीं पर होता है जहाँ भाव अप्रधान हो। किन्तु यदि अलंकार में ही पक्षपात हो तो शृङ्गार और करुण के अंग होने के कारण रसवत् अलंकार का निर्णय कर लिया जावे।’ यहाँ पर निवेदन यह है कि लोचनकार ने कविगत शिवविषयक रतिभाव को प्रयोलड्कार नहीं कहा है और शिवविषयक रति प्रयोलंकार हो भी नहीं सकती क्योंकि वह तो ध्वनि रूप में स्थित है। करुण और विप्रलम्भ के द्वारा शकूर जी के प्रभावातिशय की पुष्टि होती है और प्रभावातिशय के द्वारा कविगत रतिभाव की। इस प्रकार प्रभावातिशय (शिव जी का उत्साह जो भावरूप में स्थित है) अपरांग होकर प्रयोलड्कार बन गया है। इसमें किसी प्रकार की अनुपपत्ति नहीं हो सकती। यह भी ठीक ही है कि करुण और विप्रलम्भ ये दोनों रसवत् अलंकार हो गये हैं। दो विरोधी सहकारी कारणों से विशेष कार्य की उत्पत्ति देखी ही जाती है। उदाहरण के लिये जल शीतस्पर्शवाला होता है और अग्नि उष्णस्पर्शवाली। दोनों जाती है। उदाहरण के लिये जल शीतस्पर्शवाला होता है और अग्नि उष्णस्पर्शवाली। दोनों के विरोधी हैं किन्तु दोनों ही मिलकर सहकारी कारण बनकर भात पकाने का काम करते हैं और उनसे कोमल भात पक जाना रूप विशेष कार्य की उत्पत्ति हो जाती है। इसी प्रकार बीज के उगाने के लिये शीतल जल और भूमिगत उष्णता दोनों का सहकार अपेक्षित होता है, यही बात सभी कार्य-कारण भावों के विषय में समझनी चाहिये। प्रस्तुत पद्य में भी विरोधी करुण और विप्रलम्भ सहकारी बनकर शिव के प्रभावातिशय रूप कार्य को पुष्ट करते हैं।
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(प्रश्न) इस प्रकार का परिहार तो सर्वत्र सम्भव है फिर विरोध कहाँ रह गया ? (उत्तर) कारण का विरोध वहाँ पर विरोध तो सर्वत्र इसी प्रकार अकिञ्चित्कर हो जावेगा। (उत्तर) कारण का विरोध वहाँ पर आवेगा जहाँ एक ही कारण एक ही साथ दो विरोधी फलों को उत्पन्न करें। हो विरोधियों का सहकार विरोधी नहीं माना जाता। आशय यह है कि एक ही वस्तु एक ही साथ दो विरोधियों को जन्म नहीं देती जैसे जल एक ही साथ शीत और उष्ण इन दोनों फलों को उत्पन्न नहीं कर सकता। किन्तु दो विरोधी तत्व एक ही कार्य के सहयोगी तो हो ही सकते
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हैं। यही बात 'विरुद्ध का उपादान' इत्यादि में कही गई है। (लोचनकार ने यहाँ पर 'नोपादानं विरुद्धस्य' केवल इतना ही अंश उद्धृत किया है। पूरी कारिका का पता नहीं है। सम्भवतः इस कारिका का अर्थ यही होगा कि सहकारी के रूप में विरोधियों का उपादान सदोष नहीं होता।) (प्रश्न) यदि इस प्रकार का वाक्य किसी ऐसे काव्य में आवे जो अभिनय के मन्तव्य से लिखा गया हो और उस समस्त वाक्य का अभिनय करना हो तो एक साथ ही दो विरोधियों का अभिनय कैसे किया जा सकेगा? (उत्तर) वाच्य में जब दो विरोधी तत्त्व उददेश्य रूप में आ जाते हैं उनका भी तो अभिनय किया ही जाता है। जैसे 'आओ, जाओ, उठो, गिरो', इत्यादि वाक्य में उद्ददेश्य रूप से दो-तीन विरोधी तत्त्व आये हैं। अभिनय तो इनका भी किया ही जाता है। वहाँ जो बात अभिनय के लिये होती है वही यहाँ पर भी हो सकती है।
विरोधियों के अभिनय पर विचार
ऊपर अभिनय के विषय में जो कुछ कहा गया है उसका आशय यह है——यदि 'खिसो हस्तावलग्न:' इत्यादि पद्य का अभिनय करना हो तो सर्वप्रथम भीत और विप्लुत दृष्टि के उपपादन के द्वारा प्राकरणिक अर्थ का अभिनय किया जाना चाहिये। यहाँ पर वस्तु का विभाजन इस प्रकार किया जा सकता है——(१) शङ्कर जी के प्रभावातिशय से परिपुष्ट कविगत शङ्करविषयक रति (भक्ति) भाव। (२) शङ्कर जी के प्रभाव को पुष्ट करनेवाला विप्रलब्ध युवतियों का करुण रस, (३) 'कामी' के इस उपमा के बल पर आया हुआ शृङ्गार रस। शङ्कर जी का प्रभावातिशय सर्व प्रमुख है, और करुण तथा शृङ्गार दोनों गौण हैं, क्योंकि दोनों ही शङ्कर जी के प्रभावातिशय को पुष्ट करनेवाले होने के कारण अपराङ्ग हो गये हैं। किन्तु इन दोनों में विप्रलम्भ शृङ्गार की अपेक्षा करुण शङ्कर जी के प्रभावातिशय के अधिक निकट पड़ता है क्योंकि उसका उपयोग शङ्कर जी के प्रभावातिशय के द्योतन में अधिक होता है, अतः प्राकरणिकता उसमें अधिक है। शृङ्गार तो बहुत दूर है क्योंकि उसका शङ्कर जी के प्रभावातिशय में बहुत ही कम उपयोग होता है, 'कामी के समान' इस उपमा के बल पर ही उसका उपादान हुआ है, अतः प्राकरणिक अर्थ को चमत्कारपूर्ण बनाने में ही उसका उपयोग है, मुख्यार्थ को पारपुष्ट करने में उसका उपयोग नहीं है। अतः जब प्रस्तुत पद्य का अभिनय किया जावेगा तब 'सानुनेत्रोत्पलाभि:' यहाँ तक करुण रस का उपयोगी अभिनय ही किया जावेगा और साथ-साथ बहुत थोड़े रूप में विप्रलम्भ से करुण के सादृश्य की सूचना भी जावेगी। (दो विरोधियों का एक साथ अभिनय सम्भव नहीं है, अतः पहले करुण का अभिनय किया जावेगा और बाद में विप्रलम्भ की सूचना दी जावेगी।) 'कामी के समान' यहाँ पर यद्यपि प्रणयकोप के लिये उचित अभिनय किया गया है तथापि उससे जिस विप्रलम्भ की अभिव्यक्ति होती है वह मुख्य नहीं हो पाता। अपितु 'वह शङ्कर की शरारिन आपके पापों को जला डाले' इस वाक्य से जो बहुत ही जोरदार अभिनय होता है और उससे शङ्कर जी के जिस प्रभावातिशय का समर्थन होता है उसमें विप्रलम्भ भाग बनकर पर्यवसित होता है। इस प्रकार विधि और अनुवाद का आश्रय लेने से अर्थात् यह मान लेने से कि दो विधियों का विरोध हो दूषित होता है, दो उद्देश्यों का जो एक ही विधि को पुष्ट कर रहे हों विरोध दूषित नहीं होता, यहाँ पर विरोध का परिहार हो जाता है।
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(ध्वन्या०)—किञ्च नायकस्याभिननन्दनीयोदयस्य कस्यचित्प्रभावातिशयवर्णने तत्प्रतिपक्षाणां यः करुणो रसः स परोक्षकाणां न वैक्लव्यमादधाति प्रत्युत प्रीत्यतिशय- निमित्ततां प्रतिपद्यते इत्यतस्तस्य न कुण्ठशक्तिकत्वात्तद्विरोधविषयिना न कश्चिद्दोषः । तस्माद्वाव्यार्थीभूतस्य रसस्य भावस्य वा विरोधी रसविरोधीति वक्तुं न्याय्यः, न त्वङ्गभूतस्य कस्यचित् ।
(अनु०) और भी—अभिनन्दनीय उदयवाले किसी नायक के प्रभावातिशय के वर्णन में उसके विरोधियों का जो करुण रस वह परोक्षकों के वैक्लव्य का आधान नहीं करता अपितु अतिशय प्रीति का निमित्त बन जाता है । अतः उस विरोध करनेवाले तत्त्व की शक्ति के कुण्ठित हो जाने से कोई दोष नहीं होता । इसलिये वाक्यार्थ रूप में स्थित रस या भाव का विरोधी रसविरोधी होता है यह कहना न्याय्य है; अङ्गभूत किसी का ( विरोधी कहना ) ठीक नहीं ।
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(लो०)—विषयान्तरे तु प्रकरणान्तरेण विरोधपरिहारमाह—किञ्चेति । परीक- षकाणामिति सामाजिकानां विवेकशालिनाम् । न वैक्लव्यमिति । न तादृशे विषये चित्त- द्रतिरुत्पद्यते करुणास्वादविश्रान्त्यभावात् । किन्तु वीररस योऽसौ क्रोधो व्यभिचारिता- प्रतिपद्यते तत्फलरूपोज्ज्वलजनद्रारेण वीरास्वादातिशय एव पर्यवस्यति । यथोक्तम्—‘रोद्रस्य चैव यत्कर्म स जेयः करुणो रसः’ इति । तदाह— प्रीत्यतिशयेति । अत्रोदाहरणम्—
(अनु०) विषयान्तर में तो प्रकरणान्तर से विरोध परिहार बतलाते हैं—‘और भी’ यह । परीक्षकों का अर्थात् विवेकशाली सामाजिकों का ‘वैक्लव्य नहीं’ यह । उस प्रकार के विषय में चित्तद्रुति उत्पन्न नहीं होती क्योंकि करुण के आस्वाद में विश्रान्ति नहीं होती । किन्तु जो यह क्रोध वीररस के व्यभिचारी भाव का रूप धारण करता है उसका फलरूप यह करुण रस अपने कारण के अभिव्यंजन के द्वारा वीररस के आस्वाद की अधिकता में ही पर्यवसित होता है । जैसा कहा गया है—‘और रौद्र का जो कर्म है वह करुण रस समझा जाना चाहिये ।’ वही कहते हैं—‘प्रीति की अधिकता’ यह । यहाँ उदाहरण—
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तृतीय उद्योतः
कुरवक कुचाघातक्रिडासुखेन वियुज्यसे वकुलविटपिन् स्मर्तव्यं ते मुखासवसेवनम् । चरणघटनाशून्यो यास्यस्यशोक सशोकता- मिति निजपुरत्यागे यस्य द्विषां जगदु: स्त्रियः ॥
हे कुरवक ? कुचाघात के क्रिडासुख से वियुक्त हो रहे हो, हे वकुलवृक्ष ? मुखासव के सेचन का तुम्हें स्मरण करना होगा । हे अशोक ? चरणघटना शून्य होकर सशोकता को प्राप्त होंगे । इस प्रकार जिसके पुर-त्याग के अवसर पर स्त्रियाँ कह रही थीं । ‘अथवा भाव का’ । उस रस में प्रधान स्थायी या प्रधानभूत व्यभिचारी का जैसे विप्रलम्भ में औत्सुक्य का ।
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तृतीय उद्योतः
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विरोध परिहार के अन्य प्रकार
तारावती—उपर जो विरोध—परिहार के प्रकार बतलाये गये हैं उनसे भिन्न एक दूसरा प्रकार भी विरोध—परिहार का है—यदि किसी नायक का उदय हो चुका हो और उसके उस उदय का अभिनन्दन करना हो तो उसके प्रभाव की अधिकता का वर्णन किया जाता है। यदि उसके साथ ही उसके विरोधी राजाओं के करुण रस का वर्णन किया जाय तो उनसे न तो विवेक—शील पाठक ही उद्विग्न होंगे और न आलोचक ही उसे अनुचित बतलावेंगे। कारण यह है कि अनौचित्य वहीं पर होता है तथा पाठकों को वैकल्प वहीं पर उत्पन्न होता है जहाँ चित्तवृत्ति की दशा परस्पर विरुद्ध हो। उदाहरण के लिये करुण रस में चित्तवृत्ति में द्रवण—शीलता उत्पन्न होती है और रौद्र में चित्तवृत्ति दीप्त हो जाती है। दीप्ति और द्रवणशीलता दोनों परस्पर विरोधी हैं। अतः दोनों रूप एक साथ चित्तवृत्ति में कभी उत्पन्न नहीं हो सकते। अब यदि किसी नायक के उदय का अभिनन्दन करना है और उसके लिये उसके विरोधियों के करुण रस का उपादान किया गया है तो इस प्रकार के विषय में अर्थ की परिसमाप्ति करुण रस में नहीं होती क्योंकि करुण रस ऐसे स्थान पर साध्य बन कर नहीं रुपित साधन बनकर ही आता है। ऐसी दशा में चित्त में द्रवणशीला ही उत्पन्न नहीं हो पाती जिससे विरोध की सम्भावना की जा सके। अपितु होता यह है कि ऐसे स्थान पर पाठकों का पूरा ध्यान नायक के उत्कर्ष मे ही केन्द्रित रहता है और उनके अन्दर प्रतिपक्षी से सहानुभूति ही उत्पन्न नहीं हो पाती जिससे उनका हृदय प्रतिपक्षियों के प्रति द्रवित हो ही नहीं पाता। वहाँ पर प्रतिपक्षियों का उपादान तो आलम्बन के रूप में ही होता है आश्रय के रूप में नहीं। अतः उनके भाव से तादात्म्य का प्रश्न ही नहीं उठता। वहाँ पर नायक वीर रस का आश्रय होता है। युद्धवीर में क्रोध व्यभिचारी के रूप में आता है। क्रोध का फल ही शोक होता है। आचार्यों को ऐसी ही मान्यता है। कहा गया है कि—रौद्र का जो कर्म (फल) होता है वही करुण रस समझा जाना चाहिये। नायक की क्रोधपूर्ण चेष्टाओं का ही यह फल होता है कि उनके शत्रुओं की दशा करुणिक हो जाती है। इस प्रकार ऐसे स्थल पर करुण रस अपने कारणों की (रौद्र रस की) अभिव्यंजना करते हुये वीररस में पर्यवसित हो जाता है। इस प्रकार करुण की शक्ति से कुण्ठित हो जाने के कारण उस विरोधी का विधान करनेवाले रस में कोई दोष नहीं आता। एक उदाहरण लीजिये—
तारावती—उपर जो विरोध—परिहार के प्रकार बतलाये गये हैं उनसे भिन्न एक दूसरा प्रकार भी विरोध—परिहार का है—यदि किसी नायक का उदय हो चुका हो और उसके उस उदय का अभिनन्दन करना हो तो उसके प्रभाव की अधिकता का वर्णन किया जाता है। यदि उसके साथ ही उसके विरोधी राजाओं के करुण रस का वर्णन किया जाय तो उनसे न तो विवेक—शील पाठक ही उद्विग्न होंगे और न आलोचक ही उसे अनुचित बतलावेंगे। कारण यह है कि अनौचित्य वहीं पर होता है तथा पाठकों को वैकल्प वहीं पर उत्पन्न होता है जहाँ चित्तवृत्ति की दशा परस्पर विरुद्ध हो। उदाहरण के लिये करुण रस में चित्तवृत्ति में द्रवण—शीलता उत्पन्न होती है और रौद्र में चित्तवृत्ति दीप्त हो जाती है। दीप्ति और द्रवणशीलता दोनों परस्पर विरोधी हैं। अतः दोनों रूप एक साथ चित्तवृत्ति में कभी उत्पन्न नहीं हो सकते। अब यदि किसी नायक के उदय का अभिनन्दन करना है और उसके लिये उसके विरोधियों के करुण रस का उपादान किया गया है तो इस प्रकार के विषय में अर्थ की परिसमाप्ति करुण रस में नहीं होती क्योंकि करुण रस ऐसे स्थान पर साध्य बन कर नहीं रुपित साधन बनकर ही आता है। ऐसी दशा में चित्त में द्रवणशीला ही उत्पन्न नहीं हो पाती जिससे विरोध की सम्भावना की जा सके। अपितु होता यह है कि ऐसे स्थान पर पाठकों का पूरा ध्यान नायक के उत्कर्ष मे ही केन्द्रित रहता है और उनके अन्दर प्रतिपक्षी से सहानुभूति ही उत्पन्न नहीं हो पाती जिससे उनका हृदय प्रतिपक्षियों के प्रति द्रवित हो ही नहीं पाता। वहाँ पर प्रतिपक्षियों का उपादान तो आलम्बन के रूप में ही होता है आश्रय के रूप में नहीं। अतः उनके भाव से तादात्म्य का प्रश्न ही नहीं उठता। वहाँ पर नायक वीर रस का आश्रय होता है। युद्धवीर में क्रोध व्यभिचारी के रूप में आता है। क्रोध का फल ही शोक होता है। आचार्यों को ऐसी ही मान्यता है। कहा गया है कि—रौद्र का जो कर्म (फल) होता है वही करुण रस समझा जाना चाहिये। नायक की क्रोधपूर्ण चेष्टाओं का ही यह फल होता है कि उनके शत्रुओं की दशा करुणिक हो जाती है। इस प्रकार ऐसे स्थल पर करुण रस अपने कारणों की (रौद्र रस की) अभिव्यंजना करते हुये वीररस में पर्यवसित हो जाता है। इस प्रकार करुण की शक्ति से कुण्ठित हो जाने के कारण उस विरोधी का विधान करनेवाले रस में कोई दोष नहीं आता। एक उदाहरण लीजिये—
‘किसी राजा ने शत्रुओं को पराजित कर दिया है। शत्रु अपनी प्रियतमाओं को लेकर अपनी राजधानी से भाग खड़े हुये हैं। उस समय शत्रुओं की स्त्रियाँ करुणापूर्ण स्वर में कहती हैं कि—हे कुरवक ? अभी तक तुम हमारे स्तनों के आघात की क्रोडा का आनन्द लिया करते थे, अब वह आनन्द तुम्हें कहाँ मिलेगा ? हे वकुल वृक्ष ? अब तुम हमारे मुखासब के सेवन का स्मरण किया करना। हे अशोक ? अब तुम्हें हमारे चरणों के प्रहार का सुख नहीं मिल सकेगा, अतः तुम अशोक नहीं रह सकोगे अपितु तु शोको हो जाओगे।’ (ये कविसमयसिद्ध यातियाँ हैं कि अशोक सौभाग्यवती स्त्रियों के चरणाघात से फूलता है; कुरवक आलिंगन से और वकुल मुख का कुल्ला मारने से खिलता है।)
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तृतीय उद्योत:
यहाँ पर कुचाग्रात इत्यादि से शृङ्गार की व्यंजना होती हैं, वह शत्रुओं की करुणा का पोषक होकर उसका अंग बन जाता है। मुख्य वर्ण्य विषय है राजा का प्रभावातिशय । उस प्रभावातिशय को शत्रुओं की करुणा पुष्ट करती है । इस प्रकार विरोधियों का परस्पर सम्मिलन पाठकों के हृदय में विक्षोभ उत्पन्न नहीं करता अपितु प्राकरणिक अर्थ की शोभा बढाता है। अतः यह निष्कर्ष निकला कि वाक्यार्थरूप में स्थित चाहे रस हो चाहे भाव हो और वह भाव भी चाहे उस रस का स्थायी भाव हो चाहे प्रधानौभूत व्यभिचारी हो उसका अर्थात प्रधान रस का विरोधी हीं वास्तविक विरोधी होता है यही कहना ठीक है जैसे यदि विप्रलम्भ शृङ्गार में औत्सुक्य प्रधानीभूत व्यभिचारी भाव हो तो उसका विरोधी वास्तविक विरोधी कहा जावेगा। किन्तु यदि कोई रस या कोई भाव अंग रूप में स्थित हो तो उसका विरोधी होना अकिञ्चित्कर होता है ।
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तृतीय उद्योत:
(ध्वन्यो०) अथवा वाक्यार्थोभूतस्यापि कस्माच्चित्करणरসवিষয়स्य तावृशेन शृङ्गारवस्तुना भङ्ग्यविशेषाष्येण संयोजनं रসपरिपोषायैव जायते। यतः प्रकृतिमधुराः पदार्थाः शोचनीयतां प्राप्ताः प्राग्वस्त्यभाविभिः संस्मयमानेविलासैरधिकतरं शोकारवेशमुपजनयन्ति।
अथवा वाक्यार्थरूप में स्थित किसी करुण रस के विषय का उस प्रकार की शृङ्गार वस्तु के साथ विशेष भङ्गिमा का आश्रय लेकर जो संयोजना की जाती है वह रस परिपोष के लिये ही होती है। क्योंकि स्वभावतः मधुर पदार्थ शोचनीयता को प्राप्त होकर इस प्रकार पुरानी अवस्था में होनेवाले तथा स्मरण किये जाते हुये विलासों से शोक के आवेश को अधिक उत्पन्न करते हैं।
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तृतीय उद्योत:
यथा स रसनोत्कर्षी पौनःस्थनविमर्दनः । नास्योजघनस्पर्शी नोद्विवल्लंसनः करः ॥ तथा त्रिपुरयुवतीनां श्लाघ्यः शरामिनरार्द्रापराघः । कामी व्यवहरति स्म तथा व्यवहृतवानित्यनेनापि प्रकारेणास्त्येव निर्विरोधत्वम् । तस्माद्यथा यथा निरूप्यते तथा तथात्र दोषाभावः ॥
जैसे—'यह वह रसना को ऊपर खींचनेवाला, स्थूलस्तनों का मली-भाँति मर्दन करनेवाला, नाभि, ऊरू तथा जंघाओं का स्पर्श करनेवाला और नींवी को खोलनेवाला हाथ है ।' तथा 'तीन पुरों की युवतियों का श्लाघनीय शरारिनरार्द्रापराघः कामी व्यवहरति स्म तथा व्यवहृतवानित्यनेनापि प्रकारेणास्त्येव निर्विरोधत्वम् । तस्माद्यथा यथा निरूप्यते तथा तथात्र दोषाभावः ।'
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तृतीय उद्योत:
इत्यं च— क्रामत्यः क्षतकामलाड्गुलिललितब्रक्तः सदर्भः स्थलीः पातितयैकवीरैरपदद्वयाश्लिष्यमुन्निनिनः । भूत्कारवलम्बितकरास्तथैव रिनार्योऽघुना द्वार्ग्न परितो रमन्ति पुनरप्युदधावाहा इव ॥
इत्येवमादीनां सर्वेषामेव निर्विरोधत्वमवगन्तव्यम् । एवं तावद्रसादीनां विरोधिरसादिभिः समावेशसमावेशयोरविषयविभागो दर्शितः ।
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ध्वन्यालोके
श्रृङ्गार इत्यादि में । अतः यहां पर त्रिपुरयुवतियों से शङ्कर की शारामिन ने वैसा ही व्यवहार किया जैसा पहले अपराध में आर्द्रंकामी किया करता था । इस प्रकार भी निर्विरोधता है ही ।
वैसे-वैसे दोष का अभाव सिद्ध हो जाता है ।
‘घायल कोमल उँगलियों से प्रवाहित होनेवाले रक्त से भरे हुये अतः महावर लगाये हुये के समान पाँव से दमयंतीरुणी स्थलियों की ओर करती हुई, प्रवहमाने अश्रुभिआ से घुले हुये मुखवाली, डरी हुई अतः अपने हाथों को प्रियतमों के हाथों में पछाड़ये हुये तुम्हारे वैरियों की स्त्रियाँ इस समय दावाग्नि के चारों ओर घूम रही हैं मानों उनके विवाह सन्निहित हों ।’ इत्यादि सभी का निर्विरोधत्व समझा जाना चाहिये ।
इस प्रकार रसादिकों का विरोधी रसादिकों के साथ समावेश और असमावेश का विषय-विभाग दिखला दिया गया ।
(लो०) अधुना पूर्वस्मिन्नेव श्लोके क्षिप्र इत्यादौ प्रकारान्तरेण विरोधं परिहरति-अथवेत् । अयं छात्रभावः-पूर्व विप्रलम्भकरुणयोर्न्यत्राद्भुतभावगमनान्निर्विरोधत्व-मुक्तम् । अधुना तु स विप्रलम्भः करुणस्यैवाङ्गतां प्रतिपन्नः कथम् विरोधीति व्यवस्थाप्यते-तथाहि करुणो रसो इष्टेष्टजनविनिपातादेःविमावादिव्यक्ततम् । इष्टता च नाम रमणीयतामूला । ततश्च कामीवाद्रापराध इत्युप्रेक्ष्येदमुक्तम् । शाम्भवशरवरह्रिचेष्ट-तावलोकने प्राक्तनप्रणयकलहवृत्तान्तः स्मयमाण इदानीं विध्वस्ततया शोकविमावतां प्रतिपचते । तदाह-भ्रूद्धविशेषेति । अग्राम्यतया विभावानुभावादिरूपताप्रापण्या ग्राम्योक्तिविरहितयेत्यर्थः ।
अत्रैव दृष्टान्तमाह—यथा अयमिति । अत्र भूमिश्रवसः समरभुवि निपतितं बाहुं दृष्ट्वा तत्कान्तानामेतदनुशोचनम् । रसनां मेखलां सम्भोगावसरेऽपि न कर्षन्तीति रसनोत्कर्षः ।
अमुना विरोधोदाहरणप्रकारेण बहुत्रं लक्ष्यमुपपादितं भवतीत्यभिप्रायेणाह-इत्यं चेत् । होमामिनधूमकृतं वाष्पाम्बु यद् वा बन्धुग्लतयागदःखोद्वमु । भयं कुमारीजने चितः साध्वसः । एवमिति । तावद्ग्रहणेन वक्तव्यान्तरमप्यस्तीति सूचयति ॥२०॥
(अनु०) इस समय तो ‘क्षिप्र’ इत्यादि पहले श्लोक में ही प्रकारान्तर से विरोध का परिहार करते हैं—‘अथवा’ इत्यादि । यहां पर यह भाव है—पहले अन्यत्र अंगभाव को प्राप्त होने के कारण विप्रलम्भ और करुण का निर्विरोधत्व कहा गया ।
इस समय तो वह विप्रलम्भ करुण की अंगता को प्राप्त होनेवाला विरोधी कैसे यह व्यवस्थापित किया जा रहा है । वह इस प्रकार—यह कहा गया है कि करुण रस इष्टजनों के विनिपात इत्यादि विभाव से होता है और इष्टता तो रमणीयता से ही उद्भूत होती है ।
इससे ‘कामीवाद्रापराध’ इस उत्प्रेक्षा से यह कहा गया है—शङ्कर जी की शरामिन की चेष्टाओं के अवलोकन से पूर्ववर्ती प्रणयकलह का वृत्तान्त स्मरण किया जाता है ।
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३
तृतीय उद्योतः
२०
स्मरण किया जाता हुआ इस समय विध्वस्त हो जाने के कारण शोकविभावता को प्राप्त हो जाता है। वह कहते हैं—‘विशेष भंगिमा के द्वारा’ यह। आश्रय विभाव अनुभाव इत्यादि की प्राप्ति के साथ ग्राम्योक्ति रहित। इसी विषय में दृष्टान्त कहते हैं—‘जैसे यह।’ यहाँ पर युद्धभूमि में पड़ी हुई भूरिश्रवा की बाहु को देखकर उनकी कान्ताओं का यह अनुशोचन है। सम्भोग के अवसरों पर रसना अर्थात् मेखला को ऊपर को खींचनेवाला रसनोत्सर्षी उस विरोोषोद्धरण के प्रकार से बहुत अधिक लक्ष्य उपपादित हो जाते हैं इस अभिप्राय से कहते हैं—‘और इस प्रकार’। होमाग्नि के धूम से उत्पन्न अश्रुजल या बन्धुगृहहत्याज के दुःख से उत्पन्न भय का अर्थ है कुमारजेनोचित साध्वस। इस प्रकार इतने से ‘अंगभाव को प्राप्त होनेवालों की उक्ति छलरहित होती है।’ इस कारिका भाग का उपयोगी निरूपण कर दिया गया यह उपसंहार करते हैं—‘इस प्रकार’। तावत् शब्द से सूचित करते हैं कि और भी कुछ कहना है॥२०॥ तारावती—ऊपर यह दिखलाया जा चुका है कि ‘क्षिप्तो हस्तावलम्बन’। इस पद्य में विरोधी का समावेश सदोष नहीं होता जब यह दिखला रहे हैं कि उसी पद्य में विरोधपरिहार दूसरे प्रकार से भी सम्भव है और केवल दोषपरिहार ही नहीं अपितु उसमें गुणरूपता भी आ सकती है। पहले यह बतलाया गया था कि प्रस्तुत पद्य में विप्रलम्भ और करुण दोनों ही एक तीसरी रसवस्तु शंकरविषयक भक्तिभाव का पोषण करते हैं अतः परांग होने के कारण दोनों का परस्पर विरोध नहीं होता। अब यह सिद्ध किया जा रहा है कि विप्रलम्भ स्वयं करुण का अंग बन गया है। अतः उनके विरोध का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। यदि करुण रस का विषय वाक्यार्थ हो गया हो अर्थात् वाक्यरचना में करुण रस को प्रधानता प्राप्त हो गई हो और उस प्रकार की विरोधी शृंगारवस्तु के साथ उसकी संयोजना विशेष भंगिमा के साथ की जावे तो वह विरोधियों की सहसंयोजना रसपरिपोषक हो होती है रसविरोधी नहीं। इसको इस प्रकार समझिये—करुण रस का विभाव अर्थात् कारण होता है इष्टजनविनिपात, क्योंकि इष्टजनविनिपात से ही करुण रस सम्भव होता है यह बात कही जा चुकी है और इस विषय में किसी का मतभेद नहीं हैं। वस्तु तभी इष्ट बनती है जब उसमें रमणीयता विद्यमान होती है। क्योंकि रमणीयता ही किसी वस्तु को इष्ट बनानेवाली होती है। सामान्यतया जब हम किसी भी वस्तु की दुर्गति देखते हैं तो हमें दुःख होता ही है, किन्तु यदि वह वस्तु रमणीय भी हो तो हमारा दुःख और अधिक बढ़ जाता है कि जो पदार्थ स्वभाव से ही मधुर था वह कैसी शोचनीय दशा को प्राप्त हो गया? इस प्रकार जितना ही हम उसकी पुरानी गौरवपूर्ण आनन्ददायक दशा का स्मरण करते हैं उतना ही हमारा शोकावेश अधिकाधिक बढ़ता चला जाता है। इस प्रकार विरोधी होते हुए भी शृंगार की व्युत्पत्ति हुई आनन्दमय दशा का स्मरण शोक को बढ़ाता ही है किन्तु शर्त यह है कि उसकी संयोजना नवीन भंगिमा के साथ करुण के परिपोषक के रूप में की गई हो! यह परिपोषकता शृंगार रस में तब आती है जब वर्णन में ग्राम्यता व आने पावे, शृंगार रस करुण के विभाव अनुभाव इत्यादि रूपों में परिणत हो जावे और उसमें ग्राम्य उक्तियों का अभाव हो। एक उदाहरण—महाभारत के स्त्रीपर्व में
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हताहत सैनिकों को आलम्बन मानकर शोक का वर्णन किया गया है। शोक का पूर्ण परिपाक स्त्रीपर्व में ही होता है। भूरिश्रवा की स्त्रियाँ अपने मरे हुये पति का कटा हुआ हाथ देखती हैं और विलाप करती हुई कहती हैं—
'यह वही हाथ है जो सहवास के लिये हमारी रसना को ऊपर उठाया करता था, जो हमारे स्थूल स्तनों का विमर्दन किया करता था और हमारी नाभि ऊरु तजा जंघाओं का स्पर्श किया करता था'
यहाँ पर करुण के प्रसंग में शृंगार काल की सम्बोगचेष्टाओं का वर्णन किया गया है। ये चेष्टायें करुण का अंग बन गई हैं क्योंकि शोक को अधिक तीव्रता प्रदान कर देती हैं : इसी प्रकार 'क्षिप्तो हस्तावलग्नः' में 'मानो अपराध में आर्द्र कामी हो' इस उल्लेख का प्रयोग किया गया है। इस उल्लेख से शोक की भावना अधिक तीव्र हो जाती है। जब उन त्रिपुर-युवतियों ने शंकर जी के बाण की अग्नि का उपद्रव देखा तब उन्हें अपने पूर्वानुभूत प्रियतम समागम का स्मरण हो आया। कहाँ तो उनके प्रियतमों की वह चाटुकारिता जब कि अपनी प्रियतमाओं से तिरस्कृत होकर भी वे उनकी चाटुकारिता ही करते थे और कहाँ उनकी यह दुर्दशा। वैसे भी किसी की दुर्दशा करुणाभाव ही जागृत करती है; किन्तु जब यह ज्ञात होता है कि दुर्दशा-प्रस्त व्यक्ति पहले कितना आनन्दपूर्ण सम्पन्न जीवन व्यतीत करता था और अब उसके समस्त आनन्द समाप्त हो गये तब करुणाभाव और अधिक तीव्र हो जाता है। इस प्रकार जितना अधिक निरूपण किया जावे उतना ही प्रस्तुत पद्य निर्दोष ही सिद्ध होता है।
यह विरोध का उद्धार केवल एक ही पद्य में नहीं किया जा सकता। अनेक लक्ष्य ऐसे हो सकते हैं जहाँ इस प्रकार विरोध का उद्धार किया जा सकता है। एक और उदाहरण लीजिये—
किसी राजा ने अपने समस्त शत्रुओं को विचिछिन्न कर दिया है। वे शत्रु अपनी प्रियतमाओं को लेकर जंगल को भाग गये हैं। उस समय का वर्णन करते हुये कवि कहता है कि—वे शत्रुस्त्रियाँ दावाग्नि के चारों ओर घूम रही हैं उस समय ऐसा मालूम पड़ता है मानों उनका पुनः विवाह हो रहा हो (विवाह में अग्नि की परिक्रमा की ही जाती है)। वे ऐसे स्थलों को पार कर रही हैं जहाँ कुआँ बिनारे हुये हैं। कुशों से उनके पैर लाल हो गये हैं तब उनकी ऐसी शोभा हो गई है मानों उनके महावर लगाया गया है (विवाह में भी कुछ बिछा—कर उन पर भंवरों में पैर रख्खे जाते हैं और पैरों में महावर लगाया जाता है)। उन पर जो आपत्ति पड़ी है उसके कारण उनके आँसू बह रहे हैं जिससे उनके मुख घुल गये हैं। (विवाह में भी एक तो होम के धुयें के कारण कुमारियों के आँसू बहते हैं दोसरे उन्हें अपने बन्धुजनों के परित्याग का दुःख होता है उससे भी उनके आँसू बहते हैं)। वे डरी हुई हैं क्योंकि राज-महलों को छोड़कर पहले पहल उन्हें उन्हें बनों के भयावह दृश्यों का साक्षात्कार हुवा है। (विवाह में भी कुमारियों का स्वभाव ही डरना होता है। पहले पहल अपने प्रियतमों के सम्पर्क में उन्हें भय का अनुभव होता है)। उन्होंने अपने हाथ अपने पतियों के हाथों में दे दिये हैं
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तृतीय उद्योत:
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इदानीन्तेषामेकप्रबन्धनिवेशने न्याय्यो यः क्रमस्तं प्रतिपादयितुमुख्यते—
(ध्वन्या०)—इदानीन्तेषामेकप्रबन्धनिवेशने न्याय्यो यः क्रमस्तं प्रतिपादयितुमुख्यते—
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तृतीय उद्योत:
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प्रसिद्धे डपि प्रबन्धानां नानारसनिबन्धने । एको रसोडङ्गकर्तव्यस्तेषामुत्कर्षमिच्छता ॥२१॥
(अनु०) इस समय उनके एक प्रबन्ध में निविष्ट करने में जो उचित क्रम है उसके प्रतिपादन के लिये कहते हैं—— 'प्रबन्धों का नाना रस निबन्धन प्रसिद्ध होने पर भी उनका उत्कर्ष चाहनेवाले के द्वारा एक रस अंग बना दिया जाना चाहिये' ॥२१॥
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तृतीय उद्योत:
प्रबन्धेषु महाकाव्यादिषु नाटकादिषु वा विप्रकीर्णतया डङ्गडङ्गभावेन बहवो रसा उपनिबध्यन्त इत्यत्र प्रसिद्धौ सत्यामपि यः प्रबन्धानां छायातिशययोगमिच्छति तेन तेषां रसानामन्यतमः कदाचिद्विवक्षितो रसोद्रुत्त्वेन निवेशयितव्य इत्ययं युक्ततरौ मार्गः ।
प्रबन्धों में अर्थात् महाकाव्य इत्यादि में अथवा नाटक इत्यादि में बिखरे हुये रूप में अङ्गाङ्गी भाव से बहुत से रसों को उपनिबन्धन किया जाता है । इस प्रसिद्धि के होते हुये भी जो प्रबन्धों की छाया की अधिकता का योग चाहता है उसके द्वारा उन रसों में अन्यतम किसी विवक्षित रस को अङ्गी के रूप में सन्निविष्ट कर दिया जाना चाहिये यह अधिक उचित मार्ग है ।
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तृतीय उद्योत:
(लो०) तदेवावतारयति—इदानीमित्यादिना तेषां रसानां क्रम इति योजना । प्रसिद्धे डपि । भरतमुनिप्रणीतैर्भिनिरूपिते डप्यर्थः तेषामिति प्रबन्धानाम् । महाकाव्यादिष्वित्यादि शब्दः प्रकारे । अनभिनेयान् भेदानाह, द्वितीयस्त्वभिनेयान् । विप्रकीर्णतयेति । नायकप्रतिनायकपताकाप्रकरणायकादिनिष्ठेत्यर्थः । अङ्गाङ्गिभावेन त्वेकनायकनिष्ठत्वेन । युक्ततर इति । यद्यपि समवकारादी पर्य्यायबन्धादौ च नैकस्यादृत्त्वं तथापि नायुक्तता तस्याप्येवंविधो यः प्रबन्धः तदयथा नाटकं महाकाव्यं वा तदुक्तुष्टतरमिति तरशब्दार्थः ।
(लो०) वही अवतारित करते हैं—'इस समय' इत्यादि के द्वारा । उन रसों का क्रम यह योजना है । 'प्रसिद्ध होने पर भी' यह । अर्थात् भरतमुनि इत्यादि के द्वारा निरूपित होने पर भी । 'महाकाव्यादिषु' इत्यादि शब्दः प्रकारे । अनभिनेयान् भेदानाह, द्वितीयस्त्वभिनेयान् । विप्रकीर्णतयेति । नायकप्रतिनायकपताकाप्रकरणायकादिनिष्ठेत्यर्थः । अङ्गाङ्गिभावेन त्वेकनायकनिष्ठत्वेन । युक्ततर इति । यद्यपि समवकारादी पर्य्यायबन्धादौ च नैकस्यादृत्त्वं तथापि नायुक्तता तस्याप्येवंविधो यः प्रबन्धः तदयथा नाटकं महाकाव्यं वा तदुक्तुष्टतरमिति तरशब्दार्थः ।
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तृतीय उद्योत:
(अनु०) वही अवतारित करते हैं—'इस समय' इत्यादि के द्वारा । उन रसों का क्रम यह योजना है । 'प्रसिद्ध होने पर भी' यह । अर्थात् भरतमुनि इत्यादि के द्वारा निरूपित होने
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पर भी । उनका अर्थात् प्रबन्धों का । 'महाकाव्य इत्यादि में' यहां आदि शब्द प्रकारवाचक है । अनभिनेय भेदों को कहता है; द्वितीय तो अभिनेयों को । 'विप्रकीर्ण रूप में' यह । अर्थात् नायक, पताका और प्रकरी नायक इत्यादि में रहने के कारण । अङ्गाङ्गिभाव के द्वारा अर्थात् एकनायकनिष्ठ होने के कारण । 'अधिक उचित' यह । यद्यपि समवकार इत्यादि में और पर्यायबन्ध इत्यादि में एक का अङ्गित्व नहीं होता तथापि उसकी भी अयुक्तता नहीं होती इस प्रकार का जो प्रबन्ध होता है, जैसे नाटक या महाकाव्य वह अधिक उत्त्कृष्ट होता है यह तर शब्द का अर्थ है ।॥२१॥
तारावती—उपर की कारिका की वृत्ति में 'तावत्' शब्द का प्रयोग कर यह सङ्केत किया गया था कि इस विषय में और भी कुछ कहना शेष है । वह क्या है ? इसी प्रश्न का उत्तर २१ वीं कारिका से दिया जा रहा है । इस कारिका में यह दिखलाया गया है कि यदि कई रस किसी एक प्रबन्ध में आ जावें तो उनके एक में सन्निविष्ट करने का क्रम क्या होना चाहिये ? कारिका का आशय यह है—'यद्यपि यह बात प्रसिद्ध है कि प्रबन्धों में अनेक रसों का निर्वन्धन किया जाता है तथापि यदि कवि अपने प्रबन्ध को उत्त्कृष्ट बनाना चाहे तो उसका कर्तव्य है कि वह एक रस को अङ्गी रस बना दे ।'
'प्रसिद्ध है' कहने का आशय यह है कि भरतमुनि इत्यादि आचार्यों ने इस बात का निरूपण किया है (और काव्य-परम्परा के परिशीलन से भी यही तथ्य प्रकट होता है ।) कि चाहे काव्य अभिनेय न हो जैसे महाकाव्य इत्यादि, और चाहे अभिनेय हो जैसे नाटक इत्यादि, सभी प्रकार के काव्यों में अनेक रस आते हैं वे समस्त रस समस्त काव्य में व्याप्त होते हैं और उनमें कोई अङ्गी होते हैं तथा कोई अङ्ग । कोई रस नायकगत होता है कोई प्रतिनायक गत, कोई पताका (व्यापक प्रासङ्गिक इतिवृत्त) के नायक से सम्बद्ध होता है और कोई प्रकरी (प्रदेशस्थ प्रासङ्गिक इतिवृत्त) के नायक से सम्बद्ध । आशय यह है कि एक नायक में रहने-वाला कोई रस अपने नायक की सत्ता के अनुसार ही महत्व को प्राप्त होता है । यदि प्रधान नायक गत (आधिकाधिक काव्यवस्तु के नायकगत) होता है तो वह अङ्गी होता है, नहीं तो अङ्ग । यह सब प्रसिद्ध है तथापि यदि कवि की कामना हो कि उसका काव्य अत्यन्त रमणीयताशाली हो तो उसे उन समस्त रसों में किसी एक अभीष्ट रस को अङ्गी अवश्य बना देना चाहिये यही अधिक अच्छा मार्ग है । 'अधिक अच्छा' कहने का आशय यह है कि ऐसे भी काव्य होते हैं जिनमें किसी एक रस की प्रधानता नहीं होती । उदाहरण के लिये श्रव्य काव्य में पर्यायबन्ध और दृश्य काव्यों में समवकार ऐसे ही काव्य होते हैं जिनमें विभिन्न रस बिखरे हुये होते हैं और उनमें किसी एक को अङ्गी के रूप में यदि प्रतिष्ठित न किया जावे तो कुछ अनुचित नहीं होता तथापि नाटक या महाकाव्य में एक रस को अङ्गी बनाना अधिक समीचीन होता है ।॥२१॥
(ध्वन्यः)—मतु रसादन्तरङ्गु बहुधा प्रतिपरिसरोपेतु सतु काव्यकलाङ्गितायां न विरुध्यत इत्याश्रद्द्रुच्यते—
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उद्योत:
रसान्तरसमावेशः प्रस्तुतस्य रसस्य यः । नोपहन्त्यज्जितां सोऽस्य स्थायित्वेनावभासिनः ॥२२॥ प्रबन्धेषु प्रथमतरं प्रस्तुतः सन् पुनः पुनरनुसन्धीयमानत्वेन स्थायी यो रस-स्तस्य सकलप्रबन्धव्यापिनो रसान्तरैरन्तरालवर्तिभिः समावेशो यः स नाझितामुपहन्ति ।
(अनु०) परिपोष को प्राप्त होनेवाले बहुत से दूसरे रसों के होते हुये भी एक का अङ्गी होना विरुद्ध क्यों नहीं होता ? यह शङ्का कर कह रहे हैं— 'प्रस्तुत रस का जो दूसरे रसों के साथ समावेश वह स्थायी के रूप में अवभासित होनेवाले इस रस के अङ्गीभाव को नष्ट नहीं करता ॥२२॥ प्रबन्ध में पहले ही प्रस्तुत तथा बार-बार अनुसन्धान किये जाने के कारण स्थायी जो रस उस समस्त प्रबन्ध में व्यापक रस का अन्तरालवर्ती दूसरे रसों के साथ जो समावेश वह उसकी अङ्गिता को उपहत नहीं करता ॥ (लो०)—नन्विति । स्वयं लब्धपरिपोषत्वे कथं पुनस्त्वम् ? अलब्धपरिपोषत्वे वा कथं रसत्वमिति रसत्ववाञ्छतां चाङ्गीभवयोगे कथमेकस्याङ्गित्व-मुक्तिमिति भावः । रसान्तररहित-प्रस्तुतस्य समस्तेतिवृत्तव्यापिनस्तत् एव वितत-व्याप्तिकत्वेनाङ्गिभावोचितस्य रसान्तरैरितिवृत्तवशात्त्वेन परिमितकथाशकल-व्यापिभिर्यः समुपवृंहणं स तस्य स्थायित्वेनैतिवृत्तव्यापिताङ्ग भासमानस्य नाझितामुपहन्ति, अङ्गितां पोषयत्येवेत्यर्थः । एतदुक्तं भवति--अङ्गभूताल्यपि रसान्तराणि स्वविभावादिसामग्रया स्वाव-स्थायां यद्यपि लब्धपरिपोषाणि चमत्कारगोचरतां प्रतिपद्यन्ते, तथापि स चमत्कार स्तावत्येव न परितुष्य विश्राम्यति किन्तु चमत्कारान्तरमनुद्यावति । सर्वत्रैवाङ्गाङ्गि-भावेड्यमेवोदन्तः । यथाहि तत्प्रभान्—
तृतीय
उद्योत:
गुणः कृतात्मसंस्कारः प्रधानं प्रतिपद्यते । प्रधानस्योपकारे हि तथा भूयसी वर्तते ॥ इति ॥२२॥
(अनु०) 'ननु' यह । स्वयं परिपोष को प्राप्त होने पर अङ्गी कैसे ? अथवा परिपोष को न प्राप्त होने पर रसत्व कैसे ? इस प्रकार रसत्व और अङ्गित्व के सिद्ध न होने पर कैसे एक का अङ्गी होना कहा गया है ? यह प्रश्न का भाव है । 'रसान्तर' यह । प्रस्तुत तथा समस्त इतिवृत्त में व्यापक और इसीलिये विस्तृत व्याप्तिवाला होने के कारण अङ्गी होने के अधिकारी (किसी) रस के इतिवृत्त वश आने के कारण परिमित कथाखण्डों में व्यापत दूसरे रसों के साथ जो समावेश अर्थात् उसका अभिवर्धन वह उस स्थायी होने से इतिवृत्त में व्यापक होने के कारण शोभित होनेवाले (रस) की मुख्यता को उपहत नहीं करता अर्थात् अङ्गिता को पुष्ट ही करता है । यह कहा गया है—अङ्गभूत भी दूसरे रस अपनी विभाव इत्यादि की सामग्री से अपनी अवस्था में यद्यपि परिपोष को प्राप्त होकर चमत्कारगोचरता को प्राप्त कर लेते हैं
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तथापि वह चमत्कार उत्पन्न से ही सन्तुष्ट नहीं होता, किन्तु दूसरे चमत्कार की ओर दौड़ता है। अज्ञाज्ञिभाव में सर्वत्र यही घटना होती है। जैसा कि श्रीमान् जी ने कहा है— 'गुण अपना संस्कार करके प्रधान को प्राप्त हो जाता है, और प्रधान के उपकार करने में अधिकता में वर्तमान होता है' यह ॥२२॥
रस के अंगांगरी भाव का औचित्य तारावती—(प्रश्न) रस की परिभाषा करते हुये आचार्यों ने लिखा है कि रस उसे कहते हैं जो वेद्यांतरस्पर्शशून्य हो अर्थात् जिसके आस्वादन के अवसर पर अन्य सभी प्रकार के संवेदनशील पदार्थों का विलरोभाव हो जावे जो स्वप्रकाशानन्द चिन्मय हो और जिसका स्वरूप अखण्ड हो उसे रस कहते हैं। रस की इस परिभाषा को स्वीकार कर लेने पर उनका अंगांगिभाव तो दूर रहा उनका एक साथ समावेश भी कठिन प्रतीत होता है, वह न तो दूसरे का अंग ही हो सकता है और न अंगी ही। यदि स्वसामग्रीसमवधान में ही उसका परिपोष हुवा है। तो वह अंग किस प्रकार हो सकता है? यदि उसका परिपोष दोष नहीं हो गया है तो वह रस ही किस प्रकार कहा जा सकता है? इस प्रकार अनेक रसों के परिपुष्ट हो जाने पर एक की ही अंगी देन वयों सिद्धांतविरुद्ध नहीं है? आशय यह है कि रस कभी अंग नहीं हो सकता और अंग कभी रस नहीं हो सकता। रसत्व और अंगत्व परस्पर विरुद्ध हैं। जब अंगत्व रस में आही नहीं सकता तो कोई एक अंगी भी कैसे हो सकता है ? (उत्तर)— 'प्रस्तुत रस स्थायी के रूप में अवभासित होता है (और वही अंगीरस कहा जाता है।) यदि उसमें (प्रस्तुत रस में) अन्यरसों का समावेश हो जावे तो उसके अंगी होने में कोई उपघात नहीं होता। आशय यह है कि वही रस काव्य में बाङ्गीरस का रूप धारण करता है जो नाटक के बीज के साथ ही सर्वप्रथम उपस्थित हो और काव्य जितना ही आगे बढ़ता जावे वह रस भी साथ साथ परिपोष को प्राप्त होता रहे तथा उसका बार बार अनुसन्धान भी किया जाता रहे। इस प्रकार के रस को हम काव्य का स्थायी रस कह सकते हैं; क्योंकि यह रस समस्त प्रबन्ध में व्याप्त होता है और प्रारम्भ से समाप्ति पर्यन्त स्थिर बना रहता है। बीच बीच में और रस भी आते रहते हैं। उनका समावेश इस व्यापक रस में होता चलता है। अन्य रसों से मिल जाने के कारण उसकी अंगिता (प्रधानता) नष्ट नहीं होती। सारांश यह है कि किसी रस को समस्त इतिवृत्त में व्याप्त होने के ही कारण अंगी होने की योग्यता प्राप्त हो जाती है। इतिवृत्त में कोई एक ही कथा हो ऐसा तो कोई नियम नहीं है। मुख्य कथा एक होती है और उसके साथ छोटी-छोटी कथाओं के खंड गुंथे हुये से चलते रहते हैं। उन छोटी छोटी कथाओं में स्वतन्त्र रसों की सत्ता विद्यमान रहती है। इस प्रकार वे छोटे-छोटे रस उसी व्यापक रस को बढ़ाते हुये चलते हैं और वह व्यापक रूप में ही बढ़ता चला जाता है। छोटे रस उसकी अंगिता नष्ट नहीं होती अपितु पुष्ट ही होती है।
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सन्ध्यादिस्य प्रबन्धशरीरस्य यथा कार्यमेकस्यायि व्यापकं कल्प्यते न च तर्कार्यान्तरैर्न सङ्घीयते, न च तैः सङ्घीयमानस्यापि तस्य प्राधान्यमपचीयते, तथैव रसस्याप्येकस्य सन्निवेशे क्रियमाणे विरोधो न कश्चित् । प्रस्युदितविवेकानामनुसन्धावतां सचेतसां तथैवधे विषये प्रह्लादातिशयः प्रवर्तते ।
इस प्रकार गोण रसों का प्रधान रस में समावेश दूषित नहीं कहा जा सकता और उनका विरोध भी अङ्कित हो जाता है ॥२२३॥ जिस प्रकार प्रबन्ध के एक व्यापक कार्य का विधान किया जाता है उसी प्रकार रस की विधि में भी विरोध नहीं होता ॥२३॥ जिस प्रकार सन्धि इत्यादि से युक्त प्रबन्ध-शरीर के अन्त तक जानेवाले व्यापक कार्य की कल्पना की जाती है और ऐसा नहीं होता कि उसका सादृश्य दूसरे कार्यों से न हो । यह भी नहीं होता कि उनके द्वारा सादृश्य हो जाने पर भी उसकी प्रधानता जाती रहती हो । उसीप्रकार सन्निवेश किये जाने पर रस का भी कोई विरोध नहीं होता । इसके प्रतिकूल उदय हुये विवेकवाले अनुसन्धान करनेवाले सहृदयों का उस प्रकार के विषय में अत्यन्त आनन्द प्रवृत्त हो जाता है ।
दृष्टान्तस्य समुचितस्य निरूपणेनैति भावः । न्यायेन चैतदेवोपपद्यते । कार्यं हि तावदेकमेवाधिकारिकं व्यापकं प्रासङ्किकार्यान्तरोपक्रिय-माणमवश्यमझ्झीकार्यं । तत्पृष्टवर्तिनीनां नायकचिन्तवृत्तीनां तद्लदेवाझ्झाझ्भावः प्रवाहपतित इति किमत्रापूर्वमिति तात्पर्यं । तथैति व्यापितया । यदि वा एककारो भिन्नक्रमः, तथैव तेनव प्रकरणे कार्याझ्झाझ्भाविरूपं रसानामपि बलादेवासावा-पत्तोत्यर्थः । तथा च वृत्तौ वक्ष्यति 'तथैव' इति ।
(लो०)-उपादयितुमिति । दृष्टान्तस्य समुचितस्य निरूपणेनैति भावः । न्यायेन चैतदेवोपपद्यते । कार्यं हि तावदेकमेवाधिकारिकं व्यापकं प्रासङ्किकार्यान्तरोपक्रिय-माणमवश्यमझ्झीकार्यं । तत्पृष्टवर्तिनीनां नायकचिन्तवृत्तीनां तद्लदेवाझ्झाझ्भावः प्रवाहपतित इति किमत्रापूर्वमिति तात्पर्यं । तथैति व्यापितया । यदि वा एककारो भिन्नक्रमः, तथैव तेनव प्रकरणे कार्याझ्झाझ्भाविरूपं रसानामपि बलादेवासावा-पत्तोत्यर्थः । तथा च वृत्तौ वक्ष्यति 'तथैव' इति । कार्यंमिति । 'स्वल्पमात्रं समुद्रिष्टं बहुधा यद्विसर्पति' इति लक्षितं बीजम् । बीजात्प्रभृति प्रयोजनानां विच्छेदे यदविच्छेदकारणं यावत्सम्प्राप्तवन्धं स तु विन्दुः । इति विन्दुरूपयार्थप्रकृत्या निर्वहणपर्यन्तं व्याप्नोति तदाह-अनुयायोति । अननेन बीजं
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विन्दुरुचेत्यर्थप्रकृती संगृह्हीते। कार्यान्तरैरिति । ‘आगर्भादाविमर्शाद्वा पताका विनिवर्तते’ इति प्रासङ्गिकं यत्पत्ताकालक्षणार्थप्रकृतिनिष्ठं कार्यं यानि च ततोऽन्यूनव्याप्तिवर्तते’ तथा प्रकरोलक्षणानि कार्याणि तैरित्येवं पञ्चाननार्थप्रकृतिनां वाक्यैकवाक्यतया निवेश उक्तः । तथाविध इति । यथा तापसवत्सराजे । एवमनने इलोकेनाझाझ्रितायां दृष्टान्तनिरूपणमितिवृत्तबलपततय्वं च रसाझाझ्रिभावस्येति द्वयं निरुपितम् । वृत्तिग्रन्थोऽप्युभयाभिप्रायेणैव नेy: ॥२३॥
(अनु०) ‘उपादान करने के लिये’ यह । भाव यह है कि समुचित दृष्टान्त के निरूपण के द्वारा । और न्याय से यही उपन्न होता है । कार्य तो निस्सन्देह एक आधिकारिक ही प्रासझ्झिक दूसरी कार्यो से उपकार किया जाता हुआ अवश्य अंगीकृत किया जाना चाहिये । उसकी पृष्ठवर्तिनी नायक की चित्तवृत्तियों का उसके बल से ही अझाझ्रिभाव प्रवाह से प्राप्त हुआ है अतः इसमें अपूर्व क्या है ? यह तात्पर्य है । ‘उस प्रकार’ अर्थात् व्यापक रूप में । अथवा ‘एव’ शब्द क्रमभेद से लगाया जाना चाहिये । ‘उसी ही प्रकार’ अर्थात् कार्य के अझाझ्रिभाव के रूप में ही रसों का भी वह बलपूर्वक आ जाता है । अतः वृत्ति में कह्होगे—‘तथैव’ यह । ‘कार्य यह । जो थोड़ी मात्रा में समुचिह्ठ होकर बहुत प्रकार से फैलता है’ यह वीज लक्षित किया गया । बीज से लेकर प्रयोजनों के विच्छिन्न हो जाने पर जो समाहितपर्यन्त अविच्छेद का कारण हो वह तो वीज होता है । इस विन्दुरूप अर्थ प्रकृति से निर्वहण पर्यन्त व्यास कर लेता है—वह कहते हैं—‘अनुपायी’ यह । इससे बीज और विन्दु इन दो अर्थप्रकृतियों का संग्रह हो गया । ‘दूसरे कार्यो से’ यह । ‘गर्भ तक या विमर्श तक पताका निवृत्त हो जाती है’ इस प्रकार ‘पताकारूप जो अर्थप्रकृति में रहनेवाला कार्य और जो उससे कम व्यापितवाला प्रकार इस इलोक के द्वारा अझाझ्रिभाव में दृष्टान्त निरुपण तथा रस के अझाझ्रिभाव में इतिवृत्त के बलपर आना इन दोनों का निरुपण किया गया है । वृत्ति ग्रन्थ की योजना भी इसौप्रकार करनी चाहिये ॥
तारावती—२२ वीं कारिका में जो बात कही गई है उसको सिद्ध करने के लिये २३ वीं कारिका में एक समुचित दृष्टान्त का निरूपण किया गया है । कारिका का आशय यह है :- “जिस प्रकार प्रबन्ध के एक व्यापक कार्य का विधान किया जाता है वही प्रकार रस की विधि में भी अपनाया जा सकता है उसमें कोई विरोध नहीं होता ।” प्रस्तुत कारिका का आशय ठीक रूप से समझने के लिये यह आवश्यक है कि नाट्यवस्तु-विधान की संक्षिप्त रूपरेखा सम्भल ली जानी चाहिये । वस्तु दो प्रकार की होती है—आधारिक और प्रासझ्झिक । प्रत्येक काव्य का एक फल होता है । उस फल पर स्वामित्व वाधिकार कहलाता है । उस अधिकार को लेकर चलनेवाली कथावस्तु को आधिकारिक कथा-वस्तु कहते हैं । प्रासझ्झिक कथावस्तु का उपादान आधिकारिक के उपकार के लिये ही होता
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है। आधिकारिक कथावस्तु समस्त प्रवन्ध में व्याप्त होती है और प्रासङ्गिक काव्य के थोड़े भाग में। प्रवन्धनिर्वाह के लिये ५ कार्यावस्थाओं, ५ अर्थप्रकृतियों और पाँच सन्धियों पर विचार किया जाता है। ५. कार्यावस्थायें होती हैं—आरम्भ, यत्न, प्रत्याशा, नियताप्ति और फलागम। पाँच अर्थप्रकृतियाँ होती हैं—बीज, बिन्दु, पताका, प्रकरी और कार्य, तथा पाँच सन्धियाँ होती हैं—मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श और निर्वहण। इन सन्धियों में प्रत्येक के अनेक अङ्ग भी होते हैं। इन समस्त तत्वों के लक्षण और सन्ध्यङ्गों के लक्षण तथा परिभाषायें नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थों में विस्तारपूर्वक दी गई हैं। इस कारिका का आशय यह है—इस विषय में कोई सन्देह नहीं हो सकता कि सन्धि इत्यादि से युक्त कथा-शरीर में एक व्यापक कार्य स्वीकार करना अनिवार्य है जो कि प्रवन्ध के अन्त तक चला जाता है। आधिकारिक नाट्यवस्तु का प्रवर्तक होता है बीज। बीज की परिभाषा की गई है—‘जो बहुत ही थोड़ी मात्रा में उद्देश्य के रूप में स्वीकार किया गया हो और नाट्यवस्तु में बहुत प्रकार से व्याप्त हो जावे उसे बीज कहते हैं।’ जैसे छोटे से बीज से विशाल वटवृक्ष तैयार हो जाता है उसी प्रकार होने से नाट्यबीज से काव्यकला विशाल केलवृक्ष तैयार होता है। जैसे रत्नावली में ‘दीपादानन्यस्मादृपि’ इत्यादि कथन नाट्यबीज है। बीज को लेकर वस्तु, जब आगे बढ़ती है तब कथासूत्र के प्रवाह में पड़कर कोई ऐसा स्थल आ जाता है जहाँ कथा-प्रयोजन विच्छिन्न होता हुआ सा दिखाई पड़ने लगता है। उस समय कोई ऐसा तत्त्व आ जाता है जो उस वस्तु को और आगे बढ़ा देता है तथा वस्तु को अन्त तक अग्रसर करता रहता है, उस तत्त्व को बिन्दु कहते हैं। बिन्दु का कार्य कथावस्तु में विच्छेद न होने देना है। इस प्रकार आधिकारिक कथावस्तु बीज और बिन्दु इन दो अर्थप्रकृतियों के सहयोग से प्रारम्भ से अन्त तक चली जाती है। (कार्य के विषय में पहले ही बतलाया जा चुका है कि वह एक व्यापक तत्त्व होता है जो प्रारम्भ से अन्त तक चलता रहता है और अन्त में जहाँ बीज का फल से योग होता है वहाँ दर्शकों और पाठकों को कार्य की प्रत्यक्ष प्रतीति होती है।) इस प्रकार बीज, बिन्दु और कार्य इन तीन अर्थप्रकृतियों का सम्बन्ध आधिकारिक कथावस्तु से होता है ओर उसमें बीज तथा बिन्दु के सहयोग से अनुयायी कार्य व्यापक रूप में कल्पित कर लिया जाता है। यह तो हुई आधिकारिक वस्तु की बात। वह आधिकारिक वस्तु प्रासङ्गिक वस्तु से सादृश्य को न प्राप्त होती हो ऐसा नहीं होता। आशय यह है कि आधिकारिक वस्तु के कार्य के साथ अन्य कार्य भी आते ही हैं। ये कार्य दो प्रकार के होते हैं—एक तो ऐसे कार्य जो आधिकारिक कार्य के साथ कुछ दूर तक चलते हैं और उन्हें पताका नाम से अभिहित किया जाता है और दूसरे वे कार्य जो किसी एक देश में आकर वहीं समाप्त हो जाते हैं। उन्हें प्रकरी कहते हैं। पताका या तो गर्भसन्धि तक चलती है या फिर अधिक से अधिक विमर्शसन्धि पर्यन्त जाती है। उसके बाद निवृत्त हो जाती है। इस प्रकार विस्तृत पताका या स्वल्प देशगत प्रकरी को बीज बिन्दु इत्यादि से मिलाकर कथाशरीर का निष्पादन होता है। इस प्रकार मुख्यवस्तु के साथ प्रासङ्गिक वस्तु के सन्निवेश से मुख्य-वस्तु का प्राधान्य समाप्त नहीं हो जाता। इसी प्रकार मुख्य (अङ्गी) रस में अप्रधान रसों का समावेश करने में कोई विरोध
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नहीं होता। इसके प्रतिकूल कहा जा सकता है कि जो सहृदय विवेकशील हैं और ठीक रूप में अंगी का अनुसन्धान करते हैं उन सहृदयों को दूसरे रसों से सङ्घटृणं मुख्य रस के आस्वादन में प्रमोद की मात्रा बहुत अधिक बढ़ जाती है। जैसे तपस्सरस्सराज में। ( इसकी व्याख्या पहले की जा चुकी है। ) इस कारिका में दो बातें कही गई हैं— ( १ ) इतिवृत्ति के दृष्टान्त से यह सिद्ध किया गया है कि जिस प्रकार इतिवृत्त में मुख्य वस्तु के साथ अमुख्य वस्तु का समावेश दूषित नहीं होता और न मुख्य वस्तु की मुख्यता को ही व्याघात लगता है उसे प्रकार अमुख्य रसों के समावेश से मुख्य रस की न तो मुख्यता नष्ट होती है और न किसी प्रकार का विरोध आता है। ( २ ) मुख्य इतिवृत्त का रस मुख्य रस होता है और अमुख्य इतिवृत्त का रस अमुख्य होता है। अतः उनका अंगाङ्गिभाव असंगत नहीं माना जा सकता। वृत्ति ग्रन्थ की योजना भी इन्हीं दो दृष्टिकोणों से को जानी चाहिये।
(ध्वन्या०)—ननु येषां रसानां परस्पराविरोधः यथा वीरभृङ्गारयोः भृङ्गारहास्यो रौद्रशृङ्गारयोर्वीराद्भुतयोर्वीररौद्रयोः रौद्रकरुणयोः शृङ्गाराद्भुतयोरवा तत् भवत्वाङ्गाङ्गिभावः; तेषां तु कथं भवेद्येषां परस्परं बाध्यबाधकभावः ? यथा शृङ्गार-बीभत्सयोरवीरभयानकयोः शान्तरौद्रयोः शान्तभृङ्गारयोर्वा ।
इत्याशङ्क्यचमुच्यते— अविरोधी विरोधी वा रसोरङ्गिनि रसांतरेः । परिपोषं न नेतव्यस्थास्त्याविरोधिता ॥२४॥
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अविरोधी विरोधी वा रसोरङ्गिनि रसांतरेः । परिपोषं न नेतव्यस्थास्त्याविरोधिता ॥२४॥
(अनु०)—( प्रश्न ) जिन रसों का परस्पर अविरोध है जैसे वीर शृङ्गार का शृङ्गार हास्य का, शृङ्गार रौद्र का, वीर अद्भुत का, वीर रौद्रका, रौद्र करुण का अथवा शृङ्गार अद्भुत का, उनमें अंगाङ्गि भाव हो उनका तो कैसे हो जिनका परस्पर बाध्यबाधक भाव है जैसे शृङ्गार वीभत्स का, वीर भयानक का, शान्त रौद्र का अथवा शान्त-शृङ्गार का ?
यह आक्षेप करके यह कहा जा रहा है— 'दूसरे अङ्गीरस में अविरोधी या विरोधी रस को परिपोष को नहीं प्राप्त कराना चाहिये। इससे अविरोधिता होती है' ॥२४॥
(लो०)—शृङ्गारे वीरस्याविरोधी युद्वाद्यनुप्रवेशादिना काव्यार्थनिबन्धनात् । क्वचिद्विरोधी । हास्यस्य तु स्पष्टमेव तद्रुत्वं हास्यस्य स्वयंपुरुषार्थस्वभावत्ववेऽपि समधिकतररक्त-नोत्पादनेन शृङ्गाराङ्गतयैव तथात्वम् । रौद्रस्यापि तेन कथञ्चिद्दविरोधः। यथो-क्तम्—'शृङ्गारश्च तेः प्रभवं सेवते' तैरिति रौद्रशृङ्गारभिः रक्षोदनवोद्भततनुष्ये-कतुम् । केवलं नायिकाविषयमुप्रयत् तत् परिहर्तव्यम् । असम्भाव्यपृथिवीसम्मार्ज-नादिजनितविस्मयतया तु वीराद्भुतयोः समावेशः। यथाह मुनिः—'वीरस्य चैव यत्कर्म सौद्भुतम्' इति। वीररौद्रयोर्धीरोदात्तौ समावेशः क्रोधोत्साहयोर-विरोधात् । रौद्रकरुणयोरपि मुनिनेवोक्तः—'रौद्रस्यैव च यत्कर्म स ज्ञेयः करुणो रसः' इति। शृङ्गाराद्भुतयोरपि । यथा रत्नावल्यामिन्द्रजालिकदर्शने । शृङ्गारवीभत्सयो-रिति । कोऽयं रौद्राद्भुतयोः ? आलम्बन-रिति । ययोर्हि परस्परमूलनात्मकत्वाद् द्वयोस्तु रसत्वं निमग्नरुपतया । न रतिर्यत्तिष्ठति तत् पलायमानरुपतया जुगुप्सेति समानाश्रयत्वेन
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तृतीय उद्योतः
तयोरन्योन्यसंस्कारोन्मूलनत्वम् । भयोत्साहावप्येवमेव विरुद्धौ वाच्यौ । शान्तस्यापि तत्वज्ञानसमृद्धथतसमस्तसंसरविषयनिरवेदप्राणत्वेन सर्वतो निरीहस्वभावस्य विषयशक्तिजीवीताभ्यां रतिक्रोधाभ्यां विरोध एव ।
अविरोधी विरोधी वेति । वाग्रहणस्यायमभिप्रायः—अङ्गरसानपेक्षया यस्य रसान्तरस्योत्कर्षो निबध्यते तदा तदविरुद्धोऽपि रसो निबद्धश्चेत्यावह । अर्थ तु युक्त्याsद्र्धिनि रसेऽङ्गभावतयेनोपपत्तिघंटते तद्विरुद्धोऽपि रसो वच्यमाणेन विषयभेदादियोजननोपनिबध्यमानो न दोषावह इति विरोधाविरोधवकिचित्करौ । विनिवेशनप्रकार एव त्वधातव्यमिति । (अनु०) शृङ्गार से वीर का अविरोध युद्धनय पराक्रम इत्यादि के द्वारा कन्यारत्न लाभ इत्यादि में । हास्य का तो उसका अंग होना स्पष्ट ही है । हास्य के स्वयम् अपुरुषार्थ स्वभाव होते हुये भी अपेक्षाकृत बहुत अधिक रक्षण के उत्पादक होने के कारण शृङ्गार के अंग के रूप में ही पुरुषार्थ स्वरूप प्राप्त होती है । रौद्र का भी किसी प्रकार से उसे अविरोध होता है । जैसे कहा गया है—‘उनके द्वारा बलात् शृङ्गार का सेवन किया जाता है । उनके द्वारा अर्थात् रौद्र प्रकृतिवाले राक्षस, दानव और उद्दत मनुष्यों द्वारा, वहां पर केवल नायिकाविषयक औदात्य का परित्याग कर दिया जाना चाहिये । असम्भव पृथिवी सम्मार्जन इत्यादि से उत्पन्न विस्मय के कारण तो वीर और अद्भुत का समावेश होता है । जैसा कि मुनि ने कहा है—‘वीर का जो कर्म वह अद्भुत’ यह । वीर रौद्र का अधिरोधत भीमसेन इत्यदि में समावेश होता है, क्योंकि क्रोध और उत्साह का विरोध नहीं होता । रौद्र और करुण का भी मुनि ने ही कहा है—‘रौद्र का ही जो कर्म वह करुण रस समझा जाना चाहिये ।
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तृतीय उद्योतः
शृङ्गार और अद्भुत का’ यहां । जैसे रत्नावली में ऐन्द्रजालिक के दर्शन में । ‘शृङ्गार और वीभत्स का’ यह । निस्सन्देह जिनका उद्भव परस्पर उन्मूलनात्मक रूप में ही होता है उसमें क्या अगाङ्गिभाव ? आलम्बन में निमित्तन रूप में रति का उद्भव होता है और उसके पलायन रूप में जुगुप्सा का उद्भव होता है इस प्रकार समानाश्रयत्व वे एक दूसरे के संस्कार का उन्मूलन करनेवाले होते हैं । इसी प्रकार भय और उत्साह के विरोध को भी कहना चाहिये । शान्त भी तत्वज्ञानजन्य समस्त संसार के विषयों से विराग ही प्राण होने के कारण चारों ओर से निरीह स्वभाववाला होता है उसका (उन) रति और क्रोध से विरोध ही होता है जिनका जीवन ही विषयासक्ति ‘विरोधी अथवा अविरोधी’ यह । वा ग्रहण का यह अभिप्राय है—अङ्गीरस की अपेक्षा जिस दूसरे रस का उत्कर्ष निबद्ध किया जाता है तब निबद्ध किया हुआ उसका अविरुद्ध रस भी प्रश्न उठानेवाला होता है । और यदि युक्तिपूर्वक अंगी-रस में अंगभाव की प्राप्ति के द्वारा उत्पत्ति घटित होती है तो विरुद्ध भी रस आगे कहे जाने योग्य विषयभेद इत्यादि की योजना के द्वारा उपनिबद्ध किया हुआ दोषावह नहीं होता, इस प्रकार विरोध और अविरोध अविचल्कर होते हैं । विनिवेशन के प्रकार में ही तो ध्यान देना चाहिये ।
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अविरोधी रसों का विवेचन
तारावती—ऊपर यह सिद्ध किया जा चुका कि दो रसों का अंगाङ्गिभाव सम्भव है ।
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यहाँ पर यह प्रश्न उपस्थित होता है कि कुछ रस तो ऐसे हैं जिनका एक में सन्निवेश सम्भव है और कुछ रस ऐसे हैं जिनका परस्पर सन्निवेश सम्भवव नहीं हैं । जिन रसों का परस्पर सन्निवेश सम्भव है उन रसों का तो अंगांगिभाव बन जाता है । किन्तु जिनका परस्पर सन्निवेश सम्भव नहीं है उनका अंगांगिभाव कैसे बनेगा ? आचार्यों के कथन के अनुसार कुछ रस परस्पर विरोधी होते हैं कुछ अविरोधी । वीर और शृंगार परस्पर अविरोधी रस होते हैं ! ( वीर का आलम्बन होता है विजेतव्य व्यक्ति और शृंगार का आलम्बन होता है प्रेम-पात्र व्यक्ति । एक ही व्यक्ति को आलम्बन मानकर वीर शृंगार दोनों की निष्पत्ति नहीं की जा सकती । क्योंकि जिससे प्रेम करने की इच्छा हो उसी पर विजय प्राप्त करने की कामना नहीं हो सकती । किन्तु यदि आलम्बन भेद हो तो दोनों रसों में विरोध नहीं होता । ) जब कन्यारत्न का लाभ युद्ध नीति अथवा पराक्रम के द्वारा होता है तो शृंगार का वीर से विरोध नहीं होता । ( रघुवंश में प्राप्ति युद्ध के द्वारा हुई थी, वासवदत्ता को उदयन ने योगनन्धरायण के नीतिजन्य उत्साह से प्राप्त किया था और राक्षस विधि से कन्यापहरण मे पराक्रमजन्य उत्साह से कन्या प्राप्त होती है।) हास्य तो स्पष्ट रूप में ही शृंगार का अंग होता है । ( मुनि ने शृंगार की प्रकृति को ही हास्य कहा है ।) समस्त रसों में आश्रय के उपनिबन्धन का अनिवार्य नियम है अर्थात रसों में यह अवश्य ही दिखलाया जाता है कि अमुक भाव किस में उद्भूत हुआ । यदि शकुन्तला के प्रति रति का वर्णन किया जावेगा तो उस रति का आश्रय दुष्यन्त है यह अवश्य दिखलाया जावेगा । किन्तु हास्य रस में हास्य की परिस्थिति (आलम्बन-मात्र) का 'चित्रण किया जाता है । यह अनिवार्यतया नहीं दिखलाया जाता कि उसका आश्रय कौन है अर्थात उस परिस्थिति से हँसी किसको आई । ( उसका आश्रय या तो समस्त सहृदय होते हैं या सहृदयों द्वारा कल्पित कोई व्यक्ति ) तथापि हास्य रस में यह विशेषता होती है कि वह अनुरक्षण बहुत अधिक मात्रा में उत्पन्न करता है और इस प्रकार शृंगार रस के हर्ष को अतिकाधिक तीव्र करता जाता है । अतः हास्य को शृंगार का अंग होकर ही आश्रय प्राप्त होता है। अतः उसी रूप में हास्य के अवयवों की पुष्टि होती है और उसे रसरूपता प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार हास्य और शृंगार का भी परस्पर विरोध नहीं हैं । रौद्र और शृंगार परस्पर विरोधी कहे जाते हैं । किन्तु उनका अविरोध भी किसी न किसी रूप में स्थापित किया जा सकता है । भरत ने कहा है कि राक्षस दानव और उद्धत स्वभाववाले मनुष्य शृंगार का सेवन बलपूर्वक किया करते हैं । किन्तु इतना ध्यान रखना पड़ता है कि जिस नायिका के प्रति उनमें प्रेमप्रवृत्ति दिखलाई जाती है उस नायिका के प्रति क्रोध और उप्रता नहीं दिखलानी पड़ती । प्रेम में व्याघात डालनेवालों तथा अन्य व्यक्तियों के प्रति उनकी उप्रता का वर्णन किया जाता है । शृंगार एक ऐसा रस है जो सभी के लिये हित्य होता है । अतएव जहाँ दानव इत्यादि के उद्धत स्वभाव का वर्णन होता है वहाँ साथ ही यदि किसी सुन्दरी के प्रति उनकी प्रेमलोलुपता का भी वर्णन किया जावे तो किसी न किसी प्रकार शृंगार और रौद्र का परस्पर समावेश हो सकता है । वीर और अद्भुत भी परस्पर विरोधी नही होते ।
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क्योंकि जहाँ वीरों के असम्भव क्रिययों का वर्णन किया जाता है वहाँ वीर और अद्भुत का परस्पर समावेश हो जाता है । मुनि ने कहा हो है कि वीर का जो कर्म वही अद्भुत होता है । घोरोदात्त स्वभाववाले भीमसेन इत्यादि में वीर और रौद्र का समावेश हो सकता है क्योंकि क्रोध और उत्साह दोनों का विरोध तो है ही नहीं । रौद्र और करुण भी विरोधी नहीं होते क्योंकि इनके सम्बन्ध को ही मुनि ने बताया है—‘रौद्र का ही जो कर्म होता है उसी को करुण रस समझा जाना चाहिये ।’ हृदय आश्रय की एकता में दोनों का विरोध होता है । यदि एक में क्रोध हो और उसके विरोधी दूसरे व्यक्ति में करुण हो तो कोई विरोध नहीं होता । शृंगार और अद्भुत भी परस्पर विरुद्ध नहीं होते । उदाहरण के लिये रत्नावली नाटिका में राजा और सागरिका का सम्मिलन ऐन्द्रजालिक की अद्भुत क्रियाओं के द्वारा हुया है और उसी के द्वारा सागरिका से वासवदत्ता की ईर्ष्या-निवृत्ति हुयी है । अतः शृंगार और अद्भुत भी परस्पर अविरोधी होते हैं ।
ऊपर उन रसों का दिग्दर्शन कराया गया है जिनका परस्पर मिल सकना सम्भव होता है और जो एक दूसरे के विरोधी नहीं होते । इसके प्रतिकूल कुछ रस ऐसे भी होते हैं जिनकी उत्पत्ति या सत्ता ही एक दूसरे को उन्मूलित करनेवाली होती है । उदाहरण के लिये शृंगार और बीभत्स को लीजिये । शृंगार का स्थायी भाव है रति और बीभत्स का स्थायी भाव है जुगुप्सा । रति का तो उत्थान ही तब होता है जब आश्रय का मन आलम्बन के प्रति ललकने लगता है और उसी में गड़ जाता है । इसके प्रतिकूल जुगुप्सा का उदय तभी होता है जब आश्रय आलम्बन की ओर से दूर भागने के लिये आतुर हो जाता है । इस प्रकार शृंगार बीभत्स के संस्कारों का उन्मूलन करता है और बीभत्स शृंगार के संस्कारों का उन्मूलन करता है । अतः एक हो आश्रय में एक साथ उन दोनों का कथन संगत नहीं कहा जा सकता । इसी प्रकार भय में आलम्बन से भागने की प्रवृत्ति होती है, और उत्साह में आलम्बन को अभिभूत करने के लिये उसकी ओर बढ़ने की प्रवृत्ति होती है । अतः दोनों विरोधी हैं और दोनों का एक साथ उपादान ठीक नहीं कहा जा सकता । शान्तरस का प्राण होता है निर्वेद जो कि तत्वज्ञान से उत्पन्न होता है और संसार के समस्त विषयों से प्रियक होने की प्रवृत्ति उत्पन्न करता है । अतः सभी ओर से स्वभाव का इच्छारहित हो जाना ही शान्त रस है । इसके प्रतिकूल रति का जीवन है विषयों में आसक्ति । क्रोध भी विषयासक्ति से ही उत्पन्न होता है । क्योंकि जब विषयों के प्रति तीव्र अनुराग होता है तभी विध्न डालनेवालों के प्रति क्रोध उत्पन्न हुया करता है । इस प्रकार विषयों के प्रति विराग और विषयों के प्रति अनुराग इन दोनों में स्वाभाविक विरोध होने के कारण शान्तरस स्वाभाविक रूप में शृंगार और रौद्र का विरोधी है ।
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तृतीय उद्योतः
यह पूर्वपक्ष का प्रश्न है । इसका आशय यह है कि रस का विरोध दो प्रकार का होता है—एक तो सामानाधिकरण्य का विरोध और दूसरा उन्मूल्य-उन्मूलक रूप में विरोध । सामानाधिकरण्य का विरोध कहीं आलम्बन की एकता में होता है, कहीं आश्रय की एकता में
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और कहीं अधिकरण की एकता में । अतः जिन परिस्थतियों से विरोध होता है उनसे भिन्न परिस्थितियों में न तो विरोध होता है और न उनका एक साथ वर्णन दूषित ही कहा जा सकता है । किन्तु जिनका उन्मूल्य-उनमूलक भाव में विरोध होता है उनका विरोध तो अत्यन्तिक होता है अतः उनका एकत्र समावेश दूषित क्यों नहीं होता ? इसी प्रशन का उत्तर २४वीं कारिका में दिया गया है । कारिका का आशय यह है कि---
यदि किसी प्रकरण में कोई एक अंगी रस विधमान हो तो उसके साथ कोई भी दूसरा रस आ सकता है चाहे वह विरोधी हो चाहे अविरोधी । किन्तु शर्त यह है कि दूसरे रस को पूर्णरूप में पुष्ट नहीं करना चाहिए । यदि अंगी रस पूर्णरूप से पुष्ट कर दिया जाता है और दूसरा रस पुष्ट नहीं किया जाता तो विरोध नहीं होना ।।२४८।।
(ध्वन्य०) अद्भिः रसान्तरे श्रृङगारादौ।प्रबन्धपद्ये च सति अविरोधी विरोधी वा रसः परिपोषं न नेतव्यः। तत्राविरोधिनो रसस्याङ्गत्वेन रसापेक्षयात्रन्तमाध्रिष्यं न कतुंव्यमित्ययं प्रथमः परिपोषपरिहारः उत्कर्षसाम्येऽपि तयोर्विरोधासम्भवात् ।
एकन्तो व्वहड्ड पिआ अणणन्तो समरतुरणिङघोसो । गोहेण रणरसे ण अ भडस्स दोलाइर हिअअअमु ।।
यथा---
कण्ठाच्छित्वाक्षमालावलयमिव करे हारमावर्तयन्ती कुल्तवा पर्यडकुबन्धं विषधरपतिना मेखलाया गुणेन । मध्ये मन्त्राऽऽजापसुरद्रुधरपुटव्यक्तहासा देवो संध्यास्यसूआहसिततत्पुरपतिस्तत्र दृष्टा तु वोड्डय्याव ।।
इत्यत्र । (अनु०) यहाँ दूसरे रस श्रृंगार इत्यादि के प्रबन्ध व्यंग्य होने पर अविरोधी या विरोधी रस परिपोष को नहीं प्राप्त किया जाना चाहिये । उसमें अविरोधी रस का अंगी रस की अपेक्षा अत्यन्त आधिक्य नहीं करना चाहिये यह परिपोष का पहला परिहार है; क्योंकि उत्कर्ष साम्य में भी उनका विरोध असम्भव होता है जैसे---
'एक ओर प्रिया रो रही है दूसरी ओर युद्धवाओं का शब्द हो रहा है । प्रेम तथा युद्धरस से वीर का ह्रदय दोलायमान हो रहा है ।'
अथवा जैसे---
'मोतियों की माला को गले से उतारकर रुद्राक्षमाला के समान घुमाती हुई, मेखला के सूत्र से सर्पराज के द्वारा पर्यङकुबन्ध बनाकर मिथ्यामन्त्र जप से फड़कनेवाले अघरपुट के द्वारा गूढ हास को व्यक्त करती हुई संध्या की असूया से पचुपति को हँसनेवाली वहाँ देखी हुई देवी (पार्वती) आपलोगों की रक्षा करें ।' यहाँ पर।
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तृतीय उद्योतः
(लो०) अङ्गिनोति सम्पम्यानादरे। अङ्गिनं रसविशेषमनादृत्य न्याक्कृत्याङ्गभूतो न पोषयितव्य इत्यर्थः। अविरोधतति। निर्दोषतैत्यर्थः।।परिपोषपरिहारेऽत्र त्रीन् प्रकारानाह-तत्रेत्यादिना तृतीय इत्यन्तेन।। ननु न्यूनत्वं कर्तव्यमितिवाच्ये आधिक्यस्य का सम्भावना येनोक्तमाधिक्यं न कर्तव्यमित्याशङ्क्याह—उत्कर्षं साम्य इति।। एकतो रोदिति प्रिया अन्यतः समरतयर्निर्घर्षः। स्नेहेन रणरसन च भटस्य दोलायितं हृदयम् ।। इतिच्छाया। रोदिति प्रियेत्यतो रत्युत्कर्षः। समरतूर्य्यति भटस्येति चोत्साहोत्कर्षः। दोलायितमिति तयोरनूनाधिकतया साम्यमुक्तम् । एतच्च मुक्तकविषयमेव भवति न तु प्रबन्धविषयमिति केचिदाहुः-च्चासत्; आधिकारिकेतिवृत्तेषु त्रिवर्गफलसमप्राधान्यस्य सम्भवात्। तथाहि रत्नावल्यां सचिवायत्तसिद्धित्वाभिप्रायेण पृथिवीराज्यलाभ आधिकारिकं फलं कन्या-रत्नलाभः प्रासङ्गिक फलं नायकाभिप्रायेण तु विपर्ययमिति स्थिते मन्त्रिबुद्धौ च स्वाम्य-मात्यबद्धचौ कत्वात्फलकमिति नीत्या एकीक्रियमानायां समप्राधान्यमेव पर्यवस्यति। यथोकतम्—‘कवे: प्रयत्नान्नेतॄणां युक्ततानाम्’ इत्यलमवान्तरेण बहुना।
(अनु०) ‘अङ्गिनि’ में अनादर में समसी है। अर्थात् अंगी रस विशेष का अनादर करके अर्थात् नीचे गिराकर अंगभूत को पुष्ट नहीं करना चाहिये। ‘अविरोधिता’ अर्थात् निर्दोषता। ‘परिपोष परिहार’ में तीन प्रकारों को कहते हैं है—‘तस्मिन्’ इत्यादि से ‘तृतीय’ यहाँ तक । ‘निस्सन्देह न्यूनत्व करना चाहिये इस कष्टन के उचित होने पर आधिक्य की सम्भावना जिससे कहा गया है कि आधिक्य नहीं करना चाहिये ?’ यह शंका करके कहते हैं—‘उत्कर्षं साम्य में’ इत्यादि । ‘एकतो रोदिति’ यह छाया है। ‘प्रिया रोती है’ ‘इससे रति का उत्कर्ष’ ‘समरतूर्य्य’ इससे और ‘भट’ इससे उत्साह का उत्कर्ष । ‘दोलायमान’ इससे उन दोनों की न न्यूनता न आधिकता इससे साम्य कहा गया है। कुछ लोग कहते हैं कि यह मुक्तकविषय में ही होता है प्रबन्ध विषय में नहीं—यह ठीक नहीं है; क्योंकि आधिकारिक इतिवृत्तों में त्रिवर्ग फल का समप्राधान्च्य सम्भव है । वह इस प्रकार—रत्नावली में सचिवायत्त सिद्धित्व के अभिप्राय से पृथिवी राज्य का लाभ आधिकारिक फल है और कन्यारत्नलाभ प्रासङ्गिक फल है; नायक के अभिप्राय से तो विपरीत है ऐसी स्थिति में ‘स्वामी और मन्त्री की बुद्धि की एकता से ही फल होता है’ इस नीति से मन्त्री की बुद्धि के एक किये जाने पर समप्राधान्य में ही पर्यवसान होता है । जैसा कि कहा गया है—‘कवि के प्रयत्न से नेताओं की’ इत्यादि—बस आधिक अवान्तर की आवश्यकता नहीं ।
युक्तिपूर्वकं रसविरोध के परिहार का निर्देश तारावती—सारांश यह है कि शृङ्गार इत्यादि रस यदि प्रबन्ध के द्वारा व्यंश्य हो रहे हों तो अविरोधी या विरोधी किसी दूसरे रस को पुष्ट नहीं करना चाहिये । ‘या’ कहने का
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आशाय यह है कि यदि अंगी रस के सामने किसी ऐसे दूसरे रस को अधिक उत्कृष्ट बना दिया जाता है जो विरोधी नहीं है तो वह भी एक दोष ही होगा और सहृदयों के अंगुलि-निर्देश का विषय बन जायेगा । इसका प्रतिकूल यदि अंगी रस के साथ किसी ऐसे रस को लाया जाता है जिसका विरोधी है--किन्तु वह रस एक तो पुष्ट नहीं किया जाता; दूसरे युक्तिपूर्वक उसके अन्दर अंगरुपता की सिद्धि सन्निहित कर दी जाती है तो उनका एक साथ निवन्धन सदोष नहीं होता और विरोध औचित्यप्रकर्ष हो जाता है । विरोध परिहार के उपाय भाग चलकर बतलाये जायेंगे । उन्हीं का आश्रय लेकर विरोधियों का परस्पर सन्निहित करना चाहिये ।
आशाय यह है कि निवन्धन के प्रकार के प्रति ही जागरूक रहना चाहिये । यदि निपुणतापूर्वक किन्हीं भी दो रसों का एक साथ सन्निहित कर दिया जाये तो दोष नहीं रह जाता । कारिका में 'अंगिनि' शब्द का प्रयोग किया गया है । इसमें ससम्बी विभक्ति है । यहाँ पर ससम्बी अनादर के अर्थ में हुई है । आशाय यह है कि विशेष प्रकार के अंगी को अनादरपूर्वक दबाकर तथा तिरस्कृत करके ऐसे रस को पुष्ट नहीं करना चाहिये जो अंग-मात्र हो ।
दो रसों के परस्पर समावेश में दोष किस प्रकार नहीं आता और उनके विरोध का परिहार किस प्रकार हो जाता है ? अब इस पर विचार किया जा रहा है । विरोधनिवृत्ति के तीन प्रकार हो सकते हैं । (१) पहला प्रकार यह है--यदि अविरोधी रस को किसी अंगी रस के साथ कहना हो तो उस अविरोधी रस को प्रस्तुत रस के सामने बहुत अधिक नहीं बढाना चाहिये । यह ध्यान देने की बात है कि आचार्य ने यहाँ यह नहीं कहा कि अंगीरस की अपेक्षा अविरोधी रस न्यूना होना चाहिये । यदि न्यूना होना कहा गया होता तो अधिक की सम्भावना ही क्या रह जाती । किन्तु न्यूना न कहने का कारण यह है कि यदि रस विरोधी न हो तो उसको अंगीरस के समकक्ष समान उत्कर्षवाला बना देने में भी विरोध नहीं होता । जैसे--
'कोई वीर वीर्य युद्ध के लिये प्रस्थान कर रहा है--एक ओर वियोगजन्य पीड़ा से उसकी प्रियतमा रो रही है और दूसरी ओर युद्ध के ढोल इत्यादि बाजे बज रहे हैं जिनका शब्द वीर के कानों में पड़ रहा है । एक ओर प्रियतमा का स्नेह है और दूसरी ओर युद्ध का आनन्द हृदय में उमड़ रहा है । इस प्रकार वीर का हृदय झूले पर झूल-सा रहा है । वह निश्चय नहीं कर पाता कि प्रियतमा के प्रेम का स्वागत किया जाय या युद्ध का आनन्द लिया जाय ।' वह प्रियतमा है; केवल पत्नी नहीं । उसका रुदन रति को बढ़ा रहा है जिसके लिये 'स्नेह' शब्द का प्रयोग किया गया है । यह रति शृंगार रस का स्थायी भाव है । युद्ध वाद्य तथा अपने 'भट' होने की भावना से उसके अन्दर उत्साह का उत्कर्ष अभिव्यक्त होता है । जो कि वीर रस का स्थायिभाव है । रति का आलम्बन प्रियतमा है और उत्साह का आलम्बन शत्रु । अतः आलम्बनभेद होने से ये दोनों वीर और शृंगार 'विरोधी रस' नहीं हैं । वीर एक ओर निश्चय नहीं कर पा रहा है । उसका हृदय दोनों ओर बरावर जाती है । अतः वीर और शृंगार दोनों की प्रधानता एक सी ही है । दोनों के समावेश में कोई विरोध नहीं है ।
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तृतीय उद्योत:
दूसरा उदाहरण—
एक बार सन्ध्या प्रमदा की आकृति बनाकर भगवान् शंकर के पास आई और शंकर जी ने उसे स्वीकार किया। इस पर भगवती पार्वती को ईर्ष्या उत्पन्न हुई और उन्होंने शंकर जी की हँसी उड़ाई। उसी का इस पद्य में वर्णन है। 'पार्वती ने अपने कण्ठ से हार को उतार कर उसे रुद्राक्ष माला के बल से सम्मान धारण कर दिया। पर्यड्कबन्ध (वीरासन) बाँध लिया (जिसमें दाहिना पैर बायें ऊरु पर रखा जाता है और बायाँ पैर दाहिने ऊरु पर रखा जाता है।) इस पर्यड्कबन्ध में शंकर जी के नागराज का कार्य उन्होंने मेखला के सूत्र से चलाया। उस समय वे शंकरजी के जप का अनुकरण करने के लिये ओठों को फड़कां रहीं थीं और जप के लिये वे किसी मन्त्र का उच्चारण नहीं कर रहीं थीं अपितु मिथ्या ही जप करती हुई जान पड़ रहीं थीं। उनके ओठों में गुप्तरूप से हँसी छिपी हुई थी जो ओठों के काँपने से कुछ-कुछ प्रकट हो रहीं थी। इस प्रकार देवी पार्वती सन्ध्या की असूया से पशुपति की हँसी उड़ा रहीं थीं। अपने भक्तों के द्वारा इस रूप में देखी हुई देवी आप सब लोगों की रक्षा करें।'
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तृतीय उद्योत:
(यहाँ पर सन्ध्या के प्रति असूया शंकर के प्रति पार्वती के रतिभाव को अभिव्यक्त करती है। इस रतिभाव ने विभाव, अनुभाव, और सञ्चारीभाव के संयोग से शृंगार-रस का रूप धारण कर लिया है। साथ ही शंकर जी की सन्ध्योपासनकालिक चेष्टाओं के अनुकरण तथा अधरपुट में हास की अभिव्यक्ति से हास्य रस भी व्यक्त होता है। यहाँ हास्य और शृंगार दोनों समान बलवाले हैं। शंकर जी का सन्ध्यानुरागविषयक अनुकरण ईर्ष्या को पुष्ट करता है जोकि रतिभाव का पोषक है। साथ ही प्रेम की अधिकता शंकर जी की हँसी उड़ाने में पर्यवसित हुई है। अतः दोनों रस शृंगार और हास्य एक दूसरे के पोषक हैं। अतः समान बलवाले होते हुए भी सदोष नहीं माने जा सकते। दीधितिकार ने लिखा है कि अक्ष-
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तृतीय उद्योत:
माला जप इत्यादि से शान्तरस की अभिव्यक्ति होती है। अतः शान्त और शृंगार का एकत्र समावेश है। किन्तु यह व्याख्या ठीक नहीं हैं। क्योंकि एक तो इस पद्य में पार्वती का वैराग्य व्यक्त नहीं होता। शान्तरस की चेष्टाओं का अनुकरण हास्य को ही अभिव्यक्त करता है। दूसरी बात यह है कि शान्त और शृंगार एक दूसरे के विरोधी रस हैं। प्रस्तुत प्रकरण अविरोधी रसों के समबल होने पर एकत्र समावेश की व्याख्या करनेवाला है। अतः शान्तरस को मानने में प्रकरण की संगति भी नहीं लगती। बालप्रिया में हास्यरस ही माना गया है और वही ठीक है।)
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कुछ आचार्यों ने लिखा है कि यह नियम मुक्तक के विषय में ही लागू होता है प्रबन्ध के विषय में नहीं। किन्तु यह ठीक नहीं है। प्रबन्ध काव्य में भी दो रसों का प्राधान्य समकोटि का हो सकता है। प्रबन्धकाव्यों में आधिकारिक वस्तु का फल ही प्रधान फल कहा जाता है उसी को उद्देश्य मानकर प्रबन्ध काव्य प्रवृत्त होता है। काव्य का फल हो सकता है धर्म अर्थ और काम इन तीनों में किसी एक दो या तीन का साधन। अतः यह असम्मव
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नहीं है कि किसी प्रबन्ध काव्य के दो उद्देश्य हों और दोनों की प्रधानता समान कोटि की हो। उदाहरण के लिये रत्नावली में कथावस्तु के बढ़ने का एक मात्र यही निमित्त है कि योगन्धरायण मन्त्री ने रत्नावली को सागरिका के रूप में राजा के अन्तःपुर में रखा है। नीतिशास्त्र के अनुसार सिद्घियाँ तीन प्रकार की होती हैं—मन्त्री के दृष्टिकोण से, राजा के दृष्टिकोण से, और दोनों के दृष्टिकोण से। रत्नावली में योगन्धरायण का दृष्टिकोण है पृथिवीराज्य की प्राप्ति। यहाँ मन्त्री की दृष्टि से आधिकारिक फल है और कन्यारत्न का लाभ प्रासंगिक फल है। अतः पृथिवीराज्य प्राप्ति के लिये सचेष्ट होने के कारण योगन्धरायण का उत्साह अभिव्यक्त होता है। जो वीर रस पर्यवसायी है। दूसरी ओर नायक उदयन के दृष्टिकोण से कन्यारत्न की प्राप्ति आधिकारिक फल है और पृथिवीराज्य लाभ प्रासंगिक फल। अतः उदयन का शृङ्गार रस अभिव्यक्त होता है। नीति यह है कि फल वही कहा जा सकता है जिसमें स्वामी और अमात्य दोनों की बुद्धि एक ही हो। जब योगन्धरायण और उदयन दोनों की बुद्धि को एक किया जाता है तब योगन्धरायण के उत्साह और उदयन की रति दोनों की प्रधानता समान ही सिद्घ होती है। अतः दो अविरोधी रसों का समकोटिक होना प्रबन्ध में भी सम्भव है, केवल मुक्तक में नहीं।
(ध्वन्य०) अद्घीरसविरुद्धानां व्यभिचारिणां प्राचुर्येणानिवेशनम्, निवेशनेऽवा क्षिप्रमेवाङ्गीरसव्यभिचार्यनुवृत्तिरिति द्वितीयः॥
(अनु०) अङ्गीरस के विरोधी व्यभिचारियों का निवेशन करना अथवा निवेशन करने पर शोघ्र ही अङ्गीरस के व्यभिचारियों की अनुवृत्ति करना यह दूसरा (प्रकार है)।
(लो०) एवं प्रथमं निरुप्य द्वितीयमाह—अद्घीतेः । अनिवेशनमिति । अद्घीरसस्य यो रस इतो शोषः । नन्वेवं नासो परिपुष्टो भवेदित्यशङ्क्य मतान्तरमाह—निवेशनेऽवेत्यादि । अत्र एवं प्रकारः । अन्यथा द्वौ स्यातां अद्घीनो रसस्य यो व्यभिचारी तस्याऽनुवृत्तिरनुसन्धानम् । यथाऽ‘कोपात्कोमललोल’ इति श्लोकेरङ्गीभूतां रतिमद्घीरसस्य क्रोध उपनिबद्धो दृश्यते । ‘बद्ध्वा ददृशम्’ इत्यमरस्य निवेशनस्य क्षिप्रमेव हृदयेऽद्घीरसस्य रत्युत्पत्तेष्टस्यानुसन्धानम् ।
रस इति शोषः। नन्वेवं नासो परिपुष्टो भवेदित्यशङ्कय मतान्तरमाह—निवेशनेऽवेत्यादि । अत्र एवं प्रकारः। अन्यथा द्वौ स्याताम अद्घीनो रसस्य यो व्यभिचारी तस्याऽनुवृत्तिरनुसन्धानम् । यथा—‘कोपात्कोमललोल’ इति श्लोकेरङ्गीभूतां रतिमद्घीरसस्य क्रोध उपनिबद्धो दृश्यते। ‘बद्ध्वा ददृशम्’ इत्यमरस्य निवेशनस्य क्षिप्रमेव हृदये अद्घीरसस्य रत्युत्पत्तेष्टस्यानुसन्धानम् । हर्षानुसन्धानम् ।
(अनु०) इस प्रकार प्रथम प्रकार का निरूपण कर दूसरे को कहते हैं—‘अङ्गीरस इत्यादि । ‘न निविष्ट करना’ यहाँ पर अङ्गभूत रस में यह शोष है। फिर तो निस्सन्देह यह परिपुष्ट नहीं होगा यह शंका करके दूसरा मत कहते हैं—‘अथवा निवेशन में’ यह। इसीलिये ‘वा’ प्रहण उत्तर पक्ष की द्रुतता को सूचित करता है विकल्प को नहीं। अत एव यह एक ही प्रकार है नहीं तो दो हो जायें । अङ्गीरस का जो व्यभिचारी उसकी अनुवृत्ति अर्थात् अनुसन्धान जैसे ‘कोपात्कोमललोल……।’ इस श्लोक में अङ्गीभूत रति में अङ्गभूत जिस क्रोध का उपनिबन्धन किया गया था उसमें ‘बांध कर’ दृढ़ता से’ इन शब्दों से निवेशित अमर्ष का शोघ्र ही ‘रोती हुई के द्वारा’ इससे और ‘हँसते हये’ इससे रति के योग्य ईर्ष्या, औत्सुक्य और हर्ष का अनुसन्धान किया गया है।
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तारावती--रसों के एक में सन्निवेश होने पर दोष होने का दूसरा प्रकार यह होता है—यदि अंगी रस के विरुद्ध किसी अन्य रस को काव्य में सन्निविष्ट किया जावे तो अंगीरस के विरोधी व्यभिचारियों का बहुत अधिकता से निवेश नहीं करना चाहिये और यदि विरोधी व्यभिचारियों का सन्निवेश अनिवार्य ही हो जावे तो उनका उपादान कर उन्हें ऐसा रूप दे देना चाहिये कि वे शीघ्र ही अंगी रस के व्यभिचारियों का अनुरर्तन करने लगें । यह दूसरा प्रकार है जो कि अंगी रस के साथ किसी अंग रस के प्रयोग में दिया जा सकता है । इस द्वितीय प्रकार के दो खंड हैं (१) अंगी रस से विरुद्ध व्यभिचारियों का प्रचुरता से सन्निवेश करना ही नहीं चाहिये और (२) सन्निवेश कर देने पर शीघ्र ही उन्हें अंगीरस के व्यभिचारियों का अनुयायी बना देना चाहिये । इस दूसरे खंड के उद्भावन का कारण यह है कि पहले खंड के अनुसार यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि यदि विरोधी रस के व्यभिचारियों का सम्यक् उपादान नहीं किया जायेगा तो विरोधी रस का परिपोष किस प्रकार हो सकेगा? यदि विरोधी रस का परिपोष न हुआ तो उस अपरिपुष्ट अविकसित अवस्था को रस की संज्ञा ही किस प्रकार प्राप्त हो सकेगी? इसी प्रश्न का समाधान करने के लिये द्वितीय खंड को स्वीकार किया गया है जिसका आशय यह है कि यदि विरोधी रस को पुष्ट करने के लिये व्यभिचारियों का उपादान अपरिहार्य ही हो जाये तो उनका उपादान करना तो चाहिये किन्तु उन व्यभिचारियों को मुख्य रस के व्यभिचारियों का अनुयायी अवश्य बना देना चाहिए। अतएव यहाँ पर द्वितीय खंड के उल्लेख के लिये जिस 'अथवा' शब्द का प्रयोग किया गया है उसका अर्थ वैकल्पिक पक्ष को सूचित करना नहीं है जैसा कि 'अथवा' शब्द का प्रायः अर्थ हुआ करता है अपितु उसका आशय है कि 'अच्छा तो यही है कि विरोधियों के व्यभिचारियों का उपादान किया ही न जाये । परन्तु यदि करना अनिवार्य ही हो तो उसे मुख्य रस की अपेक्षा गौण तथा मुख्य रस का पोषक बना देना चाहिए' । अतः दोनों खंडों को मिलाकर यह एक ही प्रकार है । परिपोष की संगति भी इसीप्रकार हो जाती है । अंग रस का परिपोष निषिद्ध नहीं है । अपितु रस-संज्ञा के लिये उसका परिपोष अवश्यंक है, उसके परिपोष के लिये यदि विरोधी व्यभिचारियों के उपादान की आवश्यकता पड़े तो निस्संकोच भाव से उनका उपादान करना चाहिए किन्तु तत्काल ही अंगीरस के अनुकूल व्यभिचारियों का परिपोषण कर लेना चाहिए । यह है मुख्य पक्ष इस प्रकार इस पक्ष के दो तत्व हैं विरोधियों का उपादान न करना और उपादान करके अंगी का अनुरर्तन कर लेना । इन दोनों में दूसरा तत्व (विरोधियों का उपादान करके अंगी का अनुसरण कर लेना) मुख्य पक्ष है । यदि 'अथवा' शब्द विकल्प-परक माना जायेगा तो ये पुथक्-पृथक् दो प्रकार हो जायेंगे । अंगी के व्यभिचारी को अनुवृत्ति का आशय यह है कि यदि विरोधी गौण रस का अधिक विस्तार हो रहा हो और उससे अंगी रस दृष्टि से द्वेषपूर्ण होता जा रहा हो तो बीच-बीच में इस प्रकार स्मरण कर लेना चाहिए कि विरोधी रस के व्यभिचारी उस मुख्य रस का अनुसरण करते हुये ही जान पड़ें और पाठकों या दर्शकों को मुख्य रस की प्रतीति भी हो जाये । उदाहरण के लिये—'कोपात्कोमललोलबाहु—' इत्यादि पद्य को लीजिये । इस पद्य
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का अंगीरस है शृंगार । नायक के अपराध के प्रमाणित होजाने के कारण नायिका को क्रोध आगया है जो रौद्र रस का स्थायी भाव है । रौद्र को पुष्ट करने के लिये उसके 'बांध कर' 'पाश' 'मजबूती से' इन अनुभवों का उपादान किया गया है । जिससे क्रोध के व्यभिचारी अमर्ष की प्रतीति होती है। रौद्र शृंगार का विरोधी है । अतः अंगी शृंगार का कवि ने तत्काल परिशीलन कर लिया है और उसी निमित्त 'नायिका रो रही थी' 'नायक हँस रहा था' इन अनुभवों का उल्लेख कर दिया है । ये अनुभव रति के व्यभिचारी ईर्ष्या, औत्सुक्य और हर्ष का अनुसंधान करते हैं और अमर्ष रति के इन व्यभिचारियों का अनुयायी बन गया है । (यहाँ पर 'नचैवं नासौ परितुष्यो भवेत्' यही पाठ सभी पुस्तकों में पाया जाता है। रस का परितुष्ट होना कोई स्वाभाविक बात नहीं जान पड़ती । अतः यहाँ पर 'परिपुष्टो भवेत्' यह पाठ कर लिया गया है । यदि 'परितुष्यो भवित' यहि पाठ माना जावे तो भी आशय वही होगा । रस का परितोष उसका परिपोष ही है । इस दशा में यहाँ पर लक्षणिक प्रयोग माना जावेगा ।
(ध्वन्या०) अङ्गस्वेन पुनः पुनः प्रत्यवेक्षा परिपोषं न्यायमात्रस्याप्यङ्गभूतस्य रसस्येति तृतीयः । अन्यया दिशा अन्येऽपि प्रकारा उत्प्रेक्षणीयाः ।
(अनु०) परिपोष का प्राप भी अंगभूत रस का अंग के रूप में पुनः पुनः पर्यवेक्षण यह तीसरा प्रकार है । इसी दिशा से अन्य प्रकारों की भी उत्प्रेक्षा कर लेनी चाहिये ।
(लो०) तृतीय प्रकारमाह—अङ्गस्वेनeti । अत्र च तपस्वत्सराजे वत्सराजस्य पञ्चावतविषयः सम्भोगशृङ्गार उदाहरणीकार्तव्यः । अन्येऽपि तत्र । विभावानुभावानां चापि उत्कर्षो न कर्तव्योऽत्र रसविरोधिनां निवेशनेनैव वा न कार्यमपि कृतमपि चाङ्गिरसविभावानुभावरूपबृहणीयम । परिपोषिता अपि विरुद्धरसविभावानुभावा अङ्गत्वं प्रति जागरयितव्या इत्यादि स्वयं शक्यमुप्रेक्षितुम् ।
(अनु०) तृतीय प्रकार को कहते हैं—अङ्गत्व के रूप में यह और यहाँ पर तपस्वत्सराज में वत्सराज के पञ्चावतीविषयक सम्भोग शृंगार का उदाहरण देना चाहिये । 'दूसरे भी' यह । विभावों और अनुभवों का उत्कर्ष नहीं करना चाहिये अथवा अंगीरस के विरोधियों का निवेश ही नहीं करना चाहिये, किये हुये को भी अंगीरस के विभाव अनुभव इत्यादि के द्वारा बढ़ा दिया जाना चाहिये । परिपोषित किये हुये भी विरुद्ध रस के विभाव और अनुभवों को अंगत्व के प्रति जागृत कर देना चाहिये इत्यादि की कल्पना स्वयं कर लेना चाहिये ।
तारावती—अब तृतीय प्रकार को बतलाते हैं—यदि अंगीरस कोई अन्य हो और किसी अन्य रस को उसके अंग के रूप में अभिव्यक्त किया जा रहा हो तथा उस अंग (अप्रधान) रस को पूर्ण रूप से परिपुष्ट भी कर दिया हो तो वह रस अंग है इस तथ्य की ओर परिशीलकों का ध्यान बार-बार आकृष्ट करते चलना चाहिए । यदि इस नियम का पालन किया जाता है तो एक रस में दूसरे का समावेश सदोष नहीं माना जाता । उदाहरण के लिए तपस्वत्सराज में अंगी रस है उदयन का वासवदत्ता के प्रति शृंगार । वासवदत्ता के मरण के समाचार के बाद उदयन परिस्थितियों से प्रभावित होकर पञ्चावती से विवाह कर लेते हैं । पञ्चावती को आलम्बन मानकर उदयन के सम्भोग शृंगार को वर्णन अंगी रस वासवदत्ता और उदयन के प्रेम
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का अंग बन गया है। पचावली के साथ सम्भोग शृंगार वर्णन पूर्ण रूप से परिपुष्ट हो गया है किन्तु कवि बीच-बीच में उदयन की वियोग-वेदना का वर्णन करता चलता है जिससे वासवदत्ता के प्रति रतिभाव भी परिशोलक की दृष्टि से सर्वथा ओजस्वल नहीं होता। ऐसी दशा में अंग रस का परिपोष भी दूषित नहीं माना जा सकता।
तृतीय
उद्योत:
२३४
विरोधिनस्त रसस्याड्रसापेक्षया कस्यचिन्ल्यूनता सम्पादनीया। यथा शान्तेऽङ्गिनि शृङ्गारस्य शृङ्गारे वा शान्तस्य। परिपोषरहितस्य रसस्य कथं रसत्वमितिचेत्—उक्तमत्राऽङ्गिरसापेक्षयैति। अङ्गिनो हि रसस्य यावान् परिपोषस्तावान्—स्तस्य न कर्तव्यः, स्वतस्तु सम्भवी परिपोषः केन वायते। एतच्चापेक्षिकं प्रकाशयोगित्वमेकस्य रसस्य बहुरसेषु प्रबन्धेषु रसानामङ्गाङ्गिभावमन्युपगच्छताड्यशक्यप्रतिक्षेपमिल्यनेन प्रकारेणविरोधिनां च रसानामङ्गाङ्गिभावेन समावेशे प्रबन्धेषु स्थादविरोधः। एतच्च सर्वं येषां रसो रसान्तरस्य व्यभिचारीभवति इति दर्शने तन्मतेनोच्यते। मतान्तरे तु रसानां स्थायिनो भावाः उपचाराद्रसशब्देनोक्तास्तेषामङ्गत्वं निर्विरोधमेव॥२३४॥
(अनु०) विरोधी तो किसी रस की अंगी रस की अपेक्षा न्यूनता कर देनी चाहिए। जैसे शान्त के अंगी होने पर शृङ्गार की अथवा शृङ्गार में शान्त की। यदि कहो कि परिपोषरहित रस का रसत्व कैसा ? तो यहाँ यह कहा गया है कि अंगीरस की अपेक्षा। निस्सन्देह अंगीरस का जितना परिपोष है उतना उसका नहीं करना चाहिए। स्वतः सम्भवी परिपोष तो किसके द्वारा मना किया जा सकता है। बहुत रसोंवाले प्रबन्धों में एक रस का यह आपेक्षिक प्रकाशयोगित्व रसों के अंगाङ्गिभाव को न मानने वालों के द्वारा भी खण्डित नहीं किया जा सकता; अतः इस प्रकार से प्रबन्धों में अविरोधी और विरोधी रसों के अंगाङ्गिभाव के द्वारा समावेश करने में विरोध न हो। यह सब उनके मत से कहा गया है कि जिनका सिद्धान्त है कि रस दूसरे रस का व्यभिचारी होता है। दूसरे मत में तो रसों के स्थायीभाव औपचारिक रूप में रस शब्द से अभिहित किये गये हैं। उनका अंगत्व तो निर्विरोध हो ही है।
तृतीय
उद्योत:
(लो०)—एवं त्रिरोध्यविरोधिसाधारणप्रकारमभिधाय विरोधिविषयासाधारणदोषपरिहारप्रकारगतत्वेनैक विशेषान्तरमप्याह—विरोधित्येनैतिशेषः। एतच्चैति। उपकार्योपकारकभावो रसानां नास्ति स्वचमत्कारविश्रान्तत्वात्; अन्यथा रसत्वायोगात्। तदभावे च कथमङ्गित्वेत्यपि येषां मतं तैरपि कस्यचिद्रसस्य प्रकृष्टत्वं भूयः प्रबन्धव्यापकत्वमन्येषां चाल्पप्रबन्धानुगामित्वमभ्युपगन्तव्यमिति वृत्तसङ्कटनाया एवंन्यथानुपपत्तोः, भूयः प्रबन्धव्यापकस्य च रसस्य रसान्तरयेऽपि न काचित्सङ्कः गतिस्तदितिर्वृत्तस्यापि न स्यात्ससंगतिश्चेद्यमेवोकार्योपकारकभावः। न
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च चमत्कारविश्वान्तेर्विरोध: कश्चिदिति समनन्तरमेवोक्तम् । तदाह—अनभ्युपगच्छतापीति । शब्दमात्रेणासौ नाभ्युपगच्छति । अकारमेवाभ्युपगमयितव्य इति भाव: । अन्यस्तु व्याचष्टे—एतच्चापेक्षिकमित्यादिग्रन्थो द्वितीयमतमभिप्रेत्य यत्र रसनामुपकार्योपकारकता नास्ति तत्रापि हि भूयो वृत्तव्याप्यमेवांगित्वमिति । एतच्चासत्; एवं हि एतच्च सर्वमिति सर्वशब्देन य उपसंहार एकपक्षविषय: मतान्तरेऽपीत्यादिना च यो द्वितीयपक्षोपक्रम: सोज्जीव दःकिलासुरित्यलं पूर्कवत् । स हि बहुना संलक्ष्यते ।
येषामिति भावाद्वायासमाप्तावस्ति श्लोक:— बहूनां समवेतानां रूपं यस्माद् भवेद्रुहू । स मन्तव्यो रस: स्थायी शेषा: सञ्चारिणो मता: ॥ इति ।
तत्रोक्तक्रमेणाधिकारिकेतिवृत्तव्यापिका चित्तवृत्तिरस्स्यमेव स्थायित्वेन भाति प्रासंगिकवृत्तान्तगामिनी तु व्यभिचारितयैव रस्यमानता समये स्थायिव्यभिचारिभावस्य न कश्चिद्विरोध इति केचिद्व्याचचक्षिरे । तथा च भागुरिररपि किं रसानामपि स्थायिसञ्चारितास्तीत्याक्षिप्य नाभ्युपगमेनैवोत्तरमवोचद्वाहमस्तीति ।
अन्ये तु स्थायितया पठितस्यापि रसस्य रसान्तरे व्यभिचारित्वमस्ति । यथा क्रोधस्थ वीरे व्यभिचारितया पठितस्यापि स्थायित्वमेव रसान्तरं, यथा तथ्यज्ञाननिर्वेदभावकस्य निर्वेदस्य शान्ते, व्यभिचारिणो वा सत् एवं व्यभिचार्यन्तरापेक्षया स्थायित्वमेव, यथा विक्रमोर्वशीयमुनिमदस्य चतुर्थेऽङ्के इतीयान्तमर्थमवबोधयितुमयं श्लोक:— बहूनां चित्तवृत्तिरूपाणां भावानां मध्ये यस्माद् बहुलं रूपं यथोपलभ्यते स स्थायी भाव: । स च रसो रसीकरणयोग्य:; शेषास्तु सञ्चारिण इति व्यवकल्पते न तु रसानां स्थायिसञ्चारिभावेनांगतोक्तिति । अत एवान्ये रसस्थायीत इति पठितया सप्तम्या द्वितीयया वाश्रितादिषु गमिगम्यादीनामिति समानं पठन्ति । तदाह—मातान्तरेऽपीति । रसशब्दे— नेति । 'रसान्तरसमावेश: प्रस्तुतस्य य:' इत्यादि प्राक्तनकारिकानिविष्टेनैतर्थ: ॥२३४॥
(अनु०) इस प्रकार विरोधी और अविरोधी में सर्वसाधारण प्रकार को कहकर विरोधी विषयक असाधारण दोष के परिहार प्रकार के सम्बन्ध में ही दूसरी विशेषता भी कहते हैं— ‘विरोधी का’ यह । ‘सम्भवी यह’ । यहाँ पर प्रधान के अविरोधी के रूप में यह शेष है । अपने चमत्कार में विश्वस्त होने के कारण रसों का उपकार्योपकारक भाव नहीं होता नहीं तो रसत्व होना ही न बने और उसके अभाव में अंगिता कैसी ? यह भी जिनका मत है उन्हें भी किसी रस का प्रकृष्टत्व अर्थात् अधिक प्रबन्ध में व्यापकत्व और दूसरों का थोड़े प्रबन्ध का अनुगामित्व मानना पड़ेगा क्योंकि नहीं तो इतिवृत्त की संघटना ही सिद्ध नहीं होती । अधिक प्रबन्ध में व्यापक रस की यदि अन्य रसों से कोई संगति नहीं होती तो इतिवृत्ति की भी कोई संगति नहीं होगी यदि ऐसा मानो तो यह उपकार्योपकारक भाव होता है । चमत्कार विश्वान्त से कोई विरोध नहीं होता यह अभी कहा गया है । यह कहुते
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तृतीय
उद्योत:
है—‘न मानने वालों के द्वारा भी’ यह । वह केवल शब्द से नहीं मानता । आशय यह है कि बिना ही इच्छा के उनको स्वीकार कराया जाना चाहिए । दूसरे ने तो कहा—‘यह आपेक्षिक—‘इत्यादि ग्रन्थ द्वितीय मत लेकर (लिखा गया है) कि ‘जहाँ रसों की उपकार्योपकारकता नहीं होगी वहाँ अधिक कथनक में व्याप्त होना ही अंगित्व होता है’ यह । यह ठीक नहीं है—ऐसे तो एक पक्ष के विषय में ‘यह सब’ इत्यादि जो उपसंहार किया गया है और दूसरे मत में इत्यादि के द्वारा जो द्वितीय पक्ष का उपक्रम किया गया है उसकी योजना बहुत कठिन हो जायेगी; बस, अपने पूर्व वंशावलो के साथ अधिक विवाद की आवश्यकता नहीं । ‘जिनका’ यह । भावाध्याय की समासि में श्लोक है—‘एकत्व बहुतों में जिसका रूप बहुत हो वह स्थायी रस माना जाना चाहिए । शेष संचारी माने जाते हैं ।’ उसमें उक्त क्रम से आधिकारिक इतिवृत्त में व्यापक चित्तवृत्ति अवश्य हो स्थायी रूप में शोभित होती है और प्रासंगिकवृत्त में रहने वाली तो व्यभिचारी रूप में इस प्रकार रसस्वादन में समय के स्थायी और व्यभिचारी भाव का कोई विरोध नहीं होता । यह कुछ लोगों ने व्याख्या की है । उसी प्रकार भागुरि ने ‘क्या रसों की स्थायीरूपता और संचारी-रूपता होती है ?’ यह आक्षेप करके स्वीकृति के द्वारा ही उत्तर दिया है—‘हां निस्संदेह है ।’ यह ।
तृतीय
उद्योत:
दूसरे लोग तो ( कहते हैं )—‘स्थायी के रूप में पठित भी रस का रसान्तर में व्यभिचारित्व होता है जैसे वीर में व्यभिचारी के रूप में पढे हुए भी क्रोध का दूसरे रूप में रस में स्थायित्व होता ही है । जैसे तत्त्वज्ञान विभाव वाले निर्वेद का शान्त में अथवा विद्यमान भी व्यभिचारी का दूसरे व्यभिचारी की अपेक्षा स्थायित्व ही (होता है) जैसे विक्रमोर्वशीय में चौथे अंक में उन्माद का इस इतने अर्थ का बोध कराने के लिए यह श्लोक है । बहुत से चित्तवृत्ति रूप भावों के मध्य में जिसका जैसा अधिक रूप उपलब्ध होता है वह स्थायी भाव होता है और वह रस अर्थात् आस्वादन के योग्य होता है । शेष तो संचारी होते हैं यह व्याख्या करते हैं; रसों का स्थायी और संचारी भाव के द्वारा अंगांगो भाव नहीं कहा गया है यह । भट एवं दूसरे लोग रसस्थायी इसमें षष्ठी समसी अथवा द्वितीया के द्वारा ‘द्वितीयाश्रितातीत......’ इत्यादि में ‘गम्यादिकों का...’ इससे समास हो जाता है यह पढ़ते हैं । वह कहते हैं—‘मतान्तर में भी’ यह अर्थात् ‘प्रस्तुत रस का रसान्तर में समावेश...’ इत्यादि प्राक्तन कारिका में निविष्ट रस शब्द के द्वारा ॥२४॥
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उद्योत:
दो रसों के परस्पर समावेश के अन्य प्रकार दिखाई—आचार्यों ने बतलाये गये हैं जिनसे दो रसों का एकत्व समावेश दृष्ट नहीं होता । ये प्रकार केवल दिग्दर्शन मात्र हैं । इन्हीं का अनुसरण कर दूसरे प्रकारों की भी कल्पना कर लेनी चाहिए । संक्षेप में जिन दूसरे प्रकारों की कल्पना की जा सकती है उनमें कुछ ये हैं—(१) अंगीरस से भिन्न किसी दूसरे रस के विभावों और अनुभावों में उत्कर्ष नहीं आने देना
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चाहिए। (२) अथवा अंगी रस के विरोधी रस से सम्बद्ध विभावों और अनुभावों का विनिवेश करना नहीं चाहिए। (३) यदि विरोधी रस के विभावों और अनुभावों का सन्निवेश किया गया हो तो उनका पोषण अंगी रस के विभावों और अनुभावों के द्वारा कर देना चाहिए। (४) विरुद्ध रस के जिन विभावों और अनुभावों को परिपुष्ट भी कर दिया हो उन्हें भी जागरूक कर देना चाहिए कि वे कहीं अपने अप्रधान रूप को छोड़कर प्रधान न बन जायें। इसी भाँति के दूसरे प्रकारों की भी कल्पना कर लेनी चाहिए और उनका संगमन उदाहरणों में भी कर लेना चाहिए।
रसों के अङ्गाङ्गी भाव के द्वारा विरोध परिहार
ऊपर दो रसों के परस्पर सन्निवेश के जो प्रकार बतलाये गये हैं वे सामान्यतया विरोधियों और अविरोधियों में एक समान लागू होते हैं। किन्तु विरोधी रसों की संयोजना में कुछ विलक्षण अवश्य होती है। दोष परिहार के साधारण नियमों के साथ उनके कुछ विशेष घारण प्रकार अवश्य होते हैं। उदाहरण के रूप में एक दूसरी विशेषता भी बतलाई जा रही है—यदि किसी अंगी रस के साथ अंगरूप में किसी विरोधी रस को सन्निविष्ट करना हो तो अंगी रस की अपेक्षा विरोधी रस को कुछ न्यून अवश्य कर देना चाहिए। जैसे यदि शान्ति रस अंगी हो और श्रृंगार रस को उसका अंग बनाना हो तो श्रृंगार को शान्त रस से कुछ न्यून कर देना चाहिए और यदि श्रृंगार अंगी हो तो उसकी अपेक्षा शान्त को कुछ न्यून कर देना चाहिए। यहाँ प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि रस स्वप्रकाशानन्द चिन्मय तथा वेद्य-स्तर स्पर्श शून्य होता है। रस का अर्थ है रसन या आस्वादन। किसी भी तत्व में रसनीयता तभी उत्पन्न होती है। जब उसका पूर्ण परिपाक हो जाता है। यदि उसमें थोड़ी सी न्यूनता रह जाती है तो न तो उसमें रसनीयता ही उत्पन्न होती है और न उसे रस ही कहा जा सकता है। फिर उसकी रस ही मानकर हम कैसे कह सकते हैं कि एक रस का दूसरे में समावेश हुआ? इसका उत्तर यह है कि हमने यह नहीं कहा कि उसके परिपोष में कमी रखनी चाहिए। किन्तु हमने यह कहा है कि अंगी रस की अपेक्षा उसे कम रखना चाहिए। जितना परिपोष अंगी रस का करना चाहिए उतना अंग या अप्रधान रस का परिपोष नहीं करना चाहिए। किन्तु यदि उसका परिपोष स्वतः हो रहा हो और उससे अंगी का विरोध न हो रहा हो तो उसके परिपोष को कौन रोक सकता है? कुछ लोग यह आक्षेप करते हैं कि रस अखण्ड चर्वणात्मक स्वप्रकाशानन्द रूप होता है तथा उसमें अङ्गाङ्गिभाव की कल्पना व्यर्थ है। क्योंकि कोई भी रस तभी रस कहलाने का अधिकारी होता है जब उसमें स्वमात्रविश्रान्त चर्वणात्मक स्वप्रकाशानन्द रूप होता है। यदि उसे अपने चमत्कार के लिए अपने क्षेत्र से भिन्न किसी अन्य तत्व की अपेक्षा हुई तो न तो उसमें आनन्द देने की शक्ति ही उत्पन्न हो सकती है और न उसे रस की संज्ञा प्राप्त हो सकती है। ऐसी दशा में यह कहना किसी प्रकार भी संगत नहीं हो सकता कि रस में अङ्गाङ्गिभाव होता है। आशय यह है कि कितिपय आचार्य रस को अखण्ड चर्वणात्मक स्वमात्रविश्रान्त चमत्कारपरक मानते हैं। उनके मत में रस की कोटियाँ होती ही
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तृतीय उद्योत:
नहीं । उनको भी इतना तो मानना ही पड़ेगा कि जिन प्रबन्धों में अनेक रसों का उपादान किया जाता है उनमें कोई रस अधिक प्रबन्ध को घेरता है और दूसरा कम प्रदेश में ही समास हो जाता है। जो रस अधिक प्रबन्ध में व्यापक होता है वह अधिक उत्कृष्ट माना जाता है और जो कम प्रदेश को व्याप्स करता है वह कम महत्त्वपूर्ण माना जाता है । इस प्रकार आपेक्षिक महत्त्व योग का तो प्रतिवाद रस की अखण्डता और अंगांगिभाव के असम्भव मानने वाले भी नहीं कर सकते । क्योंकि अनेक रसोंवाले प्रबन्ध में किसी कथ्यांक का विस्तृत होना और किसी का अल्प होना अनुभव सिद्ध ही है और यदि उन कथ्यांकों को एक दूसरे से सर्वथा असम्बद्ध माना जायेगा तो इतिवृत्त की संघटना भी सिद्ध नहीं हो सकेगी । यह तो उनको भी मानना ही पड़ेगा कि जो विभिन्न इतिवृत्त एक प्रबन्ध में गुँथे हुए हैं वे एक दूसरे से असम्बद्ध नहीं हैं। उनमें एक दूसरे का उपकार्योपकारक भाव विद्यमान है । अधिक प्रबन्ध में व्यापक इतिवृत्त उपकार्य है और कम देश में व्यापक इतिवृत्त उपकारक है । जिस तर्क के आधार पर इतिवृत्तों का उपकार्योपकारक भाव माना जाता है उसी तर्क के आधार पर उनसे अभिव्यक्त होने वाले रसों का भी उपकार्योपकारक भाव माना जा सकता है। यदि रसों में उपकार्यो-पकारक भाव नहीं माना जायेगा तो वह इतिवृत्तों में भी सिद्ध न हो सकेगा और इतिवृत्त के विभिन्न खण्ड विश्वृंखल हो जायेंगे । चाहे इसे आप उपकार्योपकारक भाव कहें या अंगांगि-भाव, इतिवृत्त और प्रबन्ध दोनों में यह सिद्ध हो ही जाता है । किसी एक रस में चमत्कार का विश्वास हो जाना या उस रस का स्वतः पर्यवसित होना कोई ऐसी बात नहीं है जो इस मान्यता में विरोध उत्पन्न करे । कोई रस स्वतः पर्यवसित और चमत्कारविश्रान्त होकर भी दूसरे रस का अंग हो सकता है यह अभी सिद्ध किया जा चुका है। जो लोग रसों के अंगांगिभाव नहीं मानते उनका यह शाब्दिक विरोध ही है वस्तुतः आन्तरिक विरोध नहीं । अतः उनसे यह उनके न चाहने पर भी तर्क के आधार पर स्वीकृत करा लेना चाहिए ।
कुछ लोगों ने इस वृत्तिग्रन्थ की व्याख्या दूसरे प्रकार से की है । वृत्तिग्रन्थ में यहाँ पर दो मत दिखलाये गये हैं—(१) रसों का उपकार्योपकारक भाव होता है और (२) रस शब्द का यहाँ पर अर्थ है स्थायीभाव तथा स्थायीभाव में श्रेणीविभाजन हो सकता है । उसी को मानकर रसों के उपकार्योपकारक भाव की व्याख्या की जा सकती है । इन लोगों का कहना है कि प्रस्तुत वृत्ति-ग्रन्थ द्वितीय मत को मानकर लिखा गया है कि जहाँ रसों का उपकार्यो-पकारक भाव नहीं होता वहाँ भी उसे अंगी कहने लगते हैं जो अधिक काव्यात्मक में व्याप्त हो । यह इन लोगों की व्याख्या ठीक नहीं है । ये हमारे पूर्ववंशज हैं अतः इनसे हम (अभिनवगुप्त) अधिक विवाद तो नहीं करेंगे । हाँ इतना अवश्य कहेंगे कि इस प्रकरण को द्वितीय मत में लगाने से इस ग्रन्थ की संगति नहीं बैठती । वृत्तिकार ने प्रस्तुत वाक्य को लिखकर इस प्रकरण का उपसंहार करते हुए लिखा है "यह सब 'रस दूसरे रस का व्यभिचारी होता है' इस मत को मान कर लिखा गया है।" यहाँ पर सब शब्द का प्रयोग ही सिद्ध करता है कि इसके पहले जो कुछ लिखा गया है वह प्रथम मत को मानकर ही लिखा गया है । उसके बाद लिखा है कि 'दूसरे मत में भी...' । यदि उक्त कथन द्वितीय मत से सम्बद्ध माना जायेगा तो सारा कथन
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अस्त-व्यस्त हो जायेगा। अतः उक्त कथन प्रथम मत से सम्बद्ध ही माना जाना चाहिए। ऊपर जो कुछ कहा गया है वह उन लोगों का मत दृष्टिगत रखते हुये कहा गया है जो यह मानते हैं कि एक रस दूसरे में व्यभिचारी होता है। अर्थात् जिस प्रकार किसी रस की निष्पत्ति में स्थायिभाव का परिपोष संचारियों के द्वारा होता है इसी प्रकार किसी एक रस को अन्य दूसरे रस पुष्ट किया करते हैं। नाट्यशास्त्र में भावाध्याय की समाप्ति पर एक श्लोक आया है जिसका आशय यह है—
जहां बहुत से रस मिले हुये हों उन रसों में जिस भाव का रूप बहुत अधिक व्यापक हो वह रस स्थायी होता है, शेष रस व्यभिचारी होते हैं।
भावाध्याय में जो क्रम बतलाया गया है उस पर विचार करने से अवगत होता है कि किसी प्रबन्ध काव्य में कोई एक चित्तवृत्ति ऐसी होती है जो समस्त प्रबन्ध में व्याप्त रहती है और आधिकारिक इतिवृत्त की चित्तवृत्ति कही जाती है। ऐसी चित्तवृत्ति स्थायी रूप में आभासित होने के कारण स्थायी चित्तवृत्ति कही जाती है और प्रासंगिक इतिवृत्त में रहनेवाली चित्तवृत्ति व्यभिचरित अथवा परिवर्तित होनेवाली होती है। अतः वह चित्तवृत्ति व्यभिचारिणी चित्तवृत्ति कही जाती है। आधिकारिक इतिवृत्त से सम्बन्ध रखनेवाली चित्तवृत्ति उपकरियों के संयोग से परिपोष को प्राप्त होकर स्थायी रस का रूप धारण कर लेती है और प्रासंगिक इतिवृत्त से सम्बद्ध चित्तवृत्ति व्यभिचारी रस का रूप धारण कर लेती है। जिस प्रकार आस्वादन के अवसर पर स्थायिभाव का संचारियों से कोई विरोध नहीं होता अपितु संचारियों से स्थायी की पुष्टि ही होती है उसी प्रकार स्थायी रस की पुष्टि संचारी रसों से हो जाती है। आचार्य भामह ने भी प्रश्न उठाया है कि क्या रसों में स्थायी और संचारी की व्यवस्था होती है? इसका उत्तर उन्होंने स्वीकृतिपरक दिया है तथा कहा है कि रसों में यह अवश्य मानना पड़ता है कि कुछ रस स्थायी होते हैं और कुछ संचारी।
बहूनां समवेतानां संचरणो मत्तः
इस श्लोक की एक व्याख्या ऊपर दी गई है। हमारे लोग इस व्याख्या को नहीं मानते। वे कहते हैं कि इस पद्य में यह सिद्धान्त माना गया है कि एक स्थान पर जो रस स्थायी के रूप में स्वीकृत किया जाता है वही अन्यत्र व्यभिचारी हो जाता है। भरत मुनि ने भावों की संख्या कुल ४९ बतलाई हैं। उनमें केवल ८ स्थायिभाव बतलाये गये हैं। वस्तुतः वे ८ स्थायिभाव सर्वदा स्थायी ही रहें ऐसा नहीं होता। जो भाव एक स्थान पर स्थायी होता है वही अन्यत्र व्यभिचारी भी हो सकता है और जो एक स्थान पर व्यभिचारी होता है वह दूसरे रस में स्थायी हो सकता है। उदाहरण के लिये वीर रस में क्रोध व्यभिचारी के रूप में आता है और वही रौद्र रस में स्थायी बन जाता है। निर्वेद को संचारियों में गिनाया गया है। यह भाव अनेक रसों में संचारी होता भी है। किन्तु यही भाव उस समय स्थायी बन जाता है जब तत्त्वज्ञान को विभाव बनाकर शान्त रस की निष्पत्ति की जाती है। यह तो हुई प्रसिद्ध रसों की बात। जो भाव शास्त्रीय ग्रन्थों में स्थायी की श्रेणी में नहीं रखे गये हैं केवल संचारी ही होते हैं वे भी जब इतिवृत्त
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तृतीय उद्योतः
में व्यापक रूप धारण कर लेते हैं तब वे स्थायी भाव ही हो जाते हैं चाहे वे शास्त्रीय ग्रन्थों में स्थायी के रूप में परिगणित न भी किये गये हों। उदाहरण के लिये विक्रमोर्वशीय के चौथे अङ्क में जब कि रुष्ट होकर उर्वशी ललनाओं के निषिद्ध उपवन में प्रविष्ट होकर शाप के अनुसार लता बन जाती है तब उसके वियोग में पीड़ित पुरुरवा उन्मत्त हो उठते हैं और कभी नदी को कभी मेघों को अपनी प्रेयसी के रूप में देखने लगते हैं। यह उन्माद इतना तीव्र हो गया है कि सामान्य सञ्चारी न रहकर स्थायी बन गया है। इस प्रकार सामान्य सञ्चारी भी बहुप्रबन्धघटयापी बन कर स्थायी बन जाते हैं। इसी अर्थ को कहने के लिये यह कारिका 'बहुनां समवेतानां...सञ्चारिणो मताः' लिखी गई है। इस प्रकार इस कारिका का अर्थ यह होगा—'जहाँ बहुत से समवेत हों' का अर्थ है जहाँ बहुत सी चित्तवृत्तियाँ जिनका पारिभाषिक शब्द है 'भाव' एक साथ मिली हुई हों उन चित्तवृत्तियों में जित चित्तवृत्ति का स्वरूप अन्य की अपेक्षा अधिक व्यापक और विस्तृत हो उसे स्थायी भाव कहते हैं। वही रस होता है अर्थात् रसन या आस्वादन की योग्यता उसी में होती है। शेष सञ्चारों होते हैं। आशय यह है कि इस भावाध्याय की कारिका में रसों का एक दूसरे के प्रति स्थायित्व और सञ्चारित्व नहीं बताया गया है कि भावों में कौन स्थायी होता है और कौन सञ्चारी।
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तृतीय उद्योतः
(भावाध्याय की प्रस्तुत कारिका 'बहुनां.......मताः' में यह स्पष्ट नहीं है कि यह कारिका रसों की परस्पर स्थायिता और सञ्चारिता का प्रतिपादन करती है या भावों में कौन सा भाव स्थायी होता है यह बतलाती है। कारिका की प्रथम पंक्ति में न रस शब्द का उपादान किया है और न स्थायी का। किन्तु द्वितीय पंक्ति में 'स रसस्थायी' यह आया है। 'रसस्थायी' शब्द का सन्धि विच्छेद दो प्रकार से किया जा सकता है (१) 'रसः + स्थायी' इसमें 'खपरे शरि' इससे विकल्प का लोप हो जाता है। (२) 'रस स्थायी' दोनों शब्दों में समास मानकर मध्यवर्तिनी विभक्ति का लोप हो गया है। यदि पहले सन्धिविच्छेद को मानकर 'रसः' और 'स्थायी' ये दो स्वतन्त्र शब्द माने जायें तो इनकी योजना दो प्रकार से हो सकती है—'जहाँ कई एक मिले हुये हों वहाँ जिसका रूप अधिक हो वह रस (स रसः) स्थायी होता है और शेष सञ्चारी होते हैं। यह योजना उन लोगों के मत में है जो रसों का परस्पर उपकार्योपकारक भाव मानते हैं और यह स्वीकार करते हैं कि रसों में भी कोई स्थायी और कोई सञ्चारी हुवा करते हैं। दूसरे प्रकार की योजना यह होगी—'कई एक समवेत (भावों) में जिसका रूप अधिक होता है वह भाव स्थायी होता है (सः स्थायी) और वही रस बनता है, अन्य भाव सञ्चारी होते हैं। यह योजना उन लोगों के मत में है जो यह मानते हैं कि रस अव्यापक वर्णनात्मक होता है। हु उसमें परस्पर उपकार्योपकारक भाव नहीं होता।)
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जो लोग 'रसस्थायी' में रस शब्द को स्वतन्त्र न मानकर समासगर्भित मानते हैं उनके मत में तीन प्रकार की कल्पत्ति हो सकती है (१) 'रस का स्थायी' यहाँ षष्ठी समास है। (२) 'रस में स्थायी' यहाँ 'सप्तमी' इस योग विभाग से समास किया गया है और (३) 'रसं स्थायी—'रस के प्रति स्थायी' यहाँ द्वितीया-तत्पुरुष 'आश्रिलादिषु गमिगम्यादीनामुपसंख्यानम्' इस वार्तिक से द्वितीया समास हो जाता है।
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संख्यानम्' इस वार्तिक से हो जाता है। इन तीनों मतों में रस का स्थायी कहकर रस शब्द से स्थायी भाव के ग्रहण की ओर संकेत किया गया है। अतएव 'रसान्तरसमावेश: प्रस्तुतस्य रसस्य य:' इस कारिका में जो रस शब्द आया है उसकी व्याख्या ये लोग यह कह कर करते हैं कि यहाँ पर रसशब्द का अर्थ है स्थायी भाव। इस प्रकार इस मत में विरोधी रसों के समावेश का अर्थ है विरोधी स्थायी भावों का परस्पर समावेश। स्थायीभावों के परस्पर उपकार्योपकारक भाव में कोई विरोध आता ही नहीं। अतः इस मत में कोई अनुपपत्ति है ही नहीं। इस प्रकार यहाँ ये तीन मत हैं (आनन्दवर्धन और अभिनवगुप्त प्रथम मत से सहमत प्रतीत होते हैं क्योंकि एक तो इन्होंने प्रथम मत का विस्तारपूर्वक निरूपण किया है और उसी के आधार पर अपने निष्कर्ष भी निकाले हैं, दूसरी बात यह है कि 'भतृ-न्तरे तु' तथा अभिनवगुप्त ने 'अन्ये तु' में 'तु' शब्द के द्वारा उक्त मतों से अपनी अरुचि प्रकट की है। अतः इन आचार्यों के मत का सार यह है कि स्वतन्त्र रसों का स्वतः परिपोष तो होता ही है किन्तु वे रस किसी प्रबन्ध में दूसरे रस का अंग भी हो सकते हैं)।
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(ध्वन्यालोके)---एवमविरोधिनां विरोधिनां च प्रवन्धस्थेनाऽऽङ्गिना रसेन समावेशो साधारणमविरोधोपायं प्रतिपादयेदानीं विरोधविषयमेव तं प्रतिपादयितुमिवमुख्यते---साधारणमविरोधोपायं प्रतिपादयेदानीं विरोधविषयमेव तं प्रतिपादयितुमिवमुख्यते—विरोधिनां च प्रवन्धस्थेनाऽऽङ्गिना रसेन समावेशे सविभिन्नाश्रय: कार्यस्तस्य पोष्योपोष्यता ॥२२५॥ ऐकाधिकरण्यविरोधी नैरन्तर्यविरोधी चेति द्विविधो विरोधी । तत्र प्रबन्धस्थेन स्थायिनाऽऽङ्गीरेसनौचित्यापेक्षया विरुद्धैकाश्रययो यो विरोधी यथा वीरेण भयानक: स विभिनाश्रय: कार्य:। तस्य वीरस्य य आश्रय: कथानायकस्तद्विपक्षविषये सन्निवेशयितव्य: । तथा सति च तस्य विरोधिनोऽपि य: परिपोष: स निर्दोष:। विपक्षविषये हि भयातिशयवर्णने नायकस्य नयपराक्रमादिसम्पत्त्सुतरां द्वोतिता भवति । एतच्च मदीयैरर्जुनचरितैरर्जुनस्य पातालावतरणप्रसङ्गे वैशद्येन प्रदर्शितम् ॥२५॥
इस प्रकार अविरोधियों और विरोधियों का प्रबन्धगत अंगी रस के साथ समावेश करने में साधारण अविरोध का उपाय प्रतिपादित कर विरोधी के विषय में ही उसको प्रतिपादित करने के लिये यह कहा जा रहा है— 'जो एक आश्रय में विरोध रखनेवाला स्थायी का विरोधी हो वह विभिन्न आश्रयवाला बना दिया जाना चाहिये उसके परिपोष में भी दोष नहीं होता' ॥२२५॥ दो प्रकार का विरोधी होता है ऐकाधिकरण्य विरोधी और नैरन्तर्य विरोधी। उसमें प्रबन्धगत स्थायी अङ्गीरस के साथ औचित्य की दृष्टि से विरुद्ध एक आश्रयवाला जो विरोधी, जैसे वीर (रस) के साथ भयानक, वह विभिन्न आश्रयवाला किया जाना चाहिये। उस वीर का जो आश्रय कथानायक उसके विपक्ष के विषय में सन्निविष्ट किया जाना चाहिये। ऐसा होने पर उस विरोधी का भी जो परिपोष वह निर्दोष होता है। विपक्ष के विषय में भय के अत्यधिक वर्णन करने में नायक की नय प्राक्रम इत्यादि की सम्पत्ति बहुत अधिक प्रकाशित हो जाती है। यह मर अर्जुनचरित में अर्जुन के पाताल अवतरण के प्रसङ्ग में विशदतापूर्वक दिखलाया गया है॥२५॥
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तृतीय उद्योतः
२५
(लो०)—अथ साधारणं प्रकारमुपसंहरत्नसाधारणमासूत्रयति—एवमिति । तमित्यविरोधोपायम् । विरुद्धति विशेषणं हेतुगरभितम् । यस्तु स्थायी स्थाय्यन्तरेरण-संभाव्यमानैकाश्रयत्वाविरोधी भवेदेव्यथोत्साहेन भयं स विभिनाश्रयत्वेन नायकविपक्षादिगामित्वेन कार्यः । तस्येति । तस्य विरोधिनोऽपि तथाकृतस्य तथानिबद्धस्य परिपुष्टताप्रतिपादन निर्दोषत्वा नायकत्वोपपादनात् । अपि चाद्वो भिन्नकमः । एवमेव वृत्तावपि व्याख्यानात् । ऐकाधिकरण्यमेकाश्रयेण सम्बन्धमात्रं, तेन विरोधी यथा—भयेनोत्साहः, एकाश्रयत्वेऽपि सम्भवति कश्चिन्निरन्तरत्वेन व्यवधानराहित्यप्रदर्शितमिति । ‘समुत्थिते धनुर्ध्वन्नो भयावहे किरोटिनो महानुपप्लवोऽभवत्पुरे पुरन्दरद्विपाम्’ इत्यादिना ।।२५।।
(अनु०) अब साधारण प्रकार का उपसंहार करते हुये असाधारण को सूत्रबद्ध कर रहे हैं—‘इस प्रकार’ इत्यादि । ‘उसको’ अर्थात् अविरोधोपाय को । विरुद्ध यह हेतुगरभित विशेषण है । जो स्थायी दूसरे स्थायी के साथ एकाश्रय के असम्भावित होने के कारण विरोधी हो जैसे उत्साह से भय उसे विपक्षाश्रयत्व के रूप में नायक के विपक्षादिगत रूप में कर देना चाहिये । ‘उसके’ तथाकृत अर्थात् उस प्रकार निवद्ध उस विरोधी की परिपुष्टता की भी प्रस्तुत निर्दोषता हो होती है क्योंकि उससे नायक के उत्कर्ष का आधान होता है । आश्रय यह है कि अपरिपोषण तो दोष ही होता है । ‘अप’ शब्द भिन्नक्रमवाला है । ऐसी ही वृत्ति में भी व्याख्या की गई है । ऐकाधिकरण्य अर्थात् एक आश्रय से सम्बन्धमात्र । उससे विरोधी जैसे—भय से उत्साह । एकाश्रयत्व के सम्भव होते हुये भी कोई निरन्तरत्व के द्वारा अर्थात् व्यवधानराहित्य के द्वारा विरोधी (होता है) जैसे रति से निर्वेद । दिखलाया गया है) यह ‘अर्जुन की भयावह धनुर्ध्वनि के उठने पर इन्द्र-शत्रुओं के नगर में महान् उपद्रव खड़ा हुआ ।’ इत्यादि के द्वारा ।।२५।।
३
तृतीय उद्योतः
—२४ वीं कारिका में यह सिद्ध किया गया है कि अंगी रस के साथ अन्य रसों का समावेश होता है तथा यह भी दिखलाया गया है कि एक रस में दूसरे के समावेश के प्रकार कौन से हैं । वहाँ जो प्रकार बतलाये गये हैं वे सामान्य प्रकार हैं और विरोधियों तथा अविरोधियों के अंगी रस में सन्निविष्ट होने की साधारण व्याख्या करते हैं । अब इस पच्चीसवीं कारिका में यह दिखलाया जा रहा है कि विरोधी रस के अंगी में सन्निविष्ट होने के विशिष्ट नियम क्या है ? यह कहने की आवश्यकता इसलिये पढती है कि अविरोधी रसों का किसी रस में सन्निविष्ट होना एक साधारण बात है, कितु विरोधी के विषय में यह प्रश्न अवश्य उपस्थित होता है कि उसका विरोध परिहार किस प्रकार होता है और वह अंगी का अंग किस प्रकार बनता है ?
३
तृतीय उद्योतः
सामान्यतया विरोध दो प्रकार का हो सकत है एक तो दो रसों का एक ही अधि-करण में रहने पर विरोध होना, दूसरे एक के तत्काल बाद दूसरे के आ जाने पर विरोध १६
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होना । (एक ही अधिकरण में विरोध दो प्रकार का होता है—एक ही आलम्बन के प्रति दो
होना । (एक ही अधिकरण में विरोध दो प्रकार का होता है—एक ही आलम्बन के प्रति दो
विरुद्ध रसों का होना और एक ही आश्रय में दो विरुद्ध रसों का होना । जैसे प्रेम और उत्साह
विरुद्ध रसों का होना और एक ही आश्रय में दो विरुद्ध रसों का होना । जैसे प्रेम और उत्साह
दोनों का एक ही आलम्बन नहीं हो सकता । यह सम्भव नहीं कि जिसके प्रति रति हो उसी
दोनों का एक ही आलम्बन नहीं हो सकता । यह सम्भव नहीं कि जिसके प्रति रति हो उसी
को विजय करने की आकांक्षा भी विद्यमान हो । इसी प्रकार उत्साह और भय दोनों का
को विजय करने की आकांक्षा भी विद्यमान हो । इसी प्रकार उत्साह और भय दोनों का
आश्रय एक नहीं हो सकता । यह सम्भव नहीं कि जो व्यक्ति शत्रु पर विजय प्राप्त करने के
आश्रय एक नहीं हो सकता । यह सम्भव नहीं कि जो व्यक्ति शत्रु पर विजय प्राप्त करने के
लिये उत्साहित भी हो और शत्रु से डर भी ।) प्रस्तुत कारिका में प्रथम प्रकार के विरोध के
लिये उत्साहित भी हो और शत्रु से डर भी ।) प्रस्तुत कारिका में प्रथम प्रकार के विरोध के
निराकरण का प्रकार बतलाती है अर्थात् इसमें यह बतलाया गया है कि एक ही अधिकरण
निराकरण का प्रकार बतलाती है अर्थात् इसमें यह बतलाया गया है कि एक ही अधिकरण
में विरोध होने पर उसका परिहार किस प्रकार करना चाहिये—
में विरोध होने पर उसका परिहार किस प्रकार करना चाहिये—
‘जो रस एक आश्रय में होने के कारण एक दूसरे के विरोधी हों उनमें स्थायी रस को
‘जो रस एक आश्रय में होने के कारण एक दूसरे के विरोधी हों उनमें स्थायी रस को
तो उसी रूप में रहने देना चाहिये किन्तु उसके विरोधी रस के आश्रय को बदल देना चाहिये ।
तो उसी रूप में रहने देना चाहिये किन्तु उसके विरोधी रस के आश्रय को बदल देना चाहिये ।
आश्रय के बदल देने पर यदि विरोधी रस का परिपोष भी कर दिया जाए तो भी कोई दोष
आश्रय के बदल देने पर यदि विरोधी रस का परिपोष भी कर दिया जाए तो भी कोई दोष
नहीं होता” ।।२५।।
नहीं होता” ।।२५।।
आशय यह है कि एक रस के स्थायी भाव का यदि दूसरे रस के स्थायी भाव के
आशय यह है कि एक रस के स्थायी भाव का यदि दूसरे रस के स्थायी भाव के
साथ एक आश्रय में रहना किसी प्रकार भी सम्भव न हो और इस कारण उन दोनों रसों में
साथ एक आश्रय में रहना किसी प्रकार भी सम्भव न हो और इस कारण उन दोनों रसों में
परस्पर विरोध हो जैसे भय और उत्साह एक ही व्यक्ति में रह ही नहीं सकते इसीलिये दोनों
परस्पर विरोध हो जैसे भय और उत्साह एक ही व्यक्ति में रह ही नहीं सकते इसीलिये दोनों
परस्पर विरोधी हैं ऐसी परिस्थिति में उनके आश्रय को बदल देना चाहिये । मान लो यदि
परस्पर विरोधी हैं ऐसी परिस्थिति में उनके आश्रय को बदल देना चाहिये । मान लो यदि
कथानायक में वीर रस का परिपोष हुआ है तो उसके शत्रु में भय दिखला दिया जाना
कथानायक में वीर रस का परिपोष हुआ है तो उसके शत्रु में भय दिखला दिया जाना
चाहिये । ऐसी दशा में यदि भय का परिपोष भी कर दिया जाता है तो शत्रु का भय नायक
चाहिये । ऐसी दशा में यदि भय का परिपोष भी कर दिया जाता है तो शत्रु का भय नायक
के उत्साह का पोषक ही होता है और नायक में उत्साह के आधिक्य करने के कारण उसमें
के उत्साह का पोषक ही होता है और नायक में उत्साह के आधिक्य करने के कारण उसमें
दोष तो नहीं होता अपि तु गुण हो जाता है । इसके प्रतिकूल उसका पुष्ट न करना ही दोष
दोष तो नहीं होता अपि तु गुण हो जाता है । इसके प्रतिकूल उसका पुष्ट न करना ही दोष
होता है ।
होता है ।
कारिका में ‘अपि’ शब्द ‘पोषे’ के साथ आया है ‘तस्य पोषेऽप्यदोषता’ । किन्तु इस
कारिका में ‘अपि’ शब्द ‘पोषे’ के साथ आया है ‘तस्य पोषेऽप्यदोषता’ । किन्तु इस
अपि शब्द का क्रम बदलकर ‘तस्य’ के साथ लगाना चाहिये—‘तस्यापि पोषे’ । अर्थात् उस
अपि शब्द का क्रम बदलकर ‘तस्य’ के साथ लगाना चाहिये—‘तस्यापि पोषे’ । अर्थात् उस
विरोधी के भी परिपोष में । वृत्तिकार ने यही व्याख्या की है । (किन्तु इसकी कारिका
विरोधी के भी परिपोष में । वृत्तिकार ने यही व्याख्या की है । (किन्तु इसकी कारिका
के ठीक क्रम में योजना अधिक संगत प्रतीत होती है । इसका आशय यह हो जाता है कि
के ठीक क्रम में योजना अधिक संगत प्रतीत होती है । इसका आशय यह हो जाता है कि
‘यदि विरोधी को पुष्ट भी कर दिया जाए तो भी दोष नहीं होता ।’ यही अर्थ अधिक
‘यदि विरोधी को पुष्ट भी कर दिया जाए तो भी दोष नहीं होता ।’ यही अर्थ अधिक
संगत है ।)
संगत है ।)
ऐकाधिकरण्य का अर्थ है एक आश्रय से सम्बन्ध होना । भय और उत्साह का एक
ऐकाधिकरण्य का अर्थ है एक आश्रय से सम्बन्ध होना । भय और उत्साह का एक
आश्रय में सहभाव दूषित होता है । किन्तु उनके आश्रय को बदल देने से उनका विरोध
आश्रय में सहभाव दूषित होता है । किन्तु उनके आश्रय को बदल देने से उनका विरोध
जाता रहता है । उदाहरण के लिए आनन्दवर्धन के लिखे हुए अर्जुनचरित में अर्जुन पाताल-
जाता रहता है । उदाहरण के लिए आनन्दवर्धन के लिखे हुए अर्जुनचरित में अर्जुन पाताल-
विजय के लिये जाते हैं । वहाँ पर कहा गया है कि ‘जब किरोटधारी अर्जुन के धनुष की
विजय के लिये जाते हैं । वहाँ पर कहा गया है कि ‘जब किरोटधारी अर्जुन के धनुष की
ध्वनि भयानक रूप में उठने लगी तब इन्द्र के शत्रुओं के नगर में बहुत बड़ा कोलाहल मच
ध्वनि भयानक रूप में उठने लगी तब इन्द्र के शत्रुओं के नगर में बहुत बड़ा कोलाहल मच
गया ।’ इस प्रसंग में अर्जुन का वीर रस दिखलाया गया है और शत्रुओं का भय दिखलाया
गया ।’ इस प्रसंग में अर्जुन का वीर रस दिखलाया गया है और शत्रुओं का भय दिखलाया
गया है । इस प्रकार एक आश्रय में जिन रसों का मिल सकना असम्भव हो उनको विभिन्न
गया है । इस प्रकार एक आश्रय में जिन रसों का मिल सकना असम्भव हो उनको विभिन्न
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तृतीय उद्योतः
२५
एवमेकाधिकरण्यविरोधिनः प्रबन्धस्थेन स्थायिना रसेनाडभावगमने निर्विरोधत्वं यथा तथा दर्शितम्। द्वितीयस्य तु तत्प्रतिपादविगुमुच्यते— एकाश्रयत्वे निर्दोषो नैरन्तर्ये विरोधवान्। रसान्तरव्यवधानेन रसो व्यङ्गः: सुमेधसा॥२६॥
आश्रयों में रख देने से काम चल जाता है। वहाँ दोष का ही निराकरण नहीं हो जाता अपितु कभी-कभी प्रकृत रस का परिपोष भी हो जाता है॥२५॥ (ध्वन्या०)—एवमेकाधिकरण्यविरोधिनः प्रबन्धस्थेन स्थायिना रसेनाडभावगमने निर्विरोधत्वं यथा तथा दर्शितम्। द्वितीयस्य तु तत्प्रतिपादविगुमुच्यते— एकाश्रयत्वे निर्दोषो नैरन्तर्ये विरोधवान्। रसान्तरव्यवधानेन रसो व्यङ्गः: सुमेधसा॥२६॥ यः पुनरेकाधिकरणत्वे निर्विरोधी नैरन्तर्यं तु विरोधी स रसान्तरव्यवधानानेन प्रबन्धे निवेशयितव्यः। यथा शान्तशृङ्गारो नागानन्दे निवेशितो॥
तृतीय उद्योतः
२६
(अनु०) इस प्रकार प्रबन्धस्थ स्थायी रस के साथ एकाधिकरण्य विरोधी (रस) के अङ्गभाव को प्राप्त होने में जिस प्रकार 'निर्विरोधित्व' होता है वह दिखला दिया गया। दूसरे का तो निरविरोधित्व प्रतिपादन करने के लिये कहा जा रहा है— 'एकाश्रयत्व में निर्दोष और नैरन्तर्य में विरोधवाला रस बुद्धिमान् के द्वारा अन्य रस के व्यवधान के साथ व्यक्त किया जाना चाहिये'॥२६॥
फिर जो एकाधिकरणत्व में निर्विरोध और नैरन्तर्य में जो विरोधी हो वह रसान्तर के व्यवधान के साथ प्रबन्ध में निवेशित किया जाना चाहिये। जैसे शान्त और शृङ्गार नागनन्द में निविष्ट किये गये हैं॥ (लो०) द्वितीयस्येति। नैरन्तर्यविरोधिनः। तद्विति। निर्विरोधितव्वम्। एकाश्रयत्वेन निमित्तेन यो निर्दोषः न विरोधी किन्तु निरन्तरत्वेन निमित्तेन विरोधमेति स तथा-विधविरुद्धरसद्वयाविरुद्धेन रसान्तरेण मध्ये निवेशितेन युक्तः कार्यमिति कारिकार्थः। प्रबन्ध इति बाहुल्यापेक्षं, मुखकेडपि कदाचिदेवं भवेदपि। यदक्ष्यति—'एकवाक्यस्थ-योरपि' इत्येतत्।
तृतीय उद्योतः
यथेतितत् हि 'रागस्यास्पदमित्यवैमि नहि मे ध्वंसोती न प्रत्ययः' इत्यादिनो-पक्षेपातप्रभृति परार्थशरीरविरणात्मके निर्वहणपर्यन्तः शान्तो रसस्तस्य विरुद्धो म्लय-वर्तीविषयः शृङ्गारस्तदुभयाविरुद्धमद्भुतमुत्सररीकृत्य क्रमप्रसरसम्भवाभिप्रायेण कविना निबद्धः 'अहो गीतमहो वादित्रम्' इति। एतदर्थमेव 'व्यक्तिव्यङ्ग्यजनधातुना' इत्यादि-नीरसप्रायमपयन्त्र निबद्धमद्भुतरसपरिपोषकतयाल्यन्तरसस्तावर्हिति 'निर्दोषदर्शना-कन्यका:' इति च क्रमप्रसरो निबद्धः। यथाहुः—'चित्तवृत्तिप्रसरप्रसङ्यानधनाः सांख्या-गतो यः शेखरकवृत्तान्तोदितहास्यरसोपकृतः शृङ्गारस्तस्य विरुद्धो यो वैराग्यशम-पोषको नागीकलेबररास्थिजालावलोकनादिवृत्तान्तः स मित्रावसोः प्रविष्टस्य म्लयव-तीनगमनकारणः 'संस्पृशद्भिः समन्तात्' इत्यादिकाव्योपनिबद्धकोधव्यभिचार्युपकृत-वीररसान्तरितो निवेशितः॥
(अनु०) 'द्वितीय का' अर्थात् नैरन्तर्यविरोधी का। 'वह' अर्थात् निर्विरोधित्व। एकाश्रयस्व निमित्त से जो निर्दोष अर्थात् विरोधी नहीं किन्तु निरन्तरस्व निमित्त से विरोध को प्राप्त होता है उसको उस प्रकार के दोनों विरोधी रसों के अविरुद्ध तथा मध्य में निवेशित किये हुये अन्य रस से युक्त कर दिया जाना चाहिये यह कारिका का अर्थ है। 'प्रबन्ध में' यह
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बाहुल्य की अपेक्षा से कहा गया है। मुक्तक में भी कभी ऐसा हो भी जाए। जैसा कि कहेंगे—‘एक वाक्य में स्थित भी दो काव्य''' इत्यादि।
‘जैसे’ यह। वहाँ पर निस्संदेह ‘राग का स्थान है यह जानता हूँ, मुझे यह ध्वंस होनेवाला है यह विश्वास न हो ऐसा नहीं' इत्यादि के द्वारा उपकल्प से लेकर दूसरे के लिये शरीरदान रूप निवन्धन पर्यन्त शान्त रस है; उसके विरुद्ध मलयवतीविषयक शृङ्गार है उन दोनों के अविरुद्ध मालयवती के अनुराग को मध्य में रखकर क्रमिक प्रसार की सम्भावना के अभिप्राय से कवि ने निवद्ध किया है—‘आश्चर्यजनक गीत, आश्चर्यजनक बाधा' इसके द्वारा।
इसी निमित्त ‘व्यञ्जन धातु के द्वारा अभिव्यक्त' इत्यादि प्रायः नीरस ही निवद्ध किया गया है जो कि अद्भुत रस का परिपोषक होने के कारण अत्यन्त सरसता का सम्पादक है; इस प्रकार ‘कन्याएँ निर्दोष दर्शनीय होती हैं'है इसके द्वारा क्रमप्रसार का निवन्धन किया गया है।
जैसाकि कहा गया है—‘साध्य लोग चित्तवृत्ति के प्रसार के विवेचन को ही धन समझते हैं—यह निमित्त-नैमित्तिक के प्रसंग से पुथ्वार्थहेतुक होता है।' इसके बाद निमित्त-नैमित्तिक प्रसंग से आया हुआ जो कि शोबरक वृत्तान्त से अभिव्यक्त हास्यरस से उपकृत होनेवाला शृङ्गार रस है उसके विरुद्ध जो वैराग्य और शम का पोषक नागों के शरीर के अस्थिजाल के अवलोकन इत्यादि का वृत्तान्त वह मलयवती के निर्गमन करनेवाले प्रवृष्ट हुये मित्राव्मु के ‘चोरी और विचारणशील विभावा के द्वारा इत्यादि वचनो से उपनिबद्ध क्रोध व्योमचारिणी से उपकृत वीररस को मध्य में करके निविष्ट किया गया है।
तारावती—२५ वीं कारिका में ऐसे रसों विरोध परिहार का उपाय बतलाया है जिनका एक आश्रय में मिल सकना असम्भव हो। अब दूसरे प्रकार का विरोध लीज़िये—कतिपय रस ऐसे होते हैं जिनका एक आश्रय में रहना तो विरुद्ध नहीं होता किन्तु एक के तात्काल बाद दूसरे रस के आ जाने में विरोध होता है। जैसे रति और वैराग्य का विरोध। ये दोनों भाव किसी व्यक्ति में एक साथ नहीं रह सकते। किन्तु कालान्तर में तो एक के बाद दूसरा भाव आया ही करता है।
इस प्रकार इन रसों का एक साथ वर्णन करना ही विरुद्ध है क्योंकि वैराग्य रति से उपहत हो जाता है और रति वैराग्य से। एक के बाद दूसरे रस पर एकदम आ जाने से पाठक की मनोवृत्ति उसके आस्वादन के लिए सन्नद्ध नहीं रहती। ऐसे अवसरों पर क्या करना चाहिये यह इस २६ वीं कारिका में बतलाया गया है—
२६
‘जिन रसों का एक आश्रय में होना तो दूषित नहीं होता किन्तु उनकी निरसतरता विरोध उत्पन्न करनेवाली होती है—बुद्धिमान् कवि को चाहिए कि ऐसे रसों की व्याख्या किसी अन्य रस को बीच रख कर करें।’।२६।
आशय यह है कि जिन रसों का विरोध का निमित्त ही उनका एक साथ आना है उन रसों का विरोध तभी दूर होता है जब उन दोनों के बीच में कोई ऐसा तीसरा रस रख दिया जाए जो दोनों का विरोधी न हो और दो दो से मेल खा सके। यह बात अधिकतर प्रबन्ध काव्यों में ही होती है क्योंकि प्रबन्ध काव्यों में ही इतना अवकाश होता है कि अनेक रसों का परिपोष हो सके।
किन्तु मुक्तक में यह बात बिल्कुल सम्भव न हो ऐसी बात नहीं है। अपि तु
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तृतीय उद्योत:
कारिका में यही दिखलाया जायगा कि एक वाक्य में भी दो रसों के मध्य में तीसरा रख देने से उनका विरोध जाता रहता है । इस विषय में नागानन्द का उदाहरण यहाँ पर उदाहरण के रूप में नागानन्द में शान्त और शृंगार का अद्भुत को मध्य में रखकर मिलना बतलाया गया है । अभिनवगुप्त ने नागानन्द की प्रायः सम्पूर्ण कथा पर प्रकाश डाला है । अतः यहाँ पर नागानन्द का कथानक समझ लेना आवइयक है । नागानन्द की वस्तु बौद्ध साहित्य से सम्बद्ध है और बृहकथा से ली गई है । विद्याधरों का युवराज जीमूतवाहन स्वभावतः उदासीन है और अपने पिताजी का राज्य इत्यादि सभी कुछ छोड़ देता है तथा अपने घर के कल्पवृक्ष को भी दानकर माता-पिता की सेवा को ही परम कर्तव्य मानकर माता-पिता के साथ तपवन को जाता है । विदूषक के साथ जब वह मलय पर्वत पर किसी निवासोपयोगी स्थान की खोज में जाता है तब उसे वहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य आकर्षित कर लेता है । वहीं वह गीतध्वनि सुनता है और संगीत की शास्त्रीय विशेषताओं पर ऐसा मुग्ध हो जाता है कि उस संगीत का अनुसरण करते हुए देवमन्दिर की ओर जाता है जहाँ मलयवती अपनी चेटी के साथ भगवती गौरी की प्रार्थना में लाना गा रही है । मलयवती का रूप और भी आकर्षक है और जीमूतवाहन उसपर एकदम रीझ जाता है । चेटी के साथ वार्तालाप में यह प्रकट हो जाता है कि मलयवती एक कन्या है । अतः कन्याओं को देखना बुरा नहीं होता यह समझकर जीमूतवाहन को और अधिक प्रोत्साहन मिलता है । मलयवती अपनी चेटी से अपने स्वप्न की कथा कहती है कि गौरी ने उन्हें स्वप्न में विद्याधर चक्रवर्ती को पति के रूप में प्रदान किया है । इस पर जीमूतवाहन और विदूषक मलयवती के सामने आ जाते हैं और दोनों का परस्पर अनुराग व्यक्त हो जाता है । इसी समय मलयवती को एक तपस्वी घर को बुला ले जाता है । दोनों एक दूसरे के वियोग में दुःखी हैं । संयोगवश जिस समय चेटी के साथ मलयवती प्रच्छन्नरूप में सुन रही होती हैं उस समय जीमूतवाहन विदूषक से अपने प्रेम का वर्णन करते हैं और स्मृति से अपनी प्रेमिका का चित्र बनाते हैं । मलयवती निश्चय नहीं कर पाती कि यह प्रेमिका स्वयं वही है या कोई और । इसी समय मित्रावसु आकर अपनी बहन मलयवती के विवाह का प्रस्ताव जीमूतवाहन से करते हैं । जीमूतवाहन को यह पता नहीं है कि उनका प्रेम वस्तुतः मलयवती से ही है । अतः जीमूतवाहन अपने अन्य प्रेम की बात कहकर मलयवती के प्रेम को ठुकरा देते हैं और विदूषक के निर्देश पर मित्रावसु जीमूतवाहन के माता-पिता से जीमूतवाहन के विवाह की अभ्यर्थना करने चले जाते हैं । मलयवती निराश होकर फाँसी लगाकर आत्महत्या करने पर उतारू हो जाती है । तब चेटी के चिल्लाने पर जीमूतवाहन उसे छुड़ाने जाते हैं जहाँ दोनों का परिचय होता है और राजा अपने प्रेम का प्रमाण अपने बनाये हुए चित्र के द्वारा देते हैं । फिर गुरुजनों की अनुमति से दोनों का विवाह हो जाता है । यहाँ पर दोनों के शृंगार का विस्तार किया गया है । विदूषक को वहाँ की स्त्रियाँ उपहास के रूप में कई सुगन्धित रंगों से रंग देती हैं । सुगन्धि की ओर आकृष्ट होकर मोर विदूषक की ओर आने लगते हैं । तब विदूषक भागने के लिये स्त्रियों के वस्त्र पहनकर और घूँघट काढ़कर चलता है ।
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दास शरार के नशे में चूर होकर विदूषक को अपनी प्रेयसी समर्पण कर श्रृङ्गार चेष्टायें करते हैं जब कि विट की प्रेयसी आकर दोनों को खूब बनाती हैं। यहाँ हास्य का पुष्ट मिल जाता है।
जिस समय जीमूतवाहन मलयवती के प्रेम में मस्त हैं उसी समय मित्रावसु आ जाते हैं और मलयवती बहाँ से चली जाती है। मित्रावसु सूचना देते हैं कि मतङ्ग ने विद्याधरों का राज्य छीन लिया है और जीमूतवाहन से युद्ध की आज्ञा माँगते हैं। जीमूतवाहन राज्य छिन जाने की प्रसन्नता ही होती है। किन्तु मित्रावसु क्रोध से भरे हुये हैं। अतः जीमूतवाहन समय टाल देते हैं।
जीमूतवाहन समुद्रतट पर घूमने जाते हैं और वहाँ नागों के कङ्काल देखकर अपना शरीर देकर भी नागों की रक्षा करने का निश्चय कर लेते हैं। उधर शङ्खचूड़ अपनी पारी में गरुड़ के भोज्य के रूप में उपस्थित होता है। जीमूतवाहन सब रहस्य जानकर अपने प्राण देने के लिये उद्यत हो जाता है और जब शङ्खचूड दक्षिण शोकर्ण की परिक्रमा करने जाता है तब तक जीमूतवाहन अपना शरीर गरुड़ को अर्पित कर देते हैं। गरुड़ उनको लेकर उड़ जाता है। शङ्खचूड़ भी उनका अनुसरण करता है तथा जीमूतवाहन के माता-पिता और उनकी पत्नी मलयवती भी जिस स्थान पर पहुँचते हैं जहाँ गरुड़ जीमूतवाहन को लिये उपस्थित है।
किन्तु जीमूतवाहन अन्त समय में स्वजनों से मिलकर दिवंगत हो जाते हैं। गरुड़ परचात्ताप से आक्रान्त होकर प्रत्युज्जीवन के लिये अमृत लेने चले जाते हैं उसी समय गौरी आकर अपने कमण्डल के जल से जीमूतवाहन को जीवित कर देती हैं। उधर गरुड़ अमृत वर्षा के द्वारा अस्यपोष नागों को जिला देते हैं और फिर कभी नागवंश का संहार न करने का व्रत लेते हैं।
इस नाटक में निम्नलिखित रसों का उपादान किया गया है :
१
सर्वस्वदान कर पितृचरण सेवा में तत्परता और परार्थ जीवन का उत्सर्ग इसमें जीमूतवाहन के शान्त रस की अभिव्यक्ति होती है।
२
मलयवती की संगीतपटुता में अद्भुत रस निष्पन्न होता है।
३
जीमूतवाहन और मलयवती की प्रणयलीला में शृङ्गार रस है।
४
शेखरक के वृत्तान्त में हास्य रस है।
५
मित्रावसु द्वारा युद्ध की प्रेरणा में वीर रस है। जिसमें क्रोध संचारी के रूप में सन्निहित है।
६
माता पिता और मलयवती के विलाप तथा शङ्खचूड और उसकी माता के संबाद में करुण रस है।
यहाँ वंगी रस शान्तरस है। क्योंकि अंगी रस वही होता है जिसका उपक्षेप नाट्य-बीज के रूप में किया गया हो तथा जो निर्वहण में विम्बित हो। उपक्षेप मुखसन्धि का पहला सन्ध्यंग है और इसमें बीज का उपन्यास किया जाता है। इस उपक्षेप में जीमूतवाहन कहते हैं—
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३
तृतीय उद्योतः
मैं जानता हूँ कि यौवन राग का प्रमुख स्थान है। यह विनश्वर है। यह मुझे न मालूम हो ऐसा भी नहीं है। यहाँ कौन नहीं जानता कि यौवन कर्तव्याकर्तव्यविवेचन में अक्षम होता है। किन्तु यदि मेरा यह निन्दनीय यौवन भी इसी प्रकार माता-पिता की सेवा करते हुए व्यतीत हो जाए तो यह अभीष्ट फल को प्रदान करनेवाला ही होगा।
३
तृतीय उद्योतः
यहाँ यौवन की गरिष्ठा वीररस्यपरक है। इस प्रकार नाट्य का बीज शान्त पर्यवसायी ही है। निर्वहण में दूसरे के लिए जीवन का उत्सर्ग दिखलाया गया है जो कि वीररसपरक ही है। इस प्रकार बीज और फल दोनों वीररसपर्यवसायी हैं। अतः शान्तरस अङ्गी है। शान्तरस के बाद जिस रस का सर्वाधिक विस्तार हुआ है वह है शृङ्गार। यह रस प्रथम तीन अङ्कों में व्याप्त है। किन्तु शान्त और शृङ्गार दोनों विरोधी रस हैं। शान्त से एकदम शृङ्गार पर जाना एक दोष हो जाता है। इसीलिये कवि ने 'क्या ही सुन्दर गीत है, क्या ही सुन्दर वाद्य है ?' कहकर अद्भुत रस को बीच में निबद्ध कर दिया है। इसीलिये 'व्यतिर्य्यख्यापनशतत्ना—' इत्यादि के द्वारा संगीत की शास्त्रीय विशेषताओं का उल्लेख किया गया है जो न तो प्रासङ्गिक ही है और न सरस ही। किन्तु उसका उपयोग यही है कि बीच में अद्भुत रस की निष्पत्ति कर दी जाए। यह अद्भुत रस न तो शृङ्गार का विरोधी है न शान्त का। अतः बीच में आकर दोनों को जोड़ने का महत्त्वपूर्ण कार्य करता है जिससे संगीत शास्त्र की नीरस भी शास्त्रीयता सरस हो उठती है।
३
तृतीय उद्योतः
क्रमशः जीमूतवाहन मन्दिर की ओर जाते हैं और यह जानकर कि संगीतपरायणा युवती एक कन्या है, उनके हृदय में यह भावना उत्पन्न होती है कि कन्याओं को देखना अनुचित नहीं होता। इस प्रकार उनकी तीव्र शान्तरससमयी चित्तवृत्ति में पहले आश्चर्य का प्रसार होता है, फिर कन्या के सम्मिलन की उत्कण्ठा और उसके बाद शृङ्गार रस। यहाँ इस क्रमिक प्रसार के लिये ही मध्य में अद्भुत रस को लाया गया है।
३
तृतीय उद्योतः
यहाँ पर चित्त के प्रसार का समीक्षण के लिये अभिनव गुप्त ने सांख्य शास्त्र के दो सिद्धान्तों का उल्लेख किया है—चित्तवृत्ति का प्रसार और लिङ्गशरीर का अनेक रूप धारण करना। अतः इन दोनों तत्त्वों पर प्रकाश डालना आवश्यक प्रतीत होता है—
३
तृतीय उद्योतः
सांख्य शास्त्र के अनुसार दो तत्त्व होते हैं—पुरुष और प्रकृति। पुरुष चेतन होता है और प्रकृति में क्रियाशीलता होती है। पुरुष में क्रियाशीलता नहीं होती और प्रकृति में चेतना नहीं होती। किन्तु जिस प्रकार एक दूसरे के सामने रखे हुए दो दर्पणों में एक दूसरे की प्रतिच्छाया संक्रान्त हो जाती है उसीप्रकार पुरुष और प्रकृति की निकटता से एक दूसरे के धर्मों का संक्रमण एक दूसरे में प्रतीत हो जाता है जिससे पुरुष क्रियाशील और प्रकृति चेतन प्रतीत होने लगती है।
३
तृतीय उद्योतः
प्रकृति में तीन गुण होते हैं—सत्त्व, रज और तम। सत्त्व का कार्य है प्रकाशित होना, रज का काम है क्रियाशील होना और तम का काम है स्थिरता। प्रारम्भ में तीनों गुणों की साम्यावस्था रहती है और प्रकृति में तीनों गुण विद्यमान रहते हुए भी पूर्ण क्रियाशील नहीं होती।
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रहते । उस अवस्था को मूल प्रकृति कहा जाता है । यह किसी से उत्पन्न नहीं होती किन्तु अनेक तत्त्वों को जन्म देनेवाली होती है । यह केवल प्रकृति ही कही जाती है । अदृष्ट इत्यादि के प्रभाव से रजोगुण को क्रियाशीलता के कारण सत्वगुण प्रकाश में आ जाता है तब उसे महत्तत्त्व या बुद्धि की संज्ञा प्राप्त हो जाती है । बुद्धि में जब रजोगुण का अंश तीव्र हो जाता है तब अहङ्कार या विभाजक तत्त्व का आविर्भाव होता है । इसी क्रम से अहङ्कार से पञ्चतन्मात्रायें, पञ्चतन्मात्राओं से स्थूलभूत तथा ११ इन्द्रियों का आविर्भाव होता है । महत्तु से पञ्चतन्मात्राओं तक समस्त तत्त्व अपने पूर्ववर्तियों की प्रकृति है और पूर्ववर्तियों की विकृति । ११ इन्द्रियाँ और स्थूल भूत केवल विकृति हैं, और प्रकृति किसी भी तत्त्व की नहीं । पुरुष न प्रकृति है और न विकृति । इस प्रकार सांख्याभिमत पदार्थ चार प्रकार के होते है । सांख्य के मत में सत्कार्य-वाद माना जाता है ।
बाह्यइन्द्रियां विषय को ग्रहणकर अन्तःकरण को सम्प्राप्त करती हैं । उन विषयों के प्रभाव से अन्तःकरण की जो परिणमवृत्तियां उद्भूत होती हैं उन सबके समूह को चित्त कहते है । अन्तः करण के दो धर्म होते हैं प्रत्यय और संस्कार । प्रख्या और प्रवृत्ति को प्रत्यय कहते हैं और स्थिति को संस्कार । प्रख्या, प्रवृत्ति और स्थिति, इन तीनों में पांच-पांच वृत्तियां होती है । प्रख्या की ५ वृत्तियां होती हैं—प्रमाण, स्मृति, प्रवृत्ति-विज्ञान, विकल्प और विपर्यय । चित्त की भली प्रवृत्तियां ५ प्रकार की होती हैं—संकल्प, कल्पन, कृति, विकल्पन और विपर्यासत चेष्टा । स्थितिसंस्कार के ५ प्रकार हैं—प्रमाण संस्कार, स्मृति संस्कार, प्रवृत्तिसंस्कार, विकल्पसंस्कार और विपर्याससंस्कार । इस प्रकार चित्तवृत्ति का प्रसार ही प्रमाणादि समस्त तत्त्वों को आवृत कर लेता है ( चित्तप्रवृत्ति के प्रमाणादि रूप में प्रसार की विस्तृत व्याख्या के लिये देखिये—स्वामी हरिहरानन्द अरण्य कृत सांख्यतत्वालोक ) इसी-
लिये अभिनव गुप्त ने लिखा है कि साङ्ख्यों का धन चित्तवृत्ति के प्रसार की व्याख्या करना ही है । इसलिये चित्तवृत्ति का निरोध हो योग माना गया है ।
पुरुष की योगप्राप्ति और निर्वाणप्राप्ति के निमित्त प्रकृति सचे्ट होकर उसके लिये एक लिङ्गशरीर की रचना करती है । इस लिङ्गशरीर में महत् ( बुद्धि ), अहङ्कार, पञ्च-तन्मात्रायें और ११ इन्द्रियाँ ये मिलाकर १८ पदार्थ होते हैं और इसमें ८ भावों की अधि-वासना होती है । वे ८ भाव हैं—धर्म, अधर्म, ज्ञान, अज्ञान, वैराग्य, अवैराग्य, ऐश्वर्य और अनैश्वर्य । यह लिङ्गशरीर सूक्ष्म होता है और भोग तथा अपवर्ग के लिये पुरुष को आवेष्टित किये रहता है । किन्तु यह लिङ्गशरीर तब तक अविच्छिन्न होता है जब तक स्थूल भूतों से बने हुये शरीर से इसका संयोग नहीं हो जाता । जिस प्रकार नट अनेक भूमिकायें करने के लिये कभी परशुराम, कभी अजात शत्रु कभी वत्सराज बन जाता है उसीप्रकार यह लिङ्गशरीर भी अनेक योनियों में भटकता फिरता है । स्थूल भौतिक शरीरों के नष्ट हो जाने पर भी इस लिङ्गशरीर का नाश नहीं होता और यह अपने कर्मों के अनुसार शरीरान्तर में प्रवेश करता है । यह क्रम तब तक चलता रहता है जब तक ज्ञान के द्वारा चित्तवृत्ति का निरोध नहीं हो जाता जो कि अपवर्ग की एक आवश्यक शर्त है । यही सांख्य के सिद्धान्तों का सार है । इस प्रसंग में अभिनवगुप्त ने सांख्य की निम्नलिखित कारिका का उद्धृत की है—
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३
तृतीय उद्योतः
पुरुषार्थहेतुमिदं निमित्तनैमित्तिकप्रसङ्गेन ।
[ पुरुष के प्रयोजन ( भोग और अपवर्ग ) को निमित्त मानकर बना हुआ यह लिङ्ग-शरीर निमित्त ( धर्म इत्यादि ) और नैमित्तिक ( भौतिक शरीर ) के प्रसंग से प्रकृति की व्यएक्ता के कारण नट के समान अनेक रूपों को धारण कर व्यवहार करता है । ]
३
तृतीय उद्योतः
नित्यम् ।
नागानन्द में उसी क्रमिक चित्तवृत्ति के प्रसार के कारण शांत से अद्भुत पर होती हुई चित्तवृत्ति श्रृङ्गार पर आती है फिर निमित्तनैमित्तिक प्रसङ्ग से ही शेखरक, विदूषक और नवमालिका विषयक हास्यरस उपस्थित होता है । यह हास्य प्रस्तुत श्रृङ्गार का विरोधी नहीं है, अपि तु श्रृंगार की भावना की अभिवृद्धि ही करता है । इस हास्यरस से उपकृत होकर नायक-नायिका का श्रृंगार रस पुष्ट हो जाता है । ( किन्तु वह श्रृंगार रस है अथवा नहीं क्यों-कि पहले सिद्ध किया जा चुका है कि नागानन्द में शान्तरस हो अंगी है । नायक का नवीन परिणय इस शान्त की भावना को अधिक महत्वपूर्ण बना देता है । ) अब कवि को श्रृङ्गार से पुनः शान्त पर आना है । एकदम आया नहीं जा सकता क्योंकि दोनों का तैरन्तर्य विरोधी तथा सदोष माना जाता है । इसीलिये कवि ने जिस प्रकार पहले शान्त श्रृङ्गार पर आने के लिये बीच में अद्भुत रस को रख दिया था उसी प्रकार श्रृंगार से पुनः शान्त पर आने के लिये कवि ने बीच में वीर रस को सन्निविष्ट कर दिया है । जब मित्रावसु आते हैं तब मलयवती चली जाती है जिससे श्रृङ्गार में विराम लग जाता है । मित्रावसु युद्ध का प्रस्ताव करते हुये कहते हैं—
३
तृतीय उद्योतः
संसप्त्तिः समन्तात् कृतसकलविलयनमध्यगयानेकिमानः ।
३
तृतीय उद्योतः
कुर्वाणा: प्रावृीव स्थगितरविरुच: इयमार्तां वासरस्य ।
३
तृतीय उद्योतः
एते याताश्च सद्यस्तदववचनमितः प्राप्य युद्धाय सिद्धाः ।
३
तृतीय उद्योतः
सिद्धश्वेतद्वृत्त शत्रुक्षणभयविनमद्राजकं ते स्वराज्यम् ॥
[ चारों ओर से घेरकर तथा समस्त शत्रुओं को बीच में लाकर घोर वर्षा काल के समान सूर्य के प्रकाश को रोककर दिन को काला करते हुये ये सिद्ध तुम्हारे वचनों को प्राप्तकर यहाँ से युद्ध के लिये प्रस्थान करें और तुम्हारा अपना राज्य उद्दत शत्रुओं के क्षणिक भय के दूर हो जाने से नम्र राजाओंवाला बन जाए । ]
३
तृतीय उद्योतः
इसके बाद मित्रावसु अकेले ही शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लेने का उत्साह दिखलाते हैं । यह उत्साह क्रोध से मिला हुआ है । क्रोध वीररस का संचारी भाव है । इस वीररस को बीच में डालकर कवि अनायास ही श्रृङ्गार से शान्त पर पहुँच जाता है । इस प्रकार किसी तटस्थ रस को दो विरोधियों के मध्य में डाल देने से दोनों विरोधियों का विरोध मिट जाता है ।
३
तृतीय उद्योतः
(ध्वन्या०) शान्तरश्च तृष्णाक्षयसुखस्य यः परिपोषस्तल्लक्षणो रसः प्रतीयत
एव । तथा चोक्तम्—
३
तृतीय उद्योतः
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् ।
३
तृतीय उद्योतः
तृष्णाक्षयसुखस्यैते नाहत: षोडशों कलाम् ॥
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(अनु०) और तृष्णाक्षय सुख का जो परिपोष उस लक्षणवाला शान्तरस प्रतीत ही होता है। इसीलिये कहा गया है—
‘लोक में जो कामना का सुख है जो दिव्य महान् सुख है, ये तृष्णाक्षय सुख की षोडशी कला के भी अधिकारी नहीं ’
(लो०)—ननु नास्त्येव शान्तो रसः तस्य तु स्थायित्वेन नोपदिष्टो मुनिनेत्याशङ्क्याह—शान्तइच्रेति । तृष्णानां विषयाभिलाषाणां यः क्षयः सर्वतो निवृत्तिरूपो निर्वेदः तदेव सुखं तस्य स्थायिभूतस्य यः परिपोषो रस्यामनता कृतस्तदेव लक्षणं यस्य स शान्तो रसः । प्रतीति एवति । स्वानुभवे नापि निवृत्तभोजनाद्यशेषविषयेच्छाप्रस-
त्वकाले सम्भाव्यत एव ।
अन्ये तु सर्वचित्तवृत्तिप्रशम एवास्य स्थायीतिं मन्यन्ते । तृष्णासद्रावस्य प्रसज्यप्रतिषेधरूपत्वे चेतोवृत्तित्वभावेन भावत्वयोगात् प्रयुदासे त्वस्मत्पक्ष एवायम् ।
अन्ये तु—
स्वं स्वं निमित्तमासाद्य शान्ताद्रावः प्रवर्तन्ते । पुनर्निमित्तापाये तु शान्त एव प्रलीयते ॥
इति भरतवाक्यं द्रष्टव्यम् । सर्वरसरामान्यस्वभावं शान्तमाचक्षाणा अनुपजात-
चित्तवृत्तिविशेषान्तररूपं शान्तस्य स्थायिभावं मन्यन्ते । एतच्च नातिवास्मत्पक्षाद् दूरम् । प्रागभावप्रध्वंसाभावकृतस्तु विशेषः युक्तरुचि प्रध्वंस एव तृष्णानाम् ।
यथोक्तम्—‘वीतरागजन्मादर्शानात्’ इति ।
प्रतीति एवति । मुनिनाप्यझोकीत एव ‘स्वचिच्छम्’ इति वदता । न च तदीया पर्यन्तावस्था वर्णनीया येन सर्वचेष्टोपरमदनुभवाभावेनाप्रतीममानता स्यात् । श्रृङ्गारादेरपि फलभूभावर्णननयीतदेव पूर्वभूमौ तु ‘तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् । तच्च्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः’ इति सूत्रद्वयेनैव चित्रकारा यमनियमादिचेष्टा राजधुरोद्वहनादिलक्षणा वा शान्तस्यापि जनकादेरिङ्गितैवेत्यनुभावसद्रावाद्-
व्यभिचारिसद्रावाच्च प्रतीत एव ।
(अनु०) ‘निस्सन्देह शान्त तो है ही नहीं; उसका तो स्थायी ही मुनि के द्वारा उपदिष्ट नहीं किया गया है’ यह शङ्का करके कहते हैं—‘और शान्त’ । तृष्णाओं का अर्थात् विषयाभिलाषों का क्षय अर्थात् सभी ओर से निवृत्तिरूप निर्वेद वही सुख, स्थायिभूत उसका जो आस्वादन-
यता से उत्पन्न परिपोष वही जिसका लक्षण (लक्षित करानेवाला) हो वह शान्तरस होता है। ‘प्रतीत ही होता है’ । भोजन इत्यादि समस्त विषयों की इच्छाओं के प्रसार की निवृत्ति के
काल में सम्भावित ही किया जाता है।
दूसरे लोग तो सब चित्तवृत्तियों का प्रशम ही इसका स्थायी है यह मानते हैं । क्योंकि सद्राव के प्रसज्यप्रतिषेध रूप होने पर चित्तवृत्ति के अभाव से भावत्व ही सिद्ध नहीं होता । पर्यन्त में तो यह हमारा ही पक्ष है । और लोग तो—
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३
तृतीय उद्योतः
'अपने-अपने निमित्त को प्राप्तकर शान्त से भाव प्रवृत्त होता है फिर निमित्त के अपाय में शान्त में ही प्रलीन हो जाता है ।'
इस भरतवाक्य को देखे हुये सर्वरससामान्य स्वभाववाले शान्त को कहते हुये दूसरी चित्तवृत्ति की विशेषता की अनुत्पत्ति को शान्तरस का स्थायी भाव मानते हैं । यह हमारे पक्ष से बहुत दूर नहीं है । प्रागभाव और प्रध्वंसाभाव की उत्पत्ति की हुई विशेषता तो है । तृष्णाओं का प्रध्वंस हो उचित है । जैसा कहा गया है—'वीतराग का जन्म न देखने से ।'
३
तृतीय उद्योतः
'प्रतीत होता ही है' । 'कहीं शम' यह कहते हुये मुनि के द्वारा भी अंगीकृत किया ही गया है ।
उसकी पर्यन्तावस्था तो नहीं वर्णनीय है जिससे समस्त चेष्टाओं के उपरम से अनुभव के अभाव से ही अप्रतीयमानता हो । श्रृंगार इत्यादि भी फलभूमि में अवर्णनीय ही होते हैं पूर्वभूमि में तो '(नि:रोघ) संस्कार से उसकी प्रशान्तवाहिता होती है; उसके छिद्रों में संस्कारों से दूसरे प्रत्यय होते हैं' इन दो सूत्रों की नीति से विचित्र प्रकार की यम नियम इत्यादि चेष्टा अथवा राजधुरोधन इत्यादि की चेष्टा शान्तजनक की भी देखी ही गई है । अतः अनुभवों के होने से और यम नियम इत्यादि के मध्य में सम्भावित अनेक व्यभिचारियों के योग से प्रतीत होता ही है ।
३
तृतीय उद्योतः
तारावती—(प्रश्न) ऊपर शान्त और श्रृंगार के नैरन्तर्य विरोध का उदाहरण दिया गया है । यह तभी सज्जत हो सकता है जब दोनों रसों की सत्ता स्वीकृत कर ली जाए । शान्त नाम का तो कोई रस ही नहीं है । भरतमुनि ने रसों के प्रसङ्ग में शान्तरस के स्थायी भाव का उल्लेख ही नहीं किया है । फिर शान्त और श्रृंगार के विरोध का उदाहरण कैसे सज्जत हो सकता है ?
३
तृतीय उद्योतः
(उत्तर) शान्तरस की प्रतीति होती ही है उसका अपलाप किसी प्रकार भी नहीं किया जा सकता । जहाँ पर तृष्णाक्षय के सुख का परिपोष हो वहीं पर शान्तरस हुआ करता है । यही शान्तरस का लक्षण है । विषयाभिलाष से चारों ओर से निवृत्त हो जाना हो निर्वेद या वैराग्य कहलाता है । उस निर्वेद में एक अभूतपूर्व आनन्द आया करता है । यह निर्वेद रूप आनन्द ही शान्तरस का स्थायी भाव है । जब उसका परिपोष आस्वाद में हेतु हो जाता है तभी शान्तरस कहा जाता है । यही शान्तरस का लक्षण है । इसका अनुभव एक साधारण व्यक्ति को भी हुआ करता है ।
३
तृतीय उद्योतः
जब मनुष्य की पूर्ण तृप्ति हो जाती है और उसकी भोजन इत्यादि सभी विषयों की ओर इच्छा जाती रहती है उस समय उसे एक अपूर्व आनन्द का अनुभव हुआ करता है । इसीप्रकार तृष्णाक्षय के सुख में भी एक अभूतपूर्व आनन्द की प्रतीति होती है । यही आनन्द शान्तरस का स्थायी भाव होता है । यह बात कही सी गई है :—
३
तृतीय उद्योतः
'लोक में कामना से जो सुख प्राप्त होता है और जो स्वर्गीय महान् सुख होता है, वे दोनों प्रकार के सुख तृष्णाक्षय से उत्पन्न होनेवाले सुख का सोलहवाँ भाग भी नहीं होते ।'
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कतिपय आचार्यों का मत है कि सब प्रकार की चित्तवृत्ति का प्रशम ही शास्त्रस का स्थायी भाव होता है । यहाँ पर मुझे यह पूछना है कि 'चित्तवत्ति के न होने' में जो 'न' का प्रयोग किया गया है उसका क्या अर्थ है, निपेधवाचक 'न' के दो अर्थ हु्रा करते हैं—(१) प्रसज्यप्रतिषेध, यह प्रतिषेध वहाँ पर होता है जहाँ 'न' क्रिया के साथ लगता है, जैसे 'यहाँ पुरुष नहीं है' इस वाक्य में क्रिया के साथ 'न' लगा हुआ है और इसका अर्थ ग़लत हो जाता है कि 'न' यहाँ पुरुष है और न तस्मदश कोई अन्य । (२) पर्युदास-प्रतिषेध, जहाँ संज्ञा के साथ 'न' जुड़ता है जैसे—यहाँ 'अपुुरुष हैं' इसका अर्थ है कि यहाँ पुरुष नहीं हैं किन्तु तस्सम कोटि का कोई व्यक्ति विद्यमान है । अब प्रश्न यह है कि चित्तवृत्ति के निषेध में प्रसज्यप्रतिषेध है या पर्युदासप्रतिषेध । यदि आप प्रसज्यप्रतिषेध मानते हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप किसी प्रकार की चित्तवृत्ति मानते हो नहीं । इस प्रकार आप तृष्णा की सत्ता का सर्वतभावेन अभाव मान लेते हैं । ऐसी दशा में अभाव किसी प्रकार के भाव के अन्तर्गत किस प्रकार आ सकता है? अतः अभाव को स्थायी भाव कहना वदतोव्याघात दोष है । यदि आप पर्युदासप्रतिषेध मानते हैं तो इसका अर्थ होता है कि तृष्णा से भिन्न तसदृश किसी अन्य प्रकार की चित्तवृत्ति । ऐसी दशा में मेरा ही पक्ष सिद्ध हो जाता है क्योंकि हम निर्वेद एक विशेष प्रकार की चित्तवृत्ति मानते हैं और तृष्णाक्षय को शान्त का लक्षण स्वीकार करते हैं । पर्युदासप्रतिषेध का यही अर्थ है ।
दूसरे लोग कहते हैं कि शास्त्र एक सामान्य प्रकार की प्राकृत चित्तवृत्ति होती है और रति इत्यादि विकृत चित्तवृत्तियाँ हैं । यही बात भरतमुनि ने छठे अध्याय के अन्तिम भाग में कही हैं :— 'रति इत्यादि विकृत भाव होते हैं और शान्त उनकी प्रकृति होता है विकार प्रकृति से हो उत्पन्न होता है और प्रकृति में ही लीन हो जाता है । 'अपने-अपने कारणों को लेकर शान्त से ही दूसरे भावों का जन्म होता है और जब कारण जाता रहता है तब वह भाव शान्त में ही लीन हो जाता है ।'
इस भरतवाक्य का सहारा लेनेवालों का मत है कि शान्त सभी रसों के मूल में रहता है, सभी रसों की शान्तावस्था ही शान्त रस कहलाती है । अतः एवं शान्त रस का स्थायी भाव वही चित्तवृत्ति होती है जिसमें किसी अन्य प्रकार की चित्तवृत्ति की विशेषता का आविर्भाव न हुआ हो । यह सिद्धान्त भी लगभग वही है जिसे मैं मानता हूँ । विशिष्ट भावनाओं का अभाव ही हम दोनों के मत में शान्तरस का प्रयोजक होता है । अन्तर केवल यह है कि मेरे मत से तृष्णा का प्रध्वंसाभाव ( नष्ट होने के बाद का अभाव ) शान्त-रस कहलाता है और इन लोगों के मत से तृष्णा का प्रागभाव ( उत्पत्ति के पहले का अभाव ) शान्तरसरस कहलाता है । उचित यही है कि तृष्णा का प्रध्वंसाभाव ही शान्तरस माना जाए । न्यायसूत्रकार ने तृतीय अध्याय के प्रथम आाह्निक में कहा है कि 'वीतराग का जन्म नहीं देखा जाता ' वीताराग का यही आशय है कि जिसकी तृष्णा का प्रध्वंस हो गया हो ।
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तृतीय उद्योत:
'शान्तरस की प्रतीति होती ही है' कहने का आशय यह है कि विषयों से पूर्ण तृप्ति के बाद उनके परित्याग में उसी प्रकार का आनन्द आता है जिस प्रकार भोजन से तृप्त होने के बाद एक प्रकार के आनन्द का अनुभव हुआ करता है। यह तृप्ति जन्य आह्लाद सर्वजनानुभव सिद्ध है। साथ ही इस प्रतीति का यह भी अर्थ हो सकता है कि भरत मुनि ने भी इसे अङ्गीकार किया है। मुनि ने कहा है कि 'कहीं कहीं भावों का प्रशम भी होता है।' (शान्त रस के पक्ष, विपक्ष, सिद्धान्त पक्ष तथा उसके स्थायिभाव पर अभिनव भारती में विस्तारपूर्वक विचार किया गया है। अतः वहीं देखना चाहियें।) कुछ लोगों का कहना यह है कि शान्तरस में जब चित्त वृत्तियों का उपरम हो जाता है तब न तो उसकी प्रतीति ही होती है और न उसका अभिनय ही सम्भव है। इस विषय में मुझे यह कहना है कि शान्तरस की इतनी पर्यन्तावस्था का वर्णन करना ही नहीं चाहिये जिससे सभी प्रकार की चेष्टाओं का उपरम हो जाए और अनुभवों के अभाव में उसकी प्रतीति ही न हो सके। शान्तरस की ही पर्यन्तावस्था का वर्णन करना निषिद्ध नहीं है। अपितु शृङ्गार इत्यादि दूसरे रसों की पर्यन्तावस्था का वर्णन भी निषिद्ध ही है। यदि शृङ्गार की फलभूति का वर्णन किया जाए तो सरत का ही वर्णन होगा जो कि साहित्य में कभी समीचीन नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार रौद्र की पर्यन्तावस्था ह्रास्या है जो कि शास्त्र में निषिद्ध मानी जाती है। पूर्वभूमि में किसी भी रस का वर्णन अनुचित नहीं होता और यही बात शान्तरस के विषय में भी लागू होती है। और शान्तरस में भी पूर्व भूमि में चेष्टायें सर्वथा समाप्त नहीं हो जातीं। इस विषय में योग के दो सूत्रों का उल्लेख अग्रेतर न होगा। योगदर्शन के तृतीय पाद का एक सूत्र है—'तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात्' इसका आशय यह है—'जब चित्तवृत्ति की क्षय, मूढ़ और विक्षिप्त वृत्तियाँ समाप्त हो जाती हैं तब व्युत्थान रूप (सांसारिक) ज्ञानों का अवसर ही नहीं रहता। उस समय निरोध संस्कार से चित्तवृत्ति का प्रवाह प्रशान्त भाव की ओर चल देता है।' चतुर्थ पाद में एक दूसरा सूत्र और है—'तचित्तेन्द्रिय प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः' इसका आशय यह है कि जिस समय जीव समाधि में स्थित हो जाता है, उस समय भी बीच बीच में कुछ ऐसे विघ्न स्वरूप अवसर आते रहते हैं जिनमें दूसरे प्रकार के प्रत्ययों का आविर्भाव होता रहता है और उसमें पुराने संस्कार कारण होते हैं। आशय यह है कि समाधि की दशा में आने से पहले जिन व्युत्थान रूप ज्ञानों का अनुभव किया था उनसे संस्कार बन जाते हैं। वे संस्कार समाधि में आने पर भी पीछा नहीं छोड़ते। बीच बीच में विघ्न उपस्थित होते रहते हैं और उन अवसरों पर पुराने संस्कारों के बल पर व्युत्थानात्मक ज्ञानों का उद्रेक होता ही रहता है। यह शान्तरस की पूर्व भूमि का वर्णन है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि शान्त रस की पूर्वावस्था में भी चेष्टायें होती ही हैं। (शान्तरस के उत्पन्न हो जाने पर भी विषयों में अभ्यस्त हमारी मनोवृत्तियाँ उसी प्रकार की भावनाओं का अनुभव करने लगती है। केवल उनका विषय बदल जाता है। लौकिक अनुभूति में भौतिक वस्तुओं के प्रति मन में ललक रहती है, किन्तु वैराग्य के उत्पन्न हो जाने पर लौकिक वस्तुओं से वैमुख्य उत्पन्न हो जाता है तथा उसके स्थान पर मनोवृत्तियाँ परमात्मतत्त्व की ओर उन्मुख हो जाती हैं।) यही बात जनक इत्यादि के अन्दर भी देखी जाती है। उनकी भी
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समाधि अवस्था में यम नियम इत्यादि की चेष्टायें और व्युत्थान काल में राज्य के भार का वर्चन करना प्रसिद्ध ही है। इस अनुभव के बल पर कहा जा सकता है कि यम नियम इत्यादि के मध्य में बहुत से व्यभिचारियों की सम्भावना की जा सकती है। अत एव शान्तरस की प्रतीति का अपलाप नहीं किया जा सकता।
(ध्वन्यो०)—यदि नाम सर्वजनानुभवगोचरता तस्य नास्ति नेतावतासावलोकसामान्यमहानुभावविवक्षितवृत्तिविशेष: प्रतीक्ष्यतु श्लोक्य:।
(अनु०) यदि कहो कि उस (शान्त) की सर्वजनानुभवगोचरता नहीं होती तो इतने से ही अलोकसामान्य महानुभावों की विशेष प्रकार की उस चित्तवृत्ति का परित्याग किया जा सकता है।
(लो०)—ननु न प्रतीयते नास्य विभावा: सन्तीति वेतु न; प्रतीत एव तावद् तस्य च भवितव्यमेव प्राक्तनकुशलपरिपाकपरमेश्वरानुग्रहाध्यात्मरहस्यशास्त्रवीतरागपरिशीलनादिभिर्विभावैरित्यतेव विभावानुभाव्यविचारसन्दर्भ: स्थायी च दर्शित:।
ननु तत्र हृदयसंवादाभावाद्रस्यानुमान्तेव नोपपन्ना। क एवमाह स नास्तीति, यतः प्रतीत एवेत्युक्तम्। ननु प्रतीयते सर्वस्य इलाघास्पदं न भवति। तर्हि वीतरागाणां शृङ्गारो न इलाघ्य इति सोऽपि रसत्वाच्च्यवतामिति तदाह—इति नामेति।
(अनु०) निस्सन्देह नहीं प्रतीत होता है (क्योंकि) इसके विभाव नहीं होते। यदि यह कहो तो (ऐसा) नहीं (क्योंकि) यह तो प्रतीत ही होता है और उसने पुराने शुभ कर्मों का परिपाक, परमेश्वरानुग्रह, अध्यात्म रहस्य शास्त्र, वीतरागपरिशीलनादि विभावादि होने ही चाहिये। इस प्रकार विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव की सत्ता और स्थायी दिखलाया गया है। (प्रश्न) निस्सन्देह वहाँ पर हृदय संवाद के अभाव से रस्यानुमानता ही सिद्ध नहीं होती। (उत्तर) कौन ऐसा कहता है कि वह नहीं होती क्योंकि प्रतीति होती ही है ऐसा कहा जा चुका है।
"निस्सन्देह प्रतीत होता है (किन्तु) सभी की प्रशंसा का स्थान नहीं होता" तो वीतरागों को शृंगार प्रशंसनीय नहीं होता अतः वह भी रसत्व से च्युत हो जाए, यह कह रहे हैं—'यदि नाम—' इत्यादि।
तारावती—(प्रश्न) हम आपके इस तर्क से तो सहमत हो सकते हैं कि व्युत्थान काल की मनोवृत्तियाँ प्रशान्त अवस्था में भी होती हैं। हम यह भी मान सकते हैं कि उन मनोवृत्तियों की संवाहिका चेष्टायें (अनुभाव) भी सम्भव हैं। किन्तु केवल सत्त्ववारी भाव और अनुभवों से ही रसनिष्पत्ति सम्भव नहीं होती। उसमें विभाव का भी योग अपेक्षित होता है। यदि कहीं रसनिष्पत्ति सम्भव नहीं होती। उसमें विभाव का भी योग अपेक्षित होता है। यदि कहीं विभाव का उपादान नहीं भी किया जाता है तो भी उसका आक्षेप करके ही रसनिष्पत्ति होती है। किन्तु शान्त के विभाव सम्भव हो नहीं हैं। अतः वहाँ पर रसनिष्पत्ति किस प्रकार हो सकती है?
(उत्तर) शान्त रस की प्रतीति होती है यह तो दिखलाया ही जा चुका। पुराने
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३
तृतीय उद्योतः
२२६
(ध्वन्या०)—ननु च वीरतथ्यान्तभावः कुतो युक्तः। तस्याभिमानमयत्वेन व्यभिचारिस्थापनात्। अस्य चाहङ्कारप्रशमेकरूपतया स्थिते: तयौश्चैवविभ्रंशद्वारावेशदपि यदैक्यं परिकलल्प्यते तद्वीररौद्रयोरपि तथा प्रसङ्गः। दयावीरादीनां च चित्तवृत्तिविशेषाणां सर्वाकारमहङ्काररहितत्वेन शान्तप्रभेदत्वम्, इतरथा तु वीररसप्रभेदत्वमिति व्यवस्थाध्यमाने न किचिद्विरोधः। तदेव-मस्ति शान्तो रसः। तथ्य चाविरुद्धरसदयवघानेन प्रबन्धे विरोधिरससमावेशे सत्यपि निर्विरोधत्वम्। यथा प्रदर्शिते विषये ॥२२६॥
(अनु०) वीर में भी उसका अन्तर्भाव करना उचित नहीं है। क्योंकि उसकी व्यवस्था अभिमानमयत्व के रूप में की गई है और इसकी स्थिति अहङ्कारप्रशम की एकरूपता के साथ होती है। उन दोनों की इस प्रकार की विशेषता के होते हुये भी यदि एकता की कल्पना की जाती है तो वीर और रौद्र की भी वही बात होगी। दयावीर इत्यादि विशेष चित्तवृत्तियों का अहङ्काररहितत्व के कारण शान्तरस का प्रभेदत्व होता है अन्यथा वीररसप्रभेदत्व होता है, यह व्यवस्था किये जाने पर कोई विरोध नहीं होता। तो इस प्रकार शान्तरस है। और उसके अविरुद्ध रस के व्यवधान के द्वारा प्रबन्ध में विरोधीरस के समावेश के होने पर भी निर्विरोधत्व ही होता है। जैसा कि प्रदर्शित विषय में ॥२२६॥
३
तृतीय उद्योतः
(लो०)—ननु धर्मप्रधानोऽसी वीर एवेति सभ्भाव्यमान आह—न चेति। तस्येति वीरस्य। अभिमानमयत्वेनैति। उत्साहो ह्यहमेवविच इत्येवं प्राण इत्यर्थः। अस्य चैति। ईहामयत्वनिरीहामयस्वाभ्यामत्यन्तविरुद्धयोरपीति च्छेदार्थः। वीररौद्रयोरस्त्वन्तविरोधोऽपि नास्ति। समानं रूपं च चर्मार्थंकामार्ज्जनो-पयोगित्वम्। नन्वेवं दयावीरो धर्मवीरो वा नासो कश्चित्, शान्तस्यैवेदं नामान्तरकारणम्। तथा हि मुनि:— दयावीरं धमवीरं युद्धवीरं तथैव च । रसीरमपि प्राह ब्रह्मा त्रिविधसमितमत्व ॥ इत्यागमपुरस्सरं नैविध्यमेवाभ्यधात्। तदाह—दयावीरादीनां चेत्यादि ग्रह-णेन। विषयजुगुप्सारुपत्वाद्विभत्सेऽन्तर्भाव: शङ्कूयते। सा त्वस्य व्यभिचारिणी भवति न तु स्थायितामेति, पर्यन्ततनावहि तस्यामूलत एव विच्छेदात्। अधिकारिकत्वेन तु शान्तो रसो न निबद्धव्य इति चन्द्रिकार: तच्चेहास्माभिरन्तं पर्यालोचितं प्रसज्ञान्तरात्। मोक्षफलत्वेन चायं परमपुरुषार्थनिष्ठत्वात् सर्वरसेष्यः प्रधानतमः। स चास्म-
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दुपाध्रायभटृत्तौतेन काव्यकौतुके, अस्माभिश्च तद्विवरणे बहुत्रकृतपूर्वपक्षसिद्धान्त इत्यलं बहुना ॥२६॥
(अनु०) निस्सन्देह धर्मप्रधान वह वीररस ही है यह सम्भावना करते हुये कहते हैं—‘और नहीं’ यह । उसका अर्थात वीर का । ‘अभिमानमयत्व के द्वारा’ यह निस्सन्देह उत्साह का प्राण ही यह है कि मैं इस प्रकार का हूँ । ‘और इसका’ अर्थात शान्त का ‘और उन दोनों का’ यह । ‘और’ शब्द का अर्थ है उन दोनों के इच्छा से युक्तत्व और इच्छारहितत्व के द्वारा अत्यन्त विरोधी होते हुये भी वीर और रौद्र इन दोनों का तो अत्यन्त विरोध भी नहीं है और समानरूप से; धर्मी, अर्थ और काम के अर्जन की उपयोगिता है । निस्सन्देह इस प्रकार दया-वीर, धर्म-वीर अथवा दान-वीर यह कुछ नहीं है । शान्त का ही यह दूसरा नामकरण है । ऐसा निस्सन्देह मुनि कहते हैं—‘ब्रह्मा जी ने दानवीर, धर्मवीर और उसी प्रकार युद्धवीर इन तीन विधाओं में विभक्त वीररस को कहा है । इस प्रकार आगम के साथ तीन प्रकार ही कहे हैं । वही कहते हैं—दयावीर इत्यादि का इसमें आदिग्रहण से (धर्मवीर और दानवीर के लिये जाते हैं) विषयों के जुगनू-सारूप होने से बीभत्स में इसके अन्तभाव की शङ्का की जाती है । वह तो इसकी व्यभिचारिणी होती है स्थापितता को प्राप्त नहीं होती । पर्यन्तनिर्वाह में तो उसका मूल से ही विच्छेद हो जाता है । चन्द्रिकाकार ने कहा है कि आधिकारिक रूप में शान्तरस को निवद्ध नहीं करना चाहिये । हमने यहाँ पर उसकी पर्यालोचना नहीं की क्योंकि वह दूसरा प्रसङ्ग था । और यह मोक्षफलवाला होने से परम पुहषार्थनिष्ठ होने के कारण सब रसों से सर्वाधिक प्रधान है । इसके पूर्वपक्ष तथा सिद्धान्तपक्ष का हमारे उपाध्याय भट्टौत ने काव्यकौतुक में और हमने उसके विव रण में बहुत अ धक निर्णय किया है, बस इतना कहना पर्याप्त है । तारावती—(प्रश्न) परिशोलकों के हृदय का सन्तुलन और वस्तु से सामझस्य रसास्वादन का मूल है । शास्त्र रस परिशीलन करनेवालों के हृदय से मेल खाता ही नहीं, अत एव उसका आस्वादन किस प्रकार सङ्जत कहा जा सकता है ? (उत्तर) कौन कहता है कि शान्तरस हृदय से मेल नहीं खाता ? जब उसका प्रतीत होना सिद्ध हो चुका है तब उसका सहृदयों द्वारा आस्वादन स्वतः उपन्न हो जाता है । (प्रश्न) यह तो मैं मान सकता हूँ कि शान्तरस प्रतिभागोचर होता है । किन्तु सभी लोगों की प्रझा का पात्र नहीं होता और न सभी लोगों के हृदयों से उसका सामझस्य ही होता है । इसीलिये उसकी रसनीयता सन्देहास्पद हो जाती है । (उत्तर) यह कोई तर्क नहीं कि जो रस सभी के लिये हृद्य हो वही रस कहा जाता है । श्रृङ्गार भी तो वीतराग व्यक्तियों के आस्वादन और आदर का हेतु नहीं होता । तो क्या इसी आधार पर श्रृङ्गार भी रसत्व से च्युत हो जायेगा । शान्तरस सभी व्यक्तियों के अनुभावगोचर नहीं होता तो केवल इतने से ही अलोकसामान्य महानुभावों की एक विशेष प्रकार की मनोवृत्ति का खण्डन नहीं किया जा सकता ।
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तृतीय
उद्योत:
(प्रश्न) शान्तरस का धर्मवीर में अन्तर्भाव क्यों नहीं हो सकता ? (उत्तर) शान्तरस और धर्मवीर इन दोनों प्रकार की चित्तवृत्तियों में स्पष्ट-रूप में अन्तर है। वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है। यह व्यवस्थित ही किया जा चुका है कि उत्साह अभिमानमय होता है। वस्तुतः उत्साह का प्राण हो अपनी महत्ता को स्वीकार करना है। जब तक अपनी शक्ति का अभिमान और शत्रु के अपमान की चेतना नहीं होती उत्साह का जन्म ही नहीं हो सकता। इसके प्रतिकूल शान्तरस में अभिमान का प्रशम ही उसका एकमात्र स्वरूप होता है। इस प्रकार धर्मवीर ईहामय होता है और शान्तरस ईहारहित। इस प्रकार इनमें महान् वैषम्य है; अतः इन दोनों को एक माना ही नहीं जा सकता। यदि कोई व्यक्ति इनके एक मानने का दुराग्रह करता ही चला जाय तो कहना होगा कि युद्धवीर तथा रौद्र में तो इतना भी अन्तर नहीं है; फिर युद्धवीर और रौद्र को एक मानना तो और भी अधिक युक्तियुक्त नहीं होगा। इनकी समानरूपता का आशय यही है कि धर्म अर्थ और काम के उपायों की उपयोगिता का समान होना। इस दृष्टि से युद्धवीर और रौद्र दोनों की उपयोगिता एक जैसी है। धर्मवीर और शान्त में तो इस दृष्टि से भेद भी किया जा सकता है कि धर्मवीर में अभिमान की परिपुष्टि भी उसका उपयोग हो सकती है किन्तु शान्तरस में युद्ध धर्मोपार्जन का ही उपयोग होता है। अतः जिस तर्क के आधार पर युद्धवीर और रौद्र एक नहीं माने जा सकते उसी तर्क के आधारपर धर्मवीर और शान्त भी एक नहीं हो सकते।
तृतीय
उद्योत:
( प्रश्न ) भरतमुनि ने वीररस के उपभेदों का परिगणन करते हुये लिखा है— 'ब्रह्मा जी ने वीररस के तीन भेद बतलाये हैं—दानवीर, धर्मवीर, और युद्धवीर ।'
इस कारिका में केवल तीन प्रकार का ही वीररस बतलाया गया है और उसमें भी आभिमान की सम्मति दी गई है। कि यह कथन ब्रह्मा जी का है। इन भेदों में दयावीर को सम्मिलित नहीं किया गया है। अत एव या तो दयावीर को ही शान्तरस की संज्ञा प्रदान की जा सकती है अथवा दयावीर धर्मवीर और दानवीर को अलग न मानकर शान्तरस स्वीकार किया जा सकता है और इन तीनों को शान्तरस का ही भेद माना जा सकता है। पृथक् रूप में शान्तरस को मानने की क्या आवश्यकता? ( उत्तर ) दयावीर इत्यादि शान्तरस के प्रभेद उस समय होते हैं जब उनमें सब प्रकार के अहङ्कार का अभाव हो। यदि उनमें उत्साह के साथ अहङ्कार का भी समावेश किया जाता है तो वे सब वीररस के हो प्रभेद माने जाते हैं। ऐसी व्यवस्था करने में किसी को अनुपपत्ति हो ही नहीं सकती। ( मूल में 'दयावीरादीनां च...' यह पाठ आया है। इस प्रतीक को लेकर अभिनवगुप्त ने लिखा है—'दयावीरादिनोच्चेत्यादिग्रहणेन ।' इस 'आदिग्रहणेन' के बाद विराम लगा दिया गया है। स्पष्ट हो है कि यह वाक्य पूरा नहीं होता। ज्ञात होता है कि यहाँ पर 'दानवीरधर्मवीरयोग्रहणम्' यह छूट गया है। यही मानकर उक्त व्याख्या की गई है और यह मान्यता बालप्रिया इत्यादि टीकाकारों को भी अभिमत है।)
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कुछ लोग शान्तरस का अन्तर्भाव बीभत्सरस में करते हैं। क्योंकि शान्तरस में भी विषयों की ओर से घृणा होती ही है। किन्तु यह मत भी ठीक नहीं। क्योंकि घृणा शान्तरस में स्थायी भाव नहीं हो सकती अपितु व्यभिचारी भाव ही होती है। जिस समय शान्तरस का पर्यन्त निर्वाह किया जाता है उस समय घृणा का मूल से ही विच्छेद हो जाता है। ( शान्तरस के विषय में और भी अनेक प्रश्न उठाये जा सकते हैं। इसका विस्तृत विवेचन प्रकरणानुकूल अभिनव भारती में किया गया है। वहां रति इत्यादि प्रत्येक स्थायी भाव में शान्तरस का अन्तर्भाव क्यों नहीं होता यह दिखलाया गया है। ) इसी से समृद्ध मत चन्द्रकाकार का भी है। उनका मत है कि शान्तरस का उपनिबन्ध आघिकारिक रस के रूप में नहीं करना चाहिये। किन्तु अभिनव गुप्त का कहना है कि यह इस विषय का प्रकरण नहीं है। अतः यहां पर उसका विवेचन नहीं किया जा रहा है। इस विषय में अभिनव गुप्त के उपाध्याय भट्टतौत ने अपने काव्यकौतुक नामक ग्रन्थ में पूर्वपक्ष और सिद्धान्तपक्ष का विस्तृत विवेचन किया है। अभिनवगुप्त ने इस ग्रन्थपर विवरण लिखा है जिसमें उन्होंने भी पर्याप्त प्रकाश डाला है। यहां उसके विस्तार करने की आवश्यकता नहीं। संक्षेप में इतना कहा जा सकता है कि शान्तरस का फल मोक्ष होता है जो कि सबसे बड़ा फल है। अत एव इस रस की निष्ठ पुरुषों में भी सबसे अधिक होती चाहिये। इस प्रकार यह रस सभी अन्य रसों की अपेक्षा सर्वाधिक प्रधान माना जा सकता है।
इस प्रकार शान्तरस सिद्ध हो जाता है। यदि उसके अविरोधी रसों के व्यवधान के द्वारा विरोधी रसों के साथ रखा जाय तो उनका परस्पर विरोध जाता रहता है।
२५७
रसांतरव्यवहितयोरेकप्रबन्ध्योर्विरोधिता निवर्तते इत्यत्र न काचिदभ्रान्तिः । यस्मादेकवाक्यस्थयोरपि रसयोर्हि विरोधिता निवर्तते । यथा— रसान्तरघटितयोरेकप्रबन्ध्योर्विरोधिता निवर्तते ।
भूरणुद्भासितनवपल्लवजालैरजायताम्रहृदयामध्यमाध्या: । गाढं शिवाभि: परिरस्यमाणान् सुराढ्य गनाहिलष्टभुजान्तराला: ॥ सशोणिते: काव्यभुजां स्फुरन्नद्भि: पक्षै: खगानामुपवोध्यमानान् । संवीजिताइचन्दनवारिसेकै: सुगन्धिभि: कल्पलताद्रुकुलै: ॥ विमानपर्यङ्कतले निषण्णा: कुतूहलाविष्टतया तदानोसम् । निर्दिंश्यमानान् ललनाड्गुलीभि: बोरा: स्वेदहान् पतिताननपद्मयन् ॥
इत्यादौ । अत्र हि शृङ्गारवीभत्सयोस्त्रद्रयोरवीररसव्यवधानेन समावेशो न विरोधी ॥२५७॥
२५७
(अनु०) इसको स्थिर करने के लिये यह कहा जा रहा है— ‘दूसरे रस से अन्तरित, एक वाक्यस्थ भी दो रसों के समावेश में विरोधी भाव जाता रहता है’ ॥२५७॥
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३
तृतीय उद्योत:
२७
(लो०) स्थिरोक्तुमिति । शिष्यबुद्धिविवर्थ: अपि शब्देन प्रबन्धविषयतया सिद्धोऽयमर्थ इति दर्शयति-भूरेणिवति । विशेषणैरतीव दुरापेतेतत्सम्भावनास्पदंक्तम् । स्वदेहानिल्यत्वेन देहत्वाभिमानादेव तादात्म्यसम्भावनानिष्पत्तोरेकाश्रयत्वर्मास्त्यन्थथा विभिन्नविषयत्वात्को विरोध: । ननु वीर एवात्र रसो न शृङ्गारो न बीभत्स: किन्तु रतिजुगुप्से हि वीरं प्रति व्यभिचारीभूते । भवत्प्रेमु, तथापि प्रकृतोदाहरणता तावदुपपन्ना । तदाह-तदङ्गैरेवति । तयोरङ्गे तत्स्थायिभावावित्यर्थ: । वीररसेति । 'वीरा: स्वदेहान्' इत्यादिना तदोयोद्भासाह्यवगत्या कर्तृकर्मणो: समस्तवाक्यार्थानुयायितया प्रतीतिरिति मध्यपाठभावेडपि सुतरां वीरस्य व्यवधायकतेतिभाव: ॥२७॥
दूसरे रस से व्यवहित एक प्रबन्धस्थ ( दो रसों ) की विरोधिता निवृत्त हो जाती है इस विषय में कोई भ्रान्ति नहीं है । क्योंकि उक्त नीति से एक वाक्यस्थ भी दो रसों की विरुद्धता निवृत्त हो जाती है। जैसे- 'उस समय पर विमानपर्यन्तल में विराजमान वीर लोग जिनकी बाहुओं के मध्यभाग नवीन परिजात की मालाओं को रजे से सुवासित हो रहे थे, जिनकी भुजाओं के आन्तरिक भाग का आलिङ्गन देवताओं की स्त्रियाँ कर रहीं थीं और जिनके ऊपर चन्दन जल से सिंचे हुये सुगन्धित कल्पलता के वसनों से पंखा किया जा रहा था, कोतूहल से आविष्ट होने के कारण समरभूमि में पड़े हुये अपने ऐसे शारीरों को देख रहे थे जो कि पृथ्वी की धूल से सने हुये थे, शृङ्गालियाँ जिनके शरीर का गाढ़ आलिङ्गन कर रहीं थीं, मांसाहारी पक्षियों के खून से सने हुये पंखों से जिन पर हवा की जा रही थी और ललनाओं के अंगुलियों से जिनकी ओर संकेत कर रहीं थीं ।' इत्यादि में। यहां पर निस्सन्देह शृङ्गार और बीभत्स का अथवा उसके अंगों का वीररस के व्यवधान से समावेश विरोधी नहीं है ॥२७॥ (अनु०) 'स्थिर करने के लिये' यह अर्थात् शिष्यबुद्धि में । कविच्छन्द से प्रबन्ध-विषयतया के रूप में यह अर्थ सिद्ध है यह दिखलाते हैं 'भूरेणु...' इत्यादि । विशेषणों के द्वारा अत्यन्त दूरी होना (और एकता का) असम्भावनास्पदत्व कहा गया है । 'अपनी देहों को' इससे देहत्व के अभिमान से ही तादात्म्य की सम्भावना की निष्पत्ति से ही एकाश्रयत्व होता है, नहीं तो विभिन्न विषय होने से क्या विरोध हो ? ( प्रश्न ) निस्सन्देह यह वीररस ही है न शृङ्गार न बीभत्स; किन्तु रति और जुगुप्सा वीर के प्रति व्यभिचारी भाव हो गये हैं । हो ऐसा, तथापि प्रकृत का उदाहरण होना तो सिद्ध ही हो जाता है । वह कहते हैं— 'अथवा उसके दोनों अंगों का' । उन दोनों के अङ्ग अर्थात् उनके स्थायीभाव । 'वीररस' यह । भाव यह है कि 'वीर अपनी देहों को' इत्यादि के द्वारा उसके उत्साह की प्रतीति से मध्य में पाठ न होने पर भी वीररस की तो व्यवधायकता (असंदिग्ध रूप में) विद्यमान है ही ॥२७॥ तारावती—२६ वीं कारिका में बतलाया गया है कि अविरोधी रस को बीच में रखने से दो विरोधी रसों का विरोध मिट जाता है । अब शिष्यों की बुद्धि में उसी बातको ठीक रूप में जमा देने के लिये इस कारिका में यह बतलाया जा रहा है कि यह सिद्धान्त बहुत ही स्थिरता तथा निश्चय के साथ लागू होता है । कारिका का भाव यह है—
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२६०
ध्वन्यालोके
ही कहा 'यदि दो विरोधी रस एक ही वाक्य में स्थित हों तो भी किसी अन्य रसको बीच में रख देने से उनका विरोध जाता रहता है ।'
प्रायः देखा जाता है कि यदि दो विरोधी दूर दूर रहें तो न तो उनका विरोध अधिक तीव्र हो पाता है और न वे एक दूसरे को हानि ही पहुँचा सकते हैं । इसके प्रतिकूल जब वे एक दूसरे के अधिक निकट आ जाते हैं तो उनका विरोध भी तीव्र हो जाता है और एक दूसरे को हानि पहुँचाने की उनकी क्षमता भी बढ़ जाती है । प्रबन्ध का कलेवर विशाल होता है । उसमें यदि दो विरोधी बने भी रहें तो भी एक दूसरे को इतनी क्षति नहीं पहुँचा सकते । उसमें एक मुक्तक में केवल एक वाक्य होता है । यदि उसमें दो विरोधी एक साथ आ जाएँ तो वे एक दूसरे के अधिक हानि कर हो सकते हैं । बीच में एक तीसरे रस को रख देना एक ऐसा तत्व है जो एक वाक्य में आनेवाले दो रसों के विरोध को मिटा देता है । फिर यदि प्रबन्ध में दो विरोधियों के मध्य में एक तीसरे रस का आ जाने से उनका विरोध जाता रहे तो आश्चर्य ही क्या ? एक वाक्य में भी विरोध मिट जाता है यह कहने से प्रबन्ध में विरोध मिट जाता है यह बात तो स्वतः सिद्ध हो गयी । एक वाक्य में विरोधनिवृत्ति का उदाहरण—
'युद्ध भूमि में अपने प्राण देकर वीर लोग देवत्व को प्राप्त हो गये हैं, वे देवशरीर में विमानों पर चढ़कर आकाश में पहुँच गये हैं और वहाँ से कोतूहल के साथ अपने मृत शरीरों को देख रहे हैं जो युद्धभूमि में पड़े हुये हैं । उनके शव पृथ्वी की धूल से सने हुये हैं जवकि उनके देवशरीरों में गले में पारिजात की मालाएँ हैं और उन देवपुष्पों की रज उनके वक्षस्थल को सुवासित बना रही है । उनके शवों में सियारियाँ बुरी भाँति चिपटी हुई हैं जवकि देवशरीरों में उनकी भुजाओं के मध्यभाग का आलिङ्गन देवों की बढ़नायें कर रही हैं । उनके शवों पर मांसाहारी पक्षी अपने खून से सने हुये पंखों को फड़फड़ा कर हंबा कर रहें हैं जवकि उनके देवशरीरों पर कल्पलता के बने हुये रेशमी वस्त्रों से वायु की जा रही है जिन पर चन्दन का जल छिड़का हुआ है और वे वस्त्र सुगन्धित हो गये हैं । उस समय उनके शवों की ओर देवस्त्रियाँ सङ्केत कर रही हैं कि यह तुम्हारा शरीर पड़ा है और वे उसे कोतूहल तथा उत्कण्ठा से देख रही हैं ।
यहाँ पर 'वीराः' में कर्ता कारक है और 'स्वदेहान्त' में कर्मकारक, सभी पद्यों में प्रथममात्र तो कर्ता के विशेषण हैं और द्वितीयान्त कर्म के । इन विशेषणों से सिद्ध होता है कि दोनों का साम्य बहुत ही दूरवर्ती है और यह विश्वास करना असम्भव हो जाता है कि वस्तुतः दोनों एक ही हैं । शव के वर्णन में बीभत्स रस का परिपाक होता है और देवशरीरों के वर्णन में श्रृङ्गार रस का, दोनों एक दूसरे के विरोधी रस हैं । इन दोनों विरोधी रसों के मध्य में वीररस का व्यवहार हो जाता है । अतः एक यहाँ पर दोनों विरोधी रसों का एक साथ सङ्क्षिवेश दुधित नहीं कहा जा सकता । ( प्रश्न ) यहाँ पर बीभत्स का विभाव है शव और श्रृङ्गार का विभाव है देवशरीर इस प्रकार विभावभेद होने के कारण दोनों का विरोध सङ्क्षुचित ही नहीं होता । फिर वीररस को बीच में रखने से विरोध-निवृत्ति होती है यह कथन किस प्रकार सङ्गत कहा जा सकता है ? ( उत्तर ) यहाँ पर विशेषणों द्वारा यह व्यक्त हो
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३
तृतीय उद्योतः
रहा है कि उनकी दोनों दशाओं में इतना पार्थक्य था कि दोनों की एकता ही असम्भव प्रतीत हो रही थी । किन्तु वीर लोग देख रहे थे कि 'ये मेरे शरीर हैं ।' इस देहत्वाभिमान से ही उन स्वर्गत वीरों का उन शरीरों के साथ तादात्म्य सिद्ध हो रहा था । अर्थात् वे वीर उन शरीरों को ही अपना स्वरूप समझ रहे थे, इसीलिये उन्हें दोनों दशाओं में विरोध मालूम पड़ रहा था । अन्यथा शरीरों के पृथक् होने पर विप्रलम्ब में विरोध की कल्पना ही निरर्थक हो जाती । ( प्रश्न ) यहां पर एकमात्र वीररस की ही सत्ता मानी जानी चाहिये, श्रृङ्गार और बीभत्स ये दोनों वीररस के ही पोषक हैं; ये किस प्रकार स्वतन्त्र रस माने जा सकते हैं ? (उत्तर) मेरा यहां पर यह मन्तव्य नहीं है कि ये दोनों रस स्वतन्त्र हैं । चाहे हम इन्हें स्वतन्त्र रसों की दृष्टि से देखें और चाहे वीररस का व्यभिचारी भाव मानें, दोनों अवस्थाओं में यह उदाहरण तो अनुपपन्न हो ही नहीं सकता । यह तो सिद्ध ही हो जाता है कि किसी तटस्थ रस को मध्य में रख देने से दो विरोधी रसों का विरोध जाता रहता है । स्वतन्त्र रस मानने पर तो कोई आपत्ति हो ही नहीं सकती । वीररस का अङ्ग मानने पर श्रृङ्गार और बीभत्स के स्थायीभाव रति और जुगुप्सा के एक साथ समाविष्ट होने का यह उदाहरण हो सकता है ।
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तृतीय उद्योतः
वीररस के समावेश की इस प्रकार की व्याख्या का सार यह है—इस पद्य में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि 'वे वीर' 'युद्धभूमि में पड़े हुये' 'अपने शरीरों को देख रहे थे ।' इन शब्दों से वीरों के उत्साह इत्यादि को प्रतीति होती है । इससे वीररस पुष्ट हो जाता है । शेष पद्यखण्डों में देह के विशेषणों से बीभत्सरस व्यक्त होता है और दिव्य शरीरों के वर्णन से श्रृङ्गाररस व्यक्त होता है । 'वीर' देखना क्रिया का कर्ता है और 'देह' कर्म । कर्ता और कर्म के विशेषण समस्त वाक्य में बिखरे हैं जिनसे क्रमशः श्रृङ्गार और बीभत्स की अभिव्यक्ति होती है । जब उनके वैपरीत्य के कारण का विश्नेषण किया जाता है तब उनका उत्साहरूप वीररस सामने आ जाता है । इस प्रकार यद्यपि वीररस का मध्य में उपादान किया नहीं गया है किन्तु मध्य में उसका आस्वादन करते हुये ही हम श्रृङ्गार और बीभत्स का आस्वादन कर सकते हैं । अत एव इनका विरोध दोष के क्षेत्र से बाहर हो जाता है । कालिदास ने निम्नलिखित एक ही पद्य में वीररस को मध्य में रखकर श्रृङ्गार और बीभत्स की योजना की है :—
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कश्चिद्दष्टिप्रसङ्गहतुत्तमाङ्गः सद्यो विमानप्रभृतामुपैति । वामाङ्गसंसक्तसुरङ्गननः स्वं नृत्यत्कन्धरं समरे ददर्श ॥
( इन्दुमती के विवाह के बाद अज उन्हें लेकर अपनी राजधानी की ओर आ रहे हैं मार्ग में शत्रुओं ने घेर लिया है । उस समय जो महान् संहार हुआ उसका वर्णन करते हुये कवि कहता है कि—'किसी का मस्तक नुकीले शस्त्र की क्रूरता से कटा गया था, वह तत्काल विमान के प्रभुत्व को प्राप्त हो गया । उस समय उसके वामाङ्ग में देवाङ्गना सुशोभित हो रही थी और वह भूमि पर नाचते हुये अपने कन्धर को देख रहा था । )
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(ध्वन्या०) विरोधमविरोधं च सर्वत्रैवं निरूपयेৎ । विशेषतस्तु शृङ्गारे सुकुमारतमो ह्यसौ ॥
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यथोक्तलक्षणानुसारेण विरोधाविरोधौ सर्वेषु रसेपु । प्रबन्धेऽन्यत्र यत्न च निरूपये-त्सहृदयः; विशेषतस्तु शृङ्गारे । स हि रतिपरिपोषात्मकत्वाद्रतेश्च स्वल्पेनापि निमित्तेन भङ्गसम्भावत्कुमारतमः सर्वेष्यो रसेभ्यो मनागपि विरोधी समावेशं न सहते ॥२८॥
(अनु०) 'सर्वत्र इसी प्रकार विरोध और अविरोध का निरूपण करना चाहिये और विशेषरूप से शृङ्गार में क्योंकि यह सुकुमारतम होता है' ॥२८॥ यथोक्त लक्षणों का अनुसरण करते हुये समस्त रसों के विषय में प्रबन्ध में और अन्यत्र विरोध और अविरोध का निरूपण करना चाहिये । विशेष रूप से तो शृङ्गार में । निस्सन्देह उसके रतिपरिपोषात्मक होने से तथा रति का भङ्ग थोड़े निमित्त से भी सम्भव होने के कारण वह (शृङ्गार रस) सुकुमारतम होता है अर्थात् सभी रसों से थोड़ा भी विरोधी समावेश नहीं सह सकता ॥२८॥
अवधानातिशयवान् रसे तत्रैव सत्कवि: । अवेत्तस्मिन् प्रमादो हि सङ्केत्यपोऽपलप्त्यते ॥२९॥
'सत्कवि उसी रस में अवधान की अतिशयतावाला हो । निस्सन्देह उसमें प्रमाद शीघ्र ही उपलक्षित हो जाता है' ॥२९॥
तत्रैव च रसे सर्वेष्योडपि रसेभ्यः सौकुमार्य्यातिशययोगिनि कविरवधानवान् स्यात् । तथ हि प्रमाद्यतस्तस्य सहृदयमध्ये क्षिप्रमेवाज्ञानविषयता भवति । शृङ्गाररसो हि संसारिणां नियमेनानुभविष्यत्वात् सर्वरसेम्यः कमनीयतया प्रधान-भूतः ॥२९॥
'सभी रसों की अपेक्षा सौकुमार्य की अधिकता से युक्त उसी रस में कवि अवधान-वान् अर्थात् प्रयत्नवान् हो । निस्सन्देह उसमें प्रमाद करनेवाले उस (कवि) की सहृदयों के मध्य में शीघ्र ही अज्ञानविषयता हो जाती है । शृङ्गार रस निस्सन्देह संसारियों के लिये नियम से अनुभव विषय होने के कारण सब रसों की अपेक्षा कमनीय होने से प्रधानभूत होता है ।
(लो०) अन्यत्र चेति । मुक्तकादौ । स हि शृङ्गारः सुकुमारतम इति सम्बन्धः । सुकुमारस्तावद्रसजातीयः; ततोऽपि करुणस्ततोऽपि शृङ्गार इति तमप्रतयः ॥२८-२९॥
(अनु०) 'और अन्यत्र' यह मुक्तक इत्यादि में । सम्बन्ध इस प्रकार होता है—वह शृङ्गार निस्सन्देह सुकुमारतम होता है । इसका कोई भी जातीय सुकुमार होता है । उससे भी करुण कहण और उससे भी शृङ्गार, इसलिये तम प्रयत्न किया गया है ॥२८-२९॥
रसविरोध की दृष्टि से शृङ्गार रस में विशेष सावधानी की आवश्यकता तारावती—२८वीं और २९वीं कारिकाओं तथा उनकी वृत्ति का सार इस प्रकार है—विरोध और अविरोध के लक्षण ऊपर बता दिये गये हैं किसी भी सहृदय व्यक्ति को उन्हीं का आश्रय लेकर सभी रसों में विरोध और अविरोध का निरूपण कर लेना चाहिये फिर ये रस चाहे प्रबन्धगत हों चाहे मुक्तकगत । यह बात शृङ्गार के विषय में विशेष ध्यान
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रखनी चाहिये। कारण यह है कि शृंगार रस की आत्मा रति का परिपोष ही है और रति स्वल्पतम विरोधी कारण के उपस्थित होते ही भंग हो जाती है। इसीलिये रति सबसे अधिक सुकुमार मानी जाती है। कहा जाता है कि यों तो रसत्व जाति ही सुकुमार होती है; किन्तु उसमें भी करुण रस अधिक सुकुमार होता है और करुण से भी शृंगार रस अधिक सुकुमार होता है। दूसरे रस विराधी के कुछ ने कुछ तो सहन कर लेते हैं किन्तु शृंगाररस थोड़े से भी विरोधी को सहन नहीं कर सकता।
२९वीं कारिका में कहा गया है कि सभी रसों की अपेक्षा अधिक सुकुमारता धारण करनेवाले उस शृंगाररस में कवि को विशेष ध्यान रखना चाहिये। अर्थात् शृंगार की रचना करने के अवसर पर प्रयत्नपूर्वक विरोध और अविरोध को समझ लेना चाहिये। उसमें प्रमाद करनेवाला कवि शीघ्र ही सज्जनों के बीच अपमान तथा उपहास का पात्र बन जाता है। निस्सन्देह शृंगार रस सभी सांसारिक व्यक्तियों के लिये नियमितपूर्वक अनुभव का विषय बनता है। इसीलिये वह सभी रसों की अपेक्षा अधिक कमनीय होता है तथा अधिक प्रथान माना जाता है।
३०
एवञ्च सति- विनेयानुन्मुखोकतुं काव्यशोभार्थमेव वा । तद्विरुद्धरसस्पर्शस्तदङ्गानां न दुष्यति ॥३०॥ शृङ्गारविरुद्धरसं स्पर्शैः शृङ्गारराज्ञानां यः स न केवलमविरोधलक्षणयोगे सति न दुष्यति यावद्विनेयानुन्मुखोकतुं काव्यशोभार्थमेव वा क्रियमाणो न दुष्यति । शृङ्गारसाड्गैरुन्मुखोकता: सन्तो हि विनेयाः सुखं विनयोपदेशं गृन्नन्ति । सदा- चारोपदेशरूपा हि नाटकादिगोष्ठी विनेयजनहितार्थमेव मुनिभिरवतारिता ।
(अनु०) ऐसा होने पर- 'अथवा विनेयों को उन्मुख करने के निमित्त काव्यशोभा के लिये ही उसके अंगों का उसके विरुद्ध रस से स्पर्श दूषित नहीं होता' ।।३०।। शृङ्गार के अंगों का जो शृंगारविरोधी रस से स्पर्श वह न केवल अविरोध लक्षण के योग होने पर दूषित नहीं होता अपितु विनेयों को उन्मुख करने के लिये काव्यशोभा-संपादन के निमित्त किये जाने पर भी दूषित नहीं होता। शृङ्गाररस के अंगों से उन्मुख किये हुये निस्सन्देह विनेय लोग विनय के उपदेशों को सुखपूर्वक ग्रहण कर लेते हैं। मुनियों ने निस्सन्देह सदाचारोपदेशरूप नाटक गोष्ठी विनेयजनों के हित के लिये ही अवतारित की है।
लो०—एवञ्चेतित यतोऽसो सर्वसंवादितैर्यर्थः: तद्विति । शृङ्गारस्य विरुद्रा ये शान्तादयस्तेऽपि तद्ज्ञानां सम्बन्धी स्पर्शो न दुष्टः । तथा भण्य्या रसान्तर्गतापि विभावानुभावाद्या वर्णनीया या शृङ्गाराङ्गमुपागमन् ।
(लो०)—एवञ्चेति । यतोऽसो सर्वसंवादितैयर्थः: तद्विति । शृङ्गारस्य विरुद्धा ये शान्तादयस्तेऽपि तद्ज्ञानां सम्बन्धी स्पर्शो न दुष्टः । तथा भण्य्या रसान्तर्गतापि विभावानुभावाद्या वर्णनीया या शृङ्गाराङ्गमुपागमन् ।
यथा ममेव स्तोत्रे— त्वां चन्द्रचूडं सहसा स्पृशन्ती प्राणेश्वरं गाढवियोगतमा । सा चन्द्रकान्ताकृतिपुत्रिकेव संवृद्धिलीयापि विलीयते मे ॥
यथा ममेव स्तोत्रे— त्वां चन्द्रचूडं सहसा स्पृशन्ती प्राणेश्वरं गाढवियोगतमा । सा चन्द्रकान्ताकृतिपुत्रिकेव संवृद्धिलीयापि विलीयते मे ॥
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इत्ययत्र शान्तविभावानुभावानामपि श्रृङ्गारभङ्गया निरूपणम् । विनेयानुमुखी-
कर्तुं या काव्यशोभा तदर्थ नैव दुष्यतीति सम्बन्धः । वायुप्रणेन पक्षान्तरमुच्यते—न केवलमिति । वाच्यदस्यैतद्व्यङ्ग्याख्यानम् । अविरोधलक्षणं परिपोषपरिहारादि पूर्वोक्तम् ।
विनेयानुमुखीकृतं या काव्यशोभा तदर्थमपि वा विरुद्धरससमावेशः न केवलं पूर्वोक्तैः प्रकारैः, न तु काव्यशोभा विनेयोन्मुखीकरणमनन्तरेणास्ते व्यवधानाव्यवधानेऽपि केचित् लभ्येते यथान्येऽव्यभिचारिणः । सुखोर्मिति । रञ्जनापुरःसरमतद्रयः । न तत्र काव्यं क्रिडारूपं क्व च वेदादिगोचरा उपदेशकथा इत्याश्रयदूषाह—सदाचाररति । भरतादिभिरिरित्यर्थः । एतच्च प्रभुमित्रसमित्तेभ्यः शास्त्रेतिहासेभ्यः प्रीतिपूर्वकं जायासम्मिततत्वेन नाट्यकाव्यगतं व्युत्पत्तिकारितवं पूर्वमेव निरूपितमस्माभिरिति न पुनरुक्तभयादिह लिखितम्
(अनु०) ‘और ऐसा होने पर यह । अर्थात् क्योंकि यह सर्वसंवादी है । ‘तत्’ यहां । शृङ्गार के विरोधी जो शान्त हेत्यादि उसके अङ्गों का अर्थात् शृङ्गार के अङ्गों से सम्बद्ध स्पर्श दूषित नहीं होता । दूसरे रसों को प्राप्त भी विभाव अनुभव इत्यादि उस भङ्गिमा के साथ वर्णन किये जाने चाहिये जिसने वे शृङ्गार के अङ्गभाव को प्राप्त हो जाएं । जैसे मेरे ही स्तोत्र में—
‘वह प्रगाढ़ वियोग से संतप्त चन्द्रकान्तमणि की बनी हुई आकृतिवाली पुतली के समान मेरी चेतना तुम प्राणेश्वर चन्द्रचूड का सहसा स्पर्श करती हुई विलीन होकर भी विलीन हो रही है ।’
यहां पर शान्त के विभावानुभावों का शृङ्गार भङ्गिमा से निरूपण किया गया है । यहां सम्बन्ध इस प्रकार है—विनेयों को उन्मुख करने के लिये जो काव्यशोभा उसके लिये दूषित नहीं होता । ‘वा’ ग्रहण से पक्षान्तर कहा गया है । उसी की व्याख्या करते हैं—‘न केवल’ यह । यह व्याख्या वा शब्द की है । अविरोध लक्षण परिपोष परिहार इत्यादि पहले कहा गया है ‘अथवा विनेयों को उन्मुख करने के लिये जो काव्यशोभा उसके लिये भी दूषित नहीं होता) केवल पूर्वोक्त प्रकारों से ही नहीं । काव्यशोभा ‘विनेयों के उन्मुखीकरण के बिना नहीं होती । कोई व्यवधान और अव्यवधान भी उपलब्ध होते हैं जैसी कि दूसरों ने व्याख्या की है । ‘सुखपूर्वक’ यह । अर्थात् अनुरंजन के साथ । कहां तो क्रीडारूप काव्य और कहां वेदादिगोचर उपदेश कथा ?’ यह शंका करके कहते हैं—‘सदाचार
मुनियों के द्वारा’ यह । अर्थात् भरत इत्यादि के द्वारा । प्रभुमित्रसमित्त शास्त्र और इतिहासों की अपेक्षा प्रीतिपूर्वक जायासम्मित होने के कारण यह काव्यनाट्य-गत व्युत्पत्तिकारित्व हमने पहले ही निरूपित कर दिया है यहां पुनरुक्ति के भय से नहीं लिखा ।
तारावती—पिछली कारिका में बतलाया गया था कि शृङ्गार मधुरतम और सुकुमार-तम होता है । उसमें किसी भी दूसरे विरोधी रस का स्पर्श उसे मलिन बना देता है और उसके प्रभाव को नष्ट कर देता है । अब इस कारिका में यह बतलाया जा रहा है कि शृङ्गार में तो किसी विरोधी रस का स्पर्श दूषित होता है
Taravati - In the previous verse, it was explained that Sringar is the most sweet and delicate. In it, the touch of any other opposing sentiment makes it impure and destroys its effect. Now, in this verse, it is being explained that in Sringar, the touch of any opposing sentiment is considered a fault.
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तृतीय उद्योत:
किन्तु किसी भी विरोधी या अविरोधी रस में शृंगार का स्पर्श उस रस को अधिक हृद्य बना देता है :-
'(विरोध परिहार के जो उपाय पहले बतलाये गये हैं उनके अतिरिक्त एक यह बात भी है कि) यदि कवि का मन्तव्य सहृदयों को अपनी ओर उन्मुख करना हो और इसके लिये कवि काव्यशोभा का आधान करना चाहे तो इसी मन्तव्य से शृंगाररस के अंगों का अपने विरोधी रस से स्पर्श दूषित नहीं कहा जा सकता ॥३०॥ आशय यह है कि शृंगार रस ही एक ऐसा रस है जो सभी व्यक्तियों के अन्तःकरणों से मेल खाता है । यह मनुष्य जाति के लिये ही नहीं पशु-पक्षियों तक के लिये हृद्य होता है । अतः इसकी ओर सर्वसाधारण की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप में ही हो जाती है । वैराग्य, कर्त्तव्य इत्यादि दूसरे तत्वों की ओर अवलेप के कारण राजपुत्रादिकों की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप में नहीं होती । अतः यदि उनको पहले शृंगार रस की ओर आकृष्ट कर लिया जाय और वे शृंगार का आस्वादन करने की बुद्धि से हो किसी काव्यशोभा की ओर उन्मुख हों तो उस माध्यम से उन्हें विनय के उपदेश देना सरल हो जाता है । (यह उसी प्रकार होता है जैसे कडुई दवा को सहद इत्यादि किसी मधुर वस्तु से मिलाकर खिलाया दिया जाय ।) कहने का सारांश यह है कि अन्य रसों के विभावानुभावादिकों का वर्णन ऐसी भंगिमा से करना चाहिये कि जिससे वे शृंगार के अंगभाव को प्राप्त हो सकें । एक उदाहरण लीजिये । शृंगार और शान्त दोनों सर्वथा विरोधी रस हैं । किन्तु अभिनवगुप्त ने अपने शंकर-स्तोत्र में शान्त का वर्णन शृंगार की भंगिमा के साथ किया है । अभिनवगुप्त ने लिखा है—
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तृतीय उद्योत:
'मेरी चेतना चन्द्रकान्तमरिण से बनी हुई पुतली जैसी रूपवती तरुणी के समान है; आप चन्द्र को अपने चूड़ा में धारण किये हुये हैं और आप उसके प्राणेश्वर हैं । आपके प्रगाढ वियोग से वह नितान्त सन्तप्त है और सहसा आपका संस्पर्श प्राप्तकर विलीन होती हुई भी पुनः विलीन हो जाती है ।'
यहां पर कवि का आशय यह है कि जिस प्रकार कोई तरुणी अपने प्रियतम के वियोग में सांसारिक सन्तापों का अनुभव करती रहती है, फिर जब संयोगवश, उसे अपने प्रियतम का संसपर्श हो जाता है तब वह आनन्दातिरेक से अपने को भूल सी जाती है और प्रियतम में ही लीन हो जाती है; उसी प्रकार कवि की चेतना भी शिवरूपी प्रियतम से वियुक्त होकर सांसारिक संतापों का अनुभव करती है और जब थोड़ा बहुत शंकर जी का संसपर्श कर पाती है तब वह अपने को भी विस्मृत कर देती है और शंकर जी में ही लीन हो जाती है । 'विलीन होकर भी विलीन हो जाती है' का नायिका के पक्ष में अर्थ है कि नायिका का हृदय अपने प्रियतम के स्मरणमात्र से सर्वदा द्रवित हो जाता है जिससे नायिका प्रियतममय हो जाती है । शंकर जी के पक्ष में इसका अर्थ यह है कि मेरी चेतना प्रायः सर्वदा ही आप में विलीन रहती है; किन्तु उस समय तन्मयता इतनी अधिक नहीं आती कि मैं ध्याता, ध्येय और ध्यान का भेद भूल जाऊँ । किन्तु जब मेरी चेतना किञ्चित भी आपका साक्षात प्राप्त करती है तब वह अपने को सर्वथा आप में खो देती है । यहां पर शान्तरस के विभावों और अनुभवों का निरुपण शृंगार की भंगिमा से किया गया है ।
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यहाँ पर 'वा' 'वा' शब्द की योजना कुछ जटिल है । 'विनेयाननुमुलीर्त्तुं काव्यशोभार्थमेव वा' में 'वा' शब्द की प्रत्यक्ष योजना इस प्रकार मालूम पडती है कि 'विनेयों को उन्मुख करने के लिये अथवा काव्यशोभा से लिये ।' किन्तु इस योजना में एक आपत्ति यह है कि सहृदयों का उन्मुखीकरण और काव्यशोभा ये दो पृथक् प्रयोजन हो जाते हैं । वह काव्यशोभा कैसी जिसकी ओर सहृदय उन्मुख न हों और सहृदयों के उन्मुखीकरण के अतिरिक्त काव्यशोभा का दूसरा प्रयोजन हो क्यों ? अतः ये दोनों प्रयोजन एक ही होने चाहिये कि 'सहृदयों को उन्मुख करने के लिये जिस काव्यशोभा का सम्पादन किया जाता है...' इत्यादि । अतः लोचनकार ने इस 'वा' शब्द को इस प्रकार संयोजित किया है—'वा' शब्द का सम्बन्ध पिछले प्रकरण से है । यह शब्द पिछले प्रकरण का पक्षान्तर उपस्थित करता है । पहले यह बतलाया गया है कि वे कौन सो व्यवस्थायें हैं जिनसे दो विरोधी रसों का विरोध निवृत्त हो जाता है । 'वा' ग्रहण का आशय यह है किसी रस का परिपोष न करना इत्यादि पुराने तत्व ही विरोधनिवृत्ति में कारण नहीं होते अपितु एक और तत्व ऐसा है जो विरोध को निवृत्त कर देता है और वह यह है कि यदि अन्य रसों के साथ श्रृंगार की योजना कर दी जाय तो विरोध नहीं आता । किन्तु शर्त यह है कि श्रृंगार की योजना काव्य की शोभा में कारण हो और काव्य की शोभा सहृदयों को अपनी ओर आकृष्ट करने में कारण हो । यदि यह बात पूरी हो जाती है तो श्रृंगार के अन्य रसों के साथ योजना सदोष नहीं मानी जा सकती । यहाँ पर लोचन के 'व्यवधानाप्यवघाने अपि केचित् लम्येते यथान्यैरव्यवधायिते' इन शब्दों का अर्थ स्पष्ट नहीं है । सम्भवतः इनकी व्याख्या इस प्रकार को जा सकती है—विरोधपरिहार के पिछले प्रकरण में बतलाया गया था कि दो विरोधी रसों का यदि किसी तीसरे अबिरोधी रस से व्यवधान हो जाता है तो विरोध का परिहार हो ही जाता है । अव्यवधान में भी विरोधपरिहार होते देखा है । व्यवधान और अव्यवधान दोनों प्रकार के काव्य देखे जाते हैं । व्यवधान की व्याख्या पहले की जा चुकी है । अव्यवधान में किस प्रकार विरोधपरिहार होता है यह कारिका में कहा गया है । यह व्याख्या अन्य आचार्यों ने की है जो लोचनकार के अनुसार बहुत असंगत नहीं है । किन्तु पूर्णरूप से इसका समर्थन भी नहीं किया जा सकता । क्योंकि इस कारिका में 'वा' शब्द पिछले पूरे प्रकरण की ओर संकेत करता है । उसमें केवल व्यवधान में विरोधपरिहार की बात नहीं कही गई है अपितु अनेक और तत्व भी दिखलाये गये हैं । सहृदय सुखपूर्वक विनय के उपदेशों को ग्रहण कर लेते हैं' यहाँ सुखपूर्वक का अर्थ है अनुरंजन के साथ ।
(ध्वन्यो०) किन्तु श्रृङ्गरस्य सकलजनमनोहराभगमत्स्वातद्रुंसंमावेशः काव्ये शोभातिशयं पुष्यत इत्यनेनापि प्रकरणे विरोधिनि रसे श्रृङ्गाराद्रुसंमावेशो न विरोधी ।
सत्यं मनोरमा रामा: सत्यं रम्पा विभूतय: । किन्तु मत्ताढ्यपाझडभ्रूलोलं ही जीवितम् ॥ इत्याविषु नास्ति रसविरोधदोष: ।
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तृतीय उद्योतः
३०
ननु शृङ्गाराज्जाताभङ्गया यद्भावादिनिरूपणमेतावतैव किं विनेयोन्मुखीकरणं ? न; अस्ति प्रकारान्तरं, तदाह—किं तु इति । शोभातिशयमिति । अलङ्कारविशेषोऽपमाप्रभृति पुष्यति सुन्दरीकरोतीत्यर्थः । यथोक्तम्—‘काव्यशोभाया: कर्तारो धर्मा गुणास्तदतिशयहेतवस्तु अलङ्काराः’ इति । मत्ताङ्गनेति । अत्र हि शान्तविभावे सर्वस्याऽनित्यत्वे वण्र्यमाने न कस्यचिद्भावस्य शृङ्गाराद्भङ्गया निबन्ध: कृतः किन्तु सत्यमिति परहृदयानुप्रवेशोनोक्ततम्, न खल्वलौकवैराग्यकोतुकरुच्च प्रकटयाम:, अपितु यस्य कृतेऽसर्वमप्यध्यवसिते तदेवदं चलमिति, तत्र मत्ताङ्गनापाङ्गभङ्गस्य शृङ्गारं प्रति सम्भाव्यमानविभावानुभावाद्भाविताङ्गस्य लोभनीयास्पमानतौक्तौ तत्र प्रियतमाकटाक्षो हि सर्वस्याऽभिलषणीय इति च तत्प्रतीत्या प्रवृत्तिमान् गुडजिह्विकया प्रकटताऽनुप्रसक्तवस्तुसंवेदनैन वैराग्ये पर्यवस्यति विनेयः ॥३०॥
(अनु०) और भी शृङ्गार के सकलजन-मनोहर और अभिराम होने से काव्य में उसके अङ्गों का समावेश शोभातिशय को पुष्ट करता है इस प्रकार से भी विरोधी रस में शृङ्गार के अङ्गों का समावेश नहीं होता । इससे—‘सचमुच रामायें मनोहर होती हैं; सचमुच विभूतियाँ रमणीय होती हैं; किन्तु जीवन मत्त अङ्गनाओं के अपाङ्गभङ्ग के समान चञ्चल होता है ।’ इत्यादि रस में रस विरोध का दोष नहीं होता ॥३०॥ (लो०)—ननु शृङ्गाराज्जाताभङ्गया यद्भावादिनिरूपणमेतावतैव किं विनेयोन्मुखीकार: ? न; अस्ति प्रकारान्तरं, तदाह—किं तु इति । शोभातिशयमिति । अलङ्कारविशेषोऽपमाप्रभृति पुष्यति सुन्दरीकरोतीत्यर्थ: । यथोक्तम्—‘काव्यशोभाया: कर्तारो धर्मा गुणास्तदतिशयहेतवस्तु अलङ्काराः’ इति । मत्ताङ्गनेति । अत्र हि शान्तविभावे सर्वस्याऽनित्यत्वे वण्र्यमाने न कस्यचिद्भावस्य शृङ्गाराद्भङ्गया निबन्ध: कृतः किन्तु सत्यमिति परहृदयानुप्रवेशोनोक्ततम्, न खल्वलौकवैराग्यकोतुकरुच्च प्रकटयाम:, अपितु यस्य कृतेऽसर्वमप्यध्यवसिते तदेवदं चलमिति, तत्र मत्ताङ्गनापाङ्गभङ्गस्य शृङ्गारं प्रति सम्भाव्यमानविभावानुभावाद्भाविताङ्गस्य लोभनीयास्पमानतौक्तौ तत्र प्रियतमाकटाक्षो हि सर्वस्याऽभिलषणीय इति च तत्प्रतीत्या प्रवृत्तिमान् गुडजिह्विकया प्रकटताऽनुप्रसक्तवस्तुसंवेदनैन वैराग्ये पर्यवस्यति विनेयः ॥३०॥ (अनु०) (प्रश्न) शृङ्गारता की भङ्गिमा से जो विभावादि निरूपण, क्या इतने से ही विनेयों का उन्मुखीकरण होता है ? (उत्तर) नहीं प्रकारान्तर है । वह कहते हैं—‘और भी’ यह । ‘शोभातिशय’ यह । अर्थात् अलङ्कार विशेष उपमा प्रसृति को पुष्ट करता है अर्थात् सुन्दर कर देता है । जैसे कहा गया है—‘काव्यशोभा के करने वाले धर्म गुण होते हैं और उसके अतिशय में हेतु अलङ्कार होते हैं ।’ ‘मत्ताङ्गना’ यह । यहाँ निस्सन्देह शान्त के विभाव सभी के अनित्यत्व के वर्णनीय होने पर किसी विभाव का शृङ्गार की भङ्गिमा के साथ निबन्धन नहीं किया गया है, किन्तु सचमुच इन शब्दों से परहृदयानुप्रवेश के द्वारा कहा गया है कि हम निस्सन्देह अलौकिक वैराग्य कौतुक की हिच प्रकट नहीं कर रहे हैं अपितु जिसके लिये सब कुछ अध्यवसित है उसी का चञ्चलत्व चरित है । उसमें मत्ताङ्गनापाङ्गभङ्ग की शृङ्गार के प्रति विभाव और अनुभावता की सम्भावना किये जाने से इसके अङ्ग की चञ्चलता में उपमानता कही गई है और उस प्रकार प्रियतमाकटाक्ष निस्सन्देह सभी का अभिलषणीय है इससे उसके प्रेम से प्रवृत्तिवाला विनेय गुडजिह्विका से प्रकट और अनुप्रसक्त वस्तु के संवेदन के द्वारा वैराग्य में पर्यवसित होता है ॥३०॥
तारावती—(प्रश्न) काव्य तो क्रीडा रूप होता है और उपदेशकथा वेदादि सच्छास्त्रों से गृहीत होती है । अत एव इन दोनों का सम्बन्ध हो ही किस प्रकार सकता है ? ( उत्तर ) भरत इत्यादि मुनियों ने काव्यगोष्ठी विनेयजनों के हित के लिये ही प्रवृत्त की थी और उसका प्रयोजन था विनेय व्यक्तियों को सदाचार का उपदेश । यह पहले ही बतलाया जा चुका है कि नाटच और काव्य का उपदेश जायासम्मित होता है । यह प्रभुसम्मित और
काव्य का जाया सम्मत्तत्व
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मित्रसम्बद्ध शास्त्र और इतिहास की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि यह आनन्द के साथ व्युत्पत्ति को उत्पन्न करता है । यह विषय विस्तारपूर्वक पहले ही समझाया जा चुका है । अतः यहाँ पुनः उसका विवेचन पुनरुक्त मात्र होता है । अत एव इस वास्तविकता को उसी प्रकरण में समझना चाहिये ।
( प्रश्न ) क्या काव्य में शृंगार के द्वारा विनेयों का उन्मुखीकरण इसी प्रकार सम्भव है कि विभाव और अनुभाव का निरूपण शृंगार के अंगों की संख्या के साथ किया जाय या और भी कोई उपाय सम्भव है ? ( उत्तर ) इसके लिये एक उपाय और है और वह शृंगार रस सभी प्रकार के व्यक्तियों के मन को हरण करने वाला होता है । अत एव काव्य में उसके अंगों का समावेश उपमाप्रभृति अलंकार विशेषों को भी पुष्ट कर देता है । यहाँ पर ' शोभातिशयं पुष्णति ' इस वाक्य का प्रयोग किया गया है । शोभातिशय शब्द का अर्थ है अलंकार । कहा भी गया है कि काव्यशोभाकारक धर्मों को गुण कहा जाता है और उस शोभा को अधिक बढ़ानेवाले ( अतिशय करनेवाले ) धर्मों को अलंकार माना जाता है । शृंगार रस अलंकार को अधिक सुन्दर बना देता है जिससे काव्य की सुन्दरता बढ़ जाती है । इस रूप में भी विरोधी रस में शृंगार के अंग का समावेश विरोधी नहीं माना जा सकता । आशय यह है कि यदि विरोधी रस में शृंगार के अंग का समावेश विभाव, अनुभाव इत्यादि के रूप में न हो तो अलंकार के रूप में हो सकता है । इससे भी काव्य की शोभा बढ़ जाती है और रसास्वादन में किसी प्रकार का व्याघात उपस्थित नहीं होता है । अत एव—
' यह सच है कि रमणियाँ भी मनोरमा होती हैं और सम्पत्तियाँ भी रमणीय होती हैं, किन्तु जीवन तो मतवाली ललनाओं के अपांगभंग ( कटाक्ष-पात ) की भ्रान्ति हो क्षणभंगुर होता है ।'
यहाँ पर सभी की अनित्यता का वर्णन करना है जो कि शान्तरस का विभाव है ! इसमें काव्यशोभा का आधान करने के लिये शृंगाररस की किसी भी अंगिमा का समावेश नहीं किया गया है । अपितु ' यह सच है.... रमणीय होती हैं ' यह आख्या वाक्य दूसरे के हृदय में अनुप्रविष्ट होकर कहा गया है । आशय यह है कि शान्तरस के विरोध में कोई रसिक व्यक्ति जो कुछ कह सकता है उसकी शान्तरस के समाश्रक पहले ही मान लिया और इस प्रकार अपने विरोधी के हृदय में प्रविष्ट हो गया । उसका कहना है कि जिन वस्तुओं में तुम रमणीयता के दर्शन करते हो उन्हें मैं भी अरमणीय नहीं कहता । मैं तुम्हारे अन्दर झूठे वैराग्य के कौतूहल की रुचि उत्पन्न करना नहीं चाहता । किन्तु ये रमणीय वस्तुयें जिस जीवन के लिये चाही जाती हैं वह जीवन ही स्थिर नहीं है, तब इसकी रमणीयता किस काम आयेगी । यहाँ पर रमणियों और विभूतियों की आस्र्यता के लिये उपमा दी गई है मतवाली ललनाओं के कटाक्षपात की । इस उपमा को देखकर एकदम सम्भावना हो जाती है कि यहाँ पर अलङ्कार के विभाव नायक और नायिका का वर्णन किया गया होगा । मतवाली ललनाओं के कटाक्ष को कौन नहीं चाहेगा ? अत एव कटाक्ष के अनुराग से कोई विनेय व्यक्ति इस सक्ति को ओर प्रवृत्त होगा और प्रसंग प्राप्त तथा उससे अनु गत वस्तु अनित्यता के ज्ञान के द्वारा वैराग्य में उसी प्रकार उसकी भावनाओं का पर्यवसान
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तृतीय उद्योत:
३०
रसादीनामविरोधविरोधयोः । विषयं सुकवि: काव्यं कुर्वन् मुहुर्हति न क्वचित् ॥३१॥
अनु० इस प्रकार सुकवि रस इत्यादि के अविरोध और विरोध के विषय को जान कर काव्य करते हुये कभी मोहित नहीं होता ॥३१॥ इस प्रकार अर्थात् अभी अनन्तर कहे हुये प्रकार से रस इत्यादि के अर्थात् रस भाव तथा उनके अभ्यास के परस्पर विरोध और अविरोध के विषय को जानकर सुकवि अर्थात् काव्य के विषय में प्रतिभा की अतिशयता से युक्त काव्य करते हुये कहीं व्यामोह में नहीं पड़ता ॥३१॥ लो० तदेतदुपसंहरन् अस्योक्तस्य प्रकरणस्य फलमाह—विज्ञायेत्थमिति ॥३१॥ अनु० अतः इसका उपसंहार करते हुये इस प्रकरण का फल कहते है—‘इस प्रकार जानकर’ यह ॥३१॥
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तृतीय उद्योत:
तारावती—३०वीं कारिका तक रसों के परस्पर सम्बन्ध तथा उनके एक में समावेश के प्रकार पर विचार किया गया है। ३१वीं कारिका इस प्रकरण का उपसंहार है। इसमें कहा गया है कि :—
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तृतीय उद्योत:
'यदि कवि काव्यरचना के अवसर पर उक्त व्यवस्था का ध्यान रखता है तो वह अपनी काव्य क्रिया में कभी व्यामोह को प्राप्त नहीं होता ॥३१॥ रस इत्यादि में इत्यादि का अर्थ है रस, भाव, रसाभास और भावाभास, इनके परस्पर विरोध और अविरोध के विषय इसी पिछले प्रकरण में बतलाये जा चुके हैं। जब कोई अधिक प्रतिभाशाली व्यक्ति इनको समझकर काव्य रचना करता है तो उसमें श्ुुटियाँ नहीं होतीं ॥३१॥
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तृतीय उद्योत:
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वाच्यवाचकनिरूपणस्यापि तद्र्रतिपाद्यते— वाच्यानां वाचकानां च यदौचित्येन योजनम् । रसादिविषयेऽनत्कर्म मुख्यं महाकवे: ॥३२॥ वाच्यानामितिवृत्तविशेषणां वाचकानां च तद्विषयाणां रसादिविषयेणौचित्येन यद्योजनम् काव्यकर्मणि मुख्यं महाकवेः कृत्य तद्वचकतयाऽनुगुणत्वेन शब्दानामर्थानां चोपनिबन्ध- दीनव मुख्यतया काव्यार्थी कृत्य तद्वचकतयाऽनुगुणत्वेन शब्दानामर्थानां चोपनिबन्धनम् ॥३२॥
अनु० इस प्रकार रस इत्यादि में विरोध और अविरोध निरूपण की उपयोगिता का प्रतिपादन करके तद्र्दर्शक वयंजक वाच्यवाचक-निरूपण को भी वह प्रतिपादित कर रहे हैं—
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'रस इत्यादि विषयक औचित्य के साथ वाच्यों और वाचकों की जो योजना यह महाकवि का मुख्य कर्म है' ॥३२॥
वाच्यों का अर्थात् इतिवृत्तविशेषों का और वाचकों का अर्थात् तद्विषयकों (इतिवृत्त-विषयकों) का रसादि विषयक औचित्य के साथ जो योंजन यह महाकवि का मुख्य कर्म है । यही महाकवि का मुख्य व्यापार है जो कि रस इत्यादि को ही मुख्यरूप में काव्यार्थ बनाकर उसकी क्यंजना के अनुरूप शब्दों और अर्थों का उपनिबन्धन ॥३२॥ (लो०) रसादिषु रसादिविषये व्यज्जकानि यानि वाच्यानि विभावादीनि वाचकानि सुप्तिदादीनि तेषां यन्नरूपणं तस्येति । तद्विषयस्येति रसादिविषयस्य । तदिति उपयोगित्वम् । मुख्यमिति । आलोकार्थी इत्यत्र यबुक्तं तद्वोपसंहतम् । महाकवेरिति सिद्धवत्कफलनिरुपणम् एवं हि महाकवित्वं नान्यथेत्यर्थः । इतिवृत्तं हि प्रवन्धवाच्यं तस्य विशेषः प्रागुक्तः—'विभावभावानुभावसञ्चार्यौचित्यच-रुणः विधिः कथा शृङ्गाररस' इत्यादिना । काव्यार्थीकृतयेऽनन्यथा लौकिकशास्त्रीयवाव्यार्थेभ्यः कः काव्यार्थस्य विशेषः एतच्च निश्चितमाभ्योते—काव्यस्यात्मा स एवार्थः इतिव्रान्तरे ॥३२॥ (अनु०) रसादिकों में अर्थात् रस इत्यादि के विषय में क्यंजक जो वाच्य विभाव इत्यादि और वाचक जो सुप्तिद इत्यादि उनका जो निरुपण उसका । तद्विषय का अर्थात् रस इत्यादि विषय का वह अर्थात् उपयोगित्व । 'मुख्य' यह । 'आलोकार्थी' यहाँ पर जो कहा गया था उसे का उपसंहार कर दिया गया । 'महाकवि का' यह । यहाँ सिद्ध के समान फल का निरुपण है । निस्सन्देह इस प्रकार महाकवित्व होता है अन्यथा नहीं । 'इतिवृत्त विशोषों का' इतिवृत्त निस्सन्देह प्रवन्धवाच्य होता है उसकी विशोषतायें पहले की गई है—भावानुभावसञ्चार्यौचित्य चारुणः । विधिः कथा शृङ्गाररस्य' इत्यादि के द्वारा । 'काव्यार्थ करके' यह । अन्यथा लौकिक और शास्त्रीय वाव्यार्थों से काव्यार्थ की क्या विशोषता । यह प्रयम उद्योत में 'काव्यस्यात्मा स एवार्थः' इस कारिका के बीच में निरुपित किया गया है ।
रसप्रकरण में वाच्यवाचक की आवश्यकता और औचित्य का निर्देश तारतम्य—अथ यह बताया गया है कि रस इत्यादि के विषय में विरोध और अविरोध के निरुपण करने का उपयोग वया है । रस के व्यंग्य रूप के विषय में उतना निरुपण कर देने के बाद स्वभावतः उसके व्यखक रूप पर विचार करने का प्रस्न सामने आ जाता है । व्यखक दो होते हैं—वाच्य और वाचक । वाच्य और वाचक की योजना पर ३३ वीं कारिका में संक्षिप्त प्रकाश डाला जायगा । इस ३२ वीं कारिका में यह दिखलाया जा रहा है कि रस इत्यादि के विषय और वाचक के निरुपण का उपयोग क्या है ? यहाँ पर यह भी समझ लेना चाहिये कि रस इत्यादि के विषय में वाच्य तो विभाव इत्यादि होते हैं और वाचक सुप्तिदृश् (शब्द इत्यादि) होते हैं । इनके निरुपण का क्या उपयोग है यह इस कारिका में बताया गया है । कारिका का आशय यह है— 'कवि का सर्वाधिक प्रशान कर्म है ऐसे वाच्य और वाचक की योजना करना जिसमें रस इत्यादि की दृष्टिगत रहते हुए औचित्य का पूरा निर्वाह किया गया हो ।'
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तृतीय उद्योत:
वाच्य का अर्थ है विशेष प्रकार के काव्यानुकूल इतिवृत्त की विशेषतायें और वाचक का अर्थ है उस इतिवृत्तविशेषक शब्दों की योजना जिसमें रसादिविषयक औचित्य का ध्यान रखा गया हो । यह महाकवि का सर्वप्रमुख कर्तव्य बताया गया है । उससे यह भ्रम हो सकता है कि यहाँ पर-रम की अपेक्षा छन्द और अर्थ को प्रधानता दे दी गई है। अतः यहाँ पर शब्द और अर्थ तथा रस इनके महत्व के तारतम्य को समझ लेना चाहिये । प्रथम उद्योत में कहा गया है कि व्यंग्यार्थ के लिये उत्सुक कवि वाच्यार्थ का उसी प्रकार आदर करता है जैसे—आलोक का इच्छुक व्यक्ति दीपशिखा के लिये प्रयत्नवान् होता है । क्योंकि दीपशिखा आलोक का उपाय है और वाच्यार्थ व्यंग्यार्थ का उपाय है । अभीष्ट वस्तु को प्राप्त करने के लिये महत्व तो होता ही है। यहाँ इन दोनों के महत्व का तारतम्य है । इस प्रकार 'आलोकार्थी...' इत्यादि प्रथम उद्योत की कारिका में जो बात कही गई थी उसी का उपसंहार यहाँ पर कर दिया गया । 'महाकवि का मुख्य कर्म है' इस वाक्य में महाकवि शब्द का प्रयोग सिद्ध हुये तत्व के फल का निरुपण है । आशय यह है कि कोई भी व्यक्ति महाकवि तभी हो सकता है जब वह रसानुप्रहण के औचित्य का पालन करते हुये शब्द और अर्थ का प्रयोग करे । औचित्य युक्त शब्दार्थ का प्रयोग कारण है और महाकवि होना कार्य । पहले शब्दार्थ का प्रयोग किया जायेगा बाद में महाकवित्व का पद प्राप्त होगा । किन्तु यहाँ पर उचित शब्दार्थ प्रयोग की सम्भावना में ही महाकवित्व को सिद्ध मानकर कह दिया गया है कि महाकवि को उचित शब्दार्थ का प्रयोग करना चाहिये । यहाँ वाच्य का अर्थ किया गया है इतिवृत्तविशेष । इतिवृत्त यह प्रबन्ध का वाच्य होता है । उसकी विशे पता पहले बतला दी गई है ( देखें—तृतीय उद्योत की कारिका १० से १४ तक की व्याख्या ) सारांश यह है कि महाकवि का मुख्य व्यापार यही है कि रस इत्यादि को ही काव्यार्थ मानकर उसकी अभिव्यंजना के अनुकूल शब्द और अर्थ का उपनिबन्धन करे । रस इत्यादि को काव्यार्थ बनाने का आशय यही है कि रस का होना ही काव्यवाक्यों की सबसे बड़ी विशेषता है। नहीं तो लौकिक तथा शास्त्रीय वाक्यों से काव्य का भेद ही क्या रहे । इसका निर्णय तो प्रथम उद्योत की ५ वीं कारिका में ही कर दिया गया कि 'वही रसादि रूप अर्थ काव्य की आत्मा है'
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तृतीय उद्योत:
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(ध्वन्या०) एतच्च रसादितात्पर्येण काव्यनिबन्धनं भरतादवपि सुप्रसिद्धमेवेति प्रतिपादयितुमाह— रसाद्यनुगुणत्वेन व्यवहारेारड्यशब्दयोः । औचित्यवान्यस्य एता वृत्तयो द्विविधाः स्थिताः ॥३३॥
3
तृतीय उद्योत:
व्यवहारो हि वृत्तिरित्युच्यते । तत्र रसानुगुण औचित्यवान् वाच्यार्थयो यो व्यवहारेारस्ता एतः कैशिक्याद्या वृत्तयः । वाचकाश्रयैरचोपनागरिकाद्याः । वृत्तयो हि रसादितात्पर्येण सन्निवेशिता कामपि नाद्यस्य काव्यस्य च्छायामावहन्ति । रसादयो हि द्वयोरपि तयोः जीवभूताः इति वृत्तादिव तु शरीरभूतमेव ।
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( अनु० ) और यह रसादि तात्पर्य से काव्यनिबन्ध भरत इत्यादि में भी सुप्रसिद्ध ही है यह प्रतिपादन करने के लिये कहते हैं—
'रस इत्यादि के अनुपगुणत्व के साथ जो औचित्यवाला शब्द और अर्थ का व्यवहार वे ये दो वृत्तियाँ स्थित हैं' ॥३३॥
वह 'वृत्ति' यह कहा जाता है । उसमें रसानुगुण औचित्यवाला वाच्यार्थ जो व्यवहृत होते हैं और वाचकाश्रय जो काव्यादि वृत्तियाँ हैं । और वाचकाश्रय जो काव्यादि वृत्तियाँ हैं
और वाचकाश्रय जो काव्यादि वृत्तियाँ हैं । और वाचकाश्रय जो काव्यादि वृत्तियाँ हैं
दि हैं ! वृत्तियाँ नि:संदेह रस इत्यादि के तात्पर्य से सचितवित की हुई काव्य और नाट्य की कोई विचित्र छाया को उत्पन्न करती हैं । रस इत्यादि नि:संदेह उन दोनों के जीवनभूत हैं । इतिवृत्त इत्यादि तो शरीर हो हैं ।
(लो०)—एतच्चैतद् यदस्माभिरुक्तमित्यर्थ: । भरतादावित्यादिग्रहणादलङ्कारशास्त्रेषु परुषाद्या वृत्तय इत्युक्तं भवति । द्वयोरपि तयोरिति । वृत्तिलक्षणयोरव्यवहारयोरित्यर्थ: । जीवभूता इति । 'वृत्तय: काव्यमातृका:' इति बुवानेन मुनिना रसौचित्येति—वृत्तसमाश्रयणोपदेशेन रसस्यैव जीवलतत्वमुक्तम् । भामहादिभिश्च—स्वादुकाव्यरसोनमिश्रै: वाक्यार्थमुपभुञ्जते । प्रथमालङ्कारमधुर: पिवन्ति कटुकमेषजम् ॥
इत्यादिना रसोपयोगजीवित: शब्दवृत्तिलक्षणो व्यवहार उक्त: । शरीरभूतमिति । 'इतिवृत्त' हि नाटचस्य शरीरम् इति मुनिना: । नाटचं च रस एवेत्युक्तं प्राक् ।
(अनु०) 'और यह' यह । अर्थात् जो हम लोगों ने कहा है । भरत इत्यादि में इत्यादि शब्द से अलंकार शास्त्रों में परुष इत्यादि वृत्तियाँ होती हैं यह बात कही गई है । 'उन दोनों का' अर्थात् वृत्तिलक्षण दोनों व्यवहा
रों का । 'जीव भूत' यह । 'वृत्तियाँ काव्य की माताएँ होती हैं' कहनेवाले मुनि ने रस के लिये उपयुक्त इतिवृत्त के आश्रय लेने का उपदेश देने के द्वारा रस का ही जीवनत्व कहा है । भामह इत्यादि ने भी—
'स्वादु काव्यरस से मिश्रित वाक्यार्थ का उपयोग करते हैं । पहले शब्द को चाटकर कड़ई दवा पी लेते हैं ।'
इत्यादि के द्वारा शब्दवृत्ति लक्षणवाली ऐसे व्यवहार बतलाया है जिसका जीवन रस इत्यादि के द्वारा होता है । 'शरीरभूत' यह । मुनि ने कहा है । 'इतिवृत्त नाटच का शरीर होता है ।' यह हम पहले ही कह चुके हैं कि नाटच तो रस ही होता है ।
इस प्रसङ्ग में द्विविध वृत्तियों का निरूपण
तारावती—रस इत्यादि के तात्पर्य से वाच्य और वाचक की योजना कोई कपोलकल्पित सिद्धान्त नहीं है । इस को तो भरत इत्यादि आचार्यों ने भी मान्यता दी है । अतः यह सिद्धान्त परम्परानुमोदित है । यही बात इस ३३ वीं कारिका में कही गई है :—
'अर्थ और शब्द का इस रूप में व्यवहार करना कि उसमें रस के अनुपुण होने का सर्वथा ध्यान रखा गया हो और औचित्य का भी पालन किया गया हो, वृत्ति कहलाता है । ये वृत्तियाँ दो रूपों में स्थित हैं' ॥३३॥
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तृतीय उद्योत:
१८
(वृत्तियों के विषय में कुछ अधिक विस्तार के साथ प्रकाश प्रस्तुत उद्योत की ४६ वीं और ४७ वीं कारिका में डाला जायगा । यहाँ इतना समझ लेना चाहिये कि आनन्दवर्धन से पहले नाट्यशास्त्र और काव्यशास्त्र ये दो पृथक्-पृथक् शास्त्र थे । जहाँ आनन्दवर्धन को काव्यशास्त्र की अनेक नवीन दिशाओं के उन्मीलन का श्रेय प्राप्त है वहाँ उनका एक महत्त्वपूर्ण योगदान यह भी है कि उन्होंने नाट्यशास्त्र और काव्यशास्त्र दोनों के एकीकरण का महत्त्वपूर्ण कार्य सम्पन्न किया । वृत्तियों के विषय में भी आनन्दवर्धन के पहले दो प्रकार की वृत्तियाँ चल रही थीं एक तो भरत की नाट्यवृत्तियाँ जिनमें कैशिकी इत्यादि आती थीं और दूसरी उद्धट इत्यादि की उपनागरिका इत्यादि वृत्तियाँ जो कि काव्यवृत्तियाँ कही जा सकती थीं । इनके साथ ही काव्य में वैदर्भी इत्यादि रीतियाँ भी चल रही थीं । आनन्दवर्धन और अभिनवगुप्त ने इन काव्यरीतियों को रसочित शब्दगयवहार कहकर वृत्तियों से इनके ऐक्य की स्थापना की । इसीलिये आगे चलकर मम्मट को कहने का अवसर प्राप्त हुआ कि—‘कैशि-वैदर्भीप्रमुखा रीतयो मताः’ और पण्डितराज का ‘वैदर्भी वृत्ति’ शब्द का प्रयोग उपपन्न हो सका । सारांश यह है कि आनन्दवर्धन के पहले वृत्तियाँ दो प्रकार की थीं कैशिकी इत्यादि नाट्यवृत्तियाँ और उपनागरिका इत्यादि काव्यवृत्तियाँ ।)
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तृतीय उद्योत:
'वृत्ति' शब्द 'वृत्' धातु से संज्ञा में क्तिन् प्रत्यय होकर बना है । इसका अर्थ है वर्तन करना या व्यवहार करना । काव्य के पक्ष में व्यवहार दो प्रकार का हो सकता है—अर्थ का व्यवहार और शब्द का व्यवहार । यदि अर्थ का व्यवहार रसानुबुण तथा औचित्ययुक्त हो तो उसे कैशिकी इत्यादि नाट्यवृत्तियों में अन्तर्भूत कर दिया जाता है और यदि शब्दगयवहार रसानुगुण तथा औचित्यवान् हो तो उसे उद्धट इत्यादि की उपनागरिका इत्यादि वृत्तियों में सन्निविष्ट कर दिया जाता है । (यहाँ पर नाट्यवृत्ति और काव्य-वृत्ति दोनों के एकीकरण के लिये आनन्दवर्धन ने नाट्यवृत्तियों को अर्थवृत्ति कहा है और काव्यवृत्तियों को शब्दवृत्ति । इस मान्यता का आधार यह है कि भरत ने वृत्तियों में सभी प्रकार के अनुभावों और चेष्टाओं को सन्निविष्ट किया है । ये अनुभाव और चेष्टायें अर्थ से ही सम्बन्ध रखती हैं । अतः आनन्दवर्धन का यह मानना कि नाट्यवृत्तियाँ वस्तुतः अर्थवृत्तियाँ हैं, ठीक ही है । काव्यवृत्तियों का व्यवहार अधिकतर वृत्यानुप्रास के प्रसाद्ध में किया जाता है जिसमें कोमल, कठोर इत्यादि वर्णों के आधार पर वृत्तियों का निरूपण किया जाता है । अतः यह स्पष्ट ही है कि ये शब्दवृत्तियाँ हैं । इस प्रकार आनन्दवर्धन ने नाट्य और काव्यवृत्तियों का सफल तथा सुन्दर सामञ्जस्य स्थापित किया है ।)
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तृतीय उद्योत:
शब्द और अर्थ दोनों प्रकार के व्यवहारों का नाट्य और काव्य दोनों में यदि रस इत्यादि के तात्पर्य से सन्निवेश किया जाता है तो दोनों की एक अनिर्वचनीय छाया उत्पन्न हो जाती है । आशय यह है कि दोनों वृत्तियाँ नाट्य और काव्य दोनों में समान रूप से उपयोगिनी होती हैं, ऐसा नहीं है कि कोई एक प्रकार की वृत्ति नाट्य के लिये ही उपयोगी हो और दूसरे प्रकार की काव्य के लिये ही । दोनों प्रकार की वृत्तियों का जीवन रस ही है । इतिवृत्त तो केवल शरीरस्थानीय ही होते हैं । मुनि ने लिखा है कि वृत्तियों की माता काव्य (कविता) ही है । मुनि ने यह भी कहा है कि इतिवृत्त नाट्य
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का शरीर होता है और ऐसे इतिवृत्त का आश्रय लेने का उपदेश दिया है जो रस के लिये उपयुक्त हो। नाटघ या अभिनय वस्तुतः रस ही होता है यह पहले समझाया जा चुका है। इस प्रकार भरत मुनि का मन्तव्य स्पष्ट हो जाता है कि इतिवृत्त काव्य का शरीर होता है, रस उसका जीवन है और वृत्तियों को आश्रय देनेवाला काव्य ही होता है। जो बात भरत मुनि ने कही है वह भामह के इस कथन से भी सिद्ध होती है—
जिस प्रकार पहले शब्द को चाटकर कड़वी ओषधि पी ली जाती है उसी प्रकार स्वादिष्ट काव्यरस से मलीभांति मिले हुये वाक्यार्थ का उपभोग करते हैं।
इसे भी यही सिद्ध होता है कि भामह शब्दवृत्तिरूप व्यवहार का जीवन रस के उप-योग को हो मानते हैं। इस प्रकार नाट्यशास्त्र और काव्यशास्त्र दोनों से सिद्ध हो जाता है कि रस जीवन है और इतिवृत्त शरीर।
(ध्वन्यालोके)—अथ केचिदाहुः—‘गुणगुणिव्यवहारो रसादीनामितिवृत्तादिभिः सह युक्तः न तु जीवशरीरादिव्यहारः।
रसादिमयं हि वाच्यं प्रतिभासते न तु रसादिविभिः पृथग्भूतम् इति।
अत्रोच्यते—यदि रसादिमयैव वाच्यं यथा गौस्त्वमयं शरीरम् एवं सति यथा शरीरे प्रतिभासमाने नियमेनैव गौरवं प्रतिभासते सर्वस्य तथा वाच्येन सहैव रसाद्योदपि सहृदयस्यासहृदयस्य च प्रतिभासेते। न चैवम्, तथा चेतत्प्रतिपादितमेव प्रथमतः।
(लोकार्थ)—गुणगुणिव्यवहार इति। अत्यन्तसम्मिश्रतया प्रतिभासनाद्र्मंधर्मिणोः वहारो युक्तः। न तु द्वित्ति।
क्रमस्यासंवेदनादिति भावः। प्रथमेति ‘शब्दार्थशासनज्ञानमात्रेणैव न वेत्तते’ इत्यादिना प्रतिपादितमदः।
(अनु०) ‘गुण-गुणी व्यवहार’ यह। अत्यन्त सम्मिश्रित रूप में प्रतिभासित होने के कारण धर्मधर्मी व्यवहार उचित है। ‘न तु’ यह। भाव यह है कि क्रम के असंवेदन के कारण। ‘प्रथम’ यह। ‘शब्दार्थ-शासनज्ञानमात्रेणैव न वेत्तते’ के द्वारा उसका प्रतिपादन कर दिया गया।
यह। ‘शब्दार्थ-शासनज्ञानमात्रेणैव न वेद्यते’ के द्वारा उसका प्रतिपादन कर दिया गया।
तारावती—यहाँ पर यह एक विवाद उठ खड़ा हुआ है कि इतिवृत्त और रस का क्या सम्बन्ध है। दो प्रकार के सम्बन्ध सम्भव हैं (१) गुण और गुणी का सम्बन्ध अथवा धर्म और धर्मी का सम्बन्ध, तथा (२) जीव और शरीर का सम्बन्ध। आलोकार ने जीव और शरीर का सम्बन्ध माना है। इसपर पूर्वपक्षी का कहना है कि काव्य के इतिवृत्त
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तृतीय उद्योतः
है और जीव का प्रवेश उसमें बाद में होता है। इसके अतिरिक्त एक समय ऐसा भी होता है जब शरीर तो होता है किन्तु जीव नहीं होता। इस प्रकार जीव से पृथक् शरीर रह सकता है और उसमें एक क्रम होता है कि पहले शरीर और बाद में जीव। किन्तु रस के प्रसङ्ग में ऐसा नहीं होता। न उसमें पौर्वापर्य क्रम होता है और न पृथग्भाव। काव्य में वाच्य प्रतीति सर्वदा रसादिमय ही होती है। रसादि से व्यतिरिक्त वाच्य की प्रतीति कभी नहीं होती। अतः जीव और शरीर का व्यवहार ठीक नहीं। अब दूसरे सम्बन्ध को लीजिये—रस गुण अथवा धर्म है और इति वृत्त गुणी अथवा धर्मी है। यही सम्बन्ध ठीक जँचता है। गुण कभी गुणी से पृथक् नहीं रहता और धर्म कभी धर्मी से पृथक् नहीं रहता। इनकी प्रतीति अत्यन्त सम्मिलित रूप में ही होती है। यही बात रस के विषय में लागू होती है। अत्यन्तसम्मिश्रतारूप धर्म इनके अन्दर विद्यमान है। जिससे ये गुण और गुणी अथवा सम्बन्ध और सम्बन्धी कहलाने के अधिकारी हो जाते हैं। (सिद्धान्ती) इस पर मेरा निवेदन यह है कि यदि आप इतिवृत्त को गुणी मानते हैं और रस को गुण मानते हैं, क्योंकि वाच्य सर्वदा रसादिमय ही होता है, तो जिस प्रकार शरीर के प्रतिभासित होने पर नियमपूर्वक गरिष्ठ इत्यादि गुणों की प्रतीति अवश्य होती है उसी प्रकार वाच्य के प्रतिभासित होने के साथ हो रस भी अवश्य हो प्रतिभासित होना चाहिये। उसमें यह नियम नहीं होना चाहिये कि रस की प्रतीति केवल सहृदयों को ही होती है असहृदयों को नहीं होती। गुण और गुणी की प्रतीति सभी प्रकृतियों को चाहे वे सहृदय हों चाहे असहृदय, एक जैसी होती है। किन्तु रस और इतिवृत्त की प्रतीति सभी को एक जैसी नहीं होती। इस बात का प्रतिपादन प्रथम उद्योत में किया जा चुका है—‘उस रसादिरूप व्यङ्ग्यार्थ का ज्ञान केवल शब्दानुशासन और अर्थानुशासन के ज्ञान से ही नहीं होता उसका परिज्ञान तो काव्यार्थतत्त्ववेत्ता ही कर सकते हैं।’
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तृतीय उद्योतः
स्यान्नन्तं, रत्नानामिव जात्यत्वं प्रतिपत्तृविशेषतः संवेद्यं वाच्यानां रसादिरूपत्वमिति। नैवम्, यतो यथा जात्यत्वेन प्रतिभासमाने रत्ने रत्नस्वरूपानतिरिक्तत्वमेव तस्य लक्ष्यते तथा रसादीनामपि विभावानुभावादिरूपवाच्यव्यतिरिक्तत्वमेव लक्ष्यते। न चैवं, न हि विभावानुभावव्यभिचारिण एव रसा इति कस्यचिद्वगमः। अत एव च विभावादिप्रतीत्यविनाभाविनो रसादीनां प्रतीतिरिरिति तत्प्रतीत्योः कार्यकारणभावेन व्यवस्थापनाट्रमोजडयंभवति। स तु लक्ष्यते ‘इत्यलक्ष्यक्रम एव सन्तो व्यङ्ग्यं रसायः’ इत्युक्तम्।
(ध्वन्य०)—स्यान्नन्तं, रत्नानामिव जात्यत्वं प्रतिपत्तृविशेषतः संवेद्यं वाच्यानां रसादिरूपत्वमिति । नैवम्, यतो यथा जात्यत्वेन प्रतिभासमाने रत्ने रत्नस्वरूपानतिरिक्तत्वमेव तस्य लक्ष्यते । तथा रसादीनामपि विभावानुभावादिरूपवाच्यव्यतिरिक्तत्वमेव लक्ष्यते । न चैवं, न हि विभावानुभावव्यभिचारिण एव रसा इति कस्यचिद्वगमः । अत एव च विभावादिप्रतीत्यविनाभाविनो रसादीनां प्रतीतिरिरिति तत्प्रतीत्योः कार्यकारणभावेन व्यवस्थापनाट्रमोजडयंभवति । स तु लक्ष्यते ‘इत्यलक्ष्यक्रम एव सन्तो व्यङ्ग्यं रसायः’ इत्युक्तम्।
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तृतीय उद्योतः
(अनु०) रत्नों के जात्यत्व के समान प्रतिपत्तिविशेष के आधार पर यदि वाच्यों का रसादिमयत्व आपका अभिमत हो तो ऐसा नहीं। क्योंकि जैसे जात्यत्व के रूप में प्रतिभासित होनेवाले रत्न में उसका रत्नस्वरूपानतिरिक्तत्व ही लक्षित होता है उसी प्रकार रसादिकों का भी विभावानुभावादि वाच्यानतिरिक्तत्व ही लक्षित हो। किन्तु ऐसा होता नहीं। किसी के लिए यह अवगम नहीं होता कि विभावानुभाव व्यभिचारी ही रस होते हैं और इसीलिए विभाव इत्यादि की प्रतीति से अविनाभाविनी रस इत्यादि की प्रतीति होती है। इस प्रकार उन दोनों प्रतीतियों के कार्यकारण भाव के द्वारा व्यवस्थित किये जाने से क्रम अवश्यम्भावी हैं।
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यह लाघव के कारण प्रकाशित नहीं होता अतः रस इत्यादि अलक्ष्यक्रम होते हुये ही व्यङ्गच होते हैं यह कहा गया है !
(लो०)—ननु यदस्य धर्मरूपं तत्तत्प्रतिभाने सर्वस्य नियमेन भातीयतैनैकान्तिकमेतत् । माणिक्यधर्मों हि जात्यत्वलक्षणो विशिष्टो न तत्त्रतिभासेऽपि सर्वस्य नियमेन भातीयताऽऽडुते—स्यादिति । एतत्परिहरति—नैवमिति । एतदुक्तं भवति—अत्यन्तोन्मग्नस्वभावत्वे हि तद्र्मन्त्वादिति विशेषणमस्माभिः कृतम् । उन्मग्नरुपता च न रूपवज्जात्यत्वस्य, अत्यन्तलीनस्वभावत्वात् । रसादीनां चोन्मग्नतास्त्येवेत्त्येव केचिद्देतं ग्रन्थमनेषुः ।
अस्मद्गुरवरस्त्वाहुः—अत्रोच्यत इत्यनेनैवोच्यते—यदि रसादयो वाच्यानां धर्मोऽस्तथा सति द्वौ पक्षौ रूपादिसदृशा वा स्युर्माणिक्यगतजात्यत्वसदृशा वा । न तावत्प्रथमः पक्षः, सर्वान्न प्रति तथावभासात् । नापि द्वितीयः, जात्यस्ववदनति-रिकत्वेनाप्रकाशनात् । एष च हेतुरग्रेऽपि पक्षे सङ्गृहीत एव । तदाह—स्यात्मन-मित्यादिना न चैवमितेन । एतदेव समर्थयति—न होति । अत एव चैति । यतो न वाच्यधर्मत्वेन रसादीनां प्रतीति:, यतश्च तत्त्रतीतौ वाच्यप्रतीति: सर्वथाऽनुपयोगिनी
स तु सहृदयभावनाभ्या-सान्न लभ्यते अन्यथा तु लक्ष्यतापत्तियुक्त एव । यस्यापि प्रतीतिविशेषात्मकव् रस इत्युक्तः: प्राक्तस्यापि व्यपदेशत्वाद्रसादीनां प्रतीतिरित्येवमन्यत्र ।
(अनु०) निस्सन्देह जो जिसका धर्मरूप होता है वह उसके प्रतिभान में सभी के लिये नियमितः प्रतीत हो होता है यह अनैकान्तिक है। जात्यत्वलक्षण माणिक्य धर्मविशेष उसके प्रतिभास में भी सभी के लिये नियमित प्रतीत नहीं होता यह शङ्का कर रहे हैं—‘स्यात् मतम्’ इत्यादि । इसका परिहार करते हैं—ऐसा नहीं यह है । यहाँ यह कहा गया है—हमने ‘अत्यन्त उन्मग्न’ स्वभाववाला होते हुये उसका धर्म होने के कारण यह विशेषण किया है । और उन्मग्नरूपता तो अत्यन्त लीन स्वभाववाला होने से रूपवज्जात्यत्व की नहीं होती । और रस इत्यादिकों की उन्मग्नता है—ही-कुछ लोगों ने इस ग्रन्थ को इस प्रकार लगाया है ।
हमारे गुरु लोग तो कहते हैं—‘अत्रोच्यत’ इस प्रकरण के द्वारा यह कहा जा रहा है—यदि रस इत्यादि वाच्यों के धर्म हैं तो ऐसा होने पर दो पक्ष हैं या तो रूप इत्यादि के सदृश हो या माणिक्यगत जात्यत्व के सदृश हो । प्रथम पक्ष तो नहीं हो सकता क्योंकि सबके प्रति वैसा अवभास नहीं होता । द्वितीय भी नहीं क्योंकि जात्यत्व के समान अनतिरिक्त रूप में प्रकाशन नहीं होता । और यह हेतु प्रथम पक्ष में भी सङ्गृहीत हो जाता है । इसी का समर्थन करते हैं—‘नहि’ इत्यादि । ‘और इसीलिये’ यह । क्योंकि वाच्यधर्म के रूप में रस इत्यादि की प्रतीति नहीं होती और क्योंकि उसकी प्रतीति में वाच्यप्रतीति सर्वथा अनुपयोगिनी नहीं होती
इसी हेतु से क्रम अवश्य होना चाहिये, क्योंकि साथ में होनेवालों का उपकार का योग होता ही नहीं । वह सहृदय भावना के अभ्यास के कारण लक्षित नहीं होता अन्यथा लक्षित भी हो
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तृतीय उद्योतः
यह पहले कहा गया है जिसकी पहले की यह उक्ति है कि प्रतीतिविशेषात्मक ही रस होता है उसके भी मत में व्यपदेश्यविनिर्द्देश्यव्दार से ( भेदारोप ) से रस इत्यादि की प्रतीति कही जाती है। ऐसा ही अन्यत्र भी ( समझना चाहिये)।
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तृतीय उद्योतः
तारावतो—(प्रश्न)
गुणी के साथ गुण का अथवा धर्मी के साथ धर्म का अवश्य ही भान होता है इस हेतु में अनेकान्तिक सव्यभिचार हेत्वाभास है। गुण दो प्रकार के होते हैं—एक तो वे गुण होते हैं जिनका भान गुणी के साथ अवश्य होता है जैसे गौरवर्ण का भान शरीर के साथ अवश्य होता है। दूसरे वे गुण होते हैं जिनका भान गुणी के साथ अनिवार्य रूप से अवश्य ही नहीं होता। जैसे माणिक्य का एक विशेष प्रकार का धर्म होता है जात्यत्व। इस धर्म के होने पर माणिक्य में उत्त्कृष्टता आ जाती है। माणिक्य के प्रतिभास होने पर उसके देखनेवाले सभी व्यक्ति उस जात्यस्व धर्म को नहीं जान पाते। उस धर्म को विशेष प्रकार के देखनेवाले ही जान पाते हैं। इसी प्रकार वाच्य के धर्म रस इत्यादि की प्रतीति सभी वाच्यार्थज्ञ व्यक्तियों को नहीं होती। उसे विशेष प्रकार के प्रतिपत्ता ( सहृदय ) व्यक्ति ही जान पाते हैं। इस प्रकार इनका धर्मी और धर्म का सम्बन्ध ही ठीक है शरीर और जीव का सम्बन्ध ठीक नहीं। ( उत्तर ) किसी भी तत्त्व के गुण दो प्रकार के होते हैं एक तो उन्मग्न स्वभाववाले और दूसरे निमग्न स्वभाववाले। उन्मग्न स्वभाववाले गुण केवल उसी द्रव्य में नहीं रहते जब—कि निमग्न स्वभाववाले गुण केवल उसी द्रव्य में रहते हैं। जैसे गौरत्व इत्यादि ऐसे गुण हैं जो पुरुष में भी रहते हैं और अन्यत्र भी। अतः ये उन्मग्न स्वभाववाले गुण कहे जा सकते हैं। इसके प्रतिकूल जात्यत्व ऐसा गुण है जो रत्न को छोड़कर अन्यत्र नहीं रहता, अतः यह निमग्नस्वभाववाला गुण है। जब हम यह कहते हैं कि गुणी के प्रतीत होने पर गुण की प्रतीति आवश्यक होती है तब हमारा अभिप्राय यह होता है कि उन्मग्न स्वभाववाले गुण द्रव्य के साथ अवश्य प्रतीत होते हैं। गौरत्व उन्मग्न स्वभाववाला होता है, अतः द्रव्य के साथ उसकी प्रतीति निश्चित ही है। जात्यत्व अत्यन्त लीन स्वभाववाला होता है जो रत्न से भिन्न अन्यत्र रहता ही नहीं। अतः रत्न की प्रतीति के साथ जात्यत्व की प्रतीति अपरिहार्य नहीं हैं। अत एव गौरत्व और जात्यत्व दोनों धर्मों में भेद हो गया। रस गौरत्व के समान उन्मग्न-स्वभाववाला ही है। यदि रस जात्यत्व के समान इतिवृत्त का स्वरूपान्तरिरिक्त धर्म होता तो वह भी विभाव अनुभाव इत्यादि वाच्य से अगत्यतिरिक्त ही प्रतीत होता। किन्तु ऐसा होता नहीं है। विभावादि वाच्य से सर्वथा भिन्न ही प्रतीत होते हैं। अत एव यदि रस और इतिवृत्त का धर्म-धर्मी भाव सम्बन्ध माना जायगा तो उसमें यह बात सिद्ध न हो सकेगी कि रसानुभूति केवल सहृदयों को ही होती है। अतः मानना पड़ेगा कि वाच्यार्थ सदा रसादिमय ही होता है, यह सिद्धान्त ठीक नहीं। अत एव इनके सम्बन्ध को जीव और शरीर का सम्बन्ध मानना ही ठीक नहीं है। यह है कुछ लोगों के मत में इस ग्रन्थ की व्याख्या।
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तृतीय उद्योतः
'इसपर मेरा निवेदन है—''मानना ठीक है'' इस सन्दर्भ की व्याख्या आचार्य अभिनवगुप्त के गुरुओं ने इस प्रकार की है—'यदि रस इत्यादि वाच्य के धर्म माने जायेंगे तो वे या तो रूप इत्यादि के समान होंगे या माणिक्य के जात्यत्व गुण के समान। रूप इत्यादि के
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समान हो ही नहीं सकते क्योंकि ऐसी दशा में उसकी प्रतीति सबको होने लगेगी । माणिक्य-गत जात्यत्व के समान भी नहीं हो सकते क्योंकि उनका प्रकाश जात्यत्व के समान अनन्वित रिक्त या अभिन्नरूप में नहीं होता । अनन्वित रूप में प्रकाशित न होना एक ऐसा हेतु है जो रस को दोनों प्रकार के धर्मों से पृथक् सिद्ध कर देता है । जिस प्रकार जात्यत्व माणिक्य से भिन्न नहीं रहता उसी प्रकार गौरत्व भी स्वाश्रय द्रव्य से पृथक् नहीं रहता । किन्तु रस इत्यादि का विभावानुभाव इत्यादि से वही अविच्छेद्य सम्बन्ध नहीं है । इस प्रकार रस का इतिवृत्त से गुण-गुणी भाव या धर्म-धर्मी भाव सम्बन्ध नहीं है । अत एव इनका जीव और शरीर का सम्बन्ध मानना ही ठीक है
ऊपर जो जीव-शरीर व्यवहार स्वीकार किया गया है इसमें सबसे बड़ी अनुपपत्ति यही शोभ रह जाती है कि शरीर कभी जीव से पृथग्भूत भी रहता है । शरीर पहले होता है और जीव बाद में उसमें प्रवेश करता है । यह पौर्वापर्य क्रम रस और इतिवृत्त में नहीं होता । रस और इतिवृत्त का प्रतिभास सर्वदा समकालिक ही होता है । अतः इनका जीव-शरीर व्यवहार ठीक नहीं है । इसका उत्तर यह है कि ऊपर सिद्ध किया जा चुका है कि विभाव इत्यादि का रस इत्यादि से अविच्छेद्य सम्बन्ध नहीं है । यह कोई नहीं समझता कि विभाव अनुभाव और व्यभिचारी भाव ही रस होते हैं । किन्तु रस इत्यादि की प्रतीति विभाव अनुभाव इत्यादि की प्रतीति के बिना हो भी नहीं सकती । अत एव हम उनमें गुण-गुणीभाव अथवा धर्म-धर्मीभाव न मानकर कार्य-कारणभाव सम्बन्ध ही मानेंगे । कार्य-कारण भाव में क्रम मानना अनिवार्य है अतः रस और इतिवृत्त में भी क्रम मानना ही पड़ेगा । सारांश यह है कि क्रम मानने में दो बहुत ही सबल तर्क विद्वान हैं—एक तो रस इत्यादि की प्रतीति वाच्यधर्मत्व के रूप में होती है और दूसरे रस इत्यादि की प्रतीति में वाच्य की प्रतीति का सर्वथा अनुपयोग नहीं होता । अतः क्रम मानना ही पड़ेगा क्योंकि जो तत्त्व एक साथ होते हैं उनमें न तो कार्यकारण भाव होता है और न उपकार्योपकारक भाव । यदि हम वाच्य और व्यंग्य का उपकार्योपकारक भाव मानेंगे तो पौर्वापर्यक्रम मानने के लिये बाध्य हो जायेंगे । यह दूसरी बात है कि जिन लोगों ने सहृदय-भावना का अभ्यास किया है उनके उस अभ्यास के कारण वाच्य के बाद व्यंग्य की इतनी शीघ्रता से प्रतीति होती है कि वे जान ही नहीं पाते कि उन दोनों तत्त्वों में कोई पौर्वापर्य क्रम है । उन्हें तो वाच्य और व्यंग्य दोनों एक साथ होते हुए दिखाई देते हैं । जिन्होंने सहृदयता की भावना का अभ्यास नहीं किया है । यदि वे सरस काव्य पढ़ें तो उन्हें पहले वाच्य की ओर फिर व्यंग्य की प्रतीति हो भी सकती है । (कभी-कभी तो ऐसे व्यक्ति केवल वाच्यार्थ समझ पाते हैं और रसानुभूति के लिये उनका ध्यान आकर्षित करने की आवश्यकता पड़ जाती है ।) इन सब बातों की व्याख्या प्रथम तथा द्वितीय कद्योत में की जा चुकी है । जो लोग कहते हैं कि विशेष प्रकार की प्रतीति ही रस की आत्मा है अर्थात् वे लोग प्रतीति को हि रस कहते हैं उनके मत में 'रस की प्रतीति' यह भेदमूलक शब्द संगत नहीं होता । अतः उनके मत में व्यपदेशिवद्भाव से 'रस की प्रतीति' यह संगत हो जाता है । एक ही वस्तु में भेद का आरोप करके सम्बन्ध कारक का प्रयोग
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ननु शब्द एव प्रकरणाद्यवच्छिन्नो वाच्यध्यक्ष्यो: सममेव प्रतीतिमुपजनयतीति । तत् क्रमकल्पनया । न हि शब्दस्य वाच्यप्रतीतिपरामर्श एव व्यञ्जकत्वे निबन्धनम् । तथा हि गीतादिशब्देष्वोडपि रसाभिव्यक्तिरस्ति । न च तेषामन्तरा वाच्यपरामर्शः ।
करना व्यपदेशवद्भाव कहलाता है। जैसे राहु एक राक्षस के सिर को ही कहते हैं। किन्तु आरोपित भेद को लेकर ‘राहु का सिर’ इस शब्द का प्रयोग कर दिया जाता है। इसी प्रकार रस की प्रतीति के विषय में भी समझना चाहिये ।
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(अनु०) (प्रश्न) शब्द ही प्रकरण इत्यादि से संयुक्त होकर वाच्य और व्यङ्गच्य की एक साथ ही प्रतीति उत्पन्न कर देता है क्रमकल्पना की क्या आवश्यकता ? शब्द की वाच्यप्रतीति का परामर्श ही व्यञ्जकत्व में निबन्धन नहीं है । इस प्रकार—गीत इत्यादि शब्दों से भी रस की अभिव्यक्ति होती है। उनमें बीच में वाच्य का परामर्श नहीं होता ।
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तृतीय उद्योतः
ननु भवतु वाच्यादतिरिक्ता रसाद्यसत्त्रापि क्रमो न लभ्यत इति तावत्स्येवोक्तम् । तत्कल्पनेऽपि प्रमाणं नास्ति । अन्वयव्यतिरेकाभ्यामर्थप्रतीतिमन्तरेण तत्रैकयैव सामग्री सहैव वाच्यं व्यङ्गच्याभिमतं च रसादि भाति तिवचनव्यञ्जनव्यापारद्वयेन न किञ्चिदिति तदाह—नन्वति । यत्रापि गीतशब्दानामर्थोडस्ति तत्रापि तत्प्रतीतिरनुपयोगिनी ग्रामरागानुसारेणापहस्ततत्वाच्यानुसारतया रसोदयदर्शनात् । न चापि सा सर्वत्र भवन्ती दृश्यते, तदितदाह—न चेति । तेषामिति गीतादिशब्दानाम् । आदिशब्देन वाद्याविलपितशब्दादयो निर्दिष्टाः ।
(लो०)—ननु भवन्तु वाच्यादतिरिक्ता रसाद्यसत्त्रापि क्रमो न लभ्यत इति तावत्स्येवोक्तम् । तत्कल्पनेऽपि प्रमाणं नास्ति । अन्वयव्यतिरेकाभ्यामर्थप्रतीतिमन्तरेण तत्रैकयैव सामग्री सहैव वाच्यं व्यङ्गच्याभिमतं च रसादि भाति तिवचनव्यञ्जनव्यापारद्वयेन न किञ्चिदिति तदाह—नन्वति । यत्रापि गीतशब्दानामर्थोडस्ति तत्रापि तत्प्रतीतिरनुपयोगिनी ग्रारागानुसारेणापहस्ततत्वाच्यानुसारतया रसोदयदर्शनात् । न चापि सा सर्वत्र भवन्ती दृश्यते, तदितदाह—न चेति । तेषामिति गीतादिशब्दानाम् । आदिशब्देन वाद्याविलपितशब्दादयो निर्दिष्टाः ।
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तृतीय उद्योतः
(अनु०) (प्रश्न) वाच्य से अतिरिक्त रस इत्यादि हों, वहाँ पर भी क्रम लक्षित नहीं होता यह तो तुमने ही कहा है। और उसकी कल्पना में प्रमाण (भी) नहीं है । क्योंकि अन्वय-व्यतिरेक से अर्थप्रतीति के बिना ही पद से रहित स्वर आलाप गीत इत्यादि में शब्द-शास्त्र में उपकृत रस इत्यादि की प्रतीति देखी जाती है । इससे एक ही सामग्री से साथ ही व्यङ्गच्याभिमत वाच्य रसादि शोभित होते हैं; अतः वचन और व्यञ्जन इन दो व्यापारों से कोई प्रयोजन नहीं ।
३
तृतीय उद्योतः
वही कहते हैं—‘ननु’ इत्यादि । जहाँ पर भी गीत-शब्दों का अर्थ होता है वहाँ पर भी उनकी प्रतीति अनुपयोगिनी होती है क्योंकि ग्रामराग के अनुसरण से वाच्यार्थ प्रतीति का तिरस्कार करके रसोदय देखा जाता है । वह (वाच्य प्रतीति) सर्वत्र होती हुई देखी भी नहीं जाती । यह वही कहते हैं—‘और नहीं’ । उनका अर्थात् गीत इत्यादि शब्दों का। आदि शब्द से वाद्य विलपित इत्यादि शब्द निर्दिष्ट किये गये हैं ।
३
तृतीय उद्योतः
तारावती—(प्रश्न) यह मान भी लें कि रस इत्यादि वाच्यार्थ से व्यतिरिक्त होते हैं, किन्तु फिर भी आपने ही कहा है कि वाच्यार्थ और रसादि की प्रतीति में क्रम लक्षित नहीं होते । ऐसी दशा में क्रम की कल्पना करने में ही क्या प्रमाण है? यदि अन्वय-व्यतिरेक के आधार पर परीक्षा की जाय तो सिद्ध होगा कि रस में क्रम का मानना आवश्यक नहीं है । अन्वय इस प्रकार होगा—‘रस इत्यादि के होने पर क्रम अवश्य होता है’ और व्यतिरेक इस प्रकार
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होगा—‘क्रम के न होने पर रस इत्यादि नहीं होते ।’ कभी-कभी देखा जाता है कि जहाँ पर अर्थ की प्रतीति नहीं भी होती अथवा जहाँ पद भी नहीं होते वहाँ पर केवल स्वरलाप और गीत इत्यादि के द्वारा केवल शब्द के ही उपयोग से रस की प्रतीति हो जाती है । इस प्रकार जहाँ वाच्यार्थ बिल्कुल नहीं होता वहाँ भी रसानुभूति देखी जाती है । इस प्रकार एक ही सामग्री से एक साथ वाच्यार्थ तथा व्यंग्यार्थ के लिये अभिमत रस इत्यादि प्रतीत हो जाते हैं । फिर अभिधा और व्याख्याता इन दो व्यापारों की पृथक सत्ता मानने की भी क्या आवश्यकता ? जिस सामग्री से वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ दोनों की प्रतीति होती है वह है प्रकरणादि से अवच्छिन्न शब्द । यह आप कह ही नहीं सकते कि वाच्यप्रतीति का परामर्श ही व्याख्याना में निमित्त होता है । यह अभी सिद्ध किया जा चुका है कि गीत, वाद्य, विलाप इत्यादि शब्दों से भी रसाभिव्यक्ति देखी जाती है जिनमें वाच्यार्थ बिल्कुल नहीं होता । इसके अतिरिक्त जहाँ पर गीत इत्यादि के शब्दों का अर्थ भी हो वहाँ पर भी उन अर्थों की प्रतीति का कोई उपयोग नहीं होता क्योंकि ग्रामराग के अनुसार वहाँ पर वाच्यार्थ के अपहरण का अनुसरण करते हुये रसाभिव्यक्ति देखी जाती है । सारांश यह है कि व्यंग्यार्थप्रतीति में वाच्यार्थप्रतीति सर्वदा अनिवार्य नहीं होती । अतः क्रमकल्पना में कोई प्रमाण नहीं (उत्तर) इस विषय में हमारा कहना यह है कि यह तो हम मानते ही हैं कि प्रकरण इत्यादि से अवच्छिन्न होकर शब्द व्यंजक होते हैं । यह तो हमने प्रथम उद्योत की १३ वीं कारिका में दिखला ही दिया हैं । किन्तु शब्दों का व्यंजकत्व दो प्रकार का होता है—कभी-कभी तो स्वरूपविशेष-निबन्धन होता है और कभी वाचकशक्ति-निबन्धन । गीत इत्यादि में स्वरूपनिबन्धन रसनिष्पत्ति होती है और काव्य में वाचकशक्ति-निबन्धन । यदि काव्य में भी अर्थबोध के अभाव में ही गीत इत्यादि के समान रसनिष्पत्ति मान ली जाय तो वहाँ भी प्रथम प्रकार की अर्थात् स्वरूपनिबन्धन रसनिष्पत्ति ही मानी जायेगी । किन्तु ऐसा होता नहीं है । वाचकशक्ति-निबन्धन व्यंग्यार्थबोध के लिये वाचकशक्ति वाच्यार्थ में ही रहती है । अत एव पहले वाच्यार्थप्रतीति मानना ही उचित है । क्योंकि जब इतना सिद्ध हो गया कि व्यंग्यार्थप्रतीति वाचक-शक्ति निबन्धन होती है तब यह स्वतः सिद्ध हो जाता है कि कारणभूत वाच्यार्थ के बाद ही कार्यभूत व्यंग्यार्थ की निष्पत्ति होती है ।
(ध्वन्यालोके) अत्रापि भट्टनायिकाः—प्रकरणाद्यवच्छिन्नेन व्यंजकत्वं शब्दानामित्यनुमत-मेवैतदस्माकम् । किन्तु तद् व्यंजकत्वं तेषां कदाचित्स्वरूपविशेषणिबन्धनं कवाचिद्वाचकशक्तिनिबन्धनम् । तत्र येषां वाचकशक्तिनिबन्धनं तेषां यदि वाच्यप्रतीतिमन्तरेव स्वरूपप्रतीत्या निष्पन्नं तद्भवेत्न तन्निबन्धनं तन्नियामकं वाच्यवाचकभावप्रतीत्योत्तरकालं तु व्यङ्ग्यचप्रतीतेः प्राग्मेव । स तु क्रमो यदि लाघवान्न लक्ष्यते तत्तिक्रियते । यदि च वाच्यप्रतीतिमन्तरेैव प्रकरणाद्यवच्छिन्नशब्दमात्रसादृश्य रसादिप्रतीतेः स्यात्तदनवधारितः प्रकरणानां वाच्यवाचकभावे च स्वयंसमुत्पन्नानां प्रतिपत्तृणां काव्यमात्रश्रवणादेवासौ भवेत् । सहभावे च वाच्यप्रतीतिरनुपयोगी; उपयोगे वा न सहेतुः । येषामपि स्वरूपविशेषणिबन्धनं;
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तृतीय उद्योतः
प्रतीतिनिमित्तं व्यङ्ग्यकतत्वं यथा गीतादिवशब्दानां तेषामपि स्वरूपप्रतीतेर्व्यञ्ज चप्रतीतेर्नियमभावी क्रमः। तत् तु शब्दस्य क्रियापौर्वापर्यमनन्यासाध्यतत्फलघटनास्वाभाव्यभाविनीषु वाच्येनाविरोधिन्यभिधेयान्तर विलक्षणे रसादौ न प्रतीतते।
(अनु०) हम यहाँ पर भी कहते हैं—यह तो हमारा अनुमान ही है कि प्रकरण इत्यादि की विशेषता के साथ शब्दों का व्यङ्ग्यकत्व होता है। किन्तु वह उनका व्यङ्गयकत्व कदाचित् स्वरूप विशेष के आधार पर होता है कदाचित् वाचक शक्ति के आधार पर। उसमें जिनका वाचक शक्ति के आधार पर होता है उनकी वह बात यदि वाच्यप्रतीति के बिना ही स्वरूपप्रतीति से ही हो जाय तो वह वाचकशक्ति के आधार पर नहीं होती। यदि वाचकशक्तिनिवन्धन होती है तो नियम से ही व्यङ्गयप्रतीति की उत्तरकालता वाच्यप्रतीति की अपेक्षा प्राप्त हो जाती है। यदि वह क्रम लाघव के कारण लक्षित न हो तो क्या किया जाय। और यदि वाच्यप्रतीति के बिना ही प्रकरण इत्यादि से अवच्छिन्न शब्दमात्र से ही रस इत्यादि की प्रतीति साध्य हो तो प्रकरण इत्यादि का अवधारण न करनेवाले और स्वयं वाचकभाव में अग्नुत्पन्न प्रतिपत्ताओं की वह (रसादिप्रतीति) काव्यश्रवणमात्र से ही हो जाय। और सहभाव में वाच्यप्रतीति का उपयोग नहीं होता और उपयोग होने पर सहभाव नहीं होता। जिनका स्वरूपविशेष प्रतीतिनिमित्त भी व्यङ्गयकत्व होता है उनका भी स्वरूपप्रतीति और व्यङ्गयप्रतीति का नियमानुसार होनेवाला क्रम है। वह शब्द का क्रिया-पूर्वापर्य दूसरे को सिद्ध न करनेवाली, शीघ्र ही भावित करानेवाली, उसके फलवाली संघटनाओं में वाच्य के अविरोधी तथा दूसरे अभिधेयों से विलक्षण रसादि में प्रतीत नहीं होता।
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तृतीय उद्योतः
(लो०) अनुमतमिति। ‘यत्रार्थः शब्दो वा’ इति ह्यवोचामेवेति भावः। न तर्होति ततश्च गीतवदेवार्थावगमं विनैव रसावभासः; स्यात्काव्यशब्देभ्यः। न चैवमिति वाचकशक्तिरपि तत्रापेक्षणीया। सा वाच्यनिष्ठैवति प्राग्वाच्ये प्रतिपत्तिरित्यभ्युपगन्तव्यम्। तदाह—अर्थेति। तदिति वाचकशक्ति। वाच्यवाचकभावेति। सैव वाचकशक्तिरित्युच्यते।
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तृतीय उद्योतः
एतदुक्तं भवति—मा भूदाच्चयं रसादिव्यङ्गयकं, अस्तु शब्दादेव तत्प्रतीतिस्तथापि तेन स्ववाचकशक्तिस्तस्यां कर्तव्यायां सहकारितयावश्यकापेक्षणीयेयतायातं वाच्यप्रतीते: पूर्वभावित्वमिति। ननु गीतशब्दवदेव वाचकशक्तितत्राप्यनुपयोगिनी। यत्तु क्वचिच्छू तेडपि काव्ये रसप्रतीतिनं भवति तत्रोच्यते ? किं वाक्यान्तरसहायत्वम् ? अथ वाक्यान्तरराणां सम्बन्धवत्त्वम् ? उभयपरिज्ञानादपि भवति प्रकृतविपर्ययापत्ते रसादि:। स्वयमिति। प्रकरणमात्रेव परेण केनचिद् येषां व्याख्यातमिति भावः। न चान्वयव्यतिरेकवतीं वाच्यप्रतीतिमपल त्यादृष्टसदभावाभावौ शरणत्विनाश्रितो मात्सर्यादधिकं किश्चित्पुष्णीत इत्यभिप्रायः।
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नन्वस्तु वाच्यप्रतीतेरुपयोगः क्रमाश्रयेण किं प्रयोजनम्, सहभावमात्रमेव ह्युपयोग इति अनुपकारे संज्ञाकरणमात्रं वस्तुधुर्यं स्यादिति भावः। उपयोग इति अनुपकार इति संशयेत्कमः किं न लक्ष्यते इत्याशङ्क्याह—सहेति। एवं व्यपयोग इत्यनुपकार इति भावः। ननु संशेत्कमः किं न लक्ष्यते इत्याशङ्क्याह—तद्वदृष्टान्तेनैव वयं वाच्यप्रतीतेरपि पूर्वभावितां समर्थयिष्याम इति भावः। क्रियापौर्वापर्यमित्यनेन क्रमस्य स्वरूपमाह—क्रिये इति। क्रिये वाच्यव्यङ्ग्यप्रतीति यदि वाभिधाव्यापारो व्यञ्जनापरपर्यायो ध्वननव्यापारश्चेति क्रिये तयोः पौर्वापर्यं न प्रतीयते। क्वेत्याह—रसादौ विषये। कीदृशि? अभिधेयान्तरादभिधेयविशेषादिलक्षणे सर्वार्थैवानभिधेये; अनेन भवितव्यं तावत्क्रमेणेत्युक्तम्। तथा वाच्येनाविरोधिनि, विरोधिनि तु लक्ष्यत एवेत्यर्थः। कुतो न लक्ष्यत इति निमित्तमस्फुटमिन्दिदष्टं हेतुस्तरगर्भं हेतुमाह—आश्रुति। अनन्यसाध्यतत्फलघटनासु घटना: पूर्वं माधुर्यादिलक्षणा: प्रतिपादिताः गुणविनरूपणावसरे ताश्च तत्र फलं यासाम्। तथा अनन्यसदेव साध्यं यासाम्। न ह्योजोदयतनाया: करुणादिप्रतीतिः साध्या।
एतदुक्तं भवति—यतो गुणवति काव्येऽङ्गीर्णविषयतया संघटना प्रयुक्ता ततः क्रमो न लक्ष्यते। ननु भवत्क्वे संघटनायां स्थितिः क्रमस्तु किं न लक्ष्यते अत आह—आश्रुभाविनीषु वाच्यप्रतीतिकालप्रतीक्षनेन विनैव इष्टल्येव ता रसादीन् भावयन्ति तदास्वादं विदधतीत्यर्थः। एतदुक्तं भवति—संघटनागुणगुम्फत्वाद्रसादीनामुपयुक्तेऽप्यर्थविज्ञाने पूर्वमेवो-चितसंघटनाश्रवण एव यत् आसूत्रितो रसावदस्तेन वाच्यप्रतीत्युत्तरकालभवेन परिस्फुटास्वादयुक्तोऽपि परचादुत्पन्नत्वेन न भाति। अभ्यस्ते हि विषयेऽविनाभावप्रतीतिक्रम इथ्येव न लक्ष्यते। अभ्यासो ह्यायमेव यत्प्रणिधानादिनापि विनैव संस्कारस्य बलवत्त्वादेव प्रबुद्धतया अवस्थापनमित्यं यत्र धूमस्तत्राग्निरिति हृदयस्थितत्वाद्चास्मे: पक्षधर्मताज्ञानमात्रमेवोपयुज्य भवतोऽपरामर्शास्तानाक्रामति। झटत्युपलभ्यते हि धूमज्ञानं तद्विधान्तस्मृत्युपकृतं तद्विजातीयप्रतिभासनसरणादिप्रतीतौ—नतरानुप्रवेशविरहादाश्रुभाविन्यामग्निनप्रतीतौ कमो न लक्ष्यते तद्वदिहापि। यदि तु वाच्यविरोधी रसो न स्यादुचिता च घटना न भवेत्कललक्ष्यतैव क्रम इति।
यथा चन्द्रकाकास्तु पठितमनुपठितोति न्यायेन गर्जनिमोलिकया व्याचचक्षे—तस्य शब्दस्य फलं तद्वा फलं वाच्यव्यङ्गचप्रतीत्यात्मकं तस्य घटना निष्पादना यतोडनन्यसाध्या शब्दव्यापारेकजन्येति। न चात्रार्थसतत्त्वं व्याख्याने किश्चित्परश्याम इत्यलं पूर्ववंश्ये: सह विवादेन बहुना।
(अनु०) 'अनुमत हो है' यह। भाव यह है कि हमने यह कहा है—'जहाँ अर्थ अथवा शब्द' इत्यादि। 'तो नहीं' इत्यादि। तो गोत के समान हो अर्थावगम के बिना ही काव्यशब्दों से रस का अवभास हो जाय। ऐसा होता नहीं अतः वाचक शक्ति भी उसमें अपेक्षणीय
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तृतीय उद्योतः
होती है और वह वाच्यानिष्ठा ही होती है। अतः पहले वाच्य में प्रतिपत्ति होना है यह समझना चाहिये वह कहते हैं—‘यद्यपि’ यह। वह अर्थात् वाचक शक्ति। ‘वाच्यवाचक भाव’ यह वही वाचक शक्ति होती है यह कहा जाता है।
यह कहा गया है—वाच्य रसादिग्यैरूजक न हो, शब्द से ही उसकी प्रतीति हो; तथापि उस (शब्द) के द्वारा उस (रसप्रतीत) के लिये जाने योग्य होने पर अपनी वाचक शक्ति सहकारिता के रूप में अपेक्षित की जाती है। अतः वाच्यप्रतीति का पूर्वभावित्व आ गया।
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तृतीय उद्योतः
निस्सन्देह गीत शब्द के समान ही वाचक शक्ति यहां पर भी अनुपयोगिनी है, और जो कहीं सुने हुये काव्य में भी रसप्रतीति नहीं होती है वहां उचित प्रकरणावगम इत्यादि सहकारो नहीं हैं’ यह आंशंकन करके कहते हैं—‘यदि च’ इत्यादि। निस्सन्देह प्रकरणावगम कौन कहा जाता है ? क्या-वाक्यान्तरसहायत्व अथवा दूसरे वाक्यों का समभिव्याहार वाक्य ? दोनों के परिज्ञान में भी प्रकृत वाक्यार्थ के न समझने पर रस का उदय नहीं होता।
‘स्वयम्’ यह। भाव यह है कि जिनके सामने केवल प्रकरण की ही किसी दूसरे ने व्याख्या कर दी। अर्थान्तरप्रतीतिकारकत्वी वाच्यप्रतीति को छिपाकर शरण के रूप में आश्रित किये हुये अदृष्ट की सत्ता और उसका अभाव मात्र से अधिक कुछ पुष्ट नहीं ही करते हैं, यह अभिप्राय है।
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तृतीय उद्योतः
‘निस्सन्देह वाच्यप्रतीति का उपयोग हो—क्रम के आश्रय से क्या प्रयोजन ? एक सामग्री के आधीन होना इस लक्षणवाला सहभावमात्र हो उपयोग हो’ यह शङ्का करके कहते है—‘सहभाव में’ इत्यादि। भाव यह है कि इस प्रकार निस्सन्देह अनुकूल में उपयोग यह केवल संज्ञा करना ही वस्तुशून्य हो जायेगा। ‘उपकारी का तो प्रयत्न होना तुमने भी भद्दी-कृत कर लिया’ यह कहते हैं—‘जिनका यह’।
भाव यह है कि उसके दृष्टान्त से ही हम वाच्य-प्रतीति की पूर्वभाविता का भी समर्थन कर देंगे। निस्सन्देह होता हुआ क्रम लक्षित क्यों नहीं होता ?’ यह शङ्का करके कहते हैं—‘वह तो’ यह। क्रियापवींपर्य इससे क्रम के स्वरूप को कहते हैं—‘जो दो किये जाते हैं’ यह।
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तृतीय उद्योतः
दो क्रियायें अर्थात् वाच्य और व्यङ्गच्य की प्रतीति अथवा अभिधाव्यापार और व्यञ्जना इस दूसरे नामवाला ध्वननव्यापार ये दोनों क्रियायें उन दोनों का पौर्वापर्य प्रतीत नहीं होता। ‘कहां पर’ ? यह कहते हैं—‘रस इत्यादि विषय होने पर। किस प्रकार के ? अभिधेयान्तर से अर्थात् विशेष प्रकार के अभिधेय से विलक्षण अर्थात् सर्वथा अभिधान के अयोग्य—इससे क्रम तो होना ही चाहिये यह कह दिया गया।
उस प्रकार वाच्य के अविरोधी में ( क्रम लक्षित नहीं होता ) अर्थात् विरोधी में तो लक्षित होता ही है। क्यों नहीं लक्षित होता ? इसके लिये निमित्त सप्तमी के द्वारा निर्दिष्ट एक ऐसा हेतु बतला रहे हैं जिसमें दूसरा हेतु गर्भित है—‘आशुभाविनिषेध’ यह।
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तृतीय उद्योतः
अनन्यसाध्य तत्काल घट-नामों में’ अर्थात् माधुर्य इत्यादि लक्षणवाली घटनायें पहले ही गुण-निर्हपण के अवसर पर प्रतिपादित कर दी गईं। वे उस फलवाली होती हैं अर्थात् जिनका रसादि की प्रतीति ही फल होता है इस प्रकार की होती हैं—तथा अनन्यसाध्य अर्थात् वही है साध्य जिनका इस प्रकार की होती हैं। ओजोऽण्टना को साध्य करुणादि की प्रतोति नहीं हांती।
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यह बात कही गई है—क्योंकि गुणवान् काव्य में असंलक्ष्यीर्ण विषय के रूप में संहतना प्रयुक्त की गई है, उससे क्रम लक्षित नहीं होता। ( प्रश्न ) संहतना में ऐसी स्थिति हो, क्रम क्यों लक्षित नहीं होता ? ( उत्तर ) अतः कहते हैं—‘श्रृङ्गारविनीतेषु’ वाच्यप्रतीति काल की प्रतीक्षा बिना ही शीघ्र ही रसादिकों को भावित कर देते हैं अर्थात् आस्वाद को उत्पन्न कर देते हैं।
यह बात कही गई है—रस इत्यादि के सङ्घटनना द्वारा व्यङ्ग्य होने के कारण अर्थ विज्ञान का उपयोग न होने पर भी पहले ही अभ्यस्त सङ्घटनना के सुनने में ही जो कि रसास्वाद कुछ स्फुरित हो जाता है वह उसी कारण से वाच्यप्रतीति के उत्तर काल में होनेवाले परिस्कृत आस्वाद से युक्त होते हुये भी परचात् उत्पन्न हुये के रूप में प्रतीत नहीं होता। अभ्यस्त विषय में निस्सन्देह अनिवार्य साहर्य का प्रतीति क्रम इस प्रकार लक्षित नहीं होता। अभ्यास यही होता है कि प्रणिधान इत्यादि के बिना ही संस्कार के बलवान् होने के कारण सदैव प्रतीत होने को इच्छा से स्थापित किया जाना।
इस प्रकार जहाँ ध्वनाँ होता है वहाँ आग होती है। इस व्यक्ति के हृदय में स्थित होने के कारण पृथक् धर्मता का ज्ञान ही उपयोगी होता है, अतः पृथक् धर्मता के स्थान का अतिक्रमण कर जाता है। उसकी व्यक्ति की स्मृति के द्वारा उपकृत ध्वन ज्ञान के बीजाञ उद्भूत होने पर उसके विजातीय के प्रणिधान के अनुसरण इत्यादि की प्रतीति के अन्ते: प्रवेश के बिना ही शीघ्र होनेवाली अग्रम प्रतीति में क्रम लक्षित नहीं होता। उसी प्रकार यहाँ पर भी। यदि रस वाच्य का अविरोधी न हो और उचित सङ्घटनना भी न हो तो क्रम लक्षित ही हो जाये।
चन्द्रकाकारण तो ‘पढ़े हुये को ही पुनः पढ़ता है’ इस न्याय से गजनिमीलिका के ढंग से व्याख्या की है—‘उसका अर्थात् शब्द का फल अथवा वही अर्थात् वाच्य-व्यङ्गच-प्रतीत्या-त्मक फल; उसकी घटना अर्थात् निष्पादन करना क्योंकि अनन्यसाध्च होता है अर्थात् केवल शब्दव्यापारमात्र से जन्य होती है’। यह इस व्याख्या में हमें अर्थ की कोई संगति दिखाई नहीं पड़ती, बस अपने पूर्व वंश्यों के साथ अधिक विवाद की आवश्यकता नहीं।
तारावती—यहाँ पर आशय यह है कि यदि आप वाच्य को रसप्रतीति का अनिवार्य हेतु तु नहीं मानना चाहते तो मानिय शब्द को ही रसप्रतीति का हेतु मान लीजिये। फिर भी शब्द गीत इत्यादि में तो स्वरूप से ही रसाभिव्यञ्जन कर देता है किन्तु काव्य में उसे इस क्रिया में अपनी वाचक शक्ति की अपेक्षा अवश्य होती है।
ऐसी दशा में भी वाच्यप्रतीति का पहले होना सिद्ध हो गया। रसादिप्रतीति के पहले वाच्यार्थप्रतीति भी होती है। यह दूसरी बात है कि हम शब्द सुनते जाते हैं उनका वाच्यार्थ समझते जाते हैं और उससे रसास्वादन करते जाते हैं। इस समस्त क्रिया में एक पौर्वापर्य क्रम रहता है। किन्तु वह क्रम इतना सूक्ष्म होता है कि हमें मालूम पड़ने लगता है कि मानों सारी क्रियायें एक साथ हो रही हैं उनमें कोई क्रम है ही नहीं।
आशय यह है कि शब्दों के सुनने के बाद ही अर्थ की प्रतीति होती है और अर्थ की प्रतीति के बाद ही रसानुसृति होती है। किन्तु वह क्रम इतना सूक्ष्म होता है कि विचारक प्रतीति के बाद ही रसानुसृति होती है।
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तृतीय उद्योत:
और विवेचक तो उसे लक्षित कर पाते हैं; साधारण स्थिति में उसकी प्रतीति नहीं होती । यदि सर्व साधारण व्यक्ति किसी तत्त्व को न समझ पाये तो उसका चारा ही क्या ? उससे किसी प्रमाणप्रतिपन्न वस्तु का अपलाप तो नहीं हो सकता । (प्रश्न) जिस प्रकार गाने रोने इत्यादि के शब्दों से रसाभिव्यक्ति हो जाती है और उनमें वाचकशक्त्ति की अपेक्षा नहीं होती उसी प्रकार अन्यत्र भी वाचकशक्त्ति के उपयोग के बिना ही शब्दों से ही रसानुभूति हो सकती है उसमें वाचकशक्त्ति का उपयोग मानने की क्या आवश्यकता है (उत्तर) वाचकशक्त्ति के उपयोग के बिना ही यदि शब्दमात्र से ही आप रसानुभूति मानेंगे तो आप के मत में जिन्होंने वाच्यवाचकभाव की व्युत्पत्ति नहीं कर पाई है इस प्रकार के परिशोलकों को भी रसानुभूति होने लगेगी । किन्तु ऐसा होता नहीं है । रसानुभूति केवल शब्द सुनने से ही नहीं होती अपितु अर्थ समझने से होती है । अतः वाच्यार्थ रसानुभूति का कारण अवश्य है । (पूर्वपक्ष) जहाँ काव्य को सुनने पर भी रसप्रतीति नहीं होती वहाँ यही समझा जाता है कि वहाँ पर प्रकरण इत्यादि का उचित ज्ञान नहीं होता । प्रकरण का ज्ञान रसानुभूति में सहकारी अवश्य होता है । सहकारी के अभाव में रसानुभूति का न होना स्वाभाविक ही है । (उत्तर) प्रकरण के ज्ञान से आप का क्या अभिप्राय है ? इसके केवल दो ही अभिप्राय सम्भव हैं—जिस वाक्य से रसानुभूति हो रही है उससे सम्बन्धित दूसरे वाक्यों का ज्ञान होना प्रकरणज्ञान कहलाता है अथवा प्रकृत वाक्यार्थ से सम्बद्ध दूसरे वाक्यों का अर्थ जानना प्रकरण ज्ञान कहलाता है । आप चाहे जो पक्ष मानें, चाहे आप यह स्वीकार करें कि प्रकृत वाक्य से सम्बद्ध दूसरे वाक्यों का ज्ञान होने पर प्रकरणज्ञान का होना कहा जाता है अथवा आप यह मानें कि प्रकृत वाक्य से सम्बन्धित दूसरे वाक्यों के सम्बन्धित वाच्यार्थ का ज्ञान ही प्रकरणज्ञान कहा जाता है, दोनों अवस्थाओं में प्रकरणज्ञानमात्र से तब तक रसानुभूति नहीं होती जब तक प्रकृत वाच्यार्थ का ज्ञान नहीं हो जाता । (गीत में यह जान लेने मात्र से ही कि गीत शृंगारविषयक है या वीरविषयक, रसानुभूति हो जाती है । उसमें वाच्यार्थज्ञान न होने पर भी स्वर ताल और लय से ही रसानुभूति होती है । किन्तु काव्य में वाक्यार्थज्ञान का होना रसानुभूति के लिये अनिवार्य है । उसमें केवल प्रकरणज्ञान से काम नहीं चलता !) जिन्होंने प्रकरणज्ञान तो कर लिया है किन्तु वाच्यवाचक भाव की व्युत्पत्ति जिन्हें नहीं है उनको काव्य सुनकर रसानुभूति नहीं होती । अतः यह मानना ही पड़ेगा कि केवल प्रकरणज्ञान रसानुभूति के लिये पर्याप्त नहीं है । यदि कोई दूसरा व्यक्ति प्रकरणमात्र ही समझा दे और काव्य सुनने लगे तो जो व्यक्ति उस काव्य की भाषा को नहीं समझता उसे कभी भी रसास्वादन नहीं हो सकेगा । किन्तु आपके मत में प्रकरणज्ञान होने पर वाच्यार्थप्रतीति न होने में भी रसास्वादन होना चाहिये ।
[ यहाँ पर आनन्दवर्धन का आशय यही प्रतीत होता है कि यदि वाच्यार्थज्ञान के अभाव में भी प्रकरणज्ञान से ही रसानुभूति मानी जायेगी तो जिनको केवल प्रकरण का ज्ञान है और वे स्वयं वाच्यार्थ को नहीं समझते उन्हें भी रसास्वादन होने लगेगा जोकि लोकसिद्ध तथ्य नहीं है । इस आशय के अनुसार पाठ यही होना चाहिये—'तद्वधारितप्रकरणानां वाच्य-
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वाचकेभावे च स्वयमध्युपप्लवेन प्रतिपत्तृणां काव्यमात्रश्रवणादेव भवेत्' किन्तु इस मूल पाठ में एक 'न' और बढ़ गया है और 'अवधारित' के स्थान 'अनवधारित पाठ हो गया है। इससे अर्थ करने में भी श्रम हो गया है और प्रश्नोत्तर भी सङ्ज्ञत नहीं होते।
किन्तु एक तो यह पाठ सभी पुस्तकों में पाया जाता है। दूसरे बालप्रिया को छोड़कर सभी टीकाकारों ने यहीं पाठ माना है। यहाँ तक कि अभिनवगुप्त को भी यही पाठ मिला था। अतः ज्ञात होता है कि यह मूल या तो स्वयं अभिनवगुप्त की होगी या उनके तात्काल परवर्ती किसी लेखक की। दीधितिकार ने इसकी योजना इस प्रकार लगाई है—'आप प्रकरण को रसानुभूति का कारण मानते हैं। इससे आप का आशय यही सिद्ध होता है कि किसी प्रसङ्ग में प्रकरण का होना ही आपके मत में पर्याप्त है। अब यदि एक व्यक्ति ने प्रकरण को समझ भी नहीं पाया और अर्थ भी स्वयं उसकी समझ में नहीं आया है तो भी उसे रसानुभूति हो। जानना चाहिये क्योंकि प्रकरण तो वहाँ पर विद्यमान है ही और आपके मत में प्रकरण ही कारण है प्रकरणज्ञान नहीं।
किन्तु यह व्याख्या ठीक नहीं है। इसका तो पूर्वपक्षी तत्काल यह कहकर खण्डन कर सकता है कि मैं प्रकरण को नहीं प्रकरणज्ञान को कारण मानता हूँ।
अतः इससे तो सिद्धान्त का अभिमत सिद्ध नहीं होता। कि केवल प्रकरणज्ञान से नहीं अपितु वाच्यार्थज्ञान से रसानुभूति होती है। अभिनवगुप्त ने उसकी व्याख्या इस प्रकार की है—'जिस व्यक्ति ने स्वयं प्रकरण को भी नहीं समझा और वाच्य-वाचकभाव को भी नहीं समझा उसे वह है ही नहीं, उसे भी यदि कोई दूसरा व्यक्ति प्रकरण समझा दे तो रसानुभूति हो जानी चाहिये।' यह व्याख्या कुछ ठीक मालूम पड़ती है। क्योंकि ग्रन्थकार के 'स्वयं' शब्द की इस प्रकार की योजना सरलता से की जा सकती है और 'स्वयं' का यह अर्थ भी हो सकता है। इसका आशय भी यह हो सकता है कि मान लीजिये किसी ऐसी भाषा का काम पढ़ा जा रहा है जिसको श्रोता स्वयं नहीं समझता और उसे प्रकरण का भी ज्ञान नहीं है; उसे यदि कोई दूसरा व्यक्ति यह समझा दे कि यहाँ पर अमुक के प्रेम की चर्चा की जा रही है तो भी काव्य सुनकर उसे रसानुभूति नहीं हो सकेंगी।
किन्तु सबसे अच्छा तो यहाँ है कि 'अवधारितप्रकरणानाम्' यही पाठ माना जाय।
'रसप्रतीति के होने में वाच्यप्रतीति होती है' यह अन्वय और 'वाच्यप्रतीति के अभाव में रसप्रतीति का अभाव होता है' यह व्यतिरेक दोनों के मिल जाने से रसप्रतीति की कार्यरूपता और वाच्यप्रतीति की कारणरूपता सिद्ध हो जाती है। फिर भी आप उसे छिपा रहे हैं और किसी अदृष्ट तत्व के अन्वय-व्यतिरेक को सिद्ध करने को चेष्टा कर रहे हैं। इससे केवल इतना ही सिद्ध होता है कि आप जो कुछ कहते हैं वह सब हेतु बुद्धि तथा पक्षपात से पूर्ण है और आप का प्रतिपादन पूर्वाग्र-
प्रस्त है। इसके अतिरिक्त और कुछ सिद्ध नहीं होता। (संशयः अभिनवगुप्त के समास्यधिक कल्पनापूर्वक विद्वान् किसी अदृष्ट तत्व की कल्पनाकर उसे रसास्वादन का कारण मानते होंगे और वाच्यप्रतीति की कारणता का निपेध करते होंगे। उन्हीं पर यह कटाक्ष किया गया है।)
इस विषय में पूर्वपक्षी यह कह सकता है कि 'हम इतना तो मान सकते हैं कि रस-
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प्रतीति में वाच्यप्रतीति का उपयोग होता है । किन्तु हम यह नहीं मान सकते कि दोनों प्रतीतियाँ क्रमिक रूप में होती हैं और वाच्यप्रतीति पहले होती है तथा रसप्रतीति बाद में होती है । यदि पूछा जाय कि वाच्यप्रतीति का उपयोग किस प्रकार का होता है तो हम यही कहेंगे कि साथ-साथ उसका प्रतिभास होना ही उसका एकमात्र उपयोग है । जब हम किसी नाटक को देखते हैं या काव्य सुनते हैं तो हमें रसास्वादन तो होता ही है उसके साथ-साथ हम उस प्रकरण का वाच्यार्थ भी समझते जाते हैं, यही वाच्यप्रतीति का उपयोग है । दोनों की प्रतीति एक साथ होती है, अतः क्रम मानना ठीक नहीं । इसका उत्तर यह है : कि यदि एक कार्य के लिये किसी वस्तु का उपयोग किया जाता है तो उपयुक्त जाननेवाली वस्तु का पहले होना अनिवार्य होता है । ऐसा कभी नहीं होता कि उपयोग में आनेवाली वस्तु अपने द्वारा निर्मित वस्तु के साथ ही उत्पन्न हो । जब वह वस्तु पहले होगी ही नहीं तो उपकार कैसे करेगी ? यदि निर्माण में उपकार नहीं करेगी तो 'उपयोग' इस नामकरण का क्या मतलब होगा और उस शब्द के प्रयोग का लक्ष्य क्या होगा ? प्रत्येक शब्द से किसी वस्तु का बोध होता है किन्तु उपकार न करने पर उपयोग शब्द से किसी वस्तु का बोध नहीं होगा ? अत एव साथ होना मानने पर वाच्यप्रतीति का उपयोगी होना सिद्ध नहीं होगा और उपयोगी होना मानने पर सहभाव सिद्ध नहीं हो सकेगा । यह तो प्रतिपक्षी भी मानता है कि उपकारक तत्व पहले होता है और उपकायँ बाद में । उदाहरण के लिये गीत इत्यादि के शब्द अपने स्वरूप से ही व्यञ्जक होते हैं, उनके अर्थ रस इत्यादि के व्यञ्जक नहीं होते । प्रतिपक्षी भी यह स्वीकार करता है कि रसानुभूति में निमित्त गीत इत्यादि के शब्दों को स्वरूपप्रतीति पहले होती है और रसप्रतीति बाद में । हम भी उसी दृष्टान्त के आधार पर कह सकते हैं कि जहाँ काव्य में वाच्यप्रतीति के आधार पर रसाभिव्यक्ति होती है वहाँ पर वाच्यप्रतीति पहले होती है क्योंकि वह निमित्त है और व्यञ्जक रसानुभूति बाद में होती है, क्योंकि वह नैमित्तिक है ।
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ऊपर यह सिद्ध किया जा चुका है कि काव्य में रसानुभूति में वाच्यप्रतीति निमित्त होती है तथा यह भी बतलाया जा चुका है कि रसानुभूति के पहले वाच्यप्रतीति अनिवार्य है । किन्तु इस पौर्वापर्य क्रम में सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि यदि उनमें पौर्वापर्य क्रम विद्यमान है तो वह लक्षित क्यों नहीं होता ? इस प्रश्न का उत्तर 'ततु.......न प्रतीयते' इस वाक्य में दिया गया है । यदि इस वाक्य का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया जाय तो ज्ञात होगा कि इसमें क्रम के लक्षित न होने के पाँच कारण बतलाये गये हैं—( १ ) सङ्घटनायें दूसरी संघटनाओं से असङ्कीर्ण रहकर ही अर्थात् दूसरी संघटनाओं की परवा न करते हुये रसादि को अभिव्यक्त करती हैं । ( २ ) संघटनाओं का एकमात्र फल रसादि का प्रत्यायन ही होता है । ( ३ ) संघटनाओं की क्रिया अत्यन्त क्षिप्र होती है वह वाच्य वृत्ति की अपेक्षा नहीं करती । ( ४ ) वाच्यार्थ का रसादि से कोई विरोध नहीं होता और ( ५ ) रस इत्यादि दूसरे अभिधेयार्थों से इस रूप में विलक्षण होते हैं कि उनका प्रत्यायन कभी भी अभिधावृत्ति का विषय नहीं हो सकता । अब उक्त वाक्य को ले लीजिये—'ततु शब्दस्य क्रियापोर्वापर्यम्' इस वाक्य-खण्ड से क्रम का स्वरूप बतलाया गया है । 'क्रिया' शब्द की
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व्युत्पत्ति होगी—‘क्रियेते इति क्रिये’ अर्थात् शब्द के जो दो करणीय हों उन्हें दो क्रियायें कहते हैं । शब्द के दो करणीय होते हैं —एक तो अभिधाव्यापार और दूसरे ध्वननव्यापार जिसका दूसरा पर्याय व्यञ्जनाव्यापार भी है । इन दोनों क्रियाओं का पौर्वापर्य अर्थात् क्रम लक्षित नहीं होता । ‘रसादो’ इस विशेष्य से बतलाया गया है कि रस इत्यादि के विषय में ही क्रम लक्षित नहीं होता । ‘रसादो’ के विशेषण दिये गये हैं—‘अभिधेयान्तराविलक्षणे’ और ‘वाच्येन अविरोधिनि’ । प्रथम विशेषण के द्वारा क्रम न लक्षित होने का उपयोग ५ वाँ हेतु निर्दिष्ट किया गया है कि रस इत्यादि अन्य अभिधेयार्थों से विलक्षण होते हैं । विलक्षणता यही होती है कि अन्य अभिधेय अभिधावृत्ति से कहे जा सकते हैं । किन्तु रसानुभूति अभिधा-वृत्ति से कहीं नहीं जा सकती । अतः दोनों में भेद होने के कारण क्रम तो होना ही चाहिये । ( किन्तु दोनों की कोटियाँ भिन्न हो हैं । एक अभिधेय होता है दूसरा नहीं । अतः भिन्न कोटियोंवाले दो ज्ञानों में क्रम लक्षित नहीं होता । यदि एक ही प्रकार के दो ज्ञान हों अर्थात् या तो दोनों अभिधेय हों या दोनों अनभिधेय हों तो क्रम लक्षित होना अनिवार्य हो जाता है, क्योंकि जब हम एक ज्ञान के बाद उसी प्रकार का दूसरा ज्ञान करना चाहेंगे तो पहले ज्ञान का उपसंहार हो जायेगा और उसके स्थान पर दूसरे ज्ञान की प्रतीति होगी । इसके प्रतिकूल विभिन्न प्रकार की प्रतीतियों में विभिन्न तत्वों का उपयोग होगा । उदाहरण के लिये वाच्य-प्रतीति मस्तिष्क के द्वारा होगी और रसानुभूति हृदय के द्वारा । अतः दोनों एक दूसरे से इतनी अव्यवहित हो सकती हैं कि उनसे क्रम की प्रतीति का न होना ही स्वाभाविक है । ) ‘रसादो’ का दूसरा विशेषण है—‘वाच्येन अविरोधिनि’ इसका आशय यह है कि रसा-नुभूति सर्वदा वाच्य के अनुकूल ही होती है विरुद्ध कभी नहीं होती । यदि वाच्यार्थ शृंगार परक होगा तो शृंगार की अनुभूति होगी और यदि वाच्यार्थ रौद्रपरक होगा तो रौद्रसानुभूति होगी । जब दोनों प्रतीतियाँ एक ही दिशा में उद्भूत होनेवाली हैं तब उनमें क्रम लक्षित ही नहीं हो सकता । यदि दोनों एक दूसरे के विहुद्ध हों तो दोनों का क्रम लक्षित होना अनिवार्य हो जाय । इस प्रकार इस विशेषण के द्वारा ऊपर बतलाये हुये चौथे हेतु की ओर संकेत किया गया है । ‘आशुभाविनीपु’ में निमित्त में सप्तमी है । अतः यह शब्द हेतु का प्रत्यायक हो जाता है । इसका एक दूसरा विशेषण शब्द दिया गया है ‘अनन्यसाध्यतत्फलघटनासु’ यह भी हेतुवाचक सप्तमी परक ही है । इस प्रकार ‘आशुभाविनीषु’ की निमित्तसप्तमी दूसरे हेतु से गर्भित हेतु को प्रकट करती है । ‘अनन्यसाध्यतत्फलघटनासु’ में ‘अनन्यसाध्य’ और ‘तत्फल’ इन दोनों शब्दों में बहुब्रीहि समास है और ये दोनों शब्द घटना के विशेषण हैं । घटनाओं का निरूपण पहले किया जा चुका है कि कुछ घटनायें माधुर्य लक्षणवाली होती हैं कुछ परुष लक्षण-वाली । वे घटनायें ‘तत्फल’ होती हैं अर्थात् उनका फल रसादि की प्रतीति ही होता है । वे घटनायें अनन्यसाध्य होती हैं अर्थात् उन घटनाओं का साध्य उनका अपना निश्चित साध्य ही होता है; किन्तु कोई अन्य साध्य नहीं । उदाहरण के लिये भोजोघटना के लिये रौद्ररस साध्यरूप में निश्चित है । उसका साध्य करुणरस कभी नहीं हो सकता ।
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माधुर्य इत्यादि गुणोंवाली संघटना का प्रयोग किया जाता है उसका फल रसादि प्रतीति ही होता है और उस संघटना से अपने निश्चित विषय के अतिरिक्त अन्य प्रकार की रसाभिव्यञ्जना नहीं की जा सकती। इसीलिये क्रम लक्षित नहीं होता। प्रश्न किया जा सकता है कि क्रम के लक्षित किये जाने न किये जाने से संघटना का क्या सम्बन्ध ? घटनाओं की जो स्थिति आप मानते हैं वह माना करें क्रम क्यों लक्षित नहीं होता ? इसी प्रश्न का उत्तर देने के लिये 'आशुभाविनीषु' यह विशेषण दिया गया है। 'भाविनी' का अर्थ है 'भावन करना है शील जिसका'। अतः आशुभाविनी का अर्थ हुआ कि संघटनायें वाच्यप्रतीति काल की अपेक्षा किये बिना ही शीघ्र ही रस इत्यादि को भावित कर देती हैं अर्थात् उसके आस्वादन का विधान कर देती हैं।
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ऊपर जो कुछ कहा गया है उसका सारांश यह है--यह पहले सिद्ध किया जा चुका है कि संघटनायें भी रस को अभिव्यञ्जना करती हैं। संघटना का अर्थ है विशेष प्रकार की रसानुकूल वर्णसंयोजना जैसे कोमल योजना से शृङ्गारादि रसों की व्यञ्जना होती है और कठोर योजनां से रौद्र इत्यादि रसों की व्यञ्जना होती है। वर्ण रसाभिव्यञ्जन करने में अर्थ को अपेक्षा नहीं करते। जब हमें किसी सुभाषित काव्य को सुनते हैं तो अर्थ को बिना ही समझे उस काव्य के सुनते ही हमारे हृदयों में रस कुछ स्फुरित हो जाता है। बाद में हमें अर्थ की प्रतीति होती है और तब रस का आस्वाद परिपुष्ट रूप में परिपूर्णता को प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार काव्यश्रवण में वाच्यप्रतीति से पहले ही कुछ स्फुरित होकर रस वाच्यप्रतीति के बाद में परिपूर्णता को प्राप्त हो जाता है। अतः पहले से बाद तक प्राप्त रहने के कारण यह प्रतीत नहीं होता कि रसास्वादन बाद में हुआ है। इसलिये संघटना द्वारा व्यञ्ज्य कारण यह प्रतीत नहीं होता कि रसास्वादन बाद में हुआ है। यह केवल इसी एक विषय में नहीं समस्त अभ्यस्त विषयों में ऐसा ही होता है। जिन विषयों की अविनाभाव प्रतीति होती है उनमें भी अभ्यास हो जाने पर क्रम लक्षित नहीं होता। अविनाभाव का अर्थ है व्याप्तिज्ञान। जहाँ कोई वस्तु किसी दूसरी वस्तु के बिना नहीं हो सकती वहाँ न हो सकनेवाली वस्तु को देखकर जिसका बिना वह नहीं हो सकती उसका अनुमान लगा लिया जाता है। यही व्याप्तिग्रह है। उदाहरण के लिये धूम कभी भी अग्नि के बिना नहीं हो सकता। अतः धूम को देखकर अग्नि का ज्ञान करना अविनाभाव प्रतीति है। यह व्याप्तिग्रह इस प्रकार होता है कि कोई परिघलक कई बार जलती हुई आग से घूआ उठते हुए देखता है; वह जब कभी आग जलाता है उसे घूआ अवश्य दिखाई देता है। इसके अतिरिक्त वह सरोवर इत्यादि को भी देखता है और वहाँ आग नहीं देखता तथा वहाँ घुआँ भी नहीं देखता। इस प्रकार महान् इत्यादि पक्षों और सरोवर इत्यादि विपक्षों को बार बार देखकर वह इस निष्कर्ष पर पहुँच जाता है कि 'जहाँ धुआँ होता है वहाँ आग होती है।' यही व्याप्तिग्रह है। इस व्याप्ति को अपने हृदय में लिये हुए जब वह किसी ऐसे स्थानपर पहुँचता है जहाँ किसी झोपड़ी से उसे घुआँ उठता हुआ दिखाई देता है। तब उसे सर्वप्रथम व्याप्ति का स्मरण होता है कि 'जहाँ धुआँ होता है वहाँ आग होती है।' न्यायदर्शन में 'प्रणिधान निवन्धाम्यासलिङ्ग' इत्यादि लम्बे सूत्र में स्मरण के हेतुओं
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का परिगणन कराया गया है। उन्होंने से उसे व्याप्ति का स्मरण होता है और फिर 'झोपड़ी धुआँवाली है जो कि सर्वदा अगिन का सहचारी है' यह वितर्क उत्पन्न होता है। इस व्याप्ति स्मरण और वितर्क को परामर्श कहते हैं। उससे यह ज्ञान उत्पन्न हो जाता है कि झोपड़ी में अग्नि है। इस ज्ञान को अनुमान ज्ञान कहते हैं। इस प्रकार लिंग (धुआं) से साध्य (अग्नि) का अनुमान करने में एक क्रम होता है। किन्तु जब बार-बार धुयें से अग्नि का अनुमान किया जा चुका होता है तो उसका इतना अधिक अभ्यास हो जाता है कि धुयाँ को देखते ही अग्नि का बोध हो जाता है और प्रधान इत्यादि स्मरण हेतु, व्याप्ति स्मृति, परामर्श इत्यादि का क्रम लिखित ही नहीं होता। अभ्यास का अर्थ ही यह है कि किसी ज्ञान की पुनः पुनः अभ्यासवृत्ति से संस्कार इतने बलवान् हो जायें कि प्रणिधान इत्यादि स्मरण हेतुओं का बिना ही अनुसरण किये हुए सर्वदा वह तत्व अपने को ज्ञात कर देने की इच्छा करते हुये ही अवस्थित रहे। आशय यह है कि अभ्यस्त व्यक्ति धुयें को देखकर इतनी सरलता और शोघ्रता से आग को जान जाता है मानों धूम को स्वयं इस बात की आकांक्षा बनी रहती है कि अभ्यस्त व्यक्ति हमें देखते ही आग को जान ले। जिस स्थान पर किसी वस्तु का अनुमान लगाया जाता है उसे पक्ष कहते हैं; वह तत्व जिसको देखकर अनुमान लगाया जाता है हेतु या पक्षधर्म कहलाता है। उसकी भाववाचक संज्ञा ही पक्षधर्मता है। जैसे यदि पर्वत में धुयें को देखकर अग्नि का अनुमान लगाया हो तो पर्वत पक्ष होगा; धूम पक्षधर्म या हेतु होगा और धूमत्व को पक्षधर्मता की संज्ञा प्राप्त होगी। पूर्ण अभ्यास कर लेने पर व्याप्ति तो हृदय में स्थित ही रहती है। साध्य (अग्नि) का अनुमान लगाने में केवल पक्षधर्मता (धूमत्व) का ही उपयोग होता है। ऐसा अनुमान परामर्श के स्थान का अतिक्रमण कर जाता है। धूमज्ञान व्याप्तिस्मृति से उत्पन्न हो रहता है; उस धूमज्ञान के शोघ्र उत्पन्न होने पर उन दोनों (पक्षधर्मता और व्याप्तिज्ञान) से विजातीय प्रणिधान के अनुसरण इत्यादि की प्रतीति के अन्दर आये बिना ही अग्नि की प्रतीति एकदम हो जाती है और वहाँ पर क्रम लिखित नहीं होता। वही बात यहाँ पर भी होती है कि अधिक अभ्यस्त हो जाने से वाच्यप्रतीति हो जाती है और क्रम लिखित नहीं होता। यह तो हुई शोघ्र प्रतीति की बात। क्रम न लिखित किये जा सकने का एक कारण यह भी है कि जैसी वाच्यप्रतीति होती हुई वैसी ही रसप्रतीति भी होती है। दोनों का विरोध नहीं होता यदि वाच्य से अविरोषी रस न हो और संघटना भी प्रस्तुत रस के विपरीत हो तो क्रम लिखित हो जाय।
चन्द्रिकाकार ने 'अनन्यसाध्यतत्फलघटनामु' इस शब्द का अर्थ इस प्रकार किया है—'तत्फल' अर्थात् उस (शब्द) का फल (तत्पुरुष समास) अथवा 'वह फल' (कर्मधारय समास) दोनों अवस्थाओं में फल हुआ वाच्य-व्यङ्ग्यप्रतीतिरूप । उस वाच्य-व्यङ्ग्यापार से उत्पन्न होता है। आशय यह है कि वाच्य और व्यङ्ग्य की प्रतीति केवल शब्द से ही होती है, उसका साधन और कोई नहीं होता। इस व्याख्या का खण्डन करते हुए अभिनवगुप्त ने लिखा है कि चन्द्रिकाकार की यह व्याख्या मल्लिका के स्थान में मल्लिका जैसी
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है । (चन्द्रकाकार पर आक्षेप करने के लिये अभिनवगुप्त ने दो शब्दों का प्रयोग किया है— ‘पठितमनुपठति’ और ‘गजनीमीलिका’ । ‘पठितमनुपठति’ का अर्थ यह है कि चन्द्रकाकार ने जो शब्द जिस प्रकार देखे उसी प्रकार उनकी व्याख्या कर दी । यह विचार करने की चेष्टा नहीं की कि क्या प्रस्तुत प्रकरण में सीघा अर्थ ठीक रहेगा ? ‘गजनीमीलिका’ का भी यही अर्थ है कि जैसे हाथी केवल सामने ही देखता है इधर-उधर ध्यान नहीं देता उसी प्रकार चन्द्रकाकार ने भी सीघा-सीघा अर्थ कर दिया प्रकरण पर विचार करने की आवश्यकता नहीं समझी ।) चन्द्रकाकार ने अर्थ यह किया है कि ‘उस शब्द का फल अथवा वह वाच्यव्यंग्यप्रतीत्यात्मक फल उसकी संचारना शब्दव्यापारमात्रजन्य है । अन्य से उसका उद्भव नहीं होता । इस व्याख्या में यह समझ में नहीं आता कि प्रस्तुत प्रकरण तो वाच्य और व्यंग्य के पौर्वापर्यप्रतीति के विषय में है । इस प्रकरण में इस कथन का क्या उपयोग कि शब्द से ही वाच्य और व्यंग्य प्रतीतियाँ होती हैं । अतः इस वाक्य की वही व्याख्या करनी चाहिये जैसी कि ऊपर ५ प्रकारों के निर्देश के द्वारा बतलाई गई है । अभिनवगुप्त ने लिखा है कि बस इतना पर्याप्त है । हम अपने वंश के अपने पूर्वजों से अधिक विवाद करना उचित नहीं समझते । इससे ज्ञात होता है कि चन्द्रकाकार अभिनवगुप्त के ही पूर्व वंशज थे ।
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(ध्वन्यालोके) स्वचित्तु लक्ष्यत एव । यथानुरणनरूपव्यङ्ग्यप्रतीतिषु । तत्रापि कथंमिति चेतुच्यते—अर्थशक्तिमूलानुरणनरूपव्यङ्ग्यध्वनौ तावद्विघेयस्य तत्त्वसामर्थ्य-क्षिप्रस्य चार्थस्याभिधेयान्तर्विलक्षणतया यातस्यैव निबन्धनं निमित्तनिमित्तिभाव इति स्फुटमेव तत्र पौर्वापर्यम् । यथा प्रथमोद्योते प्रतीममानार्थ-सिद्धचर्थमुदाहृतासु गाथासु । तथाविधे च विषये वाच्यव्यङ्ग्योरतन्त्रविलक्षणतया वाच्यैव एकस्य प्रतीति: सैवेतरस्येति न शक्यते वक्तुम् ।
(अनु०) कहीं तो लक्ष्य हो होता है । जैसे अनुरणनरूप व्यंग्य की प्रतीतियों में । यदि कहो ‘वहाँ भी कैसे ?’ तो कहा जा रहा है—अर्थशक्तिमूल अनुरणनरूप व्यंग्य ध्वनि में हमारे अभिधेयों से अत्यन्त विलक्षण होने अभिधेय के तथा उसके संबन्ध से अभिव्यक्त अर्थ के कारण अस्यन्त विलक्षण जो दो प्रतीतियाँ उनके निमित्तनिमित्तभाव का छिपाया जान असम्भव है । अतः उनका पूर्वापर्य स्फुट ही है । जैसे प्रथम उद्योत में प्रतीममान अर्थ की सिद्धि के लिये उदाहृत हुई गाथाओं में । और उस प्रकार के विषय में वाच्य और व्यंग्य के अत्यन्त विलक्षण होने के कारण एक की जो प्रतीति है वही दूसरे की भी है यह नहीं कहा जा सकता ।
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(लो०)—यत्र तु सङ्घटनाव्यङ्ग्यत्वं नास्ति तत्र लक्ष्यत एवेत्याह—स्वव्च-त्वाति । तुल्ये व्यङ्ग्यत्वे कुतो भेद इत्याशङ्कते—तत्रापीति । स्फुटतरेवेतित । अविवक्षितवाच्यस्य पदवाक्यप्रकाशता । तदनस्यानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य च ‘ध्वनिः’ ।। इति हि पूर्वं वर्णसङ्घटनादिकं नास्य .व्यङ्ग्यत्वेनोक्तमितिभावः । गाथा-द्विति । भम धीम्भअ इत्यादिकासु । तत्रैव व्याख्यातः ।
(लो०)—जहाँ पर संघटना से व्यंग्यत्व नहीं है वहाँ लक्ष्य ही होता है ऐसा कहते हैं—स्वव्च-त्वाति । यदि व्यंग्यत्व समान हो तो भेद कैसे ? ऐसी आशंका करते हैं—तत्रापीति । और भी स्पष्ट ही है । अविवक्षितवाच्य के पद और वाक्य की प्रकाशता । उसके अनुरणनरूप व्यंग्य का नाम ‘ध्वनि’ है ।। यहाँ पर यह भाव है कि वर्णसंधटना आदि को उसका व्यंग्यत्वेन पहले कहा ही नहीं है । गाथा-द्विति । भम धीम्भअ इत्यादि गाथाओं में । वहीं पर व्याख्यात है ।
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(अनु०) जहाँ पर सङ्घटनानुग्यंग्यत्व नहीं होता वहाँ पर तो लक्षित होता ही है । यह कहते हैं—‘कहीं तो’ यह । व्यंग्यत्व के तुल्य होते हुये भेद क्यों ? यह शङ्का करते हैं—‘वहाँ पर भी’ यह । स्फुट ही है यह—अविवक्षित वाच्य की और उससे भिन्न अनुरणनरूप व्यंग्य की पद-वाच्यप्रकाश्यता होती है । भाव यह है कि इस प्रकार पहले वर्णसङ्घटना इत्यादि को उसके व्यञ्जकत्व के रूप में नहीं कहा । गाथाओं में—‘भम धम्मिअ’ इत्यादि में । उनकी वहाँ व्याख्या की गई है ।
रसप्रतीति में क्रम की संलक्ष्यता
तारावती—किन्तु यह क्रम सर्वत्र असंलक्ष्य ही बना रहे यह बात नहीं है । असंलक्ष्यक्रम व्यंग्य में क्रम में लक्षित न होने का सबसे बड़ा कारण यह बतलाया गया है कि वह ध्वनि संघटना के द्वारा व्यक्त होती है । सङ्घटना के द्वारा कुछ परिस्फुट होकर बाद में वाच्यार्थ के द्वारा उसकी पुष्टि होती है । अतः वाच्यार्थ के दोनों ओर व्यापक रहने के कारण वाच्यार्थ की प्रथमिक्ता और व्यंग्यार्थ की उत्तरकालिकता की प्रतीति नहीं होती । इसके प्रतिकूल जिस ध्वनि की अभिव्यक्ति के लिये वर्णसङ्घटना अपेक्षित नहीं होती उस ध्वनि में व्यंग्य और वाच्य अर्थों की प्रतीतियों में क्रम अवश्य लक्षित होता है क्योंकि उनमें वाच्यार्थ ही कारण होता है । जैसे अनुरणनरूप व्यंग्य में क्रम की प्रतीति होती है । अनुरणन रूप व्यंग्य ध्वनि के जो व्यञ्जक ‘अविवक्षितवाच्यस्य’ (३-१) इत्यादि कारिकाओं में गिनाये गये हैं उनमें वर्णसङ्घटना को ध्वनि का व्यञ्जक नहीं माना गया है । यहाँ पर यह प्रश्न उठ सकता है कि जब दोनों ही व्यंग्यार्थ होते हैं तब यह भेद कैसे कि रस इत्यादि की व्यञ्जना में क्रम लक्षित नहीं होता और अनुरणनरूप व्यंग्य ध्वनि में लक्षित हो जाता है ? जब दोनों व्यंग्यार्थ हैं तो या तो दोनों में क्रम लक्षित होना चाहिये या दोनों में नहीं होना चाहिये । इसका उत्तर यह है कि संलक्ष्यक्रमव्यंग्य दो प्रकार का माना जाता है अर्थशक्तिमूलक और शब्दशक्तिमूलक ।
अर्थशक्तिमूलक अनुरणनरूप ध्वनि में अभिधेयार्थ और उसके सामर्थ्य से आक्रान्त दोनों ही अभिव्यक्त करने की शक्ति नहीं होती जब कि व्यञ्जक अभिधेयार्थ में अर्थान्तर को अभिव्यक्त करने की शक्ति होती है । यह तो हुई वाच्यार्थ की विलक्षणता । व्यंग्यार्थ तो वाच्यार्थ की अपेक्षा सर्वथा विलक्षण होता ही है । इस प्रकार जो दो अत्यन्त विलक्षण प्रतीतियाँ होती हैं उनमें एक (वाच्यार्थ) तो निमित्त होता है और दूसरा (व्यंग्यार्थ) निमित्ती अर्थात् कार्य होता है । उनका यह निमित्त-निमित्तिभाव छिपाया नहीं जा सकता ।
उदाहरण के लिये प्रथम उद्योत में प्रतीयमान अर्थ की सिद्धि के लिये जिन गाथाओं का उदाहरण दिया गया था उनको ले लीजिये । उस प्रकार के विषय में वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ एक दूसरे से अत्यन्त विलक्षण होते हैं । यदि वाच्यार्थ विधिपरक होता है तो व्यंग्यार्थ निषेध-परक । यदि वाच्यार्थ निषेधपरक होता है तो व्यंग्यार्थ विधिपरक, यदि वाच्यार्थ विधिपरक होता है तो निषेधार्थ अनुभयपरक । इस प्रकार की विलक्षणता वहाँ पर दिखाई जा चुकी है । अतः अब आप यह तो नहीं कह सकते कि जो एक की प्रतीति होती है वही दूसरे की भी
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गावो वः पावनानां परमपरिमितां प्रोतिमुत्पादयन्तु
होती है। इस प्रकार प्रतीतियों की विलक्षणता और कार्य-कारण भाव सम्बन्ध इन दोनों हेतुओं से क्रम संलक्षित होना स्वाभाविक हो जाता है।
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इत्यादावर्थदयप्रतीतोः शब्दार्थसम्बन्धस्योपमानोपमेयभावप्रतीतिरुपमावाचकपदविरहे सत्यर्थसामर्थ्यादक्षिस्रेति तत्रापि सुलकषमभिधेयडङ्कचालड्कारप्रतीत्योः पौर्वापर्यम्।
(ध्वन्य०) शब्दशक्तिमूलानुरणनरूपव्यङ्ग्ये तु ध्वनौ— इत्यादावर्थदयप्रतीतोः शब्दार्थसम्बन्धस्योपमानोपमेयभावप्रतीतिरुपमावाचकपदविरहे सत्यर्थसामर्थ्यादक्षिस्रेति तत्रापि सुलकषमभिधेयडङ्कचालड्कारप्रतीत्योः पौर्वापर्यम्। पदप्रकाशशब्दशक्तिमूलानुरणनरूपव्यङ्ग्येडपि ध्वनौ विशेषणपदस्योभयार्थसम्बन्धयोग्यस्य योजकपदमन्तरेण योजनमशब्दमध्यर्थद्विस्थितमित्यत्रापि पूर्ववदभिधेयतत्सामर्थ्याक्षिप्रमालड्कारमात्रप्रतीत्योः सुस्थितमेव पौर्वापर्यम्। आश्यं च प्रतिपत्तितस्थाविघे विषये उभयार्थसम्बन्धयोग्यशब्दसामर्थ्यप्रसावितेति शब्दशक्तिमूला कल्प्यते।
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पवित्रों में सर्वोत्कृष्ट सूर्य किरणें और गायें आप में अपरिमित प्रेम पैदा करें।
(अनु०) शब्दशक्तिमूल अनुरणनरूपव्यङ्ग्य ध्वनन में तो— ‘पवित्रों में सर्वोत्कृष्ट सूर्य किरणें और गायें आप में अपरिमित प्रेम पैदा करें।’ इत्यादि में दो अर्थों की प्रतीति के शब्दैक हेतु होने पर (गी) उपमावाचक पद के अभाव में दो अर्थों की उपमानोपमेयभाव प्रतीति अर्थ सामर्थ्य से आक्षिप्त कर ली गई है। अतः वहाँ पर भी अभिधेय और व्यङ्ग्यालङ्कार प्रतीतियों का पौर्वापर्य भलीभाँति सरलता से लक्ष्ति किया जा सकता है।
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पदप्रकाश्य शब्दशक्तिमूलक अनुरणनरूपव्यङ्ग्य ध्वनन में भी दोनों अर्थों के सम्बन्ध के योग्य विशेषण पद की योजना (किसी) योजक पद के अभाव में भी शब्दरहित होते हुये भी अर्थ से ही अवस्थित होती है; अतः यहाँ पर भी पहले के समान ही अभिधेय तथा उसके सामर्थ्य से आक्षिप्त अलङ्कारमात्र प्रतीतियों का पौर्वापर्य ठीक रूप में स्थित ही है। आर्थी प्रतीति भी इस प्रकार के विषय में दोनों अर्थों के सम्बन्ध के योग्य शब्दसामर्थ्य से प्रसूत की गई है, अतः शब्दशक्तिमूला की कल्पना की जाती है।
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शाब्दाश्रिति शाब्द्यामपितर्थः। उपमावाचकं यथेवादि। अर्थस्सामध्यादिति। वाक्यार्थसामध्यादिति यावत्। वाक्यप्रकाशशब्दशक्तिमूलं विचार्य पदप्रकाशं विचारयति— पदप्रकाशेति। जड इत्यस्य। योजक्रमिति। कूप इति च अह्मिमति चोभयसमनाधिकरणतया संवलनम्।
(लो०)— शाब्दाश्रिति शाब्द्यामपितर्थः। उपमावाचकं यथेवादि। अर्थस्सामध्यादिति। वाक्यार्थसामध्यादिति यावत्। वाक्यप्रकाशशब्दशक्तिमूलं विचार्य पदप्रकाशं विचारयति— पदप्रकाशेति। जड इत्यस्य। योजक्रमिति। कूप इति च अह्मिमति चोभयसमनाधिकरणतया संवलनम्। अभिधेयं च तत्सामर्थ्याक्षिप्तं च तयोरलङ्कारमात्रयोः। ये प्रतीतो तयोः पौर्वाप्यक्रमः सुस्थितं सुलक्षितमित्यर्थः। मात्रग्रहणेन रसप्रतीतिस्तत्राप्यलक्ष्यक्रमैवति दर्शयति। नन्वेमार्थत्वं शब्दशक्तिमूलत्वं चैति विरुद्धप्रतीतिस्तत्राप्यलक्ष्यक्रमैवति दर्शयति। नन्वेमार्थत्वं शब्दशक्तिमूलत्वं चैति विरुद्धप्रतीतिस्तत्राप्यलक्ष्यक्रमैवति दर्शयति। नन्वेमार्थत्वं शब्दशक्तिमूलत्वं चैति विरुद्धप्रतीतिस्तत्राप्यलक्ष्यक्रमैवति दर्शयति। नन्वेमार्थत्वं शब्दशक्तिमूलत्वं चैति विरुद्ध-
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मेवोक्तमिति न पुनरुच्यते।
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शब्दी मे
(अनु०) 'शब्दी मे' यह। अर्थात् शब्ददी में भी। उपमा वाचक यथा इव इत्यादि। 'अर्थ-सामर्थ्य से' यह। अर्थात् वाक्यार्थ सामर्थ्य से।
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इस प्रकार वाक्यप्रकाश्य शब्दशक्तिमूल का विचार करके पदप्रकाश का विचार करते है—‘पदप्रकाश’ यह ‘विशेषण पद का’ यह । ‘जड’ इसका । ‘योजक’ यह । ‘कूप’ यह और ‘मे’ यह इन दोनों के समाना धिकरण के रूप में संमिलन । अभिधेय और उसके सामर्थ्य से आक्षित उन दोनों का (अर्थात्) केवल दो अलङ्कारों का । जो दो प्रतीतियाँ उनका पूर्वापर्य क्रम । सुस्थित है अर्थात् भली भाँति लक्षित किया गया है । मात्र ग्रहण से यह दिखलाते है कि रस प्रतीति वहाँ पर भो अलक्ष्य क्रम ही होती है । ‘निस्सन्देह इस प्रकार अर्थत्व और शब्दशक्तिमूलत्व विरुद्ध है यह शङ्का करके कहते है—‘बार्थी भो’ यह । भाव यह है कि यहाँ कोई विरोध नहीं है । यह विस्तारपूर्वक पहले बतलाया गया है अतः पुनः नहीं कहा जा रहा है ।
तारावती—अब शब्दशक्तिमूलानुरणन रूप व्यङ्ग्यध्वनि को ले लीजिये—इसके दो भेद बतलाये गये थे वाक्यप्रकाश और पदप्रकाश । द्वितीय उद्योत में वाक्यप्रकाश शब्दशक्तिमूलक ध्वनि का उदाहरण दिया गया था—‘दत्तानन्दः:"प्रेतीमुपाद्यन्तु । वहाँ पर दो अर्थ होते है—सूर्य किरणपरक अर्थ और घेनुपरक अर्थ । सूर्य किरणपरक अर्थ प्राकरणिक होने से वाच्यार्थ है और घेनुपरक अर्थ व्यङ्ग्यार्थ है । यहाँ पर दोनों अर्थों की प्रतीति शब्दशक्तिमूलक है । इसके बाद दोनों अर्थों की असम्बद्धार्थकता का निवारण करने के लिये ‘किरणों के समान गायें’ इस उपमानोपमेय भाव की कल्पना कर ली जाती है । इस कल्पना में कोई ऐसा शब्द सहायक नहीं होता जो कि उपमावाचक कहा जा सके । आशय यह है कि यहाँ पर इव इत्यादि कोई ऐसा शब्द नहीं आया है जो कि उपमावाचक माना जाता है । केवल अर्थसामर्थ्य से ही उपमा का आक्षेप कर लिया जाता है । यद्यपि वहाँ पर प्रथम और द्वितीय अर्थों की प्रतीति ज्येष्ठ और कनिष्ठ की उत्पत्ति के समान होती है और उनमें कार्यकारण भाव के अभाव में पूर्वापर्य की कल्पना नहीं की जा सकती तथापि इन दोनों अर्थों की प्रतीति उपमा की कल्पना में कारण अवश्य होती है । अत एव अभिधेय और व्यङ्ग्य अर्थों की प्रतीति में तथा उपमालङ्कार की प्रतीति में कार्यकारण भाव सम्बन्ध होने से पूर्वापर्य क्रम लक्षित अवश्य होता है ।
ऊपर वाक्यप्रकाश शब्दशक्तिमूलक ध्वनि में क्रम के सङ्क्षित होने की व्याख्या की गई है, अब पदप्रकाश शब्दशक्तिमूलक को लीजिये—जहाँ पर शब्द शक्ती के आधार पर अनुरणनरूप व्यङ्ग्यध्वनि होती है वहाँ पर कोई एक ऐसा विशेषण विद्यमान होता है जिसमें दोनों अर्थी से सम्बन्ध करने की योग्यता होती है । वहाँ पर कोई ऐसा योजक पद नहीं होता जो दोनों में संयोग उत्पन्न करे । इस प्रकार बिना ही शब्द के अर्थ सामर्थ्य से वहाँ पर उन दोनों अर्थों की योजना की जाती है । इस प्रकार वाक्यप्रकाश कार्य शब्दशक्तिमूलक ध्वनि के समान वाच्यार्थ और उसके सामर्थ्य से आक्षित केवल अलङ्कार की प्रतीति में पूर्वापर्य क्रम सरलता पूर्वक लक्षित किया जा सकता है । उदाहरण के लिए इसी उद्योत के ‘प्रातं धनैः........कृतोदयम्’ इस पद्य को ले लीजिए । यहाँ पर ‘जड’ यह विशेषण कूप के साथ भी लगता है और मैं के साथ भी । क्योंकि ‘जड:’ मे प्रथमा मे ‘कूप:’ तथा ‘अहम्’ के साथ उसकी समाना धिकरण्य है । यहाँ पर कोई यथा वा इव इत्यादि वाच्यकसिद्ध विद्यमान
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तृतीय
उद्योतः
नहीं है। फिर भी अर्थसामर्थ्य से उपमालंकार की अभिव्यक्ति हो जाती है। इस प्रकार वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ उपमा की प्रतीति में पूर्वापर्य क्रम भली-भाँति लक्षित होता है। यहाँ पर यह भी ध्यान रखना चाहिये कि यदि ऐसे स्थान पर किसी रस की भी ध्वनि होती है तो वह असंलक्ष्यक्रम ही रहता है। इसी तथ्य को प्रकट करने के लिये 'केवल अलंकार' में 'केवल' शब्द का प्रयोग किया गया है। जैसे 'प्रातुं धनैः……कृतोदरम्' इस पद्य से ही उपमालंकार की ध्वनि तो संलक्ष्यक्रम है किन्तु उससे अभिव्यक्त होनेवाला करुण रस असंलक्ष्यक्रम ही रहता है।
तृतीय
उद्योतः
(प्रश्न) 'गावो वः पावनानां परमपरिमितां प्रीतिमुत्पादयन्तु' इस शाब्दी वाच्यवृत्तिज्ञा में और 'प्रातुं धनैः……कृतोदरम्' इस शाब्दी पदवृत्तिज्ञा में व्यंग्यार्थप्रतीति को शाब्दशक्तिमूलक कहा गया है, दूसरी ओर आप कहते हैं कि यहाँ पर अर्थ सामर्थ्य से अलंकार का आक्षेप कर लिया जाता है। इस प्रकार ये दोनों कथन परस्पर विरुद्ध हैं। यदि अर्थ शक्ति से उपमा की व्यञ्जना होती है तो यह उपमा शाब्दशक्तिमूलक कैसे हुई ? यदि शाब्दशक्तिमूलक है तो अर्थसामर्थ्य से आक्षेप का क्या अर्थ ? अर्थ शक्ति से आक्षेप और शाब्दशक्तिमूलकता इनमें विरोध क्यों नहीं ?
तृतीय
उद्योतः
(उत्तर) इस प्रकार के विषय में ऐसे शब्दों का प्रयोग होता है जिनमें दोनों प्रकार के (वाच्य और व्यङ्ग्य) अर्थों से सम्बन्ध रखने की योग्यता हो। जब एक प्रकार का अभिधेय अर्थ प्रकरणादिवश नियन्त्रित हो जाता है तब शब्दसामर्थ्य से दूसरा भी अर्थ ले लिया जाता है और उसी शब्दसामर्थ्य से आर्थी प्रतीति भी प्रति प्रसूल हो जाती है। अत एव वहाँ पर व्यंग्यार्थप्रतीति शाब्दशक्तिमूलक कही जाती है। आशय यह है कि अर्थसामर्थ्य का पुनरुज्जीवन शब्दशक्ति के बल पर ही होता है। अतः अर्थसामर्थ्य से आक्षेप और शब्दशक्तिमूलकता इन दोनों कथनों में परस्पर कोई विरोध नहीं। इस विषय की पहले शाब्दशक्तिमूलक ध्वनि-निरूपण के प्रकरण में पर्याप्त व्याख्या की जा चुकी है, अतः यहाँ विशेष विवेचन अपेक्षित नहीं है।
तृतीय
उद्योतः
(ध्वन्यालो०) अविवक्षितवाच्यस्य तु ध्वने: प्रसिद्धस्वविषयवैमुख्यप्रतीतिपूर्वकमेवार्थान्तरप्रकाशनमिति नियमभावी क्रम:। तत्राविवक्षितवाच्यत्वादेव वाच्येन सह-व्यङ्ग्यस्य क्रमप्रतीतिविचारो न कृत:। तस्मादभिधानाभिधेयप्रतीत्योरिव वाच्यव्यङ्गयप्रतीत्योर्निमित्तनिमित्तभावानियमभावी क्रम:। स तु क्तयुक्त्या वचचिल्लक्ष्यते स्वचिन्तलक्ष्यते।
(अनु०) अविवक्षितवाच्यध्वनि का प्रकाशन तो अपने प्रसिद्ध विषय के वैमुख्य की प्रतीति के साथ ही होता है; अतः क्रम नियम से ही होनेवाला है। उसमें वाच्य के अविवक्षित होने के कारण ही वाच्य के साथ व्यंग्य के क्रम की प्रतीति का विचार नहीं किया गया। अत एव अभिधान और अभिधेय की प्रतीति के समान वाच्य और व्यंग्य की प्रतीतियों का निमित्त-निमित्तभाव होने से नियमनुसार क्रम होनेवाला है। वह उक्त युक्ति से कहीं लक्षित होता है कहीं लक्षित नहीं होता।
तृतीय
उद्योतः
(लो०)--स्वविषयेत्यादि:। अन्यशब्दादेरुपहतचक्षुष्कादि: स्वो विषय:, तत्र यद्-मुख्यमनादर इत्यर्थ:। विचरो न कृत इति नामधेयनि रुपणद्धारेणेत शेष:। सहभावस्य
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शब्दीतमत्रायुक्ततवादितिभावः। एवं रसादयः केशिक्यादीनामितिवृत्तभागरूपाणां वृत्तीनां जीवितमुपनागरिकाद्यनात्र सर्वस्यास्योभयस्यापि वृत्तिव्यवहारस्य रसादिन्यन्त्रितविषयत्वादिति यत्प्रसुतंतं तत्प्रसज्येन रसादीनां वाच्यातिरिक्तत्वं समर्थयितुं क्रमो विचारित इत्यदुपसंहरति—तस्मादिति। अभिधानस्य शब्दरूपस्य पूर्वं प्रतीतिसततोऽभिधेयस्य । यदाह तत्र भावान्—
'विषयत्वमनुपन्ने: शब्देनार्थः प्रकाश्यते' इत्यादि । 'अतोऽनिज्ञातरूपस्वात्किमहेत्यभिधीयते ।' इत्यत्रापि चाविनाभाववत्त्वं समयस्याभ्यस्ततत्त्वात् क्रमो न लक्ष्येतापि ।
(अनु०) 'अपने विषय' यह । अन्ध शब्द इत्यादि का फूटा हुआ आखोंवाला इत्यादि अपना विषय है, उसमें जो वाच्यमुख्य अर्थात् अनादर यह अर्थ है । 'विचार नहीं किया गया' यह । यहाँ पर यह शेष है—'नामघेय निरूपण के द्वारा' । भाव यह है—क्योंकि यहाँ पर सहभाव की शङ्का करना उचित नहीं है । इस प्रकार इतिवृत्तभागरूप केशिकी इत्यादि वृत्तियों के और उपनागरिका इत्यादि वृत्तियों के जीवन रस इत्यादि होते हैं । क्योंकि दोनों प्रकार के इस सभी वृत्तिव्यवहार के विषय रस से नियन्त्रित होते हैं । इस प्रकार जो प्रस्तुत था उसके प्रसङ्ग से रस इत्यादि के वाच्यातिरिक्तत्व का समर्थन करने के लिये क्रम का विचार किया गया यह उपसंहार कर रहे हैं—'अत एव' इत्यादि । शब्दरूप अभिधान की पहले प्रतीति होती है तब आभभिधेय की । जैसा कि श्रीमान् मुनि जी ने कहा है—
'विषयत्व को बिना प्राप्त हुये शब्दों से अर्थ का प्रकाशन नहीं होता' इत्यादि । 'इससे रूप के अनिज्ञात होने से क्या कहा ? यह कहा जाता है है ।' यहाँ पर भी अविनाभाव के समान संकेत के अभ्यस्त हो जाने से क्रम लक्षित ही न हो ।
तारावती—यह तो हुई विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि की बात । अब अविवक्षितवाच्य ध्वनि को ले लीजिये—इस ध्वनि में दूसरे अर्थ का प्रकाशन स्वविषयवैमुख्य की प्रतीति के द्वारा हुआ करता है । आशय यह है कि अविवक्षितवाच्य (लक्षणामूलक) ध्वनियों में पहले तो अपने विषय (वाच्यार्थ) की प्रतीति होती है, फिर उसका बाध होता है । जिसमें अपने विषय (वाच्यार्थ) से विमुख हो जाना पड़ता है, तब लक्ष्यार्थ की प्रतीति होती है । और बाद में व्यञ्जनाजन्य बोध होता है । जैसे 'निःश्वासान्ध इवादर्शश्चच्रमा न प्रकाशते' में अन्ध शब्द का अर्थ है नेत्रहीन । शोभा नेत्रहीन हो ही नहीं सकता । अत एव वाच्यार्थ का बाध हो जाता है । फिर मलिनरूप लक्ष्यार्थ की प्रतीति होती है । और तब कहाँ अतिशयतारूप व्यङ्ग्यार्थ का बोध होता है । इस प्रकार इस प्रक्रिया में नियम से ही एक प्रकार का क्रम अवश्य विद्यमान रहता है जो कि लक्षित भी किया जा सकता है ।
(प्रश्न) जब कि यहाँ पर क्रम अवश्य लक्षित होता है तब आप इस भेद को संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य के भेदों में क्यों नहीं रखते ? (उत्तर) यदि वाच्यार्थ अभिमत और विवक्षित हो तब तो उसके साथ व्यङ्ग्यार्थ का विचार करना ठीक हो सकता है, किन्तु जब वाच्यार्थ विवक्षित ही नहीं तब उसके साथ व्यङ्ग्यार्थ के क्रम का न तो विचार ही किया जा सकता है और न उसके आधार पर नामकरण ही किया जा सकता
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३
तृतीय उद्योत:
है । आशय यह है कि क्रम होता तो प्रत्येक व्यंग्यार्थ प्रकाशन में है । किन्तु वह कहीं लक्षित होता है कहीं नहीं ।
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तृतीय उद्योत:
(प्रश्न) रस इत्यादि को वृत्तियों का जीवन बतलाने के लिये प्रकरण का उपक्रम किया गया था और उपसंहार 'कहीं वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ का क्रम लक्षित होता है कहीं नहीं होता' यह कहकर किया गया । इस उपक्रम और उपसंहार की संगति किस प्रकार बैठती है ? (उत्तर) प्रस्तुत प्रकरण यह दिखलाने के लिये उठाया गया है कि वृत्तियाँ दो प्रकार की होती हैं—कैशिकी इत्यादि अर्थवृत्तियाँ जो इतिवृत्त भाग रूप होती हैं और उपनागरिका इत्यादि शब्द वृत्तियाँ । इन दोनों प्रकार की वृत्तियों का जीवन रस इत्यादि ही होते हैं । इस प्रकार इस समस्त वृत्तिग्रहण का नियन्त्रण रस इत्यादि के द्वारा ही होता है । इसीलिये वृत्तियों का जीवन रस माना जाता है । यही प्रस्तुत प्रकरण है । इस प्रकरण में प्रसंगवश यह दिखलाया गया है कि रस इत्यादि वाच्य से भिन्न होते हैं । इसी बात का समर्थन करने के लिये वाच्य और व्यंग्य के क्रम पर विचार कर लिया गया । इस प्रकार यहाँ पर उपक्रम और उपसंहार का कोई विरोध नहीं ।
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तृतीय उद्योत:
ऐसा तो प्रायः होता है कि कार्य कारण का क्रम अधिक अभ्यस्त हो जाने पर प्रतीति नहीं होता । उदाहरण के लिये अभिधान और अभिधेय को लीजिये । शब्द अभिधान होता है उसकी प्रथम प्रतीति होती है और अभिधेय (वाच्यार्थ) की प्रतीति बाद में, क्योंकि शब्द और अर्थ का निमित्त-निमित्तभाव सम्बन्ध होता है (इनमें भी एक क्रम होता है) । पहले बालक वृद्ध व्यवहार में शब्द को सुनता है, फिर अवापोद्वाप से उसका अर्थ समझता है और तब प्रत्यभिज्ञा के बल पर अर्थबोध करता है । किन्तु जब अनेकशः व्यवहार के कारण उसे किसी अर्थ का पूर्ण ज्ञान होता है तब बिना ही क्रमप्रतीति के वह अर्थ को समझता जाता है ।
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तृतीय उद्योत:
शब्द और अर्थ के क्रम के विषय में भगवान् भर्तृहरि जी ने कहा है—'जब तक शब्द श्रवण इत्यादि ज्ञान-विषय को प्राप्त नहीं हो जाते तब तक वे अर्थ का प्रकाशन नहीं कर सकते ।' इसके बाद भर्तृहरि जी ने इसका प्रतिपादन करते हुये लिखा है—'इसलिए शब्द के रूप-ज्ञान न होने पर लोग पूछा करते हैं कि आपने क्या कहा ?'
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तृतीय उद्योत:
इस प्रकार जैसे अविनाभाव सम्बन्ध अर्थात् व्याप्ति ज्ञान में क्रम होते हुये भी अधिक अभ्यस्त हो जाने के कारण लक्षित नहीं होता, उसी प्रकार संकेतज्ञान भी अधिक अभ्यस्त हो जाने के कारण लक्षित नहीं होता । यही दशा वाच्य और व्यंग्य की है कि इनमें एक क्रम अवश्य विद्यमान रहता है किन्तु जब विशेष अभ्यास हो जाता है तब उसकी प्रतीति नहीं होती ।
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तृतीय उद्योत:
(ध्वन्या०) तदेवं व्यङ्ग्यमुखेन ध्वनिप्रकारेषु निष्पिपितेषु कश्चिद्दर्शयति-किमिदं व्यङ्ग्यकत्वं नाम ? व्यङ्ग्यार्थप्रकाशनम् ? नहि व्यङ्गकत्वं व्यध्यतं च वार्थस्य । व्यङ्गकत्वं व्यङ्ग्यविषयत्वं वा व्यङ्ग्यताव्यपेक्षया न व्यङ्गकत्वव्यतिरिक्तव्यतिरेकिणोस्तयोःसंश्रयाद्व्यवस्थानम् ।
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तृतीय उद्योत:
ननु वाच्यव्यतिरिक्तस्य व्यङ्ग्यस्य सिद्धिः प्रागेव प्रतिपादिता तत्सदृशचधीना
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च व्यञ्जकसिद्धिरिति कः पर्यनुयोगावसरः। सत्यमेवैतत्; प्रागुक्तयुक्तिभिरवाच्यव्यवतिरिक्तस्य वस्तुनः सिद्धिः कृता, स स्वार्थो व्यङ्ग्यतयैव कस्माद्वचपद्विधते ? यत्र च प्राधान्यानवस्थानं तत्र वाच्यतयैवासौ व्यपदेश्यं युक्तं;, तत्परत्वाद्वाच्यस्य । अतएव तत्प्रकाशिनो वाक्यस्य वाचकत्वमेव व्यापारः । किं तस्य व्यापारान्तरकल्पनया ? तस्मात्तात्पर्यविषयो योडर्थः स तावन्मुख्यतया वाच्यः। या त्वन्तरा तथाविधे विषये वाच्यान्तरप्रतीति: सा तत्प्रतीते रुपायमात्रं, पदार्थप्रतीतिरिव वाक्यार्थप्रतीते: ।
(अनु०) वह इस प्रकार व्यञ्जक मुख से ध्वनि के प्रकारों के निरूपित कर दिये जाने पर कोई कहे—यह व्यञ्जकत्व क्या है ? क्या व्यञ्ज्यार्थ का प्रकाशन ? अर्थ का व्यञ्जकत्व और व्यङ्गयत्व (बनता) ही नहीं । व्यङ्गचत्व व्यञ्जकत्व की सिद्धि के आधीन होता है और व्यञ्जक को अपेक्षा से व्यञ्जकत्व की सिद्धि होती है । इस प्रकार अन्योन्याश्रय होने से अव्यवस्था हो जायेगी । (प्रश्न) वाच्यव्यतिरिक्त वस्तु की सिद्धि का प्रतिपादन तो पहले ही कर दिया; उसकी सिद्धि के आधीन व्यञ्जक की सिद्धि है तो परिप्रश्न का अवसर ही क्या ? (उत्तर) यह सच ही है । पहले कही हुई युक्तियों से वाच्य-व्यतिरिक्त वस्तु की सिद्धि कर दी । वह अर्थ तो 'व्यञ्जक' के रूप में हो पदों में व्यपदेश (नाम) को प्राप्त होता है । और जहाँ पर प्राधान्यक के रूप में अवस्थान नहीं होता वहाँ इसका नामकरण वाच्य के रूप में ही करना उचित है क्योंकि वहाँ पर वाचकत्व तत्परक है । अतः उसको प्रकाशित करनेवाले वाक्य का वाचकत्व ही व्यापार है । उसके दूसरे व्यापार की कल्पना की क्या आवश्यक्यता ? इससे तात्पर्यविषयक जो अर्थ होता है वह मुख्य रूप में वाच्य होता है । और जो बीच में उस प्रकार के विषय में दूसरे वाच्य की प्रतीति होती है वह उस प्रतीति का केवल उपाय उसी प्रकार होती है जिस प्रकार पदार्थप्रतीति वाक्यार्थप्रतीति का उपायमात्र होती है ।
उद्योतारम्से यदुक्तं व्यञ्जनमुखेन ध्वने: स्वरूपं प्रतिपाद्यत इति तद्- दान्नीमुपसंहरन् । व्यञ्जकभावं च प्रथमोद्योते समर्थितमपि शिष्याणामेकप्रघट्टकेन हृदि निवेशयितुं पूर्वपक्षमह—तद्वेदितुम् । कोऽपि वदति—न तावत् प्रथमोद्योते अभाववादनिराकरणे । अतएव न व्यञ्जकसिद्धया तत्सिद्धिर्येनानन्योन्याश्रय: शङ्केत, अपि तु हेत्वन्तरैस्तस्य साधितत्वादिति भावः । तदाह—तत्सिद्धीति । स त्विति । अस्वसौ द्वितीयोऽर्थ:; तस्य यदि व्यङ्गच इति नाम कृतमु, वाच्य गम्यमानत्वेन हि शब्दार्थत्वं तदेव वाचकत्वम् । अभिधा हि यत्पर्यन्ता तत एवाभिधा- कत्वमुच्यतं, तात्पर्यनता च प्रधानीभूते तस्मिन्नर्थे—इति मूर्धाभिषिक्तं ध्वनेर्दूपं
(लो०) उद्योतारम्से यदुक्तं व्यञ्जनमुखेन ध्वने: स्वरूपं प्रतिपाद्यत इति तद्- दान्नीमुपसंहरन् । व्यञ्जकभावं च प्रथमोद्योते समर्थितमपि शिष्याणामेकप्रघट्टकेन हृदि निवेशयितुं पूर्वपक्षमह—तद्वेदितुम् । कोऽपि वदति—न तावत् प्रथमोद्योते अभाववादनिराकरणे । अतएव न व्यञ्जकसिद्धया तत्सिद्धिर्येनानन्योन्याश्रय: शङ्केत, अपि तु हेत्वन्तरैस्तस्य साधितत्वादिति भावः । तदाह—तत्सिद्धीति । स त्विति । अस्वसौ द्वितीयोऽर्थ:; तस्य यदि व्यङ्गच इति नाम कृतमु, वाच्य गम्यमानत्वेन हि शब्दार्थत्वं तदेव वाचकत्वम् । अभिधा हि यत्पर्यन्ता तत एवाभिधा- कत्वमुच्यतं, तात्पर्यनता च प्रधानीभूते तस्मिन्नर्थे—इति मूर्धाभिषिक्तं ध्वनेर्दूपं
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तृतीय उद्योतः
निरुपितं तत्रैवाभिधाव्यापारेण भवितुं युक्ततम् । तदाह—यत्र चेतित् । तत्प्रकाशिन इति । तद्रव्याभिमतं प्रकाशयत्ववश्यं तद्वाक्यं तस्येति । उपायमात्रमित्यनेन साधारण्योक्त्या भाट्टं प्राभाकरं वैयाकरणं च पूर्वपक्षं सूचयति । भाट्टमते हि—
(अनु०) उद्योत के प्रारम्भ में जो कहा गया था कि ‘व्यञ्जकमुख से ध्वनि के स्वरूप का प्रतिपादन किया जा रहा है’ यह उसका इस समय उपसंहार करते हुये प्रथम उद्योत में समर्थित भी व्यञ्जकभाव को शिष्यों के हृदय में एक प्रथक्कृत के द्वारा निविष्ट करने के लिये पूर्वपक्ष को कहते हैं—‘बह इस प्रकार’ यह । ‘कोई’ यह । मीमांसक इत्यादि । ‘यह क्या’ यह । आगे कहा जानेवाला पूर्वपक्ष—प्रश्नकर्त्ता का अभिप्राय है । ‘पहले ही’ यह । प्रथम उद्योत में अभाववाद के निराकरण में । और इसीलिये व्यञ्जक की सिद्धि से उसकी सिद्धि नहीं होती जिससे अन्योऽन्याश्रय को आशङ्का की जाय, अपितु क्योंकि दूसरे हेतुओं से उसे सिद्ध कर दिया गया है । यह भाव है । वही कहते हैं—‘उसकी सिद्धि’ यह ।
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तृतीय उद्योतः
वाक्यार्थंमिलितये तेषां प्रवृत्तो नान्तरीयकम् । पाके ज्वालैव काष्ठानां पदार्थप्रतिपादनम् ॥
‘वह तो’ यह । यह द्वितीय अर्थ हो । उसका यदि व्यञ्जक यह नाम किया गया है तो वाच्य यह भी क्यों नहीं किया जाता ? व्यञ्जक यह वाच्याभिमत का भी क्यों नहीं किया जाता ? अवगत होने के साथ जो शब्द का अर्थ वही निस्सन्देह वाचकत्व होता है । जिस पर्यन्त अभिधा हो वही अभिधायकत्व उचित होता है । उसका पर्यन्त होना तो उस अर्थ के प्रधान होने पर होता है; इस प्रकार ध्वनि का जो रूप मूर्धाभिषिक्त रूप में निरुपित किया गया था उसी में अभिधाव्यापार का होना उचित है । वही कहते हैं—‘जहाँ पर’ यह । ‘उसको प्रकाशित करनेवाला’ यह । जो वाच्य उस व्यङ्ग्याभिमत को अवश्य प्रकाशित करे उसका यह (अर्थ है) । ‘उपायमात्र’ इसके द्वारा साधारण उक्ति से भाट्ट, प्राभाकर ओर वैैयाकरण के पूर्वपक्ष को सूचित करता है । निस्सन्देह भाट्टमत में—
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तृतीय उद्योतः
इति शब्दावगते: पदार्थोस्तात्पर्येण योऽर्थ उत्प्याप्यते स एव वाक्यार्थ: । स एव च वाच्य इति । प्राभाकरदर्शनेऽपि दीर्घदीर्घो व्यपारो निमित्तत्तिन वाक्यार्थे, पदार्थानां तु निमित्तभाव: परमार्थिक एव । वैैयाकरणानां तु सोऽपारमार्थिक इति विशेष: । एतच्चास्माभि: प्रथमोद्योत एव विततस्य निर्धारितमिति न पुनरायस्यते ग्रन्थ-योजनैव तु क्रियते । तदेतन्मतत्रयं पूर्वपक्षे योज्यम् ।
'वाक्यार्थ की प्रतीति के लिये ही उनकी प्रवृत्ति में अविनाभाव सम्बन्ध से प्राप्त पदार्थों का प्रतिपादन पाक में काष्ठों की ज्वाला के समान होता है ।' इस प्रकार शब्दों के द्वारा अवगत पदायों से तात्पर्य के रूप में जो अर्थ उत्प्यापित किया जाता है वही वाक्यार्थ होता है और वही वाच्य होता है । प्राभाकर दर्शन में भी दीर्घ व्यापार हेतु वाक्यार्थ में रहता है, पदार्थों का हेतुभाव तो परमार्थिक ही है । वैयाकरणों के मत में वह (हेतु होना) अपारमार्थिक होता है, यह विशेषता है । यह सब बातें हम लोगों के द्वारा प्रथम उद्योत में ही विस्तार से निर्धारित कर दी गई हैं, अतः यहाँ पर उनका पुनरुल्लेख नहीं किया जा रहा है । केवल ग्रन्थ की योजना ही यहाँ पर की जा रही है । ये तीनों मत पूर्वपक्ष में रखे जा रहे हैं ।
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नैमित्तिक वाच्यार्थ में दीर्घ-दीर्घतर व्यापार होता है और पदार्थों का निमित्तभाव तो पारमार्थिक ही होता है। वैद्याकरणों के मत में तो वह अपारमार्थिक होता है यह विशेषता है। यह हमने प्रथम उद्योत में ही विस्तारपूर्वक निर्णय कर दिया था। अतः पुनः कष्ट नहीं उठाया जा रहा है; केवल ग्रन्थयोजना की जा रही है। इस प्रकार इन तीनों मतों की योजना पूर्वपक्ष में की जानी चाहिये।
व्यञ्जनावृत्ति पर पुनः विचार का उपक्रम
तारावती-प्रस्तुत (तृतीय) उद्योत के प्रारम्भ में प्रतिज्ञा की गई थी कि इस उद्योत में व्यञ्जना के रूप में ध्वनि का निरूपण किया जायगा। वह लगभग पूरी हो गई। अब उस प्रकरण का उपसंहार करते हुये व्यञ्जना की स्थापना की जा रही है। यद्यपि यह कार्य तो प्रथम उद्योत में ही किया जा चुका है तथापि शिष्यबुद्धिवैचित्र्य और विपक्षमुखमुद्रण के लिये उसका फिर एक बार समर्थन उचित प्रतीत होता है जिससे एक प्रष्ठक में ही सारी वस्तु शिष्यों की बुद्धि में सन्निविष्ट हो जाय। सर्व प्रथम यहाँ पर पूर्वपक्ष की स्थापना की जा रही है। अतः यहाँ पर जो कुछ कहा जा रहा है वह इस प्रकरण को उठानेवाले प्रेरक व्यक्ति की ओर से ही समझा जाना चाहिये।
व्यञ्जनाविषयक विप्रतिपत्तियाँ
कतिपय दार्शनिक विचारधारायें इस प्रकार की हैं कि जो ऐसे अवसरों पर व्यङ्ग्यापार को स्वीकार नहीं करती। इसमें मीमांसक और वैयाकरण मुख्य हैं। वे लोग कहते हैं कि आपने यहाँ पर व्यञ्जकत्व के द्वारा ध्वनि का निरूपण तो कर दिया, किन्तु इस पर प्रकाश नहीं डाला कि व्यञ्जकत्व क्या वस्तु है? क्या आप व्यञ्जकत्व की परिभाषा यह करते हैं कि व्यङ्ग्यार्थ को प्रकाशित करना (व्यङ्ग्यार्थ को प्रकाशित करनेवाला तत्त्व) व्यञ्जक कहलाता है? यदि आप व्यञ्जकत्व की यह परिभाषा मानेंगे तो न तो अर्थ का व्यङ्गयत्व ही सिद्ध हो सकेगा और न व्यञ्जकत्व ही। क्योंकि जब व्यङ्ग्यार्थ का पहले ज्ञान हो जायगा तभी व्यङ्ग्यार्थ को प्रकाशित करनेवाला तत्त्व व्यञ्जक कहला सकेगा। इस प्रकार व्यञ्जक की परिभाषा के अनुसार यदि पहले व्यङ्ग्यार्थ का ज्ञान नहीं हो जायेगा तो व्यञ्जक का ज्ञान हो ही न सकेगा। तब प्रश्न उठेगा कि व्यङ्गय किसे कहते हैं और व्यञ्जक की परिभाषा यह की जायेगी कि व्यञ्जक शब्दों से उत्पन्न बोध के विषय को व्यङ्गय कहते हैं। इस प्रकार व्यङ्गय को समझने के लिये पहले व्यञ्जक को समझना अनिवार्य हो जायेगा। व्यञ्जक की सिद्धि व्यङ्गय के आधीन और व्यङ्गय की सिद्धि व्यञ्जक के आधीन, यह अन्योन्याश्रय दोष आ जायेगा। शास्त्र का नियम है कि अन्योन्याश्रय दोष जहाँ होता है वहाँ उसे शास्त्रीय मान्यता प्राप्त नहीं होती तथा दोनों का ही परित्याग कर दिया जाता है। अतः यहाँ पर अन्योन्याश्रय दोष आ जाने से न तो व्यञ्जकत्व ही सिद्ध हो सकेगा न व्यङ्गयत्व ही। इस प्रकार पूर्वपक्षी ने यह सिद्ध कर दिया कि व्यञ्जकत्व का स्वरूपनिरूपण ही असम्भव है। फिर उसके रूप में ध्वनि के विवेचन का प्रश्न ही नहीं उठता। किन्तु पूर्वपक्षी को यह शङ्का कि कहीं उसकी मान्यता का प्रत्याख्यान सिद्धान्ती एक दूषरे रूप में न कर दे। अतः वह सिद्धान्ती के सम्भावित उत्तर की कल्पना
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करके उसका निराकरण कर रहा है—इस पर यह कहा जा सकता है कि प्रथम उद्योत में अभाववाद के निराकरण के अवसर पर व्यंग्य की सत्ता पहले ही सिद्ध की जा चुकी है। अतः व्यंग्य की सिद्धि में व्यंजक की सिद्धि की अपेक्षा नहीं है। इस प्रकार अन्योन्याश्रय दोष नहीं आता। क्योंकि व्यंग्य तो पहले ही सिद्ध है। उस व्यंग्य के आधीन व्यंजक सिद्ध हो सकता है। अतः कोई दोष नहीं। इस सम्भावित कथन पर पूर्वपक्षी का कहना है कि यह तो ठीक ही है कि पहले इसकी सिद्धि की जा चुकी है। हमें इसमें विवाद नहीं कि वाच्य से भिन्न दूसरा और अर्थ होता है। किन्तु प्रश्न तो यह है कि उसका नामकरण 'व्यंग्य' होना चाहिये इसमें आपके पास क्या प्रमाण है ? हम उसे व्यंग्य तभी कहेंगे जब व्यंजना नामक अतिरक्त व्यापार सिद्ध हो जाय। उस व्यंजनाव्यापार को तो आपने सिद्ध ही नहीं किया, फिर आप उस वाच्यातिरिक्त अर्थ को व्यंग्य यह नाम दे किस प्रकार सकते हैं ? यदि आप मनमाना नाम रखने के लिये स्वतन्त्र हैं तो जिसे आप व्यंग्य कहते हैं उसे हम वाच्य कह सकते हैं अथवा जिसे आप वाच्य कहते हैं उसे हम व्यंग्य कह सकते हैं। इसके अतिरिक्त दोनों अर्थों को वाच्य कहने में तर्क भी अधिक है, क्योंकि वाचकत्व की परिभाषा यही तो है कि किन्हीं शब्दों का ऐसा अर्थ हो जो कि तत्त्व का बोध करा सके। जिस तत्त्व का बोध कराया जाता है उस तत्त्व को वाच्य की संज्ञा प्राप्त हो जाती है। उचित यही है कि अभिधा का प्रसार जहाँ तक हो उसी अर्थ को अभिधेयार्थ माना जाय और उस क्रिया को अभिधान क्रिया कहा जाय। आशय यह है कि अभिधायकत्व उसे ही कहें जो शब्दप्रयोग से अन्तिम बोध होगा। अन्तिम बोध तो प्रधानीभूत तात्पर्य में ही होता है। अतः अभिधा का प्रसार वहाँ तक हो जाता है जो शब्द का अन्तिम अभिप्रेत अर्थ होता है। इस प्रकार जिस अर्थ को आप ध्वनि नाम से मूर्धाभिषिक्त करते हैं और जिसको आप ध्वनि का स्वरूप घोषित करते हैं वह और कुछ नहीं वाच्य का तात्पर्य मात्र है और उस अर्थ के प्रत्यायन के लिये भी अभिधाव्यापार ही पर्याप्त है। पृथक् रूप में व्यंजनाव्यापार को मानने की क्या आवश्यकता ? आशय यह है कि जहाँ वाच्यार्थतात्पर्य अर्थ प्राधान रूप में स्थित हो वहाँ भी उसे वाच्य का नाम देना ही उचित है क्योंकि वाच्य का तात्पर्य उसी अर्थ में होता है। अतएव जिस शब्दव्यापार का आश्रय लेकर उस अर्थ का प्रकाशन किया जाता है उसे वाचकत्व या अभिधाव्यापार कहना ही ठीक है। उसके लिये पृथक् एक दूसरे व्यंजना व्यापार को मानने की क्या आवश्यकता ? इस प्रकार तात्पर्यविषयक जो अर्थ होता है मुख्यरूप में वही वाच्य कहा जाता है। जहाँ पर दो अर्थों की प्रतीति होती है वहाँ एक अर्थ तो अन्तिम होता है और दूसरा अर्थ मध्यवर्ती होता है। वह अन्तिम अर्थ की प्रतीति का एक उपाय-मात्र होता है। ( जहाँ पर व्यंग्याभिमत अर्थ अन्तिम तात्पर्य का विषय होता है वहाँ वाच्यार्थमात्र मध्यवर्ती होकर व्यंग्याभिमत अर्थ का उपाय हो जाता है और जहाँ व्यंग्यार्थ गौण तथा वाच्यार्थ मुख्य होता है वहाँ व्यंग्यार्थ मध्यवर्ती होकर वाच्यार्थ का उपाय हो जाता है। ) यह उसी प्रकार होता है जिस प्रकार पद का अर्थ—वाक्य के अर्थ का उपाय हुआ करता है। ऊपर बतलाया गया है कि जिस प्रकार पदार्थ वाक्यार्थ का उपाय होता है उसी
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प्रकार वाच्यार्थ भो वन्तिम तात्पर्यार्थ का उपाय होता है। यहाँ पर यह नहीं बतलाया गया है कि प्रस्तुत पूर्वपक्ष किन लोगों के मत में हैं; किन्तु सामान्य रूप में उपाय का प्रतिपादन करने से यह संकेत मिलता है कि यह पूर्वपक्ष भाट्ट, प्राभाकर और वैय्याकरणों के मत के अनुसार प्रतिपादित किया गया है। इन तीनों मतों में पदार्थ वाक्यार्थ का उपाय ही माना जाता है। श्लोक वार्तिक के वाक्याधिकरण में इस विषय में लिखा है :—
'जिस प्रकार जलते हुये काष्ठ्ठ का मुख्य प्रयोजन पाक को तैयार कर देना ही है; किन्तु ज्वाला के अभाव में काष्ठ कभी भी पाक तैयार करने में समर्थ नहीं हो सकते, अतः ज्वाला का पाकक्रिया में अविनाभाव सम्बन्ध है जिसका नान्तरीयक हेतु कहते हैं—अर्थात् ज्वाला के बिना काष्ठ पाक तैयार नहीं कर सकत—इसीलिये मध्य में ज्वाला की कल्पना कर ली जाती है और यह मान लिया जाता है कि काष्ठ ज्वाला में हेतु है तथा ज्वाला पाक में। वस्तुतः काष्ठ का मुख्य प्रयोजन पाक ही है। इसी प्रकार अर्थबोध के लिये उच्चारण किये हुये शब्दों का मुख्य फल होता है वाच्यार्थ बोध करना। किन्तु बिना शब्दार्थ के वाक्यार्थबोध नहीं हो सकत; इसीलिये मध्य में शब्दार्थ की कल्पना कर ली जाती है और पदार्थ का प्रतिपादन किया जाता है।'
यह है कुमारिल भट्ट के अनुयायियों का कथन। इसका आशय यह है कि शब्दों से जिन अर्थों का अवगमन होता है वे अर्थ पदार्थ कहलाते हैं; वे मध्यवर्ती अर्थ होते हैं और तात्पर्य के रूप में एक नये अर्थ को उठाने में कारण बनते हैं। इस प्रकार जो नया अर्थ उठाया जाता है वही वाक्यार्थ कहलाता है और वही वाक्यार्थ होता है। इस प्रकार पद प्रयोग का मुख्य प्रयोजन वाच्यार्थज्ञान होता है किन्तु अन्तरालवर्ती पदार्थ उसके सहायक या उपायमात्र होते हैं।
कुमारिल भट्ट के अनुयायियों का कथन। इसका आशय यह है कि शब्दों से जिन अर्थों का अवगमन होता है वे अर्थ पदार्थ कहलाते हैं; वे मध्यवर्ती अर्थ होते हैं और तात्पर्य के रूप में एक नये अर्थ को उठाने में कारण बनते हैं। इस प्रकार जो नया अर्थ उठाया जाता है वही वाक्यार्थ कहलाता है और वही वाक्यार्थ होता है। इस प्रकार पद प्रयोग का मुख्य प्रयोजन वाच्यार्थज्ञान होता है किन्तु अन्तरालवर्ती पदार्थ उसके सहायक या उपायमात्र होते हैं। यह है भट्टटमतानुयायियों की मान्यता। प्राभाकर दशर्न में भी 'सोऽयमितोऽवि दीर्घ-दर्शतरोग व्यपार:' का सिद्धान्त माना जाता है। इसका आशय यह है कि जिस प्रकार बाण का व्यापार सन्धान के बाद गात्रापघात और प्राणापहरण रूप में आगे-आगे बढ़ता जाता है; प्राणापहरण ही उसका मुख्य प्रयोजन होता है; गात्रापघात इत्यादि मध्यवर्ती क्रियायें उसका उपायमात्र होती हैं उसी प्रकार पद, पदार्थ और वाक्यार्थ के विषय में भी समझना चाहिये।
वाक्यार्थ निमित्तक होता है और पदार्थ निमित्त-मात्र। इस प्रकार प्राभाकर दशर्न में भी पदार्थ का वाक्यार्थ से उपायमात्र का सम्बन्ध माना जाता है। वैय्याकरण दशर्न में भी इसी प्रकार की मान्यता है। अन्तर केवल यह है कि प्राभाकर दर्शन में कार्यान्वित में शक्ति मानी जाती है, अत एवं उसमें पृथक् रूप में तात्पर्य-वृत्ति के मानने की आवश्यकता नहीं होती और अन्तरालवर्ती पदार्थ तात्विक माने जाते हैं। किन्तु वैय्याकरण इन अन्तरालवर्ती अर्थों को उसी प्रकार अतात्विक मानते हैं जिस प्रकार वेदान्त में अविद्या कल्पित घट पट इत्यादि समस्त पदार्थ अतात्विक ही माने जाते हैं। वेदान्त उन सबको ब्रह्मरूप ही मानता है। उसी प्रकार वैय्याकरण उन अन्तरालवर्ती पदार्थों को असत्य मानकर सभी को स्फोट ( शब्द ब्रह्म ) रूप ही मानते हैं। उनके मत में जिस प्रकार 'घट' में प्रत्येक वर्ण का कोई अर्थ नहीं होता उसी प्रकार 'घट लाओ' में प्रत्येक शब्द का कोई अर्थ नहीं। उनका अर्थ मानना केवल
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अविद्याकल्पित है। इसका विस्तृत विवेचन प्रथम उद्योत में किया जा चुका है। अतः यहाँ पर प्रस्तुयोजना के लिये संकेतमात्र कर दिया गया है। सारांश यह है कि पूर्वपक्ष भाट्ट, प्रभाकर और वैय्याकरण इन तीनों के मत में सामान्यरूप में स्थापित किया गया है।
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(ध्वन्य०)—अत्रोच्यते—यत्र शब्दः स्वार्थंसमविदधानोऽध्यन्तरमवगमयति तत्र यत्तस्य स्वार्थाभिधायित्वं यच्च तदर्थान्तरावगमनहेतुत्वं तयोर्विशेषो विशेषो वा ? न तावदविशेषः, यस्मात्तौ दो व्यापारी भिन्नविषयौ भिन्नरूपौ च प्रतीयते एव। तथाहि—वाचकत्वलक्षणो व्यापारः शब्दस्य स्वार्थविषयः गमकत्वलक्षणस्त्वर्थान्तरविषयः। न च स्वपररूपवहारौ वाच्यगम्योरपत्तेरितोऽयं शब्दः, एकस्य सम्बन्धित्वेन प्रतीतेरपरस्य सम्बन्धिसम्बन्धित्वेन।
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वाच्यो ह्यार्थः साक्षाच्छब्दस्य सम्बन्धी तदितरस्त्वमिधेयसामर्थ्याक्षिप्तः सम्बन्धिसम्बन्धी। यदि च स्वसम्बन्धित्वं साक्षात्तस्य स्यात्तदा त्वव्यवहार एव न स्यात्। तस्माद्विषयभेदस्तावत्त्वयोर्व्यापारयोः सुप्रसिद्धः।
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यहाँ कहा जा रहा है—जहाँ शब्द अपने अर्थ को कहते हुये अर्थान्तर का अवगमन कराता है वहाँ जो उसका अपने अर्थ का कहना और जो दूसरे अर्थ के अवगमन का हेतु होना उन दोनों में ( कोई) विशेषता (भेद) नहीं है या ? यह नहीं कि भेद नहीं है क्योंकि वे दोनों व्यापार भिन्न विषयवाले और भिन्न रूपवाले प्रतीत होते हैं। वह इसप्रकार—शब्द का वाचकत्व रूप व्यापार अपने अर्थ के विषय में होता है और गमकत्वरूप व्यापार दूसरे अर्थ के विषय में होता है। वाच्य और व्यङ्ग्य का अपना और पराया यह व्यवहार छिपाया हीं नहीं जा सकता क्योंकि एक की प्रतीति सम्बन्धी के रूप में होती है और दूसरे की सम्बन्धी के सम्बन्धी के रूप में।
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निस्सन्देह वाच्यार्थ शब्द का साक्षात् सम्बन्धी होता है और उससे भिन्न तो अभिधेय सामग्री से साक्षात् स्वसम्बन्धित्व हो तो अर्थान्तरत्व व्यवहार नहीं ही हो। अत एव उन दोनों व्यापारों का विषयभेद तो सुप्रसिद्ध है।
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(लो०) अत्रैति पूर्वपक्षे—उच्यत इति सिद्धान्तः। वाचकत्वं गमकत्वं चेति स्वरूपतो भेदः स्वार्थेडर्थान्तरे च क्रमेणैति विषयतः। नतु तस्माच्छेदसो गम्यतेरर्थः कथं तर्हि च्यतेरर्थान्तरमिति। नो चेत्स तस्य न कश्चिदिति को विषयार्थ इत्याशङ्क्याह—
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न स्यादिति। एककारो भिन्नक्रमः, नैव स्यादित्यर्थः। यावता न साक्षात्सम्बन्धित्वं तेन युक्त एवार्थान्तरव्यवहार इति विषयभेद उक्तः।
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यहाँ पर अर्थात् पूर्वपक्ष में ‘कहा जा रहा है’ अर्थात् सिद्धान्त। वाचकत्व और गमकत्व यह स्वरूप से भेद है और क्रमशः स्वार्थ में तथा अर्थान्तर में यह विषय से (भेद है)।
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यदि उसे अर्थ अवगत होता है तो अर्थान्तर क्यों कहा जाता है । नहीं तो वह उसका कुछ नहीं होता तो विषय का क्या अर्थ ? यह शाब्द करके कहते हैं—न च इत्यादि । 'नहीं' यह । (यहाँ) 'एव' का प्रयोग भेद से होता है; अर्थात् नहीं ही हो । जिससे कि साक्षात् सम्बन्धत्व नहीं होता उससे अर्थान्तरत्व का व्यवहार उचित ही है । यह विषय-भेद बतलाया गया ।
पूर्वपक्ष की स्थापना और स्वमत स्थापना
तार्किकता—अब सिद्धान्तपक्षी अपने मत का प्रतिपादन करने के लिये पूर्वपक्ष की आलोचना कर रहा है—यहाँ पर मुझे यह कहना है कि जहाँ पर शब्द अपने अर्थ को कहते हुये दूसरे अर्थ का अवगम करता है वहाँ दो अर्थ हो जाते हैं । एक स्वार्थ और दूसरा अर्थान्तर । वहाँ पर स्वार्थ और अर्थान्तर दोनों को प्रकट करने में शब्द के जो दो व्यापार होते हैं उनमें आप भेद ( व्यापार की एकात्मकता ) मानते हैं या भेद ( विभिन्नरूपता ) । यह आप कह ही नहीं सकते उनमें व्यापार की एकात्मकता होती है क्योंकि दोनों व्यापारों के विषयों में भी भेद होता है और रूप में भी भेद होता है । तथा दोनों में भेद की प्रतीति प्रकट रूप में होती है । शब्द पहले स्वार्थ को प्रकट करता है फिर अर्थान्तर को, इस प्रकार इनकी प्रतीति भिन्न कालों में क्रम से होती है, अतः दोनों का विषयभेद मानना अनिवार्य हो गया । इसी प्रकार एक व्यापार को वाचकत्व ( अभिधा ) कहते हैं और दूसरे को व्यञ्जकत्व ( व्यञ्जना ) । यह इनके रूप में भेद हो गया । विषय और रूप दोनों में भेद होने के कारण हम इन दोनों व्यापारों को अभिन्न नहीं मान सकते । ( प्रश्न ) यदि आप यह मानते हैं कि शब्द से ही दूसरा अर्थ अवगत होता है तो आप उसे अर्थान्तर ( दूसरा अर्थ ) क्यों कहते हैं; वह तो शब्द का अपना ही अर्थ है—अर्थान्तर कैसे हुआ ? यदि आप यह मानते हैं कि वह अर्थ शब्द का नहीं है तो शब्द से उसका सम्बन्ध ही क्या ? ऐसी दशा में उस अर्थ को शब्द का विषयार्थ मानना तो और भी दूर की बात हो गई । जब शब्द से उसका सम्बन्ध ही नहीं तो उसको शब्द का विषयार्थ मानना किस प्रकार संगत हो सकता है ? ( उत्तर ) इस बात को तो आप अस्वीकार कर ही नहीं सकते और न आप उसे छिपा ही सकते हैं कि वाच्यार्थ शब्द का अपना अर्थ होता है और व्यङ्ग्यार्थ अर्थान्तर होता है । कारण यह है कि वाच्यार्थ तो शब्द से साक्षात् सम्बद्ध होता है और व्यङ्ग्यार्थ परम्परा से सम्बद्ध होता है—व्यङ्ग्यार्थ वाच्यार्थ से सम्बद्ध होता है और वाच्यार्थ शब्द से सम्बद्ध होता है । इस प्रकार व्यङ्ग्यार्थ का प्रत्यक्ष सम्बन्ध शब्द से नहीं होता इसीलिये वह शब्द का साक्षात् अर्थ न कहा जाकर अर्थान्तर कहलाता है । वह शब्द का विषय इसलिये कहा जाता है कि परम्परा से उसका सम्बन्ध शब्द से होता तो है ही । सारांश यह है कि वाच्यार्थ शब्द का साक्षात् सम्बन्धी होता है और व्यङ्ग्यार्थ वाच्यार्थ सामर्थ्य से आक्रान्त होकर सम्बन्धी का सम्बन्धी हो जाता है । यह तो ठीक ही है कि यदि व्यङ्ग्यार्थ भी शब्द का साक्षात् सम्बन्धी होता तो अर्थान्तर कहा ही नहीं जाता । यहाँ पर 'व्यवहार एव न स्यात्' में 'एव' शब्द व्यवहार के साथ जुड़ा है किन्तु उसका अन्वय क्रम को बदल कर 'न' के साथ होता है । अतः यहाँ अर्थ होगा—कि यदि व्यङ्ग्यार्थ शब्द का साक्षात् सम्बन्धी हो तो उसके लिये अर्थान्तर का व्यवहार नहीं ही हो । अतः विषयभेद तो प्रसिद्ध ही है ।
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(ध्वन्यालोके)—रूपभेदोऽपि प्रसिद्ध एव । न हि यैवाभिधानशक्तिः सैवागमनशक्तिः । अवाचकस्यापि गतिशब्दादौ रसादिलक्षणार्थमवगमदर्शनात् । अशब्दस्यापि चेष्टादेरर्थविशेषप्रकाशनप्रसिद्धेः । तथाहि—‘श्रोड़योगान्नतवदनया' इत्यादिश्लोके चेष्टाविशेषः सुकविनार्थप्रकाशनहेतुःः प्रदर्शित एव ।
(अनु०) रूपभेद भी प्रसिद्ध ही है । जो अभिधानशक्ति है वही अवगमनशक्ति नहीं ही है । क्योंकि आवाचक भी गीत शब्द की रस इत्यादि लक्षणवाली अर्थ की प्रतीति देखी जाती है और शब्द से रहित भी चेष्टा इत्यादि की अर्थ विशेष प्रकाशन की प्रसिद्धि है ही । वह इस प्रकार—‘श्रोड़योगान्नतवदनया' इत्यादि श्लोक में सुकवि ने विशेष प्रकार की ‘चेष्टा’ को अर्थविशेष के प्रकाशन के रूप में प्रदर्शित किया है ।
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तस्माद्भिन्नविषयत्वाद्भिन्नरूपत्वाच्च स्वार्थाभिधायित्वमर्यान्तरावगमहेतुत्वं च शब्दस्य तत्तत्त्वतः । स्पष्टमेव । निशेषदर्शने तद्वान्तरीयत्वमभिधेयतया शब्दस्य तत्तत्त्वतः । स्पष्टमेव । विश्रान्तौ हि तद्वान्तरीयत्वं वाच्यत्वव्यवपदेश्यता शब्दगव्यापारगोचरत्वं तु तस्यास्माभिरिष्यत एव, न तु व्यङ्ग्यतयैव न वाच्यत्वेन । प्रसिद्धाभिधानान्तरसम्बन्धयोग्यतया च तस्यार्थान्तरस्य प्रतीतः शब्दान्तरेण स्वार्थाभिधायिना यद्विषयोकारणं तत्र प्रकाशनोक्तिरेव युक्ता ।
इसलिये विषयभेद होने से और रूपभेद होने से शब्द का जो अपने अर्थ का कहन। और दूसरे अर्थ के अवगमन का हेतु होना, उन दोनों में स्पष्ट ही भेद है । यदि भेद है तो अब अवगमनीय अभिधेय सामर्थ्यापेक्षित अर्थान्तर के लिये वाच्यत्व का नाम नहीं दिया जा सकता । हम लोग उसकी शब्दगव्यापारगोचरता तो चाहते हैं । वह तो व्यङ्ग्यत्व के रूप में ही हो सकती है वाच्यत्व के रूप में नहीं । क्योंकि दूसरे प्रसिद्ध अभिधान के सम्बन्ध के योग्य होने के कारण उस अर्थान्तर की प्रतीति का जो अपने अर्थ को कहनेवाले दूसरे शब्द से विषय किया जाना है उसमें प्रकाशन की युक्ति ही ठीक है ।
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(लो०) न तु भिन्नेऽपि विषये अक्षशब्दादेर्व हेतुत्वस्य एक एवाभिधानलक्षणो व्यापार इत्याशङ्क्य रूपभेदमुपपादयति—रूपभेदोऽपि । प्रसिद्धिमेव दर्शयति—न विप्रतिपन्नं प्रतिहेतुमाह—अवाचकस्यापीति—यदि स्यादवाचकस्य गमकत्वमपि न स्यात्, गमकत्वेनैव वाचकत्वमपि न स्यात् । न चैतदुभयमपि गीतशब्दे शब्दव्यतिरिक्ते चाधोवक्त्रत्वकुचकम्पनवाष्पावेशादौ तस्यावाचकस्याप्यवगमकारित्ववदर्शनादवगमकारिणोऽपि वाचकत्वेन प्रसिद्धत्वादिति तात्पर्यम् । एतदुपसंहरति—तस्माद्भिन्नेति । न तर्हीति । वाच्यत्वं ह्यभिधायित्वापारविषयता न तु व्यापारमात्रविषयता, तथाहि—तु सिद्धसाधनमित्येतदाह—शब्दगव्यापारेति । ननु गीतादौ माभूद्वाचकत्वमिह तुर्थान्तरेऽपि शब्दस्य वाचकत्वमेवोच्यते किं हि तद्वाचकत्वं सङ्कोच्यत इत्याशङ्क्याह—प्रसिद्धेति । शब्दान्तरेण तस्यार्थान्तरस्य यद्विषयोकारणं तत्र प्रकाशनोक्तिरेव युक्ता न वाचकत्वोक्तिः शब्दस्य, नापि वाच्यतोक्तिरर्थस्य तत्र युक्ता ।
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समयवशादव्यवधानेन प्रतिपादकत्वं यथा तस्यैव शब्दस्य स्वार्थे, तदाह—स्वार्थाभिधायिनोति । वाच्यत्वं हि समयबलεν निर्गव्यवधानं प्रतिपाद्यत्वं यथा तस्यैवार्थस्य शब्दान्तरं प्रति तदाह—प्रसिद्धेति । प्रसिद्धेन वाचकतयाभिधानान्तरेण यः सम्बन्धो वाच्यत्वं तदेव तथा वा यद्योग्यत्वं तेनोपलक्षितस्य । न चैवं विधं वाचकत्वमर्थं प्रति शब्दस्येहास्ति, नापि तं शब्दं प्रति तस्यार्थस्योक्तरूपं वाच्यत्वम् । यदि नास्ति तर्हि तस्य विषयीकरणमुक्तमतिर्याशङ्क्याह—प्रतोतेरिति । अर्थ च प्रतीते सोऽर्थो न च वाच्यवाचकव्यापारयोगेनैवासौ व्यापार इति यावत् ।
(अनु०) ‘निस्सन्देह भिन्न विषय में बहुत अर्थवाले अक्षर शब्द इत्यादि का एक ही अभिधारूप व्यापार होता है’ यह शङ्का करके रूपभेद का उपपादन कर रहे हैं—यदि जो वाचकत्व है वही गमकत्व हो तो अवाचक का गमकत्व भी न हो और गमकत्व होने पर वाचकत्व नहीं है ऐसा भी न हो । यह दोनों ही बात है क्योंकि गीत शब्द में तथा शब्दरहित मुख के झुकने, स्तनों के कम्पन, वाष्प के आवेश इत्यादि में उस अवाचक का भी अवगमकारित्व देखा जाता है । अतः अवगमकारित्व की भी अवाचकत्व के रूप में प्रसिद्धि है ।
इसका उपसंहार करते हैं—‘इसलिये....... इत्यादि । ‘तो नहीं’ यह—वाचकत्व निस्सन्देह अभिधायापार की विषयता को कहते हैं समस्त व्यापारों की विषयता को नहीं । ऐसा होने पर तो यह सिद्ध का साधन ही है यह कहते हैं—‘शब्द व्यापार’ इत्यादि । ‘गीत इत्यादि में वाचकत्व न हो यहां पर तो अर्थान्तर में भी शब्दवाचकत्व ही कहा जाता है । उस वाचकत्व का सङ्केत क्यों किया जा रहा है ? यह शङ्का करके उत्तर देते हैं—प्रसिद्ध यह । दूसरे शब्द के द्वारा जो दूसरे अर्थ का विषय बनाया जाना उसमें शब्द की प्रकाशन की उक्ति ही ठीक है न तो शब्द की वाचकत्व की उक्ति ठीक है और न अर्थ की वाचकत्व की उचित । सङ्केतवश अभयवधान रूप में प्रतिपादन करना निस्सन्देह वाचकत्व है जैसे उसी शब्द का अपने स्वार्थ में, वही कहते हैं—‘अपने अर्थ को कहनेवाले के द्वारा’ यह । वाच्यन्त्व निस्सन्देह सङ्केत के बल पर व्यवधान रहित प्रतिपादित होने को कहते हैं जैसे उसी अर्थ का दूसरे शब्द के प्रति, वही कहते हैं—‘प्रसिद्ध’ यह । वाचक के रूप में प्रसिद्ध दूसरे अभिधान के साथ जो सम्बन्ध अर्थात् वाचकत्व वही या उसी में जो योग्यता उस योग्यता के द्वारा उपलक्षित ( अर्थान्तर की प्रतीति ) । निस्सन्देह यहां पर शब्द का इस प्रकार का अर्थ के प्रति वाचकत्व नहीं है, नहीं ही उस शब्द के प्रति उस अर्थी का कहे हुये रूपवाला वाच्यत्व है । ‘यदि नहीं है तो क्यों उसका विषयीकरण कहा गया है?’ यह शङ्का करके कहते हैं—‘प्रतीति का’ यह । यदि वह अर्थी प्रतीत होता है किन्तु वाच्यवाचक व्यापार के द्वारा नहीं
तो विलक्षण ही वह व्यापार है यह सब का सार है ।
तारावती—( प्रश्न ) जहाँ द्वचर्थक या अनेकार्थक शब्दों का प्रयोग किया जाता है वहाँ दो या अनेक अर्थों का शब्द से साक्षात् सम्बन्ध होता है । जैसे ‘अक्ष’ शब्द के इन्द्रिय इत्यादि अनेक अर्थ होते हैं । ऐसे स्थलों पर एक हो व्यापार से काम चल सकता है और उसे अभिधाग्यापार की संज्ञा प्रदान की जा सकती है । फिर व्यापारभेद मानने की क्या आवश्य-
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कता ? ( उत्तर ) वाच्यार्थ और व्यङ्ग्यार्थ के व्यापारों में केवल विषय भेद ही नहीं होता इनका रूपभेद भी होता है। और वह रूपभेद भी सुप्रसिद्ध हो है। यदि अभिधाव्यापार और व्यञ्जनाव्यापार दोनों एक ही वस्तु होते तो जहाँ वाचकत्व विद्यमान न होता वहाँ व्यञ्जना भी नहीं हो सकती और यदि व्यञ्जना व्यापार होता तो यह कहा ही नहीं जा सकता वहाँ पर अभिधा व्यापार नहीं है। किन्तु ये दोनों बातें ही नहीं होती। जहाँ वाचकत्व नहीं होता वहाँ भी व्यञ्जनाव्यापार हो सकता है और जहाँ व्यञ्जनाव्यापार होता है वहाँ अवश्य ही अभिधा हो ऐसा नहीं होता।
उदाहरण के लिये गीत नृत्य इत्यादि शब्दों में अभिधा-व्यापार नहीं होता और न उनमें वाच्यार्थ ही होता है, फिर भी उनसे रस इत्यादि रूप व्यङ्ग्यार्थ की प्रतीति देखी जाती है। केवल इतना ही नहीं अपितु जहाँ शब्द भी नहीं होता वहाँ भी व्यञ्जनाव्यापार देखा जाता है। उदाहरण के लिये ‘श्रीदशरथतनयावदनया’ इत्यादि पद्य में नायिका का मुख नीचा हो जाना, स्तनों का कॉंपने लगना, आँसुओं का आवेश इत्यादि शब्द नहीं हैं; केवल चेष्टायें ही है किन्तु इनसे भी विशेष अर्थ की व्यञ्जना होती ही है।
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इस प्रकार जहाँ शब्द होता है किन्तु वाचकत्व नहीं होता वहाँ भी व्यञ्जनाव्यापार देखा जाता है और जहाँ शब्द भी नहीं होता केवल चेष्टायें ही होती है वहाँ भी व्यञ्जनाव्यापार देखा जाता है। अतः यह स्वतः सिद्ध हो जाता है कि व्यञ्जनाव्यापार न तो अभिधाव्यापार का पर्याय है और न इनका अनिवार्य साहचर्य हो है।
इस प्रकार व्यञ्जना और अभिधा का विषय-भेद भी है और रूपभेद भी। अतः शब्द का अपना अर्थ प्रकट करना और अर्थान्तर के अवगम में हेतु होना इन दोनों तत्त्वों में स्पष्ट भेद है। अब दूसरे पक्ष को लीजिये कि आप स्वार्थ और अर्थान्तर के प्रत्यायन की क्रियाओं को भिन्न मानते हैं।
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ऐसी दशा में आप यह नहीं कह सकते कि जिस द्वितीय अर्थ का अवगमन कराया जाता है और जिसका आक्षेप अभिधेय के सामर्थ्य से होता है उसको वाच्य की संज्ञा ही प्राप्त होती है। क्योंकि अभिधा-व्यापार को जो विषय होता है उसी को वाच्य की संज्ञा प्राप्त होती है, सभी व्यापारों के विषय को वाच्य नहीं कह सकते।
यदि इतनी बात स्वीकार कर ली जाती है कि जिस अर्थान्तर की प्रतीति होती है उसे वाच्य की संज्ञा प्राप्त नहीं हो सकती तो सिद्धान्तपक्षी का पूर्वपक्ष से कोई विरोध नहीं रह जाता। फिर तो पूर्वपक्षी उसी बात को सिद्ध करने लगता है जो कि सिद्धान्तपक्षी की मान्यता है।
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यह तो सिद्धान्तपक्षी में भी स्वीकार किया जाता है कि जिस अर्थान्तर की प्रतीति होती है वह शब्द के व्यापार का ही विषय होता है अर्थात् अर्थान्तर की प्रतीति में शब्द का व्यापार ही निमित्त होता है वह शब्दव्यापार अभिधा से भिन्न होता है। इतना मान लेने पर पूर्वपक्ष की दृष्टि से भी सिद्धान्ती का अभिमत व्यञ्जना व्यापार सिद्ध हो जाता है।
निष्कर्ष यह निकलता है कि शब्द से प्रतीत होनेवाले अर्थान्तर को व्यङ्ग्यार्थ की ही संज्ञा प्राप्त होना चाहिये वाच्यत्व की नहीं। (प्रश्न) आपने गीत इत्यादि में वाचकत्व के अभाव में भी व्यञ्जनाव्यापार को सिद्धकर वाचकत्व और व्यङ्ग्यत्व का विभेद पादित किया है।
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इस पर निवेदन यह है कि जहाँ वाचकत्व बिल्कुल नहीं होता उसकी बात जाने दीजिये। किन्तु जहाँ वाचकत्व होता है वहाँ अर्थान्तर में भी आप वाचकत्व ही क्यों
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नहीं मानते ? वहाँ पर व्यङ्जकत्व स्वीकार करने से क्या लाभ ? ( उत्तर ) गीत इत्यादि में वाचकत्व के अभाव में भी व्यङ्जकत्व होता है केवल यही हेतु नहीं है जिससे हम वाचकत्व के साथ आनेवाले अर्थान्तर में व्यङ्जकत्व स्वीकार करते हैं। किन्तु इसका एक दूसरा भी हेतु है—व्यञ्जनाव्यापार के द्वारा जिस अर्थान्तर की प्रतीति करना हमें अभीष्ट है वह अर्थान्तर दूसरे शब्दों से भी अभिहित किया जा सकता है। ( उदाहरण के लिये 'गङ्गागायां घोष:' को लीजिये। यहाँ पर गङ्गा शब्द के प्रयोग से तट में लक्षणा होती है और उससे शौच्य और पावनत्व की प्रतीति व्यञ्जनाव्यापार जन्य है। इस प्रकार शौच्य पावनत्व रूप व्यञ्जना जन्य बोध में 'शौच्य' और 'पावनत्व' रूप शब्दों के द्वारा अभिहित किये जाने की भी योग्यता विद्यमान है। आशय यह है कि शौच्य पावनत्व का प्रत्यायन दो प्रकार से हो सकता है, एक तो शौच्य पावनत्व इत्यादि शब्दों के प्रयोग के द्वारा और दूसरे इन शब्दों या इनके समानार्थक शब्दों का प्रयोग न करते हुये 'गङ्गा' शब्द के प्रयोग के द्वारा ही उनका प्रत्यायन कराया जा सकता है। ) इस प्रकार जहाँ पर अन्य शब्दों के द्वारा अन्य अर्थ को विषय बनाया जाता है (जैसे उक्त उदाहरण में 'गङ्गा' शब्द के द्वारा शौच्य और पावनत्व को विषय बनाया गया है। ) वहाँ पर न तो शब्द को वाचकत्व का पद प्राप्त हो सकता है और न अर्थ को वाच्यत्व का पद दिया जाना ही उचित है। इस क्रिया को प्रकाशन का पद देना ही उचित है। क्योंकि वाचकत्व का यही अर्थ है कि जहाँ किसी अर्थ को बिना बीच में लाये सङ्केत के बल पर प्रत्यक्ष रूप में जिसका प्रतिपादन कर दिया जाये उसी ( व्यञ्जक ) शब्द का अपने अर्थ में प्रयोग। ( गङ्गा शब्द का अपना एक स्वतन्त्र प्रवाहपरक अर्थ है। इस अर्थ के प्रत्यायन में मध्य में किसी अन्य अर्थ को नहीं लाना पड़ता। अतः प्रवाह अर्थ के कथन में गंगा शब्द वाचक है। ) इसी प्रकार वाच्यत्व की परिभाषा यह है कि बीच में किसी दूसरे अर्थ को बिना लाये हुये केवल सङ्केत के बलपर जो अर्थ प्रतिपादित कर दिया जाता है उसे वाच्य कहते हैं। ( जैसे शौच्य और पावन इन अर्थों का प्रत्यायन कराने के लिये गङ्गा से भिन्न साक्षात् शौच्य और पावन शब्द। इन शब्दों के प्रति शौच्य और पावनत्व अर्थों की वाच्यता कही जायगी। ) आशय यह है कि व्यञ्जक शब्द का अपना एक स्वतन्त्र अर्थ भी होता है। वही उसका वाच्यार्थ कहा जाता है। व्यञ्ज्यार्थ की भी एक स्वतन्त्र सत्ता होती है। जोकि उस शब्द से भिन्न दूसरे शब्दों से अभिहित की जा सकती है। ( गङ्गा का स्वतन्त्र अर्थ होता है और शौच्य पावनत्व इत्यादि व्यञ्ज्यार्थों का अभिधान गङ्गा से भिन्न अन्य शौच्य पावनत्व इत्यादि शब्दों से भी किया जा सकता है। ) वाचक और वाच्य की यह परिभाषा मान लेने पर न तो इस प्रकार का वाच्यत्व गङ्गा शब्द में आता है और न इस प्रकार का वाच्यत्व शौच्य पावनत्व इत्यादि अर्थों में आता है। किन्तु उस वाच्यभिन्न अर्थ में किसी अन्य प्रसिद्ध शब्द के द्वारा कहे जाने की योग्यता होती है और शब्द अपने पृथक् अर्थी को कहा करता है। इस प्रकार अन्य प्रतीति को जहाँ अन्य शब्द का विषय बनाया जाता है वहाँ वाच्य-वाचक शब्द का प्रयोग ठीक नहीं है। यहाँ पर यह पूछा जा सकता है जब वह अर्थ उस शब्द का वाच्य ही नहीं है तब उस अर्थ को उस शब्द का विषय बनाया ही किस प्रकार जा सकता है ? इसी प्रश्न का उत्तर देने के लिये आलोकार ने
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तृतीय उद्योत:
'प्रतीते:' इस शब्द का प्रयोग किया है। इसका अर्थ यह है कि इस द्वितीय अर्थ की प्रतीति तो होती है। उसका प्रतिषाद किसी प्रकार नहीं किया जा सकता। प्रतीति होना ही उसकी सत्ता और उसके शब्द का विषय होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। वह अर्थ प्रतीति-गोचर तो होता ही है, किन्तु उसकी प्रतीति वाच्य-वाचक व्यापार के द्वारा होती नहीं अतः उसके लिये विलक्षण व्यापार ही मानना पड़ेगा।
(ध्वन्य०) न च पदार्थवाक्यार्थन्यायो वाच्यगडदूषणायोः । यत्रः पदार्थप्रतीति-रसत्थैवैति कश्चिद्धिददूभिराश्रितस्तम् । यैरप्यसत्यत्वमस्य नाङ्गीकृतं तैरप्यवाक्यार्थपदार्थ-योग्घटतदुपादानकारणन्यान्योड्सुपगन्तव्यः। यथाहि घटे निष्पन्ने तदुपादानकारणानं न पृथगुपलम्भस्स्थैव वाक्ये तदर्थे वा प्रतीते पदतदर्थानाम् । तेषां तदाविभक्ततयो-पलम्भे वाक्यार्थबुद्धिरेव दूरीभवेत् । न त्वेष वाच्यगडदूषणयोर्न्यायः, नहि व्यङ्ग्ये प्रतीय-माने वाच्यबुद्धिदूरीभवति, वाच्यावभासाविनाभावेन तस्य प्रकाशनात् । तस्माद्दृट-प्रबोध्यायस्तयोः, यथैव हि प्रदीपद्धारेण घटप्रतीतावबुध्यमानायां न प्रदीपप्रकाशो निवर्तते तह्दृचप्रतीतो वाच्यावभासः । यत्नु प्रथमोद्योते 'यथा पदार्थद्धारेण' इत्याद्युक्तं तहुपायोऽमात्रेऽस्ति साॅम्यविवक्ष्यो ।
(अनु०) वाच्य और व्यङ्ग्य का पदार्थ-वाक्यार्थ न्याय नहीं ही है। क्योंकि कुछ विद्वानों ने 'पदार्थप्रतीति असत्य ही है' यह सिद्धान्त माना है। जो इसके असत्यत्व को नहीं भी मानते हैं उनको वाक्यार्थ और पदार्थ का घट तथा उसके उपादान कारण का न्याय स्वीकार करना चाहिये। जैसे घट के बन जाने पर उसके उपादान कारणों की पृथक् रूप में उपलब्ध नहीं होती उसी प्रकार वाक्य या उसके अर्थ के प्रतीत हो जाने पर पदों तथा उसके अर्थों का । उनकी उस समय विभक्त रूप में उपलब्ध होने पर वाक्यार्थबुद्धि ही दूर हो जाय। यह वाच्य और व्यङ्ग्य का न्याय नहीं है। क्योंकि व्यङ्ग्य के प्रतीत होने पर वाच्यबुद्धि दूर नहीं होती। क्योंकि उसका प्रकाशन वाच्य के अवभास के साथ अविनाभाव सम्बन्ध से होता है। इससे उनका घट-प्रदीप न्याय है। जैसे प्रदीप के द्वारा घट की प्रतीति के उत्पन्न हो जाने पर प्रदीप-प्रकाश निवृत्त नहीं होता उसी प्रकार व्यङ्ग्य प्रतीति में वाच्य का अवभास (निवृत्त नहीं होता)। जो प्रथम उद्योत में 'जैसे पदार्थ के द्वारा' इत्यादि कहा वह उपायमात्र से साम्यविवक्षा के आधार पर।
(लो०) नन्वेवं माभूदकचक्रशक्तिस्थापि तात्पर्यशक्तिर्यविषयतीत्याशङ्क्याह—न चेन्ति । कश्चिदिति वैयाकरणैः । यैरपि न भट्टप्रभृतिभिः। तमेव न्यायं व्याचष्टे—यथा तदुपादानकारणानामिति । समवायिकारणानि कपालानि अनयोक्त्या निरुपि-तानि । सौगतकापालिकमते तु यदव्युपादतव्यघटके उपादानानां न सत्ता एकत्र क्षणस्थायित्वेन परत्र तिरोभूतत्वेन तथापि पृथक्त्वया नास्त्युपालम्भ इतीत्यमेव दृष्टान्तः । दूरीभवेदिति । अर्थकत्वस्याभावादिति भावः ।
किञ्च एवं पदार्थवाक्यार्थन्यायं तात्पर्यशक्तिसाधकं प्रकृते योजयन्नाह—तस्मादिति ।
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यतोऽसौ पदार्थवाक्यार्थन्यायो नेह युक्तस्तस्मात् । प्रकृतं न्यायं व्याकरणपूर्वकं दाष्टान्तिके योजयति—ध्रुवैव होति । ननु पूर्वमुक्तत्वात्
यहाँ पदार्थ और वाक्यार्थ के न्याय को उचित नहीं मानते हुए प्रकृत न्याय को व्याकरणपूर्वक दाष्टान्तिक में योजित करते हैं—'निश्चय ही होता है ।' शंका करते हैं—'पहले ही कहा जा चुका है कि'
यथा पदार्थद्वारेण वाक्यार्थ: स: प्रतीयते । वाक्यार्थपूर्विका तद्वत्प्रतिपत्तस्तस्य वस्तुन: ॥
जैसे पदार्थ के द्वारा उस वाक्यार्थ को प्रतीति होती है । उसी प्रकार उस वस्तु की प्रतीति वाक्यार्थपूर्वक होती है ।
इति तत्कथं स एव न्याय इह यत्नेन निराकृत इत्याशङ्क्याह—यस्त्वति । न तु सर्वथा साम्येनैतदर्थ: ।
इति प्रकार से वह न्याय यहाँ पर प्रयत्नपूर्वक निराकृत किया गया ? यह शङ्का करके कहते हैं—'जो तो' यह । 'वह' यह । अर्थात् सर्वथा साम्य के द्वारा नहीं ।
तारावती—ऊपर यह सिद्ध किया जा चुका है कि शौच्य पावनत्व इत्यादि अर्थों की गङ्गा इत्यादि शब्दों से प्रतिपत्ति के लिये अभिधाग्रापार से भिन्न कोई अन्य व्यापार मानना पड़ेगा । इतना मान लेने पर भी यह प्रश्न उपस्थित होता है कि उस व्यापार को व्यञ्जनाव्यापार हो क्यों कहा जाना चाहिये ? जिस प्रकार शब्दों के अर्थों से भिन्न तथा उन से गलतार्थ न होनेवाले वाक्यार्थ की प्रतिपत्ति के लिये तात्पर्यवृत्ति मानकर काम चल जाता है उसी प्रकार तात्पर्यवृत्ति से ही शौच्य पावनत्व की प्रतीति भी हो जायगी । उसके लिये पृथक् वृत्ति की कल्पना व्यर्थ है । किन्तु इस विषय में कहा जा सकता है कि यहाँ पर पदार्थ और वाक्यार्थ की पद्घति की एक दार्शनिक सम्मति नहीं है ।
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तृतीय उद्योत:
करते हैं, अन्विताभिधानवादी मीमांसक उसे मानते ही नहीं ।) वैैयाकरण लोग पदार्थप्रतीति को सर्वथा असत्य मानते हैं । (वैयाकरण अखण्ड स्फोट को ही सत्य मानते हैं । उनके मत में वर्ण पद इत्यादि समस्त भेदकल्पना असत्य ही है । पद में वर्ण भिन्न नहीं होते, वर्णों में अवयव भिन्न नहीं होते और वाक्य में पदों की भेदकल्पना भी प्रमाणप्रतिपन्न नहीं है ।' यह है वैयाकरणों के मत का सार ।) इनके अनुसार जब पद पदार्थ कल्पना ही ठीक नहीं तब उसका अनुसरण कर व्याख्या की तात्पर्य में गत्यन्तर स्वीकार ही किस प्रकार की जा सकती है ! कुछ आचार्य वैयाकरणों के इस मिथ्यावाद को नहीं मानते उनके मत में पद-पदार्थ कल्पना सत्य है । किन्तु उनके मत में उसकी व्याख्या इस प्रकार करनी होगी--वाक्य अथवा वाक्यार्थ कार्य है और पद अथवा पदार्थ कारण हैं । यहाँ पर कारण शब्द का अर्थ है उपादान अथवा समवायी कारण । कार्यकारण के लिये यह सामान्च नियम है कि समवायी कारण की प्रतीति पहले तो होती रहती है किन्तु जब कार्य बन चुकता है तब कारण की प्रतीति समाप्त हो जाती है । जैसे घट में समवायिकारण मिट्टी है । जब तक घट नहीं बनता तब तक तो मिट्टी की प्रतीति होती रहती है किन्तु जब घट बन चुकता है तब मिट्टी की पृथक् उपलब्धि नहीं होती । यही बात पद-पदार्थ तथा वाक्य-वाक्यार्थ के विषय में भी कही जा सकती है । पद-पदार्थ की प्रतीति पहले होती रहती है किन्तु वाक्य-वाक्यार्थ के निष्पन्न हो जाने पर पद-पदार्थ बुद्धि जाती रहती है । वाक्यार्थबोध के समय पद-पदार्थ बुद्धि के तिरोहित हो जाने का सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि वाक्य की परिभाषा की गई है कि वाक्य उसे कहते हैं जिसमें एक अर्थ हो । यदि वाक्यार्थबोध काल में पदार्थबोध बना रहेगा तो वाक्य की यह परिभाषा घटेगी किस प्रकार ? ऐसी दशा में उसको वाक्य या वाक्यार्थ कहना ही असंगत हो जायगा । ऐसी दशा में यह मानना ही पड़ेगा कि कार्य-कारण भाव के समान (घट तथा मृतिका के समान) वाक्य और वाक्यार्थबोध में भी पद और पदार्थ का ज्ञान समाप्त हो जाता है । यह तो हुई मीमांसकों के अनुसार व्याख्या । बौद्ध लोग क्षणिकवादी होते हैं । उनके मत के अनुसार प्रत्येक पदार्थ क्षण-क्षण पर बदलता रहता है । इस प्रकार क्षणस्थायी होने के कारण कार्योत्पत्ति काल में समवायी कारण की सत्ता शेष ही नहीं रह जाती । इसी प्रकार (सांख्य और) कापालिकों के मत में कार्योत्पत्ति होने पर कारणसत्ता तिरोहित हो जाती है । ऐसी दशा में कार्यप्रतीति काल में कारणप्रतीति तिरोहित हो जाती है । आशय यह है कि चाहे हम वैयाकरणों के अनुसार पदार्थकल्पना को असत्य मानें, चाहे मीमांसकों के अनुसार कार्य-कारण भाव मानकर कार्यप्रतीति काल में कारण की अप्रतीति मानें, चाहे बौद्धों के अनुसार कारण के क्षणस्थायी होने से कार्यप्रतीति काल में कारण की असत्ता स्वीकार करें अथवा कापालिकों के अनुसार कार्य में कारण का तिरोभान मानें इतना तो निश्चित ही है कि किसी भी सिद्धान्त के अनुसार वाक्यार्थबोधकाल में पदार्थबोध नहीं होता । इसके प्रतिकूल वाच्य और व्यंग्य दोनों अर्थ एक साथ प्रतीतिगोचर होते हैं । व्यंग्य के प्रतीतिगोचर होने के समय वाच्यबुद्धि दूर नहीं हो जाती; अपितु व्यंग्य प्रतीति का यह अनिवार्य तत्व है कि उसकी प्रतीति वाच्यप्रतीति के साथ ही होती है । इसी अन्तर के कारण व्यंग्य और वाच्य
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की प्रतीतियों के विषय में पदार्थ-वाक्यार्थ न्याय लागू नहीं हो सकता। अतः उस विषय में किसी अन्य न्याय का अन्वेषण करना होगा क्योंकि पदार्थवाक्यार्थ न्याय के निराकरण के साथ तात्पर्यशक्ति के द्वारा निर्वाह हो सकने का तो प्रश्न ही जाता रहा। अत एव कहना होगा कि वाच्य और व्यंग्य के विषय में प्रदीप-घटन्याय लागू होगा। प्रदीप घट को प्रकाशित करता है और स्वयं भी प्रकाशित होता रहता है। पहले प्रदीप स्वयं प्रकाशित होता है और बाद में घट को प्रकाशित कर देता है। घट के प्रकाशित हो जाने के बाद प्रदीप का प्रकाशित होना समाप्त नहीं हो जाता। इसी प्रकार अभिधेयार्थ प्रकाश के समान पहले प्रकाशित होता है; फिर जिस प्रकार प्रकाश घट को प्रकाशित करता है उसी प्रकार अभिधेयार्थ व्यंग्यार्थ को प्रकाशित करता है। बाद में जैसे घट के प्रकाशित हो जाने से प्रदीप प्रकाश निवृत्त नहीं हो जाता उसी प्रकार व्यंग्यार्थ प्रकाशन के बाद वाच्यार्थ निवृत्त नहीं हो जाता। किन्तु दोनों ही साथ-साथ प्रतीतिगोचर होते रहते हैं।
आशय यह है कि चाहे हम न्यायकरन दर्शन के अनुसार मानें कि पद-पदार्थ कल्पना असत्य हैं; चाहे मीमांसकों के अनुसार कार्यकारणभाव सम्बन्ध मानें, चाहे बौद्धों के अनुसार क्षणिकतावाद अंगीकार करें और चाहे कापलिकों के मत का अनुसरण करते हुये कार्योत्पत्ति के बाद कारण का तिरोधान मान ले, प्रत्येक अवस्था में पद-वाच्य-वाक्यार्थ की समसामयिक सत्ता स्वीकार नहीं की जा सकती जब तक कि वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ दोनों का समसामयिक होना अनिवार्य हो। इसीलिए वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ के विषय में पदार्थ-वाक्यार्थ न्याय नहीं लागू हो सकता। इस विषय में यही कहना होगा कि वाच्यार्थ के द्वारा व्यंग्यार्थ प्रकाशित होता है; क्योंकि प्रकाशक और प्रकाश्य दोनों एक साथ रह सकते हैं।
(ध्वन्या०)—नन्वेवं युगपदर्थद्वययोगित्स्वं वाक्यस्य प्राप्तं तद्भावे च तस्य वाक्यतैव विघटते, तस्या एकार्थलक्षणत्वात्; नैष दोषः; गुणप्रधानभावेन तयोः्यव-स्थानात् । व्यङ्ग्यस्य हि क्वचिच्चप्राधान्यं वाच्यस्योपसर्जनभावः क्वचिद्व्यतिप्राधान्ये ध्वनिचरितयुक्तमेव, वाच्यप्राधान्ये तु प्रकारांतरं निर्देक्ष्यते। तस्मात्तु स्थितमेतत्—व्यङ्गच्यपरत्वेऽपि काव्यस्य न व्यङ्ग्य-स्याभिधेयरत्वम् ।
(अनु०) (प्रशन) निस्संदेह इस प्रकार वाक्य का एक साथ दो अर्थों से युक्त होना सिद्ध हुआ, उसके होने पर उसकी वाक्यता ही नष्ट हो गई क्योंकि उसका लक्षण एक अर्थ होना है। (उत्तर) यह दोष नहीं है क्योंकि उन दोनों की व्यवस्था मुख्य और गौण भाव से हो जाती है कहीं व्यंग्य की प्रधानता होती है और वाच्य की गौणरूपता होती है; कहीं वाच्य का प्राधान्य होता है और दूसरे की गौणरूपता होती है। उसमें व्यंग्य की प्रधानता में ध्वनि (होती है) यह कहा ही गया है। वाच्य प्राधान्य में तो प्रकारांतर का निर्देश किया जायगा। इससे यह स्थित है—काव्य के व्यंग्यपरक होने पर भी व्यंग्य की अभिधेयरूपता नहीं होती अपितु व्यंग्यपरकता ही होती है।
(लो०)—एवमिति । प्रदीपघटवद्वयपदद्वयभावाभासप्रकारेणोभयार्थः ।
एवमिति । प्रदीपघटवद्वयपदद्वयभावाभासप्रकारेणोभयार्थः ।
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तृतीय उद्योतः
वाक्यताया:। एकार्थलक्षणमर्थैकत्वाद्धि वाक्यमेकमितीयुक्तम्। सकृत् श्रुतो ही शब्दो यत्रैव समयस्मृति करोति स चेदनैनावगमितः तद्विराम्य व्यपाराभावात् समयस्मरणानां बहूनां युगपदयोगार्कोष्ट्रंभेदस्यावसरः। पुनः श्रुतस्तु स्मृतो वापि नासावितिभावः। तयोरिति वाच्यव्यंग्ययोः। तत्रेति। उभयोः प्रकारयोरमध्यावदात प्रथमः प्रकार इत्यर्थः। प्रकारान्तरमिति गुणीभूतव्यंग्यसंज्ञितम्। व्यंग्यत्वमेवेति प्रकारयत्वमेवेत्यर्थः।
(अनु.) ‘इस प्रकार’ यह। अर्थात् प्रदीपघट के समान एक साथ दोनों अवभास के प्रकार के द्वारा। ‘उसके’ अर्थात् वाक्यता के। ‘एकार्थ्य लक्षण का आशय यह है कि अर्थ की एकता में वाक्य होता है यह कहा गया है। निस्सन्देह एक बार सुना हुआ शब्द जिस किसी स्थान पर सङ्केत स्मरण करता है यदि वह इसी के द्वारा अवगत करा दिया जाय तो विरत होकर व्यापार न होने के कारण बहुत से सङ्केत स्मरणों का एक साथ होना सम्भव न होने से अर्थ-मेद का अवसर ही क्या ? भाव यह है कि यह पुनः सुना हुआ या स्मरण किया हुआ नहीं है। ‘उन दोनों का’ अर्थात् वाच्य और व्यंग्य का। ‘बहाँ पर’ यह। अर्थात् जहाँ पर दोनों प्रकारों के बीच में पहला प्रकार है। ‘दूसरा प्रकार’ यह। अर्थात् गुणीभूत व्यंग्य नामक। व्यंग्यत्व हो अर्थात् प्रकारयत्व ही।
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तृतीय उद्योतः
तारावती—(प्रश्न) प्रथम उद्योत में व्यंग्याभिव्यक्ति के लिये पदार्थ-वाक्यार्थ न्याय की उपमा दी गई थी। वहाँ पर कहा गया था—‘जिस प्रकार पदार्थ के द्वारा वाक्यार्थ की प्रतीति होती है उसी प्रकार व्यंग्यवस्तु की प्रतीति वाक्यार्थपूर्वक होती है किन्तु यहाँ पर प्रयत्नपूर्वक यह सिद्ध कर दिया गया कि वाच्य व्यंग्य के विषय में पदार्थ-वाक्यार्थ न्याय लागू नहीं होता। इस पूर्वापरविरोध की संगति किस प्रकार बैठ सकती है?’ (उत्तर) (उपमा केवल साधर्म्य में होती है। उसमें वैषम्य नहीं लिया जाता।) प्रथम उद्योत की उक्त कारिका में उपमान और उपमेय का साधर्म्य केवल इतना ही है कि एक अर्थ की प्रतीति में दूसरा अर्थ उपाय होता है। इतने साम्य के आधार पर ही प्रथम उद्योत में पदार्थ-वाक्यार्थ को उपमा दे दी गई थी, पूर्ण साम्य के आधार पर नहीं।
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तृतीय उद्योतः
(प्रश्न) जब घट और प्रदीप की उपमा देते हैं और उसके द्वारा यह सिद्ध करने की चेष्टा करते हैं कि दोनों अर्थों की प्रतीति एक ही काल में होती है तब उस वाक्य की वाक्यता ही जाती रहती है। कारण यह है कि आचार्यों ने वाक्य की यही परिभाषा की है जिसका एक अर्थ हो उसे वाक्य कहते हैं। जैमिनि सूत्र में वाक्य की परिभाषा इस प्रकार दी हुई है—‘अर्थैकत्वादेकं वाक्यं साकान्क्षं चेदविभागे स्यात्’ अर्थात् यदि विभक्त करने पर उसके पदरूप अवयव परस्पर साकाङ्क्ष हों और समस्त पदसमूह का एक अर्थ हो तो उसे वाक्य कहते हैं। (प्रतिप्रश्न) जब वाक्य के लिये आप एक अर्थ को होना अनिवार्य मानते हैं तब ऐसे स्थलों की क्या व्यवस्था होगी जहाँ इलेष के कारण एक वाक्य के दो अर्थ हो जाते हैं ? (समाधान) ऐसे अवसरों पर भी वाक्य एकार्थक ही रहता है। दोनों अर्थों को मिलाकर एक-
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रूपता स्थापित कर दी जाती है। वह इस प्रकार समझिये—मानलीजिये किसी शब्द का एक बार उच्चारण किया गया है, यदि वह शब्द एक से अधिक अनेक अर्थों का वाचक है। एक से भिन्न अनेक अर्थ लसी शब्द से ही निकलते हैं और उन अर्थों में उस शब्द का संकेत-स्मरण भी होता है। अब प्रश्न यह है कि उस एक शब्द से ही अनेक संकेतित अर्थ निकल किस प्रकार सकते हैं? क्या एक के बाद दूसरा इस क्रम से वे अर्थ निकलते हैं या सब एक साथ ही निकलते हैं? क्रमशः अर्थ निकल नहीं सकते क्योंकि शास्त्रों का नियम है कि शब्द की किये रुक-रुक कर नहीं होती। एक अर्थ का प्रत्यायन कराकर अभिधा व्यापार समाप्त हो जाता है—उसका पुनर्जोवन हो ही नहीं सकता। सब अर्थों का अभिधान एक साथ भी नहीं हो सकता क्योंकि अर्थ के अभिधान के लिये संकेतस्मरण एक अनिवार्य तत्व है। अनेक अर्थों का एक साथ बुद्धि में उपार्जन हो सकना असम्भव है। अत एव दोनों ही प्रकार से अर्थभेद की कल्पना सर्वथा असंगत है। शब्द न तो बार-बार सुना गया है और न उसका स्मरण ही बार-बार किया गया है जिससे अनेकार्थता का प्रश्न उठे। अत एव वाच्य की यह परिभाषा असन्दिग्ध है कि एक अर्थ में पर्यवसित होनेवाले पदसमूह को वाक्य कहते हैं। तब यह प्रश्न उठता है कि यदि किसी पद समुदह के दो अर्थ हो गये हों एक वाच्यार्थ और दूसरा व्यंग्यार्थ, वहाँ पर वाक्य की क्या रचना किस प्रकार घट सकती है? कि जहाँ एक अर्थ होता है उसे वाक्य कहते हैं।
( उत्तर ) वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ की व्यवस्था गोण और मुख्य रूप में कर दी जाती है। एक अर्थ को गोण मान लिया जाता है और दूसरे को प्रधान। इस प्रकार एक ही अर्थ मुख्य होने के कारण वाक्य की परिभाषा ठीक रूप में घट जाती है। कहीं-कहीं व्यंग्य प्रधान होता है और वाच्य गोण होता है। कहीं-कहीं वाच्य प्रधान होता है और व्यंग्य गोण होता है। यह विस्तार पूर्वक बतलाया जा चुका है कि जहाँ वाच्य की अपेक्षा व्यंग्य प्रधान होता है उसे ध्वनि कहते हैं। इसके प्रतिकूल जहाँ व्यंग्य की अपेक्षा वाच्य प्रधान होता है उसे गुणीभूत व्यंग्य कहते हैं। इस बात का निर्देश आगे चलकर किया जायगा। इस समस्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि शब्द व्यंग्यपरक भी हो ( और 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थः' के अनुसार उसे ही वाच्य संज्ञा प्राप्त होनेवाली हो ) फिर भी वहाँ पर व्यंग्यार्थ अभिधावृत्ति से गतर्य नहीं होता अनितु उसके लिये व्यंजन-वृत्ति मानना अनिवार्य हो जाता है।
किचिन्नगद्यपस्य प्राधान्येनाविवक्षायां वाच्यत्वं तावद्भवदुधिरनास्युपगतस्थप्रमत्ततपरत्वाच्छब्दानां करिचद्धिष्य इति । यत्रापि तस्य प्राधान्यं तत्रापि किमिति तस्य स्वरूपमपहूय नीयते । एवं तावद्वाचकत्वादन्यदेव ।
यत्रापि तस्य प्राधान्यं तत्रापि किमिति तस्य स्वरूपमपहूयते । एवं तावद्वाचकत्वादन्यदेव ।
देव व्यञ्जकत्वस्यान्यत्वं पददाचकत्वं शब्ददैकाश्रयमितरत् । शब्दार्थयोरपि व्यङ्गचकत्वस्य प्रतिपादितत्वात् ।
(अनु०) और भी व्यंग्य की प्राधान्यरूप में विवक्षा न होने पर आपको वाच्यत्व स्वीकार नहीं करना चाहिये क्योंकि वहाँ पर शब्द तत्परक नहीं है। इससे व्यंग्य शब्द का कोई विपय है। जहाँ पर उसका प्राधान्य भी है वहाँ पर भी उसका स्वरूप क्यों छिपाया जा रहा है। इस प्रकार वाच्यत्व से तो व्यङ्गचकत्व अन्य ही है।
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तृतीय उद्योतः
अपेक्षा व्यङ्गचकत्व अन्य होता है जोकि वाचकत्व शब्द मात्र के आश्रित होता है और दूसरा शब्दाश्रित भी होता है और अर्थाश्रित भी, क्योंकि दोनों के व्यङ्गचकत्व का प्रतिपादन किया गया है।
(लो०) ननु यत्परः शब्दः स शब्दार्थ इति व्यङ्गचस्य प्राधान्ये वाच्यत्वमेव न्याय्यम्, तह्य प्रadhane किं युतं व्यङ्गचर्मिति चेत्सदृशो नः पक्ष, एतदाह—किंचेत्। ननु प्राधान्ये मा भूदव्यङ्गचत्वमित्याशङ्क्याह—यत्रापीति। अर्थान्तरत्व, सम्बन्धित्वमनुपयुक्तसमयत्वमिति व्यङ्गचयतां निबन्धनं तच्च प्राधान्येडपि विद्यते इति स्वरूपमहेयमेवेति भावः। एतदुपसंहरति—एवमिति। विषयभेदेन स्वरूपभेदेन चेत्यर्थः। तावदिति वक्तव्यान्तरमासूयति। तदेवाह—इतिश्चेति। अननन सामग्रिभेदात्कारनभेदोऽप्यस्तीति दर्शयति। एतच्च विततं ध्वनिलक्षणे ‘यत्रार्थः शब्दो वा’ इति वाक्रहणं ‘व्यङ्गक्तः’ इति द्विवचनं च व्याचक्षाणैरसमाभिः प्रथमोद्योत एव दर्शितमिति पुनर्-विस्तार्यते।
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(अनु०) निस्सन्देह ‘यत्परक शब्द होता है वह शब्दार्थ हुआ करता है’ इसलिये व्यङ्ग्य के प्राधान्य होने पर वाच्यस्व ही न्याय्य है तो अप्रधान में क्या व्यङ्गयस्व उचित है, यदि यह कहो तो हमारा पक्ष सिद्ध हो गया। यह कहते हैं—‘और भी’ इत्यादि ‘निस्सन्देह प्राधान्य में व्यङ्गयत्व न हो’ यह आशङ्का करके कहते हैं—‘यहां पर.........भी’ इत्यादि। अर्थान्तरत्व, सम्बन्धित्व और अनुपयुक्त सङ्केतत्व यह व्यङ्ग्यता में निबन्धन है और वह प्राधान्य में भी विद्यमान ही है, अतः उसका स्वरूप नहीं छिपाया जा सकता—यह भाव है। इसका उपसंहार करते हैं—‘इस प्रकार’ यह। अर्थात् विषयभेद से और स्वरूप से। ‘तावत्’ इससे दूसरे वक्तव्य का उपक्रम करते हैं। वही कहते हैं—‘इससे भी’ यह। इससे यह दिखलाते हैं कि सामग्रीभेद से कारणभेद भी होता है। यह ध्वनिलक्षण में ‘यत्रार्थः शब्दो वा’ इस कारिका में ‘वा’ ग्रहण की ओर ‘व्यङ्गक्तः’ में द्विवचन की व्याख्या करते हुये हमने प्रथम उद्योत में ही विस्तारपूर्वक दिखला दिया है अतः पुनः विस्तारपूर्वक नहीं दिखलाया जा रहा है।’
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यत्परः शब्दः स शब्दार्थः
की विशेष मीमांसा
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तारावती—(प्रश्न) सामान्यतया नियम यही है कि शब्द का वही अर्थ होता है जिस अर्थ को कहने के लिये वह प्रयुक्त किया गया हो। यदि शब्द व्यङ्गचार्थप्रतीति के लिये प्रयुक्त किया गया हो तो व्यङ्गचार्थ ही शब्द का अर्थ माना जायगा। ऐसी दशा में जहां व्यङ्गचार्थ की प्रधानता हो और वाच्यार्थ गौण हो वहां पर वाच्यार्थ की अपेक्षा शब्द व्यङ्गचार्थपरक ही होता है। अतः व्यङ्ग्यार्थ को मुख्य वाच्यार्थ कहना ही ठीक है। फिर आप उसे व्यङ्ग्य की संज्ञा क्यों प्रदान करते हैं ?
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(उत्तर) व्यङ्ग्यार्थ और वाच्यार्थ के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय में दो परिस्थितियां हो सकती हैं—एक तो ऐसी परिस्थिति जिसमें व्यङ्गचार्थ गौण हो और वाच्यार्थ मुख्य हो। तथा मुख्य वाच्यार्थ की पुष्टि का उपकारक होकर ही व्यङ्गचार्थ आये। दूसरी परिस्थिति इसके प्रतिकूल होती है अर्थात् वहां पर वाच्यार्थ उपकारक होता है और उससे उपकृत होकर व्यङ्गचार्थ को ही प्रधानता प्राप्त होती है।
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यत्परः शब्दः स शब्दार्थः
के अनुसार प्रथम प्रकार की परिस्थिति में शब्द वाच्यपरक होता है और द्वितीय प्रकार की
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ध्वन्यालोके
परिस्थिति में व्यञ्जकपरक । अब प्रश्न यह उठता है कि प्रथम प्रकार की परिस्थिति में जहाँ व्यंग्यार्थ मुख्य नहीं होता और वह मध्यवर्ती ही रह जाता है वहाँ उसे वाच्य की संज्ञा नहीं दी जा सकती क्योंकि शब्द तट्परक नहीं है । ऐसी दशा में आप उसे व्यंग्य ही कहने के लिये बाध्य होंगे । इससे हमारा यह पक्ष तो सिद्ध ही हो गया कि व्यंग्यार्थ कुछ न कुछ होता अवश्य है और वह शब्द का विषय भी होता है । अब यह परिस्थिति शेष रह जाती है जहाँ व्यंग्य की प्रधानता होती है उसे भी व्यंग्य कहना ठीक है वहाँ पर भी उसके स्वरूप का छिपाया जाना उचित नहीं है । (कारण यह है कि स्फुटतित अर्थ न होने के कारण उसे हम वाच्यार्थ नहीं कह सकते ।) व्यंग्य संज्ञा प्राप्त करने के लिये जिन शर्तों की आवश्यकता होती है वे सब शर्तें वहाँ पर भी पूरी ही हो जाती है जहाँ वाच्यार्थ गौण और व्यंग्यार्थ मुख्य होता है । व्यंग्य संज्ञा प्राप्ति के लिये इन शर्तों की अपेक्षा होती है—(१) अन्य अर्थ का होना अर्थात् व्यंग्यार्थ वहाँ पर होता है जहाँ एक से अधिक अर्थ होते हैं । (२) सम्बन्धी का सम्बन्धी होना अर्थात् शब्द का सम्बन्धी या तो वाच्यार्थ होता है या लक्ष्यार्थ, उस वाच्यार्थ या लक्ष्यार्थ का सम्बन्धी व्यंग्यार्थ होता है । और (३) संकेत का अनुयुक्त होना अर्थात् व्यंग्यार्थ संकेतित अर्थ नहीं होता अपितु तात्पर्य अर्थ होता है । यही तीनों शर्तें व्यंग्यार्थ की होती हैं । ये तीनों शर्तें वहाँ पर भी लागू ही हो जाती हैं जहाँ वाच्यार्थ गौण और व्यंग्यार्थ मुख्य होता है । अतः वहाँ पर भी उसकी व्यंग्य संज्ञा का परित्याग नहीं किया जा सकता । इससे यह सिद्ध हो गया कि व्यंग्यार्थ वाच्य से सर्वथा भिन्न ही हुआ करता है । इस भेद में दो कारण हैं (१) वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ के स्वरूप में परस्पर भेद होता है । (वाच्यार्थ संकेतानुसारी होता है और व्यंग्यार्थ में संकेत की अपेक्षा नहीं होती ।) और (२) वाच्यार्थ तथा व्यंग्यार्थ के विषय परस्पर भिन्न होते हैं । (वाच्यार्थ का विषय संकेतित अर्थ होता है और व्यंग्यार्थ का विषय रस, वस्तु तथा अलंकार ये तीन होते हैं ।) केवल इतना ही नहीं अपितु वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ में सामग्री का भी भेद होता है और सामग्री भेद होने से कारण का भी भेद हो जाता है । कारण यह है कि वाच्यार्थप्रतीति के लिये केवल शब्द की ही सामग्री के रूप में अपेक्षा होती है; किन्तु जैसा कि पहले दिखलाया जा चुका है व्यंग्यार्थ की प्रतीति के लिये शब्द और अर्थ दोनों का आश्रय सामग्री के रूप में लिया जाता है । इस प्रकार वाच्यार्थ में केवल शब्द ही कारण होता है किन्तु व्यंग्यार्थ में शब्द और अर्थ दोनों कारण होते हैं । इस बात का प्रतिपादन किया ही जा चुका है कि शब्द और अर्थ दोनों व्यञ्जक होते हैं । इस विषय का विशेष निरूपण प्रथम उद्योत में ‘यत्रार्थ: शब्दो वा’ इस कारिका में ‘वा’ ग्रहण तथा ‘व्यक्तिक्’ के द्विवचन की व्याख्या के अवसर पर किया जा चुका है । अतः वहाँ देखना चाहिये ।
(ध्वन्या०) गुणवृत्तिस्तुपचारेण लक्षणया चोभयाथ्यापि भवति । किन्तु ततोजपि व्यञ्जकत्वं स्वरूपतो विषयतश्च भिद्यते । रूपवेदस्तावदयम्— यदमुख्यतया व्यापारो गुणवृत्ति: प्रसिद्धा । व्यञ्जकत्वं तु मुख्यतयैव शब्दस्य व्यापार: न ह्यर्थ-दृश्यदृश्यतयप्रतীতिस्तस्या अमुख्यत्वं मनागपि लक्ष्यते ।
अथ वाच्यम्: स्वहृदयम्;—व्यञ्जकत्वं तु न लक्षणा ।
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३
तृतीय उद्योतः
कतवमेवोच्यते । व्यङ्क्ककस्वं तु वाचकत्वादन्यतं विभिन्नमेव । एतच्च प्रतिपादितम् । अयङ्क्यापरो रूपभेदो यद्गुणवृत्तो यदार्थोडर्यान्तरमुपलक्ष्यति तदोपलक्षणीयार्थात्मना परिणत एवं सौम्पद्यते। यथा 'गङ्गायां घोष:' इत्यादौ । व्यङ्क्यकत्वमार्गे तु पदार्थोडर्यान्तरं द्योतयति तदा स्वरूपं प्रकाशयन्नेवासावनरस्य प्रकाशक: प्रतীয়ते प्रदीपवत् । यथा 'लीलाकमलपत्राणि गण्यामास पार्वती' इत्यादौ । यदि च यत्रातिरस्कृतस्वप्रतीतिरथ्योडर्यान्तरं लक्ष्यति तत्र लक्षणाव्यवहारः क्रियते तदेवं सति लक्षणैव मुख्य: शब्दव्यापार इति प्राप्नुम् । यस्मात्प्रायेण वाक्यानां व्यङ्ग्यव्यतिरिक्ततात्पर्यविषयार्थावभासितवम् ।
(अनु०) गुणवृत्ति तो उपचार और लक्षणा दोनों के आश्रयवाली होती है । किन्तु व्यङ्क्यकत्व उससे भी स्वरूप के द्वारा और विषय के द्वारा भिन्न हो जाता है । रूपभेद तो यह है—कि अमुख्यरूप में व्यापार गुणवृत्ति प्रसिद्ध है । व्यङ्क्यकत्व तो मुख्यरूप में ही शब्द का व्यापार होता है । अर्थ से जो तीन व्यङ्गयों की प्रतीति है उसका अमुख्यत्व थोड़ा भी लक्षित नहीं होता । और यह दूसरा स्वरूपभेद है— जो कि गुणवृत्ति अमुख्यरूप में स्थित वाचकत्व ही कही जाती है । व्यङ्क्यकत्व तो वाचकत्व से अत्यन्त विभिन्न ही होता है । इसका तो प्रतिपादन किया ही जा चुका है । और यह दूसरा रूपभेद है जो कि गुणवृत्ति में जब अर्थ दूसरे अर्थ को लक्षित करता है तब उपलक्षणीय अर्थ की आत्मा के रूप में परिणत हुआ ही हो जाता है । जैसे 'गङ्गायां घोष:' इत्यादि में । व्यङ्क्यकत्व के मार्ग से तो जब अर्थ दूसरे अर्थ को द्योतित करता है तब स्वरूप को प्रकाशित करते हुये ही यह दूसरे का प्रकाशक प्रतीत होता है जैसे 'पार्वती लीला-कमलपत्रों को गिन रही थी' इत्यादि में । और अपनी प्रतीति का तिरस्कार न करते हुये जहाँ अर्थ दूसरे अर्थ को लक्षित करता है वहाँ लक्षणा व्यवहार किया जाय तो यह सिद्ध हो गया कि लक्षणा ही शब्द का मुख्य व्यापार है । क्योंकि वाक्य प्रायः व्यङ्गयव्यतिरिक्त तात्पर्यार्थ के अवभासी होते हैं ।
३
तृतीय उद्योतः
(लो०) एवं विषयमेदादतस्वरूपमेदादाच्च वाचकत्वान्मुख्यात्प्रकाशकत्वस्य भेदं प्रतिपाद्योभयाश्रयत्वविशेषात्तहि व्यङ्ककत्वगौणत्वयोः को भेद इत्यशङ्क्यामुख्यादपि प्रतिपाद्यतुमाह—गुणवृत्तिरिति । उभयाश्रयापेक्षि । शब्दार्थाश्रया । उपचारलक्षणयोः प्रयमोद्योत एवं विमज्य निर्यातं स्वरूपमिति न पुनर्लिख्यते । मुख्यास्खलद्गतित्वेनैतर्थः । व्यङ्गचात्रयमिति । वस्तुलड्घाररसात्मकम् । वाचकत्वमेवेति । तत्रापि हि तथैव समयोपयोगोऽस्त्येवेत्यर्थः । प्रतिपादितमिति । इदानामेव परिणत इति । स्वेन रूपेणानिर्भासमान इत्यर्थः ।
(अनु०) इस प्रकार विषयभेद से, स्वरूपभेद से और कारणभेद से मुख्य वाचकत्व से प्रकाशत्व के भेद का प्रतिपादन कर 'तो उभयाश्रयत्व की विशेषता के कारण व्यङ्ककत्व और गौणत्व में क्या भेद है ?' यह शङ्का करके अमुख्य से भी प्रतिपादन करने के लिये कहते हैं—गुणवृत्ति इत्यादि । दोनों के आश्रयवाली भी अर्थात् शब्द और अर्थ के आश्रयवाली भी । उपचार लक्षणा इत्यादि दोनों के आश्रयवाली । उपचारलक्षणयोः प्रयमोद्योत एवं विमज्य निर्यातं स्वरूपमिति न पुनर्लिख्यते । मुख्यास्खलद्गतित्वेनैतर्थः । व्यङ्गचात्रयमिति । वस्तुलड्घाररसात्मकम् । वाचकत्वमेवेति । तत्रापि हि तथैव समयोपयोगोऽस्त्येवेत्यर्थः । प्रतिपादितमिति । इदानामेव परिणत इति । स्वेन रूपेणानिर्भासमान इत्यर्थः ।
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और लक्षणा का स्वरूप प्रथम उद्योत में ही विभक्त करके निर्धारित कर दिया गया अतः यहाँ पुनः नहीं लिखा जा रहा है। 'मुख्यता के रूप में ही' अर्थात् मुख्यार्थबाध होने के कारण ही। तीन व्यंग्य अर्थात् वस्तु, अलंकार और रसरूप व्यंग्य। 'वाचकत्व ही' यह। अर्थात् उसमें भी उसी प्रकार संकेत का उपयोग है ही। 'प्रतिपादन किया गया है' इसी समय। 'परिणत' यह। अर्थात् अपने रूप में निर्भरित न होते हुये।
लक्षणा और व्यञ्जना का स्वरूपभेद तारावती—ऊपर यह दिखलाया जा चुका है कि वाचकत्व मुख्य होता है तथा उसका प्रकाशकत्व से विषयमेद भी होता है और स्वरूपभेद भी होता है। इन्हीं हेतुओं से वाचकत्व और प्रकाशकत्व का भेद माना जाता है। अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि जो बातें व्यञ्जकत्व में होती हैं वे ही गौणीवृत्ति में भी होती हैं। व्यञ्जकत्व भी शब्द और अर्थ दोनों का आश्रय लेता है और गौणीवृत्ति भी दोनों का आश्रय लेती है! फिर व्यञ्जकत्व का गौणीवृत्ति से क्या भेद हुआ? इसी प्रश्न पर विचार करने के लिये यहाँ यह प्रकरण उठाया जा रहा है।
(लक्षणा दो प्रकार की होती हैं—शुद्धा और गौणी। यहाँ आलोक में शुद्धा लक्षणा के लिये लक्षणा शब्द का प्रयोग किया गया है और गौणी के लिये उपचार शब्द का। ये दोनों ही अप्रधान अर्थ को कहनेवाली होती हैं। इसीलिये दोनों को मिलाकर गुणवृत्ति (अप्रधानवृत्ति) शब्द का प्रयोग किया जाता है।) इसमें सन्देह नहीं कि गुणवृत्ति चाहे लक्षणापरक हो चाहे उपचारपरक, दोनों अवस्थाओं में गुणवृत्ति शब्द और अर्थ दोनों का आश्रय लेती हैं; तथापि यह कहा नहीं जा सकता कि गुणवृत्ति और व्यञ्जना दोनों एक ही वस्तु हैं।
कारण यह है कि लक्षणा और गुणवृत्ति दोनों एक दूसरे से स्वरूप के दृष्टिकोण से भिन्न होती हैं और विषय के दृष्टिकोण से भी भिन्न होती हैं। स्वरूपभेद को इस प्रकार समझिये—गुणवृत्ति उसे कहते हैं जहाँ अमुख्यरूप में शब्द का व्यापार हो। गुणवृत्ति में पहले वाच्यार्थबोध होता है; फिर तात्पर्यनुपपत्ति के कारण उस अर्थ का बाघ हो जाता है। इस प्रकार शब्द अपने अर्थ के विषय में सकलद्गति हो जाता है। तब उस मुख्यार्थ से सम्बन्ध रखनेवाला दूसरा अर्थ जहाँ पर ले लिया जाता है वहाँ वह गुणवृत्ति या लक्षणा कहलाती है।
इस प्रकार सकलद्गति होने के कारण लक्षणा या उपचार दोनों प्रकार की गुणवृत्तियों को अमुख्य व्यापार कहा जाता है। यह बात उसके गुणवृत्ति इस नाम से ही प्रकट होती है। इसके प्रतिकूल यह कोई कह नहीं सकता कि कि व्यञ्ज्यार्थ भी गौण ही होता है, रस गौण होता है यह तो कहा ही नहीं जा सकता। चमत्कारपर्यवसायी होने पर वस्तु और अलंकार भी मुख्य ही होते हैं। वे कभी गौण कहे ही नहीं जा सकते। इस प्रकार तीनों ही प्रकार के व्यंग्यार्थ मुख्य ही होते हैं। वे कभी गौण नहीं होते और लक्षणा सर्वदा अमुख्य ही होती है।
यहीं इन दोनों का स्वरूपभेद है। (आश्रय यह है कि लक्षणा सर्वदा बाध--सापेक्षिणी होती है और मुख्य अर्थ के बाधित हो जाने पर तत्संबद्ध अमुख्य अर्थ का प्रत्यायन कराती है। अमुख्य वृत्ति व्यञ्जना बाध-सापेक्षिणी नहीं होती। अतः व्यञ्जना द्वारा प्रतिपादित अर्थ मुख्य ही होता है। यहीं इन दोनों का स्वरूपभेद है।)
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तृतीय उद्योत:
दूसरे प्रकार का स्वरुपभेद यह होता है कि लक्षणा एक प्रकार की वाचकत्व वृत्ति ही कही जाती है अर्थात वह एक प्रकार की अभिधा ही होती है; भेद केवल यह होता है कि कहीं अभिधा मुख्य संकेतित अर्थ का प्रत्यायन कराती है किन्तु लक्षणा अमुख्य अर्थ को कहती है । इसके प्रतिकूल यह सिद्ध ही किया जा चुका है कि किपय्यना अभिधा से सर्वथा भिन्न ही होती है । (विस्तृत विवेचन के लिये देखिये प्रथम उद्योत का भेदनिरुपणपरक प्रकरण । ) आशय यह है कि लक्षणा सर्वदा शक्य-सम्बन्ध में ही होती है और वह अभिधापुच्छभूता कही जाती है । उसमें किसी न किसी रूप में संकेत का उपयोग होता ही है । किन्तु व्यज्य्यार्थप्रतीति के लिये संकेत की कोई अपेक्षा नहीं होती; व्यज्य्यना शक्यसम्बन्ध में ही नहीं होती ।
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तृतीय उद्योत:
एक दूसरा स्वरुपभेद इस प्रकार का होता है कि गुणवृत्ति में जहाँ एक अर्थ दूसरे अर्थ को उपलक्षित करता है वहाँ वह अपने को बिलकुल खो देता है और उपलक्षणीय अर्थ के रूप में पूर्णतया परिणत हो जाता है । (जैसे ‘गंगा में घर’ इस वाक्य में प्रवाहवाचक गंगा शब्द ‘तीर’ अर्थ को लक्षित करता है और पूर्णरूप से तीर अर्थ को ही कहने लगता है । प्रवाहरूप वाच्यार्थ अपने को तीररूप लक्ष्यार्थ में सर्वदा खो देता है । ) किन्तु व्यजकत्वमात्र में ऐसा नहीं होता । उसमें जब एक अर्थ दूसरे को प्रकाशित करता है तब वह अपने को भी प्रकाशित करता रहता है और वह दूसरे को भी प्रकाशित कर देता है । वह दूसरे को प्रकाशित करने में अपने को खो नहीं देता । जैसे दीपक स्वयं प्रकाशित होता है और घट को भी प्रकाशित करता है । घट के प्रकाशन के अवसर पर दीपक का प्रकाश जाता नहीं रहता । उदाहरण के लिये कुमारसम्भव में जिस समय नारद पार्वती के विवाह की चर्चा उनके पिता हिमाचल से कर रहे थे उस समय ‘पार्वती पिता के पास बैठी हुई नीचे को मुख किये लीला-कमल की पंखडियों को गिन रहीं थीं ।’ यहाँ पर पार्वती का मुखनमन इत्यादि वाच्यार्थ है और पार्वती की लज्जा इत्यादि लक्ष्यार्थ है । पार्वती की लज्जा को अभिव्यक्त करने में मुखनमन रूप वाच्यार्थ अपने को खो नहीं देता किन्तु अभिव्यज्यजना काल में स्वयं भी प्रकाशित बना रहता है । लक्षणा के लिये यह अनिवार्य है कि उसमें वाच्यार्थ का बाघ अवश्य हो । यदि यह अनिवार्य शर्त नहीं मानी जाती तो लक्षणा गौणीवृत्ति नहीं रह जायगी अपितु मुख्यवृत्ति बन जायगी । क्योंकि जितने भी वाच्य होते हैं उनमें अधिकतर वाच्यों में शब्दार्थ की अपेक्षा तात्पर्यार्थ अतिरिक्त हुआ करता है और सभी शब्दार्थ मिलकर तात्पर्यार्थ का अवभासन करते हैं । यदि लक्षणा ऐसे स्थान पर मानी जायगी जहाँ शब्दार्थ अपनी प्रतीति का तिरस्कार न कर दूसरे अर्थ का प्रत्यायन करा देता है तो प्रत्येक वाक्य का तात्पर्यार्थ लक्षणा-गम्य ही ही जायगा और लक्षणा मुख्य शब्द-वृत्ति बन जायगी वह गौणी-वृत्ति नहीं रहेगी । अतः लक्षणा वहीं पर मानी जा सकती है जहाँ मुख्यार्थ का बाघ हो और मुख्यार्थ दूसरे अर्थ के प्रत्यायन में अपने को खो दे । व्यजजनना में ऐसा होता नहीं । अतः व्यजजनावृत्ति लक्षणा से सर्वथा भिन्न होती है ।
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तृतीय उद्योत:
(ध्वन्या०) ननु सत्वपक्षेऽपि यवार्थो व्यङ्ग्यश्रनयम् प्रकाशयति तदा शब्दस्य
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कोऽहसो व्यापारः ? उच्यते—प्रकरणादवच्छिन्नस्य शब्दवशेन वार्थस्य तथाविधं व्यञ्जकत्व-
मिति शब्दस्य तत्रोपयोगः कथं अपह्नूयते ।
(अनु०) (प्रशन) निस्सन्देह तुम्हारे पक्ष में भी जब तीन व्यञ्जनों को प्रकाशित
करता है तब शब्द का किस प्रकार व्यापार होता है ? (उत्तर) बतलाया जा रहा है—प्रकरण इत्यादि से अवच्छिन्न शब्द के वश में ही अर्थ की उस प्रकार की व्यञ्जकता होती है, अतः यहाँ पर शब्द के उपयोग को कैसे छिपाया जा सकता है ?
(लो०) कोऽहसो इति मुख्यो वा न वा प्रकरणान्तराभावात् । मुख्यत्वे वाचक-
त्वमन्यथा गुणवृत्ति: गुणो निमित्तं सादृश्यादि तद्वारिका वृत्ति: शब्दस्य व्यापारो गुण-वृत्तिरिति भावः । मुख्य एवासौ व्यापारः सङ्ग्रहाभेदाच्च वाचकत्वाद्यतिरिक्त
इत्यभिप्रायेयाह—उच्यत इति ।
(अनु०) 'किस प्रकार का' यह मुख्य है या नहीं है क्योंकि तीसरा प्रकार नहीं होता ।
मुख्य होने पर वाचकत्व होता है नहीं तो गुणवृत्ति होती है । भाव यह है कि जिसमें गुण निमित्त हो अर्थात् सादृश्य इत्यादि उसके द्वारा जो वृत्ति अर्थात् शब्द का व्यापार होता है उसे गुणवृत्ति कहते हैं । यह व्यापार मुख्य ही होता है किन्तु सङ्ग्रहभेद से वाचकत्व से व्यतिरिक्त
जाति है इसे अभिप्राय से कहते हैं—बतलाया जा रहा है यह ।
तारावती—(प्रश्न) आपके मत में उस स्थान पर शब्द की क्या व्यवस्था होगी जहाँ
एक अर्थ दूसरे अर्थ को प्रकाशित करता है ? आप शब्द के दो हो प्रकार के व्यापार मान सकते हैं—या तो मुख्य या अमुख्य । यदि ऐसे स्थल पर शब्द का मुख्य व्यापार होता है तो उसको
आप अभिधा की संज्ञा प्रदान कर सकते हैं । यदि अमुख्य व्यापार होता है तो उसे आप गुण-
वृत्ति ( लक्षणा ) कह सकते हैं । क्योंकि गुणवृत्ति शब्द का अर्थ ही अमुख्यवृत्ति होता है । गुणवृत्ति शब्द का अर्थ हैं गुणों के द्वारा वर्तमान होना ! अर्थात् शब्द के प्रयोग में गुण निमित्त
होकर आते हैं । ( जैसे 'देवदत्त बैल हैं' में बैल के गुणों के आधार पर देवदत्त के लिये बैल
शब्द का प्रयोग किया गया है । ) इस प्रकार गुणवृत्ति शब्द का अर्थ होगा—गुण अर्थात्
सादृश्य इत्यादि निमित्त को माध्यम मानकर जहाँ वृत्ति अर्थात् शब्द का व्यापार हो उसे
गुणवृत्ति कहते हैं । आशय यह है कि जितने प्रकार के मुख्यार्थ होते हैं उन सब में अभिधा
मानी जाती है और जितने प्रकार के अमुख्यार्थ होते हैं उन सब में गुणवृत्ति या लक्षणा
मानी जाती है । मुख्य और अमुख्य के अतिरिक्त तीसरा प्रकार ही कोई नहीं होता । अतः
यदि आप इन दोनों वृत्तियों से भिन्न तीसरी व्यञ्जना नामक वृत्ति मानते हैं तो उसमें आप
शब्द का व्यापार कैसा मानेंगे मुख्य या अमुख्य ? ( उत्तर ) व्यञ्जना में भी शब्द का मुख्य
व्यापार ही होता है । किन्तु उस मुख्य व्यापार को हम अभिधा नहीं कह सकते । कारण यह
है कि दोनों व्यापारों में सामग्री का भेद होता है । अभिधा की सामग्री है सङ्केत ग्रहण और
व्यञ्जना की सामग्री है प्रकरण इत्यादि का ज्ञान । जब एक अर्थ दूसरे अर्थ का प्रत्यायन कराने
के लिये ऐसे शब्द का सहारा लेता है जिसमें प्रकरण इत्यादि का सहयोग भी सन्निहित रहा
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तृतीय
उद्योतः
करता है तब उस अर्थ में व्यङ्गयकता आ जाती है। उस व्यङ्गयकता में शब्द का सहकार भी अपेक्षित होता है। अतः शब्द के उपयोग का अपलाप नहीं किया जा सकता। ( कहा भी गया है—‘शब्दबोध्य अर्थ व्यङ्गयक होता है और शब्द भी अर्थान्तर का आश्रय लेकर व्यङ्गयक होता है।’ अतः एक की व्यङ्गयकता में दूसरे का सहकार होता है। ) ऊपर गुणवृत्ति और व्यञ्जकता के स्वरूपभेद की व्याख्या तीन प्रकार से की गई है। इन तीनों प्रकारों का सार यह है कि ( १ ) व्यञ्जना में शब्द की गति स्वलित नहीं होती किन्तु लक्षणा में शब्द की गति स्वलित हो जाती है! अर्थात् लक्षणा में बाध होता है किन्तु व्यञ्जना में नहीं। ( २ ) व्यञ्जना में सङ्केत का किसी प्रकार भी उपयोग नहीं होता किन्तु लक्षणा में प्रत्यक्ष रूप में सङ्केत का उपयोग होता है। लक्षणा शाब्दार्थज्ञान-सापेक्षिणी होती है, अतः लक्षणा में शाब्दार्थज्ञान अपेक्षित होता है और ( ३ ) व्यञ्जना का प्रतिभास शाब्दार्थ के साथ साथ उससे पृथक् रूप में होता है किन्तु लक्षणा का प्रतिभास शाब्दार्थ से पृथक् नहीं किन्तु शाब्दार्थ से मिलकर एकसाथ एक रूप में ही होता है। यह्ो तीन प्रकार हैं जिन से गुण-वृत्ति और व्यञ्जना के स्वरूप से भेद हो जाता है। ( निर्णयसागरीय संस्करण में आलोक में ‘व्यङ्गचुरूपाच्चिह्नं वस्तु चैति त्रयं विषयः’ इस पंक्ति के बाद इतना पाठ और जोड़ दिया गया है—‘अस्वलदृतित्वं समयानुपयोगित्वं पृथग्वभासित्वं चैति त्रयं !’ किन्तु इसकी यहाँ सङ्गति नहीं बैठती। इसीलिये कुछ लोगों ने इस पाठ की ‘कथमपहृतं’ के पहले कल्पना कर ली है और लिखा है कि लोचन में इन्हीं शब्दों के आने की सङ्गति बैठाने के लिये इस पाठ का मानना अत्यावश्यक है। किन्तु ध्यान देनेवाली बात यह है कि यदि आलोक में यह पाठ विद्यमान ही होता तो लोचन में प्रतीक के रूप में इसका उपादान कर बाद में ‘इति’ शब्द का प्रयोग किया गया होता तथा इसकी व्याख्या में कुछ कहा गया होता। इसके प्रतिकूल लोचनकार ने ‘विषयभेदोऽपिति’ के अवतरण के रूप में इन शब्दों का उपादान किया है। इससे स्पष्ट है कि यह पाठ लोचनकार का ही है। आलोकार का यह पाठ नहीं है। किसी ने अभवश्ा इसे आलोक में सन्निविष्ट कर दिया है। वस्तुतः लोचनकार ने आलोक के विस्तृत प्रकरण का इन शब्दों में समाहार किया है। )
तृतीय
उद्योतः
(ध्वन्या० ) विषयभेदोऽपि गुणवृत्तिव्यङ्गयकत्वयोः स्पष्ट एव। यतो व्यङ्गयकत्वस्य रसाद्योःलङ्कारविशेषा व्यङ्गचुरूपाच्चिह्नं वस्तु चैति त्रयं विषयः। तत्र रसादिप्रतितिगुणवृत्तिरिति न केनचिदुच्यते न च शक्यते वक्तुम्। व्यङ्गचालङ्कारप्रतीतिरपि तथेव। वस्तुचाहृतप्रतीतये स्वशब्दानभिधेयस्वेन यत्प्रतिपाद्यतुमिष्यते तद् व्यङ्गच्यम्। तच्च न सर्वं गुणवृत्तेरविषयःः प्रसिद्धचानुरोधाभ्यामपि गौणानां शब्दानां प्रयोगदर्शनात्। तथोक्तं प्राक्। यदपि च गुणवृत्तेर्विषयस्तदपि च व्यङ्गयकत्वानुप्रवेशन। तस्माद्गुणवृत्तेरपि व्यङ्गयकत्वस्यार्थान्तर्विलक्षणत्वम्। वाचकत्वगुणवृत्तिविलक्षणस्यापि च तस्य तदुभयाभयत्वेन व्यवस्थानेम्
( अनु० ) गुणवृत्ति और व्यङ्गयकत्व का विषयभेद भी स्पष्ट ही है। क्योंकि व्यञ्जकत्व के तीन विषय हैं—रस इत्यादि, अलङ्कार विशेष और व्यङ्गचुरूप से अवच्छिन्नवस्तु। उनमें रस आदि के प्रति तिगुणवृत्ति है ऐसा किसीने नहीं कहा है और न कहा ही जा सकता है। व्यङ्गचालङ्कार की प्रतीति भी इसी प्रकार ( तिगुणवृत्ति नहीं होती ) है। वस्तु के ग्राहक प्रतीति के लिये जो अपने शब्दों से अभिधेय न होने पर भी यत् प्रतिपादन करने के लिये इष्ट होता है वह व्यङ्गय है। और वह सब गुणवृत्ति का विषय नहीं है क्योंकि प्रसिद्ध अर्थ के अनुरोध से भी गौण शब्दों का प्रयोग देखा जाता है। जैसा कि पहले कहा गया है। और यदपि गुणवृत्ति का विषय है वह भी व्यङ्गयकत्व के अनुप्रवेश से ही है। इसलिये गुणवृत्ति में भी व्यङ्गयकत्व से अर्थान्तर में विलक्षणत्व है। वाचकत्व और गुणवृत्ति से विलक्षण उस ( व्यङ्गयकत्व ) की उस उस ( वाचकत्व और गुणवृत्ति ) से भिन्नता के द्वारा व्यवस्था की गई है।
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इत्यादि गुणवृत्ति है यह न किसी के द्वारा कहा गया है और न कहा जा सकता है। उसी प्रकार की व्यंग्यालङ्कार-प्रतीति भी है। वस्तु की वाच्यता की प्रतीति के लिये अपने शब्द के द्वारा अभिधान न किये जाने के रूप में जिसके प्रतिपादन की इच्छा की जाती है वह व्यंग्य होता है। वह सब गुणवृत्ति का विषय नहीं होता क्योंकि प्रसिद्धि और अनुरोध से भी गौण शब्दों का प्रयोग देना जाता है। वैसा पहले कहा जा चुका है। और जो भी गुणवृत्ति का विषय होता है वह भी गुणवृत्ति के अनुप्रवेश से। उससे गुणवृत्ति का भी व्यञ्जकत्व से अत्यन्त विलक्षणत्व होता है। और व्यञ्जकत्व तथा गुणवृत्ति से विलक्षण उसे व्यंग्य की व्यवस्था उन दोनों के आश्रय से ही होती है।
(लो०)—एवमस्खलद्गतित्वात् कथञ्चिदपि समयानुपयोगात् पृथग्भावासमान-त्वाच्चेष्टि त्रिभिः प्रकारैः प्रकाशकत्वस्यैतद्विपरीतरूपत्रियायाश्च गुणवृत्तेः स्वरूपभेदं व्याख्याय विषयभेदमप्याह—विषयभेदोऽपि इति। वस्तुमात्रं गुणवृत्तेरपि विषय इत्यभिप्रायेण विशेषयति—व्यङ्ग्यरूपावचिन्नमिति। व्यञ्जकत्वस्य यो विषयः स गुणवृत्तेन विषयः अन्येऽच तस्या विषयभेदो योग्यः। तत्र प्रथमं प्रकारमाह—तत्रेति ‘न च शक्यते’ इति। लक्षणासामर्थ्यादस्त्राविद्यमानत्वादिति पूर्वमेवोक्तम्। तथै वेत। न च तत्र गुणवृत्तिरयुक्ततैयथर्थः। वस्तुनो यत्पूर्वं विशेषणं कृतं तद्व्याचष्टे—चारुत्वप्रतीतये इति। न सर्वास्विति। किञ्चिदत्र भवति। यथा—‘चित्रतामाध इवाहर्रे’ इति। यदुक्तम्—‘कस्य-चिद्ध्वनिभेदस्य स तु स्यादुपलक्षणम्’ इति। प्रसिद्धतो लावण्यादयः शब्दाः, वृत्तानुरोधव्यवहारानुरोधादे: ‘वदति विसिनिपेताश्रयनम्’ इत्येवमादयः। प्रागिति प्रथमोद्योते ‘रूढा ये विषयेऽन्र्र’ इत्यत्रान्तरे। न सर्वमिति यथास्माभिरव्याख्यातं तथा स्फुटयति—यदपि चेति। गुणवृत्तेरिति पश्चम्य। अधुनातररूपोपजीवकत्वेन तदितर-द्वितयरूपोपजीवकत्वेन च तदितरस्मादितररूपोपजीवन वाचकत्वादगुणवृत्तेश्च द्वितयादपि भिन्नं व्यञ्जकत्वमित्युपपादयति—वाचकत्वेति। चोङ्वधारणे भिन्नक्रमः, अपिशब्दोऽपि न केवलं पूर्वोक्तो हेतुकलापो यावत्तदुभयाश्रयत्वेन मुख्योपचाराश्रयत्वेन यद्व्यवस्थानं तदपि वाचकगुणवृत्तिविलक्षणस्येवेति व्याप्तिघटनम्। तेनायं तात्पर्योऽर्थः—तदुभयाश्रयत्वे व्यवस्थानात्तदुभयवैलक्षण्यमिति।
(अनु०) इस प्रकार गति के सकलित न होने से (मुख्यार्थबाध न होने से), किसी प्रकार भी संकेत का उपयोग न होने से और पृथक् अवभास होने से इन तीन प्रकारों से प्रकाशकत्व की इससे विपरीत रूपवाली गुणवृत्ति के स्वरूपभेद की व्याख्या कर विषयभेद को भी कहते हैं—‘विषयभेद भी’ यह। वस्तुमात्र गुणवृत्ति का भी विषय होता है। इस अभिप्राय से विशेषण देते हैं—‘व्यङ्ग्यरूपावचिन्न’ यह। व्यञ्जकत्व का जो विषय है वह गुणवृत्ति का विषय नहीं है और उस ( गुणवृत्ति ) का दूसरा है इस प्रकार विषयभेद की योजना की जानी चाहिये। उसमें प्रथम प्रकार को कहते हैं—‘उसमें’ यह। ‘नहीं कहा जा सकता है’ यह लक्षणा की सामग्र्री के विद्यमान न होने से है। यह पहले ही कहा जा चुका है। ‘उसी प्रकार’ यह। अर्थात् वहाँ पर गुणवृत्ति उपयुक्त नहीं है। वस्तु का जो पहले विशेषण दिया था उसकी व्याख्या करते हैं—‘चारुत्वप्रतीतये’ इति।
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तृतीय उद्योतः
करते हैं—‘चारुत्वप्रतीति के लिये’ यह । ‘सब नहीं’ यह । कुछ तो होता ही है। जैसे ‘नि:श्वास से अभिन्न श्वासो के समान’ यह । जो कि कहा गया है—‘किसी ध्वनिभेद का वह उपलक्षण तो हो सके’ यह प्रसिद्धि से लावण्य इत्यादि शब्द; वृत्त के अनुरोध इत्यादि से ‘विसिनी’ के पत्तों की शय्या कहती हैं’ इत्यादि । ‘पहले’ यह । प्रथम उद्योत में ‘जो शब्द अन्यत्र रूढ हो’ इस कारिका के अन्दर कहा गया है । सब नहीं इसकी व्याख्या की थी वैसा स्फुट कर रहे हैं—‘और जो भी’ यह । ‘गुणवृत्ते:’ में पञ्चमी है । अब इतर रूप ( गुणवृत्ति ) का उपजीवक होने से उस इतररूप ( गुणवृत्ति ) से और उससे भिन्न ( अभिधा ) का उपजीवक होने से उससे भिन्न से इस प्रकार पर्याय से वाचकत्व को अपेक्षा और गुणवृत्ति की अपेक्षा दोनों से ही व्यंजकत्व भिन्न है यह सिद्ध करते हैं—‘वाचकत्व’ इत्यादि । ‘च’ यह अवधारण अर्थ में भिन्न क्रमवाला है और अपिशब्द भी । केवल पूर्वोक्त हेतु-समूह ही नहीं अपितु उन दोनों का आश्रय होने से अर्थात् मुख्य और उपचार का आश्रय होने से जो व्यवस्थित होना है वह भी वाचक और गुणवृत्ति से विलक्षण का ही हो सकता है यह व्याप्ति की सङ्कुचनता है । इससे यह तात्पर्यार्थ है—‘उन दोनों के आश्रय के रूप में व्यवस्थित होने से उन दोनों से विलक्षण होता है’ यह ।
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तृतीय उद्योतः
विषयभेद तारावती—ऊपर स्वरूपभेद की व्याख्या की जा चुकी । अब विषयभेद को लीजिये । विषयभेद पर विचार करने से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि गुणवृत्ति और व्यंजना ये दोनों वृत्तियाँ एक दूसरे से भिन्न ही हैं । व्यंजना के तीन विषय होते हैं—रस इत्यादि, विशेष प्रकार के अलङ्कार और व्यंग्यत्व से अवच्छिन्न शब्द का उपादान विशेष प्रयोजन से किया गया है । यहाँ प्रकरण है गुणवृत्ति और व्यंग्यजना के भेद-निरूपन का । रस और अलङ्कार केवल व्यंग्यजना के विषय होते हैं; वे गुण-वृत्ति का विषय होते ही नहीं । केवल वस्तु ही गुणवृत्ति और व्यंग्यजना दोनों का विषय होती है । इसी लिये विशेष रूप से कहा गया है कि व्यंग्य-वस्तु व्यंजना का विषय होती है । व्यंजकत्व का जो विषय होता है वह गुणवृत्ति का विषय नहीं होता । गुणवृत्ति का विषय और ही होता है; वह व्यंजना का विषय नहीं होता । यही व्यंजना और गुणवृत्ति के विषयभेद की योजना है । न तो अब तक किसी ने कहा ही है और न कोई कह ही सकता है कि रसप्रतीति गुणवृत्ति के द्वारा होती है । यह तो निश्चित ही है कि गुणवृत्ति वहीं पर होती है जहाँ लक्षणा की सामग्री विद्यमान हो । लक्षणा की सामग्री है मुख्यार्थबाध, मुख्यार्थसम्बन्ध और रूढिप्रयोजनान्यतर । ये सब सामग्री रसप्रतीति में नहीं मिलती इसकी यथास्थान व्याख्या की जा चुकी है । रस केवल व्यंग्यजना का ही विषय होता है । इसी प्रकार व्यंग्य अलङ्कारों की प्रतीति भी गुणवृत्ति के माध्यम से नहीं हो सकती क्योंकि वहाँ पर भी लक्षणा की सामग्री विद्यमान नहीं होती । अब केवल वस्तु शेष रह जाती है जो गुणवृत्ति का भी विषय हो सकती है और व्यंजना का विषय वही वस्तु होती है जिसमें कवि चारुता का आधान करना चाहे और इसीलिये उसे अपने वाचक शब्दों से ही अभिहित न कर दूसरे शब्दों से अभिव्यक्त करे । इस प्रकार की वस्तु ही व्यंग्य होती है ।
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ऐसी सभी वस्तु सर्वत्र गुणवृत्ति का विषय बन सके ऐसा नहीं होता। हाँ गुणवृत्ति के कतिपय स्थल ऐसे अवश्य हो सकते हैं जिनमें कवि चारता का आधार करना चाहे। उदाहरण के लिये ‘निःश्वासाङ्ग इवादर्शः’ में कवि ने आदर्श के लिये अन्ध विशेषण का बाधित प्रयोग चारुत्व के उद्देश्य से ही किया है। यही बात इस प्रकार एक कारिका में कही गई है कि ‘लक्षणा किसी एक ध्वनि भेद का उपलक्षण हो सकती है।’ आशय यह है कि रस तथा व्यंग्य अलंकार तो कभी गुणवृत्ति का विषय हो ही नहीं सकते। व्यंग्यवस्तु के कछु प्रकार ऐसे होते हैं जो गुणवृत्ति का विषय हो सकते हैं। किन्तु व्यंग्यवस्तु के सभी प्रकार गुणवृत्ति का विषय नहीं हो सकते। इसी प्रकार सभी प्रकार की गुणवृत्ति व्यंजना का विषय नहीं हो सकती। प्रायः देखा जाता है कि बाधित शब्दों का प्रयोग केवल चारुत्व के आधार के ही लिये नहीं होता। ऐसे अनेक स्थान पाये जाते हैं जहाँ बाधित शब्दों का प्रयोग या तो प्रसिद्धि के आधार पर होता है; जैसे—लावण्य इत्यादि शब्दों का सौन्दर्य के अर्थ में प्रयोग प्रसिद्धि के बल पर ही होने लगा है अथवा किसी घटना के अनुरोध से या व्यवहार के अनुरोध से ही बाधित शब्दों का प्रयोग होने लगता है जैसे ‘वदति विसिनिप्रभृतयः’ में वदति का प्रयोग। इस प्रकार व्यंग्यवस्तु भी ऐसी होती है जो गुणवृत्ति का विषय नहीं हो सकती और गुणवृत्ति के ऐसे भी स्थल होते हैं जो व्यंजना का विषय नहीं हो सकते। यह सब ‘रुढ़ा ये विषयेऽनुयत्र’ इस कारिका की व्याख्या में प्रथम उद्योत में विस्तारपूर्वक बतलाया जा चुका है। अब वह वस्तु शेष रह जाती है जो गुणवृत्ति का विषय भी हो सकती है और व्यंग्य की संज्ञा भी प्राप्त कर सकती है। ऐसे स्थान पर भी लक्ष्यार्थ और होता है और व्यंग्यार्थप्रयोजन और होता है। उस स्थान पर चारुत्व व्यंजना के अनुप्रवेश के कारण ही आती है। गुणवृत्ति के कारण नहीं। अत एव यह सिद्ध हो गया कि स्वरूपभेद तथा विषयभेद दोनों दृष्टियों से जिस प्रकार व्यंजना अभिधा से अत्यन्त विलक्षण है उसी प्रकार गुणवृत्ति से भी अत्यन्य विलक्षण हो है।
(ध्वन्यालोके) व्यङ्कत्वं हि सर्वचिद्धाचकत्वाव्ययेग व्यतिष्ठते यथा विवक्ष-तान्यपरवाच्ये ध्वनौ। स्वचिद्नु गुणवृत्त्याश्रयेण यथा अविवक्षितवाच्ये ध्वनौ। तदुभय-श्रयत्वप्रतिपादनायैव प्रथमतरं द्वौ भेदावुपन्यस्तौ। तदुभयाश्रितत्वाच्च तदेकस्वरूपत्वं तस्य न लक्षणयैकनयेन वस्तुसामान्यकथनवृत्या। न च लक्षणैकरूपमेवायत्तं व्यवस्थानेतु। न चोभयधर्मसंप्लवेनैव तदेकैकरूपं न भवति। यावदाचकत्वलक्षणादिरूपरहितशब्दधर्मत्वेनैवापि । तथाहि गीतध्वनिनामपि व्यङ्कत्वमस्ति रसादिविषयम् । न च तेषां वाचकत्वं लक्षणा वा कथमपि लक्ष्यते । शब्दादन्यत्रापि विषये व्यङ्कत्वस्य दर्शयामाचकत्वादिधर्म-प्रकारत्वमयुक्तं वक्तुम् । यदि च वाचकत्वलक्षणादीनां शब्दप्रकाराणां प्रसिद्धप्रकार-विलक्षणत्वेऽपि व्यङ्कत्वं प्रकारस्त्वेन परिलक्ष्यते । तदेवं शब्दे व्यवहारे त्रयः प्रकाराः:- वाचकत्वं गुणवृत्तिस्तथा डङ्कत्वं च । तत्र व्यङ्कत्वे यदा व्यङ्ग्यचप्राधान्यं तदा ध्वनिः। तस्य चाविवक्षितवाच्यो विवक्षितान्यपरवाच्यश्चेति द्वौ प्रभेदावान्तरौ प्रथमतरं तौ सविस्तरं निर्धारितौ ।
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तृतीय उद्योतः
ताम्र्रक (अनु०) व्यंजकत्व निस्सन्देह कभी वाचकत्व के आश्रय से व्यवस्थित होता है जैसे विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि में । कहीं तो गुणवृत्ति के आश्रय से जैसे अविवक्षितवाच्य ध्वनि में । उन दोनों के आश्रयत्व का प्रतिपादन करने के लिये ही कुछ पहले दो भेदों को प्रस्तुत किया गया था । और उन दोनों के आश्रित होने से उनकी एकरूपता नहीं कहीं जा सकती । क्योंकि वह वाचकत्व के साथ एकरूप नहीं होता क्योंकि कहीं लक्षणा के आश्रय से भी उसका व्यवहार होता है । लक्षणा से भी एक रूप नहीं होता क्योंकि अन्यत्र वाचकत्व के आश्रय से व्यवस्था होती है । उभयधर्म होने के कारण ही उन दोनों में प्रत्येक की एकरूपता न हो ऐसा नहीं है, अपितु वाचकत्व और लक्षणा इत्यादि रूपों से रहित शब्दधर्म होने के कारण भी । वह इस प्रकार—गीतध्वनियों का भी रस इत्यादि के विषय में व्यंजकत्व है। उनका वाचकत्व या लक्षणा किसी प्रकार भी लक्षित नहीं होती । शब्द से अन्यत्र विषय में भी व्यंजकत्व के दिखलाई पड़ने से वाचकत्व इत्यादि शब्दधर्मों से विशिष्ट होने का कथन अनुचित है । और यदि वाचकत्व तथा लक्षणाप्रसिद्ध प्रकारों से विलक्षण होते हुये भी व्यंजकत्व को आप वाचकत्व और लक्षणा इत्यादि शब्दप्रकारों का ही एक प्रकार कल्पित करते हैं तो शब्द के ही प्रकार के रूप में क्यों कल्पित नहीं कर लेते । इस प्रकार शब्दव्यवहार में तीन प्रकार हैं—वाचकत्व, गुणवृत्ति और व्यंजकत्व । उसमें व्यंजकत्व में जब व्यङ्ग्यप्रशान्य हो तो ध्वनि होती है । उसके अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य इन दो भेदों का पहले ही उपक्रम किया गया था और विस्तारपूर्वक निरूपण कर दिया गया ।
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तृतीय उद्योतः
(लो०) एतदेव विभजते—व्यञ्जकत्वं हीति । प्रथमतरमिति । प्रथमोद्योते ‘स इत्यादिना ग्रन्थेन । हेतुत्वर्मपि सूच्यति—न चेत् । वाचकत्वगौणत्वोभयवृत्तान्तवैक्षण्यादिति सूचितो हेतुः । तमेव प्रकाशयति—तथाहि इत्यादिना । तेऽप्यमिति । हेतुर्न्तरमपि सूच्यति—शब्दादन्यत्रैति । वाचकत्वगौणत्ववाभ्यामहेतुत्वव्यतिरेकात् । ननु व्यतिरेके हेतुः—प्रतीयमानेऽपि वत्मनित्वात् प्रतीयत्ववदिति । आदिपदेन गौणं गृह्यते । शब्दस्यैवैति । तदविलक्षणमेवास्त्वित्याशङ्क्याह—यदि पर्यायौ कल्प्येते, इच्छायाऽव्याप्तत्वात् । व्यञ्जकत्वस्य तु विविक्तं स्वरूपं दर्शयतं तद्विषयानन्तरे कथम् विपर्यस्ताम् । एवं हि पर्वतगतो घूमोऽग्निजोडपि स्यादिति भावः । अधुनोपपादितं विभागमुपसंहरति—तदेवमिति । व्यवह्रारग्रहणेन समुद्रोषादीन् व्युदास्यति ।
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तृतीय उद्योतः
(अनु०) इसी का विभाजन करते हैं—‘व्यंजकत्व निस्सन्देह’ इत्यादि ‘कुछ पहले हो’ यह । प्रथम उद्योत में ‘स च’ इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा । दूसरे हेतु को भी सूचित करते हैं—‘न चेत्’ इत्यादि । वाचकत्व और गौणत्व इन दोनों के वृत्तान्त से विलक्षण होने के कारण यह हेतु सूचित किया गया है । उसीको प्रकाशित करते हैं—‘तथाहि’ इत्यादि के द्वारा । ‘उनका अर्थात् गीतादि शब्दों का । दूसरे हेतु को भी सूचित करते हैं—‘शब्द से अन्यत्र भी’ यह ।
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वाचकत्व और गुणत्व से भिन्न व्यंजकत्व होता है क्योंकि वह शब्द से अन्यत्र भी वर्तमान होता है । जैसे प्रनेयत्व यह हेतु सूचित किया गया है । ( प्रश्न ) अन्यत्र अवाचक में जो व्याख्यक्त्व वह वाचकत्व इत्यादि से विलक्षण हो; वाचक में तो जो व्यञ्जकत्व वह उससे अविलक्षण ही हो यह शङ्का करके कहते हैं—‘यदि’ इत्यादि । आदि शब्द से गौण ग्रहण किया जाता है । यदि व्यञ्जकत्व और वाचकत्व को पर्याय के रूप में कल्पित किया जाता है तो व्यञ्जकत्व शब्द होता है यह पर्यायता भी क्यों नहीं कर ली जाती क्योंकि इच्छा में तो कोई प्रतिबन्ध है नहीं । व्याख्यक्त्व का तो पृथक् स्वरूप दिखलाया गया है वह विषयान्तर किस प्रकार विपर्यस्त हो जाय । इस प्रकार तो पर्वतगत धूम बिना अग्नि के ही हो जाय, यह भाव है । अब उपपादित विभाग का उपसंहार करते हैं——‘वह इस प्रकार’ यह । व्यवहार ग्रहण से समुद्र——गर्जन इत्यादि का निराकरण कर रहे हैं
तारावती——ऊपर स्वरूपभेद और विषयभेद के आधार पर व्यञ्जकत्व का अभिधा तथा गुणवृत्ति से भेद सिद्ध किया गया है । अब यहां यह बतला रहे हैं कि एक हेतु ऐसा और है जिससे व्यञ्जकत्व अभिधा तथा गुणवृत्ति इन दोनों से भिन्न होता है । वह हेतु यह है कि व्यञ्जकत्व अभिधा और गुणवृत्ति दोनों से विलक्षण होता है तथा उन दोनों के आश्रय से ही व्यवस्थित होता है । इसको इस प्रकार समझिये——व्यञ्जकत्व अभिधा से इसलिये विलक्षण होता है क्योंकि वह अभिधा से इतरे ( भिन्न ) गुणवृत्ति का सहारा लेता है और गुणवृत्ति से इसलिये भिन्न होता है क्योंकि गुणवृत्ति से इतरे अभिधा का आश्रय लेता है । इस प्रकार यहां पर पर्याय ( क्रम ) से योजना करनी चाहिये कि व्यञ्जकत्व एक से भिन्न इसलिये होता है कि वह एक के अतिरिक्त दूसरे का भी सहारा लेता है और दूसरे से भिन्न इसलिये होता है कि वह दूसरे के पहले का भी सहारा लेता है । इस प्रकार अपने से भिन्न का सहारा लेने के कारण व्यञ्जकत्व दोनों से भिन्न होता है । यहां पर वृत्ति में यह पंक्ति है—‘वाचकत्वगुणवृत्तिविलक्षणस्यापि च तस्य तदुभयाश्रयत्वेन व्यवस्थानम्’ इसमें ‘अपि’ और ‘च’ इन दोनों शब्दों को क्रमभेद से स्थानान्तरित करके लगाना चाहिये । ‘च’ को ‘विलक्षणस्य’ के साथ और ‘अपि’ को ‘व्यवस्थानम्’ के साथ लगाना चाहिये । इस प्रकार यह पूरा वाक्य ऐसा हो जायगा—‘वाचकत्वं गुणवृत्तिविलक्षणस्य च तस्य तदुभयाश्रयत्वेन व्यवस्थानमपि’ यहां पर ‘व्यवस्थानम्’ के साथ ‘अपि’ शब्द को लगाने का आशय है कि व्यञ्जना का अभिधा और गौणीवृत्ति से भेद सिद्ध करने के लिये पहले जो हेतुसमूह दिया गया है केवल वही उनके भेद को सिद्ध नहीं करता अपितु एक और हेतु ऐसा है जो उनके पृथकत्व तथा स्वतन्त्र अस्तित्व को सिद्ध करता है और वह यह है कि व्यञ्जना अभिधा का भी आश्रय लेती है और गुणवृत्ति का भी आश्रय लेती है । इसलिये वह इन दोनों से एक रूप नहीं हो सकती । यहां पर व्यासि की संघटना हो जाती है । वह व्यासि दो प्रकार से बन सकती है—‘जो जिसका सहारा लेता है वह उससे भिन्न होता है ।’ व्याख्यना अभिधा और लक्षणा का सहारा लेती है अतः दोनों से भिन्न होती है । ‘जो अपने से किसी अन्य का सहारा लेता है वह उससे भिन्न होता है ।’ व्यञ्जना अभिधा का सहारा लेने के कारण लक्षणा से भिन्न होती है और लक्षणा का सहारा लेने के कारण अभिधा से भिन्न होती है ।
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तृतीय उद्योतः
कहीं-कहीं व्यंजकत्व की अवस्थिति अभिधा के आश्रय से होती हैं जैसे कि विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि में हुुआ करती है और कहीं-कहीं उसकी अवस्थिति गुणवृत्ति के आश्रय से होती है जैसी कि अविवक्षितवाच्य ध्वनि में हुुआ करती है। (दोनों के उदाहरण 'एवं वादिनि' 'पार्वती' और 'निःश्वासान्ध इवादर्शः' में दिखलाये जा चुके हैं।) व्यंजना इन दोनों के आश्रित होती है इसी बात का प्रतिपादन करने के लिये ही प्रथम उद्योत में ध्वनि के दो भेद बतलाये गये थे। इन दोनों के आश्रित होने के कारण यह बात नहीं कही जा सकती कि व्यंजना की अभिधा-लक्षणा से एकरूपता है। उसकी वाचकत्व से एकरूपता हो ही नहीं सकती क्योंकि व्यंजना वाचकत्व के आश्रय से भी वत्मान रहती है। इसी प्रकार लक्षणा से भी एकरूपता नहीं हो सकती क्योंकि व्यंजना वाचकत्व के आश्रय से भी व्यवस्थित होती है। यहाँ पर यह हेतु मृचित किया गया है कि व्यंजना में अभिधा तथा लक्षणा दोनों के वृत्तान्त से विलक्षणता होती है। केवल इतनी बात नहीं कि उभयधर्मता के।कारण उनसे एकरूपता नहीं होती किन्तु यह भी बात है कि जहाँ पर शब्द तो होता है किन्तु अभिधा या लक्षणा कुछ भी नहीं होती वहाँ पर भी व्यंजना हो जाती है। इस प्रकार व्यंजना केवल अभिधालक्षणार्थमिणी नहीं होती वहाँ पर भी व्यंजना हो नहीं होती किन्तु शब्दमात्रधर्मिणी भी होती है। उदाहरण के लिये गीत इत्यादि के शब्दों को लीजिये। गीत इत्यादि के शब्दों से अर्थ का बिना ही अनुगमन किये रसाभिव्यक्ति हो जाती है। वहाँ पर कोई नहीं कह सकता कि रसाभिव्यक्ति अभिधा लक्षणा की अपेक्षिणी है। मत एवं वहाँ पर व्यंजना को शब्दवृत्तिधर्ममात्र मानना पड़ेगा, यह कोई नहीं कहेगा कि व्यंजना वहाँ पर अभिधा या लक्षणाधर्मवाली है। इस व्यंजना को केवल शब्दधर्मिणी भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि जहाँ पर शब्द बिल्कुल नहीं होता वहाँ पर भी शब्द इत्यादि से व्यंजना देखी जाती है। अतः यह कहना सर्वथा असंगत है कि व्यंजना वाचकत्वादि धर्मप्रकाशक ही होती है। यहाँ पर आशय यह है कि व्यंजना न तो केवल वाचकत्वधर्मिणी कही जा सकती है; न केवल शब्दधर्मिणी और न केवल शब्देतरधर्मिणी। केवल वाचकत्वधर्मिणी इसलिये नहीं जा सकती क्योंकि वह वाचकत्व से भिन्न गुणवृत्ति शब्दमात्र और शब्देतर स्थानों में भी रहती है। शब्दमात्रधर्मिणी इसलिये नहीं कही जा सकती क्योंकि यह शब्दमात्र से भिन्न वाचकत्व गुणवृत्ति और शब्देतर स्थानों में भी रहती है। केवल शब्देतरधर्मिणी भी नहीं मानी जा सकती क्योंकि शब्देतरभिन्न वाचकत्व गुणवृत्ति और शब्दमात्र में भी पाई जाती है। इस प्रकार यह व्यंजना सर्वतन्त्रस्वतन्त्र स्वच्छन्दचारिणी ही है किसी प्रकार भी किसी दूसरे तक ही सोपित नहीं रहती। यह बात अनुमान प्रमाण से सिद्ध हो जाता है। अनुमान की प्रक्रिया यह होगी—व्यंजना में अभिधा और लक्षणा (अथवा मीमांसक के मत में गुणवृत्ति) में से किसी एक का अभावरूप भेद विद्यमान रहता है क्योंकि व्यंजना शब्द में भी रहती है और शब्दभिन्न में भी रहती है जैसे प्रमाणत्व। इसकी अन्वयव्याप्ति इस प्रकार होगी—जो पदाथ शब्द में भी रहता है और उससे पृथक् भी रहता है वह अभिधा और लक्षणा इन दोनों से भिन्न हुुआ करता है जैसे प्रमाणत्व (प्रमाण द्वारा प्रतिपन्न होनेवाला वस्तु) शब्द में भी रहता है और उससे भिन्न भी रहता है अर्थात् शब्द भी प्रमाण द्वारा प्रतिपन्न होता है और दूसरी वस्तुयें भी प्रमाण
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द्वारा प्रतिपन्न होती हैं; इसीलिये प्रमेयत्व हेतु को कोई भी अभिधा और लक्षणा में अन्तर्भुक्त नहीं करता । इसी प्रकार व्यंजना के विषय में भी समझना चाहिये । व्यंजना भी शब्द तथा तद्भिन्न दोनों स्थलों पर रहती है; इसीलिये उसे भी अभिधा और लक्षणा के द्वारा गतार्थ नहीं माना जा सकता
लक्षणा और व्यंजना के भेद पर दृष्टिपात
( प्रश्न ) इतना स्वीकार किया जा सकता है कि जहाँ बिना ही शब्द के व्यंजना का उदय हो वहाँ व्यंजना एक पृथक्वृत्ति होती है । किन्तु जहाँ अभिधा लक्षणा और गौणी के आश्रय से व्यंजना का उदय होता है वहाँ व्यंजना को उन वृत्तियों से पृथक् मानने की क्या आवश्यकता ? वहाँ पर व्यंजना अभिधा और लक्षणा से अभिन्न ही क्यों न मानी जाय ।
( उत्तर ) वाचकत्व और लक्षणा ये शब्द के ही प्रकार हैं उनमें व्यंजना पृथक् होती है इस बात को बड़े विस्तार से अनेक रूपों में सिद्ध किया जा चुका है । अभिधा तथा लक्षणा इत्यादि को आश्रित करके जो व्यंजना प्रवृत्त होती है वह भी शब्द का एक विलक्षण ही प्रकार है जिस प्रकार अभिधा और लक्षणा इत्यादि शब्द के प्रकार होते हैं । यदि इस प्रकार के विशेष होने पर भी आप व्यंजना को अभिधा और लक्षणा का ही भेद मानने को प्रस्तुत हैं तो फिर आप उसे शब्द का ही प्रकार क्यों नहीं मान लेते ?
( यहाँ पर वृत्ति में 'शब्दप्रकाराणां' 'प्रकारत्वेन' इन वाक्यों में 'प्रकार' का प्रयोग धर्म के अर्थ में किया गया है । वृत्तिकार का आशय यह है कि अभिधा और लक्षणा ये शब्द के विशिष्ट धर्म हैं और व्यंजना को आप अभिधा और लक्षणा का धर्म मान लेते हैं, उससे अच्छा यहीं है कि आप उसे अभिधा और लक्षणा के समान शब्द का ही धर्म मान लें । यही अर्थ यहाँ पर ठीक है । किन्तु लोचनकार ने 'शब्दप्रकाराणां' के प्रकार शब्द को धर्मपरक तथा 'प्रकारत्वेन' को भेदपरक मानकर दूसरी ही व्याख्या की है । उनकी व्याख्या इस प्रकार है—अनेक प्रमाणों के आधार पर अभिधा और लक्षणा से व्यंजना का भेद दिखलाया जा चुका, यह भी सिद्ध किया जा चुका कि अभिधा और लक्षणा के समान ही व्यंजना भी शब्द का व्यापार होती है तथा यह भी सिद्ध किया जा चुका कि व्यंजना कभी अभिधा का आश्रय लेती है और कभी लक्षणा का ।)
इतना सब होते हुये यदि आप अभिधा और लक्षणा से व्यंजना का अभेद मानते हैं तथा व्यंजना को अभिधा का ही पर्यायवाचक मानते हैं तो आपको इस बात में भी संकोच नहीं होना चाहिये कि शब्द और व्यंजना का भी अभेद मान लें तथा शब्द और व्यंजना को भी एक दूसरे का पर्याय करने लगें । क्योंकि मन अपना है और मानना भी अपना है । इच्छा तो बेरोक-टोक सभी कुछ माना जा सकती है । वास्तविकता तो यह है कि व्यंजकत्व का स्वरूप सर्वथा पृथक् होता है यह दिखला दिया गया फिर उसका दूसरे विषय के द्वारा विपर्यास किस प्रकार किया जा सकता है ।
यदि इस प्रकार मनमाने ढंग से किसी के विषय द्वारा हम स्वतन्त्र अस्तित्वबादों का विपर्यास करने लगेंगे तो सारी व्यवस्था ही उच्छिन्न हो जायगी । हम धूम के द्वारा अग्नि का अनुमान पर्वत में लगाते हैं, किन्तु इस प्रकार का विपर्यास मानने पर तो पर्वत से उठनेवाले धुयें से आग का अनुमान हो ही नहीं सकेगा, क्योंकि तब तो यह भी कहा जा सकेगा कि पर्वत का धुआँ अग्नि से उद्भूत नहीं हुआ है ।
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तृतीय उद्योत:
तृतीय उद्योत:
३२९ यहाँ तक जो कुछ भी प्रतिपादित किया जा चुका है उसका उपसंहार कर रहे हैं—इस प्रकार शब्द व्यवहार में तीन प्रकार होते हैं—( १ ) वाचकत्व, ( २ ) गुणवृत्ति और ( ३ ) व्यंजना । इस व्यंजकत्ववृत्ति में जब व्यंग्यार्थ की प्रघानता हो तब ध्वनिकाव्य होता है । उस ध्वनिकाव्य के दो भेद बतलाये गये हैं—अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य । इन दोनों की पदले ही व्याख्या की जा चुकी है । यहाँ पर शब्द व्यवहार के तीन प्रयोग बतलाये गये हैं और उसमें विशेष रूप से व्यवहार शब्द का प्रयोग किया गया है । इसका आशय यह है कि व्यवहार में आनेवाले शब्द की तीन वृत्तियाँ होती हैं । वैसे शब्द तो समुद्रगर्जन में भी होता है किन्तु उन सब शब्दों की वृत्तियाँ नहीं होती । इस प्रकार व्यवहार शब्द से समुद्रघोष इत्यादि शब्दों का निराकरण हो जाता है ।
(ध्वन्यो०)
अन्यो बूयाद्—ननु विवक्षितान्यपरवाच्ये ध्वनौ गुणवृत्तिता नास्तीति यदुच्यते तद्युक्तम् । यस्माद् व्याच्यवाचकप्रतीतिपूर्विका यत्रार्थान्तरप्रतिपत्तिस्तत्र कथम् गुणवृत्तिव्यवहारः; नहि गुणवृत्तौ यदा निमित्तेन केनचिद्विषयान्तरे शब्द आरोप्यते अत्यन्ततिरसकृतस्वार्थः यथा 'अग्निर्माणवक:' इत्यादौ, यदा वा स्वार्थमशेनापरित्यजस्तत्सम्बन्धधारण विषयान्तरमाक्रामति यथा 'गडायां घोष:' इत्यादौ तथा विवक्षितान्यपरवाच्ये ध्वनौ वाच्यवाचकयोरप्योरपि स्वरूपप्रतीतिरर्थावगमनं च हृश्यत इति ध्वनिकत्वव्यवहारोयुक्त्यनुरोधी । स्वरूपं प्रकाशयन्नेव परावभासको व्यञ्जक इत्युच्यते, तथाविधे विषये वाचकत्वस्यैव व्यञ्जकत्वमिति गुणवृत्तिव्यवहारो नियमेनैव न शक्यते कर्तुम् ।
(अनु०) (कोई) दूसरा कहे— 'निस्सन्देह विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि में गुणवृत्ति नहीं होती यह जो कहा जाता है वह उचित है । क्योंकि वाच्य-वाचक की प्रतीति के साथ जहाँ अर्थान्तर की प्रतिपत्ति होती है वहाँ गुणवृत्ति का व्यवहार किस प्रकार हो सकता है । गुणवृत्ति में जब किसी निमित्त से विषयान्तर में शब्द का आरोप अत्यन्त तिरस्कृत अर्थ रूप में किया जाता है जैसे 'अग्निर्माणवक:' इत्यादि में, अथवा जहाँ स्वार्थ को एक अंश में न छोड़ते हुये उसके सम्बन्ध के द्वारा ( शब्द ) विषयान्तर को आक्रान्त कर लेता है जैसे 'गडायां घोष:' इत्यादि में तब विवक्षितवाच्यत्व सिद्ध नहीं होता । इसीलिये विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि में वाच्य-वाचक इन दोनों की स्वरूपप्रतीति और अर्थागम देखा जाता है, अतः व्यञ्जकत्व का व्यवहार तर्कसंगत है । स्वरूप को प्रकाशित करते हुए ही व्यञ्जक दूसरे का अवभासक होता है यह कहा जाता है, उस प्रकार के विषय में वाचकत्व होता है, अतः नियम से ही गुणवृत्ति का व्यवहार नहीं किया जा सकता ।
(लो०)
तन्नु वाचकत्वरूपोज्जीवकत्ववाद गुणवस्तुनजीवकत्वादिति च हेतुद्वयमयुक्तम् । तद्विवक्षितवाच्यभागे सिद्धं न भवति तस्य लक्षणैकशरीरत्वादित्यभिप्रायेणोपक्रमते—अन्यो बूयादिति । यद्यपि च तस्य तदुभयाश्रयत्वेन व्यवस्थादिति बुबता निर्नीतचरमेवैतत्, तथापि गुणवृत्तेरविवक्षितवाच्यस्य च दुरिनरूपं वैलक्षण्यं यः पश्यति तं प्रत्यारड्ढनिवारणार्थोड्यमुपक्रमः । अत एवाभेदस्याsड्ढीकरणपूर्वकमकृत
(लो०) तन्नु वाचकत्वरूपोज्जीवकत्ववाद गुणवस्तुनजीवकत्वादिति च हेतुद्वयमयुक्तम् । तद्विवक्षितवाच्यभागे सिद्धं न भवति तस्य लक्षणैकशरीरत्वादित्यभिप्रायेणोपक्रमते—अन्यो बूयादिति । यद्यपि च तस्य तदुभयाश्रयत्वेन व्यवस्थादिति बुबता निर्नीतचरमेवैतत्, तथापि गुणवृत्तेरविवक्षितवाच्यस्य च दुरिनरूपं वैलक्षण्यं यः पश्यति तं प्रत्यारड्ढनिवारणार्थोड्यमुपक्रमः । अत एवाभेदस्याsड्ढीकरणपूर्वकमकृत
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द्वितीयभेदाक्षेपः। विवक्षितान्यपरवाच्य इत्यादिना पराभ्युपगमस्य स्वाङ्गीकारो दर्श्यते । गुणवृत्तिव्यवहाराभावे हेतुं दर्शयितुं तस्या एव गुणवृत्तिस्तावद्वृत्तान्तं दर्शयति— न होति। गुणतया वृत्तिव्यापारो गुणवृत्ति:। गुणेन निमित्तेन साहस्यादिना च वृत्तिः अर्थान्तरविशयेsपि शब्दस्य सामान्याधीकरण्यमिति गौणं दर्शयति। यदा वा स्वार्थ'मिति लक्षणां दर्शयति । अनेन भेदद्वयेन च स्वीकार्यमविवक्षितवाच्यभेदद्वयात्मक- मिति सूच्यति। अत एव अत्यन्ततिरस्कृतस्वार्थशब्देन विषयान्तरमाक्रामति चेत्यनेन शब्देन तदेव भेदद्वयं दर्शयति—अत एव चेति । यत एव न तत्रोक्तहेतुबलाद्गुणवृत्ति- व्यवहारो न्याय्यस्तत इत्यर्थः। युक्ति लोकप्रसिद्धरुपामवादितां दर्शयति—अविवक्षित- तeti। उच्यत इति प्रदीपादिः, इन्द्रियादेस्तु कारणत्वान्न व्यङ्ग्यक्त्वं प्रतीतियुपपत्तौ।
(अनु०) (प्रण) निस्सन्देह 'वाचकत्वरूप के उपजीवक होने से' और 'गुणवृत्ति के अनु- जीवक होने से' ये जो दो हेतु बतलाये गये हैं वे अविवक्षितवाच्य के भाग में सिद्ध नहीं होते इस अभिप्राय से उपक्रम करते हैं—'दूसरा कहे' यह । यद्यपि, उसके उभयाश्रयत्व के रूप में व्यव- स्थित होने से' इन शब्दों के द्वारा इसका प्रायः निर्णय हो कर दिया गया तथापि गुणवृत्ति और अविवक्षितवाच्य के निरूपण में अशक्य विलक्षणता को जो समझता है उसके प्रति आशङ्का निवारण करने के लिये यह उपक्रम है। इसीलिये प्रथम भेद के अङ्गीकार के साथ यह द्वितीय भेद का आक्षेप है। 'विवक्षितान्यपरवाच्य' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा दूसरे की मान्यता के प्रति अपनी स्वीकृति दिखला रहे हैं। गुणवृत्ति के व्यवहार के अभाव में हेतु दिखलाने के लिये उसी गुणवृत्ति का वृत्तान्त पहले दिखला रहे हैं—'नहि' इत्यादि । गुण ( अप्रधान ) रूप में वृत्ति अर्थात् व्यापार गुणवृत्ति कहलाती है और गुण को निमित्त मानकर अर्थात् सादृश्य इत्यादि के द्वारा वृत्ति अर्थात् अर्थान्तर के विषय में शब्द का सामान्याधीकरण इस अर्थ के द्वारा गौण को ( गौणी वृत्ति को ) दिखलाते हैं। 'अथवा जब स्वार्थ को' इत्यादि के द्वारा लक्षणा को दिखलाते हैं। इन दो भेदों के द्वारा अविवक्षितवाच्य के दो भेदोंवाला स्वीकार किया गया है यह सूचित करते हैं। अत एव अत्यन्ततिरस्कृतस्वार्थ शब्द के द्वारा और विषयान्तर को आक्रान्त कर लेता है इस शब्द के द्वारा उन्हीं दो भेदों को दिखलाते हैं—'अत एव च' इत्यादि । अर्थात् उक्त हेतुओं के बल से वहाँ गुणवृत्ति का व्यवहार उचित नहीं हैं इसो- लिये । लोकप्रसिद्ध रूपवाली अबाधित युक्ति को दिखलाते हैं—'स्वरूप' यह । कहा जाता है अर्थात् प्रदीप इत्यादि । कारण होने से प्रतीति की उत्पत्ति में इन्द्रियों की कारणता नहीं होती।
तारावती—यहाँ तक ध्वनि का अभिधामूलकत्व ओर लक्षणामूलकत्व सिद्ध किया जा चुका। इससे व्यञ्जना की अभिधा और लक्षणा से विभिन्नता स्वभावतः सिद्ध हो गई। तथापि विचारकों का एक वर्ग ऐसा भी है जो गुणवृत्ति और अविवक्षितवाच्य का भेद मानने को तैयार नहीं । उनका आशय यह है कि व्यञ्जनवृत्ति को सिद्ध करने के लिये जो दो हेतु दिये गये हैं—( १ ) व्यञ्जना वाचकत्व की उपजीवक होती है और (२) व्यञ्जना गुणवृत्ति की अनुजीवक ( निकट सहचरीणि ) होती है— ये हेतु अभिधा और व्यञ्जना के विरोध को सिद्ध
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करने के लिये तो पर्याप्त हैं किन्तु अविवक्षितवाच्य के विषय में लागू नहीं होते क्योंकि अविवक्षितवाच्य ओर लक्षणा का शरीर एक ही होता है । इसी मन्तव्य से अग्निम प्रकरण का प्रारम्भ किया जा रहा है । 'यद्यपि वयंजना गुणवृत्ति ओर अभिधा दोनों के 'आश्रय' से अवस्थित होती हैं' इन शब्दों के द्वारा उक्त प्रश्न का उत्तर दिया ही जा चुका है तथापि जो लोग यह समझते हैं कि गुणवृत्ति और अविवक्षितवाच्य का वैलक्षण्य सिद्ध ही नहीं किया जा सकता उनको समझाने के मन्तव्य से एक बार पुनः यह प्रकरण उठाया जा रहा है । इसमें सर्वप्रथम गुणवृत्ति और अविवक्षितवाच्य का भेद माननेवाले की ओर से पूर्वपक्ष की स्थापना की जायगी और फिर सिद्धान्ती की ओर से उत्तर दिया जायगा । पूर्वपक्षी ने विवक्षितान्यपरवाच्य के नाम के ध्वनिभेद को तो माना है किन्तु अविवक्षितवाच्य का अन्तर्भाव गुणवृत्ति में करने की चेष्टा की है । उसका कहना है कि आप विवक्षितान्यपरवाच्य नामक जो ध्वनि का भेद मानते हैं वह तो हम भी मानते हैं और उसका मानना ठीक ही है । कारण यह है कि विवक्षितान्यपरवाच्य को हम गुणवृत्ति के अन्तर्गत नहीँ ला सकते । विवक्षितान्यपरवाच्य में वाच्य-वाचक की प्रतीति भी होती रहती है और उसके साथ ही अर्थान्तर की भी प्रतीति हो जाती है । आशय यह है कि वहाँ पर मुख्यवृत्ति का प्रत्याख्यान नहीं होता, मुख्यवृत्ति ( वाच्य-वाचक भाव ) की प्रतीति साथ-साथ होती रहती है अतः उसे हम गुणवृत्ति की संज्ञा दे नहीं सकते । गुणवृत्ति का अर्थ है गुनत्व के रूप में ( गौणरूप में ) वृत्ति अर्थात् व्यापार तथा गुणों को निमित्त मानकर सादृश्य इत्यादि के द्वारा वृत्ति अर्थात् किसी अन्य के अर्थ में शब्द का सामानाधिकरण्य । आशय यह है कि गुणवृत्ति वहीं पर हो सकती है जहाँ पर या तो किसी निमित्त को लेकर किसी दूसरे अर्थ में शब्द का आरोप कर दिया जाय और उसके मुख्य वाच्यार्थ का सर्वथा परित्याग हो जैसे 'बालक आग है' में बालक और आग का सामानाधिकरण्य निर्दिष्ट किया गया है जो कि सादृश्य नहीं होता, अतः अग्नि का शाब्दिक अर्थ सर्वथा परित्यक्त हो जाता है; उससे तेजस्वी में लक्षणा हो जाती है जिसका प्रयोजन है तेजस्विता की अधिकता । यही अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य कहलाता है । अथवा जहाँ शब्द स्वार्थ को एक अंश में परित्याग नहीं करता और वाच्य सम्बन्ध के द्वारा वाच्य सम्बन्धी किसी अन्य अर्थ में आक्रान्त हो जाता है । जैसे 'गङ्गा में घर' यहाँ पर गङ्गा का वाच्यार्थ है धारा में प्रवाहित जलराशि । यह अपने अर्थ में वाधित होकर नीरसमृद्ध तीर को लक्षित करा देता है । इसका प्रयोजन है गंगागत औद्य पावनत्व की प्रतीति । ( वस्तुतः गुणवृत्ति दो प्रकार की होती है गौणी ओर शुद्धा । गौणी में गुणों के सादृश्य के आधार पर एक शब्द दूसरे शब्द के अर्थ में प्रयोग किया जाता है जैसे 'बालक अग्नि है' में तेजस्विता के सादृश्य के आधार पर अग्नि का बालक के सामानाधिकरण्य के रूप में प्रयोग किया है । शुद्धा उसे कहते हैं जहाँ सादृश्य से भिन्न अन्य सम्बन्धों के आधार पर एक शब्द का अन्य अर्थ में प्रयोग किया जाता है । जैसे निकटवर्तिता के सम्बन्ध के आधार पर 'गङ्गा में अहीर का घर' इस वाक्य में प्रवाहवाचक गङ्गा शब्द का तट के अर्थ में प्रयोग किया गया है । ये दोनों प्रकार की लक्षणायें दो-दो प्रकार की होती हैं उपादानलक्षणा और लक्षणा-लक्षणा । जहाँँ शब्द के वाच्यार्थ का एक अंश में ग्रहुण कर लिया जाता है और अर्थ की पूर्ति के लिये दूसरे अर्थ का उपादान
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किया जाता है वहाँ उपादान लक्षणा होती है, उसे ही जहत्स्वार्था भी कहते हैं । इसके प्रतिकूल जहाँ शब्द के अर्थ का सर्वथा परित्याग हो जाता है उसे लक्षणलक्षणा या अजहत्स्वार्था कहते हैं । इस दृष्टि से विचार करने पर वृत्तिकार का दिया हुआ 'गङ्गायां घोष:' यह उदाहरण ठीक नहीं प्रतीत होता । यह उदाहरण अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य का दिया गया है । किन्तु इसमें गङ्गा का वाच्यार्थ प्रवाह लक्ष्यार्थ तौर में अपने को अत्यन्त तिरस्कृत कर देता है । अतः यह उदाहरण भी अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ( अजहत्स्वार्था ) का ही होना चाहिये । अत एव अजहत्स्वार्था के उदाहरण होंगे--'छाते जारहे हैं' 'कुओं से दही बचाना' इत्यादि । ज्ञात होता है वृत्तिकार ने यहां पर 'जहत्स्वार्था' और 'अजहत्स्वार्था' पर विचार न कर एक उदाहरण गोणी का दिया है और एक लक्षणा का । ऐसा मानने पर ही इस ग्रन्थ की सङ्गति बैठती है अन्यथा नहीं ।) यद्यपि लक्षणा के और भी अनेक भेद हो सकते हैं । तथापि यहां पर केवल दो का ही निर्देश किया गया है । इसका कारण यह है कि विवक्षितवाच्य ध्वनि के केवल दो ही भेद किये गये हैं और उन भेदों से मिलते हुये भेद यहां पर दिखला दिये गये हैं । इसीलिये वृत्तिकार ने 'अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य' और 'विषयान्तर को आक्रान्त कर लेता है' इन शब्दों का प्रयोग किया है और इन शब्दों के द्वारा उन्हीं दो भेदों को शोर इङ्गित किया है । सारांश यह है कि गुणवृत्ति इन्हीं दोनों स्थानों पर होती है । विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि में ये दोनों तत्त्व आते हैं या नहीं । क्योंकि उसमें वाच्य और व्यङ्गय दोनों के स्वरूप भी प्रतीत होते रहते हैं और साथ ही दूसरे अर्थ का भी अवगमन करा देते हैं । इसी विशेषता के कारण विवक्षितान्यपरवाच्य में गुणवृत्ति का व्यवहार नहीं हो सकता और हम उसके लिये व्यञ्जना कहने के लिये बाध्य हो जाते हैं । व्यञ्जना यह नामकरण भी अत्यन्त युक्तियुक्त है, इसमें एक लोकसिद्ध तर्क है जिसके स्वरूप का बाध हो ही नहीं सकता और वह तर्क यह है कि लोक में हम उसे ही व्यञ्जक कहते हैं जो अपने को प्रकाशित करते हुये दूसरें को प्रकाशित कर दे । जैसे दीपक अपने को भी प्रकाशित करता है और अन्य पदार्थों को भी व्यक्त कर देता है । प्रतीति की उत्पत्ति में इन्द्रियाँ व्यञ्जक नहीं कही जा सकती क्योंकि वे तो कारण होती हैं । आशय यह है कि विवक्षितान्यपरवाच्य में वाच्यार्थ अपने को प्रकाशित करते हुये व्यङ्ग्यार्थ को व्यक्त करता है अतः उसके व्यापार को व्यञ्जनाव्यापार कहना ही उचित है ।
( ध्वन्या० ) अभिवक्षितवाच्यस्तु ध्वनिगुणवृत्तितः कथम् भिद्यते ? तस्य प्रभेदद्वये गुणवृत्तिद्वयरूपतैव लक्ष्यत एव यतः । अयमपि दोषः । यस्याविवक्षितवाच्यो ध्वनिगुणवृत्तिममार्गाश्रयोज्ज्वलि भवति न तु गुणवृत्तिरूप एव । गुणवृत्तिस्तु व्यङ्ग्यकत्वशून्यापि दृश्यते । व्यङ्ग्यकत्वं च यथोक्तचारुत्वहेतुं व्यङ्गयं विना न व्यवतिष्ठते । गुणवृत्तिस्तु वाच्यधर्माश्रयणैव व्यङ्ग्यमात्राश्रयेण चाभेदोपचाररूपा सम्भवति, यथा लोकसत्त्वादिमिरमणवकः आह्लादकत्वाच्छन्द्र एवास्या मुखमित्यादौ । यथा च 'प्रिये जाने नास्ति पुनरुक्तम्' इत्यादौ । यद्यपि लक्षणारूपा गुणवृत्ति: साध्युपलक्षणीयार्थसम्बन्धमात्राश्रयेण चारुरूपव्यङ्ग्यप्रतीति विनापि सम्भवत्येव, यथा सख्या: कोशनतीत्यादौ विषये ।
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तृतीय उद्योतः
(अनु०) अविवक्षितवाच्यध्वननि तो गुणवृत्ति से कैसे भिन्न होती है ? क्योंकि उसके दोनों प्रभेदों में गुणवृत्ति के दोनों भेदों की एकरूपता देखी ही जाती है ।
दोनों प्रभेदों में गुणवृत्ति के दोनों भेदों की एकरूपता देखी ही जाती है । यह भी दोष नहीं है । क्योंकि अविवक्षितवाच्यध्वननि निस्सन्देह गुणवृत्ति मार्ग का आश्रय लेनेवाली भी होती है, केवल गुणवृत्ति रूप ही नहीं होती । गुणवृत्ति तो निस्सन्देह व्यंजकत्व से शून्य भी देखी जाती है । व्यंजकत्व तो यथोक्तचारुत्व हेतु व्यङ्गच के बिना व्यवस्थित नहीं होता । गुणवृत्ति के केवल वाच्यधर्म के आश्रय से ही और केवल व्यङ्गच के आश्रय से अभेद के आरोपप्रसप्त होती है । जैसे तीक्ष्ण होने से 'बालक आग है', 'आह्लादक होने से चन्द्रमा ही इसका मुख है' इत्यादि में । और जैसे 'प्रियनजन में पुनरुक्त नहीं होता' इत्यादि में । और जो लक्षणारूप गुणवृत्ति है वह भी केवल उपलक्षणीय अर्थ के सम्बन्ध के आश्रय से चारुतारूप व्यङ्गच की प्रतीति के बिना भी सम्भव होती है जैसे 'मद्र शोर मचा रहे हैं' इत्यादि विषय में ।
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तृतीय उद्योतः
(लो०) एवमभ्युपगमं प्रदर्श्य आक्षेपं दर्शयति—अविवक्षितेति । तु शब्दः पूर्वस्माद्विशेषं द्योतयति । तस्येति । अविवक्षितवाच्यस्य यत् प्रमेदद्वयं तस्मिन् गौणलक्षणिकत्वात्मक प्रकारद्वये लक्यते निमित्तत इत्यर्थः । एतदर्थं पूर्वमेव निर्धारितम् । तादृश्या भावे हेतुमाह—गुणवृत्तिरिरित । गौणलक्षणिकोभयरूपोऽप्यर्थः । ननु व्यंजकत्वेन कथम् शून्या गुणवृत्तिरभवत्, यतः पूर्वमेवोक्तं—मुख्यां वृत्ति परित्यज्य गुणवृत्त्यार्थदर्शनम् । यदुद्दिश्य फलं तत् शब्दो नैव स्खलद्गति: ॥इति॥
इस प्रकार स्वीकार करके आक्षेप को दिखलाते हैं—अविवक्षित इति । 'तु' शब्द पहले से विशेषता को द्योतित करता है । 'उसका' यह । अविवक्षित वाच्य के जो दो प्रभेद उसमें गौण लक्षणिकत्वात्मक दो प्रकार लक्षित होते हैं अर्थात् भासित होते हैं । इसका परिहार कहते हैं—'यह भी' यह । अर्थात् गुणवृत्ति का जो मार्ग वह है आश्रय अर्थात् निमित्त के रूप में पूर्व कक्षा में निविष्ट होनेवाला जिसका । इसका तो निर्णय पहले ही कर दिया गया । तादृश्य के अभाव में हेतु बतलाते हैं—'गुणवृत्ति' यह । न हि प्रयोजनशून्य उपचारः प्रयोजनांश निवेशी च व्यञ्जनाव्यापार इति भवदिरेवाभ्यधायीत्या श्रयाभिमतं व्यञ्जकत्वं विश्रान्तिस्थानरूपं तत्र नास्तीत्याह—व्यञ्जकत्वं चेति । वाच्यधर्म इति । वाच्यविषयो यो धर्मोविधाव्यापारस्तस्याश्रयेण तदुपवृंहणायेत्यर्थः । श्रुतार्थपत्तिविवर्तान्तरस्याभिधेयार्थोपपादन एवं पर्यवसानादिति भावः । तत्र गौणस्योदाहरणमाह—यथेति । द्वितीयमपि प्रकारं व्यञ्जकत्वशून्यं दर्शयितुमुपक्रमते—यापोति । चारुरूपं विश्रान्तिस्थानम् । तदभावे स व्यञ्जकत्वव्यापारो नैवोन्मीलति, प्रत्यावृत्य वाच्य एव विश्रान्ते:, क्षणदृष्टनष्टदिव्यविभवप्राकृतपुरुषवत् ।
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अर्थात् गौण और लक्षणिक रूपवाली दोनों ही प्रकार की । (प्रश्न) गुणवृत्ति व्यंजकत्व से शून्य कैसे हो सकती हैं । क्योंकि आप पहले ही कह चुके हैं—“जिस फल का उद्देय लेकर मुख्यवृत्ति का परित्यागकर गुणवृत्ति से अर्थदर्शन किया जाता है उसमें शब्द की गति स्वलित नहीं होती ।”
उपचार कभी प्रयोजन से शून्य नहीं होता और यह अपने ही कहा है कि व्यंजना-व्यापार प्रयोजनांश में निवेशित होनेवाला होता है यह शंका करके यह कहते हैं कि विश्रान्तिस्थानरूप अभिमत व्यंजकत्व यहाँ पर नहीं होता—और व्यंजकत्व इत्यादि । वाच्यधर्म यह । वाच्यविषयक जो धर्म अर्थात् अभिधाव्यापार उसके आश्रय से अर्थात् उसके उपवृंहण के लिये । श्रुतार्थापत्ति के समान अभिधेयार्थ के उपादान में ही अर्थान्तर का पर्यवसान हो जाता है । उसमें गौण का उदाहरण देते हैं—‘जैसे’ यह । द्वितीय प्रकार को भी व्यंजकत्वशून्य बतलाने का उपक्रम करते हैं—‘जो भी’ इत्यादि । विश्रान्तिस्थान चाहतारूप होता है । उसके अभाव में व्यंजकत्वव्यापार उन्मीलित नहीं होता क्योंकि लौटकर उसकी विश्रान्ति वाच्य में ही हो जाती है जैसे कोई प्राकृत पुरुष जिसका दिव्य विभव क्षण भर दिखाई पड़कर नष्ट हो गया हो ।
तारावती—यहाँ तक तो हुई वह बात जिसमें पूर्वपक्षी और सिद्धान्ती दोनों एक मत हैं । मतभेद अविवक्षितवाच्य के विषय में है । इस विषय में पूर्वपक्षी का कहना यह है कि यह माना ही कैसे जा सकता है कि अविवक्षितवाच्य भी ध्वनि की सीमा में आने का अधिकारी है । अविवक्षितवाच्य में तो वह बात होती नहीं जो विवक्षितान्यपरवाच्य में होती है । अर्थात् अविवक्षितवाच्य में अर्थान्तर के प्रकाश के अवसर पर वाच्यार्थ अपने को प्रकाशित ही नहीं करता रहता । दूसरी बात यह है कि अविवक्षितवाच्य के दो भेद बतलाये गये हैं अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य और अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य । इन दोनों का अन्तर्भाव सफलतापूर्वक गुणवृत्ति के उक्त दोनों रूपों में किया ही जा सकता है । (वे दोनों रूप हैं उपादान अजहत्स्वार्था लक्षणा और लक्षणलक्षणा अथवा जहत्स्वार्था लक्षणा । लोचनकार ने गौण लक्षणिकत्वात्मक दो भेदों में अविवक्षितवाच्य का अन्तर्भाव माना है । वह ठीक नहीं है क्योंकि गौणी और लक्षणा दोनों के उक्त दो भेद होते हैं ।) अतः अविवक्षितवाच्य ध्वनि गुणवृत्ति ही है वह ध्वनि भेद के अन्तर्गत नहीं आती ।
(उत्तर) यह दोष आप नहीं दे सकते । क्योंकि गुणवृत्ति का जो मार्ग है अर्थात् उसके जो दोनों भेद हैं और अविवक्षितवाच्य का आश्रय बनते हैं । आश्रय यह है कि अविवक्षितवाच्य ध्वनि में गुणवृत्ति के दोनों भेद निमित्त होकर आते हैं और इसीलिये अविवक्षितवाच्य ध्वनि से पहली कक्षा में उनका सन्निवेश हो जाता है । गुणवृत्ति-मेद कारण होते हैं और अविवक्षितवाच्य कार्य । कारण कार्य से पहले होता है, अतः लक्षणामेद पहले होते हैं और बाद में ध्वनि-भेद । इस पूर्वपर्य्य के कारण गुणवृत्ति और ध्वनि में कार्य-कारण भाव सम्बन्ध है उनका तादात्म्य नहीं हो सकता । कारण कभी कार्य से रहित भी होता है, अतः गुणवृत्ति कभी व्यंजना से रहित भी हो सकती है, फिर इनका तादात्म्य कैसा ? (प्रश्न) यह कहना तो ठीक नहीं
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तृतीय उद्योतः
मालूम पड़ता है कि गुणवृत्ति व्यंजकत्व से शून्य भी हो सकती है। क्योंकि आपने स्वयं ही कहा है कि— 'जिस फल के लिये मुख्यवृत्ति का परित्याग किया जाता है और अर्थदर्शन के लिये गुणवृत्ति का आश्रय लिया जाता है उस फल के प्रत्यायन में शब्द की गति कुण्ठित नहीं होती ।' आशय यह है कि लक्षणा के प्रयोजन के प्रत्यायन में बाध की अपेक्षा नहीं होती। ऐसा कोई उपचार या लक्षणिक प्रयोग नहीं होता जिसका कोई प्रयोजन न हो और ऐसा कोई प्रयोजन नहीं होता जिसमें व्यंजनाव्यापार का सन्निवेश न हो, इतना तो आप भी मानते हो हैं। फिर आपके इस कथन का क्या आशय कि गुणवृत्ति व्यंजकरवशून्य भी देखी जाती है ? (उत्तर) (लक्षणा के आचार्यों ने दो भेद किये हैं—निरूढ़ा लक्षणा और प्रयोजनवती लक्षणा। जहाँ अनादि परम्परा के आधार पर रूढ़ि के समान लक्षणा का प्रयोग किया जाता है उसे निरूढ़ लक्षणा कहते हैं। इसमें कोई प्रयोजन नहीं होता, केवल अनादि परम्परा ही निमित्त होती हैं। जैसे लावण्य, कुशल, मण्डप, कुण्डल इत्यादि लक्षणामूलक शब्दों का शक्तिश्रम से अभिधेयार्थ के समान प्रयोग हुआ करता है। ऐसे स्थानों पर प्रयोजन-प्रत्यायन की अपेक्षा नहीं होती। अब प्रयोजनवती लक्षणा को लीजिये—इसमें प्रयोजन-प्रत्यायन के लिये व्यंजना की अपेक्षा अवश्य होती है, किन्तु उसमें भी एक विशेषता है। ठीक रूप में व्यंजकता वहीं पर कही जा सकती है जो विश्रान्तिस्थान हो अर्थात् अर्थ का पर्यवसान यदि व्यङ्ग्यार्थ में हो तभी वहाँ व्यंजनाव्यापार माना जा सकेगा। विश्रान्तिस्थान का आशय यह है कि व्यङ्ग्यार्थ चारुता-हेतु होना चाहिये, अर्थात् सौन्दर्य का पर्यवसान व्यंजना में ही होना चाहिये। गुणवृत्ति में भी कहीं-कहीं चारुता का पर्यवसान और अर्थ की परिसमाप्ति व्यङ्ग्यार्थनिष्ठ होती है। किन्तु गुणवृत्ति ऐसे स्थान पर सम्भव है जहाँ वाच्यविषयक धर्म अर्थात् अभिधाव्यापार के आश्रय से ही केवल व्यङ्ग्य का सहारा ले लिया जाता है। वहाँ पर व्यङ्ग्यार्थ का सहारा लेने का प्रयोजन केवल वाच्यार्थ का उपवर्णन करना हो होता है। जैसे श्रुतार्थापत्ति या अर्थापत्ति में दूसरे अर्थ लेने का प्रयोजन केवल यही होता है कि अभिधेयार्थ का उपपादन कर दिया जाय। उदाहरण के लिये 'स्थूल देवदत्त दिन में भोजन नहीं करता ।' बिना भोजन किये स्थूलता उत्पन्न हो ही नहीं सकती। अतः श्रुतार्थापत्ति या अर्थापत्ति से देवदत्त के रात्रिभोजन का आक्षेप कर लिया जाता है। इस रात्रिभोजनरूप अर्थान्तर के आक्षेप का मन्तव्य केवल स्थूल के वाच्यार्थ को सिद्ध करना ही है, इसमें अर्थ का पर्यवसान आक्षित अर्थ में नहीं होता। इसी प्रकार गुणवृत्ति के भी कुछ स्थान ऐसे होते हैं जिसमें व्यङ्ग्यार्थ का उपयोग वाच्यार्थ के उपकार के लिये ही होता है। पहले गुणवृत्ति को लीजिये—गुणवृत्ति वहीं पर होती है जहाँ दो सर्वथा पृथक् तथा विभिन्न पदार्थों के अशेष का आरोप-चारीक प्रयोग किया जाय। यह प्रयोग गुणों के साम्य के आधार पर होता है और गुण इसमें व्यङ्ग्य होते हैं। जैसे अग्नि और बालक दोनों सर्वथा विभिन्न पदार्थ हैं। इनका औपचारिक तादात्म्य 'बालक अग्नि है' में स्थापित किया गया है। इस तादात्म्यस्थापन का
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हेतु है तीक्ष्णत्व जो कि एक गुण है और जिसकी प्रतीति व्यञ्जनावृत्ति के आधार पर होती है। यह व्यञ्जना तादात्म्य का हेतु बतलाकर ही विश्रान्त हो जाती है। इसी प्रकार 'मुखचन्द्र है' में आह्लादकत्व व्यक्त होकर वाच्य तादात्म्य का उपकार करता है। इसी प्रकार 'प्रियजन में पुनरुक्त नहीं होता' में पुनरुक्त शब्द की गुणवृत्ति के विषय में भी समझना चाहिये। यह तो हुई गुणवृत्ति की बात। अब लक्षणा को लीजिये—इसमें गुणसाम्य के आधार पर अभेदस्थापन नहीं होता अपितु सादृश्य से भिन्न किसी अन्य सम्बन्ध से अन्यार्थक शब्द का अन्य अर्थ में प्रयोग किया जाता है। उसमें भी यह सम्भव है कि जिस प्रयोजन में व्यञ्जना होती है उसमें न तो अर्थ का पर्यवसान हो और न चाशता की परिसमाप्ति तद्गत हो। जब कि चारुत्वरूप विश्रान्तिस्थान व्यञ्जनाव्यापार में होगा ही नहीं तब व्यञ्जना का उन्मीलन भी नहीं हो सकेगा। जैसे 'मड़ मड़ शोर मचा रहे हैं' में तात्स्थ्य सम्बन्ध से बालकों के लिये 'मड़' शब्द का प्रयोग किया गया है। प्रयोजन है बहुत्व की प्रतीति जो कि व्यञ्जनाव्यापारगम्य है। यह बहुत्व की प्रतीति लक्ष्यार्थी का बोध कराकर लौटकर उसी में विश्रान्त हो जाती है। इसकी वही दशा होती है जो किसी ऐसे व्यक्ति की दय्या करती है जिसका दिव्य वैभव क्षणभर के लिये देखा गया हो और तत्काल नष्ट हो जाय। इसी प्रकार कुछ गुणवृत्तियाँ तथा लक्षणायें ऐसी होती हैं जिनमें व्यञ्जना का क्षणिक आभास मिलता है और फिर उसका पर्यवसान वाच्यार्थ के सिद्ध करने के लिये ही हो जाता है। ऐसे स्थलों के विषय में कहा जा सकता है कि गुणवृत्ति व्यञ्जनाशून्य है।
('गुणवृत्तिसु वाच्यधर्माश्र्योणैव व्यङ्ग्यधर्मात्राश्रये च' इन शब्दों की ठीक सङ्ङति न लगा सकने के कारण टीकाकारों में प्रायः भ्रम उत्पन्न हो गया है। अधिकतर टीकाकारों ने 'वाच्यधर्माश्र्योणैव' की योजना निरुद्धालक्षणापरक लगाई है और 'व्यङ्ग्यधर्मात्राश्रये' की योजना प्रयोजनवतिलक्षणापरक लगाई है। किन्तु यह अर्थ करने पर एक तो 'एव' का प्रयोग सङ्ङत नहीं होता; दूसरे पूर्वापर ग्रन्थ की सङ्ङति नहीं लगती, तीसरे उदाहरण भी निरुद्धालक्षणापरक नहीं दिये गये हैं और चौथी बात यह है कि लोचनकार ने स्पष्ट हो लिखा है कि श्रुतार्थापत्ति के समान वहाँ पर व्यङ्ग्यार्थ का प्रयोग अभिधाव्यापार के उपबृंहण के लिये ही होता है; ऐसे स्थलों पर व्यञ्जना की वही दशा होती है जो क्षणभर विभव को देखकर गरीबों में लौट जानेवाले व्यक्ति की हत्सा करती है। इन सबकी सङ्ङति बिठाने से स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ पर आलोककार ने ऐसे स्थलों का निर्देश किया है जहाँ व्यञ्जना अभिधा की साघक होती है।)
यत्र तु सा चारूप्रयुक्ता व्यञ्जकत्वानुप्रवेशनेच वाचकत्ववत् । नासम्भविना चार्थेन यत्र व्यवहारः, यथा 'सुवर्णपुष्पां पृथिवीम्' इत्यादौ तत्र चारुत्वव्यङ्ग्यप्रतीतिरेव प्रयोजिकेति तथाविधेपी विषय्ये गुणवृत्तौ सत्यामपि ध्वनिरव्यवहार एव युक्त्यनुरोधी। तस्माद्विवक्षितवाच्ये ध्वनौ ह्यदयोरपि प्रभेदयो-व्यङ्ग्यकत्वविशेषाविशिष्टा गुणवृत्तिनं तु तदेकरूपा सहृदयहृद्याह्लादिनी प्रतीयमाना प्रतीतिहेतुत्वादिष्यियान्तरे तदूपशून्याया दर्शयितुं एतच्च सर्वं प्राक्सूचितमपि स्फुटतरप्रतिपत्तिपत्तये पुनरुक्तम् ।
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तृतीय उद्योत:
(अनु०) जहाँ पर तो वह (गुणवृत्ति) चारुरूप व्यञ्ज्यचप्रतीति में हेतु होती है वहाँ पर भी वाचकत्व के समान व्यञ्जकत्व के अनुप्रवेश से ही (उसमें चारुता आती है ।) और असम्भव अर्थ से जहाँ व्यवहार होता है जैसे 'सुवर्णपुष्पां पृथिवीम्' इत्यादि में, वहाँ चारुरूप व्यञ्ज्यचप्रतीति ही प्रयोजिका होती है; अतः उस प्रकार के विषय में भी गुणवृत्ति के होते हुये भी 'रसनि' का व्यवहार युक्तिसंगत है । अत एव अविवक्षितवाच्य के दोनों ही प्रभेदों में गुणवृत्ति व्यञ्जकत्व विशेष से विशिष्ट होकर ही सहृदयों के हृदयों को आह्लाद देनेवाली होती है क्योंकि गुणवृत्ति प्रतीयमान की प्रतीति में हेतु नहीं होती क्योंकि वह उसके रूप से शून्य भी देखी जाती है । यह सब पहले सूचित किया हुआ भी अधिक स्फुट प्रतीति के लिये फिर कह दिया गया है ।
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तृतीय उद्योत:
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(लो०) नतु यत्र व्यञ्ज्येष्टर्थे विश्रान्तस्तत्र किं कर्तव्यमित्याशङ्क्याह—तत्र त्विति । अस्ति तत्रापरो व्यञ्जनव्यापार: परिस्फुट एवेत्यर्थ: । दृष्टान्तं पराङ्कृतमेवाह—वाचकत्ववदिति । वाचकत्वे हि त्वयैवाङ्गीकृतो व्यञ्जनव्यापार: प्रथमध्वनिप्रभेदमप्यन्वाचष्टेति भाव: । किश्च वस्त्वन्तरे मुख्ये सम्भवति सम्भवदेव वस्त्वन्तरं मुख्यप्रत्यञ्चक्षणेनेति भाव: । सुवर्णपुष्पादिषु मुख्योऽस्त्वारोप्यव्यवहार:, 'सुवर्णपुष्पां पृथिवीम्' इति हि स्वादारोप:; तस्मादत्र व्यञ्जनव्यापारानुरोधतया भवितव्यमिति । तदाह—असम्भविनेतिनि । प्रयोजिकेति । व्यञ्ज्यमेव हि प्रयोजनरूपं प्रतीतिविश्रामस्थानमारोपिते त्वसम्भवति प्रतीतिविश्रान्तिराशङ्कनीया अपि न भवति । सत्यामपीति । व्यञ्जनव्यापारसम्पत्तये क्षणमात्रमवलम्बताया अमितभाव: । तस्मादिति । व्यञ्जकत्वलक्षणो यो विशेषस्तेनाविशिष्टा अविकल्पमानं विशिष्टं विशेषो भेदनं तस्या: । व्यञ्जकत्वं न यस्या: भेदनं इत्यर्थ: । यदि वा व्यञ्जकत्वलक्षणेन व्यापारविशेषेणाविशिष्टा न्यक्कृतस्वभावा आसन्नतादृश्यासि । तदकोटौ । तेन व्यञ्जकत्वलक्षणविशेषणाविशिष्टा सहेतुकं रूपं यस्या: सा तथाविधा न भवति । अविवक्षितवाच्ये व्यञ्जकत्वं गुणवृत्ते: पृथक्च्चारुत्वप्रतीतिहेतुत्वमस्तीति दर्शयति—विषयान्तर इति । अग्निवर्णदुरित्यादौ । प्रागिति प्रथमोद्योते ।
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तृतीय उद्योत:
(अनु०) (प्रश्न) जहाँ व्यञ्ज्यार्थ में विश्रान्ति होती है वहाँ क्या करना चाहिये ? इस शंका पर कहते हैं—(उ०) 'बहांपर तो' यह । अर्थात् वहाँ पर दूसरा व्यञ्जनाव्यापार परिस्फुट ही है । दूसरे के द्वारा स्वीकार किया हुआ ही दृष्टान्त देते हैं—'वाचकत्व के समान' यह । भाव यह है कि प्रथम ध्वनि भेद का खण्डन न करते हुये तुमने ही वाचकत्व में व्यञ्जनाव्यापार अङ्गीकार कर लिया । दूसरी बात यह है कि मुख्य दूसरी वस्तु के सम्भव होते हुये सम्भव अज्ञीकार कर लिया । दूसरी मुख्य वस्तु का ही आरोप किया जाता है; केवल विषयान्तर होने से ही आरोप का व्यवहार किया जाता है है; यही उपचार का जीवन है । सुवर्ण पुष्पों का होना तो मूल से ही असम्भव है अत एव उनके चयन करने के आरोप का व्यवहार ही कैसा ? 'सुवर्णपुष्पा पृथिवी' इत्यादि में
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यह आरोप हो सके, इससे यहाँ पर व्यंजनाव्यापार ही प्रधान है आरोपव्यवहार नहीं । वह केवल व्यंजनाव्यापार के अनुरोध से ही उठता है । वही कहते हैं—‘असम्भव अर्थ के द्वारा’ इत्यादि । ‘प्रयोजिका’ यह । निस्सन्देह प्रयोजनरूप व्यंग्य ही प्रतीति का विश्रामस्थान होता है । आरोपित के असम्भव होने पर प्रतीतिविश्रान्ति की शंका भी नहीं की जा सकती । ‘होने पर भी’ यह । भाव यह है कि व्यंजनाव्यापार की सम्पत्ति के लिये क्षणमात्र अवलम्बन की ही हुई होने पर भी । ‘जिससे’ यह । व्यंजकत्व लक्षणवाला जो विशेष उससे अविशिष्ट अर्थात् विशिष्ट या विशेष अथवा भेदेन जिसका विद्यमान नहीं हैं । अथवा व्यंजकत्वलक्षणवाले विशेष प्रकार के व्यापार के द्वारा अविशिष्ट अर्थात् तिरस्कृत स्वभाववाली, चारों ओर से व्याप्त । ‘उससे एकरूप’ यह । उससे अर्थात् व्यंजकत्व लक्षण के साथ एकरूप नहीं है जिसका उस प्रकार की नहीं होती । अविवक्षितवाच्य में व्यंजकत्व गुणवृत्ति से पुष्टक् होता है क्योंकि चारुता की प्रतीति/में हेतु होता है जिस प्रकार विवक्षित वाच्य में रहनेवाला व्यंजकत्व । गुणवृत्ति की चारुप्रतीतीहेतुता नहीं है । यह दिखलाते है ‘विषयान्तर में’ यह । ‘अग्नि ब्रह्मचारी है’ इत्यादि में । ‘वहले’ यह अर्थात् प्रथम उदयोत में ।
तारावती—(प्रश्न) जहाँ व्यंजना गुणवृत्ति की साधिका होकर आती है उसके विषय में आपने जो कुछ कहा वह ठीक हो सकता है किन्तु ऐसे स्थलों के विषय में आप क्या करेंगे जहाँ व्यङ्ग्यार्थ में ही अर्थ की विश्रान्ति होती है और उसी में चारुता की परमसमाप्ति होती है ? (उत्तर) वहाँ पर स्पष्ट ही व्यंजना नामक एक अतिरिक्त् व्यापार विद्यमान रहता है । इस बात को सिद्ध करने के लिये आनन्दवर्धन ने वही उदाहरण दिया है जो कि पूर्वपक्षियों ने स्वीकार कर लिया था । पूर्वपक्षियों ने विवक्षितान्यपरवाच्य नामक ध्वनिभेद का खण्डन नहीं किया अपितु उसका समनर्थन हो किया था । यहाँ पर वृत्तिकार का कहना है कि जिस प्रकार वाच्यार्थ के साथ प्रतीयमान अर्थी चारुता में हेतु होकर ध्वनिरूपता की धारण करता है और उसके लिये आपने व्यंजनाव्यापार स्वीकार किया है उसी प्रकार गुणवृत्ति में भी चारुताप्रतीति में हेतु आपने व्यंजकत्व के अनुप्रवेश से ही गुणवृत्तिमूलक ध्वनि में भी चारुताप्रतीति होती है । दूसरी बात यह है कि गुण सादृश्य के आधार पर जहाँ पर दो विभिन्न वस्तुओं में तादात्म्य का आरोप किया जाता है और विभिन्न-वस्तुओं के भेद का स्थगन कर दिया जाता है उसे उपचार कहते हैं । इस उपचार का बीज यही है कि मुख्यवस्तु सम्भव हो और उसपर ऐसी ही मुख्यवस्तु का आरोप किया जाय जो स्वयं सम्भव हो । तबही उसे उपचार की संज्ञा प्राप्त हो सकती है । यहाँ यह पूछा जा सकता है कि जब दोनों वस्तुयें मुख्य भी होतीं और दोनों ही सम्भाव भी होतीं हैं तब उनका आरोप कैसे कहा जा सकता है ! इसका उत्तर यह है कि मुख्य वस्तु का विषयान्तर में प्रयोग होता है इसीलिये उसे आरोप की संज्ञा दी जाती है । इससे यह सिद्ध हुआ कि जिस वस्तु वाच्य । आरोप किया जाय और जिसपर आरोप किया गया हो दोनों वस्तुयें सम्भाव अवश्य होनी चाहिये । इसके प्रतिकूल कुछ स्थल ऐसे होते हैं जहाँ एक वस्तु सर्वथा असम्भव होती है । उदाहरण के लिये ‘सुवर्णपुष्पों पृथिवीभू’ को लीजिये सुवर्ण के पुष्पों का होना तो मूलत:
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तृतीय उद्योत:
असम्भव है; अतः वहाँ पर उनके उच्चयन के आरोप का व्यवहार हो ही कैसे सकता है ! यदि यहाँ सुवर्ण-पुष्प सम्भव होते तो पृथिवीपर सुवर्णपुष्पा होने का आरोप हो सकता था जोकि सुवर्ण-पुष्पों के असम्भव होने से सर्वथा असङ्गत हो जाता है। अत एव यहाँ पर आरोप का व्यवहार प्रधान नहीं है अपितु व्यञ्जनाव्यापार ही प्रधान है। व्यञ्जना व्यापार के अनुरोध से ही आरोप के व्यवहार का आश्रय ले लिया जाता है। आश्रय यह है कि जहाँ व्यञ्जना गुणवृत्ति की साधिका न होकर स्वयं स्वतन्त्र तथा चमत्कारपूर्ण होती है वहाँ गुणवृत्ति का उपयोग केवल व्यञ्जना के उपकारक के रूप में ही होता है। यही बात वृत्तिकार ने 'असम्भविना चार्येन' इन शब्दों के द्वारा व्यक्त की है। वृत्तिकार का आशय यह है कि जहाँ पर अर्थ असम्भव होता है वहाँ पर गुणवृत्ति के जिस प्रयोजन की व्यञ्जना की जाति है उसी में प्रतीति का पर्यवसान हो जाता है और उसी में चारुता परिणिष्ठित होती है। यह तो शङ्का भी नहीं की जा सकती कि जो आरोप असम्भव है उसमें प्रतीति की विश्रान्ति होगी। ऐसे स्थलों पर व्यञ्जनाव्यापार की पूर्ति के लिये तथा उसके सम्पन्न हो जाने के लिये गुणवृत्ति का क्षणभर के लिये आश्रय ले लिया जाता है; वस्तुतः वहाँ व्यञ्जना ही प्रमुख होती है, अतः ऐसे काव्य को 'व्दनिकाव्य' कहना ही अधिक युक्तियुक्त प्रतीत होता है। इस समस्त निरूपण का निष्कर्ष यही निकलता है कि गुणवृत्ति और व्यञ्जना दोनों एकरूप कभो नहीं हो सकती। अविवक्षितवाच्यध्वनि वहीं पर होती है जहाँ व्यञ्जना का उपकार करने के लिये साधक के रूप में गुणवृत्ति का क्षणमात्र के लिये आश्रय ले लिया जाता है और उसमें व्यञ्जनावृत्ति ही प्रधान होकर स्थित होती है। आश्रय यह है कि अविवक्षितवाच्य के दोनों प्रभेदों में ( अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य इन दोनों प्रभेदों मे ) गुणवृत्ति व्यञ्जकत्वविशेषाविशिष्ट होती है। लोचन में व्यञ्जकत्वविशेषाविशिष्ट के तीन अर्थ किये गये हैं—( १ ) व्यञ्जकत्वरूप विशेष से अविशिष्ट अर्थात् व्यञ्जकत्व एक विशेष तत्त्व है; गुणवृत्ति उससे विशिष्ट नहीं होती। आश्रय यह है कि गुणवृत्ति में व्यञ्जकत्वरूप विशेष या भेदकत्व विद्यमान नहीं रहता अर्थात् व्यञ्जकत्व उसका भेद नहीं है। ( २ ) विशिष्ट का अर्थ है आदर, अविशिष्ट का अर्थ है अनादर। व्यञ्जकत्वरूप व्यापारविशेष के द्वारा जिसका अनादर कर दिया गया हो अर्थात् जहाँ गुणवृत्ति व्यञ्जनाव्यापार के द्वारा दबा दी जाती है वह ध्वनि का विषय होता है और ( ३ ) व्यञ्जकत्वविशेषाविशिष्ट की सन्धि इस प्रकार होगी—व्यञ्जक विशेष + आ + विशिष्ट। विशिष्ट का अर्थ है व्याप्त अर्थात् जो व्यञ्जकविशेष से चारों ओर से व्याप्त हो। इस प्रकार अविवक्षितवाच्य ध्वनि में गुणवृत्ति की स्थिति के विषय में बतलाया गया है कि उसमें गुणवृत्ति में व्यञ्जकत्व के द्वारा गुणवृत्ति दबा दी जाती है और व्यञ्जकत्व गुणवृत्ति में सभी ओर व्याप्त रहता है। इस प्रकार व्यञ्जना और गुणवृत्ति का तादात्म्य नहीं होता और गुणवृत्ति व्यङ्ग्यार्थ के प्रधान होनेपर ही अविवक्षितवाच्य ध्वनि का रूप धारण कर सहृदयों के हृदयों को आह्लाद देनेवाली होती है; इसके प्रतिकूल गुणवृत्ति सहृदयों के हृदयों को आह्लाद देनेवाली नहीं होती। व्यञ्जना प्रतीयमान होती है किन्तु गुणवृत्ति प्रतीयमान नहीं होती। व्यञ्जना चारुताप्रतीति में हेतु होती
असम्भव है; अतः वहाँ पर उनके उच्चयन के आरोप का व्यवहार हो ही कैसे सकता है ! यदि यहाँ सुवर्ण-पुष्प सम्भव होते तो पृथिवीपर सुवर्णपुष्पा होने का आरोप हो सकता था जोकि सुवर्ण-पुष्पों के असम्भव होने से सर्वथा असङ्गत हो जाता है। अत एव यहाँ पर आरोप का व्यवहार प्रधान नहीं है अपितु व्यञ्जनाव्यापार ही प्रधान है। व्यञ्जना व्यापार के अनुरोध से ही आरोप के व्यवहार का आश्रय ले लिया जाता है। आश्रय यह है कि जहाँ व्यञ्जना गुणवृत्ति की साधिका न होकर स्वयं स्वतन्त्र तथा चमत्कारपूर्ण होती है वहाँ गुणवृत्ति का उपयोग केवल व्यञ्जना के उपकारक के रूप में ही होता है। यही बात वृत्तिकार ने 'असम्भविना चार्येन' इन शब्दों के द्वारा व्यक्त की है। वृत्तिकार का आशय यह है कि जहाँ पर अर्थ असम्भव होता है वहाँ पर गुणवृत्ति के जिस प्रयोजन की व्यञ्जना की जाति है उसी में प्रतीति का पर्यवसान हो जाता है और उसी में चारुता परिणिष्ठित होती है। यह तो शङ्का भी नहीं की जा सकती कि जो आरोप असम्भव है उसमें प्रतीति की विश्रान्ति होगी। ऐसे स्थलों पर व्यञ्जनाव्यापार की पूर्ति के लिये तथा उसके सम्पन्न हो जाने के लिये गुणवृत्ति का क्षणभर के लिये आश्रय ले लिया जाता है; वस्तुतः वहाँ व्यञ्जना ही प्रमुख होती है, अतः ऐसे काव्य को 'व्दनिकाव्य' कहना ही अधिक युक्तियुक्त प्रतीत होता है। इस समस्त निरूपण का निष्कर्ष यही निकलता है कि गुणवृत्ति और व्यञ्जना दोनों एकरूप कभो नहीं हो सकती। अविवक्षितवाच्यध्वनि वहीं पर होती है जहाँ व्यञ्जना का उपकार करने के लिये साधक के रूप में गुणवृत्ति का क्षणमात्र के लिये आश्रय ले लिया जाता है और उसमें व्यञ्जनावृत्ति ही प्रधान होकर स्थित होती है। आश्रय यह है कि अविवक्षितवाच्य के दोनों प्रभेदों में ( अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य इन दोनों प्रभेदों मे ) गुणवृत्ति व्यञ्जकत्वविशेषाविशिष्ट होती है। लोचन में व्यञ्जकत्वविशेषाविशिष्ट के तीन अर्थ किये गये हैं—( १ ) व्यञ्जकत्वरूप विशेष से अविशिष्ट अर्थात् व्यञ्जकत्व एक विशेष तत्त्व है; गुणवृत्ति उससे विशिष्ट नहीं होती। आश्रय यह है कि गुणवृत्ति में व्यञ्जकत्वरूप विशेष या भेदकत्व विद्यमान नहीं रहता अर्थात् व्यञ्जकत्व उसका भेद नहीं है। ( २ ) विशिष्ट का अर्थ है आदर, अविशिष्ट का अर्थ है अनादर। व्यञ्जकत्वरूप व्यापारविशेष के द्वारा जिसका अनादर कर दिया गया हो अर्थात् जहाँ गुणवृत्ति व्यञ्जनाव्यापार के द्वारा दबा दी जाती है वह ध्वनि का विषय होता है और ( ३ ) व्यञ्जकत्वविशेषाविशिष्ट की सन्धि इस प्रकार होगी—व्यञ्जक विशेष + आ + विशिष्ट। विशिष्ट का अर्थ है व्याप्त अर्थात् जो व्यञ्जकविशेष से चारों ओर से व्याप्त हो। इस प्रकार अविवक्षितवाच्य ध्वनि में गुणवृत्ति की स्थिति के विषय में बतलाया गया है कि उसमें गुणवृत्ति में व्यञ्जकत्व के द्वारा गुणवृत्ति दबा दी जाती है और व्यञ्जकत्व गुणवृत्ति में सभी ओर व्याप्त रहता है। इस प्रकार व्यञ्जना और गुणवृत्ति का तादात्म्य नहीं होता और गुणवृत्ति व्यङ्ग्यार्थ के प्रधान होनेपर ही अविवक्षितवाच्य ध्वनि का रूप धारण कर सहृदयों के हृदयों को आह्लाद देनेवाली होती है; इसके प्रतिकूल गुणवृत्ति सहृदयों के हृदयों को आह्लाद देनेवाली नहीं होती। व्यञ्जना प्रतीयमान होती है किन्तु गुणवृत्ति प्रतीयमान नहीं होती। व्यञ्जना चारुताप्रतीति में हेतु होती
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है किन्तु गुणवृत्ति चारुताप्रतीति में हेतु भी नहीं होती; क्योंकि विषयान्तर में ( ‘बालक अमिन है’ इत्यादि में ) गुणवृत्ति व्यंजकत्व के रूप से शून्य भी देखी जाती है । यही सब कारण हैं जिनसे व्यंजनावृत्ति को गुणवृत्ति से पृथक् मानना ही पड़ता है। यहाँ पर व्यंजकरव और गुणवृत्ति का पृथकत्व अनुमान के आधार पर सिद्ध होता है। अनुमान की प्रक्रिया यह होगी—अविच्छिन्नवाच्य का व्यंजकरव गुणवृत्ति से प्रियक् होता है । ( प्रतिज्ञा ) ‘क्योंकि वह चारुताप्रतीति में हेतु होता है’ ( हेतु ) ‘जो जो चारिताप्रतीति में हेतु होता है वह गुणवृत्ति से प्रियक् होता है’ ( उदाहरण ) ‘उसी भिन्न हृदय करता है जैसे विवक्षितान्यपरवाच्य में रहनेवाला व्यंजकत्व’ ( उपनय ) और ‘अत एव उसी प्रकार का है’ ( निगमन ) । यद्यपि प्रथम उद्योत में यह सब सूचित किया जा चुका है तथापि यहाँ पर फिर से इसीलिये कह दिया गया है कि पाठक लोग अधिक स्पष्टता के साथ समझ सकें ।
( ध्वन्या० )—अपि च व्यञ्जकत्वलक्षणो यः शब्दार्थयोर्धर्मः स प्रसिद्धसम्बन्ध-
नुरोधीति न कस्यचिद्विषयतामहन्ति । शब्दार्थयोर्हि प्रसिद्धो यः सम्बन्धो वाचकभावाध्यस्तमनुसन्धान एव व्यञ्जकत्वलक्षणो व्यापारः । सामप्रचन्तरसम्बन्धादौ-पाधिकः प्रवतन्ते । अत एव वाचकत्वात्तस्य विशेषः । वाचकत्वं हि शब्दविशेषस्य
पाङिकः प्रवतन्ते । अत एव वाचकत्वात्तस्य विशेषः । वाचकत्वं हि शब्दविशेषस्य
नियत आत्मा व्युत्पत्तिकालादारभ्य तद्वाच्यभावेन तु प्रसिद्धत्वात् । स त्वनियत
तस्य प्रतीतिरतरथा स्वप्रतीते: । ननु यद्यनियतस्त्वंक तस्य स्वरूपपरীক্ষा । नेष दोषः; यतः शब्दात्मनि
तस्यानिततत्त्व्वं, न तु स्वे विषये व्यङ्गच्यलक्षणे
( अनु० ) और भी—शब्द और अर्थ का जो अनुसरण करनेवाला होता है यह बात किसी के मतभेद का विषय बनने के योग्य है ही नहीं । शब्द अर्थ का जो प्रसिद्ध वाच्यवाचक नामक सम्बन्ध उसका अनुसरण करते हुये ही दूसरी सामग्री के सम्बन्ध से व्यंजकत्व नामक व्यापार औपाधिकरूप में प्रवृत्त होता है । इसीलिये वाचकत्व की अपेक्षा उसमें विशेषता होती है । निस्सन्देह वाचकत्व शब्दविशेष की निश्चित आत्मा होता है क्योंकि व्युत्पत्तिकाल से लेकर उससे वाच्यभाव से वह प्रसिद्ध होता है, वह ( व्यंजकत्व ) तो अनियत होता है, से लेकर उससे अपृथक् भाव में वह प्रसिद्ध होता है । वह ( व्यंजकत्व ) औपाधिक होता है; प्रकरण इत्यादि से अवच्छिन्न होने पर उसकी प्रतीति होती है अन्यथा नहीं ।
( प्रश्न ) यदि अनियत है तो उसकी स्वरूपपरोक्षा से क्या लाभ ? ( उत्तर ) यह दोष नहीं है, क्योंकि उसका अनियत्तत्व शब्दात्मा में होता है, व्यङ्गच्यरूप अपने विषय में नहीं ।
( लो० ) नियतस्वभावावच्च वाच्यवाचकत्वादौपाधिकत्वेनानियतं व्यञ्जकत्वं
कर्थं न भिन्ननिमित्तमिति दर्शयति—अपि चेति । औपाधिक इति । व्यञ्जकत्ववैचित्र्यं
यत्वपूर्वमुक्तं तत्कृत इत्यर्थः । अत एव समयनियमितादिभिधाभिधेयापाराद्विलक्षण इति
प्रकृतम् । एवं स्फुटयति—अत एवेति । औपाधिकत्वं दर्शयति—प्रकरणादिति ।
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तृतीय उद्योतः
किं तस्येति । अनियतत्वाद्यथार्थावचि कल्प्येत पारमार्थिकं रूपं नास्तीति; न चावस्तुनः परीक्षणोपपद्यत इतिभावः । शब्दातमनीति । सङ्केतास्पदे पदसवरूपमात्र इत्यर्थः ।
(अनु०) नियत स्वभाववाले वाच्यवाचकत्व से औपाधिक होने के कारण अनियत व्यंजकत्व क्यों भिन्न निमित्तवाला नहीं है यह दिखलाते हैं—‘और वो’ इत्यादि । ‘औपाधिक’ अर्थात् जो व्यंजकत्व वाच्यत्व पहले बतलाया गया है, उसके द्वारा प्रयुक्त । आशय यह है कि इसीलिये सङ्केत में नियमित अभिधाव्यापार से विलक्षण होता है। इसी को स्फुट कर रहे हैं—अत एव इत्यादि । औपाधिकत्व को दिखलाते हैं—‘प्रकरणादि’ इत्यादि ।
‘उसकी’’क्या’ यह । अनियत होने से रचि के अनुसार कल्पना कर ली जाय, वास्तविक रूप नहीं होता है । भाव यह है कि अवस्तु की परीक्षा उत्पन्न ही नहीं होती । ‘शब्दात्मा में’ यह । अर्थात् सङ्केतास्पद पद के स्वरूपमात्र में ही ।
व्यंजना वृत्ति को सिद्ध करने लिये अन्य हेतु तारावती—यहाँ अब व्यंजना की सत्ता सिद्ध करने के लिये दो एक हेतु और दिये जा रहे हैं । इस विषय में तो किसी को मतभेद होना ही नहीं चाहिये कि वाच्यवाचकभाव शब्द और अर्थ का प्रसिद्ध सम्बन्ध है तथा उसी को उपजीव्य मानकर तथा उसी का आश्रय लेकर व्यंजनाव्यापार प्रवृत्त हुआ करता है । वाच्यवाचकभाव तथा व्यंजनाव्यापार में एक बहुत बड़ा अन्तर यह होता है कि वाच्यवाचकभाव का स्वभाव निश्चित होता है तथा व्यंजनाव्यापार औपाधिक होता है । ( उपाधि शब्द ‘उप + आ’ उपसर्ग ‘धाृ’ धातु से ‘कि’ प्रत्यय होकर बना है इसका अर्थ है अपने धर्म को दूसरे के निकट ले जाना । वस्तु का स्वभाव एक सा ही होता है, किन्तु किसी विशेषतरव को प्राप्तकर वह वस्तु अन्य प्रकार की प्रतिभासित होने लगती है । किन्तु उस वस्तु में भेद नहीं होता । उदाहरण के लिये मुख की आकृति एक सी ही रहती है किन्तु दर्पण, तेल, जल इत्यादि में उसको आकृति विभिन्न प्रकार की दिखलाई देने लगती है । अतः दर्पण, तेल, जल इत्यादि पदार्थ उपाधि हुये और उनमें दिखलाई पड़नेवाली विभिन्न आकृतियाँ औपाधिक हुई । इसी प्रकार दर्पण इत्यादि वस्तुओं का रंग सफेद होता है किन्तु उनपर जिस प्रकार की विजली का प्रकाश डाला जाता है वे वस्तुयें भी उसी रंग की मालूम पड़ने लगती हैं । विभिन्न प्रकार के प्रकाश उपाधि कहे जायेंगे और उनसे प्रतीत होनेवाला वस्तुओं का विभिन्न प्रकार का वर्ण औपाधिक कहा जायगा । उपाधिभेद से वस्तु में भेद नहीं आता किन्तु उसकी प्रतीति भिन्नरूप में होने लगती है । ) शब्द और अर्थ का वाच्यवाचकभाव सम्बन्ध नित्य सम्बन्ध है, किन्तु व्यंजना-जन्य बोध औपाधिक होता है (व्यंजना की उपाधियों का वर्णन काव्यप्रकाश की निम्नलिखित कारिकाओं में किया गया है—
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तृतीय उद्योतः
वस्तुवोधककाकूनां वाच्यवाच्यान्यसत्रिधे: । प्रस्तावदेशकालादे: शिष्टघ्यातप्रतिभाजुषाम् । योङ्न्यास्यार्थीहेतुर्यापारो व्यक्तिरेव सा ।।
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वक्ता इत्यादि की विशेषताओं से जो अन्य अर्थ में अन्य अर्थ की बुद्धि बन जाती है उसे व्यंजना ही कहा जाता है। आशय यह है कि वाच्यवाचक भाव तो शब्दविशेष की एक नियत आत्मा है। जब से हमें वाच्य-वाचक का ज्ञान होता है तब से जब कभी हम उस शब्द को सुनते हैं तब हमें उसी अर्थ की प्रतीति होती है और जब कभी उस अर्थ को कहने की प्रवृत्ति होती है तब वह शब्द सामने आ जाता है। इस प्रकार वाच्य और वाचक अपने ही रूप में सर्वदा एक दूसरे के साथ बने रहते हैं, उनमें कभी अन्तर नहीं आता। (पुस्तक शब्द का एक निश्चित अर्थ होना है। जब व्यक्ति को उस अर्थ का ज्ञान हो जाता है तब से लेकर जब कभी पुस्तक शब्द का प्रयोग किया जाता है वह व्यक्ति अनिवार्य रूप से पुस्तक शब्द का वही वाच्यार्थ समझ जाता है।) इस प्रकार वाच्यवाचकभाव सम्बन्ध नित्य होता है। इसके प्रतिकूल व्यङ्गच्य-व्यंजकभाव सम्बन्ध अनियत होता है। एक प्रकरण में किसी एक शब्द का कोई एक व्यङ्ग्यार्थ प्रतीत होता है उस प्रकरण में न रहने पर उसी अर्थ की प्रतीति नहीं होती, जब दूसरा प्रकरण आ जाता है तब उसका दूसरा ही अर्थ हो जाता है। इस प्रकार व्यङ्गचव्यंजक भाव अनियत तथा औपाधिक होता है। सारांश यह है कि वाच्यवाचक भाव संकेतित अर्थ में होता है और वह निश्चित भाव रहता है, इसके प्रतिकूल व्यङ्गचव्यंजक-भाव उपाधि के आधार पर बदलता रहता है। जब दोनों में इतना अन्तर है तब उनको एक ही कैसे कहा जा सकता है ? (प्रश्न) जब व्यंग्यव्यंजक भाव अनियत रहता है तब उसकी स्वरूपपरिक्षा से क्या लाभ? जब उसका कोई पारमार्थिक रूप ही नहीं, जब वह सर्वथा अनिश्चित है तब जो जैसा चाहे वह वैसी कल्पना कर सकता है और अपनी रुचि के अनुसार उसको समझ सकता है, उसकी स्वरूपपरिक्षा हो ही कैसे सकती है ? परिक्षा कैसी ? (उत्तर) यह दोष नहीं। 'वाच्यवाचक भाव नियत होता है किन्तु व्यंजना नियत नहीं होती' यह कहने का आशय केवल यहीं है कि जिस प्रकार अभिधा में शब्द का एक नियत संकेतित अर्थ होता है उस प्रकार का संकेतित नियत अर्थ व्यंजना का नहीं होता। यह अनिश्चय केवल शब्द की आत्मा में ही होता है, व्यंजना का अपना स्वतन्त्र विषय होता है जिसको व्यंग्यार्थ की संज्ञा दी जाती है। यह व्यंग्यार्थ अपने विषय में तो नियत होता ही है। (व्यंग्यार्थ का विषय-विभाजन रस, वस्तु और अलङ्कार के रूप में किया गया है। इन सबका भी अपना-अपना विषय नियत रहता है। अतः उस पर विचार करना अत्युक्ति नहीं।) व्यङ्गचकत्व शब्दात्मा में नियत नहीं होता किन्तु अपने विषय में नियत होता है। (ध्वन्या०) लिङ्गद्वन्वयादिच्छास्य व्यङ्गचव्यंजकभावस्य लक्ष्यते, यथा लिङ्गत्व-माथुर्येष्वनियताताभासम्, इच्छाधोनत्वात्, स्वविषयाव्यभिचारि च । तथैवेदं यथा दार्शन्तं व्यङ्गकत्वम्। शब्दात्मन्वनियतत्वादेव च तस्य वाचकत्वप्रकारता न शङ्कच कल्प-यितुम्। यदि हि वाचकत्वप्रकारता तस्य भवेत्च्छब्दात्मनि नियततापि स्याद्वाचक-त्ववत्।
लिङ्गद्वन्वयादिच्छास्य व्यङ्गचव्यंजकभावस्य लक्ष्यते, यथा लिङ्गत्व-माथुर्येष्वनियताताभासम्, इच्छाधोनत्वात्, स्वविषयाव्यभिचारि च । तथैवेदं यथा दार्शन्तं व्यङ्गकत्वम्। शब्दात्मन्वनियतत्वादेव च तस्य वाचकत्वप्रकारता न शङ्कच कल्प-यितुम्। यदि हि वाचकत्वप्रकारता तस्य भवेत्च्छब्दात्मनि नियततापि स्याद्वाचक-त्ववत्।
(अनु.) और इस व्यंग्यव्यंजकभाव का लिङ्गत्व न्याय भी लक्षित होता है। जैसे लिङ्गरव का आश्रयों में अवभास अनियत होता है। क्योंकि वह इच्छाधीन होता है तथा अपने विषय का उसमें व्यभिचार भी नहीं होता। उसी प्रकार का यह व्यङ्गकत्व है जैसा दिखलाया
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तृतीय उद्योतः
गया है । शब्दात्मा में अनियत होने के कारण ही उसकी वाचकत्वप्रकारता की कल्पना नहीं की जा सकती । यदि उसमें वाचकत्वप्रकारता हो तो वाचकत्व के समान शब्दात्मा में उसकी नियतता भी हो ।
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तृतीय उद्योतः
(लो०) आध्येयष्विति । न हि धूमे वह्निगमकत्वं सदातनम्, अन्यगमकत्वस्य वन्ह्यगमकत्वस्य च दर्शानात् । इच्छाधीनत्वादिति । इच्छाश्रय पक्षधर्मत्वजिज्ञासाव्यासि-सुस्मूर्षाप्रभृतिभिः स्वविषयत्वात् स्वाश्रयन् विषय च गृहीत्वा त्रैरूप्याद् न व्यभिचरति ।
(अनु०) 'आश्रयों में' यह । धूम में वह्नि का प्रत्यायकत्व सर्वदा रहनेवाला नहीं होता । क्योंकि अन्यगमकत्व और वह्नि का अगमकत्व देखा जाता है । 'इच्छा के आधीन होने से' यह । यहां इच्छा पक्षधर्मत्व की जिज्ञासा और व्याप्ति के स्मरण की इच्छा इत्यादि है । 'अपने विषय में' यह । अपने (लिङ्ग के) और अपने .विषय के ग्रहण कर लिये जाने पर त्रैरूप्य (अनुसमानाझ्भूत सपक्षसत्त्व) इत्यादि में उसका व्यभिचार नहीं होता ।
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तृतीय उद्योतः
उक्त विषयों में अनुमान पद्धति पर संक्षिप्त दृष्टिपात तारावती—उक्त बात को समझने के लिये एक दृष्टान्त लीजिये—इस व्यंजक भाव में लिङ्गत्व न्याय भी देखा जाता है । ('लिङ्ग' यह न्यायशास्त्रियों का एक पारिभाषिक शब्द है जो कि साधक हेतु के अर्थ में प्रयुक्त हुआ करता है । इस शब्द का अर्थ है—'जो तत्व अपने में लीन वस्तु को अवगत करा दे उसे लिङ्ग कहते हैं—('लीनं गमयति' इति लिङ्गम् पृषोदरादित्वात् । सिद्धम् ।
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लिङ्ग न्याय को समझने के लिये अनुमान की प्रक्रिया पर संक्षिप्त विचार कर लेना चाहिये । जब हम किन्हीं दो तत्वों को कई बार साथ-साथ देखते हैं तब हमें उनके नियत साहचर्य का पता चल जाता है । जैसे कई बार धुआँ और आग को साथ साथ देखकर हमें ज्ञान हो जाता है कि 'जहां धुआँ होता है वहां आग होती है ।' इस ज्ञान को अन्वयव्याप्ति कहते हैं । इसी प्रकार हमें यह भी ज्ञान हो जाता है कि 'जहां आग नहीं होती वहां धुआँ नहीं होता ।' इस ज्ञान को व्यतिरेकव्याप्ति कहते हैं । ये दोनों प्रकार के ज्ञान अनुमिति में होते हैं तथा इन्हीं दोनों प्रकार के ज्ञानों को अनुमान कहते हैं । इन ज्ञानों को लेकर जब कोई व्यक्ति कहीं जाता है और उसे आग की तलाश होती है और वह किसी मकान से उठते हुये धुएं को देखता है तथा व्याप्ति का स्मरण करता है तब वह इस निष्कर्ष पर पहुंच जाता है कि इस मकान में आग है ।
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यही अनुमान की संक्षिप्त प्रक्रिया है । इसमें जिस मकान से धुआँ उठता हुआ दिखाई देता है उसे पक्ष कहते हैं और 'इस मकान में आग है' यह निष्कर्ष अनुमिति कहलाता है । धुआँ लिङ्ग है और वह्नि साध्य है । जिन स्थानों पर वह धुआँ और अग्नि इत्यादि के नियत साहचर्य का ज्ञान प्राप्त करता है उन्हें सपक्ष कहते हैं और जिन स्थानों पर नियत रूप से धुआँ और आग कुछ नहीं रहते उन्हें विपक्ष कहते हैं ।
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आश्रयों में लिङ्गत्वप्रतीति अनिश्चित रहती है, कारण यह है कि उसकी प्रतीति इच्छाधीन हुआ करती है । इसको इस प्रकार समझिये—अनुमान के लिये पक्षधर्मत्व ( पक्षता ) का ज्ञान नितान्त अपेक्षित होता है । आचार्यों ने पक्षता में दो तत्व माने हैं—एक तो सिद्धि का अभाव और दूसरे सिषाधयिषा अर्थात् सिद्ध करने की इच्छा । जो वस्तु स्वयं सिद्ध है उसको सिद्ध करने के लिये अनुमान का आश्रय नहीं लेना
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पड़ता। जैसे चौके में हमे प्रत्यक्ष आग दिखाई पड़ती है अतः चौके में आग को सिद्ध करने के लिये अनुमान का आश्रय नहीं लिया जाता । दूसरी बात यह है कि जब तक सिद्ध करने की इच्छा नहीं होती तब तक भी अनुमान का अवसर नहीं आता । उदाहरण के लिये लोक व्यवहार में हमे वीसीं वस्तुयें ऐसी दिखाई पड़ती रहती हैं जिनसे हम दूसरे पदार्थों का अनुमान लगा सकते हैं। किन्तु उनकी ओर हमारा ध्यान भी नहीं जाता और अनुमान की प्रक्रिया प्रसार पा ही नहीं सकती । कारण यह है कि अनुमान के प्रसार के लिये एक तो हमें व्याप्तिज्ञान होना चाहिय और दूसर व्याप्ति के स्मरण की इच्छा भी होनी चाहिये । यह इच्छा तभी हो सकती है जब उस ओर हमारा ध्यान हो । जब तक ये सब शर्तें पूरी नहीं होतीं अनुमान की प्रक्रिया प्रसार पा ही नहीं सकती । इसी प्रकार की और भी बातें हैं जिनसे अनुमान की प्रक्रिया प्रसार पाती है जैसे हेतु का सप्रक्ष में होने का ज्ञान इत्यादि । आशय यह है कि लिंग ( हेतु ) सर्वदा साध्य का प्रत्यायन नहीं कराता रहता, उसके लिये अपेक्षित तत्वों का होना भी आवश्यक माना जाता है । किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि लिंग सर्वदा साध्य में नियत नहीं रहता और उसका कहीं-कहीं अतिक्रमण हो जाता है । लिंग साध्य में नियत तो रहता ही है किन्तु विशिष्ट शर्तों के अभाव में उसकी प्रतीति नहीं होती । जब हेतु के स्वरूप और उसके विषय का ग्रहण हो जाता है अर्थात् जब हेतु और साध्य के स्वरूप और उनकी व्यापकता का परिज्ञान हो जाता है तब उसका व्यभिचार त्रैरूप्य इत्यादि में नहीं होता ।
त्रैरूप्य का अर्थ है—हेतु की पक्ष में सत्ता, सपक्ष में हेतु और साध्य की उपस्थिात और विपक्ष में उनका अभाव । इसी प्रकार अबाधितत्व इत्यादि बातें भी स्वतः सज्जित हो जाती हैं और अनुमान की प्रक्रिया वहाँ पर ठीक बैठ जाती है । इस सम्पत निरूपण का सारांश यही है कि जिस प्रकार लिङ्ग का व्यभिचार अपने साध्य में नहीं होता और न उन दोनों का व्यभिचार सपक्ष इत्यादि में होता है उसी प्रकार व्यंजना का विषय भी अव्यभिचरित तथा निश्चित ही होता है । किन्तु जिस प्रकार लिङ्ग के द्वारा साध्य की प्रतीति सार्वकालिक नहीं होती उस प्रकार व्यंजना की प्रतीति भी औपाधिक होती है—किन्तु उपाधियों के अभाव में उसकी प्रतीति नहीं होती । शब्द की आत्मा वाचकत्व तो नियत होता है किन्तु व्यंजकत्व नियत नहीं होता । यही कारण है कि हम व्यंजकत्व को वाचकत्व की कोटि में नहीं ला सकते । यदि व्यंजकत्व भी शब्द की आत्मा में नियत हो तो वह भी वाचकत्व की कोटि में आ जाय । यही भी एक प्रमाण है जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि व्यंजकत्व वाचकत्व की कोटि में नहीं आ सकता क्योंकि वह वाचकत्व के समान शब्द की आत्मा में नियत नहीं होता ।
( ध्वन्या० ) स च तथाविध औपाधिको धर्मः शब्दानामौत्पत्तिकशब्दार्थसम्बन्धादिना वाक्यतत्त्वविदा पुरुषेयापौरुषेययोर्वाक्ययोः्विशेषमभिविदधता नियमेनास्म्युपगन्तव्यः; तदन्युपगमे हि तस्य शब्दार्थसम्बन्धनियत्वे सत्यप्यपौरुषेयपौरुषेयोर्वाक्ययोरवैय्योरेथप्रतिपादने निर्विशेषत्वं स्यात् । तदन्युपगमे तु पौरुषेयाणां वाक्यानां पुरुषेच्छानुविधानसमरोपितौपाधिकव्यापारानन्तराणां सत्यपि स्वाभिधेयेसम्बन्धापरित्यागे मिथ्यार्थतापि भवेत् ।
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तृतीय उद्योतः
(अनु०) और वह उस प्रकार का औपाधिक धर्म शब्दों के औपत्तिक शब्दार्थ सम्बन्ध को माननेवाले, पौरुषेय और अपौरुषेय वाक्यों में विशेषता का प्रतिपादन करनेवाले, वाक्यतत्व को समझनेवाले ( मीमांसक ) के द्वारा भी नियमितपूर्वक स्वीकार किया जाना चाहिये । उसके न स्वीकार करने पर उसके शब्द और अर्थ के नित्य सम्बन्ध होते हुये भी पौरुषेय और अपौरुषेय वाक्यों में अर्थप्रतिपादन में कोई विशेषता न रहे । उसके मानने पर पुरुषेच्छा के अनुविघान के कारण जिसमें दूसरे औपाधिक व्यापारों का आरोप कर दिया गया है इस प्रकार के पौरुषेय वाक्यों की अपने-अपने अभिधेय के सम्बन्ध का परित्याग करते हुये भी मिथ्यार्थता भी हो जाय ।
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तृतीय उद्योतः
(लो०) न कस्यचिदमतिमतेति यदुक्तं तत्स्फुट्यतिति- स चेतिः । व्यञ्जकत्वलक्षण इत्यर्थः । औत्पत्तिकेति जन्मना द्वितीयो भावविकारः सततारूपः सामीप्याललक्ष्यते विपरीतलक्षणातो वानुत्पत्तिः, रूढ्या वा औत्पत्तिकशब्दो नित्यपर्यायः, तेन नित्यं यः शब्दार्थयोः शक्तिलक्षणं सम्बन्धमिच्छति जैमिनेयस्तेनैत्यर्थः । निर्विशेषत्वमिति । ततश्च पुरुषदोषानुप्रवेश्याकिञ्चित्करत्वात्तन्नबन्धनं पौरुषेये वाक्येषु यदग्रामाण्यं तन्न सिध्येत् । प्रतिपत्तुरेव हि यदि तथा प्रतिपत्तिस्त्रहि वाक्यस्य न कश्चिदपराध इति कथमग्रामाण्यम् । अपौरुषेये वाक्येऽपि प्रतिपत्तदौरात्म्याच्च स्यात् ।
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तृतीय उद्योतः
(अनु०) किसी की विमति को प्राप्त नहीं होता यह जो कहा गया था उसको स्पष्ट करते हैं—‘और वह’ यह । अर्थात् व्यञ्जकत्व लक्षणवाली । ‘औत्पत्तिक यह’ । जन्म से ( जन्म के कारण ) दूसरा भावविकार जो कि सततारूप है । सामीप्य के कारण लक्षित हो जाता है, अथवा विपरीत लक्षणा से अनुत्पत्ति होती है अथवा रुढि से औत्पत्तिक शब्द नित्य का पर्यायवाचक हो गया है । इससे अर्थ यह हो जाता है कि जो जैमिनिमतानुयायी शब्द और अर्थ के शक्तिरूप नित्यसम्बन्ध की इच्छा करता है उसके द्वारा । ‘निर्विशेषत्व’ यह । इससे पुरुष दोष के अनुप्रवेश के अकिñ्चित्कर होने के कारण उसके आधार जो पौरुषेय में वाक्यों में अप्रामाण्य वह सिद्ध न हो । यिहि प्रतिपत्ता ( समझनेवाले ) की ही वृत्ति प्रतिपत्ति मानी जाय तो वाक्य का कोई अपराध नहीं अतः अप्रामाणिकता कैसे होती ? अपौरुषेय वाक्यों में भी प्रतिपत्ता के दौरात्म्य के कारण कैसा हो जायगा ।
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तृतीय उद्योतः
विभिन्न दर्शनों में व्यञ्जना को स्वीकार करने की आवश्यकता तारावती—ऊपर व्यञ्जकत्व का वाचकत्व विभेद सिद्ध किया गया। इस प्रकरण के उपक्रम में कहा गया था कि इस व्यञ्जनाव्यापार को स्वीकार करने में किसी को मतभेद नहीं है। अब इसी कथन पर विस्तृत प्रकाश डाला जा रहा है (शब्दवृत्तियों पर विशेष विचार मीमांसा दर्शन, व्याकरण और न्यायशास्त्र में किया गया है । इन्हीं दर्शनों के आधार पर अब यह दिखलाया जायेगा कि इन दर्शनों के माननेवालों को भी अनिवार्य रूप से व्यञ्जना माननी ही पड़ेगी । )
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तृतीय उद्योतः
सर्वप्रथम मीमांसा दर्शन को लीजिये । मीमांसा दर्शन में शब्द और अर्थ का सम्बन्ध नित्य माना जाता है । एक जैमिनि सूत्र हैं—‘औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धः’ अर्थात् शब्द का अर्थ से सम्बन्ध औत्पत्तिक होता है । इसके विवरण में शबर स्वामी ने लिखा है—‘औत्पत्तिक
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इति नित्यं ब्रूमः । उत्पत्तिभाव उच्यते लक्षणया । अविच्छिन्नः शाब्दार्थयोर्भावः सम्बन्धो नोत्पत्तिज्ञयोः पश्चात् सम्बन्धः ।
अर्थात् ‘हमारे मत में औत्पत्तिक का अर्थ होता है नित्य । निस्स्वेह लक्षणा से उत्पत्ति का अर्थ है भाव । शब्द और अर्थ का भाव अर्थात् सम्बन्ध वियोगरहित (नित्य) होता है, उत्पन्न होने के बाद सम्बन्ध नहीं होता ।’ औत्पत्तिक शब्द किस प्रकार नित्य का वाचक होता है इसकी व्याख्या अभिनवगुप्त ने लोचन में इस प्रकार की है
कि भाव या द्रव्य के ये विकार होते हैं—जायते, अस्ति, वर्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, नश्यति, अर्थात् कोई द्रव्य उत्पन्न होता है, सत्ता में आता है, बढ़ता है, विपरिणाम को प्राप्त होता है, क्षीण होता है और नष्ट हो जाता है ।
यहां पर उत्पत्ति के तत्काल बाद सत्ता आती है अतः समीप होने के कारण जन्म के बाद का दूसरा भाव विकार सत्ता हो गृहीत होती है और उसका अर्थ हो जाता है कि शब्द का अर्थ से सम्बन्ध सत्तामात्र में ही रहता है उसके अन्दर और विकार उत्पन्न नहीं होते क्योंकि उत्पत्ति के बाद सत्ता ही आती है ।
किन्तु इस व्याख्या में एक आपत्ति यह है कि यहां सत्तामात्र ही उपलब्ध होती है, उससे यह मान लेना कि उनकी सत्ता सदा बनी ही रहती है कुछ अधिक संगत प्रतीत नहीं होता, यह कोरी कल्पना हो है ।
(अतः लोचनकार ने दूसरी व्याख्या यह दी है कि ) अथवा उत्पत्ति में विपरीत लक्षणा कर ली जाती है और उससे यह सिद्ध हो जाता है कि शब्द और अर्थ के सम्बन्ध की उत्पत्ति ही नहीं होती, वह नित्य ।
अब वाक्य को लीजिये। वाक्य में शब्द उसी प्रकार जोड़े जाते हैं जिस प्रकार माली पुष्पों को माला में गूंथा है।
वह पुष्पों को बनाता नहीं अपितु उनको लेकर केवल संयोजना कर देता है । यही दशा वाक्यगत शब्दों की भी है । वाक्य का प्रयोक्ता शब्दों को बनाता नहीं अपितु बने बनाये शब्दों की योजना वाक्य में कर देता है ।
वाक्य दो प्रकार के होते हैं—अपौरुषेय और पौरुषेय । अपौरुषेय वाक्य पुरुष के बनाये नहीं होते किन्तु पौरुषेय वाक्य पुरुष के बनाये होते हैं ।
अपौरुषेय वाक्य वैदिक वाक्य होते हैं और स्वतः प्रमाण माने जाते हैं । जिन वाक्यों को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिये उन वाक्यों के ज्ञान की ग्राहक सामग्री ही पर्याप्त हो उन्हें स्वतः प्रमाण कहते हैं और जिन वाक्यों को प्रमाणित सिद्ध करने के लिये अन्य प्रमाण देने की आवश्यकता पढ़े उन्हें परतः प्रमाण कहते हैं ।
आशय यह है कि मीमांसकों के मत से वेदवाक्य पुरुषनिर्मित न होने के कारण स्वयं ही प्रामाणिक होते हैं, किन्तु लौकिक वाक्य पुरुषनिर्मित होने के कारण तभी प्रामाणिक माने जा सकते हैं जब उनमें कोई अन्य प्रमाण विद्यमान हो ।
अब प्रश्न यह उठता है कि वाक्यों में यह भेद कैसे ? जब शब्द भी नित्य होते हैं, उनके अर्थ भी नित्य होते हैं और शब्द तथा अर्थ का परस्पर सम्बन्ध भी नित्य ही होता है तब उनकी संयोजना से जो अर्थ आयेगा वह भी नित्य तथा सर्वथा सत्य ही होगा ।
उसमें यह विशेष कैसे सिद्ध हो सकता है कि कुछ वाक्य तो स्वतः प्रमाण कुछ परतः प्रमाण ।
जब शब्दों का अर्थ सत्य तथा एकरूप, नियत नित्य है तब उनकी अप्रामाणिकता का प्रश्न हो कैसे उठ सकता है ?
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तृतीय उद्योत:
(ध्वन्यालोके) दृश्यते हि भावानामपरिलक्षितस्वभावानामपि साम्प्रचन्तरसम्पातसम्पादितौपाधिकव्यापारान्तराणां विरुद्धक्रियत्वम् । तथाहि- हिमशययूकप्रसूतानां निर्वापितसकलजीवलोकं शीतत्वमुप्रहतामेव प्रियाविरहदहनद्यामानमानसे जननैरालोक्यमानानां सतां सन्तापकारित्वं प्रसिद्धमेव । तस्मात् पौरुषेयाणां वाक्यानां सत्यपि नैसर्गिकेऽर्थसम्बन्धे मिथ्यार्थत्वं समर्थयितुमिच्छता वाच्यवाचकतिरिक्तं किश्चित्प्रौपाधिकं व्यक्तिमेवाभिधानव्यापार । तच्च व्यङ्यत्ववादिनो नान्यत् । व्यङ्यत्वप्रकाशनं हि व्यङ्यत्वम् । पौरुषेयाणि च वाक्यानि प्राधान्येन पुरुषाभिप्रायमेव प्रकाशयन्ति । स च व्यङ्ग्य एव न त्वभिधेयः, तेन सहाभिधानस्य वाच्यवाचकभावलक्षणसम्बन्ध-
सकता है । फिर उन वाक्यों की प्रामाणिकता में भेद कैसे सिद्ध हो सकता है । चाहे वे वाक्य पुरुष निर्मित हों चाहे सर्वथा अनिर्मित हों । यदि वहाँ पर शब्द जुड़े हुये हैं तो उनका सत्य कभी सन्देह का विषय हो ही नहीं सकता । अतः मीमांसकों के मत से पौरुषेय और अपौरुषेय वाक्यों में विशेषता सिद्ध करने के लिये व्यञ्जनाव्यापार मानना अनिवार्य हो जाता है ।व्यञ्जनाव्यापार के मान लेने पर पौरुषेय और अपौरुषेय वाक्यों का विभेद सिद्ध हो जाता है कारण यह है कि पौरुषेय वाक्य पुरुष की इच्छा का अनुविﬞान करते हैं । पुरुष के अपने दोष होते हैं । पुरुषों में भ्रम, प्रमाद इत्यादि दोष होते हैं, उनमें दूसरों को छलने की कामना होती है । ये सब पुरुष के दोष होते हैं । पुरुष के कहे हुये वाक्यों में ये सब दोष औपाधिक रूप में सञ्ज्ञष्ट हो जाते हैं और उन वाक्यों पर दूसरे व्यापारों का आरोप कर दिया जाता है जो कि वाच्यवाचकभाव व्यापार से भिन्न होता है । अन्य व्यापारों के आरोप कर देने के कारण ही पुरुष के वाक्यों में अप्रामाणिकता आ जाती है । जो वाक्य पुरुषनिर्मित नहीं होते उनमें पुरुष के दोषों का भी आरोप नहीं होता । उनमें शब्द और अर्थ तथा उनके सम्बन्ध में रहनेवाला सत्य ही प्रयोजनीय होता है ।इस प्रकार औपाधिक धर्मों को अभिव्यक्त करने के लिये व्यञ्जनावृत्ति के मानने पर ही पौरुषेय वाक्य अप्रामाणिक और अपौरुषेय वाक्य प्रामाणिक सिद्ध होते हैं और उनका विभेद व्यञ्जनावृत्ति के मानने पर ही सञ्ज्ञ्ट होता है । यदि व्यञ्जनावृत्ति नहीं मानी जायगी तो पौरुषेय वाक्यों में पुरुष-दोषों का अनुप्रवेश भी नहीं हो सकेगा और उनके आधीन होने वाला अप्रामाण्य भी पौरुषेय वाक्यों में सिद्ध न हो सकेगा । यदि कहो कि वक्ता के दोषों का आरोप न सही सुननेवाले (प्रतिपत्ता) के दोषों का आरोप हो जायगा और यह मान लिया जायगा कि प्रतिपत्ता की प्रतिपत्ति ही सदोष है जिससे लोकिक वाक्य अप्रामाणिक हो जाता है, तो इससे भी निस्तार न हो सकेगा । क्योंकि वह तो प्रतिपत्ता का दोष रहा, उसमें वाक्य का क्या अपराध जो उसे अप्रामाणिक माना जाय । दूसरी बात यह है कि प्रतिपत्ता का दोष तो अपौरुषेय वैदिक वाक्यों में भी सम्भव है, फिर, जिस आधार पर पौरुषेय वाक्यों को अप्रामाणिक माना जाता है उसी आधार पर अपौरुषेय वाक्यों को क्यों अप्रामाणिक नहीं माना जा सकता । अतः व्यञ्जना के मानने पर ही यह विभेद सम्भव है कि पौरुषेय वाक्य परतः प्रमाण होते हैं और अपौरुषेय वाक्य स्वतः प्रमाण होते हैं ।
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(अनु०) निस्सन्देह ऐसे भावों का विरुद्ध क्रिया करना देखा जाता है जिन्होंने अपने स्वभाव को न छोड़ो हो और दूसरी सामग्री के आ पड़ने से जिसमें दूसरे ओपाधिक व्यापारों का सम्पादन हो गया हो । वह इस प्रकार—समस्त जीवों को शान्ति प्रदान करनेवाली शीतलता को ध्याण करते हुये भी प्रियतमा की वियोगाग्नि से जलते हुये मनवाले लोगों के द्वारा देखे जाने पर चन्द्रकिरण इत्यादि की सन्तापकारिता प्रसिद्ध ही है । अत एव पौषेय वाक्यों के नैसर्गिक अर्थ सम्बन्ध के होते हुये भी मिथ्यार्थत्व का समर्थन करने की इच्छा करने-वाले व्यक्ति के द्वारा वाचकत्व से अतिरिक्त किसी रूपवाले ओपाधिक धर्म का स्पष्ट ही अभिधान करना चाहिये । और वह व्यञ्जकत्व से भिन्न और कुछ नहीं होता । व्यञ्जक का प्रकाशन ही व्यञ्जकत्व होता है । और पौषेय वाक्य प्रधानतया पुरुष के अभिप्राय को ही प्रकाशित करते हैं । वह व्यञ्जक ही हो सकता है अभिधेय नहीं । क्योंकि उसके साथ शब्द का वाच्यवाचकभाव रूप सम्बन्ध हो ही नहीं सकता ।
(लो०) ननु धर्मान्तराभ्युपगमेऽपि कथम् मिथ्यार्थता, नहि प्रकाशकत्वलक्षणं स्वधर्मो जहाति शब्द इत्यादिकाऽ-दूशयत इति । प्राघान्येनैव नेयम् । यदाह—‘एवमयं स्वधर्मो न जहाति भवति प्रत्ययः नस्त्वेवमयमर्थः’ इति । तथा प्रमाणान्तरदर्शनानमत्र बाध्यते, न तु शब्दोज्ञवय इत्येनन पुरुषाभिप्रायानुप्रवेशादेवाऽ-दूष्यप्रवाक्यादौ मिथ्यार्थत्वमुक्तम् । तेन सह इति । अन्यथात्वया नैसर्गिकत्वभावादितिभावः ।
(अनु०) (प्रश्न) धर्मान्तर के प्राप्त होने पर भी मिथ्यार्थता कैसे होगी ? प्रकाशकत्व रूप अपने धर्म को तो शब्द छोड़ता ही नहीं । यह श्लोक करके कहते हैं—‘देखा जाता है’ यह । प्राघान्य के द्वारा’ यह । जैसा कि कहा गया है—‘यह सम्प्रत्यय तो नहीं होता कि यह पुरुष ऐसा जानता है, यह सम्प्रत्यय तो नहीं होता कि यह ऐसा अर्थ है ।’ उस प्रकार से प्रमाणान्तर दर्शन ( प्रत्यक्ष इत्यादि ज्ञान ) का बाध हो जाता है, शाब्दिक अन्वय का बोध नहीं होता । इसके द्वारा पुरुष के अभिप्राय के अन्तः प्रवेश से ही ‘अङ्गुली के अप्रभाग में ( सौ कवि हैं)’ इत्यादि वाक्यों का मिथ्यार्थत्व कहा गया है । ‘उसके साथ’ यह । भाव यह है कि अनिश्चित होने के कारण स्वाभाविक न होने से ।
तारावती—(प्रश्न) एक धर्म में दूसरे धर्म का समावेश तभी सम्भव है जब कि पहले धर्म का सर्वथा विरोधी हो जाय । जैसे उत्पलत्व का तिरोभाव हुये बिना शीतत्व का आरोप हो ही नहीं सकता । इसी प्रकार शब्द और अर्थ के नियत सम्बन्ध में जो प्रामाणिकता का धर्म है वह जब तक समाप्त नहीं हो जाता तब तक पुरुष दोष के आरोप से मिथ्यार्थता कभी आ ही नहीं सकती । कारण यह है कि शब्द अपने वाच्यार्थ को प्रकाशित करने के धर्म का परित्याग तो कर ही नहीं देता । ऐसी दशा में व्यञ्जना के मान लेनेपर भी और धर्मान्तर की स्वीकृति में भी न तो पौषेय वाक्यों की मिथ्यार्थता ही सिद्ध हो सकती है और न पौषेय तथा शवपौषेय वाक्यों की विशेषता ही । फिर आपका व्यञ्जना व्यापार किस प्रकार उपयोगी हो सकता है ? (उत्तर) प्रायः देखा जाता है कि जब भावों (पदार्थों) में दूसरी सामग्री आ पड़ती है और उससे उनमें दूसरे ओपाधिक (नैमित्तिक) व्यापार का सम्पादन हो जाता है तब वे अपने स्वाभाविक धर्म को न छोड़ते हुये भी विरुद्ध क्रिया करने लगते हैं ।
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तृतीय उद्योतः
(ध्वन्यो०) ननुवन्तेन न्यायेन सर्वेषामेव लौकिकानां वाक्यानां ध्वनिव्यवहारः प्रसक्तः । सर्वेषामप्यनेन न्यायेन व्यङ्क्यत्वात् । सत्यमेतत्; किन्तु वक्त्रभिप्रायप्रकाश-
उदाहरण के लिये चन्द्र की शीतल मयूखों को लीजिये। शीतलता उनका स्वाभाविक धर्म है और वे अपनी शीतलता के द्वारा समस्त जीव लोक के उष्णमाजन्य सन्ताप को शान्तकर परा शान्ति प्रदान करती हैं। किन्तु जब ऐसे व्यक्ति उनको देखते हैं जिनके अन्तःकरण अपनी प्रियतमाओं की वियोगाग्नि से उद्भूत सन्ताप से जल रहे होते हैं तब वे ही चन्द्र की शीतल मयूखें उन व्यक्तियों को सन्ताप देनेवाली हो जाती हैं, इसमें किसी को आपत्ति हो ही नहीं सकती क्योंकि यह बात तो प्रसिद्ध ही है। इससे सिद्ध होता है कि विपरीत तथा विभिन्न क्रिया के लिये यह आवश्यक नहीं है कि पदार्थ अपने स्वाभाविक धर्म को छोड़ दें। इसी प्रकार शब्द और अर्थ भी अपने नैसर्गिक सत्य तथा नित्य सम्बन्ध का परित्याग न करते हुये भी विरुद्ध क्रिया कर सकते हैं। अत एव पौषेय वाक्यों में यद्यपि अर्थ का स्वाभाव- विक सम्बन्ध होता है और बना भी रहता है तथापि पुरुष-दोषों के प्रतिफलन से उनमें मिध्यार्थकता आ जाती है। उस मिथ्यार्थकता का समर्थन करने के लिये यह नितान्त अपेक्षित है कि उनमें किसी प्रकार का औपाधिक धर्म आरोपित किया जाय। यह आरोपित धर्म व्यञ्जकत्व के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता। क्योंकि व्यंग्यत्व का अर्थ होता है वाच्यार्थ को प्रकाशित करना। पौषेय वाक्यों से जो पुरुष का अभिप्राय ही प्रधानतया प्रकाशित होता है। शाबर भाष्य में स्पष्ट रूप से लिखा हुआ है कि जब कभी हम किसी पौषेय (लौकिक) वाक्य को सुनते हैं तब हमें केवल इतना ही विश्वास होता है कि यह पुरुष जो कुछ कह रहा है वह उसको उसी रूप में जानता है। हमें किसी भी पौषेय वाक्य को सुनकर यह विश्वास नहीं हो जाता है कि अमुक व्यक्ति ने जो कुछ कहा है वह वैसा ही है। आशय यह है कि वैदिक वाक्यों का अर्थ तो सर्वथा विश्वसनीय होता है। किन्तु लौकिक वाक्यों में अर्थ विश्वसनीय नहीं होता किन्तु उससे इतनी ही प्रतिति होती है कि जो कुछ कहा गया है वह वक्ता का अपना दृष्टिकोण है या वक्ता के ज्ञान की वह सीमा है। उसमें प्रायः ऐसा हो जाता है कि जो कुछ उसने कहा है उसका प्रत्यक्ष दर्शन बाधित हो जाता है। अर्थात् जब हम उसके कथन की सत्यता को प्रमाणित करने की चेष्टा करते हैं तब उसका प्रमाणप्रतिपन्न होना बाधित हो जाता है। किन्तु यह बाधा उसी में उत्पन्न होती है जोकि पुरुष का विचार समझा जाता है, शब्द और अर्थ का सम्बन्ध तो निर्भ्रान्त रहता है। उसमें शब्द का अन्वय भी बाधित नहीं होता। इस कथन से यह बात सिद्ध हो जाती है कि 'अंगुली के अग्र भाग में १०० कवि हैं' इसमें अर्थ केवल इसी दृष्टि से मिथ्या हो जाता है कि उसमें पुरुष का अभिप्राय सन्निविष्ट हो गया है। अन्यथा शब्द और अर्थ का अपना स्वाभाव- विक सम्बन्ध तो सर्वथा अनुवर्त ही रहता है। पुरुष का अभिप्राय तो व्यङ्गच्य ही होता है, वह कभी वाच्य नहीं हो सकता। क्योंकि पुरुष के अभिप्राय के साथ शब्द का वाच्य-वाचक- भाव सम्बन्ध है ही नहीं। उसमें न तो संकेत ग्रहण होता है, न वह नियत होता है और न उस अर्थ में स्वाभाविकता ही होती है।
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नेन यद् व्यङ्गकत्वं तत्सर्वेषामेव लौकिकानां वाक्यानामविशिष्टम् । तत्तु वाचकत्वान्न भिञ्चते व्यङ्ग्यं हि तत्र नान्तरीयकतया व्यवस्थितम् । नतु विवक्षितत्वेन । यस्य तु विवक्षितत्वेन व्यङ्ग्यस्य स्थितिः तद्व्यङ्ग्यकत्वं ध्वनिव्यवहारस्य प्रयोजकम् ।
(अनु०) (प्रश्न) इस न्याय से तो सभी लौकिक वाक्यों का ध्वनिव्यवहार प्रकाशित हो जायगा क्योंकि इसके द्वारा तो सभी व्यंजक हो जाते हैं । (उत्तर) यह सच है; किन्तु वक्ता के अभिप्राय के प्रकाशन के द्वारा जो व्यंजकत्व है वह सभी लौकिक वाक्यों में अविशिष्ट होता है; वह वाचकत्व से भिन्न नहीं होता; क्योंकि व्यंजकत्व वहाँ पर अनिवार्य आवश्यकता के रूप में व्यवस्थित होता है; वह वहाँ वक्ता के कथनोद्देश्य के रूप में अभीष्ट नहीं होता । वह व्यंजकत्व ध्वनि व्यवहार का प्रयोजक होता है जिसमें व्यंग्य की स्थिति विवक्षितरूप में होती है । (लो०) नान्तरीयकतयैति । गामानयेत्य श्रुतेऽप्यमिश्रायें व्यक्के तदभिप्रायविशिष्टोऽर्थ एवमभिप्रेताननादिक्रियायोग्यो न त्वभिप्रायमात्रेण किश्चित्कृत्यमिति भावः । विवक्षितत्वेनैति । प्राधान्येनैतद्यर्थः । यस्य त्विति । ध्वन्युदाहरणेष्विति भावः । काव्यवाक्येभ्यो हि न नयनानयनाद्युपयोगिनी प्रतीतिरस्माद्यते, अपि तु प्रतीतिविश्वान्तिकारिणी, सा चाभिप्रायान्निर्भरैव वास्तुपर्यवसान । (अनु०) 'नान्तरीयक रूप में' यह । भाव यह है कि 'गाय लाओ' यह सुने जाने पर अभिप्राय के व्यक्त होने पर भी उस अभिप्राय से विशिष्ट अर्थ ही अभिप्रेत के आनयन इत्यादि क्रिया के योग्य होता है; केवल अभिप्राय से कोई कार्य नहीं होता । 'विवक्षितत्व के रूप में' अर्थात् प्राधान्य के रूप में । 'जिसका तो' यह । भाव यह है कि ध्वनि के उदाहरणों में । काव्य वाक्यों से निस्समदेह ले आने-ले जाने की उपयोगिनी प्रतीति की अभ्यर्थना नहीं की जाती किन्तु प्रतीति को विश्वान्ति देनेवाली प्रतीति ही चाही जाती है और वह अभिप्राय में रहनेबाली ही होती है; अभिप्रेत वस्तु में पर्यवसित होनेवाली नहीं होती । तारावती—(प्रश्न) यदि आप इस न्याय का समर्थन करेंगे कि पुरुष का अभिप्राय व्यंग्य ही होता है तब तो सभी लौकिक वाक्य ध्वनि के क्षेत्र में आ जायेंगे क्योंकि इस न्याय से तो सभी वाक्य व्यंजक हो जायेंगे । (उत्तर) यह हम मानते हैं कि सभी वाक्य वाच्य के अतिरिक्त वक्ता के अभिप्राय की भी व्यंजना करते हैं और व्यंजना ही ध्वनि की प्रयोजिका होती है । तथापि यह दोष नहीं आता कि सभी वाक्य ध्वनि की सीमा में सन्निविष्ट हो जायेंगे । कारण यह है कि वक्ता का अभिप्राय को प्रकाशित करनेबाली व्यंजना तो सभी वाक्यों में एक जैसी ही होगी; अतः इस व्यंग्य की सत्ता भी बिल्कुल वाच्यार्थ की सत्ता के समान ही होगी; इन दोनों में कोई भेद नहीं होगा । वहाँ पर वक्ता के अभिप्राय की व्यंजना केवल इसीलिये होती है कि वाक्यार्थबोध के लिये उसका माना अपरिहार्य है । शब्दों से संकेत-लम्य वाच्यार्थ का बोध होता है और लौकिक वाक्य से वक्ता के तात्पर्य का बोध होता है । यदि वहाँ पर व्यंजना नहीं मानो जायगी तो वाक्यार्थपूर्तित ही न हो सकेगी । अतः वहाँ पर व्यंजना अवश्य माननी चाहिये । किन्तु इस प्रकार की व्यंजना का प्रवेश अनिवार्य होने के कारण ही होता है ।
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तृतीय उद्योतः
ध्वनित्व की प्रयोजिका नहीं होती है। ध्वनि वहीं पर हो सकती है जहाँ पर व्यंग्य विशेष रूप से वक्ता का विवक्षित हो। आशय यह है कि केवल व्यंग्य होने से ही कोई वस्तु ध्वनि नहीं हो जाती। ध्वनि तभी होती है जब व्यंग्यार्थ प्रधान हो। यद्यपि तात्पर्य तथा तात्पर्यैक अर्थ व्यंग्य होता है तथापि वह उसमें विच्छित्तिविशेष का आधान नहीं करता, अतः वह ध्वनि नहीं हो सकता। इसको इस प्रकार समझिये, किसी ने 'गाय लाओ' यह ऐसी भङ्गिमा से कहा कि उसका कोई विशेष अभिप्राय भी व्यक्त हो गया कि 'शाम हो गई है' गाय लाकर बांध लो; कहीं गुम न हो जाय' 'बच्चों को दूध की आवश्यकता है, गाय लाकर दूध दुह लो' इत्यादि। सुननेवाले ने इस वाक्य को सुना भी और उस पर उसने वक्ता का अभिप्राय भी समझ लिया कि अमुक व्यक्ति अमुक मन्तव्य से गाय लाने को कह रहा है। किन्तु इस वाक्य में अभिप्रेत है ले आने की क्रिया। वह क्रिया उस द्रव्यगत ही हो सकती है जिसके विषय में कोई अभिप्राय व्यक्त किया गया है। आशय यह है कि आनयन क्रिया के योग्य गाय ही होगी यद्यपि उस गाय में वक्ता का विशेष प्रयोजन सन्निहित रहेगा। केवल अभिप्राय वहाँ पर कुछ भी न कर सकेगा। अत एव वहाँ पर वक्ता का विवक्षित अर्थी उसका अभिप्राय नहीं है अपितु वाच्यार्थ ही उसे अभिप्रेत है। इस प्रकार व्यंग्य अभिप्राय केवल वाच्य का साधक होता है स्वयं प्रधान नहीं होता। यही कारण है कि लौकिक वाक्य में व्यंग्य होते हुये भी उसे प्रधानता प्राप्त नहीं होती। इसके प्रतिकूल ध्वनिगव्यवहार का प्रयोजक वह व्यंग्य होता है जिसमें व्यंग्य वक्ता के अभीष्ट के रूप में स्थित होता है और वाच्य की अपेक्षा प्रधान हो जाता है। यह बात ध्वनि के उदाहरणों में पाई जाती है। काव्यवाक्यों में वक्ता का यह अभीष्ट नहीं होता। कि जैसे लौकिक वाक्यों में गाय के ले आने-ले जाने इत्यादि क्रिया में अर्थ की परिसमाप्ति होती है उसी प्रकार किसी विशेष क्रिया में अर्थ की परिसमाप्ति हो। अर्थात् वहाँ पर कवि को यह अभीष्ट नहीं होता कि काव्यवाक्यों में जो कुछ कहा जा रहा है परिशीलक उसी के अनुसार कार्य करने लगे। वहाँ तो कवि को केवल यहीं अभीष्ट होता है कि परिशीलक की वाच्यार्थविषयक प्रतिपत्ति हो समाप्त हो जाय और उसकी अन्तरात्मा सर्वथा कवि के प्रतिपाद्य भाव से सर्वथा एकाकार हो जाय। कविता को सफल परिणति इसी में है कि कवि पाठकों के अन्तःकरणों को भावनामय बना दे तथा जो कुछ वह कह रहा है वह सब पाठकों की मनोवृत्ति से सर्वथा तिरोहित हो जाय। इस प्रकार भावनामय परिणति वस्तुतः कवि का अभिप्राय ही है। लौकिक वाक्यों के समान अभिप्रेत वस्तु में उसका पर्यवसान नहीं होता। सारांश यह है कि लौकिक वाक्यों में व्यंग्यार्थ वाच्य का पूरक होता है और वक्ता को वाच्य ही अभिप्रेत होता है; अतः हम उसे ध्वनि की संज्ञा प्रदान नहीं कर सकते। इसके प्रतिकूल काव्यवाक्यों में वाच्यवस्तु का तिरोधान ही कवि को अभीष्ट होता है तथा भावनामय परिणतिरूप अभिप्राय ही वहाँ पर मुख्य होता है। इसीलिये हम उसे ध्वनि की संज्ञा प्रदान करते हैं।
(ध्वन्यालो)
वस्त्वभिप्रायविशेषरूपं व्यङ्ग्यं शब्दार्थाभ्यां प्रकाशते तद्भवति विवक्षितं तात्पर्येण प्रकार्यमानं सत्। किन्तु तदेव केवलपरिमितविषयस्य ध्वनि-
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व्यवहारस्य न प्रयोजकमव्यापकस्वात् । तथा वाच्यतावेद्यतयारूपं तात्पर्यं चोत्यमानसभिप्रायरूपमनभिप्रायप्राहुरपं च सर्वमेव ध्वनिनिग्रहवारस्य प्रयोजकर्मिति यथोक्तव्यञ्जकत्वविशेषे ध्वनिलक्षणे नातिव्याप्तिनचाव्याप्तिः । तस्माद्वाक्यार्थतस्वविदां मतेन तावद् व्यञ्जकत्वलक्षणः शब्दो व्यापारो न विरोषी प्रत्युतानुगुण एव लक्ष्यते ।
अनु० विभिप्रायविशेषरूप जो व्यंग्य तात्पयं के रूप में प्रकाशित होता हुआ शब्द और अर्थ के द्वारा प्रकाशित होता है वह विवक्षित तात्पर्य करता है । किन्तु केवल वही अपरोमित विषयवाले ध्वनिविषयवार का प्रयोजक नहीं होता है क्योंकि वह (ध्वनि की अपेक्षा) अव्यापक होता है । उस प्रकार से दिखलाये हुये तीन भेदोंवाला तात्पर्य के द्वारा च्योतित किया जानेवाला अभिप्रायरूप और अनभिप्रायरूप सभी प्रकार का ध्वनिविषयवार का प्रयोजक होता है । इस प्रकार जैसा बतलाया गया है उस प्रकार के व्यङ्गचत्वविशेषवाले ध्वनिलक्षण में न तो अतिव्याप्ति है और न अव्याप्ति है । इससे वाक्यतत्वज्ञों के मत से तो व्यङ्गकत्व नामवाले शब्द का व्यापार विरोधी नहीं है प्रत्युत अनुगुण ही लक्षित होता है । लो० नन्वेवमभिप्रायस्यैव व्यङ्गयत्वान्नतिविधं मित्याह-यथिवदिति । अनु० प्रश्न) इसप्रकार अभिप्राय के ही व्यंग्यत्व के कारण जो कहा है कि तीन प्रकार का व्यंग्य होता है वह कैसे ? यह कहते हैं-‘जो तो’ यह । तारावती—प्रश्न) जो कुछ आपने ऊपर कहा है उससे तो यहीं सिद्ध होता है कि केवल अभिप्राय ही व्यंग्य होता है । किन्तु इसके पहले आप व्यंग्य के तीन भेद कर चुके हैं रस, वस्तु और अलङ्कार । अतः इस कथन के प्रकाश में उन भेदों की सङ्गति कैसे बेठेगी ? उत्तर) जहाँ कहीं व्यंग्य हो वहाँ सर्वत्र ध्वनि होती है यह नियम नहीं है । नियम यह है कि जहाँ शब्द और अर्थ अपने को गौण बना देते हैं और व्यंजना के द्वारा जिस विशेष अभिप्राय को अभिव्यक्त करते हैं यदि उस अभिप्राय में विशेष रूप से चमत्कार के आध्रान की क्षमता हो तो वह विशेष अभिप्राय ही ध्वनि का रूप धारण करता है । कारण यह है कि काव्य का उद्देश्य ही विशेष चमत्कार को उत्पन्न करने वाली अभिप्रायरूप प्रतीति को उद्भावना करना । यहाँ पर यह ध्यान रखना चाहिए कि केवल शब्द और अर्थ से ही जहाँ चमत्कारपूर्ण होता है अभिप्राय की अभिव्यक्ति होती है उसे ही ध्वनिसंज्ञा प्राप्त होती है । चेष्टा इत्यादि से भी व्यंजना होती है; किन्तु उस व्यंजना को ध्वनि की पदवी प्राप्त नहीं होती अपितु वह गुणीभूत व्यङ्गच के अन्तर्गत ही आता है । इसी बात को प्रकट करने के लिये वृत्तिकार ने ‘शब्दार्थ-स्याम्’ शब्द का प्रयोग किया है । (दीक्षितिकार ने यहाँ ‘एव’ और जोड़ दिया है—शब्दार्थ-स्यामेव) यहाँ पर ध्वनि की जो परिभाषा की गई है वह वस्तुतः प्रथम उद्योत की ध्वनि-परिभाषा का अनुवाद मात्र है—
यत्रार्थः शब्दो वा तमर्थमुपसर्जनीकृतस्वार्थी । व्यङ्क्तः काव्यविशेषः स ध्वनिरिति सूरिभिः कथितः ॥
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३
तृतीय उद्योतः
किन्तु ध्वनिव्यवहार अपरिमित होता है । अतः केवल उस चमत्कारपूर्ण अभिप्राय को ध्वनि कहें ऐसा नहीं होता । अभिप्राय ध्वनि के समस्त भेदों में व्यापक नहीं हो सकता और न ध्वनि के समान अभिप्राय का क्षेत्र ही व्यापक है । अतः केवल अभिप्राय को ध्वनि नहीं कह सकते । पहले ध्वनि के तीन भेद दिखलाये जा चुके हैं; जब उन तीनों भेदों की अभिव्यंजना कवि के तात्पर्य के रूप में होती है ( और उसमें चमत्कार आधायक की शक्ति आ जाती है ) तब उमे ध्वनि कहने लगते हैं और फिर चाहे अभिप्राय रूप हो जैसे रसध्वनि या अभिप्राय से भिन्न रूपवाला हो जैसे वस्तु और अलङ्कार ध्वनि । जब हम ध्वनि का इतना क्षेत्र मान लेते हैं और जैसी व्यंजकता बतलाई गई है वैसी व्यंजकता को ध्वनि का प्रयोजक मानते हैं तब न तो कहीं अतिव्याप्ति होती है और न अव्याप्ति । ( यदि सभी प्रकार के अभिप्रायों को ध्वनि की संज्ञा दे दी जाय तो लौकिक वाक्यों में अतिव्याप्ति होगी; क्योंकि उनमें भी वक्ता का अभिप्राय सन्निहित रहता है । इसी प्रकार उन स्थलों में व्याप्ति होगी जहाँ कवि का अभिप्राय तो पाठकों को चमत्कृत करना और रसमय बनाना है; किन्तु रचना के द्वारा वस्तु तथा अलङ्कार अभिव्यक्त होकर ध्वनि का रूप धारण कर लेते हैं । ध्वनि का उक्त स्वरूप मान लेने से न कहीं अतिव्याप्ति होती है और न अव्याप्ति । ) ऊपर जो कुछ कहा गया है, उससे सिद्ध होता है कि वाक्यतत्त्ववेत्ा मीमांसकों के मत में शब्द का व्यंजकत्वरूप व्यापार विरोधी नहीं है अपितु उनके सिद्धान्तों से मेल ही खाता है ।
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तृतीय उद्योतः
२३
प्रवृत्तौऽयं ध्वनिव्यवहार इति तैः सह किं विरोधाविरोधौ विलीयेते । ( अनुः ) जिन्होंने अविद्या-संस्कार रहित शब्दब्रह्म का पूर्णरूप से निश्चय कर लिया है उन विद्वानों ( वैय्याकरणों ) के मत का आश्रय लेकर ही यह ध्वनि व्यवहार प्रवृत्त हुआ है; अतः उनके साथ विरोध और अविरोध पर क्या विचार किया जाय । ( लो० ) एवं मीमांसकानां नात्र विमतिरयुक्तेति प्रदर्श्य वैय्याकरणानां नैवात्र सास्तीत दर्शयति—परिनिश्चितेति । परतः निश्चितं प्रमाणेन स्थापितं निरपद्रंशं गलितभेदप्रपञ्चतया अविद्यासंस्काररहितं शब्दब्रह्म प्रकाशपरमार्थस्वभावं ब्रह्म व्यापकत्वेन वृद्धिविशेषणशक्तिनिभरतया च बृंहणं वृद्धिं यैरिति । एतदुक्तं भवति—वैय्याकरणास्तावद् ब्रह्मापदेनाऽनन्यलिङ्गचिदिच्छान्ति तत्र का कथा वाचकत्वव्यापारजकत्वोः अविद्यापदे तु तैरपि व्यापारान्तरमभ्युपगतमेव । एतच्च प्रथमोद्योते वितत्य निरुपितम् ।
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३५४ ध्वन्यालोके गया है—वैय्याकरण लोग तो ब्रह्म दशा में और कुछ नहीं चाहते तब वाचकत्व और व्यंजकत्व की बात ही क्या ? अविद्या दशा में तो उनके द्वारा भी दूसरा व्यापार स्वीकार ही किया गया है । यह सब विस्तारपूर्वक प्रथम उद्योत में निरूपित किया जा चुका है । वैय्याकरणों के मत में व्यञ्जना व्यापार की आवश्यकता तारावती—मीमांसकों को तो व्यञ्जनावृत्ति को स्वीकार करने में वैमत्य हो भी सकता है यद्यपि उनके वैमत्य का अवसर नहीं है । किन्तु वैय्याकरणों को तो इस सिद्धान्त से वैमत्य है ही नहीं । कारण यही है कि उन्हीं विद्वानों के मत का अनुसरण करके ही तो हमने श्रवपन इस ध्वनि-सिद्धान्त की स्थापना की है, फिर उनका वैमत्य हो ही किस प्रकार सकता है ? वैय्याकरणों ने पूर्णरूप से प्रमाणों के आधार पर शब्दब्रह्म की स्थापना की है । इस शब्दब्रह्म में भेदप्रपञ्च समास हो जाता है और सारा अविद्या का संस्कार जाता रहता है । ( वैय्याकरणों का मत अद्वैत वेदान्तियों के मत से बहुत कुछ मिलता-जुलता है । ) जिस प्रकार वेदान्ती सांसारिक भेदप्रपञ्च घट पट इत्यादि को मिथ्या मानते हैं और एक अखण्ड ब्रह्म की सत्ता को ही सत्य कहते हैं, उसी प्रकार अनेक वर्णों से निष्पन्न शब्दों को वैय्याकरण भी असत्य ही मानते हैं, उनके मत में भी अखण्ड शब्द ब्रह्म ( स्फोट ) ही सत्य है । यह सारा भेदप्रपञ्च अविद्या के संस्कारों से प्रादुर्भूत हुआ है । यह शब्दब्रह्म स्वप्रकाश ज्ञान स्वरूप है । जिस प्रकार वेदान्तियों का ब्रह्म स्वप्रकाशानन्द चिन्मय होता है । ( ब्रह्म का अर्थ ही व्यापक होने के कारण बहुत ( वेदान्तियों का ब्रह्म समस्त वस्तुओं में व्यापक होता है और वैय्याकरणों का स्फोट समस्त वर्णों और शब्दों में व्यापक होता है । ) अथवा विशेष या व्यक्तिरूप पदार्थों की शक्तियों से परिपूर्ण होने के कारण वह उनसे बढ़ाया हुआ होता है । ( वेदान्तियों का ब्रह्म जगत् के घट पट इत्यादि पदार्थों की शक्तिसे वृद्धिहोता है और वैय्याकरणों का स्फोट पद-पदार्थों की मिलित शक्ति से वृद्धिहोता है । ) अथवा विश्व की निर्माणकारिणी शक्तियों के कारण ईश्वर होता है । ( ब्रह्म संसार की रचना करता है और शब्दब्रह्म से वाड्मय जगत् का निर्माण होता है । ) अथवा विश्व को निर्माण करने वाली मायारुपिणी शक्ति पर वह ईश्वर होता है । ( ब्रह्म माया का ईश्वर होता है और शब्दब्रह्म वाड्मय की रचना करनेवाली वैखरी वाणी का ईश्वर होता है । ) यहाँ कहने का आशय यह है कि वैय्याकरण जब शब्द को ही ब्रह्म मानते हैं और ब्रह्मज्ञान की दशा में और किसी की सत्ता मानते हो नहीं ( जिहि जाने जग जाइ हेराई ) तब वाचकत्व और व्यंजकत्व का प्रश्न ही नहीं उत्पन्न होता । जब ब्रह्मज्ञान की दशा में कोई पदार्थ विद्यमान ही नहीं रहता तब वाचकत्व और व्यंजकत्व ही नहीं रह जाते यह कहने की कोई आवश्यकता ही नहीं । हाँ अविद्या दशा में वे अन्य पदार्थों की सत्ता स्वीकार करते हैं । उस दशा में वे अभिधा से भिन्न व्यञ्जना नामक दूसरा व्यापार मानते ही हैं । ( वायुसंयोग स्फोट का व्यंजक होता है जिसको वैय्याकरण लोग ध्वनि कहते हैं । ) उन्हीं का अनुकरण कर साहित्यजों ने अपने ध्वनि-सिद्धान्त का प्रवर्त्तन किया है, अतः वैय्याकरणों से विरोध-अविरोध का प्रश्न ही नहीं उठता । वैय्याकरणों के सिद्धान्त का आधार लेकर किस प्रकार ध्वनि सिद्धान्त का प्रवर्त्तन हुआ था इसकी विस्तृत व्याख्या प्रथम उद्योत में की जा चुकी है । वेहां देखनी चाहिये ।
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तृतीय
उद्योत:
(ध्वन्यो०)—कृतृत्रिमशब्दार्थसम्बन्धवादिनां तु युक्तिविदामनुभवसिद्ध एवायं व्यङ्गयकभाव: शब्दानामर्थान्तराणामिवाविरोधरुचेचि न प्रतिक्षेप्यपदवीमततरति ।
( अन्० ) कृतृत्रिम शब्दार्थ सम्बन्ध को माननेवाले तार्किकों का तो यह व्यङ्जकभाव अनुभव सिद्ध ही है और दूसरे पदार्थों के समान शब्दों का भी विरोध नहीं है अतः निराकरण की पदवी पर आरूढ नहीं होता ।
तृतीय
उद्योत:
(लो०)—एवं वाक्यविदां पदविदां चाविमतिविषयत्वं दर्शय्य प्रमाणतत्त्वविदां तार्किकानामपि न युक्त्यात्र विमतिरिति दर्शयितुमाह—कृतृत्रिम इति । कृतृत्रिम: संकेतमात्र-स्वभाव: परिकल्पित: शब्दार्थ्यो: सम्बन्ध इति ये वर्दान्त नैयायिकसौगतादय: । यथोक्तम्—‘न सामयिकत्वाच्छब्दार्थप्रत्ययस्ये’ति तथा शब्दा सदृङ्खितं प्राहुरिति । दीपादीनाम् । नन्वनुभवेन द्विचन्द्राद्यपि सिद्धं तच्च विमतिपद-मित्याशङ्क्याह—अविरोधइचेति । अविद्यामानो विरोधो बाधकत्वको द्वितीयेन ज्ञानेन यस्य तेनानुभवसिद्धश्चाबाधितश्चेत्यर्थ: अनुभवसिद्धं न प्रतिक्षेप्यं यथा वाचकत्वम् ।
(अनु०) इस प्रकार वाक्यज्ञों और पदज्ञों के अवैमत्य को दिखलाकर, प्रमाणसतत्त्वज्ञ तार्किकों का वैमत्य भी यहाँ ठोक नहीं है, यह दिखलाने के लिये कहते हैं—‘कृतृत्रिम’ इत्यादि । जो लोग यह कहते हैं कि शब्द और अर्थ का सम्बन्ध कृतृत्रिम है अर्थात् संकेतमात्र स्वभाववाला तथा पूर्णरूप से कल्पित है वे नैयायिक और सोगत (बौद्ध) इत्यादि । जैसा (न्याय सूत्र में) कहा गया है—कि (शब्द लिङ्गादि से अर्थबोधक होता है ऐसा) ‘नहीं क्योंकि शब्द और अर्थ का प्रत्यय सांकेतिक होता है ।’ ‘शब्द संकेतित को कहते हैं ।’ ‘दूसरे अर्थों (पदार्थों) का’ यह दीप इत्यादि का । (प्रश्न) अनुभव से तो चन्द्र इत्यादि का होना भी सिद्ध हो जाता है और वह तो विमति का स्थान हो जाता है । यह शंका करके कहते हैं—‘और. अविरोध’ यह । नहीं विद्यमान है विरोध अर्थात् द्वितीय ज्ञान के द्वारा बाधकरूप प्रतिबन्ध जिसका । इससे यह अनुभवसिद्ध भी हो जाता है और अबाधित भी । अनुभवसिद्ध का प्रतिषेध नहीं हो सकता जैसे वाचकत्व का ।
तृतीय
उद्योत:
तारावती—उपर यह दिखलाया जा चुका कि यह ध्वनि-सिद्धान्त मीमांसकों के मत में भी अनिवार्य है जो वाक्य-तत्त्व पर विशेष विचार करते हैं और वैय्याकरणों के मत में भी इसका कोई विरोध नहीं जो पद-तत्त्व की व्याख्या को लक्ष्य बनाकर चलते हैं । अब यह दिखलाया जा रहा है कि प्रमाण तत्त्व को लक्ष्य माननेवाले और उसका विशेष विवेचन करनेवाले सिद्धान्तियों की दृष्टि से भी इस ध्वनि के विषय में मतभेद का अवसर नहीं है और न उन्हें विरोधी ही होना चाहिये, प्रत्युत उनके मत से भी ध्वनि-सिद्धान्त अनिवार्य ही है । इस प्रकार के सिद्धान्ती हैं नैयायिक बौद्ध इत्यादि । ये लोग शब्द और अर्थ के सम्बन्ध को नित्य नहीं अपितु कृतृत्रिम मानते हैं । इनका सिद्धान्त है कि ‘इस शब्द से यह अर्थ समझना चाहिये’ यह संकेत ही शक्ति है । (चाहे शब्दार्थ संकेत के विषय में ईश्वरेच्छा को शक्ति कहा जाय या इच्छामात्र को शक्ति कहा जाय) उनके मत में यह सम्बन्ध परिकल्पित ही माना
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जाता है। न्यायसूत्रों में यह पूर्वपक्ष स्थापित किया गया है कि शब्द उसी प्रकार अर्थबोधक होता है जिस प्रकार लिङ्ग (हेतु) से साध्य की सिद्धि होती है। इसका उत्तर इस सूत्र में दिया गया है—‘न सामयिकत्वाच्छब्दार्थप्रत्ययस्य’ अर्थात् शब्द लिङ्ग विद्या से अर्थबोधक नहीं होता। अपितु शब्दार्थप्रत्यय सांकेतिक होता है। इसी प्रकार बौद्धों ने भी कहा है कि शब्द संकेतित अर्थी को कहा करता है। आशय यह है कि नैय्यायिक बौद्ध इत्यादि प्रमाणवादी शब्द और अर्थ का सम्बन्ध कृतिम ही मानते हैं। उनके मत में भी यह व्यंजकभाव अनुभव सिद्ध ही है। एक पदार्थ दूसरे की व्यंजना किया करता है। जैसे दीपक इत्यादि घट इत्यादि की व्यंजना करते हैं। उसी प्रकार शब्द तथा उसका अपना अर्थ भी दूसरे अर्थ की व्यंजना कर सकता है। इसमें किसी प्रकार की अनुपपत्ति नहीं आती।
(प्रश्न) जितने अनुभव होते हैं उनमें किसी प्रकार की अनुपपत्ति तथा असहमति न हो यह ठीक नहीं, नहीं। बहुत से ऐसे अनुभव होते हैं जिनसे सहमत नहीं हुआ जा सकता। जैसे आंखों में उँगली लगाकर देखने से दो चन्द्र दिखाई देते हैं। इस प्रकार दो चन्द्रों का होना अनुभव सिद्ध है। किन्तु उससे सहमत नहीं हुआ जा सकता। ऐसी दशा में आप यह कैसे कह सकते हैं कि व्यंजकभाव अनुभवसिद्ध है अतः वह मान्य है ? (उत्तर) समस्त अनुभवसिद्ध वस्तुयें प्रामाणिक ही होती हों ऐसा कोई नियम नहीं है। जिन अनुभवसिद्ध वस्तुओं को कोई विरोध बाधित होता है अर्थात् किसी अन्य प्रमाण से जहाँ अनुभवसिद्ध वस्तु का कोई बाधक उपस्थित हो जाता है और उससे अनुभवजन्य ज्ञान में प्रतिबन्ध उपस्थित हो जाता है वह अनुभवसिद्ध वस्तु प्रामाणिक नहीं मानी जाती। किन्तु जिस वस्तु में कोई प्रतिबन्ध नहीं होता वह प्रामाणिक ही मानी जाती है। जैसे दो चन्द्रों के अनुभव में प्रत्यक्ष प्रतीति प्रतिबन्धक का कार्य करती है जिससे वह ज्ञान बाधित हो जाता है। किन्तु व्यंजना के अनुभव में किसी प्रकार का प्रतिबन्ध उपस्थित नहीं होता, अतः उस ज्ञान को अप्रामाणिक नहीं माना जा सकता। आशय यह है कि व्यंजना की प्रतीति अनुभव सिद्ध भी है अबाधित भी है। जो वस्तु अनुभव सिद्ध भी होती है और अबाधित भी होती है उसका प्रतिषेध नहीं किया जा सकता। जैसे वाचकत्व का कोई प्रतिषेध नहीं करता।
(ध्वन्या०)—वाचकत्वे हि तार्किकाणां विप्रतिपत्तयः प्रवर्तन्ताम्, किं तद्-
स्वाभाविकं शब्दानामहोस्वामयिकमित्यपि। न व्यञ्जकत्वे तु तत्पुष्टभाविनि
भावान्तरसाधारणे लोकप्रसिद्धेऽवानुगम्यमाने को विमतो नाम वस्सरः। अलौकिके
व्यर्थे तार्किकाणां विमतयो निबिलाः प्रवर्तन्ते न तु लौकिके। न हि नीलमधुरादिश्व-
रोषलोकेन्द्रियगोचरे बाधारहिते तत्त्वे परस्परं विप्रतिपन्ना दृश्यन्ते। न हि बाधारहितं
नीलं नीलमिति बुवन्नपेरण प्रतिषिध्यते नेन्नीलं पोतमतदिति। तथैव व्यञ्जकत्वं
वाचकानां शब्दानामवाचकानां च गीतध्वनौनादशब्दरूपाणां च चेष्टादीनां यत्सर्वे-
षामनुभवसिद्धमेव तत्तेनापह्नूयते ?
(अनु०) वाचकत्व के विषय में तार्किकों की समस्त विप्रतिपत्तियाँ प्रवृत्त हों कि क्या यह शब्दों का स्वाभाविक (धर्म) है या सांकेतिक इत्यादि। किन्तु उस (वाचकत्व) की पीठ
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३
तृतीय उद्योतः
पर होनेवाले दूसरे भावों (दीप इत्यादि पदार्थों) में साधारणरूप में मिलनेवाले लोक प्रसिद्ध व्यंजकत्व के अवलम्बन लेने में विमतियाँ का अवसर हो क्या है ? अलौकिक पदार्थ में तार्किकों की सभी विप्रतिपत्तियाँ प्रवृत्त होती हैं लौकिक पदार्थ में नहीं । नील, मधुर इत्यादि में समस्त लोक के इन्द्रियगोचर तथा बाधारहित तत्व के विषय में परस्पर विप्रतिपन्न (विरोधी विचारों-वाले) लोग नहीं देखे जाते । बारहिंत नील को नील कहनेवाला दूसरे के द्वारा मना नहीं किया जाता कि यह नील नहीं है यह तो पीत है । उसी प्रकार वाचक शब्दों का, अवाचक गीत ध्वनियों का और अशब्दरूप चेष्टा इत्यादिकों का जो व्यंजकत्व सभी का अनुभव सिद्ध तत्व है वह किसके द्वारा छिपाया जा सकता है ?
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तृतीय उद्योतः
(लो०) ननु तत्राप्येषां विमति: । नेतत्, नहि वाचकत्वे हि सा विमति:, अपितु वाचकत्वस्य नैसर्गिकत्वकृत्रिमत्ववादौ तदाह—वाचकत्वे होति । नन्वेवं व्यंजकत्वस्यापि धर्मान्तरमुखेन विप्रतिपत्तिविषयत्वादपि स्यादित्याशङ्क्याह—व्यञ्जकत्वे त्विति । अक्षिनिकोचादेः: साङ्केतिकत्वं चक्षुरादिकस्यास्यानुप्रयोग्यतेति दृष्ट्वा काममस्तु संशय: शब्दस्याधेयप्रकाशने व्यञ्जकत्वं तु यादृशमेकरूपं भावान्तरेषु तादृशे प्रकृत्युपात्ते निश्चिततया कं न नेतव्योऽपि नीलं हि न विप्रतिपत्ति:, अपितु प्राधानिकमिति पारमाणवमिति ज्ञानमात्रमिति तुच्छीमदमिति तत्त्वष्टावालौकिकस्य एवं विप्रतिपत्तय: । वाचकानामिति । ध्वन्युाहरणेष्वितिभाव: ।
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तृतीय उद्योतः
(अनु०) (प्रश्न) उसमें भी इनका वैमत्य है। (उत्तर) ऐसा नहीं है। वह वैमत्य निस्सन्देह वाचकत्व के विषय में नहीं है अपितु वाचकत्व के नैसर्गिकत्व, कृत्रिमत्व इत्यादि के विषय में है। यह कहते हैं—‘वाचकत्व में निस्सन्देह’ यह । (प्रश्न) इस प्रकार दूसरे धर्मों के द्वारा व्यंजकत्व की भी विप्रतिपत्तिकविषयता हो जाय यह शङ्का करके कहते हैं—‘व्यंजकत्व में तो’ यह । ‘भावान्तर’ यह । आखों के संकोच विकास इत्यादि से उनकी सङ्केतवत्ता और नेत्र इत्यादि की अनादि योग्यता को देखकर शब्द के अभिधेयार्थ प्रकाशन में चाहे जितना सन्देह हो, किन्तु व्यंजकत्व तो दूसरे पदार्थों में जिस प्रकार एकरूप होता है वैसा ही प्रकृत में भी है; इस प्रकार निश्चित एकरूप में सन्देह का अवसर ही क्या है? यही यहाँ पर आशय है। नील में ‘यह नील नहीं है’ यह विप्रतिपत्ति किसी को नहीं होती, अपितु उसकी सृष्टि में अलौकिकता के विषय में ही विप्रतिपत्ति होती है कि क्या यह प्रधान (मूलप्रकृति) से उत्पन्न हुआ है ? क्या यह परमाणुजन्य है ? क्या यह ज्ञानमात्र है ? क्या यह शून्यमात्र है ? इत्यादि । ‘वाचकों का’ यह । भाव यह है कि ध्वनि के उदाहरणों में
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तृतीय उद्योतः
तारावती—(प्रश्न) वाचकत्व के विषय में भी तार्किक विप्रतिपत्ति उठाते हैं । (उत्तर) वह विप्रतिपत्ति उनकी इस विषय में नहीं होती कि शब्द का अभिधेयार्थ होता है या नहीं अथवा शब्द के वाचकत्व धर्म को स्वीकार किया जाय या नहीं । उनकी विप्रतिपत्ति इस विषय में होती है कि शब्द के वाचकत्व धर्म को नैसर्गिक मानें या कृत्रिम । वाचकत्व नित्य होता है या अनित्य इत्यादि विप्रतिपत्तियाँ होती हैं । शब्द के वाचकत्व धर्म की सत्ता स्वीकार करने
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में किसी को अनुपपत्ति है ही नहीं। आशय यह है कि वाचकत्व धर्मी में अनुपपत्ति नहीं है किन्तु उसके धर्मों के विषय में ही अनुपपत्ति हो सकती है। (प्रश्न) जिस प्रकार वाचकत्व के धर्मों के विषय में विप्रतिपत्ति हो जाती है उसी प्रकार व्यंजकत्व के अन्दर भी दूसरे धर्मों का आश्रय लेकर उसे भी विप्रतिपत्ति का विषय क्यों नहीं बनाया जा सकता ? (उत्तर) वाचकत्व के विषय में अनेक धर्मों को लेकर ताकिकों को अनेक विप्रतिपत्तियाँ उत्पन्न हो सकती हैं; किन्तु उस प्रकार की विप्रतिपत्तियाँ व्यंजकत्व धर्म के विषय में नहीं हो सकती। शब्द का वाच्य अर्थ के साथ नैसर्गिक सम्बन्ध होता है या सांकेतिक इस विषय में सन्देह का पर्याप्त अवसर है। अर्थों के साथ सम्बन्ध के विषय में दोनों प्रकार के उदाहरण मिलते हैं। जैसे आँखों का सिकोड़ना फैलाना इत्यादि के द्वारा अर्थ का अभिधान किया जाता है। यह आँख सिकोड़ने इत्यादि के द्वारा अर्थ का अभिधान सांकेतिक (कृत्रिम) है। दूसरी ओर आँख इत्यादि इन्द्रियाँ घट इत्यादि अर्थी को स्वयं ग्रहण करती हैं। घट इत्यादि अर्थी को ग्रहण करने में इन्द्रियों में स्वाभाविक योग्यता विद्यमान है। तब यह सन्देह उत्पन्न हो जाता है कि शब्दों का अभिधेयार्थ से किस प्रकार का सम्बन्ध है ? क्या अक्षिसंयुक्त इत्यादि दृष्टान्त के आधार पर यह कहना ठीक होगा कि उनका सांकेतिक सम्बन्ध है या नेत्रों से पदार्थों के साक्षात् ज्ञान के उदाहरण से यह कहना ठीक होगा कि शब्द और अर्थ का स्वाभाविक सम्बन्ध है ? दोनों प्रकार के उदाहरणों के मिलने से वाचकत्व के विषय में सन्देह उत्पन्न हो जाता है। किन्तु इस प्रकार का सन्देह व्यंजना के विषय में उत्पन्न नहीं होता। कारण यह है कि एक तो व्यंजना वाचकत्व के पीछे आती है; अतः उस विषय में किसी को सन्देह का अवसर है ही नहीं। दूसरी बात यह है कि व्यंजना सर्वत्र एक जैसी ही होती है। दीपक अपने को प्रकाशित कर घट को प्रकाशित करता है। जहाँ कहीं एक वस्तु के द्वारा दूसरे की व्यंजना होती है वहाँ सर्वत्र ऐसा ही होता है। प्रकृत में भी यही बात है। शब्द या वाच्यार्थ पहले अपने को प्रकाशित करता है फिर किसी अन्य अर्थ को प्रकाशित कर देता है। इस विषय में अनुपपत्ति का कोई अवसर है ही नहीं। अतः जिस व्यंजना का रूप सर्वत्र निश्चित है, उसमें सन्देह का अवसर ही क्या हो सकता है ? ताकिकों में मतभेद सर्वदा अलौकिक वस्तु के विषय में हुआ करता है। लौकिक वस्तु के विषय में तो निश्चय होता है। अतः उस विषय में मतभेद कभी होता ही नहीं। जो वस्तु नील है वह सारे संसार की आँखों उसे नीला ही समझती हैं अतः इस विषय में कभी विवाद उठता ही नहीं कि अमुक वस्तु नीली है या नहीं। इसी प्रकार जो वस्तु मधुर होती है सारे संसार की जिह्वाएँ उसे मीठा ही समझती हैं। अतः यह विवाद कभी उठता ही नहीं कि अमुक वस्तु मधुर है या नहीं। कारण यह है कि नीलत्व में या मधुरत्व में किसी प्रकार की बाधा उपिस्थत ही नहीं होती, फिर उसमें विवाद ही किस बात का ? यह तो हुई लौकिक तत्व की बात। अब अलौकिक तत्व को लीजिये। नील यह क्या वस्तु है ? सांख्य शास्त्र के आचार्य कहते हैं कि मूलप्रकृति प्रधनातत्व है; उससे महत्तत्व की उत्पत्ति होती है और उसी परम्परा में नील इत्यादि की भी उत्पत्ति होती है। इस प्रकार सांख्य के आचार्य नील को प्रधान का विपरिणाम मानते हैं। इसके प्रतिकूल न्यायशास्त्र के आचार्यों का कहना है कि संसार के समस्त पदार्थ परमाणुओं से बने हैं। अतः नैय्यायिकों के
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मत में नील यह परमाणुओं का कार्य है। इसके प्रतिकूल विज्ञानवादी संसार के सभी तत्त्वों को विज्ञानरूप मानते हैं । अतः उनके मत में नील भी विज्ञान रूप है । माध्यमिक बौद्ध संसार के समस्त तत्त्वों को शून्य रूप मानते हैं । अतः उनके मत में नील भी शून्य का ही रूप है । इस प्रकार नील की उत्पत्ति के अलौकिक रूप में ही विप्रतिपत्तियाँ उठती हैं । यदि लौकिक नील को कोई नील कहे तो दूसरा व्यक्ति कभी उसका प्रतिषेध नहीं करेगा कि यह नील नहीं है यह तो पीत है । किन्तु यदि उसकी अलौकिकता के विषय में कोई कुछ कहे कि नील प्रधान का विपरिणाम है तो दूसरा चट कहेगा कि नहीं यह तो परमाणुओं से बना है; तीसरा कहेगा ‘नहीं यह तो विज्ञानरूप है’ चौथा कहेगा कि ‘नहीं यह तो शून्य का परिणाम है ।’ आशय यह है कि लौकिक पदार्थों में सन्देह नहीं होता; अलौकिक में सन्देह होता है । व्यंजकत्व भी लौकिक वस्तु ही है । व्यंजना वाचक शब्दों से भी होती है, अवाचक गीत-ध्वनियों से भी होती है और अशाब्द रूप चेष्टा इत्यादि से भी होती है । सभी का यह अनुवसिद्ध तत्त्व है । अतः इसे छिपा ही कौन सकता है ?
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तृतीय उद्योतः
(ध्वन्य०) अशाब्दसर्थ रमणीयं हि सच्चयन्तो व्यवहारारस्तथा व्यापारानिबद्धाश्चानिबद्धाश्च विदग्धपरिषत्सु विविघावयन्ते । तदनुप्रास्यतामातमनः परिहरनू कोटिसंवन्धीत सचेताः
(अनु०) शब्दरहित (वाच्यार्थ से भिन्न) रमणीय अर्थ को सूचित करनेवाली उक्तियाँ तथा क्रिया कलाप निबद्ध तथा अनिबद्ध (दोनों प्रकार के) विद्वद्गोष्ठियों में पाये जाते हैं । कौन सहृदय अपनी उपहास्यता को बचाते हुये उनका अधिक तिरस्कार कर सकता है !
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तृतीय उद्योतः
(लो०) अशाब्दमिति । अभिधाव्यापारेऽस्पृष्टमित्यर्थः । रमणीयमिति । यद्गोप्यमानतयैव सुन्दरीभवतील्यनेन ध्वन्यमानतयासाधारणप्रतीतिलाभः प्रयोजनमुक्तम् । निबद्धाः प्रसिद्धाः । तानिति । व्यवहारान्तु कः सचेताऽतिसंवन्धीत नाद्रियेतेऽर्थः । लक्षणं तावदेकः । आत्मानः कर्मभूतस्य गोप्यमानतया तस्याः परिहारेणोपलब्धतस्तां परिजिहीर्षितुमित्यर्थः ।
(अनु०) ‘अशाब्द’ यह । अर्थात् अभिधा व्यापार से स्पर्श न किया हुआ । ‘रमणीय’ यह । जो कि गोप्यमान रूप में ही सुन्दरता को प्राप्त होता है इसके द्वारा ध्वन्यमान होने में असाधारण प्रतीति लाभ प्रयोजन के रूप में बतलाया गया है । निबद्ध का अर्थ है प्रसिद्ध । लक्षण में शत् आदेश (यह अर्थ देता है कि) कर्मरूप में स्थित अपनी जो उपहसनीयता उसके परिहार के द्वारा उपलक्षित किया हुआ अर्थात् उसके परित्याग की इच्छा करनेवाला ।
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तृतीय उद्योतः
तारावती—अनेक प्रकार की उक्तियाँ और अनेक प्रकार के व्यापार ऐसे होते हैं कि शब्दों के द्वारा अभिधान करने में उनमें सुन्दरता नहीं आती, वे शब्द के द्वारा अभिहित किये ही नहीं जा सकते । जब उनको छिपाकर दूसरे शब्दों से अभिहित किया जाता है तब उनमें अभूतपूर्व रमणीयता आ जाती है । इससे सिद्ध होता है कि ध्वनित होने में असाधारण प्रतीति की प्राप्ति
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३६० ध्वन्या लोके हो जाती है। यह ध्वनि सिद्धान्त का एक बहुत बड़ा प्रयोजन है। इस प्रकार के रमणीय कथन और व्यापार मुक्तक इत्यादि निर्बन्धों में भी होते हैं और गद्यकाव्यों में भी हो सकते हैं। विद्वानों की सभा में इस प्रकार की सूक्तियों का प्रायः परिशीलन किया जाता है और उनका आनन्द लिया जाता है। इतना सब होते हुये भी यदि कोई व्यक्ति अपने को सहृदय कहलाने का दावा करता हो और साथ में इस प्रकार के रमणीय अर्थ को छलपूर्वक छिपाने की चेष्टा करे तथा चारुतापूर्ण कथन के व्यापार व्यंजना को स्वीकार न करे तो विद्वद्गोष्ठी में उसकी हँसी ही होगी। यदि वह चाहता है कि उसकी हँसी न उड़ाई जाय तो उसे चाहिये कि इतने स्पष्ट और इतने आदृत व्यंजनाव्यापार के विरुद्ध प्रचार करने की चेष्टा न करे। यहीं सहृदय का यही लक्षण बतलाया गया है कि जो व्यक्ति अपनी उपहासनीयता को बचाना चाहता है और आदरास्पद ध्वनि-सिद्धान्त के विरुद्ध नहीं जाता वही सहृदय है। इस लक्षण में ‘परिहरण्’ शब्द में ‘शतृ’ प्रत्यय किया गया है। यह शतृ प्रत्यय वर्तमानकाल प्रथमा समानाधिकरण में हुआ करता है। यहाँ प्रथमा है ‘सचेताः’ शब्द में और ‘परिहरण्’ शब्द उसीका समनाधिकरण है। ‘परिहरन्’ का कर्म है उपहास्यता। और उपहास्यता का कर्म है ध्वनि का निरादर करनेवाले, जिनके लिये आत्मशब्द का प्रयोग किया गया है। आशय यह है कि जो लोग अपनी उपहास्यता का परिहार करते हुये ही दृष्टिगत होते हैं अर्थात् अपनी उपहास्यता को उत्पन्न ही न होने देते हैं वही सहृदय हैं।
अस्यतिसन्धानावसरः व्यङ्ग्यकत्वं शब्दानां गमकत्वं तच्च लिङ्गस्वमतश्च गृह्यते न तु लिङ्गलिङ्गिभाव एव तेषां व्यङ्ग्य-व्यञ्जकभावो नापरः कश्चित् । अतएव चेतद्विषयमेव बोद्धव्यं यस्माद्वस्त्रेभिप्रायापेक्षया व्यङ्ग्यत्वमिदानीमेव त्वया प्रतिपादितं वस्त्रेभिप्रायाचतुनेरुप एव ।
(अनु०) (कोई) कहे—अतिसन्धान (अस्वीकृति) का अवसर है—व्यङ्ग्यकत्व शब्दों के गमकत्व (अन्यार्थप्रत्यायकत्व) को ही कहते हैं और वह लिङ्गत्व (हेतु) ही है, अतः व्यङ्ग्य-प्रतीति लिङ्गी (साध्य) की प्रतीति ही है। इस प्रकार इनका लिङ्गलिङ्गिभाव (साधन-साध्यभाव) ही है व्यङ्ग्य-व्यञ्जकभाव कोई अन्य वस्तु नहीं। और इसलिये भी यह अवश्य ही समझा जाना चाहिये कि आपके द्वारा अभी प्रतिपादित किया गया है कि वक्ता के अभिप्राय की अपेक्षा करते हुये ही व्यङ्ग्यकत्व होता है। वक्ता का अभिप्राय तो अनुमान गम्य ही होता है।
व्यङ्ग्यत्वं नापद्यतेऽते तस्मात्तिरस्कृतं न भवति, अपितु लिङ्गलिङ्गिभाव एवायम् । इदानामेव जैमिनीयमतोपक्षेप ।
(लो०) अस्तीति । व्यङ्ग्यत्वं नापद्यतेऽते तस्मात्तिरस्कृतं न भवति, अपितु लिङ्गलिङ्गिभाव एवायम् । इदानामेव जैमिनीयमतोपक्षेप । (अनु०) ‘है’ यह व्यङ्ग्यत्व छिपाया नहीं जा रहा है, किन्तु वह अतिरिकृत (सिद्ध) नहीं होता, अपितु यह लिङ्ग-लिङ्गिभाव ही है। अभी अर्थात् जैमिनीय मत के उपक्षेप में ।
व्यंजना की अनुमानगतार्थकता का निराकरण तारावती—यहाँ पर कुछ लोग कह सकते हैं कि हमें व्यङ्ग्यत्व के मानने में तो कोई आपत्ति नहीं और न हम उसे छिपाना ही चाहते हैं, किन्तु खाप जो यह कह रहे हैं कि व्यंजना के
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तृतीय उद्योत:
प्रतिकूल बोला हो नहीं जा सकता इससे हम सहमत नहीं। व्यंजना के प्रतिकूल बोलने का अवसर भी विद्यमान ही है। व्यंजकत्व कुछ और वस्तु नहीं है अपितु शब्दों के अन्यार्थ प्रत्य-यन को ही व्यंजक कहते हैं। व्यंजक होते हैं शब्द और उनके अर्थ इत्यादि और व्यंग्य होते हैं वस्तु, अलंकार तथा रस। ध्वनिवादी को भी इतना तो मानना ही पड़ेगा कि व्यंग्य और व्यंजक का कोई न कोई सम्बन्ध अवश्य होता है। यदि बिना सम्बन्ध के व्यंजना प्रकाशित होने लगे तो चाहे जिस वाक्य से चाहे जो व्यंजना निकल सकती है। किन्तु ऐसा होता नहीं। अतः व्यंजक और व्यंग्य के साहचर्य सम्बन्ध को मानना ही पड़ेगा। व्यंजक लिङ्ग ( हेतु ) है और व्यंग्य लिङ्गी ( साध्य ) है। दोनों की व्याप्ति बन जाती है कि जहाँ व्यंजक होता है वहाँ व्यंग्य भी होता है और जहाँ व्यंग्य नहीं होता वहाँ व्यंजक भी नहीं होता। इन व्यासियों के आधार पर व्यंजक ( लिङ्ग या हेतु ) को देखकर उससे अविनाभूत व्यंग्य ( लिङ्गी या साध्य ) का अनुमान कर लिया जाता है। इस प्रकार व्यंजनाव्यापार अनुमिति-व्यापार से भिन्न वस्तु नहीं है। और यह तो आपको मानना ही पड़ेगा क्योंकि अभी जैमिनीय मत की व्याख्या करने के अवसर पर आप ही इस सिद्धान्त का प्रतिपादन कर चुके हैं कि व्यंजकत्व वस्तु का अभिप्राय की अपेक्षा करता हुआ होता है। वस्तु का अभिप्राय सर्वदा अनुमान का विषय ही होता है। अतः व्यंजना भी अनुमान से भिन्न सिद्ध नहीं होती।
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(ध्वन्यो०) अत्रोच्यते—नन्वेऽपि यदि नाम स्वार्थतस्तिक्र निश्चिन्रम् । वाचकत्वगुणवृत्तिव्यतिरिक्तो व्यङ्गकवलक्षणः शब्दव्यापारोऽस्तीतस्यामिरस्मुपगतम् । तस्य चैवमपि न काचित् क्षति: तद्वै व्यङ्गकत्वं लिङ्गत्वमस्तु अन्यथा । सर्वथा प्रसिद्धशाब्दप्रकारविलक्षणत्वं शब्दव्यापारविषयत्वं च तस्यास्तीत नास्त्येवाव्यभिचारवाद: न पुनरयं परमार्थो यद्व्यङ्गकत्वं लिङ्गत्वमेव सर्वत्र व्यङ्ग्यप्रतीतिश्वालिङ्गिप्रतीति-रेवेति ।
(अनु०) यहीं पर कहा जा रहा है—निस्सन्देह यदि ऐसा भी हो जाय तो हमारी क्या बिगड़ जायगा। हम लोगों ने यह स्वीकार किया है कि वाचकत्व और गुणवृत्ति से व्यतिरिक्त व्यंजकत्व लक्षणवाला शब्द का व्यापार होता है। उसके इस प्रकार होने में भी कोई दोष नहीं। निस्सन्देह वह व्यंजकत्व लिङ्गत्व हो जाय या कुछ और। हम दोनों का इस विषय में विवाद नहीं है कि वह शब्द प्रकारों से सर्वथा विलक्षण होता है और उसकी शब्दव्यापारविषययता होती है। किन्तु यह वास्तविकता नहीं है कि व्यंजकत्व सर्वत्र लिङ्ग ( हेतु ) ही होता है और व्यंग्यचप्रतीति सर्वथा लिङ्गी ( साध्य ) की ही प्रतीति होती है।
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तृतीय उद्योत:
(लो०) यदि नाम स्यादिति । प्रोढिवादितयाभ्युपगमेऽपि स्वपक्षस्तावन्न सिद्ध्य-तीति दर्शयति—शब्द एव । शब्दस्य व्यापार: सन् विषय: शब्दव्यापारविषय:; अन्ये तु शब्दस्य यो व्यापारस्तस्य विषयो विशेष इत्याहु: । न पुनरिति । प्रदीपालोकादौ लिङ्गलिङ्गिभावशून्योऽपि हि व्यङ्गचव्यञ्जकभावोऽस्तीतित व्यङ्गचव्यञ्जकभावस्य लिङ्गलिङ्गिभावस्य लिङ्गलिङ्गिभावोऽपि इति कर्थं तादात्म्यम् ?
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(अनु०) 'यदि ऐसा हो' यह । प्रौढ़िवादी होने के रूप में स्वीकार करने पर भी अपना पक्ष तो सिद्ध नहीं होता यह दिखलाते हैं—'शब्द' यह । शब्दव्यापारविषय का अर्थ है शब्द का व्यापार होते हुए जो विषय हो । और लोग तो शब्द का जो व्यापार उसका विषय अर्थात् उसकी विशेषता यह अर्थ करते हैं । 'किन्तु नहीं' यह प्रतीप के आलोक इत्यादि में लिङ्ग-लिङ्गिभाव से शून्य भी व्यङ्गच-व्यंजकभाव होता है अतः व्यङ्गच-व्यंजकभाव का लिङ्गलिङ्गिभाव अव्यापक है फिर तादात्म्य कैसा ?
तारावती—कुछ लोगों के उक्त कथन पर हमारा कहना यह है कि यदि हम आपकी बात मान लें तो भी हमारा क्या बिगड़ जायगा । हमारा पक्ष तो केवल इतना है कि शब्द का एक तीसरा व्यापार भी होता है जो सामान्यतया माने हुए अभिधा और गुणवृत्ति इन दोनों शब्दव्यापारों से भिन्न होता है, इस व्यापार को हम व्यंजना व्यापार कहते हैं । उसको आप कहते हैं कि वह लिङ्ग-लिङ्गव्यवहार से गतार्थ हो जाता है । मैं कहता हूँ कोई बात नहीं आप उसे लिङ्गलिङ्गव्यवहार से गतार्थ हुआ मान लीजिये या कुछ और मान लीजिये । कम से कम आपने हमारी बात तो मानली कि एक ऐसा भी शब्दव्यापार होता है जो अभिधा और गुणवृत्ति में अन्तर्भूत नहीं हो सकता, वह प्रसिद्ध शब्दव्यापारों से विलक्षण होता है । और होता शब्दव्यापार की ही एक प्रकार है, इस विषय में हमारी और आपका मतभेद नहीं है । यदि आप उसे अनुमान में अन्तर्भूत करना चाहते हैं । तो इसमें हमें कोई आपत्ति नहीं । यहाँ पर व्यंजना के लिये 'शब्दव्यापारविषयत्व' शब्द का प्रयोग किया गया है । वस्तुतः व्यंजना शब्दव्यापार का विषय नहीं अपितु शब्द का एक व्यापार ही होती है, इस दृष्टि से शब्दव्यापारविषयत्व शब्द का प्रयोग उचित नहीं जान पड़ता । लोचन में इसकी योजना इस प्रकार की गई है—शब्द का व्यापार होते हुए जो उसका विषय होता है अर्थात् व्यंजना शब्द का व्यापार होती है और शब्द का विषय होती है । लोचनकार का कहना है कि कुछ लोगों ने इस शब्द का अर्थ किया है—'शब्द का जो व्यापार उसका विषय अर्थात् उसकी विशेषता । किन्तु यह अर्थ ठीक नहीं हैं क्योंकि व्यंजना शब्द का व्यापार होती है न कि शब्दव्यापार की विशेषता । यहाँ पर यह जो कहा गया है कि व्यंजना को यदि आप अनुमान में अन्तर्भूत करना चाहते हैं उसमें भी हमें कोई आपत्ति नहीं यह सब प्रौढ़िवाद मात्र है प्रौढ़िवाद उसे कहते हैं जहाँ दूसरे की कही हुई बात को मान करके भी अपने सिद्धान्त की स्थापना की जाय । यहाँ पर ग्रन्थकार का आशय यह है कि यदि हम थोड़ी देर के लिये आपके कथन को स्वीकार भी कर लें तो भी बात हमारी ही सिद्ध होती है कि व्यंजना वृत्ति है अवश्य । इस प्रकार हमारी मान्यता के एक अंश से तो आप सहमत हो ही गये । अब उसका दूसरा अंश लीजिये कि हम उसका अन्तभाव अनुमान में कर सकते हैं । आपकी मान्यता का यही अंश ठीक नहीं है । आप अपने पक्ष की तब ही सिद्धि कर सकते हैं जव कि अव्यभिचार व्याप्ति और व्यतिरेक व्याप्ति दोनों घटित हो जाँय । यहाँ पर अव्यभिचार व्याप्ति इस प्रकार बनेगी—'जहाँ व्यंजना होती है वहाँ अनुमान की प्रक्रिया लागू होती है' और व्यतिरेक व्याप्ति इस प्रकार की होगी—'जहाँ
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अनुमान की प्रक्रिया लागू नहीं होती वहाँ व्यंजना भी नहीं होती । ये दोनों व्याप्यतियाँ व्यभिचरित है । क्योंकि प्रदीप व्यंजक होता है और घट इत्यादि पदार्थ व्यङ्ग्य । उसमें लिङ्ग-लिङ्गिभाव ( हेतु-साध्यभाव ) लागू नहीं होता । वहाँ अनुमान की प्रक्रिया के आधार पर यह सिद्ध नहीं किया जा सकता कि वहाँ पर घट है । जब कि समस्त व्यङ्ग्य-व्यंजक भाव उस व्याप्ति से अन्वित नहीं हो जाते तब यह कहना ठीक नहीं है कि व्यंजकत्व तो लिङ्गत्व होता है और व्यङ्ग्य की प्रतीति लिङ्गी की प्रतीति है । अत एवं व्यंजना और अनुमान की तादात्म्य नहीं हो सकता ।
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यदपि स्वप्रकाशसिद्धयेडस्महुक्तमदीतं त्वया वक्त्रभिप्रायस्य व्यङ्ग्यत्वेनास्युपगमात्तत्प्रकाशने शब्दानां लिङ्गत्वमेवेति तदेतद्यथास्माभिरभिहितं तद्विभज्य प्रतिपाद्यते श्रूयताम्—द्विविधो विषयः शब्दानाम्—अनुमेयः प्रतिपाद्यश्च । तत्रानुमेयो विवक्षालक्षणः । विवक्षा च शब्दस्वरूपप्रकाशनेच्छा शब्देनार्थप्रकाशनेच्छा चेति द्विपकारा । तत्राद्या न शब्दव्यवहारादि: । सा हि प्राणितवमात्रप्रतिपत्तिफला । द्वितीया तु शब्दविशेषावधारणावसितव्यवहारनिबन्धनम् । ते तु द्वे अप्यनुमेयो विषयः शब्दानाम् । प्रतिपाद्यस्तु प्रयोक्तुरर्थप्रतिपादनसंमोहाविषयी-कृतोडर्थः ।
(ध्वन्य०) यदपि स्वप्रकाशसिद्धयेडस्महुक्तमदीतं त्वया वक्त्रभिप्रायस्य व्यङ्ग्यत्वेनास्युपगमात्तत्प्रकाशने शब्दानां लिङ्गत्वमेवेति तदेतद्यथास्माभिरभिहितं तद्विभज्य प्रतिपाद्यते श्रूयताम्—द्विविधो विषयः शब्दानाम्—अनुमेयः प्रतिपाद्यश्च । तत्रानुमेयो विवक्षालक्षणः । विवक्षा च शब्दस्वरूपप्रकाशनेच्छा शब्देनार्थप्रकाशनेच्छा चेति द्विपकारा । तत्राद्या न शब्दव्यवहारादि: । सा हि प्राणितवमात्रप्रतिपत्तिफला । द्वितीया तु शब्दविशेषावधारणावसितव्यवहारनिबन्धनम् । ते तु द्वे अप्यनुमेयो विषयः शब्दानाम् । प्रतिपाद्यस्तु प्रयोक्तुरर्थप्रतिपादनसंमोहाविषयी-कृतोडर्थः ।
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तृतीय उद्योतः
(अनु०) और जो अपने पक्ष को सिद्ध करने के लिये हमारा कहा हुआ तुमने अनूदित किया कि 'व्यंग्य के रूप में वक्ता के अभिप्राय को स्वीकार करने से उसके प्रकाशन में शब्दों का लिङ्गत्व ही होता है' तो यह जो हमने कहा है विभागपूर्वक प्रतिपादित किया जा रहा है सुनो—शब्द का विषय दो प्रकार का होता है—अनुमेय और प्रतिपाद्य । उसमें अनुमेय विवक्षाक्षरूप होता है । और विवक्षा दो प्रकार की होती है शब्दरूप प्रकाशन की इच्छा और शब्द से अर्थ प्रकाशन की इच्छा । इनमें प्रथम शब्दव्यापार का अंग नहीं होती । उसका फल निस्त्र्देह प्राणित्वमात्र की प्रतिपत्ति ही होती है और दूसरी यद्यपि शब्दविशेष के निर्णय करने में अध्यवसित होकर व्यवहरित होती है तथापि उस व्यवहार में निमित्त होती है जिसका कारण शब्द है । ये दोनों शब्दों का अनुमेय विषय हैं । प्रतिपाद्य तो प्रयोकता के अर्थप्रतिपादन की इच्छा से विषय बनाया हुआ अर्थ होता है ।
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विषय इति । शब्द उच्चरिते यावत् प्रतिपत्तिस्तावान् विषय इत्युक्तः । यत्र शब्दप्रयुज्युक्तौ अर्थप्रतिपादयिषा चेत्युभयेऽपि विवक्षानुमेयो तावत् । यस्तु प्रतिपादयिषा कर्मभूतोऽर्थस्तत्र शब्दः कारणत्वेन व्यवस्थितः न त्वसावनुमेयः । तद्विप्रतिपादयिषैव केवलमनुमीयते । न च तत्र शब्दस्य करणत्वे यैव लिङ्ग-करत्वता पक्षधर्मत्वग्रहणादिका सास्ति, अपि त्वन्यैव सङ्केतस्फुरणादिका तत् तत् शब्दो लिङ्गम् । इतिकर्तव्यता च द्विधा—एकया अभिधाव्यापारं करोति द्वितीयया व्यञ्जनाव्यापारम् । तदाह—तत्रेत्यादिना ।
(लो०) विषय इति । शब्द उच्चरिते यावत् प्रतिपत्तिस्तावान् विषय इत्युक्तः । यत्र शब्दप्रयुज्युक्तौ अर्थप्रतिपादयिषा चेत्युभयेऽपि विवक्षानुमेयो तावत् । यस्तु प्रतिपादयिषा कर्मभूतोऽर्थस्तत्र शब्दः कारणत्वेन व्यवस्थितः न त्वसावनुमेयः । तद्विप्रतिपादयिषैव केवलमनुमीयते । न च तत्र शब्दस्य करणत्वे यैव लिङ्ग-करत्वता पक्षधर्मत्वग्रहणादिका सास्ति, अपि त्वन्यैव सङ्केतस्फुरणादिका तत् तत् शब्दो लिङ्गम् । इतिकर्तव्यता च द्विधा—एकया अभिधाव्यापारं करोति द्वितीयया व्यञ्जनाव्यापारम् । तदाह—तत्रेत्यादिना ।
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(अनु०) 'विषय' यह । शब्द के उच्चारण करने पर जितनी प्रतिपत्ति होती है उतना विषय इत्युक्तः । यत्र शब्दप्रयुज्युक्तौ अर्थप्रतिपादयिषा चेत्युभयेऽपि विवक्षानुमेयो तावत् । यस्तु प्रतिपादयिषा कर्मभूतोऽर्थस्तत्र शब्दः कारणत्वेन व्यवस्थितः न त्वसावनुमेयः । तद्विप्रतिपादयिषैव केवलमनुमीयते । न च तत्र शब्दस्य करणत्वे यैव लिङ्ग-करत्वता पक्षधर्मत्वग्रहणादिका सास्ति, अपि त्वन्यैव सङ्केतस्फुरणादिका तत् तत् शब्दो लिङ्गम् । इतिकर्तव्यता च द्विधा—एकया अभिधाव्यापारं करोति द्वितीयया व्यञ्जनाव्यापारम् । तदाह—तत्रेत्यादिना ।
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विषय यह कहा गया है। उसमें शब्द के प्रयोग की इच्छा ओर अर्थ के प्रतिपादन की इच्छा यह दोनों प्रकार की विवक्षा तो अनुमेय ही होती है। और जो प्रतिपादन की इच्छा में कर्मरूप में स्थित अर्थ है उसमें शब्द कारण के रूप में व्यवस्थित होता है, वह अनुमेय नहीं होता, तद्विषयक प्रतिपादन की इच्छा या ही केवल अनुमान लगाया जाता है। शब्द के कारण होने में लिङ्ग की जो पक्षधर्मत्व प्रहणादिक इतिकर्तव्यता होती है वह वहाँ पर नहीं होती, अपितु संकेतस्फुरणादि रूप अन्य ही होती है; इसलिये शब्द वहाँ पर लिङ्ग नहीं होता। और इतिकर्तव्यता दो प्रकार की होती है—एक से अभिधाय्यापार करता है और दूसरे से व्यञ्जनाव्यापार। वहाँ कहते हैं—‘उसमें’ इत्यादि के द्वारा।
तारावती—हमने जो मीमांसकों का मत प्रतिपादित करते हुये यह कहा था कि वक्ता का अभिप्राय व्यङ्ग्य होता है उसका उदाहरण अपने अपने पक्ष को सिद्ध करने के लिये दिया और कहा कि वक्ता का अभिप्राय सर्वदा अनुमानगम्य ही होता है, इसी आधार पर अपने लिङ्ग-लिङ्गी कथा प्रतीत होती है कि अपने कथन का मैं स्पष्टीकरण कर लूँ। अतः विभागपूर्वक दिखलाया जा रहा है कि कितने अंश में व्यङ्ग्य अनुमेय होता है और कितने अंश में वह शुद्ध व्यङ्ग्य होता है। शब्द के उच्चारण करने के बाद जहाँ तक प्रतिपत्ति होती है वह सब शब्द का विषय ही कहा जा सकता है। शब्द का विषय दो प्रकार का होता है—अनुमेय और प्रतिपाद्य। !विवक्षा-रूप शब्द का विषय अनुमेय होता है। विवक्षा भी दो प्रकार की होती है—शब्दस्वरूप के प्रकाशन की इच्छा और शब्द के द्वारा अर्थप्रकाशन की इच्छा। आशय यह है कि जब कोई व्यक्ति शब्द का उच्चारण करता है तब उससे सर्वप्रथम यह प्रतीत होता है कि अमुक व्यक्ति कुछ करना चाहता है। यह कथन की उसकी इच्छा दो प्रकार की होती हैं—एक तो शब्द के स्वरूप प्रकाशन की इच्छा और दूसरे शब्द के द्वारा अर्थप्रकाशन की इच्छा। शब्द के स्वरूप प्रकाशन की इच्छा से केवल इतना ही सिद्ध होता है कि शब्द का प्रयोक्ता प्राणवान् है क्योंकि शब्द का प्रयोग तो प्राणी ही कर सकता है प्राणहीन नहीं। अतः शब्दप्रकाशन की इच्छा कभी भी व्यवहार का अर्थ नहीं हो सकती। अब दूसरी विवक्षा के विषय में देखिये—जब वक्ता अपने अभीष्ट अर्थवोधन में समर्थ तथा उसके अनुरूप शब्द समूह रूप वाक्य का प्रयोग करता
है तब श्राता सर्वप्रथम उस वाक्य का अनुसन्धान करता है और अर्थबोध का अवसर बाद में आता है। इसप्रकार शब्दसमूह के प्रयोग और अर्थबोधानुकूल बुद्धि में उस वाक्य को समझने और उसका अनुसन्धान करने का ब्यवधान पड़ जाता है, तथापि अर्थप्रकाशन की इच्छा में शब्द कारण होता है और उसी के ब्यवहार के आर्षीन अर्थप्रकाशन की इच्छा होती है। ये दोनों प्रकार की विवक्षायें केवल अनुमेय होती हैं और इनको शब्द का अनुमेय विषय कह सकते हैं। इस समस्त विवेचन का सार यही है—वक्ता शब्दों का उच्चारण करना चाहता है और उन शब्दों के द्वारा अपने मनोगत अर्थ को भी प्रकट करना चाहता है। इस प्रकार वक्ता की ये दो इच्छायें होती हैं। इन दोनों को विवक्षा कहते हैं। जब श्राता वक्ता के द्वारा उच्चरित शब्दसमूह को सुनता है तब उसे सर्वप्रथम तो यह ज्ञात होता है कि वक्ता कुछ शब्दों का
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उच्चारण करना चाहता है। और उन शब्दों को दूसरों को सुनाना चाहता है। यह इच्छा परगत (वक्ता के हृदय में विद्यमान) है अतः श्रोता उस इच्छा का अनुमान ही लगा सकता है। किन्तु इस अनुमान का कोई और फल नहीं होता। इसका केवल इतना ही फल होता है कि श्रोता यह जान लेता है कि अमुक व्यक्ति चेतन है और शब्द का प्रयोग कर सकता है। इसके बाद वह प्रयोग किये हुये शब्दविशेषों का निश्चय करता है और तब व्यवधान के बाद उसे यह ज्ञात होता है कि सार्थक शब्दों के प्रयोग के द्वारा वक्ता विशेष अर्थ का प्रतिपादन करना चाहता है। वक्ता को अर्थ का प्रतिपादन अभीष्ट होता है। अतः प्रतिपादन की इच्छा में कर्म अर्थ ही होता है और उस अर्थ के प्रतिपादन में शब्द करण होता है। शब्दप्रयोग की इच्छा और अर्थप्रतिपादन की इच्छा ये दोनों अनुमान का विषय ही होती हैं क्योंकि पराई इच्छा का ज्ञान अनुमान के द्वारा ही हो सकता है। अनुमान में शब्द करण होता है और शब्दबोधनेच्छा तथा अर्थबोधनेच्छा साध्य होती हैं। शब्दबोधनेच्छा तो शब्द से सीधे संबद्ध होती है किन्तु अर्थबोधनेच्छा में शब्द से वाक्यानुसंधान का व्यवधान पड़ जाता है। तथा हेतुता तो उसमें रहती ही है। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिये कि वक्ता की केवल इच्छा ही अनुमान का विषय हो सकती है, जिस अर्थ का प्रतिपादन किया जाता है वह अर्थ स्वयं अनुमान का विषय नहीं हो सकता। वह अर्थ शब्द का प्रतिपाध्य विषय कहा जा सकता है। अनुमेय नहीं। इस प्रतिपाद्य अर्थ को हम अनुमान में अन्तर्भूत इसलिए नहीं कर सकते, क्योंकि जब लिङ्ग से साध्यसिद्धि की जाती है तब उस लिङ्ग की कुछ इतिकर्तव्यता होती है जैसे पक्ष में लिङ्ग की उपस्थिति, पक्षधर्मता का ग्रहण, व्याप्तिस्मृति इत्यादि। समस्त अनुमानों में ऐसा ही हुआ करता है। किन्तु जब हम शब्द से अर्थ का बोध करते हैं तब हमें लिङ्ग की वह समस्त इतिकर्तव्यता उपलब्ध नहीं होती। अतः शब्द से अर्थबोध को हम अनुमान में अन्तर्भूत नहीं कर सकते। जब हम शब्द से अर्थ ज्ञान प्राप्त करते हैं तब उसमें लिङ्ग की नहीं शब्द की एक भिन्न ही इतिकर्तव्यता दृष्टिगत होती है। यह इतिकर्तव्यता होती है—संकेतस्फुरण, प्रकरण आदि का ज्ञान इत्यादि।
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(ध्वन्या०) स च द्विविधः—वाच्यो व्यङ्ग्यश्च। प्रयोक्ता हि कदाचित् स्वशब्दनार्थं प्रकाशयितुं समीहते कदाचित्स्वशब्दानभिधेयत्वेन प्रयोजनापेक्षया कयाचित् । स तु द्विविधोऽपि प्रतिपाद्यो विषयः शब्दानां न लिङ्गितया स्वरूपेण प्रकाशते, अपितु कृतिमेणाकृतिमेण सम्बन्धान्तरेण। विवक्षाविषयत्वं हि तस्यार्थस्य शब्दैरिङ्गितया प्रतीयते न तु स्वरूपम्। यद्य हि लिङ्गितया तत्र शब्दानां व्यापारः स्यात्तच्छब्दार्थे सम्यग् मिथ्यात्वादिविवादा एव न प्रवर्तेरन् धूमादिलिङ्गानुमेयान्तरत्वत् ।
(अनु०) और वह प्रकार का होता है—वाच्य और व्यङ्गय। प्रयोग करनेवाला निस्सन्देह कभी स्वशब्द से अर्थ को प्रकाशित करने की इच्छा करता है। कभी किसी प्रयोजन की अपेक्षा से अपने शब्द के द्वारा अनभिधेयरूप में। वह दोनों ही प्रकार का शब्दों का प्रतिपाद्य विषय लिङ्गी के रूप में स्वरूप से प्रकाशित नहीं होता। अपितु कृत्रिम या अकृत्रिम दूसरे सम्बन्ध से। वक्ता की विवक्षा का विषय होना ही उस अर्थ का शब्दों के द्वारा लिङ्गीरूप में प्रतीत होता है न कि स्वरूप से। यदि हाँ लिङ्गीरूप में वहां शब्दों का व्यापार हो तो मिथ्यात्व आदि के विवाद में प्रवृत्ति ही न हो क्योंकि वह धूम आदि लिङ्ग से अनुमेय के समान होगा।
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सम्बन्ध के द्वारा। उस अर्थ का विवक्षाविषयत्व शब्दों के द्वारा लिङ्ग के रूप में प्रतीत होता है उसका स्वरूप नहीं। यदि वहाँ लिङ्गी के रूप में शब्दों का व्यापार हो तो शब्दों के अर्थ के विषय में सम्यक् मिथ्यात्व इत्यादि विवाद ही प्रवृत्त न हो जैसे धूम इत्यादि लिङ्ग से अनुमित दूसरे अनुमेय।
(लो०) कयापि विधि गोपनकृतसौन्दर्यादिलिलाभाभिसन्धानादिकयेत्यर्थः। शब्दार्थ इति। अनुमान हि निश्चयरूपमेवतिभावः।
(अनु०) ‘किसी अपेक्षा से’ यह। अर्थात् गोपन से उत्पन्न सौन्दर्य इत्यादि के लाभ के अनुसन्धान की अपेक्षा से। ‘शब्दार्थ’ यह। भाव यह है कि अनुमान निश्चय रूपवाला ही होता है।
तारावती—शब्द की जिस इतिकर्तव्यता से हमें अर्थबोध होता है वह इतिकर्तव्यता दो प्रकार की हो सकती है—एक से तो अभिधाव्यापार होता है और दूसरी से व्यञ्जनाव्यापार। संकेतस्फुरण से अभिधाव्यापार होता है और वक्तृवैशिष्ट्य इत्यादि से व्यञ्जनाव्यापार। इसी आधार पर प्रतिपाद्य अर्थ दो प्रकार का हो सकता है—वाच्य और व्यङ्ग्य। प्रयोग करनेवाले का लक्ष्य कभी तो केवल इतना ही होता है कि शब्द जो भी अर्थ दे रहे हों और उनका संकेत जिस अर्थ में नियत हो। श्रोता उतना ही अर्थ समझे। इसके प्रतिकूल कभी-कभी उसकी इच्छा होती है कि शब्द जो भी संकेतिक अर्थ दे रहे हों उनसे भिन्न एक दूसरा अर्थ ही प्रतीतिगोचर हो। अन्य अर्थ को अन्य शब्द द्वारा प्रकट करने में वक्ता का कुछ प्रयोजन भी होता है। छिपाकर किसी बात को कहने में एक सुन्दरता आ जाती है। अन्य शब्दों से अन्य अर्थ को कहने में वक्ता का या तो यह प्रयोजन होता है कि किसी बात को छिपाकर कहने में जो सौन्दर्य आ जाता है। उसका लाभ श्रोताओं और पाठकों को भी प्राप्त हो सके अथवा उसका कोई अन्य प्रयोजन होता है। इस प्रकार वक्ता का प्रतिपाद्य अर्थ दो प्रकार का होता है—शब्दों के अभिधेय के द्वारा प्रकाशित वाच्यार्थ और किसी प्रयोजन से प्रकाशित व्यङ्ग्यार्थ। न तो यह दोनों प्रकार का प्रकाशित अर्थ लिङ्गी (साध्य) होता है और न इनका प्रकाशक लिङ्ग (हेतु) होता है और न इनके प्रकाशन की क्रिया अनुमान कही जा सकती है। इसका प्रकाशन तो किसी अन्य सम्बन्ध के द्वारा ही होता है, वह सम्बन्ध मीमांसकों के अनुसार अकृत्रिम हो सकता है या नैय्यायिकों के अनुसार कृत्रिम (सांकेतिक) हो सकता है। कारण यह है कि अनुमान से जिस अर्थ (वस्तु) की साध्यरूप में प्रतीति होती है वह पदार्थज्ञान होता है उसमें किसी प्रकार के संशय का अवसर नहीं रह जाता कि क्या यह ठीक हो सकता है, क्या यह मिथ्या हो सकता है। इत्यादि। जैसे हम धूम को लिङ्ग मानकर उससे अग्नि का अनुमान लगाते हैं तब अग्नि का हमें यथार्थज्ञान हो जाता है और यह सन्देह भी नहीं उठता कि क्या जहाँ से धूम उठ रहा है वहाँ आग हो सकती है या नहीं। ऐसा ही हेतु साध्य का साधक होता है जो अव्यभिचरित रूप में साध्य के साथ व्याप्तव्यापकभाव सम्बन्ध रखता हो। अतः साध्यसिद्धि हो जाने पर उसमें सन्देह का अवसर ही नहीं रह जाता। यदि शब्द के प्रतिपाद्य अर्थ वाच्य और व्यङ्ग्य के अनुमान में अन्तर्भूत कर तो वह ज्ञान भी निश्चित ज्ञान ही
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तृतीय उद्योत:
होगा। उसमें यह सन्देह ही नहीं उत्पन्न होगा कि क्या अमुक ज्ञान सम्यक् ज्ञान है? क्या मिथ्या ज्ञान है? इत्यादि। शब्दार्थी के विषय का ज्ञान होने में इस प्रकार के सन्देह तथा विकल्प उठते हैं अतः हम उसे अनुमान में अन्तर्भूत नहीं कर सकते।
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तृतीय उद्योत:
(ध्वन्या०) व्यङ्गच्यार्थो वाच्यसामर्थ्यैकश्रिततया वाच्यवाचकभावाभयतवं सम्बन्धी भवत्येव। साक्षादसाक्षाद्वानो हि सम्बन्धस्य प्रयोजकः। वाच्यवाचकभावाभयत्वं च व्यङ्गकत्वस्य प्रागेव दूरशतम्। तस्माद्वक्त्रभिप्रायरूप एव व्यङ्ग्ये लिङ्गतया शब्दानां व्यापारः। तद्विषयीकरुते तु प्रतिपाद्यतया। प्रतिपाद्यमाने तस्मिन्नभिप्रायरूपेऽभिप्रायरूपे च वाचकत्वेनैव व्यापारः सम्बन्धान्तरेण वा। न तावद्वाचकत्वेन यथोक्तं प्राक् सम्बन्धान्तरेण व्यङ्गकत्वमेव। न च व्यङ्गकत्वं लिङ्गत्वरूपमेव आलोकादिष्वनन्यथा हृष्टत्वात्। तस्मात्प्रतिपाद्यो विषयः शब्दानां न लिङ्गित्वेन सम्बन्धी वाच्यवत्। यो हि लिङ्गित्वेन तेषां सम्बन्धी यथा वशितो विषयः स न वाक्यत्वेन प्रतीये अपि तूपाधित्वेन। प्रतिपाद्यस्य च विषयस्य लिङ्गित्वे तद्विषयानां विप्रतिपत्तीनां लौकिकैरेव क्रियमाणानामभावः प्रसज्येत। एतच्चोक्तमेव।
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तृतीय उद्योत:
(अनु०) और व्यंग्य अर्थ वाच्यसामर्थ्यैकश्रित होने के कारण वाच्य के समान शब्द का सम्बन्धी होता ही है। साक्षात् या असाक्षात् होना निस्सन्देह सम्बन्ध का प्रयोजन नहीं होता। और व्यङ्गकत्व का वाच्यवाचक भाव का आश्रय लेना तो पहले ही दिखला दिया गया है। अतएव वक्ता के अभिप्राय रूप व्यंग्य में ही लिङ्ग के रूप में शब्दों का व्यापार होता है। उन शब्दों का विषय बनाये हुये अर्थ में तो प्रतिपाद्य रूप में शब्दों का व्यापार होता है। अभिप्राय रूप या अनभिप्राय रूप उसके प्रतीत होने पर या तो वाचकत्व से ही व्यापार होता है या दूसरे सम्बन्ध से। वाचकत्व से नहीं होता जैसा कि पहले कहा गया है। दूसरे सम्बन्ध से तो व्यङ्गकत्व ही होता है। व्यङ्गकत्व लिङ्गत्वरूप नहीं होता क्योंकि आलोक इत्यादि में अन्यथा देखा गया है। इससे शब्द का प्रतिपाद्य लिङ्गी के रूप में सम्बन्धी नहीं होता जैसे वाच्य जो निस्सन्देह लिङ्गी के रूप में उनका सम्बन्धी होता है जैसे दिखलाया हुया विषय वह वाच्य के रूप में प्रतीत नहीं होता अपितु औपाधिक रूप में। और प्रतिपाद्य विषय के लिङ्गीरूप में मानने पर लौकिकों द्वारा ही की हुई तद्विषयक लौकिक विप्रतिपत्तियों का अभाव ही प्रसक्त हो जाय। यह तो कहा ही जा चुका है।
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तृतीय उद्योत:
(लो०) उपाधित्वनेति। वक्त्रेच्छा हि वाच्यादेरर्थस्य विशेषणत्वेन भाति। प्रतिपाद्यस्येति। अर्थद्वयस्य। लिङ्गित्व इति। अनुमेयत्व इत्यर्थः। लौकिकैरेवेत। इच्छायां लोको न विप्रतिपत्तिमानेव।
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तृतीय उद्योत:
(अनु०) ‘उपाधित्व के रूप में’ यह। वक्ता की इच्छा निस्सन्देह वाच्य आदि के विशेषण के रूप में शोभित होती है। ‘प्रतिपाद्य का’ यह अर्थात् व्यंग्य का ‘लिङ्गित्व में’ यह। अर्थात् अनुमेयत्व में। ‘लौकिकों के द्वारा’ यह। इच्छा में लोक को विप्रतिपत्ति नहीं होती अर्थ में तो लोक विप्रतिपत्तिवाला होता ही है।
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तारावती—यहाँ पर यह प्रश्न उठता है कि वाच्यार्थ तो शब्द का अर्थ होता ही है, व्यङ्ग्यार्थ तभी उस कोटि में आ सकता है जब कि उसका शब्द से सम्बन्ध सिद्ध हो जाय। वह सम्बन्ध सिद्ध नहीं होता है फिर आप यह कैसे कह सकते हैं कि व्यङ्ग्यार्थ भी शब्द का प्रतिपाद्य विषय है ? इसका उत्तर यह है कि यह हम पहले ही सिद्ध कर चुके हैं कि व्यङ्ग्यार्थ वाच्यसामर्थ्य से आकलित होता है । वाच्य तो शब्द का सम्बन्धी होता ही है और वाच्य का सम्बन्धी व्यङ्ग्य होता है । सम्बन्धी का सम्बन्धी अपना भी सम्बन्धी माना जाता है । इस प्रकार व्यङ्ग्यार्थ भी शब्द की सम्बन्धी हो जाता है । (प्रथम) वह सम्बन्धी तो परम्परा सम्बन्ध हुआ, प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं हुआ । फिर इनको सम्बन्धी कैसे माना जा सकता है ? (उत्तर) शब्दार्थ के क्षेत्र में यह कोई नियम नहीं कि शब्द और अर्थ का प्रत्यक्ष हो सम्बन्ध हो । यदि परम्परया भी सम्बन्ध होता है तो वह भी सम्बन्ध हो माना जाता है । यही बात अन्य सम्बन्धों के विषय में भी लागू होती है । (उदाहरण) के रूप में प्रत्यक्ष को लीजिये । प्रत्यक्षज्ञान के लिये इन्द्रिय और विषय का सम्बन्ध होना चाहिये । नैैयायिकों की भाषा में इन्द्रिय और विषय के सम्बन्ध को सन्निकर्ष कहते हैं । ये सन्निकर्ष ६ प्रकार के माने जाते हैं । यदि उन सब पर विचार किया जाय तो ज्ञात होगा कि उनमें से कुछ तो इन्द्रियों से साक्षात् सम्बद्ध होते हैं जैसे संयोगसन्निकर्ष और कुछ परम्परया सम्बद्ध होते हैं जैसे संयुक्त-समवायसन्निकर्ष इत्यादि । घट का प्रत्यक्ष इन्द्रिय और घट के साक्षात् सम्बन्ध से होता है और घट के गुणों का प्रत्यक्ष परम्परा सम्बन्ध से होता है । इस प्रकार कहा जा सकता है कि परम्परया सम्बन्ध से शब्द और व्यङ्ग्यार्थ का सम्बन्ध मानने पर भी उसे शब्दव्यापार मानने में कोई आपत्ति नहीं । ऊपर जो कुछ कहा गया है उसका सार कतिपय शब्दों में इस प्रकार दिया जा सकता है—वक्ता के अभिप्राय की जो व्यंजना होती है अर्थात् श्रोता को जो यह ज्ञान होता है कि वक्ता शब्दों का प्रयोग करना चाहता है अथवा उन शब्दों के माध्यम से कुछ अर्थ प्रकट करना चाहता है यह सब वक्ता की इच्छा अनुमान का विषय होती है । किन्तु वह जो कुछ कहना चाहता है वह शब्द का प्रतिपाद्य ही होता है । उसका ज्ञान अनुमान के द्वारा नहीं हो सकता । जो कुछ वह कहना चाहता है वह अभिपायरूप (रसादिरूप) भी हो सकता है और उससे भिन्न (अलङ्कारादिरूप) भी हो सकता है । वह चाहे जिस रूपवाला क्यों न हो उसके प्रत्यायन में या तो वाचकत्वव्यापार हो सकता है या वाचकत्व से भिन्न कोई और व्यापार हो सकता है । वाचकत्वव्यापार वहाँ पर हो ही नहीं सकता, इस बात का विस्तृत विवेचन पहले किया जा चुका है । अतः उससे भिन्न कोई अन्य सम्बन्ध ही हो सकता है । यह अन्य सम्बन्ध और कुछ नहीं केवल व्यंजना हो है और उसी व्यंजना के द्वारा अभीष्ट या अनभिप्रेत अर्थ का प्रत्यायन होता है । व्यञ्जकत्व सर्वदा लिङ्गत्व (हेतुत्व) रूप ही नहीं होता और न उसका समावेश सर्वदा अनुमान में किया जा सकता है । क्योंकि यह देखा जा चुका है कि द्वीपालोक में व्यंजकता तो होती है किन्तु उसे अनुमान में अन्तर्भूत नहीं किया जा सकता । जब सभी व्यंजनाें अनुमान में नहीं आ सकतीं तब अनुमान में उसके अन्तर्भाव का प्रश्न ही नहीं उठता । अतएव जिस प्रकार वाच्य शब्दों का प्रतिपाद्य होता है वैसे ही व्यङ्ग्य भी शब्दों का प्रतिपाद्य होता है । जिस प्रकार वाच्य को हम शब्दों का सम्बन्धी
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तृतीय उद्योत:
मानते हैं उसी प्रकार व्यङ्गच्य को भी शब्दों का सम्बन्धी मानना पड़ता है। जिस प्रकार वाच्य को हम लिङ्गी (साध्य) की कोटि में नहीं रख सकते उसी प्रकार व्यङ्गय को भी हम लिङ्गी अर्थात् साध्य की कोटि में नहीं रख सकते। इस प्रकार नैय्यायिकों को भी व्यञ्जना की स्वतन्त्र सत्ता माननी ही पड़ेगी। हाँ शब्दों का कुछ विषय ऐसा अवश्य होता है जो अनुमान के क्षेत्र में आता है। उसकी व्याख्या पहले की जा चुकी है कि वक्ता के शब्दप्रकाश की इच्छा और उसके अर्थप्रकाश की इच्छा अनुमान का ही विषय होती है। उस इच्छा की प्रतीति वाच्यरूप में नहीं होती किन्तु औपाधिक रूप में होती है। औपाधिक का अर्थ है विशेषण के रूप में प्रतीत होना 'इस वक्ता का यह अर्थ विवक्षित है' इस में वक्ता की इच्छा अर्थ के विशेषण के रूप में प्रतीत होती है। (नैय्यायिकों के मत में प्रथमान्त विशेषण्यक शब्दबोध होता है। अतः उससे भिन्न तत्त्व प्रकार (विशेषण) के रूप में माने जाते हैं।) यदि प्रतिपादनीय अर्थ को लिङ्गी (साध्य) की कोटि में रखा जायगा तो उसके विषय में लौकिक लोग ही अनेक प्रकार की जो विप्रतिपत्तियाँ किया करते हैं वे किस प्रकार सिद्ध हो सकेंगी ? उनका तो अभाव ही हो जायगा। आशय यह है कि अनुमान-जन्य ज्ञान यथार्थज्ञान होता है। उसमें किसी को कभी कोई विप्रतिपत्ति नहीं होती और न उसकी सच्चाई में कभी कोई संदेह ही उठता है। सांसारिक व्यक्ति किसी के कहे हुये वाक्य के अर्थ की सच्चाई में संदेह भी करते हैं, उसका खण्डन भी करते हैं और उससे असहमत भी होते हैं। यदि वाक्य के व्यङ्गयार्थ को अनुमान का विषय माना जायगा तो इन अनुपपत्तियों का क्या होगा ? इनकी तो सत्ता ही मिट जायगी। 'वक्ता कुछ कहना चाहता है' इसमें किसी को न संदेह होता है और न अनुपपत्ति है। अतः यह अनुमान का विषय हो सकता है। यह है प्रस्तुत प्रकरण का सार।
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(ध्वन्यालो०) यथा च वाच्यविषये प्रमाणान्तरानुगमेऽपि सम्यक्त्वप्रतीतोः क्वचिच्चित्रक्रममाणायां तस्य प्रमाणान्तरविषयत्वे सत्यपि न शब्दध्यापारविषयताहानिस्त-रच्यतेऽस्यापि। काव्यविषयं च व्यङ्ग्यप्रतीतिनां सत्यासत्यैरुपणस्याप्रयोजकत्व-सेवति तत्र प्रमाणान्तरव्यापारपरिक्षोपहासायैव सम्पच्यते। तस्माल्लिङ्गप्रतीतिरेव सर्वत्र व्यङ्ग्यप्रतीतिरिति शङ्क्यते वक्तुम्॥
(अनु०) और जिस प्रकार वाच्य के विषय में दूसरे प्रमाण के अनुगम के द्वारा कहीं सम्यक्प्रतीति किये जाने में उसके प्रमाणान्तर विषय हो जाने पर भी शब्दव्यापार की विषयता नष्ट नहीं होती वह व्यङ्गय का भी होता है और काव्यविषय में व्यङ्ग्यप्रतीतियों का सत्यासत्य निरुपण अप्रयोजनीय ही होता है; अतः वहाँ पर प्रमाणान्तर व्यापार परीक्षा उपहास के लिये ही होती है। इसलिये यह नहीं कहा जा सकता है कि व्यङ्गय की प्रतीति सर्वत्र लिङ्गी की प्रतीति ही होती है।
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(लो०) ननु यदा व्यङ्ग्योऽर्थः प्रतिपन्नस्तदासत्यत्वनिश्चयोऽस्याऽनुमानादेव प्रमाणान्तरात्कियत इति पुनरप्यनुमेय एवासौ। मैवम्, वाच्यस्यापि सत्यत्वनिश्चयादनु-मानादेव। यदाहुः— 'आस्तवादिविसंवादसामान्यादत्न चेद्नुमान्त' इति॥
(लो०) ननु यदि व्यङ्ग्यार्थ की प्रतीति हो जाने पर उसके असत्य होने का निश्चय अनुमान से ही किया जाता है तो वह प्रमाणान्तर से नहीं किया जाता है, अतः वह अनुमेय ही है। ऐसा नहीं है, क्योंकि वाच्य के भी सत्य होने का निश्चय अनुमान से ही होता है। जैसा कि कहा है— 'आस्तवादिविसंवादसामान्यादत्न चेद्नुमान्त' इति॥
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न चैतावतावाच्यस्य प्रतीतिरानुमानिकी किन्तु तद्गतस्य ततोऽधिकस्य सत्य-त्वस्य तद्व्यङ्ग्येऽपि भविष्यति । एतदाह—यथा चेत्यादिना । एतच्चाभ्युपगम्योक्तं न त्वनेन नः प्रयोजनमिति । काव्यविषये चेतिं । अप्रयोज-कत्वमिति । नहि तेन वाक्यानामग्निष्टोमादिप्रवर्तकत्वं सत्यार्थप्रवर्तकत्वान्वारेण प्रवर्तक-कत्वमिति । नहि तेन वाक्यवत् सत्यार्थप्रवर्तकत्वं प्रतीयते, प्रीतिमात्रपर्यवसायित्वात् । प्रीतिरेव चालौकिकचमत्कार-रूपया व्युत्पत्तौ हेतुः । एतच्चोक्तं वितत्य प्राक् । उपहासायैवेतिं । नायं सहृदयः केवलं शुष्कतकर्कर्कशहृदयः प्रतीति परामर्शड नालमित्येष उपहासः ।
(अनु०) ( प्रश्न) जब व्यङ्ग्य अर्थ की प्रतिपत्ति हो गई तब इसके सत्यत्व का निश्चय दूसरे प्रमाण अनुमान से ही किया जाता है इस प्रकार फिर भी यह अनुमानगम्य ही हुआ । ( उत्तर ) ऐसा नहीं । वाच्य के भी सत्यत्व का निश्चय अनुमान से किया जाता है । जैसा कि कहते हैं— 'यदि यहाँ पर आप्तवाद के अविसंवाद ( सत्यत्व ) रूप सामान्य हेतु से अनुमानता मानी जाय' इत्यादि । केवल इतने से ही वाच्य की प्रतीति आनुमानिकी नहीं हो जाती किन्तु उससे भी अधिक तद्गत सत्यत्व की ( प्रतीति अनुमानिकी हो जाती है । ) वह व्यङ्ग्य में भी हो जायगा । यह कहते हैं—'यथा च' इत्यादि के द्वारा । और यह स्वीकार करके कह दिया गया है, इससे हमारा कोई प्रयोजन तो है ही नहीं । 'और काव्य के विषय में' यह । 'अप्रयोजकत्व' यह । उन वाक्यों के समान सत्य अर्थ के प्रतिपादन के द्वारा प्रवर्तकत्व के लिये प्रमाण का अन्वेषण नहीं किया जाता क्योंकि वह प्रतीतिमात्रपर्यवसायी होता है और क्योंकि अलौकिक चमत्कार रूप प्रतीति ही व्युत्पत्ति का अङ्ग होती है । यह विस्तारपूर्वक पहले समझा दिया गया । 'उपहास के लिये हो' यह । उपहास यह है कि यह सहृदय नहीं है, केवल शुष्क तकों के उपक्रम के कारण कर्कश हृदयवाला है और प्रतीति का परामर्श करने में समर्थ नहीं है ।
तारावती—(प्रश्न) व्यङ्ग्य अर्थ को हम मान लेते हैं । किन्तु व्यङ्ग्य अर्थी ठीक है या नहीं इसके लिये तो हमें फिर भी अनुमान का ही सहारा लेना पड़ेगा । अनुमान से ही यह सिद्ध किया जायगा कि जो कुछ व्यक्त किया गया है वह सत्य है या नहीं । ऐसी दशा में जिस अनुमान से पीछा छुड़ाया था वह पुनः गले पड़ गया । वाक्य के अर्थ में तभी प्रामाणिकता आती है जब वह दूसरे प्रमाणों के मेल में ठीक बैठ जाय । अतः यह मान लेने पर भी प्रतिपाद्य व्यङ्ग्यार्थ लिङ्गी नहीं हो सकता यह तो अनिवार्य ही है कि व्यक्त अर्थ की सत्यता प्रमाणित करने के लिये उसे लिङ्गी ( साध्य ) बनाया जाय । इस अनुमान से आप कैसे पीछा छुड़ायेंगे ? ( उत्तर ) यह कोई अनुपपत्ति नहीं कही जा सकती । वाच्यार्थ के भी सत्यत्व की परीक्षा तो अनुमान से ही होगी । पहले वाक्यार्थबोध हो जायगा, तत्त्व संवदाक ( लौकिक
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तृतीय उद्योतः
आसवादिसंवादसामान्यादत्र चेदनुमानता । निर्णयस्तावता सिद्धचेदबुद्धयुपप्लवस्तत्र तत्कृता ॥ अन्यदेव हि सत्यस्वमाप्तवादस्वहेतुकम् । वाक्यार्थश्चिन्यान्य एवेति ज्ञातः पूर्वतरं ततः ॥ तत्र चेदाप्तवादेन सत्यस्वमनुमीयते । वाक्यार्थाप्रतिपत्तौ सत्यात्र कथमुमता ॥
सत्य से मेलखानेवाले ) अनुमान की प्रवृत्ति होगी । वाक्यार्थ शब्द का विषय और उसकी सत्यता अनुमान का विषय । जिस प्रकार वाक्य के विषय में प्रमाणान्तर का अनुमगमन करके उसके ठीक होने की परीक्षा की जाती है किन्तु उस प्रमाणान्तर की प्रवृत्ति से शब्दव्यापार की विषयता समाप्त नहीं हो जाती वैसे ही यहाँ पर भी व्यङ्ग्यार्थ की परीक्षा दूसरे प्रमाणों से करने पर भी उसकी शब्दविषयता समाप्त नहीं हो जाती । यही बात श्लोकवार्तिक की निम्नकारिकाओं में कही गई है- आसवादिसंवादसामान्यादत्र चेदनुमानता । निर्णयस्तावता सिद्धचेदबुद्धयुपप्लवस्तत्र तत्कृता ॥ अन्यदेव हि सत्यस्वमाप्तवादस्वहेतुकम् । वाक्यार्थश्चिन्यान्य एवेति ज्ञातः पूर्वतरं ततः ॥ तत्र चेदाप्तवादेन सत्यस्वमनुमीयते । वाक्यार्थाप्रतिपत्तौ सत्यात्र कथमुमता ॥ अर्थात् 'यदि कहा जाय कि वाक्यार्थबोध में अनुमान की प्रक्रिया लागू होती है और उसमें आप्तवाद को सत्यरूप में स्वीकार कर लिया जाना हो सामान्य हेतु होता है तो इस पर कहा जा सकता है कि उतने से अर्थ की सत्यता का निर्णय तो सिद्ध हो जाता है किन्तु वाक्यार्थ बुद्धि उस ( अनुमान ) के द्वारा उत्पन्न नहीं की जाती सत्यत्व और वस्तु है जिसमें आप्तवाद हेतु के रूप में आता है और वाक्यार्थी अन्य ही वस्तु है यह उसे बहुत पहले जाना जा चुका है अब उन दोनों और पृथक् वस्तुओं में यदि एक वस्तु सत्यत्व का आप्तवाद के द्वारा अनुमान किया जाता है तो यहाँ पर वाक्यार्थी प्रत्यय अनुमान के अन्तर्गत कैसे आयेगा ?' इन कारिकाओं का आशय यही है कि वाच्यार्थी में अनुमान का उपयोग न होता हो यह बात नहीं है । उसमें अनुमान का योग होता है और वह अनुमान वाच्यार्थी की अपेक्षा अधिक तथा उससे अतिरिक्त अंश सत्यत्व का साधक होता है । इतने से ही तो यह तो नहीं कहा जा सकता कि वाच्यार्थप्रतीति हो अनुमानिक हो गई । इसी प्रकार व्यङ्ग्यार्थप्रतीति अन्य वस्तु है और सङ्घटित सत्य की परीक्षा दूसरी वस्तु । सत्य की परीक्षा में अनुमान का उपयोग हो सकता है; किन्तु इतने से ही व्यङ्ग्यार्थ का अनुवाद अनुमान में नहीं हो सकता । आप के प्रश्न के उत्तर में यहाँ तक जो कुछ कहा गया है वह सब आपकी इस बात को मानकर कहा गया है कि व्यङ्ग्यार्थी की सत्यता की परीक्षा करने लिये अनुमान की आवश्यकता होती है । वास्तविकता तो यह है कि हम काव्य में व्यंजना पर विचार कर रहे हैं । अतः हमें इस बात की आवश्यकता ही नहीं कि हम व्यंजना के सत्यत्व-असत्यत्व को सिद्ध करने पर विचार करें । व्यङ्गयार्थ के सत्यत्व-असत्यत्व की परीक्षा तो लोक में होती है जहाँ उस वाक्य को लेकर उसके सत्यत्व के आधार पर जनसमूह की प्रवृत्ति निश्चित कार्य में हुवा करती है । उदाहरण के लिये 'अग्निष्टोमेन यजेत' वाक्य को लीजिये । इसमें अग्निष्टोम यज्ञ करने का आदेश दिया गया है । यदि अग्निष्टोम से यज्ञ करना वस्तुतः लाभकर है तथा सत्य भी है तब जो जनता की प्रवृत्ति उस ओर होगी, अन्यथा लोग उस आदेश को नहीं मानेंगे । अतः अग्निष्टोम के सत्यत्व की
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परীক্ষा के लिये दूसरे प्रमाणों का अन्वेषण उपयुक्त तथा आवश्यक होगा। इसके प्रतिकूल काव्यवाक्यों का उद्देश्य किसी कार्य का आदेश देना नहीं होता। उनका मन्तव्य होता है वेद्यान्तरसंस्पर्शशून्य आनन्दमात्र में अवस्थिति। जब परिशीलकों के अन्तःकरण अलौकिक चमत्काररूप आनन्द में ही पर्यवसित हो जाते हैं तब वह आनन्दात्मक सत्ता ही व्युत्पत्ति का आधार करनेवाली होती है। अर्थात् परिशीलकों का अन्तःकरण प्रतिपाद्य आनन्द भावना से एक रूप होकर जिस उपदेश को ग्रहण कर लेता है काव्य की वही व्युत्पत्ति कही जाती है। अत एवं काव्य में सत्यत्व-असत्यत्व की परीक्षा ही मिथ्या है। काव्य का सत्यत्व तो परिशीलकों की अन्तरात्मा को आनन्दमय बना देना ही है। अत एवं जो व्यक्ति काव्य के सत्यत्व की परीक्षा के लिये अनुमान का अन्वेषण करता है उसकी हँसी ही उड़ाई जाती है। हँसी की तो बात यहीं है कि जो व्यक्ति तर्क का सहारा लेकर काव्यानन्द का भी निरूपण करना चाहता है वह सहृदय नहीं कहा जा सकता। उसका हृदय शुष्क तर्कों के उपक्रम के कारण अत्यन्त करकश हो गया है। अत एवं वह काव्यानन्द की प्रतीति का परामर्श करने में समर्थ हो ही नहीं सकता। बस यहीं उपहास की बात है। अत एवं यह नहीं कहा जा सकता कि व्यङ्ग्यप्रतीति सर्वत्र लिङ्गी की प्रतीति ही होती है।
(ध्वन्योऽ) यर्थानुमेयरूपद्यर्थविषयं शब्दानां व्यङ्जकत्वं तद्वद्वानियतव्यवहार-स्थाप्रयोजकम्। आप्तु व्यङ्जकत्वलक्षणः शब्दार्थानां व्यापार औौत्पत्तिकशब्दार्थसम्बन्ध-वादिनाडप्यभ्युपगन्तव्य इति प्रदर्शयन्नर्थमुपयस्तत्। तद्वत् व्यङ्जकत्वं कदाचिल्लिङ्गलक्षणं शब्दानां वाचकत्वमवाचकत्वान्नैव सर्ववादिभिरभिप्रतिक्षेप्यमित्य-स्मभियंन्त आरङ्गः। तदेवं गुणवृत्तिवाचकत्वादियः शब्दप्रकारेर्यो नियमेनैव तावद्रलक्षणं व्यङ्जकत्वम्। तदन्तःपातिरेव वपि तस्य हेतावभिधीयमाने तद्विशेष्य ध्वनेनैतत् प्रकाशनं विप्रतिपत्तिनिरासाय सहृदयहृदयपत्त्ये वा तद्विध्यमानसन्नतिसन्धेय-मेव। न हि सामान्यमात्रलक्षणेनोपयोगिविवक्षालक्षणानां प्रतिक्षेपः न्याय्यः कर्तुम्। एवं हि सति सन्तापमात्रलक्षणे कृते सकलसदस्तुरक्षणानां पौनरुक्त्यप्रसङ्गः
विमतिविषयो य आसीनमनीषिणां सततं विवादितसतत्स्वः। ध्वनिसिद्धान्तः प्रकारः काव्यस्य व्युत्पादितः सोऽयम्॥१३३॥
(अनु०) और जो शब्दों का व्यञ्जकत्व अनुमेयरूप व्यङ्ग्यविषयक होता है वह ध्वनि व्यवहार का प्रयोजक नहीं होता। अपितु व्यञ्जकत्वमा रूपवाला शब्दों का व्यापार शब्दार्थ सम्बन्ध को औत्पत्तिक सहनेवाले के द्वारा भी स्वीकार किया जाना चाहिये यह दिखलाने के लिये प्रस्तुत किया गया है। वह वाचक और अवाचक दोनों प्रकार के शब्दों का व्यञ्जकत्व निस्सन्देह कभी लिङ्ग के रूप में कभी दूसरे रूप में सभी वादियों के द्वारा खण्डन नहीं किया जा सकता यह प्रदर्शित करने के लिये हमने यह यत्न प्रारम्भ किया है। वह इस प्रकार गुणवृत्ति और वाचकत्व इत्यादि शब्दप्रकारों से व्यङ्ग्यध्वन नियमपूर्वक ही विलक्षण होता है। हेतूपाधिक उस (ध्वनि) के उनमें अन्तःपातित्व के कहे जाने पर भी विप्रतिपत्ति का खण्डन
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करने के लिये अथवा सहृदयों की व्युत्पत्ति के लिये ध्वनिरूप जो उनकी विशेषताओं का प्रकाशन वह किये जाने पर उसका अनादर नहीं किया जाना चाहिये। सामान्य क्षणमात्र से ही उपयोगी विशेष लक्षणों का प्रतिपेध नहीं किया जा सकता। ऐसा करने पर निस्सन्देह सत्तामात्र का लक्षण कर देने पर समस्त वस्तु के लक्षणों की पुनरुक्ति का दोष होगा। अतः इस प्रकार—
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जो काव्य का ध्वनिनामक प्रकार मनीषियों के लिये अविदित के समान असहमति का विषय था, वह यह व्यक्त कर दिया गया ॥१३२॥
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नन्वेवं तहि मा भूद्यत्र व्यङ्ग्यक्तता तत्र तत्रानुमानत्वम्, यत्रानुमानत्वं तत्र तत्र व्यङ्ग्यत्वमिति कथंपुनर्नूयत इत्याशङ्क्याह— यत्रानुमेयेति। तद्व्यङ्ग्यत्वं न ध्वनिलक्षणमभिप्रायविप्रतिरिक्तविषयाव्यापारादिति भावः। नन्वभिप्रायविषयं यद्व्यङ्ग्यत्वमनुमानयोगक्षेमं तच्चेन्त प्रयोजकं ध्वनिव्यवहारस्य तहि किमर्थं तत्पूर्वमुपक्षिप्तमित्याशाङ्क्याह—अपि तुत्रति। एतदेव स्फुटिक्रिय तिरुपर्यवसित—न त्वोक्तिः। यत एव हि क्वचिदनुमानप्रतिपाद्यौ क्षण दीपालोकादौ क्वचित्कारेणवलेन गीतध्वन्यादौ क्वचिदभिधया विवक्षितान्यपरैः क्वचिद्गुणवृत्या अविवक्षितवाच्येनुगृहीताम्यां व्यङ्ग्यत्वं दृष्टं तत् एव तेभ्यः सर्वेभ्यो विलक्षणमस्य रूपं न सिद्ध्यति तदाह—तदेवमिति।
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(अनु०) (प्रश्न) तो फिर इस प्रकार जहाँ जहाँ व्यञ्जकता वहाँ वहाँ अनुमान यह न माना जाय इसको कैसे छिपाया जाय कि जहाँ जहाँ अनुमान होता है वहाँ वहाँ व्यञ्जकत्व होता है। यह शङ्का करके कह रहे हैं—‘जो कि अनुमेय’ इत्यादि। भाव यह है कि वह व्यञ्जकत्व ध्वनि का लक्षण नहीं है क्योंकि उससे अतिरिक्त विषय में उसका व्यापार नहीं होता। ( प्रश्न ) अभिप्रायविषयक जो व्यङ्गयत्व होता है और जिसका योगक्षेम अनुमान से ही एकरूप होता है यदि वह ध्वनिव्यवहार का प्रयोजन नहीं होता तो उसका पहले ही (प्रस्तुत क्यों किया ? यह शङ्का करके कहते हैं—‘अपितु’ इत्यादि। इसी को संक्षिप्त करके निरूपित करते हैं— ‘वह निस्सन्देह’ यह। क्योंकि कहीं अभिप्राय इत्यादि में अनुमान के द्वारा, कहीं दीपालोक
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इत्यादि में प्रत्यक्ष के द्वारा, कहीं गीतध्वनि इत्यादि में कारणत्व के द्वारा कहीं विवक्षितान्यपरवाच्य में अभिधा के द्वारा कहीं अविवक्षितवाच्य में गुणवृत्ति के द्वारा अनुगृहीत किया जाता हुआ व्यंजकत्व देखा गया है उसी से इसका रूप हमारे लिये उन सबसे विलक्षण सिद्ध होता है। वहीँ कहते हैं—‘वह इस प्रकार’ इत्यादि।
(प्रश्न) प्रसिद्ध अभिधा और गुणवृत्ति इत्यादि का रूपसंकोच क्यों किया जा रहा है? दूसरी सामग्री के उपन्यास से जो विशिष्ट रूप हो व्यंजकत्व कहा दिया जाय। यह आक्षेप करके कहते हैं—‘उसके अन्दर खाने से भी’ यह भाव यह है कि हम संज्ञानिवेशन आदि का निपेध नहीं कर रहे हैं। विप्रतिपत्ति का अर्थ है—उस प्रकार का विशेषतत्व (व्यंजनाव्यापार) नहीं है यह व्युत्पत्ति। व्युत्पत्ति का अर्थ है संशय और अज्ञान का निराकरण। ‘नहिं’ इत्यादि। उपयोगी विशेषों के जो लक्षण हैं उनका। उपयोगी शब्द से अनुपयोगी काकदन्त इत्यादि का निराकरण हो जाता है। ‘इस प्रकार निस्सन्देह’ इत्यादि। भाव यह है कि ‘तीन पदार्थों से सज्जीर्ण सत्ता’ इतने से ही द्रव्यगुणकर्मों के लक्षित होने से श्रुति स्मृति आयुर्वेद इत्यादि सभी लोकयात्रोपयोगी वस्तुओं का आरम्भ हो न हो। विमति-विषयता में हेतु बतलाते हैं—‘अविदितसतत्व’ यह। अतएव इसी क्षण से लेकर इस विषय में किसी की विमति नहीं है यह प्रतिपादन करने के लिये ही ‘था’ इस शब्द का प्रयोग किया गया।
तारावती—(प्रश्न) यदि आप व्यंजना को अनुमान रूप नहीं मानते और इस व्यासि को अंगीकार नहीं करते कि जहाँ जहाँ व्यंजना होती है वहाँ वहाँ अनुमान होता है तो जाने दीजिये। इसके विपरीत तो व्यापित बन ही सकती है कि जहाँ जहाँ अनुमान होता है वहाँ वहाँ व्यंजना होती है इस व्यापित को आप कैसे छिपा सकते हैं? यहाँ पर पूछनेवाले का आशय यह है कि हम इस बात को मान सकते हैं कि सब प्रकार की व्यंजना अनुमान नहीं कही जा सकती। किन्तु इस बात का तो प्रतिपादन ग्रन्थकार ने ही किया है कि शब्दों के अर्थ के अतिरिक्त वाक्यार्थ रूप जो वक्ता का अभिप्राय होता है वह अनुमानगम्य ही हुआ करता है। अतः यहाँ पर ऐसी व्यापित बनाई जा सकती है कि जहाँ जहाँ अभिप्राय रूप वाक्यार्थ में अनुमिति होती है वहाँ वहाँ व्यंजनव्यापार होता है अर्थात् वक्ता का अनुमितित अभिप्राय व्यंग्य ही होता है। यदि समस्त व्यंजना अनुमान नहीं हो सकती (क्योंकि प्रदीप इत्यादि बिना अनुमान के ही व्यंजक होते हैं) तो अनुमित अभिप्राय में व्यंजना का निपेध कौन करेगा? (उत्तर) (इस पर तो पहले ही विचार किया जा चुका है कि) शब्दों की जिस व्यंजकता से अभिप्रायरूप ऐसे वाक्यार्थ की अभिव्यक्ति होती है जो अनुमान का विषय बनने की क्षमता रखता है वैसी अभिव्यक्त ध्वनि को प्रयोजिका नहीं होती। कारण यह है कि उस प्रकार की व्यंजना का व्यापार अभिप्राय की अभिव्यक्ति तक ही सीमित रहता है। उसका प्रसार अभिप्राय से अतिरिक्त अन्य वस्तु, रस और अलङ्कार की व्यंजनाओं तक नहीं हो सकता। इस प्रकार अभिप्राय की व्यंजना में अव्याप्ति दोष आ जाता है और वह व्यंजना का पूरा रूप नहीं मानी जा सकती तथा वह ध्वनि की प्रयोजिका नहीं होती। (प्रश्न) यदि
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तृतीय उद्योतः
अभिप्रायविषयक व्यंजकता ध्वनि व्यवहार की प्रयोजिका नहीं होती तो फिर आपने इस ध्वनिनिरुपण के प्रकरण में उसका उल्लेख ही क्यों किया ? आपका उल्लेख करना ही यह सिद्ध करता है कि अभिप्रायव्यंजना भी ध्वनिसिद्धान्त की प्रयोजिका होती है । यह अभिप्रायव्यंजना अनुमान से गतार्थ हो जाती है क्योंकि इसका योगक्षेम अनुमान का जैसा ही होता है । इस प्रकार अनुमान और व्यंजकत्व का व्याङ्ग्य-व्यापक भाव मानना अनिवार्य हो जाता है । इसका समाधान आपके पास है ? (उत्तर) हमने जो पिछले प्रकरण में अभिप्राय व्यंजना का उल्लेख किया है उससे यह कभी सिद्ध नहीं होता कि अभिप्राय व्यंजना ध्वनितत्त्व की प्रयोजिका होती है । अभिप्राय व्यंजना के उल्लेख का मंतव्य केवल इतना ही है कि वहाँ पर व्यंजना सिद्ध की जा रही थी और मैं यह दिखलाना चाहता था कि व्यंजना के सिद्धान्त को वे लोग भी अस्वीकार नहीं कर सकते जो लोग शब्द और अर्थ के सम्बन्ध को नित्य नहीं मानते अपितु औत्पत्तिक मानते हैं । इस प्रकरण के प्रारम्भ करने का मेरा मन्तव्य यही है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी सिद्धान्त का माननेवाला क्यों न हो यह व्यंजना तो उसे माननी ही पड़ेगी, चाहे वह लिङ्ग और लिङ्गी (हेतु और साध्य) के रूप में माने या किसी और रूप में । वाचक शब्दों में भी व्यंजना होती हैं और अवाचक शब्दों में भी । यह व्यंजना कहीं अनुमान के रूप में प्रकाशित होती है जैसे अभिप्राय की व्यंजना में (इस व्यंजना को मानने के लिये नैय्यायिक बाध्य हैं ।) कहीं प्रत्यक्ष के द्वारा व्यंजना होती है जैसे दीपोपालक वस्तुओं की व्यंजना करता है । कहीं कारण के रूप में व्यंजना होती है जैसे गीतध्वनि इत्यादि में रस की कारणता विद्यमान है । कहीं व्यंजना में अभिधा से अनुप्रहीत होती है जैसे विशिष्टानन्यपरवाच्य ध्वनि में अभिधामूलक व्यंजना होती है । कहीं गुणवृत्ति के द्वारा व्यंजना अनुप्रहीत होती है जैसे अविवक्षितवाच्य ध्वनि में लक्षणामूलक व्यंजना हुआ करती है । इस प्रकार अनुमान, प्रत्यक्ष, कारणता, अभिधा और लक्षणा ये सब व्यंजना के अनुप्राहक ही होते हैं । इससे यह सिद्ध हो गया कि व्यंजना नियम से सबका रूप नहीं अपितु इन सबसे विलक्षण होती है ।
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तृतीय उद्योतः
(प्रश्न) व्यंजना में अभिधाव्यापार गुणवृत्ति इत्यादि तो रह ही करते हैं । ये तत्त्व प्रसिद्ध ही हैं । इनका अपलाप किया ही नहीं जा सकता । आपने एक दूसरी वस्तु की ओर कल्पना कर ली और उसका नाम व्यंजना रख लिया । इस कल्पित वस्तु से प्रसिद्ध अभिधा इत्यादि व्यापारों के रूपसदृशोच की क्या आवश्यकता ? उचित तो यह है कि स्वयं व्यंजना की यह परिभाषा कर दीजिये कि अभिधा और गुणवृत्ति ही दूसरी सामग्री के आ पड़ने से जो विशिष्ट रूप धारण कर लेती हैं वही व्यंजना है । यह व्यंजना और कुछ नहीं विशेष प्रकार को अभिधा और विशेष प्रकार की गुणवृत्ति ही है । अपने ही विशिष्ट प्रकार के द्वारा किसी एक वस्तु का रूपसदृशोच कैसे किया जा सकता है ? ( उत्तर ) यदि आप हठपूर्वक हमारी बतलाई हुई वस्तु (व्यंजना) को दूसरी संज्ञा विशिष्ट अभिधा और विशिष्ट व्यंजना ही रखना चाहते हैं तो हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं । आप उसका यही नामकरण कर लीजिये । विप्रतिपत्ति तो वस्तुतः किसी तत्त्व के विषय में होती है । क्योंकि विप्रतिपत्ति शब्द का अर्थ है विरुद्ध प्रतिपत्ति या किसी तत्त्व के विषय में यह कहना कि जो विशेष बतलाया जा रहा है
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३७६ ध्वन्यालोके वह नहीं है । यही विप्रतिपत्ति शब्द का अर्थ है । जब आप उस तत्व को मानते ही हैं तब उस विषय में जो भी विरोध उत्पन्न होंगे उनका निराकरण करने के लिये आपको उसकी व्याख्या करनी ही होगी फिर आप नाम उसे जो चाहे जो दें । दूसरी बात यह है कि यदि आप उस तत्व को मानते हैं तो सहृदयों की भ्युत्पत्ति के लिये भी आपको उसकी व्याख्या करनी ही होगी । भ्युत्पत्ति का अर्थ है सन्देह और अज्ञान का निराकरण । सहृदयों को उस तत्व के विषय में सन्देह भी हो सकता है और उसके विषय में उनमें अज्ञान भी हो सकता है । उसका निराकरण तो आवश्यक है ही । इस प्रकार आप उस विशिष्ट तत्व को छलपूर्वक छिपा नहीं सकते और न आपको उसका विरोध ही करना चाहिये । आप यह भी नहीं कह सकते जब व्यंजना विशिष्ट प्रकार की अभिधा या विशिष्ट प्रकार को गुणवृत्ति ही है तब अभिधा और गुणवृत्ति का सामान्य लक्षण कर देने भर से वह विशिष्ट तत्व भी गत्यर्थ हो जायगा; उसकी पृथक् व्याख्या करने की क्या आवश्यकता? जब सामान्य का लक्षण बना दिया जाता है तब उस सामान्य के अन्दर बहुत से उपयोगी विशेष तत्व रह जाते हैं; उन तत्वों का लक्षण बनाना भी आवश्यक हो होता है । यह नहीं कहा जा सकता कि सामान्य का लक्षण बना देने के बाद विशेषों का लक्षण बनाना व्यर्थ होता है । हाँ यदि अनुपयोगी काकदन्त जैसी कोई वस्तु हो तो उसका लक्षण बनाना व्यर्थ भी हो सकता है । उदाहरण के लिये वैशेषिक दर्शन में पहले तो सातों पदार्थों और उनके अवान्तर भेदों का परिगणन किया गया; उसके बाद 'सदनित्यं...' इत्यादि सूत्र के द्वारा यह बतलाया गया कि द्रव्य, गुण और कर्म ये तीन पदार्थ सत्तावाले अनित्य इत्यादि होते हैं । सत्ता का होना इत्यादि सामान्य के लक्षण हैं । यदि कहो कि सामान्य के लक्षण बना देने के बाद विशेष के कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती तो फिर द्रव्य इत्यादि के अवान्तर भेदों के लक्षण हो व्यर्थ हो जायँ और श्रुति स्मृति आयुर्वेद धनुर्वेद इत्यादि जो तत्व समस्त लोकजीवन के लिये उपयोगी हैं उनका तो प्रारम्भ ही न हो । अतः यह नहीं कहा जा सकता कि सामान्य लक्षण बना देने के बाद विशेष का लक्षण बनाना व्यर्थ हो जाता है । अतएव सामान्य अभिधा और गुणवृत्ति का लक्षण बना देने पर भी उसमें विशिष्ट रूप से रहनेवाली व्यञ्जना की व्याख्या निरर्थक नहीं कही जा सकती । इस प्रकार—
'काव्य का' यह प्रकार ध्वनि के नाम से प्रसिद्ध है । अर्वाचीन विद्वानों की असहमति का यह इतना अधिक विषय था मानो यह लोगों को विदित ही न हो ।' यह यहाँ पर ।
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अविदित होने के समान होना असहमति का हेतु है । यहाँ पर 'आसीत्' इस भूतकाल की क्रिया का प्रयोग किया गया है । इसका आशय यह है कि अब जब कि मैंने बहुत ही साङ्गोपाङ्ग रूप में ध्वनि का विवेचन कर दिया है यह ध्वनि सिद्धान्त का विरोध इसी क्षण से अतीत की वस्तु बन गया । ( अब इसका विरोध करने का साहस किसको भी न होगा ) ।३३१।
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यत्र व्यङ्गच्याऽन्वये वाच्यचमत्कृतवं स्यात्प्रकार्षवत् । व्यङ्गच्योदर्थों ललनालावण्यप्रख्यो यः प्रतिपादितस्तस्य प्राधान्चे ध्वनि-रित्युक्तम् । तस्य तु गुणीभावेन वाच्यचमत्कृतवप्रकर्षे गुणीभूतव्यङ्गच्यो नाम काव्यप्रभेदः प्रकाश्येत । तत्र वस्तुमात्रस्य व्यङ्गच्यस्य तिरस्कृतवाच्याभ्यः प्रतीमानस्य कदाचिच्छृङ्खलारूपवाक्यार्थोपक्षयैः गुणीभावे सति गुणीभूतव्यङ्गच्यता ।
(अनु०) 'काव्य का दूसरा प्रकार गुणीभूतव्यङ्गच्य नामक दिखलाई देता है जिसमें रसादि के साथ अन्वय करने में वाच्चचारुत्व अधिक प्रकृष्ट हो जाय' ॥३४॥ जैसे ललनालावण्य के समान जो व्यङ्गच्य अर्थ पहले प्रतिपादित किया गया था उसकी प्रधानता होने पर 'ध्वनि' यह कहा गया । उसके गौण हो जाने से वाच्चचारुत्व के प्रकर्ष में गुणीभूतव्यङ्गच्य नाम का काव्यप्रभेद प्रकल्पित किया जाता है । उसमें तिरस्कृतवाच्य (शब्दों) के द्वारा प्रतीत होनेवाले वस्तुमात्र व्यङ्गच्य के वाच्च्यरूप वाक्यार्थ की अपेक्षा गुणीभाव हो जाने पर गुणीभूतव्यङ्गच्यचता होती है । (लो०) एवं यावद्व्यनेरात्मीयं रूपं भेदोपभेदसहितं यच्च व्यञ्जकभेदमुखेन रूपं तत्सर्वं प्रतिपाद्य प्राणतों व्यङ्गच्यव्यञ्जकभावविमर्शप्रश्नपट्टिकेन शिष्यबुद्धिं विशोधयितुं यितुं व्यञ्जकवादस्थानं रचितमिति ध्वननं प्रति यदुक्तं तदुकमेव । अधुना तु गुणी-भूतोऽप्ययं व्यङ्गच्यः कविभिः पवित्र्यते—इत्यमुना प्रकारेण तस्यैवासक्तत्वं समर्थयितुमाह—प्रकार इति । व्यङ्गच्येनान्वयो वाच्च्यस्योपस्कार इत्यर्थः । प्रतिपादित इति । 'प्रतीमानं पुनर्न्यदेव' इत्यत्र । उक्तमिति । 'यत्रार्थः शब्दो वा' इत्यात्रे व्यङ्गच्यं च वस्त्वादि-त्रयं तत्र वस्तुनो व्यङ्गच्यस्य ये भेदा उक्तास्तेथां क्रमेण गुणभावं दर्शयति—तत्रेति ।
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तृतीय उद्योतः
(अनु०) इस प्रकार भेदोपभेदों के सहित ध्वनि के समस्त आत्मभेद और जो व्यञ्जक भेद के द्वारा रूप उस सबका प्रतिपादन कर (ध्वनि के) प्राणरूप में स्थित व्यङ्गच्य-व्यञ्जकभाव को एक प्रघट्टक में ही शिष्यबुद्धि में निविष्ट करने के लिये व्यञ्जक के वादस्थान की रचना कर दी गई। इस प्रकार ध्वनि के विषय में जो कहना था वह कह ही दिया । अब तो गुणीभूत भी यह व्यङ्गच्य कविवाणियों को पवित्र करता है इसके द्वारा उसी के आत्मत्व का समर्थन करने के लिये कहते हैं—'प्रकार…' इत्यादि । व्यङ्गच्य के साथ अन्वय अर्थात् वाच्य का उपस्कार । 'प्रतिपादन किया गया' यह । 'प्रतीमानं पुनर्न्यदेव' इस कारिका में । 'कहा गया यह । 'यत्रार्थः शब्दो वा' इसके अन्दर । व्यङ्गच्य तो वस्तु इत्यादि तीन होते हैं, उसमें व्यङ्गच्यवस्तु के जो भेद बतलाये गये थे उनका क्रमशः गुणीभाव दिखलाते हैं—'वहाँ पर' यह ।
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गुणीभूत व्यङ्गच्य
धारावती—ध्वनि के विषय में जो कुछ कहना था वह सब यहाँ तक कह दिया गया । ध्वनि के विषय में सम्भावित वमत्य, ध्वनि का स्वरूप, भेदों का निराकरण, व्यङ्गच्य की दृष्टि से ध्वनि के भेदोपभेद और व्यञ्जक की दृष्टि से ध्वनि के भेद तथा उनके स्वरूप इन सब विषयों पर तो प्रकाश डाला ही गया, साथ ही ध्वनि का 'प्राणतस्व व्यञ्जनाव्यापार है । यह समझकर
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व्यंजना के विषय में बादविवाद उठाया गया और एक प्रष्ट्रक में ही शिष्यगण व्यंजना का ठीक रूप समझ सकें इसके लिये अनेक पक्षों के द्वारा व्यंजना की सत्ता सिद्ध कर दी गई। अब ध्वनि का जहाँ तक सम्बन्ध है कुछ कहने को शेष नहीं रहा। इस विषय में जो कुछ कहना था वह सब कह दिया। यह व्यंजनातत्व इतना महत्त्वपूर्ण है कि यदि कविगण इसका आश्रय लेकर इसे मुख्यरूप में निवद्ध कर सकें और इसे ध्वनि के प्रतिष्ठित पद पर आसीन कर सकें तब तो कुछ कहना ही नहीं; यदि वे इसका सहारा लेते हैं और इसको मुख्य नहीं बना पाते गौणरूप में निवद्ध करके ही छोड़ देते तब भी व्यंग्यार्थ काव्यवाणी को पवित्र कर ही देता है। अत एव इस तत्व को काव्य में प्रमुखरूपता और काव्य की आत्मरूपता प्राप्त होनी ही चाहिये।
परिचय
चौंतीसवीं कारिका में गुणीभूतव्यङ्ग्य की परिभाषा दी गई है। इसका आशय यही है कि गुणीभूतव्यङ्ग्य भी जब इतना महत्त्वपूर्ण होता है तब प्रधानीभूत व्यङ्ग्य पर आधृत ध्वनि का तो कहना ही क्या? कारिका का अर्थ यह है जहाँ व्यङ्ग्यार्थ स्वयं प्रधानीभूत नहीं होता किन्तु उसका वाच्य के साथ अन्वय हो जाता है और व्यङ्ग्यार्थ की अपेक्षा वाक्यार्थ में ही चारुता का उत्कर्ष होता है, उसे गुणीभूत व्यङ्ग्य कहते हैं। यह भी काव्य का एक दूसरा प्रकार है और यह भी कविवाणी में प्रायः दृष्टिगोचर करता है। प्रथम उदाहरण में यह बतलाया जा चुका है कि जिस प्रकार औष्ण नाक-कान इत्यादि अङ्गसंस्थान में सम्मिलित न हो सकनेवाला ललनाओं का लावण्य एक पृथक् ही वस्तु है जो समस्त अङ्गसंस्थान को आध्यायित किया करता है उसी प्रकार वाच्य अर्थों में सन्निविष्ट न हो सकने वाला व्यङ्ग्यार्थी एक पृथक् ही वस्तु है जो वाच्यार्थ की अपेक्षा अधिक उत्कृष्टता को प्राप्त होकर ध्वनि का रूप धारण कर लेता है। यदि वही व्यङ्ग्यार्थी वाच्यार्थ के साथ अन्वित हो जाय और व्यङ्ग्यार्थी की अपेक्षा वाच्यार्थ में चारुता का अधिक प्रकर हो तो व्यङ्ग्यार्थी गुणीभूत हो जाता है जिससे इसका नाम गुणीभूत व्यङ्ग्य पड़ जाता है, यह काव्य का एक दूसरा ही भेद मान लिया जाता है। वाच्य के साथ व्यङ्ग्य का अन्वय होने का आशय यह है कि व्यङ्ग्य वाच्य का उपस्कार कर देता है और इस प्रकार उसका गुण बन जाता है। इसीलिये इसे गुणीभूत कहने लगते हैं
लावण्यसिन्धुपरिप्लवै हि केयमत्र यत्रोपलानि शशिना सह सम्प्लवन्ते । उन्मज्जति द्विरदकुम्भटी च यत्र यत्रापरे कदलिका-ण्डमृणालदण्डा: ॥
अत्र सिन्धुशब्देन परिपूणर्ता, उत्पलशब्देन कटाक्षच्छटा:, शशिशब्देन वदनं, द्विरदकुम्भतटीशब्देन स्तनयुगलं, कदलिका-ण्डशब्देन दोरयुग्ममिति ध्वन्यते। तत्र चैषां स्वार्थस्य
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तृतीय उद्योतः
सर्वथानुपपत्ते रन्ध्रशब्दोक्तेन न्यायेन तिरस्कृतवाच्यत्वम्। स च प्रतीममानोड्यर्थ-विशेष: 'अपरैव हि केयं' इत्युक्तिगर्भीकृते वाच्येऽशो चारुत्वच्छायां विधत्ते, वाच्यस्यैव स्वात्मोन्मज्जनया निमज्जनव्युदासतस्य सुन्दरत्वेनावभानात्। सुन्दरत्वं चास्या-सम्भाव्यमानसमागमसकल्लोकसारभूतकुलयादिभाववर्गस्य अतिसुभगैकाधीकरण-वित्रान्तिलब्धसमुच्चयतया विस्मयविभावताप्राप्तिपुरस्कारेण व्यङ्गच्यार्थोपस्कृतस्य तथा विचित्रस्यैव वाच्यरूपोन्मज्जनेनाभिलाषादिविभावस्ववात्। अत एव यत् यद्यपि वाच्यस्य प्राधान्यं तथापि रसध्वनौ तस्यापि गुणतैति सर्वस्य गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य प्रकारे मन्तव्यम्। अत एव ध्वनेरेवात्मत्वमित्युक्तचरं बहुशः।
अनये तु जलक्रीडातर्णीतरुणीजलावण्यसुन्दरीकृतनदीविषये येमुक्तिरिति सहदया:। तत्प्रतिप चोक्तप्रकारैव योजना। यदि वा नदीसचिव्धौ स्तनावतीर्णयुवति-विषया। सर्वथा तावदिस्मयमुखेनेतिप्रकाराद्गुणता व्यङ्ग्यस्य। (अनु.) 'लावण्य' इत्यादि। किसी तरह की यह अभिलाषा और विस्मय से गर्भित उक्ति है। यहाँ सिन्धु शब्द से परिपूर्णता, उत्पल शब्द से कटाक्ष की शोभा, शशि शब्द से मुख, हिरणकस्मटट्टी शब्द से दो स्तन, कदली काण्ड शब्द से दोनों ऊरु और मृणाल दण्ड शब्द से दोनों वाँहीं ध्वनित होती हैं। यहाँ इन शब्दों की स्वार्थ अनुपपत्ति के कारण अन्ध-शब्द में बतलाये हुये न्याय से तिरस्कार वाच्यत्व होता है। वह प्रतीयमान भी अर्थ विशेष 'यह दूसरी कौन है' इस उक्ति के गर्भीकृतवाच्य के अंश में चाहता की छाया का आधान करता है क्योंकि व्यङ्गच्य समूह को नियन्चितकर वाच्य ही अपनी आत्मा को ऊपर उठाकर सुन्दर रूप में अवभासित होता है। कुलय इत्यादि वस्तुसमूह (सौन्दर्य में) समस्त लोक का सार-रूप है, उनका एक साथ में समागम सर्वथा असम्भावित है, किन्तु अत्यन्त मनोरम (स्त्रीरूप) एक अधिकरण को प्राप्तकर उसमें विश्रान्त होने के कारण वह समुच्चयरूप में स्थित हो गया है। इससे पहले तो उसको विस्मय की विभावरूपता प्राप्त हो जाती है। फिर व्यङ्ग्य अर्थ से उपस्कृत उस प्रकार विभावतरूप को ही वाच्यरूप में उन्मज्जित होने से अभिलाषा इत्यादि की विभावरूपता प्राप्त हो जाती है जिससे उसमें सुन्दरता आ जाती है। अत एव यद्यपि इतने तक तो वाच्य की प्राधान्यता है तथापि रसध्वनि में उसको भी गौणरूपता प्राप्त हो जाती है। यह बात सभी गुणीभूतव्यङ्गच्यों के प्रकार में मानी जानी चाहिये। इसीलिये बहुशः यह बात कही गई है कि ध्वनि को ही आत्मत्व प्राप्त होता है।
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दूसरे सहदय तो कहते हैं कि जलक्रीडा के लिये अवतीर्ण तरुणीजल के लावण्यद्रव से सुन्दर बनाई हुई नदी के विषय में यह उक्ति है, उसमें भी उक्त प्रकार की ही योजना की जानी चाहिये। अथवा नदी के निकट स्नान के लिये युवतियों के विषय में यह उक्ति है। सब प्रकार से विस्मय के द्वारा इतना होने के कारण व्यङ्गच्य को गुणीभाव प्राप्त होता है।
तारावती—अब यहाँ पर यह दिखलाया जा रहा है कि व्यङ्ग्य के जितने भी भेद बतलाये गये हैं वे सब गुणीभूत हो जाते हैं। व्यङ्ग्य तीन प्रकार का होता है—वस्तु, अलङ्कार और रस। वस्तु व्यञ्जना वो प्रकार की होती है अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य।
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अविवक्षितवाच्य दो प्रकार का होता है अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य और अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य । सर्वप्रथम अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य को लीजिये—इसमें तिरस्कृत वाच्यों के द्वारा प्रतीतिगोचर होनेवाले व्यंग्यार्थी वस्तु का कदाचित् वाच्यार्थ की अपेक्षा गुणीभाव हो जाता है। जैसे—कोई तरुण किसी नायिका तरुणी के सौन्दर्य पर रीझ कर अभिलाषा और विस्मय के साथ कह रहा है—
'यह कोई विचित्र प्रकार की एक भिन्न ही नदी दृगितगत हो रही है, नदी जल से परिपूर्ण होती है यह लावण्य से भरी हुई हैं, इसमें चन्द्रमा के साथ कमल तैर रहे हैं, इसमें हाथी की कम्भटटी कुरर को उठ रही है और इसमें मृणाल दण्ड दिखाई पड़ रहे हैं।' यहाँ सिन्धु (नदी) की उपमा से व्यक्त होता है कि नायिका लावण्य से परिपूर्ण है (सिन्धु समुद्र को भी कहते हैं ओर विशाल नदी को भी ।) चन्द्रमा से मुख और कमलों से कटाक्ष की शोभा अभिव्यक्त होती है । चन्द्रमा और कमल साथ-साथ तैर रहे हैं। इस कथन से व्यक्त होता है कि नायिका के कटाक्ष तथा मुख दोनों चञ्चल हैं । मुख की चञ्चलता नायिका की विलास-चेष्टाओं को अभिव्यक्त करती है । हाथी के कुम्भटट से दोनों स्तनों के विस्तार का, कदली स्तम्भों से दोनों ऊरुओं का और मृणाल दण्डों से दोनों भुजाओं का अभिव्यञ्जन होता है । यहाँ पर वाच्यार्थ यही है कि यह लावण्य की नदी है, इसमें कमल और चन्द्र साथ साथ तैर रहे हैं, हाथी का मस्तकटट उठता हुआ दिखाई देता है और इसमें कदली स्तम्भ तथा मृणाल दण्ड पड़े हुए हैं। यह वाच्यार्थ वाधित है क्योंकि नदी जल-परिपूर्ण होती है लावण्य से भरी हुई नहीं; नदी में चन्द्र और कमल साथ-साथ तैर ही नहीं सकते और न लावण्य के प्रवाह में हाथी का मस्तक कदली स्तम्भ और मृणालदण्ड ही दृष्टिगत हो सकते हैं । अत एव जिस प्रकार 'निःश्वासासाम्य इवादर्शः' में दर्पण को अनन्धा कहने में उसका अर्थ एकदम तिरस्कृत हो जाता है उसी प्रकार यहाँ पर भी चन्द्र, कमल इत्यादि शब्दों का वाच्यार्थ सर्वथा तिरस्कृत हो जाता है । अत एव यहाँ पर मुख कटाक्ष इत्यादि के सौन्दर्य की जो प्रतीति होती है वह अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य व्यञजना कही जायेगी । 'यह कोई दूसरी ही कौन नदी है अर्थात् यह किस प्रकार की नदी है यह समझ में नहीं आता ।' इस उक्ति में जो वाच्यांश है, वह व्यंग्यार्थ उसी में वाच्यचारुता की प्रतीति में हेतुभूत शोभा का आधान करता है । 'इसमें लावण्य भरा हुआ है' 'इसका मुख चन्द्रमा के समान सुन्दर है' 'इसके कटाक्ष कमलों के समान सुन्दर हैं' इत्यादि व्यंग्यार्थी नीचा पड़ जाता है और वाच्यार्थ 'लावण्य-नदी में चन्द्रमा और कमल साथ-साथ तैर रहे हैं' में अधिक चमत्कार की प्रतीति होती है । इस प्रकार वाच्यार्थ व्यंग्यार्थ को दबाकर अपनी आत्मा को ऊपर उठा देता है और उसी में चाक्ष्ता का प्रतिबिम्ब होता है । वाच्यार्थ में सुन्दरता यही है कि चन्द्र और कमल ये दोनों तत्त्व संसार में सुन्दरता का सार माने जाते हैं । किन्तु ये दोनों एकसाथ न तो कहीं रहते हैं और न इनके रहने की सम्भावना ही की जा सकती है । किन्तु उनको एक अद्वितीय रमणीय नायिका का शरीर प्राप्त हो गया है जिससे वे अपने नैसगिक विरोध को छोड़कर एक साथ दृष्टिगत होने लगे हैं । इन दोनों का एकसाथ दृष्टिगत होना विस्मय का विभाव बन गया है । यह विस्मय की विभावरूपता पहले वाति हैं, फिर व्यंग्यार्थ की अभिव्यक्ति होती है जिससे नायिका के मुख नेत्र इत्यादि का सौन्दर्यबोध होता है । वह विस्मय को
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उत्पन्न करनेवाला विचित्र तत्त्व ही वाच्य से उपस्कृत हो जाता है। अर्थात् कवलय और चन्द्र इत्यादि का एक साथ होना एक विचित्र वाच्यत्व है, उसमें नायिका के मुख नेत्र इत्यादि के सौन्दर्य का समावेश हो जाता है। इस प्रकार व्यंग्यार्थ वाच्यार्थ का ही उपकार करता है और वाच्यार्थ ऊपर उठा हुआ दिखाई देने लगता है जिससे हम कटाक्ष, बदन इत्यादि को कुवुलय और चन्द्र इत्यादि के रूप में देखने लगते हैं। तब नायिका का मुखचन्द्र तथा नेत्रकमल इत्यादि अभिलाषा का विभाव बन जाते हैं। यही वाच्य की सुन्दरता का आशय है और इसीलिये व्यंग्य को केवल उपस्कारक और वाच्य का प्रधान माना गया है। इस प्रकार वाक्य की अपेक्षा गौण बनकर व्यंग्य गुणीभूत हो जाता है। किन्तु यहाँ यह ध्यान रखना चाहिये कि वाच्य की प्रधानता इतने ही अंश में है कि वाच्य विस्मय का विभाव बनकर और व्यंग्य से उपस्कृत होकर अभिलाषा का विभाव बन जाता है। इसके बाद जो नायक की रीति अभिव्यक्त होकर शृंगाररस के रूप में ध्वनित होती है उसके प्रति तो यह वाच्य गौण बन जाता है। रसध्वनि ही प्रधान हो जाती है। जहाँ कहीं गुणीभूत व्यंग्यार्थ होता है वहाँ सर्वत्र यही दशा होती है कि पहले एक व्यंग्यार्थ वाच्य की अपेक्षा गौण होता है; फिर वह वाच्यार्थ रसध्वनि में आत्मसमर्पण कर देता है और पर्यवसान रसध्वनि में ही होता है। यही कारण है कि सामान्य व्यंजना को काव्य की आत्मा नहीं माना गया है। अपितु अनेक बार यह कहा गया है कि काव्य की आत्मा ध्वनि ही होती है। कुछ लोगों ने इस पद्य का अवतरण इस प्रकार लगाया है कि युवतियों का समूह जलक्रीडा के लिये किसी सरोवर में उतरा है जिससे सुन्दरियों के लावण्यरूप द्रव से नदी अधिक सुन्दर बन गई है। उस नदी का ही इस पद्य में वर्णन किया गया है। इस अवतरण में भी इसी प्रकार की योजना करनी चाहिये। (नदी का वर्णन मानने में 'लावण्यसिन्धु' का अर्थ करना पडेगा लावण्य से परिपूर्ण नदी अथवा लावण्य के कारण सुन्दरता को प्राप्त नदी। उत्पल इत्यादि शब्दों में तो पहले की बतलाई हुई परिपाटी ही लागू होगी, उसमें उसी प्रकार व्यंजनायें मानी जावेंगी। किन्तु इस व्याख्या में यह दोष है कि एक तो शृंग्य का वर्णन प्रधान हो जाता है नायिका का नहीं। दूसरी बात यह है कुवुलय और चन्द्र दोनों का एक में आना भी सिद्ध नहीं होता जो विस्मय का विभाव है। इस व्याख्या से सहृदय व्यक्ति का सरोवर की ओर आकृष्ट होना सिद्ध होता है नायिका की ओर नहीं, अतः वाच्य अभिलाषा का विभाव भी नहीं बनता। अतः यह व्याख्या त्याज्य है)। अथवा नायिका नदी के निष्कट स्नान करने के लिये अवतीर्ण हुई है, उस नायिका का वर्णन ही प्रस्तुत पद्य में किया गया है। चाहे कोई व्याख्या क्यों न की जाय चमत्कारात्मक व्यापार विस्मय के द्वारा ही होता है, जोकि वाच्य के द्वारा अधिगत होता है। इसीलिये प्रत्येक पक्ष में व्यंग्य को गुणीभूत हो मानना पडता है।
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(ध्वन्यालो०) अत्रासक्तवाच्येऽप्यङ्गोऽपि शब्देऽभ्यः प्रत्यमानस्य व्यङ्ग्यस्य कदाचिद्वाच्यप्राधान्येन काव्यचारुत्वापेक्षया गुणोभावे सति गुणीभूतव्यङ्ग्यता, यथोदाहृतम्-- 'अनुरागवतो सन्ध्या' इत्येवमादि। तस्मैव स्वयमुक्त्या प्रकाशितत्वेन गुणीभावः, यथोदाहृतम्-- 'सड्केतकलमनसम्' इत्यादि। रसादिरूपव्यङ्ग्यस्य गुणीभावो रसवद्-
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लङ्कारे दर्शितः; तत्र च तेषामाधिकारिकवाच्यापेक्षया गुणीभावो विवहनप्रवृत्तभूत्यानुयायिराजवत् । व्यङ्गयालङ्कारस्य गुणीभावो दीपकादिविषयः ।
(अनु०) अतिरसक्तवाच्य के शब्दों से भी प्रतीमान व्यङ्गच की कदाचित् वाच्यचारुत्व की अपेक्षा गुणीभाव हो जानेपर गुणीभूतव्यङ्ग्यता हो जाती है, जैसे उदाहरण दिये हुये— 'अनुरागवती सन्ध्या' इत्यादि में । उसी का अपनी उक्ति से प्रकाशित होने के कारण गुणीभाव जैसे उदाहरण दिये हुये 'सङ्केतकालमनसम्' इत्यादि में । रसादिरूप व्यङ्गच का गुणीभाव रसवदलङ्कार में दिखलाया गया; और उसमें उनका अधिकारिक वाच्य की अपेक्षा गुणीभाव विवाह में प्रवृत्त भृत्य के अनुयायी राजा के समान होता है । व्यङ्गच अलङ्कार के गुणीभाव में दीपक इत्यादि का विषय होता है । (लो०) उदाहरणमिति । एतच्च प्रथमोद्योत एव निरुपितम् । अनुरागशब्दस्य चाभिलाषे तदुपरक्तत्वलक्षणया लावण्यशब्दवत् प्रवृत्तितिरसकृतवाच्यत्वमुक्तम् । तस्यैवति । वस्तुमात्रस्य । रसादीनि भावादयः रसवच्छब्देन प्रेयस्वप्रभृतयोलङ्कृड्ढारा उपलक्षिताः । नन्वर्थ प्रधानभूतस्य रसादेः कथम् गुणीभावः ? वा कथमचारुत्वं न स्यादित्याशङ्कच प्रत्युत सुन्दरता भवतीति प्रसिद्धदृष्टान्तमुखेन दर्शयति—तत्र चेति । रसवदालङ्कारविषये । एवं वस्तुनो रसादेश्च गुणीभावं प्रदर्श्यालङ्कारात्मनोऽपि तृतीयस्य व्यङ्ग्यप्रकारस्य तं दर्शयति—व्यङ्गयालङ्कारस्येति । उपमादेः ।१३४।। (अनु०) 'उदाहरण दिया गया' यह । यह तो प्रथम उद्योत में ही निरुपित कर दिया गया। और अनुराग शब्द की उसके उपरक्तत्व की लक्षणा से अभिलाष में लावण्य शब्द के समान प्रवृत्ति होती है इस अभिप्राय से अतिरसक्तवाच्यत्व कह दिया गया । 'उसी का' यह । वस्तुमात्र का । 'रसादि' यह । आदि शब्द से भाव इत्यादि और रसवत् शब्द से प्रेयस्वी इत्यादि अलंकार उपलक्षित होते हैं । (प्रश्न) अत्यन्त प्रधानभूत रस इत्यादि का गुणीभाव कैसे होता है ? अथवा गुणीभाव होनेपर अचारुत्व क्यों न हो ? यह शङ्का करके प्रसिद्ध दृष्टान्त के द्वारा दिखलाते हैं—'और बहां पर' । यहां रसवत् इत्यादि अलंकार के विषय में । इस प्रकार वस्तु और रस इत्यादि का गुणीभाव दिखलाकर अलंकारात्मक तृतीय व्यङ्ग्य प्रकार के भी उसको (गुणीभाव को) दिखलाते हैं—'व्यङ्गयालङ्कार का' यह । अर्थात् उपमा इत्यादि का ।
वाच्यार्थ के तिरस्कृत न होने पर गुणीभाव तारावती—वस्तुगुण्यजना का दूसरा प्रकार वह होता है जिसमें वाच्यार्थी का तिरस्कार नहीं होता। ऐसे शब्दों से जब व्यङ्गयार्थ की प्रतीति होती है तब कभी-कभी काव्यचातुरता की दृष्टि से वह व्यङ्गच भी वाच्य की अपेक्षा गुणीभाव को प्राप्त हो जाता है । जैसा कि 'अनुरागवती सन्ध्या' इत्यादि में पहले उदाहरण दिया जा चुका है । यह उदाहरण प्रथम उद्योत में दिया जा चुका है और इसकी व्याख्या भी की जा चुकी है । (यह समासोक्ति अलंकार का उदाहरण है । यहां संध्या और दिवस का वर्णन किया गया है, किन्तु उनका वाच्य नहीं होता । अपितु दम्पति-व्यवहार की जो व्यञ्जना होती है वह संध्या और दिवस के वाच्यार्थ को ही अधिक
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तृतीय उद्योतः
सुन्दर बना देती हैं। इसीलिये यह गुणीभूतव्यंग्य है। १) अनुराग शब्द का अर्थ है वस्तु का उपरंजन करना। इस शब्द का अभिलाषा अर्थ में प्रयोग अनादि परम्परा से लावण्य के समान रूढ़ रुप में होता है। संध्या के अर्थ में उपरंजन प्रत्यक्ष सिद्ध है; किन्तु अभिलाषा में उसका प्रयोग निरुढ़ लक्षणा के रुप में किया गया है। इसीलिये इसे अतिरसकृतवाच्य कह दिया गया है।
उक्ति के द्वारा कथन में गुणीभाव वस्तुव्यंजना ही कहीं-कहीं पर उस अवस्था में भी गुणीभूत हो जाती है जब कि उक्ति के द्वारा उसका त्वयं प्रकाशन कर दिया जाय। जैसे—'यह जानकर कि विट संकेत काल को जानना चाहता है उसने हँसते हुये नेत्रों से अभिप्राय को प्रकट करते हुये लीलाकमल को सिकोड़ लिया।' यहाँ पर लीलाकमल को सिकोड़ने से सायंकाल की व्यंजना होती है तथापि कवि ने 'आकूत' (अभिप्राय) शब्द का प्रयोग कर उस व्यंजना की ओर स्वयं संकेत कर दिया है 'अभिप्राय' इस वाच्य अंश की व्याख्या करने के लिये 'लीला कमल निमीलन' के व्यंग्य को समझाना अनिवार्य है। अतएव वाच्यांग होने के कारण यह व्यंग्य गुणीभूत हो गया है।
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रस इत्यादि दूसरे तत्वों का गुणीभाव
रस इत्यादि व्यंग्यों का गुणीभूतव्यंग्यता रसवदलंकार में दिखलाई जा चुकी है। रसवत् शब्द उपलक्षण परक है। इससे प्रेयस् इत्यादि का उपलक्षण हो जाता है । (रस के अलङ्कार होनेपर रसवत् अलङ्कार भाव के अपरांग होनेपर प्रेयस्, रसाभास और भावाभास के अपरांग होनेपर ऊर्जस्वी, भावशान्ति के अपरांग होनेपर समाहित ये प्राचीन आलङ्कारिकों के बतलाये हुये अलङ्कार हैं। इसी प्रकार भावोदय, भावसन्धि, भावशवलता, शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्तिमूल छछिनयों की भी अपरांगता अलङ्कार की कोटि में आती है। इनका विस्तृत विवेचन काव्यप्रकाश के पांचवें उल्लास के प्रारम्भ में किया गया है।)
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तृतीय उद्योतः
विभिन्न तत्वों के गुणीभूत होने के रूप
(प्रश्न) अत्यन्त प्रधान रूप में स्थित रस इत्यादि का गुणीभाव कैसे हो सकता है? यदि गुणीभाव हो जाय तो अचर्चा क्यों न आयेगी? यह शङ्का करके उत्तर के रूप में यह कहा जा सकता है कि प्रत्युत सुन्दर ही हो जाता है। इस विषय में यह एक प्रसिद्ध दृष्टान्त दिया जा सकता है कि जैसे यदि किडी नौकर का विवाह हो और उसकी बारात में राजा चला जाय तो राजा अपने नौकर की अपेक्षा वहाँ पर गोण ही होगा। तथापि राजा के बारात में था जाने से उस बारात की शोभा बढ़ ही जाती है। इसी प्रकार यदि किसी अर्थ में रस पोषक बन जाय तो उस काव्य का सौन्दर्य ही बढ़ जाता है। जब आधिकारिक (प्रधान) वाक्यार्थ के प्रति रसगुणीभूत हो जाते हैं तब उनमें गुणीभूतव्यंग्यता आ जाती है। आधिकारिक का अर्थ है वह वस्तु जिसे फल का स्वामित्व प्राप्त हो जाय (अधिकारः फले स्वाम्यम्-धिकारी च तत्प्रभुः)। इस प्रकार का फल किसी एक वाक्यार्थ को होता है उसकी सहायता करनेवाले सभी तत्व गुणीभूत हो जाते हैं। यह तो हुई वस्तु और रसव्यंजनाओं के गुणीभूत होने की बात। अब अलंकार व्यंजना को लीजिये—दीपक इत्यादि के विषय में व्यञ्जन अलंकार गुणीभाव को प्राप्त हो जाता है। (दीपक अलंकार वहाँ पर होता है जहाँ प्रकृत और
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अपकृत के एक धर्म का निर्देश किया जाय; जैसे—‘कृपणों के घन, सर्पों के फन की मणि, सिंहों के केसर और कुलबालिकाओं के स्तन तब तक कौन छू सकता है। जब तक वे मर न जायँ।’ यहाँ कुलबालिकाओं के स्तन प्रस्तुत वर्ण्य विषय हैं और कृपणों के घन इत्यादि अप्रस्तुत। इससे उपमालङ्कार को ध्वंजना होती है कि—कुलबालिकाओं के स्तन कृपणों के घनों, सर्पों की फणमणियों और सिंहों के केसरों के समान स्पर्श में अशक्य होते हैं। इस प्रकार यहाँ व्यंग्य अलङ्कार उपमा है और वाच्य दीपक। उपमा का मूलाधार होता है सादृश्य-विधान और दीपक का मूलाधार है कई एक अप्रस्तुतों को लड़ाकर सीधे देना। यहाँ पर चमत्कार सादृश्य में नहीं अपितु कई एक अप्रस्तुतों के उपादान में है अतः वाच्यंग्यउपमा गौण हो गई है और वाच्य दीपक प्रधान। यह गुणीभूतव्यंग्य का उदाहरण है। इसी प्रकार दृष्टान्त इत्यादि दूसरे सादृश्यमूलक अलङ्कारों में भी उपमा गर्भित रहती है और गुणीभूत हो जाती है।) इस प्रकार वस्तु, रस और अलङ्कार तीनों प्रकार के व्यंग्यार्थी को गुणीभाव प्राप्त हो जाता है। (काव्यप्रकाश में गुणीभूतव्यंग्य के ८ प्रकार बतलाये गये हैं—
अग्रूढपरस्यार्थं वाच्यसिद्धचचग्रम्फुटम् । सन्दिग्धतुल्यप्राधान्यों का वाक्यैक्यसमसुन्दरम् ॥ अर्थात् (१) अगूढ (२) अपरांग, (३) वाच्यसिद्धचचग्रम्फुटम्, (४) अस्फुट, (५) सन्दिग्ध- प्राधान्य, (६) तुल्यप्राधान्य, (७) काव्यैक्यप्ति और (c) असुन्दर, ये ८ भेद गुणीभूतव्यंग्य के होते हैं।
यदि इस रूप में ध्वन्यालोक में नहीं गिनायो गया है। तथापि विवेचन करने पर अवगत होता है कि इनमें प्रत्येक का मूल आधार ध्वन्यालोक में विद्यमान है १)।
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प्रसन्नगभीरपदाः काव्यबन्धाः सुखावहाः । ये च तेभ्यः प्रकारोऽ्यमेव योज्यः सुमेधसा ॥३५१॥
ये चैतेपरिमितस्वरूपा अपि प्रकाशमानास्त्याविधार्थरमणीयाः सन्तो विवेकिनां सुखावहाः काव्यबन्धास्तेभ्य सर्वोत्तमेवायं प्रकारो गुणीभूतव्यङ्ग्यचो नाम योजनीयः। यथा—
लच्छी दुहिदा जामाउओ हरि तंस घरिणिमा गड़ढा । आमिइअहा व सुआ अहो कुडुम्ब महोअहिणो ॥
(अनु०) उसी प्रकार—
‘प्रसन्न और गंभीर पदवाले जो सुखावह काव्यबन्ध हैं उनमें बुद्धिमान् मनुष्य को इसीप्रकार (काव्यभेद) की योजना करनी चाहिये।
ये जो अपरिमित स्वरूपवाले भी प्रकाशमान और उस प्रकार के अर्थ से रमणीय होकर विवेकियों को सुख देनेवाले काव्यबन्ध हैं उन सब में इसी गुणीभूत व्यंग्य नामक प्रकार की योजना करनी चाहिये। जैसे—
‘उसकी पुत्री लक्ष्मी, जामाता हरि, गृहिणी गङ्गा, अमृत और मुगाढ़ ये पुत्र हैं; महासागर का कुटुम्ब आश्वर्यजनक है।’
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तृतीय उद्योत:
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तत्राड्यमेव प्रकार इतिभावः । सुमेधस इति । यस्त्वेतं प्रकारं तत्र योजयितुं न शक्तः स परमलोकसहृदयभावनामुकुलितललोचनोक्त्योपहसनीयः स्यादितिभावः । तथा गृहिणी गङ्गा यस्या: समभिलषणीये सर्वस्मिन्वस्तुन्यनुपहत उपायभाव: । अमृतमृगाड्को च सुतौ, अमृतमिह-वारुणी । तेन गङ्गास्तानहरिचरणाराधनाद्युपायैरलन्धया लक्ष्म्याश्चन्द्रोदययानगोष्ठचुपभोगलक्षणं मुख्यफलमिति त्रैलोक्यसारभूतता प्रतीमाना सती अहो कुटुम्बं महोदधेरित्यहो शब्दाच्च गुणीभावमनुभवति ॥३५॥
( अनू० ) इस प्रकार तीनों प्रकारों के गुणीभाव को दिखलाकर इसकी व्यापकता बहुत अधिक लक्ष्यों में है यह दिखलाने के लिये कहते है—'तथा' यह । प्रसाद गुण योग से प्रसन्न और व्यंग्यार्थ की अपेक्षा करते हुये गम्भीर पद हैं जिनमें 'सुखावह' इससे चारुताहेतु ( बतलाया गया है । ) भाव यह है कि उसमें इसी प्रकार की योजना करनी चाहिये । 'बुद्धिमान् के द्वारा' यह । जो इस प्रकार को उस ( काव्य ) में संयोजित करने में समर्थ नहीं है वह केवल मिथ्या 'सहृदयत्व की भावना से मुकुलित नेत्रवाला' इस उक्ति से उपहासनीय ही हो जाय । सब लोगों की अभिलाषा का स्थान लक्ष्मी पुत्री है । दामाद हरि है जो समस्त भोग और अपवर्ग के देने में निरन्तर उद्यम करनेवाले हैं तथा गृहिणी गंगा है जिसका अभिलपणीय सभी वस्तु में उपायभाव उपहत नहीं होता । अमृत और मृगाड्क दो पुत्र है, अमृत यहाँ पर वारुणी है । इससे गंगास्तान हरिचरणाराधन इत्यादि सैकड़ों उपायों से प्राप्त लक्ष्मी का चन्द्रोदय पानगोष्ठी का उपभोग रूप मुख्य फल है इस प्रकार तीनों लोकों की सारभूतता प्रतीम्यान होकर और 'अहो कुटुम्बं महोदधे:' इसके 'अहो' शब्द से गुणीभाव का अनुभव करता है । गुणीभूत व्यंग्य का महत्व तारावती—ऊपर यह सिद्ध किया गया है कि वस्तु, रस और अलंकार ये तीनों प्रकार के व्यंग्यार्थ गुणीभूत हो जाते है । अब इस ३५ वीं कारिका में यह बतलाया जा रहा है कि गुणीभूतव्यंग्य का क्षेत्र कम नहीं है । यह भी बहुत अधिक क्षेत्र में व्याप्त है। साथ ही इसका महत्व भी कम नहीं है, काव्य की इस विधा का उपयोग तो उच्चकोटि के काव्यों में भी किया जा सकता है । इस कारिका का आशय यह है कि 'बुद्धिमान् कवि को चाहिये कि इस प्रकार की योजना ऐसे काव्यों में करे जिसमें पदयोजना प्रमान गुण से परिपूर्ण होने के कारण बहुत स्पष्ट तथा संशयहीन हो तथा व्यंग्यार्थ का आक्षेप करने के कारण उनमें गम्भीरता आ गई हो; इस प्रकार के काव्यबन्ध सुखावह होते हैं । इन काव्यों का स्वरूप अपरिमित होता है और व्यंग्यार्थ की रमणीयता से ओतप्रोत होकर तथा प्रकाश में आकर ये
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३८६ ध्वन्यालोके विवेकियों को सुख देते हैं । (यहाँ पर ध्वनिकार का आशय यही है कि ध्वनिकाव्य तो रमणीय होता ही है साथ ही गुणीभूतव्यङ्ग्यच का महत्त्व भी कम नहीं है । यहाँ पर दो प्रकार का पाठ अभिगत होता है—दीधिति में 'ये च तेषु प्रकारोड्यमेवं योज्यः सुमेधसा' इस पंक्ति में 'एवम्' पाठ रखा गया है और उसकी व्याख्या की गई है कि बतलाये हुये तीनों प्रकारों से योजना करनी चाहिये । इस व्याख्या में सबसे बड़ी अनुपपत्ति यह है कि गुणीभूतव्यङ्ग्य की योजना के तीन प्रकारों का उल्लेख ध्वनिकार (कारिकाकार) ने नहीं किया है उसका उल्लेख तो आलोककार ने किया है। अतः ध्वनिकार के मत से यह बतलाना कि गुणीभूतव्यङ्ग्यच की योजना के तीन प्रकार होते हैं ठीक नहीं है । दूसरा पाठ निर्णयसागरवाली प्रति का है जिसमें 'एवम्' के स्थान पर 'एव' रखा गया है। इसके अनुसार प्रस्तुत कारिका का सार यह है कि उच्चकोटि के काव्यों में गुणीभूतव्यङ्ग्यच का ही योग करना चाहिये । इसमें भी यह आपत्ति आती है कि गुणीभूतव्यङ्ग्यच मध्यम कोटि का काव्य माना जाता है, उत्तम कोटि का नहीं । अतः उत्तम कोटि के काव्य में केवल इसकी ही योजना करनी चाहिये यह कहना कुछ संगत प्रतीत नहीं होता । यदि यह कहा गया होता कि इसकी भी योजना करनी चाहिये तब भी कोई बात नहीं थी । मेरी समझ में इस प्रकरण की व्याख्या इस प्रकार की जानी चाहिये—सर्वत्र व्यङ्ग्यार्थ की ही प्रधनाता होती है, अन्यथा किसी भी रचना को काव्यरूपता प्राप्त ही नहीं हो सकती । कारण यह है कि ध्वनि को ही काव्य की आत्मा स्वीकार किया गया है और किसी भी रचना को ध्वनिरूपता तभी प्राप्त होती है जब कि उसमें व्यङ्ग्यार्थ की प्रधनाता हो । स्वयं गुणीभूतव्यङ्ग्यच भी ध्वनिकाव्य के अन्तर्गत ही आता है जैसा कि ध्वनिकार ने स्वयं कहा है—
प्रकारोऽयं गुणीभूतव्यङ्ग्योऽपि ध्वनिनिहिताम् । रसादितात्पर्यपर्यालोचनया पुनः ॥
ईस कारिका का आशय यही है कि किसी काव्य को गुणीभूतव्यङ्ग्य केवल इसी दृष्टि से कहा जाता है कि उसमें एक व्यङ्ग्यार्थ गौण हो जाता है । रसव्यञ्जना तो सर्वत्र प्रधान होती ही है । क्योंकि जबतक कवि का वर्ण्यविषय से भावात्मक सम्बन्ध स्थापित नहीं होता अथवा कवि पाठकों का भावात्मक सम्बन्ध वर्ण्यविषय से स्थापित नहीँ कर सकता तबतक रचना न तो सहृदयहृदयाह्लादकारिणी होती है और न काव्यरूपता को ही धारण कर सकती है । अतः रसादि की प्रधनाता सर्वत्र सिद्ध ही हो जाती है । अब काव्य के दो भेद किये जा सकते हैं—(१) जहाँ वाच्यार्थ में कोई विशेष सौन्दर्य नहीं होता और न कोई अन्य व्यञ्जना वाच्यार्थ की सहायिका होती है; केवल वाच्यार्थ ही रसादिव्यञ्जना करने में समर्थ होता है वहाँ पर प्रथम प्रकार का काव्य होता है । (२) दूसरे प्रकार का काव्य वह होता है जहाँ पर्यवसान में भावात्मक चमत्कार तो होता ही है और रस इत्यादि की व्यञ्जना सहृदयहृदयाह्लादन में समर्थ होती है, साथ में उसमें मध्यवर्तिनी एक और व्यञ्जना होती है । इस प्रकार के काव्य में वाच्यार्थ या तो इतना उत्कृष्ट कोटि का होता है कि मध्यवर्ती व्यङ्ग्य उसके सामने दब जाता है अथवा वाच्यार्थ की पूर्ति ही व्यङ्ग्यार्थ के द्वारा होती है । स्वाभाविक बात है कि इस प्रकार का काव्य प्रथम प्रकार की अपेक्षा अधिक उत्कृष्ट होता
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है। क्योंकि रसादि में पर्यवसान तो दोनों में एक जैसा होता है। प्रथम प्रकार में वाच्यार्थ अधिक उत्कृष्ट नहीं होता किन्तु ईस प्रकार में वाच्यार्थ अधिक उत्कृष्ट होता है। प्रथम प्रकार में वाच्यार्थ में रमणीयता उत्पादक कोई अन्य व्यङ्ग्यार्थ नहीं होता किन्तु इस प्रकार में कोई अन्य तत्व अभिव्यक्त होकर वाच्यार्थ में रमणीयता का आधिक्य कर देता है। इसी मतनय से यहां पर कहा गया है कि उच्चकोटि की रचनाओं में इसी प्रकार की योजना करनी चाहिये। आशय यह है कि वही काव्य उत्कृष्ट माना जाता है जिसमें वाच्यार्थ चमत्कारपूर्ण हो और उसमें किसी व्यङ्ग्यार्थ के द्वारा नवीन रमणीयता का आधिक्य किया रहा हो, साथ ही उसकी चरमपरिस्पनति रसादिद्वव्रनि में हो। यहां पर यह भी ध्यान रखना चाहिये कि ध्वनिकार ने कहीं पर भी ध्वनिकाव्य को उत्तम और गुणीभूतव्यङ्ग्य को मध्यम काव्य नहीं कहा है। यही बात आलोककार और लोचनकार के मत से भी सिद्ध होती है। इन आचार्यों ने भी गुणीभूतव्यङ्ग्य को ध्वनिकाव्य का सारभूत तत्व माना है। साथ ही इन आचार्यों ने कहीं भी गुणीभूतव्यङ्ग्य के ८ भेदों का उल्लेख नहीं किया है। यद्यपि ८ भेदों के विभिन्न रूपों का परिगणन नहीं पाया जाता तथापि उसका मूल ध्वन्यालोक में पाया जाता है। उनमें कुछ भेद तो रसप्रवण होकर वस्तुतः काव्योत्कर्ष का कारण होते हैं जैसे अपारङ्ग, वाच्यसिद्धयङ्ग्य, संलक्ष्यप्राधान्य, तुल्यप्राधान्य इत्यादि, तथा कुछ भेद काव्यापकर्ष के भी परिचायक होते हैं जैसे अगूढ़, अस्पष्ट, असुन्दर इत्यादि गुणीभूतव्यङ्ग्य। इन पिछले प्रकार के गुणीभूतव्यङ्ग्यों को ही मध्यम काव्य कहना ठीक होगा; प्रथम प्रकार के गुणीभूतेव्यङ्ग्य तो उत्कृष्टतम काव्य कहलाने के अधिकारी हैं, क्योंकि उनमें एक के स्थान पर दो व्यङ्ग्य होते हैं—एक प्रकारभूत होकर ध्वनिरूपता को धारण कर लेता है और दूसरा वाच्यार्थ में उत्कर्ष का आधिक्य करता है। साथ ही उसमें वाच्यार्थ भी उत्कृष्ट कोटि का होता है। इसी दृष्टि से यह कहा गया है कि उच्चतम काव्यों में इसी प्रकार की योजना करनी चाहिये। इसीलिये लोचन में अधिक बल देकर लिखा गया है—‘तत्रायमेव प्रकार इति भावः’ ‘बुद्धिमान् व्यक्ति को इसी काव्यरीति की योजना करनी चाहिये इस कथन में बुद्धिमात्र शब्द का आशय यह है कि वही कवि काव्यमर्मज्ञ कहा जा सकता है जो अपनी रचना में इस प्रकार की योजना करना जानता है। जो ऐसा नहीं करपाता उसके लिये सहृदय व्यक्ति यही कहेंगे कि उसका सहृदय कहलाना और अपने को सहृदय समझना बिल्कुल झूठा है और वह अपने को सहृदय समझने में इतना अन्धा हो गया है कि वह काव्य के वास्तविक सौन्दर्य को परखने की चेष्टा ही नहीं करता। इस प्रकार वह सहृदय समाज में उपहास का पात्र ही बन जाता है। एक उदाहरण लीजिए—‘महासागर के कुटुम्ब को देखकर आश्चर्य होता है—लक्ष्मी तो उसकी पुत्री है, भगवान् विष्णु उसके दामाद हैं, गंगा उसकी गृहिणी है और अमृत तथा चन्द्रमा ये दोनों उसके पुत्र हैं।’
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(उक्त पद कहाँ से लिया गया है यह ज्ञात नहीं होता। लोचन में इसकी व्याख्या कुछ विचित्र प्रकार से की गयी है। अन्य टीकाकारों ने सीधी-सीधी व्याख्या कर दी है जो लोचन की व्याख्या से मेल नहीं खाती। लोचन की व्याख्या को देखने से ज्ञात होता है कि
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प्रस्तुत पद्य ऐसे व्यक्ति के विषय में कहा गया है जिसकी वृत्ति धार्मिक रहती है और उस धार्मिकता की कृपा से उस व्यक्ति ने बहुत अधिक धन तथा ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया है। अब वह अपने धन का उपभोग उन्मुक्त रूप में अपनी विषय-वासनाओं की तृप्ति के लिये करता है तथा उसके जीवन में आनन्दोपभोग का ही प्राधान्य है। उसी व्यक्ति के विषय में कोई तटस्थ दृष्टा आश्चर्यभाव से उक्त शब्द कह रहा है। 'लक्ष्मी उसकी पुत्री हैं' कहने का आशय यह है कि लक्ष्मी समस्त व्यक्तियों की अभिलाषा का एक बहुत बड़ा विषय होती है। वह तो समुद्र को पुत्री रूप में ही प्राप्त है। भगवान् विष्णु दामोदर हैं जो कि समस्त व्यक्तियों को सभी प्रकार के भोग और मोक्ष देने में निरन्तर उद्योग करते रहते हैं। इसी प्रकार गङ्गा गृहिणी हैं जिनका कि एकमात्र व्रत सभी व्यक्तियों को सभी प्रकार की अभिलषणीय वस्तुओं को प्रदान करना है। गङ्गा जी का आश्रय कभी भी मिथ्या नहीं होता और जिस वस्तु की अभिलाषा की जाती है वह वस्तु गङ्गा जी की अनुकम्पा से स्वयं प्राप्त हो जाता है। अमृत और मृगादृ; उसके पुत्र ही हैं। यहाँ पर अमृत का अर्थ है वारुणी। (क्योंकि अमृत सर्वजन सुलभ नहीं है।) इसमें व्यङ्ग्यार्थ यह निकलता है कि 'गङ्गास्नान हरिचरणाराधन इत्यादि सैकड़ों धार्मिक कृत्यों से जो लक्ष्मी प्राप्त की जाती है उसका एकमात्र यही मुख्य फल होता है कि चन्द्रोदय का आनन्द लिया जाय और उसमें मदिरा पान गोष्ठी का उपभोग किया जाय। यह उपभोगमय बन जाना ही तीनों लोकों का सारभूत तत्त्व है (और उसे अमुक व्यक्ति ने अत्यधिक मात्रा में प्राप्त कर लिया है।) यह व्यङ्ग्यार्थ बहुत ही सुन्दर है। तथा प्रतीतिगोचर होकर 'समुद्र के कुटुम्ब पर आश्चर्य है' इस वाक्य में जो वाच्य आश्चर्य है उसका यह अंग हो गया है और उसके प्रति गुणीभाव का अनुभव करता है।
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(ध्वन्या०) वाच्यालङ्कारवर्गोडयं व्यङ्ग्यांशानुगमे सति । प्रायेणैव परां छायां विभ्रलक्षिते निरीक्ष्यते ॥३५॥
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वाच्यालङ्कारवर्गोडयं व्यङ्ग्यांशस्यालङ्कारस्य वस्तुमात्रस्य वा यथायोगमनुगमे सति च्छायातिशयं बिभ्रल्लक्षणकारैकदेशेन दर्शितः । स तु तथारूपः प्रायेण सर्व एव परীক্ষ्यमाणो लक्ष्ये निरीक्ष्यते । तथाहि—दीपकसमासोक्त्यादिविवदनीयैड्यलङ्कारैः प्रायेणान्तरङ्गवसतु निरन्तरसंस्पर्शिनो वृत्त्यन्ते । यतः प्रथमं तावत्ततिशयोक्तिगतभेदात् सर्वालङ्कारिषु क्रियापि काव्यच्छायां पुष्यति, कर्थ नु हेतुतिशायोगिता स्वविषयौचित्येन क्रियमाणा सती काचिद्रुत्कर्षमावहेत्
(अनु०) 'यह वाच्यालङ्कार वर्ग व्यङ्ग्यांश के अनुरागम करने पर प्रायः लक्ष्य में परा छाया को धारण करते हुए देखा जाता है' ॥३६॥ यह वाच्यालङ्कार व्यङ्ग्यांश अलङ्कार या वस्तुमात्र के यथायोग अनुगमन होने पर छाया की अधिकता को धारण करते हुए एक देश के रूप में लक्षणकारों द्वारा दिखलाया गया है। वह इस प्रकार—दीपक समासोक्त इत्यादि के समान अन्य भी अलङ्कार दूसरे व्यङ्ग्य अलङ्कार
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या दूसरी वस्तु का सादृश्य करते हुए देखे जाते हैं। क्योंकि पहले तो सब अलङ्कारों में अतिशयोक्तिगर्भता दिखाई जा सकती है। महाकवियों के द्वारा की हुई ही वह किसी अनोखी काव्यच्छाया को पुष्ट करती है। अपने विषय के औचित्य के साथ की हुई अतिशययोगिता काव्य में उत्कर्ष का आधायक क्यों न करे ?
(लो०) एवं निरलङ्कारेऽप्युत्पत्तानतायां तुच्छतयैव भासमानत्वमनान्तःसारेण काव्यं पवित्रीकृतमित्युच्वलद्वारस्याप्यनेनैव रम्यतरत्वमिति दर्शयति-वाच्येति। अंशत्वं गुणमात्रत्वम् एकदेशेनैति। एकदेशविवर्तिरुपकमनेन दर्शितम्।
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इत्यत्र हंसानां यच्चामरत्वं प्रतीमानं तन्नृपा इति वाच्येऽर्थे गुणतां प्राप्तमलङ्कारैरैयावदेव दर्शितं तावद्मुना द्वारेग सूचितोऽयं प्रकार इत्यर्थः। अन्ये त्वेकदेशेन वाच्यभागवैचित्र्यमात्रेरणेतरुद्दिशन्नमेव व्याचचक्षिरे। व्यङ्गच्यं यदलङ्कारान्तरं वस्त्वन्तरं संसृशन्ति ये स्वात्मनः संस्कारायाश्लिष्यन्तीति ते तथैव महाकविभिरिरिति। काव्यशोभां पुष्टयतीति यदुक्तं तत्र हेतुमाह-हृदयहेतोः। अतिशययोगिता कथम् नोत्कर्षमावहेतु काव्ये नास्त्येवासौ प्रकार इत्यर्थः। स्वविषये यदौचित्यं तेन चेद्धृदयस्थितेन तामतिशयोक्तिः कवि: करोति।
यथा भट्टेन्दुराजहंसैरवीज्यन्त शरदैव शरोनुपा:। इति। (अनु०) इस प्रकार अलङ्काररहितों में (अर्थ के) उत्तान होने पर (ऊपर उठ जाने पर) तुच्छ रूप में ही भासित होनेवाला काव्य अन्तस्तत्स्वभावे इस (गुणीभूत व्यङ्गच्य) के द्वारा पवित्र कर दिया गया है यह कहकर अलङ्कार की भी अधिक रमणीयता। इसी के द्वारा होती है यह दिखलाते हैं—‘वाच्य में’ यह। अंशत्व का अर्थ है गुणमात्रत्व। ‘एक देश के रूप में’ यह। इसके द्वारा एकदेशविवर्ति रुपक दिखलाया गया है। अतः यह अर्थ है—एकदेश विवर्ति रूपक में—
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यद्विश्रम्य विलोकितेषु बहुशो निस्थेमनि लोचने निनु यद्गात्राणि दरिद्रति प्रतिदिनं लूनाज्जननीनालवत्। दूरवाकण्डविडम्बकश्च निविडो यत्पाण्डिमा गण्डयोः कृष्णे यूनि सयौवनासु वनितास्वेषैव वेशस्थितिः॥
'शरत्के द्वारा ही सरोवररुपी राजाओं पर रजहंसों से पखा किया जा रहा था।' यहां पर हंसों का जो चामरत्व प्रतीत होता है वह 'राजाओं पर' इस वाच्य अर्थ में गुणता को प्राप्त हो गया है। अलङ्कारकारों ने जितना कुछ दिखलाया है उतना इसके द्वारा यह प्रकार सूचित किया गया है। यह अर्थ है। और लोगों ने तो 'एक देश से' अर्थात्
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तृतीय उद्योत:
अत्र हि भगवतो मन्मथवपुषः सौभाग्यविषयः सम्भाव्यत एवायमतिशय इति तत्काव्ये लोकोत्तरैव शोभो लसति। अनौचित्येन तु शोभा लीयते एव यथा—अल्पं निर्मितमकाशमनालोच्यैव वेधसा। इदमेवविधं भावि भवत्यः स्तनजन्मणम्॥ इति॥
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वाच्यभागवैचित्र्य मात्र से यह अस्पष्ट व्याख्या की है। अलंकार जो दूसरा अलंकार या दूसरी वस्तु उसको जो अपने संस्कार के लिये स्पर्श करते हैं या आलिंगन करते हैं वे वैसे होते हैं। 'महाकवियों के द्वारा' अर्थात कालिदास इत्यादि के द्वारा । 'काव्यशोभा को पुष्ट करता है' यह जो कहा गया उसमें हेतु बतलाते हैं— 'क्यों' यह। 'हि' शब्द का प्रयोग हेतु के अर्थ में हुआ है। 'अतिशय का योग क्यों उत्कर्ष को धारण न करे' अर्थात् काव्य में ऐसा प्रकार ही नहीं यदि अपने विषय में जो औचित्य उसको हृदय में रखकर अतिशयोक्ति को कवि करता है। जैसे भट्टेन्द्रुराज का—
बीच-बीच में हक-हककर होनेवाले दृष्टिपातों में जो कि नेत्र अस्थिरता को प्राप्त हो जाते हैं, कटी हुई कमलिनी की नाल के समान जो कि उसके सारे अंग सूखते चले जा रहे हैं, दूरविकाण्ड को भी तिरस्कृत करनेवाली घनी पीलीमा जो कि उसके कपोलों पर व्यास है, युवक कृष्ण के विषय में यौवनवती वनिताओं की बस यही वेषस्थिति है।
यहीं पर निस्सन्देह कामदेव के समान शरीरवाले भगवान् का सौभाग्यविषयक अतिशय सम्भावित ही किया जा सकता है, अतः उस काव्य में लोकोत्तर शोभा ही उल्लसित होती है। शनैः शनैः तो शोभा लीन हो जाती है। जैसे— 'ब्रह्माजी ने तुम्हारे इस होनेवाले इस प्रकार के स्तनविस्तार का बिना ही विचार किये छोटा सा आकाश बना दिया।'
गुणीसूत व्यङ्ग्य द्वारा अलंकार वर्ग में सौन्दर्य का आधार तारावती—३५वीं कारिका में यह सिद्ध किया जा चुका है कि जिन काव्यों में अलङ्कार नहीं होता जो जिनमें काव्यार्थ अधिक स्फुट हो जाता है उनमें एक तो अलङ्कार का अभाव दूसरे काव्यार्थ की वाच्यरूपता; ये दोनों तत्त्व मिलकर काव्य को अत्यन्त तुच्छ बना देते हैं। यदि वहाँ पर इस गुणीसूतव्यङ्ग्य का योग हो जाता है तो वह गुणीसूतव्यङ्ग्य ही उस काव्य का आन्तरिक तत्त्व अर्थात् उसकी आत्मा बन जाता है और इस प्रकार वह काव्य पवित्र हो जाता है। (वाच्यार्थ के निम्नस्तर पर होते हुए भी व्यङ्ग्यार्थ इसीलिए गुणीभूत हो जाता है कि वह वाच्यार्थ में पूर्व में सहायक हो जाता है।) यह तो हुई ३५वीं कारिका की बात।
३६वीं कारिका में यह दिखलाया गया है कि अलङ्कारों में भी औचित्य की रमणीयता व्यङ्ग्यचार्थ के योग से ही आती है। कारिका का आशय यह है—'जितना भी वाच्य अलंकारों का समूह दिखलाया गया है यदि उसमें व्यङ्ग्य अंश का अनुरूप हो जाता है तो वह बहुत बड़ी छाया (काव्यशोभा) को धारण कर लेता है। लक्ष्य में यह बात प्रायः देखी जाती है। लक्षणकारों ने यह बात एक देश के द्वारा दिखलायी है कि व्यङ्ग्य अलंकार और व्यङ्ग्य वस्तु इन दोनों में कोई एक व्यङ्ग्य अंश जब वाच्य अलंकारों से मिल जाता है तब वाच्य अलंकारों में काव्य की अभूतपूर्व शोभा उत्पन्न हो जाती है। यहाँ पर एकदेश का अर्थ है एकदेश-विवर्ति रूपक। लक्षणकारों ने रूपक के दो प्रकार का माना हैं—सांश और निरंश। सांस के दो भेद माने गये हैं—समस्तवस्तुविषय और एकदेशविवर्ति। जहाँ पर रूपक के सभी अवयवों का उपादान शब्द के द्वारा वाच्यवृत्ति में किया जाता है उसे समस्तवस्तुविषय
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तृतीय उद्योत:
साझरूपक कहते हैं और जहाँ रूपक के कुछ अंगों का वाच्य-वृत्ति में प्रकथन किया जाता है और कतिपय अंग अर्थातः समझ लिये जाते हैं उसे एकदेशविवर्ति साझरूपक कहते हैं। इसका उदाहरण—
'शरद् राजहंसों से सरोवररूपी राजाओं पर पंखा झल रही थी।' यहाँ सरोवरों पर राजाओं का आरोप किया गया है जो कि वाच्य है और राजहंसों पर चमर (या पंखे) का आरोप अर्थातः समझ लिया जाता है। इस प्रकार यहाँ पर एकदेशविवर्ति साझ् रूपक है। प्राचीन आचार्यों के इस एकदेशविवर्ति रूपक के निर्देश से सिद्ध होता है कि प्रतीयमान अर्थ का कोई ऐसा भी रूप सम्भव है जो वाच्यार्थ का उपकारक होकर काव्यशोभा का आधार किया करता है। इस प्रकार इन आचार्यों ने मानो गुणीभूतव्यंग्य की सत्ता स्वीकार ही कर ली। यदि अलंकारों की ठीक-ठीक परीक्षा की जाय तो ज्ञात होगा कि एकदेशविवर्ति रूपक के विषय में जो बात कही गयी है वह प्रायः सभी अलंकारों के विषय में लागू होती है अर्थातः प्रायः सभी अलंकारों में व्यंग्यार्थ का संसर्ग होता है। इस प्रकार के लक्ष्य प्रायः पाये जाते हैं। जिनमें वाच्यार्थ का अनुप्राणन व्यंग्यार्थ के द्वारा होता है। कुछ लोगों ने 'एकदेश के द्वारा पुराने आचार्यों ने इस तथ्य की ओर संकेत किया है' इस संदर्भ की व्याख्या इस प्रकार की है—एकदेश का अर्थ है केवल वाच्यभाग का वेधिच्छेद्य। किन्तु यह व्याख्या बिलकुल स्पष्ट नहीं है और इससे यह ज्ञात नहीं होता कि वाच्यवैचित्र्यमात्र की व्याख्या करने से व्यंग्यार्थ की स्वीकृति कैसे सिद्ध होती है ? अतः 'एकदेश के द्वारा' इस शब्द की यही व्याख्या करनी चाहिये कि लक्षणकारों ने रूपक के एक देश को व्यंग्य मानकर यह संकेत दिया है कि प्रायः सभी अलंकारों में व्यंग्य का अंश मिला रहता है।
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तृतीय उद्योत:
अलंकारों में व्यंग्यांश के समावेश की बात को इस प्रकार समझना चाहिये—कुछ अलंकार ऐसे होते हैं जिनमें दूसरा अलंकार व्यक्त हो जाता है जैसे दीपक अलंकार में उपमा व्यक्त होती है। कुछ अलंकार ऐसे होते हैं जिनमें वस्तु अभिव्यक्त होकर उस अलंकार की सत्ता को पूरा करती है जैसे समासोक्ति में अप्रस्तुत अभिव्यक्त हुआ करता है। इस प्रकार ये अलंकार अपने संस्कार के लिये दूसरे व्यंग्य अलंकार या व्यंग्य वस्तु का सहारा लिया करते हैं। केवल यही अलंकार ऐसे नहीं हैं। अपितु दूसरे अलंकार भी व्यंग्य वस्तु या अलंकार का सहारा लेते हुये देखे जाते हैं। सबसे पहले अतिशयोक्ति अलंकार को लीजिये। यह एक ऐसा अलंकार है जिसके कार्यक्षेत्र का प्रसार सभी अलंकारों में दिखलाया जा सकता है। महाकवि कालिदास इत्यादि जब किसी अलंकार की योजना इस रूप में करते हैं कि उसमें अतिशयोक्ति गर्भित हो तब वह काव्य किसी विचित्र प्रकार के काव्योन्दर्य का पोषक हो जाता है। केवल एक शर्तें हैं कि अतिशयता की योजना में कवि को औचित्य का ध्यान सर्वथा रखना चाहिये, अर्थातः उसे यह देखना चाहिये किस स्थान पर अलंकार व्यञ्जना उपयुक्त रहेगी और कहाँ पर वस्तुव्यञ्जना उचित होगी। इसी प्रकार कहाँ पर कौन अलंकार या कौन वस्तु उचित प्रतीत होगी इस बात का भी ध्यान रखना चाहिये। यदि इस प्रकार के औचित्य को हृदय में रखकर कवि अतिशयोक्ति का गुम्फन करता है तो उससे
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काव्य अत्यन्त उत्कृष्ट बन जाता है। उदाहरण के लिये भट्टनदुराज की निम्नलिखित उक्ति को लीजिये—
'कृष्ण तरुण हैं और युवतियाँ भी यौवन से परिपूर्ण हैं। कृष्ण के प्रति भावना से भरी होने से उनकी वेषस्थिति इस प्रकार की हो रही है कि वे हक-हककर कृष्ण को बार-बार देखती हैं जिससे उनके नेत्र स्थिरता को प्राप्त नहीं हो पाते। उनके अंग काटी हुई कमलिनी की नाल के समान प्रतिदिन क्षीण होते जाते हैं और कपोलों पर पीलीमा दूब के गुच्छे की जैसी फैलती जा रही है।'
यहाँ कृष्ण के प्रति कामना रखनेवाली वियोगिनी वनिताओं की दशा का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन है। काटी हुई कमलिनी के समान सूखना और दूर्वाकाण्ड के समान पाण्डुता यह सब अतिशयोकिपूर्ण ही है! किन्तु एक तो यह वर्णन मर्यादित है। अतिशयोक्ति की इतना अधिक नहीं खींचा गया है कि वह एक मजाक सी मालूम पड़ने लगे। दूसरी बात यह है कि इसमें भगवान् कृष्ण के प्रति अनेक स्त्रियों का आकर्षण दिखलाया गया है। जोकि अनुचित नहीं है और इससे भगवान् के लोकोत्तर सौभाग्य की व्यञ्जना होती है। भगवान् स्वयं ही कामदेव के समान रूपवान् है। अत एवं उनके विषय में जो कुछ कहा गया है वह सब उचित है। औचित्य को लेकर जो अतिशयोक्ति का गुम्फन किया गया है उससे काव्य में लोकोत्तर शोभा उद्भूत हो जाती है। किन्तु जब अनौचित्य का प्रतिबिम्ब होने लगता है तब अतिशयोक्ति सदोष हो जाती है और उसकी शोभा जाती रहती है। उदाहरण के लिये दण्डी की इस उक्ति को लीजिये—
'ब्रह्माजी—ने जब आकाश की रचना की तब सम्भवतः इस बात पर विचार नहीं किया कि तुम्हारे स्तन बढ़कर इतने विशाल हो जायेंगे। इसीलिये ब्रह्माजी ने आकाश को इतना छोटा बना दिया।'
यह उक्ति एक किलबाड़ जैसी मालूम पड़ती है और इसकी अतिशयता रमणीयता का हास करनेवाली ही है
(ध्वन्यालोके) भामहेनाप्यतिशयोक्तिलक्षणे यदुक्तम्— सैषा सर्वेषु वक्रोक्तिन्तरनयार्थं विभाव्यते। यत्नादुत्कृष्टा काव्यार्थः कोऽलङ्कारोऽनया विना।। इति।
तत्रातिशयोक्तिममलङ्कारमथितिष्ठति कविप्रतिभावशात्तस्य चारुत्वातिशय- योगोऽन्यस्य तदङ्गमात्रतैवेतिसर्वालङ्कारशरीरस्वीकारणयोग्यत्वेनाभेदोपचारात्सैव सर्वालङ्काररूपित्वमेवार्थोऽङ्गत्वगतत्व्यः। तस्यैवाचालङ्कारत्वसदृशीर्णत्वं त्वेन कदाचिदङ्गरूपत्वेन कदाचिदङ्गगुणभावेन। तत्राद्ये तु गुणीभूत- व्यङ्गच्यरूपतापक्षे वाच्यालङ्कारमार्गः। द्वितीये तु ध्वनावस्तभावः। तृतीये तु गुणीभूत- व्यङ्गच्यरूपता।
(अनु.) भामह के द्वारा भी अतिशयोक्ति के लक्षण में जो कहा गया है— 'वह यह सब वक्रोक्ति ही है; इसके द्वारा अर्थ का विभावन किया जाता है। कवि को इसमें यत्न करना चाहिये; इसके बिना अलङ्कार ही कौन होता है?'
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वहाँ पर अतिशयोक्ति जिस अलङ्कार को अधिष्ठित करती है कविप्रतिभा के वश में उसमें चाहतव की अधिकता का योग हो जाता है और की तो अलङ्कार मात्रा ही रहती है—इस प्रकार सभी अलङ्कारों के शरीर को स्वीकार करने की योग्यता के कारण अभेदोपचार से वही सभी अलङ्कारों के रुपवाली होती है, बस यही अर्थ समझा जाना चाहिये । ओर उसका दूसरे अलङ्कारों से संकीर्णतव कभी वाच्य के रुप में होता है और कभी व्यंग्य के रुप में । अत्ययतव भी कभी प्रधानरुप में और कभी गौण रुप में । उसमें प्रथम पक्ष में वाच्यालङ्कार का मार्ग है । द्वितीय का तो ध्वनि में अन्तर्भाव हो जाता है ओर तृतीय में तो गुणीभूतव्यंग्यरुपता होती है ।
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(लो०) नन्वतिशयोक्तिः: सर्वालङ्कारेषु व्यङ्ग्यत्वान्तर्लीनैवास्त इति यदुक्तं तत्कथम् ? यतो भामहोक्तिशयोक्तिः सर्वालङ्कारसामान्यरुपत्ववादित् । त च सामान्यं शब्दादिविशेषप्रतितेः: पृथग्भूततया परचात्तनत्वेन चकास्तीति कथमस्य व्यङ्ग्यत्वमित्याशङ्क्याह—भामहेनैति । भामहेनापि यदुक्तं तत्नाज्यमेवार्थोज्वलन्तव्य इति दूरेण सम्बन्धः । किँ तदुक्तम्—सैवैति । यतिशयोक्तरलङ्कारप्रकारः: सर्वः । वक्रोक्तिभियेःशब्दोक्तिरपि रिष्टा वाच्यालङ्कृतिः ।
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इतिवचनात् । शब्दस्य हि वक्ता अर्थस्य च वक्ता लोकोत्तीर्णेन रुपेणावस्थानमित्यमेवासावलङ्कारस्यालङ्कारभावः, लोकोत्तरस्तैव चारित्रयः, तेनातिशयोक्तितः सर्वालङ्कारसामान्यम् । तथाहि—अनया अतिशयोक्त्या, अर्थः: सकलजनोपभोगपुराणी कृतोऽपि विचित्रतया भास्यते । तथा प्रमोदाद्यनादिः विभावतां नीयते । विशेषेण च भाव्यते रसनयो क्रियते इति तावत्तेनोकं, तत्र कोऽसावर्थ इत्यत्राह—अभेदोपचारात्सेव सर्वालङ्काररुपेति । उपचार निमित्तमाह—सर्वालङ्कार इति । उपचार प्रयोजनमाह—अतिशयवितरित्यादिना अलङ्कारमात्रतैवेत्यन्तेन । मुख्यार्थबाधोऽप्यत्रैव दर्शत: कविप्रतिभावशादित्यादिना ।
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अयं भावः—यदि तावतिशयोक्तेः: सर्वालङ्कारेषु सामान्यरुपता सा तर्हु तद्र्यप्यवसायिनीति तद्र्यतिरिक्तो नैवालङ्कारो दृश्यत इति कविप्रतिभानं न तन्नापेक्ष णीयं स्यात् । अलङ्कारमात्रं च न किंचिद्दृश्यते । अथ सा काव्यजीवितत्वेनैत्थं विवक्षिता, तथाऽऽश्यानौचित्येनापि निवध्यमाना तथा स्यात् । औचित्यवती जीवितमिति चेत्—औचित्यघटितमसुन्दरजीवितमित्यभ्युपगन्तव्यं न तु सा । एतेन यदाहुः—केचित्—औचित्यघटितमसुन्दरशब्दार्थमये काव्ये किमन्येन ध्वनिनात्मभूतानेति ते स्ववचनमेव ध्वनिसद्भावादाभ्युपगमसिद्धिमन्तः ।
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साधिभूतं मन्यमाना: प्रयुक्ता: । तस्मादमुख्यार्थबाघादुपचारे च निमित्तप्रयोजन सद्भावादभेदोपचार एकायम् । ततश्चोपपन्नमतिशयोक्तेर्व्यङ्ग्यत्वमिति । यदुक्तमलङ्कारान्तरस्वीकरणं तदेव त्रिधा विभज्यते—तस्याश्चैति । वाच्यत्वेनैति । सार्पि वाच्या भवति । यथा—‘अपरेव हि केयमन्र’ इति । अत्र रुपकेऽप्यतिशयः: शब्द
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स्पृशेव । अस्य त्रिविधस्य विषयविभागमाह—तत्रेति । तेषु प्रकारेषु मध्ये य आद्यः प्रकारस्तस्मिन् ।
(अनु०) (प्रश्न) अतिशयोक्कि सभी अलंकारों में व्यंग्य रूप में अन्तर्लीन ही रहती है यह जो कहा है वह कैसे ? क्योंकि भामह ने अतिशयोक्कि को सभी अलंकारों की सामान्य रूपवाली बतलाया है । विशेष प्रतीति से पृथग्भूत होकर परवर्ती रूप में सामान्य प्रकाशित नहीं होता फिर इसका व्यंग्यार्थव कैसे ? यह शंका करके कहते हैं—‘भामह के द्वारा’ यह । भामह के द्वारा भी जो कहा गया है वहाँ भी यहीं अर्थ समझा जानी चाहिये यह । दूर से सम्बन्ध है । वह क्या कहा ? ‘वह यह’ । जो अतिशयोक्कि लक्षित की गई है वही सब वक्रोक्ति का सब प्रकार है ।
‘अभिधेय और शब्द की वक्र उक्ति वाणी का अलंकार अभीष्ट है ।’५६
इस वचन से । निस्सन्देह शब्द की वक्रता और अर्थ की वक्रता लोकोत्तर रूप में अवस्थित होना है इस प्रकार यही वह अलंकारों का अलंकारमात्र है । और लोकोत्तर होना ही अतिशय है । इससे अतिशयोक्कि सभी अलंकारों में सामान्य होती है । वह इस प्रकार इस अतिशयोक्कि के द्वारा सभी लोगों के उपभोग के कारण पुराना बनाया हुया भी अर्थ विचित्र रूप में भावित किया जाता है । उसी प्रकार प्रमदा और उद्यान इत्यादि को विभाव-रूपता प्राप्त कराई जाती है और विशेष रूप में भावित किया जाता है अर्थात् रसमय बनाया जाता है यह निस्सन्देह उनके (भामह के) द्वारा कहा गया है उसमें वह कौन सा अर्थ है इसी विषय में कहते हैं—‘अभेदोपचार से वही सब अलंकारों की रूपवाली है’ यह । उपचार में निमित्त बतलाते हैं—‘सब अलंकार’ इत्यादि । उपचार में प्रयोजन बतलाते हैं—‘अतिशयोक्कि’ यहाँ से लेकर ‘अलंकारमात्रता ही’ यहाँ तक । यहीं पर ‘कविप्रतिभावशात्’ इत्यादि के द्वारा मुख्यार्थबाध भी दिखला दिया गया है ।
श्लोक भाव यह है—यदि सब अलंकारों में अतिशयोक्कि की सामान्यरूपता है तो उसका तादात्म्य में पर्यवसान होता है, अतः उससे व्यतिरिक्त कोई अलंकार दिखाई नहीं देता अतः उसमें कविप्रतिभा अपेक्षणीय नहीं होगी और केवल अलंकार भी कोई दिखाई नहीं देगा । और यदि काव्यजीवन के रूप में वह इस प्रकार की विवक्षित है तथापि अनौचित्य के साथ निबद्ध किये जाने पर भी वैसी हो जायेगी । यदि कहो कि औचित्यवाली अतिशयोक्कि ही काव्य का जीवन है तो रस भाव इत्यादि को छोड़कर औचित्य का निवन्धन और कुछ नहीं होता, अतः वही अन्तर्यामी मुख्य जीवन है वह अतिशयोक्कि नहीं । इससे जो कुछ लोग यह कहते हैं—औचित्यघटित सुन्दर शब्दार्थमय काव्य में दूसरी आत्मभूत ध्वनि को मानने की क्या आवश्यक्ता ? वे अपने वचन को ही मानते हुए जो कि ध्वनि की सत्ता के स्वीकार करने में साकी रूप है, स्वयं ही निरस्त हो जाते हैं । अतएव मुख्यार्थबाध होने से और उपचारों में निमित्त तथा प्रयोजन की सत्ता से यह अभेदोपचार ही है । इससे अतिशयोक्कि का व्यंग्यत्व सिद्ध हो जाता है । जो कि दूसरे अलंकारों का स्वीकार करना कहा गया है वही तीन प्रकार से विमक्त करते हैं—‘और उसका’ यह । ‘वाच्यत्व के द्वारा’ यह । वह
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तृतीय
उद्योत:
भी वाच्या होती है। जैसे—‘यह अन्य ही यहाँ कौन हैं’ यह। यहाँ रूपक में भी अतिशयता शब्द का स्पर्श करनेवाली ही है। इस त्रिविधता का विषय विभाग बतलाते हैं—‘उसमें यह। अर्थात उन प्रकारों के मध्य में जो पहला प्रकार उसमें।
वक्रोक्ति और गुणीभूतव्यङ्ग्य
तारावती—(प्रश्न) आपकी यह स्थापना कैसे विश्वसनीय हो सकती है कि सभी अलंकारों में अतिशयोक्ति व्यंग्य के रूप में अन्तर्निहित रहती है ? भामह ने अतिशयोक्ति को सभी अलंकारों का सामान्य रूप माना है। सामान्य कभी भी व्यंग्य नहीं कहा जा सकता। व्यंग्य और सामान्य में यह अन्तर है कि व्यंग्य में पहले तो शब्द से वाच्यार्थ का बोध होता है; फिर बाद में शब्द से ही पृथक् रूप में व्यंग्यार्थ का बोध होता है। किन्तु सामान्य-विशेष के विषय में यह नियम लागू नहीं होता। सामान्य और विशेष दोनों की प्रतीति एक साथ होती है; आगे पीछे नहीं। साथ ही सामान्य-विशेष दोनों की प्रतीति एकसाय एकरूप में होती है पृथक् रूप में नहीं। (जैसे ‘यह देवदत्त है’ इस वाक्य में देवदत्त का एक अर्थ है एक विशेष व्यक्ति और सामान्य अर्थ है मनुष्यत्व। मनुष्यत्व और विशिष्ट व्यक्तियों का एक साथ एक ही रूप में बोध होता है। न तो यहाँ प्रतीत होता है कि मनुष्यत्व और है तथा विशिष्ट व्यक्ति और है और न यही होता है कि पहले विशिष्ट व्यक्ति का बोध हो और बाद में मनुष्यत्व का)। आशय यह कि व्यङ्ग्यत्व का पूर्वापर्य तथा पृथक्रूपता सामान्य-विशेष भाव में लागू नहीं होते। अतिशयोक्ति और दूसरे अलंकारों का भी सामान्य-विशेष भाव सम्बन्ध है। अन्य अलंकार विशेष होते हैं और अतिशयोक्ति सामान्य। फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि अन्य अलंकारों में भी अतिशयोक्ति व्यंग्य रूप में सन्निहित रहती है ?
(उत्तर) भामह का आशय यह नहीं है कि अतिशयोक्ति सामान्य रूप है अन्य अलंकार विशिष्ट रूप। भामह के मत में भी अतिशयोक्ति एक स्वतन्त्र अलंकार है तथा दूसरे अलंकार भी अपनी स्वतन्त्र सत्ता रखते हैं। अतिशयोक्ति तथा अन्य अलंकारों का अभेद सम्बन्ध औपचारिक (लाक्षणिक) है। भामह ने यह कहा है—‘जिस अतिशयोक्त का लक्षण किया गया है वही सब वक्रोक्ति है अर्थात् सभी अलंकारों के प्रकार वह अतिशयोक्त ही हैं; क्योंकि इससे अर्थ रमणीयता को प्राप्त कराया जाता है; कवि को चाहिये कि इस अतिशयोक्ति की योजना को ही चेष्टा करे क्योंकि कोई अलंकार अतिशयोक्ति के बिना हो ही नहीं सकता।’
(भामह का परिलक्षित पाठ ‘सैषा सर्वत्र वक्रोक्तिः’ है। यही भामह की समस्त उपलब्ध प्रतियों में पाया जाता है और इसी को अन्य आचार्यों ने भी उद्धृत किया है। किन्तु यहाँ पर आनन्दवर्धन ने ‘सैषा सर्वव वक्रोक्तिः’ पाठ रखा है और उसी के आधार पर व्याख्या भी की है। अतः आनन्दवर्धन और अभिनवगुप्त का सम्मत पाठ ‘सैषा सर्वत्र वक्रोक्तिः’ ही ठहरता है।) यहाँ पर वक्रोक्ति का अर्थ किया गया है सभी अलंकार। भामह ने स्वयं ही कहा है—‘वाच्य और शब्द की वक्र उक्ति ही वाणी का अभीष्ट अलंकार है।’
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वकता शब्द का अर्थ है लोकोत्तर रूप में अवस्थित होना। यह लोकोत्तर रूप में अवस्थान शब्द का भी हो सकता है और अर्थ का भी हो सकता है। इसीलिये शब्द की वकता और अर्थ की वकता पर पृथक-पृथक विचार किया जाता है। आशय यह है कि अलंकार का अलंकारत्व इसी में है कि शब्द और अर्थ की स्थिति लोकसामान्य रूप में न होकर लोकोत्तर रूप में हो। लोकोत्तर होना ही अतिशय का अर्थ है। इस प्रकार अतिशयोक्ति सभी अलंकारों में सामान्य रूप में विद्यमान रहती है। सभी अलंकारों के मूल में अतिशयोक्ति के वर्तमान रहने का कारण यह है कि जो अर्थ सभी लोग सर्वदा प्रयुक्त करते रहते हैं और सभी के उपभोग के कारण जो अर्थ पुराना पड़ जाता है तथा अपना आकर्षण खो देता है उस अर्थ में भी यह अतिशयोक्ति नवीनता का संचार कर देती है और अतिशयोक्ति के समावेश से वह पुराना अर्थ भी विचित्र मालूम पड़ने लगता है जिससे उस अर्थ में एक आकर्षण उत्पन्न हो जाता है। इस अतिशयोक्ति का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य यह होता है कि जगत की प्रमदा उद्यान इत्यादि सामान्य वस्तुओं को भावोद्बावक बनाकर उन्हें विभावरूपता प्रदान कर देती है जिससे उन वस्तुओं के प्रति एक अनुराग जागृत हो जाता है। साथ ही विशेष रूप से भावित करती है अर्थात् रसमय बनाती है।
(भामह ने कहा था 'अनया अर्थः विभाव्यते'। यहाँ पर 'विभाव्यते' के लोचनकार ने ३ अर्थ किये हैं—(१) 'वि' अर्थात् विचित्र रूप में 'भाव्यते' अर्थात् भावित जाता है। (२) विभावता को प्राप्त कराया जाता है और (३) 'वि' अर्थात् विशेष रूप में भावमय बनाया जाता है (अर्थात् रसमय कर दिया जाता है)। यह है भामह का कथन। इसमें कहा गया है कि 'अतिशयोक्ति ही वक्रोक्ति (सर्वालंकाररूप) है। यहाँ पर शुद्ध सारोपा लक्षणा मानी जानी चाहिये जैसे 'आयुषृृतम्' में घी आयुवृद्धि का कारण होता है किन्तु उनमें अभेद सम्बन्ध स्थापित करके 'आयु ही घी है' इसका प्रयोग कर दिया जाता है। यही बात यहाँ पर भी है कि अतिशयोक्ति ही वक्रोक्तिता (सामान्य अलंकार) है। यहाँ पर भेद होते हुए भी अभेद की स्थापना की गई है। अतः यह लक्षणिक प्रयोग है। निष्पाद्य-निष्पादक भाव सम्बन्ध है। अतिशयोक्ति निष्पादक होती है; अन्य अलंकार निष्पाद्य। अतिशयोक्ति जिस अलंकार की पोषिका बनकर उसपर अधिष्ठित हो जाती है उसी अलंकार में रमणीयता आ जाती है। जिसकी पोषिका अतिशयोक्ति नहीं होती वह अलंकार मात्र हो रह जाता है अर्थात् उसमें अलंकार की जातीयता तो आ जाती है किन्तु उसका मूलतत्व रमणीयता नहीं आती। इसमें एक शर्त और है कि अतिशयोक्ति की योजना कवि-प्रतिभा से होनी चाहिये। यदि कवि-प्रतिभा से उसकी योजना नहीं होती तो कोई भी अलंकार अलंकार नहीं बनता। कहने का आशय यह है कि अन्य अलंकारों की भी स्वतन्त्र सत्ता विद्यमान है ओर अतिशयोक्ति भी स्वतन्त्र होती है। दोनों में अभेद या तादात्म्य की स्थापना को लक्षणा के द्वारा सम्पादित किया जाता है लक्षणा का निमित्त यह है कि अतिशयोक्ति में ऐसी योग्यता विद्यमान होती है जिससे वह अन्य अलंकारों की निष्पादिका बन सके तथा अन्य अलंकारों का रूप धारण कर सके। लक्षणा का प्रयोजन यह है कि अतिशयोत्पन्न किसी भी अलंकार में चमत्कार का सम्पादन कर देती है अन्यथा अलंकार अलंकार ही नहीं बन पाते।
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'अतिशयोक्ति ही वक्रोक्ति (सामान्य अलङ्कार) है' । यह लक्षण में तीन शर्तें होती हैं—मुख्यार्थबाध, निमित्त और प्रयोजन । ऊपर निमित्त और प्रयोजन दिखलाये जा चुके । अब मुख्यार्थबाध को भी समझ लीजिये—अतिशयोक्ति सामान्य अलङ्कार नहीं हो सकती क्योंकि यदि उसे सब अलङ्कारों का सामान्यरूप कहा जायगा तो उसका अलङ्कारों से तादात्म्य हो जायगा और उससे भिन्न कोई अलङ्कार ही न रह जायगी । ऐसी दशा में अतिशयोक्ति ही अलङ्कार कहलाने लगेगी; अलङ्कारों की योजना में कवि-प्रतिभा की आवश्यकता ही न रह जायगी । साथ ही उससे भिन्न कोई सामान्य अलङ्कार रह हो नहीं जायगा । यदि कहो कि अतिशयोक्ति ही काव्य का जीवन मानी जाती है और आचार्यों का मततव्य उसे काव्यजीवन मानना ही है तो यदि अतिशयोक्त अनौचित्यपूर्ण होगी तो भी वह काव्यजीवन बन जायेगी ।
यदि इस दोष को मिटाने के लिये यह माना जाय कि वह अतिशयोक्ति काव्यजीवन हो सकती है जो औचित्य के साथ निबद्ध की जाय तब तो हमारा कथन ही सिद्ध हो गया कि रस और भाव ही काव्य का जीवन होते हैं । क्योंकि केवल रस और भाव की ध्वनियाँ ही वह तत्त्व हैं जिनको दृष्टिगत रखते हुए औचित्य का निर्णय किया जाता है । औचित्य और कोई वस्तु नहीं है; वह तो केवल रस और भाव के अनुकूल रचना का ही दूसरा नाम है । रस और भाव अन्तर्यामी तत्त्व है । अतः उन्हें छोड़कर औचित्य और होगा ही क्या ? अतः रस और भाव को ही काव्य का जीवन मानना चाहिये । इससे उन लोगों को भी उत्तर मिल गया जो यह कहते थे कि जब हम काव्य मानते ही ऐसे शब्द- अर्थ के समूह को हैं जिनकी संघटना औचित्य के साथ की गयी हो; इस प्रकार हमने औचित्य के सिद्धान्त को मान ही लिया तब ध्वनि को नई कल्पना की क्या आवश्यकता और उसमें भी ध्वनि को आत्मा मान लेना कहाँ तक ठीक है ? जो लोग ऐसा कहते हैं उनसे तो हमारा निवेदन बस इतना ही है कि आपके वचनों से ही ध्वनि की सत्ता सिद्ध हो जाती है । इसके लिए हमें पृथक् रूप में किसी साक्षी के अन्वेषण की आवश्यकता नहीं । आपके वचन ही इस दिशा में साक्षी का काम देते हैं । आप औचित्य को मानते हैं । औचित्य कभी भी रस और भाव से व्यतिरिक्त नहीं होता और रस और भाव सदा ध्वनित ही होते हैं । इस प्रकार औचित्य को मान लेना ही ध्वनि को मानने के लिये पर्याप्त है । ऊपर जो कुछ कहा गया है उसका सार यहीं है कि काव्य की आत्मा ध्वनि ही होती है न तो औचित्य के साथ निबद्ध अतिशयोक्ति ही काव्य की आत्मा हो सकती है और न केवल अतिशयोक्ति काव्य की आत्मा हो सकती है । अतिशयोक्ति का अलङ्कारों से तादात्म्य भी नहीं हो सकता और न वह अलङ्कार का सामान्यरूप ही हो सकता है। इस प्रकार यह कहना किसी प्रकार भी सङ्गत नहीं हो सकता कि 'अतिशयोक्ति ही वक्रोक्ति है' । अतः इस कथन का बाध हो जाता है । निमित्त और प्रयोजन तो पहले ही दिखलाये जा चुके हैं ।
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३९८ करती है और इस प्रकार गुणीभूत व्यङ्गच का रूप धारण कर लेती है। यहाँ पर यह भी समझ लेना चाहिये कि अतिशयोक्ति किस प्रकार दूसरे अलंकारों का अङ्ग बनती है? दूसरे अलंकारों से इसका सङ्कर तीन रूपों में होता है—(१) कभी-कभी यह अतिशयोक्ति वाच्य अलंकारों से इसका सङ्कर तीन रूपों में होता है। जैसे 'लावण्यसिन्धुरपररत्नं हि केयमत्र' इत्यादि पद्य में रूपकातिशयोक्ति अलंकार है क्योंकि केवल उपमानों का ही उपादान किया गया है उपमेयों का नहीं। उस रूपकातिशयोक्ति को 'यह कोई दूसर ही कौन है?' यह कहकर वाच्य बना दिया गया है यह मार्ग वाच्यालंकार का है (२) कभी-कभी अतिशयोक्तिव्यङ्गच होती है और उस व्यङ्गच की ही वहाँ पर प्रधानता होती है। ऐसे अवसर पर ध्वनि कही जाती है। और (३) कभी-कभी अतिशयोक्ति वाच्य होकर दूसरे अलंकारों के प्रति गौण हो जाती है। यह दशा गुणीभूतव्यङ्गच की होती है। (अतिशयोक्ति ध्वनि के उदाहरण के लिये अभिनवगुप्त का ही बनाया हुआा 'केलिकलितस्य विभ्रमाङ्गैः-----त्वमेका कृति:' इत्यादि पद्य उद्धृत किया जा सकता है। इसकी विस्तृत व्याख्या द्वितीय उद्योत की २७वीं कारिका में की जा चुकी है। गुणीभूत अतिशयोक्ति का उदाहरण 'उपोद्घारेण विलोलतारकम्' इत्यादि पद्य है जिसकी व्याख्या प्रथम उद्योत की १३वीं कारिका में की जा चुकी है।)
(ध्वन्यालोकोऽयं च प्रकारोऽन्येषां चमत्कारकारणमस्ति तेऽपि तु न सर्वविषयाः । येषु चालङ्कार्येवातिशयोक्तिस्तु सङ्केतितोऽपि सम्भवति। तत्र यथा हृदयकम्पमातुल्ययोगितानिदर्शनादिषु तेषु गम्यमानसादृश्यमुखेन तत्त्वप्रतिलम्भः । यथा हपकोपमातुल्ययोगितानिदर्शनादिषु तेषु गम्यमानसादृश्यमुखेन तत्त्वप्रतिलम्भः । यथा हपकोपमातुल्ययोगितानिदर्शनादिषु तेषु गम्यमानधर्ममुखेनैव यत्सादृश्यं तदेव शोभातिशयशाली भवतीति ते सर्वेऽपि चारुत्वातिशययोगिनः सन्तो गुणीभूतव्यङ्गचस्यैव विषयाः । समासोक्त्याक्षेपपर्यायोक्तादिषु तु गम्यमानांशाविनाभावेनैव तत्त्वव्यवस्थानाद्गुणीभूतव्यङ्गयता निविवादैव । तत्र च गम्यमानांशाविनाभावेनैव तत्त्वव्यवस्थानाद्गुणीभूतव्यङ्गयता निविवादैव । तत्र च गुणीभूतव्यङ्गचप्रतायामलोडराणां केषाञ्चिद्रलङ्कारविरोधगर्भतायां नियमः । यथा व्याजस्तुतेः । केषाञ्चिद्रलङ्कारविरोधगर्भतायां नियमः । यथा सन्देहादीनामुपमागर्भत्वे । केषाञ्चिद्रलङ्कारविरोधगर्भतायां नियमः । यथा सन्देहादीनामुपमागर्भत्वे । केषाञ्चिद्रलङ्कारविरोधगर्भतायां नियमः । यथा सन्देहादीनामुपमागर्भत्वे । केषाञ्चिदलङ्काराणां परस्परगर्भतापि सम्भवति । यथा दीपकस्य । तत् दीपकमुपमागर्भत्वेन प्रसिद्धम् । उपमापि कदाचिद्दीपकच्छाया-नुकारिणी । यथा मालोपमा । तथा हि 'प्रभामहत्यां शिखयेद दीपम्' इत्यादौ स्फुटेव दीपकच्छाया लक्ष्यते ।
(अनु) और यह प्रकार और अलंकारों के लिये भी है। किन्तु उनकी सर्वविषयता नहीं होती। अतिशयोक्ति की तो सर्वालंकारविषयता भी सम्भव है, यह विशेषता है। और जिन अलंकारों में सादृश्य के द्वारा स्वरूपप्राप्ति होती है जैसे रूपक, उपमा, तुल्ययोगिता, निदर्शना इत्यादि में, उनमें गम्यमान धर्म के द्वारा ही जो सादृश्य वहाँ अतिशय शोभाशाली होता है इस प्रकार वे सब अतिशय चारुता से युक्त होकर गुणीभूतव्यङ्गच का ही विषय होते हैं। समासोक्त, आक्षेप और पर्यायोक्त इत्यादि में प्रतीमान अंश के अविनाभाव (अनिवार्यसत्ता) में ही स्वरूप की व्यवस्था होने से गुणीभूतव्यङ्गच होने में कोई विवाद नहीं रहता। और उस गुणीभूतव्यङ्गचता में कुछ अलंकारों में विशिष्ट अलंकारों के गर्भित होते का नियम है। जैसे व्याजस्तुति की प्रयोज्यलङ्कारगर्भता का नियम है। कुछ का केवल अलंकार की गर्भता है।
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तृतीय उद्योत:
का ही नियम है। जैसे सन्देहादिकों की उपमार्गमता में। कुछ अलंकारों की परस्पर गर्मता भी सम्भव है। जैसे दीपक और उपमा की। उसमें दीपक उपमार्मत्व के रूप में प्रसिद्ध है। उपमा भी कदाचित् दीपक की छाया की अनुयायिनी होती है। जैसे मालोपमा। वह इस प्रकार—‘प्रभा से महती शिखा से दीपक के समान’ इत्यादि में दीपक की छाया स्फुटरूप में ही लक्षित होती है।
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तृतीय उद्योत:
(श्लो०) नन्वतिशयोक्तिरेव चेदेवभूता तत्त्किमपेक्षया प्रथमा तावदिति क्रमः सूचित इत्याशङ्क्याह—अयं चेतिति। यदतिशयोक्तौ निरुपितोज्ज्वलद्रारान्तरेऽनुप्रवेशात्मकः॥
३
तृतीय उद्योत:
नन्वेवमपि प्रथममिति केनाशयेनोक्तमित्याशङ्क्याह—तत्रैवमिति। एवमलङ्कारेषु तावद्गुण्यसस्पर्शोज्ज्वस्तीत्युक्त्या तत्किं व्यङ्ज्यत्वेन भातित्वं विभागं व्युत्पादयति—येषु चेति। रूपकादीनां पूर्वमेवोक्तं स्वरूपम्। निदर्शनायास्तु ‘क्रिययैव तदर्थस्य विशिष्टस्योपदर्शनम्’ इष्टं निदर्शने’ति। उदाहरणम्—
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तृतीय उद्योत:
अयं मनद्युतिभास्वानस्तं प्रतियियासति। उदयः पतनायैति श्रीमती बोधयन्त्रान्त्रान्॥ प्रेयोलङ्कारेतिति।
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तृतीय उद्योत:
चाटुपर्यवसायित्वात्तस्या: सा चोदाहतैव द्वितीयोद्द्योतस्माभिः। उपमार्मत्वं इत्युपमाशब्देन सर्व एव तद्विशेषा रूपकादयः, अथवौपम्यं सर्वसामान्यमिति तेन सर्वमाक्षिप्तमेव। स्फुटैवैति। ‘तथा स पुत्रच विभूषितरुच’ इत्येतद्दीपस्थानीयेन दीपनादौपक्रमानुप्रविष्टं प्रतीममानतया, साधारणधर्माभिधानं हेतदुपमायां स्पष्टेनाभिधाप्रकारेणैव॥
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तृतीय उद्योत:
(अनु०) (प्रश्न) यदि अतिशयोक्त ही इस प्रकार की है तो किसकी अपेक्षा ‘पहले तो’ कहकर क्रम सूचित किया है? यह शंका करके उत्तर देते हैं—‘और यह’ इत्यादि। जो अतिशयोक्ति में दूसरे अलंकारों से अनुप्रवेश रूप प्रकार निरूपित किया गया है वह
३
तृतीय उद्योत:
(प्रश्न) इस प्रकार भी ‘पहले’ यह किस अभिप्राय से कहा गया? यह शंका करके कहते हैं—‘उनका’ यह। इस प्रकार अलंकारों में व्यंग्यसस्पर्श तो होता है। इस उचित से वहाँ पर व्यंग्य के रूप में क्या प्रतीत होता है इत्यादि। इस विभाग का व्युत्पादन करते हैं—‘और जिनमें’ इत्यादि। रूपक इत्यादि का स्वरूप पहले ही बता दिया गया। निदर्शना का तो—‘क्रिया के द्वारा ही उस ही विशिष्ट अर्थ को दिखलाना’ निदर्शना मानी जातीं है’ यह स्वरूप है। उदाहरण—
३
तृतीय उद्योत:
‘मन्द प्रकाशवाला यह सूर्य उदय पतन के लिए ही होता है यह श्रीमान् व्यक्तियों को बतलाते हुये अस्ताचल की ओर जा रहा है’ प्रेयोलङ्कार यह। क्योंकि उसका पर्यवसान चाटूवित में होता है। उसका तो उदाहरण द्वितीय उद्योत में हमने दे ही दिया। ‘उपमार्मत्व’ इसमें उपमाशब्द से रूपक इत्यादि उसके सब विशेष ले लिये जाते हैं। अथवा औपम्य सर्वसाधारण है। उससे तो सभी आक्षिप्त ही हो जाता है। ‘स्फुट ही है’ यह। ‘उसके द्वारा वह पवित्र भी हुआ और विभूषित भी’
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दीपस्थानीय इस कथन के द्वारा दीपन करने से प्रतীয়मान के रूप में दीपक यहाँ अनुप्रविष्ट हुआ है। यह साधारण धर्म का अभिधान इस उपमा में अभिधा प्रकार के द्वारा ही है।
तारावती—( प्रश्न ) अतिशयोक्त सभी अलंकारों में सामान्यतः व्यंग्य मानी जा सकती है। किन्तु यह एक ही अलंकार तो ऐसा है जो गुणीभूतव्यंग्य होकर दूसरे अलंकारों में रमणीयता की अभिवृद्धि करता है। फिर इस प्रकरण के आरम्भ में यह कहा गया था कि 'पहले तो अतिशयोक्ति ही व्यंग्य होती है !' यहाँ पर 'पहले तो' का क्या अर्थ है?
इस कथन से ऐसा मालूम पड़ता है कि दूसरे अलंकार भी ऐसें होते हैं जो गुणीभूत होकर दूसरे अलंकारों का पोषण करते हैं। वे दूसरे अलंकार कौन हैं ?
( उत्तर ) अतिशयोक्त के विषय में इस प्रकार का निरूपण किया गया था वह दूसरे अलंकारों में अनुप्रविष्ट होकर उनका पोषण करती है। यह बात दूसरे अलंकारों के विषय में भी लागू होती है।
( प्रश्न ) यदि सभी अलंकार दूसरे में अनुप्रविष्ट हो सकते हैं तो अतिशयोक्त को प्राथमिकता क्यों प्रदान की गई और 'पहले तो' यह इस रूप में क्यों कहा गया मानों अतिशयोक्त में कोई विलक्षणता हो तथा उसका अन्य अलंकारों से सन्निवेश असंभाव्य हो ?
( उत्तर ) निस्संदेह अन्य अलंकारों की अपेक्षा इस दिशा में अतिशयोक्ति में कुछ विलक्षणता अवश्य होती है। अन्य अलंकार भी दूसरे अलंकारों में अनुप्रविष्ट होकर उनका पोषण करते हैं किन्तु अतिशयोक्त सभी अलंकारों में सन्निविष्ट हो जाती है; अन्य अलंकार सभी में सन्निविष्ट नहीं हो सकते।
यही इन दोनों में अन्तर है और इसी लिये अतिशयोक्ति को प्राथमिकता दी गई है। यहाँ तक यह बताया जा चुका है कि एक अलंकार भी दूसरे अलंकार का पोषक हो सकता है और यह पोषण व्यंग्य के रूप में ही होता है।
अब यहाँ पर दिखलाया जा रहा है कि अलंकारों में व्यंग्य अलंकार का स्पष्ट किस प्रकार होता है जिससे व्यंग्य अलंकार गुणीभूत होकर दूसरे अलंकार का पोषण कर सके।
पहले सादृश्यमूलक अलंकारों को लीजिये—रूपक, उपमा, तुल्ययोगिता, निदर्शना इत्यादि जितने भी सादृश्यमूलक अलंकार होते हैं उनमें सादृश्य या उपमानोपमेय भाव व्यंग्य होता है किन्तु रमणीयता का रहता है।
इन सब अलंकारों में सादृश्य की अभिव्यक्ति तो होती है किन्तु अलंकारों की अपनी-अपनी विशेषताओं पर्यवसान उस व्यंग्य सादृश्य में नहीं होता।
किन्तु रमणीयता का पर्यवसान होता है। जैसे रूपक में सादृश्य की अभिव्यक्ति तो होती है में ही सन्निहित रहती हैं जो कि रूपक की अपनी विशेषता है।
किन्तु रमणीयता भेदस्थगन में ही सन्निहित रहती है। अतएव कहा जा सकता है कि रूपक में व्यंग्य सादृश्य केवल रूपक का सहायक हो जाता है।
सर्वत्र उपमा व्यंग्य होती है किन्तु वह गुणीभूत होकर रूपक को प्रघानता प्रदान कर देती है।
यही बात दूसरे भी सादृश्यमूलक अलंकारों के विषय में समझनी चाहिये। प्रस्तुत रचना के पिछले प्रसंगों में रूपक, उपमा और तुल्ययोगिता के स्वरूप और उनके उदाहरणों पर यथार्थतः विचार किया जा चुका है। केवल निदर्शना शेष रह जाती है जिसपर अबतक विचार नहीं किया गया है।
निदर्शना का लक्षण यह है—
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३
तृतीय उद्योतः
'निर्देशना उसे कहते हैं जिसमें किसी विशिष्ट अर्थ को क्रिया के द्वारा दिखलाया जाये ।' उदाहरण—
'सूर्य का प्रकाश मन्द पड़ गया है और अब यह अस्ताचल की ओर जाने का विचार कर रहा है । यह सम्पत्तिशालियों को शिक्षा दे रहा है कि संसार में सभी का उदय पतन के लिये ही होता है ।'
३
तृतीय उद्योतः
यहाँ पर सूर्य अपने क्रियाकलाप के द्वारा श्रीमानों को उपदेश दे रहा है । अतः यह नर्देशना अलंकार है । इससे इस सादृश्य की व्यञ्जना होती है कि जिस प्रकार सूर्य का उदय पतन के लिये ही होता है उसी प्रकार श्रीमानों का उदय भी पतन के लिये ही होता है । यहाँ पर यह सादृश्य की व्यञ्जना चमत्कारपर्यवसायिनी नहीं है; चमत्कार तो क्रिया के माध्यम से सूर्य के उपदेश में ही है ।
अतः व्यंग्य सादृश्य गौण होकर वाच्य निर्देशना का पोषक होकर गुणीभूत हो गया है । इसी प्रकार सादृश्यमूलक अन्य अलंकारों के विषय में भी समझना चाहिये ।
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तृतीय उद्योतः
(यहाँ पर व्यंग्य सादृश्य में उपमा का भी उल्लेख किया गया है । किन्तु उपमा में सादृश्य व्यंग्य नहीं अपितु वाच्य ही होता है । तथापि कुछ उपमायें ऐसी अवश्य होती हैं जिनमें सादृश्य व्यंग्य ही होता है जैसे आर्थी उपमा के भेद, वाचकलुप्ता उपमा, वाचकधर्मलुप्ता उपमा इत्यादि ।
उपमा के उन्हीं भेदों को दृष्टिगत रखते हुये व्यंग्य-सादृश्य में उपमा का उल्लेख भी कर दिया गया है ।) कुछ अलंकार ऐसे होते हैं जिनका मूलाधार ही व्यंग्यार्थ होता है ।
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तृतीय उद्योतः
वस्तु व्यञ्जना को लेकर ही उन अलंकारों की प्रवृत्ति हुआ करती है । इस प्रकार के अलंकारों में हैं समासोक्ति, व्याजस्तुति, पर्यायोक्त इत्यादि ।
इनमें व्यंग्यार्थ गौण होकर वाच्य चमत्कार का ही पोषण करता है ।
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तृतीय उद्योतः
अतः इनमें भी व्यंग्य गुणीभूत हो जाता है । इनका विस्तृत विवेचन प्रथम उद्योत में ध्वनिनिष्ठापन के प्रकरण में किया जा चुका है । वहीं देखना चाहिये ।
इस प्रकार यह बात तो निर्विवाद सिद्ध ही है कि समासोक्ति इत्यादि अलंकार भी व्यंग्यार्थमूलक ही होते हैं और उनका आधार भी गुणीभूत व्यंग्य ही होता है ।
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तृतीय उद्योतः
गुणीभूत व्यंग्य अलंकारों को तीन प्रकार से कृतार्थ करता है—(१) कुछ अलंकार ऐसे होते हैं जिनमें कोई विशेष अलंकार ही गुणीभूत रूप में गभित रहता है ।
उदाहरण के लिये व्याजस्तुति में प्रेयोलंकार नियमितः गभित रहता है ।
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तृतीय उद्योतः
२६
'हे राजन् ? जो लोग दूसरों के अनुरोध को ठुकराने के लिये सर्वथा रिक्तहृदय हो गये हैं उनमें आपसे बढ़कर अन्य कोई स्फूर्तिन्य नहीं है और लक्ष्मी से बढ़कर कोई निर्लज्ज नहीं है ! लक्ष्मी आप की शरण में आई और वह आपका सहारा चाहती है किन्तु आप सैकड़ों मार्गों से उसका अतिमात्र में त्याग ही किये जा रहे हैं ।
अतः ज्ञात होता है कि आपको
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शरणागत की रक्षा का कोई ध्यान ही नहीं । उधर लक्ष्मी इतनी निर्लज्ज है कि आप उसको कितना ही ठुकरायें और अपमानित करें किन्तु वह रहेगी तुम्हारे ही पास । यहाँ पर राजा की निन्दा की गई है जो राजा की दानशीलता और सम्पन्नतारूप प्रशंसा में पर्यवसित होती है । अतः यहाँ पर व्याजस्तुति अलङ्कार है । व्याजस्तुति में प्रेयोलङ्कार सर्वदा गर्भित रहता है । प्रेयोलङ्कार उसे कहते हैं जहाँ भावव्यञ्जना किसी अन्य तत्व की सहायता होकर आती है । मान लीजिये कोई कवि राजा की प्रशंसा में ऐसी बात कहता है जिसका वाच्यार्थ निन्दापरक होता है तो उस व्याजस्तुति में कविगत राजविषयक रतिभाव व्यंग्य रहता है जोकि भावव्यञ्जना के क्षेत्र में आता है । इस प्रकार व्याजस्तुति में चाटुकारिता के गर्भित रहने के कारण व्याजस्तुति में पोषक रूप में प्रेयोलङ्कार सर्वदा सन्निहित रहता है ।
(२) दूसरा प्रकार यह होता है कि कुछ अलंकारों में सामान्य अलंकार पोषक रूप में सन्निहित रहता है । जैसे सन्देह अलङ्कार में उपमा गर्भित रहती है । (सन्देह का उदाहरण काव्यप्रकाश में यह दिया गया है—
'हे राजन् ? तुम्हें युद्धभूमि में देखकर तुम्हारे विपक्षी योद्धा इस प्रकार संकल्प-विकल्प किया करते हैं कि 'क्या यह सूर्य है? किन्तु वह तो सात घोड़ों के रथपर चलता है ! तो क्या यह अग्नि है ? किन्तु इसका विस्तार तो निश्चित रूप से सब दिशाओं की ओर नहीं हो रहा है । तब क्या यह यम है ? किन्तु वह तो साक्षात् महिषवाहन है ।'
यहाँ पर संशयात्मक प्रतीति के स्वरूप के साथ सादृश्य की व्यञ्जना होती है कि राजा सूर्य के समान दुर्निरीक्ष्य है, अग्नि के समान तेजस्वी है और यमराज के समान संहारक है । इस प्रकार ससन्देह अलङ्कार में उपमा व्यंग्य रहती है । यद्यपि यहाँ पर भी उपमा को गर्भित कहा गया है और उपमा भी एक विशिष्ट अलङ्कार है । अतः सन्देह भी विशिष्ट अलङ्कार को गर्भित करता है सामान्य अलङ्कार को नहीं । अतः इसको भी प्रथम कोटि में ही रखना चाहिये । किन्तु उपमा शब्द से उसकी समस्त विशेषतायें ला जाती हैं । इसमें रूपक भी गर्भित माना जा सकता है (अपह्नुति भी, व्यतिरेक भी । जैसे उक्त उदाहरण में 'यह राजा सूर्य है । यह रूपक; 'यह राजा नहीं है सूर्य है' यह अपह्नुति । 'राजा की अपेक्षा सूर्य विशेष है' यह व्यतिरेक ।
इस प्रकार प्रायः सभी सादृश्यमूलक अलङ्कार गर्भित हो जाते हैं । अथवा औपम्य सर्वसामान्य अलङ्कार है । इस दृष्टि से कह दिया गया है कि कभी-कभी सामान्य अलङ्कार भी दूसरे अलङ्कार में गर्भित होता है । (३) कभी-कभी अलङ्कार एक दूसरे में गर्भित होते हैं । जैसे दीपक में उपमा गर्भित होती है और उपमा में दीपक गर्भित होता है । (दीपक का उदाहरण—
'कृपणानां धने नागानां फणमणिः केसराः सिंहानाम् । कुलबालिकानां स्तना: कुत: स्पृश्यन्तेऽमृतानाम् ॥'
'कृपणों के धन, नागों की फणमणि, सिंहों के केसर और कुलबालिकाओं के स्तन मृत्यु के पहले कहाँ स्पष्ट किये जाते हैं ?'
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तृतीय
उद्योत:
यहाँ कुलबालिकाओं के स्तन प्रस्तुत है और कृपनों के घन, नागों की फणमणि और सिंहों के केसर ये अप्रस्तुत हैं। इनका स्पर्श न किया जा सकना रूप एक क्रिया में अन्यय होता है। अतः यह दीपक अलंकार है। इसमें उपमा व्यंग्य है—जिस प्रकार कृपनों के घनों का, नागों की फणमणियों का और सिंहों के केसरों का मृत्यु के पहले स्पर्श असम्भव है उसी प्रकार कुलबालिकाओं के स्तनों का भी मृ़त्यु के पहले स्पर्श असम्भव है। यह तो हुई दीपक में उपमा के गर्भित होने की बात। उपमा में भी कभी-कभी दीपक गर्भित होता है और उसमें भी दीपक की रमणीयता पाई जाती है। उदाहरण जैसे कुमारसम्भवम् में पार्वती से हिमालय की शोभा बढ़ाने के विषय में लिखा है—
तृतीय
उद्योत:
प्रभामहत्या शिखयेब दीपकस्त्रिमार्गयेब त्रिदिवस्य मार्गः। संस्कारवयेक गिरा मनीषी तथा स पूतश्च विभूषितश्च॥
'जिस प्रकार प्रभा से बढ़ी हुई शिखा से दीपक की शोभा होती है; जिस प्रकार आकाशमार्गि त्रिपथगा गङ्गा जी से पूत होता है और जिस प्रकार संस्कारवती वाणी से मनीषी पवित्र होता है।' उसी प्रकार उमापार्वती से वह हिमालय पवित्र भी हुआ और विभूषित भी।
तृतीय
उद्योत:
यहाँ पर मालोपमा है। मालोपमा में स्पष्ट रूप से साधारण धर्म का अभिधान किया जाता है और उस साधारण धर्म से सभी उपमायें जुड़ जाती हैं। जैसे उक्त उदाहरण में ही 'पूत' और 'विभूषित' होना साधारण धर्म है जिसका प्राक्कथन चतुर्थ पद में किया गया है। उसी से दीपशिखा इत्यादि सभी का सम्बन्ध हो जाता है। दीपक में भी यही होता है। जिस प्रकार दीपक एक स्थान पर रखा जाकर बाहर और भीतर दोनों ओर प्रकाश फैलाता है और दोनों ओर रखी हुई वस्तुओं का साक्षात्कार कराता है उसी प्रकार एक धर्म एक स्थान पर स्थित होकर जब प्रस्तुत और अप्रस्तुत दोनों से सम्बद्ध हो जाता है तब वहीं पर दीपक अलंकार माना जाता है। यहाँ पूत और विभूषित धर्म एक स्थान पर स्थित होकर प्रस्तुत पार्वती और अप्रस्तुत दीप-शिखा दोनों का दीपन करते हैं। अतः यह मालोपमा दीपकच्छायानुग्राहिणी है। दीपक का रूप यह होगा—'महत्या प्रभा से दीपक, त्रिपथगा से आकाश मार्ग, संस्कारवती भारती से मनीषी और पार्वती से हिमालय पवित्र भी हुये और विभूषित भी।' इस भाँति से तीन प्रकार हैं जिनसे एक अलंकार दूसरे में व्यंग्य होकर आता है।
तृतीय
उद्योत:
(ध्वन्या०) तदेवं व्यङ्ग्यांशसंस्पर्शो सति चारुत्वातिशययोगिनो रूपकाद्यो- लड्कारा: सर्व एव गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं मार्ग:। गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं च तेषां तथा- जातीयान्तं सर्वेषामेवोक्तनुकार्थं मालोच्यम्। तल्लक्षणे सर्व एव पदे मुख्यतया भवन्ति। एकैकस्य स्वरूपविशेषकथनेन तु सामान्यलक्षणरहितेन प्रतिपदपाठनेनैव शब्दा न शक्यन्ते तत्वतो निर्ज्ञातुम्, आनन्त्यात्। अनन्ता हि वाच्यविकल्पास्तत्प्रकारा एव चालङ्कारा:। गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य च प्रकारान्तरेणापि व्यड्ग्यार्थानुगमलक्षणेन विषय- त्वमस्येव। तदयं ध्वनिनिष्ठनद्रूपो द्वितीयोऽपि महाकविभिर्विषयोडतिरमणीयो लक्षणीय:
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सहदयैः । सर्वथा नास्येव सहदयहृदयहारिणः काव्यस्य स प्रकारो यत्र न प्रतीयमानार्थसंस्पर्शोन सौभाग्यम् । तदिव काव्यरहस्यं परमिति सूरिभिर्भावनीयम् ।
वह इस प्रकार व्यङ्ग्यांश के स्पर्श होने पर चारुत्वातिशययोगी रूपकादि ( अनु० ) वह इस प्रकार व्यङ्ग्यांश के स्पर्श होने पर चारुत्वातिशययोगी रूपकादि (अलंकारों) का गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व सामान्य (लक्षण) है। उसके लक्षित करने में ये सभी अलंकार गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व सामान्य (लक्षण) से रहित एक-एक के स्वरूप विशेष कथन के द्वारा तो भिन्न होने के कारण (सभी) तात्त्विकरूप में उसी प्रकार नहीं जा सकते जिस प्रकार प्रतिपद पाठ के द्वारा शब्द नहीं जाने जा सकते। वाणी के विकल्प अनन्त होते हैं और उसी के प्रकार अलंकार हैं। गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व की तीन व्यञ्ज्यचार्थानुगमरूप प्रकारान्तर से विषयता है ही। वह इस प्रकार दूसरा भी महाकवियों का विषय अत्यन्त रमणीय होता है जोकि सहृदयों के द्वारा लक्षित किया जाना चाहिये। सर्वथा सहृदयों के सहृदयों को आकृष्ट करने वाले काव्य का वह प्रकार नहीं है जहाँ प्रतीयमान अर्थ के संस्पर्श से सौभाग्य नहीं होता। वह यह बहुत बड़ा काव्य का रहस्य है यह विद्वानों को समझ लेना चाहिये।
(लो०)—तथा जातीयानामित्ति । चारुत्वातिशयवता मिल्यर्थः । सुलक्षितेत्यादि । यत्किलैषां तद्विनिमुक्तं रूपं न तत्त्वावेदभ्यर्थनिमित्तम् । उपमा हि ‘यथा गोस तथा गवय’ इत्यादि । रूपकं ‘खलेवालो यूप’ इति । उदाहरणम्—‘दिवंनटनेत्री’ तन्त्रान्तरकम् । यथासंख्यमिति । रूपकं ‘तुदीशालातुरे’ति । दीपकं ‘गामरवम्’ इति । ससन्देहः ‘स्थानुर्वा स्यात्’ इति । तुल्ययोगिता ‘स्याद्वोऽपह्नुतिर्नेदं रजतम्’ इति । पर्यायोक्तं ‘पीनो नितम्बः’ इति । अप्रस्तुतप्रशंसा सर्वाणि ज्ञापकानि यथा पदसंज्ञायामन्तवचनम्—‘अन्यत्र ऋच’ इति । आक्षेपस्य च भाव्यत्र विभाषासु विकल्पात्मकसंज्ञाविधौ प्रत्ययग्रहणे तदन्तविधीन्’ इति । विशेषाभिधित्सया इष्टस्यापि विधे पूर्वनिर्देशनात् प्रतिषेधेन समीकृत इति—न्यायात् । अतिशयोक्तिः ‘समुद्रः कुण्डिका’ ‘विन्ध्यो वर्धितवान् करकर्मग्लृहत्’ इति । एवमन्यत् ।
चारुत्वातिशयवता मिल्यर्थः । सुलक्षितेत्यादि । यत्किलैषां तद्विनिमुक्तं रूपं न तत्त्वावेदभ्यर्थनिमित्तम् । उपमा हि ‘यथा गोस तथा गवय’ इत्यादि । उदाहरणम्—‘दिवंनटनेत्री’ तन्त्रान्तरकम् । यथासंख्यमिति । रूपकं ‘तुदीशालातुरे’ति । दीपकं ‘गामरवम्’ इति । ससन्देहः ‘स्थानुर्वा स्यात्’ इति । तुल्ययोगिता ‘स्याद्वोऽपह्नुतिर्नेदं रजतम्’ इति । पर्यायोक्तं ‘पीनो नितम्बः’ इति । अप्रस्तुतप्रशंसा सर्वाणि ज्ञापकानि यथा पदसंज्ञायामन्तवचनम्—‘अन्यत्र ऋच’ इति । आक्षेपस्य च भाव्यत्र विभाषासु विकल्पात्मकसंज्ञाविधौ प्रत्ययग्रहणे तदन्तविधीन्’ इति । विशेषाभिधित्सया इष्टस्यापि विधे पूर्वनिर्देशनात् प्रतिषेधेन समीकृत इति—न्यायात् । अतिशयोक्तिः ‘समुद्रः कुण्डिका’ ‘विन्ध्यो वर्धितवान् करकर्मग्लृहत्’ इति । एवमन्यत् ।
न चैवमादि काव्योपयोगीति, गुणीभूतव्यङ्गचेत्वात्रालड्कारतायां मम्भूता लक्षण्ते; तान् सुष्टु लक्षणयति । या सुपूर्णा कृतवा लक्षण्ता संग्रहीता भवन्ति, अन्यथा लक्षण्ता तान् सुष्टु लक्षणयति । या सुपूर्णा कृतवा लक्षण्ता संग्रहीता भवन्ति, अन्यथा तत्रविशेषगत्या लिङ्गतदुपमादीनां सामान्यरूपत्वं चारुताहीनानामुपपद्यते, चारुता चैतदायत्तयेतदेव गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं सामान्यलक्षणम् । व्यङ्ग्यस्य च चारुत्वं रसाभिव्यक्तियोग्यतात्मकम्, रसस्य स्वात्मनैव विश्रान्तिधाम्न आनन्दात्मकत्वमिति नानवस्था कार्चिदिति तात्पर्यम् । अनन्ता होति प्रथमोद्योत एव व्याख्यातमेतत् ‘वाग्विकल्पानामनन्त्यात्’ इत्यत्रान्तरे ।
न चैवमादि काव्योपयोगीति, गुणीभूतव्यङ्गचेत्वात्रालड्कारतायां मम्भूता लक्षण्ते; तान् सुष्टु लक्षणयति । या सुपूर्णा कृतवा लक्षण्ता संग्रहीता भवन्ति, अन्यथा लक्षण्ता तान् सुष्टु लक्षणयति । या सुपूर्णा कृतवा लक्षण्ता संग्रहीता भवन्ति, अन्यथा तत्रविशेषगत्या लिङ्गतदुपमादीनां सामान्यरूपत्वं चारुताहीनानामुपपद्यते, चारुता चैतदायत्तयेतदेव गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं सामान्यलक्षणम् । व्यङ्ग्यस्य च चारुत्वं रसाभिव्यक्तियोग्यतात्मकम्, रसस्य स्वात्मनैव विश्रान्तिधाम्न आनन्दात्मकत्वमिति नानवस्था कार्चिदिति तात्पर्यम् । अनन्ता होति प्रथमोद्योत एव व्याख्यातमेतत् ‘वाग्विकल्पानामनन्त्यात्’ इत्यत्रान्तरे ।
ननु सर्वशब्दा डित्कारेपु नालड्कारान्तरं व्यङ्ग्यं चकास्ति; तत्त्कर्थं गुणीभूतव्यङ्ग्येन लक्षितेन सर्वेषां संग्रहः । मैवम्, वस्तुमात्रं वा रसो वा व्यङ्ग्यं सद् गुणीभूतं भविष्पति तदेवाह—गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य चेति । प्रकारान्तरेण वस्तुरसात्मनोपलक्षितस्य । यदि वेन्त्यमवतरर्णिका—ननु गुणीभूतव्यङ्येनालड्कारैः यदि लक्षितास्तर्हि लक्षणं वक्तव्यं किमिति नोक्तमित्याशड्क्याह—गुणीभूतव्यङ्येनालड्कारैः यदि लक्षितास्तर्हि लक्षणं वक्तव्यं किमिति नोक्तमित्याशड्क्याह—गुणीभूतेति । विषयद्वारमिति । रक्ष्योऽयर्वार्गिति यावत् ।
ननु सर्वशब्दा डित्कारेपु नालड्कारान्तरं व्यङ्ग्यं चकास्ति; तत्त्कर्थं गुणीभूतव्यङ्ग्येन लक्षितेन सर्वेषां संग्रहः । मैवम्, वस्तुमात्रं वा रसो वा व्यङ्ग्यं सद् गुणीभूतं भविष्पति तदेवाह—गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य चेति । प्रकारान्तरेण वस्तुरसात्मनोपलक्षितस्य । यदि वेन्त्यमवतरर्णिका—ननु गुणीभूतव्यङ्येनालड्कारैः यदि लक्षितास्तर्हि लक्षणं वक्तव्यं किमिति नोक्तमित्याशड्क्याह—गुणीभूतव्यङ्येनालड्कारैः यदि लक्षितास्तर्हि लक्षणं वक्तव्यं किमिति नोक्तमित्याशड्क्याह—गुणीभूतेति । विषयद्वारमिति । रक्ष्योऽयर्वार्गिति यावत् ।
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तृतीय उद्योतः
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केन लक्षणीयत्वं ध्वनिव्यतिरिक्तो यः प्रकारो व्यङ्ग्यग्यल्वेनार्थानुगामो नाम तदेव लक्षणं तेनेयर्थः। व्यङ्गच्ये लक्षणे तद्गुणीभावे च निरुपिते किमन्यदस्य लक्षणं क्रियतामिति। तात्पर्यम्। एवं ‘काव्यस्यात्मा ध्वनिर्’इति निर्वाह्योपसंहरति—तद्यमित्यादिना सौभाग्यमित्यन्तेन। प्रागुक्तं सकलसक्विकाव्योपनिषद्भूतमिति तत् प्रतारणमात्रमर्थवादरूपं मन्तव्यमिति दर्शयितुम्—तद्विद्यमिति॥३६॥
(अनु०) ‘उस प्रकार की जातिवालों का’ यह। अर्थात् चारुतायवाले। ‘सुलक्षित’ यह। निस्सन्देह इनका जो उससे विनिर्मुक्त रूप है वह काव्य में प्रार्थनीय नहीं होता। निस्सन्देह उपमा—‘जैसी गाय वैसे गव्य’। रूपक ‘खलेवाली (खलिहान का स्तूप) रूप है’। श्लेष ‘द्विवचर्जनेडचि’ में तन्त्ररूप। यथासंख्या—‘तुदी शालातुर’ इत्यादि। दीपक ‘गाय घोड़ा’ यह। ससंदेह—‘अथवा स्याणु ही’ यह। अपह्नुति—‘यह चांदी नहीं है’ यह। पर्यायोक्त—‘स्थूल नहीं खाता है’। तुल्ययोगिता—‘स्थाश्वोरिच्च’ यह। अप्रस्तुतप्रशंसा सब ज्ञापक होते हैं जैसे पद संज्ञा में अन्त वचन—‘अन्यत्र संज्ञाविधि में प्रत्यय ग्रहण में तदन्तविधि नहीं होती’ यह। और आक्षेप उभय विभाषाओं में विकल्पात्मक विशेषों के कहने की इच्छा से इष्ट भी विधि का पहले निषेध के साथ प्रतिषेध से सम कर दिया गया इस न्याय से। अतिशयोक्ति—‘समुद्र कूंडी’ है; ‘विन्घ्याचल बड़ा और सूर्य के मार्ग को ग्रहण कर लिया’ यह। ऐसे ही और भी। इत्यादि यह सब काव्योपयोगी नहीं होता अतः गुणीभूतव्यङ्गचता ही यहाँ पर मर्म-भूत है (और) वह लक्षित की हुई होकर भली भाँति उन (अलङ्कारों) को लक्षित करा देती है जिससे परिपूर्ण करके लक्षित किये (अलङ्कार) संगृहीत हो जाते हैं अन्यथा तो व्याप्ति अवश्य ही हो जाय। वह कहते हैं—‘एक-एक का’ यह। चारुताहीन अतिशयोक्ति, वक्रोक्ति, उपमा इत्यादि का सामान्य रूपत्व ही उपपन्न नहीं होता। चारुता तो इसके आश्रय ही होती है इस प्रकार यही ‘गुणीभूतव्यङ्गचत्व’ (अलङ्कारों का) सामान्य लक्षण है व्यङ्गच्य को चारुत्व तो रसाभिव्यक्ति की योग्यतात्मक होता है। रस अपने आप ही विश्रान्तिधाम होने से आनन्दात्मक होता है। अतः कोई अनवस्था नहीं है यह तात्पर्य है। ‘निस्सन्देह अनन्त’ यह। प्रथम उद्योत में ही इसकी व्याख्या कर दी गई—‘वाणी के विकल्यों के अनन्त होने से’ इसके अन्दर। (प्रश्न) सभी अलङ्कारों में दूसरा अलङ्कार व्यङ्गय रूप में प्रकाशित नहीं होता फिर किस प्रकार गुणीभूतव्यङ्गच्य के लक्षित करने से सबका सग्रह हो जाता है ? (उत्तर) ऐसा नहीं। वस्तुमात्र या रस व्यङ्गय होकर गुणीभूत हो जायेंगे। वह कहते हैं—‘और गुणीभूत व्यङ्गय का’ यह। प्रकारान्तर का अर्थ है वस्तु रसात्मक रूप में उपलक्षित। अथवा अवतरण इस प्रकार का होगा—(प्रश्न) यदि गुणीभूत व्यङ्गय द्वारा अलङ्कार लक्षित हो गये तो लक्षण कहना चाहिए वह क्यों नहीं कहा ? यह शङ्का करके कहते हैं—‘गुणीभूत’ यह। ‘व्यतिरिक्तत्व’ यह। अर्थात् ‘लक्षणीयत्व’ किसके द्वारा लक्षणीयत्व ? ‘ध्वनि से व्यतिरिक्त जो व्यङ्गयत्व से अनुपम रूप प्रकार वही लक्षण उसके द्वारा’ यह अर्थ है। तात्पर्य यह है कि व्यङ्गय के लक्षित कर देने पर और उसके गुणीभाव के निरुपित कर दिये जाने पर इसका और क्या लक्षण किया जाय ?
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इस प्रकार काव्य की आत्मा ध्वनि है इसका निर्वाह करके उपसंहार करते हैं—‘तो यह’ इत्यादि के द्वारा ‘सौभाग्य’ यहाँंतक । पहले कहा हुआ ‘सकलसत्वकविकाव्योपनिषद्सूत’ यह प्रतारण मात्र अर्थवाद रूप नहीं माना जाना चाहिये यह दिखलाने के लिये कहा है—वह इस प्रकार इत्यादि ।
गुणीभूत व्यंग्य की अलंकारों में अनिवार्यता
तारावती—ऊपर जो कुछ विवेचन किया गया उससे स्पष्ट है कि रूपक इत्यादि अलंकारों में चरितार्थता तभी आती है जब उनमें व्यंग्यांश का स्पर्श हो । इस प्रकार जितना भी अलंकार मार्ग है वह सब गुणीभूतव्यंग्य का मार्ग ही कहा जा सकता है । जो अलंकार ऊपर बतलाये गये है जैसे दीपक उपमा तुल्ययोगिता इत्यादि और जो नहीं बतलाये गये है जैसे अर्थान्तरन्यास अप्रस्तुतप्रशंसा इत्यादि सभी अलंकारों में रमणीयता गुणीभूतव्यंग्य के द्वारा ही होती है । अतः गुणीभूतव्यंग्य सभी अलंकारों का सामान्य लक्षण है । गुणीभूतव्यंग्य को ठीक रूप में समझ लेने से सभी अलंकार अनायास ही समझ में आ जाते है । यदि बिना गुणीभूतव्यंग्य के वैसे ही अलंकार की सत्ता मानी जाय तो निम्नलिखित स्थानों पर भी अलंकार माना जाने लगागा:-
(१) उपमा उसे कहते हैं जिसमें दो वस्तुओं का सादृश्य बतलाया जाय । यह परिभाषा तो ‘गाय के समान गवय होता है’ इसमें लागू हो जाती है । अतः यहाँ भी उपमा कही जायगी ।
(२) रूपक में एक वस्तु का दूसरे पर आरोप किया जाता है । ‘खेलनेवाली’ खिलिहान के खम्भे को कहते हैं और यूप यज्ञ के स्तम्भ को कहते हैं । जिसमें पशु बांधा जाता है । यदि कहा जाय कि ‘खेलनेवाली यूप हैं’ तो इसमें खेलनेवाली पर यूप का आरोप होने से रूपक का लक्षण लागू हो जाता है । अतः इसे भी रूपक कहा जाने लगेगा ।
(३) श्लेष उसे कहते हैं जिसमें एक शब्द के एक से अधिक अर्थ लिये जायँ । व्याकरण में कई एक सूत्र ऐसे हैं जिनमें किसी शब्द का एक बार प्रयोग किया जाता है और अर्थ दो बार लिया जाता है । इसी प्रक्रिया को व्याकरण में तन्त्र कहते हैं । उदाहरण के लिये एक सूत्र है ‘द्विवचनेऽचि’ इसका अर्थ है—‘यदि द्वित्वनिमित्तक अच् बाद में हो और द्वितव करना हो तो स्वर के लिये कोई आदेश नहीं होता ।’ यहाँ पर ‘द्विवचने’ के दो अर्थ किये गये हैं । (१) द्वितव निमित्तक अच् बाद में होने पर (२) द्वितव करने योग्य होने पर । तह तन्त्र की प्रक्रिया है । यहाँ पर श्लेष का लक्षण लागू हो जाता है । अतः इसे भी श्लेष कहा जाने लगेगा ।
(४) यथासंभव अलंकार वहाँ पर होता है जहाँ समान संख्यावालों का क्रमः अन्वय सम्बन्धवाली विधि क्रमशः होती है । लोचन में ‘तुदादि शलातुर’ यह उदाहरण दिया गया है । इसका अर्थ स्पष्ट नहीं है । किसी-किसी पुस्तक में ‘सूचीमालान्तरेति’ यह वाक्य पाया जाता है । सम्भवतः ये किसी प्रतिष्ठित शास्त्रीय ग्रन्थ के उदाहरण हैं जिनका पता नहीं ।
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तृतीय उच्यत:
अधिक स्पष्ट उदाहरण है—‘एचोऽयवायावः’ अर्थात् ‘ए, ओ, ऐ और ओ को अय्, अव्, आय् और आव् आदेश हो जायें ।’ ‘ए ओ’ इत्यादि चार हैं और अय् इत्यादि भी चार हैं । इनका क्रमः अन्वय होता है । ए को अय्, ओ को अव्, ऐ को आय्, और औ को आव् हो जाता है । इस लक्षण के अनुसार यथासंख्य अलंकार कहा जा सकता है ।
( ५ ) दीपक उसे कहते हैं जिसमें एक धर्म में बहुतों का अन्वय होता है । ‘गाय, घोड़ा, पुरुष और पशु को लाते हैं’ यहाँ लाना रूप धर्म के साथ गाय इत्यादि कई का अन्वय होता है । अतः इसमें दीपक का लक्षण घटित हो जाता है ।
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तृतीय उच्यत:
( ६ ) ससंदेह अलंकार उसे कहते हैं जिसमें संदेह प्रकट किया जाय । ‘यह पुरुष है या स्थाणु है’ इसे भी ससंदेहालंकार कह सकते हैं ।
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तृतीय उच्यत:
( ७ ) अपह्नुति उसे कहते हैं जहाँ प्रकृत का निषेध करके अप्रकृत को सिद्ध किया जाय । ‘यह चांदी नहीं है किन्तु शुक्ति है’ इसमें अपह्नुति का लक्षण घट जाता है ।
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तृतीय उच्यत:
( ८ ) पर्यायोक्त उसे कहते हैं जहाँ भङ्गिमा के साथ गम्य अर्थ को ही कहा जाय । ‘स्थूल देवदत्त दिनमें नहीं खाता’ यहाँ भङ्गिमा से कहा गया है कि ‘देवदत्त रात में खाता है ।’ इस प्रकार यहाँ पर्यायोक्त का लक्षण घट जाता है ।
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तृतीय उच्यत:
( ९ ) तुल्ययोगिता—यदि एक धर्म में सभी प्रस्तुतों या सभी अप्रस्तुतों का योग हो तो तुल्ययोगिता अलंकार होता है । दीपक और तुल्ययोगिता में अन्तर यह है कि दीपक में प्रस्तुतों और अप्रस्तुतों दोनों का एक धर्म में अभिसम्बन्ध होता है जब कि तुल्ययोगिता में केवल प्रस्तुतों का एक धर्म से सम्बन्ध होता है । पाणिनी जी का एक सूत्र है—‘स्थाध्वोरिच्च’
यह सूत्र लुड्लकार में स्था और घुसञ्जक (दा और धा) धातुओं में ‘आ’ को ‘इ’ करता है और सिच् को कित् करता है जिससे गुण नहीं होता तथा ‘अदित्’ यह रूप बनता है । यहाँ पर स्था और घु दोनों प्रस्तुत हैं और उनका एक धर्म ‘इत्’ आदेश तथा कित्व में अभिसम्बन्ध होता है । अतः यहाँ पर तुल्ययोगिता अलंकार कहा जा सकता है ।
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तृतीय उच्यत:
( १० ) अप्रस्तुतप्रशंसा—उसे कहते हैं जिसमें अप्रस्तुत का अभिधान किया जाय और इससे प्रस्तुत का आक्षेप हो जाय । जैसे यदि कार्य का वर्णन करना हो तो कारण का वर्णन कर दिया जाय, कारण का वर्णन करना हो तो कार्य का वर्णन कर दिया जाय, यदि सामान्य का वर्णन करना हो तो विशेष का वर्णन कर दिया जाय और यदि विशेष का वर्णन करना हो तो सामान्य का वर्णन कर दिया जाय । इसी प्रकार जिस वस्तु का वर्णन करना हो उसके समान किसी अन्यवस्तु का वर्णन कर दिया जाय ।
व्याकरण में जितने व्यापक हैं वे सब इसके उदाहरण हो सकते हैं । जैसे एक नियम है कि ‘प्रत्ययग्रहणे तदन्ता ग्राह्या:’ अर्थात् जहाँ कहीं प्रत्यय ग्रहण करना हो वहाँ तदन्त का ग्रहण हो जाता है । इस नियम के अनुसार यदि पद संज्ञा का सूत्र बनाया जाता—‘सुप्तिङ् पदम्’ तो प्रत्यय होते के कारण सुप् का अर्थ होता सुबन्त और तिङ् का अर्थ होता तिङन्त इस प्रकार सुबन्त और तिङन्त की पद संज्ञा होती, यह अर्थ हो ही जाता । फिर इस सूत्र में अन्तग्रहण कर ‘सुप्तिडन्तं पदम्’ सूत्र क्यों बनाया गया ? यह अन्तग्रहण व्यर्थ होकर ज्ञापित करता है कि ‘यदि अन्यत्र संज्ञाविधि में
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प्रत्यय ग्रहण हो तो तदन्त विधि नहीं होती ।१ इस प्रकार आचार्य को कहना तो यह सामान्य नियम है, किन्तु इस सामान्य को न कहकर विशिष्ट अन्त ग्रहण कर दिया गया है जिससे कथम्नीय सामान्य का आक्षेप हो जाता है। इस प्रकार यहाँ पर अप्रस्तुतप्रशंसा का लक्षण घट जाता है।
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(११) आक्षेप अलंकार उसे कहते हैं जहाँ किसी विशेष बात को कहने की इच्छा से व्याकरण में ऐसे कई विकल्प हैं जहाँ आचार्य विकल्प से किसी विधि का निषेध कर दिया जाये । वहाँ पर विकल्प विधान न करके वह पहले तो अभीष्ट विधि का निषेध कर देता है और फिर उस निषेध का निषेध कर देता है जिससे दोनों विषयों सिद्ध हो जाती हैं और विकल्प भी सिद्ध हो जाता है। यहाँ पर विशेष बात कहनी है विकल्प । उसके लिये निषेध का विधान किया गया है। अतः यहाँ आक्षेप अलंकार हो सकता है।
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(१२) अतिशयोक्ति कई प्रकार की होती है । उसमें—
(क) अभेदातिशयोक्ति जहाँ भेद में अभेद का प्रतिपादन किया जाये । जैसे कूण्डी और समुद्र दोनों भिन्न पदार्थ हैं किन्तु जलबहुल्य को प्रदर्शित करने के लिये कूण्डी को समुद्र कह दिया जाये ।
(ख) जहाँ असम्भन्ध में सम्बन्ध की कल्पना की जाये उसे सम्बन्धातिशयोक्ति कह दिया जाये । जैसे 'विन्ध्याचल के न कहते हैं ।' जैसे 'विन्ध्याचल बढ़ा और उसने सूर्य के मार्ग को रोक लिया ।' विन्ध्याचल तो बढ़ने का सम्बन्ध हो सकता है और न सूर्य मार्ग के रोकने का ही सम्बन्ध हो सकता है। किन्तु दोनों के सम्बन्ध की कल्पना की गई है। अतः यहाँ पर सम्बन्धातिशयोक्ति का लक्षण घटित हो जाता है। इसी प्रकार अन्य अलंकारों के विषय में समझना चाहिये।
गुणीभूतव्यंग्य से सभी अलंकारों की गतार्थंता ऊपर जितने उदाहरण दिये गये हैं। उनमें निर्दिष्ट अलंकारों के लक्षण मिल जाते हैं फिर भी उन्हें अलंकार नहीं माना जाता क्योंकि उनमें गुणीभूतव्यंग्य का योग होकर रमणीयता उत्पन्न नहीं हुई है। सारांश यही है कि अलंकारता का सारभूत तत्त्व गुणीभूत-व्यंग्य ही है। यदि गुणीभूतव्यंग्य को ठीक रूप में समझा जा सके तो अन्य अलंकार स्वयं ही अलंकार बन जाते हैं। गुणीभूतव्यंग्य से परिपूर्ण कर यदि किसी अलंकार का अलंकारत्व समझ में न आयेगा। गुणीभूतव्यंग्य से परिपूर्ण कर यदि किसी अलंकार का प्रयोग किया जाता है तो वह अलंकार वास्तविक अलंकार बन जाता है और वह अलंकार ठीक रूप में लक्ष्यित तथा संगृहीत किया जा सकता है। यदि गुणीभूतव्यंग्य का सामान्य लक्षण विद्यमान न हो तो उपरिनिर्दिष्ट स्थानों पर भी अलंकारों के सामान्य लक्षण घटित हो जायेंगे और यह अतिव्याप्ति दोष होगा। सारांश यह है कि गुणीभूतव्यंग्य का सामान्य लक्षण कर देने मात्र से ही अन्य अलंकार संग्रहीत हो जाते हैं । विशिष्ट लक्षण बनाना न तो पर्याप्त ही है और न उससे काम ही चल सकता है । एक बात और है यदि एक एक को लेकर सभी अलंकारों के स्वरूप का प्रतिपादन किया जाये और सामान्य लक्षण पर निर्भर रहा जा सके तो अलंकारों का पूरा वर्णन हो ही न सकेगा। कारण यह है कि जैसा कि प्रथम उद्योत के प्रारम्भ में दिखलाया भा चुका है वाणी के विकल्प अनन्त होते हैं और उस वाग्विकल्प के अनन्त होने के कारण ही अलंकार अनन्त हो सकते हैं । अतः अलंकारों की भी इयत्ता नहीं हो सकती ।
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तृतीय उद्योतः
होते हैं तब उनका एक एक करके विवेचन सम्भव हो कैसे हो सकता है। अलंकारों की दशा वैसी ही है जैसी प्रतिपद पाठ में शब्दों की होती है। प्रतिपद पाठ का आशय वैयाकरण महाभाष्य में पस्पशाह्निक में महर्षि पतंजलि ने उपक्रम में लिखा है——
होते हैं तब उनका एक एक करके विवेचन सम्भव हो कैसे हो सकता है। अलंकारों की दशा वैसी ही है जैसी प्रतिपद पाठ में शब्दों की होती है। प्रतिपद पाठ का आशय वैयाकरण महाभाष्य में पस्पशाह्निक में महर्षि पतंजलि ने उपक्रम में लिखा है——
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तृतीय उद्योतः
'अब हमें शब्दों का उपदेश करनाहै। कैसे करें ? क्या शब्दों की प्रतिपत्ति में प्रति- पद पाठ करें ? गाय, घोड़ा, हाथी, पक्षी, मृग, ब्राह्मण इत्यादि अलग-अलग शब्दों को पढ़ दें ? नहीं यह कहते हैं शब्दों की प्रतिपत्ति में प्रतिपद पाठ कोई उपाय नहीं है । निस्सन्देह ऐसा सुना जाता है कि बृहस्पति ने इन्द्र से दिव्य सहस्र वर्ष पर्यन्त प्रतिपदोक्त शब्दों का शब्द परायण कहा किन्तु अन्त तक नहीं पहुँचे । बृहस्पति तो कहनेवाले, इन्द्र अध्ययन करनेवाले, दिव्य सहस्र वर्ष अध्ययन काल; फिर भी अन्त तक नहीं पहुँचे । फिर आज का तो कहना ही क्या ? जो पूर्ण चिरंजीवी हो वह १०० वर्ष जीवित रहता है । उसकी आयु ही शब्दों को सुनते-सुनते समाप्त हो जायगी । उसकी विद्या का उपयोग क्या होगा ? क्योंकि विद्या का उपयोग तो चार प्रकार से होता है——आगम काल, स्वाध्याय काल, प्रवचन काल और व्यवहार काल । अतएव शब्दों की प्रतिपत्ति के लिये प्रतिपद पाठ कोई ठीक उपाय नहीं है । तो क्या करना चाहिये ? कुछ वैयाकरण बना दिये जाने चाहिये कुछ सामान्य हों कुछ विशेष । जैसे 'कर्म उपपद होने पर अण् प्रत्यय होता है' यह नियम बना दिये जाने पर कुम्भकार, नगरकार इत्यादि सैकड़ों शब्द बन जाते हैं ।
'अब हमें शब्दों का उपदेश करनाहै। कैसे करें ? क्या शब्दों की प्रतिपत्ति में प्रति- पद पाठ करें ? गाय, घोड़ा, हाथी, पक्षी, मृग, ब्राह्मण इत्यादि अलग-अलग शब्दों को पढ़ दें ? नहीं यह कहते हैं शब्दों की प्रतिपत्ति में प्रतिपद पाठ कोई उपाय नहीं है । निस्सन्देह ऐसा सुना जाता है कि बृहस्पति ने इन्द्र से दिव्य सहस्र वर्ष पर्यन्त प्रतिपदोक्त शब्दों का शब्द परायण कहा किन्तु अन्त तक नहीं पहुँचे । बृहस्पति तो कहनेवाले, इन्द्र अध्ययन करनेवाले, दिव्य सहस्र वर्ष अध्ययन काल; फिर भी अन्त तक नहीं पहुँचे । फिर आज का तो कहना ही क्या ? जो पूर्ण चिरंजीवी हो वह १०० वर्ष जीवित रहता है । उसकी आयु ही शब्दों को सुनते-सुनते समाप्त हो जायगी । उसकी विद्या का उपयोग क्या होगा ? क्योंकि विद्या का उपयोग तो चार प्रकार से होता है——आगम काल, स्वाध्याय काल, प्रवचन काल और व्यवहार काल । अतएव शब्दों की प्रतिपत्ति के लिये प्रतिपद पाठ कोई ठीक उपाय नहीं है । तो क्या करना चाहिये ? कुछ वैयाकरण बना दिये जाने चाहिये कुछ सामान्य हों कुछ विशेष । जैसे 'कर्म उपपद होने पर अण् प्रत्यय होता है' यह नियम बना दिये जाने पर कुम्भकार, नगरकार इत्यादि सैकड़ों शब्द बन जाते हैं ।
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तृतीय उद्योतः
जो बात प्रतिपद पाठ के विषय में वैयाकरण कहते हैं वही बात अलंकारों के विषय में लागू होती है । जितनी कवितायें हैं उतने ही अलंकार-भेद हो सकते हैं । युगों से कविता होती चली आ रही है किन्तु उसका अन्त न तो हुआ और न हो ही सकता है । इसी प्रकार अलंकार भी अनन्त हैं । उनका एक-एक करके विवेचन असम्भव है । अतः उनके सामान्य तत्व का निर्देश कर देना ही पर्याप्त होगा और वह सामान्य तत्व है गुणीभूतव्यंग्य । इसके समझ लेने से सभी अलंकार समझे हुये हो जाते हैं ।
जो बात प्रतिपद पाठ के विषय में वैयाकरण कहते हैं वही बात अलंकारों के विषय में लागू होती है । जितनी कवितायें हैं उतने ही अलंकार-भेद हो सकते हैं । युगों से कविता होती चली आ रही है किन्तु उसका अन्त न तो हुआ और न हो ही सकता है । इसी प्रकार अलंकार भी अनन्त हैं । उनका एक-एक करके विवेचन असम्भव है । अतः उनके सामान्य तत्व का निर्देश कर देना ही पर्याप्त होगा और वह सामान्य तत्व है गुणीभूतव्यंग्य । इसके समझ लेने से सभी अलंकार समझे हुये हो जाते हैं ।
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तृतीय उद्योतः
(प्रश्न) अलंकारों में चातुरता का आधायक करनेवाला तत्व है गुणीभूतव्यंग्य, फिर गुणीभूतव्यंग्य में चातुरता का आधायक करनेवाला कोई दूसरा तत्व होना चाहिये । उस तत्व में चातुरता का आधान करनेवाला कोई और तत्व होना चाहिये । इस प्रकार अनवस्था दोष क्यों नहीं आता । (उत्तर) यहाँ कोई अनवस्था नहीं है । यह तो सिद्ध ही है कि अतिशयोक्ति, वक्रोक्ति, उपमा इत्यादि जितने भी अलंकार हैं उनमें सामान्य धर्म रमणीयता ही है । यदि उनमें रमणीयता नहीं होगी तो उनका कोई सामान्य धर्म भी नहीं बनेगा । रमणीयता का सम्पादन गुणीभूतव्यंग्य के द्वारा ही होता है । अतः गुणीभूतव्यंग्य होना ही अलंकारों का सामान्य लक्षण है । गुणीभूत व्यंग्य में चातुर्यव्यंग्य की होती है । व्यंग्य की चातुरता का आशीष यही है कि उसमें ऐसी योग्यता हो कि वह रस की अभिव्यक्ति कर सके । रस की अभिव्यक्ति करना व्यंग्य की चातुरता का मूलाधार है । रस स्वयं ही आनन्दात्मक तथा हृदय की विश्रान्ति का धाम होता है जब वह स्वयं आनन्दरूप होता है तब उसकी चातुरता का मूलाधार वह स्वयं ही है । ऐसी दशा में अनवस्था दोष आता ही नहीं ।
(प्रश्न) अलंकारों में चातुरता का आधायक करनेवाला तत्व है गुणीभूतव्यंग्य, फिर गुणीभूतव्यंग्य में चातुरता का आधायक करनेवाला कोई दूसरा तत्व होना चाहिये । उस तत्व में चातुरता का आधान करनेवाला कोई और तत्व होना चाहिये । इस प्रकार अनवस्था दोष क्यों नहीं आता । (उत्तर) यहाँ कोई अनवस्था नहीं है । यह तो सिद्ध ही है कि अतिशयोक्ति, वक्रोक्ति, उपमा इत्यादि जितने भी अलंकार हैं उनमें सामान्य धर्म रमणीयता ही है । यदि उनमें रमणीयता नहीं होगी तो उनका कोई सामान्य धर्म भी नहीं बनेगा । रमणीयता का सम्पादन गुणीभूतव्यंग्य के द्वारा ही होता है । अतः गुणीभूतव्यंग्य होना ही अलंकारों का सामान्य लक्षण है । गुणीभूत व्यंग्य में चातुर्यव्यंग्य की होती है । व्यंग्य की चातुरता का आशीष यही है कि उसमें ऐसी योग्यता हो कि वह रस की अभिव्यक्ति कर सके । रस की अभिव्यक्ति करना व्यंग्य की चातुरता का मूलाधार है । रस स्वयं ही आनन्दात्मक तथा हृदय की विश्रान्ति का धाम होता है जब वह स्वयं आनन्दरूप होता है तब उसकी चातुरता का मूलाधार वह स्वयं ही है । ऐसी दशा में अनवस्था दोष आता ही नहीं ।
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(प्रश्न) यह तो हमने माना कि कुछ अलंकार ऐसे अवश्य होते हैं जिनमें दूसरे अलंकार व्यंग्य होकर उनका पोषण करते हैं, किन्तु सभी अलंकार तो ऐसे नहीं होते जिनमें दूसरे अलंकार व्यंग्य होकर अवश्य उनका पोषण करें ।फिर आप यह कैसे कह सकते हैं कि गुणीभूत-व्यंग्य को लक्ष्यित कर लेने से सभी अलंकार लक्ष्यित हो जाते हैं । (उत्तर) यह पहले ही सिद्ध किया जा चुका है कि अतिशयोक्ति अलंकार तो सभी अलंकारों में व्यंग्य रहता है । इसके अतिरिक्त यह भी कहा जा सकता है कि गुणीभूतव्यंग्य का तो दूसरा विषय भी हो सकता है और वह विषय हो सकता है वस्तुगत्यक्ना या रसगत्यक्ना का अनुगम रूप । आशय यह है कि गुणीभूतव्यंग्य में केवल अलंकार ही व्यंग्य होकर स्थायिक नहीं होते अपितु वस्तु या रस भी अभिव्यक्त होकर गुणीभूतव्यंग्य का रूप धारण कर सकते हैं । अतः कोई भी अलंकार व्यंग्यशून्य नहीं होता । यह दूसरी बात है कि उत्तमं अलंकार व्यंग्य न होकर वस्तु या रस व्यंग्य हो ।
गुणीभूतव्यंग्य का लक्षण
(प्रश्न) आप ने यह तो कहा कि कि गुणीभूतव्यंग्य लक्षण है और अलंकार लक्ष्य । किन्तु आपने गुणीभूतव्यंग्य का लक्षण क्यों नहीं किया ? (उत्तर) गुणीभूतव्यंग्य विषय है अर्थात् उसका लक्षण बनाना है । उसका लक्षण है प्रकारान्तर से व्यङ्ग्यार्थानुगम अर्थात् यदि यह पूछा जाय कि वह कौन सा तत्त्व है जिसका लक्ष्य गुणीभूत होता है तो इसका उत्तर होगा व्यंग्यत्व के रूप में जो अर्थानुगम होता है वह जहाँ कहीं मुख्य होकर ध्वनिरूपता को धारण करता है उसके अतिरिक्त जितना भी व्यंग्यत्व होता है वह सब गुणीभूतव्यंग्य का ही लक्षण कहा जा सकता है और उसी के द्वारा गुणीभूतव्यंग्य लक्ष्यित होता है । हमें गुणीभूतव्यंग्य का ही तो लक्षण बनाना है । गुणीभूतव्यंग्य में दो शब्द हैं—गुणीभूत और व्यंग्य । व्यंग्य का पूरा परिचय दे ही दिया गया और गुणीभूत की भी पूरी व्याख्या कर दी गई । अब गुणीभूत-व्यंग्य के विषय में कहने को शेष ही क्या रह गया । ऊपर जो कुछ कहा गया है उससे इस कथन का पूरा निर्वाह हो गया कि काव्य की आत्मा ध्वनि है । यह जो गुणीभूतव्यंग्य का प्रकार दिखलाया गया यह ध्वनि का निष्यन्द रूप है जो कि बहुत ही रमणीय होता है और महाकवियों का एक उत्तम विषय है । सहृदयों की मलोमाओं में इसका परिचय प्राप्त कर लेना चाहिये । काव्य सहृदयों के हृदय को आकृष्ट करनेवाला होता है उस काव्य का ऐसा कोई प्रकार होता ही नहीं जिसमें व्यंग्य का समावेश हो जाने पर रमणीयता नहीं आ जाती । यह जो पहले कहा गया था कि समस्त सत्कवियों के काव्यों का यह उपनिषद् है यह केवल वच्चना के लिए ही नहीं कहा गया था और न यह अर्थवाद ही था । अर्थवाद उसे कहते हैं जिसके सत्य होने की तो बात नहीं होती किन्तु दूसरों को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर किसी की प्रशंसा कर दी जाती है । आशय यह है कि केवल प्रशंसा के लिए और दूसरों को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिये ही यह असत्यप्रलाप नहीं कर दिया गया कि ध्वनि समस्त काव्यों का उपनिषद्भूत प्रधान सारभाग है यह जो कुछ कहा गया वह सर्वांश सत्य है ।
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३
तृतीय उद्योत:
ध्वनिनिष्यान्द का अर्थ
३
तृतीय उद्योत:
(यहाँ पर गुणीभूतव्यङ्ग्य को ध्वनि का निष्यान्द कहा गया है । निष्यान्द शब्द का अर्थ है थोड़ा थोड़ा क्षरित होना या टपकना । किसी पदार्थ का जो सार तत्व थोड़ा थोड़ा करके टपकता है उसे निष्यान्द कहते हैं ! ध्वनिकार का आशय यह है कि ध्वनि एक महत्वपूर्ण पदार्थ है और उसका सारसर्वस्व तत्त्व गुणीभूतव्यङ्ग्य है । काव्य का जीवन ध्वनि है और ध्वनि का सारभूत तत्त्व गुणीभूतव्यङ्ग्य है । इस विषय में दीधितिकार ने लिखा है कि यहाँ पर निष्यान्द का अर्थ नवनीत नहीं है अपितु आमिक्षा है । आमिक्षा का अर्थ है फटे हुये दूध से निकाला हुआ जलीय अंश । दीधितिकार का कहना है कि यदि निष्यान्द को ठीक अर्थ में नवनीत के समान सारभाग मान लिया जायगा तो इसका आशय यह होगा कि गुणीभूतव्यङ्ग्य ध्वनि की अपेक्षा भी अधिक उत्तम है जब कि वास्तविकता ऐसी नहीं है । अतः गुणीभूतव्यङ्ग्य को ध्वनि का नवनीत न मानकर उसे ध्वनि का फटा हुआ छैना ही कहना अधिक ठीक होगा । किन्तु यहाँ पर विचार यह करना है कि लेखक गुणीभूतव्यङ्ग्य की प्रशस्ति लिख रहा है और महाकवियों को उपदेश दे रहा है कि वे उसे अपना विषय बनायें । आगे चलकर ग्रन्थकार इस बात का भी प्रतिपादन करेगा कि जहाँ गुणीभूतव्यङ्ग्य का अवसर हो वहाँ ध्वनि की योजना नहीं करनी चाहिये । पहले भी लेखक कह चुका है उच्चकोटि के काव्यों में इस गुर्णीभूतव्यङ्ग्य की योजना करनी चाहिये । ऐसी दशा में लेखक गुणीभूतव्यङ्ग्य को फटे दूध की उपमा देगा यह कुछ समझ में नहीं आता । वास्तविकता यह है कि प्रत्येक काव्य की परिणति तो ध्वनि में ही होती है । जहाँ कहीं व्यङ्ग्यार्थ की अपेक्षा वाच्य को प्रधानता प्राप्त होती है वहाँ भी उसकी प्रधानता का एकमात्र कारण यही होता है उसमें चमत्कार तथा आनन्द प्रदान करवे की शक्ति अधिक होती है । आनन्द स्वयं रसरूप है जो व्यङ्ग्य होता है । अतः उस काव्य को भी ध्वनिकाव्य ही कहेंगे । इस प्रकार ध्वनिकाव्य के दो भेद हो जाते हैं—(१) ऐसी ध्वनि जिसमें वाच्यार्थ निम्न हो और व्यङ्ग्यार्थ की प्रधानता प्राप्त हो जाय और (२) ऐसी ध्वनि जिसमें वाच्यार्थ उत्कृष्ट हो और उस वाच्यार्थ को कोई दूसरा व्यङ्ग्यार्थ अनुप्राणित कर रहा हो जिससे उसमें अलंकार की मधुरिमा भी आ गयी हो तथा समस्त काव्य का पर्यवसान अन्तिम रसव्यञ्जना में हो । निस्सन्देह प्रथम प्रकार की अपेक्षा द्वितीय प्रकार का काव्य उच्चकोटि का होगा ही । यही आनन्दवर्धन का अभिप्राय है)
३
तृतीय उद्योत:
३७
मुख्या महाकविगिरामलङ्कृतिभृदामपि । प्रतीयमानच्छायैषा भूषा लज्जेव योषिताम् ॥३७॥
३
तृतीय उद्योत:
अनया सुप्रसिद्धोऽव्यर्थः किमपि कामनीयकमानोयते तथथा— विश्रम्भोथा•मन्त्राज्ञाविधाने ये मुग्धाश्वया: केडपि लीलाविशेषा: । अक्षुण्णास्ते चेतसा केवलेन स्थित्वैकान्ते सन्तं भावनीयाः ॥ इत्यत्र केडपितनेन पदेन वाच्यमस्पष्टमभिदधता प्रतीयमानं वस्तुविलष्ट- मनन्तरमप्यता का छाया नोपपादिता ।
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(अनु०) 'अलंकारों को धारण करनेवाली महाकवियों की यह प्रतीयमान के द्वारा सम्पादित छाया उसी प्रकार मुख्य होती है जिस प्रकार स्त्रियों की लज्जा आभूषण' ॥३७॥
इसके द्वारा सुप्रसिद्ध भी अर्थ किसी (अद्वितीय) कमनीयता को प्राप्त करा दिया जाता है। वह इस प्रकार— 'मन्मथ के आदेशपालन में मुग्धाक्षी के जो विश्वासपूर्वक उठे हुए कोई भी लीलाविलास है वे केवल चित्त से एकान्त में बैठकर निरन्तर भावना करने योग्य हैं।' वाच्य को अस्पष्टरूप में कहनेवाले 'कोई भी' इस शब्द के द्वारा अविलष्ट और अनन्त प्रतीयमान को अपित करते हुये कौन सी छाया उपपादित नहीं कर दी ।
(लो०) 'मुख्यभूषे'ति । अलङ्कृतिभृतामपि शब्दादलङ्कारघनून्यानामप्यर्थः । प्रतीमानकृताछाया शोभा, सा च लज्जासदृशी गोপনासरसौन्दर्यप्राणत्वात् । अलङ्कारधारिणोनामपि नायिकानां लज्जा मुख्यं भूषणम् । प्रतीमानच्छाया अनन्तमदनोद्रेकजहृदयसौन्दर्यरूपा यया, लज्जाश्रयान्तर्गतदृगादीनामन्थर्विकारजुषोपविषारूपा मदनविजृम्भणैव । वीतिरागाणां यतीनां कौपीनापसारणेऽपि त्रपाकलङ्कदूषणानात् ।
तथा हि कस्यापि कवे:—'कुरङ्गीविलासिनि' इत्यादि श्लोक:। तथा प्रतीमानस्य प्रियतमाभिलाषानुनाथनम्रानप्रभृतेः छाया कान्तिः यथा । श्रृङ्गाररसरतेऽरुणी हि लज्जाविरुद्धा निर्भरतया तांस्तान् विलापान् नेत्रगात्रविकारपरम्परारूपान् प्रसूत इति गोपनासरसौन्दर्यलज्जाविजृम्भभतेमेति भावः ।
विश्रम्भेति । मन्मथाचार्येण त्रिभुवनवन्यममानशानेन अत एव लज्जासाध्वसध्वंसिना दत्ता येयमलङ्कृतिरनोयाज्ञा तदनुष्ठानेप्ययं कर्तव्ये सति साध्वसलज्जात्यागेन विश्रम्भसम्भोगकालोपनता:। मुग्धाक्ष्या इति । अकृतकसम्भोगपरिभावनोचितदृष्टिप्रसर्पवित्रता येड्ये विलासा गात्रनैत्रविकारा:, अत एवाक्षुण्णा: नवनवरूपतया प्रतिक्षणमुन्मिषनतस्ते, केवलैनात्रव्यग्रेणै कान्तावस्थानपूर्वं सर्वेन्द्रियोपसंहारेण भावयितुं शक्या अर्हु: उचिताः । यतः केनापि नान्येनोपायेन शाक्यनिरूपणा ॥३८॥
(अनु०) 'मुख्य आभूषण' यह 'अलंकार धारण करनेवाली भी' भी का अर्थ है अलंकार शून्य भी । प्रतीयमान के द्वारा की हुई छाया अर्थात् शोभा और वह लज्जा के समान होती है क्योंकि उसका प्राण है ऐसा सौन्दर्य जिसका सार गोपन ही होता है । अलंकार धारण करनेवाली भी नायिकाओं का लज्जा मुख्य भूषण है । अन्दर मदन के उद्बोध से हृदय की सुन्दरता रूप जो छाया वह प्रतीयमान है जिसके द्वारा निस्सन्देह लज्जा हृदय में उद्बोध को प्राप्त होनेवाले काम विकार के गोपन करने की इच्छा रूप कामदेव का विजृम्भण ही है । क्योंकि वीतराग यतियों के अन्दर कौपीन के अपसारण से भी लज्जा रूप कलंक के दर्शन नहीं होते वह इस प्रकार किसी कवि का—'कुरङ्गीविलासिनि' इत्यादि श्लोक । उसी प्रकार प्रतीयमान की अर्थात् प्रियतम को अभिलाषा, प्रार्थना, मान इत्यादि की छाया अर्थात् कान्ति है जिसके द्वारा निस्सन्देह शृङ्गार रस की नदी लज्जा से अवचृढ होकर नेत्र तथा शरीर के विकार
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तृतीय
उद्योत:
रूप विभिन्न विलासों को उत्पन्न करती है इस प्रकार जिस सौन्दर्य का सारभाव गोपन ही है इस प्रकार की लज्जा का यह यह सब विजृम्भण है ‘विश्रस्य’ यह । त्रिभुवन के द्वारा वन्दनीय शासनवाले अत एव लज्जा के साध्वस को ध्वस्त करने वाले मन्मथ आचार्य के द्वारा जो यह अलंघनीय आज्ञा दी गई है उसके अनुष्ठान के अवश्य करणीय होने पर साध्वस और लज्जा के त्याग के साथ विश्रब्ध सम्भोग काल में आये हुये (जो लीला विलास है) मुग्धाक्षी होने के कारण बनावट रहित सम्भोग के आस्वाद के योग्य दृष्टि प्रसार से पवित्र किये हुये जो दूसरे विलास अर्थात् शरीर और नेत्र के विकार हैं अत एव अक्षण अर्थात् प्रतिक्षण नये नये रूप में उद्भूत होनेवाले (लीलाविलास हैं) वे केवल अर्थात् अग्यात्र व्यग्र न होनेवाले (चित्त) से अर्थात् एकान्त में अवस्थानपूर्वक सब इन्द्रियों के उपसंहार के द्वारा भावित करने के योग्य हैं । क्योंकि किसी भी अन्य उपमा से निरूपण नहीं किया जा सकता ॥३७॥
तारावती—३७वीं कारिका में प्रतीममान अर्थ का काव्य में यहुत्व बतलाया गया है । इसमें कहा गया है कि ‘चाहे कोई स्त्री कितने ही आभूषण क्यों न पहिने हो अथवा वह आभूषणों से सर्वथा शून्य हो (अलंकारशून्यता का अर्थ ‘अलंकृतिभूतामिभ’ के अपभ्रंश से प्राप्त होता है ।) किन्तु उसका मुख्य आभूषण लज्जा ही होता है क्योंकि उसमें प्रतीमान की छाया (शोभा) होती है उसी प्रकार किसी कवि की वाणी में कितने ही अलंकारों का प्रयोग क्यों न किया गया हो अथवा उसमें एक भी अलंकार न हो किन्तु उसका मुख्य आभूषण प्रतीमान की शोभा ही है । यहाँ पर प्रतीमान को स्त्रियों के लज्जा आभूषण की समता प्रदान की गई है । इसके दो कारण हैं एक तो लज्जा भाव में गोपन की प्रवृत्ति होती है । लज्जाशीलता से जब ललनायें अपने भाव को छिपाती हैं तब उसमें एक सौन्दर्य आता है । यह सौन्दर्य भावगोपन का ही सौन्दर्य होता है । और यही लज्जा का प्राण है । इसी प्रकार ध्वनि में भी गोपन का ही सौन्दर्य होता है । कवि जिस बात को कहना चाहता है उसे उस रूप में न कहकर गोपन के साथ कहता है । इसी सादृश्य के आधारपर प्रतीमानजन्य रमणीयता को ललनाओं की लज्जा से उपमित किया गया है । दूसरी बात यह है कि नायिकायें कितने ही आभूषण क्यों न पहिन लें जब तक उनमें लज्जाशीलता नहीं आयेगी तब तक वे आकर्षक हो ही नहीं सकती । दूसरी ओर यदि उनके पास एक भी आभूषण न हो किन्तु लज्जाशीलता विद्यमान हो तो वे आकर्षण में हेतु बन जाती हैं । इसी प्रकार काव्य में अलंकारों का होना न होना कोई विशेष महत्व नहीं रखता । यहाँ पर प्रतीमान छाया शब्द लज्जा का भी विशेषण हो सकता है । उस दशा में इसमें बहुव्रीहि समास होगा और इसका अर्थ होगा—प्रतीमान है छाया जिसमें अर्थात् जिस लज्जा में सौन्दर्य की प्रतीति होती है । जब अन्तःकरण में काम वासना अंकुरित होती है तब हृदय में एक सरसता उत्पन्न हो जाती है । उस सरसता के कारण हृदय में एक रमणीयता उत्पन्न हो जाती है जोकि वाच्य चेष्टाओं को भी रमणीय बना देती है, लज्जा उसी रमणीयता का एक रूप है । लज्जा और है क्या ? हृदय में जो काम विकार उद्भूत हुआ है उसको
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छिपाना ही तो लज्जा है। अत एव यह भी तो कामकला की ही एक चेष्टा है। फिर इसमें रमणीयता क्यों न आयेगी। जिनमें काम-विकार नहीं होता उनके अन्दर लज्जा भी नहीं होती। वीत-राग महात्माओं की भी यदि कपूत भी हटा ली जाय तो भी उनमें लज्जा का कलंक दिखाई न देगा। किसी कवि ने कहा है-
यत् कुड्ऱीवाझ्झानि स्तिमितयति गीतध्वनिप्रणयि यत् सखीं कान्तोदन्तीं श्वसमवि पनः प्रश्नयति यत् । अनिन्द्रं यच्चान्तः स्वपिति तदहहो वेद्म्यभिनवां प्रवृत्तोद्यस्या सेकु हृदि मन्सिजः प्रेमलतिका मृक्म् ॥
'जो यह नायिका गाने की ध्वनियों से अपने अंगों को हरिणी के समान स्थिर बना लेती है। वह अपने प्रीतम के विषय में सभी बातें सुन भी लेती है फिर भी सखी के द्वारा पुनः प्रश्न कराती है, बिना ही निद्रा के अन्दर ही अन्दर सोने लगती है, इन सब बातों से प्रकट होता है कि कामदेव ने इसके हृदय में नवीन प्रेमलता को सींचना प्रारम्भ कर दिया है ।'
यहाँ पर नायिका का गीतों में अंगों को सिकोड़ने लगना, प्रियतम के विषय में सुनी हुई बात को बार-बार सखी द्वारा पूछना और बिना ही निद्रा के अन्दर ही अन्दर सोने लगना लज्जा-जन्य चेष्टायें हैं जिनसे अनुमान होता है कि उसके अन्दर काम विकार का नवोन संचार हुआ है और उसके हृदय की प्रेमलता धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है। कहने का सारांश यही है कि लज्जा-जन्य चेष्टायें सर्वदा कामविकार से प्रवृत्त होती हैं और उसी की परिपाचयिका होती हैं। इस लज्जा में जो कामविकार प्रतीत होता है उसके अनेक अनुभन्ग होते हैं। जैसे प्रियतम की अभिलाषा तथा उसकी आकांक्षा और प्रार्थना, मान इत्यादि। इन सबकी छाया अर्थात कान्ति उस लज्जा में सन्निहित रहती है। यह शृंगार रस भी एक नदी की धारा के समान है। जिस प्रकार नदी की धारा को रोक देने से उसमें इधर-उधर लहरें फैल जाती हैं। उसी प्रकार जब इस शृंगार की नदी को लज्जा रूपी बाँध से रोक दिया जाता है तब उसमें अत्यधिक परिमाण में विलास उत्पन्न हो जाते हैं। जो अनेक प्रकार के होते हैं और जिनमें नेत्र, और शरीर के दूसरे अंगों के विकार सम्मिलित होते हैं। इस प्रकार लज्जा में ऐसा सौन्दर्य सञ्चिहित रहता है जिसका सार होता है भावगोपन और यह सारा क्रिया कलाप लज्जा का ही होता है। यह सब उसी का प्रसारमय चेष्टा कलाप है।
एक उदाहरण लीजिये-
'कामदेव की आज्ञा मानने में मुग्धाक्षी के जो लीलाविलास विश्ववासपूर्वक उद्भूत हुये हैं वे नये-नये रूप में सामने आ रहे हैं और उनका भावन केवल चित्त से एकान्त में बैठकर के ही किया जा सकता है ।'
'कामदेव एक आचार्य है और ऐसा आचार्य है कि जिसकी आज्ञा की अवहेलना तीनों लोकों में कोई कर ही नहीं सकता। संसार के बड़े से छोटे तक सभी चेतन अचेतन पदार्थ नतमस्तक होकर भगवान कामदेव की आज्ञा का अभिनन्दन करते हैं। उस कामदेव ने इस नायिका को भी आदेश दिया है कि यह भी अपने लीलाविलास प्रारम्भ करे। यह कामदेव की
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३
तृतीय उद्योत:
३७
सा व्यङ्ग्यस्य गुणीभावे प्रकाइते मामाश्रिता ।
आज्ञा लज्जा को भी नष्ट करनेवाली है और भय को भी दूर कर देती है। यह आदेश अलङ्करणीय है और इसका अनुष्ठान करना अपरिहार्य है। सयोगवश ऐसे व्यक्ति का सहवास-काल भी आ उपस्थित हुआ है जिससे विश्वास की मात्रा बढ़ गई है। अतः उस अवसर पर भगवान् कामदेव की आज्ञा का पालन करने के लिये जो लीलामय विलास, चेष्टायें उपनत होती हैं उनका उत्थान विश्वाम के साथ होता है। नायिका मुस्कारती है। उसकी आँखों में भोलापन है; अतः सम्भोगजन्य आनन्द का अनुभव करने में जिस प्रकार के दृष्टिपातों का उसे आस्यास है उसमें बनावट बिल्कुल नहीं है जिससे उन विलासचेष्टाओं में पवित्रता आ गई है। ये विलास शरीर तथा नेत्र के अन्दर विकार उत्पन्न करनेवाले हैं। इसीलिये ये अक्षण हैं अर्थात् प्रतिक्षण ये नये-नये रूप में प्रफुटित होते जाते हैं। इनको समझ सकना और इनका आस्वादन कर सकना ऐसे वैसे सम्भव नहीं है। यह तभी हो सकता है जब अपनी चित्तवृत्ति को चारों ओर से हटा कर एकनिष्ठ करके तथा एकान्त स्थान पर बैठ कर उनकी भावना की जाय और सभी इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों से हटा ली गई हों। अन्य कोई उपाय नहीं है जिससे उनको समझा जा सके।
३
तृतीय उद्योत:
३७
एषा प्रतीयमानच्छाया (ध्वन्यालो) अर्थान्तरगता: काक्वा या चेषा परिहृत्यते ।
यहाँ पर कटाक्षों के लिये कहा गया है 'कोई' कटाक्ष। यहाँ कोई का अर्थ है जिनका निर्वाचन करना अशक्य है। यहाँ पर वाच्य को अस्पष्ट रूप में कहा गया है; उससे अभिधा क्यो न होती है कि उस नायिका के लीलाविलासों में कोई एक ऐसी विलक्षणता है कि उसका कथन कर सकना सर्वथा असम्भव है। उसके विलासों में इतने गुण हैं कि उनका परिसंख्या न भी नहीं किया जा सकता। इस प्रकार विलासों की महत्ता, उत्कृष्टता और अपरिमेयता इत्यादि अनेक व्यञ्जनायें अनायास ही हो जाती हैं। क्या इससे कोई एक नई शोभा उद्भूत नहीं होती ? अथवा ऐसी कौनसी रमणीयता है जो इस 'कैकप' शब्द से उद्भूत नहीं होती ? (यहाँ पर 'कैकप' का वाच्यार्थ स्फुट करने के लिये उक्त अभिव्यक्तियों की व्याख्या करनी पड़ेगी। अतः यहाँ पर अभिधाव्यापार अर्थ वाच्यसिद्धि का अङ्ग होने से गुणीभूतव्यङ्गचकी कोटि में आता है। यह कारिका भी गुणीभूतव्यङ्ग्य की ही महत्ता बतलाती है। एक तो यह गुणीभूतव्यङ्ग्य के प्रकरण के मध्य में आई है; दूसरे 'एषा प्रतीयमानच्छाया'
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तृतीय उद्योत:
३८
या चेषा काक्वा वचसिदर्थान्तरप्रतितिदृश्यते सा व्यङ्ग्यार्थस्य गुणीभावे सति गुणीभूतव्यङ्ग्यलक्षणं काव्यप्रबन्धमाश्रयते । यथा 'स्वस्था भवति मयि जीवति धृतराष्ट्र:' ।
(अनु०) काकु के द्वारा जो यह अर्थान्तरप्रतीति देखी जाती है वह व्यङ्गच के गुणीभूत होने से गुणीभूतव्यङ्गच लक्षणवाले इस काव्यप्रबन्ध का आश्रय लेती है। जैसे 'मेरे जीवित रहते धृतराष्ट्र के तुत्र स्वस्थ हो जायें ।'
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(लो•) गुणीभूतव्यङ्गस्योदाहरणान्तरमाह—अर्थान्तरेति। 'कक् लोल्ये' इत्यस्य धातोः काकुशब्दः । तत्र हि साकांक्षनिराकांक्षादिक्रमेण पाठ्यमर्थान्वितं वाच्यं भवतीति लौल्यमस्याभिधीयते । यदि वा ईषदर्थे 'कु' शब्दः प्रकृत्यर्थातिरिक्तमपि वाच्यं भवतीति लोल्यमस्याभिधीयते । तेन हृदयस्थं वस्तुप्रतीतिरेषा भूमिः काकुस्तथा यार्थान्तरगतिः स तस्य कादेशः । तेन हेतुना तत्र गुणीभाव एव काव्यविशेष इमं गुणीभूतव्यङ्गच्यप्रकारमाश्रितः । तेन हेतुना तत्र गुणीभाव एव काव्यविशेष इमं गुणीभूतव्यङ्ग्यप्रकारमाश्रितः । न तु प्रतीतरत्न गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं भवति । अर्थान्तर्गतिशब्देनात्र काव्यमेवोच्यते । न तु प्रतीतरत्न गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं वक्तव्यं, प्रतीतिद्वारेण वा काव्यस्य निरूपितत्वात् ।
अन्ये त्वाहु—व्यङ्ग्यस्य गुणीभावेऽपि प्रकारः अन्यथा तु तत्रापि ध्वनित्वमेवेति । तच्चासत्, काकुप्रयोगे सर्वत्र शब्दस्फुटत्वेन व्यङ्ग्यस्योन्मीलितस्यापि गुणीमेवेति । हसन्नेवाभावात्, काकुरहि शब्दस्यैव स्फुटं 'गोप्यैव गदितः सलेगाम्' इति, हसन्नेवाभावात्, काकुरहि शब्दस्यैव स्फुटं 'गोप्यैव गदितः सलेगाम्' इति, हसन्नेवाभावात्, काकुरहि शब्दस्यैव स्फुटं 'भ्रम धरिमअ' इत्यादौ काकुयोजनेन व्याप्त्याकूतमिति वचछब्ददैनैवानुगृहीतम् । अत एव 'भ्रम धरिमअ' इत्यादौ काकुयोजनेन व्याप्त्याकूतमिति वचछब्ददैनैवानुगृहीतम् । अत एव 'भ्रम धरिमअ' इत्यादौ काकुयोजनेन व्याप्त्याकूतमिति वचछब्ददैनैवानुगृहीतम् । सवस्था इति, भव्वान्त इति गुणीभूतव्यङ्गयतैव व्यक्तोक्तत्वेन तदाभिमानाल्लोकस्य । सवस्था इति, भव्वान्त इति गुणीभूतव्यङ्गयतैव व्यक्तोक्तत्वेन तदाभिमानाल्लोकस्य । धातिराष्ट्र इति च साकांक्षदीप्तगद्गद्गदतारप्रशमनोद्दीपनचित्रिता मयि जीवति इति, धातिराष्ट्र इति च साकांक्षदीप्तगद्गद्गदतारप्रशमनोद्दीपनचित्रिता मयि जीवति इति, काकुरसम्मानव्याजमर्थोद्यत्थ्यमनुचितश्चेत्यमुं व्यङ्गच्यमर्थं स्फुटी तेनैवोपकृतिं सतां कोधानुभावरुपतां व्यङ्गयोपस्कृतस्य वाच्यस्यैवाभिधत्ते ।
(अनु•) गुणीभूतव्यङ्गच्य के दूसरे उदाहरण को कहते हैं—'अर्थान्तर' यह । कक् लोल्ये' इस धातु का काकु शब्द बनता है । उसमें साकांक्ष और निराकांक्ष इत्यादि क्रम से पढा हुआ यह शब्द प्रकृत अर्थ के अतिरिक्त भी चाहता है अतः इसका लोल्य कहा जाता है । अथवा ईषद् अर्थ में 'कु' शब्द है जिसको 'का' आदेश हो जाता है । इससे हृदयस्थ वस्तु की प्रतीति का थोड़ा स्थान है उसके द्वारा जो दूसरे अर्थ की प्रतीति वह काव्यविशेष इसी गुणीभूतव्यङ्गच्यप्रकार के आश्रित है । उसमें हेतु का वहाँ गोण हो जाना ही होता है । अर्थान्तर्गत शब्द से यहाँ काव्य ही कहा जाता है, प्रतीति के द्वारा वह (गुणीभूतव्यङ्गचत्व) काव्य का निरुपित किया गया है ।
और लोग तो कहते हैं—'व्यङ्गय के गुणीभाव में यह प्रकार है अन्यथा तो वहाँ पर ध्वनि ही होती है' यह । वह ठीक नहीं है क्योंकि काकुप्रयोग में सर्वत्र शब्द से स्फुट होने के कारण उन्मीलित भी व्यङ्गय का गुणीभाव हो जाता है । काकु शब्द का ही कोई धर्म है, जिसके कारण उन्मीलित भी व्यङ्गय का गुणीभाव हो जाता है । काकु शब्द का ही कोई धर्म है, जैसे 'गोपी के द्वारा इस प्रकार स्पष्ट किया हुआ शब्द के द्वारा ही अनुगृहीत होता है जैसे 'गोपी के द्वारा इस प्रकार स्पष्ट किया हुआ शब्द के द्वारा ही अनुगृहीत होता है जैसे 'ने धार्मिक भ्रमण करो' इत्यादि में काकु की योजना करने पर गुणीभूतव्यङ्गच्य कहा गया है) अतएव 'ने धार्मिक भ्रमण करो' इत्यादि में काकु की योजना करने पर गुणीभूतव्यङ्गच्य कहा गया है) अतएव वहाँ पर व्यक्त रूप में उक्त होने से लोक का अभिमान (उसमें व्यंग्यता हो होगी क्योंकि वहाँ पर व्यक्त रूप में उक्त होने से लोक का अभिमान (उसमें व्यंग्यता हो होगी क्योंकि 'स्वस्थ' यह 'होते हैं' यह 'मेरे जीवित रहते होते' वह और 'धातिराष्ट्र' यह आकांक्षायुक्त दीप्त और गद्गद के साथ तार प्रशमन और उद्दीपन के द्वारा विचित्र बनायी हुई काकुयुक्त दीप्त और गद्गद के साथ तार प्रशमन और उद्दीपन के द्वारा विचित्र बनायी हुई काकुयुक्त दीप्त और गद्गद के साथ तार प्रशमन और उद्दीपन के द्वारा विचित्र बनायी हुई काकु
द्वानि 'यह व्ययं असंभव्य है और अत्यन्त अनुचित है' इस व्यंग्य अर्थ का स्फुरण करते हुये उसी के द्वारा उपकृत होकर व्यंग्य से उपस्कृत वाच्य की ही क्रोधानुभावरुपता को कहती है ।
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तृतीय उद्योतः
गुणीभूतव्यङ्ग्य का दूसरा प्रकार—काव्याक्षिप्त गुणीभूतव्यङ्ग्य
तारावती—गुणीभूतव्यङ्ग्य का एक दूसरा प्रकार और होता है जिसे काव्याक्षिप्त गुणीभूतव्यङ्ग्य कहते हैं। ३८वीं कारिका में उसी का परिचय दिया गया है। (दीधितिकार ने अवतरण में लिखा है—'काव्यादिष्वतरूप गुणीभूतव्यङ्ग्य के प्रकार का निरूपण कर रहे हैं' जबकि लोचनकार ने काव्याक्षिप्त को गुणीभूतव्यङ्ग्य का उदाहरण कहा है। लोचनकार का आशय यह है कि ध्वनिकार ने गुणीभूतव्यङ्ग्य का क्षेत्र अनन्त बतलाया है; उन्होंने उसका प्रकार-विभाजन नहीं किया। यह काव्याक्षिप्त व्यङ्ग्य भी उसी प्रकार गुणीभूतव्यङ्ग्य का एक उदाहरण हो सकता है जिस प्रकार पहले बतलाया गया है कि अनेक अलङ्कार गुणीभूतव्यङ्ग्य के ही उदाहरण होते हैं।) कारिका का आशय यह है कि 'देखा जाता है कि काकु से दूसरे अर्थ की प्रतीति हो जाती है, उसमें भी व्यङ्ग्य गुणीभूत ही होता है; अतः वह भी इसी प्रकार के अन्दर सन्निविष्ट हो जाती है।'
तृतीय उद्योतः
काकु शब्द को निष्पत्ति दो प्रकार से बतलाई जा सकती है (१) लौल्य अर्थवाली 'कक्' धातु से 'उण्' प्रत्यय होकर काकु शब्द बनता है। काकु का लौल्य (लोभ) यहीं है कि वह अपने अर्थ से सन्तुष्ट न रहकर दूसरे अर्थ को भी अपने में सम्मिलित करना चाहता है। काकु दो प्रकार का होता है साकाक्ष और निराकाक्ष क्योंकि वाक्य भी दो ही प्रकार का होता है। जिस वाक्य से जितना वाच्यार्थ आ रहा हो उतने ही वाच्यार्थ तक सीमित न रहकर जहाँ अधिक या न्यून अर्थ लिया जाता है और जिसका निर्णय बाद में प्रमाण द्वारा किया जाता है वह साकाक्ष वाक्य होता है तथा जहाँ अर्थ स्वभाव-पर्यवसित होता है वह वाक्य निराकाक्ष कहलाता है। साकाक्ष वाक्य में जो काकु होता है वह साकाक्ष काकु कहलाता है और निराकाक्ष वाक्य में जो काकु होता है उसे निराकाक्ष काकु कहते हैं।
तृतीय उद्योतः
इसी प्रकार कण्ठवृत्ति के अनुसार इसके दो भेद भी होते हैं। इन सब के क्रम से जहाँ काकु का प्रयोग किया जाता है वहाँ वह प्रकृत अर्थ के अतिरिक्त अन्य अर्थ का भी लोभ रखता है। अतः उसे काकु कहते हैं। (२) ईप्सित अर्थ में 'कु' शब्द है। उसका 'का' आदेश हो जाता है। इसका आशय यह है कि काकु उसे कहते हैं जिसमें हृदय में स्थित वस्तु की बहुत थोड़ी प्रतीति कराई जाय। उस काकु से जो व्यङ्ग्यार्थ प्रतीत होता है वह भी इसी प्रकार (गुणीभूतव्यङ्ग्य) का ही आश्रय लेता है। यहाँ पर 'अर्थान्तरगतिः' इस शब्द का बोधक्यार्थ काव्य है। अर्थात् इसका आशय यह है कि जिस काव्य में काकु से अर्थान्तर गति होती है उसे इसी प्रकार में समावेश प्राप्त होता है। इस प्रकार यहाँ काव्य ही गुणीभूत होता है, प्रतीति गुणीभूत नहीं होती। अथवा प्रतीति को गुणीभूत कहकर यहाँ पर काव्य के गुणीभाव का निरूपण किया गया है।
तृतीय उद्योतः
(यहाँ पर 'अर्थान्तरगति' शब्द में दो प्रकार से समास किया जा सकता है—बहुब्रोहि 'अर्थान्तर की गति (प्रतीति) है जिसमें' अर्थात् काव्य और तत्पुरुष समास अर्थात् अर्थान्तर की प्रतीति। प्रथम अर्थ के अनुसार काव्य की गुणीभूत-व्यङ्ग्यता सिद्ध होती है और दूसरे के अनुसार प्रतीति की गुणीभूतव्यङ्ग्यता सिद्ध होती है।
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दूसरे अर्थ के अनुसार भी प्रतीति के माध्यम से काव्य को ही गुणीभूतव्यंग्य कहा जा सकता है ।
(कारिका के 'व्यंग्यस्य गुणीभावे' में ससम्बन्ध व्याख्या दो अर्थों में की जा सकती है—निमित्त सप्तमी में और भाव सप्तमी (सति सप्तमी) में । निमित्त सप्तमी मानने पर अर्थ यह होगा कि क्योंकि काकु में व्यंग्य गुणीभूत होता है इसीलिये वहाँ पर गुणीभूत-व्यंग्य काव्य कहा जाता है । दूसरी व्याख्या के अनुसार इसका अर्थ होगा—'जहाँ कहीं काकु से अभिव्यक्त होनेवाला व्यंग्यार्थ गुणीभूत हो जाता है वहाँ गुणीभूतव्यंग्य काव्य कहा जाता है । दोनों व्याख्याओं में अन्तर यह है कि प्रथम के अनुसार जहाँ कहीं काकु का प्रयोग होगा वहाँ सर्वत्र गुणीभूतव्यंग्य ही माना जायगा । किन्तु दूसरी व्याख्या के अनुसार गुणीभूतव्यंग्य समस्त काकु स्थलों में नहीं होगा, अपितु केवल वहीं होगा जहाँ काकु व्यंग्य अर्थ गुणीभूत होकर प्रधान होगा । यदि काकु व्यंग्य अर्थ गुणीभूत न होकर प्रधान होगा तो वहाँ पर ध्वनि ही होगी । लोचनकार ने इस प्रथम अर्थ को ही मान्यता दी है और यह सिद्धान्त माना है कि जहाँ कहीं काकु हो वहाँ सर्वत्र गुणीभूतव्यंग्य हो होता है । यहाँ लोचनकार ने दूसरे पक्ष को उठाया है और उसका खण्डन किया है ।)
और लोग तो यह कहते हैं कि व्यंग्य के गुणीभाव में ही यह प्रकार होता है अन्यथा तो वहाँ पर भी ध्वनि ही होती है । यह उन लोगों का कहना ठीक नहीं है क्योंकि जहाँ कहीं काकु का प्रयोग होता है वहाँ सर्वत्र यदि व्यंग्य उन्मीलित भी होता है तो भी शब्द के द्वारा ही उसका स्पर्श कर लिया जाता है और वह व्यंग्य सर्वथा गुणीभूत हो जाता है । काकु तो शब्द का ही एक विशेष धर्म है । (भय क्रोध शोक इत्यादि भावनाओं में शब्द का विभिन्न भंगिमाओं के साथ उच्चारण किया जाता है जिससे शब्द से ही वे भावनायें व्यक्त हो जाती हैं ।) ऐसे अनेक स्थल होते हैं जहाँ व्यंजना तो होती है किन्तु किसी शब्द के द्वारा उसे कह दिया जाता है । जैसे 'गोपी ने यह साभिप्राय रूप में कहा' 'हँसते हुए नेत्रों से संकेत करके' इत्यादि में अभीव्यक्त अर्थ को शब्दों के द्वारा व्यक्त कर दिया जाता है और अभिप्राय अथवा संकेत की व्याख्या करने के लिये व्यंग्यार्थ का उपयोग करना पड़ता है । अतः व्यंग्यार्थ इन शब्दों का अर्थ कहने में अपने को गौण बना देता है । यही बात काकु के विषय में कही जा सकती है । बिना व्यंग्यार्थ का प्रयोग किये काकु की व्याख्या ही नहीं हो सकती । यह पता ही नहीं चल सकता कि वक्ता ने शब्दों का उच्चारण एक विशेष प्रकार से क्यों किया । अतः सर्वत्र काकु प्रयोग में गुणीभूतव्यंग्य ही होता है और कारिका में 'व्यंग्यस्य गुणीभावे' में सति सप्तमी न मानकर निमित्त सप्तमी मानी जानी चाहिये । ध्वनि के उदाहरण 'शम धम्मिय' इत्यादि में भी यदि काकु का प्रयोग किया जाय तो लोग तो वहाँ पर भी गुणीभूतव्यंग्य ही मानेंगे ।
लक्षागृहानलविषाणसन्निपातप्रवेशैः प्राणेःयु वित्तनिचयैः च नः प्रहृत्य । आकृष्य पाण्डववधूभिरपिधानकेशान् स्वस्थ्या भवन्तु मयि जीवति धार्तराष्ट्राः ॥
यह वृणीसहार का पद्य है । ओमसेन कण्ठ कर रहे हैं :-
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तृतीय
उद्योतः
'लाक्षागृह, अनल, विषान्न और द्यूतसभा प्रवेश के द्वारा हमारे प्राणों और धन सच्चयों पर प्रहार करके तथा पाण्डववधू के वस्त्र, ओर केशों को खींचकर मेरे जीवित रहते हुये धृतराष्ट्र के पुत्र स्वस्थ हों?'
यहाँ पर यह व्याख्या निकलती है कि बात सर्वथा असम्भव है कि मैं जीवित रहूं और धृतराष्ट्र के पुत्र स्वस्थ होकर बैठ रहें । यहां पर चार शब्दों 'स्वस्था: भवन्तु माय जीवति' और 'धार्तराष्ट्राः' के उच्चारण में कण्ठ का स्वर ऐसा बना लिया गया है कि उससे कण्ठ की चार प्रकार की अवस्थायें व्यक्त होती हैं एक तो आकांक्षा से भरी हुई दीर्घ; गद्गद (भरे हुये) रूप में तार (जोर का) स्वर, प्रशमन और उद्दीपन । इस स्वर भंगिमा से इस व्यंग्य अर्थ का स्पर्श हो जाता है कि यह बात सर्वथा असम्भव है और अत्यन्त अनुचित है। उस व्यंग्य के द्वारा उपकृत होकर काकु व्यंग्य से उपस्कृत वाच्य की ही क्रोधानुभावरूपता को व्यक्त करती है। इस प्रकार व्यंग्य के वाच्योपस्कारक होने के कारण यह गुणीभूतव्यंग्य का ही उदाहरण है ।
तृतीय
उद्योतः
क्या काकु ध्वनि हो सकता है ?
तृतीय
उद्योतः
(यहाँ पर एक बात स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि अभिनवगुप्त सर्वत्र काकु स्पलों में गुणीभूतव्यंग्य ही मानते हैं । किन्तु काव्यप्रकाशकार की ऐसी सम्मति नहीं है । उन्होंने काकु द्वारा अभिव्यक्त व्यंग्यार्थ के प्रधान होनेपर ध्वनि और गौण होनेपर गुणीभूतव्यंग्य माना है । यही मत द्वितीयकार ने भी ठीक माना है । मम्मट का कहना है कि जहाँ काकु से व्यक्तित व्यंग्यार्थ के बिना भी वाच्यार्थ की पूर्ति हो जाती है वहां प्रकारणादि की पर्यालोचना करने पर व्यंग्यार्थ की प्रतीति होती है, अतः वहाँ पर ध्वनिकाव्य ही होना चाहिये । प्रमाण के रूप में मम्मट तथा उनके समर्थक वेणीसंहार के निम्नलिखित पद्य को प्रस्तुत करते हैं—
तृतीय
उद्योतः
तथाभूतां दृष्ट्वा नृपसदसि प्राप्तावलतनया, वने व्याधेः: सार्धं सुचिरमुषितं वल्कलघरैः । विराटस्यावासे स्थितमनुचितारम्भनिभृतं, गुरु: खेदं खिन्ने मयि भजति नान्यापि कुरुपु ।।
जव भीमसेन से यह कहा जाता है कि 'तुम्हारी इसी प्रवृत्ति से तो हमारे गुरु (युधिष्ठर) को खेद होता है' तब भी भीमसेन उत्तर देते हैं—
तृतीय
उद्योतः
'गुरु ने राजसभा में दुपदराज को पुत्री को वह दशा देखी, वन में वल्कलधारी बहेलियों के साथ बहुत समय तक रहें, विराट के निवासस्थान पर अनुचित कार्यों को करते हुये गुप्त रूप से रहें । गुरु को हमारे कुपित होनेपर क्रोध होता है कुरुओं पर नहीं ।
मम्मट का कहना है कि यहां पर काकु की विश्रान्ति प्रश्नमात्र में ही हो जाती है, अतः 'हम पर क्रोध अनुचित हैं कुरुओं पर उचित है' यह अतिरिक्त व्यंजना ध्वनि का रूप धारण करती है । यहां पर दो दशायें हो सकती हैं—एक तो काकु से सीधी यही व्यंजना निकले
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कि 'हमपर क्रोध अनुचित है कुहों पर उचित है' तब तो इसके गुणीभूत होने में कोई सन्देह रह ही नहीं जाता। दूसरा यह कि यहाँ पर प्रश्न की अभिव्यक्ति हो और प्रश्न से औचित्य अनौचित्य की अभिव्यक्ति हो ऐसी दशा में प्रधान भी तो शब्द वाच्य नहीं है। अतः काकु की व्यंजना तो काकु की वाच्यसिद्धि का अज्ञ ही है। ध्वनिरूपता को धारण करनेवाला काकु से प्रत्यक्ष रूप में अभिव्यक्त नहीं होता, परवर्ती औचित्य-अनौचित्यपरक व्यङ्गचार्थ काकु से प्रत्यक्षों में सर्वत्र काकु से होनेवाली उसमें निमित्त दूसरा प्रश्नरूप व्यङ्ग्यार्थ है। अतः काकुकुसृष्टौ में सर्वत्र काकु से गुणीभूत ही होती है। यह मत समीचीन है।
राम असइओ ओरम पिब्बवए ण तुए मलिणिअं सीलं । फक उण जणस्स जाइ हू चन्दिलं तं ण कामेमो ॥
(ध्वन्या०) अथवा—
शब्दशक्तिरेव हि स्वाभिधेयसामर्थ्याक्षिप्तकाकुसहाया । सत्यर्थविशेषप्रतिपत्तिहेतुनं तु काकुमात्रं । विषयान्तरे स्वेच्छाकृतात् काकुमात्रात् तथाविधार्थप्रतिपत्त्यसम्भवात् । स च अर्थः काकुविशेषसहायारब्धौड्यर्थसामध्यालभ्य इति व्यङ्गचरूप एव । वाचकत्वानुगमनेव तु यदा तद्विशिष्टवाच्यप्रतीतिस्तदा गुणीभूत-व्यङ्गचस्यैव तद्व्यपदेशः । व्यङ्गचविशिष्टवाच्याभिधा-व्यतिरेकादव्यपदेशात् । यिनो हि गुणीभूतव्यङ्गचत्वम् ।
शब्दशक्ति ही अपने अभिधेय के सामर्थ्य से आक्षिप्त काकु की सहायता से सत्य अर्थ की विशेष की प्रतिपत्ति में हेतु होती है केवल काकु नहीं। क्योंकि दूसरे विषय में अपनी इच्छा से किये हुए केवल काकु से उस प्रकार के अर्थ की प्रतिपत्ति असम्भव होती है। और वह अर्थी काकु विषय में सहायक शब्दव्यापार में उपारूढ़ होकर अर्थ सामर्थ्य से ही प्राप्त होता है अतः व्यङ्ग्य रूप ही होता है। वाचकत्व के अनुगम के द्वारा ही जब तद्विशिष्ट वाच्य की प्रतीति होती है तब गुणीभूत-व्यङ्गच के रूप में उस प्रकार के अर्थ का द्योतन करने वाले का नाम काव्य होता है। व्यङ्गच विशिष्ट वाच्य को कहनेवाले का निस्सन्देह गुणीभूत-व्यङ्गचत्व होता है।
अथवा जैसे— 'अच्छा पतिव्रता ? अब अधिक मत कहो; हम तो असती हैं; तुमने तो शील को मलिन नहीं किया। फिर हम किसी साधारण को धर्मपत्नी के समान उस नाईं की कामना क्यों न करें ?'
३८
आम असत्यः उपरम पतिव्रते न त्वया मलिनितं शीलम् । किं पुनर्जननस्य जायेव नापितं तं न कामयामहे ॥
इति च्छाया । आम असत्यो भवामः इत्यस्युपगमकाकुः साकाङ्क्षोपहासः । उपरम पतिव्रते इति निराकाङ्क्षतया सूचनगर्भा । पतिव्रते इति दीप्तस्मितयोगिनी । न त्वया मलिनितं शीलमिति पुनर्जननस्य जायेव नापित-मनस्थान्धीकृता, चन्दिलं नापित-शीलमति सदृशद्योतकाङ्क्षा ।
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तृतीय उद्योतः
मिति पामरप्रकृति न कामयामहे इति निराकांक्षगद्गदोपहाससर्गभित् । एषा हि कयाचिन्नापितानुरक्तया कुलवध्वा दृष्टाविनयाया उपहास्यमानाया: प्रत्युपहासावेशगर्भोक्तिः काकुप्रधानैवैति । गुणीभावं दर्शयितुं शब्दस्पृष्टतां तावत्साधयति—शब्दशक्तिरेवत्यादिना ।
(अनु०) 'आम् यह—'आम असत्य:.....' इत्यादि छाया है । 'बरे हम असती हैं' यह स्वीकृति की काकु सकांक्षोपहासपरक है । 'उपरम' यह निराकांक्ष होने के कारण यहाँ सूचनागर्भित है । 'पतिव्रता' यह 'दीस स्मित' से युक्त होनेवाली काकु है । 'तुमने शीलको मलिन नहीं किया' यह गद्गद के साथ आकांक्षा । 'फिर किसी एक व्यक्ति की जाया के समान कामान्ध होकर उस चन्डाल नापित की कामना न करें' यह निराकांक्ष गद्गद और उपहास से गर्भित काकु है । यह किसी नापित में अनुरक्त कुलवधू के द्वारा हँसनेवाली देखे हुये अविनय वाली (स्त्री) की प्रत्युपहास के आवेश से गर्भित उक्ति काकुप्रधान ही है । गुणीभाव को दिखलाने के लिये शब्दस्पृष्टता को सिद्ध कर रहे—'शब्दशक्ति ही इत्यादि के द्वारा ।
तृतीय उद्योतः
३८
ननु वाच्यं व्यङ्ग्यत्वं कथमित्याशङ्क्याह—स चैति । अथ नु गुणीभावं दर्शयति—वाचकत्वेति । वाचकत्वेऽनुगमो गुणत्वं व्यङ्ग्यत्वेन व्यङ्ग्यभावस्य व्यङ्ग्यविशिष्टवाच्यप्रतीत्या तत् तत्रैव काव्यस्य प्रकाशकत्वं कल्प्यते । तेन च तथाविधपदेश इति काकुयोजनायां सर्वत्र गुणीभूतव्यङ्ग्यता तैव । अत एव 'मथ्नामि कौरवशतं समरे न कोपात्' इत्यादौ विपरीतलक्षणां य आहुःते न सम्यक् परामृशुः । यतोद्वारोच्चारणकाले एव 'न कोपात्' इति दीप्ततारगद्गदसाकांक्षकाकुबलान्निषेधस्य निषिध्यमानतयैव युधिष्ठिराभिमतसन्धिमार्गाक्षमारुपत्वाभिप्रायेण प्रतिपत्तिरिति मुख्यार्थबाधाद्यनुसरणविध्नाभावात् को लक्षणाया अवकाशः । 'दर्शे यजेत' इत्यत्र तु तथाविधकाक्वाद्युपायान्तराभावाद् द्वयतु विपरीतलक्षणा इत्यलमवान्तरेण बहुना ।
(प्रश्न) इस प्रकार व्यङ्गचत्व कैसे ? यह शङ्का करके कहते हैं—'और वह' यह । अब गुणीभाव को दिखलाते हैं—'वाचकत्व' यह । वाचकत्व में अनुगम का अर्थ है व्यङ्गयगुणकभाव का गुणत्व, व्यङ्गयविशिष्ट वाच्य की प्रतीति से वहीं पर काव्य का प्रकाशकत्व कल्पित किया जाता है । उससे वैसा नाम हो जाता है इस प्रकार काकुयोजना में सर्वत्र गुणीभूतव्यङ्गयता ही होती है । अत एव 'सो कौरवों को क्रोध से युद्ध न मारें' इत्यादि में विपरीत लक्षणा को जो कहते हैं उन्होंने ठीक परामर्श नहीं किया साकांक्ष काकु के बल से निषेध की निषिध्यमान रूप में ही युधिष्ठिर के अभिमत सन्धिमार्ग को न सह सकने के अभिप्राय के रूप में प्रतिपत्ति होती है इस प्रकार मुख्यार्थबाध इत्यादि विघ्न के अभाव से लक्षणा का क्या अवकाश ? 'दर्शे यजेत' इत्यत्र तु तथाविध काकु इत्यादि का उपाय न होने से विपरीत लक्षणा हो जाय । बस अधिक अवान्तर की आवश्यकता नहीं ॥३८॥
तृतीय उद्योतः
काकु व्यङ्ग्य गुणीभूतव्यङ्गच का दूसरा उदाहरण—
तृतीय उद्योतः
तारावती—कोई अच्छे घराने की स्त्री किसी चन्डाल नामक नाई से फँसी है । संयog
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वश वह अपने पड़ोस की किसी दूसरी स्त्री को दुश्रे�्टयों को देखकर उसकी हँसी उड़ाने लगती है जिस पर वह पड़ोसिन कहती है— 'अच्छा पतिव्रता जो ! हम तो दुराचारिणी हैं ही रहने दो तुमने तो अपना शील वचा ही लिया तुमने तो उसे मलिन नहीं किया । भला हम एक अच्छे घराने की बहू होकर उस चन्िदल नाई की कामना क्यों न करें ।
'हो हम तो दुराचारिणी हैं' यह स्वीकृति की जो काकु है उसका स्वरूप है साकांक्ष उपहास रूप । 'रहने दो' यह काकु सूचना से गर्भित है और उसको निराकांक्ष रूप कह सकते हैं । 'पतिव्रता' वह काकु द्वेष और स्मित से युक्त है । 'तुमने शील को मलिन नहीं किया' इस काकु को गद्गद पूर्ण साकांक्ष कहा जा सकता है । एक अच्छे व्यक्ति की पत्नी के समान कामान्ध होकर पामर प्रकृतिवाले उस चन्िदल नाई की कामना क्यों न करें' गद्गद और उपहास-गर्भित है । यहाँ पर उपहास की अभिव्यक्ति वाकु के द्वारा ही होती है और काकु की व्याख्या करने के लिये इस अभिव्यक्ति का सहारा लेना अनिवार्य हो जाता है । अतः वाच्यसिद्ध होने के कारण यह गुणीभूतव्यंग्य का ही एक उदाहरण है ।
काकुव्यञ्जना गुणीभाव को कैसे धारण करती है
अब इस विषय में विचार किया जा रहा है कि काकु के द्वारा अभिव्यक्त होनेवाला अर्थ गुणीभाव को धारण कैसे करता है । वही अभिव्यङ्ग्य अर्थ गुणीभाव को धारण कर सकता है जिसका स्पर्श शब्द से हो जाय अर्थात् अभिव्यक्त होकर जो अर्थ शब्द अथवा वाच्यार्थ का मुखापेक्षी हो । यहाँ पर ध्यान देनेवाली बात यह है कि केवल काकु से कभी भी कोई अर्थ नहीं निकलता । उदाहरण के लिये यदि कोई व्यक्ति वाचक शब्द का प्रयोग न करे किन्तु अपने कण्ठ को यों ही साकांक्ष द्वेष इत्यादि किसी प्रकार का बनाकर एक प्रकार का कण्ठरव करने लगे तो उससे किसी प्रकार के अर्थ की अभिव्यक्ति नहीं होगी, काकु से कोई अर्थ तभी अभिव्यक्त होता है जब उसके साथ शब्दों का भी प्रयोग किया जाय और वह शब्दशक्त्य् अभिव्यक्त अपने वाच्यार्थ के सामर्थ्य से काकुका आक्षेप कर उसकी सहायता से विशेष अर्थ की प्रतिपत्ति में कारण बन जाय । आशय यह है कि काकु से जो अर्थ निकलती है वह शब्द शक्ति का ही व्यापार होता है क्योंकि शब्दशक्ति के अभाव में केवल काकु से कोई अर्थ नहीं निकलता ।
इस प्रकार उस व्यङ्ग्यार्थ की प्रतिपत्ति में काकु केवल सहायक होता है, व्यापार तो शब्द शक्त्ति का ही होता है । अतः काकु से निकला हुआ अर्थ गुणीभूतव्यङ्ग्य की कोटि में आता है । (प्रश्न) यदि अर्थ प्रतीति में शब्दशक्ति का व्यापार ही उपयोगी होता है तो आप उसे व्यङ्ग्यार्थ क्यों कहते हैं ? उसको आप वाच्यार्थ की संज्ञा क्यों नहीं प्रदान करते ? ( उत्तर ) यद्यपि काकुस्थलों में प्रतीतिगोचर होनेवाला अर्थ शब्द के अभिधा व्यापार में ही कुछ न कुछ उपारूढ़ हो जाता है, साकांक्षादिरूप शब्द का इस प्रकार का धर्म काकु (कण्ठ-रव) उसमें सहायक मात्र होता है तथापि उसमें अर्थ के सहकार की भी अपेक्षा होती है इसलिए उस प्रतीतिगोचर अर्थ को व्यङ्ग्य कहा जाता है । आशय यह है कि जब हम कण्ठ की विशेष दशा में कोई वाक्य सुनते हैं तब हमें उस वाक्य के एक अर्थ वाच्यार्थ का बोध हो जाता है । किन्तु
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उस अर्थ की सङ्क्ति कण्ठरव से नहीं लगती क्योंकि कण्ठरव से हम वक्ता की जिस परिस्थिति का ज्ञान प्राप्त करते हैं उससे हमें यह ज्ञान हो जाता है कि वक्ता के प्रयोग किये हुए वाच्य का अर्थ हमारी समझ में आ रहा है वस्तुतः वक्ता का वही आशय वदापि नहीं हो सकता। तब हम उन शब्दों से हो ऐसा अर्थ समझ लेते हैं जिससे वक्ता के कण्ठस्वर की भी संगति बैठ जाती है। इस प्रकार यद्यपि कण्ठरव के विशेष रूप के सहकार से शब्द व्यापार ही कुछ न कुछ प्रसार पाकर दूसरे अर्थ की प्रतीति कराता है तथापि उस अर्थ के पूर्ण परिज्ञान में तो अर्थसामर्थ्य ही कारण होता है इसलिए उस अर्थ को व्यङ्गच अर्थ ही माना जाता है। (प्रश्न) इस प्रकार उस अर्थ को आप व्यंग्य तो कह सकते हैं किन्तु उसको गुणीभूत कहने का क्या कारण है ? ( उत्तर ) गुणीभूतव्यंग्यत्व वहाँ पर होता है जहाँ व्यंग्यार्थ वाच्य का अनुगमन करे। जहाँ पर व्यंग्यव्यञ्जक भाव का वाच्य के प्रति अनुगमन होता है अर्थात् व्यंग्यार्थ वाच्यार्थ के प्रति गुणवत्त को प्राप्त हो जाता है तब वहाँ पर गुणीभूतव्यंग्य कहा जाता है। काव्य में भी यही होता है, अतः व्यंग्य के गुणीभूत होने के कारण अर्थात् व्यंग्यविशिष्ट वाच्य की प्रतीति के कारण वहीं पर काव्य का प्रकाशकत्व होता है जिससे उसका नाम गुणीभूतव्यंग्य हो जाता है।
(यहाँ पर इस वाक्य का अन्वय ऐसा भी हो सकता है—‘यदा वाचकत्वानुगमेनैव तु तद्विशिष्टा वाच्यप्रतीति: तदा तथाविधार्थ्योतिना काव्यस्य गुणीभूतव्यंग्यत्वया व्यपदेशः’ अर्थात् ‘जब वाचकत्व के प्रति अनुगमन करते हुये ही व्यंग्यविशिष्ट वाच्य की प्रतीति होती है तब वहाँ पर उस प्रकार के अर्थ का द्योतन करनेवाले काव्य का नाम गुणीभूतव्यंग्य के रूप में पड़ जाता है। किन्तु यह अर्थ लोचनकार के मत के प्रतिकूल है क्योंकि लोचनकार तो सर्वत्र काकुस्थलों में गुणीभूतव्यंग्य ही मानते हैं। अतः उन्होंने ‘गुणीभूतव्यंग्यतया’ का अन्वय ‘तथा-विधार्थ्योतिना’ के साथ कर दिया है जिससे उसका अर्थ यह हो गया है कि जहाँ पर काकु के द्वारा कोई व्यंग्यार्थ प्रतीतिगोचर होकर और वाचकत्व का अनुगमन करके व्यंग्यविशिष्ट वाच्य की प्रतीति कराते हुये गुणीभूतव्यंग्य होकर उस प्रकार के अर्थ का द्योतन करता है वहाँ पर उसे काव्य का नाम प्राप्त होता है। आशय यह है कि जहाँ कहीं काकु की योजना होती है वहाँ सर्वत्र गुणीभूतव्यंग्य हो होता है। कुछ लोगों ने निम्नलिखित पद्य में विपरीत लक्षणा मानी थी :-
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मथ्नामि कौरवशतं समरे न कोपात्, दुर्योधनस्य हृदयं न पिबाम्युरसः । सङ्ख्यर्णयामि गदया न सुयोधनोरु, सन्धिं करोतु भवतां नृपतिः पणेन ॥
वेणीसंहार में यह सुनकर कि युधिष्ठिर सन्धि का प्रयत्न कर रहे हैं भीमसेन कहते हैं—‘मैं सैकड़ों कौरवों को युद्ध में न मथूँ? दुश्शासन की छाती से रक्त को न पी लूँ? गदा से दुर्योधन की जंघाओं को चूर-चूर न कर लूँ? आपके राजा पण के द्वारा सन्धि कर लें?’
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इन लोगों का आशय यह है कि भीमसेन क्रोध में भरे हैं और वस्तुतः कौरवों का मथन इत्यादि कार्य करना ही चाहते हैं; फिर उनका यह कहना तात्पर्य में ही बाधित हैं कि ‘मैं ऐसा न करूँ’ इससे यहाँ विपरीत लक्षणा होकर उसका अर्थ हो जाता है कि मैं ये सब कार्य अवश्य करूँगा। इस प्रकार कुछ लोगों के मत में यहाँ विपरीतलक्षणा है। किन्तु जो
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लोग ऐसा समझते हैं वे ठीक नहीं समझते। कारण यह है कि जिस समय इन वाक्यों का उच्चारण किया जाता है और ‘न कोपात्’ कहने मे कण्ठ का काकु दीप्त तार और गद्गद साकांक्ष हो जाता है तब उस काकु के बल पर ‘न करुण्’ इस निषेध की प्रतिपत्ति निषेध के रूप में ही होती है। और उसका यही अर्थ हो जाता है कि युधिष्ठिर जिस शान्ति मार्ग का अनुसरण कर रहे हैं उसको हम सह नहीं सकते। ऐसी दशा में मुख्यार्थबाध रूप विघ्न यहाँ उपस्थित हो नहीं होता और निर्विघ्न रूप में अक्षमता तथा अवश्यकर्तव्यता का अर्थ निकल आता है। इस प्रकार जब यहाँ पर बाध इत्यादि का प्रतिसंन्धान होता हो वहाँ तब विपरीतलक्षणा का अवसर ही क्या ? विपरीत लक्षणा तो ऐसे स्थान पर हो सकती है जहाँ काकु इत्यादि किसी अन्य उपाय से काम न चल रहा हो और बाध उपस्थित ही हो जाय। जैसे—‘दर्श मे यज्ञ करना चाहिये’ दर्श का अर्थ है अमावास्या। दर्श की व्युत्पत्ति इस प्रकार कर ली जाती है—‘जिसमें चन्द्र न दिखाई पड़ता हो ।’ किन्तु ‘दर्श’ शब्द ‘दृश्’ धातु से बना है। अतः इसका अर्थ लेने के लिये विपरीतलक्षणा का आश्रय लेना पड़ता है। आशय यह है कि काकु स्थलों में विपरीतलक्षणा का आश्रय दिना ही लिये हुए काकु के बलपर अर्थान्तर की प्रतीति हो जाती है और जहाँ कहीं काकु होता है वहाँ सर्वत्र गुणीभूतव्यङ्ग्य ही हुआ करता है। वस इतना पर्याप्त है, अवान्तर प्रकरण की अधिक व्याख्या करने की क्या आवश्यकता ?
(ध्वन्यालोके) प्रभेदस्यास्य विषयो यत्र युक्त्या प्रतीयते । विधातव्या सहृदयैस्तत्र ध्वनियोजना ॥३२९॥
सङ्कीर्णो हि कश्चिद्वनिरेगुणीरूभूतव्यङ्गचस्य च लक्ष्ये दृश्यते मार्गः । तत्र यस्य युक्तिसहायता तत्र तेन व्यपदेशः कर्तव्यः । न सर्वत्र ध्वनिरागिणा भवितव्यम् । यथा—
(अनु०) ‘और जो युक्ति से इस प्रभेद का विषय प्रतीत होता है, सहृदयों को वहाँ ध्वनियोजना नहीं करनी चाहिये’ ॥३२९॥ (अनु०) ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य का लक्ष्य में कोई सङ्कीर्ण मार्ग देखा जाता है। उसमें जिसकी युक्ति सहायता हो वहाँ उसी से नामकरण करना चाहिये। सर्वत्र ध्वनि का प्रेमी नहीं होना चाहिये। जैसे—
पत्युः शिरश्छन्द्रकलामननेन स्पृशति सख्या परिहासपूर्वकम् । सा रक्षति॒व च चरणौ कृताश्लिषालिङ्गेन तां निवंचनं जगदान ॥
‘चरणों को रंगकर परिहासपूर्वक इससे पति के सिर की चन्द्रकला का स्पर्श करो’ यह आशीर्वाद दी हुई पावती ने बिना वचन के ही माला से उसको मार दिया।
(लो०) अधुना सङ्कीर्ण विषयं विभजते—प्रभेदस्येति । युक्त्येति । चारुत्वप्रति-तिरेवात्र युक्तिः । पत्युरिति । अननेनेति । अलङ्कोपरकस्य हि चन्द्रमसः परभागल-भोजनेरतपादपतानप्रसादनेनैविना न पत्युंहन्ति तथेष्टानुरूपत्न्या भाव्यमिति चोप-देष्टः । शिरोरुहा या चन्द्रकला तामपि परिभवेतिं सपत्नीलोकापजय उक्तः ।
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निर्वचनमिति । अनने लज्जावहित्वहर्षेष्यासाध्वससौभाग्याभिमानप्रवृत्ति
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उद्योत:
यद्यापि ध्वन्यते, तथापि तन्निर्वचनशब्दार्थस्य कुमारीजनोंचितस्याप्रतिपत्तिलक्षणस्यार्थ-
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उद्योत:
स्योपस्कारकतां केवलमाचरति । उपस्कृतस्त्वर्थे: शृङ्गाराज्जतामेति ।
(अनु०)अब सङ्कीर्ण विषय का विभाजन करते हैं—‘प्रेमद का’ यह । ‘युक्ति से’ यह । ‘चारुत्व प्रतीति’ ही यहाँ पर युक्ति है । ‘पति का’ यह । ‘इससे’ यह । अलक्तक से रंगे हुये (पैर) को चन्द्र की अपेक्षा परम सौभाग्य प्राप्त होगी—और निरन्तर पैर पड़ने के प्रसाद के बिना पति की शोघ्र ही यथेष्ट अनुरवातिनी नहीं होना चाहिये यह उपदेश है । सिर पर धारण की हुई जो चन्द्रकला उसको भी पराजित करो यह सप्तनी लोक को जीतना बतलाया गया है ।
तृतीय
उद्योत:
'निर्वचन' यह । इससे लज्जा, अवहिथ्य, हर्ष, ईर्ष्या, भय, सौभाग्य, अभिमान इत्यादि
यद्यपि ध्वनित होता है तथापि वह निर्वचन शब्द के अर्थ कुमारोचित अस्वीकृति रूप अर्थ की उपस्कारकता का ही केवल आचरण करता है । उपस्कृत अर्थ तो शृंगार की बझता को प्राप्त हो जाता है ।
तृतीय
उद्योत:
गुणीभूतव्यङ्ग्य के क्षेत्र में ध्वनियिज्ञों को निषेध
तृतीय
उद्योत:
तारावती—ऊपर ध्वनि और गुनीभूतव्यङ्ग्य का विस्तृत विवेचन किया जा चुका । कुछ स्थल ऐसे होते हैं जहाँ एकदम यह कहना असम्भव हो जाता है कि अमुक स्थल ध्वनि काव्य है या गुनीभूतव्यङ्ग्य । ऐसे स्थान पर क्या करना चाहिए यहाँ इस ३९ वीं कारिका में बतलाया गया है । कारिका का आशय यह है—
तृतीय
उद्योत:
‘जहाँ पर युक्ति गुनीभूतव्यङ्ग्य के पक्ष में हो अर्थात् जहाँ युक्ति से कोई स्थल गुनी-भूतव्यङ्गय सिद्ध किया जा सकता हो सङ्घयों को यह नहीं चाहिये कि वहाँ ध्वनि को संयोजित करने की चेष्टा करें ।’
तृतीय
उद्योत:
(युक्ति एक तो तर्काशास्त्रीय होती है । किन्तु काव्यालोचन के प्रसङ्ग में इसका तर्क-शास्त्रीय अर्थ नहीं लिया जाना चाहिये । यहाँ पर युक्ति का अर्थ औचित्य ही किया जाना चाहिये । काव्य में औचित्य चारुताप्रतीतिरूप ही होता है । अत एवं यहाँ पर कारिका का आशय यही है कि जहाँ कहों चमत्कार का आधिक्य गुनीभूतव्यङ्गय में दिखाई पड़ रहा हो वहाँ बलात् ध्वनि को आरोपित करने की चेष्टा नहीं करनी चाहिये ।) इस समस्त कथन
तृतीय
उद्योत:
का आशय यही है कि चमत्कार का आधिक्य ही नामकरण का एकमात्र कारण होता है । यदि ध्वनि में चमत्कार का आधिक्य दिखाई पड़े तो उसको ध्वनि नाम देना चाहिये और यदि गुनीभूतव्यङ्गय में चमत्काराधिक्य दिखाई पड़े तो उसे गुनीभूतव्यङ्गय ही कहना चाहिये । ध्वनि का इतना प्रेमी नहीं हो जाना चाहिये कि चमत्कार का आधिक्य तो गुनी-भूतव्यङ्गय में हो और उसको बलात् ध्वनि कहने की चेष्टा की जाय । (कारिका का एक आशय यह भी हो सकता है कि यदि गुनीभूतव्यङ्गय के द्वारा चमत्कार की विशेष पुष्टि होती हुई दिखाई दे तो बलात् ध्वनि-सम्पादन की चेष्टा सहृदय कवि के द्वारा नहीं की जानी चाहिये ।) उदाहरण के लिये कुमार सम्भव के सप्तम सर्ग का यह पद्य लीजिये—
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'विवाह के अवसर पर पार्वती की सखियों ने पार्वती के पैर में महावर लगाया और उपहास के साथ कहा कि अपने इन रंगे हुये पैरों से अपने पति के मस्तक की चन्द्रकला का स्पर्श किया करना । जब सखियों द्वारा यह आकांक्षा व्यक्त की गई तब पार्वती ने बिना कुछ कहे अपनी माला से उस सखी को मार दिया ।' सखी का आशय यह है कि सुरत काल में तुम मान किया करना और तुम्हारे प्रियतम भगवान् शिव तुम्हें मानाने के लिये तुम्हारे चरणों पर अपने मस्तक रखकर तुम्हें अपने इस अलक्तक रंजित चरण से चन्द्रकला का स्पर्श किया करना । यहाँ पर व्यञ्जना यह है कि चन्द्रकला तो बिल्कुल श्वेत होगी जैसा कि तुम्हारा पैर श्वेत है, किन्तु तुम्हारे पैर में यह महावर की लाल रेखा अधिकाधिक सौन्दर्य को बढ़ानेवाली होगी जो सौभाग्य चन्द्रकला को प्राप्त नहीं होगा । इस प्रकार चन्द्रकला की अपेक्षा तुम्हारे पैर को अत्यन्त अधिक सौभाग्य प्राप्त होगा । चन्द्रकला स्त्रीलिंग शब्द है । अतः सपत्नीरूप में उसको पैर से ठुकराना उचित ही है, विशेष रूप से जब भगवान् शङ्कर उसे अत्यधिक सम्मान देने के लिये अपने मस्तक पर बैठा लिया हो तब तो उसका पार्वती के चरणों पर गिरना और अधिक महत्व रखता है इससे यहाँ पर एक व्यञ्जना सखियों के उपदेशपरक भी निकलती है कि जब तक भगवान् शङ्कर तुम्हें पैरों पर गिरकर प्रसन्न न करें तबतक उनकी इच्छानुकूल वशवर्तिनी न होना ।
'बिना कुछ कहे ही अपने गले की फूलों की माला उतार कर पार्वती ने सखी को मार दिया ।' इससे पार्वतीगत कई भाव अभिव्यक्त होते हैं—(१) लज्जा—जिससे कुमारियों को अभीष्ट वस्तु का भी प्रत्याख्यान कर देती हैं । (२) अवहिथ्या—अर्थात् भावगोपन की प्रवृत्ति । आशय यह है कि पार्वती को प्रियतम के चरण पड़ने की बात सुनकर प्रसन्नता तो हुई किन्तु वे उसे कुमारीजन्सुलभ लज्जा के कारण छिपा गई । (३) ईर्ष्या—चन्द्रकला को भगवान् शङ्कर ने सिर पर धारण किया है; इससे पार्वती को ईर्ष्या हुई । (४) अभय—यह कुमारीजनोंचित भाव है जो कि मुग्धाओं को प्रायः हुआ ही करता है । (५) सौभाग्य—कि उसका प्रियतम उसके चरणों पर पड़ेगा और साथ ही उसकी सौत भी उसके चरणों पर पड़ेगी । और (६) अभिमान—कि चन्द्रकला की अपेक्षा भी उसके चरणों में ही अधिक सौन्दर्य होगा फिर मुख इत्यादि अन्य अङ्गों में तो कहना ही क्या ! इत्यादि कई भावों को यहाँ पर व्यञ्जना होती है । कुमारियों का यह स्वभाव ही होता है कि जब उनके सामने उनके भावी प्रियतमों की और विशेष रूप में उनकी भावी प्रणयलीला की बात की जाती है तब वे अप्रगल्भ हो जाती हैं और कुछ बोल नहीं पातीं । इस अप्रगल्भता से ही लज्जा इत्यादि की अभिव्यक्ति होती है । उस अप्रगल्भता को 'निर्वचन' 'बिना कुछ कहे ही' इन शब्दों से उक्त कर दिया गया है । उस अप्रगल्भतारूप वाच्य को ही अभिव्यक्त होनेवाली लज्जा इत्यादि भाव पुष्ट करते हैं और इन भावों का काम केवल उस अप्रागलभ्यरूप वाच्य को पुष्ट करना ही है । इससे यह व्यञ्जक गुणीभूत हो गया है । अत एव बलात् इसको ध्वनि कहने की चेष्टा नहीं करनी चाहिये । अपितु गुणीभूतव्यञ्जक ही कहना चाहिये । फिर यह उपकृत वाच्यार्थ श्रृङ्गार रस का अंग बन जाता है और उसे ध्वनि बना देता है क्योंकि अन्ततः तो सभी काव्य ध्वनि होते ही हैं ।
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३
तृतीय उद्योतः
(ध्वन्याऽ) यथा च— प्रायच्छतोच्चैः कुसुमानि मानिनी विपक्षगोत्रं दयितेन लम्भिता । न किंचिदूचे चरणेन केवलं लिलेख वाष्पाकुललोचना भुवम्॥
(अनु०) और जैसे— 'ऊँचे पुष्पों को देनेवाले प्रियतम के द्वारा विपक्ष (सौत) के नाम को प्राप्त की हुई मानिनी ने कुछ नहीं कहा; केवल आँसुओं से आकुल नेत्रवाली होकर पाँव से भूमि को कुरेदन लगी । यहाँ पर 'बिना कुछ कहे ही मारा' 'कुछ नहीं कहा' इस प्रतिषेध के द्वारा व्यङ्ग्यार्थ का उक्ति से कुछ विषय बना लेने के कारण गुणीभाव ही शोभित होता है । जैसे वक्रोक्ति के बिना व्यङ्ग्यार्थ तात्पर्य के रूप में प्रतीत होता है तब उसकी प्राधान्यता होती है जैसे 'देवर्षि के इस प्रकार कहने पर' इत्यादि । इन्हें पुनरुक्तिभंडन्यास्वोति वाच्यस्यापि प्राधान्यम् । तस्मान्नात्रानुरणनरूपव्यङ्ग्यध्वनिविपदे शो विधेयः ।
३
तृतीय उद्योतः
(लो०) प्रायच्छतेति । उच्चैरिति । उच्चैर्यैःन कुसुमानि कान्तया स्वयं गृहीतान्येत्यर्थः । अस्मदुपाध्यायास्तु हृदतमालिन् पुष्पाणि अमुके गृह्णाण, गृह्णाणेत्युच्चैस्तरस्वरेणादरातिशयार्थ प्रयच्छता । अत एव लम्भितेति । न किंचिद्विति । एवमविधेषु श्रृङ्गारावसरेषु तमिवाच्य स्मरतां मन्त्रदर्शनमेवात्र न युक्तस्मिति सातिशयमन्युसम्भारो व्यङ्ग्यो वचननिषेधस्यैव वाच्यस्य संस्कारः । तद्रक्ष्यति— उक्तिभङ्गयास्तीति । तस्येति व्यङ्ग्यस्य । इहेऽति पत्युरिल्यादौ । वाच्यस्यापोति । अपि शब्दो भिन्नक्रमःः प्राधान्यमपि भवति वाच्यस्य, रसाद्यपेक्षया तु गुणतापीत्यर्थः । अत एवोपसंहारे ध्वनिशब्दस्य विशेषणमुक्तम् ॥ ३९ ॥
(अनु०) 'प्रदान करनेवाले' यह । 'ऊँचे' यह । अर्थात् ऊँचे जो पुष्प कान्ता के द्वारा स्वयं ग्रहण करने में अशक्य होने के कारण संग्रह करके दिये गये । हमारे उपाध्याय तो (यह अर्थ लगाते हैं ) 'भरी अमुक नामवाली ? इन हृदयतम पुष्पों को ले लो, ले लो, यह ऊँचे अर्थात् तारस्वर से अधिक आदर के लिये प्रदान करते हुए । अत एव 'प्राप्त कराई हुई' यह । 'कुछ नहीं' यह । इस प्रकार के श्रृंगार के अवसरों पर उसी को यह याद किया करता है अत एवं मान-प्रदर्शन हो यहाँ पर उचित नहीं है, इस प्रकार अत्यधिक मन्यु का सम्भार रूप वाच्य का ही संस्कार करता है । वह कहेंगे—'उक्ति भङ्गिमा से है' यह । उसका अर्थात् व्यङ्गय का । 'यहाँ' अर्थात् 'पत्युः' इत्यादि श्लोक में । 'वाच्य का भी' यह । भी शब्द यहाँ भिन्नक्रम से
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लगता है । अर्थात् वाच्य का प्राधान्य भी होता है और रस इत्यादि की अपेक्षा तो गौणता भी अत एवं उपसंहार में ध्वनि शब्द का विशेषण दिया गया ॥३१॥
एक दूसरा उदाहरण
तारावती—यह पद्य किरातार्जुनीय के अष्टम सर्ग से लिया गया है । गन्धर्व और अप्सरायें अर्जुन की तपस्या को भङ्ग करने के लिये भेजे गये हैं । वे वन विहार में प्रवृत्त हो गये हैं । उनके उसी उद्यान-भ्रमण का वर्णन करते हुये कवि कह रहा है—
ऊपर को जो फूल लगे हुये थे और जिनको नायिकाओं ने अपने छोटे हाथों से भी नहीं सकती थी उन फूलों को प्रियतम ने नायिका की प्रदान कर दिया, साथ ही उसने पुष्प देने के अवसर पर उसकी सौत का नाम लेकर उसे पुकारा जिससे मानिनी होकर उस नायिका ने कुछ कहा नहीं किन्तु अपनी आँखोंको आँसुओं से भरकर पैरों से केवल भूमि कुरेदने लगी ।'
यहाँ पर नायिका के भूमि कुरेदने लगने से तथा आँखों में आँसू भर लेने से उसका चिन्ता-मिश्रित मन्यु अभिव्यक्त होता है । उसे चिन्ता इसी बात की थी कि ऐसे शृंगार के अवसरों पर यह (नायिक) हमारी सौत की ही याद किया करता है । अतः मानप्रदर्शन से क्या होगा ? जब मैं इसकी प्रेयसी ही नहीं हूँ तब मान-प्रदर्शन भी उचित नहीं है । मानप्रदर्शन का अभिनय होता है आँखें घुमा लेना, उपालम्भ देना, प्रणय को न स्वीकार करना इत्यादि के द्वारा । किन्तु नायिका रोने लगी और भूमि कुरेदने लगी । ये चिन्ता और मन्यु के अनुभव है । इससे चिन्ता और मन्यु का आधिक्य अभिव्यक्त होता है । इसको 'कुछ नहीं कहा' इस शब्द के द्वारा वाच्य बना दिया गया है । अतः अभिव्यंग्य मन्यु का आधिक्य वाच्य का ही संस्कार करता है । अतः ऐसे अवसरों पर व्यंग्यार्थ वाच्य का कुछ विषय बना दिया जाता है जिससे इसे गुणीभूतव्यंग्यार्थ कहना ही अधिक समीचीन जान पड़ता है ।
अभिनवगुप्त के उपाध्याय (सम्भवतः भट्टनायक ने) उच्चैः का अन्वय दूसरे प्रकार से लगाया है । उन्होंने कहा है कि नायक उच्चैः अर्थात् तारस्वर में चिल्ला-चिल्लाकर नायिका की सौत का नाम ले-लेकर पुकार रहा था और कह रहा था कि इन पुष्यों को ले लो, ले लो ? (किन्तु यह अर्थ ठीक नहीं है; क्योंकि एक तो 'उच्चैः' शब्द 'कुसुमानि' के साथ जुड़ा हुआ है; दूसरे एक बार घोखा भी हो सकता है और नायिका की सौत का नाम मुख से निकल भी सकता है; किन्तु बार-बार ऐसा होना अस्वाभाविक प्रतीत होता है । इसीलिये अभिनवगुप्त ने अपने मत का प्रथम उल्लेख कर बाद में पक्षान्तर के रूप में अपने उपाध्याय का मत दे दिया है । यहाँ पर सारांश यह है कि जहाँ पर उक्ति में वकता न हो, किन्तु तात्पर्य से ही व्यंग्यार्थ की प्रतीति हो जाय वहाँ पर व्यंग्यार्थ की प्रधानता होती है और वह ध्वनि का उदाहरण होता है । जैसे 'एवंवादिनि देवर्षौ' इत्यादि पद्य में ।
किन्तु इसके प्रतिकूल जहाँ पर उक्ति में वक्रता (वक्रोक्ति) हो वहाँ वाच्य की प्रधानता भी होती है । जैसे 'पत्युः शिरश्चन्द्रकलामनेन' इत्यादि पद्य में । यहाँ पर 'अपि' शब्द 'वाच्यस्य' के साथ लगा हुआ है; किन्तु उसकी व्याख्या क्रम को तोड़कर 'प्राधान्य' के साथ लगाकर करनी चाहिये । इससे इसका अर्थ यह हो जाता है कि जहाँ पर उक्ति में वक्रता हो वहाँ वाच्य की प्रधानता भी होती है ।
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तृतीय
उद्योत:
वाच्य की प्रधनता भी होती है। आशय यह है कि अवान्तर व्यंग्य के द्वारा वाच्य का उपस्कार होता है; अतः वहाँ पर व्यंग्य गौण होता है और वाच्य प्रधान। अत एव उसे अनुरणनरूप व्यंग्यध्वनि की संज्ञा प्रदान नहीं की जा सकती। यहाँ पर यह ध्यान रखने की बात है कि 'वाच्य की प्रधनता भी होती है' इस 'भी' का आशय यह है कि वाच्य में गौण-रूपता तो होती ही है। गुणता और प्रधनता इस प्रकार समस्तव है कि अवास्तव व्यंग्यार्थ की अपेक्षा वाच्य में प्रधनता होती है; तः उस दृष्टि से उसे गुणीभूत व्यंग्य ही कहना ठोक होगा अनुरणन रूप व्यंग्य ध्वनि नहीं। किन्तु अन्तिम रस इत्यादि की अपेक्षा तो वाच्य में गुणता होती है। अतः वहाँ पर असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि तो कही ही जा सकती है। इसीलिये यहाँ पर आनन्दवर्धन ने यह नहीं कहा कि यहाँ पर ध्वनि नहीं होती अपितु विशेषण लगा-कर विशेष रूप में यही कहा कि अनुरणनरूप व्यंग्यध्वनि नहीं होती। इसका आशय यही है कि रसध्वनि तो सर्वत्र होती ही है।॥३९॥
तृतीय
उद्योत:
४०
गुणीभूतव्यङ्ग्योऽपि ध्वनिरूपताम् । हृत्ते रसादितात्पर्यपर्यालोचनया पुनः ॥ ४० ॥
तृतीय
उद्योत:
गुणीभूतव्यङ्ग्योऽपि काव्यप्रकारो रसभावादितात्पर्यपर्यालोचने पुनर्ध्वनिरेव सम्पद्यते। यथात्रैवानन्तरोदाहरति इलोकद्वये ।
तृतीय
उद्योत:
दुराराधा राधा सुभग यदनेनापि मृजत- स्त्वत्कान्ताप्राणेशाजघनवसनेनाधु पतितम् । कठोरं स्त्रीचेतस्तदलमुपचारैरवरम हे कृत्याकल्याणं वो हरिरनुनयेष्ये वेमुदितः ॥
तृतीय
उद्योत:
४१
(अनु०) 'यह गुणीभूतव्यङ्ग्य नाम का प्रकार भी पुनः रस इत्यादि तत्पर्य की पर्य-लोचना करने पर ध्वनिरूपत को ही धारण करता है' ॥४१॥ गुणीभूतव्यङ्गय भी काव्य प्रकार रस भाव इत्यादि तत्पर्य की पर्यालोचना करने पर घ्वनि ही हो जाता है। जैसे अपने उदाहरण दिये हुये दो श्लोकों में।
तृतीय
उद्योत:
और जैसे- 'हे सुभग ? अपनी प्राणेश्वरी की जघ्ना के इस वस्त्र से भी इस गिरे हुये आँसू को पोंछते हुये (पोंछने वाले) तुम्हारे लिये राधा को प्रसन्न करना अत्यन्त दुष्कर है। स्त्री का चित्त कठोर होता है। इसलिये उपचारों की आवश्यक्ता नहीं। एक जाओ। अनुनय में इस प्रकार कहे हुये हरि तुम्हारा कल्याण करें'
तृतीय
उद्योत:
(लो०) पतदेव निर्वाह्यन् काव्यत्वमप्य ध्वनेरेव परिधीयते—प्रकार इति । श्लोकद्वयमिति तुल्यच्छायं यदुदाहृतं पत्युरित्यादि तत्रैति ॥ द्वयशब्दादेवव्वादिनोऽस्यनवकाशः ।
तृतीय
उद्योत:
दुराराधेति । अकारणकुपिता पादपतिते मयि न प्रसादसि अहो दु- राधासि मारोदरीतियुक्तिपूर्वं प्रियतमेऽश्रूणि मार्जयति इयमस्या अभ्युपगमगर्भोक्तिः ।
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सुभगेति । प्रियया यः स्वसम्भोगभूषणविहीनः 'क्षणमपि मोक्तुं न पार्यसे । अन्नेनापीति । पश्येदं प्रत्यक्षेणैवार्थः । तदेव च यदेवमादृतं यत् लज्जादित्यागेनाप्येवं धार्यसे । मूर्छत इत्यनेन हि प्रत्युत श्वोभिस्रस्रवाही वाष्पो भवति । इयच्च त्वं हतचेतन यन्रां विस्मृत्य तामेव कुपितां मन्यसे । अन्यथा कथमेवं कुर्या: । पतितमिति । गत इदानों रोदनावकाशोऽप्यर्थः । यदि तुच्यते इयताप्यादरेण क्रिमिति कोपं न मुञ्चसि तर्त्तिक क्रियते कठोरस्वभावः स्त्रियोचितः: स्त्रियाम् हि प्रेमादिविषयत्वमात्रविवक्षितु विशेषमात्रमेतत्; आत्मनि चैतद् सुकुमारहृदया योषित इति न किश्चिद्विज्जसार-तस्यचैष स्वभावः; हृदयं यदेवविधवृत्तान्तसाक्षात्कारेपि सहस्रधा न दलति । उपचारैररिति । धिक्कमासां हृदयं यदेवविधवृत्तान्तसाक्षात्कारेपि सहस्रधा न दलति । उपचारैररिति । दाक्षिण्यप्रयुक्ते । भनुनेपिर्वति बहुवचनेन वारं वारमस्यैवमेव स्थितिदाक्षिण्यप्रयुक्ते । भनुनेपिर्वति बहुवचनेन वारं वारमस्यैवमेव स्थितिरिति सौभाग्यातिशय उक्तः । एवमेष व्यङ्गच्यार्थसारो वाच्यं भूषयति ।
(अनु०) यहाँ पर यह 'दो इलोक' जो तुल्य छाया वाले उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं—'प्रकार' यह । 'पत्यु:' इत्यादि बहाँ इस प्रकार 'दो' शब्द से 'एवंबादिनो' इत्यादि का अवकाश किये गये हैं 'पत्यु:' नहीं हैं । 'दुराराधा' यह अकस्मात् क्रोध से भरे मेरे चरणों पर गिरने पर भी अप्रसन्न न हो रही हो, आश्चर्य है कि आराधना करने में तुम बहुत ही दु:खी हो, मत रोओ, इस उक्ति के साथ प्रियतम के अनुचुम्बन करने पर यह उसकी स्वीकृति गर्भित उक्ति है । 'हे सुभग' यह । जो कि प्रिया के द्वारा अपने सम्भोग के विभूषण से रहित क्षणभर भी छोड़ें नहीं जा सकते हो । 'इसके द्वारा भी' यह । अर्थात् इसको प्रत्यक्ष रूप में ही देख लो । उसी को जो सकते हो । 'इसके द्वारा भी' यह । अर्थात् इसको प्रत्यक्ष रूप में ही देख लो । उसी को जो सकते हो । इस प्रकार आदर किया गया कि लज्जा इत्यादि के त्याग के द्वारा भी इस प्रकार धारण किया जा रहा है । 'मार्जन करते हुये' यह । इसके द्वारा प्रत्युत सहृदय स्तन में बहनेवाली वाष्प हो जाता है । तुम इतने अधिक चेतना रहित हो कि मुझे भुलाकर उसको क्रुद्ध मानते हो । नहीं तो ऐसा क्यों करो । 'पतित' यह । अर्थात् अब तो रोदन का अवकाश भी चला गया । यदि कहा जाय कि इतने आदर से भी क्यों कोप नहीं छोड़ती हो तो क्या किया जाय, कठोर स्वभाववाली स्त्रियाँ का चित्त होता है । 'स्त्री' यह प्रेम इत्यादि के योग न होने से केवल यह वस्तु ही है । उसका यह स्वभाव है । स्वयं में सुकुमार हृदयवाली स्त्रियाँ होती हैं यह कुछ नहीं । इनका हृदय वच:सार से भी अधिक (कठोर) होता है जो कि इस प्रकार के वृत्तान्त के साक्षात्कार होने पर भी सहस्रधा विदीर्ण नहीं हो जाता । 'उपचारों द्वारा' का अर्थ है दाक्षिण्य के द्वारा प्रयुक्त उपचारों से । 'अनुनयोमे' इसमें बहुवचन के द्वारा यह कहा है कि वार-वार यही स्थिति होती है । यह सौभाग्यातिशय
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तृतीय उद्योतः
कहा गया है। इस प्रकार यह व्यङ्ग्यार्थ का सार वाच्य को भूषित करता है। वह वाच्य तो भूषित होकर ईर्ष्या विप्रलम्भ श्रृंगार के अङ्गत्व को प्राप्त हो जाता है। जिसने तो तीनों ही श्लोकों में प्रतीयमान का ही रसाङ्गत्व कहा है उसने तो देव को बेचकर यात्रा का उत्सव किया। इस प्रकार निस्सन्देह व्यङ्ग्य की जो गुणीभूतता प्रकट है वही समूल नष्ट हो जाय। निस्सन्देह रसादि से व्यतिरिक्त व्यङ्ग्य का रसाङ्गभावयोगित्व ही प्रधान है और कुछ नहीं, बस अपने पूर्व वंश्यों से अधिक विवाद की आवश्यकता नहीं।
गुणीभूतव्यङ्ग्य का पर्यवसान ध्वनि में होता है
तारावती—उपर बतलाया गया है कि गुणीभूतव्यङ्ग्यत्व केवल एक दृष्टिकोण से ही होता है वह दृष्टिकोण है अवान्तरव्यङ्ग्यसङ्गतव का। किन्तु अन्ततः सभी काव्य ध्वनिकाव्य ही होते हैं; वस्तुतः काव्य की आत्मा तो ध्वनि ही है। यही बात प्रस्तुत (४०वीं) कारिका में कही गई है। प्रस्तुत कारिका का आशय यह है—
'जिस गुणीभूत व्यङ्ग्य नामक प्रकार का ऊपर परिचय दिया गया है। जब उसमें पर्यालोचना की जाती है और देखा जाता है कि उसका पर्यवसान रस इत्यादि रूप तात्पर्य में ही होता है तब उसे भी ध्वनि ही कहना पड़ता है।'
आशय यह है कि आन्तरिक दृष्टि से चाहे हम किसी काव्य को ध्वनि कहें चाहे गुणी-भूतव्यङ्ग्य, यदि अभिव्यक्त विभिन्न भाव प्रत्यक्ष रस को पुष्ट करे तो हम उसे ध्वनि कह लें और यदि वाच्य को पुष्ट करें तो गुणीभूतव्यङ्ग्य कह लें। किन्तु पर्यवसान सबका ध्वनि में ही होता है क्योंकि यह पर्यालोचना करने पर कि अमुक रचना का पर्यवसान कहाँ होता है ध्वनि ही आयेगी और स्वयं गुणीभूतव्यङ्ग्य ध्वनि का रूप धारण कर लेगा। उदाहरण के लिये कालिदास और भारवि के जो दो पद्य अभी उद्धृत किये गये हैं वे आन्तरिक व्यञ्जना की दृष्टि से तो गुणीभूत व्यङ्ग्य हैं किन्तु रस की दृष्टि से ध्वनि ही कहे जा सकते हैं। वे दोनों श्लोक हैं—'पश्यन् शयनशय्याकलामनेन' और 'पाणिभ्यामेव क्षणमात्रभिन्नौ'। ये दोनों पद्य तुल्य छायावाले हैं अर्थात् इनमें काव्यसौन्दर्य एक जैसा है; दोनों गुणीभूतव्यङ्ग्य होकर ध्वनि बनते हैं। यद्यपि यहां पर उद्धरण तो 'एवं वादिनि—'इत्यादि पद्य का भी दिया गया है तथापि इसका प्रतिदेश यहां पर नहीं हो सकता, क्योंकि इसमें शुद्ध रूप में ध्वनि ही हैं, गुणीभूतव्यङ्ग्य का सहकार इसमें अपेक्षित नहीं होता। इस लिये 'दो श्लोक' यह विशेष रूप से कह दिया गया है। नहीं तो कोई व्यक्ति सम्भवतः 'एवंवादिनि' इत्यादि में भी वही बात समझ लेता। एक और उदाहरण लीजिये—
राधा खण्डिता 'नायिका हैं कृष्ण कहीं अन्यत्र विहार कर राधा के पास आये हैं। धोखे से वे उस सौत का अधोवस्त्र (साड़ी ?) ओढ़े चले आये हैं। इस पर राधा ने मान किया है। कृष्ण उनको प्रसन्न करने की चेष्टा करते हैं किन्तु राधा नहीं मानती। तब कृष्ण कहते हैं—'तुम व्यर्थ ही रुष्ट हो गई हो; मैं तुम्हारे पैरों पर पड़ा हुआ हूँ फिर भी प्रसन्न नहीं होती हो; आश्चर्य है कि तुम्हारी आराधना कितनी कठिन है।' इस पर राधा अपनी
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'हे सौभाग्यशाली ! मेरे इस गिरे हुये आँसू को जो तुम अपनी उस प्राणेश्वरी की जाँघाओं पर धारण किये वस्त्र से पोछ रहे हो इस दशा में तुम्हारे लिये तो राधा की आँखों का आँसू घना दुष्कर है ही । स्त्रियों का चित्त तो कठोर होता ही है, इस लिये इन बाहरी दिखावों की आवश्यकता नहीं, अब रहना दो पर्याप्त चाटुकारिता हो गई इससे कोई लाभ नहीं होगा ।' कवि कहता है कि अनुत्प्रयों में जिन कृष्ण से राधा के द्वारा इस प्रकार कहा जाता है वे कृष्ण आप का कल्याण करें ।
इस पद्य की व्यञ्जनायें इस प्रकार हैं—
१
'हे सुन्दर !'
इस सम्बोधन से अभिव्यक्त होता है कि आप बड़े सौभाग्यशाली हैं जो कि आप की प्रेयसी (मेरी सौत) क्षण भर भी आपको ऐसे नहीं रहने देना चाहती है कि आप उसके सम्भोग के विभूषण से रहित रहें । जब आप यहाँ आये तब भी आपकी प्रेयसी ने आपको अपनी साड़ी उड़ा ही दी ।
२
'इससे भी'
का व्यङ्ग्यार्थ यह है कि वैसे तो आप अपने दुराचार को छिपा ही सकते थे, किन्तु जब आप प्रत्यक्ष रूप में मेरी सौत की साड़ी ओढ़े हुये हैं तब आप उसे छिपा ही कैसे सकते हैं ? दूसरी बात यह है कि आप इसका इतना अधिक आदर करते हैं कि इसको धारण करने में लज्जा का भी अनुभव नहीं करते कि कोई इसे देख लेगा ।
३
'पोछ रहे हैं'
इसमें वर्तमान काल के प्रयोग से व्यक्त होता है कि आप कितना ही पोछें ये आँसू निकलते ही जा रहे हैं, ये समाप्त नहीं हो सकते; प्रत्युत सहृदय श्रोताओं में प्रवाहित होनेवाले हो रहें हैं । दूसरी बात यह है कि तुम इतने चेतना शून्य (प्रेमावेश में बेहोश) हित होनेवाले हो रहे हो कि मुझे भुलाकर तुम अपनी उसी प्रेयसी को मुस्कमें देख रहे हो । तभी तो तुम उसके वस्त्र से मेरे आँसू पोछ रहे हो, नहीं तो ऐसा क्यों करते ?
४
'प्राणेशा'
से व्यक्त होता है कि मैं तुम्हारी कोई नहीं हूँ, मेरी सौत तुम्हारी प्राणेशा है अतः मेरा कुपित होना उचित ही है ।
५
'मैं'
इस सर्वनाम के स्थान पर 'राधा' इस अपने नाम लेने का व्यङ्ग्यार्थ यह है कि मैं कम स्वाभिमानिनी नहीं हूँ जो इस प्रकार मान जड़ाऊँ ।
६
'गिरे हुये'
इस शब्द में भूतकाल से अभिव्यक्त होता है कि मेरा रोने का अथिकार भी समाप्त हो गया ।
७
'स्त्री का चित्त कठोर होता है'
में 'स्त्री' शब्द से व्यक्त होता है कि मैं आपकी प्रेयसी नहीं हूँ । मैं तो सामान्य स्त्री हूँ; जब मुझमें प्रेम का योग हो नहीं तब मेरे अन्दर विशेषता क्या रही ? यह जो कहा जाता है कि स्त्रियाँ सुकुमार हृदयवाली होती हैं यह कोई भी बात सही नहीं है । वस्तुतः उनका हृदय तो वज्रसर से भी अधिक कठोर होता है; देखो इस दशा में भी जब कि तुम सौत की साड़ी से हमारा अपमान कर रहे हो तब भी यह हमारा हृदय सहस्र खण्डों में विदीर्ण नहीं हो रहा है ।
८
'उपचारों को रहने दो'
कहने का आशय यह है कि वस्तुतः तुम्हें मुझसे प्रेम
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तृतीय उद्योतः
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(ध्वन्या०) एत्स्थिते च 'न्यक्कारो ह्यामेव' इत्यादि श्लोके निर्दिष्टानां पद्यानां व्यङ्ग्यार्थविशिष्टत्वाच्च्युतप्रतिपादनव्यतिरिक्तद्विप्रकारभूतरसविषयत्वाद्व्यङ्ग्यत्वमुक्तम् । ने तेषां पदान्यमर्यान्तररसङ्क्रमितवाच्यपध्वनिर्शमो विधातव्यः । विवक्षितवाच्यत्वात्तेषाम् । तेषु हि व्यङ्ग्यविशिष्टत्वं वाच्यस्य प्रतীয়ते न तु व्यङ्ग्यरूपपरिणतत्वम् । तस्माद्वाक्यं तत्र ध्वनिः पदानी तु गुणीभूतव्यङ्ग्यानि । न च केवलं गुणीभूतव्यङ्ग्य एव
नहीं है । तुम्हारी प्रेमिका तो कोई दूसरी ही है । तुम केवल दाक्षिण्यवश मेरे पास आते हो । इस दाक्षिण्य की मुझे आवश्यकता नहीं है । ९- 'अनुनयों में' इसमें बहुवचन से सिद्ध होता है कि कृष्ण की अनेक वल्लभायें हैं । अतः कृष्ण को बार-बार ऐसे अवसर मिलते हैं जब कि उन्हें अनुनय विनय के द्वारा राधा को मनाना पड़ता है । इस प्रकार यह व्यञ्जक्यार्थ का सार वाच्य को भूपित करता है जिससे इस व्यञ्जक्य को गुणीभूतव्यञ्जक्य की संज्ञा प्राप्त हो जाती है । वह भूपित वाच्य फिर ईष्याविप्रलम्भशृङ्गार का अङ्ग हो जाता है । कतिपय आचार्यों ने इन तीनों इलोकों में गुणीभूतव्यञ्जक्य की ध्वनिरूपता इस प्रकार सिद्ध की है कि इनमें प्रतीयमान अर्थ रस का बाध हो जाता है । इन आचार्यों ने प्रतीयमान को गुणीभूतरूपता तो पहले ही समाप्त करदी फिर वे कहते हैं कि यह गुणीभूतवयङ्ग्य ध्वनिरूप होता है । यह उनका कहना ऐसा ही है जैसे किसी व्यक्ति के यहाँ देवता की कोई पुरानी मूर्ति रखी हो और वह उसकी सवारी निकालना तथा यात्रा का उत्सव करना चाहता हो । वह यात्राोत्सव के लिये पहले तो देवता की मूर्ति को बेचकर पैसा जुटाये फिर यात्राोत्सव करना चाहे । जब उसके पास देवता ही न हो तो यात्राोत्सव किसका होगा ( अथवा कोई व्यक्ति घड़ी की चेन के लिये घड़ी ही बेच दे । ) वही दशा प्रतीयमान को रसांग बनाकर गुणीभूतव्यञ्जक्य को ध्वनिरूप सिद्ध करनेवालों की भी हैं । उन्हें यह तो ध्यान रखना ही चाहिये कि रस सर्वदा व्यङ्ग्य होता है और काव्यतात्पर्य का पर्यवसान सर्वदा रस में ही होता है क्योंकि काव्यात्मरूप में रससद्भाव को ही स्वीकार किया गया है । इस प्रकार रससद्भावि सर्वदा स्वमात्रपरिवसायिनी होती है । किन्तु वस्तु और अलङ्कार की व्यञ्जनायें तभी ध्वनिरूपता को धारण कर सकती हैं जब वे रस का अंग होकर रसप्रवण हो जाती हैं । आशय यह है कि यदि व्यङ्ग्यवस्तु को रस का अंग माना जायगा तो वह तो वस्तुध्वनि हो जायगी, वह व्यङ्ग्यवस्तु गुणीभूतव्यङ्ग्य की कोटि में आयगी ही नहीं, फिर गुणीभूतव्यङ्ग्य की ध्वनिरूपता का उदाहरण यह हो ही कैसे सकता है ? (यहाँपर निष्कर्ष यह है कि वे स्थान ध्वनि के कहे जा सकते हैं-जहाँ रस भाव इत्यादि प्रधान रूप में अभिव्यक्त हो रहे हों या जहाँ वस्तु या अलङ्कार की अभिव्यक्ति रसप्रवण रूप में हो रही हो । इसके प्रतिकूल जहाँ रस या भाव अपरांग होकर आते हैं अथवा वस्तु या अलङ्कार की अभिव्यक्ति वाच्यांग के रूप में होती है वे समस्त स्थल गुणीभूतव्यङ्ग्य ही कहे जाते हैं । यहाँ पर यदि गुणीभूतव्यङ्ग्यता सिद्ध करनी है तो व्यङ्ग्यार्थ को वाच्यांग ही मानना होगा रसांग नहीं । ) बस इतना पर्याप्त है अपने पूर्ववन्ध्यों से अधिक विवाद करना और उनका अधिक खण्डन करना ठीक नहीं मालूम पड़ता ।
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पदान्यलक्ष्यक्रमगत्या गद्यध्वनेर्यथ्ज्ञानि यावदर्थान्तरसंङ्क्रमितवाच्यानि ध्वनिप्रभेदरूपाण्यपि । यथात्रैव इलोके रावण इत्यस्य प्रभेदान्तररूपवाच्यज्ञकत्वम् ।
(अनु०) ऐसी स्थिति होनेपर ‘न्यक्कारो ह्यामेव’ इत्यादि श्लोक में निर्दिष्ट पदों के व्यंग्यविशिष्टवाच्य के प्रतिपादन करने पर भी इस वाक्य के अर्थभूत रस की अपेक्षा व्यञ्जकत्व कहा गया है। उन पदों का अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य ध्वनि का भ्रम नहीं करना चाहिये, क्योंकि उनका विवक्षितवाच्यत्व है। उनमें निस्सन्देह वाच्य की व्यङ्ग्यवाचकताप्रतीत होता है व्यङ्ग्यविवक्षितवाच्यत्व रूप में परिणतत्व नहीं। इससे वहाँ पर वाक्यध्वनि है और पद गुणीभूतव्यङ्ग्य है। केवल गुणीभूतव्यङ्ग्य पद ही अलङ्कारमगयङ्ग्य ध्वनि के व्यङ्जक नहीं होते; क्योंकि ध्वनिप्रभेदरूप अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य भी व्यञ्जक होते हैं। जैसे इसी श्लोक में ‘रावण’ इसका प्रभेदान्तरूप व्यञ्जकत्व है।
(लो०) एवस्थित इति । अनन्तरोक्तेन प्रकारेण ध्वनिगुणीभूतव्यङ्ग्योः विभागे स्थिते सतीत्यर्थः । कारिकागतपिशब्दं व्याख्यातुमाह—न चेति । एष च श्लोकः पूर्वमेव व्याख्यात इति न पुनरलिख्यते ।
(अनु०) ‘ऐसी स्थिति में’ यह। अर्थात् अभी कहे हुए प्रकार से ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य के विभाग के स्थित होने पर। कारिका में आये हुए ‘पि’ शब्द की व्याख्या करने के लिये कहते हैं—‘न च’ यह। इस श्लोक की पहले ही व्याख्या कर दी गई इसीलिये फिर नहीं लिखा जा रहा है।
तारावती—ऊपर यह सिद्ध किया गया है कि गुणीभूत व्यङ्ग्य भी अनन्ततः ध्वनि काव्य हो होते हैं क्योंकि सभी काव्यों का तात्पर्य तो रसास्वादन ही होता है। एक उदाहरण और ले लीजिये—‘न्यक्कारो ह्यामेव’ में प्रत्येक शब्द व्यञ्जक है। इसकी व्यञ्जकता की पूरी व्याख्या इसी उद्योत की १६ वीं कारिका में की जा चुकी है।
इस पद्य में प्रत्येक शब्द का वाच्यार्थ व्यङ्ग्य के सहकार में ही लिया जाता है और वाच्यार्थ का एकमात्र प्रयोजन यही है कि वह वाच्यार्थ को पुष्ट करे। अतः वहाँ पर अभिव्यङ्ग्यार्थ का एकमात्र प्रेषण यही है कि वह वाच्यार्थ को पुष्ट करे। अतः वहाँ पर अभिव्यङ्ग्यार्थ गुणीभूत व्यङ्ग्य हो है। फिर भी सम्पूर्ण पद्य की चरम अभिव्यक्ति व्यक्त होनेवाले व्यङ्ग्यार्थ वाच्य की पोषकता के माध्यम से रसाभिव्यञ्जन में ही सहायक होते हैं। अतः मध्यवर्ती व्यङ्ग्यार्थों की दृष्टि से इसमें गुणीभूतव्यङ्ग्यता है किन्तु चरम रसाभिव्यक्ति की दृष्टि से यह ध्वनि काव्य ही कहा जायगा।
( प्रश्न ) यहाँ पर वाच्यार्थ में व्यङ्ग्यार्थ भी सम्मिलित हो जाता है और व्यङ्ग्यविशिष्ट वाच्य की प्रतीति होती है। यही बात अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य ध्वनि में भी हुमा करती है। फिर आप अवान्तर व्यङ्ग्यार्थों की दृष्टि से इसे अर्थान्तर-सङ्क्रमितवाच्य ध्वनि न कहकर गुणीभूतव्यङ्ग्य क्यों कहते हैं ?
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३
तृतीय उद्योत:
पर होती है जहाँ बाघ का प्रतिसन्धान हो और वाच्यार्थ के व्यंग्यार्थ में बिना संक्रमण किये हुए वहाँ पर वाच्यार्थ संगत हो नहीं हो। इस प्रकार अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य तो अविवक्षितवाच्य का भेद होता है किन्तु प्रस्तुत पद्य ‘न्यक्कारो ह्यामेव मे यदरयः’ में व्यंग्यार्थ का वाच्यार्थ में अभिसंक्रमण नहीं होता है और न वाच्यार्थ व्यंग्यार्थ के द्वारा विशेषित होकर के ही अर्थ की पूर्ति करता है अपितु वाच्यार्थ स्वतः पूर्ण होता है किन्तु उसमें व्यंग्यार्थ की विशेषता सन्निविष्ट हो जाती है। इस प्रकार इस उदाहरण में वाच्यार्थ विवक्षित ही रहता है। अत एव इस उदाहरण में वाच्यव्यञ्जना तो ध्वनिरूप है और पदगतव्यञ्जनायै गुणीभूत व्यंग्य ही मानी जाती हैं। यहाँ पर भी ध्यान रखना चाहिये कि रसव्यञ्जना में केवल गुणीभूत व्यंग्य हो निमित्त नहीं होते अपितु अविवक्षितवाच्य के भेद अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य भी रसव्यञ्जना में निमित्त होते हैं। उदाहरण के लिये—इसी पद्य में ‘जीवस्यहो रावणः’ में ‘रावण’ शब्द अर्थान्तरसंक्रमितवाच्यपरक है। यह अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य भी वाच्य से अभिव्यक्त होनेवाली रसध्वनि का अङ्ग है। इसी प्रकार अन्यत्र भी समुझना चाहिये। यह कारिका में आये हुए ‘अपि’ शब्द का आशय है कि ‘गुणीभूतव्यंग्य भी’ ध्वनिरूपता को धारण करते हैं अर्थात् अन्य तत्त्व तो धारण करते ही हैं
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तृतीय उद्योत:
(ध्वन्य०) यत्र तु वाक्ये रसादितात्पर्यं नास्ति गुणीभूतव्यङ्ग्यच्यैः पदैरूद्रासतेपि तत्र गुणीभूतव्यङ्ग्यतैव समुदायधर्मः। यथा—
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तृतीय उद्योत:
राजानमपि सेवल्ते विषमप्युपयुञ्जते । रमन्ते च सह स्त्रीभिः कुशला: खलु मानवाः ॥
इत्यादौ ।
३
तृतीय उद्योत:
(अनु०) जहाँ तो वाक्य में रस इत्यादि तात्पर्य न हो, गुणीभूत व्यङ्ग्यच पदों से उद्दीसित होनेपर भी वहाँ पर गुणीभूतव्यङ्ग्यता ही समुदाय धर्म होता है। जैसे—
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तृतीय उद्योत:
निस्सन्देह कुशल मनुष्य राजा का भी सेवन करते हैं; विष का भी उपयोग करते हैं और स्त्रियों से भी रमण करते हैं। इत्यादि में।
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तृतीय उद्योत:
(लो०) यत्र त्वति । यद्यपि छात्र विषयनिवेदात्मकशान्तरसप्रतीतिरस्ति, तथापि चमत्कारोङ्यं वाच्यनिष्ठ एव। व्यङ्ग्यं त्वसम्मभाव्यत्वविपरीतकारित्वादि तस्यैवानुयायी, तच्चापि शब्दाभ्यामुभयतो योजिताभ्यां च-शब्देन स्थानत्रययोजितेन खलुशब्देन चोभयतो योजितेन मानवशब्देन स्फुटतममेवेति गुणीभूतम् ।
३
तृतीय उद्योत:
(अनु०) ‘जहाँ तो’ यह। यद्यपि यहाँ पर विषयनिवेदात्मक शान्त रस की प्रतीति होती है तथापि यह चमत्कार वाच्यनिष्ठ ही है। असम्मभाव्यत्व, विपरीतकारित्व इत्यादि व्यङ्ग्यच तो उसी का अनुयायी है। और वह दोनों ओर योजित ‘भी’ शब्द से, तीन स्थानों पर योजित ‘च’ शब्द से, दोनों ओर योजित ‘खलु’ शब्द से और ‘मानव’ शब्द से स्फुट ही है, अतः गुणीभूत है।
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तृतीय उद्योत:
गुणीभूतव्यंग्य का ध्वनि वाच्याविषय
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तृतीय उद्योत:
तारावती—ऊपर जो कुछ कहा गया है उसका आशय यह नहीं है कि जहाँ-कहीं
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गुणीभूतव्यंग्यं होता है वहाँ सर्वत्र ध्वनिकाव्य होता ही है । कहीं-कहीं ऐसा भी होता है कि पदों में गुणीभूतव्यंग्यता होती है और उसका पर्यवसान ध्वनि में नहीं होता । जहाँ कहीं वाच्यार्थ रसाभिव्यञ्जनपरक नहीं होता वहाँ यदि वाच्यार्थ गुणीभूत व्यंग्यों से उद्द्बासित भी हो रहा हो तथापि उसे ध्वनिकाव्य की संज्ञा नहीं दी जायगी अपितु वहाँ समुदाय धर्म भी गुणीभूतव्यंग्य हो होता है । उदाहरण के लिये इस उक्ति को लीजिये—
निस्सन्देह वे मानव कुशल हो होते हैं जो राजा की सेवा कर लेते हैं, विष का भी लपयोग कर लेते हैं और स्त्रियों से भी रमण कर लेते हैं । यहाँ आशय यह है कि राजा की सेवा और स्त्रियों का उपभोग करना उतना ही विषम होता है जितना विष का सेवन करना । राजा के हृदय का पता नहीं चलता, विष सच्चः प्राणपहारक हो जाता है और स्त्रियाँ बाहर से अनुराग दिखलाती हैं किन्तु उनका हृदय छुरे की धार के समान तेज तथा घातक होता है । यद्यपि यहाँ पर शान्त रस की कल्पना की जा सकती है । सारा लौकिक व्यवहार ही नीरसप्राय तथा दुःख और क्लेश से भरा हुआ है । लोक राजाओं को अधिक महत्व देता है और स्त्रियों में अधिक लिप्स रहता है क्योंकि वे सर्वाधिक आकर्षक होती हैं । किन्तु ये सब तत्त्व हैं कुछ भी नहीं परिणाम में ये सब विषभक्षण के समान हो मरणक हो जाते हैं । इस प्रकार यह सब वर्णन विषयवैरस्य का प्रतिपादक है और उससे शान्तरस की अभिव्यञ्जना होती है । तथापि रसध्वनि वहीं पर होती हैं जहाँ चमत्कार रसनिष्ठ हो और रस की स्पष्ट रूप में अभिव्यक्ति हो रही हो । यहाँ पर रसध्वनि नहीं की जा सकती क्योंकि यहाँ पर चमत्कार वाच्यनिष्ठ ही है । यहाँ पर पूरे वाक्य से भी व्यञ्जना निकलती है कि राजा की सेवा कर सकना, स्त्रियों का हृदय पहचान सकना और उनका प्रेम प्राप्त कर सकना तथा विषभक्षण कर सकना ये सब असम्भव कार्य हैं और जिस फल की आकांक्षा से इनको स्वीकार करो ये उसके विपरीत ही फल देते हैं ।
निस्सन्देह वे मानव कुशल हो होते हैं जो राजा की सेवा कर लेते हैं, विष का भी लपयोग कर लेते हैं और स्त्रियों से भी रमण कर लेते हैं ।
यहाँ पर पूरे वाक्य से भी व्यञ्जना निकलती है कि राजा की सेवा कर सकना, स्त्रियों का हृदय पहचान सकना और उनका प्रेम प्राप्त कर सकना तथा विषभक्षण कर सकना ये सब असम्भव कार्य हैं और जिस फल की आकांक्षा से इनको स्वीकार करो ये उसके विपरीत ही फल देते हैं । किन्तु यह सम्पूर्ण वाक्यगत व्यञ्जना चमत्कारपर्यवसायिनी नहीं होती क्योंकि यह वाक्य का ही संस्कार करती है अत एव ध्वनि न होकर गुणीभूतव्यंग्य की ही कोटि में आती है । वाच्य का उपस्कार इस प्रकार होता है कि 'अपि' शब्द दोनों ओर लगाया जाता है कर्म के साथ भी लगाया जाता है और क्रिया के साथ भी । जैसे—'राजानम् अपि' 'सेवन्ते अपि' अर्थात् 'राजा को भी' इससे व्यञ्जना निकलती है राजा लोगों को प्रसन्न कर सकना अत्यन्त कठिन है, उनकी क्रूरता, असहिष्णुता और अन्याययुक्तता सर्वजनसंवेद्या है । 'सेवा भी कर लेते हैं' इससे व्यञ्जना निकलती है कि राजाओं से दूर का व्यवहार तो कोई बड़ी बात नहीं है किन्तु उनकी सेवा में तो सदा उनके पास उपस्थित रहना पड़ता है जो अति दुष्कर कार्य है । इसी प्रकार 'अपि' की दोनों ओर योजना 'विषमपि उपयुञ्जते' और 'स्त्रीभिः रमन्ते' में भी कर लेनी चाहिये और उनके व्यङ्ग्यार्थ की व्याख्या भी इसी प्रकार की जानी चाहिये । 'च' शब्द की योजना तीन बार होती है क्योंकि द्वोतकों का प्रयोग एक बार होता है किन्तु उनका सम्बन्ध प्रत्येक के साथ हो जाता है । 'च' भी द्वोतक है । ('प्र' इत्यादि तथा 'च' इत्यादि को द्वोतक माना जाता है । इसका आशय यह है कि इन शब्दों का अर्थ इससे सम्बद्ध
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तृतीय उद्योतः
शब्दों में ही विद्धमान रहता है किन्तु ये शब्द इस अर्थ को व्यक्त मात्र कर देते हैं। जैसे 'रामः कृष्णश्च' में कृष्ण का अर्थ है 'और कृष्ण' इस और शब्द का अर्थ 'च' शब्द के द्वारा द्योतित कर दिया गया है। यही 'च' शब्द की द्योतकता है। वैयाकरण भूषण में कहा गया है—
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तृतीय उद्योतः
'द्योतकः प्रादयो येन निपाताश्चाद्यस्थया।'
ये निपाते अन्त में प्रयुक्त किये जाते हैं किन्तु इनका अन्वय सभी से हो जाता है। जैसे 'रामः सीता लक्ष्मणश्च गच्छन्ति' यहाँ 'च' शब्द का अन्त में प्रयोग किया गया है किन्तु इसका सम्बन्ध राम, सीता और लक्ष्मण तीनों से हो जाता है। उसी प्रकार यहाँ पर भी 'राजानमपि सेवन्ते, विषममपि उपयुञ्जते; स्त्रीमिश्च सह रमन्ते' यहाँ अन्तमें 'च' शब्द का प्रयोग किया गया है, किन्तु तीनों के साथ जुड़ जाता है। इस प्रकार 'च' शब्द की तीनों स्थानों पर योजना से अभिव्यक्त असम्बन्धाद्यत्व आदि का कुछ न कुछ स्पर्श हो ही जाता है क्योंकि इस से व्यक्त होता है कि 'केवल इतना ही नहीं और भी'। इसी प्रकार 'खलु' (निस्सन्देह) शब्द की योजना दो बार होती है—'मानव' शब्द के साथ और 'कुशल' शब्द के साथ—'वे निस्सन्देह मानव हैं।' क्योंकि मानवगत विशेषता तो उन्हें ही प्राप्त हुई है और 'वे निस्सन्देह कुशल हैं' इसे भी असम्भावकारित्व का स्पर्श हो जाता है। 'मानव' शब्द भी इसी अर्थ का स्पर्श करता है। इस प्रकार यहाँ पर शान्त इत्यादि किसी रस में वक्ता का तात्पर्य नहीं है।
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तृतीय उद्योतः
अतः यहाँ समुदाय धर्म गुणवाचकतयैव ही है रसध्वनि नहीं।
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तृतीय उद्योतः
(ध्वन्य०) वाच्यव्यङ्ग्ययोः प्राधान्याप्राधान्यविवेके परः प्रयत्नो विषयतत्वः। येन ध्वनिगुणभावितव्यङ्गचर्योःलङ्काराणां चासडूणो विषयः सुज्ञातो भवति। अन्यथा तु प्रसिद्धालङ्काराविषय एव व्यामोहः प्रवर्तते।
(अनु०) वाच्य और व्यंग्य के प्राधान्य और अप्राधान्य के विवेक में बहुत बड़ा प्रयत्न करना चाहिये जिससे ध्वनि और गुणीभूतव्यंग्य का और अलङ्कारों का असडूर्ण विषय भलीभांति ज्ञात हो जाता है। नहीं तो प्रसिद्ध अलङ्कारों के विषय में ही व्यामोह प्रवृत्त हो जाता है।
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तृतीय उद्योतः
(लो०) विवेकदर्शना चेयं न निरुपयोगेति दर्शयति—वाच्यव्यङ्गचयोरेति। यत्र व्यङ्गचयं नास्त्येव तत्र तेषां प्राधान्यम्। अन्यथा त्वति। यदि प्रयत्नवता न भूयात् इत्यर्थः। व्यङ्गचप्रकारस्तु मया पूर्वमुत्प्रेक्षित-स्तस्यासंदिग्धमेव व्यामोहस्थानत्वमित्येवकाराभिप्रायः।
(अनु०) यह (सिद्धति) विवेकदर्शानवाली है निरुपयोगिनी नहीं यह दिखलाते है—'वाच्यव्यङ्गचयोरिति।' यहाँ (सिद्धति) 'अलङ्कारों का' यह। जहाँ व्यङ्गच्य नहीं ही होता वहाँ उन शुद्धों (अलङ्कारों) का प्राधान्य होता है। 'नहीं तो' यह। अर्थात् यदि प्रयत्नवाला न हुआ जाय तो। 'एव' शब्द के प्रयोग का आशय यह है कि जिस व्यङ्गच्य प्रकार की मैंने पहले कल्पना की थी उसकै व्यामोह स्थान होने में कोई सन्देह नहीं रह जाता।
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प्राधान्याप्राधान्य विवेचन का महत्व
तारावती—उपर प्राधान्य तथा अप्रधानता का जो विचार किया गया है वह व्यर्थ नहीं है अपितु काव्यतत्वचिन्तन के लिये उसका बहुत बड़ा उपयोग है। यह काव्य का एक अत्युत्कृष्ट विवेकदर्शन है। प्रत्येक विवेचक का यह बहुत बड़ा कर्तव्य है कि काव्य का परीक्षण करने में बड़ी ही सावधानी से इस बात पर विचार करे कि अमुक काव्य में कौन तत्व प्रधान है और कौन अप्रधान है? क्या व्यंग्यार्थ प्रधान है? अथवा क्या व्यंग्यार्थ वाच्यार्थ का अनुप्राणन मात्र है? अथवा क्या व्यंग्यार्थ स्वयं रस का पोषक है? अथवा वाच्योपस्कारक होकर रसाभिव्यञ्जक होता है? क्या कवि का रस में तात्पर्य है या नहीं? यदि इन सब बातों पर भलीभाँति ध्यान दिया जायगा तो यह सरलता से ही मालूम पड़ जायगा कि अमुक स्थान में ध्वनिकार्य है अथवा गुणीभूतव्यङ्गय है या शुद्ध अलङ्कार की प्रधानता है जिसमें व्यंग्य होता ही नहीं। यदि प्रयत्नपूर्वक प्रधानता और अप्रधानता पर विचार न किया जाय तो प्रधन अलङ्कारों के विषय में ही व्यामोह हो सकता है। अप्रसिद्ध अलङ्कारों का तो कहना ही क्या? यहाँ पर ‘अलङ्कार विषय एव’ में जो ‘एव’ शब्द लिखा गया है उसका अभिप्राय यह है कि यदि परिशीलक प्रधान और अप्रधान की विवेचना करने में ही चूक जायगा तो जिस वृत्त प्रकार का उसने पहले विवरण विवेचन किया है उसमें उसके व्यामोह में पड़ जाने में कोई सन्देह ही नहीं रह जायगा। प्रधानता का विचार न करने पर किस प्रकार व्यामोह सम्भव है इसके लिये केवल एक उदाहरण पर्याप्त होगा। निम्नलिखित उक्ति को लीजिये—
लावण्यद्रविणव्ययो न गणितः क्लेशो महान् स्वीकृतः स्वच्छन्दस्य सुखं जनस्य वसतश्चिन्तानलो दीपितः । एषापि स्वयमेव तुल्यरमणाभावाद्दराकी हृता कोर्थश्चेतसि वेधसा विनिहितस्तन्व्यास्तन्वता ॥
(ध्वन्यो०) यथा—
(अनु०) जैसे— 'लावण्य घन के अपव्यय को नहीं गिना, महान् क्लेश स्वीकार किया, सुखपूर्वक निवास करनेवाले स्वच्छन्द व्यक्ति के हृदय में चिन्ता को आग प्रदीप्त कर दी। यह बेचारी स्वयं ही तुल्य रमण के अभाव में मारी गई। इस कुश्र्ट्टाड़ी को बनाने में ब्रह्मा ने न जाने अपने चित्त में कौन सा प्रयोजन रखा था।'
इति । चिरेण हि यो व्ययः सम्पद्यते न तु विधुदिव इण्टिति तन्नावश्यं गणनया भवितव्यम् । अनन्तकालनिर्माणकारणोऽपि तु विधेयं विशिष्टकेशोऽप्युद्भूति परमस्याप्रे क्षोभस्वमू । अत एवाह—क्लेशो महानिति । स्वच्छन्दस्येति । विशिष्टहृदयस्येत्यर्थः ।
(लो०) द्रविणशब्देन सर्वस्वप्राप्त्यत्वमनेकस्वकृत्योपयोगित्वमुक्तम् । गणित इति । चिरेण हि यो व्ययः सम्पद्यते न तु विधुदिव इण्टिति तन्नावश्यं गणनया भवितव्यम् । अनन्तकालनिर्माणकारणोऽपि तु विधेयं विशिष्टकेशोऽप्युद्भूति परमस्याप्रे क्षोभस्वमू । अत एवाह—क्लेशो महानिति । स्वच्छन्दस्येति । विशिष्टहृदयस्येत्यर्थः ।
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तृतीय उद्योत:
एषापोति । यत्स्वयं निर्मीयते तदेव च निहन्यत इति महद्दैशामपि शब्ददेनैवकारेण चोक्म । कोऽर्थ इति । न स्वामिनो न लोकस्य न निर्मिततस्यैवर्थः ।
(अनु०) द्रविणशब्द से लगभग सर्वस्व होना और अपने अनेक कृत्यों का उपयोगी होना बतलाया गया है। ‘गिना गया’ यह । बहुत समय में जो व्यय किया जाता है बिजली के समान शीघ्र ही नहीं हो जाता वहां अवश्य गणना होनी चाहिये । अनेक काल से निर्माण करनेवाले भी ब्रह्मा की विवेकशीलता भी उदय नहीं हुआ यह उनकी बहुत बड़ी नासमझी से कार्य करना है। इसीलिये कहते हैं—‘बहुत बड़ा बलेश’ यह । ‘स्वच्छन्द का’ यह । अर्थात् विश्रृंखल का । ‘यह भी’ यह । जो स्वयं निर्मित किया जाता है वही मारा जाय यह बहुत बड़ा घात हुआ—यह ‘अपि’ शब्द तथा ‘एव’ शब्द के द्वारा कहा गया । ‘कौन अर्थ’ यह । अर्थात् न तो अपना ही अर्थ न लोक का ही और न बनाये हुये का ही ।
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तृतीय उद्योत:
‘लावण्य……’ की व्याख्या और इसमें व्याजस्तुति की संभावना
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तृतीय उद्योत:
तारावती—ब्रह्माजी ने उसको न जाने क्यों बनाया एक तो सौन्दर्य की महती सम्पत्ति का निर्ममतापूर्वंक व्यय कर डाला और उसकी परवा भी नहीं की । स्वयं इसके बनाने में न जाने कितना परिश्रम किआ । लोक का भी इसकी रचना से क्यों हितसाधन हुआ । लोग स्वच्छन्द विचरण कर रहे थे उनके हृदयों में चिन्ता की आग जला दी । स्वयं यह बेचारी भी अपने जैसे किसी प्रियतम को प्राप्त न कर सकी अतः यह भी नष्ट ही हो गई। न जाने इस कुशांगी के इतने मनोहर रूप की रचना करने में ब्रह्माजी ने अपने हृदय में क्या प्रयोजन रखा जो कि ऐसी अभूतपूर्व सुन्दरी की रचना कर दी ।
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तृतीय उद्योत:
यहां पर लावण्य पर द्रविण का आरोप किया गया है । द्रविण (पूँजी) ही एक ऐसी वस्तु है जो किसी भी व्यक्ति का सर्वस्व कही जा सकती है और उसी से मानव के प्रायः सभी कार्य बन जाते हैं । अतः उसको सुरक्षित रखने की सर्वथा चेष्टा करनी चाहिये और यह ध्यान रखना चाहिये कि कहीं उसका अपव्यय न हो जाय । ब्रह्माजी की सम्पत्ति लावण्य ही है क्योंकि उससे वे समस्त विश्व की रचना करते हैं । प्रस्तुत नायिका की रचना में ब्रह्माजी ने खुले हाथों उस सौन्दर्य का अपव्यय किया और इस बात की परवा भी नहीं की कि उनका सर्वस्वभूत बहुमूल्य पदार्थ समाप्त होता जा रहा है । कभी-कभी ऐसी परिस्थिति आ जाती है कि बिजली की चमक के समान पूँजी एकदम समाप्त हो जाती है और स्वामी उसे देखता ही रह जाता है, सम्पत्ति की रक्षा कर सकना उसके स्वामी के वश में ही नहीं रहता; अथवा इतनी अधिक आवश्यकता पड़ जाती है कि सम्पत्ति का मोह छोड़कर भी वांई हुई विपत्ति से पीछा छुड़ाया जाता है । किन्तु यहां तो ऐसी बात नहीं है । ब्रह्माजी ने बहुत सोच समझ कर बहुत समय में नायिका की रचना की है । अतः सौन्दर्य की पूँजी का विनियोग बहुत सोच समझ कर बारंबार किया गया है; बिजली के समान वह एकदम ही नहीं लग गई और न उनके विनियोजन के लिये ब्रह्माजी बाध्य ही थे । अतः उनको इस बात की परवा करनी ही चाहिये थी कि उनकी बहुमूल्य सम्पत्ति का यों ही अपव्यय हुआ जा रहा है । सबसे बड़ी आश्चर्य की बात तो यह है कि ब्रह्माजी अनन्तकाल से रचना करते चले
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आये हैं फिर भी उन्हें इतना विवेक प्राप्त नहीं हो सका कि ऐसी नासमझी न करें। केवल इतना ही नहीं किन्तु ब्रह्माजी को इतने सुन्दर निर्माण में न जाने कितना कष्ट उठाना पड़ा होगा किन्तु ब्रह्माजी ने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। यदि कहा जाय कि ब्रह्माजी ने इस निर्माण से लोक का कोई बड़ा हित किया तो यह बात भी नहीं है। क्योंकि लोक पर तो इसकी रचना से एक आपत्ति ही आ गई। अभी तक लोग स्वच्छन्दता पूर्वक आनन्द से रहते थे उनके लिये कोई बन्धन नहीं था और कोई परेशानी नहीं थी। किन्तु इसकी रचना से उन सबके हृदयों में विलक्षण आग दहक उठी कि यह कैसे प्राप्त की जा सके। आशय यह है कि इस नायिका को देखकर प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में वासना की ज्वाला जल उठती है और प्रत्येक व्यक्ति उसे प्राप्त करने के लिये आतुर हो जाता है। यह तो बैठे-बैठे ये एक आपत्ति ही सब लोगों पर आ गई। यह भी नहीं कहा जा सकता कि इस नायिका का ही कोई हित हुआ है। क्योंकि इतना रूपवान् कोई मनुष्य संसार में बनाया ही नहीं गया जिसका रमण इसके अनुकूल कहा जा सक्ता। अतः यह बेचारी भी मारी ही गई। जिसको स्वयं बनाया जाय और उसी को मार डाला जाय यह तो बहुत बड़ी हत्या हो कही जायेगी। यह बहुत बड़ी हत्या का भाव 'एषापि स्वयं मेव' में 'एष' और 'एव' शब्दों से अभिव्यक्त होता है। इस प्रकार ब्रह्माजी ने न तो अपना ही हित किया क्योंकि अपनी सारी पूँजी व्यय कर दी और महान् कष्ट उठाया, न लोक का ही हित किया क्योंकि लोगों के हृदयों में कामाग्नि प्रज्वलित कर दी और न इस नायिका का ही उपकार किया किञ्च जो कि इसे अपने समान प्रियतम नहीं मिल सका। नहीं कहा जा सकता कि ब्रह्माजी ने इसको बनाने में क्या प्रयोजन रखा होगा।
( ध्वन्यो० ) इत्यत्र व्याजस्तुतिरलङ्कार इति व्याध्यायि केनचित्तन्न चतुरख्रम्, यतोऽस्याभिधेयस्यैतदलङ्कारस्वरूपमात्रपयवसायित्वे न सुस्थितता। यतो न तावदयं रागिणः कस्यचिद्रिकल्पः। तस्य 'एषापि स्वयं मेव तुल्यरमणाभावाद्राकी हताः' इत्येवं विधोक्त्यनुपपत्तेः। न तावि नीरागस्य, तस्यैवंविश्वविलक्षणपरिहारैकव्यापारत्वात्। न चायम्लोकः वचचित्रप्रबन्ध इति श्रूयते, येन तत्प्रकरणानुगतार्थंतास्य परिकल्प्येत।
( अनु० ) यहाँ पर व्याजस्तुति अलङ्कार है, यह किसी ने व्याख्या की, वह चारों ओर से ठीक नहीं बैठता; क्योंकि इस अभिधेय के इस अलङ्कार स्वरूपमात्र में पर्यवसित होने पर सङ्गति ठीक नहीं बैठती। क्योंकि यह किसी रागी का तो विकल्प हो नहीं सक्ता, क्योंकि उसकी इस प्रकार की उक्ति उपपन्न नहीं होती कि 'यह बेचारी भी तुल्य रमण ( प्रियतम ) के अभाव में मारी गई '। यह किसी रागहीन की भी उक्ति नहीं हो सकती क्योंकि उसका तो एकमात्र कार्य ही यह होता है कि इस प्रकार के विकल्पों का परित्याग करे। यह श्लोक किसी वचचित्रप्रबन्ध में है यह भी नहीं सुना जाता जिससे उस प्रकरण के अनुगत अर्थ की वह कल्पना कर ली जाय।
( लो० ) न तत्रैव रागिणो हि वराकी हतेति कुपणताडितडितममडलोपहतं
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तृतीय
उद्योतः
चानुचितं वचनम्। तुल्यरमणाभावादिति स्वात्मन्यतयेन्तमनुचितम्। आत्मन्यपि तद्र-पासम्भावनायां रागितायां च पशुप्रायत्वं स्यात्।
'उसका' यह। रागी का 'बेचारी मारी गई' यह वचन कृपणता से आह्लादित है और अमङ्गल से उपहत अनुचित वचन है 'तुल्यरमण के अभाव में' यह अपने विषय में अत्यन्त अनुचित है। अपने विषय में भी तद्रूप की असम्भावना करने पर रागिता में भी पशुप्रायत्व हो जाय।
तृतीय
उद्योतः
ननु च रागिणोऽपि कुतश्चित्कारणात् परिगृहीतकतिपयकालव्रतस्य वा रावण-प्रायस्य वा सीतादिविषये दुष्यान्तप्रायस्य वा वर्णनिजातिजातिविशेषे शकुन्तलादौ किमियं स्वसौभाग्याभिमानगर्भा तत्सतुतिगर्भा चोक्तिर् न भवति। वीतरागस्य वा अनादिकाल-भ्यस्तरागवासनावासिततया मध्यस्थत्वेनापि तां वस्तुतस्तथा पश्यतो नियुक्तिः न सम्भाव्या। न हि वीतरागो विपर्यस्तान् भावान् पश्यति। न ह्यस्य वोणाक्वणितं काकरटितकल्पं प्रतिभाति। तस्मात्प्रस्तुतानुसारेणोभयस्यापीयमुक्तिरुपपद्यते। अप्र-स्तुतप्रशंसायामपि ह्यप्रस्तुतः सम्भाव्य एव आर्थो वक्तव्यः, नहि तेजसीत्थमप्रस्तुतप्रशंसा सम्भवति—अहो धिक्ते कृष्णयमिति सा परं प्रस्तुतपरतयैव नात्रासम्भव इत्याश्र-ड्याह—न चेति।
(प्रश्न) कहों किसी कारण से थोड़े समय के लिये व्रत लिये हुए रागी की; अथवा सीता इत्यादि के विषय में किसी रावण सदृश रागी की अथवा अज्ञात जातिविशेषवाली शकुन्त। इत्यादि के विषय में दुष्यन्त जैसे किसी रागी की—क्या यह अपने सौभाग्य के अभिमान से गर्भित तथा उसकी प्रशंसा से गर्भित उक्ति नहीं हो सकती ? अथवा अनादि काल से अभ्यस्त राग की वासना से वासित होने के कारण मध्यस्थ होते हुए भी उसको वस्तुतः उस प्रकार की देखनेवाले वीतराग की भी यह उक्ति सम्भावित नहीं की जा सकती ? ऐसा नहीं। इसको वीणा का सुमनोहर शब्द कोवे की कावकावें जैसा तो मालूम नहीं पड़ता। इससे प्रस्तुत का अनुसरण करते हुये दोनों की यह उक्ति सिद्ध की जा सकती है। अप्रस्तुत-प्रशंसा में भी सम्भव हो अप्रस्तुत अर्थ कहा जाना चाहिये। तेज में यह अप्रस्तुतप्रशंसा सम्भव नहीं होती कि तुम्हारी कालिमा को धिक्कार है। इस प्रकार वहाँ प्रस्तुतपरक ही है अतः यहाँ असम्भव नहीं यह शङ्का करके कहते हैं—'और नहीं यह इलोक' इत्यादि।
तृतीय
उद्योतः
तारावती—यहाँ पर किसी किसी ने व्याजस्तुति अलङ्कार माना है। व्याजस्तुति अलङ्कार वहाँ पर होता है। जहाँ प्रस्तुत की निन्दा की जाय जिसका अभिप्राय प्रस्तुत की ही प्रशंसा में हों। यहाँ पर ब्रह्मा प्रस्तुत हैं, उनकी निन्दा की गई है। इस निन्दा का तात्पर्य है प्रशंसा में, क्योंकि इससे अभिव्यक्त होता है कि ब्रह्मा जी इतने निपुण हैं कि वे इतनी उच्च-कोटि की सुन्दरियों का भी निर्माण कर सकते हैं। किन्तु वस्तुतः यहाँ नायिका का वर्णन ही प्रस्तुत है और ब्रह्मा जी की निन्दा के रूप में नायिका की निन्दा ही वाच्य है—'इस नायिका को व्यर्थ हो इतना लावण्य दे दिया गया, इसने स्वच्छन्द लोगों के हृदयों में कामासिन की
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ज्वाला जला दो, इसका भी जीवन व्यर्थ है क्योंकि इसे अपने समान रूपवान् व्यक्तित्व उपभोग के लिये मिल ही नहीं सकता। इस निन्दा से नायिका की प्रशंसा अभिव्यक्त होती है कि इसकी जैसी भुवनसुन्दरी और कोई है ही नहीं। इस प्रकार यह व्याजस्तुति अलङ्कार माना गया है। किन्तु यह कथन ठीक नहीं है और इस भ्रुटि का कारण यही है कि विचारकों ने सभी दृष्टियों से इस पर विचार नहीं किया है तथा ठीक रूप में प्राधान्य-अप्राधान्य के विवेचन करने की चेष्टा नहीं की। कारण यह है कि यदि इस पद्य के वाच्यार्थ का पर्यवसान केवल व्याजस्तुतिपरक ही माना जाय तो इस पद्य की सङ्गति ठीक बैठ ही नहीं सकती। इसको इस प्रकार समझिये—इस पद्य में नायिका के निर्माण के प्रयोजन के सम्बन्ध में जो अनेक विकल्प किये गये हैं वे किस व्यक्ति के विकल्प हैं? क्या वे किसी प्रेमी व्यक्ति के विकल्प हैं? किन्तु प्रेमी तो वही हो सकता है जिसकी चित्तवृत्ति अपनी प्रेयसी में बिल्कुल निमग्न हो गई हो और वह अपनी उस प्रेमिका की रूपसुधा का आस्वादन करने में ही अपने को कृतकृत्य मानता हो। वह तो अपनी प्रेयसी को सभी प्रकार का आदर देने को प्रस्तुत रहता है और उसी को सर्वस्व तथा सारभूत सफल पदार्थ समझता है। फिर भला वह अपनी प्रेयसी के लिये ही ‘वेचारी’ इस दीनता भरे हुये शब्द का प्रयोग कैसे करेगा? और ‘नष्ट हो गई’ यह अमार्ज्जनिक वाक्य भी उसके मुख से कैसे निकलेगा? ये वचन सर्वथा अनुचित हैं। जो एक प्रेमी अपनी प्रेयसी के लिये कह ही नहीं सकता। साथ ही प्रेमी तो वही हो सकता है जो नायिका के वियोग में दुःखी रहे और उसे प्राप्त करने की चेष्टा करे। ‘इसको इसकी जसा रमण करने वाली व्यक्ति मिल ही नहीं सकता’ ये शब्द किसी प्रेमी के मुखसे निकल ही नहीं सकते क्योंकि इससे यह स्पष्ट ही है कि वह अपने को उसके अनुकूल नहीं समझता। तब वह उसका प्रेमी कैसा? अपने अन्दर उसके जैसे रूप के प्राप्त कर सकने की योग्यता का अभाव समझना एक प्रेमी के लिये पशुओं की जैसी क्रिया हो जायगी। अतः यह कथन किसी रागी का नहीं माना जा सकता। तो क्या यह कथन किसी विरक्त व्यक्ति का है? किन्तु विरक्त व्यक्ति का तो एकमात्र कार्य यही होता है कि वह नायिकाओं के इस प्रकार के स्वरूप पर्यालोचन को सर्वथा बचाता रहे। यदि वह इस प्रकार सौन्दर्य की समीक्षा में प्रवृत्त रहे तो वह विरागी कैसा? अतः यह सिद्ध है कि यह कथन प्रस्तुतपरक नहीं हो सकता और न व्याजस्तुति अलङ्कार ही यहाँ सङ्गत हो सकता है। यहाँ तो अप्रस्तुत अंश पर ही प्रकाश पड़ता है। अतः यह अप्रस्तुत-प्रशंसा अलङ्कार ही हो सकता है।
( प्रश्न ) यह कथन किसी रागी का क्यों नहीं हो सकता? मान लीजिये किस रागी व्यक्ति ने कुछ समय के लिये किसी कारण से स्त्री-सहवास न करने का व्रत ले रखा है। वह अपने को उस नायिका के लिये उपयुक्त समझते हुये भी इस प्रकार के शब्द कह सकता है। अथवा (यदि कहो कि उसका भी ‘वेचारी’ या ‘मारी गई’ ये शब्द कहना तो अनुचित ही है तो ) ये शब्द किसी ऐसे व्यक्ति के हो सकते हैं जो किसी ऐसी युवती से प्रेम करना चाहता हो जो स्वयम् उससे विरक्त हो जैसे रावण का प्रेम सीता के प्रति। (किन्तु इस प्रेम में भी रावण मदोन्मत्त है और वह अपने प्रेम की असफलता पर पश्चात्ताप ही करता रह
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तृतीय उद्योत:
जाय या उसके हृदय में अपनी प्रेयसी के प्रति करुणाभाव की जागृतिमात्र हो जाय यह रावण के स्वभाव के प्रतिकूल है। रावण तो दर्प के साथ सीता को प्राप्त करने की चेष्टा करेगा। ऐसी दशा में उसका भी इस प्रकार का कथन सङ्गत नहीं होता। क्योंकि रावण के सीता के प्रति प्रेम में तो चिन्ता की ही अधिकता होनी चाहिये। अथवा यह ऐसे प्रेमी के विषय में हो सकता है जैसा कि दुष्यन्त का शकुन्तला के प्रति उस समय भाव था जब दुष्यन्त को शकुन्तला की जाति का पता नहीं चल पाया था। (अभिज्ञान शाकुन्तल में यह प्रकरण आया है कि वृक्षों को सींचती हुई शकुन्तला को आड़ से देखकर दुष्यन्त यह वितर्क करने लगे कि क्या शकुन्तला उनके लिये उपभोग्य है या नहीं।) वास्तव में शकुन्तला अनन्य साधारण सुन्दरी ही है और उपभोग्य न होने के कारण दुष्यन्त के हृदय में यह विचार आ ही सकता है कि बेचारी शकुन्तला को अपनी सुन्दरता के योग्य प्रियतम मिलना असम्भव है। यद्यपि दुष्यन्त स्वयं को इस योग्य समझते हैं किन्तु सामाजिक प्रतिबन्ध उन्हें उसके सहवास में प्रवृत्त होने की अनुमति नहीं देता। इस प्रकार इस कथन से दुष्यन्त के सौभाग्य के अभिमान में भी कमी नहीं आती और शकुन्तला की प्रशंसा भी अभिव्यक्त हो जाती है। इस प्रकार यह कथन एक रागी व्यक्ति का हो ही सकता है। वीतराग की भी यह उक्ति असम्भव नहीं है। क्योंकि वीतराग व्यक्ति भी अनेक योनियों में भ्रमण करते हुए अनादि काल से जिस रागात्मक प्रवृत्ति का आनन्द लेता रहा है उससे उसकी आत्मा वासित तो है ही। अतः इस समय यद्यपि वह समस्त विषयों का परित्याग कर चुका है तथापि किसी अभूतपूर्व सौन्दर्यशाली पदार्थ को तो वह उसी रूप में देखेगा जैसा वह है, अर्थात् जो पदार्थ सौन्दर्य में सर्वोत्कृष्ट होते हैं उनको वीतराग भी सुन्दरतम रूप में ही देखता है। उसकी सौन्दर्यप्रतीति की भावना समाप्त तो नहीं हो जाती। वह समस्त वस्तुओं को विपर्यस्त रूप में तो नहीं देखने लगता। वीणा का सुमनोहर स्वर सुनने के लिये उसके लिये कोवे की काव-काव तो नहीं हो जाती। अत एव चाहे आप इसे रागी व्यक्ति की उक्ति मानें चाहे वीतराग की; दोनों अवस्थाओं में यह प्रस्तुत का ही वर्णन हो सकता है और दोनों का ही यह कथन सङ्गत हो जाता है। अतः यहाँ व्याजस्तुति अलङ्कार ही मानना चाहिये। यदि आप अप्रस्तुतप्रशंसा मानेंगे तो भी ऐसा ही अप्रस्तुत अर्थ मानना पड़ेगा जो सम्भव हो। असम्भव अप्रस्तुत से प्रस्तुत की प्रतीति कभी नहीं हो सकती। यह तो आप कह ही नहीं सकते कि चाहे जिस अप्रस्तुत से जो प्रस्तुत अर्थ निकल सकता है। यदि आप ऐसा मानने लगेंगे कि चाहे जिस अप्रस्तुत से चाहें जिस प्रस्तुत को प्रतीति हो सकती है तब तो यह भी सम्भव हो सकेगा कि 'तुम्हारी कालिमा को धिक्कार है' इसको अप्रस्तुत मानकर इससे यह प्रतीति होगी कि वक्ता का अभिप्राय तेज का वर्णन करना है। सारांश यह है कि अप्रस्तुतप्रशंसा में अप्रस्तुत अर्थ प्रस्तुतपरक ही होना चाहिये मनमाना नहीं। जब अप्रस्तुतप्रशंसा में भी सम्भावना अपेक्षित होती ही है तब यहाँ पर व्याजस्तुति मानने में आपत्ति ही क्या है? ऊपर बतलाई हुई विधि से हम इसे किसी रागी की या विरागी की उक्ति क्यों नहीं मान सकते? (उत्तर) यह श्लोक किसी प्रबन्ध में नहीं आया है। अतः इसके लिये यह कल्पना नहीं की जा सकती कि इसमें कोई प्रकरणानुगत अर्थ हो सकता है। यदि यह पद्य किसी प्रबन्ध के अन्दर होता तो उस प्रबन्ध के अनुसार
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ही उसकी योजना कर ली जाती। अतः जो अवतरण आपने सुझाये हैं वे यहाँ पर लागू ही नहीं होते।
(ध्वन्य०) तस्मादप्रस्तुतप्रशंसेयम्। यस्मादनेन वाच्येन गुणीभूतात्मना निस्सामान्यगुणावलepāध्मातस्य निजमहिमोत्कर्षजनितसमत्सरजनज्वरस्य विशेषज्ञमात्स्नो न कृत्स्नदेवापरं पर्यतः परिदेवितमेतदिति प्रकाश्यते। तथा चायं धर्मकीर्ति: इलोक इति प्रसिद्धः। सम्भाव्यते च तस्यैव। यस्मात्—अनध्यवसितावगाहनमननलप्धशाशकत्व—प्यष्टपरमार्थतस्वमधिकाभियोगैरपि।
मत्सरं सम जगत्प्रलुढसदृशप्रतिग्राहकं, प्रयास्यति पयोनिधौ पय इव स्वदेहे जराम्॥
(अनु०) उस (कारण) से यह अप्रस्तुतप्रशंसा है। क्योंकि गुणीभूत आत्मावाले इस वाच्य से असामान्य गुणों के अभिमान से फूले हुए अपनी महिमा के उत्कर्ष से मत्सरपूर्ण व्यक्तियों के हृदय में सन्ताप उत्पन्न करनेवाले और अपने से किसी अन्य विशेषज्ञ को न देखने- वाले व्यक्ति का यह विलाप है यह प्रकाशित किया जा रहा है। क्योंकि यह प्रसिद्धि है कि यह धर्मकीर्ति का इलोक है और सम्भावना भी उन्हीं का श्लोक होने की है। क्योंकि—
‘बहुत बड़ी-चढ़ी बुद्धि की शक्तिवाले के द्वारा भी जिसके अवगाहन का अध्यवसाय नहीं किया जा सकता, अधिक अभियोगों के द्वारा भी जिसके परमार्थ तत्व को नहीं देखा जा सका है और जिसका समान प्रतिग्राहक प्राप्त नहीं होता इस प्रकार का हमारा मत महासागर के जल के समान अपने शरीर में ही जरा को प्राप्त हो जायगा’
इस श्लोक के द्वारा भी इस प्रकार का अभिप्राय प्रकाशित ही किया गया है।
(लो०) निस्सामान्येति निजमहिमेति विशेषज्ञमिति परिदेवितमिल्येतैरचतुर्भि: वाक्यखण्डै: क्रमेण पदचतुष्टयस्य तात्पर्यं व्याख्यातम्। ननुत्रापि किं प्रमाणमित्य- शङ्क्याह—तथा चेत्। नतु किमित्येतैराशङ्क्य तदाशङ्क्येन निर्विवादतदीयश्लोकार्प- तेनास्याशयं संवदयति-सम्भाव्यते इति। अवगाहनमध्यवसितमपि न यत्र आस्तां तस्य सम्पादनम्। परमे यदर्थतत्त्वं कौस्तुभादिभिर्योङ्गयुक्तमसु, अलब्धं प्रयत्ननपरीक्षित-मपि न प्राप्तं सदृशं यस्मात् तथाभूतं प्रतिग्राहमेकैको ग्राहो जलधर: प्राणी ऐरावतौच्च:-श्रवोधनवन्तरिप्रायो यत्र तदलङ्घ्यसदृशप्रतिग्राहकम्।
एवंविध इति। परिदेवितविषय इत्यर्थः। इयति चार्थे अप्रस्तुतप्रशंसोपमा- लक्षणमलङ्कारद्धयम्। अनन्तरं तु स्वात्मनि विस्मयधामाताद्भूते विश्वान्ति। परस्य च श्रोत्रुधनस्यात्यादरासदृशतया प्रयत्नग्राह्यतया चोत्साहजननेनैवभूतमतयन्तोपदेश्यं सत्कतिपयसमुचितजनानुग्राहकं कृतमिति स्वात्मनि कुशलकारिताप्रदर्शनया धर्मवीर- स्पष्टानेन वीररसे विश्रान्तिरिति मन्तव्यम्। अन्यथा परिदेवितमात्रेण किं कृतं स्यात्। अपेक्षापूर्वककारितया वेदितं चेत् किं ततः स्वार्थपरार्थसम्भावदित्यलं बहुना।
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तृतीय उद्योतः
(अनु०) 'निस्सामान्य' यह 'निजमहिमा' यह 'विशेषज्ञ' यह 'परिदेवित' यह इन चार वाक्यखण्डों से क्रमशः चार पदों के तात्पर्य की व्याख्या की गई । (प्रश्न) निस्सन्देह यहाँ पर भी क्या प्रमाण है ? यह शङ्का करके कहते हैं—'तथा च' इत्यादि । इससे क्या ? यह शङ्का करके उसके आशय से उन (धर्मकीर्ति) के निर्विवाद श्लोक के द्वारा अर्पित आशय का मेल करा रहे हैं—'सम्भावित किया जाता है' यह । जहाँ अवगाहन की तैयारी को ही और उसका सम्पादन न हो सके । परम जो अर्थतत्त्व अर्थात् कौस्तुभ इत्यादि से भी उत्तम । नहीं प्राप्त किया अर्थात् प्रयत्नपूर्वक परीक्षा करने पर भी जिसके समान प्राप्त नहीं हुवा उस प्रकार का प्रतिग्राह अर्थात् जलचर प्राणी ऐरावत, उच्चैःश्रवा, ध्वान्तरि इत्यादि है जिसमें उसको कहते हैं सदृश प्रतिप्राहक को न प्राप्त करनेवाला ।
'इस प्रकार का' यह । अर्थात् परिदेवन (विलाप) का विषय । और इतने अर्थ में अप्रस्तुतप्रशंसा और उपमा नाम के दो अलङ्कार हैं । बाद में तो अपने विषय में विस्मयघामता होने के कारण अद्भुत में विश्रान्ति होती है । दूसरे श्रोता लोगों के लिए अत्यन्त आदरास्पद होने के कारण और प्रतिप्राहक ग्रहण होने से उत्साहजनक के द्वारा इस प्रकार के (अर्थ) को अत्यन्त उपादेय बनाकर कृतिपय योग्यजनों का अनुग्राहक बना दिया गया है । इस प्रकार अपने अन्दर कुशलता प्रदर्शन के द्वारा धर्मवीर के स्पर्श से वीररस में विश्रान्ति हो जाती है यह माना जाना चाहिये । नहीं तो परिदेवन मात्र से क्या कार्य बन सकेगा ।
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तृतीय उद्योतः
यदि कहो कि अपने अन्दर बिना सोचे समझे कार्य करने की प्रवृत्ति बतलाई गई है तो इससे क्या ? क्योंकि इससे स्वार्थ और परार्थ दोनों असम्भव हैं । बस अधिक विस्तार की क्या आवश्यकता ?
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तृतीय उद्योतः
इस पद्य में अप्रस्तुत प्रशंसा का समर्थन
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तारावती—(प्रश्न) जब आपके मत में यहाँ व्याजस्तुति का मानना ठीक नहीं तो और कौनसा अलङ्कार होगा ? (उत्तर) यहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार मानना ही ठीक है । यहाँ पर प्रस्तुत है किसी विचारक की चिन्तनाशक्ति से उद्भूत गहन दार्शनिक सिद्धान्त जिसको समझ सकना भी प्रतिभाशालीयों के लिये असम्भव है । कवि इसी बात को कहना चाहता है । अतः उसके तुल्य इस अप्रस्तुत अर्थ का उपन्यास करता है कि ब्रह्माजी ने एक ऐसी अद्भुतपूर्व सुन्दरी की रचना कर दी है कि उसके उपयोगयोग ही कोई व्यक्ति दृष्टिगत नहीं होता । इस अप्रस्तुत से इस प्रस्तुत अर्थ की प्रतीति होती है कि विचारक का सिद्धान्त समझने की क्षमता ही बड़े-बड़े विद्वानों में भी नहीं है । इस प्रकार तुल्य अप्रस्तुत से तुल्य प्रस्तुत का परिस्फुरण होने के कारण यहाँ पर अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार है । यहाँ पर प्रस्तुत की अभिव्यक्ति की व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है—'लावण्यरुपो धन के व्यय की भी परवा नहीं की ओर अपने ऊपर बहुत कष्ट उठाया' इस प्रथम पद के अर्थ से व्यक्त होता है कि इसका वक्ता अपने असामान्य गुणों के अभिमान से फूला हुआ है; उसका कहना है कि उसने अपने सिद्धान्त के प्रवर्तन में अपनी सारी प्रतिभा लगा दी है और उसमें उसे बड़ा परि-
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श्रम करना पड़ा है। यह सिद्धान्त ऐसा वैसा नहीं है। अपितु इसमें असाधारण गुण भरे पड़े हैं। दूसरे पाद का अर्थ यह है—‘जो लोग स्वच्छन्द विचरण करते थे उनके हृदयों में चिन्ता का ज्वर उत्पन्न कर दिया।’ इसकी व्याख्या यह है कि ‘जो लोग मुझसे मत्सर रखते हैं वे मेरे इस महिमा के उत्कर्ष को देखकर ईर्ष्या की आग से एकदम जलने लगे हैं।’ तीसरे पाद का अर्थ है—‘यह बेचारी भी अपने तुल्य रमण को प्राप्त न कर सकने के कारण मारी गई।’ इसकी व्याख्या यह कि—‘मैंने जैसे सिद्धान्त का प्रवर्तन किया है और जैसी उच्चकोटि की प्रतिपादनशैली इसमें अपनाई है उसकी तुलना विश्व के किसी विचारक से नहीं की जा सकती। मैं अपने विषय का अद्वितीय विशोषज्ञ हूँ।’ चतुर्थ पादका अर्थ यह है—‘न जाने ब्रह्माजी ने इस तन्वङ्गी की रचनाकर किस अर्थ की सिद्धि की?’ इसका व्याख्यार्थ है—‘मुझे दुःख है कि मेरा इतना उच्चकोटि का सिद्धान्त किसी की समझ में नहीं आयेगा और यह यों ही व्यर्थ हो जायगा।’ इस प्रकार इस पद्य से वक्ता का परिदेवन व्यक्त होता है। अतः यहाँ पर अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार ही है।
(प्रश्न) इस विषय में क्या प्रमाण है कि इस पद्य का प्रस्तुत अर्थ किसी विद्वान् की उच्चकोटि की रचना के न समझे जाने से उद्भूत परिदेवन है। (उत्तर) यह प्रसिद्ध है कि यह पद्य धर्मकीर्ति का लिखा हुआ है। (आनन्दवर्धन को भी इस बात का ठीक पता नहीं था कि यह पद्य किसका लिखा हुआ था। यहाँ पर उन्होंने अपने समय की प्रसिद्धिमात्र का उल्लेख किया है। आनन्दवर्धन के इसी उल्लेख के आधार पर क्षेमेन्द्र ने निश्चय के साथ लिख दिया है कि यह धर्मकीर्ति एक बौद्धभिक्षु थे। इन्होंने न्यायबिन्दु की रचना की थी। सुबन्धु की वासवदत्ता में दी हुई एक उपमा से व्यक्त होता है कि इन्होंने एक अलङ्कार ग्रन्थ की भी रचना की थी। इससे यह भी सिद्ध होता है कि धर्मकीर्ति सुबन्धु से भी पहले हुए थे।)(प्रश्न) यह तो प्रसिद्धिमात्र है इसमें प्रमाण ही क्या कि यह धर्मकीर्ति का श्लोक है? दूसरी बात यह है कि यदि इसे धर्मकीर्ति का मान भी लिया जाय तो यह कैसे सिद्ध हो जायगा कि यह व्याजस्तुति न होकर अप्रस्तुतप्रशंसा है। (उत्तर) सम्भावना यही है कि उन्हीं का श्लोक होगा। कारण यह है कि इस पद्य में जिस प्रस्तुत की व्याख्या की गई है बिल्कुल उसी से मिलता-जुलता भाव धर्मकीर्ति के एक दूसरे श्लोक का भी है। जिसके विषय में यह सन्देह नहीं है कि वह धर्मकीर्ति का है या नहीं। उस पद्य का आशय इस प्रकार है—
'मेरा मत महासागर के जल के समान अथाह और दुर्गम है। जिस प्रकार बुद्धि की बहुत बड़ी शक्ति रखने वाले व्यक्ति भी न तो महासागर के जल में प्रविष्ट होने का साहस कर सकते हैं और न उसके आलोडन-विलोडन की शक्ति उनमें होती है उसी प्रकार मेरे मत में प्रवेश पा सकने की शक्ति अधिक से अधिक बुद्धि की शक्ति रखनेवालों में भी नहीं है। यदि वे उसमें अवगाहन का अध्यवसाय भी करें तो वह कार्य उनसे सम्पन्न नहीं हो सकता। जिस प्रकार अधिक से अधिक उद्योग करने पर भी मानव-वर्ग महासागर के बहुत बड़े अर्थ-तत्त्व कौस्तुभमणि इत्यादि से भी चढ़ी-चढ़ी रत्नराशि का अवलोकन नहीं कर सकता उसो प्रकार प्रकृष्ट अभियोग के द्वारा भी विद्वन्मण्डल मेरे मत के वास्तविक अर्थतत्त्व का परिज्ञान
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तृतीय उद्योतः
नहीं कर सकता। जिस प्रकार प्रयत्नपूर्वक परीक्षा करने पर भी समुद्र के समान प्रतिग्रह अर्थात् प्रत्येक जलचर प्राणी प्राप्त नहीं हो सकता। अर्थात् समुद्र से जैसे उच्चैःश्रवा, ऐरावत, धन्वन्तरि, कामधेनु इत्यादि महत्त्वपूर्ण प्राणी निकलते हैं वैसे अन्यत्र प्रयत्न करने पर भी नहीं मिल सकते उसी प्रकार मेरे मत के मुझ जैसे प्रतिग्राहक अर्थात् ग्रहण करने वाले और दूसरों को समझानेवाले नहीं मिल सकते। अतः एवं जिस प्रकार महासागर का जल अपने शरीर में ही वृद्ध हो गया उसी प्रकार मेरे शरीर में ही मेरा मत भी जीर्ण हो जायेगा।
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तृतीय उद्योतः
इस पद्य का वही भाव है जो कि 'लावण्यद्रविणगव्यो न गण्यत:' इत्यादि पद्य का है। इसमें वही परिदेवन की भावना है अतः यह अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार ही है न कि व्याजस्तुति नहीं। यहाँ तक तो अलङ्कारों की व्याख्या हुई। 'लावण्यद्रविणगव्यो न गण्यत:' इत्यादि में अप्रस्तुतप्रशंसा है और 'अनध्यवसिताग्रहण' इत्यादि में उपमा अलङ्कार है। बाद में रसध्वनि पर विचार का प्रश्न उठता है। इस दिशा में कवि के दृष्टिकोण से विस्मय का स्थान होने के कारण इसकी विश्रान्ति अद्भुत में होती है। यदि श्रोताओं के दृष्टिकोण से विचार किया जाय तो उनके लिये यह इस प्रकार का मत अत्यधिक आदरणीय होगा और वह मत इस योग्य है कि उसे ग्रहण करने की प्रयत्नपूर्वक चेष्टा की जानी चाहिये, अतः उसे श्रोताओं के हृदय में उत्साह का सञ्चार होता है उन्हें अनुभव होता है कि 'जो सिद्धान्त कोई नहीं समझ पाता वह मैं समझकर दिखलाऊँगा'। इससे यह व्यक्त होता है कि कवि ने एक ऐसे मत का प्रवर्तन किया है जिसका उपादान सभी के लिये बहुत ही उपयोगी है और जो व्यक्ति इस योग्य होंगे कि उसे समझ सकें तथा वे परिश्रम करके समझेंगे भी वे बहुत ही कृतार्थ हो जायेंगे। चाहे संख्या में वे कितने ही कम हों। इस प्रकार कवि ने अपनी प्रतिभा का उपयोग कर अत्यन्त परिश्रम के साथ लोगों को अनुगृहीत करनेवाला एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्धान्त प्रवर्तित किया है। इस प्रकार इस उक्ति के द्वारा कवि ने अपनी उच्चकोटि की क्रियाशीलता व्यक्त की है। यह उक्ति वीररस का स्पर्श करती है और इसकी विश्रान्ति वीररस में ही होती है। यदि इसकी विश्रान्ति साभिमान वीररस में न मानी जाय तो यह केवल एक विलाप रह जायेगा। इससे लाभ क्या होगा ? यदि कहो यहाँ कवि ने यह व्यक्त किया है कि मैं कितना नासमझी का काम करनेवाला हूँ तो इससे भी क्या लाभ होगा ? नासमझी से न तो अपना ही अर्थ बनता है और न पराया ही। बस इस पद्य की व्याख्या में इतना कहना पर्याप्त है अधिक की आवश्यकता नहीं।
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(ध्वन्या०) अप्रस्तुतप्रशंसायां च यद्वाच्यं तस्य कदाचिद्वक्षितत्वं कदाचिद्विवक्षितत्वं कदाचिद्विवक्षितत्वविवक्षितत्वमिति त्रीणि बन्धच्छाया। तत्र विवक्षितत्वं परार्थे यः पीडामनुभवति भङ्गुरेऽपि मधुरो यदीयः सर्वेषामिह खलु विकारोऽप्यभिमतः । न सम्प्राप्तो वृद्धिं यदि स भूशमक्षेत्रपतितः किंक्षुद्रैर्योंऽसौ न पुनरगुणाया मरभुवः ॥
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यथा वा ममैव— कस्मो ये दृश्यन्ते ननु सुभगरूपा: सफलता भवत्येषां यस्य क्षणमुपगतानां विषयताम् । निरालोके लोके कथंमिदमहो चक्षुरघुना समं जातं सर्वन्न समस्थवान्घैरव्यवैः ॥
(अनु०) और अप्रस्तुतप्रशंसा में जो वाच्य होता है वह कदाचित् विवक्षित होता है; कदाचित् अविवक्षित और कदाचित् विवक्षिताविवक्षित । इस प्रकार तीन प्रकार की वन्धच्छाया होती है । उसमें विवक्षित जैसे— 'दूसरे के लिये जो पीड़ा का अनुभव करता है, जो दुःखने पर भी मधुर होता है, जिसका विकार निस्सन्देह सभी व्यक्तियों के लिये अभिमत होता है यदि वह बुरे खेत में पड़कर वृद्धि को प्राप्त नहीं हुआ तो क्या यह गन्ने का दोष है गुणहीन मरुभूमि का नहीं ? 'अथवा जैसे मेरा ही— 'ये जो सुन्दर रूपवाले ( शरीरावयव ) देखे जाते हैं इनकी सफलता जिस ( चक्षु ) के क्षणमात्र विषय बन जाने से हो सकती है; आश्चर्य है कि आलोकरहित इस लोक में ये नेत्र कैसे अन्य सब अवयवों के समान ही हो गये अथवा अन्य अवयवों के समान भी नहीं रहे ।' (लो०) ननु यथास्थितस्यार्थस्यासझक्ती भवत्प्रस्तुतप्रशंसा इह तु सझक्तिरस्येवेत्याशङ्क्य सझक्तावपि भवत्येवैषित दर्शयितुमुपक्रमते—अप्रस्तुतेति । नन्विति । पैरिदं जगद्भूषितमित्यर्थः । यस्य चक्षुषो विषयतां क्षणं गतानामेव सफलता भवति-तदिदं चक्षुरिति सम्बन्धः । आलोको विवेकोऽपि । न सममिति । हस्तो हि परस्पर्शा- दानादावनुपयोगी । अवयवैरिति अतितुच्छप्रायैरित्यर्थः । अप्राप्तः पर उत्कृष्टो भागोऽर्थलाभात्मके: स्वरूपप्रथनलक्षणो वा येन तस्य । (अनु०)(प्रश्न) यथास्थित अर्थ की असझक्ति में अप्रस्तुतप्रशंसा हो जाय; यहाँ तो सझक्ति है ही यह आशङ्का करके सझक्त होने पर भी यह हो ही जाती है यह दिखलाने के लिये उपक्रम करते हैं—'अप्रस्तुत' यह । निस्सन्देह यह अर्थात् जिनके द्वारा यह संसार भवित किया क्रम करते हैं—'अप्रस्तुत' यह । जिस नेत्र की विषयता को क्षणभर गये हुये इन ( अवयवों ) की सफलता होती है वह यह नेत्र—यह सम्बन्ध है । आलोक का अर्थ विवेक भी है । 'समान नहीं' यह । हस्त निस्सन्देह दूसरे के स्पर्शा और आदान इत्यादि में भी उपयोगी है । 'अवयवों' से अर्थात् जो अत्यन्त तुच्छप्राय हैं उसे । नहीं प्राप्त किया गया है पर अर्थात् उत्कृष्ट भाग अर्थात् अर्थप्राप्तिरूप अथवा स्वरूप प्रसिद्धिरूप जिसके द्वारा उसका ।
अप्रस्तुतप्रशंसा के विभिन्नरूप तारावती—( प्रश्न ) अप्रस्तुतप्रशंसा का ऐसे स्थान पर होना तो ठीक है जहाँ जो कुछ कहा गया हो उसकी सझक्ति ठीक न बैठे। यदि सझक्ति ठीक बैठ जाती है तो अप्रस्तुत- प्रशंसा हो ही नहीं सकती यहाँ पर 'लावण्यद्रव्यगणित:' इत्यादि पद्य में किसी
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तृतीय उद्योतः
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व्यक्ति का किसी रमणी के अभूतपूर्व सौन्दर्य पर मुग्ध होना दिखलाया गया है जो कि सज्जत ही है। अतः आप इसे अप्रस्तुतप्रशंसा कैसे कह सकते हैं ? ( उत्तर ) अप्रस्तुतप्रशंसा केवल वहीं पर नहीं होती जहाँ अर्थ की सज्ज्ञति न हो। किन्तु अप्रस्तुतप्रशंसा तीन प्रकार की होती है—(१) जहाँ वाच्य विवक्षित हो अर्थात् अर्थ की सज्ज्ञति लग जाती हो, (२) जहाँ वाच्य अविवक्षित हो अर्थात् अर्थ की सज्ज्ञति न लग सकने से वाच्यार्थ का बोध हो जाता हो और (३) जहाँ वाच्यार्थ एक अंश में विवक्षित हो और दूसरे अंश में अविवक्षित अर्थात् जहाँ अर्थ की सज्ज्ञति एक अंश में लग जाती हो और एक अंश में न लगती हो। इन तीनों प्रकारों को उदाहरणों द्वारा यहाँ पर स्पष्ट किया जायेगा। पहले प्रथम प्रकार को लीजिये— प्रस्तुत अर्थ यह है कि कोई बहुत ही गुणवान् व्यक्ति किसी ऐसे स्थान पर जा पड़ा है जहाँ न तो उसे अपने गुणों के सम्मान की आशा है, न पैसा हो मिलने वाला है और न उसकी प्रसिद्धि ही हो सकती है। यह उसके लिये बड़े दुर्भाग्य की बात है; किन्तु इससे उस व्यक्ति की गुणहीनता तो नहीं सिद्ध हो जाती, इससे तो उस स्थान के लोगों की गुणग्राहकता की कमी हो सिद्ध होती है। यही बात कवि गन्ने की अप्रस्तुत योजना के माध्यम से व्यक्त कर रहा है—
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तृतीय उद्योतः
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'गन्ना कितनी अच्छी वस्तु है? यह दूसरे के लिये पीड़ा सहता है ओर चाहे तोड़ा जाय चाहे पीसा जाय किन्तु अपनी मधुरता नहीं छोड़ता। यदि संयोगवश वह किसी बहुत ही बुरे ऊसर खेत में पड़ जाय और बढ़ न सके तो गन्ने का दोष तो नहीं हो गया। यह तो उस मरुप्रदेश का दोष होगा जो उस गन्ने जैसे अच्छे पदार्थ को भी नहीं बढ़ा सका।'
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तृतीय उद्योतः
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आनन्दवर्धन ने एक दूसरा और उदाहरण इसी विषय में दिया है जो कि उन्हीं का बनाया हुआ पद्य है और जिसमें उक्त बात ही कही गई है तथा यह बतलाया गया है कि यदि पूज्य व्यक्ति के रहते हुए अपूज्यों की पूजा होती है तो उसमें पूज्य का क्या दोष ?
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तृतीय उद्योतः
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'हाथ पैर इत्यादि शरीर के विभिन्न अङ्ग बहुत ही सुन्दर कहे जाते हैं और यह समझा जाता है कि शरीर के इन सुन्दर अङ्गों से ही संसार भूषित कर दिया गया है। किन्तु इन अङ्गों की सफलता तभी होती है जब ये नेत्र के सम्पर्क में आते हैं। नेत्रों का महत्व इतना बढ़ा-चढ़ा है कि क्षणमात्र के सम्पर्क से ही अर्थात् क्षण भर के लिये ही इन अङ्गों को अपना विषय बनाकर नेत्र इन्हें सफल बना देते हैं। यह कैसी आश्चर्य और दुःख की बात है कि आलोकरहित अन्धकारपूर्ण संसार में वे ही नेत्र अन्य अङ्गों के समान हो जाते हैं अथवा अन्य अङ्गों की समानता कर भी नहीं सकते !'
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तृतीय उद्योतः
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'आलोकरहित' में आलोक का अर्थ विवेक भी है। आशय यह है कि ऐसे स्थान पर जहाँ लोगों की विवेकशक्ति मारी जाती है अच्छे से अच्छे लोग भी जन साधारण में ही गिने जाते हैं। 'अथवा अन्य अवयवों के समान नत्र नहीं हो सकते' यहाँ पर 'अन्य अवयवों' से व्यञ्जना निकलती है कि वे अवयव बहुत ही तुच्छ हैं। अन्य अङ्ग हाथ-पैर इत्यादि तो अन्धकार में भी स्पर्श इत्यादि के द्वारा कुछ न कुछ कार्य कर ही सकते हैं किन्तु आँखें तो बिल्कुल व्यर्थ हो जाती हैं वे उस समय अन्य अङ्गोंके समान भी नहीं रह जाती।
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(ध्वन्यालो) अनयोरपि हृदयो: श्लोकयोरिशुचक्षुषी विवक्षितस्वरूपे एव न च प्रस्तुते। महागुणस्याविषयपतितत्ववादग्रामपरभागस्य कस्माचित्स्वरूपमुपवर्णयितुं हृदयोरपि श्लोकयोस्तात्पर्येण प्रस्तुतत्वात् ।
( अनु० ) निस्संदेह इन दोनों श्लोकों में गन्ना और नेत्र विवक्षित रुपवाले ही हैं किन्तु प्रस्तुत नहीं हैं। क्योंकि महागुणोंवाले और तुच्छस्थान में पड़ जाने के कारण उत्कर्ष को प्राप्त न करनेवाले किसी व्यक्ति के स्वरूप का वर्णन करने के लिये दोनों श्लोकों में ( वह व्यक्ति ) तात्पर्य के रूप में प्रस्तुत है ।
तारावती—इस प्रकार यहां पर अप्रस्तुत इक्षु ओर चक्षु का वर्णन किया गया है। इक्षु के विषय में जो कुछ कहा गया वह सब ठीक है और चक्षु भी सभी अङ्गों में अधिक महत्वपूर्ण है ही। अतः यहां पर वाच्यार्थ विवक्षित है। उससे इस प्रस्तुत की व्यञ्जना निकलती है कि अत्यन्त गुणी व्यक्ति बुरे स्थान पर पड़ कर परभाग अर्थात् उत्कृष्ट धन अथवा स्वरूप की प्रसिद्धि को नहीं प्राप्त कर पाया है। उसी की यहां व्यञ्जना होती है। इस प्रकार यहां विवक्षितवाच्य पर अप्रस्तुतप्रशंसा आधारित है।
(ध्वन्यालो) अविवक्षितत्वं यथा— कस्त्वं भोः कथयामि देवहूंतकं न विद्धि शाखोटकं वैराग्यादिव वक्षि साधु विदितं कस्मादिंव कथ्यते । वामेनात्र वटस्तमभगजनः सर्वात्मना सेवते न च्छायापि परोपकारकरिणी मार्गस्थितस्यापि मे ॥
( अनु० ) अविवक्षितत्व जैसे— 'अरे तुम कौन हो ? कहता हूँः मुझे देव का मारा हुआ तुच्छ शाखोट ( सिहोरा ) का वृक्ष समझों। कुछ माना वराग्य से बोल रहे हो। ठीक से समझ गये ? क्यों ? यह कहा जा रहा है ? यहां से बाईं ओर वटवृक्ष है; यात्री लोग पूरी आत्मा से उसी का सेवन करते हैं; मार्ग में स्थित भी मेरी छाया भी परोपकार करनेवाली नहीं है ?'
न हि वृक्षविशेषण सहोक्तिप्रयुक्ती सम्भवत इत्यविवक्षिताभिधेयेनैवानेन श्लोकेन समृद्धासत्पुरुषसमोपर्य्यतनो निर्घनस्य कस्माचिच्चनमनस्विनः परिदेवितं तात्पर्येण वाक्यार्थीकृतमिति प्रतोयते ।
( अनु० ) अविवक्षितत्व जैसे— 'अरे तुम कौन हो ? कहता हूँः मुझे देव का मारा हुआ तुच्छ शाखोट ( सिहोरा ) का वृक्ष समझों। कुछ माना वराग्य से बोल रहे हो। ठीक से समझ गये ? क्यों ? यह कहा जा रहा है ? यहां से बाईं ओर वटवृक्ष है; यात्री लोग पूरी आत्मा से उसी का सेवन करते हैं; मार्ग में स्थित भी मेरी छाया भी परोपकार करनेवाली नहीं है ?' वृक्ष विशेषण से उक्ति-प्रयुक्ति सम्भव नहीं होती; अतः अविवक्षिताभिधेयवाले इस श्लोक से समृद्ध असत्पुरुष के निकटवर्ती किसी निर्धन मनुष्य का परिदेवन तात्पर्य से वाक्यार्थ बनाया गया है यह प्रतोत होता है ।
(लो०) कथयामोत्यादि प्रत्युक्तितः अननेन पदेनेऽदस्माह—अकथनीयमेतत् श्रूयमाणं हि निर्वेदाय भवति, तथापि तु यदि निर्बन्धस्तथ्कथ्यथ्यामि । वैराग्यादिति । साधुविदितरमित्यादिना च सूचितं वैराग्यमित्यावत् । साधुविदितरमित्युतरम् ।
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तृतीय
उद्योतः
कस्मादिति वैराग्ये हेतुप्रश्नः । इदं कथ्यत इत्यादिसनिर्वेदस्मरणोपक्रमं कथंकथ्यमपि निरूपणीयतयोततरम् । वामनेति । अनुचितेन कुलादिनोपालक्षित इत्यर्थः । 'वट' इति । छायामात्रकरणादेव फलदानादिशून्यादुद्दरङ्कन्धर इत्यर्थः । छायापीति । शाखोटको हि ऋमशानाग्निज्वालालीढलतापल्लवादिस्तरुविशेषः । अत्रात्र विवक्षायां हेतुमाह— न हि । समृद्धो हि योगसत्पुरुषः । 'समृद्धसत्पुरुष' इति प्राकृतसत्पुरुष इति पाठे तु 'समृद्धेन ऋद्धिमात्रेण सत्पुरुषो न तु गुणादिनेतिव्याख्येयम्
(अनु०) 'कहता हूँ' इत्यादि प्रत्युक्ति है । इस पद से यह कहले हैं— अकथनीय यह सुने जाने पर निर्वेद के लिये होता है तथापि यदि आग्रह है तो कहता हूँ । 'वैराग्य सै' यह । काकु से तथा 'दैवहतक' इत्यादि से तुम्हारा वैराग्य सूचित हुआ है यह आशय है । 'ठीक समझा' यह उत्तर है । 'क्यों' यह वैराग्य के हेतु का प्रश्न है 'यह कहा जा रहा है' इत्यादि निर्वेदपूर्ण स्मरण के उपक्रम के साथ जैसे तैसे निरूपण करने के योग्य होने के रूप में उत्तर दिया गया है । 'बाईं ओर से' अर्थात् अनुचित कुल इत्यादि से उपलक्षित । 'वट' यह । अर्थात् फलदान इत्यादि से शून्य छायामात्र करने से ही ऊपर को कन्धा उठाये हुये 'छाया भो' शाखोटक निस्सन्देह एक वृक्ष होता है । जिसका लतापल्लव इत्यादि इमशानाग्नि की ज्वाला से कवलित कर लिये गये हों । यहां अविवक्षा में हेतु बतलाते हैं— 'न हि' यह । समृद्ध जो असत् पुरुष । 'समृद्धसत्पुरुष' इस पाठ के होने पर यह व्याख्या करनी चाहिये कि जो समृद्ध से अर्थात् ऋद्धिमात्र से सत्पुरुष हैं गुण इत्यादि से नहीं ।
तृतीय
उद्योतः
तारावती— अप्रस्तुतप्रशंसा का दूसरा प्रकार वह होता है जहाँ वाच्य की विवक्षा नहीं होती अर्थात् वाच्य बाधित होता है । उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति सिहोड़े के वृक्ष से प्रश्नोत्तर कर रहा है—
व्यक्ति— 'भाई तुम कौम हो ?' वृक्ष— 'कहता हूँ' । आशय यह है कि यह बात बतलाने की हो नहीं है कि मैं कौन हूँ क्योंकि इसको सुनकर तुम्हें दुःख और निर्वेद ही होगा तथापि यदि तुम्हारा अधिक आग्रह है तो मुझे कहना ही पड़ेगा, लो कहता हूँ— 'तुम यह समझ लो मैं दैव का मारा हुआ शाखो- टक हूँ ।'
तृतीय
उद्योतः
व्यक्ति— 'तुम तो विरागियों की भाँति बातें कर रहे हो ?' अर्थात् तुम्हारे कहने के ढंग—कण्ठ विकार ( काकु ) और 'दैवका मारा' इत्यादि शब्दों से तुम्हारे वैराग्य की भावना अभिव्यक्त होती है ।
वृक्ष— 'हाँ ऐसा ही है, आप बिल्कुल ठीक समझे ।' व्यक्ति— 'क्यों ?' अर्थात् तुम्हारे वैराग्य में क्या कारण है ? वृक्ष— 'यह मैं कहता हूँ ?— ( वृक्ष के इस कथन से वक्त होता है कि वह निर्वेद के साथ अपनी दशा का स्मरण कर रहा है और जैसे—तैसे ऐसा उत्तर देना चाहता है जो उसके वैराग्य का निरूपण कर सके ।) यहाँ बाईं ओर एक बरगद है, यात्रीगण उसका पूरे मनोयोग से सेवन करते हैं । यद्यपि मैं मार्ग में स्थित हूँ तथापि मेरी छाया भी परोपकार करने वाली नहीं है ।'
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यहाँ बाईं ओर की व्याख्यना यह निकलती है कि वट वृक्ष न तो मार्ग पर ही उगा हुआ है और न ठीक स्थान पर ही स्थित है फिर भी यात्री लोग उसी ओर जाते हैं। 'बरगद' की व्याख्या यह है कि वह एक साधारण सा वृक्ष है, जिसमें फल इत्यादि बिल्कुल नहीं होते, केवल उसमें छाया मिल जाती है। केवल इतने से ही वह अभिमान में भर कर अपना कन्धा ऊपर किये हुये है। यदि उसके पास फलों की आशा होती तो यात्रियों का उसके पास जाना ठीक था। किन्तु यात्री वहीं केवल छाया के लोभ में ही जाते हैं। यदि मेरे पास भी छाया होती तो यात्री लोग मेरे पास ही आया करते इतनी दूर चल कर क्यों जाते। किन्तु मैं ऐसा अभागा हूँ कि मुझे छाया भी नहीं मिल सकी जो मैं उसके द्वारा ही यात्रियों का उपकार कर सकता। शाखोटक नाम का एक वृक्ष होता है जो कि इमशान में प्रायः उगता है और इमशान की अमिन से उसके लता पल्लव इत्यादि झुलस जाते हैं। ( नागेश भट्ट ने इसे भूतों के आवास का वृक्ष लिखा है। वैद्यक निघण्टु में लिखा है कि शाखोट भूतवास वृक्ष होता है जिसके फल पीले होते हैं, छाल कठोर होती है और छाया बहुत थोड़ी होती है।) यह तो हुई अप्रस्तुत की व्याख्या। यहाँ पर प्रस्तुत यह है कि कोई बहुत ही सज्जन तथा उदार व्यक्ति है जो दान देना चाहता है। किन्तु उस बेचारे के पास ऐसे साधन ही नहीं है कि याचक उसके पास आया करे। (उसी के पड़ोस में एक दूसरे महाशय रहते हैं जो वस्तुतः बड़ी ही नीच प्रकृति के हैं, किन्तु परमात्मा ने उसे पैसा दिया है, अतः वह सभी लोगों से घिरा रहता है, यद्यपि वह दान किसी को नहीं देता, केवल लोगों को दुराशामात्र है जिससे सभी लोग उसके पास आते रहते हैं।) यह कथन उस निर्धन किन्तु सज्जन व्यक्ति का विलाप है। यही तात्पर्य-रूप वाच्यार्थ है। यहाँ पर वाच्यार्थ में वृक्ष के साथ उत्तर-प्रत्युत्तर किया गया है जो कि असम्भव है। क्योंकि वृक्ष किसी से बातचीत नहीं कर सकता। अतः यह अविवक्षितवाच्यमूलक अप्रस्तुतप्रशंसा है। यहाँ पर समृद्ध असत्पुरुषका निकटवर्तीं होना अप्रस्तुतप्रशंसा में हेतु है। यहाँ पर 'समुद्रसत्पुरुष' यह पाठ ठीक है। कहीं कहीं 'समृद्धसत्पुरुष' यह पाठ दृष्टिगत होता है। वहाँ भी आय वहाँ ही है। वहाँ अर्थ इस प्रकार करना होगा—जो समृद्ध होने से अर्थात् ऋद्धि या सम्पत्तिमात्र से सत्पुरुष है, अन्यथा तो वह असत्पुरुष ही है।
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अत्र हि वाच्यार्थो नात्यन्तं सम्भवी तु असम्भवी । तस्माद्वाच्यगतव्यग्ययोः प्राधान्यप्राधान्ये यत्नतो निरूपणीये ॥४०१॥
( अनु ) विश्रिताविवक्षितत्व जैसे—
हे पारमर ! उत्पथ में उत्पन्न हुई, अशोभन तथा फल, पुष्प और पत्नों से रहित वेरो के लिये वाद देते हुये हैँस जाओगे।
यहाँ पर वाच्यार्थ न तो अत्यन्त सम्भव है और न असम्भव। अतः वाच्य और व्यंग्य के प्राधान्य का निरूपण प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये।
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तृतीय उद्योतः
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(लो•) नाट्यन्तमिति । वाच्यभावनियमो नास्ति नास्तीति न शक्यं वक्तुम्; व्यङ्गचस्यापि भावादिति तात्पर्यम् । तथा हि उत्पथजाताया इति न तथा कुलोःद्भवा या इति लावण्यरहिताया: । फलकुसुमपत्ररहिताया इत्येवंभूतापि कारित्यपुत्रिणी वा भात्रादिपक्षपरिपूर्णतया सम्बन्धिवर्गपरिपोषिता वा परिरक्ष्यते । वदर्या वृत्तिं ददत् पामर भो:, हसिष्यसे सर्वलोकैरितिभाव: । एवमप्रस्तुतप्रशंसां प्रसज्जतो निरुप्य प्रकृतमेव यन्निरुपणीयं तदुपसहरति—तस्मादिति । अप्रस्तुतप्रशंसाया-मपि लावण्येत्यत्र इलोके यद्ययमोहो लोकस्य दृष्टस्ततो हेतोरिस्यर्थ: ॥४०॥
(अनु•) 'नाट्यन्त' यह । तात्पर्य यह है कि वाच्य भाव का नियम नहीं होता ( और ) नहीं होता यह नहीं कहा जा सकता क्योंकि व्यङ्गच्य की भी सत्ता होती है । वह इस प्रकार—'उत्पथ में उत्पन्न हुई' अर्थात् उस प्रकार के (अपने समान) वंश में उत्पन्न नहीं हुई । 'अशोभन' अर्थात् लावण्य रहित । 'फल, पुष्प, पत्र रहित' अर्थात् इस प्रकार की भी कोई पुत्रिणी अथवा भाई इत्यादि पक्ष से परिपूर्ण होने के कारण सम्बन्धित वर्ग से परिपोषित की रक्षा की जाती है । भाव यह है कि अरे वैरी की बेड़ी लगानेवाले पामर ? तुम सब लोगों के द्वारा हँसे जाओगे । इस प्रकार प्रशंसावश अप्रस्तुतप्रशंसा का निरूपण कर प्रकृत में ही जिसका निरूपण करना है उसका उपसंहार कर रहे हैं—'इससे' यह । अर्थात् अप्रस्तुतप्रशंसा में भी लोक का व्यामोह देखा गया है उस हेतु से ॥४०॥ तारावती—अप्रस्तुतप्रशंसा का तीसरा प्रकार वह होता है जिसमें वाच्य का कुछ अंश विवक्षित हो और कुछ अविवक्षित । इसके उदाहरण के रूप में एक प्राकृत गाथा उद्धृत की गई है। जिसकी संस्कृत छाया यह होगी— उत्पथजाताया अशोभनाया फलकुसुमपत्ररहिताया: । वदर्या वृत्तिं ददत् पामर भो अवहसिष्यसे ॥
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तृतीय उद्योतः
कोई व्यक्ति किसी कुटुम्ब तथा निम्नवंशोत्पन्न स्त्री को प्रयत्नपूर्वक पद में रखने और उसकी रक्षा करने के लिए चेष्टा कर रहा है कि कहीं कोई उसका शील भङ्ग न कर दे । उसे सुनाकर कोई दूसरा कह रहा है— 'तुम बड़े मूर्ख हो जो कि बेरी के चारों ओर बाड़ी लगाने की चेष्टा कर रहे हो जो मार्ग से हटकर बुरे स्थान पर उगी हुई है । कोई सुन्दर वृक्ष नहीं है और न तो उसमें फल ही आते हैं और न कुसुम पत्र इत्यादि ही उत्पन्न होते हैं । लोग जब तुम्हें ऐसी बेरी के चारों ओर बाड़ी लगाते हुए देखेंगे तो तुम्हारी हँसी ही उड़ाएंगे ।'
यहाँ पर वैरोपकर अर्थ अप्रस्तुत है और इससे इस प्रस्तुत अर्थ की प्रतीति होती है कि जिस रमणी की रक्षा करने के लिये तुम इतने प्रयत्नवान् हो वह न तो किसी अच्छे कुल में उत्पन्न हुई है (उत्पथजाताया:) न देखने में सुन्दर तथा लावण्ययुक्त है (अशोभनाया:) तथा न उसके सन्तान ही होती है और न उसके भाई इत्यादि कुटुम्बियों का वर्ग ही है जिसने उसका प्रेमपूर्वक पालन-पोषण किया हो (फलकुसुमपत्ररहिताया:) आशय यह है कि ऐसी स्त्री की सुरक्षा का ध्यान रखना उचित भी कहा जा सकता है चाहे सुन्दर न हो किन्तु अच्छे वंश
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में उत्पन्न हुई हो और अपने भाई विरादरों से प्रेमपूर्वक पालन-पोषण पाया हो । जहाँ यह भी न हो वहाँ तो किसी रमणी के सुरक्षित रखने की चेष्टा हास्यास्पद ही होती है । यहाँ पर वाच्यार्थ न तो बिल्कुल सम्भव है और न असम्भव । क्योंकि यहाँ व्यङ्ग्यार्थ की सत्ता भी विद्यमान है । (यहाँ पर न तो यह उदाहरण हो स्पष्ट है और न लोचन में की हुई व्याख्या ही ठीक प्रतीत हो रही है । यह उदाहरण इस बात का दिया गया है कि कहीं-कहीं जिस अप्रस्तुत वाच्य के माध्यम से प्रस्तुत की प्रतीति कराई जाती है वह अप्रस्तुत एक अंश में विवक्षित होता है और दूसरे अंश में अविवक्षित । बेरी की बाड़ लगाने में क्या अविवक्षित है और क्या विवक्षित यह समझ में नहीं आता । लोचन में इसकी व्याख्या इस प्रकार की गई है कि 'वाच्य होने का नियम नहीं है और न हो यह भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि व्यङ्ग्य की सत्ता भी यहाँ विद्यमान है ।' सम्भवतः लोचनकार का आशय यह है कि बेरी में बाड़ कोई नहीं लगाता क्योंकि यह कार्य अनुचित है, अतः यह वाच्य अविवक्षित है । किन्तु व्यङ्ग्य कुरूप नायिका की रक्षा की जाती है अतः यह विवक्षित है । यही व्याख्या दीधिति में कर दी गई है । किन्तु यहाँ आपत्ति यह है कि व्यङ्ग्य तो प्रस्तुत होता है और वह सर्वत्र विवक्षित ही होता है। यदि व्यङ्ग्यार्थ अविवक्षित होगा तो बात कहनी क्या जायेगी और पर्यवसान कहाँ होगा ? 'कसवं भोः कथयामि' इस में भी जो कि अविवक्षितवाच्य का उदाहरण दिया गया है व्यङ्ग्यार्थ वक्ता का उत्कृष्टप्रतिपादन ही अभीष्ट है । किसी निर्धन का वैराग्य तो विवक्षित ही है । अतः व्यङ्ग्यार्थ को लेकर उसके एक अंश को अविवक्षित कहना ठीक नहीं है । दूसीरी बात यह है कि 'विवक्षिताविवक्षितवाच्य' इस नामकरण से ही ज्ञात होता है कि वाच्यार्थ के ही विवक्षित और अविवक्षित होने पर विचार किया जाना चाहिये । तब बेरी की बाड़ लगाने में क्या असम्भव है ? क्या उसमें फल इत्यादि नहीं होते ? अतः उदाहरण ठीक नहीं जँचता । विवक्षिताविवक्षित वाच्य का ठीक उदाहरण बिहारी का यह दोहा हो सकता है—
दिन दस आदरु पाइके करि लै आपु बखानु । जौ लगि काग सराध पख तौ लगि तो सनमानु ॥
यहाँ पर कौवे का आदर और श्राद्धपक्ष भर सम्मान विवक्षित है । किन्तु कौवा स्वयं अपना बखान नहीं कर सकता, अतः यह अंश अविवक्षित है ।
ऊपर प्रसंगवश अप्रस्तुतप्रशंसा का निरूपण किया गया । इस निरूपण का मस्तव्य यही दिखलाना था कि अप्रस्तुतप्रशंसा केवल वहीं नहीं होती जहाँ वाच्य असङ्कत तथा अविवक्षित हो । यह वहाँ पर भी हो सकती है जहाँ वाच्य सङ्केत अथवा अर्थसङ्केत हो । ऐसा मान लेने पर 'लावण्यद्रविणव्ययो न गणित:' में वाच्यार्थ के असङ्केत तथा अविवक्षित होनेपर भी अप्रस्तुतप्रशंसा के हो सकने में कोई आपत्ति नहीं उठाई जा सकती । किन्तु इस पद्य में ('लावण्यद्रविणव्ययो न गणित:' इत्यादि में) अप्रस्तुतप्रशंसा को न समझकर कुछ लोगों ने व्याजस्तुति बतला दी है । इस भ्रम का एकमात्र कारण यही है कि इस बात का ठीक-ठीक विवेचन नहीं किया जा सका है कि प्रधानता किस तत्त्व की है । यदि प्रधानता और अप्रधानता
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तृतीय
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(ध्वन्यो) प्रधानगुणभावास्यां व्यङ्गचस्यैवं व्यवस्थिते । उभ्ये काव्ये तत्तद्य्याननिबन्धनसमृद्धिगुणैः ॥ चित्रं शब्दार्थभेदेन द्विविधं च व्यवस्थितम् । तत्किंचित्चित्रकच्वब्दचित्रं वाच्यचित्रमतः परम् ॥४२॥
(अनु०) 'व्यङ्गच के प्रधान तथा गुणीभाव के द्वारा दो काव्य इस प्रकार व्यवस्थित हैं । उन दोनों से जो भिन्न है वह चित्रकाव्य कहा जाता है ॥४१॥' 'शब्द अर्थ के भेद से चित्रकाव्य दो प्रकार से व्यवस्थित होता है । उसमें कुछ शब्दचित्र होता है और उससे भिन्न वाच्यचित्र होता है ॥४२॥'
तृतीय
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व्यङ्गचस्यार्थस्य प्राधान्ये ध्वनिसंज्ञितकाव्यप्रकारः गुणीभावे तु गुणीभूतव्यङ्गचता । ततोडन्यच्चाद्रसभावादितात्पर्यरहितं व्यङ्गचार्थविशेषप्रकाशनशक्तिशून्यं च काव्यं केवलवाच्यवाचकवैचित्र्यमात्राश्रयेणोपनिबद्धमालेख्यप्रपञ्चं यद्भासते तच्चित्रं न तन्मुख्यं काव्यं । काव्यानुकारो ह्यासौ । तत्किंचित्चित्रकच्छब्दचित्रं यथा दुष्करयमकादि । वाच्यचित्रे तत्तः शब्दचित्रादन्यद्व्यर्थसंस्पर्शरहितं प्राधान्येन वाक्यार्थतया स्थितं रसादितात्पर्यरहितमुत्प्रेक्षादि ।
व्यङ्गच अर्थ के प्राधान्य में ध्वनि नाम का काव्यप्रकार होता है और गुणीभाव में तो गुणीभूतव्यङ्गचता होती है । उनसे भिन्न रसभावादि रहित तथा विशेष प्रकार के व्यङ्गचार्थ के प्रकाशन की शक्ति से शून्य केवल वाच्यवाचक वैचित्र्यमात्र के आश्रय से उपनिबद्ध होकर आलेख्य के समान जो आभासित होता है उसे चित्र कहते हैं । वह मुख्य काव्य नहीं होता । वह निस्सन्देह काव्य का अनुकरण होता है । उसमें कुछ शब्दचित्र होता है जैसे दुष्करयमक ! इत्यादि । उस शब्दचित्र से भिन्न वाच्यचित्र होता है (जैसे) व्यङ्गचार्थसंस्पर्श से रहित और रसादितात्पर्य से रहित वाक्यार्थ के रूप में स्थित उत्प्रेक्षा इत्यादि ।
तृतीय
उद्योत:
(लो०) एवं व्यङ्गचस्तरुपं निरुप्य सर्वथा यत्तच्छून्यं यितुमाह—प्रधानेत्यादिना । कारिकाद्वयेन । शब्दचित्रमिति । यमकचक्रबन्धादि चित्रतथा प्रसिद्धमेव तत्तुल्यमेवार्थचित्रं मन्तव्यमिति भावः । आलेख्यप्रख्यमिति । रसादिजीवरहितं मुख्यप्रतिमृदिति चेत्यर्थः
(अनु०) इस प्रकार व्यङ्गच के स्वरूप का निरुपण कर जो सर्वथा उससे शून्य होता है उसमें क्या बात होती है ? यह निरुपण करने के लिये कह रहे हैं——'प्रधान' इत्यादि । दो कारिकाओं के द्वारा । 'शब्दचित्र' यह । भाव यह है कि बन्ध यमकचक्र इत्यादि चित्र के रूप में प्रसिद्ध ही हैं; उन्हीं के समान अर्थचित्र भी माना जाना चाहिये । 'आलेख्य के समान' अर्थात् रस इत्यादि जीवनरहित और मुख्य प्रतिमृतिरुप ।
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तारावती—ऊपर व्यङ्गच्य के स्वरूप का भी निरूपण कर दिया गया और यह भी बता दिया कि कि व्यङ्गयार्थ की विभिन्न परिस्थितियों में .काव्य का कौन सा रूप कहा जा सकता है । अब यहाँ प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या काव्य में कुछ ऐसे स्थल होते हैं या नहीं जहाँ व्यङ्गच्यार्थ बिल्कुल ही न हो ? यदि ऐसे स्थल होते हैं तो वहाँ पर क्या व्यवस्था होती है ? उस काव्य का क्या नाम रखा जाता है ? इस प्रश्न का उत्तर ४१ वीं और ४२ वीं कारिकाओं में दिया गया है । इन कारिकाओं का आशय यह है कि—'काव्य के उन दो प्रकारों के व्यवस्थित होने की व्याख्या की जा चुकी जहाँ व्यङ्गयार्थ प्रधान या गुणीभूत होता है । जो काव्य इन दोनों विधाओं में अन्तर्भूत नहीं होता अर्थात् जहाँ व्यङ्गयार्थ होता ही नहीं उस काव्य को चित्र-काव्य कहते हैं । इस चित्र-काव्य के भी दो भेद होते हैं—शब्द-चित्र और अर्थचित्र । कहीं शब्दचित्र होता है और कहीं अर्थचित्र ।
(ध्वन्या०) अथ किमिदं चित्रं नाम ? यत्र न प्रतीयमानार्थसंस्पर्शः । प्रतीयमानो ह्यर्थस्त्रिभेदः: प्राकप्रदर्शितः । तत्र यत्र वस्त्वलङ्कारान्तरं वा व्यङ्गच्यं नास्ति स नाम चित्रस्य कल्प्यतां विषयः । यत्र तु रसादीनामविषयत्वं स काव्यप्रकारो न सम्भवत्येव । यस्मादवस्तुसंस्पर्शिता काव्यस्य नोपपद्यते । वस्तु च सर्वंमेव जगद्गतंमवश्यं कस्यचिद्रसस्य भवाववेन । चित्तवृत्तिविशेषा हि रसादयः, न च तदर्शितं वस्तु किश्चित्कारेण चित्तवृत्तिविशेषोन्मज्जनयाति तब्नुपपादय व कविविषयतैव तस्य न स्यात् । कविविषयदच चित्रतया कदिचिन्नरूप्यते ।
(अनु०) अच्छा यह चित्र क्या वस्तु है ? यही कि जहाँ प्रतीयमान अर्थ का संस्पर्श न हो । निस्सन्देह पहले तीन भेदोंवाला प्रतीयमान अर्थ पहले दिखलाया गया है । उसमें जहाँ पर कोई दूसरी वस्तु या दूसरा अलङ्कार व्यंग्य नहीं होता वह चित्र काव्य का विषय कल्पित कर लिया जाय । जहाँ तो रस इत्यादि की अविषयता होती है वह काव्यप्रकार सम्भव ही नहीं होता है क्योंकि किसी वस्तु का स्पर्श करना काव्य के लिये सम्भव ही नहीं होता । संसार में विद्वान् सभी वस्तु अवश्य हो किसी रस या भाव की अंगता को प्राप्त हो जाती हैं क्योंकि अन्ततः विभावारूप हो होती है । रस इत्यादि तो चित्तवृत्तिविशेषरूप ही होते हैं । ऐसी कोई वस्तु नहीं होती जो विशेष प्रकार की चित्तवृत्ति को उत्पन्न न करे । उसके उद्भावन न करने पर उसकी कविविषयता ही सिद्ध न हो और कोई कविविषय ही चित्र के रूप में निरूपित किया जाता है ।
(लो०) 'अथ किमिदम्' इति आक्षेपे वक्ष्यमाण आशायः । अत्रोत्तरम्—यत्र नेति । आक्षेप: स्वाभिप्रायं दर्शयति—प्रतीयमान इति । अवस्तुसंस्पर्शितेति । कचटतपादिवन्निरर्थकत्वं दशादिमादिवदसंबद्धार्थत्वं वेत्यर्थः । नन मा भूत्कविचिषय इत्यादि शङ्कच्याह—कविविषयरूपतया यद्यपि न निर्दिष्टस्थापि कविगोचर-कृत एवं चासौ वाक्य:, अन्यस्य वासुकिवृत्तान्ततुल्यसीहाभिधानयोग्यात् । कवे:श्वेदगोचरो नूनममुना प्रोतिर्जन्यतिग्या सा चावश्यं विभावानुभावव्यभिचारिप्रपञ्चसाधनी-विषयः ।
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तृतीय उद्योत:
(अनु०) 'क्या वस्तु' इस आक्षेप में आगे कहा गया आशय है। यहाँ उत्तर है— 'जहाँ नहीं' यह। आक्षेप करनेवाला अपना अभिप्राय दिखलाता है—'प्रतीममान' यह। 'अव-स्तुसंस्पर्शिता' यह। 'कचटतप' इत्यादि के समान निरर्थकत्व अथवा 'दश दाडिम' इत्यादि के समान असम्बद्धार्थत्व हो जाय। (प्रश्न) कवि का विषय न हो (इससे क्या ?) यह शङ्का करके कहते हैं 'और कवि विषय' यह। भाव यह है कि यद्यपि काव्यरूप में उसका निर्देश नहीं किया है तथापि कवि का गोचर किया हुआ यह कहा ही जाना चाहिये, क्योंकि वासूनक के वृत्तान्त के समान उसके अभिधान का यहाँ योग ही नहीं है। यदि कवि का गोचर है तो निस्सन्देह इसके द्वारा आनन्द उत्पन्न किया जाना चाहिये और वह अवश्य ही विभाव, अनु-भाव और व्यभिचारीभाव की पर्यवसायिनी होती है।
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तृतीय उद्योत:
चित्रकाव्य—स्वरूप, नामकरण और भेद
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तृतीय उद्योत:
तारावती—इन कारिकाओं का आशय यह है कि जहाँ व्यङ्ग्य अर्थ की प्रधानता होती है उस काव्यप्रकार को ध्वनि कहते हैं और जहाँ व्यङ्ग्यार्थ गौण होता है उसे गुणीभूत व्यङ्ग्य कहते हैं। उनसे भिन्न ऐसा भी काव्य हो सकता है जिसमें न तो रस इत्यादि की तात्पर्यरूप में व्यञ्जना हो रही हो और न अन्य किसी प्रकार की वस्तु अथवा अलङ्कार की व्यञ्जना ही विद्दमान हो। उसमें या तो केवल वाच्य का वैचित्र्य हो या केवल वाचक का वैचित्र्य हो और उसी वैचित्र्य को लक्ष्य बनाकर काव्य-रचना की गई हो। इस प्रकार के काव्य को चित्रकाव्य कहते हैं। इसके नामकरण का कारण यह है कि जिस प्रकार किसी वस्तु का कोई चित्र बनाया जाता है; उसमें मुख्य वस्तु के समस्त अवयव और समस्त बाह्याकृति दृष्टिगत होती है। केवल एक वस्तु की कमी होती है और वह है जीवन। इसी प्रकार जिस काव्य में काव्य के सारे तत्व शब्द, अर्थ इत्यादि तो विद्यमान होते हैं किन्तु काव्य-जीवन रस इत्यादि विद्यमान नहीं होता उसे चित्रकाव्य कहते हैं। वह मुख्य-काव्य की कोटि में नहीं आता अपित काव्य का अनुकरण मात्र कहा जाता है। उसमें केवल मुख्य की प्रतिकृति होती है। यह चित्रकाव्य दो प्रकार का होता है एक तो शब्दचित्र और दूसरा अर्थचित्र। शब्दचित्र में ऐसे यमक सन्निविष्ट होते हैं जिनकी संयोजना दुष्कर होती है (कुछ यमक ऐसे होते हैं जो स्वाभाविक रूप में ही कविवाणी में स्फुरित होते चले जाते हैं उनसे रस परिपोष ही होता है।) इसके प्रतिकूल कुछ यमक प्रयत्नपूर्वक लाये जाते हैं वे यमक चित्रकाव्य की ही कोटि में आते हैं। उदाहरण के लिये रघुवंश के नवें सर्ग में और शिशुपालवध के छठे सर्ग में प्रयत्नपूर्वक द्वृत्तविलम्बित के तीसरे पाद में यमक लाने की चेष्टा की गई है।) इसी प्रकार चक्रबन्ध, मुरजबन्ध, गोमूत्रिका बन्ध इत्यादि में भी यही चित्रकाव्यता होती हैं। (इस प्रकार के पद्य शिशुपालवध के १९ वें सर्ग में और किरातार्जुनीय के १५ वें सर्ग में बहुतायत से आये हैं। इन सर्गों का विषय चित्रयुद्धवर्णन कहलाता ही है।) यह तो सब वाचक चित्र (शब्दचित्र) हुआ। वाच्यचित्र भी ऐसी उत्प्रेक्षा इत्यादि को कहते हैं जो शब्दचित्र से भिन्न होता है, जिसमें व्यङ्ग्यार्थ का संसर्ग नहीं होता; जिसमें रस इत्यादि का तात्पर्य नहीं होता और मुख्य वाच्यार्थ के रूप में उत्प्रेक्षा इत्यादि की ही स्थिति होती है।
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(चक्रबन्ध इत्यादि के नामकरण का कारण तो स्पष्ट है । उनमें वर्णाविन्यास इस प्रकार किया जाता है कि कहीं चक्र कहीं मुरज कहीं गोमूत्र इत्यादि के चित्र बन जाते हैं; उसी की समता के आधार पर अर्थचित्र भी मान लिया जाना चाहिये । यदि आधुनिक भाषा में कहें तो यह कहा जा सकता है कि कभी-कभी कवि बिना ही रागद्वेष की योजना किये हुए इस प्रकार का वर्णन कर देता है जिससे किसी वस्तु या व्यक्ति का चित्र सा खिंच जाता है उसके अन्दर किसी प्रकार का रागद्वेष आनन्द इत्यादि भावना के उद्भावन की शक्ति नहीं होती । यदि हम कहें तो ऐसे वर्णन को अर्थचित्र कह सकते हैं।)
(ध्वन्य०) अत्रोच्यते—सत्यं न ताहशकाव्यप्रकारोऽस्ति यत्र रसादीनां-प्रतीतिः; किन्तु यदा रसभावादिविवक्षाशून्यः कविः शब्दालङ्कारमर्थालङ्कारं वोपनिबन्धाति तदा तथावक्षापेक्षया रसादीनामत्यन्तं परिकलप्यते । विवक्षोपारूढ एव हि काव्ये शब्दानामर्थः। वाच्यसामर्थ्यंवशेन च कविविवक्षाविरहेऽपि तथाविधे विषये रसादि-प्रतीतिरभवन्ती परिदुर्बला भवतीत्यनेनापि प्रकारेण नीरसत्वं परिकल्प्य चित्र-विषयो व्यवस्थाप्यते ।
(अनु०) यहाँ पर कहा जा रहा है—सचमुच उस प्रकार का काव्य प्रकार नहीं होता जहाँ रस इत्यादि की प्रतीति न हो । किन्तु जब रस, भाव इत्यादि की विवक्षा से रहित कवि शब्दालङ्कार अथवा अर्थालङ्कार का उपनिबन्धन करता है तब उसकी विवक्षा की अपेक्षा करते हुये अर्थ की रस इत्यादि से शून्यता कल्पित की जाती है । काव्य में शब्दों का अर्थ निस्सन्देह विवक्षा में उपारूढ ही होता है । कवि को विवक्षा के न होते हुये भी उस प्रकार के विषय में होनेवाली रस की प्रतीति अत्यन्त दुर्बल हो जाती है इस प्रकार से भी नीरसत्व की कल्पना करके चित्रविषय की व्यवस्था कर दी जाती है ।
(लो०) किन्तु । विवक्षा तत्परत्वेन नालङ्कृत्येन कृतञ्चन । इत्यादिर्योऽलङ्कारनिवेशने समीक्षाप्रकार उक्तस्तं यदा नानुरसतीत्यर्थः । नैव तत्र रसप्रतीतिरस्ति यथा पाकानभिज्ञसूदविरचिते मांसपाक-विशेषे । ननु वस्तुसौन्दर्यादिवशं भवति कदाचित् तथास्वादकुशलकृततायामपि शिखरि-ण्यामिवत्याशङ्क्याह—वाच्चेत्यादि । अनन्वपोति । पूर्वं सवर्था तच्च्छून्यत्वमुक्तमधुना तु दौर्बल्यमित्यपि शब्दस्यार्थः । अज्ञकुतायां च शिखरिण्यामहोशिखरिण्यपोति न तज्ज्ञान-चमत्कारः अपि तु दधिगुडमरिचं चैतदसमञ्जसयोजितमिति वक्तारो भवन्ति ।
(अनु०) 'किन्तु' यह । अर्थात् 'तत्परक रूप में विवक्षा (होनी चाहिये) अथवा के रूप में कैसे भी नहीं ।' इत्यादि जो समीक्षा प्रकार अलङ्कार के निवेशने के विषय में बतलाया गया है उसका अनुसरण जब नहीं करता । 'रस इत्यादि से शून्यता' यह । वहाँ पर रस की प्रतीति नहीं होती जैसे पाक में अनभिज्ञ रसोइया के बनाये हुए विशेष प्रकार के मांसपाक में । (प्रश्न) वस्तु के सौन्दर्य से कदाचित् वहाँ आस्वाद अवश्य आ जाता है। जैसे अकुशल की बनाई हुई
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तृतीय उद्योतः
शिखरिन् में । यह शाखा करके कहते हैं—‘वाच्य’ इत्यादि । ‘इसके द्वारा भी’ यह । यहाँ ‘भी’ का अर्थ है—पहले तो सर्वथा उसकी शून्यता बतलाई गई थी, अब उसका दौर्बल्य बतलाया गया है । अज्ञ की बनाई हुई शिखरिणी में ‘आश्चर्य है शिखरिणी पर’ यह उसके ज्ञान से चमत्कार नहीं होता; अपितु लोग यह कहने लगते हैं कि यह दही गुड़ और मरिच बेमेल रूप में मिलाई गई हैं ।
चित्रकाव्य और भावपक्ष
तारावती—(प्रश्न) यह चित्रकाव्य है क्या वस्तु ? आप उसे ही तो चित्र काव्य की संज्ञा दे रहे हैं जिसमें प्रतীয়मान अर्थ का संस्पर्श न हो । पहले बतलाया जा चुका है कि प्रतोयमान अर्थ तीन प्रकार का होता है—वस्तुग्यज्ञना, अलङ्कारग्यज्ञना और रसग्यज्ञना । हम इतना तो मान सकते हैं कि कुछ काव्य ऐसे अवश्य हो सकते हैं जिनमें वस्तुग्यज्ञना या अलङ्कारग्यज्ञना न हो । यदि आप उसे चित्रकाव्य कहना चाहें तो कह सकते हैं । किन्तु यह कैसे माना जा सकता है कि कुछ काव्य ऐसे होते हैं जिनमें रस या भाव नहीं होता ?
कारण यह है कि ऐसा तो काव्य हो ही नहीं सकता जिसके शब्दों से किसी वस्तु का सङ्केत न मिलता हो । यदि हम केवल कुछ अक्षरों को जोड़ दें जिनका कोई अर्थ न हो जैसे ‘कचटटप’ इत्यादि तो उसे तो काव्य की संज्ञा प्राप्त नहीं हो सकेगी । इसी प्रकार यदि हम कुछ शब्दों को जोड़ दें जो आपस में न तो सम्बद्ध हों और न उनसे किसी अर्थ का प्रतिपादन हो रहा हो जैसे ‘छ पुये, दस अनार’ इत्यादि तो उसे भी काव्य की संज्ञा प्राप्त नहीं हो सकेगी । सारांश यह है कि काव्य वही हो सकता है जो किसी वस्तु का प्रतिपादन कराये’ जितनी भी कोई वस्तु संसार में विद्यमान हैं उनमें एक भी ऐसी नहीं हो सकती जो किसी रस या भाव को जागृत करनेवाली न हो । क्योंकि समस्त वस्तुओं का अन्तिम पर्यवसान तो विभाव के रूप में ही होता है ।
आशय यह है कि संसार की प्रत्येक वस्तु विभावरूपता में परिणत होती है और उस रूप में वह किसी न किसी भाव या रस की उद्दीपिका या उद्बोधिका होती है । ऐसी दशा में रस या भाव से शून्य तो कोई वस्तु हो ही नहीं सकती । रस इत्यादि वस्तुतः है क्या वस्तु ? विशेष प्रकार की चित्तवृत्ति ही तो रस कहलाती है । ऐसी कोई वस्तु संसार में होती ही नहीं जो किसी न किसी विशेष प्रकार की चित्तवृत्ति को उत्पन्न न करे । बिना वस्तु के काव्य नहीं हो सकता । अतः प्रत्येक काव्य रस या भाव के बिना सम्भव ही नहीं है ।
यदि आप किसी ऐसी वस्तु की कल्पना कर लें जो चित्तवृत्ति के उत्पादन की क्षमता न रखती हो वह कवि का विषय ही नहीं बन सकती । यदि कहो कि कविविषय न रहने में क्या हानि हो जायगी तो मेरा निवेदन है जिसे आप चित्रकाव्य के रूप में स्वीकार करना चाहते हैं वह भी तो कविविषय ही है । यदि कवि हो उसे नहीं अपना विषय बनायेगा तो वह चित्रकाव्य की संज्ञा ही कैसे प्राप्त कर सकेगा ? चाहे आप उसे काव्यरूप में स्वीकार न करें किन्तु कवि का विषय तो वह होगा ही । क्योंकि यहाँ पर जो कुछ लिखा जा रहा है वह कविता के विषय में ही लिखा जा रहा है, कोई मनमानी बात तो लिखी नहीं जा रही है । यदि कविविषय के अतिरिक्त मनमाने ढंगसे यहाँ चाहे जो कहा जाने लगेगा तो वह सब
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उसी प्रकार अप्रयोजनीय होगा जिस प्रकार वासुकी की कथा लिखी जाने लगे । इस सबका निष्कृष्टार्थ यही है कि काव्य से अर्थबोध अवश्य होना चाहिये, अर्थबोध से कोई वस्तु ही अवगत होगी । वस्तु सर्वदा विभावरूप ही होती है जो किसी न किसी भाव को जागृत अवश्य करती है । अतः यदि चित्रकाव्य की वस्तु कवि की विषयगोचर है तो उससे प्रीति का जनन अवश्य होना चाहिये । अतः प्रत्येक वस्तु का पर्यवसान विभाव, अनुभाव या सञ्चारीभाव में ही होता है । इस प्रकार आप यह कदापि नहीं कह सकते कि चित्रकाव्य रस से भी रहित होता है ।
इस विषय में उत्तर दिया जा रहा है—यह तो ठीक ही है कि कोई काव्य ऐसा नहीं होता जिसमें रस इत्यादि की प्रतीति न होती हो । वस्तुतः कवि का लक्ष्य रसनिष्पत्ति ही होना चाहिये । यदि कवि अलङ्कार योजना भी करता है तो भी उसका लक्ष्य रस ही होना चाहिये । यह पहले ही बतलाया जा चुका है कि कवि को बहुत ही सावधानी से समोक्षा पूर्वक अलङ्कारों की योजना करनी चाहिये । उस प्रकरण में कहा जा चुका है कि कवि को अलङ्कार-योजना रस-परक रूप में ही करनी चाहिये, कभी भी प्रधान रूप में नहीं करनी चाहिये । किन्तु कभी कभी कवि असावधानता के कारण इस समीक्षापूर्वक की अनजाने अवहेलना कर जाता है । ऐसी दशा में वह ऐसे शब्दालङ्कारों और अर्थालङ्कारों की योजना करता है जिनका सस्तर रसानुभूति की तीव्रता प्रदान करना नहीं होता । अतः उन स्थलों पर कवि का अमिप्रेत होने के कारण रस, भाव इत्यादि की शून्यता की कल्पना कर ली जाती है । कारण यह है कि काव्य में शब्दों का अर्थ इसी दृष्टिकोण को लेकर किया जाता है कि कवि का अभिप्रेत विवक्षित अर्थ क्या है ? अतः जो कवि अकुशल होते हैं उनकी कविता प्रायः रस-भावादि शून्य हो जाती है । यह इसी प्रकार समझिये जैसे मांस पकाना कुशल रसोइये का काम है । यदि कोई अकुशल रसोइया मांस पकाकर रख देता है तो उसमें मांस का स्वाद नहीं आता । उसमें अनुचित परिमाण में डाले हुये मिर्च मसाले इत्यादि का स्वाद ही आ जाता है । इसी प्रकार काव्य का लक्ष्य रसनिष्पत्ति करना हो है । यदि कोई अकुशल कवि रसनिष्पत्ति के लिये प्रयासशील होकर उसमें असफल हो जाता है तब उसमें रस प्रतीति की अनुभूति नहीं होती अपितु अलङ्कारों की ही प्रतीति होकर रह जाती है । उसको चित्रकाव्य कहते हैं ।
(प्रश्न) यदि अकुशल रसोइया भी किसी वस्तु को बनाता है तो भी उसमें जो पदार्थ डाले जाते हैं उनका तो स्वाद आ हो जाता है । उदाहरण के लिये यदि अकुशल रसोइया भी सिखरन बनायेगा तो उसमें जो चीनी इत्यादि डाली जायगी उनका तो स्वाद आयेगा ही । फिर आप यह कैसे कह सकते हैं कि अकुशल कवि द्वारा की हुई रसनिष्पत्ति में कोई रस आयेगा ही नहीं ? (उत्तर) यदि कवि को रसनिष्पत्ति अभिप्रेत नहीं भी होगी तब भी वाच्यसामर्थ्य के बल पर उस प्रकार के विषय में यदि रसनिष्पत्ति होगी तो भी बहुत ही शिथिल हो जायेगी । यह भी एक दूसरा प्रकार है जिससे उस प्रकार के काव्य की नीरसता की कल्पना कर ली जाती है और उसे चित्रकाव्य की संज्ञा प्रदान कर दी जाती है । इसो प्रकार चित्रकाव्य व्यवस्थापित किया जा सकता है । यहाँ पर दो प्रकार से काव्य की नीरसता
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तृतीय
उद्योत:
तदिदमुक्तं- 'रसभावादिविषयविवक्षाविरहे सति । अलङ्कारनिबन्धो यः स चित्रविषयो मतः ॥ रसादिषु विवक्षा तु स्यात्तात्पर्यवतो यदा । तदा नास्त्येव तत्काव्यं ध्वनेनन्तर न गोचरः ॥ एतच्च चित्रं कवीनां विशिष्टड्ढल गिरां रसादितात्पर्यमनपेक्ष्यैव काव्यप्रवृत्ति दर्शनाद् अस्माभिः । परिकल्पितं हि इदानीन्तनकाव्यतत्त्वकोविदव्यवस्थापन क्रियामणे नास्त्येव ध्वनिव्यतिरिक्तः काव्यप्रकारः । यतः परिपाकवतां कवीनां रसादितात्पर्यविरहे व्यापार एव न शोभते । रसादितात्पर्ये च नास्त्येव तदस्तु यदभिमतसाङ्क्तं नियमनं न प्रगुणोभवति । अचेतना अपि हि भावा यथायथमुचितरसविभाववतया चेतनवृत्तान्तयोजनया वा न सन्त्येव ते ये यान्ति न रसाङ्गताम् ।
वह यह कहा गया है— 'रसभाव इत्यादि के विषय में विवक्षा न होने पर जो अलङ्कार का निबन्ध वह चित्रविषय माना जाता है । जब रस इत्यादि के विषय में तात्पर्यवाली विवक्षा हो तब ऐसा काव्य नहीं ही होता जहाँ ध्वनि का गोचर न हो जाय ।' विश्रुत्हलवाणीवाले कवियों की रसादि तात्पर्य की बिना अपेक्षा किये हुए काव्य में प्रवृत्ति देखने से हमने यह चित्र कल्पित कर लिया है । आजकल के कवियों की तो काव्यनय की न्याय्य व्यवस्था करने पर ध्वनिव्यतिरिक्त काव्यप्रकार नहीं ही होता । क्योंकि परिपाक वाले कवियों का रसादितात्पर्य के न होने पर तो व्यापार ही शोभित नहीं होता । रस इत्यादि के तात्पर्य होने पर तो वह वस्तु नहीं ही होती जो अभिमत रस की अङ्गता को प्राप्त कराये जाने पर प्रगुण नहीं हो जाती । अचेतन भाव (पदार्थ) भी ऐसे नहीं होते जो ठीक-रूप में उचित रस के विभाव होने के कारण अथवा चेतन वृत्तान्त्योजना के कारण रस का अङ्ग नहीं बन जाते ।
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त्यादिना। परिपाकवतामिति। शब्दार्थविषयो रसौचित्यलक्षणः परिपाको विद्यते येषाम्।
'गत्पदानि त्यजन्त्येव परिवृत्तिसहिष्णुताम्' इत्यपि रसौचित्यशरणमेव वक्तव्यमन्यथा निह्नेतुकं स्यात्। अनु०) 'कहा रया' यह। अर्थात् हमारे ही द्वारा अलङ्कारों का अर्थात् शब्द और अर्थ का अलङ्कारों का निबन्ध। (प्रश्न) उसे चित्र कहते हैं इस उपदेश की क्या आवश्यकता ? क्योंकि कहा गया है कि वह तो अकाव्य रूप ही होता है। यदि कहो कि उसका उपदेश हेय के रूप में किया जा रहा है तो यह भी कहना चाहिये कि घड़ा बनाने पर कवि नहीं हो जाता यह शब्द करके कवियों ने ऐसा किया है; अतः हेय के रूप में उपदेश दिया जाता है यह निरूपण करते हैं—'और यह' इत्यादि के द्वारा 'परिपाकवाले' यह शब्दार्थविषयक रसौचित्यलक्षण वाला परिपाक जिनका विद्यमान है
'जो पद परिवृत्ति सहिष्णुता को छोड़ ही देते हैं।' यह भी रसौचित्य को शरण में रखकर ही कहा जाना चाहिये अन्यथा हेतु रहित हो जाय।
तारावती—जहाँ कवि को रस या भाव की विवक्षा नहीं होती अर्थात् जहाँ कविता करने में कवि का प्रवृत्तिनिमित्त रसनिष्पत्ति नहीं होता, किन्तु वह वहाँ पर अलङ्कार का निबन्धन करता है वहाँ काव्य चित्रकाव्य कहा जाता है। इसके प्रतिकूल जहाँ कवि की विवक्षित तात्पर्यार्थ रस इत्यादि ही होता है अर्थात् जहाँ कवि रस को तात्पर्य का विषय बनाता है इस प्रकार का कोई भी काव्य ऐसा नहीं होता जिसे ध्वनि इस नाम से अभिहित न किया जा सके या जो ध्वनि के क्षेत्र में न आ जाय।
(प्रश्न) जब रस ही काव्य का जीवन है और उस जीवन से शून्य केवल अलङ्कार के मन्तव्य से लिखा हुआ ध्वनि बाह्य काव्य कभी भी काव्यसंज्ञा का अधिकारी नहीं हो सकता। तब इस चित्रकाव्य के निरूपण से क्या लाभ ? यह तो आप कहते हो कि वह चित्रकाव्य काव्य नहीं होता। यदि कहो कि यहाँ पर चित्रकाव्य का निरूपण इसलिए किया जा रहा है कि कविता करने में उसकी परित्याग किया जा सके। यहाँ पर चित्रकाव्य के निरूपण का मन्तव्य यदि यह बतलाना ही है कि वह काव्य नहीं होता तब तो फिर संसार की जितनी वस्तुएँ काव्य नहीं होतीं उन सबको गिनाना चाहिये कि 'घड़ा काव्य नहीं होता।'
'वस्त्रकाव्य नहीं होता' इत्यादि। (उत्तर) चित्रकाव्य के परिहार का उपदेश यहाँ करना इस लिये आवश्यक प्रतीत होता है कि कतिपय कवियों ने काव्य के नाम पर जो रचनायें प्रस्तुत की हैं वे वास्तविक काव्य की सीमा में नहीं आतीं; न उनमें रस है न ध्वनि। अतः उनको काव्यबाह्य करने का उपदेश आवश्यक प्रतीत होता है। हमने प्रायः देखा है कि जो कवि काव्यकला में निष्णात नहीं होते और उनकी काव्य की व्यवस्थित पद्धति का अनुसरण करने में असमर्थ होकर अनियन्त्रित भाव से प्रवृत्त हुआ करती हैं वे रस इत्यादि तात्पर्य की परवा नहों करते यों ही काव्य में प्रवृत्त हो जाते हैं। अतः उन्हें लक्ष्य बनाकर हमने (आनन्द-
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वर्धन ने) चित्र नामक एक नये प्रकार की कल्पना कर लो है । किन्तु काव्य के इस प्रकार को काव्य की संज्ञा प्रदान करना उचित प्रतीत नहीं होता । आजकल काव्य जिस स्थिति पर पहुँच गया है और आजकल के काव्य में जैसी भावात्मक तथा कलात्मक प्रौढ़ता के दर्शन होते हैं उसको देखते हुए यही कहना पड़ता है कि यदि आजकल की उचित तथा न्याय सम्मत काव्य नीति की ठीक रूप में व्यवस्था की जाय तो ऐसा कोई काव्यप्रकार दृष्टिगत ही नहीं होता जिसको ध्वनि से बाह्य कहा जा सके। क्योंकि कवि कहलाने का अधिकारी वही व्यक्त हो सकता है जिसकी वाणी परिपाक को प्राप्त हो गई हो । परिपाक का अर्थ यही है कि वाणी में शब्द और अर्थ ठीक रूप में स्फुरित होने लगें और वे शब्द तथा अर्थ ऐसे ही हों जिनमें रसानुकूल औचित्य का सर्वथा पालन किया गया हो । जबतक रसानुकूल शब्द और अर्थ अनायास हो स्फुरित नही होने लगते तबतक यह नहीं कहा जा सकता कि कवि को काव्य परिपाक प्राप्त हो गया है । पद परिपाक की परिभाषा इस प्रकार की गई है—
यत्पदानि र्यजन्त्येव परिवृत्तिसहिष्णुताम्। tेन शब्दन्यासनिपुणता: शब्दपाकं प्रचक्षते॥
अर्थात् कवि जिन शब्दों का प्रयोग करता है यदि उन शब्दों को बदल कर उनके स्थान में दूसरे पर्यायवाचक शब्दों को रख देने से काव्य सौन्दर्य नष्ट हो जाय तथा कवि के प्रयोग किये हुए शब्दों को बदलना असम्भव हो तो शब्द प्रयोग में निपुण लोग उसे शब्दपाक कहते हैं ।
काव्य में शब्दों की परिवर्तननीयता का आशय यहां पर भी शब्दों के न बदले जा सकने का आशय यही लगाया जाना चाहिये कि शब्दों के बदल देने से 'रस' में कमी नहीं आनी चाहिये । यदि रस की दृष्टि से ही शब्द और अर्थ के परिपाक पर विचार नहीं किया जायगा तो शब्दों के न बदल सकने का हेतु ही क्या रह जायगा । आशय यह है कि कवि की ऐसी कोई क्रिया सम्भव नहीं है जिनमें रस इत्यादि के तात्पर्य का प्रभाव हो । यदि ऐसी कोई क्रिया दिखलाई पड़े तो वह न तो शोभित ही होगी और न काव्य का नाम ही ग्रहण कर सकेगी । जब इतनी बात स्वीकार कर ली और यह मान लिया कि काव्य में सर्वत्र रस इत्यादि ही तात्पर्य रूप में स्थित होते हैं तब ऐसी कोई वस्तु ही शेष नहीं रह जाती जिसको रस का अंग बना देने से उसमें परम-रमणीयता न आ जाय और उसके रमणीयतारूप गुण में अभिवृद्धि न हो जाय ।
काव्य में अचेतन वस्तु के समावेश का प्रकार (प्रश्न) रस तो चेतनगत होता है । काव्य का विषय अचेतन भी बनता ही है। कवि लोग प्रकृति इत्यादि का वर्णन करते ही हैं; फिर भी आप यह कैसे कह सकते हैं कि सर्वत्र कवि का अभिप्राय रस ही होता है ? (उत्तर) काव्य में अचेतन पदार्थों का समावेश दो ही रूपों में होता है—या तो किसी मानव भाव के उद्दीपन के रूप में या स्वयं आलम्बन होकर वर्ण्य के विषय रूप में । जहां कहीं मानवभाव के उद्दीपन के रूप में प्रकृति का उपादान होता है वहां तो प्रकृति अथवा अचेतन पदार्थ का वर्णन रसप्रवण होता ही है क्योंकि वहां
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पर अचेतन पदार्थ रस के विभाव के रूप में परिणत हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त जहाँ प्रकृति स्वयं वर्ण्यविषय के रूप में उपात्त होती है वहाँ भी चेतन वृत्तान्त की योजना कर ही ली जाती है। कवि अचेतन पदार्थों को भी चेतन के प्रकाश में ही देखता है।
(ध्वन्यो०) तथा चेदमुख्यते—
अपारे काव्यसंसारे कविरेकः प्रजापतिः । यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते ॥ श्रृङ्गारी चेत्कविः काव्ये जातं रसमयं जगत् । स एव वीतरागश्चेन्नीरसं सर्वमेव तत् ॥ भावानां चेतनादपि चेतनवच्चेतनवत् । व्यवहारयति यथेष्टं सुकवि: काव्ये स्वतन्त्रतया ॥
(अनु०) और इस प्रकार कहा जाता है—
'अपार काव्य-संसार में कवि ही प्रजापति है। जैसा विश्व इसे अच्छा लगता है वैसा ही हो जाता है। यदि काव्य में 'कवि श्रृङ्गारी' हो तो जगत् रसमय हो जाता है; वही यदि वीतराग हो तो वह सब नीरस ही होता है। सुकवि काव्य में स्वतन्त्ररूप में अचेतन भावों का चेतन के समान व्यवहार करता है।'
(लो०) अपार इति । अनाद्यन्त इत्यर्थः । यथा रुचिपरिवृत्तिमाह—श्रृङ्गारीति । श्रृङ्गारोक्तविभावानुभावव्यभिचारिभावरूपप्रतीतिमयो न तु स्त्रीविषयनीतिमन्तव्यम् । अत एवं भरतमुनि:—'कवेरन्तर्गतं भावं' 'काव्यार्थान् भावयति' इत्यादिषु कविशब्दमेव मूर्धाभिषिक्ततया प्रयुड्क्ते । निरुपितं चेतद्रसस्वरूपनिरूपणयावसरे । जगदिति । तद्रसनिमज्जनादित्यर्थः । श्रृङ्गारपदं रसोपलक्षणम् । स एवेति । यावद्रसिको न भवति तदा परिदृश्यमानोडप्ययं भाववर्गो यद्यपि सुखदुःखमोहोमाद्यस्थ्यमात्रलौकिकं वितरति, तथापि कविवर्णनोपारोहं विना लोकातिकान्तरसास्वादभुवं नाधिशेते इत्यर्थः ।
(अनु०) 'अपार' यह । अर्थात् आदि—अन्तरहित । रुचि के अनुसार परिवर्तन को कह रहे हैं—'श्रृङ्गारी' यह । श्रृङ्गारी का अर्थ यह समझा जाना चाहिये कि श्रृङ्गार में बतलाये हुए विभाव, अनुभाव और व्यभिचारिभाव की चर्वणा रूपप्रतीति से युक्त, स्त्री-व्यसनी नहीं । अतएव भरत मुनि ने कहा है—'कवि के अन्तर्गत भाव को…' इत्यादि तथा 'काव्यार्थ को भावित करता है' इत्यादिकों में कवि शब्द को ही मूर्धाभिषिक्तरूप में प्रयुक्त करता है। यह रसस्वरूपनिरूपण के अवसर पर निरुपित किया गया है। 'जगत्' यह । अर्थात् उस रस में निमज्जन से । 'श्रृङ्गार' शब्द रस का उपलक्षण है । 'वही' वह । यहाँ यह अर्थ है कि जब तक रसिक नहीं होता उस समय दिखाई देने वाला भी यह भाववर्ग केवल लौकिक सुख-दुःख और मोह की मध्यस्थता को ही प्रदान करता है तथापि कविवर्णना के उपारोह के बिना रसास्वाद की भूमि पर आरूद नहीं होता ।
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तृतीय उद्योतः
कवि का महत्त्व
वस्तुतः काव्य में कवि का भाव ही प्रधान होता है। चाहे चेतन पदार्थ हो चाहे अचेतन पदार्थ; जिस पदार्थ को कवि अपने जिस भाव के प्रकाश में देखता है वह वस्तु कवि की उस भावना से सम्बलित ही दिखलाई पड़ती है। अतः कवि का तात्पर्य सर्वत्र रसाभिव्यञ्जन में ही होता है। यही बात कविप्रिया कारिकाओं में इस प्रकार कही गई है :— ‘यह नानाविध तथा अनन्त विस्तृत काव्य भी एक जगत् ही है जिसका न आदि है और न अन्त। ( अनादि काल से कविता होती आई है और अनन्तकाल तक होती रहेगी। इस प्रकार कविता के न तो प्रारम्भ का पता है और न अन्त ही दृष्टिगत होता है। यही दशा संसार की है; संसार भी आदि अन्त से रहित है—‘आदिनस्त्यातमनः क्षेत्रपारस्पर्यमनदिकम्।’) जिस प्रकार दृश्यमान जगत् की रचना विधाता करता है उसी प्रकार की रचना कवि के द्वारा सम्पन्न होती है। इस प्रकार कवि इस काव्यजगत् का विधाता है। ब्रह्माजी तो सृष्टि की रचना कर देते हैं किन्तु अपने काव्य के माध्यम से उसकी व्यवस्था कवि ही करता है। कवि को जैसा विश्व अच्छा लगता है वह वैसा ही बदल जाता है। यदि काव्य में कवि शृङ्गारी बन जाता है तो सारा विश्व ही शृङ्गारी हो जाता है। कवि के शृङ्गारी होने का यह आशय नहीं है कि वह व्यक्तिगत जीवन में स्त्रियों के पीछे पड़ जाता है। अपितु उसका अर्थ यह है कि कवि अपनी कविता में शृङ्गारसानुकूल विभाव अनुभव और सञ्चारीभाव की चर्वणा कराने में ही दत्तचित्त हो जाता है; वह चर्वणा ही प्रतीति है तथा कवि का हृदय उस चर्वणा रूप प्रतीति से ओतप्रोत हो जाता है; उसका परिणाम यह होता है कि सारे संसार का जीवन शृङ्गार की भावना से भर जाता है। यदि कवि वीतराग हो जाय अर्थात् अपने काव्यों में वैराग्य भावना का पोषण करने लगे तो सारा संसार ही रस की भावना से रहित हो जायगा। यही बात रस की परिभाषा करते हुये भरत मुनि ने लिखी है कि भाव उसे कहते हैं जो कवि की अन्तर्गत भावना को भावित करे। ( अभिनवभारती में लिखा है कि कवि शब्द ‘कु’ धातु से अथवा ‘कव्’ धातु से बनता है। अतः कवि-कर्मरूप काव्य का अर्थ होता है कवनोय धातु से अथवा कव घातु से बनता है। अतः कवि-कर्मरूप काव्य का अर्थ होता है कवनोय और उसमें पदार्थ तथा वाक्यार्थ का पर्यवसान रस में ही होता है। इस प्रकार असाधारणता तथा प्रधानता से काव्य का अर्थ रस होता है; क्योंकि ‘अर्थ’ शब्द का क्युल्पत्तिलस्य अर्थ यही है कि जो प्रधानतया अभ्यर्थित किया जाय। प्रधानतया कवि का अभ्यर्थनीय रस ही होता है।) यहाँ पर शृङ्गार शब्द उपलक्षणपरक है। इसका आशय यह है कि जिस प्रकार कवि के शृङ्गारी होने पर सारा संसार शृङ्गारमय हो जाता है उसी प्रकार अन्य रसों की कविता से संसार उन रसों के अनुकूल बन जाता है। कवि के जगत् में चेतन-अचेतन की भी आबद्धता नहीं होती। कवि जैसा चाहता है उसी के अनुसार अचेतन भावों का व्यवहार चेतन के समान करता है। अर्थात् अचेतन पदार्थों पर कवि चेतन सत्ता का आरोप करता है और चेतन पदार्थों में भी आनन्द इत्यादि के अवसर पर अचेतनता की स्थापना करता है। ‘यदि कवि वीतराग हो तो संसार नीरस हो जाता है’, इस कथन का आशय यही है
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कि संसार की समस्त वस्तुओं में सुख दुःख और मोह के मध्य स्थित होने और सुख इत्यादि प्रदान करने की स्वाभाविक शक्ति होती है; किन्तु इन वस्तुओं में यह शक्ति नहीं होती कि वे लोकोत्तर रसास्वाद की भूमिका पर आरूढ़ हो सकें । वस्तुओं में यह शक्ति तभी आती है जब वे कविवर्णना पर आरूढ़ हो जाती हैं। यदि कवि अपनी कविता के माध्यम से वीतरागता को प्रसार देना चाहता है तो समस्त वस्तुएँ जगत् को अपने स्वभाव के अनुसार सुख-दुःख इत्यादि तो देती ही हैं किन्तु लोकोत्तरानन्दरुपता को प्रदान नहीं कर सकती ।
कवेस्वदिच्छा तन्मयीभवेत् वद्यवस्तु यत्स्वभावमनुसरत्येवः । ध्वन्यालोकः तन्मयीभवेत् वद्यवस्तु यत्स्वभावमनुसरत्येवः । तदभिमतरसासक्तिं न घत्ते । तयोपनिबद्धचमानं वा न चारुत्वातिशार्यं पुष्णाति । सर्वमेतच्च महाकवीनां काव्येषु दृश्यते । अस्माभिरपि स्वेषु काव्यप्रबन्धेषु यथायर्थं दर्शितमेव । सिथते चैवं सर्व एव काव्यप्रकारो न ध्वनिनिषेधमतमतिपतति ।
रसाय- पेक्षायां कवेर्गुणभूतव्यङ्ग्यचमत्कषर्णोदपि प्रकारस्तदङ्गतामवलम्बत इत्युक्तं प्राक् । यदा तु चाटु देवतास्तुतिषु वा रसादीनामङ्गत्वं व्यवस्थां हृदयवतीषु च सप्रज्ञकगाथासु कासुचिदचर्चाविशिष्टत्वाच्चे प्राधान्यं तदपि गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य ध्वनिनिष्यन्दभूतत्वमेवैयुक्तं प्राक् ।
( अनु० ) अत एव वह वस्तु नहीं ही है जो पूरी आत्मा से रस को तात्पर्य मानेवाले कवि की इच्छा से उसकी अभिमत रसांगता को धारण नहीं करता अथवा उस प्रकार से उपनिबद्ध किया हुआ चाहता की अतिशयता को पुष्ट नहीं करता । और यह सब महाकवियों के काव्यों में देखा जाता है । हमने भी अपने काव्यप्रबन्धों में ठीक रूप से दिखलाया ही है । इस प्रकार की स्थिति में सभी काव्य प्रकार ध्वनि की धर्मता का अतिक्रमण नहीं करता ।
यह पहले ही बतलाया जा चुका है कि कवि की रस की अपेक्षा में गुणीभूतव्यङ्ग्य नामक प्रकार भी उसकी अज्ञता का अवलम्बन लेता ही है और जब चाटुकतियों में अथवा देवतास्तुतियों में रस इत्यादि की व्यवस्था अङ्ग के रूप में होती है और हृदयवती सप्रज्ञ कतिपय गाथाओं में व्यङ्गचर्चाविशिष्ट वाक्य में प्राधान्य होती है वह भी गुणीभूतव्यङ्गचर्चा का ध्वनि निष्यन्द होता ही है यह पहले ही कहा जा चुका है ।
(लो०) चारुत्वातिशार्यं यन्न पुण्णाति तत्स्वस्येवेति सम्बन्धः । स्वेष्विति निष्माणलीलादिषु । हृदयवतीषु 'हिअअलिआ' इति प्राकृतकविगोष्ठ्यां प्रसिद्धासु । त्रिवर्गोपायोपेयकुशलासु सप्रज्ञाकाः उच्चन्ते । सहृदया तद्गाथा यथा भट्टेन्दुराजस्य लङ्घिअअणा फलहीलआओ होन्तुत्ति वड्ढहअन्तीअ । हालिअस्स आसिं पालिवेसवतुआ विणिअट्ठविआ ।
अत्र लङ्घितगगना कर्पासलता भवन्निवति हालिकस्याशिरो वर्धनल्यान् प्रातिवेश्यवधुका निर्वृणित प्राप्तापिति चौर्यसम्भोगाभिलषणीयमिल्यनेन व्यङ्ग्येन विशिष्टं वाक्यमेव सुन्दरम् ।
गोलाकच्छकुडण्णे भरेव जम्वुसु पच्चमाणासु । हालिअबहुआ णिअंसइ जम्बूसरताण सिअअसु ।
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तृतीय उद्योतः
अत्र गोदावरोकचछलितागहने भरण जम्बूफलेषु पच्यमानेषु । हालिकवधूः परिधत्ते जम्बूफलरसरक्तं निवसनमिति त्वरितचौर्यसम्भोगसम्भाव्यममानजम्बूफलररसक्तत्वपरभागनिह्नवं गुणीभूतव्यङ्ग्यमित्यलं बहुना ॥
(अनु०) यहां सम्बन्ध ऐसा है—चाहत्व की अधिकता को जो पुष्ट नहीं करता वह नहीं ही है । ‘अपने में’ यह । विषमबाणलीला इत्यादि में ‘हृदयवतियों’ में ‘हृदयलीलया’ इस प्राकृत कविगोष्ठी में प्रसिद्धों में त्रिवर्गोपाय के उपायों में कुशलों में प्रज्ञा से युक्त सहृदय कहे जाते हैं । उनकी गाथा जैसे भट्टनदुराज का—
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तृतीय उद्योतः
कपासलतिकायें आकाश को लांघनेवाली हो जाएं इस प्रकार हालिक को आशीर्वाद बढ़ाती हुई (सखी) के द्वारा पढ़ोस की बहू शान्त की गई ।
यहां ‘आकाश को लांघनेवाली कपास की लता हो जाएं’ यह आशीर्वाद हालिक को बढ़ाती हुई (सखी) के द्वारा पड़ोस की बहू को शान्त किया इस प्रकार ‘चौर्य सम्भोग की अभिलाषा’ रस व्यङ्ग्य से विशिष्टवाच्य ही सुन्दर है ।
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तृतीय उद्योतः
यहां गोदावरी के किनारे लतागहन में जामुनों के भरकर पकने पर हालिक की वधू जाम्बू के रस में रंंगे हुये परिधान को धारण करती है ।
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तृतीय उद्योतः
यहां गोदावरी के किनारे लतागहन में भरकर जाम्बू फलों के पकने पर हालिकबधू जामुन के रस से रक्त वस्त्र को धारण करती है । इसमें शीघ्रता से किये जानेवाले चौर्यसम्भोग के कारण जिस जम्बूफल-रससरक्त स्वरूप परम सौभाग्य की सम्भावना की जा सकती है उसका छिपाना गुणीभूतव्यङ्ग्य है, बस बहुत की आवश्यकता नहीं ।
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तृतीय उद्योतः
तारावती—ऊपर के विवेचन से स्पष्ट हो गया होगा कि विश्व में कोई ऐसी वस्तु होती ही नहीं जो कवि की इच्छा का अनुसरण न करे और जब कवि अपना लक्ष्य रसनिष्पत्ति को ही बनाकर चल रहा हो । उस समय कवि की इच्छा का अनुसरण करते हुये अपनी पूरी आत्मा से कवि के चाहे हुये रस का अङ्ग न बन जावे ।
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तृतीय उद्योतः
इसी मॉति ऐसी भी कोई वस्तु नहीं होती जो रसनिष्पत्ति के प्रयोजन से निवद्ध किये जानेपर चाङ्गतैतिशय को पुष्ट न करे । ऊपर जो कुछ कहा गया है उस सभी के उदाहरण महाकवियों की कविताओं में सर्वत्र देखे जाते हैं । आनन्दवर्धन का कहना है कि स्वयं मैंने अपने काव्यप्रबन्धों में औचित्य का निर्वाह करते हुये इन सभी बातों का ठीक-ठीक पालन किया है ।
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तृतीय उद्योतः
वस्तुतः आनन्दवर्धन के विषमबाणलीला इत्यादि प्रबन्धों में इसके उदाहरण पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं ।
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तृतीय उद्योतः
ध्वनि-गुणीभूतव्यङ्ग्य के विवेचन का उपसंहार यहां तक सारी स्थिति स्पष्ट हो गई । समस्त व्याख्या का सार यही है कि कोई भी काव्य ऐसा नहीं होता जिसका समाहार ध्वनिकाव्य में न हो जावे ।
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तृतीय उद्योतः
आशय यह है कि जिस किसी रचना को काव्य की संज्ञा प्रदान की जा सकती है उसका समावेश ध्वनिकाव्य में सफलतापूर्वक किया ही जा सकता है । ध्वनि को काव्य की आत्मा मानने का यही अभिप्राय है । यद्यपि काव्य का एक प्रकार वह भी होता है जहां व्यङ्ग्यार्थ प्रधान न होकर
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गुणीभूत हो जाता है। किन्तु उस विषय में यह पहले ही बतलाया जा चुका है कि इस प्रकार काव्य भी अन्तिम रसनिष्पत्ति की दृष्टि से ध्वनि के क्षेत्र में ही अन्तर्भूत हो जाते हैं। कुछ काव्य ऐसे भी होते हैं जिनमें रस भी अपनी मुख्यता को छोड़कर गौण बन जाता है। जैसे प्रशस्तियों में राजा के प्रेम अथवा शौर्य इत्यादि के वर्णन में शृङ्गार वीर इत्यादि रस कविगत रतिभाव भी अन्तिम रसनिष्पत्ति का अङ्ग होते हैं। अथवा देवताओं की स्तुतियों में देवताओं के विषय में वर्णन की हुई कोई भी भावना कविगत देवविषयक रतिभाव का अङ्ग होकर गौण हो जाती है। अथवा एक प्रकार और है—प्राकृत कवियों की गोष्ठी में कवित्पय 'हिअअललिआ' (सम्भवतः 'हृदयललिता') नाम की सहृदयों की गाथायें प्रसिद्ध हैं। इन गाथाओं में धर्म, अर्थ
और काम इन तीन वर्गों के उपाय को ज्ञातव्य में निपुणता होती है। (ज्ञात होता है कि आनन्दवर्धन के समय में ही या उससे पहले कतिपय सहृदय कवियों ने अपनी गोष्ठी बना ली थी और उसके सम्मेलनों में वे लोग अपनी प्राकृत की रचनायें प्रस्तुत किया करते थे। इस कविगोष्ठी का नाम भी कवित्व के अनुकूल ही था। 'हिअअललिआ' अर्थात् 'हृदयललिता' या 'हृदयललिता' कविता भी तो 'हृदयलतिका' के पुष्प गुच्छ के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। गोष्ठी की इन गाथाओं में धर्म, अर्थ और काम से सम्बद्ध गाथायें सुनाई जाती थीं। दीर्घदितिकार ने 'अललीलिआ' यह नाम बतलाया है और 'संप्रज्ञकागाथासु' के स्थान पर 'घट्प्रज्ञदिगाथासु' यह पाठ मानकर त्रिकाण्डशोष की घट्प्रज्ञा की यह परिभाषा दी है—
धर्म्यर्थकाममोक्षेषु लोकतत्त्वार्थयोरपि । पदस्यु प्रज्ञास्ति यस्स्योच्चैः घट्प्रज्ञ इति संस्तृतः ॥
आशय लगभग मिलता जुलता है। ज्ञात होता है कि यह गोष्ठी अभिनवगुप्त के समय तक चलती रही। अभिनवगुप्त ने इसी गोष्ठी में प्रस्तुत की हुई अपने गुरु की दो गाथायें उद्धृत की हैं।) उदाहरण के लिये भट्टतेन्द्रुराज की एक गाथा लीजिये जिसकी संस्कृतच्छाया इस प्रकार है—
लङ्घितगगना: कर्पासलता भवन्त्वति वर्षगन्या । हालिकस्याशिर्यं प्रातिवेश्यवधूका निर्वापिता ॥
कोई पड़ोसिन किसी हालिक में अनुरक्त है। किन्तु उसे सहवास का अवसर नहीं मिलता जिससे वह बहुत ही सन्तप्त है। इधर हालिक कपास के खेत में काम कर रहा है। कोई सखी उस हालिक को आशीर्वाद देने के बहाने उस सन्तप्त पड़ोसिन को आह्वस्त करने के लिये कह रही है— 'हे हालिक ! ईश्वर करे तुम्हारी ये कपास की लतायें इतनी बड़ी हो जाएँ कि आकाश को भी लाँधने लगें। सखी हालिक को बार-बार यही आशीर्वाद दे रही थी जिससे उसने पड़ोसिन के सन्ताप को शान्त किया।'
इससे यह व्यञ्जना निकलती है कि सखी ने पड़ोसिन को यह समझाया कि तुम्हें अधिक सन्ताप नहीं करना चाहिए, अब तुम्हारे दुःख दूर होने का अवसर आ गया। ये कपास की लतायें घूरे-चौरे बहुत ही बढ़ जाएँगी और तब उनमें तुम्हारा चौर्य-सुरत सफलतापूर्वक सम्पन्न हो सकेगा। इस पद्य में ही यह बात कह दी गई है कि सखी ने पड़ोसिन को शान्त
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तृतीय उद्योत:
किया ।’ इस वाच्यार्थ का सम्बन्ध आशीर्वाद से तभी स्थापित किया जा सकता है जब उक्त व्यङ्ग्यार्थ की सत्ता स्वीकार कर ली जाय । इस प्रकार वाच्यार्थ ही व्यङ्ग्यार्थ के द्वारा अधिक सुंदर होकर चमत्कार में कारण बनता है । अतः एव यह गुणीभूतव्यङ्ग्य का उदाहरण है। फिर उस वाच्यार्थ से पदोंसिन की हालिक के प्रति भाव की अभिव्यञ्जना होती है जो श्रृङ्गाररस का रूप धारण कर लेती है । अतः यहाँ श्रृङ्गाररस हावनि है । एक दूसरा उदाहरण लीजिए जिसकी संस्कृत छाया इस प्रकार है— गोदाकच्छनिकुञ्जे भरेण जम्बूषु पच्यमानासु । हालिकवधूरनियच्छति जम्बूरसरक्तं सिच्यताम् ॥
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तृतीय उद्योत:
अर्थात् गोदावरी नदी के तटपर उगी हुई झाड़ियों में जब जामुन के फल रस से पूर्ण रूप से भर गये हैं और पके हुए हैं उस समय हालिक की वधू एक ऐसा वस्त्र धारण कर लेती है जो कि जामुन के फलों के रस से रंगा हुआ है।
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तृतीय उद्योत:
यहाँ पर जामुन के फलों के रस से रंगे वस्त्र धारण कर गोदावरी तट पर स्थित निकुञ्जों में जाने से व्यक्त होता है कि वह हालिकवधू उन निकुञ्जों में अत्यन्त शीघ्रता के साथ चोरी सुरत करने जा रही है। उसे इस बात की सम्भावना है कि कहीं शीघ्रता में कार्य प्रवृत्त होने से उसके कपड़ों में जामुन के दाग न पड़ जायें । अतः उन्हें छिपाने के लिये उसने पहले से ही यह प्रबन्ध कर लिया है कि अपनी साड़ी को जामुन के रंग में रंग लिया है जिससे उसमें जामुन के दाग छिप सकें । यहाँ पर जामुन के फलों के रस से साड़ी रंगनारूप वाच्यार्थ सहवासगोपनरूप व्यङ्ग्यार्थ से अधिक सुंदर हो जाता है । इस प्रकार वह व्यङ्ग्य गुणीभूतव्यङ्ग्य की कोटि में आता है । फिर व्यङ्ग्यार्थ से सुन्दरीभूत वाच्यार्थ ही रसध्वनि में पर्यवसित होता है । इसी प्रकार दूसरे उदाहरण भी समझे जाने चाहिये । ये प्राकृत गाथायें हैं।
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तृतीय उद्योत:
इन सबमें जहाँ कहीं एक व्यङ्ग्यार्थ वाच्यार्थ को सुंदर बनाता है; फिर वह सुन्दरीभूत वाच्यार्थ रसध्वनि में पर्यवसित होता है वह सब गुणीभूतव्यङ्ग्य का विषय है । इसके विषय में भी कहा जा चुका है कि यह ध्वनिनिष्पन्दद्भुत है । कारण यह है कि इसका अन्तिम पर्यवसान तो रसध्वनि में ही होता है ।
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तदेवमिदानीन्तनकविकाव्यनयोपदेशे क्रियामणे प्राथमकानाम- स्यासार्थिनां यदि परं चित्रेण व्यवहारः, प्राप्तपरिणतोनां तु ध्वनिरेव काव्यमिति स्थितमेतत् । तदयमत्र सङ्ग्रहः— यस्मिन् रसो वा भावो वा तात्पर्येण प्रकाशते । संवृत्याभिहितौ वस्तु यत्रालङ्कार एव वा ॥४१॥
(ध्वन्या०) तदेवमिदानीन्तनकविकाव्यनयोपदेशे क्रियामणे प्राथमकानाम- स्यासार्थिनां यदि परं चित्रेण व्यवहारः, प्राप्तपरिणतोनां तु ध्वनिरेव काव्यमिति स्थितमेतत् । तदयमत्र सङ्ग्रहः— यस्मिन् रसो वा भावो वा तात्पर्येण प्रकाशते । संवृत्याभिहितौ वस्तु यत्रालङ्कार एव वा ॥४१॥
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४२
काव्याध्वनि काव्यनिष्पत्तिप्रपञ्चैकनिबन्धनः । सर्वत्र तत्र विषयी ज्ञेयः सहृदयैर्नैः ॥४२॥
(अनु०) वह इस प्रकार आजकल के कवियों की नीति से उपदेश किये जाने पर प्राथमिक अभ्यासार्थियों का यदि केवल चित्र से व्यवहार हो (तो हो सकता है) परिणति को प्राप्त करनेवालों के लिये तो ध्वनि ही काव्य है यह स्थिति है । वह इस प्रकार यह संग्रह है :—
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जिस काव्यमार्ग में रस या भाव अथवा छिपाकर कही हुई वस्तु या केवल अलङ्कार तात्पर्य के रूप में प्रकाशित होते हैं वह एकमात्र व्यङ्ग्यग्राह्यन्याय के आधीन होनेवाली ध्वनि सहृदय लोगों के द्वारा विषयी समझी जानी चाहिये ॥४१, ४२॥
लो० छ्वान्तरेव काव्यमति । आत्मात्मनोरभेद एव वस्तुतः व्युत्पत्तये तु विभागः कृत इत्यर्थः । 'वा' ग्रहणात् पूर्वोक्त तदभाव इत्यादि का ग्रहण हो जाता है । 'छिपाकर' यह । छिपाकर कहने के कारण जिसको सौन्दर्य प्राप्त हो गया हैं । 'काव्य के अध्व में' अर्थात् काव्यमार्ग में । आशय यह है कि वह काव्य मार्ग त्रिविध ध्वनि का विषय होता है ॥४१, ४२॥ तारावती—ऊपर जो कुछ कहा गया है उससे निष्कर्ष यह निकलता है कि आजकल के कवियों को जब काव्यकला का उपदेश दिया जाय तो उन्हें यह बतलाया जाना चाहिये कि जो कवि पहले पहल कविता करना प्रारम्भ करते है और काव्यक्रिया का अभ्यास प्राप्त करना चाहते हैं उन्हें रसनिष्पत्ति के फेर में अधिक नहीं पड़ना चाहिये । उनके लिये यह सरल रहेगा कि वे चित्रकाव्य की रचना करने तक ही अपने को सीमित रखें (फिर उनकी चेष्टा न होने पर भले ही उनके चित्रित किये हुये भाव रस-निष्पत्ति के रूप में परिणत हो जावें ।) किन्तु जब बाद में काव्यक्रिया में पूरी कुशलता प्राप्त हो जाय तब उनके बनाये हुये सभी काव्य ध्वनि हो कहे जायेंगे । (प्रश्न) उपक्रम में तो ध्वनि को काव्य की आत्मा माना गया है । फिर यहाँ पर ध्वनि ही काव्य यह उपसंहार कैसे सङ्गत कहा जा सकता है ? (उत्तर) आत्मतत्व एक व्यापक तत्त्व है और ब्रह्म के रूप में आत्मा तथा शरीर दोनों एक ही होते हैं । उनमें भेद नहीं होता । अतः काव्य की प्रत्येक वस्तु चाहे वह बाह्य तत्त्व हो चाहे आभ्यन्तर, ध्वनि ही कहा जावेगा । वस्तुतः ब्रह्म के समान ध्वनि के रूप में काव्य का भी एक अद्वितीय तत्त्व है । केवल शिष्यों को उपदेश देने के लिये विभाग कर लिया गया है । (यह पहले ही बतलाया जा चुका है कि ध्वनिसिद्धान्त की उत्पत्ति स्फोटवाद से हुई है जो शब्दब्रह्म का दूसरा पर्याय है । जिस प्रकार ब्रह्म में व्यवहार के लिये भेद को कल्पना कर ली जाती है उसी प्रकार काव्यब्रह्म ध्वनि के रूप में एक है किन्तु व्यवहार के लिये विभागों की कल्पना कर ली गई है ।) यहाँ पर तो सङ्ग्रह श्लोक हैं:—
असल्लक्षण्यक्रम व्यञ्जक के किसी अन्य प्रमेय में हो अथवा वस्तु या अलङ्कार इस रूप में छिपाकर कहे जायें कि उनमें सौन्दर्य प्रक्ट हो जाय तो उस काव्यमार्ग में सर्वत्र ध्वनि ही विपयी हुआ करता है अर्थात् उन तीन प्रकारोवाला काव्यमार्ग ध्वनि का विषय हो जाता है क्योंकि उसको ध्वनिरूपता प्रदान करनेवाला मुख्यतत्व व्यङ्गच का प्राधान्य वहीं पर विद्वान ही रहता है यह सहृदयों को मलीभाँति समझ लेना चाहिये ॥ ४१, ४२॥
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(ध्वन्या०) सगुणीभूतगडूचैः सालडूारैः सह प्रमेदैः स्वैः। सडूारसंशृष्टिभ्यां पुनरप्युदोतते बहुधा ॥४३॥ तस्य च ध्वने: स्वप्रभेदैर्गुणीभूतव्यङ्गचैर्नैयेन वाच्यालङ्कारैश्च सडूारसंशृष्टिभव-स्थायां क्रियमानायां बहुप्रभेदता लक्ष्ये दृश्यते। तथाहि स्वप्रभेदसडूर्णः स्वप्रभेद-संशृते। गुणीभूतव्यङ्गचैर्नैयेन सडूर्णा गुणीभूतव्यङ्गयत्नसंशृता वाच्यालङ्कारान्तरसंशृता संशृटालङ्कारसडूर्णः संशृटालङ्कारसंशृष्टइचैति बहुधा ध्वनि: प्रकाशते।
(अनु०) ‘गुणीभूतव्यङ्गचैः’ और ‘अलङ्कारों’ के सहित अपने प्रमेदों से संकर और संसृष्टि के द्वारा (वह ध्वनि) फिर भी बहुत प्रकार से उद्योतित होती है। ॥४३॥ और उस ध्वनि के अपने प्रमेदों से ‘गुणीभूतव्यङ्गचैः’ के साथ और वाच्यालङ्कारों के साथ सडूार संसृष्टि की व्यवस्था किये जाने पर लक्ष्य में बहुत प्रभेदता देखी जाती है। वह इस प्रकार—अपने प्रभेदों से सडूर्ण, अपने प्रभेदों से संसृष्ट, गुणीभूतव्यङ्गचैः से सडूर्ण, दूसरे वाच्यालङ्कारों से सडूर्ण, दूसरे वाच्यालङ्कारों से संसृष्ट, संसृष्ट अलङ्कारों से सडूर्ण और संसृष्ट अलङ्कारों से संसृष्ट इस प्रकार बहुत प्रकार से ध्वनि प्रकाशित होती है।
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(लो०) इलोकद्वयेन सङ्ग्रहार्थमभिधाय बहुप्रकारत्वप्रदशिर्कां पठति। सगुणीभूतव्यङ्गचैना सहालङ्कारैरे वतन्ते स्वध्वने: प्रमेदास्ते: सडूर्णंतया संसृष्टत्वा वाननतप्रकारो ध्वनिरनिरिततितत्पर्यमू। बहुप्रकारतां दरशोति—तथाहोति। स्वप्रभेदैर्गणीभूतव्यड्गयेनालङ्कारै: प्रकाश्यत इति तयो भेदा:। तथापि प्रत्येकं सडूारेण संसृष्टत्वा चेति पटू। सडूारस्यापि त्रय: प्रकारा: अनुग्राह्यानुप्राहकभावेन सन्देहास्पद-त्वेनैकपदानुप्रवेशोनेति द्वादश भेदा:। पूर्वं च ये पञ्चत्रिशद्रदौ उक्तास्ते गुणीभूत-व्यड्गयस्यापि मन्तव्या:। स्वप्रभेदोस्त्वनन्तो डूार इत्येकसङ्केत:। तत्र सडूारत्वेन संसृष्टत्वा च गुणने द्वे शते चतुश्चत्वारिशदधिके। तावता पञ्चत्रिशतो मुख्यभेदानां गुणनेन सप्तसहस्राणि चत्वारि शतानि विशत्यधिकानि भवन्ति। अलङ्काराणामनन्त्यास्त्व-संख्यत्वम्।
(अनु०) इस प्रकार दो श्लोकों से सङ्ग्रहार्थ कहकर बहुप्रकारत्व को दिखलानेवाली कारिका को पढ़ते हैं—‘सगुणीभूतव्यङ्गचैः’ इत्यादि। तात्पर्य यह है कि गुणीभूतव्यङ्गचैः के साथ और अलङ्कारों के साथ जो अपने अर्थात् ध्वनि के प्रभेद वतमान होते हैं, उनके साथ सडूर्णरूप में अथवा संसृष्टि से ध्वनि अनन्त प्रकार की होती है। बहुप्रकारता को दिखलाते हैं—‘वह इस प्रकार’ यह। अपने भेदों से, गुणीभूत व्यङ्गचैः से और अलङ्कारों से प्रकाशित होता है यह तीन प्रकार हुये। सङ्कर के भी तीन प्रकार होते हैं—अनुग्राह्यानुप्राहकभाव के द्वारा, सन्देहास्पदत्व के रूप में और एकपदानुप्रवेश के द्वारा ये १२ भेद होते हैं। और जो पहले ३५ भेद बतलाये गये हैं वे गुणीभूतव्यङ्गचैः के भी माने जाने चाहिये। उतने ही अपने अवान्तर भेद और अलङ्कार ये ७१ हुये। उसमें तीन प्रकार के सङ्कर और एक प्रकार की
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संस्कृति से गुणा करने पर २८४ हो जाते हैं । उतने से ३५ मुख्य भेदों के गुणा करने पर ७४२० हो जाते हैं । अलंकारों के अनन्त होने से तो असंख्यता आ जाती है ।
ध्वनि की अनन्तता और उसके भेदोपभेदों पर विचार
तारावती—ऊपर ध्वनि का पूर्ण विवेचन किया जा चुका है । अब ४३वीं कारिका में
The detailed discussion on ध्वनि has been completed above. Now, in the 43rd कारिका,
ध्वनि के विस्तार पर प्रकाश डाला जा रहा है और यह दिखलाया जा रहा है कि ध्वनि के विभिन्न भेदों के परस्पर एकत्र सन्निविष्ट होने में उनके भेदोपभेदों की संख्या कितनी अधिक बढ़ जाती है । कारिका का आशय इस प्रकार है :-
The extent of ध्वनि is being illuminated, and it is being shown how the number of its sub-types increases when its various types are combined. The intent of the कारिका is as follows:
'ध्वनि के अपने जितने भी भेद हैं उनका परस्पर सादृश्य और संसृष्टि होती है । उन अवान्तर भेदों से गुणीभूतव्यङ्ग्य के विभिन्न प्रकारों का सादृश्य और संसृष्टि होती है तथा इसी प्रकार अलंकारों से भी सादृश्य और संसृष्टि होती है । इस प्रकार की जब व्यवस्था की जाती है तब इस ध्वनि के अनेक भेद हो जाते हैं ।
आशय यह है कि इन भेदोपभेदों की कल्पना करने पर ध्वनि के इतने भेद हो जाते हैं कि उनका अन्त ही नहीं मिलता ।'
इस अनन्तता और अनेकरूपता को इस प्रकार समझिये—सर्वप्रथम तो ध्वनि के ३५ भेद होते हैं जिनका उल्लेख द्वितीय उद्योत के अन्त में किया जा चुका है । वह संक्षेप में इस प्रकार हैं—ध्वनि के दो मूल भेद होते हैं—लक्षणामूलक और अभिधामूलक । लक्षणामूलक के दो भेद होते हैं—अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ।
विभावादिज्ञानपरवश्या के दो भेद होते हैं—असंलक्ष्य क्रम और संलक्ष्य क्रम । असंलक्ष्य क्रम के अनन्त भेद होते हैं अतः उसको एक प्रकार का ही कहना ठीक होगा । संलक्ष्य क्रम दो प्रकार का होता है—शब्दशक्तिमूलक और अर्थशक्तिमूलक । अर्थशक्ति मूलक तीन प्रकार का होता है—कविप्रौढोक्तिसिद्ध, कविनिबद्धवत्प्रौढोक्तिसिद्ध और स्वतःसम्भवी ।
इनमें व्यङ्ग्य दो प्रकार का होता है—वस्तु और अलंकार तथा व्यञ्जक दो प्रकार का होता है वस्तु और अलंकार । इस प्रकार प्रत्येक के चार भेद होते हैं, जैसे कविप्रौढोक्तिसिद्ध के चार भेद—(१) वस्तु से वस्तु । (२) वस्तु से अलंकार, (३) अलंकार से वस्तु और (४) अलंकार से अलंकार ।
उक्त तीनों भेदों में प्रत्येक के चार-चार भेद होकर कुल १२ भेद हो गये । इस प्रकार ध्वनि के मूल भेद १६ हुए—लक्षणामूलक — २ + असंलक्ष्य क्रम — १ + शब्द शक्तिमूलक — १ + अर्थ शक्तिमूलक १२ ।
इनमें प्रत्येक के दो भेद होते हैं—उपप्रकारिय और वाक्यप्रकारिय । इस प्रकार ध्वनि के कुल ३५ मूल भेद हो गये । अब इनके परस्पर संयोग को लीजिये । यह संयोग तीन प्रकार का होता है—(१) मूलमेदों का मूलमेदों से संयोग; (२) मूलमेदों का गुणीभूतव्यङ्ग्य से संयोग और (३) मूलमेदों का अलंकार से संयोग ।
यह संयोग दो प्रकार का होता है—(१) जहाँ संयुक्त होनेवाले तत्त्व परस्पर निरपेक्ष भाव से स्थित हों वहाँ संसृष्टि कही जाती है । और (२) जहाँ संयुक्त होनेवाले तत्त्व परस्पर सापेक्ष भाव से स्थित हों वहाँ सङ्कर होता है ।
इन उक्त तीनों प्रकार के संयोगों के सङ्कर और संसृष्टि के रूप में ६ प्रकार हो जाते हैं । सङ्कर तीन प्रकार का होता है—(१) अनुप्राह्यानुप्राहक भाव सङ्कर—जहाँ दो संयोज्य तत्त्वों में परस्पर उपकार्योपकारक भाव हो (२) संदीप्त सङ्कर—जहाँ यह निश्चय
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३
तृतीय उद्योतः
न किया जा सके कि ध्वनि का कौन सा भेद अमुक स्थान पर विद্যমान है। और (३) एकपदानुप्रवेश सङ्कर—जहाँ एक ही पद में दो ध्वनि भेद इत्यादिकों का समावेश हो। इस प्रकार संयोजन के १२ प्रकार होते हैं—तीन प्रकार का सङ्कर और उनमें प्रत्येक के तीन-तीन प्रकार—तथा संसृष्टि ३ प्रकार की, इस भाँति मूल भेदों का १२ प्रकार से संयोजन हो सकता है। उदाहरण के लिये सन्देह सङ्कर के तीन भेद होते हैं—(१) अपने भेदों का परस्पर सन्देह सङ्कर, (२) गुणीभूतव्यङ्ग्य से सन्देह सङ्कर और (३) अलङ्कार से सन्देह सङ्कर। इसी प्रकार के तीन-तीन प्रकार सङ्कर के दो अन्य भेदों के होते हैं और यही प्रकार संसृष्टि के भी होते हैं। अब मूल भेदों को लीजिये—अभी ३५ भेद ध्वनि के बतलाये गये हैं। वे ही भेद गुणीभूतव्यङ्ग्य के हो सकते हैं। इस प्रकार इन दोनों के मिलाकर ७० भेद हुए। एक प्रकार अलङ्कार का है। इस प्रकार मूलभेद ७१ हुए। उनका यदि तीन प्रकार के सङ्कर और एक प्रकार की संसृष्टि से गुणन किया जाय तो ७१ × ४ = २८४ भेद हो गये। उनको यदि ३५ मुख्य भेदों से गुणित किया जाय तो २८४ × ३५ = ७४२० भेद हो जाते हैं। अलङ्कार तो अनन्त हैं; अतः ध्वनि के असंख्य भेद हो जाते हैं।
न किया जा सके कि ध्वनि का कौन सा भेद अमुक स्थान पर विद्यमान है। और (३) एकपदानुप्रवेश सङ्कर—जहाँ एक ही पद में दो ध्वनि भेद इत्यादिकों का समावेश हो। इस प्रकार संयोजन के १२ प्रकार होते हैं—तीन प्रकार का सङ्कर और उनमें प्रत्येक के तीन-तीन प्रकार—तथा संसृष्टि ३ प्रकार की, इस भाँति मूल भेदों का १२ प्रकार से संयोजन हो सकता है। उदाहरण के लिये सन्देह सङ्कर के तीन भेद होते हैं—(१) अपने भेदों का परस्पर सन्देह सङ्कर, (२) गुणीभूतव्यङ्ग्य से सन्देह सङ्कर और (३) अलङ्कार से सन्देह सङ्कर। इसी प्रकार के तीन-तीन प्रकार सङ्कर के दो अन्य भेदों के होते हैं और यही प्रकार संसृष्टि के भी होते हैं। अब मूल भेदों को लीजिये—अभी ३५ भेद ध्वनि के बतलाये गये हैं। वे ही भेद गुणीभूतव्यङ्ग्य के हो सकते हैं। इस प्रकार इन दोनों के मिलाकर ७० भेद हुए। एक प्रकार अलङ्कार का है। इस प्रकार मूलभेद ७१ हुए। उनका यदि तीन प्रकार के सङ्कर और एक प्रकार की संसृष्टि से गुणन किया जाय तो ७१ × ४ = २८४ भेद हो गये। उनको यदि ३५ मुख्य भेदों से गुणित किया जाय तो २८४ × ३५ = ७४२० भेद हो जाते हैं। अलङ्कार तो अनन्त हैं; अतः ध्वनि के असंख्य भेद हो जाते हैं।
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तृतीय उद्योतः
[ऊपर लोचन के गणना-परक भाग की व्याख्या की गई है।] ज्ञात होता है कि यह प्रकरण अभिनव गुप्त ने बहुत ही लापरवाही से लिखा है। पहली बात तो यह है कि २८४ × ३५ = ९९४० होते हैं ७४२० नहीं। दूसरी बात यह है कि गुणा करने के जिन विभिन्न तत्त्वों का उपादान किया गया है वे भी बहुत अधिक सङ्गत नहीं हैं। सम्भवतः इस लापरवाही का कारण यह है कि वस्तुतः काव्य प्रकारों की संख्या को सीमा में आबद्ध करना ठीक है ही नहीं।
[ऊपर लोचन के गणना-परक भाग की व्याख्या की गई है।] ज्ञात होता है कि यह प्रकरण अभिनव गुप्त ने बहुत ही लापरवाही से लिखा है। पहली बात तो यह है कि २८४ × ३५ = ९९४० होते हैं ७४२० नहीं। दूसरी बात यह है कि गुणा करने के जिन विभिन्न तत्त्वों का उपादान किया गया है वे भी बहुत अधिक सङ्गत नहीं हैं। सम्भवतः इस लापरवाही का कारण यह है कि वस्तुतः काव्य प्रकारों की संख्या को सीमा में आबद्ध करना ठीक है ही नहीं।
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तृतीय उद्योतः
‘गा रही कविता युगों से मुरझा हो; मधुर गोतों का न पर अवसान है’
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तृतीय उद्योतः
वृत्तिकार के अनुसार भी केवल गुणीभूतव्यङ्ग्य के ही भेदों की गणना उसी प्रकार असम्भव है जिस प्रकार संसार के सभी शब्दों का गिन सकना। अलङ्कार अनन्त होते ही हैं। केवल शृङ्गार रस के ही भेदोपभेदों का परिगणन असम्भव है। फिर भला ध्वनि के समस्त भेदों की संख्या के संक्षुचित घेरे में बांधा ही कैसे जा सकता है ? यह परिगणन और परिगणन भी अनन्तता का ही परिचायक है। इस दृष्टि से विचार करने पर आचार्य की यह असावधानी बहुत कुछ उपेक्षणीय हो जाती है।
वृत्तिकार के अनुसार भी केवल गुणीभूतव्यङ्ग्य के ही भेदों की गणना उसी प्रकार असम्भव है जिस प्रकार संसार के सभी शब्दों का गिन सकना। अलङ्कार अनन्त होते ही हैं। केवल शृङ्गार रस के ही भेदोपभेदों का परिगणन असम्भव है। फिर भला ध्वनि के समस्त भेदों की संख्या के संक्षुचित घेरे में बांधा ही कैसे जा सकता है ? यह परिगणन और परिगणन भी अनन्तता का ही परिचायक है। इस दृष्टि से विचार करने पर आचार्य की यह असावधानी बहुत कुछ उपेक्षणीय हो जाती है।
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तृतीय उद्योतः
यहाँ पर यह कह देना भी अप्रासङ्गिक न होगा कि काव्य-प्रकाशकार की गणना-पद्धति अधिक व्यवस्थित और वैज्ञानिक है। पहला अन्तर तो यह है कि काव्यप्रकाश में ३५ नहीं अपितु ५१ मूलभेद माने गये हैं। मूल दो भेद तो काव्यप्रकाश में भी लोचन के जैसे ही हैं और लक्षणामूलक ध्वनि के दो भेद अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य तथा अत्यन्ततिरस्कृत वाच्य लोचन के समान ही हैं। इन दोनों भेदों के पदगत और वाक्यगत ये दो दो भेद वैसे ही हैं। इस प्रकार लक्षणामूलक ध्वनि के चार भेदों में कोई अन्तर नहीं आता। अन्तर केवल अभि-
यहाँ पर यह कह देना भी अप्रासङ्गिक न होगा कि काव्य-प्रकाशकार की गणना-पद्धति अधिक व्यवस्थित और वैज्ञानिक है। पहला अन्तर तो यह है कि काव्यप्रकाश में ३५ नहीं अपितु ५१ मूलभेद माने गये हैं। मूल दो भेद तो काव्यप्रकाश में भी लोचन के जैसे ही हैं और लक्षणामूलक ध्वनि के दो भेद अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य तथा अत्यन्ततिरस्कृत वाच्य लोचन के समान ही हैं। इन दोनों भेदों के पदगत और वाक्यगत ये दो दो भेद वैसे ही हैं। इस प्रकार लक्षणामूलक ध्वनि के चार भेदों में कोई अन्तर नहीं आता। अन्तर केवल अभि-
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ध्वनिमूलक ध्वनि के भेदों में है। अभिधामूलक ध्वनि के प्रथम भेद असंललक्ष्यक्रमव्यंग्य के लोचन में ५ भेद माने गये हैं—पदप्रकाश्य, वाक्यप्रकाश्य, वर्णप्रकाश्य, संहूुटनाप्रकाश्य और प्रबन्धप्रकाश्य। काव्यप्रकाश में पदैकदेशप्रकाश्य नामक एक भेद और जोड़कर असंललक्ष्य क्रम व्यंग्य की संख्या ६ कर दी गई है। लोचनकार ने शब्दशक्तिमूलक संललक्ष्यक्रम के केवल दो भेद माने हैं पदगत और वाक्यगत। किन्तु काव्यप्रकाश में ४ भेद माने गये हैं—पदगत वस्तु, वाक्यगत वस्तु, पदगत अलंकार और वाक्यगत अलंकार। इसी प्रकार काव्यप्रकाश में अर्थ शक्तिमूलक के १२ भेद तो वही हैं, जो लोचनकार ने बतलाये हैं। किन्तु व्यंग्यों में भेद हो जाता है। लोचन में केवल दो व्यंग्यक माने गये हैं पद और वाक्य। किन्तु काव्यप्रकाश में प्रबन्ध को भी व्यंजक मानकर व्यंग्य तीन प्रकार का मान लिया गया है। इस प्रकार लोचन में अर्थशक्तिमूलक के १२×२=२४ भेद किये गये हैं जब कि काव्यप्रकाश में १२×३=३६ भेद हो जाते हैं। लोचन में उभयशक्तिमूलक का कोई भेद नहीं बतलाया गया है। किन्तु काव्यप्रकाश में उभयशक्तिमूलक का भी एक भेद विद्यमान है। इस प्रकार काव्यप्रकाश के भेदोपभेदों की गणना इस प्रकार होगी—लक्षणामूलक ध्वनि ४ + असंललक्ष्य क्रम व्यंग्य ६ + शब्दशक्तिमूलक ४ + अर्थशक्तिमूलक ३६ + उभयशक्तिमूलक १=५१ भेद हो जाते हैं। जो बात मूल भेदों के विषय में कही गई है वही गुणों की प्रक्रिया में भी लागू होती है। गुणन की प्रक्रिया में भी दोनो आचार्यों में परस्पर पर्याप्त मतभेद हैं
इस गुणनप्रक्रिया के विषय में काव्यप्रकाश की टीकाओं में एक आक्षेप उठाया गया है और उसका समाधान भी वहीं दिया गया है। आक्षेप और समाधान इस प्रकार है—कुछ लोगों का कहना है कि यह गणना ठीक नहीं है क्योंकि इसमें कई भेद कई कई बार आ जाते हैं। जैसे यदि अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य के उपभेदों की गणना की जायगी तो उसका सादृश्य अत्यन्ततिरसृतवाच्य से आ ही जायगा। फिर अत्यन्ततिरसृतवाच्य के उपभेद की गणना में पुनः अत्यन्ततिरसृतवाच्य का सादृश्य अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य से हो जायगा। इस प्रकार सभी भेद अनेक बार आ जायंगे। क्योंकि अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरसृतवाच्य ये दोनों एक हो वस्तुयें हैं। अतः यहाँ गणना का वही क्रम होना चाहिये जो काव्यप्रकाश में विरोधालंकार के प्रसंग में उठाया गया है। वहाँ पर काव्यप्रकाशकार ने लिखा है—
जातिशक्तिक्रियाद्रव्यैरिविरुध्दं स्याद्गुणैस्त्रिभिः । क्रिया द्वास्यामपि द्रव्यं द्रव्येणैवैव ते दश ॥
विरोध चार तत्वों में होता है—जाति, गुण, क्रिया और द्रव्य। इन चार का चार से विरोध होने पर गणना की प्रक्रिया यह होगी—जाति का जाति इत्यादि चार से विरोध, गुण का गुण इत्यादि ३ से विरोध, (क्योंकि गुण और जाति का विरोध तो जाति के विरोधों में ही आ गया।) क्रिया का क्रिया और द्रव्य से विरोध और द्रव्य का द्रव्य से विरोध। इस प्रकार ४+३+२+१=१० भेद हुए सीधे सीधे ४×४=१६ भेद नहीं। यही प्रक्रिया यहाँ भी अपनाई जानी चाहिये। अर्थात् अपrim भेदों में एक एक कम करके गणना की जानी चाहिये। जैसे पदगतोय अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य के ५१ भेद। फिर वाक्यगतोय अर्थान्तरसंक्र-
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तृतीय उद्योतः
एको राधिकधा स्थाप्य एकमेकाधिकं गुरू । समाधेयासमो गुण्य एतस्सङ्कुलितं लघु ॥ ( लीलावती )
मित वाच्य के ५१, इसी प्रकार एक एक कम करके गणना की जानी चाहिये । इस दशा में गुणन की प्रक्रिया यह बतलाई गई है— एको राधिकधा स्थाप्य एकमेकाधिकं गुरू । समाधेयासमो गुण्य एतस्सङ्कुलितं लघु ॥ ( लीलावती ) अर्थात् एक से जिस राशि तक गुणन करना हो, उस राशि को हो बार रखना चाहिये । एक राशि में एक को जोड़ देना चाहिये जिससे यदि वह राशि विषम होगी तो सम हो जायेगी और सम होगी तो विषम हो जायेगी । जो सम हो उसका आधा करके उससे विषम को गुणा कर देना चाहिये । वह सङ्कुलन की लघु प्रक्रिया है । इस प्रकार १ से ५१ तक प्रत्येक राशि को जोड़ने की लघु प्रक्रिया यह होगी— ५१ + १ = ५२ इस राशि ५२ का आधा = २६, अब ५१ को २६ से गुणा कर देना चाहिये ५१ × २६ = १३२६ भेद सन्देह सङ्कर के हुए । कुल मिलाकर ध्वनि के सङ्कीर्ण भेद १३२६ × ४ = ५३०४ होने चाहिये । १०४०४ नहीं । इसका समाधान यह दिया गया है कि विरोध की गुणन प्रक्रिया यहाँ पर लागू नहीं हो सकती । क्योंकि जाति और गुण का विरोध अथवा गुण और जाति का विरोध एक ही बात है । किन्तु अर्थान्तरसंंक्रमित का अत्यन्ततिरस्कृत वाच्य से और अत्यन्ततिरस्कृत वाच्य का अर्थान्तरसंंक्रमित वाच्य से सादृश्य एक बात नहीं । जब अर्थान्तरसंंक्रमित वाच्य की प्रधानता होगी तब अर्थान्तरसंंक्रमित वाच्य का अत्यन्ततिरस्कृत वाच्य से विरोध कहा जायेगा और यदि अत्यन्ततिरस्कृत वाच्य की प्रधानता होगी तो अत्यन्ततिरस्कृत वाच्य का अर्थान्तरसंंक्रमित वाच्य से विरोध कहा जायेगा । इसी उत्तर के कारण काव्य प्रकाश में बतलाई हुई प्रक्रिया ही ठीक सिद्ध होती है । यहाँ पर एक प्रश्न और शेष रह जाता है कि उक्त अन्तर के मान लेने पर भी एकव्यङ्ग्यानुप्रवेश सङ्कर के विषय में फिर यह संख्या ठीक सिद्ध नहीं होती । एकव्यङ्ग्यानुप्रवेश सङ्कर में एक ही व्यङ्ग्य में दो भेदों का समावेश होता है । इस प्रकार पद के एकदेश, पद, वाक्य, प्रबन्ध इनमें परस्पर सङ्कर नहीं हो सकता । क्योंकि मान लीजिये वाक्य से एक व्यङ्ग्य निकलता है तो उसका एकव्यङ्ग्यानुप्रवेश सङ्कर तभी हो सकता है जब दूसरा व्यङ्ग्य उसी वाच्य से निकले । यदि एक व्यङ्ग्य वाक्य से निकलेगा और दूसरा पद से तो ऐसी दशा में व्यङ्ग्यक की एकता नहीं रहेगी और इनका एकव्यङ्ग्यानुप्रवेश सङ्कर नहीं बन सकेगा । इस प्रकार भी इनकी संख्या पर्याप्त रूप में कम हो जायगी । इसका उत्तर यह है कि यहाँ पर व्यङ्ग्यकता का अर्थ है व्याख्या में किसी प्रकार का सहयोग देना । अब मान लो कि कोई ऐसा स्थान है जहाँ एक व्यङ्ग्य तो वाक्य से निकलता है और दूसरा वाक्य के केवल एक भाग पद से । वहाँ पर यदि वाक्य से निकलनेवाले व्यङ्ग्य में पद की किसी भी प्रकार की सहकारिता हो जाती है तो उस वाक्य के द्वारा उस व्यङ्ग्य अर्थ की व्यङ्ग्यकता भी उस पद में आ गई । इस प्रकार पद और वाक्य के व्यङ्ग्यार्थों में एकव्यङ्ग्यानुप्रवेश सङ्कर हो सकता है । अत एव सङ्कीर्ण भेदों की संख्या १०४०४ मानना ही ठीक है । इनमें शुद्ध ५१ भेदों के जोड़ने से १०४५५ ध्वनि भेद हो जाते हैं ।
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अब गुणीभूतव्यङ्ग्यचके सङ्कीर्ण को लीजिये—ध्वनि के जो ५१ मूलभेद बतलाये गये हैं उनमें कुछ भेद ऐसे हैं जो गुणीभूतव्यङ्ग्यच में सम्भव नहीं हो सकते। जैसा कि ध्वनिकार ने लिखा है जब वस्तु से अलङ्कार की अभिव्यक्ति होती है तब उसे केवल ध्वनिरूपता ही प्राप्त होती है। कारण यह है कि वस्तु की अपेक्षा अलङ्कार में स्वाभाविक प्रकर होता है। अतः व्यङ्ग्य अलङ्कार वस्तु की अपेक्षा तो कभी गौण हो ही नहीं सकता। वस्तु से अलङ्कार की व्यञ्जना तीन प्रकार की होती है—( १ ) स्वतः सम्भव वस्तु से अलङ्कारव्यञ्जना, ( २ ) कविकलिप्त वस्तु से अलङ्कारव्यञ्जना और ( ३ ) कविनिबद्धवस्तुकल्पित वस्तु से अलङ्कार व्यञ्जना। इन तीनों में प्रत्येक के तीन भेद होते हैं—पदगत, वाक्यगत और प्रबन्धगत।
इस प्रकार ये ९ भेद हुए। ये केवल ध्वनि भेद ही हो सकते हैं। शेष ५१—९ = ४२ भेद गुणीभूतव्यङ्गच के भेद हो सकते हैं! इन ४२ भेदों में प्रत्येक के ८ भेद होते हैं—( १ ) अगूढ़, ( २ ) अपराज्ञ, ( ३ ) वाच्यसिद्धघङ्ग, ( ४ ) अस्फुट, ( ५ ) सन्दिग्धप्राधान्य, ( ६ ) तुल्यप्राधान्य, ( ७ ) काव्याक्षिप्त और ( ८ ) असुन्दर। इन ८ प्रकारों से मूल ४२ भेदों का गुणा करने पर ४२×८ = ३३६ शुद्ध हो गये। इन ३३६ भेदों की संसृष्टि करने पर ३३६ × ३३६ = ११२८९६ भेद हो जाते हैं। एक प्रकार की संसृष्टि और तीन प्रकार का सङ्कीर्ण इस प्रकार इन भेदों को ४ से गुणा करने पर ११२८९६ × ४ = ४५१५८४ भेद सङ्कीर्ण गुणीभूत-व्यङ्ग्यच के हो गये। ध्वनि में १२४९९२ भेद बतलाये जा चुके हैं। यदि इनका परस्पर चार बार गुणा किया जाय तथा श्रृङ्गाररस के नायक-नायिका भेद विभाव अनुभाव और समस्त अलङ्कारों से पृथक् गुणन किया जाय तो इतने भेद हो जाते हैं कि कोई व्यक्ति उनकी गणना कर ही नहीं सकता इस प्रकार नवनवोन्मेषशालिनी कवि प्रतिभा के लिये कहीं अन्त का अवसर ही नहीं आता। इस प्रकार यह सरस्वती का अनन्य भण्डार अनन्त काल तक सहृदयों के समक्ष स्फुरित होता रहता है। यह है काव्यप्रकाश की गुणन प्रक्रिया का संक्षिप्त परिचय।
साहित्यदर्पण की गणना प्रक्रिया
साहित्यदर्पण में मूल भेद तो ५१ ही हैं, किन्तु उसमें विरोधालङ्कारवाली काव्यप्रकाश की शङ्का को अपनाकर प्रत्येक वृत्तिमेद में एक-एक भेद कम कर दिया है। इस प्रकार से १ से ५१ तक की संख्याओं का जोड़ ही रह जाता है। साहित्यदर्पणकार के मत में एक प्रकार के सङ्कीर्ण की संख्या मानी जानी चाहिये। तीन प्रकार का सङ्कीर्ण और १ प्रकार की संसृष्टि को मिलाकर ४ से गुणा कर देने पर ध्वनि के सङ्कीर्णों भेदों की संख्या आ जायेगी। इस प्रकार साहित्यदर्पण के अनुसार ५१ × २६ = १३२६ भेद संसृष्टि के हो जाते हैं और कुल भेद १३२६ × ४ = ५३०४ सङ्कीर्ण भेद सिद्ध होते हैं। किन्तु वस्तुतः यह सब गणना ध्वनि-अनन्तता को ही सिद्ध करती है।
(ध्वन्यो.) तत्र स्वप्रभेदसङ्कीर्णत्वं कदाचिदनुप्राह्यानुप्राहकभावेन । यथा 'एवंवादिनि देवर्षौ'इत्यादौ । अत्र ह्यर्थशक्त्युद्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यचध्वनिप्रभेदोज्ञग्राह्यमाणः प्रतीयते।
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तृतीय
उद्योतः
(अनु०) उनमें अपने भेदों से सङ्कीर्णत्व कमी अनुग्राह्यानुप्राहक भाव के द्वारा होता है। जैसे—‘एवं वादिनि देवर्षौ’ में यहाँ निस्सन्देह अर्थशक्त्यनुड्डव अनुरणनरूपपय्युद्रच नामक ध्वनि के प्रभेद के द्वारा ध्वनि का अलक्ष्यक्रमव्यङ्गच नामक प्रभेद अनुग्रहीत किया जाता दृष्टिगत होता है।
तृतीय
उद्योतः
(लो०) तत्र व्युत्पत्तये कतिपयभेदेषूदाहरणानि दित्सुः स्वप्रभेदानां कारिकायमनुपदार्थत्वेन प्रधानतयोक्तत्वाद्दाश्रयण्येव चत्वार्युदाहरणान्याह—तत्रेति । अनुगृहमाण इति । लज्जया हि प्रतीयते । अभिलाषशृङ्गारोद्रानुगृह्यते व्यभिचारिभूतत्वेन ।
(अनु०) उनमें व्युत्पत्ति के लिये कतिपय भेदों में उदाहरण देने की इच्छा करते हुए कारिका में अपने प्रभेदों के अन्यपदार्थत्व होने के कारण प्रधानरूप में कहे जाने से उसके आश्रयवाले ही चार उदाहरणों को कहते हैं—‘उनमें’ यह। ‘अनुगृहमाण’ यह। निस्सन्देह प्रतीत होनेवाली लज्जा के द्वारा। वहाँ व्यभिचारीभाव होने के कारण (लज्जा के द्वारा) अभिलाष शृङ्गार अनुग्रहीत किया जाता है।
तृतीय
उद्योतः
तारावतो—अब आलोककार यह दिखलाना चाहते हैं कि इन भेदों का परस्पर संसर्जन (संस्कृत) और सङ्कीर्ण होता किस प्रकार है। इसके लिये कुछ उदाहरण देने की आवश्यकता है। किन्तु काव्य अनन्तपार है अतः कतिपय उदाहरणों से ही सन्तोष करना पड़ेगा। जिस क्रम से उदाहरण दिये जावेंगे उसको समझ लेना चाहिये। सामान्यतया सङ्कीर्ण या संस्कृत तीन तत्त्वों में होती है—(१) अपने भेद से, (२) गुणीभूतव्यङ्गच से और (३) अलङ्कारों से।
तृतीय
उद्योतः
इनमें सर्वप्रथम अपने भेदों से सङ्कीर्ण और संस्कृत को लीजिये। सर्वप्रथम अपने भेदों से ही सङ्कीर्ण और संस्कृत के उदाहरण देने का कारण यह है कि ४३ वीं कारिका में गुणीभूतव्यङ्गच और अलङ्कार के साथ ‘म’ शब्द जोड़ दिया गया है—‘सगणीभूतव्यङ्गचः:’ ‘सालङ्कारे’। यहाँ ‘सह’ के अर्थ में ‘स’ हुआ है तथा इसमें बहुव्रीहि समास का निर्देश है। बहुव्रीहि समास का मूल निर्देशक पाणिनीय सूत्र है ‘अनेकमन्यपदार्थे’ अर्थात् अनेक प्रयमान्तों का अन्य पद के अर्थ में समास होता है। इसमें समास में आनेवाले शब्द गौण हो जाते हैं और अन्य पदार्थ प्रधान हो जाता है। अतः यहाँ पर ‘सालङ्कारे:’ में अलङ्कार गौण है और ‘सगणीभूतव्यङ्गचः:’ में ‘गुणीभूतव्यङ्गच’ गौण है। प्रधानता किसी अन्य पदार्थ की है। वह अन्य पदार्थ क्या है ? इसका निर्देश कारिका में हो कर दिया गया है ‘प्रभेदैः स्वैः’। इस प्रकार स्वप्रभेद अर्थात् ध्वनि के मूल भेद ( काव्यप्रकाश के अनुसार ५१ और लोचन के अनुसार ३५ ) प्रधान है।
तृतीय
उद्योतः
अतः इन प्रधान भेदों के सांकर्य की व्याख्या पहले ही की जायेगी तथा दूसरे भेदों से सांकर्य की व्याख्या बाद में की जायेगी। अपने प्रभेदों से सांकर्य तीन प्रकार का होता है। और संस्कृत एक प्रकार की। इस प्रकार कुल मिलाकर चार प्रकार हुए इन्हीं चार प्रकारों में प्रत्येक का एक-एक उदाहरण दिया जा रहा है।
तृतीय
उद्योतः
सर्वप्रथम सङ्कीर्ण को लीजिये। यह तीन प्रकार का होता है—(१) कभी तो एक
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मेद दूसरे का अनुकाहक होता है और उससे उपकृत होकर दूसरा मेद अधिक उत्कर्ष को प्राप्त कर लेता है। उसे अनुप्राह्यानुप्राहकभाव संकर कहते हैं। जैसे—
एवं वादिनि देवर्षौ पार्श्वे पितुरधोमुखी । लोलाकमलपत्राणि गयणामास पार्वती ॥
यह कुमारसम्भव का पद्य है, इसमें कहा गया है कि नारद जी हिमांश्वल से पार्वती के विवाह के विषय में बात कर रहे थे। उस समय पार्वती अपने पिता के पास बैठी हुई नीचे को मुख किये हुए लीलाकमल पत्रों को गिन रही थी। यहाँ पर पार्वती के अधोमुख और लीलापत्र गणना से लज्जा की अभिव्यक्ति होती है। यह लज्जा अनुरणनरूप व्यज्ज्य के रूप में प्रतीत होती है।
स्वतः:सम्भवी वस्तु से वस्तु व्यज्जना कही जा सकती है। दूसरी व्यज्जना यहाँ पर अभिलाष श्रृंगार की होती है जो कि असंललक्षणक्रमगम्य व्यज्ज्य रसध्वनि को अनुप्रहीत करती है क्योंकि लज्जा श्रृंगार का व्यभिचारी भाव है। इस प्रकार ध्वनि के एक भेद अनुरणनरूप व्यज्ज्य से रस ध्वनि उपकृत होकर चमत्काराधिक्य में कारण होती है। यहाँ पर दो स्पष्टगत भेदों का अनुप्राह्यानुप्राहकभाव सदृश है।
(यहाँ पर यह पूछा जा सकता है कि व्यभिचारी भाव तो एक संयोग्य तत्व है जिसके संयोग से रसव्यज्जना हुआ करती है। जैमा कि मुनि ने कहा है—'भावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्ति:'। फिर यहाँ पर लज्जा को अनुरणनरूप व्यज्ज्य कैसे माना जा सकता है? इसका उत्तर यह है कि विभाव पर लज्जा को अनुरणनरूप व्यज्ज्य मानना या न मानना यह तत्व स्थायीभाव से मिलकर रसनिष्पत्ति किया करते हैं।)
किन्तु जहाँ कोई व्यभिचारी भाव प्रमुख हो जाता है वहाँ उस भाव की ध्वनि कही जाती है। जैसे कपूर शकर इत्यादि अनेक पदार्थों के योग से बने हुए पदार्थ में एक सड़घातरस में मिर्च चोनी इत्यादि किसी एक वस्तु की प्रधानता हो जाती है तब कहा जाता है कि अमुक पदार्थ में चोनी का स्वाद है, मिर्च का स्वाद है इत्यादि। इसी प्रकार सामूहिक रसध्वनि में जब एक भाव की प्रधानता हो जाती है तब वहाँ उस भाव की ध्वनि कही जाती है, जैसा कि साहित्यदर्पण में कहा गया है—
'रतिदेवादिविषययो व्यभिचारी तथाकृत: भाव: प्रोक्त:.....'
इस प्रकार यहाँ पर लज्जा-भाव की व्यञ्जना अनुरणन रूप में ही होती है और इससे अभिलाष श्रृंगार अनुप्रहीत होकर चमत्कार में कारण बनता है। अतः यह अनुप्राह्यानुप्राहक भाव का उदाहरण है।
(ध्वन्यालोके) यथा— खणपाहुणिआ देअर एषा जाएँ क्किप दे भणिदा । रअइ पडोहरवलहोगरम्मि अणुणिज्जउ वराई ॥ (क्षणप्राभुणिका देवर एषा जायते किमपि ते भणिता । रतिः पतिव्रतवल्लभग्रामे अनुमोद्यतां वराकी ॥ इति इच्छाया)
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तृतीय उद्योतः
अत्र ह्यानुलीयतामिल्येतत्पदमर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यत्वेन विवक्षितान्यपरवाच्यत्वेन च सम्भाव्यते । न चान्यतरपक्षनिरर्णयेऽत्र प्रमाणमस्ति ।
(अनु०) इसी प्रकार कदाचित् दो भेदों के द्वारा । जैसे— ‘हे देवर ? उत्सव में निमन्त्रण के द्वारा बुलाई हुई, यह (वेचारी प्रेयसी) तुम्हारी पत्नी के द्वारा कुछ कही हुई शून्यवलभीगृह में रो रही है; वेचारी को मना लो ।’ यहाँ निस्सन्देह ‘मना लो’ यह पद अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य के रूप में और विवक्षितान्यपरवाच्य के रूप में सम्भावित किया जाता है । किसी एक पक्ष के निर्णय में प्रमाण नहीं ही है ।
३
तृतीय उद्योतः
(लो०) क्षण उत्सवस्तत्र निमन्त्रणेनाननीता हे देवर ! एषा ते जायया किमपि भणिता रोदिति । पडोहरे शून्ये वलभीगृहे अनुनीयतां वराकी । सा तावदेवेरानुरक्ता तज्जायया विदितवृत्तान्तया किमप्युक्तेत्येषोक्तिस्तदवृत्तान्तं दृष्टवत्या अन्यस्यास्तदेवरचौरकामिन्या:। तत् तव गृहिणीं वृत्तान्तो ज्ञात इत्युभयतः कलहायितुमिच्छन्त्येव माह । तत्रार्थान्तरे सम्भोगेनैकान्तोचितेन परितोष्यतामित्येव रूपे वाच्यस्य सङ्क्रमयम् । यदि वा त्वं तावदेवस्यामवानुरक्त इत्योक्योकपातितविवक्षितः, क्षितम् । एषा तवेदानोमुचितमगर्हणीयं प्रेङ्खास्पदमित्यनुनयो विवक्षितः, वचं त्विदानीनं गरहणीय: सम्वृत्ता इत्येतत्प्रकारया उभयस्थापि च स्वाभिप्रायप्रकाशनादेकतरनिश्चये प्रमाणाभाव इत्युक्तम् । विवक्षितस्य हि स्वरूपस्थस्यैवान्यपरत्वम् । संक्रान्तिस्तु तस्यैव दूपतापत्ति: । यदि वा देवरानुरक्तया एव तं देवरमनन्या सहालोकितसम्भोगवृत्तान्तं प्रतीयमुक्ति:, देवरेत्यामन्त्रणात् । पूर्वव्याख्याने तु तदपेक्षया देवरेत्यामन्त्रणं व्याख्यातम् ।
(अनु०) ‘क्षण’ अर्थात् उत्सव उसमें निमन्त्रण के द्वारा बुलाई हुई हे देवर ? यह तुम्हारी जाया के द्वारा कुछ कही हुई रो रही है । पडोहर अर्थात् शून्य वलभी गृह में वेचारी मना ली जाय । देवर में अनुरक्त है, वृत्तान्त को जाननेवाली उसकी जाया के द्वारा कुछ कही गई है यह उक्ति उनके वृत्तान्त को देखनेवाली किसी दूसरी अपने देवर की चौरकामिनी की है । वहाँ वह ‘तुम्हारी गृहिणो के द्वारा यह वृत्तान्त जान लिया गया है’; इस प्रकार दोनों ओर कलह की इच्छा करते हुए कहती है । (वहाँ ‘एकान्त में उचित सम्भोग के द्वारा परितुष्ट कर ली जाए’ इस प्रकार के अर्थान्तर में वाच्य का संक्रमण होता है । अथवा तुम तो इसी में अनुरक्त हो इस ईर्ष्या कोप तात्पर्य से अन्यपरक अनुनय विवक्षित है । यह तुम्हारी इस समय उचित तथा अगर्हणीय प्रेमास्पद है इस अनुनय का कहना अभीष्ट है, हम तो इस समय गर्हणीय हो गये हैं इस आशयपरत के रूप में दोनों प्रकार से अपने अभिप्राय के प्रकाशन के कारण एक ओर निश्चय न होने में प्रमाणाभाव ( वाच्यस्थ ) ही विवक्षित की अन्यपरता होती है । (उसकी इस रूप को प्राप्ति तो संक्रान्ति होती है । अथवा देवरानुरक्ता की ही उस देवरमनन्या सहालोकितसम्भोगवृत्तान्तं प्रतीयमुक्ति:, देवरेत्यामन्त्रणात् । पूर्वव्याख्याने तु तदपेक्षया देवरेत्यामन्त्रणं व्याख्यातम् ।
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तारावती— ( २ ) कभी दो ध्वनिभेद एक साथ आ पड़ते हैं और दोनों में किसी एक का निश्चय नहीं किया जा सकता कि अमुक भेद ही सझ्झत रहेगा दूसरा नहीं । ऐसे स्थान पर सन्देह होने के कारण सन्देहसङ्कर कहा जाता है । उदाहरण—
कोई नायिका अपने देवर में अनुरक्त है । वह अपने देवर के यहाँ किसी उत्सव में आई है । देवर की पत्नी उनके प्रच्छन्न अनुराग को जान गई है । अतः उसने प्रच्छन्नानुरागिणी से कुछ कह दिया जिससे वह दुःखित होकर एकान्त स्थान पर जाकर रोने लगी । उस नायिका के देवर को कोई दूसरी स्त्री भी चाहती है । उनका भी गुप्त प्रेम है । उस दूसरी कामिनी ने ये सब बातें देखलीं हैं कि उसके प्रेमी की पत्नी ने उस घर में आई हुई से कुछ कह दिया है और वह एकान्त में जाकर रो रही है । अतः वह सब समाचार उस अपने प्रेमी से कह रही है—
'तुम्हारे उत्सव में प्रेमपूर्वक आमन्त्रित किये जाने पर वह (तुम्हारी भाभी) तुम्हारे यहाँ आई थी । तुम्हारी जाया ( पत्नी ) ने न जाने उससे क्या कह दिया कि वह एकान्त वलभी गृह में जाकर रो रही है, अरे देवर ? बेचारी को मना लो ।'
वलभी का अर्थ है—अन्तःपुर, चन्द्रशाला या घर की ऊपरी मजिल ( 'बुद्धान्ते वलभी चन्द्रशाले सौधोर्ध्ववेश्मनि' )
'देवर' इस आमन्त्रण से व्यञ्जना निकलती है कि तुम्हारे उत्सव स्वाभाविक प्रेम होना हो चाहिये । 'उत्सव में प्रेमपूर्वक बुलाई गई थी' इससे व्यञ्जना निकलती है कि यहाँ तो कम से कम तुम्हारी पत्नी को उसका आदर करना हो चाहिये था किन्तु यहाँ भी उसने उसे स्पष्ट कर दिया । अतः उसका दुःखित होना स्वाभाविक हो है । 'जाया' शब्द के प्रयोग से व्यक्त होता है कि 'यह जानती है कि वह तुम्हारी विवाहिता पत्नी ही है, उसने तुम्हारा प्रेम कभी प्राप्त नहीं कर पाया और जब वह ऐसी अनुचित बातें करती है तब तुम्हारा प्रेम उसे मिल ही कैसे सकता है ? 'तुम्हारी पत्नी ने कहा है' में 'तुम्हारी' शब्द से व्यक्त होता है कि 'जब तुम्हारी पत्नी ने कहा है तब मना भी तुम्हें ही पड़ेगा' । 'कुछ कह दिया' का व्यङ्ग्यार्थ यह है कि जो कुछ कह दिया वह इतना अनुचित है कि मैं उसका उच्चारण भी नहीं कर सकती । वलभी के ध्वन्य होने से एकान्त में प्रेम करने की सुगमता, 'रोती है' से प्रतीकाराक्षमत्व तथा नायक के प्रति प्रेमाधिक्य के कारण पलायन की असमर्थता व्यक्त होती है जिससे नायक के शीघ्र जाकर मनाने का औचित्य सिद्ध होता है । 'वराकी' शब्द से भी नायिका की असहायता ही व्यक्त होती है । यहाँ पर वक्त्री का यह अभिप्राय व्यक्त होता है कि वह नायक को यह सूचना देकर नायक और उसकी पत्नी में कलह कराना चाहती है ।
'अनुनय' का वाच्यार्थ है समक्षा बुझाकर दुःख दूर कर देना । किन्तु यहाँ पर कहनेवाली का केवल यही अभिप्राय नहीं हो सकता, क्योंकि एक तो वह एकान्त स्थान इत्यादि का निर्देश करती है, दूसरे प्रणयोजनों का मानना और मना बातचीत तक ही सीमित नहीं रहता । अतः 'अनुनय' का वाच्यार्थ तात्पर्यानुपत्ति के कारण बाधित है और इससे यह अर्थ निकलता है कि सम्भोग के द्वारा उसे प्रसन्न करो । सम्भोग के साथ बातचीत द्वारा अनुनय
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तृतीय
उद्योतः
का भी वाच्यार्थ सन्निविष्ट हो जाता है । अतः यहाँ पर वाच्य अर्थान्तरसंक्रान्त हो जाता है । अतः यह अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य नामक ध्वनि भेद है । अथवा यहाँ यह कथन एक अन्य प्रेमिका का है; अतः उससे यह व्यञ्जना भी निकल सकती है—‘मेरे सामने आज तुम्हारा रहस्य खुला है; तुम वस्तुतः मेरे अतिरिक्त एक अन्य प्रेमिका (अपनी भाभी) से भी प्रेम करते हो; तभी तो तुम्हारी पत्नी उससे रुष्ट होती है ।’ इससे वक्तृो का अभिप्राय ईष्याजन्य कोप में पर्यवसित होता है । इस अर्थ में अनुनय के अर्थ का सर्वथा परित्याग हो जाता है । अतः यह अत्यन्ततिरसकृत ध्वनि नामक प्रभेद हो सकता है । अब यहाँ पर यह निश्चय करना कठिन है कि अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य माना जाय अथवा अत्यन्ततिरसकृत वाच्य । एक के निश्चय करने में यहाँ कोई प्रमाण है ही नहीं। क्योंकि दोनो अवस्थाओं में वक्तृी का यही प्रयोजन रूप तात्पर्य व्यङ्ग्य होता है कि ‘यह तुम्हारी भाभी तुम्हारी सच्ची प्रियतमा है ।’ भला अब तुम मुझसे प्रेम क्यों करोगे ? इसका तुम्हारा प्रेम उचित भी है और अनिन्दनीय भी । अव मैं तो निन्दनीय हो ही गई हूँ । चाहे अनुनय का सम्मोहपरक अर्थ मानकर तथा एक प्रेमिका से दूसरो प्रेमिका के सम्मोह का निर्देश दिलवाकर यहाँ पर अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य माना जाय या ईष्योऽ कोप में लक्षण मानकर अत्यन्ततिरसकृत वाच्य माना जाय दोनों अवस्थाओं में प्रयोजन रूप व्यङ्ग्यार्थ तो एक ही होगा । अतः एक का निश्चय करने में कोई तर्क न होने से यहाँ सन्देह सङ्कर है । यह तो बहुशः बतलाया जा चुका है कि जहाँ वाच्यार्थ के स्वरूप में हो व्यङ्ग्यार्थ अवस्थित होता है उसे अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य कहते हैं और जहाँ स्वरूप दूसरे रूप में परिणत हो जाता है वहाँ अत्यन्ततिरसकृत वाच्य कहा जाता है । अथवा उक्त पद्य की योजना एक रूप में और हो सकती है । यह कथन भाभी का ही है जिसका कि अपने देवर से स्वयं प्रच्छन्न प्रेम है । उसने किसी अन्य से देवर का प्रेम जान लिया है । वह दूसरी प्रेमिका देवर के घर किसी उत्सव में आई है और उसको देवर को पत्नी ने अपमानित किया है । यही सारा समाचार अपने देवर को दे कर वह अपना ईष्याजन्य रोष प्रकट कर रही है । वस्तुतः यही अर्थ ठीक है । क्योंकि इसमें ‘देवर’ इस सम्बोधन की सङ्गति ठीक बैठ जाती है । यदि पहली वाली व्याख्या के अनुसार यह माना जाय कि कहने वाली भाभी नहीं कोई अन्य प्रेमिका है और वह भाभी के अपमानित होने की सूचना दे रही है तो ‘हे देवर’ यह सम्बोधन भाभी की दृष्टि से माना जायगा ( और यह कटाक्षपरक सम्बोधन होगा ।)
तृतीय
उद्योतः
(ध्वन्य०) एकव्यञ्जकानुप्रवेशेन तु व्यङ्ग्यचत्वलक्ष्यक्रमङ्ग्यस्य स्वप्रभेदान्तरापेक्षया बाहुल्येन सम्भवति । यथा ‘स्निग्धय्यामल’ इत्यादौ । (अनु०) एक व्यञ्जकानुप्रवेश के द्वारा तो व्यङ्ग्यचत्वलक्ष्यक्रमङ्ग्य के अपने दूसरे प्रभेदों की दृष्टि से बाहुलता से सम्भव है । जैसे—‘स्निग्ध इ्यामल’ इत्यादि में । (लो०) बाहुल्येनeti । सर्वत्र काव्ये रसादितात्पर्यं तावदस्ति । तत्र रसध्वनेर्भावध्वनेश्चैकेन व्यञ्जकेनाभिव्यङ्गजनं स्निग्धय्यामलेत्यत्र विप्रलम्भशृङ्गारस्य तद्व्य-भिचारिणश्च शोकावेगात्मनश्च वर्णनीयत्वात् ।
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(अनु०) 'बाहुल्य से' यह । सर्वत्र काव्य में रसादि तात्पर्य तो होता ही है । उसमें रसध्वनि और भावध्वनि का एक ही व्यञ्जक के द्वारा अभिव्यञ्जन ( होता है ) क्योंकि 'स्निग्धशय्यामल' इत्यादि में विप्रलम्भशृङ्गार और उसके व्यभिचारी शोक और आवेश की ( एक साथ ) चर्वणा होती है ।
तारावती—(३) सङ्कर का तीसरा प्रकार है एकव्यङ्गयानुप्रवेश सङ्कर । अपने भेदों का एकव्यङ्गयानुप्रवेश सङ्कर अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यच ध्वनि का दूसरे भेदों से प्रायः हुआ करता है । क्योंकि काव्य में सर्वत्र तात्पर्य तो रसध्वनि में हो होता है, उस रस के पोषक भावों की भी अभिव्यक्ति होती है । उदाहरण के लिए 'स्निग्धशय्यामलकान्तिलिप्तविग्रह' इत्यादि पद्य को लीजिये । इसकी विस्तृत व्याख्या द्वितीय उद्योत की प्रथम कारिका में की जा चुकी है । यहाँ पर असंलक्ष्यक्रम व्यङ्ग्यच रसध्वनि विप्रलम्भशृङ्गारपरक है । साथ ही शोक और आवेश की भी अभिव्यक्ति होती है जो कि उसका व्यभिचारी भाव है । इन दोनों की एक साथ चर्वणा होती है । दोनों का व्यञ्जक यह पद्य ही है । अतः यहाँ ५९ ध्वनि के स्वगत भेदों का एकव्यङ्गयानुप्रवेश सङ्कर है ।
( कुछ लोगों ने यहाँ पर रामशब्द के अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य और रसध्वनि इन दो का एकव्यङ्गयानुप्रवेश सङ्कर बतलाया है । क्योंकि दोनों का अभिव्यञ्जन रामशब्द से ही होता है । वस्तुतः यह ठीक भी है । किन्तु इससे अलोकार्के इस कथन की सार्थकता नहीं होती कि अधिकतर ऐसे स्थान पाये जाते हैं जहाँ एक पद में दो व्यञ्जकों का समावेश होता है । अतः बाहुल्य की व्याख्या करने के लिये रसध्वनि का व्यभिचारियों की व्यञ्जना से उपकृत होना मानना ही पड़ेगा । यही लोचनकार का आशय है । )
(ध्वन्यालो०) स्वप्रभेदसंशृङ्गत्वं च यथा पूर्वोदाहरण एव । अत्र ह्यर्थान्तर-
(अनु०) स्वप्रभेदसंशृङ्गत्व जैसे—पहले के उदाहरण में ही । यहाँ निस्सन्देह अर्थान्तर-संक्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य का संसर्ग है ।
(लो०) एवं त्रिविधं सङ्करं व्याख्याय संसृष्टिमुदाहरति—स्वप्रभेदेति । अत्र होति । लिप्तशब्दादौ तिरस्कृतो वाच्यः, रामादौ तु सङ्क्रान्त इत्यर्थः ।
(अनु०) इस प्रकार के सङ्कर की व्याख्या करके संसृष्टि का उदाहरण देते हैं—‘अपने प्रभेदों से' यह । 'यहाँ निस्सन्देह' यह । लिप्त शब्द इत्यादि में वाच्य तिरस्कृत है और राम इत्यादि में संक्रान्त ।
संसृष्टि
तारावती—ऊपर स्वगत भेदों में तीनों प्रकार के सङ्कर की व्याख्या की जा चुकी । अब स्वगत भेदों की संसृष्टि को लीजिये । संसृष्टि वहाँ पर होती है जहाँ दो ध्वनिभेद निरपेक्ष रूप में स्थित होते हैं । जैसे 'स्निग्धशय्यामलकान्तिलिप्तविग्रह:' इसी पद्य को लीजिये । यहाँ पर 'लिप्त' शब्द इत्यादि का अर्थ वाच्य है । लेप किसी मूर्त्त तथा स्पष्ट वस्तु का किया जात ।
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तृतीय उद्योत:
है कान्ति का लेप नहीं हो सकता इससे 'लिप्त' शब्द का प्रकृत कान्ति के लेप के अर्थ में बाध हो जाता है। उससे लक्ष्यार्थ निकलता है कि 'कान्ति सभी अवयवों में व्याप्त है।' इसकी प्रयोजनरूप व्यञ्जना यह है कि कान्ति सभी अवयवों में परिपूर्ण रूप में तथा अत्यन्तता के साथ भर गई है। इस प्रकार यहाँ पर 'लिप्त' शब्द के अर्थ का सर्वथा त्याग हो जाता है। अतः यह अत्यन्ततिरस्कृत वाच्य नामक ध्वनि भेद का उदाहरण है। 'राम' शब्द अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य नामक ध्वनि भेद का उदाहरण है। जैसे कि विस्तारपूर्वक द्वितीय उद्योत की प्रथम कारिका की व्याख्या में दिखलाया जा चुका है। ये दोनों ध्वनि भेद परस्पर असम्बद्ध होकर स्थित रहते हैं। अतः यहां ध्वनि के दो स्वगत भेदों की संसृष्टि है। इसी प्रकार अन्यत्र भी समझना चाहिये।
(ध्वन्या०)
गुणीभूतव्यङ्गचूडासडूोर्णन्तव यथा—'न्यक्कारो ह्यमेव मे यदरय:' इत्यादौ। यथा वा— कर्ता श्वेतच्छलानां जतुमयशरणोहोपनः सोड्भिमानी कृष्णाकेशोत्तराव्यपनयनपटुः पाण्डवा यस्य दासः। राजा दुःशासनादेर्हृदयविगलिततत्त्वावधारणराजसत्वं बवासे दुर्योधनोऽसौ कथयत न रूषा दृष्टुमस्यागते स्वः। अत्र ह्यलक्ष्य क्रमगण्यचस्य वाक्यार्थीभूतस्य व्यङ्गचविशिष्टवाच्याभिधायिभिः पदैः सम्मिश्रणता। अत एव च पदार्थाश्रितत्वे गुनीभूतव्यङ्गचस्य वाक्यार्थ-श्यत्वे च ध्वने: सदूोर्णतायामपि न विरोधः स्वप्रभेदान्तरत्वात्। यथा हि ध्वने: प्रभेदान्तराणि परस्परं सदूोर्णन्ते पदार्थवाक्यार्थाश्रयत्वेन च न विरुध्यते।
(अनु०)
गुणीभूतव्यङ्गचसंकर्णत्व जैसे—'न्यक्कारो ह्यमेव मे यदरय:' इत्यादि में। अथवा जैसे— 'द्यूते के छलो' का करनेवाला, लोभ के वश मकोन को जलानेवाला, वह अभिमानी, द्रौपदी के केश तथा उत्तरीय के अपसारण में निपुण, जिसके दास पाण्डव हैं, ऐसा राजा, दुःशासन इत्यादि सो छोटे भाइयों का ज्येष्ठ, अज्ञराज का मित्र वह दुर्योधन कहाँ है, कहते क्यों नहीं हो, हम दोनों क्रोधपूर्वक देखने आये हैं।'
यहां निस्सन्देह वाक्यार्थीभूत अलक्ष्य क्रमगण्य का व्यङ्गचविशिष्ट वाच्य को कहनेवाले पदों से सम्मिश्रण होता है। और इसीलिये गुणीभूतव्यङ्गच के पदार्थाश्रित होने पर और ध्वनि वाक्याश्रित होने पर सदूोर्ण होने में कोई विरोध नहीं है अपने दूसरे प्रभेदों के समान। निस्सन्देह जैसे ध्वनि के दूसरे प्रभेद परस्पर सदूोर्ण होते हैं और पदार्थ तथा वाक्यार्थ के आश्रय के रूप में उनमें विरोध नहीं आता।
(लो०)
एवं स्वप्रभेदं प्रति चतुर्भेदानुदाहृत्य गुणीभूतव्यङ्गचं प्रत्युदाहरति— गुणीभूत इति। अत्र हेतूदाहरणद्वयेऽपि। अलक्ष्य क्रमगण्यचस्यैति रौद्रस्य व्यङ्गच-विशिष्टेत्यनेन गुणता व्यङ्गचस्योक्ता। पदैरित्युपलक्षणे तृतीय। तेन तदुपलक्षितो
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योऽर्थो व्यङ्ग्यगुणीभावेन वर्तते तेन सन्मिश्रता सङ्कीर्णता। सा चानुप्राह्यानुग्राहकभावेन, सन्देहयोगैकव्यङ्जकानुप्रवेशेन चेति यथासम्भवमुदाहरणद्रये योज्या। तथाहि मे यदरय इत्यादिभिः सर्वैरेव पदार्थैः कर्तृत्यादिभिश्च विभावादिरूपतया रौद्र एवानुगृह्यते।
के प्रति उदाहरण देते हैं—‘गुणीभूत’ यह। यहां ‘निस्सन्देह’ अर्थात् दोनों ही उदाहरणों में । ‘अलक्ष्यक्रमव्यंग्य का’ यह। रौद्र के प्रतीत होने से ‘व्यंग्यविशिष्ट’ इत्यादि के द्वारा व्यंग्य की गुणरूपता कही गई है। ‘पदैः’ के उपलक्षण में तृतीया है। इससे उसके द्वारा उपलक्षित की हुई, व्यंग्य के गुणीभाव के द्वारा जो अर्थ वर्तमान रहता है, उसकी सम्मिश्रता अर्थात् सङ्कीर्णता और वह अनुग्राह्यानुग्राहकभाव के द्वारा, सन्देह योग के द्वारा और एक व्यञ्जकानुप्रवेश के द्वारा यथासम्भव दोनों उदाहरणों में जोड़ दी जानी चाहिये। वह इस प्रकार ‘मेरे जो शत्रु’ इत्यादि इन सब पदार्थों के द्वारा और ‘कर्ता दृप्तच्छलानां’ इत्यादि के द्वारा विभावादि रूपता से रौद्र ही अनुग्रहीत होता है।
कर्तृत्यादौ च प्रतिपदं प्रत्यवान्तरवार्यं, प्रतिसमासं च व्यङ्ग्यगुणीमुप्रेक्षितं शाब्दमेवेति न लिखितम्। ‘पाण्डवा यस्य दासाः’ इति तदीयोक्त्यनुसारः। तत्र गुणीभूतव्यङ्गयतापि भूतव्यङ्गयतापि योजयितुं शक्या, वाच्यस्यैव क्रोधोद्दीपकत्वात्। दासैश्च कृतकृत्यः स्वाम्यवश्यं हृदयग्य इत्यर्थशक्येनुरणनरूपतापि उभयथापि चारुत्वादेकपक्षग्रहणे प्रमाणाभावः। एकव्यञ्जकानुप्रवेशस्तु तैरैव पदैः गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य च रसस्य विभावादिरूपतयाभिव्यञ्जनात्। अत एव चेति। यतोऽत्र लक्ष्ये दृश्यते तत् इत्यर्थः।
और ‘कर्ता’ इत्यादि प्रत्येक शब्द में, प्रत्येक अवान्तर वाक्य में और प्रत्येक समास में व्यङ्ग्य की उपस्थिति की जा सकती है इसलिये नहीं लिखा गया। ‘पाण्डव जिसके दास है’ यह उसकी उक्ति का अनुकरण है। उसमें गुणीभूतव्यङ्ग्यता की भी योजना की जा सकती है, क्योंकि वाच्य ही क्रोधोद्दीपक है और ‘कृतकृत्य’ दासों के द्वारा स्वामी अवश्य देखा जाना चाहिये, यह अर्थशक्तिमूलक अनुनादन रूप व्यङ्ग्यता भी है। दोनों प्रकार से चारुत्व होने के कारण एक पक्ष के ग्रहण में प्रमाण नहीं है। एकव्यञ्जकानुप्रवेश तो उन्हीं पदों से गुणीभूतव्यङ्ग्य के और प्रधानभूत रस के विभाव इत्यादि के द्वारा अभिव्यञ्जन होने के कारण सिद्ध हो जाता है। ‘अत एव च’ यह। ‘क्योंकि यहीं लक्ष्य में दिखाई देता है’ इससे।
नतु व्यङ्ग्यं गुणीभूतं प्रधानं चेति विरुद्धमेव तदूदृश्यमानमध्ययुक्तत्वात्तन्न श्रद्धेयमित्याशङ्क्य व्यञ्जकभेदावावन्न विरोध इति दर्शयति—अत एवेति। स्वप्रभेदान्तराणि सङ्कीर्णतया पूर्वमुदाहृतानीति तानैव दृष्टान्तरयति तदेव व्याचष्टे—यथा होति। तथात्रापील्यध्याहारोद्ध कर्तव्यः। ‘तथाहि’ इति वा पाठः।
(प्रश्न) व्यङ्ग्य गुणीभूत भी और प्रधान भी यह विरुद्ध है वह दिखलाई पड़ता हुआ भी उक्त है उसे श्रद्धेय नहीं हैं यह शङ्का करके व्यञ्जक भेद से विरोध नहीं होता यह दिखलाते हैं—‘अत एव’ इति। स्वप्रभेदान्तराणि सङ्कीर्णतया पूर्वमुदाहृतानीति तानैव दृष्टान्तरयति तदेव व्याचष्टे—यथा होति। तथात्रापील्यध्याहारोद्ध कर्तव्यः। ‘तथाहि’ इति वा पाठः।
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तृतीय उद्योतः
दिखलाते हैं 'अत एव' यह । 'अपने' यह । अपने दूसरे प्रभेद जिनका सादृश्य के रूप में उदाहरण दिया गया है उन्हीं को दृष्टान्त बना रहे हैं । वही कहते हैं—'निस्सन्देह जैसे' । 'वैसा यहाँ पर' यह अध्याहार करना चाहिये । अथवा 'तथाहि' यह पाठ है ।
गुणीभूतव्यङ्गच्य से सादृश्य और संसृष्टि तारावती—यहाँ तक ध्वनि के स्वगत भेदों के चारों प्रकारों की व्याख्या की गई । अव गुणीभूतव्यङ्ग्य के साथ ध्वनि के सादृश्य और संसृष्टत्व को लोजिये—तृतीय उद्योत की १६ वीं कारिका की व्याख्या में 'न्यक्कारो ह्यामेव' इत्यादि पद्य में प्रत्येक पद व्यङ्ग्यविशिष्ट होकर हो चमत्कारकारक होता है । इस प्रकार प्रत्येक पद गुणीभूतव्यङ्ग्य का उदाहरण है । पूर्ण पद्य में रौद्र रसध्वनि होती है । (यहाँ पर रौद्र रस की व्याख्यना होती है यह लोचनकार का मत है । निर्वेद नामक व्यभिचारी भाव की प्रधान रूप में अभिव्यक्ति होती है । यह दर्पणकार का मत है । वस्तुतः यहाँ पर निर्वेद व्यभिचारी से पुष्ट होकर वीर रस ही ध्वनि का रूप धारण करता है ।) इस प्रकार यहाँ पर रस, ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य का सादृश्य है ।
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तृतीय उद्योतः
दूसरा उदाहरण लीजिये—
यह पद्य वेणीसंहार के पञ्चम अङ्क से लिया गया है । महाभारत के युद्ध में अनेक वीरों का संहार हो चुका है । भीम ने दुश्शासन के हृदय का रक्त पी लिया है; कर्ण और अर्जुन का युद्ध चल रहा है । दुर्योधन बट वृक्ष के नीचे चिन्ताग्रस्त मुद्रा में बैठे हैं । उसी समय धृतराष्ट्र, सञ्जय और गान्धारी आकर दुर्योधन को युद्ध छोड़ने का उपदेश देते हैं । किन्तु दुर्योधन दृढ़ है । इतने में सुनाई देता है कि कर्ण मारा गया । सब उद्विग्न तथा खिन्न हैं; दुर्योधन बदला लेने के लिये एकदम चल देना चाहता है । इसी समय पर्दे के पीछे भीम और अर्जुन का स्वर सुनाई देता है । वे कहते हैं—
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तृतीय उद्योतः
'हम दोनों दुर्योधन से क्रोध के साथ मिलने आये हैं, तुम लोग हमें क्यों नहीं बतलाते कि वह दुर्योधन कहाँ है ? वह दुर्योधन जो कि भूतचछलों का करनेभाला है, वह दुर्योधन जो लाख के बने हुए हमारे आवासस्थलों को जलानेवाला है, वह अभिमानो दुर्योधन जो द्रौपदी के केश और उत्तरीय के हटाने में बड़ा ही निपुण है, वह ऐसा राजा, दुर्योधन पाण्डव जिसके दास हैं, दुश्शासन इत्यादि सौ छोटे भाइयों में ज्येष्ठ, अंगराज ( कर्ण ) का मित्र वह दुर्योधन कहाँ है ?'
(लोचनकार ने इस पद्य की व्यञ्जनाओं के विषय में केवल इतना ही लिखा है कि 'इसके प्रत्येक शब्द, प्रत्येक वाक्यांश और प्रत्येक समास की व्यञ्जनायें स्पष्ट हैं, अतः उनका उल्लेख अनावश्यक है ।' इसकी व्यञ्जनाओं की व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है 'कर्तुं' में 'कृ' धातु से सीधे कर्तृर्थक प्रत्यय से व्यक्त होता है कि झूठ के अवसर पर छल करने में शकुन्ति तो निमित्तमात्र था वास्तवत: उत्तरदायी तो यह दुर्योधन ही था । 'भूतचछलानां' के बहुवचन से व्यक्त होता है कि इस दुर्योधन ने हम लोगों से एक नहीं अनेक छल किये हैं । 'जातुमयशरणोद्धोपन:' की व्यञ्जना यह है कि इस दुर्योधन ने हम लोगों को नष्ट कर देने में कोई कसर शेष नहीं रख्खी, यह तो परमात्मा की कृपा थी कि हम अपने भाग्य से बचते
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रहे। 'कर्ता दूतच्छलानां' 'जतुमयशरणोद्धोपनः' इन दोनो वाक्यखण्डों से व्यञ्जना निकलती है कि सारा अपराध इसी दुष्ट दुर्योधन का है जिससे यह सारा वंश नष्ट हो गया। 'सः' 'वह' से अभिव्यक्त होता है कि दुर्योधन अपनी दुष्टता के लिये सर्वत्र प्रसिद्ध हो गया। 'अभिमानी' को व्यञ्जना यह है कि अज्ञ दुर्योधन का अभिमान कहाँ चला गया ? उसे अपने अभिमान का पूरा बदला मिल गया। 'कृष्णाकेशोत्तरौषधयपनपटः' से सभी को साक्षी बनाकर दुःशासन की बाँहें नुचवाने और उसके वक्षस्थल का रक्त पीने की व्यञ्जना होती है। 'पाण्डवा यस्मादासाः' से व्यञ्जना निकलती है कि दुर्योधन ने तो द्यूत के अवसर पर पाण्डवों को जीतकर अपना दास बना लिया था और वह सर्वदा पाण्डवों को अपना दास ही कहा करता था। क्या उसे अज्ञ तक पता नहीं चला कि ऐसे अन्याय का परिणाम क्या होता है ? 'दुःशासनादे राजा' से दुःशासन इत्यादि सभी वंशवर्तियों के मारे जाने की व्यञ्जना होती है, 'मुहरत्नशतस्य' से व्यक्त होता है कि जिस दुर्योधन को अपने सौ भाइयों पर पूरा अभिमान था वह अब अकेला शव रह गया, उसके सभी भाइयों को एकाकी भीम ने ही मार डाला। 'अङ्गुराजस्य मित्रम्' से व्यक्त होता है कि दुर्योधन सर्वदा अंगराज की ही सम्मति पर चला करता था और समस्त अनर्थ अंगराज की दुर्बुद्धि के ही कारण हुये थे। दुर्योधन समझता था अकेला अंगराज ही सभी पाण्डवों को मार सकता है किन्तु आज अंगराज का कहीं पता नहीं। आज हम क्रोध और क्रूरता के साथ दुर्योधन का अन्त करने आये हैं। दुःशासन उसके सौ भाई और कर्ण इत्यादि उसके सहायक अब कहाँ हैं जिनके बल पर उसने इतना अन्याय किया था)।
'न्यक्कारो ह्यमेव' और 'कर्ता दूतच्छलानां' इन दोनों पदों में रौद्ररस की व्यञ्जना होती है (अथवा प्रथम में वीररस की और दूसरे में रौद्ररस की व्यञ्जना होती है।) यह रौद्ररस असंललक्ष्याक्रम व्यङ्ग्य है और प्रधानीभूत वाक्यार्थ बनकर यही ध्वनि का रूप धारण करता है। इन दोनों पदों में शब्दों से जो व्यञ्जनायें बतलाई गई हैं शब्दों के अर्थ उन विशिष्ट प्रकार की व्यञ्जनाओं से मिश्रित होकर ही अवभासित होते हैं। इस प्रकार व्यङ्ग्य-विशिष्ट वाक्य का अभिमान करने के कारण इनमें गुणीभूतव्यङ्ग्य है। यहाँ पर 'पदैः सम्भ्रष्टः' अर्थात् विशिष्ट रसादिव्यञ्जकविशिष्ट वाक्य को कहनेवाले से असंललक्ष्याक्रम व्यङ्ग्य का सम्मिश्रित होना बतलाया गया है। वस्तुतः असंललक्ष्याक्रमव्यङ्ग्य पदों से नही अपितु उनके अर्थों से सम्मिश्रित होता है। अतः यहाँ पर 'पदैः' के उपलक्षण में तृतीया माननी चाहिये जिसका आशय यह होता है कि पदों के विशिष्टाभिधायजनपरक प्रयोग के कारण ही असंललक्ष्याक्रम व्यङ्ग्य से विभिन्न गुणीभूतव्यङ्ग्यों का सम्मिश्रण उपलक्षित होता है। अब यह प्रश्न उपस्थित होता है कि इन दोनों पदों में यह सम्मिश्रण होता किस प्रकार है ? इसका उत्तर यह है कि सङ्कर के तीनों भेदों की यहाँ यथासम्भव योजना कर लेनी चाहिये। वह इस प्रकार—(१) 'मेरे और शस्त्र' इत्यादि सभी वाक्यों से अथवा 'कर्त्रा' इत्यादि के वाक्यार्थों से इन दोनों पदों की विविधरूप सामग्री का सम्पादन किया जाता है। यह विभावरूप सामग्री सर्वदा रसनिष्पत्ति में अनुप्राहक होती है। इस प्रकार व्यङ्ग्य विशिष्ट वाक्य के द्वारा रस ध्वनि के अनुप्रहोत होती है।
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तृतीय उद्योत:
होने से गुणीभूतव्यंग्य और रस का अनुग्राह्यानुग्राहक भाव सङ्कर है । ( २ ) 'पाण्डव जिसके दास हैं' यह दुर्योधन की उक्ति का अनुकरण है । अर्थात् दुर्योधन ऐसा कहा करता था । उसने हम लोगों को दास बना लिया था जिसका उचित दण्ड उसे मिल गया कि उसके सब भाई इत्यादि मारे गये । इस प्रकार 'पाण्डव जिसके दास हैं' से यह व्यञ्जना निकलती है । किन्तु प्रधानता वाच्यार्थ की ही है क्योंकि क्रोध की अभिव्यक्ति वाच्यार्थ से ही होती है । व्यंग्यार्थ उसमें सहायक मात्र होता है । इस प्रकार यह गुणीभूतव्यंग्य है । साथ ही इससे यह भी व्यञ्जना निकलती है कि 'हम तो दुर्योधन के दास हैं, दासों का यह कर्तव्य होता है कि स्वामी का कार्य कर के स्वामी का दर्शन करें । हम दुर्योधन का काम कर आये हैं और अब उनसे मिलना चाहते हैं, उनसे कह दो कि तैयार हो जाएँ ।' यह व्यञ्जना वाच्य की अपेक्षा प्रधान है अतः स्वतःसम्भवी वस्तु से अनुरणनरूप वस्तु ध्वनि भी यहीं विद्यमान है । यह निर्णय नहीं किया जा सकता कि उक्त व्यंग्यविशिष्ट वाक्य अधिक चमत्कारकारक है । या यह अनुरणनरूप व्यंग्यध्वनि है । इस प्रकार यहाँ सन्देहसङ्कर है । ( ३ ) एकव्यञ्जकानुप्रवेश सङ्कर तो स्पष्ट हो है । उन्हीं शब्दों से गुणीभूतव्यंग्य की भी व्यञ्जना होती है और उन्हीं से विभाव इत्यादि के माध्यम से असंललक्ष्यक्रम व्यंग्य रससञ्चारि भी अभिव्यक्त होती है । इस प्रकार सङ्कर के तीनों भेदों की यहाँ पर व्याख्या की जा सकती है ।
(धन्यो०) किं चैकव्यञ्जकाश्रयत्वे तु प्रधानगुणभावो विरुद्ध्यते न तु व्यङ्ग्यभेदापेक्षया यतोऽप्यस्य न विरोधः । मयं च सङ्करसंसृष्टितिवहारो बहूनामेकत्र वाच्यवाचकभाव एव व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावेऽपि निर्विरोध एव मन्तव्यः ।
(अनु०) और भी—एकव्यञ्जकाश्रयत्व में प्रधान तथा गुणभाव का परस्पर विरोध होता है व्यंग्यभेद की दृष्टि से नहीं । इससे भी इसका विरोध नहीं होता । और यह सङ्करसंसृष्टि व्यवहार बहुते के एकत्र वाच्यवाचकभाव के समान व्यंग्यव्यञ्जकभाव में भी निर्विरोध ही माना जाना चाहिये ।
(लो०) ननु व्यङ्जकभेदात्प्रथमभेदयोः परिहारोऽस्तु एकव्यञ्जकानुप्रवेशे तु वक्तव्यमित्याशङ्क्य पारमार्थिकं परिहारमाह—किञ्चेत । ततोडन्यदृश्यदृश्यं गुणीभूतमन्यच्च प्रधानमिति को विरोधः? ननु वाच्यालङ्कारविषये श्रुतोऽयं सङ्करादिव्यवहारो न तु व्यङ्ग्यविषय इत्याशङ्क्याह—अयं चेतित । मन्तव्य इति मन-नेन प्रतीत्या तथा निश्चयः उभयत्रापि प्रतीतरेव शरणत्वादितिभावः ।
(अनु०) (प्रश्न) व्यङ्जक भेद से प्रथम दो भेदों का परिहार हो जाय, एकव्यङ्जकानुप्रवेश सङ्कर के विषय में क्या कहा जाना चाहिये ? यह शङ्का करके वास्तविक परिहार बतला रहे हैं 'और भी' यह । 'उससे भी' यह । क्योंकि दूसरा व्यंग्य गुणीभूत है और दूसरा प्रधान है, अतः उसमें क्या विरोध ? (प्रश्न) यह सङ्कर इत्यादि का व्यवहार तो वाच्यालङ्कार के विषय में सुना गया है; व्यंग्य के विषय में तो नहीं ? यह शङ्का करके कहते हैं—'और
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यह'। 'माना जाना चाहिये' यह। भाव यह है कि मनन से अर्थात् प्रतीति से वैसा निश्चय करना चाहिये क्योंकि दोनों ओर प्रतीति का हो सहारा है।
प्रधानता और गुणीभाव पर विचार
तारावती—( प्रश्न ) यह तो विचित्र सी बात है कि व्यंग्य गुणीभूत भी है और प्रधान भी। यह परस्पर विरुद्ध बात मानी कैसे जा सकती है ?
( उत्तर ) क्योंकि यह लक्ष्य में दिखाई पड़ता है जिसके उदाहरण भी दिये गये हैं; अतः यह मानना ही पड़ता है।
( प्रश्न ) चाहे वह लक्ष्य में दिखाई ही क्यों न पड़ता हो; किन्तु दिया हुआ हेतु इतना प्रबल है कि लक्ष्य में दिखाई पड़नेवाले तत्व पर भी श्रद्धा करना उचित ही प्रतीत नहीं होता।
जब प्रधान और अप्रधान सर्वथा एक दूसरे के विरुद्ध हैं तब दोनों तत्वों को एकत्र सन्निविष्ट कहना कहाँ तक उचित कहा जा सकता है?
( उत्तर ) प्रधान और अप्रधान व्यञ्जकों में व्यञ्जकभेद है। अतः उनका परस्पर सन्निवेश विरुद्ध नहीं कहा जा सकता।
यहाँ पर गुणीभूतव्यङ्गय की अभिव्यक्ति पदों के अर्थ से होती है और असंल्लक्ष्यक्रम व्यङ्गय रसध्वनन की अभिव्यक्ति वाक्यार्थ से होती है। एक के व्यञ्जक पदार्थ हैं और दूसरे के व्यञ्जक वाक्यार्थ है।
इस प्रकार जब दोनों के व्यञ्जकों में भेद है तब आप यह कैसे कह सकते हैं कि दोनों के प्रधान और अप्रधान होने में परस्पर विरोध है?
इनका सादृश्य हो सकता है और व्यञ्जकभेद के कारण उनमें कोई विरोध भी नहीं आता।
यह इस प्रकार समझिये कि जैसे ध्वनि के स्वगत भेदों में सङ्कर और संसृष्टि दिखाई गई है।
उसमें व्यञ्जकभेद के कारण ही दो भेदों के प्रधान और अप्रधान भाव में विरोध नहीं आता।
ध्वनि के स्वगत भेदों के उदाहरण पहले दिये जा चुके हैं और यह दिखलाया जा चुका है कि पदार्थ तथा वाक्यार्थ इन दो विभिन्न तत्वों से अभिव्यक्त होने के कारण दोनों का सांकर्य बन जाता है।
उसो दृष्टान्त से गुणीभूतव्यङ्गय और ध्वनि के सांकर्य के विषय में भी समझ लिया जाना चाहिये।
यहाँ आलोक में—'यथाहि…'…..विरुद्धानि' यह वाक्य अधूरा सा मालूम पड़ता है। क्योंकि इसमें केवल दृष्टान्त तो दिया गया है दार्ष्टान्त नहीं।
अतः यहाँ पर 'तथाात्रापि' यह वाक्यखण्ड जोड़कर पूरा कर लेना चाहिये।
अथवा 'यथाहि' के स्थान पर 'तथाहि' कर लेना चाहिये जिससे यह तर्क हो जावेगा और वाक्य की अपूर्णता जाती रहेगी।
( प्रश्न ) अपने विरोधपरिहार के लिये व्यञ्जकभेद का सहारा लिया है।
यह अनु ग्राह्यानुप्राहकभाव सङ्कर और सन्देहसङ्कर के विषय में तो ठीक कहा जा सकता है; किन्तु एकाश्रयानुप्रवेश सङ्कर के विषय में क्या व्यवस्था होगी जहाँ एक ही व्यञ्जक से दो व्यङ्ग्यार्थ निकलते हैं ?
जब तक व्यञ्जक एक ही नहीं होगा तब तक यह भेद कहा हो नहीं जा सकेगा और व्यञ्जक के एक हो जाने पर व्यञ्जकभेद का आपका आश्रय समाप्त हो जावेगा।
( उत्तर ) केवल व्यञ्जकभेद ही नहीं व्यङ्ग्यभेद भी प्रधानता तथा गुणीभाव का भेदक होता है।
प्रधानता तथा गुणीभाव का विरोध वहीं पर होता है जहाँ एक ही व्यङ्ग्य को प्रधान भी कहा जाय और उसी को गुणीभूत भी बतलाया जाय।
इसके प्रतिकूल जहाँ प्रधान कोई दूसरा व्यङ्ग्य होता है और गुणीभूतव्यङ्गय कोई दूसरा होता है वहाँ विरोध का प्रश्न ही नहीं उठता।
वस्तुतः
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३
तृतीय उद्योतः
यहाँ उत्तर ठीक है। व्यङ्ग्यमेद का उत्तर तो अधूरा रह जाता है। व्यङ्ग्यमेद का उत्तर सभी भेदों में ठीक बैठ जाता है। जब दो वस्तुएँ भिन्न-भिन्न ही हैं तब उनमें एक प्रधान और दूसरी अप्रधान होगी हो। उसमें विरोध की कल्पना की ही किस प्रकार जा सकती है ? (प्रश्न) पुराने आचार्यों ने संकर और संसृष्टि का व्यवहार तो वाच्यालंकारों के विषय में किया है। आप उन्हें ध्वनिभेदों के क्षेत्र में लागू कर रहे हैं इसमें क्या औचित्य है ? (उत्तर) पुराने आचार्यों ने मनन किया और उन्होंने प्रतीत हुआ कि संकर और संसृष्टि का व्यवहार वाच्यालंकारों के विषय में किया जा सकता है। ईस बात का निर्णय कि किस तत्व का व्यवहार किस क्षेत्र में किया जाय मनन और प्रतीति का ही कार्य है। यही मनन और प्रतीति यह बतलाती है कि संकर और संसृष्टि का व्यवहार व्यंग्य अर्थों के विषय में भी हो सकता है। दोनों स्थानों पर प्रतीति का ही एकमात्र आश्रय लिया जा सकता है और वह आश्रय वाच्यालंकारों के समान व्यञ्जना के क्षेत्र में भी उनके व्यवहार के औचित्य को सिद्ध करता है।
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तृतीय उद्योतः
(ध्वन्यालोक) यत्र तु पदेन कानिचिदविवक्षितवाच्यानुरणननरूढप्रच्वच्यानी वा तत्र ध्वनिगुणभूतव्यङ्ग्यचचयोः 'सुहतद्वम्' यथा—'तेषां गोपवधविलाससुहृदाम्' इत्यादौ। अत्र हि 'विलाससुहृदाम्' 'राधारहःसाक्षिणाम्' इत्येते पदे ध्वनि-प्रभेदरूपे 'ते' 'जाने' इत्येते च पदे गुणीभूतव्यङ्गचयचचुरूपे।
(अनु०) जहाँ कुछ पद तो अविवक्षितवाच्य होते हैं अथवा अनुरणनरूप व्यंग्यवाच्य होते हैं वहाँ ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य की संसृष्टि होती है। जैसे—'तेषां गोपवधूविलाससुहृदाम्' और 'राधारहःसाक्षिणाम्' ये दो पद ध्वनि के उपमेदरूप ही हैं और 'ते' तथा 'जाने' ये दो पद गुणीभूतव्यङ्ग्यरूप हैं।
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तृतीय उद्योतः
(लो०) एवं गुणीभूतव्यङ्ग्यसड्ढ़रमेदांसत्रीनुदाहृत्य संसृष्टिमुदाहरति—पत्र तु पदाती कानिचिद्वित्यन सड्ढ़ूरावाक्षां निराकरौति । सुहच्छछदेन चाविवक्षितवाच्यो ध्वनिः; 'ते' इति पदेनासाधारणो गुणगणोऽभिव्यक्ततोऽपि गुणत्वमवलम्बते, वाच्यस्यैव स्मरणस्य प्राधान्येन चारुत्वहेतुत्वात् । 'जाने' इत्येनोत्प्रेक्ष्यमाणानन्तधर्मगुणजकेनापि वाच्यप्रेमोत्प्रेक्षणरूपं प्रधानीक्रियते । एवं गुणीभूतव्यङ्गचयेऽपि चत्वारो भेदा उदाहृताः।
(अनु०) इस प्रकार गुणीभूतव्यङ्ग्यच के संकर के तीन भेदों के उदाहरण देकर संसृष्टि का उदाहरण देते हैं—'जहाँ जो पद' इत्यादि। 'कुछ' इससे संकर के अवकाश का निराकरण करते हैं। 'सुहृत्' शब्द और 'साक्षि' शब्द अविवक्षितवाच्य ध्वनि हैं। 'ते' इस पद के द्वारा यद्यपि असाधारण गुणगणों की अभिव्यक्ति होती है तथापि (वह गुणगण) गौणरूपता को प्राप्त कर लेता है। क्योंकि यहाँ वाच्यस्मरण ही प्राधान्यरूप से चारुता में हेतु है। 'जाने' इस शब्द के उत्प्रेक्षा किये जानेवाले अनन्तधर्म के व्यञ्जक होने पर भी उत्प्रेक्षा वाच्य ही प्रधान बना दिया जाता है। इस प्रकार गुणीभूतव्यङ्ग्यच में भी चारों भेदों के उदाहरण दिये गये।
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तारावतो—ऊपर गुणीभूतव्यङ्ग्याङ्ग के सांकर्य के तीनों प्रकारों को उदाहरणों के के द्वारा समझाया गया है। अब गुणीभूतव्यङ्ग्य की सृष्टि पर विचार किया जा रहा है। गुणीभूतव्यङ्ग्य तथा ध्वनिभेदों की सृष्टि वहाँ पर होती है जहाँ कुछ पद अविवक्षितवाच्यपरक हों और उनसे भिन्न कुछ दूसरे पद अनुरणनरूप व्यङ्ग्यपरक हों तथा उनमें कुछ तो प्रधान होकर ध्वनि की रूप धारण करते हैं और दूसरे गुणीभूतव्यङ्ग्य का। कुछ पद इस प्रकार के हों और कुछ उस प्रकार के यह कहने का अभिप्राय यह है कि ध्वनिहीनता में परिणत होने वाली व्यञ्जना और गुणीभूतव्यङ्ग्य का रूप धारण करनेवाली व्यञ्जना पृथक्-पृथक् शब्दों से प्रतीत होने चाहिये। यदि व्यञ्जक शब्दों का पार्थक्य नहीं होगा तो एक ही शब्द से उद्भूत होकर दो पृथक् व्यञ्जनायें संकर का रूप धारण कर लेंगी सृष्टि का उदाहरण नहीं बन पायेंगी। इसीलिये मन्तव्य से ‘कुछ’ शब्द का प्रयोग किया गया है। ‘कुछ शब्दों’ में ‘कुछ’ शब्द के प्रयोग से ध्वनि की सम्भावना का निराकरण हो जाता है। उदाहरण के लिये ‘तेपां गोपवधूविलासमुहूदाम्’ इस पद को लीजिये। इसकी विस्तृत व्याख्या द्वितीय उद्योत की ५ वीं कारिका में की जा चुकी है। वहाँ पर ‘लतावेश्म’ को गोपवधुओं के विलास का ‘मित्र’ तथा ‘राधा के एकान्त विहार का साक्षी’ कहा गया है। मित्रता करना या साक्ष्य देना यह चेतन धर्म ही है, लतावेश्म जैसे जड़ तत्व से न तो मित्रता की ही सम्भावना की जा सकती है और न साक्ष्य ही का कार्य उनसे सम्पन्न हो सकता है। अतः मुदूद और साक्षी शब्द वाच्य हैं तथा उनसे लक्ष्यार्थ निकलता है कि उन लताओं में गोपियों के विलास और राधा की एकान्त प्रणय लीला चला करती थी। इनसे प्रयोजन रूप व्यङ्ग्यार्थ यह निकलता है कि उनमें पर्याप्त मात्रा में स्वच्छन्द तथा उन्मुक्त विहार हुआ है, इसी व्यङ्ग्यार्थ की प्रधानता है। अतः यहाँ पर अत्यन्ततिरस्कृत अविवक्षित वाच्य ध्वनि है। इसके साथ ही से ‘ते’ ‘वै’ शब्द से व्यक्त होता है कि उनमें असाधारण गुणसमूह विद्धमान है यह अभिव्यक्त असाधारण गुणसमूह गौण हो है क्योंकि इन अभिव्यक्त गुणगणों से युक्त ‘ते’ शब्द हो चाहता में हेतु है और वही स्मरण का बोधक है। इस प्रकार ‘जाने’ ‘ज्ञात होता है’ वह शब्द उत्प्रेक्षा या कल्पना का वाचक है। इससे अनेक उत्प्रेक्ष्य धर्मों की व्यञ्जना होती है। उन व्यङ्ग्य उत्प्रेक्ष्य धर्मों से वाच्य है। इससे अनेक उत्प्रेक्ष्य धर्मों की व्यञ्जना होती है। उन व्यङ्ग्य उत्प्रेक्ष्य धर्मों से उपस्कृत होकर ‘जाने’ की उत्प्रेक्षा ही चमत्कार में कारण होती है। इस प्रकार ‘ते’ और ‘जाने’ शब्दों में व्यङ्ग्योपस्कृत वाच्य ही चमत्कार में कारण है। अत एव इन शब्दों में गुणीभूतव्यङ्ग्य है। ‘सुहृदाम्’ और ‘साक्षिणाम्’ शब्दों में अविवक्षितवाच्य ध्वनि सिद्ध की जा चुकी है। इस ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य के व्यञ्जक पृथक्-पृथक् है। अत एव यहाँ इन दोनों की सृष्टि है। इस प्रकार गुणीभूतव्यङ्ग्य में भी तीन प्रकार का सङ्कर और एक प्रकार की सृष्टि ये चार भेद बतलाये जा चुके और उनके उदाहरण दे दिये गये।
(ध्वन्यालोके) वाच्यालङ्कारसङ्कीर्णत्वमलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यापेक्षया रसवति सालङ्कारे काव्ये सर्वत्र सुव्यवस्थितम्।
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तृतीय
उद्योत:
(अनु०) वाच्यालङ्कारसङ्कीर्णत्व अलङ्क्य क्रमव्यङ्ग्यगग्य की दृष्टि से रसवान् तथा सालङ्कार काव्य में सर्वत्र सुव्यवस्थित है ।
(लो०) अधुनालङ्कारगतांस्तान् दर्शंयति-वाच्यालङ्कार इति । व्यङ्गचत्वे स्वलङ्काराणामुक्तभेदाष्टक एवान्तर्भाव इति वाच्यशब्दस्याशायः। 'काव्य' इति । एवं विधमेव हि काव्यं भवति । 'सुव्यवस्थित'मिति । 'विवक्षा तत्परत्वेन' इति द्वितीयोद्योत्तमूलोदाहरणेभ्यः सङ्करतयैव । 'चलापाङ्गां दृष्टिम्' इत्यत्र हि रूपकव्यतिरेकस्य प्राग्व्याख्यातस्य शृङ्गारानुग्राहकत्वं स्वभावोक्तेश्चैकानुप्रवेशः । 'उप्पहजाया' इति पाठे पामरस्वभावोक्तिर्या ध्वनिरेवेति प्रकरणाद्भावे एकतरप्राहकं प्रमाणं नास्ति ।
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(अनु०) अब अलङ्कारगत उन (भेदों) को दिखलाते हैं—'वाच्यालङ्कार' यह । वाच्य शब्द का आशय यह है कि व्यङ्गचत्व में तो अलङ्कारों का उक्त ८ भेदों में ही अन्तर्भाव हो जाता है । 'काव्य' यह । निस्सन्देह इस प्रकार का ही काव्य होता है । 'सुव्यवस्थित' यह । 'विवक्षा तत्परत्वेन' इस द्वितीयोद्योत के मूल के उदाहरणों से तीन प्रकार का सङ्कर और संसृष्टि ये प्राप्त हो जाते हैं। 'चलापाङ्गां दृष्टिम्' यहां पर रूपक और व्यतिरेक जिनकी पहले व्याख्या की जा चुकी है शृङ्गाररस के अनुग्राहक हैं, स्वभावोक्ति और शृङ्गार का एक में अनुप्रवेश है । 'उप्पह जाया' इस पाठ में पामर स्वभावोक्ति है या ध्वनि है ? इनमें एक को ग्रहण करनेवाला प्रमाण प्रकरण इत्यादि के अभाव में है ही नहीं ।
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अलङ्कारों से सांकर्य और संसृष्टितारावती—अब अलङ्कारों के सांकर्य और संसृष्टि का प्रश्न सामने आता है । अलङ्कार मूलतः दो प्रकार के होते हैं—एक तो व्यङ्ग्य अलङ्कार और दूसरे वाच्य अलङ्कार । व्यङ्ग्य अलङ्कार के सांकर्य और संसृष्टि का अन्तर्भाव तो उक्त ८ भेदों में ही हो जाता है जो कि ध्वनि के ४ और गुणीभूत व्यङ्ग्य के ४ भेद अभी तक बतलाये गये हैं । अब वाच्यालङ्कारों का प्रश्न शेष रह जाता है । जहाँ कहीं रसमयी रचना होती है और उसमें अलङ्कारों का भी प्रयोग किया जाता है वहां सर्वत्र असंललक्षण्य क्रम व्यङ्ग्य की दृष्टि से वाच्यालङ्कार और ध्वनि का सांकर्य तो सुव्यवस्थित रूप में अधिगत हो ही जाता है । यदि सच पूछा जाय तो ठीक रूप में काव्य की संज्ञा उसे ही प्राप्त हो सकती है जिसकी रचना का उद्देश्य रसनिष्पत्ति हो और उसमें रसप्रवण अलङ्कारों का चमत्कारों की दृष्टि से प्रयोग किया गया हो । द्वितीय उद्योत में बहुत विस्तार के साथ दिखलाया जा चुका है कि समीक्षा पूर्वक सन्निविष्ट किये हुये अलङ्कार ही रसपोषक होते हैं । वहां यह भी बतलाया जा चुका है कि रस के उद्देश्य से अलङ्कारों के निबन्धन में किस प्रकार की समीक्षा से काम लेना चाहिये । वहां पर 'विवक्षा-तत्परत्वेन' इत्यादि कारिकाओं की व्याख्या के अवसर पर जो उदाहरण दिये गये थे उन्हीं में वाच्यालङ्कार और रसध्वनि भेद के सांकर्य के उदाहरण भी सन्निविष्ट हैं और उनमें रसध्वनि तथा वाच्यालङ्कार की संसृष्टि भी मिल जाती है । जैसे 'चलापाङ्गां दृष्टिम्' इस
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उदाहरण को लीजिये । इसकी विस्तृत व्याख्या द्वितीय उद्योत की १९ वीं कारिका मे की जा चुकी है । वहाँ यह भी बतलाया गया था कि इसमें मतान्तर से रूपक से युक्त व्यतिरेक भी हैं । वह रूपकव्यतिरेक शृंगाररस का अनुग्राहक है । अतः रूपक व्यतिरेक और शृंगार ध्वनि का वहाँ पर अनुगृह्यानुग्राहक भाव संकर है । उस पद्य मे प्रमुख रूप मे स्वभावोक्ति अलंकार है । अतः स्वभावोक्ति और शृंगार रस का एकाश्रयानुप्रवेश संकर है । एक दूसरी गाथा है 'उत्पह जाओ' इसकी व्याख्या तृतीय उद्योत की ४० वीं कारिका में की जा चुकी है । वहाँ यदि प्रकरण का ज्ञान न हो तो यह निश्चय नहीं किया जा सकता कि वहाँ पर पामरों के स्वभाव का कथन किया गया है या रसध्वनि है । क्योंकि गाथा से दोनों बातें सिद्ध होती हैं । इस प्रकार इस गाथा मे रसध्वनि और वाच्यार्थोलेकार का सन्देहसङ्कर है ।
(ध्वन्यालो) प्रभेदान्तराणामपि कदाचित्सङ्कीर्णत्वं भवत्येव । यथा ममैव— या व्यापारवती रसान् रसयितुं काचिद्वित्कवीनां नवा हस्त्र्या परिणिष्ठितार्थविषयोसेषा च वैपश्चिती । ते दे अप्यवलबल्गु विश्वमनिशं निर्वर्णयन्तो वयं शान्ता नैव च लब्धसदृशश्रयन्तद्रूक्तितुल्यं सुखदम् ॥
इत्यत्र विरोधालङ्कारसमर्थनतरसङ्क्रमितवाच्यस्य ध्वनिप्रभेदस्य सङ्कीर्णत्वम् ।
(अनु०) दूसरे प्रभेदों का भी कदाचित् संकीर्णत्व होता ही है । जैसे मेरा ही—
'हे समुद्रशायी भगवान् ! जो रसों को आस्वादमय बनाने के लिये व्यापारवाली कवियों की कोई नवीन दृष्टि और जो परिणिष्ठित अर्थविषय का उन्मेष करनेवाली विद्वानों की दृष्टि उन दोनों का अवलम्ब लेकर निरन्तर विश्व का वर्णन करते हुए हम शान्त हो गये; किन्तु तुम्हारी भक्ति के समान सुख प्राप्त नहीं हुआ ।'
यहाँ पर विरोधालङ्कारों का अर्थान्तर संकीर्णमितवाच्य नामक ध्वनि प्रभेद से संकोर्णत्व है ।
(क्रो०) यद्यपि सङ्कीर्णा रसमवश्रयमनुगृह्णीते, तथापि 'रसनिरूपणैपषिता' इतियदभिप्रायेणोकं तत् सङ्कीर्णरासम्भवात् संसृष्टिरेवालङ्कारेण रसध्वने: । यथा 'बाहुलतिकापाशेन वद्धवा दृढम्' इत्यत्र । प्रभेदान्तराणामपोती । रसादिध्वनिव्यतिरिक्कानाम् । निष्ठादनप्राणो हि रस इत्युक्तम् । तत्र विभावादियोजकानाम् वर्णनात्, ततः प्रभृति घटनापर्यन्ता किया व्यापारः, तेन सततयुक्ता । रस्यमानतासारान् स्थायिभावान् रसयितुं रस्यमानतापत्तियोग्यगवान् कर्तुम् । लोकवार्तापतितबोधावस्थात्यागेनोन्मीलनतो । अत एव ते कवयः वर्णनायोगात् तेषाम् । न वेति । क्षणे क्षणे नूतनैरूतैर्नैवचित्रयेजगन्त्यस्मृत्रयन्ती । दृष्टिरिरिति प्रतिबिम्बरुपा, तत् दृष्टिश्चक्षुष्प ज्ञानं पाडवायदि रसयितोति विरोधालङ्कारोद्द्योत एव न वा । तदनुगृहीतरुचि ध्वनेः, तथाहि चाक्षुष्य ज्ञानं नाविवक्षितमतनयमसम्भवा न वा ।
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भावात्। न चान्यपरम्, अपि त्वर्थान्तरे ऐन्द्रियकविज्ञानाभ्यासोल्लसिते प्रतिबिम्बलक्षणेर्ड्ये सङ्क्रान्तम्। सङ्क्रमणे च विरोधोज्जुप्राहक एव। तद्रक्ष्यत–‘विरोधालङ्कारेण’ इत्यादिना। या चैवंविधा दृष्टि: परिणिष्ठितोऽचल: अर्थविषये निश्चितेतव्ये उन्मेषो यस्या:। तथा परिणिष्ठते लोकप्रसिद्धेर्ड्ये न तु कविवदपूर्वस्मिन्नर्थे उन्मेषो यस्या: सा। विप्रचित्तामियं, वैपश्चित्ती। ते अवलम्ब्येति कवीनामिति वैपश्चित्तीति वचनेन नाहं कविर्न पण्डित इत्यात्मनो, नौद्धत्यं ध्वन्यते। अनात्मीयमपि दरिद्रग्रृहेवोपकरणतायन्वित आहुतमितन्मया दृष्टिद्वयमित्यर्थ:। ते ड्वे अपीति। न होकया दृष्ट्या सम्यङ् निर्वर्णनं निर्वंहति। विश्वमित्यशेषम् अनिशामिति। पुन: पुनरनवरतम्। निर्वर्णयन््तो वर्णनया तथा निश्चितार्थं वर्णयन्त: इदमित्थमिति परामर्शानुमानादिना निर्भय निर्वर्णनं किमत्र सारं स्यादिति तिलशस्तिलशो विचयन्। यच्च निर्वर्ण्यते तत्त्वलु मध्ये व्यापार्यमाणया मध्ये चाथविशेषपेषु निश्चितोन्मेषया निश्चितया दृष्ट्या सम्यङ्निर्वर्णितं भवति। वयस्मिति। मध्यातातदृष्ट्या हरणव्यसनिन इत्यर्थ:। श्रान्ता इति। न केवलं सारं न लब्धं यावत्त्यत खेद: प्राप्त इत्यभाव:। अत्र शब्ददृष्टुशब्दयो: अभिन्नत्वेनात्र योगानिद्रया तमते। एवं सारस्वरूपवेदि स्वरूपावस्थित इत्यर्थ:। श्रान्तस्य शयनस्थितं प्रति बहुमानो भवति। त्वद्रृकोति। त्वमेव परमात्मस्वरूपो विश्वसारस्तस्य भक्तिः श्रद्धादिपूर्वक उपासना क्रमजस्तदावेशस्तेन तुल्यमपि न लब्धमास्तां तावज्ज्जातीयम्।
एवं प्रथममेव परमेश्वरभक्तिभाग: कुतूहलमात्रावलम्बत्कविप्रामाणिकोभयवृत्ते: पुनरपि परमेश्वरभक्तिविश्वान्तरेव युक्तिते मन्वानस्येयमुक्तिः सकलप्रमाणपरिनिश्चितदृष्टादृष्टविषयविशेषं यत्सुखं, यदपि च लोकत्तरं रसचर्वणात्मकं तत् उभयतोऽपि परमेश्वरविश्वान्यनन्द: प्रकृत्यते। तदनन्दविग्रुणमात्रावभासो हि रसास्वाद इत्यक्तं प्राग्स्माभिः। लौकिकं तु सुखं ततोऽपि निष्कृष्टप्रायं बहतरद्रखानपानादितितात्पर्यम्। तत्रैव दृष्टशब्दापेक्षयैकपदानुप्रवेश: दृष्टमवलम्ब्य निर्वर्णनमितिविरोधालङ्कारो वाश्रीयताम्, अन्धपदलन्यायेन दृष्टशब्दबोऽड्यनन्तरितरसकृतवाच्यो वस्तु इत्येकतरनिश्चये नास्ति प्रमाणम्। प्रकारहयेनेपि हृदयतवात्। न च पूर्वत्राप्येवं वाच्यम्। न वा शब्देन शब्दशक्यतनुरणनतया विरोधस्य सर्वथालम्बनात्। (अनु.) यदपि अलङ्कार रस को अवश्य अनुगृहीत करते हैं तथाप ‘अत्यन्त निर्वहण की इच्छा नहीं होनी चाहिये’ यह जिस अभिप्राय से कहा गया है उसमें शङ्कर असम्भव होने से रसध्वनि की अलङ्कार के साथ संशृष्टि ही होती है। जैसे ‘बाहुलतिकापाश से दृढ़तापूर्वक बांधकर’ इसमें। ‘दूसरे प्रमेयों का भी-’ यह। रस इत्यादि की ध्वनि से व्यतिरिक्त ‘व्यापारवाली’ यह। यह कहा गया है कि रस का प्राण निस्सन्देह निष्पादन है। उसमें विभाव इत्यादि योजनात्मक वर्णना होती है। वहाँ से लेकर घटनापर्यन्त जो क्रिया होती है उसे व्यापार कहते हैं उससे निरन्तर युक्त। ‘रसों को’ यह। रस्यमानता या आस्वादन करना ही जिसका सार है इस प्रकार के स्थायिभावों को रसित करने के लिये अर्थात् रस्यमानता की
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प्राप्ति के योग्य बनाने के लिये। 'कोई' यह। लोकवर्ती में आये हुए बोध की अवस्था के त्याग के द्वारा उन्मीलित होनेवाले। अत एव वे कवि होते हैं क्योंकि उनका वर्णनना से योग होता है। 'नई' यह। क्षण क्षण में नई नई विचित्रताओं से जगत् को प्र+रवशित तथा गुम्फित करती हुई। 'दृष्ट' यह। अर्थात् प्रतिभारूप। उसमें दृष्ट अर्थात् चाक्षुष ज्ञान शाब्दव इत्यादि को रसित करती है यह विरोधालंकार है इसीलिये नई है। और ध्वनि से अनुगृहीत भी होती है, वह इस प्रकार—चाक्षुप ज्ञान अविवक्षित नहीं है क्योंकि उसमें अत्यन्त असम्भव होने का अभाव है। अन्यपरक भी नहीं है, अपितु ऐन्द्रियक विज्ञान के अभ्यास से उल्लसित प्रतिभान रूप अर्थ में संक्रान्त हो जाता है। और संक्रमण में विरोध अनुप्राहक ही होता है। वह कहेंगे—'विरोधालंकार' इत्यादि के द्वारा। और जो इस प्रकार की दृष्टि है: कि जिसका उन्मेष अर्थविषय में अर्थात् निश्चेतव्य विषय में परिणिष्ठित अर्थात् अचल है उसी प्रकार परिनिष्ठित अर्थात् लोकप्रसिद्ध अर्थ में कवि के समान पूर्व अर्थ में नहीं जिसका उन्मेष है। विपश्चितों अर्थात् विद्वानों की यह (दृष्टि) वैपश्चितां कहलाती है। 'उन दोनों का सहारा लेकर' यह। 'कवियों की ओर विद्वानों की' इस कथन से 'न मैं कवि हूँ न विद्वान् हूँ' इस प्रकार अपना अनौदर्य ध्वनित किया जाता है। अर्थात् अपना न होते हुए भी दरिद्र गृह में उपकरण के रूप में दूसरे स्थान से यह दो दृष्टियाँ मैं लाया हूँ। 'उन दोनों को भी यहाँ केवल एक के द्वारा ठीक निर्वर्णन का निर्वाह नहीं होता है। 'निरन्तर' यह। बार-बार निरन्तर। निर्वर्णन करते हुए अर्थात् वर्णना के द्वारा तथा निश्चित अर्थ का वर्णन करते हुए 'यह इस प्रकार है' यह परामर्श और अनुमान इत्यादि के द्वारा विभक्त करके निर्वाचन करना, यहाँ क्या सार होगा ? यह तिल-तिल करके चयन करना।
और जिसका निर्वर्णन किया जाता है वह निस्सन्देह मध्य में व्यापारित की जानेवाली और मध्य में अर्थविशेषों में निश्चित उन्मेषवाली, निश्चल दृष्टि से ठीक रूप में निर्वर्णित हो जाता है। 'हम' यह। अर्थात् मिथ्या और तत्त्व दृष्टि से आहरण का व्यवसाय रखनेवाले। 'श्रान्त' यह। भाव यह है न केवल सार ही प्राप्त नहीं कर पाया प्रस्तुत खेद भी प्राप्त किया। यहाँ पर 'च' शब्द 'तु' शब्द के अर्थ में है। 'अभिधान' यह। अर्थात् इसीलिये योगनिद्रा से तुम सारस्वरूप को जाननेवाले और अपने स्वरूप में ही स्थित हो। थके हुये के प्रति बहुमान होता है। 'तुम्हारी भक्ति' यह। तुम्हें परमात्मस्वरूप विश्वसारहो उसकी श्रद्धापूर्वक उपासना इत्यादि के क्रम से उत्पन्न जो भक्ति उसके जो आवेश उसके तुल्य भी प्राप्त नहीं किया तज्जातीय की तो बात दूर रही।
इस प्रकार पहले ही परमेश्वर की भक्ति से युक्त तथा कुतूहल मात्र से कवि तथा प्रामाणिक दोनों की वृत्ति का अवलम्ब लेनेबाले फिर भी परमेश्वर की भक्ति में विश्रान्ति ही उचित है ऐसा माननेवाले की यह उक्ति है। समस्त प्रमाणों से परिनिष्ठित दृष्टि और अदृष्ट विषय की विशेषता से उत्पन्न जो रसचर्वणात्मक लोकोत्तर सुख उन दोनों से परमेश्वर-विश्रान्ति का आनन्द प्रकृष्ट हो जाता है हमने यह पहले ही कहा था कि उस आनन्द के विन्दुमात्र का अवभास ही रसास्वाद है। लौकिक सुख तो उससे भी निकृष्टप्राय है क्योंकि
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उसमें बहुत से दुःखों का अनुस्मरण हो जाता है यह तात्पर्य है। वहाँ पर दृष्ट शब्द की अपेक्षा से एकपदानुप्रवेश हो जाता है। अथवा दृष्टि का आश्रय लेकर निर्वर्णन करने में विरोधालंकार का आश्रय ले लिया जाय। अथवा अन्धशब्दन्याय से दृष्टिशब्द अत्यन्त तिरस्कृत वाच्य हो जाय इसमें एक के निश्चय में प्रमाण नहीं हैं क्योंकि दोनों प्रकारों से हृद्यता आ जाती है। यह नहीं कहा जा सकता कि पहले भी ऐसा कहना चाहिए। क्योंकि वहाँ पर नवा शब्दशक्तिमूलक अनुरणन होने के कारण वहाँ विरोध का सर्वथा आलम्बन लिया जाता है।
तारावती—ऊपर वाच्यालंकार और रसध्वनि के तीनों प्रकार के संकर को व्याख्या की जा चुकी है। अब रसध्वनि और अलंकार की संसृष्टि पर विचार करना है। वस्तुतः जितने भी अलंकार होते हैं वे रस को अवश्य ही अनुग्रहीत करते हैं तथापि कुछ अलंकार ऐसे अवश्य होते हैं जिनके निर्वन्धन में कवि का मन्तव्य अलंकार निर्वन्धन ही होता है। इसीलिये तो रसपोषक अलंकारों का उपदेश देते हुए आचार्य ने कहा है कि ‘अलंकार की योजना करने में इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि जिस अलंकार की योजना में कवि का ध्यान अलंकार के निर्वहण की ओर होता है वह अलंकार रसपोषक नहीं होता। इससे सिद्ध होता है कि कुछ अलंकार ऐसे भी होते हैं जो रसध्वनि को पुष्ट नहीं करते। ऐसे अलंकारों का रसध्वनि से संकर हो ही नहीं सकता।
जैसे उसी प्रकरण में ‘नातिनिर्वहणेष्टिता’ का उदाहरण दिया गया था—‘कोपार्कोमललोलबाहुलिकापाशेन बद्धवा दृढम्’ इत्यादि। यह बतलाया गया था कि यदि ‘बाहुलिकापाशेन’ इस रूपक का निर्वाह किया जाय तो नायिका पर व्याघ्रबन्ध का आरोप करना होगा। इस प्रकार का रूपक रस का पोषक नहीं होगा अपितु उसकी रसध्वनि से संसृष्ट ही होगी। इस प्रकार वाच्यालंकार की रसध्वनि से संसृष्टि और संकर के तीन भेद, इन चारों भेदों की व्याख्या की गई।
जिस प्रकार वाच्यालंकार की संसृष्टि और संकर रसध्वनि के साथ होते हैं उसी प्रकार अन्य भेदों के साथ भी उनका सांकर्य हो सकता है। उदाहरण के लिये आनन्दवर्धन का ही पद लीजिये—इसका भाव यह है कि ‘एक तो हम कवियों की किसी नवीन दृष्टि का आश्रय लेकर विश्व का निर्वर्णन करते रहे जो दृष्टि निरन्तर रसों को आस्वादमय बनाने के लिये व्यापारमयी रहती है, दूसरे हमारी दृष्टि प्रामाणिकों की दृष्टि का आश्रय लेकर निश्चित वस्तुओं के प्रकथन में दृढता से जमी रही। इन दोनों दृष्टियों का अवलम्बन लेकर हमने निरन्तर ही विश्व का निर्वर्णन किया और इस कार्य में हम श्रान्त हो गये किन्तु हे क्षीरसागरशायी भगवान् ! हम आपकी भक्ति के समान सुख कहीं भी प्राप्त नहीं कर पाये।
अब इस पद्य के शब्दों के प्रयोग पर विचार कीजिये—इसमें कवियों की दृष्टि को व्यापारवाली कहा गया है और इस व्यापार का उद्देश्य बतलाया गया है रसों को आस्वाद-
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योग्य बनाना। यह पहले ही बतलाया जा चुका है कि रसों का प्राण होता है निष्पादन या 'निष्पत्ति'। यह निष्पत्ति इसी प्रकार होती है कि पहले उसमें विभाव अनुभाव और संचारीभाव इस रस सामग्री की संयोजना की जाती है और उस संयोजना को ही वर्णन का विषय बनाया जाता है। फिर उस वर्णन के लिये उचित शब्द और अर्थ की सङ्क्रुटना की जाती है। इस प्रकार सङ्क्षित हुए शब्द अर्थ के माध्यम से जब विभाव, अनुभाव और संचारीभाव से सम्बन्धित रसों को समर्पित किया जाता है तब ठीक रूप में रसनिष्पत्ति हो पाती है। इस रसनिष्पादन की क्रिया में कवि वाणी निरन्तर ही प्रवृत रहती है। यहाँ पर रस शब्द का अर्थ है स्थायीभाव। क्योंकि स्थायीभाव का सार ही उनमें रसनीयता उत्पन्न करता है। रति इत्यादि भाव जब विभावादिरहित होते हैं तब उन्हें स्थायीभाव कहते हैं और जब उनमें विभावादि के योग से आस्वादनीयता उत्पन्न हो जाती है तब उसे रस कहने लगते हैं। स्थायीभाव को आस्वादयोग्य बनाने में कवि की वाणी निरन्तर क्रियाशील रहती है। यह्ही 'व्यापारवती' इस विशेषण का आशय है। 'कोई' 'काचित्' यह दृष्टि का दूसरा विशेषण है। इसका आशय यह है कि यह दृष्टि अभूतपूर्व तथा आश्चर्यजनक है। यह वही दृष्टि नहीं है जो कि लौकिक वस्तुओं को देखने के काम में लाई जाती है। लोक में दृष्टि के अन्दर जो वस्तु आ पड़ती है उसका बोध हो जाता है, किन्तु कवि की दृष्टि लोकवार्ता में आ पड़नेवाली बोध की व्याख्या को पीछे छोड़कर नवीन रूप में परिणत होती है और उसी दृष्टि का आशय लेकर कवि लोग विश्व का वर्णन करते हैं। कवि शब्द का भी यही अर्थ है। 'कवि' शब्द 'कव् वर्णे' इस धातु से निष्पन्न हुआ है तथा इसका आशय है 'लोकोत्तर रूप में वर्णन करनेवाला'। यह दृष्टि का तीसरा विशेषण है 'नई' 'नवा'। इसका आशय यह है कि कवि की दृष्टि प्रत्येक क्षण पर विश्व को नये रूप में देखती और प्रकाशित करती है। कवि अपनी दृष्टि से प्रतिक्षण नई-नई विचित्रताओं का आशय लेकर लोक-लोकोत्तर तत्त्व का जिस रूप में शुम्फन करता है वह सर्वथा अद्वितीय तथा लोकोत्तरकान्त रूप में अवस्थित होता है। दृष्टि का आशय है प्रतिभा। कवि की दृष्टि प्रतिभारूपिणी ही होती है जिससे वह नई कल्पना करके विश्व को नये रूप में ही दिखलाने की चेष्टा करता है। 'कवि की दृष्टि रसों को आस्वादामय बनाने में सर्वदा क्रियाशील रहती है' इस कथन में विरोधाभास अलङ्कार है। दृष्टि तो चाक्षुष प्रत्यक्षीकरण हो है। वह सरसता सम्पादन का कार्य करे हो नहीं सकती। सरस बनाने का अर्थ तो यह है कि खाद्य इत्यादि पेय अथवा दूसरे प्रकार के लेढ़ चोष्य भोज्य इत्यादि पदार्थ बनाये जावें उनमें चीनी कपूर इत्यादि डालकर उनको सरस बना देना ही सरसता सम्पादन कहा जाता है। यह कार्य दृष्टि का हो ही नहीं सकता। अतः यहाँ पर विरोध है। किन्तु जब दृष्टि का अर्थ कविप्रतिभा ले लिया जाता है और उससे लौकिक पदार्थों में रस का संचार कर कविता का रूप प्रदान करने का अर्थ किया जाता है तब विरोध जाता रहता है। अतः यह विरोधाभास अलङ्कार है। इसी प्रकार यहाँ ध्वनि की भी व्याख्या की जा सकती है। यहाँ पर 'दृष्टि' को देखकर वर्णन करने में दृष्टि का अर्थ सर्वथा बाधित नहीं है। क्योंकि कवि को भी तो लौकिक पदार्थों का चाक्षुष साक्षात् करके
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ही अपनी कल्पना की भित्ति करनी पड़ती है। इसप्रकार दृष्टि को हम अत्यन्त तिरस्कृत वाच्य नहीं कह सकते। कारण यह है कि यह शब्द सर्वथा अपने अर्थ को छोड़कर अन्य अर्थ का ही बोधक नहीं हो जाता। किन्तु यहां पर अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य ध्वनि हो जाती है। क्योंकि इस शब्द का यहां पर अर्थ हो जाता है ऐसो कविप्रतिभा जिसमें लौकिक विभिन्न वस्तुओं का ऐन्द्रिय विज्ञान भी स्फुटिविष्ट हो और उस ऐन्द्रिय ज्ञान का निरन्तर अभ्यास करने के कारण प्रतिभा में एक चमत्क आ गयी हो। इस प्रकार दृष्टि का अर्थ यहां पर अत्यन्त-तिरस्कृत न होकर अर्थान्तरसंक्रमित हो जाता है और इस प्रकार यहां पर अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य ध्वनि हो जाती है। इस अर्थान्तरसंक्रमण में सहयोग और सहायता उक्त विरोधालंकार से भी मिलती है। अतः विरोधालंकार और अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य ध्वनि का यहां पर अनु-ग्राह्यानुग्राहकभाव संकर है। यही बात मूल में आनन्दवर्धन ने कहीी है। यह तो हो गयी एक प्रकार की दृष्टि की बात जिसके द्वारा कवि नई-नई उद्भावनायें और कल्पनायें करके विश्व को नवीन रूप में हो प्रदर्शित करता है। अब दूसरे प्रकार की दृष्टि को लीजिये। यह दृष्टि विद्वानों की दृष्टि होती है। इसमें नवीन कल्पनाओं का अवसर नहीं होता और न नये विश्व की उद्भावना ही की जाती है, किन्तु जिस प्रकार का है उसका ठीक रूप में वैसा ही उद्घाटन किया जाता है। वस्तुतः संसार रहस्यों से भरा हुआ है। यह एक जादू की पिटारी है। इसको खोलना सामान्य व्यक्ति का काम नहीं। यह तो वस्तुतः विद्वानों के ही समझने और निरुपित करने की वस्तु है। अतः विद्वान् लोग जिस दृष्टि का सहारा लेकर विश्व के रहस्यों का उद्घाटन करते हैं वह दूसरे प्रकार की दृष्टि होती है। यहां पर इस दृष्टि के लिये विशेषण दिया गया है—‘परिनिष्ठितार्थविषयोनमेषा’ इसमें बहुव्रीहि समास है। और इसकी व्युत्पत्ति दो प्रकार से की जा सकती है—एक के अनुसार परिनिष्ठित शब्द अर्थ-विषय का विशेषण होगा। प्रथम व्युत्पत्ति यह होगी —अर्थ विषय अर्थात् निश्चितेध्य विषय का उन्मेष अर्थात् निरूपण जिसका परिणिष्ठित है अर्थात् जिसका निरूपण सर्वदा निश्चित और एकरूप ही रहता है कवियों के समान नवनवोन्मेषशालिनी नहीं होती। दूसरा व्युत्पत्ति यह होगी—जिसका निरूपण परिनिष्ठित अर्थविषयक ही होता है अर्थात् जो दृष्टि कल्पित संसार का निरूपण नहीं किया करती अपितु दृश्यमान जगत् जिस प्रकार का है उसी प्रकार का उसका वर्णन किया करती है। ‘इन दोनों दृष्टियों का सहारा लेकर’ कहने का आशय यह है कि एक दृष्टि तो कवियों की है और दूसरी विद्वानों की। हमारी दृष्टि इनमें कोई नहीं। न मैं कवि हूँ न विद्वान्। किन्तु जैसे दरिद्र के घर में अपना कुछ भी नहीं होता; वह अवसर पड़नेपर इधर-उधर से कुछ वस्तुओं को मांगकर अपना घर सजा लेता है। उसी प्रकार कवियों और विद्वानों दोनों की दृष्टियों में मेरी कोई अपनी दृष्टि नहीं है। मैं तो इधर-उधर से कुछ ले-लिवाकर विश्व का वर्णन करने लगा हूँ। इस कथन से अपने औद्धत्य का निराकरण हो जाता है। यहां पर जगत् के लिये विश्व शब्द का प्रयोग किया गया है। विश्व शब्द का एक अर्थ और है —समस्त, इस प्रकार इसका आशय यह है कि हम निरन्तर ही बार-बार समस्त विश्व का वर्णन करने में लगे रहते हैं। समस्त विश्व का पूर्ण रूप से वर्णन न तो केवल काल्पनिक दृष्टि से सम्भव है और न केवल पारमार्थिक दृष्टि से। अतः हम समस्त विश्व का वर्णन दोनों दृष्टियों
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का आश्रय लेकर किया करते हैं। हम इस विश्व का निर्वर्णन अर्थात् विशेष रूप में वर्णन किया करते हैं। निर्वर्णन में दोनों दृष्टियों की आवश्यकता होती है एक तो कविकृत वर्णना की क्योंकि यह बतलाया जा चुका है कि कवि शब्द की निष्पत्ति ही वर्णनार्थक 'कव्' धातु से होती है। दूसरी दृष्टि है विद्वानों की। इस अर्थ में निर्वर्णन का अर्थ होगा निश्चितार्थ का वर्णन। यहाँ 'निः' उपसर्ग का अर्थ है निश्चित। आशय यह है कि हम कविवर्णना के अतिरिक्त निश्चितार्थ का भी वर्णन करते हैं जिसमें व्याप्तिग्रह, लिङ्गुपरामर्श आदि अनुमान की सारी प्रक्रिया सन्निविष्ट रहती है और हम प्रत्येक वस्तु के विभिन्न तत्वों को पृथक् पृथक् करके समझाते हैं कि अमुक वस्तु को बनानेवाले विभिन्न पदार्थ कौन-कौन से हैं। हम यह भी दिखलाते हैं कि किसी वस्तु का सार क्या है और उसको तिलतिल करके पृथक् पृथक् कर उनको सङ्कलित करके समझाते हैं। (आशय यह है कि एक ओर तो हम तर्क का आश्रय लेकर वस्तुतत्व की वास्तविकता का निर्वचन किया करते हैं और दूसरी ओर वैज्ञानिक पद्धति का आश्रय लेकर हम किसी पदार्थ के सार, उसके पृथक्-पृथक् निर्माणिक तत्व और उन तत्वों से किसी वस्तु के निर्माण की प्रक्रिया को समझाया करते हैं। यह सब वैपश्चित्ती बुद्धि की ही क्रिया है। जिस वस्तु का ठीक रूप में वर्णन करना हो उसके प्रकथन करने में बीच-बीच में स्थायीभावों की रसनात्मकता के सम्पादक के व्यापार से उसमें भावात्मक सम्बन्ध स्थापित किया जाता है और उसी बीच में विशेष अर्थों का निर्देशात्मक उल्लेख किया जाता है। इसी प्रकार किसी वस्तु का ठीक-ठीक निर्वचन हो सकता है। 'हम' 'व्यम्' इस कर्ताकारक से व्यक्त होता है कि हमारा यह व्यसन ही है कि कभी मिथ्या (काल्पनिक) दृष्टि से और कभी तत्व दृष्टि से इधर-उधर का कुछ खींच-खाँच कर विश्व का वर्णन करते रहें। किन्तु इस व्यसन से हमें लाभ क्या हुआ? विवेचन करते-करते थक गये कि हमें इस विश्व का सार प्राप्त हो न हो सका। केवल इतना ही नहीं कि हमें इसका सार नहीं मिला; अपितु हमारी बहुत बडी हानि यह हुई कि हमें अत्यधिक कष्टों का सामना करना पड़ा। हे भगवान् आप क्षीरसागर में सोनेवाले हैं और हम थके हुये हैं। जो व्यक्ति थक जाता है वह ऐसे व्यक्ति का ही तो सम्मान करता है जो सो रहा है। इस प्रकार यहाँ पर हे अनिघश्रयन ! यह सम्बोधन सामान्य है। इस सम्बोधन का दूसरा प्रयोजन यह है कि हम प्रत्येक प्रकार से विश्व का सार ग्रहण करना चाहते हैं; किन्तु हमें कहीं सार के दर्शन होते ही नहीं। किन्तु उस सार का आकर तो हे भगवान् आप ही हैं। आपका यह शयन योगनिद्रा का परिचायक है। योगमाया का आश्रय लेकर आप शयन करते हैं और योगमाया के आश्रय से ही एकमात्र आप ही संसार के सार को भलीभाँति जानते हैं तथा अपने स्वरूप में अवस्थित रहते हैं। केवल आप ही परमात्मस्वरूप हैं; विश्व का सार है। आपकी उपासना जब श्रद्धापूर्वक की जाती है तब उसी क्रम से हमारे अन्दर भक्ति उत्पन्न हो जाती है और भगवद्विषयक प्रेमाधिक्य जब हमारे अन्तःकरणों में सञ्चरित हो जाता है तथा हमारे अन्तःकरण की वृत्तियाँ जब भगवदाकार रूप में ही परिणत हो जाती हैं उस समय हमें जितना सुख प्राप्त होता है उस सुख के तुल्य भी सुख हमें समस्त विश्व के निर्वचन में प्राप्त नहीं होता; यह तो कहने की आवश्यकता ही नहीं कि हमें
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तज्जातीय सुख विश्व में नहीं मिलता । ऊपर जो कुछ कहा गया है उससे सिद्ध होता है कि यह कथन किसी ऐसे व्यक्ति का है जो पहले से ही परब्रह्म परमात्मा की भक्ति से ओतप्रोत रहा है; वह कवि भी बना है और प्रामाणिक भी । किन्तु ये दोनों वृत्तियाँ उसने केवल अपनी कौतूहलवृत्ति शान्त करने के लिये ही स्वीकार की है । सब कुछ कर चुकने के बाद उसे ज्ञात हो गया है कि संसार में सार नहीं है । यदि कहा सार है तो वह परमात्मा में ही मिलता है । अतः मनुष्य के लिये विधेय भगवद्भक्ति ही है । यह मानकर ही प्रस्तुत कथन किया गया है । इसका सारांश यही है कि समस्त प्रकरणों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विश्व को विशेषताओं का जितना भी निश्चय किया जाता है और उससे जो भी सुख मिलता है अथवा रसचर्वणाजन्य जितना भी लोकोत्तर सुख मिलता है वह समस्त सुख मिलकर भी परमेश्वरानन्द के समक्ष नहीं हो सकता, परब्रह्मानन्द इन दोनों प्रकार के सुखों से अत्यधिक प्रकृष्ट होता है । यह तो हम पहले ही बतला चुके है कि ब्रह्मानन्द का जो बिन्दुमात्र अवभास या प्रतीति है वही रसास्वाद है । जब रसास्वाद की यह दशा है तब लौकिक आनन्द का तो कहना ही क्या ? लौकिक आनन्द तो रसास्वाद की अपेक्षा भी निम्नतिनिम्न कोटि का होता है । क्योंकि रसास्वाद आनन्दघनमय होता है और लौकिक आनन्द में अनेक दुःखों का संसर्ग रहता है । अब इसमें तीनों प्रकार के सङ्कर को समझ लीजिये—पहले दृष्टि से रससञ्चार में विरोधाभास और दृष्टि शब्द में अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य की व्याख्या की जा चुकी है और इनका अनुग्राह्यानुग्राहक भाव सङ्कर भी बतलाया जा सकता है । अब निश्चित वर्णनपरक दृष्टि शब्द को लीजिये । क्या यहाँ विरोधाभास अलङ्कार माना जाय या जैसे—‘निश्वासान्ध इवर्दशः’ में अन्ध शब्द की भान्ति अत्यन्ततिरस्कृत वाच्य माना जाता है उसी प्रकार यहाँ पर भी दृष्टि शब्द अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य माना जाय ? विरोधाभास और तिरस्कृतवाच्य में किसको माना जाय इस विषय में कोई प्रमाण नहीं हैं । क्योंकि दोनों ही प्रकारों के मानने में बलत्कार की समान प्रतीति होती है और दोनों ही प्रकार हृदय तथा आनन्ददायक है । इस प्रकार इस दूसरे दृष्टि शब्द में सन्देह सङ्कर है । इस प्रकार इस एक ही पथ्य में सङ्कर के तीनों प्रकार मिल जाते हैं । प्रथम कविसमयबन्धिनी दृष्टि में अनुग्राह्यानुग्राहकभाव और एकग्यवधानुप्रवेश सङ्कर तथा वैपश्चित्ती दृष्टि में सन्देह सङ्कर । यहाँ यह पूछा जा सकता है कि कविसमयबन्धिनी दृष्टि में सन्देह सङ्कर क्यों नहीं माना जाता । इसका उत्तर यह है कि पहले दृष्टि शब्द के लिए ‘नई’ ‘नवा’ यह विशेषण दिया गया था । अतः इस ‘नई’ शब्द की व्याख्या करने के लिए शब्दशक्तिमूलक अनुरणन रूप व्यञ्जना विरोधालङ्कार का आश्रय लेना ही पड़ेगा । ऐसी दशा में एक ओर निर्णय का हेतु अधिगत हो जाने से वहाँ पर सन्देह सङ्कर का अवसर ही नहीं रहा ।
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(ध्वन्या०) वाच्यालङ्कारसंशृटत्वं च पदापेक्षयैव । यत्र हि क्रानिचित् पदानी वाच्यालङ्कारभाजि कानिचिच्च ध्वनिप्रभेदयुत्तानि ।
(अनु०) और वाच्यालङ्कार संशृटत्व पद की अपेक्षा ही होता है । जहाँ निस्सन्देह
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कुछ पद वाच्यालङ्कार से युक्त होते हैं ओर कुछ ध्वनिप्रभेद से युक्त ।
कुछ पद वाच्यालङ्कार से युक्त होते हैं ओर कुछ ध्वनिप्रभेद से युक्त ।
सकलवाक्ये हि यत्रलङ्कारोऽपि वाच्यार्थोऽपि प्रधानं तदानुप्राह्यग्राहकत्वसङ्करस्तद्भावे त्वसत्त्वित्यलङ्कारे वा ध्वनिना वा पर्यायेण ग्राह्यामि वा युगपत्पदार्थविश्रान्ताभ्या भाव्यमिति त्रयो भेदा: ।
सकलवाक्ये हि यत्रलङ्कारोऽपि वाच्यार्थोऽपि प्रधानं तदानुप्राह्यग्राहकत्वसङ्करस्तद्भावे त्वसत्त्वित्यलङ्कारे वा ध्वनिना वा पर्यायेण ग्राह्यामि वा युगपत्पदार्थविश्रान्ताभ्या भाव्यमिति त्रयो भेदा: ।
एतदङ्गभूतिकृत्य सावधारणमाह—पदापेक्षयैवेतित । यत्रानुप्राह्यानुग्राहकभावे ग्राहकभावं प्रत्यारोपि नावतरति तं तृतीयमेव प्रकारमुदाहरतुंमुपक्रमते —यत्र हि यति: ।
एतदङ्गभूतिकृत्य सावधारणमाह—पदापेक्षयैवेतित । यत्रानुप्राह्यानुग्राहकभावे ग्राहकभावं प्रत्यारोपि नावतरति तं तृतीयमेव प्रकारमुदाहरतुंमुपक्रमते —यत्र हि यति: ।
यस्माच्चात्र कानिचिदलङ्कारभाजौ कानिचिद्ध्वनियुक्तास्तत्सङ्करान्तर्गततथाविधपदार्थापेक्षयैव वाच्यालङ्कारसंसृष्टत्वमित्यावृत्त्या पूर्वग्रन्थेन सम्बन्ध: कर्त्तव्य: । अत्र हि ।
यस्माच्चात्र कानिचिदलङ्कारभाजौ कानिचिद्ध्वनियुक्तास्तत्सङ्करान्तर्गततथाविधपदार्थापेक्षयैव वाच्यालङ्कारसंसृष्टत्वमित्यावृत्त्या पूर्वग्रन्थेन सम्बन्ध: कर्त्तव्य: । अत्र हि ।
अत्रत्यो हि श्लोको मैत्रीपदमित्यस्याऽनन्तरं योज्य इति ग्रन्थसङ्कृति: ।
अत्रत्यो हि श्लोको मैत्रीपदमित्यस्याऽनन्तरं योज्य इति ग्रन्थसङ्कृति: ।
(अनु०) इस प्रकार तीन प्रकार के सङ्कर का उदाहरण देकर संसृष्टि का उदाहरण दे रहे हैं—'वाच्य' यह ।
(अनु०) इस प्रकार तीन प्रकार के सङ्कर का उदाहरण देकर संसृष्टि का उदाहरण दे रहे हैं—'वाच्य' यह ।
यदि समस्त वाक्य में अलङ्कार भी और व्यङ्ग्यार्थ भी प्रधान हो तो अनुप्राह्यानुप्राहक सङ्कर होता है । उसके अभाव में तो असङ्कृति हो हो जायेगी, अत: पर्याय से अलङ्कार को अथवा ध्वनि को अथवा दोनों को एक साथ पदविश्रान्त होना चाहिये ।
यदि समस्त वाक्य में अलङ्कार भी और व्यङ्ग्यार्थ भी प्रधान हो तो अनुप्राह्यानुप्राहक सङ्कर होता है । उसके अभाव में तो असङ्कृति हो हो जायेगी, अत: पर्याय से अलङ्कार को अथवा ध्वनि को अथवा दोनों को एक साथ पदविश्रान्त होना चाहिये ।
इस प्रकार तीन भेद होते हैं । इसको गर्भित करके अवधारण के साथ कह रहे हैं—'पद को अपेक्षा से' यह ।
इस प्रकार तीन भेद होते हैं । इसको गर्भित करके अवधारण के साथ कह रहे हैं—'पद को अपेक्षा से' यह ।
जहाँ अनुप्राह्यानुप्राहक भाव के प्रति आशङ्का भी अवतार्ण नहीं होती उस तृतीय प्रकार का उदाहरण देते के लिये ही उपक्रम करते हैं—'जहाँ निस्सन्देह' यह ।
जहाँ अनुप्राह्यानुप्राहक भाव के प्रति आशङ्का भी अवतार्ण नहीं होती उस तृतीय प्रकार का उदाहरण देते के लिये ही उपक्रम करते हैं—'जहाँ निस्सन्देह' यह ।
क्योंकि जहाँ कुछ पद अलङ्कार से युक्त होते हैं जैसे 'दीर्घी कुरव्न्' इत्यादि में ।
क्योंकि जहाँ कुछ पद अलङ्कार से युक्त होते हैं जैसे 'दीर्घी कुरव्न्' इत्यादि में ।
उस प्रकार के पद की अपेक्षा से ही वाच्यालङ्कारसंसृष्टत्व होता है ।
उस प्रकार के पद की अपेक्षा से ही वाच्यालङ्कारसंसृष्टत्व होता है ।
इस प्रकार आवृत्ति से पूर्व ग्रन्थ से सम्बन्ध कर लेना चाहिये । 'यहाँ निस्सन्देह' यह ।
इस प्रकार आवृत्ति से पूर्व ग्रन्थ से सम्बन्ध कर लेना चाहिये । 'यहाँ निस्सन्देह' यह ।
यहाँ का 'निस्सन्देह' 'हि' शब्द 'मैत्री पद' इसके बाद जोड़ा जाना चाहिये यह ग्रन्थ की सङ्कृति है ।
यहाँ का 'निस्सन्देह' 'हि' शब्द 'मैत्री पद' इसके बाद जोड़ा जाना चाहिये यह ग्रन्थ की सङ्कृति है ।
तारावती—ऊपर सङ्कर के तीनों भेदों के उदाहरण दे दिये गये । अब यह दिखलाया जायेगा कि वाच्यालङ्कार की ध्वनि से संसृष्टि किस प्रकार होती है ?
तारावती—ऊपर सङ्कर के तीनों भेदों के उदाहरण दे दिये गये । अब यह दिखलाया जायेगा कि वाच्यालङ्कार की ध्वनि से संसृष्टि किस प्रकार होती है ?
उत्तर यह है कि वाच्यालङ्कार की ध्वनि से संसृष्टि भी पद को दृश्टिकोण में रखकर ही होती है ।
उत्तर यह है कि वाच्यालङ्कार की ध्वनि से संसृष्टि भी पद को दृश्टिकोण में रखकर ही होती है ।
सम्पूर्ण वाक्य में नहीं । क्योंकि यदि सम्पूर्ण वाक्य से ही किसी अलङ्कार की प्रतीति होगी और इसी से व्यङ्ग्यार्थ की भी प्रतीति होगी तो उनमें अनुप्राह्यानुप्राहक भाव साक्ष्य अनुवाय रूप से आ जायेगा ।
सम्पूर्ण वाक्य में नहीं । क्योंकि यदि सम्पूर्ण वाक्य से ही किसी अलङ्कार की प्रतीति होगी और इसी से व्यङ्ग्यार्थ की भी प्रतीति होगी तो उनमें अनुप्राह्यानुप्राहक भाव साक्ष्य अनुवाय रूप से आ जायेगा ।
आशङ्का यह है कि अलङ्कारों की अलङ्काररूपता तथा प्राप्त होती है जब व अलङ्कार रस को हो अलङ्कृत करते हैं ।
आशङ्का यह है कि अलङ्कारों की अलङ्काररूपता तथा प्राप्त होती है जब व अलङ्कार रस को हो अलङ्कृत करते हैं ।
अत: जब समासोक्त इत्यादि अलङ्कार सम्पूर्ण वाक्य से अवगत होते हैं और रसध्वनि में भी सम्पूर्ण वाक्य से ही होती है तब उनका अनुप्राह्यानुप्राहक भाव हो जाना स्वाभाविक ही है ।
अत: जब समासोक्त इत्यादि अलङ्कार सम्पूर्ण वाक्य से अवगत होते हैं और रसध्वनि में भी सम्पूर्ण वाक्य से ही होती है तब उनका अनुप्राह्यानुप्राहक भाव हो जाना स्वाभाविक ही है ।
यदि उनमें अनुप्राह्यानुप्राहक भाव न माना जाय तो उनका अलङ्कार होना ही असङ्कृत हो जायेगा ।
यदि उनमें अनुप्राह्यानुप्राहक भाव न माना जाय तो उनका अलङ्कार होना ही असङ्कृत हो जायेगा ।
अत: यह निश्चय ही है कि अलङ्कार तथा ध्वनि की संसृष्टि वहीं पर हो सकती है जहाँ अलङ्कार पद के आश्रित हो ।
अत: यह निश्चय ही है कि अलङ्कार तथा ध्वनि की संसृष्टि वहीं पर हो सकती है जहाँ अलङ्कार पद के आश्रित हो ।
(यहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिये कि पदबोध्य अलङ्कार रसोपकारक तो होता ही हो ।
(यहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिये कि पदबोध्य अलङ्कार रसोपकारक तो होता ही हो ।
अन्यथा उसमें अलङ्कारता ही नहीं आती । किन्तु केवल रसच्वनि हो तो नहीं होती ।
अन्यथा उसमें अलङ्कारता ही नहीं आती । किन्तु केवल रसच्वनि हो तो नहीं होती ।
दूसरी ध्वनियाँ भी तो होती हैं । पदाश्रित अलङ्कार उन्हीं रसात्मक रसध्वनियों के साथ संसृष्टि को प्राप्त होते हैं ।
दूसरी ध्वनियाँ भी तो होती हैं । पदाश्रित अलङ्कार उन्हीं रसात्मक रसध्वनियों के साथ संसृष्टि को प्राप्त होते हैं ।
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३
तृतीय उद्योत:
प्राप्त होता है। इस सृष्टि की तीन अवस्थायें सम्भव हैं—या तो अलङ्कार पदविग्रान्त हो या ध्वनि हो पदविग्रान्त हो अथवा दोनों एक साथ पदविग्रान्त हों। यही समझकर 'एव' शब्द का प्रयोग किया गया है, 'एव' शब्द का यहां पर अर्थ है अवधारण अर्थात् केवल पद की दृष्टि से हो सृष्टि हो सकती है वाक्य की दृष्टि से नहीं। जहां पदविग्रहित अलङ्कार में पर्यवसान होता है अथवा वहां यह शंका हो सकती है कि अलङ्कार और ध्वनि का कोई न कोई संकर हो। अतः यहां पर तृतीय प्रकार का ही उदाहरण दिया जा रहा है जहां ध्वनि और अलङ्कार दोनों को एक साथ पृथक् रूप में विश्रान्ति होती है। इस प्रकार की स्थिति में अनुग्राह्यानुग्राहक भाव या दूसरे प्रकार के सङ्कर की सम्भावना ही नहीं रहती। क्योंकि इसमें कुछ पद अलङ्कार से युक्त होते हैं और कुछ पद ध्वनि से युक्त होते हैं। यहां पर यह एक वाक्य है—'जहां निस्सन्देह कुछ पद वाच्यालङ्कारवाले होते हैं और कुछ ध्वनि के किसी प्रभेद से युक्त' यह वाक्य अधूरा मालूम पड़ता है। अतः इसकी सङ्घटना बैठाने के लिए इसका सम्बन्ध पूर्ववाक्य से कर देना चाहिये कि 'वहां उस प्रकार के पद की दृष्टि से ही वाच्यालङ्कार सृष्टत्व होता है।' इस वाच्यालङ्कार सृष्टत्व का उदाहरण दिया गया है 'दीर्घीकुर्वन्' इत्यादि मेधदूत के पद्य और लक्षण से इसकी सङ्घटना करने के लिए पद्य के बाद आलोककार ने लिखा है—'अत्र हि मत्रीपदमविवक्षितवाच्यो ध्वनि:'। इस पर लोचनकार ने लिखा है कि इस वाक्य का 'हि' शब्द 'मत्रीपदम्' के बाद जोड़ा जाना चाहिये। इससे यह वाक्य बन जाता है—'यहां मत्रीपद निस्सन्देह अविवक्षितवाच्य ध्वनि है।'
३
तृतीय उद्योत:
दीर्घीकुर्वन् पदुमदकलं कूजितं सारसानां, प्रत्युषेषु सरसिकमोदमन्त्रीकषायः । यत्र स्त्रियां हहरति सुरतग्लानिमङ्गनाकुलः सिप्रावातः प्रियतम इव प्रार्थनाचाटुकारः ॥
अत्र हि मत्रीपदमविवक्षितवाच्यो ध्वनि: । (अनु.) जैसे— 'सारसों के रमणीय तथा मद के कारण मधुर कूजन को निपुणतापूर्वक दीर्घ करते हुए, प्रातःकालों में खिले हुए कमलों की सुगन्धि से मत्री के कारण सुगन्धित, यमुना के अनु-कूल सिप्रा का वायु प्रार्थनाचार्टुकार प्रियतम के समान जहां स्त्रियों की सुरतग्लानि को दूर करता है।' यहां मत्री शब्द अविवक्षितवाच्य ध्वनि है। दूसरे पदों में दूसरे अलङ्कार हैं।
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तृतीय उद्योत:
दीर्घीकुर्वन्निति । सिप्रावातेन हि दूरमप्यसो शब्दो नीयते तथा सुकुमारपवनस्पर्शजातहर्षा: चिरं कूजितं, तत्कूजितं च वातान्दोलितसिप्रातटजमधुरशब्दमिश्रं भवतीति दीर्घस्त्वम् । पट्टवति । तथा सौ सुकुमारो वायुर्येन तज्जः शब्दः सारसकूजितमपि नाभिभवति प्रत्युत तत्स्नेह्याचारी तदेव दीपयति । न च दोपनं
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तदीयमनुपयोगि यतस्तन्मदेन कलं मधुरमाकर्णनीयम् । प्रत्युपवेधि यत् । प्रभातस्य तथाविधसेवावसरत्वम् । बहुवचनं सदैव तत्प्रेक्षा हृद्यतेऽपि निरुपयति । स्फुटिततान्तर्वन्तंमानसकरन्दभरणं । तथा स्फुटितितानि नयनहारिणी यानि कमलानि तेषां य आमोदस्तेन या मैत्री अभ्यासाद्वियोगपरस्परानुकूल्यलभस्तेन कषाय उपरक्तो मकरन्देन च कषायवर्णीकृतः । स्त्रियोऽमिति । सर्वस्य तथाविधस्य त्रैलोक्यसारभूतस्य य एवं करोति सुरतकृतां ग्लानिं तां तु हरति, अथ च तद्विषयां ग्लानिं पुनः सम्भोगाभिलाषोद्दीपनेऽन हरति । न च प्रसह्या प्रभृतयापि त्वङ्ङानुकूलो हृदयस्पर्शः हृदयान्तर्भूतश्च प्रियतमे तद्विषये प्रार्थनार्थी चाटूनी कार्यति । प्रियतमोऽपि तत्पदनस्पर्शप्रबुद्धसम्भोगाभिलाषः । प्रार्थनार्थं चाटूनी करोतीति तेन तथा कार्यत इति परस्परानुरागप्राणशृङ्गारसर्वस्वभूतौ पवनः । युक्तं चैत्तत्स्य यतः सिप्रापरिचितोदसौ वात इति नागरिको न त्वविदग्धो ग्राम्यप्राय इत्यर्थः । प्रियतमोऽपि रताने डाङ्कानुकूलः संवाहनादिना प्रार्थनार्थं चाटुक्कार एवमेव सुरतग्लानिं हरति । कूजितं चानङ्गीकरानवचनदिमधुरध्वनितं दीर्घीकरोति । चाटुकरणावशरे च स्फुटितं विकसति यत्कमलकान्तिधारि वदनं तस्य यामोदमेत्री सहजसौरभपरिचयस्तेन कषाय उपरक्तो भवति । अज्ञेषु चातुष्प्रष्टिकप्रयोगेष्वनुकूलः एवं शब्दरूपगन्धस्पर्शी यत्र हृद्यो यत्र च पवनोऽपि तथाविधसम्भोगेच्छया हेतु हति, मेधाविनो मेधं प्रति कामिनि उक्तिः । तथा नागरिकः स तद्विशेषमवगन्तॄणां दृष्टे हति ।
(अनु०) 'दीर्घ करते हुये' यह । सिप्रावात के द्वारा निस्सन्देह यह शब्द दूर ले जाया जाता है । उसी प्रकार सुकुमार पवन के स्पर्श से उत्पन्न हुष्बाले बहुत समय तक कूजते रहते हैं, उनका कूजन वायु से आन्दोलित सिप्रातरंगों से उत्पन्न मधुर शब्द से मिला हुआ हो जाता है यह दीर्घत्व है । 'पदं' यह । वह वायु इतना सुकुमार है कि उससे उत्पन्न शब्द सारसों के कूजन को भी नहीं दबा पाता प्रत्युत उसका सहचर बन कर उसी का दीपन करता है । उसका दीपन अनुयोगी तो नहीं होई । क्योंकि वह मद के कारण कल अर्थात् मधुर और आकर्षणीय है । 'प्रसादों में' यह । प्रभात का हो उस प्रकार को सेवा का अवसर है । बहुतवचन यह निरुपित करता है कि यह हृद्यता वहाँ सर्वदा रहती है । स्फुटित अर्थात् अन्दर विद्यमान मकरन्द के भार के द्वारा । तथा स्फुटित अर्थात् विकसित नेत्रों को हरनेवाले जो कमल उनका जो आमोद उससे मैत्री अर्थात् संश्लेष के अभियोग से परस्पर अनूकूलता का लाभ उससे कषाय वर्ण का बनाया हुआ । 'स्त्रियों का' यह । उस प्रकार के त्रैलोक्यसारभूत सभी का जो यह करता है—सुरत से उत्पन्न हुई ग्लानि को हरता है और तद्विषयक ग्लानि को पुनः सम्भोग की अभिलाषा के उद्दीपन के द्वारा हरता है । बलात् प्रभुता से नहीं अपितु अंगानुकूल अर्थात् प्रियतम के विषय में प्रार्थना के लिए चाटुकारित कराता है । प्रियतम भी उस पवन के स्पर्श से प्रबुद्ध सम्भोग की अभिलाषावाला हो जाता है । प्रार्थना के लिये चाटुकारिता करता है और उससे वैसा कराता है । इस प्रकार यह पवन ऐसे शृंगार का सर्वस्वभूत
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तृतीय
उद्योत:
है जिसका प्राण परस्परानुराग ही होता है । यह उसके लिये उचित ही है क्योंकि यह वायु सिप्रा से परिचित है अतः नागरिक है एक गंवार के समान अविदग्ध नहीं है । प्रियतम भी सुरत के अन्त में अंगों के अनुकूल अर्थात् संवाहन इत्यादि के द्वारा प्रार्थना के चाटुकार होकर इस प्रकार सुरत ग्लानि को हरता है । कूजित अर्थात् अस्वीकृति के वचन इत्यादि अर्थात् मधुरध्वनि को और अधिक बढ़ाता है । और चाटुकरण के अवसर पर स्पुटित अर्थात् विकसित जो कमल की कान्ति को धारण करनेवाला मुख उसकी जो सुगन्धि की मन्त्रो अर्थात् स्वाभाविक सुगन्धि से परिचय से कषाय अर्थात् उपरक्त हो जाता है । अज्ञों में अर्थात् चतुष्पष्टिक प्रयोगों में अनुकूल होता है । इस प्रकार शब्द, रूप, गन्ध, स्पर्श जहाँ हृदय हैं और जहाँ पवन भी नागरिक है वह देश तुम्हारे लिये अवश्य ही अभगन्तव्य है यह मेघदूत में मेघ के प्रति कामो को उक्ति है । उदाहरण में लक्षण को योजित करते हैं—‘मैत्रीपद’ यह । ‘हि’ शब्द बाद में पढ़ा जाना चाहिये यह कहा ही गया है । ‘दूसरे अलंकार’ यह । अर्थात् उत्क्रेक्षा, स्वभावोक्ति, रूपक और उपमा क्रमशः ।
तारावती—अब उदाहरण को लीजिये—यक्ष मेव को अपने घर का मार्ग बतलाते हुए विशाला नगरों का परिचय देते लगता है । वह कहलता है कि ‘यह विशाला नगरी सिप्रा नदी के तट पर बसी हुई है। यहाँ सिप्रा के जल के सम्पर्क से शीतल होकर जो वायु चलता है वह वह सारसों के सुमधुर तथा आकर्षक कूजन को और अधिक बढ़ा देता है । प्रातःकाल जब कमल खिल जाते हैं तब उनकी सुगन्धि को लेकर जो वायु बहता है वह अत्यन्त सुगन्धित हो जाता है । वह वायु शरीर के अनुकूल होता है और जिस प्रकार कोई चाटुकार प्रियतम प्रातःकाल अपनी प्रियतमाओं की सुरतजन्य श्रान्ति को दूर किया करता है उसी प्रकार वह सिप्रा का वायु भी इस नगरी की स्त्रियों के शरीर की सुरतजन्य थकावट को दूर किया करता है ।’ यह है कालिदास के पद्य का सारांश । अब इस पद्य के शब्दप्रयोग पर ध्यान दीजिये । वायु के लिये कहा गया है कि वह सारसों के कूजन को और अधिक ‘दीर्घ’ कर देता है । इस दीर्घ करने में कई एक व्यञ्जनायें निकल सकती हैं—सिप्रा का वायु सारसों के कूजन को दूर ले जाता है जिससे सारसों का कूजन एक स्थान पर उद्भूत होकर दीर्घ-देशव्यापी हो आता है । दूसरी बात यह है कि जब यह शीतल मन्द सुगन्धित वायु के संसर्ग से सारसों में आनन्द का अतिरेक उत्पन्न हो जाता है जिससे सारस बड़ी देर तक सुमधुर स्वर में कूजन करते रहते हैं । तीसरी बात यह है वायु सिप्रा की तरङ्गों को घेरे-धीरे आन्दोलित करता है जिससे सिप्रा की तरंगों में एक मनोहर शब्द होने लगता है । उस शब्द से मिलकर सारसों का कूजन अधिकाधिक दीर्घ हो जाता है । ‘दीर्घ करते हुए’ का विशेषण दिया गया है ‘कुशलतापूर्वक’ (पटु) । यह क्रियाविशेषण है । कुशलतापूर्वक कहने का आशय यह है कि यह वायु इतना सुशुमार है कि इसके शब्द से सारस का मृदु स्वर भी दब नहीं पाता । अपितु जैसे कोई साथ में पढ़नेवाला साथी ब्रह्मचारी ‘अपने दूसरे सहचर के अध्ययन में सहायता पहुंचाता है वैसे ही यह वायु भी एक अच्छे सहचर के समान सारसकूजन को प्रदीप्त ही करता है । यह प्रदीप्त करना व्यर्थ ही नहीं है । अपितु इसका बहुत बड़ा उपयोग
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यह है कि कोमल वायु के कारण सारस मदमस्त हो जाते हैं और उसके स्वर में एक स्वाभाविक माधुर्य आ जाता है । इससे वह कूजन मनोहर आकर्षक और सुनने योग्य हो जाता है । 'प्रभातों में' यह शब्द भी साभिप्राय है । कारण यह है कि अपनी प्रियतमाओं की सहवास की थकावट को दूर करने का सबसे अच्छा अवसर तो प्रभात ही होता है । इसमें बहुवचन का अभिप्राय यह है कि इस विशाला नगरी में कोई एक प्रभात ही ऐसा नहीं होता कि उसमें हृद्यता आ जाती है । अपितु यहाँ सदैव सभी प्रभात ऐसे ही हृदय होते हैं । 'स्फुटितकमलामोदमत्तप्रसङ्गाय' स्फुटित का अर्थ है फूटा हुआ । जब कोई वस्तु अत्यधिक मात्रा में भर दी जाती है और वह समाती नहीं है तब पात्र फूट पड़ता है । विशाला के कमलों में पुष्पों का रस मकरन्द इतनी अधिक मात्रा में भरा रहता है कि उनके भार से कमल फूट पड़ते हैं । स्फुटित का दूसरा अर्थ है खिले हुए । मकरन्द भार से दब कर के ही कमल एकदम खिल उठते हैं । ( यहाँ पर विकसति के लिए स्फुटित शब्द का प्रयोग किया गया है जिससे व्यञ्जना निकलती है कि कमल मकरन्द भार के आधिक्य से फूट कर खिलते हैं ।) अत एव वे कमल इतने सुन्दर होते हैं कि दर्शकों के नेत्र एकदम उनकी ओर खिंच जाते हैं । इन कमलों में मस्तिष्क को तृप्त कर देनेवाला अनुपम गन्ध विद्धमान रहता है जिससे सिप्रा के वायु को स्थायी मैत्री हो । जिस प्रकार दो निकटवर्त्ती मित्र कभी एक दूसरे से अलग नहीं रहना चाहते उसी प्रकार विशाला में सिप्रा का वायु भी मकरन्द के अतिनिकट सम्पर्क से रहित नहीं रहता । यह वायु निरन्तर कमलों के आमोद से सम्पृक्त रहने के कारण सर्वदा उसके अनुकूल ही रहता है और उससे कपाय अर्थात् उपरक्त हो जाता है । दार्शनिक भाषा में कपाय चित्त के उपरञ्जक भावों को कहते हैं । मित्र का चित्त अपने मित्र के प्रति सदा उपरक्त रहता है । उसी प्रकार यह वायु खिले हुए कमलों की सुगन्धि से सर्वदा उपरक्त रहता है । कपाय का दूसरा अर्थ है लाल पीला मिला हुआ एक विशेष प्रकार का वर्ण । सिप्रा का वायु मकरन्द के मिश्रण से उसी वर्ण का हो जाता है । 'स्त्रियों की' यहाँ स्त्री शब्द में बहुवचन का प्रयोग विशेष मन्तव्य से किया गया है । एक तो स्त्रियाँ स्वतः तीनों लोकों का सारमूत तत्व हैं । उनसे अधिक रमणीय वस्तु जगतीतल पर कोई अन्य है ही नहीं । फिर यह वायु केवल किसी एक विशेष स्त्री की सुरतग्लानि को ही दूर नहीं करता अपितु सभी स्त्रियों को सुरतग्लानि को दूर करता है । सुरतग्लानि के दूर करने के भी दो अर्थ हैं— एक तो स्त्रियों में रात्रि में सहवासजन्य थकावट के कारण जो मालिन्य आ जाता है यह ताजा वायु उन स्त्रियों के शरीर का स्पर्श कर उस थकावट को दूर कर देता है । दूसरा अर्थ यह है कि जब स्त्रियों में सम्भोग की कामना उद्दीप्त हो उठती है तब उनमें एक अवसाद तथा मुखमालिन्य उत्पन्न हो जाता है । यह वायु उन रमणियों के प्रियतमों में एक हर्ष तथा सम्मोगामिलाष उत्पन्न कर उन रमणियों की सुरताकाङ्क्षाजन्य मलिनता को दूर करता है ।
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तृतीय
उद्योत:
भो दो अर्थ हैं। एक तो अङ्गों में स्पर्श करने में सुख देता है, दूसरे यह हृदय के अन्दर प्रविष्ट हो जाता है अर्थात् इसके प्रति हृदय में एक अनुराग उत्पन्न हो जाता है। इस प्रकार यह वायु बलात् नहीं अपितु प्रेमपूर्वक हृदय में प्रवेश कर तथा अङ्गों में सुखकर स्पर्श करके सुरतग्लानि को दूर करता है। 'प्रियतम इव' शब्द की सन्धि दो प्रकार से तोड़ी जा सकती है। 'प्रियतमे + इव' और 'प्रियतमः + इव'। प्रथम सन्धिविच्छेद में प्रियतम शब्द विषयसमम्यन्त है। अतः इसका अर्थ यह होगा कि स्त्रियों के हृदय में प्रियतमविषयक सम्भोग की अभिलाषा का उत्पादन करने के लिए यह पवन चाटुकारिता करता है। दूसरी व्युत्पत्ति के अनुसार यह अर्थ होगा कि प्रियतम के हृदय में भी उस पवन के स्पर्श से सम्भोग की अभिलाषा प्रबुद्ध हो जाती है और प्रियतम स्त्रियों में सहवास की आकांक्षा उत्पन्न करते के लिए चाटुकारिता करने लगता है। प्रियतम को चाटुकारिता करने में प्रेरणा वायु से प्राप्त होती है। अतः वायु प्रियतमों से स्त्रियों की चाटुकारिता कराता है। इस अर्थ में 'प्रार्थनाचाटुकारः' में प्रेरणार्थक णिच् होकर उससे घञ् प्रत्यय होता है। प्रियतम चाटुकारिता करता है। वायु उसे प्रेरित करता है इस प्रकार वायु प्रियतमों से स्त्रियों की चाटुकारिता कराता है। उधर दूसरे अर्थ में वायु स्त्रियों के हृदय में स्वयं सम्भोग की प्रार्थना का भाव जागृत कर देता है। इस प्रकार वायु शृङ्गाररस का सर्वस्व है। क्योंकि शृङ्गार रस का प्राण ही यह है कि दोनों में एक दूसरे के प्रति अनुराग की भावना जागृत हो और उस व्याख्या में यह बताया ही जा चुका है कि वायु दोनों में अभिलाषा को जागृत करता है। और यह बात ठीक भी है कि वायु में यह गुण विद्यमान हो क्योंकि वायु कोई देहाती गँवार तो है नहीं वह तो एक अच्छे नागरिक के समान है। अतः उसमें यह निपुणता होनी ही चाहिये कि वह दोनों के हृदयों में प्रेम भावना जागृत करे। यह बात सिप्रावात शब्द से अभिव्यक्त होती है। यह वायु सिप्रा से परिचित है जो कि विशाला जैसी नगरी के पास होकर बहती है। अतः यह विशाला के व्यवहार को भलीभाँति जानता है, नागरिक है और नागरिकों का जैसा व्यवहार करता है।
उपर इस पद्य की पवनसम्बन्धी व्याख्या की गई है। इसी प्रकार यह पद्य प्रियतम के विषय में घटाया जा सकता है। प्रियतम भी जो सुरत के बाद में अङ्गानुकूल होकर अर्थात् अङ्गों को दबा दबाकर इसी प्रकार तो सुरत की ग्लानि को दूर किया करता है जिससे उसकी प्रियतमा में सुरत के लिये प्रार्थना उत्पन्न हो जावे। अतः वह भी अङ्गों के संवाहन इत्यादि से चाटुकारिता करता है। जिस प्रकार वायु सारसों के कूजन को दीर्घ करता है उसी प्रकार प्रियतम भी स्त्रियों के कूजन अर्थात् सुरत को अस्वीकार करने के मधुर स्वर को अधिकाधिक बढ़ाता जाता है। प्रियतम प्रार्थना करता है और स्त्रियाँ इन्कार करती जाती हैं जिसमें उनका बड़ा मधुर कूजन के समान स्वर होता है। (कामशास्त्र में स्त्रियों के सुरत कालीन शब्द के लिये अनेक पक्षियों के कूजन को उपमा दी गई है।) प्रियतम जिस समय अपनी प्रियतमाओं से चाटुकारिता करते हैं उस समय स्त्रियों का मुख प्रसन्नता से विमोर होकर खिल उठता है और उनके मुख की शोभा प्रफुल्लित कमल की जैसी हो जाती है। उस मुख में एक प्रकार की स्वाभाविक सुगन्ध होती है जो हर समय बनी रहती है। उससे सम्भोगकाल में रसिकों का
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विशेष परिचय होता है जिससे रसिकों के अन्तःकरण कषाय या अनुरक्त हो जाते हैं । 'अंगों के अनुकूल' यह जब प्रियतमपरक होगा तो उसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि प्रियतम कामशास्त्र की ६४ कलाओं में निष्णात है और उसके अनुकूल ही सहवासविषय में प्रवृत्त होता है । इस प्रकार यह विशालाननरी सभी गुणों से परिपूर्ण है और सभी इन्द्रियों को तृप्त करनेवाली है । यहां सारसों और रमणियों का मधुर कूजन कानों को तृप्त करता है । खिले हुये कमल तथा सुन्दरियों के बदनारविन्द रूप के आगार हैं और नेत्रों को तृप्त करते हैं । चारों ओर सारमें उड़ती हैं और वायु आमोद से परिपूर्ण है । जिससे घ्राणेन्द्रिय तृप्त हो जाती है । यहां वायु का त्वचा को तृप्त करनेवाला बड़ा ही सुकोमल स्पर्श है । यहां का पवन भी बहुत ही नागरिक है जो कि प्रेम की विधि को भलीभांति जानता है । हे मेघ ! तुम्हें उस देश में अवश्य जाना चाहिये । यह मेघदूत में मेघ के प्रति कामी यक्ष का कथन है ।
अब इस उदाहरण की योजना लक्षण में कीजिये । यहां पर मैत्री शब्द अपने अभिधेयार्थ में बाधित है । क्योंकि मित्रता करना मनुष्य का धर्म है पवन का नहीं । अतः यहां पर लक्ष्यार्थ निकलता है कि वायु का कमल-मकरन्द की सुगन्ध से अविच्छिन्न सम्बन्ध बना रहता है । इससे प्रयोजनरूप व्यञ्जना यह निकलती है कि वहां का वायु और कमल की सुगन्ध एक दूसरे के सर्वथा अनुकूल है और वह प्रदेश बड़ा ही मनोरम है । इस प्रकार मैत्री शब्द के अर्थ का सर्वथा परित्याग हो जाता है । अत एव मैत्री शब्द में अत्यन्ततिरसृतवाच्य ध्वनि है ।
साथ ही दूसरे शब्दों से यहां अलंकार भी प्रतीत होते हैं—(१) मानो वायु सारसों के कूजन को और अधिक बढ़ाता है, मानो वायु स्त्रियों की सुरतग्लानि को दूर करता है, इस प्रकार यहां प्रतीपमान उपमेय अलंकार है । (२) वायु तथा प्रभात का स्वाभाविक वर्णन किया गया है, अतः स्वभावोक्ति अलंकार है । (३) खिले हुये कमलरूपी स्त्रियों के मुख, नायक रूपी वायु इनमें रूपक अलंकार है और (४) प्रियतम इव में उपमा है; इन अलंकारों की यहां मैत्री शब्द की अत्यन्ततिरसृतवाच्य ध्वनि से संसृष्टि है (मल्लिनाथ ने 'प्रार्थनाचाटुकार:' से खण्डिता के अनुनय की व्याख्या की है और 'सुरतग्लानि हरतीव' यह अन्वय मान कर लिखा है—क्योंकि खण्डिता का सुरत हुआ हो नहीं है, अतः इस समय उसको मनाना बाद में होनेवाले सुरत की ग्लानि को हरने के समान है, अतः यह उत्प्रेक्षा अलंकार है ।)
(ध्वन्यालोके) संश्लिष्टालङ्कारान्तरसङ्घट्टनैर्ध्वनिनिर्मन्था— दन्तकषतानि करजैरच विपादितानि, प्रोद्भिन्नस्नानद्रुलके भवतः शरीरेऽदत्तानि रक्तमनसा मुगराजवध्वा, जातस्फुरद्गुम्फनिभृत्यवलोकितानि ।।
छत्र हि समासोक्तिसंसृष्टेन विरोधालङ्कारेण सदृशोऽन्स्यालक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यचस्य ध्वने: प्रकाशनम् । दयावीरस्य परमार्थतो वाक्यार्थीसूततावात् ।
(अनु) दूसरे संसृष्ट अलंकार से संकीर्ण जैसे—
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तृतीय उद्योत:
'उठे हुये घने पुलकवाले आपके शरीर पर रक्तमनवाली सिंहो की वधू के द्वारा दिये हुये दन्तक्षत और नाखूनों से विदारण, उत्पन्न इच्छावाले मुनियों के द्वारा भी देखे गये ।' यहाँ निस्सन्देह समासोक्ति से संसृष्ट विरोधालंकार के द्वारा संकीर्ण अलंकारकमध्यंग ध्वनि का प्रकाशन होता है । क्योंकि यहाँ वस्तुतः तो दयावीर ही वाच्यार्थ हो जाता है । (लो०) एवमियता—
(अनु०) इस प्रकार इतने से—'गुणीभूतव्यंग्यों के साथ, अलंकारों के साथ अपने प्रभेदों से संकर और संसृष्टि से इ' । यहाँ तक की व्याख्या करके और उदाहरणों का निरूपण करके 'पुनः भो' ये जो कारिका के भाग में दो पद हैं उनके अर्थ को उदाहरणों के द्वारा ही प्रकाशित करते हैं—संसृष्ट इत्यादि । पुनः शब्द का यह अर्थ है—न केवल ध्वनन के अपने प्रभेदों से संकर और संसृष्टि कहना अभीष्ट है अपितु उनका एक दूसरे के साथ भी । अपने भेदों का अपने प्रभेदों से अथवा गुणीभूतव्यंग्य से संकीर्ण और संसृष्ट मिलना कठिन है, अतः इनका स्पष्ट उदाहरण नहीं मिल पाता ।
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तृतीय उद्योत:
'सगुणीभूतव्यङ्ग्यैः सालङ्कारैः सह प्रभेदैः स्वः सङ्करसंसृष्टिभ्याम् ।" इत्येतदन्तं व्याख्यायोदाहरणानि च निरुप्य पुनरपि इति यत्कारिकाभागे पदद्वयं तस्यार्थ प्रकाशयत्युदाहरणैरैव—संसृष्टेत्यादि । पुनः शब्दस्यायमर्थः—न केवलं ध्वने: स्वप्रभेदादिभिः संसृष्टतद्वच संसृष्टत्वं वा सप्रभेदैरगुणीभूतव्यङ्ग्यै: सङ्कीर्णतद्वा सङ्कीर्णस्य वा ध्वनो: सदृशं संसर्गी प्रदर्शनीयो ।
वह इन चार भेदों में प्रथम भेद का उदाहरण देते हैं—'दन्तक्षत' यह । अपने किशोरों के भक्षण में प्रवृत्त सिंहों के प्रति अपने शरीर को दे देने वाले बोधिसत्व की कोई चाटुकारिता कर रहा है उत्कृष्ट रूप में उद्भूत हुआ है घना पुलक—दूसरे के अर्थ सम्पादन से उत्पन्न आनन्द भार के द्वारा जिसमें । रक्त में अर्थात् रगिरे में मनोडमिलाषो है जिस (सिंही)
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की। और अनुरक्त है मन जिसका। मुनि होते हुए मदन के आवेश को उद्दबोधित करनेवाले यह विरोध है। 'जातस्पृह:' इसका अर्थ यह है कि हम भी कदाचित् कारुणिक पदवी पर अघिरुढ होंगे तब मुनि बनेंगे इस मनोराज्य से युक्त। और समासोक्ति है नायिका के वृत्तान्त की प्रतीति के द्वारा। 'दयावीर का' यह। यहाँ धर्म के दयाप्रवृत्त होने के कारण धर्मवीर ही दयावीर शब्द से कहा गया है। यहाँ पर वीररस है, क्योंकि उत्साह का ही स्थायीभावत्व है, यह भाव है। अथवा दयावीर शब्द से शान्त का नामोल्लेख करते हैं। वह यह रस संसृष्ट अलंकार से अनुगृहीत किया जाता है। समासोक्ति की महिमा से यह अर्थ हो जाता है। जैसे कोई सैकड़ों मनोरथों से प्राप्त प्रार्थनीय प्रेयसी के सम्भोग के अवसर पर पुलकपूर्ण हो जाता है वैसे ही तुम पराधीनसम्पादन के लिये अपने शरीरदान में, यह करुणा का अतिशय अनुभव विभाव की सम्पत्ति से उद्दीप्त किया गया है।
तारावती—प्रस्तुत (४३ वीं) कारिका में कहा गया था कि हृदनि की गुणीभूत-व्यङ्गच्य और अलङ्कार महित अपने प्रभेदों से सङ्कर और संसृष्टि होती है। यहाँ तक उस सङ्कर और संसृष्टि की पूरी व्याख्या कर दी गई और प्रत्येक प्रकार का सङ्क्रमण उदाहरणों से मो कर दिया गया। कारिका के अग्निम भाग में लिखा है—'पुनरप्युद्योतते बहुधा' यह ध्वनि और भी बहुत प्रकार से उद्योतित होती है। इस 'पुनरपि' शब्द का क्या अर्थ है? अब इसी पर विचार किया जायगा। यहाँ 'पुनरपि' शब्द का यह अर्थ है कि इस ध्वनि के उत्त सादृश्य और संसृष्टि में भिन्न और भी संकर और संसृष्टि सम्भव हैं। वे संकर और संसृष्टि इस प्रकार हो सकती हैं कि ध्वनि के अपने भेदों से, गुणीभूतव्यङ्गच्य के प्रकारों से और अलङ्कारों से जब एक बार सङ्कर और संसृष्ट हो जाती हैं तब उन सङ्कीर्ण और संसृष्ट प्रकारों से पुनः ध्वनि की संसृष्टि और सङ्कर हो सकते हैं। उसमें ये भेद और सम्भव हैं—(१) अपने स्वतन्त्र सङ्कीर्ण भेदों को अपने स्वतन्त्र भेदों से संसृष्टि या सङ्कर। (२) गुणीभूतव्यङ्गच्य से संसृष्ट या सङ्कीर्ण अपने भेदों की पुनः अपने भेदों से संसृष्टि या सङ्कीर्णता। (३) परस्पर संसृष्ट गुणीभूतव्यङ्गच्य की संसृष्टता या सङ्कीर्णता (४) अलङ्कारों से संसृष्ट ध्वनि की अपने भेदों से संसृष्टता या सङ्कीर्णता। (५) परस्पर संसृष्ट या सङ्कीर्ण अलङ्कारों की ध्वनि के किसी भेद से संसृष्टता या सङ्कीर्णता इत्यादि। यहाँ पर प्रथमतः चार प्रकारों के उदाहरण नहीं दिये जावेंगे क्योंकि उदाहरणों में उनको संगठित करना कुछ कठिन हैं। अतः अन्तिम प्रकार के ही उदाहरण दिये जावेंगे। ये भेद भी चार प्रकार के हो सकते हैं—(१) सङ्कीर्ण अलङ्कारों का ध्वनि भेद से सादृश्य (२) सङ्कीर्ण अलङ्कारों की ध्वनि भेद से संसृष्टि। (३) संसृष्ट अलङ्कारों का ध्वनि भेद से सादृश्य और (४) संसृष्ट अलङ्कारों की ध्वनि भेद से संसृष्टि। यहाँ पर दो के उदाहरण दिये जावेंगे एक तो संसृष्ट अलङ्कारों की सङ्कीर्णता और दूसरे संसृष्ट अलङ्कारों की संसृष्टि। दोप उदाहरण स्वयं समझ लेने चाहिये। पहले संसृष्ट अलङ्कार की सङ्कीर्णता का उदाहरण लीजिये—
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तृतीय
उद्योतः
के बच्चों की रक्षा करने के लिये उस सिंहिनी को अपना शरीर अपित कर देते हैं। उस समय वह सिंहिनी अपने दांतों ओर नाखूनों से बोधिसत्व की जो दुर्दशा कर डालती है। उसको देख कर कोई भक्त बोधिसत्व की प्रंशा करते हुये कह रहा हैं —
जिस समय बोधिसत्व ने यह देखा कि कोई सिंहिनी भूख से अत्यधिक पीड़ित हो गयी है और यहाँ तक कि अपने बच्चों को भी खा जाने को उद्यत हैं। उसी समय बोधिसत्व ने उन सिंहिनी के बच्चों को बचाने के लिए अपना शरीर उस सिंहिनी को अर्पित कर दिया। उस समय दूसरे का उपकार करने का अवसर मिल जाने और अपने कर्तव्य का निर्वाह करने में समर्थ हो सकने के कारण बोधिसत्व के हृदय में अभूतपूर्व आनन्द उत्पन्न हो गया और उस हर्ष के कारण उनके शरीर पर बहुत ही घना रोमांच उठ आया। उस समय सिंहिनी का मन रक्तपान में लगा हुवा था। अतः उस सिंहिनी ने बोधिसत्व पर आक्रमण कर दिया और उनके शरीर में दांतों के घाव बना दिये और नाखूनों से उनका शरीर विदीर्ण कर डाला। यह देख कर मुनियों के हृदय में भी आकांक्षा जागृत हो गयी कि परमात्मा हमें भी एसी शक्ति देता और हमारे अन्दर भी कारणिकता की एसी ही भावना जागृत होती कि हम भी परोपकार के लिए अपना शरीर अपित कर सकें जिससे हमारा भी मन्त्र कहलाना वास्तविक रूप में सत्य हो सकता हैं। किन्तु वह अभिलाषा उनकी मनोराज्यपदवी पर ही आसीन है। अर्थात् यह उनका खयाली पुलाव पकाना ही हैं। और मुनियों में इतनी शक्ति ही नहीं कि वे जोवरक्षा के लिये अपने प्राण दे सकें। यहाँ पर नायिका के वृत्तान्त की भी प्रतीति होती हैं। अतः यहाँ पर समासोक्ति अलंकार हैं। समासोक्ति अलंकार वहाँ पर होता हैं जहाँ विशेषणवाचक शब्द द्रव्यथंक हो किन्तु विशेष्य द्रव्यथंक न हो, किन्तु उन द्रव्यथंक विशेषणों के बल पर एक अप्रस्तुत अर्थ और निकाला जाय और प्रस्तुत तथा अप्रस्तुत दोनों अर्थों का उपमानोपमेय भाव स्थापित कर दिया जाय। यहाँ पर दनत्क्षत इत्यादि शब्द द्रव्यथंक हैं किन्तु विशेष्य मृगराजवधू शब्द द्रव्यथंक नहीं हैं। द्रव्यथंक विशेषणों के बल पर एक अप्रस्तुत अर्थ की व्यंजना होती हैं कि किसी नायिका ने किसो नायक के शरीर पर अनुरागपरिपूर्ण चित्त होकर दनत्क्षत और नखक्शत के चित्र बना दिये। उस समय नायक के शरीर पर सम्भोगजन्य हर्ष के कारण अत्यन्त घना रोमांच हो रहा था। इस अर्थ में 'रक्तमनसा' का अर्थ होगा—'अनुरक्त हैं मन जिनका'। इस प्रकार इस समासोक्ति के द्वारा इसका अर्थ हो जावेगा—'जिस प्रकार कोई रसिक प्रेमी व्यक्ति सैकड़ों मनोरथों से प्रेयसी के समागम की कामना करता रहे और सौभाग्य से उसे अपनी मनचाही प्रेयसी का समागम मिल भी जाय तथा वह सुन्दरी हर्ष निर्भर होकर अपने उस प्रियतम के शरीर पर दनत्क्षत और नखक्षत के अनेक चित्त बनाये। उस समय वह रसिक प्रेमी कामान्ध निर्भर हो जाता हैं। और उसके शरीर पर अत्यन्त घना रोमांच उद्भूत हो जाता हैं। उसी प्रकार भगवान् बोधिसत्व के हृदय में प्राणिरक्षा के लिये अपने शरीर दे देने की कामना अत्यन्त तीव्रता के साथ विद्यमान थी फिर जब उन्हें सिंही के बच्चे की रक्षा के लिये अपने शरीरदान का सौभाग्य प्राप्त हो गया तब हर्षातिरेक से
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उनके शरीर पर भी गाढ़ा रोमाञ्च हो गया। यह तो हो गया समासोक्ति अलङ्कार। यहाँ पर दूसरा अलङ्कार है विरोधाभास—‘मुनियों ने स्पृहापूर्वक देखा’ यहाँ पर स्पृहा का अर्थ है कामवासना का आवेश। रसिकों के शरीर पर दन्तकस्त और नखकस्त देखकर रागियों के हृदय कामवासना से भर हो जाते हैं। यहाँ मुनियों के मन कामवासना से भर गये यह विरोध है। मुनियों के चित्तों में भगवान् बुद्ध के समान अपने शरीरदान की उत्कट स्पर्धा उत्पन्न हुई यह विरोध का परिहार है। इस प्रकार यह विरोधाभास अलङ्कार है। उक्त समासोक्ति और विरोधाभास का परस्पर संसृष्टि है। क्योंकि दोनों में उपकाव्योपकारक भाव है और न सन्देह हो, तथा दोनों की प्रतीति विभिन्न शब्दों से होती ही है। यह समासोक्ति और विरोधाभास की संसृष्टि समस्त पद से अभिव्यक्त होनेवाले दयावीर को उपकृत करती है। दयावीर ही यहाँ मुख्य वाक्यार्थ (तात्पर्यार्थ) है। अतः समासोक्ति और विरोधाभास की संसृष्टि से उपकृत दयावीर ही यहाँ पर ध्वनि का रूप धारण करता है। अतः यहाँ पर दयावीर और उक्त दोनों अलङ्कारों की संसृष्टि का सङ्कर है। यहाँ पर यह प्रश्न है कि भरत मुनि ने वीररस का दयावीर नामक भेद तो माना ही नहीं फिर दयावीर की ध्वनि कहना कहाँ तक शास्त्रसममत हो सकता है? इसका उत्तर यह है कि यहाँ यदि दयावीर न माना जाय तो धर्मवीर हो माना जा सकता है। आनन्दवर्धन ने दयावीर इसलिए बतलाया है कि यहाँ पर धर्म वस्तुतः दयाप्रयुक्त हो है। वास्तविकता यह है कि चाहे इसे आप धर्मवीर कहें चाहे दयावीर, है यह वीररस हो। क्योंकि यहाँ पर उत्साह हो स्थायीभाव है। अथवा दया का यहाँ पर अर्थ है शान्तरस। क्योंकि निवेद की भी यहाँ प्रधानता बतलाई जा सकती है। इस प्रकार यह रस संसृष्ट अलङ्कारों से अनुप्राणित हुआ है।
(ध्वन्यालो) संसृष्टालङ्कारसंस्तवत्वं च ध्वनेरयथा— अभिनव पओअरअसेअ पहिआसामाइएप्तु विअहेसु । सोहइ पसारिअगिआणं णच्छिअं मोरवन्दाणं ॥ at्थ हू पमारुपकास्यां सव्दशक्त्युद्भवावनतरूपव्यङ्ग्यस् ध्वने: संसृष्ट- त्वम् ॥ ४३ ॥
(अनु.) संसृष्ट अलङ्कार का ध्वनि से संसृष्टत्व जैसे— ‘अभिनव प्योदों के शब्द से युक्त पथिकों के लिए इयामायित दिवसों में ग्रीवाओं का फैलाये हुए मयूरवृन्दों का नृत्य शोभित हो रहा है ।’ यहाँ निस्सन्देह उपमा और रूपक से शब्दशक्त्युद्भव अनुरणनरूप व्यङ्ग्य ध्वनि की संसृष्टि हो जाती है ॥४३॥
(लो.) द्वितीयं भेदमुदाहरति—संसृष्टतेति। अभिनवं हृदयं पयदानां मेघानां रसितं येषु दिवसेषु । तथा पथिकानं प्रति श्यामायितेषु मोहजनकत्वाद्वारिवृपताम-चरितवस्तु । यदिवा पथिकानां इयामायितं दुःखवहत्वं श्यामिका येषु । शोभते प्रसारितग्रीवाणां मयूरवृन्दानां नृत्तम् । अभिनयप्रयोगरसितेषु पथिकसामाजिकेषु सत्सु मयूरवृन्दानां प्रसारितगीतानां प्रकृष्टसारणानुसारिगीतानां तथा ग्रीवारेचकाय प्रस-
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रितग्रीवाणां नृतं शोभते । पथिकान् प्रति श्यामा इवाचरन्तीति क्यच । प्रत्ययेन लुप्तोपमानिर्दिष्टा । पथिकसामाजिकेष्वति कर्मधारयस्य स्पष्टत्वात् रूपकम् । ताभ्यां ध्वने: संसर्ग इति ग्रन्थकारस्याशय: । अत्रैवोदाहरणेऽन्यदद्भेददर्शयमुदाहरतुं शक्यमित्याशयेनो- दाहरणान्तरं न दत्तम् । तथाहि व्याघ्रादेराकृतिगणत्वे पथिकसामाजिकेष्वत्युपमा- रूपकाभ्यां सन्देहास्पदत्वेन सङ्कीर्णाभ्यामभिनयप्रयोगे च रसिकेष्वति प्रसारितगीता- नामिति य: शब्दशक्त्युद्भवस्तस्य संसर्ग मात्रमनुप्रहेलित्वात् । 'पथिक सामाजिकै:पु नामिति य: शब्दशक्त्युद्भवस्तस्य संसर्ग मात्रमनुप्रहेलित्वात् । 'पथिक सामाजिकै:पु इत्यत्र तु पदे सङ्कीर्णाभ्यां ताभ्यामुपमारूपकाभ्यां शब्दशक्तिमूलस्य ध्वने: सङ्कीर्णत्वमेक- गव्यकजानुप्रवेशादिति सङ्कीर्णालङ्कारसंश्रित: सङ्कीर्णालङ्कारश्चेत्यपि भेदद्वयं मन्तव्यम् ॥ ४२ ॥
(अनु.) द्वितीय भेद का उदाहरण देते हैं—'संस्कृष्ट' यह । अभिनव अर्थात् हृदयपयोदों अर्थात् मेघों का गर्जन है जिन दिवसों में । तथा पथिकों के प्रति श्यामायित अर्थात् मोहजनक होने से रात्रिरुपता का आचरण करनेवाले ( दिनों ) में । अथवा पथिकों के लिए श्यामायित अर्थात् दु:खवश श्यामवर्ण की है जिनसे । फैलाई हुई गर्दनोंवाले मयूरवृन्दों का नृत्य शोभित होता है । अभिनव प्रयोग के रसिक पथिक सामाजिकों के होते हुए प्रकृष्ट सारणा के अनुसार गीतोंवाले तथा ग्रीवारेचक के लिए फैलाई हुई गर्दनोंवाले मयूरवृन्दों का नृत्य शोभित हो रहा है । पथिकों के प्रति श्यामा के समान आचरण करते हुए हैं इस अर्थ में क्यचु प्रत्यय हो जाता है । प्रत्यय से लुप्तोपमा का निर्देश किया गया है । 'पथिकसामाजिकेषु' में कर्मधारय के स्पष्ट होने के कारण रूपक है । उन दोनों से ध्वनि का संसर्ग होता है यह ग्रन्थकार का आशय है । इसी उदाहरण में और दो भेदों के उदाहरण दिये जा सकते हैं इस आशय से दूसरे उदाहरण नहीं दिये गये । वह इस प्रकार—व्याघ्रादि के आकृतिगण होने के कारण 'पथिक सामाजिकों' में सन्देहास्पद के रूप में सङ्कीर्ण उपमा और रूपक के द्वारा 'अभिनय के प्रयोग में और अभिनव' प्रयोग में रसिकों में और 'गीत को प्रसारित करनेवालों का' यह जो शब्दशक्त्युद्भव ध्वनि है उसका केवल संसर्ग होता है क्योंकि अनुप्रहेलित्व का अभाव है । 'पथिक सामाइएपु' इसमें तो पदों में सङ्कीर्ण उन दोनों उपमा रूपकों से एकगव्यकजानुप्रवेश के कारण शब्दशक्तिमूलक का सङ्कीर्णत्व हो जाता है । इस प्रकार सङ्कीर्णालङ्का- लङ्कारसङ्कीर्ण ये दो भेद मी माने जाने चाहिये ॥४३॥
तृतीय
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४३
तारावती—अब दूसरे भेद का उदाहरण लीजिये जहाँ संसृष्ट अलङ्कार और ध्वनि के किसी भेद की संसृष्टि होती है । इसके उदाहरण के रूप में एक गाथा उद्धृत की गई है जिसकी छाया यह है:- अभिनवपयोदरसितेषु पथिकृष्यामायितेषु दिवसेषु । शोभते प्रसारितग्रीवाणां नृतं मयूरवृन्दानाम् ॥
इस वर्षाकाल के इन दिनों में अभिनव अर्थात् हृदय को प्रिय मेघ गरज रहे हैं । तथा विरहियों के लिए विरह वेदना के कारण ये दिन मोह या मूर्छा उत्पन्न करने वाले हैं जिससे ये रात्रि जैसे हो गये हैं अथवा इन दिनों के कारण ही पथिकों में श्यामता अर्थात् कालुष्य
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रामकुजरकेशिनीभिरभिनयप्रयोगरसिकेपु पथिकसामाजिकेपू दिवसेपु । अह्नि प्रभापूरितशोभते प्रसारितगीतानां नृतं मयूरवृन्दानाम् ॥
उत्पन्न हो गया है । इस समय गर्दन को फैलाकर मोर नाच रहे हैं । अतः बहुत ही सुन्दर मालूम पड़ते हैं । -निरूपण इस पद्य की एक छाया यह भी हो सकती है :- अर्थात् वार्षिक सामाजिकों के अभिनय प्रयोग के रसिक होने पर इन दिनों में सारङ्ग के अनुसार उत्त्कृष्ट नाचवाले मयूरवृन्दों का नाच शोभित हो रहा है । इस द्वितीय छाया में 'प्रसारितगीतानां' के स्थान पर 'प्रसारितप्रीवाणां' यह छाया भी रखी जा सकती है । तब इसका अर्थ यह होगा कि मयूरवृन्द प्रोवारेचक नामक नृत्यभेद के लिये अपनी गर्दन फैला रहे हैं और उनका नृत्य बहुत शोभित हो रहा है । इस पद्य का आचाय यह है कि वर्षाकाल में मेघों का गर्जन मयूरों के लिये हर्षपरवश कर देने वाला है जिससे मयूरवृन्द अपनी गर्दन को फैलाकर नाचने और गाने लगते हैं । ये दिन पथिकों अर्थात् वियोगियों के लिये अभिमकारपूर्ण हैं । इसके दूसरे अर्थ का सार यह है कि पथिक तो सामाजिक अर्थात् दर्शक हैं, अभिनय प्रयोग में आनन्द लेना चाहते हैं और उस समाज को आनन्द देने के लिये मयूरों का गान तथा नृत्य प्रवृत्त हो रहा है । यहाँ पर 'पथिकश्यामायितेपु' की पथिकों के प्रति श्यामायित यह व्युत्पत्ति होगी । श्यामायित का विग्रह होगा—'श्यामा इवाचरन्ति' अर्थात् रात्रि के समान आचरण करनेवाली । यहाँ आचारार्थ में क्यच् प्रत्यय हो जाता है । इस प्रकार इसमें लुपोपालम्कार है । यदि इसका पाठ 'पथिकसामाजिकेपु' रखा जाय तो कर्मधारय समास होगा—'पथिका एव सामाजिकाः' अथवा 'पथिकाश्च ते सामाजिकाः:' इस कर्मधारय समास के अनुसार इसमें रूपक अलंकार माना जायगा । ये दोनों अलंकार विभिन्न दो शब्दों में हैं । इसलिये इनकी यहाँ पर संसृष्टि है । यहाँ पर श्यामायित शब्द का अर्थ होता है दिन रात्रि बन जाते हैं अथवा अभ्य-कारमय हो जाते हैं क्योंकि जब मेघ गर्जन हो रहा हो और मयूरों का नृत्यगान भी प्रारम्भ हो गया हो उस समय दिनों की उद्द्दीपकता बहुत बढ़ जाती है । इस प्रकार यहाँ पर दिनों के उद्द्दीपन की व्यञ्जना होती है । यह व्यञ्जना शब्दशक्तिमूलक है क्योंकि 'श्यामायित' परिकर को सहन नहीं कर सकता । अतः उत्त्क अलंकारों की संसृष्टि से शब्द-शक्तिमूलक ध्वनि की संसृष्टि है । यहाँ पर दो उदाहरण और दिये जाने चाहिये थे एक तो दो संकीर्ण अलंकारों की ध्वनि के किसी भेद से संसृष्टि का । किन्तु वृत्तिकार ने ये दो उदाहरण नहीं दिये हैं । उसका कारण यह है कि यह अन्तिम उदाहरण ऐसा है जिसमें दोष दो उदाहरण भी सन्निविष्ट किये जा सकते हैं । वह इस प्रकार—'उपमितं व्याघादिभिः सामान्यप्रयोगे' इस सूत्र के अनुसार जहाँ साधारण धर्म का प्रयोग न हो वहाँ उपमान और उपमेय का समास हो जाता है । इस प्रकार 'पथिकसामाजिकेपु' का यह भी विग्रह किया जा सकता है—'पथिका: सामाजिकाः इव' इस प्रकार यहाँ
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पर 'पथिकसामाजिकेपु' शब्द में ही लुप्तोपमा हो सकती है। व्याघ्रादिगण आकृति-गण है; अतः यह भी नहीं कहा जा सकता कि सामाजिक शब्द उसमें नहीं आया है, अतः यह समास यहाँ पर नहीं हो सकता। 'पथिकसामाजिकेपु' में रूपक बतलाया ही जा चुका है। इस प्रकार एक ही शब्द से दो अलंकारों के सम्भव होने के कारण इन दोनों अलंकारों का सन्देह संकर है। इन संकीर्ण अलंकारों के साथ ध्वनि की संसृष्टि हो जाती है। यह ध्वनि शब्दशक्तिमूलक वस्तु ध्वनि है—'अभिनय के प्रयोग में या अभिनव प्रयोग में रसिकों के मध्य गर्जन को फैलाये हुये या गीतों का प्रसार करनेवाले......' इत्यादि से यह ध्वनि निकलती है कि पथिक रूपी रसिकों का समूह उपस्थित है जो कि नये अभिनयों को देखने की आकांक्षा कर रहा है। समां वाँधा हुआ है, मयूर नाच रहे हैं और अपनी नई नई कला दिखला रहे हैं, साथ ही अभिनय और संगीत भी चल रहा है। इस ध्वनि से उक्त दोनों अलंकारों की संसृष्टि हो जाती है क्योंकि रूपक ध्वनि के अनुग्राहक नहीं होते। यहाँ पर ध्वनि शब्दशक्तिमूलक वस्तुध्वनि है क्योंकि 'अहिणा' इत्यादि शब्द बदले नहीं जा सकते। इसी प्रकार 'पथिकसामाजिकेपु' शब्द में जो उपमा और रूपक का सन्देह संकर है उसके साथ इसी शब्द से अभिव्यक्त होनेवाली ध्वनि का संकर हो जाता है। क्योंकि यहाँ एक ही व्यज्जक से अलंकार और ध्वनि दोनों निकलते हैं इस प्रकार संकीर्णालंकार संसृष्टि और संकीर्णालंकार संकर के दोनों उदाहरण प्रस्तुत उदाहरण में ही गतार्थ हो जाते हैं। इसीलिये इनके उदाहरण पृथक् नहीं दिये गये॥४३१॥
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एवं ध्वने: प्रभेदा: प्रभेदभेदैश्च केन शब्द्यन्ते । संख्यातुं दिडमात्रं तेषामिदमुक्तमस्माभिः ॥
(अनु०) इस प्रकार ध्वनि के प्रभेद और प्रभेदों के भी भेद किसके द्वारा परिगणित किये जा सकते हैं? उनका यह निर्देशर्शनमात्र हमारे द्वारा कह दिया गया है॥४४१॥
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अनन्ता हि ध्वने: प्रकारा: सहृदयै: व्युत्पत्तये तेषां दिडमात्रं कथितम् ।
(लो०) एतदुपसंहरति—एवमिति। स्पष्टम् ॥ ४४ ॥ (अनु०) इसका उपसंहार करते हैं—'इस प्रकार' यह। स्पष्ट है॥४४॥
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ध्वनि भेदों की अपरिमिति का उपसंहार तारावती—४४वीं कारिका उपसंहारात्मक है जिसमें कहा गया है कि किसी में इतनी शक्ति नहीं है जो ध्वनि-भेदों का पूरा परिगणन कर सके। ध्वनि के भेद, भेदों के भेद, उनकी संसृष्टि और संकर फिर संसृष्टि और संकर की संसृष्टि और संकर, इस प्रकार ध्वनि के अनन्त प्रकार हो जाते हैं। हमने यहाँ पर जितने उदाहरण दिये हैं वह तो केवल भेदों की दिशा दिखलाना है जिससे सहृदय लोग उसी पद्धति का आश्रय लेकर ध्वनि की व्याख्या विभिन्न कार्यों में कर सकें अथवा उसे समझ सकें। ध्वनि की इयत्ता दिखलाना प्रस्तुत प्रकरण का उद्देश्य नहीं है॥४४॥
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(ध्वन्यालो) इत्युक्तलक्षणो यो ध्वनर्निर्विवेच्यः प्रयत्नतः सद्धिः । सत्काव्यं कर्तुं वा ज्ञातुं वा सम्यगभियुक्तः ॥ ४५ ॥
(अनु०) यह उक्त लक्षणवाली जो ध्वनि सज्जनों के द्वारा अथवा सत्काव्य को करने के लिये या जानने के लिये ठीक रूप में उद्यत लोगों के द्वारा प्रयत्नपूर्वक् विवेचित की जानी चाहिये ॥४५॥
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अस्फुटत्स्फुरितं काव्यतत्त्वमेतद्योचितम् । आकल्नाद्दिव्यक्तितं रीतयः समप्रवर्तिताः ॥ ४६ ॥
उक्त स्वरूपवाली ध्वनि के निरूपण में निपुण सत्कवि और सहृदय निश्चितरूप से ही काव्यविषये में प्रकर्ष पदवी को प्राप्त कर लेते हैं ।
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एतदध्वनि प्रवर्तनेन निर्णयां काव्यतत्त्वमस्फुटस्फुरितं सदर्शशानुरोध्रिः प्रतिपाद्यितं वैदर्भी गौडी पाक्षाली च रीतयः प्रवर्तिताः । तत्त्वमेतदस्फुटतया मनाक्स्फुरितमासीदिति लक्ष्यते । तदत्र स्फुटतया समप्रकाशितेन रीतिलक्षणेन न किंचित्
‘जैसा कहा गया है यह काव्यतत्त्व अस्फुटरूप में स्फुरित हो रहा था । (इसको) व्याख्या करने के लिये असमर्थ होनेवालों के द्वारा वैदर्भी गौडी और पाक्षाली ये रीतियां प्रवृत्त की गईं । रीति तत्व का विधान करनेवालों के सामने यह काव्यतत्त्व अस्फुटरूप में प्रवृत्त की गई । रीति तत्व का विधान करनेवालों के सामने यह काव्यतत्त्व अस्फुटरूप में थोड़ा सा स्फुरित हो रहा था यह लक्षित होता है । वह यहां पर स्फुटरूप में प्रदर्शित (ध्वनि सिद्धान्त) के कारण अन्य रीति लक्षण की कोई आवश्यकता नहीं ।
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निर्व्यूढमित्यादिेनाह-इत्युक्तेति । यः प्रयत्नतो विवेच्यः अस्माभिरुचोक्तलक्षणो ध्वनिरेतदेव काव्यतत्त्वं यथोदितेन प्रपञ्च निरुपणादिना व्यक्तकुंराशनुरोध्रलङ्कार-ध्वनिरेतदेव कारः रीतयः प्रवर्तिताः इत्युक्तकारिकया सम्बन्धः । अन्ये तु यच्छब्दस्थाने ‘अयं’ इति पठन्ति । प्रकर्षपदवीं प्रति—निर्माण बोध नोते भावः । अपाकतुं शक्नुवन्तो दिव्यन्ति हेतुः—अस्फुटं कुत्वा स्फुरितमिति । लक्ष्यत इति । रीतिरिह गुणेष्वेव पर्यवसिता । यदाह—विशेषो गुणात्मा गुणाश्च रसपर्यवसायिन एवेति । हृदयं कर्तु प्राग्गुणनिरुपणे—‘श्रृङ्गार एव मधुरः’ इत्यत्रेति ॥ ४५– ४६ ॥
(अनु०) अब ‘सहृदयमनः प्रीतये’ यह जो सूचित किया था वह इस समय शब्दमात्र नहीं है अपितु पूरा हो गया । इस आशय से कहते हैं—‘यह उक्त’ इत्यादि । जो उक्त लक्षणवाली ध्वनि प्रयत्नपूर्वक हमारे द्वारा विवेचित की जानी चाहिये; यही काव्यतत्त्व है, इस काव्यतत्त्व की ठीक रूप से बतलाये हुए प्रपञ्चनिरुपण इत्यादि के द्वारा व्याख्या करने में असमर्थ लोगों के द्वारा रीतियां प्रवृत्त की गईं यह उत्तर कारिका से सम्बन्ध है । और लोग तो ‘यत्’ के स्थानपर ‘अयं’ यह पढ़ते हैं । ‘प्रकर्षपदवीं को’ यह । भाव यह है कि निर्माण बोध न होने के भावः । अपाकतुं शक्नुवन्तो दिव्यन्ति हेतुः—अस्फुटं कुत्वा स्फुरितमिति । लक्ष्यत इति । रीतिरिह गुणेष्वेव पर्यवसिता । यदाह—विशेषो गुणात्मा गुणाश्च रसपर्यवसायिन एवेति । हृदयं कर्तु प्राग्गुणनिरुपणे—‘श्रृङ्गार एव मधुरः’ इत्यत्रेति ॥ ४५– ४६ ॥
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तृतीय उद्योत:
निर्माण में और बोध में । 'व्याख्या करने में असमर्थ हुए' इसमें हेतु है—‘अस्फुट करके स्फुरित यह । 'लक्षित होता है' यह । रीतियां निस्सन्देह गुणों में ही पर्यवसित होती हैं । जैसा कहा गया है—विशेष गुणात्मक होता है और गुण रसपर्यवसायी होते ही हैं यह निस्सन्देह पहले गुणनिरुपण में कहा गया है—'श्रृंगार ही मधुर होता है' इसमें ॥४५, ४६॥
तारावती—४५ वीं कारिका में ध्वनि निरुपण के प्रयोजन का उपसंहार किया गया है । उपक्रम में प्रयोजन पर दृष्टिपात करते हुए 'सहृदयमनःप्रीतिलक्षणोऽर्थ:' लिखा गया था यह सहृदयमनःप्रीति कोई झूठा वादा नहीं था । यहां तक ध्वनिनिस्सिदान्त का पूर्ण विवेचन करके यह सिद्ध कर दिया गया कि सहृदय मनःप्रीति जो कि प्रमुख लक्ष्य था वह पूरा कर दिया गया । ४५वीं कारिका के प्रथम चरण में लोचन के अनुसार दो प्रकार का पाठ प्राप्त होता है—(१) 'इत्युक्तलक्षणोऽयं ध्वनि:' और (२) 'इत्युक्तलक्षणो यो ध्वनि:' । प्रथम पाठ के अनुसार यह एक पूरा वाक्य है और स्वतन्त्र रूप में अर्थ का प्रतिपादन करता है । इस पाठ के अनुसार इसका सार यह है इस ध्वनि का लक्षण बतलाया जा चुका और उसकी व्याख्या भी कर दी गई । सज्जनों का कर्तव्य है कि वे इसकी मनोयोगपूर्वक विवेचना करें । इसी प्रकार जिन लोगों की कामना है कि वे उत्तम काव्य की रचना कर सकें अथवा जिनकी कामना है कि वे उत्तम काव्य का परिज्ञान कर सकें इन दोनों प्रकार के व्यक्तियों का परम कर्तव्य है कि वे ध्वनि का ठीक रूप में विवेचन करें । प्रथम पाठ के अनुसार इस कारिका का यही आशय है । काव्य के मूलतत्व के रूप में रीतियों का प्रवर्तन और ध्वनि
अब दूसरे पाठ को लीजिए । इसमें 'अयम्' के स्थान पर 'यः' पाठ है । अत एव यह एक अपूर्ण वाक्य रह जाता है और उसका अर्थ पूरा करने के लिए ४६ वीं कारिका का आश्रय लेना पड़ता है । इस प्रकार ४५ वीं और ४६ वीं कारिकाओं का सम्मिलित अर्थ हो जाता है । ४५ वीं कारिका उदेश्य वाक्य है और ४६ वीं कारिका विषय वाक्य । इस प्रकार इन दोनों का मिलाकर अर्थ यह होगा कि—जिस ध्वनि के लक्षणों का हमने उक्त प्रकरण में ठीक रूप में निरुपण किया है, जिस ध्वनि का विवेचन करना सज्जनों का परम कर्तव्य है और सस्काव्य की रचना करनेवाले कवियों तथा सस्काव्य को समझने की इच्छा करनेवाले सहृदयों दोनों के द्वारा जिस ध्वनि का विवेचन करना अपरिहार्य कर्तव्य है वह ध्वनि एक सर्वप्रमुख काव्यतत्व है जैसा कि उक्त विवेचन से स्पष्ट हो गया होगा । यह काव्यतत्व अस्फुट रूप में प्राचीन काव्यशास्त्रियों के सम्मुख स्फुरित अवश्य हुआ था । किन्तु क्योंकि यह तत्व बहुत स्पष्ट नहीं था भत एव प्राचीन आचार्य उसकी ठीक रूप में व्याख्या नहीं कर सके । किन्तु उन्होंने इस तत्व की व्याख्या करने की चेष्टा अवश्य की और उसका परिणाम यह हुआ कि उन आचार्यों ने रीतियों का प्रवर्तन कर डाला । उनके विवेचन से इतना तो स्पष्ट ही प्रतीत होता है कि काव्य का यह तत्व बहुत ही मन्द रूप में उनके मस्तिष्क में विद्यमान अवश्य था किन्तु उसका स्पष्ट चित्र उनके सामने नहीं था । उन्होंने व्याख्या करने की चेष्टा की किन्तु वे ठीक व्याख्या नहीं कर सके । इसीलिए उन्होंने रीतियों को प्रवृत्त कर दिया । ये रीतियां तीन हैं—वैदर्भी, गौडी और पांचाली । उन्होंने रीति की परिभाषा बनाई
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'विशिष्टा पदरचना रीति:' अर्थात् विशेष प्रकार की पदरचना को रीति कहते हैं । इस पद-रचना की विशेषता होती है गुणात्मक अर्थात् ऐसी पदरचना जिसमें गुण विद्यमान हो । बस उन आचार्यों का विवेचन यहाँ पर हक गया । उन्होंने यह बतलाने की चेष्टा नहीं की कि गुणों को गुणरूपता प्रदान करनेवाला तत्त्व कौन सा है । यदि उन्होंने यह विचार किया होता तो उन्हें ज्ञात हो जाता कि गुणों का पर्यवसान रस में ही होता है । ध्वनिकार ने कहा ही है— 'श्रृङ्गार एव मधुरः परः प्राहादनो रसः ।' इसका अर्थ यह है कि माधुर्य श्रृङ्गारपर्यवसायी ही होता है । ( रस सर्वदा व्यङ्ग्य ही होते हैं । ) इस प्रकार स्वतः सिद्ध हो जाता है कि काव्य का सर्वप्रमुख तत्त्व ध्वनि ही है । इस ध्वनि की व्याख्या की जा चुकी । अतः अब रीति के विस्तृत विवेचन की कोई आवश्यकता नहीं रह गई ।
रीतियों का संक्षिप्त परिचय
[ यहाँ पर ध्वनिकार ने लिखा है कि रीति का प्रवर्तन वस्तुतः काव्य के मूलतत्त्व के अनुसन्धान की चेष्टामात्र है । यहाँ पर ध्वनिकार ने सम्भवतः वामन की ओर संकेत किया है क्योंकि वामन ने ही स्पष्ट रूप में रीति को काव्य-आत्मा कहा है । आनन्द-वर्धन ने व्याख्या करने में तीन रीतियों का उल्लेख किया है वैदर्भी, गौड़ी और पांचाली । यह मान्यता भी वामन की ही है । अभिनव गुप्त ने तो वामन के सूत्रों का भी उल्लेख कर दिया है । इन सब प्रमाणों से यहाँ निष्कर्ष निकलता है कि यहाँ पर वामन की ही ओर आचार्यों ने संकेत किया है ]
वस्तुतः रीतियों का इतिहास बहुत पुराना है । भरतमुनि ने तो देश-भेद पर आधारित आचार-व्यवहार और रीति-रिवाजों का वर्णन किया ही है । वाणी का आचार ही रीति है । काव्य शास्त्र का सर्वप्राचीन उपलब्ध ग्रन्थ भामह का काव्यालङ्कार है । इसमें सबल शब्दों में काव्य रीति को वैदर्भी और गौड़ी के रूप में विभाजित करने का प्रतिवाद किया गया है और कहा गया है कि दूसरे विद्वानों रीतियों की मान्यता स्वीकार करते हैं । इससे सिद्ध होता है कि भामह के बहुत पहले रीतियाँ प्रतिष्ठित हो चुकी थीं और देशभेद के आधार पर एक अच्छी और दूसरी बुरी ये दो रीतियाँ मानी जाने लगी थीं । वामन ने तो चार रीतियों का उल्लेख कर उनके समन्वय की चेष्टा की है । ये चारों रीतियाँ हैं उत्तरी, दक्षिणी, पूर्वी और पश्चिमी । ज्ञात होता है कि काल क्रम से उत्तरी और पश्चिमी शैलियों ने अपनी सत्ता खो दी थी और दक्षिणी (वैदर्भी) तथा पूर्वी (गौड़ी) ये दो शैलियाँ ही शेष रह गई थीं । इन दोनों शैलियों का विस्तृत विवेचन और इनके प्रति पूरी आस्या हमें दण्डी के काव्यादर्श में प्राप्त होती है । दण्डी ने १० काव्य गुणों का उल्लेख किया है और उनकी सत्ता वैदर्भी रीति में मानी है । दण्डी के बाद वामन ने स्पष्ट रूप में रीति को काव्य की आत्मा कहा । इनकी मौलिकता दो बातों में है—(१) एक तो इन्होंने १० के स्थान पर २० गुण मान लिये १० शब्द गुण और १० अर्थ गुण । अर्थ गुणों में ओज प्रौढ़ि माधुर्य (उक्तिश्लेष) और कान्ति (दीप्तरसत्व) को स्वीकार कर इन्होंने रीतियों का क्षेत्र बहुत ही व्यापक बना दिया और (२) इन्होंने दो के स्थान पर तीन रीतियाँ स्वीकार कीं । उक्त दोनों रीतियों में एक पांचाली रीति और जोड़
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तृतीय उद्योत:
दी। किस्तु वामन ने गुण साकल्य के कारण वैदर्भी को ही प्राह्या बतलाया और शेष दो में गुणों की कमी बतलाकर उनको स्वीकार न करने का निर्देश दिया। वामन के बाद आनन्दवर्धन के समय तक रीतियों की संख्या में केवल एक की वृद्धि हुई—रुद्रट ने लाटीया रीति को और स्वीकार कर रीतियों की संख्या चार कर दी और अच्छी रीतियों में वैदर्भी तथा पांच्चाली को और बुरी रीतियों में गौड़ी तथा लाटी को सन्निविष्ट कर दिया। रुद्रट ने रीतियों का सम्बन्ध वस्तु से भी स्थापित कर दिया। आनन्दवर्धन के पहले रीतियों की यही स्थिति थी। रीतियों का मुख्य आधार तो शब्दगुम्फ ही है। कतिपय आचार्यों ने रीतियों के विवेचन में वर्ण-सङ्घटना पर विचार किया है तथा कतिपय अन्य रुद्रट इत्यादि आचार्यों ने समास प्रयोग पर रीतियों को आधृत माना है। किन्तु रीतियों के केवल यही दो आधार नहीं हैं। दण्डी तथा वामन ने रीतियों के आघारभूत तत्वों में काव्य के प्रायः समी तत्व समेट लिये हैं। वाण ने भी शैष इत्यादि को रीतियों का आधार माना है। ध्वनिकार तथा ध्वनिसम्प्रदायवादी दूसरे आचार्य रीतियों को अस्वीकार तो नहीं करते किन्तु उनका कहना है कि रीतियों की काव्य के मूलतत्व के रूप में यह कल्पना सर्वथा अधूरी है। यदि रीतियों के मूलाधार का अनुसन्धान किया जाय तो वह रस ही सिद्ध होगा। 'कोमलवन्ध से शृङ्गाररस' 'कठोरवन्ध से रौद्ररस' इत्यादि कथनों से यह स्पष्ट हो जाता है कि शृङ्गार इत्यादि सब वाच्य नहीं होते अपितु बन्ध के आधार पर उनकी अभिव्यक्ति होती है। इस प्रकार यदि रीतियों का ठीक रूप में अनुसन्धान किया जाय तो उनका पर्यवसान ध्वनि सिद्धान्त में ही होगा। ध्वनि सिद्धान्त की ठीक ठीक व्याख्या कर देने पर रीतियों के विवेचन की आवश्यकता ही नहीं रह गई।
४७
शब्दतत्त्वाश्रया: काव्यविचारतत्त्वयुजोडपराः । वृत्तयोऽपि प्रकाशन्ते ज्ञातेsस्मिन् काव्यलक्षणे ॥ ४७ ॥
(अनु०) 'इस काव्यलक्षण के ज्ञात हो जाने पर वृत्तियाँ भी प्रकाशित होती हैं; कुछ शब्दतत्व के आश्रित होती हैं और दूसरी अर्थतत्व के आश्रित' ॥४७॥
इस व्याख्यादृशयथारुजकभाव-विवेचनमये काव्यलक्षण के ज्ञात हो जाने पर जो कोई प्रसिद्ध उपनागरिका इत्यादि शब्दतस्वाश्रित वृत्तियाँ और जो अर्थतत्व से सम्बद्ध कैशिकी इत्यादि वृत्तियाँ व ठीक रूप में रीतिप्रवृत्तियों पर अवतीर्ण होती हैं। नहीं तो उन वृत्तियों का अदृष्टार्थ के समान अश्रद्धेयस्व ही हो जाय अनुभावसिद्धत्व नहीं।
(लो०) प्रकाशन्त इति । अनुभवसिद्धतां काव्यजीविततत्वे प्रयान्तीतार्थः । रीतिपदवृत्तिमिति । तद्रदेव रसपर्यवसायित्वात् । प्रतीतिपदवृत्तिमति वा पाठः । नागरिकया
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ह्युपमितेत्यानुप्रासवृत्तिः शृङ्गारादौ विश्राम्यति। पुरुषेति दीप्तेऽपु रौद्रादिषु। कोमलেতिहास्यादौ। तथाह—‘वृत्तयः काव्यमातृका:’ इति यदुक्तं मुनिना तत्र रसौचित एव चेष्टाविशेषो वृत्तिः। यदाह—‘कैशिकी शृङ्गारनेपथ्या श्रृङ्गाररसमसम्भवा’ इत्यादि।
इयता तस्याभावं जगदुरपरे इत्यादावभावविकलपेऽपु वृत्तयो रीतियश्च गता श्रवणगोचरं, तदतिरिक्तः कोऽयं ध्वनिरिति तत् कथमदभ्युपगमः। कृतः कथञ्चिद्दूषणं दत्तमस्फुटस्फुरितमिति वचनेन।
(अनु.) ‘प्रकाशित होती है’ यह। अर्थात् काव्य जीवितत्व में अनुभावसिद्धता को प्राप्त हो जाती है। ‘रीतिपदवी को’ यह। उसी के समान रसपर्यवसायी होने के कारण अथवा ‘प्रतीतिपदवी को’ यह पाठ है। ‘नागरिका के साथ उपमित’ इस (अर्थ) से अनुप्रासवृत्ति शृङ्गार इत्यादि में विश्रान्त होती है। ‘पुरुषा’ यह दीप्त रौद्र इत्यादि में। ‘कोमला’ यह हास्य इत्यादि में। तथा मुनि ने जो कहा है कि वृत्तियों की माता काव्य हो होता है उसमें रसौचित चेष्टाविशेष ही वृत्ति कहलाती है जैसा कि कहते हैं—‘कैशिकी कोमला नेपथ्यवाली होती है जिसका जन्म शृङ्गार से होता है।’ इत्यादि में अभाव के विकल्पों से दूसरे लोग उसका अभाव कहते हैं।
इतने से दूसरे लोग उसका अभाव कहते हैं। इत्यादि में अभाव के विकल्पों में वृत्तियाँ और रीतियाँ श्रवणगोचर हुई हैं, उनसे अतिरिक्त यह ध्वनि क्या वस्तु है? यह (जो कहा था) उसमें किसी प्रकार स्वींकृति दे दो और किसी प्रकार ‘अस्फुटस्फुरित’ इस वचन के द्वारा दोष दे दिया।
वृत्तियाँ और ध्वनि—४७वीं कारिका वृत्तियों के विषय में है। इसका आशय यह है कि व्यञ्जकव्यापक भाव का विवेचन करना हो काव्य का लक्षण है। जब इतनी बात मान लो गई और व्यञ्जकव्याप्यपक्षक के रूप में काव्यलक्षण का विवेचन कर दिया गया तब काव्य जीवन के पर्यालोचन के क्षेत्र में वृत्तियों पर विचार करना भी सार्थक हो जाता है। ये वृत्तियाँ दो प्रकार की होती हैं—एक तो उपनागरिका इत्यादि वृत्तियाँ होती हैं जिनका आश्रय शब्दतत्त्व होता है और दूसरी वृत्तियाँ कैशिकी इत्यादि होती हैं जिनका आश्रय अर्थतत्त्व होता है। इन दोनों प्रकार की वृत्तियों के विषय में भी वही कहा जा सकता है जो कि ४६वीं कारिका में रीतियों के विषय में कहा गया है। अर्थात् वृत्तियाँ भी रीतियों के समान ही रसपर्यवसायिनी होती हैं।
यदि रस की सत्ता हो न मानो जाय तो वृत्तियों पर विचार करना ही व्यर्थ हो जायेगा। अतः रस पर बिना विचार किये वृत्तियों पर विचार अधूरा ही रह जायेगा। रस-प्रवणता के अभाव में उन वृत्तियों पर उसी प्रकार विश्वास नहीं किया जा सकेगा जिस प्रकार यज्ञ इत्यादि कायों पर विश्वास नहीं किया जाता क्योंकि उनका फल प्रत्यक्ष नहीं अपितु अदृष्ट होता है जिस प्रकार प्रत्यक्ष फल न दिखलाई पड़ने के कारण यज्ञ इत्यादि अनुभव सिद्ध नहीं माने जाते उसी प्रकार वृत्तियों को भी कोई प्रत्यक्ष अनुभव सिद्ध नहीं मानेगा। अतः वृत्तियों का रसप्रवण मानना हो उचित है।
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तृतीय उद्योतः
वृत्तियों का संक्षिप्त परिचय
[ यहां पर वृत्तियों का संक्षिप्त परिचय प्राप्त कर लेना आवश्यक प्रतीत होता है। रीति, वृत्ति और प्रवृत्ति ये तीन शब्द काव्यशास्त्र में प्रयुक्त हुए हैं। इनका अन्तर दिखलाते हुए राजशेखर ने लिखा है—वेषविन्यासक्रम को प्रवृत्ति कहते हैं, विलासविन्यासक्रम को वृत्ति कहते हैं और वचनविन्यासक्रम को रीति कहते हैं। अग्निपुराण में इनको अनुभवों के अन्तर्गत रखा गया है। शरीरारम्भ अनुभव आाज्ञीक अभिनय कहलाता है। जिस प्रवृत्ति शब्द से अभिहित किया जाता है। वागारम्भ अनुभव वाचिक अभिनय होता है जो कि रीति शब्द से अभिहित किया जा सकता है। वृत्ति समस्त क्रियाओं को कहते हैं। वृत्तियों का निरूपण आानन्दवर्धन के पहले पर्याप्त मात्रा में किया जा चुका था। भरत मुनि ने ही वृत्तियों का सर्वप्रथम विवेचन किया था। उनके अनुसार वृत्तियां चार प्रकार की होती हैं—सात्वती, कैशिकी, आरभटी और भारती। यदि इन वृत्तियों का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया जाय तो उसका निष्कर्ष यह होगा कि सात्वती वृत्ति सात्विकाभिनय में प्रयुक्त होती है। इसका उपयोग नाट्य में होता है। कैशिकी वृत्ति कोमल वर्णन में प्रयुक्त होती है और आरभटी कठोर वर्णन में। भारती वृत्ति सभी प्रकार के वाचिक अभिनय को कहते हैं। अतः समस्त श्रव्य काव्य भारती वृत्ति में ही अन्तर्भूत हो जाता है। इस भारती वृत्ति को कैशिकी और आरभटी परिवर्तित कर देती हैं। यदि भारती वृत्ति कैशिकी के साथ होगी तो वह वृत्ति वैदर्भी रीति बन जायेगी और यदि आरभटी के साथ होगी तो गौडीरीति बन जायेगी। यह वृत्तियों के विषय में भरतमुनिसम्मत परम्परा है। इसके अतिरिक्त वृत्तियों के विषय में दूसरी मान्यता है अलङ्कारवादियों की। उनके अनुसार अनुप्रास-जाति को हो वृत्ति कहते हैं। अनुप्रास तीन प्रकार का होता है, उसी आधार पर तीन वृत्तियों की कल्पना की गई है—उपनागरिका, परुषा और कोमला। इसी आधार पर अनुप्रास का एक भेद वृत्त्यनुप्रास माना गया है। आानन्दवर्धन को भरत की वृत्तियों का तो ज्ञान है ही उद्भट की उपनागरिका इत्यादि वृत्तियों का भी उन्हें पूरा ज्ञान है। इन दोनों प्रकार की वृत्तियों की व्यवस्था तथा समन्वय उन्होंने इस प्रकार किया है कि भरत की कैशिकी इत्यादि वृत्तियां अर्थगत होती हैं और उद्भट की उपनागरिका इत्यादि वृत्तियां शब्दगत होती हैं। यहां पर ध्वनिकार का आशय यही है कि वृत्तियां रसाभिव्यक्ति और रसानुभूति की साधनमात्रा हैं। अतः इनकी मान्यता ही ध्वनिसिद्धान्त में एक प्रमाण है।]
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तृतीय उद्योतः
रीतियों और वृत्तियों में ध्वनि के अन्तर्भाव का उपसंहार
यह तो स्पष्ट ही है कि उपनागरिका का अर्थ है नगरनिवासिनी ललना का अनुकरण करनेवाली वृत्ति। जिस प्रकार नगरनिवासिनी ललना अपने सौकुमार्य के लिये प्रसिद्ध होती है उसी प्रकार अनुप्रास की उपनागरिका नामक वृत्ति भी श्रृङ्गाररस में विभान्त होती है। उसी प्रकार परुषा शब्द का अर्थ है कठोर वृत्ति। यह रौद्र इत्यादि दोष्त रसों में विभान्त होती है तथा कोमला हास्य इत्यादि में विभान्त होती है। ये वृत्तियां रसपर्यवसायिनी होती हैं इसमें स्वयं भरतमुनि प्रमाण हैं। उन्होंने लिखा है कि ‘वृत्तियों की माता काव्य ही है।’ इस कथन से मुनि का तात्पर्य यही है कि वृत्ति उन विशेष प्रकार को चेष्टाओं को कहते हैं
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जिनका सन्निवेश रस के औचित्य को ध्यान में रखकर किया गया हो। (क्योंकि भरत की कैशिकी इत्यादि वृत्तियों वसुतः चेष्टा की विशेषता में ही हैं क्योंकि उन्हीं को लक्ष्य कर कहा गया है कि 'विलासविन्यासकरुणो हि वृत्ति:' 1) यहां पर मुनि का अभिप्राय रसप्रवण चेष्टाविशेष को वृत्ति कहनाहै। इस मान्यता में भी मुनि का वचन ही प्रमाण है, क्योंकि मुनि ने अन्यत्र स्वयं कहा है कि- 'कैशिकी का संविधान कोमल होता है और उसकी उत्पत्ति शृंगाररस से होती है ।'
सारांश यही है कि वैदर्भी रीति कैशिकी अर्थवृत्ति और उपनागरिका शब्दवृत्ति माधुर्य के कारण शृंगाररस के अनुकूल होती हैं। इसी प्रकार गौडी रीति आरभटी अर्थवृत्ति और परुषा शब्दवृत्ति ये ओज के कारण रौद्र रस के अनुकूल होती है और पांचाली रीति, सात्त्वती अर्थवृत्ति और कोमला शब्दवृत्ति ये प्रसाद की प्राभानता के कारण हास्य इत्यादि के अनुकूल होती हैं। इन वृत्तियों की स्वरूपस्थिति रस के कारण ही होती हैं। अतः वृत्तियों से रस सिद्धान्त ही पुष्ट होता है। रस सर्वदा व्यंग्य ही होता है, अतः वृत्तियों की दृष्टि से भी ध्वनि ही काव्य का परम तत्व सिद्ध होता है।
रीतियों और वृत्तियों को काव्य की आत्मा नहीं मान सकते अपितु उनका अन्तर्भाव ध्वनिसिद्धान्त में हो हो जाता है, यह ऊपर दिखलाया गया है। इसके प्रतिपादन का कारण यह है कि आधुनिक विद्वानों में कुछ लोग रीतियों और वृत्तियों में ध्वनि के अन्तर्भाव का समर्थन करते थे! अतः उनकी मान्यता पर विचार करना उचित तथा आवश्यक था। इस मान्यता को आनन्दवर्धन ने आंशिक रूप में स्वीकार कर लिया और आंशिक रूप में उसका प्रत्या ख्यान कर दिया। ध्वनिकाव ने इसी सिद्धान्त का समर्थन किया कि रीति और वृत्ति को काव्य की आत्मा मानना केवल एकांगी दृष्टिकोण हैं। रीतियां और वृत्तियां रसप्रवण होकर ही काव्य की आत्मा हो सकती हैं। अतः दृष्टिकोण ध्वनि को काव्य की आत्मा मानना ही है।
यत्र शब्दानामर्थानां च केषांचिद्वत्प्रतिपत्तृविशेषसंवेद्यं जात्यत्वमिव रसनिवेशेषाणां चात्वमनोऽनुग्राह्येयमव-भासते काव्ये तत्र ध्वनिरव्यवहार इति यल्लक्षणं ध्वनेरुच्यते केनचित्तदयुक्तंमिति नाभिधेयतामहति । यतः शब्दानां स्वरूपपाश्रयस्यातावक्लिष्टत्वे सत्यप्रयुक्तप्रयोगः वाचकत्वायस्तु प्रसादो व्यञ्जकत्वं चैति विशेषः । अर्थानां च स्फुटतरस्वनेनावभासनं गूढोऽर्थ: परत्वं गूढार्थप्रतीतत्वं चैति विशेषः । तौ च विशेषौ व्याख्यातुं शक्येते व्याख्यातो च बहुप्रकारम् । तद्रुचितरितकान्वयेयविशेषसम्भावना तु विवेकावसाद-भावसूलैव । यद्मान्वयेयशब्देन तस्याभिधानसम्भवात् । सामान्यसंप्रकर्षविकलपशब्दागोचरत्वे सति प्रकाशमानत्वं तु यदान्वयेयत्वमुख्यते तदपि काव्यविशेषाणां रसनिवेशेषाणा-शिव न सम्भवति । तेषां लक्षणकारैरव्याकृतत्वात् । रसनिवेशेषाणां च सामान्यस-भावनयैव मूल्यस्थितिपरिकल्पनादर्शनाच्च । उभयेषामपि तेषां प्रतिपत्तृविशेषसंवेद्य-त्वमस्यैव । वैदग्धिका एव हि रसनतत्वविदः, सहृदया एव हि काव्यानां रसज्ञा इति कस्याचित् विप्रतिपत्तिः ।
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३
तृतीय उद्योत:
(अनु०) इस प्रकार स्फुटरूप में ही इस ध्वनि का स्वरूप लक्षणत करने योग्य है। जहाँ कुछ शब्दों और अर्थों का रत्नविशेषों के जात्यत्व के समान विशेष प्रतिपत्ता से संवेद्य चारुत्व न कहने योग्य ही अवभासित होता है उस काव्य में ध्वनि-व्यवहार होता है यह जो ध्वनि का लक्षण किसी के द्वारा कहा जाता है वह अनुचित है अतः वर्णन की योग्यता को प्राप्त नहीं कर पाता। क्योंकि शब्दों की स्वरूपाश्रित विशेषता है क्लिष्ट न होने पर प्रयुक्त का प्रयोग न करना। वाचकाश्रित विशेषता है प्रसाद और व्यञ्जकत्व। अर्थ का विशेषता है स्फुटरूप में अवभासित होना, व्यङ्ग्यपरता और व्यङ्ग्यांशाविशिष्टता। उन दोनों विशेषताओंकी व्याख्या की जा सकती है और बहुत प्रकार से व्याख्या की भी गई है। उसे भिन्न अनाख्येय विशेष की सम्भावना तो विवेकध्वंसमूलक ही है। क्योंकि सर्व शब्द के अगोचररूप में किसी का अनाख्येयत्व सम्भव नहीं है क्योंकि अन्त में अनाख्येय शब्द से उसका अभिधान सम्भव है। सामान्य का संसर्ग करनेवाले विशेष से जो शब्द, उससे अगोचर होते हुए प्रकाशमानत्व यदि कहीं अनाख्येयत्व कहा जाय वह भी रत्नविशेषों के समान काव्यविशेषों का सम्भव नहीं है। क्योंकि लक्षणकारों ने उसके रूप की व्याख्या कर दी और क्योंकि सामान्य सम्भावना के द्वारा हो मूल्यसिद्धि की परिकलपना देखा जाती है। उन दोनों को ही प्रतिपत्तृविशेष सापेक्षत्व है ही क्योंकि वाचकत्व ही रत्न का तत्व जाननेवाले होते हैं और सहृदय ही काव्यों के रसज्ञ होते हैं इस विषय में किसको विप्रतिपत्ति हो सकती है ?
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तृतीय उद्योत:
(लो०) इदानों वाचां स्थितमविषये इति यदूचे तत्र प्रथमोद्योते दूषितमपि दूषयति सर्वप्रपञ्चकथने हि असम्भाव्यमेवानाख्येयत्वमित्यभिप्रायेण । अक्लिष्टत्व इति । श्रुतिकष्टाद्यभाव इत्यर्थः । अप्रयुक्तस्य प्रयोग इत्यपोनिरुक्त्यम् । तार्वति शब्दगतोडर्थ-गतश्च । विवेकस्यावसादो यत्र तस्य भावो निर्विवेकत्वम् । सामान्यसंसर्गी यो विकलप्यस्ततो यः शब्दः लप्यस्ततो यः शब्दः । दृष्टान्तेऽपि अनाख्येयत्वं नास्तीति दर्शयति—रत्नविशेषाणां चात्र । ननु सवर्ण तत्र सवेद्यत इत्याशङ्कयासम्भावनमात्रेति परिहरति—अभ्येषामिति । रत्नानां काव्यानां च ।
(लो०) इदानों वाचां स्थितमविषये इति यदूचे तत्र प्रथमोद्योते दूषितमपि दूषयति सर्वप्रपञ्चकथने हि असम्भाव्यमेवानाख्येयत्वमित्यभिप्रायेण । अक्लिष्टत्व इति । श्रुतिकष्टाद्यभाव इत्यर्थः । अप्रयुक्तस्य प्रयोग इत्यपोनिरुक्त्यम् । तार्वति शब्दगतोडर्थगतश्च । विवेकस्यावसादो यत्र तस्य भावो निर्विवेकत्वम् । सामान्यसंसर्गी यो विकलप्यस्ततो यः शब्दः लप्यस्ततो यः शब्दः । दृष्टान्तेऽपि अनाख्येयत्वं नास्तीति दर्शयति—रत्नविशेषाणां चात्र । ननु सवर्ण तत्र सवेद्यत इत्याशङ्कयासम्भावनमात्रेति परिहरति—अभ्येषामिति । रत्नानां काव्यानां च ।
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तृतीय उद्योत:
(अनु०) इस समय ‘वाणी के अविषय में स्थित’ यह जो कहा गया वह प्रथम उद्योत में दूषित भी सर्वप्रपञ्चकथन में निस्सन्देह अनाख्येयत्व असम्भव ही है इस अभिप्राय से (पुनः) दूषित कर रहे हैं—‘अक्लिष्टत्व’ यह । अर्थात् श्रुतिकष्टत्व इत्यादि का अभाव । अप्रयुक्त के प्रयोग का अर्थ है अपोनिरुक्त्य । वे दोनों अर्थात् शब्दगत और अर्थगत । विवेक का अवसाद है जिसमें उसका भाव अर्थात् निर्विवेकत्व । सामान्य का संसर्ग करनेवाला जो विकल्प उससे जो शब्द । दृष्टान्त में भी अनाख्येयत्व नहीं है यह दिखलाते हैं—‘और रत्न विशेषों का’ यह । ( प्रश्न ) सबके द्वारा वह विदित नहीं किया जा सकता यह शङ्का करके स्वीकृति पूर्वक ही उत्तर देते हैं—‘दोनों का’ यह । रत्नों का और काव्यों का ।
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तृतीय उद्योत:
अनाख्य-वक्तव्यत्व पक्ष का खण्डन
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तृतीय उद्योत:
तारावती—ऊपर जो कुछ कहा गया है उससे अभाववाद के तीनों पक्षों ओर लक्षणा में अन्तर्भाव के प्रदान पर पर्याप्त प्रकाश पड़ जाता है और यह सिद्ध हो गया है कि
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ध्वनि का अन्तर्भाव इन किन्हीं काव्य के प्रतिष्ठित तत्त्वों में नहीं हो सकता तथा ध्वनि काव्य का सर्व प्रमुख स्वतस्त्र तत्त्व है । अब पाँचवीं पक्ष शेष रह जाता है जिसमें यह कहा गया है कि ध्वनि का तत्त्व सर्वथा अनिर्वचनीय है और वाणी में इतनी शक्ति ही नहीं कि उसका ठीक विवेचन कर सके । यद्यपि इसका उत्तर श्री पहले उद्योत में दिया जा चुका है । तथापि अन्त में उसपर प्रकाश डालना आवश्यक प्रतीत होता है । इस पक्ष वालों के कयन का सार यही है कि जिस प्रकार माणिक्य का एक धर्म होता है जास्यत्व यह वही धर्म माणिक्य में उत्कर्ष का आधान करता है । इस जात्यत्व धर्म को एक तो सभी लोग जान नहीं पाते, कतिपय विशेषज्ञ ही इससे परिचित होते हैं, दूसरे जो लोग इस जात्यस्व को जानते भी हैं वे भी ठीक रूप में उसकी व्याख्या नहीं कर सकते जिससे दूसरे लोग जात्यत्व के आधार पर माणिक्य के उत्कर्ष को पहिचान सकें । इसी प्रकार शब्दों और अर्थों में एक प्रकार की चारुता होती है । जिस प्रकार सभी रत्नों में जात्यत्व गुण विद্যমान नहीं होता उसी प्रकार सभी शब्दों और अर्थों में चारुता नहीं होती । कतिपय शब्द ही ऐसे होते हैं जिनमें इस प्रकार की चारुता विद्यमान होती है । जिस प्रकार रत्नों के जात्यत्व गुण को सभी लोग नहीं समझ पाते उसी प्रकार शब्दों और अर्थों की चारुता का ज्ञान भी कतिपय विशेष सहृदयों को ही होता है । किन्तु वह चारुता गूंगे के गुड़ के समान सर्वथा अनिर्वचनीय है उसका आनन्द ही लिया जा सकता है प्रकटित नहीं किया जा सकता । इस प्रकार सौन्दर्य का जो अनिर्वचनीय तत्त्व अवभासित होता है वही ध्वनि नाम से अभिहित किया जा सकता है । यह है कुछ लोगों का मत । इस पर निवेदन है कि यह मत तो नितान्त अनुचित है, अतः इस प्रश्न का उठाया जाना भी ठीक नहीं । ऐसी कौन सी विशेषता होती है जिसका निरूपण न किया जा सके । उदाहरण के लिये शब्द को ही लीजिये । शब्द की तीन प्रकार की विशेषतायें होती हैं—( १ ) स्वरूपगत विशेषता ( २ ) वाचकत्व के आश्रित रहनेवाली विशेषता और ( ३ ) अर्थ की विशेषता । शब्द की स्वरूपगत विशेषता यही होती है कि शब्द श्रुतिकटु न हो और एक ही शब्द का बार-बार प्रयोग न किया जाय अर्थात् शब्द की पुनरुक्ति न हो । शब्द की वाचकाश्रित विशेषता यही होती है कि उसमें बोधगम्य ही अर्थसमर्पण की शक्ति हो अर्थात् उसमें प्रसाद गुण विद्यमान हो और विशेष अर्थ के अभिज्ञापन की क्षमता हो । इसी प्रकार अर्थ को भी यही विशेषता होती है कि अर्थ स्फुट रूप में अवभासित हो रहा हो, वह दूसरे व्यङ्ग्यार्थ के प्रति उन्मुख हो और व्यञ्जकांश को लेकर उसकी चारुता में अभिवृद्धि हो रही हो । यही शब्द की कतिपय विशेषतायें हैं । इन समस्त विशेषताओं का कथन कर सकना असम्भव नहीं है और अधिकतर आचार्यों ने शब्द और अर्थ की इन विशेषताओं पर प्रकाश डाला भी है । इतना सब होते हुये भी शब्द और अर्थ की विशेषताओं को अनिर्वचनीय ( गूंगे का गुड़ ) कह देना तो यही सिद्ध करता है कि कहनेवाले के विवेक का सर्वथा द्वंस हो गया है और उसके अविवेक से ही इस प्रकार के तर्क उद्भूत हो गये हैं । आखिर 'अनालम्ब्येय' शब्द का अर्थ क्या है ? यही न कि ऐसी विशेषता जिसके लिये किसी शब्द का प्रयोग न किया जा सके अर्थात् जिसका निर्देश किसी शब्द के द्वारा न किया जा सके । यह तो सम्भव ही नहीं है । जितनी भी विशेषतायें होती
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तृतीय
उद्योतः
सबके लिये किसी न किसी शब्द का प्रयोग तो किया ही जाता है और प्रत्येक वस्तु का अभिधान शब्द के द्वारा तो हो ही जाता है। यदि कहो कि कुछ ऐसी विशेषतायें होती हैं जिनके लिये किसी शब्द का प्रयोग नहीं किया जा सकता तो इस पर मेरा निवेदन है कि यदि कोई ऐसी विशेषता सम्भव भी हो तो भी उसे 'ध्वनाऽऽयेय विशेषता' कहेंगे अर्थात् ऐसी विशेषता जिसका वर्णन नही किया जा सकता । यह कहना भी तो है। उसे विशेषता का एक परिचय देना ही हो गया। 'अनाऽऽयेय' शब्द स्वयं ही उस विशेषता का परिचायक हो गया। अतः यह कहना किसी प्रकार भी ठीक नहीं कि कोई भी तत्व अनाऽऽयेय हो सकता है।
इस विषय में पूर्वपक्षी यह कह सकते हैं कि ज्ञान दो प्रकार का होता है एक तो सविकल्पक और दूसरा निर्विकल्पक। जो ज्ञान विशेषण-विशेष्य पर आधारित होता है वह सविकल्पक कहलाता है और जो ज्ञान विशेष्य-विशेषण पर आधारित नहीं होता वह निर्विकल्पक कहलाता है। उदाहरण के लिये हम किसी गाय को इस लिये पहचान लेते हैं कि हमें गोत्व ( आकृति ) का ज्ञान है। गाय का ज्ञान विशेष्य ज्ञान है और गोत्व का ज्ञान विशेषण ज्ञान है अत एव गाय का ज्ञान सविकल्पक ज्ञान कहा जावेगा। इससे प्रतिकूल जो ज्ञान विशेषण पर आधृत नहीं होता वह निर्विकल्पक कहलाता है। जब हम किसी ज्ञान को अनाऽऽयेय या अनिर्वच्य कहते हैं तब हमारा अभिप्राय यही होता है कि उस ज्ञान का आधार कोई सामान्य धर्म नहीं है ओर वह ज्ञान सविकल्पक ज्ञान नहीं कहा जा सकता। आशय यह है कि जो ज्ञान प्रकाशित तो होता है किन्तु सामान्य धर्म का स्पर्श करनेवाले सविकल्पक शब्द का क्षेत्र नहीं होता वह ज्ञान अनाऽऽयेय कहा जाता है। इस पर मेरा निवेदन है कि यह परिभाषा मान लेने पर भी काव्य अनाऽऽयेय सिद्ध नहीं होता जैसे रत्नों की विशेषतायें जात्यत्व इत्यादि अनाऽऽयेय नहीं होती। काव्यशास्त्र के अनेक लक्षणकार आचार्यों ने उन विशेषताओं की व्याख्या कर दी है। अतः हम उसे अनाऽऽयेय कह ही नहीं सकते। रत्नों के विषय में और काव्य के विषय में उपमान्तर यह कहा जा सकता है कि सामान्य की सम्भावना होती है। उनके लिये पर्याप्त होता है। रत्नों के मूल्य की परिकल्पना इतने से ही हो जाती है कि उनकी दृष्टि में सामान्य रूप से उसे रत्न की संज्ञा दे दी जावे। किन्तु उनका विशेष ज्ञान तो विशेष व्यक्तियों को ही होता है सामान्य व्यक्ति इतना तो जान लेता है कि यह रत्न होने के कारण बहुमूल्य है किन्तु उसमें जात्यत्व इत्यादि गुण विद्यमान है यह बात तो जोहरी ही जान पाता है। इसी प्रकार सामान्य सहृदय काव्य से चमत्कृत हो जाता है किन्तु उसके विशेष गुणों को विशेष सहृदय ही जान पाते हैं। इस विषय में तो किसी को विप्रतिपत्ति हो ही नहीं सकती। यह उन लोगों को उत्तर दिया गया है जो यह कहते थे कि विशेषताओं का ज्ञान सभी को नहीं होता।
तृतीय
उद्योतः
यस्त्वनिर्वाच्यत्वं सवंलक्षणविषयं बौद्धानां प्रसिद्धं तत्त्वतन्मतपरिक्ष्याऽऽग्रन्थान्तरे निरूपयिष्यामः। इह तु ग्रन्थान्तरेऽभिधानलवप्रकाशानां सहृदयवैमनस्यप्रवृत्ति न प्रक्रियते। बौद्धमतेऽपि यथा प्रत्यक्षादिलक्षणं तथास्माकं ध्वनिलक्षणं भविष्यति। तस्माल्लक्षणान्तरस्याघटनादर्शनादार्थतस्तस्युक्तमेव, ध्वनिलक्षणं साधीयः। तदिदमुक्तम्—
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३
तृतीय उद्योतः
अनाश्रयेयांशभासितवं निर्वाच्यार्थतया ध्वने: । न लक्षणं लक्षणं तु साधीयोडस्य यथोचितम् ॥
इति श्रीराजानकानन्दवर्धनाचार्यविरचिते ध्वन्यालोके तृतीय उद्योतः ॥ (अनु०) जो तो सब लक्षणों के विषय में अनिर्देश्यत्व बोधकों का प्रसिद्ध है उसका निरूपण हम उसके मत की परीक्षा के दूसरे ग्रन्थ में करेंगे । यहाँ तो ग्रन्थान्तर के श्रवण के एक अंश का प्रकाशित करना सहृदयों को वैमनस्य देनेबाला होगा अतः (उसकी अंशमात्र ही प्रकाशन) नहीं किया जा रहा है । अथवा बौद्धमत से जैसे प्रत्यक्ष इत्यादि का लक्षण (किया जाता है) वैसा हमारा ध्वनिलक्षण हो जावेगा । इस कारण से उसके दूसरे लक्षण के घटित न होने से और शब्द का अर्थ न होने से कहा हुआ ही ध्वनिलक्षण अधिक अच्छा है । वह यह कहा गया है 'ध्वनि के निर्वाच्यार्थक होने के कारण अनिर्वाच्यांशभासितव लक्षण नहीं है; इसका लक्षण तो वही ठीक है जैसा कहा गया है । यह राजानक आनन्दवर्धनाचार्य के रचे हुए ध्वन्यालोक में तीसरा उद्योत है ।
३
तृतीय उद्योतः
(लो०) ननु नार्थ शब्दा: स्फुशन्तिलयपीत, अनिर्देश्यस्य वेदकमिल्यादौ कथमन्येयत् वस्तूनामुक्तमिति चेदत्राह—यथर्वति । एवं ध्वानिरिस्वभावमनाश्रयेयमिल्यादिव्यापकलक्षणं स्यादितिभाव: । ग्रन्थान्तर इति । विनिश्चयटीकायां धर्मोत्तर्या या विवरण्तिरमुना ग्रन्थकृता कता तत्ैव तद्वचाश्यातम् । उत्क्रमिति । संग्रहार्थं मयैवेत्यर्थ: । अनाश्रयेयांशास्यामसो विद्यते यस्मिन् काव्ये तस्य भावस्तन्न लक्षणं ध्वनेरिति सम्बन्ध: । अत्र हेतुः निर्वाच्यार्थतयैति । निर्विभज्य वक्तुं शक्यत्वादित्यर्थ: । अन्यस्तु 'निर्वाच्यार्थतया' इत्यत्र निसो नत्रर्थकं परिकल्यानाअ्ये-यांशभासितवेत्य हेतुरिति व्याचष्टे, तत्तु क्लिष्टतम् । हेतुरिश्च साध्याविशिष्ट इत्युक्तत्वात्-ख्यातनमेवेति शिवम् ॥
३
तृतीय उद्योतः
काव्यालोके प्रथां नीतान् ध्वनिभेदान् परामृशन् । इदानों लोचनं लोकान् कृतकार्यं संविधास्यति ॥ आदिसूत्रितानां भेदानां स्फुटतापत्तिदायिनीम् । त्रिलोचनपियान् वन्दे मध्यमान् परमेश्वरীম् ॥
इति श्रीमहामहेश्वराचार्यवर्यभिनवगुप्तोन्मीलिते सहृदयालोकलोचनेध्वनिसंकেতে तृतीय उद्योतः ॥ (अनु)(प्रश्न) अर्थ को शब्द स्पष्ट नहीं ही करते यह अनिर्देश्यत्व का आवेदक है इत्यादि में वस्तुओं का अनाश्रयेत्व कैसे कहा गया है यदि यह कहो तो यहाँ पर कहते हैं—'जो तो यह । इस प्रकार निस्संदेह सब पदार्थों के वृत्तान्त के समान ही ध्वनि है इसमें ध्वनिस्वरूप अनाश्रयेय है यह लक्षण अत्यधिक व्यापक हो जावेगा यह भाव है । 'ग्रन्थान्तर में' यह । विनिश्चय-टीका में धर्मोत्तर्या में जो विवरण लिखी है वहीं उसकी व्याख्या की है । 'कहा है' यह । अर्थात् संग्रह के लिये मेरे द्वारा ही ।
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३
तृतीय उद्योतः
में विद्वमान है उसका भाव वह ध्वनि का लक्षण नहीं है यह सम्बन्ध है। इसमें हेतु है—निर्वाच्य होने के कारण। अभ्रान्त् निर्विभक्त करके कहे जाने योग्य होने के कारण। दूसरे ने तो ‘निर्वाच्यार्थतया’ यहां पर निस् के निपेघ अर्थ की परिकल्पना करके यह हेतु अनाख्येयांशभासित्व में है यह व्याध्यिa की। वह तो विलष्ट है और हेतु साध्य से अवशिष्ट है अतः उक्त व्याख्या ही ठीक है। बस, आनन्द मंगल और कल्याण हो।
काव्यालोक में विस्तार को प्राप्त ध्वनिनिर्मेदों का परामर्श करानेवाला लोचन अब लोगों को कृतार्थ कर देगा। आसूत्रित भेदों को स्पष्टता की प्राप्ति करानेवाली त्रिलोचन की प्रिया परमेश्वरी मध्यमादेवी की मैं वन्दना कर रहा हूँ।
३
तृतीय उद्योतः
यह है परममाहेश्वर श्रेष्ठ आचार्य अभिनवगुप्त द्वारा उन्मीलित ध्वनिसंकेत रूप सद्धृदयालोक लोचन में तृतीय उद्योत।
तारावती—यहां पर एक प्रश्न यह है कि बौद्धों में एक क्षणिकतावादी वर्ग है जो प्रत्येक वस्तु को क्षणिक मानता है। इस मत के अनुसार प्रत्येक वस्तु प्रत्येक क्षण बदलती रहती है देवदत्त एक क्षण पहले और था दूसरे क्षण वह नहीं है और हो गया। इस मत के अनुसार आनन्द—इत्यव तो सभी वस्तुओं में आ गया। क्योंकि क्षणिक होने के कारण शब्द तो अर्थ का स्पर्श कर ही नहीं सकते।
३
तृतीय उद्योतः
इस प्रकार जब सभी वस्तुयें अनाख्येय ही हैं तब ध्वनि में ही क्या विशेषता है कि उसको अनाख्येय न माना जा सके। इस विषय में आनन्दवर्धन का कहना यह है कि यह दार्शनिक विषय है। इसका विवेचन हम विनिश्चय नामक बौद्धग्रन्थ पर धर्मोत्तर नाम की टीका लिखने के अवसर पर करेंगे।
३
तृतीय उद्योतः
साहित्य के छात्र सु कुमार बुद्धि वाले होते हैं अतः यह विषयान्तर यदि उनके सामने विस्तार से रखा जावेगा तो वे ऊब उठेंगे और उनको वह विषय नीरस प्रतीत होगा। हां यहां पर इतना कह देना अप्रासङिक न होगा कि बौद्ध लोग मानते तो सभी पदार्थों को क्षणिक हैं; फिर भी प्रत्यक्ष का लक्षण बनाते ही हैं।
३
तृतीय उद्योतः
इसी प्रकार उनके मत को हुज्नतोप न्या० से स्वीकार करते हुए भी हमारे ध्वनिलक्षण करने में कोई अनुपपत्ति नहीं होनी चाहिए। इस प्रकार क्योंकि कोई दूसरा लक्षण सङ्घटित नहीं होता और ध्वनि का वाच्य अर्थ है भी नहीं इसलिए हमारा बनाया हुआ लक्षण ही ठीक है।
३
तृतीय उद्योतः
अनिर्वाच्य पक्ष का उपसंहार
उपर जो कुछ कहा गया है उसको एक ही श्लोक में मैंने इस प्रकार संग्रहीत किया है :—
३
तृतीय उद्योतः
'इस ध्वनि का अर्थ (निः) निश्शेष रूप में तथा इसको (निर्विभक्त कर) खराड—खराड करके निरुपित किया जा सकता है; अतः यह ध्वनि का यह लक्षण नहीं है कि ध्वनि उसे कहते हैं जिसमें अनाख्येय (अनिर्वाच्य) तत्व अभासित हो रहा हो। ध्वनि का वास्तविक लक्षण तो वही है जिसका भली भांति इस ग्रन्थ में प्रतिपादन कर दिया गया है।
इस श्लोक का अर्थ करने में किसी ने ‘निर्वाच्यार्थतया’ इस हेतु को ‘अनाख्येयांश-भासित्व’ के साथ लगाया है और ‘निः’ का अर्थ किया है निपेघ।
३
तृतीय उद्योतः
इस प्रकार उनका अर्थ
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यह हो जाता है कि 'क्योंकि ध्वनि के अर्थ का निर्वचन नहीं किया जा सकता अतः ध्वनि अनाख्येयोंशभासी है। किन्तु यह अर्थ ठीक नहीं है क्योंकि एक तो इसमें क्लिष्ट कल्पना है दूसरे 'निर्वाच्यार्थता' यह हेतु है और 'अनाख्येयोंशभासित्व' साध्य है। दोनों का अर्थ एक ही है। अतः हेतु और साध्य में कोई भेद नहीं रहता। ऊपर जो अर्थ किया गया है वही माना जाना चाहिए। बस इतना पर्याप्त है। शेष यही कहना है कि सभी का इस ग्रन्थ के द्वारा आनन्दमंगल हो।
लोचन के समापन श्लोक
अन्त में लोचनकार ने दो उपसंहारात्मक श्लोक लिखे हैं। एक में लोचन के प्रयोजन का उपसंहार है और दूसरे में अन्त का मंगलाचरण है। प्रथम श्लोक का अर्थ यह है— 'काव्यालोक (ध्वन्यालोक) में विस्तारपूर्वक जिन ध्वनिभेदों का निरूपण किया गया है उन्हीं की छानबीन इस लोचन नामक व्याख्या में की गई है। यह लोचन तृतीय उद्योत तक पूरा हो चुका है। अतः अब यह इस योग्य हो गया है कि सहृदय समाज को ध्वनि का रहस्य समभाकर कृतार्थ कर दे। यह लोचन ऐसा ही करेगा ऐसी हमारी आशंसा है।'
दूसरा श्लोक ग्रन्थान्त में मंगलाचरणपूर्वक है। दूसरे उद्योत में पश्यन्ती देवी की अस्पार्थना की गई थी, अब इस उद्योत में मध्यमा देवी की अस्पार्थना की गई है। वाणी के चार रूप हैं परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी। परारूप में सभी ध्वनियाँ 'शब्दब्रह्म' इत्यादि एक सी रहती हैं; पश्यन्ती में भेद का सूत्रपात होता है। जिसको केवल बुद्धि ग्रहण कर सकती है; फिर मध्यमा में भेद स्फुट हो जाते हैं। द्वितीय उद्योत में ध्वनिभेदों का सूत्रपात किया गया था; अतः उसमें पश्यन्ती की प्रार्थना ठीक थी। अब इस उद्योत में ध्वनिभेदों का स्पष्टकरण किया गया है, अतः इसमें मध्यमा की प्रार्थना ही उचित है। दूसरी बात यह है कि चौदह लोग शिव को ही परब्रह्म का स्वरूप मानते हैं और महामाया भगवती पार्वती ही हैं। भेदों का सूत्रपात कर जगत् को सत्ता में लाना और उनको स्पष्टता प्रदान करना यह महामाया भगवती पार्वती का ही कार्य है। अतः पश्यन्ती और मध्यमा ये भगवती पार्वती के ही रूप हैं। इस प्रकार इस पद्य में मध्यमा के रूप में भगवती पार्वती की वन्दना की गई है।
दूसरे उद्योत में पश्यन्ती देवी की अस्पार्थना की गई थी, अब इस उद्योत में मध्यमा देवी की अस्पार्थना की गई है।
दलोक का सार यह है— 'जिन भेदों का सूत्रपात हो जाता है उनकी स्पष्टता प्रदान करनेवाली भगवती पार्वती की शक्तिम मध्यमा रही है। यह त्रिलोचन भगवान् शंकर की प्रेयसी है। और उन्हीं के अधीन रहकर कार्य करती है। इसकी हम वन्दना करते हैं।'
यहाँ पर शंकर के लिए त्रिलोचन शब्द का प्रयोग बहुत ही सार्थक है। 'त्रि' शब्द तृतीय उद्योत की ओर संकेत करता है और 'लोचन' शब्द लोचन टीका की ओर। अतः त्रिलोचन की प्रिया मध्यमा देवी की वन्दना भी सार्थक हो जाती है और इससे यह भी अभिव्यक्त हो जाता है कि ध्वनिभेदों को स्पष्टता प्रदान करना ही लोचन टीका का प्रमुख उद्देश्य है।
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चतुर्थ
उद्योतः
एवं ध्वान्तं सुप्रपञ्चं विप्रतिपत्तिनिरासार्थं व्युत्पाद्य तद्व्युत्पादने प्रयोजनान्तरमुख्यते—
चतुर्थ
उद्योतः
१
ध्वनेर्यः सगुणीभूतव्यङ्ग्यचस्याध्वा प्रदर्शितः। अनेनानन्वयमायाति कवीतां प्रतिभागुणः॥ १ ॥ य एष ध्वनेगुणीभीतव्यङ्ग्यस्य च मार्गः प्रकाशितस्तस्य फलान्तरं कविप्रतिभानल्यम् ॥
(अनु॰) इस प्रकार विप्रतिपत्ति के निराकरण के लिए प्रपञ्च के साथ ध्वनि का व्युत्पादन कर उसके व्युत्पादन में दूसरा प्रयोजन कहा जा रहा है। 'गुणीभूतव्यङ्गचस्य' के साथ ध्वनि का जो यह मार्ग दिखलाया गया है इससे कवियों का प्रतिभागुण अनन्वयता को प्राप्त हो जाता है। जो यह ध्वनि का और गुनीभूतव्यङ्गच का मार्ग प्रकाशित किया गया है इसका फल है कविप्रतिभा की अनन्वता।
चतुर्थ
उद्योतः
२
कृत्यपचकनिवर्हायोगेऽपि परमेश्वरः । नान्योपकरणापेक्षो यतां नौमि शाङ्करीम् ॥ उद्योतान्तरसङ्गतिं विचारयितुं वृत्तिकार आह—एवमिति । प्रयोजनान्तरस्मिति । यद्यपि 'सहृदयमनःप्रीतये' इत्यनेन प्रयोजनं प्रागेवोक्तं, तृतीयोद्योतावधी च सकलकाव्यकतुर्वा शास्तुर्वा तद्वेदशास्त्रपारङ्गतनुधापि स्कुटतरोक्ततुप्रदानां पथः । यतस्मुस्पष्टरूपत्वेन विज्ञायते, अतोऽस्पष्टनिरूपितास्पष्टनिरूपणमन्यर्थेव प्रतिभातीतिप्रोजनान्तरमिल्युक्ततम् । अथवा पूर्वोक्तयोः प्रयोजनयोरन्तरं विशेषोऽभिधीयते, केन विशेषण सत्काव्यगुणनमस्य प्रयोजनं, केन च सत्काव्यबोध इति विशेषो निरूप्यते । तत्र सत्काव्यगुणने कथमस्य व्यापार इति पूर्वं वस्तव्यं निप्पादितस्य ज्ञेयत्वादितितदुच्यते ॥ २ ॥
(अनु॰) 'परमेश्वर कृत्यपञ्चक के निर्वाह योग में भी जिस माया के कारण अन्य उपकरणों की अपेक्षा नहीं करते उस शाङ्करी माया की हम वन्दना करते हैं ।' (लो॰) तीसरे उद्योत की सङ्घति पर विचार करने के लिए वृत्तिकार कहते हैं—'इस प्रकार यह । 'दूसरा प्रयोजन' यह । यद्यपि 'सहृदयों की मनःप्रीति के लिये' इसके द्वारा प्रयोजन पहले ही कहा गया और तृतीय उद्योत की समाप्ति पर्यन्त अच्छे काव्य को करने के लिए अथवा जानने के लिए उसीको कुछ स्पष्ट कर दिया गया तथापि और अधिक स्पष्ट करने के
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लिए यह यत्न है । क्योंकि सुस्पष्टरूप में विज्ञात होता है; अतः अस्पष्ट निरुपित की अपेक्षा स्पष्टनिरूपण अन्यथा ही प्रतिभात होता है इसलिए प्रयोजनान्तर यह कहा गया है । अथवा पूर्वोक्त दोनों प्रयोजनों का अन्तर अर्थात् विशेषता बतलाई जा रही है: कि किस विशेषता से सत्काव्य का बनाया जाना इसका प्रयोजन है और किससे सत्काव्यबोध यह विशेषता निरुपित की जा रही है । उसमें सत्काव्य करण में इसका व्यापार कैसे होता है, यह पहले कहा जाना चाहिए क्योंकि निष्पादित ही ज़ेय होता है । वह कहते हैं—'ध्वनि का जो यह ॥११॥
लोचन का मंगलाचरण
तारावती—चतुर्थ उद्योत के प्रारम्भिक मंगलाचरण में भी अभिनवगुप्त ने भगवान् शङ्कर की मायारूपिणी शक्ति की ही अभ्यर्थना की है । जिसका सार यह है—
'भगवान् शिव सर्वदा ५ कर्तव्यों का निर्वाह किया करते हैं—उत्पत्ति, स्थिति ( पालन ), संहार, तिरोभाव और अनुग्रहकरण । इन कर्तव्यों का पालन कोई सामान्य बात नहीं है तथापि इनके पालन में परमेश्वर को केवल एक साधन की अपेक्षा होती है । वह है शङ्कर जी की मायारूपिणी शक्ति । उसके रहते हुए संसार के क्रियाकलाप सञ्चालित करने में भगवान् को किसी अन्य उपकरण की अपेक्षा ही नहीं होती । हम उसी मायारूपिणी शङ्कर की शक्ति को नमस्कार कर रहे हैं ।'
यहाँ आशय यह है कि भगवती शाङ्करी शक्ति ही सबसे बड़ा साधन है जिससे विश्व के सारे क्रियाकलाप सञ्चालित होते हैं । हमें भी उस शाङ्करी शक्ति का हो पूरा विश्वास है कि केवल उसी की सहायता से हम ध्वन्यालोक की व्याख्या जैसे अपने दुस्साध्य कार्य को सफलतापूर्वक पूरा कर लेंगे ।
तृतीय उद्योत की संगति तथा ध्वनिनिरूपण का प्रयोजनान्तर
चौथे उद्योत की प्रथम कारिका की व्याख्या करने के पहले वृत्तिकार ने प्रतीकात्मक उपक्रम में तृतीय और चतुर्थ उद्योतों की सङ्गति बैठाने का प्रयत्न किया है । उनका कहना है कि ध्वनि के विषय में आचार्यों में पर्याप्त विप्रतिपत्तियाँ चल रही थीं । जब तक उन विप्रतिपत्तियों का निराकरण नहीं किया जाता तब तक इस सिद्धान्त को स्थिरता प्राप्त ही नहीं हो सकती थी । अतः ध्वनि का हमें प्रपञ्च के साथ निरूपण करना पड़ा है और यह कार्य हमसे
तृतीय उद्योत के अन्त तक पूरा कर लिया । इस ध्वनिनिरूपण के भो और भी प्रयोजन हैं । अब इस चतुर्थ उद्योत में उन्होंने प्रयोजनों पर प्रकाश डाला जायेगा । 'दूसरे प्रयोजन' कहने का आशय यह है कि तृतीय उद्योत तक कतिपय प्रयोजन तो बतलाये जा चुके । प्रथम उद्योत में
ही कहा गया था कि प्रस्तुत प्रबन्ध का प्रयोजन है सहृदयमनःप्रोति, तृतीय उद्योत में भी ४५ वीं कारिका में कहा गया था कि इस ध्वनिनिरूपण का प्रयोजन है सत्काव्य का करना या सत्काव्य समझना । वस्तुतः प्रथम उद्योत में कहे हुए प्रयोजन ‘सहृदयमनःप्रोति’ का ही स्पष्टीकरण है—सत्काव्य का करना या सत्काव्य का समझना । किन्तु यह बात वहाँ पर बहुत स्पष्ट नहीं थी । अब यह जो चतुर्थ उद्योत में प्रयोजन का प्रकरण प्रारम्भ किया जा रहा है
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४
चतुर्थ उद्योतः
१
ध्वनेरपि मार्गोऽभिहितो गुणीभूतव्यङ्ग्यस्य च । मनःप्रीतिस्तु फलं हि द्वितीयं फलमपि तत्स्यात् ॥ १ ॥
'ध्वनि का भी मार्ग बतलाया जा चुका और गुणीभूतव्यङ्ग्यच का भी । इसका (सहृदयमनःप्रीति तो फल है ही दूसरा) फल यह भी है कि इससे कवि का प्रतिभा-गुण अनन्त हो जाता है ॥ १ ॥'
४
चतुर्थ उद्योतः
२
अतो ध्वन्यत्मनाsपि प्रकारेण विभूषिता । वाणी नूतनतामेति पूर्वार्थान्वयवत्यपि ॥ २ ॥
अतो ह्रन्यतमेनापि प्रकारेण विभूषिता । वाणी नूतनतामायाति पूर्वार्थान्वयवत्यपि ॥ २ ॥
४
चतुर्थ उद्योतः
२
अतो ध्वनेरुक्तप्रबन्धसदृश्यतयाsपि प्रकारेण विभूषिता सती वाणी पुरातनकविप्रबन्धार्थसंस्कारवत्यपि नूतनतामेति ।
अतो ध्वनेरुक्तप्रबन्धसदृश्यतयाsपि प्रकारेण विभूषिता सती वाणी पुरातनकविप्रबन्धार्थसंस्कारवत्यपि नूतनतामेति ।
४
चतुर्थ उद्योतः
(अनु०) यदि कहो कैसे ? तो— 'यदि दोनों में से किसी एक प्रकार से भी विशूषित वाणी पूर्व अर्थ के अन्वयवाली होते हुये भी नवीनताको प्राप्त हो जाती है ।'
४
चतुर्थ उद्योतः
३
यदि स्फुटतरव्यङ्ग्यध्वनिर्नाम निबध्यते । तयोरन्यतमप्रकारविभूषितापि सा पुनः ॥ ३४ ॥
'इन दोनों में से अर्थात् ध्वनि के उक्त प्रभेदों के मध्य से अन्यतम प्रकार से विभूषित होती हुई वाणी पुराने कवियों के निबद्ध अर्थ का स्पर्श करती हुई भी नवीनता को प्राप्त हो जाती है ।'
४
चतुर्थ उद्योतः
(लो०) ननु ध्वनिभेदात् प्रतिभानामाननल्यमिति व्यधिकरणमेतदिव्यभिप्रायेण— शङ्कूते—कथमिति । अतोत्तरम्—अतो इति । आसन्नताद् बहवः प्रकाराः, एकेनाप्येवं भवतोत्यपिशब्दार्थः । अतदुक्तं भवति—वर्णनीयवस्तुनिष्ठः प्रज्ञाविशेषः प्रतिभानं तस्य माननं परिमाणं तन्नास्तीत्यन्यः ।
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भानं, तत्र वर्णनीयस्य पारिमित्याद्यैकविनैव स्पष्टत्वात् सर्वस्य तद्विषयं प्रतिभानं तज्जातीयमेव स्यात् । ततश्च काव्यमपि तज्जातीयमेवेतिभ्रष्ट इदानों कविप्रयोगः । उक्तिवैचित्र्येण तु ता एवार्था निरवधयो भवन्तीति तद्विषयाणां प्रतिभानामाननल्यमुपपन्नमिति । ननु प्रतिभानल्यस्य कि फलमितिनिर्णेतुं वाणी नवत्वमायातीयुक्तं, तेन वाणीनां काव्यवाक्यानां तावन्नवत्वमायाति । तच्च प्रतिभानल्ये सत्युपपद्यते, तच्चार्थाननल्ये तच्च ध्वनिप्रभेदादिति ।
(अनु०) ध्वनिभेद से प्रतिभानलस्य यह व्यधिकरण है । इस अभिप्राय से आशङ्का करते हैं—‘कैसे ?’ यह । यहाँ उत्तर है—‘इन दोनों में से’ यह । ‘आ’ का अर्थ है कि एक प्रकार के द्वारा भी ऐसा हो जाता है । यह कहा गया है—‘प्रतिभान’ का अर्थ है वर्णनीय वस्तु में रहनेवाली प्रज्ञा की विशेषता । उसमें वर्णनीय के परिमित होने के कारण आदि कवि के द्वारा ही स्पष्ट होने से सभी का तद्विषयक प्रतिभान तज्जातीय ही होगा । उससे काव्य भी तज्जातीय ही होगा । इससे इस समय कविप्रयोग भ्रष्ट हो गया । उक्तिवैचित्र्य से तो ये ही विषय सीमार्तीत हो जाते हैं अत एवं उनके विषयों का प्रतिभानालस्य सिद्ध हो जाता है । प्रतिभानालस्य का क्या फल है ? यह निर्णय करने के लिये वाणी नवीनता को प्राप्त हो जाती है । इससे वाणियों का अर्थात् काव्यवाक्यों का नवीनत्व आ जाता है । और वह प्रतिभा के अनन्त होने पर सिद्ध होता है और वह अर्थ की अनन्तता में और वह ध्वनि के प्रभेद से ।
पुरानी उक्ति में ही ध्वनि से नवीनता का संचार
तारावती—दूसरी कारिका की प्रतीकयोजना करते हुये वृत्तिकार ने प्रश्न किया है ‘यह कैसे ?’ । इस प्रश्न का आशय यह है कि वस्तुतः प्रयोग एकाधिकरण्य में होता है । जो व्यक्ति कोई कार्य करता है या जिसमें कोई गुण होता है उसी व्यक्ति को उसका फल मिलता है अन्य को नहीं । यहाँ पर काव्यमार्ग बतलाया गया है और उसी प्रसङ्ग में ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गच का विवेचन किया गया है । अतः फल भी ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गच का ही दिखलाया जाना चाहिये था । किन्तु इसके प्रतिकूल प्रथम कारिका में फल दिखलाया गया है कवि की प्रतिभा की अनन्तता । इस प्रकार ध्वनि इत्यादि भेद तो काव्यगत होते हैं फल दिखलाया जा रहा है प्रतिभा की अनन्तता, जो कि कविगत होती है यह वैषम्यमकरण्य हो गया । अर्थात् गुण कहीं अन्यत्र है और फल कहीं अन्यत्र । इसकी सङ्गति किस प्रकार लगती है ? इसी प्रश्न का उत्तर दूसरी कारिका में दिया गया है । इस कारिका का आशय यह है कि जिस अर्थ को प्राचीन कवि वाल्मीकि इत्यादि ने काव्यबद्ध कर दिया है उसी अर्थ को लेकर अर्वाचीन कवियों की जो वाणी प्रवृत्त होती है यद्यपि उसमें उपात्त अर्थ पुराना ही होता है तथापि यदि उसमें ध्वनि या गुणीभूतव्यङ्गच के किसी एक ही प्रकार का आश्रय ले लिया जाता है । तो वह पुराना अर्थ भी नया मालूम पड़ने लगता है । ‘किसी एक ही’ कहने का आशय यह है कि यदि अनेक प्रकारों का आश्रय लिया जाय तो कितकी नवीनता आ जावेगी । यह तो कहा भी नहीं जा सकता । ‘आयाति’ में ‘आ’ इस उपसर्ग का अर्थ है ‘चौबीसों घोर में ।
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चतुर्थ
उद्योतः
अर्थात् ध्वनि के प्रभेद अनन्त है; अतः नवीन प्रकार का आश्रय लेने से सभी ओर से उसमें नवीनता आ जाती है।
यहाँ कहने का आशय है कि प्रतिभा का अर्थ क्या है ? यही न कि कवि की एक विशेष प्रकार की प्रज्ञा जो वर्णनीय विषय के सम्बन्ध में होती है अर्थात् कवि के अन्दर एक विशेष प्रकार की प्रज्ञा होती है जिससे वह किसी वस्तु को उसके अनेक रूपों में देख लेता है उसी प्रज्ञा को प्रतिभा कहते हैं। यदि इस दृष्टि से विचार किया जाय तो कविता के क्षेत्र में आनेवाली वर्णनीय वस्तुएँ तो बहुत थोड़ी हैं। ( चन्द्र, कमल इत्यादि कुछ गिने-चुने अप्रस्तुत तथा रति उत्साह इत्यादि कतिपय प्रस्तुत भाव ही कविता के क्षेत्र में अपनाये जाते रहे हैं। ) इन सबका वर्णन तो आदि कवि वाल्मीकि ने ही कर दिया। अब यदि उन्हीं विषयों को लेकर कवि की प्रतिभा प्रफुटित होगी तो उसमें भी वही तत्त्व आयेंगे जिनको महाकवि वाल्मीकि ने पहले ही अपने काव्य में स्थान दे दिया था। यदि इस प्रकार समस्त काव्य एक जैसा ही बनेगा तो कविवर वाल्मीकि के लिये तो कवि कहना ठीक होगा उसके बाद जितने भी कवि हुये हैं उन सबके लिये कवि शब्द ही उच्चरित हो जायेगा। अतः उस तत्त्व का अन्वेषण किया जाना चाहिए जिसके कारण पुराने विषय भी नये जैसे प्रतीत होते हैं। वह तत्त्व है उक्ति-वैचित्र्य अथवा वैनदघभंगीभणिति। यदि उक्तिवैचित्र्य का आश्रय लिया जाय तो वही पुराना विषय नवीन हो जाता है और जैसा कि पहले बतलाया जा चुका है उक्तिवैचित्र्य असीमित होता है; अतः कोई एक विषय भी काव्य के लिये असीमित हो सकता है। इस प्रकार प्रतिभा की अनन्तता सिद्ध हो जाती है। प्रतिभा की इस अनन्तता का यही फल है कि कवि की वाणी में नवीनता का संचार हो जाय और चमत्कारपूर्ण उक्तियाँ नई-नई ज्ञात होने लगें। इस प्रकार यह प्रश्न उठाया गया था कि ध्वनि के अनन्त भेदों से प्रतिभा के अनन्त भेद कैसे हो जायेंगे ? यह तो वैद्यषीकरणय में फल का स्वीकार कर लेना हो जायेगा ? इसका उत्तर भी हो गया। वह इस प्रकार कि इनमें परम्परा सम्बन्ध है। ध्वनियों के भेदोपभेद अनन्त होते हैं। इसकी परिणति में यह होती है कि उपादेय अर्थ भी अनन्त हो जाते हैं क्योंकि यह बतलाया ही जा चुका है कि एक ही अर्थ नवीन भंगिमा से कहे जाने पर नवीन ही हो जाता है। किन्तु अर्थों में अनन्तता स्वयं एक हेतु है और उससे कविप्रतिभा में अनन्तता आ जाती है क्योंकि प्रतिभा भी अनन्ततः कवि की वर्णनीय वस्तुनिष्ठ विशेष प्रकार की प्रज्ञा हो है। प्रतिभा की अनन्तता का फल यह होता है कि काव्य वाक्य भी अनन्त हो जाते हैं। इस प्रकार वैद्यषीकरणय का परिहार हो जाता है। यही बात दूसरी कारिका में कही गई है जिसका सार यह है—
चतुर्थ
उद्योतः
ध्वनि के बहुत से भेदोपभेदों पर प्रकाश डाला जा चुका है। यदि उनमें से किसी एक का ही आश्रय ले लिया जाय तो कवि चाहे ऐसी ही बात कहे जो पुराने किसी कवि ने कह दी हो फिर भी वह बात पहले कही गई सी नहीं प्रतीत होगी अपितु उसमें एक नवीनता के दर्शन होने लगेंगे।
इस विषय में दो एक उदाहरण देना वाञ्छनीय होगा। सर्वप्रथम यह दिखलाया जा
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स्मितं किञ्चिन्मुग्धं तरलमधुरो दृश्टिविभवः परिस्पन्दो वाचामभिनवविलासोऽमिसरसः । गतानामारम्भः किसलयितलोला परिमलः सृश्न्त्यास्तारुण्यं किमिव न रम्यं मृगदृशः ॥
इत्यस्य सविभ्रमस्मितोद्भेदा लोलाक्ष्यः प्रस्कलदूगिरः । नितम्बालसगामिन्यः कामिन्यः कस्य न प्रियाः ॥ इत्येवमादिषु सत्व्वपि तिरस्कृतवाच्यध्वनिसामाश्रयेणापूर्वत्वमेव प्रतिभासते । (अनु०) वह निस्सन्देह पूर्व अर्थ के अनुप्रग में भी अविवक्षितवाच्य ध्वनि के दो प्रकारों के आश्रय से नवीनता जैसे— ‘कुछ मृदु स्मित, तरल और मधुर दृष्टि का विभव, अभिनव विलास की ऊर्मियों से सरस वाणी का प्रवाह; लीला का परिमल जिसमें किसलय का आचरण कर रहा है इस प्रकार का गमन का आरम्भ (इत्यादि), ऐसी तारुण्य को स्पर्श करनेवाली नायिकाओं की क्या वस्तु है जो रमणीय नहीं प्रतीत होती ।’ इसका— ‘जिनकी मुस्कुराहट का उद्भेद विलासपूर्ण है, नेत्र चञ्चल हैं; वाणी सकलित हो रही है, जो नितम्बभार से आलस्ययुक्त गमन वाली हैं वे कामिनियाँ किसको प्यारी नहीं हैं ।’ इत्यादि के होते हुए भी तिरस्कृतवाच्यध्वनि के समाश्रय से अपूर्वत्व ही प्रतिभासित होता है ।
(लो०) तत्र प्रथममत्यन्ततिरस्कृतवाच्यान्वयमाह—स्मितमिति । मृदुमधुरविभवसरसकिसलयितपरिमलस्नान्तरतानि । तैरनाहृतसौन्दरयंसर्वजनवallभ्याक्षीणप्रसररव सन्तापप्रशमन तर्पणकतन सो कुमार्य सार्वकालिकतत्संस्कारानुवृत्तित्व यत्नाभिलषणीय संगतत्व ये जो ध्वननियम होते हैं उनसे प्रसिद्ध अर्थवाले स्मित इत्यादि की बुढ़े ब्रह्मा के द्वारा बनाये हुए धर्म से भिन्न दूसरे धर्मों की जब तक पात्रता की जाती है तब तक वह अपूर्व ही हो जाता है यह सर्वत्र माना जाना चाहिए ।
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चतुर्थ
उद्योत:
'इसका' 'अपूर्व हो जाता है' इस दूर के शब्द से सम्बन्ध है। संगति यह है कि सर्वत्र इसका नवल्य ही हो जाता है।
अत्यान्ततिरसकृतवाच्य के कारण नवीनता का उदाहरण
चतुर्थ
उद्योत:
तारावती—'जब मृगनयनी तारुण्य का स्पर्श करती है तब उससे सम्बद्ध क्या वस्तु मनोरम नहीं हो जाती ? मुस्कुराहट कुछ मृदु होती है, दृष्टि का वैभव कुछ तरल और मधुर होता है, वाणी का प्रवाह अभिनव विलास की लहरों से सरस हो जाता है, गमन में यह तत्व उद्भूत हो जाता है कि उसमें लीला परिमल किसलय का कार्य करने लगता है।'
अब इसके शब्द प्रयोग पर विचार कीजिए :-
चतुर्थ
उद्योत:
( १ )
'मुस्कुराहट कुछ मृदु है' 'मृदु' ( भोलाभाला ) कोई व्यक्ति हो सकता है मुस्कुराहट नहीं। अतः यह शब्दार्थ में बाधित होकर 'स्वाभाविक' इस अर्थ को लक्षित कराता है। इससे प्रयोजनरूप व्यंग्य निकलता है कि मुस्कुराहट में बिना किसी बनावट के सौन्दर्य का अतिरीक विद्यमान है।
चतुर्थ
उद्योत:
( २ )
'दृष्टि मधुर है' मधुर कोई खाद्य पदार्थ हो सकता है, दृष्टि के लिए यह विशेषण बाधित है। अतः इससे लक्ष्यार्थ निकलता है कि 'दृष्टिप्रसार सुन्दर है।' इसका प्रयोजनरूप व्यंग्यार्थ होगा कि दृष्टि का प्रसार इतना आकर्षक है कि बिना किसी अपवाद के सभी रसिकों के हृदयों का प्रेम अपनी ओर खींच लेता है।
चतुर्थ
उद्योत:
( ३ )
'दृष्टि का वैभव' वैभव या ऐश्वर्य व्यक्ति का हो सकता है दृष्टि का नहीं। इससे लक्ष्यार्थ निकलता है 'दृष्टि का प्रसार' और व्यंग्यार्थ निकलता है कि नायिका का दृष्टिपात बेरोकटोक अविरतगति से हो रहा है; उसको कोई रोक ही नहीं सकता।
चतुर्थ
उद्योत:
( ४ )
'वाणी का सरस प्रवाह' सरस प्रवाह जलधारा का हो सकता है वाणी का नहीं। इससे लक्ष्यार्थ निकलता है कि वह निरन्तर श्रुतिसुखद वाणी बोल रही है। इससे व्यंग्यार्थ निकलता है कि उसकी मधुर वाणी को सुनकर सन्ताप शांत हो जाता है और हृदय में एक तृप्ति का अनुभव होने लगता है।
चतुर्थ
उद्योत:
( ५ )
'गमन किसलय का कार्य कर रहा है।' गमन का किसलय कार्य असम्भव है; अतः बाध होकर लक्ष्यार्थ निकलता है कि उसकी चाल में मनोहरता है। इससे व्यंग्य निकलता है कि उसकी चाल सौकुमार्य से युक्त है और हर समय सौकुमार्य का ही अनुवर्तन करती रहती है।
चतुर्थ
उद्योत:
( ६ )
'लीला-परिमल' परिमल कमलों का हो सकता है लीला में सम्भव नहीं। अतः बाधित होकर परिमल शब्द सुन्दरता को लक्षित करता है जिससे व्यङ्ग्यार्थ निकलता है कि उसकी चाल इतनी सुन्दर है कि प्रयत्नपूर्वक उसको देखने की अभिलाषा की जानी चाहिए।
चतुर्थ
उद्योत:
( ७ )
'तारुण्य का स्पर्श' स्पर्श किसी मूर्त वस्तु का किया जा सकता है; तारुण्य का सम्भव नहीं है। अतः बाध होकर लक्षित होता है कि उसके अंगों में तारुण्य का सञ्चार हो गया है। इससे व्यङ्ग्यार्थ निकलता है कि तारुण्य उसके अंग से मिलकर बहुत ही संगत प्रतीत होता है।
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यहाँ पर स्मित इत्यादि शब्दों के वाच्यधर्म का सर्वथा परित्याग हो जाता है। ब्रह्मा जी तो वृद्ध हो गये हैं; उनमें रसिकता कहाँ से आई। अतः उन्होंने स्मित में भी जिस धर्म की स्थापना की वह बड़ा ही अनाकर्षक था। ताहण्ण के सन्निचार के साथ वह अनाकर्षक रूप दूर हो गया और यह शब्द दूसरे धर्मों का पात्र बन गया। जब इस तथ्य पर विचार किया जाता है तब इस पद्य में एक अभूतपूर्व चारुता की प्रतोतिः होने लगती है। किन्तु इस पद्य में कोई नई बात नहीं कही गई है। रमणियों की मुस्कुराहट, दृष्टिपात, भोली भाली वाणी का सरस प्रवाह और लीलागति ये ऐसे तत्त्व हैं, जिनका कविता में प्रायः उपादान होता ही है। इस पद्य की रचना के पहले ही किसी कवि ने लिखा था—
ऐसी कामिनियाँ किसको प्यारी नहीं होतीं जिनकी मुस्कुराहट हर समय प्रस्फुटित होती रहती है और उस मुस्कुराहट के साथ विलासों का भी योग रहता है, जिनके नेत्र चंचल होते हैं, जिनकी वाणी ( मद के कारण ) स्वालित होने लगती है और जिनका गमन नितम्बभार के कारण आलस्यमय होता है।'
इस पद्य में भी वे ही सब बातें आ जाती हैं जिनका उपादान उक्त पद्य में कवि ने किया है। अतः वस्तु की तो कोई नवीनता है नहीं। यदि कोई नवीनता कही जा सकती है तो केवल यह कि उस पद्य में कवि ने अत्यन्ततिरसकृतवाच्य ध्वनि का प्रयोग किया है जो कि पुराने पद्य में नहीं किया गया था। अत एव अत्यन्ततिरसकृतवाच्य ध्वनि ने ही परिचित पुराने भाव को सर्वथा नया बना दिया।
एक दूसरा उदाहरण और लीजिये जिसमें अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य के कारण पुराने परिचित भाव में नवीनता आई है। पद्य का भावार्थ यह है :—
यः प्रथमः प्रथमः स तु तथाहि हतहस्तबहुलपललाशी । हत्वापदगणेभु सिंहः सिंहः केनाधरोच्रियते ॥
स्वतेजःकृतमहिमा केनोप्यनियतिप्रसिद्ध्यते । महद्भिरपि मातङ्गैः सिंहः किमभिभूयते ॥
इत्येवमादिषु श्लोकेषु सत्स्वप्यर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनिरनुसन्ध्येयण नवत्वम् ।
( अनुवाद ) उसी प्रकार— 'जो प्राथम में वह प्रथम ही है। वह इस प्रकार कि मारे हुये हाथियों के घने मांस को खानेवाला जंगली जीवों में सिंह ही है। क्या उसको पराभूत किया जा सकता है ? इसकी— 'अपने तेज से महिमा को अजित करनेवाला किस दूसरे के द्वारा नीचा किया जा सकता है ? बड़े-बड़े हाथियों से भी सिंह क्या दबाया जा सकता है ? इत्यादि श्लोकों के होते हुये भी अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य ध्वनि का आश्रय ले लेने से नवीनता आ जाती है।
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चतुर्थ
उद्योतः
(लो०) द्वितीयः प्रथमशब्दोऽर्थान्तरेsनपाकरणीयप्रधानत्वासाधारणत्वादिव्यङ्ग्यधर्मान्तरे सङ्क्रान्तं स्वार्थ व्यनक्ति । एवं सिंहशब्दोऽपि वीरत्वानपेक्षत्वविस्मयनीयत्वादिव्यतिरेकधर्मान्तरे सङ्क्रान्तं स्वार्थ ध्वनति ।
(अनु०) दूसरा प्रथम शब्द अनुपेक्षणीय प्रधानत्व असाधारणत्व इत्यादि व्यञ्ज्यच धर्मान्तर रूप अर्थान्तर में सङ्क्रान्त अपने अर्थ को व्यक्त करता है । इसी प्रकार सिंह शब्द भी वीरत्व, अनपेक्षत्व, विस्मयनीयत्व इत्यादि व्यञ्ज्यच धर्मान्तर में सङ्क्रान्त स्वार्थ को ध्वनित करता है ।
चतुर्थ
उद्योतः
तारावती -‘जो प्रथम है वह प्रथम ही है, इसमें सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि शेर स्वयं हाथियों को मारकर उनके बहुत ही पुष्टकल घने मांस को खाता है । समस्त जंगली जीवों में वह शेर शेर ही है । क्या कोई इस विश्व में ऐसा है जो अपने वीरता के गुणों से शेर को नीचा दिखा सके ?’
यहाँ पर ‘जो प्रथम है वह प्रथम है’ यह कोई बात नहीं हुई । तात्पर्यानुपपत्ति के कारण दूसरा प्रथम शब्द स्वार्थ में बाधित है और उससे लक्ष्यार्थ निकलता है कि जिसके अपने गुणों के कारण प्रथम स्थान प्राप्त होता है वह सर्वथा प्रधान हो बना रहता है । इसका प्रयोजनरूप व्यङ्ग्यार्थ है कि जिस व्यक्ति को समाज प्रधान मान लेता है उसके गुण इतने महान् होते हैं कि उसकी प्रधानता को टाल सकने की शक्ति किसी में नहीं होती; और उसमें लोक की अपेक्षा एक विलक्षणता तथा असाधारणता होती है । इसी प्रकार ‘सिंह सिंह है’ यह कथन भी कुछ सङ्कृत नहीं होता और उससे लक्ष्यार्थ निकलता है कि सिंह सब जीवों में प्रधान है । उससे भी यही व्यञ्जना निकलती है कि सिंह की प्रधानता को कोई भी ठुकरा नहीं सकता; उसमें असाधारण पराक्रम होता है जिससे उसे किसी की परवाह नहीं होती । चमत्कार व्यङ्ग्यार्थनिष्ठ है अतः यह अर्थान्तरसङ्क्रमितविवक्षितान्यपर वाच्य अविवक्षितवाच्य ध्वनि है ।
चतुर्थ
उद्योतः
किन्तु यह भाव भी कोई नया नहीं है । इस पद्य की रचना में भी एक पुराने श्लोक का भाव ही लिया गया है । उस श्लोक का भावार्थ यह है :- ‘जिस व्यक्ति को महिमा प्राप्त करने के लिए किसी अन्य की अपेक्षा नहीं होती वह अपने तेज से ही महिमा को प्राप्त कर लेता है । क्या उसका अतिक्रमण किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा किया जा सकता है, क्या बड़े-बड़े हाथियों के द्वारा भी सिंह का पराभव किया जा सकता है ?’
प्रथम पद्य का भाव भी लगभग वही है । वस्तु में प्रायः कोई अन्तर नहीं है तो केवल इतना ही है कि उस पद्य में वही बात कहने के लिए अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य अविवक्षितवाच्य ध्वनि का आश्रय ले लिया गया है । इस प्रकार ध्वनि की नई प्रक्रिया का सहारा लेने से पुराने अर्थ भी नया हो गया है ।
चतुर्थ
उद्योतः
(ध्वन्य०) विवक्षितान्यपरवाच्यस्याप्युक्तप्रकारसमाश्रयेण नवत्वं यथा—मिद्राकैतविनः प्रियस्य बदनेन्दुनिन्द्यस्य वक्त्रं बधूः बोधाभासनिरुद्धचुम्बनरसाप्यभोगलोलं स्थिता ।
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वैलक्ष्यादिमुखीभवेदिति पुनस्तस्याध्ययनारम्भणः साङ्कार्द्रक्षप्रतिपत्ति नाम हृदयं यालं तु पारं रते:॥
इत्यादि: इलोकेस्य ।
शून्यं वासगृहं विलोक्य शयनादुत्थाय किञ्चिच्छनै- निद्राध्याजमुपागतस्य सुचिरं निर्वर्ण्य पतिमुन्मुखम् ।
विश्वस्र्धं परिचुम्ब्य जातपुलकामालोक्य गण्डस्थलोँ लज्जानचुम्बी प्रियेण हसता बाला चिरं चुम्बिता ॥
इत्यादिषु इलोकेपु सत्वापि नवत्वम् । यथा वा ‘तरङ्गभूभृङ्ग’ इत्यादिश्लो- कस्य ‘नानाभङ्गिभ्रमद्भृङ्ग’ इत्यादि इलोकापेक्षयान्यत्वम् ।
(अनु०) विक्षिप्तानन्यपरवाच्य का भी उक्त प्रकार के आश्रय से नवत्व जैसे—‘निद्रा का बहाना करनेवाले प्रिय के मुख पर मुख रखकर वधू जाग जाने के त्रास से चुम्बनरम को रोके हुए प्रयत्न के कारण चञ्चल होकर स्थित रही । लज्जा के कारण विमुख हो जायगी इसलिये उस ( नायक ) के भी आरम्भ न करने पर साङ्कार्द्रक्ष प्रवृत्ति के कारण रति के तो पार पहुँच गया ।’
इत्यादि इलोक का ।
‘वासगृह को शून्य देखकर शयन से धीरे से कुछ उठकर निद्रा के बहाने को प्राप्त हुए पति के मुख को बड़ी देर तक देखकर विश्वासपूर्वक चुम्बन करके उत्पन्न हुए पुलकवाली गण्डस्थली को देखकर लज्जा के कारण नीचे को मुख की हुई बाला हँसनेवाले प्रियतम के द्वारा बहुत देर तक चुम्बन की गई ।’
इत्यादि इलोकों के होते हुए भी नवीनता है । अथवा जैसे ‘तरङ्गभूभृङ्गा’ इत्यादि इलोक का ‘नानाभङ्गिभ्रमद्भृङ्ग:’ इत्यादि श्लोक की अपेक्षा अन्यत्व है ।
(लो०) एवं प्रथमस्य द्वौ भेदावुदाहृत्य द्वितीयस्याप्युदाहर्तुमासूत्रयति—विवक्षितां गतिंवा कृतकस्मित इत्यर्थ: वदनं विलास्य वक्त्रार्पिति । वदनस्पर्श- जमेव तावददिग्यं सुरुचि न पारयतीति । अत एव प्रियस्येति । वधू: नवोढा । बोधत्रासेन प्रियतमप्रबोधभयेन निरुद्धो हठात् प्रवर्तमानोडपि कथञ्चित्कृतथञ्चित्तः क्षण- मात्रधृतश्चुम्बनाभिलाषो यया । अत एव आयोगेन पुनः पुर्निन्द्राविचारनिरवर्णंनया विलोके कृतवा स्थिता, न तु सर्वथैव चुम्बनान्निवर्तितुम् शक्नोतीत्यर्थः ।
एवंभूतैषा यदि मया परिचुम्ब्यते तद्विलक्षा विमुखीभवेदिति । तस्यापि परिचुम्बनविषये निरारम्भस्य । हृदयं साङ्कार्द्रक्षप्रतिपत्ति नामेति । साङ्कार्द्रक्षा साभि- लाषा प्रतिपत्तिः स्थितिर्यस्य तादृशं रहरुहिकाकारदर्शितं न तु मनोरथसम्पत्तिचरितार्थं किन्तु रते: परस्परजीवितसर्वस्वाभिमानरूपा: परानुरक्तः: केनचिदप्यनुभवेनालब्ध- वगाहनाया: पारङ्गतमिति परिपूर्णीभूत एव शृङ्गारः। द्वितीयश्लोके तु परिचुम्बनं सम्पन्नम् लज्जा स्वशब्देनोक्ता । तेनापि सा चुम्बितेति यद्यपि पोषित एव शृङ्गारः;
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चतुर्थं
उद्योतः
२
तथापि प्रथमश्लोके परस्पराभिलाषप्रसरनिरोधपरम्परापर्यवसानासम्भवेन या रतिरुक्ता सोभ्योरप्येकस्वरूपचिन्तावृत्तानुप्रवेशमाचक्षाणा रतिं सुत्रां पोषयति ॥ २ ॥
(अनु०) इस प्रकार प्रथम के दो भेदों के उदाहरण देकर तृतीय के भी उदाहरण देने के लिए उपक्रम करते हैं—‘विवक्षित’ इत्यादि । ‘निद्रा में कैतबी’ अर्थात् बनावटी सोये हुए । ‘मुख के ऊपर मुख रखकर’ यह । अर्थात् वदनस्पर्श से ही उत्पन्न हुए दिव्य सुख को छोड़ने में समर्थ नहीं हो रही है । इसीलिये—‘प्रिय का’ यह । वधू अर्थात् नवोढ़ा । बोधग्रास से अर्थात् प्रियतम के प्रबोध के भय से हठपूर्वक पुनः पुनः प्रवृत्त हुई भी चुम्बन की अभिलाषा को जैसे तैसे क्षणमात्र के लिए रोका । अत एव आभोग से अर्थात् बार-बार निद्रा के विचार के निरूपण के द्वारा चञ्चल होकर स्थित हुई । अर्थात् सर्वथा ही चुम्बन से निवृत्त होने में समर्थ नहीं है । इस प्रकार की यह यदि मेरे द्वारा चुम्बित की गई तो विलक्ष ( लज्जित ) होकर विमुख हो जायेगी इसलिए उस प्रियतम के भी परिछुम्बनविषय को प्रारम्भ न करने पर । ‘साकांक्ष प्रवृत्तिवाला हृदय’ यह । साकांक्ष अर्थात् सामिलाष प्रतिपत्ति से चरितार्थ नहीं किन्तु परस्पर जीवितसर्वस्वाभिलाषिणी रूपवाली परा निवृत्त रूप रति में, जिसका अवगाहन किसी भी अनुभव के द्वारा प्राप्त नहीं हुआ है, पार को गया हुआ इस प्रकार शृंगार परिपूर्ण हो हो गया है । द्वितीय इलोक में तो परिछुम्बन हो गया है, लज्जा स्वशब्द से कही गई है । उसके द्वारा भी वह भलीभांति चुम्बित की गई इससे यद्यपि शृंगार पुष्ट ही कर दिया गया है तथापि प्रथम श्लोक में परस्पर अभिलाषप्रसार की निरोधपरम्परा के पर्यवसान के असम्भव होने से जो निवृत्ति कही गई है वह दोनों की एक स्वरूपवाली चित्तवृत्ति को कहती हुई रति को भलीभांति पुष्ट कर देती है ॥२२॥
विवक्षितान्यपरवाच्य से नवीनता का उदाहरण
तारावती—उपर इस बात का दरदर्शन करा दिया गया कि श्रविवक्षितवाच्य के दोनों भेदों का आश्रय लेने से पुराने अर्थ में भी किस प्रकार नवीनता आ जाती है । अब एक उदाहरण इसका भी लीजिये कि विवक्षितान्यपरवाच्य का आश्रय लेने से किस प्रकार पुराने अर्थ में नवीनता आती है । उदाहरण का भावार्थ यह है :- ‘प्रियतम निद्रा का अभिनय कर रहा था । अर्थात् वह वस्तुतः सो नहीं रहा था अपितु अपने को ऐसा प्रकट कर रहा था मानो सो रहा हो । वधू के अन्दर सहवास की इतनी उत्कट आकांक्षा थी कि वह क्षणमात्र विलम्ब भी सहन नहीं कर सकती थी । किन्तु प्रियतम के सो जाने के कारण उसे सहवास तत्काल सुलभ नहीं था । अतः उसने प्रियतम के मुख पर अपना मुख रख लिया जिससे उसे वदनस्पर्श का ही सुख प्राप्त हो सके । जिसे वह दिव्य सुख समस्ती थी और जिसे छोड़ने की उसमें शक्ति नहीं थी । क्योंकि सोनेवाला व्यक्ति उसका प्रियतम था । वस्तुतः वह वधू थी अर्थात् नई ही ब्याह कर आई थी । अतः प्रियतम से उसका संकोच पूर्णरूप से छूट नहीं सका था । अत एव उसे भय मालूम पड़ रहा था कि कहीं प्रियतम
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जाग न पड़े । इसीसे यद्यपि उसके अन्दर बार-बार चुम्बन की उत्कण्ठा उद्दीप्त होती जाती थी तथापि वह बड़ी कठिनाई से अपनी उस अभिलाषा को बार-बार दबा जाती थी । किन्तु बार-बार उसके अन्दर चंचलता उत्पन्न हो जाती थी और जब यह विचार करती थी कि प्रियतम तो सो रहा है क्यों न अपनी चुम्बन की अभिलाषा पूरी कर ली जाय तब उसकी वह चंचलता और अधिक उद्दाम हो जाती थी । चंचलता का आशय यह है कि वह न तो चुम्बन कर सकती थी और न चुम्बन से सर्वथा निवृत्त ही हो सकती थी । दूसरी ओर प्रियतम सोचता था कि यह इस प्रकार मुख पर मुख रखे हुए दुविधा में पड़ी है। यदि मैं इसका चुम्बन करूं तो इसके अन्दर लज्जा उत्पन्न हो जायगी और फिर लज्जा के कारण यह सहवास से पृथक् हो जायगी । अतः प्रियतम भी अपनी ओर से चुम्बन का प्रारम्भ नहीं कर रहा था । इस प्रकार दोनों की स्थिति आकांक्षा से भरी हुयी थी, दोनों का मन उत्कण्ठा से पीड़ित था किन्तु मनोरथ की पूर्णता से उनके मन को सफलता नहीं मिली थी । ऐसी स्थिति में ही उसका हृदय रति के पार पहुंच गया था । रति वस्तुतः है क्या वस्तु ? यही तो कि दोनों एक दूसरे को जीवनसर्वस्व मानें और जीवनसर्वस्व के प्राप्त हो जाने का दर्प भी उनमें विद्यमान हो । परा तृप्ति उन्हें उस अवस्था में किसी प्रकार नहीं मिल रही थी । चुम्बन आलिंगन इत्यादि किसी भी अनुभव से उनको रति के आस्वादन और अवगाहन का अवसर नहीं मिल रहा था । फिर भी उनको हृदय रति की सीमा पर पहुंच गया और उनका शृङ्गार पूर्ण हो ही गया ।
यह पद्य एक दूसरे ( अमरुक कवि लिखित ) पद्य की छाया पर लिखा गया है जिसका आशय यह है :
'नायिका ने भली-भांति देख लिया कि सोने का कमरा बिल्कुल सुना है अर्थात् कोई सखी इधर-उधर छिपी हुई भी नहीं देख रही है। वह चुपके से घोरे से अपनी चारपाई से कुछ उठी अर्थात् आड़े शरीर से लेटी रही और शरीर का आधा ऊपरी भाग उसने कुछ उठा लिया । प्रियतम पास ही लेटा हुआ था, वह सो नहीं रहा था किन्तु सोने का बहाना कर रहा था । वह बड़ी देर तक अपने प्रियतम के मुख की ओर घ्यान से देखती रही । जब उसे विश्वास हो गया कि प्रियतम वस्तुतः सो ही रहा है तब उसने निश्चिन्तता से प्रियतम के कपोलों का चुम्बन किया जिससे कामोद्दीपन जन्म हर्षातिरेक से प्रियतम के कपोलों पर रोङ्गटे खड़े हो गये । यह देखकर उसे लज्जा आ गई और उसने सिर झुका लिया । प्रियतम हंसते हुये उठा और उसने उस बाला का बड़ी देर तक चुम्बन किया ।
दोनों पद्यों का अर्थ एक ही है, किन्तु फिर भी रूपविधान में कुछ अन्तर आ गया है । अमरुक के पद्य में चुम्बन का कार्य पूरा हो गया है । किन्तु प्रथम पद्य में वह आकांक्षागत ही है । अमरुक के पद्य में लज्जा शब्द का ही प्रयोग किया गया है जिससे उसमें स्वाभाव्यक्ता आ गई है, किन्तु प्रथम पद्य में लज्जा के लिये विलक्ष शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ होता है स्वभाव का परिवर्तन अर्थात् उत्कण्ठा की शान्ति और लज्जा का उदय इस प्रकार प्रथम पद्य में लज्जा व्यङ्ग्य है । अमरुक के पद्य में नायक और नायिका दोनों एक दूसरे
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चतुर्थ उद्योत:
को चूमते हैं। इस प्रकार रति उभयनिष्ठ है। अतः यह पूर्ण स्थायी भाव है। इसके पोषक सभी तत्व विद्यमान हैं। नायिका इत्यादि आलम्बन, शून्य वासगृह इत्यादि उद्दीपन, शाय्या से उठना इत्यादि अनुभाव और लज्जा इत्यादि संचारी भावों से पुष्ट होकर उभयनिष्ठ वह रति आस्वादगोचर होकर पूर्ण श्रृंगार का रूप धारण कर लेती है। इस प्रकार कमी अमरुक के पद्य में भी नहीं है। किन्तु प्रथम श्लोक में ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी गई है कि एक दूसरे के अन्दर अभिलाषा तो विद्यमान है किन्तु उसका प्रसार एकदम रुक हुआ है और यह हकावट की परम्परा अभी समाप्त होती हुई भी नहीं जान पड़ती। इस प्रकार अवरुद्ध हो जाने के कारण रति का उपभोग नहीं हो रहा है, जिससे रति तीव्रतम अवस्था को प्राप्त हो गई है। वह रति यह बात प्रकट करती है कि दोनों की चित्तवृत्ति का अनुप्रवेश एक जैसा हो है। इस प्रकार रति का जितना परिपोष प्रथम श्लोक में हुया है उतना अमरुक के पद्य में नहीं हुया। इस उदाहरण द्वारा यह सिद्ध हो गया कि विवक्षितान्यपरवाच्य की नई भङ्ञिमा का आश्रय लेने से भी पुराना अर्थ नया हो जाता है। इसी प्रकार ‘तरंगभृंगमृगाङ्गना’ इत्यादि पद्य पर ‘नानाभंगिश्रमद्भ्रूः’ इस पद्य की छाया लक्षित होती है। (‘तरंगभृंगमृगाङ्गना’ यह विप्रलम्भशृंगार का पद्य है और इसकी व्याख्या द्वितीय उद्योत में की जा चुकी है। दूसरे पद्य का पता नहीं कि यह कहाँ से लिया गया है। और पूरा पद्य किस प्रकार है। ज्ञात होता है कि वृत्तिकार ने इस पद्य में असंललक्षणक्रमकवयंग्य का आश्रय लेने के द्वारा भावनवीनता लाने की व्याख्या की होगी। क्योंकि लोचनकार ने अप्रिम कारिका का अवतरण देते हुए लिखा है कि यहाँ तक ध्वनि के चार मूलभेदों की व्याख्या की जा चुकी। इन चार भेदों की व्याख्या तभी पूरी होती है जब इसे रसध्वनि से नवीनता लाने का उदाहरण मान लिया जाय।) (ध्वन्यालो०)
४
चतुर्थ उद्योत:
३
युक्त्यनुसतंव्यो रसाविबंधविस्तरः । मितोदाहरणन्ततां प्राप्तः काव्यमार्गो यदाश्रयात् ॥ ३ ॥ बहुविस्तारोऽयं रसभावतदाभासतत्प्रशमालक्षणो मार्गो यथास्वं विभावानुभाव- भेदकलनया यथोक्तं प्राक् । स सर्व एवानया युक्त्यनुसर्तव्यः । यस्य रसावेराश्रयादयं काव्यमार्गः पुरातनः कविभिः सहृदयसङ्ख्यैर्वा बहुप्रकारं शून्यत्वानिमित्तोऽप्यनन्तता- मेति । रसभावादीनां हि प्रत्येकं विभावानुभावव्यभिचारिसमाश्रयादपरिमितत्वम् । तेषां चैकैकप्रभेदापेक्ष्यापि तावज्जगद्वृत्तमुपनिबध्यमानं सुकविभिस्तदिच्छावशादन्य- थास्थितमप्यनन्यैर्यथैव विवर्तते । प्रतिपादितं चैतच्चित्रविचारवसरे । गाथा चात्र कृतैव महाकविना— अतहड्ढिए वि तहसण्ठिए व हिमअम्मि ज णिवेसेढ अत्थावससे सो जइड विकडइड्इअरा वाणी ॥ [ अतथासितानपि तथा संस्थितानिव हृदये या निवेशयति । अर्थविशेषणं सा जयति विकटविगोचरा वाणी ॥ ] इति छाया । तदित्यं रसभावाद्याश्रयेण काव्यार्थानामनन्त्यं सुप्रतिपादितम् ॥ ३ ॥
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(अनु०) 'इस युक्ति से बहुत विस्तारवाले रस इत्यादि का अनुसरण करना चाहिये जिसके आश्रय से सीमित भी काव्यमार्ग अनन्तता को प्राप्त हो गया है ॥३॥ यह्हु रस भाव उनके आभास और प्रशम लक्षणवाला मार्ग अपने स्वस्व के अनुरुप विभाव अनुभाव इत्यादि प्रभेदों की आकलना के द्वारा बहुत प्रखार का है जैसा कि पहिले कहा गया है । उस सभी का ही इस युक्ति से अनुसरण किया जाना चाहिये । जिस रस इत्यादि के आश्रय से यह काव्यमार्ग पुराने सहृदयसंख्या वाले अथवा असंख्या कवियों के द्वारा बहुत प्रकार अभ्यस्त होने के कारण सम्मित भी अनन्तता को प्राप्त हो जाता है । रस भाव इत्यादि में निस्सन्देह प्रत्येक का विभाव अनुभाव और व्यभिचारी भाव के आश्रय से अपरिमितत्व है उनमें एक-एक भेद की दृष्टि से भी सुकवियों के द्वारा जगद्वृत्त का उपनिबन्धन करने पर उनकी इच्छा से अन्यथा स्थित भी अन्यथा परिवर्तित हो जाता है । चित्र विचारे के अवसर पर यह भी प्रतिपादित कर दिया गया । और यहां पर महा कवि के द्वारा गाथा रची गई है— 'जो उस रूप न स्थित भी अर्थ विशेषों को तथास्थित के समान हृदय में निविष्ट कर देती है उस विकट कविगोचर विकट वाणी की जय हो । वह इस प्रकार रसभाव इत्यादि के आश्रय से काव्यार्थों का आननल्य भलिभाँति प्रतिपादित कर दिया गया ॥ ३ ॥'
(लो०) एवं मौलं भेदचतुष्टयमुदाहृत्यलक्ष्यक्रमवेदेशवतिदेशामुखेन सर्वोपभेदविषयं निर्देश करोति—युक्त्यनुरयेत । 'अनुसर्तव्यं' इति । उदाहृतग्यमिल्यर्थः । तस्यादृशानां प्रभेदा ये प्रभेदा स्वगतैरप ये । ते सममानन्यमन्योन्यसम्बन्धपरिकल्पने इत्यत्र । प्रतिपादितं चेतदिति । च शब्दोऽपशब्दार्थो भिन्नक्रमः । एतदपि प्रतीपादितं चेतदिति । च शब्दोऽपि शब्दार्थे 'त्यत्र' ।
तस्याड्गानां प्रभेदा ये प्रभेदा स्वगतैरप ये । ते सममानन्यमन्योन्यसम्बन्धपरिकल्पने ॥
इत्यत्र । प्रतिपादितं चेतदिति । च शब्दोऽपशब्दार्थो भिन्नक्रमः । एतदपि प्रतीपादितं चेतदिति । च शब्दोऽपि शब्दार्थे 'त्यत्र' । पादितं 'भावान्चेतनानपि चेतनवच्चेतनान्चेतनवदित्यत्र । अतथास्थितानपि बहिस्तथासस्थितानिवे'ति हवशब्देन एकतरत्र विशान्तियोगाभावादेव मुखरां विचित्रूपानि- त्यर्थः । हृदय इति प्रधानतमे समस्तभावकनकनिकषस्थान इत्यर्थः । निवेशयति यस्य हृदयमस्ति तस्य तस्य अचलतया तत्र स्थापयतीत्यर्थः । अत एव ते प्रसिद्धार्थ- भ्योडन्य एवेत्यर्थविशेष सम्पद्यन्ते । हृदयेनिविष्टा एव तथाभवन्ति नान्यथेत्यर्थः । 'सा जयति' परिच्छिन्नशक्तिभिः प्रजाप्रतिभिर्योत्स्यन्ते । तत्प्रसादादेव कवि- गोचरो वर्णनीयोडर्थो विकटो निस्सीमा सम्पद्यते ॥ ३ ॥
(अनु०) इस प्रकार मूलभूत चार भेदों के उदाहरण देकर अलक्ष्यादि क्रमव्यंग्य के अति- देश के माध्यम से सभी भेदों के विषय में निर्देश करते हैं—'हस युक्ति से' यह । 'अनुसरण किया जाना चाहिये' यह । 'उदाहरण दिये जाने चाहिये' जैसा कहा गया है' यह । 'उसके अङ्गों के जो प्रभेद और स्वगत जो प्रभेद उनके अन्योन्य सम्बन्ध की परिकल्पना में उनका आननल्य हो जाता है ।' यहाँ पर । 'यह भी प्रतिपादित किया गया है' यह । 'च' शब्द आप शब्द के अर्थ में भिन्नक्रम है । एतदपि प्रतिपादितं चेतदिति ।
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चतुर्थ
उद्योतः
भिन्नक्रम है। यह भी प्रतिपादित किया गया है—‘अचेतन भावों को भी चेतनवत् और’ चेतनों को अचेतनवत् यहाँ पर। ‘उस प्रकार न स्थितों को भी बाहर तथास्थितों के समान’ यह। ‘इव’ शब्द से (प्रकट होता है) एक स्थान पर विश्वान्तरयोग के अभाव से ही विचित्ररूप वाले यह अर्थ है। ‘हृदय में’ यह। अर्थात् प्रधानतम तथा समस्त भावरूप सोने के लिये कसौटी के स्थान पर स्थित ‘निविष्ट करती है’ अर्थात् जिसके जिसके हृदय है उसके उसके अन्दर अचल रूप में वहाँ पर स्थापित कर देती हैं। अतः एवं वे प्रसिद्ध अर्थ से भिन्न हो होती हैं यह अर्थ विशेष हो जाता है। अर्थात् हृदय में निविष्ट ही वैसे बनते हैं अन्यथा नहीं। ‘उसकी विजय होती है’ अर्थात् सीमित शक्तिवाले प्रजापति से भी उत्कृष्ट रूप में वर्तमान रहती है। उसके प्रसाद से ही कविगोचर वर्णनीय अर्थ विकट अर्थात् सीमा रहित हो जाता है॥३॥
चतुर्थ
उद्योतः
ध्वनिमार्ग से काव्य की अनन्तता का प्रतिपादन
चतुर्थ
उद्योतः
तारावती—द्वितीय कारिका में मूल चार भेदों के द्वारा काव्य में पुराना अर्थ भी किया प्रकार नवीन बन जाता है। इस बात की व्याख्या की जा चुकी और उनके उदाहरण भी दिये जा चुके। वे चार मूलभेद हैं—दो प्रकार का अविवक्षितवाच्य अर्थात् अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य और अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य तथा दो प्रकार का विवक्षितान्यपरवाच्य अर्थात् असंलक्ष्यक्रम और संलक्ष्यक्रम। अब तीसरी कारिका में यह बतलाया जा रहा है कि वस्तुतः काव्य मार्ग अनन्त पार है। इसका कारण ध्वनिभेदों का आश्रय लेना ही है। यहाँ पर रस इत्यादि अलंकारमुख्यग्यग्य का अतिदेश किया गया है। अर्थात् यह बतलाया गया है कि जिस प्रकार रसध्वनि के भेदों की इयत्ता नहीं है उसी प्रकार का सभी ध्वनिप्रपञ्च है। किसी भी भेद की इयत्ता नहीं कही जा सकती। कारिका का भाव यह है—
चतुर्थ
उद्योतः
‘जो उक्ति द्वितीय कारिका में बतलाई गई है वह विकल्प मात्र है। (कहीं कहीं ‘दिशानया’ भी पाठ है।) उसका आश्रय लेकर अतिविस्तृत रसा इत्यादि के भी उदाहरण देने चाहिये। इस प्रकार यद्यपि काव्यमार्ग बहुत ही सीमित है तथापि इन भेदोपभेदों के कारण वह अनन्त हो जाता है।
चतुर्थ
उद्योतः
ध्वनिभेदों के निरूपण के अवसर पर पहले ही बतलाया जा चुका है कि ध्वनि का केवल एक भेद रसध्वनि ही ऐसा है कि उसका अन्त नहीं मिल सकता। पहले तो रस, भाव, रसाभास, भावाभास, भावशान्ति, भावोदय, भावसन्धि और भावशवलता ये आठ भेद आते हैं। फिर इनमें प्रत्येक के विभाव अनुभाव और संचारी भावों का विस्तार होता है। (आलम्बन विभाव में नायक और नायिका आते हैं। आचार्यों ने केवल नायिका के ही सहस्रों भेद बतलाये हैं। वस्तुतः संसार के जितने भी स्त्री-पुरुष हैं उनके स्वभाव में कुछ भेद होता ही है, अतः स्वयं नायक-नायिका भेद ही अनन्त हो जाता है। फिर उनकी चेष्टाओं को भी इयत्ता नहीं कही जा सकती। उद्दीपन विभाव के रूप में विश्व के समस्त जड़-चेतन पदार्थ आ सकते हैं। संचारी भाव मानव चित्तवृत्तियाँ हो हैं। विश्व की अनन्तता की प्रतिफलन-रूप ये चित्तवृत्तियाँ भी अपरिमित ही होती हैं। आशय यह है कि केवल रसध्वनि भेदों की ही कोई सीमा और संख्या नहीं है। फिर ध्वनि के दूसरे भेदों के विषय में तो कहना ही क्या है।
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क्या ? इस अनन्तता और अपरिमितता की व्याख्या 'तस्याॅददानां प्रभेदा ये—परिकल्पने'(उ. २ का. १२) में की जा चुकी है । इन रसभावादिकों के एक-एक भेद का आश्रय ले लिया जाय और उसके माध्यम से जगद्वृत्त को काव्य के अन्दर लाया जाय तो वे वृत्त जिस प्रकार के होते हैं वे अन्यथा ही प्रतीत होने लगते हैं । आशाय यह है कि यदि जगत् के सामान्यवृत्त का ही उपनिबन्धन किया जाय तो भी काव्य के माध्यमों और ध्वनि के भेदों का इतना अधिक विस्तार है कि कविता के विषय कभी समाप्त ही नहीं हो सकते, फिर कविता के विषय कल्पित भी होते हैं और कवि की जैसी भी इच्छा होती है । दूश्यमान विश्व वैसा ही बन जाता है । इस प्रकार जब विश्व में कवि की इच्छा से परिवर्तन होता ही रहता है तब काव्यार्थ का अन्त हो सकेगा इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती । यही कारण है कि अनन्त काल से अनन्त कवि इस काव्यमार्ग को पीतते चले आये हैं, यह सीमित ही है जैसा कि पहले बतलाया जा चुका है । अतः इसको बहुत पहले ही समाप्त हो जाना चाहिए था । किन्तु रस-ध्वनि इत्यादि ध्वनिभेदों का इतना विस्तार है और उनकी ऐसी अनन्तता है कि वह काव्य-मार्ग न तो अभी तक समाप्त हुआ ही और न हो ही सकता है । 'प्रतिपादितं चैतत्तु' में 'च' का अन्वय भिन्न क्रम से होता है—'एतत् च' । 'च' का यहां पर अर्थ है 'भी' इस बात का भी प्रतिपादन चित्र काव्य के विचार के अवसर पर किया जा चुका है और कवि किस प्रकार अपनी रुचि के अनुसार विश्व को बदल लेता है । इसपर भी सूक्ष्म रूप में प्रकाश डाला जा चुका है जैसा कि वहां पर एक कारिका का उद्धरण देकर बतलाया गया था कि कवि अचेतन भावों को चेतन के रूप में और चेतन भावों को अचेतन के रूप में जैसा चाहता है वैसा ही व्यवहृत करता है । प्राचीन के एक महाकवि ने (सम्भवतः: शालीवाहन ने ) यही बात एक गाथा में कही है । महाकवि का आशय यह है :—
'जिन कवियों की सम्पत्ति लोकोत्तर वर्णन ही है और जो ऐसी रचना करने में समर्थ होते हैं कि जिसमें अनन्त पदार्थ-समूह का प्रकाशन हुआ करता है इस प्रकार वे कवि अत्यन्त उत्कृष्ट होते हैं और ऐसे कवियों को विकट कवि कहा जाता है । ऐसे कवि ही जिस वाणी का विषय होते हैं वह कविवाणी लोकोत्तर रूप में विद्धमान रहती है । उस कविवाणी की जय हो । इस कविवाणी की विशेषता यही है कि संसार में जो वस्तुएँ भिन्न रूप में ही स्थित होती हैं उन वस्तुओं को यह कविवाणी सहृदयों में अन्यथा के समान निविष्ट कर देती है अर्थात् कामिनी के मुख इत्यादि जो पदार्थ संसार में चन्द्र इत्यादि के रूप में प्रसिद्ध नहीं होते हैं उनको सहृदयों के हृदयों में वह उन्त्री विलक्षण रूपों में निविष्ट कर देती है ।
रसपरिग्रह से पुराने अर्थों में नवीनता का शब्द-शक्त्युद्भव अन्यथा के समान कहने का आशय यह है कि जिन अर्थसमूहों को कवि की वाणी सहृदयों में निविष्ट कर देती हैं वे अर्थसमूह विचित्ररूपवाले होते हैं क्योंकि किसी एक ही रूप में उनका पर्यवसान नहीं होता । अतः नये-नये कवि आते जाते हैं और पुरानी वस्तुओं को नये रूप में ही प्रस्तुत करते जाते हैं, उन नये रूपों से सहृदयगण पूर्व परिचित नहीं होते, अतः नवीन अर्थ सहृदयों को विलक्षण ही प्रतीत होते हैं । 'सहृदयों के हृदयों में' कहने का आशय यह है कि सहृदयों के हृदय ही वस्तुतः ऐसी कसौटी होते हैं जिनपर कसकर
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४
चतुर्थं उद्योत:
३
(ध्वन्यालोके) एतदेवोपपादयितुमुच्यते—
४
चतुर्थं उद्योत:
३
दृष्टपूर्वा अपि हृर्था काव्ये रसपरिग्रहात् ।
४
चतुर्थं उद्योत:
३
सर्वे नवाः इवाभान्ति मध्यमास इव श्रुभाः ॥ ८ ॥
४
चतुर्थं उद्योत:
३
तथाहि विवक्षितान्यपरवाच्यस्यैव शब्दशक्त्युद्भवभावानुरणनरूपव्यङ्ग्यचसमाश्रयेण नवत्वम्—‘धरणीधारणायधुना त्वं शेष:' इत्यादि॥
४
चतुर्थं उद्योत:
शेषो हिमगिरिस्त्वं च महान्तौ गुरू स्थिरौ ।
४
चतुर्थं उद्योत:
यदलङ्कृतमर्थाद्यैश्चलन्तीं विभूष क्षितिम् ॥
४
चतुर्थं उद्योत:
३
इत्यादिषु सत्स्वपि । तस्यैवार्थशक्त्युद्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यचसमाश्रयेणनवत्वम् । यथा—‘एवंवदिनि देवर्षौ' इत्यादि इलोकस्य ।
४
चतुर्थं उद्योत:
कृते वरकथालापे कुमार्यः पुलकोद्गमैः ।
४
चतुर्थं उद्योत:
सूच्यन्ते स्पृहणीयत्वमन्तर्लज्जयावनतमुखीः ॥ ९ ॥
४
चतुर्थं उद्योत:
३
इत्यादिषु सत्सु । अर्थशक्त्युद्भवानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य कविप्रौढोक्तिनिष्पन्नशरीरत्वेन नवत्वम् । ‘यथा सज्जेइ सुरहिमासो' इत्यादि:?
४
चतुर्थं उद्योत:
सुरभिसमये प्रवृत्ते सहसा प्रादुर्भवन्ति रमणीयाः ।
४
चतुर्थं उद्योत:
रागवतामुक्तकलिकाः सहैव सहकारकलिकाभिः ॥ १० ॥
४
चतुर्थं उद्योत:
३
इत्यादिषु सत्स्वप्यपूर्वत्वमेव ।
४
चतुर्थं उद्योत:
४
(अनु०) इसी का उपपादन करने के लिये कहा जा रहा है ।
४
चतुर्थं उद्योत:
४
‘काव्य में पहले देखे हुए अर्थ भी रस परिग्रह से सभी नये जैसे मालूम पड़ते हैं, जैसे मधुमास में वृक्ष' ॥४॥
४
चतुर्थं उद्योत:
४
वह इस प्रकार विवक्षितान्यपरवाच्य की ही शब्दशक्त्युद्भवभावानुरणनरूप व्यङ्ग्य का आश्रय ले लेने से नवीनता (हो जाती है) । ‘जैसे धरणी के धारण करने के लिये इस समय तुम दोष हो' इत्यादि का ।
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'शेष, हिमगिरि और तुम महान् स्थिर गुरु हो, जो कि मर्यादा का उल्लंघन न करते हुए विचलित पृथ्वी को धारण करते हो ।'
इत्यादि के होते हुए भी उसी का अर्थशक्त्युद्भवानुरणनरूप व्यंग्य के आश्रय लेने से नवत्व । जैसे—'इस प्रकार देवर्षि के कहने पर' इत्यादि श्लोक का । 'वर कथा सम्बन्धी बातचीत करने पर कुमारियाँ लज्जा से नीचे को सिर झुकाए हुए पुलकोद्गम के द्वारा अन्तर्गत स्पृहा को कहती हैं ।' इत्यादि के होते हुए भी । अर्थशक्त्युद्भवानुरणनरूप व्यंग्य का कविप्रौढोक्तिनिमित्त शरीर के द्वारा नवत्व जैसे 'सुरभि सज्जित करता है' इत्यादि का—'सुरभि समय के प्राप्त होने पर रागियों की रमणीय उत्कण्ठायें सहकार-कलिकाओं के साथ ही प्रादुर्भूत होती हैं ।' इत्यादि के होते हुए भी अपूर्वत्व ही है । (लो०) प्रतिभानां वाणीनां चाननल्यं ध्वनिकृतमिति यदनु द्रष्टव्युक्तं तदेव कारिकया भङ्गया निरूप्यत इत्याह—उपपादयितुमिति । उपपत्या निरूपयितुमित्यर्थः । यदप्यर्थानन्वयमात्रे हेतुवृत्तिकारेणोक्तः तथापि कारिकाकारण नोक्क इति भावः । यदि वा उच्चयते संग्रहश्लोकोऽ्यमिति भावः । अत एवास्य श्लोकस्य वृत्तिकारेण व्यास्यानं न कृतम् । हस्तपूरा इति । तर्हि: प्रत्यक्षादिभिः प्रमाणैः प्रकरणाद्वा काव्यमिर्याभिधाने नेयम् । कार्य्य मध्यमासस्थानीयम्, स्पृहां लज्जामिति । रागवतामुल्कलिका इति च । शब्दस्पृष्टेर्धे का हूयता ।
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चतुर्थ
उद्योत:
लिखना कहाँ तक ठीक है ? (उत्तर) उस बात को सिद्ध करने के लिए जो कुछ कहा गया था वह सब वृत्तिकार का कथन था । कारिकाकार ने उसके प्रमाण के रूप में कुछ नहीं कहा था । अतः कारिकाकार ने उसी कथन में प्रमाण देने के लिये यह कारिका लिखी है । दूसरी बात यह भी कही जा सकती है कि जिस पर चार संख्या डाली गई है वह वास्तव में परिकर श्लोक है । वृत्तिकार की यह शैली है कि किसी बात को विस्तारपूर्वक सिद्ध करके उसके सार के रूप में एक श्लोक लिख देते हैं । यह श्लोक परिकर श्लोक कहलाता है । प्रस्तुत श्लोक वस्तुतः ध्वनिकार की कारिका नहीं अपितु परिकर श्लोक है इसमें सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि वृत्तिकार ध्वनि कारिकाओं की व्याख्या के रूप में कुछ न कुछ अवश्य लिखते हैं किन्तु इस कारिका की व्याख्या में कुछ नहीं लिखा है । कारिका का आशय यह है :–
चतुर्थ
उद्योत:
‘जिन अर्थों को पहले देखा जा चुका है वे अर्थ भी यदि रस को स्वीकार कर लेते हैं तो नये ही जान पड़ते हैं । जैसे जिन वृक्षों को हम देखते ही रहते हैं वे वृक्ष भी वसन्त काल में नए मालूम पड़ने लगते हैं ॥४७॥
अनुरणनरूप ध्वनि के भेदों से काव्य में नवीनता लाने का उदाहरण पुराना अर्थ नई भंगिमा से कहे जाने पर किस प्रकार नवीन मालूम पड़ता है इसके कई उदाहरण पहले दिये जा चुके हैं । यह बतलाया जा चुका है कि अविवक्षित वाच्य के दो भेदों का आश्रय लेने से पुराने अर्थ में किस प्रकार नवीनता आती है । अब विवक्षितान्यपरवाच्य के अनुरणनरूप व्यङ्गच के दो भेदों को लीजिये—पहला भेद है शब्दशक्त्युद्भवानुरणनरूप व्यङ्गच विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि । एक पुराना भाव था—
चतुर्थ
उद्योत:
कोई चाटुकार राजा की प्रशंसा करते हुए कह रहा है—‘हे राजन् केवल तीन व्यक्ति ऐसे हैं जो अपनी मर्यादा को न छोड़ते हुए विचलित भूमि को धारण करते हैं—शेषनाग, हिमालय और आप । तीनों ही महान् हैं, (शेषनाग और हिमालय विशाल आकारवाले हैं और राजा महान् गुणावलो१) गुरु हैं, (पृथ्वी के भार को सहन करने में समर्थ हैं और राजा प्रतिष्ठित है) और स्थिर हैं, (शेषनाग और हिमालय तो अविचलित हैं और राजा दृढ़ प्रतिज्ञ है ।’
इसी भाव को वाणभट्ट ने हर्षचरित में अपनाया है । प्रभाकरवर्धन और राजवर्धन दोनों ही समाप्त हो चुके हैं । अब केवल हर्षवर्धन ही बच रहे हैं जो राज्य का भार वहन कर सकें । उसी अवसर पर यह वाक्य आया है कि—‘पृथिवी को धारण करने के लिये अब तुम शेष हो ।’ यहाँ पर पृथिवी को धारण करने के दो अर्थ हो सकते हैं—पृथिवी को विचलित होने से रोकना और राज्य-भार वहन करना । इसी प्रकार ‘शेष’ के भी दो अर्थ हो सकते हैं—शेषनाग और अवशिष्ट । प्रकरण के कारण राज्यभार वहन करने के लिये अवशिष्ट इस अर्थ में अभिधा का नियन्त्रण हो जाता है तब दूसरा अर्थ व्यङ्गच होकर उपमानोपमेयभाव धारण कर लेता है—जिस प्रकार पृथ्वी को धारण करने के लिये शेषनाग होता है उसी प्रकार तुम भी राज्यभार वहन करने के लिये अवशिष्ट हो । इस उपमा में महाराज हर्ष की अभूतपूर्व
चतुर्थ
उद्योत:
३५
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सक्षमता अभिव्यक्त होती है। इस प्रकार बात वही है किन्तु 'शेष' शब्द के प्रयोग द्वारा शब्दशक्तिमूलक अनुरणनरूप व्यङ्गच विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि का सम्पादन कर पुराने अर्थ को ही नवीनता दे दी गई है।
['शेषो हिमगिरिः']
इत्यादि श्लोक का वास्तविक पाठ 'विभ्रते भुबम्' है। किन्तु यह पाठ अशुद्ध है क्योंकि नियमानुसार जहाँ मध्यम पुरुष और अन्य पुरुष में दोनों के कर्ता पृथक-पृथक विद्यमान हों वहाँ क्रिया का प्रयोग मध्यम पुरुष में होना चाहिये।
किन्तु वचन का प्रयोग पृथक् शब्दों की संख्या के अनुसार होता है। इस प्रकार 'शेषः' 'हिमगिरिः' और 'स्वम्' इन तीन कर्ताओं के कारण मध्यम पुरुष का बहुवचन आना चाहिये। अतः यहाँ पाठ होना चाहिये 'विभृष' या 'विभृश्वे'। इस प्रकार या तो 'विमृथ शुवम्' यह पाठ होना चाहिये या 'विभृश्वे भुवम्' यह पाठ।
किन्तु दोनों दशाओं में छन्दोभङ्ग दोष आ जाता है। 'विभृथ भुवम्' में 'थ' यह पञ्चम वर्ण ह्रस्व हो जाता है जो दीर्घ होना चाहिये और 'विभृश्वे भुवम्' में 'म्' यह संयुक्ताक्षर होने के कारण गुरु हो जाता है जो लघु होना चाहिये।
अतः इन दोषों को दूर करने के लिये दीक्षितिकार ने 'विभृष स्थितिम्' यह पाठ कल्पित कर लिया है। यही पाठ ठीक प्रतीत होता है।
अर्थशक्तिमूलक ध्वनि में नवीनता का उदाहरण विवक्षितान्यपरवाच्य का दूसरा भेद है अर्थशक्त्युद्भव।
इसके आश्रय से पुराना अर्थ नया मालूम पड़ता है। जैसे एक प्रसिद्ध श्लोक है जिसका आश्रय यह है—
'जब कुमारियों के सामने उनके अभिभावक उनके विवाह और उनके भावी पति की बात करने लगते हैं तब कुमारियों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं और लज्जा से उनका सिर नीचे झुक जाता है। इस प्रकार वे अपनी अन्तर्गत अभिलाषा को अभिव्यक्त करने लगती हैं।'
इसी पद्य का आश्रय कालिदास के 'एवंवादिनि देवर्षौ' इत्यादि पद्य में भी आया है। (विस्तृत व्याख्या के लिये देखें द्वि. उ. का. २२, तृ. उ. का. ३९ तथा तृ. उ. का. ४३) उक्त श्लोक में लज्जा और स्पृहा शब्दोभास हैं,
किन्तु कालिदास के श्लोक में लीला-कमलपत्र गाथना से उनकी अभिव्यक्ति होती है। इस प्रकार यहाँ अनुरणनरूप व्यङ्गच विवक्षितान्यपरवाच्य का आश्रय लेने में ही अर्थ में नवीनता आ गई है।
अर्थशक्त्युद्भव अनुरणनरूप व्यङ्गच का जो उपर उदाहरण दिया गया है वह तो है स्वतःसम्भवी वच्य से वच्य व्युत्पत्ति।
इसके प्रतिकूल कभी-कभी कविप्रौढोक्तिरूप वस्तुध्वनि होती है। उसके अवलम्बन में नवीनता का उदाहरण जैसे एक पद्य का भाव है :—
'वसन्त काल के आ जाने पर आम्रकलिकाओं के साथ ही रागियों की रमणीय उत्पत्तियां सहसा प्रादुर्भूत हो जाती हैं।'
इसी पद्य का भाव 'सज्जेऽसौ सुरहिमासो' इत्यादि पद्य में भी लिया गया है। (दे. द्वि.-उ. का. २४) भाव वही है, केवल अन्तर यह है कि इस पद्य में वसन्त मास का कामदेव के बाणों को तैयार करना कविप्रौढोक्तिसिद्ध वस्तु है जिससे अत्यन्त गाढ़ी होनेवाली मन्थ की
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चतुर्थ
उद्योतः
दशा अभिव्यक्त होती है। इस प्रकार कविकलिप्त वस्तु से वस्तुध्वनि के कारण पुराने भाव में नवीनता आ गई है।
इसी प्रकार कविनिबद्ध-वस्तु कल्पित वस्तु से वस्तु ध्वनि का आश्रय लेने से भी काव्य में नवीनता आ जाती है। जैसे एक पुराना भाव है—
चतुर्थ
उद्योतः
(ध्वन्यालोक) अर्थशक्त्युद्भवानुरणनरूपध्यड्चस्य कविनिबद्धवस्तुप्रौढोक्तिमात्रनिष्ठपन्नशरोत्स्वेन नवत्वम्। यथा—‘वाणिअ हत्थिदन्ता’ इत्यादिगाथार्थस्य।
करणीवेअहुअरो मह पुत्तो एक्काण्डबिनिवाइ। हउसोन्हाणें तह कहो जह कण्डकरण्डअं वहुअ ॥ [करणीवेअवयकरो मम पुत्रः एककाण्डविनिपाती। हतस्नुषया तथाकृता यथा काण्डकरण्डकं वहति ॥] इतिच्छाया।
चतुर्थ
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एवसाविष्वयंपु सत्स्वयंनालीढतैव । यथा व्यङ्ग्यभेदसमाश्रयेण ध्वने: काव्यार्थानां नवत्वमुत्पद्यते, तथा व्यङ्ग्य-भेदसमाश्रयेणापि।
तत् ग्रन्थविस्तरभयान्न लिख्यते स्वयमेव सहृदयैरभ्युद्गृहीतम्।
चतुर्थ
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(अनु.) अर्थशक्त्युद्भवानुरणनरूप व्यङ्ग्य का कविनिबद्ध-वस्तु-प्रौढोक्तिमात्र निष्ठपन्न शरीर के द्वारा नवत्व—जैसे—‘हण वणिक् हाथी के दाँत’ इत्यादि गाथा के अर्थ का—
'करणी को वैधव्य करनेवाला एक प्रहार में ही विनिपात कर देनेवाला मेरा पुत्र दुष्ट बहू के द्वारा ऐसा कर दिया गया कि वाणों की राशि को ढो रहा है।' इत्यादि अर्थों के होते हुए भी अगतार्थता ही है।
चतुर्थ
उद्योतः
जिस प्रकार ध्वनि के व्यङ्ग्य भेद का आश्रय लेने से काव्यार्थों में नवत्व उत्पन्न होता है उसी प्रकार व्यङ्ग्यभेद का आश्रय लेने से भी। वह ग्रन्थ के विस्तार के भय से नहीं लिखा जा रहा है, सहृदयों के द्वारा स्वयं ही जान लिया जाना चाहिये।
चतुर्थ
उद्योतः
(लो.) एतद्न चारिहरणाद् वितत्य पूर्वमेव व्याख्यातान्नाति कि पुनरुक्त्या। सत्यपि प्राक्तनकविस्पृष्टत्वे नूतनत्वं भवत्येवत्तत्पकारानुग्रहदित्येतावति तात्पर्यं हि ग्रन्थस्याधिकं नान्यत्।
करणीवैधव्यकरो हि मम पुत्रः एकेन काण्डेन विनिपातन-मर्थः हतस्नुष्या तथा कृतो यथा काण्डकरण्डकं वहतीत्युतान एवायमर्थः, ग. थार्थ-स्यालीडतैवेति सम्बन्धः।
चतुर्थ
उद्योतः
(अनु.) और इन उदाहरणों की विस्तारपूर्वक पहले ही व्याख्या कर दी गई है अतः पुनरुक्ति से क्या ?
प्राक्तन कवियों के द्वारा विशेष स्पष्ट होते हुए भी इन प्रकारों के अनुग्रह से नवीनत्व होता हो है, ग्रन्थ का केवल इतने में ही तात्पर्य है और कुछ भी नहीं। करणी का वैधव्य करनेवाला एक बाण में विनिपातन में समर्थ मेरा पुत्र दुष्ट बहू के द्वारा ऐसा कर दिया गया, जिससे वाणों का समूह ढो रहा है, यह अर्थ उत्तान ही है, गाथा के अर्थ की अगतार्थता ही है यह सम्बन्ध है।
चतुर्थ
उद्योतः
तारावती—‘मेरा पुत्र हाथियों की पत्नियों को विधवा बनाने वाला है और वाण
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के एक ही प्रहार में महागजराजों को घराशायी कर देता है। किन्तु आजकल जीविका को नष्ट करने वाली दुष्ट बहू ने उसे ऐसा बना दिया है कि वह बाणों के समूह धारण करने वाले तरकस को ढो रहा है।
यह किसी व्यक्ति के हाथी दांत के लिये पूछने पर व्याध ने उत्तर दिया है। इसकी व्याख्या यह है कि मेरा पुत्र बहू के सम्भोग के कारण इतना क्षीण हो गया है और बहू के हावभाव कटाक्षों में ऐसा फंसा रहता है कि न तो उसमें इतनी शक्ति ही रह गई है कि वह मत्त हाथियों को मार सके और न उसकी प्रवृत्ति ही उस ओर है। वह बाणों को ढो रहा है, किन्तु उनका उपयोग कुछ नहीं। अतः हमारे घर में हाथी दांत कहाँ से आयें ? इसी आशय को लेकर 'वाणिअ हत्थिदन्ता' इत्यादि गाथा लिखी गई है।
यद्यपि भाव वही है, किन्तु 'करणी वेअहुअ अरो' 'बहू' में 'हतस्नुसिया तथाकृतः' यह कहकर व्यञ्ज्यार्थ को एक अंश में वाच्य बना दिया गया है जब कि 'वाणिअ हत्थिदन्ता' इत्यादि गाथा में 'यावल्लुलितालकमूलो' इत्यादि शब्दों के द्वारा उस अर्थ को सर्वथा व्यञ्ज्य ही रखा गया है। इस प्रकार पुराने अर्थ के होते हुए भी 'वाणिअ' इत्यादि गाथा का अर्थ सर्वथा नवीन तथा पुराने पद्य के द्वारा अगतार्थ ही है। यहाँ पर कविनिवद्धवस्तुकल्पित वस्तु से वस्तुध्वनि का आश्रय लेकर नवीनता का संचार किया गया है।
ऊपर व्यञ्जकध्वनि की दृष्टि से ध्वनि के विमिश्र भेदों का आश्रय लेने से पुराना अर्थ किस प्रकार नवीन हो जाता है इसका दिग्दर्शन करा दिया गया और कुछ उदाहरण भी दिये गये। यहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि केवल व्यञ्जकचार्थ की दृष्टि से ही ध्वनिभेद अनन्तता के प्रयोजक नहीं होते अपितु व्यञ्जकभेद भी अनन्तता के प्रयोजक होते हैं। एक भाव को एक कवि शब्द इत्यादि उपकरणों का आश्रय लेकर अभिव्यक्त करता है उसी भाव को अभियक्त करने के लिए दूसरा कवि दूसरों ही शब्दों का प्रयोग किया करता है।
इस प्रकार एक भाव के अनन्त व्यञ्जक हो सकते हैं। व्यञ्जकों का निरूपण तृतीय उद्योत के प्रारम्भ में किया जा चुका है। उन भेदों का आश्रय लेकर किस प्रकार नवीनता सम्पन्न हो जाती है यह स्वयं समझ लेना चाहिए। यदि इन सब के उदाहरण दिये जायेंगे तो ग्रन्थ का अनपेक्षित विस्तार हो जायगा। इस समस्त प्रकरण का सार यही है कि ध्वनि विस्तार काव्यगत भावों को अनन्तता प्रदान कर देता है, यह ध्वनि का सबसे बड़ा प्रयोजन है।
४
(ध्वन्या०) अत्र च पुनः पुनरुक्तमपि सारात्ययेदमुख्यते— व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावेऽस्मिन्निविषये सम्भवत्यपि । रसादिमय एकस्मिन् कविः स्याद्वधानवान् ॥५॥
५
अस्मिन्नन्थान्थनहेलतो व्यङ्गचव्यञ्जकभावे विचित्रे शब्दानां सम्भवरयपि कविरसाविमय एकस्मिन् रसपूर्वार्थलाभार्थी रसादिमय एकस्मिन् व्यङ्गचव्यञ्जकभावे यत्नादवदधीत । रसभावतदभावसरूपे हि व्यङ्गचकेशु च यथानिदिष्टेषु वर्णपदवाक्यरचना प्रब-
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चतुर्थ
उद्योतः
न्धेष्वबहितमनसः कवे: सकलंपुर्णी काव्यं सम्पद्यते। तथा च रामायणमहाभारतादिषु सडग्रामादयः पुनः पुनरभिहिता अपि नवनवता: प्रकाशन्ते। प्रबन्धे चाड्गी रस एक एवोपनिबध्यमानोऽर्थविशेषलाभं छायातिशयं च पुष्णाति । कस्यिन्निवेति चेत्—यथा रामायणे यथा वा महाभारते। रामायणे हि करुणो रसः स्वयमाविकविना सूत्रितः 'शोकः श्लोकत्वमागतः' इत्येवं वादिनः। नि:सन्देहश्च स एवं सीतात्यान्तबियोगपर्यन्त-सेव स्वप्रबन्धमुपरचयता।
(अनु०) और यहाँ पर बार-बार कहा हुआ भी साररूप में यह कहा जा रहा है— 'इस विविध व्यङ्ग्यध्वन्यात्मक भाव के सम्भव होते हुए भी कवि एक रसादिमय में ही ध्यान देनेवाला हो' ॥५॥ शब्दों के इस अर्थानुसन्ध्य में हेतु विचित्र व्यङ्ग्यध्वन्यात्मक भाव के सम्भव होते हुए भी अपूर्व अर्थ के लाभ की इच्छावाला कवि एक रसादिमय व्यङ्ग्यध्वन्यात्मक भाव में (ही) यत्न से ध्यान दे । रस, भाव और तदाभास रूप व्यङ्ग्य में जोर उसके यथा निर्दिष्ट व्यञ्जक वर्ण, पद, वाक्य, रचना और प्रबन्ध में मन को सावधानतापूर्वक लगानेवाले कवि का सारा काव्य अपूर्व हो जाता है । वह इस प्रकार—रामायण, महाभारत इत्यादि में बार-बार कहे हुए भी संग्राम इत्यादि नये-नये प्रकारों से प्रकाशित होते हैं और प्रबन्ध में एक ही अङ्गी रस उपनिबद्ध किया जाता हुआ अर्थविशेष की प्राप्ति को ओर छाया के आधिक्य को पुष्ट करता है । यदि कहो किसके समान ? तो जैसे रामायण में अथवा जैसे महाभारत में । रामायण में निस्सन्देह करुण रस 'शोक श्लोक को प्राप्त हो गया' यह कहनेवाले स्वयं आदिकवि ने सूत्र रूप में निर्देश कर दिया है और सीता के अत्यन्त वियोग पर्यन्त प्रबन्ध की रचना करते हुए उसे समाप्ति को भी प्राप्त करा दिया । (लो०) अत्यन्तग्राहणेन निरपेक्षभावतया विप्रलम्भादीन् परिहरति । (अनु०) अत्यन्त ग्रहण से निरपेक्ष भाव रूप में विप्रलम्भ की शंका को दूर करते हैं ।
रसध्वनि की प्रधानता
तारावती—प्रस्तुत पुस्तक के पिछले प्रकरणों में कई बार कहा गया है कि ध्वनि के तीनों भेदों में रसध्वनि ही प्रधान होती है तथा अन्य ध्वनियाँ रसप्रवण होकर ही काव्य की संज्ञा प्रदान करती हैं । यही प्रस्तुत रचना का सार है, अतः अन्त में एक बार पुनः इसी बात को दृढ़ करने के लिये ५वीं कारिका लिखी गई है । कारिका का आशय यह है— यह ध्वनि अनन्तता में हेतु होती है और ध्वनि का प्रयोजक व्यङ्ग्य-व्यञ्जक भाव बड़ा ही विचित्र तत्व है । इसके अनेक भेद सम्भव हैं । तथापि यदि कवि ऐसी रचना करने के लिए उत्सुक हो जिसका प्रयोजन चमत्कार-प्रकर्ष को अपूर्व प्राप्ति ही हो तो उसे ऐसे व्यञ्जक-व्यञ्जक भाव में प्रयत्नपूर्वक ध्यान देना चाहिये जिसका स्वरूप रसादिमय हो । यदि कवि रस, भाव, रसाभास, भावाभास, भावशान्ति, भावोदय, भावशबलता इत्यादि रसध्वनि के व्यञ्जक भेदों का ध्यान रखता है और उनके व्यञ्जक वर्ण, पद, वाक्य रचना और प्रबन्ध का भी विशेष ध्यान रखता है तो उसका समस्त काव्य अद्वितीय बन जाता है ।
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(इस कथन का आशय यहॉ है कि कवि को वस्तुयोजना अलङ्कार ध्वनि इत्यादि काव्य सम्बद्ध सभी तत्वों के प्रति जागरूक रहना चाहिए किन्तु विशेष रूप से उसे ऐसे शब्दों और अर्थों का प्रयोग करने में सावधान रहना चाहिये जिससे रस व्याहत न होने पाए । यदि कवि रसोपघातक शब्दों और अर्थों का प्रयोग करेगा तो यह उसके लिए दोष होगा । साथ ही उसे यह भी ध्यान रखना चाहिये कि जिस रस की वह व्यंजना कर रहा है वह भी लोकानुमोदित हो तथा औचित्य की सीमा से च्युत न होने पाये । ऐसा करने पर ही उसका काव्य अपूर्व बन जाता है । ) यदि कवि रस के प्रति जागरूक रहता है तब तो एक बात यदि वह बार-बार कहता है तो भी उसमें नवीनता ही आती रहती है और यह प्रतीत नहीं हो पाता कि वही पुरानी बात बार-बार कही जा रही है । उदाहरण के लिए रामायण और महाभारत में युद्ध का न जाने कितनी बार वर्णन किया गया किन्तु हर-बार नया ही मालूम पड़ता है । उसका कारण यही है कि यद्यपि युद्ध का वर्णन तो वैसा ही सर्वत्र है तथापि युद्ध के अभिव्यञ्जक और अभिग्यञ्ज्य तत्वों में भेद पड़ जाने से जो भी अगला वर्णन किया गया है वह नया ही मालूम पड़ता है । प्रबन्ध काव्यों में प्रकरणानुसार अनेक रसों का उपादान होता है । कहीं शृङ्गार, कहीं वीर, कहीं शान्त, कहीं हास्य इत्यादि अनेक रस रसवश के अनुसार आते रहते हैं । उन रसों में अङ्गीरस का अनुसन्धान करना पड़ता है । यह तो निश्चित ही है जितने रसों का प्रबन्ध में उपादान किया जायगा उनमें कोई एक ही प्रधान होगा अन्य रस उसके पोषक होंगे । पोषक रसों को अङ्ग कहते हैं और पोष्य रस को अङ्गी । अतः किसी प्रबन्धकाव्य का अध्ययन करने में इस बात का विशेष रूप से अनुसन्धान कर लेना चाहिये कि उस प्रबन्ध में कौन सा रस अङ्गी है और कौन-कौन से रस अङ्ग हैं । अङ्गी रस वही होता है जो अन्य रसों से पुष्ट किया जाय; जिसमें विशिष्ट चमत्कार आधान की शक्ति हो और छायाधिक्य के कारण उससे विशेष अर्थ की अवगति हो रही हो । इस बात को ठीक रूप में हृदयंगम करने के लिए हमें सर्वश्रेष्ठ प्रतिष्ठित प्रबन्ध रामायण और महाभारत के अङ्गी रस की परीक्षा कर लेनी चाहिये । इस परीक्षा के द्वारा हम दूसरे महाकाव्यों के अङ्गी रस की परीक्षा पढ़ते भली भाँति समझ सकेंगे ।
रामायण-महाभारत में अंगीरस का विवेचन
(अङ्गी रस की परीक्षा कई प्रकार से की जा सकती है—कवि स्वयं अङ्गी रस का संकेत दे देता है, कभी-कभी उपक्रम में अङ्गी रस का उल्लेख कर दिया जाता है और उपसंहार तक उसी रस का निर्वाह किया जाता है, अन्य रस उसके निर्वाह के लिये आते हैं और उस रस का पोषण हो करते हैं, इत्यादि । कुछ ऐसे उपाय हैं जिनसे अङ्गी रस की परीक्षा की जा सकती है ।) सर्व प्रथम रामायण को लीजिये । रामायण में वाल्मीकि जी ने उपक्रम में लिखा है कि—कौश्रव के जोड़े के वियोग से उत्पन्न शोक ही इलोक रूप में परिणत हो गया । यह शोक वस्तुतः करुण रस का स्थायी भाव है, क्योंकि कौश्रव का वियोग आत्यन्तिक है । मुनि के इस संकेत से व्यक्त होता है कि रामायण का अङ्गीरस करुण है । मुनिवर वाल्मीकि जी ने रामायण की रचना वहाँ तक की है जहाँ राम और सीता का वियोग आत्यन्तिक रूप में
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चतुर्थ
उद्योत:
हो जाता है और उनके पुनः सम्मिलन की सम्भावना नहीं रहती। अतः अन्त में भी करुण रस में हो रामायन की समाप्ति होती हैं। इस प्रकार मुख और निर्वहण दोनों सन्धियों में करुणरस विद्धमान हैं। मध्य में भी जो वीर रस इत्यादि आये हैं वे भी करुणरस के परिपोषक ओर अङ्ग ही है। इस प्रकार रामायण का अङ्गी रस करुणरस ही है। यहाँ पर यह प्रशन किया जा सकता है कि सीतावियोगजन्य दुःख तो विप्रलम्भ शृङ्गार का विषय है फिर यहाँ यह कैसे कहा गया कि रामायण का अङ्गीरस करुण है? इसका उत्तर यह है कि विप्रलम्भ शृङ्गार की शाखा का परिहार करने के लिये ही तो यहाँ पर 'अत्यन्त' शब्द का प्रयोग किया गया है। अत्यन्तिक वियोग करुणरस का ही विषय होता है विप्रलम्भ शृङ्गार का नहीं। (यहाँ पर दीक्षितिकार ने लिखा है कि वृत्तिकार का यह कथन सर्वथा चिन्त्य है क्योंकि 'शोकः श्लोकत्व-मागतः' यह श्लोकपाद तो ध्वनिकार का है—'काव्यस्यात्मा स एवार्थः.........' इत्यादि कारिका का यह अन्तिम चरण है—वाल्मीकी का नहीं। यह श्लोक-पाद रामायण में आया भी नहीं है। फिर यह कथन सङ्गत हो कैसे हो सकता है?) इस विषय में निवेदन यह है कि यह चरण स्वयं महाकवि वाल्मीकी का ही है ओर रामायण बालकाण्ड के द्वितीय सर्ग के अन्त में आया है। टीकाकार को आक्षेप करने के पहले रामायण का उपक्रम देख लेना चाहिये था।
चतुर्थ
उद्योत:
(ध्वन्याः०)
महाभारतेऽपि शास्त्रहुपे काव्यच्छायान्वयिनि वृष्णिपाण्डवविर-सावसानवैमनस्यदायिनीस समाप्तिमुपनिबन्धनता महामुनिना वैराग्यजननतत्परं प्राधान्येन स्वप्रबन्धस्य दर्शयता मोक्षलक्षणः पुरुषार्थः शान्तो रसश्च मुख्यतया विवक्षाविषय एव सूचितः। एतच्चांशेन विवृतमन्यैर्यव्यास्याविधायिभिः। स्वयमेव चैतदु-गीर्णं तेनोदीर्णमहामोहमन्मथुज्जहोर्षता लोकमतिविमलज्ञानालोकवायिना—
(अनु०) शास्त्र और काव्य की छाया के अन्वयवाले महाभारत में भी वृष्णि और पाण्डवों के विरसानवसान से वैराग्य देनेवाली समाप्ति को निवद्ध कर महामुनि ने भी अपने प्रबन्ध का मुख्य तात्पर्य वैराग्यजनन ही दिखलाते हुये सूचित किया है कि मोक्षरूप पुरुषार्थ और शान्तरस मुख्यरूप में विवक्षाविषय है। अन्य व्याख्याकारों ने यह आंशिक रूप में विवृत किया है। बढ़े-चढ़े महामोह में डूबे हुये लोक को निकालते हुये अति निर्मल ज्ञान का आलोक देनेवाले उन लोकनाथ (व्यास) ने स्वयं कह दिया है :-
चतुर्थ
उद्योत:
(लो०)
वृष्णीनां परस्परक्षयः, पाण्डवानामपि महापथक्लेशोनानुचिता विपत्तिः, कृष्णस्यापि व्याधादिद्दष्टंस इति सर्वस्यापि विरसत्वेवावसानमिति। मुख्यतयैति। यद्यापि 'धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे चै'त्युक्तं, तथापि चतुवारश्चकारा एवमाहुः— यद्यापि धर्मार्थकामानां सर्वस्वं तदृशृङ्खलास्ति यत्रैवात्र निगदितं, तथापि पर्यन्तविरस-त्वमत्रैवावलोक्यताम्। मोक्षे तु यद्रूपं तस्य सारातत्रैव विचार्यतामिति।
(अनु०) वृष्णियों का परस्पर क्षय, पाण्डवों की भी महापथ क्लेश से अनुचित विपत्ति, कृष्ण का भी व्याध आदि से दर्शन इत्यादि सभी का अवसान विरसता में ही हुआ है। यद्यपि 'धर्मे च अर्थे च कामे च मोक्षे च' इत्यादि में कहा गया है, तथापि चतुरार (चार बार) 'च'कार का प्रयोग करने वाले (व्यास जी) इस प्रकार कहते हैं—यद्यपि धर्म, अर्थ और काम की सभी बातें उस (महाभारत) में कही गयी हैं, तथापि उसके अन्त में विरसता ही देखी जाती है और मोक्ष का जो यथार्थ रूप है उसका विचार वहीं किया जाता है।
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कृष्ण का भी व्याघ्र से विध्वंस इस सबका भी विरस ही अवसान (हुआ) यह । 'मुख्य रूप में' यह । यद्यपि धर्म में और अर्थ और काम में और मोक्ष में 'यह कहा गया है कि तथापि चार 'और' यह कहते हैं—यद्यपि धर्म अर्थ और काम का सर्वस्व (यहाँ) वैसा नहीं है जैसा अन्यत्र विद्यमान न हो तथापि पर्यन्तविरसत्व यहीं पर देखा जावे, मोक्ष में तो जैसा रूप है उसकी सारता यहीं विचारी जावे, यह ।
तारावती—अब महाभारत के अङ्गीरसपर विचार कीजिये । महाभारत एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें हमें पातञ्जल इत्यादि शास्त्रों की भी छाया दृष्टिगत होती है और रामायण इत्यादि काव्यों के स्वरूप का भी प्रतिफलन इस महाग्रन्थ में हुआ है । यह ग्रन्थ तत्त्वनिर्णय की दिशा में शास्त्र का काम देता है और चमत्कारोत्पादन दिशा में यह महाकाव्य का कार्य करता है । इस ग्रन्थ का पर्यवसान सभी के विनाश में होता है । वृष्णिवंश वाले इतने महान् तथा संख्या में इतने अधिक हैं, किन्तु अन्त में शाप से वे सब परस्पर लड़कर ही समाप्त हो जाते हैं और उनका भरा पूरा ऐश्वर्य बात की बात में समाप्त हो जाता है । पाण्डवों की कथा मुख्य है । पाण्डव अपनी वीरता में किसी को भी अपने सामने नहीं आने देते । महाभारत जैसे महासंग्राम में अभूतपूर्व पराक्रम दिखलाकर और सभी शत्रुओं का संहार कर एक समृद्ध राज्य के अधिकारी बन जाते हैं । किन्तु अन्त में होता क्या है ? सभी को हिमालय के महापथ की ओर जाना पड़ता है और अनेक वर्णनातीत विपत्तियों को सहते हुए हिमराशि में अपनी कथा समाप्त कर देनी पड़ती है । उन युगपुरुष भगवान् वृष्ण का ही क्या होता है ! जो अपने योगेश्वर रूप के कारण अपने प्रभुत्व से सारी जनता पर छा जाते हैं और भगवान् के रूप में उनकी पूजा होने लगती है वे भगवान् कृष्ण भी अन्त में एक साधारण बहेलिये से मारे जाते हैं । सभी का कितना नीरस अन्त होता है ! यह नीरसता दिखलाकर ही महाभारत समाप्त कर दिया जाता है । इस उपसंहार से व्यक्त होता है कि महामुनि व्यास वृष्ण पाण्डव और कृष्ण का महान् उत्कर्ष दिखलाकर यही सिद्ध करना चाहते हैं कि जब इतने महापुरुषों और उत्कर्षशालियों का ऐसा नीरस अन्त हो सकता है तब साधारण मनुष्य का तो कहना ही क्या ? मानव कितना ही बढ़ जाय किन्तु अन्त में समाप्ति नीरसता में ही होती है । विश्व की सभी वस्तुएँ क्षणभङ्गुर हैं । इससे सिद्ध होता है कि महामुनि का तात्पर्य वैराग्य-जनन ही है । यदि काव्यरूप में इस महाग्रन्थ का परिशीलन किया जाय तो वैराग्यजनक परिस्थितियाँ विभाव होकर तृष्णाक्षयजन्य सुख में पर्यवसित होंगी और सम्पूर्ण काव्य का अङ्गीरस शान्तरस ही सिद्ध होगा । यदि इसकी पर्यालोचना शास्त्र की दृष्टि से की जाय तो धर्म अर्थ और काम ये तीनों पुरुषार्थ गौण सिद्ध होंगे और मुख्य पुरुषार्थ मोक्ष ही सिद्ध होगा । आशय यह है कि महाभारत के कवि भगवान् व्यास को मुख्य रूप में यह कहना अभीष्ट है कि शान्त रस ही इस ग्रन्थ का अङ्गीरस है और मोक्ष ही परम पुरुषार्थ है । मुख्य कहने का आशय यह है कि गौण रूप में इसमें दूसरे रस भी विद्यमान हैं, किन्तु उनका पर्यवसान शान्त रस में ही होता है । इसी कारण गौण रूप में इसमें धर्म अर्थ और काम को भी पुरुषार्थ के रूप में प्रतिपादित किया गया है किन्तु परम पुरुषार्थ मोक्ष ही है । पुरुषार्थ निरूपण के विषय में महा-
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४
चतुर्थ उद्योतः
धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ । यद्हास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित् ॥
भारत का यह इलोक प्रसिद्ध है :— धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ । यद्हास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित् ॥ इस श्लोक में प्रत्येक पुरुषार्थ का उल्लेख करने के बाद एक ‘च’ जोड़ दिया गया है । इस प्रकार चार चकारों का प्रयोग यहां किया गया है । इन चकारों का अभिप्राय यह है कि लोक में धर्म, अर्थ और काम ये पुरुषार्थ माने जाते हैं । इन पुरुषार्थों का जिस प्रकार उल्लेख इस महाग्रन्थ में हुआ है वह सब लोक में पाया जाता है । किन्तु लोक में इनकी निस्सारता नहीं पाई जाती जिसका ठीक रूप में उल्लेख इसी ग्रन्थ में किया गया है । मोक्ष के विषय में जो कुछ कहा गया है और जैसा रूप है वह लोक की वस्तु नहीं है । मोक्ष का सार रूप तो इस ग्रन्थ में ही है और इसी में इस तत्व का विचार किया जाना चाहिये । (‘च’ का प्रयोग समुच्चय, अन्वाचय इत्यादि अर्थों में होता है । जिन शब्दों अथवा वाक्यखंडों का एक में अन्वय करना होता है उनके साथ ‘च’ का योग किया जाता है । सामान्यतया संयुक्त होने वाले शब्दों और वाक्यखण्डों को लिखकर अन्त में ‘च’ का प्रयोग कर दिया जाता है । किन्तु यहां पर विशेष रूप से प्रत्येक शब्द के साथ ‘च’ का प्रयोग किया गया है । अतः यहां पर इसका विशिष्ट अर्थ लिया जाना चाहिये । वह विशिष्ट अर्थ यही होगा कि जो कुछ लोक में अधिगत होता है वह इस महाग्रन्थ में न हो ऐसी बात नहीं है वह सब तो इसमें है ही । किन्तु लोक में उनकी विरसावसानता दृष्टिगत नहीं होती जिसका इस ग्रन्थ में प्रतिपादन किया गया है । मोक्ष का तो प्रतिपादन इस महाग्रन्थ की विशेषता ही है । इस प्रकार विरसावसानता और मोक्ष को विशेषता ही विशिष्ट अर्थ है जिसकी अभिव्यक्ति चार चकारों के प्रयोग से होती है ।)
४
चतुर्थ उद्योतः
महाभारत के अद्भीरस के विषय में ऊपर जो कुछ कहा गया है उसका आंशिक विवरण महाभारत के विभिन्न व्याख्याताओं ने दे दिया है किन्तु स्पष्ट रूप में यह किसी ने नहीं कहा कि शान्तरस ही महाभारत का अद्भीरस है । महाभारत के रचयिता को तो हम लोकनाथ कह सकते हैं क्योंकि एक तो अवतारों के परिगणन में भगवान् व्यास का नामोल्लेख पाया जाता है, अतः भगवान् का अवतार होने के कारण वेदव्यास जी लोकनाथ हैं । दूसरी बात यह है कि उन्होंने महाभारत जैसा परमोत्कृष्ट प्रबन्ध लिखकर सांसारिक व्यक्तियों की भावनाओं को नियन्त्रित कर सन्मार्ग में प्रवृत्त करने की चेष्टा की है । इस प्रकार लोक पर नियन्त्रण करने के कारण वे लोकनाथ हैं । उन्होंने देखा कि सारा विश्व एक महान् अज्ञान और मोह में डूबा हुआ है, तमोगुण और रजोगुण का परामवश हो चुका है और रजोगुण और तमोगुण ही प्रधान हो गये हैं । अतः यह महामोह बहुत अधिक उद्दीर्ण हो गया है और लौकिक व्यक्तियों के लिये यह एक बहुत बड़ा बन्धन है । उनकी केवल एक यही कामना थी कि जैसे भी हो सके यह अज्ञानान्धकार में डूबा हुआ विश्व निस्तार प्राप्त कर ले और मोह-
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महोर्दाध से बाहर निकल सके । इसी मन्तव्य की पूर्ति के लिए उन भगवान् ने महाभारत की रचना की । इस रचना के द्वारा उन्होंने तत्वज्ञान का ऐस प्रकाश प्रदान करने की चेष्टा की जो महामोहान्धकार के अपसरण में समर्थ हो । अतः यह कहा ही जा सकता है कि उनका मन्तव्य मोक्ष को ही परम पुरुषार्थ कह्ना था और शान्तरस को ही वे प्रधान मानकर चले थे । केवल इतना ही नहीं, अपितु उन्होंने यह बात कही भी है । उनके कथन का एक नमूना द्रष्टव्य :
(ध्वन्या०) यथा यथा विपर्येति लोकतन्त्रमसारवत् । तथा तथा विरागोद्र जायतेऽत्र नात्र संशयः ।।
इत्यादि बहुशः कथयता । ततश्च शान्तो रसो रसान्तरैर्मोक्षलक्षणः पुरुषार्थः पुरुषार्थान्तरैस्तदुपसर्जनत्वेनानुगम्यममानोज्झद्भिःवेन विवक्षाविषय इति महाभारततात्पर्यं सुव्यक्तमेवाभवभासते । अङ्ङाङ्गिभावश्च यथा रसानां तथा प्रतिपादितमेव ।
(अनु०) 'जैसे जैसे लोकतन्त्र असार के समान विपरीत होता जाता है वैसे वैसे इसमें विराग होता जाता है इसमें कोई सन्देह नहीं ।'
इत्यादि बहुत बार कहने हुये । उससे शास्त्रस दूसरे रसों के द्वारा और मोक्षरूप पुरुषार्थ दूसरे पुरुषार्थों के द्वारा उसके प्रति गौण होने के कारण अनुगमन किया जाता हुवा अङ्गी के रूप में विवक्षा का विषय है यह महाभारत का तात्पर्य स्पष्ट हो अवभासित होता है । रसों का जैसा अङ्ङाङ्गिभाव है वैसा प्रतिपादित ही कर दिया गया ।
(लो०) यथा यथेति । लोकेऽस्तङ्ग्यमाणं यत्नेन सम्पाद्यममानं धर्मार्थकामतत्स-धनलक्षणं वस्तुभूततयाभिमतं च । येन येनाज्जननरक्षणक्षयादिना प्रकारण । असार-वस्तुच्छेद्रजालादिवत् । विपर्येति । प्रत्युत विपरीतं सम्पद्यते । आस्तान्तस्य स्वरूप-चिन्तेत्यर्थः । तेन तेन प्रकारेण अत्र लोकतन्त्रे । विरागो जायत इत्यनेन तत्वज्ञानो-त्थितं निर्वेदं शान्तरसस्थायिनं सूचयति । तस्यैव च सर्वेऽतरासारत्वप्रतिपादनेन प्राधान्य-मुक्तम ।
(अनु०) 'जैसे जैसे' यह । लोगों के द्वारा तन्निष्ठ किया जाता हुवा अर्थात् प्रयत्न-पूर्वक सम्पादित किया जाता हुवा धर्म, अर्थ और काम तथा उसके साधन के रूप में स्थित वस्तुरूप होने से अभिमत भी । जिस-जिस अर्जन रक्षण और क्षय इत्यादि के प्रकार से । असार-वस्तु इन्द्रजालवत् 'विपर्येति' अर्थात् प्रत्युत विपरीत हो जाता है, उसकी स्वरूप-चिन्ता तो दूर रही । उन प्रकारों से इस लोकतन्त्र में । 'विरागो जायत इत्यनेन' तत्ज्ञान से उद्भूत शान्त रस के स्थायी निर्वेद को सूचित करते हुये समस्त दूसरी वस्तुओं के असारत्व के प्रतिपादन के द्वारा उसी का प्राधान्य कहा गया है ।
तारावती—तन्त्रका अर्थ है प्रयत्नपूर्वक सम्पादन किये जानेवाले तत्व, वे हैं—धर्म, अर्थ और काम तथा उनके सम्पादन के लिए उपयुक्त साधन ये सब लौकिक तत्व हैं, सांसारिक
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चतुर्थ
उद्योत:
वस्तुयें हैं और सभी लोग इनके जुटाने का प्रयत्न किया करते हैं तथा सभी लोगों के लिये ये वस्तुयें अभिमत होती हैं। संसार इनके उपार्जन तथा संरक्षण के लिये अनेक प्रकारों को अपनाया करता है। किन्तु अन्त में वे समस्त प्रकार और उनके फल धर्म अर्थ और काम सभी कुछ असार सिद्ध हो जाता है तथा ज्ञात होने लगता है कि जैसे इन्द्रजाल में दिखाई गई वस्तुयें मिथ्या होती हैं उसी प्रकार संसार के सभी पदार्थ मिथ्या ही हैं। केवल इतना ही नहीं अपितु मानव आनन्द की कामना लेकर जिन वस्तुओं की ओर दौड़ता है वे अन्त में विपरीत फलदायक भत एव दुःखकारक हो जाती हैं। अतः उनकी स्वरूप चिन्ता से क्या लाभ ? जैसे-जैसे ये भावनायें जागृत होती हैं और अनुभव मनुष्य के सामने वास्तविकता को प्रस्तुत करता जाता है वैसे विराग उत्पन्न होता जाता है। 'विराग उत्पन्न होता है' इन शब्दों से अभिव्यक्त होता है कि तत्त्व ज्ञान से उत्पन्न निर्वेद ही संसार का एक मात्र सत्य है। यह निर्वेद शान्तरस का स्थायी भाव है। इससे अन्य समस्त वस्तुओं की असारता का प्रतिपादन करते हुए निर्वेद को ही महाभारत का प्रधान प्रतिपाद्य बतलाया है। इस प्रकार के बहुत से वाक्य महाभारत में आये हैं। इनसे यही सिद्ध होता है कि महाभारत में जितने भी रस आये हैं चाहे वे वीर हों, चाहे करुण वे सब शान्तरस के ही पोषक हैं और शान्तरस के ही अङ्ग हैं, अङ्गी शान्तरस ही है। इसी प्रकार धर्म, अर्थ इत्यादि जितने भी पुरुषार्थ प्रतिपादित किये गये हैं वे सब मोक्षरूप पुरुषार्थ के ही अङ्ग हैं और उसी के पोषक हैं, अङ्गी मोक्ष नामक पुरुषार्थ ही है। इस प्रकार इन कथनों के आधार पर स्पष्ट रूप में सिद्ध हो जाता है कि मुनि की इच्छा शान्तरस और मोक्ष का प्रतिपादन करने की ही है और यही महाभारत का तात्पर्य है। रसों का अङ्गाङ्गिभाव तो हो ही सकता है। इसका तो प्रतिपादन पहले ही किया जा चुका है (दे. उ. ३ का. २०)।
चतुर्थ
उद्योत:
(ध्वन्य०) पारमार्थिकान्तस्तत्त्वानपेक्षया शरीरस्येवाङ्गभूतस्य रसस्य पुरुष-थैंस्य च स्वप्राधान्येन चातुत्वमप्यविरुद्धम् । ननु महाभारते यावान् विवक्षाविषय: सोज्ञुक्रमण्यां सर्व एवानुक्रान्तो न चेतत्तत्र दृश्यते, प्रत्युत सर्वपुरुषार्थप्रबोधहेतुत्वं सर्वरससङ्भरत्वञ्च महाभारतस्य तस्मिन्नुद्देशे स्वशब्दनिवेदितत्वेन प्रतीयते—सत्यं शान्तस्यैव रसस्याङ्गित्वं महाभारते मोक्षस्य च सर्वपुरुषार्थेष्य: प्राधान्यमिल्येतन्न स्वशब्दाभिधेयत्वेनानुक्रान्तम्, दर्शितम्, वद्शितञ्च तु व्यङ्ग्यत्वेन——
(अनु०) पारमार्थिक अन्तस्तत्व की अपेक्षा न करते हुये अङ्गभूत शरीर के समान रस का और पुरुषार्थ का अपने प्राधान्य के द्वारा चारुत्व विरुद्ध नहीं है। (प्रश्न) महाभारत में जितना विवक्षा का विषय है वह अनुक्रमणी में सभी अनुक्रान्त किया गया है, यह तो वहाँ नहीं ही देखा जाता; इसके प्रतिकूल महाभारत का सब पुरुषार्थों के प्रबोध का हेतुत्व और सर्वरससङ्भरत्व उस उद्देश्य में स्वशब्दनिवेदितत्व के रूप में प्रतीत होता है। (उत्तर) सच ही है कि शान्त रस का ही अङ्गित्व और मोक्ष का ही समस्त पुरुषार्थों में प्राधान्य यह स्वशब्दाभिधेय के रूप में अनुक्रमणी के द्वारा नहीं दिखलाया गया है; व्यङ्ग्य के द्वारा तो दिखलाया गया है :—
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(लो०) ननु श्रृङ्गारवीरादिचमत्कारोऽपि तथा भातीयशृङ्गारद्युताह—पारमा-र्थिकेति । भोगाभिनिवेशिना लोकवासनाविष्टानामझ़्भूतेऽपि रसे तथाभिमानः, यथा शरीरे प्रमातृत्वाभिमानः प्रमातुर्योगायतनमात्रेऽपि ।
(अनु०) निस्सन्देह श्रृङ्गार वीर इत्यादि का चमत्कार भी वहाँ शोभित होता है यह शंका करके कहते हैं—‘पारमार्थिक’ यह । भोग में अभिनिवेश रखनेवाले लोक-वासनाओं में आविष्ट लोगों की अङ्गभूत में रस में वैसा अभिमान होता है जैसा प्रमाता के भोगायतन मात्र शरीर में भी प्रमाता का प्रमातृत्वाभिमान होता है ।
तारावली—बहुत से विचारक महाभारत में कई दूसरे अङ्गीरसों का प्रतिपादन करते वस्तुतः महाभारत में कई दूसरे रस भी पर्याप्त विस्तार के साथ आये हैं । कहीं श्रृङ्गार है, कहीं वीर । किन्तु ये सब रस शान्तरस के ही पोषक । किन्तु जो लोग महाभारत के वास्तविक अन्तस्तत्त्व को नहीं समझते अथवा उस ओर ध्यान नहीं देते वे कहने लगते हैं कि महाभारत में अन्य रसों की प्रधानता है । इसी प्रकार महाभारत में धर्म, अर्थ और काम का भी विस्तार देखकर वे लोग भ्रम में पड़ जाते हैं और यह नहीं समझ पाते कि ये सब धर्म अर्थ और काम वस्तुतः
मोक्ष के ही साधन होकर आये । इन लोगों की यही दशा है जैसे जो लोग सारभूत तत्त्व को नहीं जान पाते और शरीर को ही अनेक कार्य करते हुए देखते हैं वे क्रियाकलाप में आत्मा को निहित नहीं मानते और शरीर की ही प्रधानता बतलाने लगते हैं । शरीर और कुछ नहीं आत्मा का भोगायतन ही है । इसमें रहकर आत्मा अपने कर्मों का भोग किया करता है । किन्तु जब प्रमाता अपने स्वरूप को नहीं जान पाता तब वह शरीर को ही प्रमाता मानने लगता है । इसी प्रकार जिन लोगों का आप्रह ही सांसारिक वस्तुओं का उपभोग करना है और जिनमें लोकवासनायें आविष्ट हो चुकी हैं वे अङ्गभूत रस को ही अङ्गी मान बैठते हैं ।
(ध्वन्यो) " भगवान् वासुदेवश्च कीर्त्यतेऽत्र सनातनः । इत्यस्मिन् वाक्ये । अननेन ह्यप्यर्थो व्यङ्ग्यच्यतेन विवक्षितो यदत्र महाभारते पाण्डवादिचरितं यत्कीर्त्यते तत्तथ्र्वमवसानविरसमविद्याप्रपञ्चरुपतच्च परमार्थसत्य-सत्यस्वरूपस्तु भगवान् वासुदेव एव कीर्त्यते । तस्माद्विस्मयेऽपि परमेऽभरे भगवति भवत्स्वरुपस्तु भगवान् वासुदेवोऽत्र कीर्त्यते । तस्माद्विस्मयेऽपि परमेऽभरे भगवति भवति चेतसो, मा भूत् विभूतिषु निस्सारमु रागिणो गुणेषु वा नयविनयपराक्रमादि-वैचिव्रीषु केवलेषु केवचित्सर्वात्मना प्रीतिनिविष्टधियः । तथा च चाप्रे पश्यत निस्सारतां संसारस्येत्यमुनेवार्थं व्योतयन् स्फुटमेवाभाषते व्यङ्क्कशक्त्यनुगृहीतैरपि शब्दैः । एवविधमेवार्थी गर्भीकृतं सन्निवेश्यन्तोऽनन्तरलोका: लक्षयन्ते—‘स हि सत्यम्’ इत्यादयः ।
(अनु०) ‘यहाँ सनातन भगवान् वासुदेव का कीर्तन किया जाता है ।’ इस वाक्य में । अननेन ह्यप्यर्थो व्यङ्गच्यतेन विवक्षितो यदत्र महाभारते पाण्डवादिचरितं यत्कीर्त्यते तत्तथ्र्वमवसानविरसमविद्याप्रपञ्चरुपतच्च परमार्थसत्य-सत्यस्वरूपस्तु भगवान् वासुदेव एव कीर्त्यते । तस्माद्विस्मयेऽपि परमेऽभरे भगवति भवत्स्वरुपस्तु भगवान् वासुदेवोऽत्र कीर्त्यते । तस्माद्विस्मयेऽपि परमेऽभरे भगवति भवति चेतसो, मा भूत् विभूतिषु निस्सारमु रागिणो गुणेषु वा नयविनयपराक्रमादि-वैचिव्रीषु केवलेषु केवचित्सर्वात्मना प्रीतिनिविष्टधियः । तथा च चाप्रे पश्यत निस्सारतां संसारस्येत्यमुनेवार्थं व्योतयन् स्फुटमेवाभाषते व्यङ्क्कशक्त्यनुगृहीतैरपि शब्दैः । एवविधमेवार्थी गर्भीकृतं सन्निवेश्यन्तोऽनन्तरलोका: लक्षयन्ते—‘स हि सत्यम्’
इत्यादयः ।
(अनु०) ‘यहाँ सनातन भगवान् वासुदेव का कीर्तन किया जाता है ।’ इस वाक्य में ।
इस वाक्य में । इससे यह अर्थ व्यङ्ग्यचत्व के रूप में कहना अभीष्ट है कि यहाँ पर महाभारत में जो पाण्डवदि चरित कीर्तित किया जा रहा है वह सब अवसान में विरस है और अविद्याप्रपञ्च रूप हैं, परमार्थ सत्यस्वरूप तो भगवान् वासुदेव ही यहाँ कीर्तित किये जा रहे हैं । इससे अविस्मय में भी परम आभत में भगवान् में भवति चेतस: के प्रति विभूतियों में निस्सारमु रागिण: के प्रति नयविनयपराक्रमादि-वैचिव्रीषु केवलेषु में केवचित्सर्वात्मना प्रीतिनिविष्टधिय: के प्रति । तथा च अप्रे पश्यत निस्सारतां संसारस्य इत्यमुनेवार्थं व्योतयन् स्फुटमेवाभाषते व्यङ्क्कशक्त्यनुगृहीतैरपि शब्दैः । एवविधमेवार्थी गर्भीकृतं सन्निवेश्यन्तोऽनन्तरलोका: लक्षयन्ते—‘स हि सत्यम्’ इत्यादयः ।
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चतुर्थ
उद्योतः
उन परमेश्वर भगवान् में ही भावित चित्तवाले बनो, निःसार विभूतियों में रागी न बनो और न नय, विनय, पराक्रम इत्यादि केवल कुछ गुणों में पूर्ण आत्मा से आप्रहयुक्त बुद्धिवाले बनो। उसी प्रकार आगे 'संसार की निःसारता देखो' इस अर्थ को व्योतित करते हुये व्यञ्जक शक्ति से अनुगृहीत 'च' शब्द स्पष्ट ही अवभासित होता है। इस प्रकार के गर्भित अर्थ को दिखलाते हुये बाद के श्लोक देखे जाते हैं—'स हि सत्यम्' इत्यादि।
चतुर्थ
उद्योतः
(लो०) केवलेऽवति । परमेश्वरभक्त्युपकरणेषु तु न दोष इत्यर्थः । विभूतिषु रागिणो गुणेषु च निविष्टधियो माभूतेऽत्रसम्बन्धः । अग्र इति । अनुक्रमण्यनन्तरं यो भारतग्रन्थस्तत्रेत्यर्थः ।
(अनु०) 'केवलों में' यह है। अर्थात् परमेश्वर की भक्ति के उपकरणों में तो दोष नहीं है। सम्बन्ध यह है—विभूतियों में रागी और गुणों में निविष्ट बुद्धिवाले न होओ। 'आगे' यह । अर्थात् अनुक्रमणों के बाद जो भारत ग्रन्थ है वहाँ।
चतुर्थ
उद्योतः
तारावती—(प्रश्न) महाभारत में कवि को जो कुछ कहना अभीष्ट है वह सब अनुक्रमें ही दिखला दिया गया है। यह अनुक्रमणी महाभारत में दी हुई है। अनुक्रमणी लिखने का मन्तव्य यही है कि रचना के सारे उद्देश्यों से पाठक परिचित हो जायें। जिन पुरुषार्थों की सिद्धि महाभारत का लक्ष्य है वे सब पुरुषार्थ वहाँ दिखला दिये गये हैं। वहाँ वेद, योग, विज्ञान, धर्म, अर्थ, काम, विभिन्न शास्त्र, लोकयात्रा विधान, इतिहास, विभिन्न श्रुतियाँ इत्यादि ही उद्देश्य के रूप में गिनाये गये हैं। वहाँ यह लिखा ही नहीं गया कि मोक्ष ही परम पुरुषार्थ है और ये सब प्रतिपादन उसी के अङ्ग हैं। महाभारत् देखने से यही अवबगत होता है कि महाभारत का उद्देश्य सभी पुरुषार्थों का प्रतिपादन करना है। इसी प्रकार सभी रसों से गर्भित होना भी उसी प्रकरण से सिद्ध होता है। जो बात कवि ने स्पष्ट शब्दों में स्वयं कहीं है वही मानी जानी चाहिये। फिर मोक्ष को परम पुरुषार्थी और शान्त रस को अङ्गी रस मानने का आपके पास क्या आधार है ?
चतुर्थ
उद्योतः
(उत्तर) यह तो सच ही है कि महाभारत के अनुक्रमणी में ऐसा कोई प्रकरण या श्लोक नहीं है कि शान्तरस तथा मोक्ष को अङ्गी सिद्ध किया जा सके। किन्तु उसी प्रकरण में कई ऐसे वाक्य हैं जिनका परिशीलन करने से स्पष्ट रूप में ज्ञात होता है कि मुनि का अभीष्ट शान्तरस को ही अङ्गी मानना है। व्यञ्जनों के आधार पर शास्त्रस को अङ्गी सिद्ध किया जा सकता है। अनुक्रमणी के निम्नलिखित श्लोक ध्यान देने योग्य हैं—
चतुर्थ
उद्योतः
भगवान् वासुदेवश्च कीर्त्यतेदत्र सनातनः । स हि सत्यमृतं चैव पवित्रं पुण्यमेव च ॥ शाश्वतं परमं ब्रह्म ध्रुवं ज्योति सनातनम् । यस्य दिव्यानि कर्माणि कथयन्ति मनीषिणः ॥
( इसमें सनातन वासुदेव का कीर्तन किया गया है, वे निस्सन्देह सत्य हैं, ऋत हैं, पवित्र हैं, पुण्य हैं, शाश्वत परब्रह्म हैं, सनातन अटल प्रकाश हैं जिसके दिव्य कर्मों का मनोषीगण वर्णन करते हैं । )
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सनातन का अर्थ है सदा रहनेवाले, आदि मध्यान्त रहित और भगवान् का अर्थ है परम ऐश्वर्यंशाली जिनमें अचिन्त्य तथा अद्भुत शक्ति विद्यमान है । यदि देखा जाय तो ज्ञात होगा कि महाभारत का प्रधान प्रतिपाद्य वासुदेव कृष्ण का चरित्र नहीं अपितु पाण्डवचरित्र है । किन्तु उपक्रम में कहा गया है कि इस महाग्रन्थ में भगवान् वासुदेव का कीर्तन है । इससे सिद्ध होता है कि पाण्डवदिकों के जिस चरित्र को विस्तार दिया गया है वह भगवकीर्तन की ही एक अङ्ग है । इससे व्यञ्जना निकलती है कि पाण्डवादिकों का जो चरित्र महाभारत में आया है उस सका अवसान विरसता तथा नाश में ही होता है । अतः विश्व का जितना भी प्रपञ्च है वह सब अज्ञान का ही विलास है । इस अविद्या-विलास को सत्य मानकर जो भी प्रवृत्त होता है वह कितना ही महान् क्यों न हो पाण्डवों के समान अन्त में विरसता में ही समाप्त हो जाता है । इस विश्व का वास्तविक तत्त्व वासुदेव ही हैं और उन्हीं का कीर्तन इस ग्रन्थ में प्रतिपाद्य है । अत एव अखण्ड ऐक्यतास्वरूप संसार के उदय पालन और लय के करने-वाले भगवान् कृष्ण के प्रति ही अपने चित्तों में भावना भरो, जो सांसारिक तुच्छ विभूतियाँ हैं, जिनका पर्यवसान विरसता में ही होता है उनके रागी मत बनो । ये जितने भी सांसारिक गुण हैं जैसे नीति, विनय, पराक्रम इत्यादि, यदि उनका प्रयोजन केवल सांसारिक विभूतियाँ उपार्जित करना ही है तो उनमें भी किसी सीमा तक संलग्न होना बुरा नहीं है । किन्तु अपनी पूरी आत्मा से ही उन्हें अपनी बुद्धि लगा देना ठीक नहीं है । हाँ यदि इन गुणों को प्रयोजन भक्तिसान्निध्य प्राप्त करना है और ये गुण भक्ति साधना में सहायक होते हैं तो कोई बुराई नहीं, तब तो इन गुणों में आसक्त होना ही चाहिए । 'भगवान् वासुदेवश्र्च' में 'श्र्च' शब्द विशेष व्यञ्जनार्थ को द्योतित करने के लिए प्रयुक्त किया गया है । इससे यह व्यञ्जना निकलती है कि इस महाभारत ग्रन्थ में संसार की असारता और भगवत्तत्त्व की ससारता का प्रतिपादन किया गया है इसे समझने की चेष्टा करो ।
समाप्तो विद्धदतता तेनैव कविवेदसा कृष्णद्वैपायनेन सम्यक् स्फुटीकृतः । अनन्त चार्थेन संसारातो निस्तार्यतां सकल एव सांसारिको व्यवहारः पूर्वं संसारातो निस्तरन्ते सकृत्यतिशायं प्रवर्त्तयितुं
(ध्वन्यालोके) अयं च निगूढ़रमणीयोऽर्थो महाभारतावसाने हरिवंशवर्णननेन समाप्तो विद्धदतता तेनैव कविवेदसा कृष्णद्वैपायनेन सम्यक् स्फुटीकृतः । अनन्त चार्थेन संसारातो निस्तार्यतां सकल एव सांसारिको व्यवहारः पूर्वं संसारातो निस्तरन्ते सकृत्यतिशायं प्रवर्त्तयितुं
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चतुर्थ
उद्योत:
पक्षीकृतो न्यक्षेण प्रकाशते । देवतातीर्थतपःप्रभृतीनां च प्रभावातिशयवर्णनं तस्यैव परब्रह्मणः प्राप्त्युपायत्वेन तद्वृत्तिमत्त्वेनैव देवताविशेषाणामन्येषां च पाण्डवादिचरितवर्णनस्यापि वैराग्यजननतत्पर्याद्वैवैराग्यस्य च मोक्षमूलत्वान्मोक्षस्य च भगवत्प्राप्त्युपायत्वेन मुख्यतया गीतादिषु प्रदर्शितत्वात् परब्रह्मप्राप्त्युपायत्वमेव । परम्परया वासुदेवादिसंज्ञाभिधेयत्वेन चापरिमितशाक्य्यास्पदं परब्रह्मप्राप्त्युपायत्वमेव । परम्परया वासुदेवादिविसंज्ञाभिधेयत्वेन चापरिमितशाक्य्यास्पदं परं ब्रह्म गीतादिषु प्रदर्शितमन्तरङ्गु तद्विधानत्वेन लब्धप्रसिद्धिमाथुरप्रादुर्भावांश एव, सनातनशब्दविशेषितत्वात् । रामायणादिषु वानया संज्ञया भगवन्मूर्तिन्तरे व्यवहारबन्धानात् । निर्णयश्चायमर्थः शब्दतत्त्वविदाम्बिरेव ।
(अनु०) और यह निगूढ़ रमणीय अर्थ महाभारत के अन्त में हरिवंश वर्णन के द्वारा समाप्त करते हुये उन्हीं कवियों के ब्रह्मा कृष्ण द्वैपायन ने ही ठीक रूप में स्फुट कर दिया । और इस अर्थ के द्वारा संसारतीत दूसरे तत्व में भक्ति की अधिकता को प्रवर्तित करते हुये (वेदव्यास के द्वारा) सभी सांसारिक ग्रहविकार पूर्वपक्ष किया हुआ नीचे रूप में प्रकाशित होता है । उसी में परब्रह्म की प्राप्ति का उपाय होने के कारण और विशेष देवताओं तथा दूसरों का उन्हीं की विभूतिरूप होने के कारण देवता, तप, तीर्थ इत्यादि के प्रभाव का अतिशय वर्णन (किया गया है) पाण्डवावदि चरित वर्णन का भी वैराग्यजनन-तात्पर्य होने से; वैराग्य के मोक्ष का मूल होने से और मोक्ष के भगवत्प्राप्ति का उपाय होने से मुख्यरूप में गीता इत्यादि में प्रदर्शित होने के कारण परब्रह्म की प्राप्ति का उपायत्व ही है । और परम्परा से वासुदेव इत्यादि की संज्ञा से अभिधेय होने के कारण अपरिमित शाक्ति का आश्रयद परब्रह्म गीता इत्यादि दूसरे प्रदेधों में उसो नाम से प्रसिद्धि को प्राप्त करने वाला मथुरा में प्रादुर्भाव से अनुकृत सभी का स्वरूप कहनाभीष्ट है केवल मथुरा में प्रादुर्भाव का अंश ही नहीं, क्योंकि इसके विशेषण के रूप में सनातन शब्द का प्रयोग किया गया है । रामायण इत्यादि में इस संज्ञा से भगवान् की दूसरी मूर्ति में व्यवहार देखा जाता है । इसे अर्थ का निर्णय शब्दतत्त्ववेत्ताओं ने ही कर दिया है ।
चतुर्थ
उद्योत:
(लो०) नतु वसुदेवपत्यं वासुदेव इत्युच्यते, न परमेश्वरः परमात्मा महादेव इत्याशङ्क्याह —वासुदेवादिसंज्ञाभिधेयत्वेनैति । 'बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वम्' । इत्यादौ अंशिरुपमेतत्संज्ञाभिधेयमिति निश्चितं तात्पर्यम् । निर्णयश्चेति । शब्दा हि नित्या एवं सन्तोऽनन्तरं काकतालीयवशात् तथा सङ्केतिता इत्युक्तम्—ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यइचेत्यत्र ।
(अनु०) (प्रश्न) वसुदेव का अपना वासुदेव यह कड़ा जाता है, परमेश्वर, परमात्मा महादेव नहीं, यह शङ्का करके कहते हैं—'वासुदेवादिसंज्ञाभिधेयत्वेन' के द्वारा यह । 'बहुत जन्मों के अन्त में ज्ञानवान् मुझे 'वासुदेव सभी है' इस रूप में प्राप्त होता है ।' इत्यादि में यह संज्ञाभिधेय अङ्शी रूप में है यह निश्चित तात्पर्य है । शब्द नित्य होते हुये काकतालीयवशात् तथा सङ्केत किया जाता है इत्युक्तम्—ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यइचेत्यत्र ।
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ध्वन्यालोके
निस्सन्देह वाद में काकतालीय न्याय से वैसे संकेतित किये गये हैं यह 'ऋष्यशृङ्गकवृष्णिकुरुस्रियश्च' इस सूत्र में कहा गया है ।
तारावती—अनुक्रमणि में जो कुछ कहा गया है वह सर्वथा वाच्य है और इसीलिये प्रकट है । अत एव उसमें सौन्दर्य नहीं हैं । किन्तु उसका यह शान्त की अङ्गीरसङ्घटता और मोक्ष की परमपुरुषार्थता का अर्थ निगूढ रूप में व्यङ्ग्य किया गया है, अतः उसमें रमणीयता है और वेत्ता कवियों के विधाता हैं । उनके मृध्दन्य प्रबन्ध महाभारत को आ गयी हैं । महाकवि वेदव्यास ने उसे कविता करने में पूर्णता प्राप्त भुवनोपजीव्य कहा जाता है और यह अनिवार्य माना जाता है कि कविता करने में पूर्णता प्राप्त करने के लिये महाभारत का आश्रय लिया जाय । इसीलिये रमणीयता-सम्पादन के उद्देश्य से ही उन्होंने इस अर्थ को प्रच्छन्न रूप में अभिव्यक्त किया है । किन्तु इसे उन्होंने सर्वथा प्रच्छन्न रखा भी नहीं हैं । महाभारत के परिशिष्ट के रूप में हरिवंश पुराण जोड़ा गया है और उसी से महाभारत की समाप्ति की गई हैं । हरिवंश में कृष्ण की लोकोत्तर लीलायें वर्णित की गई हैं । भगवद्गुणानुवाद से ग्रन्थ का समाप्त करना ही इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि ग्रन्थ का उद्देय भगवद्गुणानुवाद का प्रकट्यन करना ही हैं । हरिवंश पुराण का जो भी अर्थ हैं उसमें पाठक को मनोवृत्ति लौकिक तत्त्व से उदासीन होकर परम सत्ता परमात्मा में ही लीन हो जाती हैं और उसी ओर पाठक की अतिशय भक्ति प्रवृत्तित हो जाती हैं । इससे महाभारत के मुख्य भाग में जो कुछ सांसारिक व्यवहार वर्णित किया गया हैं वह पूर्वपक्ष ही सिद्ध होता हैं । शास्त्रकारों की यह सामान्य परम्परा हैं कि वे पहले पूर्वपक्ष को विस्तारपूर्वक दिखलाते हैं और बाद में उसकी युक्तियाँ दिखलाकर सिद्धान्त पक्ष की स्थापना कर देते हैं । महाभारत में भी ऐसा ही हुआ हैं । इसमें पहले धर्म, अर्थ और काम का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया हैं, यह सब पूर्वपक्ष हैं । फिर पाण्डवादिकों का करुण अन्त दिखलाकर उसके दोष बतलाये गये हैं जिससे सांसारिक वैभव बहुत ही निम्नस्तर पर आ जाता हैं और उसके प्रति एक हेय बुद्धि तथा घृणा-बुद्धि उद्भव हो जाती हैं अन्त में सिद्धान्तपक्ष के रूप में भगवद्गुणानुवाद का उपादान किया गया हैं । यह सिद्धान्त रक्ष हैं । किन्तु शास्त्रकार पूर्वपक्ष और सिद्धान्तपक्ष को केवल उपाय और उपसंहार में ही नहीं दिखलाता, वह मध्य में भी सिद्धान्त पक्ष की झलक देता चलता हैं । यही कारण हैं कि महाभारत के विस्तृत त्रिवर्गसाधना वर्णन के मध्य में कहीं देवता, तप, तीर्थ इत्यादि का विस्तारपूर्वंक वर्णन कर दिया गया हैं (कहीं गीता इत्यादि प्रदेशों में ज्ञानोपदेश दिया गया हैं) । यह सब उस परब्रह्म को प्राप्त करने के उपाय हो हैं । (प्रश्न) देवता तप और तीर्थ का वर्णन भगवत्प्राप्ति का उपाय कैसे हो सकते हैं ? देवता तो भिन्न होते हैं, तीर्थ इत्यादि भी विभिन्न देवताओं से सम्बद्ध होते हैं और तप भी जिन देवताओं के उद्ददेश्य से किया जाता हैं उन्हीं की प्राप्ति का उपाय हो सकता हैं, वह भगवत्प्राप्ति का उपाय कैसे हो सकता हैं ? (उत्तर) इसका निरूपण तो गीता इत्यादि में ही किया गया हैं कि जितने विभूतिमान पदार्थ हैं वे सब भगवान् के ही रूप हैं—
यच्चिद्भूतमतस्र्वं तु श्रीमद्भूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं ममताज्ञासंभवम् ।।
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चतुर्थ
उद्योत:
येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः। तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥
अन्य देवताओं की आराधना को भी गीता में भगवदाराधन ही का संग्रह कहा गया है। इतना ही नहीं मुख्य पाण्डवचरित इत्यादि का तात्पर्य वैराग्यजनन ही है जैसा कि पहले बतलाया जा चुका है, वैराग्य मोक्ष का मूल है और मोक्ष भगवत्प्राप्ति का उपाय है। गीता इत्यादि प्रकरणों में यही दिखलाया गया है। (गीता में शरीरादियों को अनित्य कहकर ज्ञानाग्नि के द्वारा कर्मों को भस्मकर भगवत्सायुज्य प्राप्त करने का उपदेश दिया गया है। यहाँ पर यह कहना ठीक नहीं है कि मोक्ष तो भगवत्प्राप्ति रूप ही होता है, अतः मोक्ष को भगवत्प्राप्ति का उपाय बताने का आशय यही है कि मोक्ष भगवत्प्राप्ति रूप ही होता है। मोक्ष एक व्यापार है और भगवत्प्राप्ति फल। व्यापार और फल को कभी एक नहीं बतलाया जा सकता।)
चतुर्थ
उद्योत:
भगवान् वासुदेवो हि कीर्त्यतेऽत्र सनातनः।
(प्रश्न) उददेश्य वाक्य में तो वासुदेव के कीर्तन करने की बात कही गई है—‘भगवान् वासुदेवो हि कीर्त्यतेऽत्र सनातनः।’ वासुदेव का अर्थ है वसुदेव का पुत्र। वसुदेव यदुवंशी थे उनसे मथुरा में कृष्ण ने जन्म लिया था। यहाँ पर उनके ही विषय में कहा गया है कि भगवान् वासुदेव का गुणानुवाद किया जा रहा है। वासुदेव शब्द से आपने यह कैसे अर्थ निकाल लिया कि परब्रह्म का कीर्तन किया जा रहा है? (उत्तर) ‘वासुदेव’ यह संज्ञा बहुत पुरानी है, केवल मथुरा में उत्पन्न हुए व्यक्तिविशेष का ही नाम नहीं है। (‘वासु’ शब्द ‘वास’ धातु में औणादिक उण् प्रत्यय होकर बनता है जिसका अर्थ होता है आत्मरूप में समस्त जगत् में निवास करनेवाली व्यापक सत्ता। उसी का क्रिडार्थक दिव् धातु से निष्पन्न देव शब्द में समास हो जाता है। इस प्रकार ‘वासुदेव’ शब्द का अर्थ हो जाता है समस्त विश्व में व्याप्त सत्ता जो कि लीलामयता से युक्त है। वासुदेव शब्द के इस अभिधेयार्थ की ओर विष्णुपुराण में इस प्रकार निर्देश किया गया है :— 'वासुसर्वनिवासश्च विश्वानि सर्वलोमसु । वासुदेवस्ततो वेद्यो वृहस्वाद्वि ष्णुरुश्यते ॥'
चतुर्थ
उद्योत:
वासनात् सर्वभूतानां वसुत्वादेवयोर्नितः । तस्य देवः १९ं ब्रह्म वासुदेव इतोऽरितः ॥
स्वयं महाभारत में इस अर्थ की ओर सङ्केत मिलता है :— 'वासनात् सर्वभूतानां वसुत्वादेवयोर्नितः । तस्य देवः १९ं ब्रह्म वासुदेव इतोऽरितः ॥' गीता में लिखा है कि अनेक जन्मों की साधना के बाद ही कोई विरला ज्ञानी मेरे इस तत्व को जान पाता है कि यह सारा विश्व वासुदेव हो है। जिसका इस प्रकार का ज्ञान हो जाता है वही महात्मा कोठिन्ह है। (यहाँ भाव यह है कि वेद और श्री पुराणों में पाया जाता है। उदाहरण के लिये श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध में लिखा है कि ‘वेद वासुदेवपरक ही हैं, यज्ञ वासुदेवपरक ही है योग वासुदेवपरक ही हैं क्रियायें वसुदेवपरक हैं, ज्ञान, तप, धर्म
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और गति सब कुछ वासुदेवपरक हो है । इन्हीं विभु वासुदेव भगवान् ने जो स्वयं गुणरहित हैं अपनी सदसद्रूपिणी गुणमयी आत्ममाया के द्वारा इस विश्व की रचना की :
‘वासुदेवपरा वेदा वासुदेवपरा मखा: । वासुदेवपरा योगा वासुदेवपरा: क्रिया: ॥ वासुदेवपरं ज्ञानं वासुदेवपरं तप: । वासुदेवपरो धर्मो वासुदेवपरा गति: ॥ स एवेदं सदसद्भि भगवानात्ममायया । सदसद्रूपया चासौ गुणमय्याड्गुणो विभु: ॥’
इन सभी प्रकरणों में वासुदेव का परब्रह्म सत्ता के लिए प्रयोग किया गया है । इसके अतिरिक्त वासुदेव के पुत्र के लिए ही नहीं अपितु वासुदेव शब्द का प्रयोग भगवान् के दूसरे अवतारों के लिए भी होता है । (जैसे निम्नलिखित इलोक में भगवान् राम के लिये वासुदेव शब्द का प्रयोग हुआ है :
यस्येयं वसुधा कृत्स्ना वासुदेवस्य धीमतः । महिषी माधवस्येषा स एव भगवान् प्रभु: ॥)
वैयाकरणों में भी स्वयं इस तत्व का सङ्केत मिलता है कि वासुदेव शब्द व्याकरण सत्ता के लिये आचार्याला नियत शब्द है ‘ऋतष्यग्रकवृष्णिकुरुरिति’ इस सूत्र की व्याख्या करते हुए कैयट ने लिखा है—‘शब्द तो नित्य होते हैं उनका अन्वाख्यान अनित्य अन्वक वंश इत्यादि के आश्रय से कैसे उचित हो सकता है । (उत्तर) त्रिपुरुषानुक नाम करना चाहिये इस नियम से अन्धक शब्द इत्यादि भी नित्य हैं ।’ काशिकाकार ने भी यही लिखा है कि शब्द नित्य ही होते हैं, जब नामकरण में उनका उपादान होता है तब वह काकतालीय न्याय से ही समझा जाना चाहिये । आशय यह है कि शब्द संयोगावश ही नाम से मेल खा जाते हैं वस्तुतः तो शब्द नित्य ही होते हैं । इस प्रकार वासुदेव शब्द नित्य ही है, सायोगिक रूप में वसुदेव के पुत्र के रूप में भी उसकी व्युत्पत्ति हो गई है । इसका आशय यह नहीं है कि मथुरा में जन्म लेनेवाले वसुदेव के पुत्र को ही वासुदेव कहते हैं । एक बात और है—यहाँ पर वासुदेव के लिये ‘सनातन:’ यह विशेषण दिया गया है । इससे भी यहीं सिद्ध होता है कि महाभारत का मुख्य प्रतिपाद्य भगवद्विषयक ही है ।
(ध्वन्यालो) तदेवमनुक्रमेंनिद्दिष्टेन वाक्येन भगवद्वहुतिरेकिन: सर्वस्याल्य- स्त्यानित्यतां प्रकाशयता मोक्षलक्षण एवैक: पर: पुरुषार्थ: शास्त्रनये, काव्यनये च तृष्णाक्षयपरिपोषलक्षण: शान्तो रसो महाभारतस्याङ्गितोचेन विरक्षित इति सुप्रती- पावितम् । अल्यन्तसारभूतत्वाच्चायमर्थो वयड्नयत्नेनैव द्र्शितो न तु वाच्यत्वेन । सारभूतो ह्यर्थ: स्वशब्दानभिधेयत्वेन प्रकाशित: सुतरामेव शोभामवहति । प्रसिद्ध- इचेयमस्त्येव विरङ्गविद्वत्परिषत्सु यदभिमततरं वस्तु व्यङ्गचत्वेन प्रकाशयते न साक्षा- च्छन्दवद्वाच्यत्वेन ।
(अनु०) वह इस प्रकार भगवान् से भिन्न सभी अन्य पदार्थों की अनित्यता का प्रत-
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चतुर्थ
उद्योतः
पादन करनेवाले अनुक्रमणीनिर्दिष्ट वाक्य से शास्त्र की नीति में मोक्षरूप एक ही परम पुरुषार्थ और काव्य की नीति में महाभारत का अङ्गीरस तृष्णाक्षय सुखपरिपोषरूप शान्तरस भली-भाँति प्रतिपादित कर दिया गया। इस अर्थ के अत्यन्त साररूप होने के कारण यह व्यङ्ग्य-रूप में ही प्रतिपादित किया गया है; वाच्य के रूप में नहीं। निस्सन्देह सारभूत अर्थ अपने अनभिधेय रूप में प्रकाशित किये जाने पर भलो-भाँति शोभा को धारण करता है। विदग्ध विद्वानों की परिषद् में यह प्रसिद्धि है ही कि अधिक अभिमत वस्तु व्यङ्ग्य के रूप में ही प्रकाशित की जाती है साक्षात् शब्दवाच्यत्व के रूप में नहीं।
चतुर्थ
उद्योतः
(लो०) शास्त्रनय इति। तत्रास्वादयोगाभावे पुरुषेणार्थ्यत इत्यमेव व्यपदेशः सादरः, चमत्कारयोगे तु रसव्यपदेश इति भावः। एतच्च ग्रन्थकारेण तत्त्वालोके वितत्योक्तमिह त्वस्य न मुख्योडवसर इति नामाभिर्दर्शितम्। सुतरामेवति यदुक्तं तत्र हेतुमाह--प्रसिद्धिरेचिति। न च शब्दो यस्मादर्थे। यत इयं लौकिकी प्रसिद्धिर्दिस्ततो भगवद्वचासप्रभृति नामप्येवमेवास्वादशब्दाभिधाने आशयः। अन्यथा हि क्रिया-कारकसम्बन्धादौ 'नारायणं नमस्कृत्ये' त्यादि शब्दार्थनिरूपणे च तथाविध एव तस्य भगवत आशय इत्यत्र कि प्रमाणमिति भावः। विदग्धविद्वद्गणेन न काव्यनये शास्त्र-नय इति चानुसृतम्।
(अनु०) 'शास्त्रनीतिमे' यह। भाव यह है कि वहाँ आस्वाद के अभाव में पुरुष के द्वारा अर्थित किया जाता है यही नामकरण आदरपूर्ण है, चमत्कार के योग में तो रस का नामकरण है और यह ग्रन्थकार ने तत्त्वालोक में विस्तारपूर्वक बतलाया है, यहाँ तो उसका मुख्य अवसर नहीं है इस लिये हमलोगों ने नहीं दिखलाया। 'भली भाँति ही' यह जो कहा उसमें हेतु बतलाते हैं—'और प्रसिद्धि' यह। 'च' शब्द क्योंकि के अर्थ में है। क्योंकि यह लौकिक प्रसिद्धि अनादि है उससे भगवान् व्यास इत्यादि का भी अपने शब्द के द्वारा कहने में यही आशय है, अन्यथा किया-कारक सम्बन्ध इत्यादि में और 'नारायणं नमस्कृत्य' इत्यादि शब्दार्थनिरूपण में उस प्रकार का ही उन भगवान् का आशय है उसमें क्या प्रमाण है ? यह भाव है। 'विदग्ध विद्वत्' इस शब्द से काव्य की नीति में इन दोनों का अनुसरण कर लिया गया।
चतुर्थ
उद्योतः
तारावती—ऊपर जो कुछ कहा गया है उससे यही निष्कर्ष निकलता है कि चाहे हम शास्त्र की दृष्टि से विचार करें चाहे काव्य की दृष्टि से, दोनों दशाओं में यही बात सिद्ध होगी। शास्त्र और काव्य इन दोनों के दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न होते हैं। शास्त्र ऐसे व्यक्तियों के लिये लिखा जाता है जो वस्तु में आनन्द तो लेते नहीं, वे उसे समझना चाहते हैं, ये लोग विद्वान् होते हैं और विषयों की आस्वादनीयता से तटस्थ रहकर निर्लिप्त बुद्धि से बुद्धितत्त्व को जानने की चेष्टा किया करते हैं। यदि उनकी दृष्टि से महाभारत के उद्देश्य पर विचार किया जाय तो यही निर्णय करना होगा कि महाभारत में किस पुरुषार्थ का निरूपण किया गया है। पुरुषार्थ शब्द का अर्थ है पुरुष के द्वारा प्राप्य की जानेवाली वस्तु। अर्थात् उनकी दृष्टि से महाभारत में यही देखा जायगा कि महाभारत में किस तत्त्व को पुरुष के लिये प्रधान रूप में
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प्रार्थनीय माना गया है और इसका विचार करने पर निष्कर्ष यही निकलेगा कि महाभारत में परम पुरुषार्थ मोक्ष ही माना गया है। दूसरे लोग वे होते हैं जो वस्तु में आस्वाद का अन्वेषण करते हैं; ऐसे लोग काव्यरसिक कहे जा सकते हैं। उनके दृष्टिकोण से महाभारत में अद्धीरस का विचार किया जावेगा। उनके मत से विचार करने पर यही सिद्ध होगा कि शान्तरस ही महाभारत का अद्धीरस है जिसको लक्षित करानेवाला स्थायीभाव तृष्णाक्षय सुख हो है। लोचनकार ने इस प्रकरण में अद्धीरस का ही समर्थन किया है। यह सब यहाँ पर भली-भाँति सिद्ध किया जा चुका है। ग्रन्थकार ने तत्वालोक में ही यह बात भलीभाँति समझा कर विस्तारपूर्वक कही है। अतः हमें इस विषय में अब कुछ और नहीं कहना है। यह एक सामान्य नियम है कि जो बात प्रधान होती है और जो सारभूत तत्व होता है उसका प्रकथन कभी भी वाच्यवृत्तियों में नहीं किया जाता। यदि वह बात साफ-साफ कह दी जाती है तो उसमें कोई सुन्दरता नहीं आती। इसके प्रतिकूल जो बात व्यंग्यवृत्ति से कही जाती है वह कुछ छिपाकर कही जाने के कारण उसी प्रकार अत्यधिक शोभा को धारण कर लेती है; जिस प्रकार कामिनी-कुच-कलश कुछ प्रच्छन्न रूप में ही प्रकट होकर शोभा को धारण करते हैं। इसका कारण यह है कि सहृदयों और विद्वानों दोनों में यह बात प्रसिद्ध ही है कि जो वस्तु अधिक अभिव्यक्त हो उसे व्यंग्य के रूप में ही प्रकट करना चाहिए। वाच्य के रूप में वस्तु अधिक अभिव्यक्त नहीं होती। इसी प्रसिद्धि के आधार पर भगवान् व्यास ने सभी अप्रधान उद्देश्यों का अनुक्रमणीय वाच्यवृत्ति में उल्लेख किया है और प्रधान उद्देश्य मोक्ष प्राप्ति तथा शान्तरस का उल्लेख व्यंग्य के रूप में 'भगवान् वासुदेव एव कर्तृतमेष्ट सनातनः' इन शब्दों के द्वारा किया है। इन शब्दों की सङ्ज्ञति हमें इस लौकिक प्रसिद्धि के आधार पर ही लगानी चाहिए कि अत्यन्त अभिमत बात व्यंग्य के द्वारा कही जाती है वाक्य के द्वारा नहीं। सारांश यह है कि यह प्रसिद्धि अनादि है और इस प्रसिद्धि का ज्ञान भगवान् व्यास को भी था। इसीलिये उन्होंने अपना मुख्य प्रयोजन कहने के लिए व्यंजना वृत्ति का ही आश्रय लिया। यदि ऐसा न माना जाय कि भगवान् व्यास ने लौकिक प्रसिद्धि का अनुसरण किया था तो फिर महाभारत का कोई अर्थ ही नहीं होगा। कौन सी किया है? उसका कर्ता कौन है? कर्त्ता में कौन सी विभक्ति होती है? उत्तम पुरूष की क्रिया अथवा कर्ता कौन होते हैं? इत्यादि प्रश्नों का उत्तर भी लोकप्रसिद्धि के आधार पर ही दिया जा सकता है। इसी प्रकार शब्दों के अर्थ का निर्णय भी लोकप्रसिद्धि के आधार पर ही होता है। 'नारायण नमस्कृत्य' में नारायण का अर्थ विष्णु और नमः का अर्थ प्रणति है इसका भी निर्णय लोकप्रसिद्धि से ही होता है। यदि लोकप्रसिद्धि को न माना जाय तो महाभारत के किसी भी पद्य का कोई अर्थ ही न लगाया जा सकेगा। लोकप्रसिद्धि का आधार स्वीकार कर लेने पर यह भी मानना ही होगा कि महाभारत के मुख्य मन्तव्य का निर्णय भी लोकप्रसिद्धि के आधार पर ही हो और इस आधार पर निर्णय करने से यही सिद्ध होता है कि महाभारत में मोक्ष परम पुरुषार्थ माना गया है और उसका अद्धीरस शान्त है।
(ध्वन्यालोके) तस्मादिस्थतमन्तत्वं---भाझी मूतरसाधारेण काव्ये कियमाणे नवार्थलाभो भवति बन्धच्छाया च महती सम्पद्यते इति। अत एव च रसानुगुणार्थ-
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चतुर्थ
उद्योतः
विशेषोपनिबन्धनमलङ्कारान्तर विरहे ऽपि छायातिशययोगिनि लक्ष्ये हृश्यते । यथा-मुनिर्जयति योगीन्द्रों महात्मा कुम्भसम्भवः । येनैकचुलुके हस्त्रो तौ दिव्यौ मत्स्यकच्छपौ ॥ इत्यादो ।
अत्र ह्याद्दुतरसाऽनुगुणमेकचुलुके मत्स्यकच्छपदर्शनं छायातिशयं पुष्टयति । तत्र ह्येकचुलुके सकलजलनिधिसन्निधानादपि विदय्यमत्स्यकच्छपदर्शनसङ्कुणत्वादभुतरसानुगुणतरम् । क्षुण्णं हि वस्तु लोकप्रसिद्धश्राद्भुतमपि नाश्चर्यकारि भवति । (अनु०) इससे यह स्थित हुआ—अद्भुतरस इत्यादि के आश्रय से काव्य किये जाने पर नवीन अर्थी का लाभ होता है और बन्धच्छाया भी बहुत अधिक हो जाती है यह । अत एव दूसरे अलङ्कार के अभाव में भी रसानुकूल अर्थविशेष का उपनिबन्धन लक्ष्य में छाया की अतिशयता से युक्त होते हुए देखा जाता है । जैसे— 'कुम्भ-सम्भव महात्मा योगीन्द्र मुनि की जय हो जिन्होंने एक चुल्लू में उन दो दिव्य मत्स्य और कच्छप को देखा ।' इत्यादि में । यहाँ पर अद्भुत रस के अनुकूल एक चुल्लू में महासागर-कच्छप का दर्शन छायातिशय को पुष्ट करता है । वहाँ पर निस्सन्देह एक चुल्लू में समस्त महासागरों के सन्निधान से भी दिव्य मत्स्य-कच्छप का दर्शन अनभ्यस्त होने के कारण अद्भुत रस के अधिक अनुकूल है । निस्सन्देह अभ्यस्त वस्तु अभ्युत होते हुए भी लोकप्रसिद्धि के कारण आश्चर्य कारक नहीं होती ।
(लो०) 'रसादिमय एतस्मिन् कविः स्यादवधानवान्' इति यदुक्तं तदेव प्रसड्गात भारतसम्बन्धनिरूपणानन्तरमुपसंहरति-तस्मैतिस्थितमिति । अथ इति । यत एवं अवेदमपि यल्लक्ष्ये दृश्यते तदुपपन्नमन्यथा तदनुपपन्नमेव, न च तदनुपन्नं, चारुत्वेन प्रतीते इति तस्याश्चेतदेव कारणं रसानुगुणार्थंत्वमेवेत्याशयः । अलङ्कारान्तर इति ।
(लो०) 'इस रसादिमय में कवि सावधान रहे' यह जो कहा गया था, उसी का प्रसंगास भारतसम्बन्ध के निरूपण के बाद उपसंहार करते हैं—'इसलिये यह स्थित है' यह । 'अतः यह । क्योंकि ऐसी स्थिति है इसीलिये यह भी जो लक्ष्य में देखा जाता है वह उपपन्न है अन्यथा वह अनुपपन्न ही हो, वह अनुपपन्न नहीं ही है क्योंकि उसकी प्रतीति चाहता के रूप में होती है । आशय यह है कि उसका कारण यही है कि उसकी रसानुगुणार्थता ही है ।
अन्तरशब्दो विशेषवाची । यदि वा दित्सिते उदाहरणे रसवदलङ्कारस्य विद्यमानत्वादपेक्ष्यालङ्कारान्तरशब्दः । ननु मत्स्यकच्छपदर्शनात्प्रतीममानं यदेकचुलुके जलनिधिसन्निधानं ततो मुनेःमहात्म्यप्रतिपत्तिरिति न रसानुगुणेनार्थेन छायापोषितेत्याशङ्कयाह—अत्र हि इति ।
अन्तरशब्द विशेषवाची है। अथवा इष्ट उदाहरण में रसवदलङ्कार के विद्यमान होने से अलङ्कारान्तर शब्द अपेक्ष्य है। शङ्का—एक चुल्लू में जलनिधि के सन्निधान का जो मत्स्यकच्छपदर्शन से प्रतीत होता है उससे मुनि के महात्म्य की प्रतिपत्ति होती है, रसानुगुण अर्थ से छाया का पोषण नहीं होता—इस शङ्का का समाधान करते हैं—'अत्र हि' इत्यादि । पुनः पुनर्वर्णन निरूपणादि से जो प्रष्टष्ट स्वादितिर्निभन्न स्वरूप है वह इसका अर्थ है ।
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'अलङ्कारान्तर' यह ।
अन्तर शब्द विशेष अर्थ का वाचक है । अथवा दिये जाने के लिये अभीष्ट उदाहरण में रसवत् अलङ्कार के विद्यमान होने से उसकी अपेक्षा से अलङ्कारान्तर शब्द का प्रयोग किया गया है । (प्रश्न) मत्स्य और कच्छप के दर्शन से प्रतीत होनेवाला जो एक चुल्लू में समुद्र का सन्निधान उससे मुनि के महात्म्य की प्रतीपत्ति होती है अतः रसानुगुण अर्थ से छाया पोषित नहीं हुई है यह शङ्का करके कहते हैं—'यहाँ निस्सन्देह' यह । (प्रश्न) इस प्रकार प्रतीत होने वाला जलनिधिदर्शन ही अतदुतरस के अनुपुण है, इस प्रकार रसानुगुण यहाँ पर वाच्यार्थ है इस अंश में यह उदाहरण कैसे हो सकता है ? यह शङ्का करके कहते हैं—'वहाँ पर' यह । 'निस्सन्देह स्फुटम्' यह । अर्थात् पुनः पुनः वर्णन और निरूपण इत्यादि के द्वारा जो अत्यधिक पिष्ट होने से अत्यन्त निर्भिन्न स्वरूपवाला हो गया है ।
अज्जीरस के विवेचन की आवश्यकता
तारावती—यहाँ पर इस बात का विचार किया जा रहा था कि यद्यपि अनेक प्रकार के व्यंग्य-व्यञ्जक भाव सम्भव है तथापि कवि को एकमात्र रसादिमय व्यंग्य-व्यञ्जक भाव के प्रति ही जागरूक रहना चाहिये । इसी प्रसङ्ग में महाभारत के अज्जीरस का प्रश्न आ गया और उस पर भी विस्तारपूर्वक विचार कर लिया गया । किन्तु यह प्रासङ्गिक ही था मुख्य विषय नहीं । मुख्य विषय तो यहाँ पर यहाँ चल रहा है कि यदि काव्य की रचना इस प्रकार की जाती है कि एक अज्जीरस मान लिया जाय और समस्त कथानक में सभी अवान्तर रस उसी परिवेश में प्रतिष्ठित किये जायँ तो रचना सुसम्बद्ध हो जाती है और उसमें एक बड़ी वनच্ছाया सम्पन्न हो जाती है । यह बात यहाँ पर ठीक रूप में सिद्ध हो गई और उपर्युक्त विवेचन से यही निष्कर्ष भी निकल आया । जब हम इस सिद्धान्त को मान लेते हैं तब जो कुछ लक्षणग्रन्थों में देखा जाता है वह भी तर्क-सङ्घत् सिद्ध हो जाता है । यदि हम इसे न मानें तो लक्षणग्रन्थों में देखी हुई बात भी असङ्घत हो जायेगी । किन्तु वास्तविकता यह है कि लक्षणग्रन्थों में देखी हुई बात असङ्ङत होती नहीं । क्योंकि लक्षणग्रन्थों में देखा जाता है कि कवि किसी एक प्रधान रस के परिवेष में ही समस्त काव्य को गुम्फित कर देता है और ऐसा करने से उसके काव्य में चारुता भी आ जाती है । अतः एक रस के परिवेश में सम्पूर्ण काव्य को आबद्ध कर देना असङ्ङत नहीं कहा जा सकता । इस सिद्धान्त को स्वीकार करना ही पड़ेगा ।
रसप्रवण रचना में अलङ्कार के अभाव में भी काव्यत्व
यहाँ कारण है कि अलङ्कार ही काव्य की शोभा के आधार नहीं हैं । यहाँ पर अन्तर शब्द का अर्थ है विशेष । अतः इस वाक्य का आशय यह हो जाता है कि काव्यसौन्दर्य का सम्पादन करने वाला सबसे बड़ा तत्व रस ही है । यदि किसी काव्य में कोई विशेष अलङ्कार न भी हो तब भी यदि वस्तु की योजना रस की दृष्टि से कर दी जाय तो काव्य-सौन्दर्य का सम्पादन हो जाता है । अथवा यहाँ पर 'दूसरा' यह अर्थ भी किया जा सकता है । उस दशा में इस वाक्य की योजना अप्रीम उदाहरण 'मुनिर्ययौ मत्स्यकच्छपो' की दृष्टि से करनी होगी । इस दशा में इस वाक्य का आशय यह होगा कि प्रस्तुत पद्य का प्रतिपाद्य मुनिविषयक
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चतुर्थ
उद्योत:
रतिभाव है। मत्स्य-कच्छप का एक चुल्लू में दर्शन अद्भुतरस के अनुपुण होने से अद्भुतरस की निष्पत्ति कर देता है। यह अद्भुतरस प्रधान प्रतिपाद्य मुनिविषयक रतिभाव का अङ्ग होकर रसवद् अलङ्कार हो जाता है। इस प्रकार यहां पर एक तो अलङ्कार विद्यमान ही है। अत एव किसी दूसरे अलङ्कार के न होने पर भी वस्तु की रसप्रबन्ध योजना से ही छाया की अधिकता सम्पन्न हो गयी है। उदाहरण के आशय इसे प्रकार है।
'कुम्भ से उत्पन्न योगिराज महात्मा अगस्त्य की जय हो जिन्होंने उन प्रसिद्ध तथा विचित्र प्रकार के मत्स्य और कच्छप को एक ही अंजलि में देखा।'
चतुर्थ
उद्योत:
भगवान् ने प्रलयकाल में मत्स्यावतार लिया था और समुद्रमन्थन के अवसर पर कच्छपावतार। ये दोनों भगवान् के अवतार प्रसिद्ध हैं। 'तौ' इस सर्वनाम से अभिव्यक्त होता है कि वे मत्स्य और कच्छप असाधारण थे तथा उनको सब कोई जानता है। इसी असाधारणता (लोकातिक्रान्तता) को 'दिव्य' शब्द पुष्ट करता है। ये दोनों अवतार महासागर में ही निवास करते हैं। जब महर्षि अगस्त्य ने समस्त महासागर को एक ही चुल्लू में पी जाना चाहा तो दिव्य मत्स्य और कच्छप भी उनके चुल्लू में आ गये। यह महामुनि अगस्त्य की लोकोत्तर शक्ति का निर्देश है। यहां पर तिमि नाम की मछली का भी अर्थ लिया जा सकता है। एक ही चुल्लू में उस प्रकार के अनिर्वचनीय मत्स्य और कच्छप का दर्शन विस्मयाधिक्य का उत्पादक है और इस प्रकार अद्भुत रसास्वादन का प्रवर्तक है। काव्य की सुषमा का आधार यह अद्भुत रसास्वादन ही है।
यहां पर एक प्रश्न यह किया जा सकता है कि छाया की पुष्टि तो मुनि के माहात्म्य से होती है। एक चुल्लू में मत्स्य और कच्छप को देखने से जलधि-पान अभिव्यक्त होता है और उससे मुनि के माहात्म्य की प्रतीति होती है। यह मुनि का माहात्म्य ही काव्य सौन्दर्य में पर्यवसित होता है। फिर यह कैसे कहा गया कि एक चुल्लू में मत्स्य और कच्छप को देखना एक ऐसा वाच्यार्थ है जो अद्भुत रस के अनुत्पत्तिप्रद होता है। उस वाच्यार्थ में ही छाया की अधिकता का पर्यवसान होता है। इसका उत्तर यह है कि यद्यपि मुख्यरूप में प्रतीति मुनिविषयक रति की ही होती है। किन्तु उस रति में सौन्दर्य का आधन करने वाली तो यह उक्ति ही है। अत एव यह उक्ति ही चमत्कारपर्यवसायिनी है। (प्रश्न) यहां पर मत्स्यकच्छप दर्शन रूप वाच्यार्थ चुल्लू में समुद्र को भर लेने का अभिव्यञ्जक है। यह व्यङ्ग्यार्थ ही अद्भुत रस के अनुप्राण माना जाना चाहिये। यह कहनें कैसे ठीक हो सकत है कि यहां पर उक्त वाच्यार्थ ही सौन्दर्य का पोषक है? (उत्तर) सामान्तया नियम यह है कि जब किसी वस्तु का बार-बार वर्णन कर दिया जाता है और उसका निरूपण भी पर्याप्त मात्रा में हो चुकता है तब वह वस्तु भलीभांति पिस जाती है और लोगों के सामने बार-बार आने से लोग उससे परिचित हो जाते हैं। वह वस्तु कितनी ही अद्भुत क्यों न हो किन्तु लोकप्रसिद्धि के कारण फिर वह वस्तु लोगों के हृदयों में आश्चर्य उत्पन्न नहीं करती। (जैसे कितना आश्चर्य जनक है कि विज्ञान के प्रभाव से सैकड़ों मील की दूरी पर बैठे हुए दो व्यक्ति ऐसे ही बातें करते हैं मानों एक कमरे में बैठे हों। किन्तु टेलिफोन इतना सामान्य हो गया है
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ध्वन्यालोके
कि आज उसे देखकर लोगों को आश्चर्य नहीं होता है ।) इसके प्रतिकूल जो वस्तु अनेकशः परिशीलन के माध्यम से पूर्ण रूप से पिस नहीं जाती वह जब नये-नये रूप में सामने आती है तब उससे विस्मय की भावना उद्भूत हो जाती है । अगस्य का समुद्रपान इतना शुण्ठ हो चुका है कि अब पाठकों के सामने उसे प्रस्तुत करने में उन्हें आश्चर्य नहीं होता । किन्तु एक अंजलि में भगवान् के विशाल दो अवतारों का दर्शन वस्तुतः पाठकों के लिये नवीन कल्पना है । अतः एतद्वस्तु में अद्भुतरस की आधिक्य करने की अधिक क्षमता है । अधिक कहने का आशय यह है कि समुद्रपान में भी कुञ्ज न कुञ्ज तो आश्चर्य हो ही जाता है । यहाँ पर कोई विशेष अलंकार नहीं है, फिर भी वस्तु की योजना ही इतने सुन्दर ढंग से कर दी गई है कि उसमें अन्तर्रसानुगुणता आ जाती है । (यहाँ पर रचयिता ने भाविक अलङ्कार का होना बतलाया है । किन्तु भाविक अलङ्कार वहीं पर होता है जहाँ भूत और भविष्य के अर्थों का वर्तमान में प्रत्यक्षीकरण दिखलाया जाय । किन्तु यहाँ पर भूतकाल में ही प्रत्यक्षीकरण दिखलाया गया है, अतः भाविक अलङ्कार यहाँ पर नहीं हो सकता ।)
(ध्वन्या०) न चाक्षुणं वस्तूपनिबध्यमानमद्भुतरसस्यैवानुगुणं यावद्रसान्त-
रस्यापि । तद्यथा-
सिज्झइ रमणिज्जइ वेइइ रस्सातुल्लइ पोडइमग्गा ।
सोणासो अज्ज वि सुहअ जेणासि वोलीणो ।।
एतद्गाथार्थाद्रव्यमात्राच्चा रसप्रतीतिरभवत्, सा त्वां स्पष्टत्वा स्विद्यति रोमाञ्चते वेपते इत्येवं विधार्थादपि तन्मानमनुरागपि नो जायते ।
(अनु०) उपनिबद्ध किये जाने पर अक्षुण्ण वस्तु अद्भुत रस की ही अनुरूपता नहीं होती अपितु दूसरे रस की भी अनुरूपता होती है । वह इस प्रकार है—
'हे सुभग ! उस (नायिका) के जिस पार्श्व से रथ्या में सयोगवश तुम लग गये थे उसका वह पार्श्व आज भी पसीजता है, रोमाञ्चित होता है और काँपता है ।'
'वह तुम्हें स्पर्श कर पसीजती है, रोमाञ्चित होती है और काँपती है' इस प्रकार के प्रतीत-मान अर्थ से बिल्कुल नहीं होता ।
(लो०) बहुत्तरलक्ष्यव्यापकं चेतदिति दर्शयति-न चेष्टादिना । रथ्यायां तुलाग्रेण काकतालोयेन प्रतिलग्नः साम्मुख्येन स पार्श्वोऽपि सुभग तस्याः रसप्रतीतिरिति । परस्परहेतुकशृङ्गारप्रतीतिः अस्यार्थस्य रसानुगुणत्वं व्यतिरेक-द्वारेण दृढयति—सा त्वामित्यादिना ।
(अनु०) और यह बहुत से लक्ष्यों में व्यापक है यह दिखलाते है—'और नहीं' इत्यादि के द्वारा । रथ्या में तुलाग्र से अर्थात् काकतालीय से प्रतिलग्न वह (नायिका) मुख्यरूप से वह उसका पार्श्व आज भी है सुभग जिसने अतिक्रान्त हो गये हो । 'रस प्रतीति' यह । परस्पर-
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चतुर्थ
उद्योतः
हेतुक शृङ्गार की प्रतीति । इस अर्थ का रसानुगुणत्व व्यतिरेक के द्वारा ढूँढ करते हैं—‘बह तुम्हें’ इत्यादि के द्वारा ।
अक्षुण्ण रचना से रस की पुष्टि ।
चतुर्थ
उद्योतः
तारावती—ऊपर कहा गया है कि जो बात लोक में भलोभांति मँज जाती है और सर्वसाधारण में प्रचलित हो जाती है वह बात आश्रयजनक नहीं होती, किंतु जिस बात की पूर्ण प्रतिष्ठा लोक में नहीं हो चुकी होती है वही आश्रयजनक तथा अद्भुतरसप्रयोजक होती है । यहाँ पर यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अक्षुण्ण वस्तु केवल अद्भुत रस की ही प्रयोजक नहीं होती अपितु उससे अन्य रसों की भी पुष्टि होती है । उदाहरण के लिये देखिए अक्षुण्ण (नवीन) वस्तु से शृङ्गार रस की किस प्रकार पुष्टि होती है—
चतुर्थ
उद्योतः
नायिका की कोई दूती नायक से नायिका के प्रणय का निवेदन करते हुए कह रही है—
चतुर्थ
उद्योतः
स्वदयति रोमाञ्चति वेपते रथ्यातुलालापप्रतिलग्नः । स पार्श्वव्योऽपि सुभग तस्या येनास्यतितिकान्तः ॥ (छाया)
'उस दिन जब तुम उस गली से निकल रहे थे नायिका भी उधर से आ गई । न तुमने उससे टकराने का प्रयत्न किया और न उसने ही । किंतु संयोगवश उसका एक पार्श्व तुम्हारे शरीर से टकरा गया । तुम सौभाग्यशाली हो कि उसी दिन से उसका वही पार्श्व निरंतर सात्विक भावों से सारा रहता है, कभी रोमांचित हो जाता है, कभी काँपने लगता है ।
चतुर्थ
उद्योतः
यहाँ पर नायक और नायिका का उभयनिष्ठ प्रेम है, नायक सौभाग्यशाली है और नायिका अनेक सात्विकों से ओत-प्रोत है । इस शृङ्गार के आस्वादन कराने के लिये जिस वस्तु का उपादान किया गया है वह सर्वथा नवीन है । सँकरी गली में सांयोगिक स्पर्शं और उससे केवल उसी पार्श्व का निरंतर पसीजना इत्यादि न तो कवियों का सामान्य विषय है और न लौकिक घटना में ही प्रायः देखा जाता है । इसमें एक नवीनता है जिससे इसमें रसास्वादन कराने की विशेष क्षमता उत्पन्न हो गई है ।
चतुर्थ
उद्योतः
यदि इसके स्थान पर यह कहा गया होता कि 'बह तुम्हें देखकर पसीने से युक्त हो जाती है, रोमांचित हो जाती है और काँपने लगती है' तो उससे प्रतीमात्र रति उसका अंश-मात्र भी आस्वादन प्रदान न कर सकती जितना गाथा में बतलाये हुए तथ्य से हो जाता है ।
चतुर्थ
उद्योतः
(ध्वन्य०) तदेवं ध्वनिप्रबन्धसमाश्रयेण यथा काव्यार्थानां नवत्वं जायते तथा प्रतिपादितम् । गुणीभूतव्यङ्गचस्यापि त्रिभेदय्यत्नापेक्षया ये प्रकारास्तत्तस्समाश्रयणापि काव्यवस्तूनां नवत्वं भवत्येव । तत्वतिविस्तारकारीत नोदाहृतं, सहृदयैः स्वयमुपलक्षणीयम् ।
(अनु०) वह इस प्रकार ध्वनि के भेदोपभेदों का आश्रय लेने से भी जिस प्रकार काव्यार्थों की नवीनता उत्पन्न हो जाती है वैसा प्रतिपादित कर दिया गया । गुणीभूतव्यङ्गच के भी तीन भेदों वाले व्यत्न की दृष्टि से जो प्रकार होते हैं उनका आश्रय लेने से भी
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काव्यवस्तुओं की नवीनता हो ही जाती है। वह तो अत्यन्त विस्तार देने वाला है। इसलिये उसके उदाहरण नहों किये गये सहृदयों के द्वारा स्वयं समझ लिये जाने चाहिये।
(लो०) 'ध्वनेरप्यःसगुणीभूतवच्यस्याध्वा प्रदर्शितः।'
इत्युदारस्मे यः इलोकः तत्न ध्वनेरध्वना कवीनां प्रतिभागुणोडनन्तो भवतीत्येष भागो व्याख्यात इत्युपसंहरति—तदेवमित्यादिना। सगुणीभूतवच्यस्येत्यमुं भागं व्याचष्टे—गुणीभाव इति। त्रिप्रभेदो हि वस्त्वलङ्काररसात्मकतामनुगो व्यङ्ग्य-स्तस्य यापेक्षा वाच्ये गुणीभावः तयेय्यर्थः। तत्र सर्वे ये ध्वनिप्रभेदास्तेषां गुणीभाव- दानन्यमिति तदाह—अतिविस्तरेण। स्वयमिति। तत्र वस्तुना व्यङ्ग्येन गुणीभूतैः नवतंव सत्यपि पुराणार्थस्पर्शो यथा ममेव—
भण विहल रखूखणेकमल्ल सरणागआण अस्थाण । खणमत्तं विण दिण्णा विस्समकहेत्ति जत्तमिणम् ।।
अत्र त्वमनवरतमर्थस्यास्यजसोती औदार्यलक्षणं वस्तु ध्वन्यमानं वाच्यस्योपस्का- रकं नवतंव ददाति, सत्यपि पुराणकविस्पृष्टेडर्थे। तथा हि पुराणी गाथा—
चाइअणकारपरम्परासच्चारणखे अणिस्सहसरोरा । अह्था किणघरहस्थ्या सध्याबध्यास्ववंतो ।।
अलङ्कारेण व्यङ्ग्योपस्कारि नवतंव यथा ममेव— वसन्तमत्तालिपरम्परोपमा: कचासतवासनं किल रागवृद्धये । इमशानभूगपरागभासुरा: कथन्तदतेते न मनागिवरकये ।। अत्र ह्याक्षेपेण विभावनया च ध्वन्यमानाभ्यां वाच्यमुपस्कृतमिति नवतंव सत्यपि पुराणार्थयोयोगित्वे। तथा हि पुराणश्लोक:—
क्षुतृष्णाकाममात्सय्यं मरणाच्च महद्भयम् । पञ्चैतानी विरन्धन्ते वार्धके विदुषामपि ।। इति ।
व्यङ्ग्येन रसेण गुणीभूतैवाच्योपस्कारेण नवतंव यथा ममेव— जरा तेयं मूर्धिन ध्रुवमयमसी कालभुजगः, कथान्धः फत्कारैः स्फुटगरलफेनान् प्रकिरति । तदेनं संस्पश्यतयथ च सुखिततमनन्यहृदयः शिवोपायं नेच्छन्नु बत सुधीः: खलु जनः ।।
अत्राद्भुतैः व्यङ्ग्येन वाच्यमुपस्कृतं शान्तरसप्रतिपत्त्यङ्गत्वाच्चारु भवतीति न नवतंव सत्यप्यस्मिन्न् पुराणश्लोके— जराजीर्णशरीरस्य वैराग्यं यन्न जायते । तन्नूनं हृदये मृत्युर्नास्तीति निश्चयः: ।।
(अनु०) 'गुणीभूतव्यङ्ग के साथ ध्वनि का जो भाग दिखलाया गया है। यह जो उद्योतारम्मे श्लोक था उसमें ध्वनि के मार्ग से कवियों का प्रतिभागुण अनन्त हो जाता है इस भाग की व्याख्या कर दी गई यह उपसंहार करते हैं—‘वह इस प्रकार’ इत्यादि के द्वारा।
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चतुर्थ
उद्योतः
'सगुणीभूतव्यङ्ग्य का' इस भाग की व्याख्या करते हैं—गुणीभूत इत्यादि के द्वारा। अर्थात् तीन उपभेदों वाला निस्सन्देह वस्तु रस और अलंकार की आत्मा से युक्त जो व्यङ्ग्य उसकी अपेक्षा अर्थात् वाच्य में गुणीभाव उसके द्वारा। वहाँ पर ध्वनि के जो सब उपभेद उसके गुणीभाव से आननस्य हो जाता है वह कहते हैं—'अतिविस्तार' यह। 'स्वयम्' यह। उसमें गुणीभूतव्यङ्ग्य वस्तु के द्वारा नवीनता पुराने अर्थ के स्पर्श होते हुए भी जैसे मेरा ही पद्य—
चतुर्थ
उद्योतः
'भय से व्याकुल शरणागतों की रक्षा करने में अद्वितोय योद्धा (हे राजन्) शरणागत धनों को क्षणमात्र भी विश्राम की बात ही न करने दी, यह ठीक था क्या?' यहाँ पर तुम निरन्तर धनों का त्याग करते हो यह औदार्यलक्षण वाली वस्तु ध्वनित होते हुये वाच्य की उपस्कारक नवीनता को दे देता है। यद्यपि पुराने कवि का स्पर्श किया हुआ अर्थ विद्वान् है। वह इस प्रकार पुरानी गाथा है—
चतुर्थ
उद्योतः
'त्यागी लोगों के हाथों की परस्परा में सञ्चारण के खेद को अपने शरीर पर न सह सकने वाले धन, कृपणों के घरों में स्थित होकर मानों स्वस्थ अवस्था में सो रहे हैं।' व्यङ्ग्य अलंकार से वाच्योपस्कार में नवत्व जैसे मेरा ही—
चतुर्थ
उद्योतः
'वसन्त काल के मद भौंरों की परम्परा की उपमावाले तुम्हारे जैसे निस्सन्देह रोग को बढ़ाने वाले थे। इमशान भाग की पराग के समान भासुर वर्ण के ये कुछ भी विरक्त करने वाले नहीं हैं, यह क्या बात है?' यहाँ ध्वनित होने वाले आक्षेप और विभावना से वाच्य उपस्कृत हुआ है जिससे नवीनता आ गई है यद्यपि पुरानी गाथा विद्वमान थी। वह इस प्रकार पुरानी गाथा है—
चतुर्थ
उद्योतः
'भूख, प्यास, कामवासना, मात्सर्य और मरण ये ५ महान् भय वृद्धावस्था में विद्वानों के अन्दर भी बढ़ जाते हैं।' गुनीभूतव्यङ्ग्य रस से वाच्योपस्कार के द्वारा नवत्व जैसे मेरा ही—
चतुर्थ
उद्योतः
'यह बुढ़ापा नहीं है। अपितु कालरूपी क्रोधान्ध होकर सिर पर निस्सन्देह फूत्कारों के द्वारा स्पष्ट रूप में विष के भाग को छोड़ रहा है। उसको देखता है अपने को सुखी हृदयवाला समभता है, कल्याणकारक उपाय की इच्छा नहीं करता। आश्चर्य है कि व्यक्तित कितना घोर है?'
चतुर्थ
उद्योतः
यहाँ पर व्यङ्ग्य अद्भुत से उपस्कृत वाच्य शान्त रस की प्रतिपत्ति का अङ्कु होने से सुन्दर हो जाता है इससे नवीनता आ जाती है यद्यपि पुराना श्लोक विद्वमान है :—
चतुर्थ
उद्योतः
'जराजीर्ण शरीर वाले व्यक्ति के अन्दर जो वैराग्य नहीं उत्पन्न होता है उससे उसके हृदय में यह दृढ़ निश्चय है कि मृत्यु निश्चित रूप से है ही नहीं।।५।।
चतुर्थ
उद्योतः
५
गुणीभूतव्यङ्ग्य से प्रतिभा की अननन्तता और नवीनता तारावती—चतुर्थ उद्योत के प्रारम्भ में कहा गया था कि ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य के मार्ग का अवलम्बन करने से कवियों का प्रतिभागुण अनन्त हो जाता है। ऊपर यह बताया दिया गया कि ध्वनि-मार्ग के आश्रय से प्रतिभागुण में अनन्तता किस प्रकार आती है। अब यह विचार करना शेष रह गया है कि गुणीभूतव्यङ्ग्य का आश्रय लेने से प्रतिभागुण में अनन्तता
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किस प्रकार आती है। गुणीभूतव्यङ्गघ भी तीन प्रकार का होता है—वस्तु, अलङ्कार और रस। यदि गुणीभूतव्यङ्गघ वस्तु इत्यादि का भी आधार लिया जाय तो भी पुराना अर्थ नया या मालूम पड़ने लगता है। गुणीभूतव्यङ्गघ का विस्तार अनन्त है। एक तो जितने भी ध्वनिभेद होते हैं वे सब गुणीभूत हो जाते हैं। ध्वनिभेद स्वयं ही अनन्त है। अतः गुणीभूतव्यङ्गघ्यों का अनन्त हो जाना भी स्वाभाविक ही है। दूसरी बात यह है कि अलङ्कार भी अनन्त होते हैं जिनमें प्रायः गुणीभूतव्यङ्गघ का ही आधार पाया जाता है। अतः वस्तिकार ने गुणीभूतव्यङ्गघ के द्वारा काव्यार्थ में नवीनता लाने के उदाहरण नहीं दिये हैं। उन्होंने उदाहरणों का अंशेषणा पाठकों पर ही छोड़ दिया है। किन्तु अभिनवगुप्त ने दिग्दर्शन कराने के लिये वस्तु, अलङ्कार और रस इन तीन गुणीभूतव्यङ्गघ्यों से काव्य में नवीनता लाने का एक-एक उदाहरण दे दिय
1
भयविल्लोलरक्षणैकमल्लशरणागतानामर्थानाम् । क्षणमात्रमपि न दत्ता विश्रामाक्षयेतियुक्तमिदम् ॥
है इसका उदाहरण स्वयं अभिनवगुप्त की बनाई हुई एक गाथा है। गाथा की संस्कृत छाया इस प्रकार है— कोई कवि राजा की दानशीलता की प्रशंसा करते हुये कह रहा है :—हे राजन् ! जो लोग भय से व्याकुल होते हैं उनकी रक्षा करने में जितना शौर्य आपके अन्दर है उतना और किसी में नहीं पाया जाता। धन भी आपकी शरण में आये। किन्तु उन धनों को आपने एक क्षण भी अपने यहां विश्राम नहीं करने दिया। क्या ऐसा करना आपकी शरणागतरक्षणतत्परता के अनुकूल था। यहां पर यह ध्वनिजना निकलती है कि हे राजन् ! आप बड़े ही दानशील हैं और शरणागतों की रक्षा में तत्पर रहते हैं। यह व्यङ्गघार्थ काव्य की अपेक्षा सुन्दर भी है और उसका उपकारक भी। अत एव यह गुणीभूतव्यङ्गघ है। इस पद्य का आश्रय एक दूसरी गाथा से लिया गया है जिसकी छाया इस प्रकार है :—
त्याज्यो जनः परम्परासङ्कटशरणखेददैन्यासहश्वार्तः । अर्थी कृपणगृहस्थः स्वस्थावस्था स्वपन्तीव ॥
अर्थी: कृपणगृहस्थ: स्वस्थावस्था: स्वपन्तीव ॥ धन दानी लोगों के हाथों में निरय प्रति घूमते ही रहते हैं, एक हाथ में आते हैं और दूसरे में चले जाते हैं, कभी रुकते ही नहीं। इस भ्रमणलीला में वे इतने थक जाते हैं कि और अधिक भ्रमण करने की शक्ति ही उनमें नहीं रहती। मानो इसीलिये कृपणों के घरों में पहुंचकर वे धन स्वस्थ अवस्था को प्राप्त होकर आराम से सोते हैं। बात वही है। किन्तु अभिनवगुप्त ने अपने पद्य में ऐसी व्यङ्गघ वस्तु का आश्रय ले लिया है जो गुणीभूत हो गई है। इस प्रकार गुणीभूतव्यङ्गघ वस्तु का आश्रय लेने से पुराने अर्थ में नवीनता आ जाती है।
2
( २ ) यदि अलङ्कार व्यङ्गघ हो और वह गुणीभूत हो जाय तो उसका आश्रय ले
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चतुर्थ
उद्योतः
लेने से भी पुरानी वस्तु में नवीनता आ जाती है। इसका उदाहरण भी अभिनवगुप्त का पद्य ही है :
किसी व्यक्ति को वृद्धावस्था में वासनायें पीड़ित कर रही हैं। उसका कोई ज्ञानी मित्र उससे कह रहा है :— ‘तुम्हारे यौवन-काल में तुम्हारे बाल इतने काले थे और ऐसे मालूम पड़ रहे थे मानो वसन्तकाल के मतवाले भौंरे पंकित बनाकर उड़ रहे हों उसे समय तुम्हारे यौवन ने तुम्हारे अन्दर काम-वासना को खूब बढ़ाया। अब तुम्हारे ये बाल इतने सफेद हो गये हैं कि मालूम पड़ता है मानो इश्कानभूमि पर पड़ी हुई सफेद चिताभस्म हो। इन सफेद बालों से तो तुम्हारे अन्दर विराग होना ही चाहिये किन्तु क्या बात है कि ये बाल तुम्हारे अन्दर विराग को जागृत नहीं करते ।’ इस गाथा की रचना में भी एक पुराने पद्य का आश्रय ग्रहण किया गया है— ‘चाहे कोई कितना ही विद्वान् और ज्ञानवान क्यों न हो किन्तु जब उसकी वृद्धावस्था आ जाती है तो उसके अन्दर ये पांच बातें बढ़ ही जाती हैं—शूथ, व्यास, काम-वासना, दूसरों से ईर्ष्या-डाह और मरने से बहुत अधिक भय ।’ आश्रय दोनों पद्यों का एक ही है। किन्तु इस पुराने पद्य का आश्रय लेते हुये भी अभिनवगुप्त ने इसमें कुछ नवीनता पैदा कर दी है। अभिनवगुप्त के पद्य में दो अलङ्कार ध्वनित होते हैं—( क ) ‘मृत्यु के निकट पहुंचकर तो तुम्हारे अन्दर विराग होना ही चाहिये; किन्तु अधिक हम तुमसे क्या कहें? हमारा तुमसे कुछ अधिक कहना ठीक नहीं है ।’ यह उत्त- विषयक आक्षेप अलङ्कार है क्योंकि इसमें कही हुई बात का निषेध कर दिया गया है। अथवा ‘अब तुम्हारी मृत्यु निकट आ रही है’ इस न कही हुई बात के कहने का निषेध व्यंग्य है जिससे यह अनुकविषयक आक्षेप है। विराग की भावना को तीव्र करना ही विशेष अभिधेय है। ( ख ) कामवासना का कारण विद्यमान नहीं है फिर भी कामोत्तत्ति रूप कार्य हो रहा है। यह विभावना है। ये दोनों व्यङ्गच अलङ्कार वाच्य का संन्देह ही बढ़ाते हैं। अतः ये गुणीभूत हो गये हैं। इस प्रकार यहां पर गुणीभूतव्यङ्गच अलङ्कार का आश्रय ही पुराने भाव में नवीनता उत्पन्न करने वाला है।
चतुर्थ
उद्योतः
३
रस गुणीभूतव्यंग्य होकर जब वाच्य को उपस्कृत करता है तब भी पुराने अर्थ में नवीनता आ जाती है। इसका भी उदाहरण अभिनवगुप्त का बनाया हुआ एक पद्य ही है, जिस पद्य का आश्रय इस प्रकार है—
'लोगों के सिर के सफेद बाल बुढ़ापा नहीं है किन्तु निस्सन्देह यह काल रूपी सर्प क्रोध में अन्धा हो गया है और बार-बार फुफकारता है जिससे तुम्हारे सिर पर विष का प्रभाव छूट रहा है और वह स्पष्टरूप में सफेद बालों के रूप में झलक रहा है, इसको लोग देखते हैं और फिर भी उनका हृदय अपने को सुखी ही समझता है। लोग इस बात की चेष्टा नहीं करते कि कल्याणकारक उपाय का सहारा लें। निस्सन्देह लोगों में आश्चर्यजनक धैर्य है। यह दुःख की बात है ।’
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इस पद्य में भी एक दूसरे पुराने इलोक की छाया है—
'जिस व्यक्ति का शरीर जरा से जीर्ण हो चुका है उसके हृदय में भी वैराग्य की भावना उत्पन्न नहीं होती तो इसका तो आशय यही है कि उसके हृदय में दृढ़ निश्चय है कि असंदिग्ध रूप में मौत है ही नहीं ।'
दोनों पद्यों के अर्थ में कोई विशेष अन्तर नहीं है। किन्तु इस श्लोक में शान्तरस का प्रतिपादक हुआ है । शान्तरस का प्रतिपादक न तो अभिनवगुप्त के श्लोक में भी है । किन्तु अन्तर यह हो गया है कि अभिनवगुप्त के पद्य में विस्मय स्थायी भाव का उपादान हुआ है वह विस्मय अथवा तरस के रूप में आस्वादन योग्य है ।अद्भुतरस शान्त रस की प्रतिपत्ति का अंग ही है ।इसलिये वह गुणीभूत होकर शान्त को अधिक रमणीय बना रहा है ।यहाँ पर गुणीभूतव्यंग्य रस का आश्रय लेने से ही नवीनता आ गई है ।इस प्रकार गुणीभूतव्यंग्य के भेदों का आश्रय लेकर किस प्रकार पुराने अर्थ में नवीनता आ जाती है इसका दिग्दर्शन करा दिया गया है और गुणीभूतव्यंग्य के मूलभेदों का एक-एक उदाहरण दे दिया गया है ।५।
६
ध्वनेरिस्थं गुणीभूतव्यङ्गच्य च समाश्रयात् । न काव्यार्थविरामोऽस्ति यदि स्थात्प्रतिभागुणः ॥ ६ ॥
(अनु०) 'इस प्रकार यदि प्रतिभागुण हो तो ध्वनि का ओर गुणीभूतग्यच का आश्रय लेने से काव्यार्थ का विराम नहीं होता ।। ६।'
पुरातन कवि-प्रबन्धों के होते हुए भी यदि प्रतिभागुण हो; उसके न होने पर कुछ भी कवि की वस्तु नहीं होती । बन्धच्छाया भी दो अर्थों के अनुरूप शब्द-सन्निवेश (ही है वह) अर्थ- प्रतीति के अभाव में कैसे सिद्ध होती है ? अर्थविशेष की अपेक्षा न करते हुए अक्षर रचना ही बन्धच्छाया है । यह सहृदयों के निकट नहीं है । निस्सन्देह ऐसा होने पर अर्थ की अपेक्षा न करनेवाले तथा मधुर वचन-रचना में भी काव्य का नाम प्रवृत्त हो जावेगा । यदि कहो कि जब शब्द और अर्थ के साहित्य के द्वारा काव्यत्व होता है तब उस प्रकार के विषय में काव्य- व्यवस्था कैसे होगी ? तो (इसका उत्तर यह है कि) दूसरों से उपनिबद्ध अर्थ की रचना में जैसे उस काव्य का व्यवहार होता है वैसे ही उस प्रकार के काव्य-सन्दर्भों के लिए भी (काव्य का व्यवहार हो जावेगा ।
(लो०) सत्स्वपि कारिकाया उपस्कारः: तद्वीन पादान् स्पष्टतां मत्वा तुयं
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चतुर्थं
उद्योत:
४६
पादं व्याख्यातुं पठति—यद्यपि । विद्यमाने ह्यसौ प्रतिभागुण उत्करीत्या भूयान् भवति, नत्वत्यान्तासन्नेवेत्यर्थः । तस्मिन्नति । अनन्तीभूते प्रतिभागुण इति । किञ्चिदेवेति । सर्वं हि पुराणकवीनैव स्फुटतमिति किमिदानीं वर्ण्यं यत्र कवेरवर्णनाग्यापारः स्यात् । ननु यद्यपि वर्ण्यंमपूर्वं नास्ति, तथाऽप्युक्त्रिपाकगुम्फघटनाद्यपरपयायबन्धच्छायापि नवनवा भविष्यति । यन्निवेशने काव्यान्तराणां संरम्भ इत्याशङ्क्याह—बन्धच्छायापीति । अर्थद्रयं गुणीभूतव्यङ्गयं प्रधानभूतं च । नेद्रीय हन्ति । विकटतरं हृदयानुप्रवेशं न भवतीत्यर्थः । अत्र हेतुमाह—एवं हि सतोति । चतुरत्वं समाससङ्घटना । मधुरत्वमपारुष्यम् । तथाविधानामिति । अपूर्वबन्धच्छायायुक्तानामपि परोपनिबद्धार्थानिबन्धने परकृतकाव्यत्वव्यवहार एव स्यादित्यर्थस्यापूर्वत्वमाश्रयणीयम् । कवनीयं काव्यं तस्य भावः काव्यत्वं, न त्वयं भावप्रत्ययान्तात् । भावप्रत्यय इति शब्दकृतव्यम् ॥४६॥
(अनु०) 'होते हये भी' यह कारिका का उपस्कार है तो । तीन पादों को स्पष्ट मान कर चौथे पाद की व्याख्या करने के लिए पढते हैं—'यदि' यह । निस्सन्देह विदग्धमान वह प्रतिभागुण उत्क रोति से अधिक हो जाता है, अत्यन्त रूप में न होते हुए नहीं । 'उसके' यह । अर्थात् अनन्तभूत प्रतिभागुण के । 'कुछ भी नहीं' यह । निस्सन्देह सभी कुछ पुराने कवि द्वारा ही स्पष्ट कर लिया गया, अतः इस समय क्या वर्ण्य शेष रह गया जिसमें कवि का वर्णनाग्यापार हो ? (प्रश्न) यद्यपि नवीन नहीं है तथापि उक्ति-परिपाक गुम्फघटना इत्यादि दूसरे पर्याय वाली बन्धच्छाया नई-नई हो जावेगी जिसके निवेश करने में दूसरे काव्यों की रचना के प्रति अभिनिवेश होता है यह शङ्का करके कहते हैं— 'बन्धच्छाया भी' यह । 'दो अर्थ' गुणीभूतव्यङ्गयंग्य और प्रधानभूतव्यङ्गय । 'नेद्रीय' निकटतर अर्थात् हृदय में अनुप्रविष्ट होने वाला । इसमें हेतु बतलाते हैं—'ऐसा होने पर निस्सन्देह' यह । चतुरत्व अर्थात् समास-संधटना । मधुरत्व अर्थात् अपारुष्य । 'उस प्रकार के' यह । अपूर्व बन्धच्छाया से युक्तों के लिये दूसरों से उपनिबद्ध अर्थ के निबन्धन करने पर परकृत काव्यत्व का व्यवहार ही होगा इसलिये अर्थ के अपूर्वत्व का आश्रय लेना चाहिये । कवनीय को, उसका भाव है काव्यत्व । यह शंका नहीं करनी चाहिये कि यहाँ भाव-प्रत्यय से भाव-प्रत्यय किया गया है ॥४६॥ प्रस्तुत प्रकरण का उपसंहार तारावती—ऊपर विस्तारपूर्वक सिद्ध किया जा चुका है कि कविता में नवीनता ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गयंग्य से ही होती है । अर्थ तो पुराने ही होते हैं किन्तु अभिव्यञ्जन-कौशल पुराने अर्थों को भी नवीन रूप दे देता है । इस कारिका में उसी प्रकरण का उपसंहार किया गया है । कारिका का अर्थ करने में 'सत्त्वेऽपि पुरातनकविप्रबन्धेषु' इतना वाक्यखण्ड और जोड़ देना चाहिये । इस प्रकार पूरी कारिका का आशय यह हो जावेगा— जैसा ऊपर वर्णन किया गया है उससे सिद्ध होता है कि चाहे पुराने कवियों के काव्य प्रबन्ध कितनी ही संख्या में विद्यमान हों । किन्तु यदि कवि में प्रतिभा का गुण विद्यमान है और वह पुराने अर्थ की ही अभिव्यञ्जना करने के लिये ध्वनि तथा गुणीभूतव्यङ्गयंग्य का
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सहारालेलेताहैतोपुरानेअर्थभीनयेह्रीमालूमपड़नेलगतेहैंइसप्रकारकाव्यार्थोंकीकहींपरिसमाप्तिआयेगीहिनहीं।काव्यार्थअनन्तहोजायेंगे।
प्रतिभाकेगुणसेभीकाव्यमेंअनन्तता
इसकारिकामेंऔरजोकुछकहागयाहैवहतोपुरानीहीबातहै;वहसबस्पष्टहै।औरउसविषयमेंकुछनहींकहनाहै।हाँएकबातनईअवश्यहै।वहवहकि,यदि(प्रतिभाकवियोंकीउसस्फुरणात्मकशक्तिकोकरतेहैंजिससेअवसरकेअनुकूलशब्दऔरअर्थएकदमतिस्फुरितहोजातेहैं।)औरयहप्रतिभागुणबीजरूपमेंविद्यमानहोतोध्वनि,औरगुण-रीतिरसादिगुणोंकेभिन्न-भिन्नप्रकारोंकाआश्रयलेनेसेउसप्रतिभाशालीकविकेसामनेनये-नयेअर्थआतेजातेहैंऔरउनकीसंख्याबहुतबढ़जातीहै।अनन्तताकासम्पादकतोप्रतिभागुणहीहै।यदि(प्रतिभागुण)बीजरूपमेंविद्यमाननहींहैतोकविकेलियेकोईभीविषयवर्णनीयरहनहींजायेगा।नयेअर्थउसेउपलब्धनहींहोंगेऔरजोअर्थउपलब्धहोंगेउनकावर्णनतोपुरानेकवि(ही)करचुकेहैं।अतःनवीनअर्थोंकास्फुरणकेलियेप्रतिभाकाहोना(अनिवार्य)हैऔरकविकेलियेकेवलयहीएकशर्तहै।
(प्रश्न)नवीनताकेवलअर्थकीहीनहींहोती;यदि(काव्यमेंनवीनअर्थभीनहींहोंतौभीउक्तिसौभाग्य,गुम्फन,सङ्घटनाइत्यादिअनेकनामोंसेपुकाराजासक्ताहै।इसप्रकारपुरानेअर्थोंकोलेकरयदि(कविता)नईजोड़दीजायतोकाव्यभीनवीनहोसकताहैऔरउसीप्रकारकेकाव्यलिखनेमेंसहृदयोंकाअभिनिवेशभीहोसकेगा।ऐसीदशामेंक्याध्वनिऔरगुण-रीतिरसादिकेआश्रयकीअपेक्षाहै?
(उत्तर)बन्धच्छायाका(ही)अर्थक्या(है)?यहीनतोऐसेप्रतिभागुणकीआवश्यकताहै?शब्दोंकासन्निवेशकियाजायजोकिध्वनिऔरगुण-रीतिरसादि(गुणों)केअनुरूपहों।यहीनतोसङ्घटनाया(ही)बन्धच्छायाकीपरिभाषाहै।ऐसीदशामेंयदि(काव्यमें)अर्थकाप्रतिमानहीनहींहोगातोबन्धच्छायाभी(ही)कैसेबनेंगी?
क्योंकितबहमबन्धकीपरिक्षाकिसआधारपरकरसकेंगे?(प्रश्न)बन्धच्छायाकीपरिभाषामेंध्वनिऔरगुण-रीतिरसादिकीसन्निवेशकीक्या(भी)आवश्यकताहै?बन्धच्छायातोहमकाव्यकेउस(शब्द)सौन्दर्यकोमानतेहैंजिसमेंअर्थकीअपेक्षानहींहोती;केवलअक्षररचनाकेसौन्दर्यपरही(आधारितहोतीहै)।ध्यानदियाजाय।केवलशब्दसौन्दर्यकोहीलेकरकाव्यपवृत्तहोसकताहै,अर्थकीनवीनतापरविचारकरनेसेक्यालाभ?
(उत्तर)इसप्रकारकीबन्धच्छाया,जिसमेंअर्थपरध्यानहीनदियाजायकेवलशब्दसङ्घटनासौन्दर्यकोलेकरहीसबकुछनिर्णयकरलियाजायसहृदयोंकेहृदयोंमेंनतोप्रविष्टहोसकतीहैऔरनउनकेनिकटहीजासकतीहै।यदि(काव्यमें)बन्धच्छायाआपऐसीहीमानतेहैंऔरउसीकेमाननेका(ही)आग्रहकरतेहैंतोजहाँपरसमासोंकीसुन्दरसङ्घटनाकरदीजायऔरपारुष्यहीनमधुरअक्षरजोड़दियेजायेंतौउसेभीआपकाव्यकीसंज्ञादेनेकेलियेबाध्यहोंगे;चाहेउसमेअर्थविल्कुलहीनहो।
(प्रश्न)इसकेलियेतोहमेंकाव्यकीपरिभाषापरध्यानदेनाहोगा।काव्यउसेभी(तो)कहतेहैं
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चतुर्थ
उद्योत:
सहृदय-हृदयाह्लादजनक शब्द और अर्थ दोनों विद्यमान हों । केवल आह्लादजनक शब्द रचना में अर्थसौन्दर्य तो होगा नहीं, फिर वहाँ पर काव्य की परिभाषा ठीक कैसे बंधेगी और हम उसे काव्य की संज्ञा भी कैसे दे सकेंगे ? (उत्तर) जहाँ पर कवि किसी दूसरे के कहे हुये अर्थ को लेकर अपना काव्य बना देता है; वहाँ उस कवि का काव्यबन्धन ही अपूर्व (नया) होता है और बन्धच्छाया ही उसकी अपनी होती है । केवल इतनी सी नवीनता को लेकर उस कवि का वह काव्य कहा जाता है । अतः बन्धच्छाया ही तो आपके मत में काव्य ग्यवहार की प्रयोजिका हुई । क्योंकि अब दूसरे कवि का बन्ध ही अपना रहा; अर्थ तो पूर्ववर्ती कवि का हो गया । अतः यदि आप उक्त स्थल पर बन्धच्छाया को लेकर उस कविता को परवर्ती कवि की रचना मान सकते हैं तो जहाँ केवल बन्ध है अर्थ ही नहीं उसे आप कविता की संज्ञा क्यों नहीं दे सकते ? यदि अर्थ को लेकर आप काव्य के कर्त्ता का निर्णय करेंगे तो उस काव्य का कर्त्ता पुराना ही माना जावेगा । अतएव बन्धच्छाया में अनिवार्य रूप से अर्थ की विशेषता सम्मिलित की जानी चाहिये । वह अर्थ की विशेषता ध्वनि तथा गुणीभूतव्यंग्य के द्वारा ही होगी । अतः ध्वनि और गुणीभूतव्यंग्य को काव्य की अनन्तता का प्रयोजन मानना ही चाहिये और उसका प्रवर्तन कवि की प्रतिभा के द्वारा ही होता है । ( इस उत्तर वाक्य का अर्थ विभिन्न व्याख्याओं में विभिन्न प्रकार से प्राप्त होता है । किन्तु एक तो वे व्याख्यायें लोचन के प्रतिकूल हैं, दूसरे उनसे न तो वृत्ति के शब्द ही ठीक सङ्क्ष्मित होते हैं और न प्रकरण को सङ्क्ष्मति ही ठीक बैठती है । अतः उक्त अर्थ हो मान्य हैं ।)
चतुर्थ
उद्योत:
यहाँ पर वृत्तिकार ने 'काव्यस्व' शब्द का प्रयोग किया है । यह शब्द 'व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध मालूम पड़ता है । 'कवृ-वर्ण' धातु से 'कवि' शब्द निष्पन्न होता है । कवि शब्द से भाव और कर्म अर्थ में 'ष्यच्' प्रत्यय होकर 'काव्य' बनता है जिसका अर्थ होता है कवि का भाव या कर्म । इस प्रकार 'कवि' शब्द से भावार्थक प्रत्यय होकर 'काव्य' शब्द बनता है । व्याकरण का नियम है कि एक भावप्रत्यय के बाद दूसरा भावप्रत्यय नहीं होता । अतः यहाँ पर 'त्व' नहीं हो सकता । इस प्रकार यह शब्द अशुद्ध है । लोचनकार ने इसका उत्तर यह दिया है कि यहाँ पर भाव प्रत्यय है ही नहीं। यहाँ पर तो विधि के अर्थ में 'कवृ' धातु से ही "ण्यत्" प्रत्यय हो गया है—सूत्र है—'ऋहलोण्यत्' । यह प्रत्यय उसी अर्थ में होता है जिस अर्थ में तव्य और अनीयर हुया करते हैं । अतएव काव्य का अर्थ हुवा कवनोय अर्थात् कवि का विधेय । इस प्रत्यय से त्व प्रत्यय हो सकता है । अतः यह शब्द अशुद्ध नहीं है ।
चतुर्थ
उद्योत:
६
(ध्वन्यालो) न चार्थान्तरं व्यङ्ग्यार्थापेक्षयैव यावद्वाच्यार्थापेक्षयापिति प्रतिपादितमुच्यते--
चतुर्थ
उद्योत:
७
अवस्थादेशकालादिविशेषैरपि जायते । आनन्त्यमेव वाच्यस्य शुद्धस्यापि स्वभावतः ॥७॥ शुद्धस्यापेक्षितव्यङ्ग्यस्यापि वाच्यस्यानन्त्यमेव जायते स्वभावतः । स्वभावो ह्ययं वाच्यानां चेतनानामचेतनानां च यदवस्थाभेदादेशभेदात्कालभेदात्स्वलक्षण्यभेदाच्चानन्तता भवति । तैश्च तथाव्यवस्थितैः सङ्केतः प्रसिद्धानेकस्वभावानुसरणरूपया
चतुर्थ
उद्योत:
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स्वभावोक्त्यापि तदुपनिबन्ध्यमानैर्निरवधिः काव्यार्थः सम्पद्यते । यथा ह्रुवस्थाभेद-स्वत्वं यथा-भगवती पार्वती कुमारसम्भवे 'सर्वोपमाद्रव्यसमुच्चयेन' इत्यादिभिः क्तिभिः प्रथममेव परिसमापितरुपवर्णनापि पुनर्भगवत् शम्भोलोचनगोचरमायान्ती 'वसन्तपुष्पाभरणं वहन्ती' मनमथोपकरणभूतेन भड्डच्यलङ्कारेणोपरि वाणिता । सैव च पुनर्नवोद्राहसमये प्रसाध्यमाना 'तां प्राड्मुखीं तत्र निवेश्य तन्वोम्' इत्याद्युक्तिभिरन्ववैनैव प्रकारेण निबन्धितरुपसौष्ठवा । न च ते तस्य कवेरेकत्रैवाश्रुत्कृता वर्णनप्रकारा अपुनरुक्तत्वेन वाजनवावार्तिनिबर्हत्केन वा प्रतिभासन्ते । द्वितीयमेव चित्रोप्तिसम्भावनालीलायाम्—
ण अ ताण घड्इ ओही ण अ ते दीसन्ति कह वि पुनरुत्ता । जे बिडभमा पि माणं अस्थ अ वा सुकइ वाण्णोणम ।।
(अनु०) और अर्थान्तरन्यास न केवल व्यङ्ग्यार्थ की अपेक्षा से ही, अपितु वाच्यार्थापेक्षा से भी होता है यह प्रतिपादन करने के लिये कहा जा रहा है— 'अवस्था, देश, काल इत्यादि की विशेषताओं से शुद्ध भी वाच्य का स्वभावतः आनन्त्य हो जाता है' ।। ७ ।।
शुद्ध का अर्थात् व्यङ्ग्य की अपेक्षा न करनेवाले भी वाच्य का स्वभावतः आनन्त्य हो जाता है । वाक्यार्थों का निबन्धनक यह भाव होता है कि चेतनों और अचेतनों की अवस्था के भेद से, देशभेद से, कालभेद से और अपने स्वरूप के भेद से अनन्विता हो जाती है । उस प्रकार व्यवस्थित किये हुये होनेवाले उनसे अनेक स्वभावों के अनुसरण रूपवाली स्वभावोक्तिके द्वारा भी निबद्ध किये जानेवाले से काव्यार्थ अवधिहीन हो जाता है । वह इस प्रकार अव-स्थाभेदभिन्नत्व जैसे—कुमारसम्भव मे 'सर्वोपमाद्रव्यसमुच्चयेन' इत्यादि उक्तियों से पार्वती के रूप का वर्णन यद्यपि पूर्णरूप से समाप्त कर दिया गया तथापि पुनः भगवान् शङ्कर के नेत्रों के सामने आती हुई 'वसन्त पुष्पों का आभरण धारण की हुई' कामदेव की उपकरणभूत दूसरी भङ्गिमा के द्वारा वर्णित की गई है । वह फिर नवीन उद्राह के समय आभूषित की जाती हुई 'पूर्व को मुख किये हुये उस तन्वी को बैठाकर' इत्यादि उक्तियों के द्वारा नये ही प्रकार से रूपसौष्ठव मे निबन्धित की गई । वे उस कवि के एक ही स्थान पर बार-बार किये हुये वर्णन के प्रकार पुनरुक्तत्व मे अथवा पुराने-पुराने अर्थ से परिपूर्ण रूप में नहीं प्रतीत होते । और यह विप्रवाणलीला में दिखलाया ही गया है—
'उनकी सीमा नहीं घटित होती, और वे कैसे भी पुनरुक्त नहीं दिखाई देते जो प्रियाओं के विभ्रम होते हैं अथवा जो सुरुचियों के अर्थ होते हैं ।'
(लो०) प्रतिपादयितुमिति । प्रसज्यादिति शेपः । यदि़ वा वाच्यं तावद्विविध-व्यङ्ग्यचोपयोगि तदेव व्यङ्गचयानन्त्यं भवन्तोऽभिप्रायेणेऽ प्रकृतमेवोच्यते । शुद्धस्यैति । व्यङ्ग्यविषयो यो व्याघारः तत्स्पर्शं विनाप्यनन्त्यं स्वरूप-स्वर-वेणानन्तं सदृशव्यङ्गचं व्यनक्तीति भावः । न तु सर्वथा तत्र व्यङ्गचं नास्तीति मन्तव्य-मात्रभूततद्भावं काव्यग्यवहारहानेः तथा चोदारणेपु रसध्वने: सद्रावोदस्येव ।
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ततुर्थ उद्योत:
आदिग्रहणं व्याचष्टे—स्वलक्षण्येति । स्वरूपेत्यर्थः । यथा रूपस्पर्शयोसतीवैकावस्थ्यो-रेकद्रव्यनिष्ठयोरेककालोयश्च ।
आदिग्रहण की व्याख्या करते हैं—'स्वलक्षण्येति' । अर्थात् स्वरूप । जैसे रूप और स्पर्श की एक ही अवस्था में रहनेवाले, एक द्रव्य में रहनेवाले और एक काल में रहनेवाले ।
न च तेषां घटते डवधि:, न च ते दूर्यन्ते कथमपि पुनरुक्ता: । ये विभ्रमाः प्रियाणामर्था वा सुकविवाणीनाम् ॥
न च तेषां घटते डवधि:, न च ते दूर्यन्ते कथमपि पुनरुक्ता: । ये विभ्रमाः प्रियाणामर्था वा सुकविवाणीनाम् ।
चककाराभ्यामतिविस्मय: सूच्यते । कथमपि इति प्रयत्नेनापि विचार्यमाणं पौन-रुकत्यं न लभ्यमितियावत् । प्रियाणामिति । बहुवल्लभो हि सुभगो राधावल्लभप्राय-स्तास्ता: कामिनी: परिभोगसुगमुपभुज्जानोऽपि न विश्रमपुनरुक्त्यं पर्यति तदा । एतदेव प्रियात्वमुख्यते यदाह—
दो चकारों से अतिविस्मय सूचित होता है । 'कैसे भी' यह । आशय यह है कि प्रयत्नपूर्वक विचार किया हुआ भी पौनरुक्त्य प्राप्त नहीं है । 'प्रियाओं को' यह । बहुत वल्लभाओंवाला राधावल्लभ का जैसा सुभग व्यक्ति विभिन्न कामिनियों के सम्भोग का सौभाग्य के साथ उपभोग करता हुआ उस समय विलासों के पौनरुक्त्य को नहीं देखता । यही तो प्रियात्व कहा जाता है जैसा कि कहा गया है—
'क्षणे क्षणे यन्नवतामुपैति तदेव रूपं रमणीयताया: ।' इति प्रियाणामिति चासंसारं प्रवहदूपो योष्यं कान्तानां विश्रमविशेष: स नवनव एव दूश्यते । न ह्रासादिचयनादिवदनन्वयत् शिक्षित:, येन तत्सादृश्यात् पुन-रुक्ततां गच्छेत् । अपि तु निर्गर्गोऽद्रिद्युमानमदनादूरविकासमात्रं तदिति नवनव-त्वम् । तदतद्विषयकशिक्षानपेक्षिणिजप्रतिभागणनिष्पनन्दभत्: काव्यार्थ इति भाव: ।
और 'प्रियाओं का' इसका भाव यह है कि समस्त संसार में प्रवाहमय रूप वाला जो कान्ताओं का विश्रम—शेष वह नवीन-नवीन हो दिखाई देता है । यह अभिनचयन इत्यादि के समान कहीं और स्थान से नहीं सीखा गया है जिससे उसके सदृश्य से पुनरुक्तता को प्राप्त हो जाय । अपितु वह स्वभावत: खिलने वाले मदनादूर का ।
(अनु०) 'प्रतिपादन करने के लिये' यह । प्रसज्यप्रतिषेध यह शेष है । अथवा वाच्य तो विभिन्न व्यङ्ग्यों का उपयोगी होता है, यदि वही अनन्त हो तो उसके बल पर व्यङ्ग्यों की भी अनन्तता हो जावेगी इस अभिप्राय से यह प्रकृत ही कहा जा रहा है । 'शुद्ध का' यह । व्यङ्गय-विषयक जो व्यापार उसके स्पर्श के बिना भी स्वरूपमात्र से ही आननत्य हो जाता है; बाद में तो स्वरूप से अनन्त होते हुए व्यङ्गय को व्यक्त करता है यह भाव है । सर्वथा वहाँ पर व्यङ्गय नहीं होता ऐसी बात नहीं मानी जानी चाहिए क्योंकि आत्मस्थानीय उस रूप के अभाव में काव्यव्यापार की ही हानि हो जायेगी, और भी उदाहरणों में रसध्वनि की सत्ता है ही । आदि ग्रहण की व्याख्या करते हैं—'स्वलक्षण्य' यह । अर्थात् स्वरूप जैसे तीन एक अवस्था-वाले, एक द्रव्य में रहनेवाले रूप और स्पर्श का ।
'न च …… 'वाणीनाम्' उक्त गाथा की संस्कृतच्छाया है ।
'न च …… 'वाणीनाम्' उक्त गाथा की संस्कृतच्छाया है ।
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विकासमात्र है, अतः वह नवीन नवीन हो होता है। वैसे ही पराई शिक्षा की अपेक्षा न करते हुए अपनी प्रतिभा के गुण का निध्यन्व रूप ही काव्यार्थ होता है।
वाच्य की अपेक्षा भी काव्य में नवीनता
तारावती—ऊपर ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य की दृष्टि से काव्य की अनन्तता की पूरी व्याख्या कर दी। अब इस ७ वीं कारिका में वाच्य की दृष्टि से काव्य की अनन्तता की व्याख्या की जा रही है। यहाँ पर प्रश्न यह है कि प्रकारण तो ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य के प्रयोजन-निरूपण का है, यहाँ पर वाच्य की अनन्तता के प्रतिपादन से क्या लाभ? इसका उत्तर यह है कि ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य के प्रयोजन निरूपण के प्रसंग में ही यह भी विषय आ पड़ा कि इनसे काव्य अनन्त हो जाता है। अतः इस अनन्तता के प्रसंग में ही यह भी दिखला देना आप्रासंगिक नहीं कहा जा सकता कि अनन्तता केवल व्यङ्ग्यार्थ के ही अधीन नहीं होती अपितु वाच्यार्थ के अधीन भी होती है। अथवा इसका दूसरा उत्तर यह भी हो सकता है कि व्यङ्ग्यार्थ का व्यञ्जक तो वाच्यार्थ ही होता है। एक वाच्यार्थ से बहुत से व्यङ्ग्यार्थ निकल आते हैं। यदि व्यञ्जक वाच्यार्थ ही अनन्त होगा तो व्यङ्ग्यार्थ के अनन्त होने में तो कोई सन्देह रह ही नहीं जाता। अतः इस कारिका में जो वाच्यार्थ की अनन्तता बतलाई गई है वह प्राकरणिक है न अप्राकरणिक नहीं। कारिका का आशय यह है :-
'यदि शुद्ध वाच्य की दृष्टि से ही विचार किया जाय अर्थात् वाच्य का जो व्यङ्ग्य विषय-व्यापार होता है उसका विचार न किया जाय केवल उसके स्वरूप पर ही ध्यान दिया जाय तो भी स्वाभाविक रूप में ही वाच्य की अनन्तता हो जाती है। यह अनन्तता अवस्था देश काल इत्यादि अनेक विशेषताओं से हुआ करती है।'
यहाँ पर यह ध्यान रखना चाहिये कि 'शुद्ध वाच्य' का यह अर्थ नहीं है कि ऐसा वाच्य जिसमें व्यञ्जना की सत्ता हो न हो। क्योंकि यदि यह अर्थ माना जायगा तो काव्य की आत्मा तो वहाँ रहेगी नहीं। कारण यह है कि आत्मा तो प्रधानतया व्यङ्ग्यार्थ ही हो सकती है। अतः यहाँ पर शुद्ध वाच्य का अर्थ यह है कि केवल वाच्यार्थ की दृष्टि से ही विचार किया जाय व्यङ्ग्यार्थ पर विचार बाद के लिये स्थगित कर दिया जाय तो भी वाच्यार्थ भी अनन्त ही होते हैं। वृत्तिकार का मन्तव्य यही है इसमें प्रमाण यह है कि उन्होंने शुद्ध वाच्य के जो भी उदाह- हरण दिये हैं उनमें सब रसव्यञ्जना विद्वान हैं। वाच्य चाहे चेतन हों चाहे अचेतन उनका स्वभाव ही यह होता है कि जब वे काव्य का विषय बनते हैं तब उनमें अनन्तता आ जाती है। यह अनन्तता अनेक कारणों से होती है जैसे अवस्था-गत भेद, देश-गत भेद, कालगत भेद! इन विभेदक तत्त्वों की परिगणना करते हुये कारिका में आदि शब्द का प्रयोग किया गया है। आदि का अर्थ है स्वालक्षण्य (स्वालक्षण्य शब्द स्वलक्षण शब्द की भाववाचक संज्ञा है। स्व अर्थात् स्वयं ही लक्षण है जिसका अर्थात् अपना स्वरूप)। आशय यह है कि अवस्थाभेद, देशभेद और कालभेद के साथ भी अपना स्वरूप भी भेदक होता है जैसे एक ही दृश्य में, एक ही काल में तीन एक अवस्थावाले रूप और स्पर्शो में परस्पर भेद होता
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चतुर्थ
उद्योत:
है। आशय यह है कि वस्तुएँ तो अवस्था इत्यादि के भेद से अनेक स्वभाव वाली होती हैं। यदि उन वस्तुओं को काव्य में इस रूप में उपनिबद्ध किया जाय कि उसमें स्वभावोक्ति का ही प्रयोग किया जाय, जिसका रूप यह होता है कि वस्तुओं के प्रसिद्ध अनेकविध स्वभावों का अनुसरण किया जाता है तो भी काव्य का विस्तार इतना अधिक हो जायेगा कि काव्यार्थी की कोई सीमा हो न रहेगी। सर्वप्रथम अवस्थाभेद से अनन्यता को लीजिये। कुमारसम्भव में कविवर कालिदास ने पार्वती के यौवनजन्य लावण्य का बड़ा ही मनोरम वर्णन किया है। यह वर्णन ‘असम्मृतं मण्डनमज्जुग्वष्टे:' इस पद्य से प्रारम्भ होता है। ‘अंग-प्रत्यंग का वर्णन तथा ‘सर्वोपमाद्रव्यसमुच्चयेन' इत्यादि पद्य के द्वारा सामूहिक समस्त शरीर-वर्णन इतना मनोरम बन पड़ा है कि मालूम पड़ने लगता है कि रूप लावण्य के वर्णन की दिशा में अब कुछ कहने को शेष ही नहीं रह गया है। फिर जब तृतीय सर्ग में सखियों के साथ शंकर जी की पूजा करने जाती है वहाँ पर ‘वसन्तपुष्पाभरणं वहन्ती' ‘संचारिणी पल्लविनि लतेव' इत्यादि के द्वारा पुनः उनके सौन्दर्य का वर्णन किया गया है। यह अवस्था भिन्न है जिससे वर्णन में भी एक नया चमत्कार आ जाता है। फिर पंचम सर्ग में ‘विमुच्य साहारमहार्यनिर्झर्या' इत्यादि के द्वारा उसहि तपस्विनी रूप का वर्णन किया जाता है वह अवस्था भिन्न ही है और वह वर्णन भी नवीन हो गया है। इसके बाद सप्तम सर्ग में जब विवाह का अवसर आता है तब सखियाँ उनका मण्डन कर रही हैं—‘तां प्राङ्मुखीं तत्र निवेविष्ट तन्वीम्' इत्यादि पद्यों के द्वारा उनकी इस नवीन अवस्था का वर्णन किया गया है जो कि नई चमक पैदा कर देता है। एक ही पार्वती हैं और वर्णन करने वाला कवि भी एक ही है तथा एक ही काव्य में बार-बार वर्णन किया गया है फिर भी वहाँ पर न तो स्वल्प मात्र भी पुनरुक्ति मालूम पड़ती है और न यही मालूम पड़ता है कि प्रत्येक वर्णन में एक नवीनता नहीं है। कारण स्पष्ट है—एक ही व्यक्ति अवस्थाभेद से असंख्य प्रकारों से वर्णित किया जा सकता है।
( यहाँ पर ‘दीर्घिति' टीकाकार ने ‘पुनरुक्तत्वेन वाडनववार्थनिभरत्स्वेन' यही पाठ माना है और प्रकरण के अनुसार यह ठीक भी है। आचार्य विश्वेश्वर ने लिखा है कि सभी संस्करणों में ‘अपुनरुक्तत्वेन' और ‘नवनवार्थनिभरत्स्वेन' यह पाठ पाया जाता है। यद्यपि प्रकरणानुसार यह ठीक नहीं है तथापि जो सभी संस्करणों में पाया जाता है वह लेखक का प्रमाद नहीं हो सकता, अतः उसकी संगति बिठाई ही जानी चाहिये। उन्होंने उसकी संगति बैठाने की चेष्टा की है और बहुत कुछ संगति बैठ भी गई है। किन्तु मेरी समझ में अशुद्ध पाठ की जैसे तैसे संगति बैठाने की अपेक्षा यह अधिक अच्छा है कि लेखक का प्रमाद मान लिया जाय। दीर्घ-तिकार ने ऐसा किया भी है।) यह आनन्दवर्धन की लिबी हुई विषमबाणलीला में दिखलाया गया है।
चतुर्थ
उद्योत:
प्रियतमाओं के जितने विलास होते है तथा सखियों के जितने अर्थ होते हैं न तो उनकी इयत्ता ही निश्चित की जा सकती है, न उनकी सीमा ही प्राप्त होती है और यदि एक ही प्रकार की चेष्टायें बार-बार होती हैं तो भी उनमें किसी प्रकार का भी पुरानापन तथा पुनरुक्ति नहीं मालूम पड़ती।
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उक्त पद्य में दो बार 'न च' शब्द का प्रयोग किया गया है जिससे ध्वनित होता है कि यह महान् आचार्य की बात है कि रमणियों के विलासों और कवियों के अर्थों में कभी पुरानापन नहीं आता । 'किसी प्रकार भी' शब्द का आशय यह है कि कितना हो प्रयत्नपूर्वक उनका मनन तथा चिन्तन किया जाय, कितना ही उनका पर्यवेक्षण तथा अनुसन्धान किया जाय किन्तु उनमें पुरानापन तथा चिसापिटापन दिखलाई नहीं देता । 'प्रियतमाओं' में बहुवचन का आघाय यह है कि राधावल्लभ भगवान कृष्ण जैसे जो व्यक्तित अनेक बल्लभाओं का उपभोग किया करते हैं और प्रत्येक कामिनी के उपभोग में सौभाग्य का अनुभव करते हैं उन्हें कभी भी ऐसा नहीं मालूम पड़ता कि उनकी प्रत्येक प्रेयसी के विह्रम एक जैसे ही हैं । उन्हें प्रत्येक बार नया नया आनन्द आता है । प्रिय होने की परिभाषा भी तो यही है जैसा कि शिवुपाल-वध में कहा गया है कि 'जो वस्तु प्रत्येक क्षण पर नई ही मालूम हो वही रमणीयत । का रूप कही जा सकती है ।' समस्त संसार में कामिनियों और प्रियतमायें भरी पड़ी हैं । प्रत्येक कामिनी के विलास धारावाहिक रूप में प्रवाहित होते रहते हैं । कान्ताओं का प्रत्येक दृष्टिपात, प्रत्येक चाल तथा अंगों की प्रत्येक क्रिया सर्वदा नई ही मालूम पड़ती है । उसमें कमी पुरानापन नहीं आता । बात यह है कि पुरानापन तो उसमें आता है जो किसी दूसरे से सीखा जाय और सीखकर उसी प्रकार उसका अभ्यास किया जाय । उदाहरण के लिए अमिन का आधान एक ऐसी वस्तु है जिसकी शिक्षा दूसरे से ली जाती है और उसी के अनुसार अभ्यास किया जाता है । अत एव अग्न्याधान की क्रिया एक जेसों ही मालूम पड़ेगी और बार-बार देखने पर वह क्रिया देखी हुई पुरानी प्रतीत होगी । इसके प्रतिकूल रमणियों की प्रेमाभिव्यञ्जक चेष्टायें कहीं से सीखी हुई नहीं होती, अपितु जिस समय उनके हृदयों में कामवासना का अज्झुर फूटता है उस समय उनके विलास उसी प्रकार प्रारम्भ हो जाते हैं जैसे कि अज्झुर के निकल आने के बाद उसका विकास अपने आप होता जाता है । विभिन्न अज्झुरों के विकास प्रकार के होते हैं उसी प्रकार नायिकाओं के यौवनजन्य विलास भी व्यक्तिगतरूप से होते हैं, कभी पुराने नहीं पड़ते । यही दशा स्रकवियों की काव्यवस्तु की भी होती है । वस्तु की कल्पनात्मक 'उद्भावना' कहीं सीखी हुई नहीं होती और न इसकी कोई शिक्षा ही दे सकता है अपितु कवियों में जो जन्मजात प्रतिभा होती है उसी का सारभूत निध्यन्वादि काव्यवस्तु है । वह भी युवतियों की विलास चेष्टा के समान व्यक्तिगत ही होती है । अतः उसमें पुरानापन कभी आता ही नहीं ।
(ध्वन्या०) अथसपरिचयावस्थाभेदप्रकारो यत्चेतनानां सर्वेषां चेतनं द्वितीयं रूपमभिमानित्यप्रसिद्धं हिमवद्गङ्गावीनाम् । तच्चोचितविषयस्खरूपयोोजनोपनिबध्यमानमन्यदेव सम्पद्यते । यथा कुमारसम्भव एव पर्वतस्वरूपस्य हिमवतो वर्णनं, पुनः सप्रतिप्रियोक्किशु चेतनतत्त्वस्खरूपापेक्षया प्रदर्शितं तद्पूर्वमेव प्रतिभाति । प्रसिद्धरचायं सत्कवीनां मार्गः । इदञ्च प्रस्तुतं विषमबाणलीलाभिः सप्रपञ्चं च दर्शितम् । चेतनानां च वाल्याद्यवस्थाभिरनन्यद्व सत्कवीनां प्रसिद्धमेव । चेतनानामवस्थाभेदेऽङ्गवस्त्राभेदान्तरा-वस्थाभेदान्नानात्वम् । यथा कुमाराणां कुसुमशराभिन्नहृदयानामन्यासां च । तत्रापि
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चतुर्थ
उद्योतः
विनीतानामविनोतानाञ्च । अचेतनानाञ्च भावानामारम्भाच्चावस्थाभेदभिन्नानामे-कैकश: स्वरूपमुपनिबध्यमानमनन्यमेवोपयाति । यथा—हंसानां निनदेषु येः कवलितैरासज्यते कूजता—मन्त्र्य: कोडपि कषायकण्ठलुठनादवघ्नरो विडम्ब: । ते स्पष्टत्यकठोरवारणवधदन्ताडकुरस्फुरणो निर्याताः कमलाकरेषु विसिनीकन्दाप्रिमग्रथ्य: ॥ एवमन्यत्रापि दिशानयानुसतंवग्यम् ।
(अनु०) यह दूसरा अवस्थाभेद का प्रकार है जो हिमालय, गंगा इत्यादि सब अचेतनों का दूसरा चेतनरूप अभिमानित्व के रूप में प्रसिद्ध है । वह उचित विषय-स्वरूप की योजना के द्वारा उपनिबद्ध किए जाने पर और ही हो जाता है । जैसे कुमार-सम्भव में ही पर्वत स्वरूप हिमालय का वर्णन, फिर सस्पष्टियों को प्रिय उक्तियों में उसके चेतन स्वरूप की दृष्टि से दिखलाया हुआ वह अपूर्व ही प्रतीत होता है और यह सत्कवियों का मार्ग प्रतिप्ठ ही है । यह प्रस्थान विषमबाणलीला में प्रपंच के साथ दिखलाया गया है । चेतनों का वाल्य इत्यादि अवस्थाओं से अन्यत्र सत्कवियों में प्रसिद्ध ही है । चेतनों का अवस्थाभेद होने पर भी अवान्तर अवस्थाभेद से नानात्व हो जाता है जैसे कुमारियों का, कामदेव से भिन्न हृदयवालियों का और दूसरों का । उसमें भी विनीतों का और अविनीतों का । आरम्भ इत्यादि अवस्थाभेद भिन्न अचेतनों का एक-एक स्वरूप उपनिबद्ध किये जाने पर अननन्तता हो जाती है । जैसे—
चतुर्थ
उद्योतः
देशभेदादनानात्वमचेतनानां तावत् । यथा वायूनां नानाविग्देशचारणामन्येषामपि सलिलकुसुमादीनां प्रसिद्धमेव । चेतनानामपि मानुषपशुपक्षिप्रभृतीनां ग्रामारण्यसलिलादिसमेधितानां परस्परं महान् विशेष: समुपलक्ष्यत एव । स च विविच्य यथायथमुपनिबध्यमानस्थैवाननलमयायाति । तथा हि मानुषाणामेव ताव-दृशदेशादिभिन्नानां ये व्यवहारव्यापारादिषु विचित्रा विशेषास्तेषां केनान्तः शस्यते गन्तुम्, विशेषतो योषिताम् । उपनिबध्यते च तत्सर्वमेव सुकविकभियंयाप्रतिभाम् ।
'जिनको भक्षण करने पर शब्दायमान हंसों के मधुर कण्ठों में संयोग होने से कोमल स्निग्ध नया ही विलासमय स्वर सम्पन्न हो जाता है; हथिनियों के कोमल दन्तांकुरों से स्पर्धा करनेवाली कमलिनींकह की वे ही अधिम ग्रन्थियाँ कमलाकरों में निकल आई हैं ।' इस प्रकार अन्यत्र भी इसी दिशा से (अनन्तता का) अनुसरण कर लेना चाहिये ।
चतुर्थ
उद्योतः
कालभेदाच्च नानात्वम् यथतुंमेदादि ग्योमसलिलादीनामचेतनानां चेत-नानां चोत्वमुख्यादय: कालविशेषाश्रयिण: प्रसिद्धा एव । स्वालक्षण्यप्रभेदाच्च सकल-जगद्गतानां वस्तूनां विनिबन्धनं प्रसिद्धमेव । तच्च यथावस्थितमपि तदुपनिबध्यमान-मन्ततामेव काव्यार्थस्याप्रद्यति ।
देशभेद से नानात्व । पहले अचेतनों को लीजिये जैसे नाना दिशाओं और देशों से चलनेवाली वायु और दूसरे जल पुष्प इत्यादि का प्रसिद्ध ही है । चेतनों का गाँव वन
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जल इत्यादि में बड़े हुए मनुष्य पशु पक्षी इत्यादिकों का परस्पर महान् विशेष दिखलाई हो देता है। और वह विवेचन करके ठीक रूप में उपनिबद्ध किया हुआ उसी प्रकार भाननल्य को प्राप्त हो जाता है। वह इस प्रकार—दिशा देश इत्यादि से भिन्न मनुष्यों के ही जो ब्यवहार और ब्यापार इत्यादि उनकी जो विचित्र विशेषताएं होती हैं उनके अन्त को कौन जान सकता है, विशेष रूप से स्त्रियों का। और वह सब कवियों के द्वारा प्रतिभा के अनुसार निबद्ध किया जाता है।
और कालभेद से नानात्व जैसे ऋतुओं के भेद से दिशा आकाश इत्यादि अचेतनों के और चेतनों के औत्सुक्य इत्यादि कालनिर्मेष का आश्रय लेनेबाले प्रसिद्ध ही हैं। और स्वरूपभेद से समस्त संसार में विद्यमान वस्तुओं का विनिबन्धन प्रसिद्ध ही है। और वह ठीक अवस्था में उपनिबद्ध किये जाने पर काव्यार्थ की अनन्तता का ही सम्पादन करता है।
(लो०) तावदिति ।। उत्तरकालं तु व्यवध्वंसर्पणेन विचित्रितां परां भजतां नाम तावत् तु स्वभावेनैव सा विचित्रेति तावच्छब्दस्यामिप्रायः ।
(अनु०) ‘तावत्’ यह। बाद में तो ब्यङ्ग्य के संस्पर्श से बहुत बड़ी विचित्रता को प्राप्त कर ले, उतने में तो स्वभाव से ही वह विचित्र होती है यह ‘तावत्’ शब्द का अभिप्राय है।
तारावती—( अप्पिम तीन चार अनुच्छेदों में वृत्तिकार ने वस्तु की नवीनता की ही व्याख्या की है। यह समस्त प्रकरण स्पष्ट है और लोचनकार ने इस पर टिप्पणी भी नहीं दी है। यहाँ इसका सार दिया जा रहा है। ) अवस्थाभेदसे वस्तुभेद इस प्रकार भी होता है कि हिमालय गंगा इत्यादि का एक तो अपने स्वाभाविक अचेतन रूप में वर्णन किया जाता है, दूसरा रूप उन पर चेतना के आरोप के द्वारा होता है जिनमें उनके अभिमानी देवता की कल्पना कर दी जाती है। ( पुराण इत्यादि में जहाँ कहीं हिमालय गंगा इत्यादि के मानवरुलभ क्रिया-कलापों का वर्णन किया जाता है वहाँ उनके एक चेतन अभिमानी देवता की कल्पना कर ली जाती है और उस देवता के क्रियाकलापों को ही गंगा इत्यादि का क्रियाकलाप माना जाता है। इसके अतिरिक्त मानव-जात चेतना के आरोप के साथ वस्तुओं के वर्णन की भी कवि परम्परा है। ) कुमार-सम्भव में हिमालय के अचेतन रूप का प्रारम्भ में वर्णन किया है, किन्तु बाद में सप्तर्षियों की बातचीत के अवसर पर उन पर मानव धर्म का आरोप कर लिया गया है। अचेतन पर चेतन भावों का आरोप कवियों का एक सामान्य मार्ग है। इसका विस्तृत विवेचन आनन्दवर्धन ने विषय-भङ्गीला में किया है। अचेतन भावों की आरम्भ इत्यादि अवस्थाओं का भी भेद होता है जैसे ‘हंसानां निनदेषु’ इत्यादि पद्य में विसिनी कन्द की प्रारम्भिक अवस्था का वर्णन एक नई ही वस्तु है। यद्यपि विसिनी के अनेक रूपों का कवियों ने वर्णन किया है। इसी प्रकार चेतनों की अवस्थाएं भी बाल यौवन इत्यादि के द्वारा भिन्न होती हैं। फिर उनमें अवस्था-स्तर अवस्थाएं होती हैं जैसे कुमारियों की कामवासना से पीड़ित अवस्था और विकार रहित अवस्था, उसमें भी विनीत कुमारियां और अविनीत कुमारियां।
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चतुर्थ
उद्योतः
देश-भेद से अचेतनों का नानात्व जैसे अनेक दिशाओं से चलने वाली वायु, अनेक देशों और दिशाओं के जल तथा पुष्प इत्यादि एक दूसरे से भिन्न होते ही हैं । चेतनों में भी मानव, पशु, पक्षी इत्यादि में भी देशजन्य तथा ऋतुजन्य भेद होता ही हैं । इसी प्रकार ग्रामीण, जंगली, जलीय, शहरी इत्यादि विशेषताएँ जीवों में होती हैं । यदि देश-भेद को दृष्टिगत रख-कर काव्य-रचना की जाय तो काव्य-वस्तु अनन्त हो जायेगी । दिशा और देश के भेद से मनुष्यों में, उनके व्यवहार में, रीति-रिवाज में, क्रिया-कलाप में, मनुष्यों में परस्पर इतने भेद होते हैं कि कोई भी व्यक्ति उनका पार नहीं पा सकता । स्त्रियों में विशेष रूप से जैसा चाल-ढाल पहिरावों इत्यादि में भेद होता है उसका तो कोई ठिकाना नहीं । कवि लोग अपनी प्रतिभा के अनुसार इन सभी विभेदों का उपयोग अपने काव्यों में करते हैं ।
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कालभेद से भी नानात्व होता है । विभिन्न ऋतुओं में दिशायें, आकाश, जल इत्यादि विभिन्न प्रकार के हो जाते हैं । यह तो हुई अचेतन की बात । चेतनों में उत्कण्ठा इत्यादि का परिमाण और उनका स्वरूप आयु, ऋतु इत्यादि काल भेद के अनुसार घटता-बढ़ता रहता है । स्वरूपभेद तो प्रसिद्ध ही है । किसी एक लोहे के खम्भे पर ही असंख्य दृष्टियों से विचार किया जा सकता है, अतः उसके असंख्य ही स्वरूप हो जाते हैं । यदि इन समस्त भेदों को दृष्टिगत रखते हुए इनकी स्वभाविक स्थिति का ही काव्य में निरूपण कर दिया जाय तो भी काव्य-विषय अनन्त हो जायगा । फिर यदि उनमें कल्पना का भी योग कर दिया जाय तब तो कुछ कहना ही नहीं ।
चतुर्थ
उद्योतः
वृत्तिकार ने इस प्रकरण में देशभेद का परिचय देते हुये 'तावत्' शब्द का प्रयोग किया है ( देशभेदेन नानात्वमचेतनानां तावत् ) इस तावत् शब्द का आशय बतलाते हुये लोचनकार ने लिखा है—'तावत्' शब्द के प्रयोग का आशय यह है कि यहाँ पर जो भी विचार किया गया है वह वाच्यवृत्ति तथा काव्यविषय को ही दृष्टिगत रखते हुये किया गया है । यदि हम अभिव्यंजक अर्थ की विचित्रता पर ध्यान न दे केवल वाच्य वस्तु को ही विलक्षणता पर विचार करें तो भी काव्य-वस्तु का स्वाभाविक स्वरूप ही अनन्त हो जाता है । इसके बाद जब उन वाच्यार्थों से व्यंग्य का स्फुरण होता है और एक-एक वाच्य के सैकड़ों व्यंग्य हो जाते हैं तब तो काव्य की अनन्तता का ठिकाना ही नहीं रहता
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उद्योतः
अत्र केचिद आसीरन्—यथा सामान्यात्मना वस्तूनि वाच्यता प्रतिपद्यन्ते न विशेषात्मना; तस्मिन् हि स्वयमनुभूतानां सुखादीनां तत्र मित्तानां च स्वरूपमन्यमारोपयद्धिः स्वपरानुभूतृपसामान्यमात्राश्रयेपपन्ने कविभिः । नहि तैरतोतमतनागत वर्तमानमनन्र परिच्छिदादिस्वलक्षण योगिभिरिव प्रत्यक्षीक्रियते, तच्चानुभाव्यनुप्रासामारव्यं सर्वत्रापत्तिमदाधारणं परिमितत्वात्परत्वानुपपत्तेः । अत्र एव स प्रकारविशेषो यैरधटनैरभिनवत्वेन प्रतीयते तेषामपि मानवमात्र एव भणितिकृतवैचित्र्यमत्रास्तोति ।
(अनु०) यहाँ पर कुछ लोग कहे—जैसे वस्तुयें सामान्य आत्मा से वाच्यता को प्राप्त होती हैं विशेष आत्मा से नहीं । वे ( वस्तुएँ ) तो स्वयम् अनुभूत सुख इत्यादि के और उन
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( सुख इत्यादि ) के निमित्तों के स्वरूप को अन्यत्र आरोपित करनेवाले कवियों के द्वारा अपने और दूसरों के द्वारा अनुभूत किये हुए सामान्यमात्र के आश्रय से उपनिबद्ध की जाती हैं । उनके द्वारा अपरिचित स्वभाववाले अतीत अनागत और भविव्य वस्तु का योगियों के समान प्रत्यक्ष नहीं किया जाता । और वह अनुभाव्य और अनुभावक सामान्य सभी प्रतिपत्ताओं में सर्वसाधारण रूप में परिमित होने के कारण प्राचीनों के ही गोंचरीभूत हो गया क्योंकि उसके प्रत्यक्ष का विषय न होने की स्थिति नहीं होती । अत एव वह प्रकारविशेष जिन आधुनिकों के द्वारा अभिनव रूप में प्रतीत किया जाता है वह उनका अभिमान मात्र है । यहाँ पर उक्ति के द्वारा सम्पादित वैन्चिच्य है ।
(लो०) तन्निमित्तानां चेति । ऋतुमाल्यादीनाम् । स्वेति । स्वानुभूतपरानुभू- तानां यत्सामान्यं तदेव विशेषान्तररहितं तन्मात्रं तस्याश्रयेण । न हि तैरिति कविभिः । एतच्चाल्यन्तासम्भावनार्थमुक्तम् । प्रत्यक्षदर्शनेरपि हि—
शब्दा: सङ्केतितं प्राहुरव्यवहाराय स स्मृतः । तदा स्वलक्षणं नास्ति सङ्केतस्तेन तत्र नः ॥
इत्यादियुक्तिभिस्सामान्यमेव स्फुट्यते । अनुः) 'तन्निमित्तान का' यह । ऋतुमाल्य आदि का । स्व यह । स्वानुभूत और परानुभूतों का जो सामान्य अर्थात् वही दूसरी विशेषता से रहित केवल उतना भाग, उसके आश्रय से । उनके द्वारा नहीं । अर्थात् कवियों के द्वारा । और यह अत्यन्त असम्भावना के लिये कहा गया है । प्रत्यक्ष दर्शन में भी निस्सन्देह :—
'शब्द संकेतित अर्थ को कहते हैं, वह व्यवहार के लिये होता है । उस समय स्वरूप ( सम्मुख ) नहीं होता । अतः उसमें हमारा संकेत होता है ।' इत्यादि युक्तियों से सामान्य का ही स्पर्श किया जाता है ।
उक्त विषय में प्रश्न
तारावती--वाच्य की दृष्टि से काव्य की अनननता का ऊपर प्रतिपादन किया गया है । इस पर पूर्वपक्ष की ओर से एक प्रश्न उठाया जा रहा है कि इसमें सन्देह नहीं कि वस्तु के अनेक पक्ष हो सकते हैं । एक ही वस्तु विभिन्न देशों में विभिन्न प्रकार की होती है, फिर भूत, भविष्य, वर्तमान कृत कालभेद के कारण भी वस्तुएँ बदल जाती हैं, फिर विभिन्न अवस्थाओं में पड़ने के कारण भी वस्तुमेद हो जाता है, फिर उनके अपने तो स्वगत असंख्य पक्ष हो ही सकते हैं । यह सब विवादास्पद नहीं है । किन्तु प्रश्न यह है : कि इस सबका परिज्ञान होता किसको है ? इस प्रश्न का उत्तर होगा एक योगी ही अपनी योगसाधना के द्वारा करतलामलकवत् सभी विश्व को देख सकता है और भूत, भविष्य तथा वर्तमान का प्रत्यक्ष कर सकता है । कवि कोई योगी तो है नहीं । जो वस्तु को उसके समस्त पक्षों में देख सके तथा उसक ।नुभव कर सके आशय यह है कि जिस प्रकार योगी अपरिचित के स्वरूप को भी योगसाधना से प्रत्यक्ष के समान देख सकता है वैसी शक्ति कवि को नहीं होती । कवि तो जितना कुछ उसके लिये प्रत्यक्ष होता
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चतुर्थ
उद्योत:
है उतना ही देख सकता है। अतः कवि को यह करना पड़ता है कि वह अपने अनुभव से ऐसे सामान्य तत्त्वों को छांटता है जो दूसरों के भी अनुभव हो सकते हैं। इस कार्य में कवि उन तत्त्वों को बचाने की चेष्टा करता है जो विशिष्ट अंश होते हैं और सामान्य अनुभव का विषय नहीं बन सकते। कवि केवल सामान्य तत्त्व का आश्रय लेकर काव्यवस्तु को चुनता है। अपने अनुभव किये हुये सुख इत्यादि तथा सुख इत्यादि के निमित्त ऋतु माला इत्यादि का आरोप अपने कल्पित पात्रों पर कर देता है। इस सबका सार यही है कि सामान्य तत्त्व ही काव्य का विषय बन सकते हैं निश्चित नहीं। इससे सिद्ध होता है कि अनुभवयोग्य जितने भी सुख इत्यादि हैं, उनके जितने भी लौकिक पदार्थ वे सभी गृहीताओँ के लिये एक जैसे ही होते हैं। इस प्रकार वस्तुओं के सामान्य रूप तो सीमित ही होते हैं और उन सबको पुराने कवियों ने ही प्रत्यक्ष कर लिया था तब उनको अपने काव्यों में स्थान भी दे दिया। यह तो हम कह ही नहीं सकते और न यह बात सिद्ध ही की जा सकती है कि सामान्यरूप में सभी पदार्थ काव्य का विषय नहीं बन सकते तथा पुराने क्रान्तदर्शी कवियों ने वस्तुओं को उनके सामान्य रूप में नहीं देखा पाया। यहां पर जो कुछ कहा गया है उसका सार यही है कि कवि अपने काव्य में सामान्य वस्तु का ही व्यवहार करते हैं। समस्त वस्त्रों को उनके विशेष रूप में देखना सर्वथा असम्भव है। जिन वस्तुओं को कवि विशेष रूप में देखता भी है उन वस्तुओं का प्रयोग भी वह उनके सामान्य रूप में ही करता है विशेष रूप में नहीं। यदि कवि विशेष रूपों का अपने काव्य में उपादान करे तो वे वस्तुयें सर्वसाधारण की सम्वेदना का विषय बन ही न सकेंगी। जैसा कि कहा गया है :— ‘शब्द संकेतित अर्थ को ही कहते हैं। संकेत ग्रहण का प्रयोजन यही है कि व्यवहार का निर्वाह हो सके। शब्दों का अर्थ विशिष्ट नहीं होता ओर न संकेतग्रहण के अवसर पर विशेषता की ओर ध्यान ही जाता है। इससे संकेत उन वस्तुओं में सम्भव होता है।’ (आशय यह है कि ‘गो’ शब्द से संकेत के द्वारा गोत्व का ही बोध होता है विशिष्ट गाय का नहीं। क्योंकि विशिष्ट गाय में संकेत ग्रहण नहीं हो सकता।)
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इस प्रकार वस्तुयें अपने सामान्य रूप में प्राचीन कवियों के द्वारा ग्रहीत हो ही चुकी हैं। आधुनिक काव्य में अर्थ की तो कोई नवीनता है नहीं। जो लोग अपने अर्थ को नवीन कहने का साहस करते हैं यह उनका दम्भमात्र ही है। यदि काव्य में कोई नवीनता सम्भव है तो वह उक्तिवैचित्र्य या अभिव्यक्ति के प्रकार की ही नवीनता है, या हम दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि वस्तु के प्रस्तुत करने में ही कोई नवीनता हो सकती है वस्तु में कोई नवीनता नहीं हो सकती। ऐसी दशा में अवस्था, देश, काल इत्यादि के द्वारा काव्य-वस्तु की नवीनता का प्रतिपादन कहाँ तक संगत कहा जा सकता है ? यह है प्रश्नकार का आशय। (यह प्रश्न स्वरूप-गत भेद के विषय में विशेष रूप से संगत होता है। किन्तु अवस्था, देश, काल इत्यादि सभी भेदों के विषय में लागू किया जा सकता है।) यह एक सम्भावनामूलक प्रश्न है क्योंकि ‘वाचकरीरन् इसमें लिङ्गलकार का प्रयोग किया गया है। यह सम्भावना उसी प्रकार की है जैसी कि प्रथम उद्योत में विरोधी सिद्धान्तों की उद्भावना में की गई थी। यहाँ पर बहुवचन प्रयोग सिद्ध करता है कि यह मत अनेकों का है किसी एक का नहीं।
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(ध्वन्या०) तत्रोच्यते—यतत्कं सामान्यमात्राश्रयेण काव्यप्रवृत्तिस्तस्य च परिमितत्वेन प्रागेव गोचरोकृतत्वान्नास्ति नवत्वं काव्यवस्तुनामिति तदयुक्तम्—यतो यदि सामान्यमात्रमात्रस्य काव्यं प्रवर्तते कृतकस्त्रैह महाकविनिबन्ध्यमानानां काव्यार्थानामतिशय:? वाल्मीकिव्यतिरिक्तस्यान्यस्य कविविप्रलेश एव वा ? सामान्यव्यतिरिक्तस्य काव्यार्थस्याभावात, सामान्यस्य चादिकविनैव प्रदर्शितत्वात् ।
(अनु०) उस विषय में कहा जा रहा है—जो यह कहा गया है कि सामान्यमात्र के आश्रय से काव्यप्रवृत्ति होती है और उसके परिमित होने के कारण पहले ही गोचरोकृत हो जाने से काव्यवस्तुओं का नवत्व नहीं होता है ठीक नहीं है क्योंकि यदि केवल सामान्य जाने से काव्यवस्तुओ का नवत्व होता ही नहीं, वह तो महाकवियों के द्वारा निबद्ध किये हुये काव्यार्थो की अतिशयता किसके द्वारा सम्पादित की हुई होती है ? अथवा वाल्मीकि से व्यतिरिक्त किसी अन्य का कवि नाम ही कैसे होता है ? क्योंकि सामान्य से भिन्न अन्य काव्यार्थ का अभाव ही होता है और सामान्य का आदि कवि के द्वारा ही प्रदर्शम कर दिया गया है । यदि कहो उक्ति-वैचिच्य से यह दोष नहीं होता तो यह उक्तिवैचिच्य क्या वस्तु है ? उक्ति निस्संदेह वाच्य विशेष के प्रतिपादन करनेवाले वचन को कहते हैं । उसके वैचिच्य में वाच्य वैचिच्य क्यों नहीं होता ? क्योंकि वाच्य और वाचक की प्रवृत्ति अविनाभाव सम्बन्ध से होती है और काव्य में प्रतिभासित होनेवाले वाच्यों का जो रूप वह तो ग्राह्य विशेष के अमेद के साथ ही प्रतीत होता है । इससे उक्तिवैचिच्यवादी के द्वारा न चाहते हुये भी वाच्यवैचिच्य स्वीकृत किया जाना चाहिये । तो यह यहाँ पर संक्षेप है :—'यदि वाल्मीकि से भिन्न किसी एक की भी प्रतिभा अर्थ में अभीष्ट हो तो वह आननल्य हो जायेगा ।'
वाल्मीकिव्यतिरिक्तस्य यथेकस्यापि कस्यचिन् । इष्यते प्रतिभार्थेषु तत्स्वानल्यमक्षयम् ॥
(लो०) किमिति । असंवेद्यमानमरथंपोनरुक्तं कुत्सं प्राकरणिकैरज्जीकार्यमितिभाव: । तमेव प्रकटयति—न चेदविति । उक्तिहोंति पर्यायमात्रतैव युक्तिविशेषस्तत्पर्य्यान्तरैरविचकलैस्तदर्थोपनिबन्चे अपीनरुच्त्याभिमानो न भवति । तस्माद्विशिष्टवाच्यप्रतिपादकेनैवोक्तिविशेष इति भाव: । ग्राह्याविशेषेऽपि ग्राह्य: प्रत्यक्षादिप्रमाणैयों विशेष: तस्य योडमेद: । तेनायमर्थ:—पदानां तावत्साम्ये वा तद्वृत्तौ वाड्पोहे वा यत्र कुत्रापि वस्तुनि समय:, किमनेन वादान्तरेण ? वाक्यात्तद्विशेष: प्रतीत इति कस्यात्र वादिनो विमति:? अन्विताभिधानतद्विपर्ययसंसर्गभेदादिवाच्यार्थपक्षेपु सर्वत्र विशेषस्याप्रत्याख्येयत्वात् । उक्तिवैचिच्यं च न पर्यायमात्रकृतमित्युच्यते—
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(अनु०) 'किसके द्वारा' यह । भाव यह है—संवेदनागोचर न होनेवाला अर्थ पौनरुक्त्य प्राकरणिकों के द्वारा कैसे अंगीकार किया जाने योग्य है । उसी को प्रकट करते हैं—'यदि कहो' इत्यादि । 'निस्सन्देह उक्त' यह । यदि उक्तिविशेष पर्यायमात्रता ही है तो दूसरे पर्यायों से अविकल रूप में उस अर्थ के उपनिबद्ध करने पर अपौनरुक्त्य का अभिमान नहीं होता । उससे विशिष्ट वाक्य के प्रतिपादक के द्वारा ही उक्ति की विशेषता होती है । यह भाव है । 'ग्राह्य विशेष' यह । ग्राह्य अर्थात् प्रत्यक्ष इत्यादि प्रमाणों से जो विशिष्ट उसका जो अभेद । उससे यह अर्थ होता है—पदों का तो सामान्य में अथवा तद्दानू में अथवा अपोह में चाहे जिस किसी वस्तु में हो, इन विशेषवादों की क्या आवश्यकता ? वाक्य से उसकी विशेषता प्रतीत होती है इस विषय में किस वादी की असहमति है ? क्योंकि अन्वताभिधान, उसके विपर्यय, संसर्ग भेद इत्यादि वाक्यार्थ पक्षों में सर्वत्र विशेष का तो प्रत्याख्यान किया ही नहीं जा सकता । यह तो कहा ही गया है कि उक्ति वैचित्र्य केवल पर्यायिकृत नहीं होता ।
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वस्तुओं का सामान्य-विशिष्ट भाव
तारावती—अब इस प्रश्न के उत्तर पर विचार किया जा रहा है—यह कहना ठीक नहीं है कि काव्य में वस्तुओं के सामान्य रूपों का ही उपादान होता है । यदि सामान्यरूप में ही वस्तुओं को काव्यविषय बनाया जाय तो काव्य की असौम्यता सिद्ध हो नहीं हो सकती । वास्तविकता यह है कि काव्य में वस्तुयें अपने विशिष्ट रूप में ही प्रस्तुत की जाती है अथवा सामान्य रूप के साथ वस्तुओं का कुछ न कुछ विशेष रूप रहता ही है । कवि जिस देश जाति अथवा वर्ग का होता है और जिस समय में उसके व्यक्तित्व का निर्माण होता है साथ ही वस्तु की जिन अवस्थाओं को वह प्रत्यक्ष करता है उन सबकी झलक उसकी कविता में आ ही जाती है । इस प्रकार उसकी कविता कभी भी सामान्यमात्र को लेकर प्रवृत्त नहीं हो सकती । (उदाहरण के लिये राम-काव्य की रचना वाल्मीकि, कालिदास, तुलसीदास, मैथिलीशरणगुप्त इत्यादि अनेक कवियों ने की है । प्रत्येक कवि की कविता में उसके देशकाल की स्पष्ट छाप दिखाई देती है जिससे रामकथा अनन्त प्रकार की हो गई है । इसी आधार पर तुलसी ने कहा है—'राम कथा की मिति जग नाहीं ।') यदि देशकाल अवस्था इत्यादि परिस्थितियों को काव्य-वस्तु के भेदक तत्त्व के रूप में स्वीकृत न किया जाय और यही माना जाय कि काव्य केवल वस्तु के सामान्य रूप को लेकर चलता है तो महाकवियों के काव्यों की जो सीमातीत-रुपता है उसमें प्रमाण ही क्या रह जाय ? क्या यह सब व्यर्थ ही है जो कहा जाता है कि कालिदास महाकवि हुए, भारवि और माघकवि के महाकाव्यों की रचनायें की, भवभूति बड़े अच्छे नाटककार थे, इत्यादि । क्या जितना भी काव्यवैचित्र्य दिखाई देता है वह पिष्टपेषण ही है ? क्या सर्वत्र पौनरुक्त्य ही है ? जब हम कोई नया काव्य पढ़ने लगते हैं तब हमें यह आभासित ही नहीं होता कि हम पढ़े हुए पुराने भावों को ही पढ़ रहे हैं । जब अर्थपौनरुक्त्य हमें संवेदनागोचर होता हो नहीं तब उसे प्रसंगानुकूल कविता करनेवाले लोग स्वीकार कैसे कर सकते हैं ? जब वे किसी विशेष प्रसंग को लेकर कविता करते हैं तब यह कैसे मान सकते हैं कि उस प्रसंग की उनकी कविता पर कोई छाप नहीं वे तो केवल कही हुई बातों को ही
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दोहरा रहे हैं ? यदि सामान्य को लेकर ही काव्यरचना की जाती है तो वाल्मीकि से भिन्न कालिदास इत्यादि किसी अन्य व्यक्ति को कवि कहना ही ठीक नहीं कहा जा सकता क्योंकि वाल्मीकि आदि कवि हैं—उनके काव्य का इतना विस्तार है कि उन्होंने सभी सामान्य काव्य-विषयों को काव्यबद्ध कर ही दिया है तथा आप के मत में सामान्य से भिन्न कोई काव्यार्थ होता नहीं । अतः कोई नया कवि कवि ही न कहा जा सकेगा और कोई भी नई कविता पुरानी कविता की पिट्ठू बनने ही रह जायेगी । यहाँ पर सामानयतावादी यह कह सकते हैं कि काव्य में नवीनता विषयवस्तु से नहीं अपितु उक्तिवैचित्र्य से आती है । इससे मैं पूछना चाहता हूँ कि उक्तिवैचित्र्य से आप का तात्पर्य क्या है? यदि पुरानी बात को पर्यायवाचक शब्दों द्वारा प्रकट कर दिया जाय तो उसे आप उक्तिवैचित्र्य कहोगे ? यदि हाँ तो यदि पूरा-पूरे अर्थ पर्यायवाचक शब्दों के माध्यम से उपनिबद्ध कर दिया जाता है तो आपका यह अभिमान सिद्ध नहीं हो सकता कि आपने कोई नई बात कही है या आप यह नहीं कह सकते कि आप पुरानी बात को ही नहीं दोहरा रहे हैं । आप का अपौरुषेय का अभिमान सिद्ध ही नहीं हो सकता । अतः उक्तिवैचित्र्य के मूल में आप को नये शब्द ही नहीं—अपितु नया वाच्य भी स्वीकार करना पड़ेगा । आपको यह कहना पड़ेगा कि उक्तिवैचित्र्य उसे ही कहते हैं जिसमें किसी विशेष उक्ति के द्वारा विशिष्ट वाच्य का प्रतिपादन किया जाय । क्योंकि वाच्य और वाचक का अविनाभाव सम्बन्ध है । वाच्य के बिना वाचक नहीं रह सकता और वाचक के बिना वाच्य नहीं रह सकता । दोनों का तादात्म्य सम्बन्ध है । अतः यदि वाचक में नवीनता स्वतः ही आ जायेगी । काव्य में जितने भी वाच्य प्रतीतिगोचर होते हैं उन वाच्यों के जितने भी रूप होते हैं वे सब अपने विशिष्ट रूप में ही प्रतीत हुआ करते हैं । प्रत्यक्ष इत्यादि प्रमाणों के आधार पर वस्तु की जो विशेषता अवगत होती है उस विशेषता से अभिन्न रूप में ही काव्य के वाच्य संवेदनागोचर हुआ करते हैं । आशय यह है कि काव्य-वस्तु विशिष्ट से ही सम्बन्ध रखती है सामान्य से नहीं । इस सबका निष्कर्ष यह है कि जो लोग काव्य में उक्तिवैचित्र्य को अंगीकार करते हैं वे यदि न भी चाहें तब भी उनको उक्तिवैचित्र्य के साथ वाच्यवैचित्र्य मानना ही पड़ेगा । इससे वे पीछा नहीं छुड़ा सकते ।
( ध्वन्या०) किंच उक्तिवैचित्र्यं यत्काच्यनवल्यै वे निबन्धनमुख्यते तदस्मत्य-क्षाणुगुणमेव । यतो यावानयं काव्यार्थानलभेदहेतुः प्रकारः: प्रदर्शितः स सर्व एव पुन-रुक्तिवैचित्र्यादिगुणालभापद्यते । यथायमुपमाइल्लेबादिललितकलङ्कारवर्गः: प्रसिद्धः स भण-तिवैचित्र्यादुपनिबन्धमानः स्वयमेवानवधिर्यन्त्रे पुनः शतशाखताम् । भणतिरुच स्वभा-षाभेदेन व्यवस्थितता सतो प्रतीनियतभावागोचरार्थवैचित्र्यनिबन्धनं पुनरपपं काव्य-थानामानल्यमापद्यति । यथा समेव—
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महामह इति भणन्तड वज्जादि कालो जणस्स । तोडि ण देउजणडुण गोवारी भोदिः मणसो ॥
इत्थं यथा निरूप्यते तथा तथा न लभ्यतेनः काव्यार्थनाम् ॥ ७ ॥
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( अनु० ) और भी उक्तिवैचित्र्य जो काव्य की नवीनता में हेतु कहा जाता है वह हमारे पक्ष के अनुयुण ही है। क्योंकि जितना यह काव्यार्थों के आननल्य भेद में हेतु के रूप में प्रकार पहले दिखलाये गये हैं फिर वे सभी उक्तिवैचित्र्य से द्विगुणता को प्राप्त हो जाते हैं। और जो यह उपमा श्लेष इत्यादि अलङ्कारवर्ग प्रसिद्ध है वह भणितिवैचित्र्य से उपनिबद्ध किया हुवा स्वयंमेव सीमतातीत होकर शतशाखता को धारण कर लेता है। और भणिति अपने भाषा-भेद से व्यवस्थित होकर प्रत्येक नियत भाषा में दिखलाई पड़नेवाले अर्थवैचित्र्य के कारण फिर दूसरा ही काव्यार्थों का आननल्य सम्पादित कर देती है। जैसे मेरा ही— 'मेरा मेरा कहते यद्यपि लोगों का समय व्यतीत हो जाता है फिर भी मधुमथन देव जनार्दन उनके मन के गोचर नहीं होते' इस प्रकार जैसे-जैसे निरुपित किया जाता है वैसे-वैसे काव्यार्थों का अन्त नहीं मिलता ॥७॥
७
(लो०) अन्यत्तु यत्तत्प्रत्युतास्माकं पक्षसाधकमित्याह——किञ्चेति पुनरिति । भूय इत्यर्थः। उपमा हि निभ, प्रतिम, छल, प्रतिबिम्ब, प्रतिच्छाय, तुल्यसदृशाभासादिर्भिर्वचित्राभिधानैरभिन्नार्थे विचित्रं भवत्येव । नियमेन भानयोगादि निभशब्दः, तदनुकर्त्या तु प्रतिमशब्द इत्येवं सर्वत्र वाच्यं केवलं बालोपयोगि काव्यटीकापरिशीलनदौर्बल्यादेशु पर्यायत्वभ्रम इति- भावः। एवमर्थाननल्यमलङ्काराननल्यञ्च भणितिवैचित्र्याद् द्विगुणत्वं भवतीति दर्शयति भणितिरिति। प्रतिनियतया भाषया गोचरो योड्यस्तत्कृतं यदृ- च्छया तन्निबन्धनं निमित्तं यस्, अलङ्काराणां काव्यार्थानामननल्यस्य। तत्कर्म- भूतं भणितिवैचित्र्यं कर्तृभूतमपादयतीति सम्बन्धः। कर्मणो विशेषणच्छलेन हेतु- द्दशितः।
मम मम इति भणतो व्रजति कालो जनस्य । तथापि न देवो जनार्दनो गोचरो भवति मनसः ॥
मधुमथन इति योऽन्वरन्तं भणति, तस्य कथन्न देवो मनोगोचरौ भवतीति विरोधालङ्कारच्छाया। सैन्यवभाषया महामह इत्यनया भणित्या समुन्मेषिता ॥ ७ ॥
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(अनु०) और जो कुछ है वह प्रत्युत हमारे पक्ष को ही सिद्ध करनेवाला है यह कहते हैं —'और भी' 'अर्थात् फिर' उपमा निस्सन्देह निभ, प्रतिम, छल, प्रतिबिम्ब, प्रतिच्छाय, तुल्य, सदृश, आभास इत्यादि विचित्र उक्तियों से विचित्र हो ही जाती है। क्योंकि वस्तुतः इन उक्तियों का अर्थवैचित्र्य विधान ही है। नियम से भान का योग होने से निभ शब्द; उसका अनुकरण होने से प्रतिम शब्द इस प्रकार सर्वत्र कहा जाना चाहिये। केवल बालोपयोगी काव्य- टीकाओं के परिशीलन के दौर्बल्य से इनमें पर्यायत्व का भ्रम है यह भाव है। इस प्रकार अर्थाननल्य और अलङ्काराननल्य यह भणिति वैचित्र्य से निस्सन्देह हो जाता है। अन्यथा भी वह भणितिवैचित्र्य से हो जाता है यह दिखलाते हैं—'और भणिति' यह। प्रतिनियत भाषा में गोचर अर्थात् वाच्य जो अर्थ उससे किया हुवा जो वैचित्र्य वह है निबन्धन अर्थात् निमित्त
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जिसका अर्थात् अलङ्कारों के और काव्यार्थ के आनन्वयका। उस कर्मंभूत को कर्तृंभूत भणति वैचिच्य सम्पादित कर देता है यह भाव है। कर्म के विशेष के बहाने हेतु दिखलाया गया है। 'मम मम—मनसि' यह छाया है। 'मधुमथन' यह जो निरन्तर कहता है देव उसके मनोगोचर क्यों नहीं होते यह विरोध अलङ्कार की छाया है। सङ्घटना भाषा के द्वारा 'महमह' इस उक्ति से प्रकट की गई है ॥ ७ ॥
प्रत्येक दार्शनिक की दृष्टि में शब्द की विशिष्ट अर्थ ही वाच्य अर्थ माना पढेगा
तारावती—ऊपर जो कुछ कहा गया है उसका आशय यह है कि यद्यपि अनेक विचारक पद की शक्ति सामान्य में मानते है तथापि वाक्यार्थ की दृष्टि से उन्हें विशेष में शक्ति माननी ही पढेगी। पदों का अर्थ आप चाहे जो मानें (१) चाहे आप मीमांसकों के अनुसार यह मानें कि 'जिस शब्द से नियमित रूप से जो प्रतीत होता है वह उसका वाच्य होता है' जैसे, गाय लाबो इस वाक्य में गाय शब्द का वाच्य गोत्व है (अर्थसंग्रह) अतः मीमांसकों के अनुसार सामान्य में शक्ति मानें; (२) चाहे नैय्यायिकों के अनुसार जातिविशिष्ट व्यक्ति में शक्ति मानें; (३) चाहे बौद्धों के अनुसार अपोह को पदार्थ के रूप में स्वीकार करें अर्थात् यह मानें कि गो इत्यादि शब्दों का अर्थ अश्व इत्यादि का परित्याग होता है, हम चाहे जिस सिद्धान्त तथा चाहे जिस बाद को स्वीकार करें हमें यह तो मानना ही पडेगा कि पदार्थ के मानने में चाहे जैसा वैमत्य क्यों न हो वाक्यार्थ विशिष्ट में ही होता है और वाक्य से विशेष अर्थ की ही प्रतीति होती है इस विषय में किसी भी वादी को वैमत्य नहीं है। (१) चाहे हम अन्विताभिधान के अनुसार यह मानें कि शब्द की अन्वित में शक्ति होती है
(२) तद्रिपर्यय अर्थात् अभिहितान्वय के अनुसार अभिहितों का अन्वय स्वीकार करें, (३) चाहे नामार्थों का सङ्गवधा से अन्वय मानें (देखिये वाक्यपदीय, प्र० प्रकरण) और चाहे (४) भेदसम्बन्ध का सिद्धान्त मानें अथवा इसी प्रकार की कोई और वाक्यार्थ की व्याख्या करें, प्रत्येक अवस्था में इस तथ्य का प्रत्यक्षज्ञान नहीं हो सकता कि वाक्य सर्वदा विशिष्ट अर्थ का ही अभिधायक होता है। इस विषय में किसी सिद्धान्ती का वैमत्य है ही नहीं। केवल उक्तिवैचित्र्य के आधार तक ही। काव्य की अनन्तता सीमित नहीं होती और न यह कहा ही जा सकता है कि किसी वाक्य में शब्दों के पर्याय रख देने से ही उसमें उक्तिवैचित्र्य आ जाता है। उक्तिवैचित्र्य तो तभी हो सकता है जब वाच्यवैचित्र्य हो। इस प्रकार संक्षेप में कहा जा सकता है कि-
'यदि आप वाल्मीकि को छोडकर किसी एक कवि को भी कविरुप में स्वीकार करते हैं और यह मानते है कि अर्थ की दिशा में उसकी प्रतिभा प्रस्फुरित हुई है तो यही बात आपको सभी कवियों के विषय में माननी पडेगी तथा इस प्रकार काव्य की अनन्तता स्वतः सिद्ध हो जायेगी। यदि वाल्मीकि से भिन्न किसी एक कवि को भी आप कवि नहीं मानते तो दूसरी बात है ।'
काव्य की अनन्तता में उक्तिवैचित्र्य का योग
ऊपर जो कुछ कहा गया है उससे काव्य की अनन्तता पूर्णरूप से प्रतिपादित हो जाती है।
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है। और भी बहुत सी बातें हैं जो काव्य की अनन्तता का प्रतिपादन करने की ओर अग्रसर करती हैं। अपने जो उक्तिवैचित्र्य की बात कही है वह भी निस्सन्देह काव्य की अनन्तता का ही निष्कर्ष निकालती है। क्योंकि हमने ऊपर बहुत से हेतु ऐसे दिखलाये हैं जो कि काव्यार्थ की अनन्तता का प्रतिपादन करते हैं उन सब प्रकारों के साथ जब उक्तिवैचित्र्य भी सम्मिलित हो जाता है तब काव्यार्थों की अनन्तता और दूनी हो जाती है। उपमा इलेश इत्यादि बहुत से अलंकार गिनाये गये हैं। एक तो इन अलंकारों की संख्या ही बहुत अधिक है। फिर इनके भेदोपभेद असंख्य हो जाते हैं। उन भेदोपभेदों के साथ जब अन्य अलंकारों का प्रवर्तन होता जाता है तब सिद्ध होता है कि उनकी कोई निश्चित संख्या ही नहीं, वे असंख्य हैं। फिर उन अलंकारों का सङ्कर या संसृष्टि होती है, दो-दो अलंकारों का सङ्कर, तीन-तीन का, चार-चार का, इस प्रकार अलंकारों के प्रयोग की कोई सीमा ही नहीं रह जाती। इतना ही नहीं एक अलंकार के प्रयोग के भी इतने रूप हो सकते हैं कि उनका अन्त मिलता ही नहीं। उदाहरण के लिये उपमा को ही लीजिये—इसको प्रकट करनेवाले बहुत से शब्द हैं—निभ, प्रतिम, छल, प्रतिबिम्ब, प्रतिच्छाय, तुल्य, सदृश, आभास इत्यादि। इन सब विचित्र प्रकार की उक्तियों से स्वयं उपमा अलंकार विचित्र हो ही जाता है। यह भी बात नहीं कि उपमा वाचक इन सब शब्दों के अर्थों में कोई अन्तर न हो। सूक्ष्म अन्तर तो इन सभी अर्थों में पाया ही जाता है ‘निभ’ शब्द का अर्थ है नियम से भान होना। प्रतिम शब्द का अर्थ हैं—‘प्रति’ अर्थात् ‘ओर’ और ‘मा’ अर्थात् नापना अर्थात् जिसकी ओर करके कोई वस्तु नापी जाय, आशय यह है कि जिसका अनुसरण किया जाय। इस प्रकार सभी अर्थ कुछ न कुछ एक दूसरे से भिन्न अवश्य हैं। किन्तु कुछ लोगों ने बच्चों को समझाने के लिए काव्य ग्रन्थों की टीकायें लिखीं और उनमें उपमा वाचक सभी शब्दों को समानार्थक बना दिया। परिणाम यह हुआ कि जब दूसरे लोगों ने भी उन टीकाओं को पढ़ा तो वे भी उन सब शब्दों को पर्याय समझने लगे। किन्तु यह केवल उनका भ्रम है और इस भ्रम का उत्तरदायित्व उन टीकाओं के परिशीलन पर है। वस्तुतः सभी शब्दों में कुछ न कुछ अर्थभेद होता है जिससे एक ही अलंकार की सैकड़ों शाखायें हो जाती हैं। इस प्रकार उक्तिवैचित्र्य का ही यह प्रभाव है कि अर्थों में भी आनन्त्य आ जाता है और अलंकारों में भी आनन्त्य आ जाता है। केवल उक्तिवैचित्र्य ही भाषाभेद से भी काव्यार्थ में अनन्तता का सम्पादन करता है। संसार में संख्यातीत भाषायें हैं और सब भाषाओं की अपनी-अपनी विशेषतायें होती हैं। उन विशेषताओं से उक्तिवैचित्र्य सम्पन्न हो जाता है जिससे पुनः काव्यार्थों में अनन्तता आ जाती है। भाषा की विशेषता से अर्थानन्त्य भी हो जाता है और अलंकारानन्त्य भी। उदाहरण के लिये आनन्दवर्धन ने एक सिन्धी भाषा का पद्य बनाया था जिसका आशय यह है—
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‘लोगों का समय मधुमथन कहते ही बीतता जा रहा है तथापि देव-जनार्दन लोगों के मनोगोचर नहीं होते।’ जो लोग निरन्तर मधुमथन की ही रट लगाये रहते हैं उनको भगवान् जनार्दन मनोगोचर नहीं होते यह विरोध है। विरोध का परिहार यह है कि ‘महमह’ शब्द के सिन्धी
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भाषा में दो अर्थ हो सकते हैं—‘मधुमथन’ और ‘मम मम’ अर्थात् ‘मेरा मेरा’ । जब दूसरे अर्थ को लिया जाता है तब इस पद्य का आशय हो जाता है कि लोग मोह माया में फँसे हैं; रात दिन ‘यह मेरा’ ‘यह मेरा’ की रट लगाये रहते हैं किन्तु भगवान् जनार्दन का ध्यान नहीं करते । यह विरोध का परिहार है । इस प्रकार सिन्धी भाषा के ‘मह मह’ शब्द के आधार पर यहाँ पर विरोधाभास अलङ्कार बन गया है । इसी प्रकार भाषाओं का आश्रय लेने से भी काव्यार्थ अन्तविष्ट हो जाता है । जितना-जितना निरूपण किया जाय उतना-उतना काव्य की अनन्तता का ही परिचय मिलता है ।११८।
(ध्वन्यालोके) इदं तुच्यते— अवस्थादि विभिन्नानां वाच्यानां विनिबन्धनम् । पदप्रदर्शितं प्राक् भूम्नैव हृयते लक्ष्ये न तच्छक्यमपोहितुम् । तत्तु भाति रसाधयात् ॥ ८ ॥ तदिदमत्र संक्षेपेणाभिधीयते सत्कवीनामुपदेशाय— रसभावादिसंबद्धा युज्योचित्यानुसारिणी । अन्वीयते वसुगतिदर्शकलादिमेदिनो ॥ ९ ॥ तत्त्का गणना कवीनामन्येषां परिमितशक्तीनाम् । वाचस्पतिसहस्राणां सहस्रैरपि यत्नतः । निबद्धा सा कथमेतत् प्रकृतिजङ्गतामिव ॥ १० ॥ तथा हि जगत्प्रकृतितरितकल्पपरम्पराविश्रान्तविचित्रवस्तुप्रपञ्चा सती पुनरिदानों परिक्षीणा परपदार्थनिर्माणशक्तिररिति न शक्यतेऽभिषातुम् । तद्धदेवेयं काव्यस्यित- तिरनन्ताभिः कविमतिभिरुपभुक्तापि नेदानीं परिहीयते प्रत्युत नवनवाभियुक्तपत्तिभिः परिवर्धते ॥ ११ ॥
( अनु० ) ‘अवस्था इत्यादि से विभिन्न वाच्यों का विनिबन्धन’ जो पहले दिखलाया गया है । ‘लक्ष्य में अधिकता से देखा जाता है’ उसका परित्याग नहीं हो सकता ‘वह तो रस के आश्रय से शोभित होता है’ ॥ बहु यहाँ पर सत्कवियों के उपदेश प्रसङ्ग में कहा जा रहा है— यदि रस भाव इत्यादि से सम्बद्ध औचित्य का अनुसरण करने वाली तथा देश-काल इत्यादि से भिन्न होने वाली वस्तु का अनुमान किया जाय ।११। तो दूसरे परिमित शक्ति वाले कवियों की गणना ही क्या जब कि ‘सहस्र वाचस्पतियों के द्वारा सहस्रों ही यत्नों से निबद्ध की हुई वह संसारों की प्रकृति के समान क्षय को प्राप्त नहीं होती’ ।
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चतुर्थ
उद्योतः
वह इस प्रकार 'जगत् की प्रकृति अतीत कल्प परम्परा से आविर्भूत विचित्र वस्तु प्रपंच वाली होते हुए पुनः इस समय दूसरे पदार्थ के निर्माण की शक्ति परिक्षीण हो गई है यह नहीं कहा जा सकता।' उसी प्रकार यह काव्यस्थिति भी अनन्त कविमतियों के द्वारा उपभुक्त भी इस समय परिहीन नहीं होती प्रत्युत नई-नई व्युत्पत्तियों द्वारा बढ़ती जाती है ॥१०॥
चतुर्थ
उद्योतः
८
(लो०) अवस्थाद्यादिभिन्नानां वाच्यानां विनिबन्धनम् । भूम्नेव दृश्यते लक्ष्ये तत्त् भाति रसाश्रयात् ॥
चतुर्थ
उद्योतः
इति कारिका । अन्यस्तु ग्रन्थो मध्योपस्कारः ॥८॥
अत्र तु पादत्रयस्यार्थमनूद्य चतुर्थपादार्थोऽपूर्वंतयाभिधीयते । तदित्यादि शक्तिनामित्यन्तं कारिकयोर्मध्योपस्कारः । द्वितीयकारिकयासूत्र्य पादं व्याचष्टे—यथा होति ॥९, १०॥
चतुर्थ
उद्योतः
११
(अनु०) 'अवस्थादि' ''रसाश्रयात्' यह कारिका है । अन्य ग्रन्थ का उपस्कार है ।
यहाँ तो तीन पादों के अर्थ का अनुवाद करके चौथे पाद का अर्थ अपूर्व होने के कारण कहा जा रहा है । 'तत्त्' यहाँ से 'शक्तीनाम्' यहाँ तक दो कारिकाओं के मध्य का उपस्कार । द्वितीयकारिका के चौथे पाद की व्याख्या करते हैं—'वह इस प्रकार इत्यादि ।' ॥ १० ॥ 'संवादस्तु' यह कारिका व्याख्या है; 'नेकरूपतया' यह द्वितीय है ॥ ११ ॥
चतुर्थ
उद्योतः
तारावती—८ से १० तक कारिकायें सामान्य उपसंहारात्मक हैं । न इन पर वृत्तिकार ने कोई विशेष टिप्पणी की है ओर न लोचनकार ने ही विशेष कुछ कहा है । इन सबका सार यह है—यह अधिकतर देखा जाता है कि वाच्यों को काव्य में अवस्था, देश, काल, स्वरूप इत्यादि के भेद से निवद्ध किया जाता है जिसका पहले परिचय दिया जा चुका है और जिसका अपलाप सम्भव ही नहीं है किन्तु उस सबकी शोभा रस के आश्रय से ही होती है शर्त यह हैकि औचित्य का पालन किया जाय और रचना को रस, भाव इत्यादि से सम्बद्ध रखा जाय तो देश और काल से विभेद को प्राप्त होने वाली वस्तु की गति इतनी अनन्त हो जाती है कि सामान्य सीमित शक्ति वाले कवियों का तो कहना ही क्या यदि हजारों वाचस्पति आ जावें और हजारों प्रयत्नों के द्वारा उसको निवद्ध करने की चेष्टा करें तो यह काव्यस्थिति समाप्त नहीं हो सकेगी । इसमें यह दृष्टान्त दिया जा सकता है कि संसार अनादि-काल से चला आ रहा है । अनेक कल्पों में सृष्टि की रचना करने के लिये प्रकृति का उपयोग किया गया और सर्वदा सृष्टि में विचित्र और आश्चर्यजनक वस्तुओं का ही आविर्भाव हुआ । फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि दूसरे पदार्थों के निर्माण की शक्ति अब समाप्त हो गई है । उसी प्रकार कवियों की संख्यातीत बुद्धियों का समूह इस काव्यस्थिति का उपभोग करता रहा है फिर भी काव्यवस्तु समाप्त नहीं हुई प्रत्युत नवीन नवीन व्युत्पत्तियों से बढ़ती ही जा रही है ॥ ८, ९, १० ॥
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(ध्वन्या०) इत्थं स्थितेऽप- संवादास्तु भवत्येव बाहुल्येन सुमेधसाम् । स्थितं हि संवादिन्य एव मेधाविनां बुद्धया: । किन्तु— नैकरूपतया सर्वे ते मन्तव्या विप्रकृतिता ॥ ११ ॥
(अनु०) ऐस स्थित होने पर भी—‘बुद्धिमानों के ( वचनों में ) मेल तो बहुलता से होता ही है’ यह निश्चित रूप से सिद्ध है कि बुद्धिमानों की बुद्धियाँ संवादिनी ही होती हैं । किन्तु—‘बुद्धिमानों के द्वारा वे सब एक रूप में नहीं माने जाने चाहिये । यदि कहो किस प्रकार ? तो—‘संवाद जिस्सन्देह अनःसादृश्य को करते हैं, किर वह शारीरियों के प्रतिबिम्ब- वत्त, चित्र के आकार के समान और तुल्यदेही के समान होता है । संवादो ह्यनुसन्धयैकं तत्त्वेन: प्रतिबिम्बवत् । आलेख्याकारवत्तुल्यदेहीवच्च शारीरिणाम् ॥ १२ ॥ संवादो हि काव्यार्थस्योच्यते यदन्येन काव्यवस्तुना सादृश्यम् । यत्पुनःशारी- रिणां प्रतिबिम्बवाले ख्याकारवत्तुल्यदेहीवच्च त्रिधा व्यवस्थितम् । किञ्चिद्धि वस्तु वस्त्वन्तरस्य शरोखरण: प्रतिबिम्बकल्पम्, अन्यदालेख्यप्रख्यम्, अन्यतुल्येन शारीरिणा सदृशम् ।
(लो०) किमियं राजाज्ञेत्यभिप्रायेणाशङ्कते । चेदिति । अत्रोत्तरम्— संवादो ह्यनयेतनया कारिकया । एपा खण्डीकृत्य वृत्ती व्याख्याता । शारीरिणामित्ययच्छब्द: प्रतिबिम्बं द्रष्टव्य इति दर्शितम् । शारीरिण इति पूर्वमेव प्रतिलब्धस्वरूपतया प्रधानभूतस्थत्व्याद् ।
(अनु०) क्या यह राजा की आज्ञा है इस अभिप्राय से शङ्का करते है—‘कैस’ यह । ‘यदि’ यह । यहाँ उत्तर है—‘संवादो ह्यान्येत्’ इस कारिका से । वृत्ति में इस कारिका की खण्डित करके व्याख्या की गई है । और यह दिखलाया गया है कि ‘शारीरियों की’ यह शब्द प्रत्येक वाक्य में दिखलाया जाना चाहिये । ‘शारीरी का’ यह । अर्थात पहले ही स्वरूप को प्राप्त हो जाने के कारण जो प्रधान है उसका ॥ १२ ॥
तारावती—११ वीं कारिका में यह बतलाया गया हैं कि अच्छे कवियों की कवितायें प्राय: एक दूसरी से मिलती ही हैं । इसका कारण यही है कि मेधावी लोगों की बुद्धियाँ एक दूसरे से मेल खाती ही हैं । अतः होता यही है कि एक कवि को जो भाव सूझता है प्राय: वही
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चतुर्थ
उद्योत:
दूसरे को भी सूक्ष्म जाता है । अतः एक कवि का भाव यदि दूसरे कवि के भाव से मिलता हुया दिखलाई दे तो यह नहीं समझना चाहिये कि परवर्ती कवि ने पूर्ववर्ती कवि के भाव का अपहरण ही किया है और इसी आधार पर किसी कवि पर भावापहरण का दोषारोपण भी नहीं करना चाहिये । जो इस प्रकार का आक्षेप करता है वह बुद्धिमान् नहीं कहा जा सकता ॥ ११ ॥
चतुर्थ
उद्योत:
दो कवियों के भावों में मेल के प्रकार
चतुर्थ
उद्योत:
यहाँ पर एक प्रश्न यह किया जा सकता है कि इसमें प्रमाण क्या है कि पूर्ववर्ती कवि के भाव का परवर्ती कवि ने अपहरण नहीं किया है; पूर्ववर्ती और परवर्ती दोनों कवियों को निरपेक्ष भाव से कोई वस्तु सूझी है ? क्या आपकी यह बात हम राजाज्ञा के समान भञ्जीकार कर लें ? इसो प्रश्न का उत्तर देने के लिये १२ वीं कारिका लिखी गई है और इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि दो भावों का मेल कितने प्रकार का होता है । इस कारिका के प्रथम पद में 'संवाद' की परिभाषा की गई है और शेष तीन पदों में संवाद के प्रकार बतलाए गये हैं । 'संवाद' की परिभाषा है अन्य सादृश्य अर्थात् एक कवि की बुद्धि का दूसरे कवि की बुद्धि से सादृश्य अथवा एक कवि की काव्यवस्तु से दूसरे कवि की काव्यवस्तु का सादृश्य । यह सादृश्य तीन प्रकार का होता है—
चतुर्थ
उद्योत:
प्रतिबिम्बवत् अर्थात् पहले जो काव्यवस्तु अपने स्वरूप को प्राप्त कर चुकी है और इस प्रकार प्रधान पद पर आरूढ़ हो गई है उसी काव्यवस्तु को लेकर जब दूसरे काव्य लिखे जाते हैं; भाव में कोई परिवर्तन नहीं किया जाता; केवल पर्यायवाचक शब्दों से वही बात कह दी जाती है तब बने बनाए काव्यशरीर का प्रतिबिम्ब दूसरे काव्य पर पड़ जाता है । इस प्रकार के काव्य की वही स्थिति होती है जो स्थिति दर्पण में मानव शरीर के सङ्क्रमण हो जाने पर उसके प्रतिबिम्ब की हुया करती है । अतः इस प्रकार के अनुकरण रूप काव्य को प्रतिबिम्बकल्प काव्य कहते हैं ।
चतुर्थ
उद्योत:
१२
अर्थ: स एव सर्वो वाक्यान्तरविचनापरं यत्न । तत्परमार्थविम्बेन काव्यं प्रतिबिम्बकल्पं स्यात् ॥
अर्थात् जहाँ सभी अर्थ पुराने कवि का ही कहा हो किन्तु वाक्यरचना दूसरे प्रकार की कर दी जाय और उसमें तात्त्विक भेद न हो उस काव्य को प्रतिबिम्बकल्प काव्य कहते हैं । जैसे एक पुराना पद्य है :—
चतुर्थ
उद्योत:
ते पान्तु वः पशुपतेर्ललनीलभासः कण्ठप्रदेशघटिता: फणिनः स्फुरन्तः । चन्द्रामृतास्वादनसेकसुखप्रबुद्धैरडकुरैरिव विराजति कालकूटः ॥
अर्थात् ‘पशुपति के कण्ठ प्रदेश में सलग्न स्फुरित होनेवाले वे सर्प आप लोगों की रक्षा करें; जिनसे कालकूट इस प्रकार शोभित होता है मानों चन्द्र के अमृत रूपी जल के कणों से सींचकर सुखपूर्वक उस कालकूट के अङ्कुर निकल आए हों ।’
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जयन्ति नीलकण्ठस्य कण्ठे नीला महाहयः । ग्लद्गद्ग्राभ्रमुस्सिक्तकालकूटाड्डुराः इव ॥
इसी अर्थ को लेकर एक नवीन पद्य बनाया गया है :— 'नीलकण्ठ के कण्ठ में लगे हुये बड़े-बड़े सर्पों की जय हो जो कि गिरनेवाले गङ्गाजल से सिंचकर उगे कालकूटाडूर जैसे प्रतीत होते हैं ।' अर्थ वही है केवल शब्दभेद कर दिया गया है । ( इस प्रकार के काव्य को प्रतिबिम्बकल्प काव्य कहते हैं ।)
अर्थापहरण काव्य का दूसरा प्रकार होता है आलेख्याकारवत् काव्यरचना । अर्थात् जिस प्रकार किसी मूर्त पदार्थ का कोई चित्र उतार लिया जाता है और वह चित्र वास्तविक वस्तु के बिल्कुल समानाकार मालूम पड़ता है। उस काव्य को आलेख्याकारवत् कह सकते हैं । ( आलेख्याकारवत् की परिभाषा काव्यमीमांसा में इस प्रकार दी है :—
कियतापि यत्र संस्कारमन्तरा वस्तु भिन्नवद्भाति । तत्त्वस्थितमर्यादचतु रालेख्यप्रख्यप्रच्यमिति काव्यम् ॥
अर्थात् जहाँ काव्यवस्तु तो पुरानी हो किन्तु उसको कुछ थोड़ा सा संस्कार कर दिया जाय, जिससे वस्तु भिन्न जैसी प्रतीत होने लगे उस काव्य को अर्थचतुर लोग आलेख्यप्रख्य काव्य कहते हैं । जैसे ऊपर के ही भाव को लेकर एक दूसरा पद्य बनाया गया है :—
जयन्ति धवलभूयाला: शम्भोर्जटाटावलम्बिनः । गलद्गद्ग्राभ्रमुस्सिक्तचन्द्रकान्तद्रुता: इव ॥
'शंकर जी के जटाजूट में लम्बमान श्वेत सर्पों की जय हो, जो ऐसे शोभित होते हैं मानो गिरनेवाले गङ्गाजल से सिंचकर चन्द्रकान्तमणि से अड्डूर निकल आये हों ।' बात वही है किन्तु अन्तर यह पड़ गया है कि मूल पद्य में चन्द्रामृत को जल माना गया था इसमें गङ्गाजल के द्वारा सिंचन का उपादान किया गया है, पहले कृष्ण सर्प थे इसमें श्वेत सर्प हैं, पहले कालकूट के अड्डूर थे इसमें चन्द्र के अड्डूर हैं । इस प्रकार थोड़ा सा संस्कार कर देने से यह भाव कुछ नया सा हो गया है । इस प्रकार का काव्य आलेख्यप्रख्य कहुलाता है ।
( ३ ) तीसरे प्रकार का काव्य होता है तुल्यदेहिवत् अर्थात् जिस प्रकार दो व्यक्ति एक सी ही आकृति वाले होते हैं और उन दोनों को देखकर यह कहा जाता है कि दोनों की आकृति एक जैसी ही है, उसी प्रकार भावों के मेल के कारण जहाँ पर यह कहा जाता है कि दोनों पद्य एक जैसे ही हैं उस काव्य को तुल्यदेहिवत् कहते हैं ( तुल्यदेहिवत् काव्य की परिभाषा काव्यमीमांसा में यह दी गई है—
विषयस्य यत्र भेदोऽपि भेदबुद्धौ नितान्तसीदत्यर्थे । तत्तुल्यदेहिसुलयं काव्यं निवन्धन्ति सुधियोऽपि ॥
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चतुर्थ
उद्योतः
अर्थात् जहाँ विषय का भेद होते हुये भी अत्यन्त सादृश्य के कारण अभेद-बुद्धि भाषित होने लगती है, उस काव्य को तुल्यदेहित्व काव्य कहते हैं। इस प्रकार के काव्य का निवन्धन बुद्धिमान् लोग भी करते हैं।
चतुर्थ
उद्योतः
उदाहरण के लिये एक पुराना पद्य है—
चतुर्थ
उद्योतः
अवीरिनादो कृत्वा भवति तुरगो यावद्वयाघ्रः, पशूधन्यस्त्वात्प्रतिवसति यो जीवति सुखम्। अमोषानिर्माणं किमपि तदमृत्युघ्नकरिणाम्, वनं वा क्षोणीभृद्वनमथवा येन शरणम्॥
जो पशु अश्व भेड़ों को आगे करके जब तक रहता है अर्थात् अपने साथ भेड़ों को भी सुख पहुँचाता है। तब तक वह सुखपूर्वक रहता है और जीता भी है। ऐसा पशु धन्य है। इन भाररूप नष्ट हाथियों का निर्माण हों कैसा अर्थात् व्यर्थ हुआ जिनका निवास या तो वन में होता है या राजाओं के घर में होता है। आशय यह है कि 'जो सभी के काम नहीं आ सकते उनका जीवन व्यर्थ है।'
चतुर्थ
उद्योतः
इसी अर्थ को लेकर एक दूसरा पद्य लिखा गया है—
चतुर्थ
उद्योतः
प्रतिगृहमुपलानामेक प्रकारो मुहुरुपकरणत्कार्द्राचितः पूजिताश्च। स्फुरितहतमणीनां किन्तु तद्वाम येन क्षितिपतिभवने वा स्वाकरे वा निवासः॥
प्रत्येक घर में पत्थरों का एक ही प्रकार है। जो उपभोग का साधन होने के कारण बार-बार अभिषित किया जाता है और पूजा जाता है। किन्तु इन अभागिन मणियों का एक अद्वितीय प्रकाश स्फुरित हो रहा है। जिससे उनका निवास या तो राजभवनों में होता है या अपनी खानो में ही होता है।
चतुर्थ
उद्योतः
यहाँ पर दोनों पद्यों का निष्कृष्टार्थ एक ही है, जीवन उसी का धन्य है जो सभी का उपकार करता है, किन्तु इस अर्थ को अभिव्यक्त करने के लिये जिन विषयवस्तुओं का उपादान किया गया है वे दोनों परस्पर भिन्न हैं। इस प्रकार विभिन्न वस्तुएँ ऐसी मालूम पड़ती हैं। जैसे दो शरीरो अत्यन्त सादृश्य के कारण एक जैसे मालूम पड़ते हैं। अतः यह प्रकार तुल्यदेहीतुल्य कहा जा सकता है।
चतुर्थ
उद्योतः
(राजशेखर ने परार्थहरण का श्रेणीविभाजन अन्य प्रकार से किया है। उन्होंने इस दृष्टि से प्रथमतः काव्य के तीन प्रकार माने हैं—अन्ययोनि, निह्न्तयोनि और अयोनि। अन्ययोनि के दो प्रकार बतलाये हैं—प्रतिबिम्बकल्प और आलीढ्यप्रतीति। निह्न्तयोनि भी दो प्रकार की बतलाई है—तुल्यदेहीतुल्य और परपुरप्रवेश सदृश। अयोनि को केवल एक प्रकार का ही बतलाया है। फिर इन भेदों के अवान्तर भेद किये हैं। इनका विस्तृत निरुपण काव्य-मीमांसा में किया गया है। वहीं देखना चाहिये। अनपेक्षित होने के कारण यहाँ उन पर विचार नहीं किया जा रहा है॥ १२॥
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(ध्वन्या०) तत्र पूर्वमनन्यात्म तुच्छात्म तदनन्तरम् । तृतीयं तु प्रसिद्धात्म नान्यसाम्यं त्यजेत्कवि: ॥ १३ ॥
(अनु०) 'उनमें पहला अनन्य आत्मा वाला और उसके बाद तुच्छ आत्मा वाला और तृतीय प्रसिद्ध आत्मा वाला होता है । कवि दूसरे के साम्य का त्याग न करे' ॥ १३ ॥ उनमें पहले काव्यवस्तु प्रतिबिम्ब के समान होती है । वह बुद्धिमान् के द्वारा छोड़ दी जानी चाहिये, क्योंकि वह अनन्य आत्मा वाली अर्थात् तात्त्विकशरीरशून्य होती है । उसके बाद चित्र के समान अन्यसाम्य दूसरे शरीर से युक्त भी तुच्छ आत्मा वाली होने के कारण छोड़ दी जानी चाहिये । तीसरी तो विभिन्न कमनीय शरीर के होने पर मिलती हुई भी काव्यवस्तु कवि के द्वारा छोड़ी नहीं जानी चाहिये । एक शरीरी दूसरे शरीरी के समान होते हुये भी एक ही है यह नहीं कहा जा सकता ॥ १३ ॥
(लो०) तत्र पूर्वस्मितकारिका । अनन्या पूर्वोपनिबन्धकाव्यादात्मा स्वभावो यस्य तदनन्यात्म येन रूपेण प्रतिबिम्बं भाति तेन रूपेण विम्बमेवेतत् । स्वयं तु तत्त्किदृशमित्यत्राह—तात्त्विकशरीरशून्यमिति । न हि तेन किंचिदपि पूर्वमुल्लेखितं प्रतिबिम्बमप्येवमेव । एवं प्रथमं प्रकारं व्याख्याय द्वितीयं व्याचष्टे—तदनन्तरनिवृत्ति । द्वितीयमित्यर्थ: । अन्येन साम्यं यस्य तत्तथा । तुच्छात्मेति । अनुकारे ध्यानुकार्यवुद्धिरेव चित्रपुस्तादाविव न तु सिन्दूरादिबुद्धि: स्फुरति, सांपि च चारुत्वायैति भाव: ॥१३॥
(अनु०) 'तत्र पूर्वं......' इत्यादि कारिका है । पहले उपनिबन्धन किये हुए काव्य से अनन्य है आत्मा अर्थात् स्वभाव जिसका, वह है अनन्यात्मा, वह जिस रूप से शोभित होता है बहु रूप दूसरे कवि का स्पर्श किया हुआ ही है । अर्थात् जिस प्रकार जिस रूप में प्रतिबिम्ब शोभित होता है उस रूप में यह विम्ब ही है । स्वयं वह किस प्रकार का है इसमें कहते हैं—'तात्त्विकशरीरशून्य' यह ! उसके द्वारा किसी अपूर्व की कल्पना नहीं की गई । प्रतिबिम्ब भी तो ऐसा ही है । इस प्रकार प्रथम प्रकार की व्याख्या करके द्वितीय की व्याख्या करते हैं—'तदनन्तर तो' यह । अर्थात् द्वितीय अन्य से है साम्य जिसका वह अनुकरण में चित्रलिखित किसी कलाकृति के समान अनुकार्य बुद्धि स्फुरित 'होती है; सिन्दूर इत्यादि की बुद्धि नहीं और वह भी चारुता के लिये नहीं होती ॥१३॥
प्रकारों की उपादेयता पर विचार
तारावती—१२वीं कारिका में यह दिखलाया गया था कि कितने प्रकार के सम्वाद
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चतुर्थ
उद्योतः
हो सकते हैं। अब इस तेरहवीं कारिका में उनकी उपादेयता के तारतम्य पर विचार किया जा रहा है। इस कारिका में यह बतलाया गया है कि संवाद का पहला रूप होता है-प्रतिबिम्बकल्प अर्थात् जिस प्रकार दर्पण में संक्रान्त प्रतिमा प्रतिबिम्ब कहलाती है उसी प्रकार जब किसी पुराने कवि की कविता नये कवि के बुद्धिदर्पण में उसी रूप में संक्रान्त हो जाती है तब उसे प्रतिबिम्बकल्प काव्य कहते हैं। बुद्धिमान् कवि का कर्तव्य है कि इस प्रकार के काव्यनिर्माण से सदा दूर रहे, क्योंकि उसकी कोई दूसरी आत्मा नहीं होती। आशय यह है कि जिस प्रकार दर्पण में संक्रान्त प्रतिमा स्वरूपहीन होती है और उसका वही स्वरूप माना जाता है जो वास्तविक वस्तु का होता है। उसी प्रकार बाद के कवि के लिखे हुए काव्य का स्वरूप, स्वभाव अथवा आत्मा उससे भिन्न नहीं होती जो कि पहले उपनिबद्ध काव्य में विद्यमान थी। प्रतिबिम्ब छाया मात्र होता है उसका तात्त्विक शरीर नहीं होता। उस रूप में तो वह बिम्ब ही होता है। इस प्रकार के काव्य की रचना करने वाले को स्वयं कुछ भी श्रेय नहीं मिलता; उसका तो कार्य केवल इतना ही होता है कि दूसरे की कही हुई बात को अपने शब्दों में पाठकों तक पहुंचा दे। अतः मुख्यत्व तो पूर्ववर्ती कवि को ही मिलता है। अत एव कवियों का यह कर्तव्य है कि जिसके लिए लोग यश कहें कि इसने तो कोई नई कल्पना नहीं की इस प्रकार के काव्य को रचना में कभी प्रवृत्त न हो।
चतुर्थ
उद्योतः
दूसरं प्रकार का काव्य आलेख्यप्राय होता है। अर्थात् चित्र के समान उसमें कुछ थोड़े से संस्कारों को बदलकर वही बात दूसरे रूप में कही जाती है। इस काव्य का शरीर तो दूसरा अवश्य होता है; किन्तु इसमें भी दूसरे की समानता बनी रहती है। अतः इसका स्वरूप या स्वभाव अथवा आत्मा अत्यन्त तुच्छ होता है; क्योंकि अनुकरण करने में प्रधानता तो उसी की रहती है जिसका अनुकरण किया जाता है। जैसे यदि सिन्दूर इत्यादि से कोई कलात्मक वस्तु बनाई जाय तो उसे देखकर एकदम मुंह से निकल जाता है कि यह घोड़ा इत्यादि अमुक वस्तु है और ध्यान भी उसी की ओर जाता है जिसका वह चित्र बना होता है। सिन्दूर इत्यादि की ओर ध्यान प्रायः जाता ही नहीं। उसी प्रकार किसी ऐसे काव्य को पढ़कर जिसमें पुराने काव्य की छाया कुछ विभिन्नता के साथ दृष्टिगत हो रही हो, उस पुराने काव्य पर ही ध्यान जाता है। यह काव्य तुच्छ आत्मा वाला होता है अतः इसकी रचना में भी कवि को प्रवृत्त नहीं होना चाहिए क्योंकि उसमें भी कोई चारता नहीं होती।
चतुर्थ
उद्योतः
तीसरे प्रकार का काव्य वह होता है जिसमें या तो केवल अभिध्यैर्ज्यार्थ का साम्य हुआ करता है, (वैसे दोनों के अभिध्यैर्जक वस्तुतत्व भिन्न-भिन्न ही होते हैं) या ध्वनितत्व भिन्न होते हैं दोनों का अभिध्यैर्जकतत्व एक ही होता है। दोनों को देखने से यह मालूम पड़ता है कि दोनों भाव समान हैं। यदपि यह समानता एक दूसरे से ली हुई नहीं मालूम पड़ती, अपितु जैसे दो आकृतियां अपनी स्वतन्त्र सत्ता रखते हुए भी सांयोगिक रूप में एक दूसरे से मिलती हुई प्रतीत होती हैं उसी प्रकार उन भावों का साम्य भी अवगत होता है। इस प्रकार यदि उनकी अपनी सत्ता पृथक्-पृथक् हो और दोनों का कमनीय कलेवर भी एक दूसरे से निरपेक्ष होकर स्थित हो तो यदि काव्यवस्तु मेल भी खाती हो तो भी कवि को उसका परि-
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त्याग नहीं करना चाहिए। क्योंकि दो समान आकृतियों को देखकर यह तो कोई कह ही नहीं सकता कि दोनों एक ही हैं। इसी प्रकार वहाँ पर परवर्ती काव्य को पूर्ववर्ती से मिलता हुआ देखकर कोई नहीं कह सकता कि परवर्ती कवि ने पूर्ववर्ती कवि के आशय का अपहरण किया है। कारण यह हैं कि दोनों के कलेवर भिन्न होते हैं॥१३॥
एतद्वोपपादयितुमुच्यते—
१४
आत्मनोऽन्यस्य सद्भावे पूर्वस्थित्यनुरूप्येऽपि । वस्तु भातितरां तन्व्या: शशिच्छायामिवाननम् ।। १४ ।। तत्त्वस्य सारभूतस्यात्मन् सद्भावेऽन्यस्य पूर्वस्थित्यनुरूप्येऽपि वस्तु भातित- राम्। पुराणरमणीयच्छायानुगृहीतं हि वस्तु शरीरवत्परां शोभां पुष्णाति । न तु पुनरुक्ततत्त्वेनाभासते तन्व्या: शशिच्छायामिवाननम् ॥ १४ ॥
( अन्० ) इसी को उपपादित करने के लिये कहते हैं— 'पूर्वस्थिति का अनुकरण करने वाली वस्तु अन्य आत्मा के होने पर तन्वी के चन्द्रमा की छायावाले मुख के समान अत्यन्त शोभित होती है॥१४॥ तत्व के अर्थात् सारभूत दूसरी आत्मा के होने पर पूर्वस्थिति का अनुकरण करने वाली वस्तु भी अत्यन्त शोभित होती है। पुरानी रमणीय अनुगृहीत वस्तु निस्सन्देह शरीर के समान परा शोभा को पुष्ट करती है, पुनरुक्ततत्व के रूप में तो अवभासित नहीं होती। जैसे तन्वी का चन्द्रमा की छाया वाला मुख॥१४॥
एतदेवेति । तृतीयस्य रूपस्यात्याज्यत्वम् । आत्मनोऽन्यस्येतिकारिका- खण्डीकृत्य वृत्तौ पठिता । केपुचित्पुस्तकेषु कारिका अखण्डीकृता एव दृश्यन्ते । आत्मन इत्यस्य शब्दस्य पूर्वपठिताभ्यामेव तत्त्वस्य सारभूतस्य च पदाभ्यामर्थो निरू- पित: ॥ १४ ॥
( अनु० ) 'इसी को' अर्थात् तृतीय रूप की आत्मान्यता को। 'आत्मनोऽन्यस्य' यह कारिका वृत्त में खण्डित करके हो पढ़ी गई है। किन्हीं पुस्तकों में कारिकायें अवपृथक् ही दिखलाई देती है। 'आत्मन:' इस शब्द का पहिले पढ़े हुए 'तत्वस्य' और 'सारभूतस्य' इन दो पदों से अर्थ निरूपित किया गया है॥१४॥
तारावती—ऊपर बतलाया गया है कि प्रतिबिम्बकल्प और मालेघ्यप्रकृत्य रचना करने से कवि निन्दनीय हो जाता है, किन्तु यदि तुल्यदेहितुल्य रचना की जाय तो कवि को दोष नहीं होता। अब इस १४वीं कारिका में उसी बात को सिद्ध किया जा रहा है कि तुल्यदेहितुल्य काव्यरचना करने से कवि का दोष नहीं होता। कारिका का सार यह है कि 'काव्य की आत्मा दूसरी होनी चाहिए। आत्मा का अर्थ है तत्व और सार रूप जैसे। यदि इस
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चतुर्थ
उद्योत:
प्रकार की आत्मा में तादात्म्य नहीं होता तो वह काव्य नवीन ही कहा जाता है फिर चाहे उस काव्य का निर्माण किसी पुराने काव्य की छाया पर ही हुआ हो । उदाहरण के लिए सुन्दरियों के मुख चन्द्र के समान हुआ करते हैं, उनमें भी पूर्णचन्द्र की जैसी आकृति और वैसी ही रमणीयता विद्यमान रहती है । किन्तु उनमें लावण्य का भेद होता है । नायिकाओं के मुख पर एक ऐसी यौवनजन्य चमक आा़ा़ादकता होती है जैसी चन्द्र में नहीं होती । चन्द्र का लावण्य दूसरे ही प्रकार का होता है। इस प्रकार यद्यपि नायिकाओं के मुख का निर्माण पूर्णचन्द्र का जैसा ही हुआ है फिर भी लावण्य का भेद होने के कारण यह कोई नहीं कहता कि चन्द्र और मुख दोनों एक ही वस्तु हैं । यह पहले ही (प्रथम उद्योत में) बतलाया जा चुका है कि काव्य का ध्वनि तत्व (प्रधानीयमान अर्थ) ललनाआों के लावण्य के समान हुआ करता है । अतः यदि वह तत्व भिन्न हो तो जिस प्रकार ललनाआों का लावण्यमय मुखचन्द्र पुनरुक्त नहीं मालूम पड़ता उसी प्रकार नवीन काव्य भी पुनरुक्त नहीं कहा जा सकता । आशय यह है कि जिस काव्य से भावापहरण किया गया हो उसमें भी सङ्घटनाजन्य एक रमणीयता विद्यमान ही होती है उस रमणीय वस्तु का उपादान कर यदि नवीन काव्य की रचना की जाय और उसमें आत्मा को बदल दिया जाय तो काव्य पुराना नहीं, नया ही मालूम पड़ता है । जैसे सभी शरीरों की बनावट एक जैसी होती है किन्तु रमणियों का लावण्य ही प्रत्येक की आकर्षकता में विभाजक-तत्व का काम देता है । पुराने अङ्ग-प्रत्यङ्गों से युक्त भी शरीर नये लावण्य को पाकर नया हो जाता है । ऐसा ही काव्य के विषय में भी समझना चाहिए ।
चतुर्थ
उद्योत:
यहां पर 'आत्मन:' इस शब्द की व्याख्या करने के लिए ही वृत्तिकार ने 'तत्वस्य' और 'सारभूतस्य' इन दो शब्दों का प्रयोग किया है । वस्तुतः पर्यायवाचक शब्द बाद में लिखे जाते हैं, किन्तु यहां पर वृत्तिकार ने 'आत्मन:' के पहले इनको लिख दिया है । कहीं-कहीं इस कारिका को दो भागों में बाँटकर भी पढ़ा गया है अर्थात् पहली पंक्ति के बाद वृत्ति 'तत्वस्य......पूर्वस्थित्यनुरूपादपि' यह पंक्तित आई है । फिर दूसरी पंक्ति लिखकर वृत्ति का शेष भाग लिखा गया है । ऐसी दशा में भी अर्थ में कोई भेद नहीं पड़ता ।
चतुर्थ
उद्योत:
उपर अर्थ हरण पर पूरा प्रकाश डाला गया है ओर उसके प्रयोजनों पर भी दृष्टिपात किया गया है । इसके प्रयोजनों के विषय में राजशेखर ने काव्यमीमांसा में विभिन्न मतों का उल्लेख किया है जिसका सार यह है—
चतुर्थ
उद्योत:
आचार्यों का कहना है कि 'पुराने कवियों के द्वारा भली भाँति अभ्यस्त मार्ग में ऐसी वस्तु को प्राप्त करना ही कठिन है जिसका पहले स्पर्श न किया गया हो । अतः पुराने कवियों के द्वारा अभ्यस्त मार्ग का संस्कार करने की चेष्टा करनी चाहिए ।' इस पर वाक्पतिराज का कहना है कि ऐसा नहीं होता क्योंकि—
चतुर्थ
उद्योत:
संसार की प्रगति पर्यन्त (उसको मर्यादा मानकर) उदार कवि प्रतिदिन उसका सार ग्रहण करते रहते हैं फिर भी वाणी के प्रवाह की मुहर आज तक नहीं टूटी ।
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अतः “दुर्लभ और अस्पृष्ट वस्तु को स्पष्ट करने के लिये दूसरों के प्रबन्ध पढ़ने चाहिये |” कुछ लोगों का कहना है कि “दूसरों के प्रबन्धों को पढ़ने से यह बात मालूम पड़ जाती है कि जो एकरूप भाव विभिन्न काव्यों में था गये हैं उनमें पार्थक्य कहाँ-कहाँ पर क्या-कया है ?” दूसरे लोग कहते हैं कि ‘विभिन्न काव्यों में पढ़े हुये अर्थों का नवीन छाया के द्वारा परिवर्तन कर लेना ही प्राचीन काव्यग्रन्थों के पढ़ने का फल है |’ कुछ लोग कहते हैं कि ‘महाकवियों की बुद्धियाँ मिल खाने वाली होती हैं और वे एक समान अर्थ को उपस्थित करती हैं, अतः अपने काव्यों में पुरानी बातें न आ जायें इसके लिये पुराने काव्यों को पढ़ना चाहिये |’
इस पर यायावरीय राजशेखर का कहना है कि ऐसा नहीं होता | आचार्य इत्यादिकों ने जो कुछ कहा है वह सब ठीक नहीं है | कारण यह है कि कवियों के नेत्र सरस्वती के तत्त्व से ओतप्रोत होते हैं | उनको भी योगियों की समाधि का वरदान प्राप्त हुवा रहता है | उनकी भी समाधि लोकोत्तर होती है जहाँ न वाणी जा सकती है और न मन | कवियों के ऐसे विलक्षण नेत्र समस्त अर्थ-तत्त्व को उनके सामने स्पष्ट कर देते हैं और उन्हें स्वयं वे सब तत्त्व दिखाई पड़ जाते हैं जिनको पुराने कवि देख चुके होते हैं या नहीं देख चुके होते हैं | (तुलसी ने अपनी काव्य-रचना में इसी सारस्वत चक्षु का सहारा लिया था किन्तु दिव्य दर्शन का श्रेय गुरु की चरणरज को दिया था :-
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन । नयन अमिञ्च दुङ्ग दोष विभञ्जन ॥ तेहिकरि विमल विवेक विलोचन । वरणों रामचरित भव मोचन ॥ यथा सुभग्खन आंजि द्रुग साधक सिद्ध सुजान । कोतुक देखहि शैल वन भूतल सूर्ति निघान ॥ )
राजशेखर का कहना है कि—‘यदि महाकवि सो भी रहा हो तो भी सरस्वती उसके सामने शब्द और अर्थ को प्रकट कर देती हैं | दूसरे लोग यदि जाग भी रहे हों तो भी उनके नेत्र अन्धे हो जाते हैं | महाकवि औरों के देखे हुये अर्थ में जन्मान्ध अन्धे होते हैं और दूसरों को नेत्र अन्धे हो जाते हैं | न तो त्रिनेत्र शंकर और न सहस्राक्ष के द्वारा अदृष्ट अर्थ में उन्हें दिव्यदृष्टि प्राप्त होती है | इन्द्र उस वस्तु को देख पाते हैं जिसको चर्मचक्षु वाले कवि लोग देख लेते हैं | सारा विश्व कवियों के मति-दर्पण में प्रतिबिम्बित हो जाता है | महात्मा कवियों के सामने शब्द और अर्थ ‘मैं पहले जाऊँ मैं पहले जाऊँ’ इस होड़ के साथ आगे दौड़ते चले आते हैं कि मैं कैसे देख लिया जाऊँ | सिद्ध प्रणिधान वाले योगी जिसको देखते हैं कवि उसमें वाणी के द्वारा बिहार करते हैं | इस प्रकार कवियों की सूक्तियों का अन्त नहीं मिल सकता |’ ]।१४।
१५
ध्वन्यादि तात्पर्यसंवादानां समुदायारुपाणां वाक्यार्थानां विभक्ता: । सीमान: । पदार्थरुपाणां च वस्त्वन्तरसहशानां काव्यवस्तूनां नास्त्येव दोष इति प्रतिपादयितुमुच्यते— अक्षरादिरचनैव योज्यते यत्र वस्तुरचना पुरातनी । नूतने स्फुरति काव्यवस्तुनि व्यवस्थमेव खलु सा न दुष्यति ॥ १५ ॥
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चतुर्थ
उद्योत:
न हि वाचस्पतिनाऽप्यक्षराणि पदानी वा कानि चिदपूर्वाणि घटयितुं शक्यन्ते । तानि तु तान्येवोपनिबद्धानि न काव्यादिषु नवतां विरुध्यन्ति । तथैव पदार्थरूपाणि श्लेषादिमयानिर्थंतस्वानि ।
(अनु०) इस प्रकार संवाद से युक्त समुदायरूप वाक्यार्थों की सीमाएँ विभक्त ही गईं । ( अब ) पदार्थरूप दूसरी वस्तु के समान काव्यवस्तुओं को दोष नहीं है । यह प्रतिपादित करने के लिये कह रहे हैं— 'अक्षर इत्यादि की रचना के समान स्फुरित होने वाली नवीन काव्यवस्तु में पुरानी वस्तुरचना संयुक्त की जाती है वह स्पष्ट रूप में ही निस्सन्देह दूषित नहीं होती' ॥ १५ ॥ वाचस्पति के द्वारा भी कुछ अपूर्व अक्षर या पद सृजित नहीं किये जा सकते । वे तो उसी रूप में उपनिबद्ध किये हुये नवीनता के विरुद्ध नहीं जाते । उसी प्रकार पदार्थरूप श्लेषादिमय अर्थतत्त्व भी ॥ १५ ॥
१५
(लो०) ससंबादानामिति पाठः । संवादानामिति तु पाटे वाक्यार्थरूपाणां समु दायानां ये संवादाः तैरामितवैय्यधिकारण्येन सृज्यतिः । वस्तुशब्देन एको वा द्वो वा तयो वा चतुरादयो वा पदानामर्थाः । तानि तिबति । अक्षराणि च पदानी च । ताल्येव रुपेण युक्तानि मनागप्यन्यरूपतामनागतानित्यर्थः । एवमक्षरादिरचनैवेतिदृष्टान्तभागं व्याख्याय दाष्टान्तिके योजयति—तथैवेतित । श्लेषादिमयानिति । श्लेषदिस्वभावानित्यर्थः । सद्वृत्ततेजस्विगुणद्विजादयो हि शब्दाः पूर्वपर्वीरपि कविसहृदैः श्लेषच्छायापथा निवघ्यन्ते, निवद्धैरचन्द्रादयश्चोपमानस्वेन । तथैव पदार्थरूपाणीत्यान्त नापूर्वाणि घटयितुं शक्यन्ते इत्यादिविरुध्यन्तीत्येवमन्यत प्राक्तनं वाक्यमभिसंधानीयम् ॥
(अनु०)'ससंबादानाम्' यह पाठ है । 'संवादानाम्' इस पाठ में तो वाक्यार्थरूप समुदायों के जो संवाद उनका इस वैष्यधीकरण्य से सृज्यति होगी । वस्तु शब्द से एक अथवा दो अथवा तीन अथवा चार इत्यादि पदों के अर्थ लिये जाते हैं । 'वे तो' यह । अर्थात् उसी रूप से युक्त तथा थोड़ी भी अन्यरूपता को न प्राप्त हुये । इस प्रकार "अक्षरादिरचना हो" इस दृष्टान्त भाग की व्याख्या करके दाष्टान्तिक में जोड़ते हैं—'उसी प्रकार' यह । 'श्लेषादिमय' यह अर्थात् श्लेष आदि स्वभाव वाले । सद्वृत्त, तेजस्वि, गुण, द्विज इत्यादि शब्द पुराने भी सहृदयों कवियों के द्वारा श्लेष की छाया से निबद्ध किये जाते हैं । और चन्द्र इत्यादि उपमानत्व के रूप में निबद्ध किये गये हैं । 'उसी प्रकार पदार्थरूप' यहाँ पर 'अपूर्वरूप में घटित नहीं किये जा सकते' यहाँ से 'विरुद्ध होते हैं, यहाँ तक पहले के वाक्य का भी अभिसंधान कर लेना चाहिए ॥ १५ ॥
वस्तुयोजना के मेल में तो दोष होता ही नहीं तारावती—ऊपर यह बतलाया गया है कि वाक्यार्थ जो कि शब्दार्थ समुदायरूप होते हैं यदि एक दूसरे से मेल खा रहे हों अर्थात् एक कवि का शब्दार्थसमुदायरूप वाक्यार्थ दूसरे कवि
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के शब्दार्थसमुदायरूप वाक्यार्थ से मेल खा रहा हो तो उसकी सीमायें क्या-क्या होती हैं और कौन सा प्रकार उपादेय है तथा कौन सा प्रकार त्याज्य है । अब इस कारिका में यह बतलाया जा रहा है कि यदि काव्यवस्तु पदार्थ की दिशा में दूसरी वस्तु के समान हो तो उसके मेल खाने में पौनरुक्त्य इत्यादि दोष तो होते ही नहीं । यहाँ पर वृत्तिप्रभ का दो प्रकार का पाठ उपलब्ध होता है—'ससंबादानम्' और 'संवादानाम्' । यदि पहला पाठ माना जाय तो 'ससंबादानाम्' शब्द 'वाक्यार्थानाम्' का विशेषण होगा और यदि दूसरा पाठ माना जाय तो 'समुदायरूपाणां' शब्द 'वाक्यार्थानाम्' यह 'संवादानाम्' का सम्बन्धी होगा । ऐसी दशा में इसका अन्वयार्थ इस प्रकार किया जायेगा—'समुदायरूप वाक्यार्थों के जो संवाद उनका' । प्रथम पाठ में समानाधिकरण्य है और दूसरे में वैषय्यिकरण्य । आशय में कोई भेद नहीं । इस कारिका का भाव यह है कि—रचना करने वाले स्वयं वाचस्पति ही क्यों न हों किन्तु यह कभी नहीं हो सकता कि वे पुराने अक्षर न लिखें यह हो ही नहीं सकता कि अक्षर भी नये कल्पित कर लिये जायँ और उन्हीं का प्रयोग किया जाय । अक्षर पुराने ही जोड़े जाते हैं । इसी प्रकार वाड्मय में जो शब्द निश्चित हैं उन्हीं शब्दों का प्रयोग किया जाता है । यह भी सम्भव नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने नये शब्द बनाया करे और उन्हीं का प्रयोग किया करे । आशय यह है कि पुराने ही शब्दों का प्रयोग किया जाता है और पुराने ही अक्षरों का प्रयोग किया जाता है,
किन्तु इस तथ्य के आधार पर यह कोई नहीं कहता कि कवि ने कोई नई बात नहीं कही है । पुराने अक्षरों और पदों का प्रयोग नवीनता का विरोधी नहीं होता । उसी प्रकार जब नवीन रूप में स्फुरित होने वाली काव्यवस्तु में पुरानी वस्तुरचना संश्लिष्ट की जाती है तब स्फुट ही उसमें पौनरुक्त्य का दोष नहीं होता । यहाँ पर 'वस्तुरचना' शब्द से वस्तु का आशय यह है कि बहुत से शब्दों के अर्थ एक होते हैं, बहुतेरों के दो, बहुतेरों के तीन, बहुतेरों के चार या इससे भी अधिक होते हैं । इस प्रकार के शब्दों के आधार पर जहाँ पुरानी वस्तुरचना संयुक्त की जाती है और उसका पर्यवसान नवीनता में होता है, वहाँ पर दोष नहीं होता । वे अक्षर और पद वे ही अर्थात् अपने ही रूप में निबद्ध किये जाते हैं और उनमें थोड़ी भी अन्यरूपता नहीं आती । यह है दृष्टान्त । इसका दार्ष्टान्तिक यह है कि उसी प्रकार शब्द पर आश्रित कोई अर्थतत्त्व भी जब पुराना ही होता है और नया कवि उसे नये ढंग से प्रस्तुत करता है तब उनमें भी पुरानापन नहीं रह जाता । श्लेषादिमय अर्थ-तत्त्वों के विषय में भी यही बात कही जा सकती है । सहस्त्रों कवि अनेक परम्पराप्राप्त श्लिष्ट शब्दों का प्रयोग करते रहते हैं जैसे सद्वृत्त के अर्थ हैं सदाचार, गुणवान्, वतुंलाकार, सदाचार, सत्वभाव इत्यादि । इसी प्रकार तेजस्वी शब्द के अर्थ हैं—प्रकाशमान, शक्तिशाली, उदात्त, प्रदीप्त, अभिमानी इत्यादि । गुण शब्द भी अनेक रूपों में प्रयोग किया जाता है—सामान्य विशेषता, अच्छी विशेषता, उपयाग ( कः स्थानलाभे गुणः ? ), परिणाम, सूत्र, धनुर्ज्या इत्यादि । डिंज के अर्थ हैं पक्षी, दांत, नक्षत्र इत्यादि । श्लेष के लिये कवि लोग प्रायः इन्हीं तथा इन जैसे दूसरे शब्दों का आश्रय लिया करते हैं । जैसे शिलीमुख, हरि, कोशिक, विष, कमल इत्यादि । अनेकशः इन शब्दों का श्लेषमयी रचनाओं के लिये प्रयोग होता है किन्तु इनमें पुरानापन नहीं आता ।
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चतुर्थ
उद्योत:
के लिए चन्द्र और कमल; नेत्रों के लिये इन्दीवर, खञ्जन, हरिण; स्तनों के लिए कलश, पर्वत; केशों के लिए मयूरकलाप, भुजङ्ग, तिमिर, सर्प इत्यादि की उपमाएँ अनादि काल से दी जाती रही हैं । किन्तु इनमें कभी पुरानेपन नहीं आया । इस पुरानेपन न आने का कारण यही है कि पद्यों में पदार्थवस्तु के पुराने होते हुये भी उनकी अन्तरात्मा नई ही होती है । यहाँ पर वृत्तिग्रन्थ का अन्तिम वाक्य पिछले वाक्यों के सन्दर्भ मे उनसे मिलाकर पढ़ा जाना चाहिए । इस प्रकार पूरा वाक्य यह हो जायेगा—‘तथैव पदार्थरूपाणि श्लेषादिमयानर्थतत्स्वानि न हि कानिचिदपूर्वाणि घटयितुं शक्यन्ते । तानि तु तान्येवोपनिबन्धादिषु नवतां विरोधयन्ति’
चतुर्थ
उद्योत:
इस वाक्य का आशय यही है कि जिस प्रकार महान् से महान् कवि नये अक्षर नहीं लिख सकता या नये शब्दों का प्रयोग नहीं कर सकता अपितु पुराने अक्षरों और पुराने शब्दों का ही प्रयोग किया करता है फिर भी नवीनता में न्यूनता नहीं आती । उसी प्रकार कवि शब्दों के अर्थों ओर श्लेष इत्यादि के क्षेत्र में परम्परा का ही पालन करता रहता है और पुराने अर्थों को ही लिखता रहता है फिर भी उसकी नवीनता नष्टित नहीं हो जाती । इस समस्त कारिका करने पर भी कवि किस प्रकार नवीन बना रह सकता है यह बतलाया गया है कि पिछली कारिकाओं में समस्त वाक्यार्थ के अपहरण कारिका में यह बतलाया गया है कि उसी प्रकार विशिष्ट पदों के अर्थों का अपहरण करके भी कवि नवीन बना रह सकता है ॥ १५ ॥
चतुर्थ
उद्योत:
१५
(ध्वन्या०) तस्मात्— यदपि तदपि यत्र लोकस्य किञ्चिच्चित्त- स्फुरणं प्रति मदमितोयं बुद्धिरस्मुज्जिहीते । स्फुरणेयं कार्चिदिति सहृदयानां चमत्कृतिरुत्पद्यते । अनुगतमपि पूर्वच्छाया वस्तु ताहक् । सकविःशक्तिनिबन्धनं निर्वाह्यतां नोपपद्यते ॥१६॥ तदनुगतमपि पूर्वचायापया वस्तुताहकृताहकं सुकविविवक्षितगयड्ढचवाच्यार्थ- सम्पण्ङसमर्थशब्दरचनारूप्यया बन्धच्छायोपनिबन्धनं निन्द्यतां नैव याति ॥१६॥
(अनु०) उससे— ‘जहाँ लोक की यह बुद्धि उत्पन्न होती है कि यह कुछ स्फुरित हुआ है वह चाहे जो हो रमणीय होता है ।’ यह कोई स्फुरण है अतः सहृदयों में चमत्कार उत्पन्न होता है । ‘सुकवि उस प्रकार की वस्तु को पूर्वच्छाया के रूप में भी उपनिबद्ध करते हुए निन्द्यता को प्राप्त नहीं होता ॥१६॥ तो पूर्वच्छाया से अनुगत भी उस प्रकार की वस्तु विवक्षित गूढ़ और वाच्य अर्थ के सम्पण्ड में समर्थ शब्दरचनारूप बन्धच्छाया के द्वारा उपनिबद्ध करते हुए कवि निन्द्यता को प्राप्त नहीं होता ।
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(लो०) लोकस्येति व्याचष्टे—सहृदयानामिति । चमत्कृतिरिरति । आस्वादप्रधाना बुद्धिरित्यर्थः: अभ्युद्जिहीति इति व्याचष्टे—उद्भूत इति । उदेतीत्यर्थः । बुद्धिरेवाकारं दर्शयति—स्फुरणेयं काचिद्विति । 'यदपि तदपि रस्म्यं .......नोपयाति' इति कारिका खण्डीकृत्य पठिता ।
('लोक की' इसकी व्याख्या करते हैं—'सहृदयों का' यह । 'चमत्कृति' यह । (अनु०) 'लोक की' इसकी व्याख्या करते हैं—'उत्पन्न होती है' । अर्थात् आस्वादप्रधाना बुद्धि । 'अभ्युद्जिहीति' इसकी व्याख्या करते हैं—'उद्भूत है' । अर्थात् उदय होती है । बुद्धि के ही आकार को दिखलाते हैं—'यह कोई सम्मुख है' । 'यदपि तदपि रस्म्यं .......नोपयाति' इस कारिका को खण्डित करके पढ़ा गया है ।११६॥
प्रस्तुत प्रकरण का उपसंहार
तारावती—सोलहवीं कारिका उपसंहारात्मक है । इस कारिका में पूर्वार्द्ध की दो पंक्तियाँ लिखी गई हैं । फिर 'स्फुरणेयं......उद्भूयते' यह वृत्तिकार की पंक्ति है । उत्तरार्द्ध की दोष दो पंक्तियाँ बाद में लिखी हुई हैं । इस कारिका का सारार्थ यह है—जिस कविता को पढ़ कर सहृदयों की बुद्धि में यह आभासित होने लगे कि इस कविता में कुछ स्फुरित हुआ है वह चाहे पुराना हो चाहे नया, रमणीय ही कहा जायगा । 'कुछ स्फुरित' होने का आशय यह है कि जिसके पढ़ कर सहृदय लोग चमत्कृत हो जायँ अर्थात् सहृदयों की बुद्धि में आस्वाद उत्पन्न हो जाय । तात्पर्य यह है कि रमणीयता का एकमात्र आधार है—सहृदयों को आस्वादमय चमत्कार की अनुभूति । यदि वह अनुभूति उत्पन्न हो जाती है तो इस बात का कोई महत्व नहीं रह जाता कि उस अनुभूति का साधन क्या है ? क्या वह कोई नया अर्थ है या पुराना ? इन प्रश्नों का कोई महत्व नहीं रह जाता । अतएव यदि कवि ऐसी वस्तु का उपनिबन्धन करता है जो आस्वादमय चमत्कार को उत्पन्न करती है तो फिर वह चाहे पुरानी छाया से अनुगत ही क्यों न हो उस कवि की निन्दा नहीं होती । हाँ शर्त यह है कि उसकी अभिव्यक्ति शिथिल नहीं होनी चाहिए । कवि जिस व्यङ्ग्यार्थ को अभिव्यक्त करना चाहता है और उसके लिए जिस वाच्यार्थ का अभिधान करता है और उन दोनों व्यङ्ग्य-वाच्य अर्थों के सम्पर्ण करने में उसकी शब्दरचना समर्थ अवश्य होनी चाहिए और उसकी बन्धचातुर्य भी उतनी ही शक्त होनी चाहिए ।११६॥
(ध्वन्या०) तदित्थं स्थितम्— प्रतायन्तां वाचो निमित्तविविधार्थामृत्ररसा । न साधः कर्तव्यः कविविभववधे स्वविषये ॥ सन्ति नवाः काव्यार्थाः परोऽनुपदद्यार्थविरचनैः कवित्कवेभुं इति भावयितवा । परस्वादानेच्छा विरतमनसो वस्तु सुक्तवे: सरस्वत्यैवैषा घटयति यथेष्टं भगवती ॥११७॥
परस्वादानेच्छाविरतमनस: सुकवैः सरस्वत्यैषा भगवती यथेष्टं घटयति वस्तु । येषां सुकवीनां प्राक्तनपुण्यास्यसंपरिपाकवशेन परोपरचितार्थपरिप्रहप्रवृत्तिस्वोक्तिनिषेधां
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चतुर्थ
उद्योतः
११७
निस्पृहाणां स्वव्यापारो न क्वचिदुपयुज्यते ! सैव भगवती सरस्वती स्वयमभिमतमर्थमारिभावयति। एतदेव हि महाकवित्वं महाकवीनामित्योम् ॥११७॥
(अनु०) वह इस प्रकार स्थित है— 'विविध अर्थों का अमृतरस मिला दिया गया है इस प्रकार की वाणियाँ कवियों द्वारा विस्तारित की जायें। उन्हें अपने अनिन्दनीय विषय में विस्तार नहीं करना जापिये।' नये काव्यार्थ हैं; दूसरों द्वारा उपनिबद्ध अर्थ की रचना में कवि का कोई गुण नहीं है यह समझ कर । 'दूसरे के अर्थ का आदान करने की इच्छा से विरत कवि की वस्तु को यह भगवती सरस्वती ही यथेष्ट रूप में सँपुटित कर देती है ।' दूसरे के अर्थ का आदान करने की इच्छा से विरत मन वाले सुकवि की यह सरस्वती भगवती ही यथेष्ट वस्तु सँपुटित कर देती है। जिन सुकवियों की प्रवृत्ति पुराने पुण्यों से और अभ्यास के परिपाक के कारण होती है दूसरों द्वारा उपनिबद्ध अर्थ के ग्रहण करने में निस्पृह उन कवियों का अपना व्यापार कहीं उपयुक्त हो नहीं होता। वह भगवती सरस्वती स्वयं अभिमत अर्थ का आविर्भाव कर देती है। यहीं महाकवियों का महाकवित्व है। बस आनन्द मज़ूल हो ॥११७॥ (लो०) स्व विषय इति । स्वयं तात्कालिकल्वेनास्फुरित इत्यर्थः । परस्वादानेच्छया विरतमनसो वस्तु सुकवे:रिति । तृतीय: पद: कुतः खल्वपूर्वंमनयामित्याशायेन निरुद्योग: परोपनिबद्धवस्तूपजीवको वा स्यादित्याशङ्कयैवेतत् । कारिकायां सुकवे:रिति जातावेकवचनमित्यभिप्रायेण व्याघटे—सुकवीनामिति । एतदेव स्पष्टयति—प्राक्तने त्यादिना तेषामित्यन्तेन । आविर्भावयतीति नूतनमेव सृजतीत्यर्थ: ॥ १७ ॥ (अनु०) 'स्वविषयं' यह । अर्थात् स्वयं तात्कालिक रूप में स्फुरित न हुए । 'परस्वादानेच्छा' इत्यादि द्वितीय इलोकार्थ पूर्वोपस्कार के 'परस्वादानेच्छा विरतमनसो वस्तु सुकवे:' यह तृतीय पद है। कहाँ से अपूर्वता लायें इस आशय से निहृद्योग या परोपनिबद्ध वस्तु का उपजीवक हो जाय यह शङ्का करके कहते हैं—'सरस्वती ही' यह । कारिका में 'सुकवे:' यह जाति में एक वचन है। इस अभिप्राय से कहते हैं—'सुकवियों का' यह । इसी को स्पष्ट करते हैं—'प्राक्तन' इत्यादि से लेकर 'न तेषाम्' इस तक । 'आविर्भूत कर देती है' अर्थात् नूतन ही रच देती हैं ॥११७॥
कवियों को निःशङ्क होकर कविता करने का उपदेश
१७वीं कारिका में कवियों को निःशङ्क होकर रचना करने का उपदेश दिया गया है। इस कविता का सारांश यह है—कि कवि को निःशङ्क होकर अपनी भारती का यथेष्ट विस्तार करना चाहिये। जो कुछ भी स्फुरित हो उसको निःसङ्कोच भाव से व्यक्त कर देना चाहिए। किन्तु यह ध्यान रखना चाहिए कि उसकी वाणी से जो वर्ण या शब्द निकलें वे
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ध्वन्यालोके
अर्थगर्भित हों और प्रत्येक अर्थ अमृतोपम काव्यरस से ओतप्रोत हो। उसको यह समझ लेना चाहिए कि कविता का अनन्त क्षेत्र हो सकता है और कवि के असंख्य विषय हो सकते हैं। कोई भी विषय कवि की वाणी में आकर निन्दनीय नहीं रह जाता। अतः कवि को अपने मन में अवसाद नहीं आने देना चाहिए कि उसकी वाणी निम्न कोटि की है, अथवा उसकी वाणी में नवीनता नहीं है, या उसकी वाणी सहृदयसंवेद्य नहीं है। उसे यह समझकर भी कि 'नये काव्यार्थ विवमान हैं ही' पुराने अर्थों को मन में अवसाद नहीं आने देना चाहिए। साथ ही जिन लोगों की यह दृढ़ धारणा लेकर कविता करने में कवि की क्या विशेषता? बन गई है कि नवीन अर्थ के लिखने में ही कवि का गौरव होता है पुराना अर्थ लिखना उसके लिए व्यर्थ है उन्हें भी यह समझकर निराश नहीं होना चाहिए कि अब हम नया अर्थ कहाँ से ले आवें। क्योंकि यदि उनकी यह धारणा बन जायेगी तो या तो वे काव्य-क्रिया से विरत हो जायेंगे या दूसरों के बनाये हुए काव्य का आश्रय लेकर उसी की आधीन कविता करने लगेंगे। ये दोनों स्थितियाँ श्रेयस्कर नहीं हैं। न तो उनका काव्य-क्रिया को छोड़ बैठना ही वाञ्छनीय है और न सर्वथा परमुखापेक्षी हो जाना ही उचित है। (ऐसी दशा में या तो काव्यरचना होगी ही नहीं या यदि होगी भी तो प्रतिबिम्बकल्प अथवा आलेख्यप्राय तो काव्यरचना होगी ही नहीं या यदि होगी भी तो प्रतिबिम्बकल्प अथवा आलेख्यप्राय होगी। यह बतलाया जा चुका है कि इस प्रकार की रचनाओं साहत्य-जगत् में वाञ्छनीय नहीं होंगी।) तब प्रश्न यह है कि ऐसे लोगों को और चारा ही क्या है जिन्होंने दूसरों की रचनाओं से भावापहरण कर रचना न करने का व्रत ले लिया है? उनकी धारणा यह है कि कवियों की कविता भी उनका एक धन है। अतः उनके भाव को लेना दूसरों की सम्पत्ति की चोरी करना जैसा है। ('स्व' शब्द का अर्थ धन भी है और यहाँ पर उसका अर्थ काव्यार्थ भी है।) इसका उत्तर यह है कि उन्हें भी निराश होने की आवश्यकता नहीं। क्योंकि भगवती सरस्वती में अपूर्व शक्ति है। वे ऐसे लोगों के हृदय में स्वयं ही उस समस्त नवीन अर्थ-समूह को सङ्घटित कर देती हैं जो कि एक कवि के लिये वाञ्छनीय होता है। वे भगवती यह क्रिया किसी एक कवि पर ही नहीं करती अपितु कवियों की पूरी जाति पर उनकी यह अनुकम्पा होती है। जिन कवियों की काव्य में प्रवृत्ति या तो पूर्वजन्म के सञ्चित पुण्यों के प्रभाव से होती है या अभ्यास का पूरा परिपाक कर लेने पर उन कवियों की प्रवृत्ति होती है तथा दूसरों के रचे हुये अर्थ का उपादान करना ही नहीं चाहते उनको यह आवश्यकता कता नहीं होती कि वे स्वयं अपने प्रयत्न से नवीन अर्थों की कल्पना करें। यह तो भगवती सरस्वती की उन पर अनुकम्पा का ही प्रभाव है कि उन्हें नये-नये अर्थ एकदम दृष्टिगत हो जाते हैं। भगवती सरस्वती की इस प्रकार की कृपा प्राप्त कर लेना ही महाकवित्व का सबसे बड़ा लक्षण है। (ऐसे ही कवियों को राजशेखर ने सारस्वत कवि कहा है।)
१७
यस्याहास्तु समाहितं सुकृतिभिः सर्वे समासाद्यते । काव्याऽर्थैर्द्विलसौख्यधाम्नि विभुधोद्याने ध्वनिर्दोऽशातः सोऽयं कल्पतरूपमानमहिमाऽऽयोग्योऽस्तु भग्यात्मनां ।
(ध्वन्या०) यस्यैकृत्सरसाश्रयविततगुणालङ्कारशोभाभृता,
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चतुर्थ
उद्योत:
(अनु०) इस प्रकार अक्लिष्ट रस के आश्रय से उचित गुण और अलङ्कार को शोभा को धारण करने वाले, जिससे समीहित समस्त वस्तु पुण्यात्माओं के द्वारा प्राप्त कर ली जाती है, समस्त सौख्य के धाम इस काव्य नामक देवोद्यान में छवि प्रदर्शित की गई है। जिसकी महिमा कल्पवृक्ष की उपमा वाली है वह यह भव्य आत्मवालों के उपभोग के योग्य बने।
चतुर्थ
उद्योत:
(लो०) इतोति। कारिकातद्वृत्तिनिरुपणप्रकारेणेत्यर्थः। अक्लिष्टा रसाश्रयेण उचित्तये गुनालङ्कारास्ततो या शोभा तां बिर्भाति काव्यमू। उद्यानमप्यक्लिष्टः कालोचितो यो रसः सेकादिकृतः तदाश्रयस्तत्कृतो यो गुणानां सौकुमार्यच्छायावत्स्वसौगन्ध्यप्रभृतीनांलङ्कारः पर्याप्तताकारणं तेन च या शोभा तां बिर्भाति। यस्मादिति। सर्वसमीहितमिति। व्युत्पत्तिकरीतिप्रीतिकरणमित्यर्थः। एतच्च सर्वं पूर्वमेव वितत्योक्कमितिश्लोकार्थमात्रं व्याख्यातम्। सुकृतिभिरिरिति। ये कष्टोपदेशेऽपि विना तथाविधफलभाज। तैरित्यर्थः। अखिलसौख्यधाम्नीतिः। अखिलदुःखलेशेऽन्यनुविद्धं यत्सौख्यं तस्य धाम्नि एकायतन इत्यर्थः। सर्वथा प्रियं सर्वथा हितं च दुर्लभं जगतीतिति भावः। विवुधैश्च काव्यतत्स्वविदः द्वौशल इति। स्थित एवं सन्न प्रकाशितः। अप्रकाशितस्य हि कथं भोग्यत्वम्। कल्पतरुणा उपमानं यस्य तादृश् महिमा यस्येति बहुव्रीहिरभोस् बहुव्रीहिः। सर्वसमीहितप्राप्तिहि काव्ये तदायत्ता। एतच्चोक्कं विस्तरत।
चतुर्थ
उद्योत:
(अनु०) 'इस प्रकार' यह। अर्थात् कारिका और वृत्ति के निरुपण के प्रकार से। रस के आश्रय से उचित (और) क्लेशरहित जो गुण और अलङ्कार उनसे जो शोभा उसको (जो) धारण करता है (अर्थात्) काव्य। उद्यान भी अक्लिष्ट अर्थात् कालोचित जो सेक इत्यादि से उत्पन्न रस उसको आश्रय वाला अर्थात् उससे किया हुआ जो गुणों का अर्थात् सौकुमार्य छायावस्तु सौगन्ध्य इत्यादि का अलङ्कार अर्थात् पर्याप्त कर देना उससे जो शोभा उसको धारण करता है। 'जिससे' यह। अर्थात् काव्य नामक उद्यान से। 'सभी' समीहित यह। अर्थात् व्युत्पत्ति को करनेवाला और प्रीतिलक्षणवाला। यह सब पहले ही विस्तारपूर्वक बता दिया गया है। इसलिये श्लोक के अर्थमात्र की व्याख्या की गई है। 'सुकृतियों के द्वारा' यह। अर्थात् जो कष्टोपदेश के बिना भी उस प्रकार का फल प्राप्त करने वाले है उनके द्वारा। 'समस्त सुख के धाम' यह अखिल अर्थात् दुःखलेश से भी अननुविद्ध जो सौख्य, उसके धाम अर्थात् एक मात्र आयतन। भाव यह है कि सर्वथा प्रिय और सर्वथा हित लोक में दुर्लभ है। विवुधोद्यान अर्थात् नन्दन सुकृतियों का अर्थात् किया है ज्योतिष्टोम इत्यादि जिन्होंने उनकी समोहित प्राप्ति के निमित्त। विवुध काव्यतत्स्ववेदा भी (कहलाते हैं)। 'दिखलाया है' यह। स्थित होता हुआ ही प्रकाशित किया गया है; अप्रकाशित का भोग्यत्व कैसा ? 'कल्पतरूपमानमहिमा' में बहुव्रीहिरभित बहुव्रीहि है—कल्पतरु से उपमान है जिसका, उस प्रकार की महिमा है जिसकी। काव्य में निस्सन्देह समोहित प्राप्ति एकमात्र उसी के अधीन है। और यह विस्तारपूर्वक बता दिया गया है।
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तारावती—यहाँ पर वृत्तिग्रन्थ समाप्त होता है और इस समाप्ति की सूचना देने के लिये आनन्दवर्धन ने ‘इत्योम्’ शब्द का प्रयोग किया है । ओम् शब्द मङ्गलाचरणपरक है क्योंकि स्मृति में कहा गया है कि अथ और ओम् शब्द पहले ब्रह्माजी के कण्ठ को भेद कर निकले थे अतः दोनों माङ्गलिक हैं । यहाँ पर ‘ओम्’ का प्रयोग आशीर्वादात्मक मङ्गल के लिये किया गया है । इसका आशय यह है कि बस, अब मैं वह सब कुछ कह चुका जो मुझे ध्वनि-कारिकाओं की व्याख्या में कहना था । यदि कुछ शेष रह गया है, तो बस यही कि पाठकों का—सम्मस्त विश्व का कल्याण हो । यहाँ पर यह समझना ठीक नहीं है कि ‘इत्योम्’ यह शब्द वृत्ति-भाग की समाप्ति का सूचक है; अतः बाद के दोनों पद्य कारिका-भाग समझे जाने चाहिये । यहाँ पर ‘इत्योम्’ शब्द केवल इस बात का सूचक है कि वृत्तिकार को कारिकाओं की व्याख्या में जो कुछ कहना था वह उसने कह दिया । अब अगले दोनों पद्य उसके अपने निवेदन हैं जो कि उसने उपसंहार के रूप में पाठकों के सामने प्रस्तुत किये हैं ।
उपसंहारात्मक कारिकाओं में ग्रन्थ के विषय इत्यादि का उल्लेख
अब उपसंहार के रूप में लिखे गये दोनों पद्यों में ग्रन्थकार ( वृत्तिकार ) ग्रन्थ के विषय, सम्बन्ध, प्रयोजन इत्यादि का उल्लेख कर रहे हैं । यहाँ पर पहले पद्य में काव्य पर नन्दनवन का आरोप किया गया है और ध्वनि को कल्पवृक्ष की उपमा दी गई है । यहाँ पर कई शब्द द्वचर्यंक हैं—( १ ) रस—काव्यरस तथा जल, ( २ ) गुण—माधुर्यादि तथा सौकुमार्य इत्यादि, ( ३ ) अलङ्कार—उपमा इत्यादि तथा सीमा तक पहुँचा देना, ( अलम् अर्थात् समात्ति और कार अर्थात् करना ), ( ४ ) समीहित वस्तु—व्युत्पत्ति, कीर्ति, प्रीति इत्यादि तथा मनचाही वस्तु, ( ५ ) सुकृति—काव्यतच्ववेत्ता सहृदय तथा समीहित की प्राप्ति के लिए ज्योतिष्टोम इत्यादि यज्ञ करनेवाले, ( ६ ) विभुध—विद्वान् तथा देवता । यहाँ पर देवोद्यान नन्दन अप्रसुत है और काव्य प्रस्तुत है । यहाँ पर उपमानोपमेय भाव के अनुसार इस पद्य का यह अर्थ होगा—जिस प्रकार अक्लिष्ट अर्थात् समयानुसार बिना कष्ट के प्राप्त रस अर्थात् जल से सींचने इत्यादि के आश्रय से देवोद्यान अर्थात् नन्दन वन, उद्यान के सभी वांछनीय गुणों की चरम सीमा प्राप्त कर लेता है—वे गुण हो सकते हैं सौकुमार्य, कोमल छायावस्तु, सोगन्ध्य इत्यादि । तथा जिन लोगों ने समीहित की प्राप्ति के लिए ज्योतिष्टोम इत्यादि यज्ञ किये हैं और पुण्यों के प्रभाव से वे नन्दनवन में विहार करने के अधिकारी बन गये हैं वे लोग उस नन्दनवन से अपनी मनचाही सभी वस्तु प्राप्त कर लेते हैं उसी प्रकार का यह काव्यजगत् नन्दनोद्यान की उपमावाला है । इसमें भी गुणों और अलङ्कारों को संयोजन इस रूप में की जाती है कि उनके संयोजन में यह प्रतीत नहीं होता कि बलात् उनको काव्य में समाविष्ट किया गया है और उन ( गुणों और अलङ्कारों ) का प्रयोग रस-निष्पत्ति के अनुकूल भी होता है । काव्य में इस प्रकार के गुणों और अलङ्कारों का सौन्दर्य विद्यमान रहता है । जिस प्रकार नन्दनवन से पुण्यात्माओं को सब कुछ मिल जाता है उसी प्रकार जिन लोगों को अपने प्राक्तन पुण्यों के प्रभाव से सहृदयता प्राप्त हो गई है वे काव्य से व्युत्पत्ति, कीर्ति, प्रीति इत्यादि सभी कुछ प्राप्त कर लेते हैं । काव्य-प्रयोक्ताओं के प्रसङ्ग में इन तत्वों का
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चतुर्थ
उद्योतः
विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है वहीं देखना चाहिए। यह काव्यरूपी विभुधोद्यान समस्त सुखों का धाम है। क्योंकि सुख दो प्रकार का होता है—एक तो लौकिक सुख और दूसरा अलौकिक सुख। लौकिक सुख में दुःख का अंश अवश्य विद्यमान रहता है। इसके प्रतिकूल अलौकिक सुख वही होता है जो दुःख से सर्वथा विनिर्मुक्त हो। स्वर्ग में नन्दनवन-विहार और काव्यास्वाद दोनों ही दुःख से संबद्ध नहीं होते। इनमें केवल सुख ही सुख होता है। (काव्यप्रकाशकार ने काव्य-सूत्रों की हृदयङ्गमयता बतलाया है।) इसमें दुःखाश्रयों में भी केवल आह्लाद हो होता है। आशय यह है कि जगत् में सर्वथा प्रिय और सर्वथा हित दुर्लंभ ही होता है। किन्तु काव्य तथा नन्दनोद्यान में सभी कुछ आनन्दमय ही होता है। इस काव्यरूपी नन्दनोद्यान में ध्वनि की महिमा कल्पवृक्ष की उपमावाली है। ‘कल्पतरुपमानमहिमा’ में दो बहुव्रीहि हैं। एक है ‘कल्पतरुपमान’ में, ‘कल्पतरु है उपमान जिसक’ा और दूसरा है ‘कल्प-रुपमानमहिमा’ में अर्थात् कल्पतरु की उपमावाली है महिमा जिसकी। काव्यरूपी नन्दनोद्यान में ध्वनिरुपी कल्पवृक्ष पहले से ही विद्यमान था किन्तु इस नन्दनोद्यान में विचरण करने वाले लोग इसे जानते ही नहीं थे। अब इस ध्वन्यालोक की रचना से लोग जान गये हैं कि इस उद्यान में यह कल्पवृक्ष है। कल्पवृक्ष नन्दनोद्यान में अपनी सत्ता-मात्र से ही उपभोग का साधन नहीं बन सकता। इसके लिए आवश्यकता होती है कोई आकर उस कल्पवृक्ष के दर्शन करा दे। आनन्दवर्धन ने ध्वन्यालोक लिखकर उसी कल्पवृक्ष के दर्शन करा दिये हैं। अब आनन्दवर्धन की कामना यह है कि यह कल्पवृक्ष उन लोगों के उपभोग का साधन बने जिनकी आत्माएँ सच्ची तथा होनहार हैं। (कल्पवृक्ष सभी इच्छाओं को पूरा कर देता है और यह ध्वनि-सिद्धान्त भी काव्य के सभी तत्त्वों को आत्मसात् करा देता है।)
चतुर्थ
उद्योतः
सत्काव्यतत्त्ववर्त्मचिरप्रसुप्तकल्पं मनस्सु परिपक्वधियां यदासीत् । तद्व्याकारोत्तसहृदयोदयलाभहेतोरानन्दवर्धन इति प्रथिताभिधानः ॥ इति राजानकानन्दवर्धनाचार्यविरचिते ध्वन्यालोके चतुर्थ उद्योतः॥
(अनु०) सत्काव्यतत्त्व की नीति का मार्ग जो परिपक्व बुद्धिवालों के मनों में बहुत समय से सोया हुआ जैसा था उसकी सहृदयों के उदयलाम के लिये आनन्दवर्धन इस प्रसिद्ध नाम वाले (आचार्य) ने व्याख्या की। यह है श्रीराजानक आनन्दवर्धनाचार्य कृत ध्वन्यालोक का चौथा उद्योत।
चतुर्थ
उद्योतः
सत्काव्यतत्त्ववर्त्मचिरप्रसुप्तकल्पं मनस्सु परिपक्वधियां यदासीत् । तद्व्याकारोत्तसहृदयोदयलाभहेतोः— इति सङ्गतार्थविशयप्रयोजनोपसंहारः । इयं बाहुल्येन लोको लोकप्रसिद्धया- सम्भावनाप्रत्ययबलेन प्रवर्तते । स च सम्भावनाप्रत्ययो नाम श्रवणवशात्प्रसिद्धानां- तदीयसमाचारकवित्वविदग्धतादिसमनुसरणेन भवति । तथाहि भर्तृहरिणदं कृतं यस्याय- मोदायर्महिमा यस्यास्मच्छास्त्रे एवंविधस्सारो दृश्यते तस्यायमिलोकप्रबन्धस्तस्मादा-
यह ग्रन्थ समाप्त हुआ। (लो०) सत्काव्यतत्त्ववर्त्मचिरप्रसुप्तकल्पं मनस्सु परिपक्वधियां यदासीत् ।
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दरणीयमेतदितिलोक्तः प्रवर्तमानो दृश्यते। लोकरुचावश्यं प्रवर्तनीयः तच्छास्त्रोदितप्रयोजनसम्पत्तये। तदनुग्राह्यश्रोतृजनप्रवर्तननाऽऽत्वाद्वाग्रन्थकाराः स्वनमनिबन्धनं कुर्वन्ति, तदभिप्रायेणाह—आनन्दवर्धन इति। प्रतितशब्दनेतदेव प्रतितं यत्तु तदेव नामश्रवणं केषाञ्चिन्निवृत्ति, तन्मात्सर्यविजृम्भितं नात्र गणनीयम, निःश्रेयसप्रयोजनदेव हि श्रुतात्कोजिप रागान्धो यदि निवर्तते किमेतावता प्रयोजनमप्रयोजनमवश्यं वस्तव्यमेव स्यात्। तस्मादथिनां प्रवृत्त्यर्थं नाम प्रसिद्धम्। स्फुटीकृतार्थत्वादप्रसादायिनीयम्॥
१
तुर्यां शक्तिमहं वन्दे प्रत्यक्षार्थनिर्दाशिनीम्॥ १॥
आनन्दवर्धनविवेकविकासिकाव्यालोकार्थतस्वघटनानुभेदसारम्। यत्प्रोन्नमर्षकलसद्विदुष्यप्रकाशि व्यापार्यंताभिनवगुप्तविलोचनं तत्॥ २॥ श्रीसिद्धिचेलचरनावज्जपरागपुष्टभट्टेन्द्रराजमतिसंस्कृतबुद्धिलेशः। वाक्यप्रमाणपदवेदिगुरुः प्रबन्ध सेवारसो व्यरचयदध्वनिवस्तु वृत्तिम्॥ ३॥ सज्जनानां कविरसो न याचते ह्लादनाय शाब्दृकर्मार्थितः। नैव निम्नति खलानां मुहुमुंहुः धिक्कृतोऽपि नहि शीतलोऽनलः॥ ४॥ वस्तुतश्शिवमये हृदि स्फुटं सर्वतश्शिवमयं विराजते। नाशिवं वचनं कस्यचिद्धः तेन वाश्शिवमयी दशा भवेत्॥ ५॥
इति महामाहेश्वराभिनवगुप्तविरचिते काव्यालोकोचने चतुर्थ उद्योतः। समासरुचायं ग्रन्थः॥
(अनु०) 'सत्काव्य....लाभ हेतोः' यह समन्वय, अभिषेय और प्रयोजन का उपसंहार है। यहाँ लोक अधिकता से लोकप्रसिद्धि से सम्भावना के विश्वास के बल पर प्रवृत्त होता है। वह सम्भावना का विश्वास नाम सुनने से उसके अन्य प्रसिद्ध समाचार कवित्व विदग्धता इत्यादि का अनुसरण करने से होता है। वह इस प्रकार—भट्टुंहरि के द्वारा यह किया गया है जिसकी यह औदार्य महिमा है। जिसका इस शास्त्र में इस प्रकार का सार दिखाई देता है, उसका यह श्लोक प्रबन्ध है, इससे यह आदरणीय है। इस बात को लेकर लोक प्रवृत्त होता हुआ देखा जाता है। उस शास्त्र में कहे हुए प्रयोजन की पूर्ति के लिये लोक को अवश्य प्रवृत्त किया जाता है। इसलिये अनुप्राप्त श्रोताजनों के प्रवर्तन का भझ होने के कारण ग्रन्थकार अपने नाम का निबन्धन करते हैं। उस अभिप्राय से कहते हैं—'आनन्दवर्धन' यह। प्रतित शब्द से जो यह प्रकाशित किया गया है वही नाम श्रवण किसी की निवृत्ति कर देता है; इसलिये मात्सर्य के विजृम्भण को यहाँ पर नहीं गिना जाना चाहिए। नि:श्रेयस प्रयोजन वाले ही शास्त्र से यदि कोई रागान्ध निवृत्त हो जाय तो क्या इतने से ही प्रयोजन को अप्रयोजन कहना आवश्यक हो जायेगा। इसलिये प्रसिद्ध नाम अर्थों की प्रवृत्ति का भझ होता है। मन में स्पष्त किये हुये अर्थ वैचिज्य को बाहर प्रसार देनेवाली प्रत्यक्षार्थ को दिखलाने वाली चौथी शक्ति की हम वन्दना करते हैं।
आनन्दवर्धन के विवेक से प्रकाशमान काव्यालोक के अर्थतस्व को संयोजित करने से
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चतुर्थ उद्योत:
जिसके सारपूर्ण होने का अनुमान लगाया जा सकता है, जो सब प्रकार के भलीभांति प्रकट होने वाले विषयों को प्रकाशित करने वाला है इस प्रकार के अभिनवगुप्त के नवीन और गुम विलोचन को क्रियाशील बनाया गया है ॥३२॥
श्री सिद्धिचैल के चरणकमलों की पराग से पवित्र हुये भट्टनायक की बुद्धि से जिनकी बुद्धि का अंश संस्कृत हुआ है; जो मीमांसा, न्याय और व्याकरण जानेनेवालों के गुरु हैं और जिनको प्रबन्धरचना के सेवन में आनन्द आता है ( इस प्रकार के अभिनवगुप्त ने ) ध्वनि नामक वस्तु के विवरण की रचना की ॥३३॥
वह कवि सज्जनों से प्रार्थना नहीं करता । क्या आह्लाद देने के लिए चन्द्र से प्रार्थना की गई है ? कुष्टों को निन्दा भी नहीं करता । बार-बार धिक्कार करने पर भी अग्नि शीतल नहीं होती ॥४४॥
वस्तुतः शिवमय हृदय होने पर स्फुट रूप में सभी शिवमय ही शोभित होता है; कहीं किसी के वचन अशिव नहीं होते । इससे आप लोगों की दशा शिवमय हो जाय ।
यह है महामहेश्वर अभिनवगुप्तविरचित काव्यालोकलोचन में चतुर्थ उद्योत । और यह ग्रन्थ समाप्त हो गया ॥
तारावती
—दूसरे पद्य में सम्बन्ध, विषय, प्रयोजन, ( और अधिकारी ) इन अनुबन्धों का उपसंहार किया गया है । ग्रन्थ के प्रारम्भ में भी इन पर प्रकाश डाला गया था और अब यहां पर उपसंहार में भी इनका उल्लेख किया जा रहा है । यह ध्वनि-सिद्धान्त सत्काव्य का एक उचित तथा न्याय्य मार्ग है । यह सहृदयों के अन्तःकरण की अवचेतन अवस्था में सोया हुआ सा पड़ा था । जिन लोगों की प्रज्ञा परिपाक को प्राप्त हो चुकी है उनको इस ध्वनिमार्ग का आभास अवश्य प्राप्त हो रहा था किन्तु यह तत्व उनके सामने सर्वथा प्रकट रूप में विद्यमान नहीं था । आनन्दवर्धन इस प्रसिद्ध नाम वाले आचार्य ने सहृदयों के उदयलाभ के लिए उस तत्व की व्याख्या कर दी है । यदु नहीं समझा जाना चाहिए कि आनन्दवर्धन ने किसी नये काव्यतत्व का प्रवर्तन किया है । यहां पर निगूढ़ ध्वनि तत्व ग्रन्थ का विषय है, काव्यसम्बन्धी इतर तत्व विषय से सम्बद्ध है । सहृदयों को उदय प्रदान करना ग्रन्थ का प्रयोजन है और सहृदय उसके अधिकारी हैं । प्रारम्भ में "सहृदयमनःप्रीति" प्रयोजन माना गया था यहां पर सहृदयों का उदय प्रयोजन माना गया है ।
आनन्दवर्धन नाम पर विशेष प्रकाश
अभिनवगुप्त ने यहां पर 'आनन्दवर्धन' इस नामग्रहण पर विशेष प्रकाश डाला है । उनका कहना है कि यह लोक की एक सामान्य प्रवृत्ति होती है कि लोग किसी काम में तभी प्रवृत्त होते हैं जब उन्हें लोकप्रसिद्धि के आधार पर किसी से विशेष सम्भावना हो जाती है और उसका उन्हें विश्वास हो जाता है । कहने का आशय यह है कि हमें किसी नई बात का अतिशोध्र प्रायः विश्वास ही नहीं होता । किन्तु जब कोई लेखक लोक में प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेता है और लोक उससे सम्भावना करने लगता है कि जो कुछ कहेगा वह सब अनुभूत तथा
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सत्य होगा तब लोग उसकी कही बात को प्रमाणरूप में मानने लगते हैं और उसके अनुसार अपना आचरण बनाने की चेष्टा करते हैं। जब उस प्रामाणिक महापुरुष का नाम लिया जाता है तब उसके दूसरे प्रसिद्ध कार्योपर एकदम ध्यान चला जाता है और उसकी विद्वत्ता तथा कवित्वशक्ति एकदम नेत्रों के सामने नाचने लगती है। तब उस पर विश्वास जम जाता है और उससे एक प्रकार की सच्ची बात की सम्भावना की जाने लगती है। जैसे यह प्रायः देखा जाता है कि लोग कहते हैं कि यह पञ्च अभूःहार का बतलाया हुआ है; उनकी उदारता की ऐसी महिमा है और उनका इस शास्त्र में इतना अधिक प्रवेश है। इस प्रकार भतृंहरि के नाम आ जाने से उनके औदार्य महिमा तथा शास्त्र में उनकी गति एकदम सामने आ जाती है तथा लोग कहने लगते हैं कि अमुक पद्य उन्हीं भर्तृहरि का बनाया हुआ है। अतः इसका आदर करना चाहिए और इसी आधार पर लोग उस कार्य में प्रवृत्त होते हुए दिखाई देते हैं। शास्त्र का मुख्य प्रयोजन यही होता है कि शास्त्र में जो कुछ कहा गया हो उसमें लोफ की प्रवृत्ति हो जानी चाहिए। क्योंकि लोक को प्रेरणा ही न मिले और लोक उस शास्त्र का आदर ही न करे तो शास्त्र-रचना में जो भी उद्योग किया गया होता है वह व्यर्थ ही हो जाता है। इसी लिये ग्रन्थकार अपना नाम ग्रन्थ के साथ जोड़ देते हैं जिससे उनका शास्त्र ऐसे श्रोताओं की प्रवृत्ति का अड़ बन जाय जिनपर शास्त्रकार अनुग्रह करना चाहता है। आनन्दवर्धन भी लोक में प्रामाणिकता के पद पर प्रतिष्ठित हो चुके हैं, अतः उनकी कही हुई बात को लोग नतमस्तक होकर स्वीकार कर लेंगे। इसी मन्तव्य से यहाँ पर उन्होंने अपना नाम लिखा है। यहाँ पर ‘प्रतिते’ शब्द का प्रयोग इसी मन्तव्य से किया गया है। इस शब्द का आशय यह है कि जिन आनन्दवर्धन का नाम लोक में प्रसिद्ध हो चुका है उनका लिखा हुआ यह शास्त्र है। यहाँ पर एक बात ओर ध्यान रखनी चाहिए कि जिस प्रकार किसी का नामोल्लेख दूसरों के अन्दर श्रद्धा पैदा करता है उन्हें उस शास्त्र की ओर झुका देता है उसी प्रकार किसी का नाम सुन कर कुछ लोग उस ओर से उदासीन भी हो जाते हैं। किन्तु इस प्रकार की वैराग्यभावना तभी जागृत होती है जब दूसरे लोगों में द्वेष की भावना उद्दीप्त हो रही हो। अतः इस प्रकार की द्वेष बुद्धि से जो बात प्रकट होती है उस पर तो ध्यान देना ही नहीं चाहिए। उदाहरण के लिए यदि एक व्यक्ति रोग से अन्था हो रहा है और वेदनाएँ उसके अन्तःकरण में भरी हुई हैं तो जब उसके सामने कहा जावेगा कि श्रुति का प्रयोग है पारलौकिक कल्याण प्रदान करना तब वह उससे विरक्त ही हो जावेगा। तो उसके विरक्त हो जाने से क्या यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि श्रुति का प्रयोजन तो विपरीत फल देता है ? ऐसा तो शायद कोई विचार भी न करेगा। इससे यह सिद्ध होता है कि किसी महान् लेखक का नामप्रहण केवल उन्हीं को प्रवृत्त कर सकता है जो उस शास्त्र को जानने के लिये प्रार्थी होते हैं। ऐसे ही लोगों को ध्वनिसिद्धांत में प्रवृत्त करने के लिये और उनमें श्रद्धा उत्पन्न करने के लिए आनन्दवर्धन ने अपना नाम लिखा है।
लोचन के उपसंहारात्मक पद्य
अन्त में लोचनकार ने ५ पद्य उपसंहार के रूप में लिखे हैं। प्रथम पद्य में ग्रन्थान्त
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४
चतुर्थ उद्योतः
का मङ्गलाचरण है, द्वितीय मे लोचन का परिचय दिया गया है, तृतीय में अभिनव गुप्त ने अपने और अपने गुरु के विषय में कुछ कहा है, चौथे में सज्जन और दुर्जन का विभाजन किया गया है और पाँचवें में हृदय के शिवमय होने पर सभी विश्व का शिवमय होना बतलाया गया है और पाठकों की मङ्गलाशंसा की गई है ।
४
चतुर्थ उद्योतः
अन्त में मंगलाचरण
प्रथम पद्य मङ्गलाचरणपरक है । इसमें क्रमप्राप्त वैखरी वाणी की ननन्दना की गई है । यह बतलाया जा चुका है कि वाणी ४ प्रकार की होती है—परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी । प्रथम तीन उद्योतों में क्रमशः परा, पश्यन्ती और मध्यमा की वन्दना की गई है और इस उद्योत के अन्त में चौथी अर्थात् वैखरी वाणी की वन्दना है । वैखरी वाणी को उस अवस्था को कहते हैं जिसमें शब्द, स्थान और प्रयत्न के बल पर मुख से बाहर निकल कर दूसरों के श्रोतिगोचर हो जाते हैं । प्रथम तीन वाणियों को लोग सुन नहीं पाते, अतः कहने का काम चौथी वाणी से ही लिया जाता है । (गुहात्रिोणि निहितानेद्ध्रयन्ति तुरीं वाचं मनुष्या वदन्ति ।) परा वाणी में सभी अर्थ एकरूप रहते हैं, उनमें वैचित्र्य नहीं होता, सर्वप्रथम मन में अर्थवैचित्र्य स्फुट होता है; उसको बाह्य जगत् में प्रसार देनेवाली वैखरी वाणी ही होती है जिसके प्रभाव से लोग समझ सकते हैं कि अमुक व्यक्ति के मन में अमुक बात है । वैखरी ही अर्थ का प्रत्यक्ष निदर्शन करती है । इसीलिये अभिनवगुप्त ने यहाँ इस वैखरी वाणी की वन्दना की है और उसे शाक्ति का एक रूप बतलाया है ।॥१॥
४
चतुर्थ उद्योतः
लोचन की विशेषता
दूसरे पद्य में लोचन की विशेषता बतलाई गई हैं । अभिनवगुप्त ने अपने प्रसिद्ध लोचन को ध्वन्यालोक समझने के पुनीत कार्य में प्रवृत्त किया है । यह लोचन अपने कर्ता के नाम के अनुसार अभिनव भी है और गूढ़त भी, क्योंकि दूसरे लोग अभी तक इसे समझ नहीं सके हैं । इस लोचन में सार भरा हुआ है जिसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि आनन्दवर्धन जैसे परमनिष्ठात आचार्य के विवेक से जिस काव्यालोक का विकास हुआ था उसके अर्थ को पूर्णरूप से इसमें संशोधित करा दिया गया है और सहृदयों में काव्य के जितने भी महत्त्वपूर्ण विप्र प्रकृष्ट रूप में प्रकाशित होते हैं उन सबको यह प्रकाशित करनेवाला है ॥२॥
४
चतुर्थ उद्योतः
अपनी गुरुपरम्परा का निर्देश
तीसरे पद्य में बतलाया गया है कि अभिनवगुप्त ने भट्टनदुराज से शिक्षा पाई थी । भट्टनदुराज के गुरु थे श्रीसिद्धिचेल । यहाँ पर लिखा गया है कि अभिनवगुप्त की बुद्धि के एक अंश को भट्टनदुराज ने संस्कार किया था । इसका आशय यह है कि अभिनवगुप्त ने कई आचार्यों से शिक्षा पाई थी । विभिन्न शास्त्रों के अध्ययन की इनकी अभिरुचि इतनी अधिक बढी चढी थी कि ये काश्मीर के तथा बाहर के अनेक अधिकारी विद्वानों के पास शिक्षा प्राप्त करने गये थे । इनके कतिपय आचार्यों के नाम ये हैं—श्रीनरसिंहगुप्त-इनके पिता जो चुलुक
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नाम से प्रसिद्ध थे उनके व्याकरण गुरु थे। श्रीशम्भुनाथ कौलमत के गुरु, भूतिराज वेदान्त के गुरु, त्रिकदर्शन, प्रत्यभिज्ञादर्शन और शैव सम्प्रदाय के गुरु श्री सोमानन्द, श्री उत्पलपादचार्य और लक्षण सुत्तनाथ, ध्वनि सिद्धान्त के गुरु भट्टनदुराज इत्यादि अनेक लब्धप्रतिष्ठ विद्वानों से इन्होंने विभिन्न शास्त्रों का अध्ययन किया था। यहाँ इन्होंने अपने को वाक्यानुशासन अर्थात् मीमांसा दर्शन, प्रमाणानुशासन अर्थात् न्याय दर्शन और पदनुशासन अर्थात् व्याकरण शास्त्र का गुरु बतलाया है। साथ ही इन्होंने इसमें अपने को विभिन्न रचनाओं में रस लेने वाला कहा है। (इनके विशेष परिचय के लिए देखें भूमिका का संबद्ध भाग ।।३।।
सज्जन प्रशंसा और दुर्जन निन्दा
कवियों तथा लेखकों की सामान्य परम्परा है कि वे अपने ग्रन्थों में सज्जनों की प्रशंसा और दुष्टों की निन्दा किया करते हैं तथा सज्जनों से अपने ग्रन्थ पढ़ने की अभ्यर्थना करते हैं और दुष्टों की निंदा कर उनकी आलोचना की ओर ध्यान न देने का उपदेश देते हैं। ( तुलसी ने ऐसा ही किया है ।) किन्तु अभिनवगुप्त ऐसा नहीं करना चाहते क्योंकि सज्जनों और दुष्टों का जन्मजात दृढ़ स्वभाव होता है, कहने सुनने से उसमें अन्तर नहीं आ सकता। चन्द्र स्वतः आह्लाद देता है और सज्जन स्वभाव से ही बना प्रार्थना किये ही अपने आचरण से आनन्दित किया करते हैं। इसके प्रतिकूल दुष्ट लोगों को कितना हीं चित्कृत किया जाय वे अपने दुष्ट स्वभाव को नहीं छोड़ते। क्या निन्दा के भय से पावक भी कभी शीतल हुआ है या हो सकता है? यहाँ 'वह कवि' का अर्थ यह है कि जिसका परिचय तीसरे पद्य में दिया गया है ।।४।।
शिव पर विश्वास और सब कुछ शिवमय होने की प्रशंसा
सज्जनों और दुर्जनों के व्यवहार पर विचार करने की आवश्यकता ही क्या? कवि को तो अपने भक्तिभाव पर विश्वास है। कवि महेश्वर है और उसका हृदय शिवमय है। अतः उसके लिये तो सारा विश्व ही शिवमय है क्योंकि हृदय की झलक सभी पदार्थों पर पड़ती है और अपना हृदय जैसा होता है सारा विश्व वैसा ही मालूम पड़ने लगता है। जिसके हृदय में भगवान् शिव सदा विराजमान रहते हैं उसकी कहीं भी कोई भी वाणी अशिव हो ही नहीं सकती। अतः कवि की कामना यही है कि उसकी शिवमयी वाणी का पाठकों पर ऐसा प्रभाव পড়े कि सब पाठकों की दशा भी शिवमय हो जाय ।।५।।
ग्रन्थ की "तारावती" नामक विस्तृत हिन्दी व्याख्या भी समाप्त हुई तथा महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा रचा यह काव्यालोचन का चौथा उद्योत समाप्त हुआ और साथ ही यह ग्रन्थ भी समाप्त हो गया!
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कारिकार्थभागानामुदाहरणानां लोचनोद्घृतकारिकादिवण्डानाच्च वर्णानुक्रमणी
अकाण्ड एव विच्छित्तिः (का०)
अक्षरादिरचनैव योज्यते (का०)
अण्णत्तवच्च वालअ (वृ०)
अतहट्ठिठ वितहहि मणिठिअ (वृ०)
अतिक्रान्तमुखः कालः (वृ०)
अतोऽनिजातिहेतुत्वात् (लो०)
अतो हन्यत इमे ऽपि (का०)
अन्ध्येवास्तिविग्रहणं (वृ०)
अनवरतनयनजलनिपतन (वृ०)
अनास्वाद्येयांशभासितव् (वृ०)
अनिष्टस्य श्रुतिर्यद्दत् (वृ०)
अनुगतमपि पूर्वच्छायया (का०)
अनुरागवती सन्ध्या (वृ०)
अनुस्वानोपमात्रपि (का०)
अनेनानन्यमायाति (का०)
अनौचित्यादते नान्यत (व०)
अनौचित्यादृते नान्यत् (लो०)
अन्वीया तेवस्तुगतिः (का०)
अपारे काव्यसंसारे (वृ०)
अमी ये दृश्यन्ते (वृ०)
अमुं कनकवर्णाभं (लो०) (महाभा० श्लो० १५३-१४)
अयं मन्दव्युतिभास्वान् (लो०) (भामह ३-३४)
अयं स रसनोत्कर्षी (वृ०) (महाभा० स्वीप० २४-१९)
अयं स राअ उदयणोत्ति (लो०) (वासव०)
अयमेकपदे तया वियोगः (वृ०) (विक्रमो० ४-३)
अर्थान्तरगतिः काक्च (का०)
अलङ्कृतीनां शक्तावपि (का०)
अलसस्थित्वा इमझानेडसिमन् (लो०) (महाभा० श्लो० १५२-११)
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अल्पं निर्मितमाकाङ्क्षं
(लो०)
३८९
अवधानातिशयवान्
(का०)
२६२
अवसररौद्रंचिअ
(वृ०)
१४९
अवस्थादिवभिन्नानां
(का०)
५९४
अवस्थादेशकालादि
(का०)
५७७
अविरोधी विरोधी वा
(का०)
२२२
अविवक्षितवाच्यस्य
(का० लो०)
१, २११
अन्युत्पत्तिकृते दोषः
(वृ०)
६७
अशक्नुवद्भिः व्यक्ततुं
(का०)
५१४
असमासा समासेन
(का०)
५०
अस्फुटस्फुटितं काव्यं
(का०)
५१४
अहिणअ पओअरसिअसु
(वृ०)
५१०
अहो वतासि स्फुरणीयवोः
(वृ०)
१५७
आ
२२०
आगर्भादाविमर्शान्त्रा
(लो०)
६०२
आत्मनोऽनुज्झये सदृशवै
(का०) (नाट॰ शा॰)
१३६
आदित्योदयै स्थितो मूढः
(लो०) (महा०भा० शा० १५२-१३)
५७७
आननत्यमेव वाच्यस्य
(का०)
६१४
आनन्दवर्धनविवेक
(लो०)
३६९
आप्तवादविसंवाद
(लो०) (इलो०वा० ११-११-७)
४२०
आम असच्योओरम्
(वृ०)
५०६
आलेख्याकारवत्तुल्य
(का०)
१८९
आलोकार्थी यथा दीप
(लो०)
११६
आश्चर्यवदभियानं
(लो०)
५०४
आसक्तितानां भेदानां
(लो०)
इ
९४
इतिवृत्तवशायातां
(का०)
२७२
इतिवृत्तं हि नाट्यस्य
(लो०)
१३८
इत्थं यन्त्रणया
(लो०)
६१०
इत्यक्लिष्टरसायोचितगुणा:
(वृ०)
२७५
इत्यलक्ष्यकमा एव सन्तः
(वृ०)
५१४
इत्युक्तलक्षणो यः
(का०)
१६८
इन्दीवरगुति यदा
(लो०) (भट्ट॰ न्दुराजस्य)
११६
इष्टस्यार्थस्य रचना
(लो०)
Page 638
उत्कम्पिनी भय (वृ०) (तां० वृ०)
40
उत्प्रेक्ष्योपनन्तराभीष्ट (का०)
94
उद्दीपनप्रशमने (का०)
116
उपक्षेप: परिकर (लो०) (ना० शा० २९-३९)
116
उपभोगसेवावसरौष्यं (लो०)
452
उपपह जाइए (वृ०)
491
उपपहु जायउ (लो०)
226
एक्न्तो रुड़इ पिआ (वृ०)
243
एकाश्रयत्वे निर्दोष: (का०)
215
एको रसोद्र्घीकर्तव्य: (का०)
90
एतद्यथोक्तमौचित्यं (का०)
11
एमेअजणोतिस्सा (वृ०)
513
एवं ध्वने: (का०)
427, 476
एवं वादिनि (वृ०) (कु० स० ६-८४)
198, 204
एहि गच्छ पतोत्तिष्ठ (वृ०) (न्यासस्य)
271
औचित्यवान्स्तायात (का०)
86
कथमपि कृतप्रत्यपत्तो (वृ०)
226
कण्ठाच्छिन्नवाक्ष्मालावलयं (वृ०)
119
कथामार्गे न चाल्पो
107
कथाशरीरमुत्पाद्य (वृ०)
547
करणीवेहवअरो (वृ०)
483
कर्तृद्योतच्छलानां (वृ०) (वे० स० ५-२६)
226
कव: प्रयत्नान्नेतण्णां (लो०) (ना० शा०)
464
कवेरन्तर्गतं भावं (लो०)
450
कस्त्व भो: कथययामि (वृ०)
322
कस्यचिद्ध्वनिभेदस्य (लो०)
8
कस्सन्नद्धे विरहविधुरां (वृ०) (मे० दू०)
219
कार्यमेकं यथाव्यापि (का०)
81
काव्यप्रभेदाश्रयत: (का०)
Page 639
काव्यशोभाया: कर्त्तरी धर्मा: (लो०) (वा० सू० ३-१-१)
काव्यस्यात्मा ध्वनि: (लो०)
काव्याद्ध्वनि ध्वनि: (वृ०)
काव्यार्थान भावयति (लो०) (ना० शा० ७-६१)
काव्यालोके प्रथां नीतान् (लो०)
काव्ये उभे ततोन्यत् (का०)
किमिव हि मधुराणां (वृ०)
कुरङ्गीवाञ्जानि (लो०) (शाकुन्तल १-१७)
कुरवककुचाघात (लो०)
कृतक क्रुपितै: (वृ०) (रामाभ्युदये)
कृतक क्रुपितै: (लो०) (रामाभ्युदये)
कृते वरकस्थालापे (वृ०)
कृतद्वितसमासैश्च (का०)
कृत्यपच्वचनिर्वहिर्योडपि (लो०)
कैशिकी इलक्ष्यनैपथा (लो०) (ना० शा०)
कोपास्तकोमलोलबाहुलतिका (वृ०) (लो०) (अमरू-९)
क्रामनन्य: क्षण कोमलांगुलि (वृ०)
क्रिययैव तदर्थस्य (लो०) (भामह ३-३३)
व्वाकार्यो ध्वनालक्षण: (वृ०) (विक्रमो-४)
क्षणे क्षणे यन्नवताम् (लो०) (माघ ४-१७)
क्षिप्तो हस्तावलम्बन: (वृ०) (अमरू २)
क्षुतृष्णाकाममात्सर्यी (लो०) (पुराणश्लोक)
खणपाहुणिआ देखार (वृ०)
खलेवालीयूप: (लो०)
गद्यपद्यमयी चम्पू: (लो०) (दण्डी०)
गावो व: पावनानां (वृ०)
गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती (का०)
गुण: कृतात्मसंस्कार: (लो०) (ना० शा०)
गोलाकच्छकुड्यौ जे (लो०) (स० शा०)
गोप्यंवदित: सङ्केतं (लो०)
Page 640
चलापाङ्गां दृष्टि (लो०) (शा० १-२५)
चाञ्चयणकर परस्पर (लो०) (पुराणी गाथा)
चित्तवृत्तिप्रसरप्रसंख्यानधना: (लो०)
चित्रं शब्दार्थभेदेन (का०)
चूडाकुरावसं (वृ०) (हरिविजय)
चूर्णपादै: प्रसन्नै: (लो०) (ना० शा०)
जराजीर्णशरीरस्य (लो०)
जरा तेयं मूर्छित (लो०) (अभिनव)
ण अताण घड़ै ओही (वृ०)
त एव तु निवेश्यन्ते (का०)
तत्र किश्चितिच्छेदचित्रं (का०)
तत्र पूर्वममन्यास्त्र (का०)
तथा दीर्घसमासेति (का०)
तथा रसस्यापि विधौ (का०)
तथाभूते तस्मिन् मुनिवरचसि (लो०) (ता० वो ५)
तदनुस्यातुरणनरूप (का०)
तदा तं दीपयन्न्येव (का०)
तदगेहं नतभित्ति (वृ०)
तदग्रेन्दुद्विलोकनेन दिवस: (लो०) (ता० वो १)
तद्रिद्रुररसस्पर्श: (का०)
तमर्थमवलम्बन्ते ये (वृ०)
तया स पूतश्च विभू पितृष्च (लो०) (कु० सं०)
तरड्भूभङ्गा: (वृ०)
तस्य प्रशान्त वाहिता (लो०) (यो० सू० ३-१०)
तस्याद्रानां प्रभेदा ये (लो०)
तस्याभावं जगदरपरे (लो०)
तां प्राङ्मुखी तत्र निवेश्य (वृ०) (कु० सं०)
तालै: शिख्जावलयसुभगै: (वृ०) (मे० दू० १६)
तृतीयं तु प्रसिद्धात्म (का०)
Page 641
191
तीर्थे तोयव्यतिकरभवे (लो०)
489
तेपां गोपवधूविलासमुहुरां (वृ०)
128
त्वत्सम्प्राप्तिविलोलभितेन (लो०)
263
त्वां चन्द्रचूडं सहसा स्पृशन्ती (लो०)
88
स्वामिलिङ्ग्य प्रणयकुपितां (लो०) (मे० दो०)
406
दन्तक्षतनि करजैश्च (वृ०)
255
दानवीरं धर्मवीरं (लो०) (ना० शा०)
501
दीर्घाकुर्वन् पटुमदकलं (वृ०)
429
दुराराधा राधा सुभग (वृ०)
543
दृष्टपूर्वा अपि हार्तिः (का०)
127
दृष्टिटनमृतव्राणि (लो०)
128
देवी स्वीकृतमानस्य (लो०) (ता० व० ४)
420
धत्ते रसादितात्पर्यं (का०)
543
धरणीधारणायाधुना त्वं शेपः (वृ०)
551
धमें चार्मे च कामे च (लो०)
5
धृति: क्षमा दया शौचं (लो०) (या० स्मृ०)
527
ध्वनेर्थ: सगुणीभूत (लो०)
133
ध्वनेरस्य प्रबन्धेपु (का०)
574
ध्वनेरिस्थं गुणीभूत (का०)
427
ध्वनेर्थस्स गुणीसूत (का०)
537
न काव्यार्थ विरामो (का०)
136
च चेह जीवितः कविचत् (लो०) (म० भा० शा० १५३।२)
94
न तु केवलया शास्त्र (का०)
86, 492
नातिनिर्वहणैपिता (लो०) (ना० शा०)
536
नानार्भक् भ्रमद्भूः (बु०)
562
नारायणं नमस्कृत्य (लो०)
535
निद्राकेतविनः (वृ०)
519
निबद्धा सा कयं नैति (का०)
258
निवर्तते हि रसयोः (का०)
5, 322
निःश्वासान्ध इवादर्शः (लो०)
108
नीरसस्तु प्रबन्धो यः (वृ०)
Page 642
नीवारा: शुचि (वृ०) (शाकु० १, १४)
नूतने स्फुरति काव्यवस्तुनि (का०)
नैकरूपतया सर्वे (का०)
नोपह्नुत्याद्भितां सोऽस्य (का०)
नोपादानं विरुद्धस्य (लो०)
न्यङ्कारो ह्येमव (वृ०) (ह० ना० अ० १४)
पत्यु: शिरश्चन्द्रकलामनेन (वृ०)
पदानां स्मारकत्वेऽपि (वृ०)
परस्वादानिच्छा (का०)
परार्थे य: पीडामनुभवति (वृ०) (भ० श० इलो० ५६)
परिपोषं गतस्यापि
परिपोषं न नेतऽय: (का०)
पहिअसामाइअसु (लो०)
पाण्डुकुक्षौ वदनं (लो०)
पुरुषार्थहेतुकमिदं (लो०)
पूर्वे विश्वृङ्खलङ्गिर: (वृ०)
प्रकरणनाटकयोगात् (लो०) (ना० शा०)
प्रकोटद्यो गुणीभूत (का०)
प्रकारोड्यं गुणीभूत (का०)
प्रतयन्तां वाचो (का०)
प्रतीयमानं पुनरन्यदेव (लो०)
प्रतीयमानाच्छायैषा (लो०)
प्रधानगुणभावाभ्यां (का०)
प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे (लो०)
प्रबन्धस्य रसादीनां (का०)
प्रबन्धे मुक्तके वापि (का०)
प्रभामहत्य शिखयेन (वृ०)
प्र प्रथयत्युत्तरीयाल्वि (वृ०)
प्रभेदस्यास्य विषयो (का०)
प्रसन्नगम्भीरपदा: (का०)
प्रसादे वरमस्तु (लो०) (चन्द्रका०)
प्रसिद्ध डपि प्रबन्धानां (का०)
प्रातु जनैरर्थजनस्य (वृ०)
प्राप्ता देवी भूतधात्री च (लो०) (रत्ना०)
Page 643
प्रायच्छत्तोच्चैः
कुसुमानि (वृ०)
प्रायेणीव परां छायां
(का०)
प्रारम्भश्च प्रयत्नश्च
(लो०)
प्रारम्भेऽस्मिन् स्वामिनः
(लो०)
प्रासङ्किके परार्थत्वात्
(लो०) (ना० शा० २१-२०)
प्रिये जने नासति पृथकृतम्
(वृ०)
प्रौढोक्तिमात्रनिष्ठपल्वशरीरः
(लो०)
बद्धोक्तकर्णमिदं मनः
(लो०) (ता० व० १)
बहूनां जन्मनाम्न्ते
(लो०)
बहूनां समवेतानां
(लो०) (ना० शा०)
बाध्यमानोऽपि भावो वा
(का०)
भगवान् वासुदेवश्च
(वृ०)
भअविहल रख्खणे
(लो०) (अभिनव०)
भम धम्मअ (लो०)
(गा० स० शा० ७६)
भवेत्स्मिन् प्रमादो हि
(का०)
भावान्चेतनानन्वपि
(वृ०)
भावान्चेतनानन्वपि
(लो०)
भूस्त्रीव दृश्यते लक्ष्म्यै
(का०)
भूरेणुविग्गान्
(वृ०)
भ्रमिमरतिमलस
(वृ०)
मथ्नामि कौरवशन्त्
(लो०) (वेणी० १-१५)
मनुष्यवृच्या समुचाररन्त्
(वृ०) (लो०)
मन्दारकुसुमरेतुपिच्जरित
(वृ०)
महमहं इति भणन्तोड
(वृ०)
मापन्थं रुन्धीयो अवेहि
(वृ०) (स० शा० ९६१)
मिअवहंड अरोओरो
(लो०)
मितोड्यनस्ततां प्राप्तः
(का०)
मुख्या महाकविगिरां
(का०)
मुख्यां वृत्ति परित्यज्य
(लो०)
मुख्या व्यापारविषया:
(वृ०)
Page 644
मुनिर्जयति योगीन्द्र: (वृ०)
मुहुरडगुलिसंवताधरोष्ठं (कु०) श्लो० ३-३८)
य: प्रथम: प्रथम: (वृ०)
यच्च कामसुखं लोके (वृ०)
यस्तः कार्य: सुमतिना (का०)
यत्पदानि त्यजन्त्येव (लो०) (ना० शा०)
यत्र व्यङ्गच्यन्वये वाच्य (का०)
यत्रार्थ: शब्दो वा (लो०)
यथा पदार्थद्वारेण (लो०)
यथा यथा विपर्येति (वृ०)
यदपि तदपि रसं (का०)
यद्दृष्टान्तमहितमति: (वृ०) (सुमतिप्रकाशिका २७८)
यद्रामाभिनिवेशितस्वम् (लो०) (ना० शा०)
यद्विद्राम्य विलोकितेषु (लो०)
यस्यलक्ष्यक्रमगृद्यच: (का०)
यस्मिन् रसो वा भावो वा (का०)
या निशा सर्वभूतानां (वृ०)
या व्यापारवती रसान् (वृ०)
युक्स्यानयानुसर्तव्य: (का०)
ये च तेषु प्रकारोद्यम् (का०)
ये जीवन्ति न मान्ति (वृ०)
यो य: शास्त्रं बिभर्ति (वृ०) (लो०) (वेणी० ३-३२)
रचनाविषयापेक्षं (का०)
रसबन्योक्तमौचित्यं (का०)
रसभावादिविषय (वृ०)
रसभावादि सम्बद्धां (का०)
रसस्यारन्धविश्रान्ते: (का०)
रसस्य स्याद्विरोधाय (का०)
रसादिमय एकस्मिन् (का०)
रसादिविषयेणैतत् (का०)
रसादिषु विवक्षा तु (वृ०)
Page 645
रसाच्चनुगुणत्वेन (का०)
रसान् तन्नियमें हेतुः (का०)
रसान्तरव्यवधिना (का०) (लो०)
रसान्तरसमावेशः (का०) (लो०)
रसान्तरान्तरितयोः (का०)
रागस्यास्पदमित्यवैमि (लो०) (नागा० १-५)
राजहंसैरवीज्यन्त (लो०)
राजानमणि सेवन्ते (वृ०)
राज्यं निर्जितशत्रु (लो०)
रामेण प्रियजीवितेन तु (ष्ट०)
रुढा ये विषयेऽनयत्र (लो०)
रौद्रस्य चैव यत्कर्म (लो०) (ना० शा०)
लडिघअगअणा फल (लो०)
लच्छी दुहिदा जामाउओ (वृ०)
लावण्यद्रविणव्ययो न गणितः (वृ०)
लावण्यसिद्धुपरंबवहि (वृ०)
लीलाकमलपत्राणि (वृ०) (कु० स०)
लीलादडाशुढ्युढा (लो०)
वक्रोभियेयशब्दोक्त (लो०) (भामह १-२६)
वदति विसिनिपत्रशायनम् (लो०)
वसन्तपुष्पाभरणं वहन्ती (वृ०) (कु० स०)
वसन्तमत्तालिपरस्पररोपमा (लो०) (अभिनव०)
वस्तुतः शिवमये हदि (लो०)
वस्तु भातितरां तन्व्या: (का०)
वाक्यार्थमितये तेषाम् (लो०) (इलो० वा० १-१-७)
वाक्ये सङ्घटनायां च (का०)
वाग्ढ्यसत्वोपेतान् काव्यार्थान् (लो०) (ना० शा०)
वाग्विकल्पानामनन्य्यत् (लो०)
वाचस्पतिसहस्राणां (का०)
वाच्यानां वाचकानुरच (का०)
वाच्यालङ्कारवर्गोऽयं (का०)
Page 646
वाणिअ हत्थिदन्ता
(वृ०) २६, ४८७
वाणी नवत्वमायाति
(का०) ५२९
वाल्मीकिग्यतिरिक्तस्य
(वृ०) ५८८
वाल्मीकिग्यासमुख्याइश्च
(वृ०) १९८
वासुदेवः सर्वमिति
(लो०) ४५२
विच्छित्तिशोभिनैकेन
(वृ०) ३१
विजयेल्यं रसादीना
(का०) २६९
विधातव्या न सहदृयैः
(का०) ४२८
विधिः कथाशरीरस्य
(का०) ९४
विनेयानुस्मुखीकरतुं
(का०) २६३
विन्द्यो वर्णितवान्
(लो०) ४०४
विभावभावानुभाव०
(का०) ९४, २७०
विमतिविपयो य आसीत्
(वृ०) ३७२
विमानपर्यडकुले निष्पणा:
(वृ०) २५८
विरुद्धे काव्यो यस्तु
(का०) २४०
विरोधमविरोधश्च
(का०) २६१
विरोधाङ्कारेण
(लो०) ३६७
विरोधिनः स्युः श्रृङ्गारे
(का०) ३४
विरोधिरसम्बन्धिः
(का०) १७३
विवक्षातत्परत्वेन
(लो०) ४५८
विवक्षिते रसे लब्ध
(का०) १९७
विशेषतस्तु श्रृङ्गारे
(का०) १६१
विश्रान्तिवि प्रहर्ष:
(लो०) ९११
विषयस्य मनापनैः
(लो०) (ना० शा०) ११६
विषयं सुकवि: काव्यं
(का०) २९६
विषयाश्रयमव्यन्वयत्
(का०) २६९
विसमिअ काणवि
(वृ०) ८१
विसतरणान्वितस्यापि
(का०) १७३
विस्रम्भोक्तया मन्मथाज्ञाविधौ न
(वृ०) ४११
वीतरागजनादर्शनात्
(लो०) (न्या० सू० ३-१) २५०
वीरस्य चैव यत्कर्म
(लो०) (ना० शा०) २२२
वृत्तयः काव्यमातृका:
(लो०) (ना० शा०) २७२,५१८
वृत्तयोपि प्रकाशन्ते
(का०) ५१७
वृत्तेऽस्मिन् महाप्रलये
(वृ०) (ह० न०) २१
Page 647
व्यक्तिव्यञ्जनधातुना (लो०)
व्यक्तव्यञ्जकभावेऽस्मिन् (का०)
वीडायोगान्नतवदनया (वृ०)
शब्दतस्वाथ्या: कारिचतू (का०)
शब्दार्थपासनज्ञानमात्रेण (लो०)
शब्दा: सङ्केतितं प्राहु (लो०)
शषौ सरेफयोग: (का०)
शून्यं वासगृहं विलोक्य (वृ०) अमु)
श्रृङ्गार एव परम: (लो०)
श्रृङ्गार एव मधुर: (लो०)
श्रृङ्गारस्त तै: प्रभस्मृ (लो०) (ना धा०)
श्रृङ्गारी चेत्कवि: काये (वृ०)
शेपो हिमपिस्रत्व च (वृ०) (भा०म०३-२८)
शोक: श्लोकत्वमागत: (वृ०) (रामा०)
श्रीसिद्धिवेलचरणारविन्द (लो०) (अभिनव०)
म एव वीतरागश्चेत् (लो०)
संख्यातुं दिङ्मात्रम् (का०)
संवादास्तु भवन्त्येव (का०)
संवादा ह्यन्यसादृश्यं (का०)
संवृत्याभिहितो वस्तु (वृ०)
संशब्द्ये फलयोगे तु (लो०) (ना० धा० २१ ७)
सगुणीभतव्यङ्ग्ये: सालङ्कारें: (का०)
सगुणीभूतव्यङ्ग्ये: (लो०)
सङ्केतसंस्कृतिभ्यां पुन: (का०)
सङ्केतकालमनसं (वृ०)
सज्जनात् कविरसौ (लो०)
सज्जे हि सुरहिमासो (वृ०)
सत्काव्यकरतुं वा ज्ञातुं (का०)
सत्काव्यतत्व नयवर्त्म (वृ०)
सत्यं मनोरमा: काम: (लो०)
सत्यं मनोरमा राम: (वृ०)
Page 648
१११
सन्तिसिद्धिरसप्रख्या: (वृ०)
२४
सन्चिसन्ध्यारूढघटनं (का०)
४
सप्ततां समिध: श्रिय: (वृ०) (ध्यासस्य)
६७
समर्पकत्वं काव्यस्य (लो०)
१४२
समाधिमणिदर्पणेषु (वृ०)
११६
समीहा रतिभोगार्था (लो०)
२४१
समुत्थिते धनुर्धरौ (लो०) (अर्जुन व०)
४०४
समुद्र: कुण्डिका (लो०)
१६०
सर्वक्षितिभृतां नाथ दृष्टा (लो०) (विक्रमो०)
९०
सर्वत्र गद्यबन्धेऽपि (का०)
१२७
सर्वत्रज्वलितेऽपि वेधसि (लो०) (ता० व०)
४४३
सर्वे नवा इवाभान्ति (का०)
४७८
सर्वोपमाद्रव्यस मुच्चयेन (वृ०) (कुमार सं०)
२४०
सविभिन्नाथय: कार्य (आ०)
४३२
सविभ्रम स्मितोद्भेदा: (वृ०)
२५८
स शोणितं ऋतयभुजां (वृ०)
४१४
सा व्यज्जयस्य गुणीभावे (का०)
४६८
सिज्जइ रोमच्चिज्जइ (वृ०)
२७
सिहिविच्छ कर्णऊरा (वृ०)
१४०
मुचितडवचन सम्बन्धे: (का०)
४४३
सुरभिसमये प्रवृत्ते (वृ०)
३३१
सुवर्णपुष्पां प्रियवयीं (लो०)
३६२
सैषा सर्वेष वक्रोभित: (वृ०)
९२
स्त्रियो नरपतिवन्द्ध: (लो०)
३११
स्थितमिति यथाश्रय्याम् (लो०) (रामाभ्युदये)
१०८
स्थैयेंणोत्तम मध्यम (लो०) (ना० शा०)
४८१
सिन्धुरघयमालकान्तिलिप्त (वृ०)
६१४
स्फुटीकृतार्थवैचित्र्य (लो०)
४६
स्मरणनदीपूरेणोढा (वृ०) (अमरु १०४)
९
स्मरामि स्मर संहार (लो०) (अभिनव०)
४३२
स्मितं किश्चित्स्मरदुर्गं (वृ०)
१२८
स्वच्छिन्नपक्ष्मकपाट (लो०) (स्वप्रवा०)
४३४
स्वतेज: क्रीतमहिमा (वृ०)
७१९
स्वल्पमात्रंसमुदृष्टं (लो०) (ना० शा०)
Page 649
स्वस्था भवन्ति मध्या जीवति (वृ०) (वे० सं०)
४५५
स्वं स्वं निमित्तमासाद्य (लो०) (ना० शा०)
२५०
स्वादुकाव्यरसोनिम्रश्रं (लो०) (भामह ५-३३)
ह
४१६
हसनोपहितकार्त् (लो०)
५८३
हंसानां निनदेषु यैः (वृ०)
४६६
हिअअललिआ (लो०)
Page 651
ध्वन्यालोक: डॉ० रामसागर त्रिपाठी
भारतीय साहित्य-शास्त्र की शास्त्रीय परम्परा में ध्वन्यालोक का अन्यतम स्थान निर्विवाद है। इसका सबसे बड़ा महत्व इसी बात में है कि इसमें प्राक्तन समस्त साहित्यराशि पर दृष्टिपात कर एक समन्वयात्मक सिद्धान्त स्थापित करने की चेष्टा की गई है। केवल काव्यशास्त्र के विभिन्न तत्वों का ही नहीं नाट्यशास्त्र को भी काव्यशास्त्र से समन्वय इसका एक बहुत बड़ा गुण है।
इस ग्रन्थ में द्वितीय उद्योत पर्यन्त ध्वनि-सिद्धान्त की स्थापना तथा व्यङ्गयार्थ की दृष्टि से ध्वनि-सिद्धान्त का विवेचन प्रस्तुत किया गया है। तृतीय उद्योत के प्रारम्भ में व्यञ्जक तत्वों की मीमांसा की गई है। ग्रौर उसके बाद ऐसे अनेक प्रश्नों पर विचार किया गया है जो ध्वनि-सिद्धान्त के विरोध में सामने आते हैं। साथ ही विभिन्न सिद्धान्तों के समन्वय की दिशा में आचार्यों ने स्फुट प्रेरणा की है। चतुर्थ उद्योत में ध्वनि-सिद्धान्त के मानने पर काव्य किस प्रकार अनन्तता को प्राप्त हो जाता है इसका विस्तृत विवेचन किया गया है। साहित्यशास्त्र के जिज्ञासु के लिये ध्वन्यालोक का यह खण्ड सर्वथा अनुपेक्षणीय है।
प्रस्तुत संस्करण में योजना कुछ भिन्न कर दी गई है। विषयों के अनुसार पाठ्य सामग्री एक साथ देकर उसकी व्याख्या उसके साथ ही दे दी गई है। ग्रोर स्थान-स्थान पर उपशीर्षक भी दे दिये गये हैं जिससे समस्त विषय एकसाथ हृदयंगम हो जाता है। आशा है कि यह योजना परिशीलकों के लिये अधिक सुविधाजनक होगी।
मूल्य : रु० ४० (सजिल्द) रु० ३५ (अजिल्द)