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1. Dhyana-Bindu Upanishad

Text (part 1)

Verse १

यदि शैलसमं पापं विस्तीर्ण बहुयोजनम्। भिद्यते ध्यानयोगेन नान्यो भेदः कदाचन ॥

yadi śailasamaṃ pāpaṃ vistīrṇa bahuyojanam। bhidyate dhyānayogena nānyo bhedaḥ kadācana ॥

Even if sin should accumulate to a mountain extending over many Yojanas (distance), it is destroyed by Dhyana-Yoga. At no time has been found a destroyer of sins like this.

यदि पर्वत की तरह (अनेक जन्मों के सञ्चित) अनेक योजन व्यापकत्व लिए पाप समूह हों, तो भी ध्यान योग साधना द्वारा उनको नष्ट किया जाना सम्भव है, अन्य किसी साधन से उनका नाश सम्भव नहीं ॥


Verse २

बीजाक्षरं परं बिन्दु नादं तस्योपरि स्थितम् । सशब्दं चाक्षरे क्षीणे नि:शब्दं परमं पदम्॥

bījākṣaraṃ paraṃ bindu nādaṃ tasyopari sthitam । saśabdaṃ cākṣare kṣīṇe ni:śabdaṃ paramaṃ padam॥

Bijakshara (seed-letter) is the supreme Bindu. Nada (spiritual sound) is above it. When that Nada ceases along with letter, then the Nada-less is supreme state.

बीजाक्षर (ॐ कार) से परे बिन्दु स्थित है और उसके ऊपर नाद विद्यमान है, जिसमें मनोहर शब्द-ध्वनि सुनाई पड़ती है। उस नादध्वनि के अक्षर में विलय हो जाने पर जो शब्द विहीन स्थिति होती है, वही 'परमपद' के नाम से जानी गयी है ॥


Verse ३

अनाहतं तु यच्छब्दं तस्य शब्दस्य यत्परम् । तत्परं विन्दते यस्तु स योगी छिन्नसंशयः ।।

anāhataṃ tu yacchabdaṃ tasya śabdasya yatparam । tatparaṃ vindate yastu sa yogī chinnasaṃśayaḥ ।।

The Yogin who considers as the highest that which is above Nada, which is Anahata, has all his doubts destroyed.

उस अनाहत शब्द (मेघ गर्जना की तरह प्रकृति का आदि शब्द) का जो परम कारण तत्त्व है, उससे भी परे परे परम कारण (निर्विशेष ब्रह्म) स्वरूप को जो योगी प्राप्त कर लेता है, उसके सब संशय नष्ट हो जाते हैं ॥


Verse ४

वालाग्रशतसहस्त्रं तस्य भागस्य भागिनः। तस्य भागस्य भागार्धं तत्क्षये तु निरञ्जनम्॥

vālāgraśatasahastraṃ tasya bhāgasya bhāginaḥ। tasya bhāgasya bhāgārdhaṃ tatkṣaye tu nirañjanam॥

If the point of a hair be divided into one hundred thousand parts, this (Nada) is one-half of that still further divided; and when (even) this is absorbed, the Yogin attains to the stainless Brahman.

यदि बाल (गेहूँ आदि की बाल) के अग्रभाग अर्थात् नोक के एक लाख हिस्से किये जाएँ. (तो उसका एक सूक्ष्म भाग जीव कहलाएगा), उसके पुनः उतने भाग अर्थात् एक लाख भाग किये जाएँ (इन सूक्ष्मतर भागों को ईश्वर कहा जायेगा) । तत्पश्चात् उस (एक लाखवें) हिस्से के भी पचास हजार हिस्से किये जाने पर जो शेष रहे, उसके भी (साक्ष्य-साक्षी आदि विशेषण के भी) क्षय हो जाने पर जो सूक्ष्म से भी अतिसूक्ष्म शेष रहे, वह उस निरञ्जन (विशुद्ध) ब्रह्म की सत्ता है॥


Verse ५

पुष्पमध्ये यथा गन्धः पयोमध्ये यथा घृतम्। तिलमध्ये यथा तैलं पाषाणेष्विव काञ्चनम्॥

puṣpamadhye yathā gandhaḥ payomadhye yathā ghṛtam। tilamadhye yathā tailaṃ pāṣāṇeṣviva kāñcanam॥

One who is of a firm mind and without the delusion (of sensual pleasures) and ever resting in Brahman, should see like the string (in a rosary of beads) all creatures (as existing) in Atman like odour in flowers, ghee in milk, oil in gingili seeds and gold in quartz.

जिस प्रकार पुष्य में गन्ध, दूध में घृत, तिल में तेल तथा सोने की खान के पाषाणों में सोना प्रत्यक्ष रूप से न दिखने पर भी अव्यक्त रूप से विद्यमान रहता है, उसी प्रकार आत्मा का अस्तित्व सभी प्राणियों में निहित है। स्थिर बुद्धि से सम्पन्न मोहरहित ब्रह्मवेत्ता मणियों में पिरोये गये सूत्र की तरह आत्मा के व्यापकत्व को जानकर उसी ब्रह्म में स्थित रहते हैं ।।


Verse ६

एवं सर्वाणि भूतानि मणौ सूत्र इवात्मनि । स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः।।

evaṃ sarvāṇi bhūtāni maṇau sūtra ivātmani । sthirabuddhirasaṃmūḍho brahmavidbrahmaṇi sthitaḥ।।

One who is of a firm mind and without the delusion (of sensual pleasures) and ever resting in Brahman, should see like the string (in a rosary of beads) all creatures (as existing) in Atman like odour in flowers, ghee in milk, oil in gingili seeds and gold in quartz.

जिस प्रकार पुष्य में गन्ध, दूध में घृत, तिल में तेल तथा सोने की खान के पाषाणों में सोना प्रत्यक्ष रूप से न दिखने पर भी अव्यक्त रूप से विद्यमान रहता है, उसी प्रकार आत्मा का अस्तित्व सभी प्राणियों में निहित है। स्थिर बुद्धि से सम्पन्न मोहरहित ब्रह्मवेत्ता मणियों में पिरोये गये सूत्र की तरह आत्मा के व्यापकत्व को जानकर उसी ब्रह्म में स्थित रहते हैं ।।


Verse ७

तिलानां तु यथा तैलं पुष्पे गन्ध इवाश्रितः । पुरुषस्य शरीरे तु स बाह्याभ्यन्तरे स्थितः ॥

tilānāṃ tu yathā tailaṃ puṣpe gandha ivāśritaḥ । puruṣasya śarīre tu sa bāhyābhyantare sthitaḥ ॥

Again just as the oil depends for its manifestation upon gingili seeds and odour upon flowers, so does the Purusha depend for its existence upon the body, both external and internal.

जिस प्रकार तिलों में तेल और पुष्यों में गन्ध आश्रित है, उसी प्रकार पुरुष के शरीर के भीतर और बाहर आत्मतत्त्व विद्यमान है ॥


Verse ८

वृक्षं तु सकलं विद्याच्छाया तस्यैव निष्कला।सकले निष्कले भावे सर्वत्रात्मा व्यवस्थितः।।

vṛkṣaṃ tu sakalaṃ vidyācchāyā tasyaiva niṣkalā।sakale niṣkale bhāve sarvatrātmā vyavasthitaḥ।।

The tree is with parts and its shadow is without parts but with and without parts, Atman exists everywhere

जिस प्रकार वृक्ष अपनी सम्पूर्ण कला के साथ स्थित रहता है और उसकी छाया कलाहीन (निष्कल) होकर रहती है। उसी प्रकार आत्मा कलात्मक स्वरूप और निष्कल (छाया स्थानीय मायारूप) भाव से सभी जगह विद्यमान है॥


Verse ९

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ध्येयं सर्वमुमुक्षुभिः । पृथिव्यग्निश्च ऋग्वेदो भूरित्येव पितामहः ॥

omityekākṣaraṃ brahma dhyeyaṃ sarvamumukṣubhiḥ । pṛthivyagniśca ṛgvedo bhūrityeva pitāmahaḥ ॥

The one Akshara (letter OM) should be contemplated upon as Brahman by all who aspire for emancipation.

ॐ कार रूपी एकाक्षर ब्रह्म ही सभी मुमुक्षुओं का लक्ष्य रहा है। प्रणव के पहले अंश 'अकार' में पृथ्वी, अग्नि, ऋग्वेद, भूः तथा पितामह ब्रह्मा का लय होता है। दूसरे अंश 'उकार' में अन्तरिक्ष, यजुर्वेद, वायु, भुवः तथा जनार्दन विष्णु का लय होता है । तृतीय अंश 'मकार' में द्यौ, सूर्य, सामवेद, स्वः तथा महेश्वर का लय होता है।'अकार' पीतवर्ण और रजोगुण से युक्त है,'उकार' श्वेत वर्ण और सात्त्विक गुण वाला तथा 'मकार' कृष्णवर्ण एवं तमोगुण से युक्त है। इस प्रकार ॐकार आठ अङ्ग, चार पैर, तीन नेत्र और पाँच दैवत से युक्त है ॥ [ यहाँ ॐकार के आठ अंग' का अभिप्राय- अकार, उकार, मकार, नाद, बिन्दु, कला, कलातीत तथा उससे भी परे से है।'चतुष्पाद' का अभिप्राय- व्यष्टिपरक-विश्व, तैजस,प्राज्ञ और तुरीय समाष्टिपरक-विराट्,सूत्र, बीज और तुर्य से है। ‘त्रिस्थान' का तात्पर्य-जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति; स्थूल, सूक्ष्म, कारणशरीर; सत, रज, तम गुण; ज्ञान, इच्छा, क्रिया शक्ति अधवा भूत, वर्तमान, भविष्यत् काल से है। पंचदेवता का अभिप्राय-ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव से है।]


Verse १०

अकारे तु लयं प्राप्ते प्रथमे प्रणवांशके। अन्तरिक्षं यजुर्वायुर्भुवो विष्णुर्जनार्दनः ॥

akāre tu layaṃ prāpte prathame praṇavāṃśake। antarikṣaṃ yajurvāyurbhuvo viṣṇurjanārdanaḥ ॥

Prithvi, Agni, Rig-Veda, Bhuh and Brahma -- all these (are absorbed) when Akara (A), the first Amsa (part) of Pranava (OM) becomes absorbed.

ॐ कार रूपी एकाक्षर ब्रह्म ही सभी मुमुक्षुओं का लक्ष्य रहा है। प्रणव के पहले अंश 'अकार' में पृथ्वी, अग्नि, ऋग्वेद, भूः तथा पितामह ब्रह्मा का लय होता है। दूसरे अंश 'उकार' में अन्तरिक्ष, यजुर्वेद, वायु, भुवः तथा जनार्दन विष्णु का लय होता है । तृतीय अंश 'मकार' में द्यौ, सूर्य, सामवेद, स्वः तथा महेश्वर का लय होता है।'अकार' पीतवर्ण और रजोगुण से युक्त है,'उकार' श्वेत वर्ण और सात्त्विक गुण वाला तथा 'मकार' कृष्णवर्ण एवं तमोगुण से युक्त है। इस प्रकार ॐकार आठ अङ्ग, चार पैर, तीन नेत्र और पाँच दैवत से युक्त है ॥ [ यहाँ ॐकार के आठ अंग' का अभिप्राय- अकार, उकार, मकार, नाद, बिन्दु, कला, कलातीत तथा उससे भी परे से है।'चतुष्पाद' का अभिप्राय- व्यष्टिपरक-विश्व, तैजस,प्राज्ञ और तुरीय समाष्टिपरक-विराट्,सूत्र, बीज और तुर्य से है। ‘त्रिस्थान' का तात्पर्य-जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति; स्थूल, सूक्ष्म, कारणशरीर; सत, रज, तम गुण; ज्ञान, इच्छा, क्रिया शक्ति अधवा भूत, वर्तमान, भविष्यत् काल से है। पंचदेवता का अभिप्राय-ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव से है।]


Verse ११

उकारे तु लयं प्राप्ते द्वितीये प्रणवांशके। द्यौः सूर्यः सामवेदश्च स्वरित्येव महेश्वरः ॥

ukāre tu layaṃ prāpte dvitīye praṇavāṃśake। dyauḥ sūryaḥ sāmavedaśca svarityeva maheśvaraḥ ॥

Antariksha, Yajur-Veda, Vayu, Bhuvah and Vishnu, the Janardana - all these (are absorbed) when Ukara (U), the second Amsa of Pranava becomes absorbed.

ॐ कार रूपी एकाक्षर ब्रह्म ही सभी मुमुक्षुओं का लक्ष्य रहा है। प्रणव के पहले अंश 'अकार' में पृथ्वी, अग्नि, ऋग्वेद, भूः तथा पितामह ब्रह्मा का लय होता है। दूसरे अंश 'उकार' में अन्तरिक्ष, यजुर्वेद, वायु, भुवः तथा जनार्दन विष्णु का लय होता है । तृतीय अंश 'मकार' में द्यौ, सूर्य, सामवेद, स्वः तथा महेश्वर का लय होता है।'अकार' पीतवर्ण और रजोगुण से युक्त है,'उकार' श्वेत वर्ण और सात्त्विक गुण वाला तथा 'मकार' कृष्णवर्ण एवं तमोगुण से युक्त है। इस प्रकार ॐकार आठ अङ्ग, चार पैर, तीन नेत्र और पाँच दैवत से युक्त है ॥ [ यहाँ ॐकार के आठ अंग' का अभिप्राय- अकार, उकार, मकार, नाद, बिन्दु, कला, कलातीत तथा उससे भी परे से है।'चतुष्पाद' का अभिप्राय- व्यष्टिपरक-विश्व, तैजस,प्राज्ञ और तुरीय समाष्टिपरक-विराट्,सूत्र, बीज और तुर्य से है। ‘त्रिस्थान' का तात्पर्य-जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति; स्थूल, सूक्ष्म, कारणशरीर; सत, रज, तम गुण; ज्ञान, इच्छा, क्रिया शक्ति अधवा भूत, वर्तमान, भविष्यत् काल से है। पंचदेवता का अभिप्राय-ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव से है।]


Verse १२

मकारे तु लयं प्राप्ते तृतीये प्रणवांशके। अकारः पीतवर्णः स्याद्रजोगुण उदीरितः ॥

makāre tu layaṃ prāpte tṛtīye praṇavāṃśake। akāraḥ pītavarṇaḥ syādrajoguṇa udīritaḥ ॥

Dyur, sun, Sama-Veda, Suvah and Maheshvara - all these (are absorbed) when Makara (M), the third Amsa of Pranava becomes absorbed.

ॐ कार रूपी एकाक्षर ब्रह्म ही सभी मुमुक्षुओं का लक्ष्य रहा है। प्रणव के पहले अंश 'अकार' में पृथ्वी, अग्नि, ऋग्वेद, भूः तथा पितामह ब्रह्मा का लय होता है। दूसरे अंश 'उकार' में अन्तरिक्ष, यजुर्वेद, वायु, भुवः तथा जनार्दन विष्णु का लय होता है । तृतीय अंश 'मकार' में द्यौ, सूर्य, सामवेद, स्वः तथा महेश्वर का लय होता है।'अकार' पीतवर्ण और रजोगुण से युक्त है,'उकार' श्वेत वर्ण और सात्त्विक गुण वाला तथा 'मकार' कृष्णवर्ण एवं तमोगुण से युक्त है। इस प्रकार ॐकार आठ अङ्ग, चार पैर, तीन नेत्र और पाँच दैवत से युक्त है ॥ [ यहाँ ॐकार के आठ अंग' का अभिप्राय- अकार, उकार, मकार, नाद, बिन्दु, कला, कलातीत तथा उससे भी परे से है।'चतुष्पाद' का अभिप्राय- व्यष्टिपरक-विश्व, तैजस,प्राज्ञ और तुरीय समाष्टिपरक-विराट्,सूत्र, बीज और तुर्य से है। ‘त्रिस्थान' का तात्पर्य-जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति; स्थूल, सूक्ष्म, कारणशरीर; सत, रज, तम गुण; ज्ञान, इच्छा, क्रिया शक्ति अधवा भूत, वर्तमान, भविष्यत् काल से है। पंचदेवता का अभिप्राय-ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव से है।]


Verse १३

उकारः सात्त्विकः शुक्लो मकारः कृष्णातामसः ।अष्टाङ्गं च चतुष्पादं त्रिस्थानं पश्चदैवतम् ॥

ukāraḥ sāttvikaḥ śuklo makāraḥ kṛṣṇātāmasaḥ ।aṣṭāṅgaṃ ca catuṣpādaṃ tristhānaṃ paścadaivatam ॥

Akara is of (Pita) yellow colour and is said to be of Rajo-Guna; Ukara is of white colour and of Sattva-Guna; Makara is of dark colour and of Tamo-Guna.

ॐ कार रूपी एकाक्षर ब्रह्म ही सभी मुमुक्षुओं का लक्ष्य रहा है। प्रणव के पहले अंश 'अकार' में पृथ्वी, अग्नि, ऋग्वेद, भूः तथा पितामह ब्रह्मा का लय होता है। दूसरे अंश 'उकार' में अन्तरिक्ष, यजुर्वेद, वायु, भुवः तथा जनार्दन विष्णु का लय होता है । तृतीय अंश 'मकार' में द्यौ, सूर्य, सामवेद, स्वः तथा महेश्वर का लय होता है।'अकार' पीतवर्ण और रजोगुण से युक्त है,'उकार' श्वेत वर्ण और सात्त्विक गुण वाला तथा 'मकार' कृष्णवर्ण एवं तमोगुण से युक्त है। इस प्रकार ॐकार आठ अङ्ग, चार पैर, तीन नेत्र और पाँच दैवत से युक्त है ॥ [ यहाँ ॐकार के आठ अंग' का अभिप्राय- अकार, उकार, मकार, नाद, बिन्दु, कला, कलातीत तथा उससे भी परे से है।'चतुष्पाद' का अभिप्राय- व्यष्टिपरक-विश्व, तैजस,प्राज्ञ और तुरीय समाष्टिपरक-विराट्,सूत्र, बीज और तुर्य से है। ‘त्रिस्थान' का तात्पर्य-जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति; स्थूल, सूक्ष्म, कारणशरीर; सत, रज, तम गुण; ज्ञान, इच्छा, क्रिया शक्ति अधवा भूत, वर्तमान, भविष्यत् काल से है। पंचदेवता का अभिप्राय-ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव से है।]


Verse १४

ओंकारं यो न जानाति ब्राह्मणो न भवेत्तु सः। प्रणव धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्मतल्लक्ष्यमुच्यते ॥

oṃkāraṃ yo na jānāti brāhmaṇo na bhavettu saḥ। praṇava dhanuḥ śaro hyātmā brahmatallakṣyamucyate ॥

He who does not know Omkara as having eight Angas (parts), four Padas (feet), three Sthanas (seats) and five Devatas (presiding deities) is not a Brahmana.

जो व्यक्ति ॐकार (प्रणव) से अनभिज्ञ हैं, उसे ब्राह्मण नहीं कहा जा सकता। प्रणव को धनुष, आत्मा को बाण और ब्रह्म को ही लक्ष्य कहा जाता है। बिना प्रमाद किये तन्मयतापूर्वक बाण से लक्ष्य का वेधन करना चाहिए। (इसके परिणाम स्वरूप) परावर अर्थात् ब्रह्म के सायुज्यत्व को प्राप्त कर लेने पर सभी क्रियाओं से निवृत्ति (मोक्ष की प्राप्ति) होती है ॥


Verse १५

अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् । निवर्तन्ते क्रियाः सर्वास्तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥

apramattena veddhavyaṃ śaravattanmayo bhavet । nivartante kriyāḥ sarvāstasmindṛṣṭe parāvare ॥

Pranava is the bow. Atman is the arrow and Brahman is said to be the aim. One should aim at it with great care and then he, like the arrow, becomes one with It. When that Highest is cognised, all Karmas return (from him, viz., do not affect him).

जो व्यक्ति ॐकार (प्रणव) से अनभिज्ञ हैं, उसे ब्राह्मण नहीं कहा जा सकता। प्रणव को धनुष, आत्मा को बाण और ब्रह्म को ही लक्ष्य कहा जाता है। बिना प्रमाद किये तन्मयतापूर्वक बाण से लक्ष्य का वेधन करना चाहिए। (इसके परिणाम स्वरूप) परावर अर्थात् ब्रह्म के सायुज्यत्व को प्राप्त कर लेने पर सभी क्रियाओं से निवृत्ति (मोक्ष की प्राप्ति) होती है ॥


Verse १६

ओंकारप्रभवा देवा ओंकारप्रभवाः स्वराः । ओंकारप्रभवं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्॥

oṃkāraprabhavā devā oṃkāraprabhavāḥ svarāḥ । oṃkāraprabhavaṃ sarvaṃ trailokyaṃ sacarācaram॥

The Vedas have Omkara as their cause. The Swaras (sounds) have Omkara as their cause. The three worlds with (all) the locomotive and the fixed (ones in them) have Omkara as their cause.

ॐ कार से देवों की उत्पत्ति, ॐकार से स्वर की उत्पत्ति और ॐ कार से ही त्रिलोक के सभी स्थावरजंगम की उत्पत्ति हुई है ॥


Verse १७

ह्रस्वो दहति पापानि दीर्घः संपत्प्रदोऽव्ययः । अर्धमात्रासमायुक्तः प्रणवो मोक्षदायकः॥

hrasvo dahati pāpāni dīrghaḥ saṃpatprado'vyayaḥ । ardhamātrāsamāyuktaḥ praṇavo mokṣadāyakaḥ॥

The short (accent of OM) burns all sins, the long one is decayless and the bestower of prosperity. United with Ardha-Matra (half-metre of OM), the Pranava becomes the bestower of salvation.

ॐ का ह्रस्व अंश पापों का दहन करता है, दीर्घ अंश अमृतत्वरूप अक्षय सम्पदा को प्रदान करता है तथा अदर्धमात्रा से युक्त प्रणव मोक्षदायक है ॥


Verse १८

तैलधारामिवाच्छिन्नं दीर्घघण्टानिनादवत् । अवाच्यं प्रणवस्याग्रं यस्तं वेद स वेदवित्॥

tailadhārāmivācchinnaṃ dīrghaghaṇṭāninādavat । avācyaṃ praṇavasyāgraṃ yastaṃ veda sa vedavit॥

That man is the knower of the Vedas who knows that the end (viz., Ardha-Matra) of Pranava should be worshipped (or recited) as uninterrupted as the flow of oil and (resounding) as long as the sound of a bell. 19. One should contemplate upon Omkara as Ishvara resembling an unshaken light, as of the size of a thumb and as motionless in the middle of the pericarp of the lotus of the heart. 20. Taking in Vayu through the left nostril and filling the stomach with it, one should contemplate upon Omkara as being in the middle of the body and as surrounded by circling flames.

तेल को अजस्त्र धारा की तरह, घण्टा के लम्बे निनाद के समान प्रणव के आगे ध्यनिरहित शब्द होता है, उसका ज्ञाता ही वेदवेत्ता है॥


Verse १९

हृत्पद्मकर्णिकामध्ये स्थिरदीपनिभाकृतिम् । अङ्गुष्ठमात्रमचलं ध्यायेदोंकारमीश्वरम् ॥

hṛtpadmakarṇikāmadhye sthiradīpanibhākṛtim । aṅguṣṭhamātramacalaṃ dhyāyedoṃkāramīśvaram ॥

हृदयकमल की कर्णिका के मध्य स्थिर ज्योतिशिखा के समान अंगुष्ठमात्र आकार के नित्य ॐकार रूप परमात्मा का ध्यान करे ॥


Verse २०

इडया वायुमापूर्य पूरयित्वोदरस्थितम्। ओंकारं देहमध्यस्थं ध्यायेज्ज्वालावलीवृतम् ॥

iḍayā vāyumāpūrya pūrayitvodarasthitam। oṃkāraṃ dehamadhyasthaṃ dhyāyejjvālāvalīvṛtam ॥

इड़ा (बायीं नासिका) से वायु को भरकर उदर में स्थापित करे और देह के बीच में ज्योतिर्मय ॐ कार का ध्यान करे । पूरक, कुम्भक और रेचक को क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र कहा गया है, ये प्राणायाम के देवता कहलाते हैं ।।[यहाँ यह ध्यातव्य है कि आगे चलकर २९ से ३१ मन्त्र में पूरक के समय 'विष्णु', कुम्भक के समय 'ब्रह्मा' एवं रेचक के समय 'शिव' का ध्यान करना लिखा है । यही पुरातन परम्परा भी है, परन्तु इस मन्त्र में पूरक को 'ब्रह्मा' और कुम्भक को 'विष्णु' कहा जाना परम्परा से हटकर है, जो विचारणीय है।]


Verse २१

ब्रह्मा पूरक इत्युक्तो विष्णुः कुम्भक उच्यते।रेचो रुद्र इति प्रोक्तः प्राणायामस्य देवताः ।।

brahmā pūraka ityukto viṣṇuḥ kumbhaka ucyate।reco rudra iti proktaḥ prāṇāyāmasya devatāḥ ।।

Brahma is said to be inspiration, Vishnu is said to be cessation (of breath) and Rudra is said to be expiration. These are the Devatas of Pranayama.

इड़ा (बायीं नासिका) से वायु को भरकर उदर में स्थापित करे और देह के बीच में ज्योतिर्मय ॐ कार का ध्यान करे । पूरक, कुम्भक और रेचक को क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र कहा गया है, ये प्राणायाम के देवता कहलाते हैं ।।[यहाँ यह ध्यातव्य है कि आगे चलकर २९ से ३१ मन्त्र में पूरक के समय 'विष्णु', कुम्भक के समय 'ब्रह्मा' एवं रेचक के समय 'शिव' का ध्यान करना लिखा है । यही पुरातन परम्परा भी है, परन्तु इस मन्त्र में पूरक को 'ब्रह्मा' और कुम्भक को 'विष्णु' कहा जाना परम्परा से हटकर है, जो विचारणीय है।]


Verse २२

आत्मानमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम्। ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्देवं पश्येन्निगूढवत् ॥

ātmānamaraṇiṃ kṛtvā praṇavaṃ cottarāraṇim। dhyānanirmathanābhyāsāddevaṃ paśyennigūḍhavat ॥

Having made Atman as the (lower) Arani (sacrificial wood) and Pranava as the upper Arani, one should see the God in secret through the practice of churning which is Dhyana.

अन्त:करण और प्रणवाक्षर को नीचे और ऊपर की अरणिरूप बनाकर मंथनरूप ध्यान के अभ्यास से अग्नि की भाँति व्याप्त गूढ़तत्त्व (परमात्मा) का साक्षात्कार करे ॥


Verse २३

ओंकारध्वनिनादेन वायोः संहरणान्तिकम् यावद्वलं समादध्यात्सम्यनादलयावधि ॥

oṃkāradhvaninādena vāyoḥ saṃharaṇāntikam yāvadvalaṃ samādadhyātsamyanādalayāvadhi ॥

One should practise restraint of breath as much as it lies in his power along with (the uttering of) Omkara sound, until it ceases completely.

प्रणव ध्वनि का, नाद सहित रेचक वायु के विलय हो जाने तक अपनी सामर्थ्यानुसार ( तब तक) ध्यान करे, जब तक नाद का भली प्रकार लय नहीं हो जाता ॥


Verse २४

गमागमस्थं गमनादिशून्यमोंकारमेकं रविकोटिदीप्तम्। पश्यन्ति ये सर्वजनान्तरस्थं हंसात्मकं ते विरजा भवन्ति ॥

gamāgamasthaṃ gamanādiśūnyamoṃkāramekaṃ ravikoṭidīptam। paśyanti ye sarvajanāntarasthaṃ haṃsātmakaṃ te virajā bhavanti ॥

Those who look upon OM as of the form of Hamsa staying in all, shining like Crores of suns, being alone, staying in Gamagama (ever going and coming) and being devoid of motion - at last such persons are freed from sin.

गमन और आगमन में विद्यमान तथा गमनादि से रहित, करोड़ों सूर्यों को प्रभा के समान सभी मनुष्यों के अन्त:करण में विराजमान हंसात्मक प्रणव का जो दर्शन करते हैं, वे कृतकृत्य हो जाते हैं ॥


Verse २५

यन्मनस्त्रिजगत्सृष्टिस्थितिव्यसनकर्मकृत् ।तन्मनो विलयं याति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥

yanmanastrijagatsṛṣṭisthitivyasanakarmakṛt ।tanmano vilayaṃ yāti tadviṣṇoḥ paramaṃ padam ॥

That Manas which is the author of the actions (viz.,) creation, preservation and destruction of the three worlds, is (then) absorbed (in the supreme One). That is the highest state of Vishnu.

जो मन त्रिगुणमय संसार के सृजन, पालन और संहार का कारण है, उसके विलय हो जाने पर विष्णु के परमपद की प्राप्ति होती है। अष्टदल और बत्तीस पंखुड़ियों से युक्त जो हृदयकमल है, उसके बीच सूर्य और सूर्य के बीच चन्द्रमा विद्यमान है॥


Verse २६

अष्टपत्रं तु हृत्पद्यं द्वात्रिंशत्केसरान्वितम्।तस्य मध्ये स्थितो भानुर्भानुमध्यगतः शशी ॥

aṣṭapatraṃ tu hṛtpadyaṃ dvātriṃśatkesarānvitam।tasya madhye sthito bhānurbhānumadhyagataḥ śaśī ॥

The lotus of the heart has eight petals and thirty-two filaments. The sun is in its midst; the moon is in the middle of the sun.

जो मन त्रिगुणमय संसार के सृजन, पालन और संहार का कारण है, उसके विलय हो जाने पर विष्णु के परमपद की प्राप्ति होती है। अष्टदल और बत्तीस पंखुड़ियों से युक्त जो हृदयकमल है, उसके बीच सूर्य और सूर्य के बीच चन्द्रमा विद्यमान है॥


Verse २७

शशिमध्यगतो वह्निर्वह्निमध्यगता प्रभा।प्रभामध्यगतं पीठं नानारत्नप्रवेष्टितम् ॥

śaśimadhyagato vahnirvahnimadhyagatā prabhā।prabhāmadhyagataṃ pīṭhaṃ nānāratnapraveṣṭitam ॥

One should meditate upon the stainless Lord Vasudeva as being (seated) upon the centre of Pitha, as having Srivatsa (black mark) and Kaustubha (garland of gems) on his chest and as adorned with gems and pearls resembling pure crystal in lustre and as resembling Crores of moons in brightness. He should meditate upon Maha-Vishnu as above or in the following manner.

चन्द्रमा के बीच अग्नि और अग्नि के बीच दीप्ति स्थित है। उसके बीच नानाविध रत्नों से सुसज्जित पीठस्थान है। उस पीठ के बीच निरञ्जन प्रभु वासुदेव विराजमान हैं, जो श्रीवत्स, कौस्तुभमणि एवं मणि-मुक्ताओं से विशेष रूप से सुशोभित हैं ॥


Verse २८

तस्य मध्यगतं देवं वासुदेवं निरञ्जनम्।श्रीवत्सकौस्तुभोरस्कं मुक्तामणिविभूषितम् ॥

tasya madhyagataṃ devaṃ vāsudevaṃ nirañjanam।śrīvatsakaustubhoraskaṃ muktāmaṇivibhūṣitam ॥

One should meditate upon the stainless Lord Vasudeva as being (seated) upon the centre of Pitha, as having Srivatsa (black mark) and Kaustubha (garland of gems) on his chest and as adorned with gems and pearls resembling pure crystal in lustre and as resembling Crores of moons in brightness. He should meditate upon Maha-Vishnu as above or in the following manner.

चन्द्रमा के बीच अग्नि और अग्नि के बीच दीप्ति स्थित है। उसके बीच नानाविध रत्नों से सुसज्जित पीठस्थान है। उस पीठ के बीच निरञ्जन प्रभु वासुदेव विराजमान हैं, जो श्रीवत्स, कौस्तुभमणि एवं मणि-मुक्ताओं से विशेष रूप से सुशोभित हैं ॥


Verse २९

शुद्धस्फटिकसंकाशं चन्द्रकोटिसमप्रभम् । एवं ध्यायेन्महाविष्णुमेवं वा विनयान्वितः ॥

śuddhasphaṭikasaṃkāśaṃ candrakoṭisamaprabham । evaṃ dhyāyenmahāviṣṇumevaṃ vā vinayānvitaḥ ॥

he should meditate with inspiration (of breath) upon Maha-Vishnu as resembling the Atasi flower and as staying in the seat of navel with four hands; then with restraint of breath, he should meditate in the heart upon Brahma, the Grandfather as being on the lotus with the Gaura (pale-red) colour of gems and having four faces;

शुद्ध स्फटिक के सदृश करोड़ों चन्द्रमा की कान्ति वाले महाविष्णु का विनयान्वित होकर ध्यान करे ॥


Verse ३०

अतसीपुष्पसंकाशं नाभिस्थाने प्रतिष्ठितम्। चतुर्भुजं महाविष्णु पूरकेण विचिन्तयेत् ॥

atasīpuṣpasaṃkāśaṃ nābhisthāne pratiṣṭhitam। caturbhujaṃ mahāviṣṇu pūrakeṇa vicintayet ॥

he should meditate with inspiration (of breath) upon Maha-Vishnu as resembling the Atasi flower and as staying in the seat of navel with four hands; then with restraint of breath, he should meditate in the heart upon Brahma, the Grandfather as being on the lotus with the Gaura (pale-red) colour of gems and having four faces;

पूरक द्वारा साँस अन्दर खींचते समय नाभिस्थान में प्रतिष्ठित अतसी पुष्प के समान चतुर्भुज महाविष्णु भगवान् का ध्यान करना चाहिए ॥


Verse ३१

कुम्भकेन हृदि स्थाने चिन्तयेत्कमलासनम्।ब्रह्माणं रक्तगौराभं चतुर्वक्त्रं पितामहम्॥

kumbhakena hṛdi sthāne cintayetkamalāsanam।brahmāṇaṃ raktagaurābhaṃ caturvaktraṃ pitāmaham॥

That is) he should meditate with inspiration (of breath) upon Maha-Vishnu as resembling the Atasi flower and as staying in the seat of navel with four hands; then with restraint of breath, he should meditate in the heart upon Brahma, the Grandfather as being on the lotus with the Gaura (pale-red) colour of gems and having four faces;

कुम्भक द्वारा साँस भीतर रोकने के समय हृदय स्थल में कमल के आसन पर सुशोभित लालिमामय गौर वर्ण वाले चतुर्मुख पितामह ब्रह्मा का ध्यान करना चाहिए ॥


Verse ३२

रेचकेन तु विद्यात्मा ललाटस्थं त्रिलोचनम्। शुद्धस्फटिकसंकाशं निष्कलं पापनाशनम् ।।

recakena tu vidyātmā lalāṭasthaṃ trilocanam। śuddhasphaṭikasaṃkāśaṃ niṣkalaṃ pāpanāśanam ।।

Then through expiration, he should meditate upon the three-eyed Shiva between the two eyebrows shining like the pure crystal, being stainless, destroying all sins, being in that which is like the lotus facing down with its flower (or face) below and the stalk above or like the flower of a plantain tree, being of the form of all Vedas, containing one hundred petals and one hundred leaves and having the pericarp full-expanded

रेचक से साँस छोड़ते हुए ललाट में शुद्ध स्फटिक के सदृश श्वेत रंग के त्रिनेत्रयुक्त, निष्कल( कलारहित), पाप संहारक भगवान् शिव का ध्यान करना चाहिए ॥


Verse ३३

अब्जपत्रमधः पुष्पमूर्खनालमधोमुखम् । कदलीपुष्पसंकाशं सर्ववेदमयं शिवम् ॥

abjapatramadhaḥ puṣpamūrkhanālamadhomukham । kadalīpuṣpasaṃkāśaṃ sarvavedamayaṃ śivam ॥

Then through expiration, he should meditate upon the three-eyed Shiva between the two eyebrows shining like the pure crystal, being stainless, destroying all sins, being in that which is like the lotus facing down with its flower (or face) below and the stalk above or like the flower of a plantain tree, being of the form of all Vedas, containing one hundred petals and one hundred leaves and having the pericarp full-expanded

नीचे की ओर पुष्पित हुआ, ऊपर की ओर नाल वाला तथा अधोभाग की ओर मुख किये हुए कदली पुष्प की तरह हृदयकमल में सभी वेदों के आधारभूत भगवान् शिव अवस्थित हैं ।।


Verse ३४

शतारं शतपत्राढ्यं विकीर्णाम्बुजकर्णिकम् । तत्रार्कचन्द्रवह्नीनामुपर्युपरि चिन्तयेत् ॥

śatāraṃ śatapatrāḍhyaṃ vikīrṇāmbujakarṇikam । tatrārkacandravahnīnāmuparyupari cintayet ॥

Then through expiration, he should meditate upon the three-eyed Shiva between the two eyebrows shining like the pure crystal, being stainless, destroying all sins, being in that which is like the lotus facing down with its flower (or face) below and the stalk above or like the flower of a plantain tree, being of the form of all Vedas, containing one hundred petals and one hundred leaves and having the pericarp full-expanded

सौ अरे वाले, सौ पत्ते वाले और विकसित पंखुड़ियों से युक्त हृदय पद्म में सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि का एक के बाद दूसरे का क्रमशः ध्यान करना चाहिए ॥


Verse ३५

पद्मस्योद्घाटनं कृत्वा बोधचन्द्राग्निसूर्यकम्।तस्य हृद्धीजमाहृत्य आत्मानं चरते ध्रुवम् ॥

padmasyodghāṭanaṃ kṛtvā bodhacandrāgnisūryakam।tasya hṛddhījamāhṛtya ātmānaṃ carate dhruvam ॥

There he should meditate upon the sun, the moon and the Agni, one above another. Passing above through the lotus which has the brightness of the sun, moon and Agni and taking its Hrim Bija (letter), one leads his Atman firmly.

सूर्य, चन्द्र और अग्नि के बोध हेतु सर्वप्रथम हृदयकमल के विकसित होने का ध्यान करे। तत्पश्चात् हदय कमल में स्थित बीजाक्षरों को ग्रहण करके ही अचल चेतनावस्था की प्राप्ति होती है ॥


Verse ३६

त्रिस्थानं च त्रिमार्गं च त्रिब्रह्म च त्रयाक्षरम्। त्रिमात्रमर्धमात्रं वा यस्तं वेद स वेदवित् ॥

tristhānaṃ ca trimārgaṃ ca tribrahma ca trayākṣaram। trimātramardhamātraṃ vā yastaṃ veda sa vedavit ॥

He is the knower of Vedas who knows the three seats, the three Matras, the three Brahmas, the three Aksharas (letters) and the three Matras associated with the Ardha-Matra.

तीन स्थान, तीन मार्ग, त्रिविध ब्रह्म, त्रयाक्षर, त्रिमात्रा तथा अर्द्धमात्रा में जो परमात्मा स्थित है, उसके ज्ञाता ही वेद के तात्पर्य के ज्ञाता हैं ।।[यहाँ कुछ सांकेतिक शब्द प्रयुक्त हैं, जिनका तात्पर्य इस प्रकार हैं- त्रिस्थान=अवस्थात्रय-जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति; त्रिमार्ग=धूम, अर्चि, अगति; ब्रह्मत्रय-विश्व, विराट्, ओतृब्रह्म; त्रियाक्षर=अ, उ, म्; त्रिमात्रा=हृस्व,दीर्घ, प्लुत।]


Verse ३७

तैलधारामिवाच्छिन्नदीर्घघण्टानिनादवत् । बिन्दुनादकलातीतं यस्तं वेद स वेदवित् ॥

tailadhārāmivācchinnadīrghaghaṇṭāninādavat । bindunādakalātītaṃ yastaṃ veda sa vedavit ॥

He who knows that which is above Bindu, Nada and Kala as uninterrupted as the flow of oil and (resounding) as long as the sound of a bell - that man is a knower of the Vedas.

दीर्घ घण्टा निनाद के सदृश, तेल की अविच्छिन्न धारा की तरह तथा बिन्दु-नाद और कला से अतीत उस परम तत्त्व ( ॐकार) को जो जानता है, वहीं वेदज्ञ हैं ॥


Verse ३८

यथैवोत्पलनालेन तोयमाकर्षयेन्नरः । तथैवोत्कर्षयेद्वायुं योगी योगपथे स्थितः ॥

yathaivotpalanālena toyamākarṣayennaraḥ । tathaivotkarṣayedvāyuṃ yogī yogapathe sthitaḥ ॥

Just as a man would draw up (with his mouth) the water through the (pores of the) lotus-stalk, so the Yogin treading the path of Yoga should draw up the breath.

जिस प्रकार मनुष्य कमलनाल से जल को धीरे-धीरे खींचते हैं, उसी प्रकार योगी योगस्थ होकर प्राणायाम द्वारा वायु को धीरे-धीरे ऊर्ध्व भूमिका में ले जाए ॥


Verse ३९

अर्धमात्रात्मकं कृत्वा कोशभूतं तु पङ्कजम्। कर्षयेन्नालमात्रेण भ्रुवोर्मध्ये लयं नयेत्॥

ardhamātrātmakaṃ kṛtvā kośabhūtaṃ tu paṅkajam। karṣayennālamātreṇa bhruvormadhye layaṃ nayet॥

Having made the lotus-sheath of the form of Ardha-Matra, one should draw up the breath through the stalk (of the Nadis Susumna, Ida and Pingala) and absorb it in the middle of the eyebrows.

प्रणव की अर्द्धमात्रा (अव्यक्त नाद उच्चारण) को रस्सी बनाकर हृदयकमल रूपी कूप नाल (सुषुम्ना) मार्ग द्वारा जलरूपा कुण्डलिनी को भौंहों के मध्य में लय करे ॥


Verse ४०

भ्रुवोर्मध्ये ललाटे तु नासिकायास्तु मूलतः । जानीयादमृतं स्थानं तद्ब्रह्मायतनं महत्॥

bhruvormadhye lalāṭe tu nāsikāyāstu mūlataḥ । jānīyādamṛtaṃ sthānaṃ tadbrahmāyatanaṃ mahat॥

He should know that the middle of the eyebrows in the forehead which is also the root of the nose is the seat of nectar. That is the great place of Brahman.

नासिका के मूल से लेकर भौंहों के बीच में जो ललाट स्थान है, वहाँ तक अमृत स्थान जानना चाहिए, वही ब्रह्म का महान् निवास स्थान है ॥


Verse ४१

आसनं प्राणसंरोधः प्रत्याहारश्च धारणा। ध्यानं समाधिरेतानि योगाङ्गानि भवन्ति षट् ॥

āsanaṃ prāṇasaṃrodhaḥ pratyāhāraśca dhāraṇā। dhyānaṃ samādhiretāni yogāṅgāni bhavanti ṣaṭ ॥

Postures, restraint of breath, subjugation of the senses, Dharana, Dhyana and Samadhi are the six parts of Yoga.

आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि-ये छ: योग के अङ्ग कहे गये हैं ॥


Verse ४२

आसनानि च तावन्ति यावन्त्यो जीवजातयः ।एतेषामतुलान्भेदान्विजानाति महेश्वरः ॥

āsanāni ca tāvanti yāvantyo jīvajātayaḥ ।eteṣāmatulānbhedānvijānāti maheśvaraḥ ॥

There are as many postures as there are living creatures; and Maheshvara (the great Lord) knows their distinguishing features.

विश्व में जितनी जीव प्रजातियाँ हैं, उतनी ही आसनों की विधियाँ भी बतायी गई हैं, इस प्रकार के असंख्य भेदों के ज्ञाता भगवान् शंकर हैं ॥


Verse ४३

सिद्ध भद्रं तथा सिंहं पद्यम चेति चतुष्टयम्।आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम्॥

siddha bhadraṃ tathā siṃhaṃ padyama ceti catuṣṭayam।ādhāraṃ prathamaṃ cakraṃ svādhiṣṭhānaṃ dvitīyakam॥

Siddha, Bhadra, Simha and Padma are the four (chief) postures. Muladhara is the first Chakra. Svadhisthana is the second.

सिद्ध, भद्र, सिंह और पद्म ये चार प्रमुख आसन हैं, पहला चक्र आधार (मूलाधार) और दूसरा स्वाधिष्ठान हैं ॥


Verse ४४

योनिस्थानं तयोर्मध्ये कामरूपं निगद्यते ।आधाराख्ये गुदस्थाने पङ्कजं यच्चतुर्दलम् ॥

yonisthānaṃ tayormadhye kāmarūpaṃ nigadyate ।ādhārākhye gudasthāne paṅkajaṃ yaccaturdalam ॥

Between these two is said to be the seat of Yoni (perineum), having the form of Kama (God of love). In the Adhara of the anus, there is the lotus of four petals.

इन दोनों के बीच में कामरूप प्रजनन स्थान है। गुदा स्थान के आधारचक्र में चतुर्दल कमल विद्यमान है। उसके बीच काम नाम से प्रख्यात प्रजनन-योनि (कुण्डलिनी शक्ति) है, जिसकी अभ्यर्थना सिद्धजन करते हैं। प्रजनन योनि के बीच पश्चिम की ओर पुरुष जननेन्द्रिय लिङ्ग है ॥


Verse ४५

तन्मध्ये प्रोच्यते योनिःकामाख्या सिद्धवन्दिता।योनिमध्ये स्थितं लिङ्ग पश्चिमाभिमुखं तथा ।।

tanmadhye procyate yoniḥkāmākhyā siddhavanditā।yonimadhye sthitaṃ liṅga paścimābhimukhaṃ tathā ।।

In its midst is said to be the Yoni called Kama and worshipped by the Siddhas. In the midst of the Yoni is the Linga facing the west and split at its head like the gem. He who knows this, is a knower of the Vedas.

इन दोनों के बीच में कामरूप प्रजनन स्थान है। गुदा स्थान के आधारचक्र में चतुर्दल कमल विद्यमान है। उसके बीच काम नाम से प्रख्यात प्रजनन-योनि (कुण्डलिनी शक्ति) है, जिसकी अभ्यर्थना सिद्धजन करते हैं। प्रजनन योनि के बीच पश्चिम की ओर पुरुष जननेन्द्रिय लिङ्ग है ॥


Verse ४६

मस्तके मणिवद्भिन्नं यो जानाति स योगवित्।तप्तचामीकराकारं तडिल्लेखेव विस्फुरत् ॥

mastake maṇivadbhinnaṃ yo jānāti sa yogavit।taptacāmīkarākāraṃ taḍillekheva visphurat ॥

In its midst is said to be the Yoni called Kama and worshipped by the Siddhas. In the midst of the Yoni is the Linga facing the west and split at its head like the gem. He who knows this, is a knower of the Vedas.

मस्तक में मणि की तरह से प्रकाश है, उसे जो जानता है वह योगवेत्ता है। तपे हुए सोने के समान वर्णवाला और तडित् की धारा की तरह विशेष प्रकाशित, अगनिमण्डल से चार अंगुल ऊपर और मेढ्र (मूत्रेन्द्रिय) से नीचे स्वसंज्ञक प्राण विद्यमान है, उसके आश्रय में स्वाधिष्ठान है॥


Verse ४७

चतुरस्त्रमुपर्यग्नेरधो मेढ्रात्प्रतिष्ठितम् । स्वशब्देन भवेत्प्राणः स्वाधिष्ठानं तदाश्रयम् ॥

caturastramuparyagneradho meḍhrātpratiṣṭhitam । svaśabdena bhavetprāṇaḥ svādhiṣṭhānaṃ tadāśrayam ॥

four-sided figure is situated above Agni and below the genital organ, of the form of molten gold and shining like streaks of lightning. Prana is with its Sva (own) sound, having Svadhisthana as its Adhisthana (seat), (or since Sva or Prana arises from it).

मस्तक में मणि की तरह से प्रकाश है, उसे जो जानता है वह योगवेत्ता है। तपे हुए सोने के समान वर्णवाला और तडित् की धारा की तरह विशेष प्रकाशित, अगनिमण्डल से चार अंगुल ऊपर और मेढ्र (मूत्रेन्द्रिय) से नीचे स्वसंज्ञक प्राण विद्यमान है, उसके आश्रय में स्वाधिष्ठान है॥


Verse ४८

स्वाधिष्ठानं ततश्चक्रं मेढ्रमेव निगद्यते । मणिवत्तन्तुना यत्र वायुना पूरितं वपुः ॥

svādhiṣṭhānaṃ tataścakraṃ meḍhrameva nigadyate । maṇivattantunā yatra vāyunā pūritaṃ vapuḥ ॥

The Chakra Svadhisthana is spoken of as the genital organ itself. The Chakra in the sphere of the navel is called Manipuraka, since the body is pierced through by Vayu like Manis (gems) by string.

उसके बाद स्थित स्वाधिष्ठान चक्र को मेढ्र ही कहा जाता है। जहाँ मणि के प्रकाश की तरह वायु से पूर्ण शरीर है। नाभिमण्डल में स्थित चक्र को मणिपूरक कहा गया है। वहाँ बारह दल से युक्त महाचक्र में पुण्य और पाप का नियन्त्रण रहता है ।।

Text (part 2)

Verse ४९

तन्नाभिमण्डलं चक्रं प्रोच्यते मणिपूरकम्। द्वादशारमहाचक्रे पुण्यपापनियन्त्रितः ॥

tannābhimaṇḍalaṃ cakraṃ procyate maṇipūrakam। dvādaśāramahācakre puṇyapāpaniyantritaḥ ॥

he Jiva (ego) urged to actions by its past virtuous and sinful Karmas whirls about in this great Chakra of twelve spokes, so long as it does not grasp the truth.

उसके बाद स्थित स्वाधिष्ठान चक्र को मेढ्र ही कहा जाता है। जहाँ मणि के प्रकाश की तरह वायु से पूर्ण शरीर है। नाभिमण्डल में स्थित चक्र को मणिपूरक कहा गया है। वहाँ बारह दल से युक्त महाचक्र में पुण्य और पाप का नियन्त्रण रहता है ।।


Verse ५०

तावज्जीवो भ्रमत्येवं यावत्तत्त्वं न विन्दति । ऊर्ध्वं मेढ्रादधो नाभेः कन्दो योऽस्ति खगाण्डवत्।।

tāvajjīvo bhramatyevaṃ yāvattattvaṃ na vindati । ūrdhvaṃ meḍhrādadho nābheḥ kando yo'sti khagāṇḍavat।।

he Jiva (ego) urged to actions by its past virtuous and sinful Karmas whirls about in this great Chakra of twelve spokes, so long as it does not grasp the truth.

इस तत्त्वज्ञान को न समझ पाने तक जीवात्मा को भ्रमजाल में ही फँसे रहना पड़ता है। मेढ्र स्थान से ऊपर और नाभि से नीचे पक्षी के अण्डे की तरह कन्द का स्थान है। उसी स्थान से बहत्तर हजार नाड़ियाँ उत्पन्न होती हैं,उन हजारों नाड़ियों में बहत्तर नाड़ियाँ प्रमुख हैं॥


Verse ५१

तत्र नाडयः समुत्पन्नाः सहस्त्राणि द्विसप्ततिः ।तेषु नाडीसहस्त्रेषु द्विसप्ततिरुदाहृताः ॥

tatra nāḍayaḥ samutpannāḥ sahastrāṇi dvisaptatiḥ ।teṣu nāḍīsahastreṣu dvisaptatirudāhṛtāḥ ॥

Above the genital organ and below the navel is Kanda of the shape of a bird's egg.

इस तत्त्वज्ञान को न समझ पाने तक जीवात्मा को भ्रमजाल में ही फँसे रहना पड़ता है। मेढ्र स्थान से ऊपर और नाभि से नीचे पक्षी के अण्डे की तरह कन्द का स्थान है। उसी स्थान से बहत्तर हजार नाड़ियाँ उत्पन्न होती हैं,उन हजारों नाड़ियों में बहत्तर नाड़ियाँ प्रमुख हैं॥


Verse ५२

प्रधानाः प्राणवाहिन्यो भूयस्तत्र दश स्मृताः।इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्ना च तृतीयका॥

pradhānāḥ prāṇavāhinyo bhūyastatra daśa smṛtāḥ।iḍā ca piṅgalā caiva suṣumnā ca tṛtīyakā॥

There arise (from it) Nadis seventy-two thousand in number. Of these seventy-two are generally known

इनमें से दस प्रमुख नाड़ियाँ प्राण का संचार करने वाली हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं- इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, गान्धारी, हस्तिजिह्वा, पूषा, यशस्विनी, अलम्बुसा, कुहू तथा शंखिनी ॥


Verse ५३

गान्धारी हस्तिजिह्वा च पूषा चैव यशस्विनी।अलम्बुसा कुहूरत्र शङ्गिनी दशमी स्मृता ॥

gāndhārī hastijihvā ca pūṣā caiva yaśasvinī।alambusā kuhūratra śaṅginī daśamī smṛtā ॥

Of these, the chief ones are ten and carry the Pranas. Ida, Pingala, Susumna, Gandhari, Hastijihva, Pusha, Yasasvini, Alambusa, Kuhuh and Sankhini are said to be the ten.

इनमें से दस प्रमुख नाड़ियाँ प्राण का संचार करने वाली हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं- इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, गान्धारी, हस्तिजिह्वा, पूषा, यशस्विनी, अलम्बुसा, कुहू तथा शंखिनी ॥


Verse ५४

एवं नाडीमयं चक्रं विज्ञेयं योगिना सदा। सततं प्राणवाहिन्यः सोमसूर्याग्निदेवताः ॥

evaṃ nāḍīmayaṃ cakraṃ vijñeyaṃ yoginā sadā। satataṃ prāṇavāhinyaḥ somasūryāgnidevatāḥ ॥

Of these, the chief ones are ten and carry the Pranas. Ida, Pingala, Susumna, Gandhari, Hastijihva, Pusha, Yasasvini, Alambusa, Kuhuh and Sankhini are said to be the ten.

इस नाड़ी चक्र की जानकारी योग-साधकों को होना आवश्यक है। सतत प्राण का संचार करने वाली इड़ा, पिङ्गला और सुषुम्ना ये तीन नाड़ियाँ सूर्य, चन्द्र और अग्नि देवों से युक्त हैं। इड़ा नाड़ी बायीं ओर, पिङ्गला दाहिनी ओर तथा सुषुम्ना इन दोनों के बीच विद्यमान है, ये तीनों नाड़ियाँ प्राण के संचरण-मार्ग-रूपा हैं । प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर,देवदत्त और धनञ्जय ये दस प्राण हैं, प्राणादि पाँच प्राण प्रख्यात हैं तथा नागादि पाँच उपप्राण कहे गये हैं॥


Verse ५५

इडापिङ्गलासुषुम्नास्तिस्त्रो नाड्यः प्रकीर्तिताः ।इडा वामे स्थिता भागे पिङ्गला दक्षिणे स्थिता ।।

iḍāpiṅgalāsuṣumnāstistro nāḍyaḥ prakīrtitāḥ ।iḍā vāme sthitā bhāge piṅgalā dakṣiṇe sthitā ।।

This Chakra of the Nadis should ever be known by the Yogins. The three Nadis Ida, Pingala and Susumna are said to carry Prana always and have as their Devatas, moon, sun and Agni.

इस नाड़ी चक्र की जानकारी योग-साधकों को होना आवश्यक है। सतत प्राण का संचार करने वाली इड़ा, पिङ्गला और सुषुम्ना ये तीन नाड़ियाँ सूर्य, चन्द्र और अग्नि देवों से युक्त हैं। इड़ा नाड़ी बायीं ओर, पिङ्गला दाहिनी ओर तथा सुषुम्ना इन दोनों के बीच विद्यमान है, ये तीनों नाड़ियाँ प्राण के संचरण-मार्ग-रूपा हैं । प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर,देवदत्त और धनञ्जय ये दस प्राण हैं, प्राणादि पाँच प्राण प्रख्यात हैं तथा नागादि पाँच उपप्राण कहे गये हैं॥


Verse ५६

सुषुम्ना मध्यदेशे तु प्राणमार्गास्त्रयः स्मृताः।प्राणोऽपानः समानश्चोदानो व्यानस्तथैव च॥

suṣumnā madhyadeśe tu prāṇamārgāstrayaḥ smṛtāḥ।prāṇo'pānaḥ samānaścodāno vyānastathaiva ca॥

This Chakra of the Nadis should ever be known by the Yogins. The three Nadis Ida, Pingala and Susumna are said to carry Prana always and have as their Devatas, moon, sun and Agni.

इस नाड़ी चक्र की जानकारी योग-साधकों को होना आवश्यक है। सतत प्राण का संचार करने वाली इड़ा, पिङ्गला और सुषुम्ना ये तीन नाड़ियाँ सूर्य, चन्द्र और अग्नि देवों से युक्त हैं। इड़ा नाड़ी बायीं ओर, पिङ्गला दाहिनी ओर तथा सुषुम्ना इन दोनों के बीच विद्यमान है, ये तीनों नाड़ियाँ प्राण के संचरण-मार्ग-रूपा हैं । प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर,देवदत्त और धनञ्जय ये दस प्राण हैं, प्राणादि पाँच प्राण प्रख्यात हैं तथा नागादि पाँच उपप्राण कहे गये हैं॥


Verse ५७

नागः कुर्मः कुकरको देवदत्त धनंजयः ।प्राणाद्याः पञ्चविख्याता नागाद्याः पञ्च वायवः ॥

nāgaḥ kurmaḥ kukarako devadatta dhanaṃjayaḥ ।prāṇādyāḥ pañcavikhyātā nāgādyāḥ pañca vāyavaḥ ॥

Ida is on the left side and Pingala on the right side, while the Susumna is in the middle. These three are known to be the paths of Prana.

इस नाड़ी चक्र की जानकारी योग-साधकों को होना आवश्यक है। सतत प्राण का संचार करने वाली इड़ा, पिङ्गला और सुषुम्ना ये तीन नाड़ियाँ सूर्य, चन्द्र और अग्नि देवों से युक्त हैं। इड़ा नाड़ी बायीं ओर, पिङ्गला दाहिनी ओर तथा सुषुम्ना इन दोनों के बीच विद्यमान है, ये तीनों नाड़ियाँ प्राण के संचरण-मार्ग-रूपा हैं । प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर,देवदत्त और धनञ्जय ये दस प्राण हैं, प्राणादि पाँच प्राण प्रख्यात हैं तथा नागादि पाँच उपप्राण कहे गये हैं॥


Verse ५८

एते नाडीसहस्त्रेषु वर्तन्ते जीवरूपिणः। प्राणापानवशो जीवो ह्यधश्चोर्ध्वं प्रधावति ॥

ete nāḍīsahastreṣu vartante jīvarūpiṇaḥ। prāṇāpānavaśo jīvo hyadhaścordhvaṃ pradhāvati ॥

All these are situated (or run along) the one thousand Nadis, (being) in the form of (or producing) life. Jiva which is under the influence of Prana and Apana goes up and down.

इन हजारों नाड़ियों में प्राण जीवरूप से वास करते हैं। प्राण और अपान के वशीभूत होकर जीव ऊपरनीचे आवागमन करता रहता है ।।


Verse ५९

वामदक्षिणमार्गेण चञ्चलत्वान्न दृश्यते । आक्षिप्तो भुजदण्डेन यथोच्चलति कन्दुकः ॥

vāmadakṣiṇamārgeṇa cañcalatvānna dṛśyate । ākṣipto bhujadaṇḍena yathoccalati kandukaḥ ॥

Jiva on account of its ever moving by the left and right paths is not visible. Just as a ball struck down (on the earth) with the bat of the hand springs up, so Jiva ever tossed by Prana and Apana is never at rest.

प्राण कभी दायें तो कभी बायें मार्ग से गमन करता है, परन्तु चञ्चल प्रकृति का होने से देखने में नहीं आता। हाथों से फेंकी हुई गेंद जैसे इधर-उधर दौड़ता है, उसी प्रकार प्राण और अपान द्वारा भली प्रकार फेंकने से जीव को कभी आराम नहीं मिल पाता । अपान और प्राण की एक दूसरे को खींचने की प्रक्रिया उसी प्रकार की है, जैसे रस्सी में आबद्ध पक्षी अपनी और खींच लिया जाता है। इस तत्त्व के ज्ञाता को ही योगी कहा जा सकता है। 'ह' कार ध्वनि से प्राण बाहर जाता है और 'स' कार से पुनः अन्दर प्रवेश करता है। 'हंस' 'हंस' इस प्रकार का' मन्त्र जप' जीव हमेशा जपता रहता है। इस अजपा-जप की संख्या दिन-रात में इस हजार छ: सौ होती है। इतनी संख्या में मन्त्र जीव हमेशा जपता है। जो योगियों के लिए मोक्ष प्रदान करने वाली है, यही अजपा गायत्री कहलाती है ।।


Verse ६०

प्राणापानसमाक्षिप्तस्तद्वज्जीवो न विश्चमेत् ।अपानाकर्षति प्राणोऽपानः प्राणाच्च कर्षति ॥

prāṇāpānasamākṣiptastadvajjīvo na viścamet ।apānākarṣati prāṇo'pānaḥ prāṇācca karṣati ॥

He is knower of Yoga who knows that Prana always draws itself from Apana and Apana draws itself from Prana, like a bird (drawing itself from and yet not freeing itself) from the string (to which it is tied).

प्राण कभी दायें तो कभी बायें मार्ग से गमन करता है, परन्तु चञ्चल प्रकृति का होने से देखने में नहीं आता। हाथों से फेंकी हुई गेंद जैसे इधर-उधर दौड़ता है, उसी प्रकार प्राण और अपान द्वारा भली प्रकार फेंकने से जीव को कभी आराम नहीं मिल पाता । अपान और प्राण की एक दूसरे को खींचने की प्रक्रिया उसी प्रकार की है, जैसे रस्सी में आबद्ध पक्षी अपनी और खींच लिया जाता है। इस तत्त्व के ज्ञाता को ही योगी कहा जा सकता है। 'ह' कार ध्वनि से प्राण बाहर जाता है और 'स' कार से पुनः अन्दर प्रवेश करता है। 'हंस' 'हंस' इस प्रकार का' मन्त्र जप' जीव हमेशा जपता रहता है। इस अजपा-जप की संख्या दिन-रात में इस हजार छ: सौ होती है। इतनी संख्या में मन्त्र जीव हमेशा जपता है। जो योगियों के लिए मोक्ष प्रदान करने वाली है, यही अजपा गायत्री कहलाती है ।।


Verse ६१

खगरज्जुवदित्येतद्यो जानाति स योगवित् । हकारेण बहिर्याति सकारेण विशेत्पुनः ॥

khagarajjuvadityetadyo jānāti sa yogavit । hakāreṇa bahiryāti sakāreṇa viśetpunaḥ ॥

the Jiva comes out with the letter 'Ha' and gets in again with the letter 'Sa'. Thus Jiva always utters the Mantra 'Hamsa', 'Hamsa'. The Jiva always utters the Mantra twenty-one thousand and six hundred times in one day and night. This is called Ajapa Gayatri and is ever the bestower of Nirvana to the Yogins.

प्राण कभी दायें तो कभी बायें मार्ग से गमन करता है, परन्तु चञ्चल प्रकृति का होने से देखने में नहीं आता। हाथों से फेंकी हुई गेंद जैसे इधर-उधर दौड़ता है, उसी प्रकार प्राण और अपान द्वारा भली प्रकार फेंकने से जीव को कभी आराम नहीं मिल पाता । अपान और प्राण की एक दूसरे को खींचने की प्रक्रिया उसी प्रकार की है, जैसे रस्सी में आबद्ध पक्षी अपनी और खींच लिया जाता है। इस तत्त्व के ज्ञाता को ही योगी कहा जा सकता है। 'ह' कार ध्वनि से प्राण बाहर जाता है और 'स' कार से पुनः अन्दर प्रवेश करता है। 'हंस' 'हंस' इस प्रकार का' मन्त्र जप' जीव हमेशा जपता रहता है। इस अजपा-जप की संख्या दिन-रात में इस हजार छ: सौ होती है। इतनी संख्या में मन्त्र जीव हमेशा जपता है। जो योगियों के लिए मोक्ष प्रदान करने वाली है, यही अजपा गायत्री कहलाती है ।।


Verse ६२

हंसहंसेत्यमुं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा। शतानि षड् दिवारोत्रं सहस्त्राण्येकविंशतिः ॥

haṃsahaṃsetyamuṃ mantraṃ jīvo japati sarvadā। śatāni ṣaḍ divārotraṃ sahastrāṇyekaviṃśatiḥ ॥

The Jiva comes out with the letter 'Ha' and gets in again with the letter 'Sa'. Thus Jiva always utters the Mantra 'Hamsa', 'Hamsa'. The Jiva always utters the Mantra twenty-one thousand and six hundred times in one day and night. This is called Ajapa Gayatri and is ever the bestower of Nirvana to the Yogins.

प्राण कभी दायें तो कभी बायें मार्ग से गमन करता है, परन्तु चञ्चल प्रकृति का होने से देखने में नहीं आता। हाथों से फेंकी हुई गेंद जैसे इधर-उधर दौड़ता है, उसी प्रकार प्राण और अपान द्वारा भली प्रकार फेंकने से जीव को कभी आराम नहीं मिल पाता । अपान और प्राण की एक दूसरे को खींचने की प्रक्रिया उसी प्रकार की है, जैसे रस्सी में आबद्ध पक्षी अपनी और खींच लिया जाता है। इस तत्त्व के ज्ञाता को ही योगी कहा जा सकता है। 'ह' कार ध्वनि से प्राण बाहर जाता है और 'स' कार से पुनः अन्दर प्रवेश करता है। 'हंस' 'हंस' इस प्रकार का' मन्त्र जप' जीव हमेशा जपता रहता है। इस अजपा-जप की संख्या दिन-रात में इस हजार छ: सौ होती है। इतनी संख्या में मन्त्र जीव हमेशा जपता है। जो योगियों के लिए मोक्ष प्रदान करने वाली है, यही अजपा गायत्री कहलाती है ।।


Verse ६३

एतत्संख्यान्वितं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा। अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्षदा सदा ॥

etatsaṃkhyānvitaṃ mantraṃ jīvo japati sarvadā। ajapā nāma gāyatrī yogināṃ mokṣadā sadā ॥

The Jiva comes out with the letter 'Ha' and gets in again with the letter 'Sa'. Thus Jiva always utters the Mantra 'Hamsa', 'Hamsa'. The Jiva always utters the Mantra twenty-one thousand and six hundred times in one day and night. This is called Ajapa Gayatri and is ever the bestower of Nirvana to the Yogins.

प्राण कभी दायें तो कभी बायें मार्ग से गमन करता है, परन्तु चञ्चल प्रकृति का होने से देखने में नहीं आता। हाथों से फेंकी हुई गेंद जैसे इधर-उधर दौड़ता है, उसी प्रकार प्राण और अपान द्वारा भली प्रकार फेंकने से जीव को कभी आराम नहीं मिल पाता । अपान और प्राण की एक दूसरे को खींचने की प्रक्रिया उसी प्रकार की है, जैसे रस्सी में आबद्ध पक्षी अपनी और खींच लिया जाता है। इस तत्त्व के ज्ञाता को ही योगी कहा जा सकता है। 'ह' कार ध्वनि से प्राण बाहर जाता है और 'स' कार से पुनः अन्दर प्रवेश करता है। 'हंस' 'हंस' इस प्रकार का' मन्त्र जप' जीव हमेशा जपता रहता है। इस अजपा-जप की संख्या दिन-रात में इस हजार छ: सौ होती है। इतनी संख्या में मन्त्र जीव हमेशा जपता है। जो योगियों के लिए मोक्ष प्रदान करने वाली है, यही अजपा गायत्री कहलाती है ।।


Verse ६४

अस्याः संकल्पमात्रेण नरः पापैः प्रमुच्यते । अनया सदृशी विद्या अनया सदृशो जपः ॥

asyāḥ saṃkalpamātreṇa naraḥ pāpaiḥ pramucyate । anayā sadṛśī vidyā anayā sadṛśo japaḥ ॥

Through its very thought, man is freed from sins. Neither in the past nor in the future is there a science equal to this, a Japa equal to this or a meritorious action equal to this. Parameshvari (viz., Kundalini Sakti) sleeps shutting with her mouth that door which leads to the decayless Brahma-hole.

इस (अजपा गायत्री) के संकल्प मात्र से व्यक्ति पापकर्मों से मुक्त हो जाता है । जिस मार्ग से योग साधक सुगमता से ब्रह्मपद को प्राप्त करता है। जिसके सदृश न कोई विद्या है, न जप है और न ही कोई पुण्य, जो पहले न कभी हुआ है और न आगे कभी हो सकेगा ॥


Verse ६५

अनया सदृशं पुण्यं न भूतं न भविष्यति।। येन मार्गेण गन्तव्यं ब्रह्मस्थानं निरामयम्॥

anayā sadṛśaṃ puṇyaṃ na bhūtaṃ na bhaviṣyati।। yena mārgeṇa gantavyaṃ brahmasthānaṃ nirāmayam॥

Through its very thought, man is freed from sins. Neither in the past nor in the future is there a science equal to this, a Japa equal to this or a meritorious action equal to this. Parameshvari (viz., Kundalini Sakti) sleeps shutting with her mouth that door which leads to the decayless Brahma-hole.

इस (अजपा गायत्री) के संकल्प मात्र से व्यक्ति पापकर्मों से मुक्त हो जाता है । जिस मार्ग से योग साधक सुगमता से ब्रह्मपद को प्राप्त करता है। जिसके सदृश न कोई विद्या है, न जप है और न ही कोई पुण्य, जो पहले न कभी हुआ है और न आगे कभी हो सकेगा ॥


Verse ६६

मुखेनाच्छाद्य तदद्वारं प्रसुप्ता परमेश्वरी। प्रबुद्धा वह्नियोगेन मनसा मरुता सह ॥

mukhenācchādya tadadvāraṃ prasuptā parameśvarī। prabuddhā vahniyogena manasā marutā saha ॥

Through its very thought, man is freed from sins. Neither in the past nor in the future is there a science equal to this, a Japa equal to this or a meritorious action equal to this. Parameshvari (viz., Kundalini Sakti) sleeps shutting with her mouth that door which leads to the decayless Brahma-hole.

वह्नियोग द्वारा जाग्रत् होने वाली परमेश्वरी (कुण्डलिनी) उस द्वार-पथ को अपने मुँह से आच्छादित करके प्रसुप्त स्थिति में है। वह जाग्रत् किये जाने पर सुषुम्ना मार्ग से मन और प्राण वायु के साथ ऊर्ध्वगमन करती है, जैसे सुई धागे को साथ ले जाती है। योगी मुक्ति द्वार को कुण्डलिनी शक्ति द्वारा उसी प्रकार उद्घाटित करते हैं, जैसे ताली से प्रयासपूर्वक दरवाजे को खोल लिया जाता है ॥


Verse ६७

सूचिवद्गुणमादाय व्रजत्यूर्ध्वं सुषुम्नया। उद्घाटयेकपाटं तु यथा कुञ्चिकया हठात् ॥

sūcivadguṇamādāya vrajatyūrdhvaṃ suṣumnayā। udghāṭayekapāṭaṃ tu yathā kuñcikayā haṭhāt ॥

Being aroused by the contact of Agni with Manas and Prana, she takes the form of a needle and pierces up through Susumna. The Yogin should open with great effort this door which is shut. Then he will pierce the door to salvation by means of Kundalini.

वह्नियोग द्वारा जाग्रत् होने वाली परमेश्वरी (कुण्डलिनी) उस द्वार-पथ को अपने मुँह से आच्छादित करके प्रसुप्त स्थिति में है। वह जाग्रत् किये जाने पर सुषुम्ना मार्ग से मन और प्राण वायु के साथ ऊर्ध्वगमन करती है, जैसे सुई धागे को साथ ले जाती है। योगी मुक्ति द्वार को कुण्डलिनी शक्ति द्वारा उसी प्रकार उद्घाटित करते हैं, जैसे ताली से प्रयासपूर्वक दरवाजे को खोल लिया जाता है ॥


Verse ६८

कुण्डलिन्या तया योगी मोक्षद्वारं विभेदयेत् ॥

kuṇḍalinyā tayā yogī mokṣadvāraṃ vibhedayet ॥

Being aroused by the contact of Agni with Manas and Prana, she takes the form of a needle and pierces up through Susumna. The Yogin should open with great effort this door which is shut. Then he will pierce the door to salvation by means of Kundalini.

वह्नियोग द्वारा जाग्रत् होने वाली परमेश्वरी (कुण्डलिनी) उस द्वार-पथ को अपने मुँह से आच्छादित करके प्रसुप्त स्थिति में है। वह जाग्रत् किये जाने पर सुषुम्ना मार्ग से मन और प्राण वायु के साथ ऊर्ध्वगमन करती है, जैसे सुई धागे को साथ ले जाती है। योगी मुक्ति द्वार को कुण्डलिनी शक्ति द्वारा उसी प्रकार उद्घाटित करते हैं, जैसे ताली से प्रयासपूर्वक दरवाजे को खोल लिया जाता है ॥


Verse ६९

कृत्वा संपुटितौ करौ दृढतरं बध्वाथ पद्मासनं गाढं वक्षसि सन्निधाय चुबुकं ध्यानं च तच्चेतसि ।वारंवारमपानमूर्ध्वमनिलं प्रोच्चारयन्यूरितं मुञ्चन्प्राणमुपैति बोधमतुलं शक्तिप्रभावान्नरः ।।

kṛtvā saṃpuṭitau karau dṛḍhataraṃ badhvātha padmāsanaṃ gāḍhaṃ vakṣasi sannidhāya cubukaṃ dhyānaṃ ca taccetasi ।vāraṃvāramapānamūrdhvamanilaṃ proccārayanyūritaṃ muñcanprāṇamupaiti bodhamatulaṃ śaktiprabhāvānnaraḥ ।।

Folding firmly the fingers of the hands, assuming firmly the Padma posture, placing the chin firmly on the breast and fixing the mind in Dhyana, one should frequently raise up the Apana, fill up with air and then leave the Prana. Then the wise man gets matchless wisdom through (this) Sakti.

सुदृढ़ रूप में पद्मासन लगाकर, दोनों हाथों को सम्पुटित करके ठोड़ी से वक्षभाग (कण्ठकूप) को दृढतापूर्वक दबाकर, चित्त में स्वरूप का ध्यान करते हुए बार-बार अपान वायु को ऊपर की ओर चलायमान करता हुआ और अन्दर खींची हुई प्राण वायु को नीचे छोड़ता हुआ योग साधक अतुलित कुण्डलिनी शक्ति के सामर्थ्य बोध को प्राप्त करता है ।।


Verse ७०

पद्मासनस्थितो योगी नाडीद्वारेषु पूरयन्। मारुतं कुम्भयन्यस्तु स मुक्तो नात्र संशयः ॥

padmāsanasthito yogī nāḍīdvāreṣu pūrayan। mārutaṃ kumbhayanyastu sa mukto nātra saṃśayaḥ ॥

That Yogin who assuming Padma posture worships (i.e., controls) Vayu at the door of the Nadis and then performs restraint of breath is released without doubt.

जो योगसाधक पद्मासन में बैठकर नाड़ीद्वार से प्राणवायु को खींचकर, कुम्भक द्वारा उसे रोकता है। वह सुनिश्चित रूप से मोक्ष को प्राप्त करता है, इसमें संदेह की गुंजायश नहीं ॥


Verse ७१

अङ्गानां मर्दनं कृत्वा श्रमजातेन वारिणा। कद्वम्ललवणत्यागी क्षीरपानरतः सुखी ॥

aṅgānāṃ mardanaṃ kṛtvā śramajātena vāriṇā। kadvamlalavaṇatyāgī kṣīrapānarataḥ sukhī ॥

Rubbing off the limbs the sweat arising from fatigue, abandoning all acid, bitter and saltish (food), taking delight in the drinking of milk and Rasa, practising celibacy, being moderate in eating and ever bent on Yoga, the Yogin becomes a Siddha in little more than a year. No inquiry need be made concerning the result.

(प्राणायाम के) परिश्रम द्वारा जो स्वेदकण निकले, उन्हें अङ्गों में ही मल ले । कटु, अम्ल और नमक का परित्याग करके दुग्ध का सेवन करने वाला सुखी रहता है। इस प्रकार योगस्थ होकर अल्प आहार करने चाला ब्रह्मचारी योगी एक साल के अन्तराल में ही सिद्धि को प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नही।।


Verse ७२

ब्रह्मचारी मिताहारी योगी योगपरायणः । अब्दार्ध्वं भवेत्सिद्धो नात्र कार्या विचारणा ॥

brahmacārī mitāhārī yogī yogaparāyaṇaḥ । abdārdhvaṃ bhavetsiddho nātra kāryā vicāraṇā ॥

Rubbing off the limbs the sweat arising from fatigue, abandoning all acid, bitter and saltish (food), taking delight in the drinking of milk and Rasa, practising celibacy, being moderate in eating and ever bent on Yoga, the Yogin becomes a Siddha in little more than a year. No inquiry need be made concerning the result.

(प्राणायाम के) परिश्रम द्वारा जो स्वेदकण निकले, उन्हें अङ्गों में ही मल ले । कटु, अम्ल और नमक का परित्याग करके दुग्ध का सेवन करने वाला सुखी रहता है। इस प्रकार योगस्थ होकर अल्प आहार करने चाला ब्रह्मचारी योगी एक साल के अन्तराल में ही सिद्धि को प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नही।।


Verse ७३

कन्दोर्ध्वकुण्डली शक्तिः स योगी सिद्धिभाजनम्। अपानप्राणयोरैक्यं क्षयान्मूत्रपुरीषयोः ॥

kandordhvakuṇḍalī śaktiḥ sa yogī siddhibhājanam। apānaprāṇayoraikyaṃ kṣayānmūtrapurīṣayoḥ ॥

Kundalini Sakti, when it is up in the throat, makes the Yogi get Siddhi. The union of Prana and Apana has the extinction of urine and faeces.

कन्द के ऊपरी भाग में स्थित कुण्डलिनी शक्ति से योग साधक सिद्धि को प्राप्त कर लेता है। सतत मूलबन्ध का अभ्यास करने से अपान और प्राण में एकीकरण होता है, मल-मूत्र के क्षीण हो जाने पर बूढ़ा व्यक्ति भी जवान हो जाता है। एड़ी भाग से योनिस्थान को दबाकर मलद्वार को संकुचित करे और अपान वायु को ऊर्ध्व की ओर खींचे, इस क्रिया को मूलबन्ध कहा गया है। उड्डियानबन्ध की विधि में कहा गया है कि जिस प्रकार बिना थका महापक्षी उड़ने की क्रिया करता है, उसी प्रकार पेट की पश्चिम 'ताण' क्रिया (पेट को पीछे की ओर सिकोड़ने) के साथ नाभि को ऊपर की ओर खींचना चाहिए ॥


Verse ७४

युवा भवति वृद्धोऽपि सततं मूलबन्धनात्। पार्ष्णिभागेन संपीड्य योनिमाकुञ्चयेद्गुदम्॥

yuvā bhavati vṛddho'pi satataṃ mūlabandhanāt। pārṣṇibhāgena saṃpīḍya yonimākuñcayedgudam॥

One becomes young even when old through performing Mula-Bandha always. Pressing the Yoni by means of the heels and contracting the anus and drawing up the Apana - this is called Mula-Bandha.

कन्द के ऊपरी भाग में स्थित कुण्डलिनी शक्ति से योग साधक सिद्धि को प्राप्त कर लेता है। सतत मूलबन्ध का अभ्यास करने से अपान और प्राण में एकीकरण होता है, मल-मूत्र के क्षीण हो जाने पर बूढ़ा व्यक्ति भी जवान हो जाता है। एड़ी भाग से योनिस्थान को दबाकर मलद्वार को संकुचित करे और अपान वायु को ऊर्ध्व की ओर खींचे, इस क्रिया को मूलबन्ध कहा गया है। उड्डियानबन्ध की विधि में कहा गया है कि जिस प्रकार बिना थका महापक्षी उड़ने की क्रिया करता है, उसी प्रकार पेट की पश्चिम 'ताण' क्रिया (पेट को पीछे की ओर सिकोड़ने) के साथ नाभि को ऊपर की ओर खींचना चाहिए ॥


Verse ७५

अपानमूर्ध्वमुत्कृष्य मूलबन्धोऽयमुच्यते । उडयाणं कुरुते यस्मादविश्रान्तमहाखगः ॥

apānamūrdhvamutkṛṣya mūlabandho'yamucyate । uḍayāṇaṃ kurute yasmādaviśrāntamahākhagaḥ ॥

Uddiyana Bandha is so called because it is (like) a great bird that flies up always without rest. One should bring the western part of the stomach above the navel.

कन्द के ऊपरी भाग में स्थित कुण्डलिनी शक्ति से योग साधक सिद्धि को प्राप्त कर लेता है। सतत मूलबन्ध का अभ्यास करने से अपान और प्राण में एकीकरण होता है, मल-मूत्र के क्षीण हो जाने पर बूढ़ा व्यक्ति भी जवान हो जाता है। एड़ी भाग से योनिस्थान को दबाकर मलद्वार को संकुचित करे और अपान वायु को ऊर्ध्व की ओर खींचे, इस क्रिया को मूलबन्ध कहा गया है। उड्डियानबन्ध की विधि में कहा गया है कि जिस प्रकार बिना थका महापक्षी उड़ने की क्रिया करता है, उसी प्रकार पेट की पश्चिम 'ताण' क्रिया (पेट को पीछे की ओर सिकोड़ने) के साथ नाभि को ऊपर की ओर खींचना चाहिए ॥


Verse ७६

उड्डियाणं तदेव स्यात्तत्र बन्धो विधीयते। उदरे पश्चिमं ताणं नाभेरूर्ध्वं तु कारयेत् ॥

uḍḍiyāṇaṃ tadeva syāttatra bandho vidhīyate। udare paścimaṃ tāṇaṃ nābherūrdhvaṃ tu kārayet ॥

This Uddiyana Bandha is a lion to the elephant of death, since it binds the water (or nectar) of the Akasa which arises in the head and flows down.

कन्द के ऊपरी भाग में स्थित कुण्डलिनी शक्ति से योग साधक सिद्धि को प्राप्त कर लेता है। सतत मूलबन्ध का अभ्यास करने से अपान और प्राण में एकीकरण होता है, मल-मूत्र के क्षीण हो जाने पर बूढ़ा व्यक्ति भी जवान हो जाता है। एड़ी भाग से योनिस्थान को दबाकर मलद्वार को संकुचित करे और अपान वायु को ऊर्ध्व की ओर खींचे, इस क्रिया को मूलबन्ध कहा गया है। उड्डियानबन्ध की विधि में कहा गया है कि जिस प्रकार बिना थका महापक्षी उड़ने की क्रिया करता है, उसी प्रकार पेट की पश्चिम 'ताण' क्रिया (पेट को पीछे की ओर सिकोड़ने) के साथ नाभि को ऊपर की ओर खींचना चाहिए ॥


Verse ७७

उड्डियाणोऽप्ययं बन्धो मृत्युमातङ्गकेसरी। बध्नाति हि शिरोजातमधोगामिनभोजनम्॥

uḍḍiyāṇo'pyayaṃ bandho mṛtyumātaṅgakesarī। badhnāti hi śirojātamadhogāminabhojanam॥

The Jalandhara Bandha is the destroyer of all the pains of the throat. When this Jalandhara Bandha which is destroyer of the pains of the throat is performed, then nectar does not fall on Agni nor does the Vayu move.

यह उड्डियान बन्ध मृत्यु के निमित्त उसी तरह है, जैसे गजराज के लिए सिंह निमित्त बनता है। जिसमें शिरोनभ (आकाश) से उत्पादित जल को नीचे आने की अपेक्षा ऊपर ही अवरुद्ध कर लिया जाता है, उसे जालन्धर बन्ध कहा गया है। इससे कर्मबन्धन और पापजन्य दुःखों का नाश होता है । जालन्धर बन्ध करते समय कण्ठ को सिकोड़ा जाता है, जिससे वायु की गति रुक जाती है और अमृत के अग्नि में गिरने की सम्भावना नहीं रहतीं । खेचरी मुद्रा उसे कहते हैं, जिसमें जिल्ला को उल्टाकर कपाल कुहर में प्रविष्ट किया जाए और अपनी दृष्टि को दोनों भौंहों के बीच स्थिर रखा जाए। इसके सिद्ध हो जाने से निद्रा, सुधा, पिपासा नहीं सताती और न व्याधि एवं मृत्यु का भय ही रहता है ।।


Verse ७८

ततो जालन्धरो बन्धः कर्मदुःखौघनाशनः । जालन्धरे कृते बन्धे कण्ठसंकोचलक्षणे॥

tato jālandharo bandhaḥ karmaduḥkhaughanāśanaḥ । jālandhare kṛte bandhe kaṇṭhasaṃkocalakṣaṇe॥

The Jalandhara Bandha is the destroyer of all the pains of the throat. When this Jalandhara Bandha which is destroyer of the pains of the throat is performed, then nectar does not fall on Agni nor does the Vayu move.

यह उड्डियान बन्ध मृत्यु के निमित्त उसी तरह है, जैसे गजराज के लिए सिंह निमित्त बनता है। जिसमें शिरोनभ (आकाश) से उत्पादित जल को नीचे आने की अपेक्षा ऊपर ही अवरुद्ध कर लिया जाता है, उसे जालन्धर बन्ध कहा गया है। इससे कर्मबन्धन और पापजन्य दुःखों का नाश होता है । जालन्धर बन्ध करते समय कण्ठ को सिकोड़ा जाता है, जिससे वायु की गति रुक जाती है और अमृत के अग्नि में गिरने की सम्भावना नहीं रहतीं । खेचरी मुद्रा उसे कहते हैं, जिसमें जिल्ला को उल्टाकर कपाल कुहर में प्रविष्ट किया जाए और अपनी दृष्टि को दोनों भौंहों के बीच स्थिर रखा जाए। इसके सिद्ध हो जाने से निद्रा, सुधा, पिपासा नहीं सताती और न व्याधि एवं मृत्यु का भय ही रहता है ।।


Verse ७९

न पीयूषं पतत्यग्नौ न च वायुः प्रधावति। कपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा॥

na pīyūṣaṃ patatyagnau na ca vāyuḥ pradhāvati। kapālakuhare jihvā praviṣṭā viparītagā॥

The Jalandhara Bandha is the destroyer of all the pains of the throat. When this Jalandhara Bandha which is destroyer of the pains of the throat is performed, then nectar does not fall on Agni nor does the Vayu move.

यह उड्डियान बन्ध मृत्यु के निमित्त उसी तरह है, जैसे गजराज के लिए सिंह निमित्त बनता है। जिसमें शिरोनभ (आकाश) से उत्पादित जल को नीचे आने की अपेक्षा ऊपर ही अवरुद्ध कर लिया जाता है, उसे जालन्धर बन्ध कहा गया है। इससे कर्मबन्धन और पापजन्य दुःखों का नाश होता है । जालन्धर बन्ध करते समय कण्ठ को सिकोड़ा जाता है, जिससे वायु की गति रुक जाती है और अमृत के अग्नि में गिरने की सम्भावना नहीं रहतीं । खेचरी मुद्रा उसे कहते हैं, जिसमें जिल्ला को उल्टाकर कपाल कुहर में प्रविष्ट किया जाए और अपनी दृष्टि को दोनों भौंहों के बीच स्थिर रखा जाए। इसके सिद्ध हो जाने से निद्रा, सुधा, पिपासा नहीं सताती और न व्याधि एवं मृत्यु का भय ही रहता है ।।


Verse ८०

भ्रुवोरन्तर्गता दृष्टिर्मुद्रा भवति खेचरी ।न रोगो मरणं तस्य न निद्रा न क्षुधा तृषा॥

bhruvorantargatā dṛṣṭirmudrā bhavati khecarī ।na rogo maraṇaṃ tasya na nidrā na kṣudhā tṛṣā॥

When the tongue enters backwards into the hole of the skull, then there is the Mudra of vision latent in the eyebrow called Khechari

यह उड्डियान बन्ध मृत्यु के निमित्त उसी तरह है, जैसे गजराज के लिए सिंह निमित्त बनता है। जिसमें शिरोनभ (आकाश) से उत्पादित जल को नीचे आने की अपेक्षा ऊपर ही अवरुद्ध कर लिया जाता है, उसे जालन्धर बन्ध कहा गया है। इससे कर्मबन्धन और पापजन्य दुःखों का नाश होता है । जालन्धर बन्ध करते समय कण्ठ को सिकोड़ा जाता है, जिससे वायु की गति रुक जाती है और अमृत के अग्नि में गिरने की सम्भावना नहीं रहतीं । खेचरी मुद्रा उसे कहते हैं, जिसमें जिल्ला को उल्टाकर कपाल कुहर में प्रविष्ट किया जाए और अपनी दृष्टि को दोनों भौंहों के बीच स्थिर रखा जाए। इसके सिद्ध हो जाने से निद्रा, सुधा, पिपासा नहीं सताती और न व्याधि एवं मृत्यु का भय ही रहता है ।।


Verse ८१

न च मूर्च्छा भवेत्तस्य यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम्। पीड्यते न च रोगेण लिप्यते न च कर्मणा ॥

na ca mūrcchā bhavettasya yo mudrāṃ vetti khecarīm। pīḍyate na ca rogeṇa lipyate na ca karmaṇā ॥

He who knows the Mudra Khechari has not disease, death, sleep, hunger, thirst, or swoon.

जो खेचरी मुद्रा का ज्ञाता है, उसे न तो मूर्च्छा होती है, न रोग उसे कष्ट देते हैं और न ही वह कम से ही लिप्त हो पाता है। खेचरी मुद्रा से जिसका चित्त आकाश में विचरण करने लगता है और जिसकी जिह्वा भी अन्तरिक्षगामिनी हो जाती है, ऐसा साधक काल के बन्धन से बँधता नहीं है। इसलिए यह ' खेचरी मुद्रा' योगियों द्वारा प्रशंसनीय है । इस मुद्रा द्वारा जिसने तालु के छिद्र को अवरुद्ध कर दिया है, उसके द्वारा स्त्री समागम से भी वीर्य का क्षरण नहीं होता और जब तक वीर्य शरीर में विद्यमान रहता है, तब तक मौत के भय की सम्भावना ही कैसी ? ॥


Verse ८२

बध्यते न च कालेन यस्य मुद्रास्ति खेचरी। चित्तं चरति खे यस्माज्जिह्वा भवति खे गता॥

badhyate na ca kālena yasya mudrāsti khecarī। cittaṃ carati khe yasmājjihvā bhavati khe gatā॥

He who practises this Mudra is not affected by illness or Karma; nor is he bound by the limitations of time. Since Chitta moves in the Kha (Akasa) and since the tongue has entered (in the Mudra) Kha (viz., the hole in the mouth). Therefore the Mudra is called Khechari and worshipped by the Siddhas.

जो खेचरी मुद्रा का ज्ञाता है, उसे न तो मूर्च्छा होती है, न रोग उसे कष्ट देते हैं और न ही वह कम से ही लिप्त हो पाता है। खेचरी मुद्रा से जिसका चित्त आकाश में विचरण करने लगता है और जिसकी जिह्वा भी अन्तरिक्षगामिनी हो जाती है, ऐसा साधक काल के बन्धन से बँधता नहीं है। इसलिए यह ' खेचरी मुद्रा' योगियों द्वारा प्रशंसनीय है । इस मुद्रा द्वारा जिसने तालु के छिद्र को अवरुद्ध कर दिया है, उसके द्वारा स्त्री समागम से भी वीर्य का क्षरण नहीं होता और जब तक वीर्य शरीर में विद्यमान रहता है, तब तक मौत के भय की सम्भावना ही कैसी ? ॥


Verse ८३

तेनैषा खेचरी नाम मुद्रा सिद्धनमस्कृता। खेचर्या मुद्रया यस्य विवरं लम्बिकोर्ध्वतः॥

tenaiṣā khecarī nāma mudrā siddhanamaskṛtā। khecaryā mudrayā yasya vivaraṃ lambikordhvataḥ॥

He whose hole (or passage) above the Uvula is closed (with the tongue backwards) by means of Khechari-Mudra never loses his virility, even when embraced by a lovely woman. Where is the fear of death, so long as the Bindu (virility) stays in the body.

जो खेचरी मुद्रा का ज्ञाता है, उसे न तो मूर्च्छा होती है, न रोग उसे कष्ट देते हैं और न ही वह कम से ही लिप्त हो पाता है। खेचरी मुद्रा से जिसका चित्त आकाश में विचरण करने लगता है और जिसकी जिह्वा भी अन्तरिक्षगामिनी हो जाती है, ऐसा साधक काल के बन्धन से बँधता नहीं है। इसलिए यह ' खेचरी मुद्रा' योगियों द्वारा प्रशंसनीय है । इस मुद्रा द्वारा जिसने तालु के छिद्र को अवरुद्ध कर दिया है, उसके द्वारा स्त्री समागम से भी वीर्य का क्षरण नहीं होता और जब तक वीर्य शरीर में विद्यमान रहता है, तब तक मौत के भय की सम्भावना ही कैसी ? ॥


Verse ८४

बिन्दुः क्षति नो यस्य कामिन्यालिङ्गितस्य च ।यावद्बिन्दुः स्थितो देहे तावन्मृत्युभयं कुतः ।।

binduḥ kṣati no yasya kāminyāliṅgitasya ca ।yāvadbinduḥ sthito dehe tāvanmṛtyubhayaṃ kutaḥ ।।

He whose hole (or passage) above the Uvula is closed (with the tongue backwards) by means of Khechari-Mudra never loses his virility, even when embraced by a lovely woman. Where is the fear of death, so long as the Bindu (virility) stays in the body.

जो खेचरी मुद्रा का ज्ञाता है, उसे न तो मूर्च्छा होती है, न रोग उसे कष्ट देते हैं और न ही वह कम से ही लिप्त हो पाता है। खेचरी मुद्रा से जिसका चित्त आकाश में विचरण करने लगता है और जिसकी जिह्वा भी अन्तरिक्षगामिनी हो जाती है, ऐसा साधक काल के बन्धन से बँधता नहीं है। इसलिए यह ' खेचरी मुद्रा' योगियों द्वारा प्रशंसनीय है । इस मुद्रा द्वारा जिसने तालु के छिद्र को अवरुद्ध कर दिया है, उसके द्वारा स्त्री समागम से भी वीर्य का क्षरण नहीं होता और जब तक वीर्य शरीर में विद्यमान रहता है, तब तक मौत के भय की सम्भावना ही कैसी ? ॥


Verse ८५

यावद्वद्धा नभोमुद्रा तावद्बिन्दुर्न गच्छति ।गलितोऽपि यदा बिन्दुः संप्राप्तो योनिमण्डले॥

yāvadvaddhā nabhomudrā tāvadbindurna gacchati ।galito'pi yadā binduḥ saṃprāpto yonimaṇḍale॥

. Bindu does not go out of the body, so long as the Khechari-Mudra is practised. (Even) when Bindu comes down to the sphere of the perineum, it goes up, being prevented and forced up by violent effort through Yoni-Mudra.

खेचरी मुद्रा में रहते हुए वीर्य का क्षरण सम्भव नहीं, फिर भी किसी तरह यदि वीर्य स्खलित होकर योनि में चला जाए, तो उसे हठशक्तिपूर्वक योनिमण्डल से पुन: ऊपर की ओर खींच लेते हैं। वह वीर्य भी सफेद और रक्त वर्ण दोनों तरह का होता है। सफेद वर्ण वाले को शुक्र और रक्त वार्ण वाले को महारज कहा गया है। मुँगे की तरह वर्ण वाला रज (योगी के) योनिस्थान में विद्यमान है और शुक्ल वीर्य चन्द्रस्थान में है, पर इन दोनों के एक होने की सम्भावना बड़ी दुर्लभ है। वीर्य को शिवरूप और रज को शक्तिरुप कहा गया है, वीर्य ही चन्द्रमा और रज ही सूर्य है॥


Verse ८६

व्रजत्यूर्ध्वं हठाच्छक्त्या निबद्धो योनिमुद्रया।स एव द्विविधो बिन्दुः पाण्डरो लोहितस्तथा ॥

vrajatyūrdhvaṃ haṭhācchaktyā nibaddho yonimudrayā।sa eva dvividho binduḥ pāṇḍaro lohitastathā ॥

This Bindu is twofold, white and red. The white one is called Sukla and the red one is said to contain much Rajas. The Rajas which stays in Yoni is like the colour of a coral.

खेचरी मुद्रा में रहते हुए वीर्य का क्षरण सम्भव नहीं, फिर भी किसी तरह यदि वीर्य स्खलित होकर योनि में चला जाए, तो उसे हठशक्तिपूर्वक योनिमण्डल से पुन: ऊपर की ओर खींच लेते हैं। वह वीर्य भी सफेद और रक्त वर्ण दोनों तरह का होता है। सफेद वर्ण वाले को शुक्र और रक्त वार्ण वाले को महारज कहा गया है। मुँगे की तरह वर्ण वाला रज (योगी के) योनिस्थान में विद्यमान है और शुक्ल वीर्य चन्द्रस्थान में है, पर इन दोनों के एक होने की सम्भावना बड़ी दुर्लभ है। वीर्य को शिवरूप और रज को शक्तिरुप कहा गया है, वीर्य ही चन्द्रमा और रज ही सूर्य है॥


Verse ८७

पाण्डरं शुक्रमित्याहुर्लोहिताख्यं महारजः । विद्रुमद्रुसंकाशं योनिस्थाने स्थितं रजः ।।

pāṇḍaraṃ śukramityāhurlohitākhyaṃ mahārajaḥ । vidrumadrusaṃkāśaṃ yonisthāne sthitaṃ rajaḥ ।।

This Bindu is twofold, white and red. The white one is called Sukla and the red one is said to contain much Rajas. The Rajas which stays in Yoni is like the colour of a coral.

खेचरी मुद्रा में रहते हुए वीर्य का क्षरण सम्भव नहीं, फिर भी किसी तरह यदि वीर्य स्खलित होकर योनि में चला जाए, तो उसे हठशक्तिपूर्वक योनिमण्डल से पुन: ऊपर की ओर खींच लेते हैं। वह वीर्य भी सफेद और रक्त वर्ण दोनों तरह का होता है। सफेद वर्ण वाले को शुक्र और रक्त वार्ण वाले को महारज कहा गया है। मुँगे की तरह वर्ण वाला रज (योगी के) योनिस्थान में विद्यमान है और शुक्ल वीर्य चन्द्रस्थान में है, पर इन दोनों के एक होने की सम्भावना बड़ी दुर्लभ है। वीर्य को शिवरूप और रज को शक्तिरुप कहा गया है, वीर्य ही चन्द्रमा और रज ही सूर्य है॥

Text (part 3)

Verse ८८

शशिस्थाने वसेद्बिन्दुस्तयरेक्यं सुदुर्लभम्।बिन्दुः शिवो रजः शक्तिर्बिन्दुरिन्दू रजो रविः॥

śaśisthāne vasedbindustayarekyaṃ sudurlabham।binduḥ śivo rajaḥ śaktirbindurindū rajo raviḥ॥

The Bindu stays in the seat of the genital organs. The union of these two is very rare. Bindu is Shiva and Rajas is Sakti. Bindu is the moon and Rajas is the sun.

खेचरी मुद्रा में रहते हुए वीर्य का क्षरण सम्भव नहीं, फिर भी किसी तरह यदि वीर्य स्खलित होकर योनि में चला जाए, तो उसे हठशक्तिपूर्वक योनिमण्डल से पुन: ऊपर की ओर खींच लेते हैं। वह वीर्य भी सफेद और रक्त वर्ण दोनों तरह का होता है। सफेद वर्ण वाले को शुक्र और रक्त वार्ण वाले को महारज कहा गया है। मुँगे की तरह वर्ण वाला रज (योगी के) योनिस्थान में विद्यमान है और शुक्ल वीर्य चन्द्रस्थान में है, पर इन दोनों के एक होने की सम्भावना बड़ी दुर्लभ है। वीर्य को शिवरूप और रज को शक्तिरुप कहा गया है, वीर्य ही चन्द्रमा और रज ही सूर्य है॥


Verse ८९

उभयोः संगमादेव प्राप्यते परमं वपुः । वायुना शक्तिचालेन प्रेरितं खे यथा रजः ॥

ubhayoḥ saṃgamādeva prāpyate paramaṃ vapuḥ । vāyunā śakticālena preritaṃ khe yathā rajaḥ ॥

Through the union of these two is attained the highest body; when Rajas is roused up by agitating the Sakti through Vayu which unites with the sun, thence is produced the divine form.

इन दोनों के संयुक्त होने पर परम देह की प्राप्ति होती है। वायु को शक्ति से संचालित किये जाने से रज अन्तरिक्ष की ओर प्रेरित होता है और सूर्य से संयुक्त होकर दिव्य शरीर को प्राप्त करता है । शुक्लवर्ण वीर्य चन्द्रमा से और रज सूर्य से युक्त है। इन दोनों की समरसता का जो ज्ञाता है, वही योगवेत्ता है। नाड़ियों में स्थित मल के शोधन के लिए सूर्य और चन्द्र के संयोगत्व और वात, पित्त, कफ आदि रसों के भली प्रकार शोषण किये जाने को महामुद्रा कहा गया है। वक्षस्थल को ठोड़ी से और बायीं एड़ी से योनिस्थल को दबाकर, प्रसारित दाहिने पैर को हाथों से पकड़कर कुक्षियुगल को श्वास से भरकर, कुम्भक करने के बाद धीरे-धीरे श्वास को बाहर निकाले । इसे योगियों द्वारा सर्वपापनाशिनी महामुद्रा कहा गया है ॥


Verse ९०

रविणैकत्वमायाति भवेद्दव्यं वपुस्तदा। शुक्लं चन्द्रेण संयुक्तं रजः सूर्यसमन्वितम् ॥

raviṇaikatvamāyāti bhaveddavyaṃ vapustadā। śuklaṃ candreṇa saṃyuktaṃ rajaḥ sūryasamanvitam ॥

Through the union of these two is attained the highest body; when Rajas is roused up by agitating the Sakti through Vayu which unites with the sun, thence is produced the divine form.

इन दोनों के संयुक्त होने पर परम देह की प्राप्ति होती है। वायु को शक्ति से संचालित किये जाने से रज अन्तरिक्ष की ओर प्रेरित होता है और सूर्य से संयुक्त होकर दिव्य शरीर को प्राप्त करता है । शुक्लवर्ण वीर्य चन्द्रमा से और रज सूर्य से युक्त है। इन दोनों की समरसता का जो ज्ञाता है, वही योगवेत्ता है। नाड़ियों में स्थित मल के शोधन के लिए सूर्य और चन्द्र के संयोगत्व और वात, पित्त, कफ आदि रसों के भली प्रकार शोषण किये जाने को महामुद्रा कहा गया है। वक्षस्थल को ठोड़ी से और बायीं एड़ी से योनिस्थल को दबाकर, प्रसारित दाहिने पैर को हाथों से पकड़कर कुक्षियुगल को श्वास से भरकर, कुम्भक करने के बाद धीरे-धीरे श्वास को बाहर निकाले । इसे योगियों द्वारा सर्वपापनाशिनी महामुद्रा कहा गया है ॥


Verse ९१

द्वयोः समरसीभावं यो जानाति स योगवित्। शोधनं मलजालानां घटनं चन्द्रसूर्ययोः ॥

dvayoḥ samarasībhāvaṃ yo jānāti sa yogavit। śodhanaṃ malajālānāṃ ghaṭanaṃ candrasūryayoḥ ॥

Sukla being united with the moon and Rajas with the sun, he is a knower of Yoga who knows the proper mixture of these two. The cleansing of the accumulated refuse, the unification of the sun and the moon and the complete drying of the Rasas (essences), this is called Maha-Mudra.

इन दोनों के संयुक्त होने पर परम देह की प्राप्ति होती है। वायु को शक्ति से संचालित किये जाने से रज अन्तरिक्ष की ओर प्रेरित होता है और सूर्य से संयुक्त होकर दिव्य शरीर को प्राप्त करता है । शुक्लवर्ण वीर्य चन्द्रमा से और रज सूर्य से युक्त है। इन दोनों की समरसता का जो ज्ञाता है, वही योगवेत्ता है। नाड़ियों में स्थित मल के शोधन के लिए सूर्य और चन्द्र के संयोगत्व और वात, पित्त, कफ आदि रसों के भली प्रकार शोषण किये जाने को महामुद्रा कहा गया है। वक्षस्थल को ठोड़ी से और बायीं एड़ी से योनिस्थल को दबाकर, प्रसारित दाहिने पैर को हाथों से पकड़कर कुक्षियुगल को श्वास से भरकर, कुम्भक करने के बाद धीरे-धीरे श्वास को बाहर निकाले । इसे योगियों द्वारा सर्वपापनाशिनी महामुद्रा कहा गया है ॥


Verse ९२

रसानां शोषणं सम्यङ्महामुद्राभिधीयते ॥

rasānāṃ śoṣaṇaṃ samyaṅmahāmudrābhidhīyate ॥

Sukla being united with the moon and Rajas with the sun, he is a knower of Yoga who knows the proper mixture of these two. The cleansing of the accumulated refuse, the unification of the sun and the moon and the complete drying of the Rasas (essences), this is called Maha-Mudra.

इन दोनों के संयुक्त होने पर परम देह की प्राप्ति होती है। वायु को शक्ति से संचालित किये जाने से रज अन्तरिक्ष की ओर प्रेरित होता है और सूर्य से संयुक्त होकर दिव्य शरीर को प्राप्त करता है । शुक्लवर्ण वीर्य चन्द्रमा से और रज सूर्य से युक्त है। इन दोनों की समरसता का जो ज्ञाता है, वही योगवेत्ता है। नाड़ियों में स्थित मल के शोधन के लिए सूर्य और चन्द्र के संयोगत्व और वात, पित्त, कफ आदि रसों के भली प्रकार शोषण किये जाने को महामुद्रा कहा गया है। वक्षस्थल को ठोड़ी से और बायीं एड़ी से योनिस्थल को दबाकर, प्रसारित दाहिने पैर को हाथों से पकड़कर कुक्षियुगल को श्वास से भरकर, कुम्भक करने के बाद धीरे-धीरे श्वास को बाहर निकाले । इसे योगियों द्वारा सर्वपापनाशिनी महामुद्रा कहा गया है ॥


Verse ९३

वक्षोन्यस्तहनुर्निपीडय सुषिरं योनेश्च वामाघ्रिंणा हस्ताभ्यामनुधारयन्प्रविततं पादं तथा दक्षिणम्।आपूर्य श्वसनेन कुक्षियुगलं बध्वा शनै रेचयेदेषा पातकनाशिनी ननु महामुद्रा नृणां प्रोच्यते ॥

vakṣonyastahanurnipīḍaya suṣiraṃ yoneśca vāmāghriṃṇā hastābhyāmanudhārayanpravitataṃ pādaṃ tathā dakṣiṇam।āpūrya śvasanena kukṣiyugalaṃ badhvā śanai recayedeṣā pātakanāśinī nanu mahāmudrā nṛṇāṃ procyate ॥

ing the chin on the breast, pressing the anus by means of the left heel and seizing (the toe of) the extended right leg by the two hands, one should fill his belly (with air) and should slowly exhale. This is called Maha-Mudra, the destroyer of the sins of men.

इन दोनों के संयुक्त होने पर परम देह की प्राप्ति होती है। वायु को शक्ति से संचालित किये जाने से रज अन्तरिक्ष की ओर प्रेरित होता है और सूर्य से संयुक्त होकर दिव्य शरीर को प्राप्त करता है । शुक्लवर्ण वीर्य चन्द्रमा से और रज सूर्य से युक्त है। इन दोनों की समरसता का जो ज्ञाता है, वही योगवेत्ता है। नाड़ियों में स्थित मल के शोधन के लिए सूर्य और चन्द्र के संयोगत्व और वात, पित्त, कफ आदि रसों के भली प्रकार शोषण किये जाने को महामुद्रा कहा गया है। वक्षस्थल को ठोड़ी से और बायीं एड़ी से योनिस्थल को दबाकर, प्रसारित दाहिने पैर को हाथों से पकड़कर कुक्षियुगल को श्वास से भरकर, कुम्भक करने के बाद धीरे-धीरे श्वास को बाहर निकाले । इसे योगियों द्वारा सर्वपापनाशिनी महामुद्रा कहा गया है ॥


Verse ९३-१

अथात्मनिर्णयं व्याख्यास्ये——हृदि स्थाने अष्टदलपद्मं वर्तते ।तन्मध्ये रेखावलयं कृत्वा जीवात्मरूपं ज्योतीरूपमणुमात्रं वर्तते ।तस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितं भवति सर्व जानाति सर्वं करोति सर्वमेतच्चरितमहं कर्ताऽहं भोक्ता सुखी दुःखी काणः खञ्जो बधिरो मूकः कृशः स्थूलोऽनेन प्रकारेण स्वतन्त्रवादेन वर्तते ॥

athātmanirṇayaṃ vyākhyāsye——hṛdi sthāne aṣṭadalapadmaṃ vartate ।tanmadhye rekhāvalayaṃ kṛtvā jīvātmarūpaṃ jyotīrūpamaṇumātraṃ vartate ।tasminsarvaṃ pratiṣṭhitaṃ bhavati sarva jānāti sarvaṃ karoti sarvametaccaritamahaṃ kartā'haṃ bhoktā sukhī duḥkhī kāṇaḥ khañjo badhiro mūkaḥ kṛśaḥ sthūlo'nena prakāreṇa svatantravādena vartate ॥

Now I shall give a description of Atman. In the seat of the heart is a lotus of eight petals. In its centre is Jivatma of the form of Jyotis and atomic in size, moving in a circular line. In it is located everything. In knows everything. It does everything. It does all these actions attributing everything to its own power, (thinking) I do, I enjoy, I am happy, I am miserable, I am blind, I am lame, I am deaf, I am mute, I am lean, I am stout, etc. When it rests on the eastern petal which is of Sveta (white) colour, then it has a mind (or is inclined) to Dharma with Bhakti (devotion). When it rests on the south-eastern petal, which is of Rakta (blood colour), then it is inclined to sleep and laziness. When it rests on the southern petal, which is of Krishna (black) colour, then it is inclined to hate and anger. When it rests on the south-western petal which is of Nila (blue) colour, then it gets desire for sinful or harmful actions. When it rests on the western petal which is of crystal colour, then it is inclined to flirt and amuse. When it rests on the north-western petal which is of ruby colour, then it has a mind to walk, rove and have Vairagya (or be indifferent). When it rests on the northern petal which is Pita (yellow) colour, then it is inclined to be happy and to be loving. When it rests on the north-eastern petal which is of Vaidurya (Lapis Lazuli) colour, then it is inclined to amassing money, charity and passion. When it stays in the inter-space between any two petals, then it gets the wrath arising from diseases generated through (the disturbance of the equilibrium of) Vayu, bile and phlegm (in the body). When it stays in the middle, then it knows everything, sings, dances, speaks and is blissful. When the eye is pained (after a day's work), then in order to remove (its) pain, it makes first a circular line and sinks in the middle. The first line is of the colour of Bandhuka flower (Bassia). Then is the state of sleep. In the middle of the state of sleep is the state of dream. In the middle of the state of dream, it experiences the ideas of perception, Vedas, inference, possibility, (sacred) words, etc. Then there arises much fatigue. In order to remove this fatigue, it circles the second line and sinks in the middle. The second is of the colour of (the insect) Indragopa (of red or white colour). Then comes the state of dreamless sleep. During the dreamless sleep, it has only the thought connected with Parameshvara (the highest Lord) alone. This state is of the nature of eternal wisdom. Afterwards it attains the nature of the highest Lord (Parameshvara). Then it makes a round of the third circle and sinks in the middle. The third circle is of the colour of Padmaraga (ruby). Then comes the state of Turya (the fourth). In Turya, there is only the connection of Paramatman. It attains the nature of eternal wisdom. Then one should gradually attain the quiescence of Buddhi with self-control. Placing the Manas in Atman, one should think of nothing else. Then causing the union of Prana and Apana, he concentrates his aim upon the whole universe being of the nature of Atman. Then comes the state of Turiyatita (viz., that state beyond the fourth). Then everything appears as bliss. He is beyond the pairs (of happiness and pains, etc.,). He stays here as long as he should wear his body. Then he attains the nature of Paramatman and attains emancipation through this means. This alone is the means of knowing Atman. When Vayu (breath) which enters the great hole associated with a hall where four roads meet gets into the half of the well-placed triangle, then is Achyuta (the indestructible) seen.

अब आत्मा के सम्बन्ध में विवेचन करते हैं-हृदय स्थल में आठ दल का कमल है,उसके बीच रेखा वलय बनाकर जीवात्मा ज्योतिरूप होकर अणुमात्र स्वरूप में निवास करता है। वह सर्वज्ञाता, सब कुछ करने वाला है और सब कुछ उसी में प्रतिष्ठित है। उसका ऐसा विचार है कि सभी चरित्रों का मैं ही कर्ता, भोक्ता, सुखी, दुःखी,काना, लँगड़ा, बहरा,गूंगा, दुबला और मोटा हूँ; इस प्रकार का उसका स्वतन्त्र व्यवहार रहता है।।


Verse ९३-२

पूर्वदले विश्रमते पूर्वं दलं श्वेतवर्णं तदा भक्तिपुरःसरं धर्मे मतिर्भवति ॥

pūrvadale viśramate pūrvaṃ dalaṃ śvetavarṇaṃ tadā bhaktipuraḥsaraṃ dharme matirbhavati ॥

Above the aforesaid triangle, one should meditate on the five Bija (seed) letters of (the elements) Prithvi, etc., as also on the five Pranas, the colour of the Bijas and their position. The letter 'Ya' is the Bija of Prana and resembles the blue cloud. The letter 'Ra' is the Bija of Agni, is of Apana and resembles the sun.

उस अष्टदल कमल का पूर्व दिशा वाला दल सफेद रंग का है, उस दल में रहते हुए धर्म और भक्तिभाव में मति (श्रद्धा) रहती है ॥


Verse ९३-३

यदाऽऽग्नेयदले विश्रमते तदाग्नेयदलं रक्तवर्णं तदा निद्रालस्यमतिर्भवति ॥

yadā''gneyadale viśramate tadāgneyadalaṃ raktavarṇaṃ tadā nidrālasyamatirbhavati ॥

The letter 'La' is the Bija of Prithvi, is of Vyana and resembles Bandhuka flower. The letter 'Va' is the Bija of Jiva (or Vayu), is of Udana and is of the colour of the conch.

जब आग्नेय दिशा के लाल रंग के दल में निवास होता है, तब मति निद्रा और आलस्य से युक्त हो जाती।।


Verse ९३-४

यदा दक्षिणदले विश्वमते तद्दक्षिणदलं कृष्णवर्णं तदा द्वेषकोपमतिर्भवति ॥

yadā dakṣiṇadale viśvamate taddakṣiṇadalaṃ kṛṣṇavarṇaṃ tadā dveṣakopamatirbhavati ॥

The letter 'Ha' is the Bija of Akasa, is of Samana and is of the colour of crystal. Prana stays in the heart, navel, nose, ear, foot, finger and other places, travels through the seventy-two thousand Nadis, stays in the twenty-eight Crores of hair-pores and is yet the same everywhere. It is that which is called Jiva.

जब दक्षिण दिशा के काले रंग के दल में निवास होता है, तब द्वेषभाव और क्रोधी स्वभाव की मति रहती है॥


Verse ९३-५

यदा नैर्ऋतदले विश्रमते तन्नैर्ऋतदलं नीलवर्णं तदा पापकर्महिंसामतिर्भवति ॥

yadā nairṛtadale viśramate tannairṛtadalaṃ nīlavarṇaṃ tadā pāpakarmahiṃsāmatirbhavati ॥

The letter 'Ha' is the Bija of Akasa, is of Samana and is of the colour of crystal. Prana stays in the heart, navel, nose, ear, foot, finger and other places, travels through the seventy-two thousand Nadis, stays in the twenty-eight Crores of hair-pores and is yet the same everywhere. It is that which is called Jiva.

नैर्ऋत्य दिशा के नीले रंग वाले दल में निवास करने पर पाप कर्मों और हिंसक वृत्ति वाली मति रहती है ॥


Verse ९३-६-७

यदा पश्चिमदले विश्रमते तत्पश्चिमदलं स्फटिकवर्णं तदा क्रीडाविनोदे मतिर्भवति ॥ यदा वायव्यदले विश्रमते वायव्यदलं माणिक्यवर्णं तदा गमनचलनवैराग्यमतिर्भवति ।।

yadā paścimadale viśramate tatpaścimadalaṃ sphaṭikavarṇaṃ tadā krīḍāvinode matirbhavati ॥ yadā vāyavyadale viśramate vāyavyadalaṃ māṇikyavarṇaṃ tadā gamanacalanavairāgyamatirbhavati ।।

One should perform the three, expiration, etc., with a firm will and great control; and drawing in everything (with the breath) in slow degrees, he should bind Prana and Apana in the cave of the lotus of the heart and utter Pranava, having contracted his throat and the genital organ.

जब स्फटिक वर्ण वाले पश्चिम दल में निवास रहता है, तब क्रीड़ा और विनोद में अभिरुचि उत्पन्न हो जाती है। वायव्यकोण के माणिक्य वर्ण वाले दल में निवास होने पर घूमने-फिरने और वैराग्य भाव की ओर झुकाव होता है ॥


Verse ९३-८

यदोत्तरदले विश्रमते तदुत्तरदलं पीतवर्णं तदा सुखश्रृंगारमतिर्भवति ॥

yadottaradale viśramate taduttaradalaṃ pītavarṇaṃ tadā sukhaśrṛṃgāramatirbhavati ॥

One should perform the three, expiration, etc., with a firm will and great control; and drawing in everything (with the breath) in slow degrees, he should bind Prana and Apana in the cave of the lotus of the heart and utter Pranava, having contracted his throat and the genital organ.

जब उत्तर के पीले रंग के दल में निवास करता है, तो सुख-साधन और सजने-सँवरने में अभिरुचि रहती है ॥


Verse ९३-९

यदेशानदले विश्रमते तदीशानदलं वैडूर्यवर्णं तदा दानादिकृपामतिर्भवति ॥

yadeśānadale viśramate tadīśānadalaṃ vaiḍūryavarṇaṃ tadā dānādikṛpāmatirbhavati ॥

One should perform the three, expiration, etc., with a firm will and great control; and drawing in everything (with the breath) in slow degrees, he should bind Prana and Apana in the cave of the lotus of the heart and utter Pranava, having contracted his throat and the genital organ.

ईशान कोण के वैडूर्यमणि-रंग के दल में रहने पर दान-पुण्य और अनुग्रह करने में अभिरुचि जागती है ॥


Verse ९३-१०

यदा संधिसंधिषु मतिर्भवति तदा वातपित्त श्लेष्महाव्याधिप्रकोपो भवति ॥

yadā saṃdhisaṃdhiṣu matirbhavati tadā vātapitta śleṣmahāvyādhiprakopo bhavati ॥

From the Muladhara (to the head) is the Susumna resembling the shining thread of the lotus. The Nada is located in the Vinadanda (spinal column); that sound from its middle resembles (that of) the conch, etc.

जब जोड़ों के सन्धिभाग में मति वास करती है, तब वात, पित्त, कफ से सग्बन्धित बड़ी बीमारियों का प्रकोप होता है ।।


Verse ९३-११

यदा मध्ये तिष्ठति तदा सर्वं जानाति गायति नृत्यति पठत्यानन्दं करोति ॥

yadā madhye tiṣṭhati tadā sarvaṃ jānāti gāyati nṛtyati paṭhatyānandaṃ karoti ॥

Between the two bows in the Brahma-hole, one should see Purusha with Sakti as his own Atman. Then his Manas is absorbed there. That man attains Kaivalya who understands the gems, moonlight, Nada, Bindu and the seat of Maheshvara (the great Lord).

जब मति मध्य में रहती है, ऐसे में सब कुछ जानने, गाने, नाचने, पढ़ने और आनन्द मनाने में ध्यान रहता है॥


Verse ९३-१२

यदा नेत्रश्रमो भवति श्रमनिर्भरणार्थं प्रथमरेखावलयं कृत्वा मध्ये निमज्जनं कुरुते प्रथमरेखा बन्धूकपुष्पवर्णं तदा निद्रावस्था भवति ।निद्रावस्थामध्ये स्वप्नावस्था भवति।स्वप्नावस्थामध्ये दृष्टं श्रुतमनुमानसंभववार्ता इत्यादिकल्पनां करोति तदादिश्रमो भवति ॥

yadā netraśramo bhavati śramanirbharaṇārthaṃ prathamarekhāvalayaṃ kṛtvā madhye nimajjanaṃ kurute prathamarekhā bandhūkapuṣpavarṇaṃ tadā nidrāvasthā bhavati ।nidrāvasthāmadhye svapnāvasthā bhavati।svapnāvasthāmadhye dṛṣṭaṃ śrutamanumānasaṃbhavavārtā ityādikalpanāṃ karoti tadādiśramo bhavati ॥

unavailable

जब आँख श्रमशील रहती है, तो उसे विश्राम देने के उद्देश्य से पहली रेखा का आश्रय लेकर बीच में निमज्जन करती है। वह प्रथम रेखा बन्धूक पुष्य के वर्ण वाली होती है, जिससे निद्रावस्था की प्राप्ति होती है। निद्रावस्था के बीच में ही स्वप्नावस्था रहती है। स्वप्नावस्था के बीच में देखी गई, सुनी हुई और अनुमान की हुई सम्भावित बातों की कल्पना करने से जो श्रम करना पड़ता हैं ।।


Verse ९३-१३

श्रमनिर्हरणार्थं द्वितीयरेखावलयं कृत्वा मध्ये निमज्जनं कुरुते द्वितीयरेखा इन्द्रकोपवर्णं तदा सुषुप्त्यवस्था भवति सुषुप्तौ केवलपरमेश्वरसंबन्धिनी बुद्धिर्भवति नित्यबोधस्वरूपा भवति पश्चात्परमेश्वरस्वरूपेण प्राप्तिर्भवति ॥

śramanirharaṇārthaṃ dvitīyarekhāvalayaṃ kṛtvā madhye nimajjanaṃ kurute dvitīyarekhā indrakopavarṇaṃ tadā suṣuptyavasthā bhavati suṣuptau kevalaparameśvarasaṃbandhinī buddhirbhavati nityabodhasvarūpā bhavati paścātparameśvarasvarūpeṇa prāptirbhavati ॥

unavailable

उम श्रम के निवारणार्थ द्वितीय रेखा वलय में डुबकी लगाती है। वह दूसरी रेखा वीर-बहूटी के वर्ण की है, जिससे सुषुप्ति अवस्था होती है। इस सुषुप्तावस्था में बुद्धि मात्र परमेश्वर से सम्बन्ध रखने वाली और नित्य बोधस्वरूपा होती है। इसके पश्चात् ही परमेश्वर की प्राप्ति सम्भव है ॥


Verse ९३-१४

तृतीयरेखावलयं कृत्वा मध्ये निमज्जनं कुरुते तृतीयरेखा पद्मरागवर्णं तदा तुरीयावस्था भवति तुरीये केवलपरमात्मसंबन्धिनी मतिर्भवति नित्यबोधस्वरूपा भवति तदा शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतयात्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्॥

tṛtīyarekhāvalayaṃ kṛtvā madhye nimajjanaṃ kurute tṛtīyarekhā padmarāgavarṇaṃ tadā turīyāvasthā bhavati turīye kevalaparamātmasaṃbandhinī matirbhavati nityabodhasvarūpā bhavati tadā śanaiḥ śanairuparamedbuddhyā dhṛtigṛhītayātmasaṃsthaṃ manaḥ kṛtvā na kiṃcidapi cintayet॥

तृतीय रेखा वलय बनाकर जब पद्मराग वर्ण वाली रेखा में निमज्जन किया जाता है, तब तुरीयावस्था प्राप्त होती है। इसमें बुद्धि मात्र परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ने वाली और नित्य बोधस्वरुपा होती है। इस अवस्था में बुद्धि को धीरे-धीरे सबसे पृथक् करते हुए धैर्यपूर्वक मन को आत्म-केन्द्रित करके अन्य कुछ भी विचार न करे ॥


Verse ९३-१५

तदा प्राणापानयोरैक्यं कृत्वा सर्वं विश्वमात्मस्वरूपेण लक्ष्यं धारयति ।यदा तुरीयातीतावस्था तदा सर्वेषामानन्दस्वरूपो भवति द्वन्द्वातीतो भवति यावद्देहधारणा वर्तते-तावत्तिष्ठति पश्चात्परमात्मस्वरूपेण प्राप्तिर्भवति इत्यनेन प्रकारेण मोक्षो भवतीदमेवात्मदर्शनोपाया भवन्ति ॥

tadā prāṇāpānayoraikyaṃ kṛtvā sarvaṃ viśvamātmasvarūpeṇa lakṣyaṃ dhārayati ।yadā turīyātītāvasthā tadā sarveṣāmānandasvarūpo bhavati dvandvātīto bhavati yāvaddehadhāraṇā vartate-tāvattiṣṭhati paścātparamātmasvarūpeṇa prāptirbhavati ityanena prakāreṇa mokṣo bhavatīdamevātmadarśanopāyā bhavanti ॥

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तब प्राण और अपान में एकीकरण करके सम्पूर्ण जगत् को आत्मस्वरूप मानते हुए लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करे। तुरीयातीतावस्था प्राप्त होने पर द्वन्द्वभाव मिटते ही सभी कुछ आनन्दस्वरूप लगने लगता है। जब तक जीव में देहधारणा रहती है, तभी तक वह उसमें निवास करता है, बाद में परमात्मतत्व की प्राशि होती है, इसी मार्ग से मोक्ष और आत्मदर्शन दोनों की प्राप्ति सम्भव है ।।


Verse ९४

चतुष्पथसमायुक्तमहाद्वारगवायुना। सहस्थितत्रिकोणार्धगमने दृश्यतेऽच्युतः ॥

catuṣpathasamāyuktamahādvāragavāyunā। sahasthitatrikoṇārdhagamane dṛśyate'cyutaḥ ॥

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चारों मार्ग से संयुक्त महाद्वार की ओर गमन करने वाले वायु के साथ स्थिर होने पर अर्द्ध त्रिकोण में जाकर परमात्मा का साक्षात्कार होता है ॥


Verse ९५

पूर्वोत्तत्रिकोणस्थानादुपरि पृथिव्यादिपञ्चवर्णकं ध्येयम्। प्राणादिपञ्चवायुश्च बीजं वर्णं च स्थानम्। यकारं प्राणबीजं च नीलजीमूतसन्निभम्।रकारमग्निबीजं च अपानादित्यसंनि-भम् ॥

pūrvottatrikoṇasthānādupari pṛthivyādipañcavarṇakaṃ dhyeyam। prāṇādipañcavāyuśca bījaṃ varṇaṃ ca sthānam। yakāraṃ prāṇabījaṃ ca nīlajīmūtasannibham।rakāramagnibījaṃ ca apānādityasaṃni-bham ॥

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पूर्व में कथित त्रिकोण रथान से ऊपर पृथ्वी आदि पाँच रंग वाले तत्व ध्यान के योग्य हैं। इसके साथ चीज, पर्ण और स्थान प्राणादि पाँच वायु ध्यान के योग्य हैं।'य' कार जो नीले बादलों के समान है, वह प्राण का बीज है। 'र' कार आदित्यरूप वर्ण अग्निरूप अपान का बीज है ॥


Verse ९६

लकारं पृथिवीरूपं व्यानं बन्धूकसंनिभम्। वकारं जीवबीजं च उदानं शङ्खवर्णकम्॥

lakāraṃ pṛthivīrūpaṃ vyānaṃ bandhūkasaṃnibham। vakāraṃ jīvabījaṃ ca udānaṃ śaṅkhavarṇakam॥

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‘ल' कार बन्धूक पुष्प के रंग वाला पृथ्वीरूप व्यान का बीज है। शंख के रंग याला 'व' कार जीवरूप उदान का बीज है ॥


Verse ९७

हकारं वियत्स्वरूपं च समानं स्फटिकप्रभम्। हन्नाभिनासाकर्णं च पादाङ्गुष्ठादिसंस्थितम् ॥

hakāraṃ viyatsvarūpaṃ ca samānaṃ sphaṭikaprabham। hannābhināsākarṇaṃ ca pādāṅguṣṭhādisaṃsthitam ॥

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‘ह' कार स्फटिक प्रभायुक्त आकाश रूप ‘समान' का बीज है। हृदय, नाभि, नासिका, कान तथा पैर का अंगुष्ठ- ये समान प्राण के स्थान हैं॥


Verse ९८

द्विसप्ततिसहस्त्राणि नाडीमार्गेषु वर्तते । अष्टाविंशतिकोटीषु रोमकूपेषु संस्थिताः ॥

dvisaptatisahastrāṇi nāḍīmārgeṣu vartate । aṣṭāviṃśatikoṭīṣu romakūpeṣu saṃsthitāḥ ॥

avalambaka

यह समान बहत्तर हजार नाड़ियों तथा शरीर के अट्ठाईस करोड़ रोम कूपों में रहता है ॥


Verse ९९

समानप्राण एकस्तु जीवः स एक एव हि । रेचकादित्रयं कुर्याद्दृढचित्तः समाहितः ॥

samānaprāṇa ekastu jīvaḥ sa eka eva hi । recakāditrayaṃ kuryāddṛḍhacittaḥ samāhitaḥ ॥

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समान और प्राण भिन्न-भिन्न नहीं, अपितु एक हैं, दोनों एक ही जीव हैं । चित्त को दृढ़ता से समाहित कर पूरक, कुम्भक, रेचक तीनों क्रियायें सम्पन्न करे। हृदयकमल के कोटर में धीरे-धीरे सबको आकर्षित करके, प्राणवायु और अपान को अवरुद्ध करते हुए प्रणव ( ॐकार) का उच्चारण करे ॥


Verse १००

शनैः समस्तमाकृष्य हृत्सरोरुहकोटरे। प्राणापानौ च बध्वा तु प्रणवेन समुच्चरेत् ॥

śanaiḥ samastamākṛṣya hṛtsaroruhakoṭare। prāṇāpānau ca badhvā tu praṇavena samuccaret ॥

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समान और प्राण भिन्न-भिन्न नहीं, अपितु एक हैं, दोनों एक ही जीव हैं । चित्त को दृढ़ता से समाहित कर पूरक, कुम्भक, रेचक तीनों क्रियायें सम्पन्न करे। हृदयकमल के कोटर में धीरे-धीरे सबको आकर्षित करके, प्राणवायु और अपान को अवरुद्ध करते हुए प्रणव ( ॐकार) का उच्चारण करे ॥


Verse १०१

कण्ठसंकोचनं कृत्वा लिङ्गसंकोचनं तथा। मूलाधारात्सुषुम्ना च पद्मतन्तुनिभा शुभा ।।

kaṇṭhasaṃkocanaṃ kṛtvā liṅgasaṃkocanaṃ tathā। mūlādhārātsuṣumnā ca padmatantunibhā śubhā ।।

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कण्ठ का संकोचन करके लिङ्ग का संकोचन करे, तत्पश्चात् मूलाधार से पद्मतन्तु की तरह प्रकट होने वाली सुषुम्ना नाड़ी का संकोचन करे ॥


Verse १०२

अमूर्ती वर्तते नादो वीणादण्डसमुत्थितः । शङ्खनादादिभिश्चैव मध्यमेव ध्वनिर्यथा॥

amūrtī vartate nādo vīṇādaṇḍasamutthitaḥ । śaṅkhanādādibhiścaiva madhyameva dhvaniryathā॥

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सुषुम्ना के आश्रित वीणा-दण्ड से उठने वाला अमूर्त नाद सुनाई पड़ता है, जैसे शंखनाद आदि के मध्य (अमूर्त ध्वनि) सुनाई पड़ता है ॥


Verse १०३

व्योमरन्ध्रगतो नादो मायूरं नादमेव च। कपालकुहरे मध्ये चतुर्द्वारस्य मध्यमे ॥

vyomarandhragato nādo māyūraṃ nādameva ca। kapālakuhare madhye caturdvārasya madhyame ॥

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व्योमरन्ध्र (आकाशरन्ध्र) से गमन करने वाला नाद मोर (पक्षी की) ध्वनि के समान रहता है, कपाल कुहर के मध्य चार द्वारों वाला बीच का स्थान है। व्योम में सूर्य के सुशोभित होने के समान ही आत्मा यहाँ प्रतिष्ठित है और ब्रह्म प्राप्ति के स्थान पर ब्रह्मरन्ध्र में कोदण्ड (धनुष) द्वय के बीच शक्ति स्थित है। जहाँ मन को तल्लीन करके अपने आत्मस्वरूप का साक्षात्कार करते हैं, वहीं रत्नों से ज्योतिष्मान् नादबिन्दु महेश का स्थान है। जो पुरुष इसका ज्ञाता है, वह कैवल्य पद को प्राप्त कर लेता है, इस प्रकार यह उपनिषद् पूर्ण हुई ॥


Verse १०४

तदात्मा राजते तत्र यथा व्योम्नि दिवाकरः ।कोदण्डद्वयमध्ये तु ब्रह्मरन्धेषु शक्ति च॥

tadātmā rājate tatra yathā vyomni divākaraḥ ।kodaṇḍadvayamadhye tu brahmarandheṣu śakti ca॥

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व्योमरन्ध्र (आकाशरन्ध्र) से गमन करने वाला नाद मोर (पक्षी की) ध्वनि के समान रहता है, कपाल कुहर के मध्य चार द्वारों वाला बीच का स्थान है। व्योम में सूर्य के सुशोभित होने के समान ही आत्मा यहाँ प्रतिष्ठित है और ब्रह्म प्राप्ति के स्थान पर ब्रह्मरन्ध्र में कोदण्ड (धनुष) द्वय के बीच शक्ति स्थित है। जहाँ मन को तल्लीन करके अपने आत्मस्वरूप का साक्षात्कार करते हैं, वहीं रत्नों से ज्योतिष्मान् नादबिन्दु महेश का स्थान है। जो पुरुष इसका ज्ञाता है, वह कैवल्य पद को प्राप्त कर लेता है, इस प्रकार यह उपनिषद् पूर्ण हुई ॥


Verse १०५

स्वात्मानं पुरुषं पश्येन्मनस्तत्र लयं गतम्।रत्नानि ज्योत्स्निनादं तु बिन्दुमाहेश्वरं पदम् ॥

svātmānaṃ puruṣaṃ paśyenmanastatra layaṃ gatam।ratnāni jyotsninādaṃ tu bindumāheśvaraṃ padam ॥

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व्योमरन्ध्र (आकाशरन्ध्र) से गमन करने वाला नाद मोर (पक्षी की) ध्वनि के समान रहता है, कपाल कुहर के मध्य चार द्वारों वाला बीच का स्थान है। व्योम में सूर्य के सुशोभित होने के समान ही आत्मा यहाँ प्रतिष्ठित है और ब्रह्म प्राप्ति के स्थान पर ब्रह्मरन्ध्र में कोदण्ड (धनुष) द्वय के बीच शक्ति स्थित है। जहाँ मन को तल्लीन करके अपने आत्मस्वरूप का साक्षात्कार करते हैं, वहीं रत्नों से ज्योतिष्मान् नादबिन्दु महेश का स्थान है। जो पुरुष इसका ज्ञाता है, वह कैवल्य पद को प्राप्त कर लेता है, इस प्रकार यह उपनिषद् पूर्ण हुई ॥


Verse १०६

य एवं वेद पुरुषः स कैवल्यं समश्नुत इत्युपनिषत् ॥

ya evaṃ veda puruṣaḥ sa kaivalyaṃ samaśnuta ityupaniṣat ॥

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व्योमरन्ध्र (आकाशरन्ध्र) से गमन करने वाला नाद मोर (पक्षी की) ध्वनि के समान रहता है, कपाल कुहर के मध्य चार द्वारों वाला बीच का स्थान है। व्योम में सूर्य के सुशोभित होने के समान ही आत्मा यहाँ प्रतिष्ठित है और ब्रह्म प्राप्ति के स्थान पर ब्रह्मरन्ध्र में कोदण्ड (धनुष) द्वय के बीच शक्ति स्थित है। जहाँ मन को तल्लीन करके अपने आत्मस्वरूप का साक्षात्कार करते हैं, वहीं रत्नों से ज्योतिष्मान् नादबिन्दु महेश का स्थान है। जो पुरुष इसका ज्ञाता है, वह कैवल्य पद को प्राप्त कर लेता है, इस प्रकार यह उपनिषद् पूर्ण हुई ॥