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1. Garuda Upanishad

Garuda Upanishad

[ Sutra 1 ]

गारुडब्रह्मविद्यां प्रवक्ष्यामि यां ब्रह्मविद्यां नारदाय प्रोवाच नारदो बृत्सेनाय बृहत्सेन इन्द्राय इन्द्रो भरद्वाजाय भरद्वाजो जीवकामेभ्यः शिष्येभ्यः प्रायच्छत् ॥1॥

gāruḍabrahmavidyāṃ pravakṣyāmi yāṃ brahmavidyāṃ nāradāya provāca nārado bṛtsenāya bṛhatsena indrāya indro bharadvājāya bharadvājo jīvakāmebhyaḥ śiṣyebhyaḥ prāyacchat ॥1॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — अब गारुड़ ब्रह्मविद्या का वर्णन करते हैं; जिस ब्रह्मविद्या को भगवान् ब्रह्मा ने नारद से कहा, नारद ने बृहत्सेन से कहा, बृहत्सेन ने इन्द्र से कहा, इन्द्र ने भरद्वाज से कहा और भरद्वाज ने इस विद्या का शिक्षण जीवकाम (ब्रह्म प्राप्ति द्वारा जीवन धन्य बनाने की इच्छा वाले) शिष्यों को प्रदान किया ॥1॥

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[ Sutra 2 ]

अस्याः श्रीमहागरुडब्रह्मविद्याया ब्रह्मा ऋषिः । गायत्री छन्दः । श्रीभगवान्महागरुडो देवता । श्रीमहागरुडप्रीत्यर्थे मम सकलविषविनाशनार्थे जपे विनियोगः ॥2॥

asyāḥ śrīmahāgaruḍabrahmavidyāyā brahmā ṛṣiḥ । gāyatrī chandaḥ । śrībhagavānmahāgaruḍo devatā । śrīmahāgaruḍaprītyarthe mama sakalaviṣavināśanārthe jape viniyogaḥ ॥2॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस श्रीगरुडुब्रह्मविद्या के ऋषि ब्रह्मा, छन्द-गायत्री, श्रीभगवान् महागरुड़ देवता हैं । श्री महागरुड़ की प्रसन्नता के लिए तथा मेरे समस्त विषों के विनाशार्थ जप में इसका विनियोग किया जाता है ॥2॥

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[ Sutra 3 ]

ॐ नमो भगवते अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । श्रीमहागरुडाय तर्जनीभ्यां स्वाहा । पक्षीन्द्राय मध्यमाभ्यां वषट् । श्रीविष्णुवल्लभाय अनामिकाभ्यां हुम् । त्रैलोक्यपरिपूजिताय कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । उग्रभयंकरकालानलरूपाय करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् । एवं हृदयादिन्यासः ॥3॥

oṃ namo bhagavate aṅguṣṭhābhyāṃ namaḥ । śrīmahāgaruḍāya tarjanībhyāṃ svāhā । pakṣīndrāya madhyamābhyāṃ vaṣaṭ । śrīviṣṇuvallabhāya anāmikābhyāṃ hum । trailokyaparipūjitāya kaniṣṭhikābhyāṃ vauṣaṭ । ugrabhayaṃkarakālānalarūpāya karatalakarapṛṣṭhābhyāṃ phaṭ । evaṃ hṛdayādinyāsaḥ ॥3॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — ॐ नमो ...........................अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । (दोनों हाथों की तर्जनी अंगुलियों से दोनों अंगूठों का स्पर्श) श्री महागरुडाय ........तर्जनीभ्यां स्वाहा । (दोनों हाथों के अँगूठों से दोनों तर्जनी अङ्गुलियों का स्पर्श) पक्षीन्द्राय .. मध्यमाभ्यां वषट् । (अँगूठों से मध्यमा अँगुलियों का स्पर्श) । श्री विष्णुवल्लभाय ......... अनामिकाभ्यां हुम् । (अँगूठों से अनामिका अँगुलियों का स्पर्श) त्रैलोक्यपरिपूजिताय ..........कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । (अँगूठों से कनिष्ठिका अँगुलियों का स्पर्श) उग्रभयंकर .......करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् (हथेलियों और उनके पृष्ठ भागों का परस्पर स्पर्श) इसी तरह से दाहिने हाथ की पाँचों अँगुलियों से हृदयादि (शिर, शिखा, कवच, नेत्रादि) का भी न्यास (स्पर्श) करना चाहिए ॥3॥

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[ Sutra 4 ]

भूर्भवः सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥4॥

bhūrbhavaḥ suvaromiti digbandhaḥ ॥4॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — भूः भुवः स्वः' तथा 'ॐ' व्याहृतियों एवं प्रणव से दिग्बन्धन की क्रिया सम्पन्न करनी चाहिए ॥4॥

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[ Sutra 5 ]

ध्यानम्। स्वस्तिको दक्षिणं पादं वामपादं तु कुञ्चितम् । प्राञ्जलीकृतदोर्युग्मं गरुडं हरिवल्लभम्। अनन्तो वामकटको यज्ञसूत्रं तु वासुकिः । तक्षकः कटिसूत्रं तु हारः कर्कोट उच्यते । पद्मो दक्षिणकर्णे तु महापद्मस्तु वामके । शङ्खः शिरःप्रदेशे तु गुलिकस्तु भुजान्तरे । पौण्ड्रकालिकनागाभ्यां चामराभ्यां सुवीजितम् । एलापुत्रकनागाद्यैः सेव्यमानं मुदान्वितम् । कपिलाक्षं गरुत्मन्तं सुवर्णसदृशप्रभम् । दीर्घबाहुं बृहत्स्कन्धं नागाभरणभूषितम् । आजानुतः सुवर्णाभमाकट्योस्तुहिनप्रभम् । कुङ्कुमारुणमाकण्ठं शतचन्द्रनिभाननम् । नीलाग्रनासिकावक्त्रं सुमहच्चारुकुण्डलम् । दंष्ट्राकरालवदनं किरीटमुकुटोज्ज्वलम् । कुङ्कुमारुणसर्वाङ्ग कुन्देन्दु-धवलाननम् । विष्णुवाह नमस्तुभ्यं क्षेमं कुरु सदा मम । एवं ध्यायेत्त्रिसंध्यासु गरुडं नागभूषणम् । विषं नाशयते शीघ्रं तूलराशिमिवानलः ॥5॥

dhyānam । svastiko dakṣiṇaṃ pādaṃ vāmapādaṃ tu kuñcitam । prāñjalīkṛtadoryugmaṃ garuḍaṃ harivallabham । ananto vāmakaṭako yajñasūtraṃ tu vāsukiḥ । takṣakaḥ kaṭisūtraṃ tu hāraḥ karkoṭa ucyate । padmo dakṣiṇakarṇe tu mahāpadmastu vāmake। śaṅkhaḥ śiraḥpradeśe tu gulikastu bhujāntare । pauṇḍrakālikanāgābhyāṃ cāmarābhyāṃ suvījitam । elāputrakanāgādyaiḥ sevyamānaṃ mudānvitam । kapilākṣaṃ garutmantaṃ suvarṇasadṛśaprabham । dīrghabāhuṃ bṛhatskandhaṃ nāgābharaṇabhūṣitam । ājānutaḥ suvarṇābhamākaṭyostuhinaprabham । kuṅkumāruṇamākaṇṭhaṃ śatacandranibhānanam । nīlāgranāsikāvaktraṃ sumahaccārukuṇḍalam । daṃṣṭrākarālavadanaṃ kirīṭamukuṭojjvalam । kuṅkumāruṇasarvāṅga kundendu-dhavalānanam । viṣṇuvāha namastubhyaṃ kṣemaṃ kuru sadā mama । evaṃ dhyāyettrisaṃdhyāsu garuḍaṃ nāgabhūṣaṇam । viṣaṃ nāśayate śīghraṃ tūlarāśimivānalaḥ ॥5॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — ध्यान- जिनका दाहिना पैर स्वस्तिक के आकार के सदृश है, बायाँ पैर घुटने तक सिकोड़ कर रखा है । जिन्होंने दोनों हाथों को प्रणाम की मुद्रा में जोड़ रखा है, जो विष्णुवल्लभ हैं । जिन्होंने अनन्त नामक नाग को बायें हाथ में कड़े के रूप में धारण कर रखा हैं । यज्ञोपवीत के रूप में वासुकि को धारण किया है । तक्षक को करधनी के रूप में और कर्कोट को गले में हार के सदृश धारण किया है । पद्म नामक नाग को दाहिने कान में और महापद्म को बायें कान में आभूषण की भाँति धारण कर रखा है । शंख नामक नाग को सिर पर एवं गुलिक (नाग) को भुजाओं के मध्य में धारण कर रखा है । पौण्ड्र एवं कालिक नागों को चँवरों के रूप में प्रयुक्त किया गया है । एला तथा पुत्रक आदि नागों के द्वारा प्रसन्नतापूर्वक जिनकी सेवा की जाती हैं । कपिल वर्ण सदृश नेत्र सुवर्ण के समान कान्ति वाले, लम्बी भुजाओं वाले, चौड़े (विशाल) कन्धे वाले, नागों के अलंकारों से विभूषित, शानु पर्यन्त सुवर्ण के समान कान्ति वाले तथा कटि पर्यन्त हिम के समान श्वेत प्रभा वाले, कुंकुम के समान लाल शरीर वाले, सैकड़ों चन्द्रमाओं के समान मुख- कान्ति बाले, जिनकी नासिका का अग्रभाग तथा मुख मण्डल नील वर्ण का है । विशाल कुण्डलों से युक्त जिनके कान हैं । भयंकर दाढ़ों से युक्त विकराल मुख वाले, अत्यन्त देदीप्यमान मुकुट धारण करने वाले, कुंकुम लगाने से लाल अंग वाले, कुन्द पुष्प एवं चन्द्र के सदृश धवल मुख वाले, हे विष्णु के वाहन गरुड़देव! आपको नमस्कार है । आप सदैव हमारा कल्याण करें । इस प्रकार तीनों संध्याओं में नागों से अलंकृत गरुड़ का ध्यान करना चाहिए । (इससे प्रसन्न होकर वे गरुड़देव) राई के ढेर को, अग्नि के द्वारा दग्ध करने के सदृश विष को शीघ्र ही विनष्ट कर देते हैं ॥5॥

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[ Sutra 6 ]

ओमीमों नमो भगवते श्रीमहागरुड़ाय पक्षीन्द्राय विष्णुवल्लभाय त्रैलोक्यपरिपूजिताय उग्रभयंकरकालानलरूपाय वज्रनखाय वज्रतुण्डाय वज्रदन्ताय वज्रदंष्ट्राय वज्रपुच्छाय वज्र - पक्षालक्षितशरीराय ओमीमेह्येहि श्री महागरुडाप्रतिशासनास्मिन्नाविशाविश दुष्टानां विषं दूषय दृषय स्पृष्टानां विषं नाशय नाशय दन्दशूकानां विषं दारय दारय प्रलीनं विषं प्रणाशय प्रणाशय सर्वविधं नाशय नाशय हुन हुन दह दह पच पच भस्मीकुरु भस्मीकुरु हुं फट् स्वाहा ॥6॥

omīmoṃ namo bhagavate śrīmahāgaruḍa़āya pakṣīndrāya viṣṇuvallabhāya trailokyaparipūjitāya ugrabhayaṃkarakālānalarūpāya vajranakhāya vajratuṇḍāya vajradantāya vajradaṃṣṭrāya vajrapucchāya vajra - pakṣālakṣitaśarīrāya omīmehyehi śrī mahāgaruḍāpratiśāsanāsminnāviśāviśa duṣṭānāṃ viṣaṃ dūṣaya dṛṣaya spṛṣṭānāṃ viṣaṃ nāśaya nāśaya dandaśūkānāṃ viṣaṃ dāraya dāraya pralīnaṃ viṣaṃ praṇāśaya praṇāśaya sarvavidhaṃ nāśaya nāśaya huna huna daha daha paca paca bhasmīkuru bhasmīkuru huṃ phaṭ svāhā ॥6॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — पक्षिराज गरुड़, विष्णुवल्लभ (विष्णुप्रिय), तीनों लोकों के द्वारा पूजित किये जाने वाले, उग्र- 'भयंकर कालाग्नि के सदृश, कठोर नखों से युक्त, कठोर चञ्चु (चोंच) से युक्त, कठोर दाँत वाले, कठोर दादों वाले, कठोर पूंछ वाले, कठोर पंखों से लक्षित शरीर वाले भगवान् श्रीमहागरुड़ को नमस्कार है । आप आएँ, हे महागरुड़ ! अपने अनुशासित इस आसन पर आएँ, प्रवेश करें । दुष्टों के विष को दूर करें, दूर करें । जो विष स्पर्श मात्र से आ जाता है, उसे नष्ट करें, नष्ट करें । रेंगने वाले विषैले सर्पो के विष को दूर करें, दूर करें । प्रलीन (छिपे हुए) विष को दूर हटाएँ, दूर हटाएँ । सभी तरह के विषों को विनष्ट करें, विनष्ट करें । मारें- मारें, जलाएँ जलाएँ, पचाएँ-पचाएँ । समस्त विषों को भस्मीभूत करें, भस्मीभूत करें । हुं फट् (बीज मन्त्र के सहित गरुड़देव की प्रसन्नता के लिए इस मन्त्र से आहुति समर्पित करें अथवा) आहुति समर्पित हैं ॥6॥

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[ Sutra 7 ]

चन्द्रमण्डलसंकाश सूर्यमण्डलमुष्टिक । पृथ्वीमण्डलमुद्राङ्ग श्रीमहागरुड विषं हर हर हुं फट् स्वाहा ॥7॥

candramaṇḍalasaṃkāśa sūryamaṇḍalamuṣṭika । pṛthvīmaṇḍalamudrāṅga śrīmahāgaruḍa viṣaṃ hara hara huṃ phaṭ svāhā ॥7॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — आप चन्द्रमण्डल के सदृश हैं । आपको मुष्टिका में सूर्यमण्डल स्थित है, ऐसे आप पृथ्वी मण्डल के सदृश मुद्राङ्गों वाले हे श्रीमहागरुड़! (आप) समस्त विषों का हरण करें-हरण करें, नष्ट करें । हुं फट् (बीज मन्त्र के सहित श्रीगरुड़ की प्रसन्नता के लिए) आहुति समर्पित है ॥7॥

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[ Sutra 8 ]

ॐ क्षिप स्वाहा ॥8॥

oṃ kṣipa svāhā ॥8॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — ॐ (हे महागरुड़ ! आप विषधरों अथवा विषों को ) क्षिप अर्थात् दूर फेंक दें । ( इस निमित्त) आहुति समर्पित है ॥8॥

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[ Sutra 9 ]

ओम सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषाणां च विषरूपिणी विषदूषिणी विषशोषणी विपनाशिनी विषहारिणी हतं विषं नष्टं विषमन्तःप्रलीनं विषं प्रनष्टं विषं हतं ते ब्रह्मणा विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥9॥

oma sacarati sacarati tatkārī matkārī viṣāṇāṃ ca viṣarūpiṇī viṣadūṣiṇī viṣaśoṣaṇī vipanāśinī viṣahāriṇī hataṃ viṣaṃ naṣṭaṃ viṣamantaḥpralīnaṃ viṣaṃ pranaṣṭaṃ viṣaṃ hataṃ te brahmaṇā viṣaṃ hatamindrasya vajreṇa svāhā ॥9॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — तत्कारि-मत्कारि( उनकी या हमारी )हिंसा करने वाला जो विष वर्द्धित हो रहा है, उसे( ब्रह्मविद्या ) जो कि विषों के विष( अर्थात् विषनाशक)विषरूपिणी, विष को दूषित, शोषित, नष्ट एवं हरण करने वाली, ऐसी वह जो स्वयं अहारूपा है, उसके द्वारा घातक विष को, अन्तर्लीन विष को प्रणाशक (नष्ट करने वाले) विष को नष्ट कर दिया गया । विष को नष्ट करने में इन्द्र के वज्र ने सहयोग प्रदान किया । (इस निमित्त) आहुति समर्पित है ॥9॥

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[ Sutra 10 ]

ॐ नमो भगवते महागरुडाय विष्णुवाहनाय त्रैलोक्यपरिपूजिताय वज्रनखवज्रतुण्डाय वज्रपक्षालंकृतशरीराय एह्येहि महागरुड विषं छिन्धि छिन्धि आवेशयावेशय हुं फट् स्वाहा ॥10॥

oṃ namo bhagavate mahāgaruḍāya viṣṇuvāhanāya trailokyaparipūjitāya vajranakhavajratuṇḍāya vajrapakṣālaṃkṛtaśarīrāya ehyehi mahāgaruḍa viṣaṃ chindhi chindhi āveśayāveśaya huṃ phaṭ svāhā ॥10॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — (उन) भगवान् महागरुड़ को नमस्कार है । भगवान् विष्णु के वाहन तीनों लोकों में पूजित, वज्रवत् कठोर नाखून एवं कठोर चोंच वाले तथा अपने शरीर को कठोर पंखों से अलंकृत करने वाले हे गरुड़देव! आप आए आप पधारें । हे महागरुड़! आप आविष्ट (प्रविष्ट) हो करके विष को छिन्न-भिन्न कर दें । 'हुं फट्' (बीज मन्त्र के सहित गरुड़देव के प्रसन्नतार्थ) आहुति समर्पित है ॥10॥

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[ Sutra 11 ]

सुपर्णोऽसि गरुत्मान्त्रिवृत्ते शिरो गायत्रं चक्षुः स्तोम आत्मा साम ते तनूर्वामदेव्यं बृहद्रथन्तरे पक्षौ यज्ञायज्ञियं पुच्छं छन्दांस्यङ्गानि धिष्णिया शफा यजूंषि नाम । सुपर्णोऽसि गरुत्मान्दिवं गच्छ सुवः पत ॥11॥

suparṇo'si garutmāntrivṛtte śiro gāyatraṃ cakṣuḥ stoma ātmā sāma te tanūrvāmadevyaṃ bṛhadrathantare pakṣau yajñāyajñiyaṃ pucchaṃ chandāṃsyaṅgāni dhiṣṇiyā śaphā yajūṃṣi nāma । suparṇo'si garutmāndivaṃ gaccha suvaḥ pata ॥11॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — हे ऊर्ध्वगामी महागरुड़देव ! आप सुन्दर पंखों से युक्त, अग्निदेव के सदृश गतिशील हैं । त्रिवृत स्तोम आपका शिर और गायत्र (साम) आपके नेत्र हैं । दोनों पंख के रूप में बृहत् एवं रथन्तर साम हैं, यज्ञ आपकी अन्तरात्मा, सभी छन्द आपके शरीर के अंग तथा यजुः आपका नाम है । वामदेव नामक साम आपकी देह, यज्ञायज्ञिय नामक साम आपकी पूँछ एवं धिष्ण्य स्थित अग्नि आपके खुर नख हैं । हे गरुड़देव! आप अग्निवत् दिव्य लोक की ओर गमन करें तथा स्वर्गलोक को प्राप्त करें ॥11॥

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[ Sutra 12 ]

ओम ब्रह्मविद्याममावास्यायां पौर्णमास्यायां पुरोवाच सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी विषहारिणी हतं विषं नष्टं विषं प्रनष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥12॥

oma brahmavidyāmamāvāsyāyāṃ paurṇamāsyāyāṃ purovāca sacarati sacarati tatkārī matkārī viṣanāśinī viṣadūṣiṇī viṣahāriṇī hataṃ viṣaṃ naṣṭaṃ viṣaṃ pranaṣṭaṃ viṣaṃ hatamindrasya vajreṇa viṣaṃ hataṃ te brahmaṇā viṣamindrasya vajreṇa svāhā ॥12॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — प्राचीन काल में यह ब्रह्मविद्या अमावस्या- पूर्णिमा के दिन बताई थी । तत्कारि-मत्कारि (उनकी अथवा हमारी) हिंसा करने वाला जो विष वर्द्धित हो रहा है (संचरण कर रहा है), उसे (ब्रह्मविद्या) जो कि विषयों की विष अर्थात् विषनाशक हैं । विष को दूषित एवं हरण करने वाली है, ऐसी वह जो स्वयं ब्रह्मरूपा है, उसने उस घातक विष को, अन्तर्लीन विष को, प्रणाशक विष को इन्द्र के वज्र द्वारा नष्ट कर दिया। विष को नष्ट करने में । इन्द्र के वज्र ने सहयोग प्रदान किया । (इस निमित्त) आहुति समर्पित है ॥12॥

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[ Sutra 13 ]

तत्स्त्र्यम् । यद्यनन्तकदूतोऽसि यदि वानन्तकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥13॥

tatstryam । yadyanantakadūto'si yadi vānantakaḥ svayaṃ sacarati sacarati tatkārī matkārī viṣanāśinī viṣadūṣiṇī hataṃ viṣaṃ naṣṭaṃ viṣaṃ hatamindrasya vajreṇa viṣaṃ hataṃ te brahmaṇā viṣamindrasya vajreṇa svāhā ॥13॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — तत्स्त्र्म् ' (अर्थात् यह बीज मन्त्र सभी प्रकार के विषों को हरण करने में समर्थ है) तुम चाहे अनन्तक के दूत हो अथवा स्वयं अनन्तक हो । तत्कारि-मत्कारि (उनकी अथवा हमारी) हिंसा करने वाला जो विष वर्द्धित (संचरित) हो रहा है, ऐसे उस विष को (ब्रह्मविद्या) जो कि विषों के लिए विष है, ऐसी वह जो स्वयं ब्रह्ममय है, उसने इन्द्र के वज्र द्वारा उस विष को मारकर (उस) प्रणाशक विष को नष्ट कर दिया है । इस विष को नष्ट करने में इन्द्र के वज्र ने भी सहयोग प्रदान किया है। (इस निमित्त) आहुति समर्पित है ॥13॥

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[ Sutra 14 ]

यदि वासुकिदूतोऽसि यदि वा वासुकिः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥14॥

yadi vāsukidūto'si yadi vā vāsukiḥ svayaṃ sacarati sacarati tatkārī matkārī viṣanāśinī viṣadūṣiṇī hataṃ viṣaṃ naṣṭaṃ viṣaṃ hatamindrasya vajreṇa viṣaṃ hataṃ te brahmaṇā viṣamindrasya vajreṇa svāhā ॥14॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — तुम चाहे वासुकि के दूत हो अथवा स्वयं वासुकि हो । तत्कारि-मत्कारि (उनकी अथवा हमारी) हिंसा करने वाला जो विष वर्द्धित (संचरित) हो रहा है, ऐसे उस विष को (ब्रह्मविद्या) जो कि विषों की विष को दूषित, मारने, नष्ट एवं हरण करने वाली है, ऐसी वह जो स्वयं ब्रह्मरूपा है, उसने इन्द्र के वज्र द्वारा उस घातक विष को मारकर विनष्ट कर दिया है । इस विष को विनष्ट करने में इन्द्र के वज्र ने भी सहयोग प्रदान किया है । (इस निमित्त) आहुति समर्पित है ॥14॥

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[ Sutra 15 ]

यदि तक्षकदूतोऽसि यदि वा तक्षकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥15॥

yadi takṣakadūto'si yadi vā takṣakaḥ svayaṃ sacarati sacarati tatkārī matkārī viṣanāśinī viṣadūṣiṇī hataṃ viṣaṃ naṣṭaṃ viṣaṃ hatamindrasya vajreṇa viṣaṃ hataṃ brahmaṇā viṣamindrasya vajreṇa svāhā ॥15॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — तुम चाहे तक्षक के दूत हो अथवा तक्षक हो । उनकी अथवा हमारी हिंसा करने वाला जो विष वर्द्धित हो रहा है, ऐसे उस विष को (ब्रह्मविद्या) जो कि विषों की विष है, विष को दूषित, नष्ट एवं मारने वाली है, ऐसी वह जो स्वयं ही ब्रह्म स्वरूपा है, उसने इन्द्र के वज्र द्वारा उस घातक विष को मारकर विनष्ट कर दिया है । इस विष को नष्ट करने में इन्द्र के वज्र ने भी सहयोग प्रदान किया है । (इस निमित्त) आहुति समर्पित है ॥15॥

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[ Sutra 16 ]

यदि कर्कोटकदूतोऽसि यदि वा कर्कोटकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥16॥

yadi karkoṭakadūto'si yadi vā karkoṭakaḥ svayaṃ sacarati sacarati tatkārī matkārī viṣanāśinī viṣadūṣiṇī hataṃ viṣaṃ naṣṭaṃ viṣaṃ hatamindrasya vajreṇa viṣaṃ hataṃ te brahmaṇā viṣamindrasya vajreṇa svāhā ॥16॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — तुम चाहे कर्कोटक के दूत हो अथवा स्वयं कर्कोटक हो । ' तत्कारि-मत्कारि' (उनकी या हमारी) हिंसा करने वाला जो विष वर्द्धित (संचरित) हो रहा है, ऐसे उस विष को (ब्रह्मविद्या) जो कि विषों की विष अर्थात् विष नाशक है । विष को दूषित करने, मारने एवं नष्ट करने वाली है,ऐसी वह जो स्वयं ब्रह्म स्वरूपा है, उसने इन्द्र के वज्र द्वारा उस घातक विष को मारकर विनष्ट कर दिया है । इस विष को नष्ट करने में इन्द्र के वज्र ने भी सहयोग प्रदान किया है, 'स्वाहा' ॥16॥

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[ Sutra 17 ]

यदि महापद्मकदूतोऽसि यदि वा महापद्मकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥17॥

yadi mahāpadmakadūto'si yadi vā mahāpadmakaḥ svayaṃ sacarati sacarati tatkārī matkārī viṣanāśinī viṣadūṣiṇī hataṃ viṣaṃ naṣṭaṃ viṣaṃ hatamindrasya vajreṇa viṣaṃ hataṃ te brahmaṇā viṣamindrasya vajreṇa svāhā ॥17॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — तुम चाहे महापद्मक के दूत हो अथवा स्वयं महापद्मक हो । 'तत्कारि-मतत्करि' उनकी अथवा हमारी हिंसा करने वाला जो विष वर्द्धित हो रहा है, ऐसे उस विष को (ब्रह्मविद्या) जो कि विषों की विष है । विष को दूषित करने ,मारने-नष्ट एंव हरण करने वाली है ऐसी वह जो स्वयं ब्रह्मरूपा है, उसने इन्द्र के वज्र द्वारा उस घातक विष को मारकर विनष्ट कर दिया है । इस विष को नष्ट करने में इन्द्र के वज्र ने भी सहयोग प्रदान किया है, 'स्वाहा' ॥17॥

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[ Sutra 18 ]

यदि महापद्मकदूतोऽसि यदि वा महापद्मकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥18॥

yadi mahāpadmakadūto'si yadi vā mahāpadmakaḥ svayaṃ sacarati sacarati tatkārī matkārī viṣanāśinī viṣadūṣiṇī hataṃ viṣaṃ naṣṭaṃ viṣaṃ hatamindrasya vajreṇa viṣaṃ hataṃ te brahmaṇā viṣamindrasya vajreṇa svāhā ॥18॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — तुम चाहे महापद्मक के दूत हो अथवा स्वयं महापद्मक हो । 'तत्कारि-मत्कारि' (उनकी अथवा हमारी) हिंसा करने वाला जो विष वर्द्धित हो रहा है, ऐसे उस विष को (ब्रह्मविद्या) जो कि विषों की विष है । विष को दूषित करने, मारने नष्ट एवं हरण करने वाली हैं, ऐसी वह जो स्वयं ब्रह्मरूपा है, उसने इन्द्र के वज्र द्वारा उस घातक विष को मारकर विनष्ट कर दिया है । इस विष को नष्ट करने में इन्द्र के वज़ ने भी सहयोग प्रदान किया हैं 'स्वाहा ॥18॥

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[ Sutra 19 ]

यदि शङ्खकदूतोऽसि यदि वा शङ्खकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी विषहारिणी हतं विषं नष्टं विषं तमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥19॥

yadi śaṅkhakadūto'si yadi vā śaṅkhakaḥ svayaṃ sacarati sacarati tatkārī matkārī viṣanāśinī viṣadūṣiṇī viṣahāriṇī hataṃ viṣaṃ naṣṭaṃ viṣaṃ tamindrasya vajreṇa viṣaṃ hataṃ te brahmaṇā viṣamindrasya vajreṇa svāhā ॥19॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — तुम चाहे शङ्खक के दूत हो या स्वयं शङ्खक हो । उनकी अथवा हमारी हिंसा करने वाला जो विष वर्द्धित हो रहा है,ऐसे उस विष को (ब्रह्मविद्या) जो कि विषयों की विष है। विष को दूषित करने, मारने, नष्ट एवं हरण करने वाली है, ऐसी वह जो स्वयं ब्रह्मरूपा हैं, उसने इन्द्र के वज्र द्वारा उस घातक विष को मारकर विनष्ट कर दिया है, इस विष को नष्ट करने में इन्द्र के वज्र ने भी सहयोग प्रदान किया है, 'स्वाहा' ॥19॥

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[ Sutra 20 ]

यदि गुलिकदूतोऽसि यदि वा गुलिकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी विषहारिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥20॥

yadi gulikadūto'si yadi vā gulikaḥ svayaṃ sacarati sacarati tatkārī matkārī viṣanāśinī viṣadūṣiṇī viṣahāriṇī hataṃ viṣaṃ naṣṭaṃ viṣaṃ hatamindrasya vajreṇa viṣaṃ hataṃ te brahmaṇā viṣamindrasya vajreṇa svāhā ॥20॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — तुम चाहे गुलिक के दूत हो अथवा स्वयं गुलिक हो । उनकी अथवा हमारी हिंसा करने वाला जो विष वर्द्धित हो रहा है, ऐसे उस विष को (ब्रह्मविद्या) जो कि विषों की विष है। विष को दूषित करने, मारने, नष्ट एवं हरण करने वाली है, ऐसी वह जो स्वयं ब्रह्मरूपा है । उसने इन्द्र के वज्र द्वारा उस घातक विष को मारकर विनष्ट कर दिया है । इस विष को नष्ट करने में इन्द्र के वज्र ने भी सहयोग प्रदान किया है, 'स्वाहा' ॥20॥

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[ Sutra 21 ]

यदि पौण्ड्रकालिकदूतोऽसि यदि वा पौण्ड्रकालिकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी विषहारिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥21॥

yadi pauṇḍrakālikadūto'si yadi vā pauṇḍrakālikaḥ svayaṃ sacarati sacarati tatkārī matkārī viṣanāśinī viṣadūṣiṇī viṣahāriṇī hataṃ viṣaṃ naṣṭaṃ viṣaṃ hatamindrasya vajreṇa viṣaṃ hataṃ te brahmaṇā viṣamindrasya vajreṇa svāhā ॥21॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — तुम चाहे पौण्ड्रकालिक के दूत हो अथवा स्वयं पौण्ड्रकालिक हो । उनकी अथवा हमारी हिंसा करने वाला जो विष वर्द्धित हो रहा है, ऐसे उस विष को (ब्रह्मविद्या) जो कि विषयों की विष है । विष को दूषित करने, मारने, नष्ट एवं हरण करने वाली है, ऐसी वह जो स्वयं ब्रह्मरूपा है, उसने इन्द्र के वज्र द्वारा उस घातक विष को मारकर विनष्ट कर दिया है । इस विष को नष्ट करने में इन्द्र के वज्र ने भी सहयोग प्रदान किया है, ‘स्वाहा' ॥21॥

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[ Sutra 22 ]

यदि नागकदूतोऽसि यदि वा नागकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी विषहारिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥22॥

yadi nāgakadūto'si yadi vā nāgakaḥ svayaṃ sacarati sacarati tatkārī matkārī viṣanāśinī viṣadūṣiṇī viṣahāriṇī hataṃ viṣaṃ naṣṭaṃ viṣaṃ hatamindrasya vajreṇa viṣaṃ hataṃ te brahmaṇā viṣamindrasya vajreṇa svāhā ॥22॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — तुम चाहे नागक के दूत हो अथवा स्वयं नागक हो । उनकी अथवा हमारी हिंसा करने वाला जो विष वर्द्धित हो रहा है । ऐसे उस विष को (ब्रह्मविद्या) जो कि विषों को विष है । विष को दूषित करने, मारने, नष्ट एवं हरण करने वाली हैं । ऐसी वह जो स्वयं ब्रह्मरूपा है, उसने इन्द्र के वज्र द्वारा उस घातक विष को मारकर नष्ट कर दिया हैं । इस विष को विनष्ट करने में इन्द्र के वज्र ने भी सहयोग प्रदान किया है, 'स्वाहा' ॥22॥

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[ Sutra 23 ]

यदि लूतानां प्रलूतानां यदि वृश्चिकानां यदि घोटकानां यदि स्थावरजङ्गमानां सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी विषहारिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥23॥

yadi lūtānāṃ pralūtānāṃ yadi vṛścikānāṃ yadi ghoṭakānāṃ yadi sthāvarajaṅgamānāṃ sacarati sacarati tatkārī matkārī viṣanāśinī viṣadūṣiṇī viṣahāriṇī hataṃ viṣaṃ naṣṭaṃ viṣaṃ hatamindrasya vajreṇa viṣaṃ hataṃ te brahmaṇā viṣamindrasya vajreṇa svāhā ॥23॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — तुम चाहे मकड़ी, बड़ी ( श्रेष्ठ) मकड़ी हो चाहे वृश्चिक ( बिच्छु) हो, चाहे घुड़दौड़ सर्प हो और चाहे रथावर जंगम हो । उनकी अधवा हमारी हिंसा करने वाला जो विष वर्द्धित एवं संचरित हो रहा है । ऐसे उस विष को (ब्रहाविद्या) जो कि विषों की विष है । विष को दूषित करने, मारने, नष्ट एवं हरण करने वाली है, ऐसी वह जो स्वयं ब्रह्मरूपा है. उसने इन्द्र के वज्र द्वारा उस घातक विष को मारकर नष्ट कर दिया । इस विष को विनष्ट करने में इन्द्र के वज्र ने भी सहयोग प्रदान किया है, 'स्वाहा ॥23॥

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[ Sutra 24 ]

अनन्तवासुकितक्षककर्कोटकपद्मकमहापद्मकशङ्खकगुलिकपौण्ड्रकालिकनागक इत्येषां दिव्यानां महानागानां महानागादिरूपाणां विषतुण्डानां विषदन्तानां विषदंष्ट्राणां विषाङ्गानां विषपुच्छानां विश्वचाराणां वृश्चिकानां लूतानां प्रलूतानां मूषिकाणां गृहगौलिकानां गृहगोधिकानां घ्रणासानां गृहगिरिगह्वरकालानलवल्मीकोद्भूतानां तार्णानां पार्णानां काष्ठदारुवृक्षकोटरस्थानां मूलत्वग्दारुनिर्यासपत्रपुष्पफलोद्भूतानां दुष्टकीटकपिश्चानमार्जारजम्बुकव्याघ्रवराहाणां जरायुजाण्डजोद्भज्जस्वेदजानां शस्त्रबाणक्षतस्फोटव्रणमहाव्रणकृतानां कृत्रिमाणामन्येषां भूतवेतालकूष्माण्डुपिशाचप्रेतराक्षसयक्षभयप्रदानां विषतुण्डदंष्ट्राणां विषाङ्गानां विषपुच्छानां विषाणां विषरूपिणी विषदूषिणी विषशोषिणी विषनाशिनी विषहारिणी हतं विषं नष्ट विषमन्त:प्रलीनं विषं प्रनष्टं विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥24॥

anantavāsukitakṣakakarkoṭakapadmakamahāpadmakaśaṅkhakagulikapauṇḍrakālikanāgaka ityeṣāṃ divyānāṃ mahānāgānāṃ mahānāgādirūpāṇāṃ viṣatuṇḍānāṃ viṣadantānāṃ viṣadaṃṣṭrāṇāṃ viṣāṅgānāṃ viṣapucchānāṃ viśvacārāṇāṃ vṛścikānāṃ lūtānāṃ pralūtānāṃ mūṣikāṇāṃ gṛhagaulikānāṃ gṛhagodhikānāṃ ghraṇāsānāṃ gṛhagirigahvarakālānalavalmīkodbhūtānāṃ tārṇānāṃ pārṇānāṃ kāṣṭhadāruvṛkṣakoṭarasthānāṃ mūlatvagdāruniryāsapatrapuṣpaphalodbhūtānāṃ duṣṭakīṭakapiścānamārjārajambukavyāghravarāhāṇāṃ jarāyujāṇḍajodbhajjasvedajānāṃ śastrabāṇakṣatasphoṭavraṇamahāvraṇakṛtānāṃ kṛtrimāṇāmanyeṣāṃ bhūtavetālakūṣmāṇḍupiśācapretarākṣasayakṣabhayapradānāṃ viṣatuṇḍadaṃṣṭrāṇāṃ viṣāṅgānāṃ viṣapucchānāṃ viṣāṇāṃ viṣarūpiṇī viṣadūṣiṇī viṣaśoṣiṇī viṣanāśinī viṣahāriṇī hataṃ viṣaṃ naṣṭa viṣamanta:pralīnaṃ viṣaṃ pranaṣṭaṃ viṣaṃ hataṃ te brahmaṇā viṣamindrasya vajreṇa svāhā ॥24॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — (ये) अनन्तक, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्मक, महापद्मक, शङ्खक, गुलिक, पौण्ड्रकालिक आदि सभी नाग तथा अन्य सभी दिव्य महानाग एवं महानागों के आदि रूपों वाले, विषैले चञ्चु (चोंच) वाले, विषैले दाँत वाले, विषैले दाढ़ वाले, विषैले अंगों वाले, विषैली पूंछ वाले, सभी जगह विचरण करने वाले, विषैले वृश्चिक (बिच्छू), मकड़ी, प्रकृष्ट (बड़ी) मकड़ी, मूषिका (चुहिया), गृहगौलिक (छछूँदर), गृह गोधिका (छिपकली), घोटक (घृणा उत्पन्न करने वाले विषैले कीटाणु), घरों में स्थित फर्श, दीवारों के छोटे-छोटे छिद्रों आदि में रहने वाले कालानल (विषैले कीड़े), चींटी-चींटे, दीमक आदि उत्पन्न होने वाले, तृण, पत्तों, काष्ठ, पेड़, वृक्षों के कोटर (पोले स्थान) आदि में स्थित रहने वाले, जड़, तना, वृक्ष आदि के छाल, पत्ते, पुष्प एवं फलों आदि से उद्भूत होने वाले, विषैले दुष्ट कीट, बन्दर, कुत्ते, बिल्ली, सियार, व्याघ्र (अधर), वराह आदि विचरण करने वाले विषैले जानवर, जरायुज (पशु-मनुष्य आदि), अण्डज (अण्डों से उत्पन्न), उद्भिज्ज (पेड़-पौधे) एवं स्वेदज ( पसीने से प्रादुर्भूत प्राणी), शस्त्र (हाथ से लेकर प्रहार करने वाले), बाण (फेंककर मारने वाले) आदि से क्षत-विक्षत अंग, फोड़े, घाव एवं बड़े घावों से प्रकट होने वाले बड़े कीटक, कृत्रिम एवं अन्य विष, भूत, बेताल, कूष्माण्ड, प्रेत, पिशाच, राक्षस, यक्ष आदि भय प्रदान करने वाले, विषैली चंचु (चोच) वाले, विषैले दाढ़ वाले, विषैले अंगों वाले, विषैली पूंछ वाले हों, (परन्तु) विषो की विष अर्थात् विष नाशक (वह ब्रह्मविद्या) समस्त विषों को दूषित करने वाली, विषों को शोषित करने वाली, विषों को विनष्ट करने चाली, विषों को हरण करने वाली है । (वह ब्रह्मविद्या) इन सभी विषों को मारे, नष्ट करे । उस (ब्रह्मविद्या) ने इन घातक विषों को, अन्तर्लीन छिपे हुए विष को, प्रणाशक विषों को नष्ट कर दिया है । इन सभी विषों को विनष्ट करने में इन्द्र के वज्र ने भी सहयोग प्रदान किया है, 'स्थाहा' ॥24॥

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[ Sutra 25 ]

य इमां ब्रह्मविद्याममावास्यायां पठेच्छृणुयाद्वा यावज्जीवं न हिंसन्ति सर्पाः । अष्टौ ब्राह्मणान्ग्राहयित्वा तृणेन मोचयेत् । शतं ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा चक्षुषा मोचयेत् । सहस्त्रं ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा मनसा मोचयेत् । सर्पाञ्जलेन मुञ्चन्ति। तृणेन मुञ्चन्ति । काष्ठेन मुञ्चन्तीत्याह भगवा-न्ब्रह्मेत्युपनिषत् ॥25॥

ya imāṃ brahmavidyāmamāvāsyāyāṃ paṭhecchṛṇuyādvā yāvajjīvaṃ na hiṃsanti sarpāḥ । aṣṭau brāhmaṇāngrāhayitvā tṛṇena mocayet । śataṃ brāhmaṇān grāhayitvā cakṣuṣā mocayet । sahastraṃ brāhmaṇān grāhayitvā manasā mocayet । sarpāñjalena muñcanti । tṛṇena muñcanti । kāṣṭhena muñcantītyāha bhagavā-nbrahmetyupaniṣat ॥25॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जो साधक (मनुष्य) इस ब्रह्मविद्या का अमावस्या के दिन पाठ करता या श्रवण करता है, उसका जब तक जीवन रहता है, तब तक उसे सर्प ( आदि विषैले जन्तु) नहीं काटते । (इस ब्रह्मविद्या को) आठ प्राणों को ग्रहण (स्वीकार) करवाकर तृण (जड़ी-बूटी) के द्वारा विष को मुक्त करना चाहिए । सौ ब्राह्मणों को (इसे) ग्रहण करवा करके नेत्रों से (विष को) मुक्त करना चाहिए । हजार ब्राह्मणों को (इसे) ग्रहण करवाकर मन से ( अर्थात् संकल्प शक्ति से) ही (विष को) मुक्त करना चाहिए। सर्प-विष, जल, तृण एवं काष्ठ के उपचार से भी छोड़ता नहीं है । (इस प्रयोग से मुक्त कर देता है । ऐसा ही भगवान् ब्रह्मा जी ने इस गरुडोपनिषद् को ऋषियों के समक्ष उपदिष्ट किया है । यही उपनिषद् है ॥25॥