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1. Goraksha Upanishad - Hindi

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श्रीराम ॥ अथ गोरक्ष उपनिषत् ॥

श्री नाथ परमानन्द हैँ विश्वगुरु हैँ निरञ्जन हैँ विश्वव्यापक हैँ महासिद्धन के लक्ष्य हैँ तिन प्रति हमारे आदेश होय॥ इहाँ आगे अवतरन॥ एक समैं विमला नाम महादेवी किंचित् विस्मय जुक्त भ/ईश्रीमन्महा गोरक्षनाथ तिनसौंपूछतु हैँ। ताको विस्मय दूर करिबै हैँ मात्पर्य हैँ लोकन को मोक्ष करिबै हेतु कृपालु तासौं महाजोग विद्या प्रगट करिबे को तिन के एसे श्री नाथ स्वमुख सौ उपनिषद् प्रगट अरै हैँ। गो कहिये इन्द्रिय तिनकी अन्त्योमियारों रक्षा करै हैँ भव भूतन की, तासौं गोरक्षनाथ नाम है। अरु जोग को ज्ञान करावै हैँ या वास्तै उपनिषद् नाम हैँ। यातैं ही गोरक्षोपनिषद् महासिद्धनमें प्रसिद्ध हैँ। इहाँ आगै विमला उवाच॥ मूलको अर्थ॥ जासमै महाशून्य था आकाशादि महापञ्चभूत अरु तिनहै पञ्चभूतनमय ईश्वर अरु जीवादि को/ई प्रकार न थें तब या सृष्टि को करता कौन था। तात्पर्य ए हैँ कि नाना प्रकार की सृष्टि होय वै मैं प्रथम कर्ता महाभूत हैँ अरु वैही शुद्ध सत्वांशले के ईश्वर भए वैही मलिन सत्व करि जीव भये तौऐतौ साक्षात् कर्ता न भय तब जिसमै ए न थें तब कोई अनिर्वचनीय पदार्थ था॥ सो कर्ता सो कर्ता सो कर्ता कौन भयो एसे प्रश्न पर । श्री महागोरक्षनाथ उत्तर करै हैँ श्री गोरक्षनाथ उवाच। आदि अनादि महानन्दरूप निराकार साकार वर्जित अचिन्त्य कोई पदार्थ था ताकूँ है देवी मुख्य कर्ता जानियै क्यों कि निराकार कर्ता होय तौ आकार इच्छा धारिवे मैं विरुद्ध आवे है। साकार करता होय तौ साकार को व्यापकता नहीं है यह विरुद्ध आवे है। तातैं कर्ता आदिही है जो द्वैताद्वैत रोहित अनिर्वचननीय था सदानन्द स्वरूप सोही आजै कूँ वक्ष्यमाण है। इह मार्ग मैं देवता कौन है यह आशंका वारणै कहै है। अद्वैतो परि महानन्द देवता। अद्वैत ऊपर भयो तब द्वैत ऊपर तौ स्वतः भयो॥ इह प्रकार अहं कर्ता सिद्ध तूँ जान जिह्वह करैता अपनी इच्छा शक्ति प्रगट करी। ताकरि पीछे पिण्ड ब्रह्माण्ड प्रगट भए तिनमैं अव्यक्त निर्गुन स्वरूप सौँ व्यापक भयो। व्यक्त

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आनन्द विग्रह स्वरूप सों विहार करत भयो पीछे ज्यैही मैं एक स्वरूप सों नव स्वरूप होतु भयो -- तैं सत्यनाथ, अनन्तर सन्तोषनाथ विचित्र विश्व के गुन तिन सों असंग रहत भयौ, यातैं सन्तोषनाथ भयौ। आगे कूर्मनाथ आकाश रूप श्री आदिनाथ। कूर्मशब्द तै पाताल तैै अधोभूमि तकौ नाम कूर्मनाथ। बीच के सर्वनाथ पृथ्वीमण्डल के नाथ औरप्रकार सप्तनाथ भए। अनन्तर मत्स्येन्द्रनाथ के पुनह पुत्र श्री -- जगत की उत्पत्ति के हेत लाये माया को लावण्य तांसौं असंग जोगधर्म -- दृष्टा रमण कियौ है आत्मरूप सौं सर्व जीवन में। तत् शिष्य गोरखनाथ। "गो" कहियै वाक्शब्द ब्रह्म ताकी, "र" कहियै रक्षा करै, "क्ष" कहियै क्षय करि रहित अक्षय ब्रह्म एसै श्रीगोरक्षनाथ चतुर्थरूप भयो और प्रकार नव स्वरूप भयो तामें एक निरन्तरनाथ कूं किह मार्ग करि पायो जातु। ताकौं करण कहतु हैं। दोय मार्ग विश्व मै प्रगट कियो है कुल अरु अकुल। कुल मार्ग शक्ति मार्ग,: अकुल मार्ग अक्षण्डनाथ चैतन्य मार्ग तन्त्र अंस जोग तिनमै किंचित प्रपञ्च की।। एंवं । या रीत मै द्वैताद्वैत रहित नाथ स्वरूप तै व्यवहार के हेतु अद्वैत निगुणनाथ भयो अद्वैत तै द्वैत रूप आनन्द विग्रहात्म नाथ भयौ तामें ही मो एक तैं मैं विशेष व्यवहार के हेतु नव स्वरूप भयौ तिन नव स्वरूप कूं निरूपण। श्री कहियै अक्षण्ड शोभा संयुक्त गुरु कहियै सर्वोपदेशता आदि कहियै इन वक्ष्यमाण नव स्वरूप मैं प्रथम नाथ "ना" करि नाद ब्रह्म को बोध करावै, "थ" करि थापन किए है त्रय जगत जित एसो श्री आदिनाथ स्वरूप। अनन्तर मत्स्येन्द्र नाथ। ता पाछै तत् पुत्र तत् शिष्य उदयनाथ श्री आदिनाथ तैं जोग शास्त्र प्रगट कियौ है। योग कौ उदय जाहिर महासिद्ध निकरि बहुत भयो आतैं उदयनाथ नाम प्रसिद्ध भयो। अनन्तर दण्डनाथ ताही जोग के उपदेश तै खण्डन कियो है। काल दण्डलोकनि कौ व्यातै दण्डनाथ भयौ।। अगै मत्स्यनाथ असत्य माया स्वरूपमय काल ताको खंडन कर महासत्य तैं शोभत भयौ आण निर्गुणातीत ब्रह्मनाथ ताकूं जानैयातै आदि ब्राह्मण सूक्ष्मवेदि। ब्राह्मण वेद पाठी होतु है ऋग यजु साम इत्यादि कर इनके सूक्ष्म वेदि खेचरी मुद्रा अन्तरीय खेचरी मुद्रा वाद्यवेशरी करणे मुद्रा मुद्राशक्ति की निशक्त

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करबी सिद्धसिद्धान्त पद्दुति के लेख प्रमाण। अनन्त मठ मन्दिर शिव शक्ति नाथ अरु ईच्छा शिव तन्तुरियन जज्ञोपवीत शिव तं तु आत्मा तं तु जज्ञ जोग जगय उपवीत श्याम उर्णिमासुच । ब्रह्म पदाचरणं ब्रह्मचार्यं सग्रहणं गृहस्थाश्रमं अध्यात्म वासं वानप्रस्थं स सर्वेच्छा विन्यासं संन्यासं आदि ब्राह्मण कहिवे मै चतुर वर्ण कौ गुरु भयौ अरु इहां च्यारों आश्रम कौ समावेस जामै होय है प्याते ही अत्याश्रमी आश्रम कोहू गुरु भयौ । सो विशेष करि शिष्य पद्दति मैं कह्यो ही है । तत्पर्य भेदाभेद रहित अचिन्त्य वासना जुक्त जीव होय ते तै कुल मार्ग करियौ मै आवतु है अरु समस्त वासना रहित भए है अन्तह्करण जिनके, ऐसे जीव जोग भजन मै आवतु है ऐसो मार्गन मै अकुल मार्ग है। और शास्त्र वाक जालकर उपदेश करतु है। मैरो संकेत शास्त्र है प्तो शुन्य कहिये नाथ सोही संकेत है इहु मार्ग में देवता कोन है यह आशंका वारण कहै है ईश्वर संतान । संतान दोय प्रकार कौ नाद रूप विन्दु, विन्दु नाद रूप । शिष्य विन्दु रूप, पूतव नाथ रूप नाद शक्तिरूप विन्दु नादरूप करि भए । शिष्य सौ प्रथम कहै नवनाथ स्वरूप शक्तिविन्दु रूप पर शिव सोही ईश्वर नाम कर मैरो संतान है। ता करि विश्व की प्रवृत्ति करतु है। जोग मत अष्टाश्रृंग जोग मुख्य कर षडंग जोग अकुल कहने सो अवधूत जोग जोग मत सौ साधन अष्टाश्रृंग जोग । आदि ब्राह्मणा ब्राह्मण क्षत्री वैश शूद्रच्यार वर्ण करि पृथी भरी है तिनमैं ब्राह्मण वर्ण मुख्य है । ब्राह्मण किसको कहिये ब्राह्मंकु सगुण ब्रह्म द्वारे निर्गुण ब्रह्म करिजानै सो ब्राह्मण ए जोगीश्वर सगुणनाथ गम्य पदार्थ । आनन्द विग्रहात्मनाथ उपदेष्टा उपास्य रूप अत्याश्रमी गुरु अवधूत जोग साधन मुमुक्षु अधिकरी बन्ध मोक्ष रहित कोइक अनिर्वचनीय मोक्ष मोक्ष ऐसो आ ग्रन्थ मै निरूपण है सो जो कोई पढे पढावै जाको अनन्त अचिन्त्य फल है ।