1. Gorkshtrapandati(1981)
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वोर सेवा मन्दिर
दिल्ली
क्रम सख्या
काल न o
खपड
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गोरक्षपद्दति।
राजधानी-टीहरी जिला-गढवालनिवासि-
रसीको गंगाविष्णु श्रीकृष्णदासने स्वभीय "लक्ष्मीवेंकटेश्वर" छापेबलेम छापकर प्रकाशित किया। ---.
संवत् १९८१, शक १८४६.
कल्याण-मुंबई.
सब हक्क यन्त्राधिकारीने स्वाधीन ग्वरवा है.
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प्रस्तावना ।
समस्त साधनाओंका मूल योग है, तप, जप, संन्यास, उपानेषत्, ज्ञान आदि मोक्षहेतु अनेक हैं किंच सर्वोत्कृष्ट योगही है इसीके प्रभावसे शिव सर्वसामर्थ्य, ब्रह्मा कर्त्ता, विष्णु पालक है. इसके मुख्यकर्ता शिवजीने पार्वतीजीसे कहा ब्रह्माजीके सेवन करनेपर योगी याजञवल्क्य- स्मृति बनी है, विष्णु (श्रीकृष्णजी) ने गीता, एवं भागवतके ग्यारहवें मकंधमें कहा है इमके मुख्य आचार्य आदिनाथ ( शिवजी) हैं. इन्हींसे नाथसंप्रदाय प्रवृत्त भया. एक समय आदिनाथ किसी द्वीपमें पार्वतीको योग सुना रहे थे वह एक मछलीने सुनकरही दिव्यज्ञान तथा दिव्यदेह पाया यही मत्स्येंद्रनाथ भये और मत्स्येंद्रनाथ शाबर- नाथ (जिन्हाने सावरग्रन्थ देशभाषामें बनाय है) आनंदभैरवनाथ, चौंग्गी आदियोंमे योग पाय यंथेच्छ विचग्ते थे कि, एक स्थानमें हाथ पांव कटे हुए चोग्को देखा. उक्त महात्माओंके कृपावलोकनसे उसके हाथ पांव उग आये नथा ज्ञानभी हो गया. मत्स्येंद्रनाथके कृपासे योग पायकर चौरंगिया नाम योगी सिद्ध विख्यात भया और मीननाथ, गोरक्षनाथ, विरूपाक्ष, विलेशय, मंथानभैरव, सिद्धवृद्ध, कंथडी, कोरंटक, सुगनंद, सिद्धपाद, चर्पटी, कानेरी, पूज्यपाद, नित्या- नंद, निंग्जन, कपाली, बिंदुनाथ, काकचंडीश्वर, अल्लाम, प्रमुदेव, वोडाचोली, टिंटिणी, भानुकी, नारदेव, खंड, कापालिक तागनाथ इत्यादि योगासैद्धि पायकर योगाचार्य हुए हैं योगहीके प्रभावसे महा- मिद्ध अखंडऐ श्वर्यवान होकर मृत्युका जीत ब्रह्मानंदमें मग्न रह ब्रह्मां- डमें विचरत हैं. इसमंमे मुख्य मत्स्येंद्रनाथ, गोरक्षनाथ योगविद्याके आचार्य भये, गोग्क्षनाथने मुमुक्षुजनोंके उपकारार्थ राजयोग, हृठयोग आदि बहुविस्तार एवं बहुमाधनासाध्य जानकर, यह "गोरक्षपद्धति" नामक ग्रथ २०० श्रोकम सवेसमुच्चय सार्भूत प्रकट किया. सर्वमाधा- रणंक सुबोधार्थ महीधर शर्मा राजधानी टीहरी जिला गडवालनिवासीने इमका भापानुवाद करक प्रकाशित किया. इस ग्रंथक प्रथम मंगलाचरणसे (५) श्राकमें विषयप्रयाजन मंबन्ध अधिकारी कहे हैं, (१) में योगाभ्यामका फल, (१)में षडंगके नाम, (५) में आसन, (१२) में षट्चकनिरूपण, (८) में दशनाडी
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२ स्थानोंसहित, (१४) में दशवायु, (१०) में शक्तिचालन, (२६) मं महामुद्राआदि, (७) में प्रणवाभ्यास, प्राणायामप्रशंसा, (४) में प्राणायामका प्रकार, (८) में नाडीशोधन, इतन विषय पृर्वशतकम तथा (२१) में प्राणायामका विस्तार, (३०) में प्रत्याहागविधि, (९) में धारणा, (२४) में ध्यान, (१३) में समाधि, ( ४) में मुक्तिसापान, योगशास्त्राभ्यासका फल इतने विषय उत्तर शतकम कह हैं. ऐसी यह गोरक्षपद्धति योगमार्ग 'जाननेवालोंको अतिउत्तम तथा सुगम है. योगमार्गका प्रयोजन मभी शास्त्रामें पडता है, विशेषतः संध्या, पूजन आदि द्विजन्माओंके नित्यकर्मभी बिना इसके सिद्ध नहीं होते जैसे सध्यामं प्रथम "बद्धपझ्मासनो मौनी प्राणयामत्रयं चरेत्।" तथा पूजनमें "स्नातः शुचि: प्राङमुखोपविश्य प्राणानायम्य" इत्यादि सवत्र विधिवचन है. यदि योग न जाने तो प्राणायाम पद्मासन आदि कहांसे जाने. इनके न जाननेसे समस्त संध्यावद्नादि साधन निरग्थक हैं. इस समयमें बहुधा लोग नाकपर हाथ लगानेका प्राणायाम समझत हैं. पद्मासनादियोंका तो नामभी नहीं है तब कहांसे सिद्धि होवे इसी हेतु नास्तिकलोग असिद्ध तथा पोप (ठग) आदि निंदशब्दोंसे अपन मुखविवरों को दृषित करते हैं. यदि योगाभ्यास करें तो सिद्धि प्रत्यक्ष होकर अपना उद्धार हो तथा दूषकोंका उन विवरोमें मिट्टी पंडे और योगग्रन्थ बहुत तथा कठिन हैं ये २ शतक थोडेंहीमें ज्ञान देते है इस हेतु मैने भापाटीका की है कि सभी सज्न इसे देख थोडाही गुरूपदिष्ट होकर सर्वार्थसाधन योगमार्गकी महिमा जान जायँगे. पाठकोंके सुबा- धार्थ मैंने अनेक प्रसिद्ध योगग्रन्योंसे इस बढाकर गोरक्षपद्धति कर दिया और यह ग्रन्थ "लक्ष्मीवेंकटेश्वर" छापेखानेके अधिकारी गंगाविष्य श्रीकृष्णदासजीको सर्व हक्कसहित दे दिया है जा यद उन्होंने आपके छापेखानेमें छापकर प्रसिद्ध किया है. सही- पंडित-महीधरशमा. जिला-गढवाल, राजधानी-टोहरी,
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।। श्रीगणेशाय नमः ॥। अथ भाषानुवादमहिता गोरक्षपद्दति।
श्रीआदिनाथं स्वगुरुं हरिं मुनिम् गोरक्षशास्त्रस्य प्रणम्य योगिनम्। भाषाविवृतिं कुरुते महीधरो योगे सुबोधः खलु जायते यया ॥१॥ श्री आदिनाथ (शिवजी) तथा निजगुरु, हरिमुनि योगीको नणाम करके महीधर नामा गोरक्षयोगशास्त्र जो योगोंद्र गोरक्षनाथने दो शतकम शिष्योपकारार्थ बनाया है, उसकी भाषाटीका करता है जिसमे योगमार्गमे मभीको सुगमतामे बांध होता है. योगपदका अर्थ मल है. जैसे 'ह' का अर्थ सूर्य 'ठ' का चंद्रमा है इनके योग (मल) को हठ योग कहते हैं इसीको राजयोगभी कहते है. प्राण अपानवायु जिनकी मूर्य चन्द्रमा मंज्ञा है, इनका पक्य करनेवाला जा प्राणायाम उमे हठयोग कहते हैं ।। १॥। श्रीगुरुं परमानन्दं वन्दे स्वानन्दनविग्रहम्। यस्थ सान्निध्यमात्रेण चिदानन्दायते तनुः ॥२॥ शिष्यको आत्माके तत्त्ववोधनिमित्त गुरुम्वरूप धाग्ण कर परमगुरु श्रीपग्मात्माको सहस्रदल कमलमें भावनापूर्वक प्रथम ग्रन्थारंभमें वि्न- विघानार्थ प्रणाम करने हैं, कि जविब्रह्मकी ऐक्यता योगशास्त्रका प्रयोजन है सह्रुके ममीप भक्तिपूर्वक गहनेमे शिष्यका पांचभौतिक शर्गग्भी आनंदमय हो जाता है. आनंदही परब्रह्मका रूप है. जैसे श्रृतिभी कहती है कि "आनन्दा ब्रह्मणो रूपम्" यदि ऐसा न हो तो उसकी पहँचानभी नहीं हो मके क्यों कि "न रूपमस्येह तथोपलभ्येत
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गोग्क्षपद्धति ।
नान्तो न चादिन च संप्रतिष्रा।"इत्यादि गीता। एवं वदांत ग्रन्थोंमे लिखा है कि उसका रूप तथा जन्म, मरण, मध्य और रंग चिह्न मूर्ति आदि कुछ नहीं है केवल आनन्दमय स्वयं प्रकाशमान है. तथा निर्विकल्प आनन्दमय हो जानेकोही मुक्ति कहते हैं. ऐसे पग्म आन- न्दम्वरूप परब्रह्मको (जिसका शरीरभी आनंदही है) वंदना कर्के ग्रन्थाग्भ करते है. जिसम सांनिध्य (सम्मुख ) होनसे, अर्थात (केवलानुभवानंद) वह आनंदात्मा परमात्मा केवल मनके मनन अनु- भव विचार करनेमे अपनेही बीच पाया जाता है, न कि इतस्ततः तीर्थ यात्रादि फिरनेसे, यह अनुभव केवल योगहीमे साध्य है. वह ज्ञानकी प्रथम भूमिका है. नाडीशोधन. वायुशोधन, ध्यान, धाग्णा आदि बिना एवं गुरुकृपा विना नहीं मिलता बिना ज्ञानके मुक्ति नही मिलती. श्रुतिभी कहती है कि "ऋत ज्ञानान्न मुक्तिः" मुक्तिपदार्थ वही आनंदमय हो जाता है. योगम ज्ञान पायक जीवपर्मात्माका एक भाव होनेमें वह आनन्दस्वरूप परब्रह्म साक्षात्कार होता है. इम ज्ञान- गम्यके प्रत्यक्षमात्र होनेहीसे परमचिदानन्दमय आपही योगी हो जाता है. जैमे ज्ञानकी सात भूमिका है ज्ञानभृमि: विचाग्णा २ तनुमानमा ३ सत्त्वापत्ति ४ संसक्तिनामिका ५ पदार्थाभाविनी ६ तुर्य- गा ७ ये सात हें विवेक वैगग्य है प्रथम जिसमं ऐसी तीत्र मुमुक्षारूप पहिली, श्रवणमननरूप दूसगी, मनमं अनेक अर्थ संकल्प विकल्प उत्पन्न तथा नाश होते हैं, इन सभीको छोडके सत् पकार्थमें वृत्ति होनी तनुमानसातीसरी, ये नन ाधनभृमिय हैं इनसे जव अंतःकग्ण शुद्ध हो तब "अहं ब्रह्मा्मि में ब्रह्म हूं एसा योगी कहता है. समस्त साधन पूजनजपादिकमे "अहं ब्रह्मास्मीति चिरं भावयत्' लिखा है यह भावना विना उक्त तननि भृमिका माधे होतही नहीं हैं इस लिये बिना मार्गके कुछभी साधन नहीं होता है. चौथी सत्त्वापत्ति
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भाषानुवादसहिता-श० १। ज्ञानभूमि यही फलभृमि है इसमें जब योगी प्राप्त है। वे तव ब्रह्मवित् कहाता है. इसी सत्त्वापत्तिभूमिमें समीपही वही जा सिद्धि उसमें आसक्त न हाना इस असंसक्ति नाम पांचवीं ज्ञानभूमि कहते हैं, इसमें जव योगी प्राप्त झेवे तो उसे ब्रह्मविद्वर कहते हैं. जिसमें परब्र- ह्रसे व्यतिरिक्त अर्थको भावना न करे वह पदार्थाभाविनी छठी ज्ञानभूभि है, इसमें जब योगी प्राप्त होता है, तो वह दूमरेके बांधन करन मात्रसे प्रबुद्ध होता है, नहीं तो एकाग्र शून्याकारही रहता है उसे ब्रह्मविद्वगीयान् कहते हैं. तुयगा नाम सातवीं भूमि है इसमें योगी प्राप्त हानमे ब्रह्मविदरिष्ट कहंत हैं. इतन माधनाओंमे स्वात्मागम चिदानंद, परमानंद, चिन्मय आदियोगी आपही हो जाता है. कालर- हित होता है. "अन्तर्निश्चलितात्मदीपकलिका स्वधारबन्धादिभियो योगी युगकल्पकालकलनात्ततत्वं च जंगीयत। ज्ञानामोदमहोद्धि: समभवद्यत्रादिनाथः म्वयं व्यक्ताव्यक्तगुणाधिके तमनिशं श्रीमीननारथं भज । " जो मीननाथ योगीश्वर मृलाधार्बंध उड्डीयान बंध जालंध- ब्बंध आदि योगाभ्याससे हृदयकमलम निश्चलदीपककी ज्योतिसर्गखी परमात्माकी कला माक्षात्कार करके श्रास, पल, बटी, म्रहर, दिन, माम, ऋनु, अयन, वर्ष, युग, मन्वन्तर कल्प आदि निरंतर पुनः पुनः फिरनेवाला है स्वरूप जिसका ऐसे कालको तथा जलादि २५ तच्वाको पहेचानके योगाभ्यासस जीतता है तथा ज्ञानरंगरूपी समुद्र हाकर गुप प्रकट अर्थात् सगुण निर्गुण होनेकी सामर्थ्य रखनेवाला आदि- नाथ शिवस्वरूपकी भावना निन्य करनेके अभ्यासमे आपही साक्षात् शिव हो गया है. ऐमे योगीश्वर श्रीमीननाथको दिनरात नमस्काररूप सवन कग्ता हं ॥ २ ॥ नमस्कृत्य गुरुं भवत्या गोरक्षो ज्ञानमुत्तमम् । अभीष्टं योगिनां बरूते परमानन्दकारकम् ॥ ३ ॥ योगी गोरक्षनाथ भक्तिपूर्वक गुरुको प्रणाम करके पूर्वजन्मक
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८ गोरक्षपद्दति। योगसेवनसे इस जन्ममें पृर्णयागमार्गको बोध देनेवाला योगशास्त्र कहत है. जिससे योगियोको अभीष्ट (मनोवांछित) मिलता है तथा परमयोगानन्द यदा ब्रह्मानन्द होता है. कर्म और भक्तिसे जब चित्त शुद्ध हेव तब योगशास्त्रमं अधिकारी होता है।। ३ ।। गोरक्षसंहितां वक्ति योगिनां हितकाम्यया। ध्रुवं यस्यावबोधेन जायते परमं पद्म् ॥४।। योगिजनाके हितके लिय योगोंद्र गोरक्षनाथ गोरक्षसंहिता नाम योगशास्त्र कहता है, जिसका बोध होनेसे योगीको (पग्मपद) जीवनमुक्ति होती है यदा वह मिलता है जिममें पहॅुचकर पुनरावृत्ति फिर लौट आना नहीं होता।। ४ ।। एतद्विमुक्तिस्ोपानमेतत्कालस्य वच्चनम्। यद्धयावृत्तं मनो भोगादासक्तं परमात्मनि ॥ ५॥ जब योगाग्यामसे मन विषयभोगोंसे हट जॉनपर पग्मात्मा (ईश्र्वर) में आमक्त हो जांव तब योगी काल तथा मृत्युको जीनकर जग (वुढापा) मृत्यु (मर्ण) को जीतता है मुक्तिका सोपान (सीढी) यही कम है, और कालकी वंचनाभी यही है ॥ ५॥ द्विजसेवितशाखस्य श्रुतिकल्पतरोः फलम्। शमनं भवतापस्य योगं भजत सत्तमाः॥६।। मजनको संबोधन करके गोरक्षनाथ कहते हैं कि हे मत्तम श्रेष्ठ जना ! वेदरूपी कल्पवृक्षके फल इस योगशास्त्रका सवन करो जिसके शाखा (टहनियां) योगिरुपी द्विज (पक्षी) अथवा मुनिजनोंसे सेवित हैं और मंसारके तीन प्रकारके ताप (क्ेशों) को शमन कता है ॥ ६ ॥ आसन प्राणसंरोध: प्रत्याहारश्च धारणा । ध्यानं समाधिरेतानि योगाङ्गानि वदन्ति पट ।।७।।
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भाषानुवादसहिता-श० १।
प्रथम आमन सिद्ध करके क्रमशः प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधिका अभ्याम करना ये योगके छः अंग हैं इनके पृथक विस्तार आगे कहगे. यमनियमसंपन्न योगीको क्रमपूर्वक अभ्यास कनके समाधिका लाभ होता है जिममे निर्विकल्प समाधिसे राजयोग मिद्ध होता है. तब चिद़ानंदस्वरूप आपही होके योगानंदको प्राप्त होना है।।७।। अथामनानि। आसनानि च तावन्ति यावन्तो जीवजन्तवः । एतेषामखिलान् भेदान् विजानाति महेश्वरः ॥ ८ ।। आमनोंका विस्तार कहते हैं कि जितने जीवमात्र अर्थात् चौराशी लक्ष योनि है उतनही आमनभी उन्हींके शगग्चेष्टानुसार हैं. इनके प्रत्येक भदोंके जाननेहारे केवल शिवजी मात्र है और कोई नहीं जानता l। ८ ।। चतुरशीतिलक्षाणामेकैकं समुदाहतम्। ततः शिवेन पीठानां पोडशोनं शतं कृतम् ॥९ ॥ चौगशी लक्ष आसनोंका भद मनुष्योमे न जाने जायँगे इम प्रकार जानकर करुणामय शिवजीन सर्वसाधारणक उपकारहेतु चौरासी (८४) मात्र आमन योगशास्त्रम प्रगट किये. यही सवमें सार है।। ९ ॥। आसनेभ्यः समस्तेभ्यो दयमेतदुदाहृतम्। एकं सिद्धासनं प्रोक्तं द्वितीयं कमलासनम् ॥१॥ इन ८४ आमनमभी बहुतविस्तार होनेसे योगधारण करने- वालोंके उपकारहेतु दोही आसन मुख्य कहे हैं इसमे इस ग्रंथमें सुग- मताके लिये सर्वसंमत एक सिद्धामन दमग पद्मासन सविस्तार कहा जाता है॥ १० ॥
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१० गोरक्षपद्धति।
योनिस्थानकमंत्रिमूलघटितं कृत्वा हढ विन्यसे- नमेट्रे पादमथैकमेव हृदये कृत्वा हुतुं सुस्थिरम्। स्थाणुः संयमितेन्द्रियो चलदशा पइयेद् भ्रुवोरन्तरं ह्येतन्मोक्षकपाटभेदजनकं सिद्धासनं प्रोच्यते॥११॥ सर्वोत्कृष्ट दो आसनोमेंसे प्रथम सिद्धासनकी विधि कहत हैं कि. खुदा और लिंगके बीचमें योनि (कुंडलिनीका) स्थान है इसको वामपादकी एडीसे दढ पीडन (दबाव) कर दाहिने पैरकी एडी लिंगके ऊपर लगाकर दवावे दोनों पैरोकी एडियां नीच ऊपर बरावर हो जाती हैं तथा दोनों पैरोंकी अंगु्ठ जंघा और गुल्फोंक बीच नीच छिप जाते हैं इनके दबावस योनिस्थानके तले ऊपरके दो इंदिय गुढा उपस्थ रुक जाते हैं. तदनंतर हृदयके चार अंगुल ऊपर चिवुक (ठोडी) स्थिर करे और समस्त इंद्रियोंमे हटाकर एकायर चित्त करे तथा दोनीं नत्रोंसे अचल दृष्टि कर भ्रुक्कुटि (भ्रूमध्य) दखता ग्हे यह मोक्षरूपी द्वार (दरवाज) के कपाट (किंवाड) को खोलकर मोक्षमार्ग दिखाना है यद्ा जो कुंडलिनीम रुका हुआ सुषुम्णादवार उस खोलकर मीक्ष- मार्ग (सुषुम्णा) के द्वारा मोक्षस्थान महस्रदलकमलकणिकांतर्गत पर- मात्मामे पहुँचानका यत्न करता है यह मिद्दामन है॥ ११ ॥ वामोरुपरि दृक्षिणं च चरणं संस्थाप्य वामं तथा दक्षोरूपरि पश्चिमेन विधिना धृत्वा कराभ्यां हढम्। अंगुष्ठौ हृदये निधाय चिबुकं नासाग्रमालोकये- देत द््याधिविकारनाशनकरं पझासनं प्रोच्यंत॥१२॥ बांये ऊरु (जानुमूल) में दाहिना पैर उत्तान करके तथा दक्षिण ऊरु (जानुमूल) में वामपाद वैसेही स्थापन करके दाहिने हाथको पीठपीछे घुमायके दाहिने पैरकं अॅगूठंको ग्रहण कर तथा बांये हाथको
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भाषानुवादसहिता-ग० १। पीठपीछे घुमायके दाहिने हाथ ऊपरसे ले जायकर बांये पैग्क अंगु- श्रको ग्रहण के, तव चिबुक (ठोडी) को छातीसे लगाय, दोनों नत्राने नासिकाका अग्रभाग निरंतर देखता रहे. यह योगियोंके समस्त गगनिकार नाश कगनेवाला बद्धपद्मासन है ॥। १२ ॥ "प्रकारांतरसेभी पद्मासन कहा है इसलिय में ग्रंथांतरमतसे मत्स्यें- द्रनागक मतकोभी लिखता हूं-
"उत्तानौ चरणों कृत्वा ऊरुसंस्थौ प्रपत्नतः। ऊरुमध्ये तथोत्तानौ पाणी कृत्वा ततो हशौ॥ १॥ नासाय्रे विन्यसेद्राजदन्तमूले तु जिह्वया। उत्तम्भ्य चिबुकं वक्षस्युत्थाप्य पवनं शनैः॥ २ ॥ इदं पझासनं प्रोक्तं सर्वव्याधिविनाशनम्। दुर्लभं येन केनापि धीमता लभ्पते बुधैः ॥ ३ ॥" ऊरु (जानुमूल) मे पृर्वोक्त प्रकारसे चरण (जैम दक्षिण ऊरुमें वाम, वाममं दक्षिणचर्ण, उत्तान अर्थात पैगेंके पीठ जानुपर लगी रहं,) स्थापन करके दोनों हाथ मीधे एडियोके ऊपर नीच वाम ऊपर दक्षिण हस्त रखके दृष्टि नासिकांक अग्रभागपर निश्चल रक्खे नदनंतर राजदंत (डाटों) के मृल दक्षिण वाम दोनोंमें जिह्वा कर उर्ध्वस्तंभन करे (यह जिद्वाबंध गुरुमुखसे जानना चाहिय जिह्वाबंध मूलबंधका विस्तार ५७।५८ श्रोकम कहेंगे) तथा चिबुक (ठोडी) को चार अंगुल अंतर छोडकर छातीसे लगाय मंद मंद वायुको उठाव. यह मूलबंध है, 'यहभी गुरुमुखवोध्य है) यह पद्मासन मत्स्येन्द्रनाथके मतका है. संपूर्ण रोगाको नष्ट करता है: जो संसारमें भाग्यहीन हैं, उनको दुर्लभ है बुद्धिमान एवं पुण्यवान् पुरुषोंको मुरुकृपासे मिलता है । १ ॥ २ ॥ ३ ।
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१२ गोरक्षपद्धति।
अथ पट्चक्नरूपणम् । पट्चक्रं षोडशाधारं द्विलक्ष्यं व्योमपश्चकम्। स्वदेहे ये न जानन्ति कथं सिद्धयन्ति योगिनः॥।१३।। विषयवासनासे मन चंचल रहता है रोकेसे रुकता नहीं विना मन रोके योगसिद्धि नहीं होती, मन गेकनेके लिये कुछ निमित्त (अर- लंबन) अवश्य होना चाहिये. इम हेतु छः चक्र, सोलह जाधान, दो लक्ष्य, पांच आकाश ये चार प्रकार भेढ (सर्व उनतीस) कहत हैं; कि मूलाधार, स्वाधिष्टान, माणेपूर, अनाहत, विशुद्ध, आना ये छः चक्र हैं इनका विस्तार आगे कहेंगे, आधार मोलह हैं इनके विशेष विस्तार अतिगुह्य होनेसे श्रीगोरक्षनाथने यहां प्रगट नहीं कह और इनके प्रकटता विना सर्वसाधार्णको बोध होना असंभव है इसलिये जैसा गुरुकृपासे जाना, यहां ग्रंथांतरीयमतमे प्रकट कम्ता हूं प्रथम आधार पादांगुष्ठ है, इसपर एकाग्रदृष्टि करके ज्याति चैतन्य करे इससे दृष्टि स्थिर होती है १। दूमग आधार मूलाधार, इम पावांकी एडीसे अचेतन करना इसमे अग्नि दीप् होती है २। नीनग गुह्याधार, इसके संकोचविकाशके अभ्याम कग्नेस अपान वायु फिरके वज्रगर्भनाडीमें प्रवेश कर बिंदुचक्रमें जाता है इममे शुकम्तंभन एवं (बज्रोली) रेत योनिमें पातन करके पुनः मंकोचनक्ममे वज्जनाडी द्वागा बिंदुस्थानमं प्राप्त कग्नकी सामर्थ्य होती है ३-४। पंचम उड्डी- यान बंध आधार है, पश्चिमतान आसन बांधक गुदाको संकांचन कर इससे मल मूत्र कृमिका नाश होता है ५। छठा नाभिसंडलाधार, जिसमें चैतन्य ज्योति:स्वरूपका ध्यान कग्नेसे एवं प्रणवंक जपम नाद उत्पन्न होता है ६। सातवां हृदयाधार, इसमें प्राणवायुका रोध करनेसे हृदयकमल विकसित होता है ७। आठवां कंठाधार, इसमें ठोडी हृदयपर दृढ लगायके ध्यान करे तो इडा पिंगलामें
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भाषानुवादसहिता-श० १। १३
वहता हुआ वायु स्थिग होता है ८। नवम क्षुद्रघंटिकाधार कंठमूल है. इसमें जो दो लिंगाकार ऊपरसे लटकती हैं उनतक जिह्वा पहॅँ- चावे तो ब्रह्मरंध्रमें चंद्रमंडलसे बहता हुआ अमृतरस मिलता है९। दशम जिह्दामूलाधार इसमें खचरीमुद्राके प्रकारसे जिह्वाग्रस मथन करे तो खेचरीसिद्धि होती है १०। ग्यारहवां जिह्वाका अधोभागा- धार, जिसमें जिह्वाग्रसे मथन करके दिव्यकविताशक्ति होती है ११। बारहवां ऊर्ध्वदंत मृलाधार, जिसमें जिह्वाग्रस्थापनके अभ्या- सस रोगशांति होती है १२। तेरहवां नासिकाग्राधार, जिसमें दृष्टि स्थिर करनेसे मन स्थिर होता है १३। चौदहवां नामिकामूलाधार, जिसमें दृष्टि स्थिर करनेसे छः महीनेके निरंतर अभ्यामकरके ज्योति प्रत्यक्ष होती है १४। पंद्रहवां भ्रूमध्याधार, जिसमें दृष्टि अचल दृष्टिके अभ्यास करके सूर्यकिरणोंके समान ज्योति प्रकाश होती है इसी अभ्यासके दृढ होनेपर सूर्याकाशमें मनका लय होता है १५। सोलहवां नेत्राधार, जिनके मूलमें अंगुलीसे मीचतेमें वर्तुला- कार बिंदुसमान इंद्रधनुषके समान रंगकी ज्योति है इम ज्योतिके देखनका अभ्यास करके ज्योति प्रत्यक्ष हाती है १६ । य सोलह आधार हैं अथवा मूलाधार १ स्वाधिष्ठान २ मणिपृर ३ अनाहत ४ विशुद्ध ५ आज्ञाचक्र ६ बिंदु ७ अर्द्धेदु ८ गोधिनी ९ नाद १० नादांत ११ शक्ति १२ व्यापिका १३ शमनी १४ रोधिनी १५ ध्रुवमंडल १६ ये मोलह (१६) आधार हैं. 'ब्रह्म तथा अप- नेमें अभेद समझकर भावना करनेसे सि्धि होती है. अब दो लक्ष्य कहते हैं ये दो प्रकार बाह्य आभ्यंतरीय हें देखनेके उपयोगी नासिका तथा भ्रूमध्य इत्यादि बाह्यलक्ष्य हैं, मूलाधारचक्र्क, हृदयक- मल इत्यादि आभ्यंतर लक्ष्य हैं. अथ पांच आकाश इस प्रकार हैं कि प्रथम श्वेतवर्ण ज्योतिरूप आकाश है इसके भीतर रक्तवर्ण ज्योतिरूप प्र्काश है इसके भीतर धूम्रवर्ण ज्योतिरूप महाकाश है इसके भीतर नीलवर्ण ज्योतिस्वरूप तत्त्वाकाश है, इसके भीतर विद्यत
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१४ गोरक्षपद्धति ।
(बिजुली) के वर्णका ज्योतिस्वरूप सूर्याकाश है ये पांच आकाश हैं इतने ६ चक्र १६ आधार २ लक्ष्य ५ आकाश शरीरमें हैं इन्हें जो योगी नहीं पहॅचानता उसको योगसिद्धि नहीं होती ।। १३।। एकस्तम्भं नवद्वारं गृहं पञ्चाधिदेवतम्। स्वदेहे ये न जानन्ति कर्थं सिद्धयन्ति योगिन: १४।। शगीरस्तंभरूपी गृह है इसमे सकल वासनाओंका आश्रय मन है यही खंभारूप होक समस्त शरीरको थामे रहता है जिसके मुख १ नेत्र २ नासिका २ कर्ण २ गुद्य १ लिंग १ ये ९ द्वार है तथा पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश पंचतत्वोंके ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इश्वर, सदाशिव अधिदेवता हैं एसे शरीररूपी गृहको जो योगा- भ्यासी नहीं जानता वह योगसिद्धि कैमे पा सकता है ॥ १४ ।। चतुर्दलं स्यादाधारं स्वाधिष्ठानं च पट्दलम्। नाभो दशदलं पझं सूर्यसंख्यादलं हदि ।।१५।। कण्ठे स्यात् षोडशदलं समव्ये द्विदलं तथा। सहस्रदलमाख्यातं ब्रह्मरन्त्रे महापथे ॥ १२॥ षट्चक्रोंका पृथकू वर्णन है कि प्रथम मूलाधारचकर गुद्द्वारम पीले वर्णका अधोमुख कमल है, जिसके ४ दलोंमें व, श, ष, स बीज शोभित हैं, आठों दिशामें आठ शूलोंसे वेष्टित पीतवर्ण मध्य- कर्णिकामें चतुष्कोण भूमंडलके भीतर, हाथीके ऊपर आरूढ जिसके पाश्व (बगल) म (लं) बीज है और चार हाथ चार मुखका ब्रह्मा कोटिसूर्यसमान प्रकाशमान एवं डाकिनीशक्तिसे युक्त है वहा देदी- व्यमान त्रिकोणाकार कामारव्य पीठ है निसके मध्यम पश्चिममुख स्वयंभू लिंग है उसके बीचमें तिजुली समान चमकवाली माढे तीन फरे (वृत्त) मे वेष्टित होकर, सुषुम्णाके द्वारको रोकके सोया हुआ सर्प जैसी कुण्डलिनी महाशक्ति है, जैम पृथ्वीका आधार शेप तैसेही शरीरका आधार यह है बिना इसके जाने और उपाय योगक व्यर्थ
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भाषानुवादमहिता-श० १। १५ हैं. इम लिये प्रथम इसका बोधन करना मुख्य है १। दूसरा स्वाधि- ध्ानचक लिंगमूलमें रक्तवर्ण ऊर्ध्वमुख पडदल व, भ, म, य, र, ल, इन ६ वर्णोंस शोभित कमल है. शुक्कवर्ण कर्णिकामें अर्द्धेचन्द्राकार जलमंडल है इसके बीचम (वं) बीज है जिसके पार्श्व (बगल) में श्रीवत्सकौस्तुभ पीतांबर वनमालाओंसे शोभित चतुर्भुज विष्णु शाकिनीशक्तिसहित है २। तीसग मणिपूरचक्र्क, नाभिमूलमें नीलवर्ण ऊर्ध्वमुख दशदल कमल ड, द, ण, त, थ, ध, न, प, फ, इन १० वर्णोंमे शोभित है मध्यकर्णिकामें स्वस्तिकाकार तेजोमण्डल है. इसके मध्यमं सूर्यके ममान तेजवारी मेषवाहनं (रं) बीज चतु- रभुज है इमके पश्वम रक्तवर्ण विभृतिभूषित, नीलवर्ण, चतुर्भुज लाकि- नीशक्तिमहिन महारुद्र है ३। चौथा अनाहतचक्र, हृदयमें द्वादशद" लकमल ऊर्ध्वमुख क, रद, ग, घ, ड, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, इन १२ बीजास शोभित है उसके कर्णिकामें धूम्रवर्ण, षट्कोण वायुमंडलके मध्यमें धूम्रवर्ण, चतुर्वाहु, कृष्णमृगवाहन (यं) बीज है इमके पार्श्वमें अभयमुद्रा वाग्ण कर्के काकिनीशक्तिसहित ईश्वर ग। कर्णिकांक त्रिकोणमं सुवर्णवर्ण बाणलिंग है यह पूर्णागिरि पीठ कहाता है ४। पांचवां विशुद्धचक्र कंठस्थानमं रक्तवर्ण, ऊर्ध्वमुख, पोडशदलकमल अ, आ, इ, ई, उ,ऊ ऋ, ऋ, ल, ल् ए, ऐ, ओ, औ,अं अः इन १६ वर्णासे शोभित है स्फटिकवर्णकर्णिकामें वर्तु- लाकार आकाशमण्डल जिसमें निष्कलंक पूर्णचन्द्रमा है इसके मध्यमें श्वत हाथी वाहन, पाश, अभय, वर, अंकुश धारण करता आकाश बीज (हं) इसके पार्श्वमे शाकिनीशक्तिसहित सदाशिव हैं। यह जालंधरपीठ कहाता है ५। छठा आज्ञाचक्र, भ्रूमध्यमें श्वेतवर्ण ऊर्ध्वमुख द्विदल ह, क्ष, इन २ बीजोंसे शोभित कमल है इसके कर्णि- कामें हाकिनीशक्तिसहित शिव है. कर्णिकाके त्रिकोणमं, इतर लिंग- नामा शिवलिंग है यही मनका स्थान है उड्डीयानभी इसीको
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१६ गोरक्षपद्धति। कहते हैं ६। इसक ऊपर सहस्रदलकमल ब्रह्मरंध्रमें श्वेतवर्ण पूर्ण- चन्द्र समान मुख परमानंदस्वरूप ह, ळ, क्ष, इन ३ वर्णोसे शोभित है। त्रिकोणकार्णकामें पूर्णचन्द्रमण्डल जिसके मध्यमें बिजुलीक समान चमकीला परमानंदरूप देदीप्यमान ज्योति है इसमं चिदानंदस्वरूप परमशिव विराजमान हैं इनके पाश्वमें सहस्र सूर्यके समान तेजधारी प्रबोधस्वरूप अर्धचन्द्राकार निर्वाणकला विराजमान है. इसके बीचमें कोटिसूर्यसमान तेजधारी रोम समान सूक्ष्म निर्वाण शक्ति विराजमान है इनके मध्यमें मन तथा वचनसे अगम्य केवल योगसे गम्य चिदानं- दस्वरूपसे पर क्या अतिपर परम शिवपद है जिसको परब्रह्मपद कहते हैं विराजमान हैं जिसके निमेषोन्मेष अर्थात् पलक खोलने मीचनेमें सृष्टि उत्पन्न और नष्ट होती है॥ १५॥ १६ ॥ आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम्। योनिस्थानं द्वयोर्मध्ये कामरूपं निगद्यते॥ १७ ॥ पहिला मूलाधार स्वाधिष्ठान इन दो चक्रोंक बीचमें योनि स्थान है यही कामरूप पीठ है अर्थात् मूलाधाग्के कर्णिकामें काम- रूप पीठ है।। १७ ।। आधाराख्ये गुदस्थाने पंकजं च चतुर्दलम् । तन्मष्ये प्रोच्यते योनि: कामाख्या सिद्धवंदिता।१८।l मूलाधार (गुदा) में जो चतुर्दलकमल विख्यात है उसके मध्यमें त्रिकोणाकार योनि है जिसकी वंदना समस्त सिद्धजन करते हैं पंचाशत् वर्णसे बनी हुई कामाख्या पीठ कहाती है॥ १८ ॥ योनिमध्ये महालिंग पश्चिमाभिमुखस्थितम्। मस्तके मणिवद्विम्वं यो जानाति स बोगवित्।। १९॥। पूर्वोक्त त्रिकोणाकारयोनिमें सुषुम्णाद्वारके संमुख स्वयंभृ नाम करके जो महालिंग है उसके शिरमं मणिके समान देदीप्यमान बिं
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भाषानुवादसहिता-श० १।
है यही कुंडलिनी जीवाधार शरीराधर मोक्षद्वार है इसे जो सम्य प्रकारसे जानता है उसे योगवित कहते हैं ॥ १९ ॥ तप्तचामीकराभासं तडिल्लेखेव विस्फुरत्। त्रिकोणं तत्पुरं वह्नेरघो मेद्रात्प्रतिष्ठितम् ॥२०॥ मेट्रू (लिंगस्थान) से नीचे मूलाधारकर्णिकामें रहता, तपे हुए सुवर्णके समान वर्ण, एवं बिजुलीके ममान चमकदमकवाला जो त्रिकोण है वही कालाग्िका स्थान है ॥ २० ॥ यत्समार्धों परं ज्योतिरनन्तं विश्वतोमुखम्। तस्मिन् दृष्टे महायोगे यातायातान्न विन्दते ॥ २१॥ इसी त्रिकोणविषय समाधिमं अनंत विश्व (संसार) में व्यास होनेहारी परमज्योति प्रकट होती है वही कालाग्रिका रूप है जब योगी ध्यान, धारणा, समाधिकरके उक्त ज्योति देखने लगता है तो उसको जन्ममरण नहीं होते अर्थात् अजरामर हो जाता है॥ २१ ॥ स्वशब्देन भवेत्प्राणः स्वाधिष्ठानं तदाश्रयः । स्वाधिष्ठानाश्रयादस्मान्मेट्रमेवाभिधीयते॥ २२ ॥। स्वशब्द प्राण (हंस) का बोधक है इसका आश्रय स्वाधिष्ठान (लिंगमूल) है प्राणका अधिष्ठान होनेसे इसेही मेद्र कहा जाता है॥२२॥ तन्तुना मणिवत्प्रोतो यत्र कन्दः सुषुम्णया। तन्नाभिमण्डलं चक्रं प्रोच्यते मणिपूरकम् ॥ २३ ॥ नाभिमें एक कंद है जिससे सर्वागव्यापिनी सिरा (नसें) निकली हैं जैसे १० नसें ऊपरको हैं जो शब्द, रस, गंध, श्वास, जृंभा, क्षुधा, तृषा, डकार, नेत्रदृष्टि, धारणा (मगजशकक्ति ) इन दश कर्मोंको अपने २ स्थानोंमें दीपन करती हैं तथा १० नसें नीचेको हैं वात, मूत्र, मल, शुक्र, अन्न, पान, रसको नीचे पहुंचाना इनका कम है और चार जिनकी तिर्छी गति है. दो दाहिने बगल
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१८ गोर्षपद्तति।
दो बांये बगल होकर अगणिन सक्ष्मशाखा बनके मर्वोगमें जालेकी नाई शेमरोम प्रति पृग्ति है उन्हींके सुखोंसे प्रस्वेद देहके बाहर रोमोंमें होके आता है. तथा उन्होंके मागोमे लेप, मर्दनादि पदार्थ भीतर प्रवेश करने हैं. इस प्रकारका नाभिकंद जैसे सुत्रमें मण पिरोया रहता है ऐसेही सुषुम्णानाडीमें पिरोया है इमे नाभिमंडलस्थ मणिपूरचकर्क कहते हं॥ २३॥। द्वादशारे महाचक्रे पुण्यपापविवर्जिते। तावज्जीवो भ्रमत्येव यावत्तत्वं न विन्दृति ॥२४॥ हृदयम द्वादशदल अनाहत चक्र है जिसमें तन्वातीत (सत्त्वरज- स्तमोगुणरहित) जीव है गुणातीत होनेमे पुण्यपापमेभी गहत है परंतु जब तत्वकी पहिचान योगाभ्यासमे हो जावे तब ये गुण जीवमें आते हैं विना नत्वज्ञान जीव संसृतिमं भ्रमणही कग्ता रहता है॥२४॥ अथ दशनाडीवर्णनम्। ऊर्ध्व मेद्रादुधो नाभे: कन्दो योनि: खगाण्डवत्। तत्र नाडयः समुत्पन्नाः सहस्राणां द्विसप्तिः॥२॥ लिंगमूलसे ऊपर नाभिके कुछ नीचे कंदके सटश समस्त नाडि- योंका मृल (उत्पत्तिस्थान) पक्षीकें अंडके समान आकारवाला है इससे बहत्तर (७२) हजार नाडी ऊपर नीचे तिर्छी होकर सर्वोग व्याप्त है।। २५ ।। तेषु नाडीसहस्त्रेषु द्विसप्ति रुदाहताः। प्रधाना प्राणवाहिन्यो भूयस्तासु दश स्मृताः॥२६॥ उक्त ७२ हजार नाडियोंमें मुख्य बहत्तरही हैं इनमेंभी प्राणवा- हिनी (वायु चलानेहारी) प्रधान दशही नाडी हैं॥ २६ ॥ इडा च पिंगला चैद सुषुम्णा च तृतीयका। गान्धारी हस्तिजिह्वा च पृषा चैव यशस्विनी ।२७।।
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भाषानुवादसाहिता-श. १। १९
अम्बुषा कुहूश्रैव शंखिनी दशमी स्मृता। एतन्नाडीमयं चक्रं ज्ञातव्यं योगिभि: सदा॥२८॥ इडा १ पिंगला २ सुषुम्णा ३ गांधागी ४ हस्तिजिद्रा ५ पृषा ६ यशस्व्रिनी ७ अलंबुषा ८ कुह ९ शंखिनी १० ये उक्त मुख्य नाडि- योंके नाम हैं, यह नाडीमय चक्र योगाभ्यामीको अवश्य जानने योग्य है. तदनंतर इन नाडियोंमें चलनेवाले वायुको जानना नव घाणायामसे नाडीशोधन होता है॥ २७ ॥ २८।। इडा वामे स्थिता भागे पिंगला दक्षिणे स्थिता। सुषुम्णा मध्यदेशे तु गान्धारी वामचक्षुषि ॥ २९॥ दक्षिणे इस्तिजिह्वा च पूषा कर्णे च दक्षिणे। यशस्विनी वामकरणे ह्यानने चाप्यलम्बुषा ॥ ३० ॥ नासिकाके वामभागमें इडा दक्षिणभागमें पिंगला नाडी वहती है इनके मध्यमें सुषुम्णा नाडी रहती है. इन तीनोंकी जड मृलाधार- चक्रकी कर्णिकाका त्रिकोण है, जिसके वामकोणसे इडा, दक्षिण को- गसे पिंगला और पश्रिमकोणसे सुषुम्णा नाडी उत्पन्न हुई है ये नीनों नाडी उक्तचक्रको अंक्माल किये हैं अपने २ ओरके नासिका- छिद्रसे वहती है मध्य सुषुम्णा मूलाधारसे ब्रह्मरंध्रपर्यत है अन्य नाडी उक्तचक्रके कंदसे उत्पन्न होकर प्रत्येक रंध्रमें हैं जैस वामनेत्रमें गां- धारी, दक्षिण नेत्रमे हस्तिजिद्वा, दक्षिणकर्णमें पृषा, वामकणमें, यश- म्विनी, मुखमें अलंबुषा है।। २९।।३० ।। कुहूश्र लिंगदेशे तु मूलस्थाने च शंखिनी। एवं द्वारं समाश्रित्य तिष्ठन्ति दश नाडयः ॥ २१ ॥ लिंगदेशमें कुहू, मूलस्थानमें शंखिनी ये दो उस कंदसे अधोमुख होकर नीचेको गई हैं और ऊर्ध्वमुख होकर ऊपरको है इस प्रकार ये दश नाडी प्राणवायुके एक एक मार्गमें आश्रय कन्के स्थित हैं॥३१॥
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२० गोरक्षपद्धाति।
इडापिंगला सुषुम्णाः प्राणमार्गे समाश्रिताः । सततं प्राणवाहिन्यः सोमसूर्याग्निदेवताः ॥३२॥ चंद्रमा, सूर्य और अग्नि है देवता जिनके ऐसी इडा, पिंगला सुषुम्णा ये तीन नाडी प्राणवायुके मार्ग हैं॥ ३२ ॥ अथ दश वायवः । प्राणोऽपानः समानश्चोदानव्यानौ च वायवः। नाग: कूर्मोऽथ कृकलो देवदत्तो धनंजयः ॥ ३३ ।। प्राण १ अपान २ समान २ उदान ४ व्यान ५ नाग ६ कूर्म ७ कृकल ८ देवदत्त ९ धनंजय १० ये दश वायु शरीरमें हैं ॥ ३३ ॥E हृदि प्राणो वस्ेन्नित्यमपानो गुदमण्डले। समानो नाभिदेशे तु उदानः कण्ठमध्यतः ॥। ३४॥। व्यानो व्यापी शरीरेषु प्रधाना: पश्च वायवः । प्राणाद्याः पश्च विख्याता नागाद्याः पश्च वायवः॥३५॥ प्राणवायु हृदयमें रहकर श्वास बाहर भीतर निकालता तथा अन्न- पानाबिकोंका परिपाक करता है १ अपानवायु मूलाधाग्में मलमूत्र बाहर निकालनेका काम करता है २ समवायु नाभिमें शगीरको शुष्क अर्थात् यथास्थान रखनेका काम करता है ३ उदानवायु कंठमें रहकर शगीरकी वृद्धि करता है४ व्यानवायु सर्वशरीरमें लेना, छोडना आदि अंगधर्म कराता है ५ वायु तो१० हैं परंतु इनमें प्रधान ये पांचही हैं शिवयोगशास्त्रके मतसे मुख, नासिका, हृदय, नाभिमें कुंडलिनीके चारों ओर तथा पादांगुष्टमें सर्वदा प्राणवायु रहता है १ गुह्य, लिंग, ऊरु, जानु, उदग, पेड़, कटि, नाभि इनमें अपानवायु रहता है, २ कर्ण, नेत्र, कंठ, नाक, मुख, कपोल, मणिबंधमें व्यानवायु रहताहै, ३ सर्वसंधि तथा हाथ पैरोंमें उदानवायु रहता है, ४ उदराग्निके कलाको लेकर सवोगमें समानवायु रहता है, ५ इस कारणसे प्राणादि पांच
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भाषानुवादसहिता-श. १। २१
वायु प्रधान हैं. नागादि पांच वायुका कर्म जो चर्म एवं हड्डीमें रहकर जो करते हैं आगे कहते हैं ।। ३४ ।। ३५ ।। उद्धारे नाग आख्यातः कूर्म उन्मीलने स्मृतः । कृकर: क्षुतकृज्ज्ञेयो देवदत्तो विजम्भणे॥ ३६॥ उद्धार (डक्कार) निकालना नागवायुका कर्म है, नेत्रोंके पलक लगाना खोलना कूर्मवायुका तथा छींक कगना कृकरवायुका, जंभा देवदत्तवायुका कर्म है॥। ३६ ॥ न जहाति मृतं चापि सर्वव्यापी धनंजय:। एते सर्वासु नाडीषु भ्रमन्ते जीवरूपिण: ॥। ३७ ।। और धनंजयवायु सर्वेशरीग्में व्याम रहता है मृतशरीगमेंभी रहता है अर्थात् मरेमभी चार घटीपर्यन्त यह शरीग्हीमें रहता है इस प्रकार ये दश वायु आपही जीवके अभ्याससे कल्पित होकर सुखदुःखका संबन्ध जीवको कगत हैं मैं सुखी हूं उत में दूःखी हूं इत्यादि व्यवहा- रमय जीवकी उपाधि लिंगशरीरमें हनमे आपही जीवरूप होकर ममस्त नाडियोंमें फिग्ता रहता है. यद्यपि अविद्यावच्छिन्न चैतन्य जीवही हैं तो इसका घृमना फिरना असंभव है नथापि जैमे चंद्रमा तो कंपायमान नहीं है परंतु उसका प्रतिबिंब जलमें जिम समय हो उस समय उस जलको हिलाया जाय तो चंद्रबिंब हिलता दीख पडता है ऐमेही व्यवहारमे दश वायुओंका घृमना तथा इनहीकी उपाधि जीवचैतन्यंम आगेपित करते हैं॥ ३७ ॥ आक्षिप्तो भुजदण्डेन यथोच्छल ते कन्दुकः। प्राणापानसमाक्षिप्तस्तथा जीवो न तिष्ठति॥३८ ।। जैसे कंदुक (गेंद) हाथसे भूमिपर ताडन करक स्वतः उछलता है, तैसेही प्राणवायुके स्थान (हृदय) में अपानवायु तथा अपान- वायुके स्थान (गुदा) में प्राणवायुके प्राप्त होनेमें अपानवायु जीवको आकर्षण करके एकत्र स्थित नहीं रहने देता जैसे गेंद खेलनेवालेके
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२२ गोरक्षपद्धति।
बशमं गेंड रहता है ऐसेही अविद्या (माया) के वशमें जीव रहता है।। ३८ । प्राणापानवशो जीवो ह्यधश्चोर्ध्व च धावति। वामदक्षिणमार्गेण चञ्चलत्वान्न दृश्यते ॥ ३९ ॥ जीवकारणसे जीवात्मा प्राणअपानवायुके अधीन है उसी कारणम इडा और पिंगला नाडीके द्वारा गिरके नीचे मूलाधारपर्यत ऊपर मुख नासिकाछिद्रपर्येत फिरताही रहता है इसके अतिचंचल होनसे इतना कउिन है कि प्राणापानवायुके साधन बिना वायु नहीं जीता जाता इमके जीते विना हृदयकमलमें ध्यान नहीं होता॥ ३९ ॥ रज्जुबद्धो यथा इयेनो गतोऽप्याकृष्यते पुनः । गुणबद्धस्तथा जीव: प्राणापानेन कृष्यते ॥४ ॥ जैसे वाजपक्षीके पैरमें डोरी बांधके हिलाके छोड देनेपर उड जाता एवं खींचनेपर फिर हाथमें आ जाता है ऐसेही मायाके अंश सत्वरजतमोगुणके वामनामे बँधा हुआ जीव बुद्धिकी लीन हुएमें उपाधिरहित शुद्धब्रह्म हो गया हो तौभी प्राणापानवायु करके फिग खींचा जाता है जाग्रत् अवस्थाम फिर प्रबुद्ध हुपकी वृत्ति विषयमे पुनः जीवभावको प्राप्त किया जाता है।। ४० ॥ अपानः कर्षति प्राणं प्राणोऽपानं च कर्षति। ऊर्ध्वाधः संस्थितावेतौ संयोजयि योगविन् ॥४१।। ऊपरसे आज्ञाचक्रगत प्राणवायु नीचे मृलाधारस्थित अपानवायुको तथा मूलाधारगत अपानवायु आज्ञाचत्रस्थ प्राणवायुको परम्पर अपने २ और आकर्षण करते हैं योगाभ्यासी पुरुष प्राणायामसे इनहींको जोडकर थोग (जोडना) कहते हैं इसी योग जोडनेको हटयोग कहते हैं जो सूर्यचंद्रमा ऐक्य कहाते हैं ॥। ४१ ॥ हकारेण बह़ियांति सकारेण विशेत्पुनः । हंस हंसेत्यमुं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा ॥ ४२ ।।
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भाषानुवादसहिता-श० १। २₹
षट् शवानि त्वहोरात्रे सहस्राण्येकर्विशतिः। एतत्संख्यान्वितं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा ।। प्राणवायु सारूप्यको प्राप्त हो रहा चिदाभास जीव हकारकरके स्वाधिष्ठानचक्रम उत्पन्न हाता है और सकारकरके मूलाधारादि चक्रमें प्रवेश करता है एवंप्रकार 'हंस ' मंत्र (अजपागायत्री) का जप जीव नित्य करताही रहता है अर्थात् श्वास बाहर निकलनेमें हकार भीतर प्रवेश होनेमें सकार उच्चारण होता है. सूर्योदयसे पुनः सूर्या- स्तपर्यन्त ६० घटीमें इम मंत्रकी जपसंख्या २१६०० होती है इतना जप जीव स्वनः करता है ॥ ४२॥ ४३ ॥ अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्षदायिनी। अस्या: संकल्पमात्रेण सर्वपापैः प्रसुच्यते॥४8 ॥ अनया सदशी विद्या अनया सहशो जपः। अनया सदशं ज्ञानं न भूतं न भविष्यति॥ ४५॥। यह योगियोको मोक्ष देनेवाली अज्जपा नाम गायत्री है इसके संकल्पमात्रस योगी समस्तपापासे छूट जाता है संकल्पकी विधि यह है कि सूर्यादयमे पहलेही अयनसे उठकर शुद्धवस्त्र पहन हाथ, पैर, मुख प्रक्षालन कर शुद्ध आमनमें बैठ आचमन करके संकल्प- कल्पना इस प्रकार करना कि अद्येह पर्वेद्य रहो रात्रचरितनासापुटनिः
गौगीप्राणशकतिज्ञानशक्तिचिच्छक्तिसमेनेभ्यो यथासंख्यं षट्शतं, षट्- सहसं, षट्सहसं, सहस्रमकं, महन््मेकं, सहस्रमेकम् अजपागायत्रीजपं प्रत्येकं निवेदयामि इति निवेद्य। पुनरद्य प्रातःकालमाशभ्य द्वितीयप्रातः- कालपर्यन्तं नासापुटनिःमृतौच्छ्रासनिःश्वासात्मकं पद्शताधिकैकविंश- तिसहससंख्याकमजपा गायत्री जपम होगत्रेणाइ करिष्ये इति जायमान-
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२४ गोरक्षपद्धति ।
जपसंकल्पं कृत्वा स्वकृत्यमाचरत्। इस अजपाके समान जीवब्रह्मका अभेद कहनेवाला और कोई मंत्र नहीं है. यह अल्पश्नममें उत्तम फल देनेवाला है इसके समान और जप नहीं. क्योंकि प्रातःकाल संकल्प- मात्र करना है उपरांत खाते पीते चलत उठते बैठते सोते सर्वदा सब अवस्थाओंमें उक्त जप आपसे होता रहता है और अद्वैतानुभव करा- नेवाला उसके समान अन्य कोई ज्ञानशास्त्र पहिलेभी नहीं था और पीछे होनेवालाभी नहीं है।। ४४ ॥। ४५॥ कुंडटिन्यां समुद्धूता गायत्री प्राणधारिणी। प्राणविद्या महाविद्या यस्तां वेत्ति स वेद्वित् ॥४६॥ कुंडलिनी महाशक्तिमे उत्पन्न हो न्ही तथा प्राणवायुको धारण करनेवाली यही अजपा गायत्री है. जीवात्माकी शक्ति प्राणविद्यास्वरू- पभी यही है इसी कारण महाविद्याभी इसको कहते हैं इसे जो योगी पहिचान मके वही योगशास्त्राभ्यासका तात्पर्य जानता है॥। ४६ ॥ अथ शक्तिचालनम्। कन्दोर्ध्वे कुंडली शक्तिरष्टधा कुंडलाकृतिः। त्रह्मद्वारमुखं नि्त्यं मुखेनाच्छाद्य तिष्ठतति ॥४७।। अब कुंडालैनीके भेद खोलने निमित्त एवं उसकी अधिकता प्रकट करनेके लिये कुंडलिनीका और प्रकारभी स्थान कहते हैं कि समस्त ७२००० नाडियोंका उत्पत्तिस्थान पृर्वाक्त कंद है इसके ऊपर मणि- पूरचक्र कार्णकामें आट वृत्तका के वेष्टित हो ग्ही कुंडलिनीशक्ति ब्रह्मरंध्रद्वारके मुखको रोकके सर्वदा रहती है॥। ४७ ॥ येन द्वारेण गन्तव्यं ब्रह्मद्वारमनामयम्। मुखेमाच्छाद्य तद्द्वारं प्रसुप्ता परमेश्वरी॥ ४८॥ प्रवुद्धा बुद्धियोगेन मनसा मरुता सह। सूचीव गुणमादाय व्रजत्यूर्ध्व सुपुम्णया ।। ४९।।
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भाषानुवादसहिता-श० १। २५ जिस मार्ग (सुषुम्णा) करके जन्ममरणके दुःख हरण करने- बाला अखंड ब्रह्मानंदपद मिलता है उस मार्गको रोकके सोई हुई कुंडलिनी प्राणवायुके धौंकने (उत्तेजन करने) से कालाग्निके ज्योतिके मंबधमे प्रबुद्ध (जागृत) होकर मन एवं प्राणवायुके सहित होके सुपुम्णानामा मध्यनाडीसे ऊपरको जाती है, जैसे सूची (सुई) अपनेपर पिरोये तागेसहित होनेसे वस्त्रके अनेक सूत्रोंके मध्यमें प्राप्त होती है, तैसे आपही सृष्टि उत्पन्न आप करके षटचक्र तथा उनके देवताप्रभृति सकलप्रपंचको उल्लंघन करके ऊपर सहस्रदलकमलके सन्मुख होकर जाती है ॥। ४८ ।। ४९ ।। प्रसुप्भुजगाकारा पझतन्तुनिभा शुभा। प्रबुद्धा वह्नियोगेन व्रजत्यू्ध्वे सुषुम्णया ॥ ५० ।। सोते सर्पके समान कुंडलिनी अपानवायुसे धमित (धौंकी गई) जो मूलाधारमें रहनेवाली काला्निज्योतिके संबंधसे प्रबोध पायके अतिवेग (जोर) मे चलते हुए सर्पके समान कुटिलगति होकर कमलनालके तंतु (सृत्र) के समान सूक्ष्म ज्योतिर्मयस्वरूप होकर मुषुम्णामार्गसे ऊपरको जाती है॥ ५०।। उद्वाटयेत्कपाटं तु यथा कुन्विक्या हठात्। कुण्डलिन्या तथा योगी मोक्षद्वारं प्रभेदयेत् ॥११॥ जैस कूंची (चाबी) से ताला खुलकर कपाट (किवाड) खुल जाते हैं तैसही कुंडलिनीकरके मोक्षद्वार सुषुम्णाके मुखको योगी अभ्याससे खोले जिससे कि कुंडलिनीके प्रबोधविना कुंडलिनीका द्वार खुलता नहीं ॥ ५१॥ कृत्वा सम्पुटितौ करौ दढतरं बडा तु पझासनं गाढं वक्षसि सत्निधाय चितुकं ध्यानं च तच्चेतसि। वारंवारमपानमूर्ध्वमनिलं प्रोच्ारयेत्पूस्तिं् मुश्चनप्राणमुपौते बोधमतुलं शक्तिपभवादतः॥५२।
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२६ गोरक्षपद्वति।
दोनों हाथ संपुटित करके (अंजली बांधक) दोनों कूपर (बाहुमध्यभाग) हृदयमें दृढ स्थापन करके पदमासन करे, चिबुक (ठोडी) हृदयमें दढतर लगायके अर्थात् जालंधरबंध करके ज्याति :- स्वरूपका ध्यान करे केवल कुंभकप्राणायाम अधोद्वार गेकके कर, प्राणायामसे कुंभितवायुको अपानवायुमे एकत्व करकें यथा्शक्ति कुम्भक करे पुनः रचकप्राणायाम (जिसमें वायु अतिमंद २ निकला) करे इस प्रकाग्मे कुंडलिनीका बोध होता है तथा गो- गौको अपरिित ज्ञान मिलता है. कुंडलिनीको पबाध कग्नवार्ली शक्तिवालनमुद्रा यही होती है प्तु प्राणायामके अभ्यासम प्राणा- पानवायुको वशवर्ती करके इम मुद्राका बहुत कालपर्यन अभ्याम करना होता है॥ ५२॥ अंगानां मर्दनं कृत्वा श्रमसञ्जातवारिणा। कटम्ललवणत्यागी क्षीरभोजनमाचरेत् ॥३३॥ ब्रह्मचारी मिताहारी त्यागी योगपरायणः । अव्दादूर्ध्व भवे्सिद्धो नात्र कार्या विचारण ॥५४॥ शक्तिचालनमुद्राके अभ्यासीकं नियम कहते हैं कि प्राणायामा- दिकर्मसे जो अंगोंमें स्वेद (पमीना) आता है उससे अंगमर्दन करे लवण और खट्टा ये दो रम न खाव केवल दुग्धान्न खाया कर भोजनभी एक प्रमाणसे कर ब्रह्मचर्य वसे कामक्रोधमे गहदत रहे त्यागवान् होवे योगाभ्यासका मात्र अभ्यास रख उम प्रकार नियममें रहकर योगाभ्याससे शक्तिचालनमुद्राका अभ्याम कर एक वर्ष ऊपर जब इच्छा क तभी कुंडलिनीके अभ्युत्थानकी सामश्य होती है इसमें सिद्धि होती है वा नहीं ऐसा संदेह न कगना अभ्या- ससे अवश्यमेव सिद्धि होती है ॥ ५३॥५४॥ सुस्निग्धो मधुराहारी चतुर्थाशविवर्जितः । मुश्चते स्वरसं प्रीत्ये मिताहारी स उच्यते ॥३५॥
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भाषानुवादसहिता-श० १।
मिताहारके लक्षण कहते हैं स्त्रिग्ध (सचिक्कण) मीठा भोजन करे अम्ल (खट्टा) और लवणवर्जित करे दो भाग अन्न एक भाग जल खावे चौथा भाग उदरमें वायुसंचारके लिये छोड देव. देवताको निवेदन कर्के दुग्धान्न भोजन करे इस प्रकार विधि करनेहारा योगी मिताहारी कहाता है॥५५॥ कन्दोर्थ्वे कुण्डलीशक्ति: शुभमोक्षप्रदायिनी। बन्धनाय च मूढानां यस्ता वेत्ति स वेदवित ॥५६॥ कंदके ऊपर मणिपृर्चक्रके कर्णिकामें ८ फेरे होकर कुंडलाकार कुंडलिनी शक्ति है यह मूर्खजनांको वारवार जन्ममरणरूप बंधन देती है और योगाभ्यास जाननेवालको शक्तिचालनका अभ्यास जन्ममरणरूप बन्धन छुटायके मोक्ष देती है ॥ ५६॥ अथ शक्तिचालनविधौ ग्रन्थांतरे विशेषः । गङ्गायमुनयोर्मध्ये बालरंडा तपस्विनी। बलात्कारेण गृहीयात्तद्विष्णोः परमं पदम् ॥१ ॥। शक्तिचालनमें ग्रन्थांतग्मतसे कुछ विशेष कहत हैं कि, गंगायमु- नाके बीच तपस्विनी बालरण्डा बलात्कारकरके कुंडलिनीको ग्रहण करे तो विष्णुक परमपद (ब्रह्मांड) में प्राप्त करती है ।। १ ।। इडा भगवती गंगा पिंगला यमुना नदी। इडापिंगल योर्मध्ये बालरण्डा च कुंडली॥ २ ॥ इडा भगवती वामश्वासा नाडी ऐशर्यादिसंपन्न गंगा, दक्षिण- है।। २ ॥ शासा पिंगलानाम्री यमुना है इनके मम्य नाडी मुसुम्णा वालांडा
ऊर्ध्व वित्तस्तिमात्रं तु विस्तारं चतुरंगुलम् । श्वेतं तु मृदुलं प्रोक्तं वेष्टितं वरलक्षणम्॥ ३ ॥। मूलस्थानमे वितस्तिमात्र ऊपर नाभि एवं मेहकेमव्यमें नवांगुल्ड
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२८ गोर्क्षरद्धति।
विस्तार, चार अंगुल आयाम, पक्षीके अंडाकार, श्वेतरंग कोमलव- स्वेष्टित जैसा कंद है।। ३ ।। सति वज्रासने पादौ कराम्यां धारयेहढम्। गुल्फदेशसमीपे च कन्दं तत्र प्रपीडयेत् ॥४॥ वज्रासनकरके हाथोंमे पैरोंकी एडी पकड कंदस्थानमें दृढ लगाय घीडन करे॥ ४ । वज्रासने स्थितो योगी चालयित्वा च कुंडलीम्। कुर्यादनन्तरं भसत्रां कुंडलीमाशु बोधयेत्॥ ५॥ योगी वज्रामनमें बैठ कुंडलीका शक्तिचालनमुद्रासे चलायमान करे तब भस्रा नाम कुंभक कर कुंड लिनीशक्तिको शीघ्र प्रबोधित क॥ ५॥ भानोराकुश्चनं कुर्यात्कुण्डलीं चालयेत्ततः । मृत्युवऋ्रगतस्यापि तस्य मृत्युभयं कुतः ॥६॥ नाभिस्थान (सूर्य) को आकुंचन कर कुंडलीको चलावे इसका अभ्याम मिद्ध हो जाय तो मृत्युके मुखमें पड गया हो तौभी उमकी मृत्यु न होवे ॥ ६।। मुहूर्तद्वयपर्यन्तं निर्भयं चालनादसौ। ऊर्ध्वमाकृष्यते किश्चित्सुषुम्णायां समुद्रता ॥७॥ चार घडीपर्यन्त निर्भय होकर शक्तिचालन करे तो कुंडलिनी बछुक सुधुम्णामें ऊपरको उठनी है॥ ७ ॥ तेन कुण्डलिनी तस्पाः सुषुम्णाया मुखं ध्रुवम्। जहाति तस्मात्प्राणोडयं सुषुम्णा व्रजति स्वतः।।८।। इससे कुंडलिनी (जो सुषुम्णा रोक बैठी है) सुषुम्णाके द्वारको छोड देती है तब प्राणवायु आपही सुघुम्णामें प्रवेश करती है ।l८।।
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भाषानुवादसहिता-श० १।
तस्मात्सश्चालयेत्नित्यं सुखसुप्तामरुन्धतीम्। तस्याः सञ्चालनेनैव योगी रोगैः प्रमुच्यते॥९॥ इमके नित्यप्रति सुषुम्णाद्वारमें सोती कुंडलिनीको चलावे तो योगी सर्व रोगोंसे छूट जावे।। ९ येन सच्चालिता शक्ति: स योगी सिद्धिभाजनम्। किमत्र बहुनोक्त्ेन कालं जयति लीलया॥ १०॥ जिस योगीने शक्तिचालन किया वह अणिमादि सिद्धियोंका पात्र होता है और विशेष माहात्म्य क्या कहा जाय वह काल (मृत्यु) को सहजही जीत लेता है ॥ १ ॥ कुण्डलीं चालयित्वा तु भर्सत्रां कुर्याद्विशेषतः। एवमभ्यस्यतो नित्यं यमिनो यमभीः कुतः ॥ ११ ॥ जो यमी नित्य कुंडलीको चलायके भस््राकुंभकका अभ्याम विशेष- कग्के करता है तो उसे यमका भय नहीं होना ॥ ११ ॥ इयं तु मध्यमा नाडी दढाभ्यासेन योगिनाम्। आसनप्राणसंयाममुद्राभिः सरला भवेत ॥१२॥ योगियोंके दढाभ्याससे आसन प्राणायाम महामुद्रादि करके मध्य- नाडी (सुषुम्णा ) सरल हो जाती है।। १२।। अथ महामुद्राः । महामुद्रां नभोमु्द्रां उड्डीयानं जलंधरम्। मूलबन्धं च यो वत्ति स योगी मुक्तिभाजनः॥५७॥ महामुद्रा १ खेचरीमृद्रा २ उड्डीयानबंध ३ जालंधर ४ मूलबंध ५ इनको करके शक्तिचालन करे तौ योगी मुक्तिभाजन होता है शक्ति चली वा नहीं इसके जाननेका प्रमाण यह है कि जैसे शरीरम पिपीलिका (चींटी) चलनेमें उसकी गतिसे ज्ञात होता है कि कुछ जीव चलता है ऐसेही सुषुम्णामें वायु जब चलने लगता है तो शक्ति
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३० गोरक्षपद्धाते।
चलायमान हो गई जानना शक्तिचालनमुद्राके पीछे भी उक्त ५ मुद्रा करनी योग्य है ।।५७ । वक्षोन्यस्तरतुः प्रपीडय सुचिरं योनिं च वामां्िणा। हुस्ताभ्यामनुधारयेत् प्रसरितं पादं तथा दक्षिणम्॥ आपूर्य श्वसनेन कुक्षियुगलं बद्धा रनै रेचयेदेषा। व्याधिविनाशिनी सुमहती मुद्रा नृणां कथ्यते।।५,८।। महामुद्राकी विधि कहत हैं कि हदयमें चिबुक जोग्से धाग्ण करके वामपादकी एडीसे योनिस्थानको अत्यन्त दृढ कर्के अचेते दहिना पाद लंबा करके दोनीं हारथोंसे पादमध्यभाग पकडके दृढ रोके तब पेटमें पृग्क विधिसे वायु भरे कुछ काल यथाशक्ति कुंभक करके मन्द मन्द वायुको रेचन करे यह योगी जनको ममस्त रोगनाशक महामुद्रा कही है ॥ ५८ ॥ चन्द्रांगेन समभ्यस्य सूर्यागेनाभ्यसेत्पुनः । यावततुल्या भवेत्संख्या ततो मुद्रां विसर्जयेत् ॥५९॥ इस महामुद्राके अभ्यासमें प्रथम वामांगसे अभ्यास करके पीछे दहिने अंगसे करे तैसेही प्राणायामभी करता रहे. जब दोनों ओरके अभ्याससे प्राणायामकी मात्रा बगबर हो जाय तब मुद्रा छोडनी तबतक उक्त अभ्यास करते रहना ॥ ५९ ॥ नहि पथ्यमपथ्यं वा रसाः सर्वेऽपि नीरसाः। अपि भुक्तं विषं घोरं पीयूषमिव जीरयंते ॥ ६० ॥ क्षयकुष्ठमुदावर्तगुल्माजीर्णपुरोगमाः। रोगास्तस्य क्षयं यान्ति महामुर्द्रां च योऽभ्यस्ेत्॥।६१।। कथितेयं महामुद्रा महासिद्धिकरी नृणाम्। गोपनीया प्रयत्नेन न देया यस्य कस्पचित् ॥ ६२।
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भाषानुवादषमहिता-श० १। ३१
जब महामुद्राका अभ्यास दृढ हो जाय तो, पथ्यापथ्यका विचार कुछ नहीं गहता, मिष्ट, लवण, तिक्त आदियोंका स्वाद कुछ नहीं रहता जा (वृत, महद बगबर मिलायके कृत्रिमविष होता है) संयोगवि- रुद्द वम्तु व। घोरविषभी खावे नो अमृतके समान पच जाता है तथा उदावर्त, गुल्म, अजीर्ण क्षय, कुछ् आदि रेग समस्त शञांत हो जाते है. इसके अभ्यामीको महासिद्धि देनेहारी यह महामुद्रा कही है इसे च यत्रस गुप्त रखना. प्रकाश कग्नेमे सामर्थ्यहीन होती है इस हेतु अनधिकारी, अयोग्य पुरुष, छठ, दांभिक आदि जैसे कैसेको न देना॥६० ॥ ६१ ॥ ६२ ।। 'इमका विस्तार ग्रंथांतरसे पाठकोंके सुबोधार्थ लिखते हैं'- पादमूलेन वामेन योनि संपीडय दक्षिणम्! प्रसारितं पदं कृत्वा कराभ्यां धारयेदृढम् ॥१॥ वामपादकी एडीसे गुदा और शिश्नके मध्यमें योनिस्थानको रोक- के ताहिना पैर लंबा पृथ्वीमें कैलाय जैसे एडी भूमिमें रहे और अगुन्ी ऊंची डेडके नाई ग्हे, नब हाथोंके अंगुष्ठ और तर्जनीसे दाक्षि- गपादागृष पकड़के धारण के।। १॥ कंठे बन्धं समारोप्य धारयेद्वायुमूर्ध्वतः। यथा दंडाहतः सर्पो दंडाकारः प्रजायते ॥ २ ॥ तटनंतर कंठम जालंधरबंध करक वायुके ऊपर सुषुम्णामें धारण के दसमे मृन्दबंधभी हो जाता है जहां योनिस्थानको पीडन और जिह्ाबध करके मुलबंध हो जाता है ॥। २ ।। ऋज्वीभूता तथा शक्ति: कुंडली सहसा भवेत्। तदा सा मरणावस्था जायते द्विपुटाश्रया॥ ३।। जैम मर्ष दंडके प्रहारसे दंडाकार हो जाता है ऐसेही कुंडलिनी शक्तिभी कुटिलताको छोडकर इस मुद्रासे सरल हो जाती है और कूं - लिगी बोधसे सुषुरणामें वायुका प्रवेश होता है तब दोनोंको
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२३ गोरक्षपद्धति।
प्राणके वियोगसे इडा पिंगला है आश्रय जिसके ऐसी मरणावस्था होती है।। ३ ।। ततः शनैः शनैरेव रेचयेत्रैव वेगतः। महामुद्रां च तेनैव वदन्ति विबुधोत्तमाः ॥8॥। इयं खलु महामुद्दा महासिद्धैः प्रदर्शिता। महाकेशादयो दोषः क्षीयन्ते मरणादयः ॥५॥ तदनंतर शनैः शनैः रेचन करें वेगसे करनेमें बलहानि होती है इससे महामुद्रा आदिनाथादि महासिद्धोंने दिखाई हैं. इसके अभ्या- ससे महाक्केश, अविद्या, राग, द्वेषादिक शोकमोहादि दोष क्षीण होते हैं तथा जरा मरणभी नहीं होते इससे ज्ञानिजन इसे महामुद्रा कहते हैं ॥। ४।५।। चन्द्रांगे तु समभ्यस्य सूर्याङ्गे पुनरभ्यसेत्। यावततुल्या भवेत्संख्या ततो मुद्रां विसजयेत् ॥ ६ ॥ इसका क्रम कहते हैं कि (चंद्राग) वामभागमें अभ्यास कर सुर्योग (दक्षिणभाग) में अभ्याम करे और वामांगाभ्यासके पीछे जबली वामांगमं कुंभककी संख्या समान हो तवलीं अभ्यास करे जब संख्या समान हो तब महामुद्रा विसर्जन के इसमें यह क्रम है कि वामपा- दकी एडीका योनिस्थानमें लगाय दाहिना पाद लंबा फैलाय अंगु- ष्ठको हाथके अंगुष्ठ तर्जनीसे पकडके अभ्यास करे यह वामांगाभ्य। है इससे पूरित जो वायु सो वामांगमें स्थित रहता है फिर दक्षिणपा- दको समेट तिसकी एडी योनिमें लगाय वामपाद लंबा फैलाय अंगु- छको हाथके अंगु तर्जनीसे पकडके अभ्यास करे इसे दक्षिणांगा- भ्यास कहते हैं इसमे पूरित वायु दक्षिणांगहीमें रहता है ॥ ६।। न हि पथ्यमपथ्य वा रसाः सर्वेऽषि नीरसाः। अपि भुक्तं विषं घोरं पीयूषमिव जीर्यते ॥७॥
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भाषानुवादसहितां-श० १। कहते हैं कि महामुद्राके अभ्यासको पथ्यापथ्यविचार नहीं है.' कटु अम्लादि समस्त रसादिक जो खाय वही पच जावे, नीरस, बासी (पर्युषित) सब पचे, तथा दुर्जर घोर विष आदिभी अमृतके नाई पच जावे ।।७।। क्षय कुष्ठमुदावर्तगुल्मा जीर्णपुरोगमाः। तस्य दोषाः क्षपं यान्ति महामुद्रां तु योऽभ्यसेत्।।८।। जो पुरुष महामुद्राका अभ्यास करे उसे क्षयरोग, कुष्ठ, गुल्मरोग, अजीर्ण, ज्वर, प्रमेह, उदरगेग आदि कभी न होवे ।। ८ ।। कथितेयं महामुद्रा महासिद्धिकरी नृणाम्। गोपनीया प्रयत्रेन न देया यस्थ कस्यचित् ॥९।। और उस अभ्यासीको अणिमादि महासिद्धि देनेहारी यह महामुद्रा कही है इसे गुप् रखना अर्थात् अनधिकागीकों न देना । ९ ।। अथ खेचगीमुद्रा। कपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा। भ्रुवोरन्तर्गता दृष्टिमुद्रा भवति खेचरी॥ ६३ ॥ खेचरीमुद्राकी विि कहते हैं कि, जिह्वाको उलटी फिराय 7,6- मूलमें जो छिद्र (छिगलिग्या) याने क्षुद्रघंटिका है उसमें प्रवेश कराना तदनंतर भूमध्यमें निश्चल दृष्टि स्थिर करना इसे खचरीमुद्रा कहते हैं ॥ ६३ ॥ न रोगान्मरणं तस्य न निद्रा न क्षुधा तृषा। न सूच्छा तु भवेत्तस्प यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम्॥६४॥ जो योगी गुरूपदिष्ट मार्गकरके छदन, दोहन, कर्षण (ये कर्म आागे कहेंगे) प्रकारसे खेचरीमुद्राको बहुतकालपर्यत अभ्यास करता है उसके रोग, निद्रा, क्षुधा, तृषा, मूर्च्छा और मरणतुल्य कष्ट दूर होते हैं।। ६४ ।। ३
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३४ गोरक्षपद्धति। पीडयते न च शोकेन न च लिप्येत कर्मणा। बाध्यते न स केनापि यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम् ॥६५ जो योगी खेवगमुद्रा जानके उसे अभ्यास करके सिद्धि करता है यह शोकमे पीडित नहीं होता कर्मके फलमें बंधन नहीं पाता और काल मृत्यु आदियोंमेभी बाधा नहीं पाता ॥ ६५ ॥ चित्तं चलति नो यस्माज्ह्वा चरति खेचरी। तेनेयं खेवरी सिद्धा सर्वसिद्धैर्नमस्कृता ॥ ६६ ॥ जिस कारण तहां परब्रह्मविषे एकाग्र होकर मन बुद्धि चित्तशून्य विषें फिरता है तथा जिह्वाभी कंठमूल छिद्राकाशमें रहके ब्रह्मरंध्रांतर्गत चंद्रकलामृतका पान करती है इम हेतुमे मनबुद्धिके विषयबंधन निवारण करनेहारी खेचरी मुद्रा समस्त सिद्धजनोंसे अत्यंत पूजित (नमस्य) है॥ ६६ ॥ बिन्दुमूल शरीराणां शिरास्तत्र प्रतिष्ठिताः । भावयन्ति शरीरा णामापादतलमस्तकम् ॥ ६७ ।। शरीरका मूल (कारण) बिंदु है इससे शरीरकी रक्षा है, पादसे शिरपर्यत ममस्त नाडीजाल बिंदुसे मेचन हो गहा है इसी हेतु उक्त- नाडी सजीव स्वकर्मसामर्थ्य रहती हैं अर्थात् ममस्त नाडी बिंदुके आधारमें हैं॥ ६७ ।। खेचर्या मुद्रया येन विवर लम्बिकोर्ध्वतः । न तस्य क्षरते बिन्दुः कामिन्यालिद्गितस्य च।।६८।। जिस योगोने कंठनालके छिद्रलंधिकाके ऊपर आकाशविषें खेचरी- मुद्रासे रोक लिया तो चंद्रामृत रुकनेसे उस योगीको कामिनी (स्त्री) आर्लिगन करे तौभी उसका मन चलायमान नहीं होता तथा बिंदु नहीं गिरता है॥। ६८ ।। यावद्विन्दुः स्थितो देहे तावन्मृत्योर्भयं कुतः । यावदवद्दा नभोमुद्दा तावद्विन्दुर्न गच्छति॥६९॥
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भाषानुवादसहिता-श. १। ३५
जबलों देहमें बिंदु स्थिर है तावत् मृत्युकी भय नहीं होती बिंदुका स्थान व्योमचक्र है इससे कालकी गति नहीं है. जबलं खेचरीमुद्रा दृढ है तबलों बिंदु व्योमचकसे नहीं गिरता. इसके स्वस्थानस्थ ग्हनेमें कालका वश नहीं चलता ॥ ६९ ॥ चलितोऽपि यदा बिन्दुः संप्राप्तश्च हुताशनम्। व्रजत्यूर्ध्व हते शत्त्या निरुद्धो योनिमुद्रया।।७।। कदाचित् एकाग्र न होनेसे बिंदु उतर्के नाभिस्थान सूर्यमंडलमें रहुँच गया नो योनिमुद्राकरके कुंडलिनीशक्तिको ऊपर उठायके उसके माघानसे उक्त बिंदु पुनः ऊपर लौटके अपनेही स्थानमें प्राम होकर स्थिर रहता है।। ७०।। स पुनर्द्विविधो बिन्दु: पाण्डुरो लोहितस्तथा। पाण्डुरः शुक्रमित्याहुर्लोहिताख्यो महारजः॥७१॥। उक्त बिंदु दो प्रकारका होता है एक तो पांडुरवर्ण जिमे शुक्र कहते हैं दूमग (लोहित) रक्त्तवर्ण इसे महारज कहते हैं॥ ७१ ॥ सिन्दूरद्रवसंकाशं नाभिस्थाने स्थितं रजः । शशिस्थाने स्थितो बिन्दुस्तयोरैक्यं सुदुर्लभम्॥७२ तैल मिलायके सिंदूर (हिंगुल) का द्रव (रम) के समान रज सूर्यम्थान नाभिमंडलमें रहता है नथा बिंदु ( वीर्य) चंद्रमाके स्थान कंदेश षोडशारचक्रम स्थिर रहता है इन दोनोंका ऐक्य अंत्यत दुर्लेभ है।। ७२॥ बिन्दुः शिवो रजः शक्तिश्वन्द्रो बिन्दू रजो रविः। अनयोः संगमादेव प्राप्यते परमं पदम् ॥ ७३ ॥। बिंदु शिव रज शाक्ति है, इनके एक होनेमें योगासध्वि होकर परम- पद मिलता है. चंद्रमा सूर्यका (प्राणवायु अपनवायुका जीवात्मा परमात्माका) ऐक्य करना यही हठयोगपदका अर्थ है।। ७३ ।।
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३६ गोरक्षपद्दति।
वायुना शक्तिचारेण प्रेरितं तु पदा रजः। याति बिन्दोः सहैकत्वं भवैहिव्यं वपुस्ततः ॥। ७४॥ शक्तिचालनविधिसे वायुकरके जब रज बिंदुके साथ ऐक्यको प्राप्त होता है तब शरीर दिव्य हो जाता है अर्थात् उसे अग्नि जलाती नहीं, शस्त्रसे कहता नहीं॥। ७४ ॥ शुकं चन्द्रेण संयुक्तं रजः सूर्येण संयुतम्। तयोः समरसैकत्वं यो जानांति स योगवित्॥७५।। शुकर बिंदुरूप हो चंद्रमासे मिला और रज गक्तरूप होकर सर्यने मिला इनके समरसैकत्व (चंद्रसरयस्वरूप बिंदुरजके समरसन्वभात्र ) को जो योगी जानता है वह योगवित कहाता है, चंद्रमा एवं सूयक योगको योग कहते हैं॥ ७५ ॥ शोधनं नाडिजालस्य चालनं चन्द्रमुर्ययोः। रसानां शोषणं चेव महामुद्राभिधीयते॥ ७६ ॥ नाडीालके शोधनेसे; नाडीमे रहनेवाले वात-पित्त-कफादि रोगों का हरण होता है. चंद्रसूर्यके चालनस इनके एकत्र हंनेमें खाया अन्, पिया जल इनका शोपण होता है ऐसा महामुद्राका फल है अर्थान इस मुद्राकरके नाडीजीलकी शोधन चंद्रसूर्यका चालन रसोंका शोषण होता है॥। ७६ ॥ ग्रन्थातरे खेचरीमुद्र/विधिः। छेदनचालन दोहैः कलां क्रमेण वर्धयेत्तावत्। यावडूमध्यं तु स्पृशति तदा खेचरीसिद्धि:।। १।। जिह्वा खचरीयोग्य करनेकी विधि ग्रन्थांतरसे कहते हैं कि छेदन- चालन-दोहनकर्मसे जिह्वा बढती है, छेदन आगे कहेंगे, चालन यह है कि अंगुष्ठ और तर्जनीसे जिह्वाको हिलाते रहना, दोहन दानां हाथोंके अंगुष् तर्जनीसे जैसे गौके थनको दुहे ऐसे खींचखवींचके
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भाषानुवादसहिता-श० १। ३७
जिह्ाको लंबी करे जबतक बाहर निकलकर नुकुटीको स्पर्ग न करें सबतक यह विधि कग्ता रहे । १ ॥। स्नुहीपत्रनिभ शस्त्रं सुतीक्षणं स्त्रिग्धनिर्मलम्। समादाय ततस्तेन रोममात्रं समुच्छिनेत् ॥ २।। छेदन कहते हैं कि थूहग्के पत्रके समान अति नौक्षण, सचिकण निर्मल शस्त्रमे जिद्वाके नीचेकी नसको रोममात्र छेदन करे। २ ॥। ततः सैन्धवपथ्याम्यां चूर्णिताम्यां प्रघर्षयेत्। पुनः सप्तदिने प्राप्ते रोममात्रं समुच्छिनेत्॥ ३।। तिमके पीछे मेंधानमक और हग्डका चूर्ण छेदिन म्थानपर मले, परंतु योगीको लवणनिषेध है इमलिय लवणके स्थान खदिर (कत्था) मे कार्य करना योग्य है. ऐमे सायंप्रातः मात दिन करके फिर पृर्वोक्त विधिमे गेममात्र काटे पुनः उक्त औषधी लगाता र्हे ॥ ३॥ एवं क्रमेण पण्मासं नित्यं युक्त: समाचरेत्। पण्मासाद्रसनामूलशिलां बन्धः प्रण्यति॥४॥ नमे छः महीनेपर्यत नित्य युक्तिसे करे तो जिद्दामूलकी नाडी जो जिद्वाको कपालकुहरमं पहुँचानेमे गेकती है वह सुखपृर्वक कट जाती है॥४ ॥ कर्लां पराङ््सुखों कृत्वा त्रिपथे परियोजयेत्। सा भवेत् खेचरी मुद्रा व्योमचकं तदुच्यते ॥५॥ जिद्वाको तिछों करके तीनों नाडियोंका मार्ग जो कपालछिद्र उसमें योजित करे यह खेचरीमुद्रा है इसीको व्योमचक्रभी कहते हैं । ५ ॥। रसनामूर्ध्वंगां कृत्वा क्षणार्धमपि तिष्ठति। विषैर्विमुच्यते योगी व्याधिमृत्युजरादिभिः ॥६॥ तालुके ऊपर छिद्रमें जिहापवेश करके एक घडीमात्र खेचरी मुद्रा स्थिर ग्हे तो योगीको सर्प विच्छू आदियोंका विष न लगे और क्ष
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३८ गोरक्षपद्धति ।
बुढापा, रोग, मृत्युको जीते, वलीपलित (जो बुढापमें चर्म ढीला होकर सलवटें पडती है) न होव ॥। ६।। ऊर्ध्विह्धः स्थिरो भूत्वा सोमपानं करोति यः। मासार्द्देन न संदेहो मृत्युं जयति योगवित । ७॥। तालुके ऊपर छिद्रके मन्मुख जिह्वा लगाय स्थिग करके स्रमध्य- गत चंद्रमासे निकले अमृतका पान जो योगी करे वह १ पक्ष (१५ दिन) में मृत्युको निःसंदेह जीत लेता है यह निश्चय है॥।७॥ नित्यं सोमकलापूर्ण शरीरे यस्य योगिनः । तक्षकेणापि दृष्टस्य विषं तस्य न सर्पति ॥ ८ ।। और जिस योगीका शरीर नित्य उक्त चंद्रामृतकरके पृर्ण हो जाय तो तक्षकनागभी उसे डसे तौभी विष न लगे, दुःख न होवे॥८ ।। इन्धनानि यथा वह्निस्तैलवर्ति च दीपकः। तथा सोमकलापूर्ण देही देहं न मुश्चति॥९ ॥ जैसे अग्नि काष्टको एवं दीपक तेलमहित बत्तीको नहीं छोडतह तैसेही चंद्रामृतपृग्ति देहको जीव कदापि नहीं छोडता ॥ ९ ॥ गोर्मांसं भक्षयेत्नित्यं पिबेदमरवारूणीम्। कुलीनं तमहं मन्ये इतरे कुलघातकाः॥ १०॥ आचार्य कहते हैं कि जो योगी नित्य गोमांसभक्षण एवं अमर- वारुणी पान के तो उमे हम उत्तमकुलमें उत्पन्न समझने हैं अन्यथा कुयोगी, कुलनाशक है सत्कुलमं उत्पन्न हुएभी तो उनका जन्म व्यर्थ है ॥ १० ॥ गोशव्देनोदिता जिह्वा तत्प्रवेशा हि तालुनि। गोमांसभक्षणं तत्तु महापातकनाशनम्॥ ११॥ इस गोमांसशब्दका अर्थ कहते है कि गोशब्द यहां जिह्राका बोधक है जिह्वाको कपालछििद्रिमें प्रवश करनेको गोमांसभक्षण कहते हैं, यह महापातकोंका नाश करता है। ११ ॥
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भाषानुवादसहिता-श० १। ३९
जिह्वा परषेश्ञासंभुतवह्निनोत्पादितः खलु। चन्द्रातस्रवति यः सारः सा स्यादमरवारुणी ॥१२॥ अमरवारुणीका अर्थ यह है कि तालुके ऊपर छिद्रमें जिह्वाका प्रवेश उष्मा (गर्मी) से त्रुकुटिकें भीतर वामभागस्थित चंद्रामृत द्रवित होकर जिह्वाग्रमें प्राप्त होता है इसे अमरवारुणीपान कहते हैं ॥१२॥ चुम्बन्ती यदि उम्बिकाग्रमनिशं जिह्वा सरस्यन्दिनी सक्षारा कटुकाम्लदुग्धसदशी मध्ाज्यतुल्या तथा। व्याधीनां हरणं जशन्तकरणं शस्त्रागमोद्रीरणं तस्य स्याद्मरत्वमष्टगुणितं मिद्धाङ्गनाकर्षणम् १३।। जब पूर्वोक्तकमोंमे जिह्वा बढायके उक्त विधिसे चंद्रामृत पान करने लगनी है तो मुखमं लवणसहित मग्चिादि, चिंचाफलादि. दूध, मधु, घृतके आदि स्वाद आपसे ज्ञात होते हैं तब योगीके रोग तथा वृद्धावस्थाका नाश होता है शस्त्र (जो अपनेको काटने आया) का निवारण होता है आठों सिद्धि मिलती है देहभाव मिलता है सिद्धांगनाओंके आकर्षणकी सामर्थ्य होती है॥ १३ ।। मूर्ध: षांडशपत्रपझगलितं प्राणापवातं हठादूर्ध्वा- स्यो रसनां नियम्य विवरे शक्तिं परां चिन्तयन्। उत्कल्ोलकलाजलं च विमलं धारामयं यः पिबे- त्रिव्याधि: स मृणालक्ोमलवपुर्योगी चिर जीवति १४ जिद्वाको कपालछिद्रमें लगाय मुख विपरीतकरणीके तरह ऊंचा कर कुंडलिनीके ध्यानसहित प्राणायामसे भ्रुकुटमिध्य द्विदलकम- लके नीचे कंठस्थ षोडशदलकमलम हृदययोगसे प्राप्त जो निर्मल- धारामय तरंगसहित चंद्रामृतरस है इसे योगी पान करे उसको ज्वरादिरोग न होते तथा कमलके गाभेकामा कोमल शरीर होकर बहुतकालपर्यत जीवे ।। १४ ॥
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४० गोरक्षपद्टानि ।
यत्प्रालेयं प्रहितसुषिरं मेरुमूर्धान्तरस्थं तस्मिन्तत्त्वं प्रवदति सुधीस्तन्मुखं निन्नगानाम्। चंद्रात्सार: स्त्रवति वपुषस्तेन मृत्युर्नराणां तद्भ्रीयात्सुकरणमथो नान्यथा कार्यसिद्धि: ।।१५।। मेरुपर्वतसदश सबसे ऊंची सुषुम्णाके उपरिभागमें स्थित चंद्रा- मृतरूप जल जिसमें स्थित है एमे छिद्रमें सत्वगुणात्मा बुद्धि करके आत्मतत्व है और गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदासंज्ञक इडा, पिंगला, सुषुम्णा, गांधारी आदि नाडियोंका उत्तविवरमें मुख है इनके द्वारा चन्द्रमंडलगत अमृत व्यर्थ चले जानेसे शरीर जरा मृत्युको प्राप्त होता इसलिये प्रथम कह आये हैं कि सुकरण नाम खेचरीमुद्रा करके चंद्रामृत व्यर्थ स्रवित नहीं होनेमे मृत्यु नहीं होती. इस मुद्राके विना देहकी मिद्धि, लावण्य, बल, वज्रममान दृढ शरीर नहीं होते॥ १५॥ सुपिरज्ञानजनकं पश्चस्रोत्तःसरमन्वितम् । तिष्ठते खेचरीमुद्रा तस्मिन् शून्ये निरञ्रने ॥ १६ ॥ इडा १ पिंगला २ सुषुम्णा ३ गांधारी ४ हस्तिजिह्वा ५ इनका प्रवाह ऊपरको है सो इनके प्रवाहसंयुक्त आत्माको साक्षात् प्रकट रहनेवाला विवर है सो अविद्या एवं अविद्याके कार्य शोक, मोहादि दूर होते हैं जिसमें ऐसे विवरमें खेचगी मुद्रा स्थित होती है॥ १६॥ एकं सृष्टिमयं बीजमेका मुद्रा च खेचरी। एको देगे निरालम्ब एकावस्था मनोन्मनी ॥१७॥ ममम्न बी५ मुख्य सृष्टिरूप एक प्रमाण वह है समस्तदेवताओंमें भगवान् सुख्य है तैसेही समस्त मुद्राओंमें खेचरी मुख्य है॥ १७ ॥ उडयानं कुरुते यस्मादविश्रांतं महाखगम्। उड्डीयानं तदेव स्थान्मृत्युमातङ्रकेसरी॥ ७७॥
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भाषानुवादसहिता-श० १। ४१
जिम कारण उड्डीयानबंधसे रुका प्राणवायु कहींभी विश्राम न कके उडके जैसा सुषुम्णामे गति करता है उसी कारण तहां मृत्यु- रूपी मजके ऊपर सिंह जैसा यही बंध कहाता है॥। ७७॥। उदरात्पश्िमे भागे अधो नाभेर्निगद्यते। उड्डीयानो ह्ययं बन्धस्तत्र बन्धो निगद्यते।।७८।। उड्टीयानबंधका स्थान कहते हैं, कि उदरमे पश्चिम और नाभीसे नीच इस बंधका स्थान योगी कहते हैं इसलिये यह बंध उसी स्थानरमें कतना योग्य है।। ७८॥ ग्रन्थान्तरें। उदूरे पश्चिमं स्थानं नाभेरुर्ध्व च कारयेत्। उड्डीयानो हयसौ बन्धो मृत्यु मातंग केसरी।। १॥। नाभीका ऊपग्ला तथा नीचला भाग उदरमं लग जाय ऐमे पेटको पोछ बवीच इमे उड्डीयानबंध कहते है. मृत्युरूपी गजको निवृत्त ऋतेके लिये मिंह ममान है॥ १॥ उड्डीयानं तु सहजं गुरुणा कथितं सदा। अभ्यसेत्सततं यस्तु वृद्धोऽपि तरुणायते॥२॥ हिनोपदेशकर्त्ता गुरुकरके महज म्वभाव कहा गया ऐसे इस बंधको निग्तर अभ्याम करे तो वृद्धभी तरुण हो जावे ।। २ ।। नाभेरुर्व्वमधश्रापि स्थानं कुर्यात्प्रयत्नतः । षण्मासमम्पसेन्मृत्युं जयत्येव न संशयः ॥ ३ ।। नाभी ऊर्ध्बाध भागोंको खींचकर पीठमें लगावे, ऐसे इस बंधको छः महीनेपर्येत निरंतर अभ्याम करे तो निम्संदेह मृत्युको जीते ॥ ३ । सर्वेषामेव बन्धानामुत्तमो ह्युड्डियानकः। उड्डियाने दढे बन्धे मुक्ति: स्वाभाविक्री भवेत् ॥8॥
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४२ गोरक्षपद्धति ।
संपूर्ण बंधोंमें र ड्वीयानबंध उत्तम है यह दृढ हा जाय तो स्वभावसिद्ध मुक्ति होती है इसके करनेसे पक्षियोंकेसी गतिकरके सुपुम्णाद्वारा प्राण मस्तिष्कमें ले जानेसे समाधिमें मोक्ष होता है यही स्वाभाविक मुक्ति है॥। ४॥ बभ्नाति हि शिरोजालं नाधो याति नभोजलम्। ततो जालंधरो बन्धो कण्ठदुःखौघनाशनः॥७९॥ जालँधरबंध कहते हैं कि यह बंध कंठस्थानमं होता है अनेक रोगोंको हरता है शरीरस्थ नाडीजालका बंधन करता है व्यामच- ऋस्थ चंद्रकलामृतको कपाल कुहरसे नीचे नही गिग्ने देता इम कारण वह जालंधर बंध कहा है।। ७९ ।। जाउंधरे कृते बन्धे कण्ठसंकोचलक्षणे। न पीयूषं पतत्यग्ी न च वायु: प्रकुप्यति ॥ ८ ॥। कंठका संकोचन करके प्राणवायुकी गतिको गेकना जालंधर बंध है इससे चंद्रकलामृत गिरके सूर्यरूप अग्निमं नहीं पडना एवं वायु कदाचित् विरुद्ध नहीं होता ।।८0 ।। ग्रन्थान्तने !
कण्ठमाकुञ्च्य हृदये स्थापयेच्चिबुकं हढम्। बन्धो जालंधराख्योऽयं जरामृत्युविनाशकः॥५॥ ग्रंथातरसे जालंधरबंध कहते हैं कि कंठ नीचे नवाय हृदयक चार अंगुल अंतर ठोढी लगाय दृढ स्थापन करे यह जालंधग्बंध वृद्धा- वस्था तथा मृत्युनाशक है॥ १ ॥ कण्ठसंकोचनेव द्वे नाडयौ स्तंभयेदृढम्। मध्यचक्रमिदं ज्ञेयं षोडशाधारबन्धनम् ॥२ ॥ दढ़ संकोचनमात्र करके इडा पिंगला दोनहूं नाडी स्तंमित होती हैं कंठस्थानमें जो विशुद्धनामा चक्र है वह अंगुष्ठादि ब्रह्मरं-
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भाषानुवादसहिता-श० १। ४३
ध्रांत षोड्डश आधारोंका मध्यम चक्र है इन १६ आधारीका वर्णन पूर्व १३ श्रोकके टीकामें कर आये हैं ॥ २ ॥ मूलस्थानं समाकुष्च्य उड्डीयानं तु कारयेत्। इडा च पिंगलां बडा वाहयेत्पश्चिमे पथि॥ ३॥ नाभिको पश्चिमतानरूप उड्डीयानबंध करे और कंठ नमाय जालं धरबंधसे इडा पिंगला नाडियोंको स्तंभन करे तदनंतर पश्चिममार्ग सुषुम्णामें प्राणवायुको प्राप्त करे ॥ ३ ।। अननेव विधानेन प्रयाति पवनो लयम्। तता न जायते मृत्युर्जगरेगादिकं तथा॥ ४ ॥ इस विधिमे नायुकी गनि बंद होक प्राणवायु स्थिर होकर ब्रह्मरंध्रमें स्थित रहता है, इस प्राणलय कहते हैं इससे मृत्यु जग, रोग, देहकी त्रिवली, श्वेतरोगता, मृछा, आलस्यादिक नहीं होते हैं॥ ४ ।। बंधत्रयमिदं श्रेष्ठं महासिद्धेश्च् सविनम्। सर्वेषां हठतंत्राणां साधमं योगिनो विदुः ॥ ५॥ मूलबंध १ उड्डीयानबंध २ जालंधरबंध ३ ये श्रेष्ठ है मत्स्येद्रादि महासिद्ध वसिष्ठादिमुनि इन्हें सवन करते है, हठके उपायोंके सिद्धिको प्रगट करते हैं इससे गाग्क्षादि मिद्ध इन्हें जानत है ॥५॥ यत्किंचित्त्रवते चंद्रादमृतं दिव्यरूपिण: । तत्स्वे ग्रसते सूर्यस्तेन पिण्डो जरायुतः ॥६॥ तालुके मूलमें स्थित दिव्यरूप चंद्रमामे बलुक अमृत स्रवित हाता है उसे नाभिस्थित अग्निरूप सूर्य ग्राम कर लेता है तब देहको वृद्धावस्था होती है॥ ६ ॥ तत्रास्ति करणं दिव्यं सूर्यस्य मुखवश्चनम्। गुरूपदेशतो ज्ञेयं न तु शास्त्रार्थकोटिभिः॥७॥
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४४ गोरक्षपद्धति ।
इम प्रकरणमं उक्तसूर्यके मुखवंचना अर्थात् जिससे उक्त अमृत सूर्यके मुखम न पडे यह युक्ति कही है नथा विपरीतकरणी मुद्राभी (जो आगे कहेंगे) इसके उपयोगी है ये मर्व गुरुमुखसे जाने जाते हैं विना गुरु कोटिमंख्याक शास्त्रके अर्थमेंभी न जाने जाते है।। ७।। पार्ष्णिभागेन संपीडच योनिमाकुश्चयेद्गुदम्। अपानमूर्ध्वमाकृष्य मूलबंधो विधीयते ॥८१ ॥ अपानवायु ऊपर खींचके प्राणवायुमे योजित करना, पादकी एडीमे गुदा, एवं लिंगके मध्य योनिम्थानको दढ अचतक गुद्द्वार को दढ संकुचित कग्ना जिसमे अपानवायु बाहग न निकल इस प्रकार मूलबंध होता है।। ८१ ॥ अपानप्राणयोरैक्यात् क्षयो मूत्रपुरीषयोः। युवा भवति वृद्धोऽपि सततं मूलबन्धनात्॥८२ ॥। अपान और प्राणवायुका ऐक्य कर जो निग्तर मूलबंधका अ- भ्याम करता है उमके मल मृत्र श्रय होते हैं और बूढाभी जवान हो जाता है।। ८२।। "गोरक्षमंहितंप दशमुद्राओमिसे महामुद्रा ४ खचगी २ उड्डी- य्ान ३ जालंधरबंध 6 मृलबंध ५ कही है अन्य महाबंध १ महावेध २ विपगीतकरणीमृद्रा २ वज्रोली ४ गकििचालन ५ ये पांच इसी शनकमें माधारणप्रकार पुर्वही कह आये हैं नथापि विशेष प्रकटताके लिये में उन्हें ग्रन्थांतग्मतसेभी लिखना हूं'- तत्र प्रथमं महाबन्धः । पार्ष्णि वामस्य पादस्य योनिस्थाने नियोजयेत्। वामोरूपरि संस्थाप्य दक्षिणं चरणं तथा ॥। १ ।। वामपादकी एडीमे योनिम्थानकों गेधक दक्षिणपाढ़ उममे ऊपर स्थापन करे अर्थात मृलबंध करके ॥। १॥
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भाषानुवादसहिता-श० १। ४५
पूरयित्वा ततो वायुं हृदये चिचुकं हढम्। निष्पीडय वायुमाकुंच्य मनोमध्ये नियोजयेत् ॥२॥ तब जालंधरबंध कर्के वायुकी पूरकर मनको मध्यनाडी सुषुम्णामे प्रवृत्त करे ॥ २ ॥। धारयित्वा यथाशक्ति रेचयेदनिलं शनेः । सव्याङ्गे तु समभ्यस्य दक्षाङ्गे पुनरम्यसेत् ॥ ३॥ यथाशक्ति कुंभक करके मंद २ रेचन करे एमेही वामांगमें अभ्याम करे दोनों अंगोंके अभ्यासकी संख्या समान करे॥ ३ ॥ अयं तु सर्वनाडीनामूध् गतिनिरोधकः। अयं खलु महाबन्धो महासिद्धिप्दायकः ॥४॥ यह समम्त नाडियोंकी उपरकी गतिरोधक महासिद्धिदायक महाबंध है॥ ४ ॥ कालपाशमहाबन्धविमाचनविचक्षणः। त्रिवेणीषंगमं धत्ते केदारं प्रापयेन्मनः ॥५।। मृत्युपाशको काटनेवाला है, इडा. पिंगला, सुषुम्णा तनिकि संगम (त्रिवेणी) धारण कर मनको (केंदार) भ्रुकुटी शिवस्थानम प्राप्त करे।। ५।। रूपलावण्यसंपन्ना यथा स्त्री पुरुषं बिना। महामुद्रामहाबन्धी निष्फलो वेधवर्जिता ॥६॥ जैसे कांति, गुण, शोभायुक्त स्त्री पुरुष विना व्यर्थ है ऐसही महावेध विना महामुद्रा'और महाबंध निष्फल हैं इसलिये अब महावेध कहते हैं॥। ६ ।। अथ महावेधः । महाबन्धस्थितो योगी कृत्वा पूरकमेकधीः । वायूर्नां गतिमावृत्य निवृतं कण्ठमुद्रया ॥१॥।
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४६ गोरक्षपद्दति ।
एकाग्रबुद्धि करंक योगी महावेध इस प्रकार करे कि, नासापुटसे पूरक करके जालंधर बंध कर वायुकी ऊर्ध्वगतिको रोक कुंभक करे ॥ १ ॥ समहस्तयुगो भूमौ स्फिचौ संताडयेच्छनैः । पुटद्वयमतिक्रम्य वायुः स्फुरति मध्यगः ॥२॥ दोनोंहूं हाथोंकी हथेली समान पृथ्वीमें धरके पादकी एडीको यो- निस्थानमें दृढ़ लगाय हाथोंके महारे पृथ्वीसे कुछेक शरीर उठावे (परंतु जैसे मूलबंध मुद्रा न खुले) फिर मंदमंद पृथ्वीके अपने शर्गगसन स्फिचको ताडन करे इससे वायु इडा पिंगलाको उल्लंघन कर सुषुम्णामें प्राप्त होता है इस मुद्रामें म्वानुभवसे तथा हरि्गुरूपदिष्ट मार्गसे कहता हूं कि शगीर पृथ्वीसे उठायकर पृथ्वीमें ताडन कग्नेमें उक्त मुद्रा दृढ नहीं रह सकती. यदि बलसे रक्खाभी तो मूलबंध विगड जाता है इससे सुगम तो पदमासनसे यह कार्य सुखर्पूवक होता है औरभी सुभीता यह है कि हाथोंके जोरसे शरीर उठानेमें मूलबंध सुगमताहीसे होता है॥ २॥ सोमसूर्याग्निसंबन्धो जायते चामृताय वै। मृतावस्था समुत्पन्ना ततो वायुं विरेचयेत् ॥ ३ ॥। इस विधिसे सूर्यचंद्रमा अग्न्यात्मका इडा पिंगला सुषुम्णाका संयोग मोक्षके हेतु है ऐसे होनेमें मरा हुआ जैसा मृनावस्था होती है तब नासिकापुटमें मंद २ रेचन करे॥ ३ ॥
वलीपलितवेपन्ः स्ेव्यते साधकोत्तमैः ॥॥ इस महावेधके अभ्यास करनेसे अणिमादि अष्टसिध्धि मिलती हैं। वली (बुढापेमें मुखपर सलवटें पडनी) पलिन (बाल श्वेत होने) कंप (बुढापेमें शरीर कांपना) ये उक्त अभ्यामीको नहीं होते ॥ ४ ॥
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भाषानुवादसहिता-श० १। ४७
एतत्रयं महागुह्यं जरामृत्युविनाशनम्। वह्निवृद्धिकरं चैव ह्यणिमादिगुणप्रदम् ॥५॥ ये महामुद्रा, महाबंध, महावेध गोप्य हैं बुढापे तथा मृत्युको दूर करने हैं जाठराग्निको बढाते हैं अष्टसिद्धि देते हैं ॥ ५ ॥ अष्टधा क्रियते चैव यामे यामे दिने दिने। पुण्यं संभारसंधाषि पापोघभिदठुरं सदा। सम्पक्छक्षावतामेवं स्वल्पं प्रथमसाधनम् ॥ ६॥ आठो प्रहग्में ८ ही वार इनका अभ्यास करे ये पुण्यको बढाते हैं ापसमूहको वञ्रके ममान सुखाते हैं शिक्षावान् पुरुषको इम प्रकार दिन २ प्रहर २ में थोडा २ करके अभ्यास करना योग्य है।। ६ ॥ अथ विपर्रीतकरणमुद्रा। ऊर्ध्व नाभेरेधस्तालोरूर्ध्व भातुरध: शशी। करणी विपरीताख्या गुरुवाक्येन लभ्यते॥। १ ॥ अब विपरातकरणी मुद्रा कहते हैं कि, ऊपरको नाभि नीचे तालु- कर के नाभिस्थ सूर्य ऊपरको भ्ुक्कुटिस्थ चंद्रमा नीचेको हो जाता है इसमे चंद्रामृत सूर्यरूप अग्निमें नहीं पडने पाता यह विपरीतकरणी मुद्रा है यहां ग्रंथक्त्ताने उदाहरण कुछेक लिखकर लिखा गुरुलक्ष्यपर निर्भर छोड दिया. इसलिये में (भाषाकार) अपने अनुभव एवं हरिगरूपदिष्टमागसे लिखता हूं कि, दोनोंहूं पैरोंसे पद्मासन बांधकर दोनोंहूं हाथ और शिर (चोटी) को पृथ्वीमें लगाय, उक्त पद्मासनको ऊपर अंतारिक्षमं खडा करे अभ्यास हुयेमें कभी तो उस पद्मासनको खोल पांव आकाशमें लंबे करे कभी फेर वैसेहीमें पद्मासन करे हाथ और शिरके सहारे उलटा खडा रहे तब यह मुद्रा होगी अभ्या- ममे सुगम हो जाती है॥ १ ॥
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४८ गोरक्षपद्धाति।
नित्यमभ्यासयुक्तस्य जठराग्निविवर्द्धिनी। आहारो बहुलस्तस्य संपाद्यः साधकस्थच ॥२।। जो इस मुद्राका नित्य अभ्यास करता है उसकी जउरााग्रि वढती है, उस साधकको आहार बहुत (यथेच्छ) करना चाहिये ।। २ ।। अल्पाहारो यदि भवेदगिर्दइति तत्क्षणात्। अधःशिराश्रोर्थ्वपादः क्षणं स्थात्प्रथमे दिने ॥ ३ ॥ इस मुद्राका अभ्यामी यदि भोजन अल्प करे तो जठगग्न प्रज्वलेत होकर देहको फूंकती है: अब क्रिया है कि पहिले दिन शिर पृथ्वीमें रखकर पैर ऊपरको क्षणमात्र करे ।। ३ ॥ क्षणाच्च किंचिद्धिकमभ्यसेच्च दिने दिने। वलितं पलितं चैव षण्मासोर्ध्व न हइयते। याममात्रं तुयो नित्यमभ्यसेत्स तु कालजित् ॥४।। फिर प्रतिदिन एक एक क्षण बढायके अभ्यासमे साधे ता मिढि भयेमें वली पलित छः महीनेमें दूर हो जाते हैं. जो प्रतिदिन एक २ प्रहरपर्यन्त इसको करता वह कालमृत्युको जीतता है॥ ४ ॥ अथ वज्रोली। स्वेच्छ्या वर्तमानोऽपि योगोक्तैनियमौरवेना। वञ्रोलीं यो िजानाति स योगी सिद्धिभाजनमू॥3 ॥ अब वज्रोली मुद्रा कहते हैं कि जो योगोक्त नियम नहीं जानता हुआभी अपनी इच्छासे वज्रालीको जान वह आणिमा मिद्धि थाता है॥ १ ॥ तत्र वस्तुद्वयं वक्ष्पे दुर्लभं यस्य कस्थचित्। क्षीरं चेकं द्वितीयं तु नारी च वशवर्तिनी ॥२॥ इस मुद्रामें हरकिसीको दो वस्तु दुर्लभ हैं विशेषतः ये २ अवश्य चाहिये. वज्रोल्यर्थ संगमोत्तर दुग्धपान, एवं वशवर्रतिनी स्त्री ये दोे उपयोगी हैं । २ ॥।
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भाषानुवादसहिता-श. १। ४९
मेहनेन शनेः सम्यगूर्ध्व कुश्चनमभ्यसेत्। पुरुषोऽप्यथवा नारी वञ्रोलीं सिद्धिमाप्तुयात् ॥ ३ । संगम करके मंद मंद क्षरितवीर्यको इंद्रियसंकोचनकरके ऊपर खें चनेके अभ्याम सिद्ध हुएमें वज्राली मुद्राकी सिद्धि प्राप्त होती है।।३।। यत्रतः शस्तनालेन फूत्कारं वञ्रकन्दरे। शनैः शनैः प्रकुर्वीत वायुसंचारकारणात् ॥४॥ इसकी पूर्वागक्रिया कहे है कि चांदी वा कांचकी १४ अंगुल खोखरी शलाका सच्छिद्र कर जो १२ अंगुल सरल २ अंगुल तिरछी रहे उसे लिंगछिद्रम प्रतिदिन २ । २ अंगुल प्रवेश कर एक किनारेसे फूंककर वायु प्रवश कर्ते २ बारह दिनमें २४ (?) अंगुल प्रवेश कं इससे इंद्रियमार्ग शुद्ध होता है तब इस मार्गेसे जलके आकर्षणका अभ्यास कर अभ्याम सिद्ध हुएमें वीर्यका आकर्षण करे तो सिद्धि होती है. जिसको खेचरी एवं प्राणजय सिद्ध हों उसको वज्रोली सि्दि होती है॥ ४ ॥ नारीभगे पतद्विन्दुमभ्यासेनोध्वमाहरेत। चलितं च निजं बिन्दुमूर्ध्वमाकृष्य रक्षयेत् ॥५॥ स्त्रीसंयोगमें जब बिंदु (वीये) शरीरमे चलायमान होतेभी उसे उक्ताभ्याससे ऊपरको खींच लेवे अथवा जब भगमें गिर पंड तब स्त्रीके रजसहित बिंदुको आकर्षण कर ऊपरको चढायकर स्थापन करे ॥ ५ ॥ एव सरक्षयेद्विन्दुं मृत्युं जयति योगवित्। मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दुधारणात् ॥ ६ ॥ इस प्रकार जो बिंदुकी रक्षा करता है सो योगी मुत्युको जीनता है बिंदुके पतनसे मृत्यु, उसकी रक्षासे अमरत्व होते हैं इसलिये इन विधिसे बिंदुको स्थापन कंरं ॥। ६ ॥। सुगन्धो योगिनो देहे जायते बिन्दुधारणात्। याव्विंदुः स्थिरो देहे तावत्कालभयं कुतः॥॥
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५० गोरक्षपद्धति।
उक्त अभ्यासीके शरीरमें बिंदुधारणसे सुगंधि प्रकट होती है और जबलों देहमें बिंदु स्थित है तबलों कालभय नहीं होता ।। ७।। चित्तापत्तं नृणां शुकं शुकायत्तं च जीवितम्। तस्माच्छुकं मनश्चैव रक्षणीयं प्रयत्नतः ॥८।। वीर्य चित्तके अधीन है. चित्तके चलायमान होनेसे वीये चलाय- मान और स्थिरतासे स्थिर होता है एवं शुकके अधीन जीवित है इससे स्थिरतासे जीवित स्थिर और चलायमान होनेमे मरण होता है, इसलिये शुक्र और मनकी रक्षा करनी मुख्य है ॥ ८ ॥ ऋतुमत्या रजोऽप्येवं बीजं बिन्दुं च रक्षयेत्। मेट्रेणाकर्षयेदूर्व सम्यगभ्यासयोगवित् ॥ ९॥ ऐमही रजोवती स्त्रीक गजको विंदुमहित आकर्षण करके ऊपरको कवांचक स्थापन करे ऐसे वज्रोलीका अभ्यास करनेवाला योगवेत्ता होता है॥ ९ ॥ 'एक प्रकारके भेद वञ्तोलीके महजोली, अमगेलीभी हैं अतः प्रथम महजोली कहते हैं- सहजोलिश्वामरोलिवज्रोल्या भेद एकतः । जले सुभस्म निक्षिप्य दग्धगोमयसंभवम् ॥ १॥ जो वज्रोलीके फल वही महजोली अमरोलीकेभी हैं इसलिये येभी उमीके भेद हैं, गोबरके (कंडे) गोपट्टे जलायक भस्म जलमें मिलावे१॥ वज्रोलीमैथुनादूर्ध्व स्त्रीपुंसो स्वांगलेपनम्। आसीनयोः सुखेनैव मुक्तव्यापारयोः क्षणात् ॥ २ ॥ वञ्रोली अर्थ मैथुन करके क्षणमात्र सुखसे बैठके व्यवाय व्यापार छोडके उक्त भस्म जलमें मिलाय स्त्रीपुरुष अपने २ सर्वाग लेपन के ॥ २ ॥
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भाषानुवादसहिता-श० १। ५१ सहजोलिरियं प्रोक्ता श्रद्धेया योगिभि: सदा। अयं शुभकरो योगो भोगयुक्तोऽपि मुक्तिदः ॥ ३ ॥ यह मत्स्येंद्रादि योगीश्वगने सहजोली कही है यह योग शुभकारक हे अन्यत्र साधनाओमें जहां भोग तहां मोक्ष नहीं जहां मोक्ष नहां मोग नहीं इम मुद्राके अभ्यासमें भोगसहित मोक्ष भी है ॥ ३ ॥ अयं योग: पुण्यवतां धीराणां तत्त्वदर्शिनाम्। निर्मत्सराणां सिद्धचेत नतु मत्सरशालिनाम्॥४॥ जा योगी पुण्यवान, धैर्यवान्, तन्वदर्शी और निर्मत्सरी है नकों मिद्द होता है जो मत्मरी (अन्यशुभद्वेषी) है उनको सफल नही होता ॥ ४ ॥ 'अब दूमग भेद व अमंगली करते हैं'- पित्तोल्वणत्वात्प्रथशम्बुधारां विहाय निःसारतया- न्त्यधाराम्। निषेव्यतेशतिलमध्यधारां कापालि- के खण्डमतेऽमरोली ॥ १ ॥ शिवांवुक प्रथमधाग पित्तके उष्णतासे नथा अंत्यधारा निःसार- नाम न्यागकर निर्विकार मध्यधागको ग्रहण कर सेवन करते हैं यह योगाभिमन कापालिकी क्रिया है इसे अमगेली कहते हैं. यद्ा (का- पालिक) कनफटे जोगियोंका (जिमे खंडमत कहते हैं) यह कर्म विशेषतः इष्ट है ॥ १॥ अमरीयं पिवेन्नित्यं नस्य कुर्वन् दिने दिने।
जो पुरुष अमग्वारुणी (जो खेचरीप्रकरणमें कही है) का पान करते हैं एवं नासभी अमरवारुणीका लेते हैं तथा प्रतिदिन वज्रों- लीका अभ्यास करें सोही कापालिकी अमगेली कही है ।। २।। अभ्यासान्निःसृता चान्द्री विभूत्या सह मिश्रयेत्। धाश्येदुत्तमांगेषु दिव्यदृष्टिः प्रजायते ॥ ३॥।
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५२ गोरक्षपद्धति।
अमरोलीके अभ्याससे निःसृत चंद्रसुधाको पूर्वोक्त भस्ममें मिला- यके उत्तमअंग मस्तक, नेत्र, स्कंध, हृदय, भुजादिमें धारण को तो भृत, भविष्य, वर्त्तमान देखने योग्य दिव्यदृा्टि हो जाती है॥ ३ ॥। अथ स्त्रीणां वज्रोली। पुंसो बिन्दुं समाकुश्च्य सम्यगभ्यासपाटवात्॥। यदि नारी रजो रक्षेद्रज्रोल्या सापि योगिनी॥१॥ अब स्तिरियोंको वज्रोलीमाधन कहत हैं कि, जो स्त्री अभ्यामकी चतुराईस पुरुषके बिंदुको खींचके अपने रजकी वज्रोलीमुद्रा कं्के रक्षा करे वहभी योगिनी कहाती है ॥ १ ॥ तस्याः किंचिद्रजो नाशं न गच्छते न संशय:। तस्याः शरीरे नादश्र बिन्दुता येन गच्छाते॥ २ ॥ उसके रजका नाश (पतन) निस्संदेह अल्पभी नहीं होता तथ। शरीरमें नादभी उत्पन्न होता है चंद्ररूप बिंदु सूर्यरूप रजक वाहर संयोगसे सृष्टि (गर्भ) होती है जब अभ्याससे भीतरही योग होय तो योगसिद्धि होती है पग्मपद मिलता है इनके संयोगमं समस्त देवता स्थिर रहते हैं ॥ २ ॥ स बिन्दुस्तद्रजश्श्रैव एकीभूय स्वदेहगौ। वज्रोल्यभ्यासयोगेन सर्वसिद्धिं प्रयच्छतः ॥ ३ ॥
देते हैं।। ३ ।। रज, बिंदुं वज्रोलीके अभ्याससे दहमें प्राप्त, होनेपर सर्व सिद्धि
रक्षेदाकुश्चनादूर्ध्वे मा रजः सा हि योगिनी। अतीतानागतं वोत्ति खेचरी च भवेत् ध्रुवम्॥४ ॥ जो स्त्री भगको आकुंचन करते करते रजको ऊपर शरीरमें चढाय रक्षा करे वह योगिनी होती है. भूत, भविष्य, वर्तमान जाने अंतरि- क्षमें बीच रहनेहारी वैमानिकगत मिलती है ।। ४ ॥
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भाषानुवादसहिता-श० १। ५३
देहिद्धिं च लभते वञ्रोल्यभ्यासयोगतः । अयं पुण्यकरो योगो भोगे भुक्तेऽपि मुक्तिदः ॥५॥ वज्रोलीके अभ्यासयोगसे (देहसिद्धि) रूप, लावण्य, बल, वज्र- संहननभाव मिलते हैं. यह योग पुण्य देनेवाला तथा विषयभोग भोगनेमभी मुक्ति देता है ॥ ५॥ 'इनम दश शकक्तिचालनमुद्रा प्रथम अजपा गायत्रीके उपरांत कह 1 आय हं अब इन १० का माहात्म्य कहते हैं'- इति मुद्रा दश प्रोक्ता आदिनाथेन शम्सुना। एकैका नासु यभिनां महासिद्धिप्रदायिनी॥१॥ ये दश (१०) मुद्रा आदिनाथ शिवने कही हैं इनमें एक एक मुद्रा योगीको आणमादि देनेहारी हैं ॥ १॥ उपदेशं हि मुद्राणां यो दत्ते सांपरदायिकम्। स एव श्रीगुरुस्वामी साक्षादीश्वर एव सः ॥ २ ॥ जो योगियोको (मांप्रदायिक) गुरुपरंपराप्राम इन मुद्राओंका उपटेश देवे वही सर्व गुरुमे श्रेष्ट, ्वामी, साक्षात् ईश्वर हैं ।। २ ।। तस्थ वाक्यपरो भूत्वा मुद्राम्यासे समाहितः। अणिमादिगुणैः सार्द्ध लभते कालवश्चनम् ॥३॥ इनके उपदेशकर्त्ता गुरुके आसन, कुंभक, आहार, विहार, चेष्टादि वाक्योंमं आदग्पूर्वक ग्रहण कर तत्पर ग्हे तो अणिमादि सिद्धि- योंको जीतकर कालमृत्युको जीते ॥। ३ ॥ अथ पणवाभ्यामः । पदमासतनं समारुह्य समकायशिरोधरः। नासाग्रदृष्टिरेकान्ते जपेदोङ्कारमव्ययम् ॥ ८३ ।। अब प्रणवके अभ्यासकी विधि कहते हैं कि एकांत स्थलमें बैठ- कर दृढ पद्मासन बांधके शगीर कंठ शिर मम (सरल) करके नासा- प्रहाष्ट निरंतर करके प्रणवजप के ।८३ ।।
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५४ गारक्षपद्धति।
भूर्युरवः स्विमे लोकाः सोमसूर्याग्रिदेवताः ॥ यस्य मात्रासु तिष्ठन्ति तत्परं ज्योतिरोमिति॥८४॥ जिस प्रणवके अकार उकार मकार तीन वर्णमें भृ: १ सुवः २ स्व: ३ ये लोक चन्द्रमा १ सूर्य २ अग्नि ३ देवता रहने हैं, वह प्रणब परमकारणरूप ज्योतिर्मय चैतन्यॐकारस्वरूप है॥ ८४ ॥ त्रयः कालास्त्रषो वेदास्त्रयो लोकास्रपः स्वराः। त्रयो देवाः स्थिता यत्र तत्परं ज्योतिरोमिति॥८९॥ जिस ग्रणवमं भूत, वर्तमान, भविष्य ३ काल, ऋकू, यजु:, साम तीनों वेद, स्वर्ग, मृत्यु, पाताल ३ लाकः उदात्त, अनुदात्त, स्वग्ति ३ स्वर, ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर नीन ढवता रहते हैं वह प्रणव (अँकार) स्वरूप परंब्रह्म ज्योतिम्वरूप है॥ ८५ ॥ क्रिया इच्छा तथा ज्ञानं ब्राह्मी रौद्री च वेष्णी। त्रिधा शक्ति: स्थितायत्र तत्परं ज्योतिरोमिति॥८६।। जिस प्रणवके अ, उ, म, नीन मात्रा क्िया, इच्छा, ज्ञान शक्ति भेदोंकर्के ब्रह्माणी, रुद्राणी, वैष्णवी ये शक्ति रहती है मो प्रणव आंकारस्वरूप पगब्रह्म ज्योति है ॥ ८६ ॥ अकारश्र उकारश्र मकारो बिन्दुसंज्ञक । त्रिधा मात्रा स्थिता यत्र तत्परं ज्योनिगोमिति।८७। त्रिलोकात्मा अकार उक्कार और बिंदुस्वरूप मकार तीनहं मात्रा रहती हैं जिममें ऐसा ब्रह्मज्योतिम्वरूप प्रणव है ॥ ८७॥ वचसा तज्नपेद्दीजं वपुषा तत्समभ्यसेत्। मनसा तत्स्मरेन्नित्यं तत्परं ज्योतिरोमिति॥८८।। इस प्रणवको सकल जगत्काग्ण भूतभावना करके वचनमे जप करना शरीरमे सिद्धासनादिमें समुण ब्रह्मकी भावना करके पणवार्थ समझ अभ्यास करना तथा मनमे परंब्रह्मस्वरूप प्रकाश चैनन्य सम- झके सर्वदा स्मग्ण कग्ना ॥। ८८ ॥
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भाषानुवादसहिता-श० १। ५५
शुचिवांष्यशुचिर्वापि योजयेत्प्रणवं सदा। न स लिप्यति पापेन पझपत्रमिवाम्भसा ।।८९।। जो योगी बाह्याभ्यंतर शौचयुक्त वा बाह्यशौचमात्र यद्ा जैमे तैसे होकर प्रणवका अर्थ समझ अभ्यासमे जप करता है उमको शारीरकपाप स्पर्श नहीं करते. जैसे कमलदल जलमें रहता है परन्तु जल उसके पत्रको स्पर्श नहीं कर सकता ऐमेही उक्त विधिका भरण- बाभ्यासीभी निलेंप रहता है।। ८९ ।। अथ प्राणायामप्रकारः । चले वाते चलो बिन्दुर्निश्चले निश्चलो भवेत्। योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरुंधयेत्॥ ९० प्राणवायुके निश्वासोच्छरास होते रहतेमें बिंदुभी चलायमान होता है जो प्राणवायु स्थिर होगा तो बिंदु स्थिर हो जाता है, जब प्राण यामसे प्राणवायु स्थिर हो गया तो योगी चिरकाल योगाभ्यासग समर्थ होता है दीर्घजीवी तथा ईश (शित्र) भावको प्राप्त हो जाता है. इस सिये योगीको वायुनिराध करना मुख्य है॥ ९० ॥ यावद्वायुः स्थितो देहे तावजीवं न मुश्चति। मरणं तस्य निष्क्रान्तिस्ततो वायुं निरोधयेत।९१ जबलों शरीरमे वायु स्थिर रहता है तबलौं जीव शरीरको नहीं छोडता जब प्राणवादु शरीरसे निकल जाता है तो उसी अवस्थाकों मरण कहते है. जीवन मरण प्राणवायुके अधीन है, इसलिये प्राण- वायुका रोधन अवञ्य विधिसे करना चाहिये । ९१ ।। यावद्वद्दो मरुदेहे यावच्चितं निरामयम्। यावदृष्टिर्धुंवोर्मध्ये तावत्कालभयं कुतः ॥ ९२॥ जबतक प्राणवायु कुंभकमे देहमें स्थिर है तथा जबतक चित्त विषयवासना त्याग अन्तःकरण ईश्वराकार निर्विकार है और जबतक सूमध्यमें दृष्टि निश्चल है तबतक कालकी भय नहीं होती है ।।९२।।
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५६ गोरक्षपद्धाति।
अतः कालभयाङ्गह्मा प्राणायामपरायणः। योगिनो मुनयश्चैव ततो वायुं निरोधषेत्।। ९३।। जिस कारण जीवनमरण प्राणवायुके अधीन है इसी हेतु ब्रह्मा एवं सनकादि सिद्ध, दत्तात्रेयादि मुनि, प्राणायामके साधनमें तत्पर हैं अन्य योगियोंकोभी इस अभ्यामसे कालकी भय नहीं होती इस हतु प्राणायाम साधन करना योग्य है ।।९३ ॥ पट्तिंशदंगुलो हंसः प्रयाणं कुरुते बहिः। .... 1 वामे दक्षिणमार्गेण ततः प्राणोऽभिधीयते ॥ ९४ ॥ प्राणवायु अपानवायुरूप हंस इडापिंगलाके मार्गसे छत्तीस अंगुल बाहर निकलता है इस हेतु 'बहिः प्रयाणं कुरुते प्राणः' उक्तवायु प्राण कहाता है प्राणापानवायुरूप हंम है और नहीं ॥ ९४ ॥ शुद्धिगति यदा सर्वनाडीचक्ं मलाकुलम्। तदैव जायते योगी प्राणसंग्रहणे क्षमः ॥ ९५॥ जब शरीरके मलसे व्याप्त नाडीजाल, नाडीशोधन प्राणायामके प्रभावसे शोधके शुद्ध निर्मल होता है तव योगाभ्यामोपयोगी प्राण वायुको थामनेकी सामर्थ्य योगीको होती है अन्यथा नहीं ॥ ९५॥ अथ नाडीशोधनप्राणायामविधिः । बद्धपझासनो योगी प्राणं चन्द्रेण पूरयेत्। घारयित्वा यथाशक्ति भूय: सूर्येण रचयेत्॥९६। नाडीशोधन करनवाले प्राणायामकी विधि कहते हैं कि एकांतमें स्थूल और कोमल आसनमें बैठकर पद्मासन बांधे नब चन्द्रनाडी (इडा) से १२ संख्यामणव जप कर्ते मन्द मन्द पृरक तथा १६ संख्यामे दोनों आर थामके कुंभकमें चन्द्रमण्डलका ध्यान करना और १० संख्या नें सूर्यनाडी (पिंगला) से मन्द मन्द रेचन करे यह चन्द्रांग (वामांग) प्राणायाम है॥। ९६ ॥। अमृतदधिसंकाशं गोक्षीरधव लोपमम् । ध्यात्वा चन्दमस बिबं प्राणायामी सुखी भवेत् ९७।।
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भाषानुवादसहिता-श० १। ५७
चन्द्रांगप्राणायाममें दधि, दुग्ध ममान अतिशुक्कवर्ण अमृतस्वरूप चन्द्रमाका कंठ तथा नाभिमें ध्यान करनेसे आनन्दका अनुभव होकर सुख मिलता है। ९७॥ दक्षिणे श्वास्तमाकृष्य पूरयेद्ुत्तरं शनेः । कुम्भयित्वा विधानेन पुनश्चन्द्रेण रेचयेत् ॥ ९८ ॥ मूर्यनाडी (पिंगलामार्ग) मे प्राणवायु १२ संख्यासे प्रणव जप- सहित पृग्कक १६ संख्यास कुंभकमं आदित्यमंडलका ध्यान करना और १० मंख्यामे प्रणवजप करके चंद्रनाडी (इडामार्ग) से मंदे २ गचन करना यह दक्षिणांग (सूर्योग) प्राणायाम है।। ९८ ।।
ध्यात्वा नाभिस्थितं योगी प्राणायामी सुखी भवेत्॥।९९।। सुर्योग प्राणायाममें कुंभकविषय जाज्वल्यमान अग्निज्वालासमुदा- यममान अग्निमय सूर्यमंडलको अपने नाभिकमलमें ध्यान करके जो योगी प्राणायाम करे तो आनंद पाता है । ९९ ।। प्राणांश्रेदिडयापि चेत्परिमितं भूयोऽन्यया रेचयेत पीत्वा पिङ्गलया समीरणमथो बडा त्यजेद्रामया। सूर्याचन्द्रमसोरेनेन विधिना बिम्बद्वयं ध्यायतां शुद्धा नाडिगणा भवन्ति यमिनां मासत्रयादूर्ध्वतः।१०0। उक्त ४ श्रोकका अर्थ सूक्ष्मसे पुनः कहते हैं कि यदि प्राण- वायुको वामनासापुटसे १२ प्रणव जपस पूरक १६ जपसे चंद्रमंड- ल ध्यानमहित कुंभक और १० जपसे रेचन सूर्यनाडीसे करना यह एक प्राणायाम हुआ, पुनः दक्षिण नाडीसे १२ जपकर पूरक १६ मे सूर्यमंडल ध्यानसहित कुंभक और १० से रेचन करना दूसरा प्राणायाम हुआ, पुनः वामसे पूरक दक्षिणसे रेचन करके तीसरा प्राणायाम हुआ, इसी प्रकार चंद्रांग पूरकके कुंभकमें चंद्रविंब
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५८ गारेक्षपद्धति।
भराणवायुस्वरूपका औौर सर्योग पूरकके कुंभकमें सूर्यबिंब अपान- वायु स्वरूपका ध्यान करनेवाले योगीके समस्त नाडीजाल तीन महीने उपरांत शुद्ध (निर्मल) होते हैं. यह नाडीशोधनका उत्तम प्रकार कहा है जो संयमसे रहके धौति १ नेति २ नौली ३ बस्ति ४ त्राटक ५ भस्रा ६ पटूकमेमें परिश्रम न करे तौभी इनही प्राणा- यामोंके अभ्याससे उनका उक्त कृत्य संपादित हो जाताहै जैसे कहाभी है कि "प्राणायामैरव सर्वे प्रशुध्यन्ति मला इति। आर्चा- याणां तु केषांचिदन्यत्कर्म न संमतम् ।" अर्थात प्राणायामहीसे नाडमिल शुद्ध हो जाता है इसलिये याज्ञवल्क्यादियोंके अन्य धौत्यादि षटूकर्म संमत नहीं है॥ १०० ।। ग्रन्थान्ना । प्रातर्मध्यंदिनं सायमर्धरात्रे च कुम्भकानू। शनैरशीतिपर्यन्तं चतुर्वारं समभ्यसेत् ॥ १ ॥ अरुणोदयस सुर्यादयपर्यन ३ घटी प्रातःकाल दिनके पांच विभाग कर मध्यभाग मध्याह्, सूर्यास्नस ३ घर्टी आंग पीछे सायंसंध्याकाल और अर्द्धग में २ मुहर्त निशीथ काल होता है इन चारोंमें प्रत्ये- कमं ८०। ८० प्राणायाम करना अर्द्धरात्रिमं न कर सके, तीनों कालम अवश्य अभ्यास करना. चारो समयके ३२० और ३ मम- यके २४० प्राणायाम होते हैं ॥ ? ॥। कनीयसि भवेत् स्वेद: कम्पो भवति मध्यमे। उत्तमे स्थानमाप्नोति ततो वायुं निबन्धयेत् ॥।२।। जिसमें प्रस्वेद आवे वह कनिष्ठ, जिसमें कंप हो वह मध्यम है, जिसमें वायु ब्रह्मरंधमें प्राप्त हा सो उत्तम कहाता है इससे योगी निरंतर वायुका अभ्यास के और कुछ कम ४२ विपल कुंभक रहे सो कनिष्ठ, ८४ से मध्यम, १२५ में उत्तम प्राणायाम काल कहते हैं जब प्राणायाम स्थिर हो जाय तब प्राण ब्रह्मग्धको प्राप्त होना
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भाषानुवादसहिता-श० १। ५९ है तहां २५ विपला स्थिर रहे तब प्रत्याहार २५ पलापर्यत ग्हे तो धारणा तथा ६ घटी रहे तो ध्यान और वाग्ह दिन रहे तो समाधि होती है।। २ ।। जलेन श्रमजातेन गात्रमर्दनमाचरेत्। दढता लघुता चैव तेन गात्रस्य जायते॥ ३॥ प्राणायामश्रममे जो पसीना आवे उसे सर्वागमें खृब मले इममे गात्र लघु और हढ होते हैं अर्थात् जडताका अभाव होता है॥ ३ ॥ अभ्यासकाले प्रथमे शस्तं क्षीराज्यभोजनम् । ततोऽभ्यासे दृढीभृते न तादङ्रनियमग्रहः॥४॥ अभ्यासकालमें दूध, घृत भोजन करे जब केवल कुंभकाभ्यास दढ़ हो जाय नब उक्तनियमका कुछ आग्रह नहीं ॥ ४ ॥ यदा तु नाडीशुद्धि: स्पात्तथा चिह्हानि बाहयतः । कायस्य कृशता कान्तिस्तदा जायेत निश्चितम्॥५॥ जब नाडीशुद्धि हो जाती है तो बाहर चिह्न देहकी कशता कांतिवर्द्धन आदि निश्चय देखनेमें आने हैं बहुतकालममय कुंभक धाग्ण करनेमे जठगग्निप्रदीपि, नादकी प्रकटता और निगेगिता होती है ये सर्व नाडीशुद्धिके गुण है॥ ५॥ यथेष्टं धारणं वायोरनलस्य प्रदीपनम्। नादादिन्यक्तिराशेग्यं जायत नाडिशोधने ॥१॥ इति गोरक्षशास्त्रे प्रथमशतकम ।। १ ॥। नाडीशाधन हुएमें अपने समझे योग्य संत्र, जप, कालपर्यत प्राणवायुके धारणसामर्थ्य होती है उदराि प्रदीम स्पष्टनर नादका श्रवण और नैरुज्यता होती है॥ १०१ ॥ इति महधिर कृतायां गोरक्षयोगशास्त्रभाषारयां संग्रहायां योगाङ्गपूर्वाभ्यासविधिः ॥।१।।
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अथ द्वितीयं शतकम्।
*जो पूर्व १०० श्लोकके टीकामें लिखा गया है कि धौति आदि ६ कर्मका कार्य प्राणायामसे हो जाता है इन्हें न करे परंतु किसी २ आचार्योका यहभी मत है कि'- मेद: श्ेष्माधिक: पूर्वषट् कर्माणि समाचरंत्। अन्यस्तु नाचरेत्तानि दोषाणां समभावतः । जिमका भेद और श्लष्मा अधिक हो उमको प्राणायाममाधनमें अत्यंत कष्टमभी अभ्यास दृढ नहीं होता इमलिये उनको प्रथम थद्कर्म करके तब प्राणायामका अभ्याम कग्ना योग्य है इमलिये षद्कर्मविधि कहते हैं। तत्रादौ धौतिः। चतुरङ्ुलविस्तारं हस्तपच्चदशायतम्। गुरुपदिष्टमार्गेण सिक्तं वस्त्रं शनैर्ग्रसेत ।। १ ।। चार अंगुल चौडी, पंद्रह हाथ लंबी, बारीक वस्त्र (पगडी) की पट्टी थोडे गरमजलम भिगोय मुखमे पहिले दिन एक हाथ, दूमरे दिन दो हाथ, तीमरे दिन तीन हाथ एवं कमसे १५ दिनम पृरी गुरूपदिष्टमागेसे निगल जावे ।। १ ॥। पुनः प्रत्याहरेच्ैतदुदितं धौतिकमं तत्। कासश्वासप्रीहकुष्ठं कफरोगांश्र विशतिः। धौतिकर्मप्रभावेण प्रयान्त्येव न संझञयः ॥२॥ उक्त वस्त्रका पिछला किनारा मुखमें दांतोंसे दाब ओठोंसे लगाय नौलीकर्म करे इससे छातीमें लगा वस्त्र उदर (अंतडियों) में पहुँच साफ करता है तब थोडा २ बाहर निकाल डाले यह धौतिकर्म
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भाषानुवादमहिता-श० २। ६१
है. कास, श्वास, प्लाहा कुष्ठादि, विषरोग, बीस प्रकारक कफरोग इस धौतिकर्मके प्रभावसे निस्संदेह नाश हो जाते हैं॥ २ ॥ अथ बस्ति: । नाभिदघ्ने जले पायौ न्यस्तनालोत्कटासनः। आधाराकुश्चनं कुर्यात्क्षालनं बस्तिकर्म तत् ॥ १॥ अब बस्तिकर्म कहते हैं कि नाभिमात्र जलमें उत्कटासन बैठकर छः अंगुल लंबी और अंगुल प्रवेशयोग्य छिद्रवाली बांसकी नली चार अंगुल गुदामें प्रवेश कर गुदा आकुंचन करके पटमे जल चढाय नौलीकर्म करके बाहर छोड देवे यह बम्तिकर्म है. धौति वस्ति बिना भोजन किय कग्ने न चाहिये तथा इनके उपगंत शीघ्र भोजन करना योग्य है ॥ १ ॥ गुल्मप्लीहोदरं चापि वातपित्तकफोद्भवाः। बस्तिकर्मप्रभावण क्षीयन्ते सकलामयाः ॥२ ॥ बस्तिकर्मसे गुल्म, प्लीहा, जलोदर, वात. पित्त, कफसे उत्पन्न सर्व रोग नाश होते हैं॥ २ ॥। घात्विन्द्रियान्तःकरणप्रस्ादं द्द्याच्च कान्ति दहनप्रदीप्तिम्। अशेषदोषोपचयं निहन्या- दभ्यस्यमानं जलबस्तिकर्म ॥ ३ ॥ जलमं वास्तिकर्मके अभ्याससे शरीग्के सप्त धातु रस १ रुधिर ₹ मांस ३ मेद ४ अस्थि ५ मजा ६ शुक ७ तथा पांच ज्ञानेंद्रिय पांच कर्मेद्रिय और अंतःकरण मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, ताप, विक्षेप, शोकादि, मोह, गौरव, आवरण, दनिता, राजसतामसका धर्म सभी निवृत्त होते हैं. प्रसन्नता, कांति बढती है. जठरान्नि दीप्र होती है. वातादि समस्त दोषोंको दूर कर निरोगिता होती है ।। ३ ॥।
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गोरक्षपद्वाति।
अथ नेतिः। सूत्रं वितस्ति सुस्निग्धं नासानाले प्रवेशयेत। मुखात्निर्गमयेच्चषा नेतिः सिद्धैरनिगद्य ते॥ १॥ अब नेतिकर्म कहते हैं कि एक बालिस्त मुलायम, एवं ग्रंथिरहित सूत्रका एक किनाग नामिकाके एक पुटमें प्रवेश कर दूसरे पुटको बंद का पूरक करे जब कुछ सूत्र ऊपर चढे तब मुखश्वास छोडकर सूत्र बाहर निकाले तब एक किनारा सुखके बाहर दूसरा नासिकाके बाहग दोनोंको हाथोंसे पकड़ शनैः शनैः चलाता ग्हे इमे नेतिकर्म मिद्धजन कहते हैं ।। १ ।। कपेलशोधिनी चैव दिव्यदृष्टिप्रदायिनी। शत्रर्ध्वजातरोगौधं नतिराशु निहन्ति च ॥ २॥ यह क्रिया कपोल तथा नासिकादियोंके मल दूर कर सूक्ष्मपदाथ- दशी दिव्यदृष्टि देती और जञ्त (कण्ठमूल) स्थानमे ऊपर समस्त रोगममूहको शीघ्र शान्त करती है ।। २ ।। अथ त्राटकम् । निरीक्षेत्रिश्रलददशा सूक्ष्मउक्ष्पं समाहितः । अश्रुसंपातपर्यन्तमाचार्येस्ाटकं स्मृतम् ॥१॥ अच त्राटक कहते हैं क ए काग्र दृष्टिसे कुछ सूक्ष् वस्तुको जबली। नेत्रोंमें पानी न आवे निग्तर दे वता रहे. नेत्रोंमें जल आनेपर छोड देव इस मत्स्येंद्रादि त्राटक कहते हैं मैं (भाषाकार) समझता हूं कि सूक्ष्म वस्तुके स्थानमें प्रथम नासाग्र अभ्यास होनेपर भ्रूमध्य देखे तो औरभी अच्छे गुण शीघ्र होंगे ॥ १॥ मोचनं नेत्ररोगार्णा तन्द्रादीनां कपाटकम्। यत्नतस्त्राटकं गोप्यं यथा हाटकपेट कमू ॥ २ ॥ यह त्राटककर्म नेत्ररोगनाशक, बल बहानेवाला, आलस्यनि द्रादियोंका कपाट (केवाड) है तंद्रा और तमोगुणी चित्तवृत्तिके
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भाषानुवादमहिता-श० २। १३
कोधादिकोंको दूर करता है जैसे सुकर्णकी पिटारीको यत्नसे रखते हैं ऐमेही इम कर्मकोभी गोप्य रकखे ॥ २ ॥ अथ नौलिः। अमन्दावतवेगेन तुन्दं सव्यापसव्यतः । नतांसो भ्रामयेदेषा नौलिः सिद्धेः प्रचक्ष्यते ॥ १॥ अब नौलिकर्म कहत हैं कि दोनोंहूं कंधा नीचे नवाय उदरके दक्षिणवामभागकरके जलके भ्रमर (मौरे) के नाई घुमावे इसे सिद्धलोग नौलि कहते हैं. अनुभवसिद्ध यहभी है कि दक्षिणवामभागसे घुमायके अभ्यास हुएम नीचे ऊपग्कोभी चग््वीक ममान उदगनलको घुमाना चाहिय। १॥ मन्दा्निसंदीपनपाचनादिसंधापिककाननदकरी सदैव। अशेषदोषामय शोपिणोच हठकिया मौलिरियं हि नौलि: यह क्रिया मंदाग्निको बढाय भोजन किय अन्नादिकोंको शीघ्र धि्पिाक करनेवाली, समस्त वातादिगेगोको सुखानेवाली, आनदको देनेवाली, धौत्यादि मर्व कर्मोंमें (श्रेष्र) मुकुट है धौति बस्ति इन दो क्रियाआम नौलि कहनी होती है इमलिये यहां नौलिकी विधि कही है ॥ २ ॥ अथ कपालभातिः । भस्त्रावल्लाहकारस्य रेचपूरी ससभ्रमौ। कपालभातिर्विर्खव्याता कफदोषविशोषणी॥ १ ॥ अब कपालभातिकर्म कहते हैं कि लहारकी धांकनी (खाल) क नाई शीघ्र शीघर रेचन जो रेचकपूरक करे इमे कपालभाति कहते हैं हममे वीस प्रकारके कफरोग दूर होते हैं॥ १ ॥ घट्रकर्मनिर्गतस्थौल्यकफदोषमलादिकः। प्राणाथामं ततः कुर्यादनायासेन सिद्धचति ॥ २॥।
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६४ गोरक्षपद्धति। उक्त षट्कर्मोकरके स्थूलभाव कफदोष मलपित्तादि दूर हो जाते हैं तब प्राणायाम करे तो विनाश्रमही योगसिद्धि होती है॥ २ ॥ उदरगतपदार्थमुद्धमन्ति पवनमपानमुदीर्य कण्ठ- नाले। क्रमपरिचयवश्यनाडिचक्रा गजकारिणीति निगद्यते हठजैः ॥ ३॥ अब गजकरणीमुद्राभी प्रसंगसे कहत हैं कि, अपानवायुको कट- नालमें चढाय उदरगत मुक्तपीत अन्न जलादिकाको निकाले इस अभ्याससेभी नाडीचक्र अपने अधीन (वशीभृत) होता है इसे हठज योगी गजकरणी कहते हैं॥ ३ ।। अथ उत्तरार्द्धग्रन्थः । 'पूर्वोक्त प्रकागस नाडीशोधन हुएमें यम, नियम, आसन साधके षट्चक्र षोडशाधारका कर्म जानकर नाडिजाल नाडिगत वायु ज्ञात हुएमें चन्द्रतारानुकूल शुभदिन शुभ मुहूर्तमें लग्ननवांशादि शुभ साधके एकांतस्थलमें श्रीगुरु गोरक्ष, गणेशका पूजन मंगलपाठ स्वस्त्ययन कराय योगाभ्यासोपदेशक श्रीगुरुकां आराधनस संतुष्ट कर उन्हींकी आज्ञासे योगाभ्यासको आरंभ करना इसमें प्रथम प्राणायामका विस्तार कहते हैं'- प्राणो देहे स्थितो वायुरपानस्य निरोधनात्। एकइवसनमात्रेणोदवाटयेद्रगने गतिम्॥१॥ प्राणवायु जो देहमें स्थित है और मूलाधारस्थित अपानवायुकी ऊपर उठाय रोधकर एकही श्वासमें कुंडलीकरके रुका हुआ सुषुग्णा- द्वारको खोलके सुषुम्णानाडीके चिदाकाशमें ऊर्ध्गति कराता है सहे प्राणायाम सुगम होता है ॥ १ ॥ रचेक: पूरकश्रव कुम्भकः प्रणवात्मकः । प्राणायामो भवेत्रेधा मात्राद्वादृशसंयुतः॥२।।
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भाषानुवादसहिता-श० २।
रचक, पूरक, कुंभकके भेदकरके प्राणायाम तीन प्रकारका होता है. बाहरके वायुके अभ्यंतर प्रवेश करना पूरक, वायुको भीतगही रोकना कुंभक, रुद्धवायुको बाहर निकालना रेचक होता है. प्रणयका स्मरण करनेवाला प्राणायाम है. ब्राह्मणको प्रणवका क्षत्रिय वैशयको एकाक्षर मंत्रजपका अधिकार है. पूरकमें अकारका स्मरणपूर्वक १२ प्रणव जपके चंद्रनाडीसे पूरक उकारके स्मरणपूर्वक चन्द्रमण्डलका प्रणव ध्यानसहित १६ प्रणवजपसे कुंभक और मकारके ध्यानपर्वक १० जपसे रेचक करना. यह एक प्राणायाम होता है॥ २ ॥ मात्राद्वादशसंयुक्तौ दिवाकरनिशाकरौ। दोषजालमपन्नन्तौ ज्ञातव्यौ योगिभि: सदा ॥ ३ ।। प्राणायामके अभ्याम करते २ यवि संयम पूरा न पहुँचे तो नाडी मलिन हा जाता है इसलिये पुनः नाडीशोधन प्राणायाम वहते हैं कि, चंद्रांग, सनर्याग, माणायाम, प्राणापानवायुसंयुक्त १२ प्रणब मात्राकरके पूरक चंद्रसूर्य मंडलध्यानयुक्त १६ मात्रा करके कुंभक और १० मात्रासे रेचक करके चंद्रसूर्य नाडी मलको नाश करते हैं ऐसा योगियोंने जानना ।। ३ ॥ पूरके द्वादशी कुर्यात्कुम्भके षोडशी भवेत्। रेचके दश ऊँकारा: प्राणायामः स उच्यते ॥॥ प्रथमे द्वादशी मात्रा मव्यमे द्विगुणा मता। उत्तमे त्रिगुणा प्रोक्ता प्राणायामस्य निर्णय ॥ ५॥ पूरकमें १२, कुंभकमें १६, रचकम १० मात्रा प्रणवक्की यह प्राणायामप्रकार कनिष्ठ है, इससे द्विगुण अर्थात् पृ० २४ कुं० ३२ रे० २० यह मध्यम और पृ० ३६, कुं० ४८, २े० ३० यह उत्तम प्राणायाम है।।४ ॥। ५ ।। अधमे चोद्यते घर्मः कम्पो भवति मध्यमे। उत्तिष्ठत्युत्तमे योगी ततो वायुं निरोधयेत् ॥ ६ ॥
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६६ मोरक्षपद्धति ।
कनिष्ठमाणायाममें प्रस्वेद (पमीना) होता है. मध्यममें कंप होता है, उत्तममें योनिका आधार उठता है इसलिगे प्राणायामका मभ्यास करना मुख्य है॥ ६ ॥ बद्धपझमासनो योगी नमस्कृत्य गुरुं शिवम्। भ्रम्ये दृष्टिरेकाकी प्राणायामं समभ्यसेत् ।। ७॥। ऊर्ध्वमाकृष्य चापानवायुं म्राणे नियोजयेत्। ऊर्ध्वमानीयते शक्त्या सर्वपापैः प्रसुच्यते ।। ८। प्राणायामकी विधि कहते हैं कि एकांतम्थलमें मोटे दलवाला कोमलकंतलादि आसनमें पद्मासन बांधके बैठकर श्रीगुरु एवं शिवको प्रणाम करे अमृत सवित हो रहा ऐमें चंद्रबिंबका ध्यान भूम- ध्यकरके दोमहं दृष्टि स्रमध्यम स्थापन करे तदनंनर ब्राह्मण प्रण- चका क्षत्रिय वैश्य ओम इति एकाक्षगमंत्रका पर्वोक्त मात्रक प्रका- रसे पृरक; कुंभक, रेचक प्राणायाम, चंद्रांग, सुर्याग प्रकारकरके निरंतर करता न्हे मृलाधार मंकोचनपर्वक अपानवायुको ऊपर खीं- चके मराणवायुमे ऐक्य करे तब अपानवायुमिलित प्राणवायुको शक्तिचालनमुदास उठाई गई कुंडलिनीको सुपुम्णामार्गसे ऊपरको चढावे इतने विधि कर्नेमे योगी समस्तपापोंस निर्मुक्त हो जाता है।। ७ ॥ ८ ।। द्वाराणां नवकं निरुद्धय मरुतं पीत्वा दढं धारितं नीत्वाकाशमपानवह्निसहितं शक्त्या समुचालितम्। आत्मस्थानयुतस्त्वनेन विधिवद्विन्यस्य मूर््नि ध्रुवं यावत्तिष्ठति तावदेव महतां संघेन संस्तूयते ॥९॥ केवल कुंभकप्राणायामका प्रकार कहते हैं कि पण्मुखीकरके पूर- कवायुसे उदर पृर्ण करके ऊपरके ७ नीचेके २ इन नव द्वारोंको रोककं मृलाधारगन कालाग्नि अपानवायुसहित शक्तिचालनप्रकारसे
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भाषानुवादसहिता-श० २। ६७
प्रबुद्ध हो रही कुंडलिनीको ऊपरको उठाय आज्ञाचक्रते ऊपर उक्त वायुस पूर्णकमके स्थिर करे सहस्रकमलमें रहते परमात्माका ध्यानसे ज्योनि प्रत्यक्ष करके यावत्कालसम योगी निश्चल होकर परमात्माका ध्यान करता है यही काल योगीका मोक्षसम है. आत्मध्यानतत्पर योगीश्वर सिद्ध इस योगीकी धन्यवादपर्वक स्तुति करते हैं यही परम हल योगका है ।। ९ ।। त्राणायामो भवत्येवं पातकेन्धनपावकः । अवोदधिमहासेतुः प्रोच्यते योगिभि: सदा॥३० ॥। दा प्रकार नित्य निग्तर अभ्याससे प्राणायाम करता अनेक पतनहरी काष्को भस्म करनेवाला अग्नि होता है. संसाररूपी समु- कव नाग्नेवाला महामेतु (बडा परल) योगिजनोंकरके यही प्राणा- गाम कहा जाता है ॥। १० ।। आसनेन रुजो हन्ति प्राणायामेन पातकम्। विकारं मानसं योगी प्रत्याहारेण मुश्चति॥११ ॥ पश्चिमतानआदि आमनोंसे शरीग्के अशेष गेग नाश होते हैं प्राणायामसे समस्त पातक और प्रत्याहाग्मे मानमिक अनेक विकार नष् होते हैं ॥ ११ ॥ धारणाभिमतौ धैर्ये ध्यानाच्चैतन्यमद्भुतम्। समाधौ मोक्षमाप्नोति त्यक्त्वा कर्म शुभाशुभम् १२ वारणामे मनमें धैर्य बढनेसे उन्तम उत्तम ज्ञान मिलता है ध्या- नमे अद्गुत चैतन्य मर्वशारीरक ज्ञान मिलता है समाधिमे अभिमान त्याग होकर जिसमें पुण्य पाप लिप् नहीं होते ऐमा कैवल्य मोक्ष मिलता है ।। १२ ।। प्राणायामद्विषट्केन प्रत्याहारः प्रकीर्तितः । प्रत्याहारद्विपट्केन ज्ञायते धारणा शुभा ॥ १३ ॥
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६८ गोरक्षपद्धति।
धारणा द्वादश प्रोक्ता ध्यानाद्यानविशारदैः। व्यानद्वादशकेनैव समाधिरभिधीयते॥ १४ ॥ बारह प्राणायाम करके प्रत्याहारके फल देनेवाला प्रत्याहार (१२) प्रत्याहार (१४४ प्राणायाम) का धाग्णका फल देनेवारी धारणा (१२) धाग्णा (१७२८ प्राणायाम) का प्राणायामरूप ध्यान (१२) ध्यान (२०७३६ प्राणायाम) का प्राणायामरूप समाधि होती है।। १३ ॥ १४ ।। यत्समाधौ परं ज्योतिरनन्तं विश्वतोमुखम्। तम्मिन् दृष्टे क्रिया कर्म यातायातं न विद्यत॥१५।। समाधिका स्वमप कहते हैं. मूलाधाग्चकर चतुर्दलकमलकार्णि- कामं सुषुम्णादारक संमुख स्वयंभूलिंगके शिरमें देदीप्यमान बिंब है बिंदुत्वरूप कुंडलिनीका है यह वीप्यमान बिब समाधिमं अंत न मिलनेवाला, समस्त जगत् व्याप् कग्नेवाला उत्तम ज्यांति कालाप्निस्वरूप प्रगट होता है इसके दर्शन समाधिद्वारा मिलनेसे जन्ममरण नहीं होते करममें लिप्त नहीं होता कैवल्यका अनुभव हो जाता है॥ १५ ॥ संबद्धासनमेट्रमंत्रियुगलं क्णाक्षिनासापुटाद् द्वाराण्यङ्ुलिभिर्नियम्य पवनं वक्रेण संपूरितम्। ध्यात्वा वक्षसि वह्नयपानसहितं मूर््रि स्थितं धारये- देवं याति पिशेषतत्त्वसमतां योगीश्वरस्तन्मय:॥१६॥ समाधिकी प्रक्रिया दिखाते हैं. प्रथम सिद्धासन बांधके दोनहूं हाथोंके अंगुष्ठोंस दोनहूं कर्णाछद्र, तर्जनियोंसे नेत्र, मध्यमाओंसे नासिका और अनामिका २ कनिष्ठा २ से मुख रोकके अधिमुख- द्वारसे पूरित करके मूलाधारमें रहनेवाला अग्नि तथा अपानवायुस- दित प्राणवायुको हृदयकमलमें धारण कर ऊपरको वढाय सहस-
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भाषानुवादसहिता-ग० २।
दल कमलमें धारण करना इस प्रकार समाधिके अभ्याम करनेवाला योगी अपानवायुसंमिलित प्राणवायुमय होकर सर्वद्रष्टा माक्षिभृत अरंत- गत्माके तुल्यताको प्राप्त होता है।। १६ ।। गगनं पवने प्राप्ते ध्वनिरुत्पद्यते महान्। घण्टादीनां प्रवाद्यानां तदा सिद्धिरदूरतः ॥ १७॥ उक्त प्रकारसे प्राणवायु जब (गगन) सहस्रदल कमलमें प्राप्त हो जाय तो घंटा नगारे आदि वाद्योंकी ध्वनि प्रकट होती है इस चिद्न के मिलनेपर योगसिद्धि समीप है जानना ॥ १७ ।। प्राणायामेन युक्तेन सर्वरोगक्षयो भवेत्। अयुक्ताम्यासयोगेन सर्वरोगस्य संभवः॥१८॥। यथायोग्य निरंतराभ्यस्त प्राणायामसे सब रोग क्षय होता है एसही अविधि विच्छिन्नाभ्यामादि प्राणायामसे अनेक रेग उत्पन्न होते हैं॥ १८ ॥ हिक्का कासस्तथा श्वासः शिरःकर्णाक्षिवेदनाः। भवन्ति विविधा रोगा पवनस्य व्यतिकरमात्।१९॥ अयुक्त प्राणायामाभ्यासमे वायु विरुद्ध होकर हिचकी, कास, श्रवाम. शिरःपीडा. कर्णशूल, नत्रव्यथा आदि गग उत्पन्न करता है॥। १९ ॥ यथा सिंहो गजो व्याघ्रो भवेद्श्यः शनैःशनैः। अन्यथा हन्ति योक्तारं तथा वायुरसेवितः ॥२०॥ जैसे सिंह, व्याघ्र, गज इत्यादि दुष्ट जंतु मंदमंदकरके उनके अनु- ल कमक्रमसे करके पालकके वशमें रहते हैं तथापि किसी समय थोडाभी उनमें विगेध होनेमें अपनेही पालकको मार डालते हैं तैसेही पवनभी युक्त अभ्याससे वशवर्ती होता है अयुक्तअभ्यासमे गेगा- दिकांकरके अभ्यासीको अनिष्ठ हो जाता है ॥ २०॥
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७० गारक्षपद्धति ।
युक्तं युक्तं त्यजेद्रायुं युक्तं युक्तं च पूरयेत्। युक्तं युक्तं च बश्नीयादेवं सिद्धिरदूरतः ॥ २१ ॥ वायु शनैः शनैः रेचन करना जैसे नासाछिद्रिके सामने रुईका फोहा रवखा हुआ न उडे ऐसेही शनैः शनैः पूग्कभी करना युन् युक्त पूरक करना जिससे चित्तोद्वेग श्वासोत्कटता न हेोवे थोडमे क्रम सहनयोग्य बढावना उचित है इससे सिद्धि नजदीक मिलती है।२१॥ अथ ग्रन्थान्तरे प्राणायामभेद़ाः । प्राणायामस्त्रिधा प्रोक्तो रेचपूरककुम्भकैः। सहितः केवलश्चेति कुम्भको द्विविधो मतः ॥१॥ ग्रंथांतरमे प्राणायामक भेद कहते हैं कि, प्राण (शगीगंनर्गत वायु) के रोधका प्राणायाम कहते हैं इसक रचक, पृग्क, कुंभक ३ भेद हैं भीतरसे वायु बाहर छोडना ग्चक, बाहग्से वायु उदरमे वृर्ण् करना पूरक और पूरितवायुको घटवत् धार्ण करना कुंभक कहाता है, कुंभककेभी केवल एवं सहित दो भेदेह व कवल योगियांक संमत हैं और सहितभी दो प्रकार्का है एक रचकपूर्वक दूसरा कुंभकपूर्वक पहिला रेचकप्राणायामसे दूसरा पूरकप्रागायामम भिन्न नहीं है इनके पूरे भेद प्राणायामप्रकग्णसे जानने ॥ १ ॥ यावत्केवलसिद्धिः स्यात्सहितं तावदभ्यसेत्। रेचकं पूरकं मुक्त्वा सुखं यद्ायुधारणम्॥२॥ जबलों केवल कुंभककौ सिदद्धि हा तबलौं महितकुंभक सूर्याग प्राणायामसे करके सुषुम्णाके भदके पीछे उसके भीतर घटकासा शब्द हो तब केवल कुंभक सिद्ध होता है तदनंतर १०।१० बढाय- के ९० पर्यत करे सामर्थ्य हो तो अधिक करें रेचक तथा पूरक- कोभी छोडके वायुधारण करना उसे केवल कुंभक कहते हैं । २ ॥।
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भाषानुवादसहिता-श० २। ७१ प्राणायामोऽयमित्युक्त: स वै केवलकुम्भकः। कुम्भके केवले सिद्धे रेचपूरकवर्जिते॥ ३॥ प्राणायाम जा कहा शुद्ध तो केवल कुंभकही है, अन्य प्रकार नाडीशोधनार्थ हे रचकपृरकगहन केवल कुंभकके सिद्ध हो जानेमें ॥। ३ ॥ न तस्य दुर्लभं किंचित्रिषु लोकेषु विद्यते। शक्त: केवलकुम्भेन यथेष्टं वायुधारणात्॥४ ॥ योगीको तीनहूं लोकमें कुछभी दुर्लभ नही है जब केवल कुंम- कके सामर्थ्य होनस यथेच्छ (असंख्य) वायु धारण करे ।४।। राजयागपदं चापि लभते नात्र संशयः। कुम्भकात्कुंडलीबांध: कुंडलीबोधतो भवेत् ॥५ ॥ इस विधिसे निस्मंदेह राजयोगपद माम हाता है कुंभकके अभय- ससे आधारशकक्ति (कुंडलिनी) बांध होता है इससे निद्रा आ उ- स्यादि मिटते हैं ॥ ५ ॥ अनर्गला सुषुम्णा च हठसिद्धिश्र जायते। हठं विना राजयोगे राजयोगं बिना हठः। न सिद्धिचति ततो युग्ममानिष्पत्ते: समभ्यसेत्॥। ६॥। और सुषुम्णाके कफादि मल दूर होते हैं तब हठसिद्धि (मोक्ष) होता है हठयोग विना राजयोग सिद्धि गजयोग विना हठयोगसिद्धि नहीं होती इसलिये दोनहूंका अभ्यास करना ॥ ६॥ कुम्भकप्राणरोधान्ते कुर्याच्चितं निराश्रयम्। एवमभ्यासयोगेन राजयोगपदं ब्रजेत् ॥७॥ कुंभकसे प्राण संरोधके अंत्यम चित्तको आश्रयरहित कर इस प्रकारके अभ्यास योगकरके राजयोगपदको माप्त होता है /।७ ।।
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७२ गोरक्षपद्धति।
वपुः कृशत्वं वदने प्रसन्नता नादस्फुटत्वं नयने सुनिर्मले। आरोग्यता बिन्दुजयोऽगनिदीपनं नाडीविशुद्धिर्हठयोगलक्षणम् ॥।८।। हठ योगसिद्धि जब होती है तो देहमं कृशता, मुखमें प्रसन्नता, नादकी प्रगटता, नेत्रांकी निर्मलता, नीगेगिता, धातुका जय, उद- रमें जठराग्निकी वृद्धि, नाडियोंकी शुद्धि ये लक्षण होते हैं ॥ ८ ।। चरतां चक्षुरादीनां विपयेषु यथाक्रमम्। यत्प्रत्याहरणं तेपां प्रत्याहारः स उच्यते ॥ २२ ॥ अब प्रत्याहार कहते हैं रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द ये पांच विषय हैं इनमें चक्ष, जिह्वा, घ्राण, न्वक, कर्ण इन पांच ज्ञानेंद्रियोंके कर्म होते हैं अर्थात् उक्त ज्ञानेंद्रियोंके उक्त विषय क्रमसे हैं आसन, प्राणायाम, सिद्धि करके जिम इंद्रियका जो विषय है उसे दूसरेके समीप मावना कर क्रमशः शनैः शनैः त्याग करना अर्थात् इंद्रियसे उसके विषयका अनुभवकरके फेर इंद्रियांको विषयमे अलग करना प्रत्याहार कहाता है ।। २२ ॥ यथा तृतीयकालस्थो रविः इत्याहरेत्प्रभाम्। तृतीयाङ्गस्थितो योगी विकारं मानसं तथा।।२३।। दिनके प्रातः, मध्याह्न, सायं थे तीन भागसे तीन काल होते है. जैसे (तीसरे) सायंकालमें सूर्य अपनी (प्रभा) कांतिको क्रमशः हरण कर्ता है एमेही योगीभी तीसरे अंग (आसन १ प्राणायाम २ प्रत्याहार ३) प्रत्याहारमें मानसविकार (विषय) में मनके अभि- निवेशको हरण करना अर्थात् विषयसंबंधसे चित्तको छुटाना ॥२३॥ अङ्गमव्ये यथाङ्गानि कूर्मः संकोचयेद् ध्रुवम्। योगी प्रत्याहरेदेवामिन्द्रियाणि तथात्मनि ॥ २४॥
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भाषानुवादसहिता-श० २। जैमे कूर्म (कछवा) अपने शिर पैर आदि अंगोंको संकोचन कर अपनेही भीतर छिपाय देता है, अंग तो उसीमें रहते हैं परंतु न हुए- के तुल्य हो जाते हैं ऐसेही योगीनेभी इंद्रियोंको विषयोंसे विमुख कर आत्मामें उनकी वृत्तियोंको थाम लेना अर्थात् इंद्रियोंको उनके विष- योंमें आसक्त न होने देना विषयोंसे तृप्त जैसा मानकर इंद्रियोंको अपने भीतर अंतगत्मामें आसक्त करना ॥ २४ ॥। यं यं शृणोति कर्णाभ्यामप्रियं प्रियमेव वा। तं तमात्मेति विज्ञाय प्रत्याहरति योगवित् ॥ २५॥। अगन्धमथवा गन्धं यं यं जिघ्रति नासिका। तं तमात्मति विज्ञाय प्रत्याहगति योगवित् ॥२६। अमे्यमथवा मेच्यं यं यं पश्यति चक्षुषा। नं तमात्मेति विज्ञाय पत्याहरनि योगवित् ॥२७॥ अस्पृश्यमथवा स्पृश्यं यं यं म्पृशति चर्मणा। तं तमात्मेति विज्ञाय प्रत्याहरति योगवित् ॥२८।। लावण्यमलावण्यं वा यं यं रसति जिह्या। तं तमात्मेति विज्ञाय प्रत्याहरति योगवत ॥। २९। कर्णसे मधुर वा कठोर जैसे शब्दोंको सुनता है ऐसे मनभी कर्ण- द्वारा शब्दमें आसक्त होता है योगिजन उक्त शब्दोंकाभी यहभी आ- त्माही है, समझ वह मनमं निश्चय क मनको उक्त शब्द विषयसे प्रत्याहरण करे अर्थात् शब्दको विषय मानके जो मनमं मसंभ्रम शब्द सुननेका भ्रम होता है उस भ्रम मनको उमे मिथ्या (विनाशी) जानकर मनको उससे हटावे जैसे ( रज्जु) रस्सीमं सर्पका एवं स्था- शु बृक्ष प्रस्तरादिकोंमें मनुष्य भूतादि भ्रांति होती है तैसेही अखंडा- नंदस्वरूप आत्मचैतन्यमें संसार यद्ा देह है कहकर बुद्धि भ्रांति- करके कल्पना करती है वस्तुतः आत्मतस्वातिरिक्त कुछमी नहीं है
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(७४) गोरक्षपद्धति। इस कारण सम्पृर्ण जगत् आत्मस्वरूप है ऐसही शब्दादि उक्त वि- पयोंकोभी आत्माही है भावनापूर्वक निश्चय करके बाहर भीतर अद्वै- तानंदस्वरूप आत्मासे अन्य कोई नहीं है सो धारणा स्थिर करकें शन्दादि विषयांको चलायमान हुएमेभी उन्हें आत्मा माने विषय न माने नासिकासे सुगंध वा दुर्गध जो सुंघता है उसे आत्माही है नि- श्रय करके नासिकाकी वृत्ति गंधद्वारा मनको लुभाय भ्रममें डालती है उसे हटावे नेत्रेंद्रियस जो जो पवित्र वा अपवित्र पदार्थ दखता उन्हेंभी आत्माहीहै निश्चय का रूपविषयसे मिथ्याभ्रम छोडकें नेत्रें- द्रियवृत्तिको उक्त विषयसे हटावे त्वागंद्रियमे मृद्द वा कठोर तन व। शीत आदि जिस २ पदार्थको स्पर्श करता है उसभी आत्माही है भावना निश्चय कर त्वागिंद्रियपरवृत्ति जो स्पर्शसुखम मनको लुभाती है उसको हटावे जिह्वासे सलोना, अलाना, मिष्ट, कटुक आदि जिन २ रसोंको चखता है उन्हें आत्माही समझकर जिह्वाकी वृत्तिको हटाव इस प्रकार योगी प्रत्याहारके अभ्यास कके पंचेद्रियवृत्तियोंको अपन २े विषयोंस हटाय आत्मतरवम स्थिर करना जब प्रत्याहार सिद्ध हो जाता है तो योगी कानोसे सुने मधुग्शब्दके तुल्य मानता है काईभी इसके चित्तको अपनी ओर नहीं ले जाय सकते. ऐसही नेत्रोंमे दे- बता वा पिशाच, मनुष्य, कुत्ता, ब्राह्मण वा चांडाल, गौ वा गदहा इत्यादि सभीको तुल्य देखता है. नासिकासे कस्तूरी आदि सुगंधी बा पुरीषादि दुर्गैधियोंसे तुल्य सुख मानता है त्वचास आग्ने वा जल पोडशी स्त्री कुच वा कृपाण (आरे) की धारा आदिकांक स्प्शसे तुल्य सुख मानता है और जिह्वासे मीठा वा कडुवा, तप्त वा शात तक्षिण (मिर्च) वा दूध मिट्टी, रेत, गोबर वा इलुवा, पूडीआदि- कोंको तुल्य स्वादिष्ट मानता है ॥२५॥ २६। २७।। २८।।२९।
चन्द्रामृतमयीं धारां प्रत्याहरति भास्करः । यत्प्रत्याहरणं तस्याः प्रत्याहारः स उच्यते॥ ३० ॥
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माषानुवादसहिता-श० २। ७५
प्रत्याहारकी विधि कहने उपरांत केवल हठयोगहसिभी प्रत्याहारकी विधि कहते हैं कि षोडशदल कमलकर्णिकास्थित चंद्रबिंबस जो अमृ- तधारा गिरती है उसे नाभिकमलस्थित सूर्य ग्रास कर लेता है तो उक्त धागकां विपररीतकरिणीमुद्रा करके सूर्यमे हटाय अपने सुखमें पारे, इसें प्रत्याहार कहते हैं॥ ३० । एका स्त्री भुज्यते द्वाभ्यामागता चन्द्रमण्डलात्। तृतीयो यः पुनस्ताभ्यां स भवेदजरामरः ॥ ३१॥ एक स्तरी पदम कंठस्थानगत चंद्रमासे निकसी अमृतधागका बाध- न है (द्ाभ्यां) पढमे सूर्यचन्द्रमाका बोधहै तृतीयपदम आप (योगी) है उक्त अमृतधाग कंठ एवं नाभिगत चंद्रसूर्यस भोग करती है इस- को तीमरा (आप) स्वयं विपगीतकर्णीमुद्रा कर्के उक्त चंद्रसूर्यसे बचायक भोग कंग तो अजरामर होता है॥। ३१ ॥ नाभिदेशे वसत्येको भास्करो दहनात्मनः । अमृतात्मा स्थितो नित्यं तालुमूले च चन्द्रमा:३२ अभिमय एक सूर्य नाभिमें निवास करना है अमृतात्मक चंद्रमह विशुद्धचक्रमें रहता है॥ ३२ ।। वर्षत्यधोमुखश्चन्द्रो ग्रसत्यूर्व्वमुखां रविः। ज्ञातव्या करणी तत्र यथा पीयूषमाप्यते॥ ३३॥ विशुद्धचक्रमें रहका अधोमुख चंद्रमा अमृतधारा वर्षाता है उस धाराकी नाभिस्थित ऊ्वमुख सूर्य पी लेता है योगीकरके उक्त सूर्यको वंचनकर उक्त अमृतधाराको अपने मुखमें प्राप्त किया जाता है उसे विपरीि करणी जानना ॥ ३३ ॥ ऊर्ध्व नाभिरधस्तालुरूर्ध्व भातुरध: शशी । करणी विपरीताख्या गुरुवाक्येन लम्यते॥ ३४॥।
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गोरक्षपद्ति।
जो नाभिगत सूर्यको ऊपर (तालु) विशुद्धमत चंद्रमाको नीचे करे यह विपरीतकरणी गुरुमुखहीसे जानी जाती है।। ३४ ।। लिखनेसे नहीं किंतु सुबोध योगियोंको इतना औरभी स्मरण कगते हैं कि यह मुद्रा प्राणायाम योग एवं खेरीमुद्रा साधनके उप- रांत इम्हीसे सुगम हो जाती है॥ त्रिधा बद्धो वृषो यत्र रोखीति महास्वनः । अनाहतं च तच्चकं हृदये योगिनो विदुः॥ ३५ ॥ नीन फेरा रस्मियोंसे बँधा वृषभ जैसे पराधीन होकर शब्द कर ताहै ऐसेही अनाहतचक्रमे सत्व-रज-तमोगुणस्वरूप मायाविषे प्रति- बिंबिन हो रहा जीव पग-पश्यंति-मध्यमाविषे प्रतिबिंवित हो रहा जीव परा-पश्यंति मध्यमाके क्रमसे हृदयमध्यमें नादमहित होकर निर- तग शब्द कग्ताहै अनाहतचक्रको हृदयमें योगिजन जानते हैं ॥३५॥ अनाहतमतिक्रम्य चाकरम्प मणिपूरकम् । प्राप्ते प्राणे महावझं योगी स्वममृतायते ॥ ३६ ॥ खेचगे मुद्रा करके अमृनपानको सूचित करते हैं कि प्राणापान- बायुको एकत्व कर मणेपृर्क अनाहनचक्रको उलंघन करके महापद्म (ब्रह्मस्थान) को प्राप्त करके योगीका अमृतमय शगीर उक्तामृत- पानमे हो जाता है।। ३६ ॥। ऊर्ध्व षोडशपत्रपमगलितं प्रायादवातं हठा- दूर्ध्वास्थोरसना निधाय विधिवच्छक्तिं पर्रां चिन्तयेत्।। तत्कल्ोलकलाजलं सुविमलं जिह्वाकुलं यः पिबे- न्निर्दोषः स मृणालक्रोमलवपुयोंगी चिरं जिवति।।३७।। उक्त प्रकारके ब्रह्मस्थानपर्यत प्राण वायुको पूर्ण कर योगी शिरमं रहते सहसत्रदल कमलसे विशुद्धचत्रमें गिरती वेला प्राणवायुको
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भाषा नुवादसीहता-श० २।
ऊपर चढाय नासिका ऊध्बीिवरमें प्राप्त करे ऊध्वविवरमें जिद्वा प्रवश करना सुखभी ऊपरको करके सहस्रदलकमलमें प्राणवायुसहित प्राप्त हुई कुंडलिनीका ध्यान करता कुंडलिनीका सहस्रदलमं प्रवेश होतही जो अमृताकार तरंग निकलता है उसका लेशभूत अतिनिर्मल जिह्वाके मथनसे निकले हुए अमृतको पान करे वह योगी अतिसुककुमार शरीर पायके समस्त रोगदुःखोंसे रहित होका बहुत कालपर्यत जीवित रहता है।। ३७ ॥ काकचंचुवदास्येन शीतलं साललं पिबेत। प्राणापानविधानेन योगी भवति निर्जरः।। ३८।। अपानवायुको उठाय अपानवायुके साथ ऐक्य करनेवाले प्रकारसे काक (कौवे) कासा चांच मुख का शीतल सलिल (बाह्यवायु) को जो योगी पूरक (पूर्ण) करता है वह वृद्धावस्थासे रहित होता है अर्थात् सर्वदा युवाही रहता है॥ ३८ ॥। रसना तालुमूलेन यः प्राणमनिलं पिबेत्। अब्दार्द्धेन भवेत्तस्य सर्वरोगम्य संक्षयः॥ ३९॥ जिह्वाके सहायकरके तालुमूलसे जो विवर छिद्र है इस करके जा योगी प्राणवायुको पृर्ण (पूरित) करता है उसके छः महीनक अभ्याससे समस्त रोगोंका नाश होता है॥ ३९ ॥ विशुद्धे पश्चमे चक्रे व्यात्वासौ सकलामृतम् । उन्मार्गेण हतं याति वश्चयित्वा मुखं खेः ॥ ४= ॥ पांचवां विशुद्धचत्र (जो कंठमें रहता है) मे चंद्रकलामृनका ध्यानकरके कमसे ऊपरको हरण करता हुआ सूर्यके मुखको वंचन कर योगीके मुखमें उक्त चंद्रकलामृत पडता है इस प्रकार जिह्वा द्वारा उदरमें प्राप्त होकर योगीके जरा रोगादियोंको हर लेता है।। ४० ॥ विशब्देन स्मृतो हंसो नैर्मल्यं शुद्धिरुच्यते। अतः कण्ठे विशुद्धारव्यं चक्र चक्रविदो विद्ुः॥४१॥
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गोरक्षपद्धाते ।
'वि' शब्द हंसका और 'शुद्ध' शब्द निर्मलका बोधक है कण्ठमं अत्यंत निर्मल विशुद्धनामा चक्र है यह मर्वोत्कृष्ट है चक्रोंके तत्व जाननेवाले योगी जानते हैं ।। ४१ ॥ अमृतं कन्दरे कृत्वा नासान्तसुषिरे क्रमात्। स्वयमुच्चालिनं याति वर्जयित्वा मुखं खेः ॥ ४२ ॥ विशुद्धचत्रस्थ चंद्रकलामृतका अपनावायुसहित प्राणवायुको ऊपर चलायके लविका ऊर्ध्वविवग्में प्रवेश (पूर्ण) कर क्रमसे नासिकाके ऊपर विवरमें पहुँचानेसे नाभिसूर्यके मुख (जो अमृतको भस्म करता है) को वंचन (छलन) कग्के उक्तामृत उदग्मं अन्नके समान पहुँचता है।। ४२।। वहं सोमकलाजलं सुविमलं कण्ठस्थलादूर्ध्वतो नासान्ते सुषिरे नयेच्च गगनद्वारान्ततः सर्वतः। ऊर्ध्वास्यो भुवि सन्निपत्य नितरामुत्तानपाद: पिबे- देवं यःकुरुतेजितेन्द्रियगणो नैवास्ति तस्य क्षय: ४३ कंठके ऊपर निर्मल चंद्रकलामृतको पूर्वोक्त विधिसे रोकके नासा ऊ्ध्वविवरमें पूरत करे तव गर्वद्वारोंको रोकके (गगन) आज्ञाचक्र्रमें प्राणापानवायुसहित घूग्ण कन्के ऊर्ध्वमुख होकर भूमिमें उत्तान लेटकर पैरोंकोभी उत्तान क्के जितंद्रिय होकर उक्तामृनपान करना जो योगी निरंतर इस विधिको कग्ता है उसका क्षय (मृत्यु ) नहीं होता ॥ ४३ ॥ ऊर्ध्वजिह्वां स्थिरीकृत्य सोमपानं करोति यः । मासार्द्वेन न सन्देहो मृत्युं जयति योगवित्॥४४।। जिह्वाको ऊपर लंबी करके ऊपर स्थिर करके जो योगी अमृतपान करता है उस अभ्यामीको एकही पक्ष (१५ दिन) में मृत्यु जीत नेका सामर्थ्य होता है इममें संदहे नहीं ॥ ४४॥
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भाषानुवादसहिता-श० २। L९
बद्धं मूलबिलं येन तेन विभ्नो विदारितः। अजरामरमाप्नोति यथा पश्चमुखो हरः॥ ४५॥ जिस योगीने (मूलबंध मूलद्वार रोका उसने जरामरणादि विन्नका नाश करलिया, इस हेतु जरामरणयुक्त देहमें आत्मभावको छोडकर जरामग्णरहित शुद्ध आत्मभावको प्राप्त होता है जैसे पंचवक्र सदाशिव देहाहंकार जरामरणादिरहित विराजमान है ऐमेही उक्त अभ्यासीमी होता है।। ४५॥ संपीडय रसनाग्रेण राजदन्तबिलं महत्। ध्यात्वामृतमयीं देवीं पण्मासेन कार्विर्भवेत ॥ ४६ ॥ जो जिह्वाग्रसे राजदंतके बिल (रंध्र) को अचेतन (पीडन) कर अमृतमयी वागीश्वगी देवीके ध्यानका अभ्यास करता है तो अभ्यास सिद्ध हानेपर छः महीनेमें विचित्र कवितामामर्थ्य कवि हो जाता है।। ४६ ।। सर्वाधाराणि बभ्राति तदूष्व पारितं महत्। न मुश्चत्यमृतं कोऽपि स पन्थाः पश्च धारणाः।।४।। जिह्वाग्रमे पीडन कर राजदंतके छिठ्रका रोकनेसे समस्त नाडियोंके मुख रुक जाते हैं. ऊपरके सकनेसे अमृतधारा गिरके अन्यत्र नहीं गिर सकती पंचधाग्णाके अभ्यासी योगीकोभी जैमी इमीमें चंद्रमासे निस्सरिन अमृतका हरण प्रत्याहार कहा है तैमेही अमृतको लंबिकाके ऊर्ध्वविवग्में धारणा कर्ना यह धारणा होती है।। ४७ ॥ चुम्बन्ती यदि लम्बिकाग्रमनिशं जिह्वा रसस्यन्दिनी सक्षारं कट्टकाम्लदुग्धसदशं मव्वाज्यतुल्यं तथा। व्याधानां हरणं जरान्तकरणं शास्त्राङ्गमोद्गीरणं तस्प स्यादमरत्वमष्टगुणितं सिद्धांगनाकर्षणम् ४८
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८० गोरक्षपद्धति।
जिद्वाको लंबिकाके निरंतर चुंबनाभ्यास करनेवाले योगीको कभी लवण, कभी चरपरा, कभी खट्टा, कभी दूधसा, कभी सहतकासा, कभी घीकासा स्वाद जिद्वामें अनुभव होते हैं ये लक्षण जब अभ्याम सिद्ध हुएमें होन लगते हैं तब योगीके व्याधि (रोग) नाश होते हैं, वृद्धावस्थाका निवारण होता है, शास्त्रके व्याख्यान करनेका सामर्थ्य बिना पढेभी होता है, अमृतमय शरीर हाकर अष्ट सिद्धि मिलती है स्मरणमात्रसे सिद्ध, गंधर्व, नागादिकन्याओंके आकर्षण कग्नेका सामर्थ्य होता है॥ ४८॥ अमृतापूर्णदेहस्य योगिनो द्वित्रिवत्सरात्। उर्ध्व प्रवर्तते रेतोऽप्यणिमादिगुणोदयः ॥४९॥ उक्त प्रत्याहारका फल कहत हैं कि उक्त प्रकारमे अमृतसे परि- पूर्ण जब देह योगीका हा जाता है तो २।३ वर्ष अभ्याससे बीर्य (रेत) ऊपरको चढ जाता है उध्वरेता हाक कदाचित्भी वार्य स्खलित नहीं होता एवं आणिमादि सिद्धि उदय होती है॥। ४९ ॥ इन्धनानि यथा वह्निस्तैलवर्ति च दीपकः। तथा सोमकलापूर्णदेहं देही न सुञ्चाति॥५० ॥ जैसे अग्नि शुष्ककाष्ठ एवं दीपक तैलवर्तिका समग्र भस्म किय विना नहीं छोडता तैसेही जीवात्माभी चंद्रकलामृतस पूर्ण हुए योगीके शरीरको कदापि नहीं छोडता ॥ ५० ॥ नित्यं सोमकलापूर्ण शरीरं यस्य योगिनः । तक्षकेणापि दृष्टस्य विषं तस्य न सर्पति ॥५१॥ जिस योगीका शरीर नित्य सोमकलामृतसे पूर्ण रहता है उसे तक्षकनागभी डसे (काटे ) तोभी शरीरमें विष नहीं फैलता ॥५३।। इति प्रत्याहारप्रकरणम् ।