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1. Guru Gita Asram Ji Bapu Sat Sang Edition OCR

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श्रीगुरुगीता

स्कंदपुराणान्तर्गत शिवपार्वती-संवाद

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ब्रह्मलीन ब्रह्मनिष्ठ परम सद्गुरु पूज्यपाद स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज

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स्कंदपुराणान्तर्गत

श्रीगुरुगीता

तथा प्रातःस्मरणीय पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन

ती आसारामज़ी आ

श्री योग वेदान्त सेवा समिति संत श्री आसारामजी आश्रम, साबरमती, अमदावाद-380 005. फोन : 7505010, 7505011. वरियाव रोड, जहाँगीरपुरा, सूरत। फोन : 685341, 687936 वन्दे मातरम् रोड, रवीन्द्र रंगशाला के सामने, नई दिल्ली-60 फोन : 5729338, 5764161.

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प्रास्ताविक भगवान शंकर और देवी पार्वती के संवाद में प्रकट हुई 'श्री गुरुगीता' समग्र 'स्कंदपुराण' का निष्कर्ष है। इसके हर एक ल्रोक में सूत जी का सचोट अनुभव व्यक्त होता है। जैसेः मुखस्तम भकरं चैव गुणा नां च वि वर्धनम्। दुष्कर्म नाशन चैव त था सत्कम 'सिद्धदम।। "इस श्री गुरुगीता का पाठ शत्रु का मुख बन्द करने वाला है, गुणों की वृद्धि करने वाला है, दुष्कृत्यों का नाश करने वाला और सत्कर्म में सिद्धि देने वाला है।" गुरूगीताक्षरकैकं मंत्रराज मिदं प्रिये। अन्ये च विवि धा मंत्रा: कलां नारहन्तिषोड शीम।। "हे प्रिये! श्री गुरुगीता का एक एक अक्षर मंत्रराज है। अन्य जो विविध मंत्र हैं वे इसका सोलहवाँ भाग भी नहीं।" अकालम त्युहंत्री च सर्व संकटनाशिनी। यक्षराक्षसभ तादि च ररिव्याघ्रविघातिनी।। "श्री गुरुगीता अकाल मृत्यु को रोकती है, सब संकटों का नाश करती है, यक्ष, राक्षस, भूत, चोर और शेर आदि का घात करती है।" शुचि भूता ज्ञानव तो गुरुगीता ज पन्ति ये। तेषां दर्श नसंस्पर्शात् पुनर्जन्म न विद्यत॥ "जो पवित्र ज्ञानवान पुरुष इस श्री गुरुगीता का जप-पाठ करते हैं उनके दर्शन और स्पर्श से पुनर्जन्म नहीं होता।" इस श्री गुरुगीता के ल्लोक भवरोग-निवारण के लिए अमोघ औषधि हैं। साधकों के लिए यह परम अमृत है। स्वर्ग का अमृत पीने से पुण्य क्षीण होते हैं जबकि इस गीता का अमृत पीने से पाप नष्ट होकर शांति मिलती है, स्वस्वरूप का भान होता है। तुलसीदास जी ने ठीक कहा है: गुरु बिन ज्ञान भवनि धि तर हिं न कोई। जो बिर चि सकर सम होई।। आत्मदेव को जानने के लिए यह गुरुगीता आपके करकमलों में रखते हुए .. ॐॐॐॐॐॐॐॐ परम शांति !!!!

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ॐ अस्य श्रीगुरुगीतास्तोत्रमालामंत्रस्य भगवान सदाशिवः ऋषिः। विराट् छन्दः। श्रीगुरुपरमात्मा देवता। हं बीजम्। सः शक्तिः। सोऽहं कीलकम्। श्रीगुरुकृपाप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोग: ।। ।। अथ करन्यास:॥ ॐ हं सां सूर्यात्मने अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ हं सी सोमात्मने तर्जनीभ्यां नमः। ॐ हं सूं निरंजनात्मने मध्यमाभ्यां नमः। ॐ हं सैं निराभासात्मने अनामिकाभ्यां नमः। ॐ हं सः अव्यक्तात्मने करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः। ।। इति करन्यास:| ॥। अथ हृदयादिन्यास:॥ ॐ हं सां सूर्यात्मने हृदयाय नमः। ॐ हं सी सोमात्मने शिरसे स्वाहा। ॐ हं सूं निरंजात्मने शिखायै वषट्। ॐ हं सैं निराभासात्मने कवचाय हुम्। ॐ हं सौं अतुसूक्ष्मात्मने नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ हं सः अव्यक्तात्मने अस्त्राय फट्। ।। इति हृदयादिन्यास:॥ ।। अथ ध्यानम् ॥ नमा मि सद गुरुं शान्तं प्रत्यक्ष शिवरू पिणम। शिरसा योगपीठस्थ मुक्तिकामाथ 'सिद्धि दम्। । 1।। प्रातः शिर सि शुक्लाब्जो द्वि नेत्रं द्वि भुजं गुरुम्। वराभयकर शान्तं स्मरेत्तन्न मपूर्वकम्। ॥2॥ प्रसन्नवदनाक्ष च सर्व देवस्वरूपिणम। तत्पादोदकजा धारा निपतन्ति स्वमर धनि।॥3॥ तया संक्षालय द् देहे ह्यन्तर्बा ह्यगतं मल म्। तत्क्षणा द्विरजो भूत्वा जायते स्फ टिकोपम :।॥4। तीर्थानि दक्षिण पादे वेदास्तन मुखरक्षिताः। पूज येद र्चितं तं तु तदमि ध्या नपूर्व कम्।॥5॥ ।।इति ध्यानम् ॥ ।। मानसोपचारैः श्रीगुरुं पूजयित्वा।।

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लं पृथिव्यात्मने गंधतन्मात्रा प्रकृत्यानन्दात्मने श्रीगुरुदेवाय नमः पृथिव्यात्मकं गंध समर्पयामि।। हं आकाशात्मने शब्दतन्मात्राप्रकृत्यानन्दात्मने श्रीगुरुदेवाय नमः आकाशात्मकं पुष्पं समर्पयामि।। यं वाय्वात्मने स्पर्शतन्मात्राप्रकृत्यानन्दात्मने श्रीगुरुदेवाय नमः वाय्वात्मकं धूपं आघ्रापयामि।। रं तेजात्मने दर्शयामि।। वं अपात्मने रसतन्मात्राप्रकृत्यानन्दात्मने श्रीगुरुदेवाय नमः अपात्मकं नैवेद्यकं निवेदयामि।। सं सर्वात्मने सर्वतन्मात्राप्रकृत्यानन्दात्मने श्रीगुरुदेवाय नमः सर्वात्मकान् सर्वोपचारान् समर्पयामि।। ।। इति मानसपूजा।।

श्रीगु रुगीता ॥ अथ प्रथ मोऽध्याय: ॥

अचि न्त्याव्यक्त रूपाय निर्गुणाय गुणात्मन। समस्त जगदाधारम र्तये ब्रह्मणे नमः ।।

पहला अ ध्याय जो ब्रह्म अचिन्त्य, अव्यक्त, तीनों गुणों से रहित (फिर भी देखनेवालों के अज्ञान की उपाधि से) त्रिगुणात्मक और समस्त जगत का अधिष्ठान रूप है ऐसे ब्रह्म को नमस्कार हो | (1) ऋषयः ऊ चुः

सूत सत महाप्राज्ञ निग मागमपारग । गुरुस्वरूपम स्माकं ब्रहि सर्व मलापहम।।

ऋषियों ने कहा : हे महाज्ञानी, हे वेद-वेदांगों के निष्णात ! प्यारे सूत जी ! सर्व पापों का नाश करनेवाले गुरु का स्वरूप हमें सुनाओ । (2)

यस्य श्रवणमात्रण देही द:खा द्विमुच्यते। येन मार्गेण मुनयः सव ज्ञत्वं प्रपेदिरे।। यत्प्रा प्य न पुनर्या ति नरः स सारबन्धनम । तथाविध परं तत्व' वक्तव्यमध ना त्वया।।

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जिसको सुनने मात्र से मनुष्य दुःख से विमुक्त हो जाता है। जिस उपाय से मुनियों ने सर्वज्ञता प्राप्त की है, जिसको प्राप्त करके मनुष्य फ़िर से संसार बन्धन में बँधता नहीं है ऐसे परम तत्व का कथन आप करें। (3, 4)

गुह्याद गुह्यतम सार गुरुगीता वि शेषतः | त्वत्प्र सादाच्च श्रोतव्या तत्सव ब्रूहि सत नः ॥

जो तत्व परम रहस्यमय एवं श्रेष्ठ सारभूत है और विशेष कर जो गुरुगीता है वह आपकी कृपा से हम सुनना चाहते हैं। प्यारे सूतजी ! वे सब हमें सुनाइये । (5)

इति संप्राथित : सूतो म निस घैर्मुहुर्मुहुः । कुत्तूहलेन म हता प्रोवाच मधरं वच: ॥

इस प्रकार बार-बार प्रर्थना किये जाने पर सूतजी बहुत प्रसन्न होकर मुनियों के समूह से मधुर वचन बोले । (6)

सूत उ वाच श्रृणुध्वं मुनयः सव श्रद्धया परया मुदा । वदामि भ वरोगघ्नी गी ता मा तृस्वरूपिणीम . ।।

सूतजी ने कहा : हे सर्व मुनियों ! संसाररूपी रोग का नाश करनेवाली, मातृस्वरूपिणी (माता के समान ध्यान रखने वाली) गुरुगीता कहता हूँ । उसको आप अत्यंत श्रद्धा और प्रसन्नता से सुनिये | (7)

पुरा कैलास शिखरे सिद्धगन धर्व सेविते । तत्र कल्प लतापु ष्पम न्दिरेsत्यन्त सुन्दरे।। व्याघ्र जिने स मासिन शु कादिम नि वन्दि तम् । बोधयन्त परं तत्व शश्च न्नमस्कुर्वन्तमादरात. । दृष्ट्वा विस् मयमापन्ना पार्व ती परिप च्छति।।

प्राचीन काल में सिद्धों और गन्धर्वों के आवास रूप कैलास पर्वत के शिखर पर कल्पवृक्ष के फूलों से बने हुए अत्यंत सुन्दर मंदिर में, मुनियों के बीच व्याघ्रचर्म पर बैठे हुए, शुक आदि मुनियों द्वारा वन्दन किये जानेवाले और परम तत्व का बोध देते हुए भगवान शंकर

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को बार-बार नमस्कार करते देखकर, अतिशय नम्र मुखवाली पार्वति ने आश्चर्यचकित होकर पूछा।

पार्व त्युवाच ॐ नमो दव देवेश परात्पर जगद गुरो। त्वां नमस्कुर्वते भक्त्या सुरासुरनराः सदा ।।

पार्वती ने कहा: हे ऊकार के अर्थस्वरूप, देवों के देव, श्रेष्ठों के श्रेष्ठ, हे जगदगुरो! आपको प्रणाम हो । देव दानव और मानव सब आपको सदा भक्तिपूर्वक प्रणाम करते हैं। (11)

विधि विष्णु महेन्द्रादयर्व न्द: ख लु सदा भवान. । नमस्करो षि कस्म त्वं नमस्काराश्रयः किलः ॥

आप ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र आदि के नमस्कार के योग्य हैं। ऐसे नमस्कार के आश्रयरूप होने पर भी आप किसको नमस्कार करते हैं। (12)

भगवन सर्वधर्मज्ञ व्रतानां व्रतना यकम् । ब्रूहि मे कृपया शम भो गु रुमाहात्म्यम त्तम म् ।।

हे भगवान् ! हे सर्व धर्मों के ज्ञाता ! हे शम्भो ! जो व्रत सब व्रतों में श्रेष्ठ है ऐसा उत्तम गुरु-माहात्म्य कृपा करके मुझे कहें। (13)

इति संप्रा र्थित: श श्वन्महाद वो महश्वरः । आनंदभरित : स्वान्त पार्व ती मिदमब्रवीत. ॥।

इस प्रकार (पार्वती देवी द्वारा) बार-बार प्रार्थना किये जाने पर महादेव ने अंतर से खूब प्रसन्न होते हुए पार्वती से इस प्रकार कहा । (14)

महादेव उ वाच न वक्तव्यमि दं देवि रहस्या तिरहस्यकम. । न कस्यापि प रा प्रोक्तं त्व द्रक्त्यर्थ वदामि त त्।।

श्री महादेव जी ने कहा: हे देवी ! यह तत्व रहस्यों का भी रहस्य है इसलिए कहना उचित नहीं। पहले किसी से भी नहीं कहा | फिर भी तुम्हारी भक्ति देखकर वह रहस्य कहता हूँ

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मम् रूपा सि देवि त्वमतस्तत्क थयामि त । लोकोपकारकः प्रश्नो न क 'नापि कतः पुरा ॥

हे देवी ! तुम मेरा ही स्वरूप हो इसलिए (यह रहस्य) तुमको कहता हूँ। तुम्हारा यह प्रश्न लोक का कल्याणकारक है। ऐसा प्रश्न पहले कभी किसीने नहीं किया।

यस्य देवे परा भ क्ति, यथा देवे तथा गुरौ । त्स्यैते कथिता हयर्थाः प्रकाशन्त म हात्मनः 11

जिसको ईश्वर में उत्तम भक्ति होती है, जैसी ईश्वर में वैसी ही भक्ति जिसको गुरु में होती है ऐसे महात्माओं को ही यहाँ कही हुई बात समझ में आयेगी ।

यो गुरु स शि वः प्रोक्तो, यः शि वः स गुरुसमृतः । विक ल्पं यस्तु, कुर्वीत स नरो गुरुतल्पग : ॥

जो गुरु हैं वे ही शिव हैं, जो शिव हैं वे ही गुरु हैं। दोनों में जो अन्तर मानता है वह गुरुपत्नीगमन करनेवाले के समान पापी है।

वेद्शास्त्रप रा णानि च'तिहासा दिकानि च । मंत्रयंत्र विद्यादिनिमोहनोच चाटन दि कम् ।। शैवशाक्तागमा दिनि ह्य न्ये च बहवो मता : । अपभ्रं शाः स मस्ताना' जीवाना भ्रांतचेत साम् ॥ जपस्तपोव्रत तीर्थ यज्ञो दान तथैव च। गुरु तत्व अविज्ञाय सर्वं व्यर्थ भवेत् प्रिये ।।

हे प्रिये ! वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहास आदि मंत्र, यंत्र, मोहन, उच्चाट्न आदि विद्या शैव, शाक्त आगम और अन्य सर्व मत मतान्तर, ये सब बातें गुरुतत्व को जाने बिना भ्रान्त चित्तवाले जीवों को पथभ्रष्ट करनेवाली हैं और जप, तप व्रत तीर्थ, यज्ञ, दान, ये सब व्यर्थ हो जाते हैं। (19, 20, 21)

गुरुबुध्यात्मनो न नन्यत सत्यं सत्य वरानन । तल्ल भार्थं प्रयत्नस्त, कर्त वयश च मनीषिभि : ।।

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हे सुमुखी ! आत्मा में गुरु बुद्धि के सिवा अन्य कुछ भी सत्य नहीं है सत्य नहीं है। इसलिये इस आत्मज्ञान को प्राप्त करने के लिये बुद्धिमानों को प्रयत्न करना चाहिये| (22)

गूढाविद्या जगन्माया द ह शचाज्ञानसम्भवः 1 विज्ञान यत्प्रसाद न गुरुशब्देन कथयते ।।

जगत गूढ अविद्यात्मक मायारूप है और शरीर अज्ञान से उत्पन्न हुआ है। इनका विश्लेषणात्मक ज्ञान जिनकी कृपा से होता है उस ज्ञान को गुरु कहते हैं।

देही ब्रह्म भव दसमात त्वत्कृपार्थ वदा मि तत. । सर्वपापवि शुद्धा त्मा श्रीगुरोः पादस वनात ॥

जिस गुरुदेव के पादसेवन से मनुष्य सर्व पापों से विशुद्धात्मा होकर ब्रह्मरूप हो जाता है वह तुम पर कृपा करने के लिये कहता हूँ। (24)

शो षणं पापप कस्य दीपन ज्ञानत जस । गुरो: पादोदक सम्यक संसारार्ण वतारकम ।।

श्री गुरुदेव का चरणामृत पापरूपी कीचड़ का सम्यक शोषक है, ज्ञानतेज का सम्यक उद्यीपक है और संसारसागर का सम्यक तारक है। (25)

अज्ञानम लहरणं जन्मक र्मनिवारकम । ज्ञानवैरा ग्यसिद् ध्यर्थ गुरुपादोदक पिबेत् ।।

अज्ञान की जड़ को उखाड़नेवाले, अनेक जन्मों के कर्मों को निवारनेवाले, ज्ञान और वैराग्य को सिद्ध करनेवाले श्रीगुरुदेव के चरणामृत का पान करना चाहिये | (26)

स्वदेशिकस्यव च नामकीर्त नम् भवेदन न्तस्यशि वस्य कीर्त नम् । स्वदेशि कस्यैव च नामचि न्तनम् भवेदनन्तस्य शिवस्य नामचि न्तनम् ।।

अपने गुरुदेव के नाम का कीर्तन अनंत स्वरूप भगवान शिव का ही कीर्तन है । अपने गुरुदेव के नाम का चिंतन अनंत स्वरूप भगवान शिव का ही चिंतन है । (27)

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काशीक्ष त्रं निवास श्व जाह्नवी चरणोदकम. । गुरुर्वि श्वेश्वरः साक्षात तारकं ब्रह्मनि श्चयः ॥

गुरुदेव का निवासस्थान काशी क्षेत्र है । श्री गुरुदेव का पादोदक गंगाजी है । गुरुदेव भगवान विश्वनाथ और निश्चय ही साक्षात् तारक ब्रह्म हैं। (28)

गुरुसेवा गया प्रोक्ता दह: स्यादक्षयो वटः । तत्पाद विष्णु पादं स्यात तत्रदत्तमनस्तत म् ।।

गुरुदेव की सेवा ही तीर्थराज गया है। गुरुदेव का शरीर अक्षय वटवृक्ष है। गुरुदेव के श्रीचरण भगवान विष्णु के श्रीचरण हैं । वहाँ लगाया हुआ मन तदाकार हो जाता है। (29)

गुरुवक्त्र स्थि तं ब्रह्म प्राप्यत तत्प्रसादत : । गुरोध्या नं सदा कु र्या त् पुरुषं स्वैरिणी यथा ।।

ब्रह्म श्रीगुरुदेव के मुखारविन्द (वचनामृत) में स्थित है। वह ब्रह्म उनकी कृपा से प्राप्त हो जाता है। इसलिये जिस प्रकार स्वेच्छाचारी स्त्री अपने प्रेमी पुरुष का सदा चिंतन करती है उसी प्रकार सदा गुरुदेव का ध्यान करना चाहिये । (30)

स्वाश्रम' च स्वजा तिं च स्व कीर्ति पुष्टिवर्ध नम् । एतत्सर्व परित्यज य गुरुमेव स माश्र येत् ।।

अपने आश्रम (ब्रह्मचर्याश्रमादि) जाति, कीर्ति (पदप्रतिष्ठा), पालन-पोषण, ये सब छोड़ कर गुरुदेव का ही सम्यक् आश्रय लेना चाहिये| (31)

गुरुवक्त्र स्थि ता विद्या ग रुभक्त्या च ल भ्यते । त्रैलोक्य स्पुटवक्तारो देवर्षिपितृमानवाः ।।

विद्या गुरुदेव के मुख में रहती है और वह गुरुदेव की भक्ति से ही प्राप्त होती है । यह बात तीनों लोकों में देव, ऋषि, पितृ और मानवों द्वारा स्पष्ट रूप से कही गई है । (32)

गुकारश्चान धकारो हि रुकारस्त ज उच्यत । अज्ञानग्रासक' ब्र ह्म गुरुरेव न स शयः ॥

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'गु' शब्द का अर्थ है अंधकार (अज्ञान) और 'रु' शब्द का अर्थ है प्रकाश (ज्ञान)। अज्ञान को नष्ट करनेवाल जो ब्रह्मरूप प्रकाश है वह गुरु है। इसमें कोई संशय नहीं है । (33)

गुकारश्वान्धकारस्त , रुकारस्त न्निरोधकत् । अन्धकारविनाशित्वात गुरुरित्यभि धीयते ।।

'गु' कार अंधकार है और उसको दूर करनेवाल 'रु' कार है। अज्ञानरूपी अन्धकार को नष्ट करने के कारण ही गुरु कहलाते हैं। (34)

गुकारश्च ग णातीतो रूपातीतो रुकारकः । गुणरूपविहीनत्वात गुरुरित्य भिधीयत।।

'गु' कार से गुणातीत कहा जता है, 'रु' कार से रूपातीत कहा जता है। गुण और रूप से पर होने के कारण ही गुरु कहलाते हैं। (35)

गुकार: प्र थमो वर्णो मायादि ग णभास कः । रुकारोऽस्ति पर ब्रह्म मायाभ्रान्ति विमो चकम् ।।

गुरु शब्द का प्रथम अक्षर गु माया आदि गुणों का प्रकाशक है और दूसरा अक्षर रु कार माया की भ्रान्ति से मुक्ति देनेवाला परब्रह्म है । (36)

सर्वश्रुति शिरोरत्नविराजि तपदा बुजम् । वेदान्ताथ 'प्रवक्तार' तस् मात्स पूजयेद् गुरुम् ।।

गुरु सर्व श्रुतिरूप श्रेष्ठ रत्नों से सुशोभित चरणकमलवाले हैं और वेदान्त के अर्थ के प्रवक्ता हैं। इसलिये श्री गुरुदेव की पूजा करनी चाहिये | (37)

यस्यस्मरणमात्र 'ण ज्ञानम त्पद्यत स्वयम । सः एव सव सम्पत्तिः त स्मात्स पूज येद् गुरुम् ।।

जिनके स्मरण मात्र से ज्ञान अपने आप प्रकट होने लगता है और वे ही सर्व (शमदमदि) सम्पदारूप हैं। अतः श्री गुरुदेव की पूजा करनी चाहिये । (38)

संसारव क्षमारूढ़ाः प तन्ति नरकार्णवे । यस्तान द्वरते सर्वा न् तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।

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संसाररूपी वृक्ष पर चढ़े हुए लोग नरकरूपी सागर में गिरते हैं । उन सबका उद्धार करनेवाले श्री गुरुदेव को नमस्कार हो । (39)

एक एव परो बन धुर्वि षमे समुपस्थित । गुरु: स कलध र्मात्मा तस्म® श्रीगुरवे नमः ॥

जब विकट परिस्थिति उपस्थित होती है तब वे ही एकमात्र परम बांधव हैं और सब धर्मों के आत्मस्वरूप हैं । ऐसे श्रीगुरुदेव को नमस्कार हो । (40)

भवारण्यप्रविष्टस्य दि इमोहभ्रान तचेतसः । येन सन्दर्शित: पनथाः तस् मै श्रीग रवे नमः ।

संसार रूपी अरण्य में प्रवेश करने के बाद दिग्मूढ की स्थिति में (जब कोई मार्ग नहीं दिखाई देता है), चित्त भ्रमित हो जाता है , उस समय जिसने मार्ग दिखाया उन श्री गुरुदेव को नमस्कार हो । (41)

तापत्रयाग्नितप्ता नां अशान्तप्राणीना भुवि। गुरुरेव परा ग गा तस् मै श्रीग रुवे नम: ॥

इस पृथ्वी पर त्रिविध ताप (आधि-व्याधि-उपाधि) रूपी अग्नी से जलने के कारण अशांत हुए प्राणियों के लिए गुरुदेव ही एकमात्र उत्तम गंगाजी हैं । ऐसे श्री गुरुदेवजी को नमस्कार हो । (42)

सप्त सागरपय न्तं तीर्थ स्नानफल तु यत्। गुरुपादपयोबि न्दोः सह स्रांशेन तत्फ लम् ।।

सात समुद्र पर्यन्त के सर्व तीर्थों में स्नान करने से जितना फल मिलता है वह फल श्रीगुरुदेव के चरणामृत के एक बिन्दु के फल का हजारवाँ हिस्सा है । (43)

शिवे रुष्टे गुरुस्त्राता गुरौ रुष्टे न कश्चन । लब्ध्वा कुलगुरुं स म्यग्ग रुमेव समा श्रयेत् ।।

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यदि शिवजी नारज़ हो जायें तो गुरुदेव बचानेवाले हैं, किन्तु यदि गुरुदेव नाराज़ हो जायें तो बचानेवाला कोई नहीं । अतः गुरुदेव को संप्राप्त करके सदा उनकी शरण में रेहना चाहिए । (44)

गुकारं च गुणातीत रुकार रुपव र्जितम् । गुणातीतमरूप· च यो दद्यात स गुरु: स्मतः ॥

गुरु शब्द का गु अक्षर गुणातीत अर्थ का बोधक है और रु अक्षर रूपरहित स्थिति का बोधक है । ये दोनों (गुणातीत और रूपातीत) स्थितियाँ जो देते हैं उनको गुरु कहते हैं। (45)

अत्रिनेत्र: शिव : साक्षात द्विबाहु श्व ह रिः स् मृतः । योऽ चतुर्वदनो ब्रह्मा श्रीग रु: कथि तः प्रिये ॥

हे प्रिये ! गुरु ही त्रिनेत्ररहित (दो नेत्र वाले) साक्षात् शिव हैं, दो हाथ वाले भगवान विष्णु हैं और एक मुखवाले ब्रह्माजी हैं। (46)

देवकि न्नरगन धर्वा: पितृ यक्षास्त, तुम्बुरुः । मुनयोऽपि न जानन्ति गुरुशु श्रूषणे वि धिम् ।।

देव, किन्नर, गंधर्व, पितृ, यक्ष, तुम्बुरु (गंधर्व का एक प्रकार) और मुनि लोग भी गुरुसेवा की विधि नहीं जानते | (47)

तार्कि काश्छान्द साश्चैव देवज्ञाः क र्मठः प्रिये। लौकिकास्त' न जानन्ति ग रुतत्व निराकु लम् ।।

हे प्रिये ! तार्किक, वैदिक, ज्योतिषि, कर्मकांडी तथा लोकिकजन निर्मल गुरुतत्व को नहीं जानते | (48)

यज्ञिनोऽ पिन मुक्ता: स्य: न मक्ता : योगिनस्तथा । तापसा अपि नो मुक्त गुरुतत्वात्पराइमखाः ।।

यदि गुरुतत्व से प्राड्मुख हो जाये तो याज्ञिक मुक्ति नहीं पा सकते, योगी मुक्त नहीं हो सकते और तपस्वी भी मुक्त नहीं हो सकते । (49)

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न मुक्तास्त, गन धर्वः पित यक्षास्त, चारणाः । ऋष्यः सिद्धदेवाद्याः ग रुसेवापराइम खाः ॥

गुरुसेवा से विमुख गंधर्व, पितृ, यक्ष, चारण, ऋषि, सिद्ध और देवता आदि भी मुक्त नहीं होंगे।

।। इति श्री स्कान्दोत्तरखण्ड 'उमामह श्वरस वादे श्री गुरुगीताया' प्र थमोऽ ध्या यः ॥

॥ अथ द्वितीयोऽध्यायः ॥

ब्रह्मानन्द परमस खदं केवलं ज्ञानम र्ति द्वन्द्वातीत ग गनसदृश' तत वमस्यादिलक्ष्यम. । एकं नित्य' वि मलम चलं स र्वधीसा क्षिभू तम् भावतीत त्रि गुणरहि तं सद्ग रुं तं नमा मि ।।

दूसरा अध्याय

जो ब्रह्मानंदस्वरूप हैं, परम सुख देनेवाले हैं जो केवल ज्ञानस्वरूप हैं, (सुख, दुःख, शीत- उष्ण आदि) द्वन्द्वों से रहित हैं, आकाश के समान सूक्ष्म और सर्वव्यापक हैं, तत्वमसि आदि महावाक्यों के लक्ष्यार्थ हैं, एक हैं, नित्य हैं, मलरहित हैं, अचल हैं, सर्व बुद्धियों के साक्षी हैं, भावना से परे हैं, सत्व, रज और तम तीनों गुणों से रहित हैं ऐसे श्री सदगुरुदेव को मैं नमस्कार करता हूँ। (52)

गुरुपदिष्ट मार्गण मनः शिद्धिं तु कारयत् । अनित्य खण्ड येत्सर्वं यत्किंचिदात्म गोचरम ।।

श्री गुरुदेव के द्वारा उपदिष्ट मार्ग से मन की शुद्धि करनी चाहिए । जो कुछ भी अनित्य वस्तु अपनी इन्द्रियों की विषय हो जायें उनका खण्डन (निराकरण) करना चाहिए। (53)

कि मत्रं बहु नोक्तेन शास्त्रकोटिशत रपि । दुर्लभा चित्तवि श्रान्तिः विना गुरुकृपां पराम ।।

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यहाँ ज्यादा कहने से क्या लाभ ? श्री गुरुदेव की परम कृपा के बिना करोड़ों शास्त्रों से भी चित्त की विश्रांति दुर्लभ है। (54)

करुणाखड्गपात न छित्त्वा पाशाष्टक शिशो: । सम्यगानन्दजनक : सदग रु सो sभि धीयते ।। एवं श्रुत्वा महाद 'वि गुरुनि न्दा करोति यः । स याति नरकान घोरा न् यावच्चन्द्र दिवाकरौ ।।

करुणारूपी तलवार के प्रहार से शिष्य के आठों पाशों (संशय, दया, भय, संकोच, निन्दा, प्रतिष्ठा, कुलाभिमान और संपत्ति ) को काटकर निर्मल आनंद देनेवाले को सदगुरु कहते हैं | ऐसा सुनने पर भी जो मनुष्य गुरुनिन्दा करता है, वह (मनुष्य) जब तक सूर्यचन्द्र का अस्तित्व रहता है तब तक घोर नरक में रहता है। (55, 56)

यावत्कल्पान्तको द 'हस्तावद्द'वि गुरुं स्मरेत्। गुरुलोपो न कर्त्तव्यः स्व च्छन्दो यदि वा भव त् ।।

हे देवी ! देह कल्प के अन्त तक रहे तब तक श्री गुरुदेव का स्मरण करना चाहिए और आत्मज्ञानी होने के बाद भी (स्वच्छन्द अर्थात् स्वरूप का छन्द मिलने पर भी ) शिष्य को गुरुदेव की शरण नहीं छोड़नी चाहिए । (57)

हुंकारेण न वक्तव्य प्राज्ञशिष्य कदाचन। गुरुराग्र न वक्तव्यमसत्य तु क दाचन ।।

श्री गुरुदेव के समक्ष प्रज्ञावान् शिष्य को कभी हुँकार शब्द से (मैने ऐसे किया ... वैसा किया ) नहीं बोलना चाहिए और कभी असत्य नहीं बोलना चाहिए । (58)

गुरुं त्वकृत्य हुकृत्य ग रुसा न्निध्यभाषणः 1 अरण ये निर्ज ले देशे संभवेद् ब्रह्मराक्षस : ।।

गुरुदेव के समक्ष जो हुँकार शब्द से बोलता है अथवा गुरुदेव को तू कहकर जो बोलता है वह निर्जन मरुभूमि में ब्रह्मराक्षस होता है। (59)

अद्वैतं भाव येन्नित्य' सर्वा वस्थासु सर्व दा । कदा चिद पि नो कुर्या दद्वैतं गुरुस न्निधौ ।।

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सदा और सर्व अवस्थाओं में अद्वैत की भावना करनी चाहिए परन्तु गुरुदेव के साथ अद्वैत की भावना कदापि नहीं करनी चाहिए । (60)

दृश्यविस्म तिपर्य न्तं कुर्या द् गुरुपदा र्चनम् । तादृशस्यव कैवल्य न च तद्व्य तिरेकिणः ।

जब तक दृश्य प्रपंच की विस्मृति न हो जाय तब तक गुरुदेव के पावन चरणारविन्द की पूजा-अर्चना करनी चाहिए । ऐसा करनेवाले को ही कैवल्यपद की प्रप्ति होती है, इसके विपरीत करनेवाले को नहीं होती। (61)

अपि स पूर्ण तत्त्वज्ञो ग रुत्यागी भवेद्ददा । भवेत्येव हि तस्यान्तकाल विक्ष पमुत्कटम ।।

संपूर्ण तत्त्वज्ञ भी यदि गुरु का त्याग कर दे तो मृत्यु के समय उसे महान् विक्षेप अवश्य हो जाता है। (62)

गुरौ सति स्वय देवी पर षां तु क दाचन । उपदेशं न वै कुर्यात् तदा चद्राक्षसो भव त् ।।

हे देवी ! गुरु के रहने पर अपने आप कभी किसी को उपदेश नहीं देना चाहिए । इस प्रकार उपदेश देनेवाला ब्रह्मराक्षस होता है। (63)

न गुरुराश्रम' कुर्या त् दुष्पानं परिसपणम् । दीक्षा व्याख्य । प्रभुत्वा दि गुरोर ।ज्ञां न कारय त् ।।

गुरु के आश्रम में नशा नहीं करना चाहिए, टहलना नहीं चाहिए । दीक्षा देना, व्याख्यान करना, प्रभुत्व दिखाना और गुरु को आज्ञा करना, ये सब निषिद्ध हैं । (64)

नोप ाश्रमं च पय कं न च पादप्र सारणम । नां गभोगादि कं कुर्या न्न ली लामपरामपि I1

गुरु के आश्रम में अपना छप्पर और पलंग नहीं बनाना चाहिए, (गुरुदेव के सम्मुख) पैर नहीं पसारना, शरीर के भोग नहीं भोगने चाहिए और अन्य लीलाएँ नहीं करनी चाहिए। (65)

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गुरुणां सदसद्वापि यदु क्तं तन्न लंघयेत् । वुर्चन्नाज्ञा' दिवारात्रौ दासव न्निवस द् गुरौ ।।

गुरुओं की बात सच्ची हो या झूठी, परन्तु उसका कभी उल्लंघन नहीं करना चाहिए । रात और दिन गुरुदेव की आज्ञा का पालन करते हुए उनके सान्निध्य में दास बन कर रहना चाहिए । (66)

अदत्तं न गुरोर्द्र व्यमुप भुंजीत कहि र्चित् । दत्तं च रंकवद् ग्र ाह्यं प्राणोप्य तेन लभ्यते ।।

जो द्रव्य गुरुदेव ने नहीं दिया हो उसका उपयोग कभी नहीं करना चाहिए । गुरुदेव के दिये हुए द्रव्य को भी गरीब की तरह ग्रहण करना चाहिए । उससे प्राण भी प्राप्त हो सकते हैं। (67)

पादु कासन शय्यादि ग रुणा यद भिष्टित म् । नमस्कुर्वीत तत्सर्वं पादाभ्या न स्प शेत् क्वचित् ।।

पादुका, आसन, बिस्तर आदि जो कुछ भी गुरुदेव के उपयोग में आते हों उन सर्व को नमस्कार करने चाहिए और उनको पैर से कभी नहीं छूना चाहिए। (68)

गच्छत : पृष्ठतो गच छेत् गुरुच्छाया न लंघयेत् । नोल्बण धार येद्वेषं नाल कारास्ततोल्बणा न् ।।

चलते हुए गुरुदेव के पीछे चलना चाहिए, उनकी परछाईं का भी उल्लंघन नहीं करना चाहिए । गुरुदेव के समक्ष कीमती वेशभूषा, आभूषण आदि धारण नहीं करने चाहिए। (69)

गुरुनि न्दाकर दृष्टवा धावयेदथ वास येत्। स्थान वा तत्परित्याज यं जि ह्वाच्छेदाक्षमो यदि ।।

गुरुदेव की निन्दा करनेवाले को देखकर यदि उसकी जिह्ला काट डालने में समर्थ न हो तो उसे अपने स्थान से भगा देना चाहिए । यदि वह ठहरे तो स्वयं उस स्थान का परित्याग करना चाहिए । (70)

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मुनिभि : पन्नगैर्वा पि सुरैवा शा पितो यदि । कालम त्युभयाद्वापि ग रु: संत्राति पाव ति ।।

हे पर्वती ! मुनियों पन्नगों और देवताओं के शाप से तथा यथा काल आये हुए मृत्यु के भय से भी शिष्य को गुरुदेव बचा सकते हैं। (71)

विजान न्ति महावाक्य गुरोश्वरणस वया । ते वै संन्यासिनः प्र ोक्ता इतरे वेषधारिणः ।।

गुरुदेव के श्रीचरणों की सेवा करके महावाक्य के अर्थ को जो समझते हैं वे ही सच्चे संन्यासी हैं, अन्य तो मात्र वेशधारी हैं । (72)

नित्यं ब्रह्म निराक ारं निर्ग णं बो धयेत् परम्। भासयन् ब्रह्म भावं च दीपो दीपान्तर यथा ।।

गुरु वे हैं जो नित्य, निर्गुण, निराकार, परम ब्रह्म का बोध देते हुए, जैसे एक दीपक दूसरे दीपक को प्रज्ज्वलित करता है वैसे, शिष्य में ब्रह्मभाव को प्रकटाते हैं । (73)

गुरुप्रादतः स्वात्म न्यात्मा रामनिरि क्षणात् । समता म क्तिमर्गेण स्वात्मज्ञान प्रवर्त ते ।।

श्री गुरुदेव की कृपा से अपने भीतर ही आत्मानंद प्राप्त करके समता और मुक्ति के मार्ग द्वार शिष्य आत्मज्ञान को उपलब्ध होता है। (74)

स्फ़टिके स्फ़ा टिकं रूप दर्प णे दर्प णो यथा 1 तथात्म नि चि दाकारमा नन्दं सोऽह मित्युत ।।

जैसे स्फ़टिक मणि में स्फ़टिक मणि तथा दर्पण में दर्पण दिख सकता है उसी प्रकार आत्मा में जो चित् और आनंदमय दिखाई देता है वह मैं हूँ। (75)

अंगुष्ठ मात्रं पुरुषं ध्याय च्च चिन्मयं हृदि । तत्र स्फ़ुरति यो भाव : श्रुणु तत कथयामि त ।।

हृदय में अंगुष्ठ मात्र परिणाम वाले चैतन्य पुरुष का ध्यान करना चाहिए। वहाँ जो भाव स्फ़ुरित होता है वह मैं तुम्हें कहता हूँ, सुनो । (76)

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अजोs हममरोऽह च ह्यनादिनि धनोह्यहम । अविकारश्चि दानन्दो ह्य णियान, महतो महान ।

मैं अजन्मा हूँ, मैं अमर हूँ, मेरा आदि नहीं है, मेरी मृत्यु नहीं है। मैं निर्विकार हूँ, मैं चिदानन्द हूँ, मैं अणु से भी छोटा हूँ और महान् से भी महान् हूँ। (77)

अपूर्वमपरं नित्य स्वयं ज्योतिनि 'रामयम। विरज परमाकाश ध्रुवमानन्दमव्ययम.। अगोचर त था गम्यं नामरूप विवर्जि तम् । निःशबदं तु विजानीया त्स्वाभावाद् ब्रह्म पव 'ति।।

हे पर्वती ! ब्रह्म को स्वभाव से ही अपूर्व (जिससे पूर्व कोई नहीं ऐसा), अद्वितीय, नित्य, ज्योतिस्वरूप, निरोग, निर्मल, परम आकाशस्वरूप, अचल, आनन्दस्वरूप, अविनाशी, अगम्य, अगोचर, नाम-रूप से रहित तथा निःशब्द जानना चाहिए । (78, 79)

यथा ग न्धसवभावत्व कर्प रकुसु मादिष,। शी तोष्णस्वभावत्व तथा ब्रह्म णि शाश्वत म् ।।

जिस प्रकार कपूर, फूल इत्यादि में गन्धत्व, (अग्नि में) उष्णता और (जल में) शीतलता स्वभाव से ही होते हैं उसी प्रकार ब्रह्म में शश्चतता भी स्वभावसिद्ध है। (80)

यथा निज स्वभावन कुंडलकटकादयः 1 सुवर्ण त्वेन तिष्ठ न्ति त थाऽहं ब्रह्म शाश्वत म् ।।

जिस प्रकार कटक, कुण्डल आदि आभूषण स्वभाव से ही सुवर्ण हैं उसी प्रकार मैं स्वभाव से ही शाश्वत ब्रह्म हूँ। (81)

स्वयं तथा विधो भ त्वा स्थातव्य यत्रकुत्र चित्। कीटो भृंग इव यानात यथा भव ति तादृश : ।।

स्वयं वैसा होकर किसी-न-किसी स्थान में रहना । जैसे कीडा भ्रमर का चिन्तन करते- करते भ्रमर हो जाता है वैसे ही जीव ब्रह्म का धयान करते-करते ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। (82)

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गुरोध्या नेनैव नित्यं देही ब्रह्ममयो भवत्। स्थित श्व यत्रकुत्रापि म क्तोऽसौ नात्र स शयः ॥

सदा गुरुदेव का ध्यान करने से जीव ब्रह्ममय हो जाता है। वह किसी भी स्थान में रहता हो फ़िर भी मुक्त ही है। इसमें कोई संशय नहीं है। (83)

ज्ञानं वैराग्यम श्वर्यं यश: श्री स मुदाहतम । षड्गु णै श्वर्य युक्तो हि भ गवान श्री गुरु: प्रिये ।॥

हे प्रिये ! भगवत्स्वरूप श्री गुरुदेव ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, यश, लक्ष्मी और मधुरवाणी, ये छः गुणरूप ऐश्वर्य से संपन्न होते हैं। (84)

गुरु: शिवो ग रुर्देवो ग रुर्ब न्धुः श रीरिणाम. । गुरुरात्मा गुरुर्जीवो गुरो रन्यन्न विद्यत।।

मनुष्य के लिए गुरु ही शिव हैं, गुरु ही देव हैं, गुरु ही बांधव हैं गुरु ही आत्मा हैं और गुरु ही जीव हैं । (सचमुच) गुरु के सिवा अन्य कुछ भी नहीं है। (85)

एकाकी निस्प हः शा न्तः चिंतास यादिवजि 'तः । बाल्यभाव न यो भा ति ब्रह्मज्ञानी स उच्यत।।

अकेला, कामनारहित, शांत, चिन्तारहित, ईर्ष्यारहित और बालक की तरह जो शोभता है वह ब्रह्मज्ञानी कहलाता है। (86)

न सुखं वेद शास्त्रेषु न सुखं मंत्रयंत्रके । गुरोः प्रसादाद न्यत्र सुखं नास्ति महीत ले ।।

वेदों और शास्त्रों में सुख नहीं है, मंत्र और यंत्र में सुख नहीं है। इस पृथ्वी पर गुरुदेव के कृपाप्रसाद के सिवा अन्यत्र कहीं भी सुख नहीं है। (87)

चावार्क वैष्णवमत सुखं प्रभाकरे न हि। गुरो: पादान्तिक यद्वत्स खं वेदान तसम्मत म् ।।

गुरुदेव के श्री चरणों में जो वेदान्तनिर्दिष्ट सुख है वह सुख न चावार्क मत में, न वैष्णव मत में और न प्रभाकर (सांखय) मत में है। (88)

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न तत सुखं सुरेन्द्रस्य न स खं चक्र वर्ति नाम्। यत्सुखं वीतरागस्य म नेरेका न्तवासिन : ॥।

एकान्तवासी वीतराग मुनि को जो सुख मिलता है वह सुख न इन्द्र को और न चक्रवर्ती राजाओं को मिलता है। (89)

नित्य ब्रह्मरसं पीत्वा त सो यः पर मात्मनि । इन्द्रं च मन्यत रंक नृपाणा तत्र का कथा I1

हमेशा ब्रह्मरस का पान करके जो परमात्मा में तृप्त हो गया है वह (मुनि) इन्द्र को भी गरीब मानता है तो राजाओं की तो बात ही क्या ? (90)

यत: परमकवल्यं गुरुमार्गण वै भवेत् । गुरुभक्तिर तिः काया' सर्व दा मोक्षक क्षि भिः ॥

मोक्ष की आकांक्षा करनेवालों को गुरुभक्ति खूब करनी चाहिए, क्योंकि गुरुदेव के द्वारा ही परम मोक्ष की प्राप्ति होती है। (91)

एक एवाद्वि तीयोsहं गुरुवाक्य न निश्चि तः ॥ एवमभ्यास्ता नित्य न सव्यं वै वनान्तर म् ।। अभ्यासा न्निमिषणव स माधि मधिग च्छति । आजन मजनित पाप' तत्क्षणाद व नश्यति ।।

गुरुदेव के वाक्य की सहायता से जिसने ऐसा निश्चय कर लिया है कि मैं एक और अद्वितीय हूँ और उसी अभ्यास में जो रत है उसके लिए अन्य वनवास का सेवन आवश्यक नहीं है, क्योंकि अभ्यास से ही एक क्षण में समाधि लग जाती है और उसी क्षण इस जन्म तक के सब पाप नष्ट हो जाते हैं। (92, 93)

गुरुर्विष्णुः सत्त्व मयो राजसश्वत राननः । ताम सो रुद्ररू पेण स जत्यव ति ह न्ति च ।।

गुरुदेव ही सत्वगुणी होकर विष्णुरूप से जगत का पालन करते हैं, रजोगुणी होकर ब्रह्मारूप से जगत का सर्जन करते हैं और तमोगुणी होकर शंकर रूप से जगत का संहार करते हैं |(94)

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तस्यावलोकन प्राप्य सर्वसंगविवर्जितः । एकाकी निःस्प हः शा न्तः स्थातव्य तत्प्रसादत : ।।

उनका (गुरुदेव का) दर्शन पाकर, उनके कृपाप्रसाद से सर्व प्रकार की आसक्ति छोड़कर एकाकी, निःस्पृह और शान्त होकर रहना चाहिए । (95)

सर्वज्ञपदमित्याह र्देही सर्वमयो भु वि । सदाऽनन दः सदा शा न्तो रमत' यत्र कुत्रचित् ।।

जो जीव इस जगत में सर्वमय, आनंदमय और शान्त होकर सर्वत्र विचरता है उस जीव को सर्वज्ञ कहते हैं। (96)

यत्रैव तिष्ठत सो Sपि स द'शः पुण्यभाजनः I मुक्तस्य लक्षण देवी तवाग्र` क थितं मया ।।

ऐसा पुरुष जहाँ रहता है वह स्थान पुण्यतीर्थ है। हे देवी ! तुम्हारे सामने मैंने मुक्त पुरुष का लक्षण कहा | (97)

यद्यप्यधीता निगमा: षड गा आगमा: प्रिये । आध्यामादिनि श सस्त्राणि ज्ञान नास्ति ग रुं विना ।।

हे प्रिये ! मनुष्य चाहे चारों वेद पढ़ ले, वेद के छः अंग पढ़ ले, आध्यात्मशास्त्र आदि अन्य सर्व शास्त्र पढ़ ले फ़िर भी गुरु के बिना ज्ञान नहीं मिलता । (98)

शिवप जारतो वापि विष्णु पूजारतोऽथवा 1 गुरुतत्व विहीनश्च त्तत्सर्व व्यर्थ मेव हि।।

शिवजी की पूजा में रत हो या विष्णु की पूजा में रत हो, परन्तु गुरुतत्व के ज्ञान से रहित हो तो वह सब व्यर्थ है। (99)

सर्वं स्यात्सफल कर्म गुरुदीक्षाप्रभावतः । गुरुला भात्सर्व लाभो ग रुहीनस्त, बा लिशः ॥

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गुरुदेव की दीक्षा के प्रभाव से सब कर्म सफल होते हैं । गुरुदेव की संप्राप्ति रूपी परम लाभ से अन्य सर्वलाभ मिलते हैं । जिसका गुरु नहीं वह मूर्ख है। (100)

तस्मात्सवप्रयत्नेन सर्व संगविव र्जितः । विहाय शास्त्रजालानि गुरुमेव स माश्र येत् ।।

इसलिए सब प्रकार के प्रयत्न से अनासक्त होकर , शास्त्र की मायाजाल छोड़कर गुरुदेव की ही शरण लेनी चाहिए। (101)

ज्ञानहीनो गुरुत्याज्यो मिथ्यावादी विडंबकः । स्वविश्रा न्ति न जानाति परशा न्तिं करोति किम् ।।

ज्ञानरहित, मिथ्या बोलनेवाले और दिखावट करनेवाले गुरु का त्याग कर देना चाहिए, क्योंकि जो अपनी ही शांति पाना नहीं जानता वह दूसरों को क्या शांति दे सकेगा । (102)

शिलायाः कि परं ज्ञान शि लासंघप्रतारण । स्वयं तर्तु न जानाति पर नि सतारे येत्कथ म् ।।

पत्थरों के समूह को तैराने का ज्ञान पत्थर में कहाँ से हो सकता है ? जो खुद तैरना नहीं जानता वह दूसरों को क्या तैरायेगा। (103)

न वन्दनीयास्त कष्टं दर्श नाद् भ्रा न्तिकारकः 1 वर्ज येतान गुरुन दूरे धीरान व स माश्र येत्।।

जो गुरु अपने दर्शन से (दिखावे से) शिष्य को भ्रान्ति में ड़ालता है ऐसे गुरु को प्रणाम नहीं करना चाहिए। इतना ही नहीं दूर से ही उसका त्याग करना चाहिए । ऐसी स्थिति में धैर्यवान् गुरु का ही आश्रय लेना चाहिए । (104)

पाखण्डिन : पापरता ना स्तिका भेदबुद्धयः | स्त्रीलम्पटा दुराचारा: क तघ्ना बकवृतयः I1 कर्म भ्रष्टाः: क्षमानष्टाः नि न्यतर्केश्च वादिन: का मिनः क्रो धिनश्चैव हिंस्ाश्चड़ाः श ठस्त था ।। ज्ञानलुपा न कर्त व्या महापापास्तथा प्रि ये ।

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एभ्यो भि न्नो गुरुः सव्य एक भक्त्या वि चार्य च ।।

भेदबुद्धि उत्तन्न करनेवाले, स्त्रीलम्पट, दुराचारी, नमकहराम, बगुले की तरह ठगनेवाले, क्षमा रहित निन्दनीय तर्कों से वितंडावाद करनेवाले, कामी क्रोधी, हिंसक, उग्र, शठ तथा अज्ञानी और महापापी पुरुष को गुरु नहीं करना चाहिए । ऐसा विचार करके ऊपर दिये लक्षणों से भिन्न लक्षणोंवाले गुरु की एकनिष्ठ भक्ति से सेवा करनी चाहिए। (105, 106, 107)

सत्यं सत्य पुनः सत्य धर्मसारं मयोदितम । गुरुगीता सम स्तोत्रं नास्ति तत्व गुरोः परम ॥

गुरुगीता के समान अन्य कोई स्तोत्र नहीं है । गुरु के समान अन्य कोई तत्व नहीं है। समग्र धर्म का यह सार मैंने कहा है, यह सत्य है, सत्य है और बार-बार सत्य है । (108)

अनेन यद् भव 'द् काय' तद्वदामि तव प्रि ये। लोकोपकारक देवि ल ौकिकं तु विवजयेत् ।।

हे प्रिये ! इस गुरुगीता का पाठ करने से जो कार्य सिद्ध होता है अब वह कहता हूँ। हे देवी ! लोगों के लिए यह उपकारक है । मात्र लौकिक का त्याग करना चाहिए । (109)

लौकि काद्धर्म तो याति ज्ञानहीनो भ वार्ण वे । ज्ञानभा वे च यत्सव' कर्म निष्कम' शाम्यति ।।

जो कोई इसका उपयोग लौकिक कार्य के लिए करेगा वह ज्ञानहीन होकर संसाररूपी सागर में गिरेगा। ज्ञान भाव से जिस कर्म में इसका उपयोग किया जाएगा वह कर्म निष्कर्म में परिणत होकर शांत हो जाएगा। (110)

इमां तु भ क्ति भावे न पठेद्वै श णुयादपि । लि खित्वा यत्प्रसाद न तत सर्वं फल मश्रुते ॥

भक्ति भाव से इस गुरुगीता का पाठ करने से, सुनने से और लिखने से वह (भक्त) सब फल भोगता है। (111)

गुरुगीता मिमां देवि हृदि नित्य वि भावय । महाव्याधि गतैदु :खै: सर्व दा प्रजप न्मुदा ।।

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हे देवी ! इस गुरुगीता को नित्य भावपूर्वक हृदय में धारण करो | महाव्याधिवाले दुःखी लोगों को सदा आनंद से इसका जप करना चाहिए। (112)

गुरुगीताक्षर"कैकं मं त्रराजमिद प्रिये । अन्ये च वि विधा म त्राः क लां नार्ह न्ति षोडशीम ।।

हे प्रिये ! गुरुगीता का एक-एक अक्षर मंत्रराज है । अन्य जो विविध मंत्र हैं वे इसका सोलहवाँ भाग भी नहीं। (113)

अनन्तफ लमाप्न ोति गु रुगीताजप न तु। सर्व पापहरा द वि सर्व दारिद्रयनाशिनी 11

हे देवी ! गुरुगीता के जप से अनंत फल मिलता है । गुरुगीता सर्व पाप को हरने वाली और सर्व दारिद्रय का नाश करने वाली है। (114)

अकालम त्युहंत्री च स र्वसंकटना शिनी। यक्षराक्षसभ तादिचोरव्या घ्रविघातिनी ।।

गुरुगीता अकाल मृत्यु को रोकती है, सब संकटों का नाश करती है, यक्ष राक्षस, भूत, चोर और बाघ आदि का घात करती है। (115)

सर्वोपद्रवकु ष्ठदिद ष्टदोषनिवारिणी 1 यत्फल गुरुसान्नि ध्या तत्फलं पठनाद् भव त् ।।

गुरुगीता सब प्रकार के उपद्रवों, कुष्ठ और दुष्ट रोगों और दोषों का निवारण करनेवाली है। श्री गुरुदेव के सान्निध्य से जो फल मिलता है वह फल इस गुरुगीता का पाठ करने से मिलता है। (116)

महाव्य धिहरा सव विभूतेः सिद्धिदा भव त् । अथवा मो हने वश्य स्वयमेव जपेत्सदा ।।

इस गुरुगीता का पाठ करने से महाव्याधि दूर होती है, सर्व ऐश्वर्य और सिद्धियों की प्राप्ति होती है। मोहन में अथवा वशीकरण में इसका पाठ स्वयं ही करना चाहिए। (117)

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मोहनं सर्वभूताना बन्धमोक्षकर पर म् । देवराज्ञा प्रियकर राजान वश्मानय त् ।।

इस गुरुगीता का पाठ करनेवाले पर सर्व प्राणी मोहित हो जाते हैं बन्धन में से परम मुक्ति मिलती है, देवराज इन्द्र को वह प्रिय होता है और राजा उसके वश होता है। (118)

मुखस्तम्भकर चैव गुणाणा च विव र्धनम् । दुष्कर्मनाश्नं चैव तथा सत कर्म सिद्धिदम ।।

इस गुरुगीता का पाठ शत्रु का मुख बन्द करनेवाला है, गुणों की वृद्धि करनेवाला है, दुष्कृत्यों का नाश करनेवाला और सत्कर्म में सिद्धि देनेवाला है। (119)

असि द्वं साध येत्कार्य नवग्रह भयापहम. । दुःस्वप्नन शनं चैव सुस्वप्नफलदायकम ।।

इसका पाठ असाध्य कार्यों की सिद्धि कराता है, नव ग्रहों का भय हरता है, दुःस्वप्न का नाश करता है और सुस्वप्न के फल की प्राप्ति कराता है। (120)

मोह शान्ति करं चैव ब न्धमोक्षकर पर म् । स्वरूपज्ञाननिलय गीत शास्त्रमिद शिवे ।।

हे शिवे ! यह गुरुगीतारूपी शास्त्र मोह को शान्त करनेवाला, बन्धन में से परम मुक्त करनेवाला और स्वरूपज्ञान का भण्डार है। (121)

यं यं चिन्तयते काम तं तं प्राप्नोति नि श्चवयम् । नित्य सौभाग्यद पुण्यं तापत्रयक लाप हम् ।।

व्यक्ति जो-जो अभिलाषा करके इस गुरुगीता का पठन-चिन्तन करता है उसे वह निश्चय ही प्राप्त होता है। यह गुरुगीता नित्य सौभाग्य और पुण्य प्रदान करनेवाली तथा तीनों तापों (आधि-व्याधि-उपाधि) का शमन करनेवाली है। (122)

सर्व शान्ति करं नित्य तथा वन्ध्यास पुत्रदम् । अवैधव्यकर स्त्रीणा सौभाग्यस्य विवर्धनम्।

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यह गुरुगीता सब प्रकार की शांति करनेवाली, वन्ध्या स्त्री को सुपुत्र देनेवाली, सधवा स्त्री के वैध्व्य का निवारण करनेवाली और सौभाग्य की वृद्धि करनेवाली है। (123)

आयुरा रोग्म श्रर्यं पुत्रपौत्रप्रव र्धनम् । निष्काम जापी विधवा पठ न्मोक्षमवाप्न यात् ।।

यह गुरुगीता आयुष्य, आरोग्य, ऐश्वर्य और पुत्र-पौत्र की वृद्धि करनेवाली है । कोई विधवा निष्काम भाव से इसका जप-पाठ करे तो मोक्ष की प्राप्ति होती है। (124)

अवैधव्यं सकामा त, लभ ते चान्यज न्मनि । सर्वदुःखभयं वि घ्नं नाश्य त्तापहारकम. ।

यदि वह (विधवा) सकाम होकर जप करे तो अगले जन्म में उसको संताप हरनेवाल अवैध्व्य (सौभाग्य) प्राप्त होता है। उसके सब दुःख भय, विघ्न और संताप का नाश होता है। (125)

सर्वपापप्रशमन ध र्मकामार्थ मोक्षदम । यं यं चिन्तयते का मं तं तं प्राप्नोति निश्चि तम् ।।

इस गुरुगीता का पाठ सब पापों का शमन करता है, धर्म, अर्थ, और मोक्ष की प्राप्ति कराता है । इसके पाठ से जो-जो आकांक्षा की जाती है वह अवश्य सिद्ध होती है। (126)

लिखित्वा प जयेद्यस्तु मोक्ष श्रियम्वाप्न यात् । गुरूभक्ति र्विशेषेण जायत हदि सर्व दा ।।

यदि कोई इस गुरुगीता को लिखकर उसकी पूजा करे तो उसे लक्ष्मी और मोक्ष की प्राप्ति होती है और विशेष कर उसके हृदय में सर्वदा गुरुभक्ति उत्पन्न होती रहती है। (127)

जपन्ति शाक्ता : सौराश्च गाणपत्य शश्व वैष्णवाः । शैवा: पाश पताः सर्व सत्यं सत्यं न सं शयः ॥

शक्ति के, सूर्य के, गणपति के, शिव के और पशुपति के मतवादी इसका (गुरुगीता का) पाठ करते हैं यह सत्य है, सत्य है इसमें कोई संदेह नहीं है। (128)

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जपं हीनासन कुर्वन् हीनकमाफलप्रदम । गुरुगीता' प्रयाण' वा संग्राम रिप संकटे ।। जपन जयमवाप्न ोति मरण' मुक्तिदायिका 1 सर्वकमाणि सिद्धयन्ति गुरुपुत्रे न संशयः ॥

बिना आसन किया हुआ जप नीच कर्म हो जाता है और निषफल हो जाता है। यात्रा में, युद्ध में, शत्रुओं के उपद्रव में गुरुगीता का जप-पाठ करने से विजय मिलता है। मरणकाल में जप करने से मोक्ष मिलता है । गुरुपुत्र के (शिष्य के) सर्व कार्य सिद्ध होते हैं, इसमें संदेह नहीं है। (129, 130)

गुरुमंत्रो म खे यस्य तस्य सिद्धयन्ति नान्यथा । दीक्षया सव 'कर्माणि सिद्धय न्ति ग रुपु त्रके ।।

जिसके मुख में गुरुमंत्र है उसके सब कार्य सिद्ध होते हैं, दूसरे के नहीं । दीक्षा के कारण शिष्य के सर्व कार्य सिद्ध हो जाते हैं। (131)

भवमूल विनाशाय चा ष्टपाशनिव तये । गुरुगीताम्भ सि स्नान तत्वज्ञ कुरुते सदा ।। सर्वशुद्ध: पवि त्रोऽसौ स्व भावा द्यत्र तिष्ठति । तत्र देवगणा: स र्वे क्षेत्रपीठे चर न्ति च ।।

तत्वज्ञ पुरूष संसारूपी वृक्ष की जड़ नष्ट करने के लिए और आठों प्रकार के बन्धन (संशय, दया, भय, संकोच, निन्दा प्रतिष्ठा, कुलाभिमान और संपत्ति) की निवृति करने के लिए गुरुगीता रूपी गंगा में सदा स्नान करते रहते हैं। स्वभाव से ही सर्वथा शुद्ध और पवित्र ऐसे वे महापुरूष जहाँ रहते हैं उस तीर्थ में देवता विचरण करते हैं । (132, 133)

आसनस्था शयाना वा गच्छन्तष्तिष्ठ न्तोऽ पि वा । अश्वरूढ़ा गजारूढ़ा स षुप्ता जाग्रतोऽ पि वा ।। शुचि भूता ज्ञानवन्तो ग रुगीता जप न्ति ये। तेषां दर्श नसंस्पर्शात् पुनर्जन्म न विद्यत ।।

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आसन पर बैठे हुए या लेटे हुए, खड़े रहते या चलते हुए, हाथी या घोड़े पर सवार, जाग्रतवस्था में या सुषुप्तावस्था में , जो पवित्र ज्ञानवान् पुरूष इस गुरुगीता का जप-पाठ करते हैं उनके दर्शन और स्पर्श से पुनर्जन्म नहीं होता। (134, 135)

कुशदुर्वा सने देवि ह्य सने शुभ्रकम्ब ले । उपविश्य ततो द वि जप देकाग्र मानसः ॥।

हे देवी ! कुश और दुर्वा के आसन पर सफ़ेद कम्बल बिछाकर उसके ऊपर बैठकर एकाग्र मन से इसका (गुरुगीता का) जप करना चाहिए (136)

शुक्लं सर्वत्र वै प्रोत्तं वश्य रक्तासन प्रिये । पद्मासन जपे न्नित्य शान्ति वश्यकर परम् ।।

सामन्यतया सफ़ेद आसन उचित है परंतु वशीकरण में लाल आसन आवश्यक है । हे प्रिये ! शांति प्राप्ति के लिए या वशीकरण में नित्य पद्मासन में बैठकर जप करना चाहिए । (137)

वस्त्रासन च दा रिद्रयं पाषाण रोगस भवः । मेदिन्यi दु:खमाप्नोति काष्ठ भव ति निष्फल म् ।।

कपड़े के आसन पर बैठकर जप करने से दारिद्रय आता है, पत्थर के आसन पर रोग, भूमि पर बैठकर जप करने से दुःख आता है और लकड़ी के आसन पर किये हुए जप निष्फल होते हैं। (138)

कृष्णा जिने ज्ञानसिद्धि : मोक्ष श्री व्याघ्रचम'णि। कुशासन ज्ञान सिद्धि: स र्वसिद्धिस्तु कम्बल ।।

काले मृगचर्म और दर्भासन पर बैठकर जप करने से ज्ञानसिद्धि होती है, व्याग्रचर्म पर जप करने से मुक्ति प्राप्त होती है, परन्तु कम्बल के आसन पर सर्व सिद्धि प्राप्त होती है। (139)

आग्ने य्यां कर्ष णं चैव वयव्या श त्रुनाशनम । नैरत्यां दर्श नं चैव ईशान्यi ज्ञा नमेव च ॥।

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अग्नि कोण की तरफ मुख करके जप-पाठ करने से आकर्षण, वायव्य कोण की तरफ़ शत्रुओं का नाश, नैरृत्य कोण की तरफ दर्शन और ईशान कोण की तरफ मुख करके जप- पाठ करने से ज्ञान की प्रप्ति है। (140)

उदंमुख: शान्ति जाप्ये वश्य पूर्वमुखत था । याम्य तु मारण प्रोक्तं प श्चिमे च धनागम : ॥

उत्तर दिशा की ओर मुख करके पाठ करने से शांति, पूर्व दिशा की ओर वशीकरण, दक्षिण दिशा की ओर मारण सिद्ध होता है तथा पश्चिम दिशा की ओर मुख करके जप-पाठ करने से धन प्राप्ति होती है। (141)

।। इति श्री स्कान्दोत्तरखण्ड 'उमामह श्वरस वादे श्री गुरुगीताया द्वितीयोऽध्यायः =

॥। अथ तृतीयोऽध्यायः ॥

अथ काम्यजपस्थान कथया मि वरा नने । सागरान्त सरित्ती रे तीर्थ हरिहरालय।। शक्तिदेवा लये गोष्ठ सर्व देवा लये शुभे। वटस्य धात्र्या मूले व म ठे वृन्दाव ने तथा ।। पवित्रे निर्म ले देशे नित्यान ष्ठानोऽपि वा। निर्वे दनेन मौनेन जपमेतत् समारभेत् ।।

तीसरा अध्या य

हे सुमुखी ! अब सकामियों के लिए जप करने के स्थानों का वर्णन करता हूँ। सागर या नदी के तट पर, तीर्थ में, शिवालय में, विष्णु के या देवी के मंदिर में, गौशाला में, सभी शुभ देवालयों में, वटवृक्ष के या आँवले के वृक्ष के नीचे, मठ में, तुलसीवन में, पवित्र निर्मल स्थान में, नित्यानुष्ठान के रूप में अनासक्त रहकर मौनपूर्वक इसके जप का आरंभ करना चाहिए।

जाप्येन जयमाप्न ोति ज पसि द्धिं फलं त था । हीनकर्म' त्यजेत्सर्व गर्हितस्थानमेव च ।।

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जप से जय प्राप्त होता है तथा जप की सिद्धि रूप फल मिलता है। जपानुष्ठान के काल में सब नीच कर्म और निन्दित स्थान का त्याग करना चाहिए । (145)

स्मशान बिल्वम ले वा वटमूला न्तिके त था । सिद्धय न्ति कानक मूले चूतवृ क्षस्य सन्नि धौ ।।

स्मशान में, बिल्व, वटवृक्ष या कनकवृक्ष के नीचे और आम्रवृक्ष के पास जप करने से से सिद्धि जल्दी होती है। (146)

आकल्पज न्मकोटीना यज्ञव्रततप : क्रियाः । ताः स र्वाः सफ ला देवि ग रुसंतोषमात्रत : ।।

हे देवी ! कल्प पर्यन्त के, करोंड़ों जन्मों के यज्ञ, व्रत, तप और शास्त्रोक्त क्रियाएँ, ये सब गुरुदेव के संतोषमात्र से सफल हो जाते हैं। (147)

मंदभाग्य [ ह्य शक्ताश्च य जना नानु मन्वत । गुरुसेवास, वि मुखा: पच्यन्त नरकेऽशुचौ ।।

भाग्यहीन, शक्तिहीन और गुरुसेवा से विमुख जो लोग इस उपदेश को नहीं मानते वे घोर नरक में पड़ते हैं। (148)

विद्या धन बलं चैव तेषां भाग्य निर र्थकम् । येषां गुरुकृपा नास्ति अधो ग च्छन्ति पार्वति ।।

जिसके ऊपर श्री गुरुदेव की कृपा नहीं है उसकी विद्या, धन, बल और भाग्य निरर्थक है। हे पार्वती ! उसका अधःपतन होता है। (149)

धन्या माता पिता धन्यो गोत्र धन्यं कुलोद्ध वः । धन्या च वस धा देवि यत्र स्याद् ग रुभक्तता ।।

जिसके अंदर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में जन्म लेनेवाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है। (150)

शरीर मिन्द्रिय प्राणच्चाथ: स्वजनबन धुता । मातृकुलं पि तृकुलं गुरुरेव न संशयः ॥

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शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण, धन, स्वजन, बन्धु-बान्धव, माता का कुल, पिता का कुल ये सब गुरुदेव ही हैं। इसमें संशय नहीं है। (151)

गुरुर्देवो गरुर्धर्मो गुरौ निष्ठा पर तप: । गुरो: परतर नास्ति त्रिवार कथया मि ते ।।

गुरु ही देव हैं, गुरु ही धर्म हैं, गुरु में निष्ठा ही परम तप है । गुरु से अधिक और कुछ नहीं है यह मैं तीन बार कहता हूँ। (152)

समुद्रे वै यथा तोय क्षीर क्षीर घृते घृतम् । भिन ने कुंभे यथा SSका शं तथा SSत्मा परमात्मनि I1

जिस प्रकार सागर में पानी, दूध में दूध, घी में घी, अलग-अलग घटों में आकाश एक और अभिन्न है उसी प्रकार परमात्मा में जीवात्मा एक और अभिन्न है। (153)

तथैव ज्ञानवान जीव परमात्म नि सर्व दा। ऐक्येन रमत ज्ञानी यत्र कुत्र दिवानि शम् ।।

इसी प्रकार ज्ञानी सदा परमात्मा के साथ अभिन्न होकर रात-दिन आनंदविभोर होकर सर्वत्र विचरते हैं। (154)

गुरुसन तोषणाद व मुक्तो भवति पाव ति। अणिमादिष, भोक्तृत्वं कृपया देवि जायत ।।

हे पार्वति ! गुरुदेव को संतुष्ट करने से शिष्य मुक्त हो जाता है । हे देवी ! गुरुदेव की कृपा से वह अणिमादि सिद्धियों का भोग प्राप्त करता है। (155)

साम्येन रमत ज्ञा नी दिवा वा यदि वा नि शि। एवं वि धौ महामौनी त्र लोक्यसमत i व्रजेत् ॥

ज्ञानी दिन में या रात में, सदा सर्वदा समत्व में रमण करते हैं। इस प्रकार के महामौनी अर्थात् ब्रह्मनिष्ठ महात्मा तीनों लोकों मे समान भाव से गति करते हैं। (156)

गुरुभाव: पर ती र्थमन्यती र्थ निरर्थ कम् ।

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सर्वतीर्थ मयं देवि श्रीगुरोश्वरणाम्ब,जम् ।।

गुरुभक्ति ही सबसे श्रेष्ठ तीर्थ है । अन्य तीर्थ निरर्थक हैं। हे देवी ! गुरुदेव के चरणकमल सर्वतीर्थमय हैं । (157)

कन्याभोगरतामन्दा: स वकान्तायाः पराइम खाः । अतः परं मया देवि क थित न्न मम प्रिये ॥

हे देवी ! हे प्रिये ! कन्या के भोग में रत, स्वस्त्री से विमुख (परस्त्रीगामी) ऐसे बुद्धिशून्य लोगों को मेरा यह आत्मप्रिय परमबोध मैंने नहीं कहा। (158)

अभक्ते वंचके धूर्ते पाखंडे नास्तिकादिष,। मनसाs पि न वक्तव्य ा गुरुगीता कदाचन ।।

अभक्त, कपटी, धूर्त, पाखण्डी, नास्तिक इत्यादि को यह गुरुगीता कहने का मन में सोचना तक नहीं । (159)

गुरवो बहव : सन्ति शि ष्यवित्तापहारका: तमेकं दु र्लभं म न्ये शिष्यह्यत्तापहारकम. ।।

शिष्य के धन को अपहरण करनेवाले गुरु तो बहुत हैं लेकिन शिष्य के हृदय का संताप हरनेवाला एक गुरु भी दुर्लभ है ऐसा मैं मानता हूँ। (160)

चातुर्यवा न्विवकी च अध्यात्मज्ञानवा न् शुचि: । मानस निर्म लं यस्य गुरुत्व तस्य शो भते ।।

जो चतुर हों, विवेकी हों, अध्यात्म के ज्ञाता हों, पवित्र हों तथा निर्मल मानसवाले हों उनमें गुरुत्व शोभा पाता है। (161)

गुरवो निर्मलाः शा न्ताः साधवो मि तभाषिण : । कामक्रोध विनिर्म क्ता : सदाचारा जितेन्द्रियाः ॥

गुरु निर्मल, शांत, साधु स्वभाव के, मितभाषी, काम-क्रोध से अत्यंत रहित, सदाचारी और जितेन्द्रिय होते हैं। (162)

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सूचकादि प्रभ देन गुरवो बह धा स्म ताः । स्वयं समयक परीक्ष याथ तत्वनिष्ठ भजेत्सुधीः ॥

सूचक आदि भेद से अनेक गुरु कहे गये हैं । बिद्धिमान् मनुष्य को स्वयं योग्य विचार करके तत्वनिष्ठ सदगुरु की शरण लेनी चाहिए। (163)

वर्ण जाल मिदं तद्वद्वाह्य शास्त्रं तु लौ किकम् । यस्मिन, देवि स मभ्यस्त स गरु: स चक: स्मृतः ॥

हे देवी ! वर्ण और अक्षरों से सिद्ध करनेवाले बाह्य लौकिक शास्त्रों का जिसको अभ्यास हो वह गुरु सूचक गुरु कहलाता है। (164)

वर्णा श्रमो चितां विद्यां धर्मा धर्म वि धायिनीम । प्रवक्तार गुरुं विद्धि वाच कस्त्वति पार्वति ।।

हे पार्वती ! धर्माधर्म का विधान करनेवाली, वर्ण और आश्रम के अनुसार विद्या का प्रवचन करनेवाले गुरु को तुम वाचक गुरु जानो | (165)

पंचाक्षया दिमंत्राणाम पदेष्टा त पार्वति। स गुरुर्बोधको भ यादुभयोरम तमः ॥

पंचाक्षरी आदि मंत्रों का उपदेश देनेवाले गुरु बोधक गुरु कहलाते हैं। हे पार्वती ! प्रथम दो प्रकार के गुरुओं से यह गुरु उत्तम हैं। (166)

मो हमारणव२ यादित च्छमं त्रोपद र्शिनम् । निषिद्धग रुरित्याह,: प ण्डि तस्तत्वद र्शिनः ।।

मोहन, मारण, वशीकरण आदि तुच्छ मंत्रों को बतानेवाले गुरु को तत्वदर्शी पंडित निषिद्ध गुरु कहते हैं। (167)

अनित्यमिति निर्दि श्य संसारे संकटा लयम् । वैराग्यपथदर्शी यः स गुरुर्विहितः प्रिये ।

हे प्रिये ! संसार अनित्य और दुःखों का घर है ऐसा समझाकर जो गुरु वैराग्य का मार्ग बताते हैं वे विहित गुरु कहलाते हैं। (168)

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तत्व मस्यादिवाक्य नामु पदेष्टा त, पार्व ति। कारणाख यो गुरु: प्रोक्तो भवरोगनिवारक: ।।

हे पार्वती ! तत्वमसि आदि महावाक्यों का उपदेश देनेवाले तथा संसाररूपी रोगों का निवारण करनेवाले गुरु कारणाख्य गुरु कहलाते हैं। (169)

सर्व सन्देह सन्दोहनि र्मूलनवि चक्षणः । जन्मम् त्युभयघ्नो यः स गरु: परमो म तः ॥

सर्व प्रकार के सन्देहों का जड़ से नाश करने में जो चतुर हैं, जन्म, मृत्यु तथा भय का जो विनाश करते हैं वे परम गुरु कहलाते हैं, सदगुरु कहलाते हैं। (170)

बहुजन्म कृतात पुण्याल्लभ्यत sसौ महाग रुः । लब्ध्वाड मुं न पुनर्याति शिष्यः संसारबन्धनम ।।

अनेक जन्मों के किये हुए पुण्यों से ऐसे महागुरु प्राप्त होते हैं । उनको प्राप्त कर शिष्य पुनः संसारबन्धन में नहीं बँधता अर्थात् मुक्त हो जाता है। (171)

एवं बहु विधालोके गुरवः स न्ति पार्वति । तेषु सर्व प्रत्नेन सेव्यो हि परमो गुरुः ॥

हे पर्वती ! इस प्रकार संसार में अनेक प्रकार के गुरु होते हैं । इन सबमें एक परम गुरु का ही सेवन सर्व प्रयत्नों से करना चाहिए । (172)

पार्व त्युवाच स्वयं मूढा मत्युभीता: स कृताद्विर ति गताः । दैवन्नि षिद्धग रुगा यदि त षां तु का गतिः ॥

पर्वती ने कहा प्रकृति से ही मूढ, मृत्यु से भयभीत, सत्कर्म से विमुख लोग यदि दैवयोग से निषिद्ध गुरु का सेवन करें तो उनकी क्या गति होती है। (173)

श्रीमहाद व उवा च

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निषिद्धग रु शिष्यस्त, दुष्टसंकल पदूषितः । ब्रह्मप्र लयप र्यन्तं न पुनर्या ति मत्यताम ।।

श्री महादेवजी बोल निषिद्ध गुरु का शिष्य दुष्ट संकल्पों से दूषित होने के कारण ब्रह्मप्रलय तक मनुष्य नहीं होता, पशुयोनि में ही रहता है। (174)

श्रृणु तत्वमि दं देवि यदा स्याद्विरतो नरः । तदा Sसाव धिकारीति प्रोच्यत श्रुतमस्तकैः ॥

हे देवी ! इस तत्व को ध्यान से सुनो | मनुष्य जब विरक्त होता है तभी वह अधिकारी कहलाता है, ऐसा उपनिषद कहते हैं। अर्थात् दैव योग से गुरु प्राप्त होने की बात अलग है और विचार से गुरु चुनने की बात अलग है। (175)

अखण्डैकरस ब्र ह्म नित्यम क्तं निरामयम । स्वस्मिन सदर्शितं येन स भव दस्य देशिक: ॥

अखण्ड, एकरस, नित्यमुक्त और निरामय ब्रह्म जो अपने अंदर ही दिखाते हैं वे ही गुरु होने चाहिए । (176)

जलाना सा गरो राजा यथा भवति पार्वति । गुरुणां तत्र सव'षां राजाय परमो गरुः ॥

हे पार्वती ! जिस प्रकार जलाशयों में सागर राजा है उसी प्रकार सब गुरुओं में से ये परम गुरु राजा हैं। (177)

मो हादिरहि तः शा न्तो नित्यत सो निराश्रय : । तृणीकृत ब्रह्मविष्ण वैभवः परमो गुरुः ॥

मोहादि दोषों से रहित, शांत, नित्य तृप्त, किसीके आश्रयरहित अर्थात् स्वाश्रयी, ब्रह्मा और विष्णु के वैभव को भी तृणवत् समझनेवाले गुरु ही परम गुरु हैं। (178)

सर्वकालवि देशेषु स्वत त्रो निश्वलस्सु खी । अखण्डैकरसास्वादत सो हि परमो गुरु: ॥

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सर्व काल और देश में स्वतंत्र, निश्चल, सुखी, अखण्ड, एक रस के आनन्द से तृप्त ही सचमुच परम गुरु हैं । (179)

द्वैताद्वैत विनिमक्तः स्वानु भूतिप्र काशवान । अज्ञान नन्धिमश्छेत्ता सवज्ञ परमो ग रुः ॥

द्वैत और अद्वैत से मुक्त, अपने अनुभुवरूप प्रकाशवाले, अज्ञानरूपी अंधकार को छेदनेवाले और सर्वज्ञ ही परम गुरु हैं। (180)

यस्य दश नमात्रेण मनस : स्यात प्रसन्नता । स्वयं भूयात धृतिश्शा न्तिः स भवत् परमो गुरुः ॥

जिनके दर्शनमात्र से मन प्रसन्न होता है, अपने आप धैर्य और शांति आ जाती है वे परम गुरु हैं। (181)

स्वशरीर शव पश्यन तथा स्वात्मानमद्दयम यः स्त्रीकनकमोहघ्न : स भवत् परमो ग रुः ॥

जो अपने शरीर को शव समान समझते हैं अपने आत्मा को अद्वय जानते हैं, जो कामिनी और कंचन के मोह का नाशकर्ता हैं वे परम गुरु हैं। (182)

मौनी वाग्मीति तत्वज्ञो द्वि धाभूच्छृणु पार्वति। न क श्चिन मौनिना लाभो लोक Sस्मिन्भवति प्रिये । वाग्मी तूत्कटस सारसागरो तारणक्षमः 1 यतोऽसौ स शयच्छेत्ता शास्त्र युक्त्यन भूति भिः ॥

हे पार्वती ! सुनो | तत्वज्ञ दो प्रकार के होते हैं। मौनी और वक्ता। हे प्रिये ! इन दोंनों में से मौनी गुरु द्वारा लोगों को कोई लाभ नहीं होता, परन्तु वक्ता गुरु भयंकर संसारसागर को पार कराने में समर्थ होते हैं। क्योंकि शास्त्र, युक्ति (तर्क) और अनुभूति से वे सर्व संशयों का छेदन करते हैं। (183, 184)

गुरुनामजपा द्येवि बहुजन्मार्जि तान्यपि । पापानि विलय या न्ति नास्ति सन्देहम ण्वपि ।।

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हे देवी ! गुरुनाम के जप से अनेक जन्मों के इकठ्ठे हुए पाप भी नष्ट होते हैं, इसमें अणुमात्र संशय नहीं है। (185)

कुलं धनं ब लं शास्त्र' बान्धवास सोदरा इमे। मरणे नोपय ज्यन्ते गुरुरेको हि तारक : ॥

अपना कुल, धन, बल, शास्त्र, नाते-रिश्तेदार, भाई, ये सब मृत्यु के अवसर पर काम नहीं आते । एकमात्र गुरुदेव ही उस समय तारणहार हैं । (186)

कुलमेव प वित्रं स्यात सत्यं स्वगुरुसेवया । तृप्ताः स युस्स्कला देवा ब्रह्माद्या गुरुतर्प णात् ।।

सचमुच, अपने गुरुदेव की सेवा करने से अपना कुल भी पवित्र होता है । गुरुदेव के तर्पण से ब्रह्मा आदि सब देव तृप्त होते हैं। (187)

स्वरूपज्ञानश न्येन कृतमप्यक तं भवेत् । तपो जपादि कं देवि स कलं बालजल्पवत. ।।

हे देवी ! स्वरूप के ज्ञान के बिना किये हुए जप-तपादि सब कुछ नहीं किये हुए के बराबर हैं, बालक के बकवाद के समान (व्यर्थ) हैं। (188)

न जान न्ति पर तत्व गुरुदीक्षापर डमुखाः । भ्रान्ता: प शुसमा ह्य ते स्वपरिज्ञानवजि 'ताः ।।

गुरुदीक्षा से विमुख रहे हुए लोग भ्रांत हैं, अपने वास्तविक ज्ञान से रहित हैं। वे सचमुच पशु के समान हैं । परम तत्व को वे नहीं जानते | (189)

तस्मात्कैवल्य सिद्धय र्थं गुरुमेव भ जेत्प्रि ये । गुरुं विना न जान न्ति मढास्तत्परम पदम् ।।

इसलिये हे प्रिये ! कैवल्य की सिद्धि के लिए गुरु का ही भजन करना चाहिए । गुरु के बिना मूढ लोग उस परम पद को नहीं जान सकते । (190)

भिद्यते हृदयग्र न्थि श्छिद्यन्त सर्वसंशयाः । क्षीयन्त सर्वकर्माणि गुरो: करुणया शिवे।।

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हे शिवे ! गुरुदेव की कृपा से हृदय की ग्रन्थि छिन्न हो जाती है, सब संशय कट जाते हैं और सर्व कर्म नष्ट हो जाते हैं। (191)

कृताया गुरुभक्तेस्तु वेद शा स्त्रनुसारतः । मुच्यते पात काद् घोराद् गुरुभक्तो विशेषतः ॥

वेद और शास्त्र के अनुसार विशेष रूप से गुरु की भक्ति करने से गुरुभक्त घोर पाप से भी मुक्त हो जाता है। (192)

दुःसंगं च परित्यज्य पापक र्म परित्यजत्। चित्त चिह्न मिदं यस्य तस्य दीक्षा विधीयते ।।

दुर्जनों का संग त्यागकर पापकर्म छोड़ देने चाहिए । जिसके चित्त में ऐसा चिह्न देखा जाता है उसके लिए गुरुदीक्षा का विधान है। (193)

चित्तत्यागनिय क्श् क्रोधग र्वविव र्जितः । द्वैतभावपरित्यागी तस्य दीक्षा वि धीयत।।

चित्त का त्याग करने में जो प्रयत्नशील है, क्रोध और गर्व से रहित है, द्वैतभाव का जिसने त्याग किया है उसके लिए गुरुदीक्षा का विधान है। (194)

एत ल्लक्षणस युक्तं सर्व भूतहि ते रतम् । निर्मलं जी वितं यस्य तस्य दीक्षा विधीयत ।।

जिसका जीवन इन लक्षणों से युक्त हो, निर्मल हो, जो सब जीवों के कल्याण में रत हो उसके लिए गुरुदीक्षा का विधान है। (195)

अत्यन्त चित्तपक्वस्य श्रद्धाभक्तियतस्य च । प्रवक्तव्यमि दं देवि म मात्मप्रीतय सदा ।।

हे देवी ! जिसका चित्त अत्यन्त परिपक्व हो, श्रद्धा और भक्ति से युक्त हो उसे यह तत्व सदा मेरी प्रसन्नता के लिए कहना चाहिए । (196)

सत्कर्म परिपाकाच च चि त्तशुद्धस्य धीमतः ।

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साधक स्यैव वक्तव्या गुरुगीता प्रयत्नत : ।।

सत्कर्म के परिपाक से शुद्ध हुए चित्तवाले बुद्धिमान् साधक को ही गुरुगीता प्रयत्नपूर्वक कहनी चाहिए । (197)

नास्तिकाय कृतघ्नाय दांभि काय शठाय च। अभक्ताय विभक्ताय न वाच येयं कदाचन ।।

नास्तिक, कृतघ्न, दंभी, शठ, अभक्त और विरोधी को यह गुरुगीता कदापि नहीं कहनी चाहिए । (198)

स्त्रीलोल पाय मूर्खा य कामोप हतचे तसे। निन्दकाय न वक्तव्या गुरुगीतास्वभावत : ।।

स्त्रीलम्पट, मूर्ख, कामवासना से ग्रस्त चित्तवाले तथा निंदक को गुरुगीता बिलकुल नहीं कहनी चाहिए । (199)

एकाक्षरप्रदातार यो गुरुर्नेैव मन्यते । ध्वनयोनिशत गत्वा चा ण्डालेष्वपि जायते ।।

एकाक्षर मंत्र का उपदेश करनेवाले को जो गुरु नहीं मानता वह सौ जन्मों में कुत्ता होकर फिर चाण्डाल की योनि में जन्म लेता है। (200)

गुरुत्यागाद् भवेन्मृत्युर्म न्त्रत्यागादयरिद्रता - गुरुमं त्रपरित्यागी रौरव नरकं व्रजेत् ।।

गुरु का त्याग करने से मृत्यु होती है । मंत्र को छोड़ने से दरिद्रता आती है और गुरु एवं मंत्र दोनों का त्याग करने से रौरव नरक मिलता है। (201)

शिवक्रो धाद् ग रुस्त्राता गुरुक्रोधा च्छिवो न हि। तस्मात्सर्व प्रयत्नेन गुरोराज्ञा न लंघयेत् ।।

शिव के क्रोध से गुरुदेव रक्षण करते हैं लेकिन गुरुदेव के क्रोध से शिवजी रक्षण नहीं करते। अतः सब प्रयत्न से गुरुदेव की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए । (202)

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सप्त कोटिमहा मंत्राश्चित्त विभ्रं शकारकाः । एक एव म हामंत्रो गुरुरित्यक्षरद्वयम ।।

सात करोड़ महामंत्र विद्यमान हैं। वे सब चित्त को भ्रमित करनेवाले हैं। गुरु नाम का दो अक्षरवाला मंत्र एक ही महामंत्र है । (203)

न मृषा स्यादिय देवि मदुक्ति: सत्यरूपिणि । गुरुगीतासम स्तोत्रं नास्ति नास्ति महीतल ।।

हे देवी ! मेरा यह कथन कभी मिथ्या नहीं होगा । वह सत्यस्वरूप है। इस पृथ्वी पर गुरुगीता के समान अन्य कोई स्तोत्र नहीं है। (204)

गुरुगीता मिमा देवि भवदु :खविना शिनीम । गुरुदीक्षाविहीनस्य पुरतो न पठेत्क्वचि त् ।।

भवदुःख का नाश करनेवाली इस गुरुगीता का पाठ गुरुदीक्षाविहीन मनुष्य के आगे कभी नहीं करना चाहिए । (205) रहस्यमत्यन्तरहस्यम 'तन्न पा पिना लभ्यमिद महेधरि । अने कजन्मा र्जितपुण्यपाक द् गुरोस्त, तत्वं लभते मनुष्यः ।।

हे महेश्वरी ! यह रहस्य अत्यंत गुप्त रहस्य है । पापियों को वह नहीं मिलता | अनेक जन्मों के किये हुए पुण्य के परिपाक से ही मनुष्य गुरुतत्व को प्राप्त कर सकता है। (206)

सर्वती र्थवगाहस्य स प्राप्नोति फलं नरः । गुरो: पादोदक पीत्वा शेषं शिर सि धारयन ।।

श्री सदगुरु के चरणामृत का पान करने से और उसे मस्तक पर धारण करने से मनुष्य सर्व तीर्थों में स्नान करने का फल प्राप्त करता है। (207)

गुरुपादोदक' पान गुरोरु च्छिष्टभोजनम . I गुरुर्मूर्ते सदा ध्यान गुरोना म्नः सदा जप : ॥

गुरुदेव के चरणामृत का पान करना चाहिए, गुरुदेव के भोजन में से बचा हुआ खाना, गुरुदेव की मूर्ति का ध्यान करना और गुरुनाम का जप करना चाहिए । (208)

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गुरुरेको जगत्सर्वं ब्रह्मविष्ण शिवात्मकम । गुरो: परतर ना स्ति तस्मात्स पूजयेद् गुरुम् ।।

ब्रह्मा, विष्णु, शिव सहित समग्र जगत गुरुदेव में समाविष्ट है । गुरुदेव से अधिक और कुछ भी नहीं है, इसलिए गुरुदेव की पूजा करनी चाहिए । (209)

ज्ञानं विना म क्िप दं लभ्यत गुरुभक्तित : । गुरो: समानतो न न्यत साधनं गुरुमागिणाम् ।।

गुरुदेव के प्रति (अनन्य) भक्ति से ज्ञान के बिना भी मोक्षपद मिलता है । गुरु के मार्ग पर चलनेवालों के लिए गुरुदेव के समान अन्य कोई साधन नहीं है। (210)

गुरो: कपाप्र सादेन ब्रह्मविष्ण शिवादयः । सामर्थ्य मभजन सर्वे सृष्टि स्थित्य तकर्म णि ॥ गुरु के कृपाप्रसाद से ही ब्रह्मा, विष्णु और शिव यथाक्रम जगत की सृष्टि, स्थिति और लय करने का सामर्थ्य प्राप्त करते हैं। (211)

मंत्रराजमि दं देवि गुरुरित्यक्षरद्वयम । स्मृतिवेदपुराण ानां सारम व न संशयः ॥

हे देवी ! गुरु यह दो अक्षरवाला मंत्र सब मंत्रों में राजा है, श्रेष्ठ है । स्मृतियाँ, वेद और पुराणों का वह सार ही है, इसमें संशय नहीं है। (212)

यस्य प्रसादादहम 'व सर्वं मय येव सर्व परिक ल्पित च । इत्थं विजानामि स दात्मरूप त्स्या घरिपद् प्रण तोऽस्मि नित्यम ॥

मैं ही सब हूँ, मुझमें ही सब कल्पित है, ऐसा ज्ञान जिनकी कृपा से हुआ है ऐसे आत्मस्वरूप श्री सद्गुरुदेव के चरणकमलों में मैं नित्य प्रणाम करता हूँ। (213)

अज्ञानतिमिरा न्धस्य वि षयाक्रान्त चेतसः । ज्ञानप्रभाप्रदान न प्रसादं कुरु मे प्रभो ।।

हे प्रभो ! अज्ञानरूपी अंधकार में अंध बने हुए और विषयों से आक्रान्त चित्तवाले मुझको ज्ञान का प्रकाश देकर कृपा करो। (214)

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।। इति श्री स्कान्दोत्तरखण्ड उमामह श्वरसं वाद श्री गुरुगीताया तृती योऽध्यायः ॥

पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

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'गुरुकृपा हि केवलं ... ' यस्य सन्निधिमात्रेण चिदानन्दायते मनः। जिनके सान्निध्यमात्र से मन चिदानन्दमय बन जाता है, हृदय में आनन्दस्वरूप ईश्वर की झलक दिखने लगती है, जो योग और वेदान्त के जीवंत मूर्तिमान स्वरूप हैं, जिनमें गुरुत्व पूर्णरूपेण खिल उठा है ऐसे परम पूज्य संत श्री आसारामजी महाराज आत्मानन्द के गगनगामी उड्डयन के साथ आज करुणावश होकर ज्ञान का सागर लहरा रहे हैं। अपने सद्गुरु की अपार कृपा का स्मरण करते हुए वे कहते हैं : "मैंने तीन वर्ष की आयु से लेकर बाईस वर्ष की आयु तक अनेकों साधनाएँ कीं, दस वर्ष की आयु में अनजाने ही रिद्धि-सिद्धियों के कई अनुभव हुए, भयानक वनों, पर्वतों, गुफाओं में यत्र-तत्र तपश्चर्या करके जो प्राप्त किया वह सब, सद्गुरुदेव की कृपा से जो मिला उसके आगे तुच्छ है। सद्गुरुदेव ने अपने घर में ही घर बता दिया। जन्मों की सांधना पूर्ण हो गई। उनके द्वारा प्राप्त हुए आध्यात्मिक खजाने के आगे त्रिलोकी का साम्राज्य भी तुच्छ है।" हम न हँसकर सीखे हैं, न रोकर सीखे हैं। जो कुछ भी सीखे हैं, सद्गुरु के होकर सीखे हैं।। myfullneeds.com