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1. Guru Gita Bharat Dharma Maha Mandal 1920

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ॐ तक्सत्। श्रीगुरुगीता

भाषानुवाद और से सुखरत। वाका भूमिका सांहत।

श्रीभारतधर्ममहामण्डल के शास्त्रमकाश विभाग द्वारा श्रीविश्वनाथ अन्नपूर्णादानभंडार के लिये पकाशित।

काशा ह-

तृतीयातृत्ति।

बी० पलु० पावगी दारा दितचिन्तक प्रेस, रामघाट, बनारस सिटी में सुद्रित। सन् १६२० ईस्वी।

Lll rights veserred ] [ मूक्य ।) चार पाना

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श्रीभारतधर्म्म हामण्डलके सभ्यगण और मुखपत्र।

हिन्दी भाषाका और दूसराअंग्रेज वान कार्य्यालय काशीसे एक पत्न प्रकाशित होते हैं एवं श्री ीभार्षाका, इस प्रकार दो मासिक मुखपत्र श्रीमहामरडलके प्रान्ती महामसडलके अन्यान्य भाषाओंके यथा :- कलकत्तेके कार्य्याल य कार्य्यालयोंसे प्रकाशित होते हैं। (पझाव) के काने लय से हिन्दीभा यसे बंगला भोषाका मुखपत्र, फिरोजपुर

श्रीमहामराडलके पो-त्र। दूं भाषाका सुखपत्र और मेरठके कार्य्या नरपति और प्रधान प्रधार श्रेणीके सभ्य होते हैं, यथा :- स्वाधीन भारतवर्षके सब प्रान्तों के बड़ बड़ जर्मवाय्यगण सरक्षक होते हैं सामाजिक नेतागण उस उस प्रान्त के एदार, सेठ, साहुकार आवि चुने जाते हैं। प्रत्येक प्रान्तके अध्याप जतावकेद्वारा प्रतिनिधि सभ प्रान्तीय मरडलके द्वारा चुने जाकर धर्मव्यवस्थापयपहेसे उस उस जाते हैं। भारतवर्षके सब प्रान्तोंसे पांच प्रकारके सहायक सभ्य लिये जाते हैं, विद्यासम्बन्धी कार्य करनेवाले सहायक सभ्य, धर्म्म- कार्य्य करनेवाले सहायक सभ्य, महामराडल प्रान्तीयमरडल और शाखासमाओंको धनदान करनेवाले सहायक सभ्य,विद्यादान करने वाले विद्वान् ब्राह्मण सहायक सभ्य और धर्म्मप्रचार करनेवाले साधु संन्यासी सहायक सभ्य। पाँचवीं श्रेणीके सभ्य साधारण सभ्य होते हैं जो हिन्दुमात्र हो सकते हैं। हिन्दु-कुलकामिनीगण केवल प्रथम तीन श्रेशीकी सहायक-सभ्याऔर साधारण-सभ्या हो सकती हैं। इन सय प्रकारके सभ्यों और श्रीमहामरडलके प्रान्तीय मराडल, शाखा सभा और संयुक्त सभाओंको श्रीमहामरडलका हिन्दी अथवा अंग्रेज़ी भाषाका मासिकपत्र घिना मूल्य दिया जाता है। नियमितरूपसे नियत वार्षिक चन्दा २) दो रुपये देनेपर हिन्दू नर नारी साधारण सभ्य हो सकते हैं। साधारण सभ्योको विना मूल्य मासिकपत्रिका के अतिरिक्त उनके उत्तराधिकारियोंको समाजहितकारी कोषन विशेष लाभ मिलता है। यक्ष, श्रीभारतधर्म्ममहामण्डल, प्रधानकार्थ्यालय। जगतूगंज, बनारस।

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ॐ तत्सत्।

श्रीगुरुगीता

भाषानुवाद और टिप्पणी एवं भूमिका सहित!

श्रीभारतधमेमहामण्डल के शास्त्रपकाश विभाग द्वारा श्रीविश्वनाथ अन्नपूर्णादानभंडार के लिये पकाशित।

काशी

नृतीयावृत्ति।

बी० एलू० पावगी द्वारा हितचिन्तक प्रेस, रामघाट, बनारस सिटी में मुद्रित।

सन १६२० ईस्वी।

All righis reserved ] [ मूल्य 1) चार आाना

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श्रीमहामण्डलके प्रधान पद्धारिगण। प्रधान सभापतिः- श्रीमान् महाराजा बहादुर दरभंगा। सभापति प्रतिनिधिसभा :- श्रीमान् महाराजा वहादुर काश्मीर। उपसभापति प्रतिनिधिसभा :- श्रीमान् महाराजा बहादुर टीकमगढ़। प्रधान मंत्री प्रतिनिधि सभा :- श्रीमान आनरेबल के. भी.रंगस्वामी आयङ्गर जमीनदार श्रीरंगम् सभापति मन्त्रीसभा :- श्रीमान् महाराजा बहादुर गिद्धौड़। प्रधानाध्यक्ष :- श्रीमान् परिडत रामचन्द्र नायक कालिया जमीन्दार और आनरेरी मेजिष्रेट बनारस। अन्यान्य समाचार जाननेका पता- जनरल सैकेटरी। श्रीभारतधर्म्ममहामण्डल, महामण्डलभवन, जगत्गंज, बनारस

श्रीभारतधर्म्म महामरडलसे सम्बन्धयुक्त आर्य्यमहिलाहित सूचना। कारिणी महापरिषद्, आर्य्यमहिला पत्रिका, आर्य्यमहिला महाविद्य लय, उपदेशक महाविद्यालय, समाजहितकारी कोष, महामरड मेगजीन (अंग्रेजी), निगमागमचन्द्रिका, निगमागम बुकूडिप श्रीविश्वनाथ अन्नपूर्णा दानभरडार, शास्त्रप्रकाशक विभाग, एरिय बोरो आदि विभागासे तथा श्रीभारतधर्म्म महामराडलसे प व्यवहार करनेका पता :- श्रीभारतधर्म्म महामण्डल प्रधान कार्य्यालय, महामरडल भवन जगत्गंज, बनारस

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श्री तत्लत्। श्रीगुरुगीता। विज्ञापन। शरीभारतधर्म्म महामएडल प्रधान कार्य्यालय काशी: धामके शास्त्रप्रकाश विभाग द्वारा अव तक अपकाशित छः गीताओं का हिन्दी अनुवाद सहित प्रकाशन होकर हिन्दी साहित्य भएहार और साथही साथ सनातनधर्म्म ग्रन्थभएडारकी श्रीवृद्धि हुई है। इससे पहले श्रीसंन्यास गीता सब प्रकारके संन्यासी और साधुसम्परदायों के लिये, सौर्य्यं सम्प्रदायके लिये श्रीसूर्य्यंगीता, वैष्यवसम्प्रदायके लिये श्रीविष्णुगीता, शाक्तसम्प्रदायके लिये श्रीशक्तिगीता, गाणपत्य सम्प्रदायके लिये श्रीधीशगीता और शैवसम्प्रदायके लिये श्रीशम्भुगीता हिन्दी अनुवाद सहित प्रकाशित की गई है। श्रब यह श्रीगुरुगीता जैसी अब तक कभी प्रकाशित नहीं हुई थी हिन्दी अनुवाद सहित तृतीयवार प्रकाशित की जाती है। सर्वव्यापक, सर्वजीवहितकारी और प्रृथिवी के सब धर्मों के पितारूप सनातन- धर्म में निर्गु और सगुण उपासनारूप से प्रधान दो भेद हैं। यद्यपि लीलाविग्रह अर्थाव अवतार-उपासना, ऋषि देवता पितृ-उपासना और चुद्र तामसिक शक्तियों की उपासनारूप से सनातन धर्ममें सब अधिकारके उपासकटन्दके लिये और भी कई उपासनाशैलियोंका विस्तारित वर्णन पाया जाता है; परन्तु बीलाविग्रह उपासना अर्थाव अवतार उपासना तो पञ्च सगुए उपासनाके अ्रन्तर्गत ही है। श्रीविष्णुभगवान्, श्रीस्र्य्यंभगवान्, श्रीभगवती देवी, श्रीएेशभगवान् औरश्रीसदा- शिव भगवान्, इन पञ्च सगुण उपास्य देवताओंमें सबके ही अवतारों का वर्णन शान्त्रोंमें पाया जाता है; क्योंकि सगु उपासनाकी पूर्णताका लीलामय स्वरूप के विना उपासक अनुभव नहीं कर सकता। अस्तु, लीलाविग्रहकी उपासना सगुख उपासनाकी पूणता के लिये ही होती है तथा ऋषि देव पितृ-उपासना और अ्न्य चुद्र उपासनाका अधिकार सकाम राज्यसे ही सम्बन्ध रखता है। निगु उपासना में सर्व साधारणका अधिकार होही नहीं सकता। निर्गुणा उपा- सना अरूप, भावातीत, वाकू मन और बुद्धिसे अगोचर आत्मस्वरूपकी उपासना है। 5 निरगु ए उपासना केवल आत्मज्ञान-प्राप्त तत्तज्ञानी महापुरुषों तथा जीवन्मुक्त संन्या- सियोंके लिये ही उपयोगी समझी जासकती है और केवल सगुए उपासनाही सब श्रेणी के उत्तम उपासकवृन्दके लिये हितकारी समझकर पूज्यपाद महर्षियों ने उसके त्र सिद्धान्तों का अधिक पचार शात्त्रों में किया है। सष्ट के स्वाभाविक पञ्च तत्त्रों के अनुसार पञ्च विभागों पर संयम करके पञ्च उपासक सम्प्रदाय के भेद कल्पना करते हुए पूर्वाचाय्पों ने पञ्च सगुए उपासनाप्रसाली प्रचलित की है। विष्णु उपासकके लिये वैष्णव सम्पदायपणली, सूय्यं उपासक के लिये सौर्य्यसम्पदाय प्रणाली, शक्ति उपासक के लिये शाक्त सम्प्रदाय प्रणाली, गपति उपासक के लिये गाणपत्यसतम्प्रदाय

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२ ) महादेवीकी जिज्ञासा। (८) गुरुका लक्षण और आचार्य्य और गुरुके भेद. विषयिणी जिज्ञोसा। १४ महादेवकी आज्ञा। (९) गुरुका लक्षण, आचार्य्य और गुरुकी भिन्नता और उनके साधारण लक्षण और श्रेष्ठ लक्षण। .. ... ६५-१७ महादेवीकी जिज्ञासा। (१०) शिष्यलक्षविषयिणी जिज्ञासा १७ महादेवकी आज्ञा। (११) शिष्यलक्षण और उसका कर्त्तव्य एवं गुरुशुश्रूषाका फल १७-२२ महादेवीकी जिज्ञासा। (१२) योगके लक्षण और भेदविषयिणी जिज्ञासा २३ महादेवकी आज्ञा। (१३) मन्त्र हठ लय और राजयोगोंके लक्षरा, अङ्ग, ध्यान और समाधि, तीनोमेंसे किसीमें पारङगत होनेपर राज- योगका अधिकार और उससे जीवन्मुक्तिकी प्राप्ति। ... .२३-२८ महादेवीकी जिज्ञासा। ('४) उपासनाके भेद, उसकी विधिके भेद और दिव्य देशों के नामविषयिणी जिज्ञासा। महादेवकी आज्ञा। .. ... २८-२६ (१५) उपासनाके विस्तृत भेद, दिव्यदेश, भक्तिके भेद, भक्तोंके भेद और उपासकोंके भेदका वर्णन। महादेवीकी जिज्ञासा। २९-३३ (१६) गुरुमाहात्म्यचिषयिसी जिज्ासा। महादेवकी आज्ञा। ३३ (१७) गुरुमाहात्य और गुरुध्यानवर्णन । महादेवीकी जिज्ञासा। ... ३३-४० (८) परमात्मस्वरूपविषयिणी जिज्ञासा। महादेवकी आज्ञा। ... (१९) परमात्माके स्वरूपका वर्णन। महादेवीकी जिज्ञासा। ४० -४२ (२०) गुरुगीततामाहात्म्यविषयिणी जिज्ञासा। महादेवकी आज्ञा। ४३ (२१) गुरुगीतामाहात्म्यवर्णन। ४३-४६

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श्रीगुरवे नमः। श्रीगुरुगीता। भूमिका।

अखण्डमण्डलाकारं व्यापं येन चराचरम्। तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ सनातन कालसे गुरुदीक्षाकी रीति इस पवित्र भूमिमें प्रच- लित है। शास्त्रोंमें ऐसा कथित है कि जैसे पापारापर बीज बोनेसे बीज अंकुरित नहीं होता वैसे ही विना गुरुदीक्षाके साधन करने से कदापि आध्यात्मिक उन्नति नहीं होसकी । थोड़ेसे ही विचार करनेसे शाख्रोकत इस महावाक्य का सिद्धान्त हो सका है। जबसे शिशुमें ज्ञान अंकुरित होता है, उसके अनन्तर जैसे जैसे उसके ज्ञान की वृद्धि होती जाती है, वह वृद्धि औरों के उपदेश से ही होती है; अर्थात् जैसे जैसे उस शिशुको उसके माता पिता प्रति- पालक वा विद्यागुरुगण उपदेश द्वारा जैसी जैली शिक्षा देते जाते हैं वेसे ही उस बालकमें ज्ञानकी स्फूर्ति होती जाती है। अब देखिये कि वे उपदेशकगण उस शिशु के शिक्षा गुरु हैं, क्योंकि उन उपदेशोंकी सहायताके बिना उस बालकको किसी प्रकारसे ज्ञानकी प्राप्ति नहीं होसकी थी। मन बुद्धि और इन्द्रिय आदि जबतक किसी प्रबल शक्ति से उत्तेजित, आकृष्ट वा चालित न किये जायँ तब तक ये कोई काम नहीं करसकते। अब जिस शक्ति द्वारा हम लोग उन्नतिकी ओर फिराये जाते हैं वही शक्ति हमारे गुरु है। चन्द्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्रादि जिस महाशक्ति के इद्गितमात्रसे अपने

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श्रीगुरुगीता।

कार्यपर लगे रहते हैं, वही जगत्की महाशक्ति जगद्गुरु हैं। इन्हीं जगद्गुरुके जाननेके लिये जब जीवका मन व्याकुल होता है, उस व्याकुलताको दूर करके इस धोर मायामय अन्धकार-पूर्ण संसार-पथको जो तत्वज्ञानी महापुरुष उपदेशरूप दीपक द्वारा सुगम कर देते हैं वही दीक्षागुरु हैं। शब विचार द्वारा यह प्रतिपन्र हुआ कि विना दूसरेके उपदेशके जीव कुछ भी ज्ञान लाभ नहीं कर लक्ा; चाहे सांसारिक ज्ञान हो, चाहे आध्यात्मिक ज्ञान हो, विना गुरु-उपदेशके किसी प्रकारका ज्ञान लाभ नहीं होसकता। शिक्षाके भेदसे शास्त्रमें दो प्रकारके गुरु लिखे हैं; अर्थात शिक्षागुरु और दीक्षागुरु। माता, पिता, आचार्य्यादि जो कोर्ड सांसारिक ज्ञानकी वृद्धि करनेमें सहायता करें वे शिक्षागुरु हैं: अर्थात् एक कीटसे लेकर समस्त ब्रह्माराड ही शिक्षागुरु होसक्ता है ; परन्तु दीक्षागुरु वे ही होसके हैं कि जिन्होंने जीवकी व्याकुलता देख कपा कर आत्मोन्नति का पथ उसको दिखाया हो। गुरुदीत्ता वर्णन करते समय आर्य्य-शास्त्रोंने आज्ञा दी है कि दीक्षासे पहिले श्रीगुरुदेव शिष्यकी न्यूनसे न्यून छः मास भ्रथवा वर्ष काल पर्यन्त परीक्षा करलेवें और परस्परमें प्रीति तथा भक्ति होनेपर यदि गुरुदेव शिष्यको उपयुक्त समभें तो दीक्षा दान करें। और यह भी लिखा है कि शास्त्रविधिसे यदि शिष्यकी दीक्षा होगी सो अवश्य ही उस जिशासुका कल्याण होगा इसमें सन्देह- मात्र नहीं ; परन्तु शास्त्रोंने यह भी आज्ञा दी है कि श्री गुरुदेव की शक्ति का पार नहीं; वे यदि इच्छा करें तो चाहे जैसा अधिकारी हो, चाहे जैसा देश काल पात्र हो, चाहे शिष्यकी परीक्षा करें वा न करें, वे सब समयमे, सब देशमें दीक्षा द्वारा शिष्यका कल्याण करसके हैं। ग्रन्थोक्त गुरु-लक्षण तथा शिष्य-लक्षणके पाठ करनेसे जिज्ञासुगसके हृदयमें प्रश्न उठसक्ता है कि यदि च परमबानी INO AG TH श्रीगुरुदेव शिष्यके उन लक्षणोंके द्वारा शिष्यको पहिचान सके हैं परन्तु अल्पज्ञानी शिष्य कैसे सब समयमें एकापक सद्गुरु के पहिचाननेमें समर्थ होसकता है। इस प्रकारके सन्देहोंके उत्तरमें यह कहा जालकता है कि यदिच शिष्य अल्पज्ञानी होता है तवच ज्ानरूपी चैतत्य का प्रकाश सब जोवोमें हो स्थित है,विशेषतः मनुष्य~

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भूमिका।

गणमें इस प्रकाशकी श्रेष्टता बुद्धि रुपसे प्रफट है, इस कारणसे ही मनुष्य सब जीनोंमें श्रेष्ट और अपने सत् असत् कम्मोंका दायित्व (जिम्मेवारी) रखनेवाला है; अर्थात् अ्रनन्त प्राणियोंमें एकमात्र मनुष्ययोनिवाले ही अपने किये हुए सदसत्क्म्मोका फल पाया करते है; अन्य प्राणिगण प्रकृतिके अधीन होकर कार्य्य करते हैं इस कारण वे अपने किये हुए कर्मोंका फल नहीं पाते। मनुष्य अपनी बुद्धिके आधीन होकर कार्य्य करता है इस कारणसे वह अपने कियेहुए सत् अथवा असत् कर्म्मके बन्धनमें आ जाता है। यह बुद्धिकी स्वाधीनता सब प्रकारके मनुष्योंमें ही सब समयमें न्यूनाधिक रहती है, इस कारण शास्त्रने आज्ञा दी है कि जिज्ञासुकों भी उचित है कि अपनी बुद्धिके अनुसार प्रन्थोक लक्षणोको मिलाकर गुरु का अन्वेषण करे। जितने प्रकारके धर्म्म-सम्प्रदाय इस संसारमें देखनेमें आते हैं उन सबमें ही गुरुदीक्षाकी रीति अल्प अथवा अधिक रूपसे पाई जाती है। चाहे मुहममदीय ध्स्मके शरीअत, तरीकत, मारफ़त और हक़ीक़ृत अधिकार हों, चाहे ईसाई धर्म्मके रोमन कैथलिक, ग्रीकचर्च अथवा पोटस्टन्ट सम्प्रदाय हो, चाहे जैनधम्मके श्वेता- मबरी और दिगम्बरी आदि मतान्तर हों, चाहे बौद्धधर्म्मके उत्तर और दक्षिणा आस्नाय हो, सब धर्म्म-सम्प्रदायोंमें ही गुरुदीक्षा- ग्रहणकी रीति अल्प अथवा अधिकरूपेण प्रचलित है। सब धर्स्स- मार्ग एकवाक्य होकर गुरुदीत्षाग्रहण करने में आज्ञा करते हैं ; परन्तु भेद इतना ही है कि अभ्रान्त वेद-प्रकाशित सनातन धर्म्ममें जिस प्रकारसे गुरुकी महिमा और आध्यात्मिक उन्नति करनेमें गुरु- दीक्षाकी आवश्यकताको विस्तृत और ढढ़ रूप से वर्णन किया गया है; उस प्रकार वैज्ञानिक भावपूर्ण वर्णन और कहीं देखनेसे नहीं आता। वेदका यही आशय है कि जीव अरपने क्म्मके अनुसार आवागमन चक्रमें सत् असत् फल भोग किया करता है, परन्तु कर्म्म स्वयं जड़ होने के कारण वे अपने आप फलकी उत्पतति नहीं करसके; जगत्कर्त्ता, जगतूपिता, सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ही अपनी महाशक्ति द्वारा उन कम्मोके अनुसार जोवको सत् असत् फल प्रदान किया करते हैं। यदिच फलकी प्राप्तिमें निज कर्म्म ही

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श्रीगुरुगीता।

कारणरूप हैं, तत्रच ईश्वर-शक्तिके विना कर्म्म-समूह अपने फल उत्पन्न नहीं करसकते। इसी शैलीके अनुसार आध्यात्मिक उन्नति करते समय भी मनुष्यको ऐ्ेश्वरीय शक्तिकी सहायता लेनी पड़ेगी; परन्तु ईश्वर कुछ स्वयं मूर्ततिमान् होकर जीवको फलदान नहीं किया करते, जिस प्रकार परोक्ष रीति पर जगतूपिता पर- मात्मा जगत्के सारे कार्य्य चलवा रहे हैं; उसी प्रकारकी रीति पर वे अपने जीवरूप अनन्त केन्द्रोंमेंसे किसी श्रेष्ठ पुरुषके केन्द्र-स्थित होकर गुरुरुपसे जिज्ञासुका कल्याण करके उसको निम्नतर आध्यत्मिक भूमिसे उच्चतर आध्यात्मिक भूमिमें पहुँचा दिया करते हैं। इस महाकार्य्यमें, इस जीव-हितकारी प्रधान कर्म्स- में, ईश्वर कारण भूमि और श्रीगुरुमूर्तिति कार्य्य-भूमि हैं, इसमें सन्देहमात्र नहीं और इसी कारणसे गुरुदीक्षा और श्रीगुरुमा- हा्म्यकी इतनी महिमा आर्य्यशास्त्रोंने गाई है। यदिच गुरुदीक्षाकी रीति प्राचीन भारतमें बहुत ही प्रचलित थी, तत्रच अब भी इस पवित्र भूमिमें कहीं कहीं गुरुदीक्षाकी यथार्थ रीति स्वल्परूपेण प्रचलित है; किन्तु विशेषतः यह रीति लुप्त ही होगई है और कहीं कहीं यह पवित्र रीति स्वार्थ-परतामें मिलकर कुरीतिमें परिणत होगई है। अधिकतर ऐसा ही देखनेमें आता है कि शिष्यमें गुरुभक्ति कुछ भी नहीं रही, गृहस्थोंमें जैसे नाई धोबी आदि गृहस्थ-लेवक हुआ करते हैं वैसे ही गुरु भी एक समझे जाते हैं; जब कभी गुरुवंशके कोई आ जाते हैं तब उनकी घर्त्तमान हीन अवस्थाके अनुसार यत्किञ्चित् कुछ देकर उनको विदा करदेते हैं और उनसे पुनः अपना कोई सम्बन्ध नहीं रखते अथधा उनको अपने घरमें रखकर उनसे गृहस्थ सेवकोंका कार्य्य लिया करते हैं। यद्यपि अधिक दोष इस समयमें शिष्योंका ही है क्योंकि वे न तो अपने आप आध्यात्मिक उन्नतिके लिये प्रयत्न करते हैं और न गुरुसेवाकी कुछ आवश्यकता समझते हैं ; तत्रच इस समय- के शिष्योंका ही केवल दोष नहीं कहा जासकता, गुरुगणने भी अपनी मर्यादाको त्याग कर दिया है और दीक्षा देना उदरपूर्ति करनेका एक व्यवसाय मान लिया है। कहीं कहीं यह स्वार्थ पवली इतनी बढ़गई है कि प्रतिष्ठित गुरुवंशके निकट जब शिष्य

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भूमिका।

गण दीक्षाके लिये एकत्रित होते हैं तो उन सबोंको पशुदलकी नाईं एकसङ बिठाकर और सबोंको एक ही मन्त्र सुनाकर तथा उनसे अपना वात्सरिक 'कर' ठहराकर उनको विदा करदेते हैं। इसी प्रकारसे अविद्याके कारण गुरु और शिष्य उभय सम्प्रदायमें ही घोर कुरीति आज दिन इस पवित्र भूमिमें व्याप्ति हो रही है। इस कराल कालप्रभावपर ही ष्टि करके देवादिदेव महादेवजी ने श्रीपार्वतीजीसे कहा था कि- गुरवो बहवः सन्ति शिष्यवित्तापहारकाः । दुर्ल्लभस्सद्ुरुर्देवि ! शिष्यसन्तापहारकः ॥ हे देवि! कलियुगमें शिष्यका धन हरणकरनेवाले गुरु बहुत होंगे परन्तु शिष्यके सन्तापहारी गुरु दुर्ललभ होंगे। आर्यजानिकी अब वर्त्तमान अवस्था कुछ ही हो, परन्तु विचारधान् पुरुषोंका यह विश्वास है कि यदि शिष्य अपने आपको उपयुक्त करले और त्रिताप के नाश करनेकी इच्छा उसमें प्रबल हुई हो तो निःसन्देह उसको सद्गुरुके दर्शन होंगे। जब यह स्थिर सिद्धान्त है कि गुरु- उपदेशके मूलमें श्रीभगवान् है, तब गुरुदीक्षा द्वारा कल्याण प्राप्ति- के विषय में कोई सन्देह ही नहीं होसका ; परन्तु भेद इतना ही है कि शिष्य जैसा अधिकारी होगा उसी अधिकारका गुरु उपदेश उसको प्राप्त होगा। शिष्यमें जितना संसार वैराग्य होगा और वह जिस आध्यात्मिक भूमिमें स्थित होगा, उतनीही उपकोरिता गुरु- उपदेश द्वारा उस को प्राप्त होगी। यदि शिष्य अपने आपको पहले उपयोगी करके जिक्ञासु बने, पीछे सद्गुरु अन्वेषस करे तो ईश्वरभाव पूर्ण इल विस्तृत संसारमें उसको सद्गुरु के अवश्य दर्शन होंगे इसमें संशय कुछ भी नहीं है। गुरुदीक्षाकी आवश्यकताके विषयमें वेद तथा वेदसम्मत दर्शन, उपवेद, स्मृति, पुराण और तन्त्र आदि सब शास्त्र ही एक- वाक्य होकर कहते हैं, सब श्रुति तथा महर्षि-वाक्योंका यही सिद्धा- न्त है कि गुरुदीक्षा विना आध्यात्मिक उन्नतिके इच्छुक जिश्ञासु- का कदापि कल्याण नहीं होसका। जितने प्रकारके सम्प्रदाय सनातनधर्मम समाजमें स्थित हैं वे सब ही प्रथम गुरुदीता ग्रहण

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श्रीगुरुगीता।

करनेकी श्रवश्यकता मानते हैं; चाहे भक्ति-मार्ग हो, चाहे ज्ञान- मार्ग हो, चाहे कर्स्म-कारडी हो, चाहे ज्ञान-कारडी हो, सब सम्पर- दाय ही एकवाक्य होकर स्वरीकार करते हैं कि प्रथम-गुरुदीक्षा ग्रहण करके तत्पश्चात् साधनमें प्रवृत्त होना उचित है। वैष्णच, सौर्य्य, शाक, गाणपत्य तथा शैव, सब उपासक सम्प्रदाय ही स्थिर निश्चय करके यही उपदेश देते हैं कि गुरुदीक्षा विना सब प्रकार का साधन विफल होता है। उसी प्रकार मन्त्रयोग, हठयोग, लययोग और राजयोग, इन साधनचतुष्टयके सब आचार्यगण ही ने मुक्तकराठ होकर साधन वर्णन करते समय यही कहा है कि विना गुरुदीक्षाग्रहण, विना गुरुसेवा, बिना गुरुसङ्ग विना गुरु-आज्ञापालन और विना गुरुउपदेश-अनुसार साधन के कोई मुमुतु भी अपना कल्याण साधन नहीं करसका है। प्रथम गुरुस्ेवा, तत्पश्चात् गुरु कृपा प्राप्ति, तत्पश्चात् गुरुदीक्षाग्हण, तत्पश्चात् साधन-अभ्यास, क्रमशः इसी शैली के अनुसार जिज्ञासु आध्यात्मिक भूमिमें अग्रसर होता हुआ परम कल्याणरूपी मुक्तिपदको प्राप्तकरलेता है। गुरु ही मुख्य हैं।

न सुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम्। शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः ॥।

इति श्रीगुरुगीता भूमिका।

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श् तत्सत्। श्रीमद्गरुचरणकमलेभ्यो नमः।

श्रीगुरुगीता।

भाषानुवादटिप्पणीसहिता।

ऋषय ऊच:। गुद्यादगुहातरा विद्या गुरुगीता विशेषतः । ब्रूहि नः भूत ! कृपया शृणुमस्त्वत्पसादतः ॥१॥

ऋषिगण बोले। हे सूत ! धर्म्म दुर्शेय है, विशेषतः गुरुगीता विद्या सब विद्याओं- से अतिदुर्शेय है, आपकी कृपासे हम उसको श्रवण करना चाहते हैं इस कारण उसका वर्णन कीजिये ॥ १ ॥ * तीर्थप्रधान नैमिषारसय तीर्थमें महर्षिगण पायः ही एकत्रित होकर धर्म्म- जिज्ञाप्ता, धर्म्म-विचार और जीवगसके हितार्थ धर्म्मपरचार किया करते थे। इस मसककसे गुरुगीताका भी प्रचार हुआ है। गुरु विना किली पकार के ज्ञानकी प्राप्ति नहीं होसकी, इस संसारमें श्रीगुरुद्ेवसे अरधिक कोई भी नहीं है, इस कारस महर्पिगसाने ऐसे सम्मानित और प्रशंसायुक्त वाक्य द्वारा सृतसे गुरुगीताविषयक पश्न किया है।

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८ श्रीगुरुगीता।

सूत उवाच। गिरीन्द्रशिखरे रम्ये नानारत्नोपशोभिते। नानावृक्षलताकीर्णे नानापक्षिरवैर्युते ॥२॥ सर्वर्नुकुसुमामोदमोदिते सुमनोहरे।

अप्सरोगणसङ्गीतकलध्वनिनिनादिते।

सूत बोले। कैलास पर्वतका शिखर अतिरमणीय स्थान है। वह स्थान नाना मणि रत्न आदियोंसे युक्त होकर अपूर्च शोभाको धारण करता है, बहुप्रकारके वृक्ष और लतासमूहसे वेष्टित है जिनमें अगणित विह्ङ्गमगण गान किया करते हैं । ग्रीष्म, वर्षा, शरद. हेमन्त, शिशर और वसन्त इन छःहो ऋतुओंमें जिस जिस प्रकार के उत्तम पुष्प खिला करते हैं वे सब ही इस मनोहर पर्वतमें सब समय प्रस्फुटित होकर मन-आनन्दकारी सुगन्धि विस्तार किया करते हैं। मन्द सुगन्ध और शीतल-गुणधारी वसन्त-पवन सदा प्रवाहित होकर व्यजनकारीका कार्य्य किया करता है॥ २-३॥ ऐसी अपूर्य भूमिको पाकर अप्सरा और गन्घर्वगण सदी गान, * महामाया उमाके पति पकृतिजयकारी सदाशिव के कैलाशलोकमें प्रकृतिमाता सदा पूराताको धाग्स करके उनकी सेवा करेंगी यह निश्चय ही है। जिन देवादिदेव महादेवने अपने तपःप्रभावसे त्रिलोकमुग्सकारी कामकी सदा जय कर रक्खा है उनके लोकमें काम-सेवक ऋतुगए सदा आजाकारी रहेंगे इसमें विचित्रता होही नहीं सक्ती तरलतंरङ्गिणी पतितपावनी गङ्गा सदा एक ही भावसे कैखाश पर्वतमें शिवके आर्पनन्द वद्द नार्थ वह रद्ी हैं, इस कारण वहांकी वायु शीतल है, उस पवरित्र सुरनदी के अपूर्व पभावसे उसके लटं पर नाना प्रकार के स्वर्गीय कनक चम्पक पारिजात आदि और जल में कमकपम और रजतकुमुद आदि दिव्य पुष्प नित्य विकसित रहते हैं, इस कारय वहांकी वायु सुगन्धियुक्त है और उस देवनदीके दोनों तीर पर उनकी अद्भु शक्तिके कारए नाना प्रकारके देवदारु तथा मन्दार, चन्दन, कल्पवक्ष आदि रहनेके कारण उनके मध्यमें वायु बहती हुई स्वतःही मन्दगुसको धारस कर लेती है।

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श्रीगुरुगीता।

स्थिरच्छायाद्रुमच्छायाच्छादिते स्निग्धमञ्जुले ॥ ४॥ मत्तकोकिलसंदोहसंघुष्टविपिनान्तरे। सर्वदा स्वगणैः सार्द्धमृतुराजनिषेविते ॥ ५॥ सिद्ध चारणगन्वर्वगाणपत्यगणैटटैते। तत्र मौनधरं देवं चराचरजगद्गुरुम ॥ ६ ॥ सदाशिवं सदानन्दं करुणाऽमृतसागरम्। कर्पूरकुन्दधवलं शुद्धतत्त्वमयं विभुम् ॥ ७॥ दिगम्बरं दीननाथं योगीन्द्रं योगिवल्लभम।

वाद्य और नृत्यरूपी त्रिविद्यामें उन्मन्त रहते हैं और उस मधुर सङ्गीतकी ध्वनि प्रतिध्वनिसे वह पर्वत निनादित होता रहता है। उस स्थानकी वह स्वर्गीय वृक्ष-छाया सदा स्थिर भावसे रहती है अर्थात् छुओं ऋतुओंके बदलसे वृक्ष-पत्रोंके बदल होनेपर जैसे और वृक्षोंमें छायाकी न्यूनता होजाती है वहां वैसा नहीं होता, इस कारण ऐसी स्थिर छाया-युक्त वृक्षोकी छायासे वह स्थान सदा सुन्दर और शीतल होरहा है। ऐसे सुन्दर भावको देखकर वहां कोकिल सदा प्रमत्त होकर गुंजारता हुआ फिरा करता है। वहाँ सब समय में ऋतुओंका राजा वसन्त अपने अनुचरगणकों साथ लेकर विराजमान रहता है और वहां सिद्ध, चारण, गन्घर्व, गाणपत्य आदि शिवलेवकगण सदा निवास किया करते हैं। वहां एक दिन आशुतोष नित्यानन्दमय चराचर विश्वके एकमात्र गुरु श्रीमहादेव मौनभावको धारण करके बैठे हुए हैं। वे करुणारूप अ्रमृतके सागर, स्वर्ग-मर्त्य-पाताल इन तीनों लोकोंके अच्नीश्वर, शुद्ध आत्मज्ञानमय, दीनजनोंके पवित्रकर्त्ता, नित्य मङ्गलदाता, सब जीवोंमें समान दृष्टि रखनेवाले, योगिगणमें थ्रेष्ट और योगिगएके परमप्रिय प्रभु हैं। उनका शरीर कर्ूर, स्फटिक और कुन्दपुष्पके नाई लावराय- युक्त है, जिस पर भस्मसे भूषित होकर और भी शोभाको प्राप्त हुश है, वे दिगम्बर अर्थात् वस्त्र आभरण रहित हैं, उनके २

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१० श्रीगुरुगीता।

गङ्गाशीकरसंसिक्त जटामण्डलमण्डितम् ॥ ८ ॥। विभूतिभूषितं शान्तं व्यालमालं कपालिनम। अन्धकारिं त्रिलोकेशं त्रिशूलवरधारकम् ॥९ ॥ आयुतोषं ज्ञानमयं कैवल्यफलदायकम्। निर्विकल्पं निरातङ्कं निर्विशेषं निरञ्ञनम् ॥ १० ॥ सर्वेषां हितकर्च्तारं देवदेवं निरामयम्। कैलासशिखगसीनं पश्चवक्कं सुभूषितम् ॥ ११ ॥ सर्वात्मनाविष्टचित्तं गिरिजामुखपङ्कजे। प्रणम्य परया भक्त्या कृताञ्जलिपुटा सती ॥ १२ ॥ मसन्नवदनं वीक्ष्य लोकानां हितकाम्यया। विनयाऽवनता देवी पार्वती शिवमबरवीत् ॥ १३ ॥ श्रीमहादेव्युवाच। नमस्ते देवदेवेश ! सदाशिव ! जगद्गुरो ! । प्राणेश्वर ! महादेव ! गुरुगीतां वद प्रभो !॥ १४ ॥

मस्तक में जटाएँ लटपटाय रही हैं, जिनमें होकर गंगादेवी अपनी लहर विस्तार कररही हैं, उनके गलेमें सर्पकी माला शोभायमान है, मस्तक में अर्धचन्द्रकी ज्वाला अलक रही है, उनके हाथमें श्रेष्ठ त्रिशूल शोभा को प्राप्त होरहा है। उस समय जीवोंके मुक्तिदाता, निर्विकल्प, भयहारी, निरश्न, सबके हित करनेवाले, देवादिदेव, पख्चानन कैलास पर्वत को शोभित करते हुए महामाया गिरजाके मुखकमलकी ओर प्रेम-वशीभूत और अनन्यचित्त होकर देखने लगे। तब विद्यारूपिणी उमादेवी परम भक्तियुक्त होकर जीवों के मङ़लार्थ हाथ जोड़कर विनयके साथ हास्यवदन होबोलीं।४-१३। श्रीमहादेवी बोली। हे देवदेवेश ! हे सदाशिव ! हे जगद्गुरो ! मैं आपको प्रणाम करती हूँ, हे प्रारोश्वर ! हे महादेव ! मुझको गुरुगीता ,सुनाइये। हे

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श्रीगुरुगीता। ११

केन मार्गेण भोः स्वामिन् ! देही ब्रह्ममयो भवेव्। त्वं कृपां कुरु मे देव ! नमामि चरण तव ॥। १५ ।। श्रीमहादेव उवाच। गुशब्दस्त्वन्धकार: स्याद्रुशब्दस्तन्निरोधकः ।

गुकारः प्रथमो वर्णो मायादिगुणभासकः । रुकारो द्वितीयो ब्रह्म मायाभ्रान्तिविमोचकः ॥१७॥ गकारः सिद्धिद: प्रोक्तो रेफः पापस्य दाहकः। उकार: शम्भुरित्युक्तस्त्रितयाSडत्मा गुरुः स्मृतः ॥१८॥

स्वामिन ! जीव कौन उपाय अवलम्बन करने से ब्रह्मपदको प्राप्त कर सक्ता है? सो कृपा करके मुझसे कहिये। हे देव ! मैं तुम्हारे चरणों को वारम्वार नमस्कार करती हूँ॥१४-२५॥ श्रीमहादेव बोले। गु शब्दका अर्थ अन्धकार और रु शब्दका अर्थ तमका नाश करना है। इस कारण जो अज्ञानरूप अन्धकारको नाश करते हैं वेही गुरु शब्दवाच्य हैं॥। १६॥ गुरु इस शब्द्के प्रथम वर्ण गुसे माया आदि गुण प्रकाशित होता है और द्वितीय वर्ण रुसे ब्रह्ममें जो मायाका भ्रम है उसका नाश होता है; इस कारण गु शब्द सगुणको और रुशब्द निर्गुण अवस्थाको प्रतिपन्र करके गुरु शब्द बना है।१७। गकारका अर्थ सिद्धिदाता, रकारका अर्थ पाप- हर्त्ता और उकारका अर्थ शिव है अर्थात् सिद्धिदाता शिव और पापहर्त्ता शिव ऐसा अर्थ ग-उ और र-उ बोधक गुरुशब्दसे सम- भाना उचित है॥ १८ ॥

  • गुरु शब्दसे जगद्गुरु परमात्मा ईश्वरका ही बोध होता है; गुरु साक्षाद पर ब्रह्म हैं इसमें कोई सन्देह नहीं। सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ही इस संसारके सृष्टि स्थिति और लयकर्त्ता हैं; वे ही जीव पर कृपालु होकर जीवकी बुढ्धिमें अपनी शक्ति विस्तारित कर जीवको निम्न ज्ञान-भूमिसे उन्नत ज्ञान-भूमिमें पहुंचा दिया

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१२ श्रीगुरुगीता।

श्रीमहादेव्युवाच। मायामोहितजीवानां जन्ममृत्युजरादितः । रक्षायै कः प्रभवति स्वामिन् ! संसारसागरे ॥ १९ ॥ त्वत्तो नाऽन्यो दयासिन्धो ! कश्चिच्छक्रोति वै प्रभो !। दातुं प्रतिवचश्राऽस्य लोकशोकविमोचनम् ॥२०॥ त्रितापतप्तजीवानां कल्याणार्थ मया प्रभो !। विहितः सादरं प्रश्न उत्तरेणाऽनुगृह्यताम् ॥ २१ ।

श्रीमहादेवी वोली। हे नाथ ! मायामोहित जीवको जन्म मृत्यु आदिसे बचानेके लिये इस संसारमें कौन समर्थ है॥ १६॥ हे कृपामय ! आपके विना और कोई भी इस लोकशोक्विमोचन प्रश्नका उत्तर देनेवाला नहीं है।। २० । त्रितापतापित जीवोंके कल्याणार्थ मेरे इस सविनय प्रश्नका उत्तर देकर मुझे आनन्दित करें॥ २१॥

करते हैं, वे दयामय ही गुरु-मूर्ति धारण कर शिष्यको निम्न भूमिसे उत भूमिमें खेचकर चढ़ा लेते हैं, तब ही लघुशक्ति जीव गुरुशक्ति द्वारा आ्कृष्ट होकर ज्ञानमूमि- में उन्नतपदकी प्राप्त होजाता है। स्वशक्तिमान् परमात्मा ही जीवको उसके किये हुए सत असत कम्मोंका फल दिया करते हैं; मायालिप्त जीव जो कुछ फल भोगता है वह मायाश्तीत परमेश्वर का विधान किया हुआ ही भोगता है; परन्तु मायालिप्त होनेके कारण जीव ईश्वरके ऐसे कार्यको प्रत्यक्ष नहीं करसक्ता;वे भी जो कुछ करते हैं यथाव- वूही करते हैं किन्तु परोक्ष करते हैं; उसी गीति के अनुसार जीव को सद्गति दान करते समय आपही अपने और किसी जीवरूप केन्द्रमें आविर्भूत होकर श्रीगुरुरूपसे जीव- का कल्याण किया करते हैं इस कारण श्रीगुरु ही मूर्त्तिमान् परब्रह्म है इस में सन्देह मात्र नहीं। वे पापहर्ता, सिद्धिदाता, मुक्तकर्त्ता, दयामय, शिवरूप ईश्वर ही शरीरमें प्विर्भूत होकर श्रीगुरुदेव रुपसे जीवके पापों का नाश करके दीचादान द्वारा उसको उन्नत ज्ञानभूमिमें पहुंचाकर उस बन्धनप्राप्त जीवकी मुक्तिपदपाप्तिका उपाय विधान करहेते हैं। भीगुरु देव ही सापाव ईश्वर और गुरुदीक्षा ही उनकी महाशक् है।

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श्रीगुरुगीता। १३

श्रीमहादेव उवाच। संसाराऽपारपाथोधेः पारं गन्तुं महेश्वारि !।

सद्गुरो रूपमादाय जगत्यामहमेव हि।

यो गुरुः स शिवः साक्षाद्यः शिवः स गुरुर्मतः। गुरौ मयि न भेदोऽस्ति भेदस्तत्र निरर्थकः ॥ २४॥ गुरुर्ज्ञानपदो नित्यं परमाऽडनन्दसागरे। उन्मज्जयति जीवान्स ताँस्तथैव निमज्जयन् ॥ २५ ॥ गुरुस्त्रितापतप्तानां जीवानां रक्षिता क्षितौ। सच्चिदानन्दरूपं हि गुरुर्व्रह्म न संशयः ॥ २६ ॥ यादृगस्तीह सम्बन्धो ब्रह्माण्डस्येश्वरेण वै। तथा क्रियाSSर्ययोगस्य सम्बन्धो गुरुणा सह ॥२७॥ दीक्षाविधावीशवरो वै कारणस्थलमुच्यते। गुरु: कार्य्यस्थलश्चाऽतो गुरु्व्रह्म प्गीयते ॥ २८॥ श्रीमहादेव बोले। संसाररूप अपार पारावारसे पार करनेके लिये श्रीगुरुदेवके चरणकमलरूप नौकाही एकमात्र उपाय है।२२।मैंही गुरुरुपसे दृश्य- रूपमें प्रकट होकर जीवोंका उद्धार संसारपारावार से किया करता हँ।२३जो गुरु हैं वे साक्षात् शिव हैं और जो शिव हैं वे साक्षात् गुरु हैं, गुरुमें और मुझमें भेद नहीं है, इनमें भेद मानना अनुचित है॥२४॥ गुरु ज्ञानदाता हैं, गुरु परमानन्दपारावार में उन्मज्जन निमज्जन करानेवाले और गुरु त्रितापसे जीवको बचानेवाले हैं इसी कारण गुरु सचिचिदानन्दमय ब्रह्म हैं, इसमें सन्देह नहीं॥ २५-२६॥ ईश्वरके साथ जैला ब्रह्माराडका सम्बन्ध है, उसी प्रकार गुरुके साथ करिया योगका सम्बन्ध है॥। २७ । दीक्षाविधिमें ईश्वर कारणस्थल और गुरु कार्यस्थल कहे गये हैं, इस कारण गुरु ब्रह्मरूप हैं ॥। २८ ।।

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१४ श्री गुरुगीता। गुरौ मानुषबुद्धिन्तु मन्त्रे चाSक्षरभावनाम्। प्रतिमासु शिलावुद्धिं कुर्व्वाणो नरकं ब्रजेद् ॥ २९ ॥ जन्महेतू हि पितरौ पूजनीयौ पयत्नतः । गुरुर्विशेषतः पूज्यो धर्म्माऽधर्म्मपदर्शकः॥ ३०॥ गुरुः पिता गुरुर्माता गुरुर्देवो गुरुर्गतिः । शिवे रुष्टे गुरुस्त्राता गुरौ रुष्टे न कश्चन ॥ ३१ ॥ श्रीमहादेव्युवाच। जगन्मङ्गलकृन्नाथ ! विशेषेणोपदिश््यताम्। लक्षण सद्गुरोयेन सम्यगज्ञातं भवेद्धुवम्॥ ३२ ॥ आचार्य्यगुरुमेदोऽपि येन स्याद्विदितो मम। शेष्ठत्वं वा तयोः केन लक्षणेनाऽनुमीयते ॥ ३३॥ जो लोग गुरुके विषयमें मनुष्यवुद्धि और मन्त्रके विषयमें श्रक्षरबुद्धि और देवप्रतिमामें पाषाणबुद्धि रखते हैं वे नरकगामी होते हैं॥२६॥ माता और पिता जन्म देनेके कारण पूजनीय हैं किन्तु गुरु धर्म और अधर्म का ज्ञान करानेवाले हैं इस कारण उनका पूजन पितृगणसे भी अधिक यत्न करके करना उचित है॥ ३० ॥ गुरु ही पिता हैं, गुरु ही माता हैं, गुरु ही देवता हैं, गुरु ही सद्गतिरूप हैं। परमे श्वरके रुष्ट होने पर तो गुरु बचानेवाले हैं परन्तु गुरुके अप्रसन्न होनेपर कोई भी तारादाता नहीं है॥ ३१॥ श्रीमहादेवी बोली। हे नाथ ! हे स्व्वशक्तिमन् 1 हे स्व्वज्ञ ! आप जगत्के ।कल्या' णार्थ मुझे ऐसे उपदेश दीजिये जिससे मैं श्रेष्ट गुरुके लक्षण समभ सकूँ ॥३=॥ और जिससे मैं यह भी समझ सकूँ कि गुरु और आ्ाचा य्यमें भेद क्या है और श्रेष्ट गुरु तथा श्रेष्ट आचार्य्य किन लक्षणोंसे पहचाने जासकते हैं। ३३॥

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श्रीगुरुगीता। १७

श्रीमहादेव उवाच। सर्व्वशास्त्रपरो दक्ष: सर्व्वशास्त्रार्थवित्सदा। सुवचा: सुन्दरः स्वंगः कुलीनः शुभदर्शनः ॥ ३४ ॥ जितेन्द्रियस्सत्यवादी ब्राह्मणश्शान्तमानसः । मातृपितृहिते युक्तः सर्व्वकर्म्मपरायणः ॥ ३५॥ आश्रमी देशवासी च गुरुरेवं विधीयते। आचार्य्यगुरुशब्दौ द्वौ क्वचित्पर्यर्यायवाचकी।। ३६॥ एवमर्थगतो भेदो भवत्यपि तयोः क्वचित्। उपनीय ददद्वेदमाचार्य्यः स उदाहृतः ॥ ३७॥ यः साधनपकर्षार्थ दीक्षयेत्स गुरु: स्मृतः। औपपत्तिकमंशन्तु धर्म्मशास्त्रस्य पण्डितः ॥ ३८॥

श्रीमहादेव बोले। सर्व्वशस्त्रोंमें पारङ्गत, चतुर, सम्पूर्ण शास्त्रोंके तत्त्ववेत्ता और मधुर वाक्य भाषण करनेवाले, सब अङ्गोंसे पूर्ण और सुन्दर, कुलीन अर्थात् सत्कुलोन्द्रव और दर्शन करनेमें मङ्गलमूत्ति हों॥३४॥ इन्द्रियाँ जिनकी सब अपने वशीभूत हो, स्व्वदा सत्यभाषण करनेवाले हो, ब्राह्मणवर्ण हो, शान्तमानस अर्थात् जिनका मन कभी चश्चल नहीं होता हो, माता पिताको समान हित करनेवाले हों, सम्पूर्ण कम्मोंके अनुष्ठानशील हों ॥३५॥ गृहस्थ, वानप्रस्थ, ब्रह्मचर्य्य और संन्यास, इन आश्रमोंमें से किसी आश्रमके हों एवं भारतवर्ष- निवासी हो, इस प्रकारके सर्वगुणसम्पन्न महात्मा गुरु करने योग्य कहे गये हैं। आचार्य्य और गुरु ये दोनों कहीं कहीं पर्य्यायवाचक शब्द हैं ॥३६॥ तथा कार्य्य के वैलक्षरायसे कभी कभी आचार्य्य और गुरु इनमें भेद भी है। उपनयन कराकर जो शिष्यको वेदका उपदेश करते हैं वे श्राचार्थ्य हैं॥३॥ और आध्या त्मिक उन्नति के लिये जो शिष्य को दीक्षा देते हैं वे गुरु है। सम्पूर्ण

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१६ श्रीगुरुगीता।

व्याचष्टे धर्म्ममिच्छूनां स आचार्य्यः पकीर्तितः । सर्व्वदर्शी तु यः साधुर्मुमुक्षूणां हिताय वै॥ ३९॥ व्याख्याय धर्मशास्त्राणां क्रियासिद्धिमबोधकम्। उपासनाविधेः सम्यगीश्वरस्य परात्मनः ॥ ४० ॥ भेदान्पशास्ति धर्म्मज्ञः स गुरुः समुदाहृतः । सप्तानां ज्ञानभूमीनां शास्त्रोक्तानां विशेषतः ।। ४१ ।। मभेदान यो विजानाति निगमस्याऽडगमस्य च.। ज्ञानस्य चाऽधिकाराँस्त्रीन्भावतात्पर्य्यलक्ष्यतः ॥४२।। तन्त्रेषु च पुराणेषु भाषायास्त्रिविधां सृतिम 1 सम्यग्भेदैर्विजानाति भाषातत्त्वविशारदः ॥४३॥ निपुणो लोकशिक्षायां श्रेष्ठाऽडचार्य्यः स उच्यते। पश्चतत्त्वविभेदज्ञः पञ्चभेदां विशेषतः ॥ ४४ ॥ सगुणोपासनां यस्तु सम्यग्जानाति कोविदः। चातुर्विध्येन विततां ब्रह्मणः समुपासनाम् ॥ ४५ ॥ वेद और शास्त्र आदि में सुपसिडत हो और उनका औपपत्तिक ज्ञान शिप्यको करावें वे आ्चार्य्य कहाते है। जो सव्चदर्शी साधु मुमुच्नुओंके हितार्थ वेदशास्त्रोक्त क्रियासिद्धांश और परमेश्वरकी उपासनाके भेदोंको यथाधिकार शिष्योंको बतलावें उनको गुरु कहते हैं। दर्शनशास्त्रोंकी सात भूमिके अनुसार जो वेद और शास्त्र के सकल भेहोंको जानते हो। अध्यात्म अधिदैव एवं अधिभूत नामक भावत्रयको भलीभांति समझते हो और तन्त्र एवं पुराणोंकी समाधिभाषा, लौकिकभाषा और परकीयभाषा इनसे भलीभांति परिचित रहकर लोकशिक्षामें निपुणा हों, वे ही श्रेष्ठ आचार्य्य कहे जाते हैं। पञ्चत्वके अनुसार जो महापुरुष विष्सूपासना, सूर्य्योपासना, शक्त्युपासना, गणेशोपासना और शिवोपासनारूप पञ्च सगुए उपालनाके रहस्योको पूर्ण समझते हो। और जो योगिराज मन्त्रयोग, हठयोग, लययोग,

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श्रीगुरुगीता। १७

गम्भीरार्थी विजानीते बुधो निर्म्मलमानसः । सर्वकार्येषु निपुणो जीवन्मुक्तस्त्रितापहृत् ॥४६ ॥ करोति जीवकल्याणं गुरुः श्रेष्ठः स कथ्यते ॥ ४७ ॥ श्रीमहादेव्युवाच। सच्छिष्यलक्षणं नाथ ! सुमुक्षूणां त्रितापहृत !। गुरुभक्तस्य शिष्यस्य कर्त्तव्यश्राऽपि मे वद ॥४८।। मुमुक्षुभिश्च शिष्यैः कैः शुभाऽडचारैरवाप्यते। आत्मज्ञानं दयासिन्धो ! कृपया बरूहि तानपि।। ४९॥ येन ज्ञानेन लब्धेन शुभाऽडचारान्वितैर्द्ुतम्। मुच्यते बन्धनान्नाथ ! शिष्यैः सद्गुरुसेवकैः ॥ ५०॥ श्रीमहादेव उवाच। शिष्यः कुलीनः शुद्धाऽत्मा पुरुषार्थपरायणः । अधीतवेदः कुशलो दूरमुक्तमनोभवः ॥५१॥ हितैषी प्राणिनां नित्यमास्तिकस्त्यक्तवश्चनः ।

राजयोग, इन चारोंके अनुसार चतुर्विध उपासनाको जानते हो ऐसे ज्ञानी, निर्मर्मलमानस, सर्व्च-काय्यमें निपुण, त्रितापरहित, जीवोंका कल्याण करनेवाले जीवन्मुक्त महात्मा श्रेष्ठ गुरु कहलाते हैं ॥३८-४9॥ श्रीमहादेवी बोलीं। हे नाथ! हे मुमुन्तुओंके त्रिताप दूर करनेवाले ! मुझे आप कृपा करके कहें कि श्रेष्ट शिष्यका लक्षण क्या है और गुरुभक्त शिष्यका कर्त्तव्य क्या है और किन किन आचारोंके पालन करनेसे मुमुचु शिष्य आत्मज्ञान लाभ करके मुक्त हो सका है॥४८-५० ॥ श्रीमहादेव बोले। शिष्य कुलीन शुद्धात्मा और पुरुषार्थ परायण होना चाहिये। वह अधीतवेद हो, कुशल (चतुर) हो, कामी न हो, म्राणियों का २।।

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१८ श्रीगुरुगीता।

स्वधर्म्मनिरतो भक्त्या पितृमातृहिते स्थितः ॥ ५२॥ गुरुशुश्रूषणरतो वाड्मनःकायकर्म्मभिः। शिष्यस्तु स गुणैर्युक्तो गुरुभक्तिरतः सदा ॥५३ ॥ धर्म्मकामादिसंयुक्तो गुरुमन्त्रपरायणः । सत्यबुद्धिर्गुरोर्मन्त्रे देवपूजनतत्परः ॥ ५४ ॥ गुरूपदिष्टमार्गे च सत्यबुद्धिरुदारधी: । अलुब्धः स्थिरगात्रश्च आज्ञाकारी जितेन्द्रियः ॥ ५५॥ एवंविधो भवेच्छिष्य इतरो दुःखकृद्गुरोः। शरीरमर्थ प्राणाँश्च गुरुभ्यो यः समर्प्पयन ॥ ५६॥। गुरुमिः शिष्यते योगं स शिष्य इति कथ्यते। दीर्घदण्डवदानम्य सुमना गुरुसन्निधौ॥५७॥ आत्मदाराऽडदिक सर्व गुरवे च निवेदयेव। आसनं शयनं वस्त्रं वाहनं भूषणाSडदिकम ॥५८॥

हितेच्छु हो, आस्तिक हो, प्रवञ्चक न हो, स्वधर्म्मनिरत हो, भक्ति पूव्वक माता पिता के हित में स्थित हो, मन वचन और शरीर तथा कर्म्मो से गुरुसेवापरायस हो, गुणसम्पन्न हो, गुरुभक्त हो, धर्म्मादिसम्पन्न हो, गुरुदत्त मन्त्र के जपादि में प्रवृत्त हो, गुरुदत्त मन्त्र में श्रद्धालु हो, देवपूजापरायण हो, गुरूपदिष्टमार्ग में सत्यबुद्धि हो, उदार हो, लोभीन हो, शरीर जिसका चञ्चल न हो, गुरुका आाश्ञाकारी हो, जितेन्द्रिय हो, इस प्रकार का शिष्य होना चाहिये। इससे विपरीत गुण का होने पर गुरुको दुःख देनेवाला वह होगा। शरीर अर्थ और प्राणों को गुरुके अर्पण करके गुरु से शिक्षा प्राप्त करता है इसी कारण शिष्य कहा जाता है। शिष्य को गुरु के सन्मुख दीर्घ दरडाकार होकर प्रणाम करना उचित है और असंकुचित चित्त से अपनी आात्मा, स्त्री, पुत्र, कन्या आदि को गुरु के अर्पण करना उचित है। शिष्य साधक होकर अर्थात् गुरुदीक्षा ग्रहण करके गुरु के प्रीत्यर्थ आसन, शच्या, वस्त्र, वाहन और भूषण आदि उनको अर्पण करे। गुरु का

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श्रीगुरुगीता। १९

साधकेन पदातव्यं गुरोः सन्तोषकारणात। गुरुपादोदकं पेयं गुरोरुच्छिष्टभोजनम् ॥ ५९॥ गुरुमूर्ते: सदा ध्यानं गुरुस्तोत्रं सदा जपेत। ऊर्दृध्वं तिष्ठेद्गुरोरग्रे लब्धाऽनुज्ञो वसेत पृथक् ॥ ६० ॥ निवीतवासा विनयी पह्यस्तिष्ठेद्गुरौ परम्। गुरौ तिष्ठति तिष्ठेच्चोपविष्टेऽनुजया वसेत् ॥ ६१ ॥ सेवताङ्गी शयानस्य गच्छन्तश्चाऽप्यनुव्रजेव। शरीरं चैव वाचं च बुद्धीन्द्रियमनांसि च ॥ ६२ ॥ नियम्य पाअ्जलिस्तिष्ठेद्वीक्षमाणो गुरोर्मुखम्। नित्यमुद्रितपाणिः स्याव साध्वाचारः सुसंयतः ॥६३ ॥ आस्यतामिति चोक्तः सन्नासीताऽभिमुखं गुरोः। हीनान्नवस्रवेशः स्यात् सर्वदा गुरुसन्निधौ॥ ६४ ॥।

चरणामृत पान, गुरु-उच्छिष्ट भोजन, सर्वदा गुरु-मूर्ति ध्यान और सदा गुरुस्तव पाठ करना शिष्य को उचित है गुरु के सन्मुख शिष्य- को खड़ा रहना उचित है, पश्चात् गुरु-आज्ञा ग्रहण करके पृथक आसन पर बैठना युक्तियुक्त है; गुरु के सम्मुख शिष्य को अपना शरीर वस्त्र से आच्छादित कर विनयी और भययुक्त हो अवस्थान करना उचित है। गुरु के खड़े होने पर शिष्यको उसी क्षणमें खड़ा होना उचित है, पुनः गुरु के उपवेशन करने पर उनकी आज्ञा लेकर बैठना उचित है, गुरुके शयन करने पर शिष्य उनकी चरणसेवा करे और गुरुके गमन करने पर उनके पश्चात् गमन करना उचित है। शिष्य को उचित है कि वह अपने शरीर, वचन, बुद्धि, चन्तु आदि इन्द्रियगण और मनको संयम कर श्रीगुरुदेवके मुखारविन्दकी ओर देखता हुआ हाथ जोड़कर खड़ा रहे। शिष्यको उचित है कि वह सदाचारसम्पन्न होकर शरीर इन्द्रियादिको संयम करता हुषा हाथ जोड़कर सदा गुरुके सम्मुख खड़ा रहे और जब वे निज मुखसे कहें कि बैठो तब ही उपवेशन करे शिष्य जब गुरुके समीप जाय

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२० श्रीगुरुगीता।

उत्तिष्ठेत प्रथमं चाडस्य चरमं चैव संविशेत्। दुष्कृतं न गुरोर्बूयाव क्ुद्धं चैने प्रसादयेत्॥ ६५ ।। परिवादं न शृणुयादन्येषामपि कुर्वताम्। नीचं शय्यासनं चाऽस्य स्व्वदा गुरुसन्नियौ ॥ ६६ ॥ गुरोस्तु चक्षुरविषये न यथेष्टाडडसनो भवेव्। चापल्यं प्रमदागाथामहंकारं च वर्ज्जयेद्॥ ६७॥ नाऽपृष्टो वचनं किंचिद्बूयान्नाऽपि निषेधयेत्। गुरुमूर्ति स्मरेन्नित्यं गुरुनाम सदा जपेत् ॥ ६८ ।। गुरोराज्ञां प्रकुर्वीत गुरोरन्यं न भावयेत्। गुरुरूपे स्थितं ब्रह्म भाप्यते तत्पसादतः ॥ ६९ ॥

तो गुरुसे हीन अन्न उसको भोजन करना उचित है और उनके पह. ननेके अपकृष्ट वस्त्र अलंकार आदि उसको धारण करना उचित है। शिष्यको गुरुसे पहले शय्या त्याग करना और गुरुसे पीछे शय्या पर शयनार्थ जाना उचित है। शिष्यको उचित है कि गुरुका कोई दुष्कार्य्य प्रकाश न करे, गुरुके कुपित होने पर उनको प्रसन्न करने की चेष्टा करे और अन्य पुरुष यदि गुरु-निन्दा करता हो तो उसको श्रवणन करे। शिष्य को उचित है कि गुरु के लमीप में नीची शय्या पर शयन करे, नीचे आसन पर उपवेशन करे और उनके सम्मुख यथेष्टासन न हो: अर्थात् गुरुके सन्मुख हाथ पैर आदि फैलाय कर यथेच्छा से न बैठे शिष्य को गुरु के सन्मुख चपलता, नारी-सम्बन्धिकथन और अहंकार त्याग करना उचित है, गुरुको विना पूछे कोई बात करनी उचित नहीं है और गुरुके किसी कार्य्य को निषेध करना भी उचित नहीं है। सर्वदा गुरुमूर्ततिध्यान, सर्वदा गुरु-नामजप और गुरु-आज्ञा पालन शिष्य को करना उचित है; और गुरुके सिवाय और किसी की चिन्ता करना अनुचित है। गुरु-मुखस्थित परब्रह्मतत्व गुरुप्रसाद से ही लाभ हुआ करता है, इलकारण अपने आश्रम विद्या और .जातित्व-अभिमान और कीर्तिअभिमान आदि को त्याग करके गुरु शरणागत होना ही उचित है; अर्थात् "मैं उच्च वंश का हूं, संसार में

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श्रीगुरुगीता । २१

जात्याश्रमयशोविद्यावित्तगव्व परित्यजन्। गुरोराज्ञां प्रकुर्वीत गुरोरन्यं न भावयेत् । ७० ॥। गुरुवक्के स्थिता विद्या गुरुभक्त्याऽनुलभ्यते। तस्मात् सर्वमयत्नेन गुरोराराधनं कुरु ॥ ७१॥ नोदाहरेदस्य नाम परोक्षमपि केवलम्। न च वाऽस्यानुकुर्व्वीत गतिभाषितचेष्टितम् । ७२॥ गुरोर्यत्र परीवादो निन्दा वाडपि प्रवर्त्तते। कर्णो तत्र पिधातव्यौ गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः ।७३॥ 1 परीवादात् खरो भवेत श्वा वै भवति निन्दकः। परिभोक्ता भवेत्क्रृमिः कीटो भवति मत्सरी॥ ७४॥ गुरोः शय्याऽसनं यानं पादुकोपानत्पीठकम् । स्नानोदकं तथा छायां कदापि न विलङ्गयेत् ।। ७५ ।। मेरी ऐसी कीर्ति है" इत्यादि अहंकारभावोको त्याग करके सदा गुरुको ही आश्रय समझता रहे॥ ५१-७०॥ केवल गुरु-भक्ति द्वारा ही गुरुमुखस्थिता परमा विद्या; अर्थात् जिस विद्या द्वारा ब्रह्मपद लाभ होता है वह विद्यालाभ होसक्ो है, इस कारण पूर्ण यतके साथ गुरुदेव की आराधना करना उचित है।। ९१। गुरुके पीछे भी गुरु- का अधूरा नाम अर्थात् उपाधिसे व्ज्जित नाम उर्च्चारण करना उत्तम शिष्यको कभी उचित नहीं है। गुरुदेवके चलने कहने और कार्य करने आदिका अनुकरण दिखाना उचित नहीं है॥ ७२॥ जहाँ गुरुका प्रतिवाद अर्थात् साक्षात्में दोषवर्णन, निन्दा अर्थात असा- क्षातूमें दोष वर्णन आदि अकीर्ततिकथन हो वहां शिष्यको उचित है कि अपने हाथ द्वारा कानोंो बन्द करले अथवा वहांसे उठकर सथानान्तरमें चलाजाय ॥ ७२ ॥। शिष्य यदि गुरु-वाक्य का प्रतिवाद करे तो वह परजन्ममें गर्दभ, यदि निन्दा करे तो कुक्कुर, यदि अन्यायरूपसे गुरुका धन भोग करे तो कृमि और यदि गुरुका स्वर्य छूदी हो तो कीट होता है।। ७४ ॥ शिष्यको उचित है कि गुरु शयया, आसन, यान, काष्ट-पादुका, पीढो, स्नानीयजल और छाया उलहन ३॥

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२२ श्रीगुरुगीता।

गुरोरग्रे पृथक् पूजामौद्धत्यं च विवर्ज्जयेत्। दीक्षां व्याख्यां प्रभुत्वं च गुरोरग्रे परिसजेव् ॥ ७६॥ ऋणदानं तथाSSदानं वस्तूनां क्रयविक्रयम्। न कुयर्याद्गुरुणा सार्द्ध शिष्यो भृत्वा कदाचन। ७७॥ पुत्रैश्च पूजितस्तातः शिष्येश्च पूजितो गुरुः। आज्ञया कुरुते कर्म्म पुत्र: शिष्यश्च भृत्यवत् ॥ ७८ ।। न प्रेरयेद्गुरुं तातं शिष्यः पुत्रश्च कर्म्मसु। गुरवे देवि ! पित्रे च निसं सर्वस्वमर्पयेत् ॥ ७९॥ स च शिष्यः स च ज्ञानी य आज्ञां पालयेद्गुरोः। न क्षेमं तस्य मूढ़स्य यो गुरोरवचस्करः ॥ ८० ॥ गुरोर्हितं पकर्त्तव्यं वाड्मन:कायकर्म्मभिः। .अहिताSSचरणाद्देवि ! विष्ठायां जायते कृमिः ॥८१ ॥ यथा खनन खनित्रेण नरो वार्य्यधिगच्छति। न करे।। ७५। गुरुके सन्मुख गुरुके सिवाय और किसीकी पूजा, गुरुके सन्मुख घृष्टता प्रकाश, उपदेश देना, शास्त्र-व्याख्या करना और प्रभुत्व प्रकाश करना शिष्यको उचित नहीं है। ७६ ॥ शिष्य होकर गुरुके साथ ऋणदान, ऋृणग्रहण और द्रव्य-सम्बन्धीय क्रयविक्रय आदि कार्य्य करना उचित नहीं है ॥७9। पुत्र को पिताकी पूजा और शिष्यको गुरुकी पूजा करना उचित है। पुत्रको और शिष्यको उचित है कि वे भृत्य की नाई उनकी आज्ञा पालन करें ॥७।। पुत्र पिताको और शिष्य गुरुको कभी किसी काय्यमें न नियुक्त करे। उचित है कि पुत्र पिताको और शिष्य गुरुको सर्वस्व समर्पण करदेवे॥७९॥ जो मनुष्य बिना विचार करते हुए गुरुकी आज्ञा पालन किया करता है वही यथार्थ में शिष्य है और वही यथार्थमें ज्ञानी है और जो गुरुवाक्यमें अश्रद्धा करता है उस मूढ़का कभी मङगल नहीं होता॥ ८० ॥ हे देवी ! शिष्य- को उचित है कि वाक्य, मन, शरीर और कर्म्म-द्वारा गुरुका हित अनुष्ठान करे, जो शिष्य गुरु-अहिताचारी होता है वह दूसरे जन्म- में विष्ठा-फीट होकर जन्मग्रहण करता है। ८१॥ जैसे कोई मनुष्य

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श्रीगुरुगीता। २३

तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रपुरधिगच्छति ॥ ८२ ॥ आसमासेः शरीरस्य यस्तु शुश्रूपते गुरुम्। स गच्छत्यअ्सा विपो ब्रह्मणः सझ शाश्वतम् ॥८३॥ श्रीमहादेव्युवाच। हे विश्वात्मन् ! महायोगिन ! दीनबन्धो ! जगद्गुरो !। त्रितापाद्रक्षितुं जीवान्नेतुं मुक्तेः पदं तथा ॥ ८४ ॥ योगमार्गप्रचारोऽत्र गुरुभिर्यः प्रकाशितः । तल्लक्षणानि भेदाँश्च कृपया वद मे प्रभो!॥ ८५॥ श्रीमहादेव उचाच। मन्त्रयोगो लयश्चैव राजयोगो हठस्तथा। योगश्चतुर्विधः पोक्तो योगिभिस्तत्वदर्शिभिः ॥ ८६॥*

खनित्र यन्त्र द्वारा मृत्तिका खनन करते करते जल प्राप्त कर लेता है वैसेही जो शिष्य गुरु-सेवामें रत रहता है वह गुरुकी सारी विद्या लाभ करनेमें समर्थ होजाता है। ८२॥ जो ब्राह्मरा मृत्यु समय- पर्य्यन्त श्रीगुरु-सेवामें अनुरक्त रहता है वह देहान्तरके पश्चात् ब्रह्मलोकमे गमन करता है इसमें कोई भी सन्देह नहीं ॥८३ ॥ श्रीमहादेवी बोली। हे योगियोंके ईश्वर! हे विश्वके आत्मा ! हेजगद्गुरो ! जीव- को त्रितापसे बचाने और मुक्तिपदमे पहुँचानेके लिये आपने जो योगमार्गका प्रचार गुरुके द्वारा जगत्में प्रकाशित किया है उलके कितने भेद हैं और उनके लक्षण क्या हैं ? सो वर्णन करके मुझे कृत- कृत्य कीजिये॥ ८४-८५॥ श्रीमहादेव बोले। तत्त्वदर्शी योगियों ने मन्त्रयोग, हठयोग, लययोग और राजयोग,इस

  • मन्त्रयोग, हठयोग, लययोग और राजयोग, ये चार प्रकारकी पृथक् पृथक् साधनप्रणाली हैं। सब सम्प्रदायके उपासकोंके लिये ही सब साधन उपकारी हैं। केवल पृथक् प्रथक् प्रकारके अधिकारीके लिये ये पृथक् पृथक् योग-साधन-मार्ग बताये

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२४ श्रीगुरुगीता।।

नामरूपात्मिका सृष्टिर्यस्मात्तदवलम्बनाद्। बन्धनान्मुच्यमानोऽयं मुक्तिमाप्नोति साधक:॥ ८७॥ तामेव भूमिमालम्व्य स्खलनं यत्र जायते। उत्तिष्ठति जनस्सर्वोऽध्यक्षेणैतत्समीक्ष्यते॥ ८८॥ नामरूपात्मकर्भावैर्वध्यन्ते निखिला जनाः । अविद्याकलिताश्चैव तादृकूपकतिवैभवाद् । ८९॥

यो योगः साध्यते सोऽयं मन्त्रयोगः प्रकीर्त्तितः । शणाऽपाननादविन्दुजीवात्मपरमात्मनाम् ॥ ९१॥ मेलनाद्घटते यस्मात्तस्माद्वै घट उच्यते। आमकुम्भमिवाऽम्भःस्थं जीयर्यमाणं सदा घटम् ॥ ९२।। योगानलेन संदह्य घटशुद्धिं समाचरेत। प्रकारसे चार प्रकारका योग वर्णन किया है॥ ८६॥सृष्टि नाम- रूपात्मक होनेके कारण नाम रूपके अवलम्बनसेही साधक सृष्टिके बन्धनसे अतीत होकर मुक्तिपद प्राप्त कर सक्ता है।। ८9।। जहां मनुष्य गिरता है उसी भूमिके अवलस्चन से पुनःउठ सक्ता है।।८८। नाम-रूपत्मक विषय जीवको बन्धन-युक्त करते हैं, नाम-रूपात्मक प्रकृति-वैभव जीवको अविद्यासे ग्स करे रहते हैं॥ ८६॥ सुतरां अपनी अपनी सूक्षम प्रकृति और प्रवृत्ति की गतिके अनुसार नाममय शब्द और भावमय रूपके अवलबनसे जो योगसाधन किया जाय उसको मन्त्रयोग कहते हैं। प्राण अ्रपान, नाह बिन्दु और जीवात्मा परमात्माके संयोगसे बनता है इस कारण उसे घट कहते हैं। जलमें स्थित कच्चे घड़ेके समान नाश होते हुए घटको सदा योगरूपी अग्निसे पकाकर घटशुद्धि करनी चाहिये। घटका योगके साथ गये हैं। श्रेष्ठ गुरुणा इन चारें परकारके यागसाधनक रहस्यको जानत हैं और जैमा शिष्य अधिकारी होता है वैसा ही उपदेश दिया करते हैं।

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श्रीगुरुगीता। २५

घटयागसमायोगाद्धठयोगः प्रकीर्तितः ॥९३।। मन्त्राद्धठेन सम्पाद्यो योगोऽयमिति वा मिये!। हठयोग इति प्ोक्तो हठाज्जीवशुभपदः ॥९४॥ हठयोगेन प्रथमं जीर्य्यमाणामिमां तनुम्। द्रढ़यन्सूक्ष्मदेहं वै कुर्य्याद्योगयुजं पुनः ॥९५॥ स्थूल: सूक्ष्मस्य देहो वै परिणामान्तरं यतः । कादिवर्णान्समभ्यस्य शास्त्रज्ञानं यथाक्रमम् ॥ ९६ ।। यथोपलभ्यते तद्वत्स्थूलदेहस्य साधनैः। योगेन मनसो योगो हठयोग: प्रकीर्तितः ॥ ९७।। ब्रह्माण्डपिण्डे सदृशे ब्रह्मपकृतिसम्भवात्।

ऋषिदेवाश्च पितरो नित्यं प्रकृतिपूरुषौ। तिष्ठान्ति पिण्डे ब्रह्माण्डे ग्रहनक्षत्रराशयः ॥ ९९ ॥ पिण्डज्ञानेन ब्रह्माण्डज्ञानं भवति नि्चितम्। गुरूपदेशतः पिण्डज्ञानमाप्त्वा यथायथम् ॥१०० ॥ सम्बन्ध होनेसे हठयोग कहा जाता है अथवा मन्त्रयोगकी अपेक्षा यह योग हठसे सम्पादन किया जाता है इसी कारण हे प्रिये! इसको हठयोग कहते हैं। यह शीघ्र जीव-कल्याणकारी है॥ ९०-६४ ॥ नाश होनेवाले इस शरीरको पहले हठयोगसे दढ करके फिर सूक्ष्म शरीरको योगयुक्त करे॥ ९५ ॥ स्थूल शरीर सूक्षम शरीरका परि- णाममात्र है। जैसे कादि वर्णोंका अभ्यास करके यथाक्रम शास्त्र- ज्ञान प्राप्त होता है उसी प्रकार स्थूलदेह के साधनोंसे सूक्षम शरीर- का जो योगसाधन है वही हठयोग है॥ ९६-९७॥ ब्रह्मशक्ति प्रकृति से उत्पन्न होनेके कारण ब्रह्माराड और पिएड समान हैं और समष्टि व्यष्टि सर्बन्धमें गुस्फित हैं॥ हम॥ ब्रह्माराडकी तरह पिरडमें भी ऋृषि, देवता, पितर, प्रकृति, पुरुष, ग्रह, नक्षत्रादि सब नित्य स्थित हैं॥ ९९॥ पिरडके ज्ञानसे ब्रह्माराडका ज्ञान अवश्यही हो जाता है।

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२६ श्रीगुरुगीता।

ततो निपुणया युक्त्या पुरुषे प्रकृतेर्लयः। लययोगाऽभिधेयः स्यात् कृतः शुद्धैर्महर्षिभिः ॥१०१ ॥ भवन्ति मन्त्रयोगस्य पोड़शाङ्गानि निश्चितम्। यथा सुधांशोर्जायन्ते कला: पोड़श शोभनाः ॥ १०२ ॥ भक्ति: शुद्धिश्चाSSसनश्च पञ्चाङ्गस्याऽपि सेवनम्। आचारधारणे दिव्यदेशसेवनमित्यपि॥ ०३ ॥। प्राणक्रिया तथा मुद्रा तर्प्पर्ण हवनं बलिः। यागो जपस्तथा ध्यानं समाधिश्चेति पोड़श ॥ १०४ ॥ पट्कर्माSSसनमुद्रा: प्रसाहारः प्राणसंयमश्चव। व्यानसमाधी सप्तैवाङ्गानि स्युर्हर्टस्य योगस्य ॥ १०५ ॥ अङ्गानि लययोगस्य नवैवेति बुधा विदुः । यमश्च नियमश्चैव स्थूलसूक्ष्मत्रिये तथा ॥ १०६ ॥ प्रत्याहारो धारणा च ध्यानश्चापि लयक्रिया। समाधिश्च नवाङ्गानि लययोगस्य निश्चितम् ॥ १०७॥ ध्यानं वै मन्त्रयोगस्याऽध्यात्मभावाद्विनिर्गतम् । परानन्दमये भावेऽतीन्द्रिये च विलक्षणे ॥ १०८ ॥ गुरु देशसे पिराडज्ञानका यथावत् प्राप्त करके तबर सुकौशल पूर्ण युक्तिसे पुरुषमें प्रकृतिका जो लय करता है उसको लययोग महर्षि लोग कहते हैं॥ १००-१०१॥ मन्त्रयोग सोलह अङ्गोंले सुशोभित है, जैसे चन्द्रमा सोलह कलाओंसे सुशोभित है॥ १०२ ॥ भक्ति, शुद्धि आसन, पञ्चाङ्गसेवन, आचार, धारण, दिव्यदेशलेवन, प्राणक्रिया, मुद्रा, तर्पण, हवन, बलि, याग, जप, ध्यान और समाधि, मन्त्रयोगके ये पोडश अङ्ग हैं॥ १०३-१०४॥ षट् कर्म्म, आसन, मुद्रा, प्रत्याहार, प्राणायाम, ध्यान और समाधि, ये सात हठयोगके अङ्क हैं॥ १०५॥ यम, नियम, स्थूलक्रिया, सूक्षमक्रिया, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, लय क्रिया और समाधि, ये नव लययोगके अ्ङ्ग हैं॥ १०६-१ ७॥ त्ध्या त्मभावसे ही मन्त्रयोगके ध्यानोंका आविर्माव हुआ है। गम्भीर,

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श्रीगुरुगीता। २७

भ्रमद्गिः साधकश्रेयोवाञ्छद्गिर्योगवित्तमैः। उपासनां पश्चविधां ज्ञात्वा साधकयोग्यताम् ॥१०९॥ मन्त्रध्यानं हि कथेतमध्यात्मस्याऽनुसारतः। वेदतन्त्रपुराणेषु मन्त्रशास्त्रपवर्त्तकैः ॥ ११० ॥ वर्णित श्रेयइच्छद्विर्मन्त्रयोगपरस्य वै। नां वै' बहुत्वेऽपि तत्योक्तं पश्चधैव हि॥ १११॥ भावमयत्वेन समाधिरधिगम्यते। मन्त्रयोगो हठश्चैव लययोगः पृथकू पृथक् ॥ ११२ ॥ स्थूलं ज्योतिस्तथा िन्दु ध्यानं तु त्रिविधं विदुः ! स्थूलं मूर्त्तिमयं प्रोक्तं ज्योतिस्तेजोमयं भवेत् ॥ ११३ ॥ बिन्दुं बिन्दुमयं ब्रह्म कुण्डली परदेवता। सृष्टिस्थितिविनाशानां हेतुता मनासि स्थिता ॥ ११४॥ तत्साहाय्यात्साध्यते यो राजयोग इति स्मृतः । मन्त्रे हठे लये चैव सिद्धिमासाद्य यत्नतः ॥ ११५॥ अतीन्द्रिय, नाना वैचित्र्यपूर्ण और परमानन्दमय भावराज्यमें भ्रमण करते हुए पञ्चोपासना के अधिकारानुसार विभिन्न सोधकोंके लिये विभिन्न प्रकार अध्यात्मसावपुज्जके आदर्शपर मन्त्रयोग-ध्योन विधि- बद्ध हुए हैं। आत्मतत्वचेत्ता महर्षियोंने मन्त्रयोगियोंके कल्याणार्थ वेद पुराण और तन्त्रोंमें अनेक रूपोका वर्णन किया है। वे सब ध्यान बहु होने पर भी पञ्चोपासनाके अनुसार पञ्च श्रेणी में घिभक्त हैं। सबध्यान ही अभ्रान्तभावमय होने के कारण समाधि देनेवाले हैं। मन्त्रयोग, हठयोग और लययोग, इनका पृथक् पृथक् क्रमशः स्थूलध्यान, ज्योतिध्यान और बिन्दुध्यान है। स्थूलध्यान सू्ततिमय है, ज्योति- ध्यान तेजोमय है और बिन्दुध्यान बिन्दुमय ब्रहम है। वहां कुल- कुराडलिनी परदेवता है। सृष्टि स्थिति और लयका कारण मनमें स्थित है उस मनकी सहायतासे जो योगसाधन किया जाय वह राजयोग कहाता है। मन्त्रयोग, हठयोग और लययोग इनमेंसे किसी

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२८ श्रीगुरुगीता।

पूर्णाडधिकारमाप्नोति राजयोगपरो नरः। समाधिर्मन्त्रयोगस्य महाभाव इतीरितः ॥ ११६ ।। हठस्य च महाबोधः समाधिस्तेन सिध्यति। पशस्तो लययोगस्य समाधिर्ि महालयः ॥ ११७ ॥ विचारबुद्धेः प्धान्यं राजयोगस्य साधने। ब्रह्मध्यानं हि तद्धचानं समाधिर्निर्विकल्पकः ॥ ११८॥ तेनोपलब्धसिद्धिर्हि जीवन्मुक्त: प्रकथ्यते। उपलब्धमहाभावा महावोधाऽन्विताश्च वा ॥ ११९॥ महालयं प्रपन्नाश्च तत्त्वज्ञानाऽवलम्वतः । योगिनो राजयागस्य भूमिमासादयन्ति ते ॥ १२० ॥ योगसाधनमूर्द्धन्यो राजयोगोऽभिधीयते ॥ १२१॥ श्रीमहादेव्युवाच। योगेश ! जगदाधार ! कतिधोपासना च के । तद्विधेर्भगवन् ! भेदा मुक्तिमार्गपदर्शिनः ॥ १२२॥ में भी यत्नपूर्वक सिद्धि (पूर्णता) प्राप्त करके राजयोग साधन करने वाला मनुष्य पूर्णाधिकारको प्राप्त होता है। मन्त्रयोग की समाधि महाभाव, हठयोगकी महाबोध और लययोगकी समाधि महालय नामसे अभिहित होती है॥ १०८-११७॥ राजयोगके साधन में विचारबुद्धिकी प्रधानता है और उसका ध्यान ब्रह्मध्यान कहाता है और निर्तिकल्प समाधि उसकी समाधि है। उस समाधिको प्राप्त होकर योगी जीवन्मुक्त कहाता है। महाभावको प्राप्त मन्न्रयोगी, महाबोधको प्राप्त हठयोगी, महालयको प्राप्त लययोगी, ये सब ही तत्वज्ञानके अवलम्बनले राजयोगकी भूमिको प्राप्त होते हैं। योग- साधनोंमें जो परम प्रधान है वह राजयोग नामसे अभिहित होता है॥ ११८-१२१ ॥ श्रीमह्दादेवी बोली। हे योगेश्वर ! जगदात्मन् ! उपासना कितने प्रकारकी होती है।

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श्रीगुरुगीता। २९

तस्याः के दिव्यदेशाश्र दिव्यभावेन भास्वराः। तत्सच्व कृपया नाथ !वदस्व वढतां वर !॥१२३ ॥ श्रीमहादेव उवाच। सगुणो निर्गुणश्चाऽपि द्विविधो भेद ईर्य्यते। उपासनाविधेदेवि ! सगुणोऽपि द्विधा मतः ॥ १२४॥ सकामोपासनायाइ्च भेदा यद्यपि नैकशः । परन्त्वनन्यभक्तारनां जनानां मुक्तिमिच्छताम् ॥ १२५॥ भेदत्रितयमेवैतद्रहस्यं देवि ! गोपितम् । वक्ष्ये गुप्तरहस्यं तद्गवतीं भाग्यशालिनीम् ॥ १२६ ॥ समाहितेन शान्तेन स्वान्तेनैवाSतधार्य्यताम्। पश्चानामपि देवानां ब्रह्मणो निर्गुणस्य च॥ १२७॥ लीलाविग्र हरूपाणाश्वेत्युपास्तिस्त्रिधा मता। विष्णुः सूर्य्यश्चशक्तिश्च गणाधीशश्च शङ्करः ॥ १२८ ॥ पश्चोपस्याः सदा देवि ! सगुणोपासनाविधौ। एते पञ्च महेशानि ! सगुणो भेद ईरितः ॥ १२९ ॥ मुक्ति-पथ-प्रदर्शक उपासनाविधिके भेद क्या क्या हैं और उपालनाके दिव्यदेश क्या क्या हैं सो वर्णन करके मुझे सफल-मनोरथ कीजिये ॥ १२२-१२३॥ श्री महादेव बोले। उपासनाके दो भेद हैं। यथा-निर्गुण उपासना और सगुण उपासना। सगुण उपालना दो प्रकारकी है॥ १२४ ॥ यद्यपि सकाम, उपासना के और भी अ्नेक भेद हैं परन्तु मुक्तिकी इच्छा रखने. वाले अनन्य भक्तके लिये केवल ये तीन ही भेद हैं। यह तुमसे मैं गुप्त रहस्य कह रहा हूँ। सावधान होकर सुनो। निर्गुण उपासना, सगुण पञ्चोपासमा और लीला-विग्रह-उपासना, इस प्रकारसे तीन भेद माने गये हैं। शिव, गणेश. शक्ति, सूर्य्य और विष्णु, ये पश्च उपास्य सगुण रूप पञ्च सगुणोपासनाके माने गये हैं। ये पाँचो

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३० श्रीगुरुगीता ।

सच्चिदानन्दरूपस्य ब्रह्मणो नाडत्र संशयः। निर्गुणोऽपि निराकारो व्यापक: स परात्परः ॥ १३०॥ साधकानां हि कल्याणं विधातुं वसुधातले। विभर्ति सगुण रूपं त्वत्साहाय्यात्पतिव्रते !॥ १३१॥ यथा गवां शरीरेषु व्याप्ं दुग्वं रसात्मकम्। परं पयोधरादेव केवलं क्षरते ध्रुवम् ॥ १३२॥ तथैव सर्व्वव्याप्तोऽपि देवो व्यापकभावतः। दिव्यषोड़शदेशेषु पूज्यते परमेश्वरः ॥ १३३ ॥ वह्नयम्बुलिङ्गकुड्यानि स्थण्डिलं पटमण्डले। विशिखं निययन्त्रश्च भावयन्त्रश्च विग्रहः ॥ १३४॥ पीठश्चाऽपि विभूतिश्च हन्मूर्द्धापि महेश्वरि !। एते पोड़श दिव्याश्च देशाः प्रोक्ता मयाऽनघे!॥ १३५॥ यद्यच्छरीरमाश्रित भगवान्सर्वशक्तिमान्।

सच्चिदानन्दमय ब्रह्मकेही सगुण भेद हैं यह निस्सन्देह है। परमात्मा निराकार निर्गुण और व्यापक होने पर भी साधकके कल्याणार्थ तुम्हारी सहायताले सगुणरूप धारण किया करते हैं॥ १२५-१३१॥ जिस प्रकार गायके सब शरीरमें रसरूपसे दुग्ध व्यात है परन्तु केवल स्तनके द्वारा ही वह निःसरण होता है; उसीप्रकार परमात्मा सर्वव्यापक होने परभी सोलह दिव्य देशों में पूजे जाते हैं॥१३२-१३३॥ वहि, अम्बु, लिङ्, स्थस्डिल, कुड्य, पट, मराडल, विशिख, नित्ययन्त्र, भावयन्त्र, पीठ, विग्रह, विभूति, नाभि, हृदय और मूर्द्धा, ये सोलह दिव्य देश कहाते हैं। इन सोलह दिव्य देशोंमें जैसा गुरूपदेश हो साधक परमात्माकी पूजा कर के मुक्तिपद लाभ करता है॥१३४-१३५॥ जिन अवतार शरीरोंको धार णकरके स्व्वशन्तिमान् भगवान् तुम्हारी * सनासनध्म्मावलम्वी मूर्ततिकी पूजा नहीं करते हैं परन्तु इनसोलह दिव्यदेशों में सर्व्वव्यापक परमात्माकी पूजा करते हैं। इन सोलह दिव्यदेशोंमेंसे मूर्ति एक दिव्यदेश है।

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श्रीगुरुगीता। ३१

वतीर्णो विविधा लीला विधाय वसुघातले॥ १३६ ॥ जगत्पालयते देवि ! लीलाविग्रह एव सः । उपासनाऽनुसारेण वेदशास्त्रेषु भूरिशः ॥। १३७ ।। लीलाविग्रहरूपाणामितिहासोऽपि लभ्यते। तदुपासनकञ्चाऽपि सगुणं परिकीर्तितम् । १३८।। विष्णोः सूर्य्यस्य शक्तेश्र गणेशस्य शिवस्य च। गीतासु गीता ये शब्दा विष्णुसूर्य्याियः मिये !॥ १३९॥ ब्रह्मणञ्चाद्वितीयिस्य साक्षात्त चापि वाचकाः। भक्तिस्तु त्रिविधा ज्ञेया वैधी रागात्मिका परा ॥ १४० ॥ देवे परोऽनुरागस्तु भक्ति: सम्पोच्यते बुधैः। विधिना या विनिर्णीता निषेधेन तथा पुनः।॥ ४१॥ साध्यमाना च या धीरैः सा वैधी भक्तिरुच्यते। ययाऽडस्वाद्य रसान्भक्तेर्भावे मज्जति साधकः ॥१४२ ॥ रागात्मिका सा कथता भक्तियोगविशारदैः। . पराSडनन्दपदा भक्ति: पराभक्तिर्मता बुधैः ॥१४३॥ सहायतासे नाना लीला करके संसार की रक्षा करते हैं वे रूपही लीला- विग्रह कहाते हैं। पञ्चोपासनाके अनुसार वेद और शास्त्रोंमें अनेक लीला-विग्रह धारणक इतिहास पाये जाते हैं उनकी उपासना भी सगुण उपासना कही जाती है॥ १३३-१३८॥ शिवगीता ( शम्भुगीता) गणेशगीता (धीशगीता ) देवीगीता (शक्तिगीता) सूर्य्यगीता और विष्युगीताके प्रतिपाद्य शिव, गरोश, देवी, सूर्थ्य और विष्यु, ये सब एक ही अद्वितीय परब्रह्मके ही वाचक हैं। भक्तिके तीन भेद हैं, यथा-वैधी भक्ति, रागात्मिका भक्ति और पराभक्ति। अपने इष्टदेवमें ऐकान्तिक अनुरागको धीर पुरुष भक्ति कहते हैं। विधिनिषेध द्वारा निर्णीत और साध्यमान भक्तिको वैधी कहते हैं! भक्तिरसका आस्वादन कराकर साधकको भावविशेषमें निमझ् करानेवाली भक्ति रागात्मिका कही जाती है। परमानन्दप्रदा भक्ति

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३२ श्रीगुरुगीता।

या प्राप्यते समाधिस्थैर्योगिभिर्योगपारगैः । त्रैगुण्यभेदात्रिविधा भक्ता वै परिकीर्तिताः ॥ १४४ ॥ आर्त्तो जिज्ञासुरार्थार्थी तथा त्रिगुणतः परः! पराभक्त्यधिकारी यो ज्ञानिभक्तः स तुर्यकः ॥१४५ ॥ उपासका: स्युस्तिविधास्त्रिगुणस्याऽनुसारतः । ब्रह्मोपासक एवाऽता श्रेष्ठः प्रोक्तो मनीषििः ॥ १४६॥ पथमा सगुणोपास्तिरवताराऽर्च्चनाइच याः। विहिता ब्रह्मबुद्धया चेदत्रैवाऽन्तर्भवन्ति ताः ॥१४9 ॥ सकामबुद्धया विहितं देवर्पिपितृपूजनम्। मध्यम मध्यमा ज्ञेयास्तत्कर्त्तारस्तथा पुनः ॥ १४८ ॥ अधमा वै समाख्याताः क्षुद्रशक्तिसमर्चकाः । प्रेताद्युपासकाश्चव विज्ञेया ह्यथमाऽयमाः॥१४९॥ सर्व्घोपासनहीनास्तु पशवः परिकीर्ततिता:। ब्रह्मोपासनमेवाडत्र मुख्यं परममङ्गलम् ॥ १५० ॥

परामक्ति कहाती है जो योगमें कुशल योगिगणको समाधिदशामें प्राप्त होती है। भक्त त्रिगुणभेदले त्रिविध होते हैं, यथा-आर्त्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और चतुर्थ ज्ञानी जो त्रिगुणातीत है। ज्ञानी भक्त ही पराभक्तिका अधिकारी हो सक्ता है॥ १३६-१४५ ॥ त्रिगुणभेदसे उपासक तीन प्रकारके होते हैं । ब्रह्मोपासक सबमें श्रेष्ट है ऐसा विद्वदुगरने कहा है। १४६॥ ब्रह्म बुद्धि से प्रथम सगुणोपासक अर्थात् पञ्चदेवोपासक और ब्रह्मबुद्धिसे द्वितीय सगुणोपासक अर्थात् श्व- तारोपासक इसी श्रेष्ट श्रेणीमें हैं ॥१४७॥ सकाम बुद्धिसे ऋयृषि देवता और पितरोंकी उपासना करनेवाले द्वितीय श्रेणी (मध्यम श्रेसो) के हैं और चुद्र शक्तियोंकी उपासना करनेवाले तृतीय श्रेणी (अधम श्रेणी) के हैं। उपदेवता प्रेतादिककी उपासना इसी निम्न श्रेणी (अधमाधम श्रेणी) की समझी जाती है। जो किसी उपासनाको नहीं करते हैं वे पशु हैं। प्रथम श्रेणीकी उपासना अर्थात् ब्रह्मोपांसना

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श्रीगुरुगीता। ३३

निःश्रेयसकरं ज्ञेयं सर्व्वश्रेष्ठं शुभावहम् ॥ १५१॥ श्रीमहादेव्युवाच। यथा मे गुरुमाहात्म्यं सम्यगूज्ञातं भवेत्पभो !। तथा विस्तरतो नाथ ! तन्माहात्म्यमुदाहर ॥ १५२॥ सद्गुरोमहिमा देव ! सम्यगज्ञातः श्रुतो भुवि। अज्ञानतमसाऽडच्छन्नं मनोमलमपोहति ॥ १५३ ॥ श्रीमहादेव उचाच। गुरुर्व्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ १५४॥ अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्। तत्पर्द दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १५५ ॥ अज्ञानतिमिराऽन्धस्य ज्ञानाअनशलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः १५६ ॥

ही परम कल्याणप्रद और निःश्रेयसकर होनेके कारण सर्व्वश्रेष्ठ जानने योग्य है॥ १४८-१५१ ॥ श्रीमहादेवी बोली। हे नाथ ! गुरुदेवकी महिमा जिससे मैं भली प्रकारसे समझ सकं, इस कारण गुरुदेवकी विस्तृत महिमा वर्णन करके मुझे कृतार्थ करें॥ १५२-१५३ ॥ श्रीमहादेव बोले। गुरु ही त्रह्मा, गुरु ही विष्यु, गुरु ही शिव और गुरु ही परब्रह्म हैं,ऐसे श्रीगुरुदेवको नमस्कार है। जो अखराड मराडलरूप इस स्थावर अङ्गमात्मक संसारमें व्याप्त हो रहे हैं उन परमात्माके परम पदका दर्शन जो कराते हैं; ऐसे श्रीगुरुदेवको नमस्कार है। जिन्होंने ज्ञान- रूप अख्जनकी शलाका द्वारा अज्ञानरूप अन्धकारसे अन्धे जीवके नेयंको खोल दिया है ऐसे श्रीगुरदेवको नमस्कार है॥ १५४-१५६ ॥

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३४ श्रीगुरुगीता।

स्थावरं जङ्गमं व्यापं यत्किञ्चित्स चराऽचरम । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १५७॥ चिन्मयं व्याप्नुवन्सव्व त्रैलोक्यं सचराचरम्। तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १५८ ॥

वेदान्ताऽम्बुजसूर्य्यो यस्तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १५९॥ चेतनः शाशवतः शान्तो व्योमाऽतीनो निरञ्नः । बिन्दुनादकलातीतस्तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥१६० ॥ ज्ञानशक्तिसमारूढ़स्तत्त्वमालाविभूषितः । भुक्तिमुक्तिमदाता च तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १६१ ॥ अनेकजन्मसंगाप्तकर्म्मबन्धविदाहिने। आत्मज्ञानप्रदानेन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १६२ ॥ शोषणं भवसिन्धोश्च ज्ञापनं सारसम्पदः । आकाशके सहित जड़ और चेतन जो कुछ पदार्थ हैं उनमें जो परमा- त्मा व्याप्त होरहे हैं उनके चरणकमलोंका दर्शन जिनके द्वारा मिला है, ऐसे श्रीगुरुदेवको नमस्कार है॥ १५७॥ जो स्थावर जङ्गमात्मक त्रिलोकमें व्याप्त होरहे हैं और जो शुद्धज्ञानमय हैं ऐसे परमात्माके चरणकमलोंका दर्शन जिनके द्वारा हुआ है उन श्रीगुमृदेवको नमस्कार है। १५८॥ जिनके चरणकमल-युगल समस्त श्रुतियोंके शिरोम णिरुपसे विराजित हैं, जो वेदान्तरूप अमल कमलके चिकसित करनेमें कमलपति सूर्य्य हैं ऐसे श्रीगुरुदेवको नमस्कार है॥:५९॥जो पुरुष चैतन्यरूप, नित्य, शान्त, आकाशसे भी परे और निरसन हैं, जो प्रणंव ज्योति और कलासे अतीत हैं ऐसे श्रीगुरुदेवको नमस्कार है ॥१६०॥ जो ज्ञान-शक्तिकी पूर्णताको पहुँचे हुए हैं और तत्त्वरूप माला से विभूषित हैं और भोग और मोक्ष प्रदान करनेमें समर्थ हैं, ऐसे श्रीगुरुदेवको नमस्कार है॥ ६१॥ जो आत्मज्ञानदान द्वारा बहु जन्म जन्मान्तरके कर्म्मरूप बन्धनको दग्ध किया करते हैं ऐसे श्री गुरुदेवको नमस्कार है॥ १६२॥ जिनके पादोदक पान करनेसे पूर्ण-

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श्रीगुरुगीता। ३५

गुरोः पादोदकं सम्यक् तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ६३॥ * न गुरोरधिकं तत्त्वं न गुरोरधिकं तपः। तत्त्वज्ञानात्परं नाऽस्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥१६४॥ मन्नाथः श्रीजगन्नाथो मद्गुरु: श्रीजगद्गुरुः। मदात्मा सर्वभूतात्मा तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १६५ ॥ X गुरुरादिरनादिश्च गुरुः परमदैवतम। गुरोः परतरं नाडस्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १६६ ॥ ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरो: पदम् । रूपेण भवसमुद्र सूख जाता है और त्वज्ञानरूप सारवान् सम्पत्तिकी प्राप्ति हो जाती है ऐसे श्रीगुरुदेवको नमस्कार है॥१६३॥ तत्व अर्थात् ब्रह्मश्ञान श्रीगुरुसे अधिक नहीं हैं, तपस्या भी श्रीगुरुसे अधिक नहीं है और जिस गुरुतत्वज्ञानले अधिक और इस संसास्में कुछमी नहीं है ऐसे श्रीगुरुदेवको नमस्कार है॥१:४॥ मेरे नाथ ही जगत्के श्रीनाथ ईश्वर हैं, मेरे श्रीगुरु ही जगद्गुरु हैं, मेरा आत्मा ही जगत्के सब प्राणियोंका आत्मा है, सो ऐसे श्रीगुरुदेवको नमस्कार है॥ १६५॥ गुरु ही सबके आदि हैं, उनसे आदि कोई भी नहीं है, गुरुही देवदा- ओंके देवता हैं, गुरुले श्रेष्ट कोई भी नहीं है, ऐसे श्रीगुरुदेवको नमस्कार है॥ १६६॥ गुरु-मूर्ति ध्यान ही सब ध्यानोंका मूल है, * विना गुरुके ज्ञानकी प्राप्ति होही नहीं, सक्ती, विना तथ्वज्ञानके भगवद्भक्ति, भगव- दशंन और मुक्ति पाप्त होना दुर्ल्लभ है; इस कारग श्रीगुरुदेव ही भगवदर्शन और भगवत्माप्तिरूप मुक्ति माप्त करनिके कारए हैं। जब देहधारी गुरु-मूर्लिमें लोकनाथ श्रीभगवान् आ्रविर्भत होकर शिष्यकी शक्तिके अनुसार उपदेश दान द्वारा उसका कल्याणा किया करते हैं, तब गुरुफी और श्रीभगवान्की एकता स्थापन हुई, इसमें कोई भी सन्देह नहीं। श्रीगुरुदेव ही मुक्तिदाता हैं, भ्रीगुरु महाराज ही मूर्तिमान् ब्रह्ा हैं, यही वेदका सिद्धान्त है। -जब श्रीगुरु द्वारा ही ब्रह्मज्ञान और साधन तप आ्ादिकी माप्ति होती है तब गुरु ही सबसे अधिक हुए, श्रीगुरुदेवसे अधिक इस संसारमें कुछ भी नहीं हो सक्ता। x जगद्गुरु ईश्वर ही गुरु हैं। गुरु एक पद्धितीय हैं; अर्थात वह एकमात्र जगद्गुरु ही जगतके समस्त जिज्ञासुगसके उपदेश दाता हैं। वह अ्रद्धितीय परम ज्ञानमय परमात्मा समानरूपसे सब भूनों में व्यापित हैं।

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३६ श्रीगुरुगीता।

मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ॥ १६७ ॥

गुरोरङ्गिपयोविन्दुसहस्त्रांशेन दुर्लभम् ॥ १६८ ॥ गुरुरेव जगत्सव्व ब्रह्मविष्णुिवात्मकम्। गुरोः परतरं नाऽस्ति तस्मात् सम्पूजयेद्गुरुम् ॥ १६९. ॥ ज्ञानं विना मुक्तिपद लभते गुरुभक्तितः । गुरोः परतरं नाडस्ति व्येयोऽसौ गुरुमार्गिणा॥१७०॥ गुरो: कृपापसादेन ब्रह्मविष्णुसदाशिवाः। सृष्ट्यादिकसमर्थास्ते केवलं गुरुसेवया ॥ १७१ ॥ देवकिन्नरगन्धर्व्वाः पितरो यक्षचारणा:। मुनयोऽपि न जानन्ति गुरुशुश्रूषणाविधिम् ॥ १७२॥। * गुरुके श्री चरणकमलकी पूजा ही सब पूजाओंका मूल है, गुरुधाक्य ही सब मन्त्रोंका मूल है और गुरुकी कृपाही मुक्ति प्राप्त करनेका प्रधान कारणा है ॥१६७॥ सप्त समुद्र पर्य्यन्त तीर्थोंमें स्नान करनेसे जो फल लाभ होता है, गुरुके चरणकमलोंके एक बिन्दु चरणामृत पान करनेसे उसले अधिक फल होता है, इस कारण गुरुपादपद्म जल सहस्र-अंशेन पवित्र और दुर्ल्लभ है। १६८॥ गुरुही ब्रह्मा, विष्यु और शिव, इन त्रिदेवरूपोसे समस्त विश्वमें व्यापित हैं, गुरु्की अपेक्षा और कोई श्रेष्ठ नहीं है इस कारण गुरुकी पूजा करना सदा उचित है॥१६६॥ गुरुके प्रति भक्ति करनेसे ज्ञानके विना भी मुक्तिपद लाभ होसका है। श्रीगुरुदेवसे परे और कुछ भी नहीं है. इस करिरा गुरुपथावलस्व्री साधकगपको ऐसे गुरुदेवका ध्यान करना उचित है।७०॥। ब्रह्मा, विष्णु और शिव ये तीनों देवता केवल एकमात्र श्रीगुरुदेवकी कृपासे ही और गुरुसेवाके फलसे ही सृष्टि, पालन और प्रलय क्रिया करनेमें समर्थ हुए हैं॥१७१॥ देवतागण, किन्नर गण, गन्धर्व्वगण, पितृगण, यक्षगरा, चारणगण और मुनिगण कोई * श्रीगुरुदेव जब सबसे बड़े हैं तब उनकी सेवा कौन करनेमें समर्थ हो सक्ता है। अरथाव गुरुसेवा अतिशय कठिन है।

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श्रीगुरुगीता। ३७

न मुक्ता देवगन्धर्व्वाः पितरो यक्षकिन्नराः । ऋषयः स्व्वसिष्धाश्च गुरुसेवापराङ्मुखाः ॥१७३॥ श्रुतिस्मृतिमीिज्ञाय केवलं गुरुसेवया। ते वै संन्यासिन: परोक्ता इतरे वेषधारिणः ॥ १७४॥ गुरोः कृपापसादेन आत्मारामो हि लभ्यते। अनेन गुरुमार्गेण आत्मज्ञानं प्रवर्तते ॥ १७५ ॥ * सर्च्वपापविशुदधात्मा श्रीगुरोः पादसेवनात्। सव्वतीर्थावगाहस्य फलं प्राप्नोति निश्चितम् ॥ १७६ ॥ यज्ञत्रततपोदानजपतीर्थाऽनुसेवनम्। गुरुतन्तमविज्ञाय निष्फलं नाऽन संशयः ॥१७७॥ मन्त्रराजमिद देवि ! गुरुरित्यक्षरद्यम् । भी गुरुसेवाकी विधि नहीं जानते ॥१७२॥देवगण, गन्धर्व्वगण, पितू- गण, यक्षगण, किन्नरगण, ऋषिगण और सब सिद्धगणके बीचमें जो कोई गुरुसेवापराङ्मुख हो सो कदापि मुक्रि-लाभ करनेमें लमर्थ न होगा ॥१७३॥। जो वेद और स्मृति आदि शास्त्र न पढ़कर और केवल गुरुसेवा द्वारा काल व्यतीत करते हैं वे भी संन्यासी कहाते हैं और जो लोग संन्यासी होकर गुरुसेवा नहीं करते वे केवल वेषधारी मात्र है॥१७४॥ केवल गुरुकृपा के चलसे ही आत्माराम पद लाभ होता है, गुरुपथ अवलम्बन द्वारा ही आत्मज्ञान उदय होता है॥१७५॥ श्रीगुरु देवकी चरण सेवा करने पर जीवात्मा सब पापोसे मुक्त और पवित्र होजाता है और सब तीर्थोंमें स्नान करनेसे जितना फल होता है उसको उतना फल लाभ होता है इसमें कोई सन्देह नहीं ॥ १७६॥ गुरुतत्व न जानकर जो यज्ञ, व्रत, तपस्या, दान, जप और तीर्थ- स्नान आदि कार्य्य करते हैं वह सब निष्फल होता है इसमें कोई भी सन्देह नहीं॥ १७७ ॥ हे देवि! "गुरु" यह दोनों भक्षर सब मन्त्रों- *इसमें कोई सन्देह नहीं कि जगद्गुरु क्ीभगवान्की कृपासे ही जीवगण आ्त्मा- रामरूप मुक्तिरद प्राप्त करते हैं; और इसमें भी सन्देहमात्र नहीं कि साप्तात भगतरद्- रूप भीगुरुदेवकी सेत्रामें युक्त होकर उनके उपदेश किये हुए पथ पर जो चलता है वही आत्मज्ञान लाभ करसक्ता है.।

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३८ श्रीगुरुगीता।

श्रुतिवेदान्तवाक्येन गुरु: साक्षात्परं पदम् ॥ १७८ ॥। गुरुर्देवो गुरुर्धर्म्मो गुरुनिष्ठा परं तपः । गुरोः परतरं नास्ति नास्ति तत्वं गुरो: परम्॥ १७९ ॥ धन्यां माता पिता धन्यो धन्यो वंशः कुलं तथा। धन्या चं वसुधा देवि ! गुरुभक्ति: सुदुर्लभा ॥ १८० ॥ शरीरमिन्द्रियपाणा अर्थस्वजनवान्धवाः । माता पिता कुलं देवि ! गुरुरेव न संशयः ॥ १८१॥ आजन्मकोख्यां देवेशि ! जपत्रततपःक्रियाः । एतत्सव्वं समं देवि ! गुरुसन्तोषमात्रतः ॥ १८२ ॥। विद्याधनमदेनैव मन्दभाग्याश्च ये नराः । गुरो: सेवां न कुर्ध्वन्ति सत्यं ससं वदाम्यहम् ॥ १८३॥ गुरुसेवापरं तीर्थमन्यत्तीर्थमनर्थकम् ।

से श्रेष्ठ हैं। श्रुति और वेदान्तवाक्य द्वारा यही निश्चय कियागया है कि गुरु ही साक्षात् परमपद है। अर्थात् श्रीगुरुदेव ही ब्रह्मरूप हैं ॥१७८। गुरु ही देवतारूप, गुरुही धर्म्मरूप और गुरुमे निष्ठा ही परम तपस्यारूप है इस कारण गुरु की अपेक्षा श्रेष्ठ वस्तु और श्रेष्ठ तत्व और कुछ भी नहीं है॥१७२॥ हे देवि!गुरुमक्ति दुर्लभ है जिसके हृदयमें वह भक्ति उदय हुआ करती है उसकी माता धन्य है, पिता धन्य है, उसका वंश और कुल धन्य है और वह जिस पृथिचीमें वास करता है वह पृथिवी भी धन्य है॥ १८० ॥ हे देघि ! शरीर, इन्द्रिय, प्राण, अर्थ, अपने स्वजन, सुहत्, माता, पिता और कुल यह सब ही गुरुस्वरूप हैं इसमें फोई भी सन्देह नहीं॥ १८१॥ हे देवेशि! कोटि कोटि जन्म में जो जप, व्रत, तपस्या और सत्क्रिया का अनुष्ठान किया जाता है, एकमात्र श्रीगुरुदेवकी सन्तुष्टता हीसे उन सबके समान फल लाभ हुआ करता है॥ १८२॥ जो मनुष्यगण विद्या और धन आदि के अहंकार से गुरुसेवा नहीं करते मैं सत्य सत्य ही कहता कि उनका भाग्य मण्द है॥ १८३॥ हे देवि ! गुरुसेवा ही सफल

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श्रीगुरुगीता। ३९

सर्च्वतीर्थाश्रयं देवि ! सद्गुरोश्चरणाम्बुजम् ॥ १८४॥* गुरुध्यानं महापुण्यं भुक्तिमुक्तिमदायकम्। वक्ष्यामि तव देवेशि ! शृणुष्व कमलानने!॥१८५ ॥ पातः शिरास शुलाब्जे द्विनेंत्रं द्विभजं गुरुम। वराऽभयकरं शान्तं स्मरेत्तन्नामपूर्व्वकम् १८६॥। वामोरुशक्तिसाहितं का रुण्येनाऽवलोकितम्। मियया सव्यहस्तेन घृतचारुकलेवरम् ॥ १८७॥ वामेनोत्पलधारिण्या रक्ताऽडभरणभूपया। ज्ञानाSSनन्दसमायुक्तं स्मरेत्तन्नामपूर्व्वकमू ॥ १८८ ॥ अखण्डमण्डलाSSकारं व्यापं येन चराचरम्। तीर्थोंकी अपेक्षा प्रधान तीर्थ है, गुरुके सम्मुख और तीर्थ वृथा हैं, सद्गुरुके पादपद्म ही और तीर्थोंके अवलम्बन हैं॥१८४॥ हे कमला- नने ! हे सुरेश्वरि ! मैं तुम्हारे निकट गुरु-ध्यान कहता हूँ श्रवण करो। इस गुरु-ध्यानसे महापुराय लोभ होता है और एकाधार में यह भोग और मुक्ति प्रदान किया करता है॥ १८५ ॥ वे मस्तकस्थि- त सहस्रदलकमल पर विराजित हैं, उनके दो नेत्र और दो बाहु हैं और जो अपने दो हार्थोमेंसे एकमें वर और दूसरेमें अभयको धारण कर रहे हैं; ऐसे प्रशान्तमूर्ति गुरुदेवका नामोश्चारणपूर्वक प्रातःकालमें स्मरण करना उचित है॥ १८६ ॥ वे दयापूर्ण दष्टिसे समस्त संसारको देष रहे हैं; उनके वाम उरु पर उनकी शक्ति देवी विराजित हैं, जो देवी रक्त अलंकारसे भूषित हैं, जिनके वाम हस्तमें कमलपुष्प है और जो अपने दक्षिण हस्तले निजपतिके चारु कले चरको धारण कर रही है; इस प्रकारके ज्ञानानन्द पूर्ण गुरुदेवको चिग्तन करना उचित है । १८७-१८८। संख्या १८६ श्लोकसे *धम्म के साधन में श्रीगुरुदेव ही कारण हैं,इस कारण उनकी सेवा से स्व्वोत्तप फल की प्राप्ति हुआ करती है। तीर्थादि धम्म जगदमें अद्भुत और तुरन्त फलके दाता हैं, परन्तु जब धम्मसाधनमें श्रीगुरुदेव ही कारणा हैं तो उनकी सेत्रा से जो फल की प्राप्ति हुआर करती है उसके समान तीर्थसेवन का फल कदापि नहीं होसक्ता और इसी कारयासे गुरुचरणोंकी मक्ति बिना कोई तीर्थ भी फलदान में समर्थ नहीं होते।

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४० श्रीगुरुगीता। तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १८९॥ नमोऽस्तु गुरवे तस्मै इष्टदेवस्वरूपिणे। यस्य वाक्याऽमृत हन्ति विषं संसारसंजञिनम् ॥१९० ॥ श्रीमहादेव्युवाच। मदेकहृदयाSडनन्द! जगदात्मन ! महेश्वर !। उपास्यस्य रहस्यं मे माहात्म्यश्चापि सद्गुरोः ॥ १९१॥ वर्णितं यच्वया नाथ ! कृतकृत्याऽस्मि साम्पतम् । भूयोऽपि श्रातुमिच्छामि त्वन्मुखाज्जगदीश्वर !॥ १९२॥ परतत्त्वैकरूपस्य तत्त्वाSतीतपराSSत्मनः। समासेन स्वरूपं मे वर्णयित्वा कृपां कुरु ॥ १९३॥ श्रीमहादेव उवाच। स एक एव सदूपः सत्योऽद्वैतः परात्परः । स्वपकाशः सदा पूर्णः सच्चिदानन्दलक्षणः ॥ १९४॥ निर्व्धिकारो निराधारो निर्विशेषो निराकुलः । लेकर ६८८ तकमें जिस प्रकारका ध्यान वर्सित है उस रीतिपर श्रीगुरुदेवका ध्यान करना उचित है; तत्पश्चात् मानस उपचार द्वारा गुरुपूजा करके पुनः उपयर्युक्त श्लोक-द्वय द्वारा श्रीगुरुदेवको प्रणाम करना उचित है। इन दोनों श्लोकोंमेंसे पू्का अरथ होचुका है, इसकारण पुनरुक्ति नहीं कीगई दुसरेका अर्थ यह है, इष्टदेव स्वरूप उन श्रीगुरुदेवको नमस्कार है कि जिनका वाक्यामृत संसार- रूप विषको नाश करता है॥ ₹८९-१६० ॥ श्रीमहादेवी बोली। हे जगदात्मन्! हे महेश्वर ! हे मेरे हृदयनाथ! आपने जो इस समय गुरुदेवका माहात्म्य और उपास्यका रहस्य सब कुछ वर्णन किया जिस- से मैं कृतकृत्य हुई। अब जगदाधार तत्त्वातीत परमतत्वरपी परमा्मा का स्वरूप संक्षेपरूपसे वर्णन करके मुझे कृतार्थ की जिये॥१६१-१६३॥ श्रीमहादेव बोले। वह एक, अद्वितीय, सत्य, नित्य, परात्पर, स्वप्रकाश, सदापूर्ण औौर सचिदानन्दरूप है॥१६४॥ वह निर्तिकार, निराधार, निर्विशेष

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श्रीगुरुगीता। ४१

गुणातीतः सर्व्वसाक्षी सर्व्ात्मा सर्व्वदृग्विभुः ॥ १९५॥ गूढ़ः सर्व्चेषु भूतेषु सर्व्वव्यापी सनातनः। सव्वेन्द्रियगुणाभास: स्व्वेन्द्रियविवर्जितः ॥ १९६। लोकाऽतीतो लोकहेतुरवाडन्मनसगोचरः। स वेत्ति विश्वं सर्व्वज्ञस्तं न जानाति कश्चन ॥ १९७ ॥ तदधीनं जगत्स्व्व त्रैलोक्यं सचराऽचरम्। तदालम्बनतस्तिष्ठेदवितर्क्यभिदं जगत् ॥ १९८ ॥। तत्सत्यतामुपाडश्रित्य सद्वद्गाति पृथक् पृथक्। तेनैव हेतुभूतेन वयं जाता महेश्वरि ! ॥ १९९ ॥ कारणं सव्वभूतानां स एक: परमेश्वरः। लोकेषु सृष्टिकरणात्स्रष्टा ब्रह्मेति गीयते ॥ २०० ॥ विष्णुः पालयिता देवि ! संहर्त्ताऽहं तादिच्छया। इन्द्राSSदयो लोकपालाः सव्चे तद्वशवर्ततिनः ॥ २०१॥ स्वे स्व्ेऽधिकारे निरतास्ते शासति तदाज्या। निराकुल, गुणातीत, सवसाक्षी, सर्वात्मा, सर्वोको देखनेवाला और व्यापक है॥१९.५॥ वह सर्वव्यापी सनानन गूढभावसे सब जीवोंमें अवस्थित है, सम्पूर्ण इन्द्रिय-शक्रियोंका प्रकाशक होनेपर भी समस्त इन्द्रियोंसे रहित है ॥१९६। वह लोकका कारण होने पर भी लोकसे अतीत है और वह मन और वचन दोनों से परे है, वह सर्वज्ञ सबको जानता है परन्तु उसको कोई नहीं जानता॥ १९७॥ चराचरपूर्ण तैलोक्य उसके आधीन है उसीके अवलम्बनसे यह अवितर्क्य विस्तृत जगत् ठहरा हुआ है॥ १ह८॥ यह असत्य जगत् उसीकी सत्यता पाकर सत्यके ऐसा पृथक पृथक् शोभता है, हे महेश्वरि! उन्हींके द्वारा हमलोग उत्पन्न हुए हैं।। १९९ ॥ वही एक परमेश्वर सब प्राणियोंका कारण है, लोकमे सृष्टि करनेके कारण वह सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा कहा जाता है ॥२॥ हे देवि ! उसी की इच्छासे विष्यु पालन तथा मैं संहार करता हूं, इन्द्रादिक देवता सब उसी के चशवर्सी है। २०१॥ और उसकी आझ्ासे अपने अपने

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४२ श्रीगुरुगीता।

त्वं पुरा पकृतिस्तस्य पूज्याऽसि भुवनत्रये॥२०२ ॥ तेनाऽन्तर्यामिरूपेण तत्ताद्विषययोजिताः । स्वस्वकर्म्म मकुर्च्वन्ति न स्वतन्त्राः कदाचन ॥ २०३ ।। यद्रयाद्वाति वातोऽपि सूर्य्यस्तपति यद्धयात्। वर्षन्ति तोयदाः काले पुष्प्यन्ति तरवो वने ॥ २०४॥ कालं कलयते काले मृत्योर्मृत्युर्भियो भयम्। वेदान्तवेद्यो भगवान्यत्तच्छव्दोपलक्षितः ॥ २०५।। सव्चे देवाश्च देव्यश्च तन्मयाः सुरवन्दिते !। आब्रह्मस्तम्वपर्य्यन्तं तन्मयं सकलं जगद ॥ २०६ ॥ तस्मिस्तुष्टे जगनुष्टं प्रीणिते प्रीणितं जगव् । तदाराधनतो देवि ! सव्चेषां प्रीणनं भवेत् ॥ २०७ ॥ तरोर्मूलाऽभिषेकेण यथा तद्भुजपल्लवाः । तृप्यन्ति तद्नुष्ठानात्तथा स्व्वेऽमराद्यः ॥ २०८ ॥

अधिकारोमें रहकर जगत्का शासन करते हैं। तुम उसकी प्रधान प्रकृति हो इसलिये तीनों भुवनमें तुम पूज्य हो॥ २०२ ॥ हम उस अन्तर्य्यामीसे उन २ विषयोंमें नियोजित होकर अपने २ काय्योंको करते हैं कोई भी कभी स्वतन्त्र नहीं है। २०३॥ जिसके भयसे वायु चलती है, सूर्य्यं तपता है, मेघ वर्षते हैं और समयपर वृक्ष पुष्पित होते हैं, जो प्रलयकालमें कालको भी कवलित करजाता है और जो मृत्यु की मृत्यु एवं भयका भी भय है॥ २०४-२०५ ॥ जो वेदान्तवेद्य प्रभु यत् और तत् शब्द से उपलक्ित होता है हे देववन्दिते ! देवि ! सम्पूर्ण देव और देवीगण तथा ब्रह्मसे लेकर स्तम्यपर्यन्त समस्त जगत् तद्रूप है॥ २०६॥ उसके सन्तुष्ट होनेसे जगत् सन्तुष्ट और उसके तृप्त होनेसे जगत् तृप्त होता है; हे देवि! उसी की आराधना से सब तृप्त होते हैं ॥२०७॥ जैले वृक्षके मूलमें सिञ्चन करनेसे उसके शाखा पल्व सव तृप्त होते हैं उसी प्रकार सगवान्के अ्रनुष्ठानसे सब देवगण तृप्त और प्रसन्न होते हैं॥ २०८ ॥

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श्रीगुरुगीता। ४३

श्रीमहादेव्युवाच। संसाररोगहन्नाथ ! करुणावरुणाSडलय !। गुरोर्माहात्म्यपूर्णा या गुरोर्गीता सुवर्णिता॥२०९ ॥ तत्स्वाध्यायस्य माहात्म्यं फलन्नाऽपि विनिर्दिश। जीवमङ्गलमेतेन कृपातोऽतः कृपाऽर्णव !॥२१० ॥ सम्यगविविच्य संवर्ण्य विनोदय दयाणव !। त्वहते को हि देवेश ! शिक्षां मेऽन्यो विधास्यति ॥२११॥ श्रीमहादेव उवाच। इदं तु भक्तिभावेन पठ्यते श्रयतेऽथवा। लिखित्वा वा पदीयेत स्त्वकामफलप्रदम् ॥ २१२॥ गुरुगीताऽभिधं देवि ! शुद्ध तत्त्वं मयोदितम्। भवव्याधिविनाशार्थ स्वयमेव सदा जपेत् ॥ २१३ ॥। गुरुगीताSक्षरैकैकं मन्त्रराजमिद मिये!। अनेन विविधा मन्त्राः कलां नार्हन्ति पोड़शीम्॥ २१४॥ श्रीमहादेवी वोली। हे कृपानिधे! संसार-दुःखके मेटनेवाले ! गुरुमाहात्म्यपूर्ण गुरुगीताका जो आपने वर्णन किया, इसके पाठका क्या माहात्म्य है सो कृपापूर्वक जीवोंके कल्याणार्थ वर्णन करके सुझे सुखी करिये। हे देवेश ! आपके बिना और कौन मुझे शिक्षा देगा॥ २०६-२११॥ श्रीमहादेव बोले। इस गुरुगीता को भक्तिपूर्वक पाठ, श्रवण अथवा लिखकर दान करनेसे सकल प्रकारकी वासना पूर्ण होती है। २१२ ॥ हे देवि ! संसाररूप रोगसे मुक्त होनेके निमित्त इस गुरुगीता नामक पवित्र तत्वको मैंने प्रकट किया है। शिष्यगणको उचित है कि वे स्वयं इसको सर्वदा पाठ करें।। २१३ ॥ हे प्रिये ! इस गुरुगीताका एक एक अक्षर एक एक प्रधान मन्त्ररूप है; इसके सिवाय और और मन्त्र-समूह इसके पोडश अंशके तुल्य भी नहीं हैं।। २१४।।

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४४ श्रीगुरुगीता।

सर्व्वपापहरं स्तोत्रं सर्वदारिद्रयनाशनम्। अकालमृत्युहरणं सव्वसंकटनाशनम् ॥ २१५ ॥ यक्षराक्षसभूतानां चौरव्याघ्रभयाऽपहम्। महाव्याविहरश्रव विभूतिसिद्धिदं ध्रुवम् ॥ २१६ ॥ मोहनं सर्व्वभूतानां परं बन्धनमोचनम्। देवभूतप्ियकरं लोकान्स्ववशमानयेव् ॥ २१७॥ मुखस्तम्भकरं नृणां सद्गुणानां विवर्द्धनम्। दुष्कर्म्मनाशनश्चैव सत्कर्म्मसिद्धिदं भवेत् ॥ २१८ ॥ भक्तिदं सिद्धयेत् कार्य्य नवग्रहभयाऽपहम्। दुःस्वप्ननाशनञ्चैव सत्कर्म्मसिद्धिदं भवेत् ॥ २१९ ॥ सर्व्चशान्तिकरं नित्यं वन्ध्यापुत्रफलपदम् ।

यह गुरुगीता सब प्रकारके पापोको नाश करती है, सकल प्रकारके दारिद्रयको दूर करती है, अकालमृत्यु निवारण करती है और सब विपदोंको नाश कर देती है। २११॥ इस गुरुगीताके पाठसे यक्ष, राक्षस, भूत, चौर और व्याघ्र आदिका भय नहीं रहता; इससे महाव्याधिका नाश और सस्पत्तियोंकी प्राप्ति हुआ करती है॥२१६॥ यह गुरुगीता सकल जीवोका मन सुग्ध करती है, संसारबन्धन से मुक्तिलाभ करनेका प्रधान उपाय है और देवता और राजागणको प्रसन्न करनेवाली है और जो मनुष्य इसको पाठ करता है वह सकल लोकोंको अपने वशमें करलेता है॥ २१७॥ यह गुरुगीता वादी मनुष्यगणकी वाकूशक्तिकी निरोधक, सारे सद्गुणोंकी वर्धक, पाप-कम्मोंकी विनाशक और धर्म्म कर्म्मकी फल-प्रदानकारक है।२१८।। इस भक्तिप्रद, नवग्रह-भयनिवारक गुरुगीताके पाठ करने- से अभिलषित कार्य्य सिद्ध होते हैं, इसके पाठ द्वारा दुःस्वोका दोष दूर और सत्कर्म्मका तुरन्त फल प्राप्त हुआ करता है॥ २१३॥ इस गुरुगीताके पाठ करनेसे स्व्वदा जीवगए विपद्से बच सक्ते हैं और इसके पाठ करनेसे वन्ध्या नारी पुत्रफल प्रसव करती है

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श्रीगुरुगीता। ४५

अवैधव्यकरं स्त्रीणां सौभाग्यदायकं परम् ॥ २२० ॥

निष्कामतस्त्रिवारं वा जपन्मोक्षमवाप्तुयात् ॥१२१॥ सर्वदुःखभयं विघ्नं नाशयेत्तापहारकम्। सर्व्ववाधापशमनं धर्माञर्थकाममोक्षदम् । २२२॥ यो यं चिन्तयते काम स तमाप्नोति निश्चितम्। कामिनां कामधेनुश्च कल्पितं च सुरदुमः ॥ २२३ ॥ चिन्तामणि चिन्तितस्य स्व्वमङ्गलकारकम्। जपेच्छाक्तश्र शैवश्च गाणपत्यश्च वैष्णवः ॥ २२४।। सौरश्च सिद्धिदं देवि ! धर्म्मर्थकाममोक्षदम्। संसारमलनाशार्ऽर्थ भवतापनिटनये ॥ २०५ ॥ और नारीगणकी वैधव्य-यन्त्रणा दूर होजाती है और वे परम सौभाग्यको प्राप्त होजाती हैं॥ २२० ॥ कामनाशून्य होकर इस गुरुगीताको थोड़ा भी पाठ करनेसे आयु, शारोग्य, ऐश्वर्य्य, पुत्र और पौत्र आदिकी वृद्धि होती है और वह पाठकर्त्ता अनायास- से ही मोक्ष पद प्राप्त करनेमें समर्थ होजाता है॥ २२१ ॥ इस सन्तापहारी गुरुगीताके पाठले सकल प्रकारका दुःख, भय और विघ्न नाश हो जाता है; लकल प्रकारकी विपदोंकी शान्ति होती है और धर्म्म, अर्थ, काम और मोक्षरूपी चतुर्वर्ग लाभ होता है। २२२ ॥ जो मनुष्य जिल प्रकारकी कामना करके इस गुरुगीता- का पाठ करता है, वह उसी फलको प्राप्त करता है इसमें कोई भी सन्देह नहीं। यह गुरुगीता कामीगणके लिये कामधेनु और कल्पित कल्पवृक्षरूप है; अर्थात् सकाम होकर पाठ करनेसे इसके द्वारा कामनाकी सिद्धि होती है और निष्काम होके पाठ करनेसे मुक्ति- पढकी प्राप्ति होती है॥। २२३॥ हे देवि !- यह गुरुगीता धर्स्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चतुर्वर्ग प्रदान करती है, यह चिन्तामणिरूप होकर चिन्तन किया हुआ अर्थ प्रदान करती है और सर्व प्रकारके मङगलोंका कारण है इस कारण क्या शाक्त, क्या वैष्णव, क्या

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४६ श्रीगुरुगीता।

गुरुगीताऽम्भस स्नानं तत्त्वज्ञः कुरुते सदा। योगयुञ्जानचित्तानां गीतेयं ज्ञानवरद्धिका ॥ २२६॥ त्रितापतापितानाक्च जीवानां परमौषधम्। संसाराSपारपाथोधौ मज्जतां तरणिः शुभा ॥ २२७॥ देशः शुद्धः स यत्राऽसौ गीता तिष्ठति दुर्लभा। तत्र देवगणा: सव्चे क्षेत्रपीठे वसन्ति हि॥ २२८ ॥ गुचिरेव सदा ज्ञानी गुरुगीताजपेन तु। तस्य दर्शनमात्रेण पुनर्जन्म न विद्यते ॥ २२९ ॥ सत्यं सत्यं पुनः सत्यं निजधर्म्मो मयोदितः । गुरुगीतासमो नाडस्ति सत्यं सत्यं वरानने !॥ २३०॥ इति श्रीगुरुगीता समाप्ता। शैव, क्या गाणपत्य और क्या सौरय्य, सब प्रकारके उपासकगण ही इसके पाठ द्वोरा सिद्धि प्राप्त करसक्ते हैं। तत्वज्ञानी मनुष्यगण संसार तापके विनाशार्थ और भव-दुःख-निवारणार्थ इस गुरुगीतारूप तरङ्गिणीमें सदा स्नान किया करते हैं। यह गीता योगाभ्यासनिरत व्यक्तियोंके लिये ज्ञानवर्द्धिनी है ॥ २२४-२२६ ॥ त्रितापतापित जीवों केलिये यह परम औषधरूपा है और संलार महासागरमें डूबने वालोंके लिये यह शुभ नौका है॥ २२७॥ यह सुदुर्लमा गुरुगीता जिस स्थानमें रहती है उस स्थानको परम पवित्र, सिद्ध-स्थान और पीठस्थानके तुल्य समभना उचित है; उस स्थानमें सकल देवतोगण आकर वास किया करते हैं। २२८॥ ज्ञानी मनुष्यगण गुरुगीताको पाठ करके सदा पवित्र रहते हैं, ऐसे पवित्र मनुष्योंके दर्शन करनेसे पुनः जन्म ग्रहण करना नहीं पड़ता है। २२६ ॥ हे चारुमुखि! मैं पुनः पुनः कहता हूं कि यह परमात्मरूप स्वधर्म्म जो मैंने तुम्हारे निकट वर्णन किया वह सत्य ही है; इस गुरुगीताके तुल्य और कोई भी पदार्थ नहीं है; यह वाक्य सत्य सत्य ही जानना ॥ २३०॥ इति श्रीगुरुगीता समाप्ता।

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शीविश्वनाथो जयति। धर्मप्रचारका सुलभ साधन। समाजकी भलाई ! मातृभाषाकी उन्नति !! देशसेवाका विराट् आयोजन !!!

इस समय देशका उपकार किन उपायोंसे हो सकता है? संसा- रके इस छोरसे उस छोरतक चाहे किसी चिन्ताशील पुरुषसे यह प्रश्न कीजिये, उत्तर यही मिलेगा कि धर्मभावके प्रचारसे ; क्योंकि धर्मने ही संसारको धारण कर रक्खा है। भारतवर्ष किसी समय संसारका गुरु था, आज वह अधःपतित और दीन हीन दशामें क्यों पच रहा है? इसका भी उत्तर यही है कि वह धर्मभावको खो बैठा है। यदि हम भारतसे ही पूछें कि तू अपनी उन्नतिके लिये हम- से क्या चाहता है ? तो वह यही उत्तर देगा कि मेरे प्यारे पुत्रो ! धर्मभाव की वृद्धि करो। संसारमें उत्पन्न होकर जो व्यक्ति कुछ भी सत्कार्य करनेके लिये उद्यत हुए हैं, उन्हें इस बातका पूर्ण अनु- भव होगा किऐसे कायों में कैसे विघन और कैसी बाधाएँ उपस्थित हुआ करती हैं। यदपि धीर पुरुष उनकी पर्वाह नहीं करते और यथालम्भव उनसे लाभ ही उठाते हैं, तथापि इसमें सन्देह नहीं कि उनके कायोंमें उन विघ्न बाधाओंसे कुछ रुकावट अवश्य ही हो जाती है। श्रीभारतधर्म महामरडलके धर्मकार्यमें इस प्रकार श्रनेक बाधाएँ होनेपर भी अब उसे जनसाधारणका हित साधन करनेका सर्वशक्तिमान भगवानने सुभवसर प्रदान कर दिया है। भरत अधार्मिक नहीं है, हिन्दुजाति धर्म्मप्राण जाति है, उसके रोम- रोम में धर्ममसंस्कार शतप्रोत हैं। केवल वह अपने रूपको-धर्म- आावको-भूल रही है। उले अपने स्वरूपकी पहिचान करा देना- धर्मभावकी स्थिर रखनाही श्रीभारतधर्ममहामराडलक्षा एक पवित्र और प्रधान उद्दश्य है। यह कार्य १8 वर्षों से महामराडल कर रहा है और ज्यों ज्यों उसको अधिक सुअवसर मिलेगा, त्यों त्ौ वह जोर शोर से यह काम करेगा। उसका विश्वास है कि इसी

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उपायसे देशका सच्चा उपकार होगा और अन्तर्मे भारत पुनः अपने गुरुत्वको प्राप्त कर सकेगा। इस उद्देश्य साधनके लिये सुलभ दो ही मार्ग हैं। (१) उपदे- श्कों द्वारा धर्मप्रचार करना और (२) धर्मरहस्य सम्बन्धी मौलिक पुस्तकोंका उद्धार और प्रकाश करना । महामराडलने प्रथम मार्गका अवलम्बन आरम्मसे ही किया है और अब तो उपदेशक महाविद्यालय स्थापित कर महामरडलने वह मार्ग स्थिर और परिष्कृत करलिया है। दूसरे मार्गके सम्बन्धमें भी यथायोग्य उद्योग आरम्भसे ही किया जा रहा है। विविध ग्रन्थोंका संग्रह और निर्माण करना, मासिक पत्रिकाओं का संश्चालन करना, शास्त्रीय ग्रन्थोंका ओविष्कार करना, इस प्रकारके उद्योग महामरडलने किये हैं और उनमें सफलता भी प्रात की है : परन्तु अभीतक यह कार्य संतोष- जनक नहीं हुआ है। महामएडलने अब इस विभाग को उन्नत करने का विचार किया है। उपदेशकों द्वारा जो धर्मप्रचार होता है उस- का प्रभाव चिरस्थायी होनेके लिये उसी विषयकी पुस्तकोंका प्रचार होना परम आवश्यक है; क्योंकि वक्ता एक दो वार जो कुछ सुना देगा, उसका मनन विना पुस्तकोंका सहारा लिये नहीं हो सकता। इसके सिवाय सब प्रकारके अधिकारियों के लिये एक घक्ता कार्यकारी नहीं हो लकता। पुस्तकप्रचार द्वारा यह काम सहल हो जाता है। जिसे जितना अधिकार होगा, वह उतने ही अधिकारकी पुस्तकें पढ़ेगा और महामराडल भी लब प्रकारके अधिकारियों के योग्य पुस्तकें निर्माण करेगा। सारांश, देशकी उन्नतिके लिये, भारत- गौरवकी रक्षाके लिये और मनुष्योमें मनुष्यत्व उत्पन्न करनेके लिये महामरडलने अब पुस्तक प्रकाशन विभागको अधिक उम्नत कर- नेका विचार किया है और उसकी सर्वलाधारणसे प्रार्थना है कि वे ऐसे सत्कार्यमें इसका हाथ बटावें एवं इसकी सहायता कर अपनी ही उन्नति कर लेनेको प्रस्तुत हो जावें। श्रीभारतधर्ममहामरडल के व्यवस्थापक पूज्यपाद श्री १०८ स्वामी ज्षानानन्दजी महाराजकी सहायतासे काशीके प्रसिद्ध विद्वा- नोंके द्वारा सम्पादित होकर प्रामाणिक, सुबोध और सुटृश्यरूपसे यह ग्रध्थमाला निकलेगी। ग्रन्थमालाके जो ग्रन्थ छुपकर प्रकाशित हो चुके हैं उनकी सूची नीचे प्रकाशित की जाती है।

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( ३ ) स्थिर ग्राहकोंके नियम।

(१) इस समय हमारी ग्रन्थमालामें निम्नलिखित ग्रन्थ प्रका- शित हुए हैं :- मंत्रयोगसंहिता (भाषानुवादसहित) १) भक्तिदर्शन (भाषाभाष्यसहित) योगदर्शन (भाषाभाष्यसहित नूतन संस्करण) २) नवीन दृष्टिमें प्रवीण भारत १) देवीमीमांसादर्शन प्रथम भाग (भाषाभाष्यसहित) १।) कल्किपुराण (भाषानुवादसहित) १) उपदेश पारिजात (संस्कृत) गीतावली 11) भारतघर्ममहामरडल-रहस्य १) सन्न्यासगीता (भाषानुवादसहित) I11) गुरुगीता (भाषानुवादसहित नूतनसंस्करण ) 1) धर्मकरपह्रुम प्रथम खराड २) द्वितीय खरड तृतीय खराड २) चतुर्थ खराड २) पश्चम खरड २) वछ्ठ खराड श्रीमन्गवद्गीता प्रथम खराड (भापामाग्यसहित) सूर्य्यगीता (भाषानुवादसहित) १) (1) पस्सुगीता (भाषानुवादसहित) [1) शक्तिगीता (भाषानुवादल्हित) I1I धीशगीता (भाषानुवादसहित) विष्युगीता (भाषानुवादसहित) (२) इनमें से जो कमसे कम ४) मूल्य की पुस्तकें पूरे मूल्यमें खरीदेंगे अथवा स्थिर वाहक होनेका चन्दा १) भेज देंगे उन्हें शेप और आगे प्रकाशित होनेवाली लब पुस्तकें है मूल्यमें दी जायंगी। (३) स्धिर ग्राहकोंको मालामे अथित होनेवाली हर एक

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( ४ ) पुस्तक खरीदनी होगी। जो पुस्तक इस विभाग द्वारा छापी जायगी वह एक विद्वानोंकी कमेटी द्वारा पसन्द करा ली जायगी। (४ ) हर एक ग्राहक अपना नम्बर लिखकर या दिखाकर हमारे कार्यालयसे अथवा जहाँ वह रहता हो वहां हमारी शाखा हो तो घहांसे, स्वल्प मूल्य पर पुस्तकें खरीद सकेगा। (५) जो धर्मलभा इस धर्म्मकायर्यमें सहायता करना चाहे और जो सज्जन इस ग्रन्थमालाके स्थायी ग्राहफ होना चाहें वे मेरे नाम पत्र भेजनेकी कृपा करें। गोविन्द शास्त्री दुगवेकर, अध्यक्ष शास्त्रप्रकाश विभाग श्रीभारतधर्ममहामण्डल प्रधान कार्य्यालय, जगत्गंज, बनारस।

इस विभाग द्वारा प्रकाशित समस्त धर्मपुस्तकोंका विवरण। सदाचारसोपान। यह पुस्तक कोमलमति बालक बालि- काओकी धर्म्मशिक्षाके लिये प्रथम पुस्तक है। उर्दू और बंगला भाषामें इसका अनुवाद दोकर छपचुका है और सारे भारतवर्षमें इसकी बहुत कुछ उपयोगिता मानी गई है। इसकी पांच आवृत्तियां छपचुकी हैं। अपने बच्ोकी धर्म्मशिक्षाके लिये इस पुस्तकको हर एक हिन्दूको मँगवाना चाहिये। मूल्य-) एक आना। कन्घाशिक्षासोपान। कोमलमति कन्याओंको धर्म्मशिक्षा देनेके लिये यह पुस्तक बहुत ही उपयोगी है। इस पुस्तककी बहुत कुछ प्रशंसा हुई है। इसका बंगला अनुवाद छप चुका है। हिन्दु- मात्रको अपनी अपनी कन्याओंको धर्म्मशिक्षा देनेके लिये यह पुस्तक मँगधानी चाहिये। धर्म्मसोपान। यह धर्म्मशिक्षाविषयक बड़ी उप्तम पुस्तक है। मूल्य-)

वालकोंको इससे धर्म्मका साधारण ज्ञान भली भांति हो जाता है।

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( ५) यह पुस्तक क्या बालक बालिका, क्या वृद्ध स्त्री पुरुष, सबके लिये चहुत ही उपकारी है। धर्म्मशिक्षा पानेकी इच्छी करनेवाले सजन अवश्य इस पुस्तकको मँगावें। मूल्य ।) चार आना। ब्रह्मचर्य्यसोपान। ब्रह्मचर्य्यव्रतकी शिक्षाके लिये यह ग्रन्थ बहुत ही उपयोगी है। सब ब्रह्मचारी आश्रम, पाठशाला और स्कूलोंमें इस ग्रन्थकी पढ़ाई होनी चाहिये। मूल्य) राजशिक्षासोपान। राजा महाराजा और उनके कुमारोको धर्म्मशिक्षा देनेके लिये यह ग्रन्थ बनाया गया है; परन्तु सर्वसाधा रणकी धर्म्मशिक्षाके लिये भी यह ग्रन्थ बहुत ही उपयोगी है। इसमें सनातनधर्म्मके अङ्ग और उसके तत्व अच्छी तरह बताये गये हैं। मूल्य =) तीन आना। साधनसोपान। यह पुस्तक उपासना और साधनशैलीकी शिक्षा प्राप्त करनेमें बहुतही उपयोगी है। इलका बंगला अनुवाद भी छपचुका है। बालक वालिकाओंको पहलेहीसे इस पुस्तकको पढ़ना चाहिये। यह पुस्तक ऐसी उपकारी है कि बालक और वृद्ध समानरूपसे इससे साधनविष्यक शिक्षा लाभ कर सक्त हैं। मूल्य =) दो आना। शास्त्रसोपान। सनातनधर्ममके शास्त्रोका संक्षेप सारांश इस ग्रन्थमें वर्णित है। सब शास्त्रोंका कुछ विवरण समझनेके लिये प्रत्येक सनातनधम्मवलम्बीके लिये यह ग्रन्थ बहुत उपयोगी है। मूल्य 1) चार आना। धर्म्मप्रचारसोपान। यह ग्न्थ धर्मोपदेश देनेवाले उपदेशक और पौरासिक परिडतोंके लिये बहुतही हितकारी है। मूल्य =) तीन आना। उपरि लिखित सब ग्रन्थ धर्ममशिक्षाचिषयक हैं इस कारणस्कूल, का लेजऔर पाठशालाओंको इकट्ठे लेने पर कुछ सुबिधा से मिल सकेंगे और पुस्तक विक्रेताओंको इनपर योग्य कमीशन दिया जायगा। उपदेशपारिजात। यह संस्कृत गद्यात्मक अपूर्व ग्रन्थ है। सनातनधर्म्म क्या है, धर्मोपदेश किसको कहते हैं,सनातनधर्म्मके सब शास्त्रों में क्या विषय हैं, धर्म्मवक्ता होनेके लिये किन २ योग्यताओं के

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( ६) होनेकी आवश्वकता है इत्यादि अनेक विषय इस ग्रन्थ में संस्कृत विद्वान्मात्रको पढ़ना उचित है और धम्मवक्ता, धर्म्मोपदेशक, पौराणिक पसिडत आदिके लिये तो यह ग्रन्थ सब समय साथ रखने योग्य है। मूल्य ।I) आठ आना। इस संस्कृत ग्रन्थके अतिरिक्त संस्कृत भाषामें योगदर्शन, सांख्यदर्शन, दैवीमीमांसादर्शन आदि दर्शन सभाष्य, मन्त्रयोग- संहिता, हठयोगसंहिता, लययोगसंहिता, राजयोगसंहिता, हरिहर- ब्रह्मसामरस्य, योगप्रवेशिका, धर्म्मसुधाकर, श्रीमधुसूदनसंहिता आदि ग्रन्थ छप रहे हैं और शीघ्रही प्रकाशित होनेवाले हैं। कल्किपुराण। कल्किपुराणका नाम किसने नहीं सुना है। वर्तमान समयके लिये यह बहुत हितकारी ग्रन्थ है। विशुद्ध हिन्दी अनुवाद और विस्तृत भूमिका सहित यह ग्रन्थ प्रकाशित हुआ है। धर्र्मजिक्षासुमात्रको इस अ्रन्थको पढ़ना उचित है। मूल्य १) एक रुपया। योगदर्शन। हिन्दीभाष्य सहित। इसप्रकारका हिन्दी भाष्य और कहीं प्रकाशित नहीं हुआ है। सब दर्शनोंमें योगदर्शन सर्ववादि सम्मत दर्शन है और इसमेंसाधनके द्वारा अन्तर्जगत्के सब विषयोंका प्रत्यक्ष अनुभव करादेनेकी प्रणाली रहनेके कारण इसका पाठन और भाष्य एवं टीका निर्माण वही सुचारु रूपसे करसक्ता है जो योगके क्रियासिद्धांशका पारगामी हो। इस भाष्यके निर्माणमें पाठक उक्त विषयकी पूर्णता देखेंगे। प्रत्येक सूत्रका भाष्य प्रत्येक सूत्रके आदिमें भूमिका देकर ऐसाक्रमबद्ध बनादिया गया है कि जिलसे पाठकोंको मनोनिवेश पूर्वक पढ़ने पर कोई असम्बद्धता नहीं मालूम होगो और ऐसा प्रतीत होगा कि महर्षि सूत्रकारने जीवोंके क्रमाश्युदय और निःशेयसके लिये मानो एक महान् राजपथ निर्माण करदिया है। इसका द्वितीय संस्करण छपकर तयार है, इसमें इस भाध्यको और भी सुस्पष्ट परिवरद्धित और सरल किया गया है। मूल्य २) रुपया। नवीन दृष्टिमें प्रवीण भारत। भारतके प्राचीन गौरव और आर्यजातिका महत्व जाननेके लिये यह एक ही पुस्तक है। मूह्य १) एक रूपया।

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( s) श्रीभारतधर्म्ममहामण्डलरहस्य। इस ग्रन्थमें सात अध्याय हैं। यथा-आर्यजातिकी दशाका परिवर्तन, चिन्ताका कारण, व्याधिनिर्णय, औषधिप्रयोग, सुपथ्यसेवन, बीजरक्षा और महायज्ञ- साधन। यह ग्रन्थरत् हिन्दूजातिकी उन्नतिके विषयका अस्ाधारण ग्रन्थ है। प्रत्येक सनातनधर्मीवलम्बीको इस ग्रन्थको पढ़ना चाहिये। द्वितीयावृत्ति छप चुकी है, इसमें बहुतसा विषय बढ़ाया गया है। इस ग्रन्थका आदर सारे भारतवर्ष में समान रूपसे हुआ है। धर्म्मके गूढ़ तत्व भी इसमें बहुत अच्छी तरह से बताये गये है। इसका बंगला अनुवाद भी छुप चुका है। मूल्य १) एक रुपया। निगमागमचन्द्रिका। प्रथम और द्वितींय भागकी दो पुस्तकें धर्ममानुरागी सजनोंको मिल सकती हैं। प्रत्येक का मूल्य १) एक रुपया। पहले के पाँच सालके पाँच भागोंमें सनातनधर्रमके अनेक गूढ़ रहस्यसम्बन्धी ऐसे १ प्रबन्ध प्रकाशित हुए हैं कि आजतक वैसे धर्म्मसस्बन्धी प्रबन्ध और कहीं भी प्रकाशित नहीं हुए हैं। जे। मँगावें। धर्मके श्रनेक रहस्य जानकर तृप्त होना चाहें वे इन पुस्तकोंको मूल्य पांचो भागों का २॥) रुपया। भक्तिदर्शन। श्रीशासिडल्यसूत्रों पर बहुत विस्तृत हिन्दी भाष्यसहित और एक अति विस्तृत भूमिकासहित यह ग्रन्थ प्रणीत हुआ है। हिन्दीका यह एक असाधारण अ्रन्थ है। ऐसा भक्तिलस्व- न्धी ग्रन्थ हिन्दीमें पहले प्रकाशित नहीं हुआ था। भगवद्भक्तिके विस्तारित रहस्योंका ज्ञान इस ग्रन्थके पाठ करनेसे होता है। भक्तिशास्त्रके समझनेकी इच्छा रखनेवाले और श्रीभगवान्में भक्ति करने वाले धार्मिकमात्रको इस ग्रन्थको पढ़ना उचित है। मूल्य १) गीतावली। इसको पढ़नेसे सङ्गीतशास्त्रका मर्स्म थोड़ेमें ही समझमें आसकेगा। इसमें अनेक अच्छे अच्छे भजनोंका भी संग्रह है। सङ्गीतानुरागी और भजनानुरागियोंको अवश्य इसको लेना चाहिये। मूल्य II) आठ आना। मन्त्रयोगसंहिता। येगविषयक ऐसा अपूर्व ग्रन्थ आज तक प्रकाशित नहीं हुआ है। इसमें मन्त्रयोगके १६ अङ्ग और क्रमशः उनके लक्षण, साधनप्रणाली आदि सब अच्छीतरहसे वर्णन किये

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( =) गये हैं। गुरु और शिष्य दोनों ही इससे परम लाभ उठा सकते हैं। इसमें मंत्रोंका स्वरूप और उपास्यनिर्णय बहुत अच्छा किया गया है। घोर अनर्थकारी साम्प्रदायिक विरोध के दूर करनेके लिये यह एकमात्र ग्रन्थ है। इसमें नास्तिकोंके मूर्तिपूजा, मन्त्रसिद्धि आदि विषयोंमें जो प्रश्न होते हैं उनका अच्छा समाधान है। मूल्य १) एक रुपयामात्र। तत्त्ववोध। भाषानुवाद और वैज्ञानिक टिप्पणी सहित। यह मूल ग्रन्थ श्रीशङ्कराचार्यकृत है। इसका बंगानुवाद भी प्रकाशित हो चुका है। मूल्य =) दो आना। देवीमीमांसा दर्शन प्रथम भाग। वेदके तीन काराड है। यथा :- कर्म्मकारड, उपासनाकारड और ज्ञानकाराड। ज्ञानकारडका वेदान्त दर्शन, कर्म्मकारड का जैमिनी दर्शन और भरद्वाज दर्शन और उपासनोकाराड का यह अङ्िरा दर्शन है। इसका नाम दैवी- मीमांसा दर्शन है। यह ग्रन्थ आज तक प्रकाशित नहीं हुआ था। इसके चार पाद हैं, यथा :- प्रथम रसपाद, इस पाद में भक्तिका विस्तारित विज्ञान वर्णित है। दूसरा सृष्टि पाद, तीसरा स्थिति पाद और चौथा लयपाद, इन तीनों पादोंमें दैवीमाया, देवताओंके भेद, उपासनाका विस्तारित वर्णन और भक्ति और उपासनासे मुक्तिकी प्रास्तिका सब कुछ विज्ञान वर्शित है। इस प्रथम भागमें इस दर्शन शास्त्र के प्रथम दो पाद हिन्दी अनुवाद और हिन्दी भाप्यसहित प्रकाशित हुए है। मूल्य १॥) डेढ़ रुपया। श्रीभगवद्गीता प्रथमखण्ड। श्रीगीताजीका अपूर्व्व हिन्दी भाष्य यह प्रकाशित हो रहा है जिसका प्रथम खराड, जिसमें प्रथम अध्याय और द्वितीय अध्यायका कुछ हिस्सा है प्रकाशित हुआ है। आ्ज तक श्रीगीताजी पर अनेक संस्कृत और हिन्दी भाष्य प्रकाशित हुए हैं परन्तु इल प्रकारका भाष्य आज तक किसी माषामें प्रका शित नहीं हुआ है। गीताका अध्यात्म, अधिदैव, अधिभूतरूपी त्रिविध स्वरूप, प्रत्येक श्लोकका त्रिविध अर्थ और सब प्रकारके अधिकारियोंके समझने योग्य गीता-विज्ञानका विस्तारित विवरण इस भाष्यमें मौजूद है। मैनेजर, निगमागम बुकडिपो, मूल्य १) एक रुपया

महामण्डलभवन, जगतगंज, बनारस।

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( ६) सप्त गीताएँ पश्चोपासनाके अनुसार पाँच प्रकारके उपासकोंके लिये पांच गीताएं-श्रीविष्युगीता, श्रीसूर्य्यगीता, श्रीशक्तिगीता, श्रीधीशगीता और श्रीशम्भुगीता एवं सन्न्यासियोंके लिये सन्न्यासगीता और साधकोंके लिये गुरुगीता भाषानुवाद सहित छप चुकी हैं। श्रीभारतधर्म महामराडलने इन सात गीताओंका प्रकाशन निर्न लिखित उद्देश्योंसे किया है :- १ म, जिस साम्प्रहायिक विरोधने उपासकोंको धर्मके नामसे ही अधर्म्म सक्षित करनेकी अवस्थामेंपहुंचा दिया है, जिस साम्प्रदायिक विरोधने उपासकोंको शहंकारत्यागी होनेके स्थानमें घोर साम्प्रदायिक अहंकारसस्पन्न बना दिया है,भारतकी वर्तमान दुर्दशा जिस साम्प्रदायिक विरोधका प्रत्यक्ष फल है और जिस साम्प्र- दायिक विरोधने साकार-उपासकोमें घोर देषदावानल प्रज्चलित कर दिया है उस साम्प्रदयिक विरोधका समूल उन्मूलन करना और २ य, उपासनाके नामसे जो अ्रनेक इन्द्रियासक्तिकी चरितार्थता के घोर अनर्थकारी कार्य होते हैं उनका समाजमें अस्तित्व न रहने देना तथा ३य, समाजमें यथार्थ भगवद्भक्तिके प्रचार द्वारा इह- लोकिक और पारलौकिक अभ्युदय तथा निःश्रेयस-प्राप्तिमें अनेक सुबिधाओंका प्रचार करना। इन सातो गीताओंमे शअ्नेक दार्शनिक तत्व, अनेक उपासनाकाराडके रहस्य और प्रत्येक उपास्य देवकी उपासनासे सम्बन्ध रखनेवाले विषय सुचारुरूपसे प्रतिपादित किये गये हैं। ये सातो गीताएं उपनिषद्रूप हैं । प्रत्येक उपासक अपने उपास्यदेवकरी गीतासे तो लाभ उठावेगा ही, किन्तु, अन्य चार गीताओंके पाठ करनेले भी वह अनेक उपासनात्त्वोंको तथा अनेक वैज्ञानिक रहस्योंको जान लकेगा और उसके अन्तःकरणमें प्रचलित साम्प्रदायिक ग्रन्थोंसे जैला विरोध उदय होता है वैसा नहीं होगा और वह परमशान्तिका अधिकारी हो सकेगा। सन्न्यास गीतामें सब सम्प्रदायोंके साधु और सन्यासियोंके लिये सब जानने योग्य विषय सन्निविष्ट हैं। लन्न्यासिगण इसके पाठ करनेसे विशेष ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे। गृहस्थोंके लिये भी यह ग्रन्थ धर्म्भ- ज्ञानका भाएडार है। श्रीमहामरडलप्रकाशित गुरुगीताके सदश ग्रन्थ आज तक किली भाषामें प्रकाशित नहीं हुआ है। इसमें गुरु शिष्य

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( १० ) लक्षरा, उपासनाका रहस्य और भेद, मन्त्र हठ लय और राजयोगोंके लक्षण और अङ्ग एवं गुरुमाहात्म्य, शिष्यकर्त्तव्य, परम तत्त्वका स्वरूप और गुरुशव्दार्थ आदि सब विषय स्पष्टरूपसे हैं। मूल, स्पष्ट सरल और सुमधुर भषानुवाद और वैज्ञानिक टिप्पणी सहित यह ग्रन्थ छपा है। गुरु और शिष्य दोनोंका उपकारी यह ग्रन्थ है। इसका अनुवाद वंगभाषामें भी छप चुका है। पाठक इन सातों गीताओंको मंगाकर देख सकते हैं, ये छप चुकी हैं। विष्युगीताका मूल्य I।।) सूर्यगीताका मूल्य ॥) शक्तिगीताका मूल्य ।।।) धीशगीताका मूल्य ॥) शंसुगीताका मूल्य II!) सन्न्यासगीताका मल्य ॥।।) और गुरुगीताका मूल्य ।) है। इनमेंसे पश्चोपालनाकी पांचगीताओंमें एक एक तीनरंगा विष्णुदेव सुर्य्यदेव भगवती और गणपतिदेव तथा शिवजीका चित्र भी दिया गया है। मैनेजर, निगमागम बुकूडिपो, महामण्डलभवन, जगवूगज बनारस।

धार्मिक विश्वकोष। (श्रीधर्म्मकल्पद्रुम) यह हिन्दूधर्म्मका अद्वितीय और परमावश्यक ग्रन्थ है। हिन्दू जातिकी पुनरुन्नतिके लिये जिन जिन आवश्यकीय विषयोंकी जरूरत है उनमें से सबसे बड़ी भारी ज़रूरत एक ऐसे धर्म्मग्रन्थकी थी कि, जिसके अध्ययन-अध्यापनके द्वारा सनातन धर्मका रहस्य और उसका विस्तृत स्वरूप तथा उसके अङ्ग उपांगोका यथार्थ ज्ञान प्राप्त हो सके और साथही साथ वेदों और सब शास्त्रोंका आशय तथा वेदों और सब शास्त्रोंमें कहे हुए विज्ञानोंका यथाकम स्वरूप जिज्ासुको भलीभाँति विदित हो सके। इसी गुरुतर अभावको दूर करनेके लिये भारतके प्रसिद्ध धर्मवक्ता और श्रीभारतधडर्म महामरदलस्थ उपदेशक महाविद्यालयके दर्शनशास्त्रके अध्यापक श्रीमान् स्वामी दयानन्दजीने इस अ्रन्थका प्रणयन करना प्रारम्भ किया है। इसमें वर्तमान समयके आलोच्य सभी विषय विस्तृत रूपसे दिये जायंगे। अबतक इसके छुः खराडोंमें जो अध्याय

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( ११ ) प्रकाशित हुए हैं वे ये हैं :- धर्म्म, दानधर्म्म, तपोधर्मर्म, कर्मयश, उपासनायज्ञ, ज्ञानयश्, महायज्ञ, वेद, वेदाङ्ग, दर्शनशास्त्र (वेदोपाङ्ग) स्मृतिशास्त्र, पुराणशास्त्र, तन्त्रशास्त्र, उपवेद, ऋषि और पुस्तक, साधारण धर्म्म और विशेष धर्म्म, वर्णधर्म्म, आश्रमधर्म्म, नारी- धर्म्म ( पुरुषधर्म्मसे नारीधर्म्मकी विशेषता), आार्य जाति, समाज और नेता, राजा और प्रजाधर्म, प्रवृत्तिधर्म्म और निवृत्तिधर्म, आपद्धर्म, भक्ति और योग, मन्त्रयोग, हठयोग, लययोग, राजयोग, गुरु और दीक्षा, वैराग्य और साधन, आत्मतत्व, जीवतत्व, प्राण और पीठत्व, सृष्टि स्थिति प्रलयतत्व, ऋृषि देवता और पितृतत्त्व अवतारतत्त्व, मायातश्व, त्रिगुणतश्व, त्रिभावतत्त्व, कर्म्मतत्त्व, मुक्ति तत्व, पुरुषार्थ और वर्णाश्रमसमीत्ता, दर्शनसमीक्षा, धर्मलम्प्रदाय- समीक्षा, धर्मपन्थसमीत्षा और धर्ममतसमीत्षा। आगेके खरडोंमें प्रकाशित होनेवाले अध्यायोंके नाम ये हैं :- साधनसमीक्षा, चतुर्दशलोकलमीक्षा, कालसमीक्षा, जीवन्मुक्ति-समीक्षा, सदाचार, पश्च महायश्ञ, आहनिककृत्य, षोडश संस्कार, श्राद्ध, प्रेतत्व और परलोक, सन्ध्या तर्पण, ओकार-महिमा और गायत्री, भगवन्नाम माहात्स्य, वैदिक मन्त्रों और शास्त्रोंका अपलाप, तीर्थ- महिमा, सूर्य्यादिग्रह-पूजा, गोसेवा, संगीत-शास्त्र, देश और धर्म सेवा इत्यादि इत्यादि। इस ग्रन्थसे आजकलके अशासत्रीय और विज्ञान रहित धर्म्मग्रन्यों और धर्म्मप्रचारके द्वारा जो हानि हो रही है वह सब दूर होकर यथार्थ रूपसे सनातन तैदिक धर्म्मका प्रचार होगा। इस ग्रन्थरतमें साम्प्रदायिक पक्षपातका लेशमात्र भी नहीं है और निष्पक्षरूपसे सब विषय प्रतिपादित किये गये हैं जिससे सकल प्रकारके अधिकारी कल्याण प्राप्त कर सकें। इसमें और भी एक विशेषता यह है कि हिन्दूशास्त्रके सभी विज्ञान शास्त्रीय प्रमाणों और युक्तियोंके सिवाय, आजकलकी पदार्थ विद्या (Science) के द्वारा भी प्रतिपादित किये गये हैं जिससे आजकलके नवशिक्षित पुरुष भी इसले लाभ उठा सकें। इसकी भाषा सरल, मधुर और गम्भीर है। यह ग्रन्थ चौसठ अध्याय और आठ समुलासोंमें पूर्ण होगा और यह वृहत् ग्रन्थ रायल साइजके चार हजार पृष्ठोसे अधिक होगा तथा बारह खराडोमें प्रकाशित होगा। इसी के शन्तिम खएडमें आध्यात्मिक शव्द्कोष भी प्रकाशित करनेका विचार है।

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( १२ ) इसके छः खएड प्रकाशित हो चुके हैं। प्रथम खराडका मूल्य २), द्वितीय का१॥), तृतीयकार), चतुर्थकार),पंचमकार) और षष्ठका१) है। इसके प्रथम दो खराड बढ़िया कागज पर भी छापे गये हैं और दोनों ही एक बहुत सुन्दर जिल्दमें बांधे गये हैं। मूल्य ५) है। सातवाँ खराड यत्त्रस्थ है। मैनेजर, निगमागम बुकूडीपो, महामण्डलभवन, जगतगेज, बनारस।

अंग्रेजी भाषाके धर्म्म्रन्थ।

श्री भारतवर्म्म महामरडल शास्त्रप्रकाश विभाग द्वारा प्रकाशित सब संहिताओ, गीताओं और दार्शनिक ग्रन्थोंका अंग्रेजी अनुवाद तयार हो रहा है जो क्रमशः प्रकाशिग होगा। सम्प्रति अंग्रेजी भाषामें एक ऐसा ग्रन्थ छप गया है जिसके द्वारा सब अंग्रेजी पढ़े व्यक्तियोंको सनातन धर्म्मका महत्व, उसका सर्वजीवहितकारी स्वरूप, उसके सब श्द्गोंका रहस्य, उपासनातत्व, योगतत्त्व, काल और सृष्टितत्व, कर्म्मतत्व, वर्णाश्मधर्म्मतत्त्व इत्यादि सब बड़े बड़े विषय अच्छी तरह समझमे आजावें। इलका नाम, वर्लूस इटरनल रिलिजन है। इसका मूख्य रायलपडीशनका ५) और साधारसका ३) है। जिल्द बंधी हुई है और दोनोंमें सात त्रिवर्ण चित्र भी दिये हैं। मैनेजर, निगमागम वुकूडीपो महामण्डलभवन, जगतगज, बनारस।

"The World's Eternal Religion." A Unique work on Hinduism in one volume, containing 24 Chapters with tri-colour illustrations, glossary, ete. No work has hitherto appeared in English that gives in a suggestive manner the real expositon of the Hindu religion in all its phases. This book has perfectly supplied of long-felt want. The names of the

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( १३ ) chaptors are as follows :- 1. Foreword, 2. Universal Religion, 3. Classification of Religion, 4. Law of Karma, 5. Worship in all its phases, 6. Practice of Yoga through Mantras, 7. Practice of Yoga through physical exercise, 8. Practice of Yoga through finer force of Nature, 9. Yoga through power of reasoning. 10. The Mystic Circle. 11. Love and Devotion, 12. Planes of Knowledge, 13. Time, space, creation. 14. The Occult world, 15. Evolution and Reincarnation, 16. Hindu Philosophy, 17. The System of castes and stages of Life, 18. Woman's Dharma, 19. Image Worship, 29. The great Sacrifices, 21. Hindu Scriptures, 22. Liberation, 23. Education, 24. Reconciliation of all Religions .- The followers of all religions in the world will profit by the light the work is intended to give. Price cloth bound, superior edition, Rs. 5, postage extra. Apply to the Manager, Nigamagam Book Depot, Mahamandal Buildings, Jagatganj, Benares, विविध विषयोंकी पुस्तकें।

असभ्यरमणी -) अनार्यसमाजरहस्य ) अम्त्येष्टिक्रिया ।) आनन्दे रघुन्दन नाटक ॥) आचारप्रबन्ध १) इङ्गलिशमामर ।) उपन्यास कुसुम 5) एकान्तवार्सी योगी -) कल्किपुराण उर्दू ॥) कार्तिकम्रसादकी जीवनी=) काशीमुक्ति विवेका-) गोवंशचिकित्सा।) गोगीतावली -) ग्वीसेफमेजिनी 1) जैमिनीसृत्र।) तर्कसंग्रहा-)दुर्गेश- नन्दिनी द्वितीय भाग=)देवपूजन-) देशीकरघा॥) धनुर्षेद संहिता।) नवीन रत्नाकर भजनावली )। न्याय दर्शन -पारिवारिक प्रबन्ध १) पयाग महात्म्य II=) प्रवासी =) बारहमासी -) बालहित -)।। भकतसर्वस्व = भजनगोरक्षाप्रकाश मखरी )।। मानल मजरी।) पेगास्थनीजका भारतवर्षीय वर्णन ॥=) महलदेव पराजय =) रगरत्नाकर २) रामगीता ) राशिमाला।।। वसन्तशद्गार?र) हारेन्हेस्टिङ्गकी जीवनी १) वीरवाला ॥) वैष्णवरहस्य)। शारीरिक पाष्य।) शास्त्रीजीके दो व्याख्यान ॥=) सारमयरी।) सिद्धान्तफौमुदी २) सिद्धान्तपटर-) सुजान चरित्र २) सुमारी।) सुबोध व्याकरर।)

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( १४ ) सुश्रुत संस्कृत ३) संध्यावन्दन भाष्य II) हनुमज्जयोतिष =) हनुमान- चालीसा)। हिन्दी पहिलीकिताब)।। क्षत्रियहितैषिणी ) नोट-पचीस रुपयोंसे अधिककी पुस्तक खरीदनेवालेको योग्य कमीशन सी दिया जायगा। शाघ्रि छपने योग्य ग्रन्थ । हिन्दी साहित्यकी पुष्टिके अभिप्रायसे तथा धर्म्मप्रचारकी शुभ वासनासे निम्नलिखित ग्रन्थ क्रमशः हिन्दी अनुवाद सहित छापनेको तैयार हैं। यथा :- भाषानुवाद सहित हठयोग संहिता, भरद्वाजकृत कर्ममीमांसादर्शनके भाषाभाष्य का प्रथम खरड और सांख्यदर्शनका भाषाभाष्य। मैनेजर, निगमागम वुकूडीपो, महामरडलभवन, जगत्गंज, बनारस।

श्रीमहामण्डलका शास्त्रपकाशविभाग। यह विभाग बहुत विस्तृत है। अपूर्वव संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेजीकी पुस्तकें काशी प्रधान कार्य्यालय (जगत्गंज) में मिलती हैं। बंमला सिरीज कलकत्ता दफ्तर(ह२बहूबीजारस्ट्रीट) में और उर्दूसिरीज फीरोजपुर (पसाब) दफ्तर में मिलती है और इसी प्रकार अन्यान्य प्रान्तीय कार्य्यालयोंमें प्रान्तीय भाषाओंके अ्रन्थोंका प्रबन्ध होरहा है। सेक्रेटरी श्रीभारतधर्म्प महामण्डल, जगत्गंज बनारस। श्रीमहामण्डलस्थ उपदेशक-महाविद्यालय। श्रीभारतधर्मम्रहामराडल प्रधानकार्यालय काशी में सातु और गृहस्थ धर्ममवक्ता प्रस्तुत करनेके अर्थ श्रीमहामरडल- उपदेशक महाविद्यारय नामक विद्यालय स्थापित हुआ है। जो साधुगण दार्शनक और धर्म्मसम्बन्धी ज्ञान लाभ करके अपने साधु जीघनको कृतकृत्य करना चाहे और जो विद्धान् गृहस्थ धार्मिक शिक्षा लाभ करके धर्म्मप्रचार द्वारा देशकी सेवा करते हुए अपना जीवन निर्वाह करना चाहें वे निम्नलिखित पते पर पत्र भेजें। मधानाध्यक्ष, श्रीभारतवर्म्ममहामण्डल प्रधान कार्यालय, जगत्गंज, बनारस (डावनी)

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( १५ ) श्रीभारतधर्म्म महामण्डल में नियमित धर्म्म चर्चा। श्रीभारतघर्म महामरडल धर्मपुरुषार्थ में जैसा अ्ग्रसर हो रहा है, सर्वत्र प्रसिद्ध है। मएडल के अनेक पुरुषार्थो में 'उपदेशक सहा- विद्यालय' की स्थापना भी गणना करने योग्य है। अच्छे धार्म्मिक चक्ता इसमें निर्माण हुए, होते हैं और होते रहेंगे ऐसा इसका प्रबन्ध हुआ है। अब इसमें दैनिक पाठ्यक्रम के पतिरिक्त यह भी प्रबन्ध हुआ है कि रात्रि के समय महीने में दस दिन व्याख्यान शिक्षा, दस दिन शास्त्रार्थ शिक्षा और दस दिन सङ्गीत शिक्षा भी दी जाया करे। धक्तृता के लिये संगीत का साधारण ज्ञान होना आवश्यक है और इस पश्चम वेदका (शुद्ध सङ्गीत का ) लोप हो रहा है। इस कारस वयाख्यान और शास्रार्थ शिक्षा के साथ सङ्गीत शिक्षा का भी सभा ेश किया गया है। सर्व साधारण भी इस धर्म चर्चा का यथा समय उपस्थित होकर लाभ उठा सकते हैं। निवेदक सेक्रटरी महामण्डल, जगवूगंज बनारस। हिन्दूधार्मिक विश्वविद्यालय। (श्री शारदामण्डल) हिन्दू जातिकी विराट् धर्म्मसभा श्रीभारतधर्म्म महामरडलका यह विद्यादान विभाग है। वस्तुतः हिन्दूजातिके पुनरभ्युक्य और हिन्दूधम्मकी शिक्षा सारे भारतवर्षमें फैलानेके लिये यह विश्व विद्यालय स्थापित हुआ है। इसके प्रधानतः निम्न लिखित पाँच कार्य विभाग हैं। (१) श्री उपदेशक महाविद्यालय (हिन्दू कालेज श्रोफ डिधि निटी) इस महाविद्यालयके द्वासा योग्य धर्म्मशिक्षक और धर्मो पदेशक तयार किये जाते हैं। अंभ्रेजी भाषाके थी. ए. पास अथवा संदकृत भाषा के शास्त्री आचार्य्य आादि परीक्षाओंकी योग्यता रखने

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( १६ ) वाले परिटत ही छात्र रूपसे इस महाविद्यालयमें भरती किये जाते हैं। छात्रवृत्ति २५) माहवार तक दी जाती है। (२) ध्म्मशिक्षाविभाग । इस विभागके द्वारा भारतवर्षके प्रधान प्रधान नगरोमें ऊपर लिखित महाविद्यालय से परीक्षोत्तीर्ण एक एक परिडत स्थायीरूपले नियुक्त करके उक्त नगरोंके स्कूल, कालेज और पाठशालाओंमें हिन्दूधर्म्मकी धार्मिक शिक्षा देनेका प्रबन्ध किया जाता है। वे परिडतगण उन नगरोंमें सनातनधर्म्मका प्रचार भी करते रहते हैं। ऐसा प्रबन्ध किया जो रहा है कि जिससे महामरडलके प्रयत्नसे सब बड़े बड़े नगरों में इस प्रकार धर्म्मकेन्द्र स्थापित हो और वहाँ मासिक लहायता भी थी महामरडलकी ओरसे दी जाय। (३) श्री आर्यमहिलामहाविद्यालय भी इसी शारदामएडलका अंग लमझा जायगा और इस महाविद्यालयमें उच्च जातिकी विधवाओंके पासन पोषणका पूरा प्रबन्ध करके उनको योग्य धर्मो- पदेशिका, शिक्षयित्री और गवरनेस आदिके काम करनेके उपयोगी बनाया जायगा। (४) सर्व्वधर्म्मसदन (हाल आफ आल रिलिजन्स) इस नामसे यूरोप-महायुद्धके स्मारक रूपलेए क संस्था स्थापित करनेका प्रबन्ध हो रहा है। यह संस्था श्रीमहामरडलके प्रधान कार्य्यालय तथा उपदेशक महाविद्यालयके निकट ही स्थापित होगी। इस संस्थाके एक ओर सनातन धर्म्मके श्तिरिक्त सब प्रधान २ धर्म्ममतोंके उपासनालय रहेंगे जिनमें उक्त धम्मोंके जाननेवाले एक एक विद्वान् रहेंगे। दूसरी ओर सनातनचर्म्मके पश्चोपासनाके पाँच देवस्थान और लीलाविग्रह उपासना आदि देवमन्दिर रहेंगे। इसी संस्थामें एक वृहत् पुस्तकालय रहेगा कि जिसमें पृथिवी भरके सब धर्म्ममतोंके धर्म्मग्रन्थ रकसे जायंगे और इसी संस्थासे संश्लिष्ट एक व्याख्यानालय और शिक्षालय (हाल)रहेगा जिसमें उक विभिन्न धम्मोंके विद्वान् तथा सनातन धर्म्मके विद्वानगण यथाक्रम व्याख्यानादि देकर धर्ममासम्बधीय अनुसन्धान तथा धर्म्मशिक्षा- कार्य्यकी सहायता करेंगे। यदि पृथिवीके अन्य देशोंसे कोई विद्धान काशीमें आकर इस सर्व्वधर्म्मसदनमें दार्शनिक शिक्षा लाभ करना चाहेगा तो इसका भी प्रबन्ध रहेगा।

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(१७ ) (५) शास्त्र प्रकाश विभाग। इस विभागका कार्य रुपष्टही है। इस विभागसे धर्म्मशिक्षा देनेके उपयोगी नाना भाषाओंकी पुस्तकें तथा सनातनधर्म्मकी सब उपयोगी मौलिक पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं और होंगी। इस प्रकारसे पाँच कार्य्यविभाग और संस्थाओंमें विभक्त होकर श्री शारदामरडल सनातनधर्म्मावलस्चियोंकी सेवा और उन्नति करनेमें प्रवृत्त रहेगा। प्रधान मंत्री श्रीभारतवर्म्म महामण्डल प्रधान कार्यालय, बनारस। श्रीमहामण्डलके सभ्योंको विशेष सुबिधा। हिन्दू समाजकी एकता और सहायताके लिये विराट् आयोजन। श्रीभारतधर्म्ममहामराडल हिन्दू जातिकी अद्वितीय धर्म्ममहा- सभा और हिन्दू समाजकी उन्नति करने वाली भारत वर्षके सकल प्रान्त व्यापी संस्था है। श्रीमहामराडतके सभ्य महोदयोंको केवल धर्म्म शिक्षा देना ही इसका लक्ष्य नहीं है; किन्तु हिन्दू समाजकी उन्नति, हिन्दूसमाजकी ढढ़ता और हिन्दू लमाजमें पारस्परिक प्रेम और सहा यताकी वृद्धि करना भी इसका प्रधान लक्ष्य है इस कारण निम्नलि- खित नियम श्रीमहामराडलकी प्रबन्ध-कारिणी समाने बनाये हैं। इन नियमोंके अनुसार जितने अधिक संख्यक सभ्य महामराडलम सिम्मिलित होंगे उतनी ही अधिक सहायता महामरडलके सभ्य महोदयोंको मिल सकेगी। ये नियम ऐसे सुगम और लोकहितकर बनाये गये हैं कि श्रीमहामएडलके जो सभ्य होंगे उनके परिवारको बड़ी भारी एककालिक दानकी सहायता प्राप्त हो सकेगी। वर्त्तमान हिन्दूसमीज जिस प्रकार दरिद्र होगया है उसके अनुसार ्रीमहा. मराडल के ये नियम हिन्दू समाजके लिये बहुत ही हितकारी हैं इसमें सन्देह नहीं।

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( १८ ) श्रीमहामण्डलके मुखपत्रसस्बन्धी उपनियम। (१) धर्म्मशिक्षाप्रचार, सनातनधर्मचर्चा, सामाजिकउन्नति, सद्विद्याविस्तार, श्रीमहामराडलके काय्योंके समाचारोंकी प्रसिद्धि और सभ्योको यथासम्भव सहायता पहुँचाना आदि लक्ष्य रखकर श्रीमहामराडलके प्रधान कार्य्यालय द्वारा भारत के विभिन्न प्रान्तो- में प्रचलित देशभाषाओंमें मालिकपत्र नियमितरूपसे प्रचार किये जायँगे। (२) अभी केवल हिन्दी और अँगरेजी-इन दो भाषाओोंके दो मासिकपत्र प्रधान कार्य्यालयसे प्रकाशित हो रहे हैं। यदि इन नियमोंके अनुसार कार्य्य करने पर विशेष सफलता और सभ्योंकी विशेष इच्छा पाई जायगी तो भारतके विभिन्न प्रान्तोकी देश भाषाओंमें भी क्रमशः मालिकपत्र प्रकाशित करनेका विचार रक्ष्खा गया है। इन सालिकपत्रोमें से प्रत्येक मेम्वरको एक एक मासिक- पत्र, जो वे चाहेंगे, बिना मूल्य दिया जायगा। कमसे कम दो हजार सभ्य महोदयगण जिस भाषाका मौसिक पत्र चाहेंगे, उसी भाषामें मासिकपत्र प्रकाशित करना आरम्म कर दिया जायगा, परन्तु जबतक उस भाषाका मासिकपत्र प्रकाशित न हो तब तक श्रीम- हामरडलका, हिन्दी अथवा अंगरेजीका मासिकपत्र विना मूल्य दिया जायगा। (३) श्रीमहामराडलके साधारण सरभ्योको वार्षिक दो रुपये चन्दा देने पर इन नियमोंके अनुसार सब सुबिधाएँ प्राप्त होगी। श्रीमहामराडलके अन्य प्रकारके सभ्य जो धर्म्मोन्नति और हिन्दू- समाजकी सहायताके विचारले अथवा अपनी सुविधाके विचारसे इस विभागमें स्वतन्त्र रीतिसे कमसे क्म २ दो रुपये वार्षिक नियमित चन्दा देंगे वे भी इस कार्य्य विभागकी सब सुबिधाएँ प्राप्त कर सकेंगे। (४) इस विभागके रजिस्टरदर्ज सभ्योंको श्रीमहामराडलके अन्य प्रकारके सभ्योकी रीतिपर श्रीमहामरडले सम्बन्धयुक्त सब पुस्तकादि अपेक्षाकृत स्वल्प मूल्य पर मिला करेंगी। समाजहितकारी कोष। (यह कोष श्रीमहामराडलके सब प्रकारके सम्योंके-जो इसमें

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( १8 ) सम्मितित होंगे-निर्वाचित व्यक्तियोंको आर्थिक सहायताके लिये खोला गया है) (५) जो सभ्य नियमित प्रतिघर्ष चन्दा देते रहेंगे उनके देहान्त होने पर जिनका नाम वे दर्ज करा जायंगे, श्रीमहामरडलके इस कोष द्वारा उनको आर्थिक सहायता मिलेगी। (६) जो सेम्बर कमसे कम तीन वर्ष तक मेम्बर रहकर लोका- न्तरित हुए हों, केवल उन्हींके निर्वाचित व्यक्तियोंको इस समाज- हितकारी कोषकी सहायता प्राप्त होगी, अन्यर्था नहीं दी जायगी। (७) यदि कोई सभ्य महादय अपने निर्वाचित व्यक्तिके नामको श्रीमहामराडलप्रधानकार्यालयके रजिस्टरमें परिवर्तन कराना चाहेंगे तो ऐसा परिवर्त न एकवार विना किसी व्ययके किया जोयगा। उसके बाद वैसा परिवर्तन पुनः कराना चाहें तो ।) भेजकर परि- वर्तन करा सकेंगे। (८) इस विभागमें साधारण सभ्यों और इस कोषके सहायक अन्यान्य सभ्योकी ओरसे प्रतिवर्ष जो आमदनी होगी उसका आधा अंश श्रीमहामराडलके छपाई-विभागको मासिक पत्रोंकी छुपाई और प्रकाशन आदि कार्य्यके लिये दिया जायगा। बाकी आाधारुपया एक स्वतन्त्र कोषमें रक्खा जायगा जिस कोषका नाम "समाजहित कारी कोष " होगा। (९) "समाजहित कारी दोष" का रुपया बैंक ऑफ बंगाल छाथवा ऐसे ही विश्वस्त बैंकमें रक्खा जायगा। (१०) इस कोषके प्रबन्धके लिये एक खास कमेटी रहेगी। (११) इस कोषकी आमदनीका आधा रुपया प्रतिवर्ष इस कोषके सहायक जिन मेम्बरों की मृत्यु होगी, उनके निर्वाचित व्य क्ियोंमें समानरूपसे बाँट दिया जायगा। (१२) इस कोषमें बाकी आ्राधे रुपयोंके जमा रखनेसे जो लाभ होगा, उसले श्रीमहामराडलके कार्यकर्ताओं तथा मेखरोंके क्लेशका विशेष कारण उपस्थित होने पर उन क्केशोंको दूर करनेके लिये कमेटी व्यय कर सकेगी। (१३) किसी मेम्बरकी मृत्यु होने पर वह मेम्बर यदि किसी महामरडलकी शाखालभाका सभ्य हो अथवा किसी शाखसभाके

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(२० ) निकटवर्ती स्थानमें रहने वाला हो तो उसके निर्वाचित व्यक्तिका फर्ज होगा कि वह उक्त शाखालभाकी कमेटीके मन्तव्यकी नकल श्रीमहामराडल प्रधान कार्य्यालयमें भिजवावे। इस प्रकारसे शाखा सभाके मन्तव्यकी नकल आने पर कमेटी समाजहितकारी कोषसे सहायता देनेके विषयमें निश्चय करेगी। (:४) जहाँ कहीं सभ्योकों इस प्रकारकी शाखालभाकी सहायता नहीं मिल सकती है या जहाँ कहीं निकट शाखासभा नहीं है ऐसी दशामें उस प्रान्तके श्रीमहामरडलके प्रतिनिधियोमेंले किसीके अथवा किसी देशी रजवाड़ोमें हो तो उक्त दर्बार के प्रधान कर्म्मचारीका लार्टिफिकेट मिलने पर सहायता देनेका प्रबन्ध किया जायगा। (१५) यदि कमेटी उचित समझेगी तो वाला २ खबर संगाकर सहायताका प्रबन्ध करेगी, जिससे कार्य्यमें शीघ्रता हो। अन्यान्य नियम। (१६) महामराडलके अन्य प्रकारके सभ्योंमेंसे जो महाशय हिन्दूसमाजकी उन्नति और दरिद्रोंकी सहायताके विचारसे इस कोषमें कमसे कम २) दो रुपये सालाना सहायता करने पर भी इल फराड से फायदा उठाना नहीं चाहेंगे वे इस कोषके परिपोषक समझे जायंगे और उनकी नामावली धन्यवादसहित प्रकाशित की जायगी। (१७) हर एक साधारण मेम्बरको-चाहे स्त्री हो या पुरुष- प्रधान कार्यालयसे एक प्रमाणपत्र-जिसपर पञ्चदेवताओ्ोंकी मूर्ति और कार्यालयकी मुहर होगी-साधारण मेम्बरके प्रमाणरूपसे दिया जायगा। (१८) इस विभागमें जो चन्दा देंगे उनका नाम नम्बरसहित हर वर्ष रसीदके तौर पर वे जिस भाषाका सासिकपत्र लेंगे उसमें छापा जायगा। यदि गलूतीसे किसीका नाम न छपे तो उनका फर्ज होगा कि प्रधान कार्यालयमें पत्र भेजकर अपना नाम छपवावें क्योंकि यह नाम छपना ही रसीद समझी जायगी। (१९) प्रतिघर्ष का चन्दा २) मेम्बर महाशयों को जनवरी महीनेमें आगामी भेज देना होगा। यदि किली कारण विशेषसे

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( २१ ) जनवरीके अन्त तक रुपया न आवे तो और एक मास अर्थात् फरवरी मास तक अवकाश दिया जायगा और इसके बाद अर्थात् मार्च महीनेमें रुपया न आने से मेम्वर महाशयका नाम काट दिया जायगा और फिर वे इस समाजहितकारी कोषसे लाभ नहीं उठा सकगे। (२०) मेम्बर महाशयका पूर्व नियम के अनुसार नाम कट जानेपर यदि कोई असाधारण कारण दिखाकर वे अपना हक्क साबित रखना चाहेगे तो कमेटीको इस विषयमें विचार करने- का अधिकार मई मास तक रहेगा और यदि उनका नाम रजि प्टरमें पुनः दर्ज किया जायगा तो उन्हें।) हर्जाना समेत चन्दा अर्थात् २1) देकर नाम दर्ज करा लेना होगा। (२१) वर्षके शन्दर जब कभी कोई नये मेम्बर होगे तो उन- को उस सालका पूरा चन्दा देना होगा। वर्षारम्भ जनवरी से .समझा जायगा। (२२) हर सालके मार्चमें परलोकगत मेम्बरोंके निर्वाचित व्यक्तियोंको 'समाजहितकारी कोष' की गतवर्षकी सहायता बांटी जायगी; परन्तु नं. १२ के नियमके अनुसार सहायताके बांटनेका अधिकार कमेटीको सालभर तक रहेगा। (२३) इन नियमोंके घटाने-बढ़ाने का अधिकार महामरडल को रहेगा। (२४) इस कोम की सहायता 'श्रीभारतधर्मम हामराडल, प्रधान कार्यालय, काशी' से ही दी जायगी। सेक्रेटरी, श्रीभारतधर्म्ममहामण्डल, जगत्गंज, बनारस। 0X04 श्रीविश्वनाथ-अन्नपूर्णा-दानभण्डार। श्रीभारतधर्म्ममहामरडल प्रधान कार्य्यालय काशीमें दीनदुःखि- योंके क्लेशनिवारणार्थ यह सभा स्थापित की गई है। इस सभाके द्वारा अतिविस्तृत रीतिपर शास्त्र प्रकाशनका कार्य्य प्रारम्भ किया गया है। इस समाके द्वारा धर्म्मपुस्तिका पुस्तकादि यथासम्भव चिना मूल्य वितरण करनेका भी विचार रक्खा गयाहै।। इस दानभ-

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( २२ ) रडारके द्वारा महामरडलद्वारा प्रकाशित तत्वबोध, साधुओंका कर्तव्य, धर्म्म और धर्रमाङ्ग,दानधर्म्म,नारी धर्म्म, महामराडलकी आवश्यकता आदि कई एक हिन्दीभाषाके धरर्मग्रन्थ और अंग्रेजी भाषाके कईएक ट्रैक्स विना मूल्य योग्य पात्रोको बांटे जाते हैं। पत्राचार करनेपर विदित हो सकेगा। शास्त्र प्रकाशनकी आमदनी इसी दानभराडार में दीनदुःखियोंके दुःखमोचनार्थ व्यय की जाती है। इस सभामें जो दान करना चाहें या किसी प्रकार पत्राचार करना चाहें वे निस्न लिखित पते पर पत्र भेजें। सेकेटरी, श्रीविश्वनाथ-अन्नपूर्णा दानभण्डार, श्रीभारतधर्म्ममहामण्डल, प्रधान कार्य्यालय, जगतगंज, बनारस (छावनी) आय्येमाहिलाके नियम। १-श्रीआर्य्यमहिलाहितकारिणी महापरिषद्की सुखपत्रिकाके रूपमें आर्थ्यमहिला प्रकाशित होती है। २-महापरिषद्की सब प्रकारकी सभ्या महेदयाओं और सभ्य महोदयोंको यह पत्रिका चिना मूल्य दीजाती है। अन्य ग्राहकोंके ६)वार्षिक अग्निम देने पर प्राप्त होती है। प्रति संख्याका मूल्य।॥)है 5 पुस्तकालयों (पब्लिक लाइब्रेरियों) वाचनालयों (रीडिंग रूमो) और कन्यापाठशालाओंको सेवल ३) वाषिकमे हीदी जाती है। ४-किसी लेखको घटाने बढ़ाने वा प्रकाशित करने न करनेक सम्पूर्ण अधिकार सम्पादिका को है। ५-योग्य लेखकों तथा लेखिकाओंको नियत पारितोषिक दिया जाता है और विशेष योग्य लेखकों तथा लेखिकाओंको अन्यान्य प्रकारसे भी सम्मानित किया जाता है। ६-हिन्दी लिखनेमें असमर्थ मौलिक लेखक लेखिकाओंे लेखोंका अनुवाद कार्यालयसे कराकर छापा जाता है। ७-माननीया श्रीमृती सम्पादिकाजीने काशीके विद्वानोंकी ए समिति स्थापित की है; जो पुस्तकें आपदि समालोचनार्थ कार्यालय पहुंचगी. उनपर यह समिति विचार करेगी। जो पुस्तकें आ योग्य समझी जायँगी उनके नाम, पता और विषय आदि आय महिलामें प्रकाशित कर दिये जायंगे।

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(२३ ) 5- समालोचनार्थ पुस्तकें,लेख परिवर्तनकी पत्र-पत्रिकाएँ, कार्य्यालय-सम्बन्धी पत्र, छपने योग्य विज्ञापन और रुपया तथा महापरिषत्सम्बन्धी पत्र आदि सब निम्न लिखित पते पर आने चाहियें। कार्य्याध्यक्ष, आार्थमहिला तथा महापरिषतकार्यालय, श्रीमहामरडल भवन, जगत्गञ्, बनारस। आर्यमहिला महाविद्यालय। इस नामका एक महाविद्यालय (कालेज) जिसमे विधवा आश्रम भी शामिल रहेगा श्रीआर्यमहिलाहितकारिणी महापरिषद् नामक सभाके द्वारा स्थापित हुआ है जिसमें सत्कुलोद्भव उच्च जातिकी विधवाएँ मासिक ६५) से २०) तक वृत्ति देकर भरती की जाती हैं और उनको योग्य शिक्षा देकर हिन्दू धर्म्मकी उपदेशि- का, शिक्षयित्री आदि रूपसे प्रस्तुत किया जाता है। भविष्यत् जीविकाका उनके लिये यथायोग्य प्रबन्ध भी किया जाता है। इस विषयमें यदि कुछ अधिक जानना चाहे तो निम्न लिखित पते पर पत्र व्यवहार करे। प्रधानाध्यापक आर्यमहिला महाविद्यालय महामरडल भवन जगत्गंज बनारस। एजन्टोंकी आवश्यकता। श्रीभारतधर्म्म महामरडल और आय्यमहिलाहितकारिी महापरिषद्के मेम्बरसंग्रह और पुस्तकविक्रय आदिके लिये भारतवर्षके प्रत्येक नगरमें एजराटोंकी जरूरत है। एजन्टोंको अच्छा पारिताषिक दिया जायगा। इस विषयके नियम श्रीमहामरडल प्रधान कार्यालयमें पत्र भेजनेसे मिलेंगे। सैक्रेटरी श्रीभारतधर्म्म महामण्डल जगत्गंज बनारस।

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भारतधर्म्म प्रेस। मनुष्यों की सर्वाङ्गण उन्नति लिखने पढने से होती है। पहिले समय में शिक्षा प्रचारका कोई सुलभ सा- धन नहीं था; परन्तु वर्तमान समय में शिक्षा-वृ्धिके जितने साधन उपलब्ध हैं, उनमें 'प्रेस' सब से बढ़कर है। सनातन धर्म के सिद्धान्तों का प्रचार करने के लिये भी इस साधन का अवलम्बन करना उचित जानकर श्री भारतघर्म महामण्डल ने निजका भारतधर्म्म नामक प्रेस खोल दिया है। इसमें हिन्दी, अँग्रेजी और उर्दू का सब प्रकार का काम उत्तमता से होता है। पुस्तक, पत्रिकाएँ, हेंडबिल, लेटरपेपर, वालपोस्टर्स, चेक, बिल, हुण्डी, रसीदें, रजिस्टर फार्म आदि छपवाकर इस प्रेस की छपाई की सुन्दरता का अनुभव कीजिये। पत्र व्यवहार करने का पता :-

मैनेजर भारतधर्म्म प्रेस महामण्डल भवन जगत्गंज, बनारस। दितचिन्तक प्रेस, रामघाट, काशी में सुद्रित ।

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श्रीआर्यमहिला-हित कार्य्यसम्पािका :- भारत महाराणी सुरथ कुमारी देवी. O. B.L. सावित्री महाराणी शिवाकुमारी देवी, नरलिंहगढ़। भारतवर्षकी प्रतिष्ठित रानी-महारानियों तथा विदुषी भद्र महिला- ओंके द्वारा, श्रीभारतधर्म-महामरडलकी निरीक्षकतामें, आर्यमाता- ओंकी उन्नतिकी सदिच्छ्रासे यह महापरिषद् श्रीकाशीपुरीमें स्थापित की गई है। इसके निस्नलिखित उद्देश्य हैं :- (क) आार्यमहिलाओंकी उन्नतिके लिये नियमित कार्यव्य- वस्थाका स्थापन (स) श्रुति-स्मृति-प्रतिपादित पवित्र नारी-धर्मका प्रचार (ग) स्वधर्मानुकूल स्त्रीशिक्षाका प्रचार (घ) पारसपरिक प्रेम स्थापितकर हिन्दूसतियोंमें एकताकी उत्पत्ति (ङ) सामाजिक कुरीतियोंका संशोधन और (च) हिन्दीकी उन्नति करना तथा (छ) इन्हीं उद्देश्योकी पूर्तिके लिये अन्यान्य आवश्यकीय कार्य करना। परिषद्के विशेष नियम -:- १ म-इसकी सब प्रकारकी सभ्या- ओंको इसकी मुखपत्रिका आर्यमहिला मुफ़ मिलेगी। श्य-स्त्रियाँ ही सभ्याएँ हो सकेंगी। श्य-यदि पुरुष भी परिषद्की किसी तरहकी सहायता करें तो वे पृष्ठपोषक समझे जायँगे और उनको भी पत्रिका मुफ मिला करेगी। ४ र्थ-परिषद् की चार प्रकारकी अभ्याओंके ये नियम है :- (क) कमसे कम १५०) एकवार देनेपर "शाजीवन-सभ्या" (ख) १०००) एक ही वार वा प्रतिमास १०) देने पर "संरक्षक- सभ्या" (ग) १२) वार्षिक देने पर "सहायक-सभ्या" और (घ) ५) वार्षिक देनेपर वा अ्लमर्थ होनेसे ३) ही वार्षिक देने पर "सहयोगिसभ्या" आर्यमहिला मात्र बन सकती हैं। पत्रिका-सम्बन्धी तथा महापरिषत्सम्बन्धी सब तरहके पत्रव्य वहार करनेका यह पता है :- महोपदेशक पण्डित रामगोविन्द त्रिवेदी वेदान्तशास्त्री कार्याध्यक्ष आर्यमहिला तथा आर्यमहिला हितकारिणी महापरिषत्कार्यालय श्रीमहामएडल-भवन जगत्गंज, बनारस।

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भारत ED PATRONACE OF THE LEADERS OF EERS & SAVANTS. ARMA MAHAMANDAL this name has been starte farted with the मनष्यों की सर्वा the velueio ustablishing a connocting link, througl mitence. with those Scholars and Literar; Socipties that tke an interet iu questions of Theclogy, Hiudu Philosopl, and Sanskrit Literature all over the sivilised world. tLo fuliil the shove objects this Bareau intends to take up the Folfowing :- 1. Tu reecive and answer muetions through bona fide corre- pon lence regarding Hidn Religion and Science, Codes, Practi- cal Yoga, Vaidie Philosophy and General Sanskrit Literatnre. 2. To exhibit to the enlightened world the eatholicity of the Vnidie doctrino, and ie fostering agency as universal helper towarde moral and spiritual amehoration of nations. 3. To render inalidl help anorards comparative researches in Science, Philosoph aud Literatures both Oriental and Ocei dental. 4. To welepme such snygestions us may emanate from learn- ed sontco & ail over the world roedneive to the imurovement and beneGt of humanity. 7. And to do snch ofher things as may lead to, the fuiGlont af the nboye chjects or any of they ;. RUIES OF THF SOCILTY. 1. There are to bo two classes of Mombers, General & Sneci 2. The Memberships are te be ell honorary. 3. Those whe will sympathise with the obiect, and onlist theie ne nes and andresses in the Register of the Bureau as Co-oporstors will be couvidered as General Members. 4. Srecinl mumibers . io w mhuse who shail be qualifed to aswer points of th ir re peetice religions. 5. The Memborsaip of che Bnrean will he irrospeetive of caste. vreod and nationnlicy. 6. The spiritoal. quostions wili be responded to througl tmrrespondenee as well as in Debate Meetings held in the office of the Burean on dates Gxod fe the purpose. 7. There is to be n Secretary and an Assistent Secretary to be sppointed isy tho Woander of the Barean (both posts honora y-) 8. All the books, traots aind leafints that will be pullishe 1 coneorning the Baregu ill be torwarded free to all the Members of the Burenu. All correspondence to he addressed to- BWAMI DAYANAND, SRORFTARY, Aryan Bureau of Brers & Sanant s Clo Bu Mat amair lal Office, BUNAErS Crry ( India. ) N.B .- Orinatal cholara, :il over tas world, ar iviled lo gond ther nomo. and audresses to fncilluste m .tual comro uications end dergnioli of neceoer Paporo,