1. Hindi Rasa Gangadhar Purushottam Sharma Chaturvedi Vol 3
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सूयंकुमारी पुस्तकमाक्षा-१६
हिंदी रसगंगाधर
तृतीय भाग
लेखक पुरुषोत्तमशर्मा चतुर्वेदी
लरी नागरी-प्र
नागरीप्रचारिणी सभा, वाराणसी
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प्रकाशक : नागरीप्रचारियी सभा, काशी मुद्रक : महताबराय नागरी मुद्ररा, काशी प्रथम संस्करण, १५०० प्रतियाँ, सं० २०१५ मूल्य ८)
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श्रीहरिः।
वक्तव्य
आज यह हिंदी-रसगंगाघर का अवशिष्ट भाग भी बनता बनार्दन की सेवा में समर्पित करते हुए अत्यन्त श्रानन्द का अ्रनुभव हो रहा है। आथ से लगभग ३५ वर्ष पूर्व साहित्याचार्य के परीक्षार्थी के रूप में रहते हुए मैंने इस कार्य का आरंभ किया था। इसका आरंभ विन् संयोगों में हुआ उनका दिग्दर्शन आज इसकी समाप्ति के समय अप्रासंगिक न होगा। मैंने संस्कृत का अध्ययन घर पर पिता जी से ही आरंभ किया था, पर गांवों में, और विशेषतः राजस्थान के गाँवों में, उस समय परीक्षा का रिवाब न था। लोग परीक्षाओं से प्रायः घृणा करते थे। अतः बीस- वाईस वर्ष की अवस्था तक मैंने कोई परीचा न दी। नाथद्वार जाने पर यद्यपि मैंने सिद्धांतकौमुदी पढ़ ली तथापि वहाँ भी हमारे गुरु बी परीच्षाविरोधी ही मिळे, किंतु मैं समय की गति से परिचित हो चुका था, अतः मैंने परीक्षा देना उचित समझा। मैं वृत्तिप्राप्त विद्यार्थी था, अतः बिना अ्नुमति के परीक्षा दे नहीं सकता था। अंत में बढ़ी कठिनता से सन् १६२० में मुझे परीक्षा की अनुमति मिली। उसी वर्ष मैंने व्याकरय में गवनमेंट संस्कृत कालेन काशी की संपूर्यामध्यमा परीक्षा दी। भगवत्कृपा से उचीर्यां भी हो गया। परन्तु उचीर्य होने के बाद विदित हुआ कि मध्यमोत्तीगाता तो पांडित्य में प्रवेशमात्र है, पर श्रागे आचार्य परोचा के अतिरिक्त उन दिनों कोई परीक्षा ही नहीं थी और वह भी होती थी छः वर्ष में समाप। वृचिकशित व्यक्ति के लिए इतने
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दिन परीक्षा में लगे रहना असंभव नहीं तो अतिकठिन तो था ही, क्योंकि और कोई निर्वाह का साधन नहीं था। पर इतने पर भी साइस करके आचार्य परीच्षा में प्रविष्ट होना निश्चित कर लिया। वृच्तिकर्शितता के कारण मैंने उन दिनों अध्यापकता भी स्वीकार कर ली। मेरे सामने उस समय आचार्य परीक्षा के लिए दो ही विषय थे व्याकरण और साहित्य। उनमें से मैंने साहित्य ही लेना उचित समझा। कारण यह था कि मैं हूँ सदा से ही स्वतंत्र प्रकृति का व्यक्ति और वहाँ थी राजनीति की चालें, अतः मैं समझता था कि न जाने किस दिन मुझे यहाँ से छोड़कर चला बाना पड़े। साहित्य में मेरा प्रवेश था और उसे मैं बिना किसी की सहायता के भी तयार कर सकता था, व्याकरय में सहायता आवश्यक थी। हुआ भी ऐसा ही। परीचा आरंभ करने के तीन हो वर्ष बाद मुझे नायद्वार छोड़ देना पड़ा। उस समय मैं काव्यप्रकाश की परीक्षा दे चुका था, जिसमें उस वर्ष यावन्मात्र परीक्षार्थियों में एकमात्र मैं ही उचीर्य हुआ था। श्ब रसगंगाघर की तयारी करनी थी, पर उसी वर्ष मुझे नाथद्वारनरेश के साथ मुंबई और दक्षियायात्रा में, राजपंठित के रूप में, जाना पड़ा। उस समय रसगंगाघर के विकल्प में महिमभट्ट का 'व्यक्तिविवेक' भी था। मेरे पास न रसगंगाघर था न व्यक्तिविवेक। दच्िया यात्रा में बब पूना पहुँचा तो वहाँ मेरे परिचित एक प्रोफेसर महोदय के पास व्यक्तिविवेक मिल गया। उनने वह पुस्तक सुझे देना स्वीकार भी कर लिया। अतः यात्रा में मैंने परीक्षार्थ व्यक्तिविवेक की तयारी आरंभ कर दी। यात्रा से बब कार्तिक (अक्टूबर) में लौट कर नाथद्वार आया तब काशी का आया हुआ सूचनापत्र मिला कि 'व्यक्तिविवेक आउट श्फ स्टाक है, अतः केवल रसगंगाघर में ही परीता ली आयगी'। फरवरी में परीचा थी। केवल ३ मास रह गए। निर्याय-सागरवाली
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रसगंगाघर की पुस्तक तो मेरे पास थी नहीं, पर चव मैं फाशी आया था तो चौखंभा में मुद्रित रसगंगाघर की बीर्सा-शीया कापियाँ खरीदकर ले गया था। उन्हें देखना आरंभ किया। अशुद्ध और विषयविभागादिरहित उस पुस्तक में सिर मारकर नौकरी में व्यस्त रहते हुए भी परीक्षा की तयारी की, पर थी तयारी श्रधूरी ही। रसगंगाघर की स्वयं तयारी और वह भी अधूरी, ऐसी स्थिति में उत्तीरयं होने की आशा मृगतृष्णा ही थी, पर नवयुवकोचित उत्साह के कारण साइस कर ही लिया। परिणाम तो बो होना था सो हुआ ही। मैं श्रनुचीरस हो गया। यद्यपि यह अनुचीयां होना उस समय अभिशाप समझा गया और मैं श्रभी तक कभी अनुचोय नहीं हुआ था अतः इस अनुत्तीर्णता से उस समय अत्यंत दुःखी भी हुश, तथापि वही श्नुचीर्ाता इस हिंदी अनुवाद का कारण हुई। यदि मैं अनुचीर्ण न हुश होता तो यह अनुवाद कदापि न लिखा गया होता। मैंने सोचा कि मेरे साथी कहेंगे कि 'चौवेनी काव्यप्रकाश में तो निकल गये, पर रसगंगाघर में स्वयं गाड़ी खीच ले बाना तमाशा नहीं था। पंदित केशवप्रसाद जी मिश्र (अध्यत्त, हिंदी विभाग, हिंदू विश्वविद्यालय) ने भी मुझे एक बार लिखा या कि 'रसगंगाघर का अनुवाद हँसी खेल नहीं है'। मैं चाहता था कि इस नैयायिकमाषामय ग्रंथ का प्रचलित भाषा में अ्रनुवाद करूँ और दिखाऊँ कि मैं रसगंगाघर समझता हूँ अथवा नहीं। इसी धुन में मैंने इसका अनुवाद आरंभ कर दिया। यहाँ तक हुआ कि दूसरे वर्ष परीक्षा देने के समय तक मैंने इस अनुवाद के ५०, ६० पृष्ठ (फुल्सकेप), संभवतः रसप्रकरण की समासति पर्यन्त, अ्थवा कुछ अषिक, तयार कर लिए और उन्हें काशी लेता आया। महामहोपाध्याय श्री बालकृष्ण मिश्र, जो उस समय हिंदू विश्व- विद्यालय के संस्कृत कालेज के प्रोफेसर मात्र थे, मेरे परिचित थे।
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( ४ ) उनके एक शिष्य भी सदानंद सा नाथद्वार में मेरे सहयोगी थे। वैसे तो मिश्र जी सभी विषयों के बड़े पंडित थे, पर न्याय, वेदांत और साहित्य के तो माने हुए मार्मिक विद्वान् घे। मेरा विचार हुआ कि मैं यह अनुवाद उनको दिखाऊँ। परीक्षा देने के अनंतर पं० श्री साँवलजी नागर के साथ मैं उन पृष्ठों को लेकर हिंदू विश्वविद्यालय गया। वे उन दिनों रुइया होस्टल में रहते थे। सूचना देने पर वे बड़े प्रेम से मिले। बब मैंने उनसे इस अनुवाद की चर्चा की तो उनने सबसे पहले यही कहा कि 'पंडित बी, आप भी किस चक्कर में पड़े हैं। रसगंगाधर परु अभी तक संस्कृत में भी कोई अच्छी व्याख्या नहीं है। फिर हिंदी में उस पर लिखना तो और भी जटिल है।' मैंने इसके उत्तर में कहा कि 'यह मेरा बालोचित प्रयास है। आप सुन लें तो मुझे पता पड़ेगा कि यह उचित है वा अनुचित। यदि आपकी दृष्टि में न जँचे तो इन पृष्ठों को मैं बाकर ताक पर रख दूँगा। शभी तो मैं बहुत आगे बढ़ा भी नहीं हूँ।' इस पर उनने सुनने की स्वीकृति दे दी। मैंने पूछा 'कहाँ से सुनाऊँ।' उनने कहा-'रसप्रकरय ही सुनाइए'। मैंने सुनाना आरंभ किया। लगभग आध घंटे वे सुनते रहे। समाति पर उनने कहा-'सर्वाङ्गीणा संमतिर्मम'। फिर मैंने पद्यों का पद्यानुवाद भी सुनाया। उसे भी सुन कर वे बहुत प्रसन्न हुए। दूसरे वर्ष मैंने प्रस्ता- वना भी उन्हें सुनाई, प्रथम भाग छुपने पर उनको यह सब भेषा गया तो उनने वह संमति, जो द्वितीय संस्करण में सबसे प्रथम छपी है, स्वयं लिख भेजी। उनका मैं कृतश हूँ कि उनके उत्साहप्रदान से ही यह कार्य भगवान् की कृपा से आम संपूर्ण हुआ। भगवान् उनकी आरत्मा को शांति प्रदान करें। यही प्रार्थना है। यह तो हुई प्रसंगागत बात। श्रब प्रकृत कथा सुनिए। प्रथम संस्करण में इस अनुवाद के उत्प्रेवांत भाग का मुद्रण हुश था।
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उतना भी दो भागों में निकला था। इसका कारय यह था कि मेयो कालेश बाने से पूर्व मैं इतना ही भाग लिख पाया था। उनमें से भी प्रथमानन और उसकी भूमिका तो सन् १६२८ में ही प्रकाशित हो गए थे। सो उत्प्रेकषांत भाग तयार हो बाने पर हमने उसे द्वितीय भाग के रूप में प्रकाशित कर दिया, 'क्योंकि गवर्नमेंट संस्कृत कालेज, फाशी' में उत्पेक्षांत भाग ही पढ़ाया जाता है। विद्यार्थियों को उस समय उस भाग की अत्यंत आवश्यकता थी। द्वितीय संस्करण के समय यह विभाग हमें ठीक नहीं जँचा, क्योंकि प्रथमानन बहुत छोटा है और द्वितीयानन अपूर्ण होने पर भी बहुत बड़ा। सो उसमें से प्रथम संस्करय के समय तो उत्प्रेक्षांत भाग ही निकल पाया था। वह भी प्रथम भाग के दुगुने से भी शषिक हो गया था और अब द्वितीय संस्करय में तो रसगंगाघर संपूर्ण निकालना था। इसलिए एक भाग बहुत ही छोटा और दूसरा भाग मात्रा से भी शधिक बड़ा हुआ जा रहा था। अतः प्रथम भाग में अलंकारों से पूर्व वाला समग्र प्रकरण ले लिया गया और केवल अलंकारप्रकरण पृथक कर दिया गया। वह भी इस समय दो भागों में निकल सका है। विनोक्ति पर्यत द्वितीय भाग और शेष अलंकारों का यह तृतीय भाग। अगले संस्करण तक तो मैं शायद ही रह सकूँ, क्योंकि ६० वर्ष पर पहुँच चुका हूँ और शरीरस्थिति भी अच्छी नहीं है, अतः सभा से मेरा यह नम्र निवेदन है कि वे अगले संस्करण में इसके पुनः दो भाग कर दें। प्रथम भाग तो ज्यों का त्यों रहने दें और द्वितीय भाग में समग्र अंश निकाल दें, जिससे खरीदने वालों को भी सुविधा रहेगी। दोनों भाग खरीदने पर समग्र रसगंगाघर उनके हाथों में पहुँच जायगा। एक बात और है, इस संस्करण के निकलते समय सभा की प्रबंध-
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समिति ने यह निश्चय किया था कि रसगंगाघर मूल भी इसके साथ रहे, किंतु मेरी उस समय शारीरिक स्थिति अच्छी नहीं थी, अतः मैंने सोचा कि इतना बड़ा कार्य मुझसे संभाला न जा सकेगा, इस कारय ऐसा करने से मैं असहमत हो गया, पर अब मैं अनुभव करता हूँ कि ऐसा करके मैंने कुछ श्रच्छा नहीं किया। कारणा यह है कि इस ग्रंथ को प्रायः संस्कृत के विद्यार्थी ही खरीदते हैं और उनको परीक्षार्थ मूल संस्कृत की भी आवश्यकता रहती है। इसी का लाभ उठाकर अन्यों ने हमारे अतिप्रयत्नसिद्ध अनुवाद को यत्रतत्र थोड़ा बहुत बदल कर मूल सहित ग्रंथ प्रकाशित भी कर दिया है, पर उत्प्रेक्षांत ही; क्योंकि आगे सीधी सामग्री कहाँ से मिलती। यदि यह ग्रंथ मूल सहित प्रका- शित हो गया होता तो उन लोगों को ऐसा करने का साहस कदाचित् ही होता। दूसरी बात यह है कि मूल का उत्प्रेक्षांत भाग तो इस श्रनु- वाद की सहायता से संशोषित भी कर लिया गया है, पर शरगे के भाग में कई स्थल निर्णयसागर के आधुनिक संस्करण में भी कहीं कहीं शशुद्ध रह गये हैं। मैंने अनुवाद करते समय मूल ग्रंथ का भी आवश्यकता- नुसार संशोधन पुस्तकों और टीकाओं के आधार पर कर रखा है। यदि मैं अगले संस्करय तक न रहूँ तो मेरी उन पुस्तकों का मूलसंशो- घक महानुभाव उपयोग कर सकते हैं। मेरा तो सभा से भी अनुरोध है कि अगले संस्करया में इसे मूल और नागेश के 'गुरुममप्रकाश' सहित प्रकाशित कर दें, जिससे यह भंफट ही मिट जाय। आरगे जैसी इच्छा ! वैसे तो संपूण ही रसगंगाघर के अनुवाद में जो कठिनता इमने अनुभव की है, उसे परमात्मा के अतिरिक्त कौन समझ सकता है, क्योंकि हमें तो उन्हीं पुराने संस्करणों की अशुद्ध पुस्तकों से काम पड़ा है। पर आागे का भाग तो और भी कठिन रहा, क्योंकि उघर तो श्री- मधुरानाथ बी भट्ट के अतिरिक्त अन्य किसो ने आब तक भी हाथ नहीं
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लगाया है। भवतु, भगवत्कृपा से किसी भी प्रकार यह अनुवाद समास हो गया और हमारे रहते प्रकाशित भी हो गया। मेरे मेयोकालेब में नाने के बाद तो अनुवाद का कार्य एक प्रकार से बंद ही हो गया था, क्योंकि मूल अ्रंथ को यथावत् लगाकर उसका अनुवाद करने के लिये वहाँ अधिक अवसर न रहता था। छुट्टियाँ भी शरन्य कार्यों में समाप् हो जाती थीं। ऐसी स्थिति में भी थोड़ा बहुत अनुवाद तो कर लिया गया; किंतु समाप्ति की आशा कम ही रही। पर मेयोकालेख छोड़ देने के बाद इसका फिर यथाविधि आरंभ किया गया, किंतु फिर भी जटिल ग्रंथ की कई एक पंक्तियाँ ऐसी आ जाती थीं कि बिन पर न नागेश ने कुछ लिखा है न कोई अन्य साधन था। ऐसी परिस्थिति में कई छोटी-छोटी पंक्तियाँ भी कई कई दिन ले लेती थी। उदाहरय के लिये निम्नलिखित श्लोक को लीखिए।
संभूत्यर्थ सकलजगतो विष्णुनाभिप्रपभं यलालं स त्रिसुवनगुरुर्वेदनाथो विरिश्िः। ध्येयं धन्यालिभिरतितरां स्वप्रकाशस्वरूपं पद्माखयं तत् किमपि ललितं वस्तु वस्तुष्टयेस्तु। इस पद्य को पूर्रातया न नागेश ने लगाया है न सरला ने। नागेश की टिप्पणी यों है- "संभृतिरुत्पत्तिः, ऐश्वर्य च । विष्णुनामिं प्राप्तम्, विष्णुना अभिप्रपन्नं प्राप्तं च । स तादृशो ब्रह्माऽपि। यस्य कमलस्य नालं नालदएड:, यस्मादलं समर्थो न च । धन्यै ््रमरैः, धनिकपकिक्तमिश्र। पद्माख्यं कमलसंज्ञकं ... कमला-
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संज्ञकं च। अयं प्रकृतमात्राश्रितः । एवमग्रेपि। आराद्यं भग-
बस। यद्यपि नागेश ने शब्दों के भिन्न-भिन्न अर्थ स्पष्ट दिए, तथापि इस श्लोक के पूर्वाघं में क्रिया क्या है इसका विचार नहीं किया। यदि 'वेद' को क्रिया बनाई चाय तो 'नाथो' का क्या अर्यं हुआ और उसका अन्वय कैसे किया जाय। 'नाथो' का पदच्छेद यदि 'न + अथो' किया जाय तो उसे अन्य पदोंसे कैसे जोड़ा जाय। यह समस्या हमारे सामने खड़ी हुई। इस समस्यामें हमारा कितना ही समय व्यतीत हुआ। अरन्त में जब हमने विरिश्चि शब्द के योगार्थ पर विचार किया तब यह समस्या हल हुई। अब इसका अर्थ अनुवाद में देखा जा सकता है। थोड़ा सा उस अंश में अशुद्ध भी छुप गया है। कृपया विद्वान् लोग उसे शुद्धिपत्र से संशोधन करके उस पर विचार करें। यह तो एक उदाहरयमात्र है, ऐसी अनेक बटिल पंक्तियाँ रस- गंगाघर में हैं बिनके सोचने समझने में बड़ा सिर खपाना पड़ा है और कभी कभी तो जब तक समस्या इल नहीं हुई तब तक रुफ बाना पड़ा है। कई स्थानों पर सारा का सारा अनुवाद एकबार समाप्त कर लेने पर भी बदलना पड़ा। इन सब बातों को वही विद्वान् समझ सकते हैं जिनने ऐसे ग्रन्थों में सिर मारा है। जो अनुवाद को चलती कलम की चीज समझते हैं वे इस अनुवाद का महत्त्व नहीं समझ सकते, पर जो विद्वान् इन बातों को समझते हैं वे जानते हैं कि इमने इसमें क्या किया है। ऐसी स्थिति में चौखम्भा से हमारी हिन्दी को इघर उघर करके अनुवाद प्रकाशित करने वाले परिडत श्री मदनमोहन भा ने बो इस अ्रनुवाद की प्रशंसा करते हुए भी यह कहा है कि-
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"किन्तु संस्कृत के विद्वानों को इस अनुवादमात्र से संतोष नहीं होता, क्योंकि इसके साथ मूल नहीं है, और कहीं कहीं 'अवच्छेदक- सामय भाषा का' बाल की खाल निकालना कहकर अनुवाद करना भी छोड़ दिया गया है।"
यह कथन केवल मत्सरग्रस्तता नहीं तो और क्या है। क्या कृपा करके वे प्रथम संस्करय में भी काव्यलक्षण के अतिरिक्त अन्य कोई सथल छोड़ दिया गया है यह दिखा सकते हैं, विसे भी द्वितीय संस्करण में पूर्ण कर दिया गया है। वे मिलाकर देखें कि उनने उस भाग का अनुवाद कैसा किया है और हमारा अनुवाद कैसा है।
संस्कृत के विद्वानों को संतोष नहीं होने की जो बात उनने उठाई है उसे देखकर भी आश्चर्य होता है, जब कि काशी के मान्य विद्वान् इस अनुवाद का उपयोग कर रहे हैं और भा जी स्वयं इसका उपयोग कर चुके हैं, तब ऐसा कहना कहाँ तक उचित है। गवर्नमेण्ट संस्कृत महाविद्यालय काशी के साहित्यप्रधानाध्यापक श्री मुकुन्दशास्त्री खिस्तेजी स्वयं उस दिन कह रहे थे कि 'आपका अनुवाद बाबार में मिल नहीं रहा था, अतः उक्त अनुवादक ने वह पुस्तक मुझसे मंगवाई।' फिर भी इस अनुवाद से 'संस्कृत के विद्वानों को संतोष नहीं है' यह कहना कहाँ तक सच है, इसे वे स्वयं ही अपने हृदय पर हाथ रख कर सोचें। हमें तो ये अक्षर लिखने में भी संकोच हो रहा है, पर जब उनने व्यर्थ व्यङ्गथोक्ति की तो विवश होकर लिखना ही पड़ा। भवतु। संस्कृत के मार्मिक विद्वानों ने तो इस विषय में जो कुछ लिखा है वह संमतियों के रूप में द्वितीय संस्करण में उद्धृत कर दिया है। का जी के माने हुए साहित्यशास्त्र के मार्मिक विद्वान् श्रीमथुरानाथणी शास्त्री ने निर्ायसागर से प्रकाशित अपना संपादित रसगंगाघर मुझे देते हुए पुस्तक पर लिखा है-
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सप्रम सबहुमानं सानन्दं चोपदीकुरुते।।" इसके अतिरिक्त उनने अपनी भूमिका में भी लिखा है- "साहित्याचार्येग श्रीमता पुरुषोत्तमशर्ममहाभागेन रसगंगाघरे कियान् परिश्रम: कृत इति त एव तत्वतो आानीयुयैस्तदनूदितो हिन्दी- रसगंगाघरस्याद्यावधि मुद्रितो भागो मनोयोगेन पौरोभाग्येनापि वा हष्ट: स्यात्। मूलशोधनं कृत्वा एवंविघभाषायां लिखितस्य पुस्तकस्य हिन्दी- भाषायामर्थविशदीकररं न यस्य कस्यचित्कार्यम्।" उसी भूमिका में आगे भी लिखा है- "परममार्मिकस्य साहित्याचार्यपं० श्रीपुरुषोत्तमशर्ममहाभागस्या- प्युपकारभारमह्मनत्पं घारयामि, यतो हिन्दीरसगंगाघरावलोकनमपि मे शोघने सहायकमासीत्।"
इतने पर भी जिन्हें 'संस्कृत के विद्वानों के संतोष न होने की बात सूझती है उनसे क्या कहा जाय' यदि कवि श्रीहर्ष के शब्दों में कहें तो यों कह सकते हैं कि- "मदुक्तिश्चेदन्तर्मंदयति सुघीभूय सुधियः किमस्या नाम स्यादरसपुरुषानादरभरैः ॥" पर ऐसा कहना मेरी प्रकृति के अनुकूल नहीं है। भवतु। यह कथा यहीं समाप् की जाती है। इस भाग में अलंकारों के विषय में अतिविस्तृत भूमिका देने का विचार था और वह प्रायः तयार भी हो गई, किंतु यह भाग बहुमूल्य हो जाता और उस विवेचना का दर्शन भी उन्हीं लोगों को होता जो
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इतना बढ़ा ग्रंथ खरीदते, अतः यहाँ उसका उचित संक्षेप ही दिया जा रहा है। पाठक इसीसे संतोष करें। वह ग्रंथ 'भारतीय साहित्य समीक्षा' अथवा ऐसे ही शन्य किसी नाम से पृथक् प्रकाशित किया चाय ऐसा विचार है। आगे जैसी भगवदिच्छा। अंत में मार्मिक विद्वानों से निवेदन है कि-इस अनुवाद का अ्रधिकांश मेरी रुग्णावस्था में लिखा गया है। उसकी मुद्रमालयोचित प्रतिलिपि भी अन्यों और प्रायः अनभिश्ञों द्वारा ही को गई है। भ्ूफ- संशोधन यद्यपि मैंने ही किया है,पर वह भी रुग्ावस्था में ही, अरतः यदि शुद्धिपत्र दे देने पर भी कहीं अशुद्धियाँ अथवा भ्रम रह गया हो तो कृपा कर संशोषित कर लें और संभव हो तो मुझे भी सूचित करें, जैसा कि श्रीमथुरानाथणी भट्ट ने 'रोषोदयो व्यंग्यः' के स्थान में श्रशुद्ध सुद्रित 'रोषादयो व्यंग्याः' के अनुवाद के विषय में लिखा है, विसे द्वितीय संस्करण में शुद्ध कर दिया गया है।
इस कार्य में अनेक लेखकों ने द्रव्य लेकर तथा कई मेरे शिष्यादि ने बिना द्रव्य भी प्रतिलिपि और श्रुतलेख में सहायता की है उन सबका मैं हृदय से कृतज्ञ हूँ। उनमें से श्री पं० दामोदर का साहित्याचार्य, पं. श्री रामावतार पांडेय आयुर्वेदाचार्य और पं० श्री हीरामणि जी व्याकरणाचार्य विशेष स्मरणीय है।
ग्रंथ की समाप्ति के समय मेरे प्रिय शिष्य फाशीनरेश श्रीविभूति- नारायगासिंह बी को तो कैसे भुलाया जा सकता है, बिनके शुभाश्रय और प्रेमवश ही यह कार्य आज समाप् हो रहा है। भगवान् भ्री कृष्ण उन्हें सर्वदा सुखी रखें।
रामनगर (वारायासी) पक्षय तृतीया २०१५ विक्रम संवत्सर पुरुषोत्तमशर्मा चतुर्वेदी
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विषय-विवेचन
उपक्रम
प्रथम भाग में काव्य-सम्बन्धी विविध विषयों पर विचार किया जा चुका है। द्वितीय और तृतीय भाग में अ्रब केवल अलंकार रक्खे गए हैं। साहित्यशास्त्र में अलंकारों का महत्व सदा ही अनुपेक्षणीय रहा है। ध्वनि-विवेचन के पूर्व तो यह शास्त्र, अलंकारशास्त्र के ही नाम से अभिहित होता था। सभी ग्रंथकार अपने ग्रंथों के नाम 'काव्यालंकार' अथवा केवल अलंकार' शब्द देकर ही रखते थे, जैसे भामह का काव्यालक्कार, वामन का काव्यालङ्कारसूत्र, रुय्यक का अलंकारसर्वस्व, वाग्भट का काव्यालङ्गार इत्यादि। यद्यपि अब यह बात नहीं रही, वथापि बिना अलंकारों का ज्ञान प्राप्त किए, कोई साहित्यशास्त्र का पण्डित नहीं हो सकता, इसमें तो सन्देह नहीं। इसीलिए पण्डितराज ने अपने ग्रंथ में अलंकारों का बड़े विस्तार से पाण्डित्य-पूर्ण विवेचन किया है। उस विवेचन में प्रवेशार्थ आवश्यक विवेचन यहाँ दिया जाता है।
अलंकार का सामान्य लक्षण 'श्रलंक्रियतेनेनेत्यलङ्कारः" इस व्युत्पत्ति के अनुसार शब्द और अर्थ के-फिर वह अर्थ चाहे वाच्य हो, लक्ष्य हो, श्रथवा व्यङ्गग्य हो-सुशोभित करनेवाले (अर्थात् उत्कृष्ट बनानेवाले) धर्मों को अलंकार कहा जाता
:- "करणव्युत्पर्या वसते' (वामन; वृ्ति)
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है। इमने प्रथम भाग की भूमिका में गुणों और अलंकारों का मेद समझाते हुए दसडी और वामन के मत के अनुसार यह बताया है कि "काव्य में काव्यत्व लानेवाले धर्मों का नाम गुय है और इस काव्यत्व को उत्कृष्ट करनेवाले धर्मों का नाम अलंकार है। 'काव्यशोमायाः कर्चारो धर्मा गुयाः' "तदतिशयहेतवस्त्वलंकाराः" (वामन) (देखिए प्रथमभाग की भूमिका का विषयविवेचन भाग)। वामन और दण्डी के बाद अन्य विद्वानों ने अपनी-अ्रपनी बुद्धि के अनुसार अन्यान्यलक्षय भी बनाए हैं। जयदेव ने चन्द्रालोक में लिखा है- "शब्दार्थयोः प्रसिद्धया वा कवेः प्रौढिवशेन वा। हारादिवदलंकार: सन्निवेशो मनोहरः ।। अर्थात् प्रसिद्धि के अ्रथवा कवि की प्रौढि (श्रतिशयोक्ति) के शरधीन होकर जो शब्द शर्थ का, हार आदि की तरह, मनोहर विन्यास होता है उसे अलंकार कहते हैं। साहित्यसार में लिखा है-
"रसादिभिन्नत्वे शब्दविशेषश्रवोचरम्। चमत्कारकरत्व यदलङ्कारत्वमत्र तत् ।। शर्थात् रसादि से भिन्न होने पर विशेष प्रकार के शब्द सुनने के अ्रनन्तर होनेवाली चमत्कारों की उत्पादकता को अलंकारत्व कहते हैं। तात्पर्य यह कि शब्द सुनने के अनन्तर जो कुछ भी चमत्कारखनक वस्तु प्रतीत होती है, उसे अलंकार कहा जाता है, पर रस आदि को नहीं।" कुवलयानन्द की टीका में भी नव्यन्याय की शैली से इसी बात को लिखा ह-
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"अलंकारत्वं चरसादिव्यङ्भिन्नत्वे सति्दार्थान्यतरनिषठा या विषयतासम्बन्वावच्छिना चमत्कृतिजनकतावच्छेदकता तदवच्छेदकत्वम्।" इस लक्षण में साहित्यसार की शैली के अनुसार रसादि से भिन्न तो कहा ही, पर व्यङ्गयों से भिन्न होना और समाविष्ट किया गया है, अर्थात् कुवलयानन्द के टीकाकार (अलंकारचन्द्रिकाकार) के हिसाब से कोई भी व्यङ्गय कभी अलंकार नहीं हो सकता। पर इस बात का रसगंगाघर में बार बार खंडन किया गया है और कहा गया है कि व्यङ्गषों के अलंकार होने में कोई बाघा नहीं, अतः इस अंश को छोड़ने पर साहित्यसार के लच्षण में और इस लक्षया में किञ्चित् भी भेद नहीं रह जाता। काव्यप्रकाशकार और उनके अनुयायी साहित्यदर्पसकार ने अलंकारों के कुछ अन्य प्रकार के लच्षय बनाए हैं। काव्यप्रकाशकार ने लिखा है- "उपकुर्वन्ति तं सन्तं येङ्गद्वारेय जातुचिद्। हारादिवदलङ्कारास्तेऽनुप्रासोपमादयः॥ शब्द और अर्थ के द्वारा अर्थात् शब्द और अर्थ में विशेषता उत्पन्न करके खो धर्म यदि रस हो तो उसका भी उपकार करते हैं- अर्थात् उसका भी चमत्कार बढ़ाने में काम देते हैं, वे अलंकार हैं, जैसे कि हारादिक कराठ आदि के उत्कर्ष के द्वारा देहवारी का उत्कर्ष करते हैं। सारांश यह कि यदि रस हो तो उसका उत्कर्ष करें, अरन्यथा केवल उक्ति की विचित्रता में समाप्त हो बांय ऐसे शब्द और अर्थ के द्वारा रस के उपकारक धर्मों को अलंकार कहते हैं।" साहित्यदर्पसकार ने इसी का अनुवाद-सा लिखा है। वे कहते हैं कि-
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"शब्दार्थयोरस्थिरा ये धर्माः शोभातिशायिनः ।
शब्द और अर्थ की शोभा बढ़ानेवाले उन अस्थिर धर्मों को, जो रसादिकों का उपकार करते हैं, अंगद आदि की तरह अलंकार कहा जाता है।" इन दोनों लक्षणों के साररूप में काव्यप्रदीपकार आदि ने-(१) रस के उपकारक होने पर भी रस में न रहने वाले होना, (२) रस के उपकारक होने पर भी रस को छोढ़ देने वाले होना (३) अ्नियत रूप से रसों का उपकारक होना, इस प्रकार तीन लच्षण बनाए हैं। इस तरह यह बात सिद्ध हुई कि दंडी और वामन का, काव्य प्रकाशकार और साहित्यदर्पण का, कुलयानंद की टीका और साहित्य- सार का इस तरह दो दो लक्षया प्रायः समान हैं और चंद्रालोक का लक्षण सबसे विलक्षण है। इस सबका संक्षेप यह हुआ कि :- दंडी और वामन 'काव्य का उत्कर्ष बढ़ानेवाले धर्मों को अलं- कार कहते हैं। काव्यप्रकाशकार और साहित्यदर्पसकार 'रस में न रहनेवाले रस के उपकारक धर्मों' को अलंकार मानते हैं। कुवलयानंद का टीकाकार और साहित्यसारकार शब्द सुनने के अनंतर जो रसादिव्यंग्यों के अतिरिक्त श्रन्य चमत्कारजनक वस्तु प्रतीत होती है उसे अलंकार कहते हैं। पर इन सबसे सरल, संचित और सुबोध लक्षण है पंडितराज का। वे कहते हैं "सुन्दरत्वे सत्युपस्कारकत्वमलंकारत्वम् (परिकरालक्कार के प्रसंग में) अर्थात् चमत्कारजनक होने पर परिष्कृत करनेवाले को अलं- कार कहते हैं" सारांश यह कि बो शब्द, यद्ा वाच्य अ्थवा व्यंग्य अर्थ सुंदर हो और दूसरे की सुंदरता बढ़ावे वह अलंकार है। यहाँ शर्थ के विषय में यह समझ लेना चाहिए कि जो चमत्कारजनक अर्यं अपने
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आाप में समाप्त हो जाता है वह अलंकार नहीं है, और जो दूसरे का उपस्कारक श्रथवा परिष्कारक होता है वह अलंकार है। गुणों में इस लक्षण की अतिव्यासि इसलिए नहीं होती कि वे रस के श्रंग और अतएब उपकारक हैं उपस्कारक नहीं। इस बात को स्पष्ट करने के लिए 'शन्दार्थघर्मत्वेन' शब्द और बोड़ देना चाहिए। अतः 'शब्दार्थ- धर्मत्वेन सुन्दरत्वे सत्युपस्कारकत्वम्' अलंकार का निष्कृष्ट लच्षण हुआ। हिंदी में इसका अर्थ यह हुश कि जो वस्तु शब्द अथवा शर्थ में रहे, सुंदर हो और शन्य की सुंदरता बढ़ावे वह अलंकार है। अलंकार के भेद अलंकार दो प्रकार के हैं-(१) शब्दालंकार औरर (२) अर्था- लंकार। अग्निपुराय और भोजराज ने कुछ उभयालंकार भी माने है, पर बाद में वे लुप हो गए। शब्दालंकारों का तो काव्य में केवल शान्दिक शोभा बढ़ाने के अतिरिक्त श्रन्य कोई उपयोग नहीं। यमक औरर शब्दालंकार तो यदि प्रयासपूर्वक लाये चाँय तो रसाभिव्यक्ति में बाघक भी हो जाते हैं। ध्वनिकार तो इन यमकादि से इतने चिढ़ गये हैं कि शृंगाररस में तो उनने उनका सर्वथा बहिष्कार करने की ही श्राज्ञा दे डाली है। उनने लिखा है- ध्वन्यात्मभूते शृङ्गारे यमकादिनिबन्धनम्। शक्तावपि प्रमादित्वं विप्रलम्भे विशेषतः ।। अर्थात् ध्वनि के आत्मारूप श्रृंगार में यमक आदि की रचना करना, यदि कवि में रचना करने की शक्ति हो-वे स्वभावतः श्र जाते हों, तो भी कहना चाहिए कि, कवि की असावधानता है जो उसने इन्हें आ जाने दिया, और यदि विप्रलंभश्रंगार के काव्य में वे श्र गए तब तो विशेष रूप से असावधानी समझी जायगी। ऐसी दशा में यमकादिक शब्दालंकारों को विशेष-रूपेण साधारण
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लोगों की प्रसन्नता का साधन ही कहा था सकता है, मार्मिकों की प्रसन्नता का नहीं। हाँ अनायास आए हुये अनुप्रासादिक शब्दालंकार काव्य के अनुकूल होने से शाब्दिक चमत्कार को अवश्य बढ़ा देते हैं। इसमें कुछ भी संदेह नहीं। संभवतः इसीलिये रसगंगाघरकार ने शब्दा- लंकारों से पूर्व अर्थालंकारों को स्थान दिया है और दुर्भाग्यवश ग्रंथ के अपूर्य रह जाने से शब्दालंकारों का रसगंगाधर में समावेश ही नहीं हो पाया। पर अर्थालंकार केवल काव्य की शोभा ही नहीं बढ़ाते, वे विषय को स्पष्ट करने में भी उपयोगी होते हैं। 'मोती से दाँत' कहने पर जो दाँतों की कांतिमत्ता, उज्जलता आदि स्पष्टतया प्रतीत होती है वह अरन्य पाँच सात शब्दों के प्रयोग से भी नहीं हो सकती। यह बातः किसी सहृदय से छिपी हुई नहीं है और काव्य की सुंदरता तो अलंकारों से बढ़ती ही है। अतएव अग्निपुराय में लिखा है :- "अलङ्करयमर्थानामर्थालद्कार इष्यते। तं विना शब्दसौन्दर्यमपि नास्ति मनोहरम्। अर्थालङ्काररहिता विधवेव सरस्वती।। अर्थात् शथों के सुशोभित करने को अर्थालंकार कहते हैं। इसके बिना शब्दों की सुंदरता भी मनोहर नहीं होती। तात्पर्य यह कि शर्था- लंकाररहित शब्दालंकार मार्मिकपुरुष का चिच्त अपनी तरफ नहीं खींच सकते। अर्थालंकार से रहित वायी विधवा सी प्रतीत होती है, जैसे स्री के सौमाग्यसूचन और सौंदर्य दोनों के लिए मिंदी, चूड़ी आदि शृंगार अपेक्तित हैं, उसी तरह वागी को अर्थालंकारों की आवश्यक अपेचा है।" पर साथ ही यह भी ध्यान रखिए कि मात्रा से अधिक आभूषणों के कारय जैसे मारवाहिनों की स्वाभाविक सुंदरता दब सी जाती है वैसे अलंकारों की भरमार के द्वारा वाणी की स्वाभाविक सुन्दरता को दबा २
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देना भी अनुचित है। तात्पर्य यह कि अर्थालंकार वाणी के लिए शरव- श्यक और अपेक्षित वस्तु हैं, पर उनका उपयोग एक मात्रा में होना चाहिए। मात्रा से अधिक होने पर सभी वस्तुएं भार सी हो बाती हैं। अलंकारों के विकास का इतिहास अलंकार प्रारंभ में बहुत ही कम थे। नाट्य-शास्त्र में तो केवल चार अलंकारों का ही वर्णन है। नाट्यशास्त्र के समय में, प्रतीत होता है कि, इनसे अधिक अलंकार प्रसिद्धि में नहीं थे, अन्यथा नाट्य के समस्त शगों का सविस्तर वर्न करनेवाले भरतमुनि अलंकारों पर विस्तृत लेख लिखे बिना न रहते। वे ही अलंकार बढ़ते-बढ़ते आज सौ से भी ऊपर की संख्या पर पहुँचे हैं। आचार्य दंडी तो छठी शताब्दी में ही अलंकारों की बढ़ती हुई बाढ़ को देखकर विकल हो उठे थे। उनने लिखा है- "काव्यशोभाकरान्धर्मानलङ्कारान्प्रचक्षते। ते चाद्यापि विकल्प्यन्ते कस्तान्कार्त्स्न्येन वत्त्यति ॥ अर्थात् काव्य में शोभा करनेवाले धर्मों को अलंकार कहते हैं। आज भी उनमें विकल्प हो रहे हैं। कोई कितने बताता है तो कोई कितने। कौन उन्हें पूर्णतया कहेगा।" पर इससे आप यह न समफिए कि जो कोई आचार्य पुस्तक लिखने बैठा, उसने दो-चार अलंकार बढ़ा दिए और इस तरह यह संख्या सौ से ऊपर जा पहुँची। कई लोगों ने पुराने अलंकारों में काँट छाँट भी की है। कई ने तो कम से कम करने का भरसक प्रयास किया है। पर उनलोगों का प्रयास नक्कारखाने में तूती की आवाज ही रही। अलंकारों की बाढ़ को काव्य-प्रेमी जनता स्वीकार ही करती गई। नीचे दी गई सूची से आप को विदित होगा कि किस आचार्य ने इन्हें कितना माना है-
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संख्या समय आचार्य ग्रंथ शब्दालंकार अर्था० उभया० योग
१-त्रेतायुग (ग्रंथलेखानुसार)' भरत नाट्यशास्त्र १-३-० =४ २-द्वापर का अंत (पुराणों के अनुसार)२ वेदव्यास श्रग्निपुराय ६-८-६=२३ ,-As there is no other extant work on the theory of poetics and allied topics as old as 300 A. D. The arzara must be regarded in the present state of our knowledge as the oldest work on the भलंकारशास्त्र (History of Sanskrit Poetics by P. V. kane poge 46) ( ?& ) २-अग्निपुराण के विषय में यद्यपि महामहोपाध्याय काणे महोदय का यह कथन है कि- The अग्निपुराण is later than भरत, भामह, दंडी, The ध्वन्यालोक and pro- bably mr and has no claim to be regarded as the original work on the wcianara, moreover, medieval writers guided by their reverence for puranas in general because they were ascriled to the mythical Vyasa (व्यास) naturally looked upon the अग्निपुराण as the most ancient work on the अलंकारशाख्र (काये page 10) अर्थात् अ्ग्निपुराण; भरत, भामह, दंडी, ध्वन्यालोक और संभवतः भोज से भी बाद का है और भलंकारशास्त्र पर मौलिक कृति के रूप में संमानित करने का हक नहीं रखता, इसके अतिरिक्त कि
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संख्या समय आ्रचार्य अ्रंथ शब्दालंकार अर्था० उभया० योग
३-दापर का अंत (संदिग्ध)3 वेदव्यास विष्णुघर्मोच्तर ०- १७ - ० =१७ मध्यकाल के लेखक साधारणतया पुराणों के प्रति आदर के अभ्यस्त थे, क्योंकि वे पुराणोक्त ब्यास द्वारा वर्णित हैं, अतः स्वभावतः अग्निपुराण के प्रति अत्यंत प्राचीनता की दृष्टि से देखते थे।" तथापि अग्निपुशायोक्त अलंकार प्रकरण का गंभीर अध्ययन करने से यह प्रतीत होता है कि भामहादिक उसके बाद के ही हैं। कम से कम हम इस मत के हैं। काे ने अपने मत का समर्थन केवल इसी आधार पर किया है कि अग्निपुराण में जो कुछ है वह अन्य पुस्तकों से संगृहीत है। अतः जहाँ (२० ) अग्निपुराण वाली बात मिल जाय उन सबसे अग्निपुराए नवीन है यह समझना चाहिए। पर यह आधार अत्यंत दुर्बल है। जिस अमरकोश को वे अग्निपुराण के संग्राध्यों में सबसे पुराना मानते हैं वही स्वयं कहता है-'समाहृत्यान्यतम्त्राणि ( १-१-२)। अर्थात् दूसरे तन्त्रों (शाखतरों) से संगृहीत करके यह अरंथ लिखा गया है'। ऐसी स्थिति में अग्निपुराण को नवीन मानना जँचता नहीं। पर जब तक कोई प्रबल प्रमाण प्राप्त न हों तब तक नवीनताबादियों को समझाना कठिन ही है। भवतु। जिसे जो जँचे सो माने। हम इस विवाद में पढ़ना नहीं चाहते। इमको तो ग्रंथ पढने से उसमें प्राचीनता ही प्रतीत हुई। पाठक अन्यत्र किये गये हमारे अलंकारों के विवेचनों से इस बात का अनुभव कर सकेंगे। २-अभिपुराण की सी ही गति इसकी भी है। परन्तु यह तो स्पष्ट कहा जा सकता है कि उसमें भी जो अलंकार आये हैं वे नवीन नहीं हैं।
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संख्या समर्य प्राचार्य ग्रं्थ शब्दालंकार अर्धा० उभया० योग
४-पाँचवीं शताब्दी४ भामह काव्यालंकार २ - ३६ - ० =२६
५-छुठी शताब्दी५ दंडी काव्यादरश २-३५ - ० =२७
६-आठवीं शताब्दी का अंत या नवी उन्द्रट काव्यालंकार-
शताब्दी का प्रारंभ६ संग्रह ४- ३७ -० =४१
७-नवम शताबदी (८२५-८७५)" रुद्रट काव्यालंकार ५ - ५७ - ० =६२
४ -- "दिकुमागादर्वाचीनस्वेन वागाभट्टाज्ज प्राचीनतया श्रीमान् भामहाचार्यइचतुर्थयञ्चमशतक- योमंध्यभागे एव प्रादुरबभूवेति साधु वक्तु® शक्वते।" श्री बटुकनाथ एम० ए० तथा श्री बलदेव उपाध्याय ( २१
एम० प० । भामह के काव्यालंकार की भूमिका। -The 6th century had been accepted by many scholars as the date of Dandin. Vide Maxmuller, weber, Prof. Macdonell and Col. Jacob (कायो Page 124) ६-"जयापीढनृपतिराजयकालस्तु ७७९ वर्षमारम्य ८१३ वर्षपर्यन्तमासीदिति ज्ञायते। अतस्त- सभापतेर््टभष्टस्यापि जीवितसमयः स एव" ( उद्भटके काव्यालंकारसंग्रह की प्रस्तावना) .- He is quite unaware of the afa theory and has great affinity with wHE and aa He was probably contemporary of or a little older
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संर्या समय आचार्य अंथ शब्दालंकार अ्रथो० उभया० योग
८-नवम शताब्दी का शंत वामन अलंकारसूत्रवृच्ति २-३० =३२
६-ग्यारहवीं शताब्दी९ भोजराज सरस्वती कराठाभरणा २४-२४-२४ = ७२ १०-ग्यारहवीं शताब्दी का उच्चरार्घ१० मम्मट काव्य प्रकाश ६-६१ -०=६७
११- बारहवीं शताब्दी का पूर्व भाग"' रुय्यक अलंकार सर्वस्व ७-७ -०= ८२ than the author of the ध्चनिकारिका and flourished between 825 and 875 A. D. (कायो Page 146) ( २२ )
८-वामन therefore वामन flourished before 900 A. D. ( History of Sanskrit poetics by P. V. Kane Page 138. ६- भोजदेव (१०१०-१०५५ A. D.) काव्यमालासंस्करण, भूमिका। The सरस्वतीकसठाभरण and शंगारप्रकाश must have been composed between 1005-1054 ( काये) १०-The date of the काव्यप्रकाश lies between 1050 and 1100 A. D. (कायो Page 263) "-The date of aw can be easily determined. He quotes from the विक्रमांकदेवचरित (Composed about 1085 according to Buhler ) and
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criticizes the व्यक्तिविवेक and the काव्यप्रकाश therefore the सरवस्व is later than 1100 A. D. ( काखे Page 273) अस्य प्रयोता उद्दटविवेकाख्यअ्रन्थकर्तृराजानकतिलकसूनू रुचकापरनामा रुय्यकाचार्यः खिनिस्ता- ब्दस्य द्वादशशतकपूर्वभाग आसीत् (पं० गिरिजाप्रसाद द्विवेदी अलंकारसवंस्व की भूमिका द्वि० सं०) यद्यपि गिरिजाप्रसाद जी ने अलंकार सर्वस्वकार को काव्यप्रकाशकार से पूर्ववर्ती सिद्ध करने का प्रयास किया है। जैसा कि वे कहते हैं- अ्नेन च संकरालङ्वारं विचारयता- . राजति तटीयममिहतदानव-रासातिपातिसाराव-नदा। गजता च यूथमविरतदानवरा साति पाति सारा वनदा ॥ (हरविजय ५ सर्गः) २१ ) इति रक्ाकरश्लोकस्थित: प्राचां शब्दालंकारसंकरो दूषितः । स च मम्मटेन दशमोल्लासे समर्थितः । अपिच रुय्यकेया यद्व्यतिरेकालक्कारे उपमानादुपमेयस्याधिक्यमित्यपरो लक्षराप्रकारो लक्षितः, सोऽपि 'क्षीणः क्षीणोऽपि शशी' इति तदीयोदाहरणमुपदश्यं निराकृतः । अन्यज्न 'स्फुट मेकत्र विषये शब्दार्थालंकृति- दयम्' इत्यादिकारिकाव्याख्यानेऽलंकारानुद्दिश्य 'कुतः पुनरेष नियमो यदेतेषां तुल्येऽपि काव्यशोभातिशय हेतुत्वे कश्चिदल द्वार'-इत्यादिना रुय्यक एव प्रत्युक:। पतेन नमोल्लासे श्लेषभेदावख्यानावसरे-'ननु वरितादि- गुणभेदात्' इत्यारम्य 'कथमयं शब्दालंक्कारः' इत्यन्तः पूर्वपक्षअन्थोऽपि रुथ्यकमतनिरासपरः संगच्छते।" तथापि यह प्रयत व्यर्थ ही है। क्योंकि एक तो जिन बातों को पं० गिरिजाप्रसाद जी ने रुय्यक की समझकर काव्यप्रकाश द्वारा खसिडत मानी हैं, वे वास्तव में रुय्यक की ही हैं-इसमें कोई प्रमाण नहीं।
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संर्या समय आ्राचार्य ग्रंथ शब्दालंकार अर्था० उभया० योग
१२-बारहवीं शताब्दी का पूर्वाघ१२ वाग्भट वाग्भटालंकार ४ - ३५ -०= २६
१३-बारहवीं शताब्दी का पूर्वार्ध13 हेमचन्द्र काव्यानुशासन ६- २६ - ० =३५ कारण, 'राजति तटी०' वाला शब्दालंकारसंकर प्राचीनों का उदाहृत नहीं है, किन्तु मम्मट का ही है और ऐसी स्थिति में मम्मट के उदाहरणा से रुय्यक ने मतभेद प्रकट किया है-यह सहज ही कहा जा सकता है, दूसरे 'क्षीणः क्षोणोऽपि शशी' यह उदाहरण भी रुद्रट का है (अ० ७ श्लोक ६०) मम्मट उसी की आलोचना कर रहे हैं, रुय्यक की नहीं। इसी तरह तीसरा प्रमाण भी शिथिल है, क्योंकि 'व्यवस्थितं च' ( २४ ) इस मम्मट के शब्द को लेकर 'वयवस्थितमत्रानुभाषितम्' यह रुय्यक ने लिखा है। चौथे प्रमाण में भी कोई बल नहीं है। क्योंकि यह रुय्यक का ही मत है यह किसी तरह सिद्ध नहीं किया जा सकता। और सबसे बढ़ा प्रमाण तो यह है कि रुय्यक काव्यप्रकाश की कारिका (४।३८ उद्धृत) कर रहे हैं। अतः अलंकारसवंस्व के विषय में महामहोपाध्याय कारो का जो यह कथन है-Therefore the अलं० स० was composed sometimes between 1135-1150 यही सही विदित होता है। '-Therefore a flourished in the first half of the 12 century and his काव्यालंकार was written between 1125-1143 A.D. (काखे Page 276) १३-The काव्यानुशासन was composed between 1136-1143 A. D. (कारो Page 279)
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संख्या समय श्राचार्य ग्रंथ शब्दालंकार अर्था० उभया० योग
१४-तेरहवीं शताब्दी का पूर्वार्ध१४ पी पूष वर्ष चन्द्रालोक जयदेव द - ६१
१५-चौदइवीं शताब्दी (सम्मवतः)१५ वाग्मट (२) काव्यानुशासन ६३ - ० =६६
१६-चौदहवीं शताब्दी का पूर्वार्ध१६ विश्वनाथ साहित्यदर्पय - ७६ -
१७- सोलहवीं शताब्दी का उत्तरार्धं१ केशवमिश्र अलंकारशेखर ७ - १४ =२१ १४-The चन्द्रालोक is to be placed .between 1200 and 1250 A. D. (२ )
(कायो Page 281) १५-He mentions the काव्यप्रकाश and वाग्भट Therefore he is later than 1150 A. D. He probably flourished in the 14 th Century (कामे Page 285 ) 18 -The date above assigned to Viswanath, Viz, between 1300- 1380 A. D. is thus confirmed by unimpleachable and independent testimony. १७- माणिक्यचन्द्रस्य राज्यारोहकालस्तु १५६३ मितः सीस्टान्दः। अतस्तदाभ्नितस्य के शवमिश्र- स्यापि समयस्तत्कृतग्रन्थनिर्माणकालश्च षोडशशताब्द्या उत्तरार्धस्तृतीयभागो वा निःसंशयं निश्चेतुं शक्यते। (अलंकारशेखर की प्रस्तावना, चौखम्भा संस्कृत सीरीज )।
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संख्या समय श्राचार्य अ्रंथ शब्दालंकार अर्था० उभया० योग
१८-सत्रहवीं शताब्दी का श्रप्पय कुवलयानन्द
प्रथम चरणा१८ दीचित ०-१२१ - ०=१२१
१६-अठारहवीं शताब्दी१९ विश्वेश्वर अ्रलंकार- (काव्यप्रकाशानुसार
कौस्तुभ उपर्युक्त तालिका से आप समझ सकते हैं कि अलंकारों के विषय में अब तक भारी मतमेद रहा अर्थालंकारमात्र) है। जिसने जब चाहा तब जितने उचित समझे उतने मान लिये, जिसका चाहा उसका बहिष्कार कर दिया और जिसका चाहा उसका नवीन निर्माय भी किया। कितनों ने तो यह भी नहीं लिखा कि क्यों ( २६ ) हमने नये अलंकार मान लिये और क्यों हम पुराने नहीं मानते, तथापि इनके इस विचित्र इतिहास पर एक साधारण दृष्टि अवश्य डाल लीजिये, जिससे साधारणतया यह ज्ञात हो सके कि इन अलंकारों का विकास किस तरह हुआ। १८-हिन्दीरसगंगाधर के प्रथम भाग की भूमिका में देखें। I would stick to the generally accepted dates of 1554-1624 A. D. (काखे Page 308)
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१-भरत ऊपर लिखा जा चुका है कि सबसे पूर्व लोगों को केवल चार अलंकार विदित हुए। वे हैं-(१) यमक. ( २) उपमा ( ३)· रूपक और (४) दीपक। भरत के समय में यही चार अलंकार थे। बाद में अनुप्रास भी सम्मिलित हुआ। इस तरह अत्यंत प्राचीन काल में दो शब्दालंकार और तीन अर्थालंकार प्रचलित हुए। उससे पहले क्या होगा सो भगवान् जानें। भामह ने यहा पाँच* अलंकार प्राचीनों के लिखे हैं। २-अग्नि-पुरा अग्निपुराण ने नौ शब्दालंकार3 आठअर्थालंकार और छः उभयालंकार इस तरह गिनाए तो सब २२ अलंकार हैं, पर अवांतर भेदों में वहाँ अन्य अलंकार भी आ गए हैं। जैसे अर्थालंकार 'सादृश्य' के अवांतर मेदों में उपमा, रूपक, सहोक्ति और अर्थातरन्यास
१-उपमा रूपकं चैव दीपकं यमकं तथा। अलंकारास्तु विज्ञेयाइचत्वारो नाटकाश्रया: ॥ (नाट्यशास्र अ्र० १७) २-अनुप्रासः सयमको रूपकं दीपकोपमे। इति वाचामलक्टारा: पञ्च वान्यैरुदाहताः॥ (भामह २-४) ३-छाया मुद्रा तथोक्िश्च युक्तिरगुंम्फनया सह। वाकोवाक्यमनुप्रासश्चित्रं दुष्करमेव च।। (अग्निपुराण ३४२-१६-२०) ४- स्वरूपमथ विभावना विरोधश्य हेतुश्च सममष्टधा।। (अग्निपराण ३४४-२-१)
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एवं उभयालंकार अ्भिव्यक्ति के एक भेद आक्षेप के आक्षेप, स्तुति (भप्रस्तुतप्रशंसा), समासोक्ति, अपह ति और पर्यायोक्ति इन अवांतर भेदों को, धो बाद में पृथक अलंकार हो गये, मिलाया बाय तो अग्नि- पुराण में कुल ३२ अलंकार होते हैं। इसी तरह शब्दालंकारों के शवांतर भेदों में भी अन्य अलंकार आर गए हैं। श्रग्निपुराय में सब मिलाकर इतने अलंकारों के नाम शए हैं- छाया, मुद्रा, उक्ति, युक्ति, गुम्फना, वाकोवाक्य, अनुप्रास, चित्र और दुष्कर ये नौ शब्दालंकार; स्वरूप (स्वभावोक्ति), सादृश्य, उपमा, रूनक, सहोक्ति, अर्थातरन्यास,उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, विभावना, विरोध, हेतु, सम (यथासंख्य), आक्षेप, स्तुत (श्रप्रस्तुतप्रशंसा), समासोक्ति, अपह ति और पर्यायोक्त ये सत्रह अर्थालंकार और प्रशस्ति, कांति, श्रचित्य, संक्षेप, यावदर्थता और अभिव्यक्ति ये छः उभयालंकार। इनमें से प्रायः श्रनेक शब्दालंकारों का (और कुछ अन्य का भी) सविस्तर वर्णन सरस्वतीकंठामरण में मिलता है। श्न्य शलंकारिकों ने तो इनमें से केवल अनुप्रास और उसी के भेद यमक तथा बंधों को और उमयालंकारों में से केवल आक्षेप और उसके भेदों को लिया है। शेष सबको प्रायः छोड़ दिया है। कुछ अलंकार अथवा इनके मेद अर्थालंकारों में भी प्रविष्ट हो गए हैं। हाँ, अर्थालंकार सब के सब वाद में उतर आए है। शब्दालंकारों के पहले इतने विस्तार एवं बाद में उनको छोड़ देने का कारण यह प्रतीत होता है कि एक तो पहले दृश्य काव्य और श्रव्य काव्य दोनों के अनुशासनग्रंथ संमिलित ही रहते थे, अतः अलंकारों में दृश्य फाव्य के उपयुक्त भी अ्रनेक बातें लिखी रहती थीं जिन्हें कि 'नाट्यशास्त्र' में 'लक्षय' आदि नामों से पुकारा गया है। दूसरे, उनमें से कुछ अलंकार ऐसे भी थे जो केवल दोषाभावरूप ही थे। अब दोषों
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का सविस्तर विवेचन हुआ तब उन अलंकारों का वाम्तविक स्वरूप विदित हुआ कि वे दोषों के हट जाने मात्र से अपनेशप श्र जाते हैं। बाद के आलंकारिकों ने ऐसे अलंकारों को कोई स्वतंत्र स्थान नहीं दिया। यह है अभिपुराण के अलंकारों की कथा। ३-विष्णुधर्मोत्तर विष्णुघर्मोत्तर में केवल १७ अलंकार हैं। यमक, स्वमावोक्ति, रूपक अर्थोतरन्यास, उत्प्रेक्षा, श्रतिशयोक्ति, विभावना, विरोध, सम, उपन्यास, अपर, व्यतिरेक, श्लेष, विशेषोक्ति, निंदास्तुति (व्याजस्तुति), निदर्शन और अनन्वय। इनमें केवल एक शब्दालंकार है और १६ अर्थालंकार हैं। यद्यपि केवल प्राथमिक संख्या की दृष्टि से इनमें अग्निपुराण की अपेत्षा २ अलंकार अधिक हैं, कितु शवान्तर विवरण में घाने से विदित होता है कि पिछले आठ अलंकार अधिक हैं। कहा नहीं जा सकता कि ये कहाँ से लिये गये हैं। पिछुले आलंकारिकों ने इन पर ध्यान नहीं दिया और ध्यान देने की बात भी नहीं थी, क्योंकि इनमें कोई नवीनता औरर वैचित्र्य नहीं है। ४-भामह भामह के समय से केवल श्रव्य-काव्यों को लेकर साहित्य-शास्त्र की एक स्वतंत्र स्थिति होती है। इस शास्त्र की प्रवृत्ि अलंकारों को प्रधान मान कर हुई है, और सबसे पहले अलंकारों का स्वतंत्र वर्णन इन्हीं के अ्रंथ में मिलता है। साथ ही भामह से पूर्व इन अलंकारों का किस तरह क्रमिक विकास हुआ यह बात भी इस अ्रंथ से विदित होती है। भामह ने प्रथमतः अनुप्रास, यमक, रूपक, दीपक और उपमा इस तरह पूर्वोक्त पाँच अलंकार लिखे हैं। साथ ही यह भी लिखा है कि ये पाँच अलंकार दूसरे विद्वानों द्वारा उदाहत हैं। अर्थात् उनमें से एक भी अलंकार उनकी नई सृष्टि नहीं है। हां, उपमा के प्रसंग में भामह ने प्रतिवस्तूपमा लिखी है और मालोपमा की सूचना मात्र दी है।
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ये अलंकार भरत से ही लिये गये हैं-यह नहीं ! कहा जा सकता। -कारण भरत ने एक तो अनुप्रास का नाम भी नहीं लिया दूसरे प्रति- वस्तूपमा और मालोपमा का भी वहाँ वर्णान नहीं है, अतः ये अलंकार किसी श्रव्य काव्य के ही विवेचनग्रंथ से लिये गए हैं। श्रव्य-काव्य के विषय में भी नाट्य शास्त्र के समय कोई अ्रंथ अवश्य था। अतएव उपमा के पाँच भेद लिखने के बाद भरत ने लिखा है-
"उपमाया बुधरैते मेदा जेया: समासतः। शेषा ये लक्षणौरनोक्तास्ते ग्राह्याः काव्यलोकतः ।
अर्थात् विद्वानों को उपमा के ये भेद संक्षेप में समझने चाहिए। शेष वो लच्षगों द्वारा यहाँ नहीं लिखे गए उन्हें काव्यसंसार से जानना चाहिए।" इस तरह यद्यपि यह निश्चय नहीं हो सकता कि ये अलंकार किस संदर्भ से लिये गए हैं। तथापि इसमें कोई संदेह नहीं कि ये अलंकार सबसे पहले हैं। भरत और मामह दोनों ही इन्हें सबसे पहले मानते हैं। इसके बाद भामह ने आक्षेप, अर्थोतरन्यास, व्यतिरेक, विभावना, समासोक्ति और अतिशयोक्ति इस तरह छः और इसी प्रकरण में यथा- संख्य, उत्प्रेक्षा और स्वमावोक्ति ये तीन अलंकार भी निरूपणा किए हैं। इनमें से व्यतिरेक को छोड़कर अन्य सभी अलंकार अग्निपुराय में मिलते हैं। इस प्रकरण में भामह ने हेतु, सूक्ष्म और लेश इन तीन अलंकारों का निषेध किया हैं। इनमें से हेतु का वर्णन तो अभिपुराय में है, पर सूक्ष्म और लेश अलंकार भामइ ने कहाँ से लिये हैं औरर उस समय उनके क्या लक्षण ये सो कहा नहीं जा सकता। भामह ने शरति- शयोक्ति की बढ़ी प्रशंसा की है। उनने लिखा है-
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( ३१ ) "सेषा सवंत्र वकोक्तिरनयार्थो विभाव्यते'। यत्नोऽस्यां कविमि: कार्य: कोलङ्कारोऽनया विना॥ अतिशयोक्ति ही 'वक्रोक्ति' है। यह सभी अलंकारों में रहती है। इसी से अर्थ चमत्कारी होता है। कवियों को इस विषय में यत्ा करना चाहिए। इसके बिना कौन अलंकार है? तात्पर्य यह कि अलंकारों का अलंकारत्व अतिशयोक्ति से ही है।" 'हेतु' आदि अलंकारों के प्रत्याख्यान में भी उनने यही हेतु दिया है कि उनमें कार्यकारण आदि समुदाय का कथन होता है, अतः इसे वक्रोक्ति का कथन नहीं माना जा सकता और बिना वक्रोकि के कोई अलंकार हो नहीं सकता। तृतीय परिच्छेद में भामह ने प्रेय, रसवान्, ऊर्जस्वी, पर्यायोक्त समाहित, उदाच (दो प्रकार का), श्लेष (तीन प्रकार का), अपह्न ति, विशेषोक्ति, विरोध, तुल्ययोगिता, अप्रस्तुतप्रशंसा, व्याजस्तुति, निदर्शना, उपमारूपक, उपमेयोपमा, सहोक्ति, परिवृत्ति, ससंदेह, शनन्वय, उत्प्रेक्षा- वयव, संसृष्ट, भाविक और आशीः इस तरह २४ अलंकार लिखे हैं। इन २४ में पर्यायोक्त अपह्न ति, विरोध, स्तुत, (अरप्रस्तुतप्रशंसा श्रथवा व्याजस्तुति में से एक) तथा सहोक्ति ये केवल पाँच अलंकार श्रभि पुराया में आए हैं। शेष नए हैं। इस तरह यह सिद्ध हुश कि-भामह ने शग्नि-पुराग की अपेक्षा कुल २० अलंकार अधिक लिखे हैं। वे हैं-व्यतिरेक, प्रेय, रसवान्, ऊर्जस्वी, समाहित, उदाच, श्लेष, विशेषोक्ति, तुल्ययोगिता, व्याषस्तुति निदर्शना, उपमारूपक, उपमेयोपमा, परिवृत्ति, ससन्देह, अरनन्वय,
१ विभाव्यते इति-विशिष्टो भाव्यते, चमरकारविशेषविषयः क्रियते इत्यर्थ: ( काव्यप्रदीप)
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उप्रेशावयव, संसृष्, भाविक और आशीः । साथ ही यह संशोधन भी किया कि शब्दालंकारों के नौ मेदों से केवल दो भेद (अनुप्रासत और यमक) लिए और उभयालंकारों को तो नाम से ही उड़ा दिया। उनमें से एक अलंकार (आक्षेप) के भेदों को पृथक् पृथक अलंकारों के रूप में गिन लिया है। यद्यपि भामह ने सब मिलाकर कुल ४३ अलंकारों के नाम लिखे है, तथापि उनमें से उनने केवल ३८ अलंकार ही माने हैं, क्योंकि पूर्वाचार्यों के हेतु, लेश और सूक्षम नाम के तीन अलंकारों का निषेध कर दिया है, और आशी: तथा स्वभावोक्ति से मतभेद' प्रकट किया है।
५-दुसडी
पीछे के आचार्यों ने प्रायः भामह के ही मत का अनुसरय किया है। दरडी ने अनुप्रास के अतिरिक्त अन्य सभी भामह के अलंकारों का संग्रह कर लिया है। इतना ही नहीं, भामह ने जिन अलंकारों का निषेष किया है अथवा बिनसे मतभेद प्रकट किया है-जैसे हेतु, सूक्ष्म, लेश, स्वभावोक्ति और आशीः आदि इन्हें भी उन्होंने अलंकारों में संगृ- हीत कर लिया है। यद्यपि प्रथमतः अलंकारों की नामावली लिखते समय दराडी ने ३५ अलंकार ही लिखे हैं, अतः किसी को भ्रम हो सफता है कि उनने भामह के अलंकारों में कुछ संशोधन किया हो, पर ऐसी बात नहीं है। गिनते समय उन्होंने भामह के निर्दिष्ट अलंकारों में से बिन अलंकारों को छोड़ दिया है वे ये हैं-प्रतिवस्तूपमा, मालोपमा, उपमेयोपमा, श्रनन्वय, ससंदेह, उपमारूपक, उत्प्रेक्षावयव और यमक। इनमें से प्रतिवस्तूपमा से ससंदेह तक के भेदों को उनने उपमा के भेदों
१ "आशीरपि च केषांचिद लंकारतया मता !" (भामह ३-५५) "स्वभावोकिर लंकार इति केचित्प्रचक्षते !" (भामह १-९१)
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में मान लिया है, उपमारूपक और उत्प्रेव्षावयव को तंकीर्यं के मेदों में और यमक का पृथक् विवेचन कर दिया है। अतः कहना पड़ेगा कि- दंडी ने अ्नुप्रास के अतिरिक्त भ्रन्य कोई भी भामह के ग्रंथ में नामत: आया हुआ भी अलंकार नहीं छोड़ा। हाँ, इसमें सन्देह नहीं कि दंडी ने भामह के अलंकारों में से कुछ के नाम में मेद अवश्य कर दिया। पर उसका कारण केवल छंद का अनुरोध है भ्रथवा श्रन्य कुछ यह कहना कठिन है।
६-सद्ट
उन्धट ने दंडी की तरह पूर्वाचार्यों का मूक अनुसरया मात्र नहीं किया। उनने अलंकारों को छः वर्गों में विभक्त किया है। उन वर्गों में क्रमशः ८,२, ७, ११, ६ और ६ इस तरह कुल ४१ अलंकार लिखे हैं। प्रथम वर्ग में उनने पुनरुक्तवदाभास, छेकानुप्रास, अनुप्रास (वृचा- नुप्रास) और लाटानुप्रास ये चार शब्दालंकार और रूपक, दीपक, उपमा और प्रतिवस्तूपभा ये नार अर्थालंकार दिए हैं, शेष वर्गों में अर्थालंकारमात्र हैं। भामह और दंडी के बताए अलंकारों में से उन्होंने अपने मत से कुछ अनावश्यक अलंकार छोड़ दिए हैं और कुछ आवश्यक अलंकारों का अ्धिक सननिवेश भी किया है, दंडी के अलंकार छोड़ने में उद्मट ने प्रायः भामह का अनुसरया किया है। हाँ, उत्प्रेक्षावयव और उपमारूपक को छोड़ने में उनने दंडी की अपेदा स्वतंत्रता अवश्य की है और उनकी इस स्वतंत्रता को बाद के प्रायः सभी आचार्यों ने स्वीकार भी किया है। पूर्वाचार्यों द्वारा प्रपंचित यमक के भेद भी संभवतः उद्भट को बहुत शखरे, अतः उनने यमक को मूलतः ही उड़ा दिया। उद्मट ने जो अलंकार बढ़ाए हैं वे ये हैं- पुनरुक्तवदाभास, छेकानुप्रास, लाटानुपास, संकर, काव्यहेतु और काव्य- इष्टान्त। उद्भट की इस स्वतंत्रता को भी बाद के आचार्यों ने सादर स्व्ी-
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कार किया है। किसी मे पुनवकवदामास आदि झलंकारों का निषेष नहीं किया। लखय और मेद लिखने में भी उद्भड्ट ने भागह औौर बंडी की अपेना स्वतंत्रता की है और उसे भी बाद के आचार्यों ने स्वीकार किया है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि उद्भट ने थो कुछ नवीनता की वह प्रायः श्रव तक के आषार्यों को स्वीकृत हुई। यदि यह कहा जाय कि आकल की अलंकारशैली के प्रथम परिष्कारक उद्भट ही हैं तो इसमें कुछ अत्युक्ति न होगी।
७- रुट्रट रुद्रट अलंकारों के बड़े मार्मिक विद्वान् हो गये हैं। उनने कुछ सवया नवीन अलंकार लिखे हैं। इनमें से अधिकांश अलंकारों को बाद के सभी आचार्यों ने लिया है। रुद्रट के बढ़ाये अलंकारों के नाम ये हं-समुच्चय, भाव, पर्य्याय, विषम, अनुमान, परिवृत्ति, परिकर, परिसंख्या, कारणमाला, अन्योन्य, उत्तर (प्रथम), सार, शवसर, मीलित, एकावलि, मत, उत्तर (द्वितीय), अन्योक्ति, प्रतीप, उभयन्यास, भ्रान्तिमान्, प्रत्यनीक, पूर्व, साम्य, समरय, तद्गुय, अषिक, शसंगति, पिहित, व्याघात, अ्हेतु, अविशेषश्लेब, उक्तिश्लेष, व्यापश्लेष, अ्सम्भव- श्लेष, तत्वश्लेष और वक्रश्लेष। इनमें से अ्नेक अलंकार अ्नन्तरभावी आचार्यों ने अन्य अलंकारों द्वारा गतार्थ तथा मेदपमेदों में अन्तर्भूत कर लिए हैं। इस पर अधिक विवेचन हमारी अलंफारसमीच्ा में देखिए। इसके श्रतिरिक्त रुद्रट ने अलंकारों को प्रथमतः चार बर्गों में विभक्त कर दिया है। उनका कहना है कि सभी अलंकार वास्न (स्वामाविकता ) शरपम्य (साडश्य) अतिशय (अनहोनी नात) और दळेम (अनेक श्रथों का एक पद में समावेस) इन चार भागों में बिमक किए या सकते हैं। इस विषय-विभाग और नवीन मालंकारों के
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अाविष्कार एरवं लचगों के परिष्कार के कारणा आलंकारिकनगत् में रद्रट का विशेष स्थान है और बाद के सम्मट जैठे मडानू आन्रायों ने भी उनकी उच्तियों को प्रमाणरूप में उद्भृत किया है। यद्रद ने जैसे भलकार बढ़ाए है वैसे ही उद्बट के अलंकारों में से १०, १२ अलंकार कम भी किए हैं, पर इस विषय में पीछे के आचार्यों ने उनकी विशेष नहीं बुनी। 5-वामन वामन का अलंकार-सूत्र यद्यपि आलंकारिकजगत् में अपना विशेष स्थान रखता है तथापि अलंकारों के विषय में उनका विवेचन कोई महत्वपूर्व नहीं। उनने प्रायः भामह, दराडी और उद्भट के अलंकारों से अलंकार लिए है, पर उन सबको उपमा का मेद बताने में उनका विशेष प्रयास रहा है। उनने ३०-३२ (२ शब्दालंकार और ३० अर्यालंकार) अलंकार लिखे हैं, पर कोई विशेष बात नहीं बताई। हाँ, इतना अवश्य है कि 'व्याजोकि' अलंकार का नाम सबसे पहले वामन के अलंकारसूत्र में ही दिखाई देता है, जिसे बाद के आचार्यों ने ग्रहण किया है। ६-भोजराज संस्कृतवाहित्य के परम प्रेमी धारानरेश महाराज भोषदेव के सरस्वतीकमठाभररा में पाँच प्रकरण हैं-१-दोषगुप्पनिवेचण, २-शन्दालंकारनियय, ३-अर्थालंक्षारमिताय, X-उभवालंकार विवेचन और ५-रसविवेचन। आप देखते हैं कि इन पाँचों में से तीन प्रकरख अलंकारों के विषय में हैं। जिनमें उनने मिम्सलिखित २४ सन्दालंकार २४ स्मालंकार २४ उभवालकारों का निक्मस किया है। शग्दालंकार-१-नति, १-गति, १-रीति, ४-रस,
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५-छाया, ६-मुद्रा, ७-उक्ति, ८-युक्ति, १-भगिति, १०- गुम्फना, ११-शय्या, १२-पठिति, १३-यमक, १४-शलेष, १५-अनुप्रास, १६-चित्र, १७-वाकोवाक्य, १८-प्रहेलिका, १६-गूढ, २०-प्रभोचर, २१-अध्येय, २२-श्व्य, २१-प्रक्ष्य और २४-भ्रभिनय। अर्थालंकार-१-गाति, २-विभावना, ३-हेतु, ४-श्रहेतु, ५-सूक्ष्म, ६-उत्तर, ७-विरोध, द-संभव, ६-अ्न्योन्य, १०-परिवृच्ति, ११-निदर्शन (दष्टान्त), १२-मेद (व्यतिरेक), १३-समाहित, १४-भ्रान्ति, १५-वितर्क, १६-मीलित, १७- स्मृति, १८-भाव तथा १६-प्रश्यच्, २०-अनुमान, २१-उपमान,र २२-शब्द, २३-अर्थापचि और २४-अभाव ये छः मीमांसोक्त. प्रमाण। उभयालंकार-१-उपमा, २-रूपक, ३-साम्य, ४-संशयोक्ति ५-अपन्हुति, ६-समाध्युक्ति, -समासोक्ति, द-उत्प्रेच्षा, ६-अप्रस्तुतस्तुति, १०-तुल्ययोगिता, ११-लेश, १२-सहोक्ति, १३-समुचय, १४-आक्षेप, १५-अर्थान्तरन्यास, १६-विशेष, १७- परिष्कृति (परिकर), १८-दीपक, १६-क्रम, २०-पर्याय, २१-श्रतिशय, २१-श्लेष, २३-भाविक और २४-संसृष्टि। शब्दालंकारों में से द तो वही हैं, जो अभिपुरारय में आये हैं। शेष १६ में से यमक भी परम्परागत है। अतः उसमें भोजराज की कोई नवीन कल्पना नहीं है और जाति, गति, रीति, वृत्ति, शय्या, भगिति, पठिति, अध्येय, श्रव्य, प्रेक्ष्य और श्रभिनय ये ११ भाषा, उच्चारण तथा शारीरिक अंगों के भिन्न २ ढंग मात्र हैं। आधुनिक परिभाषा के अनुसार उनको अलंकार नहीं कह सकते, क्योंकि वे शब्द-रचना अथवा अर्थ-रचना के अन्दर कविप्रयक्ष से सिद्ध नहीं हैं। रहे प्रहेलिका, गूढ औ्रर प्रभोततर वे अ्रगिपुरायोक्त चित्र और दुष्कर अलंकार के मेदमात्र
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हैं। अर्थालंकारों में से और उभयालंकारों में से उभयालंकार नामक वस्तु तो फिर रही ही नहीं, अतः अर्थालंकार और उमयालंकार ४८ के ४८ अर्थालंकारों में प्रविष्ठ हो गये हैं। उनमें संभव, वितर्क और छः प्रत्यक्षादि प्रमाणालंकार भोजराज के नवीन हैं। इस तरह = अलंकार यद्यपि अपूर्व हैं तथापि छः प्रमाणालंकारों को बिन्हें श्रप्पयदीचित ने ही अधया किया है, छोड़ दें तो दो अलंकार बचते हैं। इन दो अलं- कारों को पीछे के आचार्यों ने नहीं माना। अतः कहना होगा कि सरस्वतीकण्ठाभरया भोजदेव के साहित्यप्रेम का और बहुज्ता का परिचायक होते हुए भी अलंकार-साहित्य में बहुत कम नवीनता उत्पन्न कर सका।
१०-मम्मट भोजराध के पश्चात् अतिशीघ्र ही साहित्यशास्त्र का एक ऐसा सार्मिंक आाचार्य आता है जिसका साम्राज्य आब भी ज्यों का त्यों है। संस्कृत-साहित्य का कोई भी पंडित पंडित नहीं समझा जा सकता जब तक वह आचार्य मम्मट के फाव्यप्रकाश का मर्मश न हो। इस आचार्य ने वक्रोक्तिवाद, अनुमानवाद आदि साहित्य के अनिर्णीत पत्तों का निर्गाय किया और ध्वनिकार आनंदवर्घनाचार्य के पक् का समर्थन किया। इनका ग्रंथ संच्षित्त और अर्थगंभीर है। काव्यप्रकाशोक्त अ्रन्य विषयों का आवश्यक विवेचन हिंदीरसगंगाघर के पूर्व भाग की भूमिका में किया गया है। अतः इस भाग में केवल अलंकारों का विवेचन किया जायगा। मम्मट ने शब्दालंकार केवल छः माने हैं-वक्रोक्ति, अरनुप्रास, यमक, श्लेष, वित्र और पुनरुक्तवदाभास। सारांश यह है कि जिस तरह प्राचीनों के २० गुगों की छानवीन करके केवल ३ गुण रक्खे गये हैं वैसे ही उनने चौबीस तक बढ़े हुए शब्दालंकारों का समावेश केवल अनुप्रास, यमक और चित्र इन तीन अलंकारों में कर
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रिया और बकोकि, इळेव और पुनरकतवदाभास को मिलाकर शब्दा- लंकारों की संख्या ६ मानी। इनमें से पुनरुक्वदाभाष तो पहले भी शब्दालंकार ही था किंतु बक्रोक्ति और श्लेव के एक भाग को शास्त्रार्थ करके काव्यप्रकाश में शब्दालंकार सिद्ध किया गया। अर्थालंकार मम्मट ने ६१ माने हैं। आलंफारिकमगत् में बो धाँमली मची हुई थी उसे भी मम्मट ने स्थिर किया। आपने उद्भट के अलंकार प्रायः समग्र ले लिये हैं और रुद्रट के अलंकारों में से भाव, भवसर, मत, उत्तर, उभयन्यास, पूर्व, साम्य, पिद्दित, अद्देतु तथा श्लेष के भेद-अविशेष, उक्ति, व्याज, असंभव, अवयव और तत्त्व नामक पंद्रह अलंकार छोड़ दिये हैं। मम्मट की इस बात को अलंकारों की अधिकता को पसंद करनेवाले अप्पयदीचित आदि ने भी प्रायः माना है। इसके अतिरिक्त आपने वृश्यनुप्रास, विनोक्ति, सम, सामान्य औ्रर अतद्गुण ये ५ अलंकार नये लिखे हैं, बिन्हें प्रायः आलंकारिकजगत् में सभी ने स्वीकार किया है। लचयों में भी उनने सारगर्भ संक्षेप किया है। वर्गीकरण पर उनने विचार नहीं किया। ११-अलंकारसर्वस्वकार रुध्यक सालंकारिक जगत् में अलंकारसर्वस्वकार रुय्यक का स्थान बहुत ऊँचा है। विश्वनाथ, अप्पयदीक्षित और बगनाथ जैसे अलंकार जगत् के प्रसिद्ध आचार्यों ने प्रायः उनका पदानुसरय किया है। यद्यपि यह कहना कठिन है कि रुव्यक ने काव्यप्रकाशोक्त सब अलंकार मम्मट से ही उद्धृत किए हैं अथवा स्वतंत्र रूप से संगृहीत किए हैं, क्योंकि दोनों समसामयिक-से हैं और दोनों ने ही एक दूसरे का नाम नहींलिया है। तथापि उल्लेख, परिणाम, विकल्प और विचित्र सर्वप्रथम उन्हीं के ग्रंथ में आाये है, जो काव्यप्रकाश से अतिरिक है। इन अलंकारों को सभी श्रनंतरमाषी श्रचार्यों ने स्वीकार किया है। यदि संक्षेप में कहा जाय तो कह सकते हैं कि आधुनिक आलं-
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कारिकों के अलंकारसर्वस्वकार बहुमानास्पद उपनीव्य है। सभी मे आपके लक्षणादिकों को, कही-कहीं मतमेद होने पर भी, गौरव की दष्टि से देखा है। १२-वाग्भट (१) प्रथम वाग्भट का वाग्मटालंकार नामक अ्रंथ है। उनने चित्र, वक्रोक्ति, अनुप्रास और यमक ये चार ही शब्दालंकार माने हैं। अर्थालंकार भी २५ ही लिखे हैं। पर इसका कारणा यह नहीं है कि उनके समय में अन्य अलंकार नहीं थे, किंतु उनने शेष अलंकार बानकर छोड़ दिए हैं। वे स्वयं लिखते हैं- "अचमत्कारिता वा स्यादुक्तान्तर्भाव एव च। अलंक्रियायामन्यासामनिबन्धे निबन्धनम्।। (४।१४६) अर्थात् अन्य अलंकारों के न लिखने का कारणा यह है कि या तो वे चमत्कारी नहीं हैं अथवा उनका उक्त अलंकारों में अन्तर्भाष हो जाता है।" पर उनने इस पर विचार नहीं किया। १२-हेमचंद्र हेमचंद्र ने शब्दालंकार तो काव्यप्रकाशोकत वही छः रखे हैं। पर अर्थालंकारों में पर्याप्त न्यूनता कर दी है। उनने काव्यप्रकाशोक्त ६१ अलंकारों में से केवल २६ अलंकार माने हैं। उपमेयोपमा और अ्रनन्वय को उनने उपमा में अंतर्भूत कर लिया है। इस तरह आधुमिकों के अनुसार उनके ग्रंथ में २१ मलंकार होते है। उनने काव्यप्रकाश के वो तीस अलंकार कम किए हैं वे ये हैं-प्रतिवस्तूषमा, छष्टांत, तुश्य- योगिता, विभावना, विशेषोक्ति, यथासंख्य, विनोकि, भाविक, काव्य- लिंग, उदास, पर्याम, परिषर, व्याओोक्ति, अम्योन्य, उत्र, सुक्म, सार, असंगति, समाधि, अधिक, प्रत्यनीक, मीलित, एकावली, प्रतीप,
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सामान्य, विशेष, तद्गुया, अतद्गुण, व्याघात और संसुष्टि। इनमें से परिकर, यथासंख्य, विनोक्ति, भाविक और उदाच इन पाँच अलंकारों को यथासंभव दोषाभावमात्र, अ्रसुंदर, श्रभिनेयमात्र और अतिशयोकि- रूप बताने का प्रयत्न किया गया है। पर अन्य २५ को भी वे इन्हीं से गतार्थ अथवा अचमत्कारी समझते हैं। यह बात भी प्रतीत नहीं होती कि उनने ये अलंकार रुद्रट अथवा रुय्यक से लिये हैं, क्योंकि तब भी बहुतेरे अलंकार बच रहते हैं। उद्भट से भी ये लिये गये प्रतीत नहीं होते, क्योंकि उनके रसवान् आदिक अलंकारों का इनने स्पर्श भी नहीं किया। सारांश यह कि हेमचंद्र ने यद्यपि संक्षेप किया है, पर उस पर यथेष्ट विचार नहीं किया, अतएव प्रतीत होता है कि भावी आ्चार्यों ने उनका शरनुसरण नहीं किया। १४-पीयूषवर्ष पीयूषवर्ष ने शब्दालंकार अ्नुप्रास, पुनरुक्तवदाभास, यमक औ्रर चित्र ये चार माने हैं किंतु अनुप्रास के छेकानुप्रास, वृत्त्यनुप्रास, लाटा- नुप्रास, स्फुटानुप्रास और अर्थानुप्रास ये पाँच भेद कर दिये हैं। इस प्रकार उनके अनुसार आठ शब्दालंकार हो जाते हैं। इनमें स्फुटानुप्रास और अर्थानुप्रास ये दो उनके नये अलंकार हैं। स्फुटानुप्रास का लक्षय और उदाहरया उनने यह दिया है- "श्लोकस्यार्धे तदर्धे वा वर्णावृत्तिर्यदि ध्रुवा। तदा मता मतिमतां स्फुटातुप्रासता सताम्। अर्थात् श्लोक के अर्घ त्रथवा चरण में यदि वर्गों की निश्चित आवृत्ति हो तो उसे स्फुटानुप्रास कहते हैं। प्रतीत होता है कि बाद में यही हिंदीवालों का अन्त्यानुप्रास हो गया है।" अर्थानुप्रास वे उसे कहते हैं जहाँ उपमान उपमेय आदि में वर्गों को उसी क्रम से आवृत्ति हो, जैसे-
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"चन्दनं खलु गोविन्दचरबद्दन्दवन्दनम्। इस पद् के उपमेय 'वन्दनं' और उपमान 'चन्दर्न' श्दों में।" अर्थालंकारों को बढ़ाकर उनने पूरे १०० कर दिए हैं, पर वास्तव में चंद्रालोक में ८२ ही अलंकार है। यह १०० संख्या उपमा, अपह ति उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति और आक्षेप आदि के मेदों को भी पृथक अलं- कार मानकर पूरी की गई है। जो ८२ अलंकार है उनमें ६७ तो वे ही हैं वो अलंकारसर्वस्व में आए हैं। शेष १५ नये हैं। नये अलंकार ये हैं-उन्मीलित, प्रौढोक्ति, संभावना, प्रहर्षग, विषादन, आवृत्िदीपक, विकस्वर, असंभव, उल्लास, पूर्वरूप, अ्रनुगुया, अरवज्ञा, पिरित, भावि कच्छवि और अत्युक्ति। इनके श्तिरिक्त रसवत् आदि ७ अलंकारों से उनने मतभेद प्रकट किया है। वे कहते हैं कि -- "रसवत्प्रेयऊर्जस्विसमाहितमयामिधाः। भावानामुदय: सन्धिः शबलत्वमिति त्रयः। अलंकारानिमान्सस केचिदाहुमनीपियाः॥" (५-११७-११८) संसृष्टि और संकर को भी वे पृथक नहीं मानते। उनका कहना है कि- "शुद्धिरेकप्रधानत्वं तथा संसृष्टिसंकरौ। एतेषामेव विन्यासाननालङ्कारान्तराएयमी ॥ (५-११६) यदि एक अलंकार प्रधान हो तो शुद्ध अलंकार माना जाता है और यदि एक पद्य में एकाषिक अलंकार हों तो उनकी संसुष्टि भ्थवा संकर हो जाता है। वे इन्हीं अलंकारों के विन्यासमात्र हैं। अतः उन्हें पृथक अलंकार नहीं कहा जा सचता।"
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इसमें संदेह नहीं कि पीमूचवर्ष ने भलंकारिकमगत् में एक नया रंग ला दिया। बाग्भट, हेमचद्र आदि जैनाचार्यों ने जो अलंकारों की संख्या में हास करके संक्षेप की प्रवृत्ति की थी उसे इनने उड़ा दिया। चंद्रालोक के अलंकार चले भी खूष। कारण यह था कि उनके लक्षय तथा उदाहरण सरल और संचित हैं। वे प्रायः आाधे अनुष्टपू में लच्षय और यथासंभव आधे में उदाहरया दे देते हैं, अतः उनके स्मरय रखने में बड़ी सुविधा होती है। बाद में यह पद्धति खूब चली। हिंदी- वाले तो प्रायः यही पद्धति ले उड़े। उन्हें संस्कृत के आचार्यों के गभीर विचार और शास्नार्थपूर्ण उदाहरणा नहीं जँचे, अतः प्रायः सभी ने चंद्रालोक की ही शैली स्वीकार की। १५-वाग्भट (२) वाग्भट (२) ने शब्दालंकार तो छः ही माने हैं, किन्तु अर्थालंकार ६३ माने हैं, बिनमें अन्योक्ति, श्रन्य, अपर, पूर्व, पिहित, मत, उभयन्यास, भाव और आशी: ये नौ अलंकार काव्यप्रकाश से भिन्न हैं। इनमें से पूर्व, मत, उभयन्यास और आ्शी: ये ५ अलंकार तो रुद्रड के हैं शेष ४ में से अन्योक्ति अप्रस्तुतप्रशंसा ही है और उनकी अप्रस्तुतप्रशंसा एक प्रकार की अतिशयोक्ति है। केवल अन्य, अपर और पिहित रह घाते हैं बिनको अन्य आचार्यों ने कोई महत्व का स्थान नहीं दिया। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि वाग्भट द्वितीय ने भी साहित्य में कोई नवीनता उत्पन्न नहीं की, केवल साधारण अध्येताओं के लिए यथोपल्घ सामग्री का संकलनमात्र उनने कर दिया है। १६-विश्वनाथ साहित्यदर्पसकार विश्वनाथ ने काव्यप्रकाशकारोक्त शब्दालंकारों के अतिरिक्त भाषासम नामक एक अलंकार और माना है और अनुप्रातों के मेदों में भ्रुत्यनुप्रास भी माना है। अर्थालंकारों में निश्रम और
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भमुकूल दो अलंकार काव्यप्रकाश और अलंकारसर्वस्व से मिन्न है। शेन काग्यप्रकाश अ्रथवा अलंकारसर्वस्व के ही अरनुसार है। नवीन अलंकारों में से भुत्यनुप्रास को हिन्दीवालों ने आश्रय दिया है। माणासम भी कहीं २ देखने में आता है। निश्चय और अनुकूल को तो किसी ने पूछा भी नहीं। १७-केशवमिश्र केशवमिश्र ने अलंकारशेखर नामक अपने ग्रन्थ में ८ शब्दालंकारों में काव्यप्रकाशोक्त पुनरुक्तवदाभास को इटाकर, गूढ, प्रहेलिका और प्रभोत्तर ये तीन नवीन माने हैं। पर पाठकीं को विदित ही हो गया होगा कि इनमें से कोई भी नवीन नहीं हैं। ये सब अभिपुरागोक्त तथा सरस्वतीकराठाभरगोक्त हैं। अर्थालंकारों में केशवमिश्र ने पर्याप्त से भी अधिक कमी की है। केवल निम्नलिखित १४ ही उनने स्वीकार किए है-उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, समासोक्ति, अपह ति, समाहित, स्वभाव, विरोध, सार, दीपक, सहोक्ति, अन्यदेशत्व, विशेषोक्ति और विभावना। इनके श्रतिरिक्त अलंकार वे नहीं मानते। उनने स्पष्ट निषेघ किया है। 'न चापरे (११।२)'। इस संक्षेप और अन्य अलंकारों के इन्हीं में समावेश का हेतु उनने अपने 'अलंकारसर्वस्व' नामक ग्रन्थ में दिया बताथा, जो अब अप्राप्य है। वे कहते हैं- 'सुखबोधाय बालानामतिकोमलवर्त्मना। मया संक्षेपणादित्थमलंकारा: प्रदशिताः ॥ यथैतेषां मिथो मेद: परेषां नातिरेकिता। तथालंकारसर्वस्वे सम्रपञ्चमदर्शयम्।। (११वीं मरीचिका अंतिम अंस) अर्थात् मैंने वालकों के सुखपूर्वंक बोध के लिए इस तरह संक्षेप
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करके अत्यन्त कोमलमार्ग से अलंकार दिखाए हैं। इनके परस्पर भेद और अन्य अलंकारों का इनसे अतिरिक्त न होना अलंकारसर्वस्व में विस्तारपूर्वक दिखा चुका हूँ।" सारांश यह कि इस ग्रन्थ में फोई विशेषता नहीं है। १८-अप्पयदीक्षित अप्पयदीत्तित के अलंकारविषयक दो ग्रन्थ हैं-चित्रमीमांसा और कुवलयानन्द। इनमें से चित्रमीमांसा तो प्रणेता ने स्वयं ही शधूरी छोड़ दी है। उनने लिखा है- 'अप्यर्धनित्रमीमांसा न मुदे कस्य मांसला।' पर कुवलयानन्द पूर्य है। इन दोनों ही ग्रन्थों पर परिडतराज ने रसगंगाघर में डटकर विचार किया है। अतः उस चर्चा को छोढकर यहाँ अन्य अपेचतित बातों पर विचार किया जाता है। चित्रमीमांसा में केवल निम्नलिखित १२ अलंकारों पर विचार है। उपमा, उपमेयोपमा, अनन्वय, स्मरय, रूपक, परिणाम, ससन्देह, भ्रान्तिमान्, उल्लेख, अपह ति, उत्प्रेक्षा और शतिशयोक्ति। इनमें कोई नवीन नहीं है। कुवलयानन्द में भी शब्दालंकार नहीं है केवल अर्थालंकार हैं। कुवलयानन्द में मूल अलंकार तो १०० ही हैं। उनकी समाति पर ललिखा है- "इत्थं शतमलंकारा लक्षयित्वा निदशिंताः। प्राचामाधुनिकानां च मतान्यालोच्य सर्वतः ।। (कुव. १६६) अर्थात् प्राचीनों और आधुनिकों के मत की पूर्णतया भ्ालोचना करके इस तरह १०० अलंकारों के लच्षया देकर उदाहरणा दिए गए हैं।" पर इसका अर्थ यह नहीं है कि अप्पयदीचित ने पीयूषवर्ष के
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श्तिरिक्त नये अलंकार लिखे ही नहीं। पीयूषवर्ष ने जो नत्तत् अलंकारों के मेदों को पृथक् गिनकर १०० की संख्या पूरी की थी उस संख्या में से अप्पयदीच्षित ने उन मेदों को पृथक अलंकार न मानकर तचत् अलंकारों में ही समाविष्ट कर दिया है और २० नये अलंकार लिखे हैं। वे ये हैं- १-प्रस्तुतांकुर, २-व्याजनिन्दा, ३-अल्प, ४-कारकदीपक, ५-मिथ्याभ्यवसिति, ६-ललित, ७-अ्नुज्ञा, द-लेश, ६-मुद्रा,. १०-रतावली, ११-सूक्ष्म, १२-गूढोक्ति, १३-विध्वतोक्ति, १४- युक्ति, १५-लोकोक्ति, १६-छेकोक्ति, १७-निरुक्ति, १८-प्रतिषेध; १६ विधि और २०-हेतु। इसके अतिरिक्त पीयूषवर्षोक्त उदारसार और भाविकच्छवि नामक दो अलंकार अप्पयदीचित ने छोड़ भी दिए हैं, अतः पूरे १०० की संख्या बैठ जाती है। ये २० भी अप्पयदीचित के नवीन नहीं हैं, प्रायः प्राचीनों के ही हैं। इन सौ के अतिरिक्त अप्पयदीक्ित ने २१ अलंकार औरर लिखे हैं। उनमें से ७ तो वे ही प्राचीनों के रसवदादि हैं, जिनसे पीयूषवर्ष: ने मतमेद प्रकट किया है। ८ प्रमाणालंकार १ संसृष्टि और ५ प्रकार के- संकरालंकार हैं। प्रमाणालंकारों में, जो भोज से लिए गये हैं, संभव औरर ऐतिह्यालंकार नवीन हैं। संकरों में समप्राधान्यसंकर और संकर- संकर नवीन हैं। सारांश यह कि अप्ययदीचित प्रवीण विवेचक होने पर भी संग्राहकमात्र है। नवीन उद्भावना उनके अ्रंथों में अल्प हैं। बात यह भी थी कि उनसे पूर्व ही अलंकारों की इतनी भरमार हो गई थी फि उनका संग्रह ही पर्याप्त था। आगे बढ़ाने में न तो सार रह गया था, न यथार्थता ही। हाँ, उनपर यथार्थ विमर्श की आवश्यकता थी, उसे बहुत अंशों में अप्यदीच्ित ने पूरा किया।
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( n )
सम्पमदीचित से शागे बढ़कर बदि किसी मे कुछड विचार किया है नो पंहितिराम ने ही, बिनने चलंकार विषय पर भी करम वोड दी है, पर दुर्भाग्यक्श उनका ग्रंथ स्पूर्या ही रहा। १६-विश्वेश्वर पंहितराय के बाद भी अलंकारों के विषय में एक ग्रंथ और बना है,विस्में शलंकारों की बाढ़ को उलटाकर फिर काव्यप्रचाश के अलं- कारों पर पहुँच जाने का प्रयत्न किया गया है। यह रे विश्वेश्वर का अलंकार फोखुम, जिसकी टीका भी स्वयं प्रंथनिर्माता ने ही की है, किंदु यह साधारय लोगों के बोध से परे की वस्तु है। केवल न्यायशास बानने वाले ही इसमें रस ले सकते हैं।
पक्षय तृतीपा संवद् २०१५ विक्रमीय पुरुषोच्तमशर्मा चतुर्वेदी
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विषय-सूची
विषय समासोक्ति अलंकार पुषांक
खक्षण लक्षण का विवेचन समासोकि का शब्दबोध प्राचीन आचार्यों का मत पंडितराज का मत झलं कारसवंस्व का खंडन कुवलयानंद का खंडन समासोकि के भेद समासोकि में वाण्य अर्थ ही प्रधान होता है अलंकारसवंस्व का खंडन ( १) 16 " " " (२) २१ कुवलयानंद का खंडन समासोकि के अन्य भेद ३० समासोकि का अंगीभाव ३२ परिकरालंकार
सक्षय २५ लक्षमा का विवेधन ३५ परिकर को पृथक अलंकार क्यों माना जाता है ३७ कुवलयानंद का खंडम इरिकर के भेद
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विषय पृष्टाक श्लेषालंकार लक्षण ४३ लक्षण का विवेचन और भेद ४३ उदाहरय श्लेष के विषय में विचार ५० इ्लेष और शब्दुशक्तिमूलक ध्वनि का भेद ५६ इस पर विचार ५७ श्लेषमूलक ध्वनित्व और गुणीभूतव्यंग्यत्व पर विचार ६६ शव्दालंकारता और अर्थालंकारता पर विचार ६८ अप्रस्तुतप्रशंसा
लक्षण ७० लक्षय का विवेचन ७० अप्रस्तुतप्रशंसा के भेद ७० काव्यप्रकाश पर विचार अम्रस्तुतप्रशंसा पर विचार ७४ भेदों पर विचार ८०
मवीन भेद ८२ एक शंका और उसका उत्तर ८8. पर्यायोक अलंकार
लक्षण ८८ लक्षण का विवेचन ८6 प्राचीनों के मतभेद और उनपर विचार ९० कुवलयानंद का खंडन ९३ पर्यायोक्त की गुणीभूतव्यंग्यता ९६ विमर्शिनी पर विचार ९६
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( ३ )
विषय पृष्ठांक ध्वनिकार से प्राचीन भी ध्वनि आादि जानते थे ९७
पर्यायोक्त के भेद विषयविभाग पर विचार व्याजस्तुति
लक्षया १०१ लक्षण का विवेचन १०१
उदाहरण १०१ अन्य अलंकार से मिश्रित व्याजस्तुति १०२
व्याजस्तुति पर विचार १०६ कुवलयानंद का खंडन १०८ आक्षेप अलंकार लक्षण ११२ आक्षेप की ध्वनियाँ और उनपर विचार १२० शंका और समाधान १२० ध्वनिकार का समर्थन १२१ कुवलयानंद का खंडन १२२ विरोध अलंकार लक्षणा १२६ लक्षण का विवेधन १२६ विरोधालंकार के भेद २७ वस्तुतः दो ही भेद १२९
एक शंका १२९ विरोध के विषय में विचार १३० भेदों के विषय में एक शंका और उसका उत्तर १३२
कुवलयानंद का खंडन १३६
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४ )
विषय पृष्ठांक विभावना अलंकार
लक्षण १३७ लक्षणा का विवेचन १३७ अतिशयोक्ति की अनुप्रासकता पर विचार ९४०
कुवलयानंद का खंडन १४२ विभावना के भेद १४५ अलंकारसवस्व पर विचार १४६ एक शंका और उसका उत्तर १४८ विशेषोक्ति लक्षएा १५१ विवेचन १५१ उदाहरण १५२ उदाहरण का विवेचन १५२ विशेषोक्ति के भेद १५२ शाब्दी और आर्थी विभावना और विशेषोक्ति का विवेक १५५ वामन का मत और उसका खंडन १५७ अरसंगति
लक्षण १५८ लक्षणा का विवेचन १५८ अलंकारसर्वस्वकारादि के मत पर विचार १६० विरोध और असंगति का भेद १६२ अप्पयदीक्षित का खंडन १६२ विषमालंकार खक्षण १६९ लक्षणा का विवेधन १६६
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( ५ )
विषय पृश्ठाक
उदाहरण १७२
उदाहरण का विवेचन १७३
कुवलयानंद का खंडन १७७
एक शंका और उसका समाधान १८१
समालंकार
लक्षण १८३
लक्षण का विवेचन ९८३
अप्पयदीक्षित का खंडन १८५
अलंकारसवंस्वकार का खंडन १८९ विचित्रालंकार लक्षण १६०
विषमालंकार से भेद १९१
अधिकालंकार
लक्षया १९२
श्रप्रतिव्याप्ति का निरास १६४ अन्योन्यालंकार
लक्षण १९६
अप्पयदीक्षित का खंडन १९७ विशेषालंकार
लक्षया २००
लक्षण का विवेचन २०० विशेष का अ्रन्य अलंकारों से भेद २०४
प्राचीनों के अभिप्राय पर विचार २०४
व्याघात अलंकार
लक्षण २०
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विषय लक्षण का विवेचन २०७ अप्पायदीक्षित का खंडन २१० विरोधमूलक अलंकारों का उपसंहार २११ इन अलंकारों की परस्पर भिन्नता में मतभेद २११ शृंखला का लक्षण २११ शृखला की स्वतंत्रता पर विचार २१२ कारयमाला लक्षय २१२ कारगमाला के भेद २१२ एकावली
लक्षय २१८
विवेचन २१८ एकावली और मालादीपक का भेद २२० सार अलंकार
लक्षण २२१ भेद २२२ पर्याय से सार की गतार्थता नहीं है २२३ अ्नेकविषयक सारालंकार २२२ सार की शंखलारूपता पर विचार २२४ शखला स्वयं पृथक अलंकार नहीं है २२५ वच्छित्ति का लक्षणा २२५ काव्यलिंग लक्षण २२६ लक्षणा का विवेचन २२६ काव्यलिंग के भेद २२७
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वषय पृषांक काव्यलिंग का अनुमान से भेद २२० कुवलयानंद और अलंकार सर्वस्व का खंडन २३३ काव्यलिंग की अलंकारता २१५ अर्थान्तरन्यास लक्षण २३७ लक्षण का विवेचन २१७ अर्थान्तरन्यास के भेद २३७ अर्थान्तरन्यास के शाब्द और आर्थ भेद २३९ अलंकारांतर से भेद २४० उदाहरणालंकार से विशेषता २४१ समथ्यं-समर्थक के क्रम पर विचार २४३ अलंकारस्वस्व और उसकी टीका का खंडन २४५ विकस्वरालंकार का खंडन २४५ अनुमानालंकार लक्षय २४९ उत्प्रेक्षा और अनुमान में भेद २५१ अ्रनुमान के भेद २५१ निष्कृष्ट लक्षण २५२ यथासंख्यालंकार
लक्षण २५३ विवेचन २५३ क्रम से अन्वयबोध पर विचार २५५ 'यथासंख्य' को अलंकार मानना चाहिए या नहीं २५७ पर्याय अलंकार जक्षय २५
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( =)
विषय पृष्ठांक लक्षण का विवेचन २५८ कुवलयानंद का खंडन २६१ शुद्ध क्रमालंकार २६३ पर्याय के विषय में ज्ञातव्य २६४ परिवृत्ति अलंकार
लक्षय २६५ परिबृत्ति के भेद २६५ अलंकारसर्वस्व का खंडन २६६ परिसंख्यालंकार
लक्ष ए २६८
लक्षणा का विवेचन २६८
परिसंख्या के भेद २७०
परिसंख्या की अलंकारता २७३
अर्थापत्ति अलंकार
लक्षण २७५
भेद २७५ अर्थापत्ति पर विचार २७६
प्राचीनों से मतभेद २८० विकल्पालंकार
लक्षय २८२
लक्षण का विवेचन २८२ एक शंका और उसका उत्तर २८३ वेकल्पालंकार पर विचार २८४ अलंकार सर्वस्व पर विचार २८५
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( )
विषय पृष्ठांक समुच्चयालंकार
लक्षया २८९
लक्षए का विवेचन २८६
समुच्चय के भेद २८६
समाधि अलकार से भेद २८९
भेदों पर विचार २९२
समाधि अलंकार
लक्षण २९५
लक्षण का विवेचन २६५
प्रत्यनीक अलंकार
सक्षखा २९८
लक्षण का विवेचन २६८
ग्रत्यनीक पर विचार २९९
प्रतीप अलंकार
लक्षय ३०१
लक्षणा का विवेचन ३०२
प्रतीप पर विचार ३०५ प्रौढोक्ति अलंकार
लक्षण ३०८
प्रौढोक्ति और 'सम' का भेद ३१०
'मिथ्याध्यवसिति' अलंकार का खंडन ३१०
ललितालंकार
लक्षण ३१३
लक्षण का विवेचन ३१३
अन्य अलंकारों से भेद ३१५
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( १० )
विषय पृष्ठांक ललित की निदशंना से ही गतार्थंता ३१६ कुवलयानंद का खंडन ३१९ प्रहर्षण अलंकार लक्षण ३२२ लक्षण का विवेचन ३२२
उदाहरण ३२२ कुवलयानंद का खंडन ३२४ विषादन अलंकार
लक्षण ३२६ लक्षणा का विवेचन ३२६ एक शंका और उसका समाधान ३२७ उच्छसालंकार लक्षण ३२९ लक्षण का विवेधन ३२९ उच्छास के भेद ३२९ उदाहरय ३२९ अवज्ञालंकार लक्षए ३३३ लक्षणा का विवेचन अतद्गुण से भेद ३३४ पवज्ञा अतिरिक्त अलंकार नहीं है १३५ अनुज्ञालंकार कक्षण ३३५ उदाहरय ३३६ तेरस्कारालंकार पर विचार ३१७
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(११ )
विक्य पठांक लेशालंकार
लक्षण उदाहरण ३४२ लेश और व्याजस्तुति में भेद ३४३ तद्गुणालंकार
लक्षण ३४५
उदाहरण ३४५
उललास से तद्गुगा का भेद ३४६ अतद्गुखालंकार
लक्षण ३४६
उदाहरण ३४६ अवज्ञा और अतद्गुण में भेद ३४७ अतद्गुण के भेदों और अलंकांतरतापर विचार ३४७
मीलितअलंकार
लक्षण ३४९
लक्षय का विवेचन २४९
उदाहरण ३५० सामान्यालंकार
लक्षण ३५१ लक्षण का विवेचन ३५१
उदाहरण ३५१ सामान्य के विषय में मतभेद १५२ मीलित, सामान्य और तद्गुण एक अलंकार ही क्यों नहीं ५५३ उम्मीलित और विशेषक का संडन १५४
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( १२ )
विषय पृष्ठांक
कुवलयानंद का खंडन ३५५
काव्यप्रकाश पर विचार ३५८
उत्तरालंकार
लक्षणा ३५९
लक्षण का विवेचन १५९
उत्तरालंकार के भेद ३६१
उत्तरालंकार के अन्य भेद ३६३
उक्तभेदों के विषय में मतभेद ३६४
सिद्धांत ३६६
अन्य भेद ३६६
परिशिष्ट ३६९
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हिंदी-रस-गंगाघर
तृतोय भाग विशेषणविच्छित्तिमूलक अलंकार समासोक्ति अलंकार
लक्षण जहाँ प्रस्तुत धर्मी से सम्बन्ध रखने वाला व्यवहार, केवल सामान्य विशेषणों के द्वारा उपस्थित कराए हुए अप्रस्तुत धर्मी से सम्बन्ध रखनेवाले व्यवहार से अभिन्न प्रतीत होता है वह समासोक्ति है। लक्षण का विवेचन इस लक्षण को एक उक्ति में (नैयायिकों की संस्कृत में) यों कह सकते हैं- साधारणविशेषणमात्रश्रुत्युपस्थापिता भासमानाप्रकृतधर्मिकव्यहारत्वम्-अर्थात् केवल साधारण विशेषणों के श्रवण से उठार गए अप्रस्तुत धर्मी वाले व्यवहार से अभिन्न रूप में प्रतीत होने वाले प्रस्तुतधर्मी वाले व्यवहार को समासोक्ति कहते हैं, बात वही है। इस लक्षण में विशेषण के साथ 'केवल' पद (मूल में 'मात्र' पद) इसलिए दिया गया है कि 'शब्दशक्तिमूलक ध्वनि' में अतिव्यासि न
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( २ )
हो, क्योंकि शब्दशक्तिमलक ध्वनि में विशेष्य भी श्लिष्ट रहता है। सो वहाँ वही (विशेष्य ही) अप्रस्तुत धर्मी की उपस्थिति करवाने के द्वारा उसके व्यवहार की उपस्थिति करवाता है, अतः वहाँ केवल विशेषण के द्वारा अप्रस्तुत व्यवहार की उपस्थिति नहीं होती। इतने पर भी- आवध्नास्यलकान्निरस्यसितमां चोलं रसाकाङ क्या- लङ्कायावशतां तनोषि कुरुषे जङ्घाललाटक्षतम्। प्रत्यङ्गं परिमर्दनिर्दयमहो चेतः समालम्बसे वामानां विषये नृपेन्द्र! भवतः प्रागल्भ्यमत्यद्भ्रुतम् 1। हे नृपेन्द्र, 'वामानाम्' (शत्रुओं के+स्त्रियों के)' 'विषय' में (देश में + संबन्ध में) आपकी प्रगल्भता (सूझ बूझ) अत्यन्त अन्द्र त है, क्योंकि आप 'रसाकाङक्षया' ( पृथ्तरी की इच्छा से + शृ'गार अथवा वीररस की इच्छा से) अलकान् (म्) (अलकापुरी को + अलकों को) चांधते हैं और चोल (दक्षिण प्रान्त का एक देश+कञ्चुक अथवा चोली) को इटाते हैं '(अ) लङ्कायावशताम्' (लंका की अधीनता को +शरीर की पूर्णतया परवशता को) विस्तृत करते हैं, 'जंघाललाट- क्षतम्' (अत्यन्तवेगयुक्त लाट देश की हानि + जंघा और ललाट पर नखों और दातों के निशान) करते हैं और 'प्रश्यङ्गम्' (अङ्ग देश के प्रति + हर एक अङ्ग को) परिमद (तहस नहस करने + मर्दन करने ) में निर्दय चिव्व धारण करते हैं। ऐसी जगह जहाँ कि प्रकृत धर्मी (जैसे राजा) के प्रकृत (जैसे शत्रुओं के विषय में) और अप्रकृत (जैसे स्त्रियों के विषय में) व्यवहारों का श्लेष हो उसमें अतिव्याप्ति न होने के लिए प्रस्तुतत्व्र और अप्रस्तुतत्व को धर्मी के विशेषण रूप में दिया गया है। यदि 'प्रस्तुत'
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( ३ )
और 'अप्रस्तुत' को व्यवहार का विशेषग माना जाय तो यहाँ प्रकृत 'वीर' का वृत्तान्त साधारण विशेषण मात्र के सुनने से उपस्थित होने वाले अप्रकृत 'श'गार' के वृचान्त के अभिन्न रूप में स्थित ही है, इसलिए उसमें अतिव्यापि हो ही जायगी। आप कहेंगे कि यहाँ राजा का वर्णन प्रस्तुत है, अतः उसमें रहने- वाले दोनों वृत्तान्त भी प्रस्तुत हुए तो प्रस्तुत व्यवहार में अप्रस्तुत व्यवहार को प्रतीति कहाँ है, फिर लक्षण की इस श्लेष में अतिव्यापि कैसे होगी? तो हम कहते हैं कि हाँ, अतिव्याप्ति नहीं होगी, पर तब, जब 'केवल वर्णन करना ह।' प्रस्तुत हो, किन्तु यदि राजा के संग्राम आदि में केवल वीरता का वर्णन प्रस्तुत हा (ओर शगार का वर्णन अप्रस्तुत हो) तब तो अतिव्याप्ति हो ही जायगी। (एवम् इसी 'केवल' के कारण) मलिनेऽपि रागपूर्णा विकसितवदनामनल्पजल्पेऽपि। त्वयि चपलेऽपि च सरसां भ्रमर ! कथं वा सरोजिनीं त्यजसि।। हे भ्रमर, तुम्हारे मलिन (काला + मन का मैला) होने पर भी जो रागपूर्ण (रङ्गभरी + प्रेमपूर्ण) है, तुम्हारे खूब बोलते रहने पर भी जिसका वदन विकसित रहता है एवं तुम्हारे चपल होने पर भी जो सरस है ऐसी सरोजिनी को तुम कैसे छोड़ते हो। इत्यादिक अप्रस्तुतप्रशंसा में अप्रकृत का व्यवहार साक्षात् गहीत होने के कारण विशेष्य के द्वारा भी उपस्थित करवाया ही जाता है, इसलिए अतिव्याप्ति नहीं होती। किन्तु यदि जलक्रीडादिक में भ्रमर का वृत्तान्त ही प्रस्तुत माना जाय (और नायक का वृत्तान्त अप्रस्तुत हो) तब यह समासोक्ति ही है।
यहाँ नागेश ने अनेक पूर्व पक्ष और उत्तरपक्ष उठाकर यह विचार किया है कि 'समासोक्ति में प्रस्तुत व्यहार में अप्रस्तुत व्यवहार
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समासोक्ति का शाब्दबोध
समासोक्ि में प्रथमतः वाक्यार्थ अभिधा से ही प्रतीत होता है; जैसे-
विबोधयन्करस्पर्शैः प्मिनीं मुद्रिताननाम्। परिपूर्णानुरागेय प्रातर्जयति भास्कर: ॥
प्रभातकाल में मुद्रितानन (मुकुलित+मुंहबंद करके सोई हुई) पद्िनी (कमलिनी + उच्तम नायिका) को परिपूर्ण अनुराग से करस्पर्श (किरणस्पर्शों + इस्तस्पर्शों) द्वारा जगाते हुए भास्कर की विजय है। इस पद्य में 'किरणों का स्पर्श जिसका कारण है ओर मुकुलित पद्मिनी कर्म है उस विकास के अनुकूल व्यापारवान् (प्रयत्नवान्) से अभिन्न भास्कर की जय है' यह अर्थ प्रथमतः अभिधा से ही प्रतीत होता है। अब जो यहाँ दूसरा अर्थ 'हस्तस्पर्श जिसका करण है, नायिकाविशेष जिसका कम है ऐसे अनुनय के अनुकूल व्यापारवान् से अभिन्न' इत्यादिकरूप में प्रतीत होता है इसके विषय में तीन मत हैं (१) कुछ लोगों का कथन है कि यह अर्थ दानों अर्थों से सम्बन्ध रखने वाली उसा शक्ति (अभिधा) के द्वारा प्रतीत होता है (२) जो लोग एक शक्ति से एक ही अर्थ की प्रतीति मानते हैं उनके मत से दूसरी शक्ति से प्रतीत होता है (३) और जो लोग दूसरी शक्ति नहीं
मात्र का आरोप होता है अथवा प्रस्तुत धर्मी में अप्रस्तुत धर्मी का भी और अन्त में 'अप्रस्तुत धर्मी संबंधा व्यवहार समारोप' ही सिद्धान्त रूप में सिद्ध किया है, परन्तु वह बहुत विस्तृत है और सवंजनवोधगम्य भी नहीं है, अतः उसका पूरा विवरण यहाँ देना उचित नहीं समझा गया। -अनुवादफ
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V
मानते उन लोगों के मत में व्यक्षना से प्रतीत होता है। रस विषय में सहृदय ही प्रमाण हैं-इन तीनों में से जो उन्हें जँचे सो मानें। प्राचीन आचार्यों का मत अब यह सोचिए कि ये दोनों वाक्यार्थ यदि, बांए और दाहिने सींगों की तरह अत्यन्त संसर्गरहित हों तो भगवान् भास्कर की 'कामुकता' और 'कमलिनी' का 'नायिकात्व' जो कि सबकी प्रतीति से सिद्ध हैं, विरुद्ध होंगे-पहले अर्थ से दूसरे अर्थ का कोई मेल नहीं बैठेगा और दोनों अर्थों की प्रधानता होने से वाक्यभेद भी होगा। अब यदि वाक्यभेद को मिटाने के लिए दूसरे अर्थ का प्रस्तुत कर्ता (भास्कर) पर आरोप किया जाय तो सूर्य्य 'कमलिनी का विकास- कर्चा भर नायिका का अनुनयकर्ता है' इस प्रकार 'एक सूर्य में दोनों बातें हैं' ऐसा बोध हो सकता है, किन्तु पूर्वोक्त अनुपपचि (परस्पर- असंबद्धता) का परिहार तो हुआ नहीं। अब यदि श्लेषमलक अभेदाध्यवसान से कमलिनी आदिक में नायिकात्व आदि की प्रतीति सिद्ध की जाय तो भी भगवान् भास्कर तो श्िष्ट पद से उपस्थापित हैं नहीं, अतः उनसे तो नायकत्व का सम्बन्ध हुआ नहीं। और यदि 'पद्मिनी' के स्थान पर 'नलिनी' शब्द रख दिया जाय तो वह भी नायिका के रूप में कैसे प्रतीत हो सकती है (पर 'समासोक्ति' तो तब भी होगी ही)। इसलिए यह मानना चाहिए कि विशेषणों की समानता के प्रभाव से प्रतीत होने वाला अप्रकृत वाक्यार्थ, अपने अनुकूल नायिकादिक अर्थं का आक्षेप करके और तब नायिकादिक अर्थों से परिपूर्ण अतएव विशिष्ट रूप में उपस्थित हुआ, अप्रकृत वाक्य के अवयवों से अपने अवयवों का तादात्म्य बनाकर प्रकृत वाक्य के अर्थ में अभेद से स्थित होता है। और वह अप्रकृत वाक्यार्थ परिणामालक्कार की तरह (जैसे
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वहाँ 'हगब्जेन निरीक्षते' में कमल को दृष्टि रून में उपस्थित होकर निरीक्षण में अन्वित होना पड़ता है वैसे ) कार्य में प्रकृत रूप से ही उपयुक्त होता है और रसादिक के लिए अपने ( नायिकादिक के) रूप में उपयुक्त होता है। वाक्यार्थसम्बन्वी (रूपक से इसमें यह भेद हैं कि समासोक्ति में अप्रकृत अर्थ पृथक शब्दों से वर्णन नहां किया जाता और पदार्थरूपक से तो स्पष्ट ही भेद है, क्योंकि यहाँ एक पद के अर्थ के अभेद का प्रभ ही नहीं, वाक्यार्थों का ही अभेद है। इसी तरह वाक्यार्थश्लेष से भी इसका भेद है, क्योंकि समासोक्ति आकित अर्थों से भी होती है और शलेष में सब्र अर्थ शब्दप्रतिपादित होते हैं। इस तरह शक्ति और आक्षेप से सब बात का निर्वाह हो जाता है यह है इस विषय में भामह, उद्भट आदि प्राचीन आचार्यों का आशय। पसिडतराज का मत (पर इस सिद्धान्त में अररुचि यह है कि कहीं-कहीं इळेष के तथा विशेषणों की सामनता के अभाव में भी प्रकारान्तर से अप्रकृत अर्थ की प्रतीति होती है, ऐसे स्थलों में अर्थ का आक्षेप नहीं हो सकता, अतः ऐसे स्थलों में पूर्वोक्तरीत्या केवल शक्ति और आक्षेप से निर्वाह कैसे हो सकता है इसलिए आगे अपना सिद्धान्त बताते हैं-) 'निशामुखं चुम्बति चन्द्र एष :- अर्थात् यह चन्द्र निशामुख को चुम्बन कर रहा है' इत्यादिक में 'निशा' और 'चन्द्र' दोनों शब्दों में शलेष नहीं है और केवल 'मुखचुम्बन' पुत्रादिक का भी हो सकता है तो फिर उस 'मुखचुम्बन' के द्वारा नियमतः नायक का ही आक्षेप कैसे हो सकता है। यदि किसी तरह नायक का आक्षेप मान भी लिया जाय तो नायक का 'चन्द्र' के साथ और नायिका का 'निशा' के साथ अभेद से अन्वय कैसे होगा, 'चुम्बन' आदि में ही भेद सम्बन्ध से अन्वय क्यों नहीं
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होगा। अब यदि भेदसम्बन्व से चुम्बन आदि में अन्वय माना जाय तो निशा और चन्द्रमा की नायक-नायिकारूपता से तटस्थता हो जाने पर रस का उद्बोध न हो सकेगा। इम देखते हैं कि 'निशामुखं चुम्बति चन्द्र एषः' के स्थान पर 'निशामुखं चुम्बति चन्द्रिकैषा' यह बना दिया अथवा 'अहमुंखं चुम्बति चण्डभानुः' कहा जाय तो नायकत्त्र की प्रतीनि नहीं होती, क्योंकि पहले में चुम्बन करने वाली चन्द्रिका स्त्रोलिङ्ग है और दूसरे उदाहरण में दिन रूपा नपु सक लिङ्ग के मुख का चुम्बन है, अतः यह मानना पड़ता है कि प्रकृत उदाहरण में नायिकात्व और नायकत्व्र 'टाप्' प्रत्यय के द्वारा प्रतिपादित स्त्रीत्व से रात्रि में, और (पुल्लिं'ग की) प्रथमा से प्रतिपादित पुरुषत् से चन्द्रमा में अभिव्यक्त हाता है और इस तरह निशा का नायिकात्व और चन्द्रमा कानायकत्व सिद्ध हो जाता है। रिलिष्ट विशेषणों से (भी) व्यक्षना व्यापार के द्वारा ही अप्रकृत अर्थ का बोध हाता है, क्योंकि प्रकरणादि के द्वारा शक्ति का तो नियन्त्रण हो जाता है। अनः यह सिद्ध हुआ कि समासक्ति में व्यञ्ञना के प्रभाव से अप्रकृत वाक्यार्थ के अभेद से प्रकृतवाक्यार्थ स्थित रहता है और समासोक्ति गुणीभूतव्यङ्ग का भेद है-यही मार्ग सुन्दर है। (केवल शक्ति और आक्षेत से काम नहीं चल सकता)। अलङ्कारसवस्व का खएडन अलङ्कारसवंस्त्रकार ने लिा है कि "विशेषणों की समानता से प्रतीत होने वाला अप्रस्तुत प्रस्तुत के अवच्छेदकरूप में प्रतीत होता है-अर्थात् 'अयमैन्द्रोमुखं पश्य रक्तश्रम्वति चन्द्रमा:' यहाँ नायकत्व्र से अवच्छिन्न चन्द्र की प्रतीति होती हैं। और (अप्रस्तुत के) अवच्छेदक होने के कारण व्यवहार का आरोप होता है, रून का आरोप नहीं होता, क्योंकि रूप का आरोप हो तो (अप्रस्तुत से प्रस्तुत के) अवच्छादित हो जाने
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( ८)
के कारण प्रकृत में (अप्रकृत के) रूप की रूपिता हो जाने के कारण रूपक ही हो जायगा"I
सो यह कहने मात्र के लिए सुन्दर है। इस विषय में पूछा जा सकता है कि अप्रकृत व्यवहार प्रकृत कर्ता में अपने कर्ता नायकादि से विशिष्ट होकर आरोपित किया जाता है अथवा अविशिष्ट। यदि आप पहला पक्ष लं-अर्थात व्यवहार अपने कर्ता नायिकादिक से विशिष्ट होकर आरोपित किया जाता है तो यह उचित नहीं, क्योंकि ऐसा होने पर नायक के व्यवहार का ही आश्रय होने से चन्द्रादिक में नायक की समानता सिद्ध हो जायगी, जो श्लेषादि की भिच्ि पर अभेद का अध्यवसान करके (केवल) व्यवहार का अभेद प्रतिपादन करना चाहने- वाले कवि को इष्ट नहीं है, क्योंकि कवि को तो चन्द्रमा आदि में (केवल) नायकत्व अभिप्रेत है, न कि नायक की समानता और वह (केवल नायकत्व् ) नायक (चन्द्रमा आदि) के व्यवहार का विशेषण होने पर सिद्ध होता नहीं। दूसरे, 'निशामुखं चुम्बति चन्द्रः'-इस जगह आपके हिसाब से चन्द्रमा में (केवल) नायक के व्यवहार का आरोप ही है, न कि नायकत्व्र का आरोप, अन्यथा आपर्की दृष्टि में रूपक हो जायगा। इसी तरह निशा में नायिकात्व का आरोप भी नहीं मानना होगा, क्योंकि वहा यहाँ भी है। इस दशा में 'नायिका से असंबद्ध 'केवल मुखचुम्बन' के असुन्दर होने से और चंद्रभा में नायक के असाधारण व्यवहार का संबंध भी न होने से आरोप का क्या फल हुआ ? अब यदि इसका उत्तर आप यह दें कि निशा में स्त्रीलिङ्ग के द्वारा नायिकात्व व्यङ्गय है (अतः सुन्दरता आा जायगी) तो चन्द्रमा में रहने वाले पुल्लिङ्ग द्वारा व्यङ्गय नायकत्व का भी विचार कीजिए। तब फिर व्यवहार अपने कर्था से अविशिष्ट कहाँ रहा ?
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अब दूसरे पक्ष को लीजिये-अर्थात् कर्चा (नायलादिक) से अविशिष्ट केवल अप्रकृत व्यवहार का आरोप माना जाय तो वह भी उचित नहीं। क्योंकि नायक के सम्बन्धीरूप में अज्ञात (अर्थात् बिसका नायक से सम्बन्ध विदित नहीं हैं ऐसे ) कंवल 'मुखचुम्बन' में सुन्दरता नहीं है। दूसरे, 'तितीषु र्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्म सागरम् इस निदर्शना से विलक्षणता दिखाने के लिए जो हमन (रूपक और समासोक्ति में) वैधर्म्य बतलाया है उसके माने बिना गति नहीं। शेष शीघ्र ही आगे कहा जा रहा है।
कुवलयानन्द का खएडन
और जो अलङ्कारसर्वस्वकार को भज्ञा में चलने वाले कुबलयानन्द- कारने पूर्वपक्ष और सिद्धान्त सहित लिखा है कि "समासोक्ति में प्रकृत और अप्रकृत के विशेषणों की साधारणता से अथवा समानरूपता से जो अप्रस्तुत वृत्तान्त की प्रतीति करवाई जाती है वह प्रकृत विशेष्य (चन्द्रा- दिक) में उस वृध्ान्त का आरोप करने के लिए है। कारण, जिसका, प्रस्तुत से सर्वथा ही संबन्ध न हो एसी वस्तु कवि के संरम्भ का विषय नहीं हो सकती। इसलिए यह मानना पड़ना है कि-समासोक्ति में (प्रस्तुत में) अप्रस्तुत के व्यवहार का आरोप सुन्दरता का कारण है, न कि रूपक की तरह यहाँ प्रस्तुत में अप्रस्तुत का समारोप है, क्योंकि जैसे-'मुखं चन्द्रः' इत्यादिक में मुख में चन्द्रत्व के आरोप का हेतु मुखशब्द का समीपवर्ची होना है वैसे 'रक्तश्चुम्वति चन्द्रमा:'-रक्त (लाल+अनुरक्त) चन्द्रमा चुम्बन करता है' इत्यादिक समासोक्ति के उदाहरण में चन्द्रादिक पर जारत्व आदि के आरोप का हेतु जार आदि का वाचक पद समीपवर्ची नहीं है, और न यहाँ 'निरीक्ष्य विद्युन्नयनैः पयोदो मुखं निश्ायामभिसारिकाया :- अर्थात् बादल ने बिजली रूपी नयनों से अमिसारिका के मुख को देखकर' इत्यादिक एकदेशविवर्ती रूपक में
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जैसे देखने के अनुकूल नयन पद का ग्रहण मेव के 'द्रष्टा पुरुष होने' की प्रतीति कराने वाला है वैसे काई जारत्व की प्रतीति कराने वाला पद ही है। अथवा जैसे- त्वय्यागते किमिति वेपत एष सिन्धुस्त्वं सेतुमन्थकृदतः किमसौ विभेति-
अर्थात् तुम्हारे आने पर यह समुद्र क्यों काँप उठता है। क्या यह इसलिए डरता है कि तुम (रामावतार में) सेतु और (क्षीर समुद्र- मंथन के समय ) मन्थन के कर्चा हो'। इस जगह '(समुद्र पर ) सेतु और मन्थन का करना' विष्णु का कार्य है और वह राजा के विष्णुत्व की प्रतीति करा देता है, वैसा ही कुछ है। इसलिए (समासोक्ति में) विशेषण से समर्पित केवल अप्रस्तुत के व्यवहार का आरोप ही सुन्दरता का हेतु हैं। यद्यपि 'विशेषणों से समर्पित दोनों अर्थों' की प्रधानता समान होती है तथापि दो में से एक (व्यवहार) के आश्रयरूपी धर्मी पर दूसरे (व्यत- हार रूप धर्म) का आरोप मानना आवश्यक है। ऐसी दशा में शब्द से प्रतिपादित 'प्रकृत व्यवहार के धर्मी' पर हो 'अप्रकृत के व्यवहार' का आरोप उचित है और केवल स्वरूप से ज्ञात (नायकादि से असंबद्ध) व्यवहार का आरोप करने में सुन्दरता न हाने के कारण, और कामुक आदि अप्रस्तुत धर्मी के सम्बन्घी रूप से अवगत होने पर रस के अनुकूल होने के कारण, कामुकादि से संबद्ध रूप में ही उसका आरोप किया जाता है। रहे कामुकादिक, सो वे वाचक पद से अनुपस्थित होने पर भी 'चुम्बनादिक' से व्यंजित होकर व्यवहार के विशेषण बन जाते हैं। अतः 'अयमैन्द्रीमुखं पश्य रक्तश्चुम्बति चन्द्रमा :- देखिए, यह चन्द्रमा रक्त (लाल +अनुरक्त ) होकर प्राची दिशा के सुख को चुम रहा है'
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AD सम्बन्ध रखने वाले वैसे चुम्बनरूपी व्यवहार का आश्रय चन्द्रमा' यही बाध होता है।" सो यह सारा असंगत है। देखिए-सबसे पहले
(१) जो यह कहा जाता है कि "मुखं चन्द्रः इस जगह मुख में चन्द्रत्व का आरोप है" सो उचित नहीं। कारण, दो प्रातिपदिकार्थों का अभेद से ही अन्वय होने के कारण मुख में चन्द्र का आरोप होता है, न कि चन्द्र के विशेषण चन्द्रत्व का।
(२ ) ओर जो यह कहा जाता है कि "जार-आदि पद के सपीपवर्ती होने रूपी हेतु के अभाव से चन्द्रादिक में जारत्व का आरोप नहीं है"' सा यह भी ठीक नहीं। कारण, श्रौत आरोप में ही वैसे समीपवर्ची होने को हेतु माना जाता है, अर्थनाप्त आरोप में नहीं, अन्यथा रूपकध्वनि का उच्छेद हो जायगा। आप कहेंगे-कि 'रूपकध्वनि में जिस (चन्द्रादि) को आरोपित किया जाता है उसके साधारण धर्म की उक्ति आरोपित किए जाने वाले तादात्म्य का अभिव्यक्त करती है किन्तु यहाँ वैसा कुछ नहीं है तो इसका उत्तर यह है कि यहाँ भी परनायिका का मुखचुम्बन जो (प्राचीनों के मत से) श्लेष की मर्यादा से अथवा (अपने मत से) व्यंजना की मर्यादा से प्रतीत होता है उसका प्रकृत धर्मी चन्द्रमा में आरोप किये जाने पर उसके जार का आसाधारण धर्म' हो जाने से वह स्पष्ट ही जारत्व का अभिव्यंजक है।
(३ ) इसी से "विद्युन्नयनैः" और 'त्वं सेतुबन्धनकृत्' इन स्थानों पर जैस 'द्रष्टृत्व' और 'विष्णुत्व' की प्रतीति करवाने वाला धर्म विद्यमान है वैसे यहाँ नहीं है यह कहना भी निरस्त हो जाता है, क्योंकि 'मुखचुम्बन रूपी जार का व्यवहार' व्यक्षक रूप में विद्यमान है, यदि आप कहें
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कि 'आारव्यवहार' का आरोप चन्द्रादि में बारत्वादि का आरोप न करने पर भी सिद्ध हो जाता है, अतः अनुपपत्ति के अभाव में आरस्व्न को अवगत नहीं करवा सकता। तो इसका उत्तर यह है कि-गमक (अवगत करवाने वाला) दो प्रकार का होता है आक्षेरक और व्यंजक, उनमें से आक्षेरक गमक अनुपपत्र होने पर ही किसी बात को प्रतीत करवाता है, किन्तु व्यज्जक गमक अनुनप्त्ति की अपेक्षा नहीं रखता, क्योंकि 'गतोऽस्तमकः' इत्यादिक में वैसा ही देवते हैं, अन्यथा 'अर्थापच्ति' से गतार्थ होने के कारण व्यंजना व्यर्थ हो जायगी। दूसरे, आपको भी जार-आदि अप्रकृत धर्मी की प्रतीति अवश्य ही कहनो पड़ेगी, क्योंकि उसे आरोपित किए जानेवाले व्यवहार का विशेषण बनाना है, अन्यथा (मुखचुम्बन के जारसम्बन्धी न होने पर) केवल स्वरूप से अप्रकृत व्यहार का आरोप करने से सुन्दरता न हो सकेगी। इस तरह जब जार आदि की उपस्थिति आवश्यक है तब वैसा चुम्बन करनेवाले चन्द्रादिक में जारादिक की तादात्म्य सम्बन्ध से विशषणता उचिय है, न कि भेद सम्बन्ध से व्यवहार में। अर्थातू चन्द्र को जाररूप मानना ही उचित है, न कि चन्द्र में जारव्यवहार मानना, क्योंकि चन्द्रमा के जार से भिन्न रून में प्रतात होने पर 'परनायिका के वदन- चुम्बन' का वर्णन असुन्दर होगा।
(४) और देखिए 'निशामुखं चुम्बति चन्द्र एषः' इस जगह 'मुखचुम्बन' रूपी अर्थ के सचिव स्रालिंग और पुललिङ्ग से नायिकात्त और नायकत्त्र अभिव्यक्त होते हैं-इस बात में तो कोई विवाद है नहीं, अन्यथा 'निशामुखं चुम्बति चन्द्रिकैषा' 'अहमुंखं चुम्बति भानु- विम्ब' इत्यादिक में भी नायक की प्रतीति होने लगेगी। सा इस तरह 'समानाधिकरणता' रूपी संतर्ग से अभिव्यक्त होने वाला नायकत्व्व चन्द्रमा और निया पर नायकत्व और नायिकात्व के आरोप में ही
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पर्यवसित होता है और ऐसा न मानने से आपके उपजीव्यग्रन्थ (अलंकार- सवस्व) का विरोध भी होगा, क्योंकि उसमें लिखा है कि-"अपने रूप को न छोड़कर निशा और शशी नायिकात्व और नायकत्व्व रूपी धर्म से विशिष्ट प्रतीत होते हैं" इतना ही नहीं, किन्तु उसकी टीका में जो यह लिखा है कि-"अनिवार्य होने के कारण अप्रकृत व्यवहार से आक्षिप् धर्मी (नायकादि) के द्वारा ही प्रस्तुत धर्मी (चन्द्रादिक ) अर्वच्छिन्न होता है" इसका भी विरोध होगा।
(५) और जो अपने कहा है कि "चुम्बनादिक के व्यवहार से अभिव्यक्त होने वाला नायक व्यवहार का ही निशेषण हो सकता है, अभेद सम्बन्ध द्वारा चन्द्रमादि का विशेषण नहीं, क्योंकि 'चन्द्र'- आदि के समानाधिकरण पद (नायक वाचक शब्द) के द्वारा यह अर्थ उपस्थित नहीं करवाया गया है"। इसके विषय में हमें यह कहना है कि जो बात आपने चंद्र के विषय में कही है यही बात (नायिकावाचक पद की अनुपस्थिति) निशा में भी है, इसलिए वहाँ भी 'नायिकात्व' का आरोप नहीं होगा, किन्तु, नायक की तरह, अभिव्यक्त हुई नायिका की भी 'व्यवहार से संबंध रखने वाली' के रूप में ही अवस्थिति होगी- यह मानना पड़ेगा। पर यह बाधित है; कारण, नायिकात्व से संबंध रखनेवाली 'केवल रात्रि' का 'मुखचुम्बन' रूपी व्यवहार नायक से संबंध नहीं रख सकता, क्योंकि रात्रि से तादात्म्य माने बिना 'नायिका' अलग से मुख (वदन) का विशेषण बनने का सामर्थ्य नहीं रखती- रात्रि और नायिका को अभिन्न मानो तभी मुख का नायिका से संबंध हो सकता है, अन्यथा नहों । इतना ही नहीं, •किन्तु
निर्लच्मीकाभवत्प्राची प्रतीचीं याति भास्करे। प्रिये विपक्षरमणीरक्ते का सुदमश्चति॥
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सूर्य के प्रतीची (पश्चिम दिशा) गमन करने पर प्राची (पूर्व दिशा) शोभारहित हो गई। प्रिय के शत्रुरमणी में आसक्त होने पर कौन सुखी रह सक है।'
इस जगह पूर्वार्द्ध में जो समासोक्ति है वहाँ यदि भास्कर की नायकत्व्र के रूप में और प्राची प्रतीची की नायिकात्व के रूप में प्रतीति न हो तो उत्तरार्ध में प्रियत्व आदि से उसका समर्थन करना स्वथा ही अनुपपन्न हो जाता है। सो यह भी गड़बड़ ही है।
(६) अब एक बात और लीजिए। हम आपसे पूछते हैं कि- 'प्रकृत विशेषण में अप्रकृत व्यवहार' प्रकृत व्यवहार से तटस्थ रखकर आरोपित किया जाता है अथवा उससे अभिन्न मानकर। यदि तटस्थ माना जाय तो उचित नहीं। ऐसा मानने से प्रकृत विशेष्य में प्रकृत और अप्रकृत दो व्यवहारों के होने से 'एक में दो' ऐसा बोध होगा और ऐसा बोध आसिद्ध है-यह कहा जा चुका है कि 'तब अप्रकृत व्यवहार प्रकृत से असंत्रद्ध हो जायगा'।
अब यदि कहा जाय कि 'प्रकृत विशेष्य' पर दोनों व्यवहारों का अभिन्न होकर आगेप होता है सो वह भी ठीक नहीं। कारण, इसकी अपेक्षा तो 'प्रकृत व्यवहार में ही अप्रकृत व्यवहार का अभेद से आरोप श्रेष्ठ है', न कि (भिन्न-भिन्न दो व्यवहारों को अभिन्न मानकर उनका) भेद संसर्ग से प्रकृत विशेष्य पर आरोप। कारण, इस दशा में अभेदांश में और व्यवहारांश में दो जगह आरोप स्वीकार करना पड़ता है अर्थात् पहले अप्रकृत व्यवहार को प्रकृत व्यवहार के अभेद में विशेषण रूप से जोड़ना पड़ेगा और तब-उन दोनों अभिन्न व्यवहारों को भेद संसर्ग से विशेष्य में। और हमारे मत में तो केवल अभेद अंश में ही आरोप मानना पड़ता है, इसलिए हमारे मत की विशेषता स्पष्ट ही है।
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अतः यह मानना चाहिए कि-अप्रकृतव्यवहार से अभिन्न रूप में माना हुआ प्रकृत व्यवहार अप्रकृत व्यवहार के विशेष्य से अमिन्न रूप में स्थित प्रकृत विशेष्य में भासित होता है। यहाँ प्रकृत अर्थ में उपस्कारक होने के कारण अप्रकृत अर्थ गौण है यही प्रकार सुंदर है।
यहाँ यह सूक्ष्म विचार भी कर लेना चाहिए कि-यह आरोप 'तवपादनखरत्नानाम्' इत्यादि वाक्यार्थरूपक की तरह विशिष्ट अर्थ का विशिष्ट अर्थ में नहीं है, कारण, समासोक्ति में प्रकृतवाक्यार्थ और अप्रकृतवाक्यार्थ पृथक-पृथक शब्दों से ज्ञात नहीं होते, किन्तु प्रकृत- वाक्यार्थ के घटक पदार्थ तादात्म्य संबंध के द्वारा अप्रकृतवाक्यार्थ के घटक पदार्थों से उपश्लिष्ट होकर ही विशिष्टता का अनुभव करते हुए यहाँ वाक्यार्थ के रूप में परिणत होते है और अतिशयोक्ति की तरह यहाँ अप्रकृत से प्रकृत का निगरण तो कहा नहीं जा सकता, क्योंकि यहाँ प्रकृत विशेष्य शब्दवाच्य है-अतिशयोक्ति में तो वह (प्रकृत) रहता ही नहीं।
समासोक्ति के मेद
अच्छा अब इसके भेद बताए जाते हैं- विशेषण की समानता दो प्रकार से होती है श्लेष से अथवा शुद्ध साधारणता से। वह प्रत्येक दो दो प्रकार की है -: १) कहीं किसी अन्य धर्म को आगे रख कर और कहीं कार्य को आगे रख कर। इस तरह चार भेद होते हैं।
उनमें से श्लेष में धर्मान्तर को आगे रखकर विशेषण की समानता का उदाहरए यद्यपि 'विबोधयन्करस्पर्शेः०'इस पद् द्वारा पहले दिया जा चुका है, तथापि फिर दिया जाता है-
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( १६ ) उत्सङ्ग' त गङ्ग ! पायं पायं पयोऽतिमधुरतरम्। शमिताखिलश्रमभरः कथय कदाहं चिराय शयिताहे।। हे गङ्गे आपकी गोदी में अत्यन्त मधुरतर पयपान करता हुआ सारे श्रम के बोभ को शान्त करके, कहिए, मैं चिरकाल के लिए कब सोऊँ गा ? यहाँ 'माँ-बच्चे के वृत्तान्त' के अभेद से प्रकृत वृत्तां्त स्थित है। कार्य को आगे रखकर इलेष से विशेषण की समानता का उदाहरण-"आबध्नास्यलकान्निरस्यसि०' इस पूर्वोक्त पद्य में दिया जा चुका है। शुद्ध साधारणता से अन्य धर्म को आगे रखकर विशेषण की समानता; जैसे- अलंकर्तु कर्सौं भृशमनुभवन्त्या नवरुजां ससीत्कारं तिर्यग्वलितवदनाया मृगदृशः । कराब्जव्यापारानतिसुकृतसारान्रसयतो जनुः सर्वश्लाध्यं जयति ललितोत्तंस! भवतः ॥ हे सुंदर, कर्णभूषण, तुम्हारे सर्वश्लाध्य जन्म की जय है। कानों को अलङ्कन करने के लिए नवीन पीड़ा का अत्यन्त अनुभत् करती और सीत्कार के साथ मुँह को तिरछा झुकाती मृगनयनी के करकमलों की चेष्टाएँ जो अत्यन्त सुकृत का सार है उनका रस ले रहे हो।
यहाँ नववधू से कशपूर्वक कान में पहने जाते हुए कर्णभूषण का वृत्तान्त जिसने अभी-अभी अधर खण्डित किए हैं उस कामुक के वृच्तान्त के अभेद से स्थित है।
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अथवा जैसे- अन्धेन पातभीत्या संचरता विषमविषयेषु। दृढमिह मया गृहीता हिमगिरिशङ्गादुपागता गङ्गा ।। विषम विषयों में (दुखदायी विषयों + ऊबड़-खाबड़ प्रदेशों) में भटकते मुझ अंधे ने, पतन के भय से, हिमालय के शिखर से आई गङ्गा को दढता से पकड़ लिया है। यहाँ 'पहाढ़ के शिखर पर उत्पन्न हुई बांस की लकड़ी के व्यतहार के अभेद से प्रकृत वृचान्त स्थित है कार्य की साधारणता से; जैसे- देवत्वां परितः स्तुवन्तु कवयो लोभेन किं तावता स्तव्यस्त्वं भवितासि यस्य तरुणश्राषप्रतापोडघुना। क्रोडान्त: कुरुतेतरां वसुमतीमाशाः समालिङ्गति द्यां चुम्बत्यमरावतीं च सहसा गच्छत्यगम्यामपि।। हे देव, कवि लोग चारों ओर से लोभ के कारण तुम्हारी स्तुति भले ही करें-पर इससे क्या आन स्तुति के योग्य हो जाएँगे ? जिसके धनुष का तरुण प्रताप वसुमती (पृथ्ती) को छाती से लगाता है, दिशाओों को आलिङ्गन करता है, द्ौ (स्वर्ग) को चूमता है और अगम्य (अप्राप्य+गमन के अयोग्य) भी अमरावती से (वस्तुत; में) सहसा (अनायास +बलात्) गमन करता है। कार्य और धर्मान्तर के मिश्रण से साधारणता; जैसे- उत्किप्ताः कबरोभरं, विवलिता: पार्श्वद्वयं, न्यकृता: पादाम्भोजयुगं, रुषा परिहता दूरेश चेलाश्लम्। २
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गृहन्ति त्वरया भवत्प्रतिभट्त्मापालवामभ्रुवां यान्तीनां गहनेषु कएटकचिता: के के न भूमीरुहाः। हे राजन्, कौन ऐसे पेड़ हैं, को कण्टकचित (कँटीले+पुलकित) होकर जङ्गल में जाती हुई आपके शत्रु-राजाओं की रमणियों के, ऊचे उठाने पर केश-पाश को, टेढ़े करने पर दोनों बगलों को, दबाने पर दोनों चरण-कमलों को और रोष से दूर हटा देने पर तत्काल कपड़े का प्रत न पकड़ लेते हों। यहाँ 'कंटकचितता' (रोमाञ्चितता) धर्मान्तर (नायक का एक धर्म) है और 'केश पाश पकड़ना' आदि कार्य है-इन दोनों का मिश्रण है। समासोक्ति में वाच्य अर्थ ही प्रधान होता है यह कहा जा चुका है कि समासोक्ति में अप्रकृत व्यवहार उपस्कारक मात्र होता है, प्रधान नहीं, प्रधानता तो उससे उपस्कृत वाच्य अर्थ की ही होती है। यदि व्यङ्य की ही प्रधानता हो और वाच्य की नहीं, तव 'देव त्वां परितः स्तुवन्तु०' इस पूर्वोदाहृत पद् में निंदा के मिष से स्तुति में पर्यवसान न होगा, क्योंकि स्तुति प्रकृत व्यवहार (राजा के प्रतापप्रकर्ष, जो वाच्य है) का आश्रय है और निदा है अप्रकृत व्यवहार (अनेक-स्त्री-संग, जो व्यङ्गय है) का आश्रय। इस बात को ध्यान में रखना चाहिए। अलङ्कारसर्वस्त् का खण्डन (१) और जो कि अलङ्कारसर्वस्त्रकार ने कहा है- "तन्वी मनोहरा वाला पुष्पान्षी पुष्पहासिनी। विकासमेति सुभग! भवद्दर्शनमात्रतः ॥
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( {& )
हे सुभग, आपके केवल दर्शन से ही पुष्पाक्षी, पुष्पहासिनी, वह दुर्बल तथा मनोहर बाला विकसित हो जाती है। यहाँ दुर्बलता आदि विशेषणों की ममानता से चंचलनयनी में लता के व्यवहार की प्रतीति होती है, उस प्रतीति का कारण है केवल लता में रहने वाले 'वकास' नामक धर्म का आरोप। यदि इसे आरोप का कारण न माना जाय तो केवल विशेषणों की समानता से लता में नियत व्यवहारों' की (कामिनी में) प्रतीति नहीं हो सकती। प्रकृत (नायिका के पक्ष) में विकास शब्द प्रसन्नता अर्थ में लाक्षणिक समझना चाहिए।"
इस पर विचार किया जाता है। एक तरफ तो आपही ने कहा है कि "यहाँ केवल विशेषणों की समानता से लता के व्यवहार की प्रतीति नहीं है, किंतु लतारूपी अप्रकृत के असाधारण धर्म 'विकास' के आरोप की महिमा से उसकी प्रतीति होती है।" दूसरी तरफ आप समासोक्ति का लक्षण बता रहे हैं-"विशेषणसाभ्यादप्रस्तुतस्य गम्यत्वम्-अर्थात् विशे- 'षण की समानता से अप्रस्तुत के प्रतीत होने को समासोक्ति कहते हैं।"
अब आप सोचिए कि इस आपके लिखे समासोक्ति के लक्षण की उक्त उदाहरण में कैसे प्रवृत्ति होगी? यदि आप कहें कि-लक्षण में 'विशेषर्णो की समानता मात्र से प्रतीत होना' यह कथन अभीष्ट नहीं है, किन्तु 'विशेषणों की समानता से प्रतीत हाना' इतना मात्र ही अभीष्ट है। अतः यदि प्रकृत उदाहरण में विशेषणों की समानता के साथ 'विकास रूपी' धर्म की भी गमकता अधिक हो गई तो इतने से 'विशेषणों की समानता की गमकता' में क्या हानि हो गई ? तो ऐसा कहना उचित नहीं, कारण, ऐसा मानने से श्लेष में अतिव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि वहाँ विशेष्य के श्लिष्ट होने पर भी 'विशेषणों की समानता' में तो कोई त्रुटि है नहीं।
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अब यदि आप कहें कि लक्षण में 'विशेषणसाम्य' शब्द से 'विशेषणों की समानता' मात्र कहना अभीष्ट नहीं है, किन्तु 'केवल विशेषणों का समानता' यह कथन अभीष्ट है। सो अब न तो श्लेष में अतिव्याति होती है, क्योंकि वहाँ 'विशेष्य की श्लिष्टता' भी अप्रकृत अर्थ की प्रतीति में सहायक है, अतः विशेषण केवल न रहे और न 'तन्वी मनोहरा' इस उदाहरण में ही लक्षण की अव्याप्ति होती है, क्योंकि यहाँ भी समानता तो विशेषणों के अतिरिक्त किसी की है नहीं, विकास तो असा- धारण अर्थ है तो यह भी उचित नहीं। कारण, 'तन्वी मनोहरा०' इस उदाहरण में समासोक्ति है ही नहीं, क्योंकि यह व्यवस्था मानी जाती है कि 'जहाँ साधारण विशेषणों के प्रभाव से अप्रकृत की स्फूर्ति होती है वहाँ समासोक्ति होती है और जहाँ 'किसी असाधारण के प्रभाव' से अप्रकृत की रफूति होती है वहाँ व्यङ्गय रूपक होता है।' ऐसी स्थिति में प्रकृत उदाहरण में साधारण विशेषण होने पर भी उनके प्रभाव से लता की स्फूति नहीं होती, किंतु 'विकास' के प्रभाव से होती है, इसलिए यहाँ व्यङ्गयरूपक ही उचित है। जैसे कि-
"चकोरनयनानन्दि कहाराह्लादकारणम्। तमसां कदनं भाति वदनं सुन्दरं तव।।
चकोरों के नेत्रों को आनंद देने वाला, कल्हार पुष्प के ल्हाद का कारण तम का नाश करनेवाला तुम्हारा सुन्दर वदन सुशोभित हो रहा है।"
इत्यादिक में 'सुन्दर' इस साधारण विशेषण के होने पर भी रूनक ही है वैसे ही यहाँ भी व्यङ्गय रूपक ही समझना चाहिए। यह दूसरी बात है कि कहीं रूपक गौण होता है, जैसे 'तन्वो मनोहरा०' इस उदाहरण में और कहीं प्रधान, जैसे 'चकोरनयनानंदि' इस उदाहरण
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में कहा जायगा कि तब 'साधारणता से विशेषणसाम्यमूला समासोक्ति' का उदाहरण ही नहीं रहेगा। सो यह भय व्यर्थ है, क्योंकि इसका "अंधेन पातभीत्या०" यह हमारा पहले दिया हुआ उदाहरण विद्यमान है, जहाँ कि असाधारण धर्म के आरोप के बिना केवल साधारण विशेषणों के प्रभाव से ही अप्रकृत की प्रतीति हो जाती है। इसी से "तदेवं साधारण्येन समासोक्तेविशेषणसाम्येऽप्य प्रकृतसंबन्धिधर्मकार्यसमारोप मन्तरेण तद्व्यवहारप्रतीतिर्न भवति-अर्थात् सो इस तरह यह सिद्ध है कि समासांक्ति के साधारणतया विशेषणों की समानता होने पर भी अप्रकृतसंबंधी धर्म अथवा कार्य के आरोप के बिना समासोक्ति के व्यवहार की प्रतीति नहीं होती" यह जो विमर्शिनीकार ने लिखा है वह निरस्त हो जाता है। अतः उक्त प्रकार से विषयविभाग के सम्भव होने पर 'तन्वी मनोहरा०' इस उदाहरण में समासोक्ति बताना हृदय को जँचता नहीं। (२ ) और जो उन्होंने यह कहा है कि " विशेषण की समानता उपमागर्भित भी हो सकती है, जैसे- दन्तप्रभापुष्पचिता पासिपल्ववशोभिनी। केशपाशालिवृन्देन सुवेषा हरियेक्षया॥
अअलंकारसर्वस्व का मूल्ल ग्रन्थ इस प्रकार है- "औपभ्यगर्भरवेन यथा- दन्तप्रभापुष्पचिता पाणिपल्लवशोभिनी। केशपाशालिवृन्देन सुवेषा हरिणेक्षण। अत्र दन्तप्रभाः पुष्पाणीवेति सुवेषत्ववशादुपमागभंतवेनच कृते समासे पश्चाइन्तप्रभासडशैः पुष्पैदिचितेति समासान्तराश्रयणेन समानविशेषण-
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पुष्पों के समान दन्तप्रभा से युक्त, पल्लवों के समान पाणिसे सुशोभित, मृगनयनी अलिवृन्द (भ्रभरसमूह) के समान केशपाश से सुवेषा (खुब सजी हुई) है। "यहाँ केवल मृगनयनी में रहनेवाले 'सुवेषा' इस विशेषण की महिमा से ( 'उपमानानि सामान्यवचनैः' २।१५५ इस सूत्र के अनुसार होने वाली) 'दन्तप्रभा के समान पुष्प' इत्यादिक सीधी योजना को छोड़कर 'पुष्पों के समान दन्तप्रभा' इत्यादिक ('उपमितं व्याघ्रादिभि: सामान्याप्रयोगे' २।१५६ इस सूत्र के अनुसार) उपमितसमास के सहारे योजना करने पर प्रकृत अर्थ की सिद्धि हो जाती है, फिर भी उसी छोड़ी हुई योजना का व्यंजना के द्वारा पुनरु- जीवन होने पर जो लता की प्रतीति होती है वह पुष्प, पल्लव और अलिवृन्द रूपी उपमेयों से आक्षित्त है, (न कि विशेषणों की समानता के कारण) अतः मृगनयनी में लता के व्यवहार का आरोप नहीं है (सो समासोक्ति नहीं हो सकती)। "और लोक के 'सुवेषा' पद को हटाकर इसके स्थान पर 'परीता =व्याप्त अथवा घिरी हुई' यह कर देने पर उपमा के साधक और रूपक
माहालयाल्लताव्यवहारप्रतीतिः। अत्रैव 'परीता हरिणेक्षण' इति पाठे उपमारूपकसाघकवाधक्राभावात्संकरसमाश्रयेण कृते योजने पश्चात् पूर्ववत् समासान्तरमहिम्ना लताप्रतीतिज्ञया। रूपकगर्भत्वेन तु समासा- न्तराश्रयणात् समानविशेषणत्वं भवद्पि न समासोक्ते: प्रयोजकम्।" (निर्णयसागरीयद्वितीयसंस्करण पृ० ११०) पण्टितराज ने यहां मछग्रन्थ को ज्यों का त्यों उद्दध त न करके उसकी व्याख्या करते हुए बक्ताका तात्पर्य उद्धत किया है। अनुवादक-
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के बाघक प्रमाणों के अभाव के कारण उपमा और रूनक के संदेह- संकर के सहारे याजना हो जाने के बाद जो पूर्वोंक्क रीति से (व्यंजना द्वारा) लता की प्रतीति होगी वह समासोकि ही होगी, क्योंकि यहाँ समास्त के भेद से अर्थ का भेद होने पर भी शब्द का एकता को लेकर 'श्लिष्टविशेषणमूला समासोक्ति' की तरह विशेषणों की समानता हो जाती है-यह समझना चाहिए और आदि में अथवा अंत में रूपक का आश्रय लेकर 'दन्तप्रभा एव पुष्पाणि=दन्तप्रभारूपी पुष्प' यह योजना की जावे तो 'मृगनयनी' इस अंश में आक्षत लता के तादात््य वाले एकदेशविवर्ती रूपक से हो अप्रकृत अर्थ की सिद्धि हो जाती है, इसलिए यहाँ समासोकि का कोई प्रयोजन नहीं।"
सो यह कथन भी विचार करने पर टिक्क नहीं सकता। कारण (एकदेशविवर्ती रूपक न मानने पर भी) 'दन्तप्रभाः पुष्पाणीव-पुष्पों के समान दन्त प्रभाएँ' इस तरह प्रथमतः उपमागमित योजना कर लेने पर 'मृगनयनी' इस अंश में 'आक्षिप्त लता जिसका उपमान है ऐसी एकदेशविवर्तिनी उपमा' से ही गतार्थंता हो जाने के कारण ('परीता' कर देने पर भी) समासोक्ति के निरथंक हो जाने से उस का यहाँ प्रसङ्ग ही नहीं है। यदि आप कहें कि उन्भट के मत में एकदेश- विवरची उपमा संकरों का स्वीकार न किए जाने के कारण यहाँ समासोक्ति कही गई है तो यह भी ठोक नहीं, क्योंकि अभी-अभी आप ('साघकवाधकप्रमाणाभावात्' कह कर) इसे स्वीकार कर चुके हैं। इतना ही नहीं, किंतु- हालाहलसमो मन्युरनुकम्पा सुधोपमा। कीर्तिस्ते चन्द्रसदृशी भटास्तु मकरोन्डटाः ।।
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हे राजन्, आपका क्रोध जहर के समान है, कृपा अमृत के समान है, कीर्ति चंद्र के समान है और योद्वा लोग मगरों के समान उद्भट है।
इत्यादिक उदाहरणों में अन्य कोई गति न होने के कारण उन्भट को भी एकदेशविवर्ती उपमा ही स्वीकार करनी पड़ेगी, (क्योंकि यहाँ अन्य सब तो है, पर राजा को रत्नाकर के समान नहीं कहा गया है जो एकदेशविवर्चिनी उपमा मानने के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार से बन नहीं सकता)। अतः अवश्य मानेजानेवाले इस भेद से ही सिद्ध हो जाने पर अन्य भेद की कल्पना अनुचित है। इसलिए सादृश्यगर्भ विशेषणों से उत्थापित समासोक्ति का प्रकार भसंगत ही है।
हाँ, जहाँ श्लिष्ट विशेषण के अथवा शुद्ध साधारण विशेषण के उपमागर्मित विशेषण साथ हो गया हो, वहाँ यद्यपि समासोक्ति है तथापि वह समासोक्ति का 'साहृश्यगर्भ विशेषण से उत्थापित' तृतीय मेद नहीं हो सकता, क्योंकि उसका विषय स्वतन्त्र नहीं है। जैसे कि-
निर्मलाम्बररम्यश्री किंचिद्दर्शिततारका । हंसावलोहारयुता शरद्विजयतेतराम् ॥ निर्मल अंबर (आकाश+त्रस्त्र) से सुंदर शोभावली और किश्चित् तारा (तारे+आँख का तारा) दिखानेवाली हार के समान हंसावली से युक्त शरद् सर्वोत्कृष्ट है। यहाँ पूर्वाद्ध में रहने वाले श्लिष्ट विशेषणों ('निर्मलाम्वररम्यश्री' और 'किञ्चिदर्शिततारका') से उठाई हुई समासोक्ति उच्वरार्ध में
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रहने वाले उपमागमिंत विशेषण (हंसावलीहारयुता) द्वारा इस तरह अनुमोदित की जाती है; जैसे कि किसी विद्वान् की उठाई हुई युक्ति उसके अनुगामी मूर्ख द्वारा अनुमोदित की जावे। इसी तरह उक्त श्लोक का पूर्वाद्ध 'दचानंदा समस्तानां प्रफुल्लोत्पलमालिनी-भर्थात् सब को आनंद देने वाली और खिले हुए कमलों की माला वाली' इस प्रकार कर दिया जाय तब भी समासोक्ति 'शुद्ध साधारण विशेषणों से उत्थापित' होगी, न कि सादृश्यगर्भ विशेषण से। कारण वही पूर्वोक्त है। इस तरह यह सिद्ध हुआ कि- परिफुल्लाब्जनयना चन्द्रिकाचारुहासिनी। हंसावलोहारयुता शरद्विजयतेतराम्। नयनों के समान-अथवा नयन रूपी-खिले कमल वाली, सुंदर हास के समान-अथवा सुंदर हास रूपी-चंद्रिका वाली, और हार के समान-अथवा हार रूनी-हंस पंक्तियों से युक्त शरद् सर्वोत्कृष्ट है। इस जगह उपमा और रूपक के साधक-बाधक (प्रमाणों) के अभाव के कारण जो उपमा रूपक का संकर स्वीकार करते हैं उनके सिद्धांतों में तो उपमा और रूपक का संदेह ही जिसका स्वरूप है ऐसा 'एकदेशविचर्ती संकरालंकार' ही होगा और जो लोग 'संदेह संकरालंकार' को नहीं मानते उनके हिसाब से जब उपममितसमास की स्फूर्ति होगी तब एकदेशविवर्तिनी उपमा ही होगी और जत्र विशेषण- समास की स्फूर्ति होगी तब एकदेशविवर्ती रूपक ही होगा। इस तरह प्रथम याजना से हा अप्रकृत अर्थ का बोध हो जाने के कारण 'खिले हुए कमल के समान नयनों वाली' इस उपमागर्भ द्वितीय योबना के व्यर्थ हो जाने के कारण वह उठ ही नहीं पाबेगी।
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और बत इस पद्य का चौथा चरण 'शरदवर्षासखी बभौ-अर्थात् वर्षा की सखी शरद् शोभित हुई" यह बना दिया जाय तब तो केवल शरदू में रहने वाले 'वर्षा के सखीत्व' का ग्रहण होने के कारण जिसमें कमल, चंद्रिका और हंस प्रधान होते हैं (विशेष्य से अन्त्रित होते हैं) ऐसे उपमितसमास के ही आवश्यक हो जाने से, जिसमें नयन, हास और हारों के द्वारा कामिनी रूपी उपमान आक्ित होता है उस एक- देशविवर्तिनी उपमा से निर्वाह हो जाता है, अतः समासोक्ति मानने की आवश्यकता ही नहीं रहती। यह बात यद्यपि पहले निवेदन की जा चुकी है तथापि सहृदयों की प्रसन्नता के लिए फिर निवेदन कर दी है। इसी प्रकार- "अथोपगूढे शरदा शशाङ्के प्रावृड्ययौ शान्ततडित्कटाक्षा। कासां न सौभाग्यगुोऽङ्गनानां नष्टः परिभ्रष्टपयोधराखाम्। अब शशांक के शरद द्वारा आलिङ्गन कर लिए जाने पर जिसके तड़िद् रूपी कटाक्ष शान्त हो गये हैं ऐसी वर्षा चल दी। बिनके पयोघर (स्तन+मेघ) गिर चुके हैं ऐसी कोन अङ्गनाएं हैं जिनका सुभगता- गुण नष्ट नहीं हुआ।" इस किसी कवि के पद्य में एकदेशविवर्ती रूपक से वर्षा के स्त्रीत्व की सिद्धि हो जाती है, इसलिए उत्तराधगत अर्थान्तरन्यास में अनुपपत्ति नहीं रहती। हाँ, प्रथम चरण में तो 'आलिङ्गन' की समानता के कारण (अप्रकृत व्यवहार की प्रतीति होती है अतः) भले ही समासोक्ति रहे। कुवलयानन्द का खएडन और जो कुवलयानंद में लिखा है कि "सारूप्य के कारण भी समासोक्ति देखी जाती है जैसे-
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पुरा यत्र स्रोतः पुलिनमधुना तत्र सरिरता विपर्यासं यातो घनविरलभावः चितिरुह्दाम्। बहोद्ष्ट कालादपरमिव मन्ये वनमिदं निवेशः शैलानां तदिदमिति बुद्धिं द्रढयति॥
रामचंद्र दण्डकारण्य वन में शम्बूक को मारने के लिये दस हजार वर्ष के बाद फिर पहुँचते हैं। वहाँ का स्थिति देखकर वे कहते हैं- जहाँ पहिले नदी का प्रवाह था वहाँ अब्न पुलिन (बालुकामयतट) हो गया है, पेड़ों की सघनता और विरलता पलट गई है-अर्थात् जहाँ पहले सघन वन था वहाँ अव एक भीं पेड़ नहीं और जहाँ पहले खाली वीहड़ था वहाँ आज सघन जंगल है। बहुत समय के बाद देखा हुआ यह वन मानों दूसरा ही प्रतीत होता है। केवल पहाड़ों का सन्निवेश 'यह वही है' इस बुद्धि को दढ़ करता है। यहाँ वन का वर्णन प्रस्तुत है उसके सारूप्य से कुटुंबियों में धन-संतान आदि की समृद्धि और असमृद्धि की विपरीतता को प्राप्त उनके निवासभूत ग्राम-नगर-आदि का वृत्तान्त प्रतीत होता है।"
सो यहाँ समासोक्ति बताना ठीक नहीं। कारण, समासोक्ति का जीवन है विशेषणों की समानता, उसके अभाव के कारण यहाँ समासोक्तिता ही असिद्ध है। यदि आप कहें कि समासोक्ति का लक्षण 'विशेषणों की समानता से अथवा सादृश्य से जहाँ अप्रस्तुत का व्यवहार प्रस्तुत द्वारा अभिव्यक्त हो उसे समासोक्ति कहते हैं' यों बना दिया जायगा तो यह भी ठीक नहीं। कारण, 'समासोक्ति में प्रकृत वृत्तान्तः अप्रकृत वृचांत के अभेद से स्थित रहता है' यह सर्वसम्मत सिद्धांत है और तुमने भी "प्रकृतधर्मिण्यप्रकृतव्यवहार आरोप्यते-प्रकृत धर्मी में अप्रकृत का व्यवहार आरोपित किया जाता है" यह लिखा है।
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ऐसी स्थिति में यहाँ यह नहीं कहा जा सकता कि 'प्रवाह और वृक्ष आदि की विपरीतता धन-संतान आदि की विपरीतता के अभेद से प्रतीत होती है। और न वन-आदि में धन-संतान का विपर्यास ही है। इस तरह अन्य समासोक्तियों से भिन्नता होने पर भी यदि आप 'यह समासोक्ति ही है' यह शपथ खा चुके हैं तो अन्य अलंकारों को भी समासोक्ति की कुक्ि में ही डाल दीजिए, क्योंकि यह तो एक खबर्दस्ती ही ठहरी। अब यदि आप पूछें कि तब 'पुरा यत्र स्रोतः पुलिनमधुना तत्र सरिताम्' इस पूर्वोक्त पद्य में कौन अलकार है? कारण, यहाँ 'अप्रकृत वाच्य के द्वारा प्रकृत व्यतहार की अभिव्यक्तिरूप अप्रस्तुतप्रशंसा संभव नहीं है, क्योंकि यहाँ प्रकृत ही वाच्य है। तो हम कहते हैं- आपने अच्छा प्रश्न किया, किन्तु इसका समाधान विस्तारसहित अप्रस्तुत प्रशंसा के प्रकरण में ही निवेदन करेंगे।'
१-नागेश कहते हैं कि- "पसिडतराज ने इसका समाधान यह बताया है- 'पुरा यत्र स्रोत:०' इस पद् में अप्रस्तुतप्रशंसा ही अलंकार है, क्योंकि 'अप्रस्तुतप्रशंसा' का अर्थ 'अप्रस्तुत की प्रशंसा' नहीं है, किन्तु 'अप्रस्तुत द्वारा प्रस्तुत की प्रशंसा' यह है। सो इस तरह यह सिद्ध हुआ कि 'जहाँ वाच्य अथवा उषग्य अप्रस्तुत के द्वारा वाच्य अथवा व्यग्थ प्रस्तुत की सादश्यादि पाँच प्रकारों (इनका विवरण अप्रस्तुतप्रशसा के प्रकरण में देखिए) में से किसी एक प्रकार से 'करिया जाय वहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा है, केवल वाच्य से केवल व्यङ्श्य की ही प्रशंसा नहीं।' पर यह विचारणीय है, क्योंकि यह कथन युक्ति का सहन नहीं करता।
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हाँ, अल्क्कारसर्वस्वकार ने 'सादश्यगर्भ विशेषणोत्थापिता सादृश्य- मूला समासोक्ति :- अर्थात् सादृश्य से गर्मित विशेषणों के द्वारा उठाई गई समासोक्ति सादश्यमूला समासोक्ति कहलाती है' यह लिखा है,
देखिए, 'प्रशंसा' का यहाँ क्या अर्थ है? (प्रस्तुत अर्थ में) 'उत्कर्षं उत्पन्न करना' अथवा 'प्रस्तुत अर्थ की प्रतीति मात्र'। इनमें से प्रथम तो बन नहीं सकता, क्योंकि अप्रस्तुतप्रशंसा के कई उदाहरण ऐसे हैं जिनमें व्यङ्श्य का वाच्य पर आरोप नहीं होता, उनमें अव्यापि होगी, क्योंकि तटस्थता से स्थित भर्थ को उत्कर्ष करनेवाला कहना उचित नहीं। अब यदि 'प्रशंसा' का अर्थं 'प्रस्तुत की प्रतीति मात्र' मानो तो वह 'पुरा यत्र स्रोत:०' इस उदाहरण में है नहीं, क्योंकि प्रस्तुत के वाच्य हाने के कारण अप्रस्तुत से प्रस्तुत की प्रतीति नहीं होती यदि कहा जाय कि 'प्रशंसा के दोनों अर्थो में से कोई एक' यह कहकर यहाँ दोनों अर्थो का संग्रह कर लिया जायगा तो यह उचित नहीं, क्योंकि वैसा समासोक्ति में भी किया जा सकता है। अतिशयोकि आादि में ऐसा किया भी है।" पर यह नागेश की धांघली ही है, क्योंकि समासोक्ति में 'प्रस्तुत औौर अप्रस्तुत वृत्तांतों का अभेद मानना सर्वसंमत है' यह मूल में ही लिखा है। उसे उड़ाकर समासोकि का नया लक्षण बनाने की अपेक्षा अप्रस्तुतप्रशंसा, (जहाँ आरोप का बखेड़ा नहीं है) मानना ही उच्नम पक्ष है। और प्रशंसा का 'उत्कर्षाधान अर्थ' करने वाला पक्ष तो उठाना ही व्यर्थ है, क्योंकि स्वयम् पण्डितराज ने लिखा है-'प्रशंसनं घ वर्णनमात्रम्, न तुस्तुतिः-अर्थात् प्रशंसा का अर्थ यहाँ केवल बर्णन है-स्तुति नहीं।" -अनुवादक
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इसलिए उनका विशेषणों की समानता होने से उक्त पद्य में समासोक्ति का कथन संभव भी है, किन्तु आपकी बताई समासोक्ति में तो इसका किसी तरह प्रवेश नहीं हो सकता। इससे यह सिद्ध होता है कि या तो आप मूल ग्रन्थ (अलंकारसर्वस्त्र) को समझे नहीं है या उससे आपकी उक्ति का विरोध है-यह स्पष्ट ही है। यह है इस सब का संक्षेप ।
समासोक्ति के अन्य भेद
यह पूर्वोक्त चार प्रकार की समासोक्ति पुनः चार प्रकार की है, (१) लौकिक व्यवहार में लौकिक व्यवहार का आरोप। (२) शास्त्रीय व्यवहार में शास्त्रीय व्यवहार का आरोप। और उसके विवरीत अर्थात् (३) लौकिक व्यवहार में शास्त्रीय व्यवहार का आरोप और (४) शास्त्रीय व्यवहार में लौकिक व्यवहार का आरोप। उनमें से पहिली अर्थात् लौकिक व्यवहार में आरोपवाली ऊपर कही जा चुकी है।
दूसरी; अर्थात् शास्त्रीय व्यवहार में शास्त्रीय व्यवहार का आरोप जैसे- गुसवृद्धी परे यस्मिन्नैव स्तः प्रत्ययात्मके। बुधेषु सदिति ख्यातं तद् ब्रह्म समुपास्महे।। इस श्लोक के दो अर्थ हैं। वेदान्त के अनुसार- ( १ ) जिस 'प्रत्ययात्मक' (ज्ञानस्वरून) 'पर' (सर्वोक्कृष्ट) में 'गुण' और 'वृद्धि' (बढ़ना) नहीं होते-अर्थात् जो निर्गुण तथा वृद्धिक्षयरहित है और विद्वानों में जो सद्रन से विख्यात है(ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्राह्मणस्त्रिविध: स्मृतः'-भगवद्गीता ) उस ब्रह्म की हम उपासना करते हैं।
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और व्याकरणशास्त्र के अनुसार- (२) जिस 'प्रत्ययात्मक' (शतृ-शानच्रूप) के 'परतः' (भगे) आने पर गुण (इ, उ,ऋ अक्षरों को ए, भ, अर हो बाना) और 'वृद्धि' (इ उ ऋ अक्षरों को ऐ भ, आर हो जाना) नहीं होते और विद्वानों में जो 'सत्' इस नाम से विख्यात है ('तौ सत्' इस व्याकरण सूत्र से शतृ-शानच् प्रत्ययों को 'सत्' कहा जाता है) उस ब्रह्म की उपासना करते हैं। यहाँ वेदान्तशास्त्र से सिद्ध व्यवहार में व्याकरण से सिद्ध शतृ शानच के व्यवहार का आरोप किया गया है। लौकिक व्यवहार में शास्त्रीय व्यवहार का आरोप जैसे- परार्थव्यासङ्गादुपजहदथ स्वार्थपरता- ममेदैकत्वं यो वहति गुसभृतेषु सततम्। स्वभावाद्यस्यान्तः स्फुरति ललितोदात्तमहिमा समर्थो यो नित्यं स जयतितरां कोऽपि पुरुषः ॥ वह कोई पुरुष सबसे उत्कृष्ट है, जो परार्थ (परोपकार+अन्य अर्थ) के प्रसंग से स्वार्थपरता (स्वार्थतत्परता+अपने अर्थ के प्रतिपादन) को छोड़ता हुआ अपने गुणभूतों को ( आश्रितों+अप्रधान अर्थों) में सदा अभेद से एकता को धारण करना है, जिसके अन्दर स्वभाव से ही ललित उदाव महिमा (अत्यन्त महत्व+उदाच् स्वर का महत्त्व) स्फुरित होता है और जो नित्य ही समर्थ (शक्तिसम्पन्न+एकार्थीभाव स युक्त) है। यहाँ 'समर्थ सूत्र' के (महाभाष्य के) अर्थ का लौकिक अर्थ में आरोप किया गया है, क्योंकि वहाँ "अथ ये वृत्विं वर्तयन्ति किं त आहु :- अर्थात् जो समास करते हैं वे क्या कहते हैं' इत्यादिक अ्रन्थ से
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'सहत्स्वार्था' वृत्ति और 'अजहत्स्वार्था' वृत्ति इस तरह दोनों पक्षों का निरूपण किया गया है। वहीं उपसर्जन (गौण) अर्थ में 'अभेदेकत्व' संख्या भी ध्वनित की गई है, जो भतृ हरि द्वारा इस प्रकार प्रकट की गई है-
"यथौषधिरसाः सर्वे मधुन्याहितशक्तयः। अविभागेन वर्तन्ते तां संख्यां तादृशीं विदुः।। जैसे सभी औषघियों के रस शहद में अपनी शक्ति डालते हुए अविभाग से रहते हैं। इस संख्या को वैसी जानना चाहिए।" वहों 'सामथ्य' का अर्थ 'एकार्थीभाव को प्राप्त अर्थ की बोधकता' के रूप में वर्णन किया गया है। शास्त्रीय अर्थ में लौकिक अर्थ का आरोप; जैसे- कृत्वा सूत्रैः सुगूढार्थैः प्रकृतेः प्रत्ययं परम्। आगमान्भावयन्भाति वैयाकरणपुङ्गवः ।। श्रेष्ठ वैयाकरण 'सुगूढार्थ' (अत्यन्त गुप् अर्थ वाले+अत्यन्त गुप्त प्रयोजनवाले) 'सूत्रों' (सूत्रों+व्यवस्थाओं) से 'प्रकृति' (प्रातिपदिक+ कर्मचारियों) से + (के) 'पर' (आगे+अ्रत्यन्त) 'प्रत्यय' (प्रत्यय+ भरोसा) करके आगम (शास्त्रों+आय) की 'भावना करता हुआ' (लगाता हुआ + विचार करता हुआ) शोभित होता है। यहाँ व्याकरणशास्त्र के व्यवहार में राजा के व्यवहार का आरोप है। इसी तरह अन्य शास्त्रों के व्यवहार में भी समझना चाहिए। समासोक्ति का अंगीभाव
यह समासोक्ति अन्य बहुतेरे अलंकारों में अनुकूलता से स्थित रहती है; जैसे-
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३३ ) स्थितेऽपि सूर्ये पध्मिन्यो वर्तन्ते मधुपैः सह। भ्स्तं गते तु सुतरां स्त्रीणां कः प्रत्ययो भुवि ।। सूर्य के स्थित रहने पर (सूर्य की विद्यमानतामें अर्थात् दिन में) भी पद्मिनियों (कमललताएँ+उच्तम स्त्रियाँ) मधुपों (भौंरों+मदिरा पीनेवालों) के साथ रहती हैं और शस्त हो जाने पर तो सुतरा रहती हैं। अतः संसार में स्त्रियों का क्या विश्वास ? यहाँ समासोक्ति अर्थान्तरन्यास से समर्थनीय होकर अर्थान्तरन्यास की अनुकूलता करती है। यदि यह समासोक्ति नहीं होती तो अर्थान्तर- न्यास का आत्मलाभ ही दुर्लभ था। उत्तमानामपि स्त्रीयं विश्वासो नैव विद्यते। राजप्रिया: कैरविएयो रमन्ते मधुपैः सह।। उत्तम स्त्रियों का भी विश्वास नहीं है। राजप्रिय (चन्द्रमा की प्रिय+राजा की प्यारी) कुमुदिनियाँ मधुपों (भौंरों+मदिरा पायियों) के साथ विहार करती हैं। यहाँ समासोक्ति अर्थान्तरन्यास के समर्थक रूप में स्थित है। व्यागुञ्जन्मधुकरपुञ्ज मज्जुगीता- माकएर्य स्तुतिमुदयत्त्रपातिरेकात्। आभूमीतलनतकन्धरायि मन्येऽरएयेड स्मिन्नवनिरुहा कुटुम्बकानि।। वन का वर्णन है-इस जंगल में वृक्षों के झुंड, मानो गूँजते हुए भ्रमर-समूह से सुन्दर गान की हुई स्तुति को सुनकर उत्पन्न हुई लज्जा की अधिकता से अपनी गर्दनों को पृथ्वीतल तक झुकाए हुए हैं।
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यहाँ अरन्य से की हुई अपनी स्तुति के सुनने से गर्दन नीचे करने आरदि विशेषणों की समानता से उठाई हुई समासोक्ति के द्वारा, 'सजन के व्यवहार' से अभिन्न रूप में स्थित 'वृक्ष के व्यवहार' में पृथ्वी के साथ शाखाओं के सम्बन्ध से अभिन्न रूप में अध्यवसित 'गर्दन झुकाने' रूपी निमिच्त से उत्थापित 'लजा रूपी हेतु की उत्प्रेक्षा' संभव है, अन्यथा धूर्त के गर्दन झुकाने से भी लजा की उत्पत्ति हो सकेगी। इसलिए समासोक्ति उत्प्रेक्षा के अनुकूल है।
इसी तरह- राज्याभिषेकमाज्ञाय शम्बरासुरवैरियः । सुधाभिजगतीमध्यं लिम्पतीव सुधाकरः॥ कामदेव के राज्याभिषेक को जानकर, मानो, चन्द्रमा सुधाओं से पृथ्वी के मध्य को पोत रहा है-सारी पृथ्वी पर सफेदी कर रहा है। यहाँ भी स्वामि-सेवकव्यवहारमूला 'सुधालेपन' की उत्प्रेक्षा की गई है। इसी तरह अचेतन का व्यवहार प्रकृत होने पर चेतन के व्यवहार सम्बन्धी स्वरूपोत्प्रेक्षा, हेतूत्प्रेक्षा और फलोत्प्रेक्षा में और चेतन के व्यवहार के प्रकृत होने पर अचेतन के व्यवहार सम्बन्धी स्वरूपोत्प्रेक्षा हेतूत्प्रेक्षा और फलोत्प्रेक्षा में समासोक्ति ही मूल होती है।
समासोक्ति समाप्त
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परिकरालंकार
लक्षण
विशेषणों की साभिप्रायता को परिकरालक्कार कहते हैं। लक्षण का विवेचन
'साभिप्राय' का अर्य यह है कि 'विशषणों में ऐसा चमत्कारी व्यंग्य होना चाहिए जो प्रकृत अर्थ का उपपादन करे' इसीलिए इस अलङ्कार की 'हेतु अलंकार' से विलक्षणाता है, क्योंकि हेतु अलंकार में व्यंग्य आवश्यक नहों है। 'उपपादन करने' का अर्थ यह है कि चाहे प्रकृत अर्थ को उपस्कृत करे चाहे निष्पन्न करे। व्यंग्य के गुणीभूत होने के कारण यहाँ ध्वनित्व नहीं कहा जा सकता। उदाहरण- मन्त्रैर्मीलितमौषधैर्मुकुलितं त्रस्तं सुराणां गयैः स्रस्तं सान्द्रसुधारसैर्विदलितं गारुत्मतग्रावभिः । वीचिक्षालितकालियाहितपदे स्वर्लोककल्लोलिनि! त्वं तापं तिरयाधुना भवभयव्यालावलीढात्मनः ।। मन्त्रों ने आँखे मूँद लीं, औषर्धे कुम्हला गई, देवताओं के गए डर गये, सघन सुधा के रस बह गये और गारुड मणियाँ टूट-फूट गई। अब तो हे लहरों से कालिय नाग के शत्रु-भगवान् कृष्ण-के चरण धोने वाली ! हे स्वर्ग लोक की नदी ! भवभयरूपी सर्प से जिसका अन्तःकरणा ग्रस्त हो गया है ऐसे मेरे ताप को आरप ही मिटाओ। यहाँ भागीरथी द्वारा 'संसार सर्प के डसने से उत्पन्न अपने ताप के दूर करने की चाहना' वाक्यार्थ है। उसमें भगवती गङ्गा की भवताप
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नाशकता सुप्रसिद्ध है, अतः 'परिणामालङ्कार' द्वारा सर्परूपी 'विषयी'का संसार रूपी 'विषय' से ताद्रूप्य हो जाने के कारण सर्प से उत्तन्न संताप का नाशक होना सहज ही सिद्ध किया जा सकता है। इतना ही नहीं, किन्तु गङ्गाजल के विषय में पुराणों में यह भी लिखा है- "स्थास्नुजङ्गमसंभूतबिषहन््यै नमो नमः-हे गङ्ग शरप स्थावर- जङ्गमों से उत्पन्न जहर को नाश करने वाली हैं, आरपको नमस्कार।" इंत्यादि शास्त्र के वल से 'विषय के साथ ताद्रुप्य' न मानने पर भी सर्प से सीधे उत्पन्न संताप का नाशक होना भी स्वभाव सिद्ध है। इस तरह वाच्य अर्थ की सिद्धि हो जाने पर भी अधिक सुन्दरता उत्पन्न करने के लिए 'लहरों से कालियनाग के शत्रु के चरण धोने वाली' यह साभिप्राय विशेषण दिया गया है, जिससे यह सिद्ध होता हैं कि- कृष्णा के अन्य नाम होते हुए भी 'कालियनाग के शत्रु' इस शब्द के ग्रहगा के सामर्थ्य से फणों पर नृत्य करने से काली को निःसार करने वाले भगवान् के चरण में विष को हरण करने की अलौकिक शक्ति जन्मसिद्ध ही थी और वह शक्ति उन चरणों को लहरों से धोने के कारण गङ्गा में चररारज के द्वारा संक्रान्त हो गई-यह प्रतीत होता है। कहा जायगा कि शक्ति के कृष्णावतार से पूर्व ही धुल जाने से, क्योंकि गङ्गावतरण वामनावतार में हुआ, विषहरण की शक्ति से रहित चरण के द्वारा कृष्णावतार में कालिय के विष का हरण कैसे संभव है तो इसका उत्तर यह है कि उक्त अभिप्राय के अन्तर्गत यह बात भी मान ली गई है कि धुल जाने के बाद चरगा में जो लेश रूप कुछ शक्ति बची थी उसी ने इस समय काली का विष हरसा किया, इसलिए कोई अनुपपत्ति नहीं रहती। इस तरह यह भी सिद्ध है कि यहाँ व्यंग्य का गुणीभूत होना 'वाच्य के उपस्कारक होने के कारण' है, न कि वाच्यसिद्धि का श्रङ्क होने के कारण।
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श्रथवा, जैमे-
मदकामतिमोहमत्सरा रिपवस्त्वतपुर एव तावकम्। धृतशाङ्क गदारिनन्दक / प्रतिकर्षन्ति कथं न वीचसे॥
हे शाङ्ग धनुष, गदा, चक्र और नन्दक खङ्ग के धारण करनेवाले, आरपके सामने ही मद, काम, मोह और मत्सर नामक शत्रु आरपके जन को खींच रहे हैं, आप कैसे नहीं देखते।
यहाँ भी 'आपके जन' इस शब्द से प्रतिपादित 'म्वामि-सेवक भाव' से ही 'उपेक्षा' की अनुचितता का ढाँचा बन जाता है, उसको 'हे शार्ङ्ग आदि के धारण करने वाले' यह विशेषण 'अमोध शस्त्र से युक्त आपके समक्ष ही आपके दास को शत्रु खींच रहे हैं और आप उपेक्षा कर रहे हैं। आपका अपयश होगा' इस अभिप्राय को गर्मित करके प्रकृष्ट कर देता है। परिकर को पृथक अलक्कार क्यों माना जाता है आप कहेंगे-प्रयोजनरहित विशेषण के ग्रहण करने में शरयुष्टार्थ दोष बताया गया है, अतः प्रयोजनसहित विशेषण होना केवल दोष का आभाव है। सो वह 'कष्टत्व' आदि अन्य दोषों के अभाव की तरह दोष का अभाव मात्र हो सकता है, अलंकार नहीं। इसका उत्तर 'विमशिनीकार' आदि ने यह दिया है कि 'विशेषणों का अरधिक होना यहाँ अभीष्ट है और अरभिप्रायसहित विशेषणों की अरनेकता के कारण ही यहाँ विचित्रता की अधिकता भी होती है, अतः दोषाभाव मात्र को तो केवल एक विशेषण होने पर अवकाश मिल जाता है। तात्पर्य यह कि जहाँ एकमात्र विशेषण हो वहाँ दोषाभाव शीर जहाँ अ्रनेक विशेषण हो वहाँ परिकरालक्गार मानना चाहिए।' सो यह ठीक
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नहीं। विशेषणों की अनेकता व्यंग्य की अरधिकता को उत्पन्न करने के कारण विशेष विचित्रता को उत्पन्न करने वाली भले ही रहे, किन्तु वही प्रकृत अलंकार का शरीर है-यह नहीं कहा जा सकता। कारण, पूर्वोक्त उदाहरण में 'लहरों से कालियनाग के शत्रु के चरण धोने वाली' इस एक ही विशेषण का जो चमत्कारित्व है वह छिपाया नहीं जा सकता। इसी प्रकार- अयि लावएयजलाशय ! तस्या हा हन्त ! मीननयनायाः। दूरस्थे त्वयि किं वा कथयामो विस्तरेणालम् ॥ हे सुंदरता के समुद्र, हाय उस मीन-नयना का तुम्हारे दूर रहने पर क्या हाल होता होगा सो क्या कहें। विस्तार व्यर्थ है। यहाँ केवल एक-एक विशेषण से (नायक के एक मात्र विशेषण 'लावण्यजलाशय' से और नायिका के भी एकमात्र विशेषण 'मीन नयना' से) संपूर्ण वाक्यार्थ का संजीवन होता है। कुबलयानंद का खंडन
और जो कुवलयानंदकार ने लिखा है कि "श्लेष यमक आरदि में 'अपुष्टार्थ' दोष नहीं होता इस कारण ऐसे स्थलोंपर एक भी साभिप्राय विशेषण के विन्यास से विशेष चमत्कार उत्पन्न हो जाने से 'परिकरालंकार का होना' सिद्ध हो जाता है। जैसे-
'च्ितिभृतैव सदैवतका वयं वनवतानवता किमहिद्रुह्दा।-इम लोग वनयुक्त गोवर्धन पर्वत को ही देवता समझते हैं, रक्षा न करनेवाले इन्द्र से क्या प्रयोजन'
इस गोवर्धन पर्वत के विषय में नंदादि के प्रति कहे हुए भगवान् के वाक्य में (यहाँ यमक में आये हुए 'वनवता' इस पहाड़ के एक
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मात्र विशेषण ने और 'अनवता' इस इंद्र के एकमात्र विशेषण ने चमत्कार उत्पन्न कर दिया है) सो यह भी ठीक नहीं। कारण, इस विषय में हम आप से पूछते हैं कि 'जो इस अलंकार को दोषाभाव के अंदर आ जाने के कारण अलंकारों के बीचसे हटाता है वह तुम्हारे बताए हुए 'श्लेष यमक आदि शब्द चित्रों' से अतिरिक्त स्थान में जो साभिप्राय विशेषण आरते हैं उनमें किसी प्रकार का चमत्कार मानता है अथवा नहीं ? यदि आरप कहें कि मानता है तो केवल दोषाभाव मे किसी भी प्रकार का चमत्कार बिना अलंकार के सिद्ध नहीं हो सकता, अतः चाहे यमक श्लेष आरदि हों या न हों, परिकर की अलंकारता सिद्ध हो गई। औरर यदि नहीं मानता है तो वह 'यमक आदि में भी किसी प्रकार का चमत्कार नहीं है' यह सहज ही में कह देगा। उदाहरण के लिए देखिए, धर्मशास्त्र में लिखा है- "अनापदि बिना मार्गमनिशायामनातुरः। मृत्तिकाशौचहीनस्तु नरो भवति किल्विषी । जो मनुष्य बिना आपत्ति के बिना मार्ग के बिना रात्रि के औरर बिना रोगी हुए मृत्तिका से शौच नहों करता वह पापी होता है।" यहाँ 'आपत्काल आदि में पाप से बचाव' बताया गया है तथापि कोई आपत्ति-काल आदि में भी शौच आदि करे तो जैसे कोई निषेध नहीं करता प्रत्युत वह कार्य-कर्चा के सामर्थ्य का बोधक होता है वैसे ही प्रकृत में भी दोष के निषेध की विधि होने पर भी यमकादिक में भी यदि कोई सत्कवि दोष के अभाव पुष्टता (यमकादि में शपुष्टता के स्थान पर) का संपादन करे तो दोषाधायक नहीं होगा, किंतु रसपोषक ही होगा। और यदि आप यामक के स्थल पर किसी प्रकार के चमत्कार होने में
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अ्रनुभव को प्रभाण बताते हैं तो फिर अन्यत्र भी उसी को प्रमाण मानिए, अतः यमक तक दौड़ना व्यर्थ है। इसलिए 'पुष्टार्थता रूपी दोषाभाव से परिकरालंकार के विषय को पृथक कर देना कठिनता से ही हो सकता है-यह प्राप्त हुआर। इस स्थिति में हम कहते हैं कि 'सुंदरता होने पर उपस्कारक होना' अलंकार का लक्षण है और 'चमत्कार के अपकर्षक का श्रभाव' दोषाभाव का लक्षण है। यदि ये दोनों धर्म, जिनके कि विषय पृथफ- पृषक हैं, सयोग से, किसी एक विषय में समाविष्ट हो जाँय तो क्या हानि होगी, क्योंकि ऐसे स्थल में उपधेय (जिसे उपहित किया जा रहा है उस) में मिश्रण हो जाने पर भी उपाधियों में कोई मिश्रण नहीं है। जैसे ब्राह्मण के लिए मूर्खता दोष है, किंतु विद्या तो उसके लिए दोषाभावरूप भी है और गुण भी है वैसे यहाँ भी बन सकता है। यदि आप कहें कि दोषाभावरूप में प्राप्त परिकर को अलंकारों में गिनने का गौरव क्यों किया जाता है, तो इसका उत्तर यह है कि- यह अलंकाररूप भी है औरर दोषभावरूप भी, किंतु सभी दोषाभाव अलंकार नहीं होते, अतः उनसे विलक्षणता जताने के लिए इसका अलंकारों में गिनना सिद्ध हो जाता है; जैसे-समासोक्ति 'गुणीभूत- व्यंग्य' के भेदरूप से संगरहीत हो जाने पर भी पुनः अलंकारों की गणना में भी गिनी जाती है। अथवा जैसे -- जो मनुष्य महलों में भी रहता है और नीचे भी रहता है, वह महलों में गिन लिए जाने पर भी नीचे रहनेवालों की गिनती के समय फिर गिना जाता है वैसे ही यहाँ भी इसे अलंकार गिनने में कोई दोष नहीं। अन्यथा प्राचीनों का 'काव्य- लिंग' भी अलंकार नहीं होगा, क्योंकि वह भी निर्हेतुत्व रूप दोष का अभाव ही है (अतः 'परिकर' को अलंकार मानने में कोई गड़बड़ नहीं है) ।
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हाँ, यह वूसरी बात है कि- द्विजराज ! कलाधार ! विश्वतापनिवारय। कथं मामबलां क्रूरैः करैर्दहसि निर्दय!॥ हे द्विजराज, हे कलाओं के आधार, हे संसार के ताप को निवारण करने वाले, हे निर्दय,मुझ अबला को क्रूर किरणों से कैसे जला रह हो! इत्यादिक में विशेषणों की अरधिकता से व्यंग्य की अधिकता होने पर चमत्कार की भी शधिकता हो जाती है।
परिकर के भेद
इस परिकरालंकार में कहीं तो व्यंग्य वाच्यसिद्धयंग होता है औ्रर कहीं उपस्कारक। अतः प्रथमतः दो भेद होते हैं-(१) वाक्यसिद्धयंग व्यंग्यगर्भ और (२) उपस्कारफव्यंग्यगर्भ उनमें से प्रत्येक में व्यंग्य के वाच्यायमान होने और न होने से दो-दो भेद हो जाते हैं। इस तरह परिकरालंकार के चार भेद होते हैं। उनमें से (१) वाच्यसिद्धयंग-वाच्यायमान-व्यंग्य गर्भ, जैसे- विहाय संसारमहामरुस्थलीमली कदेहादि मिलन्मरीचिकाम्। कृपातरङ्गाकुल! मन्मनोमृगो विगाढुमीश ! त्वयि गाढमीहते। मेरा मन रूनी मृग जिसके अंदर झूठे देहादिरूप मृग- तृष्णा संमिलित हो रही है ऐसी संसाररूपी महा मरुस्थली को छोड़ कर हे कृपारूपी तरङ्गों से आकुल ईश, तुम्हारे अंदर खूब गोते लगाना चाहता है। यहाँ 'गोते लगाने' (रूपी वाच्य) की सिद्धि का अङ्ग 'कृपारूपी तरङ्गों से आकुल' इस पद का समुद्ररूपी व्यङ्ग्य वाच्य के समान ही हो गया है।
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(२) वाच्यसिद्धयङ्ग-वाच्यतास्पर्शशून्य-व्यङ्यगर्भ परि कर, जैसे-
खर्वीकृतेन्द्रगर्व ! त्वरया चक्रेणा भिन्ननक्रमुख। लीलात्तकोलमूर्ते ! मामुद्धर्तुं कथं न शक्तोऽसि ॥ हे इंद्र के गर्व को कम करनेवाले, हे चक्र के द्वारा त्वरा से मगर का मुख काटने वाले और हे लीला से वाराहमूर्ति को धारण करनेवाले, आप मेरा उद्धार करने के लिये कैसे समर्थ नहीं हैं। यहाँ गोवर्धन, गजेन्द्र और 'पृथ्वी का उद्धार वाच्यता के स्पर्श से रहित ही उलहनारूपी वाच्य की सिद्धि का अरद्ग है। (३) उपस्कारक - वाच्यायमानव्यङग्यगर्भ परिकर का उदाहरण है 'धृतशाङ्गगदारिनन्दक०' यह पूर्वोक्त श्लोक औ्रर (४) उपस्कारक-वाच्यस्पर्शशन्य-्यङ्ग्य गर्भ परिकर का उदाहरण है पूर्वोक्त 'वीचिक्षालित कालियाहितपदे०' यह श्रोक। परिकरालक्कार समाप्त
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श्लेषालङ्कार
लक्षण
एक श्रुति से अनेक अथों के प्रतिपादन को श्लेष कहते हैं।
लक्षण का विवेचन और भेद
उन अनेक अर्थों का प्रतिपादन दो प्रकार से होता है-अ्रनेक धर्मों के पुरस्कार से और एक धर्म के पुरस्कार से। उनमें से पहला (अरनेक धर्मों के पुरस्कार से प्रतिपादन वाला ) दो प्रकार का है- अरनेक शब्दों के प्रतिभान द्वारा और एक शब्द के प्रतिभान द्वारा इस तरह श्लेष प्रथमतः तीन प्रकार का होता है।' उनमें से एक श्रुति से अनेक शब्दों के प्रतिभान वाले श्लेष को समङ्ग और एक श्रुति से एक शब्द प्रततिभान वाले श्लेष को श्रभङ्ग कहते हैं। तीसरा शुद्ध श्लेष कहलाता है। इस तरह तीन प्रकार का यह श्लेष केवल प्रकृत के आश्रित केवल अरप्रकृतेक आरश्रित और उभयाश्रित (प्रकृताप्रकृत दोनों के आरश्रित ) इस तरह फिर तीन प्रकार का है। इनमें से प्रथम (प्रकृतमात्राश्रित )
१-यहाँ मूल के "तत्र" शब्द का अर्थ नागेश ने "आद्यभेदयो- मंध्ये" किया है। जिसका अर्थ हे-आद्यस्य=अनेक धमपुरसकारेण श्लेषस्य भेदयो :- अनेकशब्दप्रतिभानद्वारा, एकशब्दप्रतिभानद्वारा चेत्येतयोः। "इसको न समझकर भट्ट जी ने 'सरला' टिप्पणी में "नागेशटीका तु अज्ञानमूलिका" 'अहो धन्या टीका" जैसे भह् शब्द लिख दिए हैं। एक बड़े विद्वान का इस तरह बिना सोचे-समझे तिर- स्कार करना अच्छा नहीं।
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और द्वितीय (अप्रकृतमात्राभित) मेदों में विशेष्य का ल्िष्ट हाना इच्छा पर अवलम्बित है-चाहे करो-चाहे न करो, कितु तीसरे (उभयाश्रित) भेद में विशेषरावाचक ही श्लिट होता है, विशेष्य- चाचक नहीं, क्योंकि वैसा मानने से तो शब्दशक्तिमूलक ध्वनि का उच्छेद ही हो जायगा। केवल विशेषणों के श्लिष्ट होने पर भी प्रकृत और अप्रकृत दोनों धर्मियों के ग्रहण करने पर ही श्लेष होता है, केवल प्रकृतधर्मी का ही ग्रहण करने से तो समासोक्ति का ही विषय होता है।
सो इस तरह यह सिद्ध हुआ कि (१) जिसके विशेषण अनेकार्थ हों ऐसे केवल प्रकृत विशेष्य वाला एक भेद (२) इसी प्रकार केवल अप्रकृत जिसका विशेष्य हो ऐसे अनेकार्थ विशेषण वाला दूसरा भेद और (३) जहाँ विशेषण अनेकार्थक हों और प्रकृत तथा अप्रकृत दोनों विशेष्य पृथक ग्रहणा किये गये हों वह तीसरा भेद; और 'इन ज्ीनों में से कोई एक होना' यह श्लेष का लक्षण पर्यवसित होता है। क्रम से उदाहरण (१) अनेकधर्मपुरस्कारेण प्रकृताश्रित सभङ्ग श्लेषः जैसे- संभूत्यर्थ सकलजगतो विष्णुनाभिप्रपत्नं यलालं स त्रिभुवनगुरुर्वेदनाथो बिरिश्ि:। व्येयं धन्यालिमिरतितरां स्वप्रकाशस्वरूपं पद्मार्यं तत्किमपि ललितं वस्तु वस्तुष्टयेऽस्तु॥ इस पद्य के दो अर्थ हैं-एक पद्म के पक्ष में, दूसरा पझ्मा (लक्ष्मी) के पक्ष में। पद्म के पक्ष में यह अर्थ है-
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पद्माख्यं तत् किमपि ललितं वस्तु वस्तुष्टयेस्तु-पद्म नामक वह कोइ ललित वस्तु आपके लिए संतोषप्रद हो, सकलजगतः संभूत्यर्थ विष्णुनाभिप्रपन्नं यन्नालं सः त्रिभुवनगुरु:, अथो विरिक्विः,' न वेद=संपूर्ण जगत् की उत्पत्ति के लिए विष्णु की नाभि में पहुँची हुई जिसकी डंडी को त्रिलोकी के गुरु और जगत् के उत्पन्न करने वाले (ब्रझ्मा) (भी) नहीं जानते (उनने भी जिसका२ अरंत नहीं पाया), जो धन्यालिभिरतितरां ध्येयम्=धन्य भ्रमगें के अत्यन्त ध्यान का विषय है ( भाग्यशाली भ्रमर ही उसके विषय में सोच सकते हैं) और स्वप्रकाशस्वरूपम्=जिसका स्वरूप स्वप्रकाश है (क्योंकि विकासक सूर्यं तो उस समय उत्पन्न ही नहीं हुआ था)। लक्ष्मी के पक्ष में यह अर्थ है- पद्माख्यं तत् किमपि ललितं वस्तु वस्तुष्टयेऽस्तु=पद्मा (लक्ष्मी) नामक वह कोई ललित वस्तु आपके लिए संतोषप्रद हो, यत्
१-"विरिङ के सूते विरिञ्चः-विरिश्चिरिति प्राच्च्याः।" क्षीरस्वामी (अमरकोशटीका)। इस व्युस्पत्ति के अनुसार 'जगत् के उत्पन्न करने वाले' वह अर्थ किया गया है, अन्यथा 'अथो' का अन्वय संभव नहीं है। अनुवादक २-यहाँ श्रीमन्भामवत के (तृ० एक०, अध्याय ८, इलो० १७-१८- १९) के कथा प्रसङ्ग का अनुसंधान करना चाहिए। वे छलोक ये है- जलोमिंचक्रास्स लिलाहिंरदम्। उपाश्रितः कञ्जमु लोकतत्वं, नात्मानमद्दाविद्दादिदेवः।।१७। क एष योऽसावइमन्जपृष्ठ, एतसकुतो वाग्जमनन्यदच्सु। अस्ति हथस्वादिह किञ्ञनैतयृभिष्ठितं यत्र सव्ासुभाध्यम् ॥८II
नार्याम्गतर्त्रत्खर नाकनाढ-नामि विचिन्वंस्तद्विन्दृताज: ५१९।
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(यस्मात्)=क्योंकि, स त्रिभुवनगुरु: वेदनाथः विरिध्िः न अलम्= वह त्रिलोकी के गुरु और वेदों के स्वामी ब्रह्मा, सकलजगतः सम्भूत्यर्थ= संपूर्ण जगत् के सम्यक ऐश्वर्य के लिए, न अलम्=समर्थ नहीं है, (तात्पर्य यह कि ब्रह्मा उत्पन्न कर सकते हैं, वेदों द्वारा ज्ञान भी दे सकते हैं, पर ऐश्वर्य नहीं दे सकते) (अतः) विष्गुनाऽभिप्रपन्नम्= विष्णु से स्वीकार की गई है, और जो, धन्यालिभिरतितरां ध्येयम्= धनियों की पंक्तियों से अत्यन्त ध्यान करने योग्य है, तथा स्वप्रकाश- स्वरूपम्=जिसका स्वरूप स्व्प्रकाश है। यहाँ आशीर्वाद के प्रकरण में 'संतोष उत्पन्न करने में समर्थ होने' के. कारण 'लक्ष्मी' और 'भगवान की नाभि का कमल' दोनों ही प्रकृत हैं, अतः यह श्लेष केवल प्रकृताश्रित है और एकश्रुति (पद्माख्यम्) से दो पदों का प्रतिभान होने से भिन्न धर्मो के पुरस्कार से शनेक अर्थों का प्रतिपादन करने के कारण सभंग है।
यह श्लेष विशेष्यों के श्लिष्ट न होने पर भी होता है जैसे यहाँ ही इस पद् का चौथा चरा पायादादं कमलमथवा योगमायास्वरूपम्- अर्थात् 'आद् कमल' अथवा 'योगमाया का स्वरूप' आप की रक्षा करे यह बना देने पर। अ्रनेकधर्मपुरस्कारेण प्रकृताश्रित अरमङ्गश्लेष; जैसे- करकलितच क्रघटनो नित्यं पीताम्बरस्तमोरातिः । निजसेविजाड्यनाशनचतुरो हरिरस्तु भूतये भवताम्। वह हरि (विष्णु +सूर्य) आपके ऐश्वर्य के लिए हों। जो नित्य 'करकलितचक्रघटन' (हाथ में सुदर्शन चक्र की चेष्टा रखनेवाला+ किरणों से कालचक्र की घटना करनेवाला) है, जो 'पीताम्बर' (पीत वस्न्नवाला + आकाश को पी जाने वाला अर्थात् पार कर जाने वाला
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अथवा आकाश को पीला बनाने वाला) है, जो 'तम' (राहु+ अन्धकार) का शत्रु है और जो अपनी सेवा करनेवालों की 'जड़ता' (मूर्खता +शीत) के नाश करने में चतुर हैं। यह भेद भी विशेष्यों के श्लिष्ट न होने पर हो सकता है; जैसे पूर्वोक्त श्लोक का उत्तराद्ध निजसेविजाड्य हरणो विष्णुः सूर्यश्र वः पातु' यह कर देने पर।
अर्थश्लेष जैसे-
अर्जुनस्य गुरुर्मायामनजः परमः पुमान्। गुञ्जापुञ्जधरः पायादपायादिह कोऽपि वः॥ अर्जुन के गुरु माया मनुष्य गुआ्जापुज्ज को धारण करने वाले कोई परम पुरुष आपकी विघ्न से रक्षा करें। (यहाँ गुरु शब्द के स्थान पर 'उपदेशक' 'शिक्षक' आ्रप्रदि शब्द भी श सकते हैं, अतः 'गुरु' में अर्थश्लेष है)'
१-यह नागेश के अनुरोध से लिखा गया है, पर यहाँ 'गुरु' शब्द के स्थान पर शिक्षकादि पद आ सकते हैं, एतावता अर्थश्लेष कैसे हो गया। यों तो सभी शब्दों में अर्थ श्लेष हो जायगा, क्योंकि पर्यायवाचक शब्द तो प्रायः सभी शब्दों के मिल सकते हैं और नागेश ने जो इसके आगे लिखा है-"एवं च गुरुरुपदेश वृहस्पतिश्च ।" इसका क्या अभिप्राय है सो तो कुछ भी समक में नहीं आता। यदि यहाँ 'गुरु' शब्द का वृहस्पति भी अर्थ है तो 'अजुंन का वृहस्वति' कहने में क्या विशेषता हो गई, जिससे इ्लेष मानना पड़ा। दूसरे उस स्थिति में यह अर्थ श्लेष रहा भी नहीं, क्योंकि तब 'गुरु' पद अपरिवर्सनीय हो
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इस तरह ये तीनों प्रकृतविषयक ही भेद हैं। केवल अप्रकृताश्रित; जैसे- हरिकरसङ्गादधिकं रमणीयाप्यतुलरागसंवलिता। सुन्दरि! तवाननाग्रेकमलाभा विगलितप्रतिभा॥ हे सुन्दरि, तुम्हारे मुख के सामने 'कमलाभा' (कमल की कान्ति + कमला की कान्ति) 'हरिकर' (सूर्य की किरणें+विष्णु के हाथ) के लगने से 'अधिकम्' (जल में + अधिक) रमणीय और अनुपम 'राग' (रंग +स्नेह) से युक्त होने पर भी 'प्रतिभारहित' हो जाती है कमल और कमला दोनों की सिट्टी गुम होना है। यह श्लेष केवल अप्रकृत के विषय में है, क्योंकि यहाँ प्रकृत है 'शनन' वह श्लेष का विषय नहीं है। यह श्लेष 'कमलाभा' इस विशेष्य के अंश में और 'अधिकम्' इस विशेषण के शंश में सभंग है और अरन्यत्र अभंग है।
गया, क्योंकि 'उपदेश' या 'शिक्षक' का तो बृहस्पति अर्थ होता नहीं। काव्य प्रकाशकार ने तो अर्थश्लेष का उदाहरण दिया है- 'अहो सुसदशी वृत्तिस्तुलाकोटे: खलस्य च। स्तोकेनोप्रतिमायाति स्तोकेनायास्यघोगतिम् ।।' अर्थात् आइचर्य है कि लकड़ी के डंडी और दुष्ट का व्यवहार सर्वथा समान है, थोड़े से में उम्नत हो जाता है और थोढ़े से में अवनत। यह।ँ 'उम्नत होना' और 'अवनत होना' ऐसे धर्म हैं जिनका सब्द बद्छने पर भी दोनों में अन्वय हो जाता है। इस पहेली को मार्मिक विद्ञान् ही सुलझावें।
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प्रकृति विशेष्य के श्िष्ठ न होने पर; जैसे इसी पद्य में उच्तरार्ध 'कमलायाः कमलस्य च शोभा गलिता तवाननस्याग्रे' इस तरह बना देने पर। प्रकृत और अरप्रकृत दोनों के विषय में (उभयाश्रित) शलेष; जैसे- अलं हि मानी परिदीणगात्रः समापितः फाल्गुनसंगमेन। अत्यन्तमाकाङ् च्ितकृष्णवर्त्मा भीष्मो महात्माजनि माघतुल्य:।।
महात्मा भीष् माघमास के समान थे, क्योंकि भीष्म भी 'अरलं हि मानी परिदीर्णगात्रः' (अत्यंत मानी और जिनका सब्र शरीर बाणों से छ्विद गया ऐसे) थे और माघमास भी 'अलं हिमानीपरिदीर्णगात्र" (पूर्णतया ठंढ की अधिकता से शरीर को फाड़ देने वाला) होता है। भीष्म भी फाल्गुन (अर्जुन) के संग से समाप्त हो गये थे और माघ भी फाल्गुन (फागुन) के प्राप्त होने से समाप् हो जाता है। भीष्म भी 'अत्यंतमा काच्ितकृष्णवर्त्मा' (जिनको कृष्ण का मार्ग-भगवन्भक्ति- अत्यंत त्र्प्रभीष्ट थी) थे और माघ मास भी 'अत्यंतमाकांचितकृष्णव्त्मा' (जिसमें अग्नि की बहुत इच्छा रहती है ऐसा ) होता है। यहाँ भीष्म प्रकृत हैं और माघ अप्रकृत। वे दोनों ही श्िष्ट नहीं हैं, केवल विशेषण ही ग्िष्ट हैं; इस कारण यह भी तृतीय भेद होता है, किंतु यह भेद उपमा से मिश्रित है। और यदि 'माघो महात्माजनि हंत भीष्म :- खेद है कि महात्मा (महा शरीर) माघ भीष्म (भयंकर) हो गया। इस तरह तप्रकृत अ्ंश को भी श्लेष से ग्रस्त करके रूपक किया जावे तथापि प्रकृत विशेष्य के अश्िष्ट होने से श्लेष अखंडित ही रहता है। ऐसे स्थल पर समासोक्ति का भ्रम नहीं करना चाहिए, क्योंकि यहाँ अप्रकृत धर्मी भी शब्द से वाच्य है, और समासोक्ति वहीं मानी जाती है
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जहाँ अप्रकृत व्यवहार शब्दशक्ति (अभिधा) का सहन कर भी ले, किंतु अप्रकृत धर्मी में अरभिधा का स्वर्श भी न हो-अर्थात् वह केवल व्यंग्य हो। श्लेष के विषय में विचार यहाँ इस विषय पर विचार किया जाता है कि- यह अलंकार प्रायः शन्य अलंकारों के विषय में प्रविष्ट हो जाता है, ऐसी जगह इसको (उन अलंकारों का) बाधक मानना चाहिए, उनसे संकीर्ण (मिश्रित) मानना चाहिए अथवा उनके द्वारा बाध्य मानना चाहिए। तात्पर्य यह कि वहाँ दूसरा अलंकार गौए होकर श्लेष प्रधान हो जाता है अथवा दोनों समान माने जाते हैं, किवा श्लेष माना ही नहीं जाता।
इस विषय में उद्भटाचार्य कहते हैं-"येन नाप्रास्ते य आरभ्यते स तस्य बाधकः-अर्थात् जिसकी पूर्णतया प्राप्ति होने पर जो दूसरा आररंभ किया जाता है वह (दूसरा) उस (प्रथम) का बाधक हो जाता है" इस न्याय से श्लेष अन्य अलंकारों को बाधित कर देता है, क्योंकि यह दूसरे अलंकारों के विषय में ही आरंभ किया जाता है- इसका कोई पृथक विषय नहीं है कि जहाँ यह सावकाश होकर दूसरे अलंकार को बाधित नहीं करे। देखिए केवल शप्रकृत और केवल प्रकृत के श्लेष में तो तुल्ययोगिता जग ही रही है-उसे कोई रोक सकता नहीं, और प्रकृताप्रकृत में हो जायगा दीपक, तथा दीपक से अनुमोदित उपमादिक भी हैं ही।" शरब यदि आप कहें कि 'काव्यप्रकाश' ने इसका उत्तर दे दिया है, क्योंकि- "देव त्वमेव पातालमाशानां त्वं निबंधनम् । त्वं चामरमरुद्ूमिरेको लोकत्रयात्मंकः ॥
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हे देव, तुम ही 'पातालम्' (पातालरूप+पूर्णतया रक्षक) हो तुम ही 'आशाश्ं' (दिशाओं +आशाओं) के आश्रय (पृथ्वी रूप) हो और तुम ही 'चामरमरुद्भूमि' (और देवताओं और मरुद्गणों के स्थान (स्वर्ग ) + चामरों के पवन के पात्र-अधिकारी) हो, इस तरह अकेले ही त्रिलोकीरूप हो।
इत्यादिक में श्लेष के लिए पृथक विषय मिल जाता है।" तो यह उचित नहीं। कारण, यहाँ रूपकालंकार स्पष्ट है, क्योंकि श्लेष से उपस्थापित 'पातालादिक अर्थों के अभेद से आरोप किए बिना राजा को त्रिलोकीरूप कहना सिद्ध नहीं हो सकता (और अमेद से आरोप का नाम ही रूपक है)। यदि आप यह कहें कि
'नदीनां संपदं बिभ्रद्राजायं सागरो यथा'
अर्थात् 'नदीनाम्' (नदियों की + दीन नहीं -अत्यधिक) सम्पत्ति को धारण करने वाला यह राजा जैसे समुद्र है।' इत्यादिक में उपमा की प्रतीति कैसे होती है औ्रर वहीं 'यथा' शब्द के स्थान में 'किमु' शब्द रखने पर ('सागरः किमु' कर देने पर) उत्प्रेक्षा की प्रतीति क्यों होती है ? इसी तरह 'अपर' शब्द कर देने पर ('सागरोऽपर:' कर देने पर) रूपक की प्रतीति क्यों होती है ? इसका उत्तर वे यह देते हैं कि उपमा-आदि की प्रतीति- मात्र होती है, वस्तुतः वे अलंकार यहां हैं नहीं; जैसे सफेदी के कारण सीप में चांदी प्रतीत होने पर भी वस्तुतः चांदी वहां है थोड़े ही। इसलिये यह मानना चाहिए कि जहां-जहां श्लेष का विषय हो वहाँ सब जगह उपमादिक की प्रतीति का उत्पत्तिहेतु श्लेष
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ही अलंकार होता है, अन्य सब अलंकार बाधित हो जाते हैं।' यह है उद्भटाचार्य का पक्ष। किंतु इस बात को दूसरे लोग सहन नहीं करते। वे कहते हैं। देखिए आप जो यह कह रहे हैं कि 'जहाँ किसी के पूर्णतया प्राप्त हो ने पर जो नवीन आरम्भ किया जाता है वह अवकाशरहित होने से पहले को बाधित कर देता है' सो ठीक नहीं। कारण, पहले उदाहरण दिए गये 'पद्माख्यं तत्किमपि ललितम्' इस हमारे पद्य में औ्रर 'सर्वदोमाधवः' पातु यो गङ्गां समदीधरत्' इत्यादि अन्य कवि के पद्य में भी श्लेष के अतिरिक्त कौन-सा अलंकार है? यदि कहो कि तुल्य- योगिता है तो तुल्ययोगिता में सादृश्य की प्रतीति नियत रूप से होती है; अतः वह यहाँ कैसे कही जा सकती है, क्योंकि प्रकृत (उक्त पद्यों) में लक्ष्मी और कमल का अथवा हरि और हर का सादृश्य कहना अरभीष्ट नहीं है, एवम् यहां 'एक श्रति से दो अर्थों के ग्रहण' के अरति- रिक्त अन्य कुछ चमत्कारजनक है भी नहीं जिसके कारण दूसरा अलंकार स्वीकार किया जाय, और एक श्रुति से दो अर्थ का भ्रहण तो श्लेष ही है। सो इस तरह श्लेष के सावकाश होने से उसे शन्य अलंकारों का वाधक मानना उचित नहीं।
इस पद्य के दो अर्थ हैं-सर्वदः= सब कुछ देने वाले, माधवः=हरि, पातु=रक्षा करें, यः=जिनने ( कृष्णावतार में ) अगम्=गोवर्धन पर्वत को, (और) (बराह अवतार में) गाम्=पृथ्वी को, समदीधरत्=धारण किया यह हरि के पक्ष में अर्थ है। शिव के पक्ष में अर्थ है -- यः=जिनने, गङ्गाम्=गंगा को, समदी- धरत्=धारण किया, (वह) उमाधवः=पार्घतीपति (शिव) १ सर्वदा=सदा पातु=रक्षा करें।
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इसीलिए जो यह लिखा है कि 'उपमादिक केवल प्रतीत होते हैं-उनकी वास्तविक स्थिति नहीं है' सो भी संगत नहीं। कारख, जैसे उपमा में गुएा, क्रिया आदि समानधमरूप होते हैं वैसे ही कंवल 'शब्द' के भी समानधर्म होने में किसी प्रकार की बाधा नहीं है। इसी तरह श्लेष के विषय में अन्य अलंकारों का श्रस्तित्व भी वास्तविक है प्रतिभासिक नहीं। प्रत्युत यह कहना चाहिए कि वहाँ श्लेष कीं प्रतीतिमात्र है। कारण, यदि ऐसा न मानों तो पूर्णोपमा का सभी विषय तीनों प्रकार के श्लेष से आक्रान्त होने के कारण उपमा का कहीं अवकाश ही नहीं रहेगा। श्लेप को तो अपने विषय में शव- काश है, अतः श्लेष का ही बाधित होना उचित है, उपमा आदि का नहीं।
इतना ही नहीं, किंतु 'समरार्चितोऽप्यमराचिंतः-अर्थात् समर में पूजित होने पर भी अमरों से पूजित है'- इत्यादिक में श्लेष की तिमिररोगी (मोतियाबिंद वाल) के दो चंद्रमा की तरह केवल प्रतीतिमात्र ही है, न कि अलंकाररूपता। कारण, श्लेष का जीवन- मूल है द्विताय अर्थ, वह यहाँ स्थिर नहीं होता, क्योंकि 'समराचिंतः' का 'रण में पूजित' यही अर्थ है 'मरण सहित में अथवा मरण सहित से अचिंत' इस अर्थ की तो कोई स्थिति ही नहीं है। औरर यह कहा नहीं जा सकता कि जैसे-'विरोध के आमास मात्र को विरोधालंकार माना जाता है वैसे श्लेष के आभास मात्र को भी श्लेष अलंकार मान लिया जाय', क्योंकि ऐसा मानने को कोई तैयार नहीं। यह स्पष्ट ही है।
इसलिए 'समरार्चितोऽप्यमरार्चितः' इत्यादि स्थलों में श्लेष की प्रतिभा (प्रतीति मात्र) से उत्पन्न विरोध ही अलंकार है; न कि विरोध का प्रतिभा से उतन्न श्लेष।
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इस तरह यहाँ तक यह बताया गया कि श्लेष को स्वतंत्र रूप में अवकाश है, अतः वह अनवकाशता के कारण 'येन नाप्राप्ते०' इस न्याय के आधार पर किसी अलंकार का बाधक नहीं हो सकता। अब यह विचार करिए कि-आप जो 'अवश्यप्राप्ति' की बात करके श्लेष को बाधक बना रहे हैं, सो यह 'अ्रवश्यप्राप्ति' श्लेष के विषय में उप- मात्व, रूपकत्व आदि विशेषों के रूप से सोची जा रही है अथवा 'सामान्यतया किसी अरलंकार' के रूप में ? यदि पहला पक्ष लिया जाय कि तचद् अलंकारों के उपमात्व, रूपकत्वादि विशेषरूप श्लेष के विषय में अवश्य प्राप्त हो जाते हैं, तो यह अ्रसंभव है; क्योंकि कोई भी अलं- कार विशेष (अर्थांत् केवल अकेला रूपक अथवा त्रकेली उपमा) शलेष के यावन्मात्र विषय (श्लेषविषयत्वा्व्छन्न) में अवश्य प्राप्त नहीं है-अर्थात् जहाँ कहीं श्लेष हो वहाँ उपमा ही हो अथवा रूपक ही हो ऐसा कोई नियम नहीं है, कहीं कोई अलंकार होता है और कहीं कोई। अब यदि कहा जाय कि किसी विशेष अलंकार की बात हम नहीं कर रहे हैं, कितु 'श्लेप से मिन्न कोई-न-कोई अलंकार श्लेष के विषयमें श्र्रा ही पड़ता है-अतः किसी-न किसी की वहाँ अवश्य प्राप्ति है' इस कारण 'शलेष के विषय में जहाँ कहीं भी जो अन्य अलंकार आ जाय उसे बाधित करके श्लेष मान लिया जाना चाहिए'-इस रूपमें बाध्य- सामान्यचिंता कर रहे हैं तो यह बहुत अच्छी रही। श्लेष आया और अन्य अलंकार बाधित हुआ, अतः 'श्लिष्टपरंपरित रूपक' औरर 'श्लिष्ट समासोक्ति' अलंकार तो समाप्त ही हो जायँगे, क्योंकि बिना श्लेष के तो वे हो नहीं सकते, अतः सिद्ध हुआ कि श्लेष अलंकारांतर का बाधक नहीं हो सकता। हाँ, अलंकारांतर से संकीर्ण (मिश्रित) हो सकता है। सारांश यह कि आपका पहला पक्ष (अरर्थात् श्लेष का बाधित हो जाना) निरस्त है और दूसरे; पक्ष (संकीर्णता) का संभव हो सकता है।
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शब तीसरे अर्थात् श्लेष की बाध्यता वाले-पक्ष पर विचार करिए। इस विषय में अन्य विद्वानों का कहना है कि-
"जो अलंकार प्रधान रूप से चमत्कार उत्पन्न करनेवाले होते हैं वे अरपना-अपना नाम पाते हैं। किंतु यदि वे ही अलंकार दूसरों के उप- स्कारक रूप में वर्तमान होते हैं तो वे अपने नाम से नहीं पुकारे जाते उपस्कार्य अलंकार का ही नाम वहाँ प्रधान रहता है; जैसे-
'रराज भूमौ वदनं मृगाक्ष्या नभोनिभागे हरिणाङ्कबिंबम् अर्थात् पृथ्वी पर मृगनयनी का मुख सुशोभित हुश और आकाश भाग में चंद्रविंब'।
यहाँ 'प्रकृत और अप्रकृत का एक धर्म के साथ संबंध' दीपक के नाम से पुकारा जाता है, किंतु इसी बात को यदि यों कहा जाय कि। 'राजते वदनं तन्व्या नभसीव निशाकरः
अर्थात् 'तन्वी का मुख आकाश में चंद्रमा की तरह शोभित हो रहा है।'
यहाँ दोनों का एक धर्म में संबंध होने पर भी वह। ('इव' शब्द से वाच्य, अतएव प्रधान) उपमा का उपस्कारक होने के कारण दीपक के नाम से नहीं पुकारा जाता। इसीलिए तो कहा जाता है कि "प्रधान्येन व्यपदेशा भवन्ति-अर्थात् प्रधानता से नाम हुआ करते हैं" इस दशा में अन्य अलंकार के उपस्कारक रूप में रहनेवाला श्लेष, जैसे घर का आदमी मेहमान नहीं कहला सकता वैसे, श्लेषालंकार का नाम कैसे पा सकता है। इसीलिए उसे बाध्य-सा ही समझना चाहिए।"
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(५६) श्लेप और शब्दशक्तिमूलक ध्वनि का भेद इस तरह संक्षेप से श्लेष का थोड़ा सा विवरण दिया गया है। यह कहा जा चुका है कि जहाँ प्रकृत और अप्रकृत दोनों विशेष्यों का भी श्लिष्ट पद से ग्रहण हो वह (शब्दशक्तिमूलक) ध्वनि का विषय है, जैसे-
अरविरल विगल दानोदकधारासासिक्तधरसितलः। धनदाग्रमहितमूर्तिर्जयतितरां सार्वभौमोऽयम् ॥
कवि कहता है-जिसने निरंतर गिरते हुए मद-जल की धाराओं की वृष्टि से भूमंडल को सींच दिया है और जिसके स्वरूप की कुबेर के आगे प्रशंसा होती रहती है-कुबेर भी जिसकी शरीर-संपत्ति पर लटटू है, उस सार्वभौम नामक दिग्गज के समान, जिसने निरंतर गिरते दान-जल (संकल्प के पानी) की धाराओं की वृष्टि से भूमंडल को सींच दिया है और जिसका स्वरूप धन देने वालों में सर्वप्रथम प्रशस्त है ऐसा यह सार्वभौम (सब् पृथ्वी का स्वामी) सबसे उत्कृष्ट है।
यहाँ राजा प्रस्तुत है, पर 'सार्वभौम' नामक उत्तर दिशा का हाथी अप्रस्तुत होने पर भी व्यंजना की मर्यादा से प्रतीत होता है। ऐसे स्थल पर अप्रस्तुत का कथन असंबद्ध न हो इसलिए प्रस्तुत और अप्रस्तुत के उपमान-उपमेय भाव में तात्पर्य की कल्पना कर ली जाती है। इसको शब्दशक्तिमूलक अरनुरनरूपध्वनि कहते हैं। ध्वनिकार ने इसका उदाहरया यह दिया है-
"उन्नतः प्रोल्लसद्धारः कालागुरुमलीममः। पयोधरमरस्तस्याः कंन चक्रेऽभिलापिसाम्॥
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उसका 'उन्त' (उभरा हुआ बढ़ा-चढ़ा) 'प्रोल्लसद्धार' (जिसमें हार सुशोभित हो रहा था+जिसकी धाराएँ सुशोभित हो रही थीं) औरर 'कालागुरुमलीमस' (काले अगर से रँगा हुआ + काले अगर के समान काला) 'पयोधरभर' (स्तनों का भार +मेघसमूह) किसको अभिलषित नहीं बनाता था।-सभी उसे चाहते थे।" और मम्मट भट्ट ने यह उदाहरण दिया है-
"भद्रात्मनो दुरधिरोहतनोर्विशाल- वंशोन्नतेः कृतशिलीमुख संग्रहस्य। यस्यानुपप्लुतगतेः परवारसस्य दानाम्बुसेकमुभगः सततं करोऽभृत्॥
यहाँ प्रस्तुत अर्थ है-जिसके शरीर पर कष्ट से आक्रमश किया जा सकता था, जिसका विशाल वंश में उन्नति हुई थी, जिसने बाणों का पक्का अभ्यास किया था, जिसका ज्ञान अबाधित था, जो शत्रुओं का निवारण करनेवाला था, ऐसे उस कल्याणरूप राजा का हाथ निरंतर दान के जलों की सिंचाई से सुंदर रहता था।
अप्रस्तुत अर्थ है-जिसके शरीर पर कष से चढ़ा जा सकता था, जिसके मेरुदंड (पीठ) ने बड़ी उन्नति की थी, जिसने भौरों का इकट्ठा कर रक्खा था ऐसे उस 'भद्र' जाति के उत्कृष्ट हाथी की सूँड निरंतर मद के जल की सिंचाई से सुंदर रहती थी।
इस पर विचार पर कुवलयानंदकार तो कहते हैं कि-"यहाँ प्रकृताप्रकृत श्लेष के उदाहरण में जो प्राचीन लोग शब्दशक्तिमूलक ध्वनि चाहते हैं सो वह
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प्रकृताप्रकृताभिधानमूलक उपमादिक अलंकार की व्यंग्यता के अभिप्राय से है, न कि अप्रकृत अर्थ की व्यंग्यता के अभिप्राय से। कारण, श्रप्र- कृत अर्थ भी शक्ति से प्रतिपाद्य होने के कारण वाच्य है, अतः वहाँ व्यंजना की अपेक्षा नहीं है। यद्यपि
परसाबुद्यमारूढ: कान्तिमानरक्तमएडलः । राजा हरति सर्वस्वं मृदुभिनूंतनैः करैः ॥ सायंकाल का वर्शान है। यह 'उदय' (उदयाचल +अ्रभ्युदय) पर आरूढ़, कांतिमान् और जिसका 'मण्डल' (तिंत + प्रजाजन) 'रक्त' (लाल +अनुरक्त) है ऐसा राजा (चंद्र + राजा) कोमल और नूतन करों (किरणों+टेक्सों) के द्वारा सर्वस्व हरणा कर रहा है इत्यादिक में प्रकरणवशात् ('राजा' और 'कर' के) प्रकृत अर्थ (चन्द्रमा और किरणा) के तत्काल बुद्धि स्थित हो जाने पर ही बाद में 'राजा' और 'उसके लिए जाने वाले धन (टेक्स)' आदि के वाचक 'राजा' और 'कर' आदि पदों के परस्र सन्निधान के बल से राजा के विषय में अन्य शक्ति के उन्मेषपूर्वक अप्रकृत अ्रर्थ प्रतीत हो सकता है, तथानि इतने मात्र से उसे व्यग्य नहीं कहा जा सकता। कारण, शक्ति से प्रतिपादन किए जानेवाले अथ में व्यक्त होने की बिल्कुल ही अपेक्षा नहीं रहती। प्रकृत अर्थ का कथन समाप् हो जाने पर यदि वह स्फुटित होता है तो भले ही आप उसे गूढश्लेष कहिए पर व्यंग्य नहीं कह सकते। अन्यत्र भी ऐसा गूढ़श्लेष है; जैसे-
सततमसुमतामगम्यरूपाः परितदिक्करिकास्तटीर्बिभर्ति॥ माघ काव्य में रैवतक पर्वत का वर्गान है-यह पहाड़ अत्यन्त कठिन, भारी-भारी और बड़े-बड़े लम्बमान मेवों से व्याप्त ऐसी तटियों
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(झाँपों) को धारण करता है जिनका रूप सदा प्राशियों के अगम्य है और जिनमें दातों के तिरछे प्रहार करने वाले दिग्गज रहते हैं।' यह तो है इसका प्रकृत अर्थ और इसके बाद स्फुरित होनेवाला अप्रकृत अर्थ यह है-यह राजा अत्यन्त बृद्ध बड़े लम्बे चौडे लटकते स्तनों से युक्त, प्रागियों के सङ्गम करने के सर्वथा अयोग्य और जिनके 'दिक्' (दाँतों के गोल निशान) और 'करिका' (नख के चिह्न) परिणात हो चुके हैं-सूखसाखकर निशानमात्र रह गए हैं ऐसी वृद्ध बेश्याओं का पोषणा करता है।
इस समासोक्ति के उदाहरण में बृद्ध वेश्याओं का वृत्तान्त प्रतीत होता है इस स्थान पर अभंग श्लेष है-यह सर्वसम्मत है।
सो इस तरह यह सिद्ध हुआ कि (शब्दशक्तिमूलक ध्वनि में भी) अप्रकृत अर्थ व्यंग्य नहीं होता।" अरब इस पर विचार किया जाता है-
(१ ) सबसे पहले तो आरप जो यह कहते हैं कि 'उपमादिक अलंकारों का ही व्यंग्य होना प्राचीनों का श्रभीष्ट हैं, 'अप्रकृतार्थ का व्यंग्य होना नहीं।' सो कैस ? क्योंकि तन्र फिर - "अनेकार्थस्य शब्दस्य वाचकत्वे नियन्त्रिते। संयोगादयैरवाच्यार्थधीकृद् व्यापृतिरञ्नम् ॥ काव्यप्रकाश) अ्रनेकार्थक शब्द की शक्ति के 'संयोगादिक' के कारण रुक जाने पर वाच्य से भिन्न अर्थ को समझानेवाला व्यापार व्यअ्जना है।" इत्यादिक उनके ग्रंथ का आपने कैसे समर्थन किया, सो सभझ में नहीं आता, क्योंकि उपमादिक की व्यंग्यता वाचकता के नियन्त्रण की
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अंपेक्षा नहीं रखती। कारण, अनेकार्थक शब्द उपमादिक का वाचक नहीं होता जिसके नियन्त्रण के लिए संयोगादिक का अनुसरण सार्थक होता। उपमादिक की व्यंग्यता में तो दूसरे अर्थ की वाचकता का नियन्त्रण न होने पर भी कोई बाधा नहीं आती। इसलिए यह स्पष्ट ही है कि आपने जो प्राचीनों के अभिप्राय का वर्णन किया है वह उनके ग्रन्थ पर विचार न करने के कारण किया है-यदि आपने ग्रन्थ पर विचार कर लिया होता तो ऐसा कदापि नहीं लिखते।
(२) यह तो हुई एक बात। अब् दूसरी बात ली जिए -आप जो अप्रकृतार्थ भी शक्ति से प्रतिपाद्य है' इत्यादि कह रहे हैं, इसके विषय में हम आपसे पूछते हैं कि अप्रकृत अर्थ का शक्ति से प्रतिपादन कैसे हो सकता है ? क्योंकि उसके विषय में शक्ति का नियंत्रण उनने ( प्राचीनो ने) स्वयं ही लिखा है। अब यदि नियंत्रण का अर्थ 'केवल प्रथम बोध उत्पन्न न होने देना' है न कि 'अंत में भी (बोध न होने देना)' यह करें और कहें कि प्रकृत शक्ति से प्रकृत अर्थ का बोध हो जाने पर द्वितीय शक्ति से, जो अभी उपयोग में नहीं आई है, अप्रकृत अर्थ का बोध होने में कोई बाधक नहीं है तो यह ठीक नहीं। कारण, प्रथम तो हम आपसे यह पूछते हैं कि-अप्रकृत अर्थ का बोध उत्पन्न ही क्यो नहीं होता ? यदि उसका उत्तर यह दिया जाय कि प्रकरणादिक ज्ञान से प्रतिबंध हो जाने के कारण, तो हम आपसे पूछते हैं कि प्रकृतार्थ के बोध के बाद उस 'प्रकरणादिक के ज्ञान द्वारा प्रतिबंधकता' को किसने हरण कर लिया ?- जो प्रतिबंधकता पहले थी वह अब भी है ही। यदि आप कहें कि ज्ञान तो शीघ्रविनाशी (त्रिक्षणावस्थायी) होता है, अतः अप्रकृतार्थ के ज्ञान के समय प्रकरणज्ञान ही नष्ट हो गया। तो यह ठीक नहीं। कारण, वह ज्ञान नष्ट हो गया तो अन्य ज्ञान के उत्पन्न होने में तो कोई बाधा है नहीं। कहा जायगा कि वही ज्ञानव्यक्ति
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(पुनः) प्रतिनंधक हो जायगी तो ऐसी हजारों व्यक्तियों औरर उनमें हजारों प्रतिबंधकतातओरं की कल्पना गौरवग्रस्त है। इसकी ध्रपेक्षा तो 'ग्रतोऽस्तमकः' इत्यादि में दूसरे विद्वानों ने जो व्यंजना नामक व्यापार की कल्ना की है वही उचित है। और यदि दूसरी शक्ति से यहा अप्रकृतार्थ का बोध मान भी ल तब भी-'जैमिनोयमलं धत्ते रसनायां महामतिः-इत्यादिक में 'जैमि- नीयमलम्' का 'जैमिनि का मल (विष्टा)' इत्यादिक बाधित अर्थ का बोध शक्ति से सिद्ध करना कठिन है और यदि किसी तरह शक्ति से प्रतिपादन सिद्ध हो भी जाय तो देवदत्तादिक में अपने पुत्र के दाक्य से ऐसे अर्थ का प्रकट न होना और साले आदि के उपहास वाक्य से अप्कृत अर्थ का अरभिव्यक्त होना नहीं बन सकता। कारण, वक्ता और श्रोता आदि की विशिष्टता केवल व्यंग्य का ही प्रतीति का कारण हे, वाच्य तर्थ की प्रतीति का नहीं। यह है प्राचीनों का आशय। ऐसी दशा में अभकृतार्थ का शक्ति से प्रतिपादन उनका अर्परभिप्रेत क्यों बताया जाता है।'
१-नागेश कहते हैं-यहाँ यह विचारणीय है। कुवलयानंदकार ने "प्रकृतार्थे प्रक्रणवशाज्झटिति बुद्धिस्थिते" इस उक्ति द्वारा प्राथमिक बोध को ही प्रतिवध्य बताया है-अर्थात् उनके मत से प्राथमिक बोध का ही प्रतिबंध होता है-यह कहा ही जा चुका है। ऐसी स्थिति में जो आगे उनके "अन्योन्यसंनिधानबलात्" लिखा है और जिसका अर्थ 'शब्दांतरसंनिधि' पहले बताया जा चुका है उससे यह सिद्ध होता है कि प्राथमिक बोध जब रुकता है तब 'प्रकरण' और 'शब्दांतर संनिधि' इन दो नियमों द्वारा प्रकृतार्थ की प्रथम उपस्थिति होती है और अप्रकृत अर्थ में 'शब्दांतरसंनिधि' रूप केवल एक नियामक है, अतः उसकी भी उपस्थिति होती है, किंतु पश्चात्-यह है उनका तात्पर्य। (अतः आपने
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( ६२ )
औ्रर जो आपने "( प्रकृतार्थ के स्फुरित हो जाने पर द्वितीयार्थ के बोध में) 'अयमतिजरठाः' इत्यादि समासोक्ति की तरह गूढश्लेष
जो द्वितीय शक्ति के स्थान पर व्यंजना मानने की बात लिखी है वह निरर्थक है।)
अब जो आपने लिखा है कि-'सुरभिमांसं भुंक्े ( सुगंधित मांस खाता है + गोमांस खाता है)' इत्यादि में पुत्रादिक द्वारा (सीधी भाषा में) कहने पर अप्रकृत अर्थ 'गोमांस' वाली शक्ति का प्रादुर्भाव नहीं होता, पर साले आदि ने ( मजाक में) कहा हो तभी उसका प्रादुर्भाव होता है-'यह न हो सकेगा।' सो यह व्यवस्था भी 'वक्ता का तात्पर्य न समझने' और 'समझने' द्वारा सरलता से बन सकती है, अथवा 'वक्ता श्रोता आदि की विशिष्टता' को (व्यंजनोल्लास का हेतु न मानकर) नियंत्रित (शक्ति अभिधा) के उल्लास का हेतु मान लिया जाय, क्योंकि उसका फल (अप्रकृतार्थ का बोध) तभी बन सकता है। हाँ, इतनी विशेषता अवश्य है कि जहाँ 'वक्ता की विशिष्टता' आदि का ज्ञान विलंब से होता है और 'प्रकरण' का ज्ञान शीघ्र होता है वहाँ 'वक्ता की विशिष्टता' आदि नियंत्रित शक्ति के उल्लासक होते हैं और जहाँ प्रकरणज्ञान तथा वक्तृवरैशिष्ट्यादिज्ञान साथ ही होते हैं वहाँ वे नियंत्रण की प्रतिबंधकता के उत्तेजक मात्र ही रहते हैं-द्वितीय शक्ति के उल्लास तक उन्हें दौड़ नहीं लगानी पड़ती। व्यंजनावादी को भी वक्तृवैशिष्ट्यादि को व्यंग्य के सूझने में हेतु मानना ही पड़ता है। सो अच्छा यही है कि अप्रकृत अर्थ में व्यंजना न मानकर वक्तृवैशिट्यादि को शक्स्युल्लासादि का हेतु ही माना जाय। इसी तरह योगरूढ पढ़ों की जहाँ केवल योगार्थ मात्र से बने अर्थांतर की बोधकता इष्ट हो वहाँ वक्तृवैशिष्ठयादि की रूढिप्रतिबंधकता अथवा रूढ़ि की उत्त जकता मानी जानी चाहिए। इससे जो आपने लिखा है कि 'योगरूदिस्थले तु सापि-
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होने दीजिए" यह कहा है। वह भी गर्भस्ाव से गिर गया-मूल से ही उड़ गया। कारण, श्लिष्टविशेषण समासोक्ति में भी व्यक्जना से ही प्रकृतार्थ की प्रतीति मानी गयी है। इसीलिए ध्वनिकार ने- "गुणीभूतव्यंग्यभेदः समासोक्तिः-अर्थात् समासोक्ति गुणीभूत-
दूरापास्ना' वह अपास्त हो जाता है। दूसरे, शब्दशक्तिमूलक-ध्वनि के स्थल में 'एक नवीन संबध' रूप व्यंजना की बोधजनकता की कल्पना की अपेक्षा पहले से बनी-बनाई शक्ति (अभिघा) को बोधजनक मानना ही उचित है, क्योंकि इसमें लाघव है। सो इस तरह यह सिद्ध हुआ कि अश्लिष्ट साधारण विशेषण वाली समासोक्ति में ही गुणीभूतव्यंग्यता है (क्योंकि जहाँ श्लेष हो वहाँ तो दूसरा अर्थ भी शक्ति से ही अवगत होता है)। अथवा श्लिष्टविशेषणा समासोक्ति में (केवल) आरोपांश को लेकर (व्यंग्य मान कर) गुणीभूतव्यंग्यता है (द्वितीयार्थ को व्यंग्य मानकर नहीं) यह अप्पय दीक्षित का आशय है। वस्तुतः तो द्वितीयार्थ को व्यंग्य माना जाय तब भी उसे लेकर ध्वनि मानना उचित नहीं, क्योंकि उपमात्वादि की विवक्षा से वह भी प्रकृत का उपस्कारक हो जाने के कारण गौण हो जाता है, अन्यथा समासोक्ति में गुणीभूतव्यंग्यता कहना असंगत हो जायगा। इसलिए अलंकार की व्यंजकता को लेक्कर ही शब्दशक्तिमूलक ध्वनि को ध्वनि कहा गया है यह समझना चाहिए। अतः 'अयमतिजरठा:०' पद्य में जो आपने गूढ़श्लेष का खंडन किया है वह अपास्त हो जाता है-यह समझना चाहिए। (यहाँ कहना यह है कि नागेश ने जो समाधान किया है वह पंडित- राज के अभिप्राय को सकझे बिना किया है। पंडितराज को विप्रतिपत्ति इस विषय में नहीं है कि 'शक्ति को द्वितीयार्थबोधक क्यों माना गया' किंतु विप्रतिपत्ति यह है कि 'प्राचीनों का ग्रंथ आप कैसे बैठाते हैं !' सो
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व्यंग्य का एक भेद है" यह लिखा है और उद्भटादि भी 'समासोक्ति से श्लेष बाधित हो जाता है' यह कहते हैं। यहाँ बाधित होने का शर्थ 'शलेष की वहाँ प्रवृति न होना' ही है। रहा 'श्लिष्ट' इस शब्द का प्रयोग सो उसकी उपपत्ति केवल द्वयर्थक शब्द होने के कारग करना चाहिए-( सो वहाँ श्लेषालंकार है' यह समझना व्यर्थ हे)। इसलिए यह जो कुछ आपने कहा है। वह कुछ भी नहीं है।
और हम तो कहते हैं फि अनेकार्थ स्थल में अप्रकृत के कथन में 'शक्ति' (अभिधा) की उक्ति संभव भी है, पर योगरूढ़ि के स्थल में तो 'शक्ति' की उक्ति भी दूर हट जाती हे; जैसे-
चाश्चल्ययोगिनयनं तव जलजानां श्रियं हरतु। विपिनेऽतिचञ्चलानामपि च मृगाणां कथं नुतां हरति॥
योगरूढ़ि-शक्ति द्वारा इस पद्म का अर्थ यह है-कमलों में चंचलता-रूपी गुण नहीं है अतः जिसमें उनकी अपेक्षा चंचलता गुस अरधिक है वह तेरा नेत्र यदि उनकी शोभा का तिरस्कार कर दे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। पर आरश्च्य तो इस बात का है कि तेरा नेत्र अत्यन्त चंचल (अर्थात् चंचलता गुणा से युक्त) हरिणों की शोभा का भी तिरस्कार कैसे कर देता है।
उसका समाधान तो नागेश ने भी नहीं किया। 'सुरभिमांसं भक्षयति' के विषय में भी आपने 'यदि तु यथा कथंचिदुपपत्तिः स्यात्' इस पंडित- राज की उक्ति की ही व्याख्या की है, पर पंडितराज ने 'इति प्राचीना- शयः' जो लिखा है उसे आप भूल ही गये हैं। अतः प्राचीनों के अ्रंथ न बैठने के विषय में जो विप्रतिपत्ति पंडितराज ने उठाई थी उसका समा- धान तो हुआ नहीं।)-अनुवादक
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दूसरा यह अर्थ होता है कि मूर्खों के पुत्रों और अतएव प्रमाढियों के धन का हररा, नयनों=ले जाने वालों अर्थात् चौर आदि-द्वारा हो सकता है पर, जा मृग=गवेषणा करनेवाले-अर्थात् जहाँ जाय वहाँ से खोजनिकालने वाले-हैं और अतएव सावधान कहे जा सकते हैं, उनकी 'श्री' (शोभा +धन) का हरणा कैसे हो सकता है। यहाँ 'चंचलता गुख से रहित कमलों की शोभा का चंचलतारूप गुखा में अधिक तुम्हारे लोचन से तिरस्कार होना शश्चर्यकारी नहीं है, आश्चर्यकारी तो है चंचलता रूपी गुण से युक्त हरिणों का तिरस्कृत होना।'
इस वाच्य अर्थ के समाप्त हो जाने पर भी रूढ़ि से रहित केवल योगशक्त की मर्यादा से 'मूर्ख के पुत्रों का धन हरण, 'नयन'=नेता अर्थात् ले जानेवाले (चोरों) द्वारा किया जा सकता है, न कि मृगों = गवेषकों (जहाँ हो वहाँ से ढूँढ़ निकालनेवाले) का। यह जलज, नयन और मृग शब्दों से प्रतीत होनेवाला अर्थ 'व्यञ्जना व्यापार के बिना कैसे सिद्ध किया जा सकता है, क्योंकि रूढ़ि के कारण गहरी बेड़ियों से जकड़ी 'योगशक्ति' को यहाँ स्वतन्त्रता नहीं है। इसी कारण नैयायिकों ने माना है कि 'पङ्कज' आदि पदों से 'कीचड़ से पैदा होनेवाले' के रूप में 'कुमुद''शैवाल' आदि का बोध लक्षणा के द्वारा ही होता है, क्योंकि वैसे शक्तिज्ञानों (योगरूढिजन्य ज्ञानों) का बोध 'पद्मत्वादिप्रकारक ही होता है' और इसी कारण 'ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः' इस वेदान्त (उपनिषत्) के वाक्य में 'क्या यहाँ ऐश्वर्य से युक्त किसी जीव का प्रतिपादन है अथवा ईश्वर का' यह संदेह होने पर उत्तरमीमांसा के कर्त्ता श्री व्यासदेव ने 'शब्दा- देव प्रमितः' यह सूत्र बनाया है, जिसका तात्पर्य यह है कि योगरूढ़ि द्वारा यहाँ 'ईश्वर' ही अर्थ होता है, जांव नहीं।
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इसलिए पूर्वोक्त पद्य में अप्रकृत चोर का व्यवहार शक्ति से ज्ञात नहीं होता, किन्तु व्यंजना से ही ज्ञात होता है।
इस अर्थ को लक्ष्य (लक्षणाजन्य) भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यहाँ (लक्षणा के हेतु) 'मुख्य अर्थ के बाध' आदि का अभाव है। कहा जायगा कि यहाँ तात्पर्यार्थ का बाध मानकर लक्षणा हो जायगी सो वह भी हो नहीं सकता, क्योंकि तात्पर्यार्थ के बोध के अनन्तर तात्पर्यार्थ का बाध हो सकता है, पर तात्पर्यार्थ ही बिना व्यञ्जना के कैसे ज्ञात होगा। जब अर्थ ही ज्ञात नहीं तो बाध किसका? इसलिए ब्यञ्जना ही का शरण लेना चाहिए; क्योंकि श्रोता के यह जानने के लिए कि 'चोर का व्यवहार' यहाँ ('चाञ्चल्ययोगि नयनम् में') वक्ता को कहना अभीष्ट है, सहृदयता द्वारा उन्मिषित इस व्यञ्जना व्यापार के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है।
श्लेषमूलक ध्व्रनित्व और गुणीभूतव्यंग्यत्व पर विचार
यहाँ यह बात ध्यान में रखने की है कि- रागावृतो वल्गुकराभिमृष्टं श्यामामुखं चुम्बति चारुचन्द्रः
'राग' से (रंग से + प्रेम) से घिरा हुआ चन्द्रमा सुन्दर 'करों' (किरणों + हाथों ) से अभिमृष्ट 'श्यामा' (रात्रि +षोडश वर्षा स्त्री) के सुन्दर 'मुख' (मुख+आरम्भ) को चुम्बन कर रहा है' इत्यादिक में तो समासोक्ति है यह निर्विवाद है और यह भी निर्विवाद है कि यहीं यदि चन्द्रमा के स्थान में 'राजा' पद बना दिया जायतो 'राजा' शब्द के राजा और चन्द्र दोनों अ्थं हो जाने के कारण शब्दशक्तिमूलक ध्वनि हो जायगी। अब यह सोचिए कि यहाँ दोनों ही जगह श्लिष्ट विशेषणों के प्रभाव से अप्रकृत व्यवहार की प्रतीति समानरूप में हैं-प्रतीति
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में कोई तारतम्य नहीं। तब् फिर इसी व्यवहार को एक जगह गौा मानना और दूसरी जगह प्रधान मानना यह कैसे हो सकता है। उचित तो यह है कि श्लिष्ट विशेषणों से प्रतीत होनेवाले शप्रकृत अर्थ को दोनों ही अगह गौएा माना जाय, क्योंकि 'प्रकृत का प्रधान होना और अप्रकृत का उसका उपस्कारक होना' मानी हुई बात है। और नह सिद्ध नहीं किया जा सकता कि विशेष्य के श्लिष्ट होने मात्र के कारण व्यंग्य को प्रधान माना जाय और श्लिष्ट न होने पर व्यंग्य की अप्रधानता मानी जाय। रही चंद्रमा में नायकता की प्रतीति, सो एक जगह (समासोक्ति में) अर्थशक्तिमूलक व्यंजना के द्वारा है और दूसरी जगह (ध्वनि में ) शव्दशक्तिमूलक व्यंजना के द्वारा, सो वह भी तुल्य ही है।
अब जो विद्वान् समासोक्ति में प्रकृत धर्मी में नायकत्व आरदि की प्रतीति नहीं मानते, किंतु नाथक आदि के व्यवहार की ही प्रतीति मानते हैं और जो विद्वान् ध्वनि में नायक की प्रतीति भी मानते हैं, उनके हिसाब से भी उक्त स्थल में एक स्थान पर व्यंग्य का गौणत्व और दूसरे स्थान पर प्रधानत्व किस कारण होगा ? ऐसे स्थल पर प्रकृत और अप्रकृत की 'उपमा' अथवा 'अभेद' दोनो में से किसी को भी व्यंग्य कहो, किंतु उस व्यंग्य का प्रकृतोपस्कारक होने से गौरतव ही उचित है, प्रधानत्व नहीं, अन्यथा समासोक्ति में भी व्यंग्य प्रधान होने लगेगा। अतः यदि प्राचीन आचार्य कुपित न हों तो यह भी कहा जा सकता है कि पूर्वोक्त उदाहरण में प्राचीन विद्वानों ने जहाँ 'शब्दशक्ति- मूलक ध्वनि' लिखी है वहाँ श्लिष्ट विशेष्य वाली समासोक्ति ही है जो कि परांगरूप गुणीभूतव्यंग्य का एक भेद है (और साधारण समा- सोक्ति अ्लिष्ट विशेष्य वाली होती है। इसके अ्रतिरिक्त इनमें कोई मेद नहीं है।)
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शब्दालंकारता और अर्थालंकारता पर विचार
आ्रचार्य उद्भट के अनुयायियों का कथन है कि सभंग और श्भंग दोनों ही श्लेष अर्थालंकार है और आचार्य मम्मटभट्ट का सिद्धांत है कि दोनों ही श्लेष शब्दालंकार हैं, क्योंकि दोनों ही श्लेषा में शब्द नहीं बदला जा सकता, अतः चाहे अन्वय की दृष्टि से देखिए चाहे व्यतिरेक की दृष्टि से दोनों श्लेषों को शब्द के आश्रित ही निश्चित किया जाता है। हाँ, तृतीय भेद अर्थालंकार है, क्योंकि वह केवल अर्थाश्रित है।
किंतु 'अलंकारसर्वस्कार' आरदि का सिद्धांत है कि अन्वय व्यतिरेक के द्वारा कारणता का ज्ञान होता है, आश्रयता का ज्ञान नहीं। जैसे घट के प्रति दंडादिक कारण हैं, क्योंकि उनके रहने पर घड़ा बनता है, न रहने पर नहीं, और आश्रयता का ज्ञान तो 'कौन किसमें रहता है" इस ज्ञान के अधोन है। अब सोचिए कि यहाँ सभंग श्लेष तो दो शब्दों में रहता है, (वहाँ शब्द भी दो होते हैं और अर्थ भी दो ) जैसे कि लास (लाही) से दो लकड़ी चिपकाकर एक कर दी गई हो और अरभंग श्लेष दो अर्थों में रहता है, जैसे कि एक वृच् (डंठल) में दो फल-अर्थात् वहाँ एक शब्द और दो अर्थ स्पष्ट रहते हैं। इस तरह एक (सभंग) का शब्दालंकार होना और दूसरे (अभंग) का अर्था- लंकार होना स्पष्ट ही है। यद्यपि यहाँ दूसरे (शरभंग शलेष) का भी 'प्रतिप्रवृत्तिनिमिचं शब्दभेद :- अरथांत् हर एक प्रवृत्तिनिमित्त में शब्द का भेद हो जाता है' (अतः जहाँ दो अथ हुए वहाँ दो शब्द भी हो गए) इस सिद्धांत के अनुसार अभंगश्लेष की भी दो शब्दों में रहने के कारण शब्दालंकारता उचित है, तथापि एक तो शक्ततावच्छेदक की आनुपूर्वी (शरक्षरक्रम) के अभिन्न होने से अभेदाध्यवसान के कारख वहाँ दो अथों का दो शब्दों में रहने का ज्ञान कठिन ही है,
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अन्यथा 'प्रत्यर्थ शब्दनिवेशः-प्रत्येक अर्थ में (पृथक् पृथक्) शब्द का निवेश होता है' इस सिद्धांत के अनुसार जिसे मम्मटभट्ट 'शर्थ श्लेष' कहते हैं वह भी शब्दालंकार ही हो जायगा। (अरतः सभंग श्लेष शब्दालंकार और अरभंग श्लेष अर्थालंकार है-यही सिद्धांत उचित है।)
यह श्लेष उपमा की तरह स्वतंत्र होने पर भी स्थान-स्थान पर सब अलंकारों का अनुग्राहक होने के कारण वाणी के नवीन नवीन सौभाग्य को उत्पन्न करता हुआ सहृदयों द्वारा विविध उदाहरणों में विविध भावनाओं का विषय किया जा सकता है।
श्लेषालंकार समास्त
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अप्रस्तुतप्रशंसा
लक्षण
जहाँ अप्रस्तुत व्यंग्य के द्वारा प्रस्तुत वाच्य का उपस्कार हो वहाँ समासोक्ति होती है-यह कहा जा चुका है। शब उसके विपरीत (अर्यात् अरप्रस्तुत वाच्य द्वारा व्यंग्य प्रस्तुत का उपस्कार होने पर) अप्रस्तुतप्रशंसा का वर्गान किया जाता है- जहाँ आगे बताए जाने वाले सादृश्यादि प्रकारों में से किसी एक प्रकार से (वाच्य) अप्रस्तुत व्यवहार के द्वारा (व्यंग्य) प्रस्तुत व्यवहार की प्रशंसा की जाय वह 'अप्रस्तुतप्रशंसा' कहलाती है।
लक्षण का विवेचन -
यहाँ प्रशंसा का अथं वर्णनमात्र है, न कि स्तुति। अ्रन्यथा धिकू तालस्योन्नततां यस्य च्छायापि नोपकाराय ताल की ऊँचाई को धिक्कार है जिसकी छाया भी उपकारार्थ नहीं। इत्यादिक में शरव्यासि हो जायगी।
अप्रस्तुतप्रशंसा के भेद
यह पाँच प्रकार की है- (१) जिसमें अरप्रस्तुत के द्वारा अपने सदश प्रस्तुत की श्रभिव्यक्ति हो। (२ ) जिसमें कार्य से कारण की अ्रपभिव्यक्ति हो।
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(३) जिसमें कारण से कार्य की अरभिव्यक्ति हो। (४) जिसमें सामान्य से विशेष की श्रभिव्यक्ति हो। (५) जिसमें विशेष से सामान्य की अरभिव्यक्ति हो। १-उनमें से प्रथम (अप्रस्तुत मदश से प्रस्तुत सदृश की अ्रभि- व्यक्ति); जैसे-
दिगन्ते श्र्यन्ते मदमलिनगएडाः करटिनः करिएय: कारुयास्पदमसमशीला: खलु मृगा:। इदानीं लोकेऽस्मिन्ननुपमशिखानां पुनरयं नखानां पाएि्डत्यं प्रकटयतु कस्मिन्मृगपतिः ।।
जिनके गण्डस्थल मद से मलिन हो रहे हैं ऐसे हाथी दिशाओं के अ्रंत में सुने जाते हैं, हथिनियाँ दया का पात्र हैं और मृग समानशील वाले नहीं हैं-उन पर आक्रमण ही कैसा ? अब इस संसार में यह मृगपति अनुपम नोंकों वाले अपने नखों के पारिडत्य को किस पर प्रकट करे! अरथवा; जैसे-
यस्मिन्खेलति सर्वतः परिचलत्कन्लोल कोला हलै- र्मन्थाद्रिभ्रमशभ्रमं हृदि हरिद्यूयाधिपा: पेदिरे। सोडयं तुङ्गतिमिङ्गिलाङ्गमिलनव्यापारकौतूहलः क्रोडे क्रीडतु कस्य केलिरमसत्यक्तार्यवो राघवः ।।
जिसके खेलते समय चौतरफ उठती हुई कल्लोलों के कोलाहलों से दिशाओं के पतियों-लोकपालों के हृदय में मन्दराचल के भ्रमण
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का भ्रम हो जाता था वह बड़े-बड़े तिमिङ्गलों (मत्स्य विशेषों) के अंगों को - अर्थात् पूरे के पूरे तिमिंगलों को-गिल जाने के व्यापार का कौतूहली राघव (महामत्स्य) खेल के वेग में समुद्र को छोड़ बैठा, अब किसकी गोद में खेले।
अथवा; जैसे-
पुरा सरसि मानसे विकचसारसालिस्खल- त्परागसुरभाकृते पयसि यस्य यातं वयः। स पल्वलजलेऽधुना मिलदनेकभेकाकुले मरालकुलनायकः कथय रे! कथं वर्तताम् ।'
जिसकी वय (शवस्था जीवन) पहले मानस सरोवर के खिले हुए कमलों की पंक्ति से गिरते हुए पराग से सुगंधित जल में व्यतीत हुई, वह हंसों के कुल का स्व्ामी अब अनेक (झुंडों के झुंड) मेंढकों से गंदे किए तलैया के पानी में, कहिए, कैसे जिंदगी गुजारे।
यह (सादृश्यमूला अप्रस्तुतप्रशंसा ) श्लिष्ट विशेषणों वाली भी देखी जाती है-
नितर्रां नीचोऽस्मीति त्वं खेदं कूप ! मा कदापि कृथाः । अत्यन्तसरसहृदयो यतः परेषां गुखग्रहीतासि॥
हे कूप, तुम कभी यह खेद मत करना कि मैं अत्यंत नीचा हूँ (गहरा+नीचे दर्जे का) हूँ, क्योंकि तुम्हारा हृदय अत्यंत सरस (सजल + रसिक ) है और तुम दूसरों के गुणों (गुखों +रस्सियों) के ग्रहण करने वाले हो।
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(यहाँ अरप्रकृत का वर्णन देखकर ) यह कहना उचित नहीं कि इस अलङ्गार को समासोक्ति अनुगृहीत करती है। कारण, उसका स्वरूप अप्रस्तुतप्रशंसा के बिलकुल विरुद्ध होता है, अतः उसका इसे अनुग्हीत करना नहीं वनता।
काव्यप्रकाश पर विचार
(ऐसी स्थिति में) जो मम्मट भट्ट ने लिखा है कि-
"येनास्यम्युदितेन चन्द्र ! गमितः क्लान्तिं रवौ तत्र ते युज्येत प्रतिकर्तुमेव न पुनस्तस्यैव पादग्रहः। क्षीसोनैतदनुष्ठितं यदि ततः किं लख्से नो मना- गस्त्वेवं जडधामता तु भवतो यद् व्यो्नि विस्फूर्जसे॥
हे चंद्र जिसने उदित होने द्वारा तुम्हं क्लांति को प्राप्त किया उस सूर्य के विषय में तुम्हारा प्रतिकार करना ( प्रतिद्वंद्विता में खड़े होना) ही योग्य है न कि फिर उसी के पादों (चरणों+किरणों) का ग्रहय। यदि कहा जाय कि 'क्षीरा' (धनहीन+कलाहीन) हो जाने से ऐसा किया है तो क्या तुम्हे किञ्चित् भी लजा नहीं आरती? (शरब यदि मान लिया जाय कि क्षीणों की निर्लजता तो चलती ही है तो) ऐसा भले ही रहे, पर (तुम्हारो) 'जडधामता' (मूर्खता+शीतलता) तो यह है कि आरकाश में गर्वसहित उदय होते हो। इस जगह समासोक्ति अप्रस्तुतप्रशंसा की अ्र्नुग्राहिका है।"
इस पर विचार किया जाता है कि-यहाँ विशेषणों की समानता के प्रभाव से प्रतीत होनेवाला कापुरुष (अयोग्य पुरुष) का वृच्ांत प्रस्तुत है अथवा अप्रस्तुत ? यदि प्रस्तुत है तब तो समासोक्ति का यहाँ
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विषय ही नहीं है, क्योंकि उनने (मम्मट ने ) स्वयं ही समासोक्ति का लक्षण- "परोक्तिर्भेंदकैः श्लिष्टैः समासोक्तिः-अर्थात् श्लिष्ट विशेषणों से अप्रस्तुत अर्थ की उक्ति को समासोक्ति कहते हैं।" यह लिखा है और स्वयं उन्होंने ही 'पर' शब्द का अर्थ अप्रस्तुत किया है। अब यदि कापुरुष के वृचांत को अप्रस्तुत माना जाय तो अप्रस्तुतप्रशंसा का भी यहाँ विषय नहीं है। कारण, अप्रस्तुतप्रशंसा का उन्होंने यह लक्षणा लिखा है- "अप्रस्तुतप्रशंसा सा या सैव प्रस्तुताश्रया=अर्थात् प्रस्तुत है आश्रय अर्थात् प्रधान जिसमें उस अप्रस्तुत की प्रशंसा को अप्रस्तुतप्रशंसा कहते हैं।" इसलिए यहाँ उनका यह अभिप्राय समझकर कि 'श्लिष्ट विशेषणों से उपच्षिप्त होनेवाले सभी द्वितीय अ्रथों को समासोक्ति कहा जाता है।' किसी न किसी प्रकार संगति बैठानी चाहिए। (वास्तव में तो यह कथन ठीक है नहीं।) श्रप्रस्तुतप्रशंसा पर विचार यह (उपर्युक्त उदाहरणों में निर्दिष्ट) अप्रस्तुतप्रशंसा सादृश्यमूला कहलाती है। इसमें वाक्यार्थ कहीं व्यंग्य अर्थ से तटस्थ ही रहता है- जैसे कि उक्त उदाहरणों में और कहीं वाक्यार्थ के अंतर्गत विशेषणों के अन्वय की योग्यता प्राप्त करने के लिए व्यंग्य के साथ अभेद की अपेक्षा करता है। जैसे - समुपागतवति दैवादवहेलां कुटज मधुकरे मा गाः। मकरन्दतुन्दिलानामरविन्दानामयं महामान्य: ।। हे कुटज, दैत से तुम्हारे पास आए हुए मधुकर की अवज्ञा न करो। यह मकरंदों से भरे अरविंदों का महामान्य है। १-एक जंगलो पुष्प -इंद्रजौ का फूल; जैसा कि लिखा है "कुटजः
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श्रथवा, तावत्कोकिल दिवसान्यापय विरसान्वनान्तरे निवसन्। यावन्मिलदलिमाल: कोऽपि रसालः समुल्लसति॥ हे कोफिल, तब तक अन्य बन में रहते हुए इन नीरस दिवसों को बिताओ, जब तक जिस पर भौरों के झुंड जुड़ रहे हैं ऐसा कोई रसाल (शरम्र) का वृक्ष विकसित नहीं होता। यहाँ वृक्ष और पत्तियों को संबोधित करना बन नहीं सकता, इस लिए वाक्यार्थ व्यंग्य अंश के तादात्म्य की अपेक्षा रखता है। मलिनेऽपि रागपूर्णा विकसितवदनामनन्पजल्पेडपि । त्वयि चपलेऽपि च सरसां भ्रमर कथं वा सरोजिनीं त्यजसि।।
हे भ्रमर, तुम्हारे 'मलिन' (श्याम +मलिन चित्त=कुटिल) होने पर भी जो 'राग' (रंग +प्रेम) से भरी हुई है और तुम्हारे बहुत बकवादी होने पर जो अपना मुख़ बिकसित रखती हैं एवं तुम्हारे चपल होने पर भी जो सरस है ऐसी कमलिनी को तुम कैसे छोड़ रहे हो!
यहां 'त्याग की अनुचितता' के हेतुरूप में कमलिनी के प्रशंसा- बोधक विशेषण ग्रहणा किए गए हैं; किंतु यह संभव नहीं है, कारण भौंरे में 'श्यामता आदिक' दोषरूप नहीं है और कमलिनी का 'लाल होना' आदिक गुण नहीं है, जिससे कि उसकी स्तुति हो। अतः वाच्यार्थ (वृक्ष और पक्षी को संघोधित करना अनुपपन्न होने से) विशेष्य के अंश में और (श्यामतादिक विशेषण बन (सकें इसलिए) विशेषण
शक्रो वत्सको गिरिमलिलका। एतस्यैव कलिंगेन्द्रयवभद्रयवं फले।" (अमरकोश ओषधिवर्ग ६७ इ्लो० )
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के अंश में-दोनों ही अंशों मेंयंग्य के ताद्रूप्य की अपेक्षा है। पहले उदाहरण में अंशतः (केवल संबोध्य पक्षीमात्र में) ताद्रूप्य की अपेक्षा है और इस उदाहरण में पूर्णतया (क्योंकि श्यामत्वादि दोषादि -रूप तभी हो सकते हैं, जब्र व्यंग्य से तादात्म्य हो) यह ( पहले उदा- हरण से) विशेषता है।
कहीं-कहीं व्यंग्य अर्थ भी किसी अंश में वाच्य के ताद्रूव्य की औरर वाच्य अर्थ भी किसी अंश में व्यंग्य अरथं के ताद्रूप्य की अपेक्षा रखता है, जैसे-
सरजस्कां पाएडुवर्णा कएटकप्र कराङ्किताम्। केतकीं सेवसे हन्त कथं रोलम्ब ! निस्न्नपः ॥
हे भ्रमर, खेद की बात है कि तुम निर्लज्ज होकर सरजस्का (पराग भरी+रजस्वला) पाण्डुवर्ण (श्वेत + चिन्ता से पीली) और कंटकसमूह (कांटों+रोमांच) से युक्त केतकी का सेवन करते हो। यहाँ जैसे 'सरजस्कात्व' वाच्य (केतकी) और प्रतीयमान (नायिका) दोनों में सेवन की अनुचितता का निमित्त है (क्योंकि केतकी में भी इतनी रज होती है कि उसमें भर जाना शखरता है) वैसे 'पाराडुवर्ण' और 'कण्टकित' होना नहीं, क्योंकि पाण्डुवर्ण होना कतकी में दोष नहीं हैं, प्रत्युत गुण ही है, इस कारण पाराडुरता के अंश में (उसे दोपरूप सिद्ध करने के लिये) केतकी पर नायिका के ताद्रूप्य की अपेक्षा है और नायिका में कण्टकितता के अंश में केतकी के तादात्म्य की अपेक्षा है, क्योंकि पुलकित होना कामिनी के त्याग के अनुकूल नहीं है, प्रत्युत (अनुरागसूचक होने से) नायिका के सेवन के अनुकूल है। ये तो हुए सादृश्यमूला अप्रस्तुतप्रशंसा के उदाहरण।
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(२ ) शरब कार्य से कारण का गम्य होना; जैे
क्रिं ब्रूमस्तव वोरतां वयममी यस्मिन्धराखएडल- क्रीडाकुएड लितभ्रु शोानयने दोर्मएडलं पश्यति। नानाभूषसरत्नजालजटिलास्तत्कालमेवाभव- न्विन्ध्यकमाधरगन्धमादनगुहासंबंधिनो भूरुहाः॥
हे पृथ्वीनाथ, आपकी वीरता का हम क्या वर्णन करें कि जिसके लोला से भौहों के कुराडलित (गोल) और आँखें लाल करके भुज- मंडल के देखने पर तत्काल ही विध्याचल और गंधमादन की गुफाओं के वृक्ष अनेक भूषणों और रत्नजालों से जटिल हो गए। यहाँ विंध्याटवी के वृक्षों के भूषित होने' (रूपी कार्य) से 'शत्रुओं का पलायन' (रूपी कारण) प्रतीत होता है। किंतु यदि आ्रगे लिखी जाने वाली रीति से इसको पर्यायोक्त- अलक्गार का विषय कहा जाय तो इसका पृथक उदाहरण यह है-
नितरां परुषा सरोजमाला न मृखालानि विचारपेशलानि। यदि कोमलता तवांगकानामथ का नाम कथापि पल्लवानाम्।।
नायक नायिका से कहता है-यदि तुम्हारे अंगों की कोमलता है तो कमलों की माला अत्यंत कठोर है, मृणाल विचार करने पर भी कोमल नहीं हो सकते और पल्लवों की तो बात ही क्या है। यहाँ पल्लवादिक के तिरस्काररूपी कार्य से नायिका के अरंगों का सौकुमार्यातिशयरूपी कारण प्रतीत होता है। कहा जायगा कि 'मृणाल की कठोरता' का नायिका के 'अंगों' का 'सौकुमार्यातिशय' कारण कैसे
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हुआ-यह उसका जनक तो है नहीं। तो इसका उत्तर यह है कि यहाँ 'कार्यकारणभाव' केवल ज्ञानों का है, इसलिए मृाल के अन्दर ज्ञात होने वाली कठोरता के अपने रूप में उसके शंग की सुकुमारता से उत्पन्न न होने पर भी कोई क्षति नहीं है, क्योंकि नायिका के श्रंगों के सौकुमार्यातिशय का ज्ञान पल्लवादि की कठोरता के ज्ञान का कारण तो हई है।
(३) कारण से कार्य का गम्य होना, जैसे- -
सृष्टः सृष्टिकृता पुरा किल परित्रातुं जगन्मएडलं त्वं चएडातप ! निर्दयं दहसि यज्ज्वालाजटालैः करैः। संरम्भारुखलोचनो रणभुवि प्रस्थातुकामोऽधुना जानीमो भवता न हन्त! विदितो दिल्लीधरावल्लभ: ॥
हे चण्डातप-सूर्य ! सृष्टिकर्ता ने पहले जगन्मरडल की रक्षा करने के लिए तुम्हें पैदा किया था। अब तो तुम ज्वाला से जटिल किरणों के द्वारा जगत् को निर्दयतापूर्वक जला रहे हो, हम समझते हैं कि तुम्हें अभी कोप से अरुरनयन रसभूमि में प्रस्थान करना चाहते दिल्लीपति का पता नहीं है।
यहाँ राजवर्शान के अंगरूप में 'सूर्यभयोत्पादन' वर्शान किया गया है, जो प्रस्तुत है। उसमें साक्षात् अनुकूल न होने के कारण 'दिल्ली नरेश का प्रस्थान' अप्रस्तुत है। उस प्रस्थान के द्वारा साक्षात् सूर्य के भय के अनुकूल 'शत्रुओं द्वारा किए जाने वाला सूर्य-मण्डल का भेदन' प्रतीत होता है। और यदि यहाँ किसी तरह ( परम्परया अनुकूल होने के कारण) प्रस्थान प्रस्तुत ही है यह कहा जाय तो (कारण से कार्य की गम्यता का) यह उदाहरण है-
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आनम्य रोषात्प्रयातुमुदिते मयि दूरदेशम्। बाला करांगुलिनिदेश वशंवदेन क्रीडाविडालशिशुनाशु रुरोध मार्गम्।। किसी मित्र के यह पूछने पर कि 'आप तो जा रहे थे कैसे लौट पड़े?' जाने वाला कहता है कि-नम्र होकर मनोहर वचनों से निवारण करने पर भी जब्र मैं रोष के कारण दूर देश जाने को निकल पड़ा तो बाला ने अपने अंगुली के इशारे पर चलनेवाले पालतू बिल्ली के बच्चे द्वारा तत्काल मेरा मार्ग रुकवा दिया। यहाँ 'मैं' प्रवास से लौट पड़ा' यह प्रस्तुत कार्य अप्रस्तुत कारण (बिल्ली के बच्चे द्वारा मार्ग रोकने) से प्रतीत होता है। (४) सामान्य से विशेष; जै कृतमपि महोपकारं पय इव पीत्वा निरातङ्कः। प्रत्युत हन्तुं यतते काकोदरसोदरः खलो जगति ॥ जगत् में सांप का सगा भाई खल पुरुष किये हुए महान् उपकार को भी दूध की तरह निःशंक पीकर, उल्टा, मारने को तैयार होता है। यहाँ (अप्रस्तुत) सामान्य अर्थ (खलमात्र के व्यवहार) से प्रस्तुत विशेष अर्थ (किसी खलविशेष का कार्यं) अवगत होता है और उपमा (साँप से तुलना) भी इसकी अनुकूलता से स्थित है। (x) विशेष से सामान्य; जैसे- पासिडत्यं परिहत्य यस्य हि कृते बन्दित्वमालम्बितं दुष्प्रापं मनसापि यो गुरुतरैः वलेशैः पदं प्रापितः । रूढस्तत्र स चेन्निगीर्य सकलां पूर्वोपकारावलीं दुष्टः प्रत्यवतिष्ठते तदधुना कस्मै किमाचद्तमहे॥
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जिसके लिए परिडताई को हटाकर (हमने) भाटपन स्वीकार किया और जिसे बड़े क्लेशों के साथ मन से भी दुर्लभ पद पर पहुँचाया वह उस पद पर आरूढ होकर सारी पहिले उपकार की परम्परा को निगल गया और दुष्ट उलटा सामना करता है, तो कहिये शब किससे क्या कहें।
यहाँ 'दुष्टों पर किया हुआ उपकार परिखाम में सुख नहीं देता' यह प्रस्तुत सामान्य, 'विशेष' (किसी दुष्ट के वत्तान्त) से अवगत होता है। अथवा, जैसे --
हारं वक्षसि केनापि दत्तमजेन मर्कटः। लेढि जिघ्रति संत्िप्य करोत्युन्नतमाननम् । किसी मूर्ख द्वारा वक्षस्थल में पहनाए हुए हार को बंदर चाटता है, सूंघता है और समेट (मरोड़) कर मुँह ऊँचा करता है। यहां अप्रस्तुत 'मर्कट के वत्तांत' से 'मूर्खो को सुंदर वस्तु देना वस्तु का नाश करवाना है' यह प्रस्तुत सामान्य शवगत होता है।
भेदों पर विचार
इस तरह यह पाँच प्रकार की अप्रस्तुतप्रशंसा प्राचीनों के अनुसार निरूपण की गई है। वस्तुतः तो अप्रस्तुतप्रशंसाका प्रथम ( सादृश्य- मूलक) भेद अनेक प्रकार से हो सकता है। दोनों के प्रस्तुत होने पर भी अप्रस्तुतप्रशंसा होती है उन (संभावरित) भेदों में से जहाँ अत्यंत अप्रस्तुत वाच्य के द्वारा प्रस्तुत अरवगत होता है वह प्रकार तो ऊपर के उदाहरणों में) कहा
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ही जा चुका है। किंतु किसी स्थल पर जहाँ दोनों ही वृचांत प्रस्तुत हों वह भी एक भेद हो सकता है; जैसे-भ्रमर और कमलिनी आदि सामने स्थित हों और अपनी नायिका में अनुराग न रखनेवाला नायक भी समीपवर्ची हो तो किसी नायिका की किसी सखी की उक्ति में 'मलिनेऽपि रागपूर्णाम्०' इत्यादिक पूर्वोदाहृत पद्य में (यह भेद हो सकता है)।
आप कहेंगे-यहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा होगी कैसे ? कारण यह है कि वाच्यार्थ के प्रस्तुत होने से यह उदाहरणा अप्रस्तुतप्रशंसा के लक्षण का स्पर्श ही नहीं करता; तो यह ठीक नहीं। कारण, अप्रस्तुतप्रशंसा में 'अप्रस्तुत' शब्द से 'मुख्य तात्पर्य के विषय रूप अर्थ से अ्रतिरिक्त अर्थ' कहना अभीष्ट है। सो वह कहीं अत्यंत अप्रस्तुत होता है और कहीं प्रस्तुत भी हो सकता है। इसलिए कोई दोष नहीं है। यदि श्रप कहें कि इस तरह तो प्रत्येक ध्वनि अप्रस्तुतप्रशंसा हो जायगी। (क्योंकि सभी ध्वनियों में मुख्य तात्पर्य के अरविषय वाच्य के द्वारा मुख्य तात्पर्य का विषय व्यंग्य अर्थ ध्वनित होता है) तो यह ठीक नहीं, क्योंकि इसीलिए तो लक्षण में 'सादृश्य आदि (पाँच प्रकारों) में से किसी एक प्रकार से' यह विशेषण लगाया गया है-यह सोच रखना चाहिए। इससे कुवलयानन्दादिक ने जो कहा है कि "द्योः प्रस्तुतत्वे प्रस्तुतांकुरनामान्योऽलंकार :- अर्थात् वाच्य औरर व्यंग्य दोनों के प्रस्तुत (प्रकृत) होने पर प्रस्तुताङकुर नाम का दूसरा अलंकार होता है। इसकी उपेक्षा' करनी चाहिए। अर्थात् प्रस्तुतांकुर कोई भिन्न
१-नागेश कहते हैं कि-यह विचारणीय है। 'मुख्यतात्पर्यविषय अर्थ से अतिरिक्त' यहाँ 'मुख्य' शब्द का क्या अर्थ है ? यदि 'प्रस्तुतत्व' ६
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अलक्कार है सो नहीं, किन्तु वह इसी अलक्कार का भेद है। कारण, यह बार बार लिखा जा चुका है कि किश्चित् विलक्षणता मात्र से ही भिन्न भिन्न अलंकारोंकी कल्पना करने पर कहने के ढंगों के अनन्त होने के कारण अलंकारों की भी अनन्तता हो जायगी। हाँ, यहॉ यह समझ लेना चाहिए कि-अत्यन्त अप्रस्तुत के वाच्य होने पर अभिधा उसमें समाप्त नहीं होती, इस कारण बल से खींच कर लाए हुए प्रतीयमान अर्थ का ध्वनिरूप होना बाधारहित नहीं है
अर्थ हो तब तो यहाँ दोनों प्रस्तुत हैं, अतः दोनों समान हो गए। अब यदि कहा जाय कि 'मुख्य' का अर्थ 'उद्दश्य' है तो प्राचीनों के "अप्रस्तुत से प्रस्तुत की अभिव्यक्ति' इस लक्षण में 'अप्रस्तुत से' यह पद व्यर्थ हो जायगा। दूसरे, इतनी सी विशेषता से यदि भेद न माना जाय तो साधारण विशेषणों के प्रभाव से प्रस्तुत की स्फूर्ति होने पर समासोक्ति और असाधारण विशेषणों के प्रभाव से प्रस्तुत की स्फूर्ति होने पर व्यंग्य रूपक होता है यह आपका बताया विभाग भी उड़ जायगा एवं दीपक और गुम्फ में (?) तथा दृष्टान्त और प्रतिवस्तूपमा में भी भेद न होगा। पर यह भी धक्का-मुक्कीं ही है, क्योंकि पण्डितराज ने प्राचीनों के 'अप्रस्तुत' शब्द का अर्थ 'अनुद्दिष्ट' मानकर ही तो यह सब लिखा है। ऐसी स्थिति में यह दीक्षित जी का समर्थन व्यर्थ है और नवीन अलंकार- भेद मानने न मानने का तो उत्तर पहले ही दिया जा चुका है कि "नैव प्रमाणीकुमहे वयं मृषा मुकुलितविलोचनान्प्राचः ........... इति तु प्रभुतैव केवला। न सहृद्यत्वम्।" अतः जब प्राचीनों के भेदों से किसी प्रकार काम न चलता हो तभी नवीन अलंकार की कल्पना करना ठीक है। -अनुवादक।
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और दोनों के प्रस्तुत होने पर तो ध्वनि' होने में कोई विदाद नहीं है।
नवीन भेद इस तरह सादृश्यमूलक प्रकार में दो भेद हो जाते हैं-एक गुणीभूतव्यंग्य रूप औररर दूसरा ध्वनिरूप, किन्तु कार्यकारणभाव और सामान्यविशेषणभाव के कारण होने वाले चारों प्रकार तो गुणीभूत-
१- नागेश का कहना है कि-"यह भी विचारणीय है, क्योंकि पूर्वोक्त 'मलिनेऽपि रागपूर्णाम्०' इत्यादि में व्यंग्य अर्थ के आरोप के बिना अ्रमर को संबोधन करना और उसकी श्यामता आदि में दोषारोप करना (इसका विचार पहले मूल में हो चुका है) सिद्ध नहीं होता और व्यंग्य के द्वारा ही यह सिद्ध होता है, अतः गुणीभूतव्यंग्यता ही उचित है।" यहाँ निवेदन यह है कि उक्त उदाहरण में भ्रमर में श्यामता का दोषत्व अनुपपन्न होने के कारण गुणीभूतव्यंग्यता हो सकती है, किन्तु जहाँ व्यंग्य के अनुसंधान के बिना ही द्वितीय प्रस्तुत अर्थ पूरा पूरा बैठ जाता हो; जैसे- अन्यासु तावदुपमर्दसहासु भृङ्ग लोलं विनोदय मनः सुमनोलतासु। बालामजातरजसं कलिकामकाले व्यर्थं कदर्थयसि किं नवमल्लिकायाः ॥ इस कुवलयानन्द के उदाहरण में। वहाँ भी यदि गुणीभूतव्यङ्ग्यता मानी जाय तो सभी ध्वनियाँ लुप्त हो जांयगी, क्योंकि सर्वथा असंबद्ध अर्थ की प्रतीति तो होती नहीं। यदि कहा जाय कि केवल सादृज्य संबन्ध से प्रतीति होने पर ऐसा माना जाय तो इसे आग्रह के अतिरिक्त क्या कहा जाय। -अनुवादक
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व्यंग्य के ही भेद हैं। कारणा, अभिघादि के स्पर्श के लेश से शून्य व्यंग्य में केवल अर्थ का आक्षेर मात्र ध्वनि का निमित्त होता है, जहाँ अरभिधा का थोड़ा सा भी स्पर्श हुआ वहाँ ध्वनि-काव्य नहीं कहा जा सकता।
एक शंका और उसका उत्तर अच्छा शब यह सोचिए कि आपेदिरेऽम्बरपथं परितः पतङ्गा भृङ्गा रसालमुक्कुलानि समाश्रयन्त। संकोचमञ्चति सरस्त्वयि दीनदीनो मीनो नु हन्त कतमां गतिमभ्युपैतु।। हे सरोवर, तुम्हारे संकुचित होने पर-पानी की कमी श्रने पर- पत्षियों ने चारों ओर आकाश का रास्ता लिया और भौरों ने आरमों के मौरों का आश्रय ले लिया, किन्तु खेद है कि यह अत्यन्त दीन मीन, बताइए, किस गति को प्राप्त हो। इस पद्य में किसी क्षीणा राजादिक का और उसी एक के सहारे पलने- वाले पुरुष आरदि का वृत्तान्त हो तब तो अप्रस्तुतप्रशंसा ही है इसमें कोई विवाद नहीं, और जत सरोवर का वृत्तान्त और राजा का वृत्तान्त दोनों ही प्रस्तुत हों तन भी पूर्वोक्त रीति से अप्रस्तुतप्रशंसा ही है, किन्तु जब्र केवल सरोवर का वृत्तान्त ही प्रस्तुत हो और उसमें राजा का वृत्तान्तरूपी व्यंग्य गुणीभूत हो जावे तब इस पद्य में कौन सा अलंकार होगा ? कारण, तब अप्रस्तुतप्रशंसा तो होगी नहीं, क्योकि उस स्थिति में यहाँ प्रस्तुत का ही वर्णन है। समासोक्ति भी नहीं हो सकती, कारण, समासोक्ति का जीवनमूल है विशेषणों की समानता, जो सर्दालङ्कारिक
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संमत हैं, वह यहाँ है नहीं। यदि आरप कहें कि 'विशेषणों की समानता' वाले प्रकार की तरह समासोक्ति का एक शुद्ध साहश्यमूलक भी प्रकार मान लेना चाहिए। तो यह ठीक नहीं। कारण, किसी एक धर्म' से व्याप्त न होने पर भी यदि एक अलंकार माना जाय तो सभी की एकालंकारता हो जायगी। दूसरे, अलंकारों के व्यवस्थापकों ने ऐसा समासोक्ति का भेद कहा भी नहीं है, अतएव अलंकारसर्वस्वकार आदि ने विशेषणवाची शब्दों की समानता की रक्षा करके ही भिन्न समास का आश्रय लेकर सादृश्यमूलता दिखाई है, विशेषणवाची शब्दों की समानता की उपेक्षा करके नहीं।
१-नागेश कहते हैं कि-"यहाँ यह विचारणीय है कि जिस तरह अतिशयोक्ति आदि में अथवा यहाँ (अप्रस्तुत प्रशंसामें) अन्यतम (भेदों में से कोई एक) का निर्देश करके एकधर्मव्यास्ता बना ली जाती है, उसी तरह समासोक्ति भी 'अन्यतरहेतुक (विशेषणसाम्यमूलक अथवा सादश्यमूलक) अप्रस्तुत वृत्तान्त के आरोपरूपी एक धर्म से व्याप हो सकती है, अतः यहाँ समासोक्ति के अंगीकार में (जैसा कि अप्पय दीक्षित ने 'पुरा यत्र स्रोतः' इस पद में माना है) कोई बाधा नहीं है।"
पर इसी के समाधानार्थ तो पण्डितराज ने "व्यवस्थापकैस्तन्मेदानु- केश्च-अर्थात् इसको सादृश्यमूलक समासोक्ति का भेद, प्राचीनों ने नहीं माना है" यह लिखा है और कुवलयानंद में भी लक्षण का विवेचन करते हुए यही लिखा है कि-"यत्र प्रस्तुतवृत्तान्ते वर्ण्यमाने विशेषण- साम्यबलादप्रस्तुतवृत्तान्तस्यापि परिस्फूर्तिस्तत्र समासोक्तिरलंकारः" ऐसी दशा में यहाँ समासोक्ति मानना अंडगेबाजी ही है। (शेष का विचार पहले किया जा चुका है।)
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इसका उत्तर यह है कि यहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा ही अलंकार है 'अप्रस्तुतप्रशंसा' शब्द का अर्थ 'अप्रस्तुत की प्रशंसा' यह नहीं है, किन्तु 'प्रस्तुत के द्वारा प्रशंसा' यह है और वह प्रशंसा किसकी? तो 'प्रस्तुत की' यह तो अर्थप्राप्त ही है। इस तरह यह सिद्ध हुआ कि अप्रस्तुत चाहे वाच्य हो चाहे व्यंग्य जहाँ उसके द्वारा वाच्य अथवा व्यंग्य प्रस्तुत की पूर्वोक्त सादृश्यादिक ('पाँचों) में से किसी एक प्रकार से प्रशंसा की जाती है वह अप्रस्तुत- प्रशंसा होती है, न कि वाच्य से ही व्यंग्य की प्रशंसा की जाय तभी।
हाँ, यहाँ यह शंका हो सकती है कि-
"कमलमनम्भसि कमले च कुवलये तानि कनकलतिकायाम्। अर्थात् बिना पानी के कमल हैं, कमल में दो कुबलय हैं, और ये सब कनक की लता में हैं।"
इत्यादिक की तरह यहाँ भी 'निगीर्याध्यवसान' मानने से श्रति- शयोक्ति की जा सकती है। यह दूसरी बात है कि पदार्थ का पदार्थ के द्वारा निगरण करके अध्यवसान हो या वाक्यार्थ का वाक्यार्थ के द्वारा।
कहा जायगा कि यहाँ अन्वयानुपपत्ति तो है नहीं कि लक्षणा मानी जाय तो इसका उत्तर यह है कि जिस प्रकार अन्वय की अनुपपत्ति लक्षणा का बीज है उसी प्रकार प्रस्ताव (प्रसंग) की अनुपपत्ति भी लक्षणा का बीज है। सो इस तरह अरतिशयोक्ति से ही काम चल जाने पर सादृश्यमूलक अप्रस्तुतप्रशंसा की यहाँ क्या आवश्यकता है?
यदि आप यह कहें कि यहाँ निगरणा करके अध्यवसान ही संभव नहीं है। कारण, अध्यवसान में वाच्यतावच्छेदकरूप से लक्ष्य अर्थ की
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( =७ )
प्रतीति होती है, किन्तु यहाँ अर्थान्तर की प्रतीति वाच्य से तटस्थ होकर होती है-यह भेद है। हाँ, जहाँ श्लेषादिक के द्वारा विशेषणों की समानता हो वहाँ उसके प्रभाव से अभेद का अध्यवसान भले ही हो (पर यहाँ कैसे हो सकता है ? ) तो यह ठीक नहीं। कारण, यहाँ भी वाच्य (अप्रस्तुत ) के व्यवहार की अरभिन्नता से ही प्रस्तुत के व्यवहार की प्रतीति होती है, इसलिए इसमें उसमें कोई विलक्षणता नहीं है। तो यह आपका कथन ठीक है, पर 'यस्मिन्खलति' और 'दिगन्ते श्रूयन्ते०' इत्यादि पूर्वोक्त उदाहरणों में वाक्यार्थ से तटस्थ होकर ही व्यंग्य अर्थ की प्रतीति सब सहृदयों को संमत है, (श्रतः आपकी कल्पना उचित नहीं।) हाँ कहीं-कहीं सम्बोधन और उन-उन विशेषणों के उपपन्न न होने से अभेदांश की भी अपेक्षा रहती है इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि सब जगह दोनों अर्थों की अभेद से ही प्रतीति होती है। दूसरे, इस विषय में कोई विवाद नहीं कि अप्रस्तुतप्रशंसा में प्रस्तुत व्यंग्य होता है, अब यदि (आप के कथनानुसार) यहाँ 'निगरण करके अध्यवसान' माना जाय तो वह अर्थ लक्ष्य होगा ( जो सिद्धान्त के विरुद्ध है)। यह हो सकता है कि जहाँ वाच्य अत्यन्त अप्रस्तुत हो वहॉ (अप्रस्तुतार्थ में) अभिधा के समाप्त होने के कारण कहीं लक्षण को अवकाश हो, किन्तु जब दोनों ही अर्थ पूर्वोक्त राति से प्रस्तुत हों तब बाधा का लेश भी स्फुरित नहीं होता, अतः लक्षणा का गन्ध भी नहीं है, तब फिर निगरण कहाँ से होगा, क्योंकि निगरण तो लक्षणा का एक भाग मात्र है। सो वहाँ तो अर्थ का आक्षेप ही करना होगा। अरतः ऐसे स्थलों में सादृश्यमूला अप्रस्तुतप्रशंसा आवश्यक होने के कारण अन्यत्र भी उसके सजातीयस्थल में अप्रस्तुतप्रशंसा ही उचित है।
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(25)
हाँ, यदि प्रस्तुत से प्रस्तुत की प्रतीति को ध्वनिकाव्य का भेद माना जाय और ध्वनि के अलङ्कार्य होने के कारण इस भेद में अलक्कारता की अनुपपत्ति है यह सूक्ष्म विचार किया जाय तो (सादश्यमूला से अतिरिक्त) अन्य भेद (कार्यकारभावादिक) ही अप्रस्तुतप्रशंसा का विषय हो सकते हैं, सादृश्यमूला नहीं-यह भी (विद्वान् लोग) कहते हैं।
शप्रस्तुतप्रशंसा समाप्त
गम्यत्वमूलक अलकार पर्यायोक्त अलङ्कार
लक्षय
विवक्षित अर्थ का (सीधे-सीधे न कहकर) किसी दूसरे ढङ्ग से प्रतिपादन पर्यायोक्त कहलाता है। लक्षण का विवेचन 'दूसरे ढंग' का अर्थ यहाँ 'जिस रूप में कहना चाहते हैं- उससे अतिरिक्त प्रकार' अथवा आ्रक्षेप है।
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(८६)
उदाहरण; जैसे- त्वां सुन्दरीनिवहनिष्ठुरधैर्यगर्व- निर्वासनैकचतुरं समरे निरीचष्य। केषामरिच्ितिभृतां नवराज्यलक्षमीः स्वामित्रतात्वमपरिस्खलितं बभार ।।
हे राजन्, सुन्दरी-समूह की निठुर धीरज के नर्व को हटाने में एक ही चतुर आपको युद्ध में देखकर किन शत्रुराजाओं की नवीन राज्य- लक्ष्मी ने अखसिडत पतिब्रतापन धारण किया है? वह उनको छोड़कर आपको वरण कर ही लेती है।
यहाँ यह कहना अभीष्ट है कि 'सभी शत्रुओं की राज्यसंपत्ति तुमको प्राप्त हो गई' किंतु वह उस रून में नहीं कहा गया है और 'राज्य लक्ष्मी का पतिव्रतापन खण्डित हो गया' इस रूप में कहा गया है। अथवा; जैसे-
सूर्याचन्द्रमसौ यस्य वासो रञ्जयतः करैः। अङ्गरागं सृजत्यग्निस्तं वन्दे परमेश्वरम्। शिवस्तुति है-जिसके वस्त्र को सूर्य और चन्द्रमा अपनी किरणों से रंगते हैं और जिसके अंगराग को अग्नि उत्पन्न करता है उस परमे- श्वर को नमस्कार करता हूँ। यहाँ दिगम्बर (नग्न) इस अर्थ को 'जिसका वस्त्र सूर्य और चंद्रमा की किरणों से रँगा जाता है' इस रूप में लिखा गया है और 'जिसका शंगराग भस्म है' इस बात को 'जिसके अंगराग को अग्नि उत्पन्न करता है' इस रूप में लिखा गया है।
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( ९ )
प्राचीनों के मतभेद और उन पर विचार (१) मम्मट भट्ट का मत है कि-"इस अलंकार में व्यंग्य की व्यंग्यता जिस आ्रकार से होती है उसके अतिरिक्त आकार से वाच्यता होती है। अर्थात् जो बात व्यंग्य होती है वहीं वाच्य भी होती है- केवल बोलने के प्रकार में भेद होता है। इसी कारण इसका 'पर्यायेण' अर्थात् दूसरे ढंग से 'उक्तम्' अर्थात् कहा गया है व्यंय जिसमें, यह लक्षण प्राचीनों ने बनाया है। इस विषय में यह शंका नहीं करनी चाहिए कि व्यंग्य और वाच्य का परस्पर विरोध होने से यह कथन असङ्गत है। कारण एक ही वस्तु का एक प्रकार से वाच्य होना औरर दूसरे प्रकार से व्यंग्य होना विरुद्ध नहीं है; जैसे-आलता, कुसूंभा, अनार के फूल और गुड़हल के फूल इत्यादि के रूप रक्तत्वादि से वाच्य होने पर भी (सभी के लाल होने पर भी) तत्तद् भिन्नजातीयता के रूप में उनका प्रत्यक्ष ही होता है, वह विजातीयता वाच्य नहीं होती। इसी तरह यहाँ भी (एक रूप में वाच्य होने पर शन्य रूप में उसकी व्यंग्यता) ही है।" (२ ) किन्तु अलंकारसर्वस्व्रकार कहते हैं कि "वयंग्य का भी दूसरे ढंग से कथन पर्यायोक्त कहलाता है। यदि आप कहें कि व्यंग्य होते हुए उसका अभिधा से प्रतिपादन कैसे हो सकता है तो इसका उत्तर यह है कि कार्य आदि के द्वारा वैसा हो सकता है।" इस कथन का अभिप्राय यह है कि- 'चक्राभिघातप्रसभाजयव चकार यो राहुवधूजनस्य। आलिङ्गनोद्दामविलासवन्ध्यं रतोत्सवं चुम्बनमात्रशेषम्। विष्णु का वर्णन है-जिनने चक्र चलाने रूपी बलात्कार की आ्रज्ञा से ही राहु की स्त्रियों का सुरतोत्सव आलिङ्गन के उच्छं खल विलासों से रहित बना दिया, जिसमें केवल चुम्बन मात्र शेष रह गया।'
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( a१ )
इस प्राचीनों के पद्य में 'राहु के शिर को छेदन करनेवाले' इस व्यंग्य अर्थ का 'राहु की स्त्रियों का ऐसा सुरतोत्सव बनानेवाले जिसमें केवल चुम्बन बचा है' इस रून में दूसरे प्रकार से अभिधा द्वारा वर्णन किया गया है। अब इसका भी विवेचन करने पर पर्यवसित अर्थ यह निकलता है कि 'राहु का शिरश्छेद करना' रूपी धर्म' यहां साक्षात् ग्रहण किए गए अपने साथी 'वैसे रूपांतर (चुम्बनमात्रशेषता करना)' से प्रतीत होता है। इस व्यंग्यांश में विष्णु की तो व्यंग्यता है नहीं; कारण विष्णु पहले से प्रकरणागत भी हैं और 'यत्' शब्द से विष्णु का अभिधान भी हो गया है। औ्रर इसी तरह- यं प्रेक््य चिररूढापि निवासप्रीतिरुज्किता । मदेनैवरावणामुखे मानेन हृदये हरे: ।।
जिसे देखकर मद ने ऐरावत के मुख में और मान ने इन्द्र के हृदय में चिरकाल से रूढ हुई निवास की प्रीति को छोड़ दिया।
इस प्राचीनों के पद्य में भी 'इन्द्र और ऐरावत मान और मद से मुक्त हो गए' इस व्यंग्य का पर्यावसान भी 'मद और मान के छूटने मात्र' में है, क्योंकि धर्मी (ऐरावत और इन्द्र) वाला अंश अभिधा से प्रतिपादित है। इस तरह यह सिद्ध हुआ कि जो व्यंग्यांश है वह रूपान्तर के पुर- स्कार से कभी अभिधा द्वारा प्रतिपादित नहीं होता और जो अभिधा से प्रतिपादित होता है वह धर्मी अभिधा का आश्रय होने से व्यंजना व्यापार का आश्रय नहीं हो सकता। ऐसी स्थिसि में 'व्यंग्य का दूसरे प्रकार से वाच्य होना' यह कथन असंगत ही है, अतः 'कार्य आदि के द्वारा जो व्यंग्य उक्त-सा हो उसको पर्यायोक्त कहते हैं।' सो इसका अर्थ
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( ९२ )
आच्षिप्' ही हुआ। तात्पर्य यह कि कार्यादि के वर्णन द्वारा शरच्तित कारखादि पर्यायोक्त हैं। प्राचीनों ने जो इस अलंकार में धर्मी को भी व्यंग्य कहा है उसका अभिप्राय यह है कि व्यंजना के बोध का वियय जो वाक्यार्थ होता है वह सब-का-सब व्यंग्य ही समझा जाता है। हाँ, यदि उसका विवेचन किया जाय तो उस वाक्यार्थ में कुछ पदार्थ केवल अभिधा के गोचर होंगे और कुछ व्यंजना के यह दूसरी बात है। (३ ) अभिनवगुप्ताचार्य ने तो पर्यायोक्त का यौगिक अर्थ औ्रर लक्षण यों किया है-'पर्यायेण'=वाच्य से अतिरिक्त प्रकार से अर्थात् व्यंग्य से उपलच्ित जो उक्त्तम्=अभिधा से प्रतिपादित हो उसे पर्यायोक्त कहते हैं।'
उनका अभिप्राय यह है कि-यदि 'पर्याय' शब्द का अरर्थ 'प्रका- रान्तर' या 'धर्मान्तर' किया जाता है तो 'पर्यायोक्त' का यौगिक अर्थ यह होगा कि 'जिस अर्थ को हम कहना चाहते हैं उस अर्थ के अव- च्छेदक धर्म के श्रतिरिक्त धर्म को पुरस्कृत करके अभिधा से प्रतिपादित' ऐसी दशा में दशवदननिधनकारी दाशरथि: पुएडरीकानः अर्थात् रावण को मारनेवाले कमलनयन दशरथ पुत्र' इत्यादिक में भी रामत्व से अरतिरिक्त (पुएडरीकाक्षत्व) धर्म के पुरस्कार द्वारा राम का वर्णन होने के कारण पर्यायोक्त अलंकार होने लगेगा-अर्थात् लक्षण में अरतिव्याप्ति हो जायगी। अब यदि इसका अर्थ आप यह करें कि 'जहाँ व्यंग्य का वर्णन उस प्रकार से किया गया हो-अर्थात् व्यंग्यतावच्छेदक धर्म से अतिरिक्त धर्म को पुरस्कृत करके व्यंग्य का निरूपण हो वहाँ पर्यायोक्त होता है'। तो यह ठीक नहीं, क्योंकि 'व्यंग्य'
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(६ )
धर्मान्तरवाले यौगिक अर्थ के अन्दर आता नहीं। यदि आप कहें कि यौगिक अर्थ के अन्दर न आने पर भी वह लक्षण के अन्द: तो शर जायगा-अर्थात् यौगिक अर्थ में न आने पर भी हम लक्षण में उसका समावेश कर लेंगे। तो हम कहेंगे कि आपने मान लिया कि लक्षण में व्यंग्य का प्रवेश आवश्यक है तो फिर 'पर्याय' शब्द से व्यंग्य का ही ग्रहण करना उचित है-प्रकारान्तर या धर्मान्तर का नहीं। क्योंकि व्यंग्य से उपलक्षित को यदि अरभिधा से वर्णन किया जाय तो यह प्रका- रान्तर से ही होगा, अतः (पर्यायोक्त के लक्षण में) 'प्रकारान्तर' का ग्रहणा अत्यावश्यक नहीं रहता। इसी कारण हमने ( लक्षण में 'भंग्य- न्तर' का अ्थ बताते हुए) 'अथवा आक्षेप' यह भी दूसरा पक्ष वर्णन किया है। अरब यह बात बच रहती है कि 'वापीं स्नातुमितो गतासि न पुन- स्तस्याधमस्यान्तिकम्-अर्थात् तुम यहाँ से बाबड़ी नहाने गई थी, न कि उस शधम के पास'। इस सर्वप्रसिद्ध ध्वनि के उदाहरण में 'श्रधम के पास जाने के निपेव' के रूप में 'शरधम के पास जाने से युक्त 'दूती' का अथवा 'अधमत्व' रूप में 'दूती से संभोग करनेवाले' का अभिधान हो जाने से इस (अभिनवगुप्त के) पक्ष में भी मम्मट भट्ट के पक्ष की तरह पर्यायोक्त प्राप्त हो जाता है। उसको इन्हें भी उसी की तरह व्यंग्य विशेष का ग्रहणा करके हटाना पड़ेगा-अर्थात् 'श्रधम' पद से व्यक्त होने वाला व्यंग्य वक्तृवैशिष्टयादि कारणों की अपेक्षा रखता है और पर्यायोक्तवाला व्यंग्य उनकी अपेक्षा नहीं रखता। हाँ, अलंकारसर्वस्व- कार के पक्ष में तो यह भी दोष नहीं है।
कुवलयानन्द का खएडन सो तीनों पक्षों का निष्कर्ष उक्त प्रकार से स्थित होने पर भी जो इस प्रकरण में कुवलयानन्दकार ने लिखा है वह सब न विचारें तब
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तक ही सुन्दर है। देखिए, पहले तो जो इन्होंने लिखा है कि 'नमस्तस्मै कृतौ येन मुधा राहुवधूस्तनौ' इस पद् में 'भगवान् वासुदेव अपने असाधारण रूप से गम्य हैं, उन्हीं का राहु की वधू के कुचों केव्यर्थ करनेवाले होने के रूप में रूपान्तर से अभिधान किया गया है'। सो यह ठीक नहीं। कारण, यहाँ 'जिसने राहु की वधू के कुचों को व्यर्थ किया है' इस रूप में अभिधा द्वारा प्रतिपादित 'राहुबधू-कुचवैयर्थ्य- कारित्व' इस वाच्य अर्थ से 'राहुशिरश्छेदकारित्व' व्यक्त होता है, इसमें तो कोई विवाद है नहीं, किन्तु 'भगवान् वासुदेव' (जिन्हें आरपने व्यंग्य बताया है) सो विशेषण की मर्यादा से प्राप्त होते हैं, अरतः 'वासुदेवत्व' काव्य के मार्ग में आनेवाले व्यंग्य की कक्षा पर चढ़ने के लिये समर्थ नहीं है, अन्यथा 'नमो राहुशिरश्छेदकारिणे दुःखहारिणे' इस जगह भी 'भगवान् वासुदेव' के अभिव्यक्त होने के कारण पर्यायोक्त अलंकार हो जायगा। यद्यपि विशेषणमर्यादा से प्राप्त होनेवाले धर्म में भी कुछ व्यंग्यता का स्पर्श रहता है, किन्तु वह काव्यमार्ग में गिना नहीं जाता, क्योंकि वह उतना सुन्दर नहीं होता, जैसा कि अन्विता- भिधानवादियों के सिद्धान्त में पदों के सामान्य रूप से तरवगत अर्थों के अरन्वय में अरत्यन्त विशेषाकार में प्रतीत होने वाले अर्थ की गणना नहीं होती। तात्पर्य यह कि जिस प्रकार अन्विताभिधानवादियों के मत में माना जानेवाला, पदों के सामान्य रूप अर्थों से अन्वय में अति विशेष रूप में प्रतीत होने वाला अर्थ वाच्य न होने पर भी व्यंग्य नहीं माना जाता-उसी प्रकार यहाँ 'वासुदेवत्व' भी व्यंग्य नहीं माना जा सकता। और यदि आप 'नमस्तस्मै कृतौ येन मुधा राहुवधुकुचौ' यहाँ किसी प्रकार वासुदेव को व्यंग्य मान भी लें तथानि 'राहुस्त्रीकुचनैष्कल्य- कारिणे हरये नमः' यहाँ भगवान् अपने वाचक शब्द ('हरि' पद) से अरभिधेय हैं, अतः अपने असाधारण रूप में भी व्यंग्य नहीं होते, किन्तु 'राद्ु के शिर को छेदन करनेवाले' के रूप में ही व्यंग्य मानना पड़ेगा,
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न कि अपने असाधारण धर्म के रूप से, और यह किसी को सम्मत नहीं है कि यहाँ पर्यायोक्त नहीं है। (अतः पूर्वोक्त उदाहरग में भी वैसा ही मानना उचित है)। और उनने जो यह लिखा है कि-"सर्वस्व्रकारस्य लोचनकर्तुश्च सर्वोडप्ययं क्लेशः किमिति न विद्यः-सर्वस्वकार औ्रर लोचनकार का यह सब क्लेश किस लिए है ?" यह तो हमने उन दोनों के मत का निष्कर्ष बताने के अवसर पर ही निरूपण कर दिया है।
और जो उनने लिखा है कि "चक्राभिधातप्रसभाज्ञया० इस प्राचीनों के उदाहरण में जो राहु के शिर के छेद का बोध होता है, वहाँ पूर्वोक्तरीत्या 'प्रस्तुतांकुरालंकार' ही है। किन्तु जो 'राहुके शिर मात्र बच रहने' से आलिंगनशून्यता का प्रतिपादन रूपी वाच्य अर्थ है, उसमें भगवान् का रूपान्तर से प्रतिपादन हो जाने पर जो भगवान् के रूप में वोध होता है यह पर्यायोक्तका विषय है।" सो यह भी ठीक नहीं। यदि 'राहु के शिर के छेदन' का बोध तुम्हारे कल्पित प्रस्तुतांकरालंकार का विषय हो तो फिर पर्यायोक्त की आरवश्यकता ही क्या है ? रहा भगवान् के रूप में बोध, सो वह विशेषणों की मर्यादा से प्राप्त होने के कारण 'नमो राहुशिरश्छेदकरिण' इत्यादिक की तरह किसी भी अलंकार का विषय नहीं है-यह कका ही जा चुका है। दूसरे, प्राचीनों ने प्रस्तुतांकुर को स्वीकार किया भी नहीं है।
और यदि प्रस्तुतांकुर का स्वीकार मान भी लें तब भी जहाँ प्रस्तुत के द्वारा अपने सदश अन्य प्रस्तुत वाक्यार्थ ही अभिव्यक्त हो वह उसका विषय भले ही रहै, न कि प्रस्तुत कार्य के द्वारा कारण का बोध होना। अन्यथा 'अप्रस्तुत कार्य के द्वारा जहाँ प्रस्तुत कारण का बोध होता है वहाँ अपस्तुतप्रशंसा ही होती है और प्रस्तुत कार्य के द्वारा अप्रस्तुत कारण का बोध तो पर्यायोक्त का विषय है' यह अलंकारसर्वस्वकारादिक
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प्राचीनों द्वारा किया हुआ विषयविभाग उच्छिन् ही हो जायगा। इसके अतिरिक्त आपके (कुघलयानन्दकार के) उपजीव्य ग्रंथ 'अलंकार- सर्वस्व' में जो यह लिखा है कि राहु की वधू में रहनेवाले विशेष प्रकार के सुरतोत्सव से कारण रूप 'शिर का छेदन अवगत होता है। इसी तरह अन्यत्र भी पर्यायोक्त जानना चाहिए।' इस ग्रन्थ का भी आपका सिद्धान्त मानने से विरोध हो जाता है। इसलिए यहाँ 'राहु का शिर छेदन करनेवाले' के रूप में बोध होना ही पर्यायोक्त का विषय है, भगवद्रूप में नहीं। यह बात सहृदयों को समझनी चाहिए। पर्यायोक्त की गुणीभूतव्यंग्यता 'इस अलंकार में व्यंग्य से वाच्य की प्रतीति होती है और श्रप्रस्तुत- प्रशंसा में वाच्य द्वारा व्यंग्य की प्रतीति होती है। इस कातण यह अलंकार 'वाच्यसिद्धयंग गुणीभूतव्यंग्य' का भेद है यह ध्वनिकार के अनुयायियों का सिद्धान्त है। विमर्शिनी पर विचार
और जो अपने मूलग्रन्थ का तालर्य वर्णन करते हुए विमर्शिनीकार ने लिखा है कि- "स्वसिद्धये पराक्षेपः परार्थ' स्वसमर्पसाम्। उपादानं लक्षणं चेत्युक्ता शुद्धैव सा द्विधा।।
अर्थात् अपनी सिद्धि के लिए अन्य अर्थ का आक्षेप उपादान कहलाता है और दूसरे अर्थ की सिद्धि के लिए अपना अर्पित कर देना लक्षण कहलाता है। इसलिए शुद्ध लक्षणा के दो भेद कहे गये हैं।' इस कथित युक्ति द्वारा दोनों लक्षणाओं के आश्रित होने के कारण इन दोनों का अवान्तरविषयभेद भी है-अर्थात् पर्यायोक्त में उपादान
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लक्षया होती है और अप्रस्तुतप्रशंसा में लक्ष्य लच्षया।" सो यह नहीं हो सकता। कारख, 'चक्राभिघातप्रसभाश्ञयव' इस पद्य में 'जिसका चुम्बनमात्र शेष रह गया है उस सुरतोत्सव' के अंश में कोई बाघा नहीं है कि जिसके कारण लक्षणा करनी पड़े। इसी तरह अप्रस्तुतप्रशंसा में भी प्रस्तुत में अप्रस्तुत की लक्षणा नहीं होती, किन्तु व्यंजना ही होती है यह सर्वसम्मत है। अन्यथा "पर्यायोक्त में वाच्य की प्रधानता होती है और अप्रस्तुतप्रशंसा में गम्य (व्यंग्य) की" इस सिद्धांत का भंग हो जायगा, क्योंकि (पर्यायोक्त में) लक्षणा होने पर लक्ष्य की प्रधानता होगी, न कि वाच्य की। दूसरे "पर्यायोक्त वहाँ हुआ करता है जहाँ वाच्य अर्थ अन्य (व्यंग्य) अर्थ का अपने उपस्कारक के रूप में आरगूरण (आर्राक्षेप) करता है और अप्रस्तुतप्रशंसा वहाँ होती है जहाँ वाच्य अर्थ अपने आपको अप्रस्तुत होने के कारण, किसी शन्य प्रस्तुत अर्थ के प्रति समर्पित करता है।" इस उनके मूल ग्रन्थ (अलंकारसर्वस्व) का ही विरोध हो जायगा, क्योंकि लक्षया 'आगूरणरूप' नहीं होती। इस लिये उनके मूल ग्रन्थ का तात्पर्य यह है कि-'पर्यायोक्त में वाच्य की प्रधानता होती है और अप्रस्तुतप्रशंसा में वाच्य की प्रधानता नहीं होती'। लक्षणा का तो वहाँ कोई प्रसंग ही नहीं। ध्तनिकार से प्राचीन भी ध्वनि आदि जानते थे यहाँ यह समझ रखना चाहिए कि 'ध्वनिकार' से प्राचीन भामह, उद्भट आदि आचार्यों ने अपने ग्रंथों में कहीं भी 'ध्वनि' 'गुणीभूत व्यंग्य' इत्यादिक शब्दों का प्रयोग नहीं किया है। इतने ही मात्र से जो आधुनिक विद्वान् यह कहते हैं किं-'वे 'ध्वनि' आदि को स्वीकार नहीं करते' ऐसी बातें बनाना शयुक्त ही है; क्योंकि उनने भी समासोक्ति, व्याजस्तुति, अप्रस्तुतप्रशंसा आदिक अलंकारों के निरूपण द्वारा कितने ही गुणीभूतव्यंग्यों के भेद निरूपणा किये हैं और अन्य सभी व्यंग्यों के ७
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विस्तार को पर्यायोक्त की कुत्ति में डाल दिया है, क्योंकि अनुभवसिद्ध अर्थ को बालक भी छिपा नहीं सकता। ऐसी दशा में यदि उनने 'ध्वनि' आरदि शब्दों से इनका व्यवहार नहीं किया है, इतने मात्र से ध्वनि आरदि का अस्वीकार नहीं हो सकता। यह एक दूसरा विचार है कि ध्वनि अलंकार्य ही है, अतः उसका प्रधान होने के कारए अलंकार- रूप पर्यायोक्त की कुक्ि में निवेश कैसे हो सकता है? पर्यायोक्त के भेद
इस अलंकार के अनेक विषय हैं-(१) कहीं कारण के वाच्य होने पर और कार्य के गम्य होने पर (२) कहीं कार्य के वाच्य होने पर और कार के गम्य होने पर और (३) कहीं कार्यकारणभाव से रहित केवल एक संबंधी द्वारा केवल अन्य संबंधी के गम्य होने पर इत्यादि। उनमें से 'त्वां सुन्दरीनिवह०' इत्यादि पूर्वोक्त पद्य में 'पतिब्रता- पन से स्खलन' रूपी कारण के द्वारा 'राजा के प्रति राज्यलक्ष्मी की प्राप्ति' रूपी कार्य प्रतीत होता है और इसको उठानेवाली है समासोक्ति। शरतः 'कार्य से कारण की प्रतीति की तरह कारण से कार्य की प्रतीति में विचित्रता का अरपभाव है' यह टीका(विमरशिनी)कार का कथन निरस्त हो गया। अपकुर्वद्भिरनिशं धृतराष्ट्र तवात्मजैः । उप्यन्ते मृत्युवीजानि पाए्डपुत्रेषु निश्चितम् ॥ हे धृतराष्ट्र, नित्य पाण्डवों का अपकार करते हुए तुम्हारे पुत्र मृत्यु के बीज बो रहे हैं-यह निश्चय है।
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यहाँ (मृत्यु के) 'बीज बोने' रूनी कारण के द्वारा कार्य रूप "कुलक्षय' प्रतीत होता है। कार्य से कारण के गम्य होने पर; जैसे- त्वद्विपक्षमहीपालाः स्वर्वालाघरपन्लवम्। पीडयन्तितरां तीव्रदारुणैर्दशनचतैः॥
तुम्हारे शत्ुराजा स्वर्गीय बालाओं के अघर-पल्लव को तीव्र औरर दारुण दाँतों के घावों से अत्यन्त पीड़ित कर रहे हैं।
यहाँ शत्रुशं के 'सुरवधू-संभोग' रूपी कार्य द्वारा 'मरण' रूपी कारण अवगत होता है। कार्य-कारण भाव से रहित केवल सम्बन्धी के द्वारा सम्बन्धी के गम्य होने पर; जैसे-'सूर्या चन्द्रमसौ' इस पहले उदाहृत पद्य में 'सूर्य और चन्द्रमा की किरणों से वस्त्र रँगे जाने' के द्वारा, जो कि न कार्य है और न कारण केवल सहचारी है 'दिगम्बरता' प्रतीत होती है। इसी तरह- यश्चरणत्राणोकतकमलासनपन्न गेन्द्रलोकयुगः । सर्वाङ्गावरणपटीकृतकनकाएड: स वामनो जयति॥ जिसने ब्रह्मा के और सर्पराज के लोक (सत्यलोक और पाताललोक) को चररत्राण बनाया (नापते समय एक पैर ऊपर और दूसरा पैर नीचे गया) और ब्रह्मांड को सब शंगों को आच्छादित करनेवाला वस्त्र बनाया उस वामन की जय है। यहाँ (त्राीकृत' और 'पटीकृत' में) 'च्वि' प्रत्यय के द्वारा 'चररत्राण' और 'पट' से भिन्नता की प्रतीति होने के कारण रूपक
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नहीं हो सकता, अतः पर्यायोक्त होना चाहिए और व्यंग्य है, 'चरण का अन्तर्व्याप्त होना' और 'अरंगों का अन्तर्व्याप् होना'।
सो इस तरह संक्षेप से पर्यायोक्त तीन प्रकार का है। किन्तु बोलने के ढंगों का विचार किया जाय तो एक ही विषय में पर्यायोक्त अ्नन्त प्रकार का हो सकता है, भिन्न विषयों का तो कहना ही क्या। जैसे- 'आरप यहाँ आइए' इस विषय में 'इस देश को अलंकृत करिए' 'पवित्र करिए' 'इसका जन्म सफल करिए' 'इस देश को प्रकाशित करिए" 'इस देश के भाग्यों को उज्जीवित करिए' 'यहाँ का अंधेरा निवृच् करिए' 'हमारी आँखों का सन्ताप हरण करिए' 'हमारा मनोरथ पूरा करिए' इत्यादिक।
रही कार्यादिक की सिद्धि सो उसे आरोप के द्वारा हूँढ़ना उचित है। विषयविभाग पर विचार ऐसी दशा में 'कार्यरूप अप्रस्तुतप्रशंसा' द्वारा पर्यायोक्त के विषय के अपहरण की शंका करके 'कार्य कारण दोनों के प्रस्तुत होने पर पर्यायोक्त होता है और कार्य अप्रस्तुत होने पर और कारण के प्रस्तुत होने पर कार्यरूपा अप्रस्तुतपशंसा होती है' इस तरह अलंकारसर्वस्व- कार ने इनके विषयों को पृथक-पृथक किया है। इस विषय में हमें यह कहना है कि-कार्यरूपा अप्रस्तुतप्रशंसा का विषय न्यून है, और पर्यायोक्त का विषय बहुत अधिक है, अतः उसके द्वारा इसके विषय का अपहरण संगत नहों है, किन्तु पर्यायोक्त द्वारा अप्रस्तुतप्रशंसा के विषय के अपहरण की शंका करके विषयविभाग करना उचित है। पर्यायोक्त समास्त
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व्याजस्तुति
लक्षय
प्रथमतः प्रतीत होनेवाली निन्दा का स्तुति में और स्तुति का निन्दा में पर्यवसान होना व्याजस्तुति है। लक्षण का विवेचन व्याजस्तुति शब्द के यौगिक अर्थ दो होते हैं-एक तृतीया ततपुरुष के द्वारा-व्याज से स्तुति और दूसरा कर्मधारय के द्वारा-व्याजरूपा स्तुति; अतः व्याजस्तुति शब्द के यहाँ दोनों ही अर्थ हैं। 'प्रथमतः प्रतीत होनेवाली' इस विशेषण से उनके पर्यावसान का त्रभाव बताया गया है, जिससे उनका बाधित होना अभिप्रेत है। इसीलिए इसे 'ध्वनि' नहीं माना जाता। कारण, ध्वनि में वाच्य अर्थ बाधित नहीं होता, किन्तु आक्षेप के प्रभाव से अन्य अर्थ अवगत होता है औरर प्रकृत में ऐसा नहीं है।
उदाहरण उनमें से पहली-निन्दा का स्तुति में पर्यवसानरूपी-व्याज- स्तुति; जैसे -- उर्वी शासति मय्युपद्रवलवः कस्यापि न स्यादिति श्रौढं व्याहरतो वचस्तव कथं देव ! प्रतीमो वयम्। प्रत्यक्षं भवतो विपक्षनिवहैर्द्यामुत्पतन्ध्गि: क्रुधा यदुष्मत्कुलकोटिमूलपुरुषो निर्भिद्यते भास्कर: ॥
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हे देव, 'मेरे पृथ्वी पर शासन करते समय किसी को भी उपद्रव का लेश नहीं होना चाहिए' यह जोरों से पुकारकर कहने पर भी आरपके इस वचन पर हम कैसे भरोसा करें। कारण, प्रत्यक्ष है कि क्रोध से उछकलकर स्वर्ग में जानेवाले आपके शत्रुसमूह द्वारा आपकी वंशपरंपरा का मूलपुरुष सूर्य निर्मिन्न किया जा रहा है। यहाँ राजा के वर्णान के प्रस्ताव में निन्दा बाधित है उसका स्तुति में पर्यवसान होता है। दूसरी अर्थात् स्तुति से निन्दा; जैसे- किमहं वदामि खल! दिव्यमते! गुणपक्षपातमभितो भततः। गुणशालिनो निखिलसाधुजनान्यदहर्निंशं न खलु विस्मरसि।। हे दिव्यमति खल ! तुम्हारे सब शर से गुणों के पक्षपात को मैं क्या कहूँ-उसका क्या वर्णन किया जाय, क्योंकि तुम गुराशाली सभी सत्पु- रुषों को दिन रात भूलते नहीं। यहाँ दुश्चरित्र (खल) के वर्णन के प्रस्ताव में स्तुति बाधित है, अतः उसका निन्दा में पर्यवसान होता है। इस बात का स्मरण रहे कि ब्याजस्तुति में एक ही अर्थ किसी आकार में पहले स्तुति या निन्दा का विषय होकर प्रकरणादिक के प्रभाव से किसी अन्य प्रकार से (लक्षणा अथवा आक्षेप से) निन्दा अथवा स्तुति का विषय होता है। उस अर्थ में से जितना श्रंश बाधित है उतना ही अन्य प्रकार से पर्यवसित होता हैं, शेष शरंश तो अपनी स्थिति में ज्यों का त्यों रहता है। (इससे यह सिद्ध हुआ कि 'उर्वी शासति' इस पद्य में स्तुति लक्ष्यार्थ है, अरतः उसे लेकर इस पद्य को अलंकार का उदाहरण कहा जाता है, पर लक्षगः के प्रयोजनरूप 'स्तुत्यतिशय' को लेकर 'ध्वनि' कहना इष्ट है।)
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अन्य अलंकार से मिश्रित व्याजस्तुति जैसे -- देव त्वां परितः स्तुवन्तु कवयो लोभेन किं तावता स्तव्यस्त्वं भवितासि यस्य तरुणश्चापप्रतापोऽघुना। क्रोडान्तः कुरुतेतरां वसुमतीमाशाः समालिंगति द्यां चुम्बत्यमरावतीं च सहसा गच्छत्यगम्यामंपि। हे देव, कवि लोग आपकी लोभ के कारण चारों शर से स्तुति करें, पर क्या इससे आप स्तुतियोग्य हो जायँगे? जिसका तरुए धनुष का प्रताप प्रत्यक्ष में वसुमती को अपनी बाथ में (अकवार में) भर रहा है, दिशाओं का आलिंगन कर रहा है, दौ ( स्वर्ग) को चूमता है औरर अगम्या (प्राप्त होने के शयोग्य+संग करने के अयोग्य) भी अमरावती में (के साथ) सहसा गमन करता है। यहाँ धनुष के प्रताप में, समासोक्ति द्वारा, विट-शिरोमणि (गुरडों के सरताज) के व्यवहार से युक्त होने की प्रतीति होती है और उसके कारण प्रतीत होने वाली निन्दा शरन्त में स्तुति में पर्यवसित हो जाती है। (अरतः यहाँ समासोक्ति से अनुप्रागित व्याज- स्तुति है) । अरथवा; जैसे- अये राजनाकर्राय कुतुकमाकर्यानयन! स्फुरन्ती हस्ताम्भोरुहि तव कृपाणी रगामुखे। विपक्ायां वक्षस्यहह ! तरुणानां निपतति प्रगल्भा: श्यामानामतुपरतकामाः प्रकृतयः ॥
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( १०४ ) हे कर्णापर्यन्त विस्तृत नयन वाले राजन्, एक कौतूहल सुनिए, तुम्हारे हस्तकमल में चमकने वाली कटारी, शह ! तरुण शत्रुओं के वक्षस्थल पर गिरती है। ठीक ही है, श्यामाओं (नवयौवना स्त्रियों +काले रंगवालियों) की प्रगल्भ प्रकृतियाँ (चंटपन की आदतें) कभी काम से निवृच नहीं होतीं-कहीं भी जाओ वे अपनी कामलीला दिखाए बिना मानती नहीं। यहाँ व्याजस्तुति अर्थान्तरन्यास (और समासोक्ति दोनों) से पोषित है। प्रथम प्रतीत होने वाले अर्थ का वाच्य होना आवश्यक नहीं आरप कहेंगे-यहाँ व्याजस्तुति कैसे है? कारण, वाच्य निन्दा से स्तुति और वाच्य स्तुति से निन्दा के व्यंग्य होने पर व्याजस्तुति स्वीकार की जाती है, किन्तु यहाँ केवल धनुष के प्रताप का केवल वसुमती (पृथ्वी) आदि को आररलिंगन करना जो वाच्य है, वह निन्दास्पद नहीं है-धनुष के प्रताप ने यदि पृथ्वी को आलिङ्गन किया तो इसमें निन्दा क्या हुई ? और समासोक्ति के द्वारा प्रकट होने वाला विट का व्यवहार निन्दास्द होने पर भी वाच्य नहीं है, किन्तु गम्य है। (सो उसके कारण व्याजस्तुति मानना उचित नहीं।) तो इसका उत्तर यह है कि 'प्रथमतः प्रतीत होना' इस पद के द्वारा 'प्रतीति में पर्यवसित न होना' इतना ही मात्र अर्थ कहना यहाँ अभीष्ट है, न कि वह वाच्य भी होना चाहिए, क्योंकि ऐसा मानने से गौरव दोष होगा। सो प्रकृत उदाहरण में 'क्या उतने से आप स्तुति करने योग्य हो जाओरगे' इत्यादिक के द्वारा निन्दा के ही उपोद्वलित होने से समासोक्ति की सहायता से निन्दा ही पहले रूढ होती है और फिर स्तुति, इसलिए (व्याजस्तुति मानने में) कोई भी दोष नहीं है। और इस तरह (अर्थात् समासोक्ति आदि से अनुगहीत मान लेने पर)
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(१०५ ) 'भाग्यं ते शान्मलितरो! वद कि परिकथ्यटे। द्विजैः फलाशया युक्तैः सेव्यसे यदहर्दिवम्।।' हे शाल्मली के वृक्ष, कहिए, तुम्हारा भाग्य क्या कहा जाय, क्योंकि तुम प्रतिदिन फल की आशा से युक्त द्विजों (पत्तियों+ब्राह्मणों) से सेवन किए जाते हो-यद्यपि देने के लिए तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है तथापि याचकों से हीन नहीं हो। यहाँ यह अप्रस्तुतप्रशंसा से संकीर्ण भी होती है। 'अलंकारसर्वस्व' और 'विमर्शिनी' का खएडन इसी कारणा जो अलक्कारसर्वस्वकारने लिखा है कि- 'कि वृत्तान्तैः परगृहगतैः कि तु नाहं समर्थ- स्तूष्णीं स्थातुं प्रकृ तिमुखरो दाचियात्यस्वभावः। देशे देशे विपणिषु तथा चत्वरे पानगोष्ठया- मुन्मत्तेव भ्रमति भवतो वल्लभा हन्त ! कीर्तिः।।' दूसरों के घरों की बातों से मुझे क्या ! किन्तु प्रकृतिमुखरता (स्त्रभावतः अरधिफ बोलना ) दाकिणात्यों का स्वभाव है। अ्रतः मैं चुप नहीं रह सकता। खेद है कि आपकी प्यारी कीर्तिं देश-देश में, बाजारों में, चौहटों में और पानगोष्ठियों में उन्मत् की तरह भटकती है।' इस प्राचीनों के पद्य में "प्रकान्ताऽपि स्तुतिपर्यवसायिनी निन्दा 'हन्त कीति" रिति भगित्योन्मूलिता, न तु प्ररोहं गमिता-अर्थात् १-'हन्तकीर्ति' यही पाठ सर्वस्वकार का है और काशी-पुस्तक में वही उद्धुत भी किया है। नवीन संस्करण में 'देवकीर्तिः' पाठ प्रमाद- पतित है।
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स्तुति में पर्यवसित होनेवाली निंदा आरंभ कर देने पर भी 'हन्तकीर्तिः' इस कथन के द्वारा उन्मूलित कर दी गई है-उसे प्ररूढ़ नहीं होने दिया" और इसकी व्याख्या विमर्शिनी ने ध्वन्यालोचनकार की उक्ति को कटाक का लक्ष्य बनाकर यह लिखा है, कि "अनुदाहरणमेवैतत्पद्यं व्याजस्तुते :- यह पद्य व्याजस्तुति का उदाहरण नहीं हो सकता" सो यह सब उड़ जाता है। कारण, 'वृत्तान्तैः-दूसरों के घरों की बातों से मुझे क्या।' इत्यादिक के द्वारा पहले निंदा के अ्रनुसार ही समासोक्ति उठती है, जिसकी वाच्यता यहाँ विवच्तित है नहीं। पहले अन्वय के क्रम से निंदा का 'वल्लभा' के साथ अन्वय होता है और फिर उसका कीति से अभिन्न होकर स्थित होने पर प्रकरणादिक पर्यालोचन के कारण व्युत्क्रम से अन्वय का बोध होता है। इसका अभिप्राय यह है कि पद्य में 'वल्लभा' शब्द प्रथमोपस्थित होने के कारण 'भवतो वल्लभा उन्मत्तेव भ्रमति' यह सीधासादा निंदासूचक अन्वय पहले होता है और बाद में प्रकरखादिक ज्ञान के अनंतर 'वल्लभाऽभिन्ना भवतः कीति भ्र मति' यह पदों के हेरफेर (व्युत्क्म) से अन्वय प्रतीत होता है। इसलिये ध्वन्यालोचनकार द्वारा उक्त उदाहरण ठीक ही है।
व्याजस्तुति पर विचार
यह व्याजस्तुति जिसकी स्तुति और निंदा पहले से प्रारंभ की जाय यदि उसी की निंदा और स्तुति में पर्यवसान हो तब् होती है औरर यदि निंदा और स्तुति पृथक-पृथक आधारों में रहे-अर्थात् स्तुति किसी की की जाय और निंदा किसी की अभिव्यक्त हो तब नहीं होती-यह प्राचीन अलंकारशास्र के प्रवर्तकों की मर्यादा है। अतएव उनने अपने ग्रंथों में स्थान-स्थान पर लिखा है कि "जहाँ शब्द से अभिधान की जानेवाली स्तुति अथवा निंदा का स्वरूप बाधित होकर निंदा और स्तुति
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में अपना अपण करके पर्यवसित हो जाता है (वहीं व्याजस्तुति होती है)"। सो इस तरह परोपसर्पणानन्तचिन्तानलशिखाशतैः । अचुम्बितान्तःकरणाः साधु जीवन्ति पादपा: ॥ दूसरों के पास जाने की अनंत चिंतारूपी अग्नि की सैकड़ों शिखाओ्रं से जिनके अंतःकरण का स्पर्श नहीं होता ऐसे वृक्ष सुख से जीते हैं। इत्यादिक में 'वृक्षों की स्तुति' यद्यपि 'सांसारिक जनों की निन्दा" में पर्यवसित होती है तथापि व्याजस्तुति नहीं है, क्योंकि प्रथमतः प्रतीत होनेवाली (वृक्षों की) स्तुति यहाँ बाघित नहीं है। यही बात निन्दा से स्तुति के व्यंग्य होने पर भी समझनी चाहिए। इसी तरह एक की स्तुति से दूसरे की स्तुति और एक की निन्दा से दूसरे की निन्दा के व्यक्त होने पर भी इस अलंकार का विषय नहीं है। कारण वही पूर्वोक्त है। जैसे- ये त्वां ध्यायन्ति सततं त एव कृतिनां वराः। सुधा गतं पुराराते! भवदन्यधियां जनु:। हे त्रिपुरारि, जो आपका निरंतर ध्यान करते हैं वही कुशल पुरुषों में श्रेष्ठ है, और जो आपसे भिन्न वस्तुओं में बुद्धि लगाते हैं उनका जन्म व्यर्थ गया। यहाँ पूर्वाद्ध में (शिवजी का) ध्यान करनेवाले की स्तुति औ्रर उत्तरार्द्ध में ( विषयों का) ध्यान करनेवाले की निंदा के द्वारा ध्येय (शिवजी और विषयों) की स्तुति और निंदा की प्रतीति होती है। (अतः यहाँ व्याजस्तुति नहीं है।)
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कुवलयानंद का खंडन
ऐसी दशा में कुवलयानंदकार ने स्तुति और निंदा के द्वारा भिन्न आधार में निंदा और स्तुति की एवं स्तुति और निंदा की प्रतीति होने पर जो व्याजस्तुति के चार प्रकार शधिक लिखे हैं वे उड़ जाते हैं। और यदि प्राचीनों के संकेत की मर्यादा को तोड़कर अपनी रुचि के अनुसार जो सुंदर लगे उस मार्ग का स्वीकार किया जाय तो सभी व्यंग्यों के भेदों को अरथवा (अर्थात् ऐसा न हो सके तो) गुणीभूत- व्यंग्यों के भेदों को (ही सही) अलंकारों के अंदर समाविष्ट कर दीजिए। अथवा व्याजस्तुति को भी अप्रस्तुतप्रशंसा के यौगिक अर्थ (अप्रस्तुत की प्रशंसा-कथन) से व्याप्त होने के कारण (क्योंकि व्याज- स्तुति में भी अरप्रस्तुत का ही निरूपणा होता है अतः) अप्रस्तुतप्रशंसा में निविष्ट कर दीजिए और अप्रस्तुतप्रशंसा कार्य-कारण आदि के (पांच) विषय में ही होती है इस दुराग्रह को हटा दीजिए। सो इस तरह तो बहुत गड़बड़ हो जायगी। पूछा जा सकता है कि तब कुबलयानन्दकार के बताए चारों प्रकार का अन्तर्भाव कहाँ होगा ? हम कहते हैं व्यंग्यों के भेदों में। व्यंग्यों के सभी भेद जो अपरिमित हैं, अलंकारों के भेदरूपी गोष्पद (गाय के खुर के खड्डे) में अंतर्भूत नहीं किये जा सकते।
१- नागेश कहते हैं-यहाँ यह विचारणीय है। जैसे व्यंग्यों के भेदों में अप्रस्तुतप्रशंसा, पर्यायोक्त अलंकार स्वीकार किये जाते हैं वैसे यहाँ भी अलंकारता मानने में कोई बाधक नहीं है। (यहाँ यह पूछा जा सकता है कि क्या आप यह मानते हैं सभी व्यंग्यों को अलंकार बना दिया जाय अथवा केवल दीक्षितनी के चार भेदों को ? यदि प्रथम पक्ष लें तो आपको कई नए अलंकार बनाने पढ़ेंगे
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और जो कि कुबलयानंदकार ने निंदा के व्यंग्य होने का उदाहरण दिया है- "अर्धं दानववैरिणा गिरिजयाप्यर्ध शिवस्याहृतं देवेत्थं जगतीतले स्मरहराभावे समुन्मीलति। गंगा सागरमम्बरं शशिकला नागाधिप: च्मातलं सर्वज्ञत्वमधीश्वरत्वममम्च्वा मां च भिक्ाटनम् ॥ हे देव, शिवजी का आघा (दाहिना भाग) विष्णु ने ले लिया और आधा (बार्या भाग) गिरिजा ने ले लिया। इस तरह पृथ्वीतल पर जब शिवजी का शभाव प्रगट होने लगा तो गंगा समुद्र में चली गई, चंद्रकला आकाश में चली गई, सर्पराज पाताल में चला गया, औरर सर्वज्ञता तथा अधिपतित्व आरपको मिला औरर मुझे मिला भिच्ाटन।
और यदि दूसरा पक्ष लें तो यह समर्थन दीक्षितजी की मरहमपट्टी के अतिरिक्त कुद् नहीं-अनुवादक) कहा जायगा कि-उक्त भेदों में अप्रस्तुतप्रशंसा ही होने दो, व्याजस्तुति नहीं। तो यह भी ठीक नहीं। क्योंकि ऐसा मानने में कोई विनिगमक नहीं। यदि कहा जाय कि व्याजस्तुति लक्ष्य में ( बाधित होने पर) ही होती है व्यंग्य में नहीं तो इसमें शपथ के अतिरिक्त प्रमाण नहीं है अर्थात् यह बलात्कार है। और यहाँ व्यंग्य के गुणीभूत होने के कारण ध्वनि है नहीं। कहा जायगा कि ऐसा मानने से प्राचीन ग्रंथों का विरोध होता है सो यह कुछ नहीं। (पर यदि आप प्राचीनों की मर्यादा की रक्षा करके अप्रस्तुतप्रशंसा मान लें तो आपकी क्या हानि है ?- अनुवादक)
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यहाँ आप सर्वज्ञ हैं और सर्वेश्वर हैं इस राजा की कपटरूप स्तुति से 'मेरी विद्वत्ता-आदि और दरिद्रता-आदि को जानते हुए भी एवं श्रत्यंत दान से रक्षा करने में समर्थ होने पर भी मुझे कुछ भी नहीं दे रहे हो 'यह (राजा की) निंदा व्यक्त होती है।"
सो नहीं हो सकता। कारय, 'साधु दूति ! पुनः साधु कर्तव्यं किमतः परम्। यन्मदर्थे विलूनासि दन्तैरपि नखैरपि। हे दूति, तुमने अच्छा किया और बहुत अच्छा किया। इससे अधिक किया ही क्या जा सकता है! जो तू मेरे कारण दातों से भी औरर नखों से भी छिद-भिद गयी।' इस अभी-अभी दिए हुए तुम्हारे उदाहत पद्म से इसमें अत्यधिक भेद है। कारण, इस उदाहरण में 'बहुत अच्छा किया इससे अरधिक किया ही क्या जा सकता है' इन वर्गों से भला करनेवाली के रूप में जो स्तुति है वह सुनते ही बाधित होकर अपने से विपरीत अर्थ में अपना आत्मसमर्पण करके पर्यवसित होती है, किंतु आपके उक्त उदाहरण में 'सर्वज्ञता' और 'अधीश्वरता' वैसे बाघित नहीं हैं। कारण, राजा के वर्णन के प्रसंग में राजा में रहनेवाली 'अज्ञानता' औ्रर 'पामरता' का कथन यहाँ अभीष्ट नहीं है, अतएव 'सर्वज्ञ होने पर औरर समर्थ होने पर भी तुमने रक्षा नहीं की' इस उलाहना के रूप में होने वाली निंदा यहाँ विवक्षित नहीं है, प्रत्युत 'सर्वज्ञ और समर्थ आ्रापके लिए मैं दरिद्री रक्षा करने के योग्य हूँ' यही कहना अभीष्ट है। फिर भी; थोड़ी देर के लिए, तुम्हारी बताई हुई 'उलाहना रूपी निंदा' को यहाँ व्यंग्य मान लीजिये-आप यदि इसी तरह संतुष्ट होते हैं तो यों ही सही। किंतु 'साधु दूति पुनः साधु०' इस पद्य में साधुकारि-
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खीत्व (दूती का भला करनेवाली होना) 'जैसे बिजली की तरह चमक कर शांत हो जाता है वैसे यहाँ (राजा की) 'सर्वज्ञता' आरर 'श्रधी- शवरता' शांत नहीं होती। कारण, ऐसी स्थिति में उपालम्भरूपी निंदा उठ नहीं सकेगी और प्रतीति का विरोध होगा, अतः द्रविडशिरोमणि (अप्पयदीक्षित) जी ने क्या लिखा है इसपर सहृदयों को विचार करना चाहिए१।
व्याज स्तुति समाप्त
१-नागेश कहते हैं कि-बहुत समय तक सेवा करके दुखी होने पर भी जिसे धन नहीं मिला ऐसा भिक्षुक राजसेवा छोड़ना चाहता है, उसके ऐसे वाक्य में आपाततः प्रतीयमान स्तुति का वक्तृवैशिष्ट्य आदि के सहकार से निंदा में ही पर्यवसान होता है, अतः 'सर्वज्ञत्व' और 'अधीश्वरत्व' की चमक विजली के समान ही है-वास्तव में तो वह राजा को अज्ञ और दरिद्री ही कहना चाहता है। (पर तब 'अज्ञ' और 'दरिद्री' को उलाहना देना बेकार है, अतः 'उपालम्भरूपी निंदा उठ नहीं सकेगी' इसका तो कोई उत्तर हुआ नहीं-अनुवादक)
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आच्तेप अलंकार
(श्राक्षेप अलंकार के अ्रनेक लक्षणा हैं। उनमें से एक यह है-) (१) "उपमान संबंधी सब प्रयोजनों के संपादन करने में उपमेय के समर्थ होने के कारण जो उपमान की निरर्थकता उपमान के तिरस्काररूप में होती है उसे 'आक्षेप' कहते हैं।" यह कुछ लोगों का मत है। उनके मत में इस तरह उदाहरण बनाना चाहिए-
अभूदप्रत्यूह: कुसुमशरकोदएडमहिमा विलीनो लोकानां सह नयनतापोऽपि तिमिरैः। तवास्मिन्पीयूषं किरति परितस्तन्वि ! बदने कुतो हेतो: श्वेतो विधुरयसुदेति प्रतिदनम्॥ कामदेव के धनुष का प्रभाव निर्विध्न हो गया है-उसे सबने मान लिया और मनुष्यों के नेत्रों का संताप भी अंधकारों के साथ विलीन हो गया है। हे तन्वी, (इस तरह) तुम्हारा मुख जब्र चारों तरफ अमृत बरसा रहा है तब यह सफेद चंद्रमा प्रतिदिन क्यों उदय होता है? अ्रथवा; जैसे- वसुधावलयपुरंदर ! विलसति भवतः कराम्भोजे। चिन्तामशिकल्पद्रुमकामगवीभिः कृतं जगति॥
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हे पृथ्वीमंडल के स्वामी, आपका कर-कमल जन्र सुशोभित हो रहा है तब चिंतामणि, कल्पवृक्ष और कामधेनु की संसार में कोई आवश्यकता नहीं।
इन दोनों उदाहरणों में से प्रथम उदाहरण में उपमान के प्रयोजन का संपादन शब्दतः प्रतिपादित है और द्वितीय उदाहरण में शर्थतः प्राप्त है। यह भेद है। (२) दूसरे लोगां का कहना है कि प्रथमतः वर्णित वस्तु का किसी अन्य पक्ष के आलंबन के कारण निषेध कर देना आक्षेप कहलाता है। उनके मत में यह उदाहरण देना चाहिए- सुराखामारामादिह भगिति भञ्फानिलहताः पतेयुः शाखीन्द्रा यदि तदखिलो नन्दति जनः । किमेमिर्वा कार्य शिव ! शिव ! विवेकेन विकलै- श्चिरं जीवन्नास्तामधिधरि दिव्वीनरपतिः॥
यदि देवताओं के उपवन में से तूफान के मारे बड़े-बड़े वृक्ष (कल्पवृक्ष ) पृथ्वी पर गिर पड़ें तो सभी मनुष्य प्रसन्न हो जाँय-फिर उनके मनोरथ सिद्ध होने में विलंब न होगा। अथवा शिद ! शिव! इन विवेकरहित (जड़ों) का संसार क्या करेगा पृथ्वी पर तो दिल्ली- नरेश चिरंजीव रहें। यहाँ श्लोक के उत्तरार्द्ध के द्वारा, पूर्वार्द्ध में बताए हुए पक्ष का, एक अन्य पक्ष आलंबन करने के कारण, केवल प्रतिक्षेप मात्र किया जा रहा है।
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श्रथवा; जैसे-
किं निःशङ्क शेषे शेषे वयसि त्वमागतो मृत्युः । अथवा सुखं शयीथा जननी जागर्ति जाह्ववी निकटे।। इस शेष अवस्था में तुम निःशंक होकर क्या सो रहे हो। मौत (सिर पर) आ गई है। अथवा, सुख से सोते रहिए, क्योंकि माता जाह्वी तुम्हारे समीप जग रही है। (३ ) कुछ लोगों का कहना है कि- निषेधो वक्तुमिष्टस्य यो विशेषाभिधित्सया। वत्त्यमाणोक्तविषयः स आन्षेपो द्विधा मतः ॥ (काव्यप्रकाश) विवच्तित वस्तु में कोई विशेषता बताने की इच्छा से जो निषेध किया जाता है उसे आक्षेप कहते हैं। वह दो प्रकार का होता है-१- वक्ष्यमाणविषय और २-उक्तविषय।" यहाँ 'विशेषता' का अर्थ है कोई व्यंग्यरूप अर्थ, 'विवचित' का शर्थ है प्रकृतार्थ और 'निषेध' का अर्थ है निषेध-सा अर्थात् कथना- दिक का प्रत्याख्यान-कहकर बदल जाना। इनके मत में इस तरह उदाहरण देना चाहिए- रीतिं गिराममृतवृष्टिकिरां त्वदीयां ता चाकृति कृतिवरैरभिनन्दनीयाम्। लोकोत्तरामथ कृतिं करुणारसार्द्रा ज्ञातुं न कस्यचिदुदेति मनःप्रसारः ।
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शमृत की वृष्टि करने वाली आपकी बातचीत की प्रशाली को तथा श्रष्ठ कुशल पुरुषो द्वारा अभिनन्दन करने योग्य उस (अनुपम) आरकृति को एवं करुणारस से भीगी हुई अलौकिक कृति को जानने के लिए किसी के मन का प्रसार नहीं होता।
यहाँ किए जानेवाले 'मन के प्रसार का निषेध' वर्णनीय वस्तु की अनिर्वचनीयता समझाने के लिये है। श्वासोऽनुमानवेद्यः शीतान्यङ्गानि निश्चला दृष्टिः। तस्या: सुभग ! कथेयं तिष्ठतु तावत्कथान्तरं कथय ।।
सखी नायक से कहती है-हे सुभग, उसका श्वास अनुमान से ज्ञात होने योग्य है, शरंग शीतल हो गए हैं और दृष्टि निश्चल है-यह है उसकी कथा। इसलिए इसे तो रहने दीजिए। आप तो कुछ दूसरी ही बात करिए। (यहाँ उक्तविषय आक्षेप है।) ४ ) अलङ्कारसर्वस्वकारादिक तो कहते हैं कि- "आक्षेप दो प्रकार का है-एक वह जिसमें प्राकरणिक अर्थ का निषेध प्रतिष्ठित न होने के कारण केवल आरभासरूप रहता है औरर इस तरह किसी विशेष अर्थ के विधान को अभिव्यक्त करता है; औ्रर दूसरा वह जिसमें अप्राकारखिक अर्थ की विधि केवल आभासरूप होकर निषेध में पर्यवसित हो जाती है।
इनमें से निषेधाभासरूपी आक्षेप प्रथमतः दो प्रकार का है-उक्त्त- विषय और वक्ष्यमाणविषय। इन दोनों में से उक्तविषय के भी दो भेद हैं-कहीं केवल वस्तु का निषेध होने से और कहीं वस्तु के कथन का निषेध होने से और वच्यमाणविषय तो वस्तु-कथन का निषेधरूप
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ही हो सकता है। वह शब्दतः सामान्य धर्म से अवच्छिन्न के निषेधरूप में उपस्थित किए जाने पर भी वस्तुतः विशेषरूप इष्ट वस्तु के निषेधरूप में उपस्थित होने के कारण जिस वस्तु का निषंध किया जाता है उसमें रहने वाले किसी अन्य विशेष को उत्पन्न कर देता है। यह भी दो प्रकार का है-एक वह जिसमें सामान्याश्रित किसी विशेष का निरूपणा किया जाता है, दूसरा वह जिसमें केवल सामान्य का ही वर्ण होता है- तदाश्रित विशेष का निरूपण नहीं होता। उनमें से कुछ विशेषों के निरूपण कर दिए जाने पर प्रयोजन के अभाव से निषेध की प्रवृत्ति नहीं होती। अतः वह निषेध वक्ष्यमाण इष्ट वस्तु के विषय में ही सम्पन्न हो जाता है और जहाँ विशेषों का निरूपण ही नहीं होता वहाँ तो सुतरां उसे वक्ष्यमाणा श्रभीष्ट वस्तु के विषय में सम्पन्न होना ही पड़ता है।
इन चारों प्रकार के आक्षेप में इन चार बातों का उपयोग होता है-अभीष्ट वस्तु, उसका निषेध, निषेध की भी असत्यता और अरभीष्ट वस्तु में रहनेवाली विशेषता का प्रतिपादन। इसलिए यहाँ पर निषेध की विधि अथवा विहित का निषेध नहीं कहा जा सकता, किंतु अरसत्य निषेध के द्वारा विधि का आक्षेप होने के कारण इसका 'योग-शक्ति' के द्वारा अर्थात् (व्युत्वत्ति के अनुसार) आक्षेप नाम सार्थक है औरर वह आक्षेप पूर्वोक्त रीति से चार प्रकार का है। दूसरा आक्षेप असत्य विधि के द्वारा निषेध का आक्षेप होने पर होता है। इसमें भी अनभीष्ट अर्थ उसकी विधि, उस विधि का भी आभासरूप होना और अर्थ में रहनेवाली विशेषता का प्रतिपादन इन चारों बातों का उपयोग होता है।
इनके मत में इस तरह उदाहरण बनाना चाहिए।
(१) ( उक्तविषय वस्तुनिषेधात्मक; जैसे-)
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न वयं कवयस्तव स्तवं नृप कुर्वीमहि यन्मृषाच्तरम्। रखसीम्नि तवावलोकने तरुणार्को दिनकौशिकायते।। हे राजन्, इम कवि नहीं हैं कि झूठे अक्षरों में तुम्हारी स्तुति करें। सचमुच युद्ध भूमि में तुम्हारे देखने पर तरुण सूर्य दिन के उल्ल. की तरह प्रतीत होता है।
(२) ( उक्तविषय वस्तुकथननिपेधात्मक; जैसे-)
मां पाहीति विधिर्विधेयविषयो वाच्यः स्व्रतंत्रं कथं नोपेक्यो भवतास्मि दीन इति गीः श्लाध्या न संखयावताम्। एवं दोषविचारणाकुलतया देव! त्वयि प्रोन्मुखे वक्तव्यप्रतिभादरिद्रमतयः किंचिन्नहि ब्रूमहे।। हे देव, 'मेरी रक्षा करिए' इस तरह 'विधि' (का प्रयोग) विधेय आज्ञाकारी भृत्य) के विषय में होता है, इस वाक्य को (श्रप जैसे) स्वतंत्र के लिए कैसे कहा जाय। रहा यह कहना कि 'आपको मुझ दीन की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए' सो यह विद्वानों के लिए प्रशंसनीय नहीं। इस तरह आपके सन्मुख आने पर दोष की विचारण में व्याकुल होने के कारण हमारी बुद्धि वक्तव्य की सूझ से रहित हो जाती है और हम कुछ नहीं बोलने पाते। (३) ( सामान्याश्रय यत्किञ्चिद्विशेषनि रुपणात्मक ; जैसे -) रे खल ! तव खलु चरितं विदुषामग्रे विविच्य वच्त्यामि। अलमथवा पापात्मन्कृतया कथयापि ते हतया॥ हे दुष्ट, (देख तो सही) तेरे चरित्र को विद्वानों के आगे विवेचन
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करके वर्शन करूँगा, अथवा हे पापात्मन्, (जाने दे) तेरी मरी कथा न की जाय यही अच्छा है। (४) ( वच्यमाणविषय अ्रनिरूपणात्मक; जैसे-) श्वासोऽनुमानवेद्यः शीतान्यङ्गानि निश्चला दृष्टिः। तस्याः किं वा पृच्छसि निर्दय ! तिष्ठत्वसौ हता वार्ता।। श्वास अनुमान से जानने योग्य है, शरंग शीतल हो गए हैं, दृष्टि निश्चल हो गई है। हे निर्दय, उसके विषय में आप क्या पूछते हैं, इस मरे प्रसंग को जाने ही दीजिए। इनमें से प्रथम पद्य में जो कवि की उक्ति है उसमें 'कवि होने का निषेध' बाधित है। अतः वह मिथ्यावादित्व के निषेध रूप में परिणत होकर उच्तरार्ध में वर्णित वस्तु को 'सत्यता'रूपी विशेषता को अ्रभि- व्यक्त करता है। इसी तरह दूसरे पद् में वक्ता को 'रक्षा करने' और 'दान देने' का कथन अभीष्ट हे, अतः वह वक्ता के अभीष्ट होने के रूप में पर्य- वसित होकर उक्त दोनों कार्यों की 'अवश्यकर्तव्यता' को अरभिव्यक्त करता है। तीसरे पद्य में खल-संबंधी वृत्तान्त के कथनरूपी सामान्यरूप से प्रस्तुत 'चुगलीखोरी' आदि वृत्तान्त का कथन जो वक्ष्यमाण है, उसका वर्शान किया जा रहा निषेध उस वृत्तान्त के 'सोचने मात्र से दुखदायी- पन' को श्रभिव्यक्त करता है। चौथे पद्य में नायिका-संबंधी वार्ता के कुछ अंश श्वास, कृशता आदि को कहकर बाद में उसका निषेध करना, आगे कहे जानेवाली मरण की वार्ता के विषय में परिणात होकर उस वार्ता के 'मुख से न निकालने योग्य होने' को अभिव्यक्त करता है।
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इन उदाहरणों में निषेध के प्रतिष्ठित न होने के कारण न तो विहित का निषेध ही कहा जा सकता है और न निषेध की विधि ही। (५) (विध्याभासरूप आ्राक्षेप; जैसे-) तपोनिधे कौशिक! रामचन्द्र निनीषसे चेन्नय कि विकल्पैः। निरन्तरालोकनपुएयधन्या भवन्तु वन्या अपि जीवभाजः ।।
हे तपोनिधि विश्वामित्र, यदि आप रामचंद्र को ले जाना चाहते हैं तो ले जाइए। आगा-पीछा सोचने से क्या फल है। जंगली जीवों को भी (राम के) निरन्तर देखने के पुण्य से धन्य होने दीजिए। यहाँ पुत्र के स्नेह से व्याकुल दशरथ के वाक्य में 'ले जाइए' यह विधि बाधित है, अतः 'मत ले जाइए' इस निषेध में पर्यवसित होती है और तब उससे यह अभिव्यक्त होता है कि 'अन्यथा मेरा प्राण- वियोग हो जायगा' अतः यह आक्षेप विध्याभासरूप है। यद्यपि इनके मत के अनुसार इस तरह उदाहरण हो जाते हैं, तथापि इन लोगों के मत में प्राचीन मत के अनुसार दिए जाने वाले आक्षेप के उदाहरण अनुदाहरण ही हैं। इस तरह उनका आशय यह है कि प्रथम मत द्वारा सिद्ध आ्रक्षेप प्रतीप का भेद है और द्वितीय मत से सिद्ध आरक्षेप तो विहित का निषेध- मात्र ही है, आक्षेप नहीं; क्योंकि उनमें आभासरूप निषेध नहीं है।
( x) दूसरे लोगों का तो कहना है कि निषेधमात्र आक्षेप होता है औरर चमत्कारी होना तो अलंकार के सामान्य लक्षण से प्राप्त है ही। तथा वैसा चमत्कारीपन व्यंग्य अर्थ होने पर ही हो सकता है अतः यह सिद्ध हुशर कि-
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व्यंग्य सहित सभी निषेध आक्षेपालंकार हैं। औरर इस तरह इस लक्षण में उपमेय द्वारा की गई उपमान की किमर्थकता का, पक्षांतर का स्वीकार करने के द्वारा की गई प्रथम पक्ष की किमर्थकता का, विशेष प्रतिपादन के प्रयोजन वाली उक्तविषया तथा वक्ष्यमाण- विषया किमर्थकताओं और अभी-अभी बताए गए निषेध के आभास और विवि के आभास इन सभी का संग्रह हो जाता है। आक्षेप की ध्वनियाँ और उनपर विचार
(अरभी-शभी बताया जा चुका है कि 'आक्षेप' के लक्षण के विषय में ५ मत हैं उनमें से ३ किमर्थकताएँ और एक निषेधाभासरूप तथा एक निषेधरूप हैं)
अब तत्तन्मतानुसार आक्षेपध्वनि के उदाहरण दिए जाते हैं- त्वामवश्यं सिसृच्षन्यः सृजति स्म कलाधरम् । किं वाच्यं तस्य वैदुष्यं पुराणस्य महामुनेः॥ तुम्हें अवश्य उत्पन्न करने की इच्छा रखते हुए भी जिसने चंद्रमा को उत्पन्न किया है उस पुराने महामुनि की विद्वत्ता का क्या कहना है। इस उदाहरण में जिनके हिसाब से (तीनों प्रकार की) उपमान की किमर्थकता आक्षेप है उनके मत से 'तुम्हारे रहने पर चंद्रमा की क्या आवश्यकता है' इस अंश को लेकर आक्षेप की ध्वनि है, और जिनके मत में केवल निषेध ही आक्षेप होता है उनके हिसाब से 'बूढ़े ब्रह्मा में विद्वत्ता नहीं है' इस अंश को लेकर आक्षेप की ध्वनि है। शंका और समाधान आप कहेंगे कि 'उसकी विद्वचा का क्या कहना' इस तरह बाध-
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सहित विद्वत्ता की उक्ति का पर्यवसान तत्काल ही विद्वत्ता के शभाव में हो जाता है, अतः उपमान की किमर्थकता की भी प्रतीति तत्काल हो जाने के कारण यह व्यंग्य वाच्य के ही समान हो जाता है, अतः इसको ध्वनि किस तरह कहा जा सकता है? किंतु यह दोष नहीं है, कारण 'तुमको उत्पन्न करने की इच्छा वाले ब्रह्मा ने अपनी कृति में कुशलता- संपादन करने के निमिच्च प्रथमतः पाराडुलेख (Rough copy) के समान चंद्रमा को बनाने वाले की विद्वत्ता का क्या कहना है, इस तरह विद्वत्ता की उक्ति निर्बाध होने के कारण पहिले विश्रांति हो जाने के बाद में 'पुराने' इस विशेषण के अर्थ पर विचार करने से 'विद्वचा के अभाव' और 'चंद्रमा की किमर्थकता' में इस पद्य के अर्थ का पर्यवसान होता है। इसलिए 'ध्वनि' होने में कोई त्रुटि नहीं। किंतु जिनके मत में 'आभासरूप निषेध ही आक्षेप है' उनके मत में उपर्युक्त पद्य आक्षेप की ध्वनि का उदाहरण नहीं होता। उनके मत में निम्नलिखित पद्य आक्षेप की ध्वनि का उदाहरण है। त्वां गीर्वाणगुरुं सर्वे वदन्तु कवयस्तु ते। समानकक्षस्तेनासीत्येषोऽर्थस्तु मतो मम ॥ सब लोग आपको देवताओं के गुरु (वृहस्पति) कहें, क्योंकि वे कवि हैं, किंतु 'आरप उनके समकक्ष हैं' यह वस्तु तो मुझे संमत है। इस कवि के वाक्य में 'मैं कवि नहीं हूँ' यह गम्यमान (प्रतीत होनेवाला) निषेध बाधित होने के कारण आभास रूप में प्रतीत होकर 'मिथ्यावादित्व के अभाव' रूप में पर्यवसित हो जाता है और तब उत्तरारघ के अर्थ की सत्यता रूपी विशेषता को ध्वनित करता है। ध्वनिकार का समर्थन इस तरह अपनी-अपनी मान्यता के भेद से आक्षेपों का भेद होने के कारण उनकी ध्वनियों की पृथकता है। इतने पर भी-
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"स वक्तुमखिलाञ्शक्तो हयग्रीवाश्रितान्गुखान्। योऽम्बुकुम्मैः परिच्छेदं ज्ञातुं शक्तो महोदधेः ॥
हयग्रीव में रहने वाले गुणों को पूर्णातया वही कह सकता है जो जल के घड़ों के द्वारा (घड़े भर-भरकर) महासमुद्र के अंत को जानने में समर्थ हो।"
इस पद्य को ध्वनिकार ने (इष्टार्थ के निषेध के अभिव्यक्त होने के कारण) जो 'आक्षेप ध्वनि' का उदाहरण दिया है उसके विषय में अपने माने हुए (निषेधाभासरूप) आरक्षेप की अरभिव्यक्ति न होने के कारण "यह आक्षेप की ध्वनि का उदाहरण नहीं है" इस तरह बिना युक्ति के कहने वाले 'अलंकार-सर्वस्व' कार परास्त हो जाते हैं, क्योंकि 'शभासरूप ही निषेध आक्षेप है' यह कोई वेद की आज्ञा नहीं हैं। न प्राचीन आचार्यों की ही आज्ञा है और न इसमें कोई युक्ति ही है जिसके कारण ध्वनिकार के कथन की उपेक्षा करके आप कथन पर श्रद्धा करें। किंतु विपरीतता (ध्वनिकार पर श्रद्धा और आप पर अश्रद्धा) ही उचित है, क्योंकि ध्वनिकार आलंकारिकों की पद्धति के व्यवस्थापक हैं। इस शास्त्र (साहित्य शास्त्र) में 'शक्षेप' आदि शब्दों के संकेत का ग्रहक प्राचीन वचनों के अतिरिक्त अन्य कोई प्रमाण है भी नहीं। यदि ऐसा न मानो तो सर्वत्र विपर्यास होने लगेगा।
कुवलयानंद का खंडन
और जो कुवलयानंदकार ने- "नरेन्द्रमौले ! न वयं राजसंदेशहारियः। जगत्कुटुम्बिनस्तेऽद्य न शत्रुः कश्चिदीच्यते॥
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हे राजशिरोमशि, हम राजा के संदेशवाहक 'खुशामदिया' नहीं हैं। सब जगत् के कुटुम्बी आपका आज कोई शत्रु नहीं दिखाई देता।" इस पद् को अलंकारसर्वस्वकार के मत से उदाहरण देकर कहा है कि "यहाँ संदेशवाहकों की उक्ति में 'हम संदेशवाहक नहीं हैं' यह निषेध उत्पपन्न नहीं, अतः, संधिकाल के उचित कपट-वचनों को हटा- कर यथार्थवादित्व में पर्यवसित हो जाता है और तब 'सब पृथ्वी के पालन-फर्त्ता आपके द्वारा कोई भी शत्रुभाव से देखने के योग्य नहीं हैं, किंतु सभी राजा लोग भृत्यभाव से रक्षा करने के योग्य हैं' इस विशेषता को आरक्षिप्त करता है।" सो यह ठीक नहीं। कारण, आपने जो विशेष अर्थ बतलाया है वह निषेध से अभिव्यक्त नहीं होता, क्योंकि 'हम राजा के संदेशवाहक नहीं है' यह कह देने मात्र से 'तुम्हारे द्वारा कोई भी शत्रुभाव से देखने योग्य नहीं है, किंतु सभी राजा लोग भृत्यभाव से रक्षा करने योग्य हैं' यह विशेष अर्थ प्रतीत नहीं होता, अपितु 'जगत् के कुटुंबी ......... ' इत्यादिक उत्तरार्ध के प्रयोग करने पर वह विशेष अर्थ प्रतीत होता है, अतः यहीं पर उसे निषेध से आ्िप् कहना अनुचित है, क्योंकि 'जो विशेष अर्थ केवल निषेध के सामर्थ्य से शत्तित होता है उसी के विषय में निषेध श्रचित करता है' यह कहना उचित है, न कि अन्य किसी वाक्य द्वारा प्रतीत हुए विशेष अर्थ को निषेध के द्वारा आचतित् कहना।
देखिए, यहाँ पर राजा के संदेशवाहक द्वारा प्रयुक्त किए हुए 'हम राजा के संदेशवाहक नहीं हैं' इस वाक्य में अपने आप (राज- संदेशवाहक) में अपना (राजसंदेशवाहकता का) निषेध वाघित होने के कारण 'राजा के संदेशवाहक' इस पद से लक्षणा द्वारा राजा के संदेशवाहकों में रहने वाले 'कपटवचन के प्रयोगकर्तृत्व' आरदि धर्मों
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से युक्त अथं (कैतववादी) उपस्थित किया जाता है (अर्थात् 'राज- संदेशवाहक' पद का लक्ष्य अर्थ है 'कैतववादित्व') और उसका प्रयोजन है 'कपटवचनप्रयोक्तत्व का निषेध हो जाने पर अरपने अंदर सत्यवक्तृत्व की अथवा अपने वचन के अंदर सत्यत्व की प्रतीति'। यही विशेष अर्थ का आक्षेप है ऐसी दशा में क्यों कहा जाता है कि 'आपके द्वारा कोई भी शत्रु भाव से देखने योग्य नहीं है ...... इत्यादि निषेध से शक्तिप् है।
अब यदि कहा जाय कि पूर्वोक्त बाध (राजसंदेशहारी का राज- संदेशहारित्व के निषेध) के कारण ही 'राजा' पद की शत्रु अर्थ में लक्षणा करके 'हम शत्रु के संदेशहारी नहीं हैं' इस तरह (लक्ष्य रूप में) प्राप्त हुए अर्थ के द्वारा 'हमारे स्वामी शत्रु नहीं हैं इतना ही नहीं, किंतु भृत्यभाव से पालन करने योग्य है' इस विशेष अर्थ की प्रतीति होती है। तो तृतीय कक्षा में आया हुआ 'हमारे स्वामी शत्रु ही नहीं हैं' यह निषेध 'आक्षेप' होगा, न कि उसको उठानेवाला आपके द्वारा उक्त निषेध, जो इस निषेध का उत्थापक है। किंतु यदि 'परंपरया यथाकथञ्चित् किसी विशेष अर्थ को उठाने- वाला भी आक्षेप होता है' यह कहा जाय तथापि 'संधिकाल के उचित कपटवचन के परिहार द्वारा यथार्थवादिता में पर्यवसित होता हुआ ......... 'इत्यादिक आरपके कथन की तो शसंगति ही रही, क्योंकि केवल यथार्थवादित्व के द्वारा आप का बताया हुआ विशेष अर्थ आच्तिप नहीं हो सकता, किंतु उससे उचरार्द्ध द्वारा आच्ित अर्थ का परिपोषण मात्र होता है। इसलिए जहाँ तुमने निषेध का पर्यवसान बताया है वहीं विशेष अर्थ निषेध के द्वारा आक्षेप करने योग्य है, न कि अन्य कोई विशेष अर्य। अतएव अलंकारसर्वस्वकारने जो यह लिखा है कि --
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"बालक१ नाहं ............. "
यहाँ "दूतीत्वरूपी वस्तु के निषेध द्वारा 'यथार्थवादित्व' श्रदि विशेष की अरभिव्यक्ति होती है" वह संगत हो जाता है। आक्षेप समास
१- इसका मूल, प्राकृत पद्य, जो अलंकारसर्वस्व में है, वह यह है- वालअ णाहं दूई तीए पिओ सि त्ति राम्हवावारो। सा मरइ तुज्झ अयसो एअं धम्मक्खरं भणिमो।। इसकी संस्कृत छाया यों है- बालक नाहं दूती तस्या: प्रियोऽसीति नास्मदव्यापारः । सा म्रियते तवायश एतद् धर्माक्षरं भणामः ॥ अर्थात् हे बालक, मैं दूती नहीं हूँ और 'तुम उसके प्रिय हो' यह हमारा धंघा भी नहीं है, किंतु 'वह मरती है और तुम्हारा अपयश है' इस तरह धर्म के अक्षर कह रही हूँ।
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विरोधमूलक अलंकार- विरोध अलंकार
लक्षण ऐसी दो वस्तुओं का, जिनका एक आधार से संबद्धत्व प्रति- पादन किया गया हो, प्रतीत होनेवाला एक आधार से असंबद्धत्व, अथवा एक आधार से असंबद्धत्व का भान 'विरोध' कहलाता है। (ऐसा भान भ्रममूलक भी हो सकता है अतः दूसरा लक्षण बताते हैं) त्रथवा एक अधिकरण में असंबद्धत्व से प्रसिद्ध दो वस्तुओं का एकाधिकरएसंबद्धत्व के रूप में प्रतिपादन 'विरोध' कहलाता है। लक्षण का विबेचन वह विरोध दो प्रकार का होता है-एक प्ररूढ, दूसरा अप्ररूढ। प्ररूढ विरोध उसे कहते हैं जो बाधक बुद्धि द्वारा अभिभूत न हो, उससे विपरीत (बाधबुद्धि से अभिभूत) को अप्ररूढ विरोध कहते हैं। उनमें से प्रथम विरोध दोष का विषय है और दूसरा अलंकार का। इसी कारण इसे विरोधाभास कहते हैं। आभास का अर्थ है 'कुछ भासित होनेवाला' अतः यह सिद्ध हुआ कि जो विरोध आरंभ में ही प्रतीत हो और तत्काल ही अविरोध की बुद्धि उत्पन्न हो जाने के कारण तिरस्कृत हो जाय उसे विरोधाभास कहते हैं। उस विरोध में से भी जो विरोधाभास कार्यकारणादि के ज्ञान से संवलित न हो उसे विरोधालंकार कहते हैं और यदि कार्यकारणादि के ज्ञान से युत हो तो वह विरोधालंकार नहीं कहलाता, किंतु आगे बताए जानेवाले विभावनादिरूप होता है।
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विरोधालंकार के भेद
इस अलंकार के दस भेद होते हैं। कारण, सब पदों के अर्थ चार प्रकार के होते हैं-१ जाति २ गुण ३ क्रिया और ४ द्रव्य । उनमें से जाति का जाति, गुपा, क्रिया और द्रव्य चारों से, गुएा का गुर, क्रिया और द्रव्य तीन से, क्रिया का क्रिया और द्रव्य इन दो से एवं द्रव्य का द्रव्य से, इस प्रकार (अपुनरुक्त दश भेद होते हैं)। यहाँ इतना और समझ लेना चाहिए कि यहाँ क्रिया शन्द से वैयाकरणों की तरह शुद्ध भावनामात्र अथवा नैयायिकों की तरह केवल स्पन्दनरूप क्रिया नहीं मानी जाती, किन्तु तचद् धातुओं से वाच्य विशिष्ट व्यापार को ही क्रिया कहा जाता है।
उदाहरण कुसुमानि शरा मृखालजालान्यपि कालाय सकर्कशान्यभूवन्। सुदृशो दहनायते स्म राका भवनाकाशमथाभवत्पयोधि: ॥
दूती कहती है-उस सुनयनी के लिए पुष्प वाण हो गए, मृणालों के समूह काले लोहे के समान कठोर हो गए, पूर्ण चन्द्रमावाली पूर्णिमा की चाँदनी रात आग की सी चेष्टा करती है और भवन का आरकाश समुद्र हो गया है।
(यहाँ पुष्पत्व और बाणत्व दो जातियों का, मृणालत्व जाति और कठोरता रूप गुणा का, पूर्णिमात्व जाति और आरग की सी चेष्टा करना रूपी क्रिया का तथा पयोधित्व जाति और आकाश द्रव्य का विरोध है- इसी दृष्टि से आगे के उदाहरणों पर भी विचार करिए)। यहाँ जाति आदि का विरोध प्रथमतः प्रतीत होने पर भी विरहिणी के दुःखजनक होने का विचार करने पर निवृच् हो जाता है।
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त्वयि दृष्टे त्वया दृष्टे भवन्ति नगतीतले। महान्तोऽप्यसवो राजनखवश्च महत्तरा: ॥ हे राजन्, तुम्हें देखने पर महान भी अणु हो जाते हैं और तुमसे देखे जाने पर श्रणु भी अत्यन्त महान हो जाते हैं। (यहाँ 'महत्त्व' और 'अणुत्व' गुणों का विरोध है) खलानामुक्तयो हन्त कोमला: शीतला अपि। हृदयानीह साधूनां छिन्दन्त्यथ दहन्ति च।। हाय! खलों की उक्तियाँ कोमल और शीतल होने पर भी सत्पुरुषों के हृदयों को काट डालती और जला डालती है। (यहाँ 'कोमलत्व' गुश का 'काटना' क्रिया से और 'शीतलत्व' गुख का 'दहन' क्रिया से विरोध है) विचारिते महिमनि त्वदीये नित्यनिर्मले। परमात्मन्गगनमप्याधने परमाणुताम्। हे परमात्मन्, नित्यनिर्मल आपकी महिमा का विचार करने पर आकाश भी परमाणुता को धारण करने लगता है। (यहाँ 'आररकाश' द्रव्य औरर 'रमाणुता' गुण का विरोध है।) हषयन्ति क्षणादेव क्षसादेव दहन्ति च। यून: स्मरपराधीनान्निर्दया हन्त योषितः ।। खेद है कि निर्दय कामिनियाँ कामके वशीभूत युवकों को क्षणभर में ही हर्षित कर देती हैं और क्षरभर में ही जला देती हैं। (यहाँ 'हर्षित करना' क्रिया का 'जलाना' क्रिया से विरोध है।)
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कान्तारे विलपन्तीनां त्वदरातिमृगीद्ृशाम्। देवनानि समाकए्य हरिद्धिरपि चुन्नुभे ।।
दुर्गम माग में विलाप करती हुई तुम्हारे शत्रुओं की स्त्रियों के विलापों का सुनकर दिशाएँ भी क्षुब्ध हा गई। (यहाँ 'दिशा' रूपी द्रव्य से 'क्षोभ' रूपी क्रिया का विरोध है।) इत्यादिक उदाहरण स्वयं तर्कित कर लेने चाहिए। यहाँ 'जाति आदि' यह उपलक्षय है, अतः 'धर्म मात्र' कहना अभीष्ट है, इसलिए 'यः किल बालकोऽपि पुराणपुरुषः-जो बालक होने पर भी सबसे पुगना पुरुष है', 'विशुद्धमूर्तिरपि नीलम्वुदनिभ :- शुद्धमूर्ति वाले होने पर भी नीलमेघ की सो कान्ति वाले हैं', 'जगद्धित- कृदषि जगदहितकृत्-जगत् के हितकारी होने पर भी जगत् के अहित करने वाले हैं' (वस्तुतः जगत् के शत्रुतं को काटने वाले हैं) और 'अगोद्धारकोऽपि नागोद्धारक :- जा पवत के उठाने वाले होने पर भी पर्वत के उठाने वाले नहीं है (वस्तुतः कालिय अथवा कुवलयापीड़ के उद्धारकर्ता हैं') इत्यादिक में सखंड उपाधि और अभाव का भी ग्रहण हो जाता है। वस्तुतः दो ही भेद वस्तुतः तो जाति-आदि भेदों के चमत्कारी न होने के कारण विरोधाभास अलंकार शुद्ध और श्लेषमूलक इस तरह दो प्रकार का ही समझना चाहिए! एक शंका आप कहेंगे कि 'हितकृदप्यहितकृत्' और 'अगोद्वारकोऽपि नागो- द्वारकः' इत्यादि में विरोध का तो प्रतिमान मात्र होता है, अलंकार तो
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शलेष ही है, क्योंकि अपने विषय में प्रायः श्लेष सभी अलंकारों का अपवाद हो जाता है, तो यह कवि सुनता है (जिसे इसका पता है कि क्ेष अन्य अलक्गारों का अनुग्राहक होता है, अपवाद नहीं) विरोध के विषय में विचार
(१) यहाँ यह समझना चाहिए कि-जहाँ 'अपि' आदि विरोध का द्योतक शब्द हो वहाँ शाब्द विरोध होता है और अन्यत्र आर्थ विरोध होता है'-यह प्राचीनों का सिद्धांत है। यहाँ 'शाब्द' पद से यदि यह अर्थ लिया जाय कि 'जो विरोध शब्दकरणक (शब्द द्वारा प्रतीत) हो', तो विरोध के विषय में यह बात घटित नहीं होती, क्योंकि 'त्रयोऽप्यत्रयः' इत्यादिक में जो विरोध प्रतीत होता है उसका नियत विशेषण, विशेष्य और संसर्ग इन तीनों में से किसी में भी समावेश नहीं होता। कहने का अभिप्राय यह है कि-जिस तरह 'हितकृदप्यहितकृत्' यहाँ जिस व्यक्तिरूप आधार में 'हितकृत्व' धर्म रहता है उसमें 'श्रहित- कृत्व' रूप ध्म नहीं रह सकता-अर्थात् 'हितकृत्' का विशेषण 'अरहितकृत्' नहीं हो सकता -- इस विरोध को 'अपि' शब्द द्योतित करता है वह बात 'त्रयोऽप्यत्रयः' इस उदाहरण में नहीं है, क्योंकि 'त्रयः' के साथ 'अत्रित्व' का किसी एक अधिकरण में रहना विशेषण, विशेष्य अथवा संसर्ग किसी रूप में नहीं, 'अत्रित्व' तो 'त्रित्व' का प्रतियोगी मात्र है। इसका उत्तर यदि आप यह दें कि 'एक आधार में न रहने' की तरह 'एक का प्रतियोगी होना' भी विरोध है और इस तरह प्रस्तुत उदाहरण में 'नञ' के अर्थ और उसके उत्तर पद के अर्थ का प्रति- योगिता संसर्ग होने से इस विरोध का संसर्ग में ही समावेश हो जाता
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है। तो यह भी ठीक नहीं। कारण, 'मुप्तोऽपि प्रबुद्ध :- सोया हुआ भी जगा हुश+सोया हुआ भी प्रकृष्ट ज्ञानवान्' इत्यादि में जो विरोध है उसका समावेश फिर भी नहीं होता, क्योंकि सुप् पुरुष 'सुप्तत्व के विरुद्ध प्रबुद्धत्व धर्म से ुक्त से अभिन्न' यह शाब्दबोध अनुभव सिद्ध नहीं है, जिससे कि लक्षणा-आदि की कुसृष्टि का प्रयत्न करें।
इसके विषय में प्राचीनों की ओर से यह कहा जाता है कि 'मुप्तोऽपि प्रबुद्धः' 'त्रयोऽप्यत्रयः' इत्यादि विरोध के उदाहरों में दो शब्दों के द्वारा प्रथमतः 'मुतत्व' और 'जागरितत्व' रूप दोनों धर्मों की उपस्थिति हो जाने के अनन्तर उन दोनों धर्मों के संबंधी (जो एक है) के ज्ञान से 'अरप्रपि' शब्द की सहायता द्वारा उन धर्मों में रहने वाले विरोध का भी स्मरण हो आता है। उसके बाद प्रतिबन्धक ज्ञान की सामग्री के बलवान् होने के कारण 'ये दोनों धर्म विरुद्ध है' इसतरह मानस अथवा व्यञ्जना-सम्बन्धी विरोध का बोध हो जाने पर उस विरोध के द्वारा रुकावट के कारण सुत और जागरित के अभेद की बुद्धि उत्पन्न नहीं होती, अतः दूसरा शक्ति द्वारा प्रकटित दूसरे अर्थ को लेकर अन्वय का बोध होता है, न कि विरुद्ध अर्थ को लेकर। इसतरह (अर्थज्ञान के समय ) विरोध के बोध का मूल शिथिल हो जाने के कारण निवृत्त होता हुआ भी विराध का बोध कवि के संरम्भ का विषय होने से चमत्कार का कारण हो जाता है। यह है प्राचीनों के सिद्धांत का सार।
किन्तु नवीनों का कहना है कि-दो अर्थों के प्रादुर्भाव के विना विरोधाभास का संभव ही नहीं। हाँ, यह सत्य है कि उन दोनों अर्थों में से एक अर्थ विरोध को उल्लसित करता है और दूसरा अर्थ अन्वय- बोध का विषय होता है, परन्तु जो दूसरा अन्वयबोध का विषय बनता है उसमें विरोध के उल्लसित करने वाला अर्थ 'भेद होने पर भी श्लेष
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के आधार पर अभेदाध्यवसाय होता है' इस पूर्वोक्त रीति से श्रभिन्न के रूप में भासित होता है, और इसतरह विरोघरहित द्वितीय अर्थ को लेकर अन्वयबोध हो जाने पर भी अपने आधारभूत विरुद्ध अर्थ के संपूर्णतया निबृच न होने के कारण सांस लेते हुए अधमरे के समान तिरोध भी दूसरे मानस बोध में आ जाता है और इसीलिए वह चमत्कारी कहलाता है, क्योंकि सम्पूर्तया निबृच वस्तु चमत्कार उत्पन्न नहीं कर सकती और चमत्कारजनक न होने पर अलंकार नहीं कहला सकता इसलिए यह मानना चाहिए कि न तो विरोध के बोध का मूल अत्यन्त शिथिल ही होता है और न उसकी सर्वथा निबृच्ि ही होती है।१
१- यहाँ नागेश कहते हैं कि 'सुप्तोऽपि प्रबुद्धः' इत्यादि में समा- नाधिकरण विभक्तियों (दोनों प्रथमाओं) को अर्थो (प्रतिपदिकार्थों ) का अभेद संबंध है और 'अपि' शब्द के द्वारा द्वितीय पदार्थंतावच्छेदक (प्रबुद्धत्व) में प्रथम पदार्थतावच्छेदक (सुप्तत्व) का विरुद्धत्व द्योतित किया जाता है। ऐसी स्थिति में दो गमक (अभेद और विरोध) होने से और प्रकरणादि नियामक के अभाव से ('प्रबुद्ध' पद के ) दोनों अर्थ (जागरितत्व और प्रकृष्टज्ञानाश्रयत्व) एकसाथ प्रतीत होते हैं। उनमें से अभेद वाला वाक्यार्थ मुख्य है, अतः इ्लेष के आधार पर होने वाले विरुद्धार्थ के साथ अभेदाध्यवसाय द्वारा (उसकी प्रतीत अर्थ में विशेष्यता है और) विरुद्धार्थ की उसमें विशेषणता है-यह उचित है। सो इस तरह 'सुप्तोऽपि प्रबुद्धः' इस वाक्य का शाब्दबोध 'स्वाप- विरुद्धजागरणाभिन्नविशिष्टज्ञानाश्रयः' यह होता है। किंतु जहाँ 'अपि' शब्द का अभाव हो वहाँ प्रथमतः शब्दों का अन्वयबोध हो जाने पर सहृदयतावश द्वितीय अर्थ की उपस्थिति होने पर विरहादि- उद्बोधक के सहकार से 'एक संबंधी का ज्ञान अपर संबंधी का स्मारक
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कहा जायगा कि इतने पर भी 'अपि' शब्द आदि (वरिरोष्ट वाचक शब्द) के प्रयोग में शाब्द विरोध भासित होता है' यह कथन संगत नहीं होता, क्योंकि वैयाकरणों के सिद्धांत में निपातों में शक्ति (वाचकता) स्वीकार नहीं की गई है-ऐसी स्थिनि में 'अपि' शब्द को विरोध- वाचक कैसे माना जाय। तो इसका उत्तर यह है कि निरूढलक्षणा की तरह निरूढ दयोतना भी शक्ति के ही समकक्ष है।
भेदों के विषय में एक शंका और उरका उत्तर
यहाँ यह शंका की जा सकती है कि जाति का जाति के साथ और द्रव्य का द्रव्य के साथ विरोधालंकार नहीं हो सकता, क्योकि इसके उदाहरण "कुमुमानि शराइचंद्रो बाडवो दुःखिते हदि-दुखित हृदय में पुष्प बारा और चद्रमा अरग्नि है" इत्यादि में आरोपमूलक रूपक का ही उल्लास होता है, विरोध का नहीं। और यदि वह आरोप होने पर भी विरोधाभास कहा जाय तो 'मुखं चंद्रः' इत्यादिक में भी विरोवाभास ही कहिए। इसका उत्तर यदि आप यह दें कि 'सभी रूपक का विषय विरोध से आ्क्रांत ह, इस कारण रूपक का कोई विषय ही नहीं रहेगा, इसलिए गुसादि में सावकाश 'विराध' का रूपक अपने विषय में अपवाद हो जाता है-अर्थात् जहाँ रूपक का विषय हो वहाँ विरोध नहीं माना जाना चाहिए।' तो यह ठीक नहीं, क्योंकि तब तो 'कुसुमानि शरा :- पुष्प वाण है', 'मृसालवलयादि दवदहनराशिः-मृणाल वलय आदि दावानल की राशि है' 'चन्द्रो बाडवः-चंद्रमा बडवानल है'और 'शंकरचूडापगा कालिंदी-शव जी के शिर की नदी (गंगा)
होता है' इस रीति से उपस्थिति होने पर व्यंजना के द्वारा ही वसा बोध होता है। अतएव कहा जाता है कि 'अपि' शब्द के अभाव में विरोध व्यंग्य होता है।
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कालिंदी है' इत्यादिक में आपका अभीष्ट 'विरोध' सिद्ध न हो सकेगा अर्थात् इनको भी रूपक का ही उदाहरण मानना होगा। तो यह सच है, किंतु यह जानना चाहिए कि यहाँ अलंकारवर्ग में, जहाँ जो अलंकार सहृदयों के चमत्कार के मार्ग में अवती्सा होता है वहाँ वही अलंकार समझा जाता है, यह बात निविवाद है। ऐसी दशा में यद्यपि 'मुखचंद्र' इत्यादि रूक में विरोध है तथापि उसका प्रतिपादन वहाँ अभीष्ट नहीं, किंतु चंद्रमा में रहने वाले शह्लादकता आदि सब गुणों की मुख में प्रतीति होने के लिये चंद्रमा का अभेद ही अभीष्ट है, इसलिये वही चमत्कारी है, विरोध नहीं। प्रत्युत विद्यमान भी विरोध विवचित अर्थ की अनुकूलता के अभाव से दूषित है, इसलिए वह अलंकार नहीं है। केवल विद्यमानता कुछ नहीं कर सकती। रही 'कुसुमानि शराः' इत्यादिक की बात। सो ऐसे स्थलों में विरहिणी आदि की अवस्था के अत्यद्भुतत्व का कथन श्भीष्ट है इसलिये उसकी अनुकूलता के लिये अंतर्गर्मित होने पर भी अर्थप्राप्त विरोध उल्लसित होता है इसलिये वही अलंकार है।
अब यदि आप कहें कि रूपक के स्थल में विरोध के अविवक्षित होने के कारण वह अलंकार नहीं हो सकता तो भल ही नहीं हो, किंतु 'कुसुमानि शराः' इत्यादिक विरोधस्थलों में विरोध के उठाने के लिये अभेद की विवक्षा हे ही, इसलिये वहाँ तो रूपक होने ही लगेगा तो इसका उत्तर यह है कि रूपक के लक्षण में 'विरोध की विवक्षा से युक्त न हो' इतना और बढ़ा देना चाहिए। अथवा, यहाँ जो अभेद है वह केवल विरोध के उठाने के लिये स्वीकार किया गया है, अतः चमत्कारी न होने के कारण विरोध के स्थल पर रूनकालंकार मानना अयोग्य है, क्योंकि सभी अलंकारों के लक्षणों में अथता अलंकारों के सामान्य लक्षण में 'चमत्कारित्व' कहा जा चुका है।
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किंतु यदि विरहिसी-आदि की अवस्था का 'अत्यद्रुत होना' आदि विवक्षित न हो और 'अपि' का अर्थ भी अंतर्गत न किया गया हो, किंतु 'कुमुमानि शराः' इत्यादिक में 'पीडाजनकत्व' औरर 'शंकर चूडापगा कालिंदी' इत्यादिक में 'श्यामता' आदि का अतिशय मात्र कहना अभीष्ट हो तो यहाँ रूपक ही होगा।
इसी तरह यदि किसी नगर की स्थिति की अद्भुततामात्र बताना हो और यह लिखा जाय कि 'जहाँ नारियों का नुख (ही) चंद्रमा है' तो वहाँ विरोधाभास ही है-यह समझना चाहिए।
आप कहेंगे कि जिस तरह 'सुप्तोऽपि प्रबुद्धः' इत्यादिक में एक अर्थ के द्वारा विरोध उठाया जाता है और दूसरे के द्वारा उसकी निवृत्ति हो जाती है। इसी तरह 'गङ्गायां घोषः' 'मञ्चाः क्रोशन्ति' 'कुन्ताः प्रविशन्ति' इत्यादिक में भी वाच्य अर्थ से विरोध का उत्थान होता है और लक्ष्य अर्थ से उसकी निवृत्ति हो जाती है, इसलिये वहाँ भी विरोधाभास का प्रसंग होगा। यदि इसका उत्तर आप यह दें कि दृष्टांत ('कुमुमानि शराः' आदि) में विरोध के उठानेवाले औ्रर निवृच् करने वाले दोनों अर्थों की शक्ति (श्रभिधा) द्वारा ही उप- स्थिति होती है, किंतु दार्ष्टान्तिक (गंगायां घोषः आदि) में उन दोनों की उपस्थिति भिन्न भिन्न वृत्तियों द्वारा होती है-यह विलक्षणता है, अतः यहाँ विरोधाभास नहीं माना जा सकता। तो यह कोई बात नहीं, क्योंकि विलक्षणता होने पर भी तुम्हारे बनाए विरोधाभास के लक्षणा की शरतिव्याप्ति का निवारण नहीं होता। इसका उत्तर यदि आप यह दें कि लक्षण में 'विरोध के उठाने वाले और निवृच्त करने वाले का एक वृत्ति से ज्ञात होना अपवा एक- जातीय वृत्ति से ज्ञात होना' कहना शभीष्ट है। तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा होने पर 'कुसुमानि शराः' इत्यादिक में प्राचीनों की रीति
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से लक्षण की अव्याप्ति होगी (क्योंकि प्राचीनों के मत में विरोध का बोध मानसअथवा व्यंजनाजन्य होता है, देखिए पृष्ठ १३१) अतः इसका एकमात्र यही उत्तर है कि यहाँ (गंगायां घोषः आदि में) विरोध के प्रतीत होने पर भी वह कत्रि के संरंभ का विषय न होने के कारण चमत्कारी नहीं है (और जो चमत्कारी न हो वह अलंकार होता ही नहीं यह बार बार कहा जा चुका है)। कुवलयानंद का खण्डन
इस विरोध अलंकार का कुवलयानन्दकार ने ऐसा उदाहरण भी दिया है जिसमें उत्प्रेक्षा की प्रधानता है; जैसे- प्रतीपभूपैरिव किंततो मिया विरुद्धधर्मैरपि भेत्तृतोज्भिता । अमित्रजिन्मिन्त्रजिदोजसा स यद्विचारटक्चारदृगष्यवर्तत।। नैषधीयचरित में राजा नल का वणन है। कवि कहता है कि क्या उसके डर के मारे शत्रु राजाओ की तरह विरुद्ध धर्मों ने भी भेद- कता (कटधनापन+भिन्न होना) छोड़ दी ह, क्योंकि वह (पराक्रम के कारण) 'अमित्रजित्' (शत्रुतं को जीतनेवाला) होने पर भी तेज के कारण 'मित्रजित्' (सूर्य को जीतने वाला) है, 'चारहक्' (जासूसो के द्वारा देखने वाला) होने पर भी 'विचार टक्' (चारों के द्वारा न देखने वाला +विचार से देखने वाला) था। इस पर विचार करिए कि 'जहाँ विरोध की प्रतीति के अरनंतर अन्य अर्थ की प्रतीति द्वारा विरोध का समाधान हो वहाँ विरोधाभास माना जाता है' जैसे कि -- 'रिपुराजि-रस-भाव-भञ्जनोप्यरिपुरा-जिर- सभा-Sत्रभञ्जनः (जो शत्रुओं की पंक्ति के रसों और भावों का भग करने वाला होने पर भी शत्रुओं के पुरांगणा में होने वाली सभा का भंग करने वाला था) इत्यादिक में। किंतु आपके उदाहरण में तो विरोध
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के समाधानरूप में सबसे आगे (प्रथम) स्थित उत्प्रेक्षा ने विरोध के उत्थान को ही भङ्ग कर दिया है। तब जो विरोध उठ ही नहीं रहा है वह चमत्काग्मूलक अलंकाररूपता को कैसे प्राप्त कर सकता है।
विरोधालंकार समाप्त
विभावना अलङ्गार
लक्षण कारण के व्यतिरेक (निषेध) के साथ प्रतिपादन की जाने- वाली कार्य की उत्पत्ति विभावना कहलाती है। लक्ष का विवेचन जैसा कि लिखा है कि "क्रियायाः श्रतिषेधेऽपि फलव्याक्तविभावना-अर्थात् क्रिया (हेतु) के निषेध होने पर भी फल के प्रकाशन को विभावना कहा जाता है।" (काव्यप्रकाश) यहाँ 'क्रिया' शब्द से कारण कहना अभीष्ट है। यहाँ कारण के व्यतिरेक के साथ कार्य की उत्पच्ति लिखे जाने पर ऊनरी तौर पर विरोध दिखाई देने पर भी उससे भिन्न कार की कल्पना द्वारा निवृत्त हो जाता है।
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उदाहरण- विनैव शस्त्रं हृदयानि यूनां विवेकभाजामपि दारयन्त्यः । अनन्तमायामयवल्गुलीला जयन्ति नीलाब्जदलायताच्य:।
संसार में अनन्त मायामय मनोहर लीलाओं से युक्त नीलकमल- दल के समान विशाल नेत्रों वाली कामिनियाँ सर्वोत्कृष्ट हैं, जो बिना ही शस्त्र के विवेकयुक्त भी युवा पुरुषों के हृदयों को विदीर्श करती रहती हैं।
यहाँ काटने का कारण शस्त्र हे उसके अभाव में भी लिखा गया काटना ऊपर से विरुद्ध प्रतीत होने पर भी 'कामिनियों के विलास रूप कारण से तिदारण' के रूप में पर्यवसित हो जाता है।
आप कहेंगे कि यहाँ जिस कार्य की उत्पत्ति वर्न की जाती है उसके कारणरूप में प्रतीत होने वाली वस्तु का व्यतिरेक (निषेध) प्रतीत नहीं होता और जिसके कारण का व्यतिरेक (निपेध) प्रतीत होता है उसके कार्य की उत्पत्ति का वर्णन प्रतीत नहीं होता। यहाँ 'विदीर्गा करने' द्वारा एक प्रकार की पीडा (कामपीडा) कहना अभीष्ट है, न कि 'दो टुफड़े कर देना' और शस्त्र 'कामपीड़ा' का कारण नहीं है, किंनु 'दो टुकड़े कर देने' का कारण है, अतः यह आप का लक्षण ठीक नहीं। इसका उत्तर यह है-'विदीण करने' शब्द का मुख्य अर्थ है 'दो टुकड़े कर देना' और 'काम आदि से जनित एक प्रकार की पीड़ा' गौए (लाक्षशिक) अर्थ है। उन गौरा और मुख्य 'विदीर्स करने' रूी कार्यों का 'साहश्यमूलक अभेदाध्यवसानरूपी श्रतिशय' के द्वारा भेद स्थगित हो जाने पर यद्यपि शस्त्र 'दो टुकड़े कर देने' का कारण है तथानि वह 'कामपीड़ा' का कारण भो हो जाता है। ऐसी स्थिति में उसका अभाव होने पर भो, यतः यहाँ कार्य (दो टुकड़े
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करने) से अभिन्न रूप में अध्यवसित 'एक प्रकार की पीड़ा' का वर्गन किया गया है अतः उक्त दोष नहीं रहता।
सो इस तरह यह सिद्ध हु कि इस अलंकार में सभी जगह कार्य के अंश में अभेदाध्यवसानरूप अतिशयोक्ति अनप्राणाक के रूप में स्थित रहती है-अरर्थात् कार्याश में अरतिशयोक्ति से रहित विभावना होती ही नहीं। अतः यों समझना चाहिए कि जिस तरह पेड़ा के अंदर वस्तुतः-चीनी और खोआ-दो वस्तुएं समन रूप में रहती हैं तथापि जब वे एक होकर पेड़ा बन गई तब यह कहा जा सकता है कि 'बिना खोआा के पेड़ा कैसे बन सकता है', यद्यपि पेड़ा केवल खोश से नहीं बनता, क्योंकि पेड़ा में जो दो वस्तुएँ समान परिमाण में हैं उनमें से खोआ तो केवल एक वस्तु है, उसी प्रकार विभावना का कार्याश, यद्यपि वास्तविक कार्य (द्विघाभावन आदि) औ्रर अरति- शयोक्ति से अभेदरूप में अध्यवसित कार्य (कामपीड़ादि) जब्र अभेदा- ध्यवसान द्वारा एकरूप हो जाते हैं तब बनता है, तथापि उन दोनों के एक अंश से संनंध रखने वाल 'कारण' के अभाव के साथ दूसरे अंश को भी लकर पयवसान होता है; अतः 'तिशयोक्ति वाले कार्याश की भी उत्पत्ति बिना कारण के' बन जाती है।
यहाँ कार्याश 'कारण के अरभाव रूप' विरोधी द्वारा वाध्य के रूप में ही स्थित है, बाधक रूप में नहीं; क्योंकि कार्योश (पूर्वोक्तरीति से) कलित है और कारण का अ्भाव स्वभावसिद्ध है। इसी कारय कार्योश (मिश्रित होने पर भी) रूपांतर (मुख्यकार्य के रूप) में पर्यवसित हो जाता है और इसी कारण से इस अलंकार की विरोधा- लंकार से विलक्षगता है, क्योंकि उसमें दो समान बल वाले विरोधियों का वर्णन रहता है, पर यहाँ ऐसा नहीं है। जैसा कि कहा भी गया है-
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"कारणस्य निषेधेन वाध्यमानः फलोदयः । विभावनायामाभाति विरोधोऽन्योन्यवाधनम्। अर्थात् विभावना में कारण के निपेव द्वारा फल (कार्य) का उदय बाध्यमान प्रतीत होता है और विरोध है परस्पर बाधित होना।"
अतिशयोक्ति की अनुप्राणकता पर विचार अरब यदि यह कहा जाय कि विभावना में सर्वत्र अतिशयोक्ति अनुप्राशिका नहीं होती, किंतु कहीं होती है, जैसे कि काव्यप्रकाशोक्त विभावना के निम्नलिखित उदाहरण मे- "निरुपादानसंभारमभित्तावेव तन्वते। जगचित्रं नमस्तस्मै कलाश्लाध्याय शूलिने॥
बरिना ही मित्ति के और बिना उपादान की सामग्री के जगत्रूपी चित्र बनने वाले कला में प्रशंसनीय शिवजी को नमस्कार।" अध्यवसानमूलिका अर्प्रतिशयोक्ति अ्रनुप्रासिका नहीं है। कहा जायगा कि 'कारण के अभाव मे असभव कार्य की उत्पत्ति किसी विशेष अभिप्राय से कवि के द्वारा वशन किए जाने पर' विभावना कहलाती है। सो वह बात उक्त उदाहरस में नहीं है, क्योंक ईश्वर के द्वारा जगत् की उत्पत्ति किसी अरन्य उपादान के अरभाव में त्र्संभव नहीं है, जिससे कि 'विभावना' हो सक। कारण, "नासदासीत्-कारग नहीं था", "सदेव सौम्येदमत्र आसीत्-हे सौम्य, यह जगत् आरगे सद्ूप ही था", "आत्मा वा इदमेक एवाम्र आसीत्-सबसे पहले यह (जगत् ) एक आप्रत्मरूप हा था", "असद्वा इदमग्र आरसीत्ततो वै सद्जापत-सबसे पहले यह असत् (कारशरूप) था उससे सत् (कार्य) पैदा हुआ", इत्यादिक श्रतियों से और "अहमेवासमेवाम्रे
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नान्यद्यत्सद्सत्परम्-भगवान् कहते हैं कि आगे केवल मैं ही था- सत् असत् या इससे परे कुछ नहीं था" (श्रीमन्भ्ागवत) इत्यादिक स्मतियों से सृष्टिकाल में भगवान् के श्रतिरिक्त सभी वस्तुओं का निषेध ज्ञात होता है। इस कारण यहाँ विभावना की ही संभावना नहीं है फिर अतिशयोक्ति से अनुपाशित होने की शंका ही क्या? अ्रतः यहाँ अतिशयोक्ति से अनुप्राशितता का व्यभिचार है।
इस शंका का समाधान यह है कि भगवान् वे केवल जगन् की उत्पत्ति होना यहाँ कवि को अभिग्रेत नही है, जिससे कि बिना अन्य उपादान के भी भगवान् से जगत् की उत्पत्ति हो सकने के कारण अ्रसंभव- मूलक विभावना न हो सके, किंतु जगद्रूपी चित्र की उत्पत्ति। और चित्र की उत्पत्ति केवल चित्र के उपादान स्ाही-हरताल आदि और आधारभूत भित्ति आरदि के तभाव में केवल आकाश के ही रहने पर नहीं हो सकती। अतः असंभव होना जग ही रहा है। और वह चित्र की उत्पत्ति का अ्र्प्संभव होना चित्र के जगदूप में अ्र्नुसंधान करने पर जगत् रूपी चित्र के कारण और जगत् रूनी चित्र के आश्रय के व्यतिरेक को लेकर-अर्थात् वास्तव में इस चित्र का न कोई कारण है न आश्रय, अरतः निवृत्त हो जाता है। इसलिए 'निमनादानसंभारम्' इस उदाहरण में विभावना मानने में कोई बाधा नहीं। ऐसी स्थिति में 'विभावना सवंत्र अरतिशयोक्ति से अनुप्राशित होती है' इस कथन का व्यभिचार हो जाता है।
अतः अलंकारसर्वस्वकार ने जो यह लिखा है कि "विभावनायां सर्वत्रातिशयोक्तिरनुप्राशिका -विभावना में सब्र जगह श्रतिशयोक्ति अनुप्राशिका होती है" यह परास्त हो जाता है और विमर्शिनीकार ने जो यह लिखा है कि "निरुपादानसंभारम् इत्यत्र विभावनाया एवा- भावात्कुत्र व्यभिचार :- उक्त पद्म में विभावना का ही शरभाव होने से
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व्यभिचार कहाँ है ?" इसका भो उच्तर दिया जा चुका है। (अरतः यह समस्या फिर भी उपस्थित ही रहती है कि 'विभावना में अरतिशयोक्ति सर्वेत्र अनुप्रासिका नहीं होती' ।) इस विषय में हमारा कथन है कि विभावना में चाहे सर्वत्र श्रति- शयोक्ति अनुपाणिका न भी हो, किंतु अहार्याभेदबुद्धिमात्र तो सर्वत्र अरनुप्राशक है ही। यह दूसरी बात है कि वह आहार्याभेदबुद्धि कहीं अतिशयोक्ति के द्वारा होती है और कहीं रूपक के द्वारा। इसलिए कोई दोष नहीं।
कुवलयानन्दकार का खएडन कुवलयानंदकार ने छः प्रकार की विभावनाएँ मानी हैं- "(१) कारण के बिना कार्य की उत्पत्ति, (२) कारणों के समग्र न होने पर कार्य की उत्पच्ि, (३) प्रतिबंधक होने पर भी कार्य की उत्पत्ति, (४) जो कारण न हो उससे कार्य की उत्पत्ति (५) विरुद्ध वस्तु से कार्य की उत्पत्ति और (६) कार्य से कारण की उत्पत्ति; तथा इनके क्रमशः ये उदाहरण दिये है- (१) "अप्यलाक्षारसासिक्तं रक्तं तन्व्याः पदाम्बुजम् । कृशाङ्गी का चरणकमल लाक्षारस न लगाने पर भी लाल है।" (२) "अस्त्नैरतीचणकठिनैजगञ्जयति मन्मथः । कामदेव भोटे और कठोर अस्त्रों से जगत् का विजय करता है।" (३) "सातपत्रं दहत्याशु प्रतापतपनस्तव। आपषा प्रतापरूपी सूर्य छत्रधारी को शीघ्र जलाता है।" (४) "शङ्ाद्वोणानिनादोऽयमुदेतिमहदद्भुतम् ।
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अत्यन्त अद्भुत है कि यह वीणा का निनाद शङ्ग से उत्पन्न हो रहा है।" (५) "शोतांशो: किरणाहन्त दहन्ति सुद्दशो दृशौ। खेद है कि चन्द्रमा के किरण सुनयनी के नयनों को जला रहे हैं।" (६) "यश:पयोधिरभवत्कर कल्पतरोस्तव। आरपके हाथरूपी कल्पवृक्ष से यशरूपी समुद्र उत्पन्न हुआ।"
इस विषय में हमें यह कहना है कि-आप जो 'प्रतिबंधक होने पर कार्योपत्ति को तृतीय और बिना कारण से कार्योत्पत्ति को चतुर्थ' इत्यादि कहकर विभावना के भेदों को गिना रहे हैं, इससे यह सिद्ध होता है कि 'विना कारण के कार्य की उत्ति'-यह (जो आपने प्रथम- भेद बताया है वह) भी विभावना का एक भेद ही है, क्योंकि यदि ऐसा न मानो तो उक्त भेदों की तृतीय-चतुर्थादि भेद कहना नहीं बनता और यदि ऐसा मानते हैं तो प्रश्न होता है कि जैसे "सादृश्य- मुपमा भेदे-भेद होने पर सादृश्य को उपमा कहते हैं"' "तदूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः-उपमान और अमेय के श्भेद को रूपक कहते हैं" इत्यादि लक्षणों से लक्षित सामान्य उपमा सामान्य रूपक आरदि के 'पूर्णा' आदिक और 'सावयव' आदिक भेद कहे गए हैं इस तरह यहाँ सामान्यविभावना का लक्षण क्या है? जिस लक्षण से लच्चित सामान्य विभावना के आपके बताए हुए ये प्रकार सिद्ध हो सकें।
यदि आप कहें कि 'कारण के बिना कार्य की उत्पचि' यह सामान्य लक्षण है। तो यह उचित नहीं, क्योंकि आपने इसको भी प्रकारों के अन्दर ही गिना दिया है, अतः यह भी एक प्रकार ही हुआ-सामान्य लक्षण नहीं।
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अब यदि आरप यह कहें कि अतिशयोक्ति आदि के समान 'उक्त 'सकल प्रकारों में से कोई एक होना' यह सामान्य लक्षण तर्कित कर लेना चाहिए। तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा करने पर भी प्रथम प्रकार से द्वितीय प्रकार की विलक्षणता कठिनता से ही सिद्ध हो सकेगी। कारण यह है कि 'कारण के अभाव में भी कार्य की उत्पत्ति' यहाँ पर 'कारणतावच्छेदक संबंध से कारणतावच्छेदक से अरवच्छिन्न (अथात् सभी प्रकार के) कारणा का अ्र््रभाव' ही कहना त्भीष्ट है, क्योंकि असमग्र कारण को पृथक स्व्रीकार करने की अ्पेक्षा इस विवक्षा में ही लाघव है। इसी तरह प्रतिबंधक भी कारण का अभाव रूप ही है, क्योकि प्रतिबंधकाभाव कारण ही तो है। इसलिए तृतीय भेद में भी कोई विलक्षणता नहीं रहती। चौथे भेद में भी अर्थतः कारणभाव आ जाता है, क्योंकि 'यह वीखा का शब्द शङ्ग से हो रहा है' यह कहने पर 'वीखा के बिना ही वाखा का निनाद' हो रहा है यही प्रतीत होती है, अतः इन दोनों कथनों में कोई विलक्षणता नहीं है। (इसी प्रकार पञ्चम 'विरुद्ध' और षछ 'कार्य' भी कारण से व्यतिरिक्त ही हैं) अतः प्रथम प्रकार से ही अन्य सब प्रकारों के व्यात होने के कारण छः प्रकार की विभावना है यह कहना अनुपपन्न ही है। इतने पर भी यदि किसी प्रकार कुवलयानंद के कथन का समर्थन करना ही चाहिए-यह आग्रह हो तो इस तरह समर्थन करिए। आप कहिए कि 'कारणा के बिना कार्य का जन्म' (जो ऊपर से समझना चाहिए) यह विभावना का सामान्य लक्षण है और यह विभावना प्रथमतः दो प्रकार की है-(१) शाब्दी (जहाँ शब्द द्वारा कारख के अरभाव का प्रतिपादन हो) और (२) आर्थी (जहाँ कारण का अभाव अर्थ से प्रतीत हो)। उनमें से शाब्दी विभावना तीन प्रकार की है (१) प्रतिबंधक से अ्रतिरिक्त काररवस्तु के अरभाव की उक्तिपूर्वक- अर्थात् जिसमें कारण के अ्रभाव का प्रतिबंधक के रूप में वर्शन न
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होकर कारणरून वस्तु के अभाव का वर्शन हो (जैसा प्रथम मेट में है) (२) कारण वस्तु के विद्यमान होने पर भी कारणताबच्छेदक धर्म और कहीं-कहीं कारणतावच्छेदक संबंध से अवच्छिन्न होने में जिसकी विकलता (कमी) के कारण कार्य का आभाव हो उसकी विकलता की उक्तिपूर्वक अर्थात् कारणवस्तु का वर्शन होने पर भी उसमें कुछ त्रुटि होना (जैसा द्वितीय मेद में है) । यहाँ 'जिस' शब्द से कारणता- वच्छेदक धर्म और कहीं कारणतावच्छेदक संबंध समझना चाहिए। (३) प्रतिबंधक की उक्तिपूर्वक-अर्थात् कार्य में रुकावट डालने वाले के रहते हुए भी कार्य की उत्पप्ति। इसी तरह आर्थी विभावना भी तीन प्रकार की है (१) प्रस्तुत कार्य (जैसे वीणानिनाद) के सजातीय अन्य किसी कार्य (शङ्गनाद) के कारण (शङ्ग) से प्रस्तुत कार्य (वीणानिनाद) की उत्पत्ति अथवा (२) प्रस्तुत कार्य (जैसे दाह) से विरुद्ध कार्य (शीतलता) के कारण (शीतांशु) से प्रस्तुत कार्य (दाह) की उत्पत्ति किंवा (३) अपने (जैसे पयोधि के) कार्य (कलपवृक्ष) से ही प्रस्तुत कार्य (पयोधि) की उत्पत्ति। इसी अरभिप्राय से 'अरकारण से कार्य का जन्म' इत्यादिक (चतुर्थ, पंचम और षष्ठ विभावना के प्रकारों का वर्णन) है।
विभावना के भेद
यह विभावना दो प्रकार की है (१) उक्तनिमिचा औरर (२) अ्रनुक्तनिमित्ता।
उनमें से अनुक्तनिमित्ता विभावना "विनैव शस्त्रं" इस पूर्वोक्त उदाहरण में दिखाई जा चुकी है; क्योंकि वहाँ काम-पीड़ा के उत्पादक विलासों (स्त्रियों के हावभाव) रूपी (हृदयविदारक) निमिचों का वर्शन नहीं किया गया है। १०
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उक्त निमित्ता; जैसे -
यदवधि विलासभवनं यौवनमुदियाय चन्द्रवदनायाः। दहनं विनैव तदवधि यूनां हृदयानि दद्यन्ते।। जब से विलासों का भवन चंद्रमुखी का यौवन उदित हुआ तब से तर्खों के हृदय बिना ही अग्नि के जलते रहते हैं। - इस उदाहरख में वसित 'यौवन' में दाह की कारणता पर्यवसित होती है-अर्थात् यहाँ तरुगों के हृदयदाह के निमित्त 'यौवन' का वर्गन है।
अलंकारसर्वस्व पर विचार
और जो अलंकारसर्वस्वकार आरदिकों ने लिखा है कि- "असंभृतं मण्डनमङ्गयष्टेरनासवाख्यं करणं मदस्य। कामस्य पुष्पव्यतिरिक्तमस्त्रं बाल्यात्परं साथ वयः प्रपेदे॥ इसके अनंतर पार्वती ने शैशव से आरगे की अवस्था (यौवन) प्राप्त की, जो शरीर का अरसंभृत (विना सामग्री के-स्वाभाविक्) भूषण है और आसव (मध) नाम न होते हुए भी मद का साधन है और पुष्नों (जो कामदेव के अस्त्ररूप में प्रसिद्ध हैं) के शरतिरिक्त कामदेव का शरस्त्र है।
यहाँ द्वितीय चरणा में 'आसव के न होने पर भी मद का प्रतिपा- दन करने' से और 'यौवन' के उक्त होने से उक्तनिमित्ता विभावना है। प्रथम और तृतीय चरण में तो विभावना नहीं है, क्योंकि 'संभरण' और 'पुष्प' ये दोनों क्रमशः मंडन और अस्त्र के प्रति हेतु नहीं हैं।"
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इस पर विचार किया जाता है-विभावनादिक अलंकार विरोध- मूलक हैं, क्योंकि इनमें बिजली की प्रभा के समान आरपाततः प्रतीत होनेवाला विरोध ही चमत्कार का बीज है। और यहाँ पर आसव से भिन्न बताते हुए 'यौवन' को मद का कारण कहा गया है। ऐसी स्थिति में यौवन का 'मद का कारण होना' शब्द से ही गृहीत होने के कारण 'पज्ञ में चावल और जौ के समान' मद में यौवन और आसव दोनों की कारणता एक दूसरे की अपेक्षा न रखकर प्रतीत हो रही है, अतः लेशमात्र भी विरोध प्रतीत न होने के कारण विभावना ही नहीं है, फिर उक्तनिमित्ता विभावना की कथा ही क्या।
यदि कहो कि 'आसव' मद के कारणरूप से प्रसिद्ध है श्रतः उसके बिना मद की उत्पत्ति का वर्णन करने में विरोध की प्रतीति होती ही है तो इसका उत्तर यह है कि वैसी प्रतीति हो सकती थी, यदि कवि ने यौवन को मद का कारण साक्षात् रूप से प्रतिपादित न करिया होता, किंतु यौवन का साक्षात् मद का कारण प्रतिपादन कर देने पर प्रतिद्ध कारण (आसव) के समान उसके अतिरिक्त कवि द्वारा प्रतिपादित मद का दूसरा कारण 'यौवन' भी हो जायगा, शतः (आसव औरर योवन में) कारणता की वैकल्पिक प्रतीति होने के कारण विरोध को प्रतीति नहीं हो सकती। सो यहाँ प्रथम और तृतीय चरण में 'न्यूनाभेदरूपक' और द्वितीय चरण में 'गम्योत्प्रेक्षा है' यह विवेक है-अर्थात् विवेचना से यही सिद्ध होता है।
किंतु हमारे बनाए हुए उदाहरणों में तो दाह का प्रसिद्ध कारण अग्नि ही (का वर्णन) होने से और यौवन की दाहकारणता सुनी नहीं गई है, अतः 'बिना अग्नि के दाह की उत्पत्ति' वर्यन करने में आपाततः विरोध प्रतीत होता है-यह बात सहृदयों को समझनी चाहिए।
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एक शंका और उसका उत्तर
अरब यदि कहा जाय कि आपके लक्षणानुसार फिर भी "मृगमोनसञ्जनानां तृयजलसंतोष विहितवृत्तीनाम्। लुब्धकधीवरपिशुना निष्कारणवैरिणो जगति । अर्थात् क्रमशः तृण-जंल और संतोष से जीवन निर्वाह करने वाले मृग, मत्स्य और सजनों के शिकारी, मछुए और चुगुलखोर इस जगत् में निष्कारण बैरी हैं।" यहाँ विभावना होने लगेगी। यदि इसके उत्तर में कहा जाय कि होने दो विभावना, इससे हमारा क्या बिगड़ा। तो यह उचित नहीं। कारण, आलंकारिकों ने इस जगह विभावना स्वीकार नहीं की है। अब यदि यह परिष्कार किया जाय कि लक्षया में जो 'कारणाभाव' है उसके 'कारणतावच्छेदक रूप से अवच्छिन्न' यह विशेषण और लगा दीजिए-अर्थात् लक्षणों में केवल कार का शभाव नहीं, किंतु 'किसी विशेष रूप में आए हुए कारण का अभाव' समझना चाहिए और प्रकृत उदाहरण में जो कारण शब्द आया है उसमें 'कारणत्वावच्छिन्न का आभाव और अधिक से अधिक लें तो प्रसिद्धकारणत्वावच्छिन्न का श्रभाव' लिया जा सकता है, अतः यह अभाव 'कारणतावच्छेदक रूप से अवच्छिन्न का आभाव' नहीं है, क्योंकि वहाँ पर कारणतावच्छेदक धर्म केवल 'कारणत्व' ही कहा जा सक़ता है उसका कोई रूप (अर्थात् अपराधत्वआदि) नहीं लिखा गया। अतः उक्त उदाहरण में विभावना नहीं हो सकेगी। तो यह भी अधूरा ही उत्तर है, क्योंकि "खला विनैवापराधं भवन्ति खलु वैरियः अर्थात् दुष्ट लोग बिना ही अपराध के बैरी हो जाते हैं।"
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इस उदाहरण में फिर भी अतिव्यापि हो जाएगी, क्योंकि 'अपराधाभाव' कहने पर तो कारणतावच्छेदक 'अपराधत्व' का रूप स्पष्ट ही है। अ यदि कहा जाय कि-विभावना में कार्यभाग के 'अतिशयोक्ति से व्याप्त' अथवा 'अभेदनिश्चय से व्याप्' यह विशेषण लगा दीजिए तो इसस भी काम बनता नहीं। कारण,
"खला विनैवापराधं दहन्ति खलु सज्जनान्। अर्थात् दुष्ट लोग बिना ही अपराध के सजनों को जलाते हैं" इत्यादिक में फिर भी दोष का उद्धार न हो सकेगा-अति- व्याप्ति हो ही जायगी, क्योंकि यहाँ 'पीडा' रूपी कार्य 'जलाने' में अभेद से अध्यवसित है, अतः कार्यभाग अतिशयोक्ति से व्याप्त है ही।
अतः इस पूर्वपक्ष का उत्तर यह है कि-'कार्यभाग में जो विष- यितावच्छेदक हो उससे अवच्छिन्न कार्यता से निरूपित कारणता का अवच्छेदक' ग्रहण करना चाहिए। इससे उक्त उदाहरण में अ्रति- व्याप्ति नहीं होगी, क्योंकि 'खला विनैवापराधम्०' इस उदाहरण में विषयितावच्छेदक है 'दाहत्व' क्योंकि 'दाहत्व' से त्रवच्छिन्न 'दाह' से श्रमिन्न के रूप में पीडा का अध्यवसान हुआ है। अब सोचिए कि दाहत्व से अवच्छिन्न कार्यता से निरूपित कारणता का अवच्छेदक 'अपराधत्व' हो नहीं सकता, (क्योंकि दाह का कारण अग्नि हो सकता है, न कि अपराध) किंतु 'दाहत्व से अरवच्छिन्न (दाह)' से अ्रभिन्न रूप में अध्यवसित जो पीड़ा है उसमें रहनेवाली कार्यता से निरूपित कारणता का अवच्छेदक 'अंपराधत्व' हो सकता है (अर्थात् पीड़ा का कारण अपराध हो सकता है, न कि दाह का), अतः अपराधत्व से अवच्छिन्न (अपराध) के अभाव के साथ (दाहरूपी) कार्य की
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उत्पत्ति का वर्गन करने पर भी यहाँ विभावना की अरतिव्यापि नहीं होती।
हाँ, यदि "खला विनैव दहनं दहन्ति जगतीतलम्। अर्थात् दुष्ट लोग बिना अग्नि के ही भूतल को दग्ध कर देते हैं।" यह बना दिया जाय तो विभावना हो ही जायगी, अतः कोई दोष नहीं। (इस सब का सरल भाषा में सारांश यह है कि-केवल 'कारण' शब्द लिखकर उसका अभाव वर्णन कर देने मात्र से (जैसा कि 'निष्कारण' शब्द में है) विभावना नहीं हो सकती औरर न कार्योश के अतिशयोक्ति से अथवा अभेदनिश्चय से व्याप्त होने पर ही हो सकती है, किंतु जिससे अरभिन्न रूप में कार्योश का वर्णन किया गया हो (जैसे दाह से अभिन्न रूप में पीड़ा का ) उस (दाह) के कारण (अरग्नि) का अरभाव वर्णन किया जाय तभी विभावना होती है, जैसे कि 'खला विनैव दहनं दहन्ति जगतीतलम्' में है, न कि 'खलाविनैवा- घराधं दहन्ति खलु सजनान्' इस उदाहरण में, क्योंकि यहाँ 'अपराध' पीड़ा का कारण है, पर पीड़ा जिससे अभिन्न रूप में मानी गई है उस 'दाह' का कारण नहीं है।)
इसी प्रकार-
"कमलमनम्भसि कमले च कुवलये तानि कनकलतिकायाम्। सा च सुक्ुमारसुभगेत्युत्पातपरम्परा केयम् । अर्थात् बिना जल के कमल है, कमल में दो कुवलय हैं और ये तीनों कनफलता पर हैं और वह कनकलता अत्यंत कोमल
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और सुंदर है। यह कौन उत्पात की परंपरा है।" इस किसी दूसरे कवि के अतिशयोक्ति के उदारहणरूप पद्य में भी विभा- वना है ही। यह दूसरी बात हैं कि 'बिना जल में कमल है' इस भाग में शाब्दी विभावना है और 'कमल में कुवलय'तथा 'कनकलता पर ये तीनों हैं' यहाँ आर्थी विभावना है ( क्योंकि 'कनकलता' कमल और कुवलयों का तथा 'कमल' कुबलयों का कारण नहीं है, पर यह बात शब्दों में नहीं लिखी है, अतः 'बिना कारण के कार्य की उत्पत्ति' अर्थतः सिद्ध होती है) यह है इस सबका संक्षेप।
विभावना समाप्त
विशेषोक्ति
लक्षण प्रसिद्ध कारणकलाप के साथ रहने पर वर्णन की जानेवाली कार्य की अनुत्पत्ति को विशेषोक्ति कहते हैं। विवेचन
इस अलंकार में कारण की विद्यमानता होने पर भी कार्य की उत्पच्ति न होने में विरोध प्रतीत होता है, परंतु वह प्रसिद्ध से भिन्न कारया की विकलता (न्यूनता) का ज्ञान होने से निवृत्त हो जाता है।
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(१५२ )
उदाहरय उपनिषदः परिपीता गीतापि च हन्त मतिपथं नीता। तदपि न हा विधुवदना मानससदनाद्वहिर्याति॥ उपनिषदों का पूर्णतया पान कर लिया-घोल घोल कर पी ली, और गीता को भी बुद्धिपथ में ले लिया-खूब सोच समझ लिया, तथापि खेद है कि मानसभवन से चंद्रमुखी नहीं हटती।
अ्रथवा प्रतिपलमखिलाँल्लोकान्मृयुत्मुखं प्रविशतो निरीच्यापि। हा हतकं चित्तमिदं विरमति नाद्यापि विषयेभ्यः ।।
सब लोगों को प्रतिपल मृत्यु के मुख में प्रवेश करते देखकर भी यह मरा चिच आज भी विषयों से विरत नहीं होता।
उदाहरणा का विवेचन
यहाँ उपनिषद का अ्र्थ विचार करने से सब जगत् के अनित्यत्व का ज्ञान जो कि वैराग्य का प्रसिद्ध हेतु है उसके होने पर भी वैराग्य की अनुत्पत्ति का वर्शन करने से 'राग की अधिकतारूपी' प्रतिबंवक प्रतीत होता है। विशेषोक्ति के भेद यह अनुक्तनिमित्ता विशेषोक्ति है, क्योंकि वैराग्य की अनुत्पत्ति के निमित्तरूप 'प्रतिबंधक (रागाधिक्य)' का वणन नहीं किया गया है। इसी पद्य में यदि तृतीय चरण 'रागान्धं चिचमिदम् (अर्थात् यह राग से अंध चित्त)' यों बना दिया जाय तो यही उक्तनिमित्ता विशेषोक्ति का उदाहरय हो जायगा।
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(१५३ )
कुछ विद्वान् अचित्यनिमित्ता तृतीय विशेषोक्ति भी मानते हैं औरर उसका उदाहरण यह देते हैं- "स एकस्त्रीणि जयति जगन्ति कुसुमायुधः । हरतापि तनुं यस्य शंुना न बलं हृतम्।।
वह कामदेव अकेला ही तीनों लोफों का जय करता है, जिसका शरीर हरण करते हुए भी शिवजी ने बल हरण नहीं किया।" उन विद्वानों का अभिप्राय यह है कि-अनुक्तनिमिचा विभावना में यदि सोचा जाय तो निमित्ततावच्छेदक के रूप में निमिच प्रतीत हो जाता है (जैसे पूर्वोक्त उदाहरण में राग की अरधिकता)। किंतु इस उदाहरण में ऐसा नहीं है, अपितु 'कुछ निमित्त होगा' इस आरकार से प्रतीति होती है। इस तरह अनुक्तनिमित्ता से अचिंत्यनिमित्ता का भेद है!
दूसरे विद्वान् तो कहते हैं कि-अनुक्तनिमिचा में निमिच्त का विशेषण 'चिन्त्य' नहीं लगाया गया है, क्योंकि यदि निमित्त के विशे- षणों के भमेले में पड़ा जाय तो अन्य अनेक भेदों की कल्पना का गौरव होगा। अतः यह मानना चाहिए कि 'चिन्त्य' अथवा अचिन्त्य' ये दोनों ही प्रकार के निमिच जहाँ वर्शन नहीं किए गए हों वह अनुक्तनिमित्ता विशेषोक्ति है। इस कारण अचिन्त्यनिमित्ता विशेषोक्ति अनुक्तनिमिच्ा से पृथक होने योग्य नहीं है। कारण की विद्यमानता बाधित होती है अथबा कार्य की अनुत्पत्ति 'इस अलंकार में कार्य की अरनुपपत्ति से कारण की विद्यनानता बाधित होती है' यह अनेक विद्वानों का मत है, किंतु वास्तव में तो कार्य की अनुत्पच्ति ही इस अलंकार में बाघित होती है; क्योंकि-
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(१५४ )
"कर्पूर इव दग्धोऽपि शक्तिमान्यो जने-जने। नमोऽस्त्ववार्यवीर्याय तक्मै मकरकेतवे।।
जो कपूर के समान दग्ध होने पर भी प्रत्येक प्राणी पर शक्तिमान् है ऐसे अनिवार्य पराक्रम वाले कामदेव को नमस्कार है।" "स एक स्त्रीणि जयति जगन्ति कुसुमायुधः । 1 हरतापि तनुं यस्य शंभुना न बलं हृतम्।" (इसका अर्थ अरभी-श्रभी लिखा जा चुका है) इत्यादि प्राचीनों के प्रसिद्ध उदाहरणों में 'काम के शरीरनाश रूपी' कारण की विद्यमानता प्रमाश (पुराणादिशास्त्रों) द्वारा सिद्ध होने के कारण बाधित नहीं हो सकती। कारण, ऐसे उदाहरणों में सभी लोगों को यही बोध होता है कि 'कामदेव के शरीर का नाश होने पर भी शक्ति और बल का नाश क्यों नहीं हुआ' न कि 'शक्ति और बल के विद्यमान रहते हुए भी शरीरनाश कैसे हो गया' यह बोध। प्रत्युदाहरण दृश्यतेऽनुदिते यस्मिन्नुदिते नैव दृश्यते। जगदेतन्नमस्तस्मै कस्मैचिद्धोधभानवे।। जिसके उदय न होने पर यह जगत् दिखाई देता है और जिसके उदय होने पर यह जगत् नहीं दिखाई देता उस किसी 'बोधरूपी' सूर्य को नमस्कार है।
यहाँ उदय के अभाव में जगत् के दर्शन का और उदय होने पर दर्शन के श्रभाव का वर्शान होने पर भी विभावना और विशेषोक्ति नहीं हैं, क्योंकि यहाँ पर साहजिक सूर्योदय का वर्णान नहीं है जिससे विभा-
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वना और विशेषोक्ति का प्रसंग होता। यदि यहाँ पर साहबिक सूर्योदय का ही वर्णन होता तो 'सूर्य के उदय होने पर यह जगत् दिखाई नहीं देता है' इस उक्ति का संभव ही नहीं होता, क्योंकि सूर्य उदय हो और वस्तु दिखाई न दे यह कैसे हो सकता है, कितु यहाँ पर 'ब्रह्म और आत्मा की एकता के बोधरूपी' सूर्य का वर्णन है, जिसका काम ही है 'जगत् का न दिखाई देना', न कि जगत् का दिखाई देना। यदि फिर भी 'जगत् का दिखाई देना' बना रहे तो सूर्योदय के समान इस उक्ति का भी संभव नहीं हो सकता, क्योंकि पूर्वोक्त बोष के उदय होने पर भी जगत् दिखाई दे तो बोध हुआ ही क्या। इसी कारण यहाँ पर बोध और सूर्य में (अभेद न मानकर) ताद्रूप्य रूपक मानते हुए बोध में सूर्य से विशेषता बताने के कारण व्यतिरेकालंकार उल्लसित होता है। .
शाब्दी और आर्थी विभावना और विशेषोक्ति का विवेक जहाँ कारणाभाव के प्रतिपादन के साथ जिनका अभाव है उनका (अर्थात् कारण और कार्य का) भी शब्दतः प्रतिपादन हो वहाँ शाब्दी विभावना और शाब्दी विशेषोक्ति होती है; जैसे-
भगवद्वदनाम्भोजं पश्यन्त्या अप्यहर्निशम्। तृणाऽधिकमुदेति स्म गोपसीमन्तिनीदृशः।।
भगवान् के मुखारविंद को रात-दिन देखती हुई भी गोपाङ्गनाश्रं की दष्टि में अधिकाधिक तृष्णा का उदय होता था। संसार में 'समीप न होना' तृष्णा का कारण माना जाता है, इस कारणा के अभाव रूप 'समीप होने' पर भी यहाँ तृष्णा का वर्णान किया गया है। इसी प्रकार 'समीप होना' तृप्ति का कारण है, उसके होने पर भी 'तृप्ति का अभाव' बताया गया है, परंतु पूर्वोक्त प्रकार से
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कारणाभाव और कार्याभाव का प्रतिपादन नहीं है, अतः विभावना और विशेषोक्ति के संदेह-संकर का अर्थतः प्रतिपादन ही है। इसी बात को मन में रखकर मम्मट भट्ट ने- यः कौमारहरः स एव हि वरस्ता एव चैत्रक्षपा- स्ते चोन्मीलितमालतीसुरभयः प्रौढाः कदम्बानिलाः। सा चैवास्मि तथाऽपि तत्र सुरतव्यापारलीलाविधौ रेवारोधसि वेतसी-तरुतले चेतः समुकएठते ॥'
इस पद् का उदाहरण देकर कहा है "अत्र स्फुटो न कश्चिद- लंकार :- अर्थात् यहाँ कोई स्पष्ट अलंकार नहीं है"। तात्पर्य यह है कि वहाँ भी विभावना और विशेषोक्ति का संदेह-संकर ही है।
वामन का मत और उसका खंडन। वामन ने तो "एकगुशहानिकल्पनायां साम्यदाढ्य विशेषोक्ति :- अर्थात् एक गुण से हीनता की कल्पना करने पर भी समानता की दृढता को विशेषोक्ति कहते हैं।" और उदाहरण दिया है कि-
१-कोई स्वाधीनपतिका अपनी सखी से कहती है-यद्यपि जो कौमार्य का हरण करनेवाला है-अर्थात् जिसके साथ सुहागरात से हो संबंध है वही प्रतिदिन का अनुभूत वर है, यद्यपि वे ही चैत्र की रात्रियाँ हैं-जिनका जीवन में अनेक बार अनुभव किया जा चुका है, यद्यपि वे ही खिली मालती (वासन्तिक लता) से सुगंधित श्रौढकदम्बानिल (धूली कदम्ब) है, और बही-जिसने इन सब का अनेक बार उपभोग कर लिया है-मैं हूँ-अर्थात् कोई वस्तु नवीन नहीं है, तथापि उन्हीं सुरत की चेष्टाके वेषविन्यासादिविधान में, रेवा के तट में और वृक्ष के समान वेतसलता के अधोभाग में चित्त उत्कंठित हो रहा है।
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"द्यूतं हि नाम पुरुषस्यसिंहासनं राज्यम्-अर्थात् जुश्रा पुरुष के लिए सिंहासन रहित राज्य है।" यहाँ विचार करने पर यह सिद्ध होता है कि-द्यूत में राज्य का तादात्म्य से आरोप है। उसमें यह कठिनता होती है कि सिंहासनरहित द्यूत सिंहासनसहित राज्य के तादात्म्य को कैसे पा सके, आरोप को उखाड़नेवाली इस युक्ति के हटाने के लिए आराष्यमाण राज्य में भी 'सिंहासनरहितता' की कल्पना कर ली गई है। अतः यह दृढारोफ रूपक ही है, विशेषोक्ति नहीं। इस तरह यह सिद्ध हुआ कि- "अचतुर्वदनो ब्रह्मा द्विवाहुरपरो हरिः। अभाललोचनः शंभुर्भगवान्बादरायखः॥
अर्थात् भगवान् वेदव्यास बिना चार मुख के ब्रह्मा, दो भुजवाले दूसरे विष्णु और भाललोचन से रहित शिवं हैं।" इस पुराण के पद्य में भी रूपक ही है। इसी प्रकार गुण की शअधि, कता की कल्पना में भी; जैसे- "धर्मो वपुमान्ुवि कार्तवीर्यः
सहस्रबाहु अरजुन पृथ्वी पर मूर्तिमान धर्म है" इत्यादि उदाहरणों में भी रूपक ही है। इस उपर्युक्त विवेचन से "एकगुशहान्युपचयादिकल्पनायां साम्य- दाव्य विशेषणाम्-अर्थात् एक गुश की हानि अथवा वृद्धि आदि की क़ल्पना करके सादृश्य की दढता को विशेषण कहते हैं।" इस तरह विशेषालंकार का लक्षण बनाने वालों को भी उत्तर मिल जाता है। विशेषोक्ति समाप्त।
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त्रप्रसंगतिः
लक्षण
आपाततः (ऊपर-ऊपर से) विरुद्धरूप में प्रतीत होने वाली हेतु और कार्य कीव्यधिकरणता (भिन्न आधार में रहना) असंगति अलंकार कहलाती है।
लक्षण का विवेचन
स्पृशति त्वयि यदि चापं स्वापं प्रापन्न केऽपि नरपाला:। शोये तु नयनकोे को नेपालेन्द्र! तव सुखं स्व्रपितु॥
हे नेपालनरेश ! यदि आरपके धनुष पर हाथ डालने के समय (भी) कोई राजा निद्रा न पा सके तब आपके नयनकोण के लाल होने पर तो कौन सुख से सो सकता है।
यहाँ 'धनुष पर हाथ डालना' और 'नेत्र का लाल होना' इन दोनों कारणों का निद्रानाशरूपी कार्य मिन्न-भिन्न आधारों में है- अर्थात् यहाँ कारण (चापस्पर्श तथा नेत्र की लाली) नेपालराज में है और उसका कार्य (निद्राभंग) शत्रु राजाओं में है। इस उदाहरण में अरतिव्याप्ति न होने के लिए 'ऊपर-ऊपर से विरुद्धरूप में प्रतीत होने वाली' यह लिखा गया है। चाप-स्पर्श और नयन की लाली भिन्न देश में रहने पर ही निद्रा-नाश रूपी कार्य के प्रयोजक हो सकते हैं, श्रतः यहाँ 'विरुद्ध रूप में प्रतीत होने' को शरवकाश ही नहीं है।
आप कहेंगे कि 'नेत्र की लाली' से अभिव्यक्त 'रोष' की भिन्न- देशता हो सकती है, क्योंकि वह कालिक संबंध से निद्रा-नाश का हेत
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(१५६)
है, किंतु धनुष का स्पर्श तो लीला से किया गया है वह निद्रा-नाश का स्वरूप से हेतु नहीं हो सकना, किंतु चापस्पर्श का ज्ञान, भो कि राजाओरं के अन्तःकरण में ही उद्भूत है उसे निद्रा-नाश के हेतु रूप में स्वीकार करना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में चापस्पर्श के ज्ञानरूपी कारण और निद्रानाशरूपी कार्य के एक ही आधार में होने के कारण व्याधिकरणता कैसे होगी? उत्तर यह है कि लक्षणा में 'हेतु' पद से यहाँ पर प्रयोजक भी लिया गया है। चापस्पर्श यद्यपि निद्रा-नाश का साक्षात् हेतु नहीं है तथापि प्रयोजक है, और 'प्रयोजक होने' का कारण यह है कि नेपाल नरेश के रोष की भ्रमात्मक अनुमिति का चाप-स्पर्श लिंग (हेतु) है- धनुष का स्पर्श करने से शत्रुराजाओं को यह भ्रम होना संभव है कि नेपाल-नरेश कहीं हमारे ऊपर रुष्ट तो नहीं हो गए है? उदाहरण अङ्ग: सुक्ु मारतरैः सा कुसुमानां श्रियं हरति। प्रहरति हि कुसुमवाणो जगतीतलवर्तिनो यूनः ॥ वह (नायिका) अपने अत्यंत सुकुमार अंगों के द्वारा पुष्पों की 'श्री' (शोभा + संपत्ति) को हरणा करती है और कुसुमायुध (कामदेव) पृथ्वीतल पर रहनेवाले (अर्थात् सारी पृथ्वी के) तरुगों पर प्रहार करता है। अ्रथवा जैसे- श्रुत्यन्तपरिशीलिनी। मुच्यन्ते बन्धनात्केशा विचित्रा वैधसी गतिः ।। मृगनयनी की दृष्टि श्रुत्यंत (वेदांत +कानों के छोर) का अत्यंत परिशीलन (श्रभ्यास+स्पर्श) करने वाली है और बंधन से छूटते हैं केश। विधाता की गति विचित्र है।
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यहाँ प्रथम उदाहरण में शुद्ध असंगति है और दूसरे उदाहरण में श्लेष से उपबृंहित है। प्रथम उदाहरण में 'प्रहार करता है' इस शब्द से अध्यवसानरूप 'अतिशय' (निगरण) के द्वारा 'अपराध के कारण ताडन' के रूप में 'कामपीड़ा' अवस्थित है। यहाँ 'कामपीड़ा' विषय है औरर (अपराध के कारण) 'ताडन' विषयी है। इस विषयी भाग के सहारे व्यधि- करणता का ज्ञान होने से विरोध की पुरःस्फूर्ति (ऊपरी प्रतीति) होती है, क्योंकि विषयिभाग (अरपराधनिमिच्तक प्रहार)में ताडन औरर अपराध की समानाधिकरणता प्रसिद्ध है-जो अपराध करता है वही पिटता है। यह विरोध विषयभाग (कामपीड़ा वाले अंश) पर विचार करने के बाद निवृत्त हो जाता है, क्योंकि भावना द्वारा उपनीत 'पुष्पों की श्री के हरा' से अभिव्यक्त शोभाविशेष की कारणता का, अरथवा शोभाविशेष की भावना की कारणता का हेतु रूप में अनुसंधान हो जाता है-अर्थात् यह समझ में आ जाता है कि कामिनी के शोभा- विशेष के कारण कामपीड़ा हो गई है। अतः यह सिद्ध हुआ कि असंगति का अभेदाध्यवसान अनुप्राणक है और विरोधाभास उत्कर्षक है।
इसी तरह अन्यत्र भी समझना चाहिए। अलंकारसर्वस्वकारादि के मत पर विचार
अलंकारसर्वस्वकारादि का मत है कि "असंगति अलंकार में विभावना के समान कार्योश में अतिशयोक्ति का अनुप्रायान आवश्यक है, अन्यथा विरोध मिट ही नहीं सकेगा।"
१-यह मत अलंकारसर्वस्वकार का नहीं, किंतु विमर्शिनीकार का है (देखिए 'असंगति' की विमर्शिनी)।
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यह मत असंगत है, क्योंकि पूर्वोक्त इमारे बनाये हुए 'ष्ठिमृगी- हश:०'इस उदाहरण में व्यभिचरित हो जाता है, क्योंकि 'बंधन से छूटते हैं केश' इस अंश में अरतिशयोक्ति नहीं है किंतु श्लेष के आधार पर केवल अभेदाध्यवसानमात्र है, अतः 'कार्योश में किसी भी प्रकार अरभेद का अध्यवसान आवश्यक है' यह कहना संगत है, 'अतिशयोक्ति' कहना नहीं।
यद्यपि 'दृष्टिर्मृगीदृश:०' इत्यादिक में कारणांश (वेदांत के अभ्यास और कानों के छोर का स्पर्श) में भी शभेद का अध्यवसान संभव है तथापि कारणांश में वह नियमतः नहीं रहता। जैसा कि-
स्विधति सा पथि यान्ती कोमलचरणा नितम्बभारेण। स्विद्यन्ति हन्त परितस्तद्रूपविलोकिनस्तरुणाः ॥ कोमल चरसवाली वह नितंब्रभार से रास्ते में चलती हुई पसीने से भीगती है और खेद है कि चारों ओर उसके रूप को देखनेवाले तरुय पसीने से भीग जाते हैं।
इत्यादि उदाहरखों में 'भार से उत्पन्न स्वेद' इस अंश में अभेदा- ध्यवसान का अभाव है। आप कहेंगे कि वहाँ भी जलपूर्ण घट आदि के भार से उत्पन्न स्वेद के साथ नितंबभार से उत्पन्न स्वेद का अभेदा- व्यवसान है ही, तो यह ठीक नहीं, क्योंकि नितंबभार से उत्पन्न स्वेद (पसीना) अपने स्वरून से भी खेदजनक है, अतः अन्य भार से उत्पन्न स्वेद के साथ अध्यवसान की कोई अपेक्षा नहीं रखता। और- "सा बाला वयमप्रगल्भमनसः सा स्त्री वयं कातराः। यह बाला है और हमारा मन प्रतिभाहीन हो रहा है, वह स्त्री है और हम कायर हो रहे हैं।" ११
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इत्यादि प्राचीनों के पद्य में 'बालात्व' 'स्त्रीत्व' आदि कारणांश में अभेदाध्यवसान के लेश का भी संभव नहीं है। अतः कारणांश में अभेदाध्यवसान की श्रनियतता ही है। विरोध और असंगति का भेद विमर्शिनीकार ने लिखा है कि-विरोधालंकार में एक आधार में दोनों का संबंध होने से विरोध प्रतीत होता है और असंगति में दो भिन्न आधारों में विरोध की प्रतीति होती है इस कारण विरोध से असंगति की विलक्षणता है। यह ठीक नहीं। कारण, असंगति में भी उन-उन कार्यों के कार्यतावच्छेदक और उन-उन कारणों की व्यधि- करणता इन दोनों धर्मों का 'कार्यरूपी एक अधिकरण' में संबंध होने से ही विरोध का प्रतिमान उत्पन्न होता है। अतः विरोधालंकार में औरर असंगति में यह भेद है कि विरोध में उत्पत्ति के विमर्श के बिना ही विरोध की प्रतीति होती है और असंगति में उत्पत्ति के विमर्श- पूर्वक विरोध के प्रतिभान की उत्पत्ति होती है।
वास्तव में तो विरोध और असंगति में यह भेद है कि जो दो पदार्थ व्यधिकरसत्वेन प्रसिद्ध है-अर्थात् एक आधार में नहीं रह सकते, उनका समानाधिकरणत्वेन-अर्थात् एक आधार में निबंधन करने पर विरोधालंकार होता है और जो दो पदार्थ समानाधिकरणत्वेन प्रसिद्ध हैं उनका व्यधिकरणता से (भिन्न-भिन्न आधारों में) निबंधन करने पर अरसंगति होती है।
अरतः पूर्वोक्त असंगति के लक्षण में 'कारण और कार्य की व्यि- करणता' 'समानाधिकरण मात्र की व्यधिकरणता' का उपलक्षण है- अर्थात् दो समानाधिकरण पदार्थों की व्यधिकरणता का नाम अ्संगति है, वे कार्यकरशरूप हों अथवा नहीं। अतः-
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नेत्रं निरञ्जनं तस्पा: शून्यास्तु वयमद्भुतम्। आ्रश्चर्य है कि उसका नेत्र निरंजन (कज्लरहित+श्रव्यक्त) है शरर हम शून्य हैं।" यहाँ निरंजनत्व और शून्यत्व का उताद्योत्ादकभाव संबंध नहीं है, केवल समानाधिकरणता है, इस प्रकार शुद्ध समानाधिकरणरूप में प्रसिद्ध की तरसंगति भी संगत हो जाती है, लक्षण में केवल कार्यकारण- भाव रखने से तो वह न हो सकेगी। इस तरह विरोधालंकार से असंगति का भेद स्ष्ट ही है। रहा यह कि विरोधालंकार से अतिरिक्त शुद्ध विरोध का अंश जो सभी विरोधमूल्क अलंकारों में अनुस्यून रहता है, जैसा कि उपमामूलक शलं- कारों में सादृश्य का अंश, वह तो कुछ अलंकारों को बनानवाला है न कि स्वयं पृथक अलंकारता का पात्, क्योंकि अलंकार केवल उक्ति- विशेषरूप हैं-अर्थात् एक ही वस्तु को भिन्न-भिन्न रूप से बोलने पर भिन्न-भिन्न अलंकार हो जाते हैं, अतः उसमें अनुस्यूत सादृश्य या विरोध की अलंकाररूता आवश्यक नहीं। सो इस तरह विमर्शिनीकार का उदाहृत पद्य भी यदि इसी दिशा में ले जाया जाय तो दोष नहीं है। अप्पयदीक्षित का खंडन औ्रर जो कुवलयानंदकार ने "अन्यत्र करणीयस्य ततोऽन्यत्र कृतिश्च सा। अन्यत्कतु प्रवृत्तस्य तद्विरुद्धकरतिस्तथा।। अपारिजातां वसुधां चिकीर्षन्द्यां तथाऽकृथाः। गोत्रोद्धारप्रवृत्तोऽपि गोत्रोन्ददं पुराऽकरोः॥
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(१) अ्रन्यत्र करने योग्य की उससे भिन्न स्थान पर कृति और (२) अन्य कार्य करने के लिए प्रवृत्त की उसके विरुद्ध कृति ये दोनों भी असंगतियाँ हैं। जैसे (१) पृथ्वी को अरपारिजात (शत्रुहीन) केरना चाहते हुए आप (कृष्ण) ने स्वर्ग को अपारिजात ( पारिजातवृक्ष से रहित) कर दिया तथा (२) गोत्रोद्धार (पृथ्वी के उद्धार) में प्रवृच् होने पर भी पहले (वराहावतार में) आपने गोत्रोद्भेद (खुरों के द्वारा पर्वतों का दलन) कर दिया। यहाँ श्रीकृष्ण के प्रति इंद्र के उपालंभवचन में पृथ्वी पर करने के लिए अभिलषित 'अपारिजातत्व' स्वर्ग में कर दिया गया, यह एक असंगति है, और गोत्रोद्धार में प्रवृत्त होने पर भी वराहावतार के समय खुरों से खोदकर गोत्रोद्भेद कर दिया, यह दूसरी शसंगति है। अथवा जैसे-
त्वत्खङ्गखष्डितसपत्नविलासिनीनां, भूषा भवन्त्यभिनवा भुवनैकवीर। नेत्रेषु कङ्कयामथोरुषु पत्रवल्ली, चोलेन्द्रसिंह तिलकं करपल्लवेषु ।।
हे जगत् के एक वीर ! सिंह सदश चोल नरेश ! तुम्हारे खड्ग से कटे हुए शत्रुओं की स्त्रियों के नवीन आभूषण हो जाते हैं-नेत्रों में कंकरा (वलय +श्यामिका) जाँघों में पत्रवल्ली (पत्ररचनारूप मंडन + पचों सहित लता) और कर पल्लवों में तिलक (तिलक + तिल सहित जल )। मोहं जगत्त्रयभुवामपनेतुमेत- दादाय रूपमखिलेश्वर! देहभाजाम्।
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निःसीमकान्तिरसनीरधिनामुनैव मोहं प्रवधयसि मुग्धविलासिनीनाम्॥
हे अखिलेश्वर ! त्रिलोकी में उत्पन्न प्राशियों का मोह मिटाने के लिए यह रूप ग्रहण करके असीम कांति और रस के समुद्र इसी रूप के द्वारा आप भोली युवतियों के मोह को बढ़ाते हैं।
यहाँ प्रथम उदाहरग में कंकणादि का अन्यत्र करणीयत्व प्रसिद्ध है, इस कारण उसका वर्शन नहीं किया गया। 'हो जाते हैं' के द्वारा भावना रूप 'अन्यत्र कृति' का आक्षेप हो जाता है, अतः लक्षण बैठ जाता है।"
ये दोनों असंगति के भेद लक्षित करके उदाहरया दिए हैं, वे ठीक नहीं है। इन दोनों में से प्रथम उदाहरण 'अपारिजातां वसुघां चिकीर्षन्यां तथा कृथाः' में कारणरूप पारिजातराहित्य करने की इच्छा के साथ 'पारिजातराहित्यरूपी कार्य' की विरुद्ध व्यधिकरणता का निरू- पण होने से 'विरुद्धं भिन्नदेशत्वं कार्य हेत्वोरसङ्गतिः' इस (आपकी बताई हुई) प्रथम असंगति से कोई विलक्षणता सिद्ध नहीं होती, क्योंकि कार्यमात्र के प्रति 'करने की इच्छा' का शरलंबननामफ विषयतासंबंध द्वारा समानाधिकरशात्वेन हेतुता प्रसिद्ध है।
यदि कहो कि 'पारिजातराहित्य' अभावरूप है, और नैयायिकों के मत में अभाव नित्य है, अतः नित्य वस्तु के कारण की प्रसिद्धि न होने से आपकी बात नहीं बनती तो यह उचित नहीं, क्योंकि आलंकारिकों के सिद्धांत में अभाव की जन्यता अभीष्ट है, (अतः नैयायिकों का सिद्धांत यहाँ उठाना उचित नहीं) और यदि जन्य न भी माने तब भी अरसंगति के लक्षण में 'कार्यकारण पद उपलक्षरामात्र है' यह पहले
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कहा जा चुका है। अतः 'करने की इच्छा' के साथ शभाव का कार्य- कारण संबंध न भी हो तो भी कोई दोष नहीं।'
१- नागेश का कहना है कि-आलंकारिकों के मत में अभाव के जन्य होने पर भी 'पारिजातराहित्य' की कारणता चिकीर्षा में कृति के द्वारा अन्यथासिद्ध है, क्योंकि ज्ञान से इच्छा, इच्छा से कृति (प्रयल) और कृति से कर्म होता है, अतः इच्छारूप चिकीर्षा कृति से पूर्ववर्त्ती होने के कारण कार्य से साक्षात् सबंध नहीं रखती। अतः कुलाल- पिता के समान अन्यथासिद्ध है।
(पर यह उत्तर उचित नहीं। इसका उत्तर पहले ही दिया जा चुका है कि यहाँ हेतु शब्द से कारण नहीं किंतु 'प्रयोजक' मात्र लिया जाता है, अतः यह समाधान व्यर्थ है-अनुवादक) चिकीर्षा का अधिकरण में अंतर्भांव होने के कारण हेतुत्व भी नहीं है। (यह भी ठीक नहीं, क्योंकि 'कारणकार्य' शब्द यहाँसमानाधि- करणता के उपलक्षक हैं, यह कहा जा चुका है) और यह भी निश्चित नहीं है कि चिकीर्पित वस्तु जहाँ चिकीर्षित है वहाँ की ही जाय, क्योंकि करना चाहते हुए भी प्रमादादि से अन्यत्र की जा सकती है; अतः व्यधिकर- णता विरुद्ध ही नहीं है। (यह भी अडंगा हो है, प्रमादादि से अन्यत्र हो जाना प्रसिद्धि को कैसे हटा सकता है) दूसरे, 'अपारिजातां वसुधा' यहाँ कार्यकारण की व्यधिकरणता के द्वारा चमत्कार नहीं है, किंतु 'कहीं करना था और कहीं कर दिया' यही चमर्कारजनक है, अतः पूर्व असंगति से इसका भेद उचित भी है। (यदि सहृदय ऐसा समझते हैं तो यह समाधान हो सकता है)
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गोत्रोद्धारप्रधृत्तोऽपि
इस उदाहरण में तो विरुद्धात्कार्यसंपत्तिर्दष्टा काचिद्विभावना इस पंचम विभावना के लक्षण से आक्रांत होने के कारण यह भेद विभावना के ही अंतर्गत हो जाता है। अरतः असंगति के अन्य भेदों की कल्पना अनुचित है। 'गोत्रोद्धार' के विषय में प्रवृत्ति 'गोत्रोद्भेद' रूपी कार्य के प्रति विरुद्ध है। सिद्धांत में भी यहाँ पर विभावना और विशेषोक्ति का संदेहसंकर ही उचित है।' 'नेत्रेषु कङ्गगाम्' इत्यादि उदाहरण में भी 'कंकरत्व' और 'नेत्रा- लङ्गारत्व' के व्यधिकरणरूप में प्रसिद्ध होने से (अर्थात् 'कंकणण' नेत्रालंकार नहीं हो सकता, अतः) समानाधिकरणता के वर्शन के कारण
तीसरी बात यह है कि-यहाँ पूर्व उदाहरण के समान कार्यकारण के विरोध का चमत्कार दुःसमाधानता के कारण नहीं, किंतु आपाततः विरुद्धता से भासमान ही है। इसलिए यह असंगति भासमानविरोध- पूर्वक है। अतः यह कथन विचारणीय है। (यह भी वैसा ही है, दृढ विरोध में ही असंगति हो ऐसा कोई नियम नहीं है) १-नागेश का कहना है कि यह वचन उपालंभरूप है, अरतः यहाँ विरुद्ध कृति के भान द्वारा ही चमर्कार है और विभावना में तो विरोध की निवत्ति के कारण भी चमत्कार हो जाता है, अतः महान् भेद है।
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विरोघाभास ही उचित है।' यही बात 'मोहं जगत्त्रयभुवाम्' इस उदाहरया के मोहनिवर्सकत्व और मोहजनकत्व में भी है।
आप कहेंगे कि-आपके उदाहरणों में भी विरोधाभास से ही काम चल जाता है, फिर विभावनादि की कल्पना निरर्थक है तो इसका उत्तर दिया जा चुका है कि "विरोधमूलक सब अलंकारों में शुद्ध विरो- धांश अनुस्यूत रहता है, किंतु वह पृथक् अलंकार का पात्र नहीं है।"
श्रसंगति समाप्त।
१-नागेश का कहना है कि यहाँ 'कंकण' और 'नेत्र के अलंकार' एक विभक्ति में नहीं आए हैं, अतः शब्द से समानाधिकरणता की प्रतीति नहीं होती और अभेद भी प्रतीत नहीं होता, अतः यह विचार- जीय है और जिन दोनों में विरोध की प्रतीति होती है उनमें अरथांतर लेकर भी समानाधिकरणता की प्रतीति होती है।
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विषमालंकार
लक्षय
अतनुरूप संसर्ग को विषम कहने हैं। लक्षणा का विवेचन 'अनुरूपम्' यह योग्यता के अर्थ में अव्ययीभाव समास है। 'अनुरूपं यत्र न विद्यते' इस प्रकार विग्रह किए हुए बहुव्रीहि समास से 'अननुरूप' का अर्थ 'योग्यतारहित' होता है, और योग्यता का अर्थ है 'यह युक्त (उचित) है' इस लौकिक व्यवहार का विषय होना। सारांश यह है कि जिस संसर्ग को संसार उचित कहता है वह अनुरूप और जिस संसर्ग को अनुचित कहता है वह अननुरूप है।
यह तो हुआ अननुरूप का अर्थ, अब संसर्ग का अर्थ लीजिए। संसर्ग दो प्रकार का है-उत्पत्तिरूप और संयोगादिरूप, इनमें से उत्पच्तिरूप संसर्ग की अयोग्यता, कारण के गुणों से विलक्षय गुण वाले कार्य की उत्पत्ति द्वारा होती है और संयोगादिरूप संसर्ग की अयोग्यता, इष्ट साधनरूप में निश्चित कारण से अनिष्टकार्योत्पत्तियों द्वारा होती है। सो यहाँ दो संसर्गियों में से एक के गुणों अथवा स्वरूप के द्वारा दूसरे के गुणों अथवा स्वरूप के तिस्करणीय होने के कारण अयोग्यता है। इस तरह 'अननुरूप संसर्ग के रूप में सामान्यरूप से कहे हुए और आगे कहेजानेवाले सभी भेदों का संग्रह हो जाता है। क्रम से उदाहरण लीजिए-
उत्पत्तिरूप संसर्ग की अननुरूपता में कारण से विरुद्ध गुण वाले कार्य की उत्पचि; जैसे-
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अमृतल हरी चन्द्रज्योत्स्नारमावदनाम्बुजा- न्यधरितवतो निर्मर्यादप्रसादमहाम्बुधेः । उद्भवदयं देव ! त्वत्त: कथं परमोल्वण- प्रलयदहनज्वालाजालाकुलो महसां गयः॥ हे राजन् ! आपने अमृत की लहरी नंद्रमा की चाँदनी और लक्ष्मी के मुखकमल को नीचा दिखा दिया है और आप अरसीम प्रसन्नता के महासमुद्र हैं, ऐसे आपसे यह परम प्रचंड प्रलयाग्नि की ज्वालामाला से व्याप्त प्रतापसमूह कैसे उत्पन्न हुआ? यहाँ पर माधुर्य (अमृतलदरी द्वारा सूचित), शैत्य (चाँदनी द्वारा सूचित) और श्रह्मादकत्व (लक्ष्मी के मुखककल द्वारा सूचित) एवं प्रसन्नता आदि अनेक गुणों से युक्त करण से उन गुणों से विरुद्ध गुए युक्त (कार्य) प्रताप की उत्पत्ति हुई, अतः कार्यकारणभाव अ्रननुरूप है। यहाँ प्रताप का निमिच्तकारण राजा, अभेदाध्यवसानरूप श्रतिशय द्वारा समवायिकारण के रूप में स्थित है अथवा निमिची (कार्य-प्रताप) अभेदाध्यवसानरूपी अ्र्रतिशय द्वारा निभित्तकारख (राजा) में समवेत कार्यरूप से स्थित है, दोनों ही स्थितियों में विषय (राजगत माधुर्य आदि) के निगरण करनेवाले विषयी' के अ्रंश (अमृतलहरी आदि १-यहाँ दोनों पुस्तकों में पाठ अशुद्ध होने से स्वयं निर्मित उलटे पाठ के चक्कर में पड़कर शत्रुओं को प्रताप का समवायिकारण बताने वाली सरला की लीला की विलक्षणता विलोकनीय है। वस्तुतः शुद्ध पाठ यों है- "विषय्यंशमालम्ब्य स्फुरितो विरोधो विषयांशविमर्शोत्तरं निवनते।" -शनुवादक
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के माधुर्य आदि) को लेकर स्फुरित होने वाला विरोध, विषय के श्रंश (राजगत माधुर्यादि) के विमर्श के अनंतर निवृच् हो जाता है (क्योंकि जिस माधुर्य, शैत्य, श्रह्लादकत्वादि के आधार-श्रमृतलहरी आदि-के द्वारा ज्वालामालाकुल वस्त का उत्पन्न होना विरुद्ध है, उस माधुर्यादि से राजगत माधुर्य आदि भिन्न हैं और उनका कोश- दण्डज नेज रूप प्रताप के साथ रहना त्रिरुद्ध नहीं है)। इस कारण यहाँ भी अभेदाध्यवसान अनुप्रासक है और उससे उत्थापित विरोधा- भास परिपोषक है और यही अंश कवित्रतिभानिमिंत होने के कारणा यहाँ अलङ्कारता का बीज है। "संयोगादिरूप संसर्ग की अर्रयोग्यता इष्टसाधनतारूप में निश्चित कारण से अनिष्टकार्योत्पत्तियों द्वारा" इस लक्षणविवेचन के पूर्वोक्त अरंश में जो 'अनिष्टकार्योत्पत्ति' शब्द है, उसमें एकशेष१ से घटित एकशेष समझना चाहिए। अतः उसके तीन अर्थ होते हैं। (१) अनिष्ट अर्थात् अनर्थरूप कार्य की उत्पत्ति (२) इष्ट कार्य की उत्पत्ति न होना और (३) अनिष्ट अर्थात् अनभीष्ट (इष्ट नहीं ऐसे) कार्य की उत्पत्ति इन सभी को "अ्रनिष्टकार्यातत्ति" शब्द से ग्रहण किया गया है। इस तरह यह सिद्ध हुआ कि इष्ट कार्य की अरनुतत्ति और अरनिष्ट कार्य की उत्त्ति ये दोनों कार्य जहाँ एक साथ हों वह एक भेद है। केवल इष्टकार्य की अ्रनुत्यच्ति यह दूसरा भेद है। औ्रर केवल अनिष्ट कार्य की उत्प्ति यह तीसरा भेद है। इस तरह ये तीनों भेद "अ्रनिष्टकार्योतचि" शब्द से
१-संस्कृत में अ्र्प्निष्टकार्योत्पत्ति का विग्रह यों होगा। "अनिष्ट मनर्थः तादृशकार्योत्पचिश्च न इष्टकार्योत्पचिश्चेत्यनिष्टकार्योत्पची । ते चानिष्ट (अनभीष्ट) कार्योत्पचिश्चेत्यनिष्ट कार्योत्पयः"।
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संगृहीत हो जाते हैं। इष्ट शब्द से चार वस्तुएँ समझरी बाती हैं (१) अपने किसी सुखसाधन वस्तु की प्राप्ति (२) अपने किसी दुःखसाधन वस्तु की निवृत्ति (३) और विरोधी के दुःखसाधन वस्तु की प्राप्ति (४) तथा उसके सुस्साधन वस्तु की निवृच्ति। इस प्रकार इष्ट की अप्राप्ति वाले दो भेदों में से प्रत्येक के चारन्चार भेद हो जाते हैं। अनिष्ट भी तीन प्रकार का है-(१) अपने दुःखसाधनरूप वस्तु की प्राप्ति (२) विरोधी के सुखसाघनरूप वस्तु की प्राप्ति और (३) विरोधी के दुःखसावनरूप वस्तु का नाश। यद्यपि अपने इष्ट की अप्राप्ति भी यहाँ गिनी जानी चाहिए, शरतः इसके भी चार भेद होने चाहिए थे, तथापि इष्ट वस्तु की श्रप्राप्ति पृथक गिनी जा चुकी है, अतः अनिष्ट में उसकी गणना नहीं की गई। इस तरह अनिष्ट प्रापतिवाले दोनों भेदों में से प्रत्येक के तीन तीन भेद हो जाते हैं। इन सब भेदों में से कुछ भेदों के उदाहरण आगे दिए जाते हैं। उदाहरण ( १) इष्ट के लिए प्रयुक्त साधन से इष्ट की अरनुत्पत्ति औरर अरनिष्ट की उत्पच्ति; जैसे- दूरीकतु प्रियं बाला पद्मेनाताडयद्दुषा। स बागेन हतस्तेन तामाशु परिषस्वजे॥ मुग्धा नायिका ने प्रिय को दूर हटाने के लिए पभ्म से ताड़न किया, उस (काम-)बाख से ताड़ित प्रिय ने उसका तत्काल आलिङ्गन कर लिया। यहाँ 'प्रिय के हटाने' रूपी 'इष्ट' के लिए प्रयुक्त 'पद्म' द्वारा 'ताडन' रूपी कारण से प्रिय का हटना तो दूर रहा प्रत्युत प्रिय के द्वारा आलिङ्गन रूप 'अनिष्ट' की उत्पच्ति हो गई।
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अरथवा जैसे- खञ्जनद्दशा निकुञ्जं गतवत्या गां गवेषयितुम्। अपहारिताः समस्ता गावो हरिवदनपङ्कजालोकात्॥ खंघननयनी 'गोगवेषय' (गाय हूँढ़ने) के लिए कुंज में गई थी, किंतु भगवान् के मुखक्मलदर्शन से 'समस्त गोहरण' (समस्त गायों का लुटना + समस्त इंद्रियों का हरणा-मुग्ध होना) करवा दिया। उदाहरण का विवेचन पूर्व उदाहरण में वस्तुतः ही अनिष्ट हुआ अर्थात् जिस आलिंगन को वह नहीं चाहती थी वह बलात् गले पड़ गया। इस उदाहरण में यद्यपि 'समस्त गोहरण' का दूसरा अर्थ 'समस्त इंद्रियों का हरण' लोक में भी अनिष्ट सा ही है तथापि यहाँ उसको सामने रखने पर चमत्कार नहीं रहता, कितु 'गोहरण' के प्रथम अर्थ के सामने रहने पर ही चमत्कार रहता है, अतः 'गोहरण' शब्द के दोनों श्र्थों के श्लेषमूलक अरभेदाध्य- वसान के द्वारा 'गोहरणा' का द्वितीय अर्थ 'इंद्रियहरण' भी 'सकलधेनु- हरस' रूपी अरनिष्ट के रूप में स्थित होकर अनिष्ट होता है-यह विशे- बता है। आप कहेंगे कि पूर्व उदाहरण में इष्ट की अप्राप्ति और अनिष्ट की प्राप्ति दोनों का वर्णन है और इस उदाहरण में जिस 'गोगवेषण' के लिए खंजननयनी गई थी उसकी अप्राप्ति का वर्शन न होने से यह केवल अनिष्टप्राप्ति का ही उदाहरण है, अरतः इस उदाहरण में प्रथम उदाहरय से यह विशेषता भी मानी जानी चाहिए, तो यह उचित नहीं; क्योंकि 'समस्तगोहरण' शब्द सामान्यवाचक है अरतः ढूँढ़ी जानेवाली 'गो' का भी हरण उससे प्रतीत हो जाता है-समस्त से बाहर वह एक कैसे रह सकती है?
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इस तरह् इष्टाप्राप्ति और अरनिष्टप्राप्ति दोनों के द्वारा होनेवाली संसर्ग की अननुरूपता का सामान्यरूप में वर्णन किया गया। पूर्वोक्त चार भेदवाली इष्टाप्राप्ति के पूर्वोक्त तीन भेदवाले अ्रनिष्ट से मिलने पर इसी के बारह प्रकार हो जाते हैं। उनमें से अपने सुख- साधनरूप वस्तु को अपरात्ति और दुःखसाधनरूप वस्तु की प्राप्ति वाले 'उभयभेद' (विषम) का उदाहरण दिया जा चुका है। (२-३) अब अप्रपने दुःखसाधनरूप वस्तु के निवृच्त न होने औ्रर शरतिरिक्त दुःख के साधनरूप वस्तु की प्राप्ति वाले दो भेदों के उदा- हरण; जैसे- रूपारुचिं निरसितु रसयन्त्या हरिमुखेन्दुलावरायम्। सुदृशः शिव ! शिव !! सकले जाता सकलेवरे जगत्यरुचि: ॥
रूपसंबंधिनी अ्रर्र्चि को निवृत् करने के लिये मुनयनी ने-भग- वन्मुखचंद्र के लावण्य का रस लेना आरंभ किया, कितु खेद है कि उसे कलेवरसहित संपूर्ण जगत् में तरुनन उत्पन्न हो गई। यहाँ यर्दया ब्रह्मदर्शन के अनंतर जगत् में वैराग्यरूप अ्रपरुचि उत्पन्न हो जाने पर भी भगवान् के वदनलावण्य के दर्शन के कारण जो मिन्न प्रकार की रूपारुचि थी वह निवृत हो ही गई - यह कहा जा सकता है, तथापि जगत् की अरुचि में सब अरुचियों का अभेदा- ध्यवसान करने से रूपारुचि की निवृत्ति की अप्रतीति ही होती है। श्रन्यथा वैराग्यरूपी श्ररुचि के मुखजनक होने के कारण ्रतिरिक्त दुःख का साधन मानना कठिनता से ही सिद्ध किया जा सकेगा, अरतः यह इष्टाप्राप्ति और अनिष्टप्राप्ति दोनों का उदाहरण हो जाता है। (४-५) विरोधी के दुःखसाधन की अप्राप्ति और अपने दुःखांतर- साधन की प्राप्ति, ये दोनों; जैसे-
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पुरो गीर्वाखानां पुलकितकपोलं प्रथयतो भुजग्रौढिं साक्षाद्द्गवति शरं संसुखयितुम्। स्मरस्य स्वर्बालानयनसुममालाचितमहो वपुः सद्यो भालानलभसितजालास्पदमभृत्॥ देवतातं के आगे कपोलों को रोमांचित करते हुए साक्षात् भग- वान शिव पर बाण चढ़ाने के लिए भुजाओं की डींग हाँफने वाले कामदेव का सुराङ्नाओं के नयनरूपी पुष्पमालाओं से अचित शरीर, आश्चर्य है कि, तत्काल ही भालानल के भस्मसमूइ का पात्र बन गया।
(यहाँ शिव जी को दुःख पहुँचाने के स्थान पर, उनको दुःख न होकर अपने ही भस्म होने की नौबत आ गई, अतः इष्ट की अप्राप्ति और तनिष्ट की प्राति स्पष्ट ही है।) (६-७) विरोधी के सुखसाधन की अनिव्ृत्ति औरपर अपने दुःख- साधन की प्राप्ति ये दोनो; जैसे-
न मिश्रयति लोचने सहसितं न संभाषते कथासु तव किं च सा विरचयत्यरालां भ्रुवम्। विपक्षसुदृशः कथामिति निवेदयन्त्या पुरः प्रियस्य शिथिलीककतः स्वविपयोऽनुरागग्रहः । किसी प्रौढ नायिका ने-'जब आप की बात आती है तब वह आँखें नहीं मिलाती, हँसकर नहों बोलती, भौंह, टेढ़ी कर लेती है,' इस प्रकार प्रिय के सामने सपत्नी की कथा कहते हुए अपने विषय में अ्रनुरागबोध शिथिल कर दिया।
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यहाँ किसी प्रौढ नायिका ने, जिसको प्रिय शब तक अज्ञातयौवना ही समझे हुए थे उस सपत्नी के प्रेम में बखेड़ा डालने के लिए प्रिय के समक्ष सपतनी के दुर्गुणों का वर्शन किया, किंतु इससे जो कुछ वह करना चाहती थी वह सिद्ध न हो सका, प्रत्युत अपने विषय में जो अनुराग था उसमें कमी करवा ली।
यहाँ यह विचारणीय है कि यद्यपि सुखसाघन की निवृत्ति दुःख- साधन रूप ही है, अतः उसकी पृथग्गराना उचित नहीं है, तथापि जिस प्रकार दुःखसाघन की निवृत्ति में सुख का होना नियत नहीं है उसी प्रकार मुखसाधननिवृत्ति में भी दुःख होना अनियत है, क्योंकि इन दोनों के कारण एक ही हों ऐसा कोई नियम नहीं, शतः दोनों का पृथग्ग्रहणा किया गया है।
इसी प्रकार आठ शन्य उभयमेदों की भी तर्कना करनी चाहिए। (८) केवल इष्टाप्राप्ति का उदाहरण; जैसे- प्रभातसमयप्रभां प्रणयिनि ह्वु वाना रसा- दमुष्य नयनाम्बुजं सपदि पाणिनामीलयत्। त्र्नेन खलु पद्मिनीपरिमलालिपाटचरैः समीरशिशुकैश्चिरादनुमितो दिनेशोदयः ।
नायिका प्रेम के कारण प्रेमी से प्रभातसमय की प्रभा को छिपा रही है, अतः उसने प्रेमी के नेत्रकमल को तत्काल हाथ से मूँद दिया, किंतु प्रेमी ने थोड़े समय के बाद कमलिनी के सुगंधसमूह के चुरानेवाले मंद वायुओं के कारण सूर्योदय का अनुमान कर लिया। यहाँ प्रियतम को प्रभातविषयक ज्ञान न हो यह सुखसाधन के रूप में कामिनी को इष्ट है, इसके लिए उसने प्रयत्न किया, किंतु सफलता न
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हुई, अतः केवल इष्टाप्राप्ति ही है। अथवा प्रियतम का प्रभात समय का ज्ञान उसके दुःख का साधन है, उसकी निवृत्ति उसका इष्ट है। प्रयक्ष करने पर भी वह इष्ट सिद्ध नहीं हुआ अतः यह भी इष्टाप्राति ही हुई। इस तरह यहाँ दोनों प्रकार की इष्टाप्राप्ति ही संभव है। इसी तरह इसके अन्य प्रकार भी सोचे जा सफते हैं। (६) केवल अ्रनिष्टप्राप्ति; जैसे -- मुकुलितनयनं करियो गएडं कणड्यतो विषद्ठुतटे। उदभूदकाएडदहनज्वालाजालाकुलो देहः।। हाथी ने आँख मूँ दे हुए जहरीले पेड़ के किनारे कपोल खुजलाना आररंभ किया, किंतु अकस्मात् उत्पन्न अग्निज्वाला के समूह से देह व्याकुल हो उठा। यहाँ इष्टाप्राप्ति नहीं है, क्योंकि यहाँ 'आँख मूँदे हुए' इस कथन से 'खुजलाने से उत्पन्न सुख की प्राप्ति' है। किंतु केवल श्रनिष्टप्राप्ति हो है। इसके भी (शन्य) दोनों भेदों के उदाहरण सोच लेने चाहिए। ग्रंथविस्तार के भय से यहाँ उदाहरण नहीं दे रहे हैं। इष्टसाधनरूप में निश्चित कारण से अनिष्ट कार्य की उत्पच्ति वाले ये सब भेद आगे कहे जानेवाले विषादन अलंकार से मिश्रित ही प्राप्त होते हैं-यह विषादन अलंकार के प्रकरण में निरूपण किया जायगा। कुवलयानंद का खंडन कुवलयानंदकार ने
"अनिष्टस्याप्यवाप्तिश्व तदिष्टार्थससुद्यमात्। .
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अर्थात् इष्ट अर्थ के लिए उद्यम से अनिष्ट की भी प्राप्ति।" यह विषमालंकार के भेद का लक्षय बनाकर "अपि शब्द से संगहीत होने के कारय 'इष्टाप्राप्ति' भी इसमें श्ररा जाती है, इस कारण अनिष्टप्रात्ति और इष्टाप्रासति इन दोनों में से प्रत्येक का विषय पद के साथ अन्वय है।" यह कहा है, सो ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा व्युत्पत्ति के विरुद्ध है। 'इस गाँव में देवदच को द्रव्य का भी लाभ है' इत्यादिक में द्रव्य शब्द के अनंतरवर्ची 'भी (अरपि)' शब्द द्वारा संगहीत विद्यादिक का द्रव्य के अन्वयी (लाभ) में ही अन्वय होने के कारण 'द्रव्य का लाभ और विद्या का लाभ।' यह बोध होता है-यह निविवाद है। ितु प्रस्तुत वाक्य में 'अनिष्ट' का अन्वय तो 'अवाप्ति' के साथ है और ('अपि' शब्द से लब्घ) इष्टा- प्राप्ति का 'तत्' शब्द से परामृष्ट विषम के साथ अन्वय है-यह विष- मता है। प्रत्युत लक्षणवाक्य में आरपया 'अरपि' शब्द विरुद्ध बुद्धि को उत्पन्न करता है, क्योंकि उससे 'अनिष्ट की प्राप्ति' और 'इष्ट की भी प्राप्ति' यह प्रतीति होती है। हाँ, यह तो हो भी सकता है कि 'च' शब्द से संगरदीत 'इष्टाप्राप्ति', 'अनिष्टाप्राप्ति' से एक बार संमिलित है, अब उसी का 'तत्' पद से परामृष्ट 'विषम' के साथ अन्वय होने पर वाक्य की आधृत्ति द्वारा वारांतर में प्रत्येक (केवल इष्टानवाति औरर केवल अनिष्टावाप्ति) के साथ अन्वय होने से तीनों भेदों का संग्रह हो जाता है, किंतु 'अपि' शब्द की डींग हाँकना ठीक नहीं। (२) और जो उन्हीं ने उदाहरण दिया है -- "भच्त्याशयाऽहिमञ्जूषां दष्टाऽSखुस्तेन भक्ितः (चूहा) भक्ष्य की आशा से साँप की पेटी को काटकर साँप के द्वारा खा लिया गया।"
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यहाँ क्त्वा प्रत्यय की प्रकृति (दंशन) क्रिया का कर्ता जिसका कर्ता है ऐसी उत्तरकालवर्चिनी अन्य क्रिया का प्रयोग न होने तथा उसका श्क्षेप भी न होने से 'प्रविष्टः' इस द की आकांक्षा रहती है, अतः 'नयून पदता' दोष है। (कहने का तात्पर्य यह है कि कतवा प्रत्यय 'समान- कचृ कयो: पूर्वकाल' (३।४ २१) इस पाशिनिसूत्र के अनुसार, जब दो क्रियाओं का एक कर्ता होता है तभी होता है। उक्त उदाहरण में दंशन क्रिया का कर्ता चूहा है और भक्षण क्रिया का कर्ता सर्प है, अतः क्त्वा प्रत्यय अरनुपपन्न है। इस कारण 'दष्टा' के बाद 'प्रविष्टः' पद जोड़ना आवश्यक हो जाता है-अर्थात् 'चूहा काटकर घुसा और साँप द्वारा खा लिया गया' इसके स्थान पर 'साँप की पेटी को काटकर साँप द्वारा खा लिया गया' यह कहना अशुद्ध है।) (३ ) और जो उन्हीं ने केवल इष्टप्राप्ति का -- "खिन्नोऽसि सुश्च शैलं िभृमो वयमिति वदत्सु शिथिलभुजः। भरभुग्नविततबाहुषु गोपेषु हसन्हरिजयति ॥ गोवर्धनोद्धरण के समय जब गोपों ने कहा कि 'तुम थक गए हो, पहाड़ को छोड़ दो, हम उठाते हैं' तब भगवान् ने भुजा को ढीला कर दिया। गोपों की भुजाएँ बोझे से टेढ़ी होकर पसरने लगी, तब हँसते हुए हरि की जय है।"
यह उदाहरण दिया है, वह भी सुंदर नहीं है; क्योंकि यहाँ 'बोझे से टेढ़ी और पमरने लगी' इत्यादि द्वारा भुजा की शस्थिसंघियों के भंग रूप अनिष्ट की प्राप्ति साच्षात् ही लिखी है और सब अंगों के चूर्ग होने तथा गर्व के अपहाररूप अनिष्टप्राप्ति की स्पष्ट प्रतीति हो रही है। इतने पर भी यहाँ 'केवल इष्टाप्राप्ति' है यह कैसे कहा जा रहा है। इसी कारणाजो उनने कहा है कि 'पहाड़ के गिरने रूपी अनिष्ट की प्राप्ति तो
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भगवान् के करकमल के स्पर्श की महिमा से विदित नहीं हुई' यह भी निःसार है, क्योंकि अ्निष्टों (हाथों का टेढ़ा होने और पसरने) का स्पष्ट वर्शन है।
इस प्रकार उत्पच्ति रूप संसर्ग की अननुरूपता का निरूपण किया गया है। संयोगादिरूप संसर्ग की अननुरूपता; जैसे -- वनान्त: खेलन्ती शशकशिशुमालोक्य चकिता भुजप्रान्तं भतु : श्रयति भयहर्तु : सपदि या। अहो सेयं सीता शिव ! शिव !! परोता श्रुतिचल -- त्करोटीकोटीभिर्वसति खलु रक्षोयुवतिभि: ॥ जो सीता बन के अंदर खेलती हुई, खरगोश के एक बच्चे को देखकर चकित होती हुई भयहर्ता भर्ता (श्रीराम) के भुजप्रांत का आश्रय लेती थी, ओह ! वही यह सीता, (मनुष्य के) सिर की हड्डियाँ जिनके कामों पर हिल रही हैं, शिव ! शिव !! उन तरुण राक्षसियों से घिरी हुई निवास कर रही हैं। यहाँ सतीशिरोमणि भगवती राघवधमपत्री के परम प्रभावयुक्त होने के कारण यद्यपि राक्षसियों द्वारा नाशयोग्यता नहीं है-अर्थात् भगवती सीता उनसे नष्ट नहीं की जा सकती, तथापि मनुष्यत्व जाति के संयोग से जो कि राक्षसों द्वारा किए जानेवाले नाश की स्वरूपयोग्यता की अवच्छेदक है-अर्थात् मनुष्यमात्र राक्षसों से नष्ट किए जा सकते हैं और भगवती सीता भी मनुष्य जाति से युक्त है, अतः स्व्ररूप की नाशयोग्यता और राक्षसों के दर्शन से सुंदरता, सुकुमारता आदि गुणों की नाशयोग्यता के कारण (राक्षसियों और सीता के संयोग में)
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विरुद्धता होने से एक स्थान में रहने रूपी संयोग के रूप में अरननुरूप संसर्ग है। एक शंका और उसका समाधान आप कहेंगे कि-अननुरूप संसर्ग को विषम मानने पर- "क शुक्तयः क वा मुक्ता: क पङ्ग: क च पङ्कजम्। क्व मृगा: क च कस्तूरी धिग्विधातुविंदग्धताम्॥ कहाँ सीपें और कहाँ मोती, कहाँ काचड़ ओर कहाँ कमल, कहाँ मृग शर कहाँ कस्तूरी, विधाता की विदग्धता को धिक्कार है (जिसने ऐसे जोड़े मिलाये)।" इत्यादि केवल वस्तुकथन में भी विषमालंकार होने लगेगा। यदि इसका 'हाँ' में उत्तर दिया जाय तो उचित नहीं, क्योंकि वस्तुकथन तो लोकसिद्ध है, अतः उससे अलंकारत्व का कोई संबंध नहीं। कारय बाहर (संसार में) न होनेवाले केवल कवि की प्रतिभा से कल्पित पदार्थ ही काव्य में अलंकार पद से अभिहित होते हैं। आरप कहेंगे कि यदि ऐसा ही है तो 'यथा पद्म तथा मुखम्-जैसा कमल वैसा मुख' इत्यादि में सादृश्य के लोकसिद्ध होने के कारण कविप्रतिभाकल्पित न होने पर भी अलंकारता कैसे है? तो यह उचित नहीं; क्योंकि 'सादृश्य रूप' अथवा 'सादृश्य का उत्थापक' जो मुख और पद्म में अभिन्न धर्म है उसका अभेदांश केवल कवि की प्रतिभा के अधीन है। इसका कारय यह है कि पद्म और मुख का जो शोभारूप धर्म है वह, जात्यादि के समान, वस्तुतः एक नहीं हैं और जो जात्यादिरूप धर्म वस्तुतः एक हैं उनसे उत्थापित सादृश्य अलंकारों से बहिर्भूत है; जैसे 'पद्ममिवास्य मुखं द्रव्यम्-पद्म के समान इसका मुख भी द्रव्य है' इत्यादि को अलंकार नहीं कहा जा सकता। सो इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि 'वनान्तः खेलन्ती' इस पूर्वोक्त पद्य से प्रतिपादित 'सीता
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और राजसियों के संसर्ग की अननुरूपता' लौकिकी होने के कारण कवि- प्रतिभा की अपेक्षा नहीं रखती, अतः अलंकार नहीं है। इसी कारण- "अरसयानी क्वेयं धृतकनकसूत्रः क् स मृगः क मुक्ताहारोऽयं क च स पतगः क्वयमबला। क तत्कन्यारत्नं ललितमहिभतुः क च वयं स्वमाकूतं धाता कमपि निभृतं पल्लवयति॥
कहाँ यह महान जंगल और कहाँ वह कनकसूत्र धारण किए हुए मृग, कहाँ यह मोती का हार और कहाँ वह पक्षी तथा कहाँ यह अबला, कहाँ वह नागराज का सुंदर कन्यारत और कहाँ हम, विधाता अपने किसी गूढ अभिप्राय को चुपचाप प्लवित कर रहा है।"
इस अलंकारसवस्वकार के उदाहरण का भी प्रत्याख्यान हो जाता है और वही मार्ग अन्य पद्यों में भी, जिनका अर्थ कवि प्रतिभा से अनुत्थापित है वहाँ भी, है-अर्थात् वहाँ अलंकार कहना व्यर्थ है। तो हम कहते हैं कि आपका यह कथन सच है। यदि ऐसा ही है तो-
क सा कुसुमसाराङ्गी सीता चन्द्रकलोपमा। क्व रक्ष:खदिराङ्गारमध्यसंवासचैशसम्।।
कहाँ वह कुसुमसार (श्रेष्ठ कुसुम) के समान अंगोंवाली चंद्रकला के सदश सीता और कहाँ राक्षसरूपी खैर के अंगारों के मध्य निवास- रूपी क्ररता।
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इस पद्य को उदाहरय समझिये, क्योंकि यहाँ यद्यपि केवल सीता और केवल राक्षसियों के संसर्ग की अननुरूपता है तथापि वह कवि को विवक्षित नहीं है, किंतु जो कुसुमसार और खैर के अंगारों की श्रन- नुरूपता है दह विवक्षित है, अरतः इसमें अलौकिकता के कारण कवि- प्रतिभा की अपेक्षा स्पष्ट ही है।
समालकार
लक्षणा अनुरूप संसग को सम कहते हैं। लक्षण का विवेचन संसर्ग पहले के समान दो प्रकार का है। उनमें से उत्पचिरूप संसर्ग की अनुरूपता तीन प्रकार की है-(१) कारण से अपने समान गुशवाले कार्य की उत्पत्ति द्वारा (२) जैसे गुणवाली वस्तु से संसर्ग हो वैसे गुणा की उत्पत्ति द्वारा और (३ ) जिस किसी इष्ट की प्राप्ति के लिये कारण का प्रयोग किया गया हो उससे उस इष्ट की प्राप्ति द्वारा। यहाँ यह याद रखना चाहिए कि-अन्य उत्कट इष्ट की प्रासि होने पर तो 'प्रहर्षण अलंकार' होता है, जिसका वर्शन आगे किया जायगा।
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इसी प्रकार संयोगादिरूप संसर्ग की अनुरूपता दो संसर्गियों में से एक के गुणा और स्वरूप द्वारा दूसरे के गुणा और स्वरूप के अनुगृहीत होने पर होती है। सो इस तरह 'अनुरूप संसर्गता' रूपी सामान्य लक्षणा से सब भेदों का संग्रह हो जाता है। जैसे- कुवलयलक्ष्मीं हरते तव कीर्तिस्तत्र कि चित्रम्। यस्मान्निदानमस्या लोकनमस्याङ घ्रिपङ्कजस्तु भवान्।। राजा की स्तुति है। कवि कहता है कि-आप की कीचिं कुवलय (रात्रिविकाशी कमल + भूमंडल) की शोभा को हरणा करती है इसमें क्या आश्चर्य, क्योंकि इसका उत्पत्तिस्थान आप हैं, जिनके चरसकमल लोक द्वारा नमस्करणीय हैं। अथवा जैसे-
शिखास्पर्शेन पाश्चाल्याः स्थाने दग्धः सुयोधनः ॥ मंत्र से अ्पित हवि से प्रदीप्त अग्नि के शरीर से उत्पन्न होनेवाली द्रौपदी की शिखा (ज्वाला+चोटी) के स्पर्श से सुयोधन उचित ही दग्ध हुश्र। पहले उदाहरण में कारण और कार्य के धर्मों का श्लेष द्वारा एकतासंपादन होता है और इस उदाहरण में मररा और दाह का अभेदाध्यवसानरूपी अ्ररतिशय से एकतासंपादन होता है-यह विशे- बता है। द्वितीय भेद; (जैसी वस्तुओं का संसर्ग वैसे गुणों की उत्पत्ति) जैसे --
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(१८५ )
रजनीरमयो भवेन्नृणां न कथं प्राणवियोगकारखम्।। विरहिणी कहती है-बड़वानल, विष, लक्ष्मी, मगर और सर्प- समूह के साथ बढ़ा हुआ चंद्रमा मनुष्यों के प्राशवियोग का कारण कैसे न हो ?
यहाँ लक्ष्मी का भी मारक रूप में ही कथन कवि को अभीष्ट है।
तृतीय भेद; (जिस इष्ट की प्राप्ति के लिये कारण का प्रयोग किया गया उससे उस इष्ट की प्राप्ति) जैसे- नितरां धनमाप्तुमर्थिभिः च्ितिप! त्वां समुपास्य यत्नतः । निधनं समलम्भि तावकी खलु सेवा जनवाञ्छितप्रदा।।
हे राजन् ! धन चाहने के लिये याचकों ने प्रयत्न से आप की अत्यंत सेवा करके 'निधन' (नितरांधन+मृत्यु) प्राप्त किया, आप की सेवा निश्चय ही मनुष्य के मनोरथ पूरे करनेवाली है। यहाँ श्लेष के द्वारा 'अत्यंत धन और मरणा की एकता' हो जाने पर 'बहुधनरूपी इष्ट' के रून में वांछित अर्थ की प्रात्तिरूपी समालंकार का चमत्कार है। इस जगह व्याजस्तुति में, आरंभ में 'धनप्रापिरूप स्तुति की स्फूर्ति के समय' तो समालंकार निर्विघ्न है ही, किंतु 'मरणप्रापि' की प्रतीति की अवस्था में व्याजस्तुति के अंग पूर्ण हो जाने के कारण व्याजस्तुति के द्वारा विषमालंकार बाघित होता है। अप्पय दीक्षित का खंडन और जो कुवलयानंदकार ने-
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( १८६ ) "उच्चैर्गजैरटनमर्थयमान एव त्वामाश्रयन्निह चिरादुषितोऽस्मि राजन्। उच्चाटनं त्वमपि लम्भयसे तदेव मामद्य नैव तिफला महतां हि सेवा।।
हे राजन्, उच्च गजों से अटन की-हाथीनशीन होने की इच्छा करते हुए ही मैंने यहाँ तुम्हारे आश्रय में बहुत समय निवास किया है, आज आप वही उच्चाटन (उच्चों से अटन+निष्कासन) प्राप्त करवा रहे हैं। महापुरुषों की सेवा निष्फल नहीं होती।'
यह उदाहरय देकर-"यहाँ व्याजस्तुति में यद्यपि स्तुति से निंदा की श्रभिव्यक्ति की विवक्षा में विषमालंकार है, तथापि प्राथमिक स्तुति- रूप वाच्य की कक्षा में समालंकार का निवारण नहीं किया जा सकता" यह कहा है।
इसमें दो बातें विचारणीय हैं-एक तो उदाहरण में 'मामुच्ाटनं लम्भयसे' इसमें द्विकमकता कैसे हुई ? क्योंकि गत्यादि (१।४/५२) सूत्र को यदि प्राचीनों की रीति से 'नियम विधि' माना जाय तो (अर्थात् सभी शिजंतों में प्राप्त कर्मसंज्ञा में यह नियम किया जाता है कि गिजंतों में यदि पूर्वावस्था के कर्त्ता की कम संज्ञा हो तो सूत्र में परिगगित धातुओं की ही हो सकती है, अन्यों की नहीं, तो 'लभ' धातु की सूत्रोक्त धातुओं में गराना न होने के कारण) 'लभ' धातु के अरण्यंतकर्ता का कर्मत्व निवृत्त हो जाता है और यदि-
"परत्वादन्तरङ्गत्वादुपजीव्यतयाऽपि च प्रयोज्यस्यास्तु कतृँत्वं गत्यादेर्विधितोचिता॥"
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(१८७ )
पर, अंतरंग और उपजीव्य होने के कारण प्रयोज्य (पूर्वावस्था के कर्चा) का कर्तृत्व होने दीजिए, परंतु गति आदि का तो विधि होना ही उचित है।" इस नवीनों की रीति से इसे अपूर्व विधि कहा जाता है, तथा श्रौत (शब्दतः प्रतिपादित) शिजन्तार्थ क्रिया (लम्भयसे) की प्रधानता को छोड़कर पूर्त क्रिया (लभसे) की आर्थ (अर्थ प्राप्त) प्रधानता का ही अरनुरोध किया जाता है तब तो कर्मत्व का प्रसंग ही नहीं है। सो 'माम् उच्चाटनं लम्भयसे' के स्थान पर 'उच्चाटनं मया लम्भयसे' यह होना चाहिए। इतने पर भी यदि किसी प्रकार लभ् धातु को गत्यर्थक बनाकर प्रयोग सिद्ध किया जाए, तथापि "प्राथमिक कक्षा में समा- लंकार का निवारण नहीं किया जा सकता" इसमें 'दूसरी कक्षा में विषमालंकार भले ही रहे' यह सूचित करना मिथ्या ही है, क्योंकि वैसी विषमता निंदारूप है, अतः व्याजस्तुति का विषय होने से 'व्याचस्तुति विषम का अपवाद (बाघक) हो' यही न्यायोचित है ( न कि आरप के कथनानुसार विषम का अपवाद होना)। यदि कहो कि विपरीत ही क्यों न मांन लिया जाय ? अर्थात् विषम को व्याजस्तुति का त्रपवाद क्यों न समझा जाय, तो यह उचित नहीं, क्योंकि यहाँ व्याजस्तुति परिपूर्ण चमत्कार का आरधार (पूर्णचमत्कारयुक्त) है, जिसे आप भी नहीं छिपा सकते। संयोगादि रूप संसर्ग की अनुरूपता दो प्रकार से हो सकती है- ( १ ) स्तुति में परिणत होनेवाली और (२) निंदा में परिणत होने- वाली। उनमें से प्रथम; जैसे-
. अनाथः स्नेहार्द्रां विगलितगतिः पुएयगतिदां पतन्विश्वोदर्त्री गदविदलितः सिद्धभिषजम् ।
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( १८८ ) तृषार्तः पीयूषप्रकरनिधिमत्यन्तशिशुकः सवित्रीं प्राप्तस्त्वामहमिह विदध्याः समुचितम्।। (हे गंगे !) अत्यंत छोटा बालक मैं आप माता की शरण में आया हूँ, मैं अनाथ हूँ और आप स्नेहाद्र है, मैं अगतिक हूँ और शरप पवित्र गति देनेवाली हैं, मेरा पतन हो रहा है और आप विश्व का उद्धार करने वाली हैं, मैं रोग से पीड़ित हूँ और आप सिद्ध भेषज हैं (रामबाण औरषध है), मैं तृषार्त हूँ और आप अमृतसमूह का खजाना हैं। अब आप जो उचित समझें सो करिए। यहाँ अनाथत्वादि धर्मों से युक्त के, स्नेहार्द्रता आदि धर्मों से युक्त के साथ, संसग की अनुरूपता भागीरथी की स्तुति में पर्यवसान को प्राप्त होती है। द्वितीय अर्थात् निंदाार्यवसायिनी अनुरूपता; जैसे- युक्त सभायां खलु मर्कटानां शाखास्तरूणां मृदुलासनानि। सुभाषितं चीत्कृतिरातिथेयी दन्तैनखाग्रश्च विपाटनानि॥ बंदरों की सभा में उचित है कि वृक्षों की शाखाएँ कोमल श्रसन हों, चोत्कार शब्द सुभाषित हो और दाँतों तथा नखाओों से फाड़ना शतिथिसत्कार हो।
यहाँ अप्रस्तुत (बानरों की निंदा) उसके द्वारा आचित प्रस्तुत (कलहपरायण समासदों) में पर्यवक्ित होता है।
इस प्रकार जैसे विषमालंकार के तीन भेद हैं उसी प्रकार उसके विपरीत तीन भेदों से युक्त समालंकार का भी विस्तार से निरूपण किया गया।
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अलंकारसर्वस्वकार का खंडन और जो 'विरूपकार्यानर्थयो रुत्पत्तिर्विरूपसंघटना च विषमम्-विरूप कार्य की उत्पत्ति, अनर्थ की उत्पत्ति और विरूपों का संयोग विषम कहलाता है' इस प्रकार विषमालंकार का लक्षण बनाकर 'तद्विपर्ययः समम्-जहाँ उसकी विपरीतता हो वह समालंकार है' यह लक्षण बनाने के अनंतर अलंकारसर्वस्वकार ने कहा है कि 'तत् (उस) पद से यहाँ पर विषमालंकार से संबंध रखनेवाले विरूपों का संसर्ग रूप अंतिम भेद ही ग्रहणा किया जाता है, क्योंकि उसकी विपरीतता (सरूपों का संसर्ग ) ही सुंदर होती है, न कि प्रथम दोनों भेदों की विपरीतता, जो कि 'कारण से अनुरूप कार्य की उत्पत्ि' और 'वांछित अर्थ की प्राप्ति' रूप हैं। ये दोनों वस्तु सिद्ध होने के कारण (सभी वस्तुओं में ऐसा होता ही है अतः) चमत्कारी नहीं होतीं। सो समा- लंकार का अनुरूपसंघटनात्मक एक ही भेद होता है, न कि विषमा- लंकार के समान तीन भेद।" और इसपर विमर्शिनीकार ने विवेचन किया है कि-'कारण से अनुरूप कार्य की उत्पत्ति लोकसिद्ध है, शरतः उसका निरूपण सुंदर नहीं होता।' ये दोनों ही (कथन) ठीक नहीं हैं, क्योंकि वस्तुतः अरननुरूप कार्यकारणों का भी श्लेषादि से धर्म की एकता के संपादन द्वारा अनु- रूपता के वर्न करने में तथा वस्तुतः अनिष्ट का भी उसी उपाय द्वारा इष्ट से एकता संपादन हो जाने पर इष्टप्राप्ति के वर्णन में सुंदरता श्रभी श्रभी दिखाई जा चुकी है, अतः समालंकार भी तीन प्रकार का है।
१-यहां मूल में तात्पर्यकथन है। अलंकारसर्वस्व का मूल अरंथ तो 'यदपि विषमस्य भेदत्रयमुक्त तथापि तच्छब्देन संभवादन्त्यो भेद: परामृष्यते। पूर्वभेदद्वयसंसर्गस्यानलङ्कारत्वादन्त्यभेदविपर्ययस्तु चारुतवा- स्समाख्योऽलंकारः।' यों है।
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विचित्रालंकार
लक्तय
इष्टसिद्धि के लिए इष्टाभिलाषी के द्वारा किये जानेवाले इष्ट के विपरीत आचरण को विचित्र कहते हैं। विपरीतता का अर्थ यहाँ प्रतिकूलता है। जैसे- बन्धोन्मुक्त्यै खलु मखमुखान्कुर्वते कर्मपाशा नन्तःशान्त्यै मुनिशतमतानल्पचिन्तां वहन्ति। तीर्थे मज्जन्त्यशुभजलघेः पारमारोढुकामाः सर्व प्रामादिकमिह भवभ्रान्तिभाजां नराखाम्।।
संसार के भ्रम में पड़े हुए पुरुषों के सभी काम प्रामादिक होते हैं, ये लोग बंधन छुड़ाने के लिए यज्ञादिक कर्मपाशों की रचना करते हैं, अंतःकरण की शांति के लिए सैकड़ों मुनियों के मतों की (शास्त्रों की) महती चिंता ढोते हैं और अशुभ समुद्र के पार पहुँचने की इच्छा से तीर्थ में डुबकी लगाते हैं। यहाँ प्रथम चरणगत 'विचित्र' (बंध छुड़ाने के लिए कर्मपाशों की रचना) रूपक से अनुप्रागित है, यदि यज्ञादिक कर्मों को पाशरूप न माना जाय तो 'यज्ञादि कर्म करने' को 'बंधन'-मुक्ति के विपरीत कहना संगत नहीं होता। द्वितीयचरणगत विचित्र तो शुद्ध है, क्योंकि चिंता स्वरूप से ही शांति के विपरीत है।
यह तो हुआ पूर्व लक्षण के अनुसार उदाहरा, किंतु यदि इष्ट के स्वतः सिद्ध होने पर इष्टाभिलाषी द्वारा किया जानेवाला इष्ट के अ्रनु
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( १६१ )
कूलाभास (जो वास्तव में श्रनुकूल न हो और अनुकूल सा दिखाई देता हो) का प्रयोग भी विचित्र कहा चाय, क्योंकि इष्टाभिलाषी की भ्रांतता की अ्रभिर्व्यक्त यहाँ भी उसी के तुल्य है औरर लक्षण में 'विप- रीत' पद के स्थान पर 'अननुकूल' पद रक्खा जाय-अर्थात् 'विपरीत आचरय' के स्थान पर 'अननुकूल आचरय' कहा जाय, तब यह भी उदाहरण हो सकता है-
विष्वद्रीचा भुवनमखिलं भासते यस्य धाम्ना सर्वेषामप्यहमयमिति प्रत्ययालम्बनं यः । तं पृच्छन्ति स्वहृदयगतावेदिनो विष्णुमन्या- नन्यायोऽयं शिव ! शिव ! नृखां केन वा वर्णनीयः ॥ जिनके सर्वत्र व्याप्त तेन से संपूर्ण जगत् प्रकाशित हो रहा है, औरर बो सभी की यह मैं (अहम्) इस प्रतीति का आधार है ऐसे विष्णु को, अपनी हृद्गत वस्तु को न बाननेवाले दूसरों से पूछते फिरते हैं, शिव! शिव !! मनुष्यों के इस अन्याय का कौन वर्णन कर सकता है। यहाँ जीवरूप से सब जगत् के प्रत्यक्षसिद्ध परमेश्वर के ज्ञान के लिए दूसरों से पूछना अनुकूलाभास है, क्योंकि मुख्य अनुकूल तो अपना हृदय ही है, जैसा कि-'यत्साक्षादपरोचात्' इस श्रुति में लिखा है। विषमालंकार से भेद यहाँ यह शङ्का नहीं करनी चाहिए कि कारण से अननुरूप कार्य होने के कारण विचित्रालक्कार विषमालङ्कार का भेद है, क्योंकि एक तो विषमालक्गार में पुरुष के प्रयत्त की अपेक्षा नहीं रहती-उसमें पुरुष के प्रयत् का वर्शन नहीं होता; दूसरे, उसके भेद कार्य और कारण के
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(१६२ )
गुणों की विलक्षणता द्वारा ही निरूपणा किये जाते हैं और कोई बात वहाँ नहीं रहती।
अधिकालंकार
लक्षण
आधार और आधेय में से किसी एक को अतिविस्तृत सिद्ध करने के लिए दूसरे की अतिन्यूनता की कल्पना अधिका- लंकार है। जैसे- लोकानां विपदं धुनोषि तनुषे सम्पत्तिमत्युत्कटा- मित्यल्पेतरजल्पितैजडधियां भूपाल ! मा गा मदम्। यत्कीतिस्तव वल्वभा लघुतरब्रह्माएडसद्मोदरे पिएडीकृत्य महोन्नतामपि तनुं कष्टेन हा वर्तते।। हे राजन्, 'आपलोगों की आपत्ति को नष्ट करते हैं और श्रत्यंत उत्कट संपच्ति का विस्तार करते हैं' इस प्रकार मूढबुद्धियों की बड़ी बढ़ी बातों से अभिमान मत करिए, क्योंकि आपकी वल्लभा कीर्ति इस छोटे से ब्रह्मांडरूपी घर के अंदर अपने अत्यंत विशाल शरीर को सिकोड़ कर बड़े कष्ट से रहती है-जो आप अपनी वल्लभा के कष्ट का भी निवारण नहीं कर सकते उनकी यह कीर्ति व्यर्थ ही है कि शरप सब लोगों की आपत्ि नष्ट करते हैं।
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यहाँ ब्रझ्मांड की अतिसूक्ष्मता की कल्पना द्वारा आधेय कीति की परम महत्ता फलित होती है। इसके द्वारा व्याजस्तुति का परिपोषण होता है।
गिरामविषयो राजन्विस्तारस्तव चेतसः। सावकाशतया यत्र शेते विश्वाश्रयो हरिः ॥ हे राजन् ! आप के चित्त का विग्तार वाणा का विषय नहीं है, जिस में जगन्निवास भगवान् सावकाशता से सोते हैं। यहाँ 'सावकाशता से' इम कथन के द्वारा कल्पित आधेय की न्यूनता से आधार की महत्ता पयंवसित होती है। औ्रर यदि 'सावकाशता से' इसको विशेषणारूप में 'विश्वाश्रय (जगन्निवास)' के साथ भी जोड़ दिया जाय-अर्थात् जो सारे जगत् के सावकाशता से आश्रय है-यह भी समझा जाय तो शृंखलारूप आधाराधिकालंकार का भी यही उदाहरण हो सकता है। (तात्पर्य यह है कि-'सावकाशतया विश्वाश्रयो हरिः सावकाशतया यत्र शेते' इस तरह 'सावकाशतया' शब्द की आवृत्ि करके अन्वय करने पर इसका अर्थ यह होगा कि 'जिस हरि में सावकाशतया विश्व की स्थिति है वह हरि जिस चित्त में सावकाशतया सोते हैं' ऐसी स्थिति में विश्व का सावकाश आधार हुए हरि, और उनका सावकाश आधार हुआ चिच। अतः उचरोत्तर का पूर्व पूर्व में संसर्ग होने से और दोनों ही जगह आधार की अधिकता की कल्पना होने से यह शंखलारूप आरधा- राधिकालंकार का उदाहरण भी हो जाता है।) (शंखला का लक्षण कारणमाला अलंकार के आरंभ में देखिये) ब्रह्माएडमएडले मान्ति न ये पिएडीकृता अपि। परस्परापरिचिता वसन्ति त्वयि ते गुखाः॥ १३
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जो गुपा पिंडीकृत होकर (सिकुड़कर) भी ब्रह्मांडमंडल में नहीं समाते वे गुण आप के अंदर परस्पर अपरिचित होकर निवास करते हैं।
यहाँ दोनों प्रकार के (आरधाराधिक्य और आधेयाधिक्य) अलं- कार की समानाधिकरणता है-अर्थात् दोनों एकसाथ आए हैं, क्योंकि पूर्वार्ध में आधेय की अधिकता की कल्पना की गई है और उचरार्ध में आधार की अधिकता की।
अरतिव्याप्ति का निरास
लक्षण में 'कल्पना' शब्द से यह सूचित किया गया है कि-जहाँ आधार और आधेय में से किसी एक की वस्तुतः न्यूनता शथवा अधि- कता होती है वहाँ इस लच्षण की अतिव्यासि नहीं है। सो इस तरह-
क्वाहं तमोमहदहंखचराग्निवाभूं- संवेष्टिताएडघटसप्तवितस्तिकायः 1
वाताध्वरोमविवरस्य च ते महित्वम् ।
प्रकृति, महत्तत्व, अ्रहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल औरर पृथ्वी इन आठ आवरणों से वेष्टित इस ब्रह्मांड में, जिसका केवल सात वितस्ति (विचे) का शरीर है ऐसा, मैं कहाँ ? और ऐसे अरगगित ब्रह्मांडरूपी परमाणु, गवाच् (भरोखा) के समान जिनके रोमविवर (रोमकूप) में, भ्रमणा करते हैं, उन आपकी महिमा कहाँ ? यह श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में ब्रह्मस्तुति का पद्य इस अलं- कार का उदाहरण नहीं हो सकता, क्योंकि दिशाकाल आदि से अन-
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वच्छिन्न परमेश्वर की नहिमा सब वेदों से सिद्ध है, अतः उसे कवि- प्रतिभानिर्मित नहीं कहा जा सकता। अतएव- "दौरत्र क्वचिदाश्रिता प्रविततं पातालमत्र क्वचि- त्क्वाप्यत्रैव धराधराधरजलाधारावधिवतते। स्फीतस्फीतमहो नभः कियदिदं यस्येत्थमेभिः स्थितै- र्दूरे पूरणमस्तु शून्यमिति यन्नामापि नास्तं गतम् ।। इसमें किसी बगह स्वर्ग ने आश्रय लिया है, कहीं विस्तृत पाताल है, इसी में कहीं समुद्र पर्येत पृथ्वी वर्तमान है और यह शरतिविस्तृत आकाश भी जिसके लिए कितना सा है, इस तरह इन सब के रहने पर भी उसकी पूर्ति तो दूर रही, परंतु जिसका 'शून्य' यह नाम भी निवृत्त नहीं हुआ।" यह 'अलंकारसर्वस्वकार' ने जो उदाहरण दिया है, उसका भी प्रत्याख्यान हो गया, क्योंकि यहाँ भी वास्तविक वर्णन है, अलं- कार नहीं।
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अन्योन्यालंकार
लक्षण
दो में से एक दूसरे द्वारा परस्पर विशेषता उत्पन्न करने को अन्योन्यालंकार कहते हैं। विशेषता क्रियादि के रूप में होती है। जैसे-
सुदृशो जितरत्नजालया सुरतान्तश्रमबिन्दुमालया। अलिकेन च हेमकान्तिना विदधे कापि रुचि: परस्परम् ॥ सुरत के अंत में सुनयनी के स्वेदचिदुश्ं की, रत्नसमूहों की जीतने- वाली, माला ने और सुवर्सा की सी कांतिवाले ललाट ने परसर अनिर्वचनीय शोभा का विधान कर दिया। यहाँ 'गुशरूप विशेषता' का उत्पत्ति है, क्योकि 'शोभा' गुण है। 'विधान करना' इस क्रिया के रूप में विशेषता की उत्पत्ति की शंका यहाँ नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'विधान करना' का अर्थ यहाँ 'करना' मात्र है और यह एक 'सामान्य भावनारूप' है, अतः चमत्कारी न होने से इसे विशेषता नहीं कहा जा सकता। 'परपूरुषदृष्टिपातवज्राहतिभीता हृदयं प्रियस्य सीता। अविशत्परकामिनीभुजंगीभयतः सत्वरमेव सोऽपि तस्याः॥
परपुरुष के दृष्टिपातरूपी वज्र के आघात से डरी हुई सीता अपने प्रिय (भगवान् राम) के हृदय में प्रविष्ट हुई और परस्त्रीरूपी भुजंगी कं भय से वह भी तत्काल उसके हृदय में प्रविष्ट हो गए।
यहाँ '(प्रवेश त्मक ) क्रियारूप विशेषता' का उत्पादन है।
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अप्पय दीक्षित का खंडन और जो कुवलयानंदकार ने लिखा है- "यथोर्ध्वाक्ः पिवत्यम्बु पथिको विरलाङ्गुलिः। तथा प्रपापालिकापि धारां वितनुते तनुम्। जिस प्रकार पथिक ऊँचे नेत्र करते हुए अंगुलियों को विरल करके पानी पी रहा है उसी प्रकार प्याऊवाली भी धार को पतली करती जा रही है।
"यहाँ पथिक ने अपनी आसक्ति के कारण पानी देने के बहाने बहुत समय तक अपना मुख दर्शन चाहनेवाली प्याऊवाली का, अंगु लियों को विरल करने द्वारा दरी तक पानी पीने का सिलसिला बनाये रखने से उपकार किया; उसी प्रकार प्याऊवाली ने भी अपना मुख देखने की अभिलाषा वाले पथिक का धार पतली करने द्वारा पानी देने का सिलसिला देरी तक चालू रखकर उपकार किया।" सो उचित नहीं। प्रथम तो यह पदरचना ही आ्रयुष्मान् ग्रंथकर्ता की व्युत्पत्ति- शिथिलता प्रकट करती है। उदाहृणार्थ 'स्वमुखावलो कनमभिलषन्त्या: (अपना मुखदर्शन चाहनेवाली ) यहाँ पर 'स्व' शब्द प्याऊवाली का विशेषण बनता है, अतः इसका अरर्थ प्याऊवाली ही होना उचित है, पथिक नहीं। इसी प्रकार 'स्व्रमुखावलोकनमभिलषतः (अ्रपना मुख देखने की अभिलाषावाले) यहँ भी 'स्व' शब्द का अर्थ पथिक ही होना चाहिए, न कि प्याऊवाली। इस स्थिति में अर्थ की अ्रसंगति स्पष्ट ही है। आप कहेंगे कि-सर्वनामों की शक्ति 'बुद्धिस्थ प्रकार से अव- च्छ्िन्न' में होती है-अर्थात् जिस वस्तु को हमने बुद्धिस्थ कर रखा है वह सर्वनाम का अर्थ होती है, अतः अभीष्टबोध सिद्ध हो जायगा,
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क्योंकि आप की बुद्धि में जिस प्रकार 'स्व' शब्दों के श्रथों के अवच्छे- दक विशेषण 'प्रपापालिकात्व' और 'पथिकत्व' हैं उसी प्रकार हमारी बुद्धि में 'पथिकत्व, और 'प्रपापालिकात्व' हैं, पर यह उचित नहीं। क्योंकि तत्, इदम्, अस्मद् युष्मद् इत्यादि के समान उन उन के विशेषों की व्युत्पत्ति की भी यहाँ कल्पना करनी पड़ेगी। कहने का तात्पर्य यह कि जिस प्रकार 'तत्' शब्द का प्रयोग परोक्षवर्ची के ही लिए हो सकता है और 'इदम्' शब्द का अर्थ प्रत्यक्षवर्ती के ही लिए होता है-वहाँ आप यह नहीं कह सकते ककि 'तत्' का अथ 'प्रत्यक्षवर्ची' और 'इदम्' का अथ 'परोक्षवर्त्ती' हो सकता है वैसे ही यहाँ भी जो आप चाहें सो अर्थ कर लें यह नहीं बन सकता और यहाँ वह व्युत्पत्ति इस रूप में होगी कि 'स्व' 'निज' आदि शब्द जिसके विशेषण बनाकर लगाए गए हैं, उसके बोधक होते हैं। इसी का फल यह है कि-'स्वदाररतानां विप्राणामहं भक्तः (अपनी पत्नी में आसक्त ब्राह्मणों का मैं भक्त हूँ) और 'देवदत्तस्य पुत्रः स्वमातुर्भक्तः (देवदत्त का पुत्र अपनी माँ का भक्त है। इत्यादिक में किसी भी अभ्रांत को 'मेरी स्त्री में श्रसक्त' अरथवा 'देवदत्त की माता का भक्त' यह प्रतीति स्वरसतः नहीं होती। अतएव व्युत्पन्नशिरोमणि मम्मट भट्ट ने काव्यप्रकाश में कहा है कि- "'निजतनुस्वच्छलावरायवापी संभूताम्भोजशोभां विदधदभिनवो दराडपादो
१-यह पूरा श्लोक और उसका अर्थ इस प्रकार है- नखकिरणलसत्केसरालीकरालः प्रत्यग्रालक्तकाभाप्रसरकिसलयो मञ्जुमज्जीरमृङ्गः। भर्तुनृत्तानुकारे जयति निजतनुस्वच्छलावरयवापी- संभूताम्भोजशोभां विदधदभिनवो दएडपादो भवान्या: ।। भवानी का चरणदंड विजयी है, जो स्वामी ( शिवजी) के नृत्त के अ्रनुकरण के समय अपने शरीर के स्वच्छ लावएयरूपा वापी से उत्पन्न
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भवान्याः' यहाँ 'तनु' दंडपाद से संबद्ध प्रतीत होती है और अपेकतित है भवानी से संबद्ध"।
आप कहेंगे कि यह दूषय (अभवन्मतयोग) श्रुतिक्टुत्वादि के समान केवल काव्य के ही विषय में है, न कि साधारण वाक्य में। तो यह उचित नहीं, क्योंकि शब्दव्युत्पत्ति में काव्य का अंतर्भाव नहीं है-अथांत् शब्दव्युत्पन्ति केवल काव्य में ही हो और अन्यत्र नहीं ऐसा कोई नियम नहीं है। इसके अतिरिक्त उक्त व्युत्पत्ति यदि केवल काव्य के ही विषय में मानी जाय तो यह दोष होगा कि पूर्वोक्त वाक्य का प्रयोग 'मेरी पत्नी में आसक्त' और 'देवदत्त की माता का भक्त' इस तात्पर्य से करने वाले का आप उपहास नहीं कर सकते-उसे शुद्ध मानना पड़ेगा। दूसरी बात यह है कि लक्षण में जो 'परस्पर का उपकार' लिखा है वह अपने (जिसका उपकार हो रहा है) से भिन्न में रहनेवाले प्रयत् से सिद्ध होने पर ही चमत्कारी होता है, न कि अपना उपकार अपने आप करने पर, क्योंकि जैसे बरफ को ठंढा करने के लिए दूसरे का प्रयत्न अनावश्यक है उसी प्रकार अपना स्वार्थ भी अपने आप करने में भीं परस्पर का प्रयत्न अनावश्यक होने से चमत्कारिता का अभाव हो जाता है, कितु प्रकृत उदाहरण में 'घार को पतली करने वाली' द्वारा अन्यमुखदर्शन के लिए प्रयुक्त धार के पतली करने और शँगुलियों को विरल करनेवाले द्वारा चिरकाल तक प्रयुक्त अंगुलियों को विरल करने का उपयोग अपने आप के उपकार में ही चमत्कारी है, न कि दूसरे
कमल की शोभा को धारण करता है, जिस कमल का जंघाकांड (पिंब्ली) बड़ी डंडी है, जो नख किरणों से सुशोभित केसरों की पंकि से कराल (भरा हुआ) है, ताजे आलते की कांति का विस्तार जिसके पल्लव हैं और सुंदर नूपुर जिसके भ्रमर हैं।
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द्वारा किए जानेवाले (अपने) चिरकालदर्शन में। तात्पर्य यह कि धार गिरानेवाली इसलिए घार मंदी नहीं कर रही है कि पानी पीने- वाला इसका मुँह देर तक देख सके और इसी प्रकार जल पीनेवाला भी अंगुलियाँ इसलिए विरल नहीं कर रहा है कि घार गिरानेवाली का मुँह देर तक दीखता रहे। इसलिए यह इस अलंकार का अनुदाहरण ही है-इस तरह सहृदयों को विनार करना चाहिए।
श्रन्योन्यालंकार समाप
विशेषालंकार
लक्षण
विशेषालंकार प्रथमतः दो प्रकार का है (१) प्रसिद्ध आश्रय के बिना वर्णन किया जानेवाला आधेय यह एक प्रकार है औरर (२ ) एक आधेय का जिस किसी परिमित आधार में रहने पर भी एकसाथ अनेक आधारों में रहने के रूप में वर्णान किया जाय-यह दूसरा प्रकार है। लक्षण का विवेचन 'एकसाथ (युगपद्)' इस विशेषण के कारण आगे कहे जाने-
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वाले पर्याय अलंकार में अतिव्याप्ति नहीं होती। इससे यह भी सिद्ध है कि अन्य ग्रंथों के लक्षण अतिव्याप्तग्रस्त ही हैं।
इस अलंकार का तीसरा प्रकार प्राचीनों ने यह लिखा है कि- (३ ) किसी कार्य को आ्ररंभ करनेवाले द्वारा असंभावित अ्रशब् अन्य वस्तु का बन जाना।
सो इस तरह इन तीनों में से काई-एक होना विशेनालंकार का सामान्य लक्षण है।
यह प्राचीनों का कथन है।
इनमें से प्रथम भेद दो प्रकार है (क) आधेय का प्रसिद्ध आधार से भिन्न में रहने का वर्शन श्रर (ख) निराधारत्वेन वर्णन। क्रम से उदाहरण, जैसे-
( १-क) अये राजान्नाकर्णाय कुतुकमाकर्रानयन! त्वदाधारा कीर्तिवसति किल मौलौ दशदिशाम्। त्वदेकालम्बोऽयं गुरगणाकदम्बो गुसनिधे! मुखेषु औ्रौढानां विलसति कवीनामविरतम्।
हे विशालनेत्र राजन् ! आ्ररप जिसके आधार हैं वह कीर्ति दशों दिशाओं के मस्तक पर निवास करती है; और हे गुखनिधे ! जिसके एक मात्र आप आलंबन हैं यह गुखावली का समूह प्रौढ कवियों के मुखों में निरंतर क्रीडा कर रहा है।
यहाँ (प्रसिद्ध आधार राजा के बिना) कीर्ति का दिशाओं के
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मस्तक पर वर्शन किया गया है और इसी प्रकार गुरागणों का कवियों के मुखों में।
(१-ख) युक्त तु याते दिवमासफेन्दौ तदाश्रितानां यदभूद्विनाशः। इदं तु चित्रं भुवनावकाशे निराश्रया खेलति तस्य कीर्तिः॥
आसफ खाँ रूपी चंद्रमा के स्वर्ग चले जाने पर उनके आश्रितों का जो विनाश हुआ यह तो उचित ही था, किंतु आश्चर्य यह है कि- लोकों (पृथ्वी आदि) के मध्य उनकी कीर्ति निराश्रय खेल रही है। दूसरा प्रकार (यहाँ आधेय का अनेक आधारों में रहने का वर्गन) जैसे- नयने सुदृशां, पुरो रिपूणां, वचने वश्यगिरां महाकवीनाम्। मिथिलापतिनन्दिनीभुजान्तःस्थित एव स्थितिमाप रामचन्द्रः॥ भगवान् रामचंद्र ने मिथिलेशनंदिनी की भुनाओं के मध्य में स्थित रहते हुए ही सुनयनियों के नयन में, शत्रुशं के संमुख और वश्यवाक् महाकवियों के वचन में स्थिति प्राप्त की। (यहाँ सीता के भुजांतररूपी परिमित आधार में स्थित होते हुए भी श्री रामचंद्रका सुनयनियों के नयन आदि अनेक आधारों में एक- साथ वर्णन किया गया है) तृतीय प्रकार (किसी कार्य के आरंभ द्वारा अशक्य अन्य वस्तु का बन जाना) जैसे- कोदए डच्युतकाए डमएडलसमाकीणंत्रिलोकीतलं रामं दृष्टवतां रसे दशमुखप्राणापहारोद्यतम्।
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ज्वालाभिर्जगतोतलं कवलयन्कालानलो गोचरः।।
• रख में रावण के प्राश लेने के लिए उद्यत अतएव धनुष से गिरे हुए बाएसमूह से त्रिलोकीतल को व्याप्त करनेवाले राम को जिन मनुष्यों ने देखा उन मनुष्यों के, महान् वायु के वेग से प्रचंड की हुई ज्वालाओं से पृथ्वीतल को कवलित करता हुआ दुर्दर्श भी प्रलयानल, (नयन-) गोचर हो गया। यहाँ राम के दर्शन करनेवालों के लिए 'कालानलदर्शन' रूपी 'अन्य अशक्य वस्तु का बन जाना' बताया गया है।
इस अलंकार के विषय में प्राचीनों के अभिप्राय
शंका की जा सकती है कि-
लोभाद्वराटिकानां विक्रेतु तक्रमानिशमटन्त्या। लब्धो गोपकिशोर्या मध्येरथ्यं महेन्द्रनीलमखिः ॥ कौडियों के लोभ से छाछ बेचने के लिए रात तक भटकती हुई गोपकिशोरी ने गली के बीच महान् इंद्रनीलमणि पा लिया।
इस 'वक्ष्यमाण प्रहर्षर और विषमालंकार के संकर' में (उक्त) तृतीय भेद की अर्परतिव्याप्ति होती है, क्योंकि यहाँ 'दही बेचना आ्ररंभ करनेवाली' को नीलमशि की प्राप्ति का वर्शन है, जो 'अननुरूप संसर्ग' और 'साक्षात् प्रयत न करने पर भी इष्टार्थ की प्राप्ति' दोनों में से कुछ भी कहा ना सकता है। इसका समाधान यह है कि-'अशक्य अन्य वस्तु का बन जाना' इसके साथ 'अशक्य वस्तु का अ्रभेदाध्यवसान जिसका मूल हो' यह
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विशेषण और है। सो 'कालानलो वीक्षितः' इस अभी अभी दिए हुए विशेषालंकार के उदाहरण में जैसे अशक्य अन्य वस्तुरून कालानल का दर्शन 'राम और कालानल के अभेदाध्यवसान' द्वारा अथवा 'राम- दर्शन और कालानलदर्शन के अभेदाध्यवसान' द्वारा बनाया गया है वैसे 'दही बेचने को भटकनेवाली' के साथ 'महेंद्रनीलमसिदर्शन' का अभेदाध्यवसान नहीं है, अतः कोई दोष नहीं। यदि कहो कि भगवान् में नीलमगि के अभेदाध्यवसान से वह बना है, अतः फिर भी दोष निवृत नहीं हुआ, तो यह ठीक नहीं, क्योंकि (लक्षण में) 'किसी कार्य को आरंभ करने वाले द्वारा; इस जगह जो कार्य विशेषणरूप से प्रविष्ट है उसके साथ 'अशक्य अरन्य वस्तु का अ्र्भेद' विवच्ित है, न कि कहीं भी अभेदाध्यवसान होना, और प्रस्तुत उदाहरण में छाँछ बेचने के साथ नीलमगि के अभेद का अध्यवसान है नहीं। 'विशेष' का अरन्य अलंकारों से भेद यह विशेषालंकार का तृतीय भेद अरतिशयोक्ति से भी गतार्थ नहीं होता, क्योंक उक्त उदाहरण में विषय 'राम' का विषयी 'कालानल' द्वारा निगरख नहीं है। न यह रूपक से ही गतार्थ होता है, क्योंकि विषय और विषयी की समानाधिकरणता न होने से आरोप नहीं बनता। न स्मरणालंकार के द्वारा ही गतार्थ है, क्योंकि 'कालानल' का श्रवसा 'देखना' क्रिया के कर्मरूप में है, अतः उसे 'समरण' का कर्म सिद्ध नहीं किया जा सकता। सो 'अशक्य अन्य वस्तु का बन जाना' विशेषालंकार का ही भंद है। यह है प्राचीनों का अभिप्राय। प्राचीनों के अभिप्राय पर विचार अ्रब इस विषय में विचार किया जाता है-यह (तीसरा प्रकार) विशेषालंकार का भेद है यह कैसे जाना जाता है? क्योंकि रूपकादि के
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समान इस अलंकार का कोई सामान्य लक्षण तो है नहीं, जिससे तदंतर्गत होने के कारण 'श्रशक्य अरन्य वस्तु के करने' को हम विशेष का एक भेद स्वीकार करें। आरप कहेंगे कि-'इन तीनों में से काई एक' यह सामान्य लक्षण है, तो यह उचित नहों, क्योंकि इसी प्रकार से ('कोई एक' कहकर) इसको अन्य किसी अलंकार का भेद भी सहज ही कहा जा सकता है। अनुगत लक्षण के बिना प्राचीनों की उक्ति तो राजाज्ञा मात्र है, उसकी अपेक्षा तो इसको पृथक अलंकार ही फहना सुंदर है।
दूसरी बात यह है कि 'येन दृष्टोडसि देव त्वं तेन दृष्टो हुताशनः' अथवा 'तेन दृष्ट वमुघरा'-अर्थात् हे देव जिसने आपको (क्रोध के समय) देखा उसने अग्नि को देखा, अथवा (क्षमा के समय ) पृथ्वी को देखा। 'इत्यादिक में 'अरग्निदर्शन' अ्रथवा 'वसुधादर्शन' आररदि अ्रन्य वस्तु के अ्रशक्य और अ्रसंभावित न होने से प्रकृत (विशेष) अलंकार का संभव नहीं है, अतः यदि वहाँ निदर्शना स्वीकार की जाय तो 'येन दष्टोऽि देव त्वं तेन दृष्टः सुरेःबरः' इत्यादि विशेषालंकार में भी उसी का आश्रय लेना चाहिए, क्योकि-'अग्निरूप होने' और 'सुरेश्वररू होने' इन दोनों में कोई चमत्कार का भेद नहीं है। सो इस तरह प्राचीनों के अ्नुसार हमन जो 'कोदंडच्युत०' इत्यादि उदाहरगा दिया है वह भी विशेषालंकार के पथ पर शरूढ होने में श्रसमर्थ ही है।
इसी से "त्वां पश्यता मया लब्घं कल्पवृक्षनिरीक्षगाम्-आरपको देखते हुए मैंने कल्सवृक्षका दर्शन प्राप्त किया" इत्यादि कुवलयानंदोक्त उदाहरण भी गतार्थ हो जाता है-अर्थात् वहाँ भी निदर्शना ही है, विशेष नहीं। अरतः तृतीय भेद का उदाहरण निम्नलिखित होना चाहिए-
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कि नाम तेन न कृतं सुकृतं पुरारे दासीकृता न खलु का भुवनेषु लक्ष्मीः। भोगा न के बुुजिरे विवुघैरलभ्या येनार्चितोऽसि करुणाकर! हेलयापि।।
हे करुणाकर त्रिपुरारि ! जिसने खेल में भी आपकी अर्चना कर ली उसने कौन सुकृत न कर लिया, त्रिलोकी में कौन सी लक्ष्मी को दासी न बना ली और देवताओं से अलभ्य कौन से भोग न भोग लिए। यहाँ संपूर्ण त्रिवर्ग की प्राप्ति 'अरशक्यकर' है, क्योंकि यहाँ 'भगवदर्चन' से 'सुकृत करने' आदि का सादृश्य विवच्ित नहीं है, जिससे कि निदर्शनादिक की संभावना की जाय (याद रखिए कि निदर्शना सादश्यमूलक अलंकार है किंतु (अ्रर्चन और त्रिवर्ग प्राप्ति में) कार्यकारयाभाव विवचित है। सो इस तरह अब 'अशक्य अन्य वस्तु के बनाने' में 'अभेदा- ध्यवसानमूलक' यह विशेषण अपेक्षित नहीं। आरप कहेंगे कि 'दधि विक्रेतुमटन्त्या' इस पूर्वोक्त उदाहरण में अतिव्यास्ति हो जायगी तो यह कोई दोष नहीं, क्योंकि वहाँ प्रहर्षण और विषम के संकर के साथ विशेष का संकर हमें अभीष्ट है-यह अन्य विद्वान् कहते हैं। विशेषालंकार समाप्त
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व्याघात अलंकार
लक्षणा
जहाँ एक कर्ता ने जिस कारण से कोई कार्य बनाया हो अथवा बनाना चाहा हो वह कार्य दूसरे कर्त्ता द्वारा उसी कारण से उसके विरुद्ध कार्य के बना देने द्वारा अथवा बना देने की इच्छा द्वारा बिगाड़ दिया जाय उसे व्याघात कहते हैं।
लक्षण का विवेचन
इस व्याघात में पूर्व कर्ता की अपेक्षा अन्य कर्ता में विलक्षणता प्रतीत होने के कारण व्यतिरेक की सिद्धि फल है। यह भी याद रखना चाहिए कि यहाँ कर्ता का अर्थ 'कार्य के उद्देश्य से प्रवर्तमान' यह है। इस विवक्षा (कथन की इच्छा) का प्रयोजन अभी अरभी कहा जा रहा है- उदाहरण दीनद्रुमान्वचोभि: खलनिकरैरनुदिनं दलितान्। पल्ववयन्त्युव्वसिता नित्यं तैरेव सज्जनघुरीखाः॥ दुष्टसमूहों द्वारा वचनों से प्रतिदिन दलित दीनजनरूपी वृक्षों को सजनों में अग्रणी लोग उल्लसित होकर नित्य उन्हीं (वचनों) के द्वारा पल्लवित करते हैं।
यहाँ श्रवण द्वारा उपनीत 'वचनत्व' रूप एक धर्म के द्वारा अभिन्न- रूप में स्वीकृत कठोर और मधुर वचनों की एकता के अध्यवसान से
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आपाततः प्रतीत होनेवाला विरोध व्यक्तिगत रूप से भिन्न भिन्न कार्यों की कारणता का विचार करने से निवृत्त हो जाता है, अतः यह अलं- कार भी विरोधमूलक है।
प्रत्युदाहरण पाएिडत्येन प्रचएडेन येन माद्यन्ति दुर्जनाः। तेनैव सज्जना रूढा यान्ति शान्तिमनुत्तमाम् ॥ जिस प्रचंड पांडित्य से दुर्जन लोग मदमत्त हो जाते हैं, उसी पांडित्य से सुप्रसिद्ध सजन लोग सर्वोचम शांति को प्रात्त करते हैं। यहाँ दुजन और सजनों के (एक ही पांडित्य द्वारा, व्याकरण- नुसार) 'मदकर्ता' और 'शमकर्ता' होने पर भी उस उद्देश्य से प्रवृत्ति नहीं है, अतः लक्षणगत 'कर्ता' इस विशेषण द्वारा (क्योंकि कर्त्ता का अर्थ 'कार्य के उद्देश्य से प्रवर्तमान' यह ऊपर बताया जा चुका है) इस श्रलोंक का संग्रह नहों होता। कहा जा सकता है कि इसको व्याघात का उदाहरण माना जाय तो क्या दोष है ? उत्तर यह है कि आश्रयविशेष के स्वभाव की सह्ा- यता से एक ही कारण दो विरुद्ध कार्यों की उत्पत्ति करें इसमें बाधक न होने के कारण (अथांत् ऐसा होना अविरुद्ध है, अतः) व्याघात का ही अभाव है। सो यह उदाहरगा संगत नहीं होता, क्योंकि (केवल) लोकसिद्ध वस्तु (अर्थात् जिसमें कल्पना का पुट न हो वह) काव्यालंकार का स्थान नहीं हो सकती। दूमरा व्याघात (अर्थात् बनाने चाहे को बिगाड़ना) जैसे- विमुश्चसि यदि प्रिय प्रियतमेति मां मन्दिरे तदा सह नयस्व मां प्रसाययन्त्रणायन्त्रितः ।
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अथ प्रकृतिभीरुरित्यखिलभीतिभङ्गक्षमा- न्र जातु भुजमएडलादवहिती बहिर्भवय।। हे प्रिय! यदि मैं प्ियतमा हूँ इस कारण मुझे घर पर छोड़ रहे हैं तो प्रेम की वेदना से व्यथित आप मुझे साथ ही ले चललिए और यदि मैं स्वभावतः भीरू हूँ इस कारस छोड़ रहे हैं तो संपूर्ण भय के भंग करने में समर्थ भुजमंडल से, सावधान होकर, कभी बाहर न करिए।
यह दंडकारण्य में प्रवेश करने की इच्छा वाले भगवान् राम के प्रति भगवती जानका का वाक्य है। (यहाँ 'प्रियतमात्व' श्रथवा 'भीरुत्व' जिन्हें राम 'घर पर छोड़ना चाहने' का कारण मानते हैं उन्हीं द्वारा 'घर पर नहीं छोड़ना' सिद्ध किया जा रहा है)
प्राचीनों का सिद्धांत और उस पर विचार
इस दोनों प्रकार के व्याघात में पूर्वकर्ता के अभीष्ट की बाधा समान है, यह प्राचीनों का सिद्धांत है। जैसा कि उनका उदा- हरण है-
"दृशा दग्धं मनसिजं जीवयन्ति दृशैव याः । विरूपाक्स्य जयिनीस्ता: स्तुवे वामलोचनाः ।। दृष्टि से दग्ध कामदेव को जो दृष्टि से ही जिलाती हैं, उन विरू- पाच् (भोंड़ी आँख वाले-शिव) को जीतनेवाली सुनयनाओं की मैं स्तुति करता हूँ।" इसपर विचार किया जाता है-उक्त उदाहरय में व्यतिरेक ही अलंकार है, क्योंकि 'जीतने वाली' 'विरूपाक्ष को' और 'सुनयना' इन १४
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शब्दों से व्यतिरेक ही प्रकाशित होता है। कहा जा सकता है कि यहाँ व्यतिरेक के उत्थापकरूप में व्याघात स्थित है, कितु इस तरह भी व्याघात की अलंकारता सिद्ध नहीं हाती। कारण, अलंकार का उत्या- पक अलंकार ही होना चाहिए, ऐसा कोई नियम नहीं है। "आनने- नाकलङ्गेन जयतीन्दुं कर्लाङ्गनम्'-अकलंक मुख से कलकी चंद्रमा को जीत रही है" इत्यादि के समान कंवल वस्तु से भी व्यतिरेक का उत्थापन सिद्ध है। व्याघात का उक्त प्रकार वाले व्यतिरेक से पूर्णातया मुक्त कोई विषय नहीं है, जिससे कि उसकी स्वतंत्रता स्वीकार करें। इस कारणा यह सिद्ध है कि अलंकारतर से अविनाभूत (अनिवार्य रूप से संबद्ध) अ्रन्य अलंकारी के समान एक प्रकार का अरपवांतर चमत्कार इस अलंकार को भिन्न बनाता है। इस विषय में प्राचीनों की उक्ति ही शरण है-युक्ति तो कोई है नहीं।
अप्पय दीक्षित का खंडन
औ्रर जो-
"लुब्धो न विसृजत्यर्थ नरो दारिद्रयशङ्कया। दातापि विसृजत्यर्थ तयैव ननु शङ्कया।।
लोभी मनुष्य दारिद्य की शंका से धन का त्याग नहीं करता और दानी भी उसी शंका (दारिद्रू की शंका) से धन का त्याग करता है।" यह कुवलयानंद में उदाहरया दिया गया है, वह ठीक नहीं है। कारय, यहाँ व्याघात ही नहीं है, क्योंकि न तो दाता की इस क्रिया से लुब्ध के कार्य में बाधा पड़ती है और न दाता की बाधा डालने की इच्छा ही है। (इसी से नागेश का यह कथन कि "तात्कालिक श्रर जन्मांतरीय दारिद्रय की शंका के अभेदाध्यवसान से लक्षण का
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समन्वय हो जाता है" यह भी दच्तोचर है, क्योंकि यहाँ वह शंका ही नहीं है)। विरोधमूलक अलंकारों का उपसंहार इस तरह श्लेष, अतिशयोक्ति आदि उपायों द्वारा उद्घाटित एवं किसी अंश में अभेदाध्यवसान से आरंभमात्र में उत्पन्न किया हुआ बिजली की चमक के समान अनुवृत्तिरहित केवल चमत्काररूप जो विरोध है तन्मूलक विरोधाभास से लकर व्याघात पर्यत शालंकारों का निरूपण किया गया। इन अलंकारों की परस्पर निन्नता में मनभेद इस विषय में कुळ्र विद्वानों का मत है कि ये सब अलंकार भिन्न- भिन्न रूप की विचित्रता को धारग करते हुए भी विरोधाभास के ही भेद हैं, उससे अतिरिक्त कुछ नहीं, जैसे कि सोने के कंकरा आदि भेद। दूसरा मत है कि-ऐसा मानने से जिनके अंदर सादृश्य रहता है वे रूपक, दीपक आदि भी अमा के ही भेद हो जाँयगे, अतः बड़ी गड़बड़ होगी, इस कारण यह मानना चाहिए कि इनमें परस्पर केवल छाया का अनुसरण है, किंतु चमत्कार भिन्न-भिन्न है, अतः ये अलंकार भिन्न ही हैं। व्याघात अलंकार समाप्त
शृंखलामूलक अलंकार- शृंखला का लक्षण पंक्तिरूप से निबद्ध अर्थों का पूर्व पूव का उत्तरोत्तर में अरथवा उत्तरोत्तर का पूर्व पूर्व में संसृष्ठत्व (संसगयुक्त होना) शृंखला कहलाता है।
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वह संसृष्टत्व कार्य-कारणता, विशेषण-विशेष्यता आदि नाना रूप का होता है। शृंखला की स्वतंत्रता पर विचार यह शृंखला स्वतंत्र रूप में कोई अलंकार नहीं है, क्योंकि श्रगे कहे जाने वाले भेदों से गतार्थ हो जाती है, कारण उनके श्रतिरिक्त इसका कोई पृथक विषय नहीं है। जैसे रूपकादिक में अरभेदांश श्रथवा समानधर्मोश अनुप्राशक रूप में रहने पर भी पृथक पलंकार नहीं है, इसी प्रकार शृंखला भी पृथक् अलंकार नहीं है-यह कुछ विद्वान् कहते हैं। दूसरे विद्वान् इस युक्ति को सहन नहीं करते, क्योंकि ऐसा मानने से सावयवादि मेदों से रूपकालंकार और पूर्णा, लुप्ता आदि भेदों से उपमालंकार भी गतार्थ हो जायँगे-अतः वे भी स्वतंत्र अलंकार नहीं माने जा सकेंगे, क्योंकि विशेष से सर्वथा मुक्त सामान्य होता ही नहीं, जिससे उसका विषय पृथक् हो सके। इस कारण कारणमालादिक श्रृंखला के ही भेद हैं। इन मतों के तत्त्व का विवेचन आगे किया जायगा।
कारणमाला
लक्षण वही शृंखला, अनुगुता (संसृष्ठत्व) के कार्यकारणभाव रूप होने पर, कारणमाला कहलाती है। कारएमाला के भेद कारणमाला दो प्रकार की है (१) जहाँ पूर्व पूर्व कारय हों औरर पर पर कार्य हों और (२) जहाँ पूर्व पूर्व कार्य हों और पर पर कारणा हों। क्रमशः उदाहरण; जैसे-
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(१) लभ्येत पुएयैरगृहिणी मनोज्ञा तथा सुपुत्राः परितः पवित्राः। स्फीतं यशस्तैः समुदेति नूनं तेनास्य नित्यः खलु नाकलोक:।।
पुण्यों से मनोहर पत्नी मिलती है, उससे सर्वथा पवित्र पुत्र प्राप्त होते हैं, उनसे विस्तृत यश का उदय होता है और उससे स्वर्गलोक श्रनिवार्य है। (यहाँ पूर्व-पूर्व कारख हैं और पर-पर कार्य; जैसे गरहिणी कारण है पुत्र कार्य; पुत्र कारय है यश कार्य और यश कारण है और अनिवार्य स्वर्ग कार्य)।
(२) स्वर्गापवर्गौ खलु दानलक्मी- रदानं प्रसूते विपुला समृद्धिः। समृद्धिमल्पेतरभागधेयं भाग्यं च शंभो! तव पादभक्ति: ॥
दान-लक्ष्मी स्वर्ग-अपवर्ग को उत्न्न करती है, दान को विपुल समृद्धि उत्पन्न करती है, समृद्धि को महान् भाग्य उत्पन्न करता है और हे शम्भो ! भाग्य को आपके चरणो की भक्ति उत्पन्न करती है। (यहाँ पूर्व-पूर्व कार्य और उच्चरोत्तर कारणा हैं; जैसे स्वर्गापवर्ग कार्य हैं और दान-लक्ष्मी कारण, दान कार्य है और समृद्धि कारण, समृद्धि कार्य है और भाग्य कारणा और भाग्य कार्य है और शंभु की चरणभक्ति कारय)।
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इस अलंकार में यदि आरंभ में कारण की उक्ति ही प्रस्तुत की जाय तो फिर उसका काररा और फिर उसका भी कारण इस तरह, अथवा प्रस्तुत वस्तु किसी का कारण है और उसका कार्य भी किसी का कारण है इस प्रकार; दोनों ही रूपों में कारणमाला उचित है और जब आरंभ में कार्य की उक्ति हो तब कार्य का कार्य और उसका भी कार्य इस प्रकार अथवा प्रस्तुत वस्तु किसी का कार्य है और उसका कारण भी किसी का कार्य है इस प्रकार कथन उचित है। किंतु इस अलंकार में यह ध्यान रखना चाहिए कि-पूर्वोक्त भेदों में से चाहे कोई भी भेद हो, कार्यता अथवा कारखता के उपस्थापक जिस शब्द का आदि में प्रयोग किया गया हो उसी शब्द का अंत तक निर्वाह करना चाहिए। इस प्रकार क्रम से निबंधन आफांक्षा के अनुरूप होने के कारण सुंदर होता है, अन्यथा (अर्थात् पर्याय शब्दादि देने से) प्रक्रमभंग हो सकता है। जैसा कि (काव्यप्रकाश में उदाहृत) प्राचीनों के निम्नलिखित पद्य में है-
"जितेन्द्रियत्वं विनयस्य कारणं गुणप्रकर्षो विनयादवाप्यते। गुणाधिके पुंसि जनोऽनुरज्यते जनानुरागप्रभवा हि संपद:।
जितेंद्रियता विनय का कारण है; विनय से गुणों का प्रकर्ष प्राप्त होता है, अधिक गुण वाल पुरुष में जनता का अनुराग होता है और जनानुराग संपच्ियों का कारय है।" यहाँ 'जितेंद्रियता विनय का कारण है' यह सुनकर 'जितेंद्रियता का भी कारण क्या है' अथवा 'विनय किसका कारण है' इस रूप में आकांक्षा का उदय होता है, क्योंकि श्रवश के अनुसार (सुनते समय) पहले कारण की ही उपस्थिति होती है। यद्यपि कहीं कहीं ऐसी आकांक्षा भी होती है कि 'कारण तो जाना
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पर इसका कार्य क्या है' यह आफांक्षा कार्यत्व और कारगत्व के (परस्पर ) संबंधी पदार्थ होने के कारण श्रवगा के अरनंतर 'एक- संबंधिज्ञानम् अपरंसंबंधिस्मारकं भवति' इस न्याय के अनुसार कार्यत्व की उपस्थिति द्वारा बैठा दी जानी चाहिए, किंतु ऐसी आरकांक्षा सर्वत्र नहीं होती, (क्योंकि प्रथम श्रुत वस्तु ही आकांक्षा उठाने में प्रयोजक हा सकनी है) इस स्थिति में 'विनय किसका कारण है' इस आरकांका की 'विनय से गुणों का प्रकर्ष प्राप्त होता है' यह वाक्य यद्यनि फलतः पूर्ति कर देता है, तथापि साक्षात् पूर्ति नहीं करता, अतः ऐसा कथन हृदयंगम नहीं है। इसी प्रकार 'गुणपकर्ष से क्या प्राप्त होता है' इस आरकांक्षा में 'अधिक गुण वाले पुरुष में (जनानुराग हाता है)' यह कथन भी वैसा हा है। कहने का अभिप्राय यह है कि जिस रूप में और जिस पद के द्वारा आफांक्षा का उत्थान हो उसी रू में और उसी पद द्वारा आकांक्षा की पूर्ति अपेक्षित है। कहा जायगा कि यदि उसी पद की पुनरावृत्ति की जायगी तो 'कथितपदता' दोप होगा, तो इसका उत्तर यह है कि इस अलंकार में कथितपदता दोष नहीं है, प्रत्युत किसी अ्रन्य पद द्वारा उस अर्थ के कहने पर जैसे रूपांतर से स्थित नट का पहिचानना कठिन होता है वैसे पहिचानने में रुकावट आने के कारण विवक्षित अर्थकी सिद्धि अकुंठित नहीं रहता, अतः दोष होगा, क्योंकि शब्द से जो अर्थ उपस्थित होता है उस अर्थ में 'प्रवृत्िनिमित्त' (जैसे घट में घटत्व, गौ मैं गोत्व आदि) के समान शब्द भी विशेषशारून से भासित होता है, जैसा कि कहा है- "न सोस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादते। ऐसा कोई ज्ञान नहीं है जिसमें शब्द का अनुगम न हो।"
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दूसरे, प्रत्येक शब्द का (चाहे वे पर्याय ही क्यों न हों) विशिष्ट शर्थ, स्वरूप से अभिन्न होने पर भी विशेषण के भेद से कुंड, गोलक आरदि शब्दों के समान, विलक्षण प्रतीत होता है। तात्पर्य यह है कि-कुंड और गोलक दोनों ही 'जारज पुत्र' के नाम हैं, किंतु कुंड उसका नाम है जो पति की जीवितावस्था में जार से उत्पन्न हुआ हो और गोलक उसका नाम है जो पति के मर जाने पर जार से उत्पन्न हुआ हो। यहाँ जारजता के रूप में अभिन्न होने पर भी (स्त्री के) जीवितपतित्व और मृतपतित्व विशेषणों के कारख निन्न अर्थों की प्रतीति होती है। वही बात प्रत्येक पर्याय शब्द में है।
आप कहेंगे कि-कुंड गोलक आदि पदों का प्रवृत्तिनिनिच्त जीवितभतृकत्व और मृतभर्तृकत्व्व आरदि विशेषणों से घटित है, श्रतः वहाँ पर मिन्नाकारवाली प्रतीति हो सकती है, किंतु ताम्र, शोख, रक्त इत्यादिक में तो ताम्र आदि शब्दों के शक्तत्वेन (शक्तिप्रतिपाद्य के रूप में) शक्यतानवच्छेदक होने के कारण (अर्थात् ताम्र आदि शब्द अपने वाच्य के शक्यतावच्छेदक में स्व्रस्वरूपेण प्रविष्ट नहीं होते) और जो गुणगत जातिविशेष (रक्तत्व आदि) शक्यतावच्छेदक है उसके अरभिन्न होने के कारण (अर्थात् रक्तत्व, शोगत्व दो भिन्न भिन्न जातियाँ नहीं हैं) अतः अभिन्नाकार प्रतीति ही उचित है। तो यह आरपका कथन सत्य है, किंतु आप यह भी सोचिए कि-
"उदेति सविता ताम्रस्ताम्र एवास्तभेति च। संपत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता।
सूर्य ताम्रवर्स ही उदय होता है और ताम्रवर्सा ही शरस्त होता है। महापुरुषों की संपत्ति और विपत्ति में एकरूपता रहती है।"
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इस जगह जिस प्रकार विलक्षणतासे सून्य एकरूपताका बोध होता है, वैसा 'उदेति सविता ताम्रो रक्त एवास्तमेति च' यहाँ नहीं होता, यह सभीके अनुभवसे सिद्ध है। ऐसी स्थितिमें यद्यति 'शब्द' प्रवृत्ति निमि्त (घटत्वादि) से मिन्न है तथापि विलक्षणता की अ्न्यथानुपपच्ति के कारण और अनुभव के बल से शब्द में शक्य (अ्र्थ) की विशेषणता सिद्ध है, तब उसके अनुकूल ही शब्दों की व्युत्पत की कल्पना करनी पड़ती है और वह व्युत्त्ति सामान्य कार्यकारणभावरूप में अभिधा, लक्षणा आदि किसी वृत्ति के संबंध से अर्थविशिष्ट शाब्दबोध के रूप में और शब्दविशिष्ट अर्थ की उपस्थिति के रूप में होती है। और घटत्वादि तत्तत्पत्त्तिनिमिच् जिसमें विशेषण रहता है एसे बोध के रूप में तथा घटविशिष्ट पदज्ञानत्वादि के रूप में तो विशेष रूप से दूसरा कार्यकारसभाव होता है। इस तरह सामान्य-विशेष कार्यकारणभाव के द्वारा शब्द की भी शक्यार्थ में विशेषणता हो जाती है। सामान्य सामग्री विशेष सामग्री सहित ही ज्ञानजनक होती है अतः कोई दोष नहीं है। अथवा (दो दो कार्यकारणभाव मानने की अरपेक्षा यह सरल मार्ग है कि) अभिधादि वृत्ति के संबंध से घटादिविशिष्ट पदज्ञान के रूप में और घटादि पद तथा घटत्व दोनों जिसके विशेषण हैं ऐसे घटादि जिसके विशेष्य हैं ऐसी उपस्थिति के रूप में (शब्द और अर्थ का) कार्यकारसभाव है। और यह नियम है कि पदार्थोनस्थिति और शाब्द- बोध समानाकार होते हैं अतः शाब्दबोष में भी पद की प्रतीति होती है। यद्यपि घटपद से 'घटत्वप्रकारक घटविशेष्यक' शाब्दबोध ही माना जाता है, अतः पद का भी शाब्दबोध में प्रवेश करने से गौरव दोष दिखाया जा सकता है, तथापि यह जानना चाहिए कि अनुभव के बल से प्रामाशिक गौरव दोषाघायक नहीं होता, अतः कोई दोष नहीं। इस बात को हृदय में रखकर ही भतृ हरि ने-
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"न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादते। अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते।। अर्थात् कोई ज्ञान ऐसा नहीं है जो बिना शब्द के अनुगम के हो। सब ज्ञान शब्द से अनुविद्ध सा ही प्रतीत होता है।" यह कहा है।
कारणमाला समीस।
एकावली
लक्षस
पूर्वोक्त शृंखला ही संस्र्ग के विशेष्यविशेषणभावरूप होने पर एकावली कहलाती है।
विवेचन
एकावली दो प्रकार की है (१ ) पूर्व पूर्व के उत्तरोत्तर के प्रति विशेष्य होने पर (२) अथवा पूर्व पूर्व के उत्तरोत्तर के प्रति विशेषण होने पर। उनमें से पहले भेद में उचरोत्तर जो विशेषण है वह स्था- पक और अपोहक भेदों से दो प्रकार का होता है। स्थापक का अर्थ है अपने संबंध के द्वारा विशेष्यतावच्छेदक का नियत करनेवाला औरर अपोहक का अर्थ है अपने व्यतिरेक (न रहने ) द्वारा विशेष्यतावच्छे- दक के व्यातरेक का बोध उत्पन्न करने वाला। (पूर्व पूर्व के विशेष्य होने का ) उदाहरण-
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स पणिडतो यः स्वहितार्थदर्शी, हितं च तद्यत्र परानपक्रिया। परेच ते ये श्रितसाधुभावाः, सा साधुता यत्र चकास्ति केशवः। वह पंडित है जिसको अपनी हितकारी वस्तु का ज्ञान हो, हित वह है जिसमें दूसरे का अपकार न हा, दूसरे वे हें जो सत्पुरुषतायुक्त हों और सतपुरुषता वह है जिसमें भगवान् केशव शोमित हो रहे हों। यहाँ पूर्व पूर्व का उत्तरोत्तर स्थापक है। अर्थात् हितार्थदर्शिता पांडित्य की स्थापक हे, दूसरों का अ्पकार न करना हितार्थदर्शिता का स्थापक है-इत्यादि।
नार्य: स यो न स्वहितं समोक्षते न तद्वितं यन्न परानुतोषयम्। न ते परे यैरना साधुता श्रिता न साधुता सा नहि यत्र माधव:।। वह सत्पुरुष नहीं है जो अपने हित की समीक्षा नहीं करता, वह हित नहीं है जिससे दूसरे को संतोप न हो, वे दूसरे नहीं है जिनने सत्पुरुषता का आ्रश्रय नहीं लिया और वह सत्पुरुपता नहीं है जिसमें भगवान् माधव न हों। यहाँ पूर्व पूर्व का उच्रोत्तर अपोहक है। अर्थात् हितसमीक्षा का प्ररभाव आर्यता के अभाव का बोधक है, परसंतोष का अभाव दित- समीक्षा के अभाव का बोधक है-इत्यादि। यद्यपि स्थापक में भी अपोहकता प्रतीत होती है; जैसे-प्रथम उदाहरण में नो अपनी हितकारी वस्तु को नहीं जानता वह पंडित नहीं है) इत्यादि, एवं अपोहक में भी स्थापकता प्रतीत होती है; जैसे- दूसरे उदाहरण में 'जो हित की समीक्षा करता है वह सत्पुरुष है' इत्यादि; तथापि प्रतीत होनेवाली अपोहकता और स्थापकता शब्द से उक्त नहीं होती, अतः कोई दोष नहीं।
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(पूर्व पूर्व के विशेषण होने पर, जैसे) धर्मेश बुद्धिस्तव देव शुद्धा बुद्धया निबद्धा सहसैव लक्ष्मीः। लक्म्या च तुष्टा भुवि सर्वलोका लोकैश्र नीता भुवनेषु कीर्तिः॥ हे देव! आपकी बुद्धि धर्म से शुद्ध है, बुद्धि के द्वारा लक्ष्मी सहसा ही बांध ली गई हैं, लक्ष्मी के द्वारा पृथ्वी पर सब लोग संतुष्ट हैं औ्रर लोग आपकी कीर्ति सब लोकों में ले गए हैं। यहाँ पूर्व पूर्व अपने से अव्यहित उत्तरोच्तर का वरिशेषण होता है। एकावली और मालादीपक का भेद इसी एकावली के द्वितीय भेद में पूर्व पूर्व के द्वारा उत्तरोत्तर का जो उपकार किया जाता है वह (धर्म) यदि मिन्नरूप न होकर एक- रूप हो तो यही एकावली का भेद प्राचीनों के द्वारा मालादीपक के नाम से कहा जाता है। जैसा कि काव्यप्रकाशकार ने कहा है-
"मालादीपकमादं चेद्यथोत्तरगुखावहम्।
अर्थात् यदि पूर्व पूर्व उत्तर उत्तर का उपकार करे तो मालादीपक होता है।" माला और दीपक शब्दों में 'माला' शब्द का अर्थ है 'शृंखला' और 'दीप इव' इस व्युत्पत्ति के अनुसार दीपक शब्द का अर्थ है 'दीप के समान अर्थात् जो एक स्थान पर स्थित रहकर सबका उपकार करे' जैसा कि दीपक करता है। तदनुसार मालादीपक शब्द का संमिलित अर्थ हुआ 'सर्वोपकारक क्रियादि से सुशोभित एक देश में स्थित शृंखला', साधारण शब्दों में इसका अर्थ यह हुआ कि जिस शंखला को एक ही धर्म सुशोभित करता हो वह मालादीपक है।
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सो इस तरह प्राचीनों द्वारा इसका लक्षण दीपकालंकार के प्रकरण में लिख देने मात्र से यह दीपक का भेद है यह भ्रम नहीं करना चाहिए, क्योंकि दीपक के गर्भ में साहृश्य रहता है यह सब आलंकारिकों की मानी हुई बात है और मालादीपक में शृंखला के अवयवभूत पदार्थों का परस्पर सादृश्य ही नहीं है, अतः इसकी दीपकता के कथन पर कैसे श्रद्धा की जाय ? इतना ही नहीं, शंखला में जो पदार्थ आते हैं वे प्रकृताप्रकृत रूप भी नहीं होते। इस चीज का हमने दीपक के प्रक- रख में उदाहरया सहित विवेचन कर दिया है, अतः यहाँ श्रधिक परिश्रम की आवश्यकता नहीं।
इससे कुवलयानंदकार ने जो- "दीप कैकावलीयोगान्मालादीपकमिष्यते।
अर्यात् दीपक और एकावली के योग से मालादीपक बनता है।" यह कहा है, यह केवल भ्रांति का ही विल्ास है। इस पर विद्वानों को विचार करना चाहिए। एकावली समाप्त
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सार अलंकार
लक्षय
वही शृंखला संसर्ग के उत्कृष्टापकृष्टत्वरूप होने पर सार कह- लाती है।
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भेद सार अलंकार दो प्रकार का होता है-(१) पूर्व पूर्व की अपेक्षा उत्तरोत्तर के उत्कृष्ट होने पर (२) पूर्व पूर्व की अपेक्षा उत्तरोत्तर के अप- कृष्ट होने पर। उदाहरय संसारे चेतनास्तत्र विद्वांसस्तत्र साधवः । साधुष्वपि स्पृहाहीनास्तेषु धन्या निराशयाः ॥ संसार में चेतन, चेतनों में विद्वान्, विद्वानों में परोपकारी, परोप- रियों में स्पृहाहीन और स्पृहाहीनों में भी वासनाहीन घन्य हैं। इस अलंकार के पुनः दो भेद कहे जाते हैं-(१) एकविषयक (२) अरनेकविषयक। एकविषयक सारालंकार में अरवस्थादि के भेद का आश्रय लेना आवश्यक है, क्योंकि उत्कर्ष और अपकर्ष बिना भेद के नहीं हो सकते और कोई भी वस्तु बिना अवस्थादि भेदक के अपनी अपेक्षया स्वयं न्यून अथवा अधिक नहीं हो सकती। एकविषयक उत्तरोत्तर उत्कर्ष, जै जम्बीरश्रियमतिलङ्द्य लोलयैव व्यानम्रोकृतकमनीयहेमकुम्भौ। नीलाम्भोरुहनयनेऽधुना कुचौ ते स्पर्धेते खलु कनकाचलेन सार्धम्।। हे नीलकमलनयने! तुम्हारे स्तनों ने लीला से ही निम्बू की शोभा का अतिक्रमण करके सुंदर सुवर्शकलशों को नीचा दिखाया और अब वे निश्चय ही कनकाचल के साथ स्पर्धा कर रहे हैं।
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यहाँ पूर्व पूर्व अवस्था से युक्त कुचों की अपंक्षा उत्तरोचर शवस्था- युक्त कुचों का ही उत्कर्ष वर्शन किया गया है, अतः (वर्णन का विषय केवल कुच होने से) यह एकविषयक सारालंकार है। यद्यपि किसी के मत में परिमाणगेद से भी द्रव्यभेद कहा जा सकता है, तथापि उनके मत में भी 'कुचत्व' धर्म को लेकर श्रभेद के सहारे एकविषयता सहज ही मिद्ध की जा सकती है। पर्याय से सार की गतार्थता नहीं है यदि इस उदाहरण में आगे कहा जाने वाला एक आ्धार में क्रम से अनेक आधेयों की स्थिति के रूप में वर्शित 'पर्याय' अलंकार प्रतीत होता है तो उसे भी रहने दीजिए, उसके द्वारा 'पूर्व पूर्व की अपेक्षया उच्तरोत्तर का उत्कर्ष रूप' सार अ्प्रलंकार अन्यथासिद्ध नहीं किया जा सकता-अर्थात् एस स्थान पर सार अलंकार प्रधान होगा और पर्याया- लंकार गौस। अनेकविषयक सारालंकार; जैसे- गिरयो गुरवस्तेभ्योऽप्युर्वी गुर्वी ततोऽपि जगदएडम्। जगदएडादपि गुरवः ग्रलयेऽप्यचला महात्मानः । पहाड़ भारी है, पृथ्वी उनसे भी भारी है, उनसे भी ब्रह्मांड भारी है, प्रलय में भी अचल रहनेवाले महात्मा ब्रह्मांड से भारी है। यह अलंकार वंद में भी देखा जाता है- "महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः। पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः।। महान् से अव्यक्त पर है, श्रव्यक्त से पुरुष पर है, पुरुष से पर कुछ नहीं है वह अंतिम मर्यादा है और वही परम गति है।"
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प्रथम उदाहरय में गुाकृत उत्कर्ष है और इसमें केवल स्वरूप- कृत है यह विशेषता है। कहा जायगा कि यहाँ भी गुणकृत उत्कर्ष कहना चाहिए। तो यह ठीक नहीं; क्योंकि पुरुष को निर्गुय माना जाता है। आप कहेंगे कि निर्गुण मानने पर भी विनाशरहितता आरदि प्रतीयमान गुणा ही उत्कर्षक होगा। तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि 'विनाशरहित' आदि गुण को ब्रह्मरूप अधिकरण से भिन्न मानने में कोई प्रमाण नहीं है। इसी प्रकार अपकर्ष के भी उदाहरण समझने चाहिए।
सारकी शृंखलारूपता पर विचार
किंतु सार के विषय में यह समझना चाहिए कि-एक विषय में शृंखला सुंदर नहीं होती, अ्रतः ऐसी शृंखला से अनुप्रागित सार सुंदरता को धारण नहीं करता, क्योंकि शृंखला 'स्वाभाविक भेद' की अपेक्षा रखती है-एक वस्तु की शृंखला नहीं हो सकती, अतः अवस्थादिकृत भेद में शृखला का उल्लास नहीं होता। इसी कारण से इस विषय में दूसरे आलंकारिकों ने 'वर्द्धमानक' अलंकार स्वीकार किया है और उसका लक्षण "रूपधर्माभ्यामाधिक्ये वर्धमानकम्- अर्थात् एक ही वस्तु का रूप अथवा धर्म के द्वारा आधिक्य हो तो वर्ध- मानक होता है" यह बनाया है। अतः जिस प्रकार कारणमाला आदि का एकमात्र शृंखला ही विषय है वह बात सार के विषय में नहीं कही जा सकती, क्योंकि ऐसा मानने से एकविषयक सार में अन्य अलंकार स्वीकार करना पड़ेगा। इस कारण 'गुशास्वरूपाभ्यां पूर्वपूर्ववैशिष्टये सारः-अर्थात् गुण अरथवा स्वरूप के द्वारा पूर्व पूर्व की अपेक्षा उत्तरोत्तर के विशिष्ट होने पर सार अलंकार होता है।' यह सार का लक्षण उचित है। और वह
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सार कहीं शृंखला से अनुप्रागित होता है तथा कहीं स्वतंत्र होता है, सो इस तरह शनेकविषयता और एकविषयता दोनों ठीक बैठ जाती हैं। शृंखला स्वयम् पृथक् अलंकार नहीं है इस तरह शृंखलाविषयक अलंकारों (कारणमाला, एकावली और सार) की 'विच्छित्ति' की विलक्षणता अनुभवसिद्ध होने के कारण पृथगलंकारता सिद्ध हो जाने पर विरोध, अभेद और साधर्म्य आदि के समान शृंखला में अनुप्राणकता ही उचित है, धथगलंकारता नहीं। कहा जायगा कि तब पूर्णा, लुप्ता आदि उपमा के भेद भी पृथक् पृथक अलंकार हो जायँगे तो इसका उच्तर यह है कि उनमें तो विच्छित्ति की की विलच्षणता नहीं है, किंतु उपमा की निच्छित्ति ही है-ऐसा संप्र- दाय है-अर्थात् सदा से माना जाता आया है, इसलिए बखेड़ा उठाना ठीक नहीं। विच्छ्िंत्ति का लक्षण कहा जायगा-कि यह विच्छित्ि क्या वस्तु है? इसका उच्चर यह है कि-अलंकारों के परस्पर विच्छेद अर्थात् विलच्षणता के हेतुरूप और जन्यतासंसर्ग से काव्य में रहनेवाली कवि की प्रतिभा अ्थवा कवि की प्रतिभा द्वारा जन्यत्व से प्रयुक्त चमत्कारिता का नाम ही विच्छित्ति है। सार शलंकार समाप्त
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( २२६ ) तर्कन्यायमूलक अलंकार
काव्यलिंग
लक्षण
जो अर्थ प्रकृत अर्थ के उपपादक (समर्थक) के रूप में विव- क्षित हो कितु अनुमिति की कारणता से और सामान्यविशेषभाव से अस्पृष्ट हो वह काव्यलिंग कहलाता है। लक्षण का विवेचन
'उपपादकता' का अर्थ प्रकृत निश्चय के उत्पादक ज्ञान का विषय होना है-अर्थात् जो वस्तु ऐसे ज्ञान का विषय हो जिस ज्ञान के द्वारा प्रकृत वस्तु का निश्चय हो जाय-वह उपपादक कहलाता है। इस लक्षण में 'अनुमिति की कारणता से अस्पृष्ट' यह भाग अनुमान अलं- कार में अतिव्याप्ति न होने के लिये और 'सामान्यविशेषभाव से अरस्पृष्ट' यह भाग अर्थोतरन्यास में अरतिव्याप्ति न होने के लिये दिया गया है। उपमादि के निवारण के लिये 'उपपादक के रूप में' यह लिखा गया है। हेतु अलंकार में यह नियम है कि वहाँ हेतु (व्याकरण द्वारा निश्चित ) पञ्चम्यन्तादि शब्दों द्वारा ही प्रतिपादित होना चाहिए, ऐसे 'हेतु अलंकार' के निवारण के लिए 'उपपादक के रूप में विवचतित' कहा गया है, जिसका अभिप्राय यह है कि काव्यलिंग में हेतु पंचम्यं- तादि शब्दों से बोधित नहीं होना चाहिए। अरत :- भयानकत्वात्प रिवर्जनीयो दयाश्रयत्वादसि देव सेव्य:। अर्थात् हे देव ! भयानकता के कारय आप वर्जन करने योग्य हैं और दयालुता के कारणा सेवन करने योग्य है।
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इत्यादि में यह अलंकार नहीं होता, क्योंकि आलंकारिकों ने जिस हेतु में हेतुता व्यंग्य रहती है, सुंदरता के कारण, उसी को काव्यलिंग माना है। काव्यलिंग के भेद काव्यलिंग सुचन्तार्थ (नामपद) तिङन्तार्थ (क्रियापद) के रूप में प्रथमतः दो प्रकार का है। इनमें से सुवन्तार्थरूप काव्यलिंग पुनः दो प्रकार का है-जिसका शरीर अन्य शब्द के अर्थ से विशेषित हो ऐसा और शुद्ध एकसुवंतार्थरू। इनमें से भी प्रथम 'अर्थात् जिसका शरीर अन्यशब्दार्थ से विशेषित हो' उसके दो भेद हैं-साक्षात् श्रथवा परंपरया वाक्यार्थ से विशेषित और केवल सुवंतार्थ से विशेषित। इसी प्रकार तिङन्तार्थरूप काव्यलिंग के भी दो भेद हैं-एक 'साक्षात् शरथवा परंपरा से अन्यवाक्यार्थ से विशेषित' और दूसरा 'केवल सुबंत के अर्थ से विशेषित'। तिङन्तार्थरूप काव्यलिंग का शुद्ध भेद तो असंभव है; क्योंकि कोई भी क्रिया कारक से अवश्य ही विशेषित होती है। शेष आगे निरूपण किया जायगा।
उदाहरण विनिन्द्यान्युन्मत्तैरपि च परिहार्याि पतितै- रवाच्यानि व्रात्यैः सपुलकमपास्यानि पिशुनैः। हरन्ती लोकानामनवरतमेनांसि कियतां कदाप्यश्रान्ता त्वं जगति पुनरेका विजयसे॥ हे माता ! पागलों से भी निंदनीय, पतितों से भी त्याज्य, व्रात्यों (संस्कारहीनों) से भी शरवाच्य और पिशुनों (चुगुलखोरों) से भी दूरी- करणीय ऐसे न जाने कितने लोगों के अपराधों को निरंतर हरया करती हई भी कभी न थकने वाली तूँ एक ही जगत् में सर्वोत्कृष्ट है।
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इस पद्य में भगवती भागीरथी का उत्कर्ष अनन्यसाधारण रूप में प्रतिपादित किया गया है-अर्ात् आपके समान और कोई नहीं है। ऐसा उत्कर्ष आपाततः घटित नहीं होता, अतः उसके उपपादन के लिए 'निरंतर सब लोगों के पाप हरण' के साथ 'श्रम का अभाव' हेतुरूप से ग्रहण किया गया है। यह श्रम का अभाव सुवंत ('अश्रांता' पद) का शर्थ है और 'हरंती' इस केवल सुबंत के अर्थ से विशेषित है-अर्थात् केवल सुबंत ही उसका विशेषण है और विशेषरूप है-अर्थात् विशेष- रूप में ही विशेष का समर्थक है, सामान्यरूप में नहीं, अतः अर्थोतर- न्यास की शंका भी नहीं है। त्रपन्ते तीर्थानि त्वरितमिह यस्योद्धृतिविधौ करं कर्रो कुर्वन्त्यपि किल कपालिप्रभृतयः। इमं तं मामम्ब ! त्वमय करुण।क्रान्तहृदये पुनाना सर्वेषामघमथनदर्प दलयसि। हे अंब! जिसके उद्धार करने में तीर्थ शीघ्र ही लजित होते हैं औरर शिवजी आदि देवता भी कान में उँगली डाल लेते हैं, ऐसे मुझको पवित्र करती हुई, हे करुणामय हृदयवाली, तुम सभी के पापनाशन के दर्प का दलन करती हो।
यहाँ सब देवता और तीर्थों के दर्प के दलन की सिद्धि के लिए 'स्वयम् अपना पवित्र करना' वक्ता ने लिखा है। यह वस्तु क्षुद्र है, अतः ऐसे महत्त्वपूर्ण कार्य की सिद्धि में असमर्थ होने के कारणा अन्य विशेषणों की आरकांक्षा रखती है, इसलिये 'तीर्थों का लजित होना' और 'शिवजी आदि का उँगली डाल कर कान बंद करना' ये दो वाक्यार्थ 'स्वयम् आरप' (मामू)रूपी कर्म द्वारा विशेषक (विशेषित करने- वाल) के रूप में अ्रहणा किए गए है। उनसे विशिष्ट होकर वैसा पवित्र
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करना भागीरथी पर उपारूढ़ होकर उक्त कार्य के उपपादन करने में समर्थ हो जाता है, अतः (दर्पदलन का) हेतु है।
दुष्प्रापदिव्यमहिमन्भवतो तुष्टूषतो मम नितान्तविश्ृङ्धलस्य गुगौघान्।
मन्तु' शिशो: शिव ! न मन्तुमिहासि योग्यः॥ हे ब्रह्मादि देवताओं की चित्तवृत्ति से दुर्लभ दिव्य महिमावाले शिव! आपके गुणसमूह की स्तुति करने की इच्छा वाले अत्यंत उच्छु खल मुझ बालक के अपराध को मानने के योग्य आप नहीं हैं- आपको ऐसी उच्छृ खलता पर ध्यान नहीं देना चाहिए। यहाँ शुद्ध एक सुबंत का अर्थ 'शिशुत्व' अपराध क्षमा करने में हेतु है। 'दिव्यमहिमत्व' और 'अचिंत्य माहात्म्य' जो करि सुवंतार्थ- विशेषितसुबनंतार्थरूप हैं, ब्रह्मादि के चिच् द्वारा दुलभता में हेतु हैं। इसी प्रकार उक्त विशेषणों से विशिष्ट परमेश्वर के गुणों की स्तुति अपराध में हेतु है और वैसी स्तुति में उच्छृ खलता हेतु है, अ्रतः यह पद्य शुद्ध सुबंतार्थ के उदाहरण में 'विशिष्ट सुबंतार्थ का भी उदाहरय' है। तवालम्बादम्ब स्फुरदलघुगर्वेण सहसा मया सर्वेऽवज्ञापुरपथमनीयन्त विबुधाः। इदानीमौदास्यं यदि भजसि भागीरथि ! तदा निराधारो हा रोदिमि कथय केषामिह पुरः। हे माता ! आपका आश्रय लेकर अत्यंत अभिमानशाली मैंने सहसा सभी देवताओं को अवज्ञानगर के मार्ग पर पहुँचा दिया, हे
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भागीरथि! अब यदि आप उदासीनता धारण करती हैं तो हाय ! बताइए निराधार मैं किनके सामने जाकर रोऊँ! यहाँ 'निराधार' आदि शब्दों से ध्वनित वक्ता में रहनेवाले 'सबके द्वारा द्वेष' में अपने द्वारा किया गया अवज्ञापुर के मार्ग पर ले जाना' रूपी सुवंतार्थ से विशेषित तिङन्तार्थ उपपादक है। विश्वास्य मधुरवचनैः साधून्ये वञ्चयन्ति नम्रतया। - तानपि दधासि मातः काश्यपि! यातस्तवापि च विवेक: ॥ हे कश्यपपुत्रि माता पृथ्वी ! जो लोग मधुर वचनों से भरोसा देकर नम्रता द्वारा सत्पुरुषों को धोखा देते हैं, उनको भी तुम धारण करती हो (विदित होता है कि) तुम्हारा भी विवेक चला गया है। यहाँ भी पृथ्वी के विवेकनाश के उपपादन में केवल तिङन्तार्थ 'धारण' का अथवा 'सुबंतार्थ से विशेषित धारण' जो कि 'जनधारय' रूप है, का असामर्थ्य है, अतः 'साधुओं को धोखा देने' रूप पूर्व वाक्यार्थ से विशेषित 'धारण' हेतु है, पूर्ववाक्यार्थ की 'धारण' के प्रति यह विशेषणता 'धार' के कर्म ('तान्') के विशेषण होने के कारण परंपरया है, साक्षात् नहीं। काव्यलिंग के ये भेद प्राचीनों के कल्पित पदार्थवाक्यार्थरूप दो भेदों के समान केवल चातुर्यमात्र से कल्पित हैं, विचित्रता की विशेषता इनमें नहीं है। काव्यलिंग का अनुमान से भेद अब यह विचार करिए कि अनुमान से-काव्यलिंग में क्या विशेषता है? कहा जायगा कि-यह तो स्पष्ट है, जो लिंग (हेतु ) 'व्याप्यत्व' ओर 'पक्षधर्मत्व' के द्वारा ज्ञायमान ही अर्थसाधक हो- वह अनुमान है और जो लिंग केवल स्वरूप से ज्ञायमान ही प्रस्तुतः
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अर्थ का उपपादक हो वह 'काव्यलिंग' कहलाता है-यह विशेषता है। तात्पर्य यह है कि अनुमान में हेतु का व्याप्यत्व (साध्य और हेतु का साथ रहना) और पक्ष (जिसमें साध्य का संदेह है) में रहना अनिवार्य है, किंतु काव्यलिंग में प्राकृतार्थ का उपपादनमात्र ही पर्याप्त है। तो यह कहना उचित नहीं, क्योंकि कोई भी पदार्थ युक्ति होने पर ही उपपादक हो सकता है और जब 'व्यभिचार' अथवा 'पक्ष में न रहना' इन दोनों में से किसी एक का भी ज्ञान होगा तब युक्ति हो नहीं सकती-युक्ति ही बिगड़ जायगी; जैसे पूर्वोक्त उदाहरण-'विनिन्द्या- न्युन्मचे:० इस पद् में जिस 'श्रमाभाव' (रूप हेतु) क वर्णन है। वह यदि उत्कर्ष से व्यभिचरित है-अर्थात् उससे उत्कर्ष सिद्ध नहीं होता-अथवा भागीरथी (पत) में नहीं रहता है-यह ज्ञान हो जाय तो भागीरथी का सर्वोत्कर्ष कभी सिद्ध नहीं हो सकता और वह तभी सिद्ध हो सकता है बब यह ज्ञान हो कि वैसा श्रमाभाव सर्वोत्कर्ष से अव्यभिचरित है और भागीरथी में रहता है। इस तरह यह सिद्ध हुआ कि सभी जगह उपपादन तभी हो सकता है जब कि हेतु का उपपाद्य (साध्य) से व्यभिचाररहितता का ज्ञान हो, जहाँ हेतु की अव्यभिचरितता का ज्ञान नहीं होगा वहाँ तो 'यह ऐसा होगा अथवा ऐसा नहीं होगा' इस रूग में संदेह ही होगा, अतः सिद्ध है कि आलं- कारिकों के 'उपपत्ति' 'समर्थन' आदि विलक्षण शब्दों के प्रयोग अनुमिति के मार्ग में ही आ जाते हैं। कहा जायगा कि 'समर्थना' (समर्थन करना) दढ प्रतीति का नाम है और अनुमिति दृढ प्रतीति नहीं है। तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि जिस दृढ प्रतीति (जैसे भागीरथी में सर्वोत्कर्ष की दृढ प्रतीति) की आप बात कर रहे हैं वह प्रात्यक्षिक तो है नहीं, क्योंकि (किसी इंद्रिय द्वारा होनेवाले ज्ञान का नाम प्रत्यक्ष है और) इसमें इंद्रियसन्निकर्ष का आभाव है और शाब्द भी नहीं है, क्योंकि वहाँ अनुमान की सामग्री
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(हेतु) ही बलवती है और इसी कारया मानस प्रतीति भी नहीं है। अतः दढ प्रतीति मात्र कह देने से क्या फल हुआ?
इसके उत्तर में हम कहते हैं कि आपका कहना सत्य है। फाव्यलिंग प्रस्तुत वस्तु का उपपादक होता है और उपपत्ति भी अरनु- मिति ही है, क्योंकि काव्यलिंग का हेतु यदि व्यभिचारी हो तथापि उस समय व्यभिचार की स्फूर्ति नहीं होती। किंतु इतने पर भी यहाँ 'अनुमानालंकार' का विषय नहीं है, क्योंकि 'अनुमानालंकार' का विषय वहाँ होता है जहाँ कवि श्रोता को जिस हेतु वाली अनुमिति के बोध की इच्छा से काव्य का निर्माण करता है उस लिंग (हेतु) वाला काव्य हो। इसका निष्कर्ष यह है कि जिस काव्य में अनुमान की प्रणाली से हेतु का ज्ञान श्रोता को प्रतीत हो और उसी के द्वारा अनुमिति का वर्शन हो वहाँ अनुमानालंकार होता है और काव्यलिंग के ज्ञान से जो अनुमिति उत्पन्न होती है उसका तो श्रोता को समझाना कवि को इष्ट नहीं। अतएत यहाँ अनुमिति काव्यव्यापार का विषय भी नहीं है। यह दूसरी बात है कि श्रोता को केवल कारणसामग्री के अरधीन अनुमिति उत्पन्न हो जाती है, अतः अनुमिति के उत्पन्न हो जाने पर भी यह अनुमानालंकार का विषय नहीं है और 'तस्मिन्मगिं- व्रातमहान्घकारे' इस (अनुमानालंकार के उदाहरणरूप में) आगे आनेवाले पद्य में तो श्रोता को अनुभिति का बोध करवाना कवि को इष्ट है, अतः वह अनुमान का विषय है। और सबसे बड़ी विशेषता तो यह है कि कविनिवद्ध किसी अन्य प्रमाता (ज्ञाता) में रहने- वाली अनुमिति अनुमानालंकार को बनाती है और महावाक्यार्थ के निश्चय के अनुकूल श्रोता में रहने वाली अनुमिति काव्यलिंग को बनाती है। सारांश यह कि जिस काव्य में कवि ने अनुमान करनेवाले का भी वर्णन किया हो वह अनुमानालंकार है और जहाँ केवल श्रोता
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को ही अनुमान करना पड़े, कवि ने अनुमान का वर्णन न किया हो वहाँ काव्यलिंग है। सो इस तरह यह सिद्ध हुआ कि काव्यलिंग में अतिव्यापि निवा- र करने के लिए अनुमानालंकार के लक्षण में प्रविष्ट अनुमिति में 'काव्यव्यापार का विषय' यह विशेषण देना चाहिए, इस प्रकार दोनों का भेद स्पष्ट हो जाता है। कुवलयानन्द और अलंकारसर्वस्व का खएडन
कुवलयानंदकार ने जो "समर्थनीयस्यार्थस्य काव्यलिङ्ग' समर्थकम्' अर्थात् समर्थनयोग्य अर्थ के समर्थक को काव्यलिंग कहते हैं" यह लक्षण बनाया है। उसमें यदि 'सामान्यविशेषभाव से अ्रना- लिंगित' यह विशेषण न दिया जाय तो अर्थोतरन्यास में अ्रतिव्याति हो ही जायगी। और जो- "यत्वन्नेत्रसमानकान्ति सलिले मग्नं तदिन्दीवरं मेघैरन्तरितः प्रिये! तव मुखच्छायानुकारः शशी। येऽपि त्वद्गमनानुकारिगतयस्ते राजहंसा गता- स्त्वत्सादृश्यविनोदमात्रमपि मे दैवेन न क्षम्यते ।।
हे प्रिये ! जो नीलकमल तुम्हारे नेत्र के समान कांति वाला है वह जल में मग्न हो गया, तुम्हारे मुख की कांति का अनुकरण करने वाला चंद्रमा मेघों द्वारा ढक लिया गया और जिन राबहंसों की गति
१ कुवलयानंद में 'समर्थनम्' पाठ है।
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तुम्हारे गमन का अनुकरण करती है वे भी चले गये। दैव (मेरे लिए) तुम्हारे सादृश्य के विनोदमात्र को भी नहीं सहन करता। मृग्यश्च दर्भाङ्कुरनिर्व्यपेक्षास्तवागतिज्ञं समबोधयन्माम्। व्यापारयन्त्यो दिशि दक्षिणास्यामुत्पच्मराजीनि विलोचनानि॥ राम कहते हैं कि हे सीते ! दर्भोकुरों की परवाह न करती हुई मृगियाँ भी तुम्हारे गति न जाननेवाले मुझे, दक्षिण दिशा की तरफ जिनके पलकों की पंक्तियाँ उठी हुई हैं ऐसे नेत्रों को व्यापृत करती हुई, समझा रही थीं।
यहाँ प्रथम उदाइरण में अनेकवाक्यार्थरूप तीन चरणों का अर्थं (नील कमल का डूब जाना, चंद्रमा का मेघ में छिप जाना और राज- हंसों का चला जाना) चतुर्थ चरण के अर्थ (देव सहन नहीं करता) में हेतु है और दूसरे उदाहरण में 'समझाने में व्यापृत करती हुई' इस प्रकार मृगियों के विशेषणरूप में आया हुआ अनेक पदों का शर्थ हेतु के रूप में कहा गया है।"
यह अलंकारसर्वस्वकार ने कहा है और कुवलयानंदकारने इसका अनुमोदन किया है। ये दोनों ही ठीक नहीं। कारण, अनुमान और अर्थातरन्यास के विषय में हेत्वलंकार (का्यलिंग) नहीं दोता-यह सर्वसम्मत है, अ्रन्यथा उनका उच्छेद ही हो जायगा और यह है अरनुमान का ही विषय, क्योंकि प्रथम पद्य के चतुर्थ चरण में 'दैव' रूपी पक्ष में 'नायिका के अंगों के सादृश्य के दर्शन से उत्पन्न होने वाले सुख की असहिष्णुता' रूपी 'साध्य' की सिद्धि 'तत्तत् शंगों के सादृश्य के आधार की विघटकता' रूपी हेतु द्वारा स्पष्ट प्रतीत हो रही है। इस अरनुमान का प्रयोग इस प्रकार होगा-'दैव नायिका के अंग के सादृश्य के दर्शन से उत्पन्न मेरे शभीष्ट सुख का असहिष्ण है, क्योंकि नायिका
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के तच्तत् अंगों के सादश्य के आधार का विघटक है, जैसे मेरे शत्रु रूप यज्ञदच्तादिक।' 'मृग्यश्च' इस दूसरे पद्य में यद्यपि वक्ता में रहनेवाले 'समझाने' का 'ज्ञायमान मृगियों के नेत्र का व्यापार' उत्पादक है तथापि यह उत्पादकता अनुमिति की कारणता से अतिरिक्त नहीं है, अतः (यहाँ भी) अनुमानालंकार ही उचित है। हाँ इतनी विशेषता अवश्य है कि पूर्व पद्य में अनुमिति व्यंग्य है और यहाँ 'समबाधयन्-समझा रहीं थीं' से वाच्य है-अर्थात् 'समझा रहीं थीं' का अर्थ है 'अनुमान करवा रही थीं'। इस अनुमान का प्रयोग 'मृगियाँ दव्विणानिल के संपर्क' से युक्त हैं, क्योंकि वे दच्तिए की ओर विलक्षण नेत्र व्यापार से युक्त हैं' यह है और विलच्त- खता उठी हुई पलकों की पंक्तियों के द्वारा बतायी हुई समझनी चाहिए। काव्यलिंग की अलंकारता काव्यलिंग के विषय में कहा जाता है कि काव्यलिंग अलंकार नहीं है, क्योंकि इसमें विचित्रतारूप विच्छिच्तिविशेष का अभाव है। 'विच्छिच्तिविशेष' का अर्थ है 'जन्यता संसर्ग से कत्रि का प्रतिभाविशेष' अथवा 'कविप्रतिभा से निरमितता के कारण होनेवाला चमत्कार- विशेष' जैसा कि पहले कहा जा चुका है। इन दोनों में से एक का भी यहाँ सम्भव नहीं है, क्योंकि हेतुहेतुमद्भाव का नाम काव्यलिंग है और वह है वस्तुसिद्ध, अर्थात् प्रत्येक वस्तु में रहनेवाला स्वभावसिद्ध
१-यहाँ लेखाशुद्धि प्रतीत होती है, क्योंकि 'दक्षिणानिल के संपर्क की न तो पद्य में ही चर्चा है और न उक्त संपर्क की सिद्धि से यहाँ कोई प्रयोजन ही है, पर दोनों संस्करणों में यही पाठ है। शुद्ध पुस्त- कांतर के अभाव में इसे शुद्ध करना संभव नहीं। -अनुवादक ।
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धर्म, अतः उसमें 'कविप्रतिभा से निर्मितता' का संबंध ही नहीं है और जब 'कविप्रतिभा से निर्मितता' का संबंध नहीं है तो चमत्कार भी दुर्लभ है। यदि कहा जाय कि 'श्लेषादि के मिश्रण से यहाँ भी विच्छित्ति- विशेष है' तो यह भी उचित नहीं, क्योंकि वह विच्छ्ित्तिविशेष श्लेषादि के अंश के कारया होता है ( न कि हेतुहेतुमद्भाव के कारण), अ्रतः फिर भी काव्यलिंग की अलंकारता सिद्ध न हो सकी। जहाँ पर उपस्कारक की विचित्रता से उस उपस्कारक द्वारा उपस्कार्य की विचित्रता विलक्षण हो वहाँ भले ही उपस्कारक की अपेक्षा उपस्कार्य की पृथगलंकारता हो, जैसे शरतिशयोक्ति की तथा हेतूतप्रेक्षा और फलोत्प्रेक्षा की अलंकारता। किंतु जहाँ उपस्कारक (श्लेष) की विचित्रता में ही विश्राम हो जाता है वहाँ उपस्कार्य अलंकार नहीं ही है, जैसे प्रस्तुत (अर्थात् काव्यलिंग) में। कहा जायगा कि तब तो प्राचीनों से स्व्रीकृत अनेक अलंकार अ्रन- लंकार हो जायँगे, तो वे कहते हैं कि होने दो, हमारा क्या बिगड़ा? अतः उनका कहना है कि काव्यलिंग 'निहेतुरूप दोषाभाव' ही है, अ्रलंकार नहीं।
काव्यलिंग समास
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अर्थान्तरन्यास
लक्षय
सामान्य से विशेष का अथवा विशेष से सामान्य का जो समर्थन होता है उसे अर्थान्तरन्यास कहते हैं। लक्षण का विवेचन समर्थन का अर्थ है 'यह ऐसा होगा या ऐसा न होगा' इस संदेह- का प्रतिबंध करने वाली 'यह ऐसा ही है' इस प्रकार की दृढ प्रतीति अर्थात् निश्चय। इस अलंकार में प्रकृत सामान्य और विशेष की समर्थनीयता औ्रर अप्रकृत विशेष और सामान्य की समर्थकता प्रायः देखी जाती है। अर्थान्तरन्यास के भेद यह समर्थन दो प्रकार का होता है ( १) साधर्म्य द्वारा और (२) वैधम्य द्वारा (१) सामान्य से विशेष का समर्थन, साधर्म्य द्वारा; जैसे करिकुम्भतुलामुरोजयोः क्रियमाणां कविभिर्विशृङ्धलैः । कथमालि शृगोषि सादरं विपरीतग्रहणा हि योषितः ।। हे सखि! उच्छ खल कवियों द्वारा की जानेवाली स्तनों की करिकुंभ (हाथी के सिर) से तुलना को आदरपूर्वक कैसे सुन लेती हो। निश्चय ही स्त्रियाँ उलटा समझती हैं अर्थात् भ्रमयुक्त होती हैं। इस पद्य में जिससे कहा जा रहा है उसके द्वारा किए जाने वाले 'अरपने कुचों की करिकुंभ से तुलना के सादर श्रवणा की अनुचितता' प्रतिपादन की गई है। अनुचितता तभी बन सकती है अन ऐसा सुनना
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उसका अनिष्टसाधन हो और अनिष्टसाघनता 'वैसा सुनना इष्टसाधन है इस बुद्धि से श्रवण करने वाली कांता' के भ्रमयुक्त हुए बिना बन नहीं सकती, अतः 'स्त्रीत्व' द्वारा भ्रमयुक्तता का प्रतिपादन किया जा रहा है और वह 'भ्रमयुक्तत्व', जिसे समझाया जा रहा है उस 'स्त्री- विशेष की भ्रमयुक्तता' रून विशेष का, 'सामान्य' तथा समर्थक है। तात्पर्य यह है कि यहाँ 'सभी स्त्रियाँ भ्रमयुक्त होती हैं' इस सामान्य के द्वारा 'तेरा अ्रमयुक्त होना ठीक ही है' इस विशेष का समर्थन किया गया है। (२) विशेष से सामान्य का समर्थन साघर्म्य द्वारा; जैसे उपकारमेव कुरुते विषद्गतः सद्गुणो नितराम्। मूच्छा गतो मृतो वा रोगानपहरति पारदः सकलान्।। सद्गुणी विपद्गस्त होने पर भी अत्यंत उपकार ही करता है। मूर्च्छित अथवा मृत भी पारद (परा) सब रोगों का अपहरय करता है। यहाँ विपद्ग्रस्त सद्गुणी द्वारा किया जाने वाला उपकार सामान्य एवं प्रकृत है, उसका 'मू्च्छित अथवा मृत पारद द्वारा किया जाने वाला रोग का अपहरणा' विशेष है और उदाहरणरूप होने से सम- र्थक भी है। सामान्य से विशेष का समर्थन साधर्म्य द्वारा
(३) यदि पारद-वृच्तांत को प्रकृत माना जाय और पूर्वारधं उच्त- रार्घ को उलट दिया जाय तो सामान्य द्वारा विशेष की समर्थकता भी इसी उदारहणा में हो सकती है। अथवा; जैसे-
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अ्रहन्नेको रसे रामो यातुधानाननेकशः। असहाया महात्मानो यान्ति कांचन वीर्ताम्।। अकरेले राम ने रख में अरनेक राक्षसों को मारा। महात्मा लोग असहाय होने पर अनिर्वचनीय वीरता को प्राप्त कर लेते हैं। (४) यहाँ विशेष का समर्थक सामान्य है, यदि उलट दिया जाय तो सामान्य का समर्थक विशेष हो जायगा। वैधर्म्य द्वारा समर्थन
(५-६) यदि 'असहाया:०' इस उत्तरार्द्ध को हटाकर 'नूनं सहाय- संपच्तिमपेक्षन्ते बलोज्भिताः' (निश्चय ही सहायसंपति की अपेचा निर्बल करते हैं-बलवान को उसकी कोई आवश्यकता नहीं) ऐसा बना देने पर पूर्वार्धगत विशेष का उत्तरार्धगत 'सामान्य' वैधर्म्य द्वारा समर्थक हो जाता है, और दोनों शर्द्धों को उलट देने पर अर्थात् पूर्वार्ध को उचरार्घ और उत्तराध को पूर्वार्ध बना देने पर दुर्बल वृत्तांत के प्रकृत हो जाने की शरवस्था में विपरीतता हो जायगी अर्थात् पूर्वार्धगत सामान्य का उत्तरार्धगत विशेष वैधर्म्य द्वारा समर्थक हो जायगा। अर्थान्तरन्यास के शाब्द और आर्थ भेद इस अलक्गार में शाब्द और आर्थ दोनों प्रकार का 'सामर्थ्य- समर्थकभाव' अलङ्गारता का निमिच है, काव्यलिङ्ग में 'हेतुहेतुमद्- भाव' के समान केवल आर्थ ही नहीं है। इनमें से जहाँ 'हि' 'यत्' 'यतः' इत्यादि कारणवाचक शब्दों का श्ररभाव हो तो श्रर्थं अर्थान्तर- न्यास होता है। आर्थ अर्थान्तरन्यास का उदाहरण है 'मूर्छी गतो मृतो वा०' और जहाँ 'हि' 'यत्' 'यतः' आदि का ग्रहण हो वहाँ
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शाब्द अर्थान्तरन्यास होता है। उसका भी उदाहरण 'विपरीतग्रहया हि योषितः' इसमें दिया जा चुका है। श्रथवा; भवत्या हि व्रात्याधमपतितपाखणि्डपरिष- त्परित्राणस्नेहः श्लथयितुमशक्यः खलु यथा। ममाप्येवं प्रेमा दुरितनिवहेष्वम्ब ! जगति स्वभावोऽयं सर्वैरपि खलु यतो दुष्परिहरः ॥
हे माता ! जैसे आप से व्रात्यों (संस्कारहीनों), अरधमों, पतितों और पाखसिडयों के समूह की रक्षा का प्रेम शिथिल नहीं किया जा सकता, वैसे ही जगत में मेरा भी पापसमूहों में प्रेम है, क्योंकि यह स्वभाव सभी के लिए दुसत्यज है।
यहाँ भगवती भागीरथी का और स्तुतिकर्ता का वृत्तान्त विशेष हैं, उनका समर्थक है चतुर्थचरण से प्रतिपाद्य (स्वभाव की दुस्त्यजतारूपी) सामान्य उसकी समर्थकता 'यतः (क्योंकि)' द्वारा उक्त है (अरतः यह अर्थान्तरन्यास शाब्द है)। अलङ्कारान्तर से भेद कहा जायगा कि 'सामान्य अर्थ विशेष अर्थ का समर्थक हो' इस कथन का पर्यवसान अन्त में इसी अर्थ में होता है कि सामान्य का व्याप्तिज्ञान विशेष की अरनुमिति का प्रयोजक है, यदि ऐसा न माना जाय तो (उक्त उदाहरणों में) 'स्वभावादि के दुस्त्यजत्वादि' का व्यमिचार ज्ञात होने पर भी सामान्य अर्थ विशेष अर्थ का समर्थक होने लगेगा, जो स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस विषय में प्राचीनों का जो यह प्रवाद है कि 'समर्थंक द्वारा प्रतीति का सष्टीकरणमात्र होता
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है', यह न सोचें तब तक ही सुंदर है। अतः यह भेद अनुमान से अतिरिक्त नहीं होता-अर्थात् अर्थान्तरन्यास की अनुमान में अ्रति- व्याप्ति होती ही है। हाँ, विशेष अर्थ से सामान्य अर्थ का समर्थनरूप अर्थान्तरन्यास का भेद अतिरिक्त हो सकता है, क्योंकि वह 'अधिकरण- विशेष में आरूढ़ सहचरज्ञान से उत्पन्न होनेवाले व्यापिज्ञान की दृढता' के रूप में प्रतीत होता है, (अतः लिंगपरामर्शचन्य नहीं कहा जा सकता) तो यह भी ठीक नहीं। क्योंकि यह आपकी दलील कवि सुन रहा है जो काव्यालिंगालंकार में यह जान चुका है कि 'कत्रिनिबद्ध अन्य ज्ञाता में रहनेवाली अनुमिति अनुमानालंकार का बिषय है' तदनुसार यहाँ दोनों ही अर्थान्तरन्यास के भेदों में अनुमानालंकार का प्रसंग ही नहीं है, कारण, अर्थोतरन्यास में कविनिबद्ध ज्ञाता का वर्णन नहीं रहता।
उदाहरसालंकार से विशेषता आप कहेंगे कि इतने पर भी विशेष द्वारा सामान्य का समर्थन अर्थोतरन्यास का भेद नहीं हो सकता, क्योंकि पूर्वोक्त उदाहरणालंकार से ही वह गतार्थ हो जाता है। तो यह उचित नहीं; क्योंकि इवादि के प्रयोग का अभाव ही इसमें उससे विलत्णता है। कहा जायगा कि ऐसा होने पर भी वाचक के अभाव से इसे आर्थ उदाहरणालंकार कहा जा सकता है, न कि अर्थोन्तरन्यास का भेद। तो हम कहते हैं कि अर्थोतरन्यास और उदाहरण में विलक्षणता यह है कि सामान्य अर्थ के समर्थक विशेषवाक्यार्थ की दो गतियाँ हैं (१) केवल अनुवाद्य अंश में विशेषता हो और विधेयांश तो सामान्यगत ही रहे, यह एक (२) और अनुवाद्य विधेय दोनों श्रंशों में विशेषता हो, यह दूसरी। इनमें से पहली दशा उदाहरसालंकार का विषय है और दूसरी अर्थोतरन्यास के भेद का विषय है। सो इस तरह १६
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'मूच्छो गतो मृतो वा निदर्शन पारदोत रसः' इस उदाहरणालंकार में आंए हुए विशेष (पारद) में 'उपकारमेव कुरुते (उपकार ही करता है।' यह पूर्वार्धगत सामान्य में आई हुई ही क्रिया यथोक्त रूप से (ज्यों की त्यों) विधेय है, और 'रोगानपहरति पारदः सफलान्' इस अर्थातरन्यास में आए हुए विशेष में तो पृथक् ग्रहणा किए हुए विशेष रोगानपहरति-रोगों का हरा करता है) के रूप में विधेय है। इससे यह सिद्ध हुआ कि अर्थोतरन्यास के लक्षण में जो 'विशेष के द्वारा' यह लिखा है उसका अर्थ नुवाद् और विधेय दोनों अरंशों में 'विशेष' यह समझना चाहिए। सो उदाहरणालंकार में अतिव्याति नहीं होगी। तात्पर्य यह कि जहाँ विशेष द्वारा समर्थन हो वहाँ समर्थक भाग अनुवाद्य और विधेय दोनो अंशों में केवल विशेष रूप हो तो अर्थोतरन्यास होता है और यदि अनुवाद्य अंशमान विशेष हो औरर विधेयांश सामान्यगत ही रहे तो उदाहरणालंकार होता है।
यदि कहा जाय कि यह थोड़ी सी विशेषता उदाहरणालंकार से इसकी पृथक अलंकारता सिद्ध नहीं कर सकती, किंतु इसे उसका विशेष (भेद) मात्र सिद्ध करती है, तो इसके उच्तर में कहा जा सकता है कि उदाहरखालंकार अर्थोतरन्यास का, प्रतिवस्तूपमा दष्टांत का औरर अरतिशयोक्ति रूपक का ही भेद है। इतना ही नहीं, तब तो यह भी कहा जा सकता है कि स्मरण, भ्रांतिमान् और संदेह भी आर्थी उपमा ही है, क्योंकि उनमें भी थोड़ा सा ही भेद है। (अ्रतः प्राचीनों के भेदों को मान लेना ही उचित है, अन्यथा बड़ी गड़बड़ मचेगी।)
दूसरी बात यह है कि उदाहरसालंकार प्राचीनों के मन को संतुष्ट, नहीं करता, उनने उपमा से ही इसका निरास कर दिया है, अतः उनके मत में तो 'विशेष से सामान्य के समर्थन' को अर्थोतरन्यास के शतिरिक्त अन्यत्र प्रवेश करने को अवकाश ही नहीं है। (तात्पर्य यह
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कि जो लोग उदाहरसालंकार नहीं मानते, उनकी दृष्टि से तो आरपकी युक्ति व्यर्थ ही है, अतः जो हमने बताया है वही ठीक है।
समर्थ्य-समर्थक के क्रम पर विचार
अर्थातरन्यास में 'प्रतिज्ञा' और 'हेतु' अवयवों' के समान समर्थ- नीय और समर्थक वाक्यों की पूर्वापरता आकांक्षा के क्रम से प्राप्त है- यह नहीं मानना चाहिए, क्योंकि यहाँ यह नियम नहीं है कि 'समर्थनीय' की अनुपर्पाच्त द्वारा (अर्थात् जिसका समर्थन कर रहे हैं वह सिद्ध नहीं होता, अतः ) उठाई हुई आकांक्षा हो तभी 'समर्थक' का कथन हो। कारण, श्रनुप्पत्ि न होने पर भी कवि लोग प्रतीति की विशदता के लिए समर्थक वाक्य कह दिया करते हैं। सो इस तरह यह सिद्ध हुआ कि समर्थनीय और समर्थक वाक्यों की विपरीतता होने पर भी अर्थात् समर्थक वाक्य के प्रथम और समर्थनीय वाक्य के द्वितीय होने पर भी कोई दोष नहीं। जैसे-
दीनानामथ परिहाय शुष्कसस्या- न्यौदार्य वहति पयोधरो हिमाद्रौ। औनत्यं विपुलमवाप्य दुर्मदानां ज्ञातोऽयं च्ितिप! भवादृशां विवेक: ॥
१-इसका अभिप्राय यह है कि न्यायशास्त्र में अनुमान करने के लिए 'पचावयव वाक्य' का प्रयोग किया जाता है-अर्थात् उस वाक्य के पाँच अवयव होते हैं-प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरस, उपनय और निगमन। वे यथाक्रम आते हैं, क्योंकि उनमें से एक के बोलते ही दूसरे की आकांक्षा हो जाती है। उदाहरणार्थ जैसे आप कहें कि 'पर्वंत में अग्नि
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बादल गरीबों की सूखती हुई फसलों को छोड़कर हिमालय पर अपनी उदारता दिखलाता है। हे राजन्, विपुल उत्रतता को प्राप्त कर आपके ऐसे दुर्मदों का यह विवेक विदित है। यह दान द्वारा असंमानित अर्थात् जिसका दान से संमान नहीं किया गया उस विद्वान् का राजा के प्रति कोप-वचन है। इसमें उत्तराधगत सामान्य प्रस्तुत है और पूर्वार्धगत विशेष उसका समर्थक है। इस तरह अप्रकृतों द्वारा प्रकृत के समर्थन के उदाहरण दिए गए हैं। (किंतु इस अलंकार में) प्रकृत से प्रकृत का समर्थन (भी हो सकता है) जैसे- 'कस्तृप्येन्मार्मिकस्तन्वि ! रमणीयेषु वस्तुषु। हित्वान्तिकं सरोजिन्या: पश्य याति न षट्पद: ।। हे कृशांगि ! रमणीय वस्तुओं से किसकी तृत्ति होती है? देखो, भौंरा कमलिनी के समीप से नहीं हटता। जलक्रीड़ा के समय 'दूर हटिए' इस तरह कहती कामिनी के प्रति यह नायक की उक्ति है। यहाँ दोनों वृत्तांत प्रकृत हैं। कहीं प्रकृत से अप्रकृत का समर्थन भी संभव है, परंतु वह श्रप्रकृत शरंत में जाकर प्रकृत में ही पर्यवसन्न हो जाता है, उसका शरप्रकृतत्व केवल ऊपरी है, क्योंकि सवथा ही अप्रकृत के समर्थन का प्रसंग नहीं आता। जैसे-
है' यह आपका प्रतिज्ञा नामक अवयव हुआ। तो भट दूसरा पूछेगा कि-क्यों ? तब आपको कहना पड़ेगा, क्योंकि 'वहाँ धुआँ है' यह हेतु नामक अवयव हु इत्यादि। अतः उनका आकांक्षानुसार क्रम से आना आवश्यक है वह बात यहाँ नहीं है।
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प्रभुरपि याचितुकामो भजेत वामोरु! लाघवं सहसा । यदहं त्वयाधरार्थी सपदि विमुख्या निराशतां नीतः।। ये वामोरु! याचना की चाहनावाला स्वामी भी सहसा लाघव को प्राप्त हो जाता है, यतः 'श्रधर' (का चुंबन) चाहनेवाले मुझे विमुख हुई तुमने तत्काल निराश कर दिया। यहाँ कामिनी और कामी के प्रस्तुत वृच्तांतरूपी 'विशेष' द्वारा 'अप्रस्तुत' 'सामान्य'रूप दाता और याचक के तृत्तांत का समर्थन किया जा रहा है।
अलंकारसर्वस्व और उसकी टीका का खंडन अलंकारसर्वस्व्रकारने अर्थोतरन्यास के 'कारण से कार्य का औरर कार्य से कारणा का समर्थन' ये दो भेद भी निरूपण किए है, सो उचित नहीं, क्योंकि यह काव्यलिंग का विषय है, अन्यथा- "वपुःप्रदुर्भावादनुमितमिदं जन्मनि पुरा पुरारे न क्वापि क्वचिदपि भवन्तं प्रणातवान्। नमन् मुक्तः सम्प्रत्यतनुरहमग्रेप्यनतिमान् महेश ! चन्तव्यं तदिदमपराधद्वयमपि॥ हे त्रिपुरारि ! शरीर के आविर्भाव से मैंने यह अनुमान कर लिया कि मैंने पूर्व जन्म में कहीं और कभी आप को प्रणाम नहीं किया था। इस समय भी नमस्कार करते ही मुक्त होकर शरीररहित हो बाने के कारण आगे भी प्रणामरहित हो रहा हूँ। हे महेश ! मेरे ये दोनों अपराध क्षमा करने योग्य हैं।" यह सब आलंकारिकों का संमत काव्यलिंग का उदाहरय असंगत हो जायगा; क्योंकि उच्तरार्ध में दोनों वाक्यार्थ (प्रणाम करने से मुक्त
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हो जाना और शरीररहित होना) (प्राम न करने के) कारणरूप हैं, अतः यह अर्थोतरन्यास का उदाहरण हो जायगा। और जो विमर्शिनीकार ने कहा है कि-"विशेष द्वारा सामान्य का समर्थन होने पर भी जहाँ सामान्य वाक्यार्थ उपपादन की अपेक्षा रखता है वहाँ अर्थोतरन्यास होता है और जहाँ स्वतःसिद्ध के ही विशद करने के लिए उसके एकदेशरूप विशेष का ग्रहण किया जाता है वहाँ उदाहरसालंकार होता है, जैसे-'निमजतीन्दोः किरगेष्विवांकः' इस जगह।" वह भी उचित नहीं। क्योंकि- "निजदोषावृतमनसामतिसुन्दरमेव भाति विपरीतम्। पश्यति पित्तोपहतः शशिशुभ्रं शङ्गमपि पीतम् ॥ जिनका मन अपने ही दोषों से ढका हुआ है उनको अतिसुंदर भी विपरीत अर्थात् अ्सुंदर प्रतीत होता है। पित से उपइत (पांडुरोगी) मनुष्य चंद्रमा के समान श्वेत शंख को भी पीला देखता है।" इस प्राचीनसंमत उदाहरण में सामान्य वाक्यार्थ के अ्रसंदिग्ध होने के कारण उपपादन की अपेक्षा नहीं है, क्योंकि 'दोष से म्रम होता है' इस विषय में पामर पुरुष को भी संशय नहीं होता जिससे कि उपपादन की आवश्यकता हो। कहा जायगा कि तर्फ के स्थलों के समान यहाँ भी आहार्य संदेह तो हो ही सकता है, तो यह उचित नहीं; क्योंकि ऐसे आहार्य संशय का तो आपके बताए उदाहरसालंकार में भी साम्राज्य है, अरतः इमारी बताई हुई व्यवस्था का ही अनुसरय करना चाहिए। विकस्वरालंकार का खंडन कुवलयानंदकारने तो- "यस्मिन् विशेषसामान्यविशेषाः स विकस्वरः ।
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अर्थात् जहाँ विशेष, सामान्य और विशेष हों वह विकस्वरालंकार है" यह लिखा है और-
"अनन्तरत्नप्रभवस्य यस्य हिमं न सौभाग्यविलोपि जातम्। एको हि दोषो गुणसंनिपाते निमज्जतीन्दोः किरणेष्विवाङ्कः। कुमारसंभव में हिमालय का वर्णन है। कालिदास कहते हैं कि- हिमालय अनंत रत्नों का उत्पत्तिस्थान है, अतः बर्फ उसकी सुंदरता का नाशक नहीं हुआ। गुणों के समूह में एक दोष डूब जाया करता है, जैसे चंद्रमा की किरणों में कलंक।"
यह उदाहरण दिया है। इसके श्रनंतर- "कर्शारुन्तुदमन्तरेश रखितं गाहस्व काक ! स्वयं माकन्दं मकरन्दशालिनमिह त्वां मन्महे कोकिलम्। धन्यानि 'स्थलसौष्ठवेन कतिचि द्वस्तू नि कस्तूरिकां नेपालच्ितिपालभालतिलके® पङ्के न शङ्केत क:॥ हे काक! तुम कर्णपीड़ाजनक शब्द को छोड़कर मकरंद से सुशो- भित किसी शरम पर स्वयं उछ्ल-कूद करो, तुम्हें हम कोयल समभेंगे। कुछ वस्तुएँ स्थल की सुंदरता से प्रशस्त हो जाती हैं। नेपालनरेश के भालतिलकस्थ कीचड़ में किसे कस्तूरी की शंका न होगी।"
यह द्वितीय उदाहरण देकर लिखा है कि-"प्रथम उदाहरण में उपमा की रीति से और इस उदाहरण में अर्थातरन्यास की रीति से विकस्वरालंकार है।"
१-२-कुवलयानंद में 'स्थलवैभवेन' और 'भालपतिते' पाठ है।
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यह भी निःसार है, क्योंकि 'उपकारमेव कुरुते' इस हमारे उदाहरसालंकार के उदाहरण में (आपके बताए विशेष, सामान्य और विशेष में) प्राथमिक 'विशेष' न होने से (अर्थात् विशेष और सामान्य मात्र होने से) आपके बताए विकस्वरालंकार का संभव नहीं है, अतः आपको भी कोई (नया) अलंकार कहना ही पड़ेगा, (क्योंकि 'निदर्शनम्' लिखने के कारण केवल समर्थक सामान्य तो वहाँ है नहीं, अतः अर्थोतरन्यास नहीं हो सकता।) ऐसी दशा में आरपके (पूर्वोदाहरण में) 'अर्थातरन्यास' और 'उदाहरय' की तथा (द्वितीय उदाहरय में) अर्थोतरन्यास के दोनों भेदों की संसृष्टि से ही आपके बताए उदाहरणों की गतार्थता हो जाती है, अतः नवीन अलंकार का स्वीकार अनुचित है, अन्यथा उपमादि के भेद भी जब शंगांगिभाव से सन्निविष्ट हों, तब भी अन्य अलंकार की कल्पना होने लगेगी, औरर "वीच्य रामं घनश्यामं ननृतुः शिखिनो वने। अर्थात् मेघ के समान श्याम राम को देखकर वन में मोर नाचने लगे।" उपमा द्वारा पोषित इस भ्रांति में भी अरन्य अलंकार की प्रसक्ति होगी। वहाँ भी कोई नया अलंकार मानना पड़ेगा।
अर्थातरन्यास समाप्त
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अनुमान अलंकार
लक्षस अनुमितिरूपी ज्ञान के करण (पूर्णतया साधक) को अनुमान कहते हैं। अनुमिति का अर्थ है जिसमें अनुमितित्व घर्म हो। अनुमितित्व एक प्रकार की जाति है जिसका साक्षी है 'मैं अनुमान करता हूँ' यह साक्षा- त्कार। अथवा व्याप्ति जिसका प्रकार है ऐसी पक्षधर्मता के, अर्थात् प्रथमतः निश्चित रूप से ज्ञात वस्तु के संदिग्ध स्थान पर किए गए, निश्चय से उत्पन्न ज्ञान को अनुमिति कहते है। इस अनुमिति का कारण '्यापि जिसका प्रकार है ऐसे लिंग (हेतु) का निश्चय है' यह एक प्ष का मत है। दूसरों का मत है कि 'व्याप्यत्व से निश्चीयमान लिंग अर्थात् हेतु ही अनुमिति का कारण है'। यह है साधारण अनुमान का लक्षण। यही अनुमान जब कवि की प्रतिभा से उल्लिखित होने के कारण चमत्कारी हो जाता है तब अनुमान नामक काव्यालंकार कहलाता है। उदाहर एा जैसे- तस्मिन्मसिव्रातहतान्धकारे पुरे निशालोपविधानदक्षे। सदो वियुक्ता दिवसावसानं कोका: सशोका: कथयन्ति नित्यम्। वह पुर मणिसमूह से अंधकार नष्ट कर देने के कारण रात्रि का लोप कर देने में निपुण है, अतः वहाँ नित्य ही शोकसहित तत्काल वियुक्त चकई-चकवे दिवस का अवसान कहते हैं। अर्थात् चकई-चकवे के वियोग से ही वहाँ जनता को दिवसावसान का पता चलता है- अंधेरा तो होता ही नहीं।
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यहाँ 'कहने' का अर्थ है 'स्पष्ट बोध'। वह अनुमितिरूप है, क्योंकि यह बोध 'चकई-चकवे के वियोग' रूप लिंग के व्याप्यत्वेन निश्चय रूप (अर्थात् जब रात पड़ती है तभी चकई चक्वे वियुक्त होते हैं-यह निश्चित है इस निश्चयरूप) करण द्वारा उत्पन्न होता है। इस अनुमिति में 'अंधकारविशेष' (किसी समय और किसी प्रदेश के अंधकार) के अभाव को अंधकारसामान्याभाव (समस्त अंधकार के अभाव) के रूप में अरध्यवसित कर लेने पर 'रात्रि के लोप करने में निपुणता' सिद्ध हो जाने पर 'दिवसावसान की सिद्धि का अरभाव' हो जाता है तत्प्र- युक्त है, अर्थात् उसके कारण है, दिवसावसान की अनुमिति। तात्पर्य यह कि मणियों द्वारा नष्ट होनेवाले किसी स्थान के अंधकार को समस्त अंधकार मानकर उस पुर में रात्रि का अदर्शन सिद्ध किया जा रहा है, उस रात्रि के अदर्शन से सिद्ध होता है 'दिवस का अ्रंत न होना' औ्रर उस 'दिवस के अंत न होने' की सिद्धि के कारण 'दिवसावसान की अनुमिति' करनी पड़ती है, इसलिए यह अनुमिति कवि की प्रतिभा से उललिखित है, वास्तविक नहीं। यहाँ आगे कहा जाने वाला 'उन्मीलित अलंकार' है-यह नहीं समझना चाहिए; क्योंकि उसकी भी अनुमानरूपता ही सिद्ध की जायगी-अर्थात् वह भी अनुमानांतर्गत ही है; अतः उसमें अतिव्यासि दोष नहीं है। अथवा; जैसे- अम्लायन्यदरातिकैवकुलान्यग्लासिपुः सत्वरं दैन्यध्वान्तकदम्बकानि परितो नेशुस्तमां तामसाः। सन्मार्गा: प्रसरन्ति साधुनलिनान्युव्वासमातन्वते तन्मन्ये भवतः प्रतापतपनो देव ! प्रभातोन्मुखः ॥
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हे देव! जो कि शत्रुरूपी कुमुदकुल म्लान हो गए, दीनतारूपी अंघकारसमूइ क्षीणा हो गए, तामस (निशाचर प्राणी) लुप् हो गए, सन्मार्ग फैल रहे हैं, सत्पुरुषरूपी कमल उल्लास को प्राप्त हो रहे हैं, अतः मैं मानता हूँ कि आपका प्रतापरति प्रभातोन्मुख है-अर्थात् उदय हो रहा है। प्रथम उदाहरण में लिंग लिंगी दोनों शुद्ध (अरमिश्रित ) हैं और इस उदाहरण में रूपक से अनुप्राशित हैं यह विशेषता है! कवि-प्रति- भोललिखितता तो दोनों में स्पष्ट ही है। उत्प्रक्षा और अनुमान में भेद यहाँ यह स्मरण रखना चाहिए कि जहाँ लिंगलिगियों (हेतु-हेतु- मानों) की विद्यमानता हो वहाँ मन्ये, शंके, अवैमि, जाने इत्यादि पद अनुमिति के बोधक होते हैं और जहॉ उत्प्रेक्षा के निमिच्त सादृश्यादि की सत्ता हो वहाँ वे उत्प्रेक्षा के बोधक होते हैं यह इन दोनों में भेद है, अत :- मन्मथामात्यमायागतमहं मन्ये महामहम् चक्षुश्मत्कृति धत्ते यदहो किल कोकिलः । मैं महोत्सवरूप काम का अमात्य (वसन्त) आ रहा है, यह मानता हूँ, क्योंकि कोयल नेत्रों के चमत्कार का विधान कर रही है- नेत्रों को श्रानन्द देने लगी है। इत्यादिक में अनुमान है, उत्प्रेक्षा नहीं (क्योंकि यहाँ किसी से सादृश्य को संभावना नहीं है)। अनुमान के भेद यहाँ यह समझ लेना चाहिए कि (१) जहाँ 'मन्ये' इत्यादि वाचक पदों का ग्रहय हो वहाँ वाच्य अनुमान होता है; जैसे शरभी लिखे
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('मन्मथामात्य०' इस) उदाहरण में, (२) जहाँ वक्ति, कथयति इत्यादि लक्षक पदों का ग्रहणा है, वहाँ लक्ष्य अनुमान होता है; जैसे 'कोकाः सशोकाः०' इत्यादि पूर्वोक्त उदाहरण में, और जहाँ (३) उन दोनों में से किसी एक का भी ग्रहण न हो तथा साध्य द्वारा अनुमिति का आक्षेप हो वहाँ प्रतीयमान (आक्षिप्त) अनुमान होता है; जैसे 'अम्लायन्०' इत्यादि पूर्वोक्त पद्य का चतुर्थं चरस 'तद् भावी तव देव संप्रति महो- मार्तण्डब्निम्बोदयः' (हेदेव! अतः इससमय आपके प्रतापसूर्य के मंडल का उदय होनेवाला है) इस तरह बना देने पर, और (४) जहाँ साध्य का भी ग्रहण न हो और लिंगमात्र का ग्रहण हो, साध्य ऊपर से समझा जाय, वहाँ धवन्यमान अनुमान होता है; जैसे-
गुञ्जन्ति मञ्जु परितो गत्वा धावन्ति संमुखम्। आवर्तन्ते निवर्तन्ते सरसीषु मधुवताः॥ तलइयों में भौरें मंजु गुंजार कर रहे हैं, चारों शर जाकर संमुख दौड़ रहे हैं, आते हैं और लौट जाते हैं। यहाँ शरदागमरूपी साध्य का अनुमान ध्वनित होता है।
निष्कृष्ट लक्षण इस तरह यह व्यवस्था पूर्वोक्त (अरनुमिति का ) करण अरनुमान है' इस सिद्धांत में संगत नहीं होती, क्योंकि यदि 'ज्ञायमान लिंग' को करय माना जाय तो केवल वाच्यता ही होगी, और यदि 'लिंगज्ञान' को करण माना जाय तो वह वाच्य तथा लक्ष्य दोनों ही रूपों में न हो सकेगा। अत :- अनुमिति ही अनुमान है-अर्थात् जहाँ कवि प्रतिभानिमिंत अनुमिति हो वहाँ अनुमानालंकार होता है।
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यह निष्कृष्ट लक्षय होना चाहिए, क्योंकि अनुमिति वाच्य, लक्ष्य, प्रतीयमान और ध्वन्यमान सब तरह की हो सकती है। कहा जायगा कि तब इस अलंकार का नाम अनुमित्यलंकार होना चाहिए, अनुमानालंकार नहीं; सो यह कुछ नहीं, क्योंकि अनुमान- शब्द अनुपूर्वक माधातु से ल्युट् प्रत्यय होने पर बनता है औरर ्युटू प्रत्यय का करण के समान ही भाव अर्थ में भी विधान है, श्रतः अनुमान शब्द के 'अनुमिति का कररा' और 'अनुमिति' दोनों अर्थ होनेमें कोई बाधा नहीं।
प्रनुमान समाप्त
यथासंख्यालंकार
लक्षण
नामग्रहण के क्रम से अथों का संबंध (अन्वय) यथासंख्य कहलाता है। विवेचन 'यथासंख्य' शब्द में 'यथा' के अर्थ में शव्ययीभाव समास है और यथा शब्द का अर्थ है पदार्थानतिवृत्ति-अर्थात् पदार्थ का शरतिक्रमण न करना, अतः यहाँ 'यथासंख्य' का अर्थ हुआ मंख्या का शतिक्रमण न करना। जिसका अभिप्राय है-पहले का पहले से ही संबंध, दूसरे का दूसरे से ही संबंध इत्यादि क्रम से संबंध होने पर यथा-
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संख्य होता है। सो इस तरह 'यथासंख्त' शब्द का व्युत्पत्तिजन्य अर्थ ही लक्षय है।
उदाहरण
यौवनोद्गमनितान्तशङ्किताः शीलशौर्यबलकान्तिलोभिताः। संकुचन्ति विकसन्ति राघवे जानकीनयननीरजश्रिय: ॥
यौवन के उद्गम से अत्यंत शंकित और शील, शौर्य, बल तथा कांति के कारण लोभित जानकी के नयनकमलों की छटाएँ रामचंद्र के विषय में संकुचित और विकसित हो रही हैं।
यहाँ नयनों की छटाएँ यौवनोद्गम के कारण अत्यंत शंकित होकर संकुचित हो रही हैं और शील, शौर्य, बल और कांति से लोभित होकर विकसित हो रही हैं, अतः प्रथम क्रिया का प्रथम विशेषण से विशिष्ट- कर्ता के साथ अन्वय तथा द्वितीय क्रिया का द्वितीय विशेषण से विशिष्ट कर्ता के साथशरन्वय है और वह अन्वय शाब्द है, क्योंकि विशेषण और विशेष्य का समास न होने के कारणा शब्दों का भी क्रिया के साथ अन्वय है। यहाँ 'लजा और औत्सुक्य की संधि' प्रधान व्यंग्य है। अथवा; जैते-
द्रुमपङ्कजविद्वांसः सर्वसन्तोषपोषकाः। सुधैव हन्त हन्यन्ते कुठारहिमदुर्जनैः॥
सब के संतोष को पुष्ट करने वाले वृक्ष, कमल और विद्वान्, खेद है कि, कुठार, हिम और दुर्जनों द्वारा व्यर्थ ही मारे जाते हैं। यहाँ यथासंख्यालंकार 'दीपक' का शरंग रूप है, क्योंकि प्रकृत और अप्रकृत का एक धर्म 'मारे जाते हैं' में अन्वय है।
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अ्रथवा जैसे-
'वृन्दा-पितृगहनचरौ कुसुमायुधजनन-हननशक्तिघरौ। अरि-शूललाञ्छितकरौ भीति मे हरिहरौ हरताम् ।।' वृंदावन और पितृवन (३मशान) में विचरनेवाले, कामदेव के जनन और हनन की शक्ति धारण करनेवाले, चक्र तथा शूल से चिह्नित कर वाले हरिहर मेरा भय हरस करें। यहाँ हरि और हर दोनों के पक्ष में 'आर्थ यथासंख्य' है, क्योंकि पहले समस्त का समस्त से अन्वय हो लेने पर अवगवों का श्रन्वय पीछे से प्रतीत होता है। इत्यादिक यथासंख्य अलंकार का अपरिमित विषय है।
क्रम से अन्वयबोध पर विचार अब यह सोचिए कि यथासख्य अलंकार में जो क्रम से अन्वय- बोध होता है इसका नियामक कौन है? (१) इस विषय में कुछ लोगा का कहना है कि 'योग्यताज्ञान ही अन्वयबोध का नियामक है' जैसा कि 'वृन्दापितृगहनचरौ' यहाँ हरि में शमशानचारिता और हर में वृंदावनचारिता बाधित है, अरतः अन्वयबोध नहीं होता। तब हरि में वृंदावनचारिता और हर में शमशान- चारिता की योग्यता के कारण उत्पन्न होनेवाला इनका अन्वयबोध अंत में क्रमिक अन्वयबोध के रूप में पर्यवसित हो जाता है। इसी प्रकार अन्यत्र भी समझना चाहिए। (२) दूसरे कहते हैं कि योग्यताज्ञान को नियामक मानने पर इस अलंकार में 'क्रमभंग' को दोष नहीं कहा जा सकता, क्योंकि- कीर्तिप्रतापौ भातस्ते सर्याचंद्रमसाविव।
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(आरपके कीति और प्रताप सूर्य-चंद्रमा के समान शोभित होते हैं) इत्यादि में कीति में चंद्रमा की और प्रताप में सूर्य की सदशता की योग्यतावशात् ही प्रतीति उत्पन्न हो जायगी, वे क्रम से लिखे जाँय अथवा नहीं। इसका उत्तर यह तो आप दे नहीं सकते कि क्रमिक ही योग्य होता है और क्रमहीन अयोग्य, जिससे यहाँ मुख्यार्थ की क्ति हो, क्योंकि योग्यता तो क्रम और व्युत्क्रम की परवा करती नहीं। परंतु यहाँ मुख्यार्थ की क्षति अनुभवसिद्ध है। अतः कहना पड़ेगा कि (परस्वर) अ्रन्वय रखने वाले समान संख्या वाले पदार्थों के ज्ञान का 'संख्या के अनुसार अन्वय बोध' ही कार्यता का शवच्छेदक होता है- अर्थात् ऐसे पदार्थो का अन्यथा बोध होता ही नहीं (यही नियामक है)। ऐसी स्थ्रिति में 'कार्तिप्रतापौ' इस उदाहरय में यथाश्रुत पदार्थों का 'संख्या के अनुसार अन्वयधोध' बाघ के निश्चय से पराहत है, अतः मुख्यार्थ की क्षति होने के कारण क्रमभंग की दोषता का साम्राज्य है- अर्थात् यहाँ क्रमभंग को दोष मानना ही पड़ेगा। कहा जायगा कि अन्वय रखनेवाले समसंख्य पदार्थो का यदि संख्यानुसार अन्वयबोध व्युत्पत्िसिद्ध है तो 'यथासंख्यमनु देशः समानाम्' यह (पाशिनि का) सूत्र व्यर्थ हो जायगा, क्योंकि उक्त सूत्र के उदाहरण 'लोमादि-पामादि-पिच्छादिभ्यः शनेलचः' इत्यादिकों में (पूर्वोक्त) लौकिक सामग्री के बल से ही संख्यानुसार अन्वयबोध सिद्ध है, (तात्पर्य यह कि जब अरन्यथाबोध बाघित ही है तो फिर सूत्र बनाने की आवश्यकता ही क्या रह गई) अतः सूत्र व्यर्थ हो जाता है। किंतु जो विद्वान् योग्यतामात्र के बल से यथासंख्यान्वयबोध सिद्ध करते हैं उनके मन में तो जो केवल शास्त्र द्वारा समझनेवाले हैं (जिनको लक्ष्यों का ज्ञान नहीं है) उनको 'किस प्रकृति से किस प्रत्यय का संबंध है' इस रूप में योग्यता का ज्ञान न होने से उनके संख्यानुसार
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अ्रन्वयबोध के लिए 'यथासंख्यम्' यह सूत्र है (अतः योग्यताज्ञान की नियामकता ही उचित है) तो यह ठीक नहीं, क्योंकि हमारे हिसाब से भी जो लोग पूर्वोक्त व्युत्पत्ति मे रहित हैं-अर्थात् जिनको यह पता नहीं है कि 'अन्वय रखने वाले समसंख्य पदार्थों का संख्यानुसार ही बोध होता है' वैसे लोगों के बोध के लिए सूत्र की सार्थकता है।
'यथासंख्य' को अलंकार मानना चाहिए या नहीं ? यहाँ यह समझना चाहिए कि-यथासंख्य के अन्वयबोध को किसी भी प्रकार होने दीजिए-चाहे योग्यता के बल से हो अथवा बोध के बल से ? इस विषय में हमें आग्रह नहीं, किंतु विचारणीय यह है कि 'यथासंख्य' अलंकार-पदवी को कैसे प्राप्त कर सकता है? क्योंकि इस लोकसिद्ध वस्तु में अलंकारता के जीवनमूल 'कविप्रतिभा- निर्मितत्व' की लेशमात्र भी उपलब्धि नहीं है, जिससे कि इसे अलंकार कहना किंचित् भी उचित हो सके, अतः यथासंख्य 'क्रमभंगरूप दोष' का अभाव ही है। ऐसी स्थिति में भट्ट उद्भट के मतानुयायियों के कथन खोटे पैसे के समान सुंदरतारहित ही हैं-उनका कोई मूल्य नहीं। इससे 'यथासंख्य' को ही 'क्रमालंकार' के नाम से व्यवहार करने- वाले वामन की बागियों की भी व्याख्या हो जाती है। यह है नवीनों का मत।
यथासंख्य समाप्त
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पर्याय अलंकार
लक्षण (१) एक पर्याय है-क्रम से अनेक अधिकरणवाला एक आधेय और (२) दूसरा पर्याय है-क्रम से अनेक आधेयवाला एक अधिकरण। इन दोनों से भिन्न से भिन्न होना अर्थात् इन दोनों में से कोई एक होना पर्याय का सामान्य लक्षण है। लक्षण का विवेचन पर्याय शब्द का यौगिक अर्थमात्र पर्याय का लक्षण नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने से अतिव्याप्ति हो जाती है। 'परावनुपात्यय इयः' (३-३-३८) इस पाणिनि की स्मृति से (परि+इण+घञ्=पर्याय) घञ के उनाधिरूप में (अनुपात्यय =) 'क्रमप्राप्त का अरपनतिक्रमण' मात्र कहा गया है; उससे 'किसका अनतिक्रमण' यह प्रतीत नहीं होता। न दूसरा ही कोई लक्षण बन सकता है, क्योंकि 'इन दोनों में से एक' न कहने पर लक्षणा का निर्वचन ही नहीं हो सकता। उक्त दोनों लक्षणों में से प्रथम लक्षणा में 'क्रम से' इसलिए कहा गया है कि पूर्वोक्त विशेषालंकार के द्वितीय भेद में अरतिव्यासि न हो। वहाँ अनेक आधारोंमें आधेयका एकसाथ ही संबंध होता है, अतः 'क्रम से' कहने के कारण अतिव्याप्ति नहीं होती और द्वितीय लक्षणमें 'क्रम से' इसलिए कहा गया है कि आगे कहे जानेवाले समुच्चयालंकार में अतिव्याप्ति न हो, क्योंकि वहाँ एक अधिकरय में अनेक आधेयों का एक साथ अन्वय होता है, क्रम से नहीं। उदाहरए आयाता कमलासनस्य भवनाद् द्रषटु' त्रिलोकीतलं गीर्वागेषु दिनानि कानिचिदथो नीत्वा पुनः कौतुकात्।
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(२५ह)
भ्रान्त्वा भूवलये महाकविकुलोपास्या तवास्याम्बुजे राजन्संप्रति सत्यधामनि गिरां देवी सुखं वर्तते॥ सरस्वती ब्रह्मलोक से त्रिलोकीतल देखने के लिए आ्ई। इसके बाद उसने कुछ दिन देवताओं में बिताए, सदनंतर कौतुक से महाकविसमूह द्वारा उपासनाय हुई। वह भूमंडल में भ्रमण करके इस समय, हे राजन्, सत्य के निवासस्थान तुम्हारे मुखकमल में सुख से निवास कर रही है। यहाँ प्रथम चरणा में अधिकरर आर्थ (शर्थप्राप्त) है, क्योंकि विश्लेष के अवधिभूत (जहाँ से विश्लेष हुश) ब्रह्मलोक में पंचमी द्वारा शपश्लेषिक अधिकरण आचतिप हो जाता है। कारय उपश्लेष के बिना विश्लेष सिद्ध नहीं होता-जिसका उपश्लेष ही नहीं उसका विश्लेष कैसा ?
यदि पचकी से अविकरण का आक्षेप न मानकर 'ब्रह्मलोक में निवास करके आरई' इस तरह 'ल्यब्लापे पंचमी' मानी जाय तब भी व्यबन्त अर्थ की क्रिया के अ्रधिकरण में पंचमी लाक्षणिक हागी, अरतः फिर भी अधिकरण आर्थ ही रहेगा, क्योंकि 'ल्यब्लोपे कर्मण्यधिकरणे च-यह वार्तिक निरूढ लक्षणा का समर्पक है' ऐसा सिद्धांत है। अरन्य तीनों चरणों में तो शाब्द अरधिकरण है। शरथवा; जैसे-
मकरालयस्य कुच्ौ स्थित्वा सदनेऽमृताशिनां च चिरम्। संप्रति निर्दोषे ते राजन्वदनाम्बुजे सुधा वसति॥ हे राजन्, पहले मकरालय (समुद्र) की कुच्ि में (अर्थात् दुख- दायी मगरों के साथ) और फिर शमृत भोजन करने वाले (देवताओ्रं)
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के सदन (घर+दुःखदायक) में बहुत समय तक रह कर सुघा इस समय निर्दोष आपके सुखारविंद में वास करती है। पूर्व उदाइरण में अवरोह (ब्रह्मलोक से भूमंडल तक आरगमन) है और इस उदाहरण में आरोह (समुद्र से देव लोक तक गमन) है; और पूर्व पूर्व के त्याग में अरुचि के बीज (मगरों का और अपने- अ्रमृत के-खानेवालों का स्थान होने) का ग्रहया है; यह इस उदाहरण में विशेषता है। यह तो हुआ प्रथम पर्याय का उदाहरण। अब दूसरा पर्याय; जैसे- विदूरादाश्चर्यस्तिमितमथ किंचित्परिचया- दुदश्चच्चाश्चल्यं तदनु परितः स्फारितरुचि। गुरूणां संघाते सपदि मयि याते समजनि त्रपाचूर्णत्तारं नयनयुगमिन्दीवरदशः ।। गुरुजनों के समूह में बैठी हुई कमलनयनी के दोनों नेत्र तत्काल मेरे पहुँचने पर दूर से देखते ही आश्च्यं से निश्चल हो गये, तदनंतर कुछ परिचय होने से उनमें चंचलता उत्पन्न हुई, उसके बाद चारों शरर कांति फैलने लगी ओर तब लज्जा से कनीनिकाएँ (तारे) घूमने लगीं? यहाँ किसी खुले स्थल में गुरुजनों की सेवा करती हुई और बहुत दिनों से परदेश गए हुए-जिसके आगमन की संभावना नहीं थी- ऐसे प्रिय को अकस्मात् देखनेवाली नायिका के नयनयुगलरूपी एक अधिकरण में विशेषणरूप से आए हुए निश्चलता आदि आधेयों के एक साथ असंभव होने से तथा (दूरत्व आदि) कारगों के क्रमवश क्रमिकता है।
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श्रथवा; जैसे- प्रथमं श्रितकुञ्ष कोरकाभावथ शोभामनुभूय कन्दुकानाम्। अधुना श्रयितु कुचौ यतेते दयिते ते करिशावक्ुम्भलीलाम्।। हे प्रिये! पहले तुम्हारे कुच कमलमुकुल की आभा धारण करते थे, फिर कंदुकों की शोभा का अनुभव करके अब वे हाथी के बच्चे के कुंभस्थल की लीला के आश्रयणार्थ प्रयत्न कर रहे हैं। यहाँ भी कुचत्वधर्म से एकीकृत कुचरू अधिकरण में परिमाण- विशेषों का क्रमिकत्व्र है (अतः पर्याय है) और यदि कुचों के पूर्व पूर्व स्वरूप की अपेक्षा उत्तरोच्तर स्वरूप का उत्कर्ष प्रतीत होता है तो एकविषयक सारालंकार भी होने दीजिए (अर्थात् पर्याय और सार का संकर है)। कहा जायगा कि तब पर्याय बाधित हो जायगा, तो यह ठीक नहों, क्योंकि पर्याय का विषय है कुचरूप अधिकरण में परि- माणों की क्रमिकता, और सार का वरिषय है परिमाण का उच्रोचर उत्कर्ष, अरपरतः बाध्यवाधकभाव नहीं है। कुवलयानंद का खंडन शर जो कि कुवलयानंदकारने- "विम्बोष्ठ एव रागस्ते तन्वि पूर्वमदृश्यत। अधुना मृगशावाच्ि हृदयेऽप्येष दृश्यते।। हे कृशांगि ! पहले तुम्हारे बिंबोष्ठ में ही राग (रंग) दिखाई देता
देता है।" था, किंतु अब हे मृगनयने ? यह (राग-स्नेह) हृदय में भी दिखाई
इसे 'विकास-र्याय' के नाम से कहा है, वह चिंतनीय है। क्योंकि एक के संबंध के नाश होने के अनंतर दूसरे का संबंध होने पर ही लोक में पर्याय पद का प्रयोग होता है। औरर
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"श्रोणीबन्धस्त्यजति तनुतां सेवते मध्यभागः पन्ध्यां मुक्तास्तरलगतयः संश्रिता लोचनाभ्याम् धत्ते वक्ः कुचसचिवतामद्वितीयं तु वक्त्रं त्वद्गात्राणां गुसविनिमयः कल्पितो यौवनेन।। कटिभाग कृशता को छोड़ रहा है और मध्य भाग उसका सेवन कर रहा है, चरगों ने चंचल गतियाँ छोड़ दी हैं और नेत्रों ने ले लीं हैं, वक्ःस्थल कुचों की सहायता ले रहा है और मुख अद्वितीय (अ्रनु- पम+-सहायकरहित) हो रहा है। उसके (नायिका के) श्रंगों के गुगों का यौवन ने विनिमय (परस्परपरिवर्तन) कर दिया है।" इस काव्यप्रकाश के उदाहृत पर्याय में औरर "नन्वाश्रयस्थितिरियं तव कालकूट! केनोत्तरोत्तरविशिष्टप दोपदिष्टा । प्रागर्णावस्य हृदये वृषलक्मसोजथ करठेडधुना वससि वाचि पुनः खलानाम्।। हे कालकूट (विष) ! तुम्हें उच्तरोत्तर विशिष्ट पद वाली शश्रयों की इस स्थिति का किसने उपदेश दिया है? पहले तुम समुद्र के हृदय में थे, फिर शिवजी के कंठ में आए, अब दुष्टों को वाणी में रहते हो।" इत्यादि अलंकारसर्वस्त्रकार के उदाहृत पर्याय में वैसा ही देखा भी गया है, अतः इस अलंकार के लक्षण में भी 'क्रम' पद से वैसी ही विवक्षा उचित है। इस कारण यहाँ ( 'बिंबोष्ठ एव' इस पद्य में) एक विषय वाला सारालंकार ही उचित है, जिसे कि अलंकाररत्नाकरादिक 'वर्धमानक' अलंकार कहते हैं और आपने उसका उल्लेख नहीं किया है।
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शुद्ध क्रमालंकार यहाँ यह समझना चाहिए कि- प्रथमं चुम्बितचरणा जङ्गाजानूरुनामिहृदयानि। आश्लिष्य भावना मे खेलतु विष्णोर्मुखाब्जशोभायाम्।।
पहले जिसने विष्णु के चरणा का चुंबन किया है ऐसी मेरी भावना, (उनके) पिंडली, घुटने, जाँघ, नाभि और हृदय का श्रलिंगन करके मुख-कमल की शोभा में खेले।
यहाँ पर्याय अलंकार नहीं है; कारण पर्याय में उत्तरोत्तर संबंघ से पहले पूर्व पूर्व का त्याग विवच्ित है, वह यहाँ है नहीं; क्योंकि यहाँ वक्ता को अपनी मुखविषयक भावना की सर्वोगविषयकता अभिप्रेत है, केवल मुखमात्रविषयकता नहीं। तात्पर्य यह कि वक्ता मुख के ध्यान के समय भी पूर्व अंगों के ध्यान को छोड़ना नहीं चाहता, अतएव 'खेले' यह कहा है, न कि मग्न हो जाय। इसी तरह- पूर्व नयनयोर्लग्ना ततो मग्रा मनस्यभृद्। अथ सैव प्रियस्यासीत्सर्ववेदनगोचरा॥
जो पहले नेत्रों में लगी, फिर मन में मग्न हुई, अब वही प्रियतमा प्रिय के संपूर्ण ज्ञान का विषय बन गई। यहाँ भी उक्त रीति से पर्यायालंकार नहीं है, न सारालंकार ही है, क्योंकि उच्तरोत्तर उत्कर्ष अथवा अपकर्ष का शभाव है, अतः ऐसे स्थलों में शुद्ध क्रमालंकार अतिरिक्त है, यह भी कहा जाता है।
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पर्याय के विषय में ज्ञातव्य यहाँ एक बात और याद रखनी चाहिए-जहाँ आधार, आधेय, उनके संबंध अथवा क्रम, इनमें से कहीं भी कविकल्पना की अपेक्षा हो वहीं यह अलंकार होता है, और जहाँ सर्वोश में लोकसिद्धता हो वहाँ कोई अलंकार नहीं होता। अतएव काव्यप्रकाशकारने 'श्रोगीबन्घ०' और अलंकारसर्वस्व्रकार ने 'प्रागर्ावस्य०' ये पूर्वोक्त उदाहरण दिए हैं। इन दोनों ही उदाहरणों में आधार के भेद से भिन्न आधेयों को एकता के अध्यवसान से एक कर दिया गया है। हमारे दिए हुए उदाहरणों में तो क्रम भी कल्पित है, क्योंकि ब्रह्मलोक में स्थित देवता से 'हमारी वाणी' का और समुद्र में स्थित सुधा से 'वाणी के माधुर्य' का अभेद अथवा वैसा क्रम लोकसिद्ध नहीं है। ऐसी स्थिति में- "अधुना पुलिनं तत्र यत्र स्रोतः पुराभवत्। जहाँ पहले प्रवाह था वहाँ अब पुलिन है।" यह कुवलयानंद का उदाहरण 'यत्र पूर्व घटस्तत्राधुना पटः-जहाँ पहले घट था वहाँ पट है' इस वाक्य के समान लौकिकोक्तिमात्र है, अतः उदाहरण देने योग्य नहीं ही है। पर्याय अलंकार समाप्त
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परिवृत्ति अलंकार
लक्षण
दूसरे की किसी वस्तु के लेने सहित दूसरे को अपनी किसी वस्तु के समर्पण को परिवृत्ति कहते हैं। जिसे दूसरे शब्दों में क्रय अर्थात् खरीदना कहा जा सकता है।
परिवृत्ति के भेद
परिवृत्ति प्रथमतः दो प्रकार की है-सम परिवृत्ि और विषम परिवृच्ति। समपरिवृत्ति के भी दो भेद हैं-उच्चमों से उच्चमों की औ्रर न्यूनों से न्यूनों की। इसी प्रकार विषम परिवृत्ति के भी दो भेद हैं- उच्तमों से न्यूनों की और न्यूनों से उत्तमों की। क्रम से उदाहरण अङ्गानि दच्वा हेमाङ्गि! प्राणान्कीशासि चेन्नृाम्। युक्तमेतन्न तु पुनर्लोचनाम्बुरुहद्दयम् ।। हे सुवर्ाङ्गि! यदि तुम अंगों को देकर मनुष्यों के प्राण खरीद लेती हो तो यह उचित है, किंतु नेत्ररूपी दो कमल देकर प्राण ले लेती हो यह उचित नहीं। यहाँ पूर्वाध में सम परिवृत्ति है और उत्तरार्ध में तो विषम परिवृत्ति है ही।
आस्थिमालामयीं दत्त्वा मुएडमालामयीं तनुम्। गृह्णतां त्वत्पुरस्थानां को लाभ: स्मरशासन ।। हे कामारि! अस्थिमालामय शरीर देकर मुण्डमालामय शरीर अहया करनेवाले तुम्हारे नगर-काशी में रहने वालों को क्या लाभ है?
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गरिमाखमर्पयित्वा लघिमानं कुचयुगात्कुरङ्गदशाम्। स्वीकुर्वते नमस्ते यूनां धैर्याय निर्विवेकाय। तरुगों के विबेकरहित धैर्य, तुम्हें नमस्कार है, जो तुम अपने गौरव का समर्पण करके मृगनयनियों के कुचयुग से लधुता का स्वीकार करते हो। किमहं कथयामि योषितामधरं बिम्बफलं समर्प्य याः। सुरसानि हरन्ति हा! विदुषां पुएयफलानि सत्वरम्।। स्त्रियों से मैं क्या कहूँ जो अधर (निम्नकोटि के +श्रष्ठरूपी ) बिंबफल को देकर, खेद है कि, विद्वानों के सुरस (रसीले+स्वर्गसुखद) पुण्य फलों को ( पवित्र फलों को +पुण्य के फलों को) तत्काल हरण कर लेती हैं। विवेचन इन उदाहरणों में लेन-देन का व्यवहार कविकल्पित ही है, वास्तव नहीं। जहाँ वास्तव लेन-देन हो वहाँ यह अलंकार नहीं होता। जैसे- "क्रीशन्ति प्रविकचलोचनाः समन्तान् मुक्ताभिर्बदरफलानि यत्र बाला:। जहाँ विकसित लोचनवाली बालाएँ मोतियों के द्वारा बेर खरीदती हैं।" (यहाँ वास्तविक पुरसमृद्धि का वर्णन है, अतः अलंकार नहीं है) अलंकारसर्वस्व का खराडन दूसरी बात यह समझनी चाहिए कि लक्षण में 'दूसरे के लिए किसी वस्तु का समर्परा' इतने तक विवचित है, न कि 'अपनी किसी
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वस्तु का त्याग मात्र' अर्थात् केवल अपनी वस्तु छोड़ देने से गरिषृचि अलंकार नहीं होता और न किसी की कोई वस्तु ले लेने मात्र से किंतु वही वस्तु दूसरे को दे दें तब होता है। अन्यथा किसी वस्तु को छोड़कर- किशोरभावं परिहाय रामा बभार कामानुगुणां प्रसालीम्। रमणी ने किशोरता को छोड़कर काम के अनुकूल पथ स्वीकार किया। यहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी। यदि कहा जाय कि यह भी परिवृत्ति का उदाहरण ही है तो यह उचित नहीं, क्योंकि 'पूर्वावस्था छोड़कर उच्तरावस्था का ग्रहण करना' वास्तव में अलंकार ही नहीं है। ऐसी स्थिति में अलंकारसर्वस्वकार ने जो- "विनिमयोऽत्र किचित् त्यक्त्वा कस्यचिदादानम् । अर्थात् विनिमय का अर्थ यहाँ 'कुछ छोड़कर किसो का कुछ ले लेना है" यह परिवृत्ति का लक्षण बताया है और- "किमित्यपास्याभरणानि यौवने धृतं त्वया वाधकशोभि वल्कलम्। कुमार संभव में शिव जी पार्वती से कह रहे हैं-तुमने यौवन में आभूषण छोड़कर बुढ़ापे में शोभा देनेवाला वल्कल क्यों धारण किया है?" यह उदाहरण दिया है। ये दोनों ही ठीक नहीं हैं। परिवृत्ति समाप्त
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परिसंख्यालंकार
लक्षण
सामान्यतः प्राप्त वस्तु का किसी विशेषता के कारण (अर्थात् कोई विशेषता दिखाने के लिए) अन्यों से पृथक करना परिसंख्या कहलाता है।
लक्षण का विवेचन [मीमांसादर्शन के अनुसार विधि तीन प्रकार की होती है- (१) अपूर्व विधि (२) नियम विधि और (३) परिसंख्या विधि। (जिनका विवरण आगे मूल में ही दिया जा रहा है।) इनमें से] साहित्य शास्त्र में (जिस लक्षण का ऊपर निर्वचन किया गया है उस) लक्षण के अंतर्गत होने के कारणा नियम विधि भी परिसंख्या ही है; क्योंकि नियम विधि और परिसंख्या विधि में केवल इतना ही अंतर है कि नियम विधि वैकल्पिक रूग से प्राप्त में लगतो है और परिसंख्या विधि एकसाथ प्राप्त में। किंतु दोनों ही विधियों में अपने से शतिरिक्त का निवारय अपेक्षित है। इस अवांतर विशेषता की यहाँ विवक्षा नहीं है।
इसी अवांतर भेद को न मानने के कारण वैयाकरणों के मत में 'परिसंख्या' भी 'नियम' शब्द से कही जाती है। इसीलिए उनका सिद्धांत है कि "कृर्चाद्धतसमासाश्च" (१-२-४६) इस पाशिनिसूत्र में समासग्रहण नियम के लिए है; अन्यथा वहाँ समास में मीमांसकों की मानी हुई नियमविधि उपपन्न नहीं होती, क्योंकि समास में वैफल्पिक प्रातिपदिक संज्ञा प्राप्त नहीं है, "अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्" (१-२-४५) यह सूत्र समास और समास से भिन्न दोनों प्रकार के
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पदसमूहों में एक साथ ही प्राप्त है, अतः मीमांसकों के अनुसार वहाँ परिसंख्या होनी चाहिए, नियम नहीं। (सारांश यह कि जैसे वैयाकरय लोग परिसंख्याविधि को नियमविधि के अंतर्गत मानते हैं वैसे ही साहित्यशास्त्र में नियम को परिसंख्या के अंतर्गत माना जाता है।) किंतु मीमांसकों के यहाँ नियम और परिसंख्या की परिभाषा मिन्न-भिन्न है। जैसा कि वे कहते हैं-
"विधिरत्यन्तमप्राप्ते नियमः पात्िके सति। तत्र चान्यत्र च प्राप्ते परिसंख्येति गीयते।
सर्वथा तप्राप्त में अपूर्व विधि, वैकल्विक प्राप्त में एकत्र नियमन को नियमविधि और एकसाथ उसमें और अन्य में (दोनों जगह प्राप्त होने पर अन्यत्र वर्जन को) परिसंख्या विधि कहते हैं।" अपूर्व विधि का उदाहरणा है "स्वर्गकामो यजेत-जिसको स्वर्ग की इच्छा हो वह यज्ञ करे" इत्यादि, क्योंकि यहाँ यज्ञादि किसी दूसरी प्रकार से प्राप्त नहीं है।
नियम विधि का उदाहरण है "ब्रीहीन् अवहन्ति-धान कूटता है" "समे देशे यजेत-समतल भूमि में यज्ञ करे" इत्यादि। यहाँ प्रथम उदाहरण में पुरोडाशनिर्माण में फलप्राप्ति के लिए चावल का तुष- रहित होना आवश्यक है, उसका संगादन अवघात (ऊँखल मूसल से कूटना) द्वारा श्रथवा नखों द्वारा या पत्थर आदि अन्य प्रकार से भी हो सकता है, इनमें से ऊखल मूसल द्वारा संपादन करने से ही फल- प्राप्ति हो सकती है, अतः यहाँ नियम विधि है। इसी प्रकार दूसरे उदाहरण में सम देश तथा विषम देश दोनों में यज्ञ हो सकता है,
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तथापि समदेश में करने से ही फल प्राप्ति होती है विषम देश में नहीं, अ्रतः यह भी नियम विधि है। परिसंख्या विधि का उदाहरण है 'इमामगृभ्णन्रशनामृतस्येत्य- श्वाभिधानीमादत्ते-'इमामगभ्णन् रशनामृतस्य' इस मंत्र से श्रश्वा- भिधानी को ग्रहण करता है' 'पंच पंचनखा भक्ष्या :- पाँच पंचनख- प्राणी खाने योग्य हैं' इत्यादि। यहॉ प्रथम उदाहरया के मंत्र में 'रशना अ्रहय (रस्सी पकड़ना)' इस लिंग (ज्ञापक) के द्वारा घोड़े औ्रर गदहे दोनों की रस्सियों का पकड़ना एकसाथ प्राप्त होता है, उनमें से 'अ्रश्च की रस्सी के अरतिरिक्त अरन्य रस्सी के पकड़ने का वर्जन' इस वाक्य से सिद्ध होता है। इसी प्रकार दूसरे उदाहरय में 'पंचनख्र प्राशियों में से शास्त्रोक्त पाँच प्राणियों के श्रतिरिक्त प्रागियों के भक्षण का वर्जन' सिद्ध होता है। (यहाँ यह स्मरण रखना चाहिए कि नियम और परिसंख्या में इतना ही अंतर है कि नियम में विधि की प्रधानता होती है और परिसंख्या में निषेध की ।) सारांश यह कि पूर्वोक्तरीत्या यहाँ नियम विधि और परिसंख्या विधि को एक ही समझना चाहिए। इस भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए कि मीमांसकों के समान यहाँ परिसंख्यालंकार में नियम विधि वाले उदाहरण नहीं शर सकते। परिसंख्या के भेद परिसंख्या प्रथमतः दो प्रकार की है-शुद्धा औरर प्रश्नपूर्विका। इनमें से प्रत्येक आर्थी और शाब्दी होने से यह चार प्रकार की हो जाती है। उदाहरय आर्थी शुद्धा; जैसे- सेवायां यदि साभिलाषमसि रे लक्ष्मीपतिः सेव्यतां चिम्तायामसि सस्पृहं यदि चिरं चक्रायुधश्चिन्त्यताम्।
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आलापं यदि कांक्से मधुरिपोर्गाथा तदालप्यतां स्वापं वाञ्छसि चेनिनरर्गलसुखे चेतः सखे! सुप्यताम्॥ हे सखे चिच ! यदि तुझे सेवा की अभिलाषा है तो लक्ष्मीपति (विष्णु) की सेवा कर, यदि चिंतन की इच्छा है तो देर तक चक्रायुध (विष्) की चिंता कर, यदि बातचीत करने की इच्छा है तो मधु- सूदन (विष्णु) की कथा की बात कर, यदि सोना चाहता है तो प्रतिबंधरहित सुख (मोक्ष) में जाकर सो । यहाँ जिन वाक्यों में 'यदि' लगा हुआ है उन वाक्यों में श्राई हुई सेवादिक क्रियाएँ रागप्राप्त (स्वभावतः चित्त के अनुराग के विषय) हैं उनके कर्मकारक परमेश्वर और अन्य विषय दोनों प्राप्त हैं। ऐसी स्थिति में 'लोट' लकार के अर्थ (विधि अथवा आज्ञा) से रचित वाक्यार्थ की व्यर्थता होने लगती है, क्योंकि जो वस्तु अपने-आप करता ही है उसके लिए विधान अथवा आज्ञा कैसी? शरतः 'अ्रन्य विषय की सेवा न की जाय' इत्यादि रूप में 'अरन्य विषयों में उक्त क्रियाओं की कर्मकारकता की निवृत्ति' तात्पर्य-विषय (वक्ता के अरभीष्ट) के रूप में कल्पित की जाती है। अतः अर्थतः प्राप्त होने से यह परिसंख्या आर्थो और प्रश्नपूर्वक न होने से शुद्धा है। प्रश्नपूर्विका आर्थी; जैसे- किं तीर्थ ? हरिपादपद्मभजनं, किं रत्नमच्छा मतिः, किं शास्त्रं १ श्रवेन यस्य गलति द्वैतान्धकारोदयः । कि मित्रं सततोपकाररसिकं १ तत्वाबोधः सखे, कः शत्रुर्वद १ खेददानकुशलो दुर्वासनासंचयः।। हे सखे! तीर्थ क्या है ? भगवान् के चरणकमल का भजन।
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रत्ष क्या है ? स्वच्छ बुद्धि। शास्त्र क्या है? जिसके सुनने से द्वैत रूपी अंधकार का उदय निवृत्त हो जाय। निरंतर उपकार में रसिक मित्र कौन है ? तत्वज्ञान। कष्ट देने में निपुरा शत्रु कौन है ? दुर्वासनाओं का संचय। इस उदाहरण में 'भगवचरण भजनादिक ही तीर्थादिक है, अरन्य नहीं' यह अर्थ तात्पर्य का मर्यादा से प्रतीत होवा है (शब्द से नहीं), शरतः यह आर्थी परिसंख्या है और प्रश्नपूर्वक होने से प्रश्नपूर्विका। शाब्दी शुद्धा; जैसे- तीर्थ गङ्गा तदितरमपां निर्मलं संघमात्रं देवौ तस्या: प्रसवनिलयौ नाकिनोऽन्ये वराकाः। सा यत्रास्ते स हि जनपदो मृत्तिकामात्रमन्य- त्तां यो नित्यं नमति स बुधो बोधशून्यस्ततोऽन्यः।। तीर्थ गंगा है, उससे मिन्न (अन्य तीर्थ) तो केवल जल का निर्मल संघ मात्र है। देव दो ही हैं-एक गंगा के उत्पत्तिस्थान (इरि) और दूसरे निवासस्थान (हर), औ्रर बेचारे तो स्वर्ग- निवासी हैं। जनपद वही है जहाँ गंगा हैं, अन्य स्थान मृच्तिका मात्र हैं। गंगा को जो नित्य प्रणाम करता है वह ज्ञानवान् है उससे भिन्न जन अज्ञानी हैं। यहाँ मात्र (केवल) आदि पदों से अन्यत्र तीर्थत्वादि की निवृत्ति प्रतीत होती है; इसलिए शाब्दी परिसंख्या है और प्रश्नपूर्वक होने से शुद्धा है। शाब्दी प्रश्नपूर्विका; जैसे- किं मित्त्रमन्ते सुकृतं न लोका: किं ध्येयमीशस्य पदं न तोकाः ।
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किं काम्यमव्याजसुखं न भोगा: किं जल्पनीयं हरिनाम नान्यत्।। अरंत में मित्र कौन है? सुकृत, न कि लोग। (शरंत में) ध्यान किसका करना चाहिए ? ईश्वर के चरण का, न कि बाल-बचों का। चाहना किसकी करनी चाहिए ? निष्काट सुख (मोक्ष) की, न कि भोगों की। बोलना क्या चाहिए ? भगवन्नाम, और कुछ नहीं। यहाँ 'न कि लोग' इत्यादि से अन्य की निवृत्ति स्पष्ट है, अरतः शाब्दी और प्रश्नपूर्वक होने से प्रश्नपूर्विका है। यह प्राचीनों का मत है।
परिसंख्या की अलंकारता
अन्य विद्वानों का तो कहना है कि जब व्यावृत्ति (श्रन्यों से पृथक्करण) आर्थी हो तभी परिसंख्यालंकार होता है; अन्यथा तो शुद्ध परिसंख्या ही है। जैसे कि हेतु के आर्थ होने पर हेत्वलंकार होता है, श्रन्यथा केवल हेतु। अतः इसके दो ही भेद हैं। दूसरे विद्वानों का कहना है कि व्यावृत्ति के आर्थी होने पर भी अलंकारता नहीं होती, अन्यथा, 'पंच पंचनखा भक्ष्याः'समे यजेत' इन पूर्वोक्त परिसंख्या के उदाहरणों में और 'रात्सस्य' (पा० ८।२।२४) इत्यादि में भी अलंकारता होने लगेगी। कितु जहाँ पूर्वोक्त व्यावृत्ति कविप्रतिभानिमित हो वहीं परिसंख्या अलंकाररूप होती है; जैसे- "यस्मिन् शासति वसुमतीपाकशासने महानसेषु संतापः, शरधि- हृद्येषु सशल्यता, मञ्जीरेषु मौखर्यम्, भेरीषु ताडनम्, कामिनीनां कुन्तलेषु कौटिल्यम्, गतिषु मान्दम्-जिस राजा के शासन के समय 'संताप' रसोईघरों में था; 'सशल्यता' (बारा की नोकों के १८
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साथ रहना) तरकसों के हृदयों में थी, 'मुखरता' (अधिक बोलना) नूपुरों में थी, 'ताडन' (पीटना) मेरियों में था, 'कुटिलता' कामिनियों के कुंतलों में थी, और 'मंदता-' (धीमापन -- मूर्खता) गतियों में थी।" इत्यादिकों में। क्योंकि यहाँ प्रथमांत ('संताप आदि ) शब्दों का अर्थ कवि की प्रतिभा द्वारा एकत्र किया गया है, अतः उसके द्वारा वह जिस (अभाव) का प्रतियोगी है उस (संताप आरदि) की निवृत्ति बताई गई है।
सो इस प्रकार 'सेवायां यदि समिलाषमसि' इस पूर्वोंक्त उदाहरय में 'अन्य कोई सेवा के योग्य नहीं है' इस अर्थ की प्रतीति होने के कारण परिसंख्या भले ही रहे, किंतु परिसंख्यालंकार नहीं है, क्योंकि यहाँ वास्तव व्यावृत्ि होने के कारण कवि की प्रतिभा की अरपेक्षा नहीं है और 'किं तीर्थ हरिपादपद्मभजनमू०' इस उदाहरण में तो प्रश्नपूर्वक दृढारोप रूपक है, अन्यथा न विषं विषमित्याहुर्ब्रह्स्वं विषमुच्यते' यहाँ भी परिसंख्या होने लगेगी। हाँ, उक्त उदाहरया के 'कि शास्त्रं०' इस अंश में केवल परिसंख्या है; क्योंकि यहाँ आरोप्य कोई नहों है। इसी प्रकार 'तीर्थ गंगा०' इस उदाहरया में भी शुद्ध परिसंख्या ही है, क्योंकि पूर्वोंक्त हेतु के कारण (मात्र आदि पद होने से) वह तो आर्थी भी नहीं है। अतः 'महानसेषु संतापः' इत्यादिक गद्य ही परिसंख्यालंकार का उदाहरय हैं-अन्यत्र (परिसंख्या भले ही हो) अलंकारता नहीं है।
परिसंख्या समाप्त
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अर्थापत्ति अलंकार
लक्षण किसी पदार्थ से न्यायसाम्य होने पर अन्य अर्थ के आपादन को अर्थापत्ति कहते हैं। 'न्याय' शब्द का अर्थ यहाँ पर कारण है। तात्पर्य यह कि जहाँ कारणों की समानता के कारण दूसरी वस्तु अपनेआप उपस्थित हो जजाय वहाँ अर्थापच्ि होती है। भेद
अर्थापत्ति प्रथमतः चार प्रकार की होती है-प्रकृत से प्रकृत की, अप्रकृत से अप्रकृत की, प्रकृत से अप्रकृत की औरर श्रप्रकृतसे प्रकृत की। इनमें से प्रत्येक के अर्थोतर के साथ समानता, न्यूनता और अधिकता इन तीन भेदों के कारण बारह प्रकार की होती है। उक्त बारह भेद भावत्व और अभावत्व के कारण दो दो प्रकार के होते हैं; अतःइस के चौबीस भेद हो जाते हैं। उनमें से कुछ के उदाहरणा दिए जा रहे हैं। प्रकृत से अप्रकृत का आपादन समानता से; जैसे- लीलालुष्ठितशारदापुरधियामस्मादृशानां पुरो विद्यासद्यविनिर्गलत्कणमुषो वल्गन्ति चेद्वालिशाः। अद्य श्वः फणिनां शकुन्तशिशवो, दन्तावलानां शशा सिंहानां च सुखेन मूर्धनि पदं धास्यन्ति सालावृकाः॥ जिनने सरस्वती के नगर के ज्ञान को खेल ही खेल में लूट लिया है ऐसे हम लोगों के सामने यदि विद्यामंदिर से गिरते हुए कणों के
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चुराने वाले मूर्ख लोग रोब जमाते हैं तो आज या कल पत्तियों के बच्चे साँपों के, खरगोश हाथियों के और सियार सिंहों के शिर पर अनायास पैर रक्खेंगे।
यहाँ प्रकृत के द्वारा अप्रकृत का आपादन किया जा रहा है औ्रर प्रकृत अप्रकृत की समानता तथा मालारूपता है। प्रकृत से अप्रकृत का आपादन अधिकता से; जैसे-
यदि ते चरणाम्बुजं हदा वहतो मे न हतो विपद्धयः । अथ चएडकरेण मणडिते दिनमध्येऽपि जितं तमोगगैः ॥
हे भगवन् ! यदि आपके चरसकमल को हृदय में धारण करते हुए भी मेरा विपत्समूह न नष्ट हुआ तो सूर्य से मंडित दिन के बीच तमसमूह का विजय हो गया। यहाँ 'न नष्ट हुआ' इस 'विद्यमानता' रूप प्रकृत अर्थ से 'विजय हो गया', जिसका अर्थ है 'सर्वोत्कर्ष से रहना', इस आरपादन किए जा रहे अप्रकृत अर्थ की अधिकता है।
यहाँ यह शंका नहीं करनी चाहिए कि-विपत्समूह की केवल स्थिति के द्वारा तमस्समूह की केवल स्थिति का आपादन उचित है, न कि उत्कर्ष प्राप्त करना; क्योंकि ऐसा होना अनुरूप नहीं है। शंका न करने का कारण यह है कि भगवच्चरण के सन्निधान में यदि एक विप- स्समूह की स्वस्थता रह सकती है तब सूर्य के सन्निधान में अनेक तम- रसमूहों का विषय उचित ही है, इस लिए कोई दोष नहीं।
प्रकृत के अभाव से अप्रकृत के अभाव का आपादन न्यूनता से; जैसे-
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सदैव सनेहारद्रे सुरतटिनि निष्किंचनजने यदि त्वं नाधत्से सुरभिरिव वत्से मयि कृपाम्। तदा चिन्तारत्नत्रिदशपतिभूमोरुहमुखा ददीरन्नर्थिभ्यः किमिति कसाभिक्षामपि जडाः । हे सुरनदि ! यदि आप सदैव प्रेम से भींगे मुझ अकिंचन बनपर, अपने बछड़े पर गाय के समान, कृपा नहीं करती हो तो चिंतामगि, कल्पवृक्ष आदि जड पदार्थ याचकों को कराभित्षा भी क्यों देंगे। यहाँ आभाव से अभाव का आपादन है और स्नेहाद्र गंगारूप प्रकृत- पदार्थ से चिंतामगि आदि अप्रकृतों की जडता बताने के कारण न्यूनता दिखाई गई है।
उक्त उदाहरणों में आपाद्यमान अप्रकृत है। प्रकृत से प्रकृत का आपादन न्यूनता से; जैसे- मामनुरक्तां हित्वा यदि राजन्पुरुषसिंह ! यातोऽसि। मुक्त्वा वनमिदमेष्यति वनलक्मीमत्र किं चित्रम्॥ हे पुरुषसिंह राजन्, मुझ अरनुरक्त (पत्नी) को छोड़कर यदि तुम चले गए हो तो यह वन भी वनलक्ष्मी को छोड़कर चला जायगा इसमें क्या शश्चर्य है। यह राजा नल के द्वारा जंगल में छोड़ी हुई दमयंती की, ध्यान में प्राप्त नल के प्रति, उक्ति है। यहाँ आपादन किया जानेवाला वन का चृत्तांत भी समीपवर्ती होने के कारण प्रकृत ही है, अतः आपादक और आपाद्यमान दोनों ही प्रकृत हैं। नपुंसक होने के कारण पुरुषसिंह की अपेक्षा वन की न्यूनता दिखाई गई है। अतएव 'क्या आश्चर्य है' यह
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कहा गया है, जिसका अभिप्राय यह है कि-सिंह के समान पुरुष जब अपनी पत्नी को छोड़ सकते हैं तब नपुंसक छोड़ दे इसमें आश्षर्य ही क्या ? अप्रकृत से प्रकृत का आपादन न्यूनता से; जैसे- उदुम्बरफलानीव ब्रह्माएडान्यत्ति यः सदा। सर्वगर्वापहः कालस्तस्य के मशका वयम्॥ सबके अभिमान का नष्ट करने वाला जो काल उदुंबरफलों के समान ब्रह्मांडों को सदा खाता रहता है, उसके लिए इम मच्छर कौन हैं।
यहाँ अप्रकृत ब्रह्मांडभक्षण के द्वारा प्रकृत समस्त प्राणियों की अनित्यता कैमुतिक न्याय से प्रतिपादन की जा रही है।
प्रकृत से प्रकृत का और अप्रकृत से अप्रकृत का आरपादन; जैसे-
न भवानिह मे लक््यः क्षत्रवर्णविलोपिनः । के वा विटपिनो राम ! कुलाचलभिदः पवेः॥ हे राम ! इस जगत् में क्षत्रिय वर्ग के नष्ट करनेवाले मेरे तुम लक्ष्य नहीं हो-तुम्हें मैं क्या निशाना बनाऊँगा। कुल पर्वतों के तोड़ने- वाले वज्र के लिए वृक्ष क्या हैं ? यह राम के प्रति परशुराम की उक्ति है। यहाँ प्रतिवस्तूप्मा महावाक्य का अर्थ है और इस श्लोक के पूर्वाधर में इसका उपमेय वाक्यार्थ और उत्तरार्ध में उपमान वाक्यार्थ हैं। उनमें से उपमेय वाक्यार्थ की अर्थापत्ति में आपादन किया जानेवाला
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और उसका कारणभूत ये दोनों अर्थ प्रकृत हैं और उपमानवाक्यार्थ की अर्थापत्ति में दोनों अप्रकृत। इस प्रकार और उदाहरण भी सोच लेने चाहिए।
अर्थापत्ति पर विचार इस अर्थापत्ति का मीमांसकों की मानी अर्थापत्ति में समावेश नहीं है। मीमांसकों की अर्थापत्ति में आपतित अर्थ के बिना आपादक अर्थ की अनुपपचि होती है, (जैसे-पीनो देवदच्ो दिवा न भुङक्े-देवदच पुष्ट है और दिन में नहीं खाता, यह आपादक अर्थ है और रात्रि- भोजन आपतित अर्थ है यहाँ रात्रिभोजन के बिना देवदत्त की पुष्टता उपपन्न नहीं होती) किंतु यहाँ ताहश अनुपपत्ति का अभाव है। न अनुमान में ही इसका समावेश है, क्योंकि आपादक अर्थ और आपतित अर्थ की समानाधिकरणता न होने से उनके व्याप्यत्व और पक्षघर्मत्व का यहाँ कोई प्रश्न ही नहीं है और बिना इन दोनों के अनुमान होता ही नहीं। कहा जायगा कि आपकी अर्थापत्ति में भी तुल्यकारणत्व से अर्थान्तर की सिद्धि होती है, अतः जिस कारण से एक अर्थ (आरपादक) की सिद्धि हुई है उसी कारण को लिंगरूप मानकर दूसरे (आपाद्यमान) अर्थ का अनुमान कर लिया जायगा, तो यह उचित नहीं, क्योंकि यहाँ जो अर्थोतरसिद्धि है वह अनुमितिरूप नहीं है। कारण, अर्थापत्ति के ज्ञान का आकार 'यह अर्थ भी हो सकता है' यह है, और अनुमिति में 'यह अर्थ होता ही है' यह निश्चय होता है। यद्यर्थातिशयोक्ति में भी इसका अंतर्भाव नहीं होता, क्योंकि उसके दोनों भागों का विश्राम विपरीत अर्थ में ही होता है, किंतु यहाँ वैसा नहीं है, क्योंकि आपादक अर्थ सिद्ध है और आपतित
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होने वाले अर्थ की संभावना की जा रही है; अतः यथाश्रुत में ही विश्राम है। इसलिए 'जिस न्याय (कारण)' से एक अर्थ सिद्ध हुश उसी न्याय से दूसरा अर्थ भी सिद्ध हो सकता है' यही इस अर्थापत्ति का रूप है। प्राचीनों से मतभेद इस अर्थापत्ति में दूसरा (आपाद्यमान) अर्थ लोक में विद्यमान न होने पर भी कवि द्वारा यदि अपनी प्रतिभा से कल्पना करके लाया जाता है तो अलंकारता होती है। जैसे-पूर्वोक्त 'फणिनां शकुंतशि- शव :- पत्तियों के बच्चे सापों के शिर पर पैर रक्खेंगे' इत्यादि में, अ्रन्यथा तो केवल कैमुतिकन्यायता होती है। जैसे-'उदुंबरफलोनीव -गूलर के फलों के समान' इत्यादिक पूर्वोक्त उदाहरण में। हमने जो पहले ये उदाइरय दिये हैं, वे प्राचीन रीति से हैं, अतरव वहाँ इमने 'कैमुतिक' न्याय से यह शब्द लिखा है। सो इस तरह अलंकारसर्वस्वकार ने जो "कमपरमवशं न विप्र- कुर्यविभुमपि तं यदमी स्पृशन्ति भावा :- ये चित्तवृत्तियाँ जब सर्व- समर्थ (शिव जी) को भी स्पर्श करती हैं तो अन्य किस परतंत्र प्राणी को तंग नहीं कर सकती" और "अवस्थेयं स्थाणोरपि भवति सर्वामर- गुरोविधौ वक्रे मूर्त्नि स्थितवतिवयं के पुनरमी-'वक्रेविधौ"१ (वक्र- विधि अथवा विधु) जब शिर पर स्थित हो तब सब देवताओं के गुरु शिवजी की भी यह दशा होती है तो फिर ये हम कौन हैं।" इत्यादि उदाहरण दिए हैं वे अत्यंत हृदयंगम नहीं हैं।
१-यहाँ संस्कृत में 'विधौ' शब्द श्लिष्ट है; क्योंकि विधि शब्द और विधु शब्द दोनों का सप्तमी का एकवधन 'विधौ' होता है।
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और कुवलयानंदकार ने जो अर्थापत्ति का "कैमुत्येनार्थसंसिद्धिः काव्यार्थापत्तिरिष्यते-कैमुत्य न्याय से किसी वस्तु के सिद्ध करने को काव्यार्थापत्ति कहते हैं" यह लक्षण बनाया है। वह ठीक नहीं है, क्योंकि कैमुतिक न्याय न्यून अर्थ के विषय में ही हुश्रा करता है, अतः उसकी अधिकार्थवाली अर्थापत्ति में अव्यासि है। जैसे-
तवाग्रे यदि दारिद्रयं स्थित भूप ! द्विजन्मनाम्। शनैः सवितुरप्यग्रे तमः स्थास्यत्यसंशयम्॥ हे राजन्, यदि तुम्हारे सामने ब्राह्मणों की दरिद्रता रह गई तो घीरे-धीरे सूर्य के सामने तम भी रहने लगेगा, इसमें कोई संदेह नहीं। यहाँ 'धीरे-धीरे' शब्द की महिमा से राजा के आगे दारिद्रय की अपेक्षा 'सूर्य के सामने तम की स्थिति कठिनता से ही हो सकती है' यह बात, बिदित हाने पर भी, न्याय की समानता से ही आपादन की जजाती है; कैमुतिक न्याय से नहीं।
अर्थापच्ति समाप्त
१- नागेश ने लिखा है कि-'तवाये यदि०' इस उदाहरण में आगे निरूपण की जानेवाली संभावना (यह अलंकार रसगंगाधर के उपलब्ध भाग में नहीं है) अथवा यद्यर्थातिशयोक्ति अलंकार है। कहा जायगा कि यदर्थातिशयोक्ति में आपाद और आपादक की विपरीत अर्थ में विश्रांति होती है, और यहाँ तो आपादक सिद्ध है और आपाध की संभावना की जा रही है-यह भेद है तो उत्तर यह है कि-जैसे तुमने अर्थापत्ति के न्यूनता और अधिकता से भेद कल्पित किए हैं उसी
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विकल्पालंकार
लक्षय
दो विरोधियों की पाक्षिक (जब एक प्राप्त हो तब दूसरा प्राप्त न हो ऐसी) प्राप्ति को विकल्प कहते हैं। लक्षणा का विवेचन एक धर्मी में अपमे-अपने प्रापक प्रमाणों से प्राप्त, अतएव तुल्यबल, विरुद्धों की, विरोधी होने के कारण ही, एकसाथ प्राप्ति असंभव होने से अंततः पाक्िक प्राप्ति होती है। यह अलंकार समुच्चयालंकार का प्रतिपक्षी है, जैसे व्यतिरेक उपमा का प्रतिपक्षी है। और यहाँ जिनका विकल्प किया जा रहा है, उनकी सदशता अलंकारता का बीज है, क्योंकि उसे लेकर ही (विकल्प में) चमत्कार उल्लसित होता है, अन्यथा केवल विकल्प होता है, विकल्पा- लंकार नहीं। जैसे-'जीवनं मरणं वास्तु नैव धर्मत्यजाम्यहम्-बीवन
प्रकार 'यदर्थातिशयोक्ति' के भी वैसे भेद कल्पित करने में बाधा नहीं है। कहा जायगा कि तब 'कैमुत्य से अर्थसिद्धि' अर्थापत्ति को भी यधर्थातिशयोक्ति का भेद होने दीजिए। तो इसका उत्तर यह है कि प्राचीनों के अनुरोध से अर्थापत्ति को पृथक माना गया है। यदि कहा जाय कि कैमुत्यकृत चमत्कार को भी उक्कत भेद का साधक ही होने दीजिए, तो यह ठीक नहीं, क्योंकि कैमुत्यकृत चमस्कार की अलंकार- भेदकता छिपाई नहीं जा सकती। (तब तो 'अधिकता' से होने वाले भेद को यदर्थातिशयोक्ति में घुसेदना बलातू दीक्षित जी का समर्थनमात्र ही न हुआ ?) -प्नुवादक
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रहे अथवा मरण हो, मैं धर्म नहीं छोड़ता' इत्यादि में, क्यों कि यहाँ खीवन और मरणा की सदशता की प्रतीति नहीं है।
उदाहरण प्राखानर्पय सोतां वा गृधांस्तर्पय वा द्विजान्। यमं भजस्व रामं वा यथेच्छसि तथाचर।।
रावणा के प्रति यह उक्ति है-प्राणों का अपण कर अथवा सीता का, गध्रों को तृत्त कर अथवा ब्राह्मणों को, यम की सेवा कर श्रथवा राम की, जैसी इच्छा हो वैसा कर। यहाँ अर्पा, तर्पर और सेवन तीन क्रियाएँ हैं उनके कर्मरूप में मानरक्षयरूपी प्रमा से यथाक्रम प्राप्त हैं-प्राश, गध्र औ्रर यम। और इसी प्रकार जीवनरक्षणरूपी प्रमाण से कर्मरूप में प्राप्त हैं- सीता, ब्राह्मण और राम। इनका (विरुद्धता के कारण) एक साथ होना संभव नहीं है-अर्थात् प्राण का अपण करना हो तो सीता का अर्पण प्राप्त नहीं है और सीता का अर्पण करना हो तो प्राण का अरपण प्राप्त नहीं है इत्यादि, अतः एक के अनंतर ही दूसरे की प्रात्ति हो सकती है। तीनों क्रियाओं के दोनों दोनों कर्मों (प्राया सीता और गध्) का क्रियाफल (दूसरे के अधीन करना, संतुष्ट करना और सेवा करना) रूपी समान धर्मों के द्वारा सादृश्य है।
एक शंका और उसका उत्तर
कहा जायगा कि यहाँ अप, तर्प आदि धातुओं के अर्थ-फल ('दूसरे के अधीन करना' आदि) के रूप में धर्म की एकता होने के कारय जिस प्रकार कर्मों का साहश्य प्रतीत होता है उसी प्रकार 'जीवनं
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भरगां वास्तु' इत्यादिक पूर्वोक्त उदाहरण में भी 'होने' रूपी धर्म की एकता होने से उस क्रिया के कर्ता जीवन और मरणा का भी सादृश्य प्रतीत होना उचित है। तो हम कहेंगे कि उचित है, पर प्रतीत नहीं होता। आप कहेंगे-किस कारणा ? हम कहेंगे-कवि का तात्पर्य न होने से, क्योंकि यहाँ 'मरणा और जीवन समान है' यह कवि का अभि- प्रेत नहीं, किंतु जैसे 'जहर खा लीजिए और इसके घर मत खाइए' यहाँ 'धर्म के लिए मरना भी अच्छा है न कि धर्मत्याग' इस प्रकार 'निषिद्ध के विषय में द्वेष की अरधिकता' कवि को अभिप्रेत है, और 'मरया' का ग्रहय इसी के लिए होने से (सादश्य के) अधिकरण (मरण) के अविवक्षित होने के कारण सादृश्य की निष्पच्ति ही नहीं है वैसे ही यहाँ पर भी 'मरसा' अविवत्तित है, तब सादृश्य होगा किसका ? विकल्पालंकार पर विचार यह अलंकार कहीं 'लुप्त समानधम' को लेकर सादृश्य के व्यंग्य होने पर भी होता है; जैसे भगवद्गीता में-
"हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्ग जित्वा वा भोच्यसे महीम्।
भगवान् कहते हैं कि-हे अर्जुन ! या तो मरने पर स्वर्ग मिलेगा या जीतोगे तो पृथ्वी भोगोगे।"
यहाँ पृथ्वीभोग और स्वर्गप्राप्ति का 'उत्तमता' के कारण सादृश्य विवक्षित है। सो इस तरह यह विकल्प कुछ विद्वामों के मत से धातुओं के अर्थों (भोग और प्राप्ति) का है और दूसरे विद्वानों के मत से शरख्यातों (प्रत्ययों) के अर्थों (कर्ताशं अथवा कर्मों) का है। पर दोनों ही प्रकारों से यह विकल्प 'पृथ्वी और स्वर्ग' का नहीं है यह निश्चित है,
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क्योंकि जब तक पृथ्वी और स्वर्ग का कारकत्व से क्रिया के साथ अन्वय न हो तब तक विकल्प नहीं बन सकता-यह जान लेना चाहिए। अब यदि कोई कहे कि यहाँ दोनों धातुओं के अर्थों नें 'कर्तारूप' साधारणघ्म प्रत्यय के द्वारा उक्त है, अतः धर्म की लुप्ता कैसे कही जा सकती है। तो इसका उत्तर यह है कि कर्चारूप साधारणघर्म को लेकर सादृश्य सुंदररूप में सिद्ध नहीं होता; अन्यथा 'हतो वा नरकं गन्ता जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्-या तो मरने पर नरक जाओगे या जीतोगे तो पृथ्वी भोगोगे' यहाँ भी सादृश्य की प्रतीति होने लगेगी, अतः धर्म की लुप्तता ही मानना उचित है।
अलंकारसवस्व थर विचार अलंकारसर्वस्व्रकार ने जो यह लिखा है कि- "भक्तिप्रह्वविलोकनप्रणयिनी नीलोत्पलस्पर्धिनी ध्यानालम्बनतां समाधिनिरतैर्नीतेहितप्राप्तये। लावए्यस्य महानिधी रसिकतां लक्ष्मीदृशोस्तन्वती युष्माकं कुरुतां भवार्तिशमनं नेत्रे तनुर्वा हरे:॥ भगवान् के दोनों नेत्र वा तनु (शरीर) आपकी संसारबाधा का शमन करें ( 'तनु' के पक्ष में-करे) जो भक्ति नम्रों के देखने के प्रेमी हैं, ('तनु' के पक्ष में-है) जो नील कमल से स्पर्धा करने वाले हैं ('तनु' के पक्ष में-वाली है) जो हितप्राप्ति के लिए ('तनु' के पच्
१- स्मरण रहे कि 'कुरुताम्' परस्मैपद में लोट् का द्विवचन है और आत्मनेपद में लोटू का एकवचन। इसी प्रकार अन्यत्र भी वचन- भेद, लिङ्रभेद समिए।
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में-ईहित (अभीष्ट) प्राप्ति के लिए) योगियों द्वारा ध्यान का श्वलंबन बनाए गए हैं ( 'तनु' के पक्ष में-बनाई गई) जो लावराय के ('तनु' के प में-की) महानिधि हैं ('तनु' के पक्ष में-है) और जो लक्ष्मी के नेत्रों की रसिकता का विस्तार करते हैं ('तनु' के पक्ष में- करती है)। यहाँ विकल्प है और 'उत्तमता' (रूपी सादृश्य) के कारण (भवा- र्तिशमनरूपी ) तुल्य प्रमाण द्वारा ल्िष्टता है।"
यह विचारणीय है, क्योंकि संसारबाधा के शमन में तनु औरर दोनों नेत्र, इन दोनों के एक साथ कर्ता होने के विरोध का शभाव है-वे दोनों एक साथ संसारबाधा का शमन कर सकते हैं, इसमें कोई विरोध नहीं है, अतः विकल्प उठता ही नहीं, क्योंकि उनने (अलंकारसर्वस्वकार ने) ही लिखा है कि 'विरोध होने पर विकल्प होता है।' आप कहेंगे कि-शरीर में नेत्रों का भी समावेश है, अतः उनका पृथक् कथन है। वह सूचित करता है कि वक्ता को तनु औ्रर नेत्रयुगल में विरोध अभिप्रेत है, पर यह ठीक नहीं; क्योंकि वास्तव विरोध ही विकल्प का उत्थापक होता है, अतः केवल विवता के कारय माना जानेवाला विकल्प अप्रयोजक है और विकल्प की यहाँ सुंदरता भी नहीं है।
वस्तुतः तो यहाँ भी 'सकलकलं पुरमेतज्ातं सम्प्रति सुधांशुबिम्बमिव' इत्यादि के समान इलेबमूला उपमा ही अलंकार है। और 'तनुर्वा' इसका 'तनु के समान' अर्थ है। 'वा स्याद्विकल्पोपमयोः' इस कोश के अनुसार 'वा' शब्द यहाँ 'इव' के अर्थं में है। कहा जायगा कि 'लिंग और वचन का भेद' उपमा में दोष है, पर यह उचित नहीं, क्योंकि जहाँ साधारणघर्म की उपमान के साथ लगाने और उपमेय के साथ लगाने में विरूपता हो जाती है-भिन्नरूपता करनी पढ़ती है, वहीं
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लिंगवचनमेद की दोषता स्वीकार की गई है, जैसे-"हंसीव चवलश्चन्द्रः सरांसीवामलं नभः-अर्थात् हंसी के समान चंद्रमा सफेद है और सरोवरों के समान आकाश निर्मल है।" यहाँ 'इंसी घवला है चंद्र धवल है, सरोवर निर्मल हैं और आकाश निर्मल है', इस प्रकार साधारणघर्म की उपमान और उपमेय में द्विविधता से ही प्रतीति होने के कारण उपमा की सम्यक् निष्पत्ति नहीं होती (सो वह बाघा यहाँ है नहीं, क्योंकि श्लेष के द्वारा एक वचन-द्विवचन और स्त्रीलिंग-नपुंसकलिंग एकरूप कर दिए गए है।) कहा जायगा कि तब 'सरांसीव नभः-सरोवरों के समान आकाश' इत्यादिक लुप्तोपमा में वचनभेद दोष कैसे माना जाता है-वहाँ तो जब धर्म लिखा ही नहीं है तो भिन्नरूपता किसकी ? तो इसका उत्तर यह है कि वहाँ भी व्यंग्य साघारणघर्म की विरूपता से ही दोष का होना स्वीकृत है। तात्पर्य यह है कि लुत्ोपमा में भी समानध्म रहता तो है ही, पर व्यंग्य रहता है। उस धर्म को जब लगाया जायगा तब तो विरुद्धता हो ही जायगी। आरप कहेंगे कि व्यंग्य साधारणधर्म में तो वाचक शब्द का ही स्पर्श नहीं है, सो लिंग का स्पर्श तो सुतरां नहीं होता, अतः विरूपता का कोई प्रश्न ही नहीं। तो यह ठीक नहीं क्योंकि यह माना जाता है कि प्रत्येक अर्थ शब्दसहित ही प्रतीत होता है, जैसा कि कहा गया है-
"न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादते।
ऐसा कोई बोध नहीं होता जिसके साथ शब्द न लगा हो।"
अ्रथवा साधारणघमं की प्रतीति श्रतार्थापत्ति के द्वारा स्वीकार करने पर शब्द की ही कल्पना की जाती है, अर्थ का तो उसके द्वारा अभिधानमात्र होता है, अतः विरूपता है ही।
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ऐसी स्थिति में 'राजते, भासते' इत्यादि तिङन्त१ से प्रतिपाद्य साधारणधर्म में जिस प्रकार लिंग-वचन-भेद दोष नहीं होता, वही बात उक्त उदाहरय (भक्तिप्रह्व०) में भी है। इसी कारण "यस्मित्रति सरसो जनो जनपदाश्च-जहाँ का लोक अतिसरस=अत्यंत रसिक है और जनपद (प्रांत) अतिसरस=बहुत सरोवर वाले हैं" यह तुल्य- योगिता (वचनमेद होने पर भी) संगत हो जाती है, अन्यथा तुल्य- योगिता के गर्भ में उपमा रहती है, अतः उपमा के दोषयुक्त होने पर तुल्ययोगिता भी दोष युक्त होने लगेगी। एक तो यह समाधान है और दूसरा समाधान यह है कि श्लिष्टवर्णन में धर्म के लिंगवचन- भेदादि दोष हैं ही नहीं। अतः प्रतिप्रसव ( निर्दोषत्व) हो जाता है। विकल्प समास
१-स्मरया रहे कि-संस्कृत में क्रिया में लिंगेद नहीं होता।
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समुच्यालङ्कार
लक्षण पदाथा के एकसाथ अन्वय को समुच्चय कहते हैं। लक्षण का विवेचन यहाँ 'एकसाथ' का ग्रहय कम से प्राप्त होने के निवारणार्थ है। अर्यात् जहाँ पदार्थों के अन्वय में कोई समय का क्रम न हो वहाँ समु- च्चयालंकार होता है। अतः कुछ समयभेद होने पर भी समुच्चय का, भंग नहीं होता। समुच्चय के भेद समुच्चय प्रथमतः दो प्रकार का है, भिन्न धर्मियों वाला और एक धर्मी वाला। एक धर्मी वाले के भी दो भेद हैं कारणत्व वे श्रतिरिक्त संबंध से एक धर्मी में अन्वय वाला और कारणता से एक धर्मी में अन्वय वाला। इस तरह तीन प्रकार के समुच्य में पहले दो (भिन्न धर्मियों वाले और कारणतातिरिक्त संबंध से एक धर्मी वाले) भेदों में गुणों, क्रियाओं और गुशक्रियाओं का और तीसरे (कारणता से संबंध वाले) भेद में रमणीयों, अरमसीयों और रमणीयारमणीयों का समन्वय होता है।
समाधि अलंकार से भेद इस अलंकार में आगे कहे जाने वाले समाधि अलंकार की शंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि जहाँ एक कारण के द्वारा कार्य सिद्ध होते समूय अकस्मात् आपड़नेवाले दूसरे कारण द्वारा सौकर्य आदि के रूप में अतिशय का संपादन किया जाता है वह समाधि का विषय है और इस समुच्य के (तृतीय) भेद का, तो विषय वह है जहाँ एक १६
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(२६० ) कार्य के संपादन के लिए अनेक (कारण), खलिहान में कबूतरों की तरह ऊपरतले, गिरते हैं और कार्य में कोई अतिशय नहीं होता।
क्रम से उदाहरण भिन्न धर्मियों में गुणों का एक साथ अन्वय; जैसे- प्रादुर्भवति पयोदे कज्लमलिनं बभूव नभः। रक्तं च पथिकहृदयं कपोलपाली मृगीदृश: पाए्ड: ॥ बादल के प्रकट होते ही आकाश काजल सा मलिन, पथिकों का हृदय रक्त (लाल +अनुरक्त) और मृगनयनी की कपोलभिच्ति सफेद हो गई। भिन्न धर्मियों में एक साथ क्रियाओं का अन्वय; जैसे- उदितं मएडलमिन्दो रुदितं सद्यो वियोगिवर्गेण। सुदितं च सकलयुवजनचूडामणिशासनेन मदनेन ।I चंद्रमंडल का उदय हुश, तत्काल वियोगिवर्ग रो पड़ा और समस्त युवकशिरोमणियों का शासक कामदेव प्रसन्न हो गया। एक धर्मी में एकसाथ गुणों का अन्वय; जैसे- आताम्रा सिन्धुकन्याधवच रखनखोल्लासिकान्तिच्छटाभि- ज्योत्स्नाजालैजटानां त्रिपुरविजयिनो जातजाम्बूनदश्रीः। स्वाभाव्यादच्छमुक्ताफलरचितलसद्गुच्छसच्छायकाया पायादायासजालादमरसरिदघव्रातजातश्रमान्नः ॥ भगवान् विष्णु के चररनखों की उल्लासयुक्त कांतिच्छटाओं से रक्त वर्षा, शिव जी की जटाओं के कांति-समूह से सुवर्ग की शोभा से युक्त
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और स्वभावतः स्वच्छ मोतियों से बनाए गुच्छों के समप्रभ शरीर वाली गंगा, पाप समूह से थके हुए हमलोगों की, कष्ट समूह से, रक्षा करे। यहाँ यद्यपि इरिचरण के नखों से संसर्ग के समय हरजटा से संसर्ग नहीं है, इसलिए रक्तवर्ग और पीतवर्स का एकसाथ होना संभव नहीं है, तथापि साहजिक श्वेतता के साथ उनमें से प्रत्येक का एक साथ रहना संभव है ही, इसलिए कोई दोष नहीं। एक धर्मी में क्रियाओं का एक साथ अन्वय; जैसे- देव ! त्वां परितः स्तुवन्तु कवयो लोभेन कि तावता स्तव्यस्त्वं भवितासि यस्य तरुणश्रापप्रतापोडधुना। क्रोडान्त: कुरुतेतरां वसुमतीमाशाः समालिङ्गति द्यां चुम्बत्यमरावतीं च सहसा गच्छत्यगम्यामपि। हे देव ! कवि लोग ! लोम के कारण चारों ओर से आपकी स्तुति करें, पर इतने मात्र से क्या आरप स्तुतियोग्य हो जाओ्रगे! जिनके धनुष का तरुणाप्रताप वसुमती (पृथ्वी ) को अपने क्रोड (भुजाओं के बीच) में भरता है, दिशाओं का आरलिंगन करता है, चौः का चुम्बन करता है (आरकाश का स्वर्श करता है) और अरगम्या (गमन के अयोग्य+प्राप्ति के अयोग्य) शमरावती (इंद्रपुरी) (से) में सहसा गमन करता है। (ऐसे स्रीसंगी के स्वामी आ्रप स्तुतियोग्य कैसे हो सकते हैं) भिन्न धर्मियों में कारणता संबंध सेरमणीयों का अन्वय; जैसे- समुत्पत्तिः पद्मारमणपदपद्मामलनखा- न्निवास: कन्दपप्रतिभटजटाजूटभवने। अथायं व्यासङ्गः पतितजननिस्तारणविधे- न कस्मादुत्कर्षस्तव जननि जागर्ति जगतः ।
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( RER )
गंगाजी की स्तुति है-हे जननि ! लक्ष्मीरमण भगवान् विष्णु के चरसकमल के निर्मल नख से आपकी उत्पत्ति है, कामदेव के शत्रु शिवजी के बटाजूटरूपी भवन में आपका निवास है और पतितजनों के निस्तार की विधि में यह आपकी लगन है; फिर आपका (सब) जगत् से उत्कर्ष क्यों न जागरित रहे ? यहाँ तीनों में से एक के द्वारा भी उत्कर्ष की उत्पच्ति संभव है, तथापि तीनों कारण उत्कर्षोत्पत्ति के लिए मानो स्पर्धा से गिर रहे हैं, श्रतः रमणीय हैं। भिन्न धर्मियों में कारणरूप से अरमणीयों का अन्वय; जैसे- पाटीरद्रुसुजङ्गपुङ्गवमुखोद्दूता वपुस्तापिनो वाता वान्ति दहन्ति लोचनममी ताम्रा रसालदुमाः। श्रोत्रे हन्त किरन्ति कूजितमिमे हालाहलं कोकिला बाला बालमृणालकोमलतनुः प्राणान्कथं रक्षतु॥ चंदनवृक्षों के सर्पराजों के मुख से उत्पन्न, शरीर को संतप्त करने वाले, वायु चल रहे हैं, ये (पल्लवों से) ताम्रवर्ण आम्र के वृक्ष नेत्रों को जला रहे हैं और हाय ! ये कोकिलाएँ कूजितरूपी हालाइल (विष) कानों में डाल रही हैं, ऐसे समय, बालमृणालसदश कोमल शरीर वाली बाला कैसे प्राणों की रक्षा करे! यहाँ भी जीवननाश के लिए गिर रहे तीनों अरमणीय हैं। भिन्न धर्मियों में कारणरूपसे रमणीयारमणीयों का अन्वय; जैसे जीवितं मृत्युनालीढं संपद: श्वासविभ्रमाः । रामा: वणप्रभारामाः शल्यान्येतानि देहिनाम्॥
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जीवन मृत्यु से ग्रस्त है, संपच्तियाँ श्वास का विलास (क्षणिक) हैं और सुंदरियॉ बिजली के समान सुंदर (त्सिक सौंदर्य वाली) हैं, ये देहधारियों के लिए शल्य (भाले की नोकें) हैं। यहाँ जीबन आदिक स्वभाव से रमसीय हैं इसलिए हटाए नहीं जा सकते और विशेषणों (मृत्यु से ग्रस्तत्व आदि) के प्रभाव से अरमणीय होने के कारण दुःखजनक हैं, अतएब शल्यतुल्य हैं। यहाँ रमणीयारमणीय शब्द में कर्मधारय समास माना जाता है, द्वन्द्व नहीं-अर्थात् 'रमगीयारमणीय' का अर्थ रमणीय होते हुए अरमगीय है, रमशीय और अरमीय नहीं। अन्यथा सहचरभिन्नत्व दोष हो जायगा। इसी तरह अरमणीयरमणीयों (अरमणीय होते हुए भी रम- गीयों) का एक कार्य उत्पन्न करने के लिए आ गिरने पर समुच्चय हो सकता है; जैसे- शरीरं ज्ञानजननं रोगो विष्ुस्मृतिप्रदः । विपद्वैराग्यजननी त्रयं सुखकरं सताम्।। शरीर ज्ञान का उत्पादक है, रोग विष्णु की स्मृति देनेवाला है और विपत्ति वैराग्य की जननी है; तीनों सत्पुरुषों के सुखदायी हैं। शरीरादिक स्वभावतः शरमणीय है तथापि विशेषणों के प्रभाव से रभणीय हो गये हैं। भेदों पर विचार कहा था सकता है कि (केवल) रमणीयों के समुच्चय में और (केवल) अरमशीयों के समुच्चय में समालंकार से और रमखीया- रमणीयों के समुच्चय में विषमालंकार से संकीर्स होने के कारण ये समुचय के भेद उचित नहीं है; क्योंकि संकर होना किसी भेद का
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प्रयोजक नहीं है, अ्न्यथा सभी अलंकारों के अनंत भेद हो जायँगे। इसका उत्तर यह है कि पूर्वोक्त 'समुत्पत्तिः पद्मारमण०' और 'पाटीरद्ु भुजंग०' इन उदाहरणों में समालंकार विवच्षित नहीं है-कवि का वहाँ यह अभिप्राय नहीं है कि 'हरिचरण के नख से उत्पच्ि, हर के नटा- जूट में निवास और पतितों के निस्तारण का व्यासंग, इनका परस्पर योग योग्य है', किंतु कवि का अभिनाय यह है कि 'भगवती भागीरथी के उत्कर्ष को उत्पन्न करने के लिए तीनों जागरूक हैं' और (इसी प्रकार दूसरे पद्य में) न यही कवि को अभिप्रेत है कि 'मलयपवन, आम्रवृक्ष और कोकिलकूजितों का योग योग्य है' किंतु 'तीनों बाला के प्राशनाश के लिए बद्धपरिकर हैं' यह अभिप्रेत है, अतएव 'हंत' इस शब्द से उक्त खेद उपपन्न होता है। यदि समालंकार कवि को श्रभि- प्रेत होता तो तीनों का योग योग्य होने के कारण खेद अनुपपन्न होता। अब यदि कहा जाय कि 'तीनों मारकों का योग बाला के लिए अननुरूप है' इस रूप में विषमालंकार के अभिप्राय से खेद की उपप्ति हो सकती है, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि ऐसा मानने पर भी 'तीनों के योग वाले श्रंश' में समालंकार की तो (पूर्वोक्तरीत्या) अत्यंत अरप्रतीति है और विषमालंकार (जो बताया जा रहा है उस) की 'बाला' रूपी (तीनों से) बाह्य अंश (अर्थात् जिनका समुचय है उनसे भिन्न) को लेकर स्थिति बनती है, अतः समुच्चय असंकी ही रहा।
इसी प्रकार 'जीवितं मृत्युनालीढम्' इत्यादि उदाहरणों में भी 'जीवन आदि रमणीयों का मृत्यु से आलीढ होना आदि अनुचित है' वही कवि का विवच्ित है। रमगीय वस्तुओं की अचिरस्थायिता स्वभाव- सिद्ध है और वह कवि के अभिलषित के अनुरूप न होने के कारण शल्यता की प्रयोजक है, अतः तृतीय भेद की भी विषम से संकीर्ण होने
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के कारण अन्यथासिद्धि नहीं है-अर्थात् वह भेद भी संकीगाता से नहीं बना है, किंतु शुद्ध समुच्चय का है।
इससे बो रत्नाकर ने यह लिखा है कि- "सद्योगासद्योगसद्सद्योगैर्नसमुच्चयः प्रभेद्वान्। समविषम संकरेणैवान्यथासिद्धे :- अर्थात् समुच्चय रमणीयों के योग, श्रर. मणीयों के योग, रमणीयारमणीयों के योग इन भेदों से युक्त नहीं है, क्योंकि समालंकार और विषमालंकार के संकर से ही ये मेद अन्यथा- सिद्ध हैं।" यह परास्त हो जाता है (क्योंकि पूर्वोक्तरीत्या समुच्चयां शमें 'सम' और 'विषम' अलंकारों का प्रवेश ही नहीं है)।
समुच्चय समाप्
समाधि अलंकार
लक्षण
किसी एक कारण से उत्पन्न होंनेवाले कार्य में अन्य कारण के आकस्मिक आ जाने से उत्पन्न सौकर्य को समाधि कहते हैं।
लक्षण का विवेचन वह सौकर्य कहीं कार्य की अनायास सिद्धि के द्वारा होता है और कहीं सांगसिद्धि के द्वारा। समुच्य से समाधि का भेद तो पहले (समु- चचयालंकार में) बताया ही जा चुका है।
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उदाहरण आयातैव निशा मनो मृगद्दशामुन्निद्रमातन्वती मानो मे कथमेष संप्रति निरातङ्कं हृदि स्थास्यति। ऊहापोहमिमं सरोजनयना यावद्विधचेतरां तावत्कामनृपातपत्रसुषमं बिम्बं बभासे विधोः ॥। ज्योंही कमलनयनी यह ऊहापोह कर रही थी कि मृगनयनियों के मन को नागरित करती हुई रात्रि आ ही गयी, अब यह मान निःशंक- तया मेरे हृदय में कैसे रहेगा, त्योंही राखा कामदेव के छत्र की शोभा के समान शोभा वाला चंद्र बिंब चमक उठा। यहाँ मान का विनाश रात्रि के समीप आने से सिद्ध हो रहा था कि चंद्रोदय के कारण उसकी अनायास सिद्धि हो गई। अ्रथवा जैसे- स्मरदीपदीप्षद्ष्टे्घनान्धकारेऽपि पतिगृहं यान्त्याः। झटिति प्रादुरभूवन्सख्यादिव चश्चलाः परितः ॥ कामदेवरूपी दीपक से जिसकी दृष्टि प्रदीप्त हो रही थी ऐसी श्रभि- सारिका घने अंधकार में भी पति के घर जा रही थी, कि मानो मित्रता के कारण, बिजलियाँ तत्काल चारों ओर प्रकट हो गई। यहाँ निर्विध्न पतिगृह पहुँचने में आकस्मिक अन्य कारण उपस्थित होने से (मित्रतारूनी) हेतु की उत्प्रेक्षा की गई है, अतः यह उदा- हरया उत्प्रेक्षा से संकीरण है और पूर्व उदाहरय शुद्ध। नवप्रसंगं दयितस्य लोभादङ्गीकरोति स्म यदा नताङ्गी। श्लथं तदालिङ्गनमप्यकस्मादूनो निनादैर्धनतां निनाय॥
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नतांगी ने प्रिय के नवीन संगम को लोभ के कारण ज्यों ही स्वीकार किया, त्यों ही उस शिथिल आलिंगन को बादल ने शकस्मात् गर्जनों द्वारा दृढ बना दिया। यहाँ बादल के गजनों से आलिंगन की 'सांगता' की सिद्धि है और पहले दोनों पद्यों में 'अनायासकार्यसिद्धि' है। प्रत्युदाहरण कथय कथमिवाशा जायतां जीविते मे मलयभुजगवान्ता वान्ति वाताः कृतान्ताः। अयमपि बत गुञ्जत्यालि माकन्दमौलौ मनसिजमहिमानं मन्यमानो मिलिन्द:।। हे सखि! कहो मेरे जीवन की आशा कैसे हो सकती है? जब कि मलयाचल के स्पों द्वारा उगले हुए (जहरीले) वायु चल रहे हैं और कामदेव की महिमा को मानने वाला यह भ्रमर भी शम की मंजरी पर बैठ कर गूँज रहा है। यहाँ जीवननाश के प्रति 'वायु चलने' और 'मौंरे के गूँजने' दोनों के ऊगरतले पढनेवाले हेतु होने के कारण एक के आफस्मिक न होने से प्रस्तुत अलंकार का विषय नहीं है, किंतु (वायु और भ्रमर) कर्तृरूप भिन्न धर्मो वाली 'चलने' और 'गूँजने' रूप क्रियाओं के समुच्य से संकीर्णा, जावननाशरूपी एककार्यरूप एक धर्मी वाली (जीवननाश की) कारभूत उन्हीं ('चलने' और 'गूँजने') क्रियाओं का समुचय है।
समाधि समाप्त
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प्रत्यनीक अलंकार
लक्षय
कहते हैं। प्रतिपक्ष से संबंध रखनेवाले के तिरस्कार को प्रत्यनीक
लक्षण का विवेचन व्यूहरचनाकार सैन्य को अनीक कहते हैं और अनीक के सदश को 'प्रत्यनीक' कहते हैं। 'प्रत्यनीकम्' पद में श्रव्ययीभाव समास है, अरव्ययीभाव समास 'श्रव्ययं विभक्ति०' (२१६) इस पाशिनि सूत्र से होता है। इस सूत्र में जो 'यथा' शब्द आया है उसके चार अर्थों में से एक अर्थ सादृश्य भी है, उसी से 'सादृश्यार्थ में शव्ययीभाव' सिद्ध होने पर भी उक्त सूत्र में सादृश्य के पुनर्ग्रहण से वैयाकरणों ने यह तात्पर्य निकाला है कि गौण सादृश्य (सादृश्यवान्) में भी अ्रव्ययी- भाव समास होता है, अतः यहॉ प्रत्यनीक शब्द का अर्थ अनीक का सादृश्य न होकर 'अनीक का सदश' (सादृश्यवान्) है। लोक में देखा जाता है कि प्रतिपक्ष के तिरस्कार के लिए अनीक (सेना) का प्रयोग किया जाता है, परंतु प्रतिपक्ष का तिरस्कार करने की शक्ति न होने पर किसी उससे संबंध रखनेवाले का तिरस्कार किया जाता है, इस तिरस्कार का भी सेना की तरह प्रयोग किया जाता है, अतः ऐसे तिरस्कार को प्रत्यनीक कहते हैं। ऐसे तिरस्कार में प्रतिपत्त की बलवच्ता और अपनी दुर्बलता ध्वनित होती है। प्रतिपक्षी के संबंधी उपजीव्य, उपजीवक, मित्र इत्यादि के भेद से अनेक प्रकार के हैं। उदाहरण रे रे मनो मम मनोभवशासनस्य पादाम्वुजद्वयमनारतमानमन्तम्।
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किं मां निपातयसि संसृतिगर्तमध्ये नैतावता तव गमिष्यति पुत्रशोक: ।। अरे! मेरे मन ! तू मनोभव (तेरे पुत्र) के दंडदाता शिवजी के दोनों चरसकमलों को निरन्तर नमन करने वाले भुझे संसाररूपी गडढे में क्यों गिरा रहा है? इतने से तेरा पुत्रशोक मिटेगा नहीं। अ्रथवा; जैसे- जितमौक्तिकसंपदां रदानां सहवासेन परां मुदं ददानाम्। विरसादधरोकरोति नासामधुना साहसशालि मौक्तिकं ते।।
मोतियों की संपत्ति को जीतनेवाले दाँतों के सहवास से (उनके साथ रहने के कारण) परम आनंद देनेवाली नासिका को विरसता (बैर) के कारण तेरा साइसी मोती इस समय नीचा दिखा रहा है। प्रथम उदाहरण में उपनीव्य (आरश्रय देनेवाले) प्रतिपत्ती (शिवजी) के संबंधी का तिरस्कार है, तथा बैर आर्थ है (क्योंकि परंपरया-अनुसंधान द्वारा-ज्ञात होता है) और इस उदाहरण में प्रतिपक्षी के संबंधी उपजीवक (आश्रय लेनेवाले) का तिरस्कार है तथा 'विशसता के कारण' इस शब्द से उक्त होने के कारण शाब्द हैं। इस तरह अन्य उदाहरया भी सोच लेने चाहिए। प्रत्यनीक पर विचार यह अलंकार हेतूतप्रेक्षा से ही गतार्थ है, अतः मिन्न अलंकार होने के योग्य नहीं। उक्त उदाहरणों में से द्वितीय उदाहरण में 'विरसात्' यह हेतु का अंश शाब्द है, केवल उत्प्रेक्षा का अंश आर्थ है, और प्रथम उदाहरण में तो दोनों आर्थ हैं। 'पुत्रमारक का सेवक होने"
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रूपी कारण से वैर की, और मन के 'अपने को गड्ढे में गिराने रूपी कार्य' से उस वैर के हेतु होने की स्पष्ट ही प्रतीति है। कहा जायगा कि इस अलंकार में हेतुत्व का निश्चय रहता है औरर हेतूत्प्रेक्षा में तो हेतुत्व्र की संभावना रहती है-यह दोनों में भेद है। तो यह उचित नहीं, क्योंकि ऐसी स्थिति में गम्यहेतू त्प्रेक्षा उत्प्रेक्षा ही नहीं रहेगी, क्योंकि वहाँ संभावना के वाचक इवादि का अभाव रहता है, अतः वहाँ भी हेतुत्व की निश्चीयमानता कही जा सकती है।
"यस्य किचिदपकर्तु मक्षमः कायनिग्रहगृहीतविग्रहः। कान्तवक्त्रसदृशाकृतिं कृती राहुरिन्दुमधुनापि बाधते।।
शारीरिक दंड के कारण विरोध स्वीकृत करके भी उनका (विष्णु का) कुछ भी अपकार करने में असमर्थ, कुशल राहु आज भी उनके सुंदर मुख के समान आकृति वाले चंद्रमा को बाघित करता है।" इस अलंकारस्वस्व द्वारा उदाहत प्राचीन पद्य में भी 'मानो भगवान् के वैरानुबंध से भगवान् के मुख के समान चंद्रमा को राहु बाधा पहुँचाता है' इस प्रतीति के कारण गम्योत्प्रेक्षा ही है। औरर "मम रूपकीर्तिमहरद्द्रुवि यस्तदनुप्रविष्ट्हृद्येयमिति। त्वयि मत्सरादिव निरस्तदय: सुतरां निोति खलु तां मदन:॥ जिसने पृथ्वी पर मेरी रूनकीर्ति का अपहरणा किया वही इसके हृदय में प्रविष्ट है। मानो तुम्हारे साथ इस मत्सर ('दूसरे का भलान हो' इस द्वेष) के कारण, निर्दय कामदेव उसको अत्यंत चीय कर रहा है।" इस कुवलयानंदकार के उदाहत पद्य में तो हेत्वंश और उत्प्रेवांश
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दोनों ही शाब्द हैं, फिर भी आयुष्मान् ने इसे इस (प्रत्यनीक) अलंकार का उदाहरण कैसे बना दिया यह विदित नहीं होता। कहा जायगा कि 'प्रतिपक्षी की बलवता और अपनी दुर्बलता' की प्रतीति के कारण अन्य हेतूत्प्रेक्षाओरं से इसमें विलक्षयता है (अरतः यह पृथक अलंकार होना चाहिए) परंतु इतने मात्र से यह हेतू त्प्रेक्षा से बाहर नहीं जा सकता, क्योंकि बिना हेतूत्प्रेक्षा के यह अलंकार रहता ही नहीं। हाँ, उसका अवांतरभेद हो सकता है; (और अवांतर भेद पृथक होता नहीं) क्योंकि पृथ्वी के अवांतर भेद घट से पट विलक्षण है, इस कारण वह पृथ्वी से बाहर नहीं हो जाता। यह भी कहा जाता है।
प्रत्यनीक समाप्त
प्रतीप अलंकार
लक्षण
प्रतीप पाँच प्रकार का है- (१) प्रसिद्ध उपमा की विपरीतता से वर्णान की जाने वाली उपमा प्रथम प्रतीप है। उपमा से विपरीतता का अर्थ है-प्रसिद्ध उपमान में उपमेय की और प्रसिद्ध उपमेय में उपमान की कल्पना, अन्य किसी प्रकार से नहीं। (२) किसी गुए के कारण उपमान की अद्वितीयता के उत्कर्ष
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( ३०२ ) को मिटाने के लिए किसी दूसरे के प्रदर्शन द्वारा उठाया जाने- वाला सादश्य। (३) इसी तरह किसी गुण के कारण उपमेय की अद्वितीयता के उत्कर्ष को मिटाने के लिए किसी दूसरे के प्रदर्शन द्वारा उठाया जाने वाला सादृश्य। (४) उपमान का कैमर्थ्य ( 'वह क्यों है' यह कहना)। और 1 (५) सादृश्य का विघटन। लक्षणा का विवेचन
इनमें से पहले भेद में प्रसिद्ध सादृश्य में जो उपमेय था उसी के उपमान हो जाने से 'आधिक्य की प्रतीति' और जो उपमान था उसी के उपमेय हो जाने से 'न्यूनता की प्रतीति' फल है। उपमालंकार से सादृश्य में कोई विशेषता न होने पर भी इस अलंकार की विलचणता का यही बीज है। व्यतिरेक से इसका यह भेद है कि उसमें सादृश्य का निषेध किया जाता है-और इसमें सादृश्य की स्थापना ।
कहा जायगा कि साहश्य उपमान और उपमेय में साधारणरूप से रहता है-जैसा वह उपमान में रहता है वैसा ही उपमेय में रहता है, फिर यहाँ एक की अधिकता और दूसरे की न्यूनता की प्रतीति किस काशय होती है ? तो सुनिए, उपमान में साधारयधर्म (कांति आदि) के संबंध का अनुवाद रहता है-अर्थात् पहले से विद्यमान को पुनः कह दिया जाता है, और उपमेय में विधान-यह तो निर्विवाद है, और विधान होता है साध्यत्व के कारणा तथा अनुवाद होता है सिद्धत्व के कारय। सो यहाँ (प्रसिद्ध) उपमान में साधारणघर्म की साध्यता उसकी न्यूनता का और (प्रसिद्ध) उपमेय में 'साधारणधर्म की सिद्धता उसकीआ धिकता का कारण बन जाती है। लोक में भी यह स्पष्ट ही देख
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जाता है कि जिस विद्वान् की विद्या निश्चित है उसकी जैसी पूषा की जाती है उस तरह उस विद्वान् की नहीं जिसकी विद्या अनिश्चित है। श्रप कहेंगे कि तब तो यह बड़ा दोष हुआ कि सिद्ध को साध्य बना दिया गया और साध्य को सिद्ध; तो यह कोई बात नहीं; क्योंकि साध्यत्व और सिद्धत्व वक्ता की विवक्षा के शधीन हैं-जिसको चाहे सिद्ध कहे और जिसको चाहे साध्य कहे, अतः कोई दोष नहीं। प्रतीप के दूसरे और तीसरे भेदों का फल तो 'अद्वितीयता के उत्कर्ष का परिहार' स्पष्ट ही है। चौथे भेद का फल है-'जिसका निषेध किया जा रहा है उस (अर्थात् उपमान) में रहने वाले सब गुणों से युक्तता का बोध'। पाँचवें का फल 'प्रथम (प्रतीप)' के समान है-अर्थात् 'उपमान की न्यूनता और उपमेय की अरधिकता की प्रतीति'। प्रथम प्रतीप का उदाहरण; जैसे- किं जल्पसि सुग्धतया हन्त ममाङ्गं सुवर्णावर्णामिति। तद्यदि पतति हुताशे तदाः हताशे तवाङ्गचण स्यात्। सखी या नायक नायिका से कहता है-भोलेपन से क्या कह रही हो कि शह ! मेरा अंग सुवर् वर्गा है, हे निराशे, यदि वह अभि में गिरे तो तुम्हारे अग के वर्णवाला हो सकता है। यहाँ पूर्वार्ध की उपमा से प्रतीत होनेवाले 'सुवर्श के आधिक्य' का तिरस्कार करके, द्वितीयार्व में 'प्रतीप', बाला के शंग के वर्ष की अरधिकता को बताता है। विशेषता यह है कि अग्नि में गिरे बिना 'प्रतीप' भी दुर्लभ है, मुग्घत्व और हताशत्व के द्वारा यह प्रतीत होता है कि 'सुवर्स को तुम्हारा सादृश्य सपने में भी संभव नहीं है'।
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द्वितीय प्रतीप का उदाहरण; जैसे- माहात्म्यस्य परोऽवधिर्निजगृहं गम्भीरतायाः पिता रत्नानामहमेक एव भुवने को वापरो मादशः । इत्येवं परिचिन्त्य मा स्म सहसा गर्वान्धकारं गमो दुग्धाब्घे ! भवता समो विजयते दिल्वीधरावल्लभः। हे क्षीरसमुद्र! मैं अकेला ही माहात्म्य की पराकाष्ठा हूँ, गंभीरता का निजभवन हूँ और रत्नों का पिता हूँ, संसार में मुझसा दूसरा कौन है ? इस प्रकार सोचकर सहसा गर्वाघकार में मत डूब। तेरे समान दिल्लीश्वर का विजय हो रहा है-वे आज भी तेरी छाती पर बैठे हैं। तृतीय प्रतीप का उदाहरण; जैसे- निभाल्य भूयो निजगौरिमाणं मा नाम मानं हृदये विधासीः। गृहे गृहे पश्य तवाङ्गवर्णा सुग्धे सुवर्शावलयो लुठन्ति।। हे मुग्धे ! बार बार अपने गोरेपन को देख कर हृदय में मान मत करो, देखो तुम्हारे शंग के से रंग वाले सुवर्श की पंक्तियाँ घर घर में लोट रही हैं।
चतुर्थ प्रतीप का उदाहरण तो 'शरभूदप्रत्यूहः०' इत्यादि श्रक्षेप के प्रकरण में ही कहा जा चुका है।
पञ्चम प्रतीप का उदाहरण; जैसे- करिकुम्भतुलामुरोजयोः क्रियमाणां कविभिविशृङ्खलैः। कथमालि!शृणोषि सादरं विपरीतार्थविदो हि योषितः ।। हे सखि ! उच्छु खल कवियों द्वारा की जाने वाली स्तनों की करि-
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कुंभ के साथ तुलना को आदर सहित कैसे सुन लेती हो ? प्रतीत होता कि स्त्रियाँ उलटा ही अर्थ समझती हैं। यहाँ 'कैसे सुन लेती हो' इसके द्वारा 'तुलना संभव नहीं है' यह अ्रभिव्यक्त होता है। अर्थोतरन्यास भी इसी अर्थ की पुष्टि करता है- अर्थात् तुलना को भी तुम अतुलना समझती हो। सो इस तरह प्राचीनों के अनुरोध से पाँच प्रकार के प्रतीप का. निरूपण किया गया है।
प्रतीप पर विचार
वस्तुतः तो पहले तीनों भेद उपमा के ही अंतर्गत हैं, चौथा कुछ लोगों के मत में आक्षेप है और पाँचवाँ अनुक्तवैधर्म्य व्यतिरेक में अंतर्भूत हो नाता है। देखिए-'सिद्ध होने वाले सादृश्य' का अ्थवा 'सुंदर साहृश्य' का नाम उपमा है। अब सोचिए कि 'मुख के समान कमल' इत्यादि प्रतीप के प्रथम उदाहरण में सादृश्य की असिद्धि अथवा असुंदरता नहीं है, जिससे वह उपमा से बाहर हो जाय, क्योंकि एक प्रकार की सुंदरता तो तुमने भी स्वीकार की है और किसी भी प्रकार की सुंदरता रहने पर सामान्य सुंदरता का निवारण नहीं हो सकता-अर्थात् असुंदर नहीं कहा जा सकता, और यह कोई राजाज्ञा तो है नहीं कि जिस सादृश्य में प्रसिद्ध कमल आदि उपमान हो वही उपमा है। कहा जायगा कि 'प्रतीप' शब्द 'उपमाविरुद्ध' का वाचक है (न कि उपमा का), अरतः उसके प्रभाव से ही प्रतोप के विरुद्ध सादृश्य को उपमा कहा जाय। पर यह उचित नहीं, क्योंकि उपमा- सामान्य (यावन्मात्र उपमाओं) के विरुद्ध होने पर ही प्रतीप कहा जाय ऐसा नहीं है। किंतु उपमाविशेष (किसी उपमा) के विरुद्ध का वाचक होने से भी प्रतीप शब्द उपपन्न हो सकता है। सो इस तरह २०
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प्रथम प्रतीप प्रसिद्ध उपमा के समान उपमा का विशेष-अर्थात् एक प्रकार की उपमा ही है। इसी कारण प्रतीप के दूसरे और तीसरे भेद भी विशेष प्रकार की उपमाएँ हैं। कहा जायगा कि उनमें से दूसरे में उपमान का तिरस्कार और तीसरे में उपमेय का तिरस्कार है, अतः वे उपमाविशेष कैसे हुए ? तो इसका उत्तर यह है कि तिरस्कार किसी दूसरी उपमा से विलक्षणाता का प्रयोजक हो सकता है सामान्य उपमा ( यावन्मात्र उपमाओं) से विलक्षणता का प्रयोजक नहीं, क्योंकि उसकी प्रतीति उपमा से अनुस्यूत होकर ही होती है। अंगूर मधुरता की अरधिकता के कारण अन्य पार्थिव वस्तुओं से विलक्षण होता है, इस कारण वह अपार्थिव नहीं हो जाता। दूसरी बात यह है कि यदि उपमान और उपमेय के तिरस्कार को भिन्न अलंकारता का प्रयोजक माना जाय तो उनका पुरस्कार भी भिन्न अलंकारता का प्रयोजक हो सकता है; जैसे-
एको विश्वसतां हराम्यपघृणः प्राणनहं प्राणिना- मित्येवं परिचिन्त्य मा स्म मनसि ब्याधानुतापं कृथाः। भूपानां भवनेषु किं न विमलक्षेत्रेषु गूढाशयाः साधूनामरयो वसन्ति कति न त्वत्तुल्यकक्षाः खलाः ॥ हे व्याध! मैं अ्रक्रेला निर्दयी विश्वास करनेवाले प्राशियों के प्राणों का हरणा करता हूँ' इस तरह सोचकर मन में पश्चाच्ाप मत कर, राजाओं के भवनों में और निर्मल क्षेत्रों में-अर्थात् तीर्थादिकों में-अपने मन का भेद छिपानेवाले सतपुरुषों के शत्रु तुम्हारे ही सम- कक्ष कितने दुष्ट नहीं रहते ? यहाँ सादृश्य के प्रदर्शन का फल उपमान का तिरस्कार नहीं है, क्योंकि कवि उसे गर्वित नहीं कहना चाहता, किंतु उसके पश्चात्ताप का
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नाश ही सादृश्य का फल है, सो इस तरह फल की विलक्षणता मात्र से भिन्नालंकारता कहनेवाले आपको उक्त उदाहरण में भी मिन्ना- लंकारता अथवा प्रतीप का छठा भेद स्व्रीकार करना पड़ेगा। तीसरे, तुमने जो प्रतीप के भेद लिखे हैं वे भी परस्पर विलक्षयता के कारण पृथक पृथक अलंकार ही होंगे; प्रतीप के भेद नहीं, क्योंकि प्रतीप का कोई ऐसा सामान्य लक्षण' नहीं है जो सब भेदों में साधा- रख हो। और 'उनमें से कोई एक' यह लक्षण बनाना तो हजारों दूषणों से ग्रस्त है, अतः लक्षण ही नहीं है, यह बार बार कहा जा चुका है। रहा उपमा का लक्षण, सो तो (प्रतीप के) सब भेदों में साधारण है ही।
चौथा प्रभेद जिनके मत में आक्षेप नहीं है उनके मत में प्रतीपा- लंकार हो सकता है। पंचम भेद का गति तो कही ही जा चुकी है- अर्थात् वह पहले भेद के समान है, अतः उपमा के ही अंतर्गत है।
प्रतीप समाप्
१-नागेश कहते हैं-'कोई सामान्य लक्षण नहीं है' यह कहना विचारणीय है; क्योंकि 'जिसका तिरस्कार फल है ऐसी उपमान के अप- कर्षं के बोध के अनुकूल चेष्टा' यह प्रतीप का सामान्य लक्षणा हो सकता है। यह दूसरी बात है कि वह चेष्टा वाच्य हो अथवा व्यंग्य।
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प्रौढोक्ति अलंकार
लक्षण
किसी पदार्थ में किसी धर्म के कारणा, अतिशय के प्रतिपादन की इच्छा से, जिसमें वह धर्म प्रसिद्ध है उसके साथ, इस पदार्थ के संसर्ग का उद्धावन (उत्पन्न करना) प्रौढोकि है। यह संसगं सच्चा, झूठा, साक्षात् या परंपरा से कैसा भी हो सकता है।
उदाहरण
वल्मीकोदरसंभूतकपिकच्छूसहोदरा:। हा पीडयित्वा निध्नन्ति सज्जनान्दुष्टदृष्टयः॥ हाय! वाल्मीक के गर्भ से उत्पन्न कपिकच्छू' (कोंछ- (केवाँच)-स्पशमात्र से भयंकर खुजली पैदा करने वाला पौधा) के सगे भाई दुष्ट दृष्टि वाले लोग सजनों को दुःख देकर मारते हैं।
यहाँ 'कपिकच्छू का सगा भाई' होन से 'मारकता' नहीं प्राप्त होती, किंतु केवल पीड़ाजनकता प्राप्त होती है, परंतु कवि 'दुख देकर मारने' के रूप में अतिशय बताना चाहता है, अतः कपिकच्छू का विशेषण 'वल्मीक (जिसमें साँप रहते हैं) के अंदर से उत्पन्न' यह दिया गया है जिससे साँप के साथ रहने के रूप में मारकत्व प्रतीत होता है, जो कि कवि ने अपनी प्रतिभा से कल्पित किया है।
१-कपिकच्छू का वृश्रिक अथं, जो सरला में लिखा है, अप्रामा- गिक प्रतीत होता है। -अनुवादक
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अथवा; जैसे- मन्थाचलभ्रमणवेगवशंवदा ये दुग्धाम्बुधेरुदपतन्नयवः सुधायाः। तैरेकतामुपगतैविंविधौषधीभि- र्धाता ससर्ज तव देव ! दयादगन्तान्। हे देव! आपके कृपाकटाक्षों को विधाता ने मंदराचल के भ्रमणा के वेग के अधीन जो अमृत के अणु क्षीरसमुद्र से निकले, इकट्ठे हुए उनसे, तथा विविध शषधियों से उत्पन्न किया है। यहाँ कटाक्षों में केवल अमृत के ही गुगा 'संजीवकता-आदि' कवि को नहीं समझाने हैं, किंतु समग्र मनुष्यो के वशीकरण आरदि अन्य गुण भी बताने हैं, इसलिए अतिशयजननार्थ सुधाकणों में 'शषघियों का संसर्ग' विशेषणरूप से ग्रहण किया गया है। यहाँ सुघाकों के साथ हगंतों का उत्पाद्योत्पादक्भाव संबंध लोकसिद्ध नहीं है, किंतु केवल कविकल्पित है। अथवा; जैसे- त्वदङ्गणसमुद्भूता सिक्ता कुङ्कमवारिमिः। त्वदङ्गतुलनां याति कदाचिल्ववलीलता॥ लवलीलता (हरफारेवड़ी ?) यदि तुम्हारे आँगन में उत्पन्न हो और केसर के पानी से सींची जाय तो कदाचित् तुम्हारे अंग की तुलना कर सकती है। यहाँ केवल लवली में उपमानता का बोभ सहन करने का सामर्थ्य नहीं है, अतः उपमानता का सामर्थ्य सिद्ध करने के लिए 'नायिका के -सहवास' और 'कुंकुमजल के संयोग' का ग्रहणा किया गया है।
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'प्रौढोक्ति और 'सम'का भेद यह स्मरय रखना चाहिए कि यहाँ किसी धर्मी के संसर्ग से यदि शरन्य धर्मी में रहने वाला अतिशय व्यंग्य हो तभी यह अलंकार होता है। किंतु अभिषा द्वारा यदि तच्तत्कार्यत्वेन कहा जाय तो समालंकार का ही विषय होता है; जैसे- सत्तो जन्म हिमांशुशेखरतनुज्योत्सानिमग्रात्मनो दुग्धाम्भोनिधिमुग्धवीचिवलयैः साकं परिक्रोडनम्। संवास: सुरलोकसिन्धुपुलिने वाद: सुधांशो: करैः कस्मान्नोज्ज्वलिमानमश्चतितमां देव त्वदीयं यशः ॥ हे देव ! तुम्हारा यश क्यों न अत्यंत उज्जवलता को प्राप्त करे! शिवजी के शरार की चाँदनी (चंद्रमाकी कांति) में जिनका अंतःकरण निमन्न रहता है ऐसे आप से (जिसका) जन्म, त्ीर समुद्र के मुग्ध तरंगमंडलों के साथ (जिसकी) क्रीडा, देवनदी गंगाजी के पुलिन पर (जिसका) निवास और चंद्रमा को किरणों से (जिसकी) प्रति- स्पर्धा हो (वह ऐसा क्यों न हो)। यहाँ यश की धवलता का अतिशय तचद् धर्मी के संबंध से प्रयुक्त होने के रूप में कहा गया है, इस कारण उस अंश में समालंकार ही है, किंतु 'हिमांशुशेखर तनुज्योत्स्नानिमग्नात्मनः' यहाँ किरणकृत धवलता का अतिशय चंद्रमा में, चंद्रकृत धवलतातिशय भगवान् शिव में औरर भगवत्कृत धवलतातिशय राजा में, इस तरह उच्रोच्तर बढ़ता हुश राजगतघवलता का अतिशय अनुक्त होने के कारण प्रौढोक्ति का ही विषय है। 'मिध्याध्यवसिति' अलंकार का खंडन सो इस तरह
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शशभृङ्गधतुर्लसत्करा गगनाम्भोरुहमालिकाधराः । तनयैः सह भाविजन्मनां तव खेलन्ति नरेन्द्र वैरियः॥
हे महाराज ! आपके वैरी खरगोश के सींग का धनुष हाथ में लिए हुए और गगनकमल की मालाएँ धारण किए हुए जिनका जन्म शब होगा उनके पुत्रों के साथ खेल रहे हैं। इत्यादिक में एक का मिथ्यात्व सिद्ध करने के लिए अन्य मिथ्या- भूत वस्तु की कल्पना मिथ्याध्यवसतिति नाम का भिन्न अलंकार है, यह फहना उचित नहीं, क्योंकि यह अलंकार प्रौढोक्ति से ही गतार्थ हो जाता है। कारण, जिस प्रकार प्राचीनों के
"केशा: कलिन्दजा तीरतमालस्तोममेचकाः। अर्थात् केश यमुनातट के तमाल-समूह के समान काले हैं।" इत्यादि प्रौढोक्ति के उदाहरण में 'तमालों में श्यामता के शरतिशय' के लिए श्यामत्व का आ्रधार न होने पर भी आ्रधाररूप में संपादित कालिंदी का संबंध उद्भूत किया जाता है, वैसे वैरियों में भी मिथ्यात्व की सिद्धि के लिए मिथ्यात्व के आधारभूत शशशृंगादिकों का संबंध है-यह भी कहा जा सकता है, (अतः मिथ्याध्यवसिति की कल्पना व्यर्थ है)। यदि कहा जाय कि वहाँ 'श्यामता का अतिशय' है और यहाँ तो केवल मिथ्यात्व है उसका अतिशय तो सिद्ध होता नहीं-यह विल- क्षणता है; ता यह उचित नहीं; क्योंकि तमाल-समूह में अन्य समूहों से श्यामता सिद्ध होने पर भी कालिंदी के ससर्ग का उद्भूत करना पुनः श्यामत्व का साघन होने से अतिशय का व्यंजक ही हो सकता है, किंतु वैरियों में तो मिथ्यात्व असिद्ध है अ्रतः शशशंगादि के संबंधों से मिथ्यात्व की सिद्धि होती है, इस कारण उक्त अतिशयसिद्धि अर्थ-
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प्राप्त समाच के अधीन, है-अर्थात् 'अतिशय' शब्दतः प्रतिपादित तो है नहीं अर्थ के अधीन है, जहाँ पहले से श्यामता सिद्ध है वहॉ केवल शतिशय को सिद्ध करती है और जहाँ अर्थ (मिथ्यात्व) ही असिद्ध वहाँ उसे सिद्ध करती है, अतः यह शतिशयसिद्धि विलचणता का प्रयोजक नहीं होती। और जो कुवलयानंदकारने- "वेश्यां वशयेत्खस्रजं वहन्।
आरकाशपुष्प की माला लेकर वेश्या को वश में कर सकता है।" यह मिथ्याध्यवसिति का उदाहरण बनाया है वह तो निदर्शना से ही गतार्थ है। कहा जायगा कि यहाँ पर निदर्शनागर्भ मिथ्याध्यव- सिति है, तो यह उचित नहीं, क्योंकि मिथ्याध्यवसिति (स्वयं) ही मिथ्या है-फिर उसकी बात ही क्या करना है, क्योंकि यदि मिथ्या- ध्यवसिति ही भिन्न अलंकार हो तो सत्याध्यवसिति भी भिन्न अलंकार हो सकता है। जैसे- हरिश्रन्द्रेष संज्ञप्ताः प्रगीता धर्मसुनूना। खेलन्ति निगमोत्सङ्ग मातर्गङ्ग ! गुणास्तव ।
हरिश्चंद्र द्वारा बताए हुए और युघिष्ठिर द्वारा गाए हुए तुम्हारे गुया, हे मातरगेंगे ! वेद की गोदी में खेल रहे हैं।
यहाँ हरिश्चंद्र, युधिष्ठिर और वेद के संबंध से गुणों की सत्यता प्रतीत होती है। इसी प्रकार- मध्ये सुधासमुद्रस्यसितामयगृहोदरे। पूर्णेन्दुविष्टरे देव ! स्थातु योग्यास्तवोक्तयः ॥
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हे देव ! आपकी उक्तियाँ सुधासमुद्र के मध्य में मिश्री के बने हुए घर के शंदर पूर्णाचंद्र के आसन पर स्थान पाने योग्य हैं। यहाँ भी समुद्रादि के संबंध से उक्तियों में प्रतीत होनेवाला माधुर्य का अतिशय किस अलंकार का विषय होगा? इसलिए यह भी भिन्न अलंकार ही होगा। मेरे मत में तो इन सबकी प्रौढोक्ति से ही गता- र्थता है इस कारण इसे यहीं रहने दीजिए-आगे बढ़ाना व्यर्थ है।
प्रौढोक्ति समाप्त
ललितालंकार
लक्षण
प्रस्तुत धर्मी में प्रस्तुतव्यवहार का उल्लेख न करके निरूपण किया जाने वाला अप्रस्तुतव्यवहार का संबंध ललितालंकार होता है। लक्षण का विवेचन
'आददानः परद्रव्यं विषं भक्षयसि ध्रुवम्।
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दूसरे का धन लेते हुए तुम निश्चय ही जहर खा रहे हो' इत्यादि निदर्शनालंकार में अति व्याप्ति न होने के लिए लक्षण में 'प्रस्तुत व्यवहार का उल्लेख करके' यह भाग दिया गया है। अप्रस्तुत प्रशंसा में श्रति व्याप्ति न होने के लिए 'प्रस्तुत धर्मी में' यह लिखा गया है।
उदाहरण; जैसे-
के वा राम: कामप्रतिभटललाटन्तपबल- स्तव क्वामी वीरा रणशिरसि धीरा मखसुजाम्। दिधक्षोस्त्रैलोक्यं प्रलयशिखिनः पद्ममथन- प्रगल्भैः प्रालेयः प्रशममसि कतु व्यवसितः ॥
कहाँ शिवजी के शिर को चकरा देने वाले बल से युक्त राम औ्रर कहाँ यज्ञ खाने वालों (देवताओं) के रण के अग्रभाग में धीर रहने वाले तुम्हारे ये वीर ! (तुम ता) कमलों की नष्ट करने में निपुण शस की बूँदों द्वारा त्रिलोकी को दहन करना चाहनेवाले प्रलयानल को शांति करने का उद्यत हां। यह रावणा के प्रति विभीषण की उक्ति है।
यहाँ प्रस्तुत धर्मी है रावण, उसमें 'दूसरों के दिये पुरोडाशादिक खानेवाले देवताओं के सामने धैर्यशाली कुंभकर्शादिक वीरों से भगवान् राम के पराभव की इच्छा करता हुआ' इस रूप में स्पष्टतया तादृश इच्छारूप प्रस्तुत व्यवहाररूपी विषय को न कहकर 'वैसी ओस की बूँदों द्वारा वैसी अग्नि की शांति का उद्यम' रूपी अप्रस्तुत व्यवहार विषयी (उपमान) के रूप में ग्रहण किया गया है, अतः ललितालंकार है। यदि (पूर्वोक्त) विषय का ग्रहणा किया जाय तो निदर्शना ही होगी।
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श्रथवा; जैसे -
नान्यास्ति किं भूमितले सुरूपा सीतैव वा कि भवतोऽनुरूपा। आकषता चन्दनशाखिशाखां प्रबोधितोऽयं भवता फणीन्द्रः ।। क्या पृथ्वीतल पर और कोई सुंदरी नहीं है? अथवा क्या सीता ही तुम्हार अनुरूप है ? तुमने चंदनवृक्ष की शाखा को खींचते हुए इस नागराज को जगा दिया। यहाँ भी 'राघवसंबंधिनायिकाहरण के कारण उनके क्रोध जगाने' को न कहकर 'चंदनसंबंधिशाखा खींचने के कारण नागराज का जगाना' रक्खा गया है। अन्य अलंकारों से भेद कहा जायगा कि यहाँ 'भेद में अभेदरूग अरतिशयोक्ति' द्वारा गतार्थता हो सकती है, पर यह ठीक नहीं; क्योंकि 'कनकलतायां विरा- जते चंद्र :- कनकलता (गौरांगी) पर चंद्र (मुख) सुशोभित हो रहा है' इत्यादिक अतिशयोक्ति में पदार्थ से पदार्थ का ही अभेदाध्यवसान देखा गया है, व्यवहार से व्यवहार का अभेदाध्यवसान नहीं। इस कारण यह अतिशयोक्ति का विषय ही नहीं है। न यह सादृश्यमूला अप्रस्तुतप्रशंसा से ही गतार्थ हो सकता है, क्योंकि धर्मो के अरंश में अप्रस्तुतता का श्रभाव है। न यह निदर्शना से ही गतार्थ हो सकता है, क्योंकि एक धर्मी में दो व्यवहारों का ग्रहण हो तभी निदर्शना इष्ट है। अतएव निदर्शना के लक्षण में 'दोनों व्यवहारों का गहीत होना' कहा गया है, किंतु प्रस्तुत उदाहरण में प्रस्तुत व्यवहार गृहीत नहीं है। अरतः यह भिन्न ही अलंकार होगा। सो इस तरह- "क सूर्यप्रभवो वंशः क चाल्पविषया मतिः। तितीर्षुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम्।
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कहाँ सूर्य से उत्पन्न वंश और कहाँ अल्प विषय वाली (अल्पज्ञ मेरी) मति, मैं मोह के कारण छोटी डोंगी से दुस्तर सागर को पार करना चाहता हूँ। इसको काव्यप्रकाशकार ने जो निदर्शना का उदाहरण बताया है वह असंगत ही है। क्योंकि ललितालंकार अवश्य ही स्वीकार करने योग्य है और निदर्शना की यहाँ प्राप्ति भी नहीं है। यह है ललित का भिन्न अलंकार मानने वालों का शरभिप्राय।" ललित की निदर्शना से ही गतार्थता दूसरे तो कहते हैं कि 'ललित' भिन्न अलंकार नहीं है, क्योंकि वह निदर्शना से ही गतार्थ हो जाता है। कहा जायगा कि-निदशंना का जीवन है 'एक धर्मी के अंदर प्रस्तुत और अप्रस्तुत दो व्यवहारों का ग्रहण' सो वह केवल अप्रस्तुत व्यवहार के ग्रहणा करने पर यहाँ कैसे स्थान पा सकती है? तो आयुष्मान् सुनें-अलंकारशास्त्र में (सभी) अलंकार प्रायः श्रौत और आर्थ हुआ करते हैं। उनमें कहीं भी श्रौतों से आर्थ पृथक अलंकार के रूप में नहीं गिने जाते, किंतु उस अलंकार के पृथक भेद के रूप में ही गिने जाते हैं; क्योंकि वे उस अलंकार के सामान्य लक्षण के ही अंतर्गत होते हैं (यह निर्णात है)। अब इस दृष्टि से विचार करिए-वाक्यार्थनिदर्शना का स्वरूप है 'दो व्यवहारों से युक्त (भिन्न भिन्न) दो धर्मियों के शभेद के प्रतिपादन द्वारा आचित दो व्यवहारों का शभेद' वहाँ दो व्यवहारों से युक्त धर्मियों के अभेद का प्रतिपादन श्रौत ही अपेक्ित है ऐसा कोई नियम नहीं, किंतु तादृश अभेद का प्रतिपादनमात्र होना चाहिए। अरतः जिस प्रकार- 'परद्रव्यं हरन्मर्त्यो गिलति क्ष्वेडसंचयम्-जो मनुष्य दूसरे के धन का हरणा करता है वह विषसमूह को निगलता है'
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यहाँ जहाँ कि दो व्यवहारों से युक्त दो धर्मियों के श्रभेद का प्रतिपादन है, उसी तरह 'घिक परस्वं, तथाप्येष' गिलति क्ष्वेड- संचयम्-परद्रव्य को धिक्कार है तथापि यह विषसमूह को निगल रहा है।' यहाँ एक धर्मी है 'आर्थ प्रकृत व्यवहार' से युक्त और दूसरा धर्मी है 'श्रौत अप्रकृत व्यवहार से युक्त' इन दोनों धर्मियों के आर्थ शभेद का प्रतिपादन होने पर भी वाक्यार्थनिदर्शना होने में कोई क्ति नहीं। हाँ, इस विशेषता का निवारण नहीं किया जा सकता कि एक जगह श्रौता निदर्शना है दूसरी जगह आर्थी। पदार्थनिदर्शना का स्वरूप तो 'उपमान और उपमेय के धर्मों के अभेदाध्यवसाय के आरधार पर उपमेय में उपमान के धर्म का संबंध' है, सो वह ता पृथक् है ही, औरर वाक्यार्थनिदर्शना अथवा पदार्थननिदर्शना में से कोई एक होना प्राचीनों की रीति से निदर्शना का सामान्य लक्षण है।
ऐसी दशा में यदि ललित पृथक अलंकार हो तो लुसोपमादिक भेद भी उपमादिक से पृथक हो जाएँगे, क्योंकि (श्रौत और आर्थ भेदों को पृथक मानने वाली) तुम्हारी युक्ति दोनों जगह सामान्य ही है।
कहा जायगा कि ऐसा (अभेदाध्यवसान को आर्थ) माना जाय तो अतिशयोक्ति का भी रूपक में विलय हो जायगा, क्योंकि यह भी कहा जा सकेगा कि 'जहाँ विषय और विषयी दोनों का ग्रहण हो वहाँ श्रौत रूपक है और जहाँ केवल विषयी मात्र का ग्रहण हो वहाँ आर्थ रूपक है'। यह आरपका कहना सच है, किंतु जहाँ अलंकार का शरीर दोनों (शाब्द और आथं) स्थानों पर विलक्षण नहीं होता वहाँ 'एक अलंकार कहना' उचित है; जैसे-'सिद्ध किया जाने वाला सादृश्य' उपमा का शरोर है वह उत्तोपमादिक में भी विलक्षण नहीं है, अवः वहाँ भी उपमा कहना उचित है, अन्य अलंकार कहना नहीं।
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रहा लुप्तत्व पूर्रात्व आदिक, सो वह तो उपमा के लक्षण के शरीर में निविष्ट नहीं है। अतः स्वयं एक दूसरे से पृथक होते हुए भी (उक्त भेदों को) उपमात्व्र से पृथक नहीं करता। वही बात अन्यत्र भी है। यह स्थिति है। ऐसी दशा में 'विषयतावच्छेदक (मुखत्वादि) के रूप से प्रतीत होने वाले विषय में विषयितावच्छेदक (चंद्रत्वादि) से अवच्छिन्न चंद्र आदि का अभेद' है रूपक का शरीर और अतिशयोक्ति का स्वरूप है 'विषयितावच्छेदक (चंद्रत्वादि) के रूप से प्रतीयमान विषय (मुख आादि)'। सो इन दोनों के (स्वरूप) विलक्षण होने से दोनों की एकालंकारता उचित नहीं; और निदर्शना एवं ललित में तो 'स्वरूप का विलक्ष न होना' दिखाया जा चुका है, इसलिये एकालंकारता ही है। यह कहा जाता है।
नवीनों का कहना है कि 'विषय (उपमेय) में विषयी (उपमान) का आहार्य निश्चय का विषयीभूत अ्भेद' रूपक का स्वरूप है। उसमें विषयतावच्छेदक्क आदि का निवेश नहीं है, क्योंकि उससे गौरव होता है। सो इस तरह विषयी में विषय का निगरण करके अध्यवसानरूग अतिशयोक्ति भले ही रूपक का भेद रहे-इसमें हमारी क्या हानि है ? यही बात अपह्नुति के विषय में भी है-अर्थात् अप- हनुति भी रूपक का ही भेद है। विषयतावच्छेदक (मुख़त्वादि) के निह्नव (अपह्रति में), अनिह्वव (रूपक में) और निगरय (श्रति- शयोक्ति) रूपक के ही शरवांतर भेद हैं। इस मत की रीति से तो निदर्शना से ललित को पृथक अलंकार मानना केवल मनोरथ का विलास ही है। सो इस तरह (प्राचीनों और नवीनों दोनों के मत से) 'तिती- र्षुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्म सागरम्' इस काव्यप्रकाश के उदाहरण में निदर्शना अच्छी तरह संगत हो जाती है, क्योंकि 'क सूर्यप्रभवोवंशः क
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चाल्पविषया मतिः' इस पूर्वार्ध द्वारा, 'अपनी मति और सूर्यप्रभव वंश की अत्यंत अननुरूपता' बताने के बाद 'अप्रस्तुत डोंगी द्वारा सागर तैरने की इच्छा' के कथन से 'तादृशमति द्वारा ताहशवंश के वर्णन की इच्छा' जो प्रकृत है, विदित हो जाती है।
कुवलयानंद का खंडन
और जो कुवलयानंदकार कहते हैं कि-
"अनायि देशः कतमस्त्वयाद्य वसन्तमुक्तस्य दशां वनस्य।
आपने किस देश को वसंत से छोड़े हुए वन की दशा में पहुँचा दिया ?" इस पद्य में 'आपने कौन सा देश छोड़ा है-अर्थात् आप कहाँ से आ रहे हैं ? इस प्रस्तुत अर्थ को न कहकर उसके स्थान पर 'वसंत से छोड़े हुए वन की दशा को पहुँचाया' इस केवल उसके प्रतिबिंबभूत अर्थ के रखने से ललितालंकार है"। सो यह अत्यंत असंगत है, क्योंकि यहाँ एक की दशा में दूसरा कैसे पहुँचाया जा सकता है, अतः शोभारहितता रूपी 'वसंत से छोड़े हुए वन की दशा को प्राप्त कर दिया गया है' यह अंतिम अर्थ है। तालर्य यह है कि 'वसंत से मुक्त वन की दशा' का अर्थं 'शोभारहितता है। सो इस अर्थ में 'शोभारहितत्व' रूपी कार्य के द्वारा (देश के विषय में) 'राजकर्तृ कत्यागकर्मत्वरूपी कारण' का कथन पर्यायोक्त का विषय है (निदर्शना का नहीं)। यइ दूसरी बात है कि 'दोनों दशाओं ( वसंतमुक्त वन की दशा और राजमुक्त देश की दशा) की एकता का अध्यवसान पदार्थनिदर्शना का विषय है अथवा अ्रतिशयोक्ति का। सो इस तरह यहाँ पदार्थनिदर्शना से उपव्ृंहित पर्यायोक्त का ही विषय है, ललित का नहीं।
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दूसरे, तुम्हारा बताया हुआ ललितालंकार का लक्षणा भी यहाँ नहीं बैठता। आपका लक्षण है-'प्रस्तुते वरार्यवाक्यार्थप्रतिबिम्बस्य वर्णनम्'। और उसका विवेचन आपने यों किया है कि-'प्रस्तुते धर्मणि वर्णनीयं वाक्यार्थमवर्णयित्वा कस्यचिद्प्रस्तुतस्य वाक्या- र्थस्य वर्णनं ललितम्-अर्थात् प्रस्तुत धर्मी में वर्शन योग्य (प्रस्तुत) वाक्यार्थ का वर्णन न करके किसी अप्रस्तुत वाक्यार्थ का वर्णान ललित है'। इत्यादि। सो यहाँ प्रस्तुत धर्मी है देशविशेष, उसमें वर्णनीय अर्थ है-राजकर्तृकत्यागकर्मत्व, उसका वर्णन न होने पर भी श्रप्रस्तुत 'वसन्तकर्तृकत्यागकर्मत्त्र' का भी यहाँ वर्णन नहों है; अरतः लक्षण कैसे संगत होगा ?
हाँ, यदि 'श्रकारि देशः कतमस्त्वयाद्य निरस्तचन्द्रः कठिनाशयेन- कठोर अन्तःकरया वाले आपने आज किस देश को चंद्ररहित कर दिया ?' यह पद्य होता तो आपका मनोरथ हो भी सकता था। कहा जायगा कि वन की तादृश दशा अप्रस्तुत है उसका देशविशेष में वर्शन है ही, तो यह ठीक नहीं, क्योंकि यहाँ 'दशा' शब्द से उस दशा (वन की दशा) के समान अन्य दशा (देश की दशा) लक्ष्य है, वह दशा अप्रस्तुत हो नहीं सकती, अन्यथा पदार्थनिदर्शना का उच्छेद हो जायगा।
सो इस तरह- रामो विजयते यस्य क्षणात्सामर्षवीक्षखाद्। दावागनिदग्धकान्तारलीलां लङ्कापुरी दधौ।। राम सर्वोत्कृष्ट हैं, जिनके सक्रोध अवलोकन से क्षणाभर में ही लंका- पुरी ने दावानल से जले हुए जंगल की लीला धारण कर ली। इत्यादिक में जो लोग ललित को भिन्न अलंकार मानते हैं उनके
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भी मत में यह पद्य ललितालंकार का विषय नहीं, किंतु निदर्शना का विषय है। अरतएव "उदयति विततोर्ध्वरशिमिरज्जा- वहिमरुचौ हिमधाम्नि याति चास्तम्। वहति गिरिरयं विलम्बिघएटा-
जिस समय ऊपर की तरफ किरणरूपी रस्मी फेलाए हुए सूर्य. उदय होता है और चंद्रमा अस्त होता है उस समय यह पहाड़ (रैव तक) लटकते हुए दो घराटाओं से युक्त गजराज की लीला को धारण करता है।" यह प्राचीनों का निदर्शना का उदाहरण भी संगत हो जाता है। तुम्हारे पक्ष में तो 'किरणरूपी रस्सी से बंधे हुए सूर्य चंद्र जिसके दोनों बगल में लगे हुए हैं ऐसा यह पहाड़' इस रूप में प्रस्तुत धर्मी पर शररूढ प्रस्तुत अर्थ का ग्रहण न होने से ललितालंकार ही होगा। अब यदि कहा जाय कि 'प्रस्तुत व्यवहार का लेश मात्र भी कीर्तन न हो और केवल प्रकरखादि से गम्यता हो तब ललित होता है, अन्यथा निदर्शना होती है', तो फिर 'क सूर्यप्रभवः' यहाँ से निदर्शना को कैसे निकाल दिया ? अतः यह सब गड़बड़ ही है।
ललितालंकार समास
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प्रहरषेण अलंकार
लक्षण वांछ्ित अर्थ की प्राप्ति के उद्देश्य से साक्षात् यत्न के बिना भी वांदित अर्थ के लाभ को प्रहर्षण कहते हैं। लक्षण का विवेचन प्रहर्षण तीन प्रकार का है (१) अकस्मात् वांद्वित अर्थ की प्राप्ति (२) वांछितार्थ की सिद्धि के लिए यत्न करते हुए उससे भी शअरधिक श्रर्थ की प्राप्ति (३) उपाय की सिद्धि के लिए किए जाने वाले यत से साच्षात् फल का लाभ। इन तीनों प्रहर्षणों का सामान्य लक्षण ऊपर बताया गया है। लक्षण में 'साक्षात्' शब्द तीसरे भेद में अरव्याप्ति न होने के लिए दिया गया है। क्रम से उदाहरण
( १ ) तिरस्कृतो रोषवशात्परिष्वज- न्प्रियो मृगाच्या शयितः पराङ मुखः। कि मृ्च्छितोऽसाविति कांदिशीकया कयाचिदाचुम्ब्य चिराय सस्वजे॥ किसी मृगनयनी ने आलिङ्गन करते हुए प्रिय का रोषवश तिर- स्कार किया, प्रिय मुँह फेर कर सो गया, किंतु 'क्या यह मूछ्ित हो गया' यह समझकर घबड़ाई हुई ने चुम्बन करके देर तक आलिंगन किया। यहाँ किसी भी प्रकार का यत्न न करने पर भी इष्टलाभ का वर्शन है।
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(२) केलीमन्दिरमागतस्य शनकैरालीरपास्येद्वितैः सुप्ताया: सरुषः सरोरुहद्ृशः संवीजनं कुर्वतः । जानन्त्याप्यनभिज्ञयेव कपटव्यामीलिताच्या सखि! श्रान्तासीत्यभिधाय वक्षसि तया पाणिर्ममाधीयत ।।
सखियों को धीरे धीरे इशारों से हटाकर मैं केलीमंदिर में आया और वहाँ क्रोधसहित सोई हुई कमलनयनी के पंखा भलने लगा, उसने जानते हुए भी न जानती हुई के समान कपट से आँखें मूंदे हुए ही 'सखि तुम थक गई हो' यह कर मेरा हाथ वत्तस्थल पर रख लिया। यहाँ भामिनी के रोषनिवारणार्थ यत्न किए जाने पर भामिनी द्वारा कामुक के कर का उसके कुचों पर लगना रोषनिवारण से भी श्रधिक- तर सुखदायी है। यहाँ प्रहर्षण के तृतीय भेद की शंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि पंखा लते समय कामुक का मुख्य उद्देश्य माननिवारय था, श्रतः माननिवारण द्वारा प्राप्य कुचस्र्शादि अन्य फल की वहाँ उपस्थिति ही नहीं थी। अथवा; जैसे-
लोभाद्वराटिकानां विक्रेतु तक्रमानिशमटन्त्या। लब्धो गोपकिशोर्या मध्येरथ्यं महेन्द्रनीलमखिः ।। कौड़ियों के लोभ से तक्र बेचने के लिये रात तक घूमती हुई गोपकिशोरी को बीच गली में महान् इन्द्रनीलमणि मिल गई। यहाँ प्रहर्षण का द्वितीय भेद स्पष्ट ही है और अननुरूप सम्बन्ध को लेकर विषमालंकार भी है। उनमें से प्रहर्षण में 'महान् इंद्रनील- मगि' इस अतिशयोक्ति में अंतर्भूत विषय (भगवान् कृष्ण) औरर
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विषयी (नीलमणि) दोनों ही में अनुकूल हैं, क्योंकि वांछित से अधिकार्थता मगि और भगवान् दोनों में समान है। और विषमा- लंकार में तो नीलमगिरूप केवल विषयी की ही अनुकूलता है, क्योंकि जैसा कौड़ी चाहने वाले के लिए करोड़ों के मूल्य वाले मदान् इंद्र नीलमगि का संसर्ग अननुरूप है वैसा अननुरूप भगवान् का संसर्ग नहीं हो सकता। कहा जायगा कि अज्ञानियों को भगवान् का संसर्ग भी अननुरूप ही है, तो यह ठीक नहीं, क्योंकि तब तो तक बेचने वाली होने से ही अज्ञानित्व प्राप्त हो जाने पर कौड़ियों के लोभ रूपी हेतु के उपन्यास का कोई विशेष प्रयोजन नहीं रहता। यहाँ पर याद रखिए कि जिस प्रकार के वांछित की सिद्धि के लिये यत्न किया जाता है उसी प्रकार के वांछित की सिद्धि हो तो समालंकार ही होता है। (शरतः विषमालंकारसिद्धचर्थ 'कौड़ियों के लोभ' रूपी हेतु का लिखना आवश्यक है)। (३) तृतीय प्रहर्षण का उदाहरय, जैसे- तद्दर्शनोपायविमर्शनार्थ मया तदालीसदनं गतेन। तत्रैव साडलन्यत पच्मलाक्ी दाक्षायणीमचयितु प्रयाता।। उसके देखने के उपाय का परामर्श करने के लिए मैं उसकी सखी के घर गया था; वहीं पार्वती के पूजन के लिए गई वह पक्ष्मलाची दीख पड़ी। यहाँ नायिका के दर्शन के उपाय की सिद्धि के लिए नायिका की सखी के घर जाने रूपी यत्न का प्रयोग किया गया था, उससे साक्षात् ही नायिका के दर्शन का लाभ हो गया। कुवलयानंद का खंडन और जो कुछ् कुवलयानंदकार ने प्रहर्षण के द्वितीय भेद का
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(३२५ ) "वांछितादधिकार्थस्य संसिद्धिश्च प्रहर्षगाम्-गंछिन से अधिक अर्थं की संसिद्धि को (द्वितीय) प्रहर्षण कहते हैं। " यह लक्षण बनाकर- "चात कस्त्रिचतुरान् पयःकणान् याचते जलधरं पिपासया। सोऽपि पूरयति विश्वमम्भसा हन्त! हन्त! महतामुदारता॥ प्यासा चातफ मेघ से तीन चार जल के कण माँगता है और वह विश्व को जल से भर देता है, वाह !! वाह !! महापुरुषों की उदारता।" यह पद्य उदाहरण में दिया है वह ठीक नहीं, क्योंकि 'वांछित से अरधिक अर्थ की संसिद्धि' इस लक्षण में 'संसिद्धि' पद से केवल 'काम बन जाना' कहना उचित नहीं, यदि ऐसा माना जाय तो काम बन जाने पर भी चाहनेवाले को उस लाभ से उत्पन्न संतोष की अरधिकता न होने के कारणा प्रहर्षण शब्द के योगार्थ (अत्यंत हृष्ट होने) की असंगति रहती है, अतः वैसी दशा में प्रहर्षणालंकार नहीं हो सकेगा। किंतु संसिद्धि का अर्थ यहाँ 'तादृश लाभ से उत्पन्न संतोष की अरधिकता' है सो इस तरह प्रस्तुत उदाहरण में चातक केवल तीन चार कणों का चाहनेवाला है, उसे बादल द्वारा जल से विश्व भर देने से हर्ष की अधिकता नहीं हो सकती, ऐसी स्थिति में प्रहर्षय कैसे स्थान पा सकता है'। हाँ, वांछित से अधिक दान के कारणा होनेवाला दाता १- नागेश कहते हैं-"यहाँ चातक का वृत्तांत अप्रस्तुत है.। उसका दाता और याचक के वृत्तांत में पर्यवसान हो जाता है; अ्तः 'संतोष की अरप्रधिकता' का होना अनिवार्य है।" पर तब भी 'याचक को अ्धिक प्राप्त हुआ' इसका वर्णन तो यहाँ है नहीं, यदि संसार को खूब मिला और याचक को याचक की योग्यतानुसार ही मिला तो फिर प्र हषणा का द्वितीय भेद कैसे हुआ? -अनुवादक
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का उत्कर्ष तो (प्रतीत होता हुआ) नहीं निवारण किया जा सकता। अतएव 'इन्त हन्त महतामुदारता' इस अर्थान्तरन्यास द्वारा उसी का पोषणा किया जा रहा है। 'लोभाद्वराटिकानाम्' इस हमारे उदाहरणा में तो चाहनेवाले को वांछितार्थ से अधिक वस्तु का लाभ होने से संतोष की श्रधिकता प्रतीत होती है, अतः वह प्रहर्षग का उदाहरणा उचित ही है।
प्रहर्षण समाप्त
विषादन अलङ्कार
लक्षण अभीष्ट अर्थ से विरुद्ध के लाभ का नाम विषादन है।
लक्षणा का विवेचन विषादन का विषय विषमालंकार से पृथक दो स्थानों पर है, (१) एक, वहाँ जहाँ अ्रभीष्ट वस्तु के लाभ के लिए कारण का प्रयोग नहीं किया गया, केवल इच्छा ही की गयी और विरुद्ध वस्तु का लाभ हो गया (२) और दूसरा, वहाँ जहाँ इष्ट वस्तु के लिए कारया का प्रयोग किया गया, उससे तो विरुद्धार्थ का लाभ नहीं हुआ, किंतु विरुद्धार्थ के (स्वतंत्र) कारणवश ही विरुद्धार्थ की प्राप्ति हो गई।
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किंतु जहाँ इष्ट के लिए प्रयुक्त कारण से ही विरुद्ध अर्थ का लाभ हो वहाँ तादश कारणा और उसके विरुद्ध अर्थ में जन्यजनकभाव संसर्ग की अननुरूपता के कारण विषम और वांद्ित से विरुद्ध वस्तु का लाभ होने से विषादन-इस प्रकार दोनों का संदेहसंकर ही होता है।
सो इस तरह विषमालंकार के भेदों से विपादन की गतार्थता हो जाता है-यह शंका नहीं करनी चाहिए; क्योंकि विषमालंकार से रहित भी विषादन का विषय आगे दिखाया जा रहा है।
प्रथम भेद का उदाहरण, जैसे- स्वस्वव्यापृतिमग्नमानसतया मत्तो निवृत्ते जने चश्चकोटिनिराकृतार्गल इतो यास्याम्यहं पञ्जरात्। एवं कीरवरे मनोरथमयं पीयूषमास्वादय- त्यन्तः संप्रविवेश वारणकराकार: फसिग्रामणीः ॥ लोग अपने अपने काम में मग्नचित्त होकर जब मुझसे निवृत्त हो जायँगे, तब मै चोंच की नोंक से अर्गला को इटाकर इस पिंजड़े से निकल जाऊँगा, इस तरह तोता जब मनोरथमय अमृत का आस्वादन कर रहा था, तब हाथी की सूँड के आकार वाला भुजंगराज अंदर घुस आया। यहाँ विषमालंकार के भेद का विषय नहीं है, क्योंकि यहाँ हृष्ट के लिए कारण के प्रयोग का अभाव है। कारय, विषमालंकार का शरीर- है 'इष्ट के लिए प्रयुक्त कारण के साथ (उत्पन्न होनेवाली) विरुद्ध वस्तु के जन्यजनकभावरूप संसर्ग की अननुरूपता'। अ्रतः यहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा के घटक के रूप में विषादन अलंकार ही अवस्थित है। द्वितीय भेद का उदाहरण; जैसे-
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चेलाअलेनाननशीतररिंम संवृखवतोनां हरिदृश्वरीखाम्। गोपाञ्गनानां स्मरजातकम्पादकाएडसंपातमियाय नोवी।। मुखचंद्र को वस्त्र के पल्ले से ढकती हुई बिन गोपांगनाश्रं ने हरि का दर्शन किया उनकी नीवी (अधोवस्त्र) फामदेव से उत्पन्न कंप के कारण असमय में ही गिर गई।
यहाँ 'मुँह छिपाना' इष्ट है उसका विरुद्धार्थ है 'नीवी का गिर जाना'; क्योंकि वह (मुँह छिपाने शदि के) कारणरूप लज्ा-समूह का विरोधी है, और सात्विककंपरूप अपने कारण से ही उत्पन्न हुआ है, न कि मुख छिपाने के लिए किए गए यत् से। यहाँ इष्टसाधन के रूप में प्रयुक्त कारण से इष्ट की अनुत्पत्ति भी नहीं है, क्योंकि वस्त्र के पल्ले के ढकने से मुख छिपाने रूपी इष्ट की उत्पत्ति हो ही गईं। इसलिए यहाँ विषादन ही है, विषम नहीं।
एक शंका और उसका समाधान
यहाँ यह समझ रखना चाहिए कि-'जो इष्टसाधन के रूप में निश्चित है उससे अनिष्ट की उत्पत्ति' इस रूप में जो विषम का भेद पहले वर्णन किया जा चुका है वह इस विषादन से ग्रस्त होने के कारण इसी का भेद हो सकता है, विषम का नहीं, यह यदि कोई कहे तो उससे पूछना चाहिए कि 'विषम का भेद नहीं' यह जो तुम कह रहे हो सो किस कारणा? जिस तरह वह भेद विषादन से ग्रस्त है उसी प्रकार 'कार्य कारण के संसर्ग की अननुरूपता' रूपी विषम से भी ग्रस्त है और यहाँ एक को दूसरे का अपवादक कह नहीं सकते, क्योंकि दोनों अलं- कार सावकाश हैं और उनके विषय भी भिन्न हैं। विषादन का विषय है विरुद्ध लाभ रूपी अंश और विषम का विषय है विरुद्ध लाभ और इष्टार्थ में प्रयुक्त कारणा के संसर्ग की अननुरूपता रूपी शरंश, यह पहले
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कहा जा चुका है। अतः उक्त स्थल में किसी अंश में वरिषम और किसी शंश में विषादन है इस कारण दोनों का समावेश समझना चाहिए-किसी एक की बात करना व्यर्थ है।
विषादन समाप्
उल्लासालंकार
लक्षण
एक के गुण-दोष के कारण दूसरे में गु-दोष के आधान का नाम उल्लास है। लक्षणा का विवेचन यहाँ 'आधान' का अर्थ है एक के गुरादोष के कारण दूसरे की गुणदोषयुक्तता का ज्ञान (न कि गुरादोष की उत्पत्ति)। उल्लास के भेद वह आधान (१) गुण से गुए का (२) गुरा से दोष का (३) दोष से गुण का और (४) दोष से दोष का, इस तरह चार प्रकार का होता है। क्रम से उदाहरण गुण से गुए का आधान; जैसे-
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अलभ्यं सौरभ्यं हरति सततं यः सुमनसां क्षसादेव प्राणानपि विरहशस्त्र क्षतहदाम्। खदीयानां लीलाचलितलहरोखां व्यतिकरात् पुनीते सोऽपि द्रागहह पवमानस्त्रिभुवनम्॥
(हे गंगे) जो वायु पुष्पों की तलभ्य सुगंध का निरंतर हरया करता है-अर्थात् चोर है और विरहरूपी शस्त्र से जिनके हृदय घायल हैं उनके प्राणों को भी क्षणा भर में ही हरण कर लेता है- अर्थात् हत्यारा है, आश्चर्य है कि वह भी तुम्हारी लीला से चलती हुई लहरियों के संबंध मात्र से तत्काल त्रिलोकी को पवित्र कर देता है। यहाँ लहरियों की पवित्रता के अतिशयरूनी गुण से वायु में पवि- त्रतारूपी गुणांतर का वर्शन किया गया है।
गुख से दोष का आधान; जैसे- विशालाभ्यामाभ्यां किमिह नयनाभ्यां खलु फलं न याभ्यामालीढा परमरमणीया तव तनुः। अरयं तु न्यकारो जननि ! मनुजस्य श्रवसायो- र्ययोर्नान्तर्यातस्तव लहरिलीलाकलकलः ॥ हे जननि! इस जगत् में इन वड़े बड़े नेत्रों का क्या फल हैं, जिनने परम सुंदर आपके स्वरूप का आस्वादन नहीं किया, और मनुष्य के उन कानों के लिए यह घिक्कार ही है कि जिनके अंदर आपकी लहरियों की लीला का कलकल निनाद नहीं पहुँचा। यहाँ श्री भागीरथी के 'रमणीयता' रूपी गुण से भागीरथी के रूप
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से विमुख नेत्रों में 'निष्फलता' रूी दोष और उसके शब्द से विमुख कानों में 'धिक्कार' रूपी दोष बताए गए हैं। दोष से दोष का और गुण से गुण का आधान; जैसे- हिंसाप्रधानैः खलु यातुधानैर्यानीयताऽपावनतां सदैव। रामाङ घ्रियोगादय सापि वन्या विन्ध्यस्य धन्यास्त मुनेःसतोव।। हिंसाप्रधान राक्षसों के द्वारा जो सदा द्ी अपवित्र किया गया, वह विन्ध्य का वनसमूह रामचंद्र के चरणसंपर्क से मुनि की सती (अहल्या) के समान धन्य हो गया। यहाँ पूर्वार्ध में 'दोष से दोष के आधान का और उच्रार्धं में 'गुणा से गुण के आधान' का वर्णान है-यइ विशेषता है। अथवा; जैसे- भृषितानि हरेर्भक्तदूषितानि पराङ मुखैः। स्वकुलं नगरं देशो द्वीपं सर्वा च मेदिनी॥ अपना कुल, नगर, देश, द्वीप और सारी पृथ्वी इरिभक्तों से भूषित हैं और हरिविमुखों से दूषित हैं। यहाँ भी गुण से गुणा और दोष से दोष का वर्णान है, परंतु उच्च- रोत्तर व्यापकता (अरधिकदेशवृत्तित्ता) के रूप में; यह विशेषता है। दोष से गुण का आधान; जैसे- श्वपाकानां व्रातैरमितविचिकित्साविचलितै- र्विमुक्तानामेकं किल सदनमेनःपरिषदाम्। सुदा मामुद्धतु जननि ! घटयन्त्या: परिकरं तव श्लाघां कतु कथमिव समर्थो नरपशु: ।।
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हे जननि! जिन्हें अपरिमित संशयों से विचलित चंडालों के समूहों ने भी छोड़ रक्खा है ऐसे अनेक पापसमूहों के एकमात्र स्थान मेरा उद्धार करने के लिए आनंद से कमर कसनेवाली आपकी, प्रशंसा करने के लिए, नरपशु कैसे समर्थ हो सकता है।
यहाँ वक्ता में रहनेवाले पापरूनी दोष से प्रयुक्त 'उसका उद्धार करनेवाली गंगा की प्रशंसनीयता' गुण है। अरथवा; जैसे-
श्ववृत्तिब्यासङ्गो नियतमथ मिथ्याप्रलपनं कुतर्कव्वभ्यासः सततपरपैशुन्यमननम्। अपि श्रावं श्रावं मम तु पुनरेवंविधगुणा- नृते त्वत्को नाम चसमपि निरीक्षेत वदनम् ॥ नियमित रूप से श्ववृत्ति (नौकरी) में लगे रहना, झूनी बकवाद, कुतर्कों का अभ्यास ओर निरंतर दूसरों की चुगलखोरी के विचार करते रहना, ऐसे मेरे गुणों को सुन सुनकर भी तुम्हारे सिवाय कौन ऐसा है, जो चषणा भर भी मुँह देखे।
यहाँ भी पूर्ववत् दोष से गुण के आधान का वर्णन है, किंतु वह व्यंग्य है। यह विशेषता है।
कुछ विद्वानों का कहना है कि 'यह अलंकार काव्यलिंग से गतार्थ है, अलंकारता की भूमि पर ही नहीं आता' दूसरों का कहना है कि *केवल लौकिकार्थमय है, इसलिए अलंकार ही नहीं है'। उल्लास समाप
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अ्रवज्ञालकार
लक्षय
उल्लास के विपर्यय को अवज्ञालंकार कहते हैं। लक्षण का विवेचन विपर्यय का अर्थ यहाँ अभाव है, अतः लक्षणा का पर्यवसित श्रर्थ यह हुआ कि-एक के गुरादोष से प्रयुक्त अन्य में गुसदोष के आधान का अभाव। तात्पर्य यह है कि किसी एक में जो रण दोष हो उनका उसके संसर्ग में रहने वाले पर प्रभाव न पड़ने का नाम अवज्ञालंकार है। जैसे-
निष्णातोऽपि च वेदान्ते वैराग्यं नैति दुर्जनः। चिरं जलनिधौ मग्रो मेनाक इव मार्दवम्॥ वेदांत में निपुणा होने पर भी दुर्जन वैराग्य को प्राप्त नहीं होता, जैसे बहुत समय तक समुद्र में डूबे रहने पर भी मेनाक पर्वत मृदुता को (प्राप्त नहीं हुश)। यहाँ पूर्वार्द्ध में 'प्रपञ्च की अनित्यता बताने' रूपी वेदांतशास्त्र के गुण से प्रयुक्त 'वैराग्य'रूपी गुण के आ्रधान का खल में अरभाव है और उत्तरार्ध में 'द्रवत्वरूपी' समुद्र के गुग से प्रयुक्त 'मृदुता'- रूपी गुण के आधान के अभाव का मेनाक में वर्शन किया गया है। मध्येगलं विहरतां गरलं निकामं नागाधिप: शिरसि भालतले हुताशः।
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ध्याता भवज्वलनमध्यगतैस्तथापि तापं तदैव हरते हर ! ते तनुश्रीः ॥
हे हर! (आपके) गले के बीच जहर, शिरपर नागराज औरर भालतल पर अग्नि भले ही विहार करे तथापि आरपके शरीर की शोभा संसारानल के मध्यगत लोगों से ध्यान किए जाने पर तत्काल ताप हरणा करती है।
यहाँ गरल आदि के तापकता रूपी दोष से प्रयुक्त क्रूरत्वादि दोष के आधान का भगवान् शिव के शरीर में अभाव है। अतद्गुण से भेद कहा जायगा कि यहाँ वक्ष्यमाण अतद्गुया अलंकार है; तो यह ठीक नहीं; क्योंकि जैसे (अतद्गुण के उदाहरण) 'यमुनाजल में स्थित राजहंसादिक द्वारा यमुनाजलकी श्यामता का ग्रहण नहीं है' वैसे भगवन्मूर्तिस्थित गरल-आदि में रहनेवाली क्रूरता का अग्रहण विवच्ित नहीं है, अपितु 'जहर की क्रूरता से प्रयुक्त क्ररतांतर का शरविष्कार न होना' विवक्षित है, अतः इन दोनों में भेद है और पूर्वोक्त 'निष्णातोऽपि०' इस उदाहरण में तो अतद्गुण की प्रसक्ति ही नहीं है।
मद्ाणि मा कुरु विषादमनादरेण मात्स्यमन्दमनसां सहसा खलानाम्। काव्यारविन्दमकरन्दमधुव्रताना- मास्येषु यास्यसि सतां विपुलं विलासम्।। हे मेरी वाणी! मात्सर्य से संकुचित हृदय वाले खलों के सहसा
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अनादर से विषाद मत कर, तू काव्य-कमल के मधु के मधुकर सत्पुरुषों के मुखों में विपुल विलास को प्राप्त होगी।
यहाँ पूर्वार्ध में 'खल के अनादर' रूपी दोष से प्रयुक्त 'विषाद-' रूपी दोष का कविवाणी में निषेध किए जाने के कारण अप्रतिष्ठितता द्वारा शाब्द अभाव वर्शान किया गया है और वासी में रहनवाले 'रमगीयता' रूपी गुणा से प्रयुक्त 'संतोष' रूपी गुण के आधान का खल में अभाव आर्थ है, अतः इस श्लोक में शान्दी और आर्थी दोनों प्रकार की अवज्ञा है। उत्तरार्घ में तो सहृदय के सरसतारूपी गुण द्वारा वासी में उल्लास (आनंदोद्बोध) रूनी गुर का आधान है, इस कारण उल्लासालंकार ही है। अवज्ञा अरतिरिक्त अलंकार नहीं है यह भी कहा जाता है कि विशेषोक्ति अलंकार से ही गतार्थ होने के कारण 'अवज्ञा' अतिरिक्त अलंकार नहीं है।
अवज्ञालंकार समाप्त
अपनुज्ञालंकार
लक्षण
किसी उत्कट गुण की लालसा से दोषरूप में प्रसिद्ध वस्तु की भी प्रार्थना अनुज्ञालंकार है।
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उदाहरण प्रसिपत्य विधे ! भवन्तमद्धा विनिवद्धाज्जलिरेकमेव याचे। जनुरस्तु कुले कृषीवलानामपि गोविन्दपदारविन्दभाजाम्॥ हे विधाता ! आप से हाथ जोड़ कर प्रणाम करते हुए एक ही यथार्थ प्रार्थना करता हूँ कि मेरा जन्म खेतिहरों के भी कुल में हो, पर ऐसे खेतिहरों के जो गोविंद के चरणारविंद का भजन करते हों। यहाँ इरिभक्ति की लालसा से खेतिहरों के कुल में जन्म की प्रार्थना है। अ्रनुज्ञा समाप्
तिरस्कारालंकार
लक्षण
इसी प्रकार- किसी दोष के संबंध से गुणरूप में प्रसिद्ध का भी द्वेष 'विरस्कार अलंकार' है।
उदाहरण श्रियो मे मा सन्तु क्षणामपि च माद्यद्गजघटा- मदभ्राम्यद्भृङ्गावलिमधुरसंगीतसुभगा:। निमम्नानां यासु द्रविसरसपर्याकुलहदां सपर्यासौकर्य हरिचरययोरस्तमयते।।
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मदमच गणसमूह के मद के लिए भ्रमणा करती हुई घमरपंक्ति के मधुर संगीत से मनोहर संपच्ियाँ मरे न हों, जिन संपत्ियों में डूबे धन के रस से व्याकुलहृदयों के भगवान् के चरणारविंद की सेवा का सौकर्य अस्त हो जाता है। यहाँ हरिचरण की सेवा छूटने के भय से राज्यसुख का तिर- स्कार ह। तिरस्कारालंकार पर विचार इस तिरस्कारालंकार का लक्षणा न बनाकर केवल अनुज्ञा का लक्षण बनानेवाले कुवलयानंदकार का विस्मरण ही सहारा है,
श्रन्यथा-
स्फुटन्मुकुट कोटिभिमघवदादिभिर्भूयते। व्रजेम भवदन्तिकं प्रकृतिमेत्य पैशाचिकीं किमित्यमरसंपदं प्रमथनाथ! नाथामहे॥ हे प्रमथनाथ! आपके भवन की देहली पर विकटतुंड (वक्रतुंढ नामक आपके गए) के डंडों की चोटों से इंद्रादिकों के मुकुट के
१-निर्णयसागर के मुद्रित कुवलयानंद में इस पद का पूर्वाधं पीछे है और उत्तरार्ध पहले है, पर पंडितराज को विपरीत पाठ ही अभीष्ट प्रतीत होता है, अतएव उनने 'भवद्धवनदेहली'ति तदुदाहत- पधे 'किमित्यमरसंपदमित्यंशे' यह लिखा है। यह पाठभेद पुस्तकों में है भी (देखिए कुवलयानंद पृ० १४४ की टिप्पणी, निर्रायसागर संस्क- रण, पंचमावृत्ति, सन् १९२५) -प्रनुवादक २२
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किनारे टूटते रहते हैं, अतः पिशाचों की योनि प्राप्त करके आ्रपके समीप पहुँच जाय (यही प्रार्थना है)। देवताओं की संपत्ति को हम क्यों माँगें। इस उनके उदाहृत पद्य के 'किमित्यमरसंपदम्' इस अरंश में तिरस्कार का स्फुरसा' होना चाहिए था। कहा जायगा कि 'अनुज्ञा' और 'तिरस्कार' इन दोनों अलंकारों का यहाँ संभव ही कैसे है ? क्योंकि प्रार्थना का अर्थ है इच्छा और तिरस्कार का अर्थ है द्वेष, उनमें से दोष में इष्टसाघनताज्ञानरूपी कारण का अरभाव होने से इच्छा उचित नहीं है। इसका अभिप्राय यह है कि कोई भी आदमी किसी काम में प्रवृत्त तभी होता है जब उसे यह पता हो कि यह वस्तु मेरे इष्ट (वांछित) का साधन है। दोष को कोई इष्ट का साधन मानता नहीं। फिर उसकी इच्छा कोई करेगा ही क्यों? वही बात गुण में द्वेष की है, क्योंकि वहाँ भी द्विष्टसाधनताज्ञान का तरभाव है-अर्थात् गुणों से द्वेष किसी को क्यों होगा। हाँ, कारण की सच्ता के कारणा विपरीतता तो उचित हो सकती है-अर्थात् गुण में इच्छा और दोष में द्वेब; तो ऐसा न कहिए, क्योंकि दोष में गुणांश को लेकर और गुय में दोषांश को लेकर इष्टसाधनताज्ञान और द्विष्ट- साधनताज्ञान की सचा रहती है; अतः तुम्हारे बताए कारण में कोई व्याघात नहों आता। और जो आपने गुण में इच्छा और दोष में द्वेष वाली विपरीतता की बात की, सो भी उचित नहीं है, क्योंकि उपाय की इच्छा के प्रति उत्कट द्विष्ट से अनुबंध न रखनेवाला इष्टसाधनताज्ञान कारय है-और उपाय के द्वेष के प्रति उत्कट इष्ट से
१-यहाँ मुद्रित पुस्तकों में मूल में 'स्फुरखानापरेः' यह पाठ श्रशुद्ध प्रतीत होता है 'स्फुरसापत्तेः' यही शुद्ध पाठ होना चाहिए।-अनुवादक
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अनुबंध न रखनेवाला द्विष्टसाघनताज्ञान कारण है ऐसा कहना चाहिए। (अर्थात् उपाय की इच्छा के प्रति केवल इष्टसाधनता का ज्ञान ही कारण नहीं है, किंतु उसके पीछे द्विष्ट न लगा हो तभी वह कारण हो सकता है। और इसी प्रकार केवल द्विष्ट- साधनता का ज्ञान उपाय के द्वंष के प्रति कारण नहीं है, किंतु जिसके पीछे उत्कट इष्ट न लगा हो ऐसा द्विष्टसाधनता का ज्ञान ही कारणा है।) अन्यथा जो वस्तुएँ सुख दुख दोनों का साधन है; जैसे-'चांद्रायणव्रत' और 'हरीतकीभक्षय' आदि कष्टप्रद और विरस होने के कारण द्विष्ट हैं, तथापि लोग उन उपायों को इच्छा करते ही हैं। और कलञ्ज, दही और फूट (पकी ककड़ी) के भक्षणा स्वादिष्ठ होने के कारण इष्ट हैं पर उत्कट द्विष्ट (नरक में जाना और रोगी होना) उनके पीछे लगा हुआ है, अतः बुद्धिमान् लोग उनके प्राप्ति के उपाय की इच्छा नहीं करते-इत्यादि में इच्छा और द्वेष का अनियम ही हो जाएगा। कहने का तात्पर्य यह है कि चांद्रायराव्रत करना कष्टदायी होने के कारण यद्यपि द्विष्ट है, और कलज्ज खाना स्वादिष्ठ होने के कारण इष्ट है फिर भी धार्मिकों की चांद्रायणा करने की और कलञ्ज छोड़ने की इच्छा होती है, क्योंकि वे जानते हैं कि चांद्राय स्वर्ग का साधन है और कलञ्जभक्षणा नरक का। इसी प्रकार हरीतकी स्वादिष्ठ न होने से द्विष्ट है और दही फूट स्वादिष्ठ होने से इष्ट हैं, फिर भी समझदार लोग हरीतकी खाना चाहते हैं और दही फूट को पसंद नहीं करते, क्योंकि इरीतकी आरोग्यवर्धक है और 'दधित्रपुसं प्रत्यक्षो ज्वरः' इस महा भाष्य के अनुसार दही फूट (एक साथ खाने से) ज्वर उत्तन्न करता है। अतः आपका कहना ठीक नहीं।
हाँ, इतना अवश्य है कि इसमें 'पुरुष' और 'काल' का प्रवेश भी आवश्यक है। अर्थात् उस पुरुष के उस काल में उत्कट द्विष्र से
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अ्रनुबंध न रखने वाली उस पुरुष के तात्कालिक इच्छा के विषय फल की साधनता का ज्ञान उस पुरुष की उपाय की इच्छा के प्रति कारण है। इसी प्रकार उस पुरुष के उस काल में उत्कट इष्ट से संबंध न रखने वाले उस पुरुष के उस समय में द्वेष के विषय फल की साधनता का ज्ञान उस पुरुष के उपाय के द्वेष के प्रति कारण है। तात्पर्य यह कि इष्टता अथवा द्विष्टता जिस समय और जिस पुरुष की होगी उसी को औरर उसी समय वह वस्तु इष्टमाधन अ्ररथवा अनिष्टसाधन प्रतीत होगी अन्य को और अन्य समय नहीं। इस तरह कहने से अन्य पुरुष और अ्रन्य काल से संबंध रखने वाले द्विष्ट अ्रथवा इष्ट को लेकर दोष नहीं होगा। (नहीं तो जो वस्तु एक का इष्टसाधन है वह दूसरे का अनिष्ट- साधन हो सकती है और जो वस्तु आज अनिष्टसाधन है वह कल इष्ट- साधन हो सकती है, अतः वहाँ दोष आ जायगा।) यहाँ यह समझना चाहिए कि फल में उत्कट इच्छा होने से उपाय में भी उत्कट इच्छा ही उत्पन्न होती है; इसी प्रकार फल में उत्कट द्वेष होने से उपाय में भी उत्कट द्वेष ही होता है। सो इस तरह सुखदुःख दोनों के साधन चांद्रायण आदिक में यदि अपनी सामग्री के कारण पहले सुख में उत्कट इच्छा होती है तो उसके साधन चांद्रायणा आदि में भी उत्कट इच्छा ही होती है और अपनी सामग्री के कारण पहले दुख में उत्कट द्वेष होता है तो चांद्रायण आदिक में भी उत्कट द्वेष ही होता है, क्योंकि उत्कट सामग्री में ही बलवान् होने की कल्पना होती है, और इस प्रसंग में उत्कटता का अ्थ है इच्छा द्वेष में रहने वाली एक प्रकार की विषयिता। कहने का तात्र्य यह है कि जो वस्तुएँ सुख दुख दोनों का साधन हैं उनमें यदि उनको सुखरूप समझानेवाली सामग्री बलवान् होगी तो तद्विषयक उत्कट इच्छा होगी, औरर यदि उनको दुखरूप समझानेवाली सामग्री बलवान् होगी तो तद्विषयक उत्कट द्वेष हो जाएगा, क्योंकि जहाँ एक साधन से इष्टरूप औरर
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अनिष्टरूप दो फल उत्पन्न होते हैं वहाँ एक ही समय में एकत्र उत्कट इच्छा और अन्यत्र उत्कट द्वेष संभव नहीं है। वैसा होने पर चांद्रायण- दिकों में एक ही समय में इच्छा द्वेष दोनों होने लगेंगे (जैसा कि होता नहीं) सो इस तरह उपाय की इच्छा में बलवान् अरनिष्ट का अ्रपनुबंधी न होना और उपाय के द्वेष में बलवान् इष्ट का अ्रपनुबंधी न होना कारणतावच्छेदक के रूप में देना ही चाहिए। यह कुछ विद्वानों का सिद्धांत है।
दूसरे विद्वानों का कहना है कि उपाय की इच्छा के प्रति फल की इच्छा और फल की साधनता का ज्ञान दोनों कारण हैं और इसी प्रकार उपाय के द्वेष के प्रति फल के द्वेष और फल की साधनता का ज्ञान कारण हैं। इस तरह एक ही वस्तु के इष्ट, अनिष्ट दोनों का साधन होने पर भी उत्कट सामग्री के बलवान् होने के कारण कोई दोष नहीं रहता।
सो इस तरह बो दोष इष्ट अ्रनिष्ट दोनों का साधन है उसमें गुय के मिश्रित रहने से इच्छा की उत्पत्ति और जो गुण इष्ट अनिष्ट दोनों का साघन है उसमें दोष के मिश्रित रहने से द्वेष की उत्पच्ति सहृदयों के लिए उचित ही है। जैसा कि हरीस्षकी और केला खाने में होता है। समभ्रदार आदमी उदरशुद्धिकारित्वरूपी गुण होने से विरसता रूपी दोष की स्थिति में भी हरीतकी खाने की इच्छा रखते हैं और केलों में स्वादिष्ठतारूपी गुण होने पर भी गरिष्ठतारूपी दोष होने के कारग उससे द्वेष रखते हैं-यह अनुभवसिद्ध है।
तिरस्कार समाप्त
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लेशालंकार
लक्षय
अनिष्ट का साधन होने के कारण गुण का दोषरूप में और इष्ट का साधन होने के कारण दोष का गुणरूप में वर्णन लेशा- लंकार कहलाता है।
उदाहरण
गुण का दोषरूप में वर्णन; जैसे- अपि बत गुरुगवं मा स्म कस्तूरि यासी- रखिलपरिमलानां मौलिना सौरभेख। गिरिगहनगुहायां लीनमत्यन्तदीनं स्वजनकममुनैव प्राणहीनं करोषि।। हे कस्तूरी ! खेद है कि सब परिमलों (रगड़ने पर पैदा होनेवाले सुगंधों) के शिरोमणि सौरभ के कारणा तुम्हें अधिक घमंड नहीं करना चाहिए। तुम इसी गंध के कारण पर्वत की गंभीर गुफा में छिपे अत्यंत दीन अपने जनक (मृग) को प्राशहीन करती हो। दोष का गुणरूप में वर्णन; नैर्गुएयमेव साधीयो धिगस्तु गुणगौरवम् ! शाखिनोऽन्ये विराजन्ते खएड्यन्ते चन्दनद्रुमाः ॥। निर्गुणता ही अच्छी है, गुखों के गौरव को विक्कार है। दूसरे पेड़ सुशोभित रहते हैं और चंदन के पेड़ काटे जाते हैं।
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प्रथम उदाहरण में गुण का केवल दोषरूप में वर्णनमात्र है औरर दूसरे उदाहरण में दोष का गुणारूप में वर्शन अर्थोतरन्यास से अ्नुविद्ध है।
स्खलन्ती स्वर्लो कादवनितलशोकापहृतये जटाजूटग्रन्थौ यदसि विनिबद्धा पुरभिदा। अये निर्लोभानामपि मनसि लोभं जनयतां गुखानामेवायं तव जननि दोष: परिणतः ॥
हे जननि, आप भूतल के शोक का हरणा करने के लिए स्वर्ग लोक से गिरती हुई जो शिवजी द्वारा जटाजूट की ग्रंथि में बाँघ ली गई, यह निर्लोभों के भी मन में लोभ पैदा करनेवाले तुम्हारे गुणों का ही दोष- रूप में परिणाम है। यहाँ 'दोष' शब्द का अर्थ अपराध है। सो इस तरह गुगों की अपराधरूप में दोषता कही गई है।
लेश और व्याजस्तुति में भेद
यहाँ यह शंका नहीं करनी चाहिए कि यह अलंकार दोनों प्रकार की (निंदा से स्तुतिरूप और स्तुति से निंदारूप) व्याजस्तुति से गतार्थ है, क्योंकि यहाँ सर्वत्र ऐसा नहीं है कि जो बात आरंभ में कही गई हो वह पर्यवसान में विपरीत हो जाय। ऊपर दिए हुए 'अपि बत गुरुगर्वे०' इस उदाहरण में ही देखिए, कविका तात्पर्य कस्तूरी की स्तुति में नहीं है, किंतु 'जनक का प्राण लेनेवाली होने' से निंदा में ही है। अतएव अप्रस्तुत कस्तूरी के वृच्तांत से ध्वनित होनेवाले प्रस्तुत (अरकृतश्ञ के) वृचांत में भी निंदा में ही विश्राम होता है। इसी
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तरह 'नर्गुण्यमेव साधीय:०' इस द्वितीय उदाहरण में भी शरन्य वृक्षों की निंदा विवकित नहीं है, किंतु उनका आराम से रहना ही विवक्तित है। (इसी तरह) 'गुखी अपने गुणों से दुखी है' इस वाक्य में निर्गुगों की निदा अनपेच्ित है, किंतु उनकी स्तुति ही वक्तव्य है। हाँ, 'सखलंती स्वलोंकात्०' यह तृतीय श्लोक भागीरथी की स्तुति के प्रकरण में पठित है, अतः यदि भागीरथी की स्तुति में कवि का तात्पर्य है तो वहाँ व्याजस्तुति भी रहे, किंतु व्याजस्तुति सावकाश है, अतः वह लेश को बाघित नहीं कर सकती, क्योंकि
रवितुरगदिग्गजेषु स्वर्णाचलजलधिधनदकोषेषु । सत्स्वेव राजपुङ्गव! किं दातास्मीति गर्वमावहसि। हे राजश्रेष्ठ ! सूर्य के अश्व, दिशाश्ं के गज, सुमेरु, समुद्र (र्षा- कर) और कुबेर का भंडार विद्यमान रहते आप 'मै दाता हूँ' यह घमंड क्यों करते हैं ? यहाँ शरंत में प्रतीत होनेवाली 'सूर्य के घोड़े' आदि कुछ परि- गखित वस्तुओं के अतिरिक्त अन्य सब वस्तुशं के दानरूपी गुश का दोषरूप में वर्णान नहीं है और 'जिस सूर्य के घोड़ों आदि के अदान' का वर्णन है वह गुग नहीं है, अतः गुय दोष दोनों का विषय भिन्न होने के कारण यहाँ लेश के स्पर्श से रहित व्याजस्तुति होने से स्पष्ट ही सावकाशता है। इसी सावकाशता के कारय लेश भी व्याजस्तुति का बाधक नहीं होता, अतः पूर्वोक्त भागीरथीस्तुति में लेश और व्याजस्तुति दोनों का समावेश है, बाध्यबाघकभाव नहीं।
लेश अलंकार समाप्त
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तद्गुणालंकार
लक्षय
अपने गुण का त्याग करके समीपवर्ती अन्य वस्तु से संबंध रखनेवाले गुण के ग्रहण को तद्गुए कहते हैं।
उदाहरण
नीतो नासान्तिकं तन्व्या मालत्या: कुसुमोत्करः। बन्धूकभावमानिन्ये रागेखाघरवर्तिना॥
कृशांगी द्वारा नाक के रुमीप पहुँचाया हुआ मालती का कुसुम- समूह अधरोष्ठ के रंग द्वारा बंधूकता (रक्तपुष्पता) को प्राप्त कर दिया गया। अथवा जैसे-
अधरेश समागमाद्रदानामरुखिम्ना पिहितोऽपि शुद्धभाव:। हसितेन सितेन पच्मलाच्या पुनरुव्वासमवाप जातपन्: ।। पद्मलाक्षी के दाँतों की शुद्धता अधर के समागम के कारया ललाई से आच्छादित हो जाने पर भी श्वेत हास्य द्वारा उसके पंख निकल आए (फिर जोर पकड़ गई) और पुनः उल्लसित हो उठी। यहाँ प्रथम उदाहरण में मालती के कुसुमसमूद के अधर के रंग से रँग जाने के कारया बंधूकता सिद्ध हो जाने से तद्गुण है। दूसरे उदाहरण में भी पूर्वार्ध में तो दाँतों पर अधर की ललाई शर जाने से स्पष्ट ही तद्गुण है, परंतु उचरार्ध में फिर लौट आने के सदश हास के द्वारा इटाए जाने के कारय भंगुर है-स्थिर नहीं। यदि यह
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माना जाय कि हास से अधर को श्वेत करने द्वारा 'अघर की अरुगिमा का बाध' भी यहाँ वर्गित है तो वहाँ भी दूसरा तद्गु है। इस भंगुर तद्गुण को कुछ विद्वान् पूर्वरूप नामक अलंकार कहते हैं। उल्लास से तद्गु का भेद यद्यपि उल्लास में भी एक के गुण से दूसरे में गुणाधान होता है तथापि वहाँ जैसे चूने आदि की चारता के कारणा हल्दी आदि में ललाई उत्पन्न हो जाती है उसी प्रकार एक के गुण के कारण दूसरे में शरन्य नवीन गुशा उत्पन्न किया जाता है, किंतु तद्गुण में पहले का गुण ही (ज्यों का त्यों) दूसरे में आहित हो जाता है, जैसे जपाकुमुम की ललाई स्फटिक में संक्रात होती है। यह है उल्लास से तद्गुण का मेद। तद्गुण समाप
लक्तण तद्गुण का विपर्यय (अर्थात् संनिहित अन्य वस्तु के संपर्क में रहकर भी अपने गुए का अत्याग और परगुण का अग्रहय) अत- द्गुए अलंकार कहलाता है। उदाहरण कुचाभ्यामालीढं सहजकठिनाभ्यामपि रमे! न काठिन्यं धच्चे तव हृदयमत्यन्तमृदुलम्। मृगाङ्गानामन्तर्जननि निवसन्ती खलु चिरं न कस्तुरी दूरीभवति निजसौरभ्यविभवात्॥
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हे माता लक्ष्मी ! तुम्हारा अत्यंत कोमल हृदय स्वभावतः कठिन कुचों से व्याप् होने पर भी कठिनता को धारय नहीं करता। चिरकाल पर्यंत मृग के अंगों के अंदर रहती हुई कस्तूरी अपनी सुगंध की संपचि से दूर नहीं होती-यह निश्चित है। यहाँ पूर्वार्ध में अन्य वस्तु के गुण (कठिनता) का अग्रहण शान्द है और अपने गुण (कोमलता) का अत्याग आर्थ है। उच्तरार्घगत दष्टांतालंकार में तो 'अरपने गुण (सुगंध) का अरत्याग' शाब्द है औरर 'अन्य वस्तु के गुणा का अग्रहय' आर्थ है।
अ्रवज्ञा और अतद्गुख में भेद यहाँ यह शंका नहीं करनी चाहिए कि अवज्ञा और अतद्गुण में कोई भेद नहीं है, क्योंकि उल्लास के विपर्यय का नाम अवज्ञा है और तद्गुण के विपर्यय का नाम अतद्गुय। सो अवज्ञा का प्रतियोगी है उल्लास और अतद्गुण का प्रतियोगी है तद्गुर और उल्लास तथा तद्गुण में भेद ऊपर बताया जा चुका है अतः प्रतियोगियों के भेद से उनके विपर्ययों में भी भेद होना स्वतः सिद्ध है। अतद्गुण के भेदों और अलंकारांतरता पर विचार अलंकारसर्वस्वकार ने लिखा है कि-अ्रतद्गुण दो प्रकार का है। (१) जहाँ गुण न ग्रहणा करने वाल की शपेक्षा संनिहित गुशवान् उत्कृष्ट हों और (२) जहाँ गुए न ग्रहण करने वाले की अपेक्षा संनिहित गुशावान सम हो। इसका आशय यह हुआ कि-अपट्टष्ट संबंधी गुय का ग्रहण न करना स्वभावसिद्ध है-अतः विचित्रताजनक न होने के कारय कोई भी अपकृष्ट से गुण लेता नहीं, सो अपकृष्टता को लेकर तीसरा प्रकार संभव नहीं है। दूसरों का कहना है कि उक्त दोनों भेदों में भी शवांतर चमत्कार नहीं है, अतः यह द्विविघता भी नहीं हो सकती।
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अन्य विद्वान् तो यह भी कहते हैं कि-उत्कृष्ट वस्तु का संनिधान गुराग्रहण का हेतु है, उसके रहते हुए 'तद्गुयाग्रहय' रूपी कार्य का अ्रभाव होने से अतद्गुण विशेषोक्ति का ही अवांतर भेद है, श्रतिरिक्त अलंकार नहीं। कहा जायगा कि 'यहाँ कार्यकारयभाव विवक्तित नहीं है, किंतु 'संनिधान में भी उसके गुण के ग्रहण का श्ररभाव' इतना ही मात्र विवच्ित है, अतः अतद्गुण विशेषोक्ति से भिन्न है; पर यह कथन उचित नहीं, क्योंकि आपने जो 'संनिधान में भी' यह कहा है, यहाँ 'भी' से स्ष्ट है कि 'केवल संनिहित के गुण के ग्रहण का अभाव' ही विवच्षित नहीं है, कितु उन दोनों में विरोध भी विवचित है (यदि विरोध न हो ता पास में रहने पर भी गुणग्रहण क्यों नहीं होगा) और यह विरोध ही तो अतद्गुण का जीवन मूल है-यदि यह नहीं रहेगा तो अतद्गुण में अलंकारता ही न होगी (उसी में तो चमत्कार है) और यह विरोध कार्यकारणभाव की विवचा न होने पर हो नहीं सकता, अतः आप कैसे कह रहे हैं कि 'कार्यकारणभाव विवच्तित नहीं है'। (सो विशेषोक्ति से इसे पृथक मानना अनुपपन्न ही है)।
अतद्गुण समाप्
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मोलितालङ्कार
लक्षण
स्पष्ट उपलब्ध हो रही किसी वस्तु के लिंगों (ज्ञापकों) से अत्यंत समानता के कारण भिन्नता से प्रतीत न होनेवाले किसी अन्य वस्तु के लिंगों द्वारा अपने कारण (अन्य वस्तु) के अनु- मान न करवाने को मीलितालंकार कहते हैं। कहने का तात्पर्य यह कि दो वस्तुओं के लिंग एक से हने पर स्ष्ट प्रतीत होनेवाली वस्तु के लिंगों में हिल मिल जाने से अन्य वस्तु की प्रवीति (अ्रनुमिति ) न होने का नाम मीलित है।
इस लंबे लक्षणा का संग्रह (संक्षेप) इस श्लोक में है-
मेदाग्रहेण लिङ्गानां लिङ्ग: प्रत्यक्षवस्तुनः । अप्रकाशो ह्यनध्यक्षवस्तुनस्तन्निमीलितम् ॥ प्रस्यक्ष वस्तु के लिंगों से (अनुमेय वस्तु) के लिंगों के भेद का ज्ञान न होने के कारण अप्रत्यक्ष वस्तु के प्रकाशित न होने को मीलित कहते हैं।
लक्षण का विवेचन
इस श्ोक में 'अरप्रत्यक्ष वस्तु के' यह सामान्यालंकार में अतिव्याति न होने के लिए दिया गया है, क्योंकि सामान्य में प्रत्यक्ष होने वर भी अन्य वस्तु ही का ज्ञान नहीं होता (और यहाँ अनुमेय वस्तु का अनु- मान नहीं होता। )
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'तद्गुय' में इसकी अतिव्याप्ति का तो प्रसंग ही नहीं है, क्योंकि यही इन दोनों में भेद है। तद्गुण में अन्य वस्तु के गुणों का भिन्न रूप में ग्रहणा न होने पर भी अन्य वस्तु का ज्ञान तो रहता ही है और मीलित में तो वस्तु का ही ज्ञान नहीं होता )।
उदाहरय
जलकुम्ममुम्भितरसं सपदि सरस्याः समानयन्त्यास्ते। तटकुञ्जगूढसुरतं भगवानेको मनोभवो वेद। तलैया से बड़े शनंद के साथ तत्काल पानी का घड़ा लाती हुई तुम्हारे, तट के कुञ्ज पर, गुस सुरत को अकेले भगवान् कामदेव ही जानते हैं। यहाँ सुरत के ज्ञापक हैं-स्वेद, कंप और निश्चास। उनका जल- कुंभ के लाने की त्वरा से उत्पन्न उन्हीं के साथ भेद का ग्रहण नहीं होता, अतः सुरत का प्रकाशन नहीं होता। अथवा; जैसे- सरसिरुहोदरसुरभावधरितविम्बाधरे मृगाचि ! तव। वद वदने मशिरदने ताम्बूलं केन लक्षयेम वयम्।
हे मृगनयनी, कमल के गर्भ के समान सुगंधी और बिंबाफल को नीचे दिखानेवाले अधर से युक्त और मणियों के से दाँतों वाले तुम्हारे मुख में तांबूल को हम किस प्रकार पहचानें ?
१-उम्भितः पूर्णों रसो यस्मिन् कर्मणि तत्तथेति क्रियाविशे- षरामिदम्, न तु सरलोक्तः 'पूरितजल'मित्यर्थः 'जलकुम्भमित्यनेन पुनरुक्त्यापचेः । न हि रिक्तः कुम्भो जलकुम्भशब्देनोच्यते।
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यह 'तांबूल क्यों नहीं ले रही हो' प्रिय के यह पूछने पर 'शभी अरभी तांबूल खाकर ही आई हूँ' यह कहनेवाली प्रिया के प्रति प्रिय की उक्ति है। प्रथम उदाहरण में प्रत्यक्ष वस्तु (जलकुंभ लाने) के लिंग (स्वेदादि ) आररगंतुक है-अर्थात् सुरत के धर्म घड़ा लाने से उत्पन्न बतार गए हैं और इस उदाहरण में (अधर की अरुता) साहजिक (स्वभावसिद्ध) है-यह विशेषता है।
मीलितालंकार समाप्
सामान्यालङ्कार
लक्षया
प्रत्यक्ष दिखाई देने वाली वस्तु का बलवान् सजातीय ज्ञान के कारण उस (सजातीय) वस्तु से भिन्न रूप में प्रतीत न होने को सामान्यालंकार कहते हैं। लक्षण का विवेचन ऊपर लिखा जा चुका है कि मीलित में तो जो वस्तु छिपाई जा रही है वह प्रत्यक्ष का विषय नहीं होती। इसलिए मीलित में श्रति- व्याप्ति नहीं है।
उदाहरण यस्मिन्हिमानीनिकरावदाते चंद्रांशुकैवल्यमिव प्रयाते। पुच्छाश्रयाभ्यां विकला इवाद्रौ चरन्ति राकासु चिरंच मर्यः ॥
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बर्फ के ढेर से सफेद पहाड़ (हिमालय) जिस समय चंद्रमा की किरणों के साथ मानों एकता को प्राप्त हो जाता है-अर्थात् चाँदनी में डूब जाता है, उस समय उस पहाड़ पर पूर्ण चंद्रवाली पूर्णिमाओ्रं के दिन चमरी गाएँ देर तक (रात भर) पूँछ और आधार (हिमालय) से रहित-सी घूमती हैं। यहाँ चाँदनी के अंदर हिमाचल और चमरी के पुच्छ के पृथक् रूप में न दीखने के कारण उत्प्रेक्षा की उत्पत्ि है। उस उत्प्रेक्षा में सामान्यालंकार गुणोभूत (अंगरूप) है।
सामान्य के विषय में मतभेद कुछ विद्वानों का कथन है कि-पूर्वोक्त लक्षण में 'भिन्न रूप में प्रतीत न होने' के स्थान में 'भिन्नजातीय के रूप में प्रतीत न होना' यह कहा जाना चाहिए। ऐसा कहने से व्यक्तिभेद प्रतीत होने पर भी सामान्यालंकार ही होता है। जैसे-
स्तबकभरैललिताभिश्वलिताभिर्मारुतैर्नृप ! लताभिः। वृतमुपवनमेवासीदरिमहिलानां महावनं भवतः ॥ हे राजन् ! गुच्छों के भारों से ललित और वायुओं (अर्थात् कभी इघर की कभी उघर की हवाओं) से हिलने वाली लताओं से परिवृत आपका उपवन ही आपकी शत्रु-महिलाओं के लिएमहावन हो गया। यहाँ उपवन को महावन इसलिए कहा गया है कि उपवन ने महावन का कार्य 'छिपना' संपन्न कर दिया और वइ 'छिपने का संपादन' तुम्हारे भटों द्वारा लताओं के साथ तचद् व्यक्ति के रूप में महिलाओं का प्रत्यक्षरूप में भिन्नता से ग्रहणा होने पर भी भिन्न जाती- यता से ग्रहण न होने के कारय, ठीक हो जाता है-अर्थात् महिलाएँ
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तो पृथक पृथक दिखाई पड़ती हैं, पर सजातीयता के कारण लताओं से पृथक नहीं होती। पूर्व मत में तो यहाँ दूसरा अलंकार स्वीकार करना पड़ेगा। मीलित, सामान्य और तद्गु एक अलंकार ही क्यों नहीं ? कहा जायगा कि मीलित, सामान्य और तद्गुण इन तीनों अलं- कारों में साधारण रूप से रहनेवाला 'भेदाग्रह' नाम का ही एक अलंकार होने दीनिए। तीन अलंकारों (के एृथक पृथक् मानने) की क्या आवश्यकता है, क्योंकि मीलित में तो प्रस्तुत और अप्रस्तुत धर्मियों में गुणों के भेद का ग्रहण न होना पहले सिद्ध किया ही जा चुका है; सामान्य में कुछ विद्वानों के मत में गुया और गुणी के भेद: का अग्रहणा है और कुछ लोगों के मत में कहीं गुण गुणी के भेद का अग्रहण और कहों केवल जातिमात्र के भेद का अग्रहण होता है; और इसी प्रकार तद्गुख में भी रक्त (जिस पर गुणों का प्रभाव पड़ा है) में रञ्जक (प्रभाव डालनेवाले) के गुण के भेद का अग्रहया है। यदि कहा जाय कि इनमें परस्पर अवांतर भेद (अर्थात् प्रस्तुत और अप्रस्तुत धर्मी के गुणों का अ्रग्रहर, गुया-गुखी के भेद का अग्रहय और रक्त तथा रञ्षक के भेद का अग्रहर) होने के कारण एक अलंकारता नहीं बनती; तो यह उचित नहीं। क्योंकि तब तो लप्तोपमादि से पूर्णोपमादि भी पृथक अलंकार होने लगेंगे, अरतः भेदाग्रह के ही मीलितादिक तीन अवांतर भेद हैं-यह उचित है, पृथक अलंकार होना नहीं। तो इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि-इस तरह तो 'अभेद' नाम का भी एक अलंकार होने दीजिए और रूपक, परिणाम और अतिशयोक्ति आदिक उसके शवांतर भेद हो जायँगे। यदि कहा जाय कि 'उनमें चमत्कारभेद है' सो वह सो प्रस्तुत में भी समान ही है। (त्रतः यह आपकी कल्पना व्यर्थ है) २३
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उन्मीलित और विशेषक का खंडन
कुवलयानंदकार कहते हैं कि-"मीलित की रीति से भेद का अग्रहण प्राप्त होने पर किसी हेतु द्वारा भेद का ज्ञान हो जाय तो मीलित का प्रतिद्वंद्वी उन्मीलित होता है और सामान्य की रीति से बाति के भेद का अग्रहय होने पर किसी हेतु के द्वारा विजातीयता का ज्ञान हो पाय तो सामान्य का प्रतिद्वंद्वी विशेषक, ये दो नवीन अलंकार होते हैं। जैसे- हिमाद्रिं त्वद्यशोमृष्टं सुराः शीतेन जानते। लच्तितान्युदिते चन्द्रे पद्मानि च सुखानि च।। तुम्हारे यश से पुते हुए हिमाचल को देवता लोग शीत के कारया पहचानते हैं। चंद्रमा के उदय होने पर पद्म और मुख (पृथक् पृथफू) लक्षित हुए।" सो नहीं हो सकता; क्योंकि-अनुमानालंकार से ही गतार्थ होने के कारण इन दोनों में अलंकारांतरता का संबंध ही नहीं है। कहा जायगा कि यहाँ प्रत्यक्ष की सामग्री बलवान होने के कारया अनुमिति का उदय न होने से अनुमानालंकार का निरूपणा नहीं किया जा सकता, तो यह उचित नहीं; क्योंकि अनुमानालंकार के लक्षयावाक्य में जो 'अनुमिति' पद है उससे 'व्यासिविशिष्ट पक्षधर्मताज्ञानजन्य ज्ञान' का ही ग्रहणा किया जाता है, लिंगपरामर्शजन्य ज्ञान का नहीं। अतएव हमने वहाँ पक्षांतर लिखा है। प्रस्तुत में विशेष दर्शन जिसका हेतु है ऐसा प्रत्यक्ष ही 'व्याप्तिविशिष्टपत्षघमंताज्ञानजन्य ज्ञान' हो खाता है, क्योंकि प्रमाणों का विभाग करने वाले नैयायिकों के समान आलंकारिकों की पद्धति हो, यह आवश्यक नहीं है, जिससे हमें
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ऐसी अनुमिति की परिभाषा बनानी पड़े जो प्रत्यक्षत्व से शस्पृष्ट हो। कहा जायगा कि ऐसे विषय में मान्य लोगों द्वारा 'अनुमिति' पद का प्रयोग नहीं किया बाता, तो हम कहते हैं कि यद्यपि यह ठीक है, तथापि जैसे उन्मीलितादि के लिए नवीन परिभाषा बनाई जा सकती है, वैसे (अनुमान के विषय में भी) नवीन परिभाषा नहीं रोकी जा सकती। अथवा अनुमिति को अनुमितित्व बाति से युक्त ही रहने दीजिए- अर्थात् जैसा प्राचीनों का सिद्धांत है उसमें हम बाघा नहीं डालना चाहते, किंतु प्रस्तुत उदाहरय में प्रतिबंधकवशात् अनुमिति का उदय न होने पर भी अनुमिति के साधकतम कारणों में कोई विघ्न न होने से अनुमानता में कोई व्याघात नहीं आता, क्योंकि अग्नि के विद्यमान रहने पर भी मगिमंत्रादि से प्रतिबद्ध होने के कारण दाह न होने से यह नहीं कहा जा सकता कि अग्नि दाह का कारणा नहीं है। फल के असंबंध का अभाव (अवश्य प्राप्ति) करणाता का प्रयोजक नहीं है, किंतु व्यापार ही करयाता का प्रयोजक है। इससे यह कथन भी परास्त हो जाता है कि 'विशेष दर्शन किसी दूसरी कोटि की प्रतीति का प्रति- बंघक है और (पूर्वोक्त उदाहरय में) वैसा प्रत्यक्ष चक्षुःसंयोगादि- रूप अपनी सामग्री के अधीन ही उत्पन्न हुआ है, अतः (अनुमान की) हेतुता में कोई प्रमाण न होने के कारण पारिभाषिक अनुमिति भी यहाँ नहीं हो सकती, फिर अनुमिति का करा अनुमान जिसे आप अलंकार कहते हैं) यहाँ कैसे हो सकता है ?' (क्योंकि पूर्वोक्तरीत्या अनुमितिकरणता निर्बाध है)।
कुवलयानंद का खंडन और कुवलयानंदकार ने जो यह लिखा है कि-"तद्गुण की रीति से भी भेद का अग्रहणा प्राप्त होने पर (ग्रहया हो जाय तो) 'उन्मी- लित' देखा जाता है; जैसे-
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नृत्यद्भर्गाट्टहासप्रसरसह चरैस्तावकीनैर्यशोभि- र्धावल्यं नीयमाने त्रिजगति परितः श्रीनृसिंहच्ितीन्द्र। नेदग्यद्येष नाभीकमलपरिमलः श्रौढिमासादयिष्य- देवानां नाभविष्यत्कथमपि कमलाकामुकस्य प्रबोध: ।। हे नृसिंह पृथ्वीपति ! नृत्य करते हुए शिवजी के अ्टहास के विस्तार के साथी (अर्थात् अत्यंत श्वेत) आपके यशों से त्रिलोकी के श्वेत कर दिए जाने पर यदि ऐसा यह नाभी के कमल का परिमल (अरति सुंदर सुगंध ) उत्कर्ष को प्राप्त न होता तो देवताओं को लक्ष्मीपति भगवान् नारायय का प्रबोध किसी प्रकार नहीं होता।"
सो यह भी नहीं हो सकता, क्योंकि तद्गुश में दो गुणों का अभेदग्रहण होता है, दो वस्तुओं का नहीं-यह तो निर्विवाद है। ऐसी स्थिति में नाभिकमल की सुंदर सुगंध के द्वारा भगवान् का ज्ञान हो जाने पर भी 'भगवान् के गुा नीलत्व में यश के गुण श्वेतत्व से भेद के अम्रहण' रूपी तद्गुण में किसी प्रकार की बाधा न होने से इस उन्मीलित को तद्गुया का प्रतिद्वंद्वी कैसे कहा जा रहा है। (कहने का तात्पर्य यह है कि सुगंध से तद्गुश का बोध तो हुआ नहीं, क्योंकि भगवान् के विदित हो जाने पर भी यश के श्वेतत्व से जो भगवान् की नीलता तिरोहित हुई थी वह तो वापस लौटी नहीं। तब तद्गुण में किसी प्रकार की बाघा न आने पर भी प्रतिद्वंद्विता कैसे हुई।) अब यदि कहा जाय कि एक वश्तु में समीपवर्ती अन्य वस्तु के गुया से युक्त का भेदाग्रहण ही तद्गुया का जीवन है-(अर्थात् तद्गुण में केवल गुण का ही अभेदग्रहण नहीं होता, जैसे यहाँ नीलत्व और श्वेतत्व का, किंतु नील वस्तु श्वेत हो गई इस रूप में नीलत्ववान् में श्वेतत्ववान् का अभेद है) तथापि यहाँ तद्गुण में कोई बाधा नहीं
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आती, क्योंकि उक्त पद्य में 'भगवान् श्वेत नहीं रहे' (पुनः नील हो गए) इस ज्ञान का कोई उपाय नहों बताया गया है-सुगंध से भगवान् का बोध हो जाने पर भी श्वेतता तो उनकी मिटी नहीं। फिर तद्गुश का उन्मीलन क्या हुआ। कहा जायगा कि भगवत्व नीलत्त का व्याप्य है (अर्थात् भगवान् की गणाना नील वस्तुओं में है, श्वेत में नहीं), अतः भगवत्व का ज्ञान होने पर उनके (पूर्ववर्ती) नीलत्व का भी ज्ञान हो जायगा, इस कारण तद्गुशबाध का उपाय हो गया, तो यह भी उचित नहीं, क्योंकि तब भी भगवान् यद्यपि पहले नीले थे किंतु कारणविशेष (यशः प्रसार) के प्रभाव से अब श्वेत हो गए,' जो प्रत्यक्ष से अनुगहीत है-अर्थात् अरब वेश्वेत दिखाई दे रहे हैं, इस ज्ञान को तो कोई मिटा नहीं सकता, अतः भगवान् तो श्वेत के श्वेत ही रहे, फिर तद्गुण का उन्मीलन कहाँ हुआ ? अतएव आरपके उपजीव्य (जिनके आधार पर आरपने कुवलयानंद लिखा है उन) अलंकारसर्वस्वकार ने 'उन्मीलित' और 'विशेषक' अलंकारों की चर्चा ही नहीं की। इसी कारणा मर्यादा के वशवर्ची आर्यों को जहाँ तक प्राचीनों द्वारा विभक्त किए अलंकारों में (नवनिर्मित अलंकारों का) अंतर्भाव किया जा सके तहाँ तक भिन्न अलंकारता की अडंगेबाजी करके अपनी उच्छृ खलता का नाटक दिखाना उचित नहीं।
१ नागेश कहते हैं कि-"अप्पय दीक्षित यहाँ 'तद्गुय नहीं है' यह नहीं कहते, किंतु 'तद्गुए की रीति से भेद का अग्रहण प्राप्त होने पर यदि किसी प्रकार भेद का ग्रहणा हो जाय तो उन्मीलित हो जाता है' एतावन्मात्र कहना चाहते हैं, अतः कोई दोष नहीं।" पर तब उन्मीलन किसका हुआ ? तद्गुण तो ज्यों का त्यों रहा ही,
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काव्य प्रकाश पर विचार श्रर बो- "वेत्रत्वचा तुल्यरुचां वधूनां कर्रग्रतो गएडतलागतानि। भृङ्गा: सहेलं यदि नापतिष्यन्कोऽवेदयिष्यन्नवचम्पकानि ।। बेंत की छाल के समान कांतिवाली वधुओं के कानों के ऊपर से कपोलतल पर आए हुए नवीन चंपा के पुष्पों को, यदि खेलते हुए भौंरे उन पर न गिरते तो, कौन पहचानता ?" यह सामान्य का उदाहरण देकर काव्यप्रकाश में लिखा है कि 'निमिच्तान्तरजनितापि नानात्वप्रतीतिः प्रथमप्रतिपन्नमभेदं न व्युदसि- तुमुत्सइते। प्रतीतस्य त्यागायोगात्'-अन्य निमित्त से उत्पन्न भी मेद की प्रतीति प्रथमतः ज्ञात अभेद को इटाने का उत्साह नहीं कर सकती, क्योंकि प्रतीत वस्तु का त्याग असंगत है'। सो यह उचित नहीं, क्योंकि यहाँ उत्तर बोध से तिरस्कृत होने के कारणा पूर्व प्रतीति में चमत्कारिता नहीं है, किंतु उत्तर प्रतीति की ही चमत्कारिता है शरतः उसी से व्यपदेश उचित है, अन्यथा व्यतिरेक में भी उपमा होने लगेगी। हाँ, विरोधाभास तो (ऐसी दशा में भी) चमत्कारी होता है, क्योंकि उसका स्वरूप ही पूर्व उत्तर दोनों प्रतीतियों से बनता है- उसमें उत्तर प्रतीति से पूर्व प्रतीति का बाघ नहीं होता। सामान्यालंकार समाप्त
फिर इसका 'उन्मीलित' नाम ही व्यर्थ हो जायगा। इस पर भी विचार करना चाहिए। -प्रनुवादक १ काव्यप्रकाश का पाठ 'प्रतीतत्वात्तस्य। प्रतीतेश्च बाधा- योगात्।' यह है। यह उसका तातपर्यंकथनमात्र है।
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उत्तरालंकार
लक्षय
प्रश्न के प्रतिबंधक ज्ञान के बिषयीभूत अर्थ का नाम उत्तर है। अर्थात् जिस वस्तु का ज्ञान हो जाने पर प्रश्न करना निवृच हो जाय वह वस्तु उच्तर कहलाती है।
लक्षण का विवेचन 'प्रच्छ' धातु का अर्थ है 'ज्ञीप्सा' और वही 'प्रश्न' शब्द का भी शर्थ है, क्योंकि प्रभ शब्द 'प्रच्छ' धातु से भावार्थक 'नङ' प्रत्यय करने से बनता है और धातु के अर्थ का नाम ही भाव है, अतः जो धातु का अर्थ है वही भावप्रत्ययांत शब्द का भी अर्थ होता है। 'जञीप्सा' का अर्थ है ज्ञानविषयक इच्छा, सो 'प्रभ' शब्द का अर्थ हुआ 'जानने की इच्छा'। यह इच्छा उच्तरवाक्य द्वारा विषयीभूत ज्ञान के उत्पन्न हो जाने पर निवृच्त हो जाती है। सारांश यह कि 'प्रभ' शब्द का अर्थ है ज्ञानविषयक इच्छा और उसके निवृच्त करने का साधन है उस इच्छा का विषयीभूत ज्ञान। अब यहाँ यह प्रभ होता है कि उक्तरीत्या 'प्रभ' शब्द के पर्याय 'जिज्ञासा' का अर्थ है ज्ञानविषयक इच्छा, और ज्ञान की इच्छा किसी वस्तु को विषय बनाकर ही उत्पन्न होती है तथा इच्छा उसी विषय में होती है जिसमें इष्टसाधनता का ज्ञान हो-अर्थात् प्रभकर्ता जिसके. विषय में यह समझे कि इससे मेरे अभीष्ट की पूर्ति हो जायगी वही ज्ञान विषयीभूतज्ञान है। ऐसी स्थिति में जब ज्ञान की इष्टसाधनता का ज्ञान हो जायगा तब इष्टसाधनताज्ञान के रूप में ही विषयीभूत ज्ञान के सिद्ध हो जाने पर जिज्ञासा उत्तन्न ही कैसे होगी? तात्पर्य यह कि जैसे दो
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दर्पणा आमने सामने रक्खे जायँ तो जो प्रतिबिंब एक दर्पण में पड़ेगा वह दूसरे दर्पणा में भी स्वभावतः पड़ जायगा, उसी प्रकार इष्टसाधनता- ज्ञान में भी प्रभविषयीभूतज्ञान आ ही जायगा-यदि विषयीभूतज्ञान का ही पता न होगा तो उसे इष्टसाधन समझा कैसे जायगा। तब उसी से प्रभ की निवृत्ति हो जायगी, फिर विषयीभूत ज्ञान की इच्छा उत्पन्न ही कैसे होगी। पर ऐशा न कहिए। कारण यह है कि-'किमेकं देवतं लोके= - जगत् में प्रधान देवता कौन है ?' इत्यादि प्रवाक्य से 'एकदैवतत्व के व्याप्य धर्म जिसके प्रकार हैं वह ज्ञान' इष्टसाधन है-सारांश यह कि प्रभकर्ता की जिज्ञासा 'एकदेवतत्व' के शरवांतर भेदों के विषय में है। इस ज्ञान से उत्पन्न होनेवाली इस वाक्य के प्रयोग करनेवाले की 'उक्त ज्ञान मुझे उत्पन्न हो' यह इच्छा अनुमित होती है। तात्पर्य यह कि जिस इष्टसाघनता के ज्ञान से आप जिज्ञासा का प्रतिबंध मान रहे हैं वह इष्टसाधनता का ज्ञान तो प्रयोक्ता की वास्तविक जिज्ञासा का उत्पादक मात्र है। यह वास्तविक विज्ञासा उच्तरवाक्य से उत्पन्न होने वाले ज्ञान में इष्टसाधनता के ज्ञान से उत्पन्न होती है। अभिप्राय यह कि प्रभवाक्य के प्रयोक्ता का इष्टसाधन है उत्तरवाक्यार्थ का ज्ञान, न कि, 'एकदेवतत्व' मात्र का ज्ञान, जो कि सामान्य ज्ञान है। यह सामान्य ज्ञान उत्तर वाक्य से उत्पन्न होनेवाले ज्ञान का बनक है औरर इसका ग्रहया तब होता है जब कि किसी (आप्तपुरुष) से देवतत्व- प्रकारक उपस्थिति (दैवतरूप सामान्य का स्मरय) और 'एक संबंधी का ज्ञान शन्य संबंधो का स्मारक होता है' इस ज्ञान के अरधीन 'देवत के व्याप्य धर्म' के रूप से उक्त सामान्यज्ञान की उपस्थिति ये दोनों उपस्थितियाँ हो जायँ। अब सोचिए कि प्रश्नवाक्य के प्रयोक्ता की वास्तविक्क जिज्ञासा का विषय, दैवतत्व के व्याप्यधर्म जिसका प्रकार है उस सामान्यरूप से
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दैवतत्वव्याप्यघर्म के अ्रंश में निरवच्छिन्न (आवरण रहित) प्रकारता से मुक्त 'विष्णुर्देवतम्=विष्णु (प्रधान) देवता है' इत्यादि ज्ञान ही है, अतः उच्चरवाक्य से उत्पन्न उन्हीं ज्ञानों से वाक्यप्रयोक्ता की इच्छा प्रतिबद्ध होती है, अतः वही वाक्य उत्तररूप हो सकता है। इस जिज्ञासा का जनकीभूत ज्ञान तो इस जिज्ञासा का विषय ही नहीं है, अतः आपका बताया हुआ इष्टसाघनताज्ञान इस जिज्ञासा का प्रति- बंधक नहीं होता। सो कोई दोष नहीं है। तात्पर्य यह कि पहले दोनों प्रकार के सामान्य धर्मों का जिसे बोध है वही प्रश्न करता है, अतः निरावरण धर्म ही उसकी जिज्ञासा का विषय होता है, सो 'विष्णु प्रधान देवता हैं' इत्यादि निरवच्छिन्न प्रकारता वाले उत्तर वाक्यों से ही उसकी जिज्ञासा शांत हो सकती है। इष्टसाधनताज्ञान अथवा एक दैवतत्व के व्याप्य धर्मों का सामान्य ज्ञान जो कि उस इच्छा के कारणरूप ज्ञान हैं वे तो जिज्ञासा का विषय ही नहीं है, तब उनसे जिज्ञासा शांत होने की बात करना ही व्यर्थ है। उत्तरालंकार के भेद उत्तरालंकार के प्रथमतः दो भेद हैं-उन्नीतप्रश्न (जिसमें प्रश्न ऊपर से लाया जाय) और निबद्धप्रश्न (जिसका प्रश्न पद्य में ही लिखा हो)। उन्नीतप्रश्न उत्तरालंकार का उदाहरण; जैसे- त्वमिव पथिक: प्रियो मे विटपिस्तोमेषु गमयति क्ेशान्। किमितोऽन्यत्कुशलं मे संप्रति यत् पान्थ ! जीवामि ॥ हे पथिक, मेरा प्रिय तुम्हारे समान (पथिक) है और वृक्ष-समूहों में (पेड़ों के नीचे) श्रांति मिटा रहा है, इससे अतिरिक्त मेरी कुशल कया है कि अभी बी रही हूँ।
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यहाँ किसी पथिक की कुटुंबिनी का अन्य पांथ के प्रति उत्तर है। इस उत्तर से पथिक द्वारा किए गए कुशलप्रश्न का अनुमान किया जाता है, क्योंकि कुशल न पूछने पर कुशल कहना नहीं बनता।
निबद्धप्रश्न उत्तरालंकार का उदाहरण; जैसे-
किमिति कृशाऽसि कृशोदरि ? किं तव परकीयवृत्तान्तैः। कथय तथापि मुदे मम कथयिष्यति याहि पान्थ तव जाया।।
(किसी पथिक ने कहा-) हे कृशोदरि, दुबली क्यों हो ? (उसने कहा-) तुम्हें दूसरों के वृच्ातों से क्या प्रयोधन ? (फिर कहा-) तब् भी कहिए, मुझे आनंद होगा (उसने कहा-) हे पर्थिक-जाइए, आपकी पत्नी आपसे कह देगी।
यहाँ प्रथम प्रश्न का व्यंग्य है-यदि कारय बता दो तो उपाय कर दूँगा और उत्तर का व्यंग्य है-मैं पतिव्रता हूँ, परपुरुष के सामने हेतु कहना उचित नहीं और न तुम उसका उपाय कर ही सकते हो। दूसरे प्रश्न का व्यंग्य है-पातिव्रत्य में क्या घरा है, यह तो अरचतुरों की केवल हठचेष्टा है, संसार का सार तो है अपने आपको और दूसरों को संतुष्ट करना और द्वितीय उत्तर का व्यंग्य है-जो मेरी दशा है वही तुम्हारी पत्नी की भी है। उपाय ही करना है तो उसी का करिए। कोई भी अपने घर को जलता छोड़कर दूसरे के घर की शरग नहीं बुझाता और यदि 'अपनी हानि सहकर भी परोपकार करना चाहिए' यह बुद्धि है तो ऐसे उपकार में प्रवृच तुम्हारी पत्नी का उपकार किसी दूसरे को करना पड़ेगा, अतः मेरे समान परपुरुष से दूर रहनेवाली उसका विरह तुम्हें ही दूर करना चाहिए। प्राचीनों का कथन है कि उन्नीतप्रश्न उत्तरालंकार में एक बार
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उत्वर सुंदर होता है, किंतु निबद्धप्रश्नोचरालंकार में प्रश्न और उच्तर के अनेक बार आने पर सुंदरता होती है। उत्तरालंकार के अन्य भेद पूर्वोंक्तरीत्या दो प्रकार का यह उच्चरालंकार प्रश्न और उत्तर में से किसी एक अथवा दोनों के साभिप्राय और निरभिप्राय होने के कारण प्रत्येक चार प्रकार का होता है, अतः ८ आठ भेद होते हैं।
उन्नीत साभिप्राय प्रश्न; जैसे- प्रियो हृदयवर्ती मे न मां मुश्चति जातुचित्। उत्तरे नावकाशोऽस्ति दूरतस्ते मनोरथः ॥ मेरा प्रिय मेरे हृदय में रहता है, मुझे कभी नहीं छोड़ता। तुम्हारा मनोरथ तो दूर रहा उत्तर देने को भी अवकाश नहीं है। यहाँ किसी पथिक द्वारा किया गया किसी पतिव्रता के प्रति 'तुम्हारा प्रिय कहाँ है ?' यह प्रश्न उन्नीत है, जिसमें यह अभिप्राय गर्मित है कि यदि प्रिय समीपवर्ती है तो उसे धोखा देकर और यदि दूर है तो स्वच्छंदता से हम दोनों का मन्मथविलास होगा, अन्यथा 'तुम्हारा मनोरथ तो दूर रहा' यह उत्तर असंगत हो जाता है। उत्तर तो स्पष्ट है, अतः अभिप्रायगर्मित नहीं है।
उन्नीतप्रश्न का साभिप्राय उत्तर; जैसे- सुवर्ास्य कृते तन्वि देशं देशमटाम्यहम्। तस्य दुष्प्रापताहेतोश्चिन्ताक्रान्तं मनो मम।। हे तन्वि ! सुवर्सा (सोना +सुंदर रूप) के लिए मैं देश देश घूम रहा हूँ, किंतु उसकी दुर्लभता के कारण मेरा मन चिंताक्रांत है।
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यहाँ किसी ग्रामीण स्री के 'तुम्हारा मन किस कारण चिंताक्रात है ?' इस स्पष्टार्थ प्रश्न का किसी नागरिक के द्वारा साभिप्राय उत्तर है कि 'यदि सुंदर रूप मुझे दे दो तो चिंता की निवृत्ति हो बायगी'।
उन्नीत प्रश्न वाले उत्तरालक्कार में साभिप्राय प्रश्नोत्तर; जैसे- रोगस्य ते चिकित्सां निदानमालोच्य सुन्दरि करिष्ये। मा हन्त ! कातरा भू रसक्रियायां नितान्तनिपुणोऽस्मि॥ हे सुंदरि ! निदान (मूल कारण) का विचार करके तुम्हारे रोग की चिकित्सा करूँगा। तुम घबराओ नहीं, मैं रसक्रिया (पारदादि रस बनाने + रसोत्पादन) में अत्यंत निपुया हूँ। यहाँ 'बिना पूछे किसी से न कहना चाहिए' इत्यादि नीति के अनुसार वैद्य की प्रतिज्ञा से तर्कित 'हे वैद् ! मेरे रोग की चिकित्सा करोगे ?' यह प्रश्न उन्नीत है। वह विदग्ध नायिकारूपी बोलनेवाली की विशिष्टता के कारणा संभोगरूप अभिप्राय से गर्मित है औरर उत्तर भी इसी अभिप्राय से गर्मित है। प्रश्न और उत्तर दोनों की निरभिप्रायता का 'त्वमिव पथिक:०'यह उदाहरण ऊपर दिया जा चुका है ये उन्नीतप्रश्नोचरालंकार के भेद हैं। इसी प्रकार निबद्धप्रश्न उत्तरालंकार के उदाहरण भी दे लेने चाहिए। वैसे तो उपर्युक्त 'किमिति कृशासि०' यह पद्य भी वक्ता के वैदग्भय और अवैदग्ध्य की व्यवस्था से चारों निबद्ध प्रश्नों का उदाहरण हो सकता है। उक्त भेदों के विषय में मतभेद इस विषय में कहा जाता है कि-इस अलंकार का जीवनमूल है प्रश्न और उत्तर दोनों का कई बार निबद्ध होना', क्योंकि चमत्कार
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का उदय उसी प्रकार हो सकता है, केवल एक बार लिखने से नहीं। अतः 'एक बार प्रश्न का एक बार उत्तर' अलंकार का विषय नहीं है। कडा जायगा कि तब तो 'उन्नीतप्रश्न उच्तरालंकार' में श्रव्यात्त हो जायगी, क्योंकि यहाँ प्रश्न एक ही होता है और वह पद्य में निबद्ध भी नहीं होता तथा उत्वर भी एक ही होता है। इसका उत्तर वे यह देते हैं कि-प्रश्न की उन्नीतता का अथ 'उत्तर द्वारा आचिप होना' नहीं है, किंतु प्रश्नोत्तर की परंपरा (अनेक प्रश्नों) में प्राचीन उत्तर के सुनने से उत्पन्न होना मात्र है-अर्थात् उस प्रश्न से पूर्व भी कोई प्रश्न होना चाहिए, अतः श्रनेकता श्र जाती है; जैसे -- श्यामं यज्ञोपवीतं तब किमिति १ मपीसंगमात् कुत्र जात: सोऽयं १ शीतांशुकन्याषयसि कथमभूक्जलं कज्लाक्तम् ?
लक्षातीयाश्रुधारासमुदितसरितां सर्वतः संगमेन ॥ (हे ब्राह्मया) तुम्हारी जनेऊ काली क्यों है? कालिख लग जाने से। यह कलौंच कहाँ लग गई ? नर्मदा के बल में। नर्मदा का जल काजल से मलिन कैसे हो गया ? क्रोधयुक्त पृथ्वीपति जहाँगीर' के शत्रुराजाओं की लाखों सुंदरियों की निरंतर अश्रुधाराओं से इकट्ठी नदियों के चारों ओर से मिल जाने के कारण। यहाँ 'यह जनेऊ का कालापन कहाँ हो गया ?' यह प्रश्न 'कालिख लग जाने से' इस उच्तर द्वारा उपजा है, अतः ऐसे प्राचीन उच्तर से उपजे हुए प्रश्न को 'उन्नीत प्रश्न' कहा जाता है। प्रथम प्रश्न तो
१ काव्यमालासंपादक की टिप्पी है कि 'नूरदीन' जहाँगीर का दूसरा नाम है।
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उन्नीत न होने पर भी उत्तर उठाने के लिए लिख दिया गया है। यहाँ कोई अलंकार नहीं है।
सो इस मत में पूर्वदर्शित उन्नीत प्रश्न उत्तरालंकार के उदाहरय ('त्वमिव पथिक:०' दि ) उदाहरण ही नहीं हैं। इन लोगों के मता- नुसार इस अलंकार के दो भेद भी 'उन्नीतप्रश्न' और 'निबद्धप्रश्न' नाम से नहीं कहे जाने चाहिए, किंतु 'उन्नीतप्रश्न' और 'अनुन्नीत- प्रश्न' इस नाम से होने चाहिए। सिद्धांत
वास्तव में तो प्रश्न और उत्तर यदि अरभिप्रायगर्मित हो तो उतने से ही चमत्कार हो जाने के कारण प्रश्नोत्तर के बार बार ग्रहय की कोई अपेक्षा नहीं है। हाँ, यदि प्रश्नोत्तर अभिप्रायगर्भ न हो तो 'निबद्धप्रश्न' भेद में प्रश्नोतर के बार बार ग्रहण करने से उत्पन्न चम- त्कार अपेच्तित है, किंतु 'आत्तिसप्रश्न' में तो यदि प्रश्न के आक्षेप से उत्पन्न चमत्कार को सहृदय लोग उच्तर मानते हैं तो एक बार प्रश्नो- च्र में भी अलंकारता होने दो। हमारा क्या बिगड़ता है।
अन्य भेद
उचरालंकार के दूसरे प्रकार से भी भेद संभव हैं। उदाहरणार्थ (प्रश्नोत्तर ) पद्य के अंतर्गत और पद्य के बहिर्गत होने से दो भेद हो सकते हैं। पद्यांतर्वर्ती प्रश्नोत्तर वाले भेद के भी पुनः दो भेद हो सकते हैं-(१) प्रभ और उत्तर दोनों के एक ही वाक्य में आ जाने से और (२) प्रभ ओर उत्तर के भिन्न भिन्न वाक्यों में आने से। पद्यां- तर्वर्ती और पद्यबहिर्वर्ती दोनों ही उच्चरों में पुनः बहुत से भेद हो सकते हैं-(१) जिसमें एक बार शब्द सुनना ही पर्यास हो, (२) जिसमें शब्द की आवृत्ति (दुहराना) पर्याप्त हो और (३) जहाँ अनेक प्रभों
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का एक ही पद से उत्तर दिया गया हो-इत्यादि। इनमें से कुछ के उदाहरय दिए जा रहे हैं-
पद्यांतर्वर्ती एकवाक्योद्गीर् प्रश्नोत्तर; जैसे- किंकुर्वते दरिद्राः कासारवती धरा मनोजतरा। कोपावनस्तिलोक्याम्
'किं कुर्वते दरिद्राः'-दरिद्र लोग क्या करते हैं? इस प्रभ का संस्कृत भाषा में यही वाक्य उत्तर है-दरिद्रा: किंकुर्वते (दरिद्री लोग किंकरता-चाकरी-करते हैं)। इसी प्रकार 'का सारवती घरा मनो- ज्ञतरा' (सारवती मनोज्ञतरा घरा का) कौनसी पृथ्वी सारयुक्त तथा अत्यंत मनोज्ञ होती है ? इस प्रभ का संस्कृत भाषा में उत्तर है- 'कासारवती घरा मनोज्ञतरा' (तालाबों वाली पृथ्वी अत्यंत मनोज्ञ होती है)। इसी प्रकार 'कोऽपावनस्त्रिलोक्याम्'-त्रिलोकी में अपावन (अपवित्र) कौन है ? इस प्रभ का संस्कृत भापा में उत्तर है 'कोपावनः' (क्रोध रखने वाला-क्रोधी)।
इति शुभम्
१ दुर्भाग्य है कि यह अ्रन्थ इतना ही प्राप्त है।
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परिशिष्ट नं० १ पारिभाषिक शब्दों के अर्थ
उपक्रम
प्रस्तुत अनुवाद में संस्कृत के पारिभाषिक शब्द, यथासंभव, हिंदी में न आने देने का पूर्ण अवधान रखा गया है। इतने पर भी कुछ. नव्यन्याय के शब्द ऐसे हैं कि जिनके समानार्थक शब्द, हिंदी तो क्या, शायद संसार की किसी भी प्रचलित भाषा में, बिना नवीन निर्माण के कदाचित् ही प्राप्त हो सकें; ऐसे शब्द कहीं कहीं आए ही हैं। उन सबका अनुवाद ठेठ हिंदी में तो असंभव ही था, और यदि उनके समानार्थक कुछ नए सरल शब्द तैयार किए भी जाते तो वे संकेतज्ञान के अभाव तथा पर्याप्तार्थ-निदर्शक न होने के कारण, संस्कृत तथा हिंदी दोनों ही भाषाओं के अध्येताओं के लिये भ्रमजनक ही हो सकते थे। अतः इसकी अपेक्षा यही मार्ग सरल समझा गया कि ऐसे शब्दों की एक सूची अ्रंथ के अंत में दे दी जाय और उनके पारिभाषिक अर्थ-जहाँ तक हो सके-सरल हिंदी में समझा दिए बायँ। यद्पि ऐसे पारिभाषिक शब्दों में से कुछ के शर्थ जहाँ तहाँ टिप्पणी अथवा ब्रेकिट में भी दिए गए हैं, पर वे पर्याप् और यथेष्ट सुविधाजनक नहीं है। कारय, किसी महाग्रंथ के एक प्रकरय में आए अर्थ को बिना किसी विशेष संकेत के पुनः हूँढ़ निकालना अति कठिन कार्य है, और यदि कोई संकेत कर भी दिया जाय तो भी अनेक शब्दों के अथों के लिये भिन्न-भिन्न पृष्ठों को बार बार उलटते रहना, पाठकों को अ्नु- भव होगा कि घोर असुविधाजनक होता है, और बार-बार एक शब्द २४
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के विस्तृत शर्थ को दुहराते रहना अनुचित प्रपंचमात्र होता, अ्रतः वैसे शन्दों की एक वर्गक्रम-सूची तैयार कर ली गई है और यथाशक्य उदाहरयादि सहित उनके सरल अर्थ नीचे लिखे बा रहे हैं- १-अतिव्याप्ति-किसी व्यक्ति अथवा वस्तु के लक्षणा का उसके अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति अथवा वस्तु में चला जाना अरतिव्याप्ति कहलाता है; जैसे 'गाय' का लक्षय 'सींगवाली' बनाया जाय तो इस लक्षणा की भैस आदि अन्य पशुश्ों में अतिव्यापि होगी। २-अध्यवसान-उपमान (विषयी) उपमेय (विषय) में से किसी एक मात्र को लिखकर अन्य का उसके साथ मान लिया जाने- वाला अभेद अध्यवसान कहलाता है; जैसे 'महलों की छतों पर चन्द्र- माशों की पंक्तियाँ सुशोभित हो रही है' यहाँ चंद्रमारूपी उपमान के साथ कामिनियों के सुखों का शभेद मान लिया गया है। ३-अनुयोगी-संबंध श्थवा सादृश्य दो वस्तुओं में होता है। उनमें से जिस वस्तु में किसी वस्तु का संबंध अथवा सादृश्य बताया जाय वह अनुयोगी कहलाता है; जैसे 'राम श्याम का लड़का है', 'कामिनी का मुख चंद्रमा के समान है' इन वाक्यों में क्रमशः राम और मुख अनुयोगी हुए। ४-अन्यथानुपपत्ति-जहाँ किसी वस्तु के न होने के कारण शरन्य वस्तु का होना असंभव हो जाय वहाँ श्रन्यथानुपपच्ति मानी जाती है; जैसे शब्दसे शर्थ के ज्ञान में अन्यथानुपपत्ति के द्वारा 'संकेत ज्ञान' को हेतु माना जाता है, क्योंकि शब्द शर्थ दोनों के प्रत्यक्ष हो ाने पर भी-अर्थात् कानों से शब्द सुन लें और वस्तु सामने प़ी रहे तब भी-बिना 'संकेतज्ञान' के अर्थावबोध असंभव है, जैसा कि संस्कृत या अँगरेजी न बाननेवाले के सामने संस्कृत या अँगरेजी में कहने पर होता है।
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५-अवच्छेदक-जो धर्म न न्यून में रहे न अधिक में उसे अवच्छेदक कहते हैं; 'जैसे घट में घटत्व'। क्योंकि संसार का कोई घड़ा ऐसा नहीं जिसमें यह धर्म न रहता हो और न यह धर्म घड़े के अतिरिक्त किसी वस्तु में ही रहता है। ६-अव्याप्ति-अधूरे लक्षणा में शव्याप्ति दोष समझा जाता है; जैसे गाय का लक्षण 'कपिलापन'; यह लक्षण अधूरा है, क्योंकि सभी गायें कपिला नहीं होतीं। ७-असंगति-प्रमाण के अभाव में किसी बात का ठीक-ठीफ न जमना असंगति कहलाती है; जैसे 'पृथिवी चपटी है' यह बात असंगत है, क्योंकि इसमें पुरःस्फूर्तिक दृष्टि के अतिरिक्त कोई प्रमाण नहीं। 5-असंभव-जिस वस्तु का लक्षण बनावें उस चीज में उस लक्षया का स्वथा न रहना 'असंभव' दोष कहलाता है; जैसे गाय का लक्षण 'एक खुरवाली होना'। यह लक्षणा शसंभव दोष से अस्त है; क्योंकि कोई भी गाय एक खुरवाली नहीं होती।
६-आत्माश्रय-जहाँ स्वयं उस वस्तु के समझ लिए जाने पर ही वह वस्तु समझी जा सके वहाँ 'आत्माश्रय' दोष होता है; जैसे कोई बालक पूछे कि 'नकशे में काशी कहाँ है?' और उसका उत्तर दिया जाय कि 'नहाँ बनारस है', यहाँ आत्माश्रय दोष होगा, क्योंकि जो बनारस है वही काशी है, अतएव जब तक काशी का स्थान नहीं जान लेगा, तब तक बनारस का भी वह नहीं जान सकता। १०-आरोप-जिसमें जो धर्म नहीं है उसको उस धर्म से युक्त बताना आरोप कहलाता है; जैसे 'मुखचंद्र', यहाँ मुख के चंद्रत्व धर्म से युक्त न होने पर भी उसे चंद्र (चंद्रत्व धर्म से युक्त) बताया था
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रहा है। यहाँ इतना और याद रखना चाहिए कि साहित्य की परि- भाषा के अनुसार जहाँ 'मुख' और 'चंद्र' दोनों शब्द लिखे हों, वहीं आरोप माना जाता है और जहाँ उपमान को लिखकर उपमेय को अ्रध्याहृत (understood) समझा जाय वहाँ अध्यवसान होता है। ११-आहार्यज्ञान-बाघित जानते हुए भी कल्पित' ज्ञान को श्रहार्यज्ञान कहते हैं, जैसे 'मुख को चंद्रमा कहना' अथवा श्रग के लिये यह कहना कि 'यदि आग ठंडी हो जाय', क्योंकि यहाँ प्रत्येक वक्ता यह बानते हुए भी कि, न तो मुख चंद्रमा हो सकता है; न आरग ठंडी हो सकती है, इन बातों को मान लेता है। १२-उपमान-जिसके साथ किसी की तुलना की जाय उसे उपमान कहते हैं, जैसे मुख की चंद्रमा के साथ तुलना की जाय तो चंद्रमा उपमान होगा। १३-उपमेय-जिसकी तुलना की जाय वह उपमेय होता है; जैसे उपर्युक्त उदाहरय में मुख। १४-गौरव-किसी भी बात के मात्रा से अधिक बढ़ जाने में गौरव दोष माना जाता है; जैसे जातिवाचक 'गौ' आदि पदों का जाति में संकेत न मानकर व्यक्तियों में माना जाय तो गौरव दोष होगा, क्योंकि व्यक्ति अनंत हैं, अतः अनंत बार अनंत संकेत मानने पड़ेंगे। १५-धर्म-बो स्वतंत्र न रहकर केवल दूसरे के आश्रित ही रहे वह 'धर्म' कहलाता है, जैसे जाति, गुय, क्रिया आदि। १६-निर्विकल्पक ज्ञान-किसी भी वस्तु को हम तभी ठीक- ठीक समझ सकते हैं, जब उस चीज के विशेष धर्म (जाति आदि) को अच्छी तरह समझ लें; जैसे शँधेरे में मनुष्य है अथवा खंभा- इस बात को हम तभी कह सकते हैं बब उस चीज में मनुष्यपन अथवा
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खंभापन का इमको पहले ज्ञान हो जाय। इस तरह यह सिद्ध होता है कि हम किसी भी व्यक्ति या वस्तु को ठीक-ठीक तभी पान सकते हैं जब व्यक्ति श्रथवा वस्तु और उसके विशेष धर्म (मनुष्यपन आदि) दोनों का ज्ञान हो। इस पूरे ज्ञान को सविकल्पक ज्ञान कहते हैं। इस तरह यह सिद्ध हुआ!कि किसी भी वस्तु शथवा व्यक्ति का ज्ञान तो बिना विशेष धर्म के हो नहीं सकता, किंतु सविकल्पक ज्ञान के पूर्व जो विशेष धर्म (मनुष्यत्व आदि) का ज्ञान होता है वह निर्विकल्पक होता है, क्योंकि विशेष धर्म पर भी विशेष धर्म मानकर यदि उजे भी सविकल्पक ज्ञान माना जाय तो अनवस्था हो जायगी उसका कहीं अंत ही न आवेगा। १७-प्रकार-किसी विशिष्ट (विशेषण सहित) वस्तु के विशेषण रूप में ज्ञात होनेवाले धर्म को प्रकार कहते हैं; जैसे 'घट' उस वस्तु का नाम है जिसमें घटत्वरूपी विशेष धर्म रहता है, अतः घट शब्द का अर्थ होता है 'घटत्व धर्म से युक्त वस्तु'। यहाँ 'घटत्व' धर्म प्रकार कहलावेगा और 'घट' पदार्थं विशेष्य। मोटे तौर से यह समझना चाहिए कि विशेषण को प्रकार कहते हैं। १८-प्रकृति-प्रत्यय-शब्द का वह मूल भाग जिससे कोई भी प्रत्यय किया जाता है प्रकृति कहलाता है, जैसे 'जयपुरीय' शब्द में 'नयपुर' प्रकृति है और 'ईय' प्रत्यय। १६-प्रतियोगी-जिस वस्तु का अभाव, संबंध अथवा सादश्य बताया जाय वह वस्तु प्रतियोगी कहलाती है; जैसे 'कामिनी का मुख चंद्रमा के समान है' यहाँ चंद्रमा का सादृश्य कामिनी के मुख में बताया गया है, अतः चंद्रमा प्रतियोगी हुआ। यह अनुयोगी का बिलकुल उलटा हैं। २०-प्रातिपदिक-बिना विभक्ति के या (हिंदी की कारक दृष्टि से) केवल (कर्चा कर्म आदि संज्ञाओं से रहित) नाम को प्रातिपदिक कहते हैं, जैसे 'राम'।
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२१-लाघव-किसी बात को बहुत न बढ़ाना पड़े और थोड़े ही में काम हो बाय तो वहाँ लाघव गुण होता है; जैसे 'साहश्य' को अ्रतिरिक्त पदार्थ न मानकर समानधर्मरूप मान लेने में। यह 'गौरव" दोष का बिलकुल उलटा है। २२-विषय-संदर्भ में तुलना आदि के लिये प्रस्तुत वस्तु को विषय कहते हैं, जैसे उपमेय। २३-विषयी-जिस अप्रस्तुत वस्तु को प्रस्तुत वस्तु के साथ तुलना आदि के लिये उपस्थित किया जाय उसे विषयी कहते हैं; जैसे उपमान। २४-व्यभिचार-अभीष्ट भाग से अन्यत्र भी चले जानेवाले हेतु आदि में व्यभिचार दोष होता है, जैसे 'इस घर में आग है; क्योंकि इस घर का इमको पूरा पता है'। यहाँ 'क्योंकि इमको इस घर का पूरा पता है' इस हेतु में व्यभिचार दोष है। कारणा, पूरा पता तो आपको घर का ही नहीं, किंतु और कई वस्तुओं का भी है, तो क्या उन सब वस्तुओं में भी आग नहीं होनी चाहिए। २५-व्याषार-किसी वस्तु से पैदा होकर उससे पैदा होनेवाली वस्तु को पैदा करनेवाले को व्यापार कहते हैं; जैसे लकड़ी के काटने में 'कुल्हाड़े और लकड़ी का संयोग'; क्योंकि वह कुल्हाड़े से पैदा होता है और 'लकड़ी के काटने' को पैदा करता है, बिना लकड़ी से मिले कुल्हाड़ा लकड़ी को काट नहीं सकता। २६-सविकल्पक ज्ञान-देखिए (नं० १६) निर्विकल्पक ज्ञान। २७-संसर्ग-एक पद के अर्थ से दूसरे पद के अर्थ के संबंध को शान्दबोध में संसर्ग कहते हैं, जैसे 'पंडित रामचंद्र इन पदों में पंडित और रामचंद्र इन दोनों पदों के श्थों का शभेद संसर्ग है,
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क्योंकि जो पंडित है वही रामचंद्र है और बो रामचंद्र है वही पंडित है। २5-सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति-सविकल्पक ज्ञान के लक्षय (नं० २६ और १६) में यह बात अच्छी तरह समझा दी गई है कि-बिना किसी विशेष धर्म के किसी भी वस्तु का ज्ञान नहीं होता। वह विशेष धर्म 'त्व' प्रत्यय के द्वारा समझाया जाता है, जैसे गाय में 'गोक्'। इस धर्म को 'सामान्य' (अथवा 'जाति') कहते हैं। इमें एक गौ के देखने पर जो अन्य गौओं का ज्ञान हो बाता है-हमारे ज्ञान के अंदर अन्य सभी गौएँ प्रत्यक्ष रूप में आ जाती हैं-यह प्रत्यक्ष ज्ञान उप्युक्त 'सामान्य' के द्वारा अथवा उस 'सामान्य' के ज्ञान द्वारा होता है। इस तरह उस अलौकिक प्रत्यक्ष करवा देनेवाले सामान्य अथवा ऐसे सामान्य के ज्ञान को 'सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति' कहते हैं।
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उदाहत तथा उद्धृत श्लोकों के प्रतीकों की वर्णानुक्रम सूची
प्रतीक पृष्ठसंख्या प्रतीक पृष्ठसंख्या
भ श्रयमतिजरठाः ५८ श्रम्मानि दत्वा हेमाद्रि २६५ श्रयि लावण्यजलाशय ३८ अ्रङ्ग: सुकुमारतरैः सा १५६ श्रये राघन्नाकर्णाय १०३,२०१ श्रचतुर्वदनो ब्रह्मा १५७ शरण्यानी क्वेयं १६२ अथापगूढे शरदा २६ अ्रर्जुनस्य गुरुर्माया ४७ अधरेण समागमाद्रदानां ३४५ अर्धे दानववैरिया १०६ श्रघुना पुलिनं तत्र २६४ अ्रलभ्यं सौरभ्यं हरति २३० २४७ अलं कर्तु कगों १६ श्रनाथ: स्नेहार्द्राम् १८७ अलं हिमानी ४६ अनापदि विना ३६ शविरलविगलद्दानो ५६ श्रनायि देशः ३१६ शरसावुदयमारूढः ५८ अरने कार्थस्य शब्दस्य ५६ श्रस्थिमालामर्यीं दत्वा २६५ अ्रन्धेन पातभीत्या १७ श्रसंभृतं मणडन १४६ अन्यत्र करणीयस्य १६३ अरहन्नेको रणे रामो २२६ प्रन्यासु तावदुप श्रहो सुसदशी वृत्ति: ४८ श्रपकुर्वद् मिरनिशं ६८ अपि बत गुरु गवे ३४२ आताम्रा सिन्धुकन्या २६० श्रभूदप्रत्यूह: ११२ आददान: पर द्रव्यं ३१३ श्रमृतलहरी चन्द्रजोत्स्ा १७० आनम्य वल्गुवचने ७६ श्रम्लायन् यदराति २५० श्रापेदिरेम्बरपथं
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( २ ) प्रतीक पृष्ठसंरया । प्रवीक आबध्नास्यलफान् २ कान्तारे विलपन्तीनां पृष्ठ संरया १२६ श्ायाता कमलासनत्य २५६ कारणास्य निषेधेन १४० आयातैव निशा मनो २६६ किमहं कथयामि योषिताम् २६६ किमहं वदामि खल उच्चैग जैर टन १०२ १८६ किमिति कृशासि कृशोदरि ३६२ उत्क्षिप्ता: कबरीभरं १७
२६७ उत्तमानामपि स्तीयां किशोरभावं परिहाय २६७ उत्सक्के तव गङ्गे १६ किं कुवते दरिद्राः ३६७ उदयति विततोध्वरश्मिरजा ३२१ किं जल्पसि मुग्धतया ३०३ उदितं मण्डलभिन्दोः २६० किं तीर्थे हरिपादपद्म उदुम्बरफनानीव किं नाम तेन न कृतं २७१ २७८ २०६ उदेति सविता ताम्र: २१६ किं निःशङ्क शेषे किं ब्रूमस्तव वीरता ११४ उन्नतः प्रोल्लसद्ार: ५६
७७ उपकारमेव कुरुते २३८ कि मित्रमन्ते सुकृतं २७२ उपनिषदः परिपीताः १५२ किं वृत्तान्तैः पर कीर्तिप्रतापौ भातस्ते १०५ उर्वी शासति मयि १०१ २५५ ए कुचाभ्यामालीढं सहज ३४६ एको विश्वसतां हरामि ३१६ कुवलयलद्षमीं हरते १८४ कुसुमानि शरा मृगाल १२७ क कथय कथमिवाशा २६७ कृतमपि महोपकारं ७६ कमलमनम्भसि कमले १५० कृत्वा सूत्रे: सुगूढार्थे: ३२ करकलित चक्रघटनो ४६ केलीमन्दिरभागतस्य करिकुम्भतुलामुरोजयो: २३७,३०४ कोदरडच्युतकाण्ड ३२३ क्रीढन्ति प्रविकचलोचनाः २०२. कर्णारुन्तुदमन्तरेण २४७ क्व वा राम: कामप्रतिभट २६६ कपूर इव दग्घोपि व सूर्यप्रभवो वंश: ३१४ १५४
३१५ कस्तृप्येन्मार्मिक २४४ | क्व शुक्तय: क्व वा भुक्का: १८१
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( ३ )
प्रतीक पृष्ठसंख्या प्रतीक पृष्ठसंख्या क्व सा कुसुमसाराज्ज्री १८२ क्वाहं तमोमहदहं १६४ तद्दर्शनोपायविमर्शनार्थ ३२४ ख तम्वी ममोहरा १८ खञ्जनदशा निकु्ज खर्वीकृतेन्द्रगर्व १७३ तपोनिधे कौशिक ११६ ४२ तवाग्रे यदि दारिद्रयम् २८१ खलानामुक्तयो हन्त १२८ खिन्नोसि मुख् शलं तवालम्बादम्ब स्फुरद २२६ १७६ तस्माद्युगान्त ४५ ग गरिमायमर्पयित्वा तष्मिन्मणिब्रात २४६ २६६ ७५ गिरयो गुरवस्तेभ्यो तावत्कोकिल २२२ १६३ तीर्थे गंगा तदितरदपां गिरामविषयो २७२ त्पन्ते तीर्थानि २२८ गुञ्जन्ति मञ्जु परितो २५२ गुपबृद्धी परे त्वत्खड् गखण्डित १६४ ३० त्वचो जन्म हिमांशुशेखर ३१० च ३०६ चकोरनयनानन्दि २० त्वद्विपक्षमहीपाला: चक्राभिघातप्रसभा ६० त्वमिव पथिकः प्रियो मे ३६१ चाञ्चल्ययोगि नयनं ६४ त्वयि दृष्टे त्वया दष्टे १२८ ३२५ चेलाञ्चलेनाननशीतररिंम १० ३२८ त्वय्यागते किमिति त्वमवश्यं सिसच्षन् १२० ज जङघाकाण्डोरुनालो त्वां गीर्वायगुरुं १२१ १६८ पम्बीरश्रियम तिलङ्ध्य त्वां सुन्दरीनिवह २२२ दू बलकुम्भमुम्भितरसं दन्तप्रभा पुष्पचिता २१ चितमौक्तिकसंपदो २६६ दिगन्ते श्रूयन्ते ७१
वितेन्द्रियत्वं विनयस्य २१४ दीनद्रुमा बर्चोभि: २०७ नीवितं मृत्युनालीढं दीनानामथ परिहाय २४३
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(४ )
प्रतीक पृष्ठसंख्या दूरीकर्तु प्रियं बाला पृष्ठसंरूवा प्रतीक १७२ निभाल्य भूयो निज ३०४ हशा दग्घं मनसिजं २०६ निरुपादानसंभार १४०
दृश्यतेऽनुदिते यस्मिन् १५४ निर्मलाम्बररम्यश्रीः २४
दृष्टिर्मृगीद्शोत्यन्तं १५६ निलक्ष्मी काऽभवत् १३
देव त्वमेव पाता ५० निषेधो वक्तुमिष्टस्य ११४
देव त्वां परितः १७,१०३,२६१ निष्णातोपि च वेदान्ते धौरत्र क्वचिदाश्रिता १६५ नीतो नामान्तिकं तन्व्या ३४५
द्रुमपंकजविद्वांसः २५४ ३५६
द्विजराज कलाधार ४१ नैर्गुरायमेव ३४२
ध प
धर्मेग बुद्धिस्तव देव २२० २२६
न परत्वादन्तरङ्गत्वात् १८६ नन्वाश्रयस्थितिरियं २६२ परपुरुषदृदष्टिपात १६६
न भवानिह मे लक्ष्यः २७६ परार्थव्यासङ्गादुप ३१
न मिश्रयति लोचने १७५ परिफुल्लाव्मनयना २५
नयने सुदृशां पुरो २०२ परोपसर्पंणानन्त १०७
नरेन्द्रमौले न वयं १२२ पाटीरट्रुभुजङ्गपुङ्गव २६२
नवप्रसङ्क'दयितस्य २६६ पाण्डित्येन प्रचण्डेन २०८
न वयं कवयस्तव ११७ पासिडत्यं परिहृत्य ७६
न सोस्ति प्रत्ययो २१८,२६७ पुरा यत्र स्रोत: २७
नान्यास्ति किं भूमितले ३१५ पुरा सरसि मानसे ७२
नार्यः स योन २१६ पुरो गीर्वाणानां १७५
निषदोषावृतमनसा २४६ पूर्व नयनयोलग्ना २६३
नितरां धनमाप्तुं १८५ प्रणिपत्य विधे भवन्तमद्दा ३३६
नितरां नीचोस्मीति ७२ प्रतिपलमखिलॉल्लोकान् १५२
नितरां परुषा ७७ प्रतीपसूपैरिव किं १३६
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५ )
प्रतीफ पृष्ठसंख्या प्रतीक प्रथमं चुम्बितचरणा २६३ मध्येगलं विहरतां पृष्ठसंख्या ३३३ प्रथमं श्रितकञ्जकोरका २६१ मध्ये सुधासमुद्रस्य मन्त्रार्पितहवि ३१२ प्रभातसमयप्रभां १७६ १८४ प्रसुरपि याचितुकामो २४५ ३५ प्राखानपय सीतां वा २८३ मन्थाचलभ्रमणवेग ३०९ प्रादुर्भवति पयोदे २६० मन्मथामात्यमायान्तं प्रियो हृदयवर्ती मे २५१ ३६२ मम रूपकी तिमहरद् ३०० मलिनेऽपि रागपूर्णा ३, ७५ बड़वानलकालकूट १८५ बन्धोन्मुक्त्ये खलु महत: परमव्यक्तम् २२ १६० ब्रह्माण्डमण्डले भान्ति मामनुरक्तां हित्वा २७७ १६३ बालक नाहं दूती माहात्म्यस्य परोवधि: ३०४ १२५ बिम्बोष्ठ एव रागस्ते मां पाहीति विधि: ११७ २६१ मुकुलितनयनं करिणी १७७ भ मृगमीनसज्जनानां १४८ भक्तिप्रह्विलोकन प्ररायिनी मृग्यक्च दर्भाङकुर २३४ भगवद्वदनाम्भोज १५५ मोहं नगत्त्रयभुवां १६४ भद्रात्मनो दुरधिरोह ५७ य भवत्या हि ब्रात्याघम २४० २३३ भवद्मवन ३३७ यथोर्ध्वात्तः पितश्यम्बु १६७ भाग्यं ते शाल्मलितरो १०५ यथौषघिरसा: सर्वे ३२ भूषितानि हरेर्भक्तेः २३१ यदवधि विलासभवन १४६ भेदाग्रहेण लिद्गानां ३४६ यदि ते चरणाम्बुजं हदा २७६ यश्चर गात्राणीकृत ६६ मकरालयस्य कुचौ म २५२ यस्मिन् खेलति सर्वंतः ७१ दकामविमोहतमत्सरा ३७ यस्मिन् विशेषसामान्य २४६ मद्ागि मा कुरु १२४ यस्मिन् शासति २७२
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( ६)
प्रतीक पृष्ठसंख्या प्रतीफ पृष्ठ संख्या यस्मिन् हिमानीनिकरावदाते ३५१ वल्मी कोदर सम्भूत ३०८. यस्य किंचिंदपकर्तुमक्षमः ३०० वसुधावलयपुरन्दर ११२ युक्तं तु याते दिवमासफेन्दौ २०२ विचारिते महिमनि १२८ युक्तं सभार्या खल १८८ विदूरादाश्चर्य ये त्वां ध्यायन्ति २६० १०७ विधिरत्यन्तमप्रास्ते २६६ येनास्यभ्युदितेन ७३ २२७ यौवनोद्गमनितान्त २५४ दिनेव शस्त्रं १३८ यं प्रेक्ष्य चिररूढापि ६१ विबोधयन् कर ४ य: कौमारहर: १५६ विमुञ्चसि यदि प्रिय २०८
रवितुरगदिग्गजेषु र ३४४ विशालास्मामा्याम् २३०
राज्याभिषेकमाज्ञाय ३४ विश्वास्य मधुरवचनैः २३०
रामो विषयते यस्य ३२० विष्वद्रीचा भुवन १६१
रीति गिराममृत ११४ विहाय संसारमहामरुस्थली ४१
रूपारुचिं निरसितुं वीक्ष्य रामं घनश्यामं १७४ २४८
रे खल तव खलु वृन्दापितृगहनचरौ ११७ २५५
रेरे मनो मम मनो २६८ वेत्रत्वचा तुल्यरुचां वधूनां ३५८
रोगस्य ते चिफित्सां निदान ३६४ व्यागुञ्जन्मधुकर श
लभ्येत पुपयैगंहिगी ल २१३ शरीरं ज्ञानषननम् २६३
लीलालुण्ठितशारदा २७५ शशशृङ्गधनुलसत्करा: ३११
लुन्धो न विसृज्यत्यर्थ २१० श्यामं यज्ञोपवीतं तव ३६५
लोकानां विपदं १६२ श्रियो मे मा सन्तु ३३६
लोभाद्वराटिकानां २०३,३२३ श्रोणीबन्धस्त्यमति तनुतां २६२
व श्वपाकानां व्रातैः ३३१ वनान्त: खेलन्ती १८० ३३२ वपुःप्रादुर्भावा २४५ ११५,११८
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( )
पृष्ठसंरया प्रतीक पृष्ठसंख्या प्रतीफ स संसारे चेतनास्तत्र २२२ स हत्यमुद्दीक्ष्य ३५ रखलन्ती स्वर्लोंकादवनि स एफस्नीि १४३ १५३,१५४ स्तबकभरैललिताभि: ३५२ सदैव स्नेहाद्रे सुरतटिनि २७७ स्थितेऽपि सूर्यें पग्मिन्यो ३३ सदयोगासद्योगसद २६५ स्पृशति त्वयि यदि १५८ स पण्डितो यः स्वहितार्थ २१६ स्मरदीपदीपदृष्टेः २६६ समुत्पचिः पद्माभरय २६१ स्वर्गापवर्गा २१३ समुपागतवति दैवात् ८४ स्वसिद्धये पराक्षेप: ६६ सरबस्कां पाण्डुवर्णा ७६ स्वस्वव्याप्टृतिमग्नमानसतया १६१ सरसिरुहोदरसुरभावधरित ३५० स्विद्यति सा पथि यान्ती स वक्तुमखिलान् १२२ ह साधु दूति पुनः साधु ११० सुदृशो वितरत्न १६६ हतो वा प्राप्त्यसि २८४ इरिकरसंगादधिक सुराणामारामादिह ४८ ११३ सुवर्यास्य कृते तन्वि देशं इरिश्रन्द्रेग संज्ञता: ३६३ ३१२ हर्षयन्ति चगादेव सूर्याचन्द्रमसौ यस्य १२८ हालाहलसमो २३ सृष्टः सृष्टिकृता ७८ हिमाद्रिं त्वद्यशोमृष्टम् सेवायां यदि साभिलाष २५४ २७० हिंसा प्रधान: खलु संभूत्यर्थ सकलजगतो ३३१ ४४
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शुद्धि-पत्र
पृष्ठ पंक्ति श्रशुद्ध शुद्ध १ १३ श्रत्युपस्थापिता प्रकृत श्रुत्युपस्थापिताप्रकृत १ १४ भावमानाप्रकृत भासमानप्रकृत १२ ६ व्यजक व्यंजक
१२ १५ उचिय उचित १८ को नो
२४ १७ रम्मश्री रम्यश्रीः २७ ६ का स्थिति की स्थिति २=(टिप्पणी) ६ व्यग्य व्यंग्य ३२ ७ श्रषधियों के शषघियों के ४ पद्मिनियों पद्मिनियाँ २६ ७ ताद्रुप्य ताद्रूप्य २६ १६ यह प्रतीत होता हैं इटादो ३७ १४ शरयुष्टार्थ श्रपुष्टार्थ ३६ १८ शौच मृचतिका से शौच ४६ १ विरिश्चिः न भ्रलम् विरिश्चिः ४८ गुम होना है तुम्हारे सामने गुम हो जाती है ४८(टिप्पणी) ६ ककड़ी के तकड़ी की ४७ १ प्रकृति प्रकृत ५५ १५ पर भी वह। पर भी वह ५६ ६ धारातासिक्त धारासारासिक्त ६१(टिप्पणी) उनके उनने
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( २ )
पंक्ति ऋ्रशुद्ध शुद्ध
६० ४ वही वही
६१ १५ पर्यावसान पर्यवसान
१०१ १७ उर्वी शासति उर्वी शासति
११५ १८ श्रप्राकारणिक अ्रप्राकरणिक
१४२ ३ हशौ हशी
१५५ १७ तृपाऽधिक तृष्णाऽिक
१५७ १ पुरुषस्थसिंहासनं पुरुषस्यासिंहासन
१५७ १४ वपुमान् वपुष्मान्
२०१ दो प्रकार दो प्रकार का
२३४ ६ तुम्हारे गति तुम्हारी गति
२२६ १८ सामर्थ्य समथ्य
२६० १३ त्रपाचूर्य चारं त्रपाघूर्णावारं
२६५ १८ आस्थिमाला अस्थिमाला
२७२ तदितरमपां तदितरदपां
२८६ पदाथा पदार्थों
३०३ १५ तदा: तदा
३०७ १२ मेद का गति भेद कां गति
३१८ १३ का आहार्य के शहार्य
३१६ आ्रापने आ्रापने श्राज
३२० ४ धमणि धर्मिगि
३२८ १ चेलांजलेन चेलाञ्लेन
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लेखक का परिचय
आसन्नासन्नपृथ्वीपरिवृढपरिषत्पूज्यपादारविन्दा बन्दी-टोडाधिपेभ्यः सबहुमति समासादिताजीवनाञ्। ऋग्वेदेऽधीतिनः सत्कुशिककुलभुवः ख्यातवैश्वानरत्वा ज्ञातेर्नाम्नाऽथ धाम्नाऽप्यतुलितयशसो लोकनाथादिमिश्राः।। येषामभूदभिजनो जनवन्दनीया जन्मक्षितिर्मधुपुरी मधुसूदनस्य। लोकोत्तरेण कविकर्मणि नैपुऐोन ये यत्सियश्च जगति प्रथितप्रभावाः। तेषां कुले कलितकीर्तिकुलेऽवलेप- हीन: स्वधर्मनिरतः समवाप्तविद्यः। श्रीसूर्यमल्लधनिकप्रवरात्मजश्री - श्रीनाथसूनुरभवन्मथुरादिलाल:।। सस्यात्मजन्मा संप्राप्तसाहित्याचार्यसत्पद्:। पुरुषोत्तमशर्माख्यश्च् तुर्वेदीति विश्रुतः।। अनेकराजपुत्राणां शिक्षको राजमानित:। शुद्धाद्वैताख्यवेदान्वदर्शने विहितश्रमः ॥ साहित्यमार्मिकैर्यस्य मार्मिकत्वं प्रशस्यते। रसगङ्गाघरस्तेन भाषायां समनूदितः । स चायं विदुषां चित्तविनोदाय समर्पित: । प्रयास: पुष्पमालेव सौमनस्येन गृह्यताम्। इस ग्रन्थ (हिन्दी-रसगख्गाघर) के प्रणेता पं० पुरुषोचमशर्मा चतुर्वेदी माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मय हैं।
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( २)
इनका वेद ऋग्वेद तथा शाखा आश्वलायन है। गोत्र सौश्रवस और जातीय उपनाम वैश्वानर (वैसांघर) है। पूर्वओों का वंशवृक्ष यह है- मिश्रलोकनाथ जी
वैभनाथ जी
सूयमल जी I-2- श्रीनाथ की
मथुरालाल जी - पुरुषोत्तमशर्मा चतुर्वेदी साहित्याचार्य, शुद्धाद्वैत वेदान्त के मान्य विद्वान्। जन्म तिथि संवत् १६५५ (विक्रम) भाद्रपद कृष्ण ६ बुधवार है। इनकी लिखित पुस्तकों में से कुछ विशिष्ट पुस्तकें ये हैं :- हिन्दी-रसगङ्गाघर (तीन भाग) संस्कृत भाषा का सरल व्याकरय श्रीमद्भागवतान्तर्गत वेदस्तुति की श्रीघरी और सुबोघिनी टीकाओं का अनुवाद धन्यालोकसार (संस्कृत) भारतीय व्रतोत्सव। इत्यादि।