Books / isbn 978-1-60607-080-2

1. isbn 978-1-60607-080-2

Page 1

परमानंद में जीने का रहस्य

(Secrets for a blissful life' in Hindi)

परमहंस नित्यानंद

एक उपयोगी पथप्रदर्शक शक्तिशाली ध्यान विधियों तथा योग के रहस्यों के लिए, यह पुस्तक एक असाधारण अंतर्दृष्टि प्रदान करती है । हमारे मन की आंतरिक गतिविधियों को जानने के लिए, तथा यह जानने के लिए कि ध्यान की आवश्यकता क्यों है, एवं योग का मूल उद्देश्य क्या है ?

लेखक की जानकारी

इक्कीसवीं सदी के परमहंस नित्यानंद जीवित आत्मज्ञानी गुरु हैं। एक निःस्वार्थ ध्यान आंदोलन परमानंद की प्राप्ति के लिए नित्यानंद ने सभी समस्याओं का समाधान किया है - प्रतिदिन के तनाव से भरे जीवन से लेकर आत्मज्ञान तक ।.......

Ebook ISBN: 979-8-88572-545-3

Published by

Life Bliss Foundation

ISBN 1600708020

M.R.P in India: Rs.20

9781607070802

Page 2

Published by Life Bliss Foundation

Copyright ©2009 'Living Enlightenment' year

First Edition: September 2009, 1000 copies

Ebook ISBN: 979-8-88572-545-3

ISBN 13: 978-1-60607-080-2

ISBN 10: 1-60607-080-0

All rights reserved. No part of this publication may be reproduced, or stored in a retrieval system, or transmitted by any form or by any means, electronic, mechanical, photocopying, recording or otherwise, without written permission of the publisher. In the event that you use any of the information in this book for yourself, the author and the publisher assume no responsibility for your actions.

All proceeds from the sale of this book go towards supporting charitable activities.

Printed in India by Isha Publishing House, Baroda.

Page 4

जीवन मुक्ति क्या है ?

ध्यान क्यों करें ?

अपने मन के स्वामी कैसे बनें ?

नित्यध्यान - परमानंद प्राप्ति के लिए प्रतिदिन ध्यान

नित्य योग - शरीर मन व अस्तित्व के लिए योग

परमहंस नित्यानंद के बारे में

Page 5

जीवन मुक्ति क्या है ?

यदि आप यहीं हैं, तो इसका अर्थ है कि मैं सृष्टि चाहती हूँ कि आप यहीं, इस रूप में हों। आप एक अकारण घटना नहीं एक प्रत्यक्ष वास्तविकता हैं। आप प्रकृति का एक चैतन्य चमत्कार हैं। यह मत समझिए कि मैं आपको सकारात्मक विचार देना चाहता हूँ, इसलिए मैं ऐसा कह रहा हूँ। मैं ऐसा कह रहा हूँ क्योंकि यही जीवन का सीधा और सरल सत्य है। यदि आप इस सत्य पर विश्वास करते हैं तो आप जीवन की उस पराकाष्ठा को अनुभव करने लगेंगे।

सर्वोत्तम जीवन वही होगा जिसमें आंतरिक एवं बाह्य जगत में कोई संघर्ष न हो। इसी को मैं जीवन मुक्ति कहता हूँ। जीवन-मुक्ति एक सम्पूर्ण जीवन जीना है, जिसमें आंतरिक व बाह्य जगत में कोई अंतर न हो। निरंतर एक सुंदर और लयबद्ध रूप से जीना तथा जो है वह उसी से भावनाओं को जोड़ना।

जीवन-मुक्त अवस्था में जीने के लिए चार महत्वपूर्ण सूत्रों को जीवन में उतारना होगा :-

शक्ति :- एक ऐसी शक्ति का संचार, जो आवश्यक परिवर्तन ला सके।

बुद्धि :- जो नहीं बदल सकता, या बदलना आवश्यक न हो, उसको स्वीकारने की बुद्धि ! एक ऐसी स्पष्टता तथा बुद्धिमत्ता, जिससे आप यह समझ सकें कि आपको जीवन तथा संसार के हर अंग में बदलाव या परिवर्तन नहीं लाना है। वरना आप सम्पूर्ण संसार जीवन बदलने में इतने व्यस्त हो जाएँगे कि आप इस सृष्टि का आनंद लेना ही भूल जाएँगे। क्योंकि आप यह सोचने लगेंगे कि सृष्टि का आनंद आप तभी लेंगे जब यह वैसी हो जाएगी जैसी आप चाहते हैं।

युक्ति :- यह समझ, कि यह ब्रह्मांड एक नित्य बदलने वाला स्वप्न है। यदि आप यह समझ

Page 6

जाते हैं तो आपको परम शांति व विश्राम प्राप्त होगा। आप कितनी भी चेष्टा करें आप यहीं पाएँगे कि सृष्टि तथा ब्रह्मांड निरंतर परिवर्तनशील हैं।

जब आप यह समझ जाएँगे। तो आप अपने आपको एक ऐसे आनंद से जुड़ता महसूस करेंगे, जिसमें कभी परिवर्तन नहीं होता - नित्य आनंद - निरंतर होने वाला अनंत आनंद - ऐसा सत्य जो शाश्वत है, एक ऐसी शक्ति जो नित्य है। गहरे जुड़ाव उस सत्य के प्रति अनुभव करना - इसकी ही मैं भक्ति कहता हूँ। यह ही चौथा सूत्र हैं। जब आप ये चार सूत्र अपने जीवन में उतार लेंगे, आप जीवन मुक्त होकर जिएँगे। आप जीवनमुक्ति प्रकाशित करेंगे।

जब आप जीवनमुक्त होकर जिएँगे, आपकी हर श्वास हजारों लोगों की चेतना को सहजता से उतन्न करेगी। इससे मानवजाति की चेतना जागृत हो पाएगी - और उतन्न हो पाएगी - मानव चेतना से दिव्य चेतना की ओर !

मैं संपूर्ण अस्तित्व से आपको आशीर्वाद देता हूँ। आप जीवनमुक्ति प्राप्त करें - आप जीवनमुक्ति प्रसार तथा प्रकाशित करें - आप नित्यानंद को प्राप्त करें।

  • परमहंस नित्यानंद

ध्यान क्यों करें ?

जीवन का वास्तविक ध्येय क्या है ?

हमारे जीवन का परम ध्येय क्या है ? अधिक धन का अर्जन करना सदैव युवा तथा स्वस्थ शरीर एवं सुंदरता बनाए रखना ? आपसी सम्बन्धों में दृढ़ता तथा स्थिरता का होना ? या अपने व्यक्तित्व का विकास ?

हमें इस विषय पर गहराई से विचारने की आवश्यकता है; क्योंकि अंततः हम इस जीवन से चाहते क्या हैं, और क्यों ? हमें इन सबके आधार, जीवन के कुछ सत्य समझने होंगे, जिससे हमारे जीवन का रूपांतरण हो सके।

हम चाहे धन की इच्छा रखते हों, या अच्छे आपसी सम्बन्धों की, अथवा नाम और ख्याति की आशा रखते हों, हम वास्तव में जो खोज रहे हैं, वह है पूर्णत्व! पूर्णता का अनुभव करना ही हमारा सच्चा स्वभाव है। एक और महत्वपूर्ण सत्य यह है कि केवल बाहरी सफलता से पूर्णत्व नहीं प्राप्त होता। जी हाँ! सृष्टि सदैव शुभ कार्यों तथा चमत्कारों से हींमें परिपूर्ण करती है। हमें सीधे पूर्णत्व प्राप्ति के लिए प्रयास करना होगा। ऐसा करने से बाहरी सफलता स्वतः ही हमारी तरफ आकर्षित हो जाती हैं। इस जीवन में कोई भी घटना केवल एक बनाव नहीं है, बल्कि एक अदभुत चमत्कार का ही रूप है।

हममें से हर व्यक्ति वास्तव में परमानंद की खोज में है। ९९ प्रतिशत लोगों को यह ज्ञात नहीं होता कि परमानंद ही हमारा ध्येय है। हम यह जाने या न जाने कि जिस परमानंद की खोज हम बाह्य जगत में कर रहे हैं, वह हमारे भीतर विद्यमान है, हमें केवल उसे पहचानना है।

एक छोटी-सी कहानी :

एक शाम, एक व्यक्ति अपने घर के आँगन में कुछ ढूँढ रहा हैं, उसकी पत्नी ने पूछा, ''क्या हुआ ?'' व्यक्ति ने बताया कि उसकी सोने की मुहर खो गई हैं। पत्नी भी मुहर को ढूँढने में जुट

Page 7

परमानंद में जीने का रहस्य

गई । धीरे-धीरे वहाँ कई लोग इकट्ठे हो गए और उनका सारा पड़ौस उस मुहर को ढूँढ़ने में लग गया ।

अचानक एक व्यक्ति ने पूछा कि वह मुहर वास्तव में किस जगह गिरी थी, तो व्यक्ति ने जवाब दिया कि वह मुहर तो घर के अंदर ही गिरा था, पर क्योंकि घर में प्रकाश नहीं था वह बाहर ऑँगन के उजाले में उस मुहर को ढूँढ़ रहा था ।

हम भी इसी तरह अपने जीवन में व्यवहार करते हैं। हम प्रश्नों के उत्तर गलत स्थानों पर ढूँढ़ने के आदी हो चुके हैं। हम परमानन्द हर जगह ढूँढ़ते हैं, धन-दौलत में, सत्ता की शक्ति में, अच्छे सम्बन्धों में । परन्तु तथा एक स्थान पर इसे नहीं खोजते, वह है हमारा अन्तःकरण ।

परमानन्द क्या है?

हर व्यक्ति ने अपने जीवन में कुछ ऐसे क्षणों का अनुभव किया है जब उसे अपार सुख की अनुभूति होती है। यह सुख हमेशा उसे किसी कारणवश मिलता है, और इसीलिए यह सुख क्षणिक होता है। ऐसा सुख कुछ क्षणों के लिए ही रहता है, फिर दुख का अनुभव होने लगता है। ऐसा सुख, जिसकी प्राप्ति हमें किसी कारणवश नहीं होती, और जिसका अनुभव कुछ समय तक के लिए सीमित नहीं होता, वह सच्चा सुख होता है। इसीका नाम परमानन्द है। यह आनन्द किसी बाह्या कारण पर निर्भर नहीं करता ।

ध्यान क्या है?

हर एक क्षण में परम आनन्द का अनुभव करना ही ध्यान है। जब आप इस वर्तमान क्षण में सम्पूर्ण शान्ति का अनुभव करते हैं, तो आप ध्यान की स्थिति में होते हैं।

अपने जीवन का कोई एक ऐसा पल याद करिए जब आपने अदभुत सुंदरता का अनुभव किया हो। यह सूर्योदय का दृश्य हो सकता है, जो पर्वतों के बीच में से हो रहा है। या आप सुंदर संगीत सुनते हैं, आप अचानक स्तब्ध खड़े रह जाते हैं, बिना कुछ कहे। इन सुंदर दृश्य तथा घटनाओं में आप इतना खो जाते हैं कि ना तो कुछ विचार कर सकते हैं और न ही आपसे कुछ शब्द कहे जाते हैं। आप एकदम शांत जागरूकता का अनुभव करते हैं जिसमें कोई विचार नहीं। आप उस क्षण की सुंदरता में खो जाते हैं। यही ध्यान है।

कुछ पलों के पश्चात् आपके भीतर फिर से वाणों और विचारों का चक्र शुरू हो जाता है। आपका मन कहता है, "अहो, कितना सुंदर सूर्योदय" जिस क्षण आप अपने अनुभव को शब्द देते हैं, उस क्षण आप ध्यान में नहीं रहते ।

ध्यान क्यों करें?

हम जीवन में तीन स्थितियों का निरंतर अनुभव करते हैं - जाग्रत अवस्था, स्वप्न अवस्था तथा सुषुप्ति । जागृत अवस्था में आप में "अहम्" भाव होता है, तथा विचार भी होते हैं।

सुप्ति में रहना चाहते हैं, आपकी निद्रा अशांत स्वप्नावस्था में व्यतीत होने लगती है। जब आप जाग्रत अवस्था में रहना चाहते हैं, आपको निद्रा सताने लगती है। ये तीनों अवस्थाएँ आपके लिए एक समस्या बन जाती हैं।

एक चौथी अवस्था भी है जिसका हमने कभी अनुभव ही नहीं किया, और वह है तुरीयावस्था । इस स्थिति में अहम् चेतना का अनुभव होता है परन्तु बिना किसी विचार के आप जागरता का अनुभव करते हैं। इसे हम विचारहीन जागरता कहते हैं। बहुत कम व्यक्ति इस अवस्था का अनुभव कर पाते हैं। कुछ व्यक्ति इस अवस्था को कुछ क्षणों के लिए अनुभव करते हैं और फिर साधारण जाग्रत अवस्था में वापस चले जाते हैं।

यदि कभी आप किसी आघात जनक परिस्थिति से गुजरते हैं या अपने आपको प्रकृति के साथ अत्यधिक शांत स्थिति में पाते हैं तो आप कुछ क्षणों के लिए विचारहीन जागरूकता का अनुभव कर सकते हैं। इस स्थिति में विचार नहीं हैं किन्तु चेतना है। यही चौथी तुरीया अवस्था है। हमारी सभी शारीरिक व मानसिक व्याधियों, स्वप्नावस्था में उत्पन्न होती हैं। यदि स्वप्नावस्था हमारी जाग्रत अवस्था पर हावी होने लगती है तो इसे दिवा-स्वप्न कहा जाता है, जिसमें हम कल्पना में वो सब करते है, जो हम सच्चमुच करना चाहते हैं। यदि हमारे स्वपन सुषुप्ति पर हावी होने लगते हैं तो हमारी निद्रा एक अशांत निद्र कहलाती है।

निरंतर, दिन हो या रात्रि, हमारी स्वप्नावस्था हमें परेशान करती है। जब हमारी सुषुप्ति या गहरी निद्रा स्वपनों की वजह से अशांत हो जाती है तब हमें गहरी थकावट और नींद न आने जैसी समस्याओं

Page 8

का सामना करना पड़ता है। जब हमारी स्वप्नावस्था जाग्रत अवस्था में बाधा डालती है तब हम काल्पनिक दिवा-स्वप्नों के कारण संसार के प्रति कम जागरत्ता का अनुभव करते हैं।

जितनी अधिक स्वप्नावस्था हमारे जाग्रत जीवन पर असर करती है, उतनी ही मात्रा में हमारी जागरुकता घटने लगती है। हम मनुष्य शरीर में जरूर जी रहे हैं लेकिन हम सही मायनों में मनुष्य का जीवन व्यतीत नहीं कर रहे। जब जागरुकता की मात्रा कम हो जानी है, तो हम सही निर्णय नहीं ले पाते। हम जिन शब्दों को बोलते हैं अथवा सोचते हैं उनमें भी चेतना नहीं होती। हमारे अन्तःकरण में क्या चल रहा है उसका हमें ज्ञान नहीं रहता। यह इस तरह प्रतीत होता है जैसे हम एक घर में रह रहे हैं, लेकिन उस घर में में जो हो रहा है वह हमें पूरी तरह ज्ञात नहीं है।

आप पढ़ सकते हैं कि "'मजे ध्यान क्यों करना चाहिए?"' ध्यान की जरूरत इसलिए है क्योंकि

आपकी स्वप्नावस्था और सुप्ति में अधिक से अधिक जागरुकता लाई जा सके। स्वप्नावस्था के सुप्ति तथा जाग्रत अवस्था पर हावी होने के बदले, ध्यान द्वारा आप तुरीयावस्था को जाग्रत अवस्था तथा सुप्ति अवस्था में भी अनुभव करने लगेंगे।

ध्यान करने का ध्येय यही है कि कम से कम एक बार हम उसी तुरीयावस्था को अनुभव कर सकें। एक बार जब हम इसका अनुभव कर लेते हैं तो हम इस एहसास को अधिक से अधिक जाग्रत अवस्था और सुप्ति में ले जा सकते हैं। जब हमारी जाग्रत अवस्था और सुप्ति सम्पूर्णतः तुरीयावस्था में व्यतीत होने लगती है, इसे ही "'जीवन मुक्ति"' कहा जाता है।

ध्यान के फायदे :

ध्यान में वह शक्ति है जो आपका शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक तथा आध्यात्मिक रूपांतरण कर सकती है।

स्वास्थ्य क्या है? शारीरिक स्वास्थ्य का अर्थ है कि जो आप खाएं वह आपका शरीर पचा सके और वह आपके शरीर का हिस्सा बन जाए। मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ है कि आप हर विचारधारा तथा समस्या को पचा कर उसका निदान कर सकें। दूसरे शब्दों में, जीवन बिना किसी संघर्ष के जी सकें। आध्यात्मिक स्वास्थ्य का अर्थ है कि हम महान पुरुषों की दी शिक्षा और शक्ति को ग्रहण करके एक मुक्त जीवन व्यतीत कर सकें। इन तीनों का होना ही संपूर्ण स्वास्थ्य है।

शारीरिक स्वास्थ्य

ध्यान चिकित्सा का एक सहायक है। ध्यान के द्वारा आप उक्त रक्तचाप तथा मधुमेह जैसे रोगों का नियंत्रण कर सकते हैं। तथा शरीर की प्रतिरोध शक्ति को रोगों से मुक्त होने के लिए बढ़ा सकते हैं।

ध्यान क्यों करें ?

ध्यान द्वारा आप बहुकालीन समस्याएं जैसे रोगों का निदान भी पा सकते हैं। कोई भी रोग ध्यान की शक्ति के सामने बच नहीं सकता।

मानसिक स्वास्थ्य - बुद्धिमत्ता का जागरण तथा अन्तर ज्ञान का प्राकट्य :

मानसिक तौर पर ध्यान आपकी विचारधारा को स्पष्ट तथा सरल बनाता है। ध्यान, मानसिक, स्थिरता तथा स्मृति शक्ति बढ़ाने की प्रमाणित विधि है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि ध्यान आपको बुद्धि से बुद्धिमत्ता और वहाँ से अन्तर ज्ञान की तरफ ले जाता है।

ध्यान से आप मस्तिष्क के आगे निकल कर अस्तित्व तक पहुँच सकते हैं। अस्तित्व के कोई नियम नहीं होते। यहाँ आपको अपनी परिपूर्णता को खोजने की पूरी स्वतंत्रता मिलती है। इसीलिए ध्यान करते करते आप पाएंगे कि आप अपने वातावरण के साथ आसानी से घुल-मिल सकते हैं, और नई परिस्थितियों की आसानी से जिम्मेदारी उठा सकते हैं। आप अपनी जीवंतता और सजगता को पुनः प्राप्त कर लेते हैं।

आत्म चिकित्सा के विचार :

आपका शरीर चिकित्सा की दृष्टि से स्वस्थ हो सकता है, पर इसका मतलब यह नहीं है कि आप पूर्णतः स्वस्थ हैं। मैं अपने अनुभव से यह कह सकता हूँ क्योंकि ऐसे लाखों लोगों को मैंने करीब से देखा है। जिन्हें आत्म-चिकित्सा के बारे में स्पष्टता नहीं हैं, वे शारीरिक तौर पर भी स्वस्थ नहीं रह सकते। आत्मचिकित्सा स्पष्टता और समझ से ही जो आपकी चेतना को निराशा में से ऊपर उठाने में मदद करती है, जब भी आप निराशाजनक प्रवृत्तियों को पकड़ में होते हैं।

मैंने एक अध्ययन, लोगों के एक ऐसे समूह पर किया है, जो ध्यान तथा आध्यात्मिक अध्ययन चुके हैं। मैंने उन्हें बीस मिनिट तक जो उनके मनमें आए वह लिखने के लिए कहा। फिर मैंने एक दूसरे समूह से भी बीस मिनिट तक उनके मनमें जो आए वह लिखने को कहा, लेकिन इस समूह के लोग ध्यान या आध्यात्मिकता में रुचि नहीं रखते थे । इस अध्ययन के परिणाम चौंका देने वाले थे। अतः ध्यान का प्रभाव इतना गहरा होता है, यह आपको पूर्णतः स्वस्थ रख सकता है।

लोगों का वह समूह जो अध्यात्म तथा ध्यान से असंबंधित था, उसके लोगों ने अगर सौ विचार लिखे थे, उसमें से अस्सी से अधिक विचार उन्हें निराशा तथा विशाद की ओर ले जाने वाले थे, केवल बीस विचार आत्म चिकित्सा की ओर तथा उन्हें निराशा में से निकालने वाले थे। जबकि दूसरे समूह के लोग, जिनका संबंध ध्यान तथा अध्यात्म से रह चुका था, उनके साठ प्रतिशत विचार आत्म चिकित्सा के थे, केवल तीस प्रतिशत विचार उन्हें निराशा की ओर ले जाने वाले थे।

Page 9

अत: ध्यान का प्रभाव इतना गहरा होता है, यह आपको पूर्णतय: स्वस्थ रख सकता है।

शास्त्र शस्त्र निराशा से मुकाबले के लिए

ध्यान सत्य को पहचान कर उसके साथ जीवन व्यतीत करना है। सत्य का ज्ञान हो है जिसे मैं शास्त्र शस्त्र कहता हूँ। शास्त्र का अर्थ सत्य ज्ञान होता है। शास्त्र का अर्थ हथियार होता है। ज्ञान के हथियार, यानी शास्त्र शस्त्र, सत्य के हथियार होते हैं जो आपके अस्तित्व में بسی निराशा को नष्ट कर देते हैं। आपके पास जितने अधिक शास्त्र शस्त्र होंगे, निराशा आपसे उतना ही डरेगी। अगर आपके पास एक बड़ी सेना है, तो शत्रु आपपर हमला करने से डरेगा। आपके पास हथियारों की मात्रा देखकर दूसरा देश आपपर आक्रमण करने से पहले कई बार विचार करेगा। इसी प्रकार, जितने आत्म चिकित्सा के विचार आप अपने अस्तित्व में सहेज कर रखेंगे उतनी ही निराशा आपके पास आने से डरेगी।

स्वतंत्रता

ध्यान के साथ आप अपना जीवन एक बेहतर तरीके से जी सकते हैं, अधिक स्पष्टता तथा तीव्रता के साथ। आप अधिक जाग्रत और रचनात्मक बन पाएँगे। आप अपने अंदर एक गहरी और अथाह शांति को अनुभव कर सकेंगे।

आप केवल एक कर्ता नहीं रहेंगे, आप कर्ता के साक्षी बन जाएँगे। यही ध्यान का रहस्य है - एक साक्षी बन जाना, अपने कर्मों और भावनाओं का एक साक्षी।

जब आप यह समझ जाएँगे कि वह आप नहीं है जो कार्य करता है, व आप नहीं है जो क्रोधित होता है, जिसे दुःख और निराशा का अनुभव होता है, तब आप एक अदभुत स्वतंत्रता का अनुभव करेंगे।

हम यह जाने या ना जाने किन्तु हममें से हर व्यक्ति स्वतंत्रता की तलाश में हैं। हम अपना सारा जीवन स्वतंत्रता की खोज में बिता देते हैं। हम सोचते हैं कि हमारी स्वतंत्रता दूसरों पर निर्भर है। अब आप जानते हैं कि कोई भी व्यक्ति हमारी स्वतंत्रता से किसी प्रकार भी संबंधित नहीं है।

बिना किसी कारणवश प्रेम और आनंद का अनुभव

ध्यान के साथ, आप पहली बार महसूस करेंगे कि बिना किसी कारण के प्रेम क्या होता है ? जीवन में पहली बार आप कुछ पाने के लिए कुछ नहीं देंगे ? आप प्रेम देंगे सिर्फ इसलिए कि आपके पास अपर प्रेम है। आप सारे संसार के साथ प्रेम बाँटेंगे, ठीक उसी तरह, जैसे बादल धरती पर बरसता है व फूल अपनी सुगंध चारों ओर फैलाता है। आप प्रेम करेंगे क्योंकि आपके अंदर प्रेम के निर्झर झरने रहे हैं।

कार्य एक खेल

एक बार आप जो करेंगे उसे जाग्रतता से करके देखिए। यदि आप खा रहे हैं तो जाग्रतता से खाइये। इसमें अधिक समय की आवश्यकता नहीं होगी। वास्तव में, आप खाने में कम समय लेंगे क्योंकि जब आप जाग्रतता से खाएँगे, आप उतना ही खाएँगे जितने भोजन की आपके शरीर को आवश्यकता है, और आप जबरदस्ती अपने गले के नीचे विचारहीन होकर अधिक खाना नहीं उतारेंगे।

जागरुकता में एक महान बुद्धिमत्ता है। जागरुकता आपकी योजनाओं के आधार पर होते कार्यों से भी बड़े चमत्कार दिखा सकती है। जागरुकता आपकी योजनाओं के साथ प्रतिरोध नहीं करती वरन् उनके साथ सम्वादिता प्रकट करती है। जागरुकता आपकी क्षमता को बढ़ाती है।

जब आपमें जागरुकता होती है, आप नहीं होते। जब जागरुकता उपस्थित होती है, अहं भाव नहीं रह सकता। जब अहं भाव उपस्थित होता है, जागरुकता नहीं रह सकती। आपकी अनुपस्थिति ही आपको जीवन मुक्ति दिलवा सकती है।

जब आप जागरुक होते हैं, आप हर कार्य अधिक पूर्णता से कर पाते हैं, और शक्ति का कुशलतापूर्वक ढंग से उपयोग कर पाते हैं। इस प्रकार आप दिन के ढलने पर भी अपने आपको उतना ही ताज़ा महसूस करते हैं, जितना दिन की शुरुआत में करते हैं। आपका कार्य आपको नहीं थकाता है। ध्यान का पूरा आखेट आपके विचारों को कार्य उन्मुख करने के बदले जीवन के हर क्षण को एक दिव्य लीला की तरह देखने को प्रेरित करता है।

Page 10

अपने मन के स्वामी कैसे बनें?

दस मिनिट का प्रयोग

यह प्रयोग दस मिनिट के लिए करके देखें।

एक कागज़ और कलम लें। अकेले में बैठें। अपने सारे विचार, जो आपके मन में आते हैं, बिल्कुल उसी क्रम से कागज़ लिख कर लें। अपने विचारों की सटीक प्रतिलिपि तैयार करें। उनमें कुछ ना बढ़ाएं, ना घटाएं। यह प्रयोग केवल आपके लिए है, कोई दूसरा इसे पढ़ने वाला नहीं है। दस मिनिट पश्चात, जो आपने लिखा है उसे पढ़ें। आप आश्चर्यचकित होंगे। आप स्पष्टता से देख सकेंगे कि जो आपने लिखा है और आपके विचारों की उत्पत्ति बिल्कुल तर्कसंगत नहीं हैं।

उदाहरण के रूप में, आप एक कुत्ता गली में देखते हैं। तभी आपको उस कुत्ते की याद आती है जिससे आप बचपन में डरा करते थे। अगला विचार आपके बचपन के बारे में हो सकता है। तीसरा विचार आपके शिक्षक के बारे में हो सकता है जिन्होंने आपको बचपन में पढ़ाया था। चौथा विचार उस घर के बारे में हो सकता है जहां शिक्षक रहते थे।

इस सब विचारों के बीच कोई तर्कसंगत सम्बन्ध नहीं हैं। फिर भी, कुछ क्षणों में आप कुत्ते से शुरू होकर अपने बचपन के शिक्षक तक पहुंच जाते हैं। आप देख सकते हैं कि आपके विचार सिर्फ आगे ही नहीं बढ़ते, बल्कि बहने लगते हैं। हम इस क्रिया को विचारना, या सोचना भी नहीं कह सकते। यह केवल मन का असंगत रूप से बहना है, जो कुत्ते को बचपन से और बचपन को शिक्षक से जोड़ देता है।

यदि यह प्रयोग आप केवल एक बार करते हैं तो इससे अपने बारे में जो समझ आपमें उत्पन्न होगी वह आपको और आपकी अपने बारे में होती सोच को पूर्णतः परिवर्तित कर देगी। यह आपका अपने और दूसरों के प्रति व्यवहार भी बदल देगी। आपका संपूर्ण जीवन परिवर्तित हो जाएगा।

आप समझ पाएंगे कि कोई भी विचार आपके मन में तर्कसंगत ढंग से नहीं जुड़े हुए हैं। कोई भी विचार अगले विचार के लिए उत्तरदायी नहीं है। हर विचार का प्राकट्य अनियमित, स्वतंत्र और तर्कहीन है।

आप इस अनियमित विचारधारा से कैसे बंधनविमुक्ति पा सकते हैं? जब हम कार चलाते समय 'गियर्स' बदलते हैं, हर बार पहले गियर से दूसरे गियर, दूसरे से तीसरे गियर में जाने के लिए हमें न्यूट्रल गियर याने के क्लच दबाना पड़ता है। जब हम 'गियर' बदल सकते हैं। इसी तरह हम दो विचारों के बीच तटस्थ अंतराल का अनुभव करते हैं। यह अंतराल तथा मौन जो दो विचारों के बीच विद्यमान होता है, वही शाश्वत शांति और परमानंद है जिसके बारे में गुरु हमें अवगत कराना चाहते हैं। जब हम अपने विचारों को पकड़कर उन्हें भूतकाल और भविष्य से जोड़ने की कोशिश नहीं करते, हम बंधन विमुक्ति की स्थिति में रहते हैं। जैसे ही हम विचारों से बंधनविमुक्त हो जाते हैं, हमें दो विचारों के बीच की शांति का एहसास होने लगता है। दो विचारों के बीच का अंतराल सहज ही बढ़ जाता है जब हम बंधनविमुक्ति में स्थित होकर विचारों को नहीं जोड़ते।

दुख की स्मृति कड़ी

मैं आपको एक जीवन के गूढ़ सत्य के बारे में गहरी समझ देना चाहता हूँ। वह दुख, जो आपने सात साल पूर्व अनुभव किया, वह दुख जो आपने तीन साल पूर्व अनुभव किया और वह दुख जो आपने कल अनुभव किया, ये सभी दुख एक दूसरे से स्वतन्त्र, असम्बन्धित तथा भिन्न घटनाएं हैं। लेकिन आप इन्हें जोड़कर एक दुख की स्मृति की कड़ी तैयार करते हैं। आप यह विचार और विश्वास रखते हैं कि 'मेरा जीवन दुख है।' क्या यह सच है? नहीं है, आप इन दुखों के बीच में घटित उन मीठे आनंद के क्षणों के बारे में भूल जाते हैं। आपके जीवन में कुछ क्षण तो ऐसे आनंद के ज़रूर रहे होंगे। उन्हें हम सहजता से भुला देते हैं। हम उन्हें अपनी स्मृति की कड़ी बनाने के लिए नहीं चुनते। इसलिए कोई भी स्मृति की कड़ी सत्य के आधार पर नहीं बनी होती, क्योंकि वह आपकी जीवनी के कुछ अंशों पर ही निर्भरित होती है, सम्पूर्ण जीवन पर नहीं।

पहले आप इन दुखद स्मृतियों को उपयोगिता के उद्देश्य से संग्रह करते हैं। आप अपने सारे दुखों का संग्रह एक स्थान पर करते हैं, शायद चिकित्सा के दृष्टिकोण से अपने चिकित्सक को बताने के लिए। किन्तु धीरे-धीरे आप यह विश्वास करने लगते हैं कि यह सारे दुख एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। आप यह निर्णय कर लेते हैं कि आपका जीवन का एक दुख का पहाड़ है और पीड़ा से भरा हुआ है। जिस क्षण आप यह निर्णय लेते हैं कि आपका जीवन केवल दुख और पीड़ा है आप अपने लिए नर्क का निर्माण करते हैं।

Page 11

सुख की स्मृति कड़ी

जो आनंद आपने दस साल पहले अनुभव किया जो आनंद आपने नौ साल पहले अनुभव किया, जो आनंद आपने तीन साल पहले अनुभव किया, और जो आनंद आपने एक साल पहले अनुभव किया, ये सब स्वतन्त्र, अलग, असम्बन्धित विचार और घटनाएँ थीं। किन्तु आप इन्हें जोड़कर एक सुख की विशाल स्मृति कड़ी की रचना करते हैं।

आप अपने आनंद को किसी वस्तु, व्यक्ति या जगह पर निर्भर मानते हैं। अब आप इस आनंद को बार-बार अपने जीवन में लाना चाहते हैं। आप उस वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति को फिर से जीवन में लाकर उस आनंद को दोबारा अनुभव करना चाहते हैं। किन्तु आप कितनी भी कोशिश क्यों ना करें लें, आप उसी सुख का अनुभव दोबारा नहीं कर पाते। इसीलिए आप फिर से दुख और पीड़ा का अनुभव करने लगते हैं।

दुख या सुख की स्मृतियाँ कड़ियाँ - दोनों पीड़ादायक हैं।

जीवन में हम निरंतर सुख या दुख की स्मृति कड़ियाँ बनाते रहते हैं। यदि आप दुख की स्मृति कड़ी बनाते हैं तो उसे तोड़ने की कोशिश करते हैं। यदि आप सुख की स्मृति कड़ी बनाते हैं तो उसे अधिक बढ़ाने की कोशिश करते हैं। किन्तु आप यह नहीं समझ पाते हैं कि आप ना तो इन कड़ियों को बढ़ा सकते हैं और ना ही तोड़ सकते हैं, क्योंकि इस स्मृति कड़ी का वास्तव में कोई अस्तित्व ही नहीं है। यह केवल आपकी कल्पना और चयनात्मक स्मृति की रचना है। यह स्मृति कड़ी केवल आपकी कल्पना है।

बस स्मृतियों का त्याग कर उन्हें जाने दें… और आप उड़ पाएंगे!

उत्तर भारत के जंगलों में मैंने आध्यात्मिक पात्राजिका के समय यह देखा कि किस तरह शिकारी चिड़ियों को जाल में पकड़ते हैं। वे दो पेड़ों के बीच एक रस्सी बाँध देते हैं। इस रस्सी के बीचोंबीच वे एक लकड़ी बांध देते हैं। यही शिकारी चिड़िया पकड़ने का जाल है।

आप सोचेंगे, 'एक छोटी सी लकड़ी से एक चिड़िया कैसे पकड़ी जा सकती है?' वास्तव में वे इस लकड़ी को दो पेड़ों के बीच बंधी रस्सी के बीच में लगा देते हैं। जब कोई चिड़िया इस लकड़ी पर बैठती है, तो उसके वजन की वजह से लकड़ी टेढ़ी हो जाती है और चिड़िया लकड़ी पर अपने सर के बल लटक जाती है।

जैसी ही चिड़िया सिर के बल लटकती है, वह अपना संतुलन खो बैठती है। वह अपनी पकड़ पर और मजबूत कर देती है। वो लकड़ी को इस तरह जकड़ लेती है जैसे उसका जीवन उस लकड़ी पर निर्भर है। क्योंकि वह सिर के बल उलटी लटक रही है, उसे लगता है कि यदि उसने लकड़ी को छोड़ दिया तो वह सर के बल गिरेगी और मर जाएगी।

आपको कहीं भी ऐसा आभासेख नहीं मिलेगा कि कोई चिड़िया गिरी और उसका सर फूट गया। पर उस चिड़िया में यह समझने की बुद्धिमत्ता नहीं होती वह वहाँ लटकती रहती है। लकड़ी का त्याग ना करके वह अपनी स्वतन्त्रता खो बैठती है, और अपना जीवन तक खो बैठती है, क्योंकि अंत में शिकारी उसे पकड़ लेता है।

उस चिड़िया की तरह आप भी यह समझ नहीं पाते हैं कि यदि आप अपने मन से परे होकर उसका त्याग करें तो आप भी परमहंस बन सकते हैं। उसी क्षण आप स्वतन्त्र हो सकते हैं। आप भी उड़ सकते हैं।

जो डर चिड़िया अनुभव करती है, वही डर आपके अंदर भी है। आपका डर और चिड़िया का डर एक जैसे हैं। चिड़िया का विश्वास है कि वह लकड़ी नहीं छोड़ सकती, यदि वह ऐसा करेगी, तो वह मर जाएगी। इसी तरह आप अपने मन को पकड़ कर रखते हैं, और सोचते हैं कि 'मैं इसे छोड़ नहीं सकता' यदि मैं यह विश्वास कर लूँ कि मैं असम्बन्धित, बन्धनमुक्त, स्वतन्त्र तथा तर्कहीन विचार हूँ, तो मैं अपने आप को खो दूँगा''

शिकारी आराम से तीन चार घंटे बाद आकर चिड़िया को पिंजरे में डाल कर ले जाता है। चिड़िया के पास अब न उड़ने की स्वतन्त्रता है और ना संतुलन के लिए लकड़ी। बुद्धिहीन चिड़िया यह नहीं जानती है कि अगर वो लकड़ी को पकड़ना छोड़ देती है तो वह सहजता से उड़ जाती है।

इसी तरह, आप भी अपनी पहचान को, जो आप समझते हैं, आपकी पहचान, और आपकी सुरक्षा है... आपकी शिक्षा, आपका मन, आपका जीवन, आपके सम्बन्धी, आपकी धन संपदा,... इनको पकड़कर रखते हैं। अंत में जब यमराज, मृत्यु के देवता आपकी पहचान आपसे छीन लेते हैं, तब आप ना तो परमहंस, एक मुक्त आत्मा बन पाते हैं और ना अपनी पहचान को ही कायम रख पाते हैं। ना आपके पास स्वतन्त्रता रहती है और ना आपकी पहचान जिसे आप जकड़ के रखते हैं, क्योंकि यह पहचान भी लकड़ी की तरह एक परिकल्पना है।

Page 12

मैं आपको यह बता दूँ कि अगर वो चिड़िया अपनी पकड़ छोड़कर मुक्त हो जाए, तो शायद उसके पंख कुछ क्षणों के लिए स्पंदन करके संतुलन के लिए लड़खड़ाए, किन्तु वह कभी गिर कर मर नहींेगी। जब वह लकड़ी छोड़ती है, तो शायद कुछ पलों के लिए वह गिरे भी, पर फिर वह अपना संतुलन पुनः स्थापित करके उड़ने लगेगी।

यह स्पष्टता से समझिए कि अगर आप अपनी पकड़ को छोड़ दें तो आप कभी भी गिर कर मरेंगे नहीं, बल्कि आप एक परमहंस बन जाएंगे।

बस इस क्षण में अपने ऊपर भरोसा करिए। अपने परिचय खो जाने की चिंता मत करिए। बस अपने आप पर भरोसा करके अपने परिचय को छोड़ दीजिए। आप उसी क्षण परमहंस बनकर मुक्त हो जाएँगे। केवल आपको भरोसा करके अपने आपको बंधनविमुक्त बनाना है - अगर आपको इस बात पर भरोसा नहीं भी है, फिर भी यही सत्य है।

जब आप बंधनविमुक्त हो जाएँगे, आपके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन होने लगेंगे। आपकी रोजमर्रा की विचारधारा, आपकी निर्णयशक्ति, तथा आपकी जीवनशैली बदल जाएगी। यदि आप हिम्मत से इस क्रांतिकारी परिवर्तन को अपना लेंगे तो यही आपकी तपस्या होगी।

जब मैं परिव्राजिका पर था, एक दिन मैंने एक अनोखी बात देखी। मैंने देखा कि एक चिड़िया लकड़ी पर लटक रही है, दूसरी चिड़िया, जो कभी इस लकड़ी पर फँसी थी, पर हिम्मत से लकड़ी छोड़कर उड़ गई थी, वो वापस आती है, उस लटकती चिड़िया को कहती है, "लकड़ी छोड़कर मुक्ति पा लो, मैं भी तुम्हारी तरह फँसी गई थी, जब मैंने अपने आपको छोड़ दिया, तो मुझे संतुलन पाने में कुछ क्षण ही लगे पर उसके बाद में उड़कर मुक्त हो गई। चलो तुम भी उड़कर मुक्त हो सकती हो।" लेकिन लटकती हुई चिड़िया इस बात पर विश्वास नहीं करती।

आप यह बात समझ लीजिए कि उस मुक्त चिड़िया की जिम्मेदारी दूसरी चिड़िया को बचाने की है। यह मुक्त चिड़िया की जिम्मेदारी है कि वह लकड़ी पर फँसी चिड़ियों को चोंच मारकर बताए कि "मुक्त हो जाओ!"

आप समझिए, कि मैं ही वो मुक्त चिड़िया हूँ जो आपको यह बताने आया हूँ कि मैंने आपके नीचे सुरक्षा जाल बिछा रखा है, यदि आप गिरे भी तो आपको चोट नहीं लगेगी। धीरे से छोड़कर मुक्त हो जाओ, आप उड़ पाओगे!

देखो! गुरु ने तो संघ बनाया है, जो धर्म समुदाय बनाया है, वही आपका सुरक्षा जाल है। आप अगर गिरे भी, तो आपको कष्ट नहीं होगा।

पहली बात, कि आप नहीं गिरेंगे। किन्तु आपको गहरा आश्वासन देने के लिए ही संघ, आध्यात्मिक समाज की रचना हुई है। मैं आप सबको संघ को अनुभव करने का निमंत्रण देता हूँ।

आप समझिए, कि मुक्त चिड़िया की जिम्मेदारी है कि वो सब फँसी हुई चिड़ियों को मुक्त करने में उन्हें प्रेरणा दे और उनकी मदद करे।

शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक समस्याओं के समाधान

जब हम बंधनविमुक्त होंगे, तो सबसे पहले हमारा अन्तःकरण स्वस्थ होगा, उसमें एक गहरी शांति का एहसास उत्पन्न होगा।

दूसरा, यह आन्तरिक स्वास्थ्य, शारीरिक स्वास्थ्य को परिणाम देगा, जो वास्तव में हमारे खुशहाल अस्तित्व को निशानी है।

तीसरा, बहुत सहजता से ये खुशहाली, हमारे सम्बन्धों में झलकने लगेगी।

चौथे, जब ये तीनों इतने सुंदर ढंग से हमारे जीवन को परिपूर्ण करेंगे तो हम अत्यधिक रचनात्मक कार्य सम्पन्न कर सकेंगे।

दीर्घकालीन रोगों का निदान

लोग मुझसे मिलकर कहते हैं, "स्वामीजी, मुझे पिछले बीस सालों से घुटने में दर्द है।" नहीं, ऐसा नहीं हो सकता! आप समझिए कि वास्तव में ऐसा हो ही नहीं सकता। मैं आपकी बेईज्जती नहीं कर रहा, और न ही यह कहकर आपकी पीड़ा बढ़ाना चाहता हूँ कि यह सिर्फ आपके मन ने बनाया हुआ है। मैं एक सत्य बता रहा हूँ कि आपकी समस्याएँ आप के मन में ही उत्पन्न होती हैं, यही सच है।

घुटने का वह दर्द जो आपने दो साल पहले अनुभव किया, वह दर्द जो आपने दो महीने पहले अनुभव किया, वह दर्द जो दो घंटे पहले आपने महसूस किया ये सब स्वतन्त्र घटनाएँ हैं। क्योंकि आप उन्हें जोड़ देते हैं। आप इस निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं कि कि आपको घुटनों को दर्द बीस साल से है।

क्या यह सचमुच हो सकता है कि घुटनों का दर्द आपको लगातार बीस सालों तक हो? बीच के उस समय का क्या, जब आपको दर्द नहीं हो रहा था? यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि क्योंकि आप इन सब घुटने के दर्दों को एक दूसरे से जुड़ा हुआ देखते हैं, आप अपने अंदर हो रही आत्मचिंतन में बाधा बन जाते हैं। जब आप ध्यान करेंगे, आप इन सब घटनाओं को बिना जोड़े स्वतन्त्र रूप में देख

Page 13

निराशा का समाधान

जब निराशा का सवाल उठता है, तो यह समझ लीजिए कि आपका निराशात्मक विचारों में डूबना, जो एक महीने पहले हुआ था, एक साल पहले हुआ था, और जो तीन साल पहले हुआ था, ये सब स्वतन्त्र तथा असंबंधित घटनाएँ हैं। यह भी बिल्कुल शारीरिक दर्द की तरह ही है। आप इन घटनाओं को जोड़कर इस निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं कि आप निराशा के पहाड़ के नीचे दबे हुए हैं, आप यह समझने लगते हैं कि है कि निराशा ही आपका जीवन है। फिर आप इस विचार से भी लड़ते हैं और यही वजह से आप गहरे निराशावादी बन जाते हैं।

जब आप बहुत दृढ़ता से विश्वास रखते हैं कि आपका जीवन पीड़ा और निराशा से भरा हुआ है तो बहुत गहरा मानसिक एहसास उत्पन्न कर लेते हैं। इसीलिए आप यह भी सोचने लगते हैं कि आपका भविष्य भी पीड़ा से भरा हुआ तथा निराशाजनक होगा।

मान लीजिए, कि आपके सामने एक व्यक्ति बैठा है जो आपका शत्रु है। अचानक, यदि आप कल्पना करें कि उसके हाथ, पाँव और सिर अलग-अलग हैं, क्या आप अब भी उससे लड़ सकेंगे? नहीं! वह लड़ने लायक ही नहीं रहता। जैसा आपने सोचा था उसका वैसा अस्तित्व हो नहीं रहता। इसीलिए वह आपसे लड़ने वाली ही नहीं रहती।

उसी तरह, जब आप महसूस करते हैं कि आपके सामने एक बड़ी समस्या है, या कोई बड़ा व्यक्तित्व है तो आप उससे लड़कर समस्याएँ उत्पन्न करते हैं। आपकी निराशाजनक विचारधारा एक बड़ा-सा शत्रु नहीं है, यह उस व्यक्ति की तरह है जिसका शरीर कई भागों में बँट चुका है। यह आप हैं जिसने इन भागों को जोड़कर उसे जीवंत बनाया है। आपकी अपनी निराशा से लड़ना ही आपकी निराशा का मूल कारण है।

रामायण ग्रन्थ में एक बहुत सुंदर कहानी है। जो भी वानरराज बलि के सामने युद्ध के लिए खड़ा होता है, वह अपनी आधी शक्ति बालि को खो देता है। इसी तरह जो भी विचार स्मृति के सामने खड़ा होकर उससे लड़ता है, वह अपनी आधी शक्ति उस विचार स्मृति को खो देता है।

जिस क्षण आप विचार स्मृति से बंधन विमुक्त होते हैं, आप एक गहरी शांति का अनुभव करते हैं और आपका अन्तःकरण स्वस्थ्य तथा परिपूर्णता की ओर अग्रसर हो जाता है, और तभी आप शारीरिक स्वास्थ्य भी प्राप्त कर लेते हैं।

अपनी निराशा का परित्याग करने की कोशिश मत करिए, क्योंकि आपके भीतर स्वभावतः अपने आप त्याग हो रहा है, और निराशा स्वतः आपसे दूर जा रही है आपके सहज स्वभाव से जिस प्रकार सुख आपके मन से लुप्त हो जाता है, निराशा भी आपके मनसे लुप्त हो जाती है। जब भी आप निराशा को खत्म करने की कोशिश करेंगे, आप उसको बढ़ाकर अधिक जीवंत बना देंगे।

यदि आप गहरे निराशावादी बन जाते हैं तो क्या आप कार्यालय जाना बंद कर देंगे? नहीं! आप निराशा को साथ लेकर जाएँगे। आप कार्य करेंगे, किन्तु आप अधिक उत्पादक तथा कुशल कार्य नहीं कर पाएँगे। केवल आपके शरीर कार्य करेगा।

जीवन निराशा में जीने के बदले मैं आपसे कह रहा हूँ कि जीवन बंधनविमुक्त होकर जिएँ! जब हम निराशा में जीते हैं, हम यह प्रश्न पूछते हैं कि मैं इतना निराश हूँ, फिर मेरा शरीर कैसे चल रहा है? अगर मैं इतना निराश हूँ तो मैं धन-अर्जन किस प्रकार कर पाऊँगा? हमारे पास ये प्रश्न नहीं होते। केवल निराशा ही हमारा जीवन बन जाती है।

शुरुआत में, आपके पास प्रश्न होंगे, ''मैं बंधनविमुक्त होकर किस प्रकार जी सकूँगा?'' मैं कार्य कैसे कर सकूँगा?'' इतना समझिए कि बंधनविमुक्ति को निरंतर याद रखना, आपकी शारीरिक और मानसिक गतिविधियों में कोई बाधा नहीं डालेगा। वह केवल आपकी निराशा को मिटा देगा, क्योंकि वह आपके निराशाजनक विचारों को उठने और शांत होने देगा, और आप उन विचारों से भिन्न रहेंगे, उनसे जुड़ेंगे नहीं।

व्यसनों का समाधान

व्यसन क्या है? यह एक ऐसा व्यवहार या कार्य है, जब आप इसे नहीं कर पाएँगे, आप अपने जीवन में एक कमी महसूस करेंगे। किन्तु अगर आप वह करेंगे तो कुछ आनंद का अनुभव नहीं होगा। आपका व्यवहार केवल यंत्रवत होगा। व्यसनी होने का अर्थ है, कि आप विश्वास रखते हैं कि आका परम आनंद किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति के आधीन है।

आप इसे समझिए, यही व्यसन की परिभाषा है, कि आप सुख की विचार स्मृति को अधिक बढ़ाने की कोशिश करते हैं। आप उन्हीं व्यक्तियों, परिस्थितियों तथा वस्तुओं को बार-बार अपने जीवन में लाना चाहते हैं, यह जानते हुए भी कि वह सुख आप दोबारा नहीं पा सकते। व्यसन कई प्रकार के होते हैं। जैसे कुछ लोग मिलकर (पार्टी के) जश्न मनाने तथा लोगों से मिलने के आदि हो जाते हैं, कुछ लोग धूम्रपान और मदिरापान के।

याद रखिए, कोई बाह्य जगत की वस्तु यदि आप बार-बार अपने जीवन में लाएँगे, तो वह आपको वह आनंद नहीं दे पाएगी जो आपने पहली बार अनुभव किया था। वह केवल आपका व्यसन बन जाएगी, आनंद लेने का माध्यम नहीं। पहली बार जब आप मिठाई खाते हैं, एक अद्भुत अनुभव होता है। वह उत्तेजना बिल्कुल भिन्न होती है। किन्तु अगर आप वही मिठाई खाते रहें तो वही अनुभव होता है।

Page 14

नहीं होता। अंततः आप खाते-खाते इतना ऊब जाते हैं कि उस मिठाई को देखना भी पसंद नहीं करते। आप उसे देखकर कहेंगे, नहीं, और मिठाई नहीं! मुझे इस दर्शन भी पसंद नहीं। इसी प्रकार किसी से पहली बार मिलने की उत्सोजना अलग होती है, जो बाद में कम हो जाती है।

लोग मेरे पास आकर मुझसे पूछते हैं, "मैं अपनी बुराइयों किस तरह बदल सकता हूँ?" व्यसन एक ऐसी बुराई है जो बड़ी मुश्किल से तब जाती है, जब आपका अहं भाव नहीं रहता।

आप स्पष्टता से समझ लीजिए, कि धूम्रपान जो आपने दो दिन पहले किया, या बीस साल पहले किया—यह सब घटनाएँ एक दूसरे से स्वतन्त्र हैं, उनमें कोई सम्बन्ध नहीं। जब आपका मन उन्हें जोड़ने लगता है और आप यह विश्वास करने लगते हैं कि आपको धूम्रपान की आदत हो गई है। आपका विश्वास व्यसन की स्मृति तैयार करता है। फिर आप इससे लड़ना शुरू करते हैं। इसीलिए मैं कहता हूँ कि आपको अपने अहं का त्याग करना होगा। यह आपका विश्वास है जो उसे एक आदत या व्यसन बना देता है। अगर आप विश्वास छोड़ देंगे तो आदत भी छूट जाएगी।

अगर आप यकीन करते हैं कि यह एक सुखद अनुभव है तो आप अधिक धूम्रपान करेंगे। यदि आप यकीन करते हैं कि यह एक दुखद अनुभव है, आप इस स्मृति से लड़ने लगेंगे। दोनों तरह से आपकी हार है। यदि आप यह विश्वास रखते हैं कि धूम्रपान एक सुखद अनुभूति देता है, आप उनमुक्त होकर धूम्रपान करने की कोशिश करिए और देखिए आपको कैसा लगता है? जब आप जागरुकता के साथ धुएँ को अन्दर लेंगे, आप जानेंगे कि यह एक सुखद अनुभव नहीं है। वह आपको कभी भी आनंद नहीं दे सकता।

जब आप धूम्रपान करते हो, देखिए कि आपके अंतःकरण में क्या हो रहा है? आपको आनंद का अनुभव नहीं हो रहा है, बल्कि, आप किसी चीज से भाग रहे हैं। आप केवल यह सोचते हैं कि धूम्रपान आनंद देता है। यदि आप आनंदित नहीं होते, फिर भी आप आनंद को निचोड़ने की कोशिश करते हैं।

यदि आप गहराई से देखेंगे तो जानेंगे कि वह धूम्रपान हो, काम भावना, धन, या कोई और सुखद घटना, यदि आपको आनंद अनुभव नहीं होता, फिर भी आप आनंद को निचोड़ने की कोशिश करते हैं। आप अपने आपको सांतवना देने की कोशिश करते हैं। आप अपनी झुंझलाहट को ढक कर उसे आनंद बनाना चाहते हैं। आप विश्वास करना चाहते हैं कि यह आनंद है।

किसी भी आदत को छोड़ने की कोशिश करिए। आप कभी कामयाब नहीं हो पाएँगे। आप अगर उसे छोड़ भी देंगे, वह किसी भय या लोभ के कारण होगा, जो उससे भी बड़ी आदत होगी। यदि आप धूम्रपान किसी भय या लोभ के कारण छोड़ते हैं, आप अपने अंतःकरण तथा चेतना के लिए बहुत अच्छा कार्य नहीं कर रहे। आप अपने आप को नुकसान पहुँचा रहे हैं।

आप शायद धूम्रपान छोड़ दें, किन्तु भय और लोभ जिनकी वजह से आप धूम्रपान छोड़ पाएँ, वे

आपके अंतःकरण में जगह बना लेंगे। धूम्रपान से तो आप केवल अपने शरीर को नुकसान पहुँचाएँगे, किन्तु भय और लोभ आपके अस्तित्व को समाप्त कर देंगे। इसी जन्म में नहीं, कई जन्मों तक। आप अपने अगले जन्म में भी भय और लोभ को अपने साथ ले जाएँगे। धूम्रपान की आदत आपके अगले शरीर शायद आपके साथ ना जाए, किन्तु भय और लोभ की भावनाएँ आपके अगले शरीर में आपके साथ जाएँगी। इसलिए इस समस्या का सही समाधान यही है कि आप यह विचार त्याग दें कि आपमें यह आदत है, ऐसा करने से वह अपने आप छूट जाएगी।

ध्यान की विधियाँ

बंधनविमुक्त कभी भी, कहीं भी

जब आप बैठते हैं, स्वाभाविक है, विचार आने शुरू हो जाएँगे। जब आप किसी विचार को आते देखें, उसे कोई अर्थ ना दें। आप उसे तभी अर्थ दे पाएँगे, यदि आप उसे अपने भूतकाल से जोड़ें। उसको बिना कुछ अर्थ दिए उससे बंधनविमुक्त हो जाएँ—और देखें क्या होता है। जब आप याद करेंगे, "इस विचार से मुझे बंधनविमुक्त होना है, इसे कुछ अर्थ नहीं देना है" कुछ क्षणों के लिए एक अंतराल होगा, शांति का। जब आप महसूस करेंगे उस शांत अंतराल को, वह एक और विचार बन जाएगा। इस विचार से भी बंधनविमुक्त हो जाएँ। फिर से एक शांत अंतराल होगा। फिर एक और विचार आएगा, कि 'मैं शांत हूँ, या मैं बंधनविमुक्त हूँ' इस विचार से भी बंधन-विमुक्त हो जाइए। केवल वह अंतराल और शांति बढ़ने चाहिए। यह कर पाने से ही ध्यान हो जाएगा।

Page 15

नित्य ध्यान - परमानंद प्राप्ति के लिए प्रतिदिन ध्यान

करने वाली ध्यान की विधी है जिससे परमानंद की प्राप्ति होती है।

चक्रों का ज्ञान

नित्यध्यान विधी को समझने के लिए, पहले हमें चक्रों अथवा सूक्ष्म ऊर्जा केन्द्रों के बारे में कुछ जानकारी प्राप्त करनी होगी।

७ चक्र

सहस्रार चक्र

आज्ञा चक्र

विशुद्धि चक्र

अनाहत चक्र

मणिपूरक चक्र

स्वाधिष्ठान चक्र

मूलाधार चक्र

सात चक्रों पर काम करना ऊर्जा के नए स्तों को जगाने जैसा है। यह टेलीविज़न पर नए चैनल को मिलाने जैसा है।

हमारे भीतर सात ऊर्जा केन्द्र हैं। हर चक्र एक विशेष भावना से जुड़ा है। ये सात भावनाएँ, काम, भय, चिन्ता, ईर्ष्या, अहंकार, असंतुष्टि तथा सबसे प्यार पाने की कोशिश करना है। आज, मनुष्य केवल इन्हीं सात भावनाओं के आधार पर विचार करता है। उसका शरीर भी इन्हीं भावनाओं की उपयोगिता के आधार पर चलता है। कुछ लोग क्रियान्वित होते हैं इच्छा, काम तथा स्पर्श से। कुछ लोगों को हिलाने के लिए केवल भय पर्याप्त है।

एक परम विधी

ऐसी कई ध्यान की विधियाँ हैं जो विशेष लोगों के लिए विशेष समय पर उचित समझी जाती है, तथा कुछ ऐसी विधियाँ होती हैं जो कोई भी व्यक्ति कर सकता है। नित्यध्यान ध्यान की वह विधी है जो आज के जिज्ञासु के लिए है। यह आधुनिक युग की ध्यान विधी है।

नित्यध्यान का जन्म

पहले मैं आपसे यह बताना चाहूँगा कि ध्यान की विधि नित्यध्यान का जन्म कैसे हुआ। लगभग साल की उम्र तक मैंने कई ध्यान की विधियों के साथ प्रयोग किए। जब मैं बारह साल का हुआ मुझे आत्मज्ञान का गहरा अनुभव प्राप्त हुआ। बारह वर्ष की आयु से लेकर इक्कीस वर्ष तक मैंने जागरूक चेतना से कई ध्यान की विधियों का निरीक्षण तथा विश्लेषण किया। जब मुझे अपने अवतार के सही उद्देश्य की प्राप्ति हुई, तब से तीन वर्ष तक जो मैं आत्मज्ञान का अनुभव मुझे हुआ उसे दूसरों में भी उत्क्रांत करने के लिए एक परिपक्व विधी की रचना करने के लिए कार्य किया। मेरे अन्तःकरण के भीतर आज तक किए संशोधन का सार है "नित्यध्यान विधी"।

नित्यध्यान एक सूत्र है और एक विधी है जो सम्पूर्ण अस्तित्व पर कार्य करती है जिसके रुपांतरण से आत्मज्ञान के परम अनुभव की तैयारी हो सके। इसका हर भाग एक विशेष विधी है, जो अगले भाग का पूरक है, तथा हर व्यक्ति की चेतना के विकास के लिए सहायक है। यह एक नित्य

इच्छा जैसी भावनाओं के आधार पर क्रियान्वित होने में कोई बुराई नहीं हैं। किन्तु आपको इनसे उत्त्त परिमाणों जैसे कि प्रेम की भावना को भी अनुभव करना चाहिए। आपको यह समझना चाहिए कि भावनाओं के बिना आप मात्र ऊर्जा के साथ भी क्रियान्वित हो सकते हैं।

जब आप चक्रों को जाग्रत करेंगे आप अपने मन को भावनाओं से मुक्त कर पाएंगे। आप एक मुक्त अस्तित्व से कार्य करने लगेंगे। जब आप अपने मन तथा अन्तःकरण को बंधन विमुक्त कर लेंगे तभी आप स्वतंत्रता तथा मुक्ति का मूल्य समझ पाएंगे।

उदाहरण स्वरुप यदि आप किसी एक चक्र से विमुक्त हो जाते हैं, जैसे कि वह चक्र जो ईर्ष्या से जुड़ा है, आप संसार का एक नया परिमाण अनुभव करने लगेंगे, एक ईर्ष्यामुक्त संसार। आपका व्यक्तित्व जिस पहचान के आधार पर खड़ा है, आपका जीवन जिस धारणा पर निर्भर है, वह पहचान व धारणा स्वतः पिघलने लगेंगे आप एक नई ऊर्जा का अनुभव करेंगे।

उदाहरण के लिए सोचिए, जब आप शेयर बाजार के व्यवसाय में रुचि रखते हैं, आप उसी के बारे में सूचना तथा जानकारी एकत्रित करने लगते हैं, टेलीविजन से, पत्रिकाओं से और लोगों से भी... कुछ एक महीने पश्चात, आपको लगने लगता है कि सम्पूर्ण संसार शेयर बाजार के बारे में

Page 16

जाग्रत हो रहा है। आप अपने आपको शेयर बाज़ार से सम्बन्धित लोगों से घिरा हुआ महसूस करने लगते हैं। पूरा संसार नहीं बदला, यह आपका दृष्टिकोण है जो बदल गया है। जब आप अपने ऊर्जा केन्द्र को बदलते हैं तो आप उसी प्रकार के लोगों को आकर्षित करने लगते हैं।

यदि आप अपना ऊर्जा केन्द्र बदलते हैं, आप जिस संसार को देखते हैं वह बदल जाता है। हिन्दू ग्रन्थों में लिखा है कि ब्रह्माण्ड में सात संसार विद्यमान हैं। वे इन्हीं सात भावनाओं से जुड़े सात संसारों की बात कर रहे हैं। आप जिस भावना से देखते हैं, संसार वैसा ही हो जाता है।

नित्यधान-ध्यान की विधी

यह विधी सात-सात मिनट के पांच भागों में विभाजित है।

१. अनियमित श्वास लेना

अवधि - ७ मिनट

वज्रासन में बैठिए। (घुटने मोड़कर पैरों की एड़ी बैठना, पंजे बाहर की ओर रखना) साधारणतः हमारे शरीर में ऊर्जा सहस्त्रार चक्र से नीचे मूलाधार चक्र की ओर प्रवाहित होती है। वज्रासन में बैठने से ऊर्जा का यह प्रवाह नीचे से ऊपर की ओर प्रवाहित हो जाता है।

आँखें बंद करके, हाथ कमर पर रख कर बैठे तथा अनियमित श्वास लेना शुरू करें। साँस गहराई से अन्दर लें और बाहर निकालें, यह बिल्कुल अनियमित तरह से करें। केवल साँस पर ध्यान केन्द्रित करें। आपका पूरा अस्तित्व आपका श्वास बन जाना चाहिए। अपना समस्त शरीर अनियमित श्वास लेने के लिए उपयोग करें। आपका सम्पूर्ण शरीर श्वास लेते हुए हिलना चाहिए।

यह पहला भाग भौतिक स्तर पर है। वज्रासन में बैठकर श्वास अन्दर बाहर लेने से आपका शरीर और मन दोनों स्वस्थ होने लगेंगे। आप देखेंगे कि यदि आपको पाचन क्रिया बहुत सुंदर ढंग से कार्य करने लगती है।

नित्यध्यान का पहला भाग एक स्वस्थ शरीर बनाने के लिए है।

एक महत्वपूर्ण बात जो आपको समझनी है, वह यह है कि श्वास लेने की लय आपकी मानसिक स्थिति पर निर्भर करती है। आपकी श्वास लेने की लय पर आपको आपकी भावनाओं का गहरा असर होता है। जब आप गुस्से में होते हैं आपकी साँसों की लय बदल जाती है, जब आप चिंतित होते हैं तो भी आपकी श्वास की लय बदल जाती है। जब आप अत्यधिक तनाव में होते हैं और एक लम्बी गहरी

श्वास लेते हैं, अचानक आप अपने आप को हलका महसूस करने लगते हैं तथा शांत हो जाते हैं जिससे तनाव से मुक्त हो जाते हैं।

श्वास और मन एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। यदि एक में बदलाव आता है तो दूसरा स्वतः बदल जाता है। भावनाएँ हमारे हाथ में न हों किन्तु श्वास तो हमारी पकड़ में है। यदि हम श्वास पर नियंत्रण करते हैं या श्वास की लय बदलते हैं तो इसका प्रभाव सीधे हमारी भावनाओं तथा मन पर होगा।

हम श्वास लेने की अपनी लय के आदि हो जाते हैं। हमारे पुराने संस्कार, पुरानी स्मृतियाँ जो हमारे अवचेतन क्षेत्र में बन्द हैं, एक विशेष श्वास की लय हमारी प्रणाली में उत्पन्न करती हैं। जिसके परिणाम स्वरूप, हम वैसे ही संस्कारों तथा भावनाओं को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। हम इस दृष्टचक्र में फँस जाते हैं जिसमें हमारे पुराने संस्कार हमारी श्वास की लय को प्रभावित करते हैं। जिसके फलस्वरूप वैसे ही संस्कार तथा घटनाएँ भविष्य में भी हमारी ओर आकर्षित होते हैं। हमें इस तुष्चक्र को तोड़ना होगा।

नित्यध्यान की शुरुआत अनियमित श्वास के साथ होती है। क्योंकि श्वास अनियमित है, इसमें कोई दृढ़ लय नहीं होगी। हमारा मन जो एक दृढ़ साँचे में ढला हुआ है, उसका अस्तित्व व अभिव्यक्ति दोनों खंडित हो जाते हैं। विचार उन्हें परिचित धारणाओं के पीछे नहीं घूमते, जिसके वे वर्षों से आदि हो गए हैं।

हमारी माँस पेशियाँ हमारी पुरानी स्मृतियों को जैव ऊर्जा स्मृति के रूप में संग्रह करके रखती हैं। गहरी अनियमित श्वास लेने से माँस पेशियाँ तनाव से मुक्त हो जाएँगी तथा संग्रहित स्मृतियाँ शरीर के विभिन्न भागों से निष्कासित हो जाएँगी। साधारणतः हमारी माँस पेशियाँ तनावपूर्ण स्थिति में रहती हैं। अनियमित श्वासों उन्हें ढीला करके उनमें बसे संस्कार तथा पुरानी स्मृतियों को साफ कर देगी।

हर भावना हमारे भीतर एक विशेष श्वास की लय को उत्पन्न करती है। आपने शायद यह देखा हो, कि बच्चे बहुत गहरी तथा शांत, आनन्दित श्वास लेते हैं किन्तु जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं वे समाज से प्रभावित होकर, दुःख, खुशी, अपराध, अवस्था इत्यादि सामाजिक दृष्टिकोण अपना लेते हैं। फिर उनकी श्वास लेने की लय बिल्कुल बदल जाती है। दृढ़ साँचे में ढले मन के विकार मिटाने के लिए जो हमेशा भावनाओं को दबाने से गठित होते हैं, हमें अव्यवस्थितता का सत्रिवेश करना पड़ता है। इसमें यदि हम किसी दूसरी प्रणाली की सत्रिवेश करें तो समाधान नहीं होगा।

आपको पूर्ण अव्यवस्थितता की रचना अपने शरीर में करनी है जिससे सारी संग्रहित स्मृतियों की छापें मिटाई जा सकें। इसलिए प्राणायाम की तरह कोई भी नियमित श्वास प्रणाली न अपनाएँ। केवल अनियमित श्वास लें। अनियमित श्वास आपकी स्मृतियों से भावनात्मक आसक्ति नष्ट कर देगी। उसी प्रकार जैसे जब आप एक वृक्ष को हिलाते हैं तो पीले पत्ते स्वतः गिर जाते हैं। अनियमित श्वास जैसे आपकी दब्बी हुई प्रणाली हो हिलाकर रख देती हैं। आपकी सब पुरानी स्मृतियाँ तथा संस्कार

Page 17

मुक्त हो जाएँगे।

गहरी अनियमित श्वास लेने की क्रिया करने से हमारे शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है, तथा कार्बन डाय ऑक्साइड का शरीर से निष्कासन होता है, इससे वायु संचार बढ़ता है, तथा आप अधिक जीवंत और ताजापन महसूस करते हैं। शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ने से, स्वतः कोशिकाओं में जैव ऊर्जा की वृद्धि होती है। तथा शरीर अधिक जीवंत बनता है। जैव ऊर्जा आपके संस्कारों को साफ करती है जिससे आप अपने आपको हल्का, स्फूर्ति से भरा हुआ तथा आनंदित महसूस करते हैं।

२. तीव्र गुंजन करना

अवधि : ७ मिनट

वज्रासन में ही बैठे रहें, अंगूठा और प्रथम ऊँगली जोड़कर चिन मुद्रा बनाएं और हाथों को घुटनों पर रखें, हथेली ऊपर की ओर रखकर बैठें।

इसी मुद्रा में बैठकर, मुंह बंद रखें, होठों को जोड़कर गुंजन की ध्वनि उत्पन्न करें। गुंजन की ध्वनि, जितनी तीव्रता से हो सके, जितनी गहराई से हो सके, जितनी जोर से हो सके, जितनी लम्बी हो सके उत्पन्न करें।

‘ह्म्म्मम......’ की ध्वनि उत्पन्न करें। यदि आप अपने चेहरे एक पीतल के वर्तन में रखकर गुंजन ध्वनि उत्पन्न करेंगे, वैसी ही ध्वनि आपके गुंजन से उत्पन्न होगी। गुंजन अधिक से अधिक लम्बा हो। गुंजन की ध्वनि जितनी गहरी आपके नाभि क्षेत्र से निकलती हुई तथा जितनी जोर से हो सके उतनी तेज़ उत्पन्न करिए। बीच में गहरी सांस लेने की कोशिश न करें। शरीर स्वतः जितनी साँस की आवश्यकता होगी, उतनी साँसे लेगा।

अपनी सम्पूर्ण सजगता गुंजन पर केन्द्रित करें।

आप स्वयं को गुंजनमय बना दें। आपके मन के भीतर लगातार बातचीत जारी रहती है जिसे हम अंतर संवाद कहते हैं। गुंजन एक उत्कृष्ट विधि है, इस अंतरसंवाद को कम करने की। अंतरसंवाद और कुछ नहीं, स्वतंत्र विचारों का हमारे भीतर बहना है। गुंजन से आपका शरीर आपको ऊर्जा स्वरूप प्रतीत होता है। जब भी आप गुंजन करना शुरू करते हैं, आप अपने आपको बहुत हल्का महसूस करते हैं, जैसे आप हवा में तैर रहे हों। आप शरीर में भारीपन अनुभव नहीं करते क्योंकि गुंजन मन के कंपन को शरीर के कंपन से मिलाता है। आप अपने आप को ऊर्जा के रूप में अनुभव

नित्य ध्यान - परमानंद प्राप्ति के लिए प्रतिदिन ध्यान करने लगते हैं।

तनावपूर्ण मत बनिए। केवल सहजता से करिए। अपने सम्पूर्ण अस्तित्व तथा ऊर्जा के गुंजन के कम्पन की उत्पत्ति में जुटा दीजिए। दो गुंजन ध्वनि के बीच के अंतराल को कम करने की कोशिश करिए। कुछ समय के बाद आपको लगने लगेगा कि गुंजन स्वतः जारी है। आपकी कोशिश के बिना और आप केवल उसके साक्षी बन गए हैं। गुंजन के कंपन तथा ध्वनि से शरीर का समन्वय हो गया है।

गुंजन आपके भीतर एक स्वस्थ्य अंतरसंवाद तथा भावनात्मक सजगता को बढ़ाएगा।

३. चक्रों को जाग्रत करना

अवधि - ७ मिनट

वज्रासन में ही बैठे रहें या फिर पालथी मारकर सुखासन में बैठ सकते हैं। अपनी ऊँगलियों को चिन मुद्रा में रखें। अब अपनी जागरुकता मूलाधार चक्र से लेकर सहस्रार चक्र तक, हर चक्र पर ले जाएँ। जब आप अपनी जागरुकता एक चक्र पर ले जाते हैं

तो आप वह चक्र, वह ऊर्जा केन्द्र बन जाएँ। आप उस ऊर्जा केन्द्र को इस तरह अनुभव करें जैसे आपका सम्पूर्ण अस्तित्व वह ऊर्जा केन्द्र बन गया है।

इनमें से हर ऊर्जा केन्द्र हमारे अस्तित्व की एक विशेष भावना से सम्बन्धित है। किरलियन फोटोग्रैफी द्वारा इन चक्रों के अस्तित्व के बारे में ठोस प्रमाण दिया है

कि यह चक्र ऊर्जा शरीर के स्तर पर विद्यमान हैं। हमारी भावनाएँ भी हमारे भौतिक तल से जुड़ी हुई स्मृतियों का परिणाम हैं। ये स्मृतियाँ हमें लगतीं तथा पारिस्थितियों से पुराने ढंग से व्यवहार करने के लिए खींचती है, और यही व्यवहार भावना कहलाता है। उठती हुई भावनाएँ उस चक्र को बाँध देती है

तथा शारीरिक और मानसिक अवरोध उत्पन्न करती हैं। इसलिए हम अपना सम्पूर्ण ध्यान हर चक्र पर ले जाते हैं, रीढ़ की हड्डी के निचले सिरे से शुरू करके सिर के मुकुट क्षेत्र तक। जब हम अपनी पूरी सजगता किसी चीज पर केन्द्रित करते हैं, तो नकारात्मकता पिघलने लगती है। यह शारीरिक दर्द के लिए भी सही है। यदि आपके शरीर के किसी भाग में दर्द है, और आप वहाँ अपनी सम्पूर्ण सजगता

ले जाते हैं, आप देखेंगे कि दर्द एक बिन्दु में सिमट जाता है और गायब हो जाता है।

अपने हर ऊर्जा केन्द्र पर सम्पूर्ण सजगता एक-एक मिनट के लिए ले जाएँ।

ऐसा महसूस करें कि केवल वही चक्र पूरे संसार में है और कुछ नहीं। बस वह चक्र बन जाएँ। उस चक्र को अनुभव करें जैसे कि वह चक्र ही आपका अस्तित्व बन गया है। फिर अगले चक्र पर

Page 18

परमानंद में जीने का रहस्य

नित्य ध्यान - परमानंद प्राप्ति के लिए प्रतिदिन ध्यान

ध्यान ले जाएँ। इस विधी के समापन तक आप अपने आपको ऊर्जा तथा सकारात्मकता से भरपूर एवं बिलकुल हलका अनुभव करेंगे।

जब तक ऊपर के चक्रों तक पहुँचूँगे, आप पाएँगे कि जीवंतता, तथा तीव्रता बढ़ रही है। यह अंतरदृष्टि आपको एक स्वस्थ मन, स्वस्थ विचार, तथा भावनात्मक जागरुकता बढ़ाने में मदद करेगी। इस भाग के अन्त तक आप बढ़ती ऊर्जा तथा हल्कापन महसूस करने लगेंगे।

यदि आप अपने चक्रों पर ध्यान केन्द्रित करेंगे, आपका मन आसानी से इधर-उधर नहीं भटकेगा। वह स्थिर हो जाएगा क्योंकि ये जाग्रत ऊर्जा केन्द्र है। यदि आप शरीर के किसी और भाग पर ध्यान केन्द्रित करेंगे तो मन आसानी से भटक सकता है।

४. बन्धनमुक्त स्थिति में रहें

इस भाग में, यह विचार तथा समझ अपने साथ रखिए कि आपके विचार स्वतंत्र, तक्कहीन तथा असम्बंधित हैं। यदि आपके मन में विचार आते भी हैं, उन्हें न तो दबाने की कोशिश करें, और न उनके प्रति प्रतिक्रिया व्यक्त करें। केवल उन्हें देखें। इस समझ के साथ कि वे तक्कहीन तथा असम्बंधित हैं; स्वतः आपमें साक्षी चेतना का जागरण होगा।

आप समझिए कि आप जाने या न जाने माने या न माने आप आत्मज्ञानी हैं। आप स्वभावतः ही बन्धनमुक्त हैं। शांत बैठें और बन्धनमुक्त स्थिति को अनुभव करें, वह स्थिति जो परमानंद की स्थिति है। यह विधी ही एक उत्कृष्ट तकनीक है जीवन मुक्ति तथा आत्मज्ञान अनुभव करने की।

५. कृतज्ञता

अवधि - ७ मिनट

हम नित्यध्यान के अन्त में अपने आप को ब्रह्म शक्ति से जोड़ते हैं। इस भाग में हम सहज होकर इस ब्रह्म ऊर्जा में खो जाते हैं।

आराम से बैठिए, ब्रह्माण्ड को साथ सम्बन्ध को महसूस कीजिए यदि आपमें गुरु के प्रति या ईश्वर के प्रति प्रेमभाव है तो एक गहरे तथा शिशिल भाव से बैठिए, केवल उन गुरु या ईश्वर के साथ तादात्म्य बनाए रखिए, बस! सहजता से स्थिर हो जाइए।

सच्चे मन से ब्रह्म तथा गुरु के प्रति कृतज्ञता का अनुभव करें कि उन्होंने हमें महान ज्ञान की अनुभूति करवा कर अज्ञान से मुक्त किया तथा वे हमें परमानंद की प्राप्ति में मदद कर रहे हैं।

यह ध्यान विधी प्रतिदिन एकबार करें और आप अपने अस्तित्व के नए पहलू अनुभव करने लगेंगे। नित्यध्यान आपके शरीर तथा मन को तैयार करेगा जिससे आप पवित्र चेतना तथा परमानन्द की स्थिति प्राप्त कर सकें।

नित्यध्यान के फायदे

आधा घंटा 'नित्यध्यान'' ध्यान करने से आपको मिलती है :

  • तनाव से मुक्ति

  • बेहतर आपसी संबंध

  • आंतरिक शान्ति तथा पूणर्त्व

  • दूरदृष्टि की जाग्रति

  • ब्लडप्रेशर की सहजता

  • गूढ़ निद्रा

  • बढ़ती स्पष्टता

  • पूरे दिन बढ़ती हुई ऊर्जा

  • दिव्य शक्ति के साथ सम्बन्ध

आप अपने परिवार तथा मित्र जनों से भी नित्यध्यान आरंभ करवा सकते हैं। (www.dhyanpeetham.org/web/no.initiation.asp) इसका असर सीधा धरती का सामूहिक सकारात्मकता बढ़ने में होगा। अधिक से अधिक व्यक्तिगत चेतना का परिवर्तन सामूहिक चेतना में भी सकारात्मक परिवर्तन लाएगा, जिससे पूरे पृथ्वी ग्रह पर एक जीवन मुक्त संस्कृति की स्थापना होगी।

30

31

Page 19

नित्य योग - शरीर मन व अस्तित्व के लिए योग

योग केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए ही नहीं है। योग हमारे शरीर को तैयार करता है हमारे ध्येय की ओर जाने के लिए - शरीर मन और आत्मा के एकाकार का ध्येय। नित्य योग एक ऐसी विधी है जो पतंजली को शारीरिक अभिव्यक्ति करती है तथा हम सबको इस एकाकार के बारे में ज्ञान देती है।

योग क्या है

पतांजलि, जो योग के पिता कहलाते हैं, योग सूत्रों की शुरुआत में कहते हैं :

योग: चित्त वृत्ति निरोध:

वे कहते हैं, योग मन की वृत्तियों का अन्त से नहीं होता, बल्कि जहाँ मन की वृत्तियों का अन्त होता है, वहीं से योग की शुरूआत होती है।

योग एक निरंतर होने वाली क्रिया है, इसको समझने के लिए हमें यह सत्य भी समझना पड़ेगा कि जो कुछ हो रहा है, वह सब शुभ ही है।

आप स्पष्टता से समझिए कि हर अनुभव आपकी चेतना को ऊपर उठाता है, और आपको अधिक परिपक्व बनाता है। धन गंवाना भी आपको कुछ सिखाता है। स्वास्थ्य खोकर भी आप कुछ सीखते हैं। जब इस सत्य को स्वीकार करते हैं, आप पाते हैं कि जीवन में हर क्षण चमत्कार हो रहे हैं।

एक छोटी सी कहानी :

एक बार एक जहाज पानी पर तैर रहा था। अचानक, जहाज के कप्तान ने आगे बहुत सी

बतियाँ देखीं। कप्तान वहाँ से पलटा और घोर्णा की कि आने वाला जहाज पनद्रह डिग्री उत्तर की ओर मुड़ जाए जिससे कि दोनों जहाजों के बीच टकराव न हो। सामने से जवाब आया कि “आप अपने जहाज को पनद्रह डिग्री दक्षिण की ओर मोड़ लें ताकि टकराव न हो।”

अब इस जहाज के कप्तान को गुस्सा आ गया। उसने बहुत धमंड के साथ उग्रता से कहा, “यह देश का सबसे बड़ा जहाज है, हमारे साथ तीन लड़ाकू जहाज भी हैं, और सहायता के लिए कई जहाज साथ हैं। मैं आदेश देता हूं कि आप पनद्रह डिग्री उत्तर में मुड़ जाएँ, नहीं तो मुझे अपने जहाज को बचाने के लिए कुछ करना होगा।”

सामने से उत्तर मिला, “हम एक लाइटहाऊस हैं।”

आप यह समझिए कि प्रकृति निरंतर अपना कार्य कर रही है, आपको मार्गदर्शन भी कर रही है, इसलिए जो कुछ भी हो रहा है वह आपके अच्छे के लिए ही हो रहा है। केवल अपने आप को प्रकृति के साथ बहने दीजिए, यही सही रास्ता है। योग आपको प्रकृति के साथ बहने की राह दिखाता है। योग का अर्थ होता है एकाकार.......

पतंजली - योग के प्रतिष्ठापक :

पतंजली योग प्रणाली के प्रतिष्ठापक है। वे पहले गुरु है जिन्होंने एक स्पष्ट, वैज्ञानिक तथा तर्कसंगत प्रणाली की रचना की जिससे आत्मज्ञान प्राप्त करने का अनुभव मिल सके।

पतंजली वो पहले गुरु थे, मैं कह सकता हूं कि वे एक ऐसे आध्यात्मिक मार्गदर्शक थे, जिन्होंने एक नक्शे की रचना की जो हमें आत्म-ज्ञान प्राप्त करने के लिए दिशा बताता है। उन्होंने बहुत स्पष्टता से निर्देश दिए हैं, सूत्र दिए हैं, जिनका आचरण करने से एक के बाद एक सीढ़ी चढ़कर आत्मज्ञान का वही अनुभव दोहराया जा सकता है। जिस प्रकार वैज्ञानिक एक सत्य की रचना करते हैं

जिससे उनके द्वारा किए गए प्रयोग तथा उससे मिली समझ को बाहरी दुनिया के कमाल समझने के लिए उपयोग किया जा सकता है। पतंजली ने भी एक सुंदर सूत्र की रचना की, एक विधी, जो आत्मज्ञान प्राप्ति के लिए अंतःकरण में हुए प्रयोगों से मिली समझ को दोहरा सके।

रघुपति योगी - योग गुरु

मैं भाग्यशाली था कि मुझे योग के ज्ञीतित गुरु से सीखने का अवसर मिला। वे योगानन्दा पुरी, थे जिन्हें रघुपति योगी भी कहते हैं। उन्होंने योग के विज्ञान पर महारत हासिल की थी, जिसकी खोज पतंजली ने की थी।

उन्होंने योग के हर पहलू को बहुत गहराई से समझा था, जिसमें शारीरिक योग आसन, अनेक

Page 20

मुद्राएँ, हठ योग, प्राण का नियंतरण, अंतःकरण में दृश्यों का प्राकट्य, भावनाओं के साथ कार्य इस प्रकार योग के और भी कई पहलुओं का गूढ़ अध्ययन किया गया, तथा ऐसा कह सकते हैं कि योग पर उनका प्राधीकरण था। उन्हें योग के मर्म की गहरी अंतर्दृष्टि प्राप्त थी।

केवल वही व्यक्ति पतंजलि को फिर से जीतेन कर सकता है जिसने पतंजलि की चेतना को अनुभव किया हो। मैं भाग्यशाली था कि मुझे ऐसे गुरू मिले जिन्होंने पतंजलि की चेतना तथा उनके अंतःकरण को छुआ था।

उनमें एक अद्भुत शक्ति थी और अकल्पनीय शारीरिक बल था, जिसका उपयोग वे बहुत सहजता से करते थे। वे अपने सीने पर एक लोहे की चेन पहन कर पूरी साँस छोड़ते थे, फिर जब साँस भरते थे तो लोहे की चेन के टुकड़े-टुकड़े हो जाते थे।

अक्सर, एक तर्कसंगत मन यह समझ नहीं सकता और न ही स्वीकार करता है कि यह सब वास्तव में हो सकता है, पर यह महान योगी सब कुछ संभव कर सकते थे। मैं भाग्यशाली था कि मैं उनके आसपास था और मैंने उन्हें कई बार हवा में तैरते हुए देखा था। वे जोर से साँस लेकर अपनी साँस को पकड़ लेते थे। जिस क्षण वे ऐसा करते थे उनका शरीर एक फूले हुए गुब्बारे की तरह हवा में तैरने लगता था।

तीन साल की उम्र से लेकर तेरह साल की उम्र तक मुझे उनके चरणों में रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। रोज सुबह से लेकर दोपहर तक, कम से कम चार-पाँच घंटे वे मुझसे योग की परम्परागत विधियाँ करवाते थे जैसे आसन, नेति और धौति, जिसमें एक लम्बा कपड़ा निगल कर मुझे आँते साफ करनी पड़ती थीं।

शरीर को केवल लक्ष्य प्राप्ति के इरादे से चलाएँ और मन चाहा परिणाम प्राप्त करें

कुछ दिन रघुपति योगी मुझे बिलकुल शांत बैठने के लिए कहते थे, स्थितरता और शांति पर ध्यान करने के लिए कहते थे। दस मिनिट के बाद अचानक कहते थे कि खड़े हो जाओ और फिर मुझे पूरे मंदिर में जोर से दौड़ाते थे।

वे मुझे झुकाते थे, कभी इस तरफ, कभी उस तरफ। जिस मंदिर में वे मुझे योग सिखाते थे, वहीं बीस या तीस खम्भे थे। वे मुझे हर पत्थर के खम्भे पर चढ़ाते थे और उतारते थे और यह करने के लिए मैं सिर्फ एक हाथ इस्तेमाल कर सकता था।

मैं उनसे पूछता था कि वे मुझे खम्भों पर क्यों चढ़वा रहे थे, क्योंकि मैंने योग की किसी पुस्तक में इसके बारे में नहीं पढ़ा था।

उन्होंने एक बहुत सुंदर बात कही, "जिस प्रयोजन से तुम शरीर को झुकाओगे या हिलाओगे, वह स्मृति, वह विचार आपके शरीर और मन में अंकित हो जाएगा।"

यह एक चौका देने वाला रहस्योद्घाटन था। उन्होंने कहा कि जिस प्रयोजन से आप अपने शरीर को चलाएँगे, हिलाएँगे या झुकाएँगे, वह इच्छा, वह इरादा आपके शरीर में अंकित हो जाएगा। आपका शरीर उसीको व्यक्त करने लगेगा।

आज खासकर पश्चिमी देशों में, आसनों को बिमारियों से जोड़ने का प्रचलन है। आपको इस समस्या के लिए यह आसन करना है, इस बीमारी के लिए यह आसन करिए। आप यह समझिए कि योग का ध्येय एक बीमारी को ठीक करना नहीं है। जब आप एक बीमारी के बारे में सोचकर कोई आसन करते हैं, आप वास्तव में उस बीमारी का विचार अपने शरीर में अंकित करते हैं।

रघुपति योगी कहते हैं कि जब आप किसी भी आसन का अभ्यास करते हैं और उसका प्रयोजन आपके मन में स्पष्ट है तो आपके शरीर पर उसका प्रभाव पड़ता है। वे कहते हैं कि यदि आपने दृढ़ विश्वास है कि मात्र बैठने से आपका स्वास्थ्य सुधरेगा और आप स्वास्थ्य के लिए बैठते हैं, आप देखेंगे कि आपका स्वास्थ्य सुधर रहा है।

आप यह समझिए कि आपका शरीर आपकी स्मृति से बना है। आपका मन, आप सोचते हैं आप हैं, उस स्मृति के बल पर आपके शरीर के निर्माण की नींव रखता है।

आपकी हर स्मृति आपकी मांस पेशियों में अंकित है। इसलिए जब आप स्मृति बदलते हैं आपकी शारीरिक प्रणाली भी बदल जाती है। आपके शरीर का प्राकृतिक तंत्र आपके द्वारा रची हुई स्मृति के प्रति प्रतिक्रिया अवश्य देगा। इसी प्रकार आपके शरीर और मन में नित्य योग के द्वारा परिवर्तन होता है। पहले अन्तःकरण स्वच्छ होता है, फिर मन की बारी आती है। इसके पश्चात् जब शरीर योगासन में सही ध्येय के साथ चलता है तब शरीर भी अन्तःकरण और मन का अनुकरण करता है।

योग करने का प्रयोजन मांस पेशियों तथा जीवकोशिकाओं में स्मृति और प्रज्ञा बनकर बस जाता है।

वैज्ञानिक प्रमाण

जो हमारी धारणा है, हम भी वही हैं। जैसी हमारी धारणा होगी वैसी ही हमारी कार्य प्रणाली होगी। और जैसी हमारी कार्य प्रणाली होगी, वैसी ही हमारी नियति होगी। यह किसी उपनिषद् में लिखा वाक्य नहीं है, किन्तु "द बॉयोलॉजी ऑफ बिलीफ" नाम की डॉ. ब्रूस लिपटन द्वारा लिखी पुस्तक में से

Page 21

परमानंद में जीने का रहस्य

नित्या योग - शरीर मन व अस्तित्व के लिए योग

लिया गया है। डॉ. लिप्सन जीव कोशीय जीव वैज्ञानिक हैं, जिन्होंने कोशिकाओं के व्यवहार के बारे में नई पद्घति को प्रस्तुत किया है। हमें समाज यह सिखाता है कि हमारा आचरण उसी तरह का होता है जैसा नक्शा हमारी "जीन्स" में रचा गया है।

डॉ. लिप्टन ने अपने अनुसंधान के बाद इसका विपरीत निष्कर्ष निकाला है। हमारी "जीन्स" का नक्शा उस तरह का हो जाता है, जैसा आचरण होता है।

ऐसी घटनाओं के अभिलेख हमें देते हैं कि इच्छाशक्ति तथा कल्पना यह क्षमता रखते हैं कि उन्हें वास्तविकता में बदल सकें। उदाहरण स्वरूप लोगों ने कई घातक रोग जैसे कैंसर आदि तथा शारीरिक अपंगता जैसी समस्याओं से भी निदान प्राप्त किया है, जब उन्होंने इन समस्याओं को अपनी सीमा और क्षमता से भी अधिक आगे ढकेल दिया है। यह चमत्कार आपकी इच्छा-शक्ति के द्वारा जीवकोशिकाओं के परिवर्तन की वजह से होते हैं।

यह पुरातन सत्य अब आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों द्वारा भी सिद्ध हो चुका है। यह स्थापित हो गया है कि जिस विचार को हम निरंतर गहराई से सोचते हैं उसका असर हम पर शारीरिक मानसिक और आध्यात्मिक रूप से जरूर होता है।

नित्य योग का उद्देश्य

नित्य योग, विश्व को मेरी भेंट है। यह एक ऐसा विज्ञान या सूत्र है जो सबको आत्म ज्ञान का वही अनुभव दे सकता है जो मुझे हुआ है।

नित्य योग का उद्देश्य बहुत सरल है - नित्यानंद का अनुभव करना तथा उसे व्यक्त करना। नित्य योग के द्वारा परमानंद को अनुभव करने की क्षमता आपके शरीर में उत्पन्न होगी।

इस समय आपकी शारीर प्रणाली आत्मज्ञान की स्थिति में निरंतर रहने के लिए शायद तैयार न हो। नित्य योग आपके शरीर को परमानंद निरंतर प्रसारित करने के लिए तथा उसे अनुभव करने के लिए तैयार करता है। नित्य योग के द्वारा मैं मुमुक्षुओं को तैयार कर रहा हूँ, कि वे परमानंद का अनुभव कर सकें और अनुभव को निरंतर प्रसारित कर सकें। नित्य योग का उद्देश्य लोगों को बंधनविमुक्त करके उन्हें परमानंद का अनुभव कराना है। लोग यह पाएँगे कि शारीरिक स्वास्थ्य पर भी इसका अतिरिक्त असर पड़ता है। किन्तु आप इस बात को स्पष्टता से समझें कि योग का उद्देश्य शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त करने से बढ़कर है। शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त करना तो उसका मात्र एक लाभ है। योग के भावनात्मक स्तर पर भी कई लाभ हैं, पर वे भी योग के अतिरिक्त लाभों में हैं।

इसी प्रकार, ध्यान केवल मन के स्वास्थ्य के लिए नहीं है। मन का स्वस्थ होना ध्यान का एक अतिरिक्त लाभ है। नित्य योग का ध्येय आपके सम्पूर्ण जीवन को तथा जीवन के हर पहलू का

परमानंद के साथ एकाकार कराना है।

आज, नित्य योग विश्वभर में प्रचलित है। नित्य योग का हर सूत्र आपके शरीर, मन तथा आत्मा के एकाकार को अधिक गहरा बनाता है। नित्य योग पतंजलि के अष्टांग योग के तत्वों जैसे आसन, प्राणायाम तथा मुद्राओं आदि का समन्वय करता है।

नित्य योग आपके जीवन में अधिक हलचल डालने के लिए नहीं है, बल्कि आपके हलन-चलन में अधिक जीवन डालने के लिए है।

Page 22

परमहंस नित्यानंदा के बारे में

परमहंस नित्यानंदा हमारे युग के आत्मज्ञानी गुरु हैं। नित्यानंदा ने ध्यान द्वारा परमानंद की प्राप्ति के लिए एक विश्व व्यापी आंदोलन की शुरुआत की है। जिससे प्रतिदिन के मानसिक तनाव से लेकर आत्मज्ञान तथा जीवन मुक्ति जैसे पूर्ण अनुसंधानों तक किसी भी समस्या का समाधान सुलभता से हो सकता है।

नित्यानंद ने अल्पायु में ही घर का त्याग किया तथा भारत में एक छोर से दूसरे छोर तक यात्रा की, तीर्थ स्थल गए, तथा कई योगी तथा कई सिद्ध पुरुषों की संगति की। उन्होंने अपना आंतरिक तत्व ज्ञान ध्यान मार्ग, योग, भक्ति, तंत्र तथा अन्य पूर्ण आध्यात्मिक विज्ञानों से प्राप्त किया। मानव प्रकृति को एक आत्मज्ञानी अन्तर्दृष्टि से अध्ययन करने के पश्चात नित्यानंद ने मानवजाति के अपने आंदोलन की परिभाषा लिखी है।

जीवन मुक्ति में जीने की प्राचीन परम्पराओं पर आधारित सब धर्मों का समन्वय परम सत्य की खोज में करके, नित्यानंदा ने समूचे विश्व के भित्र भित्र लोगों को अपने साथ लिया है, चाहे वे किसी भी सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषा, आयु या लिंग के हों।

बैंगलोर, भारत में स्थित नित्यानंद ध्यानपीठम अपनी स्थापना से ही विश्व भर के भक्तों के लिए आध्यात्मिक केन्द्र बन गया है। इस संगठन ने कई सेवाएँ व कार्यक्रम प्रस्तुत किए हैं। इस संगठन के अंतरराष्ट्रीय आश्रम तथा केन्द्र परिमाणिक आध्यात्म पर कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं। इसके द्वारा भौतिक व आध्यात्मिक संसार एक होकर एक आनन्दित जीवन की रचना करते हैं।

नित्यानंद मिशन (आंदोलन के बारे में) : नित्यानंद मिशन एक अंतरराष्ट्रीय आंदोलन है

नित्यानंद मिशन द्वारा प्रसारित कार्यक्रम :

इनर अवेकनिंग (आंतरिक जागरण)

इनर अवेकनिंग एक २१ दिन का कार्यक्रम है जो तीव्र रुपांतरण करता है। इसका समन्वय इस प्रकार हुआ है कि जिससे हर व्यक्ति के अस्तित्व में जीवन मुक्ति जीने के अवयव उत्पन्न हो सकें, तथा यह एक कभी न बदलने वाली रसायनिक क्रिया उत्पन्न करता है जिससे आप सामान्य से दिव्य की ओर अग्रसर हो सकें।

लाइफ ब्लिस इंजीनियरिंग

यह एक ३० दिन का आवासीय कार्यक्रम है जो आत्मज्ञानी गुरु की उपस्थिति से प्रेरित तीव्र रुपांतर की शक्ति को अनुभव करने का अवसर प्रदान करता है। है। भारत में बैंगलुरु आश्रम में कार्यान्वित यह कार्यक्रम आपको अपने अस्तित्व की गहराई तक ले जाता है, योग, ध्यान तथा कई प्रवृत्तियों द्वारा जो एक आत्मज्ञान द्वारा रची गई है, आपके शरीर तथा मन को जीवन मुक्ति के लिए तैयार करने के लिए।

कल्पतरू

एक दिन का ध्यान कार्यक्रम जो आपके भीतर जीवन मुक्ति का बीज बोता है। यह कार्यक्रम आपको ऊर्जा प्रदान करता है जिससे आपके अंदर पूरे करने की शक्ति आपको प्राप्त हो जिससे आप बाह्य सफलता व आंतरिक आनन्द की ओर अग्रसर हो सकें।

: संपर्क :

INDIA:

Bengaluru, Karnataka

(Spiritual headquarters and Nithyananda Vedic Temple)

Nithyananda Dhyanapeetam, Nithyanandapuri,

Off Mysore Road, Bidadi, Bengaluru - 562 109

Karnataka, INDIA

Ph.: +91 97422 03311 / +91 92430 48957

Email: [email protected]

URL:www.nithyananda.org

Los Angeles

Life Bliss Foundation

9720 Central Avenue,

Montclair, CA 91763 USA

Ph.: +1 909 625 1400

Email: [email protected],

[email protected]

URL: www.lifeblissfoundation.org

ध्यान की गई सेवाएँ इस प्रकार है :- ध्यान, योग, कॉर्पोरेट लीडरशिप कार्यक्रम, मुफ्त ऊर्जा चिकित्सा-नित्या आध्यात्मिक चिकित्सा प्रणालो के माध्यम से युवाओं के लिए मुफ्त शिक्षा, कला व संस्कृति को सत्संग, मुफ्त मेडिकल शिविर व नेत्र शल्य चिकित्सा मुफ्त भोजन विश्व के सभी आश्रमों में, आश्रम गुरुकुल द्वारा शिक्षा की एक संपूर्ण प्रणाली तथा विशेषकर रचे गए ध्यान के कार्यक्रम।