Books / isbn 979-8-88572-019-9

1. isbn 979-8-88572-019-9

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Content: भाग-3 (अध्याय 13 से 18)

Content: भगवद् गीता

Content: नवीन व्याख्या सहित

Content: परमहंस नित्यानन्द

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Chapter Name: भगवद्-गीता की पृष्ठभूमि

Content: भगवद्-गीता वैदिक संस्कृति का एक पवित्र शास्त्र है। जैसा कि सभी शास्त्रों के साथ हुआ, यह ज्ञान भी मौखिक रूप से प्रसारित होता रहा है, इसलिए संस्कृत में इसे 'श्रुति' कहते हैं जिसका शाब्दिक अर्थ है 'सुना हुआ'। भगवद्-गीता प्रायः 'गीता' कही जाती है। जिसका संस्कृत में निहित अर्थ है 'पवित्र गीत'। जहां वेद और उपनिषद अपने आप में पूरे ग्रन्थ हैं, 'गीता' प्रसिद्ध हिन्दू ग्रन्थ 'महाभारत' का ही एक अंग है। 'महाभारत' को भी एक पुराण की संज्ञा दी जाती है। अतः गीता महाभारत की कहानी का एक हिस्सा ही है। शास्त्र के रूप में गीता प्राचीन ज्ञान की वैदिक परम्परा का आधार है जो महान ऋषियों के अनुभवों की अभिव्यक्ति है। 'श्रुति साहित्य' के वेद व उपनिषद आधार-स्तंभ हैं जो महान ऋषियों की दीर्घ समाधि में प्राप्त गहन अन्तर्दृष्टि और जागरूकता से प्राप्त ज्ञान को स्पष्ट करते हैं। ये उतने ही प्राचीन हैं जितनी मानव-संस्कृति है और मनुष्य की सत्य-अन्वेषण हित की गई यात्रा की प्रथम और सभी अभिव्यक्तियां हैं। वेद महान ऋषियों के समक्ष प्रकट होने के साथ हैं और उपनिषद् इन महान संतों की अपनी व्याख्या है। परन्तु गीता, एक महान संत व्यास ऋषि द्वारा सुनाई गई कथा का एक अंश है जो ईश्वरीय सत्ता की सीधी अभिव्यक्ति मानी जाती है। किसी भी अन्य पवित्र ग्रन्थ या उसके किसी अंग को वह विशिष्ट पद प्राप्त नहीं है जो 'गीता' को है। बल्कि गीता के कारण ही महाभारत ग्रन्थ को इतना पावन माना जाता है। 'गीता' परम देव, भगवान कृष्ण की महाचेतना की अभिव्यक्ति है, इसलिए इसे एक शास्त्र माना जाता है। 'महाभारत' का शाब्दिक अर्थ तो 'वृहत भारत' है, परन्तु इसमें एक देश और सभ्यता-भारतीय सभ्यता-के बारे में बताया गया है जब इस भूमि खण्ड पर राजा भरत के वंशजों का राज था। भगवद्-गीता कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में हुए भगवान कृष्ण और अर्जुन के मध्य संवाद पर आधारित है। कृष्ण ने अर्जुन को प्रेरित किया था कि शस्त्र उठाकर

Content: अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करे। "ये तो सब मरे हुए हैं ही", कृष्ण कहते हैं: "तेरे सामने खड़े ये सब लोग मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं... अब तू जा और अपना कर्तव्य कर... इस कृत्य के फल की चिन्ता मुझ पर छोड़ दे...!" गीता वस्तुतः अध्यात्म के अन्तर्ज्ञान की सर्वथा व्यावहारिक सीख है। कुछ विद्वानों ने इसकी जुटिपूर्ण व्याख्या कर इसे हिंसा को प्रोत्साहन देने वाला आह्वान बताया है। यह तो नित्य चलायमान शरीर और मन का उद्बोधन है जो मन और अहंकार के तर्क के परे जाने की आवश्यकता रेखांकित करने वाला ज्ञान है। राजा धृतराष्ट्र अंधे होने के कारण युद्ध में भाग नहीं ले पाते इसलिए उनके मंत्री संजय, जो 'दिव्यदृष्टि' सम्पन्न हैं, रणभूमि में यतित घटनाओं का वर्णन कर सुनाते हैं। कृष्ण और अर्जुन के मध्य संवाद का सप्रेषण भी संजय की वाणी द्वारा होता है। इस युद्ध में अन्ततःः सारे कौरव और भीष्म, द्रोण एवम् कर्ण सदृश उनके महाथी मारे जाते हैं तथा पांचों पाण्डव विजेता होकर समग्र राज्य के राजा बनते हैं। वस्तुतः कृष्णार्जुन संवाद मनुष्य और ईश्वर या जैसा संस्कृत में कहते हैंः 'नर और नारायण' के मध्य संवाद है। अर्जुन के प्रश्न और शंकाएं वास्तव में हमारी अपनी शंकाएं और प्रश्न हैं। भगवान कृष्ण उनका उत्तर देते हैं जो देश-काल के बन्धन से परे है। कृष्ण का संदेश आज तक भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पूर्व उस रणक्षेत्र में था। नित्यानन्दजी 'महाभारत' के प्रतीकात्मक अर्थों को इस प्रकार स्पष्ट करते हैंः "महाभारत का महान युद्ध मन के धनात्मक और ऋणात्मक संस्कारों का युद्ध है। पाण्डव धनात्मक संस्कारों के प्रतीक हैं और कौरव ऋणात्मक संस्कारों के। कुरुक्षेत्र का मैदान यह शरीर है। अर्जुन मनुष्य के व्यक्ति-चेतना है और कृष्ण उसको निर्देशित करने वाले प्रबुद्ध स्वामी या दैवी शक्ति! कौरव सेना के प्रमुख महाथी प्रतीक हैं उन रुकावटों या बाधाओं के जो प्रबोध कामी व्यक्ति-चेतना की यात्रा में अड़ंगे पैदा कर उभरते हैं। कुरुवंश के पितामह भीष्म, पारिवारिक और सामाजिक अनुवन्धनों के प्रतीक हैं, कौरवों और पाण्डवों के गुरु द्रोण आध्यात्मिक ज्ञान समेत शिक्षा प्रदाताओं की अपनी सीमाओं या अनुवन्धन के द्योतक हैं। कर्ण सुकृत्यों-यथा करुणा और दान के बाध्यकारी प्रभाव का प्रतीक बन कर उभरता है और दुर्योधन अहम का प्रतीक है जिसका पराभव सबसे बाद में होता है। पारिवारिक एवम् सामाजिक अनुवन्धनों को रिवाजों के खिलाफ विद्रोह कर जीता जा सकता है। इसलिए जो प्रबुद्ध ज्ञान प्राप्ति के साधक होते हैं उन्हें पारम्परिक रूप से सन्न्यासी होकर सब कुछ त्यागना पड़ता है और सभ्यता के बन्धनों से परे जाना पड़ता है। बेशक यह अनुवन्धन शरीर के रहते खत्म तो नहीं हो सकते, परन्तु इनका प्रभाव काफी कम हो जाता है। द्रोण प्रतीक है जीवन में प्राप्त ज्ञान और ज्ञानदाताओं (या शिक्षकों) के, जो रास्ता

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Content: तो इंगित कर सकते है पर अंततः ज्ञान बोध जागृत नहीं करवा सकते। इनका प्रभाव भी आसानी से छूटता नहीं, क्योंकि उनके प्रति कृतज्ञता का भाव तो रहता ही है। करण प्रतीक है सारे सुकृत्यों का, परन्तु यही सुकृत्य उसके बोध मार्ग में बाधा बनके खड़े होते हैं। फलस्वरूप कृष्ण को स्वयं करण का पुण्य भार कम करना पड़ता है, क्योंकि इस भार के रहते उसकी मुक्ति संभव ही नहीं थी। जो प्रबुद्ध गुरु या स्वामी है वह अपने शिष्य को सुकृत्यों से सम्बद्ध फलों से अनुराग भी त्यागने को कहता है, परन्तु यह त्याग होता नहीं क्योंकि शिष्य उन्हें सुकृत्य समझता है, उसका अपना अनुभव कहता है कि दूसरों के प्रति करुणा दिखाना या दीनों को दान देना बुरा हो ही नहीं सकता!! करण का चरित्र यह भी दिखाता है कि प्रबोधन का अनुभव ही व्यक्ति की अंतिम साधना है और यही वह करुणा की अमूल्य भेंट है जो कोई प्रबुद्ध आत्मा विश्व को प्रदान कर सकती है। दुर्योधन व्यक्ति का अहंकार दिखाता है, जिसका जीतना बेहद मुश्किल होता है इसमें यदि स्वामी या ईश्वर सहायक न हो तो इससे मुक्ति संभव ही नहीं होती। अहंकार की गति बड़ी सूक्ष्म होती है और कभी-कभी तो गुरु भी सहायक नहीं होते, क्योंकि अपने अभिमान में अहंकार अपने गुरु या उद्धारक से भी नाता तोड़ लेता है। महाभारत का विशाल युद्ध 18 अक्षौहिणी सेनाओं के मध्य हुआ था--11 अक्षौहिणी कौरवों की सेना, अर्थात् ऋणात्मक संस्कारों की ओर सात अक्षौहिणी पाण्डवों या धनात्मक संस्कारों की सेना। इन अठारह अक्षौहिणी सेनाओं के मध्य 18 दिन-रात ही चला था। संख्या 18 का बड़ा गूढ़ महत्व है। यह प्रतीक है मनुष्य की दस इन्द्रियों का-5 ज्ञानेन्द्रियों : स्वाद, दृष्टि, घ्राण, श्रवण और स्पर्शी का बोध कराने वालों; 5 कर्मेन्द्रियों : अर्थात् कर्म करना यथा चलना-फिरना, बोलना इत्यादि कर्मकाण्ड कराने वाली इन्द्रियों और 8 प्रकार के विचारों-लालच, वासना इत्यादि-का। इन सभी 18 बन्धनों को तोड़ कर आत्मदर्शन हो सकता है। अतः महाभारत कोई महान युद्ध गाथा नहीं है। यह भाग अच्छाई और बुराई का द्वंद्व भी नहीं है। यह तो दोनों-धनात्मक एवम् ऋणात्मक-संस्कारों को अपने शरीर-मन तंत्र से पूर्ण तिरोभाव का युद्ध है जिसके बिना पूर्ण मुक्ति संभव नहीं होती। दूसरे शब्दों में यह ज्ञान बोध प्राप्त करने के संघर्ष की कथा है। महाभारत एक सजीव कथा है जो हमेशा जारी रहती है। भगवद्-गीता ज्ञान-बोध पाने की संदेशिका है। जिस प्रकार हजारों वर्ष पूर्व अर्जुन मोहग्रस्त हो गया था उसी प्रकार हम सब भी होते हैं और इस पुस्तक से हम प्रबुद्ध स्वामी के निर्देश ग्रहण करते हैं। गीता हमें एक महती सुविधा प्रदान करती है अपने स्वामी के निर्देशों द्वारा अपने सारे शक और संशयों को दूर कर सही मार्ग पर चलने की!

Chapter Name: प्रस्तावना

Content: इस शृंखला में प्रबुद्ध स्वामी परमहंस नित्यानन्द भगवद्-गीता पर अपनी टिप्पणियां प्रस्तुत करते हैं। गीता पर सैकड़ों टीकाएं उपलब्ध हैं, जिनमें प्रारंभिक टीकाएं तो महान आध्यात्मिक संतों-स्वामियों यथा आदि शंकराचार्य, रामानुज, माधवाचार्य-द्वारा सहस्त्रों वर्ष पूर्व की गई थी। प्रस्तुत काल में महान संतों रामकृष्ण परमहंस, रमण महर्षि सदृश विद्वानों ने गीता पर अपनी टीकाएं विशद रूप से की हैं। कई अन्य लोगों ने भी इस महान शास्त्र-ग्रन्थ पर कई ग्रन्थ लिखे हैं। नित्यानन्द जी की टीका भावद्र-गीता पर मात्र शाब्दिक अनुवाद या उसकी सरल व्याख्या भर नहीं है। वे तो पाठक को हर श्लोक की व्याख्या में मानों सारी दुनिया घुमाते हैं। यह माना जाता है कि गीता के हर श्लोक का अर्थ सात स्तरों पर चलता है। साधारण रूप से जो अर्थ दिया जाता है वह प्रथम स्तर का अर्थ ही होता है। परन्तु इस टीका में प्रबुद्ध स्वामी साधारण से असाधारण अर्थों की तहें बड़ी सरलता एवम् सहजता के साथ खोलने लगते हैं। नित्यानंद जी की गीता पर टिप्पणी पढ़ना एक दुर्लभ अन्तर्-निहित दृष्टि पाना है। यह मात्र ग्रन्थ का पारायण नहीं एक ध्यान सदृश गहन अनुभव होता है। महान स्वामी और दर्शनीक शंकर का कथन है : "थोड़ा गीता का अध्ययन, पीने को गंगाजल की एक बूंद, कभी कृष्ण का ध्यान करना, यह सुनिश्चित करता है कि तुम्हें मृत्यु के देवता यम के साथ किसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा।" भगवद्-गीता पर लिखी इस शृंखला के अंतर्गत संपादकों ने श्री नित्यानंद जी द्वारा दिए गए अर्थों का विशद् विवेचन किया है जो उनके साथ लम्बे विमर्श के पश्चात् उन्होंने प्राप्त किया है। विशेष तौर पर अंग्रेजी के पाठकों की सुविधा हेतु और सभी पाठकों की अकादमिक जिज्ञासा शांत करने के लिए अंत में संस्कृत मूल पाठ के साथ उनका अनुवाद भी दिया गया है। इस सटीक व्याख्या का उद्देश्य हर व्यक्ति के न सिर्फ रोजमर्रा के जीवन में उभरती समस्याओं का समाधान सुझाना है वरन् उनकी अंतिम सत्य को प्राप्त करने के प्रयासों में भी सहारा देना है जिससे उन्हें भी नित्यानंद या शाश्वत आनन्द प्राप्त हो सके।

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Content: आधुनिक युग के वैदिक गुरु परमहंस नित्यानंद जी धर्म-अध्यात्मिक एवं योग और ध्यान की दुनिया में 'परम हंस नित्यानंद जी' एक बहुत ही लोकप्रिय एवं चर्चित नाम बनता जा रहा है। इतनी कम आयु में परमहंस नित्यानंद जी ने आध्यात्मिक की जिन ऊंचाइयों, शक्तियों एवं उपलब्धियों को छुआ है शायद ही किसी और संत या गुरु ने छुआ होगा। युवाओं पर खासा प्रभाव डाल रहे हैं। अपनी आध्यात्मिक शक्ति के चलते आज नित्यानंद जी पूरे विश्व में एक करोड़ लोगों के साथ जुड़े हुए हैं और उन्हें अपनी साधना एवं योग से 'जीवन मुक्ति' की कला सिखा रहे हैं। जितना यह वैदिक व वेदोक्त है उतने ही व्यावहारिक एवं आधुनिक है। आज की टेक्नोलॉजी से भी-भांति परिचित हैं। हर बात का मात्र धार्मिक पक्ष ही नहीं वैज्ञानिक पक्ष भी प्रकट करना जानते हैं। वह कर्मकांड और मनोविज्ञान का पूरा-पूरा तालमेल हैं। आप एक साधक होने के साथ-साथ इंजीनियरिंग में भी शिक्षा प्राप्त हैं। आपकी वाणी आपके ज्ञान के साथ मिलकर सुनने वाले के लिए एक औषधि की तरह बन जाती है जो सुनने वाले को आर्जवता प्रदान करती है। यही कारण है कि आज आप इंटरनेट के जरिए यू-ट्यूब पर सबसे अधिक देखे जाने वाले 'आध्यात्मिक गुरु' के रूप में उभरकर सामने आए हैं। इतना ही नहीं आज पूरे विश्व में आपके 10 मिलियन से अधिक अनुयायी हैं। विश्व के 150 से अधिक देशों में आपके लगभग 1000 केंद्र हैं। आपकी अब तक 26 भाषाओं में 200 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। आपके होने भर से बहुधाें ने जीवन व आरोग्यता को पाया है। लोग जिनके जरिए एवं असाध्य रोगों से मुक्त हुए हैं। आज आप पूरे विश्व में आत्म-रूपांतरण के गुण सिखा रहे हैं। प्रबंधन हो या ध्यान, धर्म हो या संबध, संसार हो या संन्यास, इन सबके बीच व साथ खुद को कैसे स्थापित व संतुलित रखें यह सब वह अपने ज्ञान व ध्यान की विधियों के माध्यम से बड़ी ही सरलता एवं सहजता से कर रहे हैं। आपके स्पर्श मात्र से आज हजारों लोग जटिल एवं असाध्य रोगों से मुक्ति पा चुके हैं। इतना ही नहीं बेग्लूरू में बना आपका 'नित्यानंद ध्यानपीठ आश्रम'

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Content: आज अपनी वैदिक एवं आध्यात्मिक गतिविधियों के चलते कई ऐसे व्यापक प्रकल्पों में जुटा है जिसके इतने कम समय में इतने अच्छे परिणाम हैरत में डालते हैं। जिसका श्रेय स्वामी नित्यानंद जी को ही जाता है। यह सब विलक्षण क्षमताएं व उपलब्धियां आपको अतुलनीय एवं अद्भुत संतों व गुरुओं की श्रेणी में ला खड़ा करती हैं।

Content: आपका आज कोई साल-दो साल का परिणाम नहीं बरसों की तपस्या का फल है। आप बचपन से ही धार्मिक एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले थे। सदियों से योगियों का आकर्षण केंद्र रही अरुणाचल की पवित्र पहाडिय़ां, जहां भगवान 'रमण महर्षि' जैसे सिद्ध पुरुषों को ज्ञान प्राप्त हुआ वह आपको भी अपनी ध्यान साधनों के लिए मूक निमंत्रण देती थी। आपको बचपन से आज तक की यात्रा अपने आपमें जितनी रोचक है उतनी ही अद्भुत भी।

Content: जन्म और बचपन

Content: परमहंस नित्यानंद जी का जन्म 1 जनवरी 1978 में तिरुवननमलाई, तमिलनाडु में हुआ। आपके बचपन का नाम 'राजशेखरन' था। आप अपने पिताजी स्व. श्री अरुणाचलनम तथा माता जी श्रीमती लोकनयकी देवी की दूसरी संतान हैं। आपने एक समृद्ध तथा परोपकारी परिवार में जन्म लिया जो 'सेवा वेलालर संप्रदाय' से ताल्लुक रखता है। आपके दादा एक धर्मपरायण व्यक्तित्व थे जो विभिन्न मंदिरों तथा आध्यात्मिक संस्थानों को अपना सहयोग दिया करते थे। स्वामी नित्यानंद जी के दादा वो पहले परमार्ष दाता थे जिन्होंने आपको आध्यात्मिक

Content: रीति-रिवाज और भारतीय संस्कृति से अवगत कराया।

Content: आध्यात्मिक झुकाव

Content: परमहंस नित्यानंद जी का आध्यात्मिक की ओर झुकाव बहुत ही कम आयु से हो गया था। आप छोटी सी आयु से ही पूजा-पाठ, योग तथा ध्यान की तरफ आकर्षित हो गए थे आप घंटों अपनी स्कूली शिक्षा के अलावा प्रभु की पूजा-पाठ में गुजारा करते थे।

Content: आपने योग तिरुवननमलाई के जाने-माने गुरु रघुपति योगी जी से योग सीखा तथा योग की पूरी शिक्षा ग्रहण की। साथ ही साथ अपने वैदिक धर्मग्रंथों की शिक्षा लेनी आरंभ की जैसे पुराणा तथा उपनिषद् आदि आपने

Content: अपने ही कई तिरुवनमलाई के अनेक गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की जिसमें से स्वामी अनामलाई योगी रामसूरत कुमार तथा माता श्री कृष्णामाल विशेष उल्लेखनीय हैं।

Content: 'योगी रघुपति जी' का नित्यानंद जी के जीवन में विशेष योगदान रहा है। यहां तक कि नित्यानंद जी का पहला प्रवचन जिसे उन्होंने अपनी दस वर्ष की आयु में तिरुवनमलाई में फण्टजलि योग सूत्र पर दिया था उसका श्रेय भी योगी रघुपति जी को ही जाता है कहते हैं इस प्रवचन को सुनने वालों की संख्या एक हजार थी।

Content: भगवान श्री रमण महर्षि के समकालीन योगी 'रामसुरत कुमार' के साथ नित्यानंद जी का विशेष आध्यात्मिक लगाव था। आप उनके नियमित दर्शनों में से एक थे। देवी माताजी 'कृष्णामाल' जी का भी आपके आध्यात्मिक उत्थान में विशेष सहयोग रहा। अरुणाचल की प्रारंभिक आध्यात्मिक यात्रा में वह आपकी आध्यात्मिक मार्गदर्शिका रहीं। साथ ही साथ आपके रख-रखाव पर भी उन्होंने विशेष ध्यान दिया।

Content: बारह वर्ष की आयु में जब नित्यानंद जी को आध्यात्मिक ज्ञान का अनुभव होना शुरू हुआ था उस समय भी माता जी कृष्णामाल जी ने उन्हें आध्यात्मिक प्रशिक्षण देने में तथा विभिन्न साधनाओं को साधने में उनकी मदद की थी।

Content: आप जब 12 वर्ष के थे तब पवित्र अरुणाचल पर्वत तिरुवननमलाई में ध्यान करने के दौरान आपको बुद्धत्व का ज्ञान प्राप्त हुआ। इस आध्यात्मिक ज्ञान के बाद आप आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर हो गए। आपने ध्यान के माध्यम से अपने अंतर्मन को जानना तथा उसे महसूस किया।

Content: आध्यात्मिक संकल्प एवं प्रयास

Content: परमहंस नित्यानंद जी आध्यात्मिकता को आम लोगों की जिंदगी तक पहुंचाना चाहते हैं। उपासना, आराधना, संस्कार तथा कीर्तन के माध्यम से मध्यवर्ग के लोग इनके प्रवचनों को सुनकर इनकी ओर उन्मुख हो जाते हैं। उन्हें अपनी समस्याओं का समाधान परमहंस नित्यानंद जी के पास मिलता है। इनके प्रवचन तथा भाषण भारत ही नहीं बल्कि विदेशी लोगों को भी अपनी शिक्षाओं से अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

Content: परमहंस नित्यानंद जी ने वैदिक संस्कृति तथा आध्यात्मिक ज्ञान को घर-घर पहुंचाने का संकल्प लिया है जिसके तहत वे 2006 से निरंतर यात्रा में हैं। जिसमें

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Content: इसी 100 से अधिक संस्थान तथा शिक्षक भी इसी तरह के कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं जिनमें योग तथा ध्यान की विधियों को भक्तों तक इंटरनेट के माध्यम में विश्वभर में पहुंचाया जाता है। परमहंस परमहंस नित्यानंद जी ने जीवन मुक्ति के चार सूत्रों को प्रतिपादित किया है। इन सूत्रों को अपनाकर आप अपनी बाह्य और आंतरिक दशा को बदल सकते हैं तथा परमात्मा से साक्षात्कार कर सकते हैं। शक्ति : ऐसी ऊर्जा जो सब कुछ बदल सके। बुद्धि : ऐसा ज्ञान जो न परिवर्तित होने वाली चीजों को स्वीकार करे। यु्क्ति : बदलाव के लिए स्पष्टता और समझ तथा जिसे आप सच्चाई कहते हैं वो निरंतर बदलता सृपा है। भक्ति : अपरिवर्तनीय उर्जा की दिशा में भक्ति इनेर अवेकनिंग 'इनेर अवेकनिंग' कार्यक्रम आपको आध्यात्मिक के परलौकिक आनंद से भर देता है। 21 दिन के इस कार्यक्रम में ध्यान, योग, आरोग्यता आदि के माध्यम से आंतरिक रूपांतरण को संभव किया जाता है जिससे आप प्राकृतिक और सुरक्षित माध्यम से कुण्डलिनी जागरण तक को उपलब्ध हो जाते हैं और एक स्वस्थ आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करते हैं। कल्पतरु, भीतरी इच्छाओं और वासनाओं को जानने और प्रकट करने का एक दिन का यह बहुत ही उपयोगी कार्यक्रम है। जिससे आप अपने सोचने समझने की शक्ति को दुरूस्त करते हैं। इतना ही नहीं इस कार्यक्रम से कई हजारों लोगों ने अपने असाध्य लोगों में चमत्कारिक परिवर्तन पाया है तो बहुुतों ने अपनी आर्थिक स्थिति संबंधों में सुधार पाया है।

Chapter Name: आत्मरूपांतरण का प्राकृतिक ऊर्जा स्थल नित्यानंद ध्यानपीठ

Content: इस पृथ्वी पर यूं तो आश्रम कई हैं परंतु बैंगलुरू के बिदादी में बसा नित्यानंद ध्यानपीठ आश्रम अपने आप में अद्भुत है। यहां की आध्यात्मिक उर्जा व वैभव वातावरण इंसान को आकर्षित ही नहीं करता बल्कि आंतरिक यात्रा के लिए भी प्रेरित करता है। नित्यानंद ध्यानपीठ स्वामी नित्यानंद जी द्वारा स्थापित आश्रम है जो बैंगलुरू (बैंगलुरू) से कुछ ही कि.मी. दूर बिदादी में स्थित है। यह आश्रम एक प्राकृतिक शक्ति का केंद्र लगता है। बैंगलुरू जो आज भारत की आई.टी. क्रांति का सबसे बड़ा शहर बनता जा रहा है। वहीं यह आश्रम अपनी ऊर्जा शक्ति से पूरे विश्व को जीवन मुक्ति के गुण सिखने की कला सिखा रहा है। इसका निर्माण पूर्व वैज्ञानिक पद्धतियों द्वारा किया गया है। एक अद्भुत प्रबंधन द्वारा निर्मित यह क्षेत्र सभी के लिए एकता तथा समानता की नींव रखता है। आश्रम के भीतर विभिन्न स्थल एवं केंद्रों का निर्माण भी पूरी तरह वैज्ञानिक तौर-तरीकों से किया गया है। आश्रम का आध्यात्मिक वातावरण व स्पंदन हर कोई महसूस करता है आश्रम में कई वैदिक मार्ग हैं जो आध्यात्मिक उर्जा को फैलाने के लिए बनाए गए हैं। इस क्षेत्र को सकारात्मक ऊर्जा का मुख्य ग्रह कहा जा सकता है जहां आने वाले सभी भक्तों तथा अनुयायियों में यें उर्जा देखी जा सकती है। यहां प्रशिक्षित शिक्षकों के द्वारा नए लोगों को अध्यात्म की शिक्षा दी जाती है तथा वह उनके जीवन को रूपांतरित करने में उनकी मदद भी करते हैं। इच्छापूर्ति करने वाला वट वृक्ष आश्रम में एक प्राचीन बरगद का वृक्ष है जो 'कल्पतरू' के नाम से विश्वभर में प्रसिद्ध है। इसे इच्छाओं को पूर्ण करने वाला वृक्ष भी कहते हैं। ये वृक्ष परमहंस नित्यानंद जी की पवित्र दूर्दर्शिता एवं व्यापकता को दर्शाता है। इस वृक्ष के आस-पास भी एक सकारात्मक उर्जा का प्रवाह अनुभव किया है।

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Content: पिछले कई सालों से ये वृक्ष मनोकामना पूरी करने वाला, श्रद्धा का पात्र तथा आध्यात्मिक जागरुकता का प्रतीक बन गया है। वृक्ष के नीचे एक प्राकृतिक शिवलिंग निकला था जिसे परमहंस नित्यानंद जी ने आज निर्माण करवाकर 'आनंदेश्वर मंदिर' की स्थापना की है।

Content: आनंद लिंग

Content: आश्रम की दूसरी पवित्र जगह है 'आनंद लिंग' जिसकी विशेषता है वहां का 21 फुट ऊंचा शिवलिंग जिसे आनंद लिंग कहा जाता है। इस पवित्र लिंग का निर्माण पवित्र नवपाषाण तथा 1008 पवित्र एक दुर्लभ जड़ी-बूटियों के द्वारा किया गया है। पानी के फव्वारे आनंद लिंग को स्नान कराकर 'वैद्य सरोवर' में जा गिरते हैं। इस पानी में लगाई गई एक डूबकी शरीर को विशेष ऊर्जा प्रदान करती है। इस सरोवर में स्नान करने से दिमाग फिर से नया व ताजा हो जाता है। स्नान के बाद जातक को स्वयं में एक रूपांतरण दिखाई देने लगता है। इस सरोवर में वो सभी ऊर्जाएं जो गुरुओं के द्वारा इसमें प्रवाहित की गई हैं, मौजूद हैं। ये सरोवर पवित्रता का अनोखा रूप हमारे सामने रखता है।

Content: जा सकता है जो कई सदियों से लोगों में भक्ति की जड़े बनता आ रहा है। इस प्राचीन कल्पतरू वृक्ष को आज पूरा विश्व जानता है। परमहंस नित्यानंद जी ने इस वृक्ष को अपनी आध्यात्मिक यात्रा के दौरान सभी के सामने ला दिया।

Content: आनंदेश्वरा - आनंदेश्वरी मंदिर

Content: कल्पतरू वृक्ष से कुछ कदम की दूरी पर यह मंदिर बना है जिसमें भगवान शिव और पार्वती की संगलन मूर्ति स्थापित है जो धर्म और आध्यात्मिक के समन्वय एवं संतुलन की प्रतीक है। मूर्तियों को पांच तरह की धातुओं से गढ़ा गया है जिनकी प्राण प्रतिष्ठा स्वयं परमहंस नित्यानंदी जी ने अपने हाथों से की। मंदिर में मंत्रोच्चारण से ईर्ष्या-गर्द एक कवच तैयार हो जाता है। जिससे भक्तों को सकारात्मक ऊर्जा मिलती है पवित्र आरती भारतीय संस्कृति वैदिक चलन को तथा लोगों में श्रद्धा एवं आसथा को प्रवाहित करती है। त्यौहारों के दिनों में बिदाड़ी आश्रम में लगभग 50 हजार भक्त तथा सैलानी आते हैं।

Content: समकालीन वैदिक मठ

Content: आश्रम का मुख्य केंद्र वैदिक मठ है यह परम ज्ञान को सीखने व उपलब्ध होने का विशेष केंद्र है। यहां विश्व भर से सैकड़ों आध्यात्मिक जिज्ञासु अपनी आध्यात्मिक यात्रा को सुदृढ़ करने में जुटे हैं। इतना ही नहीं यह विश्व में आरोग्य ऊर्जा एवं आत्म-रूपांतरण के सूत्रों का भी प्रचार-प्रचार कर रहे हैं। इसके अलावा यहां पर आने वाले दर्शार्थी स्वयं सेवी तथा आश्रम की गतिविधियों में भाग लेने वाले लोग आश्रम के वैदिक माहौल में स्वयं को आसानी से ढाल पाते हैं। विभिन्न धर्म, जाति, वर्ग और स्थान के लोग यहां बिना

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Content: नैमेशारण्या

Content: नैमेशारण्या पहला आध्यात्मिक विश्वविद्यालय था जो जिज्ञासुओं को आध्यात्मिक शिक्षा बिना किसी वाध्यता के देता है। यहां दूसरों को जगाने वाले अर्थात अध्यात्म का पाठ पढ़ाने वाले आध्यात्मिक शिक्षक स्वयं जाग्रत अवस्था को उपलब्ध है इसलिए वह दूसरों के आत्म-जागरण में सहायक सिद्ध होते हैं।

Content: एक सच्ची विचारधारा के आध्यात्मिक विश्वविद्यालय का आश्रम कैम्पस हमेशा एक ऊर्जा से भरपूर नजर आता है।

Content: स्वागत केंद्र पहला द्वार है सैलानियों के स्वागत का, इसके बाद वो आश्रम प्रांगण में अपने पांव रखते हैं। इसके बाद मिशन का कार्यालय है जहां पब्लिकेशन एवं वेब डेवलपमेंट की टीम स्वामियों के सन्देश को विश्वभर में पहुंचाने के लिए जोर-शोर से अपना काम निरंतर करती रहती है। इसके अलावा अन्नालय (रेस्तरां) में सभी को नि:शुल्क भोजन उपलब्ध कराया जाता है।

Content: भारतीय संस्कृति को विश्वभर में विख्यात करना

Content: नित्यानंद ध्यानपीठ का पश्चिमि मुख्यालय लांस एंजिल्स, कैलिफोर्निया यू. एस.ए. में है। इस संस्थान के द्वारा लगभग 30 वैदिक मंदिरों का संचालन हो रहा है जिसमें हजारों देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित है। जहां भक्तों द्वारा निरंतर उपासना, धार्मिक समारोह, ध्यान, संस्कृत कक्षा, वैदिक मंत्रों का उच्चारण और सत्संग होते हैं जहां भारतीय तथा विदेशी भक्त एक साथ पूजा पाठ तथा इन समारोह में शरीक होते हैं। इन मंदिरों में रोजाना लगभग 20,000 श्रद्धालु आते हैं। इसके अलावा श्रद्धालुओं ने लगभग 400 पादुका मंदिर तथा लगभग 1000 गृह मंदिरों का निर्माण भी करवाया है।

Content: किसी भेदभाव के एक वैदिक सूत्र में बंध कर आत्म-रूपांतरण के गुण सीखते हैं और स्वयं को रूपांतरित करते हैं। भीतरी विकास के लिए यह स्थान एक अच्छा अवसर व वातावरण उपलब्ध कराता है तथा स्वयं को प्रस्तुत कर विश्व में अपनी सेवाओं को देने के लिए तैयार भी करता है।

Content: घर से परे एक और घर

Content: आश्रम का वातावरण बहुत ही अपना एवं घर की तरह सुरक्षित है यहां आकर ऐसा नहीं लगता कि आप किसी अनजान जगह पर हैं। हजारों लोगों ने जो तीन महीने या उससे अधिक के लिए आवासीय कार्यक्रम में शामिल होते हैं उनके लिए यह घर से परे एक और घर ही है।

Content: साधारण सहभागी ग्राह प्रतियोगियों के लिए सुख-साधनों के साथ यहां सब कुछ उपलब्ध है।

Content: आश्रम में शुद्ध शाकाहारी एवं सात्विक भोजन के लिए रेस्तरां की भी सुविधा है जहां नॉर्थ इंडियन, साउथ इंडियन तथा कॉन्टिनेंटल भोजन मुख्य रूप से उपलब्ध है।

Content: यहां पर इंटरनेट की सुविधा पूरे दिन सुचारु रूप से उपलब्ध रहती है जिससे आश्रम में रहने वाले तथा उसकी गतिविधियों में भाग लेने वाले नए लोग एक दूसरे के संपर्क में सरलता से रहते हैं।

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Content: यह 'महान क्यों?'

Content: भगवत गीता का प्रारंभ ही इस 'महान क्यों?' के प्रश्न से होता है जो प्रतिबिम्बित करता है उस व्यक्तिगत संकट काल को जिसका हम सब भी जीवन के किसी न किसी बिन्दु पर सामना करते हैं।

Content: हम सब भी इसके प्रमुख पात्र अर्जुन के जीवन के एक बेहद संकट की घड़ी की ओर खिंचते हैं जब निमित्त रूप में यह प्रसिद्ध राजकुमार एक खूनी संघर्ष के लिए तैयार होता है और पाता है कि उसके अपने परिवारजन, निकट-संबंधी एवम गुरुजन शत्रु की सेना में उसके विरुद्ध युद्ध के लिए तैयार हैं तब अपने मन के भावों, कर्तव्य बोध की गलत समझ तथा एक जागृत चेतनता के साथ यह राजकुमार स्वयं को एक बेहद दुविधा में सलिप्त पाता है।

Content: आज पांच हजार वर्षो के बाद भी यह दुविधा मानवजीवन के अनुभव में अभी भी जी रही है। हमारे प्रश्न भी अर्जुन के प्रश्नों से ज्यादा फर्क नहीं है :

Content:

  • हम यहां क्यों हैं?

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  • हम अपने जीवन में जो कुछ भी करते हैं वह क्यों करते हैं?

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  • इस विश्व में वर्षों के प्रयत्नों के बाद भी हमें संतुष्टि क्यों नहीं मिलती?

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  • असंख्य चुनौतियों का हल टूटते या उनसे पार पाने के बाद भी क्यों ये चुनौतियां हमारे सामने आती रहती हैं?

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  • हम किस प्रकार आध्यात्मिक रूप से परिपक्व और संपूर्ण व्यक्ति बन सकते हैं? इस मार्ग पर चलने की जरूरत भी क्यों पड़ती है?

Content: इस 'क्यों?' का उत्तर एक सीधे सदे ढंग से दिया जा सकता है-आप यहां इसलिए हैं कि आपको अपनी चरम संभावना को प्रकट करना है।

Content: परन्तु आप में से हर एक को इस 'महान क्यों?' से खुद ही निवटना है। आप इसे जाने या न जाने पर आपकी इस 'क्यों' के बारे में गहनतम आशक्ति।

Content: अपने उद्देश्य के बारे में चरम स्पष्टता ही आपके यहां होने के उद्देश्य को प्रकट कर आपको जीवन का सामना करने के लिए प्रेरणा, ऊर्जा और साहस प्रदान कर सकती है।

Content: यह 'महान क्यों' ही ईश्वर के बीच की उपस्थिति बताता है। जब आपको पृथ्वी ग्रह पर भेजा जाता है तो यह बीज आप में स्थापित कर दिया जाता है जिससे कि आप तब तक विश्रान्त न हो जब तक कि इस बीज को पल्लवित कर एक फलदार वृक्ष न बना लें।

Content: यह समझ लें कि हर बीज में 'वीर्य' रूप में एक ऊर्जा विद्यमान रहती है जो तब तक शांत नहीं होती जब तक कि यह बीज न पैदा कर दे।

Content: यदि आप इस बीज का भक्षण भी करलें तब भी आप इसे नष्ट नहीं कर सकते क्योंकि वह वीर्य आपके शरीर में प्रविष्ट होकर अपना काम किसी दूसरी तरह से करने लगता है।

Content: यह 'क्यों' का प्रश्न आपके 'डी एम ए' के ढांचे में प्रविष्ट हो कर आपको स्वयम को पहिचानने में सहायता करता है।

Content: अर्जुन की तरह आप भी चैन से नहीं बैठ पाएंगे जब तक इस 'महान क्यों' का अपने लिए अर्थ न स्पष्ट कर लें।

Content: जिस प्रकार कृष्ण ने अर्जुन के प्रश्नों को सुना-समझा, वैसे ही परमहंस नित्यानंद जी पाठकों के प्रश्नों और संशयों पर ध्यान एकाग्र कर, बदलाव के पथ पर उनका मार्ग-दर्शन करते हुए तब तक प्रयास नहीं छोड़ते जब तक कि वे या हम सब अपनी पूरी संभावनाओं को पहिचान लें और पृथ्वी पर देवताओं की भांति रहने लगें।

Content: जैसे-जैसे आप इस पुस्तक को पढ़ते जाएंगे, आपको नित्यानंद जी की उपस्थिति महसूस ही होगी जो आपको आपके अद्वितीय किन्तु आत्म-साक्षात्कार के वैश्विक पथ का मार्ग दर्शन करते प्रतीत होंगे।

Content: सुनने की कला

Content: गीता के पहले अध्याय में तो अर्जुन ही लगातार बोलता है और कृष्ण उसको सुनते ही रहते हैं।

Content: कोई बुद्धिमान व्यक्ति ही दूसरे व्यक्ति को बोलने दे सकता है। वैसे तो हम सब आपस में बात करते हैं परन्तु 'वास्तविक' बातचीत नहीं हो पाती।

Content: हम तो एक दूसरे से मात्र एक के बाद एक 'एकालापों' का ही विनिमय करते रहते हैं।

Content: हम अपनी सौम्यता में यह दिखाते हैं कि दूसरे को हम सुन रहे हैं जिससे कि जब हमारी बारी आए तो हमें भी सुना जाए।

Content: दूसरे को बोलने का अवसर देना बुद्धिमानता की निशानी है और सुनने को भी बुद्धिमानता की ही दरकार होती है।

Content: क्योंकि जब आप दूसरों को सुनते हैं तो आप स्वयं को भी सुनते हैं और दूसरों को न सुनने के दौरान आप स्वयं को भी नहीं सुनते!

Content: आप बात समझें न! जब आप स्वयं को सुनना सीख जाते हैं तभी आप दूसरों को सुन पाते हैं। और जब आप दूसरों को सुनने के दौरान ही आप स्वयं को भी सुनते हैं।

Content: क्योंकि कोई भी श्रवण

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Content: तभी संभव होता है जब सम्पूर्णता के अंतराल में हो। आप समझ लीजिए! जब आप सम्पूर्ण होंगे तभी सुन पाएंगे। यदि आप में किसी प्रकार का अधूरापन है तो आप सुनने के काबिल नहीं रहेंगे। यह असम्पूर्णता या अधूरापन क्या है? उदाहरण के लिए आप अभी यहाँ बैठे मुझे सुन रहे हैं। परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं कर रहे क्योंकि आप सोच रहे हैं : "अरे मैं यह नहीं कर पाया-वह नहीं कर पाया-यह नहीं हुआ-वह नहीं हुआ-मैं परेशान हूँ-इत्यादि। यह व्यग्रता आपका अधूरापन दिखाती है। यदि आप में ऐसे अधूरेपन हैं तो स्पष्ट समझ लें कि आप मुझे नहीं सुन रहे। आप यहां किसी मजबूरी या अन्य कारण से बैठे जरूर हैं पर आप मुझे सुन नहीं रहे और जब आप सुनते नहीं तो आप के अंदर ज्यादा अधूरापन आता जाएगा। यह एक विषम-चक्र (विसस सर्किल) है। यदि आप सुनते हैं किसी प्रबुद्ध ज्ञानी की सम्पूर्णता से पैदा हुए शब्द, तो अचानक आप पाते हैं कि इन शब्दों से निःसृत ऊर्जा आपके आंतरिक अंतराल में प्रवेश कर उसे बदल रही है। देखिए! जब आप यहाँ आए और मुझे अपनी समस्याओं के बारे में बताया तो मैंने पूरी श्रद्धा से उनको सुना। इसी वजह से आपको एक हलकापन महसूस हुआ और आपको लगा कि आपकी समस्याएं कोई बड़ी समस्याएं नहीं रह गई हैं। यह सही रूप से सुनने की ताकत का प्रताप है जो आपकी अन्तःप्रज्ञा को चेतन करता है। सही प्रकार का श्रवण आपकी आंतरिक बुद्धिमता को जागृत करता है। सुनना ईश्वर मात्र है। सुनने से ही (अर्जुन की समस्याएं) कृष्ण अर्जुन की भय की अशान्ति दूर कर सके, अर्जुन के अधूरेपन को भर सके। कृष्ण हमें इस प्रकार अपनी पूर्णता का दिग्दर्शन कराते हैं, अपनी श्रवण-शक्ति की महिमा का प्रताप दिखाते हैं। वह सिर्फ सुनते हैं और अर्जुन अपने दिल का पूरा गुबार निकाल देता है। और तभी असली गीता शुरू हो सकती है।

Content: अर्जुन का मूल विचारविन्यास (रूट पैटर्न) यह समझ लें कि जब कृष्ण अर्जुन को सुन रहे हैं तो वह उसमें दिलचस्पी नहीं ले रहे जो अर्जुन शिकायत कर रहा है वरन उसमें उनकी अधिक दिलचस्पी है जो उसकी मूल समस्या है। कृष्ण यह भी नहीं चाहते कि जो उन्हें मालूम है वह सारा कुछ व्यक्त कर दें। वह अर्जुन को खुलकर बोलने की अनुमति देते हैं जिससे वह (कृष्ण) उसकी समस्या की तह तक जा कर उसके समाधान पर ध्यान कोन्द्रित कर सकें। क्योंकि वह जानते हैं कि एक बार अर्जुन अपनी सारी समस्याएं व्यक्त कर सकें। तो वह स्वयं ही उनका हल पा सकता है। जैसे-जैसे अर्जुन लगातार बोलता जाता है वह अपनी समस्या की जड़ तक पहुंचता है-यानी उसका मूल विचार विन्यास! मैं अब मूल विचार विन्यास (या सोचने का सहज तरीका) को परिभाषित करना चाहता हूँ। जीवन में प्राप्त होने वाला वह पहला शक्तिशाली संज्ञान-बोध जो आपके इन्का प्रभावित करता है कि आप वैसा ही संज्ञान लेने के अभ्यस्त हो जाते हैं जैसा आपका मूल विचार विन्यास (रूट थोैर पैटर्न) है। जब किसी शक्तिशाली भाव का प्रथम आक्रमण आपके सोच-संज्ञान पर होता है तो यह आपके जीवन के पूर्ण संज्ञान क्रम को विचलित कर उसे असंतुलित कर देता है। ठीक उस क्षण में जो सोचने का तरीका आप चुनते हैं वही आपका मूल विचार विन्यास बन जाता है। जब आप जीवन में पहली बार शक्तिहीन और असहाय महसूस करते हैं तो यह पैटर्न स्वतः विकास पाने लगता है। यानी जब आपका विशुद्ध संज्ञान असंतुलित होता है तब आपके मस्तिष्क का जन्म होता है। आप जैसे प्रतिसाद देते हैं, बतलाव करते हैं या कोई बात महसूस करते हैं उसका मूल तरीका इसी ठाँट रूट पैटर्न (मूल विचार विन्यास) से ही आता है। यह एक सीमित करने वाला संज्ञान प्राप्त करने का तरीका है जो आपमें बचपन से ही होना प्रारंभ हो जाता है और आप पर हावी होता रहता है। कभी-कभी यह भय के रूप में, कभी लालच, ईर्ष्या या स्वार्थ को सही सिद्ध करने के निर्णय के रूप में प्रकट होता रहता है। कभी-कभी तो सिर्फ संशय या चिन्ता के भी रूप से उभरता है। गीता के प्रारंभिक अध्यायों में अर्जुन अपने इसी मूल विचार विन्यास के अनुसार ही काम करता है जो उसे माँ-बाप द्वारा सिखाए गए पाठ या सामाजिक अनुकूलन के जरिए प्राप्त शिक्षा से प्राप्त हुआ है-अर्थात क्या करना चाहिए और क्या नहीं। पर जैसे ही उसके सामने उसके विस्तृत परिवार के लोग शत्रु बन कर सामने आते हैं वह शक्तिहीन महसूस कर युद्ध करना नहीं चाहता और मेरे अपने लोग 'मेरे अपने लोग' कह कर विलाप करने लगता है। अपने इस परिवार से जुड़ाव के तन्तु उसकी अस्मिता बनाते हैं और अर्जुन के लिए इन नातों को तोड़ना स्वयं को नष्ट करने के समान लगने लगता है! यही अर्जुन की मूल दुविधा है। और इसी क्षण 'गीता' प्रारंभ होती है; कृष्ण अंततः बोलने लगते हैं। गीता के बाद के अध्यायों में कृष्ण करुणात्रद हो कर अर्जुन का मार्ग-निर्देशित करने लगते हैं तथा उसे अपने मूल विचार विन्यास की जकड़न से छुड़ाते हैं। वे उसे सम्पूर्णता की ओर ले जाते हैं- परम ज्ञान एवम् प्रबोधन की तरफ अग्रसर करते हैं।

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Content: हैं। अर्जुन जीवन-मुक्ति में पुर्नस्थापित होता है और एक सजीव प्रबोधन प्राप्त करता है।

Content: चार तत्वों द्वारा कृष्ण के उपदेशों के सार की समझ प्राप्त करना

Content: 'गीता' में कृष्ण के उपदेशों का सार चार साधारण किन्तु शक्तिवान सार्वभौमिक सिद्धांतों के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है : सम्पूर्णति, श्रद्धा, उपायनम् एवं आपायनम्! अब मैं इन चार सिद्धांतों को परिभाषित करूँगा।

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  1. सम्पूर्णति ( इन्टिग्रिटी ) : सम्पूर्ण का अर्थ है मनसः वाचा कर्मणा स्वयं को सम्पूर्ण करना और दूसरों को भी ऐसा ही अनुभव-पूर्णतया प्राप्त करना। यानी स्वयं को और अपने जीवन को सम्पूर्ण करना।

Content: 2. श्रद्धा ( ऑथेन्सिटी ) : स्वयं को अपनी योग्यता के शिखर तक ले जाकर स्थापित करना, जीवन में वही बनना जो *चाहते हैं कि हम हों या जैसा हमें दूसरा समझे और उनकी अपेक्षा पर खरे उतरना।

Content: 3. उपायनम् ( ट्रंफ़ॉर्मेटिविलटी ) : जीवन में जो सत्य हमें मिलता है उसका सही प्रतिसाद देते हुए उसको जीना और इसलिए अपने चारों ओर घटित होने वाली गतिविधियों के लिए स्वयं को उत्तरदायी समझना!

Content: 4. साथ समझना कि हम प्रतिपल सदा समृद्ध होने के लिए अर्थात जीवन में तब अपने चारों ओर अपना विस्तार पाने के लिए। इन चारों सिद्धांतों के द्वारा जीवन की हर समस्या का समाधान व्यवहारिक रूप से पूरी दृढ़ता और यौग्यता के साथ प्राप्त किया जा सकता है।

Content: व्यक्तिगत अनुभव द्वारा यह कह सकता हूँ कि इन चार सिद्धांतों में समस्त आध्यात्मिक शास्त्रों का सार निहित है, वस्तुतः इनमें जीवन का निचोड़ है। अब मैं इन्हीं चार तत्वों के माध्यम से कृष्ण के उपदेशों का सारांश दूँगा।

Content: सम्पूर्णति सफलता के लिए रणनीति

Content: सुनिए! हम सभी सच्चाई या ईमानदारी से वाकिफ हैं। इसका अर्थ लगभग पूरी तरह नैतिक और सदाचारी होना होता है। परन्तु सम्पूर्णति के तत्व के साथ हम सच्चाई से भी एक कदम आगे जाते हैं। सच्चाई में तो आपको दूसरों को दिए गए अपने वचन निभाने हैं जबकि सम्पूर्णति में आपको स्वयं को दिए वचनों का भी पूरी तरह निर्वाह करना होता है। सच्चाई का अर्थ सम्पूर्णति नहीं यद्यपि सम्पूर्णति में सच्चाई का तत्व निहित होता है।

Content: यह दुर्भाग्य ही है कि समाज हमें दूसरों को दिए अपने वचनों को निभाने की तो सीख देता है परन्तु स्वयं को दिए गए वचनों के निभाने के बारे में कुछ नहीं कहता। वस्तुतः स्वयं को दिए गये वचनों को निभाना भी उतना ही बल्कि ज्यादा जरूरी है। क्योंकि जीवन में आपकी हर चीज प्रवाह, संतोष, सम्पूर्णति, चैन के अनुभव इत्यादि-सब इसी पर निर्भर करते हैं कि आपने स्वयं को दिए गए वचनों को कितना निभाया है।

Content: यह समझ लें कि आपके स्वयं को दिए गए वादे आपके जीवन को आधार-डौंचा बनाते हैं। यदि आपने स्वयं में वादा किया कि आप डाक्टर बनेंगे और न ही आपने उसे पूरा किया न पूरा करने का कोई प्रयत्न किया तो यह टूटे वादे की तरह सदैव आपके हृदय में चुभता रहेगा। सम्पूर्णति से ही स्पष्ट होता है कि आप स्वयं के प्रति कितने ईमानदार रहे हैं या दूसरों के प्रति अपने अपने वचन निभाने का पूरा प्रयत्न किया है।

Content: क्योंकि जब आप स्वयं को दिए अपने वादों को भंग करते हैं तब आपका आत्म-विश्वास जाता रहता है। जितनी ज्यादा आप देने के बाद अपनी कसमें तोड़ते रहेंगे उतना ही आपका आत्म-विश्वास घटता जाएगा। इसी प्रकार जब आप दूसरों के प्रति ईमानदार नहीं रहेंगे तो वे भी आपके प्रति ईमानदार नहीं रहेंगे। उनका भी आपके प्रति विश्वास खोता जाएगा।

Content: मसलन बात अपना वचन निभाने की है; वचन स्वयं से दें या दूसरों को। उनको न निभाने या न निभाने का प्रयत्न भी न करने की स्थिति में आपका आत्म-विश्वास और दूसरों का आपके प्रति विश्वास तो खत्म होता ही जाएगा।

Content: अर्जुन के साथ रण-क्षेत्र में यही होता है। अर्जुन जन्म से क्षत्रिय अर्जुन एक योद्धा है और पाण्डु का राजकुमार पुत्र है। जब पाण्डवों ने अपने चचेरे भाइयों कौरवों से युद्ध करने का अपना निर्णय लिया तो अर्जुन को अच्छी तरह मालूम था कि इस शत्रु समूह में कई लोग उसके विस्तृत परिवार के भी शामिल हैं लेकिन वो क्षत्रिय का युद्ध करना उसका धर्म था।

Content: परन्तु जब रण क्षेत्र में अपने मित्रों 'गुरुओं चाचा-ताऊ सम्बन्धियों आदि को शस्त्र सेना के शीर्ष पर देखता है, जो उसे उसके या शत्रु नहीं लगते जो उसका परिवार के भी शामिल हैं लेकिन वो क्षत्रिय का युद्ध करना उसका धर्म था।

Content: राज्य हड़पने का मन्तव्य रखते हैं या जिन्होंने उसके भाइयों और पत्नी से सबके सामने अपमानित किया हो-तो वह विचलित होता है। क्योंकि ऐसा समझना उसके माँ-बाप, समाज इत्यादि द्वारा किए अनुकूलन का प्रतिफल है। इसलिए वह स्वयं को कमज़ोर समझ कर रण क्षेत्र में पलायन करना चाहता है।

Content: इस युद्ध से पलायन के निर्णय के साथ ही उसकी सम्पूर्णति का भाव खंडित हो जाता है क्योंकि वह अपने क्षत्रिय धर्म का निर्वाह नहीं कर रहा। वह अपने धर्म से च्युत हो जाता है। क्योंकि क्षत्रिय के रूप में तो कौरवों के विरुद्ध युद्ध

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Content: करने के अपने निर्णय को उसे निभाना चाहिए था। नहीं तो उसे युद्ध करने का निर्णय लेने की ही क्या जरूरत थी? स्वयं को कमजोर समझते हुए युद्ध क्षेत्र को त्यागने का निर्णय उसकी अपनी धर्म सम्पर्ति से च्युत होना दर्शाता है। जब हम अपने मूल विचार विन्यास के अनुरूप काम करते हैं तो ऐसा ही होता है। आप अपनी सम्पूर्ति के भाव से गिरते हैं क्योंकि आप अपने वचनों का निर्वाह नहीं कर पाते। इसके बदले आपका मूल विचार विन्यास प्रतिसाद देने लगता है। इस ऊहापोह से मुक्ति तो तभी मिलेगी जब आप में पुनः सम्पूर्णता आए। अपने ‘साख्य-योग’ एवम कर्मयोग को स्पष्ट करने वाले संबंधों के माध्यम से कृष्ण अर्जुन से जीवन की प्रकृति और कर्म का उददेश्य समझाते हुए उसकी सहायता करते हैं जिससे वह अपने मूल विचार विन्यास द्वारा सीमित सनसनी-बोध की कमी का निवारण कर पुनः पूर्णता पाने के लिए सही समय प्राप्त कर सकें। कृष्ण अर्जुन को दो मुख्य अवधारणाएं समझाते हैं : ‘नित्यम्’ (अर्थात शाश्वत प्रकृति) और ‘न त्वं शोचिच तुमहिम्’ (शोक करने की व्यर्थता)। अपने शाश्वत रूप को स्पष्ट करते हुए कृष्ण अर्जुन को सारे तकों से परे ले जाकर सही समझ दिखवाते हैं जिससे कि उसके मूल विचार विन्यास में पूर्णता पा सम्पूर्ति का भाव फिर आ सकें। अब अर्जुन दूसरा पाठ सीखने को तैयार है—श्रद्धा का! श्रद्धा के माध्यम में अपनी सर्वोच्च क्षमता (या योग्यता) की खोज यहाँ मैं आपके साथ एक महत्वपूर्ण अवधारणा का साझा करना चाहता हूँ; सुनिए! आप समझते हैं आपकी एक आसमिता या पहचान है। पर वास्तव में आपकी चाह पहचान के सूत्र हैं। आप अपने को एक आयामी समझते हैं पर आपने चार आजम हैं 1. ममकार - जो आपके अनुसार आप हैं। 2. अहंकार - जो आपके अनुसार आप औरों को दिखाना चाहते हैं। 3. अन्यकार - जो दूसरे समझते हैं कि आप हैं। 4. स्व-अन्यकार - जो आप समझते हैं कि जीवन आपके लिए होना चाहिए। यह चारों अन्मिताएं आप में निहित रहती हैं श्रद्धा (ऑथेन्टिसिटी) का काम है इन चारों अन्मिताओं को सुसंगत रखना और इन चारों में आपकी सर्वोच्चता कायम रखना। प्रायः आप जैसा खुद को

Content: समझते हैं - आपका ममकार भाव वह सदा आपकी वास्तविकता से कम ही होता है और आपका वह भाव जो आप दूसरों को बनाते हैं - अहंकार-सदा आपकी वास्तविकता से अधिक ही होता है। दूसरों और आपके लिए आपकी अहंकार जो वास्तविक रूप है उससे सदैव ज्यादा ही रहता है। उदाहरण के लिए आप भले ही स्वयं को डरपोक समझते हों पर आप सदा स्वयं को मजबूत और शक्तिशाली दिखाने का प्रयास करेंगे। जो लोग ममकार का उच्च भाव होते हुए भी अपना अहंकार भाव निम्न स्तर पर दिखाएं, ऐसे दुर्लंभ हैं। और कई बार आपका अन्यकार भाव - यानी दूसरों के मन में आपके प्रति भाव - सदा ममकार और अहंकार दोनों से बिल्कुल फर्क होता है। श्रद्धा (ऑथेन्टिसिटी) का मतलब सिर्फ अपने इतिहास में अपने शिखर पर ही नहीं रहना या अपने अनुसार अपने उस शिखर स्थिति को दूसरों को ही नहीं दिखाता है, पर दूसरों के आकलन के अनुसार भी आपको शीर्‌पस्थ या अपने शिर पर कायम रहता है। जब आप अपनी पूरी योग्यता को फैलाकर दूसरों की छवि या अपेक्षाओं के अनुरूप स्वयम को ढाल लेते हैं। तब आप अपने अंदर निहित असाधारण योग्यताएं और क्षमताओं का या चमत्कारों को दिखा देने में सफल होते हैं। हर बार जब आप स्वयं को उठाकर या पूरी खिंचतान कर दूसरों के अन्यकार के अनुरूप स्वयं को ले आते हैं तो आप पूर्णत्व प्राप्त करते हैं। तब आप एकात्मता प्राप्त करते हैं। जब आप दूसरों के अन्यकार भाव तक स्वयं को ले आते हैं तभी आपको अपनी व्यक्तिगत अधिकता या पहचान से मुक्ति मिलती है। दूसरों के अन्यकार तक स्वयं को ले आने में अहंकार और भयकर दोनों से मुक्ति मिलती है। आप सोच सकते हैं : “मैं तो उसके लिए जिम्मेदार हूँ जो मैं महसूस करता हूँ कि मैं अपनी पहचान दूसरों तक प्रक्षित करता हूँ! पर दूसरों की मुझ से अपेक्षाओं के प्रति मैं क्यों जिम्मेदारी लूँ?” जब तक आप समझते हैं कि दूसरों की अपेक्षाओं के अनुरूप खरे उतरने के लिए आप अपनी पहिचान या आसमिता में इतनी खींच तान कर रहे हैं, तब तक आप झुँझलाहट, विक्षोभ एवम भारीपन महसूस करते रहेंगे। इस महत्वपूर्ण सत्य को स्पष्ट समझ लीजिए। यह आप ही हैं जो दूसरों की अंतचेतना में प्रविष्ट हो कर उनके मन में आपके प्रति अपेक्षाएं पैदा कर रहे हैं और इसलिए वे आपसे आशा करते हैं कि यह सब कुछ आप में मिलेगा। इसके लिए आपके शहर और चेहरा या शरीर भाषा जिम्मेदार हैं कि उनके मन में आपके लिए यह अपेक्षाएं पैदा हुई। इसलिए चाहें आप मानें या न मानें, जाने या न जानें दूसरों के आपके प्रति अन्यकार के लिए भी आप ही जिम्मेदार हैं।

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Content: सुनिए : जब आप अपने दिल की सुनने को तैयार ही नहीं है और अपनी काबिलियत को पूर्ण विस्तार देने को राजी ही नहीं हैं, तो ईश्वर आपकी मदद के लिए दूसरों के मन आपके प्रति ऐसी अपेक्षाएं जलता है कि आप अपनी क्षमताओं का विस्तार दें। यानी यह आपकी वह प्रच्छन्न भाग है जो आपके द्वारा दबाया गया है और जो अपनी पूर्ण विमोचन चाहता है। जब आप नहीं सुनते तो वह दूसरों के हृदय में भाव रूप से जाकर उनकी आपके प्रति अपेक्षा बनता है जिससे आपका वह दस हिस्सा भी पूरी तरह उजागर हो सके और अपनी पूर्णता पाए! ममकार की जड़ में आपका जीव है—यानी आपकी आत्मा जो हम सबके एकात्मता पैदा करती है क्योंकि उसके लिहाज से तो हम सब एक ही हैं। यदि आपने इसे एक शरीर में दक्ष था तो यह दूसरे शरीर में उभर आता है। जब आप अपनी आशाओं को अपने शरीर में दक्ष-छिपा रहे हैं—यानी आप जब ममकार की अपेक्षाएं दबा रहे हैं—तो यह सधा-साध दूसरों के आपके प्रति अल्पकार में उभर आता है। इसमें आपको कोई भी बाध्य नहीं कर रहा। यह तो आपकी अपनी स्वयं के बारे में उम्मीदें हैं जिन्हें आप एक मौका और देना चाहते हैं। अब यह किसी और के अन्याकार का हिस्सा नहीं रहा। अब तो आप अपने ममकार और अहंकार को विस्तृत कर उनको पूर्णत्व दिला रहे हैं। दूसरों की आपके प्रति अपेक्षाएं वस्तुतः ईश्वर की ओर से आपको याद दिलाने और मौका देकर अपने को पूरी तरह पहिचानें। जब आप पहचचानेंगे कि यह भी भगवत गीता अर्जुन को अपने बारे में दबी हुई कामनाओं का प्रकटीकरण है जिससे कि वह अपने भीतर के दिव्य का प्रकाशन इसके प्रारंभिक अध्यायों में कृष्ण अर्जुन के प्रति अपने अन्याकार का उसके साथ साधा करते हैं। वह अर्जुन को उद्बोधित करते हैं कि वह अपने शाश्वत आनन्द पूर्ण आत्म तत्व को पहिचानें। वह इस सत्य के बारे में उससे बौद्धिक समझ भी प्रदान करते हैं। ‘ज्ञानकर्म सन्यास योग’ एवं ‘सन्यास योग’ अध्यायों के माध्यम से कृष्ण इसको प्राप्त करने का अर्जुन को मार्ग दिखाते हैं। फिर कृष्ण अर्जुन की समझ को और गहराई देते हुए मृत्यु वैराग्य और सन्यास के गहन सत्य स्पष्ट करते हैं। जैसे ही एक बार अर्जुन के मन में यह समझ बैठी कि कृष्ण उसे अगले तत्व उत्तरदायित्व (जिम्मेदारी) की ओर ले चलते हैं।

Content: उत्तरदायित्व-स्वयं में स्वयं की उच्चतम संभावना की जागृति अगले अध्याय ‘ध्यान योग’ में दिए गए कृष्ण के उपदेशों का सार इन शब्दों

Content: में स्पष्ट किया जा सकता: “अपने अंदर देखें; और "स्वयम के उत्कर्ष का उत्कर्ष का उत्तरदायित्व स्वीकार करो!" यहां कृष्ण अर्जुन को वे तकनीक बताते हैं जिनके द्वारा वह अपने मन और इन्द्रियों से परे जाकर मुक्त हो सके। वह अर्जुन को निर्देश देते हैं कि कैसे वह स्वयं को ‘ईश्वरत्व’ स्तर तक उठाए (अर्थात नेतृत्व की चेतना पैदा करे) और स्वयं उन (कृष्ण) जैसा बन सके। इसीलिए कृष्ण कहते हैं: उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ अन्वयः तु स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयम ही अपना शत्रु है। दैवत्व की और स्वयम को विकसित कर और स्वयम को नीचे मत ले जा! इसमें कृष्ण का तात्पर्य है कि यदि तुझे स्वयम को स्वयम के द्वारा उठाने की तकनीक ज्ञात है तो तू अपने अंदर निहित ईश्वरीय तत्व का मित्र है। यदि तू स्वयम को नीचे ले जाता है तो तू उस दैवत्व का शत्रु हु।’ सुनें उत्तरदायित्व का अर्थ है सोच-विचार करना और कर्म करना जीवन का सज्ञान उस सत्य से लेते हुए कि हम स्वयम ही हर चीज का सोत है और इसलिए हमारे आस-पास, भीतर-बाहर जो भी घटित हो रहा है उसकी जिम्मेदारी हमारी ही है। मैं समझ सकता हूं कि एक बड़ा प्रश्न आपके मन में उठ रहा होगा! आप सोच रहे होंगे : ‘मेरे आस पास जो भी घटित हो रहा है उस सबकी जिम्मेदारी मेरी ही क्यों है? मैं तो अधिक से अधिक उसके लिए ही जिम्मेदार हो सकता हु जो मेरे अंदर घटित हो रहा है। मेरे बाहर होने वाली घटनाओं की जिम्मेदारी मेरी क्यों हो? उध्दरणार्थ, यदि मेरे जीवन में कोई दुर्घटना होती है तो उसकी जिम्मेदारी मेरी कैसे हो सकती है?’ यही सवाल हर कोई करता है। अब मैं इसका उत्तर देता हूं : यदि कोई अपनी करनी की जिम्मेदारी नहीं समझता तो वह एक पशु है। उसकी चेतना का स्तर बहुत ही नीचा है। जो अपनी करनी की जिम्मेदारी खुद ही लेता है वह एक मनुष्य है। उसकी चेतना का स्तर मध्यवती है। जो दूसरों की भी करनी की जिम्मेदारी खुद उठा लेता है वह ईश्वर होता है। वह सदा नेतृत्व के चेतना में निवास करता है, अर्थात ईश्वरत्व में। यह समझ ले कि जब आप अपने चारों ओर घटित होने वाली हर घटना की जिम्मेदारी महसूस करने लगते हैं तब ही आप सत्य की खोज करते हैं या

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Content: सत्यानेवसक होते हैं। आपको किसी भी समस्या के समाधान की संभावनाएं दिखाई पड़ने लगती हैं। जब आप यह जिम्मेदारी स्वयं उठाने लगते हैं तो आप उसका हल भी प्राप्त कर लेते हैं। सुनिए! जब आप कोई उत्तरदायित्व (जिम्मेदारी) उठाते हैं तो आपके माध्यम से उच्च ऊर्जाएं अभिव्यक्त होने लगती हैं। यदि आप जिम्मेदारी की तरफ एक कदम उठाते हैं तो ब्रह्माण्ड एक हजार कदम उठाकर आपको जिम्मेदारी देने को अग्रसर होता है। जब आप जिम्मेदारी के क्षेत्र या अन्तराल में पहुंचते हैं। तो आपके अंदर और बाहर के अन्तराल भी आपको सहारा देने को आगे आते हैं। वस्तुतः सारा ब्रह्माण्ड आपको सहारा देने को तत्पर रहता है क्योंकि जिम्मेदारी लेने वाले लोगों के संज्ञान के द्वारा उसे स्वयं भी सम्पूर्णता की अनुभूति होने लगती है। हर स्थिति में अपनी जिम्मेदारी लें। जब आप जिम्मेदारी महसूस नहीं करते तो आप समुद्र में एक बूंद की भांति रहते हैं और जब महसूस करते हैं तो उस बूंद में सारा समुद्र समा लेते हैं। आपके जिम्मेदारी लेते ही ईश्वरत्व-तत्वत्व चेतना-आपमें जागृत होने लगती है। जिम्मेदारी के साथ ही जीवन घटित होता है। फिर तो आप जो देखते या महसूस करते हैं, या वह भी जो अदृश्य है और महसूस नहीं हो पा रहा-वह सब कुछ आपकी जिम्मेदारी बन जाता है। जब आप विश्व की ओर और इसमें ईश्वर के व्यस्त प्रभाव की जिम्मेदारी लेते हैं तो ईश्वर का अव्यक्त भाग और समूचा विश्व आपकी जिम्मेदारी लेने लगता है। जब ईश्वर आपकी जिम्मेदारी लेता है तो आप स्वयं ही ईश्वर हो जाते हैं, आप एक अवतार बनकर उतरते हैं विव में! कृष्ण अर्जुन का मार्गदर्शन कर इसी जिम्मेदारी के तत्व के माध्यम में उसको कृष्ण चेतना का ज्ञान कराते हैं। कृष्ण की मार्गदर्शन की जिम्मेदारी उनके विश्वरूप दर्शन से पूरी होती है जिसमें वह अर्जुन पर अपना ब्रह्माण्डीय आयाम दिखाकर कृपा करते हैं- और अर्जुन को इस दिग्दर्शन से अपने प्रबोधन की पूर्वाभास हो जाता है।

Content: प्रबोधन के साथ आपायनम् (एनरिचिंग)

Content: अब हम चतुर्थ तत्व-आपायनम (समृद्धिशोलता) पर चर्चा करेंगे। पहले मैं आपायनम को परिभाषित करना चाहूंगा। (एन रिचिंग) आपायनम का अर्थ है सम्पूर्ति और श्रद्धा का समन्वय! यानी आप लगातार प्रतिबद्ध हैं कि समृद्धिशील रहेंगे और अपने जीवन में स्वयं को तथा आस-पास के माहौल को विस्तार देकर समृद्ध करते रहेंगे।

Content: आपायनम अर्थात अपने मित्रों और आसपास के माहौल में प्रथम उपरोक्त तीन तत्वों का लगातार संचार करते रहेंगे। आप पूछ सकते हैं : "स्वयम को समृद्धिशील रखना तो समझ में आता है, परन्तु दूसरों की कीप्रगति या बेहबूदी के लिए मैं क्यों प्रयत्न करूं? देखिए! जीवन आपको और औरों को मिला है। यदि दूसरों में है तभी तो जीवन होता है। यह समझ लें कि आपके द्वारा अनुभूत हर सम्बन्ध आपका एक ही आयाम प्रकट करता है। यह आपका पुत्र ही है जो आपको पितृत्व प्रदान करता है; आपकी पत्नी आपको पति बनती है। आपके अनुयायी आपको नेता बनाते हैं। जीवन का हर प्रमुख सम्बन्थ आपका एक ही आयाम प्रकट करता है। और जब तक आपका हर आयाम पूर्ण न हो, तो आप सम्पूर्ण कैसे हो पाएंगे? बार-बार यह अहम भाव या अहंकार आपको भुलवा देता है कि जीवन आनन्द तब ही प्राप्त होता है जब इसका विस्तार दूसरों के अन्धकार तक हो जाए-अौर तब नहीं जब इसकी भिडन्त अहंकार से होती है। हम सब आराम से महत्वपूर्ण तत्व बिसरा देते हैं और अपने जीवन में सभी का सयोग एक सहज घटना मान लेते हैं। हम सोचते हैं : "भाई को भाई जैसा, पिता को पिता जैसा और शिक्षक को शिक्षक की तरह व्यवहार करना चाहिए।" पर यह नहीं सोचते कि आपको अपनी भूमिका कैसे निभानी चाहिए? क्यों एक शिक्षक एक विद्यार्थी को पढ़ाए और उसका ज्ञान समृद्ध करे, अगर विद्यार्थी अपनी ओर से शिक्षक को समृद्ध बनाने की जिम्मेदारी नहीं उठाता? भगवतगीता बड़ी सुन्दरता से यह बात स्पष्ट करती है : "यदि तू यज्ञ नहीं देता, तो तू चोर है!" इसका अर्थ है जो कुछ भी हम संसार से पाते हैं उसकी बिना बढ़ाए हम वापस करते हैं तो यह चोरी है। यह समझ लें कि आयात्यनम का अर्थ है सबकी जिम्मेदारी लेना। मैं आपको बताता हूं कि जब आप दूसरों की जिम्मेदारी खुद लेते हैं तो आप में से असाधारण शक्तियां प्रवाहित होने लगती हैं। जब आप दूसरों के आयायनम में छलछित रहते हैं तब सारा संसार आपके माध्यम से स्वयम को व्यक्त करने लगता है। आपके अंदर से एक कॉस्मिक इनर्जी प्रवाहित होती है। यदि आप इस ऊर्जा का आस्वाद या अनुभव प्राप्त करना चाहते हैं तो दूसरों का ख्याल करना शुरू कर दीजिए। आपके अंदर एक उत्तेजना, ताजगी, ताजगी, तत्परता, हर्षों-याद की अनुभूति जागती है; आपको एक प्रेरणा शक्ति मिलती है। यह सब शुद्ध कामिक इनर्जी का संचार होना के कारण ही तो महसूस होता है।

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Content: जा देखें- भगवान श्री कृष्ण को-आपायनम का चरम रूप। उनकी उपस्थिति मात्र समृद्धि प्रदायक होती है। पूरी गीता में वह स्वयं अर्जुन की संशय से पैदा अश्रद्धा का उत्तरदायित्व लेते हैं और रूढ़से छुड़ाते नहीं। सम्पूर्ण गीता उनके आयायनम की अभिव्यक्ति है। भगवतगीता भगवान कृष्ण की विश्व को एक एैसी देन है जो अपने कालातीत सत्यों से अनन्त पीढ़ियों को आयायनम प्रदान करती रही है। भगवान अर्जुन को और समस्त मानवता को अन्तर्मुखी होकर अपने अन्दर विद्यमान करती रही है। भगवान अर्जुन को और समस्त मानवता को अन्तर्मुखी होकर अपने अन्दर विद्यमान ईश्वरीय चेतना का उद्बोध कराने का वरदान देते हैं और इस चेतना को प्राप्त करने के अमाघ सूत्र बनाते हैं।

Content: बारम्बार कृष्ण कहते हैं : 'अपने अन्दर के ईश्वरीय तत्व को जानना ईश्वर को जानना है।' जो कृष्ण कहते हैं वह सभी के लिए सत्य है। चाहे आप मानें या न मानें, यह विचार कि आप ईश्वर के अलावा कुछ और हैं, अपने आत्म-सम्मान को गिराता है! आप में जो कमी है वह सिर्फ यही है कि आपको सत्य का ज्ञान नहीं है। एक बार यदि आपकी समझ में आ गया कि आप ही ईश्वर हैं तो आप में और भगवान कृष्ण में कुछ फर्क नहीं जाएगा।

Content: कृष्ण इतने करुणाशील हैं कि यही बात सिद्ध करने के लिए वह पूरी भगवत गीता अभिव्यक्त करते हैं। कृष्ण यहीं साबित करने के लिए धरा पर आए थे। उन्हें यह साबित करने को कई आवश्यकता नहीं थी कि वह स्वयं ईश्वर हैं। उनका तो चरम लक्ष्य था यह सिद्ध करना कि 'तुम (हम सब) ईश्वर हो!' उनका परम उद्देश्य या अर्जुन के माध्यम से समस्त मानवता को प्रबुद्ध करना।

Content: कृष्ण की अभिव्यक्ति आपायनम का चरम प्रकटीकरण है क्योंकि यह उनका उत्तरदायित्व है आपको (हम सबको) प्रबोधन दिलाना।

Content: इसलिए वह भगवतगीता का समापन हम सबका अपने मूल विचार विन्यास को सम्पूर्ण करने और हर्षपूर्वक के जीवन को समर्पित करने से करते हैं। वह केवल यह कहते हैं : 'हर चीज छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ! एक प्रबुद्ध स्वामी एक सम्पूर्ण एकाग्र जीवन में अधिक और क्या दे सकता है! जब आप अपने ऊहापोहों को छोड़कर उनकी शरण में जाते हैं तो वह आपको मुक्त कर देते हैं। यही चरम आपायनम है।

Content: तत्व-जीवन का सहज प्रवाह

Content: यह समझ लें कि ये चार तत्व आध्यात्मिकता के अमृत-कुण्ड हैं।

Content: ये हमारे डीएमए में विद्यमान हैं। ये हमारे जीवन के सहज प्रवाह में है। और ये किसी भी समस्या का समाधान कर सकते हैं। जब आप इन तत्वों को जीते हैं तो आप पाएंगे कि : समृद्धि से आपकी निहित बुद्धिमता विस्तार पाकर सीधी हो जाती है और आपके अन्दर एक धनात्मकता का अंतर्ा जागृत होता है। श्रद्धा से आप लगातार जीवन्त रहते हैं। आप समस्त संभावना के अंतराल को अनुभव करते हैं।

Content: उपनयन (उत्तरदायित्व निर्वहन) से आपके असली प्रकृति जागृत होती है; ईश्वरत्व-या नेतृत्व चेतना आप में पल्लवित होती है। आप आयनम से आप हर चीज में अपनी उपस्थिति या अस्तित्व स्थापित करते हैं औऱ अंततः आप अपने आप में ब्रमान्यम बहुपत्रताम् अथ्रात 'संमार के प्रिय वारिस की अनुभूति प्राप्त करते हैं।

Content: यह चा सार्वभौतिक सिद्धांत आपको हमेशा प्रेरित करते रहेंगे। प्रोत्साहन देंगे और आप अपनी चरम संभावना भी अनुभव करेंगे। जब आ पाँच तत्वों को जियेंगे तो आपका लगातार विस्तार होगा और आप उस उद्देश्य की पूर्ति करेंगे जिसके लिए यह गीता कही गई थी!

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Chapter Number: 13

Chapter Name: त्रयोदश अध्याय

Content:

  1. क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ 38

Chapter Number: 13

Chapter Name: त्रयोदश अध्याय

Content: 2. जिसे तुम जानते हो वह तुम नहीं है! 42

Chapter Number: 13

Chapter Name: त्रयोदश अध्याय

Content: 3. चेतना और अंतःकरण 54

Chapter Number: 13

Chapter Name: त्रयोदश अध्याय

Content: 4. अंतरिक विज्ञान–प्रौद्योगिकी 60

Chapter Number: 13

Chapter Name: त्रयोदश अध्याय

Content: 5. चेतना शाश्वत है 66

Chapter Number: 13

Chapter Name: त्रयोदश अध्याय

Content: 6. इस ऊर्जा को समझना 76

Chapter Number: 13

Chapter Name: त्रयोदश अध्याय

Content: 7. असली कुंजी है साक्षी 82

Chapter Number: 13

Chapter Name: त्रयोदश अध्याय

Content: 8. भाव से निहरणा 82

Chapter Number: 13

Chapter Name: त्रयोदश अध्याय

Content: 9. कई लोग, कई रास्ते 85

Chapter Number: 13

Chapter Name: त्रयोदश अध्याय

Content: 10. हम ब्राह्मण हैं 90

Chapter Number: 13

Chapter Name: त्रयोदश अध्याय

Content: 11. आत्मा और शरीर 100

Chapter Number: 14

Chapter Name: चतुर्दश अध्याय

Content: 12. अपने अनुकूलन (वृत्ति) को त्यागो 107

Chapter Number: 14

Chapter Name: चतुर्दश अध्याय

Content: 13. कृष्ण (स्वयं को) दोहराते क्यों हैं? 109

Chapter Number: 14

Chapter Name: चतुर्दश अध्याय

Content: 14. प्राकृतिक गुण 115

Chapter Number: 14

Chapter Name: चतुर्दश अध्याय

Content: 15. इंद्रियों की सुरक्षा 142

Chapter Number: 14

Chapter Name: चतुर्दश अध्याय

Content: 16. सफलता का अवसाद 152

Chapter Number: 14

Chapter Name: चतुर्दश अध्याय

Content: 17. यहां से हम कहां जाते हैं 159

Chapter Number: 14

Chapter Name: चतुर्दश अध्याय

Content: 18. गुणों के पारे जाना 162

Chapter Number: 14

Chapter Name: चतुर्दश अध्याय

Content: 19. दिव्यता की अभिव्यक्ति 165

Chapter Number: 15

Chapter Name: पंचोदश अध्याय

Content: 20. कोई प्रश्न नहीं : केवल संशय 168

Chapter Number: 15

Chapter Name: पंचोदश अध्याय

Content: 21. कारणात्मक (काजल) शरीर में यात्रा 182

Chapter Number: 15

Chapter Name: पंचोदश अध्याय

Content: 22. इस वृक्ष को काटना 191

Chapter Number: 15

Chapter Name: पंचोदश अध्याय

Content: 23. शोधन की विधियां 194

Chapter Number: 15

Chapter Name: पंचोदश अध्याय

Content: 24. अनुकूलन 201

Chapter Number: 15

Chapter Name: पंचोदश अध्याय

Content: 25. आप स्वयं ही आपके संस्कार हैं 205

Chapter Number: 15

Chapter Name: पंचोदश अध्याय

Content: 26. उपलब्धि नहीं जागरुकता 212

Chapter Number: 15

Chapter Name: पंचोदश अध्याय

Content: 27. हमारा दिमाग (मन) ऐसे काम करता है 217

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Chapter Number: 13

Chapter Name: क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विज्ञान योग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग)

Content: तुम आस्तिक के सागर की एक लहर हो। जब लहर की समझ में आता है कि वह सागर से अलग नहीं है, तो उसका सागर के प्रति प्रतिरोध शेष हो जाता है और वह सागर में विलीन हो जाती है।

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Chapter Number: 13

Chapter Name: क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ

Content: इस अध्याय में कृष्ण अर्जुन को क्षेत्र एवम् क्षेत्रज्ञ के बारे में बताते हैं। इसलिए इसे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग भी कहते हैं। इसमें वह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की परिभाषा स्पष्ट करते हैं। कृष्ण स्पष्ट रूप से उसे भौतिक पदार्थ के बारे में बताते हैं जिसमें हम जीते हैं और उस चेतना का हवाला देते हैं जो उस पदार्थ में रहती है। किसी न किसी रूप में हम सब इस ब्रह्मांड से जुड़े हैं, चाहे हमारी यह बात समझ में आए या अनुभव में आए या नहीं आए। इसका मूल कारण चेतना ही है। यह चेतना न सिर्फ इस ब्रह्मांड का उद्गम है वरन इसका कारण भी है। यही वह सोत है जहां हमारा आविर्भाव होता है और जहां हम रहते हैं। यह समस्त ब्रह्माण्डीय चेतना वह अंतराल या स्पेस है जिसमें हम घटित होते हैं या होते रहते हैं। इस बात को स्पष्ट करने के लिए कृष्ण सागर का रूपक बांधते हैं। सागर अर्थात् ब्रह्माण्डीय चेतना या ईश्वर, आत्मा या जो भी हम इसे संज्ञा दें। कृष्ण यह रहस्य खोलते हैं कि हम सभी सागर में उठी लहर के समान हैं जो समग्र सागर में निवास करती है। वह बताते हैं कि कैसे लहर सागर से या हम ईश्वर से एकात्म भाव महसूस कर सकते हैं। जीवन में समस्या यही है कि हमने भुला दिया है कि हम समग्र सागर के एक अंश-लहर हैं। हम यह भूल जाते हैं कि हम क्षेत्रज्ञ के ही भाग हैं। क्षेत्रज्ञ का अर्थ है चेतना जिसमें क्षेत्र का कारण पनपता है। क्षेत्र का अर्थ है यह शरीर और क्षेत्रज्ञ का अर्थ है वह चेतना जो जानती है कि उसके पास एक शरीर है। कृष्ण जहां क्षेत्र एवम् क्षेत्र का रहस्य स्पष्ट करते हैं। यदि हमें क्षेत्रज्ञ का ज्ञान न हो, तो हम समझते हैं कि क्षेत्र ही अपना स्वामी है।

Chapter Number: 13

Chapter Name: क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ

Content: शरीर और हम एक उदाहरण : आपने एक कार खरीदी और उसे चलाने लगे। कार चलाने के दस मिनट पश्चात् आपकी समझ में आया कि आप इसे बंद करना तो जानते ही नहीं हैं। यदि आप कार को रोकना नहीं जानते, तो आप कार को नहीं, कार आपको चला रही है। इसी प्रकार हम इस मन और बुद्धि के द्वारा जीते हैं। अचानक, किसी क्षण हमें यह समझ में आता है कि हम इस शरीर या मन को रोक नहीं सकते। यह समझने में आता है कि हम अपनी धुन में चलते जाते हैं और नियंत्रित करने योग्य नहीं रह पाते। अपने मन और शरीर को अपनी चैतन्य जागरुकता में लाइए। मन और शरीर अच्छे सेवक तो हो सकते हैं पर अच्छे स्वामी नहीं। सेवक के रूप में वे श्रेष्ठ हैं। बेशक, बिना शरीर और मन के आप जी ही नहीं सकते, न जीवन का आनंद ले सकते हैं। उनकी जरूरत तो है ही। लेकिन जब तक आपका उन पर नियंत्रण नहीं होता, वे आपके स्वामी बन जाते हैं। इस संदर्भ में दो ही विकल्प हैं : या आप उनको भोगें या वे आपको भोगें। आपने जब सिगरेट पीना शुरू किया तो पहले आप धूम्रपान का मज़ा लेते हैं। कुछ समय पश्चात् आप धूम्रपान का मज़ा नहीं उठाते, धूम्रपान आपका मज़ा उठाने लगता है। यही हाल शराब (एल्कोहल) पीने में होता है। कुछ समय बाद एल्कोहल आपको ही पीने लगता है। अर्थात् शुरुआत में तो कोई आदत आपकी चेली रहती है पर कुछ समय बीतने के पश्चात् वही आपकी स्वामिन हो जाती है। फिर तो वह आदत, न कि आप, आपके जीवन को भोगती है। उस स्थिति में आपके पास कोई विकल्प रह ही नहीं जाता। आप स्वयं आदतों के एक समूह बन जाते हैं जिनकी पुनरावृत्ति बगैर आपके किसी नियंत्रण के अंतर्गत होती रहती है। जब हम कार के 'ओनर्स मैनुअल' को बिना पढ़े-समझे कार चलाने लगते हैं, तो अचानक हमारी समझ में आता है कि हैंड ब्रेक की स्थिति का तो हमें ज्ञान ही नहीं है। हमें यह भी नहीं मालूम पड़ता कि बाएँ या दाएँ कैसे मुड़ें। इसी प्रकार जब हम मन और शरीर में प्रवेश करते हैं विना उनके नियंत्रण के ज्ञान के, तो हमारी भी यही गति होती है। इसलिए पहले मन और शरीर पर नियंत्रण करना सीखें, तब उनके नियंत्रण में जाने की चेष्टा करें। चाहे हम पार्थिववादी जीवन की बात करें या आध्यात्मिक जीवन की, जब तक मन और शरीर हमारे नियंत्रण में नहीं होंगे, हमारा कुछ भी सोचना या करना बेमानी है; निरर्थक है। मान लीजिए, सुबह-सुबह ही हम दिन भर के अपने किया-कलाप का लेखा-जोखा बना लें : "मुझे यह करना चाहिए" या "यह पूरा करना है" इत्यादि। परन्तु जब दिन खत्म होता है, तब हम असहाय से अपने पीने की या सोने की आदत में मुब्तिला होकर दूसरे काम करने लगते हैं। तो ऐसे में पूरे दिन की रूप-रेखा बनाने की क्या सार्थकता रह जाती है? कुछ भी नहीं। हम अपने दिमाग में कुछ भी सोचते रहें, पर दिन के अन्त में अनियंत्रित शरीर तो

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Content: वही करेगा जो वह चाहता है। मन भी अपनी मर्जी से चलेगा... हम तो कहीं के नहीं रहेंगे। इसलिए जब तक हमें क्षेत्रज्ञ का सही ज्ञान न हो-यानी क्षेत्र को जानने वाले का तब तक सही अर्थों में जीवन तो शुरू ही नहीं हो पाएगा। इसलिए वैदिक पद्यति में किसी व्यक्ति का सही जन्म तब माना जाता है जब उसकी व्यक्तिगत्त चेतना जागृत हो जाए। तब तक उसका भौतिक जन्म तो स्वीकायं होता है पर उसे मनुष्य भी नहीं माना जाता। वेदों के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की आन्तरिक चेतना जागृत हो पाती है, तभी उसे मनुष्य रूप में पैदा माना जाता है। इसके पूर्व तो वह एक पशु के समान है। संस्कृत में 'मनुष्य' शब्द के दो अर्थ हैं : एक है 'मनु' के वंशज और दूसरा : 'वह जो मन को संभाल सके या वह जो मन के परे भी जा सकें' मनु तो हमारे आदिपुरवक माने जाते हैं। जब हम अपने मन पर नियंलण साध सकें, तभी हम मनुष्य होते हैं। संस्कृत की उक्ति है : 'प्रत्यागात्या चैतन्य जाग्रतम' अर्थ वही व्यक्ति (या मनुष्य) है जिसकी व्यक्तिगत्त चेतना जागृत है। भारतीय वैदिक पद्यति में जब बच्चा सात वर्ष का हो जाता है, तब उसे पवित्र गायत्री मंत्र की दीक्षा दी जाती है। यहां एक बात स्पष्ट समझ लें : वैदिक धर्म या हिन्दू-सनातन धर्म एक मात्र ऐसा धर्म है जिसमें वप्तिस्मा या दीक्षा का कोई नियम नहीं है। आपको न कोई आस्था बताई जाती है, न कोई ऐसी अवधारणा या दर्शन समझाया जाता है। आपसे यह भी नहीं कहा जाता कि किसी खास विचार को ग्रहण करें। यहां सिर्फ वह तकनीक बनाई जाती है जिससे आप मन और शरीर को नियंत्रित कर सकें। बस! गायत्री मंत्र एक ऐसी ही तकनीक है-जिसमें किसी देवता का हवाला नही होता। 6 या सात वर्ष के बच्चे को इसी मंत्र या तकनीक से दीक्षित किया जाता है। गायत्री मंत्र का मूल भाव है : "मुझे ऊर्जा पर ध्यान देना है, जो मेरी चेतना को जागृत कर मुझे ध्यान करने में सहायक हो।"-बस! ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम! भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्! इस मंत्र का और कोई अर्थ नही होता। इसमें गायत्री देवो (एक हिन्दू देवी) या किसी पंचमुखी देवता या ऐसे किसी देव का अर्थ नही है। इस मंत्र का सिर्फ यही मतलब है : "मुझे उस चेतना पर ध्यान लगाने दो जो मेरी 'धी' (विवेक बुद्धि) को जागृत कर मुझे ध्यान लगाने में सहायक हो!" बस इतना ही अर्थ है।

Content: तथ्य यह है कि हमारे प्राचीन प्रबुद्ध गण या ऋषि लोग चाहते थे कि सबसे पहले हम अपने शरीर व मन को नियंत्रित करना सीखें। गायत्री मंत्र इस संदर्भ में हमारा मन शरीर को नियंत्रित करने का एक 'ओनर्स मैनुअल' है। जैसे यदि हमारे पास एक कार हो तो पहली मूलभूत जरूरत है हमारे पास 'ओनर्स मैनुअल' होना। यदि हम बिना इस मैनुअल को पढ़े कार चलाने लगेंगे, तो यह किसकी गलती होगी? लगभग सारी ही सवारियों में एयरबैग पर स्पष्ट निर्देश या चेतावनियां दी रहती हैं 'एयरबैग गम्भीर दुर्घटना करवा सकते हैं,' या 'बारह वर्ष से कम के बच्चे आगे की सीट पर न बैठें'; 'ओनर्स मैनुअल' द्वारा एयर बैग के बारे में और जानकारी प्राप्त करें!' इसी प्रकार सात वर्ष की आयु में हमें शरीर और मन की समझ आती है। इसके पूर्व तो हम सहज वृत्ति (इन्स्टिक्ट) के स्तर पर काम करते हैं। सात वर्ष के उपरान्त ही यह सहज वृत्ति बुद्धिमता से संचालित होने लगती है और हम अपने निर्णय भी लेने लगते हैं। जब हममें यह समझ पैदा होती है, तब यह जरूरी है कि हम यह जानें कि शरीर-मन को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है। इसलिए वैदिक गुरुओं ने यह गायत्री मंत्र की तकनीक सिखाई जिससे हम अपनी चेतना को जागृत कर सकें। यह बिलकुल 'ओनर्स मैनुअल' पढ़ने के समान ही है कार चलाने के पूर्व।

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Chapter Number: 13

Content: जिसे तुम जानते हो वह तुम नहीं है!

Chapter Number: 13.1

Content: अर्जुन ने कहा : “हे कृष्ण! मैं प्रकृति व पुरुष, अक्षरमक एवं सकर्मक ऊर्जाओं, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ तथा ज्ञान और ज्ञान की अन्तिम सीमा के बारे में जानना चाहता हूँ।”

Chapter Number: 13.2

Content: भगवान कृष्ण ने यह कहते हुए अर्जुन को उत्तर दिया : “हे कौन्तेय! यह शरीर 'क्षेत्र' नाम से जाना जाता है। इसको तत्वतः जानने वाले को ज्ञानज्ञ 'क्षेत्रज्ञ' कहते हैं।”

Chapter Number: 13.3

Content: “हे भारत (अर्जुन)! तू सव क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ-जीवात्मा मुझे ही जान। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ को, विकार सहित प्रकृति को और पुरुप को, जो तत्त्वतः जानना है वह ज्ञान है—ऐसा मेरा मत है।”

Content: कृष्ण (अर्जुन को) समझाते हैं : “हे कौन्तेय (कुन्ती पुत्र) अर्जुन! इस शरीर को क्षेत्र कहते हैं और जो इस शरीर को जानते हैं, उन्हें क्षेत्रज्ञ कहा जाता है।” जिसे आप जानते हैं वह 'आप' नहीं है। यदि आप कुछ जानते हैं, तो वह आप नहीं है। उदाहरणार्थ आप इस पुस्तक को पढ़ सकते हैं क्योंकि यह आपसे अलग है - एक स्वतन्त्र वस्तु है। इस प्रकार यदि आप अपने शरीर को जानते हैं, तो वह जानने वाला आपका हिस्सा नहीं है। यदि आप अपने दिमाग को जानते हैं तथा वह आपका अंश नहीं है। यदि आप अपने विचारों से वाकिफ़ है, तो वह भी आपका हिस्सा नहीं है। यानी जिसको आप अलग से जान सकते हैं, वह आपका अंश नहीं होता। आप उससे अलग हैं या परे हैं- तभी तो आप उसे जान पाते हैं। वह चाहे शरीर हो या विचार या भावनाएँ- यदि आप उसे जानते हैं, तो वह आपका अंश नहीं हो सकता। अब हमें क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को अलग करना है—तभी इन्हें समझ सकते हैं। जैसे ही इन्हें अलग किया कि शरीर हर्ष और आनन्द से भर उठेगा—चेतना मुक्त हो जाएगी। जब इन दोनों को एक ही समझा जाता है, समस्या तभी पैदा होती है।

Content: कभी मैं एक पंक्ति की उक्ति सुनी थी : “एक आदमी, अपने मित्र से कह रहा था- 'मेरी राशि पृथ्वी तत्व की है और मेरी पत्नी की जल तत्व की।' हम मिल के कीचड़ बनाते हैं।” जल और पृथ्वी अलग-अलग बहुत अच्छे हैं—लेकिन जैसे ही दोनों मिले कि कीचड़ बना। इसी प्रकार चेतना भी बहुत अच्छी है और शरीर भी। लेकिन उनके मिलन से समस्या पैदा हो जाती है। इसलिए हमें यह समझना है कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ क्या है - अर्थात् क्या हम हैं और क्या हम नहीं है। हमारे जीवन में समस्या तब पैदा होती है जब हम स्वयं का किसी से तादात्मय स्थापित कर उसे ही अपनी अस्मिता समझने लगते हैं। हम समझते हैं कि हम भी वही है कर उसे ही अपनी अस्मिता समझने लगते हैं। हम समझते हैं कि हम भी वही हैं, हम स्वयं को दिमाग ही समझने बजाय यह समझने के कि हमारे पास दिमाग है, हम स्वयं को दिमाग ही समझने लगते हैं और इस प्रकार हमारा दिमाग हमारी 'अहम्‍ता' बन जाता है।

Content: जब तक हम यह समझते हैं कि यह मेज हमारी है, तब तक कोई समस्या नहीं होती। पर जैसे ही मैं इस मेज को स्वयं ही समझने लगता हूँ, समस्या शुरू हो जाती है। इसी प्रकार जब तक हम समझते हैं कि हमारे पास मन और शरीर है, समस्या नहीं होती। लेकिन जैसे ही हम उन दोनों से अपनी अस्मिता की पहचान करने लगते हैं, परेशानी पैदा होने लगती है। कृष्ण कहते हैं : “हमें समझना चाहिए, कि हम जो समझते हैं वह हम नहीं हैं।” और इस प्रकार धीरे-धीरे वह हमें क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का फर्क समझाते हैं। एक और बात समझ लें। जब हम समझते हैं कि कोई चीज हमसे अलग है, तो हम कभी यह महसूस नहीं करते कि हम इसको त्याग दें वस्तुतः हमें वह विचार त्यागना चाहिए कि हम स्वयं वही वस्तु हैं। बस! सत्य तो यह है कि हमें किसी चीज को त्यागने की ज़रूरत भी नहीं है। हमें तो यह समझना चाहिए कि हमारा मन और त्यागने को कुछ है ही नहीं! हमें तो बस यही समझना चाहिए कि हमारा मन और शरीर कैसे काम करते हैं। वे लोग जो इस मन शरीर और मन से त्रस्त होते हैं, इस विश्व की उलझनों में फँसते हैं। लोगों का एक अन्य वर्ग वह है जो 'तप' के नाम पर अपने शरीर और मन को यंत्रणा देते हैं। मैंने भारत में ऐसे लोगों को भी देखा है जो पाँच-पाँच वर्ष तक योगाभ्यास के नाम पर बैठे या खड़े रहते हैं। ऐसे भी हैं जो एक पैर पर ही खड़े रहते हैं, जमीन पर लोट लगाते रहते हैं या आग पर चलते हैं। इस तरह शरीर को यंत्रणा देने की कोई आवश्यकता भी नहीं होती। वस्तुतः हम शरीर को त्रास इसलिए देते हैं कि हम समझते हैं यही हमें यंत्रणा दे रहा है। इस प्रकार हम उससे बदला लेते हैं। दूसरे छोर पर ऐसे लोग हैं जो विषय भोगों में डूबकर स्वयं का हनन ही करते रहते हैं और इस छोर पर वे हैं जो तपस्या के नाम पर अपने शरीर को यंत्रणा देते रहते हैं। पर इनमें से किसी को नहीं मालूम कि मन और शरीर को कैसे संभाला जाए।

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Content: वह जो शरीर और मन को सही प्रकार संभालना जानता है असली आनन्द प्राप्त करता है। वह अपने मन और शरीर को नितान्त चैन की अवस्था में रखता है। वह सारे सुख-आराम पूरी शिद्दत से प्राप्त करता है और शरीर का कभी दुरुपयोग नहीं करता।

Content: आनन्द लेना और दुरुपयोग करना दो अलग चीजें हैं। आनन्द तब आता है जब शरीर और मन एक दूसरे से पूरे मिले हुए रहते हैं। तब हमें आराम मिलता है और एक गहरा चैन भी! तब हम सबसे ज्यादा सहज रहते हैं।

Content: और एक वर्ग ऐसे लोगों का है जो मन के लिए शरीर को यंत्रणा देते हैं जिसे वह तपस्या या तप कहते हैं। ये लोग शान्ति की खोज में रहते हैं। अपने शरीर को पूरी तरह नकार कर उसको कष्ट देते हैं; महीनों बगैर भोजन के रहते हैं, एक पैर पर खड़े रहते हैं या कोलों में लेटते और आग पर चलते रहते हैं। ये लोग अपने मन और शरीर को किसी न किसी तरह सदा कष्ट में रखते हैं। पर पीड़ा सदा दूसरे को कष्ट देकर ही यौनानन्द प्राप्त करते हैं तथा ऐसे यौनानन्द प्राप्त करने वाले सदैव परपीड़क होते हैं।

Content: हम दूसरों को यंत्रणा तब ही देते हैं जब हमें स्वयं को यंत्रणा देने में मज़ा आता है। हम दूसरों को कष्ट तब ही देते हैं जब हम अपने अस्तित्व में सहज नहीं हो पाते तथा अवसाद ग्रस्त या मनस्ताप से पूर्ण होते हैं। दूसरों को यंत्रणा देने का सीधा संबंध स्वयं को यंत्रणा देने से है।

Content: जब हम समझते हैं कि हम मन हैं, तो हम शरीर को कष्ट देते हैं और जब स्वयं को मात्र शरीर समझते हैं, तो हम मन को कष्ट देते हैं। लेकिन जिसको शरीर और मन की सही समझ है, वह कभी न अपने शरीर या मन का दुरुपयोग करता है, न उन्हें कष्ट देता है। वह जानता है कि दोनों को कैसे संभाला जाए और दोनों के साथ आनन्द पाता है।

Content: कृष्ण यहाँ वह रहस्य उद्घाटित करते हैं कि कैसे मन और शरीर को सुन्दर एवं ऊर्जा-आनन्द प्रदायक स्थिति में रखा जाए जिसमें अन्तरमन भी आनन्द भरी चेतना से भरा-पूरा रहे।

Content: कृष्ण आगे कहते हैं : "हे भारत! मैं सभी शरीरों का जानने वाला हूँ, जो इस शरीर और मन को जानता है, उसे ही ज्ञान कहा जाता है।"

Content: क्या सुन्दर बात है! यहाँ कृष्ण कहते हैं कि क्षेत्र या शरीर-मन की समझ और चेतना को समझना ही असली ज्ञान है। वह कहते हैं : "मैं चेतना के रूप में सारे जीवों में वास करता हूँ।"

Content: वस्तुतः हमारी चेतना ही ईश्वर है, ईश्वर जैसी कोई अलग सत्ता नहीं है। जब हम मन या शरीर से स्वयं को जोड़ने लगते हैं, तो समस्या पैदा हो जाती है। परन्तु जो समझता है कि वह स्वयं ही चेतना है स्वयं को मुक्त कर लेता है। वही प्रबुद्ध ज्ञानी होता है; बुद्ध बन जाता है। चेतना ही ईश्वर है।

Content: समीकरण यह है : ईश्वर + शरीर/मन = मनुष्य मनुष्य - शरीर/मन = ईश्वर!

Content: आप स्वयं चेतना हो : हम चाहें माने या न मानें, हम चेतना हैं। आइए देखें कि कैसे हम इसको नहीं देख पाते और अपने जीवन को गड़बड़धावा बना देते हैं।

Content: नीचे एक सुन्दर कथा दी गई है जो शरीर-मन को समझने के लिए और कैसे हम स्वयं चेतना न समझने की भूल कर बैठते हैं।

Content: एक गर्भवती शेरनी अपने शिकार की तलाश में जंगल में घूम रही थी कि उसे एक भेड़ों का झुंड मिला। उसने उस समूह पर आक्रमण करना चाहा पर भेड़ों का झुंड ज्यादा शक्तिशाली निकला। शेरनी वहीं जमीन पर गिर गई और वहीं उसने एक सिंह शावक को जन्म दिया-पृथ्वी पर गिरने के दबाव के कारण और उसी दबाव के कारण वह मर गई।

Content: भेड़ों के झुंड में वह सद्यजात सिंह शावक को देखी। वे भेड़ें उसके साथ खेलने लगीं। उनको लगा कि उन्हें उस बच्चे का ख्याल रखना चाहिए। उस पर तरस खा कर उन्होंने उस बच्चे को अपना लिया और उसका वैसे ही पालन-पोषण करने लगी, जैसे वे अपने बच्चे का करतीं। उसको अपना दूध पिलातीं और नरम घास खिलातीं।

Content: वह सिंह शावक भी भेड़ की तरह वर्ताव करने लगा और उन्हीं की तरह बड़ा होने लगा। वह उन भेड़ों के साथ मजे में था। उसे यह नहीं ज्ञात था कि वह भेड़ों की जाति का नहीं है। उसने फर्क योनि का जीव है।

Content: कुछ समय बाद समस्या पैदा होने लगी। भेड़ों की जो प्रमुख माता (रानी) थी, उसको शिकायतें मिलने लगीं उस शावक के वर्ताव के बारे में : यह तो बहुत घमंडी है। यह हमारे साथ ठीक से नहीं खेलता। फलस्वरूप, उस शावक को सबसे अलग कर दिया गया। जब भी कोई झगड़ा होता, तो उसी शावक को दण्डित किया जाता।

Content: कुछ दिन बाद वह सिंह शावक सोचने लगा : "ऐसा क्यों होता है? मुझे तो लगता है मानो मैं जीवित ही नहीं हूँ। क्या यही जीवन है कि घास खाते रहो, इधर-उधर मिमियाते हुए कूदते रहो। इधर मैदानों में मुझे तो लगता नहीं कि मैं सही प्रकार से जीवन जी रहा हूँ।" अब उसे लगने लगा था कि वह दूसरों-साथ नहीं है-फर्क है। उसे लगता ही नहीं था कि वह एक भेड़ है।

Content: जब उसे जंगल दिखाई पड़ा, तो उसमें घुस कर देखने की उसकी इच्छा हुई, परन्तु उसकी पालक भेड़ माँ उसको चेतावनी देती रही कि ऐसा कभी मत करना। उसे मशविरा भी दिया कि अपने समूह (भेड़ों) से कभी अलग न होना।

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Content: वह मां तो उसे एक भेड़ ही मानती थी न! उसने बताया कि यदि वह शावक जंगल में अंदर गया तो तो वहां शेर उसे मार डालेंगे। वस्तुतः यह पूरी कथा आध्यात्मिक साधक की है कि कैसे कोई जन्म लेने के पश्चात् अपनी खोज प्रारंभ कर अपना लक्ष्य प्राप्त कर संतुष्ट होता है। यह एक बाघिया कथा है - मुझे बहुत पसंद है। इसलिए इसको जहां संभव हो, मैं सुनाता रहता हूं। भेड़-मां ने आदेश दिया : “तुम वहां कतई नहीं जा सकते! वहां पर शेर हैं।” उस शावक ने किसी प्रकार अपनी इच्छा दबायी, यद्यपि उसका मन जंगल में जाने को बहुत हो रहा था। पर कुछ समय पश्चात् उसने तय कर लिया : “यह जीवन मेरे लिए है ही नहीं!” लेकिन उस भेड़-मां ने उस पर दबाव डालकर उसे रोक रखा। वह उसके सामने तरह-तरह के नाटक करती थी-कभी रोती-कभी हंसती, कभी धमकाती! अन्ततः उसने उस सिंह शावक की शादी करवा दी। इस कथा में एक अंतर्कथा है : जंगल में एक बड़ा विवाहोत्सव मनाया जा रहा था। राजा शेर की शादी एक शेरनी से हो रही थी। जंगल के सारे जानवर वहां एकत्रित थे और उत्सव मना रहे थे। वहां मध्य में एक नृत्य-मंच बना था, लेकिन उस मंच पर केवल शेर और शेरनी ही नाच सकते थे। बाकी सारे जानवरों को वहां जाने में डर लगता था-इसलिए वह उस मंच के बाहर खड़े तमाशा देख रहे थे। अचानक उस धमाचौकड़ी में मंच पर एक चूहा उछलकर पहुंच गया और नाचने लगा। एक शेर ने उसे पकड़ लिया और गरज कर पूछा : “तुम्हारी इस नृत्य मंच पर आने की हिम्मत कैसे हुई? क्या दिखाई नहीं पड़ रहा था कि बाकी सब जानवर बाहर हैं - यहां सिर्फ शेर -शेरनी नाच सकते हैं।” उस चूहे ने तुरन्त उत्तर दिया : “चुप रहो। शादी के पूर्व मैं भी शेर था।” हां तो उस सिंह-शावक और भेड़ों की कहानी पर लौंटे! उस सिंह शावक की शादी हुई और कई वर्ष बीत गए। एक दिन सिंह शावक सोचने लगा : “यहां क्या हो रहा है? मैं तो पुरानी ज़िन्दगी ही जी रहा हूं-वही खाना-पीना, मिमियाना और मैदान में उछलकूद मचाना। मुझे वाक़ई में महसूस होता है कि मैं कुछ प्राप्त नहीं कर पा रहा हूं। अब मुझे सब कुछ तो मिल गया - एक श्रेष्ठ मां, सुन्दर पत्नी - एक भरा-पूरा जीवन! पर मेरे अन्दर अभी भी एक प्रकार का खालीपन है। मैं संतुष्ट महसूस नहीं कर पाता? पता नहीं क्या बात है?” और फिर उसने सोचना शुरू किया। उसकी खोज फिर शुरू हुई। अचानक एक दिन पड़ौस के जंगल से वहां एक शेर आ गया और उसने भेड़ों पर आक्रमण कर दिया - सारी भेड़ें भागने लगीं। इस सिंह शावक की अजीव हालत

Content: थी। वह न ही भागना चाह रहा था, न ही उसकी हिम्मत हो रही थी उस शेर का सामना करने की। उसको मालूम था कि वह शेर आक्रमण करने वाला है - पर वह सिंह शावक सोचने लगा : “यह लगता कितना शानदार है। एक अलग ही छटा है।” उसने इतना गरिमामय जानवर अभी तक देखा ही नहीं था। सो, जाने-अनजाने, वह शावक धीरे-धीरे उस शेर की तरफ आकर्षित होने लगा। इस आकर्षण के मारे न वह शावक भाग सका और न ही उसको हिम्मत शेर के सामने जाने की पड़ी - आखिर तो वह एक ‘भेड़’ ही था शेर के आक्रमण को झेलता हुआ। यद्यपि वह पीछे तो हटता रहा, पर उसकी निगाह उसी शेर पर जमी रही। वह शेर सीधा उसके पास आया और उस सिंह शावक को पकड़ लिया। वह सिंह शावक जो भेड़ों में पला था, मिमियाने लगा : “अरे... कृपया मुझे छोड़ दें प्लीज़...मुझे मारने नहीं आया। तू तो एक ...मुझे मार नहीं पायेगी।” वह शेर बोला : “मूर्ख! मैं तुझे मारने नहीं आया। तू तो एक शेर का बच्चा है। इस तरह मिमियाना क्यों रहा है? तुझे यह कैसे लगा कि मैं तुझे मार डालूंगा?” “क्यों...मे? मैं... शेर का बच्चा।” उस सिंह शावक को शक हुआ कि शेर उसे बहका के जंगल में ले जाने की कोशिश कर रहा है। वह भयभीत हो गया और ज़ोर से चिल्लाया : “नहीं...नहीं! मुझे छोड़ दो!” उस शेर ने कहा : “मूर्ख! तू शेर है, यह बात समझता क्यों नहीं?” सिंह शावक ने उसकी बात नहीं मानी। वह तुरन्त निकल भागा। यद्यपि वह सिंह शावक वहां से भाग के तो आ गया पर उस शेर को भूल नहीं पाया। एक हफ्ते तक उसका भय कायम रहा। प्रथम दर्शन या प्रथम भेंट में प्रायः भय उमड़ता है। पहला अनुभव यही होता है। सिंह शावक ने पहली बार एक शेर को देखा था। इसी भय का अनुभव अर्जुन ने भी किया था, जब उसने कृष्ण का पहला बार विश्वरूप देखा था। उसे देखकर भय तो लगा पर उसके प्रति एक रहस्यमय आकर्षण भी महसूस हुआ। एक हफ्ते पश्चात् उस सिंह शावक का भय शान्त पड़ने लगा। उसे शेर का आकर्षण पुनः खींचने लगा। उसका शेर से मिलने को मन होने लगा : “एक बार उस शेर से और मिलना चाहिए,” उसने सोचा। पर उसके दिमाग का एक भाग कह रहा था : “नहीं-नहीं! वह खा जाएगा उसके पास मत जाना।” पर दूसरा भागने की जिद्द कर रहा था : “ऐसा कुछ नहीं होगा। उसके साथ क्या शानदार अनुभव हुआ था। कितना महिमामय लग रहा था। मैं उससे फिर मिलूंगा।” कृपया यह स्पष्ट समझ लें कि जब तक आपके अन्दर प्रबोधन नहीं होता आप किसी प्रबुद्ध स्वामी से मिलना भी नहीं चाहेंगे। यदि हम इतने परिपक्व या प्रबुद्ध

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Content: नहीं है कि अपने भीतर प्रबोधन महसूस कर सकें, तो हम प्रबुद्ध व्यक्तियों से कतई भी संपर्क रखना नहीं चाहेंगे। इस शहर में लाखों लोग रहते हैं - उनमें से कुछ सौ ही लोग यहां बैठे यह भाषण सुनने क्यों आए हैं? कुछ हज़ार तो एक बार सुनने यहां आए थे, फिर लौटके नहीं आए। सिर्फ कुछ सौ ही यहां नियमित रूप से क्यों आते हैं? जब आपके मन में किसी प्रबुद्ध व्यक्ति के लिए आकर्षण पैदा हो, तो समझ लीजिए कि आपके अंदर प्रबोधन जागृत होकर विकसित होने लगा है। यही कारण था कि वह सिंह शावक उस शेर के प्रति आकर्षण महसूस करने लगा था। उसके अंदर एक अद्भय इच्छा पैदा हुई उस शेर से मिलने की। अंततः उसने तय किया कि वह उस शेर से ज़रूर मिलेगा? पर कैसे जाए और कहां जाए? उस शेर ने कोई संदेश तो नहीं भेजा था कि फलां-फलां जगह पर फलां समय मिलेंगे - वहां मेरी कोई जगह है। वह सिंह शावक जो भेड़ रूप में पला बढ़ा था जंगल के किनारे तक पहुंचा और बड़ी उम्मीद से वहां प्रतीक्षा करने लगा कि वह शेर दिखाई पड़े। कुछ महीनों बाद वह शेर वहां आया। जैसे ही वह सिंह शावक ने उस शेर को देखा, तो उसका भय फिर जागृत हो गया और वह फिर दुविधा में पड़ गया-यद्यपि वह महीनों से उस शेर का इंतज़ार कर रहा था। इस बार वह शेर स्वयं उस सिंह शावक के पास आया और कहा : "कहां? कैसे हो?" वह सिंह शावक घबड़ा गया : "मैं...मैं...!" वह उत्तर तो नहीं पाया पर पहले की तरह वापस भागा भी नहीं। शेर ने कहा : "चिंता न कर। यदि तुझे मुझ से डर लगता है, तो मैं चला जाता हूं। मैं तुझे खाऊंगा नहीं, इसलिए मारूंगा भी नहीं। यहां रहके भी क्या करूंगा!" यह कहकर वह वापस जाने लगा। तभी उस सिंह शावक ने प्रार्थना की कि वह थोड़ी देर और उसके साथ रहे। साथ में यह भी कह दिया : "आप यहीं रहें पर मेरे पास न आएं। दूर खड़े होकर बात कर सकते हैं। कम से कम दस फीट दूर रहें और बात करें- मेरे साथ कुछ समय तक रहें।" सिंह शावक न उस शेर से दूर जाना चाहता था, न उसकी उसके पास खड़े होने की हिम्मत थी। यह दुविधा उस आध्यात्मिक साधक की थी जिसमें ज्ञान वृद्धि शुरू हो चुकी हो। इस प्रकार वे 10-15 फीट दूर खड़े रहकर बात करने लगे। वह शेर बार-बार उस शावक को समझा रहा था : "अरे तू तो शेर है। यदि तू स्वयं को भेड़ समझता है, तो तू बड़ा मूर्ख है। तू ऐसा कतई नहीं है जिनके साथ तू रहता है। अरे! तुझे ऐसे तो रहना नहीं चाहिए!" अब वह सिंह शावक उस शेर की बात पर विचार करने को बाध्य हो गया। धीरे-धीरे उसके मन का भय खत्म होने लगा कि वह उसे जंगल में ले जाकर खाना चाहता है। उसको लगा कि शेर का कोई बुरा मंतव्य नहीं है। यह भी समझ में आया कि इस कोशिश में उस शेर का कोई स्वार्थ निहित नहीं है। "मैं उसको क्या दे सकता हूं? मेरे पास होने से उसे तो कुछ नहीं मिलने वाला।" जिस समय साधक के मन में यह विश्वास जगने लगता है, वह अपने स्वामी की बात पर भरोसा करने लगता है। इसलिए वैदिक परंपरा में आध्यात्मिक ज्ञान पर कोई बन्धन नहीं है। इसे कोई भी प्राप्त कर सकता है, बशर्ते कि वह साधक अपने स्वामी को कोई व्यक्तिगत लाभ देने की स्थिति में न हो। उसे लगे कि उसके साथ में स्वामी को कोई लाभ नहीं होगा, तभी वह अपने गुरु से ज्ञान लेने की संभावना के प्रति आश्वस्त हो जाता है। स्वामी के निःस्वार्थ भाव से ज्ञान देने की संभावना तब ही शुरू होता है, जब साधक अपने स्वार्थों को लाभ से जोड़ लेगा। यह भरोसा तब ही शुरू होता है, जब साधक स्वामी को निःस्वार्थ भाव से ज्ञान देना चाहता है क्योंकि उसके मन में करुणा का अथाह सागर है-यह उफन रहा है। उसका ऐसा करना हमारे ही भले के लिए है, स्वामी का कोई प्रयोजन इससे सिद्ध नहीं होता। जब यह भाव साधक के मन में आ जाता है, तो वह अपने स्वामी के शब्दों पर भरोसा करने लगता है। यह विश्वास उस सिंह शावक के मन में उस शेर के लिए अंकुरित होने लगा था। "यह न मुझे मारेगा न खाएगा। यदि ऐसा करना इसकी मंशा होती तो यह कभी का कर चुका होता-बहुत मौके थे। तो यह बात स्पष्ट है कि इससे मुझसे कोई निजी लाभ तो पहुंचेगा नहीं। तब यह बार-बार यही क्यों कहे जा रहा है कि मैं एक शेर हूं, शेर का बच्चा हूं!" तब वह सिंह शावक उस शेर की बात पर गहराई से विचार करने लगा। जब हम आश्वस्त हो जाते हैं कि स्वामी हमसे कुछ स्वार्थ के वशीभूत होकर नहीं कह रहा है, वह तो अपने आनन्द में यह ज्ञान हमें देना चाहता है, हम ज्यादा गहराई से उस अनजान पथ पर चलने को उत्सुक होने लगते हैं तथा कई प्रायोगिक अनुभव प्राप्त करने को आतुर होने लगते हैं। जब तक हमें अपने भले होने की आश्वस्ति न हो, हम ऐसा कोई जोखिम उठाना भी नहीं चाहते। सिंह शावक सोचने लगा : "यह कितना साहसी, शानदार और बहादुर प्रतीत होता है, कितना आत्मविश्वास से परिपूर्ण है। यह तो कतई नहीं लगता कि यह झूठ बोल रहा है या फरेब कर रहा है।" कोई व्यक्ति झूठ बोल रहा है, यह हम उसकी आंखों में देखकर पता लगा सकते हैं। वह सिंह शावक भी मानने लगा : "यह झूठ तो नहीं बोल रहा है। पर यह बार-बार क्यों कह रहा है कि मैं शेर हूं-शेर का बच्चा हूं जबकि हूं तो मैं एक भेड़ ही।"

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Content: शेर ने तब कहा : “शायद तुम मेरा विश्वास नहीं करना चाहते। खैर! मैं भी अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहता। मैं जा रहा हूं!” लेकिन वह सिंह शावक रूपी भेड़ निहोरे करने लगा। “न...नहीं...नहीं! कृपया कम से कम आगे मिलने का समय (अपॉइंटमेन्ट) तो तय कर लीजिए!” तब शेर ने झुंझलाते हुए कहा : “मुलाकात? किसलिए?” सिंह शावक बोला : “मैं घर जाकर आपने जो मेरे बारे में कहा है, उस पर विचार करूंगा। फिर मैं अपने संदेहों के निवारण हेतु आपके पास आऊंगा।” वह शेर मान गया। “ठीक है, एक महीने बाद यहीं और इसी समय हमारी मुलाकात हो सकती है।” उधर वह सिंह शावक विचार करने लगा : “मैं शेर कैसे हो सकता हूं? मैं भेड़ हूं। मैं घास खाता हूं। मिमिया भी सकता हूं और भेड़ों के साथ रह सकता हूं। तो मैं शेर के से हो सकता हूं?” वह ऐसे विचार करता रहा। इस प्रक्रिया में उन सब दार्शनिक विचारों एवम् दुविधाओं को भी मथता रहा, जिनका इन दिनों मैं उत्तर देने का प्रयास कर रहा हूं! मेरे विचार से ‘भेड़-दर्शन’ पर भी कोई पुस्तक प्रकाशित होनी चाहिए।...या ‘भेड़ बाइबिल!’ ... ‘भेड़-गीता!’ ही सकता है तब रही हो और उस भेड़ रूपी सिंह शावक ने उनका गहन अध्ययन किया हो। उसके दिमाग में कई प्रश्न उभरे जिनकी उसने एक लिस्ट बना ली। महीना बीतते-बीतते यह लिस्ट काफी बड़ी हो गई। जिसमें ऐसे कई सवाल थे, जिनका उसके (पालने-वाले) मां-बाप उत्तर नहीं दे सके थे। हो- इस बीच में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी था कि उसने अपनी भेड़-मां को कभी इस शेर से मुलाकात के बारे में कोई ज़िक्र नहीं किया था। उसे मालूम था कि यदि उसकी मां को मालूम हो गया तो वह शेर से मिलने नहीं देगी। वह तो फिर जंगल के सिरे तक ही न जाने देगी। “कभी उधर न जाना, इधर ही रहना। जंगल में डरते रहना गोली मारना भी तो सीखना यहां वह कहती! मां-बाप सदा अपने बच्चों की सुरक्षा के बारे में चिंतित रहते हैं। वे अपने बच्चों को मंदिर तो जाने देते हैं, पर किसी स्वामी के पास कभी नहीं जाने देते-आध्यात्मिक क्षेत्र में तो उनकी प्रवेश वर्जित ही रखते हैं। उनको सदा यह क्षेत्र खतरनाक लगता है। देखिए, स्वामी विवेकानन्द तभी तक महान है जब वह पढ़ोसी के घर पैदा हो, अपने घर में नहीं। खैर! एक महीना बीता और मुलाकात की घड़ी करीब आने लगी। उस भेड़ रूपी सिंह शावक ने बढ़िया हरि वास एकत्रित को, उस शेर को भेंट करने के लिए। मिलने पर यह भेंट देते हुए उसने कहा : “कृपया इसे स्वीकार करें - यह मैंने ख़ास तौर पर आपके लिए तैयार की है।” सिंह शावक का यह प्रेम भाव

Content: देखकर उस शेर ने भी ऐसा नाटक किया मानो वह उस घास को खाने में बड़ा आनन्द प्राप्त कर रहा है। उसका यह प्रयास सिंह शावक से भावनात्मक रूप से गहराई से जुड़ने के लिए था। धीरे-धीरे वह आपस का फर्क मिटाना चाहता था। वह चाहता था कि सिंह शावक उसके साथ पूरी तरह सहज और सुरक्षित महसूस करें। तब ही तो बदलाव की संभावना बनेगी। स्वाभाविक था कि सिंह शावक उस शेर से पूछता : “आपको यह घास अच्छी लगी? क्या यह स्वादिष्ट है?” शेर ने कहा : “बहुत! तुमने इसे बढ़िया तरह तैयार किया है। वाह!” सिंह शावक तारीफ़ सुनकर खुश हो गया। घास की भेंट स्वीकार करने के पश्चात् धीरे-धीरे शेर सिंह शावक से वही बातें कहने लगा, जो उसने पहले कभी थी : “मैं तुम से बार-बार कहता हूं- पर तुम समझ ही नहीं रहें। तुम शेर हो-भेड़ नहीं!” अब तक सिंह शावक को यह समझ में आने लगा था कि उसका अपने बारे में विचार सही नहीं था। पर शेर की बात वह सहज रूप से स्वीकार अब भी नहीं कर पा रहा था। मैं शेर कैसे हो सकता हूं? क्या वाकई मैं भेड़ नहीं हूं?” अब उसने तर्क से काम लिया :“मेरा रंग भी भेड़ों से अलग है। यदि मैं भेड़ जैसा होता, तो उनके जैसा ही होना चाहिए था। वैसे भी मैं इस जीवन से संतुष्ट नहीं हूं। इसका स्पष्ट संकेत है कि मैं कुछ और हूं।” पर यह समझना मुश्किल है कि मैं भी शेर हूं!” पर अभी भी उसे अपने तर्क-विश्लेषण पर भरोसा नहीं हो पा रहा था। एक दिन शेर ने उसको सुझाव दिया : “चलो... हम पास वाली झील तक चलें और वहां पिकनिक मनाएं।” अब तक वह सिंह शावक उस शेर से काफी हिलमिल गया था। वह राजी हो गया, जैसे ही वह झील के पास पहुंचे, शेर ने उस सिंह शावक की गर्दन पकड़ी और उसे पानी की तरफ घसीटने लगा। “पानी पर अपने प्रतिबिम्ब को देख!” “देख तू बिलकुल शेर जैसा ही लग रहा है न।” सिंह शावक ने उत्तर दिया : “हां मैं तो आपका प्रतिबिम्ब देख रहा हूं!” शेर ने कहा : “दूसरा प्रतिबिम्ब नज़र नहीं आ रहा।” सिंह शावक ने कहा : “हां है, तो एक छोटे से शेर का-आपका बच्चा होगा। परन्तु वह है कहां? वह दिखाई तो नहीं पड़ता, लेकिन उसका प्रतिबिम्ब तो स्पष्ट है। कहीं वह पानी में तो नहीं छिपा है?” वह शेर दहाड़ा : “मूर्ख! वह तू है!” सिंह शावक इस बात को मानने को राजी नहीं हुआ। बोला : “नहीं-नहीं! यह तुम्हारा बच्चा है -पानी में छिपा है कहां। उसे बाहर बुलाओ!” शेर फिर दहाड़ा : “अरे मूर्ख! यह तू ही हे! मेरा बच्चा नहीं!”

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Content: फिर बोला : "देख! मैं जा रहा हूँ-अब इसमें सिर्फ़ तू ही दिखाई पड़ेगा, मैं नहीं।" अब उस सिंह शावक ने पानी की सतह पर देखा। उसे पहला झटका लगा : "अरे शायद शेर की बात ही सच है!" पर वह फिर भयग्रस्त हो गया : "अगर मैं शेर हूँ, तो मुझे जंगल में ही रहना चाहिए! पर यह मैं कैसे कहूँ? मैं तो भेड़ हूँ... यहीं हूँ, आराम से हूँ, मैं अपने सब भेड़ मित्रों से परिचित हूँ। मुझे नियमित भोजन मिलता है। यहां खाने-पीने इत्यादि की पूरी सुविधा है-मुझे मालूम है कि क्या कहां करना है। मैं अपना घर भी पहचानता हूँ - अपनी पत्नी को भी। यही मेरा असली जीवन-क्षेत्र है। मुझे यहां की सारी स्थितियां मालूम हैं। मैं इसी जीवनयापन का अभ्यस्त हो चुका हूँ। भेड़ के जीवन में भी काफ़ी सुख हैं; लेकिन याद मैं स्वयं को शेर समझूं, ता यह सब छोड़ना पड़ेगा। मुझे यहां से लम्बी छलांग लगानी पड़ेगी। काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।" फिर भय हावी हो गया और वह सिंह शावक भाग खड़ा हुआ। एक बार फिर भाग गया। प्रथम अनुभव कुछ महीनों बाद वह शेर फिर उसी भेड़ रुपी सिंह शावक की खोज में आया।। इस बार सिंह शावक ने उसे मुलायम हरी घास का तोहफ़ा नहीं दिया। पर वह शेर उस सिंह शावक के लिए एक ताज़ा मांस का टुकड़ा लाया था। उसने सिंह शावक को देखकर कोई बात नहीं की। इस बार उनके मध्य न कोई शास्त्रीय विचार-विमर्श हुआ, न कोई दार्शनिक वाद-विवाद। शेर ने सीधे-साधे उस सिंह शावक का मुंह खोला और मांस का टुकड़ा अन्दर रख दिया। जैसे ही सिंह शावक को मांस और खून का स्वाद मिला। उसके अन्दर एक उथल-पुथल मच गयी। उसके पूरे अस्तित्व को एक झटका लगा। उसकी चेतना मानो जागृत हो गयी और वह चुपचाप मांस को गटकने लगा। मांस निगलकर वह अचानक दहाड़ने लगा। यह दहाड़ ही वह है जिसे हम प्रबोधन कहते हैं। सिंह शावक को समझ में आ गया कि वह तो पैदाइशी एक शेर ही है - पहले दिन से ही। यही सब हमारे जीवन में भी घटित होता है। बार-बार हम सब यही समझते हैं कि हम एक भेड़ हैं। कभी-कभी हमें शक होता है : "मैं जीवन में संतुष्ट क्यों नहीं हूँ? क्या हो रहा है?" कुछ समय पश्चात् हम एक शेर को देखते हैं, जो हमें बताता है : "तुम महामहिम ईश्वर स्वयं ही हो। तुम ऊर्जा हो, चेतना हो।" परन्तु हम डरकर भाग जाते हैं। घर जाकर फिर उस पर विचार करते हैं

Content: "ज़रूर इस शेर की कोई चाल है। शायद यह एक आश्रम बनाना चाहता है और इस राय के लिए मुझसे रहा है। इसलिए यह मेरी तारीफ़ करता रहता है।" पर कुछ समय बाद हमें मालूम होता है कि उसके पास तो एक आश्रम पहले से ही है। आश्रम को बनाने के लिए उसे कोई ज़रूरत नहीं-हमारी या किसी और की। उसके पास वो सब कुछ है। उसे कोई सहायता नहीं चाहिए। फिर हम धीरे-धीरे तर्क-विश्लेषण में पड़ जाते हैं : "यह रोज़ आकर यही बात क्यों कहता है। रोज़ दो-तीन घंटे के ज़ोर से यही बात बनता रहता है।" कुछ देर सब हम सोचने लगते हैं : "एक चीज़ तो निश्चित है। मैं अपने बारे में जो कुछ भी समझता हूँ, वह सही नहीं है।" पर यह भरोसा नहीं होता कि जो कुछ वह बार-बार दुहराता है, वह सही है कि नहीं। पता नहीं क्या सच है।" ध्यान लगाने पर चेतना की अपनी समझ मिलती है। पर जब वह आकर मिलती है, तो हम डरकर भाग खड़े होते हैं "नहीं-नहीं यह सब मेरे लिए नहीं है।" पर वह सत्य बार-बार चमकता है, तो मन होता है कि "सब छोड़कर उसके पीछे जाऊँ।" यह वह स्थिति है जब हमारे प्रबुद्ध स्वामी की नज़र हम पर पड़ती है और वह ठोस आध्यात्मिक सत्य का एक (मांस का) टुकड़ा हमारे अनुभव (मुंह) में डाल देते हैं। तब हमारी चेतना में एक गहन विवोचन होता है। हमारा अस्तित्व चेतन होता है। हमारी आंखें चमकने लगती हैं और हम उस अनुभव में दहाड़ने लगते हैं। तब हमें भासित होता है कि हम तो शुरू से ही शेर थे और ऐसे ही सदा रहे हैं। यानी वह भेड़ रुपी सिंह शावक सदैव ही एक सिंह था। परन्तु इस अनुभव को प्राप्त करने के लिए हर सिंह शावक को एक शेर का सान्निध्य चाहिए। अस्तित्व में आने के प्रथम दिन से ही हम 'क्षेत्रज्ञ' या 'क्षेत्र के जानकार' होते हैं अर्थात् चेतना की मति। परन्तु अपनी गलतफहमी के कारण हम स्वयं को शरीरी-मन ही समझते रहते हैं। अचानक एक व्यक्ति जो समझ चुका है कि वह चेतना है; क्षेत्रज्ञ है-तथा इसका अनुभव उसे हो चुका है-यह कहते हुए हमारा मार्गदर्शन करता है, "यह चेतना है और यह शरीर-मन! यह समझो कि तुम चेतना हो।" यही कहानी यहां कृष्ण और अर्जुन के मध्य दुहराई जा रही है। कृष्ण बताते हैं कि क्या क्षेत्र है और कौन क्षेत्रज्ञ है। वह अर्जुन को बताते हैं कि वह भेड़ नहीं वरन शेर है; वह मात्र क्षेत्र नहीं वरन क्षेत्रज्ञ है।

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Chapter Number: 13

Content: 13.4 वह क्षेत्र जो और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है और जिस कारण से जो हुआ है; तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जैसे प्रभाव वाला है-वह सब संक्षेप में मुझ से सुन।

Chapter Number: 13

Content: 13.5 यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का तत्व ऋषियों द्वारा बहुत प्रकार से कहा गया है और विविध वेद मंत्रों द्वारा भी विभागपूर्वक कहा गया है तथा भलीभांति निश्चय किए गए युक्ति युत ब्रह्म सूत्र के पदों द्वारा भी कहा गया है।

Chapter Number: 13

Content: 13.6,7 पंच महाभूत (क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर) अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति भी; तथा दस इन्द्रियाँ, एक मन और पांच इन्द्रियों के विषय-शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध तथा इच्छा, द्वेष, सुख-दुःख, स्थूल देह का पिण्ड, चेतना और धृति-इस प्रकार विकारों के साथ यह क्षेत्र संक्षेप में कहा गया है।

Content: चेतना और अंतःकरण

Content: अंतःकरण कष्ट देता है

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Content: का औचित्य हमारे सामने स्पष्ट न हो, न हम पूर्णता से कोई काम कर पाएंगे, न पूरी एकाग्रता या निष्ठा से उसको अंजाम देंगे। कृष्ण कहते हैं कि अंतःकरण का जड़ रूप सारे नियम बनाते हैं, जो क्षेत्र कहे जाते हैं। वे पदार्थ की बात करते हैं, ऊर्जा की नहीं। वे आपके अस्तित्व का हिस्सा नहीं होते - वे आप ही होते हैं। यहां जिसका उल्लेख किया जा रहा है, वह आपके बारे में नहीं। जिस समय समझ में यह आ जाता है कि हम क्या नहीं हैं, हमारी मुक्ति का द्वार खुलने लगता है। यदि हम अपने शरीर-मन के अनुसार जीते हैं, तो हमें जान लेना चाहिए कि हम शरीर-मन नहीं हैं। यह ज्ञान हमें शरीर-मन की दासता से मुक्ति प्रदान करता है। दासता का मूल अर्थ है वह काम करने को बाध्य होना, जो आप कतई करना नहीं चाहते। वह जो आपकी रुचि के विरुद्ध है। परंत (चेतना की) जागरूकता में यदि आप मन-शरीर के साथ जीते हैं, तब भी आप दास नहीं रहते। अब मैं आपको एक यूनानी ऋषि डायोजेनीज के बारे में एक लघु कथा सुनाता हूं :

Content: डायोजेनीज एक प्रबुद्ध स्वामी थे। कुछ लोगों ने उनके विरुद्ध षड्यंत्र करके उन पर आक्रमण कर दिया। परंतु जैसा उन लोगों ने सोचा था, डायोजेनीज ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। वे लोग तो इसके लिए भी तैयार थे कि उन्हें पकड़ लेंगे। फिर भी ऋषि को कोई प्रतिरोध नहीं किया। डायोजेनीज की शून्य प्रतिक्रिया पर लोगों को बड़ा ताज्जुब हुआ। डायोजेनीज ने बड़े सहज भाव से उन आक्रमणकारियों से पूछा - "तुम लोग क्या चाहते हो?" उन्होंने प्रश्न एक स्वामी की भांति ही पूछा। आक्रमणकारी सकते थे। अंततः उनमें से एक ने बताया - "हम आपको पकड़कर ले जाते हैं और गुलामों के बाज़ार में बेच देना चाहते थे।" डायोजेनीज ने कहा - "अरे! मुझे यह बात पहले ही बता देते। फालतू इस काम के लिए योजना बनाने और चर्चा करने में तुम लोगों ने समय बर्बाद किया। आओ! मेरे हाथों पर हथकड़ी लगा दो। लाओ उन्हें! कहां हैं हथकड़ियां?" अब तो आक्रमणकारी बिल्कुल अवाक रह गए। पहली बार उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति स्वयं को हथकड़ियों में जकड़ने को स्वयं ही आदेश दे रहा है। डायोजेनीज का कहना बिल्कुल मालिकाना ही रहा - तब भी जब स्वयं को हथकड़ी लगाने को कह रहा था। कुछ समय बाद वे आक्रमणकारी हथकड़ी लेकर आए - एक ओर से उस ऋषि की कलाइयों को जकड़कर दूसरी ओर ताले को बंद कर दिया और रस्सी अपने हाथ में रखी।

Content: श्रीमदभगवत गीता 56

Content: डायोजेनीज ने तब कहा - "अरे मूर्खों! यह बंधन क्या बांध रहे हो? क्या मुझ पर भरोसा नहीं है? मैंने तो स्वयं ही हथकड़ी लगाने को कहा था न! अब मुझ पर हथकड़ी लगाने की क्या जरूरत है?" और बेचना चाहते हो। लेकिन एक बात याद रखना, मुझको छोड़कर भाग मत जाना।" अब उस ऋषि को पकड़ने वाले थोड़े भयभीत होने लगे। उनकी समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। वे अपने आपको बहुत हीन और असहाय महसूस करने लगे। डायोजेनीज ने कहा - "अरे मूर्खों! मुझे मुक्ति की तरकीब आती है। स्वतंत्रता के मूल नियमों से भी मैं वाकिफ हूं। मैं लगातार अनन्त रूप से आंतरिक स्वतंत्रता भोगता रहता हूं। मुझे कोई बंध नहीं सकता। अपनी पूरी कोशिश करके देख लो - देखेंगे क्या होता है?" यह कहकर वह एक शाहना शान के साथ सड़क पर टहलने लगा। उसके गिरफ्तार करने वाले उसके पीछे ऐसे चलने लगे मानो वे उसके दास हो। उस ऋषि ने सड़क पर रोचकता से यह तमाशा देखने वालों को बताया - "ये सब मेरे दास हैं क्योंकि यह मुझे छोड़कर नहीं जा सकते।" पर वे लोग गर्जकर बोले - "दास तो यह ऋषि डायोजेनीज है!" ऋषि ने उत्तर दिया - "देखो! यदि तुम मुझे छोड़कर गए, तो मैं भाग जाऊंगा। इसलिए मैं स्वयं तुम से जाने की कह रहा हूं। क्या तुम भाग सकते हो? मैं तुम्हें इस बंधन से स्वतंत्र करता हूं - भाग जाओ।" वह बोलता रहा - "पर तुम लोग नहीं जाओगे - क्योंकि तुम्हें मुझसे कुछ चाहिए। इसलिए तुम मेरे दास बन गए हो। पर मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए - इसलिए मैं स्वामी हूं - पूर्णतः मुक्त! तुम्हारे हथकड़ियां लगी नहीं हैं, पर तुम्हारी मानसिकता दास वाली है। दासता का संबंध तुम्हारे होने के ढंग से है। तुम्हारे शरीर से नहीं।" वे उसे बाज़ार ले आए - वह ऋषि पूरी ठसक से उस चबूतरे पर चढ़ गया, जहां बिकने वाले दास रखे जाते हैं। नीलामी शुरू हुई। नीलामी करने वाले ने कहा - "यहां एक दास है बिकने को - जो सबसे अधिक दाम लगाएगा, वह उसे खरीद लेगा।"

Content: डायोजेनीज ने तुरंत रोका - "चुप रहो! यह मत कहो यहां एक दास है बिकने को। कहो यहां एक स्वामी है - यदि किसी में ताकत हो तो वह इस स्वामी को खरीद ले।" अब स्वामी को खरीदने की किसी की हिम्मत ही नहीं हुई। उस ऋषि को कोई खरीदार ही नहीं सका। तीन दिन बीत गए। उस ऋषि को गिरफ्तार करने वालों पर उसके खाने-पिलाने का बोझ भी हावी रहा। उन्हें लगा कि इस स्वामी को तो कोई खरीदेगा ही नहीं। "लेकिन यदि हम यहीं बैठे रहें, तो कहां ये हमें न बेच दे। इसका कोई

Content: श्रीमदभगवत गीता 57

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Content: भरोसा नहीं - यह कुछ भी कर सकता है।'' अंततः उन्हें डायोजेनीज को मुक्त करने को बाध्य होना पड़ा। यह एक कहानी तो है, पर एक सत्य प्रकट करती है कि यदि हम यह समझ लें कि हम शरीर-मन ही नहीं हैं, तो हम किसी के गुलाम नहीं हो सकते। गुलामी चाहे कैसी भी हो, हमें नहीं जकड़ सकती। दासत्व तभी प्रभावी होगा जब हम उसकी सत्ता मानें। हम दासता के साथ कोई समझौता ही नहीं करेंगे। यह बारीक सत्य समझ लें। जब हम समझते हैं कि हम शरीर-मन के परे हैं, तो दासत्व में न बंधने के लिए हमें कोई प्रयास करने की आवश्यकता ही नहीं होती, क्योंकि हमें मालूम होता है कि हम अबंधनीय हैं, सर्वदा मुक्त हैं। इसी तथ्य को स्पष्ट करने के लिए शारीर-मन का भेद बताकर चेतना, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का अंतर स्पष्ट बताना चाहते हैं। प्राचीन काल में मनुष्य को शारीरिक रूप से ही दास बनाने का विधान था। परंतु आधुनिक युग में व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक रूप से दास बनाया जाता है। यह समझ लें कि अपने माहौल से प्राप्त करने वाले कई आकर्षणों के हम गुलाम होते हैं। यह वह चाहते होते हैं जो हम - जैसा कि मैं पहले बता चुका हूँ - दूसरों से उधार लेते हैं। वे वह कामनाएं नहीं होती, जिनके साथ हम पैदा होते हैं। जब कोई उत्पाद टीवी पर विज्ञापित किया जाता है, तो वह हमारे दिमाग में जम जाता है और कुछ ही दिनों में किसी-न-किसी बहाने से हम वह वस्तु खरीद लाते हैं। यह हमारा मनोवैज्ञानिक दासता का विश्व है। लेकिन जब हम यह समझ जाएं कि हम शरीर-मन के परे हैं, हम हर प्रकार की शारीरिक या मानसिक, मनोवैज्ञानिक दासता से अदृश्य रहेंगे। जब हम किसी वस्तु को प्राप्त करने या किसी घटना के घटित होने के लिए अतीव लालायित रहते हैं, तो हम उस वस्तु या घटना के 'क़ब्ज़े' में अपनी प्रसन्नता क़ैद कर देते हैं। जब हमारी इच्छापूर्ति नहीं होती, तो हम अवसाद में डूबने लगते हैं। हमें लगता है मानों सारी दुनिया हमारे विरुद्ध हो गई है। कई लोग मुझसे पूछते हैं - ''ईश्वर हमारे प्रति इतना अन्यायी क्यों है? केवल मैं ही क्यों इतनी समस्याएं झेलता रहता हूँ?'' पर जैसे ही हमने अपनी प्रसन्नता किसी वस्तु या व्यक्ति के हाथों में बंद की, हम उनके गुलाम हो जाते हैं। वे दोनों आपका मनचाहा शोषण कर सकते हैं। एक बात और - स्वतंत्र रहने की चाह का विचार मात्र भी हमारा शोषण कर सकते हैं, यदि हम उसे छूट दें। कई बार हम आध्यात्मिक खोज के आवरण में स्वतंत्रता को दुंधते रहते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि स्वतंत्रता हमें तभी मिलेगी, जब हम यह महसूस कर सकें कि हमें ऐसी किसी खोज की दरकार

Content: श्रीमद्भगवत गीता 58

Content: नहीं हैं। स्वतंत्रता की चाह को हमें वैसे ही त्यागना चाहिए और मुक्ति कामना पर भरोसा रखना चाहिए, तभी हम इसके (मुक्ति या स्वतंत्रता को) प्राप्त कर सकते हैं। नहीं तो स्वतंत्रता की चाह मात्र भी हमें गुलाम बना सकती है। जब हमें लगने लगेगा कि हम तो मुक्त हैं, तब इस प्रकार के संघर्ष की कर्मता हमारे सामने स्वयं सिद्ध होने लगेगी। जिस क्षण हम अपनी प्राप्ति से संतुष्ट होने लगते हैं, हम एक सहज प्रवाह में पड़ जाते हैं और फिर कोई प्रतिरोध नहीं करते। फिर हम किसी वस्तु, व्यक्ति या घटना को अपने पर हावी नहीं होने देते। तब हमें कोई गुलाम नहीं बना सकता। तभी हमें मुक्ति की चेतना का अनुभव होगा।

Content: श्रीमद्भगवत गीता 59

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Chapter Name: आंतरिक विज्ञान-प्रौद्योगिकी

Content: 13.8-12 श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, किसी भी प्राणी को किसी प्रकार न सताना, क्षमा भाव तथा मन-वाणी की सरलता, श्रद्धा-भक्ति सहित गुरु की सेवा, बाहर-भीतर शुद्धि, अंतःकरण की सस्थिरता, मन और इन्द्रिय सहित शरीर का निग्रह; इस लोक और परलोक के सम्पूर्ण भोगों के आसक्ति का और अहंकार का अभाव; जन्म-मृत्यु, जरा और रोगादि में दु:ख-दोषों का बार-बार विचार करना, आसक्ति का अभाव; पुत्र-स्त्री - घर-धन आदि में समता न होना, प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा चित्त का सम रहना; मुझ (परमेश्वर) में एकीभाव से स्थित रूप ध्यान योग द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति (जो केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर को ही अपना स्वामी मानती है) तथा एकांत और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना; अध्यात्म में नित्य स्थिति और तत्त्व ज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा को ही देखना - यह सब ज्ञान है और जो उसके विपरीत है वह अज्ञान है - ऐसा कहा गया है (या मैं कहता हूँ)। इन पांच श्लोकों में कृष्ण एक श्रेष्ठ युक्ति बताते हैं। अभी तक तो वह हमें बौद्धिक समझ प्रदान कर रहे थे, पर अब वह युक्ति और उसका ढंग समझाते हैं, जिससे हम वह अनुभूति महसूस कर सकें, जो वे हमें बताना चाहते हैं। मैं इन श्लोकों को आंतरिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी का उद्घाटन कहता हूँ, जिससे हमारा आंतरिक अवकाश भी मुक्त हो सके। यह विशेष तौर पर वह विशिष्ट युक्ति है, जिससे हम 'क्षेत्र' से मुक्त कर सकते हैं। इसके द्वारा हम मन-शरीर के बंधन से मुक्त होकर उन्हें अपने नियंत्रण में ला सकते हैं। पहली बात, जिस क्षण हम यह समझ लें कि हम शरीर-मन से अधिक शक्तिवान हैं, हम शरीर-मन को कैद से स्वतंत्र होने लगते हैं। यहाँ कृष्ण इस युक्ति को स्पष्ट कर बताते हैं कि कैसे हम शरीर-मन से मुक्त होकर चेतना का सही अनुभव कर सकते हैं। पहले मैं इन श्लोकों का सरल अनुवाद प्रस्तुत करता हूँ -

Content: 'श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, किसी भी प्राणी को किसी प्रकार से भी न सताना, क्षमा भाव तथा मन-वाणी की सरलता, श्रद्धा-भक्ति सहित गुरु की सेवा, बाहर-भीतर शुद्ध अंतःकरण की सस्थिरता, मन और इन्द्रिय सहित शरीर का निग्रह, इस लोक और परलोक के सम्पूर्ण भोगों में आसक्ति का और अहंकार का अभाव; जन्म-मृत्यु, जरा और रोगादि में दु:ख-दोषों का बार-बार विचार करना, आसक्ति का अभाव; पुत्र-स्त्री-कर-धन आदि में समता न होना; प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा चित्त का सम रहना, मुझ (परमेश्वर) में एकीभाव से स्थित रूप ध्यान योग द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति (जो केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर को ही अपना स्वामी मानती हो) तथा एकांत और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना; अध्यात्म में नित्य स्थिति और तत्त्व ज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा को ही देखना - यह सब ज्ञान है और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान है - ऐसा कहा गया है (या मैं कहता हूँ)। कृष्ण इन श्लोकों में कई वस्तुओं की एक लम्बी सूची बनाते हैं और कई निर्देश भी देते हैं। लेकिन मैं आपको स्पष्ट बता दूँ कि यदि इन निर्देशों का हम सीधे-सीधे पालन करने लगें, तो हम पागल हो जाएँगे। इन वस्तुओं पर एकदम अभ्यास करना संभव नहीं है। हम तो यही चाहते हैं कि किसी प्रकार हमें वह चेतना प्राप्त हो जो इन गुणों की चमक हम में पैदा करे। हम चाहते हैं कि यह गुण हम में सहज रूप में विकसित हो। उदाहरण के लिए, इस प्रक्रिया की एक तालाब से गंदगी निकालने की क्रिया से तुलना करें। यदि हम सीधे ही हाथ डालकर तालाब से गंदगी या कीचड़ निकालने का प्रयास करेंगे, तो हमें क्या मिलेगा - हम उस तालाब को और गंदा कर देंगे। वह गंदगी तो तलहट में बैठी है, सतह तक आ जाएगी, लेकिन अगर हम थोड़ा चुने का पाउडर तालाब पर छिड़क दें, तो यह चूना गंदगी को जज़्ब कर लेगा और तालाब का पानी स्वच्छ हो जाएगा। हमारा दिमाग भी गंदले तालाब की तरह ही होता है। यदि हम इसे दबाकर इससे जबरदस्ती करेंगे, तो समस्या बढ़ जाएगी। हमें थोड़ा ध्यान मिला दें - अर्थात् चूने का पाउडर छिड़क दें और चैन से बैठें, थोड़ी-सी जागरूकता पैदा कर दें और शांत रहें। सारी गंदगी स्वतः नीचे बैठने लगेगी। जैसे ही हम जागरूक हों और चेतना को कर्मशील होते देखें, तो गंदगी नीचे बैठेगी। चेतना को साक्षी भाव से निहारना वह प्रक्रिया है, जो हमारे अस्तित्व को शुद्ध करती है। प्रायः जब हम शास्त्र या पवित्र ग्रंथ पढ़ते हैं, तो उनके निर्देशों को सीधे-सीधे जीवन में उतारने का प्रयत्न करने लगते हैं। उदाहरणार्थ, एक निर्देश

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Content: है : "अपने पड़ोसी को वैसे ही प्यार करो, जैसे तुम स्वयं से करते हो।" इसका पूरा भाव समझे बिना यदि हम इसका पालन करना प्रारंभ कर दें, तो क्या होगा? पहली समस्या है हम यह नहीं समझते कि हम स्वयं को प्यार नहीं करते और हम यह भी नहीं समझते हैं कि जब तक हम स्वयं को प्यार नहीं करेंगे, हम किसी और को प्यार कर ही नहीं सकते। फिर हमारी मानसिकता या चेतना ऐसी होनी चाहिए, जिससे प्यार स्वतः रूप से स्फूर्त हो सके। फिर तो प्यार स्वतः ही प्रफुटित होगा। लेकिन जब हम किसी पर अपना प्यार थोपते हैं, तो वह एक व्यापार का रूप ले लेता है। वास्तव में हमें प्रेम का शुद्ध रूप ज्ञान ही नहीं होता; हम जो जानते हैं वह प्यार का विकृत रूप होता है। प्रेम का अर्थ सुरक्षा पाना या प्रतिदान में कुछ प्राप्त करना नहीं होता। शुद्ध रूप तो आपके अस्तित्व की असली अभिव्यक्ति है। यह तो अपने आप प्रकट होता है। यदि हम अपने प्रति सच्चे हैं, ईमानदार हैं, इतना ही बहुत है। हम इस भाव से सीधे मुक्ति पा सकते हैं। रामकृष्ण कहते हैं कि आंतरिक ईमानदारी आपके मुंह और दिमाग को जोड़ देती है और आप मुक्त हो जाते हैं। हम अपने को धोखा देते हैं, जब हम कोई काम इसलिए करते हैं कि समाज में हमारी बढ़ाई होगी, इसलिए नहीं कि हमारे अंतर्मन से हमें उस काम को करने की प्रेरणा प्राप्त होती है। समस्या तब शुरू होती है जब हमारे आंतरिक मन और बाहरी वातावरण में लगातार संघर्ष जारी रहता है। जब हम अंदर से कुछ और सोचते हैं तथा बाहर से कुछ और करते हैं, तो संघर्ष तो रहेगा ही। इस प्रकार बजाय हम अपनी चेतना जागृत करें, हम गतिविधियों को क्रियाशील करने लगते हैं। बजाय अपने अस्तित्व पर काम करें, हम अपने क्रियाकलापों को जागृत कर देते हैं। हमारा क्रियाकलाप इस क्षेत्र में कतई काम नहीं आएगा। हमारी चेतना या अस्तित्व ही काम आएगा। तो अपने 'होने' पर काम करें, अपनी 'करनी' के लिए नहीं। जो काम पर काम करता है, वह चाहे लगातार तराशता रहे कोई छवि नहीं उभरेगी और उसके अंतर्मन को कोई चैन नहीं मिलेगा, बल्कि संघर्ष, क्षत एवं दबाव ही बढ़ते रहेंगे। लेकिन जब हम अपने अस्तित्व या 'होने' पर काम करेंगे, तो हम प्रफुल्लित होकर सही ऊर्जा और सही चेतना का प्रस्फुटन कर सकेंगे। तुम अद्वितीय हो प्रायः हम अपने बारे में दूसरों के मन पर अधिक विश्वास करते हैं। हम मापन के उनके मापदंड को ही सही मानते हैं और इस प्रकार समस्या पैदा करते हैं। इसे मैं 'अपराध बोध' या 'गिल्ट' की संज्ञा देता हूं। अपराध बोध यानी अपने

Content: श्रीमद्भगवत गीता 62

Content: विगत के निर्णयों का पुनर्निरीक्षण आज की बुद्धिमत्ता द्वारा। जब भी हम अपनी आज के बुद्धि के स्तर से विगत के निर्णयों की समालोचना करेंगे, तो 'अपराध बोध' तो पैदा होगा ही। हम क्षण-प्रति-क्षण अपनी बुद्धिमत्ता को सुधारते रहते हैं। अतः जब हम आज की अक्ल से अपने पिछले निर्णयों को जांचेंगे, तो निश्चित ही हम पाएंगे कि कुछ काम हमने सही नहीं किए थे। उनको करना ही नहीं चाहिए था। समस्या तब गहरा जाती है, जब हम यह समझते हैं कि हर वस्तु के लिए हम ही ज़िम्मेदार हैं। यदि हम यह समझ सकें कि यह समस्त ब्रह्मांड विशुद्ध बुद्धिमत्ता से निर्देशित होता है, जो जानती है कि हमारे जीवन का कैसे ध्यान रखें, तो हम चैन से बैठ सकते हैं। जब हम इस ब्रह्मांडीय चेतना को निर्वाध रूप में अपना काम करने देते हैं, तो हम में स्वतः वे गुण जागृत हो जाते हैं, जिनको कृष्ण यहां गिनवाते हैं। कृष्ण पहले ज़िक्र करते हैं अपने को ऊंचा करने का। विनम्रता यानी अपने को नीचे गिराना। विनम्रता प्रयास से नहीं समझने की अर्थात् 'अमानित्व' को करने की कोशिश की जाएगी तो यह नहीं आती। यदि प्रयास द्वारा इसको प्राप्त है, जब हम महसूस करते हैं कि हर जीव अपनी जगह अद्वितीय है। जब यह बात हम पूरी गहराई से समझते हैं और स्वीकारते हैं, तो हम स्वाभाविक तौर पर हर एक का सम्मान करने लगेंगे। यह विनम्रता तब नहीं पैदा होगी, जब हम सबको बराबर मानेंगे। एक बात और समझ लें कि हमारे दुश्मन भी हमारी वृद्धि में अपना किसी-न-किसी रूप में योगदान ही सह। यहां सृष्टि में हमारी उपस्थिति देती ही है। प्रायः हम मन-ही-मन जांच-पड़ताल करते हैं कि कोई हमसे सम्मान पाने के योग्य भी है कि नहीं। इसके लिए हमारा एक अपना पैमाना होता है। हम देखेंगे कि वह व्यक्ति क्या विशेषताएं रखता है और समाज उसका कितना सम्मान करता है। फिर हम तय करते हैं - "ठीक है। यह हमारे थोड़े सम्मान का तो हकदार है।" तब हम समझते हैं कि हर जीव इस ब्रह्मांड में एक अद्वितीय अस्तित्व है तथा उसमें भी वही ईश्वर है जो हमारे भीतर है। यह विचार आते ही हमारे मन में उसके लिए विनम्र होने का भाव आता है और गर्व की ठसक दूर होने लगती है। यही कृष्ण स्पष्ट करते हैं। दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न : किसी सच्चे आध्यात्मिक गुरु के पास कैसे पहुंचा जाए या कैसे 'आचायोंपासना' की जाए। इस बारे में वह (कृष्ण) एक अन्य श्लोक में भी कहते हैं : 'तद् विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया'। इसका अर्थ है कि हमें स्वामी के निकट कुछ प्रश्नों के साथ पहुंचना चाहिए और

Content: श्रीमद्भगवत गीता 63

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Content: उनसे उनका उत्तर पाने की प्रार्थना करनी चाहिए। क्यों? कृष्ण ऐसा क्यों कहतें हैं? आवश्यकता क्या है? बार-बार आध्यात्मिक ग्रंथ गुरु के होने पर बल देते हैं। यह बात भगवत् गीता तक ही सीमित नहीं; जैन-बुद्ध धर्म, जैन धर्म, यहूदी धर्म, इस्लाम धर्म और ईसाई धर्म में भी स्वामी या गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका मानी गई है। क्यों? विशेष तौर पर ‘वेदांत’ में - वैदिक परंपरा में तो गुरु का बहुत महत्व है। क्यों है ऐसा? जब तक कि हम लगातार किसी को चेतनावस्था में रहते हुए, उसी चेतना को अभिव्यक्त करते हुए न देखते रहें, हमारी (सुप्त) चेतना यह मानने को तैयार ही नहीं होती कि ऐसा संभव है। इसी कारण हमारे हृदय और मस्तिष्क में एक अजस्र संघर्ष चलता रहता है। हमारी बुद्धि कहती है : “नहीं-नहीं-नहीं! यह सब सत्य है।” तार्किक रूप से तो हमें आवश्यकतें होती हैं, पर भावनात्मक रूप से इसको अनुभव करने की क्षमता नहीं होती। जब हम किसी सजीव गुरु को देखते हैं, हमारी भावनाएं स्वतः उनकी चेतना को अनुभव करने लगती हैं। पुस्तकों द्वारा यहीं बात हम शाब्दिक भाषा द्वारा सीखते हैं, जबकि गुरु के साथ हम उनकी शरीर-भाषा से इसे समझते हैं। वह इस सत्य को स्थापित करने का एक जिया-जागता उदाहरण हैं। वह सिद्ध करते हैं कि ये बातें हमारे जीवन में भी एक वास्तविकता बनकर उभर सकती हैं। वस्तुतः जब हम किसी प्रबुद्ध गुरु से मिलते हैं - पहली, हम अपनी आंखों से देख सकते हैं कि शाश्वत आनंद या आनन्दपूर्ण चेतना में चौबीसों घंटे रहा जाना संभव है, इससे हमें एक आश्वस्ति मिलती है और प्रेरणा भी प्राप्त होती है। यह प्राप्त करना हमें संभव लगने लगता है। लेकिन हम मन-ही-मन स्वयं से पूछते हैं : “ठीक है - गुरु के लिए यह संभव है, पर क्या यह मेरे लिए भी संभव हो सकता है?” इसकी आश्वस्ति हमें गुरु के पास पहुंच कर होती है। उधर, गुरु हमारे अंदर, यह देखकर कि “यदि मेरे लिए संभव है, तो तुम्हारे लिए क्यों नहीं”, एक विश्वास पैदा करवाता है। बीज के अंकुरित होने के लिए समर्पित है कि वह बाहर आए। उधर बीज इस प्रतीक्षा में बैठा है कि पहले पेड़ उगे तो। बीज सोचता है : “क्या पता कब पेड़ उगगा?” पेड़ कहता है : “अरे! अंकुरित तो हो बीज, तब ही तो मैं उगूंगा।” परंतु बीज पेड़ से कहता है : “पहले देख तो लूं कि तुम उग सकते हो कि नहीं, तभी मैं फूटूंगा।” हम सदा असुरक्षा और अनिश्चितता के कारण भयभीत रहते हैं। लेकिन गुरु से हमें यह आश्वासन मिलता है कि हम चैतन्य हो जाएंगे।

Content: एक लघु कथा

Content: एक पत्रकार एक अध्यक्ष के चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी से साक्षात्कार लेने गया। अपने भाषण में वह प्रत्याशी कह चुका था कि वह देख रहा है कि उसका भविष्य शानदार है। इस साक्षात्कार के दौरान पत्रकार ने उससे पूछा : “जब भविष्य शानदार है, तो आप इतने चिंतित क्यों लग रहे हैं?” प्रत्याशी का उत्तर था : “मेरी निश्चितता की कोई वारंटी नहीं है; मैं आशावादी तो हूं, पर यह कोई गारंटी नहीं है।” हम सब इन्हीं ऊहापोहों में फंसे रहते हैं। आशा तो रहती है कि हमें यह दिव्य अनुभव मिल जाएगा, पर साथ-ही-साथ इस जोखिम को उठाने में हमें डर भी लगता रहता है। गुरु तो पेड़ हो चुका है। वह शिष्य को आत्मविश्वास देता है। वह कहता है : “चिंता मत कर! तेरी तरह मैंने भी बहुत संघर्ष किया है। अब देख - मैं प्रफुल्लित हूं - मैं मरा नहीं। मैं अब पेड़ हो चुका हूं। यदि तू भी खुल सके (या तेरा बीज फूट सके) तो तू भी पेड़ बन जाएगा।” वह उसके साथ बैठकर उसका आत्मविश्वास दृढ़ करता है। वह उसमें ऊर्जा भरता है और पेड़ होने की क्षमता का विश्वास जगाता है। वह बार-बार कहता है : “जब मैं प्राप्त कर सकता हूं, तो तू क्यों नहीं प्राप्त कर सकता?” तीसरी बात, गुरु सही जगह और विधि (तकनीक) बताता है, जिसमें बीज के अंदर का पेड़ प्रस्फुटित हो सके। वह सही भूमि, स्थितियां, पानी-मिट्टी तैयार करवाता है। हमें तो मात्र गुरु पर भरोसा रखकर अपना प्रस्फुटन का मार्ग खोलना है। इसलिए गुरुगण आश्रम बनाते हैं। आश्रम वह जगह है, जहां यह प्रस्फुटन होता है। आश्रम एक ऑपरेशन थिएटर की भांति होता है, जहां बीज पेड़ बनता है और अपना अनुभव प्रकाशित करता है। आश्रम में स्थितियां नियत्रण में रहती हैं - वह एक सुरक्षित एवं पक्की जगह होती है, जहां हम अपनी चेतना को जागृत कर सकते हैं। गुरु हमें सत्य का अनुभव कराता है - वह सत्य जो हमारे अस्तित्व में शुरू से हमारे साथ रहता है। पहले वह हमें अपनी शरीर-भाषा से आश्वस्त करता है, फिर वह हमें विश्वास दिलाता है कि यह हमारे लिए भी संभव है। फिर वह जगह बनाता है, जहां यह सब हो सके। चौथी स्थिति, वह सुनिशचित करता है कि हम उस चेतना में प्रतिष्ठित रह सकें। यह सब गुरु के उत्तरदायित्व होते हैं। इसलिए वैदिक परंपरा में यह बार-बार कहा जाता है कि हम किसी सजीव गुरु के पास जाएं। इसे ही कृष्ण आचायौपदेसना कहते हैं। वह हमें आवश्यक मार्ग-निर्देश देते हैं, जिससे हम इस प्रौद्योगिकी के साथ कार्य कर सकें।

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Chapter Number: 13

Content: 13.13 वह जो जानने योग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानंद को प्राप्त होता है, उसको (मैं) भलीभाँति कहूँगा। वह अनादि परब्रह्म है न सत् है न असत् ।

Chapter Number: 13

Content: 13.14 वह सब ओर हाथ-पैर वाला और सब ओर नेत्र और सिर वाला एवं कान वाला है क्योंकि वही स्वयं संसार में सबको व्याप्त कर स्थित है।

Chapter Number: 13

Content: 13.15 वह सम्पूर्ण इंद्रियों के विषयों को जानने वाला है, परंतु वास्तव में सब इंद्रियों से रहित है; तथा आसक्त और निर्गुण होने पर भी अपनी योगमाया से सबको धारण करने वाला और गुणों को भोगने वाला है।

Chapter Number: 13

Content: 13.16 वह (परमात्मा) चराचर सब भूतों के बाहर-भीतर परिपूर्ण है और अचर रूप भी वही है। वह सूक्ष्म होने से अविज्ञेय ( न जाने जा सकने योग्य) तथा अति समीप और दूर भी वही स्थित है।

Chapter Number: 13

Content: 13.17 वह विभाग रहित एक रूप से आकाश सदृश परिपूर्ण होने पर भी चराचर संपूर्ण भूतों में विधि-विधानों से स्थित प्रतीत होता है। वह जानने योग्य परमात्मा (विष्णु रूप से), भूतों को धारण करने वाला (रुद्र रूप से), संहार करने वाला तथा (ब्रह्मा रूप से) सबको उत्पन्न करने वाला है।

Chapter Number: 13

Content: 13.18 वह ब्रह्म ज्योतियों की भी ज्योति एवं माया से अत्यंत परे कहा जाता है। वह परमात्मा बोध स्वरूप, जानने के योग्य एवं तत्त्व ज्ञान से प्राप्त करने योग्य है और सबके हृदय में विशेष रूप से स्थित है।

Content: कृष्ण कहते हैं : “अब मैं उस जानने योग्य के बारे में बताऊँगा, जिसको जानकर तुम्हें शाश्वत सत्ता (परमात्मा) की अनुभूति होगी, जो एक अनादि

Content: चेतना शाश्वत है

Content: वह अनादि चेतना है तथा इस भौतिक जगत् के कारण और प्रभाव से परे है। पिछले श्लोकों में कृष्ण उन गुणों की चर्चा करते हैं, जो अंतर्मन में दिव्य चेतना के प्रफुल्लित होते ही प्रकट होने लगते हैं। अब वे अर्जुन को बताते हैं कि यह चेतना शाश्वत है।

Content: हमारा मन किसी घटना के होने पर उनको देशकाल के परिप्रेक्ष्य में ही देखता है। हमारा मस्तिष्क एक निश्चित समयक्रम के अनुसार ही सोच सकता है। यह ऐसा है मानो कोई आंतरिक संदर्भ चार्ट है, जिस पर देशकाल क्रम में समस्या घटनाएँ रख दी जाएँ। आधुनिक विज्ञान तो प्रश्न पूछता है : “यह कैसे हुआ? कब हुआ? इसके पहले क्या स्थिति थी? इसके बाद क्या हुआ? किसने रचना करने की पहल की?” जब इस ब्रह्मांड के उद्भव की बात होती है, तो यह विज्ञान ‘बिग बैंग थ्योरी’ द्वारा इसको स्पष्ट करता है।

Content: वैज्ञानिकों का कहना है कि एक छोटी चिंगारी ने फटकर इस ब्रह्मांड का सृजन किया, पर वे इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाते कि “इसके पूर्व क्या था?” कृष्ण कहते हैं कि यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा, परम चेतना है और सदैव विद्यमान रहती है। यह कई रूपों में यथा ग्रह-नक्षत्र, मनुष्य इत्यादि के माध्यम से स्वयं को प्रकट करती है, परंतु यह है शाश्वत। यह सदैव इसी प्रकार प्रकट होती रहेगी और अपने खेत में लौट जाएगी, पर यह सदा रहेगी। हमारे मन में देश-काल की अवधारणा मन और इंद्रियों की समझ के आधार पर बनती है। हमें जो प्रतीत होता है, वह हमारे मन के विचारों का ही प्रतिबिम्बन होता है। लेकिन समय को यह समझ उस समझ से भिन्न है, जो हमारे गुरु या स्वामी की होती है। वे लोग तो समय को क्षणों के माप से मापते हैं। क्षण वह अंतराल है जो दो विचारों के मध्य रहता है। यूं समझें कि क्षण दो विचारों के बीच का सामजिक अंतराल है।

Content: बुद्ध ने इस देश-काल को शून्य कहा था। शंकराचार्य उसे ही ‘पूर्ण’ कहते हैं। यह मस्तिष्क से परे (नो-माइंड) क्षेत्र है तथा मस्तिष्क-क्षेत्र वह होता है जिसके आधार को हम छूते हैं। यह वर्तमान क्षण ही होता है, जिसमें हम अपनी आंतरिक दिव्यता से साक्षात्कार करते हैं और उस ब्रह्मांडीय ऊर्जा को पहचानते हैं, जो हमारी मूल प्रकृति है।

Content: जब हम एक पादार्थिक सुख के बाद दूसरे के पीछे पड़े रहते हैं, तो हम बहुत दबाव, चिता एवं तनाव से गुजरते हैं, जो हमारे सिर पर हर सेकंड गोलाबारी-सी करते रहते हैं। हमारा क्षण अति लघु होता है क्योंकि हमारे अंदर विचार बड़ी संख्या में उठते ही रहते हैं। इसी कारण हमें एक घबराहट भरी घुटन की अनुभूति होती रहती है। हम तो मानो एक चूहा दौड़ में फंसे हैं। हमें हमेशा यह लगता है मानो समय हमारे हाथ से फिसलता जा रहा है। हम चाहते हैं कि

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Content: शरीर छूटने से पूर्व हम अधिक-से-अधिक कमा लें तथा खूब सुख के अनुभव प्राप्त करें। हमें सदा यही लगता रहता है कि हम यहां जो पाना चाहते हैं वह हम खो देंगे, यदि शीघ्रता नहीं करेंगे। हम इस प्रकार अनुभव इसलिए करते हैं क्योंकि हम स्वयं को क्षेत्र अर्थात् अस्थाई रूप से मन और शरीर से जोड़ते हैं। यह समझ लें कि मन और शरीर से पंचभूत से बने हैं और जब उनका काम समाप्त हो गया, तो वे वापस अपने मूल स्रोत की ओर लौट जाएंगे। दूसरी ओर, एक प्रवुद्ध स्वामी जानता है कि वह क्षेत्रज्ञ है। उसे मालूम है कि वह शरीर-मन तंत्र नहीं है। उसको महसूस हो चुका है कि वह परम चेतना है। इसलिए उसे कोई भड़भड़ाहट नहीं कि वह इस चूहा-दौड़ में फंसे, क्योंकि उसे ज्ञात है कि इस शरीर के नाश होने के बाद भी जीवन चलता रहता है। वह तो स्वयं अपने मन का साक्षी हो जाता है। उसके मन में जो भी विचार उठेगा वह कर्म-जागृत करने वाला होगा और कभी भी अकारण्यता पैदा करने वाला अनुयादक विचार नहीं होगा। जैसे ही वह विचार आया कि वह स्वयं को किसी कार्य के रूप में व्यस्त कर देगा। प्रबुद्ध ज्ञानी के मन में कभी विचार एक नहीं होते। उसे अनंतता की अनुभूति होती है क्योंकि वह विचार से परे क्षेत्र में स्थाई रूप से रहता है। यही उस परम चेतना की ‘आनंदिता’ है, जिसे कृष्ण यहां बताते हैं।

Content: गुरु की सहायता

Content: जब हम प्रबुद्ध गुरु के सामने होते हैं - वह जो मस्तिष्क से परे क्षेत्र (नो माइंड्स जोन) में रहते हैं, तो हमारे अंदर भी विचारों के उदय की संख्या में भारी बढ़ोतरी हो जाती है। इस प्रकार बिना प्रयास के हम अधिक शांत और जागरूक स्वतः ही होने लगते हैं। ऋणात्मकता और धनात्मकता या विनाश और विकास हमारे चारों ओर घटित होने वाले विश्व के स्वाभाविक गुण हैं। यही गुण क्षेत्र के भी हो जाते हैं। जब हमें अनुभूति होती है कि हम इस परिवर्तनशील क्षेत्र का अंश नहीं, वरन स्थाई और शाश्वत क्षेत्रज्ञ है (अर्थात् उस चेतना के जो इस क्षेत्र को संचालित करती है), तो हम मुक्त होने लगते हैं। कृष्ण कहते हैं कि यह शाश्वत आनंद है - अर्थात् जाना या महसूस किया जा सकता है। जब यह ज्ञान आता है, तो ज्ञेय, ज्ञाता और ज्ञान सबका संगम हो जाता है। इस अनुभव में ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय एक ही हो जाते हैं। फिर तो अनुभव, अनुभवकर्ता एवं वह जिसका अनुभव किया जा रहा है, एक हो जाते हैं। इस अवस्था को ‘त्रिपुटी’ कहते हैं, जिसमें तीनों में कोई अंतर ही नहीं रहता।

Content: श्रीमद्भगवत गीता

Content: 68

Content: इसको यूं समझ लें : कल्पना करें कि आपको ड्राइव करना पसंद है और आप एक नई, उम्दा कार में बैठे हैं, जिसमें सारे स्वतः चलने वाले यंत्र लगे हैं। आप पूरी गति से एक हाईवे पर जा रहे हैं। कार चलाने में आप इतने आनंद में डूब जाते हैं कि आप स्वयं को भूल जाते हैं। कुछ समय पश्चात् आपको अचानक लगता है कि कार आप ड्राइव नहीं कर रहे, यह स्वयं हो रहा है। आप स्वयं ड्राइविंग का एक अनुभव बन जाते हैं और आपको यह नहीं लगता कि आप स्वयं ड्राइव कर रहे हैं। कार अपने आप आगे भाग रही है - आप तो मात्र इस अनुभव को ग्रहण कर रहे हैं। इसी प्रकार यदि आप अपने किसी मन के काम में डूबे होते हैं, तो अनुभव, अनुभव करने वाला एवं अनुभव का साध्य एक शाश्वत चेतना में समाहित होकर एक रूप हो जाते हैं। इसे कहा जाता है ‘क्षेत्र में होना’।

Content: कृष्ण ने स्पष्ट किया था कि उनकी शाश्वत प्रकृति, शाश्वत सत्ता समय के आयाम से बंधी नहीं है। अब वह कहते हैं कि वह देश (स्पेस) से भी नहीं बंधे हैं। प्रायः हम किसी व्यक्ति या वस्तु की उपस्थिति या अनुपस्थिति उसके भौतिक आयामों या गुणों से प्राप्त करते हैं। (अर्थात् कोई वस्तु या व्यक्ति है या नहीं, इसको हम भौतिक आयामों से सिद्ध करते हैं)। हम अपना जीवन-यापन अपने दृश्य, गंध, स्पर्श, स्वाद और श्रवण द्वारा प्राप्त सूचनाओं के अनुरूप करते हैं। यदि हमारी ये पंचेंद्रियां किसी वस्तु की अनुभूति न कर पाएं, तो हम समझेंगे कि हमारे चारों ओर कुछ नहीं है।

Content: प्रबुद्ध गुरु के साथ एक महत्वपूर्ण बात यह भी होती है कि वे अपनी भौतिक उपस्थिति से अधिक अपनी अनुपस्थिति में उपलब्ध रहते हैं। उनकी ऊर्जा देशकाल के बंधन नहीं मानती और इसलिए हर जगह, हर समय उपलब्ध रहती है।

Content: जब आप अपने प्रबुद्ध गुरु के ऊर्जा क्षेत्र में होते हैं, जो इस समय अपने शरीर में नहीं होते, वरन् ‘जीव समाधि’ में होते हैं - अर्थात् स्वामी के विश्राम की अंतिम अवस्था - तो बिना किसी विशेष प्रयास के आप चैन में आ जाते हैं और अंदर शांति की अनुभूति स्वतः ही होने लगती है। भारत के विभिन्न प्रसिद्ध मंदिर - यथा तिरुपति, तिरुवनंतमलाई, मंतिरालय और पालानी अधिकतर प्रबुद्ध स्वामियों के अंतिम समाधि स्थलों के निकट ही बने हैं। इसलिए ये मंदिर एक शक्तिशाली ऊर्जा केंद्र का काम करते हैं और लाखों श्रद्धालुओं को हर वर्ष खींचकर लाते हैं।

Content: भौतिक रूप से प्रबुद्ध स्वामी अपने शरीर में न भी हो, तब भी हमें उनकी उपस्थिति महसूस होती है। क्यों? इसलिए कि वह शरीर के बंधन में नहीं होता।

Content: श्रीमद्भगवत गीता

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Content: वह उस ब्रह्माण्डीय ऊर्जा होता है जो अपने प्राकट्य में देशकाल के बंधन से परे रहती है। हमें तो मात्र भौतिक सीमाओं की ही समझ होती है। यहां कृष्ण 'सर्वत्र आंखें' कहकर यह बात स्पष्ट करते हैं। जब कृष्ण कहते हैं : "हर जगह हाथ और पैर, सिर, कान और मुंह हर ओर" तो उनका क्या अभिप्राय है? कृष्ण के समय में जो महिलाएं-स्त्रियाँ गायों की देखभाल करती थीं, उन्हें 'गोपी' कहा जाता है। वे सब ही कृष्ण की परम भक्त थीं। घर के दूसरे कार्यों में बंधी हुईं, हर समय वे कृष्ण की भक्ति में ही सराबोर रहती थीं। कहा जाता है रासलीला के समय - कब कृष्ण अपनी ब्रह्माण्डीय चेतना का आभास कर गोपी को देते थे - कृष्ण उन सैकड़ों गोपियों के साथ नाचते थे। वृंदावन में हर गोपी को लगता था मानो कृष्ण उसके साथ ही नाच रहे हों। हर गोपी के साथ कृष्ण का एक रूप प्रकट होता था। कृष्ण का वह एक ही रूप होता था, पर सैकड़ों-लाखों गोपियों के साथ एक साथ प्रकट होता था। इसका गहन अर्थ समझें : हर गोपी कृष्ण की दिव्य चेतना के साथ जुड़ी थी और हर एक उनकी उपस्थिति का अनुभव करती थी। जब हम अपने भीतरी गहरे उतरते हैं, तो हर वस्तु में हम देवी चेतना का अनुभव करते हैं। यह सर्वव्याप्त चेतना भौतिक सीमा-बंधन से परे होती है। इसलिए कृष्ण कहते हैं कि वे 'सर्वव्याप्त' हैं। वे सब में छाए हैं और हर जगह मोजूद हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि जो भी निरोगकर्त्ता वे मेरे हाथ हैं; मेरे सारे आचार्य मेरी वाणी हैं और व्यवस्थापक मेरे मस्तिष्क हैं। अपने दो भौतिक हाथों से तो मैं सीमित संख्या में ही लोगों को निरोग कर सकता हूँ; एक मुंह से तो मैं सीमित लोगों के सामने अपना प्रवचन कर सकता हूँ और कार्यक्रम संचालित कर सकता हूँ और एक मस्तिष्क से तो मैं सीमित संख्या में आयोजन कर सकता हूँ। इसलिए मैं अपने निरोगकर्त्ताओं, शिक्षकों और व्यवस्थापकों के साथ कार्यशील करता हूँ। 'ब्रह्माण्डीय नित्यानंद' इन सबके माध्यम से कार्य करता है। एक देश से दूसरे देश तक फोन से बात करने के लिए आधारभूत ढांचा होना आवश्यक है; समुद्र की सतह के नीचे से तार डाले जाते हैं, कनेक्शन कायम किया जाता है। परंतु ब्रह्माण्डीय कनेक्शन के लिए कुछ भी नहीं चाहिए। उसमें तो संबंध भीतर से जुड़ता है, जिसकी कोई सीमा ही नहीं होती और हम समग्र से जुड़ जाते हैं। यहां कृष्ण इस ईश्वरीय तत्व के गुणों का बखान करते हैं। पर यह समझ लें कि यह सब हमें इस अनुभव को प्राप्त करने की प्रेरणा देने के लिए कहा गया है, जिससे हम स्वयं भी इसको प्राप्त कर सकें। यदि किसी को जिसे चीनी

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Content: का स्वाद मालूम ही नहीं है, वह आपसे पूछे कि चीनी का स्वाद कैसा है, तो आप उसे कैसे समझाएंगे? आप कह सकते हैं कि यह सफेद घनाकार टुकड़ों में मिलती है, जो पारदर्शक और बेहद मीठे होते हैं। पर यदि वह आपसे पूछे : "मीठा क्या होता है?" तब आप क्या करेंगे। आप भले ही कहते रहें कि चीनी मीठी होती है, वह गन्ने से निकाली जाती है, शोरा से सुखाकर बनाई जाती है - पर उसका कोई लाभ नहीं होगा। पर यदि एक चम्मच चीनी उसके मुंह में डाल दी जाए, तो उसकी समझ में तुरंत आ जाएगा : "ओह! चीनी ऐसी होती है।" चीनी को मिठास ऐसी होती है।" यानी जब तक उसे मीठेपन का स्वयम् ही अनुभव न हो जाए, 'मिठास' उसके लिए एक काल्पनिक अवधारणा रहेगी, क्योंकि उसके पास इसका कोई अनुभव नहीं है, यद्यपि उसकी कल्पना वह करने लगेगा। लेकिन बौद्धिक जनों के साथ एक परेशानी यह रहती है कि वे शक-ओ-सुबह से घिरे रहते हैं। इसलिए सैद्धांतिक स्पष्टीकरण की आवश्यकता होती है और यह महत्वपूर्ण भी है। हम हर वस्तु की नाप-तोल करना चाहते हैं, जो भी हमें ज्ञात हो। कृष्ण इस संदर्भ में बहुत कृपालु हैं और धैर्यवान भी हैं। एकादश अध्याय में उन्होंने अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाया था। परंतु उसे देखकर अर्जुन भयभीत हो गया था और उस ऊर्जा विस्फोट से घबरा गया था। उसने कृष्ण से प्रार्थना करते हुए कहा था : "हे कृष्ण! मैं आपको समझ नहीं पा रहा हूँ - न आपकी महिमा मेरी समझ में आ रही है।" लेकिन अर्जुन वह जानने को उत्सुक अवश्य था, जो कृष्ण कह रहे थे। इसलिए कृष्ण ने उसके सामने हर तरह का वर्णन प्रस्तुत किया था, जिससे वह अर्जुन के भय और संदेह का निवारण कर सकें। प्रबुद्ध स्वामी की करुणा बहुत महान होती है। भले ही शिष्य कितनेे भी संदेह या शक प्रकट करें, वे शांति से धैर्यपूर्वक उसके साथ बैठकर एक-एक कर उसके शक और संदेहों को निर्मूल करते हैं। हमारे शक और संदेह का जनक हमारा मन (दिमाग) ही होता है, जो हमारी समझ पर एक आवरण-सा डाल देता है। स्वामी का तेज और महिमा उस आवरण को गला देती है। इस श्लोक में वे कहते हैं कि सारी इंद्रियों के संचालन की जिम्मेवारी यद्यपि उन्हीं की है, पर वे उनसे परे रहते हैं। वह, हर जीवन जो प्रकट होता है, के लिए उत्तरदायी हैं, पर स्वयं उनसे परे हैं। उन्हीं के संचालन से आक्रामकता (राजस), आलस्य (तमस) और भलाई (सात्विकता) आती है, पर वे इन सबसे परे हैं। कृष्ण का कहना है जीवन का उत्स ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के एक सिरे से होता है, जो उनसे गुजरता है। पर आप देखते हैं कि हमारे चारों ओर कई वस्तुएं हमारी

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Content: जागरूकता से परे, अपने आप हो रही हैं। हम जब रोटी का टुकड़ा अपने मुंह में रखते हैं, तो हम उसे चबाकर निगल जाते हैं। इसके पश्चात् इससे ऊर्जा कैसे प्राप्त की जाए, यह पूरी प्रक्रिया बिना हमारे किसी निर्देश के चलती रहती है। निर्देश देना तो दूर, हमें मालूम ही नहीं होता कि हमारे अंदर क्या हो रहा है। आज वैज्ञानिक रसायनिक प्रतिक्रियाओं तो समझ लेते हैं, पर यह अभी भी नहीं मालूम कि एक जीवित और मरे कोश या कोशिकाओं में क्या अंतर है। इस विशाल ब्रह्मांड और अरबों ग्रह-नक्षत्र-निहारिकाओं में आपसी सामंजस्य क्या किसी की समझ में आ सकता है? क्या अंतरिक्ष में कोई पुलिस वाला बैठा है, जो इन सबको पूरी तरह व्यवस्थित करता रहता है? नहीं! यह समझ लें कि हमारी वह प्राण-शक्ति - जो यह सारा खेल चलाती है, जो हमारी हर सांस पर नियंत्रण रखती है - भी वही शक्ति है जो इस ब्रह्मांड की व्यवस्था को कभी अराजक नहीं होने देती - विशुद्ध बुद्धिमत्ता है। संस्कृत में एक कहावत है जिसके अनुसार समस्त ब्रह्मांड में घास का एक पत्ता भी नहीं हिल सकता, जब तक दैवी शक्ति (ईश्वर) की ऐसी इच्छा न हो। कृष्ण हमें एक स्पष्ट संदेश दे रहे हैं कि हम कितना उन पर निर्भर हैं, जो ब्रह्मांडीय ऊर्जा के स्त्रोत हैं। उनकी इच्छा के बगैर कहीं भी कुछ नहीं हो सकता। साथ-ही-साथ, बिना इस पूरी प्रक्रिया में शामिल हुए यह अनन्त ऊर्जा संसार में घटित होने वाली हर घटना या जीवन रूप को मात्र साक्षी भाव से देखती है। यदि हम थोड़ी गहराई से सोचें, तो हम पाएंगे कि हम जो भी देखते-सुनते हैं, वह सब हमारे मन और इंद्रियों द्वारा बनाया गया रूप होता है। हम अपनी दुनिया स्वयं ही बनाते हैं। हमारे भीतर बहुत गहरे में पैठा हुआ ईश्वर पूरी प्रक्रिया को देखता रहता है, परन्तु उसमें शामिल कतई नहीं होता। किसी विशेष परिस्थिति में हमारा मन अपनी प्रतिक्रिया के अनुसार सुखी या दुःखी होता है। हमारा मन या दिमाग कुछ लोगों को अच्छा बताता है, तो कुछ को बुरा; कोई घटना कष्टकारक लगती है, तो कोई हर्ष देने वाली और इन्हीं प्रतिक्रियाओं के आधार पर वह लोगों या अनुभव के पास जाना चाहता है या दूर भागता है। पश्चिम बंगाल के प्रसिद्ध प्रभुद् स्वामी, श्री रामकृष्ण परमहंस एक पूरा रूपक बांधकर इस प्रक्रिया को बडी सुदरता से स्पष्ट करते हैं। जब हम किसी घाटी पर खड़े होकर नीचे देखें, तो हमें गड्ढे और उतार दिखाई पड़ते हैं और यदि ऊपर देखें तो पहाड और चोटियां। पर हम जब चोटी पर पहुंच जाते हैं, तो हमें लगता है कि यह सब ऊंचाइयां और नीचाइयां फालतू की बात है। जमीनी धरातल पर दिखने वाले भेद चोटी पर कोई मायने नहीं रखते। यदि हम अपने दिमाग या अतीत से ही चिपके रहे - अपने पुराने सुख और दुःखों में घिरे रहें,

Content: श्रीमद्भगवत गीता तो हम अपने वर्तमान क्षण को गंवा बैठेंगे। इस प्रकार न केवल हम अनन्तता के दर्शन से वंचित रहेंगे, वरन् अपनी अंतर्चेतना के प्रति भी विमुख हो जाएंगे। भीतर का अंतराल हम अपने अंदर के विश्व को विभिन्न गुण-वत्ता वाली वस्तुओं से परिपूर्ण इसलिए देखते हैं क्योंकि हम स्वयं को एक अचल सत्ता के साथ जोड़ते हैं, उसे ही हम अपने सदर्भों का मूल बिन्दु मानते हैं। हम जो भी कार्य करते हैं, उसको उसी मूल सदर्भ के साथ ही जोड़ते रहते हैं। इस प्रकार हम एक बंद अंतराल, जो हमारी भौतिक सीमा - घटाकाश - द्वारा निर्धारित होती है, में जीते रहते हैं। वस्तुतः हम तीन प्रकार के धरातलों या स्पेस में जी सकते हैं : वह धरातल जो हमारे मन या मस्तिष्क द्वारा आच्छादित है, वह जो हमारे शरीर द्वारा आच्छादित है और वह धरातल जो इन दोनों (शरीर-मन) की सीमा से परे है। प्रथम को 'घटाकाश' कहते हैं - यानी शरीर द्वारा आच्छादित अंतराल। यह अंतराल हमारे भौतिक शरीर का होता है। हम में से अधिकतर लोग लगभग सारे समय इसी में निवास करते हैं। दूसरा है 'चिदाकाश' अर्थात वह धरातल जिससे आप परिचित हैं, तो यही आपका 'चिदाकाश' है। यह मन-मस्तिष्क या विचारों का अंतराल है। तृतीय अंतराल है 'महाकाश' जो संपूर्ण धरातल, ब्रह्मांड तथा उसमें स्थित हर वस्तु को समेटे हुए है। 'घटाकाश' पांच तत्वों : पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं ईथर से बनता है। यह तत्व सूक्ष्मतर होते जाते हैं जब हम उनके क्रम में ऊपर चढ़ते हैं, यथा - पृथ्वी से जल, जल से अग्नि, अग्नि से हवा और हवा से ईथर। पहले चार तत्व हमारी चेतना से जुड़ते हैं। ईथर, जो सर्वव्यापी सूक्ष्म तत्व है, हमारी चेतना से जुड़ता है व उसका प्रतिबिम्बन करता है और इसी कारण हम जीवित रहते हैं। परन्तु समस्या यह है कि हम समझते हैं कि हमारी चेतना 'घटाकाश' से बंधी है। दूसरे शब्दों में हम उसे शरीर मात्र से ही बंधा समझते हैं। इसी कारण हम इस शरीर को ही अपना संदर्भ बिन्दु मानते हैं, जब हम बाहरी विश्व को देखते हैं। हम समझते हैं कि यह शरीर ही हमारा 'मैं' है, जो समस्त विश्व को देखता है। आप गौर से देखें तो समझेंगे कि समस्त विज्ञान का यह मूल आधार है : हम अलग-अलग भौतिक सीमाओं द्वारा परिभाषित अलग भिन्न-भिन्न सत्ताएं या इकाइयां हैं, लेकिन वह प्रभुद् स्वामीगण जो 'घटाकाश' से 'महाकाश' में प्रवेश कर चुके हैं, जानते हैं कि अंतरालों (स्पेस) का यह अलगाव हमारे अज्ञान के कारण है।

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Content: यह स्पष्ट समझ लें कि अंतराल या स्पेस अविभाज्य है। यह कभी भी बांटा या अलग नहीं किया जा सकता, परंतु हम अपनी सीमित समझ के कारण स्पेस को कई सीमाओं में बांट देते हैं। यही हमारे कष्टों का मूल कारण है। हम चाहे किसी भी अंतराल में हों, हम में से हरेक को उच्चतर अंतराल में जाने का मौका उपलब्ध रहता है। मनुष्य, जैसा कि वह है, एक संभावित विभव प्राप्त करने की क्षमता प्रकट करता है। वह उस वास्तविकता को प्राप्त नहीं करता, वरन् उसकी संभावना प्रकट करता है। वह मात्र वही नहीं जो लगता है। अभी तक तो हम लोग एक बीज रूप में ही हैं और हमने अभी अपनी पूरी संभावनाएँ या सक्षमताएँ व्यक्त नहीं की हैं। अभी हम पेड़ नहीं हो पाए हैं, पर हमारा मतलब यह नहीं कि हम आगे बढ़कर पेड़ नहीं बन सकते। जब हम इन तुलनात्मक सीमाओं से परे पहुंच जाएंगे, तब हमारा अनुभव हमें कृष्ण के इस कथन का अर्थ स्पष्ट करवाएगा। कृष्ण कहते हैं कि परम सत्य हमारे तथा अन्य सभी जीव-वस्तुओं के बाहर और भीतर स्थित है। इसी सूक्ष्म सत्य के कारण हम चर या अचर रहते हैं। यह अंतराल 'महाकाश' का है, जो समस्त अंतरिक्ष तक व्याप्त होता है। यहां तो कुछ भी 'द्वैत' है ही नहीं, तो हम किसी की किसी से तुलना कैसे कर सकते हैं? जो हर जगह व्याप्त है वह किसी से दूर या पास कैसे हो सकती है। सत्य तो एक ही है और संपूर्ण है। जब हम पानी को विभिन्न आकारों के बर्तन में डालते हैं, तो पानी उन वर्तनों का आकार ही ग्रहण कर लेता है और हर बर्तन में पानी दूसरे बर्तनों के पानी से अलग लगने लगता है। लेकिन यदि हम हर बर्तन के पानी को अलग-अलग लेकर गौर से जांचें तो जल एक-सा ही लगेगा। इसी प्रकार विभिन्न रूपों-आकारों, रंगों, योनियों वाला यह विश्व यद्यपि विविधता से भरा-पूरा लगता है, परंतु इसमें एक ही चेतना है - प्राण शक्ति है। यदि हम यह सापेक्षता स्थित समझ लें कि हमारा उद्गम और अंत भी एक ही स्रोत है, तो हमारी समझ में आ जाएगा कि हम किसी महान सत्ता से जुड़े हैं, जो हमारी व्यक्तिगत सत्ता से बहुत विशाल और महान है।

Content: एक लघु कथा

Content: एक बार एक बच्चे ने एक ट्रक की दूसरे ट्रक से एक रस्सी के सहारे खींचा जाना देखा। दोनों समान गति से चल रहे थे। लड़का यह दृश्य देखकर हंसने लगा। ट्रक चालक ने उस लड़के से पूछा : 'अरे! इसमें हंसने की क्या बात है?' लड़का बोला : 'वाह! एक रस्सी को उठाने ले जाने के लिए दो ट्रकों का प्रयोग! कितनी मजेदार बात है!'

Content: श्रीमद्भगवत गीता

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Content: हमारे जीवन का भी यही हाल है। जब हम अज्ञान से घिरे रहते हैं, तो हमें दुनिया में कोई भी मूर्ख बना सकता है, क्योंकि हम वास्तविकता देख नहीं पाते। वह वैश्विक चेतना स्वयं को कई रूपों में प्रकट करती है तथा कई वस्तुओं का विनाश भी इसके कारण ही होता है। जब यह वैश्विक चेतना अव्यक्त रहती है, तो केवल संभावनाएँ प्रकट करती है। इसको शास्त्रों में 'पुरुष' कहा गया है। लेकिन जब यह विभिन्न रूपों में स्वयं को व्यक्त कर देती है, तो यह 'प्रकृति' कहलाती है। प्रकृति वस्तुतः पुरुष की सृजनात्मक अभिव्यक्ति होती है। यू समझें कि सागर का पानी तो पुरुष है, पर उसमें उठने वाली गतिमान लहर प्रकृति होती है। कृष्ण अर्जुन को याद दिलाते हैं कि परमात्मा प्रकृति और पुरुष में बंटा प्रतीत हो सकता है, क्योंकि प्रकृति विभिन्न रूपों में व्यक्त होती है, पर वह अधिकतर इन सबसे परे और अविभाज्य है। वह बंट नहीं सकता। कृष्ण कहते हैं कि वह परमात्मा है, वह साक्षी चेतना है, जो समस्त प्रकाश श्रोतों का मूल उद्गम है।

Content: यह वैश्विक चेतना सूर्य-चंद्र, तारे तथा आज के विश्व के कृत्रिम प्रकाश श्रोतों को प्रकाशित करती है। कृष्ण इस आत्मतत्व को परम प्रकाश श्रोत कहते हैं। यह आत्मतत्व या ईश्वरीय तत्व विशुद्ध बुद्धिमत्ता है, जिसका ज्ञान समस्त अज्ञान को मिटा देता है। 'प्रबुद्ध स्वामी' हर वस्तु को उसकी स्पष्टता में देखता है। वह सत्य को वैसे ही देखता है, जैसा वह है। यदि आप किसी अंधेरे कमरे में हैं, तो आपको उस कमरे में अन्य उपस्थितियों के बारे में ज्ञान नहीं होता, पर जैसे ही कमरे में बत्ती जली कि आप सब कुछ देख लेते हैं।

Content: एक प्रबुद्ध स्वामी चेतना के चिराग से सत्य को उसके सही रूप में देखता है, बिना किसी आवरण या फिल्टर के। इस चिराग के माध्यम से वह अपने पूरे माहौल का सही अनुभव प्राप्त करता है। यह चिराग दूसरे चिरागों-सा नहीं होता, चाहे वे कितनी भी गहराई हों। इसलिए पर अज्ञान की सारी परतें हटा देता है, चाहे वे कितनी भी गहराई हों। इसलिए प्रबुद्ध स्वामी अपनी स्थिति से पूरे 3600 क्षेत्र में सभी को देख लेता है। वह कोई आवरण प्रयोग में नहीं लाता; हमारी तरह वह वही नहीं देखता जो हम चाहते हैं। वह तो वहीं देखता है जो जैसा सत्य रूप में है। यह समझ लें कि हम जो हैं, वह तो वहीं देखता है जो जैसा सत्य रूप में है। यह समझ लें कि हम जो कुछ भी देखना चाहते हैं, यही हमारी समस्याओं की जड़ है। हम कोई वस्तु या व्यक्ति वैसे नहीं देख पाते, जैसे वह है। हम अपने पूर्वाग्रहों के कारण वही देखते हैं, जो हम अपने अहं भाव या पूर्व-स्मृति के आगग्रहों के कारण वही देखते हैं, जो हम देखना चाहते हैं। इस अहं को भुला दें, जो हमारी दृष्टि पर अंधकार डालती है। अज्ञान के इस अंधकार को हटाने के लिए चेतना का चिराग अपनी अज्ञान के इस अंधकार को हटाने के लिए चेतना का चिराग अपनी

Content: अंदर जलाए। जब आपकी सारी पूर्व-चेतना जल जाएगी, तब अहं भाव भी समाप्त हो जाएगा।

Content: श्रीमद्भगवत गीता

Content: 75

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Chapter Number: 13

Content: 13.19 इस प्रकार क्षेत्र तथा ज्ञान और ज्ञेय परमात्मा का स्वरूप संक्षेप में (मेरे द्वारा) कहा गया। मेरा भक्त इसको तत्व रूप में जानकर मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।

Chapter Number: 13

Content: 13.20 प्रकृति और पुरुष, इन दोनों को ही तू अनादि जान। रोग-दोष आदि विकारों को तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थों को भी प्रकृति से उत्पन्न जान।

Chapter Number: 13

Content: 13.21 कार्य और कारण की उत्पत्ति में हेतु (उद्देश्य) प्रकृति कही जाती है और जीवात्मा सुख-दुःखों के भोगने में हेतु कहा जाता है।

Chapter Number: 13

Content: 13.22 प्रकृति में स्थित पुरुष ही प्रकृति से उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थों को भोगता है और इन गुणों का संग ही इस जीवात्मा के अच्छी-बुरी योनि में जन्म लेने का कारण है।

Chapter Number: 13

Content: 13.23 वास्तव में यह पुरुष इस देह में स्थित होने पर भी (अर्थात आप या दूसरा अर्थात् त्रिगुणमयी माया से) सर्वदा अतीत ही है। मात्र साक्षी होने से उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देने वाला होने से अनुमन्ता, सबको धारण-पोषण करने वाला होने से मती, जीवन रूप से भोगत, ब्रह्म आदि का स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध (सच्चिदानंद धन) होने से परमात्मा होता है - ऐसा कहा गया है।

Chapter Number: 13

Content: 13.24 इस प्रकार पुरुष को और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य तत्वतः जानता है, वह सब प्रकार से कर्तव्य-कर्म करता हुआ भी फिर नहीं जन्मता।

Content: कृष्ण ने यह भगवत् गीता उपदेश अर्जुन को कुरुक्षेत्र की रणभूमि के मध्य रथ में दिया था। यदि इस दृश्य को गहराई से देखें - यह एक सुंदर दृष्य है, हम सबके लिए। कृष्ण प्रतिनिधि हैं ईश्वरीय तत्व के - सारथी, जो क्षेत्रज्ञ है; वह जो सारा खेल कर रहा है। यदि सारथी को रथ चलाना

Content: नहीं आएगा, तो घोड़े बेकाबू होकर रथ को अलग-अलग दिशाओं में खींचने लगेंगे।

Content: ये घोड़े हमारी इंद्रियों और मन के प्रतीक हैं, जो अपनी रुचि के अनुसार हमें विभिन्न दिशाओं में खींचते हैं, इसलिए हम अपनी हर करनी में संशयग्रस्त रहते हैं। यदि हमने इन घोड़ों को नियत्रित नहीं किया, तो वे हम पर हावी हो जाएंगे। हमारे जीवन में यही सब होता है। चूंकि हमें अपना रथ चलाना नहीं आता, हम बड़ी सुविधापूर्वक घोड़ों को अपने आपको सुपुर्द कर देते हैं।

Content: क्षेत्र का ज्ञान - अर्थात् सारी पापार्धिक दुनिया जो हमारे चारों ओर पसरी है, ही हमें बताता है कि कैसे अपने मन और इंद्रियों को नियत्रित करें। जैसे ही हमें क्षेत्र का ज्ञान होता है, हमारी समझ में आ जाता है कि हम मात्र शरीर-म

Content: या क्षेत्र ही नहीं हैं। यदि हम क्षेत्र में होते तो हम इसको कैसे (अलग से) समझ पाते? देखिए हम यह पुस्तक इसलिए पढ़ सकते हैं क्योंकि हम पुस्तक नहीं है - हम दोनों अलग-अलग सत्ताएं हैं। इसलिए जब हम क्षेत्र को जान जाते हैं, तबही तो हम कह सकते हैं कि हम क्षेत्र नहीं हैं। यह समझना कि हम क्षेत्र नहीं हैं, साथ में यह ज्ञान भी कि हम क्षेत्रज्ञ हैं। जब हमारी समझ में आ जाता है कि हम क्षेत्रज्ञ हैं, हम क्षेत्र के परे पहुंच जाते हैं।

Content: जीवन एक स्वप्न है

Content: वस्तुतः वास्तव में क्षेत्र नाम का कुछ भी नहीं होता है। यह सब तो हमारे मन या मस्तिष्क का प्रतिक्षेपण है - जैसे कि स्वप्न हो। जब हम बिस्तर पर जाते हैं, तो हमें मालूम रहता है कि हम फलां-फलां हैं - फलाने की पत्नी या फलाने के पति, फलां कंपनी में कार्यरत हैं - इत्यादि। हमें अपनी अस्मिता की पूरी पहचान रहती है - पूरी ठोस वास्तविकता के साथ, जब हम सोने जाते हैं। हम जानते हैं कि सपने जो आएंगे वह वास्तविक या हकीकत नहीं होंगे। दूसरे दिन हम नींद से जागने के बाद स्वाभाविक रूप से अपने काम निबटाते हैं, कार्यालय जाते हैं, बच्चों के साथ खेलते हैं - इत्यादि।

Content: लेकिन जैसे ही हम स्वप्नावस्था में पहुंचते हैं, हम सपने को सत्य मानने लगते हैं। जैसे-जैसे हम सपने में घुसते जाते हैं हमारी अस्मिता, हमारी स्वप्न भूमिका के साथ परिवर्तित होती जाती है। जो सपने में घट रहा हो, वह हो सकता है हमारे अपने जीवन से संबंधित न हो। पर हम उसे सही समझने लगते हैं। यदि सपने में कोई शेर हम पर आक्रमण करता है, तो हम भय के मारे वाकई में पसीने-पसीने हो जाते हैं। तब हमें यही लगता है मानो एक शेर हमें वाकई में खाने वाला है।

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Content: इसी प्रकार हम इस जीवन को सत्य और असली समझते हैं। यदि मैं अभी आपसे कहूं कि आप जो जीवन जी रहे हैं, वह आपके मन का एक प्रतिक्षेपित रूप है, तो क्या आप मेरा विश्वास करेंगे? नहीं न! क्योंकि आप इस सपने में इस कदर डूबे हैं कि आप इसे सच ही मान रहे हैं। लेकिन जब आप सपने से जागते हैं, तो अचानक आप कैसे विश्वास करते हैं कि वह सपना था - सत्य नहीं? क्योंकि अचानक हमें सपने और अपने अस्तित्व में एक अलगाव दिखाई देता है। यह समझ कि वह एक सपना था, हमें वास्तविकता में लाकर खड़ा कर देती है। इसी प्रकार यह समझ कि जो हम देख रहे हैं - यह विश्व बस हमारे मन का एक प्रतिक्षेपित रूप है; कि यह हमारी सही अस्मिता नहीं है - हमें वास्तविकता में स्थापित कर देती है।

Content: एक लघु कथा

Content: एक जैन स्वामी एक सुबह रोते हुए उठे। उनके शिष्य उनके पास गए और पूछा : "स्वामी! क्या हुआ?" "मैंने रात को सपने में देखा कि मैं एक तितली हूं।" स्वामी ने कहा। शिष्यों की कुछ समझ में नहीं आया। वे फिर बोले : "तो क्या हुआ स्वामी! वह तो एक सपना था, जो समाप्त हो गया। अब क्या परेशानी है?" स्वामी ने कहा : "तुम लोग मेरी समस्या नहीं समझ रहे। मेरे समझ में नहीं आ रहा कि मैं एक जैन स्वामी हूं, जिसने सपना देखा कि वह एक तितली है या मैं वास्तव में एक तितली हूं जो सपना देख रही है कि मैं एक जैन स्वामी हूं!" मान लीजिए हमने एक सपना देखा कि हजारों लोगों के सामने हम कोई पुरस्कार जीतते हैं। मस्तिष्क हमारा इतना शक्तिशाली हो सकता है कि वह पूरी तस्वीर आपके सामने बना सकता है - वह सभागार, हजारों लोग, तालियां, भाषण या वह सब कुछ जो ऐसे समारोहों में होता है, हमारा मस्तिष्क उस पूरे दृश्य को इतना जीवंत कर देता है कि वह सच लगने लगता है, मात्र हमारी अस्मिता या पहचान ही सपने में वास्तविक नहीं लगती। यहीँ हमारा मस्तिष्क तथा कधित हमारे वास्तविक जीवन में करता है। अंतर मात्र इतना है कि हम रात के उस स्वपन से शीघ्र बाहर आ जाते हैं। पर हमारी यह समझ में नहीं आता कि इस वृहत दिवार्सपन से कैसे बाहर आएं, जो हमें वास्तविक लग रहा है। जब तक हम इस विश्व को सत्य समझेंगे, हम कष्ट पाते रहेंगे। जिस क्षण हमें यह लगने लगे कि यह विश्व वास्तविक नहीं है, हम अपने

Content: श्रीमदभगवत गीता

Content: कष्टों और अपने बीच में एक दूरी बनाने लगते हैं। अतः मात्र एक प्रबुद्ध स्वामी, जिसको सत्य का अनुभव हो चुका है, हमें वास्तव में जागृत कर सकता है। अपनी सहज करुणा भावना के कारण यह महानुभाव इस धरा पर उतरते हैं, हमें यह बताने को कि जो कुछ हम सच समझते हैं, वह हमारे मन का प्रतिक्षेपित रूप ही है, सत्य नहीं। यदि एक बच्चे को हर समय अपने अंदर के ईश्वरीय तत्व की याद निरंतर दिलाई जाए, तो वह एक जीवन मुक्त व्यक्ति - अर्थात् शरीर में रहते हुए ही मुक्त हो जाने वाला ईंसान बनकर उभरेगा। वैदिक परंपरा में बच्चों को इसी प्रकार पाला जाता था। इसी कारण तब चेतना का स्तर इतना ऊंचा था ( आज की तुलना में)। यह पादार्थिक जगत या 'प्रकृति' अनादि है। 'पुरुष' या परम चेतना भी अनादि है। सारे परिवर्तन या बदलाव प्रकृति ही करती है। सारे बदलाव जो हम देखते हैं - यथा मौसमों का बदलना, देश-काल की अवधारणाओं में परिवर्तन, हमारे शरीर-मन के परिवर्तन या हर परिवर्तनशील क्रिया प्रकृति के ही विभिन्न रूप हैं। यह परिवर्तन तो सागर में आए ज्वार-भाटा के समान होते हैं। इनके रूप बनते-बिगड़ते रहते हैं। इन परिवर्तनों का देश-काल पूरी तरह सापेक्ष होता है। इन उतार-चढ़ावों की अवधि भी पूरी तरह तुलनात्मक ही होती है क्योंकि यह अवधारणाएं तो हमारी इंद्रियों द्वारा सृजित की जाती है। हमारी इंद्रियां समय को गतिशील मानती हैं; वे समय की गति को पादार्थिक विश्व के परिपेक्ष्य में आंकती हैं - विशेष तौर पर ग्रह-नक्षत्रों की गति के आधार पर। हमने समय की यह अवधारणा अपने इन्ड्रियलब्ध ज्ञान के आधार पर की है। हम देश या अंतराल (स्पेस) में किसी वस्तु की स्थिति की तुलना वास्तविकता के आधार पर ही करते हैं।

Content: उदाहरण के लिए, मान लीजिए हम अपने किसी प्रिय के साथ बैठे हैं, तो चाहे हम कितना भी समय गुजारें, हमें लगेगा कि साथ कम देर रहा। हमें समय के बीतने का अहसास ही नहीं होगा। इसके विपरीत हम किसी उबाऊ या परेशान करने वाले व्यक्ति के साथ बैठे हैं, तो हम अपनी घड़ी ही देखते रहेंगे। लगेगा मानो समय बीत ही नहीं रहा। समय मानों हमारे मस्तिष्क के अनुसार चलता है। गहराई से सोचें, तो हम पाएंगे कि हमारा मन या मस्तिष्क हर समय विगत और आगत के बीच में दौड़ता रहता है। यह सदा द्विविधा में रहता है और विगत का पुनर्निरीक्षण एवं आगत की योजना बनाता रहता है। इस कारण हम सदैव विगत या आगत में घूमते रहते हैं और कभी वर्तमान में स्थित नहीं हो पाते।

Content: श्रीमदभगवत गीता

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Content: लेकिन यदि हम वर्तमान में कायम रह सकें, तो हम अनन्त शाश्वत में स्थित होते हैं, जो विगत, वर्तमान और आगत का एक समेकित रूप है। इसमें कोई भेदभाव नहीं होता कि क्या बीता या क्या होगा। इस अवस्था में आकर हम देश-काल के परिप्रेक्ष्य में घटने वाली सारी घटनाओं के साक्षी हो जाते हैं। हम साक्षी चेतना बन जाते हैं।

Content: तब हम क्षेत्रज्ञ हो जाते हैं और क्षेत्र में घटने वाली घटनाओं को निरासक्त भाव से निहारते रहते हैं। हमें महसूस होता है कि बाहरी विश्व में जो कुछ भी घटित हो रहा है वह या तो एक नाटक है या स्वप्न और हमारा अपने जीवन में कुछ भी करने का प्रयास मानो इस स्वप्न में ‘चर-चलने’ का कारनामा भर है।

Content: भौतिक विश्व का ज्ञान तो आवश्यक है ही। इसी से तो हमें समझ आती है कि हम स्वप्न से कैसे बचें और यह कि हम बिना कारण क्षेत्र से आसक्त रहते हैं। क्षेत्र में घटित सारी घटनाएं देश-काल के सापेक्ष होती हैं और जिसका अपरोक्ष संबंध हमारे मस्तिष्क या मन से रहता है। हम जितने भी परिवर्तन या बदलाव यहां देखते हैं, वह सब प्रकृति या क्षेत्र के कारण होते हैं। हमारा मन भी इसी प्रकृति का एक हिस्सा है।

Content: जैसे ही हमने इस पर अपना ध्यान आकर्षित किया कि मन रुक जाता है, क्योंकि तब तक इससे अलग होकर मात्र दृष्टा या साक्षी बन जाते हैं। तब यह इस पर निर्भर रहता है कि कब हम विशुद्ध साक्षी भाव में दृष्टा रह सकते हैं, बिना उसमें उलझे जो हम देख रहे हैं। इसका हम जितना अभ्यास करेंगे, उतनी ही अवधि बढ़ती जाएगी। हमें अनुभव होगा कि हम ‘पुरुष’ हैं (प्रकृति नहीं)।

Content: ‘प्रकृति समस्त भौतिक कारकों एवं प्रभावों की श्रोत और जीवित सत्ता (जीव) हमारे सुख-दुःख और इस विश्व की अन्य अनुभूतियों कफ़ उद्गम है।’ इन शब्दों में गीता का मुख्य संदेश कूट-कथा के माध्यम से व्यक्त हो जाता है। उनकी यह कथन उनके पिछले श्लोकों में बताई गई बातों का सार है। वह स्पष्ट रूप से कहते हैं कि जो हम देखते हैं, वह हम हैं नहीं।

Content: वह कहते हैं : “सबके परे जाओ …. जब शरीर देखों तो इसके परे जाओ। यदि अपने विचारों को देख लिया, तो इसके भी परे जाओ … अपनी मनःस्थितियां देख लो तो उनके भी परे जाओ … अपने भावों को देखकर उनके भी परे जाओ, क्योंकि तुम यह भी नहीं हो।”

Content: अपने चारों ओर ऐसे निरासक्त भाव से निहारो जैसे तुम आकाश में भ्रमण करते बादलों को देखते हो। बिना उनके भ्रमण में संलिप्त हुए उन्हें गुजरने दो। यदि कोई ऐसा भाव आता है कि तुम सबकुछ साक्षी भाव से देख रहे हो, तो इस विचार को भी निहारो। अपने साक्षी भाव पर तब तक गौर करो, जब तक

Content: यह भाव कि तुम इसे देख रहे हो, गौयब हो जाए। इस प्रकार सबसे परे जाकर अपने होने की गहराई में प्रवेश करो।

Content: यह अंतिम विचार कि तुम सब साक्षी भाव से निहार रहे हो, तुम्हारे और ईश्वर के मध्य का पुल है या तुम्हारे और तुम्हारे विचार-हीन क्षेत्र का अंतिम जुड़ाव। शुरू में जब अपने विचार और कर्म को साक्षी भाव से देखोगे, तो स्वाभाविक ही है कि तुम सोचो कि तुम एक दृष्टा हो। यह रहो पर इसके परे जाने की चेष्टा करते रहो। यहां रुकना नहीं। इस भाव को कि तुम साक्षी भाव से देख रहे हो, साक्षी भाव से ही देखो। और तब विशुद्ध अभोक्तित एवं अस्पृश्य आंतरिक अंतराल (या स्पेस) तुम्हारे सामने खुलेंगा। यहीं वह जगह है जहां ईश्वर प्रकट होता है और दिव्य चेतना की अनुभूति होती है। यहीं रहस्य या असली अर्थ है वही मरी की कथा है। जिसने क्राइस्ट को जन्म दिया था। यूँ समझें कि जब हमारा अंतर्मन वर्जिन की तरह विशुद्ध और विकार रहित होता है, तब ही हम क्राइस्ट या क्राइस्ट चेतना को जन्म दे सकते हैं। तब हम स्वयं भी दैवी प्रभाप्रविष्ट हो जाते हैं।

Content: श्रीमद्भगवत गीता

Content: श्रीमद्भगवत गीता

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Content: असली कुंजी है साक्षी भाव से निहारना

Content: यहां कृष्ण हमें एक तकनीक बताते हैं। अभी तक माना हम 18 कैरट स्वर्ण हैं, जिसमें थोड़ा तांबा भी मिला है। जब हम बार-बार इस 18 कैरट स्वर्ण को चेतन साक्षी भाव से निहारने की अग्नि में डालते हैं, तो यह 22 कैरट का शुद्ध स्वर्ण बनकर निखरता है। यदि इस स्वर्ण को इस आग में लगातार पकाते रहे, तो परमशुद्ध 24 कैरट स्वर्ण हो जाएंगे। इसी तरह हमारा भी चेतन साक्षी भाव में रहने से परिमार्जन एवं शुद्धिकरण होता रहता है। हम यदि बार-बार ऐसा करते रहे, तो अंततः हम भी परम शुद्ध 24 कैरट स्वर्ण बनकर चमकेंगे।

Content: वस्तुतः समस्त धर्मों और आध्यात्मिक साधना का सार इस एक श्लोक में है जो कृष्ण यहां कहते हैं। कृष्ण यहां इस अध्याय में हमें वह 'मास्टर-की' देते हैं जो हर ताले को खोल सकती है : अपने शरीर-मन अपने समूचे अस्तित्व को साक्षी भाव से निहारो। साक्षी भाव से निहारना ही 'मास्टर-की' है।

Content: एक लघु कथा

Content: आधी रात को एक व्यक्ति हाइवे पर कार से जा रहा था। सिपाही ने उसे रोका और कहा : 'महाशय - आप पिए हुए हैं - शायद लगातार पी रहे थे!' उस व्यक्ति ने कहा : 'हां - मैंने 6 ड्रिंक्स ली है। यदि चाहो तो मैं उनके नाम भी गिनवा सकता हूं : कुछ बियर के कैनस - कुछ ब्रांडी के जाम...' सिपाही ने कहा : 'नहीं - रुको - मुझे आपका 'ब्रेथ एनालाइज़र टेस्ट' (सांस की जांच से पता लगाना कि कितनी शराब पी है) करना है। कृपया कार के बाहर आए।'

Content: उस व्यक्ति ने कहा : 'यह टेस्ट क्यों? मैं तो स्वयं ही मान रहा हूं कि मैं पिए हूं। क्या तुम्हें मेरी बात का विश्वास नहीं?'

Content: श्रीमद्भगवत गीता

Content: सिपाही को तो वह टेस्ट करना ही था, चाहे वह कार का चालक कुछ भी कहता।

Content: इसी प्रकार आप मेरी बात आखें बंद करके न मानो। आप स्वयं भी अपने टेस्ट करो - अपने ऊपर परीक्षण करो; अपने 'होने' पर करो। पढ़ने या प्रवचन सुनने से कोई बदलाव नहीं आने वाला। यह पढ़ाई या सुनना तो ऐसा है जैसे आप रेस्तरां में गए और मेन्यू पढ़कर बगैर कुछ खाए-पिए चले आए। यदि बिना आत्मपरिक्षण के आप मेरी बात सुनकर विश्वास करते हैं, तो यह रेस्तरां से मेन्यू पढ़कर बाहर आ जाने के समकक्ष ही है।

Content: अब चूंकि हमने मेन्यू कार्ड पढ़ लिया है, तो समय आ गया है कि हम कुछ वस्तुएं चखें भी।

Content: कृष्ण अब एक पग आगे जाते हैं। अभी तक उन्होंने हमें बताया था कि कैसे हम अपना अंतर्मन शुद्ध कर दिव्य चेतना की आंतरिक अनुभूति प्राप्त कर सकते हैं। अब अंतिम श्लोक में वह कहते हैं कि जो ऐसा करता है, वह चाहे वर्तमान स्थिति में कुछ भी हो, मुक्ति प्राप्त करता है।

Content: हर जीव दिव्य चेतना की ओर जा रहा है, चाहे वह स्वयं इससे अभिज्ञ हो या नहीं हो। हम अपनी कुछ इच्छाओं की पूर्ति के लिए शरीर को रगड़ते हैं। यदि हम अपनी ऊर्जा इन इच्छाओं को गलाने में खर्च कर दें, तो हमें इसकी पूर्ति के लिए दूसरा जन्म लेने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। समस्या तब पैदा होती है, जब हम दूसरों की थोपे हुई इच्छाएं अपने जीवन में पूरी करने का प्रयत्न करते हैं, यह भूलते हुए कि हम यहां अपनी इच्छाएं पूरी करने आए हैं, दूसरों की नहीं। हम दूसरों से इच्छाएं उधार लेते रहते हैं और अपने ऊपर उनका बोज़ बढ़ाते रहते हैं।

Content: फिर, अपनी मूल प्रकृति के पचानने से पूर्व है हमारा इस शरीर को त्यागने का समय आ जाता है। हम इन्हीं अपुरित इच्छाओं को बोज़ लेकर दूसरे जन्म लेते हैं। यह विश्व हमारी मदद करना चाहता है कि हम अपनी इच्छाओं को विगलित कर दें, जिससे हम मुक्त हो सकें। पर हम इसका प्रतिरोध करते हैं, हमारे अंदर और बाहर जो घट रहा है, उसे अस्वीकार करके।

Content: कृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि क्षेत्र या प्रकृति की समझ हमें सीधे-सीधे मुक्त करती है। जब तक हम इस शरीर (क्षेत्र) से अपनी पहचान करते हैं, तब तक विषय भोगों में लिप्त रहते हुए हम इच्छाओं को एकत्रित करते रहते हैं। जिस क्षण हमारी समझ में आता है कि हम इस शरीर व मन के परे भी कुछ हैं, हमें अचानक यह लगता है : 'इस चूहे-दौड़ में लिप्त रहना तो बिल्कुल मूर्खता है।'

Content: श्रीमद्भगवत गीता

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Chapter Number: 13

Content: 13.25

Chapter Number: 13

Content: उस परमात्मा को कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि से ध्यान द्वारा हृदय में देखते हैं; अन्य कितने ही ज्ञान-योग द्वारा और दूसरे कितने ही कर्म-योग द्वारा देखते हैं।

Chapter Number: 13

Content: 13.26

Chapter Number: 13

Content: परंतु इनसे दूसरे स्वयम् इस प्रकार से न जानते हुए दूसरों से सुनकर तदनुसार ही उपासना करते हैं और वे श्रवण पारायण पुरुष भी मृत्यु रूपी संसार से नि:संदेह तर जाते हैं।

Chapter Number: 13

Content: 13.27

Chapter Number: 13

Content: हे भरत वंशियों में श्रेष्ठ (अर्जुन)! जितने भी स्थावर-जंगम (जड़ चेतन) प्राणी उत्पन्न होते हैं। सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न जान।

Chapter Number: 13

Content: इस श्लोक में कृष्ण आत्म (ईश्वरीय) साक्षात्कार के लिए विविध तकनीक बताते हैं। वह कहते हैं कई योजनाएं एवं पंथ का प्रयोग किया जा सकता है, अपने सच्चे आत्म को पहचाने के लिए। लोग कहते हैं - “जितने स्वामी - उतने पथ।” परंतु ज्यादा सही है : “जितने शिष्य - उतने पथ।” हर शिष्य अपना एक पंथ चला सकता है। कृष्ण कहते हैं कि परम चेतना तक हम विभिन्न पथों के माध्यम से पहुंच सकते हैं।

Chapter Number: 13

Content: कृष्ण कहते हैं कि योग, ध्यान, ज्ञान योग, ईश्वर में समर्पण इत्यादि द्वारा मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। ये विभिन्न पंथ एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं। भगवत्-गीता का हर अध्याय आत्म-साक्षात्कार के लिए एक नई और अंतर विधि देता है।

Chapter Number: 13

Content: हमारे द्वितीय-स्तर के मेडिटेशन कार्यक्रम, नित्यानंद स्मरण कार्यक्रम के पश्चात् जो चाहते हैं, मैं उनको आध्यात्मिक नाम देता हूँ। यह नाम भक्तों में ऊर्जा के आधार पर दिए जाते हैं। यह नाम बताते हैं कि वे लोग ब्रह्माण्डीय नित्यानंद से किस प्रकार जुड़ पाते हैं। यही आधार है इन नामों को देने का। यदि मैं देखता हूँ कि साधक भावनात्मक स्तर पर - यथा भक्ति के मार्ग में कार्यरत

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Content: है, तो मैं उन्हें वही नाम देता हूँ जो उस विशिष्ट ऊर्जा के लिए सही है। दूसरा वर्ग है बौद्धिक जनो के लिए। बौद्धिक व्यक्ति प्रायः मानसिक स्तर पर जुड़ पाते हैं। उन्हें हर पाठ का एक तर्क-सम्मत स्पष्टीकरण चाहिए होता है। तीसरा वर्ग उनका होता है, जो अस्तित्व के (या मात्र 'होने' के) स्तर पर जुड़ते हैं। मैं जब उनके नाम तय करता हूँ, तो मैं उनकी ऊर्जाओं पर ध्यान लगाकर उनको आध्यात्मिक नाम देता हूँ। यह आध्यात्मिक नाम उन्हें एक रास्ता या पथ दिखाते हैं, जो हर एक के लिए भिन्न होता है। नाम का अपना महत्व होता है। यह नाम उन्हें अपना पथ बताते हैं। प्रायः हम नाम के साथ स्वयं को जोड़ते हैं। अतः जब आप अपना नाम लेते हैं या कोई आपको आपके आध्यात्मिक नाम से पुकारता है, तो इससे आपके मस्तिष्क में एक घण्टी बजती है और आपको अपने सत्य का मार्ग याद आ जाता है। कृष्ण अर्जुन को इन पथों के बारे में बताते हैं। वह इसके विकल्प भी सुझाते हैं, यथा - ध्यान, योग, मंत्र जाप, ज्ञान मार्ग और महान सत्ता को संपूर्ण समर्पण का भाव (या भक्ति)। महत्वपूर्ण यह है कि आपको मालूम होना चाहिए कि आपके लिए कौन-सा पथ अच्छा रहेगा। कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं, जो मात्र दूसरों की नकल करते हैं और अपना भला-बुरा नहीं सोचते। अपने ही पथ पर चलें एक लघु कथा एक अंधेरी रात में एक व्यक्ति को मालूम पड़ा कि उसकी कार की हैडलाइट्स खराब हो गई है। उसने तय किया कि जो कार उसके आगे होगी, उसके पीछे ही वह चलता रहेगा। बाद में वह बिलकुल अंधे था और वह कुछ भी देख नहीं पा रहा था। यदि आगे की कार मुड़ती तो वह भी अपनी कार मोड़ लेता था। आगे की कार के सहारे चलते हुए वह बहुत दूर निकल आया। कुछ समय बाद आगे की कार की बत्तियां बंद हो गई और वह अचानक रुक गई। पीछे वाले ने अपनी कार आगे वाले से टकरा दी और बाहर निकलकर पहली कार वाले से चिल्लाकर बोला : "तुम रुक क्यों गए?" "अरे! मेरा घर आ गया इसलिए!" और मैं कहाँ जाता?" उस चालक ने कहा। यदि आप किसी का अंधानुसरण करेंगे, तो कभी अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाएंगे। आपको अपना पथ स्पष्ट रूप से ज्ञात होना चाहिए।

Content: सत्य तक पहुंचने के विभिन्न मार्ग होते हैं, लेकिन हमें मालूम होना चाहिए कि हमारा रास्ता कौन-सा है। यहां एक सच्चा प्रबुद्ध स्वामी आपकी सही सहायता कर सकता है। उसे मालूम होता है कि आपके लिए सही पथ कौन-सा है। यदि आप किसी गलत पथ पर हैं, तो वह आपको सुधार कर सही पथ पर भी ला सकता है। हमारे 'ॲडवांस्ड होलिस्टिक प्रोग्राम' में शिष्यगण मंच पर बैठकर श्रोताओं के प्रश्नों के उत्तर देते हैं। वे जब उत्तर देते हैं, तो मैं उन्हें सही करता रहता हूँ - जब कभी वे कोई गलती करते हैं। इस श्लोक में कृष्ण विभिन्न विधियां बताते हैं : ध्यान, योग, ज्ञान मार्ग हेत्यादि। कई व्यक्ति करते हैं, जो यह सब करते रहते हैं। कुछ व्यक्ति पूछते हैं : "स्वामी जी! मैं प्रतिदिन 21 मिनट तथा ध्यान लगाता हूँ, पर अभी तक कुछ भी अनुभव नहीं हुआ। ऐसा क्यों?" मैं उनसे पूछता हूँ : "ईमानदारी से बताओ कि क्या तुम पूरी एकाग्रता और पूरी जागरुकता के साथ ध्यान लगाते हो? जब ध्यान में होते हो तब तुम्हारा मन शरीर के साथ होता है या तुम अपने कार्यालय के बारे में सोचते रहते हो।" जाहिर है कि इस प्रश्न के बाद वे मौन रह जाते हैं। इस श्लोक में कृष्ण 'साख्य' की बात करते हैं, ज्ञान मार्ग या दार्शनिक चर्चा के माध्यम से। एक बात यहां स्पष्ट समझ लें। ज्ञान प्राप्ति और दार्शनिक चर्चा के दो रास्ते हैं : कई व्यक्ति विभिन्न पुस्तकों का अध्ययन करते हैं। ये व्यक्ति बौद्धिक श्रेणी के होते हैं। पर यदि गौर से देखा जाए, तो ज्ञान प्राप्ति के ये रास्ते उनके अहं भाव को ही दर्शाते हैं। वे अपना ज्ञान दिखाना चाहते हैं। यदि हम इस क्रिया को अंतर्मुखी कर दें, तो हम बदलाव प्राप्त कर सकते हैं। यदि हम दार्शनिक चर्चा अपना पांडित्य और अहं दिखाने के लिए करते हैं, तो हमें कभी ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। हम अपने ज्ञान से कोई लाभ नहीं पा सकते।

Content: श्लोक के अंत में कृष्ण एक अदभुत तकनीक बताते हैं - वह तकनीक चरम तकनीक है - संपूर्ण समर्पण की विधि। वह कहते हैं : "अपने कर्मों का फल मुझे समर्पित कर दो।" यह तकनीक सर्वाधिक प्रभावशाली तकनीक है। इसके बारे में वह पूरी गीता में बार-बार उल्लेख करते हैं। yानी इस वैश्विक चेतना - ईश्वर या कृष्ण को - अपने कर्मों का फल समर्पित कर दो। प्रायः हम अपने कर्मों को जिम्मेदारी स्वयं ही उठाना चाहते हैं। इसी के कारण सारे तनाव और समस्याएं सिर उठाती हैं। कृष्ण की परम चेतना में सब कुछ समर्पण कर दो - बस। एक बार यदि हम ऐसा कर सकें, तो हम मुक्ति का अनुभव करेंगे। निर्बाधित महसूस करेंगे। सत्य तक पहुंचने का यह सबसे आसान रास्ता है।

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Content: अपने विशिष्ट पथ पर चलने के लिए किसी विशेष आध्यात्मिक ज्ञान की भी आवश्यकता नहीं होती। भले ही आध्यात्मिक क्षेत्र में कोई नया व्यक्ति आया हो, वह भी इस पथ पर चल सकता है। परंतु एक संज्ञानिक बदलाव होना आवश्यक है। कई ऐसे प्रबुद्ध स्वामी हुए हैं, जिन्हें आध्यात्मिकता के बारे में कोई पूर्व ज्ञान नहीं था। एक बात और समझ लें। यदि किसी को कोई आध्यात्मिक ज्ञान है, तब भी यह आवश्यक नहीं कि वह कोई सच्चा साधक हो। मैंने कई लोगों को बहुत-सी पुस्तकें पढ़ते हुए देखा है और वे आध्यात्मिकता का भी बार-बार उल्लेख करते रहते हैं। जवकि उनकी कोई आवश्यकता भी नहीं होती। वे समझते हैं कि वे बहुत बड़े आध्यात्मिक ज्ञानी हैं। लेकिन जब कोई प्रबुद्ध स्वामी आध्यात्मिकता के बारे में बातें करता है, तो वह अपने सत्य के अनुभव को पश्चात ऐसा करता है। जब कोई साधारण व्यक्ति यह बात करता है, तो वह नहीं उसका अहं बोलता है। उसका आध्यात्मिक ज्ञान उसकी बौद्धिकता का प्रतीक है, जिसमें उसका अहं भाव प्रमुख होता है। लोग प्राय: मुझसे पूछते हैं : 'स्वामी जी ! क्या मुझे यह कोर्स अटेंड करना चाहिए ? क्या मैं इसको पूरा करने में सक्षम रहूंगा ?' मैं उनसे कहता हूँ - 'यदि तुम स्थाई रूप से इसके लिए उपलब्ध रहोगे, तो मैं तुम्हें निश्चित ही सक्षम बना दूंगा।' मात्र एक यही पूर्व-शर्त है इस कोर्स के लिए कि अटेंड करने वाला स्थाई रूप से उपलब्ध होना चाहिए। यदि ऐसा है, तो आप अपना चरम लक्ष्य प्राप्त करने में सक्षम रहेंगे ही। यही कृष्ण यहां हम सबसे कहते हैं। आध्यात्मिकता की ओर बढ़ने के लिए कोई पूर्व ज्ञान नहीं चाहिए। अगर कोई इसके बारे में बात करता है और आप इस पथ पर चलने लगते हैं, तब भी पर्याप्त है। परंतु आपको यह मालूम होना चाहिए कि आप क्या कर रहे हैं। कभी अंधानुकरण न करें - बस। जो भी आप देखते हैं वह पदार्थ और ऊर्जा का मिलाजुला रूप है। पूरा ब्रह्मांड ही क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ; माया और आत्मा, प्रकृति और पुरुष, शरीर-मन और चेतना से मिलकर बना है। अस्तित्व इनमें से किसी एक तत्व द्वारा प्रकट नहीं हो सकता। यदि हम समझते हैं कि हम मात्र पदार्थ हैं, तो हम 'माया' के भ्रम में हैं। 'क्षेत्र' शरीर है जिससे हम अपने को जोड़कर देखते हैं और क्षेत्रज्ञ है, वह चेतना जो हमें जीवंत रखती है। मानव शरीर वस्तुतः दोनों के संगम से बनता है। यदि चेतना नहीं तो शरीर बेकार है। पदार्थ जिसे हम शरीर कहते हैं, जीवंत इसी चेतना के कारण होता है। दोनों का होना अति आवश्यक है।

Content: 'प्रकृति' प्रकट रूप है और 'पुरुष' अप्रकट रूप। 'क्षेत्र' प्रकृति है, जो प्रकट है और हम जिसे देख सकते हैं। जो कुछ दृश्य है, उसके पीछे कुछ अदृश्य भी होता है, जो 'पुरुष' कहा जाता है। यह अप्रकट रहता है। पदार्थ के पीछे ऊर्जा साधारणतया दृष्ट नहीं होती। हम पिछले श्लोकों में चर्चा कर चुके हैं कि संसार में लाखों-करोड़ों ग्रह-नक्षत्र-तारे हैं, जो संपूर्ण सर्जनस्य के साथ गतिज रहते हैं। कई तो निहारिकाएं हैं, जो उस अंतरिक्ष में विचरण करती हैं, जिसकी कोई सीमा नहीं होती। यह सब उतने बंधे क्रम में कैसे चलते हैं ? अपने ही 'सोलर-सिस्टम' को देखिए। हर ग्रह एक निश्चित कक्षा में घूमता है। चाहे उनको चट्टानों, मिट्टी या बर्फ का बना मानें या मात्र पदार्थ कहें, ब्रह्मांड में यह व्यवस्थित क्रम किस प्रकार कार्य करता है ? वस्तुतः ये सब मात्र पदार्थ ही नहीं हैं। पदार्थ के पीछे भी कोई वस्तु अस्तित्व में है। इतनी आपाधापी में हर वस्तु कितनी व्यवस्थित रूप से चलती रहती है। यह क्रम व्यवस्थित 'क्षेत्रज्ञ' के कारण होता है। यदि मात्र पदार्थ या 'क्षेत्र' होता, तो उसमें कोई बुद्धिमत्ता न होती। पर इन पदार्थों में बुद्धिमत्ता भी समाहित है। यहीं वह चेतना है, जो अस्तित्व को प्रकट कर उसे व्यवस्था प्रदान करती है। अतः क्षेत्र एवं क्षेत्रज्ञ का मिलन आवश्यक है। आधुनिक विज्ञान यह दिखा चुका है कि पदार्थ और ऊर्जा एक ही हैं। बाह्य-विज्ञान के साधकों ने यह हाल ही में सिद्ध किया है। पर अंतर-विज्ञान के साधक इसे हजारों वर्ष पूर्व सिद्ध कर चुके थे। पदार्थ और ऊर्जा का साथ ही अस्तित्व पैदा करता है। विज्ञान सिद्ध कर चुका है कि हमारे शरीर तंत्र के हर कोश में बुद्धिमत्ता छिपी है। हर कोश मात्र कुछ रसायनों के सम्मिश्रण से नहीं बना है। हर कोश में ऊर्जा है और बुद्धिमत्ता है। इसी का संयोग शरीर-मन तंत्र बनाता है। हमें समझना चाहिए कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, यदि गहराई से देखें, तो अलग-अलग सत्ता नहीं हैं। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ में एक ही तत्व होता है। क्षेत्र ऊर्जा का स्थूल रूप है और क्षेत्रज्ञ उसका सूक्ष्म रूप। अस्तित्व के प्रकट होने के लिए सूक्ष्म एवं स्थूल, दोनों का होना आवश्यक है।

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Chapter Number: 13

Content: 13.28 जो पुरुष नष्ट होते हुए सब चराचर भूतों में परमेश्वर को नाश रहित और समभाव से स्थित देखता है, वही यथार्थ देखता है। क्योंकि वह पुरुष सब में समभाव से स्थित परमेश्वर को समान देखता हुआ अपने द्वारा अपने को नष्ट नहीं करता वरन् इस प्रकार के दर्शन से वह परमगति को प्राप्त होता है।

Chapter Number: 13

Content: 13.29 जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मों को सब प्रकार से प्रकृति के द्वारा ही किए जाते हुए देखता है और आत्मा को अकर्ता (जो कर्म में लिप्त नहीं है) देखता है, वही यथार्थ देखता है।

Chapter Number: 13

Content: 13.30 जिस क्षण वह पुरुष भूतों के पृथक-पृथक भाव को एक ही परमात्मा में ही स्थित तथा उस परमात्मा से ही सम्पूर्ण भूतों का विस्तार देखता है, उसी क्षण वह (सच्चिदानंद धन) ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।

Chapter Number: 13

Content: 13.31 कृष्ण कहते हैं : “वह जो आत्म-साक्षात्कार या परम चेतना प्राप्त कर चुका है, सभी जड़-चेतन अस्तित्वों में परमात्मा को उपस्थित देखता है। वह परमात्मा को अविनाशी, अनादि और परम सौख्य चेतना मानती है। अस्तित्व जो हमें दिखाई पड़ता है, वह छोटे-छोटे अलग खंडों से मिलकर नहीं बनता, जैसा हम समझते हैं। हम समझते हैं कि हम अपने चारों ओर उपस्थित तत्वों से भिन्न हैं। वास्तव में हम सब एक ही हैं। कृष्ण जिस परमात्मा को उपस्थिति के बारे में कहते हैं, वह हम सब में और चारों ओर की हर वस्तु में समान रूप से व्याप्त है।

Content: मैं तो हर एक से कहता हूँ : “मैं यहाँ स्वयं को ईश्वर सिद्ध करने के लिए नहीं हूँ; मैं तो यह सिद्ध करने के लिए हूँ कि तुम ईश्वर हो।” यह सत्य है। जब मैं यह कहता हूँ कि लोग कहते हैं : “नहीं-नहीं, स्वामी जी! हम ईश्वर कैसे हो सकते हैं। हमने तो कई पाप किए हैं।” पर हम यह मानते हैं कि आप ईश्वर हो क्योंकि आप में लोगों को स्वस्थ बना देने की शक्ति है।

Content: हम तो ईश्वर हो ही नहीं सकते?" एक बात समझ लें। यह नहीं है कि चूंकि अपने पाप किए हैं, आप ईश्वर नहीं हो सकते। यह भी समझ लें कि आप शैतान नहीं हो सकते। क्योंकि आपने पाप किया है। आप तब भी ईश्वर हो सकते हो। पाप करने या न करने से आपके ईश्वर बनने की क्षमता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ईश्वरत्व आपकी प्रकृति में है। वैसे भी पाप-पुण्य की अवधारणा तो समाज ने बनाई है, क्योंकि वह लोगों को नियंत्रित करना चाहता है। एक चोर-डकैत की आत्मा में वही सत्य तक पहुँचने की वही पवित्रता होती है। जो किसी मंदिर के पुजारी या संत के पास होती है।

Content: हम स्वयं ही अपने और ईश्वर के मध्य रुकावटें पैदा कर लेते हैं। हम यह भी नहीं मानते कि हमारा ईश्वर हमारे अंदर ही है। हम किसी और को तो अपने भी नहीं मानते कि हमारा ईश्वर हमारे अंदर ही है। हम किसी और को तो अपने सामने ईश्वर के रूप में खुशी से स्वीकार कर लेते हैं, पर ईश्वर के अपने अन्तःकरण में स्वीकार नहीं करते।

Content: बात यह है कि यदि हमने अपने को ही ईश्वर कहना शुरू कर दिया, तो समाज फिर हमें कैसे नियंत्रित कर पाएगा?

Content: ईश्वर सर्वव्याप्त है। दिव्य ऊर्जाएँ हर कण में समाहित हैं। हमारी समस्या है कि हम इसे देख नहीं पाते, क्योंकि एक बार में हम एक ही वस्तु देख पाते हैं। हम समझते हैं कि ईश्वर कोई भिन्न सत्ता है, जो बेहद शक्तिशाली है। हम अपने और ईश्वर के मध्य बहुत अंतराल रखते हैं।

Content: पश्चिमी लोग हिंदुओं को 'मूर्तिपूजक' कहते हैं और उनका परिहास उड़ाते हैं। भारत में भी कुछ लोग 'मूर्तिपूजक' को उपहास का पात्र समझते हैं। तथाकथित बौद्धिक लोग व वैज्ञानिक भी मूर्ति पूजा करने वालों को हेय दृष्टि से देखते हैं। कुछ तथाकथित नव-वेदांतवादी भी वेदांत की शिक्षा तो देते हैं, परंतु मूर्ति पूजा को अवैज्ञानिक मानते हैं। यही सब अन्य कर्मकांड यथा 'होम' या 'अभिषेक' के बारे में कहा जाता है।

Content: हमें समझना चाहिए कि जब हम पूजा करते हैं, तो उस मूर्ति के अलावा भी बहुत कुछ हमारे सामने होता है। हम जब पूजा करते हैं, तो उस मूर्ति के माध्यम से पूजा करते हैं, मात्र उस मूर्ति को ही नहीं पूजते। जब हम उस मूर्ति के पीछे ऊर्जाएँ देखते हैं और उसकी आराधना करते हैं, तो हमारी पूजा अधिक मूल्यवान हो जाती है। यही विज्ञान है। यदि हम पत्थर की पूजा करते हैं और उसके पीछे निहित ऊर्जाओं की कोई अनुभूति नहीं करते, तो यह पूजा निरर्थक है।

Content: मैं आपसे पूछता हूँ : पूरी भावना व निष्ठा से पूजा करने के पश्चात् आपको एक बड़े चैन की अनुभूति क्यों होती है? मंदिर से अपनी प्रार्थनाएँ कहने के बाद बाहर आने पर एक संतोष का भाव क्यों महसूस होता है? हमें इतना

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Content: हल्कापन क्यों लगता है? जब हम किसी मूर्ति के पीछे ऊर्जा को अनुभूति कर लेते हैं, तो हम उस कर्जा से जुड़ जाते हैं। उस ऊर्जा से जुड़ना मतलब एक चैनल बनाना, जिसके माध्यम से आत्मा परमात्मा से जुड़ाव महसूस कर सकें। इस थोड़ी अवधि के जुड़ाव में बहुत कुछ सांसारिक ज़िम्मेदारियों से मुक्ति महसूस होती है। हम उस मूर्ति के परमात्मा के दर्शन प्राप्त करते हैं और अपनी समस्याएं अपनी प्रार्थनाओं द्वारा उनके सामने प्रकट कर देते हैं। हमें चैन और सुकून पूजा के बाद इसलिए महसूस होता है, क्योंकि हमारे अंदर ईश्वर में पूरी निष्ठा एवं विश्वास होता है। हमें भरोसा होता है कि वह ईश्वर हमारी समस्याओं को दूर कर देगा। हम परमात्मा में तो विश्वास कर लेते हैं, पर उस आत्मा में नहीं, जो हमारे ऊपर उसका अंश है। इस सत्य को हम पूरी तरह आत्मसात् नहीं कर पाते।

Content: चरम लक्ष्य तक पहुंचने में हमारा मन ही सबसे बड़ी बाधा है। पिछले श्लोकों में कृष्ण ने बताया कि हम कैसे सत्य समझ सकते हैं। यहां कृष्ण उन रुकावटों के बारे में बताते हैं, जो हमें पार करनी हैं। वह कहते हैं कि जब हम अपने मन के प्रभाव के कारण स्वयं को निम्न स्तर का समझते हैं, हम ईश्वर या परमात्मा को सर्वव्याप्त नहीं देख पाते। जब हम अपने मन के प्रभाव से बाहर निकल आएं, तभी हम अपने चरम लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं। हम अपने मन को अपने से अलग सत्ता के रूप में देखते हैं। हम कहते हैं : "यह सोचता बहुत है।" हम इसके बारे में बोलने लगते हैं, बिना समझे कि यह मन क्या है? यह ईश्वर प्रदत्त एक व्यवस्थित यंत्र है, जो ईश्वर हमें प्रदान करता है। मन वस्तुतः मनुष्य का सेवक है, जो इसकी आवश्यकताएं और कमज़ोरियाँ दूर करने में सहायता करता है। हमारी समस्याओं का मूल कारण यह है कि यह मन जो मनुष्य के नियंत्रण में होना चाहिए, वह ढांचा बन गया है, जो मनुष्य पर नियंत्रण रखता है। जब गलत समझ और जानकारियों के आधार पर हम निर्णय लेते हैं, तो वह गलत और निम्न स्तरीय होते हैं। अपने 'फर्स्ट-लेवल मेडिटेशन प्रोग्राम' में हम उसकी कार्य-प्रणाली पर चर्चा करते हैं। हम कोई वस्तु निरखते हैं और उस पर प्रतिक्रिया देखते हैं। हमारी प्रतिक्रिया प्रायः विगत के अनुभव या 'संस्कारों' पर आधारित होती है। यदि पुराना अनुभव अच्छा है, तो हमारा मन कहता है : "यह ठीक है, मैं चालू रह सकता हूँ (इस क्रिया में)।" अन्यथा उसको निरस्त कर देगा।

Content: हर पदार्थ परमात्मा है कृष्ण कहते हैं कि हमारे अंदर की आत्मा और दूसरों की आत्मा वस्तुतः परमात्मा का ही रूप या अंश है। पर हम क्या करते हैं? हम अपनी आत्मा को सबसे अलग कर देते हैं। हम अपनी आत्मा की सीमाएं खींच देते हैं और इस प्रकार परमात्मा से बिलगाव पैदा करने की कोशिश करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को यूँ समझें : पामी भरे दस वर्तन रखे हों, तो सूर्य का प्रतिबिम्ब उन दसों में प्रतीत होगा। हर बर्तन यही समझेगा कि सूर्य मात्र उसी के वर्तन में है। और यही सब वर्तन सोचेंगे - हर एक के पास एक सूर्य है; जबकि सूर्य तो एक ही है। इसी प्रकार हम समझते हैं कि हमारे अंदर जो आत्मा है, वह दूसरों की आत्मा में अंतर है। जब हम उक्त आकांक्षाओं को भोग कर देते हैं, तो वहीं आत्मा, जो सर्वव्याप्त है, परमात्मा के रूप में हमारे सामने आती है।

Content: कृष्ण कहते हैं : "जब हम देखते हैं कि हमारे अंदर की आत्मा और सर्वव्याप्त आत्मा अविनाशी है, तब हम सत्य देखते हैं।" वह जो सदा रहती है, आत्मा ही है। हमें यह समझ लेना चाहिए, शेष हर वस्तु मर्त्य है, विनाशशील है और विनष्ट होगी ही। जब हम यह सत्य समझ लेते हैं कि आत्मा अजर है और यही सर्वदा विद्यमान रहेगी (शरीर नहीं) तो अधिक-से-अधिक धन-संपदा इकट्ठा करने की चेष्टा-दौड़ अपने आप बेमानी लगने लगती है। हमारी समझ में आने लगता है : "क्या लाभ इन विषय-सुखों के पीछे पड़ने से जब यह सब सदा रहने वाला तो है ही नहीं।" जब हम इस सत्य को आत्मसात करते हैं, हम वास्तविकता देखते हैं।

Content: कृष्ण कहते हैं कि हमारे सत्य के दिग्दर्शन के मध्य दिमाग या मन एक रुकावट बनकर आ जाता है, जिसके कारण हमारे निर्णय गलत सूचनाओं के आधार पर लिए जाते हैं। जब मन का प्रभाव हम पर पड़ता है, तो हम परमात्मा की हर वस्तु में व्याप्त देख नहीं पाते। हालाँकि हमारी आत्मा इसे सत्य को जानती है कि परमात्मा सर्वव्याप्त है और सर्वत्र है। पर हमारा मन उसके ऊपर एक आवरण चढ़ा देता है और हमारे ऊपर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेता है। मन पर तो पूर्ण स्मृतियों (संस्कारों) आदि का लेप रहता है, जो एक दृष्टि भ्रम पैदा कर हमारी समझ को गलत कर देता है। यह मन ही है, जो यह निर्णय लेता है कि जीवन को भोगने के लिए इंद्रियों और शरीर का होना आवश्यक है। जब हम बच्चे थे, तब हमारे मन के पास इतनी शक्ति नहीं थी। बचपन में हमने नए संस्कार भी कायम नहीं किए थे। यह तो बाद में समाज की शर्तें हमारे मन पर संस्कारों के गहरे लेप चढ़ा देती हैं और मन को शक्तिशाली बना देती हैं। वास्तव में जब लोग कहते हैं कि बच्चा बड़ा हो रहा है, तो असल में उसका परिदृश्य

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Content: तो छोटा होता जा रहा है, मात्र मन ही बढ़ता जा रहा है। यह शक्तिवान हुआ मन आत्मा को तो एक कोने में ढकेल देता है और स्वयं फैलकर समझ पर अपना अधिकार जमा लेता है। यह मन हमें सत्य नहीं देखने देता; यह ईश्वर को सर्वव्याप्त नहीं देखने देता। जब हम इसके चंगुल से बाहर होते हैं, तब ही असलियत देख पाते हैं। जब तक हम अपने सुरक्षित क्षेत्र में होते हैं, जब तक कि हम अपने अंदर ईश्वर को और शरीर को अलग-अलग देखते हैं और शरीर का विषय फँस में लिप्त होना निष्पक्ष भाव से देखते रहते हैं। जब तक हम आश्वस्त हैं शरीर तो सांसारिक इच्छापूर्ति का एक साधन मात्र है और आत्मा शक्तिवान है, हम सुरक्षित रहते हैं और सही मार्ग पर चलते हैं। पर जब आत्मा पर शरीर छा जाता है, तो समस्याएं पैदा हो जाती हैं। हम लोग शरीर को महत्व तो बहुत देते हैं, पर वास्तव में हम उसका सम्मान नहीं करते। हम तो इसका उपयोग भर करते हैं; हम शरीर का दुरुपयोग भी करते हैं। देर तक रात को टीवी देखते रहते हैं। आंखें थक जाती हैं, पर हमें आनंद आता है। पेट भर गया है, पर हम तब तक खाते रहते हैं जब तक खाना सामने है। स्वाद में आनंद है, इसलिए हम खाते ही चले जाते हैं। हम खाते-खाते अपने शरीर को भी क्षति पहुंचाते हैं, क्योंकि अधिक खाया-फिर शरीर निरस्त कर देता है। आजकल लोग ब्यूटी पार्लरों और 'स्पा' में बहुत जाने लगे हैं। महिलाएं अपने मेकअप के लिए ब्यूटी पार्लर जाती ही हैं, जहां कृत्रिम अवयवों की परत उनके चेहरे पर चढ़ाई जाती है, जिससे वह अधिक सुंदर लगे। एक लघु कथा एक नवविवाहित दुल्हन पहली बार पति के गांव गई। बीच शहर की बड़ी और पहले कभी गांव में नहीं रही थी। सुबह सात बजे उन दोनों ने मंदिर जाने का निर्णय किया। भारत में प्रायः लोग सुबह भगवान के दर्शन करने जाते हैं। वे दोनों सात बजे मंदिर पहुंचे। पत्नी ने तो सुबह पांच बजे से ही मेकअप करना प्रारंभ कर दिया था। जैसे-तैसे वह समाप्त हुआ और वे दोनों मंदिर पहुंचे। भारत में हर गांव में मंदिर में प्रायः मोर, खरगोश तथा अन्य सौम्य जानवर रहते ही हैं। पत्नी ने तो ऐसा मंदिर पहली बार देखा था। उसे जानवरों को देखकर बहुत आनंद आया। उसने पति को बताया तो पति ने मुस्कुराकर कहा : "हां! मुझे भी। एक बड़ी बंदरिया तो मेरे साथ ही थी!" महिलाएं तो बहुत मेकअप करवाती हैं। वे समझती हैं कि ब्यूटी पार्लर और 'स्पा' में जाकर वे अपने सौंदर्य

Content: श्रीमद्भगवत गीता का वर्धन कर रही हैं; परंतु वास्तव में वे अपने शरीर का दुरुपयोग ही करती हैं। कई प्रकार के रासायनिक पदार्थ वे अपने चेहरे पर लगवा लेती हैं। इस तरह से हम अपने शरीर का दुरुपयोग क्यों करते हैं? इसलिए क्योंकि अपनी इंद्रियों द्वारा हम एक प्रकार का आनंद प्राप्त करते हैं। यही इंद्रिय सुख है, जो हमें प्रसन्न करते हैं - इसलिए हम उनसे चिपके रहते हैं और इंद्रिय-सुख भोगते हैं। पर हम यह नहीं समझते कि वे सब क्षण स्थायी होते हैं। वस्तुतः हर प्रकार के इंद्रिय सुख क्षणिक या थोड़ी देर तक ही आनंद दे सकते हैं। यही इंद्रियां आज हमें सुख देती हैं। तो कल दुःख में ढकेल देती हैं। यह तो उन घुमने वाले दरवाजों की तरह है कि एक ओर से अंदर गए, तो दूसरी ओर से बाहर आ गए। यदि हम अधिक देर दरवाजे के पास खड़े रहें, तो दरवाजा अपने आप घूमकर हमें अंदर या दूसरी ओर ढकेल देगा। हम अपने शरीर को इंद्रिय सुख भोगने का एक उपकरण समझते हैं। हम इसका प्रयोग बाहरी विश्व से सुख प्राप्त करने को करते हैं। हम उन सुखों को बार-बार पाना चाहते हैं। इसलिए हम अपने शरीर का इतना ध्यान रखते हैं। हम चाहते हैं इसकी सुरक्षा जिससे हम लगातार आनंद प्राप्त करते रहें। हम चाहते हैं कि यह हर समय अच्छी हालत में रहे। हमें यह समझना चाहिए कि क्यों हम यह शरीर धारण कर इस पृथ्वी ग्रह पर आए हैं। तभी हम इस शरीर का सही उपयोग करना सीख पाएंगे। पहले हमें यह समझना चाहिए कि वर्तमान शरीर हमारे आत्मा के कई शरीर धारणों में से एक स्थिति है। यह चाहे हम स्वीकार करें या न करें, माने या न माने - सत्य तो यही है। कई शरीरों में से होते हुए हम इस जीवन के पूर्व हम कई जीवन जी चुके हैं। अब हमें कौन-सा जीवन मिलेगा या हम इस शरीर तक पहुंचे हैं। अब हमें कौन-सा शरीर धारण करेंगे, निर्भर करता है कि हम अपने वर्तमान जीवन को किस प्रकार विताते हैं। हमने यह जन्म पिछले जन्मों में एकत्रित कई इच्छाओं की पूर्ति करने के लिए किया है। इन इच्छाओं को 'प्रारब्ध कर्म' भी कहते हैं। हमारी आत्मा ने यह शरीर कई बचे हुए प्रारब्ध कर्म पूरे करने के लिए धारण किया है। जब हम मरते हैं, तो हमारे विचार तय करते हैं कि हमारा अगला जीवन कैसा होगा। हमारी आत्मा वह शरीर चुनती है, जिससे बचे हुए प्रारब्ध कर्म पूरे हो सकें, यह एक अटल सत्य है। पिछले जीवन की बची हुई अधूरी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हम यह शरीर प्राप्त करते हैं। परंतु इस जन्म में भी हम कई नई इच्छाएं एकत्रित कर लेते हैं। हम अपने शरीर के विभिन्न अनुभवों द्वारा नई कामनाएं पैदा कर लेते हैं। इसी

Content: श्रीमद्भगवत गीता 94

Content: श्रीमद्भगवत गीता 95

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Content: कारण हम जन्म-मृत्यु के चक्र में फंसे रहते हैं। यदि एक बार हमे यह समझ आ जाए कि हमने यह शरीर एक विशिष्ट उद्देश्य या 'मिशन' पाने के लिए किया है, जो पिछले जन्म में अधूरा रह गया था, तो हमारा पूरा शरीर या भौतिक जीवन के प्रति व्यवहार में बड़ा परिवर्तन आ जाएगा। हमारा शरीर एक कपड़े की भांति है। जब हम सुबह उठते हैं, तो पुराने कपड़े उतार फेंकते हैं और नए कपड़े धारण करते हैं। ऐसा ही करते हैं? इसी प्रक्रिया जब हम मरते हैं, तो अपना पुराना शरीर हटाकर नया शरीर धारण कर लेते हैं, जिससे हमारी बची हुई अपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति हो जाए - बस यही कारण है। लोग मुझसे प्राय: पूछते हैं: "स्वामी जी! प्रबुद्ध स्वामीगण मानव जीवन ही क्यों ग्रहण करते हैं? जब वे प्रबुद्ध हो चुके हैं, तो उन्हें शरीर की क्या आवश्यकता होती है? उनकी तो सारी इच्छाएँ पूरी हो ही चुकी होंगी?" रामकृष्ण परमहंस के जीवन की एक सुंदर घटना में यहां बताना चाहता हूं। रामकृष्ण एक प्रबुद्ध स्वामी थे। उन्होंने अपने शिष्यों को बताया था: "एक बार मैं एक बैलगाड़ी में अपने गांव से वापस आ रहा था, तो रास्ते में कुछ चोर मिल गए। उन्होंने गाड़ी रोक दी। मैने तुरंत सारे देवताओं का नाम जपना शुरू कर दिया, यह सोचकर कि उनमें से कम-से-कम एक तो मुझे बचाएगा ही।" तब उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रबुद्ध स्वामीगण क्यों अपना शरीर धारण करते हैं। वह बड़ी सुंदरता से कहते हैं: "मेरे मन का एक छोटा हिस्सा मेरे शरीर से जुड़ा रहता है, जिससे मैं ईश्वर प्रेम को भोग सकूं तथा भक्तों की संगति का आनंद उठा सकूं।" यह समझ लें कि एक प्रबुद्ध स्वामी अपना शरीर दूसरों के प्रति अससीम करुणा के कारण धारण करता हैं। वह दूसरों में भी यह परिवर्तन लाना चाहता है और शरीर धारण के बाद औरों से जुड़ने में आसानी रहती है। तब स्पष्ट प्रभाव दिखाया जा सकता है। उनकी कोई इच्छा शेष नहीं रहती। वह तो यह शरीर कभी भी त्याग कर सकते हैं। दूसरों के कल्याण के लिए वे इस शरीर को एक पतले अहम् के धागे से बांधे रहते हैं। हम सदा इस शरीर से अधिक-से-अधिक फल प्राप्त करना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि हमारी आंखें अधिक-से-अधिक टेलीविजन देखें; पेट अधिक-से-अधिक स्वादिष्ट भोजन भर ले; कान अधिक-से-अधिक संगीत सुनते रहें। यह सब हम एक व्यसन के कारण ही करते रहते हैं। हम चाहते हैं कि अधिक-से-अधिक इंद्रिय सुख हम भोगें। हमारा शरीर हमारी आत्मा का मंदिर है। हमें अपने शरीर का सम्मान करना चाहिए। हमें अपने शरीर के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए, न कि लालची। हमें इसका

Content: श्रीमद्भगवत गीता 96 धन्यवाद करना चाहिए कि इसने हमारी आत्मा को एक आधार दिया है। यदि हम ऐसा सोचेंगे, तो हम अपने शरीर का एक नया आयाम देख सकेंगे। यहां कृष्ण कहते हैं कि जो भी हम आनंद भोगना चाहते हैं, वह हमारे शरीर तक ही सीमित रहता है। शरीर ही इस आनंद को भोगता है। हमारी आत्मा को इसकी कोई आवश्यकता नहीं। वह तो इनके बगैर भी रह सकती है। हमारी आत्मा तो विशुद्ध बुद्धिमत्ता या चेतना है। इसे अपनी प्रसन्नता के लिए कोई बाहरी सहायता नहीं चाहिए। समस्या तब शुरू होती है, जब हम समझते हैं कि हमारी आत्मा को यह विषय सुख चाहिए। हम प्रसन्नता को बाह्य उपादानों से जोड़ते हैं और उन्हें आत्मा की आवश्यकता समझते हैं। यहीं से समस्या प्रारंभ हो जाती है। हम समझते हैं कि भौतिक विषयक सुख-भोग हमारी आत्मा की प्रसन्नता के लिए आवश्यक है। जब हम इन भौतिक सुख-भोगों को अपने आराम के लिए अधिक एकत्र करते हैं, तो हम इनके पीछे पड़ने लगते हैं। कृष्ण हमें यहां एक योजना बताते हैं। वह कहते हैं कि जब हम अपने शरीर की निष्पक्ष रूप से इन विषय-भोगों का आनंद भोगते हुए देखते हैं और समझते हैं कि यह शरीर ही इनसे जुड़ा है - न इन बाहरी सुखों से - आत्मा नहीं, तब हम सत्य देखते हैं। शरीर को निष्पक्ष रूप से साक्षी भाव से इन भोगों को देखें। अपने शरीर के प्रति पूरी तरह जागरूक रहें। जब हम बाहरी उपादानों से अंतर्क्रिया करते हैं, तो उसे एक अलगाव से देखें। आपके मन में शरीर के अलग होने का एक संतोष उत्पन्न होगा। आप तब स्पष्ट समझ पाएंगे कि शरीर क्या है। आपकी स्पष्ट समझ में आ जाएगा कि आत्मा का इन शरीर भोगों से कोई संबंध नहीं। यह शरीर सुख है, जो हम भोग रहे हैं। कृष्ण इस श्लोक में एक महान सत्य उद्घाटित करते हैं। वह यहां सामूहिक चेतना की बात करते हैं। वह कहते हैं, जब हम परमात्मा को सभी में व्याप्त समझने लगते हैं, तो हमारे अंदर का अलगाव का भाव स्वयं ही तिरोहित होने लगता है। हमें तब सब कुछ एक ही सत्ता का प्रतिरूप लगता है; समस्त ब्रह्मांड पर सत्ता से व्याप्त लगता है - एक ही महान सत्ता, एक ही सत्य को उद्घाटित करती हुई। यह स्पष्ट समझ लें कि हम सब जुड़े हैं। हर जीव दूसरे से जुड़ा है। आपके विचार और आपके निकट बैठे व्यक्ति के विचार में कोई अलगाव नहीं है। आप चाहे मानें या न मानें, यह सत्य है। हम समझते हैं कि हम व्यक्तिगत चेतना हैं। हम मानों अलग-अलग बिखरे दीप समूह हैं। हमारे विचार मानो हमें तक सीमित हैं और हमारे विचार

Content: श्रीमद्भगवत गीता 97 बिखरे दीप समूह हैं। हमारे विचार मानो हमें तक सीमित हैं और हमारे विचार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

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Content: पर किसी का ध्यान नहीं है। पर यह सही नहीं है, क्योंकि समग्र ब्रह्मांड हमारे विचारों का प्रतिसाद देता है। यह समूचा जगत एक ही वैश्विक चेतना से परिपूर्ण है।

Content: वस्तुतः यहां और कुछ है ही नहीं, सिवाय एक वैश्विक चेतना के। व्यक्तिगत चेतना तो सामूहिक चेतना का मात्र एक होलोग्रामनुमा अंश है। क्या अपने होलोग्राम देखा है? क्या होता है, जब आप एक होलोग्राम को पांच हिस्सों में बांट देते हैं? हर भाग पुनः एक पूर्ण होलोग्राम बन जाता है और हर हिस्सा वही सब दिखाता है, जो एक पूर्ण होलोग्राम पहले दिखा रहा था।

Content: हमारी व्यक्तगत चेतना एक होलोग्राम की तरह ही है। वैश्विक चेतना का होलोग्राम कई छोटे-छोटे होलोग्रामों में बिखर जाता है या व्यक्तगत चेतनाओं में। परंतु हर एक में वही चेतना है - वही वैश्विक चेतना।

Content: वस्तुतः हमारी व्यक्तगत चेतना एक प्याज की तरह ही हैं। हम में से सब प्याज की तरह ही हैं। एक प्याज में आपको क्या मिलता है? वहां तो मात्र परतें-ही-परतें हैं; उनकी परतों को हटाते रहें, तो अंदर क्या मिलेगा? कुछ भी नहीं। यही हाल हमारी व्यक्तगत चेतना का है। बाहर से तो आपको भी प्याज ठोस लगती है। वह तो जब उसकी परतें हटाएं, तब मालूम पड़ता है कि अंदर कुछ भी नहीं है। इसी प्रकार आप अपने व्यक्तगत शरीर चेतना की परतें हटाते चले जाएं, तो अंततः आपको मालूम पड़ेगा कि आप भी एक सामूहिक चेतना ही है। एक बार सारी परतें उतार कर देखें तो मालूम पड़ेगा कि आपके पास हर जीव या सत्ता में एक ही चेतना है। आपकी शुरुआत से, आपके जन्म से ही समाज आपको इन परतों में आवृत्त करने लगता है। इस प्रक्रिया में हमारी बाल-प्रकृति, जो हर जगह परमात्मा का एक ही रूप देखती थी, वह हमसे दूर चली जाती है। हम उस प्रकृति को खो देते हैं। बच्चे के रूप में आप कई ऐसे काम करते हैं, जिसके द्वारा आप अपने परमात्मा को देखते हैं; उससे जुड़ते हैं। आपको यह नहीं मालूम होता कि आप मिट्टी या पृथ्वी से अलग हैं। इसलिए आप मिट्टी से (बच्चे के रूप में) खेलते हैं। पर मां-बाप क्या करते हैं? वे आपको डांटते हैं; "मिट्टी से मत खेलो - तुम्हारे कपड़े गंदे हो जाएंगे।"

Content: हम बच्चे पर विभिन्न सामाजिक शर्तें थोपते रहते हैं। बच्चे को क्या मालूम कि क्या गंदा है और क्या स्वच्छ है। वह तो मिट्टी को अपने फर्श का ही हिस्सा समझता है। वह चाहे स्वच्छ घर में खेले या गंदी सड़क पर, वह एक ही ऊर्जा से अपने को जोड़ता है। यह तो बड़े हैं, जो बच्चे को भेदभाव करना सिखाते हैं।

Content: जब हम शरीर-मन के जुड़ाव की वे शर्तें हटा देते हैं, तो हम विशुद्ध चेतना के दर्शन करते हैं। तभी हम समझते हैं कि सब कुछ एक ही रूप है। यही यहां कृष्ण बताते हैं। जब सब में हम एक ही परमात्मा व्याप्त देखते हैं, तो यह स्वाभाविक है कि हम सबसे जुड़े रहेंगे और जब हमारी दृष्टि ऐसी होगी, तब वह सत्य-दृष्टि होगी। हम तब देखते हैं कि समस्त ब्रह्मांड एक ही चेतना का विस्तार है और पूरा विश्व एक ही सत्य की अभिव्यक्ति है।

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Chapter Number: 13

Chapter Name: आत्मा और शरीर

Content: हे कौन्तेय! अनादि होने से और निर्गुण होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होने पर भी वास्तव में न कुछ करता है और न विकार ही होता है।

Chapter Number: 13

Chapter Name: आत्मा और शरीर

Content: जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही देह में सर्वत्र स्थित आत्मा निर्गुण होने के कारण देह से लिप्त नहीं होती।

Chapter Number: 13

Chapter Name: आत्मा और शरीर

Content: हे भारत! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस संपूर्ण लोक (विश्व) को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा संपूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करती है।

Chapter Number: 13

Chapter Name: आत्मा और शरीर

Content: इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को कार्य सहित प्रकृति के अभाव को (विकार सहित प्रकृति से छूटने के उपाय को) जो पुरुष ज्ञान-नेत्रों द्वारा तत्वतः जानते हैं, वे महात्माजन परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं।

Content: कृष्ण फिर (जीवन में स्थित) परमात्मा की असली प्रकृति के बारे में बार-बार कहते हैं। वह अर्जुन को बताते हैं कि आत्मा समस्त फसावों से मुक्त रहती है। वह सबसे परे एवं शाश्वत है। कृष्ण कहते हैं कि यद्यपि आत्मा भौतिक शरीर के संपर्क में निरंतर रहती है, तब भी वह मुक्त रहती है।

Content: पिछले श्लोकों के संदर्भ में हमने कहा था कि शरीर आत्मा का एक मंदिर होता है। किस प्रकार आत्मा शरीर को धारण कर उसका प्रयog पिछले जन्मों की आकांक्षाएं / इच्छाएं पूर्ण करने के लिए करती है। वास्तव में आत्मा कुछ नहीं करती - वह लालच और भय के फसावों में फंसती ही नहीं, मुक्त रहती है। यह तो मन ही है जो लगातार नई इच्छाओं को जोड़ता जाता है और जन्म-जन्मों तक शरीर को व्यस्त रखता है। अंत में स्थित आत्मा सर्वदा मुक्त रहती है। इसका कोई बंधन नहीं होता।

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Chapter Number: 13

Content: कृष्ण एक उदाहरण द्वारा अपनी बात स्पष्ट करते हैं। वह कहते हैं कि आकाश सर्वव्याप्त होते हुए भी आकाश में स्थित किसी वस्तु से कतई प्रभावित नहीं होता। वह आकाश, सूक्ष्म ऊर्जा या ईश्वर सर्वव्याप्त है। कण-कण में यह सूक्ष्म ऊर्जा है। यद्यपि यह हर अणु-परमाणु में है; पर जिसमें वह है उसका कोई प्रभाव इस पर नहीं पड़ता। फूल में भी रहते हुए उसकी गंध से भी अप्रभावित रहती है।

Chapter Number: 13

Content: इसी प्रकार आत्मा अपने आवास-क्षेत्र से अप्रभावित रहती है। लोग समझते हैं, यदि वे पाप करेंगे तो उनकी आत्मा नरक में जाएगी और यदि पुण्य किए हैं, तो स्वर्ग में। वे समझते हैं कि उनकी जीवन में करनी का प्रभाव उनकी आत्मा पर पड़ता है। पर यह समझ लें कि हमारे कर्मों के फल आत्मा पर प्रभाव नहीं डालते। इसकी प्रकृति अदृश्य रहती है, जब हम अपनी करनी के बारे में जागरूक हो जाते हैं, तो हमें समझ में आता है कि यह तो मात्र शरीर ही कर्म करता है। आत्मा इन सबसे मुक्त रहती है। कृष्ण कहते हैं कि जिस प्रकार एक सूर्य समस्त संसार को आलोकित करता है - अर्थात् एक परमात्मा सर्वत्र व्याप्त है, उसी तरह एक क्षेत्रज्ञ समस्त चर और अचर जीवों में रहता है। सबमें एक ही चेतना का प्रकाश है। हमें आश्चर्य हो सकता है कि कृष्ण बार-बार एक ही वस्तु क्यों कहते हैं। वह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ दोनों की अवधारणाएं पूरी तरह स्पष्ट करना चाहते हैं अर्जुन को समझाने के लिए। वह जानते हैं कि अर्जुन इस भेद को पूरी तरह समझ सकें। यह अति आवश्यक है।

Chapter Number: 13

Content: यहां कृष्ण एक नई बात भी कहते हैं। वह कहते हैं कि जिस प्रकार एक सूर्य समस्त जगत को प्रकाशित करता है, शरीर में स्थित आत्मा न केवल शरीर को प्रकाशित (जीवंत) रखती है, वरन् शरीर के चारों ओर और भी, समस्त विश्व को प्रकाशित (या जीवित) रखती है। वह कहते हैं यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः। यदा नाहम् मो था सौ यदा हम बंधनम् तय।।13.34।।

Chapter Number: 13

Content: क्षेत्री स्वयं ईश्वर है। यह आत्मतत्व (ईश्वर) पूरे क्षेत्र को प्रकाशित रखता है। अर्थात् न केवल हमारा शरीर वरन् समग्र क्षेत्र प्रकाशित होता है। हम सबके अंदर उपस्थित चेतना परमात्मा का हologram है। अतः शरीर में उपस्थित चेतना और समग्र में उपस्थित चेतना में कोई अंतर नहीं होता। हर एक के पास एक ही ऊर्जा होती है।

Chapter Number: 13

Content: सूर्य अपने चारों ओर के क्षेत्र को नित्य प्रकाशित रखता है। इसमें वह कोई पक्षपात नहीं करता। जो उसके रास्ते में आता है, प्रकाशित हो जाता है; अंधकार दूर हो जाता है। इसी प्रकार ईश्वर जो हमारे भीतर है, समग्र विश्व को प्रकाशित रखता है।

Chapter Number: 13

Content: करता है। यह हमारा अज्ञान ही है, जो आत्मा को परमात्मा से बिलग करता है। सही बात तो यह है कि परमात्मा और आत्मा के लिए दो अलग शब्दों का प्रयोग भी गलत है। परमात्मा और आत्मा अलग-अलग नहीं हैं। एक ही आत्मा या तत्व है - समग्र विश्व में एक ही परमात्मा है। हम तो वस्तुतः यह भी नहीं कह सकते कि हर एक में वही परमात्मा है क्योंकि जब हम शब्द ‘वही’ का प्रयोग करते हैं, तो लगता है मानो एक ही परमात्मा की प्रतिलिपियां हमारे अंदर हैं। ऐसा कतई नहीं है। यहां केवल परमात्मा है और कुछ नहीं है। इस समग्र विश्व में एक ही परमात्मा है। यह तो हमारा मन है, जो बिना कारण सीमाएं बनाता है - चाहे देशों के मध्य हो या दो व्यक्तियों के। इसलिए देशों में युद्ध होते हैं। हर समय उनके मध्य की सीमाएं बनती और मिटती रहती हैं।

Chapter Number: 13

Content: हम समझते हैं कि हम परमात्मा और आत्मा के मध्य सीमाएं बांध सकते हैं। हम अपनी आत्मा को लालच और भय के डिब्बों में बंद करके रखना चाहते हैं। इन डिब्बों का हम ढक्कन बंद कर देते हैं और उन्हें खोलते हुए भी डरते हैं। हमें लगता है कि यदि ऐसा किया तो हम अपनी पहचान से हाथ धो बैठेंगे। हम व्यक्तगत अहं से अपने आपको जोड़कर रखते हैं। हम दूसरों को दिखाना चाहते हैं कि हम अनोखे हैं।

Chapter Number: 13

Content: हमारा मन (दिमाग) यह जानता है कि हमने जैसे ही डिब्बे का ढक्कन खोला कि आत्मा-परमात्मा एक रूप हो जाएंगे। हमारा मन यह जानता है कि शरीर में आत्मा और संसार में परमात्मा एक ही अस्तित्व है। इन दोनों में कतई कोई अंतर नहीं है। इसलिए मन को भय लगता है कि ढक्कन खोलते ही उसकी अस्मिता विलुप्त हो जाएगी और वह औरों जैसा ही हो जाएगा। यह हमारा मन नहीं होने देना चाहता।

Chapter Number: 13

Content: इसलिए हम अपने व्यक्तगत अहं से जुड़े रहते हैं। लेकिन जब हम यह डिब्बा खोल देंगे और समझेंगे कि इस पूरे ब्रह्मांड में एक ही सत्ता है, तो हम भी परमात्मा में लीन हो सकते हैं।

Chapter Number: 13

Content: यहां अंत में कृष्ण कहते हैं : “यदि हम विशुद्ध साक्षी भाव से रहें, तो हम शरीर-मन की इस कैद से निकलकर शाश्वत चेतना प्राप्त कर सकते हैं।” कृष्ण इस शाश्वत चेतना को पाने की विधि भी बताते हैं।

Chapter Number: 13

Content: साक्षी रहो और मुक्त हो जाओ

Chapter Number: 13

Content: यह समझ लें कि आप शरीर-मन के बंधनों से परे जाकर ही क्षेत्र के साक्षी बन सकते हैं। हमें क्षेत्रज्ञ की तरह देखना चाहिए। जब हम ऐसा करेंगे, तब ही परमात्मा और आत्मा में अलगाव की फालतू रेखा को पहचान पाएंगे।

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Content: हमारे सारे क्रियाकलाप, प्रतिक्रियाएं, भावनाएं, शरीर-मन-तंत्र से ही जुड़ी रहती हैं। हमारी चाल-ढाल; गुस्से या प्रसन्नता का भाव, शोक-हर्ष सब हमारे मन की ही प्रतिक्रियाएं हैं। इनका संचालन शरीर-मन-तंत्र से ही होता है। जब हम इन सब क्रिया-प्रतिक्रिया-भावनाओं को एक निष्पक्ष साक्षी के रूप से होता देख लेते हैं, तो हम स्वयं को इस शरीर-मन-तंत्र से अलग करते हैं। हम सत्य का तब ही दर्शन कर पाते हैं, जब हम इनको ऐसे देखें, जैसे आसमान में तैरते बादल या सामने चलता कोई चलचित्र (सिनेमा)। परंतु अपने मन में उठते विचारों को साक्षी भाव से देखें, यह विचार भी हमारे मन से ही निकलता है यानी इस विचार का पैदा होना मन की सक्रियता बताता है। जब हमें इस विचार की भी अनुभूति न हो, तब ही हम शाश्वत चेतना तक पहुंच सकते हैं। मैं आपकी इसकी विधि समझाता हूँ - इसमें कम-से-कुछ दस मिनट तो लगेंगे ही। अब आप अपने शरीर की हर हरकत, श्वासों का आवागमन, मन में उठते विचार इत्यादि को साक्षी भाव से देखने का प्रयत्न करेंगे। आप पूछ सकते हैं-शरीर में कैसी-कैसी हरकतें होती हैं। जब आप सांस लेते हैं या छोड़ते हैं, तो आपका पेट निरंतर चलता रहता है। श्वास के आवागमन के समय यह पेट की एक हल्की-सी हरकत है, जो चलती रहती है। इस हरकत को साक्षी भावी से देखें। अब अपनी श्वासों के आवागमन को निहारिए, बिना उनमें कोई व्यवधान डाले या नियंत्रित करने की चेष्टा करते हुए। तीसरी बात, अपने मन को देखिए। विचार-प्रवाह तो चल ही रहा होगा। हम शरीर-मन-तंत्र से कभी त्राण नहीं पा सकते, यदि हम इनसे लड़ते रहेंगे। कुछ देर को अपने मन के पास एक घनिष्ठ मित्र की तरह बैठे बिना विश्लेषण करें कि उसमें उठते विचार सही हैं या गलत। इस मन को सब कुछ कहने दीजिए, जो यह चाहता है - बिना रोके-टोके या कोई व्यवधान उपस्थित किए। इन सबको निरासक्त होकर साक्षी भाव से निहारें - न कुछ रोकें, न श्लेषित करें, न रोकें। हम अपने मन शरीर से निरंतर लड़ते रहते हैं - ऐसे तो इनसे त्राण हम कभी नहीं पा सकते। हम इसे मित्रवत् व्यवहार द्वारा ही प्राप्त कर सकते हैं। यदि हम शरीर मन की सब हरकतों को एक घनिष्ठ मित्र की भांति देखें, तो हम उनके परे भी जा सकते हैं। यदि मन-शरीर के प्रति एक ऋणात्मक घटित हो सकता है। मित्र भाव से साक्षी रहें और अंदर की बातों बाहर आने दें। उसमें कोई खराबी नहीं है। न कुछ दबाएं, न हटाएं, न साथ रहें, न विमुख रहें। यदि

Content: इस तंत्र को सहायता दी, तो हम गंदगी के पीछे जाते हैं और यदि इसका विश्र्लेषण किया तो इसको और खंड-खंड कर गंदगी बढ़ा देंगे। अतः बीच में पढ़े ही नहीं - मात्र साक्षी बने रहें। साक्षी भाव एक अग्नि की तरह होता है जो विचारों को जलाकर समाप्त कर देता है। मात्र यही भाव कारगर रहेगा, दबाना या रोकना नहीं। जैसा मन कहे, उसे कहने दीजिए! जब हम अपने अंतःकरण में गहरे उतरते हैं, हमारी साक्षी भाव प्रदत्त चेतना स्वतः एक बुद्धिमत्ता का सृजन कर देती है। यह समझ लें कि प्रतिदिन चौबीस घंटे इस मानसिकता में रहने की आवश्यकता नहीं है। यदि हमें एकाध झलक मिलने लगी है, तो यह भी बहुत है। इन झलकों से प्राप्त ऊर्जा हमारे जीवनभर के मार्ग-निर्देशन को काफ़ी है। यदि इस साक्षी भाव की अवस्था के दौरान मस्तिष्क की अनुभूति हुई है - चाहे कुछ क्षणों के हों - तो हमें उसकी 'लत' लग जानी चाहिए और हम इसके लिए निरंतर प्रयत्न जारी रखने लगेंगे। इन्हीं कुछ क्षणों में हमें महान् ऊर्जा की उपलब्धि होती है। हर बड़े सिद्धांत या सत्य की खोज इसी चेतना या अंतप्रज्ञा से प्राप्त होती है, जो शरीर-मन तंत्र से परे होती है, फिर चाहे वह आइंस्टीन का प्रसिद्ध सापेक्षतावाद का सिद्धांत (दि थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी) हो या कोई अन्य वैज्ञानिक महान् खोज। ये सब साक्षी चेतना का प्रतिफल हैं। यह सत्य न केवल वैज्ञानिक क्षेत्र में लागू होता है, वरन् हर क्षेत्र में, जिनमें शामिल है आध्यात्मिकता का क्षेत्र भी। जब हम शारीर-मन तंत्र के परे जाते हैं, तो हम अपने अस्तित्व का अधिकतम लाभ प्राप्त करते हैं। जब हम हर तरह से संपूर्ण होते हैं, तब ही हमारा अस्तित्व अपनी चरम अभिव्यक्ति दे पाता है। हम पूर्ण पवित्र होते हैं, जब संपूर्ण होते हैं। यह समझ लें कि यह साक्षी भाव ही एकमात्र रास्ता है संपूर्ण पवित्रता या ईश्वर से साक्षात्कार का। आइए हम परमात्मा, भगवान् कृष्ण - चरम साक्षी चेतना - से प्रार्थना करें कि हमें एक ऐसा आंतरिक अंतरिक्ष प्रदान करें जहाँ विशुद्ध साक्षी चेतना रह सके, जिससे हम नित्यानंद का चरम अनुभव और शाश्वत आनंद प्राप्त कर सकें। इस प्रकार - संपन्न हुआ उपनिषद् भगवत् गीता का 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग' शीर्षक वाला १३वाँ अध्याय जिसमें परमात्मा के स्वरूप पर कृष्ण-अर्जुन संवाद के रूप में योग-शास्त्र विज्ञान पर चर्चा की गई है।

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Chapter Number: 14

Chapter Name: गुणत्रय विभाग योग

Content: मनुष्यों के पास विकल्प है : कि वे अज्ञानी रहें या प्रबुद्ध हो जाएं; परंतु अपनी स्वच्छंद वृत्ति अपनाकर हम अज्ञानी ही बने रहते हैं; कृष्ण हमें बताते हैं कि कैसे हम प्रबुद्ध हो सकते हैं।

Chapter Number: 14

Chapter Name: अपने अनुकूलन (वृत्ति) को त्यागो

Content: एक लघु कथा एक स्कूल के सत्र के अंतिम दिन विद्यार्थीगण अपनी एक महिला शिक्षक से मिलनें आए। पहले विद्यार्थी ने अपनी शिक्षिका को एक खूबसूरत बंधा हुआ बंडल दिया। उस बच्चे के पिता एक बेकरी चलाते थे। उस शिक्षिका ने उस पैकिट को हिलाकर देखा और कहा-"क्या इसमें पेस्ट्रीज़ हैं?" बच्चे ने कहा-"हाँ।" दूसरे बच्चे ने भी एक सजा-सजाया बंडल दिया और शिक्षिका ने उसे भी हिलाकर देखा और कहा-"क्या इसमें मेरे लिए कोई पोशाक है?" उस बच्चे ने कहा-"हाँ।" तीसरा बच्चा एक लड़की थी, उसके हाथ में भी एक सजा-सजाया डिब्बा था। उसके पिता की शराब की दुकान थी। शिक्षिका ने वह डिब्बा ले लिया, पर उसमें से कोई द्रव बाहर निकल रहा था। शिक्षिका ने कहा-"क्या इसमें वियर रखी है?" बच्ची ने कहा-"नहीं।" शिक्षिका ने पुनः अपनी उंगली पर वह द्रव लेकर चखा और कहा-"यह तो बड़ा स्वादिष्ट पेय है? क्या यह कोई उम्दा वाइन है?" उस बच्ची ने उत्तर दिया-"नहीं।" अब शिक्षिका ने हारकर कहा-"अच्छा तो मैं हारी! तुम ही बताओ यह क्या है?" बच्ची ने थोड़े चिंतित स्वर में कहा-"इसमें एक छोटा-सा पिल्ला (कुत्ते का बच्चा) है।" जब हम अपने निर्णय, अपने पूर्व संस्कार या जमी हुई स्मृतियों के आधार पर लेते हैं तो समस्याएं पैदा हो जाती हैं। उस शिक्षिका के पहले दो अनुमान सही थे। पहले बच्चे के पिता की बेकरी की दुकान थी तो उसने पेस्ट्री भेजी। दूसरे के पिता की कपड़े की दुकान थी तो वह उसके लिए पोशाक लाया। इसी क्रम में जब वह लड़की, जिसके पिता की शराब की दुकान थी, बंडल में भेंट लाई

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Chapter Number: 14

Content: 14.1 भगवान (कृष्ण) बोले-“ज्ञानों में अति उत्तम उस परम ज्ञान को मैं फिर कहूंगा जिसको जानकर सब मुनिजन, इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो जाते हैं।

Chapter Number: 14

Content: 14.2 इस ज्ञान की आश्रय पाकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए पुरुष सृष्टि के आदि में पुनः उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकाल में भी व्याकुल नहीं होते।

Chapter Number: 14

Content: 14.3 हे भारत! मेरी महत् ब्रह्म रूप प्रकृति अर्थात् त्रिगुणमयी माया - सम्पूर्ण भूतों की योनि है और मैं उस योनि में चेतन समुदाय रूप गर्भ का स्थापन करता हूं!

Chapter Number: 14

Content: 14.4 तथा हे कौन्तेय! नाना प्रकार की सब योनियों में जितनी मूर्तियां अर्थात् शरीर उत्पन्न होते हैं, उन सबकी त्रिगुणमयी माया महत् ब्रह्म रूप प्रकृति तो गर्भ धारण करने वाली माता है और मैं बीज स्थापित करने वाला पिता हूं।

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Content: स्मृति गहराई से गढ़ना चाहते हैं, जिससे अर्जुन उसका पालन करने लगे, इसलिए वे सत्य को बार-बार दोहराते हैं। वे स्वयं कहते हैं- 'मैं तुझे एक बार और बताऊंगा वह सत्य, वह ज्ञान, जिसका पालन कर सारे ऋषि-मुनि परम सिद्धि को प्राप्त हो गए हैं।' ''मैं यह शब्द और जुमले इसलिए नहीं दोहराता हूँ कि मेरे पास कुछ और कहने को नहीं है। इन शब्दों और वाक्यों में वह शक्ति है जो तेरे (अर्जुन के) मानस में पैठ सकते हैं। यदि तू ऐसा करने की अनुमति देगा तो वें तुम्हें बदलने में सहायता करेंगे।'' यही मैं कहता हूँ। इन शब्दों और वाक्यों को अपने अंदर उतरने दो। ये शब्द सुनो तो उन्हें अपने मानस में धंसने दो क्योंकि इनमें वह शक्ति या ऊर्जा है कि वे तुम्हारे अंदर एक इन्कलाब ला सकते हैं, तुम्हें बदल सकते हैं।

Content: थे और उस सत्य को जानना चाहते थे, जो उनकी समझ में नहीं आ रहा था। एक युवा व्यक्ति, जिसने विवेकानंद के बारे में पढ़ रखा था, मेरा एक प्रवचन सुनने भारत आया था। मैंने पूछा-''तो तुमने विवेकानंद के बारे में पढ़ा है?'' पर विवेकानंद की तरह इस व्यक्ति को सत्य जानने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह तो यह बताना चाहता था कि स्वयं कितना 'स्मार्ट' है। उसने गर्व से कहा-''हां, और मैं भी आपसे यही प्रश्न पूछता हूँ।'' वह समझ रहा था कि मैं भी रामकृष्ण की तरह विनम्र और विनीत रहूंगा। मैंने उसकी कमीज़ का कॉलर पकड़कर कहा-''मैंने न केवल ईश्वर को देखा है, वरन् मैं तुम्हें भी दिखा सकता हूँ। विवेकानंद रामकृष्ण का अनुसरण करने को तैयार थे। तुम भी तैयार हो जाओ मेरे अनुयायी होने के लिए और मैं तुम्हें ईश्वर का दर्शन कराऊंगा।''

Content: उसने स्वयं को मुझसे छुड़ाने का संघर्ष किया और भाग गया। वह इतना डर गया था कि पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। ईश्वर का अनुभव तब ही हो सकता है जब दिमाग को इस प्रक्रिया से अलग कर दें, क्योंकि वह हमारे दिमाग से परे है। हम तर्क या बुद्धि द्वारा कैसे उसके अस्तित्व को सिद्ध कर सकते हैं? जो दिमाग या इसकी सारी ताकतों की पहुंच से ही बाहर हो, उसे हम कैसे 'समझ' सकते हैं क्योंकि यदि हम उसे समझ सकते हैं तो वह हमसे श्रेष्ठ कैसे है? हमसे बेहतर कैसे है? या वह फिर हमारा ईश्वर कैसे हो सकता है?

Content: क्या ईश्वर है? (विद्यमान है?) कई धार्मिक कर्मकांड ऐसे हैं जिनका उद्देश्य हमारे मन में अच्छे संस्कार पैदा करना होता है - यथा मंदिर-मस्जिद-चर्च जाना, प्रार्थना समुहों में भाग लेना, रत्नसंग में प्रतिभागी होना, जिसमें हमारी आध्यात्मिकता को बल मिले। ये सब गतिविधियों एक माहौल बनाती है, सही निर्णय करने के लिए एक सही मानसिकता का निर्माण करती हैं, परंतु मात्र यह क्रिया-कलाप ही हमें युक्त या प्रबुद्ध नहीं बना सकता, पर हमारे अचेतन को एक दिशा देकर नियतत्रित करने का प्रयास कर सकता है कि हम एक निश्चित मार्ग पर चलें। यह हमारा पुनर्गठन कर सकता है। कुछ लोगों का मत है - यह सारे कर्मकांड तर्कहीन और अवैज्ञानिक हैं। विज्ञान तो उन तथ्यों के लिए है जो रिकार्ड किए जा सकते हैं जबकि आध्यात्मकता का संबंध उस सत्य से होता है जिसका अनुभव करना आवश्यक है। इसी कारण हमारे शास्त्र-ग्रंथों ने ऐतिहासिक रूप से सही सत्य और तथ्यात्मक विवरण प्राप्त करने की कभी परवाह नहीं की। वे तो उन मुद्दों पर केंद्रित रहे जो हमारी चेतना पर प्रभावी होते हैं। अपने शास्त्र-ग्रंथों को समझने के लिए हमें तर्क की नहीं, ध्यान की आवश्यकता है। सत्य का हमारी बौद्धिक चेतना या दिमाग से कोई सरोकार नहीं, वह तो हमारे समूचे अस्तित्व से जुड़ा होता है।

Content: प्रायः लोग मुझसे पूछते हैं-''क्या आप ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध कर सकते हैं?'' प्रबुद्ध होने के पूर्व स्वामी विवेकानंद ने भी अपने गुरु रामकृष्ण से पूछा था कि क्या वे उन्हें ईश्वर का दर्शन करा सकते हैं। विवेकानंद ने यह प्रश्न अपने गुरु को परेशान करने के लिए नहीं पूछा था-वे तो अपने गुरु से बेहद प्रभावित

Content: श्रीमदभगवत गीता 110

Content: जब हम ईश्वर की दिव्यता की बात करते हैं तो हम एक अवधारणा से जूझते हैं तथा अपनी सीमित मानस शक्ति के द्वारा एक सिद्धांत बनाना चाहते हैं। इससे ज्यादा हम कुछ कर भी नहीं सकते, क्योंकि यदि वह मात्र एक अवधारणा है तो हम उसे सिद्ध कर सकते हैं या नहीं कर सकते। इन्हीं अवस्थाओं में हम उसके भक्त या उसको न मानने वाले नास्तिक बन सकते हैं।

Content: नास्तिक होने के लिए साहस चाहिए। नास्तिक शायद ईश्वर के बारे में परम आस्तिकों से भी ज्यादा सोचता रहता है। जब हम पूरी सक्रियता से किसी बात या अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते तो हमें ज्यादा जागरूक और चाक-चौबंद होना पड़ता है, इसलिए किसी भी आस्तिक से, नास्तिक ईश्वर के बारे में ज्यादा जागरूक रहता है।

Content: ईश्वर का सिर्फ अनुभव किया जा सकता है। यही कृष्ण चाहते हैं कि अर्जुन करे। वस्तुतः वे अर्जुन को उस अवस्था तक स्वयं ले गए थे जब उन्होंने अपना विश्वरूप अर्जुन को दिखाया था। अब कृष्ण चाहते हैं कि बाकी सारी मानवता को उस स्तर तक ले जाएं। इसलिए बार-बार वे उन तरकीबों का जिक्र

Content: श्रीमदभगवत गीता 111

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Content: करते हैं जिससे हम सब इस दिव्यता की अनुभूति कर सकें। अपनी गहन करुणा में वे हमें उस जीवन-रेखा को दिखाते हैं जिसके द्वारा हम सभी का उद्धार हो सके। यहां पहली बार कृष्ण कहते हैं कि हम सब उसकी अवस्था तक पहुंच सकते हैं। अभी तक उन्होंने कहा था-“मेरी पूजा करो; मुझ में अपना समर्पण कर दो”, परंतु अब वे कहते हैं-“तुम भी मेरी अवस्था तक पहुंच सकते हो। कोई भी मेरी भावातीत प्रकृति प्राप्त कर सकता है।” अर्थात् हम भी उनकी अवस्था तक पहुंच सकते हैं, जिसमें वे हैं। कृष्ण वे पहले स्वामी हैं जो इतने साहसी और निर्भीक हैं, जो कहते हैं कि प्रबोधन के लिए सभव है और इसे कोई भी प्राप्त कर सकता है। प्रबोधन अचानक नहीं होता। यह वह संभावना है जो हम सब प्राप्त कर सकते हैं। कृष्ण से पूर्व पहले के सभी उपनिषद, ब्रह्मसूत्र एवं शास्त्रादि कहते थे कि प्रबोधन एक अचानक होने वाली घटना है। कुछ लोग प्रबुद्ध जरूर हुए, पर यह किसी को नहीं मालूम कि कैसे हुए या क्यों हुए? यह भी किसी को नहीं ज्ञात हो पाया कि बाकी सब प्रबुद्ध क्यों नहीं हो पाए या अगर हो सकते हैं तो कैसे हो? किसी को इसका ज्ञान नहीं। सिर्फ यही मालूम था कि कुछ प्रबुद्ध हो गए-मानो ईश्वर सभी के प्रार्थना-पत्रों पर विचार कर रहा हो और कुछ को स्वीकार कर उसने कहा-“तुम प्रबुद्ध हो गए” और तुरंत ही वे लोग प्रबुद्ध हो गए। कृष्ण वे पहले स्वामी हैं जिन्होंने बताया कि कैसे अपना प्रार्थना-पत्र या 'रिज्यूम' लिखना चाहिए प्रबोधन के लिए। उन्होंने बताया कि प्रबोधन अचानक नहीं होता, उसके लिए यत्न करना पड़ता है और कैसे इसे प्राप्त किया जा सकता है। इसका अनुभव हम अपने जागृत निर्णय द्वारा प्राप्त करते हैं। वे कहते हैं कि यह ज्ञान होने पर 'हम वह अवस्था प्राप्त कर सकते हैं' वे यह नहीं कहते-“अर्जुन! सिर्फ तू ही इसे प्राप्त कर सकता है।'' उनका कहना है कि प्रयत्न करे तो इसे कोई भी प्राप्त कर सकता है। अपने अर्जुन को विश्वरूप दर्शन के पश्चात् जो कुछ कृष्ण अर्जुन से कहते हैं वह सारे विश्व के लिए बताया जाता है। अर्जुन को तो जो प्राप्त करना था वह प्राप्त हो ही चुका था। उसके बाद तो कहने को कुछ बचता ही नहीं था। अर्जुन ने कृष्ण का 'विश्व-रूप' देखा था। दशम अध्याय में विश्व-रूप का दिखाया गया है और १२वें अध्याय से आगे जो कुछ कृष्ण कहते हैं या जो उनका उपदेश है-वह समग्र मानवता के हित के लिए है। जैसे एक वैज्ञानिक चीजों को बनाने के लिए बाहरी विश्व में अपना फार्मूला (सूत्र) बनाता है, उसी प्रकार एक आध्यात्मिक गुरु एक सूत्र बनाता है

Content: श्रीमद्भगवत गीता 112 जिससे आंतरिक विश्व की अनुभूति होती है। कृष्ण कहते हैं-“अपने आपको इस ज्ञान में प्रतिष्ठित कर तुम भी यह अनुभव प्राप्त कर सकते हो या तुम भी उस अवस्था में आ सकते हो जिसमें मैं रहता हूं।'' यहां 'मम' शब्द का इस्तेमाल हुआ है जिसका अर्थ है 'मेरी अपनी' (अवस्था)। “इस सत्य का अनुभव तुम्हें भी उस अवस्था में ले जाएगा जो मेरी है।'' कृष्ण यहां उस सत्य की बात करते हैं जो शाश्वत है और जीवन-मृत्यु के चक्र से परे है। यह शाश्वत अवस्था सृजन और विनाश के परे है; यह विगत या आगत से नहीं बांधी जा सकती। शाश्वत का अर्थ है यहां सदा रहने वाला अर्थात् शाश्वत यानी वह वर्तमान क्षण जो हमेशा रहता है। कृष्ण उन दार्शनिक प्रश्नों का यहां उत्तर दे रहे हैं जिनका उत्तर वास्तव में कभी दिया ही नहीं जा सकता-कैसे यह संसार ब्रह्मांड बना? यदि सब कुछ ईश्वर ही है तो यह ब्रह्मांड बना ही क्यों? हम कैसे पैदा होते हैं? इन प्रश्नों का जिसने भी उत्तर देने का प्रयास किया, उसने अपना एक नया दर्शन खड़ा कर दिया। एक बार किसी ने अपनी हताशा में मुझसे भी यही प्रश्न पूछे थे-हम क्यों पैदा हुए? हमें जन्म लेने की आवश्यकता ही क्यों है? यह पूरा नाटक क्यों होता है कि जन्म लेना, ध्यान लगाना और प्रबोधन प्राप्त करना? क्यों? यह नाटक किसके लिए होता है? यदि हमें कर्मानुसार फल भुगतने पड़ते हैं तो हम कर्म करते ही क्यों हैं? इसका उद्देश्य क्या है? क्यों यह अनंत चक्र चलता ही रहता है? कृष्ण इन्हीं प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास करते हैं, परंतु यह उत्तर अंतिम सत्य नहीं बताता। वे कहते हैं-“अभी रुको! यह उपदेश पूरा हो जाने दो।'' साधारणतया जब हमें अपने दार्शनिक प्रश्नों का उत्तर नहीं सूझता तो हम उन प्रश्नों में इतने उलझ जाते हैं कि ध्यान कर ही नहीं पाते, क्योंकि बार-बार या हर समय यही प्रश्न हमारे मन में घूमते रहते हैं। हम बार-बार उसी या उन्हीं प्रश्नों पर लौटकर आ जाते हैं। यहां अर्जुन भी बार-बार एक ही प्रश्न पर लौटकर आता है और वहीं उलझ जाता है। उसको ध्यान करने की सहूलियत देने के लिए और उसे एक विशुद्ध समझ देने के लिए कृष्ण यहां उसको एक उत्तर सुझाते हैं। एक दिन मैं भी ऐसे ही एक उदाहरण से गणित सूत्र में उलझ रहा था। मान लीजिए वह सूत्र है : x + 2 = 4 । प्रारंभ में शिक्षक एक कल्पना कर कहेगा-“मान लो कि 'x = 2' के है।'' फिर x को दो से प्रतिस्थापित कर दो और 2+2=4 हो जाएगा। यानी प्रश्न हल हो गया। फिर शिक्षक कहेगा-“चूंकि प्रश्न हल हो गया है, हम मानेंगे कि हमारी कल्पना 'x=2' सही है, लेकिन जब तक हम इस हल तक पहुंचे, हम तो यहां मानेंगे कि x=2 के।''

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Chapter Number: 14

Chapter Name: प्राकृतिक गुण

Content: हे महाबाहो! सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण-ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बांधते हैं।

Chapter Number: 14

Chapter Name: प्राकृतिक गुण

Content: हे निष्पाप! इन तीनों गुणों में सत्वगुण तो निर्मल होने के कारण प्रकाश वाला और विकार रहित है - वह सुख के संबंध से और ज्ञान के अभिमान से बांधता है।

Chapter Number: 14

Chapter Name: प्राकृतिक गुण

Content: तथा हे कोतेय! रागरूप रजोगुण को, कामना और आसक्ति से उत्पन्न हुआ जान। वह इस जीवात्मा को कर्मों और उनके फलों की आसक्ति से बांधता है।

Chapter Number: 14

Chapter Name: प्राकृतिक गुण

Content: और हे भारत! सब देहाभिमानियों को मोहित करने वाले तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न जान। वह इस जीवात्मा को प्रमाद, आलस्य और निद्रा द्वारा बांधता है।

Chapter Name: अपने संस्कारों से परे जाएं

Content: यह तीन प्रकार की जमी और गहरी स्मृतियां या संस्कार हमारे संपूर्ण

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Content: जीवन के नियंता होते हैं। उनका ज्ञान ही वह मूलभूत ज्ञान है जो सफल जीवन-यापन की कामना करने वाले के पास अवश्य ही होना चाहिए। आयुर्वेद की पूरी पद्घति इन्हीं तीन गुणों के आधार पर चलती है, जो हमारे शरीर-मन तंत्र को प्रभावित करती है। यह एक तरह का ‘ऑनर्स मैनुअल‘ (प्रयोगकर्ता के लिए निर्देश पुस्तिका) है मन के परिप्रेक्ष्य में (अर्थात् इन गुणों के प्रभाव में हर व्यक्ति अपने मन को किस प्रकार संचालित करता है)। किसी भी उत्पाद (वस्तु) का यदि हमें ‘ऑनर्स मैनुअल‘ प्राप्त नहीं होगा तो, या तो हम उस उत्पाद की उपादेयता से वंचित रहेंगे या उस उत्पाद का प्रयोग सही रूप में नहीं कर पाएंगे। कं्यूटर के आजकल अनेकष्ठ उपयोग एवं फीचर्स प्रचलित हैं। एक सादा कैलकुलेटर के ऐसे सैकड़ों उपयोग हो सकते हैं जिनका हमें ज्ञान नहीं होता। हम तो सिर्फ उसे सादा जोड़-घटाना-भाग-गुणा ही प्रयोग करते हैं और इसके अन्य उपयोगों से वंचित रह जाते हैं। इसी प्रकार हम अपने मस्तिष्क की क्षमता या उसकी योग्यताओं से परिचित नहीं रहते, क्योंकि हमारे पास भी ‘ऑनर्स मैनुअल‘ नहीं होता। इन तीन प्रकार की जमी हुई गहरी स्मृतियों या संस्कारों से हमारे दिमाग के सोचने-समझने का तरीका या ‘ऑनर्स मैनुअल‘ बनता है। चूंकि हम इन मूलभूत गुणों से पूरी तरह वाकिफ नहीं होते, जीवन में संभाव्य क्षमताओं के बारे में हम बिल्कुल आशिर रह जाते हैं, जो हमारे अवगत हो पाते हैं; यदि हमारे पास ‘ऑनर्स मैनुअल‘ हो, हम जीवन के विविध सौंदर्य और क्षमताओं को अच्छी प्रकार जान सकते हैं। इसके अभाव में हम इस ज्ञान से वंचित ही रह जाते हैं। सतही तौर पर यदि देखें तो संस्कार एक गहरी जमी हुई स्मृति है, जिसके प्रभाव से हम बाधित रहते हैं चले-चले पथ पर दोबारा चलने के लिए और इस प्रकार हम एक बंधे चक्र में ही घूमते रहते हैं और बार-बार उस पथ पर चलते हुए हम उन जमी हुई स्मृतियों को उत्तरोत्तर गहरा करते रहते हैं। आधुनिक विज्ञान इस प्रक्रिया को समझाता है-प्रयोगों से सिद्ध हो चुका है कि एक से ही भावनात्मक अनुभव मस्तिष्क में उस भाव को ग्रहण करने के कई स्वीकार-तंतु (रिसेप्टर्स) पैदा करता रहता है। शरीर शास्त्र विज्ञान यह बताता है कि हम जितना क्रोध दिखाएंगे, उतने ही उस क्रोध के स्वीकार-तंतु दिमाग में ज्यादा विकसित होते रहेंगे। हमारे महान ऋषि-ऋणिगण हजारों वर्ष से इस तथ्य को समझते रहे हैं। यदि हम कुछ मनोभावों की अभिव्यक्ति नहीं करें तो धीरे-धीरे उस भाव-बोध को ग्रहण करने वाले स्वीकार-तंतु स्वयं ही मस्तिष्क से निरोहित होते चले जाएंगे अर्थात् हम जितना ऋणात्मक भाव बोध से बचेंगे, उतना ही वे हमें कम परेशान करेंगे। इसके विपरीत जितना अधिक हम उसको अभिव्यक्त करेंगे, उतने ज्यादा वे हमें उनको अभिव्यक्त करने के लिए आदी बनाते जाएंगे। असल

Content: में किसी आदत के गुलाम बनाने के पीछे यही तथ्य काम करता है। यही हमें किसी चीज का आदी बनाता है। कृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि कैसे हम इन तीन स्तर वाली स्मृतियों में फंसते रहते हैं और कैसे वे हमें खींचती रहती हैं। यह तो वैसा ही है जैसे मानों हमारी तीन पत्नियां हों। जब एक पत्नी हो तो प्रबोधन हमारे लिए एक विलास (लुजरी) है। यदि दो पत्नियां हों तो प्रबोधन हमारे लिए एक विकल्प बनकर उभरता है, लेकिन जब तीन पत्नियां हों तो प्रबोधन हमारे लिए अत्यावश्यक हो जाता है। यदि किसी के पास तीन पत्नी या तीन पति हों तो बिना प्रबोधन प्राप्ति के विस्तार संभव नहीं होता। तब प्रबोधन अपरिहार्य हो जाता है। यहां कृष्ण बताते हैं कि कैसे इन जमी गहरी स्मृतियों या संस्कारों के साथ जीवन-यापन किया जाना चाहिए। एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है कि चूंकि ये जमी स्मृतियां जीवन्त ऊर्जा का रूप होती है, इनका प्रयोग हम शुभ या अशुभ कार्यों के लिए समान रूप से कर सकते हैं। यदि किसी के पास ऊर्जा है तो हम उस ऊर्जा को अच्छे कार्यों की ओर मोड़ भी सकते हैं। मैं कारागारों में जाकर ध्यान पढ़ाती सिखाने के अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि किसी कैदी से ज्यादा ध्यान करवाने के लिए कोई प्रयत्न या चेष्टा नहीं करता। हम प्रायः अपने ध्यान के प्रोग्राम जेलों में करते हैं। कैदी लोग इस प्रक्रिया में इतने संलिप्त हो जाते हैं कि साधारण जनों की तुलना में वे गहरा ध्यान लगाने में ज्यादा सक्षम रहते हैं। जब कैदी ध्यान से उठते हैं तो वे इसका प्रभाव ज्यादा दिखाते हैं। वे पूरी शिद्दत से ध्यान करते हैं। वे कोई काम आधे मन से शायद करते भी नहीं हैं, इसलिए जब वे बदलते या सुधरते हैं तो उनका जीवन पूरी तरह से बदल जाता है। जब हम महान भारतीय ऋषि-मुनियों या एक अत्यंत महान संत अरुण गिरिनाथर के जीवन पर दृष्टि डालते हैं तो पाते हैं कि उनमें से ज़्यादातर बड़े पापी थे, परंतु उनके जीवन में एक आमूल-चूल या संपूर्ण परिवर्तन आ गया था। उनका पूरा जीवन ही नहीं, अस्तित्व ही बदल गया था। यह बदलाव उसी शिद्दत से आता है जिस शिद्दत से हमारा मस्तिष्क या मन प्राप्त सूचनाएं-आंकड़े (या भाव) ग्रहण कर उनको संस्कारित कर उनकी परिणति दिखाता है। जब यह संज्ञानित बदलाव होता है तो हमें जो आंकड़े मिलते हैं, उनको हम प्रक्रिया में डालकर उसकी दिशा निर्धारित करते हैं। बदलाव की अवस्था में यह प्रक्रिया अंदर से बाहर नहीं, वरन बाहर से अंदर की ओर होने लगती है। तक प्रतिक्रिया बहिर्मुखी रहती है, हम अवसाद की ओर जाते रहते हैं, पर जैसे ही यह अंतर्मुखी होती है, हम आनंद को अनुभूति पाने लगते हैं।

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Content: उदाहरण के लिए जब हमारे किसी घनिष्ठ साथी या संबंधी की मृत्यु होती है तो हम या तो आध्यात्मिक होने लगते हैं या हताशा हम पर हावी होने लगती है। हम सोच सकते हैं—“खैर! मरना तो मुझे भी है तो मैं क्यों न वह करूं जो मैं चाहता हूँ।” या हम निर्णय कर सकते हैं—“मैं भी तो एक दिन मरूंगा तो मैं जो सीख सकता हूँ, सीख लूँ और अपनी वृद्धि सुनिश्चित कर लूँ।”

Content: एक लघु कथा

Content: एक आदमी को फांसी दी जाने वाली थी। वहां का (जेल का) अधिकारी आया और उसने उस व्यक्ति से पूछा कि क्या उसकी कोई अंतिम इच्छा है? उस कैदी ने कहा—“नहीं।” तो उस अधिकारी ने कहा—“फिर तुम ईश्वर से प्रार्थना कर लो और उससे क्षमा मांग लो तथा कृपा की याचना कर लो। हम एक पुरोहित को भी इसके लिए यहां ला सकते हैं।”

Content: उस कैदी ने कहा—“मैं ईश्वर को याद तो करना चाहता हूँ, पर वैसे नहीं जैसे तुम कह रहे हो। यदि मुझे मालूम होता कि मुझे अपने अपराधों के लिए यह सज़ा मिलेगी तो मैं कुछ और भी अपराध कर लेता।” वह फिर बोला—“यदि मालूम होता कि फांसी मिलेगी तो कुछ और अपराध भी कर लेता, जो करना चाहता था। इसलिए मैं यदि ईश्वर को याद करूंगा तो उससे कहूंगा कि उसने पहले मुझे क्यों नहीं आगाह किया कि मैं फांसी पर लटकाया जाऊंगा। इसके लिए मुझे पुरोहित की क्या ज़रूरत होगी?”

Content: जब लोग समझ लेते हैं कि मृत्यु तो अवश्यभावी है तो वे सोचते हैं—“यदि मृत्यु हो ही चरण अंत है तो क्यों न मैं ईश्वर की ओर ध्यान लगाकर आत्मलीन हो जाऊं और ईश्वरत्व को प्राप्त कर लूँ। परंतु कुछ लोगों की प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग होती है। वे सोचते हैं—“मरना तो मरना ही है तो क्यों न मैं अपने मन की इच्छा पूरी कर लूँ जो मैं हमेशा करना चाहता था।” इनमें प्रथम प्रतिक्रिया वाले लोग ध्यान की ओर आकर्षित होते हैं और दूसरी प्रतिक्रिया वाले बाहर के विश्व में दूने ज़ोर से लग जाते हैं। यानी हम जो पथ चुनते हैं वह हमारी अपनी रुचि के अनुसार होता है।

Content: कृष्ण बताते हैं कि कैसे मोहन स्मृतियां हमारे मन की प्रतिक्रिया पर प्रभाव डालती हैं और यह समझ ही वह रास्ता है जो हमारे अस्तित्व को पूरी तरह बदल सकती है।

Content: इन श्लोकों को समझाने के पूर्व मैं आपको एक छोटे से रेखाचित्र (डायग्राम) के माध्यम से यह दिखाना चाहता हूँ कि कैसे 'एनग्राम' हमारे

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Content: श्रीमद्भगवत गीता

Content: निर्णयों को प्रभावित करते हैं और कैसे हम इनके प्रभाव क्षेत्र से बाहर आ सकते हैं।

Content: पहले यह समझ लें कि कैसे हमें सूचना मिलती है (या कैसे आंकड़े प्राप्त होते हैं) और पहले हम कैसे इन्हें प्रक्रिया में डालकर अपने निर्णय लेते हैं। पहले हम अपनी आंखों के माध्यम से कुछ देखते हैं। मैं यहां दृष्टि का उदाहरण ले रहा हूँ। आप चाहें तो आप इसको किसी अन्य इंद्रिय से प्राप्त बोध द्वारा प्रतिस्थापित कर सकते हैं—यथा श्रवण, घ्राण–शक्ति, स्वाद लेना या स्पर्श। इन पांचों ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त कोई भी बोध यहां प्रयुक्त किया जा सकता है।

Content: दिमाग काम कैसे करता है

Content: बाहरी विश्व और हमारे बीच ज्ञान बोध प्रदान करने वाली पांच ज्ञानेन्द्रियाँ और पांच कर्मेन्द्रियाँ होती हैं जिनसे हमारा संप्रेषण कायम होता है। ज्ञानेन्द्रियाँ यानी पांच बोध प्रदायक स्रोत जो गंध, स्वाद, दृश्य, स्पर्श और श्रवण द्वारा हमें बाहरी विश्व का परिचय देती हैं। पांच कर्मेन्द्रियाँ हैं जो हमारे नकारने, सन्तानोत्पत्ति, चलने–फिरने, किसी चीज को पकड़ने और बोलने के काम को करती हैं। हर इंद्रिय एक ऊर्जा केंद्र (चक्र) से संबंधित होती है, जो हमारे मन–शरीर तंत्र में स्थापित रहते हैं। उदाहरणार्थ, चलना–फिरना 'मणि–पूरक

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Content: श्रीमद्भगवत गीता

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Content: चक्र' से संवंधित रहता है (अर्थात इस चक्र से जो हमारे पेट के क्षेत्र में स्थापित रहता है) तथा जिसकी ऊर्जा अग्नि रूप में मिलती है। ऊपर दिए गए चित्र में हम आंख की जगह किसी अन्य ज्ञानेन्द्रिय को स्थापित कर सकते हैं। आंखों के द्वारा हम दृश्य देखते हैं। मान लीजिए हम अपनी आंख द्वारा इस प्रवचन को देख रहे हैं। आप इसमें मुझे प्रवचन देते हुए देख सकते हैं। सबसे पहले आंख इस पूरे दृश्य को एक चित्र रूप में देखती है जो फिर चक्षु में जाता है (अर्थात उस ऊर्जा क्षेत्र में जो आंख के पीछे होता है)। यह समझ लें कि हम आंख से नहीं वरन आंख के माध्यम से देखते हैं। इसी प्रकार एक ऊर्जा क्षेत्र कान के पीछे होता है जिससे हम सुनते हैं। कान अपने आप तो नहीं सुन सकते। इसलिए जब हम कोई रोचक पुस्तक पढ़ रहे हों तो हमें न अल्लाह सुन पाते हैं, न दरवाजे की घट।। जब हम पढ़ने में दत्तचित्त हों तो हम अपनी पली का कमरे में आना भी नहीं सुन पाते। बेशक, जब रात को देर हो जाए तो सारी पतियां जान जाती हैं कि उनके पति कब चोरी से घर में प्रविष्ट हुए। वह बात अलग है। एक लघु कथा एक आदमी उस चोर से मिलने को पुलिस चौकी गया, जिसने पिछली रात घर में चुपचाप घुसकर सारा नकद और सामान चुराया था। पुलिस अधिकारी ने कहा-''तुम उससे यहां नहीं मिल सकते, चाहो तो कल कोर्ट में मिलना।'' उस आदमी ने अनुनय करते हुए कहा-''अरे! मैं तो उसे बिल्कुल परेशान नहीं करना चाहता। मैं तो केवल यह पूछना चाहता हूं कि वह बिना मेरी बीवी को जगाए, घर में कैसे घुसा। मैं तो कई बरसों से यह प्रयत्न करता आ रहा हूं, पर सफल नहीं हो पाया। उसने यह किया कैसे?''

Content: डिजिटल फाइल कम्प्यूटर में बनती है। यह प्रसंस्करण या प्रोसेसिंग चक्षु के क्षेत्र में होता है। फिर वह फाइल ज़दम-दर-क़दम ऊपर उठती जाती है। यह फाइल मस्तिष्क के उस क्षेत्र में जाती है जिसे चित्र (स्मृति) कहा जाता है। यदि हम यह समझ लें तो हमारा सारा जीवन बदल सकता है। तब हम समझ लेंगे कि हमें कब और कहां अपनी प्रतिक्रिया दिखानी चाहिए। तभी हमारी समझ में आएगा कि हम अपने कितने निर्णय सिर्फ एक अनुमान पर लेते हैं और बाद में कष्ट पाते हैं। पहले बताई गई लघु कथा (जिसमें विद्यार्थी शिक्षिका को भेंट देते हैं) में यही हुआ था-वह शिक्षिका डिब्बे से बाहर बहकर आ रहे द्रव को एल्कोहल समझे थी। वह पीछे दिए गए चित्र में पूरी प्रक्रिया समझी थी। बिना सोचे कि यह क्या हो रहा है हम पीछे दिए चित्र में पूरी प्रक्रिया समझकर पता कर सकते हैं कि क्यों हम ऐसी गलतियां कर बैठते हैं। फिर यह फाइल 'चित्त' में जाती है जहां विगत की स्मृतियां एकत्रित रहती हैं। यहीं वह जगह है जहां 'छंटनी' की प्रक्रिया होती है-'न इति - न इति... (अर्थात 'यह नहीं...यह नहीं')। यह प्रक्रिया यहां चलती रहती है। यहां पर चित्त उन चीजों या दृश्यो या स्मृतियों को 'न' करता है। आप उपलब्ध दृश्य को ही उदाहरण ले लें। यह पूरा दृश्य एक चित्र (फोटोग्राफ) में बंधता है। यहां से यह चक्षु-क्षेत्र में जाता है और एक 'जैव-संकत' (बायो सिग्नल) फाइल बनता है। चित्त कहता है-''यह न कोई पेड़ है न जानवर; न कोई पौधा है। यह वह चीज नहीं है।'' यह छंटनी यहीं चक्षु में होती रहती है। यह वैसा ही है मानो शब्दकोश में हम 'गाय' शब्द को ढूंढें। पहले हम सारे शब्दों को लपककर 'ग' शब्द पर केन्द्रित करते हैं-फिर 'गा' पर केन्द्रित करते हैं और अन्ततः 'य' शब्द को 'गा' के साथ ढूंढते हैं। इस प्रकार हम 'गाय' शब्द को छांट लेते हैं। ऐसे ही 'चित्त' क्षेत्र में काम होता है। इसके पश्चात् फाइल 'मानस' यानी मस्तिष्क के दूसरे हिस्से में जाती है। मानस धानात्मक रूप से पहचान करता है-''यह एक मनुष्य है, यह भगवा वस्त्र धारण किए है और एक 'स्टेज' पर खड़ा है।'' यानी यह पहचान की प्रक्रिया-'इति-इति (अर्थात यही है - यही है) मानस में आरंभ होती है। चित्त में 'नेति-नेति' होती है और यहां 'इति-इति'। इस प्रकार सही पहचान की प्रक्रिया आरंभ रहती है। जब पक्की पहचान हो जाए, तब यह फाइल मस्तिष्क के तीसरे हिस्से 'बुद्धि' में जाती है। सारी समस्या यहीं प्रारंभ होती है। यहां विश्लेषण की प्रक्रिया

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Content: प्रारंभ होती है-“मैं इस फाइल से कैसे संबंधित हूं? इस दृश्य से मेरा क्या जुड़ाव है? यह मेरे लिए क्यों ‘प्रासंगिक’ है? इस दृश्य पर मेरी क्या प्रतिक्रिया होनी चाहिए?” यदि मेरे बारे में आपकी स्मृतियां सुखद और अच्छी हैं या आपकी बौद्धिक चेतना उन्हें ‘भला’ बनाती हैं तो आपकी प्रतिक्रिया धनात्मक ही रहेगी। आप अपनी सारी विगत स्मृतियों को देखकर कहते हैं-“कल के प्रवचन में यह अच्छा लगा था।” आपकी बुद्धि विगत स्मृतियों में इसको छांटती है तथा अपने पूर्व अनुभव के आधार पर अपना निर्णय लेती है। यदि विगत का आपका अनुभव धनात्मक रहा है तो आपकी बुद्धि कहती है कि कि यहां रुक जाए और (मुझे) सुनो! यदि आपका पिछला अनुभव बताता है कि कि आप ‘बोर’ हो जाएंगे तो आपकी बुद्धि कहती है कि यहां रुकना नहीं है। यहां से निकल लो। आपकी चेतना के निर्णय होते हैं, जो मन की विगत स्मृतियों के आधार पर लिए जाते हैं। इस बिंदु तक तो संप्रेषण तुलनात्मक रूप से सीधी-सीधा होता है-अर्थात जो दृश्य आपने देखा और जो मस्तिष्क ने रजिस्टर किया। ये एक चेतन-प्रक्रिया है। मैं चेतन और अचेतन मस्तिष्क के बारे में पहले बता चुका हूं। मनोवैज्ञानिक एक अवचेतन मस्तिष्क की भी बात करते हैं। वस्तुतः इसका कोई अस्तित्व नहीं होता। इसका प्रयोग तो आपको संशय में डालने के लिए किया जाता है। यदि इंद्रिय बोध के द्वारा प्राप्त ‘डाटा’ (आंकड़े) की ‘प्रोसेसिंग’ इस चेतना-स्तर पर रोक दी जाती है-अर्थात बुद्धि के स्तर पर-तो हमारे निर्णय चेतना-स्तर पर बुद्धि के द्वारा लिए जा सकते हैं। यह ठीक है, क्योंकि हमारा चेतन मस्तिष्क, पूरे मस्तिष्क सामर्थ्य का मात्र 10 प्रतिशत होता है। इसको हम कहते हैं बुद्धि के आधार पर निर्णय लेना। यानी यह सारा निर्णय विशुद्ध तर्क या हमारी समझ के आधार पर बनी ‘तक’ से संचालित होते हैं। हमें इस उपलब्धि पर गर्व भी होता है। प्रसिद्ध फ्रांसीसी दार्शनिक डेकार्टज का कहना था-“मैं सोचता हूं कि मैं हूं, इसलिए हूं।” पर यह कहते हुए उसने यह नहीं समझा कि इस प्रकार हम अपने कुल सामर्थ्य का मात्र 10 प्रतिशत ही प्रयोग में ला रहे हैं। है न अफसोस की बात! चूंकि हमारे चेतन-मानस मस्तिष्क की सामर्थ्य सीमित होती है, इसलिए प्रकृति हमें प्रेरित करती है कि हम अपने अचेतन मस्तिष्क को भी प्रयोग में लाएं, जिसके द्वारा हम कई निर्णय लेते हैं, परंतु यह अचेतन मस्तिष्क पूर्वअनुकूलित या ‘कंडीशनड माइंड’ होता है। इसमें पुरानी जमी स्मृतियों का अम्बार लगा रहता है, जिसमें शामिल होते हैं-हमारे पूर्वाग्रह, धारणा, विश्वास, मूल्यों का आकलन जो बचपन से हमारे बोध में घुसते जाते रहे हैं, यानी वह सब कुछ

Content: जो हमारे माँ-बाप, बुजुर्गों या गुरुओं ने हमें बताया है या जो हमारी धार्मिक आस्था ने हमें दिया है या जो कच्ची आयु में जो हमारी सामाजिक मान्यताओं ने हमें सिखाया है-उन स्मृतियों को तिजोरी में भरा रहता है, जो हमारे सामने पूरी कभी नहीं खुलती। यह तो अपनी मर्जी से खुलती है-खासतौर पर जब हम किसी सदमे या आघात से गुजर रहे होते हैं। जिस प्रकार जब हमारी रोग प्रतिरोधक शक्ति के क्षीण होने पर वायरल और बैक्टीरिया हम पर आक्रमण करने लगते हैं, वैसे ही इन एनग्राम और संस्कार के वायरस हम पर प्रभावी होते हैं। जब भावनात्मक रूप से हम कमज़ोर हो जाते हैं। अहम् निर्णय लेता है संस्कार सिर्फ एक जीवकाल में ही इकट्ठे नहीं होते। ये मानसिक प्रवृत्तियां तो पिछले कई जन्मों से इकट्ठी होती रहती हैं। स्नायु तंत्र के विशेषज्ञ हमें बताते हैं कि कि हमारे मस्तिष्क का एक भाग होता है ‘रेटीलियन ब्रेन’ जिसमें हमारे जलचर अस्तित्व और जल-थलचर धरासितत्व से लेकर आज तक हुए विकास-क्रम की सारी स्मृतियां एकत्रित रहती हैं। चेतन मस्तिष्क से सूचना अचेतन मस्तिष्क के हिस्से में भेजी जाती है, जो मेरी ‘इंगो’ या ‘अहम्’ का क्षेत्र है। मैं इस अचेतन क्षेत्र को अहम का क्षेत्र इसलिए मानता हूं कि कि न सिर्फ यह घमंड देता है, वरन् हमारी अस्मिता की पहचान भी उजागर करता है। वस्तुतः यह शब्द ‘इंगो’, एक ग्रीक शब्द से बनाया गया है जिसका मतलब होता है ‘एक मुखोटा’। अतः आपकी अस्मिता आपके द्वारा ओढ़ा हुआ एक मुखोटा-भर है-वह आपकी सही पहचान नहीं है। अर्थात्‌ आपकी पहचान का सात है आपका अचेतन मस्तिष्क। आप स्वयं को उस रूप में प्रकट करते हैं, जो आप चाहते हैं कि कि आप हों, उसमें नहीं जो वास्तव में आपका सही रूप है, पर आपको सही रूप में यह भी नहीं मालूम होता कि कि आप क्या हैं। आपका असली रूप तो आपके अचेतन में गहरा दबा हुआ है। आपके जीवन के सारे महत्वपूर्ण निर्णय, जिनसे आपकी ज़िंदगी की पहचान होती है, इसी अचेतन क्षेत्र से निकलते हैं। यही वह क्षेत्र है जिसमें आपकी सारी भावपूर्ण स्मृतियां, स्वयं के बारे में विश्वास और अवधारणाएं एकत्र करती रहती हैं; जो आपको आपकी पहचान देती हैं; आपकी अस्मिता बनकर उभरती हैं। इसी को मैं ‘इंगो’ (या अहम) कहता हूं। आपका चेतन मस्तिष्क महत्वपूर्ण निर्णय नहीं लेता। यह तो वह थोड़े

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Content: निर्णय की बात आई तो यह फाइल अचेतन में 'अहम्' (इगो) की ओर चल जाती है। हमारा अचेतन सारे जीवन को खतरा पैदा करने वाले अवसर या 'लड़ाई या भागो' वाले निर्णय का नियंतक होता है, क्योंकि हमारा चेतन मस्तिष्क इतने धीरे काम करता है कि वह इन्हें निपटा ही नहीं सकत।ा आइए, हम पुनः आपके द्वारा यहां मुझे निहारने के उदाहरण को लें। समस्या तब प्रारंभ होती है जब आपका चेतन मस्तिष्क सीधे-सीधे निर्णय नहों ले पाता। यदि आपका भगवाधारियों के साथ विगत का अनुभव अच्छा नहीं है तो आपके मन में ऐसे ही एनग्राम (संस्कार या उस समय की समझ) भी वैसे ही बनेंगे। आप यह देखने का प्रयास भी नहीं करेंगे कि देखें तो यह व्यक्ति कौन है, कैसा है? उसी स्मृति के आधार पर आपका त्वरित निर्णय होगा:-“नहीं-नहीं-इधर स्वामी के साथ तो मैंने कुछ पाया था... उसके साथ तकल़ीफ़ रहा था।” इस प्रकार आपकी भगवत वस्त्रधारियों के प्रति एक आम धारणा इसी प्रकार की बन जाएगी। आपका यह निर्णय विगत के कई अनुभवों के निचोड़ या संस्कारों के आधार पर बन जाएगा। और यहीं समस्या उठ खड़ी होती है। जब निर्णय सीधी समझ के आधार पर लिए जाते हैं तो कोई बड़ी समस्या पैदा नहीं होती, पर ज्यादातर समय हमारे ज्यादातर निर्णय उन्हीं एनग्राम या संस्कारों के आधार पर लिए जाते हैं जिनका आपस में कोई संबंध नहीं होता। उदाहरण के लिए आपने किसी को श्वेत पोशाक में देखा। यदि विगत में किसी श्वेत पोशाकधारी ने आपको चोट पहुंचाई है तो श्वेत पोशाक को देखते ही वह स्मृति आपके मन में क्रोध जागेगी, भले ही आप ऐसा करना चाहें। इसी प्रकार यदि किसी घर में हमें कभी बेइज्जत किया गया है तो अगली बार जब हम उस घर में जाएंगे तो वही स्मृति सबसे पहले कौंधेगी, चाहे वहां का वर्तमान स्वामी कोई और व्यक्ति ही क्यों न हो। हम वहां पहुंचते ही एक आहट भाव में आ जाएंगे और हमारा मन खट्टा हो जाएगा। हम अपना संबंध चीजों और जगहों से भी जोड़ लेते हैं। वहां कुछ ऐसे खास बिन्दु होते हैं जो हमारी स्मृति-शृंखला को जागृत कर देते हैं। वहां स्मृति और गहरी होती है और हम स्फूर्त रूप में तुर्त अपना काम नहीं कर पाते। इसके लिए हमें ऐसा कुछ करना पड़ेगा कि किसी भी तरह से हमारा 'प्रोसेसिंग' का कार्यकाल कम हो जाए। इसके लिए हम अपनी स्मृति में ही कोई व्यवस्था करना चाहेंगे और इस प्रकार हम वास्तविक जीवन से कट जाएंगे और उतनी देर को वास्तविकता से वंचित रहेंगे।

Content: शादी के प्रारंभिक कुछ दिनों में ही हमारा अपनी पत्नी के प्रति वर्त्ताव सहज स्फूर्त होता है। कुछ महीनों बाद हमारा एक स्पष्ट विचार बनने लगता है उसके व्यक्तित्व के प्रति। उसके बाद तो हम अपने जीवनसाथी के साथ सही रूप में नहीं रहते हैं। फिर तो हम उसके साथ हमारी बनाई हुई कल्पना या अनुमान के साथ रहते हैं, सही रूप में उसके साथ नहीं। यानी हमने उसका एक रूप अपने अनुभव और कल्पना के आधार पर बना लिया और उसी के साथ रहने लगें और तब जो भी हमारा जीवनसाथी करता है वह हमें गलत ही लगता है, क्योंकि हमारा एक पूर्वाग्रह बन जाता है और हमें उसका हर काम गलत ही लगने लगता है। यदि कभी सही लगा भी तो हम कहते हैं यह गलती से हो गया होगा। इसी प्रकार जीवन में अन्य व्यक्तियों के साथ भी हम अपनी धारणा बना लेते हैं। अपने निरीक्षण के आधार पर लोगों के बारे में एक एनग्राम बना लेते हैं और उन लोगों का हर क्रिया-कलाप हम उसी एनग्राम की छलनी से छानकर ही देखते हैं। कभी-कभी तो हम ऐसे एनग्राम या जमी स्मृतियों को दूसरों के अनुभव और मीडिया के प्रभाव के अनुसार भी ढाल लेते हैं या दूसरों की राय के आधार पर अपनी धारणा बनाने लगते हैं।

Content: एक लघु कथा

Content: एक बार एक आदमी दो कुत्तों (डबल डॉग) के साथ एक शव यात्रा के आगे-आगे चल रहा था, पीछे काफ़ी लोगों का हुजूम था। एक राहगीर को बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह आदमी कुत्तों के साथ और शव यात्रा में इतने लोग! उसने उस आदमी, जो कुत्तों को पकड़े हुए था, से पूछा-“यह लाश किसकी है?” “मेरी सास की'' उत्तर मिला। “क्या वह बहुत लोकप्रिय थीं?” “पता नहीं।” जवाब मिला। “और ये कुत्ते क्या उनके पालतू थे?” “नहीं! यहीं वे कुत्ते हैं जिन्होंने आक्रमण कर मेरी सास को मार डाला।” “मार डाला?” “हां।” राहगीर ने कुछ सोचकर फिर पूछा-“क्या दो दिन को ये कुत्ते मुझे उधार दे सकते हो?” आदमी ने कहा-“भीड़ के पीछे कतार में आओ। यह भीड़ भी उन्हीं की है जो इन कुत्तों को पाना चाहते हैं।”

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Content: जब हम अपने संबंधों में पूर्वग्रहों के साथ जाते हैं तो ऐसा ही होता है। हम कई स्मृतियां ऐसी भी इकट्ठी कर लेते हैं जैसे हमारे संबंधी नहीं होते, पर हम उनके साथ उन स्मृतियों को जोड़ देते हैं। हम सदा दूसरों को अपने पूर्वग्रहों के लेंस से ही देखते हैं यानी पहले से निर्णय लिए विचारों के आधार पर हम उनका आकलन करते हैं। लोग मुझसे पूछते हैं-“स्वामी जी क्या हमारा जीवन स्वच्छंद इच्छाशक्ति पर आधारित होता है या पहले से नियत रहता है?” यह समझ लें कि जितने एनग्राम (पूर्व-धारणा या संस्कार) हमारे साथ रहेंगे, उतनी ही हमारी ज़िंदगी पूर्व-नियत हो जाएगी। वह इसलिए कि हम एक घिसे-पिटे ढरें पर ही चलते रहेंगे। जितने कम संस्कार या एनग्राम होंगे, उतनी ही हमारी ज़िंदगी स्वतन्त्र और स्वच्छंद होगी। अर्थात संस्कारों की संख्या निश्चित करती है कि हमारी ज़िंदगी स्वतन्त्र है या पूर्व-निर्धारिता। उदाहरण के लिए हमारी फाइल ईगो (अहम्) के पास जाती है और अहम् ही निर्णायक होता है तथा उसका निर्णय ही हम मानते हैं। यदि ज्यादा एनग्राम होंगे तो फाइल हर मेज तक जाएगी, जैसा अमूमन नौकरशाहियों के कार्यालयों में होता है। हर संस्कार अपनी मुहर लगाएगा, अपने हस्ताक्षर करेगा और अपनी राय देगा। जिसके पास ऐसे एनग्राम ज्यादा होते हैं, वे कभी चैन से नहीं बैठ सकते, वे कभी शांत नहीं रहते। बाहरी रूप से इतनी बेचैनी का मुख्य कारण है कि उनके अचेतन मस्तिष्क में लगातार चलने वाली संस्कारों की उठा-पटक। आप सिगरेट पीने का उदाहरण ही लें। चेतन मस्तिष्क के स्तर पर प्राप्त सूचना के अनुसार सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, यानी सीधी-सादी बात है। सिगरेट पीने से खतरा है, पर जब तलब लगती है तो हम फिर सिगरेट सुलगा ही लेते हैं। पर फाइल इतनी ज़बरदस्त छलांग (क्वान्टमलीय) कैसे लेती है? कैसे निर्णय बिल्कुल बदल दिया जाता है? जब वह फाइल अचेतन के क्षेत्र में आती है तो एनग्राम कह उठते हैं-“नहीं-नहीं, पिछली बार तो जब मैंने सिगरेट पी थी तब बहुत अच्छा महसूस किया था। मुझे लगा था कि मेरे ऊपर से सारा दबाव हट गया।” यदि आप दबाव से मुक्ति पाना चाहते हैं तो बज़ाय सिगरेट पीने के, एक कस के पहने जाने वाले जूते की जोड़ी धारण कर लें, क्योंकि जब जूता काटेगा तो सारी अन्य चिंताएं गायब हो जाएंगी। एक बड़ी समस्या जब सामने आती है तो छोटी अपने आप गायब हो जाती है, काटने वाला जूता सारी छोटी समस्याओं की छुट्टी कर देगा।

Content: यहां अचेतन क्षेत्र में सारी विगत की स्मृतियां रहती हैं-“मैंने सिगरेट पी, यहां अच्छा महसूस किया, चैन मिला। सारा दबाव गायब हो गया।” हम अचेतन ऐसे निर्णय लेते हैं जो हम नहीं लेना चाहते थे। यह सब इन्हीं अचेतन स्मृतियों द्वारा ही होता है। हम इन्हें गहरी जमी स्मृतियों के प्रभाव में असंख्य निर्णय लेते रहते हैं। अचानक हम चिल्लाते हैं और दस मिनट बाद ही अफसोस करते हैं-“मैं क्यों चिल्लाया था? मैं तो सदा हंसता हुआ चेहरा ही रखना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि लोग मुझे हंसमुख समझें। तब मैं क्यों चिल्लाया?” इस प्रकार हम अफसोस करते रहते हैं। हम अचानक एक निर्णय ले लेते हैं। इन्हीं एनग्राम या संस्कार (जमी हुई पूर्व स्मृतियों) के कारण अचानक हम ऐसे निर्णय लेते हैं। कृष्ण यहां सत्‌वगुण संस्कारों की बात करते हैं। जो हमें शक्ति और आनंद की ओर ले जाते हैं; राजसिक गुण संस्कार जो हमें व्याकुलता और हिंसा देते हैं तथा तमसिक संस्कारों की, जो हमें अवसादग्रस्त करते हैं। वह आगे बताते हैं कि कैसे ये संस्कार हमारी निर्णय लेने की प्रक्रिया पर प्रभाव डालते हैं। यूं समझें कि मानो हमारे रेंडियो को अचानक ठीक से काम करना बंद कर दिया और उसका संबंध तीन अलग-अलग चैनलों की आवृत्तियों (फ्रीक्वेंसीज़) से हो जाता है। एक चैनल किसी श्रृंगार प्रस्थापन का विज्ञापन कर रहा है; दूसरा किसानों को कुछ निर्देश प्रसारित कर रहा है तथा तीसरा चैनल कोई मजेदार नाटक चला रहा है। इन सबका परिणाम हमें इस प्रकार सुनाई पड़ेगा-“थोड़ा-सा पोस्टोसाइड छिड़ककर...अपना चेहरा पोंछ लें। फिर अपने दांत ठीक प्रकार ब्रश करके...थोड़ा पोस्टोसाइड और मल लें...फिर अपने हाथ-पैर हिलाते हुए जोर से कूदने-फांदने लगें।” यदि हम इन तीनों संस्कारों के निर्देशों का मिला-जुला पालन करेंगे तो सोचिए हमारा क्या हाल हो जाएगा, यानी हम तीनों अलग-अलग एनग्राम-सत्व, रज और तम का एक साथ प्रयोग करेंगे तो हमारा जीवन तो नरक हो जाएगा! यह समझ लें कि बुद्धिमान व्यक्ति तो तर्क ढूंढते हैं कोई ताज़ा नतीज़ा प्राप्त करने के लिए, जबकि हम में से ज्यादातर लोग अपने तर्क ढूंढते हैं अपने पूर्व निर्धारित निर्णयों को मजबूत करने के लिए। यदि हम अपने जीवन पर ही निहार कर देखें कि कितनी बार हमने अपनी गलती स्वीकार की है। बेशक, अपने जीवन पर दृष्टि डालकर यह पता करना कि कब-कब हमने गलती की है, काफी बुद्धिमत्ता की मांग करना है। प्रायः हम अपने घमंड या अपराध भावना के कारण ही ऐसी प्रतिक्रियाएं करते हैं। हम कहेंगे-“तो क्या हुआ यदि हमने कोई गलती की?” हम इसे एक ओर हटा देते

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Content: हैं। यह उसी वर्ताव का द्योतक है जो कहता है कि ताकतवर सदैव सही रहता है। दूसरा वर्ताव होता है हमारे अंदर निहित एक अपराध भाव के कारण। यह समझ लें कि एक निर्बुद्धि व्यक्ति कभी अपराध भाव नहीं महसूस करता। बेशक मैं आपसे कहता हूं कि इस भाव से भी मुक्ति पाओ–पर यह एक दूसरे संदर्भ की बात है। केवल बुद्धिमान व्यक्ति, जो धर्म की बात जानता है, ही अपराध भाव से ग्रसित होता है। वह व्यक्ति जो अपनी सहज प्रवृत्ति प्रतिक्रिया (इन्स्टिंकट) के अनुसार काम करता है, कभी अपराध भाव से ग्रसित नहीं होगा। अर्जुन और युधिष्ठिर को अपराध भाव महसूस हो सकता है, दुर्योधन को नहीं। ऐसे लोग कभी स्वयं को अपराधी नहीं समझेंगे। तो वह व्यक्ति जो बौद्धिक स्तर पर काम करता है, स्वयं को अपराध महसूस कर सकता है और जो अपने अंदर की आवाज (सहज-अंतरात्मा) अनुसार कार्य करता है, वह तो इस अपराध भाव से भी परे चला जाता है क्योंकि वह जानता है कि सत्य क्या है और किस रूप में है। कृष्ण इन तीन सहज गुणों (सत्‍व, रज, तम) को सही प्रकार से संभालने की बात करते हैं और बताते हैं कि कैसे उनका अधिकतम प्रयोग किया जा सकता है। इन गुणों में अपने हित के लिए अधिकतम प्रभाव प्राप्त कर लेना ही बौद्धिक क्रिया का द्योतक है।

Content: एक लघु कथा एक छोटे बच्चे ने एक बार एक सिक्का निगल लिया। उसे डॉक्टर के पास ले जाया गया। डॉक्टर ने बहुत प्रयास किया पर सिक्का बाहर नहीं आया। फिर नर्स ने भी प्रयास किया; पास खड़े उसके एक दोस्त ने भी बहुत प्रयास किया, पर सिक्का नहीं निकला। तभी वहां से गुज़रने वाले एक राहगीर ने कहा कि मैं पक्का डॉक्टर हूं। डॉक्टर ने कहा- 'तुम कैसे निकालोगे!' उसने कहा- 'एक मिनट रुको!' और उसने बच्चे से बात की, तुरंत ही वह मुस्कुराता हुआ आया और सिक्का डॉक्टर को दे दिया। डॉक्टर ने कहा- 'अरे! मैं तो डॉक्टर होते हुए यह सिक्का नहीं निकाल पाया...तुमने कैसे निकलवाया?' 'अरे! मैं तो पैसा निकलवाने में पुराना उस्ताद हूं! मैं किसी से भी पैसा निकलवा सकता हूं!'

Content: कृष्ण यहां तर्कीब एवं युक्ति बताते हैं कि कैसे इन तीनों गुणों का सही और अधिकतम उपयोग किया जा सकता है। इससे पहले कि इन एनग्रामों के स्तरों में अर्थात् तीनों संस्कारों–सत्‍व, रज, तम में हम प्रवेश करें, मैं आपको

Content: 128 श्रीमद्भगवत गीता

Content: बताना चाहता हूं कि हम इनमें कैसे फंसते हैं और ये कैसे काम करते हैं। फिर हम एक-एक कर इसकी तकनीकों के बारे में बात करेंगे। शरीर में ऊर्जा की सात सतहें हमारे शरीर मन-तंत्र में ऊर्जा की सात सतहें होती हैं। ये हमारे अस्तित्व के सात भागों की द्योतक हैं -

Content:

  1. भौतिक शरीर
  2. प्राणिक शरीर
  3. मानसिक शरीर
  4. ईथरिक शरीर
  5. कॉज़ल (कारणात्मक) शरीर
  6. कॉस्मिक शरीर
  7. निर्वाणिक (निर्वाणात्मक) शरीर

Content: प्रथम है भौतिक शरीर यानी हमारा मांस-मज्जा वाला शरीर। उसके बाद प्राणिक शरीर, जिसमें होती हैं पांच प्रकार की ऊर्जाएं–प्राण, व्यान, उदान, अयान, समान या पांच प्रकार की वायु जो हमारे शरीर में घूमती रहती हैं। तीसरी सतह होती है मानसिक शरीर की, जहां हमारा मानसिक आंतरिक क्रिया-कलाप चलता रहता है। इसका रिकॉर्ड बनता रहता है, चाहे हम कुछ भी कर रहे हों, खड़े हों, बैठे हों या लेटे हों या कुछ भी नहीं कर रहे हों। कभी-कभी हम मुंह

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Content: खोलकर बातें करते हैं और कभी मुंह बंद करके भी वार्तालाप चालू रहता है अर्थात चाहे हम मुंह खोलें या नहीं खोलें-वार्तालाप तो चलता ही रहेगा।। यह आंतरिक वार्तालाप मानसिक शरीर की सतह पर होता है-इसे 'चंचल' भी कह सकते हैं, जिसका अर्थ आंतरिक चलन-कलम होता है। चतुर्थ सतह होती है ईथरीय वाले शरीर की। इस सतह में हमारे गहन भाव और कष्टदायक अनुभव इकट्ठे रहते हैं। प्रायः गहन भावों में पीड़ा और कष्ट के ही अनुभव होते हैं। इनके अलावा हम किसी गहन भाव से वाकिफ़ नहीं होते। यदि हम ऐसा कोई अन्य गहन भाव रखते हैं तो हम वाकई में एक आध्यात्मिक जीव हैं। जब हम जीवन पर नज़र डालते हैं तो मालूम पड़ता है कि पीड़ा ही हमें गहन भाव दे सकती है। जब हम पीड़ा में हों या अवसाद ग्रसित हों तो हमारी भावना में शिद्दत आ जाती है और हमारा मन या मस्तिष्क केंद्रित हो जाता है फिर हमारा ध्यान कहीं और नहीं जाता। क्या आपने आनंद या कभी इतनी शिद्दत से महसूस किया है जितनी पीड़ा को अनुभूति में गहराई थी? नहीं न! यानी हम पीड़ा को ही गहराई से महसूस कर पाते हैं। बौद्धिक रूप से हम ईथरीय शरीर के परे तीन शरीरों को नहीं समझ सकते। उनका अनुभव तो आध्यात्मिक रूप से ध्यान के माध्यम से ही हो सकता है। प्राणिक सतह तो इच्छाओं-कामनाओं से भरी रहती है। मानसिक शरीर में "मुझे यह करना चाहिए था" सरीखा अपराध भाव ही रहता है। ईश्वरीय शरीर पीड़ा से पूर्ण रहता है। यह समझना कि ये तीनों भाव - कामना, अपराध बोध और पीड़ा के अनुभव - इन्हीं तीन सतह में भरे रहते हैं। जब इन तीनों सतहों से उठने वाले भाव या कामनाएं विशुद्ध होती हैं तो वे सत्व, रज और तम का बोध करती हैं, जो भाव की गुणवत्ता पर मुख्यतः निर्भर रहता है। प्रायः ये विशुद्ध नहीं होतीं। वे आपस में मिली-जुली रहती हैं। हमें जानना चाहिए कि कैसे उनको शुद्ध करें। यदि हम अपनी कामनाओं को शुद्ध कर सकें तो हम मुक्त हो सकते हैं। हम इन्हें शुद्ध और पवित्र बनाकर सही मार्ग पर संचालित कर सकते हैं। यदि कामनाएं न हों तो हमारे लिए सांस लेना भी मुश्किल हो सकता है। बिना कामना या इच्छा के हम सांस भर सकते हैं, न निकाल सकते हैं। वस्तुतः हम तो बिना कामना के जी भी नहीं सकते, इनको सही प्रकार संभाला जाना चाहिए। इनको सीधा या सरल करना ज़रूरी है। यदि हम ऐसा करेंगे तो हम सत्व की ओर बढ़ेंगे।

Content: इसके बाद आता है राजस, जिसमें हमारे मन का अपराध भाव रहता है। "मुझे यह करना चाहिए था" या "मुझे ऐसा कर लेना था", "मैं यह तब नहीं कर पाया तो अब करूं" जैसे विचार मन में उठकर हमारी व्याकुलता को और बढ़ा देते हैं। हम यहीं सोचते रहते हैं-“मुझे तब वैसी प्रतिक्रिया देनी चाहिए थी, पर तब इतनी समझ नहीं थी।” “मुझे उसे एक सबक सिखाना चाहिए। अब मुझे मालूम है कि मैं क्या कर सकता हूं।” राजस गुण में इसी प्रकार के भावों / विचारों का बाहुल्य रहता है। तीसरा वर्ग है पीड़ा का! चाहे हम सही करें या गलत, हमें यह मालूम होता है कि कैसे इसे पीड़ा पूर्ण बनाया जा सकता है। जो भी स्थिति हो उसमें पीड़ा का संचय कर देना, तमस की ओर जाना है। हमारे शरीर-मन तंत्र की प्रथम चार सतहें इन तीनों गुणों से प्रभावित रहती हैं। कभी तीन सतहों को यानी इन चार सतहों के बाद - मन महसूस ही नहीं कर सकता।। उनकी अनुभूति तो ध्यान में ही हो सकती है। पांचवीं सतह - कॉज़ल बॉडी (कारणात्मक शरीर) में हम रहते, स्वप्न विहीन निद्रा प्राप्त करते हैं। इसे शास्त्रों में 'कारण-शरीर' कहा जाता है। इसकी अनुभूति गहन निद्रा होती है। छठवीं सतह कॉस्मिक सतह होती है, जिसमें हर्षदायक या सुखद स्मृतियां रहती हैं। अंतिम सतह होती है निर्वाणिक सतह, यानी वह सतह जो हमें निर्वाण की अनुभूति देती है। फिलहाल तो प्रथम चार सतहों को ही याद रखें-भौतिक, प्राणिक, मानसिक और प्राणिक ऊर्जा वाली सतहें, क्योंकि अभी तो हम इन्हीं सतहों या स्तरों पर काम करेंगे। कृष्ण भौतिक सतह की तो बात कर ही चुके हैं। अब वे बता रहे हैं सात्विक राजस और तामसिक गुणों के बारे में। सत्व का सीधा संबंध द्वितीय सतह यानी प्राणिक सतह से होता है; राजस की तीसरी सतह अर्थात मानसिक शरीर से होता है और चौथी सतह-ईश्वरीय सतह तमस से जुड़ी रहती है। मैं बता चुका हूं सत्व का संबंध इच्छाओं या कामनाओं से होता है। अर्थात प्राण शरीर से। जब हमारी कामनाओं में परिवर्तन आता है तो हमारे प्राणों का बहाव या वायु प्रवाह की दिशा बदल जाती है। प्राण वह जीवन शक्ति है जो हम हवा के साथ श्वसन द्वारा प्राप्त करते हैं। हवा तो एक माध्यम है प्राण शक्ति प्राप्त करने का। यह प्राण शक्ति ही है जो हमारे अंदर जीवन कायम रखती है। इस प्राण में परिवर्तन तब आता है जब हमारी कामना परिवर्तित हो जाती हैं। उदाहरण के लिए यदि कभी हम वासना से उत्तेजित होते हैं तो हमारी सांस तेज़ी से आने-जाने लगती है। प्राण के शरीर में आना-जाना भी बढ़ जाता है, यानी किसी

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Content: भी इच्छा या कामना का प्रभाव सीधा प्राण शक्ति पर पड़ता है। यदि हम शान्त बनकर कायम होते हैं। यह इसलिए होता है क्योंकि हमारे पास शब्दों को ताक़त देने की क्षमता है। वे शब्द जो हमारे मन में गूँजते रहते हैं 'मंत्र' हो जाते हैं। जब इन्हें एक साथ कहा जाए तो वे सारे शब्द सम्मिलित रूप से हमारे जीवन में एक स्वरूप अख्तियार कर लेते हैं—खासतौर पर तब जब वे एक साथ दोहराए जाएँ। एक शब्द भी हमें वह करने को बाध्य कर सकता है, जो हम चाहते हैं। शब्द जो हमारे मन में उभरते हैं वे काफी महत्वपूर्ण हो जाते हैं, उदाहरण के लिए जब हम सुबह अपने दांतों पर ब्रश फेरते हैं तो हमारा मन कहीं और होता है। जब नहा रहे होते हैं तब भी मन वहाँ नहीं होता। कभी-कभी जब हम ठंडे पानी का शॉवर लेते हैं तो हम अपने मन को बहकाने के लिए कुछ गाने गुनगुनाने लगते हैं। ठंडे पानी में नहाने और गुनगुनाने में एक घनिष्ठ संबंध मालूम होता है। चूँकि बाथरूम में हमें कोई नहीं देखता, हम मुक्त होकर गाते हैं। कुछ लोग तो मुक्त भाव से स्वयं से ही ज़ोर-ज़ोर से बहस भी करने लगते हैं। एक व्यक्ति बाथरूम के पास ही खड़ा था, जब उसकी पत्नी बाथरूम से बाहर आई। व्यक्ति ने पूछा—“तुम बाथरूम में किससे बहस कर रही थीं?” उसकी पत्नी ने कहा—“मैं स्वयं से ही बात कर रही थी।” उस आदमी ने फिर पूछा—“तब बहस किस बात पर हो रही थी?” पत्नी बोली—“मुझे मालूम है कि मैं क्या कर रही थी। तुमसे क्या मतलब? अलग रहो इससे।” वह आदमी चालू रहा—“मैं समझ गया कि तुम स्वयं से बात कर रही थीं। पर अपने आपसे बहस का क्या मुहा था?” वह बीवी—“तुम तो मुझे जानते हो ही ...मैं मूर्खता के तर्क बर्दाश्त नहीं कर सकती, इसीलिए तो मैं स्वयं से ही बात कर रही थी।” हम ऐसे खेल सदा खेलते रहते हैं। बिना हक़ीक़त को समझे, हम सदा बात करते ही रहते हैं। हम ब्रश करते समय वही शब्द लगातार हफ्तों तक दोहराते रहते हैं। जैसे ही ब्रश हमारे हाथ में आया कि हमारे अंदर एक विचार श्रृंखला प्रारंभ हो जाती है, जो स्वयं को रोज़ दोहराती है। शॉवर लेते हुए भी एक से ही विचार उभरते हैं। यदि हम थोड़ा ध्यान दें तो हमें यह प्रवृत्ति स्पष्ट समझ में आ जाएगी।

Content: भी इच्छा या कामना का प्रभाव सीधा प्राण शक्ति पर पड़ता है। यदि हम शान्त बनकर कायम होते हैं। यह इसलिए होता है क्योंकि हमारे पास शब्दों को ताक़त देने की क्षमता है। वे शब्द जो हमारे मन में गूँजते रहते हैं 'मंत्र' हो जाते हैं। जब इन्हें एक साथ कहा जाए तो वे सारे शब्द सम्मिलित रूप से हमारे जीवन में एक स्वरूप अख्तियार कर लेते हैं—खासतौर पर तब जब वे एक साथ दोहराए जाएँ। एक शब्द भी हमें वह करने को बाध्य कर सकता है, जो हम चाहते हैं। शब्द जो हमारे मन में उभरते हैं वे काफी महत्वपूर्ण हो जाते हैं, उदाहरण के लिए जब हम सुबह अपने दांतों पर ब्रश फेरते हैं तो हमारा मन कहीं और होता है। जब नहा रहे होते हैं तब भी मन वहाँ नहीं होता। कभी-कभी जब हम ठंडे पानी का शॉवर लेते हैं तो हम अपने मन को बहकाने के लिए कुछ गाने गुनगुनाने लगते हैं। ठंडे पानी में नहाने और गुनगुनाने में एक घनिष्ठ संबंध मालूम होता है। चूँकि बाथरूम में हमें कोई नहीं देखता, हम मुक्त होकर गाते हैं। कुछ लोग तो मुक्त भाव से स्वयं से ही ज़ोर-ज़ोर से बहस भी करने लगते हैं। एक व्यक्ति बाथरूम के पास ही खड़ा था, जब उसकी पत्नी बाथरूम से बाहर आई। व्यक्ति ने पूछा—“तुम बाथरूम में किससे बहस कर रही थीं?” उसकी पत्नी ने कहा—“मैं स्वयं से ही बात कर रही थी।” उस आदमी ने फिर पूछा—“तब बहस किस बात पर हो रही थी?” पत्नी बोली—“मुझे मालूम है कि मैं क्या कर रही थी। तुमसे क्या मतलब? अलग रहो इससे।” वह आदमी चालू रहा—“मैं समझ गया कि तुम स्वयं से बात कर रही थीं। पर अपने आपसे बहस का क्या मुहा था?” वह बीवी—“तुम तो मुझे जानते हो ही ...मैं मूर्खता के तर्क बर्दाश्त नहीं कर सकती, इसीलिए तो मैं स्वयं से ही बात कर रही थी।” हम ऐसे खेल सदा खेलते रहते हैं। बिना हक़ीक़त को समझे, हम सदा बात करते ही रहते हैं। हम ब्रश करते समय वही शब्द लगातार हफ्तों तक दोहराते रहते हैं। जैसे ही ब्रश हमारे हाथ में आया कि हमारे अंदर एक विचार श्रृंखला प्रारंभ हो जाती है, जो स्वयं को रोज़ दोहराती है। शॉवर लेते हुए भी एक से ही विचार उभरते हैं। यदि हम थोड़ा ध्यान दें तो हमें यह प्रवृत्ति स्पष्ट समझ में आ जाएगी। जो शब्द हम अनजाने में दोहराते हैं, वे उन शब्दों से ज्यादा शक्तिशाली होते हैं, जो हम पूरे होश-ओ-हवास में कहते हैं। हम कई विचार और संस्कार अपने आप कहते हैं जो स्पष्टतया एक-दूसरे की काट करते हैं। वस्तुतः—“मुझे इस सिरदर्द से मुक्ति मिले” भी एक स्वयं काट करने वाला विचार है। जब हम यह शब्द दोहराते हैं तो हम सिरदर्द से भी बखूबी वाकिफ़ होते हैं। 'सिरदर्द' शब्द

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Content: का बार-बार ख़्याल हमें हर बार यह याद दिलाता रहता है कि हमारे सिर में में हो रहा है। तब फिर हम इस सिरदर्द से मुक्ति कैसे पा सकते हैं?

Content: हर बार यह कहना-"इस सिरदर्द से मुक्ति मिले" हमें इसकी याद बार-बार दिलाता है। यानी हम हर बार इस पूरी फ़ाइल को दिमाग में ताज़ा करते हैं। तब सिरदर्द से मुक्ति भला कैसे संभव है, इसलिए बार-बार 'सिरदर्द' का नाम लेने के बजाय यदि हम यह कहें-"मैं पूर्ण स्वस्थ हो जाऊँ" तो ज़्यादा बेहतर होगा, क्योंकि तब हमारे मन में अपने निरोग होने की चाह हावी रहेगी।

Content: हम अपने ध्यान में जो मंत्र या शब्दों का उच्चारण करते हैं, वे स्वतः हमारे अचेतन में सजग हो जाते हैं। यदि हम बार-बार सिरदर्द का उच्चारण करेंगे तो हमारे ध्यान का केंद्र हमारी 'सिरदर्द' ही हो जाएगा, न कि इससे मुक्ति और न ही हम स्वस्थ होने की बात करेंगे तो हमारे ध्यान का केंद्र हमारी स्वास्थ्य ही रहेगा। इसलिए जब हम ईश्वर पर ध्यान लगाते हैं तो हम शुरुआत एक 'ध्यान श्लोक' से करते हैं। ध्यान प्रारंभ करने से पूर्व हम एक ध्यान श्लोक कहते हैं। यानी सभी शब्दों के साथ ईश्वर के आह्वान की शुरुआत करना। इन श्लोकों में हम उन चीजों को शब्द देते हैं जो हम चाहते हैं कि हमारे जीवन में घटित हों।

Content: मानस-दर्शन की शक्ति

Content: ध्यान श्लोक का अर्थ है शब्दों का मानस-दर्शन या मन की आँख से देखना। यदि हम बार-बार शब्द 'सिरदर्द-सिरदर्द-सिरदर्द' कहते रहेंगे तो मन की आँख से हम क्या देखेंगे? वही व्यक्ति जो हमारे सिरदर्द का मूल कारण है अपनी वह स्थिति जब हमें सिरदर्द महसूस होता है। यानी लगातार हम सिरदर्द के कारण या स्थिति को ही मन की आँख से देखते रहेंगे।

Content: जिसको हम लगातार मानस-दर्शन करते रहेंगे, वह हमारे स्मृति-पटल पर अंकित हो जाएगा। हमारा आंतरिक अवकाश उससे ओत-प्रोत रहेगा। यदि हमें कोई रोग है तो कभी उस रोग का ज़िक्र न करें, न उसे दोहराएं या उन शब्दों को न कहें, जिनसे उस रोग की स्मृति गहरी होती हो। उदाहरण के लिए कभी यह न कहें-"इस हृदय रोग से मुक्ति मिले, मधुमेह से मुक्ति मिले या इस उच्च रक्तचाप से त्राण मिले।" आप स्पष्ट अपनी चाह को शब्द दें, विरोधाभासी शब्द न प्रयुक्त करें। यदि दर्द है या कोई बीमारी है तो आप सीधे-सीधे कहें-"मुझे पूर्ण स्वस्थ होना है।" शब्द से मानस-दर्शन की स्थिति बनती है और उसके सत्य होने के लिए ऊर्जा भी हम ही उसे देते हैं।

Content: हमेशा यही शब्द कहें-"मुझे स्वस्थ होना है।" बज़ाय इसके कि "मुझे इस दर्द से त्राण मिले।"

Content: कभी विरोधाभासी एन्ग्राम प्रयोग में न लाएं। जितने विरोधाभासी शब्द प्रयोग करेंगे, उतने ही आप उस रोग की पकड़ अपने आंतरिक अंतराल में दृढ़तर करते जाएंगे। अपने अंदर की इस इच्छा शक्ति का गलत उपयोग न करें। हमारी इच्छाशक्ति का आधार प्राणिक सतह है। इसमें वह ऊर्जा होती है जो चाह की वास्तविकता में बदल सकती है। यही वह शक्ति है जो कामनाओं की पूर्ति करती है, स्वप्न को वास्तविकता बनाती है। इस इच्छा शक्ति को विरोधाभासी विचारों या एन्ग्रामों में जाया न करें।

Content: यह विरोधाभासी विचार हमारे सत्य तत्व के अंतराल को भ्रष्ट कर देते हैं।

Content: आज जब आप घर वापिस जाएं तो दस मिनट के लिए यह अभ्यास करें। दस मिनट चुपचाप बैठ जाएं एकांत में और उन विचारों को लिख लें जो आपके दिमाग में नियमित रूप से आते हैं। तब आप देखें कि कहाँ आप आपमें विरोधाभासी एन्ग्राम स्वयं ही तो नहीं बना रहे हैं। यदि ऐसा है तो उन्हें संपादित कर शुद्ध करें। अपने दिमाग में विरोधाभासी शब्दों या विचारों को आने ही न दें।

Content: हम जो कुछ देखते हैं या सुनते हैं, उसके द्वारा अपना शोषण करने की छूट स्वयं ही प्रदान करते रहते हैं। जिन लोगों को मन के सत्य या चेतना की वास्तविकता की पहचान भी नहीं होती, वे हमें प्रभावित करते रहते हैं। ये सारी समस्याएं इसलिए पैदा होती हैं, क्योंकि हममें यह ज्ञान नहीं कि हमारे आंतरिक अवकाश में विशुद्ध आनंद सृजित किया जा सकता है।

Content: मुझे यह खुला सत्य यहाँ से रेखांकित करना चाहता हूँ कि कोई भी दवा या रासायनिक पदार्थ हमारे मन के लिए सहायक नहीं हो सकता। सारी चिंता मुक्त करने वाली दवाइयाँ या अवसाद दूर करने वाली औषधियाँ मन को शान्तना देने का एक छलावा मात्र हैं। पहले हम अवसाद ग्रसित हैं और फिर हम दवाइयाँ लेकर समझते हैं कि हम ठीक हो जाएंगे - बस। यही खेल चलता रहता है।

Content: एक और महत्वपूर्ण सत्य मैं आप लोगों के साथ साझा करना चाहता हूँ; यह तो एक व्यापार का रहस्य है। कई लोग मुझसे कहते हैं-"स्वामी जी! फलाने व्यक्ति ने मुझ पर काला जादू करवा दिया है। उसने मुझ पर मुंठ चलवाई है। किसी ने मुझ पर भूत-प्रेत का साया आरोपित करवा दिया है। मैं किसी दुर्यात्मा के क़ैद में हूँ।" कई लोग ऐसा भाव कुछ लोगों में व्याप्त करवा देते हैं और फिर इस भय का लाभ उठाते हैं। यह समझ लें कि ये सारे ऋणात्मक चेतक इसलिए शक्तिवान प्रतीत होते हैं क्योंकि हमारा विश्वास इनमें होता है। वही इनको शक्ति देता है।

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Content: ये सारे काले जादू, भूत-प्रेत का भय और शैतानी क्रियाओं के पास एकमात्र शक्ति वही होती है-इनमें हमारा विश्वास। चूंकि हम इन सबको मानते हैं, हम इनसे स्वयं को जोड़ लेते हैं और अपने लिए परेशानी खड़ी कर लेते हैं तथा फिर हम अपने आपको इनसे मुक्त करने का प्रयास करते हैं। जब लोग ऐसे भय लेकर मेरे पास आते हैं तो मैं उनसे कहता हूँ-“ऐसा कुछ नहीं होता। चिंता मत करो। यह कोई समस्या नहीं है।” तब वे सोचते हैं-“यह स्वामी तो लड़का है। इसे कुछ मालूम नहीं। किसी सयाने आदमी के पास चलना चाहिए जो इन परेशानियों की काट बताएगा-कुछ ताबीज़ देगा, भूत-प्रेत भगाएगा तथा इन बंधनों और ऋणात्मकताओं से निजात दिलवाएगा।” वे समझते हैं कि मुझे कुछ मालूम नहीं तो मैं उनकी सहायता कैसे कर सकता हूँ। मैं उन्हें कुछ ताबीज़ जैसी चीज़ें देता हूँ और कहता हूँ-“इसकी क़ीमत आपको नहीं देनी। बस इसे अपने तकिए के नीचे रख लें और सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी। आप ठीक हो जाओगे!” वस्तुतः इन ताबीज़ों-यंत्रों में कुछ भी नहीं होता। कम-से-कम मैं तो यही समझता हूँ इस आदमी (परेशान व्यक्ति) ने यह समस्या स्वयं ही पैदा की है। उसके अंदर ऋणात्मकता में जब उसे यंत्रादि देता हूँ तो वे उसके मन में यह विश्वास जमा देते हैं कि तुम्हारे अंदर की ऋणात्मकता समाप्त हो गई। यह तो ऐसा ही है जैसे एक कांटे से दूसरा कांटा निकाला जाए और इसमें कुछ नहीं होता। मैं लोगों को बताता हूँ-“यह न समझना कि इन यंत्रों को रखने से कोई तुम्हारी छत से टपकेगा। तुम्हारे घर में कुछ नहीं टपकता सिवाय चूहों के।” वस्तुतः ये यंत्रादि तो ऋणात्मक विश्वास को हटाने के कांटे हैं। ऐसे लोगों में यह गलत विश्वास पैदा हो जाता है कि उनके अंदर कुछ परेशानियाँ हैं। मैं तो उनसे स्पष्ट कहता हूँ-“यह समस्या तुमने स्वयं ही उत्पन्न की है और तुम्हारी मदद कर रहा हूँ, इससे निजात दिलाने में।” तो यह स्पष्ट समझ लें कि सारी ऋणात्मकता के पास एक ही ताकत होती है-उनमें हमारा विश्वास। यदि इनको फैलाने वाला आदमी सिर्फ पैसा ऐंठने के कारण ऐसा करता है तो कोई बात नहीं। ऐसा तो हम फिर पैदा कर सकते हैं। ख़तरा यह होता है कि इसके द्वारा वह हमारे मन में एक ऋणात्मक एनग्राम पैदा कर देता है। वह एक ऐसा संस्कार पैदा कर देता है जो हमें सदा डराता रहता है। फिर तो चाहे कुछ भी हो हम उसी व्यक्ति के पास भागे जाते हैं, मानो हम उसके गुलाम हों। अगर भूत हमें पकड़ ले, वह ज़्यादा अच्छा है बनिस्बत इन औज़ाओं के चक्कर में पड़ने के। भूत तो कभी-कभी परेशान करेगा पर यह औज़ा तो हमें कभी चैन से नहीं रहने देगा।

Content: जब हम विरोधाभासी विचार पैदा करते हैं तो हम उन्हें मानने भी लगते हैं। मनश्चिकित्सा के क्षेत्र में यह एक बीमारी है, जैसे फैशन का व्यापार। फैशन व्यापार में तो हर रोज़ एक नई पोशाक निकाली जाती है। इसी प्रकार इस मामले में हर महीने एक नया रोग पैदा किया जाता है तो एक ऋणात्मक विचार को दोहराकर, उसके लक्षण पर ध्यान लगाकर हम वैसे ही लक्षण अपने अंदर पैदा करते रहते हैं। यह एक ख़तरनाक खेल है। इसमें फंसने से बचना चाहिए। हम अपने अंदर में निहित सच्च के पवित्र अंतराल को भंग कर देते हैं, ऐसे ही ऋणात्मक विचार बनाकर। यह विचार प्रायः स्वयं ही एक-दूसरे की काट करने वाले होते हैं। इसलिए पहले अपने प्रमुख विचार और इच्छाएं लिख लें और फिर उनका विश्लेषण करें। यह पहला कदम होगा। फिर देखें कि कैसे आपकी इच्छाएं एक-दूसरे की विरोध करती हैं। उदाहरण के लिए देखें-हम शान्तिपूर्ण जीवन भी जीना चाहते हैं पर हमें धन और ऐश्वर्य की कामना भी रहती है। या तो तय करें कि कोई मनचाही जिम्मेदारी लेकर उसके साथ प्रसन्न रहेंगे या तय कर लें कि हम तो चैन से रहेंगे और जो होगा उसे स्वीकार करते रहेंगे। जब भी कभी दो इच्छाओं में संघर्ष दिखाई दे तो एक ही पर ज़ोर दें और दूसरी को छोड़ दें, क्योंकि यदि दोनों पर ज़ोर देंगे तो मानसिक संघर्ष की स्थिति बनती रहेगी।

Content: जब हम सात्विक, विशुद्ध अंतराल में विरोधाभासी इच्छाओं और विचारों को एक साथ रखते हैं तो हमारी जमी गहरी स्मृतियों के कारण उनमें संघर्ष पैदा होता है और हम स्वतः ही सात्विक से राजस की ओर ढकेल दिए जाते हैं। यह वासना का क्षेत्र असोमीत कामनाओं एवं चाहों के आधार पर बनता है। यहां यह श्लोक बहुत सुंदरता से अपनी बात स्पष्ट करता है। कृष्ण कहते हैं कि प्रत्येक जीवधारी परिणाम, कर्त्तव्य कर्म करने को बाध्य होता है। वे भी चाहों और कामनाओं के बारे में बात करते हैं, दोनों में अंतर क्या है? कामनाएं और इच्छाएं-'राग' का अर्थ है कामना और तृष्णा का अर्थ है चाह होना या किसी को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा होना। दोनों में अंतर यही है कि 'राग' की उत्पत्ति उन स्मृतियों से होती है, जिसको हमारी भावनाओं का सहारा मिला है जबकि तृष्णा की उत्पत्ति का कारण बाहर से दूसे गए विज्ञापनों का प्रभाव होता है।

Content: आपस में काट करने वाली इच्छाएं

Content: विज्ञापन केवल टेलीविज़न या सिनेमाघर में ही नहीं दिखाए जाते। यदि हमारे पिताजी कोई बात बार-बार दोहराते हैं तो वह भी एक विज्ञापन का रूप

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Content: ले लेता है। कुछ इच्छाओं को हमारे दिमाग का सहारा मिलता है। हम समझते हैं कि उनसे हमें एक प्रकार की संपूर्ति प्राप्त होगी। हम समझते हैं कि ये हमारी वास्तविक जरूरतें हैं, पर कुछ इच्छाएँ तो हमें किसी ने भी बेची हैं। कामनाओं और तृष्णा में यही अंतर है। कामना हमारी होती है जबकी तृष्णा तो समाज ने हम पर थोपी है। वह हमारे सामाजिक अनुकूलन का एक हिस्सा है। कामना अंदर ही उत्पन्न होती है। वह हमारी प्रकृति का हिस्सा है। यदि हम अपनी कामना पूर्ण कर सकें तो हमें बड़ी तृष्णा और संपूर्णता का अनुभव होता है, परंतु तृष्णा की पूर्ति होते ही हमारे अंदर एक खालीपन का अहसास जगता है अर्थात् असली कामना वह है जिससे हमें चैन और संपूर्णता का अनुभव हो जबकी तृष्णा की पूर्ति हमारे अंदर एक खालीपन का अहसास जगाता है। कृष्ण बताते हैं कि किस प्रकार आपस में काट करने वाली इच्छाएँ हमें राजस की ओर ढकेलती हैं। जब कामनाएँ एक-दूसरे की काट करती हैं, तब हम संशय में पड़ जाते हैं, बेचैन हो उठते हैं। जब हमारे शरीर-मन तंत्र में कोई सूचना आती है कि किसी चीज के बारे में तो यह चक्षु, चित्त, बुद्धि से होती हुई अहम् क्षेत्र में पहुंचती है। इस रास्ते पर चलते हुए, अहम् तक पहुंचने के पूर्व यह अचेतन के क्षेत्र से गुज़रती है—यहीं उस एनग्राम के अंतराल से, जो इस फाइल के बारे में अपनी राय कायम करता है। मान लीजिए 10 एनग्राम एक निर्णय लेते हैं, यह कहते हुए—''मैं तो इस प्रवचन को सुनूंगा'' और 10 एनग्राम कहते हैं—''नहीं!नहीं! चलो, सिनेमा चलते हैं। अरे, यह सप्ताहांत काल है!'' यानी 10 एनग्राम एक बात कहते हैं और 10 उसके विपरीत अपना निर्णय देते हैं और जब तक वह फाइल इंगो के निकट पहुंचती है, हम गहरे संशय में पड़ जाते हैं। इन एनग्रामों के आपसी काट करने वाले निर्णयों के कारण हम एक आंतरिक बेचैनी अनुभव करते हैं। जितने ज्यादा एनग्राम होंगे उतना ही ज्यादा निर्णय लेने में समय लगेगा। हम एक अनिश्चय और द्विविधा में डूबते-उतरते रहेंगे। मानव स्वयं ही इस द्विविधा है। हम लगातार सोचते हैं—''मुझे यह करना चाहिए था—वह करना चाहिए था। यह द्विविधा होती ही ज्यादा एनग्रामों (या जमी स्मृतियों या संस्कारों) के कारण है। इसी द्विविधा को कृष्ण राजस या व्याकुलता की स्थिति कहते हैं। राजस में हम बेहद क्रोधवंत, हिंसक और आंतरिक रूप से व्याकुल होते हैं। एक राजस प्रकृति वाला आदमी दूसरों पर चिल्लाता रहता है और सदा चिड़चिड़ा रहता है। वह इंतज़ार करता है कि कब वह अपना गुस्सा दूसरों पर उतार सके।

Content: एक बार हम इन एनग्रामों को मिटा सकें तो हम बिना किसी दबाव के हज़ारों निर्णय ले सकते हैं। तब फाइल बिना किसी व्यवधान के सीधी इंगो के पास जाएगी। फिर निर्णय लेने के लिए हमें तीन-सी मेजों (i) से होते हुए नहीं गुज़रना पड़ेगा, जैसा कि भारतीय सरकार के कार्यालयों में होता है। फिर तो बस एक या दो मेजों का अस्तित्व ही रह जाएगा। एक कहेगी—''हां!'' तो दूसरी कहेगी—''ठीक है'' और जब वह इंगो (अहम्) क्षेत्र में पहुंचेगी तो ज्यादा भिन्न मन होंगे ही नहीं। तब अहम् आसानी से निर्णय लेकर फाइल को कार्य करने के लिए तुरंत वापिस भेज सकता है। पूरी प्रक्रिया आसान हो जाएगी। निर्णय आसानी से होंगे और हमारा समय भी बर्बाद नहीं होगा। इसलिए कृष्ण कहते हैं कि जब हम कर्म फल के बारे में नहीं सोचते तो हम कर्म को पूरी शिद्दत और कुशलता से कर सकते हैं। तब एनग्राम बहुत कम होंगे और हम उनके द्वारा ग्रस्त भी नहीं होंगे। अगले श्लोक में कृष्ण तमस के बारे में कहते हैं। वे अर्जुन से कहते हैं—''हे भारत! तमो गुण या तमस अज्ञान से पैदा होता है, जिसका फल अकर्मण्यता और आलस्य है तथा निद्रा है जो इस अनुकूलित आत्मा को बंधन में डालते हैं।'' तमस की इससे सुंदर परिभाषा क्या होगी? यदि ज्यादा संस्कार या एनग्राम होंगे तो फाइल अहम् तक आसानी से पहुंच ही नहीं सकती। वस्तुतः पूरी फाइल तो अहम् तक पहुंचेगी ही नहीं। कोई शक्तिशाली एनग्राम रास्ते में ही उस पर अपना निर्णय थोप देगा। बौद्धिक शब्दावली में इसको कहें—''दिमाग का न लगाना'' यानी पूरी प्रक्रिया से ही वंचित कर देता। ऐसा क्यों होता है? क्यों हम अनजाने में निर्णय लेकर बाद में पछताते हैं? यह अचेतन क्षेत्र ऋणात्मक स्मृतियों से ओत-प्रोत रहता है और इसीलिए व्याकुलता भी बहुत रहती है। हमारी सारी स्मृतियां, विगत के विचार-प्रवाह, संस्कार या एनग्राम इसी क्षेत्र में फाइल के रूप में संकलित रहते हैं। इस क्षेत्र में इतनी सारी फाइलें रहती हैं, पर उनमें आपस में कोई तार्किक संबंध नहीं होता। तो फिर यह होता है—जब कोई फाइल यहांँ क्वांटम लीप (बड़ी उछाल) लेती है तो वह इंगो (अहम) तक सही रूप में नहीं पहुंच पाती, क्योंकि इस क्षेत्र में सारे वे आंकड़े भरे रहते हैं, जो सबसे ज्यादा बेचैनी पैदा करते हैं। यूं समझें मानो आपके कम्प्यूटर की 'हार्ड-डिस्क' हाई रेजोल्यूशन फोटोग्राफ से इतनी भरी हो कि उसके काम करने की भी कोई जगह न बची हो, जैसे आपके अवचेतन में विगत के विचार प्रवाह और स्मृतियों का अंबार लगा हो, जिसके कारण वह अयोग्य होकर बेतुके निर्णय लेने लगे।

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Content: इस उदाहरण को देखें-आपके द्वारा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, अर्थात् आपके शरीर-मन के लिए सही नहीं। यह निर्णय आप तब तक चला सकते हैं जब तक आप चेतन मस्तिष्क से काम कर रहे हैं, पर जैसे ही दिमाग उछलकर ईगो (अहम) तक पहुंचा कि वहां एनग्राम आपको निर्देश देता है कि सिगरेट पी लो और आप सिगरेट पीने लगते हैं। चेतन प्रक्रिया आपको आगाह करती है कि सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, पर अचेतन उस पर हावी होकर निर्णय लेता है और वह निर्णय आप मान लेते हैं। यह विशुद्ध सहज-वृत्ति (या इंस्टींक्ट) वाला निर्णय होता है। जब ज्यादा एनग्राम इकट्ठे होते हैं तो हमें भी मालूम नहीं होता कि हम क्या निर्णय लेंगे। यह तो 'पेंडोरा बॉक्स' खोलने के समान है, अंदर इतने एनग्राम या संस्कार छुपे हुए हैं कि क्या पता क्या निर्णय हो। इस हालत में जानवरों के समान हम अपनी सहज-वृत्ति (इंस्टींक्ट) पर ही काम करते हैं। जब एनग्राम गिने-चुने हों तो फाइल को कई मेजों से होकर गुजरने की कोई जरूरत नहीं होती, कुछ गिने-चुने ही पड़ाव होते हैं, जैसा कि निजी कॉरपोरेशनों में होता है। यहां मानव स्तर या बौद्धिक स्तर पर काम होता है। जहां ज्यादा एनग्राम नहीं होते, वहां फाइल को अचेतन क्षेत्र में जाने की दरकार ही नहीं होती। सीधी वह फाइल बुद्धि क्षेत्र में जाती है और मस्तिष्क के ईगो (अहम) क्षेत्र में पहुंचती है, कोई रुकावट नहीं होती। चेतन प्रक्रिया में समय, अचेतन प्रक्रिया की तुलना में बहुत कम लगता है। तब सहज प्रज्ञा काम में आती है और स्तर ईश्वरीय भी हो जाता है। जहां जानवरों का स्तर सहज-वृत्ति का होता है, वहीं मानव का स्तर बौद्धिक होता है। ईश्वरीय स्तर सहज प्रज्ञा का स्तर होता है। सहज बुद्धि का स्तर तमस का स्तर होता है, बौद्धिक स्तर रजस का स्तर होता है और सहज प्रज्ञा का स्तर सत्व का स्तर होता है। सत्व में हमारा दिमाग निरंतर कार्यशील रहता है और हम शीघ्र निर्णय लेते हैं। इस स्तर पर काम करने में हम चौबीस घंटे कार्य करके भी शांत रह सकते हैं इसे ही मैं 'कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म' कहता हूं। कृष्ण कहते हैं कि जब हम सत्व गुण में काम करते हैं तब हम ध्यान को केंद्रित रखते हैं। तब निरंतर गतिविधियों में लिप्त रहने के बावजूद हम पूरी तरह विश्रांत और सहज रहते हैं। अतः यह पूरी प्रक्रिया हमारे एनग्रामों और जमी हुई स्मृतियों पर आधारित होती है। एनग्रामों की संख्या हमें बताती है कि हम सत्व गुण, रजो गुण या तमो

Content: गुण किसमें लिप्त हैं, लेकिन ये तीनों स्थितियां प्रबोधन की स्थितियां नहीं होती। प्रबोधन की स्थिति तो इन तीनों से परे है। यदि हम तमोगुण में लिप्त हैं तो हमें राजस की ओर चलना है। यदि राजस में लिप्त हैं तो हमें सत्व की ओर चलना होगा, लेकिन जब हम सत्व गुण में लिप्त हैं तो हम प्रबोधन की ओर जा सकते हैं। सत्व गुण में संलिप्त स्वतः हमें प्रबोधन की ओर ले जाएगा। उदाहरण के लिए यदि हम तमोगुण में लिप्त है और हमने डॉक्टरी (मेडीकल) विद्या पढ़ी है तो हम अपने अंदर निहित एक आलस्य के कारण अपने पेशे में ठीक से काम नहीं कर पाएंगे। यदि हम प्रैक्टिस किसी ओर कारण से नहीं करते, तो ठीक है, पर तमस के कारण किसी जिम्मेदारी से मुंह चुराना, सही नहीं होगा। यदि हम अपने काम के कारण किसी जिम्मेदारी से मुंह चुराना, सही नहीं है। यदि हम अपने काम में लिप्त आलस्य के कारण अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ रहे हैं तो यह एक अलग बात है। कुछ लोग (डॉक्टर) ध्यान करने, तीर्थाटन करने या कोई अन्य आध्यात्मिक काम के लिए अपनी प्रैक्टिस नहीं कर पाते। इसमें कोई बुराई नहीं है, पर यदि हम तमस में लिप्त आलस्य के कारण अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ रहे हैं तो यह सही नहीं है। तमस के कारण अपने कर्तव्य से भागने का अर्थ है कि हम पर्याप्त ऊर्जा न होने के कारण कोई जिम्मेदारी भरा निर्णय नहीं ले पा रहे, क्यों? इसलिए कि कई एनग्रामों के कारण हमारी निर्णय क्षमता बाधित हो जाती है। जब तक हम एक भी निर्णय की स्थिति तक पहुंचते हैं तो हम थक जाते हैं और सोना चाहते हैं। इसी कारण हम जीवन से पलायन करना चाहते हैं और अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ते हैं। जो पलायनवादी है वे सब तामसिक लोग होते हैं।

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Chapter Number: 14

Content: इन्द्रियों की सुरक्षा

Chapter Number: 14.9

Content: भारत! सत्त्व गुण सुख में लगाता है, रजो गुण कर्म में तथा तमोगुण तो ज्ञान को ढककर प्रमाद में भी लगाता है।

Chapter Number: 14.10

Content: हे भारत! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण, सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण स्थित होता है।

Chapter Number: 14.11

Content: इसलिए जिस काल में इस देह में तथा अन्तःकरण और इन्द्रियों में, चेतनता और बोध शक्ति उत्पन्न होती है, उस काल में समझना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा है।

Chapter Number: 14.12

Content: हे भारत वंशियों में श्रेष्ठ! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ प्रवृत्ति, सब प्रकार के कर्मों का सकाम भाव से आरंभ और विषय-भोगों की लालसा--ये सब उत्पन्न होते हैं।

Content: कृष्ण आगे इन तीनों गुणों की व्याख्या करते हैं। "हे भारत! कभी-कभी सात्विकता प्रदायक सतोगुण वरचस्व प्राप्त करता है तो राजस और तामसिक वृत्ति को दबाकर, तो कभी तमोगुण सात्विकता और राजस वृत्ति को दबाकर प्रमुखता प्राप्त करता है और कभी राजस वृत्ति रजोगुण प्रबल होता है।" इस प्रकार वरचस्व के लिए इन गुणों में प्रतिस्पर्धा चलती रहती है।

Content: हम सभी कभी भी पूरी तरह से सतोगुण, रजोगुण या तमोगुण के अधीन नहीं होते। इन तीनों गुणों के बीच झूलते रहते हैं--एक से दूसरे पर और दूसरे से तीसरे या तीसरे से पहले पर। इस प्रकार हम पर तीनों का प्रभाव रहता है।

Content: कभी-कभी जब हम सुबह सोकर उठते हैं तो काफी तरोताजा महसूस करते हैं। हमें लगता है मानो हमारे सभी प्रश्नों का उत्तर मिल गया हो। हम तरोताजा, जीवंत और लगभग प्रबुद्ध महसूस करने लगते हैं। हर काम शाम तक बड़े आराम से पूरा होता है। अचानक हम व्याकुल हो जाते हैं और दूसरे दिन हम तमस में घिरे रहते हैं। हमारा कुछ भी करने का मन ही नहीं होता। इस प्रकार हमारा मूड इन तीनों गुणों के झूले में झूलता ही रहता है।

Content: हमारी मनःस्थिति क्यों झूले-सा झूलती रहती है?

Content: ऐसा क्यों होता है? इसलिए कि हमने कई संस्कार कुछ चीजों के संदर्भ में एकत्रित कर रखे हैं, उदाहरण के लिए शराब पीने से संबंधित एग्रामों को ही देखें। अपनी युवावस्था से लगातार हमें आगाह किया जाता है कि इस तरह शराब पीना बुरी बात है--यह एक पाप है। यह सुनकर हमारी जिज्ञासा भड़कती है और हम कम-से-कम एक बार एल्कोहल का स्वाद लेने को लालायित हो जाते हैं। बच्चों को कायदे-कानून नहीं सिखाओ, उनमें समझ पैदा करो और इन कायदे-कानूनों के पीछे स्थित उनका औचित्य समझाओ।

Content: यदि हम अपने बच्चों का सुखपूर्वक पालन-पोषण करना चाहते हैं तो हमें ऐसा उनमें बिना किसी अपराध भाव पैदा किए, करना पड़ेगा। यदि बिना औचित्य समझाए हम उन्हें अपने कायदे-कानून का पालन करने को कहेंगे तो उनकी भंग करने में वे लिप्त हो सकते हैं। बेशक, 'कानून भंग करना अपराध भाव देता है और अपराध भाव होना शायद सबसे बड़े पाप का प्रतिफल है, परंतु इसके बजाय उन्हें समझ पैदा करनी चाहिए, जिसके लिए दो चीजों की आवश्यकता होती है। पहली जरूरत है कि हमारे अंदर इतनी बुद्धिमत्ता होने की कि नियमों और कानूनों के पीछे छिपा औचित्य हमारी समझ में आ जाए, तभी हम उन कानूनों का पालन कर सकेंगे। दूसरी चीज हमारे अंदर इतना धैर्य होना चाहिए कि यह सबको समझा सकें, भले ही इसमें समय और ऊर्जा लगे, पर हमारा ध्यान सभी में यह समझ पैदा करने पर ही होना चाहिए।

Content: यदि आप चाहते हैं कि लोग आपके नियमों को मानें तो कभी उन्हें थोपें नहीं। यह स्वाभाविक है कि हम उन्हें जो नियम बताएँगे वे उसका विरोध ही करेंगे, बल्कि यह भी निश्चित नहीं कि वे विरोध ही करेंगे। यह भी कहना मुश्किल है कि वे क्या करेंगे। यद्यपि इसमें काफी समय और ऊर्जा लगती है,

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Content: पर नियमों का पालन करवाना बच्चों का पालन-पोषण करना ही है, इसमें काफी धीरज और समझ की दरकार होती है। लोग प्रायः मुझसे शिकायत करते हैं- 'स्वामी जी! आज के युग में समय ही नहीं मिलता। मेरी लड़की स्कूल जाती है; मैं भी काम करता हूँ। इतना समय ही नहीं होता कि मैं अपनी बेटी को कुछ समझा सकूँ।' मैं कहता हूँ- 'यदि तुम्हारे पास अपनी बेटी का सही ढंग से पालन-पोषण करने का समय नहीं था तो तुमने उसे पैदा ही क्यों किया? तुम्हें तो मेरी तरह से संन्यासी हो जाना चाहिए था। यह निर्णय तुम्हें पहले ही ले लेना चाहिए था।' एक माँ अपने बच्चे के साथ मेरे पास आई और बोली- 'स्वामी जी! ज़रा इसे समझाओ कि यह मेरी आज्ञा माना करो।' पर मैं यह राय देना नहीं चाहता था, क्योंकि जब मैं बच्चा था तब मेरी माँ भी अपनी माँ की कहना नहीं मानती थीं। अब वे वही राय उसकी कैसे दे सकता था, पर मैं उस महिला से मना भी तो नहीं कर सकता था तो मैंने उस महिला को खुश करने के लिए उसके बच्चे को यही मशविरा देने का निर्णय किया। उधर वह महिला कहती रही- 'स्वामी जी! इसे कुछ समझाइए ना।' दो-तीन बार मैंने टालने का प्रयत्न किया, पर बात बनी नहीं। अंततः मैंने उस बच्चे को बुलाकर कहा- 'तुम अपनी माँ का कहना क्यों नहीं मानते देखो! मैं स्वयं भी उसकी बात मान रहा हूँ। तुम्हें भी उनकी बात माननी चाहिए!' बच्चे का उत्तर सुनकर आप सब लोगों को भी आश्चर्य होगा। वह बोला- 'स्वामी जी! वह खुश नहीं हैं। यदि मैं उसका कहना मानूँगा तो मैं भी खुश नहीं रहूँगा। आप क्यों ज़ोर दे रहे हैं कि मैं उसका कहा मानूँ।' मैं तो हैरत में पड़ गया, पर बात वह सच कह रहा था। मैंने किसी प्रकार उसे समझाया और उससे पिंड छुड़ाया, पर मैं स्वयं आश्वस्त नहीं था कि मैंने सही किया या नहीं। वह बच्चे के मन में सत्य कहा था। यदि उसकी माँ दुःखी है तो वह उसकी बात कैसे मान सकता था। निकट भविष्य में बच्चे माँ-बाप पर मुकदमा कर देंगे, यदि उनका पालन-पोषण सही नहीं किया गया। कुछ ने तो इसकी शुरुआत भी कर दी है। जो बच्चे अवसाद ग्रस्त (डिप्रेशन में) हैं या जेल में हैं, उनका कहना है कि उनकी सारी समस्याओं की जड़ उनके माँ-बाप ही हैं, क्योंकि उन्होंने सही ढंग से उन्हें नहीं पाला है; बज़ाय उनकी सही देखभाल के, उनको बिगाड़ा गया है। इसलिए बच्चों के प्राप्ति करने का निर्णय करने के पूर्व आपको प्रबुद्ध होना चाहिए। भावी माँ-बाप के लिए यही अहंता होनी चाहिए। यदि हमें यह स्पष्ट ज्ञात न हो कि कैसे उनका मार्गदर्शन करना है, हमें उनका पैदा करने की

Content: योजना नहीं बनानी चाहिए। संसार में वैसे ही काफी जनसंख्या है। इस पृथ्वी ग्रह पर अरबों लोग वैसे ही मौजूद हैं। यदि जो हैं उनको सही ठिकाना, शिक्षा या दवा इत्यादि की बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं करवा सकते तो और लोगों को संसार में लाने की क्या ज़रूरत है? अतः यदि बच्चे चाहिए तो उनके सही पालन-पोषण की अक्ल भी हम में होनी चाहिए। उनको सही समझ प्रदान करना भी हमारी ज़िम्मेदारी होती है। हम जो समझ उनको प्रदान करते हैं, वह सच्च की सतह पर रिकार्ड होती है उनकी चेतना में। यहीं समझ बुद्धिमत्ता का रूप लेकर उभरती है, पर जो आप नियम या आदेश देते हैं, वह राजस और तमस की सतह में अंकित होते रहते हैं। अगर आपको कोई सही राय देनी भी है तो उसे किसी नियम या कानून के रूप में न दें, क्योंकि नियम के रूप में दी गई सही समझ भी बच्चों के अंदर एक वितृष्णा बनकर उभरती है। जब माँ-बाप अपने बच्चों को मेरे पास लाते हैं तो वे उन्हें बाध्य करते हैं मेरे चरण स्पर्श करने के लिए। मैं उनसे कहता हूँ- 'ऐसा कतई न करें।' इससे आपका लालच प्रकट होता है।' ये माँ-बाप सोचते हैं अपने बच्चों से मेरे पैर छुवाकर उन्हें या उनके बच्चों को पुण्य मिलेगा। यही विचार वे अपने बच्चों पर थोपते हैं; यानी वह विचार जो एक तरह के लालच से पैदा होता है। वस्तुतः अपने बच्चों पर यह ज़बरदस्ती कर वे उन बच्चों के अंदर मेरे प्रति एक नफरत का भाव पैदा करवाते हैं। कभी-कभी तो कुछ माँ-बाप अपने बच्चों का सिर मेरे चरणों पर रखवाने की ज़िद करते हैं- मानो मेरे चरण से एक धनात्मक लहर निकल रही हो। मैं इन माँ-बापों को कहता हूँ कि कोई काम ज़बरदस्ती न करवाओ। बस 'नमस्कार' करना ही काफी है, अन्यथा उनकी ज़बरदस्ती बच्चों के मन में मेरे प्रति एक नफरत पैदा कर देती है। इस अनुग्रह के बाद यदि वे किसी भगवत वस्त्रधारी को देखेंगे तो वे बड़बड़ाएँगे- 'अरे! अब फिर वही एक्सरसाइज़ करनी पड़ेगी।' बच्चों पर कभी कोई नियम थोपना नहीं चाहिए। अपने माँ-बाप के थोड़े गए निर्देश अभी तक हमें कष्ट दे रहे हैं, क्योंकि इस तरह माँ-बाप के दिए हुए निर्देश राजस और तमस की सतहों पर एकत्रित होते हैं, जो हमारे अंदर व्याकुलता और गहरा अवसाद लगातार पैदा करते रहते हैं और हमारी समस्याओं को बढ़ाते रहते हैं।

Content: इच्छा और अपराध बोध

Content: इच्छा और अपराध बोध एक ही ऊर्जा के दो पहलू हैं। एक का संबंध

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Content: भविष्य से होता है तथा दूसरा विगत से जुड़ता है। इच्छा भविष्य से और अपराधबोध विगत से जुड़ता है। 'मुझे ऐसा कर लेना चाहिए था' का भाव (अपराधबोध), 'मुझे यह करना चाहिए' भाव में प्रमुख भूमिका निभाता है। 'मुझे यह करना चाहिए' का निर्धारण 'मुझे ऐसा कर लेना चाहिए' भाव से होता है। अपराधबोध जो हमारे बड़े-बुजुर्गों के थोपे गए नियमों के कारण पैदा होता है, हमारे जीवन को नरक बना देता है और हमें तमस की ओर ले जाता है। कृष्ण कहते हैं कि यह हमें अंत की ओर ले जाता है। हम अंततः अज्ञान में पहुंचकर खत्म हो जाते हैं। कृष्ण कहते हैं कि शुभ गुणों का प्राकट्य तभी अनुभूत होता है जब शरीर के सारे द्वार ज्ञानालोकित हो। यही तकनीक कारगर रहती है। शरीर के द्वार यानी आंख, नाक, कान, जिह्वा और त्वचा की अनुभूति। ये वे माध्यम हैं जिनसे शरीर को बाहरी विश्व का अनुभव प्राप्त होता है। यही वह फ़ाइलें (सूचनाएं) हैं जो हमें बाहर का हाल बताती हैं। कृष्ण कहते हैं कि यदि हम यही द्वार ज्ञान के प्रकाश से आलोकित रखेंगे तो हमारा सात्विक भाव उदय होगा। इसलिए इन द्वारों को सुरक्षित रखना चाहिए। यह सुरक्षा ज्ञान से प्राप्त होती है। अर्थात् हमें यह ज्ञान होना चाहिए कि क्या हमें अंदर जाने देना है और क्या नहीं। इसका सही ज्ञान हमें सदैव सत्व भाव में रखेगा या आनंद देता रहेगा। कृष्ण कहते हैं हमें इन द्वारों के लिए एक सजग पहरेदार रखना चाहिए। हमारे शरीर में ऐसा कोई सुरक्षा तंत्र नहीं है। प्रायः हम अपने घर के लिए सुरक्षा गार्ड रखते हैं। लोग ज्यादा-से-ज्यादा 12 घंटे घर पर विताते हैं और शेष 12 घंटे बाहर व्यतीत करते हैं, पर हम 24 घंटे इस शरीरनुमा घर में विताते हैं, पर इसके लिए सुरक्षा का कोई प्रबंध नहीं करते। रमण महर्षि ने पवित्र अरुणाचल हिल, तिरुवनमलाई के लिए एक सुंदर श्रद्धांजलि में अपने प्रसिद्ध गीत 'अरुणाचल अक्षरमनामलाई' में गाया है - "जब ये पांच चोर - शरीर की पांचों इंद्रियां - घर में घुसे, तब ओह अरुणाचल, तुम क्या घर पर नहीं थे? वे घुसे कैसे अंदर?" वे शिव से पूछते हैं - "जब ये पांच चोर घर (शरीर) के अंदर घुसे तब तुम वहां नहीं थे?" तुमने इन चोरों को घुसने कैसे दिया?" कृष्ण भी कहते हैं कि हमारे इन पांच द्वारों की रक्षा हेतु कोई सुरक्षा तंत्र होना चाहिए; ज्ञान से बचाव होना चाहिए, तभी हम निरंतर आनंद में रह सकते हैं। इसका स्पष्ट अर्थ है कि हमें उन विचारों को पैदा नहीं होने देना चाहिए जो अंदर घुसकर हमारी आंख व अन्य इंद्रियों को कष्ट पहुंचाते हैं। क्या इसका

Content: अर्थ नहीं है-टेलीविजन से दूर रहो या कम-से-कम वे प्रोग्राम मत देखो जो मन में अवसाद पैदा करते हों। सिर्फ वही देखो जिनको देखकर मन प्रफुल्लित एवं हर्षित रहे। जो प्रोग्राम हमें चालाक बनाएँ या हिंसा दे या जो दुःख दें, उन प्रोग्रामों को कभी देखना नहीं चाहिए। जब हम अपनी इंद्रियों के सत्य तत्व को सुरक्षित रखेंगे तो हम ऋणात्मक एनग्रामों (संस्कारों) को अंदर आने ही नहीं देंगे। लोग मुझसे पूछते हैं - "यदि हमें समाज में होने वाली घटनाओं-गतिविधियों का ज्ञान ही नहीं होगा तो हम समाज में कैसे रहेंगे?" इसकी आप चिंता न करें। यदि कोई महत्वपूर्ण समाचार है तो किसी-न-किसी रूप में वह हमारे पास आ ही जाएगा। हम कोई एकांत द्वीप में तो नहीं निवास कर रहे हैं। फिर, मीडिया के द्वारा यदि हमें ज्यादा आपराधिक गतिविधियों के बारे में भी मालूम हो भी जाएगा तो ही हम क्या कर लेंगे?-वही खबरें तो अखबार भी छापते हैं-हत्या, बलात्कार, चोरी एवं दुर्घटनाओं के बारे में। बाकी क्या अंतर है सिवाय इसके कि देश या शहर का नाम बदल जाता है। वस्तुतः हम बज़ाय रोज़ अखबार पढ़ने के स्वयं ही बता सकते हैं कि कहां और कब क्या वारदात होगी। हम यही खबरें क्यों पढ़ना और प्रमाणिक सिद्ध करना चाहते हैं। सिर्फ जगह, संख्या इत्यादि का ही परिवर्तन होता है, हादसों का नहीं। हमारे जीवन में इनसे क्या परिवर्तन आ सकता है? यदि जो इनको संभालने के लिए जिम्मेदार हैं, इनके बारे में जानते हैं तो यह काफी है। जब हम ऐसी सूचनाएं लगातार अपने दिमाग में डालते रहते हैं तो हम इनके एनग्राम बना देते हैं। इनसे हम अपने अंदर भय और कष्ट के आघात पैदा करते हैं। यदि लगातार अपहरणों के बारे में हम पढ़ते-सुनते रहेंगे तो कभी भी अगर हमारे अपने लोगों-पति-पत्नी या बच्चे को लौटाने में थोड़ी भी देर होगी तो हम चिंता करने लगेंगे, व्याकुल हो जाएंगे। इसके बरअक्स यदि भगवान न करे कुछ गड़बड़ होनी भी है तो वह उसी दिन तो होगी। यहां तो यह भय हमें रोज़ ही सालता रहेगा-क्योंकि हमने इसके एनग्राम बना लिए हैं। क्या हम इनका होना रोक सकते हैं? यदि संभव है तो कैसे? यदि हम इन्हें रोक दें तो कोई समस्या नहीं। तब तो यह काम हमारी बुद्धिमत्ता का ही है अर्थात् जो बृद्धि-कोशल इन समस्याओं को होने से रोक सके, वही बुद्धिमत्ता है, परन्तु ज़्यादातर समय हम इन एनग्रामों को इकट्ठा करते रहते हैं, जिन्हें न हम रोक सकते हैं या उनमें कुछ भी अंतर ला सकते हैं। नतीज़तन, हम केवल कष्ट ही पाते रहते हैं। यानी बार-बार हम स्वयं को राजस और तमस में डालते रहते हैं।

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Content: इसलिए आप कृपया उन विचारों से परहेज़ करें, जो आपको कष्ट देते हैं। सिर्फ उन्हीं विचारों से सरोकार रखें जो आपको शांति और आनंद की अनुभूति देते हों। हमें यह सब थोड़ा अव्यावहारिक भी प्रतीत हो सकता है। हम सोच सकते हैं-“जब तक दुनिया में घटित होने वाली घटनाओं का हमें ज्ञान नहीं होगा, हम अपने समाज में कैसे रह सकते हैं?” यहां भी यह समझ लें कि हर समय यह जानना कि दुनिया में क्या हो रहा है, एक तरह का रोग ही होता है, फालतू में सच्चाईयां एकत्रित करते रहना भी एक बीमारी है। कुछ दिन पूर्व एक सज्जन ने मुझसे कहा-“स्वामी जी! अपनी संस्कृति के बारे में जागरूक रहने के लिए आवश्यक है कि हम टेलीविज़न देखते रहें।” “पर ये टीवी प्रोग्राम बकवास और निरर्थक होते हैं, जितना हम इनको देखते हैं उतनी ही ऋणात्मकता हमारे अंदर बढ़ती जाती है।” लगातार ऐसे टीवी प्रोग्रामों को देखने से हमारे अचेतन मस्तिष्क में मानव-जीवन के बारे में एन्ग्राम बनते जाते हैं। यदि हम इन प्रोग्रामों को लगातार देखते और सुनते रहें तो हम इससे प्राप्त सारी ऋणात्मकता को अपने जीवन में उड़ेल देते हैं, फलस्वरूप हम अपने लिए कुछ असंभव एन्ग्राम बनाते हैं, जिन्हें देखे-सुने हालात के आधार पर। जीवन बहुत मूल्यवान और क्षणस्थायी है, इसे ऐसी फालतू चिंताओं के लिए बर्बाद नहीं किया जा सकता। अवसाद, थकी-हारी मनःस्थिति और तृष्णा पैदा करने वाले ऐसे विचारों से स्वयं को मुक्त रखें, खासतौर पर संध्या के समय जब दिन और रात मिलते हों, यह समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। यह हमारे प्राचीन स्वामियों को ज्ञात था। यह संध्या, दिन में दो बार आती है—उषाकाल और गोधूलि बेला में। हमारे प्राचीन ऋषियों को ज्ञात था कि जो विचार-बीज इस समय हमारी समझ में बोए जाएंगें वह पूरा पेड़ बनकर उभरेगा। इसलिए प्राचीन मनीषियों ने कहा था कि संध्याकाल पवित्र माहौल में बिताया जाना चाहिए—पूजा-अर्चना में, प्रार्थना में, भगवत भक्ति संबंधी साहित्य पढ़ते हुए, मंदिरों में या ध्यान में। इस समय के आध्यात्मिक विचार बीज रूप में हमारे अंदर प्रविष्ट होकर हमारे जीवन के लिए छायादार वृक्ष बनकर उभरते हैं, पर आजकल हम संध्याकाल में ही टीवी देखते हैं और सारा कबाड़ अपने अंदर भर लेते हैं और दूसरे दिन इसकी दुर्गंध हमें मालूम पड़ने लगती है। इस पवित्र काल में कभी भी अपने अंदर ऋणात्मक संस्कार नहीं स्थापित करने चाहिए। हमें अपनी इंद्रियों की चौबीसों घंटे सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। यदि पूरे समय नहीं तो कम-से-कम संध्याकाल में तो स्वयं को ऋणात्मक विचारों से बचाना ही चाहिए। संध्या काल एक परीक्षा-दर्शन काल होता है, जो डेढ़ घंटे

Content: का होता है, जब दिन और रात मिलते हैं। भारत में यह समय सुबह-शाम 6 से 7:30 बजे तक का होता है, अर्थात् सूर्योदय और सूर्यास्त के समय के आस-पास का समय। यह विभिन्न देशों में अलग-अलग समय उभरता है। संध्याकाल में ऋणात्मक संस्कारों-विचारों से हमें स्वयं को बचाना चाहिए, क्योंकि इस समय के संस्कार हमारे पूरे जीवन को प्रभावित करते हैं। कृष्ण इस सलाह द्वारा हमें यह विधि बताते हैं जिसके द्वारा हम इसका क्रम भी बदल सकते हैं। इस विधि द्वारा हम संपूर्ण बदलाव ला सकते हैं, एक प्रकार का समूल परिवर्तन प्राप्त कर सकते हैं। अभी यह संज्ञेयता हमारे मस्तिष्क में ऋणात्मक एन्ग्रामों के आधार पर होती है। यदि हम 'इनपुट' को परिवर्तित कर सकते हैं या अपनी मानसिक प्रवृत्ति को भिन्न स्पंदन या भिन्न ऊर्जा क्षेत्र में ले जा सकते हैं तो संज्ञेय परिवर्तन घटीत होने लगता है। तब हम प्राप्त आंकड़ों को धनात्मक या सकारात्मक एन्ग्रामों से बरतने लगते हैं, जिसका आधार पूरी तरह धनात्मक होता है। कृष्ण हमें यही सुझाव देते हैं- यह विधि सुझाते हैं- अपने इंद्रिय-लक्ष्य ज्ञान को ऋणात्मक विचारों से बचाओ और उनको धनात्मक विचारों से भर दो। इस समय जो विचार हमें मिलेंगे वही हमारे अस्तित्व के संचालक हो जाएंगे और हम वही ऊर्जा विकिर्ण करेंगे। संध्या समय को शुभ कार्यों में बिताओ। यदि घर पर हो तो ध्यान करो। यदि ध्यान का अभ्यास नहीं है तो सुबह-शाम किसी पवित्र धार्मिक स्थल मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च इत्यादि में जाओ या किसी आध्यात्मिक क्रिया में लिप्त रहो। प्रार्थना करो, कोई शुभ कार्य करो, परंतु ऋणात्मक एन्ग्रामों से स्वयं को बचाते रहो, क्योंकि जितने ऋणात्मक एन्ग्राम जाएंगे उतने ज्यादा हम अवसाद ग्रस्त होते हैं। हम बैंक में जितना धन डालोगे उतना ही हमारे खाते में धन बढ़ेगा। जितना हम ऋणात्मक एन्ग्रामों से जूझेंगे उतना ही हम अवसाद में डूबते जाएंगे। हमारे प्राचीन स्वामियों (ऋषि-मुनिगण) ज्ञात थे कि कहां धनात्मक एन्ग्राम इकट्ठे होते हैं और कहां ऋणात्मक एन्ग्रामों का जख़ीरा रहता है। उन्होंने इसके लिए कई जगह सुनिश्चित कीं जहां से धनात्मक एन्ग्राम लेकर हम अपनी सुरक्षा कर सकते हैं। यह कृष्ण का सुझाव हमारे अस्तित्व को सुरक्षित रखकर विशुद्ध सात्त्विक सुरक्षा देता है और आनंद की अनुभूति कराता है। कृष्ण ने पहले भी बताया था कि जब कोई जागरूक रहता है तो वह शुद्ध भाव में रहता है। अब वे बता रहे हैं कि राजस भाव में क्या होता है। वे बताते हैं कि रागात्मकता, लालच, तृष्णा एवं व्याकुलता राजसिक वृत्तियों के द्योतक होते हैं। वैसे तो यह अवस्था ज़्यादातर लोगों की होती है,

Content: श्रीमद्भगवते गीता 148

Content: श्रीमद्भगवते गीता 149

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Content: पर व्यापारियों और कॉरपोरेट जगत के लोगों पर यह ज़्यादा लागू होती है। लालच एक कॉरपोरेट लालसा का लक्षण है। लोग जो अपने कार्यकार्ताओं को भर्ती कर उन्हें प्रशिक्षण प्रदान करते हैं, प्रायः अंतःप्रेरणा को एक औज़ार की तरह प्रयोग करते हैं। यह अंतःप्रेरणा या किसी लक्ष्य प्राप्ति हित प्रलोभन क्या होता है? वस्तुतः किसी को किसी खास उद्देश्य के लिए उकसाना गलत है। किसी को प्रलोभित करने के लिए उसके सामने कोई बड़ा आकर्षण रखा जाता है। फिर वही आकर्षण उसका लक्ष्य बन जाता है। यदि हम गधे हैं तो हम 'गाजर' (प्रलोभन या आकर्षण) के पीछे जाएंगे, लेकिन यदि हम में बुद्धिमत्ता है तो हमारी समझ में आ जाएगा कि यह 'गाजर' सदैव हमारी पहुंच सीमा के ठीक बाहर ही लटकाई जाएगी। गधा तो गाजर के पीछे भागेगा ही, वह तो रुक ही नहीं सकता। गाजर इतने समीप, पर कितनी दूर है तो वह (गधा) शांत कैसे रह सकता है? यह कहानी कॉरपोरेट लोगों की भी है। ये व्यापारीगण मुझसे शिकायत करते हैं- "स्वामी जी! व्यापार करना बड़ा टेढ़ा काम है। आजकल ईमानदारी तो रही ही नहीं गई। हर आदमी बेईमान है। किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता। आजकल तो खूब घाटा हो रहा है, पता नहीं कब तक टिक पाऊंगा? मुझे सही परामर्श दीजिए।" ये लोग बड़े चतुर होते हैं। कभी यह नहीं कहते- "मेरी सहायता करो!" सदा यही कहते हैं- "अपनी राय दीजिए!" इस शब्दजाल में मैं पकड़ा जाता हूँ। यदि मैं इन्हें कुछ करने की राय देता हूँ तो वे मुझ पर बाद में जिम्मेदारी थोप सकते हैं। बाद में वे हमेशा कह सकते हैं- "स्वामी जी! मैंने आपका कहा ही किया था, वह काम नहीं आया। अब मेरी सहायता कीजिए!" मैं उन्हें कहता हूँ- "यदि व्यापार करना टेढ़ा काम है, तुम्हें किसी पर भरोसा नहीं रहा है और कुछ धंध भी नहीं कमा पा रहे तो व्यापार बंद क्यों नहीं कर देते? व्यापारी दंड-फंद से मुक्ति पाओ और आराम करो।" तो वे फट पड़ते हैं- "वह स्वामी जी! खूब कही। तो मैं करूंगा क्या? जिऊंगा कैसे?" यानी एक तरफ उनका कहना है कि वे धन गंवा रहे हैं और जब मैं ऐसे व्यापार को बंद करने के लिए कहता हूँ तो वे कहते हैं कि वे जिएंगे कैसे? पता नहीं ये कैसा नाटक चालू है। हम अभी भले ही हंस लें, पर हममें से हर एक यह नाटक करता रहता है- एक मनोवैज्ञानिक नाटक, जो हम स्वयं ही दिखाते हैं। असल में हम लोग तो चाबी भरे खिलौने की तरह हैं। हमारी चाबी इतनी

Content: कसी है कि जब भी हमारे अंदर की कोई स्प्रिंग ढीली होने का प्रयास करती है तो हमारे अंदर का कोई और हिस्सा कस जाता है। हम तो टीवी में दिखाई गए विज्ञापन 'बैटरी बनी' की तरह हैं। हम हमेशा चलते रहते हैं, आराम कर ही नहीं सकते। हम समझते हैं कि जीवन का एकमात्र उद्देश्य चलते ही रहना है। हमारा जीवन उद्देश्यहीन होता है। जीवन का कोई लक्ष्य नहीं होता। हम बस इसी चिंता में डूबे रहते हैं कि हम कब पहुंचेंगे, कहां पहुंचेंगे? वस्तुतः जीते रहना ही हमारा पंथ है और वही गतव्य है। यदि हम जागरूक हैं, सत्य में हैं तो हमें पंथ पर चलने में मज़ा आता है और यात्रा आनंदपूर्ण लगती है। जब तक हमें पंथ पर चलने में आनंद आता है, हमारा रास्ता सही होता है और गतव्य भी सही रहेंगे, पर बनाय पंथ का एक आनंद लेने के हम लक्ष्य की चिंता करने लगते हैं कि कब पहुंचेंगे, कहां पहुंचेंगे और इस उधेड़बुन में हम यह नहीं देखते कि हम चल कैसे रहे हैं। यात्रा का आनंद हम गंवाते रहते हैं। यदि हमें पंथ पर चलने का आनंद मिल रहा है तो हमें काम में भी आनंद आता है। तब ही हमारा पंथ सही रहता है और हम सही ठिकाने पर पहुंचते हैं। इसी कारण जो सफल व्यक्ति होते हैं, वे अपने काम के बारे में एक जुनून पालते हैं। उन्हें इसकी चिंता कतई नहीं होती कि वे कहां पहुंचेंगे जब तक उन्हें काम में आनंद आता है। जब हमें अपने काम के बारे में जुनून हो तो हमें काम करने में मज़ा आता रहेगा और हम जो काम करेंगे वह सफल ही नहीं, अद्भुत भी होगा लेकिन यदि काम में हमें कोई मज़ा नहीं आता और हम संघर्ष करते रहते हैं तो हम कष्ट ही पाते हैं, चाहे भले ही हम थोड़ा पैसा कमा लें। हमारा लक्ष्य सदैव एक मृगतृष्णा जैसा लगा- पानी एक दृष्टिभ्रम ही रहेगा और जैसे ही हम अपने लक्ष्य तक पहुंचते हैं तो हम फिर दूसरे लक्ष्य की ओर चलने लगते हैं। एक मिनट को भी हमें न रुकना चाहते हैं, न आनंद लेना चाहते हैं, न चैन पाना चाहते हैं। अपनी उपलब्धि का संतोष भी हमें नहीं पाना आता। हमारा लक्ष्य कुछ भी प्राप्त करना होता है, आनंद नहीं। राजस में हम कभी सुखी नहीं रह सकते। यह हमें गधे की तरह तब तक जोते रखता है, जब तक कि हम थककर गिर ही न जाएं। हमें यह तय करने की ज़रूरत है कि इस ढंग से हमें जीना चाहिए या नहीं। स्वयं से पूछें- "क्या मैं एक गधे की तरह जीवनभर सामने लटकी हुई 'गाजर' के पीछे भागना चाहता हूँ?" जब हम तय करते हैं- "नहीं! यह तो वह ढंग नहीं जिसमें मैं जीना चाहता हूँ" तो यही वह क्षण होता है जब हम राजस से हटकर आनंद की ओर जाने लगते हैं।

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Chapter Number: 14

Content: 14.13 हे कुरु नंदन! तमोगुण के बढने पर अंतःकरण और इन्द्रियों में अंधेरा एवं कर्तव्य कर्मों में अप्रवृत्ति और प्रमाद अर्थात व्यर्थ चेष्टा और निद्रादि की अंतःकरण की मोहिनी प्रवृत्तियाँ-ये सब उत्पन्न होते हैं।

Chapter Number: 14

Content: 14.14 जब यह जीवात्मा सतोगुण की वृद्धि में देह छोड़ता है तो उत्तम कर्म करने वालों को निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकों की प्राप्ति होती है।

Chapter Number: 14

Content: 14.15 रजोगुण के समय मृत्यु को प्राप्त करने वाला मनुष्य कर्मों की आसक्ति वाले मनुष्यों में (दोबारा) उत्पन्न होता है; तथा तमोगुण के बढने पर मरा हुआ पुरुष कीट, पशु आदि मूढ़ योनियों में उत्पन्न होता है।

Chapter Number: 14

Content: 14.16 सात्विक कर्म का तो सात्विक-सुख, ज्ञान और वैराग्य आदि देने वाला निर्मल-फल कहा गया है; राजस कर्म का फल दुःख एवं तमस कर्म का फल अज्ञान कहा गया है।

Chapter Number: 14

Content: 14.17 सतोगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है और रजोगुण से नि:संदेह लोभ तथा तमोगुण से प्रमाद और मोह उत्पन्न होते हैं और अज्ञान भी (उत्पन्न) होता है।

Content: राजस गुण से जब हम अभिभूत होते हैं तो हम एक चाबी भरे खिलौने की तरह बर्ताव करते हैं और तमस वृद्धि में हम बैट्री चालित उस खिलौने की तरह व्यवहार करते हैं, जिसकी बैट्री खत्म हो चुकी हो। कृष्ण यहां अपनी बात समझाने के लिए शक्तिशाली शब्दों का प्रयोग करते हैं और कहते हैं कि उस स्थिति में हम कितने हताश और कामुक हो जाते हैं-अपने अज्ञान, पागलपन, भ्रम, अंधकार और आलस्यपूर्ण स्थिति के कारण।

Content: आश्चर्य होता है कि राजास से तमस की ओर व्यक्ति कितनी जल्दी फिसलता है। व्याकुलतापूर्ण गतिविधियों से निष्क्रियता में या आलस्यपूर्ण जड़ता में फिसलना स्वाभाविक है। व्यर्थ की गतिविधियाँ, तनाव से बोझल गतिविधियाँ तथा इन्द्रिय सुख पर केन्द्रित दबाव युक्त गतिविधियाँ प्रायः गहरी थकावट देती हैं। तमस की निरर्थक गतिविधियों की सक्रियता सत्व की सक्रियता से बिल्कुल फर्क होती हैं। उनमें ज़ाहिर तो कोई उद्देश्य नहीं लगता, पर उनका लक्ष्य बहुत गूढ़ होता है। इन दोनों को एक ही समझने की गलती न करे।

Content: जैसा कि मैं पहले कह चुका हूं कि राजस में असली ख़तरा होता है, हमारी लक्ष्य पर ही ध्यान केन्द्रित रखना और रास्ते के आनंद से स्वार्थ को लगातार वंचित रखना, क्योंकि कोई उद्देश्य नहीं होता। हम बेमतलब आगे बढते रहते हैं। जीवन का कोई उद्देश्य होता भी नहीं है जीवन का अर्थ है जागरूक रहना, चेतन रहना और आंतरिक दिव्यता को महसूस करना, इसलिए तो मैने कहा था कि मैं यहां अपनी दिव्यता नहीं, आपकी दिव्यता सिद्ध करने आया हूं। जीवन का चरम उद्देश्य है अपनी आंतरिक दिव्यता को महसूस करना। इससे कम कुछ भी निरर्थक है। लगातार आक्रामक होना, बेचैनी से काम करते रहना, चलते रहना इस दिव्यता को कभी महसूस नहीं करेंगे। हम ऐसे तो एक के पीछे पडते रहेंगे, फिर दूसरों के पीछे पडेंगे और इस अंतहीन चक्र में उलझे रहेंगे। इस हालात में तो हम सिर्फ अपना लालचीपन दिखाएंगे। रमण महर्षि कहते हैं कि जब उसके लिए बेचैन हो रहे हो तो एक राई भी पहाड जैसी प्रतीत होती है, पर जैसे ही उसे पाया कि पहाड जैसी चीज़ एक नगण्य राई के दाने जैसी लगने लगती है।

Content: जब हम अपनी संग्रकामो इच्छा से संचालित होते हैं तो हम कभी न कभी तो इस चाह में थकेंगे ही। आक्रामकता की परिणति गहरा अवसाद होता है। इसे ही मैं कहता हूं 'सफलता का अवसाद'। अमेरिका जैसे देशों में यह व्यापकता से दिखाई पडता है। लोग पागल रहते हैं अपनी धन-संपत्ति बढाने को और सब कुछ भूलकर इसी में जुटे रहते हैं। वहां लोग हर साल कार, हर तीसरे साल मकान और हर पांचवें साल अपना जीवनसाथी बदल लेते हैं। बिना जाने कि धन-संपत्ति संबंधी संग्रह या उनकी निशानियां एकत्रित करने से क्या होगा, लोग उनके पीछे पागलों की तरह जुटे रहते हैं। एक दिन आता है कि उनको अपनी मर्ज़ी की चीज़ें मिल जाएं या वह प्राप्त कर लें,

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Content: लेकिन दुःख उनका तब भी नहीं जाता, न बेचैनी दूर होती है, न चित्त में धीरज आता है। वे सब फिर सोचते हैं कि हम इन चीजों को इकट्ठा क्यों करना चाहते थे, क्योंकि उनके लिए इतनी मेhnat की और तबालत मोल ली। तब एक असंतोष पैदा होता है जो उन्हें गहरे अवसाद में उतार देता है, जिसे हम तमस कहते हैं। भारत जैसे गरीब देशों में लोगों के पास ज्यादा कुछ तो होता नहीं इसलिए वे कम-से-कम मूलभूत सुख प्राप्त करने को लालायित रहते हैं। दिन में तीन बार भोजन कर लेना, जूते पहनकर चलना-फिरना और कॉलेज जाने के लिए सक्षम होना ही उनके लिए बड़ी ऐश है, परंतु जिनके पास ज़रूरी सुविधाएं भी नहीं होतीं, उनकी पीड़ा का उत्स होता है असफलता का अवसर, परंतु इसको तुलनात्मक आसान से ठीक किया जा सकता है क्योंकि वांछित सफलता की प्राप्ति में ही उनकी खुशी रहती है, परंतु सफलता का अवसर ठीक करना काफ़ी मुश्किल होता है। सदा सफल रहने के बाद असफल होना, जबकि पूरी मेhnat से काम किया हो-आसानी से स्वीकार्य नहीं होता। फलस्वरूप अवसाद पैदा होता है, तमस गुण छाता है। तमस की शुरुआत होती है अपने सही रूप की न समझ पाने या अज्ञान से। यही मूल (ओरिजिनल) पाप है। आदम और हव्वा का ओरीजिनल पाप (प्रथम पाप) न तो उस सांप की बात न सुनना था और न ही यौन क्रिया में लिप्त होना था बल्कि असली पाप था अपने अंदर की दिक्कत को न समझ पाने की क्षमता का। कभी-कभी इस अज्ञान से बाहर आने के प्रयास भी तमस पैदा करते हैं। आध्यात्मिक पथ का राही, एक राजस में डूबा हुआ व्यक्ति जो बड़े आक्रामक रूप से पादार्थिक उपलब्धियों के पीछे पड़ता रहता है, भी राजस से तमस में कुछ देर को प्रवेश कर जाता है। मैं अपने आश्रम में यह सब देखता रहता हूं। जब कोई व्यक्ति जो अभी तक निरर्थक गतिविधियों में डूबा रहता हो, ध्यान को केंद्रित करता है तो उसका शरीर-मन तंत्र उस गतिविधि को स्वीकार ही नहीं करता और पूरी तरह निष्क्रिय होकर तमस में चला जाता है। कुछ लोग दिन-रात सोते रहते हैं और कुछ करना ही नहीं चाहते, पर यह स्थिति ज़्यादा दिन तक नहीं चल सकती। धीरे-धीरे उसके मन की सारी ऋणात्मक प्रवृत्तियां थककर सात्विक क्षेत्र में आकर सार्थक गतिविधियों में जुड़ जाती हैं, अर्थात् उन गतिविधियों में जिनका कोई स्पष्ट लक्ष्य या उद्देश्य नहीं होता-कम-से-कम तात्कालिक रूप में। तमस अंधकार है। ऋणात्मक है। हम इस अंधकार को प्रकाश लाकर ही दूर कर सकते हैं। इसी प्रकार हम अज्ञान को जागरुकता लाकर दूर कर सकते हैं।

Content: हैं। उपनिषद कहते हैं-"तमसो मा ज्योतिर्गमय" अर्थात "अंधकार को प्रकाश लाकर दूर करो।" कृष्ण जगतगुरु की बुद्धिमत्ता हमारी ज़िंदगी में प्रकाश और ज्ञान लाकर हमारे अंदर का अंधकार और तमस दूर करे। इन श्लोकों में कृष्ण हमें कहते हैं कि इन गुणों में- 'सत्, रज, तम' में डूबा व्यक्ति मृत्यु के पश्चात् कहां जाता है। सात्विक व्यक्ति दिव्यता को प्राप्त करता है, तामसिक व्यक्ति एक निम्न साrary जीवन चुनता है और राजसिक व्यक्ति अपने लालच के कारण निरंतर कष्ट पाता रहता है। 'गीता' के एक अन्य श्लोक में कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि व्यक्ति जिस भाव या विचार से मृत्यु के पूर्व भावित रहता है, वह उसी में दोबारा जन्म लेता है। यही कृष्ण बताते हैं कि आत्मन विचार कोई तक्के से नहीं आता। इसका आधार व्यक्ति का प्राकृतिक 'गुण' ही होता है। लोग मुझसे कहते हैं-"स्वामी जी! अभी से मैं इन आध्यात्मिक बातों की चिंता क्यों करूं। यह तो मज़ा लेने का समय है। जब बूढ़े होंगे तब आध्यात्मिकता के बारे में सोचेंगे।" वैसे भी कृष्ण ने कहा है कि हमारा अंतिम विचार (मृत्यु पूर्व) ही हमारा उद्धार कर सकता है। यानी अपनी अंतिम सांस में राम या कृष्ण का नाम ही तो लेना है, बस।" अगर यह सब इतना ही आसान होता तो हम सबका पुनर्जन्म होता ही नहीं। यदि ज़िंदगी-भर तो आप धन-सुविधा के पीछे भागते रहे हैं तो क्या समझते हैं कि आपका अंतिम विचार धन-सुविधा पर ही केंद्रित नहीं होता। यदि जीवन-भर शराब, शराब और गाने-बजाने का फितूर रहा हो तो अंत में भी सिर्फ इन्हीं का विचार आएगा। यही विचार लेकर आप मरेंगे। वस्तुतः हमारे जीवन-भर का क्रिया-कलाप ही निश्चित करता है कि हमारा अगला जन्म कैसा होगा।

Content: कृष्ण हमें बताते हैं कि सत्व गुण वाला व्यक्ति ऋषिगणों द्वारा प्राप्त उच्च लोकों में जाता है। वहां जाकर वह दिव्यता को प्राप्त होता है। जब हम सत्व गुण में रहते हैं तो हम जागरुकता पूर्ण जीवन जीते हैं। हम वर्तमान क्षण में जीते हैं। हम राग-द्वेष से मुक्त रहते हैं और अपने कार्य के फल के लिए भी व्याकुल नहीं होते, हमें तब भय या लालच नहीं सताता। इनका कोई प्रभाव हमारे मन पर नहीं होता। तब हम सिर्फ अपने बारे में नहीं, दूसरों के बारे में भी सोचते हैं। सिर्फ 'मैं और मेरा' ही हमारा विचार नहीं होता, 'तू और तेरा' भी हम सोचते हैं। तब 'तुम' में 'मैं' भी शामिल रहता है और सारे क्रिया-कलाप बिना शर्तों के चालू रहते हैं।

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Content: वर्तमान स्थिति शाश्वत होती है। यह उच्च लोकों या उस स्वर्ग की होती है जिसके बारे में हम कल्पना करते हैं। तब तो हम इसी जीवन में स्वर्ग का आनंद भोग सकते हैं। जब आत्मा शरीर से परे जाने को सक्षम होती है तो यह संस्कारों के परे भी जा सकती है और अपनी सत्य-स्थिति: आत्मानुभूति, प्राप्त कर सकती है। जब कोई व्यक्ति तमस में डूबा हो अर्थात् गहन अज्ञान के अंधकार में तो अगले जन्म में वह और निम्न स्थिति को प्राप्त होता है। कृष्ण के अनुसार ऐसा व्यक्ति जानवर के रूप में दूसरा जन्म पाता है। मानव शरीर में निम्नतम ऊर्जा केंद्र 'मूलाधार चक्र' में होता है जो रीढ़ की हड्डी के मूल में स्थित रहता है और जो मौन भाव का भी केंद्र है। जानवरों के लिए यह उदयतम केंद्र है। जहाँ से ऊर्जा विसर्जित होती है। सारे जानवर अपनी जिजीविषा की सहज वृत्ति पर काम करते हैं यानी सिर्फ जीते रहने की इच्छा को कायम रखने की सहज वृत्ति। उनको प्रकृति का अनुकूलन भी इसी तरह होता है। इसमें कोई निम्नतम या नीचता की बात नहीं होती, यह तो उनकी प्रकृति ही होती है, लेकिन मानवों में बुद्धिमत्ता होती है, जो उन्हें चेतना के उच्चतर स्तर पर ले जा सकती है। हमारे पास गलतियाँ करने की भी स्वतंत्रता है और हम गलतियाँ करते भी रहते हैं। जब कृष्ण कहते हैं कि अज्ञान वृत्ति के कारण जानवरों में जन्म होता है तो वे तो कोई जानवरों की योनि को नीचा दिखाने की बात नहीं कर रहे। वे तो यह कह रहे हैं कि जो मानव अपनी सहज वृत्ति से काम करते हैं, चूँकि मूलाधार चक्र रुका रहता है, वे जानवरों की तरह वर्ताव करते हैं क्योंकि उनको यह नहीं मालूम रहता कि मानव के रूप में उनको क्या क्षमताएँ हैं। हम लोग वह मानव नहीं जो आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करना चाहते हैं, वरन् वह आध्यात्मिक जीव हैं जो मानव-अनुभव से गुजर रहे हैं। यह सत्य है, लेकिन हम इसे स्थिति में तभी तक रह सकते हैं जब हम सत्व गुण में रहें क्योंकि तमस में जाते ही हम अपनी आध्यात्मिक प्रकृति से विमुख हो जाते हैं। जब हम राजस में होते हैं, तब हम एक धुंधला-सा विचार ही होता है, पर वह आध्यात्मिकता का विचार, वह अनुभव हमारे अंदर एक आसक्ति पैदा करता है जिसमें एक लक्ष्य और उसकें प्राप्ति की इच्छा पनपने लगती है। तब हम एक ऐसी रागात्मकता में पड़ जाते हैं जो वस्तुतः आसक्ति से परे होती है। कृष्ण कहते हैं कि हम इस मानव-स्वरूप में दोबारा जन्म लेते हैं और पुनः जन्म-मृत्यु के चक्र में पड़ जाते हैं, यानी इस संसार में पुनः इसके कष्ट भोगने को। तो यह हमारी रुचि पर निर्भर है कि हम सहज वृत्ति अपनाकर चेतना से विमुख रहें, गहरे तमस में रहें-एक जानवर की तरह या तार्किक बुद्धि का प्रयोग कर विषय भोगों के पीछे पड़ें रहें राजस गुण के प्रभाव में। तीसरा विकल्प है सारे राग-द्वेषों से परे जाकर एक अतिचेतन स्थिति में रहना और सत्व गुण में अंतरप्रज्ञा के साथ रहना। हमारी यही रुचि या विकल्प्य का चुनाव निर्धारित करता है, हमारा अगला जीवन कैसा होगा बल्कि यह भी कि अगला जन्म होगा भी या नहीं। कृष्ण एक निष्णात मनश्चिकित्सक की तरह बिल्कुल सही बात कहते हैं- सत्व द्वारा ज्ञान प्राप्ति और पवित्रीकरण; त्रास और लालच राजस से तथा मुखता, विमूढ़ता और भ्रांत हरना, तमस में प्राप्त होता है। अज्ञान से बुद्धिमत्ता की ओर जाना और लालच में कुठार भाव की ओर जाना, द्योतक है सत्व गुण के चालक का - यानी केंद्रस्थ होने की स्थिति का।

Content: हमारी केंद्रीय धान हमारी मूल प्रकृति बनाती है। वस्तुतः हमारी असली प्रकृति दैवी होती है। हम वह हैं जो ईश्वर, पराशक्ति या जो भी सार्वभौमिक सत्ता को हम नाम दें, के साथ पैदा होते हैं। यह सत्ता वर्णनातीत है; इसका केवल अनुभव किया जा सकता है। हम आनंद का अनुभव करते हैं जब हमारा ध्यान उस मध्यस्थ केंद्र की ओर होता है, हमारे व्यक्तित्व की बाहरी सतह पर नहीं। सारी जिंदगी हम इसी केंद्रस्थ स्थिति से भागते रहते हैं, जहाँ हमारे आनंद का उद्गम होता है। हमारी इंद्रियाँ बार-बार हमें बाहरी सतह पर ले आती हैं, जहाँ विषय-भोग के साधन उपलब्ध रहते हैं, तब हमारा आंतरिक भाव खाली रहता है, शून्य रहता है परंतु पूर्ण रहता है, क्योंकि यह स्वतः संपूर्ण होता है और इसको आनदानुभूति के लिए किसी भी बाहरी सहारे की जरूरत नहीं होती, लेकिन बाहरी सतह सदैव परिवर्तनशील रहती है। यहाँ कुछ भी शाश्वत नहीं होता, क्योंकि भले ही वस्तु न बदले, पर उनके बारे में हमारी समझ बदल जाती है। यही बाहरी सतह 'माया' है। वह तमस है और अज्ञान है। हमारी राजसिक प्रवृत्ति अर्थात् वह व्याकुलतापूर्ण गतिविधि, जो किसी निरर्थक काम में कोई उद्देश्य डालने का असफल प्रयास करती है, हमें बार-बार केंद्र से बाहरी सतह पर लाने का प्रयास करती रहती है उस क्षेत्र में, जो तमस के अंधकार और 'माया' से भरा है। रajas सदैव हमें तमस की ओर ढकेलता है। आक्रामकता, वासना, रागात्मकता और अंततः विरक्ति का भाव हमें विभ्रम और अज्ञान में ही ले जाता है, पर कभी-कभी हम में बुद्धिमत्ता की चिंगारी फूटती रहती है जो हम से कहती है कि जीवन इस प्रकार नहीं जिया जाना चाहिए। जीवन मात्र कल्पना ही नहीं, इसके गहरे अर्थ भी हैं और वह हम खोजने लगते हैं। जब हम अपनी मूल या सही प्रकृति को खोज लेते हैं, तब हम केंद्रस्थ होने लगते हैं, वह मूल बिंदु जहाँ आनंद का स्त्रोत है। तभी बाहरी

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Chapter Number: 14

Content: 14.18 सत्त्वगुण में स्थित पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकों को जाते हैं और रजोगुण में स्थित पुरुष मध्य में अर्थात् मनुष्य लोक में ही रहते हैं एवं तमोगुणी पुरुष कार्यरूप निद्रा, प्रमाद, आलस्यादि में स्थित हुए अधोगति (अर्थात् कीट, पशु आदि नीच योनियों तथा नरकादि) को प्राप्त होते हैं।

Chapter Number: 14

Content: 14.19 जिस समय दृष्टि के अतिरिक्त अन्य किसी कर्त्ता को नहीं देखता और तीनों गुणों के अत्यन्त परे (सच्चिदानंद स्वरूप) मुझ परमात्मा को तत्त्वतः जानता है तो उस समय वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।

Chapter Number: 14

Content: 14.20 वह पुरुष स्थूल शरीर की उत्पत्ति के कारण स्वरूप इन तीनों गुणों का उल्लंघन (छोड़) कर जन्म, वृद्धावस्था और सब प्रकार के दुःखों से मुक्त होकर परमानंद को प्राप्त होता है।

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Content: यदि हम सबसे विरक्त हैं और अपने चारों ओर होने वाली किसी भी गतिविधि से अकुंठ रहते हैं तो हम सत्‍व गुण द्वारा संचालित है। कल्पना या लालच से परे जाने के लिए संस्कारों में प्रतिकूलन या मुक्ति आवश्यक है, यानी उन स्मृतियों से जो हमारी चेतना में गहरी घुसी हैं। चेतना के स्तर पर तो ऐसा करना आसान नहीं और अचेतन के स्तर पर ऐसा करना खतरनाक भी है। यह तो महाचेतना के स्तर पर ही किया जा सकता है, जिसके लिए ध्यानादि के अभ्यास जरूरी है, जो हमारे ‘एनएसपी कोर्सेज’ में बताए जाते हैं। इस सबसे मेरा तात्पर्य आप समझे? हमने उन संस्कारों की बात की जो गहन स्मृतियों के रूप में हमारे अचेतन में ‘खुदे’ रहते हैं। यही हमें तीनों गुणों के माध्यम से संचालित करते हैं। हम इन्हीं तीनों गुणों के एकल या मिश्रित प्रभाव में अपना कर्म करते रहते हैं। यही विचार या कर्म दोहराए जाते हैं। जो संस्कारों को या हमारे सूक्ष्म मानस, वासना इत्यादि से गुजर कर हमारी मूलवृत्ति निर्धारित करते हैं। चेतन, तात्कालिक या विश्लेषणात्मक प्रक्रियाएं इनको ठीक से पहचान भी नहीं पाती—इनका परिशोधन करना या विलीन कर पाना तो बहुत दूर की बात है। इसलिए, तथाकथित कैथरीसिस (भाव-विरंचन या भाव-शांति) इत्यादि से हमें क्षण स्थायी चैन ही मिलता है, क्योंकि ऋणात्मक भाव पूरी तरह निकल ही नहीं पाते, क्योंकि हमारे मन की मूल ऋणात्मकता तो गहरे रूप से दबी ही रहती है। इसलिए सर्वप्रथम हमें अपने विचारों और कर्म के प्रति जागरूक होना पड़ेगा। पहले उन्हें पहचानने कि वे किस गुण से उत्पन्न होकर आपके मन में आ रहे हैं। यदि विशुद्ध कल्पना है तो तमस से आएंगे, यदि ऐसा है तो तुरंत कल्पना को छोड़कर वर्तमान वास्तविकता की ओर अपना ध्यान मोड़ें, पर ज्यादातर लोगों में समस्या यह रहती है कि कल्पना वास्तविकता से ज़्यादा रोचक लगती है। हम वर्तमान से ज्यादा कल्पना में आनंद लेते हैं। आपको समझना चाहिए कि यह प्रक्रिया विशुद्ध अज्ञान का प्रतिफल है, और इससे आपको कोई सहायता नहीं मिल सकती। यह समझ आपको एक काल्पनिक दुनिया से निकाल सकती है जो ध्यान पद्धति के द्वारा संभव हो सकता है क्योंकि ध्यान आपको आत्म-ज्ञान देता है। इसी प्रकार जब हम राजस गुण से संचालित होते हैं तो हम विषय-भोगों के प्रति आकर्षित होते हैं और उससे दूर भागते हैं, जो हमें क्षुब्ध करता है। हमें समझना है कि यह एक विषय चक्र होता है—राग-विराग का अर्थात् लालच और भय का। जितनी ज़्यादा हमारी कामना होगी उतनी ही कम हमें प्रसन्नता मिलेगी। जब तक हम भयाक्रांत करने वाली चीज के प्रति मुड़कर उसका सामना नहीं करेंगे, उतना ही भय बढ़ता रहेगा। इस सबसे मुक्ति पाने का एकमात्र साधन है

Content: ध्यान करना। ध्यान हमें इस विषय चक्र के बारे में जागरूक करता है और इस पूरी प्रक्रिया के प्रति तटस्थ या विरक्त बनाता है। यदि हम बार-बार ध्यान करते रहेंगे तो हम अपने संस्कारों से भी मुक्ति पा सकते हैं और यह मुक्ति हमें उस गुण के प्रभाव से भी रिहा करेगी जिसमें हम अभी फंसे पड़े हैं, तभी हम निरासक्त हो सकते हैं और अपनी स्मृतियों के भावात्मक भार से मुक्ति पा सकते हैं। हम अपनी ऋणात्मकता से भी त्राण पा सकते हैं और अपने चक्रों की फंसी ऊर्जा को भी ध्यान के द्वारा मुक्त कर सकते हैं। यही इस मुक्ति की कुंजी है। मुझे किसी ने हॉलीवुड में बताया था कि सारे चलचित्रों (सिनेमा) के प्लेट (कथानक) इन्हीं चक्रों के भावनात्मक अवरोधों पर आधारित होते हैं। यही हमें अपने प्रथम स्तर के 'लाइफ बलेंस प्रोग्राम' में सिखाते हैं। इन चक्रों के प्रभाव से हमारा वास्तविक जीवन ही नहीं, वरन् कल्पना भी प्रभावित होती रहती है अर्थात् इन चक्रों और इनके भावात्मक अवरोधों का ज्ञान हमें अपने नैसर्गिक गुणों को भी समझ देता है और यदि गुणों के बारे में सही समझ आ जाए तो हमारे आनंद का द्वार खोलने वाली राह हमें प्राप्त हो जाएगी।

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Chapter Number: 14

Chapter Name: गुणों के परे जाना

Content: अर्जुन ने पूछा-‘हे प्रभो! मनुष्य किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है? श्री भगवान बोले—‘हे पाण्डव (अर्जुन)! जो पुरुष (सत्गुण के कार्यरूप) प्रकाश को और (रजोगुण के कार्यरूप) प्रवृत्ति तथा (तमोगुण के कार्यरूप) मोह को भी न प्रवृत्त होने पर बुरा समझता है और निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा करता है; 24, 25 जो साक्षी के सदृश स्थित हुआ गुणों के द्वारा विचलित नहीं होता (या किया जा सकता हो) और ‘गुण-गुण में बरतते हैं’—ऐसा समझता हुआ जो परमात्मा में एकीभाव में स्थित रहता है एवं उस स्थिति में कभी विचलित नहीं होता; और जो निरंतर आत्मभाव में स्थित, दुःख-सुख को समान समझने वाला, पृथ्वी और स्वर्ण में भेद न करने वाला, ज्ञानी, प्रिय तथा अप्रिय को एक-मानने वाला और अपनी निंदा या स्तुति में भी समान भाव वाला है; जो मान-अपमान में समभाव से रहता है और मित्र तथा दुश्मन के साथ समान व्यवहार करता है, वह सम्पूर्ण पहलों (क्रिया कलापों) में कर्त्तापन के अभिमान रहित पुरुष गुणातीत कहा जाता है।’

Chapter Number: 14

Chapter Name: गुणों के परे जाना

Content: काफ़ी स्पष्टता के साथ यहां कृष्ण हमें बताते हैं कि हमें क्या करना चाहिए। वह इतने ख़ास शब्दों से बात समझाते हैं कि जिसको न गलत समझा जा सकता है, न उनकी गलत व्याख्या ही हो सकती है। कृष्ण यहां गुणातीत व्यक्ति की पहचान बताते हैं यानी जो इन गुणों की पहुंच से परे हैं। वे कहते हैं कि हमें त्रिगुण रहित होना चाहिए तभी हम इन गुणों के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त हो सकते हैं।

Chapter Number: 14

Chapter Name: गुणों के परे जाना

Content: जो गुणातीत होता है वह इन गुणों के खेलों से प्रभावित नहीं होता। वह भावनाओं के प्रभाव से भी अछूता रहता है। उसके लिए तो जो कुछ भी होता है वह सही ही है। सफलता और असफलता उसके लिए एक-सी है; मित्र और शत्रु में कोई अंतर नहीं रहता। धन और दरिद्रता भी उसके लिए समान अवस्थाएं ही हैं।

Chapter Number: 14

Chapter Name: गुणों के परे जाना

Content: ऐसा परम निरासक्त भाव तभी आ सकता है जब हमें (भगवान पर) पूरा भरोसा हो। जब हमें भरोसा होता है कि जो भी हो रहा है वही होना चाहिए और जो भी होता है वह उसी प्रकार हमको ग्रहण है, तब हम पूरी तरह राग-द्वेषों के परे, निरासक्त हो सकते हैं। तब हमें हर ‘होनी’ सही लगेगी। यह भरोसा तो तभी आता है जब हम पूरी तरह समर्पण कर देते हैं।

Chapter Number: 14

Chapter Name: गुणों के परे जाना

Content: मैं अपने शिष्यों से कहता हूं कि न तो मेरा कोई घर नहीं है, इसलिए मैं जिस घर में पहुंचता हूं वहीं मेरा घर हो जाता है—चाहे वह किसी पेड़ की छांव हो या किसी की महला। दीवारों-दरवाज़ों पर ताला मारने से मेरा घर नहीं बनता। लोग पूछते हैं कि मैं ऐसे जेवरात और पोशाकें क्यों धारण करता हूं? इससे क्या फर्क पड़ता होता है? यह शरीर भी मेरा नहीं है—यह त्वचा भी मेरी नहीं है तो क्या फर्क पड़ता है कि इस पर मैं क्या धारण करूं।

Chapter Number: 14

Chapter Name: गुणों के परे जाना

Content: यहां न कोई न आकर्षण है, न वितृष्णा। जैसे लोग पुत्रों-पुत्रियों को बाज़ारों में वस्त्र और जेवरात धारण किए देखते हैं, वैसे ही मैं इस शरीर पर धारण किए वस्त्रों और जेवरात को देखता हूं। मेरा उनसे कोई जुड़ाव नहीं बंधता।

Chapter Number: 14

Chapter Name: गुणों के परे जाना

Content: मेरी हर गतिविधिव असित्व का आदेश मानती है। बिना उस ब्रह्मांडीय ऊर्जा की अनुमति के मैं तो अपनी अंगुली भी हरकत में नहीं ला सकता। प्राय: जब लोग ईश्वर का हवाला देते हैं तो ईश्वर उनके लिए मात्र एक विचार या अवधारणा के और कुछ नहीं होता—जिसको सिद्ध करना है या नहीं करना है, पर प्रबुद्ध समाज के लिए ईश्वर एक वास्तविकता है—उतनी ही वास्तविकता जितना उनका अपना अस्तित्व है—हर क्षण। जब लोग अपनी ओर निहारते हैं तो उनका मैं या पहचान उनको संचालित करता है। प्रबुद्ध लोगों के लिए वह पहचान वास्तविक नहीं होती। उनके लिए तो ‘मैं’ का भाव होता ही नहीं।

Chapter Number: 14

Chapter Name: गुणों के परे जाना

Content: जब हम प्रकृति या अपने अस्तित्व के साथ एकात्म हो जाते हैं तो हमें कुछ भी प्रभावित नहीं करता। मैं भारत में लाखों मील पैदल भ्रमण कर चुका हूं। लोग पूछते हैं—‘आपके पांव अभी तक इतने नरम कैसे हैं—उनमें बिवाई क्यों नहीं पड़ीं, वे फटे क्यों नहीं? हमारे तो दस मील चलने से ही ऐसे हो जाते हैं!’ मैं उनसे कहता हूं—‘यदि प्रकृति या ईश्वर पर पूरा भरोसा करोगे तो प्रकृति या ईश्वर तुम्हारा पूरा ख्याल रखेगा।’

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Chapter Number: 14

Chapter Name: दिव्यता की अभिव्यक्ति

Content: 14.26 और जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग द्वारा निरंतर मुझको भजता है वह इन तीनों गुणों को भलीभांति लांघकर (सच्चिदानंद) ब्रह्म में एकीभाव से लीन होने के योग्य बन जाता है। 14.27 क्योंकि उस अविनाशी परब्रह्म और अमृत तथा निलयधर्म का और अखड एकरस आनंद का आश्रय मैं हूँ।

Chapter Number: 14

Chapter Name: दिव्यता की अभिव्यक्ति

Content: कृष्ण इस अध्याय का समापन यह कहकर करते हैं कि भावातीत स्थिति इन तीनों गुणों की प्रकृति से परे होती है और वही ब्रह्म के समस्त ब्रहांड की परम चेतना है। वे कहते हैं कि इसको भक्ति द्वारा भी पाया जा सकता है। वे यह भी कहते हैं कि वही वे ब्रह्म हैं-अखंड आनंद के शाश्वत खेत हैं। कृष्ण यहां परब्रह्म कृष्ण के रूप में बोलते हैं अर्थात् उस चरम सत्ता के रूप में, न कि वासुदेव कृष्ण के रूप में अर्थात् वे एक व्यक्ति के रूप में नहीं बोलते। परब्रह्म कृष्ण और वासुदेव कृष्ण में अंतर क्या है? साधारण व्यक्ति के मामले में यह कहा जा सकता है कि उसमें दिव्यता की संभावना छिपी तो रहती है, पर वह उसे समझ नहीं पाता। इसलिए वह अलग लगता है। यही अंतर है आप में और एक प्रवुद्ध स्वामी में, दोनों में दिव्यता होती है-पर आप उसे पहचान नहीं पाते जबकि प्रवुद्ध स्वामी इसके बारे में पूरी तरह से अवगत होता है। कृष्ण तो स्वयं ही एक स्वामी हैं ( जगत स्वामी) तो फिर उनके व्यक्त रूप और परब्रह्म रूप में क्या अंतर रह सकता है। असल में इस अंतर की अनुभूति तो हमें होती है, उनको नहीं। क्योंकि परब्रह्म कृष्ण जिस आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) पर संचार करते हैं वह मृत्य लोगो के द्वारा न देखी जा सकती है, न पहुंचाई जा सकती है। इसलिए अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान की गई थी जिससे वे कृष्ण का 'विश्व-रूप' देख सकें। यानी अर्जुन कृष्ण का घनिष्ठतम मृत्य साथी, उनका मानव रूपी दर्पणिक प्रतिबिम्ब भी उनका वह रूप नहीं देख सका था जब तक कि उसको ऐसी शक्ति न मिले।

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Chapter Number: 15

Chapter Name: पुरुषोत्तम योग

Content: कोई प्रश्न नहीं, केवल संशय पुरुषोत्तम योग

Chapter Number: 15

Chapter Name: पुरुषोत्तम योग

Content: जब हम प्रश्न करते हैं तो हम अपना अज्ञान एवं आक्रामकता प्रकट करते हैं; जब हम संशय करते हैं तो हम अपना अज्ञान दिखाकर स्पष्टता प्राप्त करना चाहते हैं।

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Content: कोई प्रश्न नहीं : केवल संशय

Content: भगवत गीता के पंद्रहवें अध्याय में सिर्फ कृष्ण ही बोलते हैं, अर्जुन एक शब्द नहीं बोलता। अर्जुन का आंतरिक इंद्र अब शांत हो चुका है, फलस्वरूप उसके मन से प्रश्न लुप्त हो जाते हैं।

Content: कृष्ण यहां बताते हैं कि वे कौन हैं और क्यों हैं। पारंपरिक रूप से इस अध्याय का शीर्षक ‘पुरुषोत्तम योग’ है अर्थात परम ब्रह्म का योग। कृष्ण बताते हैं वह कारण जिससे वे पुरुषोत्तम हैं अर्थात् सब जीवों में सर्वश्रेष्ठ और स्पष्ट करते हैं कि जो उन्होंने अर्जुन को बतलाया है वह एक गूढतम रहस्य का उद्घाटन है।

Content: अब कृष्ण आश्वस्त हैं कि अर्जुन सत्य ग्रहण करने को तैयार है।

Content: अर्जुन अब आत्म-निष्ठ हो चुके हैं। उनके संशय विलीन हो चुके हैं। वे सशय जो विश्व-रूप दर्शन की अनुभूति में विगलित हो चुके हैं, जिसमें उन्होंने कृष्ण का विराट रूप देखा था। अब वह दर्शन अर्जुन का अपना आध्यात्मिक अनुभव बन चुका है। अब उसे वह ज्ञान पूरी गहराई के साथ प्राप्त हो चुका है, उसकी समझ भी स्पष्ट है जिसके द्वारा कृष्ण के दिए हुए संपूर्ण ज्ञान को वह आत्मसात कर सके। उसे आध्यात्मिक अनुभूति पूरी तीव्रता के साथ प्राप्त हो चुकी है। अब तो वह एक नया जीव बन चुका है।

Content: इसके बाद अर्जुन के मन में कोई बौद्धिक संशय पैदा नहीं होता। इसलिए वह प्रश्न भी नहीं करता। वह उस स्थिति में आ चुका है जब वह कृष्ण (के दिए ज्ञान) को संपूर्णता से ग्रहण कर सके। अर्जुन अब विचारपूर्णता की अवस्था, जिसमें वह प्रश्नों से ओत-प्रोत था, आगे बढकर विचारहीनता या मस्तिष्कहीनता की स्थिति को प्राप्त हो चुका है जिसमें कोई प्रश्न नहीं उठता। सब प्रश्न तिरोहित हो चुके हैं।

Content: जब तक हमारे मन में प्रश्न घुमड़ते रहते हैं, हमें उत्तर नहीं मिलता, क्योंकि ये प्रश्न हमारे पूर्वाग्रहों को कायम रखने और समझ की सीमितता को चालू रखने के उद्देश्य से होते हैं। यही प्रश्न होते हैं जो हमारे ज्ञान और हमारी समझ के मध्य अवरोध बनते हैं या यूं कहें कि हमारे गुरु और हमारे बीच एक बाधा बने रहते हैं।

Content: हैं। सब महान स्वामीगण यथा बुद्ध और लाओत्से को सदा प्रश्नों से वितृष्णा ही रही है।

Content: संशय जरूरी है

Content: गुरु हम लोगों तक अपने अनुभव पहुँचाते हैं जिसमें एक तरह की ऊर्जा का संचारण होता है। शब्दों के माध्यम से इस अनुभव को बताना संभव नहीं होता, क्योंकि शब्द-बन्धन उस अनुभव को झुठलाने लगता है। शब्दों में बंधकर वह अनुभव अपना अर्थ खो देता है। लाओत्से कहता है- “यदि सही रूप में सत्य का अनुभव किया गया है तो वह बयान किया ही नहीं जा सकता और यदि वह बयान हो सकता है तो वह सत्य नहीं है।”

Content: अर्जुन के प्रश्न उसके मन में उठे संशय से उत्पन्न हुए थे। वह एक क्षत्रिय था और मरने-मारने का उसे अभ्यास था। उसका कुरुक्षेत्र की रणभूमि में उठा संशय केवल मरने-मारने के बारे में नहीं था। उसका संशय था अपने रिश्तेदारों, हितैषियों और प्रियजनों को मारने के बारे में। उनके संशय का उक्त अहिंसा के सिद्धांत की दैन नहीं था, क्योंकि यदि ऐसा होता तो कृष्ण का उसको युद्ध करने के बारे में कहना, संदेहास्पद हो जाता।

Content: वस्तुतः अर्जुन का संशय, अवसाद, शोक और इनसे उत्पन्न हुए प्रश्न उसके ‘अहम्’ या ‘मैं और मेरे’ के भाव से उत्पन्न हुए थे। उसके सामने यूट्स योद्धा इकट्ठे थे, उनसे उसे युद्ध करना था-मारना था या उनके द्वारा मरना था। वे कोई आम लोग नहीं थे। यह उसके मन की अपने अपनों के प्रति संग्रहीलता का भाव था, न कि अहिंसा के प्रति भक्ति, जिसने उसके मन में संशय उत्पन्न किया था। ‘संग्रह-शीलता’ कि वे मेरे ‘अपने’ हैं।

Content: यही भ्रम था जो उसके मन में संशय उत्पन्न कर रहा था। उसका मानना था कि उसके सामने जो योद्धागण उपस्थित थे वे उसके अपने रिश्तेदार, गुरुजन या मित्रगण थे, जिनसे लड़ने का उनका समाज उसे कोई अधिकार नहीं देता।

Content: बतौर एक योद्धा के अर्जुन के मन में कोई दुविधा या नैतिक अड़चन नहीं थी लोगों को मारने में। इसलिए उसके अपने अहम से उत्पन्न आक्रामकता या अपने संग्रह-शीलता (कि ये सब मेरे हैं) भाव से उत्पन्न हिंसा ही उसका मुख्य अवरोध बनकर खड़ी थी। इससे नैतिकता या अहिंसा का कोई संबंध नहीं था।

Content: अर्जुन के मन में सिर्फ वे ही प्रश्न थे जो उसके व्यक्तिगত भाव से संबंधित थे, वे संशय भी थे जो वह समस्त मानवता के हित के लिए दूर करवाना चाहता था। अब इन प्रश्नों का मूल बिन्दु बिल्कुल दूर हो गया। इनका सिर्फ ‘करना या न करना’ या ‘करना चाहिए या नहीं’ से संबंध नहीं रह गया।

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Content: था। कृष्ण का 'विश्व-रूप' देखने के पश्चात् उसके प्रश्नों का आधार था कि कृष्ण की प्रकृति और किस प्रकार उनके निकट पहुंचा जाए। अब कृष्ण उसे अपने बारे में बताते हैं कि वे क्या हैं और कैसे उन तक पहुंचा जा सकता है। कृष्ण की समझ में आ गया है कि अर्जुन के मन के सारे बौद्धिक प्रश्न अब समाप्त हो गए हैं। अब जो कुछ उसके मन में शेष है वह कुछ संशय ही है। जब ऐसा संशय मात्र रह जाए तो इसका अर्थ है कि वह व्यक्ति अब अपने गुरु की बताई सीख को आत्मसात करने को तत्पर है या गुरु-ज्ञान प्राप्त कर उसे पचाने को तैयार है। फिर तो उसके गुरु के मुख से जो कुछ भी बाहर आएगा, वह उसका संशय मिटाता जाएगा। यही संशय है जो गुरु को बाध्य करता है कि वह अपने आपको खुलकर अभिव्यक्त करे। प्रश्न तो गुरु ज्ञान का द्वार बंद कर देते हैं क्योंकि प्रश्न हिंसा के प्रत्‍ाीक होते हैं। शब्दों को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है—एक श्रेणी है प्रश्नों की और दूसरी है संशयों की। प्रश्न का अर्थ है हिंसा का प्रक्षालन यानी उस घमंड का कि 'मैं भी कुछ जानता हूं और मैं उस सत्य की सुरक्षा के लिए ये प्रश्नों के तीर फेंक रहा हूं।' प्राय: हमारे प्रश्नों का उद्देश्य अपना ज्ञान बघारना होता है। मुझसे भी लोग बड़े-बड़े प्रश्न पूछते हैं। एक व्यक्ति ने मुझसे पूछा—"स्वामी जी! ब्रह्मसूत्र कहता है कि ब्रह्म समझ से परे होता है, बुद्धि उसे समझ ही नहीं सकती। यह मुझसे परे है। क्या यह सही है?" उसका इस प्रश्न को पूछने का उद्देश्य यह बताना था कि उसने ब्रह्म सूत्र पढ़ा है। यह तो कोई प्रश्न नहीं था; कोई जिज्ञासा भी नहीं थी। प्रश्न होता है वह संशय, जिसमें कोई जिज्ञासा नहीं हो। जिज्ञासा के साथ प्रश्न संशय होता है। प्रश्न सत्य नहीं पाना चाहते, पर संशय पाना चाहता है। ज्यादा सत्य आदमी को संभालता नहीं। वह अर्ध सत्यों को ज्यादा अच्छी तरह संभाल सकता है। स्वांति सत्य तो स्वयं उसका कोयिकल्प करने लगता है। उसे लगता है कि उसका तो आधार ही खिसकने लगा है। इसलिए हम में से कोई सत्य नहीं जानना चाहता। यदि ईमानदारी से सत्य बताया जाए तो बहुत कम प्रवचन को सुनने को तैयार होंगे। असली सत्य जानकर लोग भयभीत होने लगते हैं, सत्य उन्हें डराता है, इसलिए वे सत्य पर ही प्रश्न खड़े करने लगते हैं। हम लोग सत्य को कई प्रकार से छिपाते हैं। इतना सामाजिक शिष्टाचार हम लोग क्यों निभाते हैं? हम एक-दूसरे का सम्मान करते हैं। सामाजिक शिष्टाचार निभाने के लिए हम कई औपचारिकताएं निभाते हैं। बचपन से हमें सिखाया जाता है कि 'प्लीज' या 'थैंक यू' कहना सीखो, चाहे भले ही हमारा मतलब ऐसा करने का न हो या भले ही इस स्थिति में इनको दरकार न हो, पर कहते

Content: रहो क्योंकि यही सामाजिक शिष्टाचार का क़ायदा है। जब भी हम किसी से मिलते हैं तो हम कहते हैं—"आपसे मिलकर खुशी हुई" चाहे ऐसा कुछ भी महसूस न हुआ हो। कभी-कभी तो मुझे भी यही खेल खेलना पड़ता है। जब लोग मुझसे पहली बार मिलते हैं तो वे मुझसे भली प्रकार वाकिफ नहीं होते, इसलिए मैं भी औपचारिक शिष्टता ही निभाता हूं, नहीं तो वे आहत महसूस करते हैं, क्योंकि उस समय वे सत्य स्वीकारने के लिए तैयार नहीं होते। वे मुझ से कुछ भी कहें, पर उनका मन सत्य स्वीकार नहीं कर सकता, क्योंकि वह काफी कड़ू होगा। तो मैं भी उन्हें खुश ही रखता हूं, क्योंकि उनकी सामाजिक रूप से आरामदेह स्थिति को खुर्द्य किया जाए, जब वे तैयार ही नहीं हैं सत्य स्वीकारने को? क्योंकि, यदि हम वाकई में 'खुश' होते हैं तो यह ख़ुशी हमारे शरीर से टपकती है। क्या यह कहना आवश्यक है कि 'आप से मिलकर खुशी हुई' जिससे अगला समझ सके कि हम वाकई में खुश हैं? हमारा पूरा शरीर, हमारी स्थिति, हमारा व्यक्त आनंद क्या यही बात ज़ाहिर नहीं करता होगा? क्या शब्दों द्वारा यह बताना ज़रूरी है? हमें भी मालूम होता है कि सत्य कुछ और ही है, पर हम भी उसका सामना करने का साहस नहीं कर सकते। हम समझते हैं कि हम अपनी शारीरिक चेष्टा और शाब्दिक भाषा—दोनों के द्वारा सत्य कभी उद्घाटित नहीं कर सकते, क्योंकि सत्यानुभूति हमें सीधे—सीधे प्रबुद्धता प्रदान करती है; हमारे अंदर एक समूचा बदलाव लाती है। जिस क्षण कोई भी सत्य को आत्मसात करता है या सत्य का उसके सामने एक भी आयाम उद्घाटित होता है तो उस क्षण चमत्कार हो जाता है। विवेकानंद यही बात बड़े सुंदर ढंग से कहते हैं—"यदि आप संसारभर में उपलब्ध हर पुस्तक का हर शब्द याद कर लें तो सिवाय आपके अहंकार के, आपको और कुछ भी नहीं मिलेगा। आपको सिर्फ घमंड हो जाएगा अपने किताबी ज्ञान पर। इसके बजाय कोई एक विचार पूरी तरह अपने में आत्मसात कर उसको जीने लगें। वह एकमात्र विचार ही आपके जीवन में एक महान परिवर्तन ला सकता है। सिर्फ एक ही विचार।" तमिलनाडु (दक्षिण भारत) में एक किताब है—'परिया पुराणनम' या 'महाग्रंथ' जिसमें तिरसठ प्रभु्द स्वामियों की जीवनीयों का वर्णन है। यदि हम इस पुस्तक को पढ़ें तो हमें ऐसे कई स्वामियों के बारे में पता चलेगा जिन्होंने ज़ाहिरी तौर पर कुछ किया ही नहीं। उनके जीवन में तो कुछ भी उल्लेखनीय नहीं हुआ। कुछ स्वामियों ने तो कुछ फूल इकट्ठे किए और

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Content: उन्हें ईश्वर को समर्पित कर दिया—बस! परंतु उनको प्रबोधन प्राप्त हो गया। हम क्या करते हैं इसका महत्व नहीं है, असली बात है हमारा अपने कर्म के प्रति पूरी तरह से ईमानदार होना। हम भी तो ईश्वर को फूल चढ़ाते हैं रोज़ ही, पर हम तो प्रभुज्र नहीं होते, बल्कि हमें तो बग़ीचा कायम रखने या रोज़ फूल प्राप्त करने के लिए अतिरिक्त खर्ची करनी पड़ती है। समस्या यह है कि अपने कर्म में हम ईमानदार नहीं रहते। जब यह प्रभुज्र स्वामीगण ईश्वर के लिए फूल इकट्ठे करते हैं तो उनका ध्यान अपने इष्ट देव में ही लगा रहता है वे उसी में लीन रहते हैं और उसी का ध्यान करते रहते हैं। किसी और वस्तु से उनका ध्यान नहीं बंटता। लेकिन जब हम फूल इकट्ठे करते हैं तो हम कुछ और या किसी और के बारे में सोचते रहते हैं। मैंने कई लोगों को देखा है जो कर्म-कांड तो करते हैं पर उनके ध्यान में ऑफिस की बातें या काई और छिपी रहती है। जब पूजा में हमारा मन न लगे तो वह एक उबाऊ काम-सा लगने लगता है, लेकिन जब मन लगे तो कठिन-से-कठिन काम भी एक हर्ष प्रदायक पूजा लगने लगता है। यदि हम अपनी पूरी दिनचर्या—सुबह बिस्तर से उठने से रात को सोने तक—पर दृष्टि डालें तो यह झूठ से ओत-प्रोत ही लगेगी। हमारी मुस्कानें नकली होती हैं। जब हम मुस्कुराते हैं तो हम कतई नहीं चाहते कि सामने वाला व्यक्ति समझ ले कि हमारे मन में क्या है। इसलिए हम आंख चुराकर मुस्कुराते हैं। क्यों? कहीं वह समझ न ले कि हम उससे मिलते समय क्या सोच रहे हैं। दिल में नफरत उबल रही हो, पर अपने होंठों पर हम बड़ी मुस्कान दिखाएंगे, किन्तु हमारी आंखें तो सब कुछ बयां कर ही देती हैं। ज़रा अपने को खोलकर देखें और जो घटता है उसका वैसे ही अनुभव करें, उदाहरणार्थ—जब कोई हमारा नाम पूछता है तो क्या हम कोई तैयारी करते हैं? क्या उसके लिए सुराग ढूंढ़ने पड़ते हैं? बिल्कुल नहीं। यह तो हमारा स्वाभाविक अनुभव है। यानी जब तक कोई वस्तु हमारे अनुभव का हिस्सा न बन जाए, उसके लिए हमें तैयारी करनी पड़ती है—मैनो किसी लेक्चरर देने के पूर्व की तैयारी हो। यदि कोई लेक्चरर देता है तो तैयारी करनी पड़ेगी, लेकिन यदि हम लोगों के सामने बोलने से डरते हैं तो हमें अपने अंदर झूठ भरना पड़ेगा। हमारा पूरा अस्तित्व ही झूठा लगता है—जीवन ही एक झूठ लगने लगता है। लोगों के सामने बोलने से डर क्यों लगता है? इसलिए कि साधारणतया हम जो सोचते हैं वही बोलते हैं और इसी का डर रहता है कि कहीं लोगों को हमारे मन की बात न मालूम पड़ जाए। हम जानते हैं कि मन में कितना 'कीना' भरा

Content: है—कहीं उसमें से कुछ बाहर आ गया तो? इसी का तो हमें डर रहता है। इसीलिए हम तैयारी करते हैं यह तय करने के लिए कि क्या हम लोगों के सामने बोलें। हम झूठ क्यों बोलते हैं? हमें सुनिशिचत करना होता है कि हम वही बोलें जो हम जानते हैं। इसलिए हम एक-एक प्वाइंट याद रखते हैं। यदि कोई प्वाइंट भूल जाएं तो हमें डर लगता है कि कहीं वह मुंह से न निकल जाए वर्ना हमारे मन में है इसी की तैयारी करनी पड़ती है कि कहीं और कुछ न बाहर आ जाए। अर्थात तैयारी का मतलब है हम अपने मन का असली भाव छिपाए रखें; अंदर्द्र कहीं बाहर न आ जाए। यदि कोई पेशेवर वक्ता अपने बारे में भाषण तैयार करता है तो वह जो कहेगा, वह सब झूठ ही होगा, क्योंकि यह (भाव-श्रृंखला) अभी उसका अनुभव नहीं बन पाया; अभी तो उसके आस्तित्व का हिस्सा नही बना। अभी तो यह भाव सिर्फ रटकर उगल दिया गया है; याद करके बोल दिया गया है। सिर्फ सार्वजनिक भाषणों में ही या प्रवचनों में ही नहीं, जब हम अपने दोस्तों से मिलते हैं या पत्नी से भी वार्तालाप करने वाले होते हैं तो हम शब्दों के चुनाव का पूर्व अभ्यास (रिहर्सल) कर लेते हैं। हम तय करते हैं कि कैसे बातचीत शुरू करेंगे और कैसे उसे जारी रखेंगे। हम पूरी मानसिक तैयारी ज़रूर करते हैं। यदि दूसरा व्यक्ति किसी ऐसे विषय पर वार्तालाप शुरू कर देता है जिसके लिए हम तैयार नहीं हैं तो एकाएक हमारी समझ में नहीं आता कि क्या बोलें, क्योंकि हमने रिहर्सल तो किसी और विषय के लिए की थी। यदि अपने बॉस के सामने बोलने की ज़रूरत हो तो ऐसी रिहर्सल करना ठीक भी है। हमें पूरी शालीनता दिखानी पड़ेगी, नहीं तो नौकरी से हाथ धो सकते हैं। कम-से-कम हमारे सामाजिक खेल का यह एक अनिवार्य हिस्सा है। इसको वे अपनी रगों में घोल कर आगे बढ़ना चाहिए, वरना ज़्यादा मीन-मेख निकालने हुए पर स्थित तो बहुत खराब है। हम अपने जीवासाथी एवं मित्रों से बातचीत करने के पूर्व भी ऐसे ही तैयारी करते हैं और जब हम तैयारों करके बोलते हैं तो वह झूठ ही होता है। भले ही हम उसे तथ्य कहें, वह होता मृषा ही है। यह कहना कि यह एक तथ्य है, असत्य बोलना ही है। वास्तविक जीवन में हम क्यों इतना झूठ बोलते हैं? क्यों एक पति को बार-बार अपनी पत्नी से कहने की ज़रूरत पड़ती है कि वह उसे प्यार करता है? यदि ऐसा है तो उसके शरीर की भाषा अपने आप ही इसको प्रकट कर देगी। असल में जब वह इन शब्दों का प्रयोग करता है तो वह स्वयं को इस बात की याद दिलाता है कि उसे अपनी पत्नी को प्यार करना चाहिए। जब हम ज़्यादा

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Content: शब्द प्रयोग में लाते हैं तब हम झूठ ही बोलते हैं, सत्य नहीं। हम झूठ को शब्दों के श्रृंगार से दबाने का प्रयास करते हैं। सत्य बोलना, वस्तुतः खतरनाक होता है। जब हम सत्य बोलते हैं तो प्रबुद्ध जनों के बीच तो हम सुने जाते हैं, पर अन्य लोगों के मध्य नहीं, क्योंकि सबको खतरा लगता है। सत्य तर्कपूर्ण प्रश्नों एवं दिलों को बर्दाश्त कर लेता है। वह विश्लेषण की परीक्षा से भी गुजर जाता है। अगर सोने की शुद्धता की परीक्षा करनी है तो उसे आग से गुजारना ही पड़ेगा। इसी प्रकार जब सत्य की परीक्षा करनी है तो उसका भी 'एसिड टेस्ट' हमें लेना पड़ेगा अर्थात् उसका तार्किक विश्लेषण करना पड़ेगा और हमारी तर्क पद्धति निश्चित ही असफल रहेगी अर्थात् जब उसके सामने हमारी तर्क पद्धति असफल रहे तो आप निश्चित हो सकते हैं कि वह सत्य ही है क्योंकि सत्य ही है जो तर्क को ध्वस्त कर सकता है, या यों कहें कि सत्य के सामने तर्क इतना थककर बेदम हो जाता है कि स्वयं ही बैठ जाता है। इसलिए यदि कोई बात चरम सत्य है तो उसे तार्किक-विश्लेषण को ध्वस्त करना ही पड़ेगा। सत्य हर तर्क के सामने कायम रहेगा; न झुकेगा न टूटेगा। यदि कोई शिष्य प्रश्न करने की मानसिकता बनाए हुए है तो गुरु को सत्य उद्घाटित करना ही चाहिए। उसे सत्य को शब्दों से ढकना नहीं चाहिए। तब शब्दों के खिलवाड़ की कोई जरूरत नहीं होती। नग्न सत्य सीधे-साधे कह दिया जाना चाहिए। यदि किसी के मन में कोई शक है तो उसके सामने सत्य स्पष्ट किया जाना चाहिए क्योंकि प्रश्नकर्ता की मानसिकता और किसी तरीके द्वारा शांत ही नहीं होगी। यह तो शिष्य की मानसिकता पर ही निर्भर है कि गुरु के शब्द मात्र सलाह हैं या उनमें एक समूचा परिवर्तन लाने की तकनीक भी है। यदि शिष्य पूरी तरह से गुरु के साथ समर्पित है (या 'डूब' रहा है) गुरु उसकी निश्चित हो सहायता कर सकता है। मास्टर या गुरु को ऐसे में प्रबुद्ध होना भी जरूरी नहीं है।

Content: एक लघु कथा एक विद्वान यमुना किनारे रहते थे और कृष्ण की पूजा करते थे। उनको एक दूध वाली रोज दूध लाकर देती थी। एक दिन वह नहीं आई क्योंकि पिछली रात पानी इतनी जोर से बरसा कि नदी में बाढ़ आ गई थी। अगले दिन जब वह आई तो उस विद्वान ने पूछा- 'कल क्यों नहीं आई?' वह बोली- 'बारिश के कारण नदी चढ़ आई थी। मैं उसे पार ही नहीं कर सकी।'

Content: विद्वान बोला- 'क्या बात करती है। कृष्ण का नाम लेकर लोग भव सागर पार कर लेते हैं और तू एक नदी भी पार नहीं कर सकी। बस उनका नाम ले और नदी पार कर।' किसी किताबी विद्वान की तरह उसने उस अबोध दूध वाली को अपना सूखा ज्ञान दिखाया तथा एक दिन नदी पार करने के लिए उसे डांट भी लगाई। वह अबोध स्त्री उस विद्वान की बातों को सच समझी। उसके बाद उसने कभी नदी नहीं किया। एक दिन फिर नदी में बाढ़ आ गई, पर वह दूध समय पर ही लेकर आई। अब विद्वान ने उससे पूछा- 'अरे! नदी में तो इतनी बाढ़ थी। तूने कैसे नदी पार की?'

Content: महाराज! आपने ही तो मुझे रास्ता बताया था न!'' कृष्ण का नाम लो और नदी पार कर लो। वह मैं किधर और आराधना से ऊब गई। विद्वान को ताज्जुब हुआ। उसने कहा कि वह ऐसा उसे करके दिखाए। वह दूध वाली भाग गई। वे दोनों नदी के किनारे गए। उस दूध वाली ने कृष्ण का नाम लिया और पानी पर चलती हुई पार उतर गई, ऊपर-ही-ऊपर तैरती हुई। वह विद्वान सकते में आ गया। यह तो अद्भुत था। उसने सोचा कि जब यह साधारण स्त्री कृष्ण नाम लेकर नदी पार सकती है तो वह क्यों नहीं कर सकता। वह तो इतना पढ़ा-लिखा विद्वान है।

Content: उस विद्वान ने भी कृष्ण का नाम जपना प्रारंभ किया, पर नदी के पास पहुंचने पर उसने अपनी धोती ऊपर की और पानी पर चलने का प्रयत्न किया, जिससे कि वह गीली न हो। उसने जैसे ही नदी में पांव रखा, वह डूब गया। यह इसलिए हुआ कि उस विद्वान को अपनी बात पर विश्वास नहीं था। उसके ज्ञान पर उस अबोध दूध वाली ने पूरा विश्वास किया और वह पार उतर गई, पर वह विद्वान तो उसे अपनी विद्या दिखाना चाहता था। उसे कृष्ण नाम पर इतनी आस्था थी ही नहीं। इसलिए उसे तो डूबना ही था, लेकिन यदि कोई शिष्य ज्ञान-ग्रहण की पूरी मानसिकता लिए गुरु के निकट आता है तो गुरु साधारण या हल्के शब्द या तकनीक भी उसकी वृद्धि में सहायता कर सकती है। यानी उसको गुरु के साधारण शब्द भी लाभांवित कर सकते हैं। चाहे गुरु स्वयं भी प्रबुद्ध या अपने ज्ञान पर आस्था रखने वाला न हो, पर यदि शिष्य में उसके ज्ञान के प्रति विश्वास है तो वह हर रुकावट पार कर ज्ञानी हो सकता है।

Content: वस्तुतः श्रद्धा (विश्वास) या संदेह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब तक हमारे मन में संशय नहीं होगा, हम श्रद्धालु नहीं हो सकते, इसलिए चाहे लोग कितना भी गुरु के शब्दों पर विश्वास करें, उनके मन में थोड़ा-बहुत संशय तो रहता ही है। मैं तो स्वयं लोगों से कहता हूं कि संशय करना गलत नहीं।

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Content: इसकी मौजूदगी बताती है कि वे उस प्रक्रिया में आ गए हैं, जिसमें संशय और श्रद्धा का चक्र चलता रहता है, क्योंकि जब संशय दूर होता जाएगा, श्रद्धा या विश्वास दृढ़तर होता जाएगा। फिर दूसरे स्तर का संशय पैदा होगा और समझ की एक और तह खुलती जाएगी। इस प्रकार श्रद्धा मजबूत होती जाएगी। अंततः वह स्थिति आएगी जब शिष्य या जिज्ञासु के मन में कोई संशय या श्रद्धा भी नहीं रहेगी। वह उसका अनुभव बनकर सत्य तक उसे पहुंचा देगी। इस अवस्था तक आने तक संशय और श्रद्धा का दौर तो क्रमशः चालू ही रहेगा। अब अर्जुन को एक समझ प्राप्त हो चुकी है। चूँकि उसे स्वयं एक आध्यात्मिक अनुभव हो चुका है तो उसके मन में संशय का एक स्तर अभी भी है, पर प्रश्न अब नहीं है। उसके मन में। अब वह यह भी नहीं पूछता कि उसके लिए क्या लाभकारी है। अपने बारे में सारे गुण-दोष अब अंततः की बात हो चुके हैं। कोई सवाल नहीं यथा ‘किम् तद् ब्रह्म किम् अध्यात्मम् किम् कर्म पुरुषोत्तमः?’

Content: तब तो वह शब्दों से खिलवाड़ कर रहा था। अब वह सब कुछ गायब है। प्रथम अध्याय में कृष्ण पूरी तरह मौन थे और अर्जुन ही बोलता रहा था। उसने शास्त्रों के हवाले से धर्माओद पर उद्धरण भी दिए थे, पर इस अध्याय में अर्जुन पूरी तरह मौन है।

Content: यह समस्या पृथ्वी पर अवतरित होने वाले हर गुरु या स्वामी को झेलनी पड़ती है। एक अबोध, शिष्य एक अज्ञानी शिष्य से कहीं अच्छा होता है।

Content: सीखने के लिए पहले (पुराने पाठ) भूलो

Content: एक लघु कथा

Content: एक संगीत शास्त्री के पास एक आदमी आया- ‘शास्त्री जी! मैंने चार वर्ष तक संगीत का अध्ययन किया है। अब मैं आप से संगीत सीखना चाहता हूँ। कितना समय लगेगा?’ शास्त्री जी ने कहा- ‘लगभग 6 वर्ष का समय लग सकता है।’ फिर एक दूसरा आदमी आया और बोला- ‘शास्त्री जी! मैंने 2 वर्ष संगीत का अध्ययन किया है। अब आपके पास और सीखने में कितना समय लगेगा?’ शास्त्री जी ने कहा- ‘दो वर्ष’, कुछ दिन बाद एक तीसरा साधक आया और बोला- ‘शास्त्री जी! मुझे संगीत के बारे में कुछ भी नहीं आता। मैं आपसे सीखना चाहता हूँ। कितना समय लगेगा?’

Content: शास्त्री जी ने कहा- ‘बिल्कुल भी नहीं लगेगा। तुम सारा ज्ञान मुझसे तुरंत प्राप्त कर लोगे।’

Content: एक नया-नया अबोध शिष्य अपने गुरु की बात तुरंत ग्रहण कर लेता है। वह अपने गुरु की सीख अपने में समाहित कर लेता है, परंतु वे लोग जो आशिक ज्ञान रखते हैं, उनके लिए गुरु को कुछ ऐसा करना पड़ेगा जिसमें वे अपना पिछला पाठ भूल जाएँ।

Content: वैसे तो जितने महान गुरु संसार में अवतरित होते हैं, वे वही शास्त्र ज्ञान लेकर आते हैं जो लिखित रूप में भी उपलब्ध होता है, पर साथ में उनके आत् है कि उस ज्ञान को जीता हुआ जीवन। किताबों में तो हम मात्र शब्द पढ़ते हैं। उससे पाठकों में कोई परिवर्तन नहीं आता क्योंकि कोई भी पुस्तक सत्य उद्घाटित नहीं करती; उनको इसके लिए लिखा ही नहीं जाता।

Content: एक लघु घटना

Content: रामकृष्ण परमहंस ने अपने शिष्य द्वारा एक किताब बोलकर लिखाई थी। वे बोलते रहते थे और उनका शिष्य लिखता रहता था। एक बार शिष्य एक जगह अटक गया और बोला- ‘गुरु जी! जरा उसे फिर दोहराएँ।’ गुरु ने वही बात फिर दोहराई। शिष्य ने लिखना बंद कर कहा- ‘गुरु जी! आपका यह वक्तव्य पिछले अध्याय के वक्तव्य का खंडन करता है। इससे संशय पैदा होता है।’ रामकृष्ण ने कहा- ‘तू चिंता मत कर। जो मैं बोलता हूँ, तू बस लिखता रह।’

Content: पर वह शिष्य आश्वस्त नहीं हुआ। तब रामकृष्ण ने स्पष्ट किया- ‘इस किताब का उद्देश्य, तथ्य उपस्थित करना नहीं है, वरन् सत्य उद्घाटित कर बदलाव लाना है। इसके द्वारा लोगों को प्रेरणा मिलनी चाहिए कि वे आगे बढ़कर जीते-जागते गुरु के पास जाएँ।’

Content: अर्थात् गुरु के शब्द तथ्य नहीं, सत्य बताते हैं। तथ्य तो रिकॉर्ड होते हैं, सत्य गूँजता है।

Content: यह एक सत्य है सभी शास्त्रों और किताबों के संदर्भ में। कोई पुस्तक चरम सत्य नहीं बता सकती। पर संभावना यह है कि कुछ लोग पुस्तकों को ही चरम सत्य उद्घाटक-सत्ता मान लेते हैं। वे उनकी बौद्धिकता को ही चरम सत्ता समझने लगते हैं, बजाय उस सत्य का स्वयं जिए, वे किताबों को ही सत्ता मान लेते हैं। वे चाहते हैं कि गुरु के शब्दों को पढ़ी हुई किताबों और शास्त्रों से प्रमाणिक सिद्ध करना; उनकी सत्यता स्थापित करना।

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Content: मुख्य समस्या शब्दों के अर्थ के कारण भी पैदा होती है, उदाहरण के लिए यदि कोई गुरु शब्द आता है तो वह संस्कृत कोश से लिया गया होता है, पर हम 'आत्मा' शब्द का अर्थ अपनी 'ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी' द्वारा समझना चाहते हैं तो समस्या शुरू हो जाती है। जब हम किसी जीवित गुरु के सान्निध्य में होते हैं तो हम तुरंत उनसे स्पष्टीकरण प्राप्त कर सकते हैं और इस प्रकार अपने संशय का तुरंत निवारण कर सकते हैं। गुरु तो हमारे चेहरों को देखकर समझ जाता है कि बात हमारी समझ में नहीं आई। वह हमें तब तक समझाता है जब तक कि बात पूरी तरह समझ में नहीं आ जाती। जब हम किताब पढ़ते हैं तो हम अपने मन के साथ खेल करते होते हैं। इसलिए कई लोग किताबों के सान्निध्य में ज्यादा रहना पसंद करते हैं, बाज़य गुरु के पास रहने के। वस्तुतः असली साधक और नकली जिज्ञासुओं में यही अंतर होता है। गुरु के पास खेल की कोई गुंजाइश नहीं होती। यदि हमारी साध असली है; हमें आंतरिक कामना होती है, तभी हम जीतेजागते गुरु की तलाश करते हैं, लेकिन जब हमारी कामना मन बहलाव की या समय बिताने की होती है तो हम किताबों का साथ ढूंढते हैं और पुराने गुरुओं के चित्र रखकर उनको पढ़ते हैं। यदि यह साध पूरी शिद्दत के साथ होती है तो हम किसी जीतेजागते गुरु के साथ जुड़ते हैं क्योंकि हमें वही सत्य लगता है सत्य वस्तुतः आकाशीय विद्युत के समान होता है, तुरंत और तत्काल प्रकट होता है। यह कोई विकसित होने वाली प्रक्रिया नहीं है, जबकि क़दम-दर-क़दम तार्किक रूप से इकट्ठे होते हैं और धीरे-धीरे विकसित होते हैं। इसमें आवश्यक है कि पहला हिस्सा स्पष्ट समझ लो, तब ही दूसरा हिस्सा समझ में आएगा, पर सत्य बिजली की तरह चमकता है और एक बार में ही पूरा उद्घाटित होता है। इसीलिए बौद्धिक रूप से सत्य की समझ मुश्किल लगती है। वह तार्किक भी नहीं होगा और कभी-कभी बेतुका भी लग सकता है। शताब्दियों से लोगों ने कष्ट इसलिए झेला है क्योंकि उन्हें आंतरिक रूप से समझ में आने वाले सत्य की उस सत्य से संगति नहीं बैठ पाती, जो समाज या व्यवस्थित धर्म द्वारा उसे बताया जाता है। समाज और धर्म ने कई ऐसे नियम और क़ानून बनाए हैं जिनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं होता, क्योंकि सत्य की व्याख्या कर उसे नियंत्रित नहीं किया जा सकता जबकि नियम-क़ानून केवल तथ्य आधारित होते हैं।

Content: इसलिए सत्य और तथ्य सदा साथ-साथ नहीं चल पाते। तथ्य एक-आयामी ही होते हैं, जो केवल समयबद्ध रहते हैं जबकि देश-काल में व्याप्त रहता है और इसलिए बहु-आयामी होता है। यहां अब अर्जुन परिपक्वता की उस स्तर पर आ चुके हैं कि मात्र तथ्यात्मक सूचना से उन्हें संतुष्टि नहीं होती। अब उन्हें सत्य की तलाश है। अब तक उनके सारे भ्रम तिरोहित हो चुके हैं। मन में अब कोई प्रश्न भी नहीं उठ रहा, सिर्फ़ संशय रह गए हैं - बड़े संशय। यह शिष्य अब गुरु को संपूर्णता में ग्रहण करने (अर्थात् उसका संपूर्ण ज्ञान प्राप्त करने) को तैयार है। ये संशय उस हरी बत्ती के प्रतीक हैं जो रास्ता साफ़ होने की सूचना देते हैं; जबकि प्रश्न लाल बत्ती का इशारा करते हैं। प्रश्न गुरु को अपनी सब कुंडली प्रकट करने से वंचित करते हैं। वे गुरु के लिए व्यवधान हैं क्योंकि वे एक मांग करते हैं कि उसके शब्दों का उत्तर दिया जाए। वस्तुतः जब हम पूरी तरह गुरु का अनुसरण नहीं करते हैं तो हम अपने जीतेजागते गुरु की सत्ता को ही चुनौती देने लगते हैं यानी उसके अंदर विद्यमान ऊर्जा को ही नकारने लगते हैं, क्योंकि हम गुरु को अपनी सीमित समझ के पैमाने से आंकते हैं। अपनी सीमित समझ द्वारा अपनी बौद्धिकता को उसे भी सीमित करना चाहते हैं क्योंकि हमारा पैमाना हमारी बौद्धिकता ही प्रदान करती है।

Content: एक लघु कथा एक युवा पेड़ के नीचे बैठे एक वृद्ध व्यक्ति के निकट पहुंचा और बोला कि उसे एक गुरु की तलाश है। वह वृद्ध बोला कि वह एक गुरु को जानता है। उसने उसका पूरा वर्णन किया कि वह कैसा लगता है और कहां मिल सकता है, इत्यादि। उस युवा ने उस व्यक्ति को धन्यवाद दिया और आगे वह बढ़ गया। तीन वर्षों तक वह उस गुरु को ढूंढता रहा, पर वह मिला नहीं। अंत में थककर वह फिर अपने मूल निवास की तरफ लौट आया। पर घर पहुंचने के पूर्व उसे एक वृद्ध दिखाई पड़ा, जो गुरु के बताए सारे लक्षणों से संपन्न था, पास आकर उसने देखा-अरे! यह तो वही व्यक्ति है जिसने तीन वर्ष पूर्व मुझे गुरु के लक्षण बताए थे और जिसकी तलाश में वह तीन वर्षों तक भटकता रहा था। वह युवा फिर उसके पास गया और बोला- "आपने पहले ही क्यों नहीं बताया कि वह गुरु आप ही हैं। आपने व्यर्थ में मेरे तीन वर्ष बरबाद करवा दिए।" "बेटे! यह समय बरबाद नहीं हुआ है, इस समय में तुम्हारा मानसिक ढांचा शुद्ध हुआ है। जब तुम तीन वर्ष पूर्व मेरे पास आए थे तो मैंने अपना पूरा वर्णन

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Content: तुमसे किया था- बताया था कि वह किस पेड़ के नीचे मिलेगा और कैसा लगता है, पर तुम मुझे पहचान ही नहीं पाए। तुम्हें यात्रा करने की जल्दी थी, भटकने की और अपने अहं को संतुष्ट करने की भी। इसलिए तुम्हारा भटकना जरूरी था, जिससे तुम्हारे मन के प्रश्नों का समाधान हो जाए, वे गल जाएँ और साथ ही तुम्हारा अहं भी दूर हो जाए। अब तुम परिपक्व होकर पूर्व की तरह तैयार हो मुझे स्वीकार करने के लिए। अर्जुन ने भी ऐसा ही किया। द्वितीय अध्याय में 'आत्मा' के बारे में बताया गया-"नैयन् छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः" (द्वितीय अध्याय २३वां श्लोक) (आत्मा न शस्त्रों से घायल होती है, न आग उसे जला सकती है...), लेकिन अर्जुन ने तब तुरंत कहा था-"तो प्रबुद्ध व्यक्ति बोलता कैसे है? क्यों ऐसा कहा? क्यों यह प्रश्न उठा? यह विशुद्ध अहं के कारण-वह चाहता था कि कृष्ण को आँक सके। यह जान सके कि कृष्ण वाकई में प्रबुद्ध व्यक्ति है कि नहीं? यानी अर्जुन अपने गुरु की सत्ता की परख करना चाहता था तो सवाल करने लगा जो एक हिंसा से उत्पन्न हुए हैं। धीरे-धीरे नौवें अध्याय में कृष्ण ने जब राज विद्या, राज गुह्यम् (राज ज्ञान एवं राज रहस्य) उद्घाटित कर बताया कि अस्तित्व, ब्रह्मांड की ऊर्जा इत्यादि में अपनी समझ या बुद्धिमत्ता होती है तो अर्जुन के प्रश्न धीरे-धीरे हटने लगे और जब उसने कृष्ण की महिमा सुनी तो उसके मन में उनके प्रति प्रेम पल्लवित होने लगा। जब कृष्ण ने अपना विश्वरूप अर्जुन को दिखाया तो अर्जुन ने चरम चेतना का अनुभव किया। नौवें अध्याय में वर्णित दिव्यी ज्ञान और अन्य रहस्यों के उद्घाटन के पश्चात उसमें समझ प्रकट होने लगी। दसवें अध्याय में विभूति योग द्वारा बताए दिव्यी प्राकट्य के साथ उसके मन में भक्ति का संचार होने लगा। 11वें अध्याय में विश्वरूप दर्शन इत्यादि के अनुभव के साथ अर्जुन को ज्ञान उत्पन्न होने लगा। अब उसके सारे प्रश्न तिरोहित हो चुके थे। रामकृष्ण इस पूरी प्रक्रिया को एक उदाहरण के साथ बड़ी सुंदरता से समझाते हैं-"पार्टी इत्यादि में जब तक खाना न परोसा जाए, आपसी बातचीत की आवाजें आती रहती हैं पर जैसे ही एक बार खाना परसा गया कि सिवाय भोजन चबाने के और खाना परोसने में उठी आवाजों के सारी आवाजें आना बंद हो जाती हैं, अर्थात् जब तक चरम अनुभव न हो, सवाल उठते रहते हैं, पर उसके बस सिर्फ उस अनुभव की अभिव्यक्ति मात्र ही रह जाती है। तब कोई आवाज या शोर नहीं उठता।"

Content: अर्जुन ने पहले कृष्ण की सत्ता को ही चुनौती दी और फिर अपने लाभ की गणना में जुट गया। अब उसकी मानसिकता पूर्ण स्वीकार्यता की है अर्थात पहले प्रतिरोध, फिर विमुखता और अंततः स्वीकार्यता। जैसे भी सृजनात्मक ऊर्जा और सारा लेखाजोखा करना, दो अलग-अलग प्रतिक्रियाएं होती हैं। सिर्फ ईश्वर सृजन करता है जब भी कोई किसी चीज का सृजन करता है तो उस क्षण उसे एक क्षणिक अनुभूति होती है। यही कारण है कि वैदिक काल से गर्भवती महिलाओं पूजा-पाठ में लिप्त रहती हैं। पुरानी मान्यता यह भी थी कि उनके स्पर्श मात्र से लोग चंगे हो जाते थे। वस्तुतः आर्किटेक्ट या भवन निर्माण करने वाले सृजनशील होते हैं। बेशक इंजीनियर लोग ज्यादा पैसा भले ही लगते हों, पर कर्म का संतोष तो आर्किटेक्ट्स को मिलता है। चूँकि वे सृजनशील होते हैं। यदि सृजन ही न हो न तो जीवन की जीवन्तता कहाँ रहेगी? यहाँ अर्जुन सब कुछ ख़त्म कर चुका है। उसकी सारी गणनाएं समाप्त हो चुकी हैं। अब तो वह सशय के स्तर पर आ चुका है। सवालों के साथ तो सहज फर्क रहता है क्योंकि सवाल तो गुरु से जवाब मांगते हैं। संशय ऐसे नहीं होते, वे तो कुछ सूत्र मात्र चाहते हैं (उनको दूर करने को)। अब अर्जुन गुरु को सम्पूर्णता से स्वीकार करने को तत्पर है। इसलिए इस पूरे अध्याय में अर्जुन मौन ही रहता है। वह गुरु (का ज्ञान) सम्पूर्णता से समाहित करने को तैयार है। अब जो भी उसे मिलेगा व पूरी सम्पूर्णता से उसे स्वीकार कर लेगा।

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Chapter Number: 15

Chapter Name: कारणात्मक ( कॉज़ल ) शरीर में यात्रा

Content: 15.1 श्री भगवान बोले-आदि स्वरूप परमेश्वर रूप मूल वाले और ब्रह्मस्वरूप मुख्य शाखा वाले जिस संसार रूप बरगद (पीपल) के वृक्ष को अविनाशी कहते हैं तथा वेद जिसके पत्ते कहे गए हैं-उस संसार रूप वृक्ष को जो पुरुष मूल सहित तत्वतः जानते है वह वेद के तात्पर्य को जानने वाला है। 15.2 इस संसार वृक्ष की तीनों गुण रूप शाखाएं द्वारा बढ़ी हुई एवं विषय भोग रूप कॉपलों वाली, देव, मनुष्य और तिर्यक आदि योनि रूप शाखाएं नीचे से ऊपर सर्वत्र फैली हुई हैं तथा मनुष्य योनि में क्यों के अनुसार बंधने वाली अहंमता, ममता और वासना सभी जड़ें, नीचे से ऊपर सभी लोगों में व्याप्त हो रही हैं।

Content: कृष्ण इस कारणात्मक शरीर को एक बरगद (पीपल) के पेड़ के संदर्भ में देखते हैं। यह बात पिछले अध्याय से शुरू हुई है और अभी चालू है। वस्तुतः अध्याय 14 से 17 आपस में जुड़े हुए हैं। इनके ऊपर प्रवचन भी इसलिए जुड़े रहते हैं। इस अध्याय (पुरुषोत्तम योग में) कृष्ण अब पंद्रहवीं सतह का हवाला देते हैं। पंचम सतह कारणात्मक शरीर की होती है, जहां सारे संस्कार जमा रहते हैं बीज रूप में। हम इस सतह में गहरी निद्रा में प्रवृष्ट होते हैं। हम इसी सतह से अपने संस्कार ग्रहण कर अपनी दुनिया बनाते हैं। वस्तुतः इच्छाएं एक प्रकार की ऊर्जा होती हैं। विरोधाभासी या एक-दूसरे को काटने वाली इच्छाएं, जब हम पैदा करते हैं तो इस ऊर्जा का गलत प्रयोग करते हैं। यही विरोधाभासी इच्छाएं हमें व्याकुल बनाती हैं, परंतु हम कभी उनको ठीक करने का प्रयत्न नहीं करते। इसी कारण हम अवसादग्रस्त हो जाते हैं। यहां कृष्ण हमें बताते हैं वह तरकीब जिसके द्वारा इन विरोधाभासी इच्छाओं को स्पष्ट कर सही कर सकते हैं।

Chapter Name: इच्छाएं

Content: हमारी इच्छाओं की उत्पत्ति हमारी वासना से होती है। इनमें ऊर्जा समाहित होती है जो उनकी पूर्ति के लिए सक्षम रहती है क्योंकि मूलभूत आवश्यकताएं प्रकट होती हैं और वह उद्देश्य बताती हैं जिसके लिए हम जन्मे हैं। यह समस्त संसार हमें वह शक्ति प्रदान करता है, जिससे हम अपनी सारी इच्छाओं की पूर्ति कर सकें, पर इस स्थिति में पहुंचकर हम कुछ अन्य इच्छाओं को इकट्ठा करने लगते हैं। वस्तुतः वे इच्छाएं नहीं, हमारे थोपे हुए अभाव होते हैं जो हम औरों से अपनी तुलना कर, नकल कर या ईर्ष्या कर दूसरों से उधार लेते हैं। रमण महर्षि का कथन है-"यह संसार अपने सब निवासियों की इच्छाएं पूरी कर सकता है, पर अभाव एक को भी पूरा नहीं कर सकता।" कितनी सच बात है। जब हम इच्छाएं दूसरों से उधार लेते हैं तो उनकी उत्पत्ति दूसरों की वस्तुओं को पाने के आकर्षण से पैदा होती है। इस कारण हमारी मूल इच्छाओं या मांगों से वे गंभीर रूप से विरोधाभासी लगती हैं क्योंकि वे हमने अपने ऊपर थोपी हैं। जब हमारी अपनी इच्छाओं की पूर्ति होती है तो हमें हर्ष होता है, आनंद मिलता है। इसलिए एक गरीब आदमी अपना साधारण भोजन भी पूरे भाव से करता है। हमारी ये उधार ली हुई इच्छाएं हमें अपने अभावों के पीछे दौड़ाती हैं और दुःख देती हैं। क्या आपने कभी किसी धनी व्यक्ति को सच्ची प्रसन्नता के साथ भोजन करते देखा है? उसकी इकट्ठा की हुई संपत्ति उसे बीमारियां देती है। उसे कई भोजन शास्त्री (डाइटिशियन) और व्यक्तिगত सहायक रखने पड़ते हैं, तब कहीं वह स्वस्थ और चंगा रह पाता है। इच्छाएं संस्कारों की उत्पाद होती हैं और संस्कार हमारे अचेतन मन की सतहों में गुथे पड़े रहते हैं। हमारे मन को बाकी बचे 10 प्रतिशत (90 प्रतिशत तो अचेतन ही रहता है) प्राप्त इंद्रिय लब्ध जानकारी से भी जूझना कठिन लगता है जो लगातार हमारे चेतन मस्तिष्क में आती रहती है। ये जमी स्मृतियां या संस्कार हमारे कर्मों के संचालक बनकर उभरते हैं। हमें यह भी नहीं मालूम रहता कि ये इच्छाएं हमारी वास्तविक इच्छाएं नहीं, जिनकी पूर्ति के लिए हमारे पास ऊर्जा रहती है। ये तो दूसरों से प्राप्त या उधार ली हुई इच्छाएं हैं, जिनका उद्भव ईर्ष्या और दूसरों से स्वरूप की तुलना के कारण होता है, पर हमारे समूचे अस्तित्व को परिभाषित यही संस्कार करते हैं।

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Content: अब कृष्ण आगे की सतह तक पहुँचते हैं, जहाँ बीज रूप में संस्कार दबे रहते हैं। यदि हम इन तीन सतहों से आगे भी बढ़ जाएँ-इच्छा, व्याकुलता और अवसाद की सतहों से-तब भी ये संस्कार अपना प्रभाव बीज रूप में दिखाते रहते हैं। इनको दूर करना बहुत जरूरी होता है। कृष्ण यहाँ उन तरकीबों का जिक्र करते हैं जिनमें ये संस्कार नष्ट किए जा सकते हैं। वे चाहे अभी स्वयं को अभिव्यक्त न करें, पर चूँकि वे बीज रूप में विद्यमान रहते हैं, अतः कभी-न-कभी तो वे हमारा शोषण करेंगे ही। दफ्तरों में कुछ फाइलें मेज पर रहती हैं, कुछ संग्रहालयों में, तो कुछ तिजोरी में भी रखी जाती हैं। पहले बताई गई तीन सतहें मेज पर या संग्रहालयों में उपलब्ध फाइलों की तरह होती हैं। कॉजल (कारणात्मक सतह) मानो दफ्तर की सुरक्षित तिजोरी। आगे की दो सतहें बाहरी तिजोरी के रूप में समझें। पिछले अध्याय में कृष्ण ने तरकीब बताई थी कि कैसे अपनी 'टेबिल' को साफ करें इन फाइलों से। अब वह बता रहे हैं वे तरकीबें जिनसे 'तिजोरी' की फाइलों से मुक्ति पाई जा सकती है। कृष्ण कहते हैं कि-"इस पेड़ की जड़ें बाहर की ओर होती हैं और शाखाएँ अंदर की ओर होती हैं।" यदि कारणात्मक शक्ति से जड़ें अंदर की ओर लाई जाएँ तो वे उन सतहों में होंगी जिनसे भौतिक शरीर सतह सीमा का अंत होता है। किसी भी पेड़ को गिरा जड़ से मिलती है-पानी और खनिज भी पेड़ जड़ों से ही प्राप्त करता है। वस्तुतः जड़ की स्थिति ही यह बताती है कि पेड़ कैसा होगा। इसलिए कृष्ण कहते हैं कि इस पेड़ की जड़ भौतिक शरीर में रहती है। यहाँ संस्कारों के इस पेड़ को पानी पंचेंद्रियों के बोध से प्राप्त होता है जिससे हम मरते हैं। फिर धारणात्मक शरीर के बीज रूपी संस्कारों को गिरा भौतिक शरीर की पंचेंद्रियों से मिलती है। कृष्ण आगे कहते हैं कि इस पेड़ के पत्ते वैदिक ऋचाओं जैसे होते हैं और जिसको इस पेड़ का ज्ञान होता है वह वेदों को भी जानता है। वे कहते हैं कि यहाँ संस्कार वैदिक ऋचाओं के समान हैं अर्थात् हमारे मंत्र हैं। मंत्रों की परिभाषा है-"मन साफ सिथरः अर्थात् वह जो मन को स्थित करे।" एक अन्य परिभाषा है "मनः गायते इति मंत्रः" अर्थात् जो मन को तृप्त दे या जो मानव के मन को सिथर करे या उसका उद्धार करे। वस्तुतः वे शब्द जो हमारे अंतर में बस जाते हैं, हमारे लिए मार्ग बनाते हैं। जब हम नितांत अकेले हों, तब जो शब्द हमारे मन से निकलते हैं संस्कार रूप होते हैं। जो हमारे कारणात्मक शरीर पर छपे रहते हैं। हमारा सारा जीवन उनके आसपास ही घूमता है।

Content: वस्तुतः वे शब्द दुधारੀ तलवार जैसे होते हैं। हम जिन शब्दों का प्रयोग दूसरों को आहत करने को करते हैं, वे हमारे अंतर्मन में बस जाते हैं और वे तभी बाहर आते हैं जब हम अपने आंतरिक मन या भावों को बाहर लाना चाहते हैं-तब वे शब्द प्रकट होते हैं। कोई व्यक्ति भी इतना अक्लमंद नहीं होता कि तीनों शब्द दूसरों के लिए इस्तेमाल करे और कोमल शब्द अंद रखे रहे। यह एक अचेतन कर्म होता है। इसलिए प्राचीन भारतीय समाज में विभिन्न रिवाजों द्वारा तीनों शब्दों को नियंत्रित किया जाता था। हमारा मन अपने आंतरिक संकाय में सदा व्यस्त रहता है। कभी-कभी हम अपने शब्दों द्वारा इनकी झलक दिखा देते हैं और ज्यादातर अपने मन का अंतर्द्वंद्व सामाजिक प्रतिरोध के डर से अपने अंदर ही छिपाकर रखते हैं। हम यह स्पष्ट नहीं करते इसे डर से कि कहीं वह दूसरों को चोट न पहुँचाए या उनकी अस्वीकार्य करे। ऐसे सारे शब्द हमारे अंदर 'मर्ज़ीपुरक चक्र में बस जाते हैं। यह चक्र नाभि के निकट होता है और शब्दों का मुख्य पीठ (या स्त्रोत) होता है। ये वे शब्द होते हैं जो हमें अपनी स्थिति के अनुसार श्रोता को सुनाने के लिए हमें सहूलियत भरे लगते हैं। हम तीनों शब्द अपने मातहत, जीवनसाथी, बच्चों या उनके लिए प्रयुक्त करते हैं जिन्हें हम समझते हैं कि वे हमारे नियंत्रण में हैं, पर ये शब्द हम कभी अपने से वरिष्ठों या अनजानबियों के लिए प्रयुक्त करने की सोच भी नहीं सकते। तीनों शब्द, जो चाहे बाहर व्यक्त करें या अपने अंदर ही रखें, हमारे अंदर बस जाते हैं। वैसे तो जो बाहर जाता है वह अंदर भी आता है। ये सब हमारे नाभि के निकट वाले चक्र में बसते रहते हैं। चाहे वह व्यक्त हो या अव्यक्त रहें, ये शब्द हमारे संस्कारों को विक्सित करते हैं। हर शब्द जो हम बोलते हैं, उन पर प्रभाव डालते हैं जो उनको सुनते हैं या जिनको संबोधित किया जाता है। यह प्रभाव हमारे विचारों का भी होता है। जिसको यह बात मालूम होती है वह अपने विचारों या शब्दों द्वारा दूसरों पर प्रभाव डालता है। विचारों या शब्दों का प्रभाव शायद कर्म से भी ज़्यादा प्रभावशाली होता है। भले हमें यह न मालूम हो कि किस प्रकार हमारे विचार या शब्द दूसरों को प्रभावित करते हैं। हो सकता है कि सुनने वाले इतना ध्यान न दे रहे हों, पर इनका प्रभाव पड़ता अवश्य है, कहने वाले और सुनने वाले दोनों पर। इस क्षेत्र में हमारे पास एक अच्छी खबर भी है और एक बुरी खबर भी। अच्छी खबर यह कि हम किसी भी समय अपने कारणात्मक शरीर (कॉजल बॉडी) का पुनर्गठन कर सकते हैं। बुरी खबर यह कि हमारे अंदर अभी विद्यमान ऋणात्मकता ही उस कष्ट के लिए जिम्मेदार होती है जो हमें भोगना पड़ता है।

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Content: एक औरत ने अपने पति को उसके दफ्तर में फोन किया। पति बोला कि वह इस समय व्यस्त है। उस औरत ने कहा-“ज्यादा लंबी बात नहीं करनी है। दो खबरें हैं एक अच्छी और एक बुरी।” पति ने कहा-“पहले अच्छी वाली बताओ, बुरी वाली बाद में सुनी जा सकती है।” औरत ने कहा-“मुझे अभी-अभी मालूम पड़ा है कि हमारी गाड़ी का एयरबैग अच्छी तरह काम कर रहा है।” बुरी खबर, जाहिर ही था कि उसकी गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई है-इसीलिए तो गाड़ी का एयरबैग ठीक काम कर रहा था यानी फूल गया था। वस्तुतः हर अच्छी खबर में कोई-न-कोई बुरी खबर तो छिपी होती ही है तो हमारे कारणात्मक शरीर के बारे में भी ऐसा ही है। कृष्ण आगे कहते हैं कि जो इस वृक्ष को जानता है वह वेदों को भी जानता है अर्थात् वे यह कहते हैं कि जिसने ज्ञात है कि जो संस्कार, जो कारणात्मक शरीर बनाते हैं, पंचेंद्रियों से प्राप्त बोध का प्रतिफल है, वेदों को जानता है या वह जानता है कि जीवन को संचालित करने वाला बल कौन-सा है।

Content: क्षण स्थायी और स्थायी

Content: अपनी जड़ों द्वारा प्राप्त जल ही तय करता है कि वृक्ष की स्थिति कैसी रहेगी। यदि अच्छा पानी और ज़रूरी खाद उपलब्ध है तो पेड़ हरा-भरा रहेगा, पत्ते भी घने होंगे, यदि पेड़ पर ज़हर डाल दिया जाए तो वह धीरे-धीरे मर जाएगा। यह संस्कार का वृक्ष, जो कारणात्मक शरीर में फलता है, पंचेंद्रियों के कारण ही जीवित रहता है। कृष्ण यहाँ 'अश्वस्थ' शब्द का प्रयोग करते हैं जिसका एक अर्थ है कि जो क्षण स्थायी है; जो आज वैसा नहीं जैसा कल था या कल वैसा नहीं रहेगा जैसा आज है। यह पार्थिव जीवन के संदर्भ में कहा गया है, जहाँ कोई चीज़ वैसी नहीं लगती जैसी वह है। जैसा कि बुद्ध ने कहा था-हर चीज़ क्षणस्थायी है 'अनिच्च है' (अनित्य है) और इसलिए स्थायी नहीं है। जीवन, जैसा कि लोग कहते हैं, असत्य नहीं है। क्योंकि यदि जीवन वाकई में असत्य या अवास्तविक होता तो हम उसका अनुभव ही नहीं कर पाते। सच तो यह है कि हम पार्थिव जीवन जीते ही नहीं, उसका आनंद भले ही क्षणिक रूप में लेते हैं, स्पष्ट बताता है कि यह वास्तविक या सत्य है। यह उसी हद तक असत्य है कि जो हमारा अनुभव होती है वह क्षण-स्थायी ही रहता है, स्थायी नहीं रहता।

Content: अवास्तविक का अर्थ मौजूद न होना, नहीं होता क्योंकि जब कोई चीज़ मौजूद ही न हो तो हमें उसका भान ही नहीं होगा, न उसका अनुभव होगा। चाहे क्षण मात्र को ही हो, अनुभव तो होता ही है। सपने अवास्तविक ज़रूर होते हैं पर हम यह नहीं कह सकते कि हमें सपनों का अनुभव ही नहीं होता। कई लोगों को तो अपने कई सपने याद रहते हैं। सपने अवास्तविक कैसे हो सकते हैं? पर यह सत्य है कि जब हम सपने देखते हैं तो हमें अपनी अनुभूति की जागरुकता नहीं होती, क्योंकि जैसे ही हमें अपना ज्ञान होता है, हम उठ बैठते हैं। ऐसा कभी नहीं होता कि सपने में हमारे पीछे पड़ता हुआ कोई शेर या व्यक्ति हमें पकड़ ले या खा ही जाए या मार डाले। ऐसा चरित्रों में भले ही हो जाए, वास्तविक जीवन में नहीं होता। जैसे ही कोई ख़तरा (सपने में) सामने आया कि हमारी अपने बारे में जागरुकता जागृत हो जाती है; हम उठ बैठते हैं और स्वप्न शून्य हो जाता है।

Content: सपने असत्य नहीं होते क्योंकि उनका कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं होता। वे उतने ही असत्य हैं जितनी हमारी उनके बारे में जागरुकता न होना। इसी तरह हमारे ऋषि-मुनि कहते हैं कि हम तो जागते हुए जागृत नहीं होते, पूरी तरह जागरुकता नहीं होती। वे बार-बार कहते हैं-“जागृत-जाग्रता” वे हमसे नींद से जागने का आह्वान नहीं करते; वे कहते हैं कि हम अपनी जागरण में सुप्ति से उठकर जागरण में पूरी तरह जागृत हों।

Content: 'अश्वस्थ' इसी सुप्तावस्था (बेजागरुकता) का प्रतीक है। इस बेजागरुकता-जो हमारी इंद्रियों के प्रभाव का प्रतिफल है और हमारे संस्कारों द्वारा संचालित है-को समझना ही ज्ञान प्राप्त करना है या वेदों को समझना है। वेद का अर्थ अवस्था में प्राप्त सदही ज्ञान है। कृष्ण इस बेजागरुकता को स्थिति को आगे भी स्पष्ट करते हैं।

Content: कृष्ण कहते हैं कि जड़ें ऊपर भी जाती हैं और नीचे भी। वे कहते हैं कि इस वृक्ष के पत्तों का निर्माण हमारी पंचेंद्रियों की बनाई छवि से बनता है और इसी के कारण भान व अपना कर्म करता है। ये जड़ें सिर्फ़ भौतिक शरीर में ही नहीं, वरन् हमारे कर्म में भी निहित रहती हैं। कृष्ण कहते हैं कि इस वृक्ष की जड़ें बहुत गहरे तक जाती हैं क्योंकि सभी मानवों का कर्म सदा फल से प्रेरित होता है। फलस्वरूप भय और लालच इसके संचालक हो जाते हैं।

Content: 'अश्वस्थ' वृक्ष मानव शरीर जैसा ही होता है। इसकी जड़ें ऊपर होती हैं जैसे कि हमारे शरीर की जड़ें-बाल ऊपर होते हैं। कहा जाता है कि बाल वे चैनल होते हैं जिनसे हम ब्रह्मांडीय ऊर्जा ग्रहण करते हैं। हमारे हाथ-पाँव पेड़ की शाखा की तरह हैं। वस्तुतः मानव शरीर तंत्र भी उल्टा ही बनाया गया है।

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Content: कृष्ण यहां एक अनूठी तरकीब बताते हैं संस्कारों से पिंड छुड़ाने को। यदि हम लालच या भय द्वारा संचालित नहीं होंगे; यदि हमारे कर्म फलोन्मुख नहीं होंगे तो कोई संस्कार पैदा नहीं हो पाएगा। यदि आप निष्काम भाव से रोज आधा घंटे भी कोई काम कर सकें तो आपका निश्चय ही बहुत भला होगा। इस काम या सेवा को करते हुए कोई योजना न बनाएं। यह भी योजना न बनाएं कि किसी स्वयं सेवा के लिए कितने स्वयंसेवक होने चाहिए। सिर्फ काम करें जितना आप कर सकते हों। वेशक आपको यह मुख्तापूर्ण प्रतीत हो सकता है-फालतू, वक्त की बर्वादी भी लग सकता है, परंतु कुछ समय बाद इस समय (आधा घंटे) का महत्व आप पर उजागर होगा। यदि आपकी सेवा लालच या भय से संचालित है तो आप सब कुछ गुड़-गोबर कर देंगे और दूसरों के लिए भी कष्टकारी प्रतीत होंगे। हम कभी भी सत्प्रेरित नहीं हो सकते, जब हमारी स्वार्थी इच्छाओं की पूर्ति होगी। वे तो हमारे अहं को और गिज़ा देंगे। उनसे कोई सार्वभौमिक या संसार-भर के कल्याण का उदेश्य सिद्ध नहीं होगा।

Content: एक लघु कथा एक स्कूल में स्काउट लड़कों के लिए यह आवश्यक था कि वे रोज कोई सामाजिक सेवा का काम करें और स्कूल में आकर उसकी रिपोर्ट दें अपने मास्टर को। एक दिन तीन लड़के आए और बताया कि कि उन लोगों ने एक वृद्ध महिला को सड़क पार करवाई है। उनके मास्टर ने कहा-"किसी वृद्ध महिला को सड़क पार करने में मदद करना वाकई सामाजिक सेवा है, पर इसमें तीन स्काउटों की क्या जरूरत थी? और की काफी थी।" लड़के ने जवाब दिया-"अरे नहीं सर! तीन भी बड़ी मुश्किल से उसको सड़क के इस पार ला पाए। वह महिला तो सड़क पार करना ही नहीं चाहती थी।" सिस्टेमटाईज़्ड सेवा इसी प्रकार के गुल खिलाती है, इसलिए कुछ भी प्लान मत करो। कहीं भी जाकर कोई सेवा करो। वह सेवा धीरे-धीरे तुम्हारे अस्तित्व में अससीम शक्ति का संचार कर देगी, तो कम-से-कम आधा घंटे रोज निष्काम भाव से कोई सेवा करो। मैं अपने भक्तों से कहता हूं कि कम-से-कम आधा घंटा रोज हमारे मिशन में आकर सेवा करो। यह सेवा ही ध्यान लगाना हो जाएगा। इससे सामूहिक चेतना का भाव जगेगा और सेवा में निहित दिव्यता की अनुभूति सबको होगी। भगवान कहते हैं-"कर्मानुबन्धीनी मनुष्य कोरे" अर्थात हमारे सारे कर्म फल के बंधन में रहते हैं। तो (उपर सुझाई गई) इस सेवा में न डॉलर्स का

Content: ख्याल करें, न रुपयों का, न किसी सुविधा का और न किसी को प्रभावित करने का प्रयत्न करें। अपनी उपस्थिति की पहचान भी दिखाने का प्रयास न करें। काम (सेवा) करें सिर्फ काम के लिए, पूरे निष्काम भाव से। जब हम कोई तथाकथित दान-पुण्य का काम करते हैं तो हमें तब भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हम किसी फल के बंधन में स्वयं को न डालें। लोग पूछते हैं-"क्या फायदा ध्यान लगाने से जब सारा जग कष्ट भोग रहा है?" यह ठीक है कि हम दुनिया के दु:ख को महसूस करते हैं और मानवता को पूरी शिद्दत से इससे निःज़ात दिलाना चाहते हैं, पर हमारे अंदर विस्तृत चेतना का वह भाव भी होना चाहिए जिसमें हम सभी के प्रति सहानुभूति महसूस कर सकें। प्राय: हम दान-पुण्य भी इसी भाव से करते हैं कि मृत्यु के बाद हमारी गति सुधर जाए, यदि हम पुनर्जन्म में विश्वास करें या न करें। या हम चाहते हैं कि मीडिया में हमारा काम दिखाया जाए, जिससे लोग हमारी सहायता को बखाने या यह कहें कि देखो यह व्यक्ति कितना धर्म-प्राण है कि यह इस जन्म में ही नहीं मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में भी सोचता है। आध्यात्मिक क्षेत्र में तो पाप-पुण्य की कोई अवधारणा ही नहीं होती। न यहां चित्रगुप्त या सेंट पीटर 'पर्ली गेट्स' पर खड़े होकर यह पूछने आते हैं कि तुमने अपने हिस्से का दया-दान-पुण्य संबंधी काम पूरा कर लिया है कि नहीं। आप चाहे किसी के लिए भी काम करें-दान-पुण्य करें या वित्तीय क्षेत्र या सामाजिक क्षेत्र में काम करें-यदि आपके मन में काम के प्रतिफल की ओर कोई अपेक्षा नहीं है तो वह निष्काम कर्म ही माना जाएगा, क्योंकि ऐसे कामों का संचालन लालच या भय से नहीं होता। इन कामों में संस्कारों का कोई आक्षेप नहीं होगा।

Content: बौद्धिक रूप से इसे स्वीकार करना थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि जब कोई कॉर्पोरेट आफ़िस या व्यक्ति कोई भी दानार्थ काम भी हाथ में लेता है तो वह हिसाब ज़रूर लगाता है कि लागत के हिसाब से प्राप्ति-धन या किसी और रूप में- कितनी होगी अर्थात कितना लगेगा और कितना मिलेगा। इसी के अनुसार अपना लक्ष्य निर्धारित किया जाता है, बजट बनता है और प्राप्त फलों का गहन विश्लेषण होता रहता है तथा अपने कार्य की दिशा निश्चित की जाती है। पर एक रास्ता ऐसा है जिसमें प्रक्रिया का क्रम परिभाषित किया जाता है, फल की प्राप्ति का मापदंड नहीं। जब पूरी तरह परिभाषित प्रक्रिया अपनाई जाती है तो फल भी स्वाभाविक तौर पर प्राप्त होते हैं। यदि हमारा रास्ता सही है तो हमें सही मंज़िल मिलेगी। इसके लिए साहस चाहिए कि विचार को कर्म में उतारा जाए; साहस यह कहने के लिए भी होना चाहिए कि हम बिना किसी

Content: श्रीमदभगवत गीता 188

Content: श्रीमदभगवत गीता 189

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Chapter Number: 15

Content: इस वृक्ष को काटना

Chapter Number: 15.3

Content: इस संसार का जैसा रूप कहा गया है वैसा विचार में प्रकट नहीं होता, क्योंकि इसका न आदि है, न अंत और न ही यह भली प्रकार स्थित है। इसलिए इस अहंमता, ममता और वासना रूपी अति दृढ़ मूल वाले संसार वृक्ष को दृढ़ वैराग्य रूपी शस्त्र से काट कर;

Chapter Number: 15.4

Content: (परम पद रूप) परमेश्वर को भलीभांति खोजना चाहिए, जिसमें गए हुए लोग फिर संसार में नहीं आते और जिस परमेश्वर से यह पुरातन संसार-वृक्ष की प्रवृत्ति को प्राप्त हुई है 'उसी आदि पुरुष नारायण की मैं शरण में हूँ'-ऐसा दृढ़ निश्चय कर परमेश्वर का मनन करना चाहिए।

Content: कृष्ण उस कारणात्मक शरीर के बारे में आगे बोलते हैं जहाँ संस्कार जमा रहते हैं। कृष्ण एक असाधारण वैज्ञानिक प्रतीत होते हैं, क्योंकि एक वैज्ञानिक ही ईमानदारी से सत्य की खोज करता है। वह इस खोज के लिए अपने मत या धर्म की भी कुर्बानी दे सकता है। उसी में इतना साहस होता है कि वह पग-पग पर प्रकट होने वाले रहस्यों का मर्म स्पष्ट करता रहे।

Content: कृष्ण में ये सारे गुण मौजूद हैं—आत्मव्यक्तित्व और अपनी खोज के बारे में पूरी तरह बेबाक। बड़े सत्य के लिए वे अपने लघु समय का परित्याग कर सकते हैं; कल के सत्य को त्यागकर आज तक की आद्यतन समझ पर कायम हो सकते हैं।

Content: हम पिछले वर्ष के टाइम-टेबल से आज ट्रेन का इतज़ार नहीं कर सकते। कृष्ण लगातार स्वयं को आद्यतन करते रहते हैं और उनमें इतनी हिम्मत भी है कि गुप्त रहस्यों को सार्वजनिक रूप से प्रकट कर दें। उन्हें कॉपीराइट (सर्वाधिकार) या बौद्धिक अधिकार की कोई परवाह नहीं होती।

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Content: प्राचीन वैदिक सामाजिक मान्यता थी कि ज्ञान सर्वथा मुक्त होता है। तब सर्वाधिकार की अवधारणा भी नहीं थी। कृष्ण पूरे साहस से सारे गुप्त रहस्यों का उद्घाटन करते हैं। व बड़ी सुंदरता से कहते हैं-“न रुपमस्यैव तथ्योल्यमस्ये” अर्थात कोई भी इस वृक्ष को अपने विचारों में सही रूप से समझ नहीं सकता, क्योंकि न इसका आदि ज्ञान है, न अंत और न ही इसका मूल आधार, लेकिन दृढ़ निश्चय कर इस वृक्ष की मजबूत इच्छाशक्ति एवं वैराग्य या अनासक्ति से काट देना चाहिए। कारणात्मक शरीर में क्या इकट्ठा है यह कोई नहीं देख सकता। वह तो भानुमति के पिटारे के जैसा होता है। कारणात्मक शरीर में एकत्रित संस्कार अपने आपको एक-एक कर प्रकट करते हैं, पर यदि हमने उनमें से चार को हटाया तो वहां 10 पेड़ा हो जाएंगे। अंदर किया है यह किसी को ज्ञात नहीं होता। सिर्फ एक ही संभावना है कि दृढ़ निश्चय एवं पूर्ण निरासक्त भाव की कुल्हाड़ी से इसको काट दिया जाए। यानी बुद्धि और दृढ़ इच्छाशक्ति की सहायता से इस पूरी कारणात्मक सतह से मुक्ति पाना संभव है। लोग अपने गुरुजनों से पूछते हैं कि इन संस्कारों से कैसे मुक्ति पाई जाए। सिर्फ दृढ़ इच्छाशक्ति और बुद्धिमत्ता ही ऐसा कर सकती है। यदि आग में हमारे हाथ चले जाएं, तो क्या हम अपने गुरु को सहायता के लिए गुहार लगाते हैं? नहीं। हम जानते हैं कि आग जला डालेगी, इसलिए तुरंत हाथ आग में से निकाल लेते हैं। जब गुरुजन से किसी सहायता की गुहार लगाते हैं तो वह इसलिए क्योंकि हमारे अंदर वह समझ नहीं है। यदि समझ हो तो सही कर्म भी होगा। यदि कर्म सही नहीं है तो यह समझ लें कि जरूरी समझ की कमी वहां रही है। इसी प्रकार संस्कार भी खतरनाक होते हैं (आग की तरह)। इनसे मुक्ति पाने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति और बुद्धिमत्ता की दरकार होती है। कृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि इस संस्कार वृक्ष को काटकर शाश्वत मौन में अपना आत्मसमर्पण कर दो, जहां से वापसी संभव नहीं होता। यह वह अंतराल है जिसमें हमारा समूचा अस्तित्व समाहित रहता है। मन में संस्कारों का इकट्ठा होना ही तो हमारी अस्मिता या पहचान बनाता है। पुरानी स्मृतियां और इच्छाएं अचेतन मन में दबी रहती हैं, यानी हमारी ऊर्जा की कारणात्मक सतह में। गहन समाधि और केन्द्रित ध्यान के माध्यम से इस अचेतन कारणात्मक सतह का भेदन कर वहां इकट्ठे संस्कारों को खत्म कर सकते हैं, पर ऐसा करने के पश्चात् हम वह व्यक्ति नहीं रह जाते, जो हम ऐसा करने के पूर्व थे। अब हम संस्कार-विहीन और मुक्त होंगे।

Content: वह अंतरात्मा जो शरीर छोड़ती है, सम्मोहित अवस्था में होती है, जब वह इस कारणात्मक सतह से गुजरती है। जब तक यह अंतरात्मा इस सतह को पार नहीं करती, यह शरीर में लौट सकती है। यह संस्कारों की शक्ति के कारण होता है। यह जमी हुई स्मृतियों या इच्छाओं का जमावड़ा। इस अंतरात्मा को वापिस भी खींच सकती है। इसलिए कई वर्षों तक मुर्छित पड़े रहने के बावजूद कुछ लोग वापिस चेतना में आ जाते हैं। उनको वापिस लाने वाली यही अपूर्ण इच्छाएं होती हैं, पर जब अंतरात्मा कारणात्मक सतह पार कर लेती है तो इसका वापिस आना असंभव हो जाता है। यह शरीर में फिर नहीं आ सकती। तब इसके लिए अगली सतह - कॉस्मिक (ब्रह्मांडीय) सतह-तक पहुंचना लाजमी हो जाता है। जब हम कारणात्मक सतह को पार कर कॉस्मिक सतह तक पहुंच जाते हैं और संस्कारों का तिरोधान हो जाता है, तब हम अपनी जमा की गई स्मृतियों के निर्देश से संचालित अपने अचेतन से निर्देशित नहीं होते। फिर तो हमारे प्रज्ञा-चक्षु खुल जाते हैं। पहले हमारे काम या प्रतिक्रिया हमारी सहजवृत्ति (इन्स्टिक्ट) के आधार पर होती थी, अब उसकी निर्णायक हमारी अंतरप्रज्ञा हो जाती है। फिर हम अज्ञानपूर्ण जागरण स्थिति में नहीं वरन् सही रूप में जागृत चेतना में रहते हैं। इकट्ठे हुए संस्कारों को गलाने या खत्म करने का सबसे सही तरीका है महा चेतनाशील ध्यानात्मक मार्ग द्वारा अचेतन को जागरूक करना, अपनी जागरुकता द्वारा अचेतन को चेतना देना।

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Chapter Number: 15

Content: 15.5 जिसका भाव और मोह नष्ट हो गया है; जिन्होंने आसक्ति रूपी दोष को जीत लिया है; जिसकी परमात्मा के स्वरूप में नित्य स्थिति है और जिनकी कामनाएं पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं—वे सुख-दुःख नामक द्वंद्वों से विमुक्त ज्ञानी जन उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं।

Chapter Number: 15

Content: 15.6 जिसको प्राप्त कर मनुष्य संसार में लौटकर नहीं आता। वही मेरा परम धाम है, उस स्वयं प्रकाश परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चंद्रमा, न अग्नि ही।

Content: शोधन की विधियां

Content: आसक्ति से परे (होना)

Content: यहां कृष्ण कहते हैं—“जिसका मन-मोह नष्ट हो गया है, जो आसक्ति को जीत चुके हैं; जिनकी परमात्मा के स्वरूप में नित्य स्थिति है; जिनकी कामनाएं नष्ट हो चुकी हैं और जो सुख-दुःख के द्वंद्वों से परे हैं; जो संशय मुक्त हैं और आत्म-समर्पण करना जानते हैं, शाश्वत पद को प्राप्त करते हैं।”

Content: शब्दों का कितना सही प्रयोग है? वह यह नहीं कहते कि जिन्होंने वासना का ‘परित्याग’ कर दिया है, वे शाश्वत पद को प्राप्त करते हैं। क्योंकि केवल परित्याग करने से काम नहीं चलेगा। वैराग्य का अर्थ है राग-विराग से भी परे हो जाना। निरासक्त एवं राग रहित होना। विषयों के आकर्षण और विकर्षण से परे जाना।

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Content: कृष्ण के शब्द ज़ेन 'कोदो' के समान हैं। वस्तुतः कृष्ण वही शब्द बार-बार इस्तेमाल करते हैं, न सिर्फ़ शब्द वरन् अभिव्यक्तियाँ भी वही रहती हैं। अक्षर भी वही रहते हैं। पहले वे इन शब्दों को सलाह के रूप में ज़ाहिर करते हैं और अब प्रोग्रामिंग तकनीक के लिए प्रयुक्त करते हैं। इस अध्याय में कारणात्मक सतह को व्यवस्थित करने के बारे में बताया गया है, अर्थात् संस्कारों को प्रोग्राम में ढालने के लिए। यह कार्यक्रम हमारे कारणात्मक सतह में धनात्मक संस्कार उत्पन्न करेगा। जब तक अर्जुन प्रश्नाकुल मानसिकता में था, यही शब्द उसके लिए एक परामर्श या सलाह के रूप में थे, लेकिन जब वह प्रश्नों से उत्तर कर संशय की मानसिकता में आ जाता है तो यही शब्द उसकी विधियाँ बताते हैं। जब शिष्य प्रश्नाकुल 'मूड' में होता है तो गुरु का ज्ञान उसके लिए परामर्श है, पर जब वह संशय की स्थिति में आ जाता है, प्रश्नों से मुक्त हो जाता है और सुनना चाहता है तो यही शब्द उसको कारणात्मक शरीर के संस्कारों को धनात्मक बनाने की विधियाँ बताने लगते हैं। सलाह के साथ आपको कुंजी भी चाहिए (ज्ञान का) दरवाज़ा खोलने के लिए। ये विधियाँ वही कुंजियाँ हैं। वे दरवाज़ा खोलने को तैयार हैं। अर्जुन अब पिछले अध्यायों का सार प्राप्त करता है। इस अध्याय में उसे सबका निचोड़ मिलता है। उत्तर-भारत के मठों में हर भोजन के पूर्व इसी अध्याय का पाठ किया जाता है। हर भोजन के पूर्व इस पंद्रहवें अध्याय का जाप किया जाना चाहिए, क्योंकि यह अध्याय आंतरिक अंतरात्मा के सही प्रोग्रामिंग का एक अमोघ औज़ार है। खाली शब्द ही चमत्कार पैदा कर सकते हैं आपकी कारणात्मक सतह की 'री-प्रोग्रामिंग' में। इस पाठ में पांच मिनट से भी कम का ही समय लगता है। इसे कोई भी कर सकता है। अर्थ की चिंता न करें। यदि अर्थ समझ में आता है तो अच्छा है, लेकिन बिना समझे भी इनका पाठ या जाप आपके लिए बेहद फायदेमंद रहेगा। इन शब्दों के दोहराने मात्र से आप अपनी कारणात्मक सतह की 'री-प्रोग्रामिंग' कर सकते हैं। जब आप पूर्ण समर्पण भाव से अपने गुरु के प्रति अति श्रद्धापूर्ण वातावरण में इस अध्याय का जाप करते हैं तो यह जाप सीधे आपकी कारणात्मक सतह तक पहुंचता है। इस समय अर्जुन पूरी तरह स्वीकार करने की मानसिकता में है। उसकी मानसिक आवृत्ति अपने गुरु कृष्ण से जुड़ी है। गुरु की कृपा से वह अस्तित्व का पूरा लाभ ले रहा है। अब उसे न कोई तर्क चाहिए न दिलील, वह अपने गुरु का ज्ञान आत्मसात् करने को तत्पर है। इसलिए कृष्ण निम्नलिखित शब्द उच्चारित करते हैं, उसकी कारणात्मक सतह की प्रोग्रामिंग करने के लिए। वह बताते हैं वे विधियाँ जो धनात्मक संस्कार पैदा करती हैं।

Content: वे कहते हैं-''जिसका मान और मोह नष्ट हो गया है; जिन्होंने आसक्ति रूपी दोष को जीत लिया है; जिसकी परमात्मा के स्वरूप में नित्य स्थिति है और जिसकी कामनाएँ पूरी तरह से नष्ट हो चुकी हैं—वे सुख-दुःख नामक द्वंद्वों से विमुक्त ज्ञानी जन इस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं।'' मोह या वासना का संपूर्ण त्याग आदमी के लिए बहुत मुश्किल है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी इसी वासना या मोह से स्वयं को नहीं बचा सके। यह मोह या वासना शरीर का गुण है और जब तक यह शरीर है, यह वासना भी रहेगी ही। जब तक शरीर से परे न जाया जाए, वासना से छुटकारा मुश्किल है।

Content: एक लघु कथा

Content: एक बच्चा अपने माँ-बाप के साथ बच्चों की एक फ़िल्म देखने गया। वह फ़िल्म एक जंगल के कुछ जानवरों और एक शेर के बच्चे के बारे में थी। बच्चा उस फ़िल्म को बड़े मन से देख रहा था कि उस फ़िल्म में एक सीन आया जिसमें सिंह शावक एक शिकारी द्वारा फंसा लिया गया था। बच्चा भयाक्रांत हो गया। उससे बर्दाश्त नहीं हुआ तो वह भागकर स्क्रीन के पास चला गया और वहाँ इस प्रकार वह हाथ-पैर फेंकने लगा, मानो वह उस शिकारी से सिंह शावक को पिंजड़े में डालने के लिए युद्ध कर रहा हो। जल्द ही उस सीन में जंगल के अन्य जानवर सहायार्थ आ गए और उन्होंने मिलकर उस शिकारी को भगा दिया। बच्चा अब वापिस अपनी सीट पर आया और बड़े गर्व से अपने माँ-बाप को बताया-''देखा! मैं सबसे पहले उस शेर के बच्चे की मदद के लिए पहुँचा था, बाकी जानवर तो बाद में ही आ पाए थे और हमने उस सिंह शावक को बचा लिया।'' जैसे कि वह बच्चा उस फ़िल्म को सत्य समझा था, हम भी समझते हैं कि इंद्रियों से जो हमें जानकारी मिलती है वह सत्य होती है और हम उस माया में पड़ जाते हैं जो हमारी इंद्रियाँ हमारे सामने ही रचती हैं। सबसे बड़ी माया या दृष्टिद्रष्ठम हमारी अंतर्निहित वासना के कारण पैदा होती है। एक प्रबुद्ध ज्ञानी यौन भाव एवं वासना से परे होता है। उसको लिंग भेद में भी नहीं बांधा जा सकता। वह तो 'अर्धनारीश्वर' होता है यानी जिसमें स्त्री-पुरुष दोनों के भाव रहते हैं। अतः प्रबुद्ध ज्ञानी की एक ख़ासियत यह भी होती है कि वह लिंग भेद से परे होता है। कृष्ण यहाँ सीधी बात करते हैं। अब वह कोई 'प्रलोभन' या मोहित करने

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Content: वाली क्रीम कैंडी नहीं देते मन खुश करने को। वे निर्ममतापूर्वक सीधी बात करते हैं। वे साफ कहते हैं-जिसने वासना पर विजय प्राप्त कर ली हो। वासना एक आदिम भाव है जिसके द्वारा प्रकृति विभिन्न योनियों का क्रम जारी रखती है। महा चेतना को प्राप्त करने का पहला सोपान है, इस वासना को जीत लेना, इसके পরে चले जाना।

Content: मनुष्य सदैव से प्रेम और वासना में संशयग्रस्त रहता है। वह समझता है कि सिर्फ जानवरों में ही वासना का जोर होता है। सत्य तो यह है कि जब समाज करते हैं तो मात्र जानवर ही विशुद्ध वासना दिखा पाते हैं। मनुष्य अपनी सदैव उपस्थित तर्कशीलता के कारण न कभी पूरा वासना से भरा होता है, न प्रेम से सदैव दूषितग्रस्त रहने वाला आदमी कभी न संतुष्ट होता है न पूर्णकाम।

Content: वैदिक विवाह पद्धति में एक रिवाज होता है 'सप्त पदी का'-जिसमें विवाह के बंधन में बंधने वाला जोड़ा अग्नि के चारों ओर फेरे लेता है, तब मंत्रोच्चारण होता है और अग्नि को साक्षी मानकर वे दोनों स्त्री-पुरुष विवाह बंधन में बंध जाते हैं। उसमें एक मंत्र में पति से पत्नी कहती है-“तुम मेरे ग्यारहवें पुत्र हो जाओ” और पति पत्नी से कहता है “तुम मेरी ग्यारहवीं पुत्री हो जाओ।” इसका अर्थ है कि उनकी शादी के ग्यारहवें वर्ष में उनकी आत्मीयता इतनी घनिष्ठ हो जाएगी कि वे दोनों एक-दूसरे की संतान जैसे लगने लगेंगे। घनिष्ठता द्योतक है बेहद आत्मीय संबंध। वस्तुतः यह शब्द काव्य का अंश नहीं वरन् उनके जीवन-यापन के लिए मार्गदर्शक है।

Content: इस घनिष्ठता में प्रेम भी जुड़ अभी तक हमारा प्रेम और वासना हिस्सा से बहुत गहरे जुड़ा रहता है-दूसरे व्यक्ति पर कब्जा जमा लो और उसके प्रतिरोध को पूरी तरह समाप्त कर उसको जीत लो। प्रारंभ में तो यह युद्ध ही लपटा है। अब बज़ाय झगड़े के रिश्ते में दोस्ती या घनिष्ठता का संचार करो। अपने जीवनसाथी का स्वागत करो, वह कैसा भी हो-सिर्फ स्वीकार करने से ही काम नहीं चलने वाला। स्वागत करो अपने साथी का-उसके शरीर, मन और अस्तित्व का-वह जैसा भी हो।

Content: पर क्या हम अपने शरीर के भी दोस्त होते हैं? नहीं-हम नहीं होते। यदि हम गौर से देखें तो हम अपने शरीर का सम्मान नहीं करते-उसका दुरुपयोग करते हैं। हम देर तक जागकर टीवी देखते रहते हैं, चाहे हमारा शरीर सो जाने को चीत्कार करता हो। पेट भरा हो तब भी हम उसमें भोजन ठूंसते रहते हैं। हमारे फेफड़े छलनी हो गए हों फिर भी हम सिगरेट पीना नहीं छोड़ते। शराब पी-पीकर स्वयं को बेसुध कर लेते हैं। हम अपने शरीर को कूड़े का डिब्बा समझते हैं। हम उस सूर के समान हैं जो कचरे में नाक गड़ाकर सोचता है कि

Content: वह उसकी दुर्गंध से बच सकेगा। हम अपने शरीर को निरंतर त्रास देते हैं और समझते हैं कि हम इसका मनोरेगन कर रहे हैं। हम संसार-भर में फैले आतंकवाद की, तो चिंता करते हैं, पर अपने घर की, अपने शरीर के प्रति हिंसा से विमुख रहते हैं। परपीड़ित करने वाली कामुकता और वहशीपन हमें परेशान नहीं करता, बाहर का आतंकवाद करता है। हम स्वयं को अपराध बोध द्वारा त्रास देते रहते हैं और दूसरों को अपनी 'परफ़ेक्शनिज़्म' (संपूर्ण सिद्दता) से परेशान करते रहते हैं। यह भी तो एक प्रकार की हिंसा है; आतंकवाद का ही एक सूक्ष्म रूप है।

Content: एक आदमी ने मुझसे कहा-“मेरी पत्नी एक वकील है।” मैंने पूछा-“वह कोर्ट जाती है?” उसने कहा-“नहीं, वह घर में ही दलीलें देती रहती है।” अपनी कल्पनाशीलता और सपनों से मुक्ति पाओ। दूसरों के प्रति अपने व्यवहार में दोस्तानापन जोड़ दो। उनके संपूर्ण अस्तित्व, मन और शरीर से मित्रता रखो। ऐसे शब्द बोलो जो दूसरों को भले लगें। दूसरों को चंगा रखने के लिए ही अपने शरीर का उपयोग करो। अपना वर्ताव, हर एक से सदा दोस्ताना रखो।

Content: यह भी एक आध्यात्मिक प्रक्रिया ही है। लक्ष्मी मेया की महिमा एवं करुणा सब तक पहुंचाओं; बज़ाय उसकी पूजा करने या व्रत-दान करने के।

Content: कृष्ण बताते हैं कि 'परम चेतना ही उनका शाश्वत धाम है। इसमें प्रकाश न चंद्रमा से होता है, न सूर्य से, न अग्नि से। इसमें जो एक बार प्रविष्ट हो जाता है वह पार्थिव संसार में वापिस नहीं आता।'

Content: ये शब्द कोई परामर्श नहीं हैं ये मनन के लिए कहे गए हैं। वस्तुतः सलाह एक ऐसी चीज है जो सब कोई देता है, पर कोई स्वीकारता नहीं। कृष्ण ये शब्द हमारी कारणात्मक सतह की प्रोग्रामिंग करने के लिए कहते हैं। इन शब्दों पर मनन करो, ध्यान करो। यह तो पवित्र मंत्र है जिस पर निरंतर ध्यान होना चाहिए।

Content: ऊर्जा की कारणात्मक सतह वह रास्ता है जिससे अंतरात्मा अपने अंतिम पड़ाव से गुजरती है और अंततः इस पार्थिव विश्व को त्याग देती है। जब अंतरात्मा कारणात्मक सतह पर फंसी रहती है तब वह व्यक्ति 'कोमा' (मृत्यु से पूर्व की स्थिति) में रहता है। इसमें तो वह लंबे समय तक फंसी रह सकती है।

Content: जो इस कारणात्मक सतह को पार कर जाते हैं, उनके लिए यह सतह एक ऊर्जापूर्ण अंधकार का प्रतीक है, जहां न सूर्य चमकता है, न चंद्र, न अग्नि गर्मी देती है। यहां से जीव कॉस्मिक सतह की ओर बढ़ता है और अंततः निर्णायक सतह की ओर, जो संपूर्ण मुक्ति की द्योतक है।

Content: इन तकनीकों पर ध्यान किया जाता है और उस सत्य को ग्रहण किया जाता है जो कृष्ण यहां स्थापित कर रहे हैं। यहां ध्यान अंधकार में होता है,

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Chapter Number: 15

Content: 15.7 इस देह में यह जीवात्मा ही मेरा सनातन अंश है और वही इस त्रिगुणमयी माया में स्थित मन और पांचों इंद्रियों को आकर्षित करती है।

Chapter Number: 15

Content: 15.8 जैसे वायु गंध के स्थान से गंध को ग्रहण करके ले जाती है, वैसे ही देहादि का स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर को त्याग करता है, उससे मन सहित इंद्रियों को ग्रहण कर जिस शरीर को प्राप्त होता है उसमें जाता है।

Content: कृष्ण यहां एक नए भाव (शब्द) का प्रयोग करते हैं-‘कंडीशनिंग’ (अनुकूलन) का। आधुनिक शोध बताते हैं कि आदमी दो पैरों पर अनुकूलन के कारण ही चलता है। वैज्ञानिकों के एक समूह ने हाल ही में एक 17 वर्षीय लड़के को एक जंगल में देखा। उसका पालन-पोषण भेड़ियों ने किया था। वैज्ञानिकों ने उसको दो पैरों पर चलना सिखाने की बहुत कोशिश की और कुछ शब्द भी बोलना सिखाने का प्रयत्न किया, पर वे सफल नहीं हुए और एक वर्ष में ही वह लड़का मर गया।

Content: अपने अनुकूलन (आदत) के कारण आदमी दो पैरों पर चलता है। वस्तुतः मानव प्रकृति की हर आदत का आधार यही अनुकूलन है।

Content: ज़ेन बौद्धों के पास एक सुंदर विधि है ‘अनुकूलन’ (डी-कंडीशनिंग) के लिए। इसमें साधक को 21 दिनों तक एक कक्ष में ही रहना पड़ता है। वह वहीं खाता और सोता है, पर इस दौरान उसे हर उस वस्तु का प्रभाव अपने दिमाग से दूर हटाना पड़ता है, जो भी उसने देखी या सुनी हों। उन लोगों का दावा है कि ऐसा साधक 21 दिनों में प्रबुद्ध हो सकता है। यह एक बड़ा मुशिकल काम है। 21 मिनट के लिए भी इस हालत में रहना मुश्किल है।

Content: यहां कृष्ण ‘अनुकूलित विश्व’ की बात करते हैं। हर चीज अनुकूलित है। सही या गलत, सम्मान या असम्मान सब कुछ अनुकूलन के अनुसार होता है।

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Content: हम सही-गलत, सम्मान या असम्मान को अपने अनुकूलन के अनुसार ही समझते हैं।

Content: हम सब अनुकूलित हैं। यदि लोग हमें एक प्रमाणपत्र देते हुए तालियां बजाते हैं तो उसे हम सम्मान समझते हैं। यही हमें सिखाया गया है। पर हम कभी दूसरों की इस तारीफ को अपने हिसाब से विश्लेषित नहीं करते। यह सम्मान का विचार कई लोगों को पागल कर देता है, भीड़ का निर्णय कभी स्वीकार नहीं करना चाहिए।

Content: ईमानदारी आपकी कीमत तय करती है

Content: एक लघु कथा

Content: एक बार विंस्टन चर्चिल एक भाषण दे रहे थे। लगभग 10 हज़ार लोग उन्हें सुन रहे थे। एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि इतने ज्यादा श्रोताओं को देखकर उनको कैसा लगा। चर्चिल ने कहा-“मेरा महत्व कभी श्रोताओं की भीड़ से मत आंकना। आज यहां 10 हज़ार लोग हैं। यदि घोषणा कर दी जाए कि कल मुझे सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटकाया जाएगा तो आपके 1 लाख लोग यहां इकट्ठे मिल सकते हैं। वह तो एक बड़ा तमाशा होगा।”

Content: अतः भीड़ यह तय नहीं कर सकती कि सही-गलत क्या है या सम्मान और असम्मान क्या है। आपकी अपनी ईमानदारी, चारित्रिक संपूर्णता, आपकी आत्म-जागरुकता ही आपकी असली कीमत तय करती है।

Content: यहां कृष्ण ध्यानार्थ प्रार्थनाएं बताते हैं जिससे आप अपनी कारणात्मक सतह, आपके संस्कार को पुनःव्यवस्थित कर सकें। जो लोग स्वयं को अच्छी तरह नहीं जानते, वही दूसरों द्वारा उनकी जान लेने से डरते हैं। प्रथम तीन सतहों को पार कर और कारणात्मक सतह से भी पारे जाकर आप एक ऐसे अंतराल में पहुंचते हैं जो अनुकूलन से मुक्त है। काश! आप सब भी इस अनुकूलन के कब्ज़े से स्वतंत्र रहें।

Content: कृष्ण कहते हैं-“वे छह इंद्रियों द्वारा (मन मिलाकर) आक्रांत होते हैं अर्थात् पांच तो ज्ञानेन्द्रियां हैं ही, छठवीं इंद्रिय मन है, परंतु मेरे हिसाब से इंद्रिय तो अकेला मन ही है, बाकी पांचों भौतिक इंद्रियां तो उसकी गुलाम होती हैं। यदि मन संभल गया तो पांचों इंद्रियां स्वतः ही संभल जाती हैं।

Content: एक लघु कथा

Content: रानी मदालसा ने सात संतानों को जन्म दिया। हर बच्चा सात वर्ष का होते ही प्रबुद्ध हो गया और राज्य से बाहर चला गया। उनका पिता, जो राजा था, भारी

Content: आश्चर्य में था। एक साथ उसकी सातों संतानों प्रबुद्ध हो गई! कैसे? उसने जब इस विषय में खोजबीन की तो पाया कि मदालसा ने उन सभी को एक मंत्र दिया था-‘तत्त्वम असि:’ (तुम वही हो)। इस भाव को अपने अंदर आत्मसात करते ही उन सबकी मानसिकता बदल गई। उनके संस्कारों का जाल हट गया, उनकी कारणात्मक सतह से-और वे सब प्रबुद्ध हो गए।

Content: वस्तुतः संस्कारों का हट जाना और अनुकूलन का दूर हो जाना ही प्रबोधन प्राप्त कर लेना है। तब हम अपनी शुद्ध मौलिक प्रकृति को वापिस पहुंचते हैं। इसलिए प्रबोधन को समाधि भी कहा जाता है। समाधि का अर्थ है ‘अपनी मूल अवस्था में वापिस पहुंचना’।

Content: इस विधि-योग के विषय में रहते हुए आत्मा जब एक शरीर त्यागकर दूसरे में पहुंचती है तो इन संस्कारों को भी अपने साथ ऐसे ही ले जाती है, जैसे वायु गंध के स्थान से गंध को ले जाती है। वे संस्कार एक शरीर से हटकर दूसरे शरीर में अपना ठिकाना बनाते हैं। संस्कारों का यह अंतहीन विषय-चक्र चलता ही रहता है, इसी को कृष्ण ‘संसार’ कहते हैं, जहां आवागमन का चक्र अनवरत चलता रहता है।

Content: कृष्ण कहते हैं-‘इनको लेकर’! इसमें ‘इनको’ का अभिप्राय किससे है? पिछले श्लोक में कृष्ण ने छह इंद्रियों का ज़िक्र किया था—पंचद्रियों और मन का। उन्हीं का हवाला वे यहां देते हैं। जब आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में जाती है तो अपने साथ यह छह इंद्रियां (भौतिक ज्ञान बोध) भी ले जाती हैं—पांच भौतिक इंद्रियां और एक मन। वैसे ही जैसे वायु गंध को एक स्थान से दूसरे स्थान में ले जाती है, हमारी चेतना संस्कारों को ले जाती है, भय कारणात्मक शरीर के अंकित भावों सहित-एक शरीर से दूसरे शरीर में।

Content: कृष्ण यहां पाप के बारे में प्रपंच: पूछे जाने वाले एक प्रश्न का उत्तर देते हैं। लोग पूछते हैं कि क्या एक जन्म के पाप दूसरे जन्म तक साथ जाते हैं। पाप कभी साथ नहीं जाते, उनके करने के समय हमारे संस्कार या स्मृतियों पर अंकित भाव ही साथ जाते हैं। उदाहरण के लिए अगर किसी ने एक जन्म में 100 हत्याएं की हैं तो अगले जन्म तक यह संख्या नहीं बल्कि वह मानसिकता जिसके अंतर्गत उसने यह जघन्य अपराध किया है, साथ जाएगी और उसे त्रास देती रहेगी। यानी घटना नहीं उसका प्रभाव बताने वाली मानसिकता अगले जन्म तक पीछा नहीं छोड़ेंगी।

Content: कर्मवाद का सिद्धांत: कर्म के औचित्य को सिद्ध करने के लिए उद्धृत किया जाता है। लोग प्राय: कहते मिलते हैं-“यह तो हमारा कर्म ही है; हमारी नियति है।” इससे क्या बचाव है? या जो होना था वह तो होना ही है।” यह अपनी

Content: श्रीमद्भगवत गीता

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Content: श्रीमद्भगवत गीता

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Chapter Number: 15

Content: 15.9 और उस शरीर में स्थित हुआ, यह जीवात्मा श्रोत्र, चक्षु और त्वचा को तथा रसना, घ्राण और मन का आश्रय करके (इनके सहारे) ही विषयों का सेवन करता है।

Chapter Number: 15

Content: 15.10 परंतु, शरीर छोड़कर जाते हुए (जीवात्मा) को अथवा शरीर में स्थित हुए को और विषयों को भोगते हुए को अथवा तीनों गुणों से मुक्त हुए को भी अज्ञानी जन नहीं जानते-मात्र ज्ञान रूप नेत्रों वाले ज्ञानी जन ही तत्त्वतः (असली रूप में) जानते हैं।

Content: 'जीवात्मा एक शरीर छोड़ दूसरा शरीर धारण करती है तथा नई आंखें, कान, नाक, जिह्वा एवं शरीर बोध प्राप्त करती है। वह उन संस्कारों के अनुसार काम करते हैं जो इसके कारणात्मक सतह पर नई मानसिकता से संचालित होते हैं।

Content: यहां कृष्ण एक नया रहस्य उद्घाटित करते हैं। वे कहते हैं-''कारणात्मक सतह में उपस्थित संस्कारों के अनुसार नया शरीर बनता है।''

Content: एक प्राचीन भारतीय शास्त्र 'सामुद्रिक लक्षण शास्त्र', जो शरीर के लक्षणों के अनुसार व्यक्ति की मानसिकता व्यक्त करते हैं। इसके अनुसार शरीर और मन में एक सीधा संबंध होता है। कृष्ण को कहना है कि जीवात्मा पांच इंद्रियों को मन और मानसिकता के अनुसार ढाल देती है। यह सिर्फ तभी नहीं होता जब नया शरीर धारण किया जाना है। हर रोज जब हम गहन निद्रा से उठते हैं तो हमारा इंद्रिय बोध पुनः सृजित होता है। यदि थोड़ी देर को भी हम अपनी मानसिकता परिवर्तित करते हैं, जागरुकता तो हमारे चेहरे पर परिवर्तन आ जाता है।

Content: हमारा 'मन' वह बुद्धिमत्ता है जो समस्त शरीर पर व्याप्त रहता है। यह है जो हमारे विभिन्न कोशों में उपस्थित रहता है। दो वर्ष से कम के भी समय में हमारे शरीर का हर हिस्सा, हर कोश नया होता रहता है। सालभर पूर्व जो

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Content: हमारा शरीर था वह आज नहीं है, न यह वही रहेगा सालभर बाद। यह कोई कपोल कल्पना नहीं, एक वैज्ञानिक तथ्य है। तो हम एक ही तरह से क्यों बर्ताव सालों तक करते रहते हैं तो क्यों हमें बीमारी आदि वर्षों परेशान करती हैं? जबकि कोशादि तो वही नहीं रहते हैं? हर कोश मरनेोपरांत एक स्मृति छोड़ जाता है, जो नए कोश को संचालित करती है। यही संस्कारों के साथ भी होता है। संस्कार यह सुनिश्चित करते हैं कि हमारे शरीर का एक-सा पैटर्न (कार्यशैली) चलता रहे, चाहे शरीर-मल तंत्र में परिवर्तन आते रहें, क्योंकि संस्कार बाकी शरीर-मल तंत्र से ज़्यादा प्रभावशील और शक्तिशाली होते हैं। वही निर्णय लेते हैं और शरीर-मल संचालित करते हैं। वस्तुतः रोज़मर्रा में जो हम गहन निद्रा लेते हैं, वह हमारी मृत्यु-प्रक्रिया का एक हल्का-सा पूर्वाभास होता है। हम रोज़ मरते और जीते हैं। हमारा सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर को रोज़ त्यागता है और पुनः ऊर्जायित होकर वापिस आता है, यदि हम इसे अनुमति दें तो! यह हमारे हाथों में है कि हम इस पुनर्जन्म प्रक्रिया का महत्तम विस्तार कर दें। यह प्रक्रिया तो रोज़ ही होती है। ध्यान लगाकर-मेडीटेशन के द्वारा-हम अपने संस्कारों को दूर कर अपना नया जन्म पा सकते हैं। इस प्रकार हम अपने नाक-नक्श, चित्रित या व्यवहार में भी परिवर्तन ला सकते हैं। संस्कारों को री-प्रोग्राम (पुनर्व्यवस्थित) करके। इसलिए ध्यान या मेडीटेशन प्रारंभ करने वालों के चेहरे से तेज़ टपकता लगता है जहां मेकअप (प्रसाधन) द्वारा चेहरे का सौंदर्य बढ़ाया जा सकता है, वही तेज़ मेडीटेशन द्वारा लाया जा सकता है। इस तेज़ में साधक सहज महसूस करने लगता है। उसे वातावरण बड़ा सुकून देने वाला लगता है। सौंदर्य तो उत्तेजना भरता है, वह दृष्टा में राजस (व्याकुलता) की अनुभूति पैदा करता है जबकि तेज़ शांति देता है, सत्व गुण बढ़ाता है। तेज़ से दूसरे (देखने वाले) को ऊर्जा प्राप्त होती है। अपने प्रवुद्ध गुरुओं की उपस्थिति में हमें सिर्फ अपने आपको मानसिक रूप से खुला हुआ मुक्त और मौन रखना होता है और गुरु का तेज़ हमारे अंदर पहुंच जाता है। हमें तब कुछ भी करना थोड़े ही होता है, फिर तो जो कुछ करता है वह गुरु का तेज़ ही करता है। भारत के प्रसिद्ध काव्य ग्रंथ ‘रामायण’ का एक संस्करण कहता है कि जब इस काव्य की नायिका सीता, जनक के दरबार में पहुंची तो सारे राजा लोग,

Content: ऋषि और मुनि स्वागत में स्वतः खड़े हो गए। उनको ऐसा करना ज़रूरी नहीं था, पर उसके चेहरे से जो तेज़ प्रकाशित हो रहा था, उसने उन्हें बाध्य किया, ऐसा स्वागत करने के लिए। सौंदर्य तो दूसरे के मन में एक चाह भरी उत्तेजना ही उत्पन्न कर सकती है। यह तो तेज़ ही है जो दृष्टा के मन में सम्मान पैदा करता है। सीता के चेहरे से निःसृत होने वाले तेज़ ने सबको बाध्य कर दिया सम्मान में खड़े होने के लिए। जैन बौद्ध मत का कहना है कि यदि हम किसी लॉन (घास के मैदान) पर अपने कदमों द्वारा बिना घास को आहत किए कोई पथ बना सकते हैं तो हम संन्यास लेने के अधिकारी हो जाते हैं। मुझे इस दावे पर शक था। मैं सोचता था कि ऐसा करना असंभव है। आखिर शरीर के पूरे भार से घास कैसे बच सकती है? इतना भारी बोझ तो उसे नाजुक घास पर आहत करने का कोई-न-कोई निशान छोड़ेगा ही। जैसा कि मैं पहले भी ज़िक्र कर चुका हूं, मैं दक्षिण भारत में एक सफारी पर गया था। मैं वहां एक हाथी पर बैठा, मेरे साथ एक रखवाला भी था। शाम का समय था और अंधेरा होने लगा था। उस रखवाले के पास न कोई टार्च थी, न प्रकाश का कोई अन्य स्रोत। मैंने उससे पूछा-“हम लोग वापसी का रास्ता कैसे पहचानेंगे?” उसने कहा-“मैंने अपने रोज़ के अभ्यास से एक पगडंडी-सी बना दी है, उस पर तो मैं अंधेरे में भी चल सकता हूं।” मैंने फिर हाथी के बारे में पूछा, क्योंकि हाथी भी उसके साथ रोज़ ही चलता था। उसका जवाब था-“हाथी के पांव कोई रास्ता नहीं बनाते। हाथी और अन्य जानवर अपने चलने से घास को नष्ट नहीं करते।” मैं मन-ही-मन उस भार का हिसाब लगाने लगा कि हाथी जब एक पैर उस घास पर डालेगा। यह भार मनुष्य के पैर के भार से चार गुणा से भी ज्यादा होगा। पर हाथी के पैर से घास पर कोई निशान नहीं पड़ता। घास की एक भी पत्ती घायल नहीं होती। शायद इसी कारण जैन बौद्ध मत का विचार है कि हम संन्यास के अधिकारी तब ही होते हैं; जब हम लॉन पर बिना घास को आहत किए चल सकें। हमारे मन को ऋणात्मकता, घमंड, हिंसा इत्यादि नकारात्मक संस्कार जो हमारी कारणात्मक सतह पर रहते हैं, पृथ्वी पर भार बढ़ाते हैं। यदि नाभि-क्षेत्र के निकट भारीपन रहता है तो इसका स्पष्ट मतलब है कि हमारे संस्कार ऋणात्मक हैं। इस भारीपन का हमारे वज़न से कोई संबंध नहीं। यह तो अंतर्मन पर पड़ी स्मृतियों की छापों के कारण होता है, जो व्यक्ति हल्का महसूस करता है वह एक प्रकाश अपने अस्तित्व से निःसृत करता है और घास पर कोई निशान

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Content: नहीं डालता; न घास की किसी पत्ती को आहत करता है अपनी चाल से। जैन मत कहता है कि जो आध्यात्मिक रूप से समुनत आत्माएँ होती हैं वे अपने पैरों से कोई पथ नहीं बनातीं, क्योंकि वे वस्तुतः तैंतिस-सी चलती हैं और कभी प्रकृति के विरुद्ध नहीं जातीं। यह तो मनुष्य ही ऐसा पशु है जो प्रकृति के विरुद्ध जाता है।

Content: एक लघु कथा

Content: एक आदमी अपनी पालतू बिल्ली और अपनी पत्नी से छुटकारा पाना चाहता था। भारत में तलाक देने का कोई रिवाज़ नहीं है, इसलिए उसने सोचा कि चलो कैसे भी बिल्ली से ही छुटकारा पाया जाए। वह बिल्ली को कार में बिठाकर दस मील दूर छोड़ आया, पर जैसे ही वह घर वापस पहुँचा, बिल्ली भी लौटकर आ गई! उसे बड़ी ताज्जुब हुआ। दूसरे दिन वह बिल्ली को कार में बिठाकर चालीस मिनट तक ड्राइव करता रहा और एक घने जंगल में पहुँचा, जो उसने पहले कभी नहीं देखा था। वहाँ उसने बिल्ली को छोड़ा और तुरंत वापस आ गया। परंतु जब वह वापिस घर पहुँचा तो देखा बिल्ली उसके घर के दरवाज़े पर ही उपस्थित है। तीसरे दिन उसने बिल्ली की आँखों पर पट्टी बांधकर उसे एक बोरे में डाल दिया और एक घुमावदार रास्ते से दूर ले जाकर उसे वहाँ फेंक दिया। इस बार उसने कार लगभग एक घंटे तक चलाई थी। उसी जगह से उसने पत्नी को फोन कर पूछा-"बिल्ली घर पर तो नहीं है?" पत्नी ने बताया-"बिल्ली कुछ देर पूर्व वापिस आ गई है।" तब उस आदमी ने कहा-"अरे! अब तुम मुझे वापसी का रास्ता बताओ।" उसको भटकाने के चक्कर में मैं खुद ही भटक गया हूँ।" जानवर सदा प्रकृति के संसर्ग में रहते हैं। यह तो सिर्फ मनुष्य हो है जो प्रकृति के विरुद्ध जाते हैं और अपना रास्ता भूल जाते हैं।

Content: यहाँ कृष्ण कहते हैं कि हम अपने संस्कारों अनुसार हम अपना इंद्रिय बोध विकसित करते हैं। यह सिर्फ तभी नहीं होता जब हम जन्मते या मृत्यु को प्राप्त होते हैं; हम अपने संस्कारों के अनुसार अपना इंद्रिय बोध रोज़ व्यवस्थित करते रहते हैं। यदि हम सही मानसिकता के साथ सोकर उठेंगे तो हमारी इंद्रियाँ भी सही काम करेंगी और पूरे दिन हम प्रफुल्लित रहेंगे पर जब हम ऋणात्मकता के साथ उठेंगे तो हम कष्ट पाएंगे। वस्तुतः हमारे उठने के बाद के कुछ मिनट ही बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। जो हम इस समय महसूस करेंगे, वह हमारी पूरी दिन की गतिविधियों में

Content: परिलक्षित होगा। यदि हम हर्षपूर्ण हैं तो हमारा पूरा दिन खुशी में बीतेगा। इसके विपरीत यदि चिड़चिड़े हैं तो दिनभर झगड़ा-फसाद होता रहेगा। कृष्ण आगे कहते हैं कि हम जिस प्रकार का इंद्रिय बोध विकसित करेंगे, वही हमें उन विषय-भोगों में आकर्षित देगा। यदि यह धनात्मक रहेगा तो हम धनात्मक जीवन जीएँगे। यदि यह ऋणात्मक रहेगा तो हम ऋणात्मक चीजों में ही आकर्षित होगा। इसी के अनुसार हम इंद्रिय बोध का अनुभव भी होगा। हमारी इंद्रियाँ, बुद्धिमता, शारीर-मन तंत्र हमारे चारों ओर एक प्रकार का ऊर्जा क्षेत्र विकसित करते हैं। यह ऊर्जा क्षेत्र अपने अनुकूल ऊर्जा क्षेत्रों को आकर्षित करते हैं। यदि हमारी प्रवृत्ति ऋणात्मक है तो हमारी समझ भी वैसी ही रहेगी और उसी मानसिकता के लोग हमारे इर्द-गिर्द इकट्ठे होंगे और इस प्रकार एक विषय-चक्र में बंधते रहेंगे, लेकिन यदि यही ऋणात्मकता धनात्मकता में परिवर्तित हो सके तो हमारी लोगों को आकर्षित करने की प्रवृत्ति में ही बदलाव आ जाएगा। हम फिर धनात्मक प्रवृत्ति के लोगों के साथ जुड़ते रहेंगे।

Content: आध्यात्मिक विकास में यह बहुत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। यदि गुरु हमारे साथ हों तो हम ज्यादा अच्छी तरह विकास प्राप्त कर सकते हैं। इस दौरान यदि हम कुछ लोगों के साथ भी आ जाते हैं, जो इस राह के राही नहीं हैं तो उनसे भी त्राण पाना आसान रहता है। इसलिए मैं उत्सुक हूँ ऐसे आश्रम या समुदाय केंद्र विकसित करना चाहता हूँ, जहाँ एक-सी मानसिकता के लोग साथ रह सकें और सामूहिक रूप से आध्यात्मिक विकास प्राप्त कर सकें। इस प्रक्रिया में जो ऊर्जा विकसित होगी वह बाह्म विश्व में कभी पैदा नहीं हो सकती। हम अपनी आदर्शवादी धुन में भले ही यह कह दें कि हम ध्यान तो कहीं भी लगा सकते हैं, पर सत्य यह है कि यदि अनुकूल वातावरण और संगीत हो, तभी आध्यात्मिक विकास भी फलित होता है, या सही साथ रहें या बिल्कुल एकांत हो-आध्यात्मिक विकास हित यहाँ दो विकल्प होते हैं। समान ऊर्जाएँ एक-दूसरे को आकर्षित करती है और एक-दूसरे की संपुष्टि भी करती हैं।

Content: कृष्ण एक ज़ोरदार बात इस अध्याय के मध्य में कहते हैं। कृष्ण कहते हैं- 'मूढ़' या 'मूर्ख' कभी समझ नहीं सकते कि कैसे एक जीवात्मा अपना शरीर त्यागकर दूसरा ग्रहण कर सकती है और कैसे गुणाधीन होकर वह शरीर उसी प्रकार की प्रकृति का बन सकता है। सिर्फ वही इन बातों को समझ सकते हैं जो तत्त्वतः ज्ञान हैं, अर्थात जिन्हें सही ज्ञान प्राप्त है।

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Content: जोवन-दैव को एक देन! जिस विचार के साथ हम सुबह सोकर उठते हैं, उसकी दिनभर के आनन्द में एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हमारा प्रथम विचार प्रायः क्या होता है? पहले हम जागृत अनुभव करते हैं। हमें अपने शरीर का भान होता है, फिर पैदा होता है भय कि हमें दफ़्तर जाना है या लालच कि फलाँ-फलाँ काम पूरा करना है। जैसे ही यह लालच और भय के विचार कौंधते हैं हम अपने बिस्तर से उठ जाते हैं। असल में हम अपने आप से, अपने शरीर से भय और लालच के कारण ही जुड़ते हैं। कृष्ण कहते हैं कि यदि हम अपने शरीर को भय और लालच से जितना जोड़कर रखेंगे, उतना ही भय और लालच हम दिनभर अपने पास आकर्षित करते रहेंगे। वैसे शरीर में घुसने के कई द्वार होते हैं, पर हमें शरीर के अंदर लालच और भय के विचारों से नहीं घुसना चाहिए। हमें आध्यात्मिक विचार के साथ उठना चाहिए। उस समय अपने इष्ट देव या गुरु का स्मरण करना चाहिए। इसका पूरी चेतना के साथ कुछ दिन अभ्यास करके देखें। फिर यह आपकी आदत में शुमार हो जाएगा। शरीर को भय और लालच के साथ जोड़ना बंद कर दें, नहीं तो और ज्यादा भय और लालच ही आपको मिलता रहेगा। अपना प्रथम विचार आध्यात्मिक रखें। ईश्वर या गुरु को याद करते हुए उठें और उनको धन्यवाद दें; कृतज्ञता दिखाए कि उन्होंने आपका जीवन जारी रखा है। हर रोज़ जब आप सोकर उठते हैं तो इस पृथ्वी ग्रह पर आपका जीवन एक दिन और बढ़ जाता है। ईश्वर को धन्यवाद दें इसके लिए; उसकी महिमा को सराहें। वैसे बिस्तर से सोकर उठना आपका जन्मसिद्ध अधिकार तो नहीं है। मन कहे तो जन्म भी अपना अधिकार नहीं है यह तो ईश्वर की कृपा है-इसके लिए आपको ईश्वर के प्रति अनुग्रहित होना चाहिए। यदि हम बिस्तर से आध्यात्मिक विचार के साथ उठते हैं तो यह चेतना पूरे दिन हमारे साथ जुड़ी रहती है। यदि विषय-भोग या पार्थिव विचारों के साथ सोकर उठेंगे तो दिनभर एक चिड़चिड़ापन मन में रहेगा। जब हम गहन निद्रा में सोते हैं तो हम कारणात्मक सतह के संपर्क में रहते हैं। जब हम सोकर उठते हैं तो हम तीनों प्रथम सतहों से गुजर कर भौतिक शरीर तक पहुंचते हैं। ये तीनों सतहें 'शॉपिंग माल्स' की तरह होती हैं जहाँ विभिन्न संस्कार प्रदर्शित रहते हैं। अपनी कारणात्मक सतह के अनुरूप हम संबद्ध संस्कार से शरीर को जोड़ते हैं और इंद्रियों को इन्हीं के अनुरूप 'डिज़ाइन' करते हैं।

Content: सिर्फ़ 21 दिनों तक आप आध्यात्मिक विचार के साथ उठने का प्रयत्न करें और अपने चेहरे को निहारें। इसमें निश्चित परिवर्तन आप पाएंगे। आपकी आंखों में एक नई दृष्टि प्रतीत होगी। मैं यहां कोई नया सिद्धांत प्रतिपादित नहीं कर रहा। यह मेरा अनुभव रहा है। इस विश्व में लाखों लोग ऐसा करते हैं। मैं इस जीवन अनुभव के साथ दावा करता हूँ कि यह एक अमोघ तरकीब है। अपने शरीर को तमस (अवसाद) और राजस (व्याकुलता) गुणों के साथ संचालित न करें। लालच और भय के साथ उठेंगे तो आप अपने शरीर को इन्हीं को प्रकट करने वाला बनाएंगे जो यही ऋणात्मकता आकर्षित करेगा। जब भी हम कारणात्मक सतह से भौतिक सतह की ओर चलें तो सच्चे तत्व के संस्कारों को ग्रहण करते चलें। आध्यात्मिक विचारों से अपना दिन शुरू करें। इस ईश्वर को धन्यवाद दें जो आपको आध्यात्मिक स्मृति प्रदान करता है। इसीलिए भारत के प्राचीन मनीषीगण सदा सुबह-सुबह ध्यान लगाने पर जोर देते थे। कम-से-कम कुछ क्षणों तक तो जीवन तरोताज़ा एवं आनंदपूर्ण रहेगा। कृष्ण कहते हैं कि जिनके नेत्रों को ज्ञान का प्रशिक्षण प्राप्त हो चुका है, वही इस प्रक्रिया के सत्य को ग्रहण कर सकते हैं। अब आपके सामने पूरी प्रक्रिया है। वे कहते हैं कि मुर्ख लोग इसे समझ ही नहीं सकते। सिर्फ वे जिनकी आंखों में ज्ञान का प्रकाश है इसे देख सकते हैं तो यह चुनाव अब आपको करना है कि आप मुर्ख रहना चाहते हैं या ज्ञानवान नेत्रों से पूर्ण अध्येता। यह मुर्खी पूरी तरह आपकी ही है।

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Chapter Number: 15

Content: 15.11 यत्न करने वाले योगीजन भी अपने हृदय में स्थित इस आत्मा को तत्वतः ही जानते हैं, किन्तु जिन्होंने अपने अंतःकरण को शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अज्ञानी जन तो यत्न करते रहने पर भी इस आत्मा को नहीं जानते।

Chapter Number: 15

Content: 15.12 सूर्य में स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में है और अग्नि में है, उसको तू मेरा ही तेज जान।

Chapter Number: 15

Content: 15.13 और मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों (जीवों) को धारण करता हूँ और रसरूप-अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण औषधियों (वनस्पतियों) को मैं ही पुष्ट करता हूँ।

Chapter Number: 15

Content: 15.14 मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित रहने वाला प्राण और अपान से संयुक्त वैश्वानर (जीवात्मा) अग्निरूप होकर चार प्रकार (भक्ष्य, भोज्य, लेह और पेय) का अन्न पचाता हूँ।

Content: कृष्ण ‘योगिनः’ शब्द का प्रयोग करते हैं इस श्लोक में। योग आजकल बड़ा प्रचलित शब्द हो गया है। ‘कूल’ लोगों के लिए। अभी हाल में ही मैंने एक विज्ञापन में पढ़ा था एक सुपर-डुप्लेक्स कुडलिनी योग के बारे में, जो तुरंत ‘लिबरेशन’ (मुक्ति) प्रदान करता है। मैंने ऐसे योग के बारे में आज तक किसी शास्त्र में कभी नहीं पढ़ा है।

Content: योग तो वह जुड़ने की कड़ी है जीवात्मा और महाचेतन परमात्मा के मध्य। इस कड़ी में जागरुकता वही है जो परमात्मा के संदर्भ में बुलाई गई है जिससे मुक्ति मिलती है। प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध योग-वैज्ञानिक पतंजलि ने इस योग के लिए आठ विधियां बताई हैं, जिसमें शामिल हैं मुक्ति और यह भाव कि हम में भी दैवी चेतना है।

Content: परंतु मेरे विचार से आज के युग में आध्यात्मिक प्रगति और स्वयं में दैवी चेतना की अनुपूर्ति के लिए सबसे सही मार्ग है ध्यान का, जो उन आठ पद्धतियों में से एक है।

Content: कृष्ण कहते हैं कि जब तक यह चेतना प्राप्त न हो, तब तक कुछ भी प्रयत्न किया जाए, ईश्वर तक नहीं पहुंचा जा सकता।

Content: यहां यह स्पष्ट समझ लें कि बात जागरुकता या चेतना की हो रही है, उपलब्धि की नहीं। सत्य तो यह है कि जीवात्मा वैश्वीय चेतना का एक अटूट हिस्सा है, यानी परमात्मा का अधिन्न अंग है। यह सत्य वह नहीं कि जिसकी प्राप्ति के लिए कोई प्रयत्न ज़रूरी हो। वह तो है ही, सदा विद्यमान है।

Content: हम अपने व्यक्तिगतम् अहम् के कारण माया द्वारा अंधे हो जाते हैं और अपने को अलग समझने लगते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि हम सर्वदा उसी सामूहिक परम चेतना का अटूट अंग हैं।

Content: आध्यात्मिक साधक इस ‘माया’ के पर्दे को हटाते हैं और दृष्टि भ्रम दूर करते हैं और यह देखते हैं कि हम इसी दैवी सत्ता से सदैव जुड़े रहते हैं। ध्यान लगाना भी उसी पद्धति की एक तरकीब है, जो इस पर्दे को हटाता है। ध्यान से साधक स्वयं में गहराई से उतरता है। ध्यान लगाने या ‘मेडीटेशन’ से सत्य की जागरुकता पैदा होती है।

Content: गुरु-जो अंधकार तिरोहित करता है

Content: जागरुकता यानी प्रकाश। प्रकाश ही जीवन को कायम रखता है। बाइबिल कहती है-“प्रकाश हो और प्रकाश हो गया।” सृष्टि में दैवी चेतना का प्रथम आभास प्रकाश से ही होता है। सूर्य से मिलने वाले प्रकाश और ऊष्मा के बगैर जीवन संभव ही नहीं हो सकता था। सूर्य से प्राप्त ऊष्मा और प्रकाश द्वारा प्राप्त ऊर्जा के ही चारों तरफ यह पूरी दुनिया घूमती रहती है।

Content: सूर्य ही अंधकार को दूर करता है। कृष्ण सिर्फ यही स्थापित नहीं करते कि वह इस समस्त संसार के सृष्टा हैं वरन् सूर्य, चंद्र एवं अग्नि से प्राप्त तेज के भी उत्स वही हैं। वही परम गुरु हैं जो हमारे मन से अंधकार हटाकर हमें चेतना या जागरुकता देते हैं।

Content: कृष्ण ही हमारे संस्कारों को नष्ट करते हैं। ये संस्कार हमारे अज्ञान, अचेतनता या अंधकार के कारण बनते हैं। अंधकार कोई सकारात्मक सत्ता नहीं है। इसे एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित नहीं किया जा सकता, पर यह प्रकाश द्वारा नष्ट किया जा सकता है। प्रकाश का होना ही अंधकार को मिटा देता है। उसी प्रकार जागरुकता का होना संस्कारों को मिटाता है। अंधकार का कोई अपना अस्तित्व नहीं होता। यह तो तब होता है जब प्रकाश नहीं होता। हम अंधकार का सृजन नहीं कर सकते। यह तो प्रकाश की अनुपस्थिति की स्थिति है।

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Content: लेकिन यदि कोई देख नहीं सकता तो उसे अंधकार से क्या डर! उसे तो कोई परेशानी नहीं होगी। एक अंधे व्यक्ति के लिए अंधकार उसकी सहज स्थिति है। अंधा कभी यह नहीं कहेगा कि अंधेरे में उसे भूत-प्रेत दिखाई पड़ते हैं क्योंकि वह तो सदा अंधकार में ही रहता है। जो सही मायने में साहसी होता है वह भी अंधकार से विचलित नहीं होता। जिसे किसी बात का डर न हो, उसे न अहं हानि की परवाह होती है, न अस्मिता खोने की या मृत्यु की। उसे अंधकार कतई भयभीत नहीं करता। वह बिना किसी भय या आकर्षण के प्रकाश और अंधकार को समान रूप से संभाल सकता है। सिवाय इन दो वर्गों के लोगों में, अंधकार बाकी सबको भयभीत करता है और सबके लिए समस्याएं पैदा करता है। कृष्ण सिर्फ प्रकाश के स्रोत ही नहीं हैं, अंधकार के भी मालिक हैं। कृष्ण पुनः अपनी सर्व व्यापकता स्पष्ट करते हैं—प्रकाश और उष्मा के द्वारा वे ही समस्त जीवों को जीवन देते हैं और जीवित रखते हैं। जैसा कि हम कह चुके हैं; वही अंधकार दूर करने वाले हैं और संस्कारों को नष्ट करने वाले हैं। कृष्ण पुष्ट करते हैं कि वही ब्रह्म हैं तथा अपने रूप प्राकट्य द्वारा नैसर्गिक तत्वों—आकाश, हवा, अग्नि एवं पृथ्वी को जीवित रखते हैं। वही समस्त वनस्पतियों के प्राण हैं तथा मानवों के भी जीवनदाता और जीवन संरक्षक है। पेड़-पौधे न हों तो भोजन नहीं प्राप्त हो सकता। भोजन के बिना शरीर और मन तंत्र कैसे काम कर सकता है? मृत्यु के पश्चात् शरीर और मन दूसरों के लिए खुराक बन जाते हैं। भोजन भी दैवी सत्ता की ही अभिव्यक्ति है। भोजन को देने वाली ऊर्जाएं ही संस्कारों की सृजन और विनाशकर्त्ता होती हैं। हममें से ज्यादातर भोजन को एक मूलभूत जरूरता या विषय—भोग की चीज समझते हैं। इसलिए हम उसके आदी हो जाते हैं या उसको नगण्य समझते हैं, लेकिन हमें सोच-समझकर ही खाना चाहिए जो भी हम खाते हैं। एक जैन शिष्य ने अपने गुरु से पूछा—“जब आप प्रभुद्ध हुए तो आपमें क्या परिवर्तन महसूस हुआ?" गुरु ने उत्तर दिया—"अब चूंकि मैं प्रभुद्ध हो गया हूं तो मैं जब खाता हूं तो पूरे ध्यान से खाता हूं और सोता हूं तो पूरी तवज्जो से सोता हूं!" यह बात कुछ अजीब-सी जरूर लग सकती है। हम में से कितने जब खाते हैं तो पूरे ध्यान से खाते हैं? कितने लोग सिर्फ भोजन पर ही अपना ध्यान एकाग्र रखते हैं? खाते समय हमारा ध्यान बज़ाय भोजन के सब चीजों पर रहता है। हम बातचीत करते हैं, पढ़ते हैं, टीवी देखते हैं और लड़ते-झगड़ते भी हैं—गर्ज ये कि हम खाने के अलावा सब ओर ध्यान रखते हैं।

Content: चूंकि हम भोजन को बेकार कचरे के समान समझते हैं, वह हमारे अंदर जाकर वाकई में कचरा ही हो जाता है। जब हम भोजन को ऊर्जा का रूप समझेंगे, उस ऊर्जा का जो हमें प्राण शक्ति देती है तो हम अपने अंदर भी एक बड़ा बदलाव महसूस करेंगे। भोजन के पूर्व ईश्वर की प्रार्थना करना और भोजन के लिए धन्यवाद देना, ईसाइयों की एक श्रेष्ठ परंपरा है। खाना प्रारंभ करने के पूर्व संसार के प्रति कृतज्ञ होना कि उसने इतना कुछ खाने को दिया है और भोजन पर ध्यान लगाना जरूरी है। पारंपरिक रूप से हिंदू लोग भोजन के पूर्व ईश्वर को प्रसाद चढ़ाते हैं और प्रार्थना करते हैं। जब इन शुद्ध रिवाजों का पालन किया जाता है तो बड़े बदलाव अपने अंदर महसूस किए जाते हैं। वह व्यक्ति जो अपने वर्तन में रिश्ता रखता है, जानता है कि वह कृष्ण के साथ है। उष्मा और प्रकाश ऊर्जाएं प्रदायक के रूप में सूर्य की भूमिका स्पष्ट करते हैं। यह भी ज़ाहिर है कि सूर्य के बिना जीवन किसी भी रूप में अस्तित्ववान नहीं रह सकता है पर चंद्रमा का समस्त वनस्पतियों एवं मानव का ऊर्जा प्रदायक होना इतना स्पष्ट नहीं लगता और इसलिए लोग इसकी कद्र ज्यादा नहीं कर पाते। चंद्रमा हमारे व्यवहार, मानसिकता और मन का नियत्रक होता है। सोम जो चंद्रमा का एक पर्यायवाची है, इसकी तरलता को बताता है तथा इसकी बढ़ने और घटने की प्रवृत्ति का भी द्योतक होता है। फिर, कृष्ण वैश्वानर, प्राण एवं अपान की बात करते हैं। वृहदारण्यक उपनिषद कहता है—“मनुष्य के अंदर की अग्नि जो उसके द्वारा खाया हुआ भोजन पचाती है, वैश्वानर अग्नि कहलाती है। इसी वैश्वानर अग्नि के प्रज्ज्वलन की ध्वनि हम सुनते हैं जब हम अपने कान बंद कर लेते हैं, लेकिन जब आत्मा शरीर को छोड़ने वाली हो तब यह ध्वनि सुनाई नहीं पड़ती।" यह उपनिषद आगे कहता है कि न आहार, न प्राण अकेले काम कर सकता है; क्योंकि एक-दूसरे पर यह आश्रित होते हैं। भोजन सड़ने लगेगा बिना प्राण-वायु के और बिना भोजन के प्राण-वायु सूख जाएगा। जब ये दोनों एक साथ कार्यरत रहते हैं तो जागरुकता आती है और असली चेतना उदय होती है। यहां कृष्ण का तात्पर्य है कि भोजन भी दैवी होता है क्योंकि इस पर ईश्वर का प्रभाव होता है। हम भोजन आसानी से उपलब्ध समझते हैं। इसकी महत्ता तब ही समझ में आती है जब इसकी कमी हो जाए।

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Chapter Number: 15

Content: 15.15 और मैं ही सब प्राणियों के शरीर में अन्तर्यामी रूप में स्थित हूं तथा मेरे द्वारा ही स्मृति, ज्ञान और उपोहन (विचार और बुद्धि में पड़ने वाले संशय, विपर्यय आदि दोष हटाने की प्रक्रिया) होती है और सब वेदों द्वारा मैं ही जाने योग्य हूं तथा वेदांत का कर्ता और वेदों को जानने वाला मैं ही हूं।

Chapter Number: 15

Content: 15.16 इस संसार में नाशवान और अविनाशी ये दो प्रकार के पुरुष हैं; इसमें संपूर्ण भूत प्राणियों के शरीर तो नाशवान और जीवात्मा अविनाशी कहा जाता है।

Content: कृष्ण कहते हैं कि वही स्मृति और ज्ञान है। इसका मतलब क्या है? हमारा मन कैसे काम करता है? यह कैसे अपनी धारणाएं स्थापित करता है? हमें यह भी नहीं मालूम होता कि हमारा मन कहां अवस्थित होता है। यदि मैं आपसे पूछूं कि यह कहां होता है तो आप अपने सिर की ओर इशारा करेंगे पर वह आपके मन की स्थिति नहीं होती।

Content: हमारे शरीर के हर कोश में एक अंतर्निहित बुद्धिमत्ता होती है। ये कोश सदा अपना पुनर्सृजन करते रहते हैं। यही कोश हमारे शरीर-मन तंत्र को सम्मिलित रूप में बनाते हैं, इसलिए हमारे मन की कोई एक स्थिति नहीं होती-कम से कम सिर में तो कतई नहीं।

Content: बुद्धिमत्ता और अंतप्रज्ञा

Content: हमारे सारे निर्णयों पर हमारे पुराने अनुभवों का प्रभाव रहता है जो हमारे अचेतन मस्तिष्क के संस्कारों में निहित रहते हैं। यह अचेतन क्षेत्र बहुत शक्तिशाली होता है। इसका इस्तेमाल तीन विधियों में होता है-सहज वृत्ति के स्तर पर, बुद्धिमत्ता के स्तर पर और अंतप्रज्ञा के स्तर पर। जब हमारा अचेतन ऋणात्मक स्मृतियों से बोझिल रहता है और व्याकुलता छायी रहती है तब यह

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Content: सहजवृत्ति (इन्स्टिक्ट) के स्तर पर काम करता है। तब हम सहजवृत्ति से ही काम करते हैं और हमारी प्रतिक्रिया या निर्णय जानवरों जैसे ही होते हैं, जिन पर बाद में हम अफ़सोस भी करते हैं और पश्चाताप भी। दूसरा स्तर होता है बुद्धिमत्ता का। यहां हम चेतनता से काम करते हैं और तार्किक निर्णय लेते हैं, पर हमारे मन में कोई अतिरिक्त उत्साह या ऊर्जा नहीं रहती। इस स्तर पर न हम सृजनशील रहते हैं, न कुछ नया सोच सकते हैं। इस स्तर पर हमारी वृद्धि नहीं होती। बौद्धिक स्तर पर काम करने से हम थकते तो नहीं हैं, पर हम उर्जावान भी नहीं रहते। इसमें तो सब काम बराबर होता है, यानी ‘ब्रेक-ईवन’ स्थिति रहती है। इस स्तर पर हम अपनी क्षिपी संभावनाओं या क्षमताओं का अधिकतम इस्तेमाल भी नहीं कर पाते। वह स्तर जहां हम अपनी पूरी क्षमता दिखा सकते हैं, अंतप्रज्ञ स्तर ही होता है। यदि हम अपने मस्तिष्क के उचेतन मन में गहन मौन और संपूर्ण जागरुकता भरकर जमी हुई स्मृतियों या फाइलों को शांत और पूरी तरह जागरुक कर दें तो हम अंतप्रज्ञा स्तर पर काम कर सकते हैं। इसलिए हमारी सबसे महान सम्पत्ति हमारे अंदर ही निवास करती है, बाहर नहीं। सबसे बड़ा हर्ष का स्त्रोत भी हमारे अंदर ही होता है, बाहर नहीं। बाहरी विश्व में हर्षयुक्त हर अनुभव के बाद शोक का अनुभव होता ही है, क्योंकि हर्ष उम्मीद जगाता है और जब वह उम्मीद पूरी नहीं हो पाती तो वह शोक प्रदान करती है, लेकिन जब अंदर की खोज प्रारंभ होती है तो उम्मीदें हट जाती हैं, आसक्ति दूर हो जाती है और एक नया हर्ष पैदा होता है। यह हर्ष शाश्वत होता है जो कभी ख़त्म नहीं होता। यही आनंद है या नित्यानंद है। चूँकि हमें इसकी जानकारी नहीं होती, हम ख़ुशी को बाहर ही तलाश करते रहते हैं क्योंकि हमें और कोई तरीका मालूम नहीं होता।

Content: एक लघु कथा

Content: एक लड़का अपने कॉलेज़ के अतिथियों के लेक्चरों के दौरान सदैव सोया करता था। एक दिन उसके मित्र ने उससे कहा- “तू इन लेक्चरों को सुनने आता ही क्यों है, जबकि तू यहां सोता ही रहता है?” उसने जवाब दिया- “यार! मुझे नींद न आने की बीमारी है और यहीं आकर मुझे नींद आती है।” जैसे यह लड़का अतिथियों के लेक्चरों को सुनकर सोने के लिए आता था, हम लोग भी इसी प्रकार ख़ुशी की तलाश में बाहर भटकते रहते हैं।

Content: चीज़ को गलत जगहों पर तलाश करते हैं, क्योंकि हमारा अनुकूलन इसी तरह किया गयाया है। हमें चाहिए कि हम अंतरमुखी हो जाएं। ‘गीता’ पर अपने भाष्य में शंकराचार्य कहते हैं कि कृष्ण से स्मृति और ज्ञान उन लोगों को प्राप्त होता है जो अच्छे काम करते हैं। जो बुरे काम करते हैं उनकी स्मृति और ज्ञान का हास होता है। यहां स्मृति और ज्ञान का अर्थ है अपनी मूल प्रकृति को समझना और महसूस करना कि हम इसी दैवी सत्ता कृष्ण से सदैव जुड़े रहते हैं, जो हमारे हृदय में निवास करते हैं। कृष्ण यहां अर्जुन को गहरी समझ में उतारते हैं। यहां वे ‘पुरुष’ की बात करते हैं, यानी उस ऊर्जा स्रोत की जो हमारे अस्तित्व का आधार है। ‘सांख्य-दर्शन’ पुरुष और प्रकृति की बात करता है। एक तरह से पुरुष यहां ऊर्जा और प्रकृति पदार्थ का घोतक है। पुरुष अचल अकर्मक ऊर्जा का प्रतीक है जबकि प्रकृति सकर्मक पदार्थ के सिद्धांत की। पुरुष एक नर है और प्रकृति मादा। दूसरे शब्दों में कहें तो पुरुष शिव है और प्रकृति शक्ति!

Content: कृष्ण तो इस दर्शन के भी परे जाते हैं। वे कहते हैं कि पुरुष के भी दो रूप हैं-एक अविनाशी और दूसरा नाशवान। वे कहते हैं कि सारे जीव नाशवान पुरुष के वर्ग में आते हैं जो अविनाशी उर्जाओं में स्थित रहते हैं। पहले अध्यायों में भी कृष्ण ने काफी विशदता में प्रकृति के कई पहलुओं की चर्चा की है जो मन, इंद्रिय और तीन गुणों के माध्यम से अपना काम करते हैं। यहां वह ‘पुरुष’ तत्व पर विस्तार से चर्चा करते हैं। ‘पुरुष’ वह मूल ऊर्जा है जो सबका उद्गम है। ‘ईशावास्यम इदं सर्वं’ कथन है ईशावास्य उपनिषद का- “जो अस्तित्व में है वह ऊर्जा है।”

Content: महान वैज्ञानिक आइंस्टीन उस समय अवसादग्रस्त हो गए जब उनकी सापेक्षवाद के सिद्धांत द्वारा व्यक्त सम्भावना कि ‘पदार्थ से ऊर्जा निःसृत होती है’ का प्रयोग न्यूक्लीयर बम बनाने के लिए किया गया। उनको बड़ा सदमा लगा कि उनकी खोज इतने बड़े विनाश का कारण बन सकती है। इसके बाद वे भी आध्यात्मिकता की ओर मुड़ गए थे। जब आइंस्टीन ने यह उपनिषद का सूक्त पढ़ा जो शायद पांच से दस हज़ार वर्ष पूर्व लिखा गया था तो वे बोले- “मुझे इसका गर्व है कि मैंने खोजा कि पदार्थ ऊर्जा का ही रूप है। कई हज़ारों वर्ष से इन ऋषियों को यह मालूम था कि पदार्थ से ऊर्जा निकलती है। असल में विज्ञान का आखिरी कदम आध्यात्मिकता का प्रथम कदम है। यह आदि-ऊर्जा का सिद्धांत ‘पुरुष’ द्वारा व्यक्‍त है जो एक विभवीय ऊर्जा (संभावित ऊर्जा) का स्रोत है। यानी यह ऊर्जा तो है पर अकर्मक है।

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Chapter Number: 15

Chapter Name: सामूहिक चेतना

Content: 15.17 इन दोनों से उत्तम पुरुष तो अन्य ही है जो तीनों लोकों में प्रवेश कर सबका धारण-पोषण करता है एवं अविनाशी परमेश्वर और परमात्मा कहा जाता है।

Chapter Number: 15

Chapter Name: सामूहिक चेतना

Content: 15.18 क्योंकि मैं नाशवान जड़वर्ग क्षेत्र में तो सर्वथा अतीत हूँ और माया में स्थित अविनाशी जीवात्मा से उत्तम हूँ इसलिए लोक में और वेदों में भी पुरुषोत्तम के नाम से प्रसिद्ध हूँ।

Chapter Number: 15

Chapter Name: सामूहिक चेतना

Content: 15.19 हे भारत! इस प्रकार तत्व से जो ज्ञानी पुरुष मुझको पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकार से निरंतर मुझ (वासुदेव) परमेश्वर को ही भजता है।

Chapter Number: 15

Chapter Name: सामूहिक चेतना

Content: 15.20 हे निष्पाप भारत! इस प्रकार यह अति रहस्य युक्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया है। इसको तत्वतः (पूरी तरह से) जानकर मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है।

Content: कृष्ण कहते हैं कि वे पुरुष के इन दोनों प्रकारों से परे हैं। अर्थात् नाशवान शरीर-मन तंत्र की ऊर्जा एवं अविनाशी ऊर्जा का वह स्वर है जिसे परमात्मा से तथा वे उसके रूप में ही एक पुरुष ही वह ऊर्जा है जो हम सबमें व्याप्त है। पुरुषोत्तम वह ऊर्जा है जो समस्या ब्रह्मांड में व्याप्त है। इस प्रकार पुरुषोत्तम एक प्रकार से पराशक्ति-ब्रह्मांडीय ऊर्जा का ही रूप है। यह तो चरम कॉस्मिक चेतना को स्पष्ट करने के लिए पुरुष को नर और शक्ति को मादा बनाया गया है, वस्तुतः दोनों का एक ही मूल है।

Content: जीवन को संचालित करने वाली ऊर्जा

Content: यह वह ऊर्जा है जो जीवन के पीछे कार्यरत रहती है। गौतम बुद्ध का कहना है- 'संसार (या ब्रह्मांड) स्वयं को सृजित करता है। ऐसा कोई समय

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Content: कभी नहीं था जब यह ब्रह्मांड न रहा हो और ऐसा कोई समय कभी नहीं होगा जब यह ब्रह्मांड न रहेगा।

Content: यह जगत अविनाशी है, चूंकि उसके पीछे जो ऊर्जा है वह अविनाशी है। कृष्ण कहते हैं कि वे ही वह ऊर्जा हैं, वह पुरुषोत्तम जो इस ब्रह्मांड को सदा संचालित करते हैं।

Content: उपनिषद का एक सुंदर सूक्त है जो हर कर्मकांड के पूर्व आह्वान के लिए उच्चारित किया जाता है -

Content: ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यवे:।

Content: "सब पूर्ण है। पूर्ण में से पूर्ण बनता है। जब पूर्ण को पूर्ण में से निकाला जाता है तब भी पूर्ण ही बचता है।"

Content: इसमें भी वही बात कही गई है जो कृष्ण कह रहे हैं। अनंत से ही यह ब्रह्मांड तथा कई अन्य ब्रह्मांड प्रकट हुए हैं।

Content: अभी तक कोई प्रमाण तो उपलब्ध नहीं है जो यह बताए कि यह ब्रह्मांड कैसे बना था। बाइबिल में दी गई जगत-निर्माण की कथा या ब्रह्मा और प्रलय की सनातन धर्म की कथाएं- तो पौराणिक गलत कथाएं हैं, जो मात्र यह इंगित करती हैं कि एक महा ऊर्जा से इस ब्रह्मांड का निर्माण हुआ था, पर सत्य यह है कि यह ब्रह्मांड सदैव अस्तित्व में रहा है।

Content: (वैज्ञानिक) बिग-बैंग सिद्धांत यह स्पष्ट नहीं कर पाता कि अभी भी वे 'बिग-बैंग' कैसे चालू हैं, यदि वे ब्रह्मांड का कारण थे। क्योंकि हर बिग-बैंग (ज़ोर का धमाका) नए सितारे एवं मंदाकिनियां सृजित करते हैं, पर कहीं ब्लैक होल्स भी होते हैं जिनमें बड़े सितारे व मंदाकिनियां विलीन भी हो जाती हैं। यानी हर एक जन्म के साथ एक मृत्यु भी जुड़ी है तो मूल जन्म कैसे हुआ था? असल में ऐसा कभी हुआ ही नहीं था। ब्रह्मांड सदैव विद्यमान रहा है।

Content: कृष्ण कहते हैं- "नाशवान एवं अविनाशी तत्वों से परे मैं हूं, पुरुषोत्तम!"

Content: इस समय वे यादव राजा कृष्ण का हवाला नहीं दे रहे, यानी उस कृष्ण का जो वसुदेव और देवकी के पुत्र हैं। वे बात कर रहे हैं परब्रह्म कृष्ण की-ईश्वर की।

Content: वही सगुण ब्रह्म और निर्गुण ब्रह्म दोनों प्रकार की ऊर्जाओं का केंद्र हैं। वे वही ब्रह्म हैं-परमात्मा हैं, जिसमें जीवात्मा समाहित होती है और नाशवान ऊर्जा विलीन होती है।

Content: वे वही ब्रह्म हैं जिसमें 6 अरब मानव, असंख्य जीव जो इस पृथ्वी ग्रह पर मौजूद हैं तथा लाखों-लाख जीव-जन्तु अंततः स्वयं को विलीन करते हैं। वे ही पुरुष हैं, ऊर्जाएं हैं, प्रकृति हैं और पदार्थ हैं। बिना उनके कुछ भी नहीं हो सकता।

Content: 222 श्रीमद्भगवत गीता

Content: हम पुरुषोत्तम को अपने पालन-पोषण एवं प्रशिक्षण के कारण विभिन्न रूपों में देखते हैं। कभी हम उनको ही सदानन कर्तिकेय के रूप में देखते हैं या द्वादशादित्य 'पुरुषा' के रूप में; चतुर्भुजा बालाजी के रूप में या मोद मुकुटधारी दो पांव वाले बंसी वादक कृष्ण के रूप में। यानी हम उनको उसी रूप में देखते हैं जिसमें हमको सहूलियत रहती है, जिससे कि हम उनके साथ जुड़ सकें या उन तक पहुंच सकें।

Content: एक लघु कथा

Content: एक बड़ा ज्ञानी भक्त था। उसने वर्षों शिव की मूर्ति के सामने आराधना की, परंतु शिव उसके सामने प्रकट नहीं हुए। अंततः उसने सोचा कि चलो विष्णु की आराधना की जाए। विष्णु ज्यादा सदय माने जाते हैं।

Content: उसने शिव की मूर्ति हटाकर वहां एक खूबसूरत विष्णु का विग्रह रख दिया, परंतु हृदय से वह शिव भक्त ही था अतः उसने शिव की मूर्ति एक कोने में ज़रूर रख दी, पर फेंकी नहीं। दूसरे दिन उसने विष्णु की आराधना धूप-दीप-फूल से प्रारंभ की, पर उसे यह देखकर गुस्सा आया कि धूप का धुआं बार-बार कोने में रखी शिव मूर्ति की ओर ही जा रहा था। जब वह धुएं की दिशा कैसे भी रोक नहीं पाया तो वह आगे बैठा और शिव मूर्ति की नाक दबाकर बोला-"भोलानाथ! यह धूप वंदन आपके लिए नहीं है। अब मैं आपकी आराधना कतई नहीं कर रहा हूं।"

Content: तभी उसे लगा कि उसके पास कोई है-देखा तो सामने मुस्कुराते शिव खड़े थे। वह तुरत उनके पैरों पर लोट गया और कातर स्वर में बोला-"भोलेनाथ! जब मैंने वर्षों आपकी पूजा की तब तो आप प्रकट नहीं हुए और अब जब मैंने आपकी आराधना भी नहीं की तथा आपकी नाक दबाकर आपकी बेइज्जती कर दी, तब आप तुरत प्रकट हो गए। यह क्या माया है प्रभु?"

Content: शिव जी ने मुस्कुराते हुए कहा-"वत्स! पहले तुम मेरी पूजा करते थे लेकिन मैं तुम्हारे लिए एक विचार मात्र था-एक धारणा था, परंतु इस समय जब तुमने मेरी नाक दबाई तो तुमने मुझे एक जीता-जागता अस्तित्व, एक वास्तविकता समझा तो मैं तुम्हारे सामने प्रकट हो गया।"

Content: हम में से ज्यादातर के लिए ईश्वर एक विचार, एक अवधारणा से ज्यादा कुछ नहीं हैं। हम तरह-तरह की कथाएं गढ़ते हैं अपनी सुविधा के लिए और अपने भय और चिंताओं को ढांकने के लिए तथा विभिन्न जटिल दार्शनिक सिद्धांत बनाकर मात्र अपना ज्ञान प्रदर्शित करते हैं-उसे एक जीता-जागता अस्तित्व नहीं समझते।

Content: 223 श्रीमद्भगवत गीता

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Content: क्या फ़र्क पड़ेगा यदि हम कृष्ण को, परब्रह्म, पराशक्ति इत्यादि के नाम से संबोधित करें, उसे पुरुषोत्तम मानें? अरे! उसे हम चाहे किसी भी नाम से पुकारें वह तो हमारे लिए अविनाशी सत्ता ही रहेगा, जिससे हम जीवन प्राप्त करते हैं और जीते-जागते हैं। यह कृष्ण की अनिर्वन्धित सत्ता है जो कहती है कि वही पुरुषोत्तम है जो 'गीता' को एक आध्यात्मिक प्रमाणिकता प्रदान करती है। गीता की महत्ता इसलिए ही नहीं कि इसमें महत्ती ज्ञान दिया है या यह शाश्वत सत्य दिग्दर्शित कराती है, वरन् इसलिए है कि इसमें एक साहसी व्यक्ति की उक्ति है कि वही त्रिगुणातीत परमेश्व‌र है जो इस कृति (गीता) को एक शाश्वत सत्य उद्घाटित करने का आधार बनाता है। वह पुरुषोत्तम, वह परब्रह्म कृष्ण हम पर भी कृपा करें। अब कृष्ण महान सत्य उद्घाटित करते हैं, उनके सामूहिक चेतना के शाश्वत प्रतीक होने को। यह आपको आश्चर्यचकित भी कर सकता है या आपको इसकी जानकारी या जागरुकता पहले से ही हो सकती है। चाहे यह धारणा नई हो या पुरानी, आप इस सत्य को निष्पक्षतापूर्वक विश्लेषित करें; इसे जितना कर सकते हैं उतना आत्मसात करें और इस पर प्रश्न तब तक उठाते रहें जब तक आपका तर्क थककर बेदम होकर बैठ न जाए।

Content: प्रथम सत्य हमारे सबके मन (या मस्तिष्क) इस ब्रह्मांड के अलग-अलग टुकड़े नहीं हैं। वे सभी एक हैं और एक से ही हैं। वस्तुतः हम सभी के मन आपस में जुड़े रहते हैं। सिर्फ जुड़े ही नहीं रहते, वे एक-दूसरे पर अपना प्रभाव भी डालते हैं, सीधा-साधा असर डालते हैं। इसे ही मैं सामूहिक चेतना का नाम देता हूँ। हमारे विचार ऐसे फैलते हैं जैसे सर्दी का संक्रमण हो। लोग एक-दूसरे के सर्दी प्रकोप से बच सकते हैं, पर हमारे विचारों से नहीं। हर एक पर इनका असर होता ही है। चाहे सर्दी के प्रकोप से बचाव हो जाए पर सामूहिक चेतना के विचार से बचना असंभव है। यदि किसी का सर्दी का प्रकोप हमें भी बीमार करता है तो हम शारीरिक रूप से कुछ दिन उसका कष्ट झेलेंगे, फिर ठीक हो जाएंगे। पर जब हम दूसरों के विचारों से आक्रांत होते हैं तो न सिर्फ हम मानसिक रूप से भी शिथिल होते हैं, बल्कि यह असर बहुत दिनों तक कायम रहता है। हमारा सोचा हुआ हर विचार हमारे आसपास के लोगों को प्रभावित करता है। हमारे पास के लोग ही नहीं, धीरे-धीरे बढता हुआ असर पृथ्वी पर विद्वमान हर व्यक्ति पर अपना प्रभाव छोड़ने लगता है।

Content: यह समझ लें कि हमारी बौद्धिक चेतना तो इसका प्रतिरोध करेगी ही, पर इस पर हम बाद में विश्लेषण करेंगे। पर यह सत्य कैसे हो सकता है? हम इस पर विचार प्रश्नोत्तर सत्र में करेंगे—एक-एक करके—ईच-दर-ईच। मैंने प्रथम सत्र की घोषणा कर दी है। हम सब कोई अलग-अलग जीव नहीं हैं, अलग-अलग मय (दिमाग) वाले नहीं है। हम सब आपस में घने तौर पर जुड़े हुए हैं। यह एक घनिष्ठ नेटवर्क है। मेरा कोई विचार भी आप में बदलाव ला सकता है, आपकी कोई विचार मुझे भी गहराई से स्पर्श कर सकता है। हम लोग अलग-अलग व्यक्ति नहीं हैं। हम लोग कोई कटे-फटे नहीं हैं, जिन पर एक-दूसरे का कोई प्रभाव न हो। एक सत्य जिसे हम सामूहिक चेतना कहते हैं, हम सबको जोड़ता है।

Content: दूसरा सत्य न सिर्फ मानसिक स्तर पर, परंतु गहरी चेतना स्तर पर हम जुड़े हैं। जितने हम गहन चेतना में जाएंगे उतना ही यह जुड़ाव स्पष्ट होता जाएगा। यह समझ लें कि जब तक हम अपनी निज की चेतना की अवधारणा मानते रहेंगे, हम लगातार कष्ट ही पाते रहेंगे—चाहे मानसिक या शारीरिक स्तर पर या अस्तित्व के स्तर पर भी। आखिर हम प्रकृति का लगातार इतना प्रतिरोध क्यों करते हैं? जो भी प्रकृति हमें प्रदान करती है हम उसका प्रतिरोध ही करते हैं।

Content: आप भी समग्र के अंश हैं हां! हम समग्र के अंश हैं। यदि हम समग्र से अपनी आवृत्ति जोड़ते हैं तो समग्र हमारे मित्र के रूप में उभरता है, लेकिन जब हम इसको अलग समझते हैं, इससे भेदभाव करते हैं या इसका विरोध करते हैं, यह हमारा दुश्मन बन जाता है। यह समझ लें कि यह समग्र यहां हमें मारने के लिए नहीं है; यह हमें नष्ट नहीं करेगा। यह समग्र, समूचा ब्रह्मांड एक होलोग्राम है जिसमें हम हिस्से हैं। जैसे होलोग्राम का हर हिस्सा चाहे भले ही टूटकर अलग हो होलोग्राम की संपूर्णता ही दिखाता रहता है, उसी प्रकार हम भी कितने ही अलग हों, समग्र या ब्रह्मांड की संपूर्णता दिखाते हैं। एक उदाहरण लें—क्या होता है जब कोई व्यक्ति डूबकर मरता है। उसका मृत शरीर ऊपर आकर तैरने लगता है। मृत शरीर पानी से भरा होता है, पर यह पानी पर तैरता है। दूसरी ओर जीवित शरीर पानी से हल्का होता है, लेकिन वह

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Content: उतराता नहीं; डूब जाता है। ऐसा क्यों होता है, क्योंकि जब तक हम जीवित हैं हम पानी से जुड़ते नहीं हैं। हमारा अहं आड़े आता है, हमारा मन हमें रोकता है, पर मरे शरीर में न कोई मन होता है, न अहं। वस्तुतः यह मन और अहं होता है जो हमारे शरीर को भारी बनाता है। अभी हाल ही में मैंने नियाग्रा फॉल्स में कूदकर भी बच जाने वाले व्यक्ति का इंटरव्यू पढ़ा था। कल्पना करें कि कोई नियाग्रा फॉल्स में कूदकर भी बच जाए। यदि आप कभी नियाग्रा फॉल्स गए हों तो आप समझ सकते हैं कि वहां पानी का कितना जोर और परिणाम होता है। उस व्यक्ति से हर तरह के पत्रकारों ने उसके इस असाधारण छलांग के बारे में लगातार प्रश्न पूछे। उस आदमी ने बड़ी सहजता से कहा-“जब मैं नियाग्रा फॉल्स में कूदा तो मैं उसी की हिसा हो गया। मुझे लगा कि मैं उन फॉल्स का एक अंश हूं।”

Content: जब हम एक सामूहिक चेतना के अंश होते हैं, तो हम स्वयं को सामूहिक चेतना ही समझने लगते हैं और प्रकृति के साथ होते हैं। फिर प्रकृति हमारी मित्र होती है और वही हमें बचाती है। प्रकृति कभी हमें क्षति नहीं पहुंचाती, लेकिन जब हम अपनी प्रतिस्व अस्मिता से स्वयं को प्रकृति से अलग समझते हैं तो प्रकृति प्रतिवाद करती है। यदि हम सामूहिक चेतना से जुड़े रहेंगे तो प्रकृति कभी हमारे खिलाफ़ नहीं जाएगी। वह सदैव हमारा संरक्षण करेगी।

Content: जब कभी हम कोई सामजिक या आर्थिक मुहिम में सफलता पाना चाहते हैं तो हमें हमारा लक्ष्य तब ही मिल पाता है, जब हम पूरे एक समूह से जुड़े रहें। यानी कि सामूहिक चेतना से स्वयं को जोड़े रखें। जब तक हमें अपने निजीपन का भाव रहेगा और हम अपने विचारों को मौलिक रूप से दूसरों पर थोपना चाहेंगे तो हम सबके साथ जुड़ नहीं पाएंगे। हमारी अपनी अलग अस्मिता रहेगी। फिर चाहे वह घर हो या दफ्तर, कार्यशाला हो या फैक्ट्री, हम में अलगाव का यह भाव रहेगा। परंतु यदि हम (व्यष्टि) स्वयं को समूह (समष्टि) में तिरोहित कर दें तो समष्टि हमारा बचाव करेगी। हम तब सामाजिक रूप से या आर्थिक रूप से सबके साथ जुड़ेंगे तो हम सफल भी होंगे और हमारा अनुभव भी समृद्ध होगा। सबके साथ सफल होने में एक संतुष्टि का भाव जागृत होगा। यह संपूर्णतः शब्दों में बयान नहीं हो सकती, लेकिन जैसे ही हमने समष्टि से प्रतिरोध किया कि हमारा कष्ट भोगना शुरू हो जाता है।

Content: एक लघु कथा

Content: दो चींटियां एक बार एक कप की सतह पर चल रही थीं। उस कप में अमृत भरा था। अचानक एक चींटी फिसली और लगा कि वह कप में गिर जाएगी, पर उसने स्वयं को संभाल लिया। इस पर दूसरी चींटी बोली-“अरे! तुम इस कप में गिरीं क्यों नहीं। यह तो अमृत का कप है। इसमें डूब भी जातीं तो अमर हो जातीं।” इस पर पहली चींटी बोली-“मैं स्वयं को डुबाना नहीं चाहती।”

Content: हम यह समझ नहीं पाते कि सामूहिक चेतना में स्वयं को विलीन करने से हम संपृर्णता से मुक्ति पाते हैं। हम प्रतिरोध करते रहते हैं और अपनी अस्मिता कायम रखते हैं। जब तक हम सामूहिक चेतना में अपना विलय नहीं करते, हम अपने और दूसरों के लिए नर्क पैदा करते रहते हैं। टाओवाद-जो चीन का एक प्राचीन दार्शनिक स्कूल है, में भी यहीं सीख दी जाती हैं टाओ का अर्थ ही है प्रकृति का अनुसरण करना। इस प्राकृतिक बहाव का सबसे ज्वलंत उदाहरण है पानी का बहना। पानी भूमितल के ढलान पर बहता है। यह अपने प्रतिरोधों के चारों ओर एकत्रित हो जाता है। टाओ उस घास की बात करता है जो बहाव के साथ जुड़ जाती है और बहाव गुज़रते ही सीधी हो जाती है। यदि हम ऐसा कर सकें तो हम अपने माहौल के प्रतिकूल होने की कल्पना भी नहीं कर सकते।

Content: तीसरा सत्य

Content: अपने चरम स्तर अर्थात आध्यात्मिक स्तर पर हम समझ सकें कि हम बहुत गहराई से सबसे जुड़े हैं, संपृर्णता से जुड़े हैं अपने पूरे समूह से-पूरे ब्रह्मांड से, तो हमें न सिर्फ आनंद प्राप्त करते हैं वरन् हम सही मायनों में जीते हैं क्योंकि तब हमारे सामने कई नए आयाम उभरित हो जाते हैं। इस समय हम दबाव ग्रस्त महसूस कर रहे हैं और लगातार विश्वुद्ध रहते हैं तथा बहुत सोच-विचार में उलझे रहते हैं। जब हम अपने शरीर-मन तंत्र को सबसे अलग मानते हैं तो हमें बहुत सोच-विचार करना पड़ता है। हमें जीवन का आनंद लेने के लिए भी बहुत मेहनत करनी पड़ती है। लेकिन यदि सामूहिक चेतना में हम स्वयं को विलीन कर दें तो हमारे सामने कई नई संभावनाएं व आयाम खुल जाते हैं। कल्पना करें कि हम यदि इस एक शरीर से इतना आनंद उठाते हैं तो हमारे पास दो शरीर हो तो आनंद दोगुना नहीं हो जाएगा? और यदि हमारे पास कई शरीर हों ... तो कहना ही क्या है।

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Content: जैसे-जैसे शरीर की संख्या बढ़ती है, हमारा आनंद या खुशी भी उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है, यही हमें अनुभव होता है जब हम सामूहिक चेतना के एक अंश बन जाते हैं। वैसे भी हम कोई व्यक्तगत निजी चेतना नहीं है, जैसा हम समझते हैं। जब स्तर-दर-स्तर हम गहराई में उतरते हैं तो हम पाते हैं कि हम तो सभी एक ही हैं। फलस्वरूप मन की व्याधियाँ अपने आप गायब हो जाती हैं। तब हमें मानसिक, प्राणिक, ईथरीय, भौतिक तथा सारी सतहों पर भी एक सुखद अनुभूति होने लगती है। जब यह अनुभूति हो कि हम सीमा-रहित चेतना है तो यह एक अनिर्वननीय आनंद प्रदायक अनुभूति होती हैं इसकी तो कल्पना करना भी मुश्किल है। मैंने देखा है कि हमारे प्रोग्रामों के अंत में कुछ साधकों इतने अभिभूत हो जाते हैं कि वे अपना नाम, पता, पद, प्रतिष्ठा, शिक्षा, अहर्ता, धन-सम्पदा-न की चीज के बारे में भूल जाते हैं। यानी उनकी जो व्यक्तगत पहचान है वह तिरोहित हो जाती है। वे दूसरों का सम्मान बिना किसी भेदभाव के करने लगते हैं और आपस में एक-दूसरे के पाँवों पर गिरकर अभिवादन करते हैं। मैंने श्वसुरों को भी अपनी पुत्रवधुओं के सामने साष्टांग दंडवत होते देखा है। भारत में तो यह होना असंभव ही है। यह प्रोग्रामों के अंत में देखा गया है क्योंकि श्वसुर भी अपनी पुत्रवधू के अंदर छिपी बैठी चेतना को देखता है; सांस अपने दामाद को भगवान जैसा समझकर उसके पैर छूती है। दादा-दादी अपने पोता-पोतियों के पैर छूते हैं। अक्सर अपने मातहतों के सामने साष्टांग दंडवत होकर अभिवादन करने लगते हैं। अनुभव और अनुभूति प्राप्त करना जब हम सामूहिक चेतना में एकात्मता का भाव महसूस करने लगते हैं तो हमें एक आनंदानुभूति होती है और हम सारे भेदभाव, नाम, सामाजिक स्तर, प्रतिष्ठा, धन-वैभव आदि को भूल जाते हैं। जो कुछ भी अपनी पहचान के सूत्र हैं वे तिरोहित हो जाते हैं। हमारे अंदर का सच बाहर आता है और हम समझने लगते हैं कि हम कौन हैं। मैंने स्वयं देखा है कि लोग अपने जानी दुश्मन के पांव छूने लगते हैं; अपने से बहुत छोटे या आर्थिक रूप से बहुत कमज़ोर लोगों के पांव पड़ते हैं और अपनी पहचान ही भूल जाते हैं, क्योंकि आध्यात्मिक रूप से वे प्रगतिशील रहते हैं। उनको इतनी शिद्दत से चेतना की अनुभूति होती है; आनंद का इतना सघन अनुभव होता है कि उनका अहं भाव गायब हो जाता है।

Content: सभी में ईश्वर-दर्शन करते हैं जब वे आनंद-ओ-उन्माद में सामूहिक चेतना में आते हैं। वे कुछ कल्पना से नहीं देखते। जब वह अनुभव होता है तो पूरा समूह ही सभी को एक-सा और एक ही समझने लगता है। उनकी समझ में आ जाता है कि वे अलग जीव-सत्ता नहीं हैं। कृष्ण कहते हैं कि जो माया के 'मुम्' में पड़ रहते हैं वे ही परमात्मा और आत्मा में फ़र्क समझते हैं तथा अविनाशी और विनाशी तत्वों में भेद करते हैं। एक बार जैसे ही सामूहिक चेतना की अनुभूति हुई कि कोई फ़र्क या भेदभाव नहीं रहता। हर एक सामूहिक चेतना में विलीन हो जाता है। लहर समझती है कि वह समुद्र से अलग है, फ़र्क है। वह यह नहीं समझ पाती कि वह समुद्र से ही पैदा होती हैं और समुद्र में ही विलीन हो जाती है। उसको यह भान नहीं होता कि वह स्वयं ही समुद्र है। जिस प्रकार लहर समुद्र का अभिन्न अंग है, इसी प्रकार जीवात्मा परमात्मा का अटूट भाग है। जब हम स्वयं 'पुरुषोत्तम' के भाग हैं तो हम 'पुरुषोत्तम' तक क्यों पहुंचेंगे। हम तो वे ही हैं; उन्हीं के अंग हैं। यही कृष्ण का प्रमुख ज्ञान है। इस अध्याय में कृष्ण एक परम गुरु की तरह बात करते हैं। अर्जुन इसमें पूरी तरह से मीन रहता है जो अपने गुरु को समझने का सर्वोत्तम तरीका है। यह गुरु ही है जो हमारे अस्तित्व से जुड़ा कैंसरतुमा हिस्सा 'अहम्' को पूरी तरह खत्म कर सकता है। हमारा गुरु एक तरह की शिल्य चिकित्सा कर, इस ट्यूमर या कैंसर को निकाल फेंकता है। वह कभी यह अनुभूति नहीं देगा कि प्रभुद स्थिति से कम किसी स्थिति में हम रहें। जैसे जब हम आध्यात्मिक रूप से भी उन्नति करते हैं तब भी किन्हीं सतहों में हम फंसे रह जाते हैं, लेकिन हमें यह मालूम भी नहीं रहता कि हम फंस गए हैं और कोई प्रगति नहीं कर रहे। ऐसी हालत में गुरु हमें बार-बार धक्का देकर आगे बढ़ाता है। वह हमारे समग्र जीवन में परिवर्तन ले आता है। जब हम शल्य चिकित्सा का छुरा या चाकू देखते हैं तो हमें लगता है कि यह हमें आघात पहुंचाएगा, पर सर्जन का चाकू मारने के लिए नहीं होता, यह हमें निरोग करने के लिए काम करता है। भारत में देवों या भगवानों के हाथ में हथियार दिखाए जाते हैं। वह वास्तव में शल्य क्रिया में प्रयोग में आने वाले औजारों के रूप होते हैं, जो हमारे अहम् को निकालकर बाहर फेंकते हैं। काली के हाथ में एक बड़ा छुरा (या तलवार) और दूसरे हाथ में एक कटा हुआ

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Content: सिर होता है। यह कटे सिर अहंम का प्रतीक होता है और चाकू या तलवार उस ज्ञान या विवेक का प्रतीक होता है जो हमारे अहंम भाव का नाश करता है। हमारा गुरु ही यह सुनिश्चित करता है कि हम कहीं फंसे न रह जाएं और परम स्थिति तक पहंचें। इसलिए पूर्व में गुरु को इतनी महत्ता दी जाती है। पश्चिचम में तो सिर्फ शिक्षक का ज्ञान होता है; वहां आध्यात्मिक गुरु की कोई अवधारणा नहीं होती, परन्तु पूर्व में, उन गुरुकुलों में भी जहां आध्यात्मिक शिक्षा प्रदान की जाती है, गैर आध्यात्मिक शिक्षा देने वाले भी आध्यात्मिक गुरु ही कहलाते हैं-शिक्षक नहीं। तो गुरु और शिक्षक में अंतर क्या है? शिक्षक बौद्धिक रूप से जानकार होता है, पर गुरु अनुभव में अधिक समृद्ध होता है। गुरु जब ज्ञान देता है तो अपने अनुभव के आधार पर बोलता है जिसे वह सत्य सिद्ध कर चुका है। यदि प्राचीन भारत में राजाओं को धनुर्विद्या का भी ज्ञान लेना होता था तो वे गुरु के पास ही जाते थे। आपको ताज्जुब होगा कि आखिर ये प्रबुद्ध गुरु कृषि, धनुर्विद्या या व्यापार इत्यादि के बारे में कैसे जानते थे, परन्तु यह स्पष्ट है कि हर कला या विज्ञान को सीखने की एक विधि होती है। गुरुकुलों में सात वर्ष की आयु से बच्चों को ध्यान करना सिखाया जाता है जो तब तक चालू रहता है जब तक वे 14 वर्ष के न हो जाएं। यदि उस समय तक उनको अपना प्रथम आध्यात्मिक अनुभव हो गया हो तो उन्हें फिर 'ब्रह्म सूत्र' पढ़ाया जाता है, जो उनको आध्यात्मिक सत्यों के बारे में ज्ञान देता है। ऐसे लोग संन्यासी होते हैं जो समस्त विश्व का परित्याग कर देते हैं, नहीं तो वे जीवन की जटिलताओं का ज्ञान प्राप्त करते हैं, काम सूत्र पढ़ते हैं और वैवाहिक जीवन में प्रवेश करते हैं। तब हर एक प्रसन्न था क्योंकि सभी को प्रबुद्ध गुरुओं द्वारा सही ज्ञान मिलता था और वे वह जीवन जीते जो उनके लिए सर्वोत्तम समझा जाता था। एक शिक्षक जहां शब्दों द्वारा शिक्षित करता है, वहीं एक गुरु अपनी चेष्टा या शरीर भाषा द्वारा अपने शिष्य को ज्ञान देता है। अब यह सिद्ध हो चुका है कि हमारा आपसी वार्तालाप 90 प्रतिशत शब्दहीन संचरण या शरीर भाषा द्वारा होता है। गुरु का सीधा सान्निध्य और स्पर्श शिष्य को जागरूक कर उसमें बड़ा परिवर्तन लाता है उसके मन में इस ज्ञान के लिए जगह बनाकर, उसकी भौतिक उपस्थति यह जगह बनाती है और शरीर भाषा उसमें शिष्य के मन में ज्ञान भर देती है। जैसे ही हम अपने गुरु के सामने गए कि वह हमें बताएगा कि हम वह नहीं, जो हम समझते हैं कि हम हैं। वह हमें आगाह करेगा कि हम वह मानव नहीं जो आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करना चाहते हैं, वरन् वे आध्यात्मिक जीव

Content: श्रीमद्भगवत गीता 230 हैं जो आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करना चाहते हैं, वरन् वे आध्यात्मिक जीव हैं जिन्हें मानव अनुभव प्राप्त हो रहा है, यह सुनकर न सिर्फ हम इसका स्वीकार नहीं कर पाते, वरन् थोड़े बेचैन भी हो उठते हैं। हम समझते हैं कि वह (गुरु) अपने विचारों को हममें डालकर हममें परिवर्तन करना चाहता है। यह सोचते ही हम डर जाते हैं और भाग खड़े होते हैं। असल में हम अपने 'भेड़-चाल' वाले जीवन से खुश रहते हैं कि बीवी-बच्चे प्राप्त किए, काम किया और मजे करें, पर यदि हमारा गुरु हमें यही बात लगातार बताता है तो फिर हम उसका प्रतिरोध करना बंद कर देते हैं, यद्यपि आश्वस्त हम अभी भी नहीं होते। कुछ समय और बीतने के पश्चात हमारे गुरु की ऊर्जा हमें आकृष्ट करती है और हम उनको याद करने लगते हैं। धीरे-धीरे वह हमारे अस्तित्व का एक हिस्सा बनने लगते हैं। अभी भी हम वह स्वीकार करने को तैयार नहीं जो वह कह रहे हैं। यह 'आख़िरी-मिनिटों' की 'खिलौली' जारी रहता है। फिर किसी बिन्दु पर जाकर हममें गुरु पर भरोसा होता है। तब वे बताते हैं कि हम भी उन्हीं जैसे हैं बिल्कुल। वे कहते हैं कि हम भी सत्य समझकर अंततः उन जैसे ही हो सकते हैं, पर हमें फिर डर लगता है और भेड़ की तरह बतख़ करने लगते हैं। तब हमारा गुरु भी भेड़-सा बनकर हमें सहज करता है, जिससे लगे कि वह भी हमारे जैसा ही है। एक बार जब हम उनसे जुड़कर उन पर पूरा भरोसा करने लगें तो वह हमारे मन में अनुभव उतारते हैं और कहते हैं कि हम शेर हैं (भेड़ नहीं)। इसी स्थिति को मैं 'दीक्षारंभ' कहता हूं या प्रथम अनुभव। फिर वह हमें 'शेर होने' का अनुभव कराते हैं, पर उस अनुभव को प्राप्त करने के पश्चात भी हम इसके होने को झुठलाते रहते हैं। फिर काफी समय पश्चात् गुरु हमें अपनी सत्य प्रकृति से साक्षात्कार करने का अनुभव प्रदान करते हैं और हमें अंतिम स्वतंत्रता प्रदान करते हैं। तभी सिर्फ तभी हमें अनुभव होता है कि हम तो हमेशा से 'शेर' ही थे। हमें कुछ नया नहीं होता है, हमें तो जागरूक होकर वह महसूस करना है जो हम वाकई में हैं। गुरु एक बार शुरुआत होने के बाद कभी हमें फिसलने नहीं देगा और साथ रहेगा, जब तक कि हम पूरी तरह पल्लवित न हो जाएं। वह बार-बार हमें चेतन अनुभव की उच्च श्रेणियों तक ले जाएगा और तब तक यह प्रयत्न जारी रहेगा जब तक कि हम महसूस न करने लगें कि हम शाश्वत चेतना हैं, कि हमारी सारी छिपी संभावनाएं और क्षमताएं प्रकट हो चुकी हैं या हम चरम सत्य को ग्रहण करने लगे हैं। जितनी ज़्यादा हम अपने गुरु को इन शल्य क्रियाओं को करने देंगे उतने ही हम सत्य को समग्रता से महसूस कर पाएंगे। कुछ लोग तो शल्य क्रिया की

Content: श्रीमद्भगवत गीता 231

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Chapter Number: 16

Chapter Name: दैवासुर सम्पद्विभाग योग

Content: मानव एक अंतर्निहित दैवी प्रकृति के साथ जन्म लेते हैं; वे पापी नहीं हैं; लेकिन वैश्विक अनुकूलन उन्हें आसुरी वृत्ति देता है। कृष्ण बताते हैं कि वे कैसे पुनः दैवी हो सकते हैं।

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Chapter Number: 16

Chapter Name: दैवासुर संपद् विभाग योग

Content: तुम और मैं इस अध्याय को पारंपरिक रूप से दैवासुर संपद् विभाग योग कहा जाता है, अर्थात् वह योग जो दैवी और आसुरी प्रकृति की व्याख्या करता है। इसमें कृष्ण संस्कार या (गहरी जमी स्मृतियों) को और गहरे स्तर पर ले जाकर समझाते हैं। वे मन-शरीर तंत्र की गहरी ऊर्जाओं सतहों में जाकर हमें कॉस्मिक सतह तक पहुंचाते हैं। वह ऊर्जां जो इस पूरे अंतराल में व्याप्त रहती है; इस ब्रह्मांड को घेरे रहती है, 'ईथर' की ऊर्जां है - आकाश की ऊर्जा है। दैवी या आसुरी? कृष्ण यहां दैवी और आसुरी प्रवृत्तियों पर बात करते हैं। मज़ा यह है कि इन दोनों शब्दों की (अंग्रेजी में 'डिवाइन' और 'डेमॉनिक') की मूल धातु एक ही है यह कोई तुक्के से नहीं है, क्योंकि दोनों प्रवृत्तियों का आधार एक ही ऊर्जा है। यह एक साधारण चुनाव है-जब हम शब्द 'तुम' चुनते हैं तो हम दैवी हो जाते हैं और जब 'मैं' का चुनाव करते हैं तो आसुरी हो जाते हैं-बस! श्री रामकृष्ण परमहंस-प्राचीन भारत के एक प्रबुद्ध स्वामी-इस ऊर्जा के बारे में एक बड़ी सुंदर बात करते हैं। वे कहते हैं-“कोई ऊर्जा विनष्ट नहीं हो सकती; आपका प्रेम कभी नष्ट नहीं हो सकता। इसमें तो सिर्फ़ बदलाव ही हो सकता है वे कहते हैं कि जब बच्चा 'मैं-मैं' करता है ('अहम्'- 'अहम्' करता है) उसे काम करना पड़ता है, कष्ट पाना होता है, मार पड़ती है और त्रास मिलता है, पर जब यह मार दिया जाता है और इसकी खाल (तांत) से संगीत वाद्य बनते हैं तो यह उसी वाद्य के माध्यम से से 'तुमि...तुमि' ('तुम'-'तुम') कहता है। यानी मैं-मैं कहने में कष्ट पाता है और 'तुम-तुम' कहकर यह संगीत की रस-वृष्टि करता है और ईश्वर की महिमा गाता है।'' यह बंगाली भाषा में बनाया हुआ एक मनोहारी रूपक है। तात्पर्य, परमहंस का, यही है कि जब तक 'अमी-अमी' (मैं-मैं) का उच्चारण होगा हम औरों तथा स्वयं के लिए भी असुर रूप रहेंगे, लेकिन जैसे ही संज्ञीय परिवर्तन हम

Chapter Number: 16

Chapter Name: दैवासुर संपद् विभाग योग

Content: में करते हैं तो हम अपने लिए और सभी के लिए एक दैवी रूप अधित्यार कर लेते हैं। जैसा कहा जा चुका है, जमी हुई स्मृतियां या संस्कार कारणात्मक सतह (कॉजल लेयर) में गुथें रहते हैं। वे अनियंत्रित ढंग से काम करते हैं। इनके निर्णय बिना हमारे संज्ञान के लिए जाते हैं, पर चेतना की गहनता सतह - कॉस्मिक सतह पर हर निर्णय अपनी संज्ञेयता के अनुसार लेते हैं-'तुम' या 'मैं' या 'दैवी' या 'आसुरी' वृत्ति से संचालित होकर। जब हम 'तुम' के निर्णय लेते हैं तो हम दैवी गुणों को फैलाते हैं और जब 'मैं' के निर्णय लेते हैं तो आसुरी गुण फैलाते हैं। वस्तुतः ज्यादातर लोग यहां इसलिए बैठते हैं कि उनके 'अहम्' भाव को पुष्टि मिले। आखिर प्रवचन के माध्यम से उनका ज्ञान और से अधीक हो जाएगा न? वे औरों पर अपना ज्ञान झाड़ सकते हैं। कई बार हम सिर्फ अपना अहम् भाव बढ़ाने के लिए प्रवचन सुनते हैं। ऐसी मनःस्थिति वाले चाहे भले ही 'गीता' पर प्रवचन सुनें, उनको या किसी को कोई लाभ नहीं मिलेगा, उल्टे परेशानी ही बढ़ेगी। अपने और बिराने अर्थात् 'मेरे' और 'तुम्हारे' संबंधी सारे निर्णय कॉस्मिक सतह से संचालित होते हैं। यदि 'मेरे' के वर्ताव से लिए जाएंगे तो पूरी प्रक्रिया आसुरी हो जाएगी। इसके बरअक्स यदि 'तुम्हारे' के वर्ताव से निर्णय लिए गए तो पूरे माहौल में दैवी गुणों का संचार होगा। 'चित्त' अपने आप कभी ऋणात्मक या धनात्मक नहीं होता। न गुणों (सत्‍व, रज, तम) में कुछ धनात्मक या ऋणात्मक होता है। तामसिक गुण यथा आलस्य भी ऋणात्मक या धनात्मक नहीं होता। ऐसे कई प्रबुद्ध स्वामी हुए हैं जो सदैव अकर्मक ही रहे और कुछ भी करते नहीं दिखाई पड़े। वस्तुतः उनके वर्ताव में और किसी आलसी की गतिविधियों में कोई अंतर नहीं लगता था, उदाहरणार्थ भगवान रमण महर्षि पूरे जीवन एक छोटे से शहर तिरुवन्तमलई में ही रहे, कभी वहां से बाहर ही नहीं गए। ज्यादातर वे चुपचाप ही रहते थे, परंतु यह फिर भी नहीं कहा जा सकता कि वे तमस में लिप्त थे क्योंकि उन्होंने कोई निर्णय 'मेरी-मेरा' की मानसिकता से नहीं लिया था। उनकी सारी गतिविधियों का संचालन 'तुम या तुम्हारी' मानसिकता से होता था-'मेरी' इत्यादि से नहीं। इसी प्रकार हम चित्त को, मन को या संस्कार को अच्छा या बुरा नहीं कह सकते। ऊपर की अतिरिक्त सतहों में तो ऐसा कुछ नहीं होता। यह तो गहरी सतह, कॉस्मिक सतह से मालूम पड़ता है कि वे अच्छे हैं या बुरे हैं। वस्तुतः वासना या करुणा के पीछे काम करने वाली ऊर्जां तो एक ही होती है। जब हम

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Content: मैं और मेरा' करते हैं तब वह वासना होती है, जब 'तू और तेरा' करते हैं तो वही करुणा हो जाती है। एक चीज़ और स्पष्ट समझ लें। यदि हम अपने अंदर वासना को शिद्दत ज़्यादा महसूस करते हैं और करुणा की कम, तब यह हमारी करुणा की नकली अभिव्यक्ति है, शायद कुछ नाम या ख्याति के लिए बनाई हुई, असली नहीं। यदि हमारी करुणा वासना की तरह की तीव्रानुभूति वाली नहीं होगी तो हमारी सारी गतिविधियों का केंद्र हमारा 'अहम' भाव ही होगा। यह 'गीता' पर प्रवचन भी हमारी 'अहंमता' के लिए ही एक गिज़ा का काम करेगा, यदि हम 'मैं' और 'मेरे' के बारे में ही सोचते रहें। यदि हमारे निर्णय का आधार 'तुम और तेरा' है तो हमारी रोज़मर्रा की गतिविधियां भी दैवी हो जाएंगी, सिर्फ़ यह गीता का प्रवचन ही नहीं। हमें 'करने' पर इतना ज़ोर नहीं देना है जितना 'होने' पर देना है। 'करने' से कुछ प्राप्त होने वाला नहीं। यदि हम समझते हैं कि 'करने' से हम चरम पद तक पहुंच सकते हैं तो वह हमारा कर्म है। ऐसे को 'पूर्व मीमांसी' (मीमांसी अर्थात्‌ वैदिक कर्मकांड की शाब्दिक व्याख्या) कहते हैं। जब हम समझते हैं कि हमारा मात्र 'होना' हमें चरम पद तक ले जा सकता है तो हम 'उत्तर मीमांसी' (वह जो वैदिक क्रियाओं की व्याख्या 'वेदांत' दर्शन के आधार पर करते हैं) हैं। वेदों के अनुसार लोगों के प्राय: दो वर्ग होते हैं-वे जो कुछ 'करने' में विश्वास रखते हैं और वे जो मात्र 'होने' में विश्वास रखते हैं। जो 'होने' में बदलाव ला सकते हैं, 'वेदांती' कहे जाते हैं और जो 'करने' से बदलाव की संभावना बताते हैं वे कर्मकांडी कहे जाते हैं, परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि चरम पद 'होने' से भी मिलता है, 'करने' से नहीं, क्योंकि जब हम 'करते' हैं तो या ज़्यादा कर जाते हैं या कम करते हैं। इस कारण हमारा स्वयं से झगड़ा चलता रहता है और कुछ हाथ नहीं आता। वहां जो अपने 'होने' से अपने आपको बदल सके, चरम पद इसलिए पा सकता है। यह एक क्षण या बिन्दु आता है तब हमें तय करना होता है कि हम आसुरी प्रवृत्ति चाहते हैं या दैवी। जब हमें आंकड़े (सूचनाएं) प्राप्त होते हैं और हम एक प्रक्रिया के पश्चात्‌ उसका नतीज़ा या आदेश देते हैं तो यह कैसे दिया जाता है? वह कौन-सा केंद्र है, जहां से यह आदेश या नतीज़ा दिया जाता है? यदि यह आदेश इस विचार के साथ आता है "इसमें मेरे लिए क्या है... मुझे क्या मिलेगा?" तब हम जो भी करते हैं, भय, ध्यान लगाने के तो वह मात्र हमारे 'अहम' की तुष्टि करता है। कई लोग मुझसे कहते हैं-'स्वामी जी! एक क्षण ध्यान में ऐसा आता है जब उन्मादित आनंद की पराकाष्ठा मुझे महसूस होती है, पर अचानक ही

Content: श्रीमद्भगवत गीता 236 दो-एक घंटे के पश्चात्‌ वह अनुभूति तिरोहित हो जाती है और कभी दोबारा महसूस नहीं होती। ऐसा क्यों होता है? क्या यह अनुभूति कभी वापिस नहीं आ सकती?" यह समझ लें कि 'आनंदानुभूति' का अर्थ है विकल्प रहित महसूस करना। इसमें किसी चुनाव की कतई गुंजाइश नहीं। जब हमारा 'मैं' अनुपस्थित होता है; जब हमारी अस्मिता, पहचान गायब हो जाती है तब ही हमें 'आनंदानुभूति' होती है। जिस क्षण हमने वह आनंद वापिस चाहा, उस क्षण हमारी एक रुचि पैदा होती है और इस विकल्प के लिए करना, कष्ट को न्योता देना है। सारी चाहतें कष्टदायी होती हैं, क्योंकि उनका आधार हमारा मन (या दिमाग) होता है। यह स्वयं 'द्वैत' भाव पर आधारित होता है, पर आनंद तो विकल्प रहित स्थिति में मिलता है। यह तो 'द्वैत' भाव से परे है, यहां कुछ चुनना नहीं है। यह तो मन और चाह की सीमा से भी परे है, परंतु जैसे ही हमने आनंद को पकड़ने की चाह की कि आनंद हमारी पकड़ से छूटा, क्योंकि हमारी चाह का आधार मन है, जो तुलना करने लगता है और 'द्वैत' भाव में पड़ जाता है। इस रास्ते से तो आनंद कभी मिल ही नहीं सकता। जब हम आनंद मग्न होते हैं तो हम आनंद को स्वयं पर हावी होने देते हैं, पर जैसे ही आनंद पर हम स्वयं 'छाना' चाहते हैं कि हम मन के स्तर पर आ जाते हैं और आनंद छूट जाता है। जब हम आनंद को पकड़ना चाहते हैं तो हमारे अंदर 'मैं और मेरे' के भाव का वर्चस्व होता है, जिससे हमारा 'अहम' ही और तुष्ट होता है। 'मैं और मेरा' यह भाव ही आनंद-घातक होता है। तब हम दैवी हो ही नहीं सकते। जब आनंदपूर्ण होते हैं तो 'मैं और मेरे' का भाव नहीं रह सकता। तब तो हम 'तुम या तुम्हारे' के भाव से ओत-प्रोत रहते हैं। आनंद की चाह करना इसी 'मैं और मेरे' भाव को अपनी बागडोर सौंप देना है। 'तुम' और 'मैं'

Content: हमें 'तुम' और 'मैं' का फ़र्क़ समझना ज़रूरी है। 'मैं' शब्द का अर्थ है 'अहम्‌' भाव जागरण और 'तुम' का अर्थ है ईश्वर या परमात्मा। जब हमारी पहचान तिरोहित होती है, 'अहम्‌' विगलित होता है तो जो बाकी बचता है वह है परमात्मा अर्थात्‌ दैव तत्त्व! यह तो हमें हैं जो 'मेरे' भाव द्वारा असुर को पैदा करते हैं। यदि हम में 'मैं' का भाव है तो हम चाहें कुछ भी करें-ध्यान लगाएं, पूजा-पाठ या अर्चना करें, ज्ञान प्राप्त करना चाहें-हमारे सारे कार्य-कलाप केवल हमारे 'अहम्‌' को ही तुष्ट करेंगे और स्वाभाविक है कि 'अहम्‌' भाव हमें केवल कष्ट और अज्ञान ही देगा। इसके विपरीत हमारा कोई कर्म 'तू और

Content: श्रीमद्भगवत गीता 237

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Content: तera' के भाव से संचालित होगा तो वह हमें दैवत्व देगा और विशुद्ध आनंदप्रदायी होगा। संस्कृत में दो शब्द हैं- 'निःवृत्ति' और 'प्रवृत्ति'। निःवृत्ति का मूलार्थ है अपने अंदर झांकना यानी मुक्त होना। यह 'तेरे या तुम्हारे' भाव पर केन्द्रित रहता है। प्रवृत्ति का अर्थ है बाहर देखना या बंधन में बंधना। यह 'मैं और मेरे' पर केन्द्रित रहता है अर्थात् जो 'तुम या तेरे' से किया जाए वह मुक्ति प्रदायी होता है और जो 'मैं या मेरे' भाव से किया जाए वह बंधन में डालता है और कष्ट देता है। तो जब तक हम स्वयं पर केन्द्रित हैं, हम बंधनग्रस्त हैं—राग-विराग, आकर्षण-विकर्षण के बंधन में और इसीलिए भय व लालच से संचालित रहते हैं। ये दोनों भाव हमें बांधते हैं। मुक्ति के बंधन में डालते हैं और इस विषय-भोग के संसार में बंदी रखते हैं। ये सब हमारे अहंम् भाव या अस्मिता के 'उत्पाद' हैं। लेकिन जब हम अपने अहंम् को विगलित कर देते हैं। हम सीमा-रहित हो जाते हैं। फिर हम अपने स्वार्थी विचार 'मैं या मेरे' द्वारा सीमित नहीं होते हैं—अपने संकीर्ण संबंधों में बंध नहीं पाते हैं। हम पूरे विश्व के हो जाते हैं। कृष्ण इसी को 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की संज्ञा देते हैं। यदि हम अपने मन-शरीर तंत्र को अपनी सीमा मानते हैं तो हम शेष विश्व से कट-कटे रहते हैं। तब हमारा परमात्मा से द्वैत भाव रहता है—हम प्रकृति से जूझते हैं और समग्र से सदैव संघर्ष करते रहते हैं और यह तो स्पष्ट ही है कि 'अंश' कभी 'अखिल' से जीत नहीं सकता। हम जब भी कोई काम, कोई गतिविधि 'मैं और मेरे' भाव से संचालित होकर करते हैं तो हम जीवन की जटिलता और कष्ट को ही आकर्षित करते हैं अपनी ओर आने को। सारी जटिलताएं और कष्ट हमारे इर्द-गिर्द इकट्ठे हो जाते हैं। यहां कृष्ण बड़ी सुंदरता से दैवी और आसुरी वृत्तियों का विश्लेषण करते हैं। प्रारंभिक अध्यायों में अर्जुन ही मुखर था। वह अपनी अहमन्यता व्यक्त कर रहा था तथा उसका भाव-चेतन (या कैथेरिसिस) हो रहा था। धीरे-धीरे वह दूसरे स्तर पर आया; उसने कृष्ण को भी बोलने दिया और संवाद प्रारंभ हुआ; पर इन १५वें और १६वें अध्यायों में तो अर्जुन लगभग चुप ही रहता है। वह सिर्फ सुनता है। कोई प्रश्न नहीं; सिर्फ कुछ संशय। वह अपने गुरु से ज्यादा-से-ज्यादा स्पष्टीकरण प्राप्त कर अपनी समझ बढ़ाना चाहता है।

Chapter Number: 16

Chapter Name: दिव्यता के लिए अहरताएं

Content: 16.1, .2, .3 श्री भगवान बोले— भय का सर्वथा अभाव, अंतःकरण की पूर्ण निर्मलता, तत्व ज्ञान के लिए ध्यान योग में निरंतर दृढ़ स्थिति और सात्विक दान, इंद्रियों का निरंतर दमन, भगवत पूजा और औपनिषदिक उत्तम कर्मों का आचरण एवं वेद-शास्त्रों का पठन-पाठन तथा भगवान के नाम-गुणों का कीर्तन और स्वधर्म पालन के लिए कष्ट सहना, इंद्रियों सहित अंतःकरण की सरलता (शुद्धता); अहिंसा, सत्य (यथार्थ) और प्रिय भाषण, क्रोध का सर्वथा त्याग; कर्मों में कर्त्तापन के अभिमान का त्याग; चित्त में चंचलता का अभाव; किसी की निंदा न करना तथा सब प्राणियों हेतु दया; इंद्रियों का विषयों के साथ संयोग होने पर भी आसक्ति का न होना; कोमलता तथा लोक शास्त्र के विरुद्ध आचरण में लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव; तेज, क्षमा, धैर्य, बाहर-भीतर की शुद्धि एवं किसी के लिए भी शत्रु का भाव न होना और अपने में पूज्यता के अभिमान का अभाव—हे अर्जुन! ये सब तो दैवी सम्पदा प्राप्त पुरुष के लक्षण हैं। यहां कृष्ण उन सभी गुणों का उल्लेख करते हैं जो हमें चेतना के उच्चतर स्तर पर ले जाकर हममें दिव्यता का समावेश करते हैं।

Content: व्यवहार फर्क डालता है जब हम गुणों की इस फेहरिस्त के बारे में 'मेरे' भाव में सुनते हैं तो प्रायः हम क्या करते हैं? हम इन सबको अपने व्यवहार में लाने का अभ्यास प्रारंभ कर देते हैं, पर एक बात स्पष्ट है—यदि हम इन सभी गुणों को अपने अंदर लाने का

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Content: अभ्यास करेंगे तो हम पागल हो जाएंगे। हम कुछ भी नहीं कर पाएंगे, क्योंकि हम अपने से लड़ते रहेंगे। हम अपनी इन्द्रियों को नियंत्रित करने के प्रयास में अपने अहं भाव को दृढ़तर कर देंगे। जब हम इन गुणों की अपनी अहमन्यता के साथ ग्रहण करने का प्रयास करते हैं तो हमारा 'मैं-मेरे' का भाव और मज़बूत होता जाएगा और हम समझेंगे कि हम बेहतर जीव होते जा रहे हैं, परंतु हमारे गुरु जन, स्वामी गण सदा यही कहते रहे हैं कि वे बेहतर नहीं, पूरी तरह से बदले हुए जीव हैं। बेहतर जीव और बदले हुए जीव में अंतर होता है। कुछ दिन पूर्व मैंने आपको स्वामी विवेकानंद द्वारा बताई शेर और 'भेड़-शेर' की कहानी सुनाई थी। वह एक उम्दा कथा है, वह भेड़-शेर यह समझना ही नहीं चाहता कि वह एक शेर ही है। वह तो चाहता है कि वह एक दमदार, मज़बूत भेड़ हो जाए। वह शेर से यही कहता है कि वह उसे तरकीब बताए जिससे वह एक मज़बूत भेड़ हो जाए। इसी प्रकार यदि हम उन गुणों को आत्मसात करने का प्रयत्न करेंगे जो कृष्ण ने यहां बताए हैं तो हमारा अहं भाव भी पुष्ट होगा। इसी कारण तथाकथित तपस्वी (तप करने वाले लोग) लोगों का अहं भाव बढ़ जाता है, क्योंकि वे अपने आपको दबाते हैं, उसका दमन करते हैं। जो स्वयं का दमन करेगा उसका अहं भाव बढ़ता जाएगा। यह हम स्पष्ट देख सकते हैं कि उनमें ऐंठ बढ़ जाती है। लेकिन जब हम सहज भाव से, चैनपूर्वक अपना जीवन-यापन करते हैं तो वैराग्य का भाव स्वतः ही आता है। मैंने कई संन्यासियों को खासतौर से भारत में देखा है, जो गृहस्थ लोगों की आलोचना करते रहते हैं कि वे पवित्र नहीं हैं और पापी हैं। जब हम तपस्या या वैराग्य को अपने ऊपर ज़बरदस्ती थोपते हैं तो हम अंदर-ही-अंदर जलते भी हैं और इसके साइड इफेक्ट के रूप में हमारे मन में कई बार अपने रास्ते के बारे में शक भी पैदा होते रहते हैं। यह शक हमें कुछ-न-कुछ ऐसा ही करवाता रहता है और हम दूसरों को, उनके अपने चुने हुए पथ के बारे में अपराध-बोध से ग्रसित कर देते हैं। हम दूसरों में यह अपराध बोध पैदा करते हैं कि उनका रास्ता गलत है, क्योंकि हम समझते हैं कि हमारा रास्ता ही सही है। यह खासतौर पर तब होता है जब लोग हमारे पास आकर अपनी गलतियों को कबूल करते हैं। दूसरों के कबूलनामों को सुनकर भी हमारा अहं दृढ़ होता है। श्रोता सुनकर स्वयं को मज़बूत महसूस करता है। जब दूसरे स्वयं को गलत कहते हैं तो अपरोक्ष रूप में वह स्वयं को सही समझता है, ज़्यादा पवित्र समझता है। जब हम अहं भाव द्वारा संचालित होकर कोई तप करते हैं तो हम चाहते हैं कि दूसरे स्वयं को

Content: श्रीमद्भगवत गीता 240 गलत समझें और हमारे सामने आकर यह बात कबूलें। हमें ताकत मिलती है दूसरों की गलतियाँ सुनकर और हम मज़बूती से दूसरों को पापी कहते हैं। स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि एकमात्र पाप है किसी अन्य को पापी कहना। तप तो सहज भाव से स्वयं होने वाला परिवर्तन है, जो हर्ष व आनंद के कारण घटित होता है। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया होती है। कोई भी काम बलपूर्वक किया जाएगा तो उससे न हमारा कोई भला होगा, न समाज का। समाज भी हमें बताता रहता है कि हम पापी हैं। पहली बात, यह सत्य नहीं है। कोई भी प्रबुद्ध स्वामी जिसने दिव्यता का अनुभव किया है यह कहने के योग्य नहीं होता। दूसरी बात सबको पापी बताने में किसका लाभ होता है? यदि कोई धार्मिक संगठन लोगों को आश्वस्त करता है कि वे पापी हैं तो वह संगठन कभी उन लोगों को नियंत्रित नहीं कर सकता और जब तक कोई संगठन लोगों को नियंत्रित नहीं करेगा, वह चल ही नहीं सकता। केवल दो ही तरीके हैं जिनके द्वारा कोई संगठन जीवित रह सकता है और वृद्धि को प्राप्त हो सकता है-भय और लालच द्वारा। या तो वह लोगों में लालच भरकर उन्हें अपनी ओर खींच सकता है या उनमें भय डालकर उन्हें भयभीत कर सकता है। कृष्ण कहते हैं कि न लालची बनो, न भयभीत हो। वे कहते हैं कि क्रोध भी छोड़ दो, सत्यवादी रहो, साधारण, सौम्य और विनम्र रहो, अहिंसक रहो, निष्काम भाव से काम करो और त्यागी बनो-यही वे गुण हैं दिव्यता के। यही वे गुण हैं जो आपके व्यवहार में आते हैं जब आपका ध्यान अपने पर नहीं वरन् दूसरों पर केंद्रित रहता है। ये सारे गुण हृदय से प्रकट होते हैं मस्तिष्क से नहीं, ये प्रेम की उत्पत्ति है वासना या कामना की नहीं। ईश्वर के विचार मात्र को आप में प्रेम का संचार करना चाहिए, भय का नहीं। ईश्वर हर धर्म में करुणामय माना गया है। किसी भी प्रबुद्ध स्वामी ने इसके अतिरिक्त न कोई अनुभव किया है, न कभी अभिव्यक्त ही किया है। भय एवं प्रतिहिंसा संचार करने वाले ईश्वर की छवि मानव की अपनी रुची वृत्ति है। यह तो आदमी की करनी है, एक को दूसरे से लड़वाकर फूट डालो और उन्हें नियंत्रित कर उन पर विजय पा लो। ईश्वर आप और मुझ में, सबमें निवास करते हैं। हम जो भी करते हैं, उसका हमें ज्ञान रहता है। यदि हम कोई गलती करते हैं तो हमें उसका भी पता रहता है। किसी को बताने की ज़रूरत नहीं है, वही हमारा पाप बन जाता है। यही अपराध बोध हमारा जीवन नरक बना देता है। श्रीमद्भगवत गीता 241

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Chapter Number: 16

Content: हे पार्थ! दम्भ, घमंड, अभिमान तथा क्रोध, कठोरता और अज्ञान भी, ये सब आसुरी संपदा लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।

Chapter Number: 16

Content: (इन दोनों प्रकार की संपदाओं में) दैवी संपदा मुक्ति के लिए और आसुरी संपदा बंधन के लिए मानी गई है। इसलिए हे पाण्डव (अर्जुन)! तू शोक न कर क्योंकि तुझे दैवी संपदा प्राप्त है।

Chapter Number: 16

Content: पार्थ! इस लोक में मनुष्य समुदाय दो प्रकार का है-एक दैवी प्रकृति वाला और दूसरा आसुरी प्रकृति वाला। दैवी प्रकृति के बारे में तो विस्तार से बताया गया है। अब तू आसुरी प्रकृति के बारे में विस्तार से सुन।

Chapter Number: 16

Content: आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति-इन दोनों को ही जानते। इसलिए न तो उनमें बाहर-भीतर शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण और न ही सत्य भाषण।

Content: आसुरी वृत्ति या प्रकृति क्या है? कृष्ण कहते हैं कि हर वह कर्म जो घमंड, दर्प, अहंम, नाम और प्रसिद्धि या शक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से किया गया है, आसुरी प्रकृति बताता है जैसा कि रावण के मामले में है। वे न उस व्यक्ति को लाभ पहुंचाते हैं, न दूसरों को। ये सब कर्म अज्ञान के कारण होते हैं और अंततः पतन की ओर ले जाते हैं।

Content: मैंने कई लोगों को रावण की तरह तप करते देखा है, परंतु रावण जैसे तप से न उसका ही भला हुआ, न दूसरों को कोई लाभ पहुंचा। वह तो स्वयं के लिए और दूसरों के लिए असुर ही बन गया। उसने पहले दूसरों को मारा और अंततः स्वयं को ही मार दिया। उसकी पूरी कथा 'मैं और मेरे' भाव को ही मज़बूत करने की दاستان है। यह समझ लें कि जो भी दान-पुण्य, परोपकार, पूजा-पाठ, ध्यानादि, यदि 'मैं और मेरे' भाव को दृढ़ता देते हैं तो वह कष्ट का कारण होता है।

Content: 'मैं' पर ध्यान देना तो सहज वृत्ति सभी की होती है। यह तो जिजीविषा की मांग है जो हमारे सामाजिक अनुकूलन एवं असुरक्षा भाव द्वारा संचालित

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Content: होती है। 'मैं' का मूल अर्थ ही है जीते रहने की अदम्य कामना। इस मांग के कारण 'मेरा-मेरी' का भाव पैदा होता है जो व्यक्ति जानता है कि यह अज्ञान और भ्रम की उत्पत्ति है, जागरूक व्यक्ति है। यह व्यक्ति जानता है कि यह जीने की सहज वृत्ति कोई खास सहायता नहीं करती और भले ही यह जिजीविषा कितनी तीव्र हो, कोई सदा जीवित तो नहीं ही रह सकता।

Content: यह सहज वृत्ति को जिजीविषा एक विशुद्ध भ्रम ही है। ज्यादा-से-ज्यादा हम 70 से 80 वर्ष तक जीवित रहते हैं, कभी-कभी 90 और 100 साल तक की भी किसी की उम्र हो सकती है, परंतु यह जिजीविषा इसे निरंतर बढ़ाना चाहती है और स्वयं को शाश्वत करना चाहती है, क्योंकि मरना तो कोई नहीं चाहता। स्वाभाविक है कि हम कष्टों की ओर ही चलते रहेंगे। जब तक यह सहज वृत्ति वाली जिजीविषा रहेगी हम स्वयं को आहत ही करते रहेंगे।

Content: आज सुबह ही एक आश्रमवासिनी महिला ने शिकायत की कि वह दूसरों के द्वारा उसके भले के लिए की गई आलोचना से आहत हुई। वह बोली कि वह बहुत संवेदनशील है। मैंने उससे कहा कि इस शब्द का प्रयोग न करें। मैंने कहा-"तुम संवेदनशील नहीं हो। संवेदनशील व्यक्ति तो ऐसे व्यक्तित्व का मालिक होता है जिससे शब्द आर-पार हो जाते हैं। सिर्फ घमंडी लोग ही आहत होते हैं तो यदि हम आहत होते हैं (किसी की आलोचना से) तो हम घमंडी हैं। हम पत्थर की भांति अभेद्य हो जाते हैं, तभी तो किसी के शब्द हम से टकराकर हमें आहत करते हैं तो यह न कहें कि मैं संवेदनशील हूं।"

Content: संवेदनशील व्यक्ति शब्दों को उससे होकर गुजरने देता है। वह कभी उनसे कष्ट नहीं पाता। हमें शब्द तब आहत करते हैं जब हम उन्हें रोकते हैं, जब हम उनका प्रतिरोध करते हैं और अपने हिसाब से उनका अर्थ गढ़ते हैं। जब हम शब्दों से अपना अर्थ नहीं गढ़ते तो एक कष्ट नहीं पाते। यह तो शब्दों से खेल करना होता है। हम वे शब्द अच्छे समझते हैं और उन्हें ही चुभते हैं जो हमारे अहं भाव को सहारा देते हैं। हम कभी नहीं कहते-"मैं आहत हुआ हूं क्योंकि मैं घमंडी हूं" हम शब्दों पर पुलिस मारकर कहते हैं-"मैं आहत हुआ हूं क्योंकि मैं संवेदनशील हूं।"

Content: आप कृपया शब्दों से स्वयं को धोखा न दें। सीधे-सीधे शब्दों का प्रयोग करें। मैं ऐसे पॉलिश्ड शब्द अपने चारों ओर सुनता रहता हूं। इनके प्रयोग से लोग स्वयं को आसानी से छल लेते हैं। ऐसे शब्दों से स्वयं को छलना बंद करें, बात स्पष्ट व सीधी करें। हम पॉलिश्ड शब्दों से दूसरों को छल सकते हैं, पर उनका प्रयोग स्वयं को छलने को न करें।

Content: एक लघु कथा

Content: एक ठेकेदार स्पोटर्स कार एक अफसर को भेंट करना चाहता था। उस अफसर ने भेंट लेने से इनकार करते हुए कहा-"मैं एक ईमानदार व्यक्ति हूं और यह कार लेने की सोच भी नहीं सकता।"

Content: तब ठेकेदार ने कहा-"तो ऐसा करें यह कार मुझसे आप 10 डॉलर्स में खरीद लें?"

Content: उस अफसर ने कहा-"तब तो मैं ऐसी दो कार खरीद लूंगा।"

Content: तो शब्दों के साथ न खेलें। स्वयं को शब्दों से न छलें। हमें अपना आशय स्पष्ट रखना चाहिए। हमें ईमानदारी से अपना आशय स्पष्ट करना चाहिए और बताना चाहिए कि हम क्या चाहते हैं, गोल-मोल बात नहीं करनी चाहिए। रामकृष्ण कहते हैं-"दिमाग और शब्दों को सीधा रखो।"

Content: जो भी बात करो, स्पष्ट कहो। कम-से-कम तब तो हमारी समझ में आएगा कि हम किसी समस्या में फंसे हैं। जब रंग-बिरंगे और पॉलिश्ड शब्दों का प्रयोग होगा तो धीरे-धीरे हम अपने उलझाव में अपनी समस्या के प्रति भी विमुख हो जाएंगे। हम यहीं भुला देंगे कि हम किसी समस्या से जूझ रहे हैं और यह स्थिति बेहद खतरनाक होती है।

Content: यह समझ लें कि जब हम जानते हैं कि हम नहीं जानते तो कम-से-कम हम सत्य तो समझते हैं, लेकिन जब नहीं जानते कि हम नहीं जानते तो वाकई हम नहीं जानते कि हम नहीं जानते। तब समस्या खड़ी होती है। यह स्पष्ट समझ लें कि हम अपनी समस्या को शब्दों की झाड़ में झुठलाएं नहीं।

Content: शब्दों का सदैव सीधा प्रयोग करें। दो बिंदुओं के मध्य एक सरल रेखा कम-से-कम दूरी की द्योतक होती है। किसी भी चीज को पाने का रास्ता सदैव सीधा, स्पष्ट और बेबाकी पूर्ण ही होता है और किसी से कोई नहीं चलेंगा।

Content: दिव्यता को जीना

Content: यहां कृष्ण सारे दिव्य गुणों को एक-एक करके बताते हैं। सारे गुणों की व्याख्या करना जरूरी नहीं है। हम यहां कुछ को ही स्पष्ट करेंगे, उदाहरणार्थ निर्भयता को लेंगे।

Content: जब तक हमारे अंदर जिजीविषा का भाव रहेगा, हम भयाक्रांत तो रहेंगे ही। यानी जब तक हमारी जीने की इच्छा है, तब तक भय हमारे मन में रहेगा ही। यह तो निर्भयता प्राप्त करने के लिए ईश्वर को, मृत्यु को अपना आत्मसमर्पण करना ही एकमात्र रास्ता है।

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Content: हिन्दू शास्त्र-उपनिषदों में एक सुंदर उपनिषद है—‘कठोपनिषद’। इसे आप लोग ज़रूर पढ़ें। यह वेदों के सार और उपनिषदों के लिए लिया ज्ञान है जिनके रचियता प्राचीन ऋषिगण थे। इन लोगों ने मृत्यु की प्रक्रिया का गहन अध्ययन किया है। जहां पश्चिम में सारी ऊर्जा जीवन के अध्ययन में लगा दी है, वहीं पूर्व के मनीषियों ने अपनी ऊर्जा मृत्यु के अध्ययन में लगाई है। इसलिए शायद मृत्युोपरांत भी ऋषिगण जीवित रहते हैं। वे अस्तित्ववान रहते हैं क्योंकि उन्होंने मृत्यु के परशात् भी जीवित रहने की कला खोजी है, लेकिन जो लोग इस विषय-वस्तुओं वाले संसार में उलझे रहते हैं, वे तो मानो जीवन में ही हर क्षण मरते रहते हैं। कठोपनिषद मृत्यु का विज्ञान बताती है। इसमें एक बालक नचिकेता की कथा है जो यम के लोक जाता है। यम मृत्यु के देवता हैं। लेकिन जब नचिकेता उनसे मिलने उनके लोक पहुंचा तब वे वहां नहीं थे। उनके नौकरों (दासों) ने ही नचिकेता का स्वागत किया, पर नचिकेता ने कहा कि मैं यम के आने तक वहीं रहूंगा। उसके आने के तीन दिन बाद यम से उसकी मुलाकात हो पाती है। यम उसका स्वागत करते हैं। यहां यह स्पष्ट समझ लें कि मृत्यु के लोक में कोई नहीं (जीवित) जा सकता। यम तो स्वयं हमारे लोक में आता है। सदा वही आता है (जब हमारी मृत्यु होती है)। जब हम उससे भागने का प्रयास करते हैं तो वह चूंकि मृत्यु का स्वरूप होता है, वह हमारा ‘मैं और मेरे’ का भाव और इस तरह से हमारे सारे संबंध और चीजें हर लेता है। फिर तो न हम अपने ‘चैकों’ पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, न अपनी कार चला सकते हैं। फिर तो सारे संबंध शेष हो जाते हैं। यानी जो कुछ भी हमारा है वह हमसे दूर हो जाता है—धन, संबंध, वैभव-संपदा इत्यादि। यानी हमारा कुछ भी नहीं रहता। हमारे ‘ममतव’ का ज्वलंत प्रतीक हमारा शरीर भी हमसे छिन जाता है। मृत्यु से हम ‘अपना’ सब कुछ गंवा देते हैं, पर हम जब मृत्यु लोक में जाते हैं, जैसा नचिकेता ने किया तो हम निर्णय करते हैं और मृत्यु हमारा स्वागत करती है। तब यम हमारा मेजबान होता है। इस कथा में यम नचिकेता का स्वागत बड़े प्रेम और सम्मान से करता है और तुरंत ही एक बेहद सदय मेजबान हो जाता है। यम नचिकेता को तीन वर भी देता है। पहले वर के रूप में नचिकेता अच्छे संबंध मांगता है। वह कहता है—“जब मैं अपने परिवार में वापिस जाऊं तो मेरे पिता मुझे सहर्ष अपना लें।” यम यह वर उसे देता है। फिर यम उसे धन-संपत्ति का वरदान देता है और बताता है कि कैसे धन-संपदा अर्जित की जाए तथा अनन्य सुख और आराम प्राप्त किया जाए। यम यहां एक करुणापूर्ण ईश्वर के जैसे व्यवहार करता है। अंततः यम नचिकेता को आत्म-ज्ञान प्रदान करता है अर्थात् पहले यम एक सदय मेजबान की तरह बर्ताव करता है, फिर एक करुणापूर्ण ईश्वर की तरह। आखिर में वह उसे अपने असली तत्व का ज्ञान प्राप्त करने के लिए सक्षम करता है। यह तीसरा वरदान नचिकेता को इसलिए दिया जाता है क्योंकि उसने मृत्यु का रहस्य जानने की इच्छा जताई थी। उस बालक (नचिकेता) की सदाशयता, ईमानदारी और साहस से प्रभावित होकर यम उसे प्रबोधन भी प्रदान कर देते हैं। ज़रा जीवन के इस विरोधाभास पर नज़र डालें, जब हम मृत्यु से भयभीत होकर भागते हैं तो यम हमारा पीछा करता है, चाहे हम कहीं भी हों। मृत्यु हमारी सब कुछ छीन लेती है, हमारी पहुंच, धन-संपदा, संबंध अर्थात् ‘मैं और मेरे’ का भाव, पर यहां नचिकेता के मामले में सब कुछ उल्टा हो रहा है। जब हम यम के सामने अपना आत्म-समर्पण कर देते हैं तो यम एक सदय मेजबान की तरह बर्ताव करता है। वह ऐसा भयावह देवता नहीं लगता है, जैसी हमारी कल्पना होती है। हम यमराज की कल्पना एक ऐेसे देव की तरह करते हैं जो काला है, हाथ में पाश (बंधन की रस्सियां) पकड़े है, भैंसे पर बैठा है, बड़ी-बड़ी मूछें हैं तथा बेहद घमंडी एवं आक्रामक बताव वाला लगता है। पर यहां तो दृश्य बिल्कुल दूसरा ही है। यम कहता है—“स्वागत है! तुम तो अग्नि-देव के रूप हो।” एक अतिथि को भगवान अग्नि की तरह समझना, पुरानी परंपरा है जिसकी हम आराधना करते हैं। वैदिक संस्कृति की उक्ति है—“अतिथि देवो भव!” अर्थात् अतिथि भगवतरूप होता है। अतिथि का मूल अर्थ है वह व्यक्ति, जो बिना तिथि (तारीख) निर्धारित किए आपके दरवाजे पर आता है—न कोई ई-मेल, न फोन, न फैक्स, पर वह हमसे अपेक्षा करता है कि हम एयरपोर्ट पर उसे लेने पहुंच जाएं। जो व्यक्ति पूर्व सूचना देकर आता है वह अ-तिथि नहीं होता। वह तो हमारा संबंधी है, उसका तो हम ख्याल करेंगे ही। उसका मामला अलग है, वह तो आपसी संबंध व्यापार का हिस्सा है, पर एक अतिथि एकदम अलग बात है। पहले यह समझ लें कि हमारे सारे संबंध किसी-न-किसी रूप में व्यापार-संबंध ही हैं, जबकि अतिथि वह व्यक्ति होता है जो अचानक हमारे जीवन में सीधा प्रविष्ट होता है और मुक्त भाव से रहने लगता है। आज की समस्या यह है कि अतिथि की यह अवधारणा अब है ही नहीं। लोगों को विश्वास करना मुश्किल है कि आज भी भारतीय गांवों में सारे घरों के दरवाजे़ दिनभर खुले रहते हैं। कम-से-कम जिस गांव में मेरा पालन-पोषण हुआ था, उसमें तो ऐसा ही था। मैं किसी भी घर में आराम से जा सकता था और कुछ भी खा सकता था। कोई भी बालक ऐसा करने को स्वतंत्र था, पर अब अतिथि का यह भाव ज़्यादातर जगहों से तिरोहित हो चुका है। जब लोग कहते

Content: श्रीमद्भगवत गीता

Content: श्रीमद्भगवत गीता

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Content: हैं-" भारत एक गरीब देश है" तो मैं जवाब देता हूं-"नहीं! तुम लोग भारतीय संस्कृति की कदर ही नहीं कर पाते।" उदाहरणार्थ जब हम किसी विकसित देश में भ्रमण करते हैं और किसी नए शहर में व्यापार के काम से जाते हैं तो हम कितना धन होटलों में रहने और खाने पर व्यय कर सकते हैं? पर भारत का तरीका अलग है। यदि कहीं एक भी मित्र है तो हमें बस उसको फोन करना है-सारी सुख-सुविधाएं हमारे लिए तुर्त उपलब्ध हो जाएंगी, पर भारत में भी अब सांस्कृतिक हमलों के कारण यह खातिरदारी की भावना विलुप्त होती जा रही है, पर गांवों में यह मूल वैदिक संस्कृति अभी भी जीवित है। इसलिए अतिथि-परंपरा भी आज तक जीवित है। वहां तो अभी भी 'अतिथि देवो भव:' अर्थात् मेहमान भगवान है, की भावना अभी भी कायम है। यम नचिकेता से कहते हैं-"तुम मेरे अतिथि हो और तुम मेरे लोक में वैश्वानराग्नि (पूजा की अग्नि) के रूप में पधारे हो।" पुजारी को ही अग्नि का रूप माना जाता है यानी अग्नि का दिव्य रूप। पुजारी वह जो पूजा करवाता है। यम कहते हैं कि तुम मेरे लोक में एक दिव्य रूप में पधारे हो। मुझे तुम्हें सम्मानित करना है। मुझे क्षमा कर दो कि जब तुम यहां आए, तुम्हारा स्वागत करने को यहां नहीं था। मेरी तीन दिन की अनुपस्थिति के लिए मैं माफी मांगता हूं। वैसे तो हम प्रायः यम को (मृत्यु को) टालना ही चाहते हैं, इससे बचना ही चाहते हैं, पर जब हम स्वयं उसकी खोज में जाते हैं तो वह वहां नहीं मिलता जहां उससे मिलने का हमें डर रहता है, इस पूरी कहानी का मर्म यहां प्रायः यम हमारा पीछा करता है। वह हमारे पीछे रहता है और हम भागते फिरते हैं, पर जब हम मुड़कर उसके पास स्वयं ही जाते हैं तो वह नहीं मिलता। तीन दिनों तक यम नचिकेता को नहीं मिला था। यह महत्वपूर्ण बिंदु है, इसका समझ लें। इस कथा का मर्म जो सहीति सत्य उद्घाटित करता है, जब नचिकेता मृत्यु के निकट गया तो उसे मृत्यु नहीं मिली। यानी जब हम मृत्यु के पास स्वयं जाते हैं, मृत्यु हमें नहीं मिलती। हमारी कल्पना सच नहीं होती अर्थात् मृत्यु के बारे में हमारी कोई कल्पना सच नहीं होती। जब हम स्वयं उसके सामने आत्मसमर्पण करते हैं तो जब हम भयभीत होकर भागते हैं। मृत्यु हमारे पीछे होती है। वह हमारा इसलिए पीछा करती है क्योंकि हम उससे भागना चाहते हैं। यह एक विषय चक्र बन जाता है। हमें इसे समझना चाहिए। समर्पण के समय यम वहां नहीं होगा, जहां हम सोचते हैं कि वह होगा। उसको वहां न पाकर हमारा साहस बहुत बढ़ जाएगा। यह साहस हमें उसका सामना बहादुरी से करने को प्रोत्साहित करेगा। जब उसका सामना हम हिम्मत से करते हैं तो हमारा

Content: साहस और बढ़ता है। यह तो एक गुण पूर्ण चक्र (वर्चुअस सर्किल) बनता जाता है, लेकिन जो हम डरकर करते हैं वह एक विषय चक्र में फंसता है। हमें इस विषय चक्र को गुणपूर्ण चक्र में बदलना ज़रूरी है। यदि हम कठोपनिषद की इस कथा का मर्म समझ सकें तो मृत्यु के बारे में हमारी सारी धारणा ही बदल जाएगी। पहले हम उसको खोजते हैं वह नहीं मिलता। दूसरी बात जब वह मिलता है तो वह वैसा नहीं लगता जैसी हमारी कल्पना होती है। वह बज़ाय एक भवावह घमंडी देव के, जो हमसे 'हमारा सब कुछ' छीनने वाला है, वह हमें एक सदय मेजबान की तरह लगता है, जो हमें गरिमापूर्ण अभिवादन प्रदान करता है। तब वह एक करुणापूर्ण ईश्वर की भांति प्रतीत होता है, जो हमें न सिर्फ धन-संपदा, अच्छे संबंधों का वरदान देता है वरन आत्मज्ञान भी कराता है। हमें प्रबुद्ध कर देता है। तो हम पूछ सकते हैं कि मृत्यु की ओर कैसे जाएं उदाहरणार्थ-"क्या आत्म-हत्या कर लें?" पर यह समझ लें कि आत्म-हत्या मृत्यु का सामना करना नहीं है। आत्महत्या करने वाले लोग निर्भय नहीं होते। वस्तुतः वे तो बेहद कायर होते हैं। वे आत्महत्या इसलिए करते हैं क्योंकि वे जीवन जीने के योग्य नहीं रह जाते। वे तो आत्महत्या की आड़ में जीवन से पलायन कर जाते हैं। आत्महत्या जीवन से भागना है, मृत्यु से साक्षात्कार नहीं है। जीवन से पलायन करना एक बात है और मृत्यु का सामना करना बिल्कुल दूसरी बात, दोनों में ज़मीन-आसमान का अंतर है। जब हमारे शरीर-मन तंत्र में ध्यय पैदा होता है या हम भयाक्रांत होते हैं तो एक मात्र रास्ता है इसको गुज़ारने देना। इसको स्वयं पर हावी मत होने दो। कुछ लोग कहते हैं कि उन्हें भय के भाव से बड़ा डर लगता है अरे, भय ही काफी है। इसमें डर क्यों जोड़ते हो? भय को स्वयं पर हावी मत होने दो, अपना आप पहचानो, इसको समझो। भय से कितना बच सकते हो या भय से कितना भाग सकते हो? इसे सतह पर आने दो, बाहर निकलने दो। हो सकता है आपका पूरा अस्तित्व हिल जाए; आंखों से आसू निकलने लगें और अवसाद आपको जकड़ ले। जो होता है उसे होने दें। चाहे आप चेतन रूप से भय को हावी होने दें या न होने दें, भयावह घटनाएं तो होती ही रहेंगी। इसलिए बेहतर यही है कि उसका सामना पूरी स्पष्टता और साहस से किया जाए। हम अपने भय को पांच वर्गों में बांट सकते हैं। पहला भय है-धन, सुख-सुविधा का खोना। दूसरा है-किसी बीमारी या दुर्घटना के कारण शरीर का कोई अंग खोना; तीसरा अपने निकटतम संबंधियों या घनिष्ठों की मृत्यु का भय; चतुर्थ- अपनी समझ या मानसिक क्षमता खोने का भय और पंचम है अज्ञान का

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Content: भय अर्थात मृत्यु का भय या भूत इत्यादि का भय। यही पांच मुख भय होते हैं जो हमें आक्रांत करते रहते हैं। हमारे समस्त भय इन्हीं पांच वर्गों में आ सकते हैं।

Content: इन्हें सतह पर आने दें। हर भय को बाहर आने दें। अपने मन को इन भयों का सामना करने दें। इन्हें दबाएं नहीं, उभारने दें। देखें क्या होता है। यही तो होगा कि अवसाद हमें घेरेगा, आंख से आंसू टपकेंगे। सारा शरीर कांपने लगेगा। होने दीजिए। आप कर भी क्या सकते हैं? जो कर सकते थे वह तो आपने अभी तक कर ही लिया होगा। साफ बात है कि आपका होना यह सिद्ध करता है कि आप इस बारे में कुछ भी नहीं कर पाए। इसलिए तो आप चुप बैठे हैं। इन भयों को प्रकट होने दीजिए। यह भय सामने लाइए।

Content: इस भय को अपने चेतन सतह तक, बिना दबाए बाहर आने दें। यह स्वीकार कर लें कि ये सारे भय सच साबित होंगे। यथा आपकी धन-संपत्ति की चोरी हो जाएगी; आप दुर्घटनाग्रस्त हो जाएंगे; किसी निकट एवं घनिष्ठ संबंधी की मृत्यु हो जाएगी या आप स्वयं भी मर जाएंगे। ये सारी संभावनाएं सच हो सकती हैं। हां, तो? क्या हो सकता है? यही तो जीवन है। इसे ही कहते हैं सच्चाई का सामना करना।

Content: यह तो सिर्फ नन्हे-नन्हे बच्चों को जरूरत होती है कपोल-कल्पनाओं की वास्तविकताओं का सामना करने के लिए, पर हमें तो सत्य को वैसे ही समझना चाहिए जैसा वह है। हम सच्चाई से भाग तो नहीं सकते। सत्य से पलायन नहीं कर सकते, क्योंकि हम इससे जितना दूर भागना चाहेंगे, यह उतना ही हमें भयाक्रांत करेगा, हमारे पीछे पड़ा रहेगा, पर जब हम इन भयों का सामना करते हैं; इन्हें बाहर आने देते हैं तो अचानक हमें लगेगा कि यह हमसे दूर जा रहे हैं। तब हम ज्यादा जिम्मेदार और शिद्दत पूर्ण महसूस करने लगते हैं।

Content: अकृतज्ञता से कृतज्ञता की ओर

Content: जब हमें लगता है कि हमारा स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहेगा तो हम इसकी ओर से लापरवाह नहीं होते। तब हम ज्यादा समझदारी से जीवन जीने लगते हैं। जब हमें लगता है कि हम जीवित ही नहीं रहेंगे, जब मृत्यु का भय हमारे मन में घुस जाता है तब हम जीवन की कदर पूरी जिम्मेदारी से करने लगते हैं। तब हमारी समझ में आता है कि यह परमात्मा की कितनी बड़ी देन है।

Content: चीजों को लापरवाही से लेने को रेखांकित करने वाली एक लघुकथा

Content: एक राजा था जो 45 वर्ष तक अपने जीवन को संपूर्ण सुख-सुविधा से बिताने से ऊब चुका था। उसके पास सभी कुछ था-धन-संपदा, सुख-सुविधा एवं अन्य ऐश-ओ-आराम के साधन। जो कुछ भी सुख वह उनसे भोग सकता था, भोग चुका था। अब उसके पास उत्तेजित या जीवंत होने के लिए कुछ भी बचा नहीं था। वह बहुत 'बोर' होता रहता था।

Content: यह समझ लें कि जब सारे विषय-भोग, सुख-साधन आपके पास उपलब्ध हों तो आप में एक गहरी ऊब की भावना भरने लगती है। अभाव में कम-से-कम कुछ और पाने की इच्छा तो रहती है। इससे प्रेरित होकर हम वह प्राप्त करने का काम करते हैं। तब जीवन में एक निरंतरता का भाव आता है। जीने की इच्छा जागृत होती है, सामने कोई लक्ष्य रहता है। जब सब कुछ ही उपलब्ध हो तो फिर किसके लिए जिए? कुछ भी नहीं होता। इसलिए यह कभी न सोचें कि हमारे पास जब सब कुछ होगा तो हम खुश रहेंगे।

Content: तो वह राजा भी महसूस करता था कि मानों वह नरक में है। अवसाद और बोरियत उसका जीवन नर्क बना रहे थे। उसका अपने कमरे से बाहर जाने का भी मन नहीं होता था। रातों-दिन, वर्षों तक वह ऐसे ही लेटा रहता था। उसके मंत्रीगण चाहते थे कि कैसे भी राजा को बाहर लाया जाए, जीवन में कुछ उत्साह पैदा किया जाए। वे उसके लिए देश-विदेश से हर उत्तम सुख-सुविधा मुहैया करते रहते थे, पर कोई फर्क नहीं पड़ता था। राजा का एक स्थायी ज्वाब था-"मुझे कुछ नहीं चाहिए, मुझे कुछ नहीं मत दो।"

Content: अंत में उन्होंने एक काम करने का निर्णय किया। कहा-"हे राजन्! यहां जंगल में एक प्रबुद्ध स्वामी आए हुए हैं। शायद वे आपकी सहायता कर सकें। आप उनसे एक बार मिल तो लें। हो सकता है आपके मन का अवसाद और बोरियत खत्म हो जाए। उस स्वामी ने कई लोगों को ठीक कर दिया है।"

Content: पर राजा बोला-"मुझे कहीं नहीं जाना है।" मंत्रीगण ने कहा-"महाराज! एक बार कोशिश करके तो देखिए।"

Content: जब मंत्रीगणों ने बहुत कहा तो राजा मान गया-"अगर तुम लोग कहते हो तो एक बार प्रयास करके देखता हूं।"

Content: राजा के मन में बहुत-से संशय और प्रश्न थे। उसे उस स्वामी पर ज्यादा विश्वास भी जम नहीं पा रहा था। वह सोच रहा था-"क्या पता यह स्वामी

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Content: प्रबुद्ध भी हैं कि नहीं।” उसके आश्रम में पहुंचते ही उसने सीधा प्रश्न पूछा-“क्या आप इस अवसाद से उबरने में मेरी सहायता कर सकते हैं?” प्राय: यही प्रश्न मुझसे पूछते हैं जब वे मेरे पास मेरी परीक्षा लेने आते हैं। वे कुछ सीखने नहीं आते, वरन् मुझे ‘प्रमाणिक’ सिद्ध करने के लिए ही आते हैं। कई लोग मुझसे पूछते हैं-“क्या आप हमें ईश्वर-दर्शन का रास्ता बता सकते हैं?” मैं कहता हूँ-“मैं कोशिश कर सकता हूँ, पहले आप स्थान तो ग्रहण कीजिए?” उनकी मुद्रा ऐसी ही होती है मानो वे मेरे ज्ञान की परीक्षा लेना चाह रहे हों। इसी प्रकार वह राजा भी उस स्वामी की परीक्षा लेना चाह रहा था, पूछा-“क्या आप मुझे इस अवसाद से राहत दिला सकते हैं?” उस स्वामी ने कहा कि यदि वह (राजा) अपनी सारी संपदा एक थैले में लेकर आ सकता है तो वह उस तक पहुंच सकता है-कुछ सहायता कर सकता है। तुरंत उस राजा ने निर्णय लिया कि वह कतई प्रबुद्ध ज्ञानी नहीं है, वरन् एक धोखेबाज़ ढोंगी है। “यह तो बड़ा ढोंगी है। मुझसे मेरा सारा धन लेना चाहता है।” लोग मुझसे भी पूछते हैं कि कैसे पता करें कि कौन प्रबुद्ध है और कौन नहीं। इसका पता खाली बुद्धिमत्ता के प्रयोग से तो नहीं चल सकता। सदा हर व्यक्ति के बारे में शक रखो। यदि वह वास्तव में प्रबुद्ध है तो उसका स्वरूप, उसका व्यक्तित्व हमें निश्चय रूप से प्रभावित करेगा। हम उसे भुला नहीं पाएंगे। कोई व्यक्ति प्रबुद्ध है कि नहीं, उसकी यह आसन-सी आजमाइश है। लोग पूछते हैं-“स्वामी जी! क्या हम सदैव आपका स्मरण करते रहें?” मैं कहता हूँ-“नहीं! पूरी कोशिश करो मुझे भूल जाने की, मुझ पर शक करने की। यदि मेरा तुम पर तनिक भी प्रभाव है तो तुम ऐसा नहीं कर पाओगे। अगर तुम्हें मुझसे सहायता पानी है तो धीरे-धीरे तुम्हारी मेरे साथ ट्यूनिंग बैठने लगेगी।” मैं तो सीधी-साधी बात करता हूँ-“तब तुम्हारी और मेरी ट्यूनिंग बैठ जाएगी! बुद्धि से तो यह विश्लेषण या समझ पैदा नहीं हो सकती। अपनी बुद्धि से तो तुम सदा ‘नहीं-नहीं’ कहते रहो। यदि सदा ‘नहीं-नहीं’ कहते रहोगे तो कभी धोखा नहीं खाओगे। सबसे आसान तरीका है ‘नहीं’ करना। यदि (मैं) वह व्यक्ति वाकई में प्रबुद्ध है तो वह तुम्हारे बौद्धिक स्तर से परे जाएगा। वह तुम्हारे अस्तित्व में प्रवेश कर जाएगा, उसके पार जाएगा। दिन में तुम्हारे मन में घूमता रहेगा और रात को सपनों में आएगा। वह तुम्हारा पीछा करता रहेगा। उससे बच नहीं पाओगे। इस राजा को भी लगा, मानो वह स्वामी उस पर छा गया है। रातभर

Content: करवटें बदल-बदलकर वह सोचता रहा-“तो मैं प्रयत्न करके देखूं। अगर उसने मेरी सारी संपदा ले भी ली तो मैं उसे आसानी से पकड़ सकता हूँ। आखिर वह है तो मेरी ही राज्य में, जाएगा कहाँ?” इस प्रकार वह राजा रातभर अपना हिसाब लगाता रहा। “फिर यदि मैं अपनी धन-संपत्ति से खुश नहीं हूँ तो उसे वह ले ले तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा। वह धन-संपत्ति तो वैसे भी मुझे बेकार लगती है, ले ले वह उसको।” अंत में राजा ने यह जोखिम उठाने का निर्णय किया। अगले दिन उसने अपनी सारी संपत्ति को हीरे-जवाहरात में बदल दिया और उन सारे हीरों को एक थैले में डाल लिया। फिर वह थैला लेकर उसी स्वामी के निकट पहुंचा। उस स्वामी ने तुरंत वह बैग उसके हाथ से छीन लिया और भाग खड़ा हुआ। अब राजा की समझ में आ गया कि वह स्वामी वाकई में एक ढोंगी था। वह उस स्वामी के पीछे भागा, पर हम जंगल में रहने वाले किसी आदमी का आसानी से पीछा नहीं कर सकते। उसे तो जंगल के कई रास्ते मालूम होते हैं। इसलिए शायद व्यवसाय में फंसे लोग कभी चोर-डकैतों का पीछा नहीं करते। हमारे देश में ही नहीं, विश्व में कहीं भी व्यावसायिक पुलिस कभी डकैतों-चोरों को पकड़ने में सफल नहीं हो पाती क्योंकि उनको रास्तों के ही भूल-भुलैयों का वह ज्ञान नहीं होता जो चोर-डकैतों को होता है। तो वह स्वामी जंगल में इधर-उधर भागता रहा। राजा तो जंगल में नया था, उसे रास्तों का ज्ञान था भी नहीं। फिर भी उसने अपना पूरा प्रयत्न किया उस स्वामी को पकड़ने का और यह पीछा करता रहा। अब राजा को पछतावा हो रहा था। वह क्यों इस भागमभाग में पड़ा। वह खुद को ही कोस रहा था, अपने कष्टों के लिए-“अब जब मैं वापिस अपने राज्य में पहुंचूंगा तो मेरे पास तो कुछ भी नहीं बचा होगा। अब तो भोजन के लिए भी भीख ही मांगनी पड़ेगी।” वह अपनी दीनावस्था की कल्पना करने लगा और मानसिक रूप से गरीबी उसे अभी से सताने लगी। पहले जब उसके पास सब कुछ था, तब भी दुःखी था और अब भी दुःखी था, जब उसके पास कुछ भी नहीं बचा था। यह धन-संपदा का विरोधाभास रहता है-जब धन होता है तब भी कष्ट मिलता है और जब नहीं होता तब भी कष्ट मिलता ही रहता है। शाम होने को आई थी। राजा ने पीछा करना छोड़ दिया। वह सोचने लगा-“मैं तो अब कुछ कर नहीं सकता। वह स्वामी उस जंगल से बखूबी वाकिफ है। राजा को रुकता देख वह स्वामी भी रुक गया। राजा ने देखा कि वह भी रुक गया है तो तुरंत उसके पास पहुंचा और अपना थैला छीनकर वापिस ले लिया। श्रीमद्भगवत गीता

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Content: वह स्वामी हँसने लगा। राजा की समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। उस स्वामी ने कहा-"यह ले मूर्ख! और ऐश कर।" अचानक राजा को समझ में आया कि वह तो फिर धनवान हो गया है। एक दिन उसके पास धन नहीं रहा। अब उसे लगा कि वह फिर धन संपन्न है। स्वामी ने कहा-"मूर्ख! तुझे अवसाद इसलिए महसूस होता था क्योंकि हर चीज को तू पहले से अपना समझता था। अब अपनी सारी दौलत तूने एक दिन को जब खों दी तो इसका महत्व समझ में आया। जा... ले जा इसे और ऐश कर।" एक दिन के लिए जब उस राजा ने अपनी धन-संपत्ति गंवाई तो उसका अवसाद दूर हो गया। हम अपने जीवन में भी इसी प्रक्रिया से गुजरते रहते हैं, क्योंकि हम 'असुरक्षा की चेतना' को अपने ऊपर हावी होने देना चाहते हैं। यहां ख़्याल रहे कि मैं शब्द 'चेतना' का ही प्रयोग कर रहा हूँ। असुरक्षा की भावना एक चेतना ही है। यह भी सत्य है। यदि हम चीजों को पहले से ही अपना नहीं समझेंगे तो हममें यह असुरक्षा की भावना नहीं आएगी। तब हम जीवन का आनंद पूरी शिद्दत से प्राप्त करेंगे। इसी प्रकार जब हम जीवन पर पहले से अपना हक नहीं समझेंगे, तब ही उसकी क़दर समझ में आएगी। यदि अपने पास सहज उपलब्ध चीज़, एक दिन के लिए हमसे छिन जाए तो फिर हमें जीवन में उसका महत्व समझ में आ जाएगा। उदाहरण के लिए कोशिश करके देखें कि हम 12 घंटे तक अपनी आंखें रोज़ नहीं खोलेंगे। उन्हें बंद रखेंगे तो अपनी आंखों की कदर आपको स्पष्ट होगी। इसी प्रकार यदि हम में यह भय रहे कि जीवन हमसे छिन जाएगा तो हम इसका महत्व समझेंगे। समस्या यहीं है कि हम हर चीज़ को 'टेकन फॉर ग्रान्टेड' मानते हैं। जिस क्षण हमें अनुभव हो कि यह हमसे छिन जाएगी, हम जीवन का पूरी शिद्दत से मज़ा लेने लगते हैं। यदि हम अवसादग्रस्त या ऊबे हुए हैं और हमें यह आभास हो कि हम 12 घंटे में सब कुछ गंवा देंगे तो हमारी समझ में यह सत्य आ जाएगा। फिर हम जीवन को 'टेकिन फॉर ग्रान्टेड' नहीं मानेंगे। उस राजा को भी बोरियत का अहसास इसीलिए होता था क्योंकि वह भी अपने जीवन को सहज उपलब्ध मानता था। जब हम असुरक्षा के भाव या मृत्यु भय से आक्रांत होते हैं तो हमारी तुरंत समझ में आ जाता है कि हम जीवन को 'टेकिन फॉर ग्रान्टेड' मान रहे थे। जैसे ही मन में असुरक्षा आई कि हम जीवन का मज़ा लेने लगते हैं। यही इस कथा का मूल मर्म है। यमराज ने नचिकेता को धन-संपत्ति, अच्छा संबंध एवं प्रबोधन सब कुछ दिया। जब लोग हमारे 'एनएसपी' प्रोग्राम के मृत्यु या आधार में ध्यान प्रोग्राम से

Content: श्रीमदभगवत गीता 254 बाहर आते हैं तो वे कहते हैं कि उन्हें संबंधों का असली अर्थ समझ में आ गया। इसका अर्थ यही हुआ कि यमराज ने उन्हें भी यह वरदान दिया। तभी उन्हें धन की क़दर समझ आती है अर्थात् यमराज ने उन्हें भी धन-संपत्ति प्रदान की। उनको जीवन में उत्साह मालूम पड़ता है। उनकी समझ में आता है कि जीवन कितनी महान देन है ईश्वर की। यह भी समझ में आता है कि यह शरीर भले ही छूट जाए पर उसके परे भी कुछ है जो अक्षत रहता है; अमर होता है। इसी ज्ञान को मैं 'आत्मज्ञान' कहता हूँ। अर्थात् जब मृत्यु भय सामने हो तभी हमारी समझ में धन-संपदा, संबंधों और प्रबोधन की क़दर स्पष्ट होती है। यहां कृष्ण निर्भयता की बात करते हैं। वे कहते हैं-" भय का सामना करो तभी निर्भय हो पाओगे।" अर्थात् जब हम अपनी ज़िजीविषा से दो-चार होते हैं, अपनी उपलब्धियों का संग्रहशीलता से सामना करते हैं तभी हम निर्भयता के क्षेत्र में प्रवेश पाते हैं। तब तक तो कुछ नहीं होता। जब आपके विचार और निर्णय 'तुम्हारे' भाव पर आधारित होते हैं तब ही इस ज़िजीविषा और संग्रहशीलता से परे जाकर हम निर्भय हो पाते हैं। यदि 'अपना-अपना' या 'मेरा-मेरी' का भाव रहेगा तो निर्भयता नहीं आ सकती। तो जब तक 'मैं और मेरा' भाव से सोची, आप आसुरी वृत्तियों में रहेंगे; लेकिन जब 'तू और तेरा' भाव से सोचने लगेंगे तब आपके मन में दिव्यता (देव भाव) का उदय होने लगेगा और हम एक तेज़, एक नई ऊर्जा प्रकाशित करने लगेंगे। एक और सादृश्य प्रयोग करके देखिए- मात्र एक सप्ताह तक दूसरों के लिए जीवन जिएं। इसमें मैं यह नहीं कह रहा कि दूसरों को अपनी संपदा-धन प्रदान करें, केवल उनके लिए जी कर देखें। प्रायः लोग कहते हैं-"इसमें मेरे लिए क्या है?" उदाहरण के लिए आपकी पत्नी ने आपको फोन करके कहा कि सिनेमा चलो! पर आप कहेंगे-"नहीं! आज तो मैं समुद्र तट की सैर को जाना चाहता हूँ।" यानी हर समय आप अपनी रुचि के अनुसार ही चलना चाहते हैं। इसके बरअक्स आप एक सप्ताह के लिए चाहे अपने दफ्तर में हों या घर में- दूसरों की बात मानकर देखें। दूसरों पर अपनी रुचि न थोपें, उनकी रुचि के अनुसार जीवन जिएं। अपना व्यवहार 'मैं और मेरा' केंद्रित न रखकर 'तू और तेरे' पर केंद्रित करें। केवल व्यवहार में ऐसा करें, किसी को कुछ धन-संपदा प्रदान न करें, पर आपका दिमाग सोचेगा-"यदि मैं 'तू और तेरे' के अनुसार सोचने लगूंगा तो लोग मुझे 'टेकिन फॉर ग्रान्टेड' मानने लगेंगे तथा मेरा शोषण भी कर सकते हैं। वे मुझे धोखा भी दे सकते हैं।"

Content: श्रीमद्भगवत गीता 255

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Content: चलिए माना कि यही होगा, पर अभी तो कोई धोखाधड़ी नहीं कर रहा। आप तो अपना विचार स्वयं पर 'मैं और मेरे' पर ही केन्द्रित रख रहे हैं। आप स्वयं को पूरा सुरक्षित रखना चाहते हैं तो क्या आप सुखी हैं? खुश हैं? अपनी बात खुलकर बताएं-क्या वाकई में आप सुखी हैं। नहीं ना! तो क्यों नहीं कुछ दिन 'तू और तेरे' पर दिमाग केन्द्रित कर जीवन-यापन करने के प्रयत्न करते। हम सभी इस 'आसुरी संपत्ति' के साथ अपना पूरा जीवन बिताते हैं। इसे ही कृष्ण आसुरी वृत्ति कहते हैं, यानी यह व्यवहार जो सदा 'मैं और मेरा' पर केन्द्रित रहता है।

Content: 'मैं-मेरे' से परे रहें

Content: तो मात्र एक सप्ताह के लिए क्या न इस प्रयोग को करके देखें? आश्रम की कार्यशालाएं और समय आपको ऐसा करने का बेहतरीन मौका उपलब्ध कराते हैं। अभी भी, जब आप इस कक्ष में वापिस आए अगले सत्र के लिए तो आप क्या करते हैं-अपनी सीट पर बैठते हैं और कहीं जाते हैं तो अपनी सीट पर अपना रुमाल रख जाते हैं जिससे कि सीट पर आपका ही कब्जा रहे। यानी पहले आपने अपनी सीट पकड़ी और जब प्रसाद वितरण हुआ तो आपने सबसे पहले अपनी प्लेट प्राप्त की। अब एक सप्ताह के लिए पहले प्लेट दूसरों को लेने दीजिए, फिर स्वयं ग्रहण करें। यह भी देखिए कि दूसरों को आरामदेह सीट मिल गई कि नहीं। उनसे पूछिए-"आप ठीक से, आराम से तो बैठे हैं?" जब बाथरूम प्रयोग की आवश्यकता हो तो पहले दूसरों को जाने का न्यौता ज्यादातर तो हम यही कहते हैं-"पहले मैं हो आऊं फिर आप जाना।" मुझे जरुरी काम पर जाना है।" तो बज़ाय इस वर्त्तव को इस व्यवहार को प्रयोग में लाइए और पहले दूसरों को जाने दें। उनसे कहें-"यहाँ पहले आप जाइए। मैं तो आपकी सहायता कर बोझ हल्का कर दूं।"

Content: तो एक सप्ताह तक अपने वर्त्तव में 'तुम' को पहला स्थान दें। आपको मालूम भी नहीं पड़ेगा कि कहाँ से एक आनंद का उत्साह फूट रहा है। अचानक आपको लगेगा मानो आपका पूरा अस्तित्व चैन में आ गया है। जब आप 'मैं और मेरे' को प्रश्रय नहीं देते तो आप कभी तनाव महसूस नहीं करते, पर यदि आप मात्र 'अपना' ख्याल रखते हैं तो इस तनाव से कभी निजात भी नहीं पाते। क्योंकि जब आप 'मैं' को 'तुम' से विस्तापित कर देते हैं तो आंतरिक आरोग्य का भाव चालू हो जाता है और आप बेहतर महसूस करने लगते हैं।

Content: मैं यहां केवल नैतिकता की दृष्टि से बात नहीं कर रहा। यह न समझें कि मैं आपको बता रहा हूं कि कैसे खुश रहें। ऐसे कई लोग हैं जो ऐसी किताबें लिख चुके हैं यथा- 'चिंता छोड़ो और सुख से जियो!' मैं वह नहीं जो यह सब बताऊं। मैं आपको नैतिकता का पाठ नहीं पढ़ा रहा, वरन् आपकी आध्यात्मिक उन्नति का रास्ता दिखा रहा हूं। यदि आप कोई 'पेशेवर' साधक हैं तो कृपया इस अभ्यास को अपनाकर देखें। मैं 'व्यावसायिक साधक' इसलिए कह रहा हूं क्योंकि सदा हर जगह ऐसे ही लोग का समूह जरूर रहता है। जब भी कोई स्वामी महाराज आते हैं प्रवचन के लिए तो ऐसा समूह जरूर उनका प्रवचन सुनने को आता है। चाहे कोई स्वामी महाराज आएं या कोई आध्यात्मिक समारोह हो-वे लोग जरूर आते हैं। कई लोग आकर कहते हैं-"स्वामी जी! पिछले तीस साल से मैं साधना कर रहा हूं।" इसमें कोई गर्व करने की बात नही है। इसमें गर्व के लायक कुछ भी नही है कि आप तीस वर्ष से एक पेशेवर साधक हैं। यह समझ लें कि यदि अपने कई प्रवचनों को सुना है, आप कई स्वामियों को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं या आपने कई आध्यात्मिक कार्यक्रमों में भाग लिया है तो जरुरी नहीं कि आप सही आध्यात्मिक पथ पर ही हैं। यह तो मात्र बाहर से बाज़ार निरखना या 'विंडो शॉपिंग' है। इससे ज्यादा कुछ नहीं है।

Content: यदि आप वाकई में सच्चे आध्यात्मिक साधक हैं और आध्यात्मिक विकास चाहते हैं तो एक आध्यात्मिक अभ्यास करना शुरू करें। कोई मात्र एक आध्यात्मिक अभ्यास एक सप्ताह तक करें। यदि आप सोचते हैं कि मैं आपकी सहायता कर सकता हूं तो मेरी एक बात सुनें। बाकी सबको भूल जाएं। मात्र यह करें कि बज़ाय 'मैं-मेरा-मेरी' के भाव पर निर्णय के, 'तुम-तेरा-तुम्हारी' के आधार पर लेना प्रारंभ कर दें।

Content: मैं आपसे कुछ देने को नहीं रह रहा। मात्र इस प्रकार अपने रोज़मर्रा के निर्णयों को आधार रखें-'मैं' पर नहीं 'तुम' पर केन्द्रिता। आप देखेंगे कि आपके जीवन में परिवर्तन आने लगा है। आपके अंदर जमा ठोस तनाव धीरे-धीरे पिघलने लगेगा-आप अंदर से स्वयं को काफी हल्का महसूस करने लगेंगे और एक सुखद, शीतल समीर के स्पर्श का अनुभव होने लगेगा। जब आपको इस प्रकार के मूड का अनुभव होगा तो आप स्वयं एक कृतज्ञ भाव से भर उठेंगे और हर लम्हें, हर समय, हर रोज़ आपका यही वर्त्तव हो जाएगा।

Content: प्राय: हमारे सारे क्रिया-कलाप 'मैं' पर ही आधारित रहते हैं। जब कभी भी हम किसी पर चिल्लाते भी हैं तो यही कहते हैं-"यह तो मैं इसके (उस व्यक्ति के) भले के लिए कह रहा हूं।" जब कोई अन्य क्रोध दिखाता है तो हम कहते हैं-"देखो तो! कैसा राक्षसों की तरह चिल्ला रहा है।" जब कोई चिल्लाता है

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Content: (क्रोध में) तो हम उसे राक्षस कहते हैं, पर जब हम क्रोध में चीख़ते हैं तो हम 'उसके' भले के लिए यह सब करते हैं और कहते हैं-'यदि मैं इसे सही पाठ नहीं सिखाऊंगा तो कौन सिखाएगा? यह सब तो मैं उसी के भले के लिए कर रहा हूं। आप शब्दों से खिलघाड़ बंद करें और सीधी-सीधी अपनी बात कहना सीखें। इस प्रयोग को एक सप्ताह तक ही करें-ज्यादा नहीं। उसके बाद आप चाहें तो अपने पूर्व रूप को फिर ग्रहण कर सकते हैं। यदि आप पुराने रूप में नहीं पहुंच सकते तो यह एक अलग मुद्रा है। सीधा-सरल भाव अखिल्यार करें। अपने निर्णयों का आधार 'मैं' नहीं 'तुम' रखें। आप देखेंगे कि आपके मन से चिड़चिड़ापन गायब हो जाएगा। स्वयं के प्रति गहरी जिजीविषा का भाव, ग्रहणशीलता की सहजवृत्ति भी गायब हो जाएगी। आप एक खाली मनुष्य हो जाएंगे। खाली ऐसे जैसे कि बांस होता है। जब आप भीतर से खाली होंगे तो आप दैव की बांसुरी बन जाएंगे। फिर तो जो भी होगा वह दिव्य होगा और आपकी दैवी वृत्ति हो जाएगी। कृष्ण आगे कदम-दर-कदम इस दिव्य प्रकृति को अपनाने का रास्ता दिखाते हैं कि कैसे अपने सूक्ष्म स्तर पर आप इस दिव्य प्रकृति को धारण कर सकते हैं। यह समझ लें कि सत्त्व, रज और तमस के स्तर पर काम करना मुश्किल है। यह तो ऐसे ही है जैसे स्वामी को परिवर्तित करने के लिए हम सारे नौकरों को बदल दें। यह तो हो ही नहीं सकता। आप स्वामी को बदलेंगे तो नौकर अपने आप बदल जाएंगे। कृष्ण यहां स्वामी-परिवर्तन की तरकीब सुझाते हैं-यानी अहम् के भाव को बदलने की, जो सारे निर्णयों का जिम्मेदार होता है। यह 'वहां एक सदुपरिवर्तन की राह बताते हैं। अभी तक आपकी संज्ञा का आधार 'अहम' या 'मैं' का भाव केंद्र में था। वह एक सरल तरकीब बताते हैं जिससे 'मैं' 'तुम' में बदल जाए। यही व्यवस्था है जो हमारे अंदर दैवी भाव या वृत्ति को लाती है। हिन्दू महाकाव्य 'रामायण' में राम और रावण दोनों ऊर्जा-स्थित बताए गए हैं, दोनों के पास ब्रह्मास्त्र हैं, अंतर केवल उसके केंद्रस्थ होने का है, राम में यह 'तुम' पर केंद्रित है और रावण में 'मैं' पर। इसलिए राम दैवी वृत्ति के द्योतक हैं और रावण 'आसुरी वृत्ति' के। कृष्ण आगे सूक्ष्म विधियों बताते हैं 'तुम' आधारित चेतना के अनुभव को,

Content: यानी उस चेतना की जो चरम चेतना है, समग्र की चेतना है, 'दैविक सम्पत्' है जो इस प्रकार के सजगेय परिवर्तन से संभव हो सकती है। कदम-दर-कदम कृष्ण इन दैवी गुणों को एक-एक कर समझाते हैं। जैसा मैंने पहले कहा है इन गुणों को समाविष्ट करने के लिए अलग से कोई प्रयत्न करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि जितना ज्यादा हम इसके लिए अलग से प्रयत्न करेंगे, उतना ही हमारा व्यक्तित्व यत्न या खंडित होता जाएगा। फिर तो हम अपने से ही लड़ने लगेंगे। कुछ ऐसा करें कि यह परिवर्तन सहज रूप में आपके जीवन में आ जाए। आप स्वतः आनंद-निमग्न, क्रोधादि दोषों से मुक्त और धार्मिक गुणों से संपन्न हो जाएंगे। जब हम सामाजिक अनुकूलन या किसी अन्य सीख द्वारा कोई काम करते हैं-मय परोपकार या दान-पुण्य के-यह समझ कर कि ऐसा करने से हमें स्वर्ग मिलेगा-तो हम समस्या पैदा कर लेते हैं। वह दान कभी न करें यदि आपको लगे कि आपका कुछ भाग आपसे छूट रहा है। वस्तुतः 'दान' या देना शब्द ही भ्रामक हैं। यह होना चाहिए 'साझा करना'। यानी हमारे पास जो कुछ फालतू है, अतिरिक्त है हम उससे मुक्त हो रहे हैं। 'दान' के भाव में 'अहम् भाव' निहित रहता है। यह भाव आपको बताता है कि आप 'किसी से ऊंचे हो, दान प्राप्त करने वाला आपसे नीचे स्तर पर है' परंतु 'साझा' करने में यह भाव नहीं होता। उसमें तो किसी ऊंच-नीच का प्रश्न ही नहीं रहता। उसमें तो 'मिलकर बांटने का भाव' रहता है। जो कुछ हम पर फालतू था हमने दे दिया-साझा कर लिया। साझा करना ही सही व्यवहार है, क्योंकि जब हम 'दान-पुण्य' करते हैं तो हम इस बात के लिए बहुत चौंकने रहते हैं कि हमारा नाम आया कि नहीं उस 'दान-पुण्य' पर। हमारे नाम की वर्तनी में कोई गलती तो नहीं है? 'दान-पात्र' का आरोप सही है या नहीं। हमारी नाम दूसरे के नाम के मुक़ाबले छोटे अक्षरों में तो नहीं उकेरा गया है। भारत में तो वही डोनर लाइट भी देता है तो भी उस पर अपना नाम ज़रूर खुदवाता या लिखवाता है यथा-"सोमनाथ के पुत्र रामनाथन ने यह दान अपनी माता सौंदर्य लक्ष्मी की पुण्य स्मृति में दिया है। जिनका देहावसान फलां तारीख को फलां जगह हुआ था।" काले बड़े-बड़े अक्षरों में यह छपा रहता है। जब हम वह डोनर लाइट जलाते हैं तो यह काली रेखा उभर आती है और प्रकाश को कम कर देती है। रमण महर्षि यही बात बड़ी सुंदरता से कहते हैं-"जब हम मांगते नहीं तो हम स्वतः प्राप्त कर लेते हैं।" मैं तो लोगों से कहता हूं-"जब आप अपने मुख

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Content: से अपने गुण नहीं बखानते तो उनका बखान मैं करता हूँ। जब लोग हमारे आश्रम के लिए कुछ करते हैं और चुप रहते हैं तो मैं उनकी करनी सारे संसार को बताता हूँ। पर जब वे स्वार्थ में अपने मुख से कहते हैं तो मैं चुप रहता हूँ। जब आप कोई काम 'मैं' से विमुख रहकर करते हैं तो आपको यह नहीं लगता कि आप से कोई चीज ली जा रही है, साथ ही आपको एक महती संतोष का आभास होता है। जब आप कुछ भी 'तुम' भाव पर केन्द्रस्थ होकर करते हैं तो आप से दैवी गुण स्वतः प्रकाशित होते हैं और आप तेजोमय हो जाते हैं।

Content: सेवा सदा भक्ति नहीं होती

Content: यशोदा (जिन्होंने मां के रूप में कृष्ण को पाला था) में भी 'मैं' का भाव था।

Content: अब मैं आपके एक सुंदर वृत्तांत सुनाता हूँ। यह एक महान भक्तिन तरगिणी का किस्सा है। यह प्रेम की एक अनतम अभिव्यक्ति की कथा है, जिसमें 'मैं' और 'तुम' का भाव स्पष्ट रूप से व्यक्त हुआ है।

Content: यह कथा कृष्ण के पैदा होने के 12 घंटे भीतर ही शुरू होती है। पैदा होने के बाद ही कृष्ण यशोदा को दे दिए गए थे। कृष्ण जन्म अर्धरात्रि को हुआ था और सूर्योदय के बहुत पहले ही वह यशोदा को सौंप दिए गए थे, क्योंकि एक दैववाणी के अनुसार उनका मामा कंस उन्हें मारने को सूर्योदय होने पर आने वाला था। यशोदा ने उनका तब तक पालन-पोषण किया जब तक कि वे वृंदावन नहीं चले गए, यशोदा द्वारा पालित होने पर भी उन्होंने यशोदा के कहने पर कभी बांसुरी बजाकर नहीं सुनाई।

Content: लेकिन जब नीची जाति की एक कृष्ण भक्तिन तरगिणी ने कहा तो उन्होंने बांसुरी वादन किया। वह कोने में छिपकर दूर खड़ी हो जाती और उनकी उपस्थिति और बांसुरी वादन का आनंद दूर से ही प्राप्त करती। एक बार जब कृष्ण वहां नहीं थे तो तरगिणी जाकर उस धूली को स्पर्श करती जिस ज़मीन पर कृष्ण होते थे।

Content: एक बार कृष्ण बांसुरी साथ ले जाना भूल गए। बेशक, वह भूल नहीं होंगे, जानबूझकर भूलने का नाटक किया होगा। क्या कृष्ण कुछ भूल सकते हैं? वे तो दूसरों को भुलाने वाले थे। स्वयं तो कभी भूल ही नहीं सकते थे, पर उन्होंने ऐसा ही दिखाया मानो वे बांसुरी साथ ले जाना भूल गए हों। तरगिणी ने बांसुरी वहां पड़ी देखी और बड़े प्रेम और श्रद्धा से उसे उठाकर अपने घर ले आई कि बाद में वह कृष्ण को दे देगी।

Content: दूसरे दिन कृष्ण ने कहा-"कौई मेरी बांसुरी ले गया है?" और उन्होंने उसकी ढूंढने का नाटक भी किया। जब मालूम पड़ा कि तरगिणी के पास है तो कृष्ण उसके घर गए, पर चूंकि कृष्ण ऊंची जाति के थे, नीची जाति वालों की बस्ती में जाने के लिए उन्हें कोई कारण चाहिए था। नहीं तो यशोदा उनकी डांटतीं कि तू क्यों नीची जाति की बस्ती में गया। कृष्ण उस बस्ती में गए-वहां गंदी कीचड़ भरी सड़क थी। एक ऐसी झोपड़ी थी जिसमें हज़ारों सूर्य चमकते थे (अर्थात् हज़ारों छेद थे)। कृष्ण उस कोठरी में पहुंचे और अपनी बांसुरी मांगी।

Content: कृष्ण को अपनी कोठरी में देखकर तरगिणी सकते में आग गई। भावातिरेक में उसके मुंह से आवाज़ ही नहीं फूटी। वह चुपचाप रही और बांसुरी ले आई। कृष्ण ने अपना नाटक चालू रखा और पूछा कि मैं बांसुरी बजाऊँ। जब कृष्ण स्वयं कहें तो कौन मना कर सकता था।

Content: उसने कहा-"मेरे प्रभु! आपकी बांसुरी सुनने को तो देवता और ऋषिगण व्याकुल रहते हैं। मैं भला कैसे मना कर सकती हूँ?"

Content: कृष्ण वहीं सीढ़ियों पर बैठकर बांसुरी बजाने लगे। तरगिणी एक कोने में बैठकर आह्लादित होकर सुनने लगी। तभी वहां यशोदा माई आ गई। यशोदा को बहुत बुरा लगा क्योंकि उनके कहने पर कृष्ण ने अपनी बांसुरी कभी नहीं बजाई थी-"इस नीच जाति की लड़की के लिए तू बांसुरी बजा रहा है जबकि मेरे लिए तो कभी नहीं बजाई।"

Content: यहां समझ लें तरगिणी का बर्ताव 'तुम' केन्द्रित है जबकि यशोदा का 'मैं' केन्द्रित। इस कारण यशोदा की सेवा का कोई धनात्मक परिणाम नहीं मिल सका। उदहारण, यशोदा ने चूंकि कृष्ण का ध्यान हटा दिया था, अतः उन्होंने बांसुरी बजाना बंद कर दिया। कृष्ण द्वारा तरगिणी के लिए बांसुरी बजाने का किस्सा 'पुण्यगवंरली' में दिया हुआ है, जिसका अर्थ है- 'धन-मंत्र'।

Content: कृष्ण ने यशोदा को उत्तर दिया-"तुमने मेरी बेशक बड़ी सेवा की, परंतु 'मैं' के भाव के साध। तरगिणी मेरी अनन्य भक्त है। जब तक मैं 'तुम्हारा' कृष्ण हूँ तुम मेरा ख्याल रखती हो। इसका अर्थ तो यही हुआ कि तुम अपनी ही भक्ति हो। तुम्हारा ध्यान आत्म-केन्द्रित है, मुझ पर नहीं। इसलिए तुम मुझसे पांच मिनट का अलगाव भी बरदाश्त नहीं कर पाती।"

Content: यही है अपनी ग्रहणशीलता या 'पसौसिवनेस' का भाव। कृष्ण बोलते रहे-"तुम इतनी दूर तक यहां चलकर आ गई। तुम मुझे पांच मिनट की भी छूट नहीं देना चाहतीं। जब कि तरगिणी ने कभी मुझे अपने घर आने के लिए नहीं कहा। उसने कभी इच्छा भी नहीं की कि मैं उसके लिए बांसुरी बजाऊँ। चूंकि

Content: 260

Content: श्रीमद्भगवत गीता

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Content: श्रीमद्भगवत गीता

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Content: वह मुझ में पूरी तरह समर्पित है। उसके अंदर केवल 'तुम या तुम्हारे' का भाव का वचन्व है। तब कृष्ण ने तरगिणी को वरदान देते हुए कहा-"तुम सदा सामीप्य मुक्त रहोगी तथा एक 'शनढंग' फूल बनोगी जो सदा मेरी माला का हिस्सा रहेगा। तुम मेरे पास सदा रहोगी!" चार प्रकार की मुक्ति कही गई है-'सालोक्य' मुक्ति, 'सारुप्य' मुक्ति, 'सामीप्य' मुक्ति और 'सायुज्य' मुक्ति। 'सालोक्य' अर्थात 'उसी जगह'-यानी ऐसा मुक्त विष्णु के लोक बैकुठ में निवास करेगा; उसका निवास स्वर्ग में रहेगा। सारूप्य का अर्थ है प्रभु के समान ही रूप रखने वाला, उदाहरणार्थ स्वर्ग (या बैकुठ) के रखवाले जय-विजय का रूप प्रभु के समान ही बताया गया है; वे भी विष्णु (प्रभु) के समान शंख, चक्र, गदा एवं पदम धारण किए रहते हैं। सामीप्य अर्थात समीप रहना-यानी आंतरिक क्षेत्र में ही निवास करना। विष्णु के साथ जो चक्र रहता है वह सामीप्य मुक्त है। प्रबोधन प्राप्त करना यानी सायुज्य मुक्ति पा लेना! सामीप्य मुक्ति में सर्वोत्तम प्रबोधन क्योंकि हम सदैव प्रभु के समीप ही रहते हैं। यह तो ऐसा ही है जैसे एक चींटी को चीनी में निवास मिल जाए। सायुज्य मुक्ति यानी स्वयं चीनी (शुगर कैण्डी) ही हो जाना। यह स्थिति सारे ऋषियों की होती है। भक्तों के लिए वे चरम अवस्था है सामीप्य मुक्ति प्राप्त कर लेना। कृष्ण ने तरगिणी को इसी सामीप्य मुक्ति का वरदान दिया था। उन्होंने कहा-"तुम सदा मेरी माला का फूल बनकर रहोगी; निस्तार मेरे शरीर के स्पर्श में रहेगी। (अर्थात्) तुम मुझ में रहोगी।" फिर यशोदा की ओर मुड़कर बोले-"क्योंकि तुम सदा 'माँ-माँ' के भाव से भावित रहो, इसलिए पृथ्वी पर तुम्हारा कभी कोई मंदिर नहीं होगा!" यशोदा ने कृष्ण का इतने प्रेम से पालन-पोषण किया; उनकी सेवा की, पर पृथ्वी पर कहीं उनका मंदिर नहीं है जबकि राधा के मंदिर हर जगह मिल जाते हैं। वृंदावन में तो कृष्ण से ज्यादा राधा की आराधना होती है। वहां तो हर कोई दूधवाला या कोई और सदा 'राधे-राधे' ही कहता रहता है, कृष्ण-कृष्ण' नहीं, तो अपनी सारी सेवा और प्रेम भाव के बावजूद यशोदा को प्रबोधन प्राप्त नहीं हो पाया। दूसरी ओर, तरगिणी जो कि नीची जाति की स्त्री थी और जो कृष्ण की निकटता से भी सदा वंचित रही, परंतु चूंकि वह 'तुम-तुम-तुम' के भाव से भावित रही; इसलिए कृष्ण स्वयं उसके घर गए और उसे सामीप्य मुक्ति देकर 'मुक्त' कर दिया।

Content: हम चाहे दैवी भाव से ही भावित रहें पर यदि हमारा अहं ('मै' का भाव) साथ है, कभी दिव्यता को प्राप्त नहीं कर सकते, क्योंकि दैवी गुण हमसे दूर भागते रहते हैं, लेकिन यदि 'तुम' का भाव हमारा निर्णायक विचार है तो चाहे हमारे झोपड़े में हज़ारों छिद्र हों, कृष्ण हमारे द्वार पर स्वयं आएंगे। ऐसी कई कथाएं हैं जो रेखांकित करती हैं कि 'मैं' भाव से भावित कभी दैवी गुण प्राप्त नहीं कर सकता। 'तुम' भाव से भावित व्यक्ति दिव्यता को आकृष्ट करता है अर्थात् वृत्ताहार में एक मात्र सटीय परिवर्तन पूरे जीवन को बदल सकता है। मैं अब आपको एक और कथा सुनाता हूँ। यह विष्णु की चार प्रिय वस्तुएं-शंख, चक्र, गदा, पद और उसकी पादुकाओं के मध्य आपसी झगड़े से संबंधित है। एक बार विष्णु बैकुठ से बाहर गए। साथ में उनके शंख, चक्र, पद्म, गदा और पादुकाएं थीं, पर जब वह वापिस आए तो उन्होंने पादुकाएं बाहर रख दीं तथा शंख, चक्र, गदा और पदम के साथ वापिस अंदर आ गए और 'आदेश'-अपनी शेषशैय्या (शेषनाग द्वारा बनाई गई शैय्या) पर लेट गए। तब शंख और चक्र ने बाहर रखी पादुकाओं पर व्यंग्य करते हुए कहा-"तुम भले ही विष्णु का भार वहन कर उन्हें कहीं भी ले जाओ, पर जब वह वापिस आते हैं तो तुम उनके साथ नहीं आ सकती। अंदर तो केवल हम ही आ सकते हैं। तुम्हें अभी तक सामीप्य मुक्ति नहीं प्राप्त हो पाई हैं पर हम उनके साथ हर समय रह सकते हैं। तुम रात में तो बाहर ही रहती हो। अतः तुम्हारी सामीप्य मुक्ति आधी है जबकि हमारी पूरी है।" दुःखी होकर पादुकाओं ने कहा-"हम क्या कर सकते हैं, यदि यहीं विष्णु की इच्छा है।" पर दूसरे दिन सुबह उन्होंने अपने प्रभु (विष्णु) से कहा-"प्रभु! शंख और चक्र हमारा मजाक उड़ा रहे थे। क्या सच में आप हमसे अप्रसन्न हैं? क्या यह सही है कि हमें मात्र आधी सामीप्य मुक्ति प्राप्त है? प्रभु! हमारा क्या दोष है? क्या हमारा कोई महत्व नहीं है?" विष्णु ने मुस्कुरा कर पादुकाओं को जवाब दिया-"व्यवहार और समय की बात है। कोई अमहत्वपूर्ण या महत्वपूर्ण नहीं होता। समय और व्यवहार में कोई पक्षपात भी संभव नहीं है। न मैं कोई भेदभाव करता हूँ। तुम सभी की अपनी समय और जरूरत के अनुसार महत्वता होती है।" फिर उन्होंने आगे समझाया-"पर उनसे यह कह दिया कि शंख-चक्र की पूजा कर कोई मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता जबकि तुम्हारी (पादुकाओं की) पूजा मुक्ति प्रदायक होती है। कई लोगों ने पादुकाओं की पूजा कर मुक्ति पाई है। चक्र तो हथियार है, मारता है। शंख भी युद्ध क्षेत्र में ही गूंजता है। तुम्हारा काम अलग है, महत्व अलग है। तुम्हें तो कोई

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Content: हाथ में भी पकड़े रखे तो मुक्ति मिल सकती है, पर चूंकि उन्होंने तुम्हारा उपहास किया है इसलिए उन्हें 14 वर्षों तक पृथ्वी पर तुम्हारी पूजा करनी पड़ेगी। शंख भरत के रूप में और चक्र शत्रुघ्न (भगवान राम के भाई) के रूप में पृथ्वी पर पैदा होंगे और तुम्हारी (राम की पादुका के रूप में) 14 वर्षों तक पूजा करनी पड़ेगी। तब ही उनकी समझ में तुम्हारी महत्ता आएगी। हमें यह समझना चाहिए कि प्रबुद्ध स्वामियों के अनुचरों के कई कर्तव्य होते हैं। हर एक को अपनी ज़रूरत है, महत्ता है। यदि हम भेदभाव से उन्हें देखेंगे तो समस्या पैदा हो जाएगी, क्योंकि कभी ज़ाहिरी रूप से महत्वपूर्ण व्यक्ति को किसी महत्वपुर्ण व्यक्ति के सामने झुकना पड़ सकता है। वैसे इस कहानी का मर्म है-चूंकि शंख और चक्र ने 'मैं-मैं' के आधार पर बात की, उन्हें तीसरा दिखना पड़ा और चूंकि पादुकाओं ने 'तुम-तुम-तुम' का भाव रखा, उनकी पूजा हुई। विष्णु ने पादुकाओं को वरदान देते हुए कहा-“अब शंख और चक्र तुम्हारी आराधना करके ही मुक्ति पाएंगे। इसके बाद वे इस तरह तुम्हारा उपहास नहीं कर पाएंगे।”

Content: अब भगवान कृष्ण उसे समझाते हैं कि गुणातीत रूप में जीना सीखो, अर्थात 'तुम' भाव से प्रेरित रहो-तभी मुक्ति या प्रबोधन प्राप्त होगा, जिसे नि.वृत्ति भी कहते हैं। 'मैं' भाव में जीने पर हम काफी बंधन पैदा कर लेते हैं, आसुरी गुण बंधन पैदा करते हैं जिन्हें प्रवृत्ति भी कहते हैं। भगवान अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि वह (अर्जुन) दैवी गुणों के साथ पैदा हुआ है। ये गुण उसमें जन्मजात हैं। यदि कभी हमारे अंदर यह जानने की चाह उठे कि हम 'मैं' भाव से प्रेरित काम करते हैं या 'तुम' भाव से; यदि हममें मानसिक कष्ट मिला हो या किसी भय या अपराध बोध के कारण तो यह स्पष्ट समझ लें कि हम दैवी वृत्ति के साथ पैदा हुए हैं, लेकिन इसके बरअक्स यदि हम समझते हैं कि हम सही प्रकार से जीवन-यापन कर रहे हैं और हम यहाँ (इस प्रवचन में) इसलिए आए हैं क्योंकि कोई मन बहलाव का साधन उपलब्ध नहीं था और हमने सोचा-'' चलो देख लें, ये भी क्या कहते हैं?''-यदि यही हमारा व्यवहार था तो हमारी स्पष्ट समझ आ जाएगी कि हमारी वृत्ति कैसी है।

Content: तुम दैवी हो या आसुरी (वृत्ति) के? जब हम अपनी प्रकृति का बार-बार आकलन करना चाहते हैं और स्वयं से पूछते हैं-“क्या मेरी आसुरी वृत्ति है? क्या यही मेरी प्रकृति है?” क्या हम अपनी वृत्ति विश्लेषण बार-बार करना चाहते हैं तो समझ लें कि अर्जुन भी इसी दौर से गुज़र रहा है। हम सभी दैवी गुणों के साथ ही पैदा होते हैं। यदि इन गुणों के बारे में सुनकर आपको अपनी वृत्ति के बारे में कोई शक पैदा होता है तो निश्चित समझ लें कि आपकी दैवी वृत्ति ही है। फिर आपको आगे सोचने या चिंतित होने की ज़रूरत नहीं रह जाती।

Content: जब कोई धर्म-प्राण व्यक्ति इन बातों को सुनता है तो वह अपनी प्रकृति भी जानने को उत्सुक होगा, लेकिन अधर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति सोचेगा-“यह स्वामी बार-बार इन्हीं गुणों का ज़िक्र करता है-मैं तो यह सब गुण इसमें हैं ही। देखें यह कैसे रहता है; क्या यह अपनी कथनी के अनुसार ही चलनी भी करता है?” यह समझ ले कि जो स्वयं में सुधार लाने का प्रयास करता है वह दैवी वृत्ति का होता है क्योंकि आसुरी वृत्ति वाला कभी अपना वरन् दूसरों में सुधार लाने का प्रयास करता रहता है। आसुरी वृत्ति वाला 'छीनै-हथौड़' सदा दूसरों पर ही केन्द्रित रखेगा, स्वयं पर नहीं, वह तो दैवी वृत्ति वाला करता है।

Content: जब हम अपने में सुधार करते हैं तब हम ईश्वर हो जाते हैं। अपने मन के अंदर झांकना हमारी दैवी प्रकृति बताता है। अब अर्जुन परिपक्व हो चुका है; जब वह इन सत्यों को समझता है तो अपने अंदर झांकता है। तब भगवान

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Content: कृष्ण उसे आश्वस्त करते हैं कि वह दैवी वृत्ति के साथ जन्मा है। कृष्ण उनके गुणों का जिक्र करते हैं जो 'मैं-मैं-मैं' भाव के साथ जीवन बिताता है। मेरे विचार से इन्हें समझाने की कोई जरूरत नहीं क्योंकि यह गुण तो हममें होते ही हैं। इसी कारण तो हम कष्ट भोगते हैं। यह तो हमें प्रचुरता से उपलब्ध हैं-इन्हें क्या जानने की जरूरत है? हमें तो यह सीखने की दरकार है कि कैसे हम 'तुम-तुम-तुम' वाला भाव-व्यवहार विकसित करें। जब हम 'तुम-तुम-तुम' भाव वाले व्यवहार के साथ जीवन-यापन करते हैं तो हम अपने को पूरी तरह भूल जाते हैं, क्योंकि हम परमात्मा में लीन और आनंद निमग्न रहते हैं। मैं यहां आपको एक महत्वपूर्ण तरीका बताना चाहता हूं जिसका कृष्ण यहां जिक्र करते हैं। मात्र तीन दिन के लिए समझ लें कि आप म्रिय हैं, कोई चोट और हो। यह कुछ अजीब या बेतुका सुझाव लग रहा है न? यदि आप डॉक्टर हो तो समझ लो कि तीन दिन के लिए आप एक समुद्र तट पर घूमने वाले एक घुमक्कड़ व्यक्ति हैं। मतलब डॉक्टर के अलावा (जो आप हो) अपने को कुछ और ही तस्वीर कर लो। जैसे ही आप अपने बारे में ऐसे मूल परिवर्तन की कल्पना करते हो, आपके अंदर गहरी स्वतंत्रता का भाव उभरता है और आपका तनाव गायब हो जाता है। जो साधक लोग संन्यास लेना चाहते हैं, उन्हें एक ध्यान प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जिसे 'भूत शरीर वास' कहते हैं। यानीन अपने अतीत को पूरी तरह त्याग देते हैं। वे अपने माँ-बाप का विधि-विधान से श्राद्ध करते हैं-भले ही उनके माँ-बाप जीवित हो। यह इसलिए होता है कि यदि उस साधक के माँ-बाप को मृत्यु उसके संन्यास लेने के बाद होती है तो उनका क्रिया-कर्म कौन करेगा? इसलिए वह साधक पहले ही उनका श्राद्ध कर लेता है। ये साधक अपना श्राद्ध भी कर लेते हैं क्योंकि उनके बाल-बच्चे तो होंगे नहीं तो उनका श्राद्ध कौन करेगा? श्राद्धोपरांत उन्हें अपनी सारी पहचान-अस्मिता गंवानी पड़ती है, वे अब डॉक्टर-इंजीनियर या वकील (या जो भी कुछ पहले रहे हों) नहीं रहते। अपनी पूर्व पहचान मिटाने को वे अपने पूरे शरीर पर पवित्र भस्म मल लेते हैं और भूत के समान गले में एक रुद्राक्ष माला डाल लेते हैं। फिर अपनी पहचान खोने का उत्सव मनाते हैं। जब पहचान पूरी तरह मिट जाती है तो तब वे भिक्षा मांगने जाते हैं। फिर, अपनी पहचान को पूरी तरह मिटाने के पश्चात् वे अपनी नई पहचान (साधक या तपस्वी) के रूप में तीन दिन तक ध्यान करते हैं। जब ये इस ध्यान

Content: प्रक्रिया से अपनी पहचान को पूरी तरह तिरोहित कर गुज़र जाते हैं, तब ही वे संन्यास के अधिकारी हो पाते हैं। यही पूरी प्रक्रिया 'भूत शरीर वास' कहलाती है। आप भी तीन दिन तक यही ध्यान करें, अपने को कुछ और समझें, वह नहीं जो आप हैं। अपनी धन-संपत्ति समस्ताओं, व्यावसायिक उलझनों, सबसे विमुख हो जाओ। अपने बारे में कुछ सोचो ही मत। जो तीन दिन तक रूप रखो उसके बारे में ही ध्यान केंद्रित रखो। आप पाएंगे कि आप में एक नई चेतना का उद्भव हो रहा है। अपने 'मैं' भाव को निकालकर 'तुम' भाव को प्रस्थापित दो। आपको असीमित आनंद का अनुभव होगा। जब 'मैं' भाव को अंदर से निकाल फेंकोगे, तब आप शांति महसूस करोगे। जब 'तुम' भाव को प्रस्थापित लोग तब मन में आनंद की सृष्टि होगी। शांति और आनंद पाने का यह एक सीधा रास्ता है।

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Chapter Number: 16

Chapter Name: अपने ग्रह को कैसे बचाएं?

Content: 16.8 वे (आसुरी वृत्ति वाले मनुष्य) कहा करते हैं कि जगत आश्रय रहित, सर्वथा असत्य और ईश्वर के बिना योगदान के, अपने आप केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न हुआ है, अतः केवल भोगने के लिए ही है। 16.9 इस प्रकार मिथ्या ज्ञान का आधार बनाकर जिनका स्वभाव नष्ट हो जाता है तथा जिनकी बुद्धि भी मंद है, वे सबका उपकार करने वाले कूर कर्मी मनुष्य केवल जगत का विनाश करने के लिए ही उत्पन्न होते हैं।

Chapter Name: एक लघु कथा

Content: वैज्ञानिकों के एक समूह को घमंड हो गया कि वे सब कुछ कर सकते हैं। उन्होंने ईश्वर को चुनौती दी--"अब आप फालतू हो गए हो, आपका कोई काम नहीं है दुनिया में। क्योंकि आप जो भी कर सकते हो, वह हम भी कर सकते हैं। पृथ्वी पर आपकी बनाई हर चीज, हम बना सकते हैं, एक मानव का प्रतिरूप भी। इसलिए अब आप तो जाओ और आराम करो।" ईश्वर ने जब उन वैज्ञानिकों की कृतियाँ देखीं तो उन्हें ताज्जुब हुआ, बिल्कुल वैसी ही जैसी ईश्वर ने बनाई थी। उन घमंडी वैज्ञानिकों ने ईश्वर से एक प्रतिस्पर्धा करने की ठानी--"आओ प्रभु, हमलोग मुकाबला करो। जो तुम बनाओगे उससे बेहतर वही चीज हम बनाएंगे" और प्रतियोगिता चालू हो गई। जो ईश्वर बनाए वही वैज्ञानिक बना दे, उससे भी बेहतर। अचानक ईश्वर ने थोड़ी धूल हाथ में ली और मनुष्य बना दिया। वैज्ञानिक बोले--"यह तो कोई बड़ी बात नहीं, हमारे पास इसका 'क्लोन' (प्रतिरूप) बनाने की योग्यता है।" उन्होंने वही धूल ली और मानव प्रतिरूप बनाने ही वाले थे कि ईश्वर ने ऐतराज किया--"यह धूल मेरी है। इससे नहीं, अपनी धूल लेकर आओ, तब बनाओ।" हम कुछ भी करें; विज्ञान भी उपलब्धि प्राप्त करे, उसमें दिव्यता ही उजागर होती है। यह ईश्वर और उसकी वैश्विक चेतना ही है जो समस्त ब्रह्मांड को गति प्रदान करती है। हम मनुष्य को धूल से बनाकर खड़ा तो कर सकते हैं, पर यह धूल कहां से आएगी? धूल तो हम नहीं बना सकते। यह तो ईश्वर की कृति ही होगी। यह ईश्वर और उसकी बुद्धिमान चेतना ही है जो समस्त ब्रह्मांड को आधार देती है।

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Content: खड़े रहते हैं और दर्प में मुझसे तक्र करते हैं। मैं तो मन-ही-मन कहता हूँ-"इनकी तो शादी हो जाती है।" और सालभर के पश्चात् वे फिर आते हैं शादीशुदा होकर, और अपने आप मेरे पैरों पर साष्टांग नमस्कार करते हैं, शायद एक ही साल में उन्हें समर्थन करना आ गया। मानों दस वर्ष में जो सीखा जाना चाहिए वह शादी का एक वर्ष ही सीख देता है। वे ही लोग ज़मीन पर साष्टांग हो जाते हैं और ध्यान से सुनते हैं प्रवचन को। अब वे विनम्र हो जाते हैं, कहते हैं-"हां स्वामी जी!" यानी 'हां' करने के मंत्र से भी वाकिफ हो चुके होते हैं। आसुरी वृत्ति के लोगों के साथ यही होना चाहिए, इनकी शादी कर दो और आसुरी, गुण दुरूस्त तिरोहित हो जाएंगे। शायद इसीलिए भगवान ने शादी को प्रथा चलवाई है। आसुरी गुण वाले लोग तो यही कहते हैं कि विश्व की उत्पत्ति काम-वासना एवं यौन-भाव के कारण होती है। पूरा ब्रह्मांड भी इन्हीं कारणों से उत्पत्ति में आता है। वासना कभी कोई कारण नहीं बन सकती। बुद्धिमत्ता एवं दैवी ऊर्जा इस समस्त ब्रह्मांड के कारण और फल है, यही वह कारण और फल है जिससे यह ब्रह्मांड दैवी रहता है, लेकिन जब हम काम-वासना को इसकी उत्पत्ति का मूल कारण समझते हैं तो हम 'मैं-मैं-मैं' के प्रभाव में ही रहते हैं। कृष्ण दृढ़ता से कहते हैं कि जब हम इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति का मूल हम में (हमारी काम-वासनाएं) समझते हैं तो हम इतने उदब्रांत हो जाते हैं तथा अपनी अस्मिता के प्रभाव में इतने जकड़े रहते हैं कि हम स्वयं ही इस विश्व को नष्ट करने लगते हैं। हमारे प्राचीन ऋषिगण कोई मूर्ख नहीं थे। वे जंगलों में इसलिए नहीं गए थे कि उनके पास जाने की और कोई जगह नहीं थीं। कई तो उनमें व बड़े राजा थे, इस ग्रहों के शासक पर उन्होंने स्वयं ही सब कुछ त्याग दिया था, इसलिए कि वे अपने होने का मूल कारण जानना चाहते थे। दूसरों की कही-लिखी बातें सुनना या उनके अनुभव समझना उनके लिए यथेष्ट नहीं था। वे स्वयं उस सत्य का अनुभव करना चाहते थे। इसी प्रक्रिया में उन्होंने स्वयं को समझा और मुक्ति पाई। जो उन्होंने महसूस किया, वह एक अर्थ में बहुत आसान था। जैसा कि कई हज़ार वर्षों में कई लोगों ने पाया, वही उन्होंने पाया था कि इस ब्रह्मांडीय सत्ता का एक अंश मात्र हैं। यानी उन्होंने पाया कि वे भी ईश्वर हैं, क्योंकि उनकी खोझ़ थी कि जो ऊर्जा समस्त ब्रह्मांड का आधार है, वही उनकी प्रेरणा

Content: शक्ति है। उनका अनुभव था कि हर जीव का उत्साह किसी-न-किसी ऊर्जा के स्रोत में है। हम जिस वातावरण में रहते हैं, जो ऑक्सीजन हम खींचते हैं या जो खाना-पीना हम इस धरती से प्राप्त करते हैं, उसका भी स्रोत वही ऊर्जा है। इसी को संस्कृत में 'पंचभूत' कहा जाता है, यानी पांच मूल तत्वों की ऊर्जा जो हमें जीवंत रखती है। जब हम इस ऊर्जा को अपनी निम्न स्तरीय बुद्धिमत्ता द्वारा अपने स्वार्थ द्वारा नष्ट कर देते हैं तो यह जगत भी नष्ट हो जाता है।

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Content: हम स्वयं को कैसे बचाएं?

Content: 16.10 वे दैव, मान और मद से युक्त मनुष्य किसी भी प्रकार से पूर्ण न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर, अज्ञान से मिथ्या सिद्धांतों को ग्रहण कर और भ्रष्ट आचरणों को धारण कर संसार में विचरते हैं।

Content: 16.11, .12 तथा वे मृत्यु पर्यंत रहने वाली असंख्य चिंताओं का आश्रय लिए सदा भोगों को भोगने में तत्पर रहते हैं और 'इतना ही आनंद है', इस मत को मानने वाले होते हैं। वे आशा की सैकड़ों फांसियों (मज़बूत बंधनों) से बंधे हुए मनुष्य, काम-क्रोध के परायण होकर विषय-भोगों के लिए अन्यायपूर्वक धनादि पदार्थों के संग्रह की चेष्टा में लिप्त रहते हैं।

Content: कृष्ण जो यहां कहते हैं वह आज भी ज्यादातर लोगों पर लागू होता है। अब वह वैदिककाल की शिक्षा-पद्धति तो नहीं है जिसमें बचपन से ही बालकों को आत्म-ज्ञान के लिए जागरूक किया जाता था। आज की विद्या तर्क, विज्ञान एवं कतिपय नियमों पर आधारित होती है, जिसमें आत्म-ज्ञान, धर्म इत्यादि पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है।

Content: जब हम 'मैं', या 'मेरी' भावना से सदा भावित रहते हैं तो हम 'मूलाधार' एवं 'स्वाधिष्ठान' चक्रों में ही फंसे रहते हैं। लालच और भय से संचालित हम सदा राग-विरागों से आक्रांत रहते हैं। हमारा हर काम स्वार्थ एवं अपवित्र भावों से संचालित होता है, जिसके परिणाम प्रायः हमें भ्रमित करने वाले ही होते हैं।

Content: पिछले श्लोक में कृष्ण ने हमें स्पष्ट किया था कि कैसे आसुरी वृत्ति वाले लोग इस विश्व का विनाश कर सकते हैं। यहां वे बताते हैं कैसे ऐसा व्यक्ति स्वयं का ही नाश कर सकता है। अपने दर्प, घमंड और पाखंड के कारण ऐसा है, फलस्वरूप कष्ट पाता है।

Content: 272

Content: श्रीमद्भगवत गीता

Content: वस्तुतः जब हम पदार्थ पर ध्यान केंद्रित रखते हैं तो उसमें निहित ऊर्जा की अनदेखी करने लगते हैं। जब आकार पर दृष्टि रहती है तो उस निराकार से ध्यान हट जाता है जो आकार का कारण बनता है। इन दोनों में जो स्थायी रहती है, वह तो निराकार ऊर्जा ही होती है और वही आकार और पदार्थ का भी उत्स होता है।

Content: विज्ञान अब उस प्रश्न द्वारा बनाए आकार और पदार्थ आधारित उस साँचे से बहुत आगे बढ़ चुका है। अब यह साँचा प्रासंगिक भी नहीं रहा है। आईस्टीन के ज़माने से, जब पदार्थ और ऊर्जा में अनन्य संबंध खोजा गया था, विज्ञान की धारणाओं में काफ़ी परिवर्तन आ चुका है। आज तो विज्ञान हर तरह से स्वीकार करता है कि पदार्थ एवं ऊर्ज़ा न सिर्फ़ एक साथ विद्यमान रह सकते हैं, वरन एक ही वस्तु को द्रष्ट पदार्थ या ऊर्जा का अलग-अलग रूप या दोनों को एक ही समझ सकता है।

Content: तो इस प्रकार हम लौटकर आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित उसी सिद्धांत पर आ गए हैं, जो कहता है कि दृष्टा तय करता है क्या चीज़ दृष्टि की जा रही है। हमें यह एक बेतुकी कल्पना लग सकती है, पर आज साइंस के सबसे उन्नत क्षेत्र 'क्वांटम फिजिक्स' में यह एक स्वीकृत सिद्धांत बन चुका है। मूलभूत सब एटोमिक पार्टिकल्स एक सी ही स्थिति में अलग-अलग दृष्टाओं को अलग-अलग रूप में दिख सकते हैं, पर अभी तक इसका कोई तार्किक स्पष्टीकरण नहीं प्राप्त हो पाया है।

Content: पर हमारे प्राचीन ऋषियों ने स्पष्ट किया है कि ऐसा हमारे अनुकूलन के प्रभाव द्वारा घटित होता है, जो हमारी समझ को निर्धारित करता है। जब विज्ञान भी समुन्नत हो जाएगा तो वह भी यही सत्य स्वीकार करने लगेगा।

Content: हमारे चेहरे और जो कुछ घटता है वे घटनाएं या वस्तुएं हमें दिखाई पड़ती हैं, उनको अलग-अलग रूप से देखा जा सकता है। यह देखने को समझ या प्रतीति हमारे संस्कार द्वारा निर्धारित अनुकूलन के कारण पैदा होती है।

Content: एक पति-पत्नी का जोड़ा अपने बच्चों के साथ समुद्र तट की ओर जा रहे थे। मौसम काफी गर्म था तथा शाम हो रही थी। आगे खुली कार में एक युवक महिला थी। उसने उनको ओर हाथ हिलाया - अभिवादन करने को।

Content: पति-पत्नी को कुछ भी अजीब-सा नहीं लगा, पर पीछे की सीट से एक बच्चा बोला- "मॉम, डेड-होशियार रहें।" इस महिला ने सीट-बेल्ट नहीं पहनी हुई है।

Content: हमारे अनुभवों के आधार पर हमारी समझ बदल जाती है। एक बच्चे की समझ निष्पाप और ऋणात्मकता विहीन होती है। वह पूरी तरह वस्तु परक रहती है।

Content: 273

Content: श्रीमद्भगवत गीता

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Content: है, पर जैसे-जैसे समय गुज़रता जाता है, हमारे मन में अपराध-बोध, भय, घमंड, ढोंग, लालच, चिड़चिड़ापन इत्यादि भरने लगते हैं। फिर हमारी समझ इन ऋणात्मक भावों के कारण परिवर्तित होती जाती है। जैसा कि मैंने पहले बताया, ज्यादातर मानव 'मूलाधार' चक्र द्वारा संचालित रहते हैं, इसलिए वे मूल जीवित रहने की ज़रुरतों से ऊपर नहीं उठ पाते। उनका सारा ध्यान जीवित रहने की प्रबल कामना या जिजीविषा पर ही केंद्रित रहता है, जिनके संचालक, क्रोध, लालच एवं भय आदि के भाव रहते हैं। इनके लिए तो हर चीज का अस्तित्व केवल भौतिक स्तर, पादार्थिक स्तर और स्वार्थ तक ही सीमित रहता है। यह तो पूरा व्यापार है उनके लिए। कुछ लोग 'स्वाधिष्ठान चक्र' से संचालित रहते हैं तथा अपनी असुरक्षा भाव से ही बंधे रहते हैं। प्रायः आदमी 'मूलाधार' चक्र एवं अथवा 'स्वाधिष्ठान' चक्र से संचालित रहती हैं, पर दोनों ही असंतोष से प्रदायक होते हैं, क्योंकि आध्यात्मिक परिपेक्ष्य से दोनों स्थितियां अवास्तविक रहती हैं। 'मूलाधार' चक्र बंधित कपोल कल्पना में ही रहते हैं। हमारा जीवन मनो इसी चाह पर रहता है-'काश! ऐसा होता।' इस पर नहीं कि जो जैसा है उसका आनंद लिया जाए। यही कारण है कि हम सदा कष्ट भोगते हैं। एक बार हम यह समझ लें कि जीवन कैसे बगैर कल्पनाओं के जिया जाता है तो हमें मृत्यु का भय नहीं रहेगा। तब सारे कष्ट और दैन्यता का भाव तिरोहित हो जाएगा और हम आसुरी वृत्ति से दैवी वृत्ति की ओर चलने लगेंगे। यहां भगवान कृष्ण इसी भाव को गहराई से समझाते हैं और एक बड़ी सटीक बात कहते हैं। कई लोग सुख-दुःख में ही डूबे रहते हैं, जिसका अंत केवल मृत्यु के साथ ही होता है। कुछ लोगों के लिए तो इसका समाधान तब भी नहीं होता। वे उस समय भी 'बीमा की रकम', 'चंदन ताबूत' और 'संगमरमर की कब्र' की कल्पना करते रहते हैं, क्योंकि उनके लिए कामनाओं की पूर्ति ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य रहा है। कई लोग मुझसे पूछते हैं-"स्वामी जी! कृष्ण गीता में कहते हैं कि मृत्यु से पूर्व का अंतिम विचार अगले जन्म में हमारी योनि तय करता है। क्या हम कोई ऐसा तरीका अख्तियार कर सकते हैं कि मृत्यु पूर्व हमारे मन में कोई श्रेष्ठ विचार ही आए?" मैं मानता हूं कि यह एक बड़ा व्यावहारिक प्रश्न है, पर दुर्भाग्यवश इसका कोई व्यावहारिक उत्तर नहीं है। संस्कृत में एक शब्द होता है 'वासना', जिसका संबंध हमारे मानसिक व्यवहार से होता है। यह वासना हमारे बचपन, कुछ के तो

Content: जन्म से ही बनती रहती है और पूरे जीवन यह प्रक्रिया जारी रहती है। यह हमारे दिमाग का एकत्रित 'सॉफ्टवेयर' होता है, जो हमें संचालित करता है। यही हमारा 'ऑपरेशन सिस्टम' है- 'माइक्रोसॉफ्ट-विस्टा' के समकक्ष है, यह हमारे मन के 'सॉफ्टवेयर' में। 'वासना' हमारे सारे मूल्यों और धारणाओं के आधार पर हमारा मानसिक व्यवहार तय करती है, जो हमारे सारे कर्मों का संचालनकर्ता है परंतू दुर्भाग्य से हमारी ये 'वासनाएं' और इनके प्रतिकूप हमारे 'संस्कार' हमारे अचेतन मस्तिष्क में छिपे रहते हैं, जिन तक हमारी सीधी पहुंच भी नहीं होती, इसलिए हम उनको नियत्रित भी नहीं कर सकते। यह समझें कि हमारी वासनाएं और संस्कार एक ऑटो-पायलट प्लेन की तरह हमारे कर्मों को संचालित करते रहते हैं। जीवनभर, मृत्यु-पर्यंत वही हमारे नियंतां रहते हैं। अचेतन मन की स्वाभाविक वृत्ति है इंद्रियों के बोध पर सहज प्रतिक्रिया प्रदान करना। प्रायः हम चेतन रूप में ही अपना प्रतिसाद देते हैं, पर ज्यादातर समय हमारी प्रतिक्रिया, सहज वृत्ति पर आधारित होती है जो वासनाओं और संस्कारों द्वारा संचालित रहती है। इसमें हमारे चेतन और तर्कशील मन का कोई योगदान नहीं होता। इसलिए कृष्ण इस वृत्ति को आसुरी वृत्ति कहते हैं क्योंकि असुरों की वृत्ति इसी तरह काम करती है, वे प्रकृति के साथ ही बहते हैं पर मानवों की प्रकृति सहज-वृत्ति नहीं है। मानव चेतना तो अंतरप्रज्ञा के स्तर तक उठ सकती है, जिसमें जागरुकता के कारण कर्म-बहुलता रहती हैं यही दैवी चेतना का संभावित स्तर है जो हम सब में निहित रहती है, लेकिन ज्यादातर लोगों को अंतरप्रज्ञा के या महाचेतना के स्तर तक उठने के बजाय अचेतन की सहज वृत्ति के स्तर पर डुलकना ज़्यादा आसान लगता है, नीचें गिरना आसान होता ही है बजाय ऊपर उठने के। इसलिए ही हम सुख की ओर भागते हैं और दुःख-पीड़ा से दूर भागना चाहते हैं। हम अपनी इच्छाओं की पूर्ति करना चाहते हैं और धन सुविधा एकत्रित करने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकते हैं या कोई काम कर सकते हैं, भले ही वह निम्नतम स्तर से भी संदिग्ध हो। कृष्ण कहते हैं कि हमारे मृत्यु-पर्यंत यह प्रक्रिया चालू रहती है। यदि हम समझते हैं कि सारी ज़िंदगी तो सुख-सुविधा के पीछे भागते रहे हैं और अंत में हमारे मन में कोई दिव्य विचार आ जाएगा तो यह हमारी सबसे मूर्खतापूर्ण कपोल-कल्पना होगी।

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Chapter Name: इंद्रियों का जाल

Content: 16.13 वे सोचते हैं कि "आज मैंने यह प्राप्त कर लिया और अब इस मनोरथ को प्राप्त कर लूंगा; (या) मेरे पास इतना धन है और (फिर) इतना हो जाएगा।" 16.14 "वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और अब मैं दूसरे शत्रुओं को भी मार डालूंगा। मैं (स्वयं) ईश्वर हूं और ऐश्वर्य भोगने वाला हूं। मैं सब सिद्धियों से युक्त हूं तथा बलवान और सुखी हूं।" 16.15 "मैं बड़ा धनी और बड़े कुटुंब वाला हूं। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूंगा, दान दूंगा और खूब आमोद-प्रमोद करूंगा"-इस प्रकार अज्ञान से मोहित होने वाले (ये लोग) कडुवे रहते हैं। 16.16 अनेक प्रकार से भ्रमित हुए चित्त वाले वे अज्ञानीज, मोहजाल में फंसे हुए एवं विषय-भोगों में अत्यंत आसक्त हुए यहां अपवित्र नरक में गिरते हैं।

Content: कृष्ण आसानी ने छोड़ने वाले नहीं हैं। वे अर्जुन को व उसके माध्यम से समस्त मानवता को यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि अहंमन्यता का भाव कितनी गहराई से मानव के मन को आहत करता है। अपने एक भाष्य में शंकराचार्य ने 'आहार' को समस्त इंद्रियों से प्राप्त बोध बताया है जबकी पारंपरिक तौर पर आहार का अर्थ भोजन होता है। भोजन का अर्थ यानी मुंह द्वारा भक्षण की जाने वाली चीज। इसी के आधार पर भी शारीर जीवंत और वृद्धिशील रहता है। अधिकतर लोग केवल खाने के लिए ही जीते हैं जबकी बहुत कम लोग यह समझते हैं कि उतना ही खाया जाए, जिससे जीवन चलता रहे या जीते रहने के लिए जो जरूरी है। हर इंद्रिय का अपना 'आहार' होता है, जिसके दम पर वह जीती रहती है। इसी इंद्रिय बोध-आंख, कान, जिह्वा, नाक और त्वचा के स्पर्श द्वारा हमारी कामनाएं उत्पन्न होती हैं जो इनको हमारे शरीर-म तंत्र तक ले जाकर बताती हैं कि हमें क्या चाहिए। ऋषि पतंजलि अपने 'अष्टांग योग' में यही बताते हैं कि

Content: कैसे इन इंद्रियों का नियन्त्रण कर अपनी इच्छाओं पर काबू पाया जाए, जिसे वे 'प्रत्याहार' की संज्ञा देते हैं। 'प्रत्याहार' का अर्थ इंद्रियों का दमन नहीं है; इसमें इंद्रियों को भूखा नहीं मारा जाता, जैसे कि हमें उतना ही खाना चाहिए कि हम जीते रहें, उसी प्रकार इन इंद्रियों को उतना ही आहार मिले कि वे कुशलता से काम करती रहें, पर इस इंद्रिय-बोध पर इतना नियंत्रण तो किया ही जा सकता है कि वे हमारी कपोल-कल्पनाओं पर एक अंकुश लगा सकें। एक औसत आदमी अपनी इंद्रियों के बोध द्वारा ही संचालित होता है, वह अपनी इंद्रियों का स्वयं मार्गदर्शन नहीं करता। उसकी कामनाएं जो उसके चलने-फिरने का काम करती हैं, इन्हीं ज्ञान-इंद्रियों द्वारा नियंत्रित होती हैं, पर इनमें वेतनभोगी से कोई सद्पेशा नहीं लिया जाता। अपनी सहज वृत्ति द्वारा वे दुःख-पीड़ा से बचती रहती हैं और सुख का स्वागत करती हैं।

Chapter Name: एक लघु कथा

Content: दो मित्र रास्ते में मिले। एक इतना दुःखी लग रहा था कि रोने ही वाला हो। दूसरे ने उससे पूछा-"क्या बात है मित्र! इतने दुःखी क्यों हो?" "मेरे चाचा की तीन सप्ताह पहले मृत्यु हो गई। वे मेरे लिए 50,000 डॉलर्स छोड़कर गए हैं।" "अच्छा तो है।" दूसरा बोला। पहला मित्र फिर बोला-"दो सप्ताह पहले मेरे एक रिश्तेदार मरे, वे मेरे लिए 90,000 डॉलर्स छोड़कर गए ", "अरे वाह! बढ़िया...बहुत अच्छा" दूसरा बोला। पहला मित्र-"पिछले सप्ताह ही मेरे दादा जी गुजर गए। वे तो मेरे लिए 10 लाख डॉलर्स छोड़ गए हैं।" दूसरा मित्र-"अरे वाह! तो फिर तू इतना दुःखी क्यों है?" पहला मित्र-"पर इस सप्ताह कोई नहीं मरा।" यह समझ ले कि एक बार हम अपने मन को यदिं इंद्रियों द्वारा संचालित होने देंगे तो यह सिलसिला कभी रुकने वाला नहीं है। इसलिए हम अपनी कपोल-कल्पनाएं चलाते रहते हैं। हम कल्पना करते हैं बड़ी सारी दौलत इकट्ठी करने की। दुर्भाग्यवश धन-दौलत को इकट्ठा करने का उद्देश्य कभी इनका भोग नहीं हो पाता। ज्यादातर मामलों में इनको एकत्रित करने का जोश ही एकमात्र उद्देश्य बनकर रह जाता है, इनको भोगने या आनंद उठाने का उद्देश्य रहता ही नहीं है। एकमात्र लक्ष्य होता है कि हमारे पास इतनी दौलत हो, जितनी किसी और के पास न हो। जैसे

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Chapter Number: 16

Chapter Name: कष्ट में डालना

Content: 16.17 वे अपने आपको ही श्रेष्ठ मानने वाले घमंडी पुरुष धन और मान के मद से युक्त, शास्त्र विधि से रहित केवल नाम मात्र के यज्ञों द्वारा पाखंड से भजन करते हैं।

Chapter Number: 16

Chapter Name: कष्ट में डालना

Content: 16.18 वे अहंकार, बल, घमंड, कामना और कोधादि के परायण और दूसरों की निंदा करने वाले पुरुष अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ अंतयामी से (भी) द्वेष करने वाले होते हैं।

Chapter Number: 16

Chapter Name: कष्ट में डालना

Content: 16.19 ऐसे (उन) द्वेष करने वाले पापाचारीयों और क्रूरकर्मी नराधमों को बार-बार मैं संसार में आसुरी योनियों में ही गिराता हूँ (अर्थात शूकर-कूकर जैसे नीच योनियों में ही उत्पन्न करता हूँ)।

Chapter Number: 16

Chapter Name: कष्ट में डालना

Content: 16.20 हे कौन्तेय! इसलिए वे मूढ पुरुष जन्म-जन्मांतर तक आसुरी योनि को प्राप्त, मुझको न प्राप्त होकर उससे भी (अर्थात पहले वाली योनि से भी) अति नीच गति को प्राप्त होते हैं और घोर नरकों में पड़ते हैं।

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Content: लोग मेरे पास आकर प्राय: कहते हैं—‘स्वामी जी! मैं स्वयं को आपके समर्पित करना चाहता हूँ। मेरी सहायता करें और कष्टों से त्राण दें।’ लेकिन जब मैं उनसे मेडीटेशन प्रोग्राम में भाग लेने के लिए कहता हूँ तो वे कहते हैं कि वह अपनी ‘एपाइटमेंट बुक’ में देखकर बताएँगे। तब भी उन्हें ‘गलतफहमी रहती है कि उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया है। लोग यह भी कहते हैं—‘स्वामी जी! आप कहते हैं कि विजुअलाइजेशन (मानसिक दृश्यावलोकन) से काफी सुकून मिलता है। कई बार हमने प्रयत्न किया पर कुछ नहीं हुआ।’ कुछ नहीं हो पाता क्योंकि हम स्वयं विरोधाभासों से पूर्ण रहते हैं। यदि हमें कमर के दर्द से छुटकारा पाना है तो हमारा बार-बार कहना—‘कमर का दर्द! गायब हो जा।’ से कुछ नहीं होगा, क्योंकि जब-जब भी हम ‘कमर दर्द’ का उच्चारण करते हैं तो हमारा मन इससे और जकड़ता जाता है। यदि हमें कमर दर्द से मुक्ति पानी है तो हमें अच्छे स्वास्थ्य का दृश्यावलोकन करना चाहिए, न कि कमर-दर्द का नहीं। यह महसूस करें कि हम पूरे स्वस्थ हैं। जब हम कृष्ण को स्वयं को समर्पित करें तो हमारा समर्पण संपूर्ण होना चाहिए। हमारे और उनके बीच में कोई आड़ या व्यवधान नहीं होना चाहिए। हमें स्वयं को कृष्ण चेतना में लीन कर देना चाहिए। यहाँ वे उन लोगों के बारे में जिक्र करते हैं जिन्हें उनको आत्म–समर्पण करने की कोई जरूरत नहीं होती। ये लोग तो इतने अहंमवादी होते हैं कि स्वयं भगवान को ही अपना प्रतिस्पर्धी मान लेते हैं। वे (कृष्ण) कहते हैं कि वे उन्हें विषय-भोग वाले विश्व में डाल देंगे। इस पादार्थिक विश्व में वे अपनी इंद्रियों के गुलाम होकर तब तक विषय-रस भोग सकते हैं जब तक कि मौत न आ जाए। जैसा मैने पहले कहा, यह निर्णय तो हमारा होता है कि कृष्ण भी इसमें कोई परिवर्तन नहीं ला सकते, क्योंकि उन्होंने इसके परिवर्तन का काम हमारी बुद्धिमत्ता को प्रदान कर रखा है। यह निर्णय कि हम ‘मैं’ भाव से या ‘तुम’ भाव से प्रेरित रहें, दैवी या आसुरी भाव से भरे रहें, उन्होंने हमें ही दे रखा है। यदि भक्ति और समर्पण का भाव रहेगा तो हमारी (चेतना में) वृद्धि होगी। हम अपने गुरु या स्वामी (ईश्वर) के प्रति प्रेम में वृद्धि प्राप्त करते रहेंगे। हम में से ज्यादातर ईश्वर को एक व्यक्ति रूप ही समझते हैं, जब हम उनकी प्रार्थना या पूजा करते हैं। हम समझते हैं कि ईश्वर एक तीसरा व्यक्ति है, लेकिन वह ‘हम’ नहीं है। प्रार्थना और आराधना तो उन तक पहुँचने का एक माध्यम है, पर

Content: जैसे ही हम उनके व्यक्त रूप को त्याग देते हैं, प्रार्थना का भाव विलुप्त हो जाता है। तब ध्यान लगाना ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रार्थना में हम ईश्वर की आराधना करते हैं जबकि ध्यान में हम स्वयं ही ईश्वर हो जाते हैं। आराधना करना ज्यादा आसान है क्योंकि यह बाहरी अभिव्यक्ति है, बाहर की ओर ध्यान केंद्रित करना हमारे लिए आदत का काम है। इसके हम अभ्यस्त होते हैं, पर अंतर्मुखी होना मुश्किल होता है, खासतौर पर उनके लिए जिनकी शिक्षा तर्कपूर्ण माध्यम से हुई है। इसी कारण पश्चिम में ध्यान करना कभी धर्म का मुख्य आधार नहीं हो पाया, पर पूर्व में सारे ही बड़े स्वामी गणों या ऋषियों ने अपनी सीख का आधार ध्यान लगाना ही रखा। वे सदा अपने शिष्यों से यही कहते रहे कि अंतर्मुखी बनो, अर्थात् उन्होंने अपने शिष्यों को बताया कि ईश्वर की प्रार्थना ही मोक्ष देती है, स्वयं ईश्वर बनो। यह ध्यान करना ही है जो हमें पूर्ण समर्पण तक पहुँचा सकता है। ध्यान लगाना अर्थात् जागरुकता प्राप्त करना। जागरुकता यानी यह समझना कि ‘हम और विश्व एक ही हैं। इसलिए यह ‘तुम’ पर केंद्रित है बनजाय ‘मुझ’ पर। ‘तुम’ का भाव ‘मैं’ की अस्मिता को तो गायब कर देता है। जब ‘मैं’ विलीन हो जाए, वही तो असली समर्पण है। कृष्ण इस अध्याय में यही सब बताते हैं। ‘मैं’ के भाव से ‘तुम’ के भाव तक पहुँचना साहस की दरकार मांगता है, क्योंकि इसी साहस से हम दूसरे (ईश्वर) के सामने पूरे भरोसे और प्रेम से संपूर्ण समर्पण कर देते हैं और जब ऐसा होता है तो सिवाय ‘उसके’ (ईश्वर के) कुछ नहीं रहता। तब हम स्वयं कृष्ण बन जाते हैं जब हम समस्त विश्व के साथ, कृष्ण के साथ एकात्म हो जाते हैं तो फिर कुछ और करना का रहता ही नहीं है। तब तो हम ‘नित्यानंद’ प्राप्त कर लेते हैं। शाश्वत आनंद में लीन हो जाते हैं।

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Chapter Number: 16

Chapter Name: स्वर्ण और स्त्री (कंचन और कामिनी)

Content: 16.21 काम, क्रोध तथा लोभ ये आत्मा का नाश करने वाले हैं; उसको अधोगति में ले जाने वाले तीन प्रकार के नरक के द्वार हैं; इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

Chapter Number: 16

Chapter Name: स्वर्ण और स्त्री (कंचन और कामिनी)

Content: 16.22 हे कौन्तेय! इन तीनों नरकों के द्वारों से मुक्त पुरुष अपने कल्याण का आचरण करता है, इससे वह परमगति को जाता है अर्थात् मुझको प्राप्त होता है।

Chapter Number: 16

Chapter Name: स्वर्ण और स्त्री (कंचन और कामिनी)

Content: 16.23 किन्तु जो पुरुष शास्त्र की विधि त्यागकर मनमाने स्वभाव से बर्ताव करता है, उसे न सिद्धि, न सुख और न परमगति ही प्राप्त होती है।

Chapter Number: 16

Chapter Name: स्वर्ण और स्त्री (कंचन और कामिनी)

Content: 16.24 इस कारण तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने के योग्य है। (अर्थात् तुझे शास्त्र सम्मत कर्म ही करना चाहिए)।

Content: कृष्ण इस अध्याय का समापन एक मशविरे से करते हैं। क्रोध, काम (वासना) और लोभ (लालच) को त्याग दें तो हम सभी सुरक्षित हो जाएंगे। वे कहते हैं कि ये तीनों नरक के द्वार हैं।

Content: यही वे गुण या भाव हैं जो मूलाधार चक्र में बंधे रहते हैं। यही वे भाव हैं जो हमें 'मैं' और 'मेरे' से बांधते हैं। हम भ्रांति में यह समझते हैं कि इस पृथ्वी पर रहने के लिए हममें हमारे परम आवश्यक गुण है। इससे ज़्यादा बड़ी भ्रांति कुछ और हो ही नहीं सकती।

Content: जब तक हम काम, क्रोध और लोभ से बंधे रहेंगे, जिन्हें कृष्ण नरक के द्वार बताते हैं, हम सदैव बंधन में पड़े रहेंगे, अर्थात् कष्ट पाते रहेंगे। तब मरने के बाद हमें नरक में जाने की क्या ज़रूरत है, जब यहीं हम हर दिन नरक की ताड़ना भुगतते रहेंगे।

Content: जब हम काम, क्रोध और लोभ त्याग देंगे तो मुक्त हो जाएंगे। रामकृष्ण बार-बार कहते हैं कि कंचन कामिनी के प्रति आकर्षण को त्याग दें तो हम मुक्त हो सकते हैं। स्त्री के प्रति मोह और स्वर्ण के प्रति लालच ऐसी दो कामनाएं हैं जो सारे कष्टों का मूल हैं।

Content: कष्ट से क्रोध की उत्पत्ति होती है, हमें गुस्सा आता है और यह चक्र चलता रहता है। जब ये तीनों—काम, क्रोध, लोभ जुड़ जाते हैं तो मोह पैदा होता है। कंचन व कामिनी में कोई स्थायित्व का सुख नहीं होता, क्योंकि इनसे कोई अजस्त आनंद नहीं मिल सकता। थोड़ी—बहुत देर तक तो मज़ा आ सकता है, उसके बाद तो हमें उनसे विष्ठाता प्राप्त होने लगती है।

Content: एक स्तर पर तो ये तीनों इच्छा के समरूप हैं, काम, क्रोध, लोभ का ही रूप हैं। इच्छाएं तो ऊर्जा रूप होती हैं। काम भाव तो ज़रूरी है क्योंकि इसी से स प्रजनन संभव होता है और योनि-जीव आदि की श्रृंखला चालू रहती है। लोभ तो हमारी जिजीविषा की एक बड़ी अभिव्यक्ति है। क्रोध से हम ज़्यादा सक्रिय हो जाते हैं। इस प्रकार इन तीनों के धानात्मक परिणाम भी प्राप्त हो सकते हैं,

Content: परंतु कृष्ण इन तीनों भावाभिव्यक्तियों को आत्म-तुष्टि के संदर्भ में व्यक्त करते हैं। वे मानते हैं कि यह मूल संवेगों की तुष्टि है। असल में संवेगों की उच्चता या नीचता का सीधा संबंध उसके पीछे मंशा से होता है। यदि इन तीनों की अभिव्यक्ति 'मैं' भाव से है तो यह निम्न कोटि की ओर और आसुरी वृत्ति से भावित है। इसमें कोई उद्धार की गुंजाइश ही नहीं रहती।

Content: कामना (जो काम का मूल भाव है) या निःस्वार्थ संदर्भ में व्यक्त की जाए अर्थात् पूरी अनासक्ति के साथ तो इसका मूल भाव बदल भी सकता है। तब उसमें से वासनात्मक भाव तिरोहित हो जाता है और तथी उसकी जगह करुणा और दूसरों को ख़्याल आ सकता है। स्वामी रामकृष्ण के लिए हर रीझ उनकी पत्नी सहित 'माता' रूप ही थी। उनकी पवित्रता और भक्ति इस दर्जे को हो चुकी थी। बेशक, ऐसे लोग अपवाद ही हैं और नितांत दुर्लभ हैं।

Content: कामनाओं का एक रूप वासना में स्पष्ट होता है। अनंत इच्छा लालच देती है। जब कोई कामना पूरी तरह संतुष्ट हो जाती है तो फिर वह हम से दूर हो जाती है। कर्म में उन अपूर्ण कामनाओं का जमावड़ा होता है जो हमें कर्म करने के लिए प्रेरित करती है, पर हम अपनी सारी इच्छाएं पूरी नहीं कर सकते क्योंकि इनमें से कई हमारी अपनी इच्छाएं नहीं होतीं। ये तो हमने दूसरों से उधार ली हैं यथा—और बड़ा घर, और महंगी कार या और युवा पत्नी, हमारे अन्य रिश्तेदारों की कार, घर, पत्नी की तुलना में प्राप्त ये दूसरों की इच्छाएं हैं जो हम 'उधार' ले लेते हैं।

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Chapter Number: 17

Chapter Name: श्रद्धात्रय विभाग योग

Content: सप्तदश अध्याय श्रद्धात्रय विभाग योग ईमानदारी : मुक्ति का सीधा रास्ता

Chapter Number: 17

Chapter Name: श्रद्धात्रय विभाग योग

Content: जीना अर्थात् सत्य के साथ प्रयोग करना; सत्य के साथ प्रयोग के लिए साहस रखना; यह समझना कि श्रवण और मनन से सत्य समझा जा सकता है - निरर्थक है; सत्य की समृद्धि को साहस के साथ जीवन में उतारना चाहिए।

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Chapter Name: ईमानदारी : मुक्ति का सीधा रास्ता

Content: इस सप्तदश अध्याय में कृष्ण सीधे-सीधे वह तरीका या तरकीब बताते हैं, जिसके द्वारा इस श्रद्धात्रय विभाग योग में बताई गई उनकी सीख को ग्रहण किया जा सकता है। यह योग ‘त्रि-आयामी श्रद्धा’ को पहचानने का योग है। इसमें कर्ण कर दी हैं। अभी तक जो कृष्ण ने कहा है या बताया है, वह अब जो बताने वाले हैं उसकी पूर्व भूमिका ही थी। यहां कृष्ण ईमानदारी के बारे में बताते हैं। पहले मैं आपको स्पष्ट कर दूं कि श्रद्धा का सही अर्थ क्या है। ‘श्रद्धा’ का अनुवाद प्रायः ‘विश्वास’ किया जाता है, पर यह सही नहीं है। बदलने की शक्ति श्रद्धा का अर्थ है वह विश्वास जिसके साथ साहस भी होता है—सत्य के साथ प्रयोग करने का अर्थात श्रद्धा वह विश्वास है जो साहस के साथ अपनी मान्यताओं का भी प्रयोग कर सके। श्रद्धा से हम कभी असफल नहीं होते। यह समझ लें कि केवल विश्वास रखने से हम असफल भी हो सकते हैं। यदि विश्वास के साथ अपनी मान्यताओं को प्रयोग करने का साहस भी हो तो हम कभी असफल नहीं होते। बिना साहस के विश्वास तो ऐसे ही है जैसे किसी रस्ते में जाना और खाली ‘मैन्यू’ कार्ड पढ़कर वापिस लौट आना। भोजन तो हो ही नहीं पाएगा, खाना खाने का स्वाद मिल ही नहीं पाएगा, लेकिन जब श्रद्धा में ईमानदारी का तत्व मिल जाए तभी हम में प्रयोग करने का साहस प्राप्त होता है और जब ईमानदारी हो तो हम सत्य प्राप्त करने से कभी नहीं चूक सकते। श्रद्धा सच्ची हो तो कभी विफलता नहीं मिलती। यहां कृष्ण अपना सारा जोर श्रद्धा पर ही लगाते हैं। अपनी सीख के 16 अध्याय देने के बाद उनके पास कुछ नया जोड़ने को तो बचा ही नहीं है। जो कुछ भी उन्हें कहना था, वह वे कह चुके हैं। उन्होंने ऊर्जा की सातों सतहों को विस्तार से समझा दिया है। अब तो वह सिर्फ श्रद्धा या ईमानदारी पर ही जोर देते

Content: हैं। यदि सच्ची श्रद्धा है तो कुछ भी असंभव नहीं होता। जब पूरा पेट भरा हो तो खाने को तो ‘डाईजीन’ जैसा ‘एन्टामिड’ ही चाहिए और कुछ नहीं। अर्जुन को भी ‘एन्टामिड’ ही चाहिए, जिससे सारा कुछ जो खाया है वह सही प्रकार से पच सकें और आनंद दे सके। अतः यह अध्याय ‘डाईजीन’ जैसा ही है। इसमें पूरा जोर श्रद्धा पर ही है। श्रद्धा यानी ईमानदारी, सत्य-प्रियता और वफादारी। हम प्रश्न कर सकते हैं कि पूरा अध्याय मात्र श्रद्धा पर क्यों? यह समझ लें कि इसी श्रद्धा को अधूरी समझ के कारण हम प्रभुद्ध नहीं हो पाते। मैं आपको स्पष्ट बताता हूं कि ऐसा नहीं है कि कृष्ण ने जो यहां बताया है वह हमें मालूम नहीं है। सब मालूम है पर हम कृष्ण क्यों नहीं हो पाएं? इसलिए कि हमारी श्रद्धा कम थी। यहां हमारा पूरा ध्यान नहीं था। हमारी समस्या है कि हम नहीं जानते या हम इतना कुछ जान लेते हैं कि हम उसे पचाकर अपने जीवन में उतार नहीं पाते। विवेकानंद यही बात बड़ी खूबसूरती से कहते हैं कि बजाय सारी लाइब्रेरी की किताबों का ज्ञान समेटने के यदि हम केवल पांच अवधारणाएं स्पष्ट समझ लें तो ज्यादा अच्छा होगा। इन्हीं पांच अवधारणाओं का श्रद्धा (विश्वास भी ईमानदारी) के साथ प्रयोग करना कहीं ज्यादा श्रेयस्कर है। इन पांच अवधारणाओं को जीवन में अच्छी तरह उतारना चाहिए, बाकी और कुछ करने की जरूरत नहीं है। यही पांच अवधारणाएं अपने दिमाग में स्पष्ट रखें, पूरी लाइब्रेरी की पुस्तकों का इल्म नहीं। इन्हें अपने हृदय में स्थापित कर रखें। कृष्ण यहां श्रद्धा पर ही जोर देते हैं और बताते हैं कि मात्र श्रद्धा आपके जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन ला सकती है। यदि आपके अंदर सच्ची श्रद्धा होगी तो आप अपना परम लक्ष्य पा लेंगे। भले ही आप नास्तिक हों, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। कई नास्तिक लोगों ने भी सत्य और ईश्वर को प्राप्त किया है। बुद्ध ने तो कभी ईश्वर की बात भी नहीं की पर वे प्रबुद्ध ज्ञानी हो गए और हजारों को उन्होंने प्रबोधन प्राप्त करवाया। आधुनिक समय की बात करें तो जिन कृष्णमूर्ति ने अपने दर्शन में कभी ईश्वर का जिक्र भी नहीं किया, वह एक प्रबुद्ध स्वामी थे। प्रबोधन उनके व्यक्तित्व से झलकता था। जॉर्ज गुरजिएफ भी प्रबुद्ध ज्ञानी हुए जबकि उन्होंने कभी ईश्वर की बात भी नहीं की। आपका किसमें विश्वास है यह महत्वपूर्ण नहीं, आप कितनी श्रद्धा से उस विश्वास से अभिभूत हैं, यह जरूरी है। लोग ‘महात्मा’ का प्रत्यय गांधी जी के नाम के साथ इसलिए लगाते हैं क्योंकि उनकी अपनी मान्यताओं में दृढ़ आस्था थी। वह पूरी तरह ईमानदारी से अपने विश्वास को मानते थे और जिसमें उन्हें विश्वास हो उसके साथ प्रयोग करने

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Content: में उन्हें कोई हिचक नहीं होती थी। उनकी आत्मकथा का शीर्षक है 'सत्य के साथ मेरे प्रयोग' (माई एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रूथ)। उन्होंने अपने मान्य सत्यों के साथ प्रयोग किया था, सत्य को अपने ऊपर लागू किया था। उसके साथ पूरी ईमानदारी से काम किया था। पूरे सत्य के साथ अपने प्रयोग करने को ही मैं ईमानदारी संज्ञा देता हूँ। ईमानदारी का मतलब सिर्फ सत्य को सुनना, पढ़ना और विश्वास करना ही नहीं है। ईमानदारी का मतलब पूरी सच्चाई के साथ अपना काम करना है। उनके साथ पूरी शिद्दत से प्रयोग करने का साहस होना ही ईमानदारी है। चाहे ध्यान लगाना (मेडीटेशन करना) या जुआ खेलना हो, साहस तो दोनों में ही चाहिए। साहस के साथ आप जुआ भी नहीं खेल सकते। यही सत्य ध्यान लगाने पर भी लागू होता है। वस्तुतः मेडीटेशन जुए की चरम स्थिति का ही रूप है। साधारण जुए में हम पैसे का जुआ खेलते हैं; ध्यान लगाने में हम अपने अहंम के साथ जुआ खेलते हैं; अपने अस्तित्व को दांव पर लगाते हैं। मेडीटेशन जुएबाजी में एक ही बात निश्चित है - यदि हम हारे तो ही हमारी विजय होती है। इसमें सिर्फ हारने वाला ही जीतता है। साधारण जुए में जितना हम जीतते हैं उतना ही प्राप्त करते जाते हैं। पर मेडीटेशन के जुए में जहाँ हम अपने अह्म भाव को दांव पर लगाते हैं, हम जीतते हैं तो पूरी बाजी एक बार में ही जीत जाते हैं, क्योंकि दांव पर हमारा अह्म होता है। आध्यात्मिक जीवन में भी साहस की बहुत जरूरत होती है, इसलिए स्वामी विवेकानंद अपने आध्यात्मिक शिष्यों को 'धीर' कहते थे। धीर का मतलब धैर्यवान और साहस का प्रतिरूप। हम पूछ सकते हैं - "आध्यात्मिक लोगों को साहस क्यों चाहिए? आध्यात्मिक जीवन में तो हमें शांत और मौन ही रहना पड़ता है?" नहीं, यहाँ साहस की बड़ी दरकार होती है। इसके सत्यों के साथ प्रयोग के लिए हमारे पास साहस होना चाहिए। पिछले 16 अध्यायों में हमने कई सीखों, पाठों और विभिन्न समझों के बारे में अनेक विधियाँ देखी हैं। हमने सब कुछ सुना है, ये सब हमारे जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन ला सकते हैं अगर हमारे पास उनके साथ प्रयोग करने का साहस हो। नहीं तो यह सब ज्ञान केवल हमारा सिर ही भारी करेगा और कुछ नहीं होगा अर्थात यदि इस ज्ञान को हम अपने सिर में रखे रहें तो सिर्फ हमारा सिर ही भारी होगा। अब हम कह सकते हैं कि हम 'गीता' जानते हैं, लेकिन अभी हमें इसके साथ प्रयोग करना है, इसमें बताए ज्ञान को अनुभूत करना है तब ही हम 'गीता' समझ पाएंगे। उदाहरण के लिए यदि हमने बहुत-सा खाना खा लिया और वह पच नहीं पाए तो क्या होगा? हमारे पेट में दर्द होगा तथा 'वमन' भी हो सकता है। इसी

Content: श्रीमदभगवत गीता 288

Content: प्रकार इन सब बातों को सुनकर हमने अपने प्रयोग नहीं किए तो सिर्फ़ हमारे सिर में दर्द ही होगा और कुछ नहीं। या हम लोगों को पकड़-पकड़कर उन पर अपनी 'ज्ञान' की 'उल्टी' करते रहेंगे। यह समझ लें कि यदि हमारे मन में ईमानदारी नहीं और इसमें बताए गए ज्ञान के साथ प्रयोग करने का हौसला नहीं तो इसकी मात्र सुनना तो खतरनाक भी हो सकता है। अब मैं आपको एक और क़दम आगे बढ़ाता हूँ - "यदि आपने इन सुनी हुई बातों या सत्यों पर अभ्यास अपने आप नहीं किया तो ख़तरा तो आप पूछ सकते हैं - 'क्यों?' क्योंकि इतने दिनों तक इन प्रवचनों और सत्यों को सुनने के बाद हमारे मन में यह भ्रम होना स्वाभाविक है कि हम इन्हें जानते हैं, पर वस्तुतः हम इन्हें जानते नहीं हैं। बिना जाने स्वयं को जानकर समझना बेहद खतरनाक स्थिति है। ऐसे चक्कर से सदा बचें। आध्यात्मिक जीवन में साहस, ईमानदारी और धैर्य का होना बहुत ज़रूरी है।

Content: 'भरणी' : साहसों मनों की घातक एक लघु कथा महान संत - दक्षिण मૂર્તि स्वामीगण, दक्षिणी भारत के तमिलनाडु में रहते थे, एक जगह तिरुवरुर के निकट। मैं आपको उनके जीवन की एक ऐतिहासिक घटना सुनाता हूँ। राज दरबार की एक कवि एक बार उनके पास आयीं और उनकी उपस्थिति में उसे बड़ी प्रेरणा मिली। फलस्वरूप उस कवि ने 'भरणी छंद' में उस महान संत की प्रशंसा में एक हज़ार गीत लिखे। भरणी एक प्रकार की काव्य शैली है जिसमें 1000 छंदों की कविता लिखी जाती है। इसका नियम यह है कि जिसके पास इतनी शक्ति और साहस हो कि युद्ध में वह 1000 हाथियों को मार सके, वही इस काव्य शैली में प्रशंसा पाने का हकदार होता है पर यह कवि उन संत से इतना प्रभावित हुआ कि उसने वहाँ 1000 गीत उस संत पर लिख दिए। उधर राजा भी स्वयं को इस भरणी काव्य का एक नायक समझता। मुझे नहीं मालूम कि उस राजा ने 1000 हाथी मारे कि नहीं। हो सकता है कि उस राजा ने एक हज़ार गीत लिखने के लिए उस कवि को कुछ धन चुपचाप पहले ही दे दिया हो।

Content: श्रीमद्भगवान गीता 289

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Content: बहरहाल, अचानक एक दिन दरबार में अपनी अहमन्यता या दर्प के कारण राजा ने घोषणा की - "इस पूरे देश में मैं ही अकेला हूं जिस पर 'भरणी काव्य' लिखा जा सकता है।" तभी वहां उपस्थित कवियों में से एक खड़ा हो गया और बोला - "नहीं राजन्! दक्षिणामूर्ति स्वामिगण भी भरणी के योग्य आपके दरबार के एक कवि ने तो उन पर 1000 गीतों का एक भरणी काव्य लिख भी दिया है।" राजा के अहं को चोट लगी। वह बोला - "क्या? कौन है वह आदमी जो 'भरणी काव्य' का हकदार है? उसे यहां लाकर आओ।" वह कवि बोला - "नहीं राजन्! वह तो भिखारी है, वह यहां नहीं आएगा।" भिखारियों पर कोई ज़बरदस्ती तो नहीं कर सकता, बेघर लोगों पर क्या ज़बरदस्ती हो सकती है। जिसका घर-बार न हो उस पर तो बल का इस्तेमाल कर अपना हुक्म चलाया जा सकता है, बेघर भिखारी तो कहीं भी चला जाएगा। उसे क्या फर्क पड़ता है कि यहां जाए या वहां जाए, क्योंकि उसकी तो कोई इच्छा ही नहीं होती। जब हमारे अंदर कोई कामना होती है तभी तो हम समाज के नियमों का पालन करते हैं, पर बेघर भिखारी को किसी की क्या परवाह! उसे न नाम चाहिए, न शोहरत, न सुरक्षा। उसको बंधन में लेना बहुत मुश्किल है। इस मामले में तो वह स्वामी एक सन्त भी था और भिखारी भी! उसे ज़बरदस्ती राजा के पास लाना असंभव था। पर राजा को इस बात से अपनी बहुत बेइज़्ज़ती महसूस हुई। "क्या! एक भिखारी और उस पर भरणी? वह कौन मूर्ख था जिसने ऐसा किया था। उसे यहां बुलाकर लाओ...तुरंत!" भरणी लिखने वाले कवि को तुरंत दरबार में हाजिर किया गया। राजा ने कहा - "अरे मूर्ख! तुमने एक भिखारी पर भरणी काव्य लिखा है।" उस कवि ने उत्तर दिया - "हे राजन्! मुझे क्षमा कर दें, पर इससे पहले कि आप उस स्वामी के लिए अपशब्द प्रयोग करें, मैं आपसे विनती करता हूं कि आप उससे एक बार मिल ज़रूर लें।" राजा बोला - "तुम जानते हो कि तुम मुझे क्या सलाह दे रहे हो। कल सुबह ही तुम्हारा सिर कलम कर दिया जाएगा।" उस राजा का ऐसा ही स्वभाव था - सीधा और क्रूर हिंसात्मक। वस्तुतः मूर्ख लोग अपने मन की हिंसा का तुरंत इज़हार कर देते हैं। जब उनके पास अपने से कर सकें तो वे मारपीट पर उतर आते हैं। लाठी-तलवार की बात करने लगते हैं। उदाहरण के लिए आप हिन्दू धर्म या बुद्ध धर्म के इतिहास पर नज़र डालें। इन दोनों धर्मों में किसी को तलवार के दम पर अपने धर्म में शामिल नहीं किया

Content: गया, क्योंकि इन दोनों के पास दूसरे को आश्वस्त करने की बुद्धिमत्ता थी। उनके पास तर्क-बुद्धि थी, विश्लेषण की शक्ति थी कि अपनी बात से दूसरे को राज़ी कर सकें। दो महान स्वामियों का उदाहरण देखें - "आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र का।" एक विषय पर उनके मत सर्वथा भिन्न थे, पर उनमें आपस में कभी युद्ध तो नहीं ही हुआ। शंकराचार्य ने कभी यह नहीं कहा - "यदि तुम वेदांत-दर्शन को नहीं मानोगे तो मैं तुम्हें मार डालूंगा।" वे आपस में मिलकर बैठे और अपने-अपने मत का विश्लेषण किया व शास्त्रार्थ किया। इस शास्त्रार्थ की जो निर्णायक थीं - वे थीं मंडन मिश्र जी की स्त्री। क्या सुंदर प्रबंध था? क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि प्रतिस्पर्धा में एक प्रतिस्पर्धी की पत्नी ही निर्णायक की भूमिका निभा रही थी और जो शंकराचार्य के कहने पर ही निर्णायक चुनी गई थी। उनका नाम था भारती। उन्होंने पूरा शास्त्रार्थ सुना और अंततः अपना निर्णय शंकराचार्य के पक्ष में ही सुनाया। शंकराचार्य को उन्होंने शास्त्रार्थ में विजयी घोषित किया था। पूरा प्रकरण प्रेमपूर्वक संचालित हुआ, न कोई गाली-गलौज, न मार-काट, न झगड़ा, आराम से बहस हुई। वस्तुतः पूर्व के सारे धर्म-संप्रदायों में कभी कोई मार-काट की नौबत ही नहीं आई। उन्होंने तलवार के दम पर किसी का मन नहीं बदला, वरन् अपनी बुद्धिमत्ता से अपने तर्क रखे। एक बात और, जो हारा था वह स्वस्थः ही उस पक्ष का साथ देने लगता था जिसने अपना मत अधिक सच्चाई से प्रस्तुत किया हो। जब शंकराचार्य ने मंडन मिश्र को अपने पक्ष द्वारा जीता तो मंडन मिश्र सब कुछ छोड़कर शंकराचार्य को समर्पित हो गए तथा उनके शिष्य बन गए, तब उनका नाम हुआ सुरेशाचार्य। वह शंकराचार्य के मत को ही प्रसारित करते रहे। असल में जब लोग तलवार के दम पर अपनी बात मनवाने की चेष्टा करते हैं तब वे मूर्ख दिखते हैं, क्योंकि उनमें बुद्धिमत्ता नहीं होती इसलिए वे आक्रमण करने लगते हैं। जो तलवार के दम पर ऐसा करते हैं वस्तुतः अपनी भावना और सत्य समझने की बुद्धि हीनता ही दिखाते हैं। तलवार के ज़ोर से कुछ नहीं होता। तलवार विनाश तो कर सकती है, निर्माण कभी नहीं कर सकती। तो वह राजा तो मूर्ख था और सीधा कह दिया - "मार दो इस कवि को। कल सुबह सूर्योदय होते ही।" उस कवि ने कहा - "मुझे कोई समस्या नहीं। मैंने इस स्वामी की कृपा से पूर्ण सत्य ज्ञान लिया है। मैं मरने को तैयार हूं पर हे राजन्! यदि आप में थोड़ी भी अक्ल है तो इस स्वामी से ज़रूर मुलाकात कर लें। मेरी प्रार्थना है कि जब तक आप उनसे मिल न लें, मुझे मृत्यु दंड न दें। फिर मैं मरने को तैयार रहूंगा।"

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Content: राजा ने कहा - "ठीक है! मैं उस भिखारी स्वामी से मिलूंगा। यदि वह वास्तव में भरणी के योग्य नहीं लगा तो हम उसको भी मार डालेंगे!"

Content: राजा उस स्वामी को मिलने के लिए तैयारी करने लगा, अपने 'लवजमा' के साथ - पैदल सिपाही, रथ, घोड़े-हाथी, सेना एवं योद्धाओं को लेकर वह चला। राजा लोग सदा अपने लाव-लश्कर के साथ ही चलते है, अकेले चलेंगे तो उनकी पहचान कैसे होगी? दक्षिणमूर्ति स्वामीगण थे, एक प्रबुद्ध ज्ञानी। ऐसे लोग तो स्वतंत्र विचरण करते हैं। उन्हें किसी लाव-लश्कर की आवश्यकता ही नहीं होती। यह स्वामी तो 'अभंग' ही थे अर्थात् सदा निर्वस्त्र रहने वाले। बिना किसी आडंबर के वह एक वट वृक्ष के नीचे आराम से विराजमान था। राजा की पूरी सेना ने उसे पूर्ण शांति से बैठे देखा। राजा अपने रथ से उतरकर उस स्वामी की ओर बढ़ा। वह स्वामी वैसे ही बैठा रहा। वह राजा के इतनी फौज को देखकर तनिक भी विचलित नहीं हुआ।

Content: उसने आंखें खोलकर सीधे राजा की आंखों में झांका। यह शायद पहली बार था कि किसी ने राजा की आंखों में सीधे देखने की जुर्रत की थी। राजा तो सदा दूसरों की आंखों में सीधा घूरता था और वे लोग अपनी आंखें झुका लेते थे। पहली बार किसी ने राजा की आंखों में देखा। कुछ क्षणों पश्चात् राजा ने अपनी आंखें झुका लीं। राजा को खुद महसूस हुआ मानो उसके अस्तित्व में कुछ हलचल हो रही है, उसे लगा कि उस स्वामी के सामने तो वह स्वयं एक भिखारी है। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे, क्या प्रतिक्रिया दे? एक अजीब-सी हालत हो गई थी। वह कर्तव्यविमूढ़-सा खड़ा रहा, समझ में ही नहीं आया कि वह क्या कहे।

Content: तब दक्षिणमूर्ति स्वामीगण ने इशारा किया कि राजा स्थान ग्रहण कर लें। राजा के साथ आई सेना और योद्धाओं ने भी अपने अस्त्र-शस्त्र उतारकर वहीं शांति से बैठना ठीक समझा। दस मिनट में सारी सेना-योद्धा चुपचाप सामने बैठ गए। वैसे किसी सेना का चुपचाप बैठना असंभव ही होता है इसलिए हम शैतान को लगातार काम में जोते रखना चाहते हैं? यदि उसे काम में व्यस्त न रखा तो वह हमें खा जाएगा। इसी तरह किसी सेना को शांत रखना असंभव ही है, पर यहां पूरी सेना चुपचाप शांत बैठी रही।

Content: एक घंटा गुज़र गया, फिर दो घंटे गुज़रे, तीन घंटे... और शाम भी हो गई, एक पूरा दिन गुज़र गया। राजा, उसकी सेना और वह स्वामी शांत बैठे रहे, एक शब्द भी न बोला गया। कोई आदेश नहीं दिया किसी ने, न कोई अभिवादन हुआ। वे सब सिर्फ बैठे रहे। दो दिन बीत गए, फिर तीन दिन बीतें। अब स्वामी

Content: ने सोचा - "यह तो बहुत ज़्यादा ही हो गया। तीन दिन हो गए यह राजा अपनी पूरी सेना के साथ भूखा-प्यासा बैठा है - 'हाजत रवा' करने भी कोई नहीं गया। इन्हें वापिस अपनी राजधानी और महलों को जाना चाहिए। राजा को तो पूरे राज्य का ख्याल रखना होता है। वह भी तीन दिन से यहां चुपचाप बैठा है।"

Content: तो उस स्वामी ने अपनी आंखें खोलों और कहा - "अब तुम लोग वापिस जाओ।" राजा स्वामी के चरणों पर गिर पड़ा, नमस्कार किया और जंगल से बाहर आ गया।

Content: तब राजा ने उस कवि को बुलाया और कहा - "हज़ार हाथी की बात छोड़ो, इस स्वामी की महिमा में तो तुम दस सहस्र हाथियों को मारने वाले के समान प्रशंसा में भरणी रच सकते हो।"

Content: तब कवि ने एक सुंदर बात कही - "दस हज़ार हाथियों को मारना कठिन नहीं है। यह कोई बड़ा काम नहीं है। हाथी के हाथ में लेकर उनको मारा जा सकता है पर अपने मन को मारना बेहद मुश्किल काम है। यही वास्तविक उपलब्धि होती है।"

Content: उस स्वामी ने राजा के मन को ही मार दिया था। दक्षिणमुखी स्वामीगण सिर्फ अपने ही नहीं, वह किसी के भी मन को मार सकते थे, यदि कोई उनके सामने आता। दस सहस्र हाथियों को मारने में साहस नहीं चाहिए, परंतु अपने मन को मारने में बड़ा साहस चाहिए।

Content: साहस और ईमानदारी की ही असली दरकार होती है

Content: सत्य के साथ प्रयोग करते के लिए आध्यात्मिक जीवन में दो चीजों की ही दरकार होती है - साहस और ईमानदारी। यही दो गुण हमारे अंदर नापैद होते हैं। हम सब सुनते तो बहुत हैं - किसी भी प्रवचन में वक्ता को पूरे ध्यान से सुनते हैं। ग्रंथों का भी पारायण करते रहते हैं पर जब वास्तविकता का सामना करने का समय आता है, यानी इस ज़न को परखने का तो हम कुछ नहीं कर पाते। तब आप लोग कहते हैं - "स्वामी जी! व्यावहारिक कारणों से कुछ तो हमारे पास होना ही चाहिए? न! नहीं तो हम इस दुनिया में जी कैसे पाएंगे?" और

Content: आप लोग बड़ी चतुराई से समझौता करने लगते हैं। समझौता करना कायरता की निशानी है। समझौता करने वाले को इस जीवन में कभी कोई वास्तविक अनुभव प्राप्त नहीं हो सकता, न सिर्फ आध्यात्मिक जीवन में वरन् बाह्य जगत से भी। अनुभव की ईमानदारी के रूप में एक ही सत्य क़ायम है। यह सब कुछ समेट लेता है, फिर कुछ भी ज़रूरी नहीं रह जाता। हमें कोई बड़ी-बड़ी चीज़ें

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Content: नहीं चाहिए। यदि कोई आदमी कोई ‘बड़ा काम’ करता है तो इस कारण ही हम उसे ‘बड़ा आदमी’ नहीं कहने लगते। वह क्या करता है यह महत्वपूर्ण नहीं, वह ‘कैसे’ उस काम को करता है, असली महत्व की बात होती है। उदाहरण के लिए महान संत नाम्बावलर तमिलनाडु में रहते थे और भगवान विष्णु के लिए पूरा जीवन व्रत देखे। वे बनाया करते थे और कुछ नहीं करते थे। रोज़ ही वह बगीचे में जाकर फूल इकट्ठा करते, उनकी मालाएं बनाते और भगवान पर चढ़ा देते थे। सिवाय माला बनाने के उन्होंने कुछ भी नहीं किया, परंतु वह प्रभुद् ज्ञानी हो गए। कई ऐसे प्रभुद् ज्ञानी हुए हैं जो कभी कोई बड़ा काम नहीं करते थे पर वे छोटा-छोटा काम ‘बड़ी तरह’ से करते रहते थे। उनके मन में गहरी आस्था के लिए मालाएं भी नहीं बनाई। उन्हें तो इन्होंने तो इन्हें कभी नहीं करते थे। उनका नाम था साक्य नयनार (“साक्य” अर्थात् बुद्ध के कबीले का सदस्य और ‘नयनार’ यानी शिव भक्तों का एक नाम)। पता नहीं कैसे वह एक बौद्ध भिक्षु बन गए थे। चूँकि वे बौद्ध भिक्षु हो गए थे, इसलिए वे सार्वजनिक रूप से शिवलिंग की पूजा नहीं कर सकते थे, पर उनके मन में शिव के लिए असीम भक्ति थी। बौद्धों में काया होता है कि हर परिवार से एक पुत्र बचपन में ही मठ को दे दिया जाता है। वहीं उसका लालन-पालन होता है और विधिवत् बौद्ध भिक्षु बनाया जाता है। इसी प्रकार साक्यनार को भी एक बौद्ध मठ को दे दिया गया था, पर उनके मन में शिव के लिए गहरी भक्ति थी। वह रोज़ एक पेड़ के नीचे रखे शिवलिंग के पास जाते, एक पत्थर उठाकर उसको फूल का हार समझकर शिवलिंग पर फेंक देते थे। किसी ने उन्हें जब ऐसे करते हुए देखा तो पूछा - "अरे! तुम यह क्या करते हो?" वे बोले - "कुछ नहीं! मैं तो शिवलिंग पर पत्थर फेंकता हूँ।" और पत्थर फेंककर वह वहाँ से चल देते। एक बार एक वृद्ध आदमी ने अचानक उनको पत्थर फेंकते हुए पकड़ लिया - "ऐ! क्या करते हो?" जवाब मिला - "शिवलिंग पर पत्थर फेंक रहा हूँ।" वह वृद्ध फिर बोला - "पर जिस तरह से तुम पत्थर फेंकते हो उससे तुम्हारी भक्ति प्रकट होती है। भले ही पत्थर फेंक रहे हो, पर ऐसे ही तुम करते बड़े भक्ति-भाव से हो। मुझे सच-सच बताओ कि तुम कौन हो?" साक्य नयनार बोले - "वैसे तो मैं बौद्धों के एक परिवार में जन्मा हूँ पर मुझे शिव के प्रति असीम भक्ति है। रोज़ मैं यहाँ आकर अपने पूरे अस्तित्व के रूप में एक पत्थर फेंकता हूँ (अपनी जान निछावर करता हूँ)।" तुरंत वह वृद्ध

Content: श्रीमद्भगवत गीता शिव के रूप में प्रकट हुआ, साक्य नयनार को दर्शन दिया और प्रभुद् होने का वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गया। तो यह समझ लें कि हम क्या करते हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है। चाहे भले ही हम अपने घर में झाड़ू लगाए या सफाई करें, पर यदि हम ऐसा पूरे ध्यान और ईमानदारी के साथ, उस पल में यदि डूबकर करते हैं तो यह सही है और एक तरह की साधना है। क्षण में जीना आध्यात्मिक साधना का अर्थ यह कतई नहीं है कि गहन जंगल में जाकर नौ बार नाक पकड़कर शवासन ‘च्यामयाम’ करते रहो। ऐसे तो तुम सिर्फ स्वयं को त्राम ही दोगे। इसका अर्थ है जो कुछ भी करो पूरी ईमानदारी और श्रद्धा के साथ करो। अपनी आस्था को प्रकट करने का। आप में साहस होना चाहिए अपनी आस्था को दृढ़ता देने के लिए अपनी मान्यताओं को निरंतर परखते रहना चाहिए। जो भी आप मानते हो, उसके साथ प्रयोग करने का साहस आप में होना ही चाहिए। आप इसको परवाह न करें कि जो आप सत्य मानते हैं वह चरम सत्य है कि नहीं; वह चरम है कि नहीं, आप कभी नहीं जान पाएंगे। यदि आपके पास उनके साथ प्रयोग-परिक्षण करने का साहस नहीं है। बिना स्वयं परिक्षण के आप कभी अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाल सकते, क्योंकि बिना परिक्षण के यदि आपने कोई निष्कर्ष निकाला तो वह पूर्वग्रह ही होगा। अपने माने हुए सत्य को परिक्षण करने का साहस आप होना ही चाहिए। तमिल में ‘सत्य’ के लिए तीन शब्द हैं; एक ‘वाइमाई’ जिसका मतलब मुंह से सिर्फ सत्य निकालना। इस शब्द है ‘उண்மை’ जिसका अर्थ है दिल-ओ- दिमाग से सत्य कहना और तीसरा सुंदर शब्द है ‘मெய்ம்மை’ जिसका मूलार्थ है शरीर द्वारा सत्य जीना। तमिल में ‘माई’ का अर्थ ‘शरीर’ होता है। यानी सत्य ही शरीर से, मन से, दिल-ओ-दिमाग या मुंह से कहना या जीना। सत्य बोलना और दिल-ओ-दिमाग द्वारा सत्य भाषण करना तो सब समझते हैं, पर ‘शरीर से सत्य जीने’ का क्या तात्पर्य है, यह कभी अनजात्र सुना भी नहीं गया। यही वह तत्व है जो हम देखने से चूक जाते हैं। हम सत्य के बारे में दिन-रात सोचते रहते हैं। हम जो सत्य समझते हैं वही कहते हैं, पर हम एक बात भूल जाते हैं, सत्य को जीवन में उतारने को। हम सत्य को अपने जीवन में जी नहीं पाते। सत्य को जीवन में जीना ही सार तत्व है।

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Content: पतंजलि अपने 'अष्टांग योग' में पहला अंग सत्य मानते हैं। यदि तमिल में कहा जाए तो इसमें तीनों शब्द 'वाईमाई', 'उनमाई' और 'मेइमाई' में यही अर्थ समाहित है। यदि पूरी निष्ठा से अभ्यास किया जाए तो इस अष्टांग योग का एक ही योग हमें प्रबुद्ध ज्ञानी बना सकता है। वास्तव में जब हम प्रबुद्ध हो जाते हैं तभी हम चरम सत्य के बारे में जागरूक हो पाते हैं, पहले नहीं। इसलिए मैंने पहले भी कहा है और बार-बार कहा है कि जरूरी नहीं कि आपको प्रबोधन तब ही प्राप्त हो जब आपका गुरु भी प्रबुद्ध हो। यदि हम किसी भी गुरु की पूरी ईमानदारी से अनुसरण और आज्ञा-पालन करेंगे तभी हम प्रबुद्ध हो सकते हैं। यदि किसी पत्थर की मूर्ति के प्रति भी सच्चा अनुराग रखेंगे तो भी हम मुक्त हो सकते हैं। हमारा जमा हुआ अखंड विश्वास, हमारी पूर्ण आश्वासी, हमारा साहस और भरोसा वे तत्व हैं जो हमें ऊपर उठाते हैं, हमारी सोच के धरातल को उच्चता प्रदान करते हैं। श्रद्धा का मूल अर्थ यही है - जो हम कर रहे हैं उसमें हमें पूर्ण भरोसा है। अपने पक्ष के बारे में संशय का कोई अणु मात्र भी हमारे मन में नहीं होता जब हम श्रद्धावान होते हैं। हम तब यह भी नहीं पूछते कि हम क्यों क्या कर रहे हैं। सारे प्रबुद्ध स्वामियों का संपूर्ण एवं अखंडित ध्यान उसी पर लगा रहता था जो भी वह करते थे। अपने चुने हुए पथ से वे कभी विचलित नहीं होते थे चाहे कुछ भी प्रलोभन, चुनौती या समस्या उनके सामने आए; भले ही उनका जीवन भी खतरे में पड़ जाए। श्रद्धा हमें वह सब देती है जो हम चाहते हैं - सांसारिक उपलब्धियां भी यहां कृष्ण आध्यात्मिक उत्थान की बात करते हैं। हम उनके बताए गए तरीके से जो भी चाहते हैं वह प्राप्त कर सकते हैं। श्रद्धा सांसारिक उपलब्धियां प्रदान करने में भी कारगर रहती है। इसलिए इसे मैं 'क्वालिटम आध्यात्मिकता' भी कहता हूं। आध्यात्मिकता और सांसारिक उपलब्धियां अलग नहीं होतीं। आध्यात्मिक प्रसन्नता भौतिक प्रसन्नता से कोई फर्क नहीं होती। वास्तव: भौतिक सुख-चैन आध्यात्मिक सुख-चैन का एक हिस्सा ही होता है और यही मैं 'क्वालिटम आध्यात्मिकता' कहता हूं, अर्थात संपूर्ण आध्यात्मिक उपलब्धि, जिसमें भौतिक या सांसारिक चैन भी निहित होता है। यह समझ लें कि आध्यात्मिकता का अर्थ जंगलों में चले जाना या पहाड़ों की कंदरा में रहना नहीं है। यदि हमारा मन शुद्ध नहीं है तो हम कहीं भी चले जाएं, जंगलों या पहाड़ों पर, हमें कुछ नहीं मिलने वाला, सिवाय अपनी जंगल या पहाड़

Content: के बारे में कल्पोलनाओं में। आध्यात्मिक होने के लिए हमें कहीं भी जाने की जरूरत नहीं है। हम वहीं रह सकते हैं जहां हम हैं और बिना किसी अपराध बोध या खेद के हम जीवन सुखपूर्वक जी सकते हैं, पर हमें उन सब कल्पनाओं–चाहतों से मुक्ति पानी होगी जो हम अपने अभाव के कारण पालते हैं। इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए उस पर ध्यान केंद्रित करें जो हमारे पास है, उसी को भोगें जो उपलब्ध है बिना किसी लालच या कामना के। इसके लिए हमारे पास साहस, दृढ़ इच्छाशक्ति एवं अनुशासन और संपूर्ण एकाग्रता होनी चाहिए। यही श्रद्धा का अर्थ है। समझ लें कि हमारा चरम लक्ष्य या सीधा मार्ग हमें प्रबोधन की ओर ले जाएगा, जब हम पूरी सच्चाई और ईमानदारी से अपने विश्वास का पालन करेंगे। हम क्या मानते हैं यह मुद्दा नहीं है। हमें अपने विश्वास पर दृढ़ रहने के लिए इतना साहस होना चाहिए कि हम अपनी आस्था को निरंतर परख सकें; उसके साथ प्रयोग कर सकें।

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Chapter Number: 17.1

Chapter Name: आराधना का पथ

Content: अर्जुन बोले - "कृष्ण! जो श्रद्धायुक्त पुरुष शास्त्र-विधि को त्याग कर देवादि का पूजन करते हैं, उनकी फिर कौन-सी स्थिति है - सात्विकी, राजसी अथवा तामसी?"

Content: अर्जुन यहाँ पर एक संदेह प्रश्न करते हैं, वे पूछते हैं - "जो लोग शास्त्र विधि को त्यागकर देवताओं की उपासना पूरी ईमानदारी से करते हैं, वे सात्विकी माने जाएं या राजसी या तामसी? अर्थात् उन लोगों की क्या प्रवृत्ति मानी जाए जो अपनी आस्था के अनुसार अपने इष्ट की आराधना करते हैं और वैसे नहीं करते जैसा कि शास्त्रों में बताया गया है? वे सात्विकी हैं या राजसी या तामसी अर्थात् पूजा-आराधना तो कई प्रकार से की जा सकती है। अर्जुन का यह प्रश्न गुण आधारित आस्था पर ही निर्भर करता है। आराधना का तरीका भी ऊर्जाओं के स्तरों हैं अर्थात स्थूल रूप से पूजा करना, यथा मंदिरों में जाना, देवताओं की उपासना करना और पवित्र नदियों में स्नान करना। ऊर्जा स्रोत के रूप में जल की ऊर्जा से जोड़ा है। इसका दूसरा तरीका है - यज्ञ करना, जिसका संबंध सीधे-साधे अग्नि ऊर्जा से होता है। इसमें अग्नि की ऊर्जा यज्ञ कुंड के चारों ओर रखे पानी के वर्तनों में चली जाती है। यह जल जो इस कर्म-कांड द्वारा ऊर्जासिक्त हो जाता है, पास रखी मूर्तियों (भगवान की) पर उड़ेल दिया जाता है या लोगों पर और पृथ्वी पर छिड़का जाता है, जिससे वे भी ऊर्जासिक्त हो जाते हैं। वायु की ऊर्जा प्राणायाम करने या मंत्र जाप द्वारा जोड़ी जाती है। 'शिव सूत्र' के प्रथम नौ श्लोकों में शिवजी देवी (उनकी शिष्या) को इन्हीं विधियों के बारे में बताते हैं।

Content: ईश्वर की ऊर्जा मेडीटेशन या ध्यान लगाकर जोड़ी जा सकती है, यद्यपि इसमें समझ और जागरुकता होना बहुत आवश्यक है। हर तरह की पूजा का संबंध भी व्यक्ति की सहज-प्रवृत्ति से होता है। हर एक विधि के लिए शास्त्र मार्ग-निर्देशन उपलब्ध है कि कौन-सी पूजा कहाँ, कब और कैसे की जा सकती है। अर्जुन का प्रश्न है - "इन निर्देशों को पालन करना कितना महत्वपूर्ण है? क्या होता है जब कोई व्यक्ति अपने रुझान और स्वभाव के अनुसार पूजा करता है?"

Content: यह एक दिलचस्प प्रश्न है। तमिलनाडु के एक संत ने शिव की पूजा इतनी शिद्दत से की कि अपनी आँखें ही निकालकर शिवलिंग पर रख दीं। अन्य स्वामियों ने तरह-तरह की वेशभूषा को अपने इष्ट को आरपित किया था। यहाँ तक कि कच्चा मांस भी। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने तो भोग लगाने के पूर्व अपनी इष्ट मां काली की नाक पर एक धागा रखकर यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि वे सांस ले रही हैं कि नहीं। ऐसे कई प्रबुद्ध स्वामियों ने अपनी रुचि और रुझान के अनुसार ही अपने इष्ट देव की आराधना की है। शास्त्र निर्देश उनकी आराधना में कभी आड़े नहीं आए, पर ये सभी स्वामी गण अपनी करनी में पूर्ण एकाग्र एवं पूर रहे थे। उन सभी में श्रद्धा थी। यही असली महत्व की बात है। अर्जुन का प्रश्न इसी संबंध में है।

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Chapter Number: 17.2

Content: श्री भगवान बोले - "मनुष्यों की वह शास्त्रीय संस्कारों से रहित केवल स्वभाव से उत्पन्न श्रद्धा सात्त्विकी, राजसी और तामसी - ऐसी तीनों प्रकार की होती है। उसका (उसके और भेदों! सभी मनुष्यों में श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। पुरुष स्वयं श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धा वाला है, वह स्वयं भी वही है।

Chapter Number: 17.3

Content: सात्त्विक पुरुष देवों को पूजते हैं, राजक्ष पुरुष यक्ष और राक्षसों को तथा अन्य जो तामसी मनुष्य हैं वे प्रेत और भूतों को पूजते हैं।

Chapter Number: 17.4, 6

Content: जो मनुष्य शास्त्र विधि से रहित केवल मन कलपित और घोर तप को तपते हैं तथा दम्भ एवं कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से युक्त हैं, जो शरीर रूप से स्थित भूत समुदाय को और अंतःकरण में स्थित मुझ अंतर्यामी को भी कुश करने वाले हैं, उन अज्ञानियों को तू आसुरी स्वभाव वाला जान।

Content: कृष्ण समझाते हैं कि हम अपने स्वभाव के अनुसार अर्थात् उस 'गुण' के अनुरूप जिसके साथ हम पंदा हुए हैं, ही पूजा करते हैं। जब हम पैदा होते हैं तो पूर्व जन्मों की मानसिकता के अनुसार हमारे अंदर (गहरी जमी स्मृतियों के सार) द्वारा बनाई गई हमारी मानसिक वृत्ति होती है जो हमारे कर्मों को इस जन्म में संचालित करती है। इसी के अनुसार हमारे सहज-स्वाभाविक गुणों का निर्धारण होता है अर्थात् हम एक सहज वृत्ति के साथ पैदा होते हैं जो हमारे पिछले जन्मों की वासना के अनुरूप बनती है। इसी पर निर्भर होती है हमारे सहज 'गुण' की वृत्ति कि हमारी प्रकृति का संचालन कौन-सा गुण करेगा - सात्त्विको, राजसी या तामसी गुण।

Content: हमारे सारे समाज, धर्म, मत, जाति, पंथ का आधार इन्हीं तीन गुणों के अनुसार होता है जो हमारा मानसिक अनुकूलन कर, हमारी प्रकृति या सहज वृत्ति निर्धारित करते हैं। इस ग्रह पर जन्म लेने के पश्चात् हम उसी प्रकृति में ढल जाते हैं, जो हमारे पूर्व जन्म की मानसिकता रही होती है। हमारे नए जन्म में, हमारा वही धर्म हो जाता है जो हमारी पुरानी सहज वृत्ति रही होती है अर्थात् पूर्व संस्कार हमारे स्वभाव को बनाते हैं।

Content: पर हम यह नहीं समझ पाते कि हम समग्र अंश हैं; परमात्मा या चरम चेतना 'अखिल' के हिस्से हैं। हम नहीं समझते कि हमारी मूल प्रकृति सारे पादार्थिक अनुकूलों और युक्तियों से परे होती है। जब परमात्मा के साथ हम अपना यह मूल संबंध भुला देते हैं तो हम इन सांसारिक संबंधों को वही ऊर्जा प्रदान कर देते हैं। हम फिर किसी धर्म-सम्प्रदाय के अंधे नियमों से स्वय को जोड़ लेते हैं। वस्तुतः ये संबंध भंगुर होते हैं क्योंकि पादार्थिक होते हैं और इनसे युक्ति भी कृतिम रहती है, सहज नहीं।

Content: इन बंधनों को तोड़कर ही हम आत्म-ज्ञान की ओर अग्रसर हो सकते हैं। श्रद्धा का यहां अर्थ है उस विश्वास से जो किसी नेक काम से जुड़ने से पैदा होता है, पर जो विशुद्ध नेकी है वह इन सारे सांसारिक बंधनों के परे होती है। यह 'गुणातीत' होती है, इसलिए सांसारिक जीवन में न कुछ पूर्ण शुभ होता है न पूर्ण अशुभ।

Content: यह समझ लें कि वह व्यक्ति जो स्वभावतः विशुद्ध शुभता वाला है, वही परमात्मा या दिव्यता से जुड़ सकता हैं। इसीलिए एक प्रबुद्ध स्वामी इन तीन गुणों के परे होता है - इसलिए कि वह अपनी पूर्व-वासना, संस्कार और कर्मों को जला चुका होता है। कामना, लालच, भय, राग-विराग से परे वह सांसारिक अस्तित्व की भ्रांति में कतई नहीं बंधता। जब वह अपने शरीर को त्यागना चाहता है तो उसकी आत्मा असीम कॉस्मिक ऊर्जा में विलीन हो जाती है।

Content: जब किसी प्रबुद्ध ज्ञानी की आत्मा इस ग्रह पर पुनर्जन्म लेती है और मानव रूप में अवतरित होती है तो वह सत्व गुण से भरी होती है, क्योंकि हर शरीर धारी का कोई-न-कोई सहज 'गुण' तो होना ही चाहिए।

Content: ऐसे ही जीव 'अवतार' कहे जाते हैं। जब जीव को अपनी प्रबुद्ध चेतना का भान होता है - उस अवतार के रूप में तो वह गुणातीत अवस्था की ओर आकर्षित होता है। कुछ मामलों में अवतार का एक स्पष्ट उद्देश्य होता है इस ग्रह पर आने का, जो परमात्मा निर्धारित करता है। दूसरे मामलों में जैसे ही उस अवतारी जीव को अपनी मूल प्रकृति का भान हुआ, वह अपनी मूल कॉस्मिक अवस्था में लौट जाता है।

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Content: यदि कोई तामसी वृत्ति वाला व्यक्ति प्रबुद्ध होता है तो वह राजसी और सात्विक गुणों से गुज़रता है, तभी उसे सही ज्ञान प्राप्त होता है। यह परिवर्त्तन ज़रूर चाहे बहुत शनैः-शनैः हो। वाल्मीकि तो एक डाकेत थे जो लोगों को लूटते और मारते थे। उनकी मूल मानसिकता तामसी थी जिस पर राजसी की एक परत चढ़ी थी। उन्होंने एक बार नारद को पकड़कर उनसे धन मांगा। नारद ने कहा कि तुम 'नारायण' का जाप करो, जैसे ही उन्होंने प्रभु (नारायण) का नाम लिया तो उनकी वृत्ति बदल गयी। वह सत्य की ओर चलने लगे और प्रबुद्ध ज्ञानी होकर 'रामायण' जैसे महाकाव्य की रचना की। कृष्ण कहते हैं कि हमारी आराधना का ढंग हमारी मूल प्रवृत्ति पर निर्भर रहता है। सात्विक देवताओं की पूजा करता है, वह सदा शांतिप्रिय रहता है। राजसी प्रवृत्ति वाला प्राणी यक्षों तथा राक्षसों (अति प्राकृतिक ताकतों) की पूजा करता है तथा जो तामसी प्रवृत्ति का होता है वह भूत–प्रेत की आराधना करता है। जैसी आपकी मूल प्रवृत्ति होती है उसी के अनुसार आप अपने आदर्श, इष्ट देव इत्यादि चुनते हैं और उसी के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं। आपकी गुणबत्ता आपकी मूल प्रवृत्ति से प्रकट होती है। यदि सत्व गुण वाले हम हैं तो हमारा आदर्श कोई शुद्ध पुरुष या देवता होगा। जैसे यदि हमारे कक्ष में विवेकानंद की तस्वीर लगी है तो हमारा सात्विक भाव है। यदि किसी अभिनेता का चित्र हमारे कमरे में है तो हमारी वृत्ति राजसिक है। यदि हम मारधाड़ वाली पिक्चरों के अभिनेता को पसंद करते हैं तो हम राजसी के साथ-साथ थोड़े तामसी भी हैं। विशुद्ध तामसी वृत्ति वाले को हिंसात्मक दर्शन में आनंद मिलता है। यदि आप लगातार टीवी के सामने बैठकर मारधाड़ वाली फ़िल्में या दृष्य देखना पसंद करते हैं तो आप तमस में लिप्त हैं। कृष्ण कहते हैं कि हमारे आदर्श-इष्ट से हमारे गुण की पहचान हो सकती है। अंतिम श्लोक में तो वह स्पष्ट कहते हैं - 'शरीर को त्रा मत दो क्योंकि जब तुम शरीर को त्रा देते हो तो उसमें बैठा मैं (परमात्मा) भी कष्ट पाता हूँ।'

Content: अपने शरीर का दुरुपयोग मत करो हमारे शास्त्र हमसे कभी नहीं कहते कि शरीर को विभिन्न तपों और पीड़ाों से त्रा करो। आग पर चलना, बरसों खड़े रहना फालतू क्रियाएं हैं। जब कभी मैं आपकी ऐसी किसी त्रासदायी स्थिति में गुज़रता हूँ तो मेरा उद्देश्य मात्र आपकी वह बंधी-बधाई जीवनशैली को भंग करने का होता है। आपको ऐसे किसी कृत्य में लिप्त होने की कोई ज़रूरत नहीं थी - 'रोज़ सवेरे उठकर मैं दस फुट आग भरे स्थल से गुज़रूंगा।' नहीं... कोई ज़रूरत नहीं।

Content: कृष्ण स्वयं कहते हैं कि ऐसा कुछ भी करने की कोई ज़रूरत नहीं। जो लोग ऐसा करते हैं वे अपने दर्प और आहंम के मारे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि मैं यह सब कर सकता हूँ। विशुद्ध अहं या दर्प का भाव इनका संचालक है। कुछ लोग बरसों कोल्हू के बिस्‍तर पर पड़े रहते हैं या अपना एक हाथ लगातार ऊंचा रखते हैं। यह सब मूर्खतापूर्ण कृत्य है जो शरीर को कष्ट देने के लिए किए जाते हैं। ऐसे लोग अपने शरीर में विद्यमान परमात्मा को भी कष्ट देते हैं। कृष्ण बड़ी स्पष्टता से कहते हैं - 'शरीर में विद्यमान अपनी आत्मा को कष्ट मत दो। शरीर का दुरुपयोग मत करो। यह शरीर प्रभु का मंदिर है।' अपने को त्रा देकर हम उस चरम चेतना को भी कष्ट देते हैं। कृष्ण कहते हैं जो इस चरम चेतना- जो हमारे शरीर में विराजमान है को त्रा करते हैं, वे राक्षस हैं। रावण ने भी तय किया था और अपने शरीर व उसमें विराजमान चरम चेतना को भी कष्ट दिया था। वह सब व्यर्थ था। ईश्वर ने कभी नहीं कहा कि शरीर को कष्ट है- 'स्वयं को कष्ट मत दो।' ऐसे तो कुछ ही लोग हैं जो हर समय किसी का नाश करना चाहते हैं, इसलिए जब कुछ नहीं मिला तो स्वयं का नाश करने पर उतारू हो गए। इस तरह के त्रा का एकमात्र संचालक भाव है अहंमन्यता जिससे उनकी शक्ति का लो्हा माना जा सके।

Content: किसी भी शास्त्र में यह नहीं सिखाया जाता कि कैसे दूसरों को मारो या किसी पर काला जादू चलाओ। कुछ दिन पूर्व मेरी किसी से 'यन्त्र' (एक उपचार) के बारे में बात हो रही थी। यन्त्र एक धातु की प्लेट होती है। कई मंत्रों का सच्चित्र अंकन होता है तथा जिसे कुछ क्रियाओं द्वारा 'प्राणवान' कर दिया जाता है। मेरे भाषण के बाद एक सज्जन ने मुझे बताया - 'मैंने एक ऐसा यन्त्र खरीदा था, मैंने एक व्यक्ति को तंत्र-मंत्र करने की बात उस व्यक्ति से की तो वह ख़रीददार था, पर जब मैंने उसको चेतावनी दे दी कि वह मुझे श्राप दे देगा।'

Content: यह समझ लें कि केवल प्रबुद्ध ज्ञानी जन ही किसी को श्राप दे सकते हैं; सिर्फ़ उनके पास ही यह शक्ति होती है, है पर प्रबुद्ध ज्ञानी कभी श्राप नहीं देता। वही है जो वाकई अपने श्राप को असरदार बना सकता है। दूसरों के पास यह ताकत नहीं होती। किसी अन्य का श्राप असरदार नहीं हो सकता तो आपको कोई श्राप नहीं दे सकता। यदि किसी ने ऐसी धमकी दी है तो परवाह न करें। कुछ भी नहीं होगा, क्योंकि श्राप सत्य-संकल्प अर्थात् सत्य द्वारा तभी असरदार होगा जब कोई प्रबुद्ध ज्ञानी देगा और वह कभी श्राप देता नहीं है।

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Chapter Number: 17

Chapter Name: विश्वास और अभ्यास

Content: 17.7 भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं। उनके पृथक-पृथक भेद तू मुझसे सुन:-

Chapter Number: 17

Chapter Name: विश्वास और अभ्यास

Content: अब कृष्ण भोजन की बात करते हैं। विभिन्न प्रकार के लोगों को तीन प्रकार का भोजन ही प्रिय होता है, पर इस पर चर्चा करने के पूर्व मैं यह चाहता हूं कि तीन प्रकार की श्रद्धा की चर्चा कर ली जाए, जो हमारा आधार बनती है।

Chapter Number: 17

Chapter Name: विश्वास और अभ्यास

Content: एक प्रकार के लोग होते हैं जो सदैव ऋणात्मक रहते हैं। वे सदा शंक करते रहते हैं, हर चीज पर। वे कभी कोई विश्वास नहीं करते। ऐसे लोग कभी उठना ही नहीं चाहते; सदा गूंथे-बहरे से बने रहते हैं। उनका हम कुछ नहीं कर सकते। यह एक समूह है।

Chapter Number: 17

Chapter Name: विश्वास और अभ्यास

Content: दूसरा समूह उनका होता है जो विश्वास तो करते हैं पर उसको अमल में नहीं लाते अर्थात्‌ अभ्यास नहीं करते।

Chapter Number: 17

Chapter Name: विश्वास और अभ्यास

Content: तीसरा समूह उनका होता है जो विश्वास भी करते हैं और पूरी सच्चाई से उसको अभ्यास में लाते हैं।

Chapter Number: 17

Chapter Name: विश्वास और अभ्यास

Content: यही तीन समूह होते हैं सब लोगों के। पहला शक्ती लोगों को; वे सदा शक ही करते हैं, पूर्वग्रहों से ग्रसित रहते हैं। यह समूह तमस में ही पड़ा रहता है। दूसरा समूह जो विश्वास तो करता है पर अभ्यास नहीं करता, राजस वृत्ति के लोगों का होता है। तीसरा समूह विश्वास को ईमानदारी से अभ्यास में लाने वालों का होता है - ये सात्विक गुण वाले होते हैं। कृष्ण इन तीनों समूह का अंतर स्पष्ट करते हैं - शक्तियों का, 'विश्वासियों' का और 'ईमानदारों' का।

Chapter Number: 17

Chapter Name: विश्वास और अभ्यास

Content: फिर वे बताते हैं उनके जीवन-यापन का ढंग, उनका चरित्र और कैसे हम ईमानदारी द्वारा सत्व गुण प्राप्त कर 'गीता' में दिए सत्यों को पूरी तरह समझ सकते हैं।

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Content: वह क़दम-दर-क़दम समझाते हैं कि कैसे पूर्वाग्रह युक्त शक्ती लोग, विश्वासियों के स्तर तक आ सकते हैं और कैसे वे आगे बढ़कर ईमानदारी के सात्विक स्तर तक आ सकते हैं। यहां जितने बैठे वे सब विश्वास स्तर वाले हैं क्योंकि यदि आप पूर्वाग्रह युक्त होते तो यहां नहीं होते। यदि आते भी तो एकाध बात सुनकर चले जाते। कुछ लोग तो यहां सिर्फ यह देखने को आते हैं कि यहां हो क्या रहा है। दो-तीन मिनट यहां रुके, फिर अपनी घड़ी देखने लगते हैं - 'अरे बहुत हो गया! यह स्वामी तो एक लड़का ही है।' इसे ऐसा क्या मालूम होगा, जिसे मैं पहले से नहीं जानता होऊं? तो आप यहां तभी टिकेंगे जब आप कम-से-कम विश्वासो स्तर के होंगे। आपका यहां रोज़ आना और प्रवचनों को सुनना कम-से-कम यह दिखाता है कि आप विश्वास करने वाले तो हैं। बस, आपको तो एक स्तर ऊपर छलांग लगानी है, ईमानदारी के स्तर पर पहुंचने के लिए, जैसे ही हम उस स्तर तक पहुंचे कि हमें सत्यानुभूति हो जाएगी, हम कृष्ण हो जाएंगे, कृष्ण चेतना की अनुभूति करने लगेंगे। अब हम सच्चाई की अनुभूति को प्राप्त करने की विधि में प्रवेश करेंगे अर्थात् उस तरीके में जो हमें कृष्ण चेतना तक ले जाएगा। यहां एक चुनाव आपको ज़रूर करना पड़ेगा या तो आपको यह पूरी ईमानदारी से मानना पड़ेगा कि जो मैं कह रहा हूं वह पूर्ण सत्य है या वह पूर्ण तरह से झूठ है। यदि जो मैं आपको बता रहा हूं वह आप अपने अभ्यास में उतार नहीं सकते तो वह पूरा झूठ है, क्योंकि यदि वह आपके अभ्यास में नहीं आया तो उस सत्य से क्या लाभ? तो मैं जो कह रहा हूं वह वह सत्य है या झूठ, इसका निर्णय आपको ही करना है, क्योंकि वह सिर्फ आप ही कर सकते हैं। यदि मेरा कहा आप अपने जीवन में, अभ्यास में उतार सके तो मैं सच कह रहा हूं। यदि वहां तो फिर सुनने से भी क्या लाभ है? कुछ नहीं! कोई फायदा नहीं। लगातार 18 दिनों तक रोज़ तीन घंटे आपके और मेरे बर्बाद ही हुए हैं...और क्या! यानी अगर आपके जीवन में यह सत्य नहीं उतरे तो यह सब झूठ है। यदि आपके जीवन में बदलाव नहीं आया तो यह प्रवचन इत्याादि समय की बर्बादी से ज़्यादा कुछ नहीं है। तब तो जो कुछ यहां हुआ वह सब झूठा है, असत्य है।

Content: प्रयोग करने के लिए साहस करना ही यथेष्ट है मेरे शब्दों का प्रभाव आपकी चेतना पर यह तय करता है कि जो कुछ मैंने कहा वह सत्य है या झूठ है। एक बात और समझ लें कि

Content: आपको यहां जो करना है उसे पूरी संपूर्णता या महारत के साथ करने की ज़रूरत नहीं है। प्रयोग करने का साहस करना ही यथेष्ट है (अपने विश्वास के साथ)। इतने दिनों तक मेरा आपसे इतना कहने के बाद आप कहेंगे - 'तो फिर दो-तीन दिन तक हम लोग ऐसा ही क्यों न करें?' यदि आप में ऐसा साहस है तो काफी है। यदि ऐसा नहीं है तो मेरा यहां यह सब कहना और चीख़ना-पुकारना तो ऐसा ही है मानो कोई भारतीय राजनीतिज्ञ अपनी सभा में बोल रहा हो। यदि आप दक्षिण भारत में हैं तो आप हर महीने किसी-न-किसी नेता के भाषण सुनने से बच नहीं सकते। वे लाउडस्पीकर पर बोलते हैं सारे शहर-भर में। उनका भाषण सुनने से कोई वंचित नहीं रह सकता। अब मैं आपको एक वास्तविक घटना का हवाला सुनाता हूं जो कुछ समय पहले हुई थी। मैं पाडुकोट्टटाई (तमिलनाडु) से अपने बैंगलोर स्थित आश्रम के लिए वापिस आ रहा था। अचानक लाउडस्पीकर पर एक आवाज़ आने लगी। वह व्यक्ति देसी भाषा प्रयोग कर रहा था, एक भी सभ्य शब्द का इस्तेमाल नहीं था उसकी भाषा में। एकाध बार 'हम्म-हम्म' की आवाज़ ज़रूर आती। कोई शराफत के अल्फ़ाज़ नहीं थे। दस किलोमीटर तक वे शब्द हमारे पीछे ही लगे रहे यानी लगभग आधा घंटे तक। सड़कों की हालत तो ख़राब थी ही। आधा घंटे तक यही 'भांय-भांय' कांओं में पड़ती रही। दुर्भाग्यवश हमें उस मंच के सामने से भी गुज़रना पड़ा, जहां वह सज्जन बोल रहे थे। उस मंच पर सामने केवल चार महिलाएं ही बैठी थीं, बाकी बहुत और भी मंच पर थे। सुनने वाले कम थे, बोलने वाले ज़्यादा। मैंने एक युवा बटुक (एक अविवाहित युवक जो संन्यास में दीक्षा लेने आया था) ब्रह्मचारी से पूछा- 'यह हो क्या रहा है? यह आदमी ऐसे 'देसो खांटी' शब्द क्यों प्रयोग कर रहा है?' ब्रह्मचारी बोला - 'स्वामी जी! यह क्या? वह तो शालीनता से बोल रहा है।' आप क्यों उसको दोष दे रहे हैं?' मैंने कहा - 'शालीनता से?' वह बोला - 'स्वामी जी! आपने कभी इन मीटिंगों में भाग नहीं लिया है, इसलिए आपको भाषा अटपटी और असभ्य लग रही है। यहां के हिसाब से तो यह शालीन ही है।' मैंने पूछा - 'तो वहां केवल चार महिलाएं ही क्यों बैठी थीं श्रोताओं में?'

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Content: वह बोला - "लाउडस्पीकर्स के कारण दस किलोमीटर के क्षेत्र में उस नेता की आवाज़ लोग घर बैठे ही सुन लेते हैं। वे उसे सुनने उस नेता को पास क्यों जाएं? उधर, उस मीटिंग में वह वक्ता भीड़ से कह रहा था - "प्यारे भाइयो! आप यहां एक समुद्र की तरह इकट्ठे हो...!" जबकि वहां सिर्फ चार महिलाएं ही थीं जिन्हें वह श्रोताओं का समुद्र कह रहा था और वे चारों महिलाएं पान चबा रही थीं और ज़मीन पर लगातार पीक करती जा रही थीं। ये चारों वृद्ध महिलाएं थीं। लगता था मानो वे अपनी बहुओं से लड़कर आई थीं। फिर वे जाती भी कहां? यहां कुछ मज़ा भी था, इसलिए इधर ही आ गई थीं। उन महिलाओं ने सोचा होगा - "चलो यहां चलकर बैठते हैं। शायद भाषण आदि के बाद कुछ कपड़े या अन्य भेंट प्राप्त हो।" यदि कुछ नहीं मिला तो कम-से-कम कुछ झंडे ही हम उखाड़कर ले जाएंगे, घर में पहुंचा लगाने के काम आएंगे।" शायद इसी कारण वे वहां मीटिंग में आई थीं। यह समझ लें कि यदि हम अपने सत्य और विश्वास के साथ प्रयोग करने का साहस नहीं है तो यह प्रवचन मीटिंग भी वैसे ही सिद्ध हो सकती है। यदि हम सत्य को अभ्यास में नहीं उतारेंगे तो हम कृष्ण के शब्दों को अपने ऊपर असर दिखाने से रोकेंगे। यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह प्रवचन भी वैसे ही एक राजनीतिक जनसभा होकर रह जाएंगे। उसे ऐसा न बनाएं। इन शब्दों को अपनी समझ को बांंधने दीजिए। सत्य के साथ अपना प्रयोग करें, क्योंकि यदि आपने यह परख नहीं की तो मानसिक रूप से आप यहीं समझेंगे कि यह सत्य नहीं है। हो सकता है आप सोचें - "यह स्वामी इसलिए प्रेस करते हैं ताकि वह कहीं पढ़ लिया है।" पर यदि आप इसे सत्य समझते हैं तो आप यहीं टिके रहेंगे, नहीं तो आप यहां से चले जाएंगे। यदि आप इसे सत्य नहीं समझते तो क्या इतने दिनों तक रोज़ तीन घंटे वहां आकर बैठते? आप कुछ और करते - टीवी देखते या कहीं और जाते पर आपकी यहां पर उपस्थिति यह बताती है कि आप इसे सत्य समझते हैं (जो मैं कह रहा हूं)। यदि आप इसे सत्य समझते हैं तो फिर इसे परखने में, इसके साथ प्रयोग करने में हिचकिए मत। साहस रखिए इस प्रयोग के लिए। कोई एक विचार चुन लीजिए- पूरी गीता के बताए सत्यों का प्रयोग करना ज़रूरी नहीं है। सिर्फ एक विचार ही चुन लें और उसे अपने अंतर्मन में उतारने का प्रयास पूरी ईमानदारी से करें। अपने पूरे अस्तित्व में वही विचार व्याप्त होने दें।

Content: स्वामी विवेकानंद कहते हैं - "जब आप एक ही विचार से बंधते हैं तो वह विचार आपके खून में उबाल पैदा करता है। आपके सिर के बाल भी रोमांचित होते हैं। आपका समूचा शरीर, सारी सोच, दिमाग उसी विचार से अभिभूत रहते हैं। आपका समूचा अस्तित्व उसी विचार को समर्पित हो जाता है।" तो एक कोई विचार या सत्य या अवधारणा को चुन लें और अपनी परख प्रारंभ कर दें। यदि असफल भी रहते हैं तो कोई हर्ज नहीं, पर उसके साथ काम करने का साहस रखें। यदि सफल हुए तो आप उस सत्य को आत्मसात कर लेंगे और मुक्ति पाएंगे... आनंद मग्न होंगे। यदि असफल रहे तो आपको मालूम पड़ जाएगा कि यह बात सत्य नहीं है, आपका मत स्पष्ट हो जाएगा। फिर आप अपनी खोज अन्यत्र जारी रख सकते हैं तो आप मन में पक्का विचार कर लें। कृष्ण यह एक मूल सत्य बता रहे हैं आपको पूरी तरह ईमानदारी से इसे ग्रहण करना चाहिए जैसा पहले बताया था। लोगों के तीन समूह होते हैं - तामसिक लोग पूर्वाग्रह-संशय युक्त रहते हैं, यानी सदैव ऋणात्मक रहते हैं। राजसी लोग बौद्धिक रूप से विश्वास करते हैं, पर सात्विक लोग पूरी ईमानदारी से विश्वास करते हैं। वे सिर्फ भरोसा नहीं करते अपने विश्वास को परख करने का भी हौसला रखते हैं। इस साहस से स्वयं को वंचित न करें। इन शब्दों को स्वयं को वेधने दीजिए।

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Chapter Number: 17

Content: 17.8 आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति बढाने वाले रसयुक्त चिकने और स्थिर रहने वाले तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय ऐसे आहार सात्विक लोगों को प्रिय होते हैं।

Chapter Number: 17

Content: 17.9 कटवे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गर्म, तीखे, रूखे, दाहकार और दुःख, चिंता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार राजस पुरुषों को प्रिय होते हैं।

Chapter Number: 17

Content: 17.10 तथा जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गंधयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र, वह भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है।

Content: महान राजा हरिश्चंद्र ने अपना राज्य लुटा दिया, पत्नी को बेच दिया और अपने बच्चे और स्वयं पर भी मौत का खतरा आने दिया, पर अपना वचन निभाया। हमें शब्द की समझ उसके मूल भाव के संदर्भ में ग्रहण करनी चाहिए। शब्द बड़ी आसानी से गलत समझे जा सकते हैं, पर शब्दों का मूल भाव समझ से चुकना नहीं चाहिए। शब्दों का मूल भाव आसानी से गलत समझा जा सकता है। उसका गलत अर्थ भी निकाला जा सकता है। यदि आप साहस के साथ, अपने सत्य के साथ प्रयोग कर उसे परखते रहेंगे तो ऐसी गलती नहीं होगी। यदि ऐसा नहीं कर सकते तो समझ लीजिए आपके लिए यह सत्य नहीं है - उसे भूल जाएं। तब कम-से-कम अनन्य खोज करने के लिए तो आप स्वतंत्र रहेंगे।

Content: अनुभव के साथ प्रयोग ( परखना )

Content: यदि आप समझते हैं कि कोई सत्य अपने जीवन में उतारने और पालन करने के लिए नहीं हैं तो उसे छोड़ दीजिए, क्योंकि फिर आपकी यह आदत हो जाएगी कि सत्य को सुना और उस पर अभ्यास नहीं किया। यह आपकी मानसिकता ही हो जाएगी, जो बहुत खतरनाक मानसिक स्थिति होती है। लोग प्रायः मुझसे पूछते हैं - "स्वामी जी! क्या मैं प्रबुद्ध होने के लिए सब कुछ त्याग दूँ? क्या सन्यासी हो जाऊँ?"

Content: मैं उनसे कहता हूँ- "नहीं! इसकी कोई जरूरत नहीं। सिर्फ एक काम करो - ऐसी मानसिकता मत रखो कि किसी सत्य के बारे में सुनो और उसको अपने आप न आज़माओ। बस! क्योंकि यह किसी भी प्राप्ति के लिए एक बेहद खतरनाक स्थिति है। किसी सत्य को पाना और स्वयं उसकी आज़माइश करने का साहस न रखना, सबसे भयावह मानसिकता होती है। यह वह भयंकर राक्षस है जिसके चंगुल में आप पड़ सकते हैं। इसलिए कम-से-कम इतना साहस तो रखो कि यह तय कर सको- "यह मेरे लिए नहीं है क्योंकि यह सत्य नहीं है।"

Content: यदि आप उस तथ्य को सत्य समझते हैं तो उसको आज़माने का साहस भी आप में होना ही चाहिए।

Content: अभी तक आपने कई बातें सुनीं। कृष्ण इस अध्याय में नया कुछ भी नहीं कहते। सिर्फ एक ही बात वे कहते हैं- "ईमानदारी (या सच्चे) रहो।" ईमानदारी सीधा रास्ता है। मैं लोगों से कहता हूँ - "सच्चाई मूल आध्यात्मिक गुण है। यही सब गुणों का सार है।" अर्थात पहले एक भले-सच्चे आदमी बनो। जिसमें विश्वास रखते हो उसके लिए पूरी तरह सच्चे रहो। यदि किसी सत्य के बारे में स्पष्टता नहीं है तो उसे मत मानो। यदि कुछ भी तुम्हारे लिए सत्य है तो उसको

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Content: निरंतर आज़माते रहो। सत्य तभी मानों जब उसका प्रयोग कर, आज़माइश कर तुम स्वयं संतुष्ट हो जाओ। वैज्ञानिक यह साहस रखते हैं, वे जिसे सत्य समझते हैं, उसके साथ निरंतर प्रयोग कर उसकी आज़माइश करते रहते हैं। फिर जो उनका शोध परिणाम देता है उसे वे सहेर्ष स्वीकार कर लेते हैं। इसी प्रकार आप अपने अंतर्मन के वैज्ञानिक बन जाओ - एक आध्यात्मिक वैज्ञानिक। आप में इतना साहस होना चाहिए कि अपने अनुभव को स्पष्ट शब्दों में व्यक्त कर सको। तुम में उसके साथ खेल करने का माद्दा होना चाहिए। यदि सत्य है तो वह हर तरह से सत्य रहेगा।

Content: एक लघु कथा

Content: एक प्रबुद्ध जैन स्वामी और उनका शिष्य स्नान करने के लिए एक नदी के तट पर गए। अचानक वह शिष्य नदी में गिर गया और चिल्लाने लगा - 'स्वामी! मुझे बचाइए! मुझे बचाइए!' जैन स्वामी ने कहा - 'तुम तो एक आत्मा हो। बचाओ स्वयं को। तुम खुद ही परमात्मा का अंश हो। बचाओ अपने आपको!' शिष्य ने व्याकुल होकर कहा - 'स्वामी! पहले मुझे बचा लें, फिर अपने दर्शन का पाठ सिखाएं, तब आप ध्यान करवाएं' - पर पहले बचा तो लें!' स्वामी ने कहा - 'खड़ा हो जा और स्वयं को बचा लो।' शिष्य बोला - 'नहीं-नहीं स्वामी! मुझे बचाएं। फिर आप अपने पाठ सिखाएं।'

Content: स्वामी चिल्लाकर बोला - 'मूर्ख! मैं कहता हूं खड़ा हो जा!' अब शिष्य भयभीत हो गया। भय के मारे वह खड़ा हो गया और उसने देखा कि नदी का पानी सिर्फ उसके घुटनों तक ही पहुंच पाता था। जब आप खड़े हो जाते हैं तो आप सम्पूर्ण 'संसार सागर' या 'भव सागर' को पूरा देख पाते हैं। तब आपको मालूम पड़ता है कि आपके लिए जो एक भयंकर चिंता का विषय है वह आपके घुटने तक भी नहीं पहुंच पाता (अर्थात खतरनाक बिल्कुल नहीं है)। चूंकि आप लेटे हुए हैं, खड़े होकर नहीं देख रहे हैं, आपको लगता है आप डूबने वाले हैं - मरने वाले हैं।

Content: मैं आपको अपने व्यक्तिगত अनुभव से बता सकता हूं कि यदि आप खड़े होकर देखें तो ख़तरा आपके घुटनों तक भी नहीं पहुंच पाएगा, जिसे आप संसार-सागर समझते हैं, वह तो बहुत उथला है। यह आपको कोई हानि नहीं पहुंचा सकता, लेकिन खड़े होने के लिए साहस तो दिखाना ही पड़ेगा। उदाहरण के लिए इसी लघुकथा में यदि शिष्य यह सोचने लगता - 'अरे! मैं तो डूब रहा हूं और मुझे बचाने के बजाय गुरु जी मुझे अव्यावहारिक बातों का ज्ञान दे रहे हैं। यह कैसे गुरुजी हैं?'

Content: यदि वह अपने गुरुजी पर ही दोषारोपण करता रहता तो निश्चित ही उस नदी में डूब जाता, पर उसने इतना साहस दिखाया कि अपने गुरु की बात पर भरोसा कर उसे मानने के लिए खड़ा हो गया। यानी उसने अपने विश्वास के साथ साहस दिखाया और उसकी आज़माइश की। वह बच गया। सत्य जानने के लिए आपको स्वयं यत्न करना चाहिए यानी साहस दिखाना चाहिए अपने विश्वास को परखने के लिए। इसमें आप कुछ खोते नहीं हैं, पाते ही हैं। वैसे भी यदि कोई चीज़ गँवाने योग्य है तो उसको ज़ल्दी-से-ज़ल्दी गँवाना ही श्रेयस्कर है। आप उसको गँवाने से हिचकिच ही होंगे। सत्य प्राप्त करने में कुछ फालतू चीज़ों से मुक्ति मिलती है तो अच्छा ही है। जितनी ज़ल्दी ऐसा हो उतना ही बेहतर है इससे आपका भला होगा।

Content: ईश्वर करे आप सदैव सत्य से ओत-प्रोत रहें। जो नहीं टिक सकता, जो झूठ है, असत्य है - उससे मुक्ति पाना ही बेहतर है - वह भी शीघ्राति-शीघ्र। कृष्ण यहां बताते हैं कि विभिन्न प्रकार के भोजन कैसी ऊर्जा प्रदान करते हैं। साधारणतया भोजन तो वनस्पति से प्राप्त नहीं किया जाता, कुछ पशुओं के माध्यम से प्राप्त होता है (मांस) जो ऋणात्मक ऊर्जा देता है। ग़र्म और मसालेदार भोजन कामनाओं को बढ़ाता है। आध्यात्मिक अभ्यास के लिए तो निरामिष भोजन श्रेष्ठ है जो ताज़ा और बेमसालेदार होता है।

Content: हमारे नित्य स्पिरिचुअल हीलिंग सिस्टम में यह ज़रूरी है कि निरोग करने वाले पहले स्वयं निरामिष हो जाएं तथा एल्कोहल, तम्बाकू एवं नशे के पदार्थों से मुक्त हों। मैं मांस और एल्कोहल के खिलाफ़ नहीं हूँ, न मेरी कोई पशुओं के प्रति कूरता है दिखाने के विधिन सिद्घांतों में मान्यता है। पेड़-पौधों में भी जीवन होता है, यद्यपि उनकी आध्यात्मिक चेतन नहीं होती है। इसलिए यदि सामिष लोग पशुओं के प्रति कूर होते हैं तो निरामिष पेड़-पौधों के प्रति वह निर्ममता दिखाते हैं।

Content: हमारा नित्यानंद 'स्पिरिचुअल हीलिंग सिस्टम' गहन ध्यान की विधियों पर आधारित है। ध्यान से प्राप्त ऊर्जा के असरदार होने के लिए आवश्यक है कि ऋणात्मक ऊर्जा देने वाले भोज्य पदार्थ प्रयोग में न लाए जाएं। मैंने स्वयं देखा है कि ध्यान में एल्कोहल, मांस और नशे की चीज़ें रोधक बनकर उभरती हैं। इसलिए यदि साधक इन चीज़ों का प्रयोग करते हैं तो शारीरिक और मानसिक रूप से इनका बुरा असर पड़ता है।

Content: कई लोग शिकायत करते हैं कि यह शर्त बंधनकारी है पर मैं क्या करूं? उन साधकों के लिए जो हीलर्स बनना चाहते हैं, मैंने इन शर्तों में थोड़ा परिवर्तन किया है। जो स्वयं हीलिंग वाले हैं वे उन्हें मांस खाने, ड्रिंक करने या सिगरेट पीने

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Chapter Number: 17

Content: निष्काम भाव से दान-पुण्य करना

Chapter Number: 17

Content: 17.11 'शास्त्र विधि से नियत यज्ञ करना ही कर्तव्य है'- जो इस प्रकार मन का समाधान कर, फल की कामना न करने वाले पुरुषों द्वारा किया जाता है वह सात्विक यज्ञ है।

Chapter Number: 17

Content: 17.12 हे भारतश्रेष्ठ! जो यज्ञ केवल दंभाचरण के लिए ही (दिखाने के लिए ही) अथवा फल के भी उद्देश्य से किया जाता है, उसकी पूँछ राजसी समझ।

Chapter Number: 17

Content: 17.13 शास्त्रविधि से हीन, अन्न दान से रहित, बिना मंत्रों के, बिना दक्षिणा के और बिना श्रद्धा के किए जाने वाले यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं।

Content: अब कृष्ण बताते हैं कि कैसे दान दिया जाए, यज्ञ किया जाए या दूसरों की सेवा की जाए। वैदिक कर्मकांड में अग्नि द्वारा यज्ञ, होम, हवन करना केवल देवताओं की आराधना करने का ही माध्यम नहीं था। इनका बहुत गहरा अर्थ था जिससे जीवधारियों एवं दीन-हीनों का भला हो सकता है।

Content: इस प्रकार की कर्मकांडीय गतिविधियों का प्रमुख तत्व था - किसी सुयोग्य गरीब को दान या भेंट देना। जो भी इन यज्ञों में आता था वह कभी खाली हाथ नहीं जाता था। जब महान ऋषिगण, प्रवृद्ध स्वामी इन यज्ञों को करते थे तो उनकी अपनी कोई चाह नहीं होती थी। वे तो इन्हें अपने अनुभूत सत्य के अनुसार करते थे जो उन्होंने अपनी शास्त्र प्रदत्त समझ द्वारा प्राप्त किया था।

Content: उनकी कोई कामना नहीं होती थी। वह तो यह यज्ञादि नित्य करते थे अपनी जीवन्तता को व्यक्त करने के लिए। यज्ञ इस प्रकार किए जाते थे जिससे देवी-देवता और प्रकृति खुश रहकर मानवों का कल्याण करे। यह सब सात्विक भाव द्वारा की गई निष्काम साधना का अंग था।

Content: राजा लोग भी ऐसे दान-पुण्य किया करते थे। उनके यज्ञ उनको शक्ति प्रदर्शित करते थे और अन्य लोगों पर अपना वर्चस्व दिखाते थे। ये सारे कृत्य

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Content: उनकी अहंमन्यता दिखाते थे। युधिष्ठिर जैसा राजा अश्वमेघ यज्ञ और राजागण अपनी श्रेष्ठता अन्य राजाओं पर दिखाते थे। वैसे इन अवसरों पर अपनी सम्पत्ति भी दान आदि में लुटाते थे, पर इनको राजस भाव से ही दिया जाता था।

Content: राक्षस लोग भी भयंकर यज्ञ करते थे जिसमें सिवाय अपनी कूर शक्ति प्रदर्शन के और कोई भाव नहीं होता था। इसमें कोई दान-पुण्य या शुभ क्रिया शामिल नहीं होता था। इनकी कोई शास्त्रोक्त मान्यता भी नहीं होती थी और विशुद्ध स्वार्थी भाव से किए जाते थे।

Content: जब बालक नचिकेता के पिता ने उन बेकार गायों को, जो दूध नहीं देती थीं, यज्ञ में देने के लिए तप किया तो इस बालक ने प्रतिरोध किया- "आप यज्ञ में इन बेकार गायों को क्यों दे रहे हैं? यज्ञ में तो श्रेष्ठ चीजें दी जाती है। अगर आपके पास ऐसा कुछ नहीं है तो मुझे ही दान दीजिए।" और फिर अपने गहन अज्ञान और क्रोध में उसके पिता ने अपने इस पुत्र को ही मृत्यु के देवता यम को भेंट कर दिया।

Content: दान या पुण्य के लिए दी जाने वाली चीजों की मात्रा महत्वपूर्ण नहीं होती, महत्वपूर्ण होता है उस चीज को देना, जो हम देना गंवारा ही नहीं कर सकते। यानी कुछ ऐसी चीज दी जाए जिसको देना हमें आहत करता हो, चोट पहुंचाता होता है। वह भी बिना किसी बदले की भावना से। ऐसा दान सीधा मुक्ति प्रदायक होता है।

Content: कई लोग बड़ी शुभ भावना से दान करते हैं, पर वह दान नहीं होता कि आपने अपनी वसुधा-संपत्ति में से कुछ ऐसी चीज दीजो आपके जीवन-यापन में कोई फर्क न डाले। यह कोई दान नहीं होता। मुझसे कई लोग कहते हैं - "स्वामी जी! मैंने वसीयत कर दी है कि मेरा सब कुछ मेरी मृत्यु के बाद इस आश्रम, मंदिर या आपके विशाल कार्यों को दान दिया जाए।" मृत्यु के पश्चात् देने से क्या लाभ? आप तो वैसे भी उस धन-संपत्ति को साथ नहीं ले जा सकते।

Content: दान वही है जिसको देने से आपको कष्ट हो, चोट पहुंचे, आपको परेशानी हो पर आप सहर्ष उस चीज को बिना किसी बदले की कामना से दे दें। वही दान का मूल भाव है। ऐसा दान जिसमें आपको कष्ट तो हो पर आप खुशी से बगैर किसी बदले की कामना से दे दें - वही असली दान है।

Content: मैं उस दान की भर्त्सना नहीं कर रहा जो धनी लोग बिना किसी इश्तिहार या फोटो सेशन के देते हैं। उनका भाव बड़ा शुभ होता है - वे किसी परेशानी व्यक्ति को सहायता देने के लिए ही करते हैं। देने में वह मानसिकता होनी ही चाहिए, 'जिससे किसी जरूरतमंद का काम बने। उस सदाश्यता का भाव

Content: दान के साथ ही रहता है। इस बारे में कोई संदेह नहीं है, पर वह दान राजस भाव का दान ही माना जाएगा। वह सात्विक दान नहीं होता। जब लोग इस राजस भाव से सात्विक भाव से दान करने की श्रेणी में पहुंचते हैं तो धन-संपदा स्वयं उनके पीछे आती है। ऐसे लोगों के पास बिना उनकी कामना के लक्ष्मी की कृपा पहुंचती है, क्योंकि लक्ष्मी देवी को मालूम होता है कि यहीं लोग मानवता का कल्याण करते हैं।

Content: धन-शक्ति को कभी कमतर प्रभाव देने वाली के रूप में नहीं आंकना चाहिए। वह बड़ी ऊर्जाओं की खान होती है। सभी बड़ी ऊर्जाओं की तरह समस्या वही रहती है - इनका सदुपयोग हमारे दिमाग को प्रभावित न करे। उदाहरण के लिए रावण और जनक का फर्क देखें। जनक एक राजर्षि थे अर्थात् राजा होते हुए भी ऋषि के समान। वे भी एक राज्य के स्वामी थे, पर उस पूरे राज्य-पाट की सत्ता इस तरह भोगते थे मानो वह किसी दूसरे के स्वामित्व में हो। वह तो सिर्फ उसके संरक्षक थे - एक साक्षी मात्र। इसके बरअक्स एक बड़ा तपस्वी और बड़ी तपस्याएं करने वाला महाज्ञानी रावण अपने अहंम भाव से राजसत्ता भोगता था;

Content: उनका आनंद लेता था। इसी से उसकी बर्बादी हुई।

Content: यह सारा जगत समस्त सुख-सुविधाओं से भरा-पूरा है। यहां किसी बात की कोई कमी नहीं है। जो हमें चाहिए, हमें मिलता है पर समस्या यही है कि जो हमें मिलता है उससे हम संतुष्ट नहीं होते। हमारी कामनाएं अनन्त हैं। महान स्वामियों ने बार-बार कहा है कि विश्व में सभी की जरूरतें पूर्ण करने को बहुत कुछ उपलब्ध है पर एक भी आदमी का लालच पूरा करने को कुछ नहीं है।

Content: हमारे लालच की कोई सीमा नहीं होती। ईश्वर करे आपकी दान देने की इच्छा असीम हो - पर आपकी संग्रह करने की वृत्ति शून्य हो। तब आप देखना, आपको ताज्जुब होगा कि कैसे धन-संपत्ति आपके पास दौड़ी चली आती है।

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Chapter Number: 17

Content: मनसा, वाचा, कर्मणा - सब तरह से

Chapter Number: 17.14

Content: देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानी जनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा - यह शरीर संबंधी तप कहा जाता है।

Chapter Number: 17.15

Content: जो उऋंग न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण का अभ्यास है - वही वाणी संबंधी तप कहा जाता है।

Chapter Number: 17.16

Content: मन की प्रसन्नता, शांत भाव, भगवत चिंतन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अंतःकरण की पवित्रता - मन संबंधी तप कहा जाता है।

Chapter Number: 17.17

Content: फल को न चाहने वाले योगी, पुरुयों द्वारा परम श्रद्धा से किए गए पूर्वोक्त तीन प्रकार के तप को सात्विक तप कहते हैं।

Chapter Number: 17.18

Content: जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए अथवा पाखंड के लिए ही किया जाता है, वह अनिश्चित और क्षणिक फल वाला तप यहां राजस कहा गया है।

Chapter Number: 17.19

Content: जो तप मूर्खतापूर्वक हठ से मन, वाणी, शरीर और शरीर की पीड़ा सहित दूसरों के अनिष्ट के लिए किया जाता है, वह तप तामस कहा गया है।

Content: कृष्ण अब मनसा-वाचा-कर्मणा तपों के बारे में बताते हैं। तप करना अर्थात् साधारण रूप से नियम पालन करते हुए जीवन-यापन करना, एक प्रकार से अपरिग्रह की श्रेणी में ही आता है। इसका आधार होता है आपकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति, न कि उससे जो आपकी कामना हो। जो इसका पूर्ण रूप से पालन करता है, तपस्वी कहलाता है। कृष्ण पहले भी कह चुके हैं और यहां पुनः दोहराते हैं कि तपस्या का मतलब स्वयं को, दूसरों को कष्ट देना या पीड़ा देना नहीं होता। इसमें सिर्फ शारीरिक पीड़ा या वेदना ही नहीं, मानसिक या वैचारिक वेदना प्रदान करना भी शामिल है।

Content: श्रीमद्भगवत गीता

Content: शामिल है। ऐसे तप का कोई प्रयोजन नहीं, जो शरीर मन-तंत्र को कष्ट दे तथा उसमें विद्वान ईश्वर को भी पीड़ा दे। ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि शरीर ही ईश्वर का मंदिर होता है। जो तप मूर्खतापूर्वक हठ के कारण स्वयं को त्रा‍स देता है या दूसरे को परेशान करता है, वह वस्तुतः तप नहीं त्रास है। ज्यादातर ऐसे तथाकथित तप अज्ञान के कारण ही किए जाते हैं। इसी बात को मैं काले जादू के संदर्भ में समझा चुका हूं। कोई काला जादू चलाया नहीं जा सकता, न कोई प्रेतात्मा आपके पास भेजी जा सकती है, सिर्फ प्रबुद्ध ज्ञानी के कोई श्राप नहीं दे सकता और जो प्रबुद्ध ज्ञानी है वह कभी श्राप नहीं देता, वह तो केवल वरदान ही देता है।

Content: इन ऋणात्मक चीजों की परवाह न करें। ये सब तमस की क्रियाएं जो कभी कारगर नहीं होतीं। वे प्रायः उसे परेशान करती हैं जो इनको चलाता है। ये दूसरों को तो कष्ट दे ही नहीं सकतीं। भगवान कृष्ण कहते हैं कि राजस गुण वाले व्यक्ति तप सम्मान, प्रतिष्ठा या पूजनीय होने के उद्देश्य से करते हैं। जब वह इस उद्देश्य से दान-यज्ञ या तप करते हैं तो वह स्थायी नहीं होता, और जब उन्हें लोगों का सम्मान नहीं मिलता, वे यज्ञादि करना बंद कर देते हैं। तब तक ही वे ऐसा करना चाहते हैं जब तक जनता उनके चरणों में गिरती रहे। यदि आदर नहीं मिला तो यज्ञ भी नहीं करेंगे। तपस्या भी नहीं करेंगे। जो भी तप किसी बदले की भावना से (चाहे भले ही प्रबोधन प्राप्ति के उद्देश्य से) किया जाता है, वह राजस श्रेणी में आता है, लेकिन जब संपूर्ण समर्पण के भाव से किया जाता है - निष्काम भाव से - तब ही वह सात्विक तप कहा जाएगा और तब ही उसका कोई आध्यात्मिक मूल्य होगा।

Content: मैं अब अपनी तपस्या की बात करता हूं। मैंने बताया कि उस दौरान मैंने काफी भ्रमण किया। भारत-भर में भटकता, कई मुश्किल काम भी किए। अब मैं समझता हूं कि कई ऐसे काम थे जो नहीं किए जाने थे। मैंने 10,000 कुंजियों का प्रयोग किया होगा। प्रबोधन द्वार खोलने के लिए तब एक ऐसी मिली जिससे यह द्वार खुल पाया। मैं अपने शिष्यों से कहता हूं कि उन्हें वैसी यंत्रणा से गुज़रने की कोई ज़रूरत नहीं, क्योंकि एक आसान, तीव्रगामी और सहज तरीका भी है। जब तक मैं प्रबोधन प्राप्त करने के लिए ज़द्दोज़हद में उलझा रहा, यह मुझे नहीं मिला। मैं स्वयं को पूरी तरह महसूस तब ही कर पाया, जब मैंने वह माला भी त्याग दी जिससे मैं जाप करता था और रामकृष्ण परमहंस की वह तस्वीर भी, जो वर्षों से मेरे साथ थी। मैं चुपचाप ध्यान लगाकर संपूर्ण भावना से बैठ गया कि- अब जो हो सो हो।

Content: श्रीमद्भगवत गीता

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Content: यहाँ कृष्ण 'सौहृद्य' शब्द का प्रयोग करते हैं। अंग्रेजी में इस 'सौहृद्य' के लिए कोई सही शब्द नहीं है। 'सौहृद्य' का अर्थ है संतोष के साथ से स्थिर होना। यह उस स्थिति का भान कराता है जब आप ध्यान को कर संपूर्ण चैन से बैठते हो। आध्यात्मिक लोगों के लिए तो यह एक आवश्यक स्थिति है।

Content: कुछ लोग प्रबुद्ध तो हो जाते हैं, पर दूसरों की सहायता फिर भी करते, उदाहरण के लिए मैंने एक प्रबुद्ध स्वामी को हिमालय पर देखा था, दिन-भर गांजा पीते रहते थे। उनके प्रबुद्ध होने में कोई संदेह नहीं था। वह अपने गांजे की चिलम में एक तांबे का सिक्का भी रख लेते थे और जब वह चिलम पीकर उसे लौटाते थे तो उसमें से एक सोने का सिक्का निकलता था। मैंने स्वयं कई बार देखा था। वह उस सोने के सिक्के को बेचकर और गांजा खरीद लेते थे। वह उत्तरकाशी (उत्तराखंड) में रहते थे। बेशक, उनके मन में उनके लिए बहुत श्रद्धा थी क्योंकि वे एक तपस्वी थे। वे कभी वस्त्र धारण नहीं करते थे। वे नगा साधु थे।

Content: 'नागा' का अर्थ ही होता है वह संन्यासी जो कभी वस्त्र नहीं पहनता। कड़ाके की सर्दियों में भी कभी कोई वस्त्र उनके तन पर नहीं होता है। उन्हें परमहंस भी कहा जाता है। हाँ, जब ये लोग शहरों में अपना दिव्य उद्देश्य (डिवाइन मिशन) फैलाने को जाते हैं तो ये वस्त्र धारण कर लेते हैं। इसके अलावा वे वस्त्र नहीं पहनते। परमहंस बच्चों की तरह रहते हैं तो यह परमहंस स्वामी जब अपनी चिलम खाली करता था तो उसमें से एक सोने का सिक्का निकलता था। मैंने उनसे पूछा - 'बाबा! आप एक महान तपस्वी हो, आत्म ज्ञानी हो, ब्रह्म ज्ञानी हो - तब आप गांजा क्यों पीते हो?'

Content: वे बोले - 'एक बड़ा हाथी कभी एक छोटी कुड़िया में नहीं बंध सकता, इसलिए उसे थोड़ी ढील देनी पड़ती है। तभी वह विशाल हाथी एक कुटी में निवास कर सकता है। प्रबोधन के पश्चात् आत्मा इस छोटे से शरीर में नहीं रह सकती। मुझे इसे ढीला और धीमा करना ही पड़ता है। इसको ढीला करने के लिए ही मैं यह सब काम करता हूँ।' बेशक, उनकी धूम्रपान की आदत साधारण धूम्रपान से फर्क होती है।

Content: किसी ने मुझसे पूछा - 'स्वामी जी! स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस तो धूम्रपान करते थे। मैं क्यों नहीं कर सकता?' मैंने उसे समझाया - 'स्वामी विवेकानंद प्रबुद्ध हो चुके थे, तब उन्होंने धूम्रपान शुरू किया था तो पहले प्रबुद्ध हो जाओ तब धूम्रपान क्या, जो मर्जी करना।'

Content: श्रीमद्भगवत गीता

Content: जो उन्होंने पाया वह तो पा लो, तब उनकी बराबरी की बात करना।' जो प्रबुद्ध स्वामीगण करते हैं वहीं आपको करना चाहिए, यह बिल्कुल अलग बात है। वस्तुतः वे तो सब कुछ उल्टा ही करते हैं उसका, जो आपको करना चाहिए। वे ऐसा काम इसलिए करते हैं जिससे वे कुछ नीचे स्तर पर आ सकें।

Content: उत्तरकाशी वाला वह नगा साधु प्रबुद्ध तो था, पर किसी की मदद नहीं करता था। ऐसे लोगों से जनता का कोई भला नहीं होता। वह तो रहस्यमय व्यक्तित्व होते हैं। वह न किसी को कुछ ज्ञान दे सकते हैं, न किसी को प्रबुद्ध कर सकते हैं। वह लोगों के साथ कोई काम नहीं कर सकते। ऐसे लोग समाज के लिए नहीं होते।

Content: दूसरी ओर, ऐसे भी लोग होते हैं जो सत्य प्राप्त कर विश्व के साथ उसको बांटते हैं। स्वामी विवेकानंद व रामकृष्ण परमहंस महान आत्माएँ थीं और दूसरी के भले के लिए अपने अनुभव बताते थे। वहीं उनका उद्देश्य था 'भागवतम्' के अनुसार जो लोगों को सत्य बताते या समझाते हैं - यथा कृष्ण - वे अवतारी पुरुष होते हैं।

Content: शुक-ब्रह्म ऋषि व्यास के पुत्र थे। व्यास जी ने ही वेदों को संकलित किया था तथा 'भागवत' और 'महाभारत' की रचना की थी। शुक-ब्रह्म एक प्रबुद्ध स्वामी थे जो निरावरण रहते थे। उनसे एक बार पूछा गया - 'प्रबुद्ध ज्ञानी एवं अवतारी पुरुष में क्या अंतर है?'

Content: उन्होंने बड़ी सुंदरता से उत्तर दिया - 'सौदर्यत्व, तेजस्तत्व और सारस्वत्य तथा लक्ष्मितत्व! सौदर्यत्व का अर्थ है जब हम उनको देखें तो हमारा स्वतः ही मन होगा कि उनके पास बैठकर उनको सुनें। हम बार-बार उनके पास लौटकर जाना चाहेंगे, उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए। वह तत्व जो सहज रूप से हमारी मन आकर्षित करता है, सौदर्यत्व होता है।

Content: दूसरी बात है तेजस्तत्व की, अर्थात् बड़ी स्पष्टता से फैलती हुई ऊर्जा (जो उनके व्यक्तित्व से निःश्रृत होती है)। तीसरी विशेषता है सारस्वत्व अर्थात् चाहे कोई विचार या अवधारणाएँ कितनी भी क्लिष्ट हो, वे उसे बड़ी आसानी से समझ सकते हैं। उनकी जिद्दा पर सरस्वती का वास होता है।

Content: सबसे ऊपर है लक्ष्मितत्व अर्थात् उनके विचार मात्र से धन-संपदा और कार्य तुरंत संपन्न हो जाएगा (यानि सोचा और काम हुआ)। हर चीज उसी प्रकार होगी जैसे वे चाहते हैं। जो कोई इन चारों तेजों से अपने गुण प्रकाशित करता है वह अवतार होता है।

Content: श्रीमद्भगवत गीता

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Chapter Name: प्रबोधन को प्रकाशित करना

Content: यहां कृष्ण यही बात 'सौम्यत्व' के माध्यम से स्पष्ट करते हैं। अवतारों के लिए भी सौदर्य और सौम्यत्व आवश्यक गुण हैं। हमें भी अपने जीवन में इन गुणों को समाविष्ट करने का प्रयास करना चाहिए। वाणी की तपस्या है सत्य भाषण एवं प्रिय भाषण- 'प्रियहितं च यत्'। वाणी के द्वारा किसी का कष्ट निवारण करना अत्यावश्यक है। आध्यात्मिक साधक के लिए सौम्य एवं आरोग्यकारक शब्दों का उच्चारण आवश्यक है। ऐसी भाषा न बोली जाए जो किसी को आहत करे। हमारी उपस्थिति में ही दूसरे का आराम मिलना चाहिए। सदैव मीठे शब्द बोलने चाहिए; कटु एवं विचलित करने वाले शब्दों से परहेज़ करें। एक बात और- कभी-कभी हम समझ ही नहीं पाते कि हमारे शब्द किस प्रकार दूसरे को विचलित कर सकते हैं कि कैसे हमारे शब्द दूसरे के लिए असम्मानजनक एवं भावनात्मक रूप से चोट पहंचा सकते हैं। जब कभी हम किसी के साथ बैठें तो उस व्यक्ति को महसूस होना चाहिए - 'क्या कुछ देर और इनके साथ नहीं बैठूं? थोड़ा समय इनके साथ और बिता दूं। क्या कल भी इनसे मुलाकात हो सकती है? क्या फिर मिलना होगा?' यानी दूसरों के अंदर ऐसे प्रियभाव उत्प्रेरक भावना उठनी चाहिए। सुख या आराम की अनुभूति दूसरे को हमारे सान्निध्य से स्वतः होनी चाहिए। लोग हमारी प्रतिक्रिया करें, न कि हमारा आगमन सुनकर भाग जाएं। प्रायः हम लोग ऋणात्मक प्रभाव ही डालते हैं। लोग थोड़ा असहज होते हैं और भागने की योजना बनाने लगते हैं। एक भी गलत शब्द या सही शब्द गलत ढंग से अगर बोला जाएगा तो वह सारे संबंध को बिगाड़ देगा। भगवान कृष्ण भी यही कहते हैं। एक आध्यात्मिक व्यक्ति को सदैव प्रिय भाषण करना चाहिए। दूसरे को क्षुब्ध नहीं करना चाहिए। जब हम दूसरे को विचलित नहीं करेंगे तो हम भी विनम्र ही रहेंगे, घमंडी नहीं। यह कोई सामाजिक नैतिकता की बात नहीं, आध्यात्मिक अभ्यास में भी जरूरी है। जैसा कि पहले स्पष्ट किया जा चुका है, वे शब्द जो हम दूसरों को आहत करने के लिए बोलते हैं, हमें भी चुभते हैं। वही शब्द हम अपने बारे में भी बोलने लगते हैं। विज्ञान में ऊर्जा और स्पंदन की प्रक्रिया में यह सत्य स्पष्ट होता है, इसलिए हमें शब्दों के चयन में बहुत सतर्क रहना चाहिए। कृष्ण कहते हैं कि हमें आध्यात्मिक साहित्य का नियमित रूप से अध्ययन करना चाहिए। ऐसा करने से कई शुभ विचार हमारे मस्तिष्क में प्रविष्ट होते रहते हैं। इससे हमें सत्य के

Content: साथ अपने प्रयोग करने के लिए साहस भी मिलता है। हमारा हौसला बढ़ता है सत्य की आजमाइश के लिए। मैं तो आपसे कहता हूं कि कोई एक सत्य का नित्य अभ्यास के साथ परीक्षण करे। मैंने पहले भी आपसे कहा है कि 'मैं-मैं-मैं' भाव से मुक्त होकर 'तुम-तुम-तुम' भाव द्वारा अपना जीवन संचालित करना सीखो। ऐसा कम-से-कम दस बार तो करें ही। फिर देखें अपने जीवन पर इस बदलाव का प्रभाव। यदि आपको संतुष्टि नहीं हो तो उसे छोड़कर कुछ और अपना सकते हैं, पर कम-से-कम दस बार परीक्षण जरूर करें, तभी आपको कृष्ण द्वारा बताए गए इस सत्य की स्पष्ट झलक मिलेगी। बौद्धिक लोगों के दो हथियार होते हैं - शब्द और तर्क। यदि इनका सही प्रयोग किया जाए तो इनके द्वारा बहुत कुछ सीखा जा सकता है, पर इसका गलत प्रयोग इन्हें एक भयावह हथियार बना सकता है। यह हमारे ऊपर है कि हम इनका कैसे प्रयोग करें। हमारे शब्द और विचार पानी को प्रभावित कर सकते हैं। हम लोग भी लगभग पानी से ही बने रूप हैं। इसीलिए शब्दों से हम आहत भी जल्दी होते हैं और आराम भी जल्दी पाते हैं। इन्हीं शब्दों से हम चमत्कार भी कर सकते हैं। कृष्ण कर्म के तप की भी बात करते हैं। वे भी पंचानुशासन की बात करते हैं जो पतंजलि योग में भी बताया गया है। ये पांच अनुशासन यम के हैं - सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह एवं ब्रह्मचर्य। यानी हम मन, कर्म और वचन से अहिंसा, अपरिग्रह (चीजों को समेटने का लालच) साधारण और सहज रूप वास्तविकता में रहना और ध्यान सदैव परमात्मा पर केन्द्रस्थ रखना। यह किसी भी तपश्चर्या का चरण रूप है। कुछ लोगों का विचार है कि सत्य चाहे कितना भी कटु हो, उसको कह देना चाहिए। यह समझ लें कि यदि वह किसी को भी आहत करता है तो वह सत्य नहीं हो सकता। यह तो हमारी उस तथाकथित सत्य के बारे में समझ है। यह हमारी अहंमन्यता का प्रतिफलन है। जो हमारा दिमाग सत्य रूप में दिखा रहा है। हम तब सत्य में स्थित नहीं हैं, यदि अपने इंद्रिय बोध द्वारा अपनी सीमित बुद्धि के निर्णय को सत्य समझ रहे हैं जिसको व्यक्त करने से कोई आहत महसूस कर रहा है। यदि हम ऐसा करते हैं तो हम आक्रामक भी हैं और अज्ञानी भी। हम सत्य में स्थित नहीं हैं, तब हम शुभता से भी दूर हैं। सत्य तो करुणा का प्रतिफल होता है; उसी की अभिव्यक्ति होता है। सत्य और करुणा का चोली-दामन का साथ है। इस कारण सत्य कभी आहत नहीं कर सकता; यह तो आहत को आराम देता है।

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Chapter Number: 17.20

Content: दान देना ही कर्तव्य है - ऐसे भाव से जो दान देश, काल और पात्र से प्राप्त होने पर उपकार न करने वालों के प्रति दिया जाता है, वह दान सात्विक कहा गया है (अर्थात् जिस पर जिस वस्तु का अभाव हो उसी की हितकर पूर्ति बना, किसी बदले की भावना से दिया दान सात्विक दान है)।

Chapter Number: 17.21

Content: किन्तु जो दान क्लेशपूर्वक तथा प्रत्युपकार के प्रयोजन से अथवा फल को दृष्टि में रखकर दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है।

Chapter Number: 17.22

Content: जो दान बिना सत्कार के अथवा तिरस्कारपूर्वक अयोग्य देश काल में कुपात्र के प्रति किया जाता है, वह दान तामस कहा गया है।

Content: कृष्ण यहां दान की अवधारणा स्पष्ट करते हैं। इस बारे में पहले ही बता चुका हूं। दान का अर्थ है दूसरों से साझा करना। इसमें देने का भाव नहीं होना चाहिए तथा किसी शुभ परिणाम की कामना से भी नहीं होना चाहिए कि इससे स्वर्ग का रास्ता हो जाएगा। दान के पीछे प्रेम और कृत्तज्ञता का भाव रहता है। "हे ईश्वर! तूने मुझे इतना कुछ दिया है... अब मैं इसका साझा समाज और विश्व के साथ करना चाहता हूं।" दान में आपसदारी का, साझा करने का भाव रहना चाहिए। यह तो निष्काम रूप से कर्तव्य की तरह किया गया कर्म है। इससे आपके समग्र के प्रति अपने जुड़त्त्व, ईश्वर से संबंध को अभिव्यक्ति होती है यह तो इस भाव से करें - "यही मेरा सहज गुण है और मुझे करना ही है" (बगैर किसी पर अहसान जताए)। तभी वह असली अर्थ में दान होता है। शुभता से किया गया निष्काम भाव प्रेरित कर्म जो सही पात्र को सही देशकाल अनुसार भेंट किया जाए, दान का असली रूप होता है।

Content: दान भी तीन तरह का होता है। 'अन्नदान' का अर्थ है भोजन-वस्त्र या वे सभी चीजें जो किसी व्यक्ति की भौतिक आवश्यकताएं पूर्ण करती हैं। दूसरा दान है 'विद्यादान' अर्थात् किसी को शिक्षा देना या दिलवाना, जिसमें उसकी मानसिक बृद्धि सुनिश्विचत हो, उदहारणार्थ कोई परेशान हो और उस समय आप उसको धैर्य, सांत्ना व ढांढस देकर उसे प्रसन्नचित्त कर सकें तो वह भी 'विद्यादान' की श्रेणी में आता है। यदि किसी को अपने कमरे की सफ़ाई करनी नहीं आती और आप उसे सिखा सकें, वह भी विद्यादान है। यदि किसी को घास खोदनी भी नहीं आती और आपने उसे सिखाया है तो यह भी विद्यादान में ही शामिल माना जाएगा।

Content: तीसरा दान है- ज्ञान दान अर्थात किसी को आध्यात्मिक ज्ञान देना। अन्नदान देकर आप किसी को कुछ घंटों तक - तीन या चार - संतुष्ट कर सकते हैं। तीन घंटे के पश्चात् तो उसे फिर भूख लगेगी। यदि हम किसी को विद्यादान देते हैं- शिक्षा या ज्ञान को साधारण दान तो आप उसको एक जीवन तक सूझी कर सकते हैं। शिक्षा द्वारा वह अपनी रोटी कमा सकता है पर यदि हमने किसी को ज्ञानदान दिया है तो कई जन्मों तक उसका उद्धार हो सकता है अर्थात 'अन्नदान' तीन घंटों तक, विद्यादान एक जीवनकाल तक संतुष्टि दे सकता है पर ज्ञानदान तो कई जन्मों तक उसके अभावों की पूर्ति कर सकता है। फिर वह कभी अवसादग्रस्त नहीं होगा, जब तक इस भवसागर में आता रहेगा। इसलिए 'ज्ञानदान' परम दान है।

Content: साधारण भाषा में कहें तो वह कह सकते हैं कि यदि किसी को मछली की चाह है और हमने उसे मछली प्रदान कर दी तो उसका एक भोजन तो संतुष्टि प्रदायक हो गया। यह अन्नदान है। यदि हम किसी को मछली पकड़ना ही सिखा दें तो वह पूरे जीवन भूखा नहीं मरेगा। वह विद्यादान है, पर यहां यह रुपक रुक जाता है।

Content: हम अपने 'होलर्स इनिशिएशन प्रोग्राम' में उस व्यक्ति को सिखाते हैं कि वह मछली खाना ही छोड़ दे। यह सुझाव उसकी समस्या जन्म-जन्मांतर तक सुलझा सकता है। यह 'ज्ञानदान' है।

Content: यदि आप यहां अचानक आएं और मेरी तस्वीरें देखकर यह सोचें - "मैंने एक कटआउट या पोस्टर देखा था यह तो काफी युवा है। पोस्टर कहता है कि यह 'भगवत गीता' पर बोल रहा है।" देखें - यह क्या कहता है।" यदि आप ऐसे

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Content: भी आए सिर्फ देखने के लिए और यहां बैठे, गीता पर प्रवचन सुना तो भी आपको सहायता मिलेगी। कभी-न-कभी यही बातें आपके मन में घूमेंगी, सत्य गूंजेंगे और आप उन पर अमल करेंगे। फिर स्वाभाविक है कि आप वही व्यक्ति तो नहीं रह जाएंगे। हो सकता है कभी-कभार आप कोई गलती करें तो यह सत्य आपके मन में प्रकाशित हो उठेंगे। यह विचार आपके अंदर पहुंच चुके होंगे। यह आपको सुधारने की प्रेरणा देंगे तो यह भी 'ज्ञानदान' है। अभी प्राप्त ज्ञान आपके जीवन को निश्चित ही सुधारेगा, भले ही आप उस पर अभ्यास न करें। ये शब्द इतने शक्तिशाली होते हैं कि वे आप पर जरूर ही प्रभाव डालने लगेंगे। आप वही व्यक्ति रह नहीं सकते जो (यहां आने से पहले थे)। आपके अवसाद की गहराई जरूर घट जाएगी। आपको लगेगा मानो आपके सामने एक नया जीवन खुल रहा है। आप में साहस बदलेगा और नए विश्वास के साथ आप जीवन जिएंगे। यह 'ज्ञानदान' ही है। ज्ञानदान पुण्य की चरम स्थिति होती है। आध्यात्मिक ज्ञानदान से बड़ा कोई शुभ कृत्य नहीं हो सकता। खाना देना या विद्यादान करना तो तीन घंटे तक या एक जीवन-भर ही संतुष्ट कर सकते हैं। आध्यात्मिक ज्ञानदान तो जन्म-जन्मान्तर के अभाव मिटा सकता है। कृष्ण कहते हैं कि जब कोई दान साझा भाव से दिया जाता है तो यह सात्विक होता है अर्थात परम शुचिवान एवं शुभ। एक और बात है। ज्ञानदान में दान देने वाले व्यक्ति का कुछ नहीं जाता, बाकी दानों में तो दान देने वाला कुछ-न-कुछ भौतिक रूप से भी खोता है और पाने वाला उसे प्राप्त करता है। वैसे विद्यादान में भी दानकर्ता को कोई हानि नहीं होती। उसके अपने ज्ञान का स्तर घटता नहीं है, पर 'ज्ञानदान' में कुछ और ही होता है। मैं आपको एक रहस्य बताता हूं - यह जितना दिया जाता है उससे ज्यादा ही आपको प्राप्त होता है। यह तो हर तरह से जीत का ही सौदा है। यहां आपकी प्राप्ति स्वतः ही होती है। कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता। जो ज्ञान बांटता है वह और ज्ञानी बनता जाता है। मैं आपके साथ एक और रहस्य साझा करना चाहता हूं - यह न समझें कि यहां बैठकर मुझे सुनकर केवल आप ही लाभान्वित हो रहे हैं। इन्हें बताकर मुझे भी बहुत लाभ मिल रहा है। एक सादा-सी उपमा से आपको यह पूरी प्रक्रिया समझ में आ जाएगी। जब कोई स्त्री किसी बच्चे को जन्म देती है तो सिर्फ वह बच्चा ही नहीं पैदा होता, वह स्त्री भी 'मा' के रूप में अस्तित्व में आती है। इसके पूर्व तो वह मात्र एक स्त्री ही थी, जैसे ही उसने बच्चे को जन्म दिया कि वह 'मा' हो गई।

Content: इसलिए इस प्रक्रिया में दो जन्म होते हैं- बच्चे का और उस महिला का 'मा' के रूप में। पहले वह 'मा' कहां थी, एक स्त्री ही तो थी। बच्चे को पैदा किया कि उसका पद भी 'मा' का हो गया। इसी प्रकार जब आप मुझसे आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करते हैं तो मैं भी वृद्धि को प्राप्त होता हूं। इसीलिए वैदिक परंपरा में आध्यात्मिक पाठ देने के पूर्व निम्नलिखित मंत्र बोला जाता है - 'ॐ सहनाभवतु सहनौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वी नावधितमस्तु मा विद्विषावहै॥' इस शांति मंत्र का अभिप्राय है - हम दोनों (गुरु और शिष्य) संपूर्णता प्राप्त करें; हम दोनों बुद्धि को प्राप्त हों। हम दोनों एक-दूसरे के सहायक रहें; हम दोनों में एक-दूसरे के प्रति वैमनस्य का भाव न हो। देखें, यह मंत्र यह नहीं कहता - 'तुम सीखो।' यह कहता है - 'हम दोनों सीखें (बुद्धि को प्राप्त हों)।' वैदिक परंपरा कितनी विनम्र है। सत्य कहूं तो जब मैं आपको सत्य बताता हूं तो मैं स्वयं भी सीखता हूं। किसी ने मुझसे पूछा - 'स्वामी जी! आज आप क्या बोलने वाले हैं?' मैंने कहा - 'पता नहीं? मैं भी आपकी तरह बैठूंगा और सुनूंगा।' यहां मेरे सामने कई संस्कृत के श्लोक रखे हैं। मैं किसी श्लोक को उठाता हूं और बोलने लगता हूं। बस! आप लोगों की तरह मैं भी बैठकर सुनता रहता हूं। जैसे आपको लाभ मिलता है, वैसे ही मुझमें भी लाभान्वित होता हूं, दोनों वृद्धि पाते हैं। यह तो सिर्फ धर्मोंडियों का सोचना होता है कि केवल शिष्य को फायदा होता है, नहीं गुरु को भी लाभ मिलता है। गुरु तो गुरु तभी बनता है जब शिष्य हो। इसी प्रकार बच्चा होने के पश्चात् एक स्त्री मां बनती है। जब शिष्य प्राप्त हो जाता है तब गुरु सही मायनों में स्वामी बनता है, नहीं तो वह स्वामी नहीं है, जैसे बिना बच्चे के जन्म दिए स्त्री 'मा' नहीं हो सकती, वैसे ही बगैर शिष्य को प्रबुद्ध बनाए गुरु स्वामी नहीं हो सकता। यानी जब तक आप में से किसी को प्रबोधन प्राप्त नहीं होता, मैं स्वयं को स्वामी नहीं कह सकता। यह समझ लें - जब ज्ञान का साझा मैं करता रहूंगा तब मैं भी वृद्धि को प्राप्त होता रहूंगा। वह जो विनम्रता और सरलता के साथ स्पष्ट रूप से और पूरी सफ़ाई से सत्य का साझा करता है तथा अपने अहम् भाव में लिप्त नहीं होता, तभी उसका ज्ञानदान सात्विक होता है और सच्चे गुण वाला होता है जो शुभता का परम लक्षण होता है। जब आप लोग प्रश्न करते हैं और मुझे उनका उत्तर ज्ञात नहीं होता, मैं आपसे स्पष्ट कह देता हूं कि 'मुझे उत्तर नहीं मालूम।' लोग मुझसे कहते हैं-

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Content: "यह क्या स्वामी जी! आप तो प्रबुद्ध ज्ञानी हैं और आप यह कह देते हैं कि मुझे नहीं मालूम।" मैं उन्हें बताता हूं - "केवल प्रबुद्ध स्वामी ही कह सकता है - 'मैं नहीं जानता', क्योंकि उसके पास ही यह साहस होता है" यदि किसी साधारण व्यक्ति को उत्तर ज्ञात न हो तो वह शब्दों की हेरा-फेरी करता है। सीधा जवाब न देकर वह अपने श्रोताओं को विभ्रमित करने का प्रयत्न करवय । सीधे श्रोताओं को विभ्रमित करना कोई जटिल काम नहीं होता। यह आसान है क्योंकि श्रोताओं तो पहने से ही विभ्रमित रहते हैं। ज्यादा कुछ करने को होता ही नहीं, बस कुछ शब्दों का हेर-फेर करना होता है। कोई बड़ा काम नहीं होता। यह तो केवल प्रबुद्ध स्वामी ही होते हैं जो साहसपूर्वक अपनी अनभिज्ञता प्रदर्शित कर सकते हैं और कहते हैं - "मैं नहीं जानता।" जब वह किसी प्रश्न को उत्तर नहीं जानते। बिना ज्ञान के किसी प्रश्न का उत्तर देने में प्रबुद्ध होने की क्या जरूरत है? यह तो मूर्खतापूर्ण ढोंग दिखाने का काम है, परंतु बेबाड़, सच्चे लोग सत्य की ओर वैसे ही बढ़ते हैं, जैसा कृष्ण कहते हैं - यानी सात्विक दान के माध्यम से। यहां मैं अपना सारा अनुग्रह सत्य बेबाकी से अभिव्यक्त करता हूं - बिना किसी संकोच या आवरण के। कृष्ण के अनुसार यहीं सात्विक दान है। फिर आगे वह राजसिक और तामसिक दान भी स्पष्ट करते हैं। कई बार ऐसा दान स्वेच्छा से भी नहीं दिया जाता, नहीं तो इसका भी एक बंधा-बधाया रिवाज़-सा हो जाता, उदाहरण के लिए हिन्दू विवाह पद्धति में 'कन्यादान' करने का एक रिवाज है। मैंने पहले वसीयत के द्वारा सारी संपत्ति दान दिए जाने की भी चर्चा की थी। ऐसे लोगों के पास विकल्प भी क्या होता है? वे इस संपदा को अपने साथ नहीं ले जा सकते। कई मामलों में ऐसे लोगों की अपनी संतानों के साथ लड़ाई हो जाती है और वे उन्हें वसीयत में कुछ भी नहीं देते। वह सकता है उनके लड़के या लड़की ने उनकी मर्जी से शादी करने से इंकार कर दिया हो और अपना प्रेम-विवाह कर लिया हो और इसलिए पिताश्री बेजाय उनको वसीयत में कुछ भी देने के अपना सारा धन दान में दे गए हों, पर यह कोई सही मायनों में दान नहीं होता, क्योंकि इसको देने का उद्देश्य कुछ और ही होता है, शुभ नहीं होता। ऐसे भी कई लोग कहते हैं जिनका दान स्वीकार न करना है बेहतर रहता है। कृष्ण कहते हैं यह दान अज्ञान में दिया हुआ दान है। कई लोग अपनी टैक्स की चोरी से बचाया धन और आमदनी, यहां आश्रम को देने का प्रयास करते हैं।

Content: यह तो उनका दान नहीं, कर (टैक्स) बचाने की तरकीब ही होती है। किसलिए? प्राय: मेरे शिष्य मुझसे पूछते हैं कि मैं उन धनी लोगों से दान स्वीकार क्यों नहीं करता, जो आश्रम में आकर सहायता मांगते हैं और दान देने की पेशकश करते हैं? मेरे लिए हर आदमी से दान स्वीकार करना मुश्किल होता है। जब तक कि कोई यहां आकर सालभर मेरे साथ न रहे और अपनी सच्ची सदाशयता मेरे मिशन की ओर न दिखाए, मैं दान स्वीकार नहीं करता। मैं ऐसे आदमियों के चक्कर में क्यों पड़ जिनकी मंशा न सिर्फ स्वार्थ प्रेरित है, वरन् उनको स्वयं भी हराने वाली है। मेरे आश्रम का मार्ग-निर्देशन तो पराशक्ति (परमात्मा) करती है और वही इसकी देखभाल करती है। जो वह नहीं दे सकती वह कोई नहीं दे सकता। जब उनका निर्णय न देने का हो तो कौन उस चीज को देने का साहस कर सकता है?

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Chapter Number: 17

Chapter Name: तू भी वही है

Content: 17.23 'ॐ तत् सत् - ऐसे यह तीन प्रकार का (सच्चिदानंद धन) ब्रह्म का नाम कहा गया है; उसी से सृष्टि के आदिकाल में ब्राह्मण तथा यज्ञादि रचे गए हैं ('ॐ तत् सत्' यह पृथक-पृथक रूप से ब्रह्म की महिमा (ॐ), विश्व की व्यापकता (तत्) और यथार्थता (सत्) का द्योतक है।) 17.24 इसलिए वेद मंत्रों का उच्चारण करने वाले श्रेष्ठ पुरुषों की शास्त्र विधि से नियत यज्ञ, दान और तप रूप क्रियाएं सदा 'ॐ' (परमात्मा के इस नाम का उच्चारण करके ही) से आरंभ होती हैं। 17.25 'तत्' नाम से कहे जाने वाले परमात्मा का ही यह सब है - इस भाव से फल को चाहकर नाना प्रकार की यज्ञ-तप-रूप क्रियाएं और दानरूप क्रियाएं कल्याण की इच्छा वाले पुरुषों द्वारा की जाती हैं। 17.26 और 'सत्' - यह परमात्मा का नाम है - सत्य भाव में और श्रेष्ठ भाव में प्रयोग किया जाता है तथा हे पार्थ! उत्तम कार्य करते समय भी 'सत्' शब्द का प्रयोग किया जाता है। 17.27 तथा यज्ञ, तप और दान में जो स्थिति है, वह भी 'सत्' इस कही जाती है; और उस परमात्मा के लिए किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक 'सत्' है - ऐसे कहा जाता है। 17.28 पार्थ! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तप और जो कुछ भी (इस प्रकार) किया गया कर्म है वह 'असत्' है - इस प्रकार कहा जाता है। इसलिए वह न तो इस लोक में लाभदायक है और न ही मृत्यु के पश्चात् ही (लाभ देता है)।

Content: समापन करते हुए कृष्ण एक विकल्प फ़र्क़ स्तर पर चले जाते हैं। अभी तक उन्होंने यज्ञ, तप एवं दान के बारे में बताया था और स्पष्ट किया था कि इसमें किसको कैसे करना चाहिए। लोगों की अपनी सहज प्रवृत्ति द्वारा संचालित इन यज्ञ, तप और दान की क्या विधियां हैं, इसका पूरा हवाला दिया था। हर प्रकार का आहार, तप, यज्ञ एवं दान कृष्ण द्वारा बताए तीन वर्गों में समा जाते हैं - सात्विक, राजसिक और तामसिक, जिन्हें क्रमशः शुभ, भावोत्तेजक और अज्ञान का क्षेत्र भी कह सकते हैं। पर महत्व की बात यह है कि जब ये सब सांसारिक लाभ के लिए किए जाते हैं तो ये सभी कुछ शर्तों से बंधे रहते हैं। जब ये ईश्वर के प्रति कृतज्ञता-ज्ञान रूप में किए जाते हैं तब ही आप आध्यात्मिक विकास या प्रगति पाते हैं। हमारे शास्त्रों का कथन है कि जब यह राजस या तमस गुण प्राप्त करते हैं तो परम उपलब्धि प्राप्त नहीं हो सकती। यह तो तभी प्राप्त होती है जब विशुद्ध सात्विक एवं शुभता के भाव में इनको किया जाए। अज्ञानने में जब यह कृत्य किए जाते हैं तो भी परिणाम अस्थायी ही प्राप्त होते हैं, चरम परिणाम की उपलब्धि नहीं हो पाती। महाभारत काल में यज्ञ-विधान रोज़मर्रा के जीवन का अंग बन चुके थे। आज तो ऐसा नहीं है। ब्राह्मणों को पवित्र ज्ञान का संरक्षक माना जाता है जो इन भौतिक कर्मकांडों को प्राप्त होता है। इससे जो ऋषि-मुनियों को दार्शनिक सत्य समझ में आया, उनका रक्षक भी ब्राह्मण ही माना जाता है। वही उस 'ज्ञानाग्नि' के संरक्षक माने जाते हैं। इन सारे कर्मकांडों की ऊर्जाएं अभी भी इन्हीं को समर्पित की जाती थी। यज्ञों का उद्देश्य देवियों-देवताओं एवं मूलभूत पंचतत्वों को संतुष्ट और प्रसन्न रखना था, पंरतु तप का उद्देश्य स्वयं की ओर रहता था तथा दान का लक्ष्य होता था आपके चारों ओर मौजूद लोग और वस्तुएं। इस प्रकार अपने पवित्र पेशे के अनुरूप ब्राह्मणों से यह अपेक्षा रहती थी कि वे तपस्वियों का जीवन बिताएंगे तथा दानादि करते रहेंगे। इस अध्याय में कृष्ण इन्हीं अवधारणाओं पर प्रकाश डालते हैं, जिससे हर कोई मुक्ति की ओर बढ़ सके। यह निर्देश सिर्फ़ ब्राह्मणों के लिए नहीं थे, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के लिए भी दिए गए थे। हर वर्ण का व्यक्ति मुक्ति प्राप्त कर सकता है, यदि वह इन सिद्धांतों का पालन करता हो। मुक्ति का जन्म-जाति से कोई सरोकार नहीं होता। आख़िरी तीन श्लोकों में कृष्ण वह विधि बताते हैं जिससे सभी लोग अपना लक्ष्य 'स्व' - से परम 'स्व' (आत्मा से परमात्मा) की ओर कर सकें।

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Content: वह तरीका बताते हैं कि कैसे हर व्यक्ति अपनी करनी का फल ईश्वर को समर्पित होकर इस बंधन से मुक्त हो सके। वह इसके लिए एक आह्वान सूत्र है - 'ॐ तत् सत्'। ये तीन शब्द - 'ॐ तत् सत्' दिव्य शब्द माने जाते हैं - "ॐ इति इति ब्राह्मणो वेदिस्याम नमः" यानी प्रथम लक्ष्य, प्रारंभ या शुरुआत पर केंद्रित है। 'तत् त्वम् असि' दिखाता है दूसरा लक्ष्य अर्थात् सतनता या जारी रहना। 'सत्यम् एव' अर्थात् तीसरा व अंतिम लक्ष्य। इन तीनों अभिव्यक्तियों का समेकित रूप है - 'ॐ तत् सत्'। इसी कारण से इन तीनों शब्दों की इतनी महत्ता है। कोई भी व्यक्ति यदि 'ॐ तत् सत्' की मानसिकता से दान-पुण्य करता है तो उसे परमात्मा की निकटता या दिव्य चेतना प्राप्त होती है। इन तीनों शब्दों का तात्पर्य है - "मैं सब कुछ सत्य को समर्पित करता हूँ। वही सत्य हो!" यह एक महा वाक्य है जो जगत गुरु श्री कृष्ण ने अर्जुन को दिया है, यह बताने के लिए कि किस प्रकार हर दान, तप और यज्ञ में सच्चाई का समावेश रहे। यानी जो कुछ भी वह ईश्वर को समर्पित है; वही सत्य है। यह समझ लें कि हर कर्म का उद्देश्य ईश्वर को समर्पित कर उनकी कृपा प्राप्त करना है चाहे हम कोई-सा दान, तन, यज्ञ कैसे भी करें। समस्त वेदों का भी एकमात्र उद्देश्य है - कृष्ण चेतना या परम चेतना की प्राप्ति। जब तक यह सिद्धांत या तरीका नहीं अपनाया जाएगा तब तक कोई सिद्धि, संतुष्टि या प्रसन्नता संभव ही नहीं होगी। आपका गुरु या आध्यात्मिक गुरु ही संसार में एकमात्र जीव है, जो आपकी जिंदगी को सार्थक, संतुष्ट या प्रसन्न बनाने में मदद कर सकता है। वह सही दिशा-निर्देश दे सकता है। यह समझें कि लोग चाहें अपने बचपन से अनुकूलन के अनुरूप किसी भी देवता, अर्ध-देवता, आत्मा इत्यादि की पूजा करें, वे करेंगे अपने 'गुण' के अनुसार ही, परंतु परम चेतना, कृष्ण चेतना प्राप्त करने का मार्ग इन तीनों गुणों के परिसर से परे होता है। इसी स्थिति में गुरु या आध्यात्मिक स्वामी की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। वही आपको सही दिशा-निर्देश देकर सही समझ की ओर ले जाता है और तभी आप परम चेतना की अनुभूति प्राप्त कर पाते हैं। यही समझ आप में श्रद्धा उत्पन्न करती है और आप परमात्मा से प्रेम करने लगते हैं। यही जीवन का चरम उद्देश्य और अंतिम लक्ष्य है।

Content: आइए, हम सब परमब्रह्म कृष्ण से पूरी सच्चाई के साथ प्रार्थना करें कि हमें इस अध्याय में बताई गई समझ की अनुभूति दें जिससे हम भी 'नित्यानंद' या शाश्वत चेतना प्राप्त कर सकें। हम सब ही पूरी ईमानदारी के साथ परमब्रह्म कृष्ण के बताए इन सत्यों को अपनी अनुभूति में उतार सकें। हम उस परमब्रह्म से प्रार्थना करें कि 'गीता' में बताए गए सत्य-अनुभूति के साथ हम पर प्रकट हो सकें और हम सब अपने आपको 'नित्यानंद' में स्थापित कर सकें। इस प्रकार उपनिषद, भगवत् गीता का सप्तदश अध्याय 'श्रद्धात्रय विभाग योग' संपन्न होता है जिसमें श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य संवाद द्वारा परम ब्रह्म ईश्वर पर चर्चा की गई है।

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Chapter Number: 18

Chapter Name: मोक्ष संन्यास योग

Content: अष्टादश अध्याय मोक्ष संन्यास योग सब कुछ छोड़कर समर्पण कर दो मैं और मेरे के अतिरिक्त कुछ भी समर्पण के लिए नहीं होता; कृष्ण बताते हैं कि कैसे समर्पण चरम मुक्ति-प्रबोधन देता है।

Chapter Number: 18

Chapter Name: मोक्ष संन्यास योग

Content: सब कुछ छोड़कर समर्पण कर दो 'सब कुछ छोड़कर समर्पण कर दो', यह केवल इस अंतिम अध्याय का सार नहीं वरन् पूरी भगवत गीता का निचोड़ है। जो कुछ भी तुम जीवन या धर्म के रूप में समझते हो, जो कुछ भी तुम्हारी समझ है उसको त्याग दो, क्योंकि जो तुम जानते हो वह तुम्हारे अनुसार तुम्हारा ज्ञान है पर वह वास्तविकता नहीं है। ज्ञान अस्तित्व का प्रमाण नहीं देता वास्तव में बुद्धि और सत्य हमें बताते हैं कि क्या हम नहीं जानते। हमारे मन का ज्ञान जिसके बारे में हम इतना गर्व करते हैं, हमारा वह आवरण है जो अस्तित्व का सत्य हम से छिपाता है। फ्रांसीसी दार्शनिक रेने डेकार्टर्स का कथन था - 'मैं हूँ चूंकि मैं ऐसा सोचता हूँ'। हमारा दिमाग अस्तित्व को मापने का पैमाना नहीं होता। जो हम हैं उसका हमारे विचारों से कोई सरोकार नहीं होता। यदि हमारे विचार ही हमें पूरा नाप सकते, जो भी हम हैं तो हम एक जैविक-यांत्रिक मशीन से ज्यादा कुछ भी नहीं होते। सहज निहित बुद्धि जानवरों में मनुष्यों से ज्यादा होती है। जानवर अपने दिमाग को कल्पना में लिप्त नहीं करते, जैसे मनुष्य कर लेता है। वे तो कुदरत के साथ ही बहते हैं। शेर या चीता तभी भोजन की तलाश करते हैं जब उन्हें भूख लगती है। वे तब ही खाते हैं जब खाना जरूरी हो और तब ही सोते हैं जब थक जाते हैं। सिवाय कुछ दुर्लभ अवसरों के कोई जानवर अपने भोजन को बचाकर नहीं रखता, इसलिए कोई जंगली जानवर मोटा नहीं होता। पर मनुष्य तो सोच सकता है और यही समस्या बन जाती है। हमारे महान ऋषियों, प्राचीन मनीषियों की घोषणा डेकार्टर्स की घोषणा के एकदम विपरीत थी- 'अपना मन-मस्तिष्क त्याग दो और तुम जागरूक हो जाओगे।

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Content: वात महान मानव में तुम अपनी पूरी योग्यता-संभावना को समझ लो। महान हिन्दू दार्शनिक, विचारक आदि शंकराचार्य अपने 'आत्मा' के श्लोकों में यही बात बड़ी सुंदरता से कहते हैं। अपनी आंतरिकता की परिभाषा देते समय शंकराचार्य अपने शरीर को ही नकारते हैं - शरीर-की भावनाएं और सारे संबंधों को भी। यह समझ लें कि हम मानव रूप में आध्यात्मिक जीव हैं न कि मात्र, जो आध्यात्मिक होने का प्रयास कर रहे हैं। हमारी बुद्धिमत्ता असीम परन्तु बुद्धि की समझ सीमित है। ज्ञान तीन प्रकार का होता है। पहला जो सबसे प्रासंगिक होता है, वह ज्ञान है जो मन या बुद्धि से प्राप्त किया जाता है। सामान्य वैज्ञानिक ज्ञान- यथा भौतिक शास्त्र, गणित, चिकित्सा शास्त्र इत्यादि में आता है। हम समझते हैं कि यह ज्ञान हमारे जीवन की गुणवत्ता सुधारता है पर जितना हम इस प्रथम वर्ग का ज्ञान प्राप्त करते रहेंगे, उतने ही हम विचलित रहेंगे। दूसरे प्रकार का ज्ञान बौद्धिक ज्ञान के रूप में सिखाया नहीं जा सकता, यह तो स्वयं ही सीखा जा सकता है। सृजनात्मक कला का ज्ञान इसी वर्ग का होता है। हम गाना, नाचना या कविता आदि लिखना किसी किताब को पढ़कर नहीं सीख सकते। इसे हमको पहले अपने अंदर उतारना पड़ेगा; आत्मसात करना पड़ेगा, तब ही हम इसे अभिव्यक्त कर सकते हैं। इसमें दिमाग और बुद्धि अलावा हृदय व उसके भावों का भी काफी योगदान रहता है। हृदय आधारित ज्ञान वस्तुतः बुद्धि पर तथा कहीं अन्य साधनों पर आधारित होता है। तीसरे प्रकार का ज्ञान उच्चतम होता है जो आपके 'होने' (अस्तित्व) से मिलता है। यह अस्तित्व से अस्तित्व तक जाता रहता है। यह ज्ञान वह 'अहा!' का अनुभव है जो दुर्लभता से प्राप्त होता है। इसी ज्ञान के ज़रिए संसार की बड़ी-बड़ी खोजें और आविष्कार किए गए हैं। इसमें बौद्धिक सतह एवं सहयोगिता के भाव स्तर से ऊपर नहीं, सहानुभूति का संचारण होता है। इस वस्तुतः ईश्वर के बारे में ज्ञान भी बाध्यकारी होता है, जब यह केवल बौद्धिक स्तर से प्राप्त हो, क्योंकि तब हम ईश्वर के बारे में ही जान पाते हैं, 'ईश्वर' को नहीं। ईश्वर के बारे में जानना ईश्वर को जानना नहीं होता। जब हम संपूर्ण समर्पण कर देते हैं तब हमें यह भी आभास नहीं होता कि हम ईश्वर को जानते हैं। जब यह विचार ही हमारे अंदर न हो, तभी हम ईश्वर को जान पाते हैं।

Content: शब्द ईश्वर को व्यक्त नहीं कर सकते। जब अभिव्यक्ति ख़त्म हो जाती है तब ईश्वर प्रकट होता है। जैन स्वामियों का कथन है कि चंद्रमा की ओर इंगित करने वाली उंगली चन्द्रमा नहीं होती। ईश्वर के बारे में कहे गए शब्द चाहे कितनी भी ईमानदारी से व्यक्त किए गए हों, सिफॅ इशारे या 'पॉइंटर्स' होते हैं, ईश्वर नहीं। धर्मों के साथ यही दिक्कत है कि वे ईश्वर के 'बारे' में बताते हैं। वे यह नहीं बताते कि कैसे ईश्वर को जानें। ज्यादातर धर्म ईश्वर के बारे में कुछ बातें बताकर हमारे अंदर लालच और भय भर देते हैं। आजकल कितने धर्मों ने लोगों को प्रबुद्ध किया है? लाखों लोग धर्म की रक्षा और प्रसार के चक्कर में मार डाले गए हैं। धर्मों ने तो संहार और मृत्यु ही दी है, प्रबोधन किसी को नहीं दिया। आध्यात्मिक स्वामियों ने यह कभी नहीं सिखाया कि किसी को मारो, तोड़ो या फोड़ो - अपने धर्म में उन्हें लाने के लिए। कोई आध्यात्मिक गुरु कभी हिंसा नहीं पढ़ाता। यदि उसने ऐसा किया तो वह स्वामी या गुरु रहे ही नहीं सकता।

Content: महान आध्यात्मिक स्वामी तो व्यक्ति की चेतना जागृत करने का प्रयास करते रहे हैं, जिससे हम सब यह समझ सकें कि हम सभी एक सामूहिक चेतना के अंश हैं जो विश्व व्यापी है। उनका संहार में आने का उद्देश्य ही होता है। हममें यह समझाना कि हम 'मैं' के भाव से 'हम' के भाव तक पहुँचें। महान स्वामियों के जो अज्ञानी शिष्य या अनुयायी होते हैं वे ही अपनी सीमित समझ के आधार पर धार्मिक संस्थान स्थापित करते हैं, जिनका आधार उन स्वामियों द्वारा बताए सत्य की सीमित समझ होती है। आध्यात्मिकता, जो लोगों में प्रेम प्रसारित करती है, के बरअक्स धर्म तो हिंसा को बढ़ाते हैं। प्रबोधन तो एक भेंट हैं। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि इसके लिए हमने कितना प्रयास किया है। चाहे हम सदियों तक एक पांव पर खड़े रहे हों या कुछ ऐसा ही तप किया हो - इससे उस भेंट पर कोई असर नहीं होता, बल्कि ऐसा करना तो एक डॉलर का लॉटरी टिकट खरीदने जैसा है। इसके बदले में हमें जो मिलता है, वह एक विशुद्ध भेंट है। हम जो करते हैं वह हमारे सपने में ही होता है। उस सपने के परे हम कैसे जा सकते हैं? कृष्ण कहते हैं - "हर चीज़ भुलाकर समर्पण कर दो।" असल में लोग 'समर्पण' शब्द को सुनकर भयभीत हो जाते हैं। हमें यह समझना

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Content: चाहिए कि समर्पण में हम कुछ भी खोने वाले नहीं हैं, उल्टे इससे तो हमें सब कुछ मिल जाएगा। समर्पण करो और समझो पहले यह समझ लें कि हमारे पास ऐसी कौन-सी मूल्यवान वस्तु है जो हम समर्पण में दे देंगे। हम ऐसा समझते ही हैं कि हम पर बहुत कुछ है। हम ज़रा आंखें खोलकर देखे कि हर चीज़ तो दिव्यता (ईश्वर) की ही देन है। 'मैं' और 'मेरा' कुछ नहीं है, यह तो मृथा भाव है। जैसे ही हमारी यह बात समझ में आ जाती है कि हमारा समर्पण हो जाता है और जैसे ही समर्पण हुआ कि हमारी समझ में सत्य आया। जब हम किसी चीज़ को 'मेरा' कहते हैं तो कानूनी रूप से वह चीज़ हमारी हो सकती है पर अस्तित्व के रूप में वह हमारी कतई नहीं होती। कानूनी रूप से तो हम एक ज़मीन के टुकड़े पर बाड़ लगवाकर उसे 'अपना' कह सकते हैं पर प्रकृति या अस्तित्व (ईश्वर) को तो मालूम नहीं होता कि यह हमारा है। जब एक चक्रवात उठकर संपत्ति उड़ा देता है तो उसे क्या मालूम रहता है कि वह किसकी संपत्ति नष्ट कर रहा है। अस्तित्व का तो कोई कानून नहीं होता; वस्तुतः हमारा 'मेरे' का भाव समाज के नियमों द्वारा संरक्षण प्राप्त करता है। हम सही प्रकार से इसे समझें तो हमारा ज़मीन का कानून नहीं कह सकता। 'ज़मीन' का तो कोई कानून नहीं होता। यह तो समाज ही है जो कानून स्थापित करता है। ज़मीन पर तो भूकंप कभी भी आ सकता है। क्या हम कुदरत को अपने कानूनों से नियंत्रित कर सकते हैं? नहीं। जब तक आप 'मैं और मेरे' के भावों से घिरे रहेंगे, आप अस्तित्व की सच्चाई को नहीं समझ सकते। जब कृष्ण कहते हैं कि सब कुछ समर्पित कर दो तो वह हमसे कह रहे हैं कि आंखें खोलकर देखो अपनी मूर्खता को जो हमसे अपने परिग्रह और अपेक्षाओं का नाटक खिलवा रही हैं। खेल में दूसरे के साथ धोखा करना और बात है, कम-से-कम अपने साथ तो धोखा न करो। क्या आपकी कोई भी चीज़ जिसे आप 'अपनी' समझते हैं; 'मेरी' कहते हैं, बगैर हवा के चल सकती है?; जो सकती है? क्या आप कह सकते हैं कि हवा बस 'आपकी' ही है। यदि गौर से देखें तो शरीर में नित्य आने-जाने वाला 'प्राण' भी आपका नहीं है। यदि प्राण न हो तो जो तुम 'अपना' समझते हो क्या चल पाएगा? यह तो ऐसा ही है जैसे कोई कहे कि नींव तो मेरी नहीं, पर मकान मेरी है।

Content: पहली मंज़िल मेरी है। कानून तो पर आप कह भी लें, पर अस्तित्व के रूप में तो ऐसा होना असंभव ही है। पृथ्वी जिस पर आप रहते हैं, आपकी नहीं है। पृथ्वी का एक झटका आया और जो आप अपना कहते थे, क्षण मात्र में 'ग़ायब' हो गया अर्थात् आपकी सोच के अनुसार जो आप 'अपना' सोचते हो, का आधार ही आपका नहीं है। आपका 'मूल आधार' ही आपका नहीं होता। यह तो प्रकृति का है, किसी और का नहीं। हम अपने 'श्वसन' को तो मानते हैं कि यह तो चलता ही रहेगा। मान लीजिए यदि ईश्वर ने वैसी ही हड़ताल की जैसी श्रमिक लोग आजकल करते हैं तो हमारी समझ में आ जाएगा कि यह सांस कितनी ज़रूरी है, पर ईश्वर तो करुणामूर्ति है। यह उसकी करुणा ही है जो उसे कभी हड़ताल पर नहीं जाने देती। इसीलिए हम जीवन को इतना महत्व नहीं देते - उसकी अपनी चली हो समझते हैं। चूंकि थोड़ी--बहुत चीज़ें कानून आपकी मानी जा सकती हैं, इसलिए हम समझते हैं कि 'मेरे' की अवधारणा एक ठोस तथ्य पर आधारित है। लेकिन कोई भी, जिसमें ज़रा-सी अक्ल है, आंखें खोलकर देखे तो समझ जाएगा कि 'मैं' और 'मेरा' तो एक नाटक है। एक भी सांस न आई तो खेल ख़त्म। 'मैं' ग़ायब! तुरंत आपका नाम आपके घर पर लगी प्लेट से मिटा दिया जाएगा और आपकी कब्र पर लग जाएगा, तब आप तो वहाँ जाएंगे जहाँ अनन्त विश्राम किया जाता है। कभी-कभी तो वह भूमि का टुकड़ा जिसे हम अपना समझते थे, कागज़ों को देखने पर अपना नहीं निकलता। हमारा तो यहाँ सब कुछ काग़ज़ी है। जैसे ही हमारे मन में यह अक्ल कौंधी और हमने यह पहचाना कि हमारा कुछ भी वास्तविक नहीं है, हम समर्पण के भाव में आ जाते हैं और तभी बड़ा सुकून मालूम पड़ता है कि चलो स्वयं को बचाने या सुरक्षित रखने के अनवरत झंझट से तो अब छुट्टी मिली। दो सहज वृत्तियाँ, जो 'मैं' और 'मेरे' पर कायम रहती हैं, ही असली कारण हैं हमारी सारी मानसिक और शारीरिक समस्याओं की- वे हैं हमारी ज़िजीविषा और सभी कुछ समेटने-परिग्रह करने की इच्छा। दूसरी ओर जब हमारी समझ में आ जाता है कि 'मैं' और 'मेरे' के भाव छलावा है, हकीकत नहीं हैं तो हमें अफसोस होता है कि सारी ज़िंदगी ही इन्हीं रेत के महलों को बनाने में काट दी। एक लघु ज़ैन कथा कुछ बच्चे समुद्र तट पर अपने रेत के महल (चौंदे) बना रहे थे। वे दिन-भर उन्हें बनाते और शाम को उन्हीं पर कूद-फांदकर उन्हें तोड़ देते और

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Content: ऐसा करने में उन्हें मज़ा भी आ रहा था, पास ही एक जैन स्वामी बैठे थे। उन्होंने दिन-भर बच्चों की गतिविधियाँ देखीं और कहा- "यही तो जीवन है।" एक राजा भी वहाँ पास बैठा यह सब देख रहा था। तभी एक बच्चा रोया लगा क्योंकि उसका रेत का महल दूसरे बच्चे ने तोड़ डाला था। राजा हँसकर बोला- "कितना मूर्ख है कि रेत का महल टूटने पर रो रहा है।" यह सुनकर वह जैन स्वामी राजा की ओर देखकर हँसा। राजा ने गुस्से से पूछा- "क्यों हँसता है, स्वामी?" स्वामी ने कहा - "जब ये बच्चे रेत के महल बनाते या बिगाड़ते हैं तब कम-से-कम इन्हें मालूम तो रहता है कि ये रेत के महल हैं न? पर जब तू अपने पत्थर के महल बनाता या बिगाड़ता है तो तू समझता है कि तेरा महल असली है।" सेठ पूछे तो बच्चे तुझसे ज्यादा समझदार और जागरूक हैं और उन्हें ही तू मूर्ख कह रहा है, इसलिए मुझे हँसी आ गई।" वास्तव में हमारा जीवन भी एक छद्म जीवन है। जैसे बच्चे रहते हैं वहीं असली जीवन है। वे जानते हैं कि असल में इसका कोई मूल्य नहीं है। आज बनेगा, कल उजड़ेगा, पर वे बच्चे भावनात्मक रूप से कतई विचलित नहीं होते, लेकिन जब हमारे महल टूटते हैं तो हम समस्याग्रस्त हो जाते हैं। यह सब कुछ एक खेल है। हमें यह समझ लेना चाहिए कि जो कुछ भी हम बनाते-बिगाड़ते हैं, वह हमारा नहीं है। यदि इन बाहरी घटनाओं को हम अपने अंदर, दिनभर न ले जाएँ और-न उनके प्रति उदासीन विमुख रहें जितना हमें इनके प्रति होना चाहिए तो हमारे मन में स्वतः ही समर्पण की चाह उठने लगेगी। इन इंद्रिय-लुब्ध-भावों को अपने अंदर न प्रवेश करने दें और घटनाओं को बहुत गंभीरता से न लें। जब आप इन्हें गंभीरता से लेते हैं तो आप एक ही वीज़न पाते हैं - बॉयमारी। जैसे ही आपने अपने अस्तित्व में 'ममता' या 'मैं' को स्थान दिया कि आप असली जीवन से हटने लगते हैं। यह विचार मन में रखें कि आपका 'अपना' होने का कोई आधार नहीं है - चाहे आप स्वयं को कुछ भी समझें। कभी-कभी आप स्वयं को शरीर मात्र समझते हैं, कभी मन और कभी अपनी इंद्रियों को ही अपना सही रूप समझते हैं। आप किसी को भी अपना समझें, पर असल में तो आपका कुछ भी नहीं है। आपके अपने होने का कोई आधार ही नहीं है। आप अपने जिस पहलू को 'स्वयं का रूप' समझते हो, वह कभी नहीं वृद्धि को प्राप्त होगा। जैसे ही आपने अपने को शरीर समझा कि आपके शरीर का विकास रुक जाएगा, क्योंकि फिर आप इसमें किसी बदलाव को स्वीकार नहीं करेंगे। इसी प्रकार जब स्वयं को आप अपने मन के साथ जोड़ते हैं तो मन श्रीमदभगवत गीता 340

Content: या मस्तिष्क का विकास अवरुद्ध हो जाएगा। यही वजह है कि अहमवादी लोग कभी न किसी नए विचार के बारे में सुन न पा सकते हैं, न उसे स्वीकार करते हैं, क्योंकि उनको तो लगता है कि जो जानने योग्य है वह वे पहले से ही जानते हैं। जैसे ही आपने अपने मन को 'स्वयं' समझा तो पढ़ने का चाव ही, जो प्रारंभकर्ताओं की पहली पहचान है, गायब हो जाता है। यदि आप स्वयं को शरीर समझते हैं तो आप शरीर को तरोताज़ा होने से रोक देते हैं। आप शरीर को उसका सहज कर्म नहीं करने देते। यदि मन को खुद समझते हैं तो आप इसे कुछ भी नया नहीं सीखने देते। आप फिर इसमें नया कोई तत्व घुसने ही नहीं देंगे और इस प्रकार इसको निश्चित रूप से ध्वस्त करने लगेंगे। यही हाल आपके 'मेरे' भाव के साथ होता है। इसका आधार तो समाज के बनाए नियम-क़ानून होते हैं, जिनका अस्तित्व के नियमों में कोई नियम या सरोकार नहीं होता। आप वह नहीं हैं जो आप सोचते हो कि आप हैं! विज्ञान पूरी तरह मानता है कि हमारे शरीर मन-तंत्र में अरबों कोश (सैल) रोज मरते और बनते रहते हैं। कुछ वर्षों बाद हमारे शरीर का कोई भी कोश ऐसा नहीं होता जो दो साल पहले भी रहा हो। इस शरीर की हर एकल सत्ता एक नई सत्ता होती है अर्थात् जो अस्थायी 'मैं' का भाव हम समझते हैं इस शरीर का, वह तो अस्तित्व में रहता ही नहीं है। फिर भी हम इसी गलतफ़हमी में जीते रहते हैं कि हम वही हैं। हम गर्व करते हैं अपने 'मैं' के भाव पर। हम तो कुछ स्मृतियों के संग्रह, मूल्यों एवं विश्वासों के जमावड़े से ज्यादा कुछ नहीं, जिनको संस्कार कहते हैं। हम हमारे संस्कार ही हैं। यही संस्कार हमारे निर्णय लेते हैं। यही पूरा 'मैं' का तंत्र। हम लोग अपने आश्रम में मेडिटेशन पर 'लाइफ़ विल्स प्रोग्राम' आयोजित करते हैं - इन्हीं संस्कारों से मुक्ति पाने को, क्योंकि यही संस्कार हमारे संचालक रहते हैं। इन्हीं के प्रभाव में हम अनजाने रूप से अपने निर्णय लेते रहते हैं। हम अनजाने रूप से अपनी सहज वृत्ति के अनुसार जीते हैं पूरी जानकारी के साथ अंतर्ज्ञा जागृत कर हम जी तो ही नहीं पाते। जब हम 'मैं'- पर केंद्रित रहते हैं तो हमारा प्रतिसाद अज्ञान में और सहज वृत्ति द्वारा दिया जाता है। वह सदैव सुरक्षात्मक एवं अपने बचाव के उद्देश्य से दिया जाता है। शोध कार्यों से स्पष्ट हो चुका है कि जब हमारे कोश सुरक्षात्मक भाव से संचालित होते हैं, उनकी वृद्धि रुक जाती है। यदि हम अपने 'मैं' पर ही केंद्रित रहेंगे तो हम कभी वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकते। श्रीमदभगवत गीता 341

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Content: यह 'मैं' का भाव 'स्वाधिष्ठान चक्र' से उठता है, जो तिल्ली (स्प्लीन) के निकट ऊर्जा केंद्र में स्थित रहता है। वहां परमात्मा का भाव भी प्रतिष्ठित रहता है। यह असुरक्षा के भाव की पीठ होती है। जब तक हम इस चक्र को ऊर्जास्वित कर अपने भयों से मुक्त नहीं होंगे, हम अपने 'मैं' भाव की सुरक्षा के लिए व्याकुलता से प्रयत्नसरत रहेंगे। वस्तुतः 'मैं' भाव से ज़्यादा आदिम है 'मेरे' का भाव। 'मेरे' का भाव अर्थात् जिजीविषा और परिग्रह की भावना, 'मैं' के भाव से पहले आती है। यह भाव 'मूलाधार' चक्र से उठता है, जो मूल ऊर्जा केंद्र पर स्थापित रहता है। सारे भावनात्मक अवरोध यथा वासना, लालच, क्रोध इसी परिग्रह के भाव से उत्पन होते हैं। अपनी पहचान (अस्तित्व) और संग्रह करने की प्रवृत्ति को त्यागना इसलिए मुश्किल होता है, क्योंकि समाज ने हमारा अनुकूलन इसी प्रकार किया होता है, परंतु यह असंभव तो नहीं ही है। हमारे 'नित्यानंद आर्डर' से सारे शिक्षक जो मिशन का कार्य और 'लाइफ बिल्स प्रोग्राम' चलाते हैं, अपने मूल नाम बदलकर आध्यात्मिक नाम अपना लेते हैं, जो मैं उन्हें देता हूं। वे नाम क्यों बदलते हैं? कोई-कोई तो 60 वर्ष पर ऐसा करते हैं? लोग आपको बताएंगे कि पहली बार अपने जीवन में उन्हें मुक्ति और स्वतंत्रता का अहसास होता है - मानों उनका नया जन्म हो, जिसे वह उत्सव के रूप में मनाना चाहते हैं। शुरू-शुरू में तो लोगों ने मुझे हतोत्साहित करते हुए कहा था कि नाम बदलने को स्वीकार करने वाले शिक्षक मुश्किल से ही मिल पाएंगे, क्योंकि ज़्यादातर लोग अपना विगत भूलना नहीं चाहते। वे अपनी पहचान गंवाना नहीं चाहते। पर सत्य यह है कि जब आपको भली प्रकार यह सत्य समझ में आ जाता है तो आप ईमानदारी से अपनी पुरानी पहचान भूल जाना चाहते हैं। इसी प्रकार जब आप अपनी परिग्रह और चीज़ों के प्रति मोह से त्राण पाते हैं तो भी आपको मुक्ति का अहसास होता है। आप अपना साधारण जीवन आराम से जीते रहते हैं- सिर्फ़ मोह, कपोल कल्पनाएं, तुक्के, भय और लालच की प्रवृत्ति से त्राण पा लेते हैं। जब मैं अपना घर त्यागकर आध्यात्मिक खोज़ में निकला तो मुझे कुछ खोने के भाव से करटई प्रभावित नहीं किया, तब तो यह लगा कि सारा जगत मेरा घर है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि आपको कोई भिक्षु या संन्यासी होना पड़ेगा। सिर्फ़ मोहादि, भय-लालच से छुटकारा पाना पड़ेगा। बाकी जो कुछ आपके पास है आप रख सकते हैं। आपको केवल प्रसन्नता प्राप्त करनी है सिर्फ़ वह त्यागकर जो आपका है ही नहीं।

Content: यह एक वाक्य हज़ारों लोगों के लिए एक आह्वान का काम करता रहा है। पहली बार उन्होंने अपनी गलतियों को समझा और भविष्य के बारे में कुलांचे मिलाना छोड़़ा; उसके बारे में सोचना छोड़़ा जो आपका है ही नहीं। विगत के खुद और अपराध बोध से त्राण पाया, जिसके बारे में वैसे भी आप कुछ नहीं कर सकते और यूँ पूरी तरह मुक्त होकर वह प्रसन्नता पाई जो अभी तक आपके हाथ नहीं आती थी। संन्यास या सर्वत्याग का अर्थ पद्मासन लगाकर तथा आंखें बंदकर बैठ जाना नहीं होता। यह तो आपकी एक मानसिक स्थिति है, शरीर की नहीं। यह वह स्थिति है जिसमें आप 'होते' हैं। हम सांसारिक जीवन-निर्वाह करते हुए भी अपने मोहों और संबंधों तथा परिग्रह के प्रति उदासीन रह सकते हैं। दूसरी ओर, भले ही आप संन्यास लेकर हिमालय की कंदराओं में चले जाएं, आप जब भी अपनी आंखें बंद करेंगे आपका भीतरी टीवी चलने लगेगा। सारे मोह और तृष्णाएं सामने आ जाएंगी। जिस समर्पण की कृष्ण बात करते हैं उसका अर्थ है सारी कल्पनाएं-कुलाबों से त्राण पाना और वास्तविकता के सामने नतमस्तक होना, उस सच्चाई के सामने जो एकमात्र सत्य है कि हम एक सामूहिक-विशद- चेतना के अंश हैं। जब हमारे अंदर यह जागरुकता रहेगी तो फिर हमारे अपने 'मैं' और 'मेरे' के भाव के लिए कोई जगह ही नहीं होगी। कृष्ण बार-बार संन्यास की बात करते हैं - हम अपने कर्म के फलों को कैसे उनको समर्पित कर दें बिना कर्म को छोड़़े? कैसे अपना ज्ञान और कर्म उनके चरणों पर समर्पित कर दिया जाए? वह अर्जुन को इस अंतिम क्षण के लिए तैयार करते हैं, जब वे उससे कहते हैं कि उसे सब कुछ उनको ही समर्पित करना है और कुछ नहीं करना। समर्पण भी तीन तरह का होता है - पहला समर्पण अपनी बौद्धिकता का। ज्यादातर लोगों के लिए - खासतौर पर बौद्धिक लोगों के लिए - यह सबसे आसान काम है। आपकी अहंमन्यता जब पूरी 'पक' जाएगी तब ही गिरेगी। इसका जितना कचरा आप खोपड़ी में भर लोगे उतनी ही वह ज़्यादा फूलेगी। जब कोई दृश्य उभरकर सिद्ध करता है कि सारा बौद्धिक ज्ञान कचरे का ढेर ही है, वह व्यक्ति जिसका अहं भाव पूरी तरह पक चुका है, वही इसे समझकर इस सत्य को स्वीकार कर सकता है। जब ऐसा होता है तो यह व्यक्ति अपनी बौद्धिकता अपने स्वामी को समर्पित कर देता है, जो उसका मार्ग-निर्देशन करता है, लेकिन वह जिनका अधपका ज्ञान होता है, जिन्हें अपने बौद्धिक स्तर के बारे में मुगालता है, वही इस सत्य को समझ नहीं पाते। कई बौद्धिक साधक और

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Content: 'आध्यात्मिक बाज़ार में घूमने वाले' मेरे पास अपने प्रश्नों के ढेर के साथ रहते हैं, पर मेरे साथ कुछ समय बिताने के पश्चात् उनमें से ज्यादातर आश्चर्य में डालकर कहते हैं कि अब उनके पास कोई प्रश्न नहीं बचा मुझे उनके प्रश्नों का उत्तर देने की ज़हमत भी नहीं उठाता। मैं तो सिर्फ़ उनके प्रश्नों में कुछ शब्द और जोड़ देता हूं। वे उन शब्दों से ही जुड़ते हैं और अंत में अपने प्रश्नों का उत्तर स्वयं ही पा लेते हैं। समर्पण का दूसरा क़दम है हृदय का समर्पण। लोग मुझसे पूछते हैं कि आश्रम से जाने के बाद वे मुझे कैसे याद रखें। मैं कहता हूं कि यदि मैं आपका स्वामी हूं तो आपको मुझे भुलाने में बड़ी मुश्किल होगी। स्वामी के प्रति विचार ही आपके हृदय को पिघला देगा। आप भावुक हो जाओगे। आपकी अपने स्वामी की भौतिक उपस्थिति की अब कोई ज़रूरत नहीं। सिर्फ़ उनके बारे में सोचना ही काफ़ी रहेगा। आपकी आंखों से आंसू बहेंगे। रामकृष्ण कहते हैं - "यह पक्की बात है कि आपके इष्ट देवता या स्वामी का विचार मात्र आपको आंसुओं में डुबा देगा। ऐसा लगेगा मानो आपका अंतिम जन्म हो रहा है।" जो एक प्रबुद्ध स्वामी कहता है वह सदा सत्य होता है। यह समर्पण इतना शक्तिशाली होता है कि यह आपको मुक्त कर सकता है, प्रबुद्ध बना सकता है। यही भक्ति का बल होता है। कृष्ण यह बार-बार कहते हैं कि भक्ति मार्ग उनको पाने का सबसे आसान मार्ग है। वे कहते हैं - "सिर्फ मुझमें और केवल मुझमें अपनी भक्ति रखो और मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा।" तीसरा और अंतिम प्रकार का समर्पण होता है इंद्रियों (या इंद्रिय बोध) का समर्पण। जब इंद्रियों का समर्पण होता है तब प्रबोधन होता है और जब प्रबोधन होता है तब इंद्रियों का समर्पण स्वतः ही हो जाता है। महाभारत के युद्ध के बाद कृष्ण के साथ चलते अर्जुन को एक पेड़ पर बैठा पक्षी दिखाया और कहा - "अर्जुन! उस हर कौवे को देखो!" अर्जुन ने कहा - "हे कृष्ण! मैं उस हरे कौवे को देख रहा हूं।" कृष्ण ने कहा - "कैसे मूर्ख हो तुम! कौवा हरा कैसे हो सकता है?" अर्जुन ने सहजता से कहा - "कृष्ण जब आपने मुझसे हरा कौवा देखने को कहा तो वाकई वह मुझे हरा कौवा ही लगा था।" अर्जुन का कृष्ण के प्रति समर्पण इतना संपूर्ण था कि जो कृष्ण कहते थे वही अर्जुन को दिखाई पड़ता था। यह समर्पण की अंतिम अवस्था होती है। आप लोगों को यह जानकर ताज़्जुब हो सकता है कि एक प्रबुद्ध स्वामी को कुछ भी करने की स्वतंत्रता नहीं होती। साधारण लोग तो अपनी मर्ज़ी का काम कर सकते हैं। आप में से हर एक जो चाहे करने को स्वतंत्र है। अपने मन

Content: काम करने और कष्ट पाने के बाद आप कहेंगे कि यह तो होना ही था क्योंकि यह हमारा नियति है, पर इसके विपरीत यहां मैं जो शब्द भी उच्चारित करता हूं, पराशक्ति के आदेशानुसार है - उसी कॉस्मिक ऊर्जा के आदेश से मैं यह कह रहा हूं! कृष्ण की अर्जुन को क्या, हम सभी जीवों को यह सलाह है कि सब कुछ छोड़कर उनकी शरण में आ जाओ; संपूर्ण समर्पण कर दो। यही हर समस्या का अंतिम हल है।

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Chapter Number: 18.1

Content: अर्जुन बोले - "हे महाबहो! हे अंत्योमिन! हे कोशीसूदन! संन्यास और त्याग के तत्व को पृथक-पृथक जानना चाहते हैं।

Content: काफी समय तक चैन रहने के बाद अर्जुन अब बोलते हैं, पर क्षीण ही फिर वह बोलना बंद कर देंगे। अब वह प्रश्न नहीं कर रहे हैं, सिर्फ अपने कुछ संदेह व्यक्त कर रहे हैं। अर्जुन के अंदर की सारी हिंसा और घमंड अब गायब हो चुका है। वह कृष्ण की कृपा से उनके विश्व रूप दर्शन करने के अनुवव के पश्चात पूरी तरह पल्लवित हो चुके हैं; खिल खिल चुके हैं। कभी-कभी मेरा पूरा प्रवचन सुनने के बाद, शिष्यगण मुझसे कोई जिक (चुटकुला) या कहानी सुनाने का अनुरोध करते हैं (या होती है), पर वे उनका सुना हुआ होता है से यह सब सुनना दूना मज़ा देता है। ख़ासतौर पर अपने स्वामी क्योंकि स्वामी के शब्दों में ऊर्जा होती है। ये शब्द आपका गहरा भेदन करते हैं और आपको समूचा बदल भी सकते हैं, सुनने के समय शायद आप इसका पूरा प्रभाव समझ न पाएं। अर्जुन भी बार-बार वही प्रश्न पूछता है वह कृष्ण को बार-बार सुनने से।

Content: अर्जुन कहता है - "हे महाबहो! मैं त्याग और संन्यास का उद्देश्य जानना चाहता हूँ। मुझे सत्य बताएं।

Content: एक लघु कथा

Content: एक आदमी ने अपनी पूर्व पली के वकील को टेलीफोन किया और उससे बात करना चाही, पर उस वकील के सचिव ने जवाब दिया - "माफ़ कीजिए जनाब! कल ही उनकी मृत्यु हो गई।" उस आदमी ने औपचारिक सांत्वना दी और लाइन काट दी। दस मिनट बाद ही उसने दोबारा फोन लगाया और उस वकील से बात करने की इच्छा ज़ाहिर की।

Content: उसी सचिव ने कहा - "दस मिनट पहले मैंने आपको बताया था न! उनकी मृत्यु हो चुकी है, कल रात।" और लाइन काट दी। फिर दस मिनट बाद इस आदमी ने फिर उसी नंबर पर कॉल लगाई और फिर उसी वकील (अपनी पूर्व पली के वकील) से बात करने की इच्छा जाहिर की। अब तो वह (महिला) सचिव ज़ल्ला के बोली - "मैं आपको बता चुकी हूँ क्योंकि वे कल रात गुज़र गए। आप उनसे बात नहीं कर सकते। आई बात समझ में?"

Content: वह आदमी बोला - "बिल्कुल मैम! असल में यह खबर इतनी अच्छी लगती है कि मैं इसे बार-बार सुनना चाहता हूँ!"

Content: अर्जुन भी वही बातें बार-बार सुनना चाहता है। भारत में प्रायः एक संन्यासी और एक भिखारी में फ़र्क करना मुश्किल होता है, दोनों ही भीख-सी ही मांगते हैं, कृपा चाहते हैं। दोनों के पास कुछ होता नहीं - फटेहाल से लगते हैं, बेघर - मारे-मारे घूमते हैं। ज्यादातर लोग एक भिखारी और एक संन्यासी के साथ अपनी सुविधानुसार एक-सा ही बर्ताव करते हैं, उन्हें भगा देते हैं।

Content: मैं अपने शिष्यों से कहता हूँ - 'यदि दोनों की पहचान में संदेह हो तो भिखारी को भी संन्यासी या भिक्षु ही समझना।' पर वे कहते हैं - "स्वामी जी! वे तो धोखेबाज़ होते हैं, हमें ठग लेते हैं!"

Content: "तो ठगे जाओ! और क्या? जब भी किसी को कुछ दो तो बिना किसी शर्त के दो मत दो। यदि तुम समझते हो कि संन्यासी को कुछ देने से वह आशीर्वाद देगा तो भिखारी भी तो आशीर्वाद ही देकर जाएगा, दोनों के आशीर्वाद में एक-सा प्रभाव क्यों नहीं हो सकता?"

Content: प्रायः लोग भगवा वाना धारण किए संन्यासियों को ज़रूरत मुंह कड़ देते हैं क्योंकि उनको सिखाया गया है कि उनको यदि न दिया तो उनका (लोगों का) अहित भी हो सकता है, इसलिए लोग उन न देने से डरते हैं- कहीं संन्यासी क्रोध में आकर शाप न दे दे और सम्पत्तियां पैदा हो जाएं। इसलिए संन्यासी को कुछ देना अपना बीमा करवाने जैसा ही है। 'नरक में न जाएं इससे बचने को कुछ दे ही दें', लोग सोचते हैं।

Content: मैं पहले भी कह चुका हूँ कि नरक या स्वर्ग जैसी कोई चीज नहीं होती। यह तो धर्मों की फैलाई हुई भ्रांति है जिससे नरक का भय दिखाकर और स्वर्ग का लालच देकर वे हमें अपने बस में रखे रहें। सच बात तो यह है कि किसी के पास आपके पाप-पुण्य का कोई हिसाब नहीं होता। ईश्वर इस सूची के आधार पर अपना न्याय नहीं करता।

Content: श्रीमद्भगवत गीता

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Chapter Number: 18

Content: दान सदैव निष्काम भाव के किया जाए

Chapter Number: 18.2

Content: श्री भगवान बोले - "कितने ही पंडितजन तो काम्य कर्मों को भी संन्यास ही समझते हैं तथा दूसरे विचार-कुशल पुरुष सब कर्मों के फल को त्याग कहते हैं।

Chapter Number: 18.3

Content: तथा कई विद्वान कहते हैं कि सभी कर्म दोषयुक्त हैं, इसलिए त्याज्य हैं किन्तु अन्य विद्वानों का कथन है कि यज्ञ, दान और तप रूप कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं।

Chapter Number: 18.4

Content: परंतु हे भारतों में उत्तम (अर्जुन)! उस त्याग के विषय में तू मेरे निश्चय को सुन। हे पुरुषश्रेष्ठ! त्याग (सात्विक, राजस और तामस) तीन प्रकार का कहा गया है।

Chapter Number: 18.5

Content: यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याग करने योग्य नहीं हैं - उनको करना निःसंदेह कर्तव्य है क्योंकि ये तीनों ही बुद्धिमान पुरुष को पवित्र करने वाले हैं।

Chapter Number: 18.6

Content: इसलिए पार्थ! इन (यज्ञ, दान और तप रूप कर्मों को तथा और भी) सम्पूर्ण कर्मों की आसक्ति और फलों (कामना) को त्यागकर अवश्य करना चाहिए - यह मेरा सुनिश्चित, उत्तम मत है।

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Content: बली दान ( यज्ञ या पशु मेघ) की परिभाषा

Content: कृष्ण तो स्वयं ही परम ईश्वर है, जिन्होंने सारे शास्त्र एवं नियम बनाए थे कि संन्यास की किसी भी प्रक्रिया को उसी संदर्भ में समझना चाहिए वे कहते वह की जा रही है। संन्यास के तीन रूप होते हैं – बलिदान (यज्ञ) दान या तथा ये उनको भी पवित्र कर देते हैं जो पहले से ही पूर्ण विकसति और पवित्र हैं।

Content: यह समझ लें कि किसी भी यज्ञ या बलि दान का मूल उद्देश्य पवित्रिकरण या मानव का आध्यात्मिक पथ पर क्रमिक विकास होता है। कृष्ण कहते हैं कि कोई भी यज्ञ जो मानव हित के लिए किया जाए, कभी त्याग्य नहीं होता। यज्ञ का उद्देश्य ही परमात्मा की कृपा पाना होता है। दान से हृदय की विकार पवित्रता प्राप्त होती है और साधक की आध्यात्मिक प्रगति होती है।

Content: यज्ञ को सदा ऐसे बलिदान का रूप समझा जाता है जिसमें होम, हवन आदि हो। यह वैदिक साहित्य में बताए गए अग्नि संबंधी कर्मकांड जिनसे देवों को संतुष्ट या प्रसन्न किया जाता था। जब इनको पूरी जागरुकता के साथ किया जाए तो ये शक्तिशाली विधियां हमें कौंस्मिक ऊर्जा के साथ जोड़ देती हैं।

Content: दूसरों के भले के लिए निष्काम भाव से किया गया कर्म ही यज्ञ या बलि दान है। दान का अर्थ है निष्काम भाव से, बिना बदले की कामना के कुछ देना। इसलिए जो सही मायनों में परोपकार करना चाहते हैं, वे दूसरों को बताते भी नहीं कि वे क्या कर रहे हैं। वे दान गुप्त ही रखते हैं, तभी दान का उद्देश्य सिद्ध होता है।

Content: दान में दानकर्त्ता को कुछ पीड़ा या तकलीफ तो होनी ही चाहिए जो आपकी देने की हैसियत भी हो, वह यदि आप देने का साहस करते हैं तो यह सही दान है। दान में स्वयं तप भोगने या थोड़ा कष्ट की अनुभूति तो होनी ही चाहिए, तभी वह असली दान तपस्या का अर्थ इंद्रिय के भोगों से स्वयं को वंचित करना।

Content: तपस्या में साधक अंतर्मुखी होता है जबकी यज्ञ-बलिदान या दान में बहिर्मुखी रहता है। ये सारे कर्म बिना किसी आसक्ति के या फल की कामना से करने चाहिए। "यह तो कर्तव्य समझकर किए जाने चाहिए" कथन है जगत गुरु का

Content: :- "यही मेरा उत्तम मत है।" इसको काफी गहराई से समझने की ज़रूरत है। चाहे कोई आध्यात्मिक कर्म हो या सांसारिक कर्म, यदि आपको अपना उद्देश्य या लक्ष्य स्पष्ट नहीं है तो आप कभी चैन से नहीं बैठ सकते। वह व्यक्ति जो जीवन के प्रवाह में स्वयं

Content: को समर्पित कर देता है, बाहरी और आंतरिक रूप से तुष्टि पाता है। में आपको स्पष्ट करना चाहता हूं कि शब्द समर्पण से मेरा क्या तात्पर्य है। दो एक-दूसरे को काटने वाली मूल रेखाओं या अक्षों (एक्सिस) की कल्पना कीजिए :

Content: सीधी खड़ी रेखा आध्यात्मिक जीवन का प्रतीक है, क्षैतिज रेखा सांसारिक जीवन की। जहां ये रेखाएं एक-दूसरे को काटती हैं वह जीव की स्थिति है। यह लक्ष्य आपके सामने है। एक सांसारिक जीवन का लक्ष्य और एक आध्यात्मिक जीवन का लक्ष्य। सांसारिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए आप लगातार काम करते हैं, संघर्षरत रहते हैं। आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए आप पूरी शिद्दत से योग, प्राणायाम, प्रत्याहार इत्यादि का अभ्यास करते हैं। जब आप सांसारिक लक्ष्य प्राप्त करने की चेष्टा करते हैं तो आपकी प्रगति क्षितिज रहती है, लेकिन जब आप आध्यात्मिक लक्ष्य पाने का प्रयत्न करते हैं तो आप ऊर्ध्व रेखा में प्रगति करते हैं।

Content: जब तक आपका संघर्ष सांसारिक लक्ष्य प्राप्ति के लिए होता है तो आप आध्यात्मिक जीवन से बचते हैं। इसी प्रकार आध्यात्मिक प्रगति के लिए आप सांसारिक जीवन से अलग रहना चाहते हैं। दोनों में संघर्ष तो करना ही पड़ता है। कृष्ण कहते हैं - "दोनों से विश्राम लो।" आप सोचेंगे कि यह कैसा विचित्र निर्देश है? आप कहेंगे कि यदि ऐसा किया तो दोनों से ही हाथ धो बैठेंगे, पर सत्य यही है। जब आप दोनों से विश्राम लेते हैं तो आप स्वाभाविक रूप में आंतरिक चेतना में डूब जाते हैं - अपने अस्तित्व के आंतरिक क्षेत्र में चले जाते हैं।

Content: जब आंतरिक चेतना पर आप होते हैं तो अचानक आपको लगता है कि आप किसी भी दिशा में फूट पड़ सकते हैं। तब आपको यह चुनने की जरूरत नहीं होती कि क्षितिज दिशा में जाएं या ऊर्ध्व दिशा में। तब तो आप किसी भी दिशा में एक ही साथ प्रगति कर सकते हैं।

Content: 350

Content: श्रीमद्भगवत गीता

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Content: सांसारिक क्षेत्र में - उस क्षेत्र में जहां 'मेरे' का भाव रहता है, आपकी धन-संपत्ति, आध्यात्मिक क्षेत्र में भी आपके कुछ लक्ष्य होते हैं - यथा प्रबुद्ध होना!! वस्तुतः आध्यात्मिक लक्ष्य सांसारिक लक्ष्यों की तुलना में ज़्यादा अहमन्यता बढाते हैं। सांसारिक लक्ष्य प्राप्ति के संघर्ष में एक अवस्था आपको महसूस होती है कि उनके पीछे पड़कर आप असली प्रगति प्राप्त नहीं कर सकते, पर आध्यात्मिक क्षेत्र में तो आपको मालूम ही नहीं रहता कि आप क्या कर रहे हैं। लेकिन दोनों प्रकार के लक्ष्य आपको अपने वास्तविक अस्तित्व से दूर कर देते हैं। जब आप संपूर्ण समर्पण करते हैं तो आपके अस्तल को चैन मिलता है और आपकी समझ में आता है कि 'हम न तो शरीर तक सीमित हैं, न मन तक। जब तक आप अपने मन से नियंत्रित रहते हैं, आपको इस क्षेत्रज्ञ या चेतनाओं में से किसी को तो चुनना ही पड़ेगा। आप दुविधा में पड़ जाएंगे क्योंकि चुनाव तो आपका मन या मस्तिष्क ही करेगा। जब तक मन रहेगा तब तक दुविधा तो रहेगी ही। जैसे ही मस्तिष्क का लोप हुआ कि दुविधा भी दूर हुई, नहीं तो यह दुविधा रहती ही है कि यह चुने या वह।

Content: एक लघु कथा

Content: एक आदमी अपने घर पर बैठा रो रहा था। प्रायः आदमी लोग रोते नहीं, और वह भी ज़ोर-ज़ोर से। उसकी पत्नी ने पूछा - "तुम क्यों रो रहे हो?" तो उसने कहा - "तुम्हें याद है बीस वर्ष पूर्व जब हम दोनों साथ-साथ थे तो तुम्हारे पिता ने हमें रंगे हाथों पकड़ा था। उन्होंने तब धमकी भी दी थी कि यदि मैंने तुम्हसे शादी नहीं की तो वह मुझे जेल भिजवा देंगे।" पत्नी ने कहा - "हां, बिल्कुल याद है। पर उसके लिए अब क्यों रो रहे हो?" आदमी ने कहा - "यदि मैंने वह न किया होता तो उसने कहा था तो आज मैं एक स्वतंत्र आदमी होता।" आप जो भी चुने, कभी-न-कभी यह ताज़्जुब ज़रूर होगा कि आपने यह क्यों चुना था। जो सांसारिक लक्ष्य चुनेंगे तो दुःखी होंगे कि उन्होंने आध्यात्मिक जीवन नहीं पाया, और जो आध्यात्मिक लक्ष्य चुनेंगे वे कहेंगे कि उन्होंने सांसारिक सुखों से स्वयं को वंचित कर दिया, पर कृष्ण यहां एक परम विध बताते हैं। 'क्वान्टम स्पिरीचुअलिटी' के लिए। शायद आंतरिक विश्व के प्रथम क्वान्टम वैज्ञानिक थे। वे कहते हैं पूर्ण समर्पण करो और चैन से रहो - तब ही आपको आंतरिक चेतना की पूरी शिद्दत से अनुभूति होगी। आपको तब मालूम पड़ेगा कि आप ऊपर या क्षैतिज रूप से प्रगति प्राप्त करने के लिए कुछ भी चुनने

Content: की ज़रूरत ही नहीं। आप तो 360° के क्षेत्र में कहीं भी घुस सकते हैं। आपको एक चुनाव विहीनता का नया अनुभव होगा। चुनाव विहीनता का अर्थ यह नहीं कि आप कुछ नहीं चुनते। जब आप दोनों में से कुछ भी नहीं चुनते तो वह भी तो एक चुनाव ही है। यानी आपका निर्णय यह है कि कुछ नहीं चुनेंगे। जब यह चुनावना बंद हो जाएगा तो आप वस्तुतः सब कुछ चुनने योग्य हो जाएंगे। इसी प्रकार समर्पण का यह अर्थ नहीं कि पूरी तरह निष्क्रिय हो जाओ - सब कुछ छोड़ने का नाटक करो। कई लोग मुझसे कहते हैं - "स्वामी जी! मैंने तो सब कुछ ईश्वर को समर्पित कर दिया है। मुझे आशीर्वाद दें कि एक ज़्यादा वेतन वाली नौकरी मिल जाए।" एक महिला ने मुझसे कहा - "स्वामी जी! मैंने तो अपना सब कुछ आपको समर्पित कर दिया है। अब आपको मेरी खूब रखवाली है। मुझे मानसिक शांति दिलवाएं।"

Content: मैंने कहा - "ठीक है। पहले हमारा मेडीटेशन का प्रोग्राम अटेंड कर लो। फिर देखते हैं।" तुरंत उसने कहा - "मेरे पास दो दिन फालतू नहीं हैं।" और अभी उसने मुझसे कहा था कि वह सब कुछ मुझे समर्पित कर चुकी है। कोई बात कहने के पूर्व स्थिति समझ लेनी चाहिए - नहीं तो आपको परेशानी होगी। जब वास्तव में समर्पण की बात करें तो उसमें सब कुछ शामिल कर लो। कुछ भी न छोड़ें। आपको उर्ध्व या क्षैतिज रेखाओं के लक्ष्य चुनने की कोई ज़रूरत नहीं। आपको दोनों का अनुभव ही नहीं मिलेगा, बल्कि उससे कुछ और भी ज़्यादा मिलेगा। आप अपने अस्तित्व का प्रस्कुटन विभिन्न आयामों में पूरी शिद्दत के साथ कर सकते हैं।

Content: जब में समर्पण की बात करते हैं तो आपको यह समर्पण किसी गुरु या देवता के आगे नहीं करना है। अपने 'स्व' के प्रति, अपने अस्तित्व के प्रति आपका यह समर्पण होना चाहिए। आपको समर्पण अपने अंतर को करना है, अपनी चेतना के आगे सब कुछ निछावर करना है पर समस्या यह है कि आप अपने अंतर का कतई सम्मान नहीं करते। इसीलिए शुरुआत में आपको सहारे के लिए किसी गुरु या देवता की सत्ता की दरकार होती है। किसी ने मुझसे कहा - "स्वामी जी! मैंने तो स्वयं को आपको समर्पित कर दिया है। अब मुझे क्या करना चाहिए?"

Content: मैंने उत्तर दिया - "यदि तुम्हारा समर्पण असली होता तो तुम यह प्रश्न ही नहीं पूछते। तुम्हें निर्देश अपने अंतर से मिलेगा, लेकिन जब तक तुम्हारे मन में संशय है, तुमने समर्पण नहीं किया है।"

Content: श्रीमद्भगवत गीता 352

Content: श्रीमद्भगवत गीता 353

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Chapter Number: 18

Chapter Name: भ्रांति विहीन कर्तव्य (पालन)

Content: 18.7 नियत कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए (क्योंकि निषिद्ध और काम्य कर्मों को स्वरूप से ही त्यागना उचित है)। इसलिए मोह के कारण कर्मों का त्याग करना तमस त्याग है। 18.8 जो कुछ कर्म है वह सब दुःख-स्वरूप ही है - ऐसा समझकर यदि कोई शारीरिक क्लेश के भय से कर्तव्य कर्मों का त्याग कर दे तो ऐसा राजस त्याग करके त्याग के फल को किसी प्रकार भी नहीं पाता है। 18.9 अर्जुन! 'शास्त्र विहित (कर्म) करना कर्तव्य है' - इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया गया कर्म सात्विक त्याग माना गया है। 18.10 जो मनुष्य अकुशल कर्म से द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता वह शुद्ध सत्त्वगुण से युक्त पुरुष संश्य रहित, ज्ञानवान और सच्चा त्यागी होता है। 18.11 क्योंकि शरीर धारी किसी भी मनुष्य द्वारा संपूर्णता से कर्मों का त्याग करना संंभव नहीं है। इसलिए जो कर्मफल का त्यागी है वही (सच्चा) त्यागी है - ऐसा कहा (माना) जाता है। 18.12 कर्मफल का त्याग न करने वाले मनुष्यों को तो अच्छा, बुरा और मिला हुआ - ऐसा तीन प्रकार का फल (नतीज़ा) मरने के पश्चात् अवश्य मिलता है, किन्तु कर्म फल का त्याग कर देने वाले मनुष्यों का फल किसी काल में भी नहीं होता (क्योंकि उनके द्वारा किया गया कर्म वास्तव में कर्म नहीं है)।

Content: कृष्ण कहते हैं कि नित्य कर्म तो पूरे अनुशासन एवं नियम के साथ किए जाने चाहिए। इनको न करने से हम तमस में पड़ जाते हैं तथा अज्ञान और आलस्य हम पर हावी होने लगता है। नित्य कर्म भी व्यक्ति-व्यक्ति के अलग-अलग होते हैं। किसी गृहस्थ के नित्य कर्म किसी विद्यार्थी या भिक्षु

Content: श्रीमद्भगवत गीता

Content: (संन्यासी) से अलग-अलग होते हैं। हर एक को ज्ञान होता है कि क्या उसे करना है और क्या नहीं करना है। कई बार अपनी जिम्मेदारियों को छोड़कर दूसरे की भूमिका अपनााना अपनी जागरुकता बढ़ाने से ज्यादा आकर्षक प्रतीत होता है, जिससे हम अपने कर्तव्य कर्म बिना किसी आसक्ति के कर सकें। यह स्पष्ट समझ लें कि सही वर्ताव और जागरुकता के हम कोई भी भूमिका अपना लें, वह कारगर सिद्ध नहीं होगी। हमारे आश्रम के नियम के अनुसार हर एक को सुबह 6 बजे गुरु पूजा में शामिल होना ज़रूरी है। यह नियम उनके लिए भी है जो स्थायी निवासी हैं, ब्रह्मचारी हैं तथा उनके लिए भी जो कोर्स करने या आरोग्य पाने के लिए यहां ठहरते हैं। कुछ बाहरी लोग जितनी अनिच्छा से इस पूजा में शामिल होते हैं - वह बहुत स्पष्ट होती है। कुछ तो सुबह 6 बजे नींद में ही रहते हैं। वे हमारे पास कोई पुलिस बल तो नहीं है कि उन्हें ढूंढ-ढूंढकर जगाया जाए। वह ज़रूरी काम छोड़ देना क्योंकि वह आरामदेह नहीं है, सन्यास का भाव नहीं प्रकट करता है। यह सुविधा या निश्चित्यता भी राजस तत्व की देन होती है। कोर्स में भाग लेने के बाद भी कुछ लोग पूछते हैं कि वे कितनी तरह से ध्यान कर सकते हैं? मैं उनसे कहता हूं - "कम-से-कम एक तो सही रूप से करो!" मैं उनसे कहता हूं - "कम-से-कम एक तो सही रूप से करो!" बड़े संकुचित होकर कहते हैं - "स्वामी जी!" अब तो एक बार भी ध्यान करने का समय नहीं है मेरे पास।" यानी सिवाय ध्यान करने के उनके पास हर चीज के लिए समय है। हम सभी को मिलने का समय दे देते हैं, पर खुद को नहीं देते। हानि किसकी होती है? कृष्ण कहते हैं कि जो बताएं गए हैं उन ज़रूरी कर्मों को बिना किसी आसक्ति भाव या कामना को करना ही सात्विक कर्म की आदर्श स्थिति है। कृष्ण ने यह बात गीता में इतनी बार कही है कि बात पूरी दिल में उतर गई है- अपने समाज, धर्म द्वारा बताया हुआ कर्तव्य कर्म करो बिना किसी आसक्ति या कामना के। यानी इन कर्मों में कोई 'मैं' और 'मेरे' का भाव नहीं होना चाहिए। प्रायः पारंपरिक घरों में लोग मंत्रोच्चार बिल्कुल रटे-रटाए रूप में बोलते हैं। वह एकाग्र होने का प्रयत्न तो करते हैं पर घर की हर गतिविधि से वह विचलित हो जाते हैं। ये लोग 'अपना' काम ठीक ढंग से करने में इतने आसक्त होते हैं कि हर गतिविधि उन्हें विचलित कर देती है। इसके बरअक्स जब कोई बच्चा मंत्र जपता है तो वह आराम से और मज़े लेकर पूरा जाप कर लेता है। मैं जब दस वर्ष का भी नहीं हो पाया था, तब अन्नामलाई स्वामीगण ने तिरुवनमलाई में मुझे ध्यान लगाने की विधि में दीक्षित किया था। दो साल तक तो मैं उस विधि से खिलवाड़-सो करता रहा। दो वर्ष लगे उस पढ़ाई को मुझे पर असर डालने में।

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Chapter Number: 18

Content: 18.13, 14 महाबाहो! संपूर्ण कर्मों की सिद्धि के ये पांच हेतु कर्म का अंत करने के लिए उपाय बताने वाले सांख्य में कहे गए हैं – तू उनको मुझमें भलीभांति जान कार्यों की सिद्धि में अधिष्ठान और कर्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के कारण एवं नाना प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएं और वैसे ही पांचवां हेतु देव (पूर्व कृत शुभाशुभ कर्मों के संस्कारों का नाम देव है) कहा गया है।

Chapter Number: 18

Content: 18.15 मनुष्य मन, वाणी और शरीर से शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत, कुछ भी करता है, उसके पांच कारण हैं।

Chapter Number: 18

Content: 18.16 परंतु ऐसा होने पर भी जो मनुष्य अशुद्ध बुद्धि होने के कारण कर्मों के होने में केवल शुद्ध रूप आत्मा को ही कर्ता समझता है, वह मलिन बुद्धि वाला अज्ञानी यथार्थ नहीं समझता।

Content: इन श्लोकों में कृष्ण समर्पण की सही तकनीक या तरीका बतलाते हैं। वे सांख्य दर्शन से पांच हेतुओं को मिलाते हैं जो हमारी किसी भी गतिविधि के लिए जिम्मेदार होते हैं। ये हैं – शरीर-मन तत्व, इस तत्व का संचालन (यानी उस व्यक्ति स्वत्व), इंद्रियां, विभिन्न प्रयत्नों को प्रकट करने वाली गतिविधियों और अंत में चरम सत्तवान, ईश्वर! हमारी सारी अच्छी या बुरी, गलत या सही गतिविधियां इन पांच हेतुओं के कारण ही होती हैं, लेकिन यदि वह जीव स्वयं को ‘कर्ता’ मानता है तो इसकी उसके शरीर व मन को जानकारी नहीं होती।

Content: कृष्ण यहां उस व्यक्ति या जीव को, जो अपनी और ईश्वर की सत्ता का स्वयं को निमित्त या कर्ता समझता है, ‘आत्मा’ के नाम से संबोधित करते हैं जो इन गतिविधियों को नहीं देखता या वाकिफ नहीं होता। कृष्ण जीव में विद्यमान ईश्वर के अंश एवं कौस्मिक ऊर्जा में फ़र्क मानते हैं। वे आत्मा और परमात्मा (या ब्रह्म), मानव और देव, नर और नारायण तथा स्व-अस्तित्व और पराशक्ति में भिन्नता समझते हैं।

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Content: कृष्ण समापन करते हुए कहते हैं कि दार्शनिक चर्चाएं इन पांच हेतुओं को ही सारी गतिविधियों का संचालक मानती हैं, जिनका अंतिम महा-नियंत्रक ईश्वर या दिव्य-सत्ता होती है। अपने शरीर-तंत्र आत्मा के घमंड में भूले हुए तथा इंद्रिय-बोध की भ्रांति में डूबी हुए हम सारी शक्ति का नियंत्रण स्वयं को सत्ता को मानते हैं, जो सब कुछ चलाती है। जब तक हमारी यह भ्रांत धारणा रहती है, हम अज्ञान में ही उलझे रहेंगे। हम अपने को चाहे कुछ भी समझें - स्वतंत्र सत्ता या शरीर-मन-आत्म तंत्र, यह समझ कई आयामों में सम्पूर्णता का द्योतक होता है। इसके बाकजूद हम यहीं समझते हैं कि 'हम' ही सम्पूर्णता के लिए जिम्मेदार हैं और यहीं से समस्या का आगाज हो जाता है। जैसा हम पहले कह चुके हैं समर्पण के तीन स्तर होते हैं - बौद्धिक स्तर, भावनात्मक स्तर और अस्तित्व का सार। बौद्धिक सार पर समर्पण आसान है क्योंकि यह लगातार हमें त्रास देता रहता है। जब भी हम किसी ज्यादा बुद्धिमान और स्पष्ट समझ रखने वाले से मिलते हैं तो उसके सामने समर्पण करते हुए हमें देर नहीं लगती। ज्यादातर हम इसी बौद्धिकता से मुक्ति पाना चाहते हैं। जैसे ही कोई ऐसा मिला जिसके सामने हम इससे मुक्ति पाएं, हम उसको अपनी बुद्धिमत्ता देकर चैन से बैठ जाते हैं। दूसरा नंबर है भावनात्मक समर्पण का। यह तब घटित होता है जब किसी ध्यानावस्था अनुभव या समझ के अंतर्गत आप अपने गुरु से गहन भावनात्मक जुड़ाव महसूस करते हैं। गुरु की भावना यानी वह रास्ते जो वह तुम्हें दिखाता है और जीवन-यापन के वे तरीके जो वह चाहता है तुम अपनाओ। भावनात्मक स्तर पर गुरु आपकी प्रथम प्राथमिकता पर रहता है। इसके पश्चात आता है इंद्रियों के स्तर पर समर्पण जो एक गहराई भरा समर्पण होता है। इंद्रियों को समर्पण मतलब आप वही सुनोगे जो गुरु कहता है और कुछ नहीं। साधारणतया जब आप मुझको सुनते हो तो आपके दिमाग में लगी एक 'छलनी' उसको अलग करती जाती है, जिससे आपका मतैक्य नहीं होता। मतलब आप वही सुनते हो जो आप सुनना चाहते हो, लेकिन जब बौद्धिक और भावनात्मक समर्पण हो जाता है तो आप अपनी यह गलत धारणा त्यागने को उदयत हो जाते हैं और इंद्रियों के अवरोध हटा लेते हैं। एक बार एक शिष्य ने गुरु से पूछा - "मैं क्या समर्पण करूं?" गुरु ने पूछा - "तुम यह कैसे पता लगाओगे कि क्या तुम अपने बारे में जानते हो?" शिष्य ने कहा - "मैं स्वयं को अपनी इंद्रियों के माध्यम से जानता हूं।"

Content: गुरु ने फिर पूछा - "इंद्रियों के हिसाब से तुम क्या सोचते हो कि तुम हो?" शिष्य ने कहा - "जहां तक मैं समझा हूं मैं शरीर और मन हूं।" गुरु ने आगे कहा - "जब तुम अपनी इंद्रियों का भी समर्पण कर दोगे तब तुम्हारी समझ में वह सत्य आएगा जो मैं कह रहा हूं। जैसे ही तुमने मुझ पर भरोसा कर अपनी इंद्रियों का समर्पण किया कि तुम ईश्वर का अनुभव करने लगोगे। तब तुम्हारी समझ में आएगा कि 'तत्वमसि' (तुम वही हो, यानी कि ईश्वर हो) का असली अर्थ क्या है।" मैं यहां बार-बार यह कहता रहता हूं कि मैं यहां यह सिद्ध करने नहीं आया हूं कि मैं ईश्वर हूं, बल्कि यह कि तुम ईश्वर हो। यह विचार पर, जो कहता है तुम अनंत स्वामी या गुरु का दावा होता है उस विचार पर, वह तुम्हें तुम्हारे अंतर में विभिन्न आयामों को उद्घाटित करता है जो तुमने कभी न स्वयं खोजे हैं, न उनका अनुभव किया है। वह दिखाता है कि ऐसा करना यदि उसके लिए संभव है तो तुम्हारे लिए भी संभव है, पर जब तक तुम अपनी इंद्रियों पर विश्वास करते हो, तुम यही समझते हो कि तुम मात्र शरीर और मन ही हो। जब तुम अपनी इंद्रियों से अधिक अपने गुरु पर भरोसा करते हो और समझते हो कि गुरु के शब्द सत्य हैं, न कि तुम्हारा इंद्रिय बोध - तब सत्य तुम पर प्रकट होता है। जब गुरु कहता है कि तुम ईश्वर हो तो यह सत्य अचानक तुम भी समझने लगते हो। तुम्हारी समझ में आता है कि तुम केवल मन-शरीर तंत्र नहीं, जो तुम्हारी इंद्रियां तुम्हें बताती हैं। अब दो आवाजें एक साथ दो अलग-अलग स्तरों से उठने लगती हैं। एक और तुम्हारी इंद्रियों की आवाजन जो कहती है कि तुम शरीर-मन ही हो। दूसरी और तुम्हारे गुरु कहते हैं कि तुम ईश्वर हो। जब तक तुम इंद्रियों की सुनते रहोगे, तुम्हें गुरु की आवाज सुनाई ही नहीं पड़ेगी। जब तुम इंद्रिय बोध से हटकर गुरु की ओर आते हो, तुम उनकी आवाज सुनते हो और अनुभव करते हो कि तुम ईश्वर हो; दिव्य हो।

Content: अंतिम समर्पण आंतरिक विश्व में, आपका अंतिम और प्रथम औजार संपूर्ण समर्पण ही है। तभी आपका सत्य से साक्षात्कार संभव है। आप कृष्ण चेतना की अनुभूति सिर्फ

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Content: बौद्धिक एवं भावनात्मक समर्पण से नहीं वरन् बौद्धिकता और भाव बोध के मूल अर्थात् इंद्रियों के समर्पण से ही कर सकते हैं। ये इंद्रियां ही तो हैं जो मसाला या आंकड़े मन-बुद्धि को प्रदान करती हैं। जब आप इनका समर्पण कर देते हो तो वह आंकड़े इत्यादि का मूल भी समर्पित हो जाता है। आपको अपने बारे में सारी सूचना इंद्रियों से ही तो मिलती है। आप अपना सम्मान इसलिए ही करते हैं क्योंकि इंद्रियों ने दूसरों के इंद्रिय-बोध द्वारा इसकी ताईद की है। यदि कोई कहता है - “आप सुंदर हो!” तो यह टिप्पणी आपकी ‘बही’ में दर्ज हो जाती है। जब कोई कहता है आप गूंगे हो तो दूसरी टिप्पणी दर्ज हो जाती है। फिर आखिर में आप सारी टिप्पणियों का आकलन करते हो कि किसने आपके बारे में क्या कहा? आप देखते हैं (मान लीजिए) कि 72 प्रतिशत लोगों ने कहा कि आप बुद्धिमान हैं। 20 प्रतिशत कहते हैं कि आप एक ठस दिमाग वाले हैं और बाकी कुछ नहीं कहते तो आप विश्लेषण करते हैं कि यदि 72 प्रतिशत आपको बुद्धिमान मानते हैं तो सब ही तो मूर्ख नहीं हो सकते। इसलिए आप अवश्य ही बुद्धिमान हैं। इस प्रकार आपका अपने बारे में निष्कर्ष, प्रायः दूसरों की आपके बारे में राय पर निर्भर रहता है। आप लगातार लोगों के पास जाते रहते हैं उनकी अपने बारे में राय लेने के लिए। परिणामस्वरूप आपकी अपनी राय में भी आपकी इंद्रियों के द्वारा प्राप्त जानकारी का बहुत हाथ होता है। कृष्ण कहते हैं अर्जुन कि तू अपनी इंद्रियों का भी समर्पण कर दे। जब आप इंद्रियों का समर्पण करते हो तो आपकी अपने बारे में जानकारी का मूल स्त्रोत और आपकी पहचान को उसी जो शरीर-मन के साथ जुड़ा रहती है, वह भी नहीं रहता। जब तक इंद्रियों पर भरोसा करते रहेंगे आप स्वयं को शरीर-मन ही मानेंगे, पर जब अपने गुरु या स्वामी पर भरोसा करेंगे - इंद्रियों की तुलना में - तब आपकी समझ में आएगा कि आप वाकई एक दिव्य सत्ता या ईश्वर हैं। अब यह आपके चुनाव पर निर्भर है। यदि इंद्रियों की बात मानेंगे तो गुरु की बात समझ में नहीं आएगी और गुरु की बात मानेंगे तो इंद्रियों की जानकारी झूठी लगेगी तो यह आपके निर्णय पर ही आधारित है। कृष्ण कहते हैं कि जब आप तीनों स्तरों पर आत्म-समर्पण कर देते हैं तब आपको एक चरम अनुभव प्राप्त होता है। मैं आपको बताता हूँ - यह समर्पण ही प्रबंधन है। उसी क्षण आप सत्य का अनुभव करते हैं।

Content: प्रायः हम शब्दों से खिलवाड़ करते हैं। लोग मुझसे कहते रहते हैं कि उन्होंने कृष्ण, वैंकटेश्वर या शिव को अपना जीवन समर्पित कर दिया है और फिर कहते हैं कि उनकी एक ही इच्छा है - प्रसन्न रहने की। यदि वाकई उन्होंने समर्पण कर दिया है तो काफी है। फिर उनकी कोई चाह कैसे शेष रह सकती है? लेकिन यदि मन में शक-ओ-शुबा है तो समर्पण नहीं हुआ है, क्योंकि समर्पण के बाद तो ‘आप’ रहते ही नहीं, गायब हो जाते हैं। समर्पण में कुछ देना खोना कुछ नहीं है, पाना-ही-पाना है। बोझे ही होता है। अपना सब कुछ अपने पास ही रखो, बस उसको रखने की चाह अंदर मत पैठने दो। अपना आकलन अपनी धन-सम्पदा के आधार पर मत करो। जब आपको मालूम कुछ तुम अपनी कीमत समझते हो उससे बहुत ज्यादा हो। वह भान होगा तो आप बैंक-बैलेंस, संबंधों, व्यवसायों या अपने नाम और ख्याति के फ्रेम में अपने को नहीं जकड़ोगे। तब समझो कि समर्पण हो गया। मैं तो चाहता हूँ कि आप अपने बारे में इन तुच्छ विचारों को समर्पण कर दो - इससे मुक्ति पा लो। जीवन के इस महासागर की सतह पर कुछ बुलबुले उठते हैं। एक बुलबुला सोचता है कि उसकी अपनी अलग हैसियत है जो काफी देर तक चलेगी, पर वह तो कुछ क्षणों में ही विलीन हो जाती है। वह सोचता है कि उसका बैंक बैलेंस जो रेत के एक कण के समान है, दूसरा उसकी धन-सम्पदा का द्योतक है इत्यादि। इनकी सुरक्षा के लिए वह एक बाड़ लगाता है, पर वह बुलबुला यह खेल कितनी देर तक खेल सकता है - सिर्फ कुछ सैकेंड्स ही न? जब तक वह अपना खेल पूरा करे वह पुनः सागर में विलीन हो जाता है। इन दोनों स्थितियों में वह बुलबुला समुद्र का हिस्सा रहता है - जब वह बना, जब वह रहा और जब वह गायब हुआ। जब वह समुद्र से अलग अपने अस्तित्व का दावा करता है, अपनी अलग हैसियत समझता है और सोचता है कि वह एक अलग हस्ती है - तब भी रहता वह समुद्र का ही हिस्सा है जिसमें वह क्षण ही विलीन भी हो जाता है। इसी प्रकार कुछ क्षणों के लिए हम भी सोचते हैं कि हमारी एक अलग हस्ती है इस वैश्विक चेतना में। इसी दौरान आप लोगों से अपने संबंध बनाते हैं, मित्र बनाते हैं और समझते हैं कि हम सुरक्षित हो गए। आप अपना साज-ओ-सामान जोड़ते हैं अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने को। इन चीजों से हम अपने बारे में अपनी राय कायम करते हैं। आप भी इसी बुलबुले की भाँति वर्ताव करते हैं न?

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Chapter Name: समर्पण का अनुभव करना

Content: अचानक सब कुछ गायब हो जाता है। खेल शुरू होने के पूर्व (या) खेल जारी थी और जब खेल खत्म हुआ - आप समझें या न समझें, जानां या न जानें, अनुभव करें या न करें - आप सदा समृद्ध के अंश ही रहे हैं। ईश्वर हैं, परमात्मा से एकात्म हैं। जब मैं समर्पण की बात करता हूँ तो मेरा अभिप्राय होता है इस को समझो कि आप समृद्ध हो। जब आप पैदा हुए तो आपने समझा कि आप एक अलग हस्ती हैं, पर जैसे ही आप प्रबुद्ध हुए कि आपने जाना कि आप तो सदा से ही समृद्ध थे। इस अंतिम सत्य का साक्षात्कार करना ही समर्पण है अपने बारे में सारे छोटे-छोटे तुच्छ विचारों का समर्पण कर असलियत में जागृत हों, नहीं तो आप समर्पण नहीं इस शब्द ‘समर्पण’ के साथ मात्र खिलवाड़ कर रहे हैं। हम स्वयं को परिभाषित करते हुए काफी फले-फूले शब्द प्रयुक्त करते हैं। हम यह समझ नहीं पाते कि हम वर्णनातीत हैं। एक दिन एक शिष्य ने मेरे सामने अपने बारे में काफी अतिशयोक्तिपूर्ण शब्दों का प्रयोग किया। जब वह चला गया तो मैने अपने शिष्य से कहा कि यह हीन भावना से ग्रसित प्रतीत होता है। मैने कहा कि अपने को ईश्वर न समझना, अपने को कम कर आंकना ही है; हीन भाव से ग्रसित होना ही है। कुछ मछलियाँ धारा के साथ तरती हैं और कुछ धारा के विरुद्ध, पर वे चाहे धारा के साथ जाए या विपरीत, तो वे सदा जल में ही हैं। (इसी प्रकार) आप परम तत्व (ईश्वर) के साथ रहें या विरोध करें, आप हैं तो उसी में लीन। आप स्वयं को दैवी समझें या न समझें, आप हैं तो दिव्य। इसमें कोई विकल्प नहीं है। आपके पास सिर्फ एक ही रास्ता है - या इस बात को महसूस कर आनंद उठाएं या लगातार संघर्ष करते हुए कष्ट पाएं - बस। आप अपने चारों ओर चाहे कितनी भी वाड़ लगा लें, कितने भी बुलबुले इकट्ठे कर लें, पर क्या आप लहर को आने से रोक सकेंगे? आप कुछ भी कर लें यह सारा नाटक कुछ सैकेंड्स का ही होता है। अगली समस्या है कि क्या करें यदि समर्पण नहीं कर सकते। कुछ लोग मुझसे पूछते हैं - “स्वामी जी! समर्पण तो मुझसे नहीं होता, मैं क्या कर सकता हूँ?” आप चिंता न करें क्योंकि आपके पास समर्पण के लिए कुछ नहीं है, आपका कुछ नहीं है। यह समझ कि मेरे पास समर्पण के लिए कुछ नहीं है, आपका समर्पण पूर्ण कर देती है। शांत रहें। आप समर्पण करें या न करें परमात्मा सब

Content: ख्याल रखेगा। स्वतः जीवन चलता रहेगा और आप चैन से रहेंगे। यह चैन ही समर्पण का प्रतीक है। जीवन के प्रवाह में स्वयं को चैन से बहने दें। इस सत्य को जागरूक रहें कि आप शरीर और मन से बहुत ज्यादा हैं - जैसा आपकी इन्द्रियों ने समझाया होगा। आपके समाज ने भी बताया होगा कि आप ‘कुछ’ हैं। अब इस सत्य को जागरुकता से ग्रहण करें कि आप जो सोचते हैं उससे कहीं ज्यादा हैं, महान हैं। समर्पण आप में एक नई चेतना विकसित करेगा - आप एक नए ‘जीव’ बनकर उभरेंगे। प्राचीन शास्त्रों के अनुसार तीन स्तरों का जन्म होता है और तीन प्रकार की कोख से होता है। प्रथम है भू-गर्भ यह स्त्री की कोख है जो बच्चे को पैदा करती है। इसका संबंध सृजनात्मक मूलाधार चक्र से होता है, जो सातों चक्र में सबसे नीचा होता है। चक्र अर्थात मानव शरीर में स्थित ऊर्जा केंद्र। दूसरा है हत गर्भ यानी हृदय का गर्भ, जो उसके कलाकारों में दिखाई पड़ता है। उदाहरण के लिए एक गायक या चित्रकार सबसे पहले अपनी धुन या चित्र का आभास अपने हृदय से प्राप्त करता है और तभी उसे बाहर अभिव्यक्त कर पाता है। स्त्री की पूर्णता शिशु-प्रसव से होती है, जब वह ‘माँ’ बन जाती है। इसी प्रकार एक कलाकार-चित्रकार, गायक-वादक, कवि या मूर्तिकार - तभी अभिभूत करने वाली पूर्णता पाते हैं जब अपनी कृति का ‘प्रसव’ कर देते हैं। कवि के लिए तो कोख उसका दिल ही है, हत-गर्भ। अंतिम है ‘ज्ञान गर्भ’ - यह ‘सहस्रार चक्र’ या उच्चतम ऊर्जा केंद्र में रहता है - सिर के ठीक ऊपर। ‘ज्ञान गर्भ’ में सारे आध्यात्मिक विचार मस्तिष्क

Content: श्रीमदभगवत गीता 363 में सोचे जाते हैं और वही उन पर काम होता है। अचानक एक क्षण ऐसा आता है जब आपके एक नवरूप को आप जन्म देते हैं - एक प्रबुद्ध जीव को। जब आप समर्पण की यह अवधारणा ग्रहण करते हैं और इस पर काम शुरू करते हैं तो आप जागृत होकर स्वयं को एक प्रबुद्ध जीव के रूप में सुजित करते हैं। जब तक आप स्वयं को एक बुलबुला समझते हैं, आप असुरक्षित रहते हैं। जिजीविषा और परिग्रह की चाह आपको त्रास देती रहती है, पर जैसे ही आपकी समझ में आया कि आप स्वयं सागर हैं - इसी से हैं और इसी में हैं और इसी में विलीन हो जाएंगे और कभी मरेंगे नहीं, आप सुरक्षा पाते हैं क्योंकि आप स्वयं सागर हैं। स्वयं के सागर होने की अनुभूति आपको बताती है कि अब कुछ पाना नहीं क्योंकि सब कुछ तो आपका ही है। इससे आपकी परिग्रह की चाह स्वतः

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Content: खत्म हो जाती है। मैं यह नहीं कह रहा कि आप अपनी वसुधा लुटा दो। जो आपके पास है उसे अपने पास ही रखें, पर उसको आत्मसात न होने दें - उसे स्वामित्व भाव को स्वयं को बांधने न दें। अपने अंदर यह भरासा रखें कि आपके पास जो कुछ भी है उससे आप कहीं ज्यादा महान हैं। सात वर्ष की आयु तक आपको खिलौनों में बहुत दिलचस्पी रही होगी। आपके लिए महत्वपूर्ण होंगे, पर आज भी क्या वे महत्वपूर्ण हैं? अब आपने उनको त्यागा है न उनसे कोई मोह बाकी रहा है, वे हैं बस! आप उनसे परे आ गए हैं - उनके प्रभाव से। 'राग' का अर्थ ही आसक्ति होता है और 'अराग' का अर्थ है वितृष्णा तथा विराग (या वैराग्य) का अर्थ है रोग-अराग से परे होना। आप जब बड़े हुए तो आपको खिलौनों के प्रति वैराग्य उत्पन्न हो गया। इसी प्रकार जब आप स्वयं को समुद्र समझेंगे (बुलबुला नहीं) तो आपके मन में अपने पूर्व संग्रहों के प्रति एक वैराग्य भाव उत्पन्न होगा। आपको वे रेत के कण की भांति तुच्छ लगेंगे। आप उनसे परे पहुंच चुके होंगे। अब जिजीविषा भी अपनी प्रासंगिकता खो चुकी होगी। आपकी वसुधा कहीं गायब नहीं हुई - वह तो वहीं है - पर आप उनको 'त्यक्त' भाव से भोगते हैं - शायद पहले से ज्यादा शिद्दत से भी। जब आपको लगे कि कोई चीज आपसे कभी भी छिन जाएगी तो आप उसकी परवाह करने लगते हैं। जब आपको महसूस हो कि आप भी एक समुद्र हैं और वह भी तो आप उसकी ज्यादा कद्र करने लगते हैं। यह अनुभूति आपको शरीर, मन और चेतना के स्तर पर काफी बदल देती है। चेतना का यह मही परिवर्तन आपको आपका एक नया स्वरूप प्रदान करता है। कृष्ण तो समर्पण के इन तीन स्तरों से और भी ज्यादा गहरे में जाते हैं। वे अर्जुन को एक चरम अनुभव की झलक स्वयं दिखाते हैं। यह अनुभव कृष्ण अर्जुन को 'विश्वरूप' दर्शन द्वारा प्रदान कर चुके हैं। इसके बाकजूद अर्जुन स्वयं को अपने भय के कारण इस महती अनुभव में स्थापित नहीं कर पाता। प्रथम अनुभव आप अपने भय के कारण प्राप्त नहीं कर पाते, लेकिन अब अर्जुन अधिक व्यस्क हो चुका है और स्वयं को इस अनुभव में स्थापित करने के योग्य भी। कृष्ण अर्जुन को यह अनुभव पुनः प्रदान करते हैं जो उसके साथ सदै रहता है। अगले श्लोकों में कृष्ण अर्जुन को प्रबोधन का अनुभव प्रदान करते हैं।

Content: एक लघु कथा

Content: एक व्यक्ति ने एक जैन मास्टर से पूछा कि वह बुद्ध कैसे बने? उस जैन मास्टर ने उसके एक जोरदार चांटा मारा। उसी क्षण वह व्यक्ति प्रबुद्ध हो गया। चांटा मारने से यह मालूम हुआ कि उसमें स्वयं में 'बुद्धत्व' की अनुभूति की। चांटा मारने से यह मालूम हुआ कि वह पहले से ही उस स्थिति में था। उसे नींद से जगाने की जरूरत थी। कृष्ण अर्जुन को ऐसी ही लंबी नींद से जगत कर रहे हैं, जिसे 'संस्कार सागर की सुप्ति' कह सकते हैं। या अचेतना और तमस की नींद, कृष्ण उसे जोर से हिलाते हैं, उसे अपना चरम अनुभव प्रदान कर और अर्जुन समर्पण के चरम अनुभव में स्वयं को स्थापित कर लेता है।

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Chapter Number: 18

Content: 18.17 जिस पुरुष के अंतःकरण में 'मैं कर्ता हूं' - ऐसा भाव नहीं तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों (आकर्षणों) में लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन लोकों में (किसी को) मारकर भी वास्तव में न तो मारता है, न ही पाप से बंधता है।

Content: यह काफी खतरनाक वक्तव्य है। सिवाय कृष्ण के और कोई स्वामी ऐसा साहसिक वक्तव्य नहीं दे सकता है। बेशक, जो जागरुकता के चरम स्तर तक पहुंच जाता है वह ऐसा मारने का काम तो कर ही नहीं सकता। जब तक हमारे अंदर 'मैं' या 'मेरे' का भाव रहता है, तबही हम किसी पर आक्रमण करते हैं या 'मारना' चाहते हैं। जब हम संपूर्ण समर्पण कर समग्र के साथ जुड़ जाते हैं तो फिर कौन किसको मार सकता है - सभी एक ही होते हैं।

Content: हम दूसरों को मारने की तबही सोचते हैं जब हम स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हैं। युद्ध करने के लिए हमें कोई खास साहस तो नहीं चाहिए। इसमें तो कायरता से भी काम चल जाता है। वस्तुतः साहसी व्यक्ति कभी किसी को नहीं मारता, वह तो अहिंसा में पूरी तरह विश्वास करने वाला होता है। यही कारण है कि कृष्ण यह साहसी वक्तव्य देते हैं - जो अहं में लिप्त नहीं है वह यदि किसी को मारता भी है तो वह मारना नहीं होता।

Content: यहां कृष्ण इसी पर जोर दे रहे हैं - तुम स्वयं को अहं से दूर करो। वे अर्जुन से यह नहीं कहते कि मारो। असल में समस्या तब उत्पन्न होती है जब लोग शब्दों की अपनी तरह से व्याख्या करने लगते हैं। हर एक की समझ अलग-अलग होती है।

Content: एक लघु कथा

Content: एक ज़ेन मठ में एक छोटा लड़का था जो भिक्षु बनने का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहा था। एक दिन वह अपने स्वामी के कक्ष की सफ़ाई कर रहा था तो अचानक उससे स्वामी का प्रिय चाय का प्याला टूट गया।

Content: वह स्वामी को यह बात बताना भी चाहता था, पर डर था कि स्वामी उसे डांटेगे। वह अपने स्वामी के पास गया और कहा - 'स्वामी जी! क्या यह सत्य नहीं है जो जन्म लेगा वह कभी-न-कभी मरेगा भी ज़रूर?'

Content: स्वामी ने कहा - 'हां! सच है।'

Content: उस लड़के ने उस कप के टूटे हिस्से दिखाए और बोला - 'तो आपके प्रिय कप के मरने का समय आ गया था।'

Content: कृष्ण के वक्तव्य को अपने अर्थ न दो। वे सीधे-सीधे यह कह रहे हैं कि वह यदि किसी को मारता भी है तो वह समग्र का अंग है। जिसने यह समझ लिया है कि वह समग्र का अंग है वह मारना नहीं है। कृष्ण कहते हैं कि स्वयं में निहित सत्य का अनुभव करो। सही अर्थ ग्रहण करो; स्वयं को अहं मुक्त करो। वह यह नहीं कह रहे कि जाओ और सबको मारने लगो (क्योंकि तुम्हारा मारना, मारना नहीं माना जाएगा)

Content: कृष्ण इस अतिशयता पूर्ण उदाहरण, मारने का प्रयोग अर्जुन को समझाने के लिए कर रहे हैं। जब किसी की ज़जीविषा की ज़रूरत नहीं रहती तो उसकी हर करनी अनासक्त और निष्काम (बिना बदले की भावना के) रहती है। जब कोई व्यक्ति इस अवस्था में आ जाता है तो वह परमात्मा से सीधा जुड़ जाता है। फिर तो उस व्यक्ति का कुछ भी नष्ट करना उसी प्रकार है जैसे प्रकृति किसी को नष्ट कर रही है। यह विभिन्न आवृत्तियों के अनुसार एवं विभिन्न समझ के अनुसार होता रहता है जैसा पहले स्पष्ट किया जा चुका है।

Content: कृष्ण का यह वक्तव्य अर्जुन को समझाने के उद्देश्य से दिया गया है कि वह वीरता से युद्ध करे, न कि रणभूमि से भागता फिरे।

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Chapter Number: 18

Content: 18.18 'ज्ञाता', 'ज्ञान' और 'ज्ञेय' - ये तीन प्रकार की कर्म-प्रेरणा हैं तथा 'कर्ता', 'करण' और 'क्रिया' - ये तीन प्रकार की कर्म संग्रह है।

Chapter Number: 18

Content: 18.19 इन सबमें ज्ञान और कर्म तथा कर्ता के भी तीन गुणों के भेद गुणों की संख्या करने वाले शास्त्र में, तीन-तीन प्रकार के कहे गए हैं - उनको तू भली प्रकार मुझसे सुन।

Chapter Number: 18

Content: 18.20 जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक-पृथक सब भूतों में एक अविनाशी परमात्म भाव को विभाग रहित समभाव से स्थित देखता है, उस ज्ञान को तू 'सात्विक' जान।

Chapter Number: 18

Content: 18.21 और जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य संपूर्ण भूतों में भिन्न-भिन्न प्रकार के नाना भावों को अलग-अलग जानता है, उस ज्ञान को तू राजस जान।

Chapter Number: 18

Content: 18.22 और जो ज्ञान शरीर में ही संपूर्ण एक कार्यक्रम के जैसा आसक्त है, तथा जो बिना युक्ति वाला सात्विक, अर्थ से रहित और तुच्छ है - वह तामस कहा गया है।

Chapter Number: 18

Content: 18.23 जो कर्म शास्त्र विधि से नियत किया गया और कर्तापन के अभिमान से रहित, फल की कामना न करने वाले पुरुष द्वारा बिना राग-द्वेष से किया गया हो, वह कर्म सात्विक कहा जाता है।

Chapter Number: 18

Content: 18.24 जो कर्म बहुत परिश्रम वाला होता है और भोगों को चाहने वाले पुरुष द्वारा या अंहकारयुक्त पुरुष द्वारा किया जाता है, वह कार्य राजस कहा गया है।

Chapter Number: 18

Content: 18.25 जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को विचार न कर, केवल अज्ञान से आरंभ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।

Chapter Number: 18

Content: 18.26 जो कर्ता आसक्ति से रहित, अहंकार के वचन न बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा कर्म के सिद्ध न होने में हर्ष-शोकादि विकारों से परे है, वह सात्विक कर्ता कहा जाता है।

Chapter Number: 18

Content: 18.27 जो कर्ता आसक्ति से युक्त, कर्मों के फल को चाहने वाला और लोभी है तथा जो दूसरों को कष्ट देने के स्वभाव वाला, अशुद्धाचारी एवं हर्ष-शोक से लिप्त रहता है, वह राजसिक कर्ता कहा गया है।

Chapter Number: 18

Content: 18.28 जो विक्षेप युक्त चित्त वाला, अशिक्षित, घमंडी, धूर्त और दूसरे की आजीविका का नाश करने वाला, शोर करने वाला, आलसी और दीर्घसूत्री है, वह तामसिक कर्ता कहा गया है।

Content: इन श्लोकों में कृष्ण मनुष्य की प्रकृति समझाते हैं। कृष्ण पहले ही कह चुके हैं कि असली 'कर्ता' 'नर' (मनुष्य) नहीं वरन् 'नारायण' (ईश्वर) हैं। फिर भी मनुष्य निमित्त तो होता है - यानी वे माध्यम जिसकी हम बात कर रहे हैं। हमारे अंदर जो कमजोरियां हैं वह हमारी प्रकृति में निहित रहती हैं। यह वे 'गुण' है जो हमारे स्वभाव को बताते हैं या परिभाषित करते हैं। यही गुण हैं जो हम पर प्रभाव डालते हैं तथा हमारे मनसा-वाचा-कर्मणा (मन-वाणी-कर्म) को नियंत्रित करते हैं, लेकिन किसी का जन्म से मृत्यु तक एक ही गुण नहीं रहता।

Content: 'गुण' तीन प्रकार के होते हैं - सत्व, रज, तम। सत्व गुण - शांत, शुभ व प्रायः आध्यात्मिक मनःस्थिति वाले मनुष्यों का होता है। 'राजस' गुण आक्रामक, वासनात्मक एवं क्रियाशील मनुष्यों का होता है। यह प्रमुखतः राजाओं, योद्धाओं एवं व्यापारियों का होता है। तमस आलसियों, अज्ञानियों एवं निष्क्रिय व्यक्तियों का गुण होता है। तमस ही वह निष्क्रियशील तत्व है जो कई बार हम स्वयं में भी महसूस करते हैं। यह उनका प्रमुख गुण है जो खाना और सोने के लिए ही जीते हैं।

Content: कृष्ण विस्तार से इन गुणों की व्याख्या इसलिए करते हैं जिससे हम समझ सकें कि हमारे अंदर कैसे यह कार्य करते हैं और कब-कब किसका प्रभाव रहता है। जगतगुरु कृष्ण के इन शब्दों को यदि हम समझ सकें तो हमें ज्ञात हो जाएगा कि हम कैसे कोई काम करते हैं या कोई प्रतिक्रिया देते हैं। इस समझ के साथ हम दूसरे स्तर और बेहतर गुण की ओर जाने का प्रयास कर सकते हैं।

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Content: जब हम कोई वस्तु पाना चाहते हैं या किसी उपक्रम को पूरा करना चाहते हैं तो हम सब राजस गुण, से प्रभावित रहते हैं, लेकिन यदि आक्रामक रूप से बिना लालच या भय के, क्रोध इत्यादि से निरासक्त होकर काम कर सकते हैं तो हम सात्विक गुण के प्रभाव में काम करते हैं, यद्यपि सही रूप से हम राजस गुण से प्रभावित लग सकते हैं। कृष्ण के अनुसार सात्विक व्यक्ति वह होता है वे समग्र को, सामूहिक चेतना को, संपूर्णता को हिस्सों में देख सकता है। वह जानता है कि वह अकेला नहीं है, एक कटा हुआ वृक्ष नहीं है, वरन् इस ब्रह्मांड में सभी से अदृट रूप से जुड़ा है। वह कॉस्मिक ऊर्जा के जुड़ाव को भलीभांति समझता है। सात्विक व्यक्ति कभी आत्म-केंद्रित नहीं होता। वह जानता है कि उसकी जिजीविषा का भाव या 'मैं' और 'मेरे' का भाव निरर्थक है। उसके सारे कर्म निःस्वार्थ और निष्काम भाव से होते हैं; वह न तो प्रक्रिया से आसक्त होता है न उसके फल से; उसे न सफलता की परवाह होती है, न असफलता की। उसके किसी कर्म में 'मैं' और 'मेरे' का भाव होता ही नहीं है। सात्विक अवस्था में पहुंचना कोई मुश्किल काम नहीं है। यह सच है कि हमेशा आप उस अवस्था में नहीं रह पाएंगे, पर एक बार वहाँ पहुंचकर जो मुक्ति की अनुभूति होगी वह बार-बार आपको प्रेरित करेगी कि इसी अवस्था में पहुंचे। सात्विक अवस्था में विगत-आगत एक भ्रम मात्र लगते हैं। उनका कोई अस्तित्व ही नहीं होता। विगत तो गया - कभी न वापस लौटने को। तो चिंता क्या? भविष्य या आगत तो एक छलावा-सा है। आपके पास तो कार्यशील होने के लिए केवल वर्तमान ही है, क्योंकि वर्तमान क्षण ही भविष्य का निर्धारिक होता है। यदि आप वर्तमान क्षण पर केंद्रित रहे तो आपकी जागरुकता कई गुना बढ़ जाती है और आप अपेक्षाओं एवं आसक्तियों से भी त्राण पाते हैं। आप वास्तविकता के प्रति अपना प्रतिसाद देते हैं तब आप सत्व गुण में रहते हैं। आप राजस गुण के प्रभाव में होते हैं जब आप 'मेरे' और 'तेरे' में भेद करते हैं। वास्तव में भेद तो कोई है ही नहीं। यह तो आपका अहं भाव, मन और संस्कार हैं जो यह भेद उत्पन्न करते हैं स्वयं और दूसरों में, पर राजस व्यक्ति सदा फल की प्राप्ति को लालायित रहता है। वह स्वार्थी, आक्रामक एवं अधीर रहता है। भविष्य उसके अह्म को आहत करता है। एक राजसिक व्यक्ति कभी सुखी नहीं रह सकता। आप सभी में राजस का प्रभाव है। आधुनिक युग में इसी का बोलबाला होता है। चाहे कोई धनी हो या निर्धन, बुद्धिमान हो या मूर्ख, पढ़ा-लिखा हो या निरक्षर, हर कोई दूसरे व्यक्ति से अपनी तुलना करता रहता है और वह सब कुछ चाहता है जो दूसरे के पास

Content: है। जब तक आपकी कामनाएं आपका जीवन संचालित करती रहेंगी और आप जो हैं, उससे संतुष्ट नहीं होंगे, आप राजस में ही रहेंगे। राजस आपका क्षरण करता है। यह आपकी आत्मा का भक्षण करता है। इसके भय और लालच की कोई सीमा नहीं होती। राजस के यही संचालक तत्व हैं। राजस यानी वह पाने का निरंतर प्रयास करना जो आपके पास नहीं है, जो प्राप्त है उससे संतुष्ट न रहना और अपने आपसे, अपने वर्तमान से सदा असंतुष्ट रहना। आप या तो सदा आगत में रहते हैं - इन कल्पनाओं में कि आप आगे क्या हो जाएंगे और क्या-क्या पा लेंगे या सदा विगत में कि कैसे आप तब और अच्छा काम कर सकते थे। राजस का मतलब है कपोल कल्पनाओं के जगत में विचरण करना। तमस में तो व्यक्ति सतत् भ्रम में रहता है। अपने पुराने विश्वासों और स्थितियों में पदे रहना, बिना उनकी सही-गलत होने की प्रामाणिकता सिद्ध किए या उनकी उपादेयता को परखे 'लकीर के फकीर' रहना। धर्म के कट्टर अनुयायी एवं लुटेरों के गिरोह इसी तमस में सदा पदे रहते हैं। वस्तुतः उनमें कोई फर्क नहीं सिर्फ उनके लक्ष्य फर्क होते हैं, रास्ता नहीं। दोनों ही कट्टर, दकियानूस, हिसक एवं नितांत स्वार्थी होते हैं। उनके लिए अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आपराधिक रास्ता भी चुनना संभव है। वे किसी भी निम्न स्तर तक उतर सकते हैं। वैसे तमस का असली अर्थ सिर्फ निष्क्रियता, आलस्य या टालमटूली का भाव नहीं। ये सब तो होते ही हैं, पर इसमें बिना सोचे-समझे काम करना- बिना अपनी भूमिका समझे, भी शामिल है। ये पूरा परिदृश्य समझे बिना ही उस क्षेत्र में घुस पड़ते हैं। इनका अह्म इतना विशाल होता है कि ये स्वयं को ही सब कुछ - समग्र समझ लेते हैं कि सिवाय उनके किसी और का कोई महत्व नहीं होता। हिटलर, जिसने लाखों व्यक्तियों को इसलिए मार दिया कि उन्हें वह निमन कोटि का समझता था, बहुत गहरे तमस में जकड़ा था। तमस तो पशु-वृत्ति की भी पराकाष्ठा है जो प्रकृति के नियमों का भी उल्लंघन करता रहता है; यद्यपि सिर्फ मनुष्य ही तामसिक हो सकते हैं। पशु तो तमस में हो ही नहीं सकता जो प्रकृति की नैसर्गिक बुद्धिमत्ता द्वारा अपना मार्ग निर्देशन प्राप्त करता रहता है।

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Chapter Number: 18

Chapter Name: जीवन का अर्थ

Content: 18.29 धनंजय! अब ते बुद्धि और धृति का भी गुण के अनुसार तीन प्रकार का भेद संपूर्णता से, विभागपूर्वक मेरे द्वारा कहा हुआ सुन। 18.30 हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्ति मार्ग और निवृत्ति मार्ग को, कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय तथा बंधन और मोक्ष को यथार्थ (रूप से) जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है। 18.31 पार्थ! जिस बुद्धि के द्वारा मनुष्य धर्म और अधर्म तथा कर्तव्य और अकर्त्तव्य को भी यथार्थ नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है। 18.32 और पार्थ! जो तमो गुणों से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को भी 'यह धर्म है' - ऐसा मान लेती है और इसी प्रकार अन्य संपूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है। 18.33 पार्थ! जिस अव्यभिचारिणी धारण शक्ति से मनुष्य ध्यान-योग द्वारा मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं को धारण करता है, वह सात्त्विकी है। 18.34 और पार्थ! फल की इच्छा वाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा अत्यंत आसक्त स धर्म, अर्थ और कर्मों को धारण किए रहता है, वह धारण शक्ति राजसी है। 18.35 पार्थ! दुष्ट बुद्धि वाला मनुष्य जिस धारण शक्ति द्वारा निद्रा, भय, चिंता और विषाद तथा उन्मत्तता को भी नहीं छोड़ता, वह धारण शक्ति तामसी है।

Content: कृष्ण अब पुरुषार्थ का उल्लेख करते हैं जिसको जीवन का अर्थ भी कह सकते हैं। चार पुरुषार्थ हैं - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इनको सादा भाषा में सही कार्य, धन-संपत्ति, कामनाओं की पूर्ति एवं मुक्ति कहा जा सकता है। जीवन के ये चार अर्थ है यानी वह जिसकी पूर्ति के लिए सब मानव प्रयत्न करते हैं। मैं इनको जीवन का उद्देश्य नहीं कह सकता, क्योंकि जीवन का कोई उद्देश्य नहीं होता, क्योंकि एक बार जीवन का उद्देश्य निश्चित किया तो वह लक्ष्य बन जाता है तथा आसक्ति एवं अपेक्षा का दौर शुरू हो जाता है।

Content: जीवन वस्तुतः एक लक्ष्यहीन मार्ग है। यदि लक्ष्य निर्धारित हुआ तो हम जल्दबाजी करने लगते हैं, अधीर हो जाते हैं। भविष्य एक दबाव देने वाला तत्व हो जाता है, उदाहरण के लिए मान लें कि हम न्यूयॉर्क से वाशिंगटन जाना है। जैसे ही वाशिंगटन हमारा लक्ष्य हुआ तो अगला सवाल हमारे मन में कौंधेगा - "वहां हम कब तक पहुंचेंगे?" और इसी ख्याल में उलझे हम रास्ते का आनंद नहीं ले पाएंगे। फिर यात्रा एक सिरदर्दी हो जाती है - हमें व्याकुलता रहती है कि कब यह खत्म हो और हम लक्ष्य तक पहुंचें। जीवन में कोई लक्ष्य निर्धारित न करें। हर यात्रा का पूर्ण आनंद लें। जिनसे रास्ते में आपकी मुलाकात हो, जो अनुभव हो, जो वस्तुएं दिखें या जो आप प्राप्त करें। उनका आनंद लें बिना किसी लालच के। तब हर यात्रा इतनी आनंददायक लगने लगेगी कि जहां भी आप पहुंचेंगे वहां सही लक्ष्य हो होगा।

Content: जो लोग जीवन के साथ उद्देश्य बांध लेते हैं, वे अमूमन कष्ट पाते हैं। वे दार्शनिक जिनको कोई और काम नहीं है, जीवन के विभिन्न पर छूटे उद्देश्य गढ़ते रहते हैं। जीवन को वैसे ही भोगो जैसे आप इसको प्राप्त करते हैं। तब ही इसका हर लम्हा हम भोग पाएंगे; जी पाएंगे। तब हम ईश्वर की तरह सदा वर्तमान में रहते हैं। 'पुरुषार्थ' जीवन को चार अर्थ (मानी) प्रदान करता है। बुद्ध ने इसी को मध्य 'धर्म' यानी सही एवं शुभ व्यवहार, नेकी का रास्ता। बुद्ध ने इसी को मध्य मार्ग के रूप में प्रचारित किया था। 'अर्थ' यानी वह साजो-सामान जो हम यात्रा के दौरान प्राप्त कर लेते हैं - यानी उन सांसारिक जरूरतों की पूर्ति जो जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक हैं। 'काम' यानी इंद्रियों का तुष्टिकरण; वह आनंद जो हम रास्ते में इंद्रियों के माध्यम से प्राप्त करते हैं। इसकी आवश्यकता यदि महसूस हो तो विचलित होने की जरूरत नहीं है, पर इनमें इतना न डूब जाएं कि यात्रा हो एक रुक जाए और

Content: की जरूरत नहीं है, पर इनमें इतना न डूब जाएं कि यात्रा हो एक रुक जाए और आनंद में रुकावट आने लगे। मोक्ष अर्थात् मुक्ति। यही जीवन का चरम अर्थ है। इसमें शामिल है अपेक्षाओं, कामनाओं, लालच और भय तथा इच्छाओं की आसक्ति से मुक्ति। यह समझ कि कर्म फल की इच्छा मुक्त और निरासक्त भाव से जीवन-यापन करना, आनंद का स्रोत होता है। यहां कृष्ण जीवन को सार्थक और सही रूप से जीने का सार बताते हैं। वे कहते हैं कि सत्व गुण हमें वह अवस्था प्रदान करता है जब हम सही-गलत की पहचान स्पष्टता से कर सकते हैं और जो कुछ भी हम अपने शरीर, मन एवं इंद्रियों के माध्यम से करते हैं, वह एक प्रयास होता है सारी कामनाओं की आसक्ति से मुक्ति पाने का जिससे हम समझ सकें कि हम दिव्य हैं, ईश्वर के ही एक रूप हैं।

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Chapter Number: 18

Content: 18.36, 37 हे भरतश्रेष्ठ! अब सुख के तीन प्रकार मुझसे सुन। जिस सुख में साधक पुरुष भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता हुआ दुःखों के अंत को प्राप्त हो जाता है - ऐसा सुख प्रारंभ में विष तुल्य, किन्तु परिणाम में अमृत के समान प्रतीत होता है, वह परमात्मा विषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होने वाला सुख सात्त्विक सुख कहा गया है।

Chapter Number: 18

Content: 18.38 और जो सुख, विषय और इंद्रिय के संयोग से उत्पन्न होता है, वह यद्यपि भोगकाल में अमृत जैसा किन्तु परिणाम में विष के समान भासता है, वह सुख राजस कहा गया है।

Chapter Number: 18

Content: 18.39 तथा जो सुख भोगकाल में और परिणाम में भी आत्मा को मोहने वाला है–वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न हुआ सुख, तमस कहा गया है।

Chapter Number: 18

Content: 18.40 पृथ्वी या आकाश में अथवा देवताओं तथा इनके सिवाय कहीं भी ऐसा कोई तत्व नहीं है जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से रहित हो।

Content: एक लघु कथा

Content: एक तीन साल के बच्चे ने अपनी गर्भवती बुआ से पूछा - 'आपका पेट इतना बड़ा क्यों है?'

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Chapter Number: 18

Content: 18.41 इसलिए हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों को भी कर्म, स्वभाव से उत्पन्न हुए गुणों के आधार पर ही विभाजित किया गया है।

Chapter Number: 18

Content: 18.42 अंतःकरण निग्रह करना; इंद्रियों का दमन करना; धर्म पालन के लिए कष्ट सहना; बाहर-भीतर शुद्ध रहना; दूसरों के अपराधों को क्षमा करना; मन, इंद्रिय और शरीर को स्वच्छ रखना; शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना; वेद-शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा के तत्व का अनुभव करना - ये सब ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।

Chapter Number: 18

Content: 18.43 शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध से न भागना, दान देना और स्वाभिमान - ये सब क्षत्रियों के स्वाभाविक कर्म हैं।

Chapter Number: 18

Content: 18.44 खेती, गौ पालन और क्रय-विक्रय में सत्य व्यवहार - ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं तथा सब वर्णों की सेवा करना, शूद्र का स्वाभाविक कर्म है।

Chapter Number: 18

Content: 18.45 अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवान् प्राप्ति रूप सिद्धि को प्राप्त होता है। किस प्रकार अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजाकरके मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है।

Chapter Number: 18

Content: 18.46 जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजाकरके मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है।

Chapter Number: 18

Content: 18.47 अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से अपना गुण रहित धर्म भी श्रेष्ठ है; क्योंकि स्वभाव से नियत किए गए

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Chapter Number: 18

Content: स्वधर्म रूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता। 18.48 (अतएव हे कुंती पुत्र!) अर्जुन! दोषयुक्त होने पर भी अपने सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि धुएँ से अग्नि की भाँति सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से ढके हुए हैं।

Content: कृष्ण कहते हैं - “श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्” अर्थात असंपूर्णता से किया गया अपना सहज कर्म, दूसरे के संपन्नता से किए गए कर्म से बेहतर है। वैसे यह संभव है कि एक व्यक्ति दूसरे का काम ज्यादा अच्छी तरह कर दे। विद्वान होने के कारण ब्राह्मण, वैश्य के लिए जरूरी गुणा-धर्मा ज्यादा दक्षता से कर सकता है - पर वह न तो दिल से, न दिमाग से व्यापारी बनने के योग्य होता है। गुरुकुल पद्धति में गुरु के साथ बच्चे को भी अपना व्यवसाय प्राप्त करने की छूट थी। बच्चा अपनी रुचि के अनुसार निर्णय लेने को स्वतंत्र था। समय के साथ इस चुनाव का वर्गीकरण और प्रशिक्षण की सुविधा में बिगाड़ आ गया। जो ब्राह्मण थे वे चाहते थे कि उनकी संताने ब्राह्मण ही रहें...। यह वर्ण व्यवस्था जिसमें प्रारंभ में शिक्षक-प्रशिक्षण चुनने की सुविधा रुचि के अनुसार थी। सामाजिक प्राथमिकताओं के कारण जन्म आधारित हो गई।

Content: हम इस वर्ण व्यवस्था की भर्त्सना करें, उससे पहले हमें यह समझ लेना चाहिए कि इस प्रकार का वर्गीकरण हर समाज में था। वैदिक भारत में यह वर्गीकरण बुद्धिमत्ता और सहज जन्मजात प्रतिभा के अनुसार होता था। आज के समाज में यह धन-सम्पत्ति और सत्ता के अनुसार होने लगा है। कौन-सा बेहतर है? यदि ब्राह्मण वर्ग न होता तो रूढ़ियों से प्राप्त हमारा ज्ञान असुरक्षित हो जाता और हज़ारों साल पहले ही गायब हो चुका होता। जो लोग इस व्यवस्था की भर्त्सना करते हैं वे धन और सत्ता के कारण ऐसा करते हैं, किसी स्वार्थी कारण को वजह से नहीं करते। वे कोई वैकल्पिक व्यवस्था भी नहीं सुझाते, जिससे हम अपने पारंपरिक ज्ञान को सुरक्षित रख सकें।

Content: मैं तो ब्राह्मण नहीं हूँ। मेरे पास कई ब्राह्मण आकर यह बता चुके हैं कि उनके ब्राह्मण कहे जाने से उन्हें कितनी असुविधा और कष्ट होता है। वे पढ़े-लिखे लोग हैं। मैंने उनसे कहा - “अपनी संस्कृति और परंपराओं पर उन्हें गर्व होना चाहिए। यदि ब्राह्मण न होते तो बहुत पहले ही हमारी वैदिक परंपरा मर चुकी होती।”

Content: वह प्रशंसा उन ब्राह्मणों के लिए है जो अपनी विद्वत्ता के प्रति पूरी तरह ईमानदार रहे हैं। जो धन-सुविधा के लोभ में पड़कर भ्रष्ट हो चुके हैं, उन्हें ब्राह्मण कहलाने का भी कोई अधिकार नहीं है। यही वह स्थिति है जिसमें वर्ण व्यवस्था असफल हो जाती है। बज़ाय एक वैज्ञानिक एवं कुशल पद्धति के यह बिगड़कर सत्ता की दलाली के तंत्र में तबदील हो गई है। हमें इसे ठीक करना है। जो अपनी परंपरा के लिए सच्चे और बद्ध हैं उन्हें सम्मान नहीं पाते। सिर्फ वे जो अपनी विद्वत्ता का दुरुपयोग कर पंडित और वैश्य हो गए हैं, धन, सुविधा, सत्ता और सम्मान पाने लगे हैं। हमारे समाज एवं इसके सामाजिक ढांचे के साथ यह समस्या है कि यह कुछ खास लोगों तक सीमित हो गया है। आज पश्चिम में और भारत में भी कई जगह पर हाल यह है कि यदि हमारे पास धन या सत्ता है, तभी हमारा सम्मान होता है। क्या कोई इस व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह करता है? नहीं। हम कैसे किसी समाज को उन्नत और प्रगतिशील मान सकते हैं जिसकी सम्मान की एक मात्र कसौटी धनाढ्य होना हो।

Content: इस तर्क के अनुसार यदि मैं सिवाय भारत के यदि कहीं और पैदा हुआ होता तो मेरी भर्त्सना ही होती। लगभग एक दशक तक तो मैं बेघर रहा था। नौ साल तक बिना पैसे के मैं भारत-भर में इधर-उधर घूमता रहा, लेकिन लोगों ने मेरा स्वागत किया तथा मुझे सवारी, भोजन एवं आवास की सुविधाएँ भी प्रदान की। पश्चिम में होता तो मैं या तो जेल में डाल दिया जाता या किसी शरण-स्थल में अपने दिन काट रहा होता। अमेरिका में यदि कोई बेघर व्यक्ति आपकी कार के समीप आता है तो आपकी सहज प्रतिक्रिया होती है अपनी खिड़कियाँ और दरवाजे बंद कर लेंगे। वहाँ लोग इनसे भय खाते हैं, पर भारत में क्या किसी भिखारी से कोई डरता है? कोई भिखारी भी सामने आकर खड़ा हो सकता है। क्यों? यहाँ पर सर्व-स्वीकृति का भाव है। पश्चिम में लोग कहते हैं कि यह स्वीकृति कमजोरी की निशानी है, हिंसा नहीं। सामाजिक कदरें कितनी विचित्र हो गई हैं? आप सिर्फ उसी का सम्मान करते हैं जिससे आप डरते हैं?

Content: जब तक हमारे विचारों में मूलभूत परिवर्तन नहीं आएगा हम विकसित नहीं हो सकते। अब यह नौबत आ गई है कि ऋणात्मक गुण ही सम्मान के हकदार माने जाने लगे हैं, लेकिन हिंसा और आक्रामकता कभी भी विजयी नहीं हो सकते। करुणा और स्वीकृति ही सर्वथा विजयी रहेंगी।

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Chapter Number: 18

Chapter Name: प्रबोधन के लिए निर्देश

Content: सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धि वाला, स्पृहारहित और जीते हुए अंतःकरण वाला पुरुष सांख्य (संन्यास) योग द्वारा भी नैष्कर्म्य सिद्धि (क्रिया रहित शुद्ध सच्चिदानंद परमात्मा की प्राप्ति रूप परम सिद्धि) को प्राप्त होता है। हे कुंती पुत्र! अंतःकरण की शुद्धि रूप सिद्धि को प्राप्त हुआ मनुष्य किस प्रकार से (सच्चिदानंद) ब्रह्म को प्राप्त होता है जो ज्ञान योग की परानिष्ठा है – तू मुझसे संक्षेप में जान। विशुद्ध बुद्धि से युक्त तथा हल्का, सात्विक और नियमित भोजन करने वाला, शब्दादि विषयों का त्याग कर एकांत और शुद्ध देश (स्थान) का सेवन करने वाला, जीते हुए मन, वाणी, शरीर वाला और दृढ़ वैराग्य को भली प्रकार प्राप्त हुआ पुरुष सात्विक धारणा से अंतःकरण को वश में करके और राग-द्वेषों को नष्ट करके तथा अहंकार, बल, घमंड, काम-क्रोध और परिग्रह का त्याग करके निरंतर ध्यान योग में परायण रहने वाला, ममता रहित और शांति युक्त पुरुष (सच्चिदानंद) ब्रह्म में अभिन्न भाव से स्थित होने का पात्र होता है।

Chapter Number: 18

Content: ये श्लोक वह परम विधि का अंतिम सूत्र प्रदान करते हैं जिसके द्वारा ईश्वर (परमात्मा) के दर्शन हो सकते हैं या अंतिम सत्य प्राप्त हो सकता है। कृष्ण बताते हैं कि कैसे परम सत्य प्राप्त किया जा सकता है। अर्जुन के मन में प्रश्न भरे थे – वही शायद आप सब लोगों का भी हाल होगा। प्रश्नों का उत्स अज्ञान में होता है विवेक-बुद्धि में नहीं। ये जितनों का

Content: उत्तर चाहते हैं, उससे कहीं ज्यादा प्रश्न और उठा देते हैं, क्योंकि कोई सुनता तो है नहीं, पर भगवान का हमारे प्रति करुणा भाव उन्हें बार-बार अपने उत्तर देने को प्रेरित करता है जिससे अर्जुन पूरी बात समझ सके। जब तक हम प्रश्न – ‘क्यों?’ करते रहेंगे, हमें कभी स्पष्ट उत्तर नहीं मिल पाएगा। खासतौर पर परमात्मा के संबंध में तो प्रश्न ‘क्यों?’ की कोई प्रासंगिकता ही नहीं होती। जैसा मैं पहले स्पष्ट कर चुका हूँ, चूंकि हमारी और परमात्मा की संप्रेषण आवृत्ति में फर्क होता है, यदि हमें समझया भी जाएगा तब भी सत्य की समझ हम ग्रहण नहीं कर पाएंगे। आध्यात्मिकता एक आंतरिक विज्ञान का नाम है - इसका बाहरी विज्ञान नहीं कह सकते, और यह भी हमारा सौभाग्य ही है। बाहरी विज्ञान में हम ‘क्यों-क्यों?’ पूछते रहें - और जब उत्तर न मिले तो हम वहीं अटक जाते हैं। फिर हम अधकच्चरी थ्योरियां और सिद्धांत बना लेते हैं जो किसी को आश्वस्त नहीं कर पाते। आध्यात्मिकता का सरोकार ‘क्यों?’ से तो होता है नहीं। इसका मूल ‘प्रश्न होता है - ‘कैसे?’ ‘क्यों?’ तक की उपज होती है, जबकि ‘कैसे?’ वास्तविकता की ओर इशारा करता है। जहां शास्त्र ‘क्यों?’ का उत्तर देते हैं, ‘सूत्र’ ‘कैसे?’ का जवाब देते हैं। कभी-कभी जगत गुरु (कृष्ण) ‘शास्त्र’ चर्चा के मध्य एकाध ‘सूत्र’ भी बता देते हैं जिससे अर्जुन सत्य को ग्रहण करके शांत रह सके।

Content: व कहते हैं - “दिमाग को संतुलित और इंद्रियों को नियंत्रण में रखो।” क्या आप ऐसा भरे-चौहारे पर कर सकते हैं? नहीं न। इसलिए वे कहते हैं कि एकांत में जाकर स्वयं को सबसे काट लें। कम खाओ जिससे कोई व्यवधान न पड़े। ध्यान करो और इंद्रियों का बाहरी विश्व से संबंध ही काट दो। वस्तुतः यह ध्यान लगाने के स्पष्ट निर्देश हैं। जो संभावित व्यवधान हैं उनसे स्वयं को दूर कर दो। यदि आप फोन का इंतज़ार कर रहे हैं या किसी मेहमान की प्रतीक्षा में हैं तो ध्यान करना बेमानी है। इसके लिए तो एक समय निश्चित करें जब आप बिल्कुल अकेले हों और कोई व्यवधान उपस्थित न हो सके। इंद्रिय जन्य व्यवधानों को कम करने के और भी आसान तरीके हैं। सिर्फ आंख बंद कर लेना काफी नहीं है। आपकी आंखें बंद होकर भी गतिमान रहेंगी और आपके अंदर का टेलीविजन चालू रहेगा। समझिये कि आंखें पत्थर की हो गई हैं फिर आंखों को भी निश्चल करना पड़ेगा। अपनी जीभ को ऊपर के तालू तक ले जाकर रखें, क्योंकि यदि जीभ गतिमान रहेगी तो कुछ बोलने की इच्छा रहेगी और मानसिक चित्र देखना मुश्किल हो जाएगा। ये तरीके – आंखों को स्थिर रखना और जीभ को निश्चल

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Chapter Number: 18

Chapter Name: तुम अपनी नियति के स्वामी नहीं हो

Content: 18.54 वह (सच्चिदानंद) ब्रह्म में एकीभाव से स्थित प्रसन्न मन वाला योग, न तो (किसी के लिए) शोक करता है और न किसी की आकांक्षा ही करता है। ऐसा समस्त प्राणियों में समभाव रखने वाला योगी मेरी पराभक्ति को प्राप्त हो जाता है।

Chapter Number: 18

Chapter Name: तुम अपनी नियति के स्वामी नहीं हो

Content: 18.55 उस पराभक्ति द्वारा वह मुझ (परमात्मा) को - मैं जो भी हूँ और जितना भी हूँ, ठीक वैसा ही - तत्त्वतः जान लेता है तथा उस भक्ति से मुझे तत्त्वतः जानकर तत्काल ही मुझमें प्रविष्ट हो जाता है।

Chapter Number: 18

Chapter Name: तुम अपनी नियति के स्वामी नहीं हो

Content: 18.56 मेरे परायण हुआ कर्मयोगी तो सम्पूर्ण कर्मों को- सदा करता हुआ मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परम पद को प्राप्त हो जाता है।

Chapter Number: 18

Chapter Name: तुम अपनी नियति के स्वामी नहीं हो

Content: 18.57 सब कर्मों को मन से तू मुझमें अर्पण करके तथा समत्व बुद्धि रूप योग को अवलम्बन बनाकर मेरे परायण तथा मुझमें निरंतर चित्त (लगाने) वाला हो।

Chapter Number: 18

Chapter Name: तुम अपनी नियति के स्वामी नहीं हो

Content: 18.58 इस प्रकार तू मुझमें निरंतर चित्त (लगाने) वाला होकर मेरी कृपा से (जन्म-मृत्यु आदि) सब संकटों से अनायास ही तर जाएगा और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को न सुनेगा (अर्थात तू मेरा कहा न मानेगा) तो नष्ट हो जाएगा।

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Content: हाल ही में मैंने यह अवधारणा अपने कुछ भक्तों के सामने रखी थी। जब हम अपनी इस सहज वृत्ति को विराम दे देते हैं जो लगातार हमारी रक्षा में लगी रहती है तो इस अंतराल में घटनाओं के घटित होने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है। कृष्ण कहते हैं कि यदि हम सांसारिक गतिविधियों में लगे भी रहें, उनके नाते, हम उनके संरक्षण में रहेंगे और शाश्वत चेतना को भी महसूस करेंगे। यहाँ शब्द 'रक्षा' सही नहीं है, क्योंकि कृष्ण बाहरी और आंतरिक दोनों विश्वों से हमारे संपूर्ण बचाव की बात कर रहे हैं। वस्तुतः जो मनुष्य संपूर्ण समर्पण कर देता है तो 'वह' (ईश्वर) से सर्वोत्तम अनुभव प्राप्त करता है। हम जब अपने आपको 'बाहर' कर देते हैं तो 'वह' (ईश्वर) हमारे अंदर पहुंच जाता है।

Content: घटित होने लगते हैं। तब स्वतः ही कृष्ण की उर्जा आपकी सुरक्षा में तैनात हो जाती है। लेकिन आप स्वयं को यदि इतने अक्लमंद समझते हैं कि अपने मन के अनुसार अपना रास्ता चुन सकते हैं तब आप परेशानियों को न्यौता देते हैं। कृष्ण कहते हैं कि यदि अपने मन की ओर इंद्रियों की सुनेंगे तो आप नष्ट हो जाएंगे, लेकिन यदि उनकी सुनेंगे तो बचे ही नहीं रहेंगे, वरन् प्रसन्न भी रहेंगे।

Content: समर्पण को समझें दो स्थितियां समझ लें - एक अपने को सुनें और दूसरे अपने मन को न सुनें। पहली बात अपने मन की बात सुनने से संबंधित है तो दूसरी उसके न सुनने से। कई लोगों के लिए किसी अन्य मानव की स्वयं से बेहतर समझना एक मुद्दा हो सकता है। सुनने की बात अलग, यहां तो उसके सामने संपूर्ण समर्पण की बात है। वे समझते हैं कि किसी के सामने साष्टांग होना एक असभ्य क्रिया है और स्वयं का अपमान करने का समयक्ष है।

Content: जब मैं किसी को चंगा करता हूं तो मैं ठीक हुए भाग को छूकर देखता हूं - यथा यदि पैर ठीक हुआ है तो मैं उस व्यक्ति के पैरों का स्पर्श करता हूं। किसी ने मुझसे पूछा - "आप किसी का चरण स्पर्श कैसे कर सकते हैं? आप अपने आपको इतना नीचे क्यों गिराते हैं?"

Content: मैंने कहा - "जब मैं किसी के पांव छूता हूं तो मैं उन्हें अपने स्तर तक उठाता हूं। जब आप लोग मेरे पांवों पर गिरते हैं तो अपने अहं का समर्पण करते हैं।"

Content: एक लघु कथा एक दिन विष्णु अपनी शोश्रैय्या पर आराम फरमा रहे थे और उनकी पत्नी लक्ष्मी जी, उनकी 'पाद-सेवा' (पैर दबाना) कर रही थीं। उस लोक में शायद पत्नियां वाकई सेवा करती थीं। अचानक विष्णु ने अपने वाहन 'गरूड़' को बुलाया। वह आया कुछ क़दम चला, फिर रुककर वापिस आ गया। लक्ष्मी जी को आश्चर्य हुआ। "ये क्या?" उन्होंने विष्णु से पूछा। विष्णु ने बताया कि उन्होंने एक आदमी को देखा जो उनके एक ध्यान-मग्न भक्त पर पत्थर मार रहा था। गरूड़ तुरंत आगे चला भक्त की रक्षा करने के लिए, पर तभी देखा कि भक्त ने आंखें खोल ली हैं और एक पत्थर उठाकर अपनी सुरक्षा करने को तैयार है। जब विष्णु ने देखा कि भक्त अपनी रक्षा स्वयं कर सकता है तो उन्होंने गरूड़ को रोक दिया।

Content: इसी प्रकार जब आप अपनी धन-संपत्ति की स्वयं सुरक्षा करते हैं तो ईश्वर नहीं करते, वह पीछे हट जाता है। सुरक्षा का मतलब यह नहीं कि आप अपना घर बंदकर बैठ जाएं। इसका मतलब है कि आप अपनी जिजीविषा को त्याग दें। यही जीते रहने की अनवरत चाह है जो आपको हर क्षण मारती रहती है। जब हम इस भाव को त्याग देते हैं तो यह कृष्ण की जिम्मेदारी हो जाती है। बौद्धिक रूप से आपको यह बात समझ में नहीं आएगी। आप सोचेंगे - "हजारों साल पहले किसी का किया हुआ वादा आज भी मेरी सुरक्षा कैसे कर सकता है?"

Content: आप समझते हैं कि अस्तित्ववान या जीते रहने के लिए जिजीविषा होना अपरिहार्य है, पर आप इस जिजीविषा की व्यर्थता समझ सकते हैं - जब आप संपूर्ण समर्पण कर दें तभी आपको स्वयं समझ में आएगा कि आप बगैर जिजीविषा और परिग्रह के भी जीवित रह सकते हैं। समर्पण के साथ एक अंतराल बनता है जिसमें घटनाओं या संयोग को ऐसी शक्ति मिलती है कि वह

Content: जब आप किसी के पांवों पर पड़ते हैं तो उसको अपने अहं का समर्पण करते हैं। यह आपके लिए अच्छा है। इसमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आप किसके सामने समर्पण करते हैं - मानव के या किसी पत्थर के। पर समर्पण से आपका अहंम विगलित होता है जो आपका आध्यात्मिक रूप से उत्थान करता है। यही संपूर्ण सत्य है। आपको किसी प्रबुद्ध स्वामी के सामने ही समर्पण करने की कोई ज़रूरत नहीं है, आप किसी के सामने भी ऐसा कर सकते हैं। ज़्यादा ख़ोज़बीन की दरकार नहीं है अर्थात् महत्व है झुकने का, समर्पण करने का।

Content: किसी ने मुझसे पूछा - "समर्पण से आपका मतलब क्या है?" समर्पण तब होता है जब आप किसी ऐसे व्यक्ति को पा लें जिसको आप बिना किसी शर्त प्रेम कर सकते हैं। तब कोई समय नहीं होती, क्योंकि ज़ाहिर है आपको उस व्यक्ति से असीम प्रेम होगा। आपकी पहचान उस व्यक्ति के व्यक्तित्व में विलीन हो जाती है।

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Chapter Number: 18

Chapter Name: ऊर्जा दर्शन

Content: यदि तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मान रहा है कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा' तो यह तेरा निश्चय मिथ्या है, क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे बलात् (जबर्दस्ती) युद्ध में लगा देगा। और कौन्तेय! जिस कर्म को तू मोह के वशीभूत होकर नहीं करना चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बंधा हुआ परवश होकर करेगा।

Chapter Number: 18

Chapter Name: ऊर्जा दर्शन

Content: अर्जुन! शरीर रूपी यंत्र में आरूढ़ हुए संपूर्ण प्राणियों को, अंतयामी परमेश्वर अपनी माया से उन कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ (घुमाता हुआ) सब प्राणियों के हृदय में स्थित रहता है।

Chapter Number: 18

Chapter Name: ऊर्जा दर्शन

Content: इसलिए हे भारत! सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही अनन्य शरण को प्राप्त हो। उस परमात्मा की कृपा से ही परम शांति को और सनातन परमधाम को तू प्राप्त होगा।

Chapter Number: 18

Chapter Name: ऊर्जा दर्शन

Content: कृष्ण पहले अर्जुन को एक अंतिम चेतावनी देते हैं - "अर्जुन! तू चाहे या न चाहे, युद्ध तो तुझे करना ही पड़ेगा।" आपकी (व्यक्ति की) व्यवहार बुद्धि से संचालित अहं भाव आपसे कहता है कि आपको लड़ना नहीं चाहिए, पर आपको अपने सतीही ज्ञान के कारण, आप इस भ्रम में रहते हैं कि दोस्तों, रिश्तेदारों और शिक्षकों से युद्ध करना ठीक नहीं है (यह अर्जुन की दुविधा है), पर आप अपनी सहज प्रकृति भूल जाते हैं। आपका अनुकूलन बतौर क्षत्रिय योद्धा के ऐसा है कि आपको लड़ना ही पड़ेगा। आप ईश्वर के हाथों की कठपुतली हैं। आप लड़ेंगे।

Chapter Number: 18

Chapter Name: ऊर्जा दर्शन

Content: इससे ज़्यादा स्पष्ट चेतावनी नहीं हो सकती। प्रकृति का नियम आपको अपनी अपूर्ण इच्छाएं पूर्ण करने के लिए बाध्य करेगा। हमारी पूर्व अनुकूलन की स्थिति इन इच्छाओं को उत्पन्न करती रहती है। चाहे वे इच्छाएं आपके अंचेतन

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Chapter Number: 18

Chapter Name: मुझको समर्पण कर दे

Content: 18.63 इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुझसे कह दिया। अब तू इस रहस्ययुक्त (गहरे) ज्ञान पर भलीभांति विचार कर फिर जैसा तू चाहता है वैसा ही कर। 18.64 संपूर्ण गोपनीय रहस्यों में भी अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचनों को तू फिर सुन। तू मेरा अतिशय प्रिय है इसलिए मैं परम हितकारक वचन तुझसे कहूंगा। 18.65 तू मुझमें मन (स्थित करने) वाला हो; मेरा भक्त बन जा। मेरा पूजन करने वाला बन और मुझें प्रणाम कर। ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय है। 18.66 संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें (समर्पित) कर तू केवल एक मुझ (सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापार) परमेश्वर की ही शरण आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा। शोक मत कर।

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Chapter Number: 18

Content: 18.67 तुझे यह (गीता रूप रहस्यमय) उपदेश किसी काल में भी न तो तप रहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्ति रहित से और न सुनने की इच्छा न रखने वाले से ही कहना चाहिए तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है (अर्थात् जो मुझमें दोष देखता है) उससे भी नहीं कहना चाहिए।

Chapter Number: 18

Content: 18.68 जो पुरुष मुझमें परम प्रेम भाव रखकर इस (रहस्ययुक्त गीता शास्त्र) को मेरे भक्तों से कहेगा वह मुझको ही प्राप्त होगा – इसमें कोई संदेह नहीं है।

Chapter Number: 18

Content: 18.69 मेरा उससे बढ़कर प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई नहीं है; तथा मेरा पृथ्वीभर में उससे बढ़कर प्रिय कोई दूसरा भविष्य में होगा भी नहीं।

Chapter Number: 18

Content: 18.70 तथा जो पुरुष हम दोनों के इस धर्ममय संवाद रूप (गीता शास्त्र) को पढ़ेगा उसके द्वारा मैं ज्ञान यज्ञ से पूजित होऊंगा – ऐसा मेरा मत है (या मानना है)।

Chapter Number: 18

Content: 18.71 तथा जो पुरुष श्रद्धा एवं दोष रहित दृष्टि से इस (गीता शास्त्र) का श्रवण भी करेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा।

Chapter Number: 18

Content: 18.72 हे पार्थ! क्या मेरे द्वारा कहे गए इस उपदेश को तूने एकाग्र चित्त से श्रवण किया है? और धनंजय! क्या तेरा अज्ञान जनित मोह नष्ट हो गया?

Content: कृष्ण द्वारा कहे गए ये शब्द सिर्फ अर्जुन को ही नहीं वरन् समस्त मानव जाति के लिए संबोधित हैं। वे कहते हैं कि हमें इनको पढ़ना, सुनना और समझना चाहिए, - यह संवाद जो कृष्ण और अर्जुन या 'नारायण' और 'नर' के बीच क़ायम हुआ है। इसके अलावा और कुछ भी पढ़ने-पढ़ाने या समझने-समझाने

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Content: के योग्य नहीं और कुछ भी ज़रूरी नहीं है, क्योंकि जो कुछ भी हमें चाहिए वह सब इसी गीता शास्त्र में उपलब्ध है। वे कहते हैं कि जो मेरे लिए गहरी श्रद्धा रखे वही इसे पढ़े। 'मैंने यहाँ बता दिया है कि क्या सबके लिए बेहद लाभकारी ज्ञान है। यह बेहद गहरा रहस्य है और बताता है कि कैसे जीवन-यापन किया जाए तथा मुझ तक पहुँचा जाए।' वह जो सब कुछ त्यागकर; अपने मन को निर्विचार कर इसको समझता है और मुझ पर ध्यान केंद्रित रखता है, वह निःसंदेह मुझ तक पहुंचेगा। यह कृष्ण का वादा है (हम सबसे)। उन्होंने अपनी करुणा के वशीभूत होकर समस्त जगत पर अपनी कृपा बरसाई है। अर्जुन पर अपनी कृपा बरसाई और उसे अपने में ही लीन कर लिया, क्योंकि वह भी कृष्ण ही हो गया। यहाँ चेतना समस्त विश्व के लिए भी उपलब्ध है। वे घोषणा करते हैं कि यह पवित्र संवाद जो कोई भी पढ़े, सुने या समझेगा, वह उनकी शाश्वत चेतना से एकाकार हो जाएगा। हम आग में कुछ भी डालें वह तुरंत गायब हो जाता है। इसी तरह जब हम गीता के अध्ययन में स्वयं को समर्पित करते हैं, हम वैसे तो कतई नहीं रह सकते जैसे कि हम उन्हीं (कृष्ण चेतना) के रूप हो जाएंगे, क्योंकि सिर्फ वही रहते हैं, वही परम अस्तित्ववान है। पहले कृष्ण ने ('गीता' में ही) घोषणा की थी कि जब अच्छाई और बुराई का संतुलन बिगड़ेगा तब वह बार-बार इस संसार में आते रहेंगे (संभाव्यामि युगे-युगे) और उसे सही करते रहेंगे। वही एक जगत स्वामी हैं जिनमें इतना साहस है यह कहने का - 'कि मैं ही अंतिम गुरु (या अवतार) नहीं हूँ। यह नहीं कि मेरे बाद कोई और आएगा ही नहीं।' कृष्ण वेशक वासुदेव के रूप में, मोर-मुकुट लगाए तथा बांसुरी लिए तो प्रकट नहीं होंगे। यह गलती हम अपनी नासमझी में अक्सर करते हैं। वस्तुतः उनकी ऊर्जाएँ तो बाद में बार-बार प्रबुद्ध स्वामियों के रूप में प्रकट होती रहेंगी। वे इस तरह बार-बार अच्छाई और बुराई का सही संतुलन बिठाने के लिए इस संसार में आते रहेंगे और कुटीलता का नाश करते रहेंगे। यह आखिरी बार है जब कृष्ण इस भगवत् गीता में बोलते हैं। वे पूछते हैं - 'अर्जुन! तूने मुझको पूरी एकाग्रता के साथ तो सुना है न? क्या तेरा भ्रम दूर हो गया?' अर्थात् अंतिम अवसर तक वह शिक्षक का रूप निभाते रहते हैं। वे अपने शिष्य के लिए करुणा-पूरित हैं उनका सरोकार अर्जुन एवं समग्र मानवता से ही है। वे पूछते हैं - 'तूने सब कुछ समझ तो लिया? क्या कुछ और समझना चाहता है?'

Content: महान स्वामी की यही महान उदारता है। उनके मन में सिवाय अपने शिष्यों के कल्याण के और कोई चिंता रहती ही नहीं। इसीलिए तो वे यहाँ आते हैं, नहीं तो पृथ्वी ग्रह पर आकर वे क्यों अपना समय बरबाद करें। वे तो अपनी आनंदपूर्ण ऊर्जाओं में बिना किसी व्यवधान के अपने लोक में रहते होते। उन्हें क्या जरूरत थी इस मृत्युलोक में आने की? मेरे शिष्यगण जानते हैं कि मैं सिर्फ तब ही दुःख महसूस करता हूँ जब मेरा कोई शिष्य मुझसे छोड़कर जाता है। मुझे दुःख इसका होता है कि वह (शिष्य) एक महान अवसर खो रहा है। उसकी आत्मा उसको मेरे पास उद्धार के लिए लेकर आई थी। यदि शरीर-मन तंत्र सहयोग न करे तो आत्मा को तब तक निरंतर संघर्ष करना पड़ता है, जब तक मुक्त होने का अवसर न मिल जाए। हर जनम चक्र में आत्मा को कष्ट भोगना पड़ता है और उसे अफ़सोस ही रहता है कि उसे अंतिम क़दम उठाने का फिर अवसर नहीं मिल पाया, लेकिन जिसने मेरे आश्रम द्वार के अंदर प्रवेश कर लिया, वह मुझे छोड़कर नहीं जा सकता। यदि कुछ जाते भी हैं तो मैं उनका साथ नहीं छोड़ता। मैं उनके साथ हमेशा हूँ। उनकी बुद्धिमत्ता का वह क्षण, जब वे मेरे पास आए, मेरे लिए काफी है, उनकी लगातार परवाह करने के लिए। वे जो समझ चुके हैं उस निराकार रूप को जो मेरे अंदर निवास करता है, जानते हैं कि मैं अब उनका अटूट अंग हूँ। वे कहाँ भी रहें, मैं उनके साथ ही रहूँगा। यही कृष्ण का वादा है - "मुझें सुनो, समझो और मेरे पास आओ। तब तुम मेरे ही अंश बन जाओगे।"

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Chapter Number: 18

Chapter Name: कृष्ण (सर्वत्र) उपस्थित हैं

Content: 18.73 अर्जुन बोले - "अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मैंने स्मृति (समझ) प्राप्त कर ली है। अब मैं संशय रहित होकर स्थित हूं - अतः आपकी आज्ञा का पालन करूंगा। 18.74 संजय बोले - "इस प्रकार मैंने श्री वासुदेव के और महात्मा अर्जुन के इस रहस्य युक्त, रोमांचकारक संवाद को सुना। 18.75 श्री व्यास जी की कृपा से दिव्य दृष्टि पाकर मैंने इस गोपनीय योग को (अर्जुन के प्रति) कहते हुए स्वयं योगेश्वर कृष्ण को प्रत्यक्ष सुना है। 18.76 राजन! श्रीकृष्ण और अर्जुन के इस रहस्य युक्त, कल्याणकारक और अदभुत संवाद को पुनः-पुनः स्मरण कर मैं बारम्बार हर्षित हो रहा हूं। 18.77 राजन! श्री हरि के उस अत्यंत विलक्षण रूप का बार-बार स्मरण कर मुझे अत्यंत आश्चर्य होता है और मैं लगातार हर्षित हो रहा हूं। 18.78 राजन! जहां योगेश्वर कृष्ण भगवान है और जहां धनुर्धर पार्थ है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है - ऐसा मेरा मत है।

Content: इन अंतिम श्लोकों में अर्जुन और संजय ही बोलते हैं। अर्जुन अपने स्वामी (कृष्ण) के सामने नतमस्तक होकर कहता है - "मेरे सारे शक और संदेह समाप्त हो गए हैं। मेरी समझ में सब आ गया है और मैं तैयार हूं। आप जो कहेंगे मैं करूंगा - (मैं लड़ूंगा भी)। शेष सब तो सभी को ज्ञात है। कृष्ण के मार्गदर्शन में अर्जुन ने कौरवों का संहार किया। सारे कौरव, महान गुरुजन और कितने ही योद्धा मारे गए। यह भी ज्ञात है कि कालांतर में पांडव भी काल-कवलित हुए और महान गुरु कृष्ण भी। उन्होंने अपनी मानवीय लीला का संवरन किया। जब तक कोई किसी रूप में आएगा वह रूप तो त्यागना ही पड़ेगा, पर ऊर्जा अविनाशी है और सदा रहती है। यही सब कृष्ण इन अध्यायों में अपने

Content: लोकों के माध्यम से बताते रहे हैं। अपने रूप की बलि दो और रूपरहित निराकार हो जाओ। अर्जुन तो अब 'गायब' है और संजय अब वापस दृश्य-पटल पर आता है। अर्जुन तो अब बोलना नहीं चाहते। संजय ने तब बोलना शुरू किया था जब अर्जुन अवसाद ग्रसित थे। तब कृष्ण को कुछ कहना ही नहीं था। फिर जब कृष्ण ने अर्जुन को प्रथम अनुभव दिलवाया तो कृष्ण उच्च स्तर पर थे और अर्जुन बेहद उन्मादित थे। उस समय संजय इसलिए बोलने आया क्योंकि इन दोनों में से कोई बोलने की स्थिति में ही नहीं था। अब संजय पुनः आ गया है। अब यहां संजय धृतराष्ट्र से बोल रहा है, क्योंकि अर्जुन और कृष्ण अब दृश्य-पटल पर ही नहीं। संजय कहता है - "हे राजन! मुझे वासुदेव का स्मरण हो रहा है जो अर्जुन और बार-बार इस महान (आध्यात्मिक) संवाद को सुनकर रोमांचित हो रहा था। मैं अतिशय हर्षित हूं, क्षण-क्षण रोमांचित हो रहा हूं।" संजय कहता है - "व्यास जी की कृपा से मुझे दिव्य-दृष्टि मिली और मैं यह गोपनीय संवाद सुन पाया - सीधे रहस्य के अधिष्ठाता श्रीकृष्ण से।"

Content: मैं यह अति गोपनीय संवाद सुन पाया - सीधे रहस्य के अधिष्ठाता श्रीकृष्ण से।" श्री व्यास जी ने महाभारत के रचियता थे जिसकी यह 'गीता' एक अंश है। संजय कहता है कि जहां योगेश्वर कृष्ण और धनुर्धर अर्जुन हैं वहीं सारी वसुधा, विजय, श्री, विभूति और अचल नीति रहती है - यह मेरा मत है।" इस प्रकार वह इस गीता का समापन अपने आशीर्वचनों से करता है। जब भी कभी हम पढ़ेंगे-सुनेंगे या गीता का पाठ दूसरों को सिखाएंगे, अर्जुन और कृष्ण तो वहां सदा उपस्थित रहेंगे - अपने निराकार रूपों में। वे दोनों यहां भी इन पूरे अठारह दिन रहे हैं। आप सब साधनाशील हैं कि इन दो महान आत्माओं के मध्य चला यह गोपनीय रहस्यपूर्ण संवाद सुनने का अवसर मिला। यह गुरु व शिष्य के मध्य का महान संवाद है। ईश्वर आपको आपके क्षेत्र में धन-स्वास्थ्य-संगनता

Content: दिलवाए। आप यहां से कृष्ण चेतना के साथ जाएं और आप सदा 'नित्यानंद' में रहें - शाश्वत आनंद में निमग्न। इस प्रकार भगवत गीता उपनिषद का अठारहवां अध्याय 'मोक्ष-सन्यास योग' संपन्न हुआ, जिसमें कृष्ण और अर्जुन के मध्य संवाद के रूप में परब्रह्म परमात्मा पर चर्चा की गई थी।

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Chapter Number: 13

Content: श्रीभगवानुवाच! इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥1॥ क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥2॥ तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत्। स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु॥3॥ ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिरिविष्विभिः। ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥4॥ महाभूतान्यहङ्कारी बुद्धिरव्यक्तमेव च। इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥5॥ इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः। एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥6॥ अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्। आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥7॥ इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च। जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥8॥ असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु। नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥9॥ मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी। विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥10॥ अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्। एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा॥11॥ ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते। अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥12॥ सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्। सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥13॥ सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥14॥

Chapter Number: 13

Content: बाहरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च। सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥15॥ अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्। भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं सर्वभूतस्थितम्॥16॥ ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते। ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥17॥ इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः। मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥18॥ प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्धि नानात्वसंभवान्। विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्॥19॥ कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते। पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥20॥ पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्। कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥21॥ उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः। परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः॥22॥ य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह। सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते॥23॥ ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना। अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥24॥ अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते। तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥25॥ यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्। क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ॥26॥ समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्। विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥27॥ समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्। न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्॥28॥ प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः। यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति॥29॥ यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति। तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥30॥ अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्माऽयमव्ययः। शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥31॥ यथा सर्वगतं सौक्ष्म्याद्दाकाशं नोपलिप्यते। सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते॥32॥ यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः। क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥33॥ क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा। भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥34॥

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Chapter Number: 14

Content: श्रीभगवानुवाच। पరं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्‌। यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः॥1॥ इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः। सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥2॥ मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्‌। सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥3॥ सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥4॥ सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः। निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्‌॥5॥ तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्‌। सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥6॥ रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्‌। तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्‌॥7॥ तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्‌। प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥8॥ सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत। ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत॥9॥ रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत। रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा॥10॥ सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन् प्रकाश उपजायते। ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥11॥ लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा। रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥12॥ अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च। तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन॥13॥ यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्‌। तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते॥14॥ रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते। तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥15॥ कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्‌। रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्‌॥16॥ सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च। प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च॥17॥ ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः। जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥18॥ नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति। गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥19॥ गुणानेतानतीत्य त्रीन् देही देहसमुद्भवाः। जन्ममृत्युजरादुःखैर्मुक्तोऽमृतमश्नुते॥20॥ अर्जुन उवाच। कैलैगैस्त्रीन् गुणानेतानतीतो भवति प्रभो। किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते॥21॥ श्रीभगवानुवाच। प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव। न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥22॥ उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते। गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥23॥ समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः। सम्प्रियमाणः प्रियः धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥24॥ तुल्याप्रियांप्रियः धीरः मित्रारिपक्षयोः। मानापमानयोस्तुल्यः तुल्यो निन्दासमुद्वचः॥25॥ सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥26॥ मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥27॥ ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥27॥

Chapter Number: 15

Content: श्रीभगवानुवाच। ऊर्ध्वमूलमधःशाखम् अश्वत्थं प्राहुरव्ययम्‌। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्‌॥1॥ अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः। अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥2॥ न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा। अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥3॥ ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः। तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्ति प्रसृता पुराणी॥4॥ निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः। द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्‌॥5॥ न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः। यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥6॥ ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥7॥

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Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 1

Content: शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युक्त्रकामतेश्र्वर:। गृहीत्वैतानि संयाति यौगुनामिवाश्रयात्॥8॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 2

Content: श्रोत्रं चक्षु: स्पर्शनं च रसनं प्राणमेव च। अधिष्ठाय मनश्याय उत्कामन्ति स्थिते वापि भुञ्जानुपसेवते॥9॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 3

Content: विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुष:॥10॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 4

Content: यत्तन्नो योगिनश्चैनं पश्यत्यात्मनि तिष्ठतम्। यत्तन्नोऽव्यकृतास्नो नैन्नं पश्यत्यचेतन:॥11॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 5

Content: यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्। यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्॥12॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 6

Content: गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा। पुण्णामि चौषधी: सर्वा: सोमो भूत्वा रसात्मक:॥13॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 7

Content: अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रित:। प्राणापानसमायुक्त: पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥14॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 8

Content: सर्वस्य चाहं हदि सन्निविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च। वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥15॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 9

Content: द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च। क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥16॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 10

Content: उत्तम: पुरुषस्त्वन्य: परमात्मेत्युदाहृत:। यो लोकत्रयमाविश्य विभर्त्यव्यय ईश्वर:॥17॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 11

Content: यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तम:। अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथित: पुरुषोत्तम:॥18॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 12

Content: यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम्। स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥19॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 13

Content: इति गुह्यतमं शास्त्रमिदं प्रोक्तममयानघ। एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत॥20॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 14

Content: द्वौ भूतसर्गौ लोकेSस्मिन्दैव आसुर एव च। प्रोक्तौ विस्तारश: प्रोक्तमेतद्भार्गव मे शृणु॥6॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 15

Content: प्रवृत्ति च निवृत्ति च जना न विदुरासुरा:। न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥7॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 16

Content: असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्। अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥8॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 17

Content: एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धय:। प्रभवन्त्युग्रकर्माण: क्षयाय जगतोSहिता:॥9॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 18

Content: काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विता:। मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रता:॥10॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 19

Content: चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिता:। कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिता:॥11॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 20

Content: आशापाशशतैर्बद्धा: कामक्रोधपरायणा:। ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्॥12॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 21

Content: इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्। इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥13॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 22

Content: असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि। ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥14॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 23

Content: आढयोऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया। यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिता:॥15॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 24

Content: अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृता:। प्रसक्ता: कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥16॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 25

Content: आत्मसम्भाविता: स्तब्धा धनमानमदान्विता:। यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्॥17॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 26

Content: अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिता:। मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयका:॥18॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 27

Content: तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्। क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥19॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 28

Content: आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि। मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥20॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 29

Content: त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन:। काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥21॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 30

Content: एतैर्विमुक्त: कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नर:। आचरत्यात्मन: श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥22॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 31

Content: य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत:। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥23॥

Chapter Number: 13

Chapter Name: श्लोक 32

Content: तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥24॥

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Chapter Number: 17

Chapter Name: सप्तदशोऽध्यायः

Content: अर्जुन उवाच। ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः।।1।। श्रीभगवानुवाच। त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु।।2।। सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।।3।। यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः। प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः।।4।। अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः। दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः।।5।। कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः। मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्।।6।। आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः। यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु।।7।। आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः। रसाः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः।।8।। कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः। आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः।।9।। यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्। उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्।।10।। अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते। यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः।।11। अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्। इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्।।12।। विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्। श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।।13।। देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्। ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते।।14।। अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते।।15।। मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः। भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते।।16।। श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्रिविधं नरैः। अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते।।17।। सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्। क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्।।18।।

Chapter Number: 17

Content: मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः। परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्।।19।। दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।।20।। यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः। दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्।।21।। अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते। असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्।।22। ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्राह्मणस्य विविः स्मृतः। ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा।।23।। तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः। प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्।।24।। तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः। दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः।।25।। सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते। प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते।।26।। यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते। कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते।।27।। अश्रद्धया हुतं दत्तं तप्तं कृतं च यत्। असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह।।28।।

Chapter Number: 18

Chapter Name: अष्टादशोऽध्यायः

Content: अर्जुन उवाच। संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्। त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्‍केशिनिषूदन।।1।। काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः। सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुः त्यागं विचक्षणाः।।2।। त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः। यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे।।3।। निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम। त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः।।4।। यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्।।5।। एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च। कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्।।6।। नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते। मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः।।7।। दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्। स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्।।8।। कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन। सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः।।9।।

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Chapter Number: 13

Content: संग त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्विको मतः ॥९॥ न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते । त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥१०॥ न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥११॥ अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् । भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥१२॥ पंचैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे । सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥१३॥ अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथक्विधम् । विधिवाद्वच पष्टं च दैवं चैवात्र पंचमम् ॥१४॥ शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः । न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥१५॥ तत्रैव सत्कर్తव्यमानं वेह तु यः । पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न पश्यति दुरात्मता ॥१६॥ यस्स नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥१७॥ ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना । करणं कर्म कर्ता च त्रिविधः गुणभेदतः ॥१८॥ ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिविधः गुणभेदतः । प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥१९॥ सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्विकम् ॥२०॥ पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् । वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥२१॥ यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् । अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥२२॥ नियतं संगरहितमरागद्वेषतः कृतम् । अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्विकमुच्यते ॥२३॥ यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः । क्रियते बहुलायासं मद्यागसमुदाहृतम् ॥२४॥ अनुबन्धं क्षयं हिंसामनुपेक्ष्य च पौरुषम् । मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥२५॥ मुक्तसंगोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥२६॥ रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः । हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥२७॥ अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः । विषादी दीर्घसूत्री च तामस उच्यते ॥२८॥ बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु । प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय ॥२९॥ प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।

Chapter Number: 13

Content: बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥३०॥ अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥३१॥ अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता । सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥३२॥ धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः । योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥३३॥ प्रसंगेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥३४॥ या स्वप्नं भय शोकं विषादं मदमेव च । न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥३५॥ सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ । अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥३६॥ यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् । तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥३७॥ विषयेन्द्रियसंयोगात्तत्तदग्रेऽमृतोपमम् । परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥३८॥ यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः । निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥३९॥ न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः । सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यद्भिः स्यात्त्रिभिरगुणैः ॥४०॥ बा ह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप । कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥४१॥ शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च । ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् �::४२।। शौर्यं तेजो धृतिदाक्ष्यं युद्धे चाप्यापलायनम् । दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥४३॥ कृषिर्गोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् । परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् �::४४।। स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः । स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥४५॥ यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥४६॥ श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥४७॥ सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥४८॥ असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति ॥४९॥ सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे । समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥५०॥ बुद्धया विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।

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Content: शब्दादीन्विषयांस्त्यक्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च। विविक्तसेवी लघ्वाशनो यतवाक्कायमानसः॥ ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः। अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्॥ विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥ भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्वतः। ततो मां तत्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥ सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः। मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥ चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः। बुद्धियोगमुपाश्रित्य मचिच्तः सततं भव॥ मचित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनक्ष्यसि॥ यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मनस्यसे। मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥ स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा। कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥ ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥ तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥ इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया। विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥ सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः। इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥ मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥ सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥ य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति। भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥ न च तस्मान्नरश्चित्रे प्रियकृत्तमः। भविता न च तस्माद्वन्यः प्रियतरो भुवि॥ अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः। ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतििः॥ श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः। सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥ कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।

Content: कच्चिदज्ञानसम्प मोहः प्रनष्टस्ते धनंजय॥७२॥ अर्जुन उवाच। नष्टो मोहः स्मृतिलब्धा त्वत्प्रसादान्मवाच्युत। स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव॥७३॥ संजय उवाच। इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः। संवावादिममश्रीमत्पूजं महर्षिणाम्॥७४॥ व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्। योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयत आत्मवान्॥७५॥ राजन्स्मृत्या संस्मृत्या स वादिमिमंभदूतम्। केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥७६॥ तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः। विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः॥७७॥ यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर् मम॥७८॥ गंगाधर-पुत्र, पुना-वारसी, महाराष्ट्र विप्र, वैदिक तिलक बाल बुद्ध ते विधी यमान। 'गीता रहस्य' किया श्रीश को समर्पित यह, वार काल योग भूमि शक में सुयोग जान। ॥ ॐ तत्सद् ब्रह्मार्पणमस्तु ॥ शान्तिः पुष्टिस्तु टि टि शास्तु ॥

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Content: परिशिष्ट

Content: परमहंस नित्यानंद जी

Content: भगवान के दुर्लभ सजीव अवतार, परमहंस नित्यानंद हमारी सहस्राब्दी की एक महानतम आध्यात्मिक शक्ति बनकर उभरे हैं। हर वर्ष विश्व भर में 2 करोड़ लोगों के साथ अपनी शक्ति बांटते हुए कार्यरत नित्यानंद जी समस्त मानवता को एक बड़ी देन : महाचेतना, प्रदान करने के लिए प्रयत्नशील हैं।

Content: 'विश्व की सबसे पुरानी व प्रसिद्ध, mind-body-spirit, magazine 'Watkins' ने स्वामीजी को दुनिया की सौ सबसे आध्यात्मिक व प्रबल हस्तियों में नामित किया है।' प्रतिदिन सुबह, स्वामीजी के सत्संग, 150 देशों में हजारों लोग इंटरनेट द्वारा entv.nithyananda.org पर देखकर लाभ उठाते हैं एक आध्यात्मिक मेधा और प्रबुद्ध अन्तर्दृष्टि से संपन्न जो प्रबंधन से ध्यान तक सारी प्रक्रियाओं, सम्बन्धों से धर्म और सफलता से संन्यास का मर्म समझते हैं। नित्यानंद जी हमें व्यावहारिक ज्ञान से समृद्ध कर ध्यान के वे सूक्ष्म गुरु बताते हैं जो हमारे अंदर एक स्थायी परिवर्तन ला सकते हैं। इसके अलावा लाखों लोगों को उन्होंने मात्र अपने एक स्पर्श से स्वस्थ किया है जिनमें शमिल है अवसाद से लेकर कैंसर ग्रस्त रोगी भी। आज नित्यानंद जी 'यू ट्यूब' पर सबसे ज्यादा देखे जाने वाले आध्यात्मिक गुरु तथा 27 भाषाओं में प्रकाशित 300 से अधिक अंतर्राष्ट्रीय पुस्तकों के 'बेस्ट सेलिंग' लेखक भी हैं।

Content: अभी हाल ही में उन पर धर्म और कानून की आड़ में एक झूठा मामला चलाकर कारावास में भी भेजा गया था जिससे वह और ज्यादा शक्तिवान एवं सटीक बनकर उभरे हैं और उनका विश्व को योग एवं ध्यान का आलोक प्रदान करना बदस्तूर और निर्बाध रूप से जारी है। पूर्व के प्राचीन रहस्यवादी ज्ञान में निकाली गई इन मणियों द्वारा वह लाखों का अज्ञान जनित अंधकार दूर करने में सलंग्न हैं। प्रांजलता, प्रामाणिकता के साथ श्री नित्यानंद जी की सद्य अन्तर्दृष्टि जन मानस के संघरों एवं अपेक्षाओं का आलोकन कर उन्हें ऐसी प्रासंगिक शिक्षा प्रदान करती है जो देश-काल एवं मन के बंधनों से परे रहती है।

Content: नित्यानंद मिशन : समग्र विश्व में एक नई चेतना में प्रवेश कर रहा है जिसमें भोगकामी और आध्यात्मिक जीवन के भेद, बाह्य वृद्धि और अंतरवृद्धि के फर्क तेजी से मिटते जा रहे हैं। इस नए युग का मानव एक ऐसा समरसतापूर्ण विश्व बनाने को उद्यत है जिसमें भोग-योग और प्राचीन ज्ञान व आधुनिक वैज्ञानिक समझ एक दूसरे के पूरक होकर एक ऐसे समृद्ध और संतुष्टिदायक जीवन का सृजन कर रहे हैं जहां सब कुछ एकात्मक प्रतीत होता है।

Content: इसी क्रांतिकारी सत्य को वैश्विक समाज तक उपलब्ध कराना नित्यानंद मिशन का उददेश्य है। नित्यानंद मिशन एक वैश्व्यापी आंदोलन है जो जीव मात्र में सत्य की जागरुकता भरने को कटिबद्ध है। यह नसल, लिंग भेद या राष्ट्रीयता की सीमानों से परे जाकर समष्टि को चेतन करता है। आधुनिक जीवन के संदर्भ में प्राचीन वैदिक ज्ञान की पुनर्व्याख्या कर यह मिशन व्यक्ति को समष्टि में बदलने के शक्तिवान परिवर्तन के लिए अवसर उपलब्ध कराने का निरंतर प्रयासरत है।

Content: कार्यक्रम एवं कार्यशाला : नित्यानंद ध्यान पीठ वैश्विक स्तर पर विशिष्टध्यान के कार्यक्रम उपलब्ध कराता है, जिससे शारीरिक, मानसिक और आंत्मिक स्तर पर लाखों लोगों को लाभ पहुंचे। इनमें से कुछ नीचे दिए गए हैं :

Content: आंतरिक जागरुकता पैदा करना : यह 21 दिनों का एक गहन एवं अनूठा प्रोग्राम है जिसका उददेश्य है व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र में अपनी पूरी सम्भावनाओं की तलाश करने को तैयार करना । इसकी कुछ विशेषताएं हैं :

Content: • योगिक शरीर तैयार करने हेतु नित्य योग।

Content: • शरीर को शुद्ध और मस्तिष्क एवं आत्मा को पूरी तरह ऊर्जान्वित करने के लिए विविध ध्यान तकनीक का यथोचित समिश्रण (पूर्व जन्म में प्रवेश करने की विधि)।

Content: • शक्तिवान ऊर्जा-ऋण।

Content: • बोधक कैमफायर सत्र।

Content: • कुंडलनी जागरण के गहन सत्र जिसमें प्रतिभागियों के शरीर उत्तोलन को भी अनुभव होती है।

Content: वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध हो चुका है कि यह कार्यक्रम 1300 प्रतिशत माईंड कोन्द्रपल सेल एनर्जी (कोशिका की अन्तर्निहित शक्ति) बढ़ा देता है जिससे व्यक्ति कई प्रकार के स्वास्थ्य-लाभ प्राप्त करता है - यथा रक्त शर्करा एवं रक्त चाप का नियंत्रण, भार संतुलन और अनिद्रा जैसी कई व्याधियों में राहत पाना इत्यादि।

Content: एनवैल्थ : परमहंस नित्यानंद जी का! यह एक अनूठा साप्ताहिक कार्यक्रम है जिसमें वे धन सम्पदा सर्जन के छिपे वैदिक रहस्य उजागर करते हैं - यथा धन को आकर्षित एवं सही रूप में प्रवाहित करने के लिए सही आंतरिक अवकाश पैदा करना, तृप्तिहीन और पूरे दायित्वपूर्ण निर्णय लेना, सहज रूप से सफलता पाने के तरीके और गुरु सीखना।

Content: श्रीमद्भगवत गीता

Content: श्रीमद्भगवत गीता