Books / isbn 979-8-88572-048-9

1. isbn 979-8-88572-048-9

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Content: अगर आर्की सवाल मरि॑ उस्थित मर्‌ो अनि आ वलीन ह्र जाती है, ता यी आर्की प्रकृतप्रिश्न नहीं है, कविल आर्की मन का एक खलि मात्र है॥

Content: PUBLISHED BY NITHYANANDA VEDIC SCIENCES UNIVERSITY PRESS

Content: A division of Nithyananda Vedic Sciences University, USA

Content: परम हंस नि त्या नंद

Content: आपके प्रश्नों का समाधान

Content: ('your Questions Answered' in Hindi)

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Content: सारा विश्व के आनन्द समाजियों और नित्यानन्द आश्रम के स्वामीगणों को दिया हुआ प्रवचन

Content: आपके प्रश्नों का समाधान

Content: नितत्यानंद वैदिक साइन्सस यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित

Content: नित्यानंद वैदिक साइन्सस यूनिवर्सिटी यू.एस.ए. का एक विभाग

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Content: Ebook ISBN: 979-8-88572-048-9

Content: नित्यानंद वैदिक साइन्सेस यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित नित्यानंद वैदिक साइन्सेस यूनिवर्सिटी विभाग, यूएसए.

Content: सर्वाधिकार...२००७

Content: प्रथम संस्करण: ............ २००७

Content: आईएसबीएन १३: ९७८-१-९३४७३६४-३०-७

Content: आईएसबीएन १०: १-९३४७३६४-३०-८

Content: सर्वाधिकार सुरक्षित।इस प्रकाशन का कोई भी अंश पुनः प्रस्तुत नहीं किया जा सकता, न किसी और रूप या माध्यम से प्रेषित किया जा सकता है, इलेक्ट्रोनिक, मैकेनिकल, फोटोकॉपी, रिकॉर्डिंग्स या कोई भी तरीका हो। इसके लिये प्रकाशक की लिखित अनुमति की जरूरत होगी।

Content: यदि आप इस पुस्तक में से कोई सूचना अपने लिये लें तो आपके कृत्य के लिये लेखक या प्रकाशक की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी।

Content: इस पुस्तक की बिक्री से आने वाली राशि खैराती कार्य के लिये जायेगी।

Content: भारत में मुद्रक आदित्य मुद्रक, बंगलौर. फोन: ८०२६६०६७७६

Content: मेरी उपस्थिति में आप प्राय: अपने प्रश्नों को विलीन होता हुआ क्यों पाते हैं ?

Content: क्योंकि, जब आप मेरे साथ होते हैं, आप इतनी तीव्रता के साथ जागरूक बन जाते हैं, पूर्णतः: उपस्थित, विक प्रश्नों के जागने के लिए स्थान ही नहीं बचता है!

Content: आखिर, प्रश्न क्या है, भूत काल और भविष्य काल को वर्तमान पर थोपना ?

Content: इसलिए जब आप मेरे साथ होते हैं तो आपकी शंकायें समाप्त हो जाती हैं। और इसीलिए मैं यहां हूं: आपके सवालों को हल करने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें विलीन कर देने के लिये।

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Content: ... प्र. स्वामीजी, क्या स्वयं को समझने के लिए संसार का त्याग करना आवश्यक है ?

Content: स्वयं को समझने के लिए, यहां एक ही वस्तु है जिसका त्याग करने के लिए आपको अवश्य ही राजी होना होगा–अज्ञानता।

Content: स्वयं के ज्ञान का संसार त्यागने से कोई सम्बन्ध नहीं। संसार से भाग आना उससे चिपके रहने जैसा ही बुरा है, दोनों स्थितियों में यह स्पष्ट है कि संसार ही आपके गतिविधियों को नियंत्रित करता है।

Content: सांसारिकता से घृणा जितना अज्ञानता का उत्पादन है उतना ही उससे लगाव भी, दोनों ही एक सिक्के के दो पहलू हैं।

Content: एक व्यक्ति पहाड़ पर एक गुफा में रह सकता है और उस पर संसार (सांसारिक) की धुन सवार रह सकती है, जबकि दूसरा व्यक्ति संसार में रह कर भी उससे पूरी तरह अलग–थलग होकर उस खिंचा तानी से दूर (संन्यास) रह सकता है। सन्यास लेना संसार को त्यागना नहीं है, परंतु सामान्य ढंग से संसार से लगाव और घृणा दोनों को त्यागना है। यही जीवन, जब अज्ञानता के धुंध से देखा जाए तो संसार है, और जब आत्म–जागरुकता की स्पष्ट रोशनी में देखा जाए तो सन्यास है। यह सच है, सन्यासी हमेशा सादा जीवन जीते हैं,

Content: संसार से अलग। परंतु उनके लिए लगाव और घृणा को त्यागना कोई प्रयास नहीं है। जब आत्म–समझ जाग्रित होती है, त्याग अपने आप आता है।

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Content: संन्यास की ओर पहला कदम है आपके भीतर लगाव और घृणा के मध्य चल रहे संघर्ष के प्रति जागरूक होना। जैसे ही आप इसके साक्षी बनेंगे, आप इस बात के प्रति जागरूक होंगे कि आपके भीतर एक केन्द्रिय भाग है जो इन संघर्षों से परे है, एक अन्तरात्मा जिसका हां या ना के सवालों से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह आपकी आत्मा है, स्थायी और अपरिवर्तनिय। इस जागृति की लौ में, जो भी आवश्यकता से अधिक है वह सामान्य ढंग से अलग हो जाता है जैसे कि पेड़ से मृत पत्ते। जो बचता है वह पूर्ण रूप से आवश्यक है- वह है संन्यास।

Content: असली संन्यास का अर्थ तालाब में उस कमल की तरह रहना है, जो कीचड़ से भरे उस पानी में पूरी तरह सहज, परन्तु उससे अछूता और अकलुषित रहता है।

Content: एक जेन कहानी:

Content: एक गुरू अपने शिष्य के साथ एक गांव से दूसरे गांव जा रहे थे। गांवों के सीमा पर एक छिछली जल धारा बह रही थी, जिसे गांव वाले सामान्यतः पैदल चल कर ही पार कर लेते। इस बार, उन्होंने पाया कि भारी बारिश की वजह से, जलधारा उफनकर छोटी नदी में परिवर्तित हो गई है, जो चल कर पार करने के लिए ज्यादा गहरी है।

Content: शिष्य भयभीत हुआ, और गुरु से पूछा, 'गुरूजी, क्या हमें नदी पार करने का प्रयास करना चाहिए?'

Content: गुरूजी आंखों में चमक लिए हुए मुस्कुराए और बोले, 'तुम्हें नदी अवश्य ही पार करना चाहिए, मेरे बच्चे। परंतु इतना याद रखना तुम्हारे पांव नहीं भीगने चाहिए!'

Content: यही संन्यास का वास्तविक अर्थ है। जब आप संसार की नदी को पार कर सकते हैं, परन्तु संसार आपको कभी गीला नहीं कर सकता, तो आपने संन्यास को पा लिया।

Content: ... प्र. स्वामीजी, हम अहम का समर्पण कैसे कर सकते हैं। जबकि समर्पण करने की चाहत अपने आपमें अहम की अभिव्यक्ति है?

Content: एक प्रश्न आपके लिए: आप अहम का समर्पण कैसे करेंगे, जब वह असली हो नहीं है ?

Content: मान लें कि आप एक अंधेरे कमरे में बैठे हैं। आप चाहते हैं कि अंधेरा बाहर निकल जाए। पर क्या आप उसे धक्का देकर बाहर कर सकते हैं ? क्या आप उससे लड़कर कमरा छोड़ने के लिए मजबूर कर सकते हैं? नहीं! आप कितनी देर भी कोशिश कर लें, अंततः आपको हारना ही होगा- वह भी ऐसे वस्तु से जिसका अस्तित्व है ही नहीं!

Content: अहम् अंधकार की तरह है, इसका कोई सकारात्मक अस्तित्व नहीं है। जिस तरह अंधकार बस रोशनी की अनुपस्थिति है उसी तरह अहम् जागरुकता की अनुपस्थिति है। अहम् को मारने के लिए संघर्ष करना वैसा ही है जैसा कि अंधकार को कमरे से निकालने के लिए संघर्ष करना। वास्तव में अंधकार को भगाने के लिए, आपको अंधकार के साथ कुछ करने

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Content: के बारे में भूल जाने की आवश्यकता है। अपनी ध्यान प्रकाश पर केन्द्रित करें। बस एक छोटा सा दीया कमरे में जलाये और आप पाएंगे कि अंधकार अपने आप भाग जाएगा! इसीलिए, मैं 'अहम्' के बारे में भूलने को कहता हूँ इसके बजाए, अपनी अन्तरात्मा में जागरुकता का दीया जगाने पर ध्यान केन्द्रित करें। जब आपकी संपूर्ण चंतना एक लौ बन जाएगी, आप पाएंगे कि 'अहम्' खत्म हो गया है। 'अहम्' एक भ्रम है। जब आप जागरूक न हों तो उसका समर्पण नहीं कर सकते- क्योंकि आप नहीं जानते कैसे। यचपि आप उसका समर्पण तब भी नहीं कर सकते जब आप जागरूक हो गये हों -क्योंकि तब आप समझेंगे कि समर्पण करने के लिए कुछ बचा ही नहीं है!

Content: आपने जो सुना, पढ़ा और आपको जो पढ़ाया गया- 'आत्म-ज्ञान पाने के लिए 'अहम्' का समर्पण करें' - यह अज्ञान भरा सोच है। यह केवल दूसरे तरीके से हो सकता है। आत्म-समझ का उदय होने दें, और आप अचानक 'अहम्' को कहीं नहीं पाएंगे। समर्पण तो हो चुका है, लेकिन इस तरह से। जो भी हो, मैं खुश हूँ कि यह प्रश्न आपके मन में जागा है 'अहम्' ही आपकी सारी चिंताओं, दुखों, तनाव का मूल कारण है। यह ही आपके नरक के दरवाजे का रास्ता है। क्रियाशीलता के साथ महसूस करना कि आप 'अहम्' को त्यागना चाहते हैं, इस बोझ से

Content: छुटकारा पाने की आवश्यकता को महसूस करना, स्वयं ही जागरुकता की ओर पहला कदम है। इससे यह पता चलता है कि आप नींद से जाग रहे हैं!

Content: ... प्र. स्वामीजी, जब भी मैं आपके सामने होता हूँ, सारे सवाल गायब हो जाते हैं और सब कुछ संभव लगने लगता है। परंतु जब मैं आप से दूर होता हूँ, सारे चिरपरिचित शक वापस आने लगते हैं। यह क्यों होता है और मैं इसके लिए क्या कर सकता हूँ?

Content: यदि मेरी उपस्थिति में कोई प्रश्न अपने आप ही गायब हो जाता है, तो यह समझने का वक्त आ गया है कि वह सही सवाल था ही नहीं, यह तो दिमाग का एक खेल है। जब आप मेरे साथ होते हैं, मन का नियंत्रण आप पर नहीं होता-आप सामान्य रूप से ध्यान में बह जाते हैं। आप प्रेम पूर्ण, स्वच्छ शांति बन जाते हैं। इस अवस्था में, केवल वही सवाल जो आपका वास्तविक सवाल है, वही जो आपसे पूरी तरह संबद्ध हो उपस्थित रह पायेगा।

Content: मेरी उपस्थिति में, आप बहुत अधिक जागरुक बन जाते हैं, पूरी तरह उपस्थित, कि सवाल पैदा होने के लिए स्थान ही नहीं बचता। जब आप मेरी उपस्थिति में नहीं होते हैं, तो दिमाग आजाद होता है आपके वर्तमान पर भूत काल और भविष्य काल को थोपने के

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Content: लिए-आपके प्रश्न और किसलिए होते हैं वर्तमान पर भूत काल और भविष्य काल का खेल ही न?

Content: अहम् की तरह ही, दिमाग से लड़ने में या उसे अनुचित ठहराने में कोई औचित्य नहीं है। यह वह संघर्ष है, जिसे आप निश्चित ही हारेंगे। इससे सावधान हो जाएं कि यही आपके मस्तिष्क का असली स्वभाव है, यह आशा की जा सकती है कि यह किसी और तरीके से वर्ताव नहीं करेगा। यह निश्चित ही चिंता, उलझन, शक को लाता है। बस इसके प्रति जागरूक होना ही काफी है। मन की मूर्खतापूर्ण गतिविधियों के लिए निर्णय न सुनाएं मन पर गुस्सा करना भी उसमें अपनी ऊर्जा खोना है। जैसे जैसे आप मन के कार्य कलापों का साक्षात करेंगे, धीरे-धीरे आप इस बात के प्रति जागारूक होंगे कि आप मन नहीं हैं- आप मन से कुछ ज्यादा हैं, आप उसे देखने वाले हैं। आपकी ऊर्जा से वंचित होकर, मन चल नहीं सकता! आप जिसको अपना मन कहते हैं उसमें अव्यवस्थित विचार के स्थान पर स्वच्छ, तीव्रता से चेतन अवस्था पैदा होगी। उसी पल सारे प्रश्न विलीन हो जाते हैं और मन नहीं रहता है।

Content: इसकी एक झलक ही मेरी उपस्थिति में आप अनुभव करते हैं। मैंने आपको अभी जो कहा है वह तरीका है हरदम आपके पास उसके रहने का-जब मैं आपके साथ न रहूं तब भी! यह एक धीमी प्रक्रिया है - इसे समय दें। यह होगा।

Content: ... प्र. स्वामीजी आप हमें अपने स्वाभाविक लालसाओं को दबाने के लिए मना करते हैं। पर क्या इनको पूरा करना भी क्या सही है ?

Content: यह प्रश्न भी पहले वाले प्रश्न संसार बनाम् सन्यास की दिशा में ही इशारा करता है। इस राह पर, आपका वास्ता, अनेक बार, स्पष्ट दोहरेपन से पड़ेगे: अच्छा/बुरा, सही/गलत,लगाव/घृणा, दमन करना / छूट देना। वास्तव में, आपके अन्दर की अशान्ति यही दोहरेपन का संघर्ष है। जब भी कोई दोहरापन अपने आपको व्यक्त करता है, इस मूल सिद्धांत को याद रखें: अस्तित्व में कोई दोहरापन नहीं। विलोम का कोई अस्तित्व नहीं होता। दमन करना या भोग करना अज्ञानता की निशानी है। आखिर, दमन करना और कुछ नहीं आसक्ति की प्रतिक्रिया है। आवश्यक है अपनी प्रवृत्ति की जागरुकता। गुस्से को पहचानें, ईर्ष्या को पहचानें, हवस और लोभ को पहचानें। न ही इन भावनाओं के आगे समर्पण करें न ही इन्हें दबाने की कोशिश करें। सामान्य रूप से यह जानने का प्रयass करें कि वह किसलिए है। दूरी बनाए रखें, और अपनी भावनाओं पर इस तरहसे दृढ डाले जैसे कि वह अजनबी हो। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आपके सहारे के बिना, वह जीवित नहीं रह सकता, वह बस चला जाता है! यह आपके लिए बहुत अधिक अर्थ नहीं रखता जब यह किसी और का अनुभव है -परंतु लगातार अभ्यास के द्वारा आप स्वयं ही सत्य का अनुभव करेंगे।

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Content: केवल यही जागरुकता आपमें आत्म-ज्ञान जगा सकता है, और आसक्ति दमन करने की इन धारणाओं से मुक्ति दिला सकता है, और सभी दोहरेपन से!

Content: ... प्र. स्वामीजी, आप कहते हैं कि शंकालु प्रवृत्ति सीखने में बड़ी बाधा है। परंतु आप हमें शक को कहने के लिए भी प्रेरित करते हैं । क्यों ?

Content: आप प्रश्न कर सकते हैं या तो शंकाल प्रवृत्ति से या शक के कारण। परंतु दोनों के बीच में बहुत अधिक भिन्नता है। शंकालु प्रवृत्ति वह अवस्था है जिसमें इंसान किसी पर भी विश्वास करना नहीं चाहता। बस इसी तरह, केवल तर्क करने के लिये तर्क करेगा। इस अर्थ में संशयता की प्रवृत्ति स्वयं एक अवचेतन विश्वास है, यह एक पूर्वनिश्चित नकारात्मक धारणा है कुछ भी और सब कुछ के विरोध में। संशयी व्यक्ति की अपनी कोई राय या विचार धारा नहीं होती, उसके पास केवल तर्क है, उस हर विचारधारा के खिलाफ जो उसके सामने रखा जाए। वह घंटों किसी एक विचारधारा के विरुद्ध तर्क करेगा, और अगर आप एक दूसरी विचारधारा रखें जो पहले वाले से बिल्कुल विपरित है, तो वह उतने ही जोरदार ढंग से उसके विरुद्ध भी तर्क करेगा! वास्तव में, यह सब कुछ ना के स्थायी रवैये में बस गया है। इस अर्थ में, संशयता सीखने वाले की यात्रा का अंत कर देती है, क्योंकि इस रवैये के साथ कुछ भी कर पाना मुश्किल है। संशय की प्रकृति ने स्वयं को बदलाव की संभावना के लिए बंद कर दिया है। दूसरी तरफ, शक, खुलापन और

Content: ग्रहणशीलता की अवस्था है। शक स्वीकृति है 'मैं नहीं जानता, पर सीख सकता हूँ' । यह सीखने वाले की यात्रा को प्रारंभ करती है शक सीखने वाले का मार्ग है, वह सामान्य रूप से असत्य को हटाने की कोशिश करता है ताकि सत्य का अनुभव कर सके। शक के साथ एक व्यक्ति सम्मान के साथ सुनता है, अवज्ञा के साथ नहीं। उसके अन्दर सीखने वाले की विनम्रता है वह हाँ का रवैया है, वह अनुभव करने के लिए इंतजार कर रहा है ताकि वह विश्वास कर सके।

Content: जब एक तीक्श्ण बुद्धि वाला इंसान संशयता की प्रवृत्ति ओर मुड़ जाता है, तो यह एक खतरनाक संकेत है—क्योंकि सभी कल्पनाओं को कारगर तरीके से एक तरफ रखने के काबिल होने पर अहम को बहुत संतुष्टि मिल सकती है। परंतु अंततः संशयी व्यक्ति पीछे नहीं हट सकता। विशेषकर एक गुरु के साथ, अगर आप संशयता की प्रवृत्ति अपनाते हैं कोई रास्ता नहीं रह जाता जिससे मैं आपके पास पहुँच सकूँ। यह पूछने के लिए किसी डॉक्टर के पास जाने का कोई मतलब नहीं है कि पर्चे में लिखे प्रत्येक गोली का प्रमुखता क्या है?

Content: तो निश्चित रूप से अपने प्रश्न पूछें। बस उस रवैये को देखें जिससे आप पूछते हों!

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Content: ... प्र. स्वामीजी, आप हमें प्रेम में 'अपना संपूर्ण 'देने के लिए कहते हैं। परंतु अगर प्रेम की कदर न की जाए अथवा लौटाये न जाए तो क्या होगा ?

Content: यदि आप सच में प्यार में पड़े हैं, तो आप स्वतः ही 'अपना सब कुछ 'दे देंगे। प्रेम बिना शर्त बाहर छलकना है। प्रेम में आप स्वयं से पूछने के लिए रुकते नहीं हैं कि दूसरा व्यक्ति आपका सब कुछ पाने के काबिल है या नहीं। वास्तव में, दूसरे व्यक्ति की उपयोगिता का कोई प्रश्न ही नहीं है। प्रेम एक उपहार है। यदि आप दूसरे व्यक्ति की उपयोगिता को नापेंगे और बदले में समान और सटीक मात्रा में प्रेम देते हैं, तो यह सामान्य रूप से सौदा होगा। यह व्यापार होगा, प्यार नहीं। सच्चे प्यार में यह प्रश्न 'क्या मैं अपना सब कुछ दे दूँ ?' कभी उत्पन्न ही नहीं होना चाहिए!

Content: अब प्यार के विषय में कदर होने लगी है। प्यार करने के लिए आपका कारण क्या है; बताएं ? क्या प्यार कोई कार्यक्रम है जिसके लिए आपको तालियों की आवश्यकता है ? क्या यह काफी नहीं है कि आप प्यार करते हैं? किसी और पुरस्कार के लिए देखने की क्या आवश्यकता है ? प्यार को लौटाने के लिए कहना अपने प्रियजन पर किसी तरह का नियंत्रण पाने की कोशिश है। बदले में आपको प्यार न करने की आजादी दूसरे व्यक्ति को देने से आप मना करते हैं। यह एक प्रकार के अधिकार की भावना है, जब आप अपने चाहत के पिंजरे में दूसरे व्यक्ति को कैद करते हैं एवं जैसा कि मैं दोहराता हूँ, प्यार में

Content: किसी को कैद नहीं किया जा सकता है, वह ध्यान से सुनें: प्रेम दो प्रकार के हैं- प्रेम मात्रा की तरह, और प्रेम गुण की तरह।

Content: जब प्रेम मात्रा की तरह देखा जाता है, इसका परिणाम छोटे-छोटे स्वार्थों अदला बदली के रूप में होता है जिसे ज्यादातर लोग जीवन भर करते हैं। आप पुरुष या नारी को प्यार का एक पार्सल देते हैं, और चाहते हैं कि वह भी आपको उतना ही बड़ा पार्सल लौटाए।

Content: अगर आपका साथी किसी और को पार्सल देने के लिए चुनती है, या बस उसे खोलकर इधर उधर बिखरा दे, आप ठगा हुआ और गुस्सा महसूस करते हैं। आप दोनों एक दूसरे के परस्पर व्यवहार के समझौते से बंधे हुए हैं। आपको एक दूजे के लिए बननापड़ेगा। जल्दी हो या देर से, यह व्यवस्था आपको सिकुड़ा हुआ और निराश करेगी, और गुस्से में आप अपना पुलिंदा वापस लेकर चले जाते हैं किसी और की तलाश में पुलिंदे की अदला बदली के लिए।

Content: या तो आपका साथी ऐसा करेगा। जाना– पहचानना लग रहा हैन?

Content: अब जिस प्रकार के प्रेम की ओर आपको बढ़ने के लिए कहूँगा, वह आपकी अन्तरात्मा के गुण की तरह प्रेम है। इस तरह का प्रेम केवल जीवित रहने के लिए सामान्य रूप से किसी की खुशी और कृतज्ञता का बाहर निकलना है। यह खुशी की खुशबू है, जो बिना शर्त अपने आप ही चारों ओर फैलती है। उसे किसी उददेश्य की आवश्यकता नहीं होती, उसे वापसी उपहार की आवश्यकता नहीं होती। इस तरह का प्रेम सूर्य के चमकने या बरसात

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Content: की तरह है, यह बिना शर्त अपने आपको देता है, और जो भी उसके घेरे में खड़ा होगा वह बिना सवाल के प्रेमपूर्णता या ताजगी का अनुभव करेगा। यह प्रेम हमेशा आपका समृद्ध बनाता है, यह एक प्रकार का प्रेम है जिसका आनंद बिना किसी डर या आत्म-ग्लानि के उठाया जा सकता है।

Content: प्रेम को अपना गुण बनाने के लिए, अपने को पूरी तरह से समर्पित करने के लिए राजी हो जाएं। केवल एक अहं रहित अवस्था में ही इस तरह का प्रेम उत्पन्न हो सकता है। यह आसान नहीं है, पर आप शुरुआत कर सकते हैं। आप पाएंगे कि सामान्य रूप से प्रेम और कृतज्ञता के द्वारा, आप अहं को कुछ मात्रा में जाने देना शुरू करेंगे।

Content: जैसे जैसे आप अहं को जाने देंगे, उस स्थान पर अधिक से अधिक प्रेम प्रवेश करता जाएगा। अपने रिश्तों में इसका अभ्यास करने की कोशिश करें। प्यार करने को लेकर झमेला करने की आवश्यकता नहीं है; प्रेम में गंभीर न बनें - बस पूरी तरह ईमानदार हों!

Content: ... प्र. स्वामीजी, भारत में हम रिवाजों एवं मूर्ति पूजा के साथ बड़े होते हैं। आप उनके पक्ष में हैं या विरुद्ध?

Content: सबसे पहले, मैं न ही मूर्ति पूजा और रिवाजों के पक्ष में हूं न ही विरुद्ध - या, किसी और बात के!

Content: परंतु भारत एवं पूर्व में दूसरे स्थानों पर मूर्ति पूजा इतनी सामान्य क्यों हैं इसके पीछे भी कारण है। आध्यात्मिक यात्रा का प्रारंभ करने वाले के लिए कल्पना में दैवीय शक्ति के बारे में सोचना भी मुश्किल है। जब किसी वस्तु में निश्चित करके उसे आकार दिया जाता है तो वह उसे समझता है और उसने सम्बन्ध बनाया है।

Content: जब एक मूर्ति हो तो वह, दैवीय शक्ति से उस भाषा में बात चीत कर सकता है जिस भाषा से वह परिचित हो। हमारे हजारों देवी देवता और कुछ नहीं दैवीय शक्ति की अभिव्यक्ति है। फिर भी कोई उनसे बात कर सकता है, प्रार्थना कर सकता है या उनसे खेल सकता है, शांति की खोज कर सकता है अथवा धन्यवाद दे सकता है। दैवियता की संपूर्ण विस्मयकारी, अवर्णनीय प्रकृति को कम करके सुविधाजनक अनुपात में देवी-देवता का आकार दिया गया है। यह इस तरह से होना चाहिए; बिना आकृति के देवत्य का साधारण मस्तिष्क के लिए बहुत विस्मयभरी धारणा है।

Content: गहरे, रहस्यपूर्ण स्तर पर, एक और संदेश है जिसे शक्तिशाली बनाया गया है - आपके सामने जो मूर्तियां है वह आपके जैसी ही आकृति में हैं फिर भी वह दैवीय है। वह आपके बारे में क्या कहता है ? उसके बारे में सोचें। अगर आप मूर्ति के पुजारी हैं, स्वयं की निंदा करने की कोई आवश्यकता नहीं है। जैसे जैसे आप आध्यात्मिक स्तर पर विकसित होंगे, स्वयं को बिना मूर्ति के भी दैविय शक्ति से उसी कुशलता के साथ आदान-प्रदान करने न आप

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Content: अपने को सक्षम पाएंगे। उसी तरह जैसे जब बच्चे बड़े हो जाते हैं तो गुड़ियों से खेलना बंद कर देते हैं, वक्त आने पर आप अपनी स्वेच्छा से मूर्तियों को त्याग देंगे। परंतु अभी यदि अपने प्रिय देवता की पूजा आपको खुशहाली का अहसास कराती है, तो अवश्य ऐसा करें। आध्यात्मिकता एक विशाल, छोर रहित सागर है। जब आप केवल तैरना सीख रहे हैं, तो जीवन पेटी ही आपको आत्मविश्वास बनाए रखने में मदद करेगी, जीवनरक्षक पेटी के बारे में आप निश्चित हो सकें, कुछ जो आपको धोखा न दे। जैसे जैसे आप शक्तिशाली और दृढ़ होते जाएंगे, आप स्वभावतः ही उसकी पकड़ को छोड़ कर गहरे पानी में प्रवेश करेंगे, आजादी के साथ और बिना किसी भय के।

Content: रीति-रिवाजों के लिए, यह वैज्ञानिक तरीके से प्रमाणित हो गया है कि कुछ रंग, ध्वनि, गतिविधियां आपके मस्तिष्क की अवस्था पर गहरा प्रभाव डाल सकती है, मस्तिष्क के इच्छित क्षेत्रों को क्रियाशील किया जा सकता है, और आपकी चेतना का विस्तार कर सकता है। आज रीति रिवाज अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है केवल इसलिए क्योंकि वक्त के साथ जन-समूह में उनका वास्तविक अर्थ खो गया है। केवल रीति-रिवाजों का खोखलापन रह गया है; आत्मा चली गई है। अगर आज यह आपको अप्रासंगिक लगते भी हैं, तो भी रीति रिवाजों की असली क्षमता को कभी कम करके न आंकें। रीति रिवाज शताब्दियों से ज्ञान और अनगिनत ज्ञानी गुरुओं के तपस का सत्त (निचोड़) है। जब

Content: उचित तरीके से किया जाए, तो रीति-रिवाजों में प्रचंड शक्ति है, वह अकल्पनීය स्तर की जागरुकता और बदलाव ला सकते हैं।

Content: आश्रम में, आप मुझे प्रायः पूजा व यज्ञ करते हुए पाएंगे। वास्तव में, इनका मेरे लिए कोई अर्थ नहीं है, मुझे दैवीय शक्ति से आदान-प्रदान करने के लिए किसी मार्ग की आवश्यकता नहीं है। यह मेरे लोगों के लिए है। मैं ऐसा आप सबका ध्यान एक जाने पहचाने क्षेत्र में खींचने के लिए करता हूं, एक स्थान जहाँ आप सुरक्षित और शांत महसूस करें। एक वातावरण जो वर्षों की पूजा से पवित्र हो गया है, अपने प्रिय देवी-देवताओं के आगे सर झुकाना एवं चिर परिचित मंत्रों के उद्धारण को सुनना, एक शांत, ध्यानशील अवस्था संचारित: ही आपको प्रभावित करती है। इस समय, आप पूरी तरह खुले और समर्पित होते हैं, मेरी ऊर्जा को ग्रहण करने वाले। यही वह समय होता है जब मैं आपकी जानकारी और प्रतिरोध के बिना ही, आप पर सही मायने में मेहनत कर सकूँ क्या अब आप मुझे समझ रहे हैं? (अवश्य ही, मैंने अभी बचपन नहीं त्यागा, और इसीलिए मैं इन सुंदर मूर्तियों से खेलने का आनंद पूरी तरह से लेता हूं – परंतु यह दूसरी बात है!)

Content: ... प्र. स्वामीजी, कर्म क्या है ?

Content: कर्म क्या है, मैं आपको बताता हूं।

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Content: जब भी एक गतिविधि शुरू होती है, परंतु पूरा न हुआ हो, तो एक शक्ति होती है जो आपको उसे पूरा करने के लिए खींचती है, उसे समाप्ति की ओर ले जाने के लिए। यह शक्ति कर्म है। जिसका स्वाद अपने चखा है, चाहा है परंतु पूरी तरह अनुभव नहीं किया है, आपको लगातार उस अनुभव को दोहराने के लिए खींचती रहेगी, जब तक आपको संतुष्टी का अहसास न हो। आप उस गतिविधि को दोहराते रहेंगे जब तक आप वास्तव में वही अनुभव न बन जाएं क्योंकि आप पूर्ति हैं। आप केवल इन गतिविधियों को पूरा करने के लिए ही शरीर में प्रवेश करेंगे। इस पूर्ति के दौरान, आपका सम्बन्ध इन वस्तुओं से पड़ता है, इन ‘मुसीबतों’ से।

Content: मैं कर्म के लिए यही व्याख्या देता हूं। दूसरे सभी शब्द- मेरे बुरे कर्मों की वजह से ही मुझे यह रोग हो गया, मेरे अच्छे कर्मों की वजह से ही मैं स्वामीजी से मिल सका-यह सब केवल बातें हैं जिसे हम घटना के घट जाने के बाद कहते हैं। जो भी होता है, हम उसे कर्म का नाम देते हैं।कर्म शब्द को बहुत गलत समझा जाता है। मैं आपको कर्म की व्याख्या नहीं बता रहा हूं जैसा कि हम समझते हैं मैं कर्म को तकदीर या विधि का विधान नहीं मानता हूं। मेरे अनुभव के अनुसार, विधि जैसा कुछ नहीं होता। वर्तमान पूरी तरह अस्तित्व द्वारा खुला होता है। यह हम ही हैं जो निर्णय करते हैं।

Content: रामकृष्ण एक बहुत ही सुंदर कहानी कहते हैं, जो आपको विषय पर बौद्धिक स्पष्टता देगी। अवश्य ही, आपको कोई भी कर्म के बारे में अस्तित्वात्मक या अनुभव जन्य स्पष्टता नहीं दे सकता, जैसा कि वह वास्तव में है- स्पष्टता के वल ज्ञान की अवस्था के साथ ही होती है। और ज्ञान होने के बाद उसे व्यक्त नहीं कर सकते।

Content: कर्म के बारे में एक कहानी :

Content: एक गाय एक खम्बे से पांच मीटर रस्सी से बंधा था। उसके घेरे के अंदर वह बैठ सकती थी, खड़ी हो सकती थी, खाना खा सकती थी, जो मन चाहे कर सकती थी। हमारा जीवन भी बिल्कुल वैसा ही है। हमारे पास सीमित मात्रा में आजादी होती है, शेष अस्तित्व के हाथों में होती है। परंतु रामकृष्ण यह भी कहते हैं, अगर हम पांच मीटर आजादी का इस्तेमाल बुद्धिमता के साथ करें, संभव है कि अस्तित्व हमारी रस्सी को बढ़ा दे, या हमें पूरी तरह आजाद कर दे। यह दोनों हम और हमारे गुरु पर निर्भर करता है, जीव और शिव पर। आप चुन सकते हैं कि गुलामी में रहना है या आजादी की ओर आगे बढ़ना है।

Content: किसी ने गायमालिक से एक बार पूछा, ‘क्या हो अगर गाय काटने सीख जाए और रस्सी तोड़ दे ?’ सबसे पहले, क्या आपको मालूम है कि रस्सी कहां है ? किस वृक्ष की डाली से बंधा है ? वह कहां शुरू होता है और खत्म होता है ? कहां पर काटना है ? कैसे काटना है ? एक

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Content: साधारण गाय और रस्सी के मामले में तो गाये इनको देख सकती है। आप लोगों को तो पता भी नहीं होगा कि यहाँ कहाँ आपकी रस्सी है ! तो जो मैं आपको दे सकता हूँ वह एक झलक है, मुझमें और अस्तित्व में प्रवेश करने की प्रेरणा।

Content: ... प्र. स्वामीजी, जब दिमाग केवल ‘अंतर संवाद’ है, तो क्या दैवियता के निकट आने के लिए बुद्धि को त्यागना आवश्यक है ?

Content: इससे पहले कि मैं इसका जवाब दूँ, आपको दिमाग के क्रिया कलापों को समझने की आवश्यकता है। दिमाग चार कार्यों का मिला जुला हिस्सा है: मनस (जो आपके इन्द्रियों से बाहरी दुनिया की सूचनाएं ग्रहण करता है), चित्त (ब्रह्मांड संबंधी ज्ञान की स्मृति या लेखा जोखा), बुद्धि, (समझना) अहंकार (अहम्) इन सबसे परे है आत्मन ( स्वयं )। सभी सूचनाएं दिमाग के इनही क्षेत्रों से होकर जाती हैं।

Content: उदाहरण के लिए, जब आप एक गेंदे का फूल देखते हैं, अनकही सूचना, ‘पीला फूल’ आपकी आंखों से मानस द्वारा सोख ली जाती है, जो पूर्व में देखे गए सभी फूलों के लेखे जोखे से उसको मिलाती है, और निश्चित करती है कि वह खास फूल परिचित है या नहीं।

Content: इसके बाद यह लेखा जोखा बुद्धि के पास चला जाता है, जो निष्कर्ष निकालता है कि पीला फूल गेंदे का फूल है, वह बड़ा है, वह सुगंधित फूल नहीं है आदि।

Content: उसके बाद अहंकार की बारी आती है, जिसकी जिम्मेदारी है स्वार्थपरता पर आधारित धारणा बनाना जैसे। ‘मैं इस फूल को पसंद करता हूँ’ या ‘मुझे लगता है पड़ोसियों के बगीचे में बेहतर गेंदे के फूल हैं’ या ऐसा ही कुछ। अहंकार की सूचनाओं को आधार बनाकर आत्म निर्णय लेता है कि क्या करना है: ‘फूल को तोड़ें’! या ‘फूल को पानी दो’! या ‘उसे फेंक दो’!

Content: इस व्यवस्था के विषय में एक दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि जिस वक्त तक सूचना आत्मन तक पहुंचती है, वह पहले से ही अंहकार द्वारा छनकर आती है-इसका परिणाम यह होता है कि जो आप देखते और करते हैं वह वास्तविकता नहीं है, परंतु वास्तविकता का स्वार्थपरक रूपांतर होता है जो आपको अहम् दिखाना चाहता है। आश्चर्य की बात नहीं आप अज्ञानता और उलझन की स्थिति में होते हैं, और इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि मस्तिष्क के अंतरसंवाद के योग्य है!

Content: जब प्रज्ञा जागृत होती है, अहम् स्वाभाविक मौत मरता है। पहली बार, आत्मन इस स्थिति पर सीधा नियंत्रण करता है। यह राष्ट्रपति शासन की तरह है ! प्रचंड ऊर्जा के सोत खुल जाते हैं और उपलब्ध होते हैं। सूचना का सोखना अब मात्र पांचों इन्द्रियों पर निर्भर नहीं रहता है। परिणामस्वरूप, सूचना को तैयार करना और निर्णय लेना बहुत अधिक जल्द व कुशल हो जाता है - परिणामस्वरूप साधारण आंखों को यह चमत्कार लगेगा। यही

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Content: वह अवस्था है जिसमें योगी उड़ते हैं, वस्तुओं को कहीं भी उत्पन्न कर देते हैं, और ऐसे ही चमत्कार करते हैं। यह वह जादुई अवस्था है जिसका अनुभव दैवियता के साथ सुर मिलने पर होता है।

Content: तो देखें, दैवीय शक्ति के निकट आने के लिए, जो वस्तु आपको त्यागनी होनी होंगी वह दिमाग या बुद्धि नहीं बल्कि केवल अहं होगा। नहाने के पानी के साथ बचे को भी फेंकने की गलती न करें !

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Content: आज परमहंस नित्यानंद का व्यक्तित्व दुनिया भर के लाखों लोगों के लिये एक प्रेरणा है। उन्होंने अपने सच्चे अनुभव के आधार पर परमानंद प्राप्ति को तकनीक बनायी और हर व्यक्ति के लिये भेंट की।

Content: उनकी पद्धति हमें शारीरिक और मानसिक दृष्टि से स्वस्थ गहरी आध्यात्मिक शक्ति देती है। विश्व के लाखों लोगों ने उनकी तकनीक से थोड़े समय में आभूत परिवर्तन का अनुभव किया है।

Content: वे ऐसे साधन देते हैं जिनसे बुद्धि या प्रतिभा के द्वारा नहीं बल्कि अंतरदृष्टि और अभिज्ञता द्वारा सक्रिय और रचनात्मक जीवन जीने का निर्देश मिलता है। वे बाह्य संसार में श्रेष्ठता तथा आंतरिक संसार में आलोक लाने की राह एक साथ दिखाते हैं। उनके कार्यक्रम व्यक्ति को सहज रूप से भजन-प्रार्थना में लीन होना सिखाते हैं।

Content: परमहंस नित्यानंद कहते हैं, 'इस भौतिक संसार सफलता की मास्टर कुंजी ध्यान - है। वह तुम्हारे आंतरिक जगत् में गहरी संतोष देती है।' उनके ध्यान- कार्यक्रम में जो शक्तिशाली तकनीक और प्रणाली होती है, वह व्यक्ति की चेतना को थोड़े समय में ही पुष्ट और प्रस्फुटित होने में मदद करती है।

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Content: परमहंस नित्यानंद संसार भर के वैज्ञानिकों और अनुसंधानकर्तव्य के साथ काम करके वैज्ञानिक सामग्री के आधार पर रहस्यमय घटनाओं को लिपिबद्ध करते हैं। वे स्वयं अपनी स्नात्यविक व्यवस्था से चिकित्सा विज्ञान के जगत को कुतूहल से भर देते हैं। इस सारे आश्चर्यजनक अवलोकन के बार वैज्ञानिकों को लगता है कि दिल की बीमारी, कैंसर, जोड़ों का दर्द, शराब का नशा आदि की बीमारियों का अनुपात, उनका बढ़ना आदि की स्थिति को बदलने की संभावना हो सकती है।

Content: लाइफब्‍विस फाउंडेशन संपूर्ण विश्व में फैला नित्यानंद का वह आंदोलन है जो ध्यान और परिवर्तन के लिये है। इसकी स्‍थापना २००३ में हुई। तब से अब तक तेंतीस देशों के एक हज़ार केन्द्रों में यह संस्था व्यक्ति को बदल कर मानवता के जीवन में बदलाव ला रही है।

Content: नित्यानंद मेडिटेशन अकादमी (एन एम ए) संसार भर में आध्यात्मिक प्रयोगशालाओं की तरह कार्य करती है, जहाँ आंतरिक विकास गहरा है और बाह्य विकास एक सहज परिणाम है। ये अकादमियाँ पवित्र वटवृक्ष, विडडी आश्रम, भारत जैसी जगह और स्थान के रूप में देखी जाती हैं, जहाँ ध्यान से

Content: लेकर विज्ञान तक से जुड़े ऐसे कार्यकलापों की भीड़ है जो निरंतर खोज तथा प्रस्फुटन में लगे रहते हैं।

Content: हैदराबाद आश्रम, भारत में भरपूर आध्यात्मिकता देते हैं, जहाँ भौतिक और आध्यात्मिक संसार एक हो जाते हैं और परमानंद पूर्ण जीवन का सृजन करते हैं; जहाँ चेतना की गहराई से सक्रिय बुद्धि निकलती है।

Content: दुनिया भर की बहुतसी अकादमियों में अनेकों योजनायें विकसित हो रही हैं, कई नई अकादमियों की भी स्थापना हो रही है, जिससे फैली हुई मानवता की विभिन्न क्षेत्रों में सेवा की जा सके।

Content: संस्था द्वारा विश्व भर में विभिन्न प्रकार के भजन-प्रार्थना कार्यक्रम किये जाते हैं तथा सामजिक सेवायें भी की जाती हैं।

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Content: रोगहर व्यवस्था द्वारा नित्य हीलिंग लोगों को मुफ्त में दिया जा रहा है। युवाओं को मुफ्त शिक्षा, कला और संस्कृति के लिये प्रोत्साहन, सत्संग, व्यक्तित्व विकास कार्यक्रम, मुफ्त डॉक्टर कैम्प, आँखों के आपोरेशन आदि की सुविधा दी जाती है। भारत में आवासीय आध्यात्मिक प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत एक वर्ष के लिये आवासीय गुरुकुल व्यवस्था की गयी है जिससे विश्व भर के बच्चों को गुरुकुल के ढंग से विद्या दी जाये। सालोम आश्रम, भारत में और भी बहुत प्रकार की सेवायें उपलब्ध करवायी गयीं है और की जा रही हैं। नित्य धीर सेवा सेना (एन डी एस एस) के आनंद सेवकों के स्वयं सेवक दल में दुनिया भर के युवक आ रहे हैं। समर्पित स्वयंसेवकों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, वे बड़े उत्साह के साथ इस मिशन को सहयोग रहे हैं।

Content: लॉस ऐंजेलेस आश्रम, यू.एस.ए.

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Content: संपर्क करें:

Content: यू एस ए: नित्यानंद ध्यानयीठम् ९२८ हंटिंग्टन डी आर, दारते, लॉस एंजेलेस सी ए ९०१०, यू एस ए फोन: १०२-६२९१४०० ईमेल: [email protected] यू आर एल: www.lifebliss.org, www.lifeblissgalleria.com [email protected]

Content: भारत: नित्यानंद ध्यानयीठम् नित्यानंद पुरी, कल्लूरगोपहल्ली, मैसूर रोड, बैंगलोर - ५६२१०९, कर्नाटक, भारत फोन: ९१८० ६५५९ १८४४ / २७० २०८४ फैक्स: ९१ +८० २७२८८०७७ ईमेल: [email protected] यू आर एल: www.dhyanapeetam.org विश्व भर के अन्य आश्रमों और केन्द्रों के लिये भेंट करें www.dhyanapeetam.org

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Content: निश्चित रूप से पढ़ने योग्य पुस्तकें :

Content: सरल सत्य - सीधा और प्रत्यक्ष

Content: प्रेम की समझ

Content: क्या आध्यात्मिकता आज के समय में प्रासंगिक है?

Content: चिंता से उत्सुकता तक

Content: पीड़ा से आनन्द तक

Content: निश्चित समाधान (ग्यारेंटीड सोलुशन्स)

Content: ध्यान के विधियाँ आप के लिए

Content: www.nithyananda.org

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Content: अगर आर्का सवाल मर्ि ास्थित म्र्ो अनि आ वलीन हा जाती है, ता यि आर्का प्रकृतप्रि्न नहीं है, कवल आर्का मन का एक खलि मात्र है॥

Content: PUBLISHED BY NITHYANANDA VEDIC SCIENCES UNIVERSITY PRESS

Content: A division of Nithyananda Vedic Sciences University, USA

Content: Ebook ISBN:

Content: 979-8-88572-048-9

Content: परम हंस नि त्या नंद

Content: आपके प्रश्नों का समाधान

Content: ('your Questions Answered' in Hindi)