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1. isbn 979-8-88572-697-9.pdf

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Content: नित्यानंद

Content: कर्म-बन्ध

Content: ('Karma' in Hindi)

Content: क्या श्रृंखला

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Content: क्यों शृंखला

Content: कर्म-बन्ध

Content: नित्यानंद

Content: कर्म क्या है?

Content: क्या इससे मुक्त होना सम्भव है?

Content: अगर हाँ, तो कैसे?

Content: नित्यानंद कर्मों की एक आधुनिक और सुरुचिपूर्ण समझ प्रस्तुत करते हैं।

Content: Published by Nithyananda Publishers

Content: नित्यानंद पब्लिशर्स् द्वारा प्रकाशित

Content: Ebook ISBN: 979-8-88572-697-9

Content: भारत में M.R.P.: Rs. 20/-

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Content: The meditation techniques included in this book are to be practiced only under the direct supervision of an ordained teacher of Nithyananda Dhyanapeetam and in consultation with your personal physician to determine your fitness and ability to do the techniques. They are not intended to be a substitute for medical attention, examination, diagnosis or treatment. If someone tries these techniques without prior participation in the meditation programs of Nithyananda Dhyanapeetam and without the direct supervision of an ordained teacher of Nithyananda Dhyanapeetam, they shall be doing so entirely at their own risk; neither the author nor Nithyananda Dhyanapeetam nor Nithyananda Publishers shall be responsible for the consequences of their actions.

Content: Published by:

Content: Nithyananda Publishers

Content: Nithyanandapuri, Off Mysore road, Bidadi - 562 109, Bengaluru

Content: Karnataka state, India

Content: Copyright© 2010 - ‘Radiating Enlightenment’ year

Content: First Edition: January 2010, 1000 copies

Content: M.R.P in India only: Rs. 20

Content: ISBN 13: 978-1-60607-091-8 ISBN 10: 1-60607-091-6

Content: All rights reserved. No part of this publication may be reproduced, or stored in a retrieval system, or transmitted by any form or by any means, electronic, mechanical, photocopying, recording or otherwise, without written permission of the publisher. In the event that you use any of the information in this book for yourself, the author and the publisher assume no responsibility for your actions.

Content: All proceeds from the sale of this book go towards supporting charitable activities.

Content: Printed in India by

Content: Dee Gee Printers, Varanasi.

Content: Mob. +91+9935408247.

Content: कर्म-बन्ध

Content: ('Karma' in Hindi)

Content: क्यों

Content: शृंखला

Content: नित्यानंद

Content: Published by Nithyananda Publishers

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Content: अनुक्रम

Content: कर्म-बन्ध क्या है?

Content: चेतन हो जीएँ और कर्म-बन्ध से बचे

Content: कर्म-बन्ध से जुड़े हुए भ्रम

Content: अर्चामूर्ति और आत्मज्ञानी गुरु - कर्मसंग्रह

Content: समाप्त करने का मार्ग

Content: अनुष्ठान और कर्म-बन्ध - एक सुंदर नाता

Content: तीन प्रकार के कर्म-बन्ध और 'दीक्षा' -

Content: उनसे मुक्ति का मार्ग

Content: पूजा का अनुष्ठान - 'क्लिक्स' को सुदृढ़ -

Content: बनाने की विधि

Content: गुरु-पूजा

Content: ध्यान और चेतना - कर्म-बन्ध से मुक्ति का उपाय

Content: कर्म-बन्ध से जुड़ी कुछ और बातें

Content: नित्यध्यान जीवन आनंद का स्रोत

Content: परिशिष्ट

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Content: कर्म-बन्ध क्या है?

Content: हममें से अधिकांश लोगों ने 'कर्म' शब्द को सुना होगा। हममें से प्रत्येक इसका कुछ अर्थ समझता है, जैसा उसने पुस्तकों में पढ़ा हो या दूसरों से सुना हो। कर्म के विषय को स्पष्टता से समझने की आवश्यकता है। क्योंकि यह जीवन-मरण चक्र का आधार है। यह आनंदमयी जीवन की आधारशिला है।

Content: कर्म उन अतृप्त अनुभूतियों का गुच्छा है जो हममें निवास करती है और अपनी तृप्ति के लिये हमें लगातार अपनी ओर खींचती रहती है। यह अतृप्त अनुभूतियाँ हमारे अंदर इसलिये निवास करती हैं क्योंकि हमने कुछ क्रियाएँ पूरी गहनता और गहराई के साथ नहीं किया। वे क्रियाएँ अपने पीछे इन अतृप्त अनुभूतियों को हमारे अंदर छोड़ जाती हैं। किसी भी कार्य को जब हम गहनता और गहराई के साथ करते या अनुभव करते हैं तो वह हमेशा के लिये हमारे तंत्र से बाहर निकल जाते हैं। हम उनसे मुक्त हो जाते हैं। लेकिन

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Content: कोई भी अनुभव जिससे हम पूरी तरह नहीं गुजरते हैं, जिससे हमारी पूर्ण तृप्ति नहीं हो पाती है, जिसे हमारी पूर्ण ऊर्जा, ध्यान और सजगता नहीं मिली होती है, वह हमारे अन्दर कर्म-बन्ध के रूप में रह जाता है।

Content: उपनिषद में एक सुन्दर छंद है ;

Content: ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

Content: पूर्ण से पूर्ण निकला है। यदि आप पूर्ण से पूर्ण निकालते हैं तो पूर्ण ही बचता है।

Content: इसका अर्थ यह है कि हमारा मूलभूत स्वभाव पूर्णता या तृप्ति है। हम जो भी करते हैं उसमें तृप्ति ही ढूँढते हैं। यद्यपि हम कुछ अतृप्त कर्म साथ लिये होते हैं परन्तु हमारा मूल स्वरूप पूर्ण तृप्ति का है, पूर्णता का है। इसलिये जो भी कर्म तृप्त नहीं हुआ है, वह ज्यादा समय तक हमारे अन्दर शांत नहीं रह सकता।

Content: वह अपनी ओर से स्वयं को तृप्त करने का पूरा प्रयास करेगा। वह बार-बार हमें उसी कार्य को करने को उत्रेरित करेगा, जिससे उसकी तृप्ति हो सके। कोई भी इच्छा, कोई भी अनुभूति जो हमारे तंत्र में पूर्णता को प्राप्त नहीं कर पायी, वह कर्म-बन्ध के रूप में बची रहेगी और हमें बार-बार उसी अनुभव से गुजरने के लिये विवश करेगी, जब तक कि वह तृप्त नहीं हो जाती।

Content: जीवन में हम निरंतर निर्णय लेते हैं। ये निर्णय केवल हमारे जीवन की बड़ी-बड़ी घटनाओं के लिये नहीं होते, बल्कि जिन शब्दों को हम निरंतर बोलते रहते हैं, जिन विचारों को

Content: हम निरंतर पोसते रहते हैं वे भी हमारे निर्णय ही होते हैं। हमारे समस्त विचार, शब्द और कार्य सम्मिलित रूप से हमारे कर्म की झोली में योगदान करते हैं। क्योंकि इनमें से कोई भी हमें तृप्त नहीं कर पाता और जब वे हमें तृप्त नहीं कर पाते, तो वे कर्म का बोझ बन जाते हैं और हमें उन्हें तृप्त करने के लिये निरंतर विवश करते हैं।

Content: हम स्पष्टता के बिना, तृप्ति के बिना गहरे अज्ञानता के साथ सोचते, बोलते और कार्य करते हैं। जब हम ऐसा करते हैं, तब तृप्ति का जो हमारा मूल स्वभाव है वह व्यथित होने लगता है। फलस्वरूप, हमारे अपने विचार, शब्द और कार्य ही हमारे कर्म-बन्ध बन जाते हैं और किसी भी प्रकार तृप्ति पाने के लिये हमें ढकेलते रहते हैं।

Content: स्पष्ट रूप से समझें, आप यहाँ हैं, मेरा प्रवचन सुन रहे हैं, यह आपके पिछले सभी निर्णयों का نتیजा है। आपने जो विज्ञापन पत्र देखा, उस पर ध्यान देने का निर्णय लिया। आपने अधिक जानकारी पाने का निर्णय लिया। आपने कार में बैठकर उसे चलाने का निर्णय लिया। आपने कार को यहाँ रोकने का निर्णय लिया।

Content: आपके इन सारे निर्णयों की समग्रता का आपके यहाँ बैठने में योगदान है। यह वर्तमान क्षण आपके अतीत के समस्त निर्णयों का समग्र रूप है। इसी तर्क के अनुसार, आपका भविष्य आपके वर्तमान के समस्त निर्णयों का जोड़ होगा।

Content: कर्म का संपूर्ण सिद्धान्त यही है- आपके अतीत का जोड़ है आपका वर्तमान और आपके वर्तमान का जोड़ है आपका भविष्य।

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Content: चेतन हो जीएँ और कर्म-बन्ध से बचे

Content: समस्या यह है कि प्रतिक्षण हम जो निर्णय लेते हैं उनमें से अधिकांश हम अचेतन से लेते हैं। दिनभर के हजारों निर्णय हम अचेतन से लेते हैं। चाहे वह सोचना, बोलना या करना हो, वह बिना सजगता के हमारे अचेतन से होता है।

Content: यही कारण है कि हमारे जीवन में होने वाली बहुत सारी घटनाओं के कारण और प्रभाव को हम नहीं समझ पाते हैं। हमें हमेशा लगता रहता है कि हमें उचित परिणाम नही मिले। हम आनन्दपूर्वक इस बात से अनभिज्ञ है कि हम स्वयं ही उन परिणामों के कारक हैं। अपने अचेतन जीवनयापन द्वारा हमने उन परिस्थितियों को उत्पन्न किया और अन्ततः अधिक कर्म-बन्ध एकत्रित कर लिया।

Content: अपने विचार-तंत्र में अधिक सजगता और बुद्धिमता प्रवाहित करें। अपने निर्णय-तंत्र में अधिक चेतना प्रवाहित करें। चाहे आप विश्वास करें या ना करें, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आप अपने जीवन की समस्त चीजों को चुनते हैं। कोई और नहीं चुनता है। यह आप हैं जो चुनाव करते हैं। निरंतर ही यह आपका चुनाव है, आपका निर्णय है। आप भले ही यह सोच सकते हैं कि कोई और आपके निर्णय लेता है। नहीं! यह आप ही हैं जो सदा निर्णय लेते रहे हैं।

Content: एक छोटा सा उदाहरण इस मूल सत्य को समझने में सहायक होगा।

Content: यदि कोई व्यक्ति आपकी निंदा करता है तो आप का चुनाव होता है- नाराजगी। यदि कोई आपकी प्रशंसा करता है तो आपका चुनाव होता है- प्रसन्नता। आदत के अनुसार आप यह चुनाव अचेतन से करते हैं। क्या कोई और आपके स्थान पर चुनाव करता है? नहीं! यह शुद्ध रूप से आपका चुनाव होता है।

Content: चूँकि यह आपकी आदत बन गयी है, आप भूल चुके हैं कि आप ही निर्णय लेते हैं। हर बार जब कोई आपकी निंदा करता है, आप दुखी हो जाते हैं। हर बार जब कोई आपकी प्रशंसा करता है, आप खुशी से फूल जाते हैं। इस बात को समझें की आप चाहे तो अलग प्रतिक्रिया भी कर सकते हैं। उदाहरण स्वरूप, जब कोई आपकी निंदा करता है तो आप चाहें तो आप दुःखी नहीं हो सकते हैं। आप निर्णय कर सकते हैं कि आप शांत और सहज बने रहेंगे। दुःखी होना तो आपका चुनाव है। जब आप अपने चुनाव को सही साबित

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Content: करना चाहते हैं, तब आप और गड़बड़ी पैदा कर लेते हैं। जब तक आप यह नहीं समझ लेते कि आपका जीवन आपका अपना चुनाव है, तब तक आपका जीवन एक रोग के समान रहेगा। उसमें स्वतंत्र प्रवाह कभी नहीं होगा। स्वतंत्र प्रवाह तभी आयेगा जब आप ये समझ लें कि आपके जीवन में सबकुछ आपका अपना ही चुनाव है।

Content: लोग मुझसे पूछते हैं- स्वामी जी, हम जन्म कैसे लेते हैं? कौन हैं जो हमारे जन्म और जीवन का निर्णय लेते हैं? मैं आपसे कहता हूँ, यह आप स्वयं हैं जो अपने जन्म और अगले जन्म का निर्णय लेते हैं। आप स्वयं ही निर्णय करते हैं कि अगले जन्म मैं आप कैसा शरीर ग्रहण करेंगे।

Content: इस तथ्य को ध्यान में रखकर यदि आप सम्पूर्ण सजगता के साथ सोचने, बोलने और करने का कार्य करेंगे तो फिर आप उतना ही करेंगे जितना की इस जन्म के निर्धारित कर्म-बन्ध को समाप्त करने के लिये आवश्यक है। आप नये कर्म-बन्ध नहीं बनायेंगे। हम जब कर्म-बन्ध की चर्चा करते हैं, तो लोग सोचते हैं कि नया कर्म-बन्ध इकट्ठा न हो इसके लिये उन्हें कायों से दूर होकर निष्क्रिय हो जाना चाहिये। नहीं! आध्यात्मिकता कर्म-फल के त्याग में हैं, कर्म त्याग में नहीं।

Content: कर्म के फल का सर्मपन किया जाना चाहिए, कर्म का नहीं। इसे स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए। आपको पूर्ण रूप से अपने कायों में लगे रहना चाहिए और आगे का कर्म-बन्ध नहीं बनाना चाहिए। इसी को आध्यात्मिकता कहते हैं। हर क्षण आंतरिक तृप्ति के साथ, आप इस भौतिक संसार में रहते हुए भी इससे प्रभावित न हो, ऐसा सक्षम होना चाहिए।

Content: कर्म-बन्ध से जुड़े हुए भ्रम

Content: कुछ लाग सोचते हैं कि समाज-सेवा करने से कर्म-बन्ध का नाश होता है।

Content: नहीं, ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि कर्म-बन्ध को गहरी समझ, सजगता और चेतना के एक झलक से ही समाप्त किया जा सकता है। सम्पूर्ण मानव-जाति इच्छित परिणाम न देने वाले कार्यों में लगा पड़ा है। यहीं स्थिति समाज-सेवा के क्षेत्र में भी है। कर्म-से-कम सेवा के क्षेत्र में तो धन का या यश का विचार न करें। किसी को प्रभावित करने की कोशिश न करें। अपनी उपस्थिति जताने का प्रयत्न न करें। सेवा कार्य को सेवा के लिये करें। कोई योजना जरूरी नहीं है। कोई भी सेवा कहीं भी कर लें।

Content: इस प्रकार की सेवा आपके अन्तःकरण में असीम शक्ति भर देगी। प्रतिदिन कम-से-कम आधे घण्टे निःस्वार्थ और निष्काम भाव से सेवा करें। यह सेवा ही आपके लिये

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Content: ध्यान बन जायेगी। यह आपमें सामूहिक चेतना की ज्योति जगा देगा और सेवा कार्य के दैवी स्वरूप को अनुभव करने का मार्ग प्रशस्त कर देगा।

Content: जब हम निःस्वार्थ सेवा करें, तब भी हमें सावधानं रहना चाहिए कि हम उस कार्य के परिणाम से न बंध जाएँ।

Content: प्रायः सभी सेवा भावी लोग या तो इसलिये समाज सेवा से जुड़ते हैं कि वे बिना कुछ किए रह नहीं सकते, या फिर उन्हें यह बताया गया होता है कि सेवा के पुण्य से उन्हें जन्म-मरण के चक्र से छुटने में सहयोग मिलेगा।

Content: प्रायः समाज सेवा पुण्य बटोरने के लिये किया जाता है, जिससे मरणोपरांत लाभ मिले, चाहे पुनर्जन्म में उस व्यक्ति का विश्वास हो या न हो या फिर हम समाचार पत्र या टेलीविजन में स्वयं को देखकर खुश होना चाहते हैं।

Content: इससे हमारी ध्यान आकर्षण की इच्छा की पूर्ति होती है- इस संसार में या मरणोपरांत दूसरी दुनिया में।

Content: लोग अक्सर यह पूछते हैं, जब संसार में इतने लोग परेशान हैं तब ध्यान करने का क्या मतलब है? ध्यान की जगह हम कोई सेवा कर सकते हैं।

Content: यदि हमें सचमुच लोगों के दुःख-दर्द का अहसास है और करुणा से प्रेरित होकर उनके कष्ट को मिटाने के लिये हम सेवा करते हैं, तो यह बहुत अच्छा है।

Content: परन्तु इसके लिये हमें सामूहिक चेतना की समझ होनी चाहिए, जिससे करुणा जागृत हो सके।

Content: यही नहीं, अपने दैवी-स्वरूप को प्राप्त करना

Content: मानव समाज की सबसे बड़ी सेवा होती है और ध्यान उस दिशा में आपका पहला कदम है।

Content: समस्या यह है कि आपको बताया गया है कि यदि आपने पाप बटोरे तो आपको नरक जाना पड़ेगा और पुण्य इकट्ठा किया तो स्वर्ग मिलेगा।

Content: समाज इन बातों के द्वारा आपको नियंत्रित करता है। इन्हीं मतों के द्वारा आप पर यह नियंत्रण का प्रयास कर सकता है।

Content: भय और लाभ के द्वारा समाज आप पर नियंत्रण बनाने का प्रयास करता है- नरक का भय और स्वर्ग का लोभ।

Content: इसे समझ लें कि कोई पुण्य कार्य या पाप कार्य मृत्यु के समय आपके काम नहीं आयेगा।

Content: कोई स्वर्ग और नरक नहीं है।

Content: स्वर्ग और नरक दोनों ही आपकी मनःस्थितियाँ हैं, सुदूर ईश्वर के साम्राज्य में बने हुए स्थान नहीं।

Content: जब आप अच्छे विचार करते हैं, अच्छे कार्य करते हैं, आपको अच्छा लगता है और यही स्वर्ग है।

Content: आप जब बुरा सोचते हैं, बुरा करते हैं, तब आपको बुरा लगता है और वही नरक है।

Content: बस इतना ही।

Content: कर्म का सार यही है।

Content: कारण और प्रभाव का ब्रह्माण्डीय सिद्धान्त यही है।

Content: आप वही हैं जो आपकी इच्छा है।

Content: आप वही बनेंगे जो आपकी इच्छा है।

Content: यदि आप वैसे विचारों, शब्दों और कार्यों में संलग्न होते हैं, जो आपकी सजगता से उत्पन्न न होकर अचेतन से निकलते हैं, तब आप कर्म-बन्ध बना लेते हैं, जो आपको उन्हें तृप्त करने के लिये उकसाता रहता है।

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Content: अर्चामूर्ति और आत्मज्ञानी गुरु - कर्मसंग्रह समाप्त करने का मार्ग

Content: कर्म-बन्ध एकत्रित न करने के लिये स्वयं को बार-बार स्मरण करने का और पहले से एकत्रित कर्म-बन्ध के प्रभाव से मुक्त हो जाने का एक मार्ग है। एक जागृत चेतना की उपस्थित में कर्म-बन्ध शक्तिहीन हो जाते हैं, इस बात को स्पष्ट रूप से समझना, इस दिशा में पहला कदम है।

Content: एक बार यह बात अगर समझ में आ गयी, फिर तो प्रतिदिन किये जाने वाले अनुष्ठान ही एकत्रित कर्मों को समाप्त करने में सहायक सिद्ध होंगे। आइये देखे यह कैसे संभव है! एक साधारण व्यक्ति और आत्मज्ञानी गुरु के बीच में एक महत्वपूर्ण अंतर है। एक साधारण व्यक्ति में अपने शरीर को

Content: अपनी इच्छा-शक्ति द्वारा जीवित करने की क्षमता नहीं होती है या तो उसका शरीर जीवित होता है या मृत, बस इतना ही। यह उसके नियंत्रण में नहीं होता है। परन्तु एक आत्मज्ञानी गुरु का इस पर नियंत्रण होता है। वह चाहे तो अपने शरीर को जीवित कर सकता है या निष्प्राण कर सकता है। अपनी इस क्षमता के कारण वह दूसरों के शरीर को भी जीवित कर सकता है! जब वह एक पत्थर अथवा धातु को जीवित करने का निर्णय लेता है, तब वह पत्थर अथवा धातु उनका प्रतीक बन जाता है।

Content: हमारे मुख्य पारंपरिक मंदिरों के समस्त अर्चामूर्तियाँ आत्मज्ञानी गुरुओं द्वारा ऊर्जावान किये गये हैं। तिरुवनामलाइ के अरुणागिरि योगेश्वर, चिदम्बरम के पतंजलि, तंजावुर के करूरर, तिरुपति के कोंगनावर और मदुरई की मीनाक्षी जैसे गुरुओं ने इन स्थलों के मंदिरों के अर्चा मूर्तियों को ऊर्जावान किया है। इसी कारण से अर्चामूर्तियों को आत्मज्ञानी गुरुओं का शरीर माना जाता है। गुरुओं के शरीर छोड़ने के पश्चात भी शिष्यगण अर्चामूर्तियों की सेवा करते रहते हैं। अर्चामूर्ति का शरीर गुरु के शरीर जैसा ही समझा जाता है। यही कारण है कि अर्चामूर्ति को एक आत्मज्ञानी गुरु जैसा सम्मान दिया जाता है।

Content: उदाहरण स्वरूप, अरुणागिरि योगेश्वर द्वारा दीक्षित सभी शिष्य अरुणाचल मंदिर में वंश-दर-वंश अराधना करते रहेंगे। आप यह देख पाएँगे कि जो भी गुरु को अपर्ण किया जाता है वह अर्चामूर्ति को भी अपर्ण किया जाएगा।

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Content: शरीर छोड़ने के उपरांत भी, अपने द्वारा ऊर्जवान किये गये अर्चामूर्तियों के रूप में, गुरु शिष्यों के समक्ष उपलब्ध होते हैं।

Content: उदाहरण स्वरूप, मेरे जीवनकाल में ही, मेरी शारीरिक उपस्थिति तो हर जगह एक समय में संभव नहीं है। इसलिये इन अर्चामूर्तियों को इस प्रकार गठित किया गया है कि जहाँ-जहाँ मैं सशरीर उपस्थित नहीं हूँ, वहाँ-वहाँ यह मेरा काम करेंगे। ये मेरे प्रतिनिधि हैं।

Content: अर्चामूर्तियों की अपनी स्वयं की बुद्धिमता होती है। इन अर्चामूर्तियों को ऊर्जवान करना एक बड़ी प्रक्रिया होती है। यह एक बच्चे को जन्म देने जैसा है। ऊर्जवान किये गये ये प्रतिमाएँ प्रत्यक्ष रूप से आपके प्रार्थनाओं का जवाब देंगे।

Content: यदि आप उनसे संपर्क साधने को लेकर खुले हैं, तो वह प्रत्यक्ष रूप से आपसे संपर्क साध सकते हैं।

Content: यदि आप हमारी पूजा-पद्धति देखें और हमारे आश्रम की दिनचर्या देखें तो आप पाएँगे कि सुबह में उचित गीत को चलाकर अर्चामूर्ति को जगाया जाता है। उसके बाद छोट से कप में उन्हें उनके बालों के लिये तेल और दाँतों को साफ़ करने के लिए दंतमंजन दिया जाता है। उसके बाद उन्हें स्नान कराया जाता है और उसके बाद इस्तरी किये गये कपड़े दिये जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे गुरु को दिया जाता है। उन्हें भोजन अर्पण किया जाता है और शाम में संध्या आरती की जाती है तथा दिन में पाँच बार पूजा की जाती है। रात में अर्चामूर्ति को विधिपूर्वक विश्राम के लिये बिस्तर प्रदान किया जाता है।

Content: समझें, इन सबसे प्रतिमा अथवा गुरु को कुछ नहीं मिलता मिलता है तो हमें! ईश्वर के साथ जीना इसी को कहते हैं। ईश्वर की उपस्थिति को मान कर जीना इसी को कहते हैं। गुरु की उपस्थिति को जीने को ही पूजा कहते हैं। पूजा प्रतिदिन किया जाता है क्योंकि यह ईश्वर की उपस्थिति को प्रतिदिन स्मरण करने की विधि है।

Content: यदि आप स्वयं में हुए सभी ‘क्लिक्स’ अथवा दीक्षा को, सत्य वाक्यों को तथा विचारों को, जिन्हें सुनने पर आपने एक जुड़ाव महसूस किया था, स्मरण करने का निर्णय लेते हैं, तब यह ही आपका अनुष्ठान बन जाता है।

Content: यह एक अनुष्ठान है, क्योंकि जब आप इसे करते हैं तो आप स्वयं को चेतना की उच्चावस्था में ले जाते हैं। किन्हीं शब्दों को सुनने से या स्मरण करने से आपके अन्दर होने वाले आकस्मिक जागरण को ही ‘क्लिक’ कहते हैं। जब भी आप इन ‘क्लिक्स’ को स्मरण करते हैं, वे आपको निराशा और निम्न भावनाओं से उभारते हैं।

Content: जब भी आप उदास होते हैं या निम्न भाव में होते हैं, तब यदि आप स्वयं को सही ‘क्लिक’ का स्मरण कराते हैं तो आप स्वयं की एक बड़ी सेवा करते हैं। जैसे ही आप ‘क्लिक’ को स्मरण करते हैं, आप निम्न भाव से निकल आते हैं।

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Content: अनुष्ठान और कर्म-बन्ध - एक सुंदर नाता

Content: अब मैं बताऊँगा कि किस प्रकार कर्म-बन्ध और अनुष्ठान प्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे से जुडे हुए हैं।

Content: तीन प्रकार के कर्म-बन्ध होते हैं। अब मैं आपको बताऊँगा कि तीन प्रकार के कर्म-बन्ध कौन से हैं और कैसे अनुष्ठान करने से इन कर्म-बन्धनों का नकारात्मक प्रभाव समाप्त हो जाता है। अब जो समझ मैं आपको देने जा रहा हूँ, उसके द्वारा आप उनके प्रभाव से निकल सकते हैं।

Content: अनुष्ठान बहुत ही शक्तिशाली माध्यम होते हैं। यह अत्यन्त शक्तिशाली विधियाँ हैं। बहुत लोग मुझसे पूछते हैं, 'आप तो आत्मज्ञानी हैं, तब आपको इन अनुष्ठानों को करने की क्या आवश्यकता है?' मैं उनको कहता हूँ, 'चूँकि मैं आत्मज्ञानी हूँ इसलिये ही मैं इन अनुष्ठानों को करके उन्हें करने की उचित विधि और वास्तविक समझ लोगों को सीखा रहा हूँ। आत्मज्ञानी लोगों को स्वयं के लिये अनुष्ठानों की आवश्यकता नहीं होती।'

Content: एक छोटी सी कहानी बताता हूँ :

Content: एक व्यक्ति एक होटल में गया और खाने के लिये इडली मँगवाया। उसने आठ इडली खायी और नौवीं इडली खाते ही उसकी भूख मिट गयी। बैरा उसके पास आकर उसे नौ इडलियों का बिल थमा जाता है। वह व्यक्ति बोला, 'यह क्या है? मैं तो बस उस नौवीं इडली के पैसे दूँगा जिसने मेरी भूख मिटायी! बाकी के आठ इडलियों से तो कुछ भी नहीं हुआ। केवल उस नौवें इडली ने मेरे भूख को तृप्त किया इसलिये मैं तो बस उस इडली के पैसे भरूँगा!'

Content: क्या आपको उस व्यक्ति का तर्क अजीबो-गरीब नहीं लगता? हम भी अपने जीवन में यही करते हैं। अनुष्ठानों को अस्वीकार करना पहली आठ इडलियों को अस्वीकार करने जैसा है। जो लोग यह सोचते हैं कि अनुष्ठान व्यर्थ है और वे सीधा ध्यान और आध्यात्मिक अनुभवों में जा सकते हैं, वह पहली आठ इडलियों को अस्वीकार करने जैसा ही कार्य कर रहे हैं।

Content: यह जानिये, नौवीं इडली ने उन आठ इडलियों के कारण ही अपना असर दिखाया। अगर उस व्यक्ति ने आठ इडलियाँ नहीं खायी होती तो वह नौवीं इडली उसके भूख को नहीं तृप्त कर पाती। इसलिये, आपके ध्यान की विधि काम करेगी क्योंकि आपने निष्ठापूर्वक अनुष्ठानों को किया है।

Content: क्या आप इन प्रारंभिक वस्तुओं को अस्वीकार कर सोचेंगे कि मैं सीधा नौवीं इडली खाऊँगा, तो क्या ऐसा कभी भी हो सकता है? क्या आपकी भूख कभी भी तृप्त हो पायेगी?

Content: जो भी यह सोचते हैं कि वह सीधे नौवीं इडली खा सकते हैं, वह समस्त अनुभवों से चूक जायेंगे। वे केवल नौवीं इडली

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Content: खायेंगे और उसके बाद बैठकर भूख से व्याकुल होते रहेंगे और यही नहीं, चूँकि उन्होंने चीजों को सही तरीके से नहीं किया तो उन्हें वह अनुभव भी नहीं होगा जो उन्हें होना चाहिए था और वे सोचेंगे कि, ‘शायद अनुभव बस इतना ही होता है।’ इस तरह के लोगों को ‘वेदान्तवादी’ कहते हैं- नाम के लिये ध्यान करने वाले। यदि आप उन्हें देखे तो आप पायेंगे कि उनके चेहरे पर खुशी का कोई नामोनिशान नहीं है। वे अनंत निराशा से ग्रसित दिखायी पड़ेंगे, जैसे मानो कि किसी वस्तु को खो दिया हो।

Content: रामकृष्ण परमहंस ने बहुत सुन्दर तरीके से कहा है, ‘जब तक की आप सोचेंगे की आप शरीर हैं, तब तक आप ब्रह्मंडीय ऊर्जा से किसी दूसरे शरीर द्वारा ही जुड़ सकते हैं।’ जिस समय आप ‘मैं शरीर हूँ’ की चेतना से मुक्त हो जाते हैं, केवल तब ही आप दैवी स्वरूप को निराकार के रूप में देख सकते हैं। जब तक की ऐसा नहीं होता है तब तक आपको किसी आकार, अनुष्ठानों, अर्चामूर्ति की आवश्यकता होती है।

Content: अपने मिशन के पहले तीन वर्षों में, 2003 से 2006 तक, मैंने ध्यान की विधियों के साथ किसी अनुष्ठान को नहीं जोड़ा। यह तो 2006 में जाकर मैंने ‘गुरु-पूजा’ को प्रतिदिन के ध्यान, नित्यध्यान में जोड़ा। 2003 से 2005 तक, जिन लोगों को नित्यध्यान की दीक्षा दी गई, उनमें से बस 20% से 30% लोगों ने ही तीन महीने तक ध्यान को किया। तीन महीनों के बाद उन्होंने भी बंद कर दिया।

Content: और अब जब मैंने गुरु-पूजा को नित्यध्यान में डालकर उसे एक अनुष्ठान जैसा बना दिया है, तो 80% से ज्यादा लोग जिन्होंने इसकी दीक्षा ली है, इसे करते आ रहे हैं। मैंने साख्यिकी अध्ययन द्वारा इस बात का पता लगाया है। इसलिये मेरे विचार से, ध्यान के साथ अनुष्ठान का होना अच्छी बात है क्योंकि इससे नित्य बैठकर कोई साधना करने की आदत बनती है।

Content: नहीं तो आप नित्य कोई साधना नहीं करेंगे। पहले दिन आप सोचेंगे, ‘आज मेरी साँस यहाँ है’ या ‘आज बहुत काम है’ और उसे नहीं करेंगे। दो दिनों के बाद जब आपकी साँस वापस लौट जाती है या काम के खत्म होने के पश्चात आप सोचते हैं, ‘मुझे इस छुट्टी का मजा लेना चाहिए। मैं आज नहीं करूँगा।’ या यदि आज आप खुश होते हैं तो सोचते हैं ‘आज तो मैं वैसे ही खुश हूँ तो ध्यान करने की क्या आवश्यकता है?’ या यदि आप निराश होते हैं तो सोचते हैं ‘आज मैं निराश हूँ तो एकाग्रचित होकर ध्यान कैसे संभव है?’ आपका दिमाग ध्यान से पीछा छुड़ाने के लिये कोई न कोई बहाना ढूँढ ही लेता है। परन्तु यदि इसे नित्य करने वाला कोई अनुष्ठान बना दिया जाये, तब आपका मस्तिष्क इससे बचने के लिये तर्क नहीं ढूँढ पायेगा। आप सीधा इसे करने लगेंगे।

Content: अब हम जन्म-मरण चक्र को समझेंगे और देखेंगे कि कैसे दीक्षा और अनुष्ठान हमें इस चक्र से मुक्ति दिला सकते हैं।

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Content: तीन प्रकार के कर्म-बन्ध और ‘दीक्षा’- उनसे मुक्ति का मार्ग

Content: आधारभूत तौर पर कर्म-बन्ध की तीन परतें होती हैं : आगम्य, प्रारब्ध और संचित।

Content: संचित कर्म एक बैंक जैसा है, मानो रिजर्व बैंक। इस बात को समझे कि ऐसा आवश्यक नहीं है कि यह प्रथम अवसर है जब आपने शरीर को धारण किया है और पृथ्वी पर आये हैं। इससे पहले भी आपने लाखों शरीरो को धारण किया होगा! उन लाखों शरीरो में आपने विचार ढ़ेंगे होंगे, आपने जो भी बोला होगा, जो भी कार्य किया होगा, वह सभी अतृप्त अनुभव आपके अंदर संस्कार बन गये हैं। सभी को मिलाकर उसे संचित कर्म कहा जाता है। संस्कृत में इसके लिये और एक शब्द है- समूचिता। मैं जब बैंक कहता हूँ तो यह कोई जमाराशि नहीं है, यह तो बकाया है! आपको समस्त बकाया राशि को चुकाना पड़ेगा!

Content: कर्म-बन्ध का जो दूसरा प्रकार है उसे प्रारब्ध कर्म कहते हैं। प्रारब्ध कर्म से यह अर्थ है कि कर्म के संचित बैंक से आप

Content: एक निर्धारित मात्रा लेकर शरीर की रचना करते हैं और जन्म लेकर उस शरीर द्वारा उन कर्मों का आनंद लेकर उसे समाप्त करने का सोचते हैं। इसलिये प्रारब्ध, संचित कर्म की एक छोटी सी मात्रा है जिसे लेकर आप इस जीवन में आये हैं ताकि इस शरीर द्वारा आप उसका आनंद ले सकें या उसे समाप्त कर सकें।

Content: कर्म-बन्ध का जो तीसरा प्रकार है वह सबसे बुरा है। इसे अकाम्य कहते हैं; ये वो कर्म है जिसे आप पृथ्वी पर आकर, नये विचारों, शब्दों और अपने क्रियाओं द्वारा एकत्रित करते हैं।

Content: पृथ्वी पर जो भी आता है उसे मृत्यु से पहले अपने प्रारब्ध कर्म को समाप्त करना होता है। उदाहरण स्वरूप, मान लें कि आपके संचित बैंक में आपके पास 1000 कर्म है। जब आप शरीर लेते हैं तो मान लीजिए इन 1000 कर्मों में से आप 10 कर्मों को लेकर अपना प्रारब्ध कर्म बनाते हैं, यह कहते हुए कि, ‘चलो इस बार इन दस कर्मों को समाप्त करूँगा।’ लेकिन पृथ्वी पर हम दूसरों को देखकर उनके इच्छाओं के आधार पर कर्म-बन्ध इकट्ठा करने लगते हैं। इस प्रकार की इच्छाओं को ‘दूसरों से ली गई इच्छा’ कहते हैं। दूसरों से ली गई इन्हीं इच्छाओं के कारण ही आप नये विचारों, शब्दों और क्रियाओं की रचना करते हैं।

Content: उदाहरण स्वरूप, जब आप अपने से अधिक सुन्दर व्यक्ति को देखते हैं, तो तुलना और ईर्ष्या के कारण आपके विचार कई गुणा बढ़ जाते हैं। आप विचारों पर आधारित कर्म-बन्ध

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Content: बना लेते हैं। कई बार आप तथ्यों को जाने बिना दूसरों के प्रति अपशब्द का प्रयोग करते हैं। जब आप ऐसा करते हैं, तब आप शब्दों पर आधारित कर्म एकत्रित कर लेते हैं। आपकी समस्त क्रियाएँ स्थायी रूप से लोभ या भय द्वारा संचालित होती है और अन्ततः आप निरर्थक कार्यों को कर कर्म-बन्ध एकत्रित कर लेते हैं। इसी प्रकार, मान लेते हैं कि आप 200 कर्म-बन्ध इकट्ठा कर बैठते हैं। जब तक की आप इस लोक छोड़कर वापस लौटते हैं, क्या होगा? आपके कर्म-बन्ध के खाते में 200 की बढ़ोत्तरी हो जाती है! आप अभी पहले के ही 10 कर्म समाप्त नहीं कर पाए, उस पर आपने 200 और इकट्ठा कर लिया।

Content: अगली बार जब शरीर धारण करेंगे तो फिर क्या होगा? आपका संचित कर्म अभी 990 जोड़ 210 है- पिछले जन्म की तुलना में 200 अधिक। दोबारा से आप इसमें से 10 निकालकर एक नये शरीर के साथ लौटते हैं। परन्तु आप और अधिक एकत्रित कर लौट जाते हैं। यह एक समस्या का जाल बन जाता है। इसी को हम जन्म-मरण चक्र कहते हैं- निरंतर शरीर धारण करना और छोड़ना।

Content: इसकी जगह, यदि आपके जीवनकाल के दौरान ही कोई आपको कोई यह ज्ञान प्रदान करता है कि आप शरीर या मस्तिष्क नहीं हैं और यह आपका कर्म-बन्ध है जो आपको प्रभावित करता है, तब आपके कर्म-बन्ध का प्रभाव आप पर कम होता जाता है और आप अपने प्रारब्ध कर्म, जिसे लेकर आप पृथ्वी पर आये थे, उसे समाप्त करना शुरू कर देते हैं। मान लें कि आपने 10 कर्मों के साथ यह शरीर धारण

Content: किया और इस लोक में आये। इस 10 प्रारब्ध कर्म में तीन ऐसे हैं जो आपको निराशा में डाल सकते हैं अर्थात् तीन संस्कार जिसमें आपको निराशा में डालने की शक्ति है। यदि आप इन संस्कारों से प्रभावित होकर निराश होते रहें तो यह 3 न रहकर कदाचित 10 हो जायेंगे। यह अतिरिक्त 7 कर्म, अकाम्य कर्म है। प्रारब्ध को समाप्त करने के बजाय यदि आप अकाम्य पोषण करने का निर्णय लेते हैं, तो आप अकाम्य एकत्रित कर लेते हैं।

Content: वहीं दूसरी तरफ, जब भी यह 3 संस्कार आपको निराशा में डालते हैं, तब दीक्षा या क्लिक की सहायता से यदि आपने इस निराशा से बाहर निकलना सीख लिया है, तब इन तीन संस्कारों की पकड़ आप पर ढीली होने लगती है और कुछ समय उपरांत 10 कर्मों में से तीन आपको छोड़ जाते हैं! जब भी आप प्रारब्ध कर्म का अपने ऊपर प्रभाव कम करते हैं तो न सिर्फ प्रारब्ध नष्ट हो जाता है बल्कि नये कर्म एकत्रित करने की आशंका भी कम हो जाती है।

Content: आइये समझे यह कैसे होता है। जब भी प्रारब्ध का प्रभाव आप पर कम होने लगता है तो आप अकाम्य इकट्ठा करना बंद कर देते हैं। तो जब भी इन 10 संस्कारों का आप पर प्रभाव होना बंद हो जाता है, तब आप अकाम्य इकट्ठा करना भी बंद कर देते हैं क्योंकि आगे के कर्म बनाने के लिये यह 10 संस्कार ही उत्तरदायी थे। दीक्षा की सहायता से आप अपने ऊपर प्रारब्ध का प्रभाव कम कर लेते हैं और स्वयं के वास्तविक आनंद अवस्था की

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Content: और बढ़ने लगते हैं। आप अपने शुद्ध और शांत अंतः आकाश को पुनः प्राप्त कर सकते हैं। आप अकाम्य कर्म एकत्रित करना भी बंद कर देते हैं।

Content: दीक्षा उस ज्ञान अथवा विचारों को कहते हैं जो आपको उदास बनाने वाली विचारों की पकड़ से बाहर निकालते हैं, जो आपको आपके प्रारब्ध के प्रभाव से बाहर निकालते हैं।

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Content: उन्म जन्म हर कर्म संचित अचेतन जीवन प्रणाली होते जाते एकत्रित कर्म-बन्ध

Content: कर्म-फल भोगने जीवन-यापन सिर्फ कर्म के आधार

Content: अक्रिय कर्म एकत्रित होते जाते कर्म-फलों के जाल में फँसता चला जाता

Content: उन्म जन्म हर कर्म साथ के प्रारब्ध पर आधारित जीवन प्रणाली होते कर्म संचित

Content: समस्त क्रियाँ का कर्म-फल भर कर्म में जन्मते जाते हैं कर्म-फल

Content: कर्म-फल का एक कर्म प्रारब्ध होता जाता है फकत

Content: जीवन के साथ के प्रारब्ध कर्म

Content: कर्म

Content: गुरु-दीक्षा

Content: फकत

Content: जीवन

Content: अक्रिय कर्म एकत्रित होते जाते कर्म का एक फकत प्रारब्ध होता जाता है

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Content: पूजा का अनुष्ठान - 'क्लिक्स' को सदृढ़ बनाने की विधि

Content: अपने संचित कर्म को इसमें भस्म करें....

Content: पूजा कर्मकाण्ड द्वारा समर्पण की एक विधि है। पूजा अपने अन्दर हुए सभी 'क्लिक्स' को प्रतिदिन स्मरण करने की विधि है, जिस कारण जब भी आप समस्या में होते हैं तो यह 'क्लिक्स' स्वतः आपके चेतना में जागृत हो जाते हैं।

Content: जब एक गुरु सिखाते हैं तो वह केवल एक सीख नहीं होती है, वह एक शक्तिशाली अनुभव होता है। जब आप उनके द्वारा दी गयी दीक्षा का उपयोग नहीं करते हैं, जब आप उनके द्वारा दिये गये शास्त्र-शास्त्रों का नित्य उपयोग नहीं करते हैं, तो न सिर्फ वे अपनी शक्ति खो देते हैं बल्कि आप उन्हें पुनः स्मरण भी नहीं कर पायेंगे। यह समझने के लिये एक महत्वपूर्ण बात है।

Content: उदाहरण स्वरूप, मान लीजिए आपके पास एक चारपाई है। यदि 2 सालों तक आप उस चारपाई का उपयोग नहीं करते तो ऐसा नहीं है कि वह चारपाई अनुपयोगी हो जाता है या

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Content: वह अदृश्य हो जाएगा। 2 सालों के उपरांत भी आप उसका पुनः उपयोग कर सकते हैं। परन्तु आपको दिया गया ज्ञान, आपको दी गयी दीक्षा का यदि आप 2 सालों तक उपयोग नहीं करेंगे तो वह आपके शयनकक्ष में पड़ा रह कर आपके द्वारा उपयोग की प्रतीक्षा नहीं करेगा। नहीं! वे सीधा अदृश्य हो जायेगा, बस।

Content: प्रतिदिन बैठकर स्वयं के माथे हुए समस्त 'क्लिक्स' को स्मरण कराने की विधि को पूजा या अनुष्ठान कहते हैं। पूजा को करने का यही अभिप्राय होता है।

Content: प्रतिदिन जब आप बैठकर अनुष्ठान करते हैं, तो आपकी इच्छा हो या ना हो आप स्वतः दीक्षा के अनुभव का, गुरु के साथ हुए 'क्लिक्स' का स्मरण कर पाते हैं। पूजा का यही अभिप्राय होता है। ये अनुष्ठान आपको शुद्ध चेतना की ओर ले जाते हैं। संस्कार अपनी शक्ति खो देते हैं। जिन संस्कारों के साथ आपने जन्म लिया था, जब उनकी पकड़ आप पर ढीली होने लगती है, तब संस्कार एकत्रित करने की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है। जब एकत्रित करने की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है और बचे हुए कर्म की भी पकड़ आप पर ढीली होने लगती है, तब वह व्यक्ति जो आपको महाचेतना की परिधि में बार-बार लाता है, वही गुरु आपके संचित कर्मों को भी नष्ट कर देते हैं!

Content: यह समझें कि आप स्वयं प्रत्यक्ष रूप से अपने संचित कर्मों के बैंक के साथ कुछ नहीं कर सकते। संचित कर्मों को नष्ट करने के लिये गुरु-कृपा की आवश्यकता होती है। केवल

Content: गुरु-कृपा ही आपके संचित कर्मों को नष्ट करने के लिये कुछ कर सकती है।

Content: उदाहरण स्वरूप, यदि आपका बच्चा बैठकर एक खिलौने का मकान बनाने का अथक प्रयास करता है, तब आप क्या करेंगे? आप कहेंगे, 'अच्छा ठीक है! परेशान मत हो, मैं तुम्हें बनाकर देता हूँ!' ठीक उसी प्रकार, जब एक शिष्य अपने प्रारब्ध और अकाम्य को हटाने के लिये निष्ठापूर्वक कार्य करता है, तब गुरु-कृपा होती है और आपके संचित कर्मों को भी समाप्त कर देती हैं!

Content: एक महत्वपूर्ण बात समझे कि मैं जिस गुरु-कृपा की बात कर रहा हूँ वह केवल मुझ पर निर्भर नहीं है। यदि कोई व्यक्ति निष्ठापूर्वक साधना या ध्यान करता है, तब स्वतः उस पर गुरु-कृपा हो जाती है! यह मुझ पर भी निर्भर नहीं है। यह एक स्वचालित तंत्र है।

Content: स्पष्ट रहे कि यह केवल आपके ग्रहण करने की क्षमता पर निर्भर करता है, न कि मेरे ऊपर। मैं एक सागर के समान हूँ- निरंतर उपलब्ध, जो भी चाहे, जितना भी चाहे मुझसे ले सकता है। यदि आप एक नारियल के छिलके के साथ आते हैं, तो आप उतने मात्रा में ही मुझे पा सकते हैं। यदि आप थोड़े से बड़े प्याले के साथ आते हैं, तो आप उतना ही मुझको लेकर जायेंगे। यदि आप उससे भी बड़े बर्तन के साथ आते हैं, तो आप उस बर्तन की क्षमता अनुसार लेकर लौटेंगे। यदि आप बुद्धिमान हैं तो आप एक नहर का निर्माण करेंगे।

Content: इसलिये दीक्षा या पूजा का अभिप्राय है : स्वयं को प्रतिदिन, गुरु के साथ हुए समस्त अनुभवों का, समस्त 'क्लिक्स' का

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Content: स्मरण कराना और स्वयं को निरंतर उच्च चेतनावस्था में बनाये रखना। जब आप प्रतिदिन उसी उच्च उत्साह के साथ तैयार रहते हैं, तब उसका अभिप्राय होता है कि आप अगले 24 घण्टे में घटित होने वाले जीवन के नाटक के लिये तैयार हैं! अगले 24 घण्टे के लिये आवश्यक ऊर्जा आपमें उपलब्ध है। पूजा करने का यही कारण है।

Content: गुरु-पूजा

Content: गुरु-पूजा में जो मानस पूजा मंत्र (आंतरिक दृश्यावलोकन द्वारा गुरु के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए छंद) है, आपमें हुए समस्त ‘किलकस’ को पुनः स्मरण कराने के लिये प्रयाप्त है!

Content: मानस पूजा मंत्र की पहली पंक्ति कहती है, ‘हतपद्मम् आसनम् दद्यात्’, मेरा हृदय आपके विराजने का स्थान है। यह पंक्ति ही स्पष्ट करती है कि हमारे हृदय को स्वच्छ होना पडेगा! यह एक ‘क्लिक’ है! जब यह ‘क्लिक’ होती है तो हमारे विचार, शब्द और कार्य, कर्म-बन्ध आकर्षित करने वाले गुणों से विमुख होकर स्वतः शुद्ध हो जाते हैं। हमारे सोचने, बोलने और करने में और

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Content: अधिक कर्म-बन्ध एकत्रित न करने की गहन सहजजगता होगी।

Content: उसके बाद एक पंक्ति है, 'सहस्रार अचुतामृतही पादयमचरणयोर ददयात'। 'सहस्रार अमृत' जब आप कृतज्ञता से ओत-प्रोत होते हैं तो आपके गले और जीीभ पर होने वाले गहरे और मीठे स्वाद की अनुभूति को कहते हैं। आपमें से कुछ लोगों ने इसका अनुभव किया होगा। विशेषकर आनन्द-दर्शन के समय आप इसे अनुभव कर सकते हैं। आपमें से कितनों ने इसे अनुभव किया है? आनन्द-दर्शन के समय आप अचानक ही गले के क्षेत्र में मीठे स्वाद का अनुभव करते हैं। इसी को 'सहस्रार अमृत' कहते हैं- वह अमृत जो गहरे कृतज्ञता के भाव से उत्पन्न होता है।

Content: जब आप तृप्त अनुभव करते हैं तो वह अमृत, सहस्रार- जो आपके सिर के ऊपरी भाग में स्थित ऊर्जा केन्द्र को कहते हैं, से नीचे उतरकर आपके सम्पूर्ण गले को भर देता है। इसी अमृत का 'पादयम' अथवा जल के रूप में दैवी स्वरूप गुरु के चरणों का ध्यान के लिये उपयोग किया जाता है! इसका अर्थ है कि जब भी आप पूजा के लिये बैठते हैं, तो उस अमृत को अनुभव करने के लिये आपको उन समस्त घटनाओं अथवा 'क्लिक्स' को स्मरण करना होगा जो भूत में उस अमृत के बहाव का कारक रहा है। जैसे हमारे उदाहरण में आनन्द-दर्शन अनुभव। तब आप स्वयं को उल्लास की उसी अवस्था में ले जायेंगे! यदि आप पूजा करते समय अपने गले में उस मीठे स्वाद का अनुभव नहीं करते हैं, तब फिर आप यह पूजा नहीं कर सकते क्योंकि तब आप झूठ बोलेंगे!

Content: जब तक आपको वह वास्तविक अनुभूति दोबारा नहीं होती तब तक आपको, 'सहस्रार अचूतामृतही पादयमचरणयोर ददयात' के शब्दों का पूजा में उपयोग करने का अधिकार नहीं है!

Content: 'मनसतु अर्घ्यम् निवदयेत' का अर्थ है कि आप अपने मस्तिष्क को ही भोजन के रूप में ईश्वर को अर्पण कर रहे हैं। नित्यानंद स्मरण कार्यक्रम के अंत में आप अपने समस्त संस्कारों अथवा कर्मों को अग्नि को अर्पण करते हैं। आपका मनस आपके संस्कारों और कर्म-बन्धनों का सम्मिलित रूप है। इसलिये जब आप इस पंक्ति का उच्चारण करेंगे तब आपको स्वतः याद आयेगा, 'हाँ! जैसे मैंने NSP (नित्यानंद स्मरण कार्यक्रम) में सब कुछ अर्पण किया था, वैसे ही मैं अपना सर्वस्व आपके चरणों में अर्पण करता हूँ।' यह एक उदाहरण है उस 'क्लिक' का जो यहाँ होना चाहिये।

Content: 'तेन अमृतेन आचमनीयम्' का अर्थ है कि उसी अमृत से मैं आपका अभिषेक (पवित्र स्नान) करता हूँ। यह पंक्ति आपको उस अमृत के लिये, आनन्द-दर्शन अनुभव- उस हर्ष, उस उल्लास की ओर खींचेगी। ठीक इसी प्रकार इस छंद की सभी पंक्तियाँ आपको उन 'क्लिक्स' का, आपके अंदर घटित नवजागरण के अनुभवों का स्मरण करायेगी। मैंने अभी गुरु-पूजा के कुछ शब्दों की व्याख्या की है। यदि आप संपूर्ण पूजा से परिचित होते हैं, तो न सिर्फ आप इस अनुष्ठान की प्रशंसा करेंगे बल्कि आप अनुष्ठान-विज्ञान के उपयोग की भी प्रशंसा करने लगेंगे।

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Content: यह इतना सुन्दर तथ्य है! यदि आप इसे समझते हैं तो पर्याप्त है। स्वतः सभी अनचाहे शब्द, विचार और क्रियाएँ आपको छोड़ देंगी और तक्षण ही आप पर गुरु-कृपा की वर्षा होगी। ऐसा जब भी होता है, आप मुक्त हो जाते हैं। (सम्पूर्ण गुरु-पूजा की प्रक्रिया और उसके लाभ का चित्रों द्वारा व्याख्यान, आप नित्यानंद जी द्वारा कृत पुस्तक ‘गुरु पूजा’ स्वयं पढ़ें; में आप मुक्त होते हैं)

Content: ध्यान और चेतना - कर्म-बन्ध से मुक्ति का उपाय

Content: यदि आपको शुद्ध चेतना की एक भी झलक मिल जाती है, तब फिर कर्म-बन्ध का आप पर कोई असर नहीं होता। आपका स्तर, कर्मी-बन्ध के स्तर से कहीं ऊँचा हो जाता है। कर्म-बन्ध का आप पर तभी तक असर होता है जब तक की आपमें विचार उठते हैं! सचेตนता-सजगता में आप विचारों से परे चले जाते हैं। स्वाभाविक है कि आप कर्मों पर राज करने लगेंगे। किसी भी ध्यान को यदि गहनता से किया जाए तो वह आपको चेतना की झलक-सत्य की झलक दिखा सकता है। इसलिये ही ऐसा कहा जाता है कि ध्यान का प्रभाव सूर्य की किरणों में कैमरे के फिल्म रोल को खुला छोड़ने जैसा है।

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Content: यदि कैमरे का शटर एक भी क्षण के लिये खुलता है तो कैमरे के सामने जो भी होता है वह फिल्म पर रिकार्ड हो जाता है। यदि शटर को पूरी तरह से खुला छोड़ दिया जाये तो क्या होगा? यदि सूर्य की किरणें फिल्म पर सीधे पड़ती है तो क्या होगा? जो भी रिकार्ड किया गया था वह मिट जायेगा।

Content: जब आपने जन्म लिया तो, एक क्षण के लिये कैमरे का शटर खुलता है और जीवन आपके शरीर में प्रवेश कर जाती है। बाहर का जो भी दृश्य उस क्षण उपस्थित था वह रिकार्ड हो जाता है। 'दृश्य' से मेरा अर्थ है उस क्षण रहे 'ग्रहों की स्थिति'। उसी के आधार पर आपकी चेतना कार्य करती है। लेकिन ध्यान के समय, मैं सचेतन ही शटर को कुछ देर के लिये खोलता हूँ। फिर तो स्वाभाविक है कि जो भी रिकार्ड था वह मिट जायेगा!

Content: तो पहली बार शटर खुला था जब आपने जन्म लिया। दूसरी बार यह शटर खुलता है जब आप दीक्षा लेते हैं। शटर को पूरी खोल दिया जाता है जिससे कि सूर्य की किरणें प्रवेश कर समस्त कर्म-बन्धनों का सफाया कर दे। इसलिये ही जब आप किसी गुरु से दीक्षा लेते हैं तो आपको 'द्विज' कहा जाता है, जिसका अर्थ होता है दो बार जन्मा - एक नया जीवन और वह व्यक्ति जो आपके शटर को उतने समय तक पकड़ के रखता है, उसे गुरु कहते हैं।

Content: कर्म-बन्ध से जुड़ी कुछ और बातें

Content: अतः यह समझ लें की गहरी अनभिज्ञता से उत्पन्न विचारों, शब्दों और कार्यों के प्रभावों को कर्म-बन्ध कहते हैं, जो आपको दुर्गति के परिचित शैलियों का अनुसरण करने के लिये उकसाता है। अपने अन्तः आकाश में घटित समस्त 'क्लिकस' से लय बिठा कर, चेतना के उच्च स्तर पर जीवन-यापन द्वारा आप इस चक्र से बाहर निकल सकते हैं।

Content: लोग मुझसे पूछते हैं कि दूसरों को सलाह देने से या उनकी छूने से क्या दूसरों का कर्म उन पर आ जाता है? दूसरों के कर्म से उन्हें असुरक्षा जान पड़ती है। वे जानना चाहते हैं कि इससे कैसे बचा जाए। यह समझें कि दूसरों का कर्म आपको नहीं पट सकता, वैसे भी आपके पास स्वयं के ही पर्याप्त कर्म है इसलिये दूसरे व्यक्ति से कर्म पट जाने की चिंता न करें।

Content: छूने से या सलाह देने से या शारीरिक निकटता से, कर्म कभी भी नहीं पट सकता है। यदि आप किसी के निकटवर्ती

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Content: हैं तो यह हो सकता है कि आप उस व्यक्ति के मानसिकता को अपना लें परन्तु उसका कर्म आपमें नही आ सकता है। निःशय ही आपको मानसिक रूप से प्रबल होना चाहिये जिससे की दूसरों की मानसिकता से आप प्रभावित ना हो सकें। यह हानिकारक है। परन्तु अपने अंदर घटित ‘क्लिक्स’ की वजह से यदि आप अंदेर से ठोस हैं, तब तो यह भी आप को प्रभावित नहीं कर पायेगा। एक और बात को समझे : मैं आपके कर्मों के साथ दखलअंदाजी नहीं करता हूँ। जैसे सूरज के निकलने से अंधेरा स्वयं ही खत्म हो जाता है, वैसे ही एक गुरू की उपस्थिति में कर्म-बन्ध नष्ट हो जाते हैं। कर्म-बन्ध का अंधेरे के समान एक नकारात्मक अस्तित्व है। इसका कोई सकारात्मक अस्तित्व नहीं है। मेरा अभिप्राय यह है कि इसको आप पकड़ कर फेंक नहीं सकते। जैसा की आप इस माईक के साथ कर सकते हैं। जैसे प्रकाश के अभाव को अंधेरा कहते हैं, वैसे ही, ‘कर्म-बन्ध’ आंतरिक प्रकाश के अभाव को कहते हैं या दूसरे शब्दों में ‘अज्ञानता’ को कहते हैं। ‘क्लिक्स’ को सामने कर उनके द्वारा उत्पन्न समझ के आधार पर जब हम जीवन-यापन करते हैं तो किसी भी प्रकार के कर्म-बन्ध को नष्ट किया जा सकता है। कर्म-बन्ध कुछ और नहीं आपके भय की इसमें श्रद्धा है। कम-से-कम आपके भय की भावना ठोस होती है। कर्म-बन्ध की गहराई तो आपके भय की गहराई जितनी भी नहीं होती है। भय तो आपके कॉसल शरीर (ऊर्जा की वह परत जिसमें आप गहरी निद्रा में प्रवेश करते हैं) तक गहरा होता

Content: है। यदि आप अपने सिर के ऊपर एक छुरी रखकर सोते हैं, तो आप उत्पन्न तीव्र भय से स्वतः कॉसल शरीर को स्पर्श कर सकते हैं। कर्म-बन्ध की तो इतनी भी गहराई नहीं होती है। यह तो आपके ही किये का फल है, और समझ तथा सजगता के साथ, और सचेतना से लिये गये निर्णय के साथ की मैं विचारों, शब्दों और कायोंॅ द्वारा आगे के कर्म-बन्ध एकत्रित नहीं करूँगा, इससे मुक्त हुआ जा सकता है। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि ऐसा जीवन-यापन किया जाये जिसमें प्राब्द्ध कर्म निरंतर समाप्त होते जाये और आगे के कर्म-बन्ध एकत्रित न हो। वैदिक विवाह में इसी विचार का प्रचार किया गया है। वैदिक विवाहों में जोड़े यह संकल्प लेते हैं कि वह अपने आध्यात्मिक जीवन को अपने वैवाहिक जीवन के आगे रखेंगे और साथ जीवन-यापन करेंगे। इसे वानप्रस्थ आश्रम कहते हैं। कर्म-बन्ध को समाप्त करने में एक-दूसरे का सहयोग करने का और आगे के कर्म-बन्ध एकत्रित नहीं करने का यह निर्णय होता है। सामान्यतः विवाह में पुरुष काम द्वारा संचालित होता है और महिला भय द्वारा। पुरुष महिला के भय पक्ष का फायदा उठाता है और महिला पुरुष के कामेच्छा के पक्ष का। विवाह संकल्प का कथन व्यक्त करता है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे के कर्म-बन्ध को समाप्त करने के लिये कार्य करेंगे और एक-दूसरे का शोषण नहीं करेंगे, और न ही आगे के कर्म-बन्ध एकत्रित करेंगे। किसी ने मुझसे पूछा, ‘स्वामी जी, कर्म-बन्ध से कैसे मुक्त हुआ जाये? अब तक हमने जो भी मंत्रणा किया वह कर्म-

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Content: बन्ध को एकत्रित न करने हेतु निवारक बातें थीं। कर्म-बन्ध के उपचार के रूप में, मैं आपको एक सरल विधि बताता हूँ। इस क्षण से शुरू करके, अपने जीवन की सभी घटनाओं को स्मरण करें। इस क्षण से शुरू करके, पीछे की ओर जाते हुए अपने बचपन के दिनों की ओर जायें। जो भी आप स्मरण कर सकते हैं उसे स्मरण करें। जो स्मरण न हो उसकी चिंता न करें। इसे समझें कि जो भी आप स्मरण न कर सकें वह हल्के अनुभव थे, जो आपको गहराई से स्पर्श नहीं कर सके। इसी कारण से वे आपकी स्मृति में नहीं हैं। इस विधि का एक साल तक प्रयोग करें। पुनः स्मरण की यह विधि आश्चर्यजनक रूप से राहत पहुँचाती है। हमारे दूसरे चरण का जो ध्यान कार्यक्रम है : नित्यानंद स्फुरण कार्यक्रम (NSP), वह कर्म-बन्ध को समाप्त करने की इसी प्रणाली पर आधारित है। एक आत्मज्ञानी गुरु के उपस्थिति में यह एक आध्यात्मिक स्नान जैसा है। इस बात को समझें : गुरुओं का वैसे तो कोई कर्म नहीं होता। उन्हें न तो कुछ पाना होता है न तो कुछ खाना। तो फिर किसी कारण से वह शरीर में होते हैं? बस मानवता के प्रति उनके प्रेमभाव के कारण। उनका मानव शरीर धारण करने का बस एक ही ध्येय होता है, अधिक से अधिक लोगों को जन्म-मरण के इस चक्र से मुक्त करना, कर्म के बन्धन से स्वतंत्र करना।

Content: नित्यध्यान जीवन आनंद का सोत

Content: आनलाइन रजिस्टर करके और दीक्षा लेकर उन करोड़ों लोगों में शामिल हो जाये, जो इस पृथ्वी पर असंबंध (UNCLUTCH) अवस्था में आनंद के स्रोत के साथ जीवन जी रहे हैं। नित्यध्यान दैनंदिन ध्यान की प्रक्रिया है। जो पूर्ण मानवता के लिए नित्यानंद जी ने बनाया है। यह एक ऐसा सूत्र या तकनीक है जो अपने आप में पूर्ण है। यह आपके पूरे अस्तित्व पर कार्य करके उसे रूपान्तरित करता है और आत्मज्ञान के परम अनुभव के लिए तैयार करता है। इस तकनीक का हर चरण दूसरे चरण को पूर्ण करता है। व्यक्तिगत चेतना को ऊपर उठाने के लिए यह मन से असंबद्ध होकर आनन्दमय रूप से जीवन जीना सिखाता है। यह नित्य आनंद प्राप्त करने की ध्यान विधि है।

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Content: www.dhyanapeetam.org पर जाकर आनलाइन रजिस्टर कीजिये। आपको पत्राचार (Mail) द्वारा एक माला, ब्रेसलेट, आपकी आध्यात्मिक उन्नति के लिये नित्यानंद जी द्वारा दिया गया आध्यात्मिक नाम (वैकल्पिक), नित्य ध्यान की CD और पुस्तक (आपके द्वारा चुनी गयी भाषा में) नित्यानंद जी द्वारा व्यक्तिगत हस्ताक्षर के साथ भेजी जायेगी (कमेन्ट के कालम में अपनी इच्छित भाषा लिख दें)।

Content: परिशिष्ट

Content: परमहंस नित्यानंद के विषय में :

Content: परमहंस हमारे बीच में उपस्थित एक आत्मज्ञानी गुरु हैं। ध्यान तथा आंतरिक आनंद के अपने विश्वव्यापी आंदोलन द्वारा नित्यानंद, प्रतिदिन के तनाव से लेकर आत्मज्ञान की अभिलाषा जैसे सशक्त विषयों पर समाधान प्रस्तुत करते हैं। छोटे उम्र में ही उन्होंने घर छोड़ दिया और भारत के सुदूर क्षेत्रों का भ्रमण किया, जिस दौरान वह पवित्र मठों और तीर्थस्थलों में जाते और आयध्यात्मिक गुरुओं तथा संतों के साथ समय बिताते। ध्यान, योग्य, तंत्र, ज्ञान, भक्ति तथा अन्य पूर्वी अलौकिक विज्ञान की विधियों की सहायता से उन्हें आत्मज्ञान की

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Content: अनुभूति हुई। आत्मज्ञान की अपनी अन्तर्दृष्टि द्वारा मानव प्रकृति की गहरी समझ के आधार पर उन्होंने समस्त मानवजाति के लिये अपने मिशन की स्थापना की है। जीवनमुक्ति की सनातन परम्परा में अपनी जड़ों के साथ, परम सत्य तक पहुँचने के मार्ग के रूप में, विश्व के सभी धर्मों को अपनाते हुए समस्त सामाजिक, सांस्कृतिक तथा भाषा, आयु और लिंग से जुड़ी बाधाओं को पार करते हुए आज नित्यानंद विश्व के कोने-कोने से लोगों को आकर्षित करते हैं।

Content: नित्यानंद मिशन के विषय में:

Content: नित्यानंद मिशन ध्यान तथा आंतरिक आनंद के प्रचार-प्रसार का एक विश्वव्यापी आन्दोलन है। संस्था द्वारा दी जा रही सेवाओं में निम्नलिखित सम्मिलित है : ध्यान-योग-व्यवसायिक नेतृत्व-नित्य आध्यात्मिक ऊर्जा चिकित्सा पद्धति द्वारा नि:शुल्क ऊर्जा चिकित्सा-युवाओं को नि:शुल्क शिक्षा-कला और संस्कृति को प्रोत्साहन-सत्संग-नि:शुल्क चिकित्सा कैम्प तथा नेत्र शल्य चिकित्सा- सभी आश्रमों में नि:शुल्क भोजन-आश्रम स्थित गुरुकुल द्वारा बच्चों की चहुर्मुखी विकास की शिक्षा तथा विशेष रूप से तैयार किए गये ध्यान के विभिन्न कार्यक्रम-

Content: नित्यानंद मिशन द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम :

Content: आंतरिक जागृति (Inner Awakening)

Content: आंतरिक जागृति गहन रूपांतरण लाने वाला 21 दिनों का एक मुख्य कार्यक्रम है। प्रत्येक व्यक्ति में जीवन-मुक्ति के

Content: समस्त तत्वों को पुनः उत्पन्न कर साधारण से दैवियता की ओर ले जाने वाला कार्यक्रम।

Content: जीवन आनंद प्रौद्योगिकी (LBE)

Content: LBE एक आत्मज्ञानी गुरु की उपस्थिति के तीव्र और रूपान्तर लाने वाली शक्ति का अनुभव करने का अवसर प्रदान करता है। भारत के बंगलौर आश्रम में आयोजित यह कार्यक्रम, योग, ध्यान तथा अन्य विविध प्रकार के क्रिया-कलापों द्वारा आपको अपनी अन्तरात्मा की गहराई तक ले जाता है और अपने स्वाभाविक चरम क्षमता को जागृत करने में सहायता प्रदान करता है।

Content: एक आत्मज्ञानी गुरु से प्रत्यक्ष सीखने का, जीवन-मुक्त हो जाने के लिये अपने शरीर और मस्तिष्क को तैयार करने का सुनहरा अवसर प्रदान करती है।

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Content: एक दिवसीय ध्यान कार्यक्रम जो आपमें जीवन-मुक्ति का बीज बोता है। अपनी इच्छाओं और क्रिया-कलापों में तालमेल बिठाने की ऊर्जा प्रदान कर बाह्य दुनिया में सफलता और आंतरिक आनंद के साथ जीने के लिये आपको सशक्त करता है।

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Content: 42 कर्म-बन्ध

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