Books / Jabali Upanishad

1. Jabali Upanishad

Text

1

अथ हैनं भगवन्त जाबालिं पैप्पलादिः पप्रच्छ भगवन्मे ब्रूहि परमतत्त्वरहस्यम्॥

atha hainaṃ bhagavanta jābāliṃ paippalādiḥ papraccha bhagavanme brūhi paramatattvarahasyam॥

ऋषि पैप्पलादि (पिप्पलाद के पुत्र) ने भगवान् जाबालि से प्रश्न किया-हे भगवन् ! मेरे प्रति परम तत्त्व के रहस्य का वर्णन कीजिए। तत्त्व क्या है? जीव कौन है? पशु कौन है? ईश कौन है? मोक्ष प्राप्ति का उपाय क्या है? महर्षि जाबालि ने कहा-आपने बहुत श्रेष्ठ प्रश्न किया। जो मुझे ज्ञात है, वह सब मैं आपसे निवेदन करता हूँ। पैप्पलादि ने पूछा-यह सब आपको कहाँ से ज्ञात हुआ? जाबालि ने कहा-षडानन से ज्ञात हुआ। पैप्पलादि ने पुनः पूछा-उन (षडानन) को कहाँ से यह ज्ञान प्राप्त हुआ? जाबालि ने कहा-उन्हें यह ज्ञान ईशान से प्राप्त हुआ। पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया कि उन्होंने यह कैसे प्राप्त किया? जाबालि ने उत्तर दिया कि उन्होंने (ईशान ने) उपासना के द्वारा यह ज्ञान प्राप्त किया। (यह सुनकर) पैप्पलादि ने कहा-हे भगवन् ! मुझे यह सब कुछ रहस्य सहित बताइये ॥


2

किं तत्त्वं को जीवः कः पशुः क ईशः को मोक्षोपाय इति ॥

kiṃ tattvaṃ ko jīvaḥ kaḥ paśuḥ ka īśaḥ ko mokṣopāya iti ॥

ऋषि पैप्पलादि (पिप्पलाद के पुत्र) ने भगवान् जाबालि से प्रश्न किया-हे भगवन् ! मेरे प्रति परम तत्त्व के रहस्य का वर्णन कीजिए। तत्त्व क्या है? जीव कौन है? पशु कौन है? ईश कौन है? मोक्ष प्राप्ति का उपाय क्या है? महर्षि जाबालि ने कहा-आपने बहुत श्रेष्ठ प्रश्न किया। जो मुझे ज्ञात है, वह सब मैं आपसे निवेदन करता हूँ। पैप्पलादि ने पूछा-यह सब आपको कहाँ से ज्ञात हुआ? जाबालि ने कहा-षडानन से ज्ञात हुआ। पैप्पलादि ने पुनः पूछा-उन (षडानन) को कहाँ से यह ज्ञान प्राप्त हुआ? जाबालि ने कहा-उन्हें यह ज्ञान ईशान से प्राप्त हुआ। पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया कि उन्होंने यह कैसे प्राप्त किया? जाबालि ने उत्तर दिया कि उन्होंने (ईशान ने) उपासना के द्वारा यह ज्ञान प्राप्त किया। (यह सुनकर) पैप्पलादि ने कहा-हे भगवन् ! मुझे यह सब कुछ रहस्य सहित बताइये ॥


3

स तं होवाच साधु पृष्टं सर्वं निवेदयामि यथाज्ञातमिति ॥

sa taṃ hovāca sādhu pṛṣṭaṃ sarvaṃ nivedayāmi yathājñātamiti ॥

ऋषि पैप्पलादि (पिप्पलाद के पुत्र) ने भगवान् जाबालि से प्रश्न किया-हे भगवन् ! मेरे प्रति परम तत्त्व के रहस्य का वर्णन कीजिए। तत्त्व क्या है? जीव कौन है? पशु कौन है? ईश कौन है? मोक्ष प्राप्ति का उपाय क्या है? महर्षि जाबालि ने कहा-आपने बहुत श्रेष्ठ प्रश्न किया। जो मुझे ज्ञात है, वह सब मैं आपसे निवेदन करता हूँ। पैप्पलादि ने पूछा-यह सब आपको कहाँ से ज्ञात हुआ? जाबालि ने कहा-षडानन से ज्ञात हुआ। पैप्पलादि ने पुनः पूछा-उन (षडानन) को कहाँ से यह ज्ञान प्राप्त हुआ? जाबालि ने कहा-उन्हें यह ज्ञान ईशान से प्राप्त हुआ। पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया कि उन्होंने यह कैसे प्राप्त किया? जाबालि ने उत्तर दिया कि उन्होंने (ईशान ने) उपासना के द्वारा यह ज्ञान प्राप्त किया। (यह सुनकर) पैप्पलादि ने कहा-हे भगवन् ! मुझे यह सब कुछ रहस्य सहित बताइये ॥


4

पुनः स तमुवाच कुतस्त्वया ज्ञातमिति ॥

punaḥ sa tamuvāca kutastvayā jñātamiti ॥

ऋषि पैप्पलादि (पिप्पलाद के पुत्र) ने भगवान् जाबालि से प्रश्न किया-हे भगवन् ! मेरे प्रति परम तत्त्व के रहस्य का वर्णन कीजिए। तत्त्व क्या है? जीव कौन है? पशु कौन है? ईश कौन है? मोक्ष प्राप्ति का उपाय क्या है? महर्षि जाबालि ने कहा-आपने बहुत श्रेष्ठ प्रश्न किया। जो मुझे ज्ञात है, वह सब मैं आपसे निवेदन करता हूँ। पैप्पलादि ने पूछा-यह सब आपको कहाँ से ज्ञात हुआ? जाबालि ने कहा-षडानन से ज्ञात हुआ। पैप्पलादि ने पुनः पूछा-उन (षडानन) को कहाँ से यह ज्ञान प्राप्त हुआ? जाबालि ने कहा-उन्हें यह ज्ञान ईशान से प्राप्त हुआ। पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया कि उन्होंने यह कैसे प्राप्त किया? जाबालि ने उत्तर दिया कि उन्होंने (ईशान ने) उपासना के द्वारा यह ज्ञान प्राप्त किया। (यह सुनकर) पैप्पलादि ने कहा-हे भगवन् ! मुझे यह सब कुछ रहस्य सहित बताइये ॥


5

पुनः स तमुवाच षडाननादिति ॥

punaḥ sa tamuvāca ṣaḍānanāditi ॥

ऋषि पैप्पलादि (पिप्पलाद के पुत्र) ने भगवान् जाबालि से प्रश्न किया-हे भगवन् ! मेरे प्रति परम तत्त्व के रहस्य का वर्णन कीजिए। तत्त्व क्या है? जीव कौन है? पशु कौन है? ईश कौन है? मोक्ष प्राप्ति का उपाय क्या है? महर्षि जाबालि ने कहा-आपने बहुत श्रेष्ठ प्रश्न किया। जो मुझे ज्ञात है, वह सब मैं आपसे निवेदन करता हूँ। पैप्पलादि ने पूछा-यह सब आपको कहाँ से ज्ञात हुआ? जाबालि ने कहा-षडानन से ज्ञात हुआ। पैप्पलादि ने पुनः पूछा-उन (षडानन) को कहाँ से यह ज्ञान प्राप्त हुआ? जाबालि ने कहा-उन्हें यह ज्ञान ईशान से प्राप्त हुआ। पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया कि उन्होंने यह कैसे प्राप्त किया? जाबालि ने उत्तर दिया कि उन्होंने (ईशान ने) उपासना के द्वारा यह ज्ञान प्राप्त किया। (यह सुनकर) पैप्पलादि ने कहा-हे भगवन् ! मुझे यह सब कुछ रहस्य सहित बताइये ॥


6

पुनः स तमुवाच तेनाथ कुतो ज्ञातमिति॥

punaḥ sa tamuvāca tenātha kuto jñātamiti॥

ऋषि पैप्पलादि (पिप्पलाद के पुत्र) ने भगवान् जाबालि से प्रश्न किया-हे भगवन् ! मेरे प्रति परम तत्त्व के रहस्य का वर्णन कीजिए। तत्त्व क्या है? जीव कौन है? पशु कौन है? ईश कौन है? मोक्ष प्राप्ति का उपाय क्या है? महर्षि जाबालि ने कहा-आपने बहुत श्रेष्ठ प्रश्न किया। जो मुझे ज्ञात है, वह सब मैं आपसे निवेदन करता हूँ। पैप्पलादि ने पूछा-यह सब आपको कहाँ से ज्ञात हुआ? जाबालि ने कहा-षडानन से ज्ञात हुआ। पैप्पलादि ने पुनः पूछा-उन (षडानन) को कहाँ से यह ज्ञान प्राप्त हुआ? जाबालि ने कहा-उन्हें यह ज्ञान ईशान से प्राप्त हुआ। पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया कि उन्होंने यह कैसे प्राप्त किया? जाबालि ने उत्तर दिया कि उन्होंने (ईशान ने) उपासना के द्वारा यह ज्ञान प्राप्त किया। (यह सुनकर) पैप्पलादि ने कहा-हे भगवन् ! मुझे यह सब कुछ रहस्य सहित बताइये ॥


7

पुनः स तमुवाच तेनेशानादिति ॥

punaḥ sa tamuvāca teneśānāditi ॥

ऋषि पैप्पलादि (पिप्पलाद के पुत्र) ने भगवान् जाबालि से प्रश्न किया-हे भगवन् ! मेरे प्रति परम तत्त्व के रहस्य का वर्णन कीजिए। तत्त्व क्या है? जीव कौन है? पशु कौन है? ईश कौन है? मोक्ष प्राप्ति का उपाय क्या है? महर्षि जाबालि ने कहा-आपने बहुत श्रेष्ठ प्रश्न किया। जो मुझे ज्ञात है, वह सब मैं आपसे निवेदन करता हूँ। पैप्पलादि ने पूछा-यह सब आपको कहाँ से ज्ञात हुआ? जाबालि ने कहा-षडानन से ज्ञात हुआ। पैप्पलादि ने पुनः पूछा-उन (षडानन) को कहाँ से यह ज्ञान प्राप्त हुआ? जाबालि ने कहा-उन्हें यह ज्ञान ईशान से प्राप्त हुआ। पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया कि उन्होंने यह कैसे प्राप्त किया? जाबालि ने उत्तर दिया कि उन्होंने (ईशान ने) उपासना के द्वारा यह ज्ञान प्राप्त किया। (यह सुनकर) पैप्पलादि ने कहा-हे भगवन् ! मुझे यह सब कुछ रहस्य सहित बताइये ॥


8

पुनः स तमुवाच कथं तस्मात्तेन ज्ञातमिति॥

punaḥ sa tamuvāca kathaṃ tasmāttena jñātamiti॥

ऋषि पैप्पलादि (पिप्पलाद के पुत्र) ने भगवान् जाबालि से प्रश्न किया-हे भगवन् ! मेरे प्रति परम तत्त्व के रहस्य का वर्णन कीजिए। तत्त्व क्या है? जीव कौन है? पशु कौन है? ईश कौन है? मोक्ष प्राप्ति का उपाय क्या है? महर्षि जाबालि ने कहा-आपने बहुत श्रेष्ठ प्रश्न किया। जो मुझे ज्ञात है, वह सब मैं आपसे निवेदन करता हूँ। पैप्पलादि ने पूछा-यह सब आपको कहाँ से ज्ञात हुआ? जाबालि ने कहा-षडानन से ज्ञात हुआ। पैप्पलादि ने पुनः पूछा-उन (षडानन) को कहाँ से यह ज्ञान प्राप्त हुआ? जाबालि ने कहा-उन्हें यह ज्ञान ईशान से प्राप्त हुआ। पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया कि उन्होंने यह कैसे प्राप्त किया? जाबालि ने उत्तर दिया कि उन्होंने (ईशान ने) उपासना के द्वारा यह ज्ञान प्राप्त किया। (यह सुनकर) पैप्पलादि ने कहा-हे भगवन् ! मुझे यह सब कुछ रहस्य सहित बताइये ॥


9

पुनः स तमुवाच तदुपासनादिति ॥

punaḥ sa tamuvāca tadupāsanāditi ॥

ऋषि पैप्पलादि (पिप्पलाद के पुत्र) ने भगवान् जाबालि से प्रश्न किया-हे भगवन् ! मेरे प्रति परम तत्त्व के रहस्य का वर्णन कीजिए। तत्त्व क्या है? जीव कौन है? पशु कौन है? ईश कौन है? मोक्ष प्राप्ति का उपाय क्या है? महर्षि जाबालि ने कहा-आपने बहुत श्रेष्ठ प्रश्न किया। जो मुझे ज्ञात है, वह सब मैं आपसे निवेदन करता हूँ। पैप्पलादि ने पूछा-यह सब आपको कहाँ से ज्ञात हुआ? जाबालि ने कहा-षडानन से ज्ञात हुआ। पैप्पलादि ने पुनः पूछा-उन (षडानन) को कहाँ से यह ज्ञान प्राप्त हुआ? जाबालि ने कहा-उन्हें यह ज्ञान ईशान से प्राप्त हुआ। पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया कि उन्होंने यह कैसे प्राप्त किया? जाबालि ने उत्तर दिया कि उन्होंने (ईशान ने) उपासना के द्वारा यह ज्ञान प्राप्त किया। (यह सुनकर) पैप्पलादि ने कहा-हे भगवन् ! मुझे यह सब कुछ रहस्य सहित बताइये ॥


10

पुनः स तमुवाच भगवन्कृपया मे सरहस्यं सर्वं निवेदयेति ॥

punaḥ sa tamuvāca bhagavankṛpayā me sarahasyaṃ sarvaṃ nivedayeti ॥

ऋषि पैप्पलादि (पिप्पलाद के पुत्र) ने भगवान् जाबालि से प्रश्न किया-हे भगवन् ! मेरे प्रति परम तत्त्व के रहस्य का वर्णन कीजिए। तत्त्व क्या है? जीव कौन है? पशु कौन है? ईश कौन है? मोक्ष प्राप्ति का उपाय क्या है? महर्षि जाबालि ने कहा-आपने बहुत श्रेष्ठ प्रश्न किया। जो मुझे ज्ञात है, वह सब मैं आपसे निवेदन करता हूँ। पैप्पलादि ने पूछा-यह सब आपको कहाँ से ज्ञात हुआ? जाबालि ने कहा-षडानन से ज्ञात हुआ। पैप्पलादि ने पुनः पूछा-उन (षडानन) को कहाँ से यह ज्ञान प्राप्त हुआ? जाबालि ने कहा-उन्हें यह ज्ञान ईशान से प्राप्त हुआ। पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया कि उन्होंने यह कैसे प्राप्त किया? जाबालि ने उत्तर दिया कि उन्होंने (ईशान ने) उपासना के द्वारा यह ज्ञान प्राप्त किया। (यह सुनकर) पैप्पलादि ने कहा-हे भगवन् ! मुझे यह सब कुछ रहस्य सहित बताइये ॥


11

स तेन पृष्टः सर्वं निवेदयामास तत्त्वम्। पशुपतिरहंकाराविष्टःसंसारी जीवः स एव पशुः । सर्वज्ञः पञ्चकृत्यसंपन्नः सर्वेश्वर ईशः पशुपतिः॥

sa tena pṛṣṭaḥ sarvaṃ nivedayāmāsa tattvam। paśupatirahaṃkārāviṣṭaḥsaṃsārī jīvaḥ sa eva paśuḥ । sarvajñaḥ pañcakṛtyasaṃpannaḥ sarveśvara īśaḥ paśupatiḥ॥

पैप्पलादि द्वारा पूछे जाने पर जाबालि ने कहा-मैं सम्पूर्ण तत्त्व कहता हूँ। स्वयं पशुपति ही अहंकार युक्त होकर संसारी जीव हो जाता है। वही पशु है। सर्वज्ञ और पञ्च कृत्यों से सम्पन्न, सर्वेश्वर ईश ही पशुपति है। पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया-पशु कौन है? जाबालि ने कहा-जीव को ही पशु कहा गया है। जीवों के पति होने के कारण उन्हें पशुपति कहते हैं। उन्होंने फिर पूछा-जीव पशु किस तरह है? और (पशुपति) उनके पति कैसे हैं? महर्षि जाबालि ने उत्तर दिया-जिस प्रकार घास का सेवन करने वाले, विवेक हीन, किसी अन्य के दास, कृषि आदि कार्यों में नियोजित अनेक प्रकार के दुःखों को सहन करने वाले, अपने स्वामी के बन्धन में बँधे हुए गौ आदि पशु होते हैं (उसी प्रकार ये जीव भी ईश्वर के बन्धन में बंधे रहते हैं)। जैसे-उन पशुओं के स्वामी (कोई मनुष्य) होते हैं उसी प्रकार समस्त जीवों के स्वामी (पति) सर्वज्ञ, ईश्वर-पशुपति होते हैं। पैप्पलादि ने पुनः पूछा- वह ज्ञान किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है? जाबालि ने कहा-विभूति धारण के द्वारा उस ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। पैप्पलादि ने पूछा-उसे धारण करने की विधि क्या है? उसे कहाँ-कहाँ धारण करना चाहिए?॥


12

के पशव इति पुनःस तमुवाच॥

ke paśava iti punaḥsa tamuvāca॥

पैप्पलादि द्वारा पूछे जाने पर जाबालि ने कहा-मैं सम्पूर्ण तत्त्व कहता हूँ। स्वयं पशुपति ही अहंकार युक्त होकर संसारी जीव हो जाता है। वही पशु है। सर्वज्ञ और पञ्च कृत्यों से सम्पन्न, सर्वेश्वर ईश ही पशुपति है। पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया-पशु कौन है? जाबालि ने कहा-जीव को ही पशु कहा गया है। जीवों के पति होने के कारण उन्हें पशुपति कहते हैं। उन्होंने फिर पूछा-जीव पशु किस तरह है? और (पशुपति) उनके पति कैसे हैं? महर्षि जाबालि ने उत्तर दिया-जिस प्रकार घास का सेवन करने वाले, विवेक हीन, किसी अन्य के दास, कृषि आदि कार्यों में नियोजित अनेक प्रकार के दुःखों को सहन करने वाले, अपने स्वामी के बन्धन में बँधे हुए गौ आदि पशु होते हैं (उसी प्रकार ये जीव भी ईश्वर के बन्धन में बंधे रहते हैं)। जैसे-उन पशुओं के स्वामी (कोई मनुष्य) होते हैं उसी प्रकार समस्त जीवों के स्वामी (पति) सर्वज्ञ, ईश्वर-पशुपति होते हैं। पैप्पलादि ने पुनः पूछा- वह ज्ञान किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है? जाबालि ने कहा-विभूति धारण के द्वारा उस ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। पैप्पलादि ने पूछा-उसे धारण करने की विधि क्या है? उसे कहाँ-कहाँ धारण करना चाहिए?॥


13

जीवाः पशव उक्ताः। तत्पतित्वात्पशुपतिः॥

jīvāḥ paśava uktāḥ। tatpatitvātpaśupatiḥ॥

पैप्पलादि द्वारा पूछे जाने पर जाबालि ने कहा-मैं सम्पूर्ण तत्त्व कहता हूँ। स्वयं पशुपति ही अहंकार युक्त होकर संसारी जीव हो जाता है। वही पशु है। सर्वज्ञ और पञ्च कृत्यों से सम्पन्न, सर्वेश्वर ईश ही पशुपति है। पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया-पशु कौन है? जाबालि ने कहा-जीव को ही पशु कहा गया है। जीवों के पति होने के कारण उन्हें पशुपति कहते हैं। उन्होंने फिर पूछा-जीव पशु किस तरह है? और (पशुपति) उनके पति कैसे हैं? महर्षि जाबालि ने उत्तर दिया-जिस प्रकार घास का सेवन करने वाले, विवेक हीन, किसी अन्य के दास, कृषि आदि कार्यों में नियोजित अनेक प्रकार के दुःखों को सहन करने वाले, अपने स्वामी के बन्धन में बँधे हुए गौ आदि पशु होते हैं (उसी प्रकार ये जीव भी ईश्वर के बन्धन में बंधे रहते हैं)। जैसे-उन पशुओं के स्वामी (कोई मनुष्य) होते हैं उसी प्रकार समस्त जीवों के स्वामी (पति) सर्वज्ञ, ईश्वर-पशुपति होते हैं। पैप्पलादि ने पुनः पूछा- वह ज्ञान किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है? जाबालि ने कहा-विभूति धारण के द्वारा उस ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। पैप्पलादि ने पूछा-उसे धारण करने की विधि क्या है? उसे कहाँ-कहाँ धारण करना चाहिए?॥


14

स पुनस्तं होवाच कथं जीवाः पशव इति। कथं तत्पतिरिति ।।

sa punastaṃ hovāca kathaṃ jīvāḥ paśava iti। kathaṃ tatpatiriti ।।

पैप्पलादि द्वारा पूछे जाने पर जाबालि ने कहा-मैं सम्पूर्ण तत्त्व कहता हूँ। स्वयं पशुपति ही अहंकार युक्त होकर संसारी जीव हो जाता है। वही पशु है। सर्वज्ञ और पञ्च कृत्यों से सम्पन्न, सर्वेश्वर ईश ही पशुपति है। पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया-पशु कौन है? जाबालि ने कहा-जीव को ही पशु कहा गया है। जीवों के पति होने के कारण उन्हें पशुपति कहते हैं। उन्होंने फिर पूछा-जीव पशु किस तरह है? और (पशुपति) उनके पति कैसे हैं? महर्षि जाबालि ने उत्तर दिया-जिस प्रकार घास का सेवन करने वाले, विवेक हीन, किसी अन्य के दास, कृषि आदि कार्यों में नियोजित अनेक प्रकार के दुःखों को सहन करने वाले, अपने स्वामी के बन्धन में बँधे हुए गौ आदि पशु होते हैं (उसी प्रकार ये जीव भी ईश्वर के बन्धन में बंधे रहते हैं)। जैसे-उन पशुओं के स्वामी (कोई मनुष्य) होते हैं उसी प्रकार समस्त जीवों के स्वामी (पति) सर्वज्ञ, ईश्वर-पशुपति होते हैं। पैप्पलादि ने पुनः पूछा- वह ज्ञान किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है? जाबालि ने कहा-विभूति धारण के द्वारा उस ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। पैप्पलादि ने पूछा-उसे धारण करने की विधि क्या है? उसे कहाँ-कहाँ धारण करना चाहिए?॥


15

स तमुवाच यथा तृणाशिनो विवेकहीनाः परप्रेष्याः कृष्यादिकर्मसु नियुक्ताः सकलदुःखसहाः स्वस्वामिबध्यमाना गवादयः पशवः। यथा तत्स्वामिन इव सर्वज्ञ ईशः पशुपतिः॥

sa tamuvāca yathā tṛṇāśino vivekahīnāḥ parapreṣyāḥ kṛṣyādikarmasu niyuktāḥ sakaladuḥkhasahāḥ svasvāmibadhyamānā gavādayaḥ paśavaḥ। yathā tatsvāmina iva sarvajña īśaḥ paśupatiḥ॥

पैप्पलादि द्वारा पूछे जाने पर जाबालि ने कहा-मैं सम्पूर्ण तत्त्व कहता हूँ। स्वयं पशुपति ही अहंकार युक्त होकर संसारी जीव हो जाता है। वही पशु है। सर्वज्ञ और पञ्च कृत्यों से सम्पन्न, सर्वेश्वर ईश ही पशुपति है। पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया-पशु कौन है? जाबालि ने कहा-जीव को ही पशु कहा गया है। जीवों के पति होने के कारण उन्हें पशुपति कहते हैं। उन्होंने फिर पूछा-जीव पशु किस तरह है? और (पशुपति) उनके पति कैसे हैं? महर्षि जाबालि ने उत्तर दिया-जिस प्रकार घास का सेवन करने वाले, विवेक हीन, किसी अन्य के दास, कृषि आदि कार्यों में नियोजित अनेक प्रकार के दुःखों को सहन करने वाले, अपने स्वामी के बन्धन में बँधे हुए गौ आदि पशु होते हैं (उसी प्रकार ये जीव भी ईश्वर के बन्धन में बंधे रहते हैं)। जैसे-उन पशुओं के स्वामी (कोई मनुष्य) होते हैं उसी प्रकार समस्त जीवों के स्वामी (पति) सर्वज्ञ, ईश्वर-पशुपति होते हैं। पैप्पलादि ने पुनः पूछा- वह ज्ञान किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है? जाबालि ने कहा-विभूति धारण के द्वारा उस ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। पैप्पलादि ने पूछा-उसे धारण करने की विधि क्या है? उसे कहाँ-कहाँ धारण करना चाहिए?॥


16

तज्ज्ञानं केनोपायेन जायते ॥

tajjñānaṃ kenopāyena jāyate ॥

पैप्पलादि द्वारा पूछे जाने पर जाबालि ने कहा-मैं सम्पूर्ण तत्त्व कहता हूँ। स्वयं पशुपति ही अहंकार युक्त होकर संसारी जीव हो जाता है। वही पशु है। सर्वज्ञ और पञ्च कृत्यों से सम्पन्न, सर्वेश्वर ईश ही पशुपति है। पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया-पशु कौन है? जाबालि ने कहा-जीव को ही पशु कहा गया है। जीवों के पति होने के कारण उन्हें पशुपति कहते हैं। उन्होंने फिर पूछा-जीव पशु किस तरह है? और (पशुपति) उनके पति कैसे हैं? महर्षि जाबालि ने उत्तर दिया-जिस प्रकार घास का सेवन करने वाले, विवेक हीन, किसी अन्य के दास, कृषि आदि कार्यों में नियोजित अनेक प्रकार के दुःखों को सहन करने वाले, अपने स्वामी के बन्धन में बँधे हुए गौ आदि पशु होते हैं (उसी प्रकार ये जीव भी ईश्वर के बन्धन में बंधे रहते हैं)। जैसे-उन पशुओं के स्वामी (कोई मनुष्य) होते हैं उसी प्रकार समस्त जीवों के स्वामी (पति) सर्वज्ञ, ईश्वर-पशुपति होते हैं। पैप्पलादि ने पुनः पूछा- वह ज्ञान किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है? जाबालि ने कहा-विभूति धारण के द्वारा उस ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। पैप्पलादि ने पूछा-उसे धारण करने की विधि क्या है? उसे कहाँ-कहाँ धारण करना चाहिए?॥


17

पुनः स तमुवाच विभूतिधारणादेव॥

punaḥ sa tamuvāca vibhūtidhāraṇādeva॥

पैप्पलादि द्वारा पूछे जाने पर जाबालि ने कहा-मैं सम्पूर्ण तत्त्व कहता हूँ। स्वयं पशुपति ही अहंकार युक्त होकर संसारी जीव हो जाता है। वही पशु है। सर्वज्ञ और पञ्च कृत्यों से सम्पन्न, सर्वेश्वर ईश ही पशुपति है। पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया-पशु कौन है? जाबालि ने कहा-जीव को ही पशु कहा गया है। जीवों के पति होने के कारण उन्हें पशुपति कहते हैं। उन्होंने फिर पूछा-जीव पशु किस तरह है? और (पशुपति) उनके पति कैसे हैं? महर्षि जाबालि ने उत्तर दिया-जिस प्रकार घास का सेवन करने वाले, विवेक हीन, किसी अन्य के दास, कृषि आदि कार्यों में नियोजित अनेक प्रकार के दुःखों को सहन करने वाले, अपने स्वामी के बन्धन में बँधे हुए गौ आदि पशु होते हैं (उसी प्रकार ये जीव भी ईश्वर के बन्धन में बंधे रहते हैं)। जैसे-उन पशुओं के स्वामी (कोई मनुष्य) होते हैं उसी प्रकार समस्त जीवों के स्वामी (पति) सर्वज्ञ, ईश्वर-पशुपति होते हैं। पैप्पलादि ने पुनः पूछा- वह ज्ञान किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है? जाबालि ने कहा-विभूति धारण के द्वारा उस ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। पैप्पलादि ने पूछा-उसे धारण करने की विधि क्या है? उसे कहाँ-कहाँ धारण करना चाहिए?॥


18

तत्प्रकारः कथमिति। कुत्र कुत्र धार्यम् ॥

tatprakāraḥ kathamiti। kutra kutra dhāryam ॥

पैप्पलादि द्वारा पूछे जाने पर जाबालि ने कहा-मैं सम्पूर्ण तत्त्व कहता हूँ। स्वयं पशुपति ही अहंकार युक्त होकर संसारी जीव हो जाता है। वही पशु है। सर्वज्ञ और पञ्च कृत्यों से सम्पन्न, सर्वेश्वर ईश ही पशुपति है। पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया-पशु कौन है? जाबालि ने कहा-जीव को ही पशु कहा गया है। जीवों के पति होने के कारण उन्हें पशुपति कहते हैं। उन्होंने फिर पूछा-जीव पशु किस तरह है? और (पशुपति) उनके पति कैसे हैं? महर्षि जाबालि ने उत्तर दिया-जिस प्रकार घास का सेवन करने वाले, विवेक हीन, किसी अन्य के दास, कृषि आदि कार्यों में नियोजित अनेक प्रकार के दुःखों को सहन करने वाले, अपने स्वामी के बन्धन में बँधे हुए गौ आदि पशु होते हैं (उसी प्रकार ये जीव भी ईश्वर के बन्धन में बंधे रहते हैं)। जैसे-उन पशुओं के स्वामी (कोई मनुष्य) होते हैं उसी प्रकार समस्त जीवों के स्वामी (पति) सर्वज्ञ, ईश्वर-पशुपति होते हैं। पैप्पलादि ने पुनः पूछा- वह ज्ञान किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है? जाबालि ने कहा-विभूति धारण के द्वारा उस ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। पैप्पलादि ने पूछा-उसे धारण करने की विधि क्या है? उसे कहाँ-कहाँ धारण करना चाहिए?॥


19

पुनः स तमुवाच सद्योजातादिपञ्चब्रह्ममन्त्रैर्भस्म संगृह्याग्निरिति भस्मेत्यनेनाभिमन्त्र्य मानस्तोक इति समुद्धत्य जलेन संसृज्य त्र्यायुषमिति शिरोललाटवक्षःस्कन्धेष्विति तिसृभित्र्यायुषैस्त्र्यम्बकैस्तिस्त्रो रेखाः प्रकुर्वीत। व्रतमेतच्छाम्भवं सर्वेषु वेदेषु वेदवादिभिरुक्तं भवति। तत्समाचरेन्मुमुक्षुर्न पुनर्भवाय॥

punaḥ sa tamuvāca sadyojātādipañcabrahmamantrairbhasma saṃgṛhyāgniriti bhasmetyanenābhimantrya mānastoka iti samuddhatya jalena saṃsṛjya tryāyuṣamiti śirolalāṭavakṣaḥskandheṣviti tisṛbhitryāyuṣaistryambakaististro rekhāḥ prakurvīta। vratametacchāmbhavaṃ sarveṣu vedeṣu vedavādibhiruktaṃ bhavati। tatsamācarenmumukṣurna punarbhavāya॥

ऋषि जाबालि ने कहा- ‘सद्योजात’ आदि पाँच ब्रह्म मन्त्रों से भस्म का संग्रह करे, फिर ‘अग्निरिति’ इस मन्त्र से उसे अभिमन्त्रित करे, ‘मानस्तोक’ (यजु० १६.१६) इस मंत्र से उसे उठाये, तत्पश्चात् उसे जल से गीला करके ‘त्र्यायुषम्’ (यजु० ३.६२) इस मंत्र से सिर, ललाट, वक्षस्थल, कन्धों पर धारण करे। इसके बाद तीन त्र्यायुष और तीन त्र्यम्बक (यजु० ३.६०) मन्त्रों से तीन रेखायें खींचे। वेदों में यह शाम्भव व्रत वेदवादियों के द्वारा बतलाया गया है। इसका (इस व्रत का) आचरण करने वाले मुमुक्षु का पुनर्जन्म नहीं होता ॥ [यहाँ जिन मन्त्रों का संक्षिप्तांश दिया है, उनमें जो मन्त्र यजुर्वेद के हैं, उनके सन्दर्भ दे दिये गये हैं। शेष के मन्त्र इस प्रकार हैं- सद्योजातादि पाँच मन्त्र- ॐ सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः। भवेभवे नाति भवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः ॥ १॥ वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः । श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः।कालाय नमः कल विकरणाय नमो बल विकरणाय नमः ॥ २॥ बलाय नमो बल प्रमथनाय नमः। सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः ॥ ३॥ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्व शर्वेभ्यो नमस्तेऽअस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥४॥ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि । तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥५॥(रुद्राष्टाध्यायी) अग्निरिति-ॐ अग्निरिति भस्म।वायुरिति भस्म।जलमिति भस्म।स्थलमिति भस्म। व्योमेति भस्म। सर्वँ ह वा इदं भस्म । मन एतानि चक्षुंषि भस्मानि इति॥(आह्निक सूत्रावलिः पृ. ६५)]


20

अथ सनत्कुमारः प्रमाणं पृच्छति । त्रिपुण्ड्रधारणस्य त्रिधा रेखा आललाटादाचक्षुषोराभ्रुवोर्मध्यतश्च॥

atha sanatkumāraḥ pramāṇaṃ pṛcchati । tripuṇḍradhāraṇasya tridhā rekhā ālalāṭādācakṣuṣorābhruvormadhyataśca॥

प्रमाण के विषय में पूछने पर सनत्कुमार ने बताया कि त्रिपुण्ड्र धारण करने के लिए तीन आड़ी रेखायें सम्पूर्ण ललाट के मध्य, भौंहों और नेत्रों तक खींचे ॥


21

याऽस्य प्रथमा रेखा सा गार्हपत्यश्चाकारो रजो भूर्लोकः स्वात्मा क्रियाशक्तिः ऋग्वेदः प्रातःसवनं प्रजापतिर्देवो देवतेति। याऽस्य द्वितीया रेखा सा दक्षिणाग्निरुकारः सत्त्वमन्तरिक्षमन्तरात्मा चेच्छाशक्तिर्यजुर्वेदो माध्यन्दिनसवनं विष्णुर्देवो देवतेति। याऽस्य तृतीया रेखा साऽऽहवनीयो मकारस्तमो द्यौर्लोकः परमात्मा ज्ञानशक्तिः सामवेदस्तृतीयसवनं महादेवो देवतेति ॥

yā'sya prathamā rekhā sā gārhapatyaścākāro rajo bhūrlokaḥ svātmā kriyāśaktiḥ ṛgvedaḥ prātaḥsavanaṃ prajāpatirdevo devateti। yā'sya dvitīyā rekhā sā dakṣiṇāgnirukāraḥ sattvamantarikṣamantarātmā cecchāśaktiryajurvedo mādhyandinasavanaṃ viṣṇurdevo devateti। yā'sya tṛtīyā rekhā sā''havanīyo makārastamo dyaurlokaḥ paramātmā jñānaśaktiḥ sāmavedastṛtīyasavanaṃ mahādevo devateti ॥

जो इसकी प्रथम रेखा है, वह गार्हपत्य अग्नि रजोगुण ‘अ’ कार भूलोक, अपनी आत्मा की क्रिया - शक्ति स्वरूप, ऋग्वेद रूप और प्रातः सवन स्वरूप है, इसके देवता स्वयं प्रजापति हैं। जो इसकी द्वितीय रेखा है, वह दक्षिणाग्नि स्वरूप, सत्त्वगुण रूप, ‘उ’ कार रूप, अन्तरिक्ष स्वरूप, अपनी अन्तरात्मा की इच्छा-शक्ति रूप, यजुर्वेद रूप और माध्यन्दिन सवनरूप है, इसके देवता विष्णु हैं। जो इसकी तृतीय रेखा है, वह आहवनीय अग्निरूप, ‘म’ कार रूप, तमोगुण स्वरूप, द्युलोकरूप, परमात्मा की ज्ञान-शक्ति स्वरूप, सामवेद रूप तथा तृतीय सवन स्वरूप है, इसके देवता स्वयं महादेव (शिव) हैं॥


22

त्रिपुण्ड्रं भस्मना करोति यो विद्वान्ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थो यतिर्वा स महापातको-पपातकेभ्यः पूतो भवति । स सर्वान् वेदानधीतो भवति। स सर्वान्देवान्ध्यातो भवति। स सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति।स सकलरुद्रमन्त्रजापी भवति। न स पुनरावर्तते न स पुनरावर्तते॥ इति ॥

tripuṇḍraṃ bhasmanā karoti yo vidvānbrahmacārī gṛhī vānaprastho yatirvā sa mahāpātako-papātakebhyaḥ pūto bhavati । sa sarvān vedānadhīto bhavati। sa sarvāndevāndhyāto bhavati। sa sarveṣu tīrtheṣu snāto bhavati।sa sakalarudramantrajāpī bhavati। na sa punarāvartate na sa punarāvartate॥ iti ॥

जो विद्वान् ब्रह्मचारी, गृहस्थी, वानप्रस्थी या यति भस्म का त्रिपुण्ड्र धारण करता है, (पूर्वमंत्र में दर्शाये गये त्रिपुण्ड्र के मर्म को आत्मसात् करता है।) वह महापातकों और उपपातकों से विमुक्त हो जाता है। वह समस्त वेदों का अवगाहन करने वाला, समस्त देवताओं का ध्यान करने वाला, समस्त तीर्थों के स्नान का पुण्य प्राप्त करने वाला और सकल रुद्र मन्त्रों का जप कर्ता हो जाता है। उसका (ऐसा करने वाले का) इस जगत् में पुनरावर्तन नहीं होता, पुनरावर्तन नहीं होता। यह सत्य है (इस प्रकार) यह उपनिषद् पूर्ण हुई ॥


23

ॐ सत्यमित्युपनिषत् ॥

oṃ satyamityupaniṣat ॥

जो विद्वान् ब्रह्मचारी, गृहस्थी, वानप्रस्थी या यति भस्म का त्रिपुण्ड्र धारण करता है, (पूर्वमंत्र में दर्शाये गये त्रिपुण्ड्र के मर्म को आत्मसात् करता है।) वह महापातकों और उपपातकों से विमुक्त हो जाता है। वह समस्त वेदों का अवगाहन करने वाला, समस्त देवताओं का ध्यान करने वाला, समस्त तीर्थों के स्नान का पुण्य प्राप्त करने वाला और सकल रुद्र मन्त्रों का जप कर्ता हो जाता है। उसका (ऐसा करने वाले का) इस जगत् में पुनरावर्तन नहीं होता, पुनरावर्तन नहीं होता। यह सत्य है (इस प्रकार) यह उपनिषद् पूर्ण हुई ॥