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1. Kalagni-Rudra Upanishad

Kalagni-Rudra Upanishad

[ Sutra 1 ]

अथ कालाग्निरुद्रोपनिषदः संवर्तकोऽग्निर्ऋषिरनुष्टुप्छन्दः श्रीकालाग्निरुद्रो देवता श्री कालाग्निरुद्रप्रीत्यर्थे विनियोगः ॥1॥

atha kālāgnirudropaniṣadaḥ saṃvartako'gnirṛṣiranuṣṭupchandaḥ śrīkālāgnirudro devatā śrī kālāgnirudraprītyarthe viniyogaḥ ॥1॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस कालाग्निरुद्रोपनिषद् के ऋषि संवर्तक अग्नि, अनुष्टप-छन्द और देवता श्रीकालाग्नि रुद्र हैं । श्री कालाग्निरुद्र देव की प्रसन्नता के लिए इसका विनियोग किया जाता है ॥1॥

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[ Sutra 2 ]

अथ कालाग्निरुद् भगवन्तं सनत्कुमारः पप्रच्छ अधीहि भगवंस्त्रिपुण्ड्रधिं सतत्त्वं कि द्रव्यं कियस्थानं कति प्रमाणं का रेखाः के मंत्राः का शक्तिः किं दैवतं कः कर्ता कि फलमिति च ॥2॥

atha kālāgnirud bhagavantaṃ sanatkumāraḥ papraccha adhīhi bhagavaṃstripuṇḍradhiṃ satattvaṃ ki dravyaṃ kiyasthānaṃ kati pramāṇaṃ kā rekhāḥ ke maṃtrāḥ kā śaktiḥ kiṃ daivataṃ kaḥ kartā ki phalamiti ca ॥2॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — किसी समय एक बार सनत्कुमारजी ने भगवान् कालाग्निरुद्रदेव से प्रश्न किया- 'हे भगवन्! त्रिपुण्ड्र की विधि तत्तसहित 'मझे समझाने की कृपा करें । वह क्या है ? उसका स्थान कौन सा है, उसका प्रमाण (अर्थात-आकार) कितना है, उसकी रेखाएँ कितनी हैं, उसका कौन सा मंत्र है. उसकी शक्ति क्या है उसका कौन सा देवता है, कौन उसका कर्ता है तथा उसका फल क्या होता है ? ॥2॥

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[ Sutra 3 ]

तं होवाच भगवान्कालाग्निरुद्रः यद्रव्यं तदाग्नेयं भस्म सद्योजातादिपञ्चब्रह्ममन्त्रैः परिगृह्याग्निरिति भस्म वायुरिति भस्म जलमिति भस्म स्थलमिति भस्म व्योमेति भस्मेत्यनेना-भिमन्त्र्य मानस्तोक इति समुद्धृत्य मा नो महान्तमिति जलेन संसृज्य त्रियायुषमिति शिरोललाट-वक्ष:स्कन्धेषु त्रियायुषैस्त्र्यम्बकैस्त्रिशक्तिभिस्तिर्यक्तिस्त्रो रेखा: प्रकुर्वीत व्रतमेतच्छाम्भवं सर्वेषु वेदेषु वेदवादिभिरुक्तं भवति तस्मात्तत्समाचरेन्मुमुक्षुर्न पुनर्भवाय ॥3॥

taṃ hovāca bhagavānkālāgnirudraḥ yadravyaṃ tadāgneyaṃ bhasma sadyojātādipañcabrahmamantraiḥ parigṛhyāgniriti bhasma vāyuriti bhasma jalamiti bhasma sthalamiti bhasma vyometi bhasmetyanenā-bhimantrya mānastoka iti samuddhṛtya mā no mahāntamiti jalena saṃsṛjya triyāyuṣamiti śirolalāṭa-vakṣa:skandheṣu triyāyuṣaistryambakaistriśaktibhistiryaktistro rekhā: prakurvīta vratametacchāmbhavaṃ sarveṣu vedeṣu vedavādibhiruktaṃ bhavati tasmāttatsamācarenmumukṣurna punarbhavāya ॥3॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — यह सुनकर उन भगवान् कालाग्निरुद्र ने सनत्कुमार जी को समझाते हुए कहा कि त्रिपुण्ड्र का द्रव्य अग्निहोत्र की भस्म ही है । इस भस्म को 'सद्योजातादि' पञ्चब्रह्म मंत्रों को पढ़कर धारण करना चाहिए । अग्निरिति भस्म, वायुरिति भस्म, खमिति भस्म, जलमिति भस्म, स्थलमिति भस्म, (पञ्चभूतादि) मन्त्रों से अभिमन्त्रित करे ।' मानतोक' मंत्र से अँगुली पर ले तथा मा नो महान्' मन्त्र से जल से गीला करके 'त्रियायुषं' इस मंत्र से सिर, ललाट, वक्ष एवं कन्धे पर तथा त्रियायुष' एवं ‘ त्र्यम्बक' मन्त्र के द्वारा तीन रेखाएँ बनाए । इसी का नाम शाम्भव व्रत कहा गया है । इस व्रत का वर्णन वेदज्ञों ने समस्त वेदों में किया है । जो मुमुक्षु जन यह आकांक्षा रखते हैं कि उन्हें पुनर्जन्म न लेना पड़े, तो उन्हें इसे धारण करना चाहिए ॥3॥

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[ Sutra 4 ]

अथ सनत्कुमारः पप्रच्छ प्रमाणमस्य त्रिपुण्ड्रधारणस्य ॥4॥

atha sanatkumāraḥ papraccha pramāṇamasya tripuṇḍradhāraṇasya ॥4॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — ऐसा सुनने के पश्चात् सनत्कुमार जी ने पूछा कि त्रिपुण्ड्र की तीन रेखाओं को धारण करने का प्रमाण (लम्बाई आदि) क्या है? ॥4॥

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[ Sutra 5 ]

त्रिधा रेखा भवत्याललाटादाचक्षुषोरामूर्धोराभ्रुवोर्मध्यतश्च ॥5॥

tridhā rekhā bhavatyālalāṭādācakṣuṣorāmūrdhorābhruvormadhyataśca ॥॥5॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — भगवान् श्री कालाग्निरुद्र ने उत्तर दिया कि तीन रेखाएँ दोनों नेत्रों के भ्रूमध्य से आरम्भ कर स्पर्श करते हुए ललाट- मस्तक पर्यन्त धारण करे ॥5॥

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[ Sutra 6 ]

यास्य प्रथमा रेखा सा गार्हपत्यश्चाकारो रजो भूर्लोकः स्वात्मा क्रियाशक्तिर्ऋग्वेदः प्रातःसवनं महेश्वरो देवतेति ॥6॥

yāsya prathamā rekhā sā gārhapatyaścākāro rajo bhūrlokaḥ svātmā kriyāśaktirṛgvedaḥ prātaḥsavanaṃ maheśvaro devateti ॥6॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — प्रथम रेखा गार्हपत्य अग्निरूप, 'अ' कार रूप, रजोगुणरूप, भूलोफरूष, स्यात्मकरुप, क्रियाशक्तिरूप, ऋग्वेदस्वरूप, प्रातः सवनरूप तथा महेश्वरदेव के रूप की है ॥6॥

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[ Sutra 7 ]

यास्य द्वितीया रेखा सा दक्षिणाग्निरुकारः सत्त्वमन्तरिक्षमन्तरात्मा चेच्छाशक्तिर्यजुर्वेदो माध्यंदिनं सवनं सदाशिवो देवतेति ॥7॥

yāsya dvitīyā rekhā sā dakṣiṇāgnirukāraḥ sattvamantarikṣamantarātmā cecchāśaktiryajurvedo mādhyaṃdinaṃ savanaṃ sadāśivo devateti ॥7॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — द्वितीय रेखा दक्षिणाग्निरूप, 'उ' कार रूप, सत्त्वरूप, अन्तरिक्षरूप, अन्तरात्मारूप, इच्छाशक्तिरूप, यजुर्वेदरूप, माध्यन्दिन सनरूप एवं सदाशिव के रूप की है ॥7॥

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[ Sutra 8 ]

यास्य तृतीया रेखा साहवनीयो मकारस्तमो द्यौर्लोकः परमात्मा ज्ञानशक्तिः सामवेद स्तृतीयसवनं महादेवो देवतेति ॥8॥

yāsya tṛtīyā rekhā sāhavanīyo makārastamo dyaurlokaḥ paramātmā jñānaśaktiḥ sāmaveda stṛtīyasavanaṃ mahādevo devateti ॥8॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — तीसरी रेखा आहवनीयाग्नि रूप, 'म' कार रूप, तमरूप, द्यु-लोकरूप, परमात्मारूप, ज्ञानशक्तिरूप,सामवेदरूप, तृतीय सवनरूप तथा महादेवरूप की है ॥8॥

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[ Sutra 9 ]

एवं त्रिपुण्ड्रविधि भस्मना करोति यो विद्वान्ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थो यतिर्वा स महापातकोपपातकेभ्यः पूतो भवति स सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति स सर्वान्वेदानधीतो भवति स सर्वान्देवाञ्ज्ञातो भवति स सततं सकलरुद्रमन्त्रजापी भवति स सकलभोगान्भुड्न्क्ते देहं त्यक्त्वा शिवसायुज्यमेति न स पुनरावर्तते न स पुनरावर्तत इत्याह भगवान्कालाग्निरुद्रः ॥9॥

evaṃ tripuṇḍravidhi bhasmanā karoti yo vidvānbrahmacārī gṛhī vānaprastho yatirvā sa mahāpātakopapātakebhyaḥ pūto bhavati sa sarveṣu tīrtheṣu snāto bhavati sa sarvānvedānadhīto bhavati sa sarvāndevāñjñāto bhavati sa satataṃ sakalarudramantrajāpī bhavati sa sakalabhogānbhuḍnkte dehaṃ tyaktvā śivasāyujyameti na sa punarāvartate na sa punarāvartata ityāha bhagavānkālāgnirudraḥ ॥9॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — इस तरह से त्रिपुण्ड्र की विधि से जो भी कोई ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थी अथवा संन्यासी भस्म को धारण करता है । वह महापातकों एवं उपपातकों से मुक्त हो जाता है । वह समस्त तीर्थों में स्नान करने के सदृश पवित्र हो जाता है, उसे समस्त वेदों के पारायण का फल प्राप्त हो जाता है । वह सम्पूर्ण देवों को जानने में समर्थ हो जाता है । वह समस्त प्रकार के भोगों को भोगकर भगवान् शिव के लोक को प्राप्त करता है । वह पुनः जन्म नहीं लेता । इस प्रकार से भगवान् कालाग्निरुद्रदेव ने सनत्कुमार जी से त्रिपुण्ड्र के धारण करने की विधि का वर्णन किया है ॥॥9॥

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[ Sutra 10 ]

यस्त्वेतद्वाधीते सोऽप्येवमेव भवतीत्यों सत्यमित्युपनिषत् ॥10॥

yastvetadvādhīte so'pyevameva bhavatītyoṃ satyamityupaniṣat ॥10॥

— Translation from Aurovindo (Hindi) — जो मनुष्य इस उपनिषद् का अध्ययन करता है, वह भी उसी रूप में (शिवरूप में) हो जाता है। ॐ ही सत्य है। ऐसी ही यह उपनिषद् है ॥10॥