1. Kamaratna Tantra by Nitya Natha Hindi Commentary Jwala Prasad Misra Venkateswar Steam Press 2012
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कामरत्न
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श्री:
योगेश्वरश्रीयुतगौरीपुत्रनित्यानाथविरचितं
कामरत्नम्
मुरादाबादनिवासि श्रीयुत पण्डित ज्वाला-
प्रसादमिश्रकृतहिन्दीटीकासहितम्
खेमराज श्रीकृष्णदास
प्रकाशन
बम्बई
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संस्करण : नवंबर२०१२, सम्वत् २०६९.
मूल्य : १५० रुपये मात्र
मुद्रक एवं प्रकाशक:
खेमराज श्रीकृष्णदास™
अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,
मुंबई - ४०० ००४.
© सर्वाधिकार : प्रकाशक द्वारा सुरक्षित
Printers & Publishers :
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Press, Khemraj Shrikrishnadass Marg, 7th Khetwadi,
Mumbai - 400 004.
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Estate, Pune 411 013
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प्रस्तावना
उस सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमात्माको कोटिशः धन्यवाद है जिसने इस असार संसार सागर में नाना विद्वान् पुरुष रत्न उत्पन्न किये हैं जिन्होंने लोकीय जीवों के उपकारार्थ व्याकरण, वैद्यक, ज्योतिषादि अनेक विषय के ग्रन्थ निर्माण किये हैं।
उन्हीं महाशयों की गणना में यह एक श्रीयुत योगेश्वर गौरीपुत्र नित्य-माथजी भी हैं जिन्होंने परम अद्भुत यह "कामरत्न" ग्रन्थ निर्मित किया है। वास्तव में लोकपकारहित यह ग्रन्थ अहितोयही है संसार में यावत् आवश्यकीय प्रयोग मारण, मोहन, उच्चाटन, विद्वेषण, वशीकरण, स्तम्भनादिक हैं सबकी विधि सविस्तर इसमें लिखी है, इसके सिवाय सर्वचव्याधि निवारण चिकित्सा और यन्त्र मन्त्र तन्त्रादि सब पदार्थोसहित कल्पवृक्ष इस ग्रन्थ कोष्टदायक है। अब और विशेष हम क्या प्रशंसा करें? अवलोकनसे सब वृत्त ज्ञात होगा।
यह परमोपयोगी ग्रन्थ हमको श्रीत्रिविक्रममिश्र स्टूडेन्ट, मेडिकल कालेज आगरा द्वारा प्राप्त हुआ है। हमने पं. श्रीज्वालाप्रसादजी मिश्र द्वारा इसका सरल भाषानुवाद कराय निज "लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर यन्त्रालय" में मुद्रित कर प्रकाशित किया है। आशा है कि पाठक गण उक्त हमारे हितैषियोंको धन्यवाद देते हुए हमारे परिश्रमको सफल करेंगे।
आप सुज्जनोका कृपापात्र- गद्याविणु श्रीकृष्णदास "लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर" छापखाना कल्याण-बम्बई
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भूमिका
भारतवर्षकी विद्याओंमें तन्त्र शास्त्रभी एक अनुपम सामग्री है इस शास्त्रके मूल आचार्य मृत्युविजय देवोदेव महादेवजी हैं इन्होंने प्राणियोंका अल्प सामध्यं देख थोडे परिश्रमसे ही भक्तोंकी कार्यसिद्धिके निमित्त तन्त्र शास्त्रका उपदेश किया है, तन्त्र में मन्त्र यन्त्र और औषधी तीनों का प्रयोग होने से शीघ्र ही कार्यकी सिद्धि होती है, इसी कारण तन्त्र शास्त्र की महिमा सर्वत्र बडे प्रभाव के साथ सुनी जाती है, जब काल कमसे शास्त्र लुप्त हुआ तब बडे २ सिद्ध योगी महात्माओं ने अपने तपके द्वारा मन्त्र और यन्त्रोंको देखकर उनमें दैवी शक्ति स्थापन कर चराचरके उपकारकी इच्छा की, तन्त्रों में आदि आचार्य होने और सब विषय महेश्वरी से कथन करने के कारण शिवजी का सर्वत्र संवाद पाया जाता है। सिद्धि योगियोंने तैसे उस वाताको जान अपने ग्रंथों में भी प्रचार: बेसाही लिखा है जैसे, काल, पात्र, राशि, मुहूर्त, योगी मिलकर मन्त्र साधने से साधक को शीघ्र सिद्धि होती है तन्त्र, मन्त्र, यन्त्र पूर्वंक औषधी का प्रयोग करनेसे रोगीको बहुत शीघ्र आरोग्यता होती है तथा षट कम्से कुशलता होती है, इन्हीं सब योगों से यह विद्या एक समय संपूर्ण विश्वमें व्याप्त थी, अथर्ववेद में इसका मूल है, बडी २ गूढ विद्या मन्त्रशास्त्रमें प्रत्यक्ष फल देनेवाली विद्यमान है, जिनके अनुष्ठान से साधक मनोरथ बहुत शीघ्र प्राप्त कर सकते हैं, परन्तु मन्त्रानुष्टानमें गुरुक्की बडी आवश्यकता है। जो कृतन, कृतकार्य, अनुभवी, जितेन्द्रिय गुरुके मुखसे विषय ग्रहण कर उनकी आज्ञासे शुभ दिन में अनुष्ठान प्रारंभ करते हैं वे सिद्धि लाभ करते हैं और जो निरक्षर अज्ञानी विनय गुरु के मुख सिदि करना चाहते हैं उनके मनोरथको प्राप्ति नहीं होती। इस कारण गुरुकै द्वारा ही तन्त्र विधानमें प्रवृत होना चाहिये और कठिन प्रयोगों में तो कृतकार्यं गुरुक्की बडी हो आवश्यकता है। कालक्रमसे इस समय फिर तन्त्रशास्त्रका प्रचार घट चला है, कोई २ देश तो ऐसे हो गये बिक , तन्त्र क्या पदार्थ है इसको भी नहीं जानते और कार्य सिद्धि के
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निमित्त इष्टर उष्टर भटकते फिरते तथा सैकड़ों रुपये व्यय करके भी पूर्णरूपसे कृतकायं नहीं होते हैं। तन्त्र द्वारा स्वल्प व्यय और स्वल्प परिश्रमसे कृतकार्यंता हो। यही विचारकर परोपकार दृष्टिसे वंश्यवंशदिवाकर जगाधिर्यात सेठजी श्रीयुत गंगाविष्णु श्रीकृष्णदासजी महोदयने सात्वाचीन तन्त्रों के प्रचार करनेकी इच्छासे कितने एक तन्त्र भाषाटीकासहित प्रकाशित किये और करते जाते हैं, जिनमें ६४ तन्त्रों का सार-महानिर्वाण तन्त्र बलदेवप्रसाद मिश्रकृत भाषाटीका सहित, तथा रावणकृत बालतन्त्रादि मुख्य हैं प्रकाशित हुए। ऐसे ग्रन्थोंमें कामरत्न ग्रन्थ बहुत उत्कृष्ट और सर्व साधारणको लाभदायक है। इसकी एक लिखी हुई पोथी सेठजीने मेरे पास भेजकर भाषाटीका करनेको कहा, यद्यपि वह लिखी पुस्तक विशेषरूपसे अशुद्ध थी परंतु दो और पुस्तक मिल जाने के कारण उसके शुद्ध करनेमें विशेष कठिनाई न पड़ी और भाषाटीका सहित तैयार कर पुस्तक प्रेषण की।
इस ग्रन्थमें कितने विषय हैं इसके कहनेकी तो कोई आवश्यकता नहीं। कारण कि, इसकी सूचीमें वह विषय विस्तारसे लिखे हैं। परन्तु यह कहने में अत्युक्ति नहीं है कि, इस समयतक जिसने तन्त्र प्रकाशित हुए हैं उनसे यह उत्कृष्ट है और प्रायः इसमें सब विषय सन्निविष्ट है। इसकी उत्तमताका एक और भी प्रमाण यह है कि, प्रकाशित होतेही शीघ्रतासे यह ग्रन्थ निकल गया और किन्हीं असहनशील ईर्ष्यापरवश लोलुप जनोंको यहाँतक क्षोभ हुआ कि, बंबई सरकारमें, पुस्तक को अश्लील कहकर अभियोग उपस्थित कर दिया, परन्तु 'यतो धर्मस्ततो जयः' जहां धर्म वहां जय, सत्यकी जय होती है अनृतकी नहीं। अन्तमें पुस्तक उपयोगी और प्रकाशानीय सिद्ध होकर 'श्रीयुत्संन्यस्तद्वायाध्यक्षों जय हुई।
अबकी आवृत्तिमें प्राचीन लिखित कामरत्नकी पुस्तकोंसे मिलाकर इसको विशेष शुद्ध करदिया है, तथा जहां कहीं कोई विशेषता इनमें देखी वह भी इसमें संयुक्त करदी गई है जिसमें प्रथमकी अपेक्षा पुस्तक बहुत शुद्ध और वृहत् भी हो गई है। औषधि और मन्त्र के प्रयोगों के साथ प्रंथकारने यंत्र भी लिखे हैं। मंत्र और यंत्र दोनोंहि मिलकर तंत्र सिद्ध होता है। इस कारण दोनोंही इस ग्रन्थमें संयुक्त करदिये गये हैं।
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३
तंत्र शास्त्र के प्रचार करनेमें इस समय मुरादाबाद निवासी पंडित बलदेवप्रसाद मिश्रभी अतिशय यत्नवान् हैं और उन्होंने बहुतसे तंत्र बड़ी खोजके साथ प्रकाशित भी किये हैं जिससे इस विद्याके प्रचारकों शीघ्र सम्भावना है, परन्तु साथही इस तंत्र शास्त्रका प्रचार होता देख उदरंभर स्वार्थी केवल द्रव्य उपार्जनकी इच्छासे तंत्रोंमें खेमेलकरनेको कतिपय होरहे हैं कोई तो कहॉकि सोपचास इलोक संग्रह कर उसका प्राचीन तंत्रोंके नामोंसे कोई चमकता- सानाम रख देते हैं, कोई मिथ्याही किसी पुस्तकको तंत्र कहकर अनर्थ करते हैं, कोई अपने तंत्रको अथर्व वेदान्तर्गत प्रगटकर सहृदय पुरुषोंको प्रतारण करनेकी आसुरी लीला प्रगट कर रहे हैं, कोई भत प्रेत सिद्धि वीरभद्रसिद्धि दो दो चार २ पत्रोंकी पुस्तकों को बड़े आडम्बर के साथ प्रकाश करके बड़ी कीमत लेकर ग्राहकों के चित्त संकुचित कर रहे हैं, किन्हीं की यथार्थ तंत्रोंको देख इतनी आत्मा कुलबुलाती है कि, तंत्रोंके ऊपर वरणाल्यका प्रयोग करके चिल्ला रहे हैं कोई कहॉसे दो चार पत्रे उठाय तंत्र बनाय यही तंत्र है २ कहते हुए ढोल पीटते हुए दान पात्र बन रहे हैं बहुत क्या इन मिथ्यातंत्र और कल्पोंके नामसे जो पुस्तके प्रकाशित होती हैं इनसे बड़ी हानि है कारण कि, जब कभी वे असली पुस्तक प्रकाशित होंगी तब लोगों को बड़ा श्रम होगा कि, इसमें सत्य ग्रन्थ कौनसा है ? एक नामके दो ग्रन्थोंका बखेड़ा पाठक जानही सकते हैं। 'केटलाग आफ संस्कृत मैन्युस्क्रिप्स' (Catalogue of Sanskrit Manuscriqfs) जिसमें प्राय: संस्कृतकी पुस्तकोंके बहुतसे नाम उनके पत्रों और इलोकोंकी संख्या संवत् निर्माताका नाम तथा जिसके पास वह पुस्तकें हैं उनका पता लिखा रहता है जो गवर्नमेण्टके आर्डरसे प्रकाशित हुई हैं इसके देखनेसे विदित होता है कि, कई मिथ्या तंत्र लोगोंने प्रकाशित किये हैं जो कि, उस ग्रन्थ में बहुतऔर इस समय चार पांच पत्रोंमें प्रकाश किये गये हैं। फिर ऐसे तंत्रों को ग्रहण कर उससे लाभ न होनेसे सज्जनोंकी अरुचि होनेकी सम्भावना क्यों न हो ? इन नकली तंत्रोंकेभी प्रचारसे असली तंत्रोंके भी मिलजानेका संदेह है। अनुवादक तथा तंत्रके खोजनेवालोंसे हमारा यह कहना है कि, यदि आपसे तंत्र प्रकाश किये बिना नहीं रहाजाता तो असली तंत्रोंको अनुवाद और प्रकाश कर यशके भागी हजिये प्रपंचसे लाभ नहीं होता.
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पाठक महाशयों से प्रार्थना है कि, इस ग्रन्थको अथ्योपान्त देखकर लाभ उठावें । यद्यपि यथाशक्ति इसको ठीक करदिया है तथापि यदि कहों कुछ त्रुटि रह गई हो तो क्षमा कर हुन्सके समान गुणग्राही हूजिये । इस आवृत्तिमें और भी विशेषयत्नके साथ शुद्धि की गई है ।
आपका- ज्वालाप्रसाद मिश्र (दिनदारपुरा)-मुरादाबाद
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श्री:
कामरत्नस्य-विष्यानुक्रमणिका
त्रिषया:
पृष्ठाड्का:
विषया:
पृष्ठाड्का:
प्रथमोपदेश:
मड्गलाचरणम्
१
औषधविग्रहणे कालनिर्णय:
षट्कर्माणि
२
तत्र कालनिर्णय:
३
तत्र तिथिनिर्णय:
४
वारादिनिर्णय:
५
माहेन्द्रादिनिर्णय:
६
तत्र नक्षत्राणि
७
तत्रांगुली-निर्णय:
८
औषधीनां बलाबलविचार:
९
मूलिकाग्रहणविधि:
१०
अभिमंत्रणमंत्रम्
११
नमस्कार:, खाननम्
१२
वशीकरणम्, सर्वजनवशीकरणम्
१३
सर्वजनवशीकरणयंत्राणि
१४
राजवशीकरणम्
१५
राजवशीकरणयंत्राणि
१६
स्त्रीवशीकरणम्
१७
स्त्रीवशीकरणयंत्राणि
१८
स्त्रीवशीकरणयन्त्रे, पतिवशीकरणम्
द्वितीयोपदेश:
आकर्षणम्
१९
युवत्याकर्षणयंत्राणि
२०
आकर्षणयंत्राणि
२१
ततीयोपदेश:
जय:
४५
विजयकरयंत्राणि...
४९
सौभाग्यकरणम्
५१
सौभाग्ययंत्राणि
५१
ईश्वरादीनां क्रोधोपशमनम्
५३
क्रोधोपशमनयंत्रे, गजनिवारणम्
५३
व्याघ्रनिवारणम्
५४
चतुर्थोपदेश:
शत्रूणां मुखस्तंभनम्
५५
शत्रुमुखस्तंभनयन्त्राणि
५६
निद्रा स्तोका शस्त्र-स्तंभनम्
५७
अथाग्निस्तंभनम्
६१
जलस्तंभनम्
६२
जलस्तंभनयंत्रे
६३
दिव्यस्तंभनम् यंत्रे च
६४
लोहदिव्यस्तंभनमंत्र:
६६
गजगोऽहि-स्तंभनम्
६६
मनुष्यस्तंभनम्
६७
मनुष्यस्तंभनयंत्राणि
६७
मन:स्तंभनम्
६८
आसनस्तंभनम्
६८
सर्वभूतबुद्धिस्तंभनम्
६९
शत्रुबुद्धिस्तंभनम्
६९
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(२) कामरत्नस्य- विषया: चौरीतस्तम्भनम् गर्भेस्थतम्मनम् शकस्तम्भनम् वीर्यस्तम्भनयन्त्रम् त्रिभुवनस्तम्भनयत्रे पञ्चमोपदेश: मोहनम्, धूपविधि: मोहनयन्त्राणि शत्रुमोहनम् मोहशमनम्, रञ्जनम् तत्र देह रञ्जनम् मुख रंजनम् केशरञ्जनम् स्थानीयसुगन्धिद्रव्यम् केशयुकादिनिवारणम् केशस्येन्द्रलुप्तादिनिवारणम् केशशुद्धीकरणम् अष्टमोपदेश: वाजोकरनम् नृसिंहचूर्णम् मदनमोदक: कामकलारस: अनङ्गसुन्दरीवटिका महाकामेश्वररस: मदनोदयरस: कामाञ्जनानायकचूर्णम्
पृष्ठाड्का: ६७ ६७ ६८ ६९ ७० ७१ ७९ ८० ८१ ८२ ८३ ८४ ८७ ८९ ९९ १०० १०२ १०४ पृष्ठाड्का: ११७ ११८ ११९ १२१ १२२ १२२ १२३ १२४ १२४ १२५ १२७ १३२ १३७ १४१ पृष्ठाड्का: १४४ १४६ १४७ १५१ १५१ १५२ १५२ १५२
विषया: काममतयोग: धार्त्रीलोहम् कामेश्वरस: वाजीकरणकाल: वाजीकरणफलम् स्त्रोसङ्गमकाल: अन्यथास्त्रीसङ्गमे दोषा: वाजीकरणयोग्या स्त्री वाजीकरणयोग्या: सप्तमोपदेश: गाढीकरणम्, तत्र भ निषेध: स्त्रीद्रावणम् कामध्वजस्यूलीकरण दृढीकरणञ्च स्तनवर्द्धनम्, उत्थापनम् योनिसंस्कार: लोभशातनविधि:
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विषयानुक्रमणिका (३)
विषया: पृष्ठाङ्का: विषया: पृष्ठाङ्का:
रक्तनिवारणम् ... १५४ बन्धनयन्त्रम् ... १९८
बन्ध्यानां गर्भधारणम् १५८ बन्धमोचनम्, मन्त्रैश्च १९९
जन्मवन्ध्याचिकित्सा १५८ बन्धमोचनयन्त्राणि १९९
यन्त्राणि च ... १५९ निगडादिबन्धनम् मन्त्रैश्च २००
काकबन्ध्याचिकित्सा १६५ गृहक्लेशनिवारणम् ... २०३
मृतवत्साचिकित्सा... १६६ क्षत्रोपद्रवाशनम् ... २०६
फलवृत्तम् १६९ गोमहिष्यादिगुघवर्धनम्... २०८
वन्ध्यानां सर्वरिष्टनिवारणं यन्त्रम् ... १७१ दशमोपदेश:
गर्भरक्षा १७१ उच्चाटनम्-यन्त्राणि च ... २०९
सामान्याचिकित्सा १७५ उच्चाटनकारान्तरम् ... २१४
गर्भशङ्कनिवारण, सुखप्रसवविधि: १७८ घवलवृध्यादिकम् ... २१५
सुखप्रसवमन्त्र: १८० विद्वेषणम्-यन्त्राणि च ... २१६
बालानां सर्वग्रहणिवारण, यन्त्राणि १८१ निवापातज्जलमन्त्र: ... २१८
नरसिंह मन्त्र: १८५ व्याधिकरणम्-यन्त्राणि च २१८
बालस्याहितुणिकादिनिवारणम् १८६ ज्वरानयनम्-यन्त्राणि च ... २१९
स्त्रीणां पुष्परक्षा... १८६ अक्षिरोगजननम् ... २२२
दुर्भेगाकरणम् १८८ शत्रुभ्रमणम् ... २२३
दातशक्तिप्रदायनन्त्रे ... १८८ उन्मत्तीकरणम्-यन्त्राणि च २२४
दातृशक्तिनिवारणयन्त्रम्... १८८ मारण-यन्त्राणि च २२५
कलहकरणम् १८९ अश्वनाशनम् ... २३१
नवमोपदेश: सस्यनाशनम्, रजकस्य वस्त्र- २३२
सर्वारिष्टनाशार्थ रक्षा यन्त्राणि च १९० नाशनम् ... २३२
निद्राकरणम् १९५ घीवरस्य मत्यनाशनम् ... २३३
निगमोक्तम् १९५ कुम्भकारस्य भाण्डनाशनम् २३३
निद्राकरणमन्त्र: ... १९६ तैलिकस्य तैलनाशनम् ... २३४
निद्रानाशनम् १९७ गोपानां गवां क्षीरनाशनम् २३५
तांबूलपर्णनाशनम् २३५
शाकनाशनम् ... २३५
तन्तुवायस्य सूत्रनाशनम् ... २३६
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विषया: पृष्ठाड्का: विषय: पृष्ठाड्का:
शौण्डिकस्य मदिरानाशनम् ... २३६ त्रयोदशोपदेशः
कर्मकारस्य लोहनाशनम् ... २३६ निघिदर्शकमणिजनम् ... २७३
शरीरवेधमोचनमंत्र: ... २३६ अबिकायंत्रम् ... २८०
एकादशोपदेशः: २३७ अदृश्यकरनम् ... २८०
नानाकोटुकम् ... २३७ मृतसञ्जीवनी ... २८६
उपरोक्तयोगानां मन्त्र: ... २४४ चतुर्दशोपदेशः
खड्गासतम्भनम् ... २४४ विषनिवारणम् ... २९०
सर्वार्थसिद्धिप्रदयन्त्रम् ... २४५ सर्पविषनिवारणम्-मंत्रशच २९५
द्वादशोपदेशः: २४६ अष्टकुलनागा: ... २९६
काम्यसिद्धि: २४७ दंशभेदा: २९७
वाक्सिद्धि: २४८ स्थानभेदेन दंशफलम् ... २९७
गुप्तधनगुप्तवेषचौरादिप्रकाशनम् २४९ विष चिकित्सा ३००
धनुर्विद्या २५१ वृश्चिकविषनिवारणम् ... ३१४
धनधान्याक्षयकरणम् ... २५२ शतपदीविषनिवारणम् ... ३१८
श्रुतिधरवियादिकरणम् ... २५६ मूषकविषनिवारणम् ... ३१८
ब्राह्मीवृतम् ... २५८ श्वानविषनिवारणम् ... ३१९
कितरोकरनम् ... २६१ मत्स्यमेकादिविषनिवारणम् ३२०
चक्षुष्यम् ... २६२ व्याघ्रविषनिवारणम् ... ३२०
चन्द्रौदया वटी २६२ कीटविषनिवारणम् ... ३२२
कर्णस्य बधिरत्वनाशनम् ... २६३ सर्वजन्तूनां विषनिवारणम् ३२३
कर्णपालीवृद्धनम् ... २६४ उपविषनिवारणम् ... ३२३
दन्तदृढीकरणम् २६७ कृतिमविषनिवारणम् ... ३२४
गण्डमालानिवारणम् ... २६८ योगजविषनिवारणम् ... ३२६
आहारकरणम् २६९ भल्लातकविषनिवारणम् ३२७
अनाहारकरणम् ... २७० पञ्चदशोपदेशः
पादुकासाधनम् ... २७२ द्वात्रिशयक्षिणीसाधनम् ... ३२८
अनावृष्टिकरणयं त्रे, हरण च तत्र साधकनियमाः ... ३२८
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विषयानुक्रमणिका (५)
विषय: पृष्ठाड्का: विषय: पृष्ठाड्का:
विभ्रमा रतिप्रियासाधनम् ... ३२९ रसमारणम् ... ३४६
सुरसुन्दरीसाधनम् ... ३३० गर्भयन्त्रप्रकार ... ३५२
अनुरागिणीसाधनम् ... ३३० हिंगुलशुद्धिः ... ३५३
सामुद्रीसाधनम् ... ३३१ गन्धकशुद्धिः ... "
वटयक्षिणीसाधनम् ... ३३२ अभ्रकशुद्धिः ... ३५४
विशालासाधनम् ... ३३३ अमृतीकरणम् ... ३५६
महाभ्यासाधनम् ... ३३३ अभ्रकसत्त्वपातनम् ... "
चन्द्रिकासाधनम् ... ३३४ मनःशिलाशुद्धिः ... ३५७
रक्तकबलासाधनम् ... ३३४ हरतालशुद्धिः ... "
विद्युञ्जिह्वासाधनम् ... ३३५ तुत्यशुद्धिः ... ३५८
कर्णपिशाचिनी साधनम् ... ३३५ काशीशशंखनाभिशुद्धिः ... "
चिंचपिशाचिनी साधनम् ... ३३६ शातकुम्भादिघातुशोधनम् ... "
कर्णयक्षिणीसाधनम् ... ३३७ तुत्यटङ्कणाच्चलोहशोधनम् ... ३५९
स्वप्नावती विचित्रासाधनम् ... ३३७ सर्वेऽपि मते मारणम् ... ३६०
हंसी-मदनासाधनम् ... ३३८ अस्य दोषहरणम् ... ३६१
कालकर्णी-लक्ष्मीक्षीणीसाधनम् ... ३३९ लोहामारणम् ... ३६२
शोभनासाधनम् नटीसाधनम् ... ३४० मत्स्य लक्षणम् ... ३६३
पद्मिनी साधनम् ... ३४१ शोधनम् ... ३६४
पुरसुन्दरिका साधनम् ... ३४२ अमती करणम्, भस्मसात्वम् ... "
मनोहरोसाधन, कलावतीसाधन ... ३४२ लवणपञ्चकञ्चम्, क्षारा: ... ३६४
कामेइवर साधन ... ३४३ वृक्षक्षारः ... ३६५
रतिकरीसाधन ... ३४३ विड:, अम्लवगः:, वङ्नभूषा ... ३६६
पद्मिनीसाधन, नटीसाधन ... ३४४ तोलका प्रमाण ... "
अनुरागिणीसाधन ... " दीर्घायुष्य करणम् ... ३६७
घोडशोपदेश: ... रसशोधनम् ... ३४५
इति विषयानुक्रमणिका
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श्रीगणेशाय नमः
अथ कामरत्नम्
हिन्दीटीकासहितम्
प्रथमोपदेश:
श्रीगुरुचरणकमलेश्यो नमः
मंगलाचरणम्
यस्येवरस्य विमलं चरणारविन्दं संसेव्यते विवुधविद्वद्मधुव्रतेन । निर्वाणसूचकगुणाष्टकवर्ग पूर्णं तं शंङ्करं सकलदुःखहरं नमामि ॥ १ ॥
दोहा-गौरीशंकर पदकमल, प्रेमसहित हियलाय । कामरत्नभाषातिलक, बहुविधि लिखत बनाय ॥ श्रीगणेशमंगलकरन, हरन सकल भयशूल । द्विजकुलालिप्रसादपर, महा रहहु अनुूल ॥
जिन ईश्वरके निर्मल चरणारविंद देवता सिद्ध स्रमरके समान उपासना करते रहते हैं, जिनके गुणानुवाद स्मरणसे मुक्ति होेजाती है उन अष्टमूर्ति ,वेदपूर्ण, सम्पूर्ण दुःख हरनेवाले शंकरको में नमस्कार करता हूं। "निर्माणशातकगुणाष्टकवर्गपूर्णम्" ऐसा भी पाठ है, अर्थ-जो सम्पूर्णसृष्टिके संहार गुण ध्यान धारणादि अष्टांग योग और धर्मादि चार वर्गमें विराजित हैं उन सम्पूर्ण दु:खनाशक शिवको प्रणाम है॥१॥
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पार्वतीप्रश्न
देव्युवाच
ज्ञातं तव प्रसादेन यथा कालस्य बन्धनम् । मत्स्यसारसंभूतमिदानोमौषधं वद ॥ औषधान्यप्यनेकानि मनुजानां हिताय वे । पूर्वं तु यस्वया प्रोक्तं प्रत्यक्षं कथयस्व मे ॥ १ ॥
देवी कहने लगीं-हे भगवान् ! आपकी कृपासे मैंने यथायोग्य कालका बन्धन जाना, अब इस समय आप मन्त्रके सारसे प्रगट होनेवाली औषधी कहिये. आपने पहले मनुष्योंके हित करनेवाली अनेक औषधी कही हैं, अब प्रत्यक्ष कहिये ॥ १ ॥
औषधिग्रहणे कालनिर्णय:
ईश्वर उवाच
कामरत्नमिदं चित्रं नानातन्त्रार्थवामया । वश्यादियक्षिणीमन्त्रसाधनान्तं समुद्रुतम् ॥ २ ॥
तिथिनक्षत्रकारण ऋतुभेदः परिग्रहः । खननोत्पाटन मन्त्रः कार्यद्ध चिकित्सकः ॥ ३ ॥
औषधं कालयोगेन गृह्णाति परमं बलम् । शरद्वेमान्तिके देहि त्वचो मूलपरिग्रहः ॥ ४ ॥
शिशिरे च फलं सम्यङ्मूलं सारसमन्वितम् । वसन्ते पुष्पपत्रे च ग्रीष्मे च फलबीजके ॥ ५ ॥
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स्वकाले बलवन्तोऽपि वर्षासु तरवः सदा ।
मूले शुष्के बलं चाद्धं मलादौ भिषजे तथा ।। ६ ।।
ग्रीष्मवार्षिकयोरेतच्छरत्संपूर्णता भवेत् ।
वृक्षादीनां फलं बीजं स्वकीयं चातवं तथा ।
फलपुष्पलता ह्यचेतेः स्वकाले बलिनस्तथा ।
निशायां वनजा वीर्या जलजा बलिनो दिवा ।। ८ ।।
शिवजी कहने लगे—हे देवि ! तुम्हारे प्रश्नके लिये यह विचित्र कामरत्न नामक ग्रन्थ अनेक सागररूप ग्रन्थोंसे संग्रह करके वशीकरणसे प्रारंभ कर यक्षिणीमन्त्रके साधनपर्यन्त उद्धृत किया है, इसमें तिथि-नक्षत्र, वार और ऋतुओंके भेदसे औषधियोंका ग्रहण, खनन, उखा-डना मन्त्रपूर्वक वैद्यको करना चाहिये । समय योगमें ग्रहण की हुई औषधी परम बल करती है । शरद् और हेमन्तमें त्वचा (छाल) और मूल ग्रहण करना । शिशिरमें फल मूल और सार ग्रहण करने चाहिये । वसन्तमें पुष्प पत्र और ग्रीष्ममें फल बीज ग्रहण करने चाहिये । अपने काल और वर्षामें वृक्ष सदा बलवान् होते हैं । मूल शुष्कहोजानसे आधा बल होता है तथा मलादि निकालनेमें तथा भेषजमें निर्बल होती हैं । ग्रीष्म वर्षा और शरदमें सम्पूर्णता होती है, वृक्षादिके फल बीज अपनी ऋतुमें ग्रहण करने चाहिये । फल पुष्प लता अपने समयमें बलवान् होती हैं । रातमें वनकी होनेवाली बलि होती हैं और दिनमें जलमें होनेवाली औषधी आदि बलि होती हैं ।। २-८ ।।
षट्कर्माणि
शान्तिवश्यस्तम्भनानि द्वेषणोच्चाटने तथा ।
मारणान्तानि षट्कर्माणि मनीषिणः ।। ९ ।।
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(४)
कामरत्न प्रथम—
शान्ति ,वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन, मारण ये छः कर्म विद्वानोंने कहे हैं॥ ९ ॥
षट्कर्मणि कालनिर्णय:
वर्याकर्षणकर्म्माणि वसन्ते योजयेत्प्रिये । ग्रीष्मे विद्वेषणं कुर्यात्प्रावृषि स्तम्भनं तथा ॥ १० ॥
शिशिरे मारणञ्चैव शान्तिकं शरदि स्मृतम् । हेमन्ते पौष्टिकं कुुर्यादुक्तकर्मविशारदैः ॥ ११ ॥
हे प्रिय पार्वति ! वशीकरण और आकर्षण कर्म वसन्त ऋतुमें करने चाहिये । ग्रीष्मर्तुमें विद्वेषण, वर्षात्रतुमें स्तंभन, शिशिरमें मारण, शरदमें शांतिकर्म हेमन्तमें पुष्टिकर्म इन छःकर्म कर्मोके जाननेवालोंको करने चाहिये ॥ १० ॥ ११ ॥
वसन्ते चैव पूर्वाह्ने ग्रीष्मे मध्याह्ने उच्यते । वर्षा जेयाडपराह्ने तु प्रदोषे शिशिरस्तथा ॥ अर्द्धरात्रे शरत्काले उषा हेमन्त उच्यते ॥ १२ ॥
दुपहरसे पहिले वसन्त, मध्याह्नमें ग्रीष्म ,तीसरे प्रहरको वर्षा, प्रदोषमें शिशिर, आधी रातमें शरद्, उपः काल (पांच घड़ीके तड़के) में, हेमन्त ऋतु जाननो उचित है ॥ १२ ॥
ऋतवः कथिता ह्यते सर्वे ह्येव ऋतुः तु । तद्धिहोनान न सिद्ध्यन्ति प्रयत्नेनापि कुर्वतः॥ अनन्यकरणात्ते हि ध्रुवं सिद्ध्यन्ति नान्यथा ॥ १३ ॥
यह ऋमसे ऋतुओंका वर्णन किया है, कालके बिना यत्न करनेपरभी मन्त्र सिद्धिको प्राप्त नहीं होते और अपने कालमें करनेसे वे सिद्ध होते हैं इसमें संदेह नहीं ॥ १३ ॥
- पंचपंच उषःकालः इति धर्मशास्त्र
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उपदेश: ९.
हिन्दीटीकासहित
(४)
तत्र तिथिनिर्णय:
वशीकरणकर्माणि तत्र सप्तम्यां साधयेद्बुध: । तत्पूर्वायां त्रयोदश्यां तथाकर्षणकर्म व ॥ १४ ॥
चतुर् पुरुषको उचित है कि, सप्तमीमें वशीकरण कर्म साधन करे, तीज और तेरसके दिन आकर्षण कर्म करना चाहिये ॥१४॥
उच्चाटनं द्वितीयायां षष्ठयाच्चैव प्रकारयेत । स्तम्भनञ्च चतुर्दश्यां चतुर्थ्या प्रतिपद्यपि ॥ १५ ॥
द्वितीयायां षष्ठयाच्चैव प्रकारयेत उच्चाटनम् । चतुर्दश्यां चतुर्थ्यां प्रतिपद्यपि च स्तम्भनम् ॥ १५ ॥
दोयज और छटको उच्चाटन कर्म करे, चौथ चौदसको तथा पडवाको भी स्तम्भन करे । १५ ।
मोहनन्तु नवम्यायां तृतीयायां प्रयोजयेत् । द्वादश्यां मारणञ्चैवमेकादश्यां तथैव च ॥ १६ ॥
नवमी और अष्टमी को मोहनकर्म करे, एकादशी द्वादसीको मारण कर्म करना चाहिये ॥ १६ ॥
पञ्चम्यां पौर्णमास्याञ्च योजयेच्छान्तिकादिकम् । सर्वविद्याप्रसिद्ध्यर्थं तिथय: कथिता: ऋषिभि: ॥ १७ ॥
पंचमी और पौर्णमासको मारण कर्म करना चाहिये । यह तिथि-सर्व विद्याोंकी प्रसिद्धिके निमित्त कही है ॥ १७ ॥
वारादिनिर्णय:
शुक्रे लक्ष्मी: शनौ वश्यं रवौ मारणकर्म च । उच्चाटनं बुद्धे भौमे विद्वेषादि शुभं भवेत् ॥ १८ ॥
शुक्रवारमें लक्ष्मी, शनिको वशीकरण, रविवारको मारण, बुधको उच्चाटन, मंगलको विद्वेषणकर्म शुभ होता है ॥ १८ ॥
दशम्यामित्यपिपाठ
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माहेन्द्रादिनिर्णयः
स्तंभनं मोहनच्चैव वशीकरणमुत्तमम् ।
माहेन्द्रे वारुणे चैव कर्तव्यमिह सिद्धिदम् ॥ १९ ॥
विद्वेषोच्चाटनं वह्निवायुयोगेन कार्येत् ॥ १९ ॥
स्तभनं मोहन और उत्तम वशीकरण माहेन्द्र व वारुण मंडलमें करनेसे सिद्धिदो देनेवाला है । विद्वेषण और उच्चाटन अग्नि और वायुके योगमें अर्थात् इन तत्वोंके उदय में करावे ॥ १९ ॥
तत्र नक्षत्राणि
ज्येष्ठा चैवोत्तराषाढा ह्यनुराधा च रोहिणी ।
माहेन्द्रमंडलस्थारच प्रोक्ता: कर्मप्रसिद्धिदा: ॥ २० ॥
ज्येष्ठा, उत्तराषाढा, अनुराधा, रोहिणी यह माहेन्द्र मण्डलमें स्थित हुए कर्मसिद्धिके देनेवाले हैं ॥ २० ॥
स्यादुत्तराभाद्रपदा मूला शतभिषा तथा ।
पूर्वाभाद्रपदाल्लेषा जेया वारुणमध्यगा: ।
पूर्वाषाढा च तत्कर्म्मसिद्धिदा शम्भुना स्मृता: ॥ २१ ॥
उत्तराभाद्रपदा, मूल, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपदा, आर्द्रा/लेषा यह वारुण मण्डलके मध्यचारी कहाते हैं और इसी प्रकार शिवजीनें पूर्वाषाढाको उक्त कर्मसिद्धिका देनेवाला कहा है ॥ २१ ॥
स्वाती हस्तो मृगशिराराशिचित्रा चोत्तरफाल्गुनी ।
पुष्य पुनर्वसुर्वह्निमंडलस्था: प्रक्रीर्तिता: ॥ २२ ॥
स्वाती, हस्त, मृगशिर, चित्रा, उत्तराफाल्गुनी, पुष्य, पुनर्वसु ये वहिमण्डलमें स्थित हैं ॥२२ ॥
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उपदेशः १. हिन्दीटीकासहित (७)
अश्विनी भरणी चाद्रा धनिष्ठा श्रवणं मघा । विशाखा कृत्तिका पूर्वाफाल्गुनी रेवती तथा । वायुमण्डलमध्येsस्तत्कर्मप्रसिद्धिदा: ॥ २३ ॥
अश्विनी, भरणी, आद्रा, धनिष्ठा, श्रवण, मघा, विशाखा, कृत्तिका पूर्वाफाल्गुनी रेवती ये वायुमण्डलमें स्थित हुए उन उन कर्मोंकी सिद्धि देनेवाले हैं ॥ २३ ॥
शान्तिकं पौष्टिकञ्चैव ह्याभिचारिक कर्म्मच ॥ २४ ॥
शान्त, पुष्ट और अभिचारके कर्म–आगे लिखी अंगुली द्वारा करे तो सिद्ध होते हैं ॥ २४ ॥
तत्राङ्गुलीनिर्णयः:
तर्जन्यादिसमारुढं कुर्याच्चित्नात्क्रमं सुधी: । तथाङ्गुष्ठासमारुढा सर्वकर्म ह्युभे तथा ॥ २५ ॥
पूर्वोक्त कर्म तर्जनी (अँगूठेके निकटकी अंगुली) आदि द्वारा यथा क्रमसे करे और अंगुष्ठसे सब शुभकर्म प्रयोग करने चाहिये अर्थात् अंगुष्ठ और तर्जनी द्वारा शान्तिकायँ, मध्यमा और अंगुष्ठसे पौष्टिक, अनामिका और अंगुष्ठके अभिचारकर्म करे ॥ २५ ॥
अभिचारां बलाबलविचार:
विधिमन्त्रसमायुक्तमौषधं सफलं भवेत् । विधिमन्त्रविहीनं तु काष्ठवद्द्रेषजं भवेत् ॥ २६ ॥
विधिपूर्वक मन्त्रद्वारा लाईहुई औषधी सफल होतो है और विधि तथा मन्त्रके बिना लाईहुई औषधी काठके समान होती है ॥ २६ ॥
एकान्ते तु शुचारण्ये तिष्ठत्येव यदौषधम् । कार्यवित्तिद्रभवेत्तन वीर्यमस्ति च तत्र वै ॥ २७ ॥
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जो औषधी एकान्तमें अच्छे बनमें स्थित होती है उससे कार्यसिद्धि होती है, कारण कि, उसमें बल रहता है ॥ २७ ॥
वल्मीककूपप्रस्रवणतटदेवालयवृक्षान्तरालेषु जातो विधिना विहिता ओषधय: सिद्धिदा न स्यु: ॥ २८ ॥
बाँबी, कूप (कुआँ) ,मार्ग वृक्षके तोचेरी, देवालय, इशाननमें उत्पन्न हुई औषधी विधिपूर्वक लाई हुई भी सिद्धि देनेवाली नहीं होती ॥ २८ ॥
जलजोर्णमलिनकरालितमकालजातं कृमिक्षतशरीरम् ।
न्यूनीं तथाऽधिकं वा द्रव्यमद्रव्यं जर्ग्वभिषज: ॥ २९ ॥
नत्से गलीहुई, अग्निसे जलीहुई, अकालेमें उत्पन्न हुई, कृमिसे खाई हुई, बहुत थोडी तथा अधिक औषधी (द्रव्य) होनेपरभी नहीं होनेके समान है, ऐसा विद्वान् कहते हैं ॥ २९ ॥
अथ मौलिकाग्रहणविधि:
भूतादियुक्तमम्यर्च्य गिरोशं प्रातरुत्थितै: ।
श्रद्धैरुपासितैर्वापि संग्राह्यं सर्वमौषधम् ॥ ३० ॥
प्रात:काल उठकर भूतादिके सहित शिवका पूजन कर शुद्धवतादिसे युक्त हो सुप्रभात् औषधियोंको ग्रहण करना चाहिये ॥ ३० ॥
इत्येवं सर्वमूलानां विधिमन्त्रश्च कथ्यते ।
आदौ वृक्षस्य मूलञ्च गत्वा तमभिमन्त्रयेत् ॥ ३१ ॥
इस प्रकारसे सब मूलोंकी विधि और मन्त्रको कहते हैं । पहले वृक्षमूलमें जाकर उसको अभिमन्त्रित करे ॥ ३१ ॥
अभिमन्त्रणमन्त्रम्
ॐ वेतालाश्च पिशाचाश्च राक्षसाश्च सरिसृपा: ।
अत्रस्प्यान्न ते सर्वे वृक्षादस्माच्छिन्द्ध्वाज्ञया ॥ ३२ ॥
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उपदेश: १.
हिन्दीटीकासहित (९)
यह मन्त्र है कि-बेताल, पिशाच, राक्षस, सरीसृप शिवकी आज्ञासे सब इस वृक्षसे दूर हों ॥३२॥
ॐ नमस्तेऽमृतसंभूतबलवायुविवर्द्धन !
बलमायुश्च मे देहि पापान्मे त्राहि दूरतः ॥३३॥
फिर नमस्कार करके यह मन्त्र पढे-अमृतसे उत्पन्न, ब्रह्म-वीर्यंकी बढानेवाली ! बल और आयु मुझे दो और दुरसेही पापोंसे मेरी रक्षा करो ॥३३॥
ततः खननम्
येन त्वां खनते ब्रह्मा येन त्वां खनते भृगुः ।
येन होत्रादिय वरणो येन त्वामपचक्रम ॥३४॥
यह कहकर खोದೆ-जिस कारण कि, तुमको ब्रह्मा और भृगुजीनें खोदाआ है. जिस कारण कि, तुमको इन्द्र और वरुणने खोदाआ है ॥३४॥
तेनाहं खनयिष्यामि मन्त्रपुतेन पाणिना ।
मा पातेमानि पतिते मा ते तेजोऽन्यथा भवेत् ॥३५॥
इसी कारण मन्त्रसे पवित्र हाथोंसे में तुमको बनन करता हूं, खोदने और उखाडनेमें तुम्हारा तेज अन्यथा न हो ॥३५॥
अत्रैव तिष्ठ कल्याणि मम कार्ये कृतेऽभव ।
मम कार्ये कृतेऽ सिद्धे ततः स्वर्ग गमिष्यसि ॥३६॥
हे, कल्याणि ! यहीं स्थित होकर तुम हमारा कार्य करो । मेरे कार्यकी सिद्धि होनेसे फिर तुम्हारा स्वर्गमें गमन होगा ॥३६॥
"ॐहीं चण्डे हूं फटस्वाहा,, अनेन मन्त्रेण-दित्यवरे पुष्यनक्षत्रे वा पुष्यार्कयोगे वा सर्वा
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(१०)
कामरत्न प्रथम-
क औषधिरुपाटयेत्॥ “ओं हीं क्षों फट् स्वाहा” ॥ अनेन मूलिकां छेदयेत् ॥ इति मूलिकाप्रहणविधि: ॥ “ओं हीं चण्डे हूं फट् स्वाहा” इस मन्त्रसे रविवारके दिन, पुष्य नक्षत्र वा पुष्य एक योगेन सम्पूर्णं औषधीं उखाड़े ॥ “ओंहींक्षों फट् स्वाहा”इस मन्त्रसे मूलिका छेदन करे ॥इति मूलिकाप्रहणको विधि॥
ॐ वन्दण्डे महादण्डाय स्वाहा ॥ ॐ शून्द्री (सूत्री) कपालमालिनी स्वाहा ॥ प्रत्येकं सप्तधा जप्त्वा वन्दा प्राह्या ॥ ततः कार्यसिद्धि: ॥ इति विन्दाप्रहणविधि:॥
“ओं वन्दण्डे महादण्डाय स्वाहा । ओं शून्द्री कपालमालिनी स्वाहा” यह प्रत्येक सात बार जपकर वन्दा ग्रहण करे तो कार्यांकी सिद्धि होती है ॥ इति चन्दाप्रहणमन्त्र ॥
इत्येवं सर्वविद्यानां सिद्धये कालनिर्णय: । कथितं चात्र यत्नेन मूलिकाग्रहणादिकम् ॥ ३७ ॥ इस प्रकार सब विद्याओंकी सिद्धिमें ऋतुयादिकाल निर्णय है । यह यत्नपूर्वंक मूलग्रहणादिकी विधि कही है ॥ ३७ ॥
अथ वशीकरणम्
तत्र सर्वजनवशीकरणमू
वर्णानामुत्तमं वर्णं मन्त्रस्थानं तथैव च । ओडूारशिरसं चापि ओडूारशिरसं ततः ॥ ३८ ॥
अधोमागो च रेफश्च दत्वा मन्त्रं समुद्दरेत् । निरामिषान्नभोक्ता च जप्तव्यो मन्त्र एव च ॥ ३९ ॥
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उपदेश: १.
हिन्दीटीकासहित
(११)
प्रथम सम्पूर्ण जनोंको वश करनेकी विधि—जो वर्णोंमें उत्तम वर्ण है वह मंत्रका स्थान है । ओंकार शिरके स्थानमें और दूसरे क प व लिखकर अधोभागमें रेफ देकर उद्धार करे । मांसरहित अन्न खाकर मन्त्र को जप ॥३८॥३९॥
"कों प्रों त्रो" अनेन मन्त्रेण— asाध्याश्चापि राजान: पुत्रमित्राश्च बान्धवा: । ये मे गोत्रसमुत्पन्ना: पशावो ये च सर्वतः ॥ ४० ॥ ते सर्वे वशतां यान्ति सहिताद्रदस्य जापना। पृष्ट्वा दृष्ट्वा च ये साध्या गृहीत्वा नाम तत् तु वे ॥४१॥
"कों प्रों त्रो" इस मन्त्र से असाध्य राजा, पुत्र, मित्र, बांधव जो अपने गोत्रमें है और जो परस्त्रीया है वे सब ५०० बार मन्त्र जप करनेसे वशीभूत हो जाते हैं । उन साध्योंसे पूछकर देखकर उनके नाम लेकर सिद्ध करे (कों प्रों के बदले कहिंपर त्रो डा ऐसा पाठ है ॥४०॥४१॥)
("ओंहीं क्लीं कल्लकुण्डस्वामिनी अमृतवक् ञ्रमुकं जम्भय मोहय स्वाहा" यह मन्त्र इक्कीस वार जपनसे सिद्ध होती है ॥१॥)
उदुब्ब्रान्त पत्र, मञ्जोठ, कुंकुम, तगर यह समान ले खान पान और स्पष्टमें देनेसे वशी करता है । पुष्यनक्षत्रमें सिहकी मूल लाय कमरमें बांधनेसे जगत्प्रिय होता है ॥ २ ॥
कृष्णचतुर्दशीमे र्मशानसे महानील लावे उस उखाड नरतलस अंजन करे तो लोक वशीभूत होता है अथवा इसको मूल अपने वीर्यसे अंजन करे तो लोक वशमें होता है ॥ ३ ॥
अथवा इसोकी मूल हाथमें बांधनेसे सर्व प्रिय होता है ॥ ४ ॥
चन्द्रवार पुष्यनक्षत्रमें ब्रह्मवण्डीकी मूल लाय अंजनसे करनेसे सब जीववशमें होते हैं ॥ ५ ॥
उल्लूक नेत्र, घीकुआर, वंश-लोचन इसके अञ्जनसे लोक वशीभूत होते हैं ॥ ६ ॥
"ओं नमो महा-यक्षिणी अमुकंवशमानाय स्वाहा, " इस मन्त्रका दशसहस्र जपनसे सब सिद्ध होती है ॥)
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( १२ )
कामरत्न प्रथम-
इत्यादिका: सर्वमन्त्रा ग्राह्या भक्त्या गुरोस्तदा । सिद्धयन्ति सर्वकार्यानि अन्यथा सिद्धिभागभवेत् ॥४२॥
सम्पूर्ण मन्त्र भक्तिपूर्वक गुरूसे ग्रहण करनेसे इसे तो सब कार्य सिद्ध होजाते हैं, अन्यथा कार्यसिद्धि नहीं होती॥ ४२ ॥
"ॐ नमः कटविकटघोररूपिणीस्वाहा ॥" अनेन मन्त्रेण सप्ताभिमन्त्रितं भक्त पिडं यस्य नाम्ना सप्ताहं खाद्यते स धुबमेव वशयो भवति ॥
"ओंनमः कट विकट घोररूपिणी स्वाहा" इस मन्त्रसे सात वार अभिमन्त्रित कर भोजन पिण्डको जिसका नाम लेकर बराबर सात दिनतक खाय वह अवश्य वशमें होजाता है ॥
"ॐवशयमुखी राजमुखी स्वाहा ॥" अनेन मुखप्रक्षालनात्सर्वे वश्या भवन्ति ॥
"वशयमुखी राजमुखो स्वाहा" इस मन्त्रको पढ सात वार मुख धोनेसे सब वशमें होजाते हैं ।
"ॐ श्रीराजमुखि वरयमुखि स्वाहा ॥" वामहस्तेतेलं संस्थाप्य अनामिकया त्रिधा आमन्र्य पुनर्मूलमन्त्रं त्रिधा पठित्वा प्रात:काल रात्र्यौ स्थित्वा मुखकेशादौ विलेपयेत् । तदा सर्वेजना वश्या भर्वन्ति, व्याघ्रोपि न खादति ॥
"ॐ राजमुखिवशयमुखि स्वाहा" इससे बायें हाथमें तेल लेकर कन अंगुलीसे तीन वार अभिमन्त्रित कर फिर मूलकाको तीन वार पढकर प्रात:काल रात्र्यामें स्थित होकर मुख और केशादिमें लगावे, तब सब मनुष्य वशमें होते है, व्याघ्रभी उसको नहीं खाता ।
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"ॐचामुण्डे जय २ स्तम्भय २ जंभय २ मोहय २ सर्वसत्त्वान्मः स्वाहा"अनेन पुष्पाण्यभिमंत्र्य जाल् यस्मै दीयते स वश्यो भवति॥
"ॐ चामुण्डे जय २ स्तम्भय २ जंभय २ मोहय २ सर्वसत्त्वान्मः स्वाहा" इस मन्त्रसे पुष्प अभिमन्त्रित करके जिसको दियाजाय वह वशीभूत हो जाता है ॥
एकचित्तत्स्थितो मंत्रिमन्त्र जप्त्वायुतत्रयम्॥ ततः क्षोभ्यते लोकान् दर्शनादेव साधकः ॥ ४३ ॥
मन्त्र जपनेचाला स्थिरचित्त होकर तीस सहस्र मन्त्र जप करके अपने दर्शनसेही लोकोंको क्षुभित कर सकता है ॥ ४३ ॥
भूताख्यवटमूलंच जलेन सह घर्षयेत् । विभूत्यां संयुक्तं मन्त्रं तिलकं लोकवश्यकृत् ॥ ४४ ॥
*शाखोटवृक्षकी जड़ यत्नसे घिसकर विभूति के साथ तिलक लगावे तो लोक वशीभूत होजाते हैं ॥ ४४ ॥
पुष्ये पुनर्नवामूलं करे सप्ताभिमन्त्रितम् ॥ बद्ध्वा सर्वत्र पूज्यः स्यान्मन्त्रस्तत्रैव कथ्यते ॥ "ऐं रौं डं क्षोभय भगवति त्वं स्वाहा" । मन्त्रमिममुक्तयोग-
स्य परमंमुक्तिदयं जप्तनः ॥ ४५ ॥
पुष्य नक्षत्रमें पुनर्नवाकी जड़को उक्तमन्त्रसे सातवार अभिमन्त्रित कर हायमें बाँधे तो सर्वत्र पूजित होता है ।मन्त्र यह है-"ऐं रौं डं क्षोभय भगवति त्वं स्वाहा" यह मन्त्र २ ०००० जपनसे सिद्ध होतो है ॥ ४५ ॥
- कहीं रुद्राक्ष पाठ है ।
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अपामार्गस्य मूलन्तु पेषयेद्रोरोचनेन च ।
ललाटे तिलकं कुर्याद्विशी कुर्याज्जगत्रयम् ॥ ४६ ॥
अपामार्ग (चिरचिटे) की जडको गोरोचनके साथ पीसले, इसका तिलक मस्तकमें करनेसे त्रिलोकीको अपने वशमें कर सकता है ॥ ४६ ॥
"ॐ नमः कन्दर्पशरविङ्कालिनिमालिनि सर्वलोक-
वशङ्करि स्वाहा ॥" इति मन्त्रयुक्तत्योग्याष्टोत्तर-
सहस्रं जपेच्चततः सिद्धिः ॥ ४७ ॥
"नमः कन्दर्पशर" यह मन्त्रको कथितयोगमें १००८ वार जपनेसे सिद्धि होती है ॥ ४७ ॥
कृष्णपक्षे चतुदश्यामष्टम्यां वाह्य पोषितः ।
कृणपक्षे चतुदशयामष्टम्यां वाह्य पोषितः ।
बालि दत्वा समुद्रत्य सहदेवों सच्चूर्णयेत् ॥
तांम्बूलेन तु तच्चूर्णं दतं वश्यकरं ध्रुवम् ।
स्नाने लेपे च तच्चूर्णं योज्यं वश्यकरं भवेत् ॥ ४८ ॥
कृष्णपक्षकी चौदस और अष्टमीका व्रत रहकर बलि देकर सहदेईंकी जडको उखाडके चूर्ण करे । उस चूर्णको पानमें रखकर जिसको दीजाय वह अवश्य वशीभूत होजाता है तथा इसोका चूर्ण स्नानीय जलमें मिलाकर नहानेसे अथवा शरीरमें लेप करनेसे वश्यता होती है ॥४८॥
रोचनासहदेवीस्यां तिलकं लोकवश्यकृत् ।
शिरसा धारेतच्च चूर्णं सर्वत्र वश्यकृत् ॥ ४९ ॥
गोरोचन और सहदेई मिलाकर तिलक करनेसे लोक वशीभूत होजाता है।
१ कादण्डरारिति वा पाठ
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उपदेश: १,
हिन्दीटीकासहित
( १५ )
होते हैं और उसका चूर्ण किरपर धारण करनेसे भी लोक वशीभूत होते हैं ॥ ४९ ॥
मुखे क्षिप्त्वा च तन्मूलं कटचां बद्ध्वा च कामयेत् । यां नारों सा भवेद्वश्या मन्त्रयोगेन कथ्यते ॥
“ॐनमो भगवतिमातङ्गेश्वरी सर्वमुखरञ्जिनि सर्वेषां महामाये माताङ्ग* कुमारिके*लहलहजिहे सर्वलोकवशं- करि स्वाहा॥सहत्रं जप्त्वा उक्तयोगानां सिद्धि:॥५०॥
उस सहदेईमूलको अन्यस्त्रियोंके द्वारा जिसके मुखमें डालदे या कमरमें उक्त मन्त्रयोगसे बाँधदे तो वह स्त्री वशमें होजाति है । मंत्र यह है—“ॐ नमो भगति मातङ्गेश्वरि सर्वमुखरञ्जिनि सर्वेषां महामाये मातङ्गि कुमारिके लहलहजिहे सर्वलोकवशङ्कर स्वाहा”
इसको सहत्र जप करनेसे उपर कहे योगको सिद्धि होती है ॥५०॥
श्वेतपराजितामूलं × चन्द्रप्रस्ते समुद्दृतम्। रक्तजताक्षो नरस्तेन वशीकुर्याज्जगत्रयम् ॥ तन्मूलं रोचनायुक्तं तिलकेन जगद्वशम् ॥ ५१ ॥
श्वेतविष्णुक्रान्ताकी जड चन्द्रग्रहणमें उखाडकर लावे उसको पोस- कर आंखोंमें आंजनसे त्रिलोकी वशमें होती है और इसकी जडका गोरोचनके साथ तिलक लगानेसे जगत् वशमें होता है ॥५१॥
+ग्राहं कृष्णत्रयोदश्यां श्वेतगुर्ज्जीयमूलकम् । ताम्बूलेन प्रदातव्यं सर्वलोकवशङ्करम् ॥ ५२ ॥
कृष्णपक्षकी त्रयोदशीके दिन सफेद चौंटलीकी जडको लावे, उसको ताम्बूलके साथ देनेसे सब लोक वशीभूत होते हैं ॥ ५२ ॥
- हल हल । × मृगनखक । + ग्राहं शुक्लचतुर्दश्यां । इति च पाठान्तरम्
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शिलारोचनाताम्बूलं वारिणा तिलके कृते । संभाषणेन सर्वेषां वशीकरणमुत्तमम् । स्वर्णेन वेष्टितं कृत्वा तेनैव तिलके कृते ॥ ५३ ॥ दृष्टमात्रे वशं याति नारो वा पुरुषोऽपि वा ।
"ॐ वज्रकरणेशिवेरक्षभवेममाद्यअमृतकुरु रस्वाहा । इमं मन्त्रमुक्तयोगेन सहस्रं जपेत्ततः सिद्धिः॥ ५४ ॥ मनसिल और गोरोचन ताम्बूलजलके साथ घिसकर तिलक लगानेसे जिसके साथ संभाषण करे वह वशमें होसकता है तथा स्वर्णसे वेष्टित कर "ॐ वज्रकरणे शिवे रक्षभवेममाद्यअमृतं कुरु कुरु रस्वाहा" इसको एक हजार वार जप कर तिलक करनेसे नारी या पुरुष कोई हो दिखतेही वशीभूत होजाता है इससे अवश्य सिद्ध होती है ॥ ५३ ॥ ५४ ॥
हुत्पादचक्रनासानां मलं पूगं प्रदापयेत् । तत्पूगं खाद्यते येन यावज्ज्जीवं वशीभवेत् ॥ ५५ ॥ हृदय, चरण नेत्र नासिकाका मैल इनको पूग (सुपारी) में किंचित्भी देनसे खानेवाला जीवनपर्यंत उसके वशं होजाता है ॥ ५५ ॥
मंत्राभिमंत्रितं कृत्वा दण्डेन्ट्रीवरमूलकम् । रोचनाभिमंत्रितेनामपत्रे मूष्ठवा नेत्रद्वयाञ्जनात् ॥ प्रियो भवति सर्वेषां दृष्टमात्रे न संशयः ॥ ५६ ॥ नीलकमलकी जडको पूर्वोक्तमन्त्रसे अभिमंत्रित करके गोरोचन ताम्रपत्रमें पीसकर दोनों नेत्रोंमें आंजनसे देखतेही वह मनुष्य सबका प्यारा होजाता है। इसमें सन्देह ॥ ५६ ॥
१. ॐवज्रकरणं शिवरक्षभये ममाद्यामृतं कुरुरुस्वाहा इति वा पाठ .
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उपदेश: १. हिन्दीटीकासहित ( १७ )
तन्मूलं मधुसंयुक्तं ललाटे तिलके कृते ।
ताम्बूले वा प्रदातव्यं वशीकरणमुत्तमम् ॥ ५७ ॥
इसौकी (नीलकमलकी) जडका सहतके साथ तिलक लगानेसे वा ताम्बलके साथ देतेसे उत्तम वशीकरण होता है ॥ ५७ ॥
तन्मूलं रञ्जनोत्थं वा मूलं पिष्टवा प्रयोजयेत् ।
ताम्बूलेन तु तद्भुक्ते ध्रुवं वश्यं समानयेत् ।
‘ॐ पिङ्लायै नम:' अननेनमन्त्रेणाभिमन्त्र्यो-
गानू साधयेत् ॥ ५८ ॥
तथा नीलकमलकी जड, तिरिच्छकी जड पोसकर ‘ॐ पिङ्लायै नम:' इस मन्त्रसे अभिमन्त्रितकर पानकेसाथ प्रयोग करे । ताम्बूल खाते-
ही वह मनुष्य वशमें होजायगा ॥ ५८ ॥
रक्तगृध्रोभयं नेत्रंत्रे वा कृष्णपेचकम् ।
कृष्णपेचिकमाहृत्य तत्तैलेन प्रदीपकम् ॥ ५९ ॥
लाल गृधके दोनों नेत्र और कालेउल्लूका नेत्र लेकर या काले उललूको लाकर उसे तेल से प्रदीप्त करके और सब प्रकार सावधानी
कृत्वा च मधुना लिप्लवा वर्तिं कज्जलपातने ।
तेन नेत्राञ्जनं कृत्वा त्रैलोक्यं वशमानयेत् ॥ ६० ॥
करके उसका सहतसे लपेटकर बत्ती बनाय काजर पारे, उस काजरको नेत्रोंमें लगानेसे त्रिलोकीको वशमें करसकता है ॥ ५९ ॥ ६० ॥
देवदाली च सिद्धार्थी गुटिकां कारयेद्बुधः ।
मुखे नि:क्षिप्य सर्वेषां प्रियौ भवति नान्यथा ॥ ६१ ॥
देवदाली (घघरवेल) सरसों इनका गुटिका बनाकर मुखमें रखनेसे सबका प्रिय होता है इसमें संदेह नहीं । कहिं देवदानव सिद्धार्थं
पाठहै कि, देव दानवकी सिद्धि के निमित्त गुटिका करे ॥ ६१ ॥
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भृङ्गमूलं मुखे क्षिप्त्वा सर्वैःसंपूजितो भवेत् । रोहिण्यां वटवन्दाकं सङ्ग्राह्य धारयेत्करे । वशयं करोति सकलं विश्वामित्रेण भाषितम् ॥ ६२ ॥
भृङ्गराजकी जड मुखमें डालकर सर्वत्र पूजित होता है । रोहिणीनक्षत्र- में वटके वन्देको संग्रहकर हाथमें धारण करे तो वह सबको वशीभूत कर सकता है, ऐसा विश्वामित्रने कहा है ॥ ६२ ॥
कुङ्कुमं तगरं कुष्ठं हरितालं समं त्रयम् । अनामिकाया रक्तेन तिलकं लोकवश्यकृत् ॥ ६३ ॥
केशर (कास्मीरमें उत्पन्न) तगर, कुष्ठ, हरिताल इनको बराबर लेकर कनउङ्गालोके रक्तके साथ तिलक करनेसे सब लोक वशीभूत होजाते हैं ॥ ६३ ॥
विष्णुकान्ता शुभा भृङ्गी श्वद्रष्ट्रा मूलरोचनाम् । पिष्ट्वा तु वटिकां कृत्वा तिलकं वश्यकृत्परम् ॥ ६४ ॥
विष्णु कांता, भांगरा, गोखरूकी जड़, गोरोचनइन सबको पीसकर गोली बनाले इनका तिलक करनेसे लोक वशीभूत होजाते हैं ॥ ६४ ॥
पुष्योद्भूतं श्वेतभानुमूलं मूत्रैरजाभवैः । वटिकां कार्येत्प्राज्ञस्तिलकेन जगद्वशम् ॥ ६५ ॥
पुष्यनक्षत्रमें श्वेतमन्दारकी जड (सफेद आककी जड) लेकर अजामूत्रसे पीस वटी बनाकर उसका तिलक करनेसे सब जगत वशीभूत हो जाता है ॥ ६५ ॥
अजारक्तेन तन्मूलं पुष्यार्के पेषयेद्बुधः । कज्जलं पातयित्वा तु चक्षुषी रञ्जयन्नरः ॥ त्रैलोक्यं चरतां यान्ति दृष्टिमात्रे न संशयः ॥ ६६ ॥
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भेडके रधिरके साथ मन्दारकी जड पुष्यनक्षत्रमें पीसे और उसमें काजर डालकर जो मनुष्य नेत्रोंमें लगावे तो देखतेही त्रिलोकी वशमें होजाती है, इसमें सन्देह नहीं॥ ६६ ॥
संग्राह्या धारयेद्रव्यं कुरते सकलं जगत् ॥ ६७ ॥
श्रवण नक्षत्रमें पुहकरमूलकी जड लेकर तगर मिलाकर धारण करे तो सम्पूर्ण जगत् वशमें हो जाता है ॥ ६७ ॥
तेनैवाञ्जितमात्रेण वशीकुर्याज्जगत्रयम् ॥ ६८ ॥
कृष्णकान्ता (कायिल) कीजड पुष्यनक्षत्रमें लेकर चूर्ण करे, उसमें गौका घृत मिलाकर कज्जल धारण करे (कहीं गोमूत्र लिखा है) उसके आंजनमात्रसे हो त्रिलोकी वशमें होजाती है ॥ ६८ ॥
प्रियो भवति सर्वेषां नरः कृतवा ललाटके ॥ ६९ ॥
जियेपोते वृक्षके कोमल पत्तोंको पीसकर उसमें गोरोचन मिलाकर तिलक करे। इस मस्तकके तिलकके दर्शन करतेही सब मनुष्य इसको प्यार करने लगते हैं ॥ ६९ ॥
नासाग्रे तिलकं कृत्वा वशीकुर्य्यात्र संशयः ॥ ७० ॥
श्वेत विष्णुक्रान्ताकी जड तथा श्वेत गुड इन दोनोंको पीसकर नासके अग्रभागमें तिलक लगानेसे वशीकरण होता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ७० ॥
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मञ्जिष्ठयदवचाशितसूर्यमूले: स्वीयाड़्र्शोणितयुतै: समकुष्ठकैश्च । कृत्वा ललाटफलके तिलकं कृतज्ञो लोकत्रयं वरदाति क्षणमात्रक्षण ॥ ७१ ॥
मंजोठ, मोथा, वच, इवेतआककी जड़, अपने शरीरका रुधिर, इनके बराबर कूट लेकर इनका तिलक मस्तकपर करनेसे क्षणमात्रमें त्रिलोकी वशमें होती है ॥ ७१ ॥
१शम्भोर्ज्जलं च मधुकं च कृतातज्जलिंच हव्यं समं निजशरीरमलेन २मिश्रम् । आलेपभक्षणविधौ तिलके कृते वा योगोष्यमिवभवन्ति वशीकरोति ॥ ७२ ॥
शुद्ध पारा, सहत, लज्जावन्ती, हव्य और अपने शरीरका मल इनका लेपन भक्षण वा तिलक सब भुवनोंको वशीभूत कर सकता है ॥ ७२ ॥
मूलं जटा तगरमेषविषाणिकानां पञ्चाङ्ग्जं निजशरीरमलं तथैव । एकीकृतानि मधुना दिवसे कुसस्य कृत्वातिलकेन वशां जगन्ति ॥ ७३ ॥
हुद्रजटा, तगर, मेढ़ासिंगोका पंचांग और अपने शरीरका मल इन सबको एकत्र कर मंगलके दिन टेढा तिलक लगानेसे त्रिलोकीको अपने वशमें कर सकता है ॥ ७३ ॥
भृङ्गस्य पक्षयुगलं ३शुकमांसयुक्तं स्वानामिकारधिरकरणंमलं स्वबीजम् ।
१ शम्भोर्षृतं च मधुकं च । २ पिष्टम् । इति च पाठान्तरम् । ३ कुशे ।
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एतानि लेपविधिनाप्यथ भक्षणाद्वा कुर्वंति वश्यमखिलं जगदप्यकस्मात् ॥ ७४ ॥
भौरकै दोनोँ पंख, तोतेका मांस, अनामिका उँगलीक रधिर कानका मैल, अपना वीर्य इनका लेप वा भक्षण करानेसे तत्काल जगत् वशमें होता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ७४ ॥
तालीशकुष्टतगरै: परिलिप्य वर्तिं सिद्धार्थतैलसहितां दृढपट्टवस्त्राम् । पुंस: कपालफलके विनिपातितेन तेनाज्जनेन वशतां भिल याति लोक: ॥ ७५ ॥
तालीस, कूट, तगर, इसका लेप करके दृढ रेशमी कपडेकी बत्ती बनावे, और सरसोंके तेलसे युक्त कर पुरुषके कपालमें कज्जल पार नेत्रोंमें आँजे, तो उससे जन निश्चय वशीभूत होजाते हैं ॥ ७५ ॥
गोरोचना पद्मपत्रं प्रियङ्गु रक्तचन्दनम । एकीकृत्याज्जयेतरं यं पर्य्यति वशी भवेत् ॥ ७६ ॥
गोरोचन, पद्मपत्र, प्रियंगु, लालचन्दन इनको एकत्र कर नेत्रोंमें आँज कर जिसे देखे वह वशमें होजाता है ॥ ७६ ॥
सर्वजनवशीकरणयन्त्राणि
हूं तुं हूं हूं तुं हूं हूं तुं हूं देबदत्त वशमानय हूं तुं हूं हूं तुं हूं हूं तुं हूं हूं तुं हूं हूं तुं हूं
इस यन्त्रको भोजपत्रपर लाल चन्दनसे लिखे, देवदत्तस्थानमें साध्य नामको लिखकर घी और शहदमें तीन रात्रि स्थापन करे, वह वशी भूत होता है.
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(२२)
कामरत्न प्रथम-
गोरोचनसे भोजपत्रपर (जिसका नाम लिखकर सदाफूलोंके वृक्षके नीचे स्थापन करे । इससे रातको प्लावित करते तो वह वशमें होता है.
अनामिका अंगुलीके रक्त और गोरोचनसे जिसका नाम लिखकर मधुमें स्थापन करे तो वह वशमें होता है.
इसका गोरोचनसे भोजपत्रमें लिखलाल सूत्रसे बांध मुखमें डालकर जिसे देखे वह वशमें हाता है.
फल कंटक द्वारा जिसका नाम लिख जन्तुके विवरमें स्थापन करे, वह वशमें होता है; केवल इतनाही नहीं किन्तु त्रिभुवनको भी वशीभूत कर सकता है.
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उपदेश: ९.
हिन्दीटीकासहित
( १३ )
गोरोचनसे भोजपत्रमें जिसका नाम लिख मध्यमें स्थापन करे वह वशीभत होता है।
लाल चन्दनसे जिसका नाम लिख पानमें स्थापन कर तो वह वशमें होजाता है।
जवमालीके फूल और आकके दूवसे भोजपत्र पर इस यंत्रको लिखकर भुजामें धारण करे, वह वशमें होता है।
गोरोचन और कुंकुमसे भोजपत्रपर जिसका नाम लिख सूत्रसे लपेट रखखे तो सबष्ट वशमें होते हैं।
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गोरोचनसे भोजपत्रपर जिसका नाम लिख मधुमें स्थापन करे वह वशमें होता है.
इस्को गोरोचनसे भोजपत्रपर जिसका नामलिख देवतास्थानमें स्थापन करे, वह वशमें होता है.
अनामिका रकतसे भोजपत्रपर इस यंत्रको साध्य नाम सहित लिख बाहु वा कण्ठमें धारण करे, वह वशीभूत होता है.
गोरोचिनसे भोजपत्रपर लिख साध्यका नाम लिख मधुके मध्यमें स्थापन करे वह वशमें होजाता है
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उपदेश: १.
हिन्दीटीकासहित
( २५ )
कुंकुम गोरोचनसे अनामिका या अगस्तके कलमसे साधके नामको लिख अंगारसे तापदे तो राजाभी हो वह अवश्य वशमें हो जाता है
गोरोचनसे भोजपत्रपर जिसका नाम लिखकर लाल सूत्रमें वेष्टन कर हाथमें बाँधे तो वह वशोभूत होता है.
जिसके नामसहित गोरोचनसे यह चक्र लिखकर कण्ठ बाहु वा वस्त्रके ग्रंथचलमें बाँध, चाहे शत्रुके समान भी हो वह अवश्य वशोभूत होता है.
अथ राजवशीकरणम्
कुंकुमं चन्दनञ्चैव रोचनं शशिमिश्रितम् । गवां क्षीरेण तिलकं राजवश्यकरं ध्रुवम् ॥ ७७ ॥
कुंकुम, चन्दन, गोरोचन, इसमें भोमसेनी कपूर मिलाकर गौके दूधसे युक्त तिलक करनेसे राजा अपने वशमें होजाता है ॥ ७७ ॥
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( २६ )
कामरत्न
प्रथम-
"ॐ ह्रीं सः अमुकं मे वशमानय स्वाहा ॥" पूर्वमेव सहस्रं जप्त्वाऽऽनेन मन्त्रेण सप्ताभिमन्त्रित- तिलकं कार्यम् ॥
"ॐ ह्रीं सः अमुकं मे वशमानय स्वाहा" यह मंत्र सहस्र वार पहले जपकर फिर सात वार इन औषधियोंको अभिमंत्रित कर तिलक लगावे।
चंपकस्य तु वन्दाकं करे बद्ध्वा प्रयत्नतः । संगृह्य भरणीक्षे पुष्यक्षे वा विधानतः ॥ ७९ ॥
राजानं तत्क्षणादेव मनुष्यो वशमानयेत् ; करे सुदर्शनामूलं बद्ध्वा राजप्रियः भवेत् ॥ ७२ ॥
चम्पके वन्देको यत्नपूर्वक भरणी नक्षत्रमे अथवा पुष्य नक्षत्रम उक्त विधानसे संग्रह करके हाथमें बांधकर राजाको दिखानेसे उसी समय राजा वशमें होजाता है । तथा सुदर्शनाकी जड़ हाथमें बांधनेसे राजाका प्यारा होता है ॥ ७८ ॥७९ ॥
राजवशीकरणयंत्राण
इस यंत्रको कुंकुमसे भूरजपत्रपर लिख देवदत्तके स्थानमें साध्य नाम लिखकर अपने पास रखनेसे राजा वशमें होता है।
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उपदेशः १.
हिन्दीटीकासहित
( २७ )
ॐ तारे ॐ तारे ॐ तारें ॐ तारे ॐ तारे स्वाहा ॐ तार स्वाहा ॐ तारे स्वाहा ॐ तारे ॐ तारे ॐ तारे ॐ तारे ॐ तारे स्वाहा ॐ तारे स्वाहा ॐ तारे स्वाहा ॐ तारें ॐ तारें ॐ तारे ॐ तारे ॐ तारे स्वाहा ॐ तारे स्वाहा ॐ तारे स्वाहा
गोरोचन कुंकुम कर्पूरसे भोजपत्र पर जिसका नाम होसो लिखकर घृत मधुमें स्थापन कर तीन दिन लाल फूलसे पूजन करे तो राजा वशमें हो.
गोरोचन कुंकुम कर्पूर अर्कदूधमें साधकानाम लिखकर घृत मधुमें स्थापन कर तीन दिन लाल फूलसे पूजन करे तो वह राजा वशमें होता है, इति राजवशीकरणम्॥
अथ स्त्रीवशोकरणम्
पुष्ये पुष्पं च संगृह्य भरण्यां तु फलं तथा। शाखां चैव विशाखायां हस्ते पत्रं तथैव च॥ ८०॥ मूले मूलं समुद्दृत्य कृष्णोन्मत्तस्य तत्क्रमात्।
पिष्ट्वा कपूरसंयुक्तं कुंकुमं रोचनासमम्॥ तिलाकालस्त्री वशं याति यदि साक्षादरुन्धती॥ ८१॥
पुष्यनक्षत्रमें काले धतूरेके फूल, भरणीमें फल, विशाखोंमें शाखा, हस्तमें पत्ते, मूलमें जड लावे, यह क्रमसे ग्रहण कर कपूर मिलाकर पीसे इस समय कुंकुम और गोरोचन मिलावे इसका तिलक करनेसे कैसीभी स्त्री हो वशमें हो जाती है चाहे साक्षात् अरुन्धती क्यों न हो॥८०॥८१॥
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काकजङ्घ वचा कुष्ठं शुक्रशोणितमिश्रितम् । *तदस्ते भोजनें बाला इमशाने रोदिनि सदा । "ॐ नमो भवते रुद्राय ? चामुंडे अमुकों मे वशमानय स्वाहा॥" उक्तयोगानाम्यमेव मंत्रः ॥८२॥
काकजङ्घा (चौंटली,) वच, कुष्ठ, अपना वीर्य और रुधिर मिलाकर "ॐ नमो भवतं रुद्राय ॐ चामुंडे अमुकों मे वशमानय स्वाहा" इस मन्त्रसे अभिमंत्रितकर खवादेनेसे वह स्त्री सदा इमशानमें रोदन करती है अर्थात जोतेजो साथ न छोड़कर मरनेपर भी इमशानमें सदा रोती है ॥ ८२ ॥
प्रातमुखन्तु प्रक्षाल्य सप्तावाराभिमंत्रितम् । यस्या नाम्ना पिबेतोयं सा स्त्री वश्या भवेद् ध्रुवम् ॥८३॥
"ॐ नमः क्षिप्रकार्मिनि अमुकोंमेवशमानय स्वाहा" ',ॐ नमः क्षिप्रकार्मिनि अमुकों मे वशमानय स्वाहा" इस मंत्रको प्रातःकाल सातवार पढ़ अपना मुख सातवार धोकर जिस स्त्रोंका नाम लेकर उक्तमंत्रसे जलको सातवार अभिमंत्रितकर पीवे, तो वह स्त्री अवश्य वशमें होजाती है ॥ ८३ ॥
कृष्णापराजितामूलं ताम्बूलेन सहायुतम् । avश्यायै स्त्रियै दद्याद्द्वादश्य भवति नान्यथा ॥ ८४ ॥
"ॐ हूँ स्वाहा" । अनेनाभिमंत्र्य दद्यात् ॥ ८४ ॥
कालो विष्णुक्रांताकी जड़ पानके साथ जो अवश्य स्त्रीको दे तो वह अवश्य स्त्री वशमें हो जाती है । "ओम हूँ स्वाहा" इस मंत्रसे उप- रोक्त औषधि अभिमंत्रित कर दे ॥ ८४ ॥
- तदस्ते-ऐसाभी पाठ है-उसके हाथसे खाने से जीते जी साथ नछोड़कर मरनेपर भी शमशानमें सदा रोती है यह अर्थ है
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उपदेश:१.
हिन्दीटीकासहित
( २१ )
साध्यसाधकनाम्ना तु कृत्वा सप्ताभिमन्त्रितम् । दीयते कुसुमं यस्यै सा वर्या भवति ध्रुवम् ॥ ८५ ॥
साध्य-साधक (अपना और स्त्री) का नाम लेकर "ओं हूँ स्वाहा" इस मन्त्रसे सातवार आभियात्रित कर जिसको फूल दिये जाय वह अवश्य वशमें होजाती है ॥ ८५ ॥
मुसाधितो ह्ययं मंत्र अवश्यं फलदायकः । तस्मादिमं प्रयत्नेन साधयेमन्त्रमुत्तमम् ॥ ८६ ॥
"ॐ हूँ स्वाहा" । "ॐ हूँ स्वाहा" यह मंत्र साधन करनेसे अवश्य फलका देनेवाला होता है. इस कारण इस मंत्रको यत्नसे साधे ॥ ८६ ॥
विशाखायान्तु वन्दकां मृडले च समाहरेत् । हस्ते बद्धवा तु कुरूते वशगां वरयोषितम् ॥ ८७ ॥
विशाखा नक्षत्रमें और मंगलबारमें दारु हलदीकी जड़ लाकर उसे हाथमें बांधकर श्रेष्ठ स्त्रियोंको अपने वशमें करता है ॥ ८७ ॥
ही ही
हो हौं
सः देवदत्त सः
इस यंत्रको गोरचन कुंकुमसे लिखकर देवदत्त के स्थान में गाड़ दे अर्थात जिसे वशोभत करना हो उसके स्थानमें गाड़े या घृतमधुमें रखे तो वह वशमें हो जाती है ॥
इस यंत्रको कुंकुम, रक्त और गोरोचनसे भोज पत्रपर लिखकर वशमें होनेवालीका नाम लिखकर सदा पुष्पवाले वृक्षके नीचे या घृतमें स्थापन करे वह सात रात्रिमें वशमें होजाती है ॥
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(३०)
कामरत्न प्रथम-
इस, यन्त्रको भोजपत्रपर गोरोचन लाल-चन्दनसे लिखकर, और वशमें होने वालीका य: य: य: य: य: य: य: य: य: नाम बीचमें लिखकर घीके बीचमें या जमीनमें तीन रात्रितक स्थापन करनसे, वशीभूत हो जाती है ॥
इस यन्त्रको और वशमें होने वालेके नामको कनिष्ठिका उँगलीके अग्रिसे तथा गोरोचनसे ह्रीं ह्रीं देवदत्त ह्रीं ह्रीं लिखकरसहितके बीचमें स्थापन करे वह अवश्य वशीभूत होजाती है ॥
-इन यंत्रोंको स्थापन करती बार "ॐ पाते वज्ञ्राय स्वाहा" इस मन्त्रसे अभिमन्त्रण करना चाहिये ॥
कृष्णोत्पलं मधुकरस्य च पक्षयुग्मं मूलं तथा तगरजं सितकाकजङ्घा । यस्या: शिरोगतमिदं विहितं विचूर्णं दासी भवेज्ज्जटिति सा तरुणी विचित्रं ॥ ८८ ॥
काले कमल, भौंरेके दोनों पंख, पुष्करमूल, तगर, श्वेतकाकजङ्घा इन सबका चूर्ण कर जिसके शिरपर डाले वह स्त्री झट वशो होजाती है इसमें सन्देह नहीं (कहीं मोरपंख लिखा है) ॥ ८८ ॥
सव्येन पाणिकमलेन रतावसाने य: रेतसा निज-भवन विलासिनीनाम् । वामं विलिम्पति पदं सहसैव यस्या वइयैव सा भवंति नात्र विकल्पभाव: ॥ ८९ ॥
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जो मनुष्य रतिके अन्तमें सव्य (बायें) हाथसे अपना वीर्य स्त्रीके वामचरणके तलुएं मलता है वह स्त्री उसके वशमें होजाति है इसमें सन्देह नहीं ॥ ९ ॥
सिन्धूथमाक्षिककपातमलान्न पिष्ट्वा लिङ्गं विशुद्धं विलिख्य तरुणीं रमते नवोढाम् । साध्न्यं न याति पुरुषं मनसापि नूनं दासी भवेदिति मनोहरदिव्यमूर्त्तिः ॥९०॥
जो मनुष्य संधानोन सहत, कबूतरकी बीटको पीसकर मदनांकुशरमें लेप कर तरुणीसे रमण करता है वह स्त्री मनसेभी दूसरे पुरुषके पास नहीं जाती और सदैव काल उस पुरुषकी दासी होजाति है और मनोहर दिव्य मूति मानती है ॥ १० ॥
गोरोचनाशाशिरदीप्तांशुभुजोः कार्मारचन्दनयुतैः कनकद्रवैश्च । लिप्त्वा ध्वजं परिरमत्यबलां नरो यां तस्या स एव हृदये मुकुटत्वमेति ॥ ९१ ॥
गोरोचन, कुमुद, पारा, केशर, चन्दन और धतूरेका रस इनको मदनांकुशपर लेप कर जो रमण करे वह् उसको हृदयसे क्षणमात्र भी पृथक् नहीं होता । ९१ ॥
पुष्ये रुद्रजटामूलं मुखस्थं कार्येद्बुधः । ताम्बूलादौ प्रदातव्यं वश्या भवति निश्चितम् ॥ ९२ ॥
पुष्य नक्षत्रमें रुद्रजटा (शंकरजटा) की जड़ मुखमें धारण कर ताम्बूलादिमें जिसको दे वह वशमें होजाति है ॥ ९२ ॥
तथैव पाटलामूलं ताम्बूलेन तु वशयकृत् । त्रिपत्रभण्टिकामूलं पिष्टवा गात्रे तु संक्षिपेत् ॥ यस्या: सा वशतां याति बिन्दुमात्रेण तत्क्षणात् ॥ ९३ ॥
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पाठलकी जड ताम्बूलके साथ देनेसे वशीभूत करती है। बेल तथा मँजीठकी जड पीसकर एक कणभी जिसके शरीरपर डाले वह अवश्य वशमें होजाती है इसमें सन्देह नहीं॥ ९३ ॥
स्वकीयकामदेवं स्मरेष्टनः । तरुण्या हृदये दत्तं तत्क्षणात्स्त्री वशा भवेत् ॥ ९४ ॥
अपने वीर्य को लेकर और कामदेवका स्मरण कर तरुणीके हृदयमें रखनेसे तत्काल स्त्री वशमें हो जाती है ॥ ९४ ॥
गिलित्वा पारदं किंचिद्रम्यते नायिका यदि । प्राणान्तेऽपि च सा नारी तं नरं न विमुञ्चति ॥ ९५ ॥
कुछेक शोधे पारको निगलकर यदि स्त्रीके साथ रमण करे तो प्राणान्त पर्यंत वह स्त्री पुरुषको नहीं छोड़ती है ॥ ९५ ॥
कामाक्रान्तेन चित्तेन मासाद्धं जपते निशि । अवश्यं कुरूते वश्यं प्रसन्नो विश्वचेतकः ॥
"ऐं पि स्यां क्लों कामपिशाचिनी शीघ्रं अमुकों ग्राहय रकामेन मम रूपेण नखैविदारय२ विद्रावय२ स्नेहेन बंधय२ श्रीं फट्"। अयुत द्वयेन सिद्धिः ॥ ९६ ॥
कामयुक्त चित्त होकर रात्रिके समय जो पन्द्रह दिनतक "ऐं पि स्यां क्लों कामपिशाचिनी शीघ्रं अमुकों ग्राहय २ कामेन मम रूपेण नखैविदारय विदारय विद्रावय २ स्नेहेन बंधय २ श्रीं फट्" इस मन्त्रको बीस हजार जप करता है तो यह साधक विश्वभरको निश्चयहि अपने वशीभूत कर सकता है ॥ ९६ ॥
नागपुष्पं प्रियङ्गुच्च तगरं पद्मकेसरम् । जटामांsसों समं निम्बं चूर्णयेन्त्रमवितमः ॥ ९७ ॥
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नागपुष्प,प्रियंगु, तगर, पद्मकेशर, जटामांसी इनके समान नीमका चूर्ण लेना चाहिये ॥ ९७ ॥
स्वाङ्गं तु धूपयेतनेन भजते कामवस्त्रय: ।
घूपमन्त्र:-“ॐमूली मूली महामूली सर्वं सक्षोभय² एष्य उपद्रवेम्य: स्वाहा” । इति ॥
पानीयस्याच्जलनीं सप्त कृत्वा विद्यामिमां जपेत् । सालङ्कारां नृ: कन्यां लभते मासमात्रत: ॥ ९८ ॥
इस मन्त्रसे अपने अंगको धूपित करे तो स्त्री कामदेवके समान अपने पतिको मानती है । मन्त्र यह है -“ॐ मूली मूली महामूली सर्वं संक्षो भय २ एस्य उपद्रवेम्य: स्वाहा” । अंजलीमें जल लेकर इस विद्याको जपे तो एक मासमें अलङ्कारयुक्त स्त्री प्राप्त होती है ॥९८ ॥
“ॐ विशवावसुर्मगनधर्व: कन्यानामधिपतिस्मुरुपां सालङ्कृतां कन्यां देहि नमस्तस्मै विशवावसे स्वाहा”
कन्या गृहे शालकाष्ठं क्षिपेदेकादशाङ्गुलम् । ऋक्षे च पूर्वफाल्गुन्यां यस्तां कन्यां प्रयच्छति ॥ ९९ ॥
“ॐ विशवावसुर्ताम गंधर्व: कन्यानामधिपति: सुरुपां सालङ्कृतां कन्यां देहि नमस्तस्मै विशवावसवे स्वाहा ।” इस मन्त्रसे कन्याके घरमें ग्यारह अंगुलका शालकाष्ठ पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रमें डाल दे तो कन्या- उसको स्वीकार करेगी ॥ ९९ ॥
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( ३४ )
कामरत्न
प्रथम-
स्त्रीवशीकरणयन्त्रे
कंकुम गोरोचनसे भोजपत्रपर इस यंत्रको साध्या नामसहित लिख भुजामें धारण करे तो स्त्री वशमें होती है और इससे सौभाग्य भी होता है.
गोरोचनसे भोजपत्रपर पूर्ववत् लिखकर खरके अंगारसे तीन संख्याओंमें तपावे तो उर्वशी भी बलपूर्वक वशीभूत होजाती है. इति स्त्रीवशीकरणम्
अथ पतिवशीकरणम्
खञ्जरीटस्य मांसं तु मधुना सह पेषयेत् । अननेन योनिलेपेन पतिदासी भवेद्ध्रुवम् ॥ १ ॥
पञ्चाङ्ग दाडिमं पिष्टवा ह्वेत सर्षपसंयुतम् । योनिलेपार्त्यांत दासं करोत्यपि च दुर्भगा ॥ २ ॥
कर्पूरं देवदारुं च सकौद्रं पूर्ववत्फलम् । "ॐकामकाममालिनि पांत मे वशमानय ठः ठः" उक्त योगानां सप्ताभिमंत्रिते सिद्धः ॥ २ ॥
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खंजरीटका मांस शहदके साथ पीस जो स्त्री अपनी योनिमें लेपनकरे तो उसका पति दासकी तरह वशमें हो जाता है । श्वेत सरसोंके सहित दाडिमका पंचांग पोसकर योनिमें लेपन करनेसे दुर्भागिनोभी पतिको अपना दास करती है । इसी प्रकार कर्पूर, देवदारु, सहत यह पूर्ववत् देनेवाले हैं । "ओं कामकाममालिनि पंति मे वशमानय ठः ठः" सात वार उपरोक्त औषधियोंको अभिमन्त्रित कर प्रयोग करे ॥१००-१०२॥
रोचनां मत्स्यपित्तं च पिष्ट्वापि तिलके कृतेँ । वामहस्तकनिष्ठायां पतिदासो भवेद् ध्रुवम् । स्वश्रोणितं रोचनया तिलकं पतिवश्यक्त् ॥ ३ ॥
गोरोचनको मच्छीके पित्तासे पीसकर तिलक करनेसे अर्थात् बायें हाथकी कनिष्ठिका उँगलिसे तिलक लगानेसे निश्चय पति अपना दास हो जाता है । अपने ऋतुमें गोरोचन मिलाय तिलक करनेसे पति वशमें हो जाता है ॥ ३ ॥
चित्रकस्य तु पुष्पाणि मधुयुक्तानि कारयेत् । खाने पाने प्रदातव्यं पतिवश्यकरं भवेत् । भूर्जपत्रं च मधुना योनिलेपे पतिवशः ॥ ४ ॥
चित्रकके फूल सहतके साथ मिलाकर अन्न वा पानमें देनेसे अवश्य पति अपने वशमें हो जाता है । अथवा सहतमें भोजपत्र मिलाकर योनिमें लेप करनेसे पति अपने वशमें हो जाता है ॥ ४ ॥
जलौकसां मुखे देयं शम्भूशंखादिचूर्णकम् । तच्चूर्णं तु समाग्रह्य ताम्बूलेन समायुतम् । दातव्यं स्वामिने भक्तं वश्यो भवति नान्यथा ॥ ५ ॥
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शुद्ध पारे और शंखका चूर्ण लेकर जलजीवोंके मुखमें दे, उस चूर्णको ताम्बूलमें मिलाकर स्वामीको भोजनके निमित्त दे तो अवश्य पति वश में हो जाता है ॥ १०५ ॥
गोरोचनानलदकंकुमभावितायास्तस्याः सदैव कुरते तिलकं वशित्वम् । वात्स्यायनेन बहुधा प्रमदाजनानां सौभाग्यकृत्यसमये प्रकटीकृतोज्सौ ॥ ९ ॥
गोरोचन, नलद (खस) कुंकुम इनको मिलाकर तिलक करनेस वशीकरण होता है । यह वात्स्यायन ऋषिने स्त्रियोंको सौभाग्यवृद्धिके निमित्त प्रगट किया है ॥ १०६ ॥
सम्भोगसमये निजकान्तमेढं या कामिनी स्पृशाति वामपदाम्बुजे । तस्याः पतिस्सपदि विन्दति दास- भावं गोणिसुतेन कथितः किल योगराजः ॥ १०७ ॥
इति श्रीनित्यानाथविरचते कामरत्ने वशीकरणं नाम प्रथमोपदेशः ॥ १ ॥
सम्भोगके समय जो स्त्री अपने पतिको छवजाको वामचरणसे छूती है उसका पति सदैव दास होजाता है यह योगराज गोणीपुत्रने कहा है ॥ १०९ ॥ इति पतिवशीकरणम्
इति श्रीनित्यानाथविरचते कामरत्ने पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृत- भाषाटीकायां वशीकरणं नाम प्रथमोपदेशः ॥ १ ॥
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चतुर्थवर्णान्कृष्णं द्वितीयवर्गान्त्यस्थतम् ।
कृतवा त्रिविधहांहांतं तदन्तं हे द्वितीयकम् ॥ १ ॥
अंकारशिरसं कृत्वा प्रत्यक्षरप्रजापनम् ।
मन्त्रम्-ज्ञां झां झां हां हां हां हें हें ॥ २॥
सहस्रार्द्धस्य जापेन फलं भवति शाश्वतम् ।
द्वितीय वर्गमें होनेवाला चौथा वर्णसे तीन संयुक्तकर अर्थात् झकार त्रय इनमें आकार अपने आकार सहित तीन हकार योजना कर पश्चात् एकारसहित दो हकार मिला सबके ऊपर अनुस्वार लगाकर ओंकार प्रथम लगाकर "ज्ञां झां झां हां, हां हां हें हें" इस मंत्रको पांचसौ बार जप करनेसे पूर्ण फल होता है ॥ १ ॥२ ॥
मानुषामुरदेवाश्च सक्षोरगराक्षसा: ।
स्थावराऽजङ्गमाश्चैव आकृष्टास्ते वराऽऽज्ञया ॥ ३ ॥
उत्तम अंगवाली हे पार्वति ! मनुष्य, असुर, देवता, यक्ष, उरग राक्षस, स्थावर, जङ्गम यह सब इससे आकृष्ट होते हैं ॥ ३ ॥
हान्ते रेफं समादाय यकारस्तु विशेषतः ।
अक्षरत्रितयं तच्च द्विधा कृत्वा प्रजापयेत् ।
भक्ष्यं द्रव्यं स्वहस्तेन कृत्वा मन्त्रविभावनम् ॥ ४ ॥
दोयते यस्मै भक्ष्यं तत्सर्वेषां प्राणिनां शुभे ।
ते सर्वे यत्र नीयन्ते तत्र गच्छन्ति तत्भणात् ॥ ५ ॥
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हे शुभे ! हक्कारके अन्तमें रेफ लगाकर और यकारसहित अक्षरको संयुक्त करके दोप्रकार कर (हरय हरय इस मन्त्रको) जप करे और भक्ष्यद्रव्यको अपने हाथसे बनाकर उसमें मन्त्रकी भावना करके उसके भक्षण करानेसे सब प्राणी जहां लेजाओ वहीं तत्काल गमन करने लगते हैं । ५ ।
हींकारे मन्त्रयेल्पां हूंकारेणाडकुशं तथा । त्रिफलं वामगं पाशं दक्षिणे ज्वलिताडकुशम् । संधार्य स्वकरे मन्त्री ततो मन्त्रमिमं जपेत् ॥ ६ ॥
हीं से पाशको अभिमन्त्रित कर, हूं से अंकुशको अभिमन्त्रित कर त्रिफल वाम और पाशको, दक्षिण और प्रज्वलित अंकुशको मन्त्रवाला अपने हाथमें धारण कर, फिर इस मन्त्रको जपे । ६ ।
मन्त्र:—“ॐ ह्रीं रक्ष २ चामुण्डे तुरु २ अमुकोमाकर्षय२ हों” अस्य मन्त्रस्यपूर्वमेवायुतं जपेत्ततः: सिद्धिः। “चामुण्डे ज्वल २ प्रज्वल २ स्वाहा ।” अमुं मन्त्रं स्त्रियं दृष्ट्वा जपेतत्क्षणात् सा स्त्री पृष्ठतः समागच्छति पूर्वमयुतं जपेत्तत्सिद्धिः ॥ ७ ॥
यह मंत्र १०००० बार जपनसे पश्चात् सिद्धि होती है । इस अगले मन्त्रको स्त्रीको देखकर जपे तो तत्काल स्त्री उसके पोछे पोछे चली आती है । मंत्र यह है—“ॐ चामुण्डे ज्वल २ प्रज्वल२ स्वाहा” यह मंत्रभी प्रथम १०००० जपनसे सिद्धि होतो है । ७ ।
आलेष्यायां समादाय अर्जुनस्य तु वृंधकम् । अजामृत्रेण संपीष्यस्त्रीनां शिरसि दापयेत् । पुरुषस्य पादौनां वा क्षिपेदाकर्षणं भवेत् ॥ ८ ॥
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आश्लेषा नक्षत्रमें अर्जुनवृक्षसे वन्देकोलावे, बकरीके मूत्रसे पीसकर जिस स्त्रीके शिरपर डाले अथवा जिस पुरुष वा पशुके ऊपर डाले वह तत्काल आकृष्ट होजाताहै ॥ ९ ॥
साध्यावामपदस्थां तां मृत्किकामाहरेत्ततः । कृकलासस्य रक्तेन प्रतिमां कारयेत् ततः ॥ ९ ॥ साध्यानामाक्षरं तस्यास्तद्रक्तेनविलिखेद् द्विः । मूत्रस्थाने च निखनत्सदा तत्रैव मूत्रयेत् । आकर्षयेत तां नारों शतयोजनसंस्थिताम् ॥ ११ ॥
जिसका आकर्षण करना है उसके वामचरणसे नीचेको मृत्तिका लाकर गिरागिटक हृधिरसे उस मिट्टीका पुतला बनावे और हृदयमें उसके हधिरसे आकर्षणवाले प्राणीका नाम लिखे और मूत्रस्थान पर गाडकर सदा उसी स्थानमें मूत्र करे, सौ योजनपर स्थित भी स्त्री आकृष्ट होजाती है ॥ ९-११ ॥
गुरुत्याकर्षण्यंत्राणि
गोरोचन कुमकुमसे भोजपत्रपर जिसका नाम लिख मोम घीमें स्था-नाम लिखकर धोमे स्थापन करे पनकरपावै वह स्त्री आकृष्ट हो । वह स्त्री दूरसे आकृष्ट होती है ।
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(४०)
कामरत्न
द्वितीय-
श्री ह्रीं व ह्रीं
श्रः श्रः श्रः श्रः श्रः
दवदततमा
पंचस्वाहा हो
हां व हां हो
लीं व ह्रीं
घतूरेके पत्तेके रससे और गोरो-
चनसे भोजपत्रपर जिसका नाम
लिखे करबारको नीलिकों स्थापन
करे खैरके अंगारसे तपावे तो सौ
योजनसे भी आकृष्ट होती है.
ह्रीं ह्रीं व ह्रीं
ॐ
विज्ञा
अमुकी व
शो कुरु कुरु
स्वाहा
गोरोचनसे लिखकर खैरके
अंगारोंपर तपाय तीनों कालमें जपे हाथमें लिख
रात्रमें सनमें जप
तो उर्वशों भी आकृष्ट होती है.करे तो आकृष्ट होती है.
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उपदेश: २.
हिन्दीटोकासहित
( ४१ )
गोरोचन चन्दनसे भोजपत्रपर जिसका नाम लिख शहतमैं डाल नलिकामैं रख पृथ्वीमैं गाडदे तो स्त्री शोघ्घआकर्षित होती है.
अनामिका उंगलोके रक्तसे वाम हाथमें लिख हृदयमें रखकर जपे तो रात्रिमें शघ्यापर आजाय
सूर्यावर्तस्य मूलं तु पञ्चम्यां ग्राहयेद्बुधः। ताम्बूलेन समं दद्यात्स्वयमायाति तत्क्षणातू॥ १२ ॥
बुद्धिमान पंचमोके दिन सूर्यावर्त (शाकविशेष क्षुप हूडीहुडिया) को जड़ ला वे जिसको पानमें मिलाकर दे वह तत्काल पीछे पीछे स्वयम् आजातो है॥ १२ ॥
रतिकर्म्मकरौ ग्राह्यौ भ्रमरौ यत्नतो बुधैः॥
भिन्नौ कुल्वा दहेतौ तु चिताकाष्ठैस्तयोः पुनः॥ १३ ॥
वस्त्रेण बन्धयेद्र्द्स्म पृथग्वै पुट्टलोदयम्। तयोरे काजाभ्रृङ्गै द्रृढ़ं बद्धवा परोक्षयेत्॥ १४ ॥
जिस समय भौंरा भौंरी रति करते हों उस समय उनको ग्रहण कर अलग करके चिताकाष्ठमें उनको जलादे और उनकी भस्म पृथक् पृथक् वस्त्रमैं ग्रहण कर पोटली बनाले। उनमेंसे एक्को बकरी के सींगमें द्रढ़ बांधकर परीक्षा करे॥ १३ ॥ १४ ॥
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यां यां याति च सा मेषी सा पृथग्गृह्यते बुधैः ।
तद्रस्म शिरसि न्यस्तं क्षणादाकर्षयेत्स्त्रियः ।
अपरं रक्षयेद्रस्त्रे नोचेत्सायाति कामिनी ॥ १५ ॥
"ॐ कृष्णवर्णाय स्वाहा ।" इमं मन्त्रं पूर्वमेकायुतं
जपेत् तत उक्तयोगमभिमन्त्र्य सिद्धिः ॥ १६ ॥
इति श्रीनित्यानाथविरचिते कामरत्ने आकर्षणंनाम
द्वितीयोपदेशः ॥ २ ॥
जिस जिसको वह स्पर्श करे उसकी पृथक् आकर्षित होती है,
उस भस्मको शिरपर डालनेसे तत्काल स्त्री आकर्षित होती है और
दूसरोको वस्त्रमें रक्षा करे नहीं तो स्त्री कदाचित् नहीं आवेगी
"ॐकृष्णवर्णाय स्वाहा" इस मन्त्रको १०००० जपनेसे उक्तयोगकी
सिद्धि होती है ॥ १५ ॥
आकर्षण्यंत्राणि
गोरोचनसे भोजपत्रपर लिख मधुमें स्थापन करे दूरसे भी आकर्षण होता है।
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उपदेश: २.
हिन्दीटीकासहित
( ४३ )
गोरोचनसे भोजपत्रमें जिसका नाम लिखकर मध्युमें स्थापन करे आकर्षण होता है.
अनामिकाके रक्तसे भोजपत्र नाम लिख अनामिकाके रक्तसे भोजपत्र नाम लिख में लिख अग्निमें तपावे आकर्षण होता है
हींहींहीं देवदत्तमाकर्षय स्वाहा हींहींहीं
अनामिका रक्तसे हाथमें लिख रात्रीमे जपे संध्यामें आकर्षण होता है.
लाल चन्दन और अपने रधिरसे भोजपत्रपर जिसका नाम लिख घरमें स्थापन करे वह आकर्षित होता है.
ॐ देवदत्त ॐ
अपने रधिरसे जिसका नाम लिखकर कागमें बांधकर छोड़ दे वह शीघ्र आकृष्टित होता है.
गोरोचनसे भोजपत्रमें जिसका नाम लिख मध्युमें स्थापन करे सौ योजनसे आकृष्टित होता है.
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(४४)
कामरत्न
द्वितीय-
देवदत्तोँ ह्रीँ आकर्षय स्वाहा
कुंकुम गोरोचनसे भोजपत्रमें लिख मोमसे लपेट खैरके अंग-रेसे तपावे वह शीघ्र आकर्षित होता है.
गोरोचनसे भोजपत्रमें जिसका नाम लिख मधुमध्येमें स्थापन करे उसे सौ योजनसे आकृष्ट करता है.
३१० ३१० ३१०
गोरोचनसे भोजपत्रपर जिसका नाम लिख घृतमें स्थापन करे वह आकर्षित होता है.
गोरोचनसे भोजपत्रपर जिसका नाम लिख पनीमें स्थापित करे वह आकर्षित होता है.
इति कामरत्ने पं. ज्वालाप्रसादकृत भा. टी. आकर्षणं नाम द्वितीयोपदेश:॥ २ ॥
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हकारं स्वरसंयुक्तमुकारेण सुपूजितम् । ओंकारेण च संपूज्य अग्रे फट् विनियोजयेत् । ,ओंहुंफट्' जेयाग्रे शतजापेन जितो भवति नान्यथा ।। १ ।।
हकार स्वर संयुक्त उकारसे पूजित और ॐ कार युक्त कर अन्तमें फट् लगावे । ॐहुंफट्' जय अर्थात् जिसके जीतनेकी इच्छा हो उस पुरुषके आगे सौ बार जपनेसे जीता जाता है, इसमें सन्देह नहीं ।। १ ।।
जेयनाम हृदि न्यस्य चक्षुषा तन्निमील्य च । स्पृष्ट्वा च मन्त्रजापेन तत्क्षणाज्जितवान्सौ ।। २ ।।
जो कोई हो उसके नामको हृदयमें रखकर नेत्रों उसका निराक्षण और स्पर्शं कर मन्त्र जपनेसे वह तत्काल जीतलिया जाता है ।। २ ।।
गोजिह्वाशिखिमूली वा मुखे शिरशि संस्थित । कुरते सर्ववदेशु जयँ पुष्ये समुद्रतां ।। ३ ।।
गाजुवां चीतां, पुष्करमूल शिरपर रखनेसे और पुष्यनक्षत्रमें उखाड़ लानेसे सब वादमें जय करते हैं ।। ३ ।।
मार्गशीर्षस्य पूर्ण्यां शिखिमूलं समुद्ररत । बाहु शिरासि वा ध्यायै विवाद विजयी भवेत् ।। ४ ।।
मार्गशीर्षको पूर्णमासीको शिखीकी मूल उखाड़कर लावे । भुजामें और शिरपर धारण करनेसे सब विवादमें जय प्राप्त करता है,इसमें सन्देह नहीं ।। ४ ।।
गिरिकर्णीं शरमौं गुज्जां श्वेतवर्णां समाहरें । चन्दनेनान्वितं सर्वं तिलकेन जयी भवेत् ।। ५ ।।
गिरिकर्णीं शरमौं गुज्जां श्वेतवर्णां समाहरें । चन्दनेनान्वितं सर्वं तिलकेन जयी भवेत् ।। ५ ।।
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गिरिकर्णीं (कोयल) शमी (झंड) श्वेत चौंटली इनको लेकर चन्दनसे युक्त कर तिलक लगानेसे युद्धमें जयी होता है ॥५॥
कनकाकर्कवटो वर्णीविदुमः पञ्चमस्थथा ।
तिलकं कुर्वते यस्तु पश्येतं पञ्चधा रिपु: ॥ ६ ॥
धतूरा, आक, बड, चोता, मूंगा इनका जो तिलक लगाता है उसको शत्रु पांच प्रकारसे देखता है यानी अपनेसे पचगुना जानता है ॥ ६ ॥
कृष्णसर्पंकपाले तु वसामृत्तिकयान्विते ।
सितगुञ्जां वपेतत्र तस्या मूलं समाहरत् ॥ ७ ॥
कृततिलकं तदा दृष्ट्वा पश्येत्स्वं सम्भृतां रिपु: ॥ ८ ॥
काले सांपकी खोपडीमें चर्बी व मिट्टीका युक्त कर श्वेत चौंटली बोवे ,उसकी जड लेकर तिलक करनेसे शत्रुको सब प्रकारसे रक्षित दिखाई देता है ॥७॥८॥
॥१ श्वगणैर्भक्ष्यमाणं च पतितं च ततो भुवि ।
औधी सिंहिकानाम तया घृष्टो महारस: ॥ ९ ॥
सिंहौकपाटिकामध्ये क्षेप्यस्तन्मूलसंयुतः ।
पिधाय बदनं तस्या सिक्थकेन समन्वित: ॥ १० ॥
तस्यां वत्रस्थितायां तु सिंहवज्जायते नर: ।
रणे राजकले घते विवादे चापराजित: ॥
मदोन्मत्तो गजस्तस्य दर्शनेऽपि पराड्मुख: ॥ ११ ॥
श्वगणोंके भक्षण करनेसे जो पृथ्वीपर गिरी 'सिंहिका' नाम औषधी-का महारस घिसे उस सिंहिका (कटेरी) को कौड़ीके बीचमें रख ले,
कटेरोकी जडके सहित उसका मुख मोमसे बन्द करे । उसके मुखमें रख-
॥१ स्वर्णणै: । स्वर्गतै: इति च पाठ: ।
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उपदेशः ३. हिन्दीटोकासहित (४७)
लेनेसे यह मनुष्य सिंहके समान होजाता है । युद्धमें, राजकुलमें जुए अथवा वादमें कहींभी पराजित नहीं होता है । उसे देखकर मदो- न्मत्त हाथीभी पराड्मुख होजाता है ॥ ९-११ ॥
व्याघ्रीरसेन संघुष्टः पारदो मूलसंयतः । पूर्ववत्साधयेद्वच्या ग्रीफलं चैव तथाविधम् ॥ १२ ॥
व्याघ्री (कटेरी) के फलमें मूल सहित पारे धिसनेसे यह कटेरी पूर्ववत् जयकी प्राप्ति करती है इसमें सन्देह नहीं ॥ १२ ॥
करे सुदर्शनमूलं बद्धवा राजकुले जयी । जयामूलं राजकुले मुखे संस्थं जयप्रदं ॥ १३ ॥
सुदर्शनाकी जड हाथमें बांधनेसे राजकुलमें मुकदमेमे जय प्राप्त होता है । जया (जयल्ती) को जड मुखमें रखनेसे राजकुलमें जय प्राप्त होता है ॥ १३ ॥
आद्र्रायां वटवन्दाकं हस्ते बद्ध्वापराजितः । तदृक्षे चूतवन्दाकं गृहीत्वा धारयेत्करे ॥ संग्रामे जयमाप्नोति जयां स्मृत्वा जयी भवेत् ॥ १४ ॥
आर्द्रा नक्षत्रमें वटके वन्देको हाथमें बांधनेसे जयी होता है इसी प्रकार आर्द्रामें आमका वन्दा हाथमें धारण करनेसे जहां जाय जय प्राप्त होता है तथा जयन्तीको स्मरण करनेसे (रणमें) जय प्राप्त होता है ॥ १४ ॥
कोकाया नयनं वामं गुडलोहेन वेष्टयेत् । मुखे प्रक्षिप्य च नरः सर्ववादे जयी भवेत् ॥ १५ ॥
कोकाका बायां नेत्र गुड और लोहेमे लपेटकर उसको मुखपर लेप करनेसे मनुष्य संपूर्ण वादोंमें जय प्राप्त करता है ॥ १५ ॥
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कृत्तिका च विशाखा च भौमवारेण संयुता ।
तहिने घटितं शस्त्रं संग्रामे जयदायकम् ।। १६ ।।
जब कृत्तिका और विशाखा नक्षत्रसे युक्त भौम वार हो तो उस दिनमें बनाया हुआ शस्त्र संग्राममें जयदायक होता है ।। १६ ।।
अपामार्गरसैणैव यानि शस्त्राणि लिप्यते ।
जायन्ते तानि संग्रामे वज्रसाराणि निश्चितम् ।। १७ ।।
जानन्ते तानि संग्रामे वज्रसाराणि निश्चितम् ।। १७ ।।
पूर्वोक्तमंत्रराजेन तानि सर्वाणि मंत्रयेत् ।
सर्वेषामुक्त योगानां सिद्धिर्भवति ते ध्रुवम् ।। १८ ।।
सर्वेषामुक्त योगानां सिद्धिर्भवति ते ध्रुवम ।। १८ ।।
चिराचिटके रसमे जितने शस्त्र लिप्त किये जायँ वे संग्राममें वज्र सारकी समान होजाते हैं, इसमें सन्देह नहीं । पूर्वोक्त मन्त्रराज द्वारा सम्पूर्ण अस्त्रोंको अभिमन्त्रित करतेहो सम्पूर्ण योगोंको सिद्धि होतीहै ।। १८ ।।
हस्तेड्कलाङ्कलीमूलं मूलमंत्राभिमंत्रितम् ।
तच्चूर्णोद्धृतं तन्मल्लो मल्लान्मोहयते बहून् ।।
तच्चूर्णोद्धृतं तन्मल्लो मल्लान्मोहयते बहून् ।।
मन्त्रः- ॐ नमो महाबलपराक्रम शस्त्रविद्याविशारद
शारद अमुकस्य भुजबलं बंधय बंधय दृष्टिं स्तम्भय स्तम्भय अङ्गानि धूनय २ पातय २ महातलं हूं ।। १९ ।।
हस्त नक्षत्रमें लांगली (कलिहारी) को जडको इस मूलमन्त्रसे अभिमन्त्रित करके उसके चूर्णको छोटा पहलवान शरीरमें मलकर दूसरे पहलवानको पछाड़ सकता है । मन्त्र यह है—“ॐ नमो महाबल पराक्रम शस्त्रविद्याविशारद अमुकस्य भुजबलं बन्धय बन्धय दृष्टिं स्तम्भय स्तम्भय अङ्गानि धूनय २ पातय २ महीतलहूं” इति ।। १९ ।।
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उपदेशः ३.
हिन्दोटोकासहित
(४९)
विजयकरयंत्राणि
५३
देवदत्त
गोरोचनसे भोजपत्रमें जिसका नाम लिख शिवा में धारण करे जय होती है. और सौभाग्य होता है
हींहींहींहीं
गोरोचनसे भोजपत्रपर जिसका नाम लिख भुजा वा कण्ठमें धारण करे संग्राममें जय होती है यह महामाहेश्वरि विद्या है
हींहींहींहीं
भोजपत्रपर गोरोचनसे जिसका नाम लिख भुजा कंठ, शिखामें धारण करे तो संग्राममें जय होती है.
अभिजित् अपराजित देवदत्तस्य जयौ भवेत्
शिलापटमें हरताले लिखकर जिसका नाम लिख नीचेकी ओर मुखपर रख दे, वह जयी होता है.
१९२६१९२४ ८२७२०११ २४ २९
गोरोचनसे भोजपत्रमें लिख भुजामें बांधे संग्राममें जय होती है,
हांहांहींहींदेवदत्त
तांतांतांतां
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(५०)
कामरत्न तृतीय-
गोरोचनसे भोजपत्रमें लिख| गोरोचनसे भोजपत्रमें लिख
भोजपत्रमें स्थापन करे तो युद्धमें|भुजा और कठंमें धारण करे,
जय होती है. संग्राममें जय होती है
गोरोचनसे भोजपत्रपर जिसका| गोरोचनसे भोजपत्र लिख
नाम लिखकर मध्यमध्यमें स्थापन| नाम लिखकर भुजामें धारण करे, सर्वत्र जय
करे, जय होतीहै, होती है
गोरोचनसे भोजपत्रपर जिसका| राजकुलमें देना चाहिये, व्यवहारमें
नाम लिखकर धारण करे| अथवा
जय होती है जय होती है
गोरोचनसे और कुमकुमसे राजाका| नाम लिख भुजामें धारण करे, जय होती है
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उपदेश ३.
हिन्दीटीकासहित
(५१)
अथ सौभाग्यकरंणम्
पुष्योदृतं सितार्कस्य मूलं वामेतरे भुजे ।
बद्ध्वा सौभाग्यमाप्नोति स्वामिनो दुर्भगापि सा॥२१॥
रक्त चित्रकमन्तु सोमग्रस्ते समुद्धृतम् ।
क्षौद्रै: पिष्ट्वा वटी: कुर्यात्तिलकेसुभगां न॥२२॥
हीं सौ: सौभ्य देवदत्त-
वश्यं कुरु २ स्वाहा
इवेत आककी जड़ पुष्य नक्षत्रमें उखाड़कर दहिनी भुजामें बान्ध-
नेसे दुर्भंगा स्त्रीभी स्वामीसे सौभाग्यको प्राप्त होती है.
चन्द्रग्रहणमें रक्तचीतकी जड़ उखा-
डकर शहदसे पीसकर तिलकगानेसे सौभाग्य होता है ॥
इन यंत्रोंको गोरो चनसे भोज पत्रपर (जिसका) नाम लिखकर कोखमें धारणकरें तो दुर्भंगा सुभगा होती है ॥ २० ॥ २१ ॥
सौभाग्यमंत्राणि
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कुंकुम गोरोचनसे भृर्जपत्रमे जिसका लिखकरदे निश्चय उसका सौभाग्य होता है.
जय: देवदत्त.
लाखके रसे जिसका नाम लिख मधुमध्ये डाले, सौभाग्य होता है.
कुंकुम गोरोचन और लाखसे जिसका नाम लिख वाजोकर शरी-रमें धारण करे सौभाग्य होता है.
कुंकुम, रक्त और गोरोचनसे भोजपत्रमें लिख भुजा तथा कंठमें धारण करे तो सौभाग्य होताहै.
गोरोचनसे जिसका नाम लिख शहतमे स्थापन करे सौभाग्य होता है.
गोरोचनसे भोजपत्रपर जिसका नाम लिख मधुमें स्थाप-पन करे, सौभाग्य होता है.
कुंकुम गोरोचन जिसका नाम लिख मधुमें स्थापन करे तो सौभाग्य होता है.
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अथेश्वारादीनां क्रोधोपशमनम्
"ॐ शान्ते प्रशान्ते सर्वक्रोधोपशमन स्वाहा"
अनेन मन्त्रेण त्रिसप्तधा जप्तेन मुखमाज्ञालं क्रोधोपशमनं भवति । प्रसादपरो भवति । ॥ २२ ॥
"ॐ शान्ते प्रशान्ते सर्वक्रोधोपशमन स्वाहा।" इस मन्त्रको २१ वार जप कर मुखधोबे तो क्रोधी शान्त होताहै और प्रसाद कर ने वाला होताहै। ॥२२॥
ताल पत्र में कंटक से लिख कर्द- स्थान में स्थापन करे तो क्रोधी पुरुष प्रसन्न होता है।
गोरोचन से भोज पत्र पर लिख दूध में स्थापन करे तो क्रोधित हुग्रा प्रसन्न होता है।
अथ गज निवारणम्
गृहीत्वा शुभनक्षत्रे चूर्णयेतां छुचुन्दरीम् ।
तल्लेपेन गजो याति दूरे खलु सम्मुखम् ॥ २३ ॥
शुभ नक्षत्र में ग्रहण कर छुचुंदर को भली प्रकार चूर्ण करे, इस के लेप करने से देखते ही हाथी भाग जाता है ॥२३॥
बिल्वपुष्पस्य चूर्णं तु छुचुन्द्र्याश्च तत्समम् ।
तल्लिप्ताङ्गं नरं दृष्ट्वा दूरें गच्छति कुञ्जरः ॥२४॥
बेल के फूल का चूर्ण छुचुंदर के साथ शरीर के ऊपर लेप करने से हाथी दूर से भाग जाता है ॥ २४ ॥
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(४४)
मूलं मर्कटवल्याश्च बाहौ बध्दं च मूर्द्धनि । दुष्टदन्तिहरं दूरं चित्रं संयाति जायते ॥ २५ ॥ कोंचकी जडको बाहु और शिरपर बांधनेसे दुष्ट हाथी दूरसे भाग जाता है, चित्रमा हो जाता है ॥ २५ ॥
श्वेतापराजितामूलं हस्तस्थं वारयेद्गजम् । मूलं त्रिशूल्या वक्रस्थं गजवश्यकरं ध्रुवम् ॥ २६ ॥ श्वेतविष्णुक्रान्ताकी जड हाथमें रखनेसे हाथी निवारण होता है। त्रिशूली (बेल) की जड मुखमें रखनेसे हाथी वशमें हो जाता है ॥ २६ ॥
अथ व्याघ्र निवारणम् । मूलस्थं बहतोमूलं हस्तस्थं व्याघ्रभीतिजित् । कटेरीकी जडको हाथमें वा मुखमें रखनेसे व्याघ्रका भय दूर होजाता है ॥
"हों ह्रीं श्रीं द्रौं द्रौं हि एति" अथवा "ओं ह्रीं ह्रीं ॐ ह्रीं ह्रीं" । इत्यष्टाक्षरमन्त्रेणोलोष्टं पठित्वा क्षिपेत, तदा मुखं न चाल्यति गन्तुमशक्ता: ॥ "हों ह्रीं श्रीं द्रौं द्रौं हि एति" इस अष्टाक्षर मन्त्रसे मिट्टी (ढेला) को पढकर व्याघ्रके ऊपर फेंके तब न वह मुख चला- सकेगा, न चल सकेगा ॥
मूलं कृष्णचतुर्दश्यां ग्राहयेल्लाङ्गल्रीभवम् । हस्तस्थं व्याघ्रसिंहादिभयहृत्परिकीर्तितम् ॥ २७ ॥ इति श्रीनित्यानाथविरचिते कामरत्ने विजयादिव्या घनिवारणं नाम तृतीयोपदेश: ॥ ३ ॥
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कृष्ण पक्षकोी चौदशाको कलिहारोकोी जड ग्रहण करे, उसकोी हाथमें रखनेसेहोी सिंहव्याघ्रादिका भय दूर होजाताहै ।। २७ ।।
इति श्रीनित्यानाथविरचिते कामरत्ने पण्डित ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां विजयादिविद्याध्यानवारणं नाम तृती-योपदेश: ।। ३ ।।
चतुर्थोपदेश:
अथा शत्रूणां मुखस्तम्भनम्
मघनादस्य मूलं तु मुखस्थं तारवष्टतमम् ।। परवादी भवेत्मूकोऽथवा याति दिगन्तरम् ।। १ ।।
नागरमोथाकोी जड़कोी चांदीमें लपेटकर मुखमें रखनेसे वादी मूकहोजायगा या दिशाओंके अन्तको चला जायगा । १ ।।
श्वेतगुर्ज्जोत्थितं मूलं मुखस्थं पुष्ठतुण्डजित् ।। "ॐ ह्रीं रक्ष चामुण्डे तुरुतुरु अमुकं मे वशमानय स्वाहा ।" अयं नामुण्डामन्त्र उक्तयोग्यो: सिद्धिकर: । २ ।।
श्वेत चौंलोकोी जड़ मुखमें इस मन्त्रसे रखनेसे शत्रुकोी जीतताहै । मन्त्र यह है-"ॐ ह्रीं रक्ष चामुण्डे तुरुतुरु अमुकं मे वशमानय स्वाहा" यह चामुण्डका मन्त्र पढ़नेसे उक्त योगोंकोी सिद्धि होताहै ।। २ ।।
पुष्यार्के मधुवन्ताकं गृहीत्वा प्रक्षिपेद्बुध: । सभासध्ये च सर्वेषां मुखस्तम्भ: प्रजायते ।। ३ ।।
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(४६)
कामरत्न
चतुर्थ-
पुष्यनक्षत्रमें मुलेटीका वन्दा धंणकर सभाके वीचमें फेंक देनेसे सबका मुख स्तम्भित होजाताहै ।। ३ ।।
शत्रुमुखस्तम्भनयन्त्रे
वह यन्त्र गोरोचनतले भोजपत्रपर लिख पृथ्वीतलमें गाडनेसे शत्रु मौन हो वशमें होजाताहै.
गोरोचनतले भोजपत्रमें साध्यक नाम लिख बाहु वकण्ठमें धारणकरे वह शत्रु मौन हो वशमें होता है.
हरिताल हलदोसे साध्यकानाम लिख दो सिकोरोंमें स्थापन कर पूजन कर नीचेको मुखकर स्थापन करे तो शत्रुका मुखस्तंभन होताहै ।
यह लिख उषामध्य ईशान कोणमें स्थापन करे तो शत्रुका मुखस्तंभन होताहै ।
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उपदेश: ४.
हिन्दीटीकासहित
(४७)
किसी भोजपत्र जिस शत्रुका शिलापट्टमें हलदीसे जिस शत्रुका
नाम लिखे उसका मुख बंध होता है. करे उसका मुख बन्धन होता है.
मूलं बृहृत्या मधुकं पिष्टवा नस्यं समाचरेत् ।
निद्रास्तम्भनमेतद्वि मूलदेवन भाषितम् ॥ ४ ॥
कटेरीकी जड और मुलेठी इन्को पीसकर नाम लेनेसे निद्रा दूर
हो जाती है यह मूलदेवने कहा है ॥ ४ ॥
नौकास्तम्भनम्
भरण्यां क्षीरिकाष्ठस्य कोलं पट्टचाड्गुलं क्षिपेत् ।
नौकामध्ये तदा नौकास्तम्भनं जायते ध्रुवम् ॥*॥
भरणी नक्षत्रमें क्षीरी काठकी पांच अंगुलकी कील नौकमें डाल-
नेसे नौकाकी गति स्तंभित होती है ॥ * ॥
अथ शस्त्रास्तम्भनम्
अडकुली च जटा पठा विष्णुकान्ता च पाटली ।
श्वेतापराजिता पुंसस स (ह) देवी कार्ज्ज ड्र्का ॥ ५ ॥
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पुष्यक्ष्णोण समुद्रुत्य वक्त्रे शिरसि संस्थिता । एकैकं वारयत्येव शस्त्रसङ्घट्टने नृणाम् ॥ ६ ॥
अंकुली वा अंकुशी, रुद्रजटा, पाटा, विष्णुक्रान्ता, पाटल, श्वेत जयन्ती, सहदेई, काकजंघा इनको पुष्यनक्षत्रमें उखाडकर मुखमें तथा शिरमें रखनेसे युद्धमें एक एक मनुष्यको निवारण कर सक्ता है ॥ ५ ॥ ६ ॥
बद्ध्वा तु व्याघ्रभूपालचौरशत्रुभयं जयेत् । जातीमूलं मुखे क्षिप्तं शत्रुस्तम्भनमुत्तमम् ॥ ७ ॥
चमेलीक जडको बांधनेसे व्याघ्र राजा चोर और शत्रुका भय दूर होकर जय होती है । (कहीं “वहत्थम्बु” पाठ है-जल अग्निकाभय दूर करती है) चमेलीकी जडको मुखमें रखनेसे शत्रुका स्तंभन होता है ॥ ७ ॥
सूर्यस्य ग्रहणे चन्द्रोमूलं चोत्तरगो हरेत् । पुष्पञ्जया पाटलाया वा मुखस्थं काण्डशस्त्रहृत् ॥ ८ ॥
सूर्यके ग्रहणमें अथवा चन्द्रके ग्रहणमें उत्तरको ओर जाकर शुद्ध तासे शरफोंका अथवा लाल लोधकी जडको ग्रहण करे, उसको मुखमें रखनेसे सम्पूर्ण शस्त्रसमूहको स्तंभन करसक्ता है ॥ ८ ॥
कपित्थस्य च वन्दाकं कृतकिकायां समुद्ररेत् । वक्त्रस्थित तदेव स्यात्खड्गस्तम्भकर परम् ॥ ९ ॥
कृतिका नक्षत्रमें कैथके वंदाको ग्रहण करके मुखमें रखनेसे खड्गका स्तंभन होता है ॥ ९ ॥
करे मुदर्शनामूलं बद्ध्वास्त्रस्तम्भनं भवेत् । केतकीमस्तकं नेत्रे तालमूलं मुखे स्थितम् ॥ खर्जूरं च रणे हस्ते खड्गस्तम्भः प्रजायते ॥ १० ॥
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हाथमे सुदर्शनाकी जड बांधनेसे शस्त्रोंका स्तंभन हो जाता हे । केतकी मस्तक नेत्रमे, तालमूल मुखमे, खजुंरको हाथमे रखनेसे रणमे खड्ग स्तंभित हो जाता है ॥ १० ॥
एतानि त्रीणि मूलानि चूर्णितानि घटे पिबेत । त्रयहं रात्रौ तत्स्सवैयावज्ज्जीवं न बाध्यते ॥ ११ ॥
उपर कहे हुए इन तीनोंका मूल चूर्ण कर घोके साथ तीन दिन रात्रिमे पिये तो जीवन पर्यन्त सब इन शस्त्रोंसे बाधित नहों होता है ॥ ११ ॥
सर्वेषामुक्तयोगानां कुम्भकर्ण: प्रसीदति । आयान्तं सैन्यकं शस्त्रसमूहं विनिवारयेत ॥
"ओं अहे ! कुम्भकर्ण महाराक्षस कैकसि-संभूत परसैन्यं स्तम्भय महाभगवान् रुद्र: प्रज्ञापर्यति स्वाहा ।" सर्वयोगानामष्टोत्तरशतं जपेतिसिद्धि: ॥ १२ ॥
इन उक्त योगोंसे कुम्भकरण प्रसन्न हो जाय तो आती हुई शस्त्र सेनाको निवारण करसकता है । मंत्र यह है—"ओं अहो कुम्भकर्ण महा-राक्षस केकसी (निकषा) गर्भसंभूत परसैन्यं स्तम्भय महाभगवानरुद्र: प्राज्ञापर्यंत स्वाहा" सब योगोंमे यह मंत्र एकसो आठ बार जपनसे सिद्धि होती है ॥ १२ ॥
वक्री चक्री तथा वज्री त्रिशूली मुशली तथा । देहस्था समरे पुंसां सर्वायुधनिवारिणी ॥ १३ ॥
वक्री, चक्री, वज्री, त्रिशूली, मुशलो ये नाम देहमे स्थित हों तो समरमे पुरुषके सम्पूर्णायुध निवारण करनेवाले है ॥ १३ ॥
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(६०) कामरत्न चतुर्थ- गृहीतं शुभनक्षत्रे ह्यपामार्गस्य मूलकम् । लेपमात्रेण वीराणां सर्वशस्त्रनिवारणम् ॥ १४ ॥ चिरचितेकी जड अच्छे नक्षत्रमें ग्रहण करनेसे इसके लेपमात्रसे वीरोंके सब शस्त्र निवारण होते हैं । १४ ।
खर्जूरी मुखमध्यस्था कटचां बद्धवा च केतकीम् । भुजदण्ड स्थितश्चार्कः सर्वशस्त्रनिवारणः ॥ १५ ॥ खर्जूरी मुखमें स्थित करनेसे, कमरकके मध्यमें केतकी, भुजदण्डमें स्थित आक यह सब शस्त्रोंका निवारण करनेवाला है ॥ १५ ॥
पुष्यक्षरे श्वेतगुञ्जा या मूलमुद्रृत्य धारयेत् । हस्ते काण्डं भयं नास्ति संग्रामे च कदाचन ॥ १६ ॥ पुष्य नक्षत्रमें श्वेत चौलाईको जड को हथियारमें धारण करे तो कभी- चित शस्त्रका भय न हो ॥ १६ ॥
त्रिलोहवेष्टितं कृत्वा रसं वज्राभ्रसंयुतम् । वक्त्रस्थञ्चकरस्थञ्च सर्वयुधनिवारणम् ॥ १७ ॥ सोना चांदी तांबेके सहित रस वज्राभ्र (पारा अष्टक) वे�्टित करके मुखमें स्थित वा हाथमें स्थित हो तो संपूर्ण आयुधोंको निवारण करनेवाला है ॥ १७ ॥
ब्रह्मदण्डं च कौमारी ईश्वरी वेष्टणं तथा । वाराही वज्रिणी चान्द्री महालक्ष्मीस्तथैव च ॥ १८ ॥ एतारश्चौषधयो दिव्या स्तथैता मातारः स्मृताः । स्मृत्वा चैव करे बद्धवा सर्वशस्त्र निवारणी ॥ १९ ॥ ब्रह्मवण्डी, कौमारी, ईश्वरी, वैष्णवी, वाराही, वज्रिणी, चांद्री, महालक्ष्मी यह दिव्य औषधी माताओंको स्मरण कर हाथमें बांधनेसे सब शस्त्रोंका निवारण होता है ॥ १९ ॥
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उपदेश: ४.
हिन्दीटीकासहित
(६१)
सब शस्त्रोंको निवारण करनेवाली है ॥ १८ ॥ १९ ॥ इति शस्त्र-स्तम्भनम् ॥
अथाग्निस्तम्भनम्
"ओं शंङ्कर हरहर अग्नि स्तंभय स्तंभय"
अनेनाग्नौ फुत्कारं दत्वा अग्निं स्तंभयति ॥
"ओं शंकर हरहर अग्नि स्तंभय २" इस मंत्रसे फूंक मारनेसे अग्नि थम जाती है ॥
जप्त्वा जटां नरो देवों तारां महिष्मदनीम् ।
खदिराङ्गारमध्ये तु प्रविश्टोऽसौ न दह्यते ॥ २० ॥
जटी, तारा, महिषमर्दिनी मंत्रसे १२००० जप करके फिर खेरके अंगारोंमें घुस जानेसे भी मनुष्य नहीं जलता है ॥ २० ॥
इस यंत्रको भोजपत्रपर पोत-द्रव्यसे लिख पोत सूत्र तथा मोमसे लपेटे जलसे पूर्ण घटमें स्थापन करे तो अग्निस्तंभन करे (अग्निसंतंभनं पूरयाप्रतिहतनिमित्तम्) ॥
"ओं मर्कट टचछयघनेशेकटीयमनोयश्रीआल-
यप्रायमबुदीये वशनरकोऽयमन्त्री क्रोंफट् ॥"
"ओं क्रींमहिषवाहिनी जम्भजम्भय मोहय२ भेदय
२अग्निस्तंभय २ ठः ठः" एतन्मन्त्रद्वयं पूर्वसेवायुतं जपेत्तेन सिद्धिः॥ अथवा-मत्तकटीटछयघने सेक-
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टोयमूलोयसो आलिप्याग्नायमुदीयतेशकवीज्जे मन्दीहींफट् । ॐ ह्रीं महिषवाहिनोस्तंभयमोहयभेदय अग्निस्तंभय ठः ठः इति: पाठ: ॥
"ॐ मर्कटिं तर्ज्जय घूमघोरं करोय मनोय श्री आलिख्य प्राणम्भूदौ वशनकरौयं मन्त्री क्रींफट् ॥ ॐ क्रीं महिषावाहिनी जम्भय २ भेदय २ मोहय २ अग्न स्तंभय २ ठः ठः" इन दोनों मन्त्रोंके प्रथम १०००० जप करनेसे सिद्धि हो जाती है ॥
कुमारोशरणं पिष्टवा लिप्तहस्तो naro भवेत् । दीप्ताड़=रसततो लोहरमन्त्रयुक्तेनं दह्यते ॥२१॥
जो मनुष्य घीकुवार और जमीकंदको हाथमें लपेट ले तो वह दीप्त अंगार और जलते हुए लोहेको हाथमें उठासकता है ॥ कहीं "कमा-रीरसकं" पाठ है अर्थ यह कि-घीकुआर ॥ २१ ॥
करे सुुदर्शनामूलं बद्ध्वाग्निस्तंभनं भवेत् ॥ अत्रमंत्रलेखनं पूर्ववत् ॥
पूर्व लिखा मन्त्रभी पढ हाथमें सुदर्शनाको जड़ बांधनेसे अग्नि स्तंभित होती हे ॥ इति अग्निस्तंभनम् ॥
अथ जलस्तम्भनम्
पद्मक नाम यद्द्रव्य सूक्ष्मचूर्णन्तु कारयत् । वापीकूपटागेषु नि:क्षिपेद्न्ध्रयेज्जलम् ॥ २२ ॥
जो पद्मक (पद्माख) नाम द्रव्य है उसको चूर्ण करले उसको बावडी कूप तड़ागमें डालनेसे जल थाम जाता है ॥ २२ ॥
"ॐनमोभगवते रुद्राय जलं स्तंभयस्तंभय ठःठःठः ।" क्षणाद्रें घटं भिद्याज्जलं तत्रैव तिष्ठति ॥ २३ ॥
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उपदेश: ४.
हिन्दीटीकासहित
(६३)
"ओं नमो भगवते हृद्राय जलं स्तंभय २ ठ:४:" यह मंत्र पढकर क्षणार्धमें घट भेदित होनेसे भी जल उसमें स्थित रहता है ॥ २३ ॥
देवदालीयमूलं तु मण्डूकरसयोजितम् ।
लेख्येद्वस्त्रणदौ तु जलस्तंभनमत्तमम् ॥ २४ ॥
घवरबेलकी जड (मेंडकके) मेढासिंगोके रसमैं युक्त कर हाथ पैरमें लेपकरनेसे जलका स्तंभन हो जाता है ॥ २४ ॥
जलस्तंभनयन्त्रे
पोतद्रव्यसे कर्पंटपर इस यन्त्रको लिख मोमसे लपेट पूजे तो जलस्तंभन होता है ।
इसेको पीत द्रव्यसे पटपर लिख मोमसे वेष्टितकर जलमें स्थापित करे तो उससे जल स्तंभन होता है.
इसको लिखते समय रविवार केहिनशिरसकी जड लाय जलसे घिसकर माथेपर तिलक करे.
इलेष्मान्तकस्य पिष्टिन कर्तव्यं पादुकाद्वयम् ।
गोधाचर्म्ममयं बड्ं कृत्वारुढो भवेज्जले ॥ २५ ॥
दोनों खडाऊंपर लसोडेको पीस लपेटकर गोहके चर्मका बन्धन कर जलमें चल सकता है ॥ २५ ॥
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इलेष्मान्तकफलं चूर्ण महंयित्वा लिपेद्घटम् । घनमृदुलमात्रं तु शोषयेत्पूरयेज्जले: ॥ २६ ॥ लसोदके फलको चूर्ण कर घडेपर एक अंगुल मात्र मोटा लेप कर मुखा लेवे, फिर जलसे पूर्ण करे ॥ २६ ॥
शिरोष्मूलमादाय रविवारे तु पूर्वजम् । उदकेन साहगृष्टं ललाटे तिलके कृते ॥ २७ ॥ इतवारके दिन शिरको जड लाकर जलके संग पीसकर माथेपर तिलक करनेसे (देखनेसेही जल) स्तंभित होजाता है ॥ २७ ॥
तत्तदिवये तथा सर्वकृतदोषो विमुच्यते । उत्तराभिमुखं ग्राह्यं मेघनादस्य मूलकम् ॥ २८ ॥
तप्त दिव्यमें सब दोष छूटं जाते हैं । उत्तरकी ओर मुख कर ढाकको जड ग्रहुण करे अर्थात् तत्ती वस्तु गरम नहीं लगता। उसे भक्षण कर वस्त्रद्वारा धारण करे तो दिव्यपदार्थ स्तंभित होजाते हैं ॥ २८ ॥
हीं: ह्रीः: ह्रीः: हां: ह्रीः: ह्रां: ह्रीः: ह्रीस: हौं: ह्रीः: गोरोचने कुमकुम और लाखसे भोजपत्रमें इस यंत्रको लिख तत्ती सरैयामें बन्द करे तो दिव्य स्तंभन होजाता है ॥
श्वेतगुञ्जोस्थितं मूलमृक्षे उत्तरभाद्रके । उत्तराभिमुखं ग्राह्यं दिव्यस्तंभकरं मुखे ॥ २९ ॥
उत्तराभद्रपदा नक्षत्रमें श्वेत चोंटलीकी जड उत्तरकी ओर मुखकर ग्रहुण करे और मुखमें धारण करनेसे दिव्यस्तंभन होता है ॥ २९ ॥
भृङ्गींमूलं रोचनां च पिष्ट्वा पाणौ प्रलेपयेत् । ललाटे तिलकं कृत्वा तप्तदिव्यजयी भवेत् ॥ ३० ॥
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उपदेश: ४.
हिन्दीटीकासहित
(६४)
भांगरेकी जड़ गोरोचनके साथ पीस हाथमें लपेट मस्तकमे तिलक करनेसे तप्त दिव्यपदार्थका जीतनेवाला होता है ॥ ३० ॥
इस यंत्रको गोरोचन कुंकुमसे उसके फूलके रसिके सहित भोजपत्रपर लिख दूधके घडेमे रख्खे तो सब दिव्यस्तंभ होते हैं।
मरोचं मागधी चैला चर्विता गिलिता सती । रवितण्डुलर्जैदिव्यै: कृतदोषो विमुच्यते ॥ ३१ ॥
कालीमच्, पीपल, इलायची, आँक और तन्दुल यह चाबने या निगलनेसे सब प्रकारके दिव्य दोषोंसे छुटजाता है ॥ ३१ ॥
आज्यं शर्करया पीत्वा चार्वित्ता नागरं वचाम् । तप्तलोहं लिहेत्पश्चात्कृतदोषो विमुच्यते ॥ ३२ ॥
घी और बूरा मिलाकर पीनेसे और सोंठ वच मिलाकर मुखमें रखनेसे तप्त लोहेको चाटनेसेभी उसका दोष नहीं लगता ॥ ३२ ॥
मण्डूकरससपिष्टलज्जामूलवनक्तक: । लिप्तपाणिन्तर: सत्पे तप्तदिव्ये विशुद्ध्र्चति ॥ ३३ ॥
सोनापाठाके रसमे लज्जावन्तीकी जड़ पीस उसे हाथमें लगाने से मनुष्य दिव्यपदार्थके तापसे शुद्ध होता है अर्थात् शरीर जलता नहीं ॥ ३३ ॥
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लोहदिव्यस्तम्भनमंत्र:
"ॐअनलदहंतकोधरंमैधरोजातीनाभावाच्छुच्छिनिददोदिव्यपतितस्तंभे ईश्वरो महेश:॥" एतन स्तम्भनम्। श्रीमहादेवकी आज्ञा। अमुं मत्त्र-मयुतं जपेदिव्यसिद्धिर्भवति॥
"ॐलोहा प्रज्वल कोइलाके भानुहौचण्डके-द्वारकापडी लोहापडौतुषार॥"
मंत्र-ॐ अग्नीदहंतकोधरंमैधरोजातीनाभावाच्छुच्छिनिददो दिव्य-पति तरतंभे ईश्वरोमहेश: एतन स्तम्भनम् श्रीमहादेवकी आज्ञा। इस मन्त्रको १०००० जपनसे सिद्धि होती है॥ "ॐ लोहा प्रज्वले कोइलाकेनाश्चण्डकाद्वारकापडीइलोहापडौतुषार"॥ यह लोह-दिव्यके स्तम्भनका मंत्र है॥
अथ गजगोमहिष्यादिस्तम्भनम्
उष्ट्रास्तप्रसिथ चर्तुदिक्षु निखनेद्भूते धुवम्। गोवाजिमेषीमहिषी: स्तंभयेत्करिणोमपि॥ ३४॥
ऊंटकी हड्डी चारों ओर भतलमें गाडनेसे गौ, भैंस, भेड, घोडा हाथोतकका स्तंभन होता है। इस हाथो यंत्रको तल्पाटमे लिख हाथोका दांत उखाड मट्टीका हाथी बनावे, इससे हाथी आदि सब स्तंभित होते हैं॥ ३४॥
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उपदेश: ४.
हिन्दीटीकासहित
(६७)
इस यंत्रको हलदीसे भोजपत्रपर जिसका नाम लिखकर तुमके नीचे स्थापित करे वह स्तंभित होता है।
इतिगजगोमिष्यादिस्त-
म्भनम्
अथ मनुष्यस्तंभनम्
"काली करालो अमुकं स्तंभय स्वाहा ||"
अनेन मन्त्रेण साध्यनाम हृदि धृत्वा सृष्ट्वा वा दर्शनाज्जपत: स्तंभितो भवति क्षिप्रम् || ३५ ||
"काली कराली अमुकं स्तंभय स्वाहा" इस मंत्रसे साध्यका नाम हृदयमें धारण कर उसको छूकर वा देखकर जपे तो स्तंभन होता है || ३५ ||
मनुष्यस्तंभनयंत्राणि
इन यंत्रोंको गोरोचनसे भोजपत्रपर जिसका, नाम लिख शिखोरेमें स्थापन करे उसका स्तंभन होता है
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कामरत्न चतुर्थ-
इसको गोरोचनसे जिसका नाम लिखे और कंपावे वह स्तंभित होता है “कालोकंकाली अमुकस्तंभयस्वाहा” इस मन्त्रसे साध्यकानाम हृदयमें रखकर छूकर वा दर्शन कर जपे शीघ्रस्तंभित होता है। इति मनुष्यस्तम्भनम्
अथ मनःस्तम्भनम्
चमकोरस्य कुण्डानि रजकेस्य तथैव च ।
कुण्डान्तलं समुदृधृत्य चाण्डाल्या ऋतुवाससम् ।।
बन्धयेत्पोटलिं प्राज्ञो यस्मिन् प्रे तां विरोति:क्षिपेत् ।
तस्योत्थाने भवेत्स्तम्भः सिद्धयोग उदाहृतः ।। ३६ ।।
चमार और धोबीकी नांदका मैल लेकर चांडालोका ऋतुका वस्त्र लेकर इसको पोटली बांधकर आगे फेंकदे वह उठनेमें स्तंभित होजायगा । सिद्धयोग है ।। ३६ ।।
आसनस्तम्भनम्
श्वेतगुज्जाफलं वाप्यं नृकपालेडपि मृत्सह ।
निशि कृष्ण चतुर्दश्यां त्रिदिने तत्र जागरेत् ।। ३७ ।।
नित्यं सिग्र्वेज्जलेनैव मन्त्र पूजां च कारयेत् ।
तस्या: शाखा लता ग्राह्या शुभ्रक्षे स्वमन्त्रतः ।। ३८ ।।
क्षिपेदस्त्र्यासन तां तं स्तम्भयेत तत्क्षणाद्ध्रुवम् ।। ३९ ।।
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"ॐहुद्रेभ्यो नमः । ॐ वज्ररूपाय वज्रकरणाय शिवे रक्षभवे समामृतं कुरु २ स्वाहा ।।" अयं पूजामंत्रः ।।
श्वेत चौंलोको मनुष्यकी खोपडीमें मट्टी डालकर बोवे, कृष्णपक्षकी चौदसको यह कार्य कर तीन राततक जागे और तीन दिन बराबर उस पर जल छिड़के ।। मन्त्रपूर्वक पूजा करे और शुभ नक्षत्रमें उसकी शाखाको ग्रहण करे जिसके आसनपर फेंके वह उसी समय स्तंभित होजाता है । पूजामंत्र—"ॐ हुद्रेभ्यो नमःॐवज्ररूपाय वज्रकरणाय शिवे रक्ष भवे समामृतं कुरु २ स्वाहा" ।। इति आसनस्तंभन इति मनुष्यस्तम्भनम् ।। ३७-३९ ।।
सर्वभूतबुद्धिस्तम्भनम्
भूर्जराजो ह्यपामार्गसिद्धार्थैः सहदेविकाम् ।
तुल्यं तुल्यं वचाक्षेताद्रव्यमेषां समाहरेत् ।। ४० ।।
लोहपात्रे विनिधिप्य द्विदिनान्तं समुद्रेत ।
तिलके: सर्वभूतानां बुद्धिस्तम्भकरो भवेत् ।। ४१ ।।
भांगरा, चिरचिटा, सरसों, सरदेई इनकी बारबर, बछ, श्वेतकटेरी सब लोहपात्रमें डालकर इनका रस निकाले, इसके तिलक करनेसे सब भूतोंकी बुद्धि स्तंभित होजाती है ।। ४० ।। ४१ ।।
शत्रुबुद्धिस्तम्भनम्
"ॐ नमो भगवते विश्वामित्राय नमः । सर्वमूली-श्यां विश्वामित्राय विश्वामित्र आज्ञापर्यति शक्ष्या आगच्छ२ स्वाहा ।।" उक्तयोगस्यायं मन्त्रः ।
"अङ्गुलीलात्रिधा आहाय आगल स्वाहा ।" अनेन मन्त्रेण नदीं प्रविश्य अष्टोत्तरशताज्जलैस्तर्पयेत् ।
शत्रूणां बुद्धिस्तम्भो भवति ।। करपुरेण चित्राङ्गारे
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नाम लिखित्वा तदुपरि मृत्तिकां दद्यात् तत्र शत्रोमुखबन्धो भवति ॥ इति शत्रुबुद्धिस्तम्भनम् ॥
मन्त्र–“ॐ नमो भगवते विश्वामित्राय नमः सर्वसुखोभ्यां विश्वामित्र आज्ञापर्यन्ति शक्त्या आगच्छ स्वाहा ॥” यह उपरोक्त योगका मन्त्र है ॥“अंगुलीत्रिधा आशाय आगल स्वाहा” इस मन्त्रसे नदीमें प्रवेश कर १०८ अंजलिसे तर्पण करे तो शत्रुओंकी बुद्धि स्तंभित होजाती है॥ कपूरसे चिताके अंगारेपर शत्रुका नाम लिखकर उसके ऊपर मिट्टी डालनेसे शत्रुका मुख बंध होजाता है । इति शत्रुबुद्धिस्तम्भनम् ॥
अथ चौरगतिस्तम्भनम्
“ॐ नमो * ब्रह्मदेषिणी शिवे रक्षरक्ष ठः ठः ।” अनेन मन्त्रेण सप्तपाषाणखण्डान् इमशानाद् गृहीत्वा त्रीणि कटचां बद्ध्वा पराणि मुष्टिभ्यां धारयेच्चौराणां गतिस्तम्भो भवति । इति ॥
“ॐ नमो ब्रह्मदेषिणी शिवे रक्षरक्ष ठः ठः” इस मन्त्रसे सात कंकर इमशानस्थाने लेकर कमरमें बांधे, शेष मुद्रठोंमें धारण करे तो चोरोंकी गति स्तंभित होती है ॥ (कहीं पाशोंका धारण करना कहा है) इति चोराणां गतिस्तम्भनम् ॥
अथ गर्भस्तम्भनम्
गृह्य कृष्ण चतुर्दश्यां धत्तूरस्य तु मूलकम् । कटचां बद्ध्वा रमेत्कान्तां न गर्भं धारयेत्क्वचित् ॥ मुक्तेन लब्धे गर्भं पुरा नागार्ज्जुनोदितम् । तन्मूलचूर्णं योनिस्थं न गर्भ सम्भवेत्क्वचित् ॥ ४२ ॥
- ब्रह्मवशिनो इत्यादि पाठः ।
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कृष्णपक्षको चौदसके दिन धतूरेको जड ग्रहणकर कमरमें बांधकर स्त्री पतिसे रमण करे तो कभी गर्भकी स्थिति नहीं होती है, इसके खोलनेसे गर्भकी स्थिति होती है ऐसा पहले नागार्जुनने कहा है। अथवा धतूरेको जडका चूर्णकर योनिमें धारण करनेसे कभी गर्भकी स्थिति नहीं होती है ॥ ४२ ॥
सिद्धार्थमूलं शिरसि बद्धवा कान्तं रमेतु या । नगर्भं धारयेत्सा स्त्री मुक्तेन लभते पुनः ॥ ४३ ॥
अनेन गर्भो न भवति ॥ इति गर्भस्तम्भनम् ॥ सरसोंकी जड शिरपर बांधकर जो अपने कान्तसे रमण करती है वह स्त्री कभी गर्भधारण नहीं करती, उसके खोल रखनेसे फिर गर्भकी स्थिति होती है ॥ ४३ ॥
इस मतंको आनमिका के रक्तसे या मार्जार (बिलाव) का मल अनामिकाके रक्तसे या मार्जार (बिलाव) का मल अनामिकाकासे ग्रहण कर रक्तसे देवदत्तके स्थानपर गर्भवतीके नामके साथ भोजपत्रपर लिख भूमिमें गाडे तो गर्भस्तम्भन होगा ॥ इति गर्भस्तम्भनम् ।
इति गर्भस्तम्भनम् ।
अथ वीर्यस्तम्भनम् इन्द्रवारुणिकामूलं पुष्ये नग्नः समुद्दरेत् । कटुत्रयैर्गवा क्षोरैः सम्मिश्र्य गोलकोकृतम् ॥ छायाशुष्कं स्थितं चास्ये वीर्यस्तम्भकर नृणाम् ॥ ४४ ॥
नग्न होकर पुष्यनक्षत्रमें इन्द्रायणकी जड उखाडकर उसे सोंठ, मिरच, पीपलके साथ पीस गौके दूधमें गोली बांधे और उसका छायामें सुखाले एक गोली मुखमें रखनेसे वीर्यस्तंभन होता है॥४४॥
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नीलोन्मूलं रमशानस्थं कटचां बद्धवा तु वीर्यध्रुक् ॥४५॥ इमशानमें उत्पन्न हुई नीलकी जड़ कमरमें बांधकर रमे तो वीर्य स्तंभित होता है ॥ ४५ ॥
कृष्णोन्मत्तवचामूलं मध्युपिष्टं प्रलेपयेत् । लिङ्गे तदा रमेत्कान्तां स्वभावादिग्रुगुणं नरः ॥ ४६ ॥ काले धूर्ते और वचकी जड़ शहतमैं पीसकर मदनध्वजपर लेप- कर स्त्रीके साथ रमण करनेसे दुगुना पराक्रम दिखाता है ॥ ४६ ॥
भृङ्गीविषं पारदं च प्रत्येकं तु दिगुज्जकम् । वराटाक्षं क्षिपेद्विन्दु: स्थिर: स्याच्छरसाधृतम् । अभ्रक, विष, पारा यह वस्तु शोधी हुई ले और प्रमाणमें दो दो तोटली भरले इनके प्रयोगसे शुक्रस्तंभन होता है ॥ ४७ ॥
रक्तापामार्गमूलं तु सोमवारे नियन्त्रयेत् । भौमे प्रात:समुद्रुत्य कटचां बद्धवा तु वीर्यध्रुक् ॥४८॥ लाल अपामार्ग (चिरचिटे) को जड़को सोमवारके दिन निमंत्रण देकर मङ्गलके दिन प्रात:काल उखाड़कर लावे, उसके कमरमें बांधनेसे वीर्य स्तंभित होता है ॥ ४८ ॥
दुन्दुभीनामकं सर्पं कृष्णवर्णं समाहरत् । तस्यास्थि धारयेत्कटचां नरो वीर्य्यं न मुञ्चति । विमुञ्चति विमुक्तेन सिद्धियोग उदाहरणः ॥ ४९ ॥ काले वर्णके दुन्दुभो नाम सर्पको लावे, उसकी हड्डी कमरमें धारण करनेसे मनुष्यका वीर्य स्तंभित होता है और उसको खोल रखनेसे वीर्य मुक्त होता है ॥ ४९ ॥
नखास्थीनि समादाय मार्जारस्य सितस्य च । कृकलासस्य पुच्छाग्रमुद्रिकाप्रेततन्तुभिः ॥ ५० ॥
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वेष्टधा कनिष्ठिका धार्या नरो वीर्यं न मुञ्चति ॥ ५१ ॥
इवेत मार्जारके नख और अस्थि लेकर कुकलास (गिरगट) की पूंछके अग्रभागको बनी अंगूठीको मृतकस्थानके सूतसे लपेटकर कनडंगलीमें धारण करके मनुष्य वीर्यको नहीं त्याग करसकता है ॥ ५१ ॥
पुष्योद्भृतं श्वेतपिकाक्षबीजं कटीतटे लोहितसूत्र-बद्धम् । बीजच्युतिं धारयति प्रसड्ने ख्यातः सदायं किल योगराजः ॥ ५२ ॥
पुष्य नक्षत्रमें उखाड़ा हुवा श्वेतपिकाक्षका बीज लाल सूतमे कमरमें बांधनेसे बीजकीषलितता नहीं होती । यह योगराज कथन किया है ॥ ५२ ॥
श्वेताम्बुपुष्टोल्वितरतः फलतश्च कारणे पिट्ट्वा वटपी-दपस्य । करञ्जबीजोदरमध्यगानि स्तम्भन्ति वीर्यं वदने धृतानि ॥
आदित्यवारोद्भृतसप्तपर्ण-वृक्षस्य बीजं विनिधाय वक्त्रे । जयेदकाण्डं सुरतावतारे पुमान् पुरन्ध्रौः स्मरतीव वेगः ॥ ५३ ॥
रविवारके दिन सप्तपर्ण वृक्षके बीज ला करके मुखमें रखनेसे सुरतके समय पुरुष स्त्रीका जय करता है ॥ ५३ ॥
नागकेशरक्षं तु गोधृते पातयेद्बुधः । भुक्त्वा रमेच्च रमणों तदा बिन्दु :स्थिरो भवेत् ॥ ५४ ॥
नागकेशर एक कर्ष गौके घीमें डाले उसे भोजन कर जो स्त्रीसे रमण करे तो वीर्य स्थिर होता है ॥ ५४ ॥
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श्वेतेषुपुष्टं चरणं गृहीत्वा पुष्यार्कयोगे पुरुषस्य कटचाम् । कुमारिकार्तिततसूत्रकेन बद्धं जयत्याशु मनोजबीजम् ॥ ५५ ॥
श्वेत शंखोंकी जड़को पुष्य नक्षत्रयुक्त रविवारमें ग्रहण करके कवारी कन्याके काते सूतसे पुरुषकी कमरमें बांधनेसे कामको जय करता है ॥ ५५ ॥
बीजमोशलिङ्गस्य सूतं वृश्चिककण्टकम् । क्षौपेत्पूगफलं चान्स्मस्त्रिलोहैस्तं च वेष्टयेत् ॥ ५६ ॥
जिह्वोपरि स्थिते तस्मिन्नरो वीर्यं न मुञ्चति ॥ ५६ ॥
धतूरेके बीज, पारा, मैनफल यह सुपारीके साथ मिलाकर तीन लोहेसे उसको वेष्टित करे । इसको जिह्वापर रखनेसे मनुष्य वीर्यको नहीं छोड़ता है ॥ ५६ ॥
सहदेवोबीजमूलं संमिश्यं पद्मकेसरैः । मध्याज्यसहिताल्लेपान्नरो वीर्यं न मुञ्चति ॥ ५७ ॥
सहदेवोके बीज और जड़ पद्मकेसर इसमें घी और शहद मिलाकर लेप करे तो मनुष्यका वीर्य स्खलित नहीं होता है ॥ ५७ ॥
नीलोत्पलसिताम्भोजकेसरं मधुशर्करम् ॥ ५८ ॥
अमोभिनाभिलेपेन चिरं रमति कामुकः ॥ ५९ ॥
नील कमल श्वेत कमलकी केसरमें शहद शर्करा मिलाय इसका नाभिपर लेप करनेसे बहुत देरतक कामी पुरुष रमण कर सकता है ॥ ५८ ॥ ५९ ॥
आदाय कृष्णेतरकाकजटामूलं सिताम्बोरहकेसरञ्च । क्षौद्रेण पिष्टवा परिलिप्य नाभिं स्तम्भं प्रपद्येत पुरुषस्य बीजम् ॥ ६० ॥
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इवेत काकजंघाकी जड, इवेत कमलकी केसर यह लेकर शहदके साथ पीस नाभिपर लेप करनेसे पुरुषका वीर्यस्तंभित नहीं होता है ॥६१॥
छागयेडकादृधुपिष्टं लज्जालूलं प्रलेपयेत् । हृदये पादयोर्वोर्यां द्रवते न कदाचन ॥ ६१ ॥
बकरी और भेड़ीके दूधमें लज्जावल्तीकी जड पीसकर हृदय और चरणोंमें लेप करनेसे पुरुषका वीर्य पतित नहीं होता है ॥ ६१ ॥
मूलं वा इवेतपुङ्खाया: सकशोन्दं नाभिलेपनात् । मधुना पद्मबीजस्य तद्ललेपेन वीर्यध्रुक् ॥ ६२ ॥
इवेत शरफोंकेकी जडमें शहद मिलकार नाभिमें लेप करे तो वीर्य स्तंभित होता है । अथवा शहदमें कमलका बीज मिलाकर लेप करनेसे वीर्य स्तंभित होता है ॥ ६२ ॥
इन्द्रवारुणिकामूलमुनत्ताजस्य मूत्रत: । भावयेत्सप्तवारं तं लिङ्गललेपेन वीर्यध्रुक्॥ ६३ ॥
इन्द्रायणकी जडको उन्मत्त बकरेके मूत्रमें सात वार भावना देकर लिङ्गपर लेप करनेसे वीर्यस्तंभित होता है ॥ ६३ ॥
उन्मत्ताजस्य मूत्रेण पेषयेद्धानरीशिफाम् । लिप्त्वा लिङ्गं नरो वीर्यं चिरकालं न मुञ्चति ॥ ६४ ॥
उन्मत्त बकरेके मूत्रसे जटामांसीको पीसकर ध्वजपर लेप करनेसे मनुष्यका वीर्य चिरकालतक स्वलित नहीं होता है ॥ ६४ ॥
कर्पुरं टङ्कणं सूतं तुल्यं मुनिरसं मधु । मर्दयित्वा लिपेल्लिङ्गं स्थित्वा यामं तथैव च ॥ ६५ ॥
ततः प्रक्षालयेल्लिङ्गं रमेद्रामां यथोचितम् । वीर्यस्तम्भकरं पुंसां सम्यङ्नागार्जुनोदितम् ॥ ६६ ॥
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कपूूर, सुहागा, पारा यह सब बराबर ले अगस्त्यके रस और शहदमेें इनको मिलाकर लिंगपर लेप कर एक पहरतक स्थित रहे, फिर अपने ध्वजको धोकर कान्ताके साथ रमण करे तो पुरुषका वीर्य स्तंभित होता है, यह नागौजुनका कहा है ॥ ६६ ॥
कौसुम्भतलेन विलिप्य पादौ यदृच्छया द॑व्यति वृद्धवोर्ंय: । पुनर्नवाचूण॑विलेपनाच्च जहाति बीजं न कदाचिदेतत् ॥ ६७ ॥
कुसुम्भका तेल पैरोंमें मलनेसे स्वेच्छासेही वीर्यकी वृद्धि होती है और पुनर्नवाके चूर्णके विलेपन करनेसे कदाचित्भी वीर्य स्खलित नहीं होता है ॥ ६७ ॥
कपुरसप्तकमहौषधै: * सार्ं तु बीजं पुरुषस्य नाभौ । विलिप्य कान्ताजघने च कान्ते न लभ्यते शुक्रमध: कदापि ॥ ६८ ॥
कपूर, संपाक और पारा यह नरववीर्यके साथ पुरुषको नाभिमें लेप करनेसे वा स्त्रीकी जंघामें लेप करनेसे कभी वीर्य स्खलित नहीं होता है ॥ ६८ ॥
भूलतासिक्तकं चैव कुसुम्भस्य च तैलकम् । वीर्यं स्तंभयते लेपेन हाटकांडस्य लेपनात् ॥ ६९ ॥
भीूलता और मोम और कुसुम्भका तेल पैरमें लेपनसे वीर्य स्तंभित होता है अथवा चटिकाके अंडेका पैरमें लेप करनेसे वीर्य स्तंभित होता है ॥ ६९ ॥
नवनोतेन युक्ताभ्यां शय्यां पद्ध्रांचां न स्पृशेत् । इलेष्मान्तस्य कुरण्टस्य बीजं कारंजकस्य च ॥
चादॆन्दुबिजम् इति कुथचित् पाठ: ।
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भेडीकसीरेण तं पिष्ट्वा कर्षं भुक्त्वा तु वीर्यधृक् ॥ ७० ॥
पैरोंमें मक्खन मलकर चरणोंसे सेजको स्पर्श न करे, लहसोड़ा, कुरंट (पोली कटसरैया) और करंजके बीज भेड़ीके दूधमें पीसकर एक कर्षमात्र भक्षण करनेसे वीर्य स्तंभित होता है ॥ ७० ॥
सुदर्शनाभवं मूलं ताम्बूलैस्सह पेषयेत् । भक्षत्याज्यं प्रयत्नेन शुक्रस्तम्भनमुत्तमम् ॥ ७१ ॥
सुदर्शनाकी जड ताम्बूलके साथ पीसकर घृतके साथ यत्नसे सेवन करनेसे वीर्य स्तंभित होता है ॥ ७१ ॥
श्वेतार्कतूलकैर्वर्तीद्वीप: सूकरमेदसा । यावज्ज्वलति दीपोऽयं तावद्द्रोंयं न मुञ्चति ॥ ७२ ॥
श्वेत आँकके तूल (रुई) की बत्ती करके सूकरकी चर्बीसे दीपक बालनेसे जबतक दीपक बलता रहेगा तबतक वीर्यपात नहीं होगा७२॥
मूलं वराहक्रान्ताया अजाक्षीरेण पेषयेत् । लिङ्गलेपेन चानेन वीर्यस्तम्भकरं भवेत् ॥ ७३ ॥
वाराहीकन्दकी जड बकरीके दूधसे पीसकर ध्वजपर लेप करनेसे वीर्य स्तंभित होता है ॥ ७३ ॥
पुष्योदृतं श्वेतहयमारमूलं कटोमतटे । बद्धं विम्बुस्वरकरं मुख्त तु च्यवते पुन: ॥ ७४ ॥
पुष्यनक्षत्रमें श्वेत हयमार अर्थात् कनेरकी जड ला कमरके बांधनेसे वीर्यपात नहीं होता है ॥ ७४ ॥
वक्रीरसं तुद्द्र्वगेन पात्रेण ग्राह्येद्रवौ । संपीष्य वटिकां कृत्वा संशोष्य च विनिक्षिपेत् ॥ आत्ममूत्रेण तल्लिप्यं लिङ्गमूलं तु वीर्यधृक् ॥ ७५ ॥
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पर्पटीको लेकर उसका रस रविवारके दिन ग्रहण कर इसको भली प्रकार पीस इसको गोली बनाय सुखाकर रख छोडे, अपने मूत्रसे उसको घिसकर मदन ध्वजके मूलस्थानमें लेप करनेसे वीर्य स्तंभित होता है ॥ ७५ ॥
पूतिकारञ्जबीजं च श्वेतबन्धूकमण्डयोः । मूलं पिष्ट्वा तु लिङ्गाग्रे लेपयेच्चन्दनेनसह ॥ ७६ ॥
तथा करतले दद्याद्रामे बिन्दुः स्थिरो भवेत् ॥ ७७ ॥ पूतीकरंजके, बीज, श्वेतबंधूक और मंड, सोनापाठा इनकी जड चन्दनके साथ मदनध्वजपर लेप करनेसे तथा बाँयें हथेलीमें लेप करनेसे वीर्य स्तंभित होता है ॥ ७६ ॥ ७७ ॥
लज्जालुमलं भटिकां पिष्ट्वा ताम्रस्य भाजने । कृत्वाञ्जनं च तेनाञ्ज्यादर्द्धरात्रं स्थिरो भवेत् ॥ ७८ ॥
लज्जावन्तीकी जड और भटिकाको पीसकर ताम्रपात्रमें घिस अंजन करे तो आधो राततक वीर्य स्थिर होता है ॥ ७८ ॥
कृष्णधूतं महाकालं शनिवारे निनमंत्रयेत् । रविवारे सामानौय चादत्तारमणीकृतैः ॥ ७९ ॥ सूत्रेर्गुणत्रयैर्बद्धं करे वामे प्रयत्नतः । उपविश्यासनेः खण्डत्रयैर्यात्रमत्रयं ततः ॥
बिन्दुः स्थिरत्वमाप्नोति मुक्ते स्वललित तत्क्षणात् ॥ ८०॥ काले धतूरे तथा महाकालत्तालाको शनिवारके दिन निःंंत्रण दे और रविवारके दिन लाकर और कन्यासे सूत कतवाकर तिगुने उस सूत्रके तीन खंड कर वाम हाथमें यत्नसे बांधकर आसनपर तीन पहरतक बैठे तो बराबर वीर्य स्थिर होता है, इसके खोलनेसे मुक्त होता है ॥ ८० ॥
हेम्हालोचनं तुल्यं कृष्णधत्तूरबीजकम् ॥ ८१ ॥
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उपदेश: ४.
हिन्दीटीकासहित
(७९)
वटकक्षीरेण संमर्द्य कुबेराक्षस्य बीजकै:
क्षिप्त्वा तद्वारयेद्कै वीर्यस्तंभकरं भवेत् ॥ ८२ ॥
इति श्रीनित्यानाथ। कामरत्ने शत्रुमुखस्तंभनादिवर्णनं
नामचतुर्थोपदेश: ॥ ८ ॥
(चोक) नागकेशर वंशलोचन और
काले धतूरेके बीज बडके दूधके सहित
करञ्जकै बीज यह सब एकत्र कर मुखमें
धारण करनेसे वीर्य स्तंभित होता है ॥
८१ ॥ ८२ इस यंत्रको मिश्ट रसपान
रससे भृङ्गपत्रपर लिख कपोलमध्यमें
जबतक रख्खे तबतक निश्चित वीर्य स्तंभन होता है ।
तीनों लोकोंको भी स्तंभनवाले दो यंत्र हैं ।
इनसे सब कुञ्छ स्तंभन हो जाता है ।
इस यंत्रको गोरोचनसे भोजपत्रमें
लिख निर्जन स्थानमें स्थापन करे
तो त्रिभुवन स्तंभन हो जाता है
इस यंत्रको हल्दी और हुर-
तालसे भोजपत्रपर लिख
निर्जनमें स्थापन करे
तो त्रिभुवन स्तंभनहो सकता है.
इति श्रीनित्यानाथविरचिते कामरत्ने पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृत-
भाषाटीकायां चतुर्थोपदेश: ॥ ४ ॥
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पञ्चमोपदेशः
अथ मोहनम्
कन्यावरे युवतिसंगमने नराणामालोकने नरपते: क्रयविक्रयादौ । प्रज्ञाविधौ सकलकर्मणि कौतुके वा धूपः सदैव कर्त्तिभिर्विधानियोजनीयः: कन्याके विषयमें ,स्त्रीप्रसंगमें, राजाके देखनेमें प्रज्ञाविधि, सम्पूर्ण कर्म और कौतुक इन्होंमें विद्वानोंकोधूपका प्रयोग सदा करना चाहिये ॥ १ ॥
धूपविधि:
शृङ्गोवचालदसर्ज्जरसमानं कृत्वा तृण्टि मलयजे च षडेव नित्यम् । या धूपयेत्रिजगतां वसनं शरीरं तस्यास्तु काम इव मोहमपत्ति लोकः ॥ २ ॥
काकडासिंगी, वच, उशीर, राल (वृत्ति), छोटी इलायची ये समान भाग लेकर मलयागिरी चन्दनको मिलाकर जो स्त्री अपने घर-वस्त्र और शरीरमें धूप दे तो लोक मोहको प्राप्त हो उसके दासके समान होजाताहै ॥ २ ॥
भृङ्ग-राज: केशराजो लज्जा च सहदेवीका । एभिस्तु तिलकं कृत्वा त्रैलोक्यं मोहयेत्ररः ॥ ३ ॥
भाँगरा, दूसरा भाँगरा, लज्जावन्ती, सहदेई इनका तिलक लगाकर मनुष्य त्रिलोकी को मोहित कर सकता है ॥ ३ ॥
कुङ्कुम गोरोचनसे भृर्ज्जपत्रपर अनामिका रक्तसे इस यंत्रको लिख, देवदत्तके स्थानमें साध्य नाम सहित स्थापनकरे या भुजामें बांधे तो वह मोहित होजाता है ।
त्रिदलं कुसुमं यस्य धत्तूरस्य कृताज्जलि: ।
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उपदेश: ५.
हिन्दीटीकासहित
(८१)
भृङ्गराजेन साज्येन तिलकं मोहयेत्स्त्र: ॥ ४ ॥
त्रिवल (हंसपदो) के तथा धतुरेके
फूल लज्जावन्ती और भृङ्गराज इन
सबोंको घृत मिलाकर तिलक करनेसे
मनुष्य त्रिलोकोको मोह सकता है ॥ ४ ॥
इस यंत्रको लाल द्रव्यसे साध्य नामसहित
लिख मधुमें स्थापन करे तो दुष्ट भी मोहित होजाता है।
तालकं कुनटों चैव भृङ्गपक्षं समंसमम् ।
कृष्णोन्मत्ततस्य कुरुमं वटिकां कार्येद्बुध: ।
तेनैव तिलकं कृत्वा त्रैलोक्यं मोहयेत्स्त्र: ॥ ५ ॥
हरताल, मनशिल और भौंरेके पुष्प यह समस्त भाग लेकर तथा
धतुरेके फल लेकर बनावे, उसोसे तिलक करके मनुष्य त्रिलो-
कीको मोहित कर सकता है ॥ ५ ॥
आदौ सप्तस्वरा ग्राह्यो अन्ते हुंकारसंयुता:
ऊँकारं शिरसि कृत्वा हूं अन्ते फडति न्यसेत् ॥ ६ ॥
मंत्र:-“ॐ अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ऋूं फट् ॥”
अनेनैव तु मन्त्रेण कृत्वा ताम्बूलभावनम् ।
मुखे साध्यस्य निःक्षिप्ते मोहमायाति तत्क्षणात् ॥ ७ ॥
प्रथम सात स्वर उच्चारण कर
अन्तमें हूंकार मिलावे । ॐ कार प्रथम
लगाकर अन्तपदमे फट् लगावे अर्थात्
यह मन्त्र है-“ॐ अं आं इं ईं उं ऊं
ऋं ऋूं फट्” इस मन्त्रसे तांबूलको
भावना देकर साध्यके मुखमें खवावे
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(८२)
तो मोहको प्राप्त होता है देर नहीं लगती॥६॥७॥ इस यंत्रको गोरोचनसे नामसहित भोजपत्रमें लिख पुष्पादिखंडसे पूजनकर स्थापन करे तो वह अवश्य मोहित होजाता है "ॐ भों क्षां भों मोहय २ ॥ ॐ नमो भगवतीपादपंकजपरागेभ्य: ॥" अस्य मन्त्रस्य वारत्रयजपान्मोहप्राप्तिर्जनाः॥८॥
"ॐ भों क्षां भों मोहय २ । ॐ नमोभगवतीपादपंकजपरा- गेभ्य: ।" इस मन्त्रको तीन वार जपनेसे मनुष्य मोहको प्राप्त होता है ॥८॥
शुभामूलं तथा बीजं रक्तचन्दनसंभवम् । तृटिबीजं समं पिष्टवा ताम्बूलादौ प्रयोजयेत् ॥९॥
भोक्तुं देयं स्वहस्तेन मोहमान्नात चर्वर: ॥१०॥ प्रियंगुकि जड़ तथा बीज लाल- चन्दन इलायचीके बीज इनको समान पीसकर तांबूलमें दे और अपने हाथसे खानेको दे तो ईश्वर भी मोहको प्राप्तहोजाता है ॥९॥१०॥
भोजपत्रमें गोरोचनसे साध्यनाम सहित इस यंत्रको लिखकर भुजामें बांधे तो उसका मोह होता है।
*वृश्चिकोद्भवचूर्णेन धूपो मोहयते नु नाम् ॥११॥ मैनफलके चूर्णकी धूप मनुष्योंको मोहित करदेती है ॥११॥
- दुष्टिच्योत्दव ।
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गरलं धूर्त्तपञ्चाङं महिषीशोणितं कणा।
- निशायां कुरुतेऽ मोहं धूपो गुग्गुलुसंयुतः॥ १२ ॥
विष, धूर्त्तरे का पञ्चांग, भैंसका रुधिर, श्वेत जीरा, गुग्गुलसंयुक्त इनको धूप देनेस मनुष्यकां मोहित करतां है तथा शिलाजीत मोहित करतो है॥ १२ ॥
होलनी विषधत्तूरशिखोवष्टाभिरन्चितम्।
तथा धूप: समं भागं मोहयत्येव निश्चितम्॥ १३ ॥
कलिहारी ,विष, धतूरा, मोरकी बीट यह समान भाग ले धूप देनेसे उसो क्षण मनुष्यको मोहित करती है॥ १३ ॥
छच्छुन्दरी सर्पमुण्डं वृश्चिकस्य तु कण्टकम्।
हारिताल समं धूपौ मोहयत् सकलान्तराम्॥ १४ ॥
छछुंदर, सांपका मुंड, बीचूका कांटा और हरिताल यह सब समान भाग ले इनकी धूप देनेसे मनुष्योंको मोहित करती है॥ १४ ॥
× अध: पुष्पीशिखा चैव श्वेतं च गिरिकर्णका।
गोरोचनसमायोगे तिलकं शत्रुमोहनम्॥१५॥
गोभी, कलहारी, श्वेत कितहीवृक्ष और गोरोचन इनका तिलक करनेसे शत्रुको मोहकर सकता है॥ १५ ॥
तालकोन्मत्तबीजानि पाने शत्रोश्च दापयेत्।
तत्क्षणान्मोहमान्नोति चोन्मत्तो जायते नर:॥ १६ ॥
हरताल धतूरेके बीज पानमें शत्रुको देनेसे शत्रु उषो क्षणमें मोहको प्राप्त हो जाता है और उन्मत्त हो जाता है॥ १६ ॥
- शिलायां × अवपीतशिखा इति च पाठ:॥
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समाक्षिकः सिताम्भोजे: स्वस्थः पानाद्रवेतरः ।। १७ ।। शहद मिलाकर कमलका पान करनेसे मनुष्य स्वस्थ होता है ।। १७ ।।
अथ रञ्जनम् तत्र देहरञ्जनम् अत्राऽऽज्ञारागः पुंरेष कार्यः स्त्रियांच संभोगसुखाय गात्रे । तस्मादहं गन्धविधानमादौ विलासिनः सर्व-मुदोरयामि ।। १८ ।। प्रथम देहरंजन कहते हैं—प्रायः स्त्रियोंके सुखके निमित्त पुरुषोंको गात्रे तथा पतियोंके निमित्त स्त्रियोंको अपना देहरंजन करना चाहिये । इस कारण विलासीजनोंके निमित्त गंधादिकायं कथन करता हूं ।।१८।।
हरोतकलोड्र मरिष्टपत्रं सप्तच्छदं दाडिमवल्कलं च । एषोडनुलेपः कथितः कवीन्द्रैः शरीरदौर्ग-न्ध्यहरः प्रलेपः ।। १९ ।। हरड, लोध और नीमके पत्ते, सतौना, डाडिमका, छिलका इन सबका लेप करनेसे शरीरकी दुर्गन्ध दूर होती है । यह प्रयोग विद्वानोंने कहा है ।। १९ ।।
हरोतकी श्रोफलमुस्तचिच्छाफलत्रिकं पूतिकरुज्जबोजम् । कक्षादिदौर्गन्ध्यमपि प्रभूतं विनाशय-त्याशु निदाघकाले ।। २० ।। हरड, नारियलकी जड, मोथा, चिचाफल, त्रिफला, पूतिकरंजके बीज इनका लेप करनेसे गरमोके दिनोंमें बगलमें होनेवाली महादुर्ग-न्धको दूर करता है ।। २० ।।
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उपदेश: ४.) हिन्दीटीकासहित
(८४)
हरीतकीचनन्दनमुस्तनागंरुशीरलोधामयराष्टृतुल्यै: ।
स्त्रीपुंसयोगर्धमजगात्रगन्धं विनाशयत्याशुविलेपनेन॥२१॥
हरड, लालचन्दन, नागरमोथा,नागकेशर, खस, लोध, कुष्ठ, हल्दी यह बरावर लेकर स्त्रीपुरुषोंके शरीरपर मलनेसे पसीनेकी दुर्गन्ध दूर हो जाती है ॥ २१ ॥
कदम्बपत्रं लोधं च अर्जुनस्य तु पुष्पकम् ॥ २२ ॥
पिष्ट्वा गात्रोद्वर्तनाच्च दुर्गन्धचविनाशनम् ॥ २३ ॥
कदम्बके पत्ते, लोध, अर्जुनके फूल पीसकर शरीरमें मलनेसे शारीरिक दुर्गन्ध नष्ट होती है ॥ २२ ॥ २३ ॥
सचनन्दनोशीरकरञ्जपत्रे:* कोलाक्षमज्जागुरुनागयुक्तै: ।
लिप्त्वा शरीरं प्रमदा तु तेन चिरंभसुतं विनिहन्ति गन्धम् ॥ २४ ॥
चन्दन ,उशीर, करञ्जके पत्ते, कोल, बहेड़ेकी मोंगी, अगुरु, नाग केशर यह सब पीसकर शरीरपर मलनेसे बहुत कालकी दुर्गन्धको दूर करते हैं ॥ २४ ॥
सडाडिमत्वक्वड्मधुलोधपत्रै: पिष्टस्समानै: पिचुमर्दपुत्र: ।
विलिप्य गात्रं तरुणी निदाघे दुर्गन्धघर्माम्बुचयं निहन्ति ॥ २५ ॥
दाडिमका वक्कल और मधु लोध पत्त्र इनको समान भाग लेकर नीमके पत्तोंको शरीरमें मलनेसे स्त्रीके पसीनेकी दुर्गन्ध दूर होती है ॥ २५ ॥
सके शरोशीरशिरोषलो धैरचूर्णीकृतैर्फ़विलेपनेन ।
- बालपत्रै:-ऐसा पाठ है, अर्थ नेत्रवाला ।
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ग्रीष्मे नराणां न कदापि देहे घर्मंच्युति: स्या-दिति भोजराज: ॥ २६ ॥
केशर, उशीर, शिरस, लोध इनका चूर्ण कर शरीरपर लेप करनेसे गर्मीमें शरीरसे बहुत पसीना नहीं निकलता है ऐसा भोजराजने कहा है ॥ २६ ॥
तिलसर्षपर्जनीदयदूर्वागोरोचनकुष्ठे:॥ अजमूत्रतक्रपिष्टै रुद्रात्तितमड्मनुपमं भर्वति ॥ २७ ॥
तिल, सरसों, दोनों हलदी, दूर्वा, गोरोचन, कुष्ठ इनको बकरेके मूत्र और मट्ठेके साथ शरीरपर लेप करनेसे मनोहरता होती है ॥ २७ ॥
हरीतकीतोड़दतुल्यभागेर्वनेरुहंस्यापि चतुर्थभाग: । तदर्धभाग: कथितो नखस्य स्यादेष गन्धो मदन-प्रकाश: ॥ २८ ॥
हरड और मोथा यह तुल्य भाग लेकर बनरहका चौथाई भाग ले और इनसे आधा भाग तालमखाना यह मिलाकर लेप करनेसे काम-स्थानकी दुर्गन्ध दूर होती है ॥ २८ ॥
एलायचीपत्रकचन्दनानि तोयाभयाशिगुघनाम-यानि । ससौरभोज्यं सुरराजयोग्य: स्यात: सुगन्धो नरमोह नाख्य: ॥ २९ ॥
इलायची, कचूर, पत्रज, चन्दन, मोथा, हरड, सैंजना, कपूर कुष्ठ यह नरमोहन नामक योग सब प्रकारकी दुर्गन्धको दूर करने-वाला है ॥ २९ ॥
धत्तूरकाश्मीरघनास्बुलोहनिशाकरोशीरसमासिन
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पिष्टवा। लेपः प्रियोडयं सुरमवानामुदीरितः पूर्वकवीन्द्रधीरैः। ३० ।।
धतूरा, केशर, मोथा, नेत्रवाला, लोह, कपूर, उशीर यह सब समान पीसकर इनका लेप करनेसे सबोंकी प्रियता होती है। यह मनुष्य और देवताओंको प्रिय है पूर्व विद्वानोंने कहा है ॥ ३० ॥
उशीरकृष्णागुरुचन्दनानि पत्राम्बुतुल्यानि समानि पिष्टवा। एतानि गात्रेषु विलासिनीनां श्रीखण्डचन्दन तुल्यं प्रकरोति गन्धम् ।। ३१ ।।
उशीर, काला अगर, चन्दन ,तेजपात, नेत्रवाला यह सब समान। पीसकर अंगोंमें लेप करनेसे विलासवती स्त्रियोंके अंगोंमें चन्दनकेसी सुगन्ध होजाती है ॥ ३१ ॥
अथ मुखरंजनम्
रसालजम्बूफलर्गर्भसारः सकर्कटो माक्षिकसंयुतश्च । स्थितो मुखान्ते पुरुषस्य रात्रौ करोति पुंसां मुखवासमिष्टम् ।। ३२ ।।
आम और जामुन दोनोंकी गुठली लेकर काकडासिंगी शहद मिलाकर यह रात्रिके समय मुखमें रख्खे तो बडो दुर्गन्ध नष्ट होकर सुगन्धि होती है ॥ ३२ ॥
गुडतव्गेलानखजातिहितैः स्वर्णान्वितैः क्षुद्रवटी विधेया। ताम्बूलगर्भा दिवसे च रात्रौ करोति पुंसां मुखवाससमिष्टम् ।। ३३ ।।
गुड, दालचीनी, इलायची, नख (गन्धद्रव्य) जायफल, नागकेशर इन्होंमें सुवर्ण वरक मिलाकर इनको क्षुद्रवटी करके रात्रिमें ताम्बूलके साथ खानेसे पुरुषोंके मुखमें सुगन्धि होती है ॥ ३३ ॥
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चूर्णं मुराकेशकुष्ठकानां प्रातर्दिनान्ते परिलेढ़या स्त्री । अप्यद्र्धमासेन मुखस्य गन्धः कर्पुरतुल्यो भवति प्रकामम् ॥ ३४ ॥
जो स्त्री प्रातःकाल और सन्ध्यामें जटामांसी, केशर, कूष्ठ तीनोंको पीस उसका चर्ण चाटती है तो पन्द्रह दिनमें उसके मुखको गन्ध कर्पूरके तुल्य होजाती है ॥ ३४ ॥
यः कुष्ठचूर्णं मधुना घृतेन पिकाक्षबीजान्वितमत्ति नित्यम् । मासैकमात्रेण मुखं तदीयं गन्धायते केतकगन्धतुल्यम् ॥ ३५ ॥
जो कोई तालमखाने सहित कूठका चूर्ण मधु और घृतके साथ नित्य सेवन करता है उसका मुख एक महोनेमें केतकोके गन्धके तुल्य होजाता है ॥ ३५ ॥
गोजलैः स्वथिता पथ्या मिशिकुष्ठकणान्विता । वदनस्या दुरामोदं निहन्ति परिशीलिता ॥ ३६ ॥
गोमूत्रमें हरड पकाकर उसमें सौंफ, कूठ, पीपल डालकर इसका सेवन करनेसे मुखकी दुर्गन्ध दूर होती है ॥ ३६ ॥
तिलं जातोफलं पूगं भक्षयित्वा पिबेदनु । शीततोयं पलाद्र तु आस्यदुर्गन्धनाशनम् ॥ ३७ ॥
तिल, जायफल, सुपारी भक्षण करनेसे इसके पीछे ठंडा जल आधा पल पीनेसे मुखकी दुर्गन्ध नष्ट होती है ॥ ३७ ॥
घृतकाञ्जिकगण्डूषं परितो भक्षयेच्छटोम् । तथाकृते भवेदास्ये दुरामोदविनाशनम् ॥ ३८ ॥
घी, कांजी यह दोनोंका गंडूष (कुल्ला) करे इनके आदि अन्त मध्यमें कचूरका भक्षण करे तो मुखकी दुर्गन्ध नष्ट होती है ॥ ३८ ॥
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गोमूत्रे: क्वाथयेल्कुष्ठं बालकं सहरोतकोम् । सर्वं पिष्टवा वटं कुर्वन्न्मुखबुद्गन्धनाशनम् ॥ ३९ ॥
गोमूत्रमें कुठ, सुगन्धवाला और हरड डालकर क्वाथ बनावे, पीछे सब पीसकर गोली बना मुखमें रखनेसे मुखकी दुर्गन्धका नाश होता है ॥ ३९ ॥
कटुतिक्तकषायेण दन्तकाष्ठेन नित्यशः । दुर्गन्धं हन्ति नो चित्रं क्षौद्रैर्वा कुष्ठचूर्णकम् ॥ ४० ॥
कडवे और तीखे काढे करके अथवा नित्य दतौन करनेसे अथवा शहदके साथ कुठका चूर्ण सेवन करनेसे मुखकी दुर्गन्ध नष्ट होती है इसमें आश्चर्य नहीं है ॥ ४० ॥
मितधातुस्मरिद्वार्थकमारिवानां च युतानां पर- लेपनेन । स्त्रीपुंसयोयोवनयोर्हतं विनाशमा- याति मुखस्थगन्धः ॥ ४? ॥
सैंधा, सरसों, सारिवन, बालचीनी इनको चूर्ण कर लेप करनेसे स्त्री पुरुषोंके मुखारविन्दमें उठा हुआ मुखका दुर्गन्ध दूर हो जाता है ॥४?॥
पिष्टवा मसूरं घनसावरेण मुहुर्मुहुस्तेन विलिप्य वक्त्रम् । नश्यन्ति गण्डा: पिटका: प्ररुढा मासार्धमात्रेण विलासिनीनाम् ॥ ४२ ॥
मसूरको कपूर सरिवनके साथ पीसकर वारंवार उसको स्त्रियोंके मुख पर लेप करनेसे गंड, पिटक (मुहांसे) यह पन्द्रह दिनमेंही नष्ट होजाते हैं ॥ ४२ ॥
यः कण्टकान् शाल्मलिपादपस्य क्षीरेण पिष्ट- वाष्ट- दिनं विलिप्य । गण्डप्रदेहाः पिटकास्त्र्यहेण प्रयान्ति नाशं पुरुषस्य तन्व्याः ॥ ४३ ॥
शाल्मलि वृक्षके काँटेको दूधके साथ पीसकर आठ दिन तक लेप करनेसे स्त्रीके शरीरके गंड और पिटक तीन दिनमें नष्ट होजाते हैं ॥ ४३ ॥
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जो सेमलकेवृक्षके कांटे दूधमें पीसकर स्त्री वा पुरुषके मुखपर आठ दिन लेप करे तो उस स्त्री पुरुषके मुखकी झाईं मुहांसे आदि तीन दिनमें नष्ट होजाते हैं ॥ ४३ ॥
धातुयं वच्चा ∗ सावर्तलवणां पिष्टवा लिप्तेगेन मुखं नितान्तम् । मुखोद्भवा यौवनजा नराणां नश्यन्ति नूनं पिटका: ऋमेण ॥ ४४ ॥
धनियां, वच, सरिवन यह बराबर भाग लेकर इन्हें पीस निरन्तर मुखपर लेप करनेसे निश्चयही मनुष्योंके जवानीके मुहांसे पिटिक दूर हो जाते हैं ॥ ४४ ॥
१ 'शेलज लोधतुल्यम्' भी पाठ है । अर्थ—मनसिल और लोध है । सिद्धार्थबीजद्वितयं तिलं च क्षारेण पिटवा परिलिप्य वक्त्रं । सप्ताहमात्रेण मुखस्थनीलिं निहन्ति कृष्णामिति रन्तिदेव: ॥ ४५ ॥
सरसों और तिल इनको जवाखारके साथ पीसकर मुखपर लेप करनेसे सात दिनमें मुखकी नीलिका–फुन्सी–मुहांसे आदि नष्ट होते हैं, यह रंतिदेवने कहा है ॥ ४५ ॥
निशाद्रयं गैरिकशोणयष्टिरम्भाम्बुमाहेन्द्रयवो- त्माचिन् । निध्ननन्ति नोऽलं त्रयवारमात्राच्चन्द्रेण तुल्यं वदनं भवेच्च ॥ ४६ ॥
दोनों हलदी, गेरू, सोनापाठा, कदली, नेत्रवाला इन्द्रजो यह तीन वार मुखपर लगानेसे मुखकी फुन्सी दूर होती हैं और मुख चन्द्रमाके तुल्य हो जाता है ॥ ४६ ॥
मरिचं रोचनायुक्तं संपेष्य मुखमालिपेत् । तरुण्या: पिटका: सर्वा नश्यन्ति मुखसंभवा: ॥ ४७ ॥
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काली मिरच और गोरोचन पोसकर मुखपर लगानेसे स्त्रीके मुखके जवानीके मुहांसो आदि दूर हो जाते हैं ॥ ४७ ॥
व्यड्डेन्शु चार्जुनत्क्षवा मज्जिष्ठा वा समाक्षिका । एता लिप्तास्त्र्यहं यावद्वेत्पदोपमं मुखम् ॥ ४८ ॥
अर्जुनकी छाल और मञ्जीठका चूर्ण इनको शहदमें मिलाय तीन दिन मुखपर लेप करनेसे मुख कमलसदृश निर्मल हो जाता है ॥ ४८ ॥
मातुलिङ्गटा सर्पिः शिला गोरक्षृतो रसः । मुखकान्तिकरो लेपः पिटकातिलकाल्जित् ॥ ४९ ॥
बिजौरेकी जड, घी, मनसिल, गौके गोवरका रस इनके लेप करनेसे मुखपर कान्ति होती है, पिटका तिल आदि दूर होते हैं ॥ ४९ ॥
रक्तचन्दनमज्जिष्ठाकुष्ठलोधप्रियङ्गुड्वः । वटाड्कुरमसूरारच व्यड्डथना मुखकान्तिदा: ॥ ५० ॥
रक्तचन्दन, मँजीठ, कुष्ठ, लोध, प्रियंगु वटके अंकुर, मसूर इनका लेप मसूरिका व्यङ्गादिको दूर कर मुखपर गन्ध और कान्ति कर-लेवाला है ॥ ५० ॥
मज्जिष्ठा मधुकं द्राक्षा मार्तुलिङ्गं सपिष्टकम् । कर्षप्रमाणैरेतस्तु तैलस्य कुडवं पचेत् ॥ ५१ ॥
अजापयस्तददिगुणं जलैर्मदुद्र्विना पचेत् ॥ ५२ ॥
मँजीठ, मुलेठी, लाख, बिजौरेकी जडको पीस यह एक एक कर्ष प्रमाण लेकर एक कुडव तेलमें पकावे उससे दूना बकरीका दूध लेकर मृदु अग्निमें इन सबको पकावे ॥ ५१ १५२ ॥
नीलिका पिटिका व्यङ्गा अभ्यङ्गादेव नाशयेत् । मुखप्रसन्नेपी हितं नीलकर्कशवर्जितम् ॥ ५३ ॥
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नीलिका, छोटी फुन्सी, व्यंग, (मुहांसे आदि) सब इसके मलनेसे दूर होते हैं, मुख निर्मल होजाता है, कंटकादि नहीं रहते हैं, खुदरापन जाता रहता है ॥ ५३ ॥
सप्तरात्रप्रयोगेण भवेत्काञ्चनसंनिभम् । अत्र द्रिक्तत्त्वाद्वाष्टी मधुकर्षद्धयं तथा ॥ ५४ ॥
सात रातके प्रयोगसे मुख सुवर्णके तुल्य होजाता है मधुको दो वार कहनेसे शहद दो वर्ष लेना चाहिये ॥ ५४ ॥
मनःशिला तथा लोध्रं दिनिनशासर्पपैः समाः । वारिपिष्टो हितो लेपो बदने इ्यामिकां हरेत् ॥ ५५ ॥
मनशिल, लोध, दोनों हलदी, सरसों ये बारबर लेकर जलसे पीस लेप करनेसे मुखकी स्यामता छूट जाती है ॥ ५५ ॥
महिषीक्षीरसंयुक्तं रजनोरक्तचन्दनम् । कृते लेपे निहंत्याशु श्यामिकां वदनाश्रिताम् ॥ ५६ ॥
भैंसके क्षीरसे युक्त दोनों हलदी, लालचन्दन मिलाकर मुखपर लेप करनेसे मुखकी झाँई दूर होती है स्याहीभी जाती रहती है ॥ ५६ ॥
उभे हरिद्रे मञ्जिष्ठा घृतं गौराश्च सर्षपाः । पेष्यं गैरिकसंयुक्तमजाक्षीरेण पाचितम् ॥ ५७ ॥
एतेनैव भवेद्रक्रमुदयादित्यवर्चसम् ।
वचा लोध्रमुशीरं च सर्पिष्सर्जरसंः पयः ॥ ५८ ॥ पीताम्रि वटपत्राणि रजन्या सह पेषयेत् ।
लेपोऽयं मुखपादाभ्यां पद्मवत्कुरुते भृशम् ॥ ५९ ॥ दोनों हलदी, मञ्जीठ, गौका घी, सफेद सरसों, गेरूके साथ इनको पीस कर बकरीके दूधके साथ पकावे, इसके मुखपर सूर्यके समान कांति होती है ।
वच, लोध, उशीर, घृत, राल, दूध, पीले वटके पत्ते, हलदीके साथ पीसकर लेप करना चाहिये ॥
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हलदीके साथ पीसकर मुखपर लेप करनेसे कमलके समान मुख प्रकाशित होता है ॥ ५७-५९ ॥
मसूरान् मधुना साध्य पिष्टवा तैर्मर्दयेन्मुखम् । सप्तरात्रप्रयोगेण पुण्डरीकदलप्रभम् ॥ ६० ॥
मसूर शहदके साथ पीसकर मुखपर मलनेसे सात रात्रिको प्रयोगमें कमलके समान मुख होजाताहै ॥ ६० ॥
इति मुखरञ्जनम् ॥
अथ केशरञ्जनम्
स्त्रीगन्धधूपाम्बरभूषणानां न शोभतेशुक्लशिरोरहाणाम् । यस्मात्ततो मूर्ध्नजरागसेवां कुर्याद्थैवाञ्जनभूषणानाम् ॥ ६१ ॥
माला, गन्ध, धूप, वस्त्र, भूषण ये श्वेत बालवाले पुरुषको शोभित नहीं होते हैं, इस कारण बालोंकी सेवा अवश्य करे जिससे वह अंजन और भौंरेको समान हो जाते हैं ॥६१॥
आत्राण्डेनोत्थितं तैलं कान्तपाषाणचूर्णितम् । काकतुण्डीफलं कृष्णं चूर्ण्ययित्वा प्रयत्नतः ॥ ६२ ॥
धान्यराशौ विनि:क्षिप्य मासोद्भवं शिरसि क्षिपेत् । नस्यं दिनत्रयं तेन केशरञ्जनकं भवेत् ॥
वर्षाद्धं तिष्ठते कृष्णग्रमराज्जनसन्निभम् ॥ ६३ ॥
आमकी गुठलोका तेल और कान्तापाषाणका चूर्ण, काकादनोका फल, लोहचूर्ण यह सब यत्नपूर्वक् चूर्ण करके वा अंकोलका तेल धान्यराशिमें दाबकर एक महीनेके उपरान्त निकाल शिरमें डाले, तीन दिन लेप करनेसे केश काले होजाते हैं । वे बाल छः महीनेतक काले भौंरेके समान रहते हैं ॥ ६२ । ६३ ॥
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त्रिफलालोहचूर्णं तु नीली भृङ्गीसमूलकम् ।। ६४ ।।
एतच्चूर्णमिडामात्रे दिनमेकं विभावयेत् ।
तेनैव मर्दयेच्छीर्षे रज्जते श्रमरोपमम् ।। ६५ ।।
त्रिफला, लोहचूर्ण नीलक पत्ते, भांगरामूल इने सबका चूर्ण बके-
रोकें मूत्रमें एक दिन भावना देकर फिर शिरपर मलनेसे भौरके
समान बाल होजाते हैं ।। ६४-६५ ।।
गुज्जाबीजस्य चूर्णन्तु कुष्ठेलां देवदारकम् ।
तुल्यांशं भावयेच्चूर्ण दिनेकं भृङ्गजद्रवे: ।। ६६ ।।
चूर्णाच्चतुगुणे तैले पाचयेन् मृदुवहिना ।
तेनास्यजटादधना: केशा रज्जनं भ्रमरोपमम् ।। ६७ ।।
चोटलोके बीजोंका चूर्ण, कुष्ठ, एलो, देवदार यह बराबर
लेकर इनके चूर्णकी एक दिन भांगरके रसमें भावना दे, चूर्णसे
चौगुने तेलमें कोमल अग्निसे पकावे । उसके लगानेसे बाल भौरके
समान होजाते हैं ।। ६६-६७ ।।
हस्तिदन्तस्य दग्धस्य समांशोन रसं सम्म् ।
आक्षीरेण तं पिष्ट्वा लेपनात् केशरज्जनम् ।। ६८ ।।
हाथीका दांत जलाकर और इसके समान रस ले बकरीके दूधमें
उसे पोसकर लेप करनेसे बाल काले होते हैं ।। ६८ ।।
त्रिफलालोहचूर्णान्तु इक्शुभृङ्गरसस्तथा ।
कृष्णमृत्तिकया साधं भाण्डे मासं निरोधयेत् ।
तल्लेपाद्रजयेत्केशारचतुर्मासिं स्थिरो भवेत् ।। ६९ ।।
त्रिफला, लोहचूर्ण, ईखका रस, भांगरेका रस इनके आधी काली
मिट्टी एक बर्तनमें एक महीने तक बन्द कर रखे उसके लेप करनेसे
काले बाल होकर चार महोनेतक स्थिर रहते हैं ।। ६९ ।।
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लोहकिट्टं जपापुष्पं पिष्ट्वा धात्रीफलं सम्मृज्य त्रिदिनं लेपयेच्छीर्षं द्विमासं केशरूजनम् ॥ ७० ॥
भृङ्गराजरसप्रस्थं तैलं कृष्णतिलात्समम् । मर्दयेत्प्रहरैकं तु तैलाप्तं नीलिकारसम् । तल्लेपं त्रिदिनं कुर्व्यात्केशरूजनकं भवेत् ॥ ७२ ॥
चूर्ण सज्जयवक्षार सिद्धार्थ चार्नालिकः । नागपुष्पं दिने मध्ये तल्लेपात्केशरूजनम् ॥ ७३ ॥
काकमाचीयबीजानि समं कृष्णतिलांस्सतः । तत्तैलं ग्राहयेद्यन्त्रे तद्यस्येत्केशरूजनम् ॥ ७४ ॥
गोघृतं भृङ्गजद्रवं मयूरशिखया सह । अग्निना मृदुना पाच्यं तं न्यस्येत्केशरूजनम् ॥ ७५ ॥
काकमाचीयबीजानि समं कृष्णतिलांस्सतः ।
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जपापुष्परसं क्षौद्रं कर्षेकं न्यस्यमाचरेत् ॥ सप्ताहं रञ्जयेत्केशान् सर्वन्यस्ये त्वयं विधिः ॥ ७६ ॥
काकमाचीके बीजोंके समान काले तिलके उसमें गुडहरकके फूलोंका रस शहद एक कर्ष डाल, यह एकत्र करके सात दिनतक लगावे तो बालोंको काला रखता है । यह सब न्यस्यकी विधि है ॥७५॥७६॥
त्रिफलालोहचूर्णं तु वारिणा पेषयेल्समम् । द्वयोस्तुल्येन तैलेन पचेम्द्रद्रग्निना क्षणम् ॥ ७७ ॥
तैलतुल्यं भृङ्गरसं यावत्तैलं च पाचयेत् । स्निग्धं भाण्डगतं भूमौ स्थितं मासात्सुद्ररेत् ॥ ७८ ॥
सप्ताहं लेपयेल्लिप्त्वा कदल्याश्च दले शिरः । निर्वाते क्षीरभोजी स्यात्क्षालयेत्रिफलाजले: ॥ ७९ ॥
नित्यमेवं हि कर्तव्यं सप्ताहे रञ्जनं भवेत् । यावज्जीवं न सन्देहः केशाः स्युद्र्धमारोपमा: ॥ ८० ॥
त्रिफला और लोहचूर्ण यह समान ले जलसे पीसे, इन दोनोंके समान तेल लेकर मृदु अग्निसे पकावे और तेलके बराबर भांगरेका रसभी इसमें डाले जब रस जलजाय तेल मात्र रहजाय तब उसे चिकने बर्तनमें भरकर पृथ्वीतलमें गाड दे । एक महीनेसे निकालकर केलेके पत्तेपर लगाय शिरमें सात दिनतक लगावे, निर्वातस्थानमें क्षीरका भोजन पान करे और त्रिफलके जलसे धो डाले । सात दिन ऐसा करनेसे सर्वथा बाल काले हो जाते हैं और निःसन्देह जन्मपर्यन्त केश श्याम रहते हैं ॥ ७७-८० ॥
महाकालस्य बीजानि वाकुचीबीजतसम्मम् ॥ ८१ ॥ चूर्णं द्रवैश्च निर्गुण्डचां भावयेतु चतुर्दिनम् ।
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जपापुष्पद्रवैरेवं ततः पातालयंत्रके । ८२ ।।
तैलं प्राहुं तु तल्लेपे पत्रेरेरंडजेशिरः ।
वेष्टयेत्क्षीरभोजी स्वाद्वातातपविवर्जितः ।। ८३ ।।
एवं सप्तदिनं लेयं तण्डुलान् धारयेत्सुखे ।
कृष्णवर्णाः प्रजायन्ते तथा भवति प्रत्यह्म् ।। ८४ ।।
महाकालके बीज, उसके समान बाकुची, सोमराजीके बीज उसोके समान ले इनको चूर्ण कर चार दिनतक गुडहरके रसकी भावना दे और इस पातालयंत्रसे इसका तेल निकालकर उसके लेप करनेसे अर्थात् एरंडके पत्थोंमें लेप करके शिरपर लेप करनेसे और क्षार ( दूध ) पान करनेसे और वात-धूपका सेवन न करनेसे मुखमें तण्डुल धरके इस प्रकार सात दिनतक बालों पर लेप करनेसे कृष्णवर्ण होजातें हैं ।। ८१-८४ ।।
मोहोयं कर्दमे क्षिप्त्वा षण्मासात्तु समुद्भवेत् ।
तदूदुतं जायते कृष्णं कर्षेकं शिरसि क्षिपेत् ।। ८५ ।।
केशा: कृष्णा: प्रजायन्ते श्रमरोगकुलसनिभा: ।
कपालरंजन ख्यातं यावज्जीवं न संशयः ।। ८६ ।।
वायविडंगको कीचड़में डालकर छः महीनेतक पड़ा रहने दे, उसका एक कर्ष चूर्ण कर शिरमें डालनेसे बाल काले होजातें हैं यानी काले भौंरेके समान हो जाते हैं और जीवनपर्यन्त वैसेही रह जाते हैं इसमें सन्देह नहीं, यह कपालरंजन प्रसिद्ध है ।। ८५ ।। ८६ ।।
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सनीलिकां सैन्धवपिप्पलीभिघृतानुयुक्तैरपलिप्य केशम्। ऋमेण शंखोपममाशु कृष्णं शिरोरुहं मेचकतामुपैति ॥ ८७ ॥
नीलकी जड़, सैंधा, पीपली घृत इनसे बालोंको लेपन करनेसे इवेत बालभी कमसे काले वर्णके हो जाते हैं ॥ ८७ ॥
फ्लान्वितां चूततरःः प्रसूनं पिण्डारकं पाण्डुर-नीलिके वा । प्रस्थप्रमाणं च तिलस्य तेलं पचे-दम्रीभिर्वादितोपदेशः ॥ ८८ ॥
तस्मिरच मध्ये यदि हुंषपक्षः क्षिप्तो भवेमेचकवर्णयुक्तः । पाक-स्तदेवास्य नरैरविधेयः ख्यातं पृथिव्यामपि नीलतेलम् ॥ ८९ ॥
फूलसहित आमके फल, पिंडार, धवईके फूल, नील ये सब लेकर और एक सेर तिलोंका तेल लेकर इसमें यह सब पकावे उसके मध्यमें राजहंसके बाल डालकर देखे जो वह डालतेही कृष्णवर्णके हो जायँ तो उसका पाक यथार्थ जाने और यह पृथ्वीमे नीलतेल नामसे विख्यात है ॥ ८८ ॥ ८९ ॥
एतस्न्निलिप्तं पलितं नराणां शंखावदातं सकलं त्रिरात्रम् । पुष्पं न श्रयासि समानीयुक्तं चिर-भवेदृष्ट इति प्रयोगः ॥ ९० ॥
इसको बालोंपर लगानेसे तीन रात्रिमें इवेत बाल भौरके समान काले हो जाते हैं। यह प्रयोग अच्छी प्रकार देखा हुआ है और सिद्ध है ॥ ९० ॥
शतावरी कृष्णतिलेन युक्ता गोरोचना काकमुखा-
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विधा च । अमोभिरालिप्य पुनः सुकेसान् करोति शुक्लानपि कृष्णवर्णान् ॥ ९१ ॥ शतावरी, काले तिल, गोरोचन, काकमुखा इनको पीस बालोंपर लेप करनेसे शुक्ल बाल काले हो जाते हैं ॥९१॥
मर्दनिकाया रसवल्कसिद्धं तिलोद्रवं तैलमिलं नराणाम् । अकालजातं पलितं सरौक्ष्यं केशस्य कारुष्यमलं निहन्ति ॥ ९२ ॥ नवमल्लिकाका रस निकालकर तिलका तेल डाल कल्क लगानेसे मनुष्योंके अकाले इवेत हुए बाल इयाम हो जाते हैं । बालोंके सब प्रकारके रोग और मल दूर होते हैं ॥९२॥
मुत्थं च सर्षपं चैव ह्य शीरं च तथेव च । हरीतक्याश्च क्वाथेन आमलक्यास्समं ततः ॥ ९३ ॥ केशामूलं समालेप्य मेधतुल्यो भवेत्कच: ॥ ९४ ॥ मोथा, सरसों, उशीर, हरड, आमला इनका क्वाथ करके केशोंकी जडमें लेपन करनेसे बाल मेघके समान काले हो जाते हैं ॥ ९३ ॥९४॥
स्नानीयसुगन्धिद्रव्यम् सूक्ष्मलाजीमूतनखः सचूतः स्वर्णामिसोपत्रकसं- युतैश्च । सौरभ्यकान्ति किल मूर्द्धजानां स्नात्वा नरौ विन्दति सर्वदेव ॥ ९५ ॥ छोटी इलायची, मोथा, उशीर नख (सुगन्धद्रव्य ),आम,नागकेशर, शेफालिका, तेजपात, ढाक इनका चूर्ण करके इनको बालोंमें लगाकर स्नान करनेसे बालोंमें सुगन्ध और कांति होजाती है ॥ ९५ ॥
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स्वर्णाम्बुदेशीरनखींयुतानां पथ्यान्वितानां च विलेपने च । स्नात्वा नरः सौरभमर्द्धमासं वेकल्प-माप्नोति शिरोरुहस्य ॥ ९६ ॥
नागकेसर, मोथा, उशीर, लवङ्ग (सुगन्धद्रव्य), हरड इनका लेपन कर स्नान करनेसे मनुष्योंके शिरमें पन्द्रह दिनतक सुगन्ध आती है ॥ ९६ ॥
पथ्यावसानामलकोऽफलानामजस्तु जोमूत्रसाम-यानाम् । मांसीयुतानां परिलेपनेन स्नात्वा नरः सौगन्धिकान्तिमेति ॥ ९७ ॥
हरडेकी बकली, आमला, मेंढासोंगी, मोथेका रस, कुठ जटामांसीके सहित लेप कर स्नान करे तो सुगन्धि होजाति है ॥९७॥
विडङ्गगन्धोत्पलकल्कयोगाद्गोमूत्रसिद्धं कटुतैल-लमेतत् । अभ्यङ्जयोगेन शिरोरुहाणां यूकादि-लिक्षाप्रचयं निहन्ति ॥ ९८ ॥
वार्याविडंग, गन्धक, कमल इनको पीस गोमूत्रसे सिद्ध कर कडवे तेलमें पकाकर बालोंमें मलनेसे सम्पूर्ण लौखें मरजाति हैं ॥ ९८ ॥
गोमूत्रसारिवामूलं लेपाद्दूकानिवारणम् । पारद भस्मान्विते कृतेऽपि कृष्णघृतूर्जरद्रवः ॥ ९९ ॥
नागवल्लीद्रववर्वापि वस्त्रखण्डं विलेपयेत् । तद्वस्त्रं वेष्टयेन्तौ धार्यं यामत्रयं तथा । यूकाः पतन्ति निर्जरेषं मस्तकात्रात्र संशयः ॥ १०० ॥
गोमूत्र, सरवनकी जड इनका लेप लौखोंको निवारण करता है । काले धतूरेके रसमैं एक निष्क (१०८ रत्तो) पारेको खरल करे और
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उपदेश: ५.
हिन्दीटीकासहित
(१०१)
पानके रसमें मिलाकर वस्त्रपर लपेटकर वह वस्त्र शिरपर लपेटकर तीन पहर शिरपर रखनेसे शिरसे सब लीखें गिर जाती हैं । इसमें सन्देहं नहीं ॥ ९९ ॥ १०० ॥
द्रिनिशानवनोतेन लेपात्मोले: प्रकुण्डनत् ॥ १०१ ॥
बोनों हलदी मक्खनके साथ मिलाकर मलनेसे शिरकी खुजली नष्ट हो जाती है ॥ १०१ ॥
नीलोत्पलं तिलं यष्टिसर्षपा नागकेशरम् । धात्रీఫलं समं पिष्टवा लेपो यूका विनाशक: * ॥ १०२ ॥
नीलकमल ,तिल, मुलेठी, सरसों, नागकेशर, आमलेके साथ पीस- कर लेप करनेसे यह लेप लीखका नाश करनेवाला है ॥ १०२ ॥
निशागन्धकगोमूत्रे विडङ्गं कटुतलकम् । पारदेन समं मर्द्य लेपो यूका विनाशक: ॥ १०३ ॥
हलदी, गंधक, गोमूत्र, वार्ङ्गड, कडवा तेल, पोरेके साथ पीस कर लेप करनेसे लीखोंको दूर करता है ॥ १०३ ॥
लाक्षा भल्लातकं मुस्ता कूटगुलसर्षपा: । विडङ्गेन समं लेपाद्दूमो यूका निवारक: ॥ १०४ ॥
लाख, भिलावा, नागरमोथा, कूठ, गूगल, सरसा, वार्ङ्गड इनके साथ लेप करनेसे लीखें निवारण होजाती हैं ॥ १०४ ॥
बिल्वमूलं सगोमूत्रं लेपाद्यूकाविनाशनम् ॥ १०५ ॥
बेलकी जड गोमूत्र इनका लेप लीखोंका निवारण करनेवाला है ॥ १०५ ॥
तिल प्रमाण संस्थाने वर्णा: केशाम्बराश्रया: । बहुपादा अपादाश्च यूका लिखाश्च नामतः ॥
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अथ केशस्येन्द्रलुप्तादिनिवारणम्।
गुज्जाफलैः क्षौद्रयुक्तैर्विलिप्य शिरःप्रदेशे सकलेन्द्रलुप्तम् । अननेन योगेन सदैव केशा रोहन्ति कृष्णाः कुटिला विशालाः ॥ १०६ ॥
शिरके बाल गिरने लगें इसको इन्द्रलुप्त कहते हैं । चौंटली और शहद पीसकर शिरपर लगानेसे सब प्रकारका इन्द्रलुप्तरोग दूर होजाता है इस योगसे बाल जमकर बडे और कुटिल होजाते हैं ॥ १०६ ॥
मातृदन्ततस्य मसीं विधाय श्वेतार्जनंतुल्यतया सुपिष्टम् । लिप्येदनेनैव महेन्द्रलुप्तं केशाः प्ररोहत्यप हस्तमध्ये ॥ १०७ ॥
हाथोके दांत जलाय उसकी राख कर इसको बराबर रसौत ले बकरीके दूधमें पीस इसका लेप करनेसे हाथोंकी हथेलियोंमें भी बाल जमसकते हैं औरगहको तो क्या कहें ॥ १०७ ॥
कुड्कुं मरिचैस्साद्धं पिष्ट्वा तैलेन लेपयेत् । इन्द्रलुप्तं निहनत्याशु किंवा जम्बीरद्रवैः ॥ १०८ ॥
कुंकुम और कालीमिर्च किंवा जंबीरोके बीजोंका रस इनको तेलके साथ पीसकर लेप करनेसे इन्द्रलुप्तरोग शीघ्र नष्ट होजाता है ॥ १०८ ॥
सुदग्धं हस्तदन्तं तु छागदुग्धं रसाजनम् । पिष्ट्वा लेपात्प्रजायन्ते केशाः करतलेपि ॥ १०९ ॥
दग्ध हुआ हाथोका दांत, बकरीका दूध, रसोत इनको पीसकर हाथमें लेप करनेसे भी बाल जम आते हैं ॥१०९॥
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जातिपुष्पं दलं मूलं कृष्णागोमूत्रपेषितम् । लेपोऽयं सप्तरात्रेण दृढकेशकर: पर: ॥ ११० ॥
चमेलोके फूल, दल, मूल, काली गौके मूत्रमें पीसकर लेप करनेसे सात रात्रिमें दृढ बाल कर देता है ॥ ११० ॥
शृङ्गाट*त्रिफलाभृङ्गीनीलोत्पलमयोरज: । सूक्ष्मं चूर्णं समं कृत्वा पचेतैले चतुर्गुणे । तल्लेपेन दृढा: केशा: कुटिला: सरला अपि ॥ १११ �
सिंघाडा, त्रिफला, भांगरा, नीलकमल, लोहचूर्ण इन सबका चूर्ण कर इसके चौगुना तेल डालकर पकाले, इसका लेप करनेसे बाल कुटिल और सरल हो जाते हैं ॥ १११ ॥
कोटभक्षितकेशं तु स्थानं स्वर्णेन घर्षयेत् ।। यावत्सुतप्ततां याति तावत्लेपमिमं कुरु ॥ ११२ ॥
यदि बालोंको कीट खागया हो तो सुवर्णको वहां घिसे । जबतक वह तपतताको प्राप्त न होजाय तबतक बराबर लेप करता रहे ॥ ११२ ॥
भल्लातकं च बृहती गुज्जामूलफलं तथा । मधुना सह लेपेन वायुकृशराटकप्रणुत् ॥ ११३ ॥
भिलावा, कटेरी, चॉटलोकी जड और फल इनको शहदके साथ पीसकर लेप करे तो इन्दलुप्त दूर करता है ॥ ११३ ॥
भल्लातकं कृष्णतिलं कण्टकारीफलं समम् । पिष्टं तण्डुलतोयेन लेपोऽयं तं विनाशयेत् ॥ ११४ ॥
- भृङ्गाटम् पाठ है । उसका अर्थ——भांगरा है ।
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भिलावा, काले तिल, कटेरीके फल यह समान भाग के चावलके जलसे पीसकर लेप करनेसे इन्द्रलुप्त रोग दूर करता है ॥ ११४ ॥
जपापुष्पैश्च तं हन्यात्रकृष्णागोमूत्रलेपनात् ॥ ११५ ॥
काली गौके मूत्रमें जवाके फूल पीसकर लेपन करें तो भी इन्द्रलुप्त दूर होता है ॥ ११५ ॥
तिलप्रसूनं सह गोक्षुरेण सलावणं गव्यघृतेन पिष्टम् । सप्ताहमात्रेण शिर: प्रलेपाद्वन्ति दीर्घा: प्रचुराश्च केशा: ॥ ११६ ॥
तिलके फूल, गोखरू, लवण, गौके घीसे पीसकर सात दिन लेप करनेसे बाल दीर्घ और बहुत होजाते हैं ॥ ११६ ॥
शाल्मलीतैलमूल्योश्च मूलं पत्त्रसमूद्भवम् । छागदुग्धे समं पिष्टं लेपयेन्मुण्डितं शिर: ॥ त्रिदिनं भक्षयेतच्च केशवर्धनमुत्तमम् ॥ ११७ ॥
सेमल, तालमूली, कमलमूल यह बराबर लेकर बकरीके दूधके साथ पीनेसे यह लेप शिरमुंडित बालोंको हितकारी है और तीन दिन लेप करनेसे उत्तम केशवृद्धि होजाती है ॥ ११७ ॥
अथ केशशुक्लीकरणम्
वज्रीक्षीरेण सप्ताहं तच्चेषं भावयेतिलम् । तत्तैललिप्तता: केशाश्च शुक्ला: स्युस्त्र्र संशय:॥११८॥
थूहरके दूधमें काले तिलोंको सात दिन भावना दे, फिर उस तेलको बालों पर लेप करनेसे नि:सन्देह बाल श्वेत होजाते हैं ॥ ११८ ॥
रोगामलकचूर्णं तु वज्रीक्षीरेण सप्तधा । भावयेततस्य लेपेन शुक्लतां यान्ति मूर्द्धजा: ॥ ११९ ॥
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कूठ और आमलके चूणंको थूहरके दूधसे सात वार भावित करवैसे इसका लेप बालोंके श्वेत करता है ॥ ११६ ॥
अजाक्षीरेण सप्ताहं भावयेदभयाफलम् । तच्चूर्णं सह तेलेन लेपाच्छुक्ला भवन्ति हि ॥ ११९ ॥
इति श्रीनित्यानाथविरचिते कामरत्ने मोहनादिवर्णनं नाम पंचमोपदेशः ॥ ५ ॥
हरडोंको सात दिन बकरीके दूधमें भावना दे उसका चूर्ण कर तेलमें मिलाय बालोंमें लकावे तो बाल श्वेत हों ॥ १२० ॥
इति श्रीनित्यानाथविरचिते कामरत्ने पण्डित ज्वालाप्रसादमिश्रकृत भाषाटीकायां मोहनादिवर्णनं नाम पंचमोपदेशः ॥ ५ ॥
षष्ट उपदेशः
अथ वाजीकरणम् बलेन नारी परितोषमेति न हीनवीीर्यस्य कदापि सौख्यम् । अतो बलार्थं रतिलम्पटस्य वाजोविधानं प्रथमं विधीये ॥ १ ॥
बलीसे स्त्री संतुष्ट होती है, परन्तु हीनवीीर्य पुरुषसे कभी स्त्री संतुष्ट नहीं होती है, इस कारण उन लम्पट पुरुषोंके बलके निमित्त वाजी (पुष्ट) प्रकरण लिखा जाता है ॥ १ ॥
अश्विन्यां वटवृक्षाकं क्षीरं पीतवा महाबलः । पुष्योदृतं पिबेन्मूलं श्वेतार्कस्य प्रयत्नतः ॥ सप्तरात्रं तु गोक्शीरवृद्द्रौदपी तरुणायते ॥ २ ॥
अश्विनी नक्षत्रमें बडका बन्दा दूधके साथ पीसकर पोनेसे बलवान
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होता है। पुष्यनक्षत्रमें उखाड़ी हुई इखेत आकाकी जड़ सात दिनतक गौके दूधके साथ यत्नसे पिये तो वृद्धभी तरुण होजाता है ॥ २ ॥
चूर्णं विदार्या: स्वरसेन तस्या विभावितं भास्कररशिमजालै: । मध्याज्यसंमिश्रितमेव लोहवा दश स्त्रियोगच्छति निर्विशङ्क: ॥ ३ ॥
विदारीकन्दका चूर्ण कर उसौके स्वरसमें भावना दे घूपमें सुलानेसे शहद और घृत मिलाय सेवन कर नि:शङ्क हो दश स्त्रियोंको तृप्त कर सकता है ॥ ३ ॥
भूयो विभाव्यामलकस्य चूर्णं रसन तस्यैव सिताज्यमिश्रम् । सकौद्रमालेढि निशामुखे यो नवान् स वृद्धत्वण्णमति ॥ ४ ॥
आमलेके रसमें आमलोंको भावना देकर उसमें मिश्री और घृत मिलावे, इसे शहदके साथ रात्रिमें पान करनेसे वृद्ध पुरुषभी तरुण होजाता है ॥ ४ ॥
कर्षप्रमाणं मधुकस्य चूर्णं क्षौद्राज्यसंमिश्रितमेव लोह्वा । क्षीरानुपानाद्रमते तु तावत्तरणा- मुद्ररस्य्थमेतत् ॥ ५ ॥
मुलहठीका चूर्ण एक कर्ष लेकर इसमें घृत और शहद मिलाकर वाटनेसे और पीछे दूध पीनेसे मनुष्यमें अधिक सामर्थ्य होजाती है अर्थात् यह जबतक न पचे तबतक रमण कर सकता है ॥ ५ ॥
सितपिकतकबीजं तण्डुला यष्टिकानां सघृतमधु- समेतं प्रत्येकं योजवलेढि । जठरकुहरमध्ये याति पाकं न यावद्रमयति कुषदेहोप्यजनानां समहम् ॥ ६ ॥
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कॉंचके बीज, सांठीके चावल, मुलहठी, न्यूनाधिक घृत और शहद मिलाकर चाटनेसे जबतक यह न पचे तबतक कुश मनुष्य भी स्त्री-योंके साथ रमण करसकता है ॥ ६ ॥
वृद्धशाल्मलिमूलस्य रसं शर्करया पिबेत् । एतत्प्रयोगात्सप्ताहाज्जायते रेतसोज्जबुद्धिः: ॥ ७ ॥
बृद्ध सेमलकी जड़का रस शर्कराके सहित पान करे । इस प्रयो-गसे सात दिनमें मनुष्य वीर्यवान् हो जाता है ॥ ७ ॥
लघुशाल्मलिमूलेन तालमूलीसचूर्णितम् । सर्पिषा पयसा पीत्वा रतौ चटकवद्व्रवेत् ॥ ८ ॥
लघु सेमलकी जड़ और तामूलोका चूर्ण घृतके साथ पान करनेसे रतिमें चटकके तुल्य होजाता है ॥ ८ ॥
घृतेन मासं मसृतानि भूयो सुभावयित्वा रविशो-षितानि । क्षीरेण संसाध्य च भक्षयित्वा स याति नारोशतमुप्रेता: ॥ ९ ॥
फिर घृतके साथ एक महीना इसको प्लावित करके सुखाय दूधसे संभावित कर भक्षण करे तो रतिमें चटकतुल्य हो जाता है सौ स्त्रियोंसे रमण करसकता है ॥ ९ ॥
यो वर्तकाकीलावकिपिञ्जलानां मांसं तथा वेशविह-ड्रमस्य । हव्येन सिद्धं सह सेन्धवेन महाबल: स्यादुपयुज्यमान: ॥ १० ॥
जो वर्त्तक लवा कबूतर ( जंगली चिडिया ) पक्षीका मांस में (हव्य) घृत डालकर सेधेके साथ भक्षण करता है उसका बल अधिक बढ़जाता है ॥ १० ॥
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विदारीकल्कलं तु घृतेन पयसा नरः ।
उदुम्बरसमं खादेदृद्धोऽपि तरुणायते ।। ११ ।।
विदारीकल्कके कल्कको घी मिले दूधके साथ एक तोला पान करनेसे बृद्ध पुरुष भी तरुण हो जाता है ।। ११ ।।
पिप्पलीनां रसोपेतौ बस्ताण्डौ क्षीरसर्पिषा ।
साधितौ भक्ष्येद्यस्तु स गच्छेत्प्रमदाशतम् ।। १२ ।।
बकरेके दोनो अंडकोशोंको प्रथम जलमें उबालकर फिर दूधसे निकाले हुए घीमें भूनकर ऋणुपानके अनुसार उसमें सिंधानिमक और पीपलका चूर्ण मिलाय ऋण क्षण करे तो सौ स्त्रियोंसे रमण कर सकता है ।। १२ ।।
बस्ताण्डसिद्धे पयसि भावितानसकृत्किलान् ।
यः खादेत्नरो गच्छेत्स्त्रीणां शतनपर्ववत ।। १३ ।।
बकरेके ग्रंडकोशको दूधमें औटाकर उस दूधको तिलोंमें बारं-वार भावना दे इनको छायामें सुखाय सेवन करे तो सौ स्त्रियों से रमण कर सकता है ।३।
गोक्षुरकः क्षुरकः शतमूली वानरिनागबलातिबला च ।
चूर्णमिदं पयसा निशि पेयं यस्य गृहे प्रमदाशतमस्ति ।।१४
गोखरू, तालमखाने, शतावर, कौंचके बीज, नागबला, खरैटी इनका चूर्ण दूधके साथ रात्रिमें पान करनेसे, करनेसे सौ स्त्रियों को तृप्त कर सकता है ।। १४ ।।
अश्वत्थफलमूलत्वक् छुज्झासिद्धं पयो नरः ।
स पीतवा शर्कराकौद्रव कलिज्ञ इव हृष्यते ।। १५ ।।
पीपलके फल जड़, छाल और कली इनको ग्रनुमानके अनुसार दूधमें डाल ग्रौटावे । शीतल होनेपर मिश्री, शहद मिलाय तथा बुरा डालकर पीवे तो क़ल्लिंग (चिड़े) के समान प्रसन्न होता है।१५।
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घृतं शतावरोगभं क्षीरेऽ चतुर्गुणे पचेत् । शर्करापिप्पलिक्षौद्रयुक्तं तद्वृश्य मुच्यते ॥ १६ ॥ घृतमें शताबरौका स्वरस मिलाय चौगुने दूधके साथ पकाय उसमें मिश्री, पीपल, शतावरका कल्क डालकर खाय तो पुष्टता होती है ॥ १६ ॥
शतावरोरजःप्रस्थं प्रस्थं गोक्शुरकस्य च । वाराह्या विंशतिपलं गुडूच्याः पञ्चविंशतिः ॥ १७ ॥ भल्लातकानां द्वात्रशचित्रकाणां दशौ तु । तिलानां निस्तुषाणां तु प्रस्थं दद्यात्समूर्छितम् ॥ १८ ॥ त्रिफलस्य पलोन्यष्टौ शर्करायाश्च सप्ततिः । माक्षिकं शर्कराद्रेण माक्षिकाद्रेण वैं घृतम् ॥ १९ ॥ शतावरौसमं देयं विदारौकन्दजं रजः । एतदेकीकृतं चूर्ण स्निग्धभाण्डे निधापयेत् ॥ २० ॥
शतावरका चूर्ण एक सेर, दक्षिणी गोबरूका चूर्ण एक सेर, वाराहीकन्दका चूर्ण एक सेर, सतगिलोय एक सेर नौ छटांक, शुद्ध किये भिलावें दो सेर, चीतेकी छाल ढाई पाव, धोए तिल एक सेर, सोंठ, मिरच, पीपलका चूर्ण प्राधि सेर, मिश्री साढ़े चार सेर इनसे प्राधा शहद और एक सेर दो छटांक घी, शतावरीके समान विदारीकन्दका चूर्ण यह सब बारीक कर मिलाय चिकने बर्तनमें रख छोडे ॥१९-२०॥
पलाद्दयंसमुज्जितं यथेष्टं चास्य भोजनम् । मासैकमुपयोगेन जरां हन्ति रुजामपि ॥ २१ ॥
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वलीपलितखालित्यहेम्पाण्डवाद्यपीनेसानू ।
हुल्यष्टादशकुष्ठानि तथाष्टार्वुदराणि च ॥ २२ ॥
भगन्दरं मूत्रकृच्छ्रं गृध्रसीं हलोऋकमु
क्षयं च वं महाव्याधिं पञ्चकासान् मुदारशूलान् ॥ २३ ॥
अशोथिवातजत्रागांश्चत्वारिंशच्च पञ्चतान् ।
विंशतिसूक्ष्मरोगांश्च संसृष्टान्सात्रिपातिकान् ॥ २४ ॥
सर्वानर्शोघ्नान्हन्याद्वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ २५ ॥
प्रतिदिन दो तोले सेवन कर यथेष्ट भोजन करे तो एक महीनेमे
जरा और होनवीयता नष्ट होती है । वली, शिरके बालोंकाइवेत होना
मूत्रकृच्छू, गृध्रसी, हलोऋककी रोग, क्षय, महाव्याधि, पांच प्रकारकी
दारुण खाँसी, अस्सो वातरोग चोवीस प्रकार-
रोग, सस्रिपातके रोग, बवासीर यह सब ऐसे दूर होजाते हैं जैसे
इन्द्रके वज्रसे वृक्ष नष्ट हो जाते हैं ॥ २१-२५ ॥
सकाञ्चनाभो मृगराजविक्रमसुरैरहिं चाप्यनुयाति
वेगतः । स्त्रियोणां शतं गच्छति सातिरेकं प्रहृष्टपुष्टं
च यथा विहङ्गम् ॥ २६ ॥
तथा सूवर्णके समान शरीर होकर सिंहके समान पराक्रमी, घोडेके
समान कामवेग प्राप्त होता है और यह सौ स्त्रियोंके संग गमन कर-
सकता है तथा विहंग (पक्षी) के समान हृष्ट पुष्ट होता है ॥ २६ ॥
पुत्रान्संजनयेद्द्रीमात्ररसिंहनिभांस्तथा ।
नार्सिंहिमदं चूर्ण सर्वरोगहरं नृणामु ॥ २७ ॥
यह चूर्ण खानेसे मनुष्य नृसिंहके समान कान्तिमान् पुत्रको जन्माता
है । यह नृसिंहचूर्ण मनुष्योंके सब रोग दूर करता है ॥ २७ ॥
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उपदेश: ६.
हिन्दीटीकासहित
( १११ )
मदनमोदक:
त्रैलोक्यविजयपत्रं सबीजं घृतभर्जितम् ।
त्रिकटु त्रिफला कुष्ठंभृङ्गी सैन्धवधान्यकम् ॥२८॥
चव्यं तालिशपत्रं च कट्फलं नागकेशरम् ।
अजमोदा यवानी च यष्टी मधुकमेव च ॥ २९॥
मेथी जोरकयुग्मंच गृहीत्वा समभागतः ।
च्यवन्त्येतानि चूर्णानि तावदेव तदौषधम् ॥ ३०॥
सम शिलातले पिष्ट्वा चूर्णयेदतिचिक्कणम् ।
तावदेव सिता देया यावदायाति बन्धनम् ॥ ३१॥
घृतेन मधुना मिश्रं मोदकं पारिकल्पयेत् ।
घृतभर्जिततिलचूर्णं मोदकोपरि विन्यसेत् ।
त्रिसुगन्धिसमायुक्तं कर्पूरेणाधिवासितम् ।
स्थापयेदघृतभाण्डे तु श्रीमान्मदनमोदकम् ॥ ३२॥
त्रिलोकविजया (भंग) के पत्ते और बीज घृतसे भूनकर उसमें त्रिकटु (सोंठ, मिरच, पीपल), हरडा, बहेड़ा, अमला, कूष्ठ, भांगरा, धनिया, वच, तालीसीकी छाल, कट्फल, नागकेशर, अजमोदा, अजवायन, मुलहट्टी, मधुक, मेथी, कालाजीरा, श्वेतजीरा, ये सब समान भाग लेकर यह सम्पूर्ण औषधी समान शिलापर पीसकर महीन चूर्ण करे । इतनी इसमें मिश्रीकी चाशनी करे जिससे वह बँध जाय तथा इसमें घी और शहद मिलाकर लड़ु बांधे । मोदकके ऊपर घीमें भुने हुए तिलोंका चूर्ण डाले तथा पत्रज, तज, इलायची, कपूरसे अधिवासित करे एवं घृतके बर्तनमें स्थापन करके रखछोडे । २८-३२।
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भक्ष्येत्प्रातरुत्थाय वातश्लेष्मभयापहम् ।
प्रवृद्धमांगिनं कुरते मन्दमांगिन प्रदीपयेत् ॥ ३३ ॥
कृशानामतिरूक्षाणां स्नेहनं स्थौल्यकारणम् ।
कामदं सर्वकामदहनमामधातविनाशनम् ।
सर्वरोगहरं होतत्संग्रहग्रहणोहरणम् ॥ ३५ ॥
एतस्य सतताभ्यासाद्वृद्धोऽपि तरुणायते ।
एतस्य सतताभ्यासाद्वृद्धोऽपि तरुणायते ॥ ३६ ॥
यह मदनमोदक प्रातःकालमें उठकर खानेसे कफका भय दूर होता है । बढ़ो हुई अग्निको सम और मन्दाग्निको बढाता है । कृश, अत्यन्त रूखे पुरुषोंके स्थूल और स्नेहन करता है । कास, शूल, आमवातका नाशक है । सम्पूर्ण रोग तथा संग्रहणी रोगको यह हरण करता है । निरन्तर इसके सेवन करनेसे वृद्धभी तरुण होता है ॥३३-३६
ब्रह्मणश्च मुखाच्छुत्वा वासुदेवे जगत्पतौ ।
एष कामस्य वृद्ध्यर्थ नारदेन प्रकाशितः ।
येन लैकैर्वसत्रीणामरन्स्त यदुनन्दनः ॥ ३७ ॥
ब्रह्माके मुखसे श्रवण कर वासुदेव जगत्पतिसे यह कामकी वृद्धिके अर्थ नादरजाने कथन किया है; जिसके कारण यदुनन्दन सैकडों स्त्रियोंसे रमण करते थे ॥ ३७ ॥
कामकलारसः
मृतसूताभ्रकं स्वर्णवाजिगन्धावचारसः ।
मुशली कदलीकन्दद्रवैश्च मर्दयेदिन्दुम् ॥ ३८ ॥
लाक्षालघुपुटे: पच्यान्मर्दयेत्पूर्ववद्द्रवैः ।
पुटं देयं पुनर्मर्द्यमेवमष्टपुटैः पचेत् ॥ ३९ ॥
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उपदेश: ६.
हिन्दीटीकासहित
( ११३ )
शाल्मलीजातनियर्मैश्चतुर्मासांस्तु भक्षयेत् । गोदुग्धं मर्कटीबीजं; पलाद्रं पाचयेद्नु ॥ ४० ॥
शुद्ध पारद, शुद्ध सुवर्ण, असगंध, वचके रसमें खरल कर इसमें मुशली, कदलीकरदका चूर्ण डालकर एक दिन खरल करे । लाखको लघुपुट देकर इसको फिर खरल करता रहे और लक्षā जलके आठ पुट देकर इसको पकावे । सेमलके उत्पन्न हुए गोंदसे चार महीने भक्षण गरे और गौका दूध, कौंचके बीज आधे पल डालकर पकावे ॥ ३८-४० ॥
रस: कामकलाख्योयं रमते स्त्रीसहस्रकै: । सर्वाङ्गोद्र्त्तनं कुयल्स्वरसे: शाल्मलीरसै: ॥ ४१ ॥
यह कामकलानामक रस है । इसके सेवनके मनुष्य सहल स्त्रियों्से रमण कर सकता है । सर्वाङ्गमें सेमलके स्वरसको मले तो पुरुषके कामबल बढ जाता है ॥ ४१ ॥
शुद्धसूतसमं गन्धं इयंह कल्लारजैद्रवै: । मर्दितं वालुकायन्त्रे यामं संपूटगं पचेत् ॥ ४२ ॥ रक्तागास्त्यद्रवैर्ाभियं दिनमेकमिव द्रुतम् । यथेष्टं भक्षयेच्चाहं कामयेत्कामिनीगतम् ॥ ४३ ॥
शुद्ध पारद उसके बराबर शोधी गन्धक तीन दिन इबेतकमलके साथ खरल करके वालेकायन्त्रमें एक पहर संपूट कर आंच दे और फिर निकालकर एक दिन लाल अगस्त्यके रसकी भावना दे, इसको सेवनकर यथेष्ट अन्न भक्षण करे तो सौ स्त्रियों्से रमण कर सकता है ॥ ४२ ॥ ४३ ॥
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अनङ्गसुन्दरीवटिका
पलद्वयं दृश्यं पारदं गन्धकं तथा । मृतहेम्नस्तु कर्षकं पलैकं च मृताष्टकम् ॥ ४४ ॥
मृत्ताताम्रं चतुर्निष्क सर्व पंचामृतोद्दनम् । रुद्रैर्गजपुटैः पच्यादिनैकान्ते समुद्रहेत् ॥ ४५ ॥
पिष्टवा पंचामृतैः कुर्याद्वटिकां बदराकृतिम् ।
अनङ्गसुन्दरीं खादेद्रमेद्रामाशनत्रयम् ॥ ४६ ॥
दो पल शुद्ध पारद, दो पल शुद्ध गन्धक, शुद्ध सोना एक कर्ष, शुद्ध अञ्जन एक पल, फूंका हुआ तांबा चार निष्क (६४ मासे) इन सबोंको पंचामृतसे खरल करके ग्यारह दिन पीछे * गजपुटमें रखकर एक दिनकी आंच देकर फिर इसकी फूंका दे, इसका निकालकर पंचामृतसे पीसे बेरकी बराबर इसकी गोली बनावे, यह अनङ्गसुन्दरी नामक वटी सेवन करनेसे तीन सौ स्त्रियोंसे रमण कर सकता है ॥ ४४-४६॥
शाल्मलीमूल चूर्ण तु भृङ्गराजस्य मूलकम् । पलैकं सितया चान्नं भक्षयेत्कामयेच्छतम् ॥ ४७ ॥
सेमलकी जडका चूर्ण, भांगरेकी जड इनका चूर्ण कर इसमें एक पल मिश्री डालकर खाय तो सौ स्त्रियोंके गमन कर सकता है ॥ ४७ ।
महाकामेश्वररसः
सूतपादे ताम्रचूर्णं खल्वे पिष्टं प्रकारयेत् । निक्षिप्य कदलीकन्दे पुनर्लेप्यं च गोमयैः ॥ ४८ ॥
पारा चौथाई भाग और तांबा इनको ले चूर्णकर केलेकी जडमें खरल करे फिर इनका गोला कर गोबरसे लपेट सुखाले ॥४८॥
- सवा हाथके बराबर चौकोर गढेमें पांच सौ अरने उपलोंकी अग्निसे पुट देना ।
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शुष्कं गजपुटे: पच्याततथा कन्दे पुन: क्षिपेत्। एवं सप्तपुटे: पच्यातकन्दे: कन्दं पृथकपृथक् ॥ ४९ ॥
द्रव्या तत्र घृतं चूर्णं वस्त्रे बद्धवा तु पाचयेत्। दोलायंत्रे च संयुक्तं छागादुग्धे पुन: पचत् ॥ ५० ॥
सुखाकर गजपुटसे फूंकदे फिर निकाल केलेकी दोलायंत्र कन्दमें भावना देकर फूंकदे, इस प्रकार सातवार पृथक पृथक् भावना दे और घृत मिलाय फिर वस्त्रकी कप-रोटी लगा सुखाय फिर कपड़ौटी चढावे, फिर दोला-यन्त्रमें विद्ध कर बकरीके दूधसे पाक करे ॥४९-५०॥
गुडूच्याथ शतावरी वानर्या गोक्शुरस्तथा । गजपिप्पलिका लाजा कदल्या कोकिलाक्षकै: ॥ ५१ ॥
सितय पाचयेदेव द्विगुणं लघुवह्निना । उद्धृत्य चूर्णयेत्स्वच्छं भक्षेद्गुज्जाचतुष्टयम् ॥ ५२ ॥
सितायुक्तं सदा सेव्यं महाकामेश्वरो रस: । कामिनीनां सहलैकं क्षोभयेत्निमिषान्तरे ॥ ५३ ॥
गूड़ची, शतावरी, कौंचके बीज, गोखरू, गजपीपल, लाजा (खील), केलाकन्द, तालमखाना इन सबको बराबर ले बारोक करके इनसे दूनी मिश्रीका चासनी कर लघु आंचसे पकावे, उपरोक्त सब औषधी उसमें डाले और उपरके रसभी इसमें डाल दे इस चूर्णको चार चोँटली प्रमाण भक्षण करे, मिश्रीके साथ यह महाक-मेशवर रस सदा सेवन करे तो एक क्षणमें सहव स्त्रियोंको क्षुभित कर सकता है ॥ ५१-५३ ॥ इति महाकामेश्वररस ॥
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गोक्षुरं वानरं बीजं गुडूची गजपिप्पली । कोकिलाक्षस्य बीजानि फलं गुणशातावरी ॥ ५४ ॥ कर्कशाबीजमज्जा च सर्वं तुल्यं विचूर्णयेत् । चूर्णनुतल्पिता सिता योग्या मधुना पिण्डितं लिहेत् । पलाद्धमनुपानं स्यात्किंचित्पेयं गवां पयः ॥ ५५ ॥
गोखरु, कौंचके बीज, गुडूची, गजपीपल, तामलखानके बीज और फल, शतावरी, कर्कशाके बीज और मोँगी यह सब बराबर लेकर चूर्ण करे और चूर्णके तुल्य बराबर मिश्री डालकर शहदके साथ इसकी वटी बनाकर सेवन करे । इसका अनुपान यह है कि इस पर आधे पल को कुछ गौका दूध पीना चाहिये ॥ ५४ ॥ ५५ ॥
मदनोदयरसः शुद्धसूतसस्मं गन्धं रक्तोत्पलदलद्रवैः । याममकं पुनर्गन्धं पूर्वाद्धं विनिक्षिपेत् ॥ ५६ ॥ तद्रवैर्मर्द्धयेच्चाडूं पूर्वगन्धं च मर्दनम् । पूर्वद्रावैदिनैकं तु काचकुप्या निरुध्य च ॥ ५७ ॥ दिनैकं वालुकायन्त्रं पक्वमुद्रू त्य भक्षयेत् । पश्चगुज्जासितासाढं रसोदयं मदनोदयः ॥ ५८ ॥
कोकिलाक्षस्य बीजं च मुसली शर्करासमम् । गवां क्षीरेण तत्पेयः पलाद्धमनुपानकम् ॥ ५९ ॥ शोधा पारद, शोधो गंधक, लाल कमलके दलके रसमे एक पहर तक खरल करे और इस रसको सुखाकर बराबर खरल करे और जब पारद और गंधक सब प्रकारसे ऐक रूप हो जायँ तब इसको ले कांचकी शीशीमें भरकर एक दिनतक वालुकायन्त्रमेंढादे; फिर उतार उतार इसे प्रयोग करे । यह मदनोदय रस पांच चौंटली प्रमाण मिश्रीके
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सहित खाना उचित है । तालमखानेकी बीज और मुसली, शकंरा ये समान भाग ले, आधे पल गौके दूधके साथ इसको पान करे तो पुष्टि होती है, यह मदनोदय रस है ॥ ५६-५९ ॥
कामार्जनायकचूर्णम्
वानरोकोकिलाक्षस्य बोजं ह्याम्रमतीलं सम्म् ।
मूलं गोक्सुरमासाभ्यां शुष्कचूर्णं प्रकल्पयेत् ॥ ६० ॥
चूर्ण तुल्यं मृतं चाञ्रं सर्वतुल्या सिता भवेत् ।
कर्षमेकं गवां क्षीरै: पेयं कामार्ज्नायकम् ॥ ६१ ॥
कौंचके बीज, तालमखानेकी बीज और काले तिल यह समान भाग और गोखरू, उरद इनको पीसकर चूर्ण करले, इस चूर्णमें अनुमानसे शोथा अस्रक डाले इन सबकी तुल्य मिश्री डाले एक कर्ष ( सोलहमासे ) गौके दूधसे इस कामाङ्गनायक चूर्णका पान करे ॥ ६० ॥ ६१ ॥
तैलेन पक्वं चटकं खादेद्दोजनपूर्वत: ।
भोजनान्ते पिबेत्क्षीरं रामाः कामयते शतम् ॥ ६२ ॥
अनुपान-चटक (चिड़िया) के मांसको तेलमें पकाय भोजनसे पहले तथा भोजनके अन्तमें दूध पीवे तो सौ स्त्रियोंसे रमण कर सकता है ॥ ६२ ॥
कामासृतयोग:
अश्वगन्धा वृंहिमूलं शाल्मली च शतावरौ ।
विदारी मुशलीकन्दं कोकिलाक्षस्य बोजकम् ॥ ६३ ॥
तत्तुल्यं वानरोबीजं सुष्टु चूर्ण तु कारयेत् ।
चूर्णतुल्यं मृतं चाञ्रं सर्वतुल्या सिता भवेत् ॥
गवां क्षीरै: पिबेत्कर्षं रमयेत् कामिनीशतम् ॥ ६४ ॥
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अश्वकर्कटमांसं तु भक्षयेच्च पिबेत्पयः । योगः कामामृतः ख्यातो बलायुर्वीर्यवर्द्धकः ॥ ६५ ॥ असगंध, चीतेकी जड़, सेमल, शतावरी, विदारीकंद, मुशाली कंद, तामलखाने और कौंचके बीज इनका चूर्ण करे और चूर्णके अनुसार शुद्ध अभ्रक डाले सबको बराबर मिलावे इन सबको एक कर्ष गौके दूधके साथ लेने से सौ स्त्रियोंसे रमण करसकता है । इन्हीं और केक-डेका मांस भक्षण कर उपरसे दूध पीवे यह कामामृतनामक योग अत्यन्त बल-आयु-वीर्यंका बढानेवाला है ॥ ६३-६५ ॥
धात्रीफलस्य चूर्णं तु भावयेतत्तफलद्रवैः ॥ ६६ ॥ एकाविंशतिवारं तु शोष्यं पेष्यं पुनः पुनः । चूर्णपादं मृतं लोहमध्याज्ये शर्करान्वितम् ॥ ६७ ॥ पलैकं भक्षयेत्सित्यं सिताशकं पिबेदनु । कामयेत्स्त्रियोऽतन्तं नित्यं धात्रीलोहप्रभावतः ॥ ६८ ॥ आंवलेका चूर्ण कर उसमें उश्रीके फलोेंके रसकी भावना देकर सुखावे ऐसे इक्कीस बार भावना देकर सुखाय चूर्ण करे इस चूर्णंसे चौथाई लोभस्म डाले इसमें शहद, घृत, मिश्री डाले इसको प्रतिदिन एक पल खायप मिश्रोसहित उपरसे दूध पीवे । इस धात्रीलोहके प्रभावसे सौ स्त्रियां नित्य इच्छा करसकतींहैं ॥ ६६ - ६८ इति धात्रीलोह
वानरोबीजचूर्णं तु निस्तुषं माषचूर्णितम् । नारिकेलोदकैर्भाव्यं यामान्तं पेषयेत्समम् ॥ ६९ ॥ पिष्टस्य विश्रान्तिशेन मृतमद्रिं नियोजयेत् । तद् तद्वंवतिकाकार्या मध्याज्याभ्यां तु भक्षयेत् ॥ ७० ॥
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पोतवा क्षोरं सितायुक्तं रम्या रामा रमेच्छतम् । सताम्बूलं शतामूलमनुपानं निरन्तरम् ॥ ७१ ॥ कौचके बीजोंका चूर्ण, छिलके रहित उड़दोंका चूर्ण लेकर नारियलके रसकी भावना देकर एक प्रहरके उपरान्त उसको पीसले अच्छे प्रकार उसको पीसकर शुद्ध अभ्रक उसमें डाले इस प्रकार उनकी वटिका करके शहद और घृतके साथ भक्षण करे । इसके ऊपर मिश्री डालकर दूध पीवे तो अनेक स्त्रियोंके साथ रमण कर सकता है इसके ऊपर निरन्तर शतामूलयुक्त ताम्बूल भक्षण करे ॥ ६९-७१ ॥
ऊर्णनाभिभवं बीजं मधुना वह पेषयेत् । तेन नाभिप्रलेपेन बन्धः सद्यो विमुञ्चति ॥ ७२ ॥ मकड़ीके बीजको शहदके साथ नाभिपर लेप करनेसे स्त्रीसे बढ़ हुआ पुरुष शीघ्र मुक्त होता है अर्थात् मैथुनमें समर्थ होता है ॥ ७२ ॥
अन्तरिक्षेण संग्राह्य यत्नाद्वा गुटिकामलम् । तेन लिङ्गप्रलेपेन रमेद्रामाशातं नरः ॥ ७३ ॥ अन्तरिक्षमसे गुटिकामल ले इसका लिङ्गपर लेपकर तो मनुष्य सौ स्त्रियोंसे रमण करसक्ता है ॥ ७३ ॥
कामेश्वररसः सम्यङ्मारितमुषकं कुटफलं कष्ठागरवन्ध्या मेथी मोचरसं विदारमुशली गोक्सूरमिक्षूरकं रंभाकन्दशतावरी ह्याजमुता मार्स्तिला धान्यंकं यष्टी नागबला कचूरमदनं जातोफलं सैन्धवम् ॥७४॥ मार्गीकरटंपृथृङ्भृङ्कटुकं जीरद्रयं चित्रकं नागरं चातुर्जातपुनर्नवा गजकणा ब्राह्मी निशा वासकम् ।
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बीजं मर्कटिशाल्मलं फलत्रिकं चूर्णं समं कल्पयेच्छूणंविजयासितादिगुणितता मध्याज्जयोःपिंडितम्॥७५अच्छी प्रकार शोधा अभ्रक ,शोधा हुआ कटफल, कूठ, अजमोद गिलोय, मेथी, मोचरस, विद्राकंद, मुशली, गोखरू, कोकिलाक्षर्क बीज, कदलीकंद, शतावरी, अतिबला, उडद, तिल, धनियां, असगंध, खिरेंटी, मुलहठी और नागबला, कचूर, सैनफल, जायफल, सेंधा, कस्तूरी, काकडासिंगी, भांगरा, त्रिकटु, दोनों जीरे, तज, पत्रज इलायची, दालचीनी, नागकेशर, पुनर्नवा, गजपीपल, ब्राह्मी, हल्दी, अडूसा, कौंचके बीज, सेमल, त्रिफला इनको बराबर लेकर चूर्ण करे, उस चूर्णके सान भंग, दूनी मिश्री ले इसमें घृत और मधु डालकर इसको वटिका बनाले ॥ ७४ ॥ ७५ ॥
कर्षाद्धं वटिका विलेह्रमथवा सेव्यं मुदा सर्वदा पेयं क्षोरसितानुवीर्यकरने स्तम्भेय्यं कामिनीम् । वामावर्त्तयकरं परं च सुखदं प्रौढाङ्गनाद्राक्षोणं पुष्टिकरं गदक्शयकरं हन्यात्स्थम् सर्वामयम् ॥ ७६ ॥
इसकी आधे कर्षकी वटिका बनावे उसको चाटे अथवा वैसेही सेवन करे इसके ऊपर मिश्री डालकर दूध पीवे तो यह स्त्रिको स्तम्भित कर सकता है यह स्त्रिको वशमें करनेवाला, सुखदायक, प्रौढ स्त्रियोंको प्रेरणा करनेवाला है, क्षीणवीर्यमें पुष्टिका करनेवाली, रोगक्षयकर शोघ्र सब रोगोंका नाशक है ॥ ७६ ॥
काश्वासमहातिसारशमनं मन्दाग्निसंदीपनं अर्शःसंग्रहणीम्रेहनिचय इलेश्मातिरक्तप्रणुत् । नित्यानन्दकरं विशेषकविता वाचां विलासोत्तमं धत्ते सर्वगुणं हठात्स्वदशाध्यायनप्रधानं पुनः ॥ ७७ ॥
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कास इवास मसाआतिसारका शमन करनेवाला, मन्यामिको प्रदीप्त करनेवाला, बवासीर संग्रहणी सब प्रकारसे प्रमेह कफके रोग, रक्त रोगको दूर करता है, नित्य आनन्द करनेवाला, विशेष बुद्धि आदिके गुण देता है. सम्पूर्णगुण इसके प्रभावसे प्राप्त हो जाते हैं ॥ ७७ ॥
अभ्यासेन निहन्ति मृत्युपलितं कामेश्वरो वत्सरात् सर्वेषां हितकारको निगदितः श्रीनित्यनाथेन सः । वृद्धानां मदनोदयोदयकरः पौढाङ्गनासंगमे सिद्धोयं समदृष्टिप्रत्ययकरी राज्ञा सदा सेव्यताम् ॥७८॥
यत्किञ्चन्मधुरस्निग्धं जीवनं बृंहणं गुरु । हर्षणं मनसश्चैव तत्सर्वं वृष्यमुच्यते ॥ नरो वीर्यकरान्योगान्सम्यक् शुद्धो निरामयः । ॥ ७९ ॥
जो कुछ वस्तु मधुर चिकनी है वह जीवनकारक और भारी मनको हर्षण करनेवाली जो वस्तुमात्र है वह सब वृष्य कहाती है, वीर्य कारो पदार्थोंको शुद्ध रोगरहित होकर सेवन करना चाहिये ॥ ७९ ॥
वाजीकरणकालः
आस्पत्ते: प्रकुर्वीत वर्षादूद्भिर्व च षोडशात् । न पूर्वं षोडशाद्र्षात्सप्तत्या: परतो न च ॥ ८० ॥
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सोलह वर्षसे ऊपर ७० वर्षतक इन योगोंको सेवन करे, सोलहसे न्यून और सत्तर वर्षसे श्राधिक इन योगोंको सेवन न करे॥८०॥
आयुःकामो नरः स्त्रीभिःसंयोगं कर्तुम्हन्ति । कल्पेनाद्धवयसो वाजीकरणसेवितः ॥ ८१ ॥
आयुष्मन्तो मन्दजरावपुर्वोयंबलान्विता: । स्थिरोरोपचितमांसास्च भवन्ति स्त्रीषु संयुक्ता: ॥ ८२ ॥
आयुकी कामना करनेवाला मनुष्य स्त्रियोंसे इस प्रकार संयोग करे। वाजीकरणकल्पसे शरीर पुष्ट होजाता है और इसके होनेसे उत्साह और इष्ट वृद्ध होता है, पूर्ण आयुवाले मन्दजर वीर्य बलसे युक्त जो है वे स्थिर और आरोग्य बलसे युक्त हो स्त्रियोंमें आसक्त होते हैं ॥८१॥८२
स्त्रीसंगमकाल:
त्रिभिस्त्रिभिरहोभिरिह च सेवेत प्रमदां नरः । सर्वर्तुषु च ग्रीष्मेषु पक्षात्पक्षाद्रजोदृधः ॥ ८३ ॥
संपूर्ण ऋतुओंमें तीन तीन दिनमें स्त्रियोंको सेवन करे अर्थात् तीसरे दिन स्त्रीका संगम करना उचित है और सबसे अधिक बलकी आवश्यकता हो तो ग्रीष्ममें न्यून प्रसंग करे अर्थात् एक पक्षमें गमन करे ॥८३॥
योगं कृत्वा मुसेव्यं सुभृतमपि पयः शीतलं चाम्बु पीतवा गच्छेत्स्त्री सुरुपां स्मरवरागां कामुक: कामलील: । रत्या हुर्ष: प्रहृष्टो व्यपगतसुरत: सन्ध्ये नित्यनित्यं कान्तासंगाद्वापि ह्यस्कृतदपि नरो धातु बैषम्यमेति ॥ ८४ ॥
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जो बलवर्धक औषधियोंको सेवन नहीं करता वह दुर्बल यह योग सेवन करे, शीतल जलपान करके वा औटाया दूध पीकर कामीजन रुपवती स्त्रीसे गमन करे। यत्नपूर्वक रातके समय प्रेम और धीरतासे सेवन करे। ग्रीष्मकालकी यह विधि है कि, अतिप्रसंग वर्जित करना दिन में एकवार भी स्त्रीसंग करे तो धातुओंकी वैषम्यता हो जाती है॥ ८४ ॥
अन्यथास्त्रीसङ्गे दोषाः
ग्लानिः कम्पोरुदौर्बल्यं धातविन्द्रियबलक्षयः॥ क्षयवृद्धचुपदंशाद्या रोगाश्चातीव दुर्जयाः॥ अकालमरणं चैव भजतः स्त्रियमन्यथा॥ ८५ ॥
शोषकासज्वरार्शिस ह्वासकार्यातिपाण्डुता॥ अतिव्यवायाज्जायन्ते रोगाश्च क्षयकादयः॥ असेवनान्मोहमदौ प्रन्थिरगनेच मादवम्॥ त्यर्जेच्चित्ताद्यशुचितां शोकाद्देशं च मैथुनम्॥ जरायांश्चितया शुक्रं व्याधिभिः कर्मकर्षणात्॥ ८७ ॥
क्षयं गच्छत्यनशनात्स्त्रीणां चैवातिसेवनात्॥ क्षया द्वादशवासाच्छोकस्त्रीदोषदर्शनात्॥ नारोणामवसन्नत्वादवघातादसेवनात्॥ ८८ ॥
शोषरोग, कास, इवास, ज्वर, बवासीर आदि पाण्डुरोग होता है। अति रति करनेसे क्षयादि रोग होजाते हैं। बिना सेवनसे मोह, मद, प्रन्थि आदि तथा अग्निकी मन्दता होती है। मनुष्य चिन्ता, मैथुनका
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ध्यान त्याग दे, जराको चिन्तासे वीर्य क्षीण होता है, व्याधियोंसे और अतिकर्मसे भोजन न करनेसे और स्त्रीके अति सेवन करनेसे क्षय, भय और अविश्वास तथा शोक स्त्रीदोष देखनेसे क्षीणता होती है तथा स्त्रियोंको समीपमें रखनेसे, अभिघातसे असेवनसे, क्षय होता है ॥ ८६-८८ ॥
वाजीकरणयोग्या स्त्री
रूपौवंसौन्दर्यलक्षणैय्या विभूषिता । या वया शिक्षिता या च सा स्त्री बृंघयतमा मता ॥ ८९ ॥
जो यौवनसम्पन्न और सौन्दर्य लक्षणोंसे विभूषित है, जो स्त्री वरो-भूत व शिक्षित है, वह अपने वरमें होनेसे वाजीकरणके योग्य है ८९॥
वाजीकरणयोग्या:
स्त्रीषु धयं गतवतां वृद्धानां चरितश्रिताम् । क्षीणानामल्पशुक्राणां स्त्री क्षीणाच्च ये नरा: ॥ ९० ॥
विलासिनामर्थवतां यौवने बलशालिनाम् । बहुपत्नीवतां नृणां योगा वाजकर हिता: ॥ ९१ ॥
स्त्रियोंने जिसका वीर्य अल्प होगया है, तथा जो वृद्ध हैं अत्यागयी हैं, क्षीण हैं, अल्पवीर्य हैं, और जो मनुष्य स्त्रियोंमें क्षीण हैं, विलासी, अर्थवाले, यौवनवाले पुरुष, बहुत, स्त्रियोंके पतिवाले पुरुषोंको वाजोकरनयोग हितकारक हैं ॥ ९० ॥ ९१ ॥
इति श्रीनित्यानाथविरचिते कामरत्ने पण्डित ज्वालाप्रसादमिश्रकृत-भाषाटीकायां मोहनादिवर्णनं नाम षष्ठोपदेश: ॥ ६ ॥
१ मृगयताम् इति पाठान्तरम् ।
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अथ गाढीकरणम्
तत्र क्षयनिषेध
अत्यन्तमूलकटुतिक्तकषायाम्लं क्षारं च शाकभदिं लवणाधिकं च ।
कामो सदैव रतिनान्विताभिलाषी नो भक्ष्येदिति समस्तजनप्रसिद्ध: ॥ १ ॥
अथ वीर्यगाढोकरण । तहां भक्ष्यनिषेध—अत्यन्त मूल, कडवी,
कसैली, अम्ल, खारी, शाक, खैर, अत्यन्त नमकौन वस्तु इतनी वस्तुओंकी रतिको अभिलाषा करनवाला पुरुष सेवन न करे ॥ १ ॥
प्रौढाङ्गनाया नवसूतिकाया: शृङ्गं वराङ्गं न सुखाय यूनाम् । तस्मान्नरेभेषजतो विधेया गाढी क्रिया मन्थमन्दिरस्य ॥ २ ॥
प्रौढा स्त्री, नवीन प्रसूता स्त्री इनका वरांग शिथिल होजानके कारण युवा पुरुषोंको सुखदायक नहीं होता इस कारण मदनमंदिरका संकोच करना चाहिये ॥ २ ॥
निशाद्रयं पड्कजकेशरञ्च निष्पीडच देवद्रुमतुल्य- भागम् । अननेन लिप्तं मदनातपत्रं प्रयाति संकोच- मलं युवत्या: ॥ ३ ॥
दोनों हल्दी, कमल, केशर, देवदारु इनको तुल्य भाग लेकर काम्मंदिरमें लेप करनेसे संकोच होकर निर्मलता होती है ॥ ३ ॥
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सधातकीपुष्पफलत्रिकेण जम्बूतवचा साररसं घृतेन । लिप्त्वा वराङ्गं मधुकेन तुल्यं वृद्धापि कन्येव भवेत् पुरन्ध्री ॥ ४ ॥
धायके फूल, हरड़, बहेड़ा, आमला, जामुनकी त्वचा, लोहतास, घृत और मुलहठी इनका लेप वारंबार करनेसे वृद्धा स्त्रीभी कन्याके समान होजाती है ॥ ४ ॥
पिकाक्षबीजेन मनोजगेहं विलिप्य योषा नियमं चरन्ती । हूठेन गाढं लभते तद्जं दृष्टं नरेश हठेन योग: ॥ ५ ॥
शिलारस और रुद्राक्षके बीजोंसे काममन्दिरपर लेप कर उक्त नियमको करनेसे अवश्य मदनमन्दिर संचित हो जाता है। यह योग श्रेष्ठ है ॥ ५ ॥
मृणालपत्रं पयसा सुपिष्य वृधा समाड़री गुटिका विघेया । यस्या वराङ्गे निहिता क्षणेन कन्यात्व-मेत्याह स मूलदेव: ॥ ६ ॥
कमलको जड़सहित जलसे पीसके और उसकी गुटिका बनाकर जिसके काममन्दिरमें क्षणमात्रको रखदे वह कन्यावत हो जाती है । ऐसा मूलदेवने कहा है ॥ ६ ॥
इक्ष्वाकुबीजं स्नुहिसारवेण पिष्ट्वा वराङ्गं परिलिप्य तेन । नवप्रसूतापि हूठेन नारी कन्या भवेत् संयमतो न चित्रम् ॥ ७ ॥
कड़वी तुम्बोके बीज, सेहुंडो, सारिवाके साथ पीसकर योनिपर लेप करनेसे नवप्रसूता स्त्रीकाभी कामभवन कन्याके समान हो जाता है ॥ ७ ॥
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इन्दीवरश्याम्रिवचोषणानां तुरङ्गमारासनयामिनी-नाम् । लेपेन नार्या: स्मरसङ्गरन्धं संकोचयत्याशु हठेन योग: ॥ ८ ॥
नीलकमल, कटरी, वच, काली मिरच, कनेर, असन, हलदी ये सब वस्तु लेप करनेसे तत्काल स्त्रीका काममन्दिर संकुचित हो जाता है ॥ ८ ॥
या शृङ्गोपं स्वयमेव पिष्ट्वा विलिपति स्त्री च वराङ्गदेशम् । आहत्य तस्या: कठिनं च गाढं भवेत् चात्रास्ति विचारचर्चा ॥ ९ ॥
वीरबहूटीको पीसकर जो स्त्री रतिमन्दिरपर लेप करती है उतका मदनमन्दिर मदोहर और संकुचित हो जाता है इसमें आश्चर्य नहीं ॥ ९ ॥
मदनकथन सार: क्षौद्रतुल्यैर्वराङ्गं शिथिलितमरपि यस्या: पूरितं भूय एव । भवति कठिनमुच्चै: कर्कशं कामिनीना-मिति निगदति योगं रन्तिदेवो नरेंद्र: ॥ १०
मैनफल, कथानुसार यह बराबर शहद डालकर जो काममन्दिरमें लेप करे तो वह स्थान कर्कश और कठोर होजाताहै, यह योग रन्तिदेव नरेन्द्रने कहा है ॥ १० ॥
अश्वगन्धैलेपैद्योनिं गाढीकरणमुत्तमम् ।
असगंधका योनिपर लेप करे तो योनि गाढी होती है ॥
अथ स्त्रीद्रवणम्
यद्यप्यष्टगुणाधिको निगदित: कामोद्द्नानां सदा नो याति द्रवतां तथापि श्ट्टितिस्त्री कामिनां
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संगमे । तस्माद्दोषजसंप्रयोगविधिनां संक्षेपतो द्रावणं किंचित्पल्लवयामि नीरजदृशां प्रीत्या परं कामिनाम् ॥ ११ ॥
यद्यपि स्त्रियोंको कामदेव आठ गुणा अधिक कहा है तथापि संगममें द्रवीभूत नहीं होती हैं इस कारण संक्षेपसे द्रवीभूत होनेको औषधी कहते हैं, जिसके होनेसे कामिनियोंको परम प्रीति प्राप्त होती है ॥ ११ ॥
सिन्दूरोंच्चाफलमाक्षिकाणि तुल्यानि यस्या मद- नातपत्रे। प्रलिप्य तासां पुरुषप्रसङ्गात्प्रागेव वीर्य- च्युतिमातनोति ॥ १२ ॥
सिंदूर, इमलीका फल, शहद इनको बराबर ले कामध्वजपर लेप कर स्त्रीसे रति करे तो शीघ्रही स्त्री द्रवीभूत हो जाती है ॥ १२ ॥
व्योषं रजः क्षौद्रसमन्वितं वा क्षिप्तं यदि स्वात्मस्मर- यंत्रगेहे । दूता भवेत्सा सहसैव नारी दृष्टः सदयं किल योगराजः ॥ १३ ॥
त्रिकुटेका चूर्ण शहदके साथ रतिस्थानमें डालनसे पुरुषके प्रसंगमें स्त्री बहुत शीघ्र द्रवीभूत हो जाती है । यह योगराज देखा गया है ॥ १३ ॥
सुपक्ववचाच्चाफलघोषमूली गुडं तथा माक्षिक- तुल्यभागम् । अमोभिरालिप्य पुनः सुलिझं बोजं करोत्याशु नितम्बिनी नाम् ॥ १४ ॥
पकके इमलीके फल, मूली, गुड, शहद ये सब वस्तु कामध्वजपर, लेप कर रति करनेसे स्त्री शीघ्र द्रवीभूत होती है ॥ १४ ॥
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सटी कणा क्षौद्रमहेशबोजे: कर्पूरतुल्यैरुपचिल्प्य लिंगम् । शतं नरो य: सविलासिनोनां रेत: प्रपातं कुरुते हठेन ॥ १५ ॥
कबूर पीपल, शहद, पारा, कतूर ये सब कामध्वजपर लेपन करजो पुरुष रति करता है वह सौ स्त्रियोंको द्रवीभूत करसकता है ॥ १५ ॥
पारावतपुरोषं च मधुना सैन्धवैरयुतम् । लिंगस्य लेपनात्तेन स्त्रियों द्रावणमुत्तमम् ॥ १६ ॥
कबूतरकी वीट, शहद, सैंधा ये कामध्वजपर लेपकर रति करनेसे स्त्री द्रवीभूत हो जाती है ॥ १६ ॥
गोक्षुराद्विप्रयामर्ग्धाक्षचूर्ण लिंगालेपनात् । तत्क्षणाद्रवते नारी पद्मपत्रे यथा पय: ॥ १७ ॥
गोखरु, बैंगन और अपामार्गके रसका कामध्वजपर लेप करनेसे उसी क्षण स्त्री ऐसी द्रवीभूत हो जाती है जैसे कमलपत्र- पर जल ॥ १७ ॥
पिप्पली चन्दनं चैव बृहतों पक्वोत्तमिडो । एतैर्लिङ्गप्रलेपेन द्रवेत्नारो न संशय: ॥ १८ ॥
पीपलो, ललचन्दन, कटहलो, पक्की इमली इनका कामध्वजपर लेप करनेसे स्त्री द्रवीभूत होजाती है, इसमें सन्देह नहीं ॥ १८ ॥
अगस्तिपत्रद्रवसंयुक्तेन मध्यवाज्यसंमश्रितकंटकणेन । लिप्त्वा ध्वजं यो रमतेऽत्रनानां स शुक्रमा कर्षीत शीघ्रमेव ॥ १९ ॥
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अगस्तके पत्तोंके रसके सहित उसमें मधु घृत और सुहागा मिला कर जो स्त्रियोंसे रमण करते हैं उनसे बहुत शीघ्र स्त्री द्रवीभूत होती है ॥ १९ ॥
सलोधधत्तूरकपिप्पलोनां क्षुद्रोषणक्षौद्रवीमिश्रितानाम् । लेपेन लिंगस्य करोति रेतइच्योंत विपक्षप्रमदाजनस्य ॥२०॥
लोध, धतूरा, पीपली, कटेहरी, पोपलामूल इनमें शहद मिलाय लेप कर जो रति करता है उससे स्त्री बहुत शीघ्र द्रवीभूत होजाती है ॥ २० ॥
तुरगसिलिमध्ये भावितं क्षेत्रमाषं मरिचमधुकतुल्यां पिप्पलीं पेषयित्वा । परिरमति विलिप्य स्वोयलिङ्गं नरो य: प्रभवति वनितानां कामकल्लोल मान: ॥ २१ ॥
असगंध जलके मध्यमें क्षेत्रमाष (उद्द) मिरच मुसहठीके समान पोपलको पीसकर इसको कामपतत्कापर लेप कर स्त्रीसे विहार करनेसे स्त्री बहुत शीघ्र द्रवीभूत होती है ॥ २१ ॥
बिल्वपुष्पं सुकर्पूरं मुण्डीपुष्पं च पेषितम् । लिङ्गलेपेन रामाणां द्रावो भवति संगमे ॥ २२ ॥
बेलका फूल, कपूर, मुंडीके पुष्प इनको पीसकर कामध्वजपर लेप करनेसे शीघ्र स्त्री द्रवीभूत होती है ॥ २२ ॥
बृहत्फलमूलानि पिप्पल्यो मरिचानि च । मधु रोचनया साध्रं लिङ्गलेपे द्रवन्ति ताः ॥ २३ ॥
कटेहरोके फल और जड़, पीपल, काली मिरच, शहद, गोरोचन ये मिलाय कामध्वजपर लेप कर रमण करनेसे स्त्री द्रवीभूत होती हैं ॥ २३ ॥
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क्षौद्रगंधकलेपेन शिलायुक्तेन तत्फलम् । उपचारपशो रक्तं गृह्णीयादनतरिक्षतः ॥ २४ ॥
तच्छुष्कं चूर्णतं स्थाप्यं पुष्पे रक्ताश्वमारजे । तत्पुष्पं धारयेद्वस्त्र तर्जन्यङ्गुष्ठयोगतः ॥ २५ ॥
आवर्त्य सम्मुखं स्त्रीणां दृष्ट्टमात्रे द्रवन्ति ताः । रहुद, गंधकम नशिलके लेपसे भी कार्य सिद्ध होता है, भेटके पशुका रक्त अन्तरिक्षसंग्रहण कर उसको सुखाय चूर्ण कर लाल कनेरके फूलमें धारणकर उसको वस्त्रमें बांध तर्जनो (अँगूठेके निकटको अँगुली) और अँगठेसे उसको धारण अरे ,स्त्रीक सन्मुख होतेही वह अवश्य द्रवीभूत होजाती है ॥ २४ ॥ २५ ॥
जम्बीरफलमध्ये तु मूलं वृश्चिककण्टकं । क्षिप्त्वा बद्धवा स्त्रियै दद्याद्घाणमात्रे द्रवन्ति ताः॥२६॥
जम्भरी नींबके बीचमें इवेतपुनर्नवाकी जड रखकर बांधकर स्त्रीको दे तो सूंघनेमात्रसे द्रवीभूत होतो है ॥ २६ ॥
आहरेद्वामजडूं तु टिट्टिभस्य तु दक्षिणः॥ २७ ॥
तन्मध्ये प्रक्षिपेद्भूर्ज्जपत्रमोड्कारलेपितं । रक्ताश्वमारपुष्पेण मुखं तस्य निरोधयेत् ।
कर्णोपरि स्थितं तेन दृष्ट्वा स्त्री द्रवति ध्रुवं ॥ २८ ॥
टिट्टिभकी बाई जंघा लाकर शुद्ध करके फिर उसके बीचमें ओंकार लिखाभोजपत्र डाल चारों ओर लेप कर रख्खे और लाल कनेरके फलसे इसका मुख बंद कर दे । उसे चतुरपुरुष कानपर रख्ख लेवे तो देखतेही स्त्री द्रवीभूत होजाती है ॥ २७ ॥ २८॥
जलेन लाज्जलीमूलं पिष्ट्वा हस्ते प्रलেপयेत् । हस्तेन स्त्रीकरस्पर्शो द्रवत्यग्नौ घृतं यथा ॥ २९ ॥
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कलिहारोकी जडको जलसे पीसकर हाथमें लेप कर उस हाथसे छूतेही इस प्रकार स्त्री द्रवीभूत हो जाती है जैसे अग्निसे घृत ॥ २९ ॥
मरिचकनकबीजै: पिप्पलीलोड्रयुक्तै- विमलमध्वुविग्रैर्मनानवो लिप्तालिङ्गी। स्मरतिरतिविलासे कष्टसाध्यां च नारीं समुचितरतिरागां संविदध्यादवरमू ॥ ३० ॥
कालोमिरच, धतूरेके बीज, पीपल, लोध ये सब पीस शहदमें मिलाकर कामध्वजपर लेप करनेसे रतियुद्धमें कठिन स्त्रीभी वशवर्ती पराजित होजाती है ॥ ३० ॥
सर्वेषां द्रव्योगानां मन्त्रराजं शिवोदितम् । जपदष्टोत्तरशतं तत्र योगस्य सिद्धयी ॥ ३१ ॥
इन सब द्रवीभूत होनेके योगोंका एक मन्त्र शिवजीने कहा है जिससे ये योग सिद्ध होते हैं । इस योगकी सिद्धिके निमित्त एक सौ आठ वार मन्त्र जपना चाहिये ॥ ३१ ॥
मन्त्र—“ॐनमो भगवते रुद्राय उड्डामरेश्वराय द्रावय२स्त्रीणां मदं पातय२स्वाहा ॐ ठः” ।।इति।।३२
मन्त्र यह है कि—“ॐ नमो भगवते रुद्राय उड्डामरेश्वराय द्रावय २ स्त्रीणां मदं पातय २ स्वाहा ठः ठः” इति ॥ ३२ ॥
अथ कामध्वजस्थूलोकरनम् दृढीकरणं च
सकुष्ठमातङ्गबलाबलानां वचा श्वग्नधागजपिप्पलोनाम। तुरङ्गश्रोनवनवीतयोगाल्लेपेन लिङ्गं मुसलत्वमेति॥३३॥
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कूठ, पीपल, दोनों खरेटी, वच, असगन्धा, गजपीपल, कनेर, इनका मक्खनके साथ लेप करनेसे ध्वजा मूसलके समान कठोर होती है ॥ ३३ ॥
दिनेदिने यथा होवं सुव्रत: कुर्यात्प्रयत्नत: । तदास्थूलं भवेल्लिङ्गं निश्चितं नात्र संशय: ॥ ३४ ॥
सलोघकार्मोरतुङ्गगन्धा मातङ्गगन्धापरिपाच- तेन । तैलेन वृद्धिं खलु याति लिङ्गं वाराङ्गनालो- कमनोहरं तत् ॥ ३५ ॥
लोध, केशर, असगन्धे पीपल, शिलाजीत इनका तेलमें पकाकर लेप करनेसे ध्वजाकी वृद्धि होती है । यह वेश्याओंको मनोहर है ।
भल्लातकास्थिजलशूकमथाजपत्रमन्त्रविदाह्र मतिमान् सह सैन्धवेन । एतद्विरुद्धबृंहतो- फलतोयपिष्टमालेपनं महिषवृद्धिमलोकृतेङ्ग ॥
स्थूलं महत्तरुरङ्गमत्यमाशु शेफ: करोत्यभिमतं न हि संशयोऽस्ति ॥ ३६ ॥
भिलावेकी मोंगी, शेवाल, कमलपत्र इन तीनोंको जलाकर सेंधा- निमक मिलाय और बडी़ कटेहेरीके साथ जलसे पीसकरके आलेपन करे तो महिषकी सदृश ध्वजा होती है और तुंगके समान ध्वजा हो जाती है और दृढ होतो है इसमें सन्देह नहीं ॥ ३६ ॥
सूतकं मरिचं कुष्ठं नागरं कण्टकारिका ॥ अश्वगन्धा तिलं क्षौद्रं सैन्धवं इवेतसर्षपा: ॥ ३७ ॥
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अपामागेर्वा माषा: पिप्पलीं पेषयेज्जले: । लेपोऽयं कुरते वृद्धिं लिङ्गस्य दृढतां ध्रुवम् । मासमात्रं सदा लिप्त्वा मर्दयेच्च दिवानिशम् ॥ ३८ ॥
पारा, कालिमिर्च, कूट, सोठ, कटेहरी, असगंध, तिल, शहद, सैंधा, श्वेतसरसों, चिरचिटा, जौं, उड़द, पीपल इनको जलके साथ पीसकर लेप करनेसे ध्वजाकी वृद्धि और दृढता होती है, एक महीनेमात्र इसका लेप और मालिश दिन रात करना चाहिये ॥ ३७ ॥ ३८ ॥
वराहवसाया लिङ्गं मधुना सह लेपयेत् । स्थूल दृढं च दीर्घं च मासाल्लिङ्गं प्रजायते ॥ ३९ ॥
सूअरकी चरबी शहदसे मिलाय लेप करनेसे एक महीनेमें ध्वजा स्थूल और दृढ होजाती है ॥ ३९ ॥
अश्वगन्धा वचा कुष्ठं বৃहती च शतावरी । तिलं तैलेन संपक्वं तल्लेप: स्थूललिङ्गकृत् ॥ ४० ॥
असगंध, वच, कूठ, कटेरी, शतावरी, इनको तिलके तेलसे पकाकर लेप करनेसे लिङ्ग स्थूल होता है ॥ ४० ॥
अश्वगंधा वरो कुष्ठं मांसो सिंहोफलान्वितम् । चतुर्गुणेन दुग्धेन तिलतैलं विपाचयेत् । स्तनलिङ्गकर्णपाणिवृद्धिं मांसादितिं ॥ ४१ ॥
असगंध, शतावरी, कूट, जटामांसी, कटेरीके फल इनको चौगुने दूध और तिलकے तेलसे पकावे । इसके सेवनसे स्तन, ध्वज, कान, पाणि आदिकी वृद्धि हो जाती है ॥ ४१ ॥
टडक़णं च महाराष्ट्री जम्बूसूकरतैलकम् । मधुना सह लेपेन लिङ्गं स्याद्मुसलोपमम् ॥ ४२ ॥
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सुहागा, जलपोपाल, जामुन, सूकरका तेल इनको शहदके साथ लेपन करनेसे ध्वजा मूसलके समान होजातो है ॥ ४२ ॥
महिषोनवनोतं च मुशलीचूर्णामिश्रितम् ॥ ४३ ॥
धान्यराशिस्थित भाण्ड सप्ताहाच्च समुद्रतं । तेन प्रलपयेल्लिङ्गं मासेकाद्धर्त्तते ध्रुवम् ॥ ४४ ॥
भैषके मक्खनमें मूसालीका चूर्ण मिलाकर बर्तनमें डाल धान्यमें रख दे, फिर सात दिनमें उघारकर लिङ्गपर एक महीने लेप करनेसे अवश्य ध्वजको वृद्धि होती है ॥४३ ॥ ४४ ॥
मुशली शीतला भक्ष्या लिङ्गवृद्धिकरी मता । मार*णोत्थं कृमिं चैव कण्टकारीफलं जलै: ॥ ४५ ॥
पिष्ट्वा लिङ्गप्रलेपेन स्थूलं भवति निश्चितम् । तद्ुचच मुशली साज्या लेपाद्लिङ्गस्य दाढ़चकृत् ॥ ४६ ॥
मुशली, आरामशीतला खानेसे लिङ्गकी वृद्धि करनेवाली है । धतूरा, लाख, कृमि, कंटहरीके फल इनको जलसे पीसकर लेप करनेसे कामध्वजा अवश्य स्थूल होजातो है । इसी प्रकार मुशाली घृतका लेप ध्वजाकी दृढ़ करता है ॥ ४५ ॥ ४६ ॥
पिप्पलीलवनक्षीरसितालेपोपी दीर्घकृत् । मांसी वाक्षफलं कुष्ठमश्वगंधा शतावरी ।
तैले पक्वा प्रलपेन लिङ्गंस्थौल्यकरं ध्रुवम् ॥ ४७ ॥
पोपाल, सैंधालवण, दूध, मिश्री इनका लेप करनेसे ध्वजा दृढ़ होती है । अथवा जटामांसी, बहेड़ा, कूठ, असगंध, शतावरी इनको तेलमें पकाकर लेप करनेसे ध्वजा स्थूल हो जाती है इसमें सन्देहु नहीं॥४७॥
- वमनोत्थं इति वा पाठ: ।
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रोहितामलस्यपित्तं तु जलौका लाङ्गली सदा । अनेन मर्दयेल्लिङ्गं वर्द्धते मुसलोपमम् ॥ ४८ ॥
रोहू मछलीका पिता, जोक और कलिहारोको ध्वजाकी जडमें मर्दन करनेसे ध्वजा मुसलके समान वृद्धिको प्राप्त होती है । ४८ ।
सूतको ह्यस्वगन्धा च रजनो गजपिप्पली । सितायुक्तं जले: पिष्टवा मासैकं लेपयेतदा ॥ ४९ ॥
अद्भुतं वर्द्धयेल्लिङ्गं योनिकर्णस्तनानिच ॥ ५० ॥
पारा, असगंध, हलदी,गजपोपाल, मिश्री ये सब वस्तु जलके साथ पोसकर एक महीने पर्यन्त लेप करनेसे ध्वजा अद्भुत प्रकारसे बढती है तथा योनि, कान स्तन, बढते हैं ॥ ४९ ॥ ५० ॥
यो मर्कटोश्रृङ्गमज्जालेन श्वालपुच्छकोद: रयने निशायां । पिष्टवा ध्वजं लिम्पति तस्य कामं भवेद्योदण्डमिव क्षणेन ॥ ५१ ॥
जो कौंचकी जडको अजा (मेढ़ांसगी) औषधीके साथ (या बकरीके मूत्रके साथ) पीसकर शयनके समय रात्रिमें लेप करता है उसका मदनध्वज लोहरङ्डके समान होजाता है ॥ ५१ ॥
हयारिपत्नीनवनीतमध्ये वचाबलाभगरसायैश्च । लेपेन लिङ्गं सहसैव पुंसां लोहोपमं स्यादति दृष्टमेतत् ५२
जो मनुष्य भैंसीके मक्खनमें वच, खरेंटी और पारा मिलाय लेपन करे तो तत्काल मदनध्वज लोहरङ्डके समान हो जाता है । यह देखा हुआ योग है ॥ ५२ ॥
कृष्णापराजितामूलं ग्राह्यं खदिरकोलकै: । कृष्णसूत्रै: कांटि बद्धवा उद्द्धलिङ्गं करोति च ॥ ५३ ॥
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कृष्णा, विष्णुक्रान्ताकी जड़, शदिर की फीलकसे ग्रहण कर काले तागेसे कमरमें बांधे तो रतिध्वजको दृढ़ करती है ॥ ५३ ॥
देवदालोरसं धात्री क्षीरपानतस्थिरो ध्वजः ।
इत्येवं सर्वयागानां मन्त्रराजः शिवोदितः ।
अनेन मन्त्रितं शिल्वा मासेकं लेपयेतततः ॥ ५४ ॥
वन्दालोका रस, आमला और दूध पोनेसे ध्वजा स्थिर होती है इस प्रकार इन सब योगोंमें शिवजोका कहा हुआ मन्त्रराज है, इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित कर एक मास पर्यन्त लेपन करे ॥ ५४ ॥
मंत्रराज :-“ॐनमो भगतेॐडामहेश्वराय सर्व प्रसव कुरु स्वाहा ठःठः”॥
मंत्रराज:-“! ॐनमो भगवते उड्डामहेश्वराय सर्व सर्व प्रसव प्रसव कुरु कुरु स्वाहा ठः ठः” ॥
दृढ़ीकरणं तु विनामन्त्रेण कार्यम् ॥ इति लिङ्ग-
स्थौली कारणम् (दृढ़ीकरणम्) ॥
दृढ़ीकरण तो विना मन्त्रसेही करे ॥
इतिलिङ्गस्थौलीकरणम्
अथ स्तनवर्द्धनम्
उत्थापनच
मातृज्कृष्णाप्यधवाजगन्धा वचायुता पर्युषिताम्बुमिश्रा ।
हयारिपल्नोनवनीतयोगात्कुर्वन्ति पोयं कुचकुम्भयुग्मम्॥५५
गजपीपल, असगंध, वचाइन सबोंको मिलाकर भैंसके मक्खनके साथ कुचोंमें लगानेसे ये शोघ्र दोनों स्तनोंको कुम्भके समान दृढ़ करते हैं ॥ ५५ ॥
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तेलं वचादिमकल्कसिद्धं सिद्धार्थजं लेपनतो नितान्तम् । नारोकुचौ चारुतरौ च पोतौ कुय्रादसौ योगवरः प्रदिष्टः ॥ ५६ ॥
वच, दाडिम इनका सरसोंके तेलमें पकाय इनका लेप करनेसे स्त्रीके स्तन अत्यन्त सुन्दर पुष्ट होते हैं, यह प्रयोग बहुत श्रेष्ठ कहा है ॥ ५६ ॥
श्रोपणिकया रसकं तु सिद्धं तिलोद्रवै तेलवरं प्रदिष्टम् । लेपेन वक्षोजयुगे च शौग्रं वृद्धिं प्रयातः पतिते रमण्या: ॥ ५७ ॥
श्रोपण्या (कम्बोजीके) रसमें मिल् कर तेल बना ले इसको होतों उरोजोंपर लगानेसे गिरे हुए भी स्त्रीके कुच उठ आते हैं ॥ ५७ ॥
प्रथमकुसुमकाले नस्ययोगेन पीतं सनियममथवा स्यात्तनुलाम्बो युवत्या: । कुचयुगलस्पोनींक्वापि नो याति पातं कथित इति पुरेवं चक्रदत्तेन योग: ॥ ५८ ॥
शालितण्डुलोदकं कुर्षमात्रं वामदक्षिणा नासाभ्यां नस्यं देयम् ॥
अथवा प्रथम रजोदर्शनके समय युवती चावलोंका जल नस्य योगसे नियमपूर्वक सेवन करे तो किसी समयमेंभी उसके कुचोंकापतन नहीं होता है यह योग चक्रदत्तने कहा है । शालितण्डुलका जल एक कर्ष बाँई दाहिनी नासिकाके छिद्रसे नासलेना चाहिये ॥ ५८ ॥
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*मुण्डीचूर्णं दशणलं तोयैरचतुर्गुणैः पचेत् । अर्द्धशेषं हरेत्क्वाथं स्वाथार्द्ध तिलतैलकम् ॥ ५८ ॥ तैलशेषं पचेतैन नस्यं पानं च कारयेत् । पातितं यौवनं स्त्रियां मासादुत्तिष्ठते ध्रुवम् ॥ ६० ॥ दश पल मुण्डी वा सोंठका चूर्ण लेकर उसे चौगुने जलमें पकावे आधा रहजाय तब इसमें तिलका तेल डालदे जब क्वाथ जलजाय तेलमात्र रसजाय तब उसको नस्य और काममें लावे, इसके गिरे हुये स्त्रीके कुच एक महीनेसे फिर उठ आते हैं ॥५९-६० ॥ श्यामा निशा बला लाजा लवणं क्वाथयेत्समम् । तोये चतुर्गुणे पाच्यं पादशेषं समाहरेत् ॥ ६१ ॥ तिलतलं क्वाथपादं तिलाद्र्ध मोहिषाघृतम् । स्नेहशेषं पचेतैलं नस्येन मासमात्रतः ॥ ६२ ॥ बालास्त्रीवृद्धनारीणां यौवनं कुरुतेऽद्भुतम् । ६३ ॥ प्रियंगु, हलदी, बिरंठी, खील, सैन्ध इनका क्वाथ करके चौगुने पानीमें पकावे जब चौथाई रहजाय तब तिलका तेल उसमें डालकर क्वाथ करे तेलसे आधा भैंसका घी ले और जब रस जल जाय तेलमात्र रह जाय तब एक मासेभर नस्य ले तो बाला स्त्री और वृद्ध स्त्रियोंके यौवन अद्भुत होजाते हैं ॥ ६१-६३ ॥ एरण्डतैलं शकुलस्य तैलं तथामलकस्य रसं गृहीत्वा । संर्द्धयेदूर्ध्वगहस्तकेन तदा स्तनं स्वात्प्रपतितं नवं वै ॥६४॥ एरण्डका तेल, शिलमल्स्यका तेल और बेलका रस इनको ग्रहण कर ऊपर किये हुए हाथसे कुचोंपर मर्दन करनेसे गिरे हुये स्तनभी नवीन होजाते हैं ॥ ६४ ॥
- राण्डो चूर्ण इति वा पाठः ।
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श्रोपर्णोरसकर्काभ्यां तैलं सिद्धं तिलोद्दवम् । तत्तैलं तिलके नापि स्तनस्योपरि दापयत् ॥ ६५ ॥
काठिन्यं वृद्धतां यातः पतितौ चोत्थितौ च तौ । वृद्धायाः कन्यकायाः वा ह्युभयोः पयोधरौ ॥ ६६ ॥
श्रोपर्णो (गंभारी) का, रस ककट वृक्ष और तिलका तेल लेकर पकावे और उसे स्तनपर लगावे तो स्तन कठin और वृद्धको प्राप्त होते हैं और वृद्ध वा कन्याके पयोधर पतित होजाय तो भो वे उठ आते हैं ॥ ६५ ॥ ६६ ॥
श्वेतोबदकुसुमं नित्यं कृष्णधेनुपयोयुतम् । पिष्ट्वा स्तनयुगे देयं भवेत्पीनपयोधरा ॥ ६७ ॥
श्वेत मोथके फलको काली गौके दूधके साथ पीसकर दोनों स्तनों पर लेप करनेसे पुष्ट होजाते हैं ॥ ६७ ॥
वचाश्वगन्धासंयुक्ता चाश्वारीपत्रकं तथा । गजपिप्पलिकायुक्तं सघोऽभिन्रजलेन च ॥ ६८ ॥
पेषयित्वा विधानेन लेपयेत्स्तनमण्डले । नयत्ते तु कदाचिद्ध तात्रतालफलं तथा ॥ ६९ ॥
वच, असगन्ध, असगन्धके पत्ते, गजपीपलके सहित जलसे पीस- कर स्तनमण्डलमें लेप करनेसे स्तन पके हुए ताल फलके समान उन्नत होजाते हैं ॥ ६८ ॥ ६९ ॥
गंभारीपत्रसुरसं तत्समं तिलतैलकम् । समानं जलभागं च दत्त्वा पाकं समाचरेत् ॥ ७० ॥
तैलशेषं परिज्ञाय वस्त्रेण शोधयेत्कुचौ । दिवाप्रलेपनादेव लोहत्वं जायतेद्चिरात् ॥ ७१ ॥
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गंभारौके पत्रका रस, तिलका तेल इनके बराबर जल लेकर पाक करे तब तेलमात्र शेष रहजाय तब वस्त्रसे छानकर स्तनपर लेप करनेसे स्तन लोहेके समान कठोर हो जाते हैं ॥७०-७१॥ इति स्तनवर्द्धनं स्तनोथापनम् ॥ अथ योनिसंस्कार: प्रक्षालयेत्निम्बकषायतोैर्योनिशाय कृष्णागुरुगुगुलूनाम् । धूपेन योनिं निशि धूपयित्वा नारी प्रमोदं विदधाति भर्तु: ॥ ७२ ॥ नीमके काढ़ेसे योनिको धोना चाहिये अथवा नीम, हलदी, घृत, काला अगुरु, गूगल इनकी धूप योनिमें देनेसे स्त्री अपने भर्ताको प्रमोद प्राप्त करती है ॥ ७२ ॥ प्रक्षाल्य निम्बस्य जलेन भूयस्तस्यैव वल्केन विलेपयेच्च । त्यजेच्च रत्याश्चिरकालभूतां गन्धं वरा-ड्नस्य न संशयोत्न ॥ ७३ ॥ नीमके जलसे प्रक्षालन करके और नीमके छालका लेप करनेसे चिरकाल योनिकी दुर्गन्ध नष्ट होती है इसमें सन्देह नहीं ॥ ७३ ॥ लोमशातनविधि: पलाशभस्मोऽन्वत्तालचूर्ण रसभस्मोऽम्भुमिश्रैरुपलिप्य भूय: । कन्दर्पगेहं मृगलोचनानां रोमानि रोहन्ति कदापि नैव ॥ ७४ ॥ ढाककी भस्म, हरतालकी भस्म इन दोनोंको केलेके जलसे पीस लेप करनेसे स्त्रियोंके मदनमन्दिरके रोम कदापि नहीं जमते हैं ॥ ७४ ॥ एक: प्रदेयो हरितालभाग: पञ्च प्रदेया जलजस्य
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भागा:। सवस्तरोभस्मन एव पञ्च प्रीक्ताश्च भागा: कदलीजलर्द्राः।।७५।। संसिद्धपात्रेषु च सप्त-घस्तं कृत्वा स्मरागारविलेप्तं च। रोमानि सर्वाणि विलासिनीनां पुनर्न रोहन्ति कदाचिदेव।।७६।।
हरिताल एक भाग, शंखकीभस्म पांच भाग, सवस्तरह (पिलखन) की भस्म पांच भाग इनको केलेके जलमें अच्छे पात्रमें छानकर उसको सात दिन लेप करने स्त्रियोंके मदनस्थानमें कभी रोम नहीं जमते हैं।।७५-७६।।
रम्भाजलेसप्तदिनं विभाव्य भस्मानि कम्बोर्मसृणानि परचात्। नलেন युक्तानि विलेपनेन रोमानि निर्मूलयति क्षणेन।।७७।।
केलेके जलमें सात दिनतक शंखकी भस्मको भावना दे और नल (खस) तृणसे युक्त कर लेप करनेसे फिर रोम कभी नहीं जमते और क्षणमात्रमें निर्मूल होजाते हैं।।७७।।
तालकं शंखचूर्णं तु मंजिष्ठाभस्मं बिंशुकम् । समभागप्रलेपन रोमखण्डनमुत्तमम्।।७८।।
हरताल, शंखका चूर्ण, मंजीठ, टेसूकी भस्म इनको समान भाग लेकर जलसे लेप करनेसे रोम दूर हो जाते हैं।।७८।।
तालकं शंखचूर्णं तु पिष्ट्वा च क्षारतोयकै: । तेन लिप्तवा कचा घर्मे स्थिते गच्छन्ति तत्क्षणात्।।७९।।
हरताल, शंखका चूर्ण इनको खारी जलसे पीसकर लेप करकेघूपमें स्थित होनेसे बाल उखड़ जाते हैं।।७९।।
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पृगवृक्षस्य पत्रोत्थद्रवै: पिष्ट्वा तु गन्धकम् । तेन लिप्त्वा स्थिते धमे रोमखण्डनमुत्तमम् ॥ ८० ॥
सुपारीके पेडके पत्तोंके रसमें गंधक पीसकर लेप कर धूपमें स्थित होनेसे रोम उड जाते हैं ॥ ८० ॥
नराणां खण्डकेशानां छुच्छुन्दर्याश्च तैलतः । न निर्झान्ति पुनर्लेपात्रिसप्ताहे कृते सति ॥ ८१ ॥
जिनके खण्डकेश होगये हों उनको छुच्छुंदरके तेलको तीन सप्ताहतक लगानेसे बाल नहीं जमते हैं ॥ ८१ ॥
कुसुम्भतैलतप्तानां सप्तवारं तथा गुणम् । कुसुम्भके तेलको तप्त करके सातवार लगानेसे भी यही गुण है ॥ ८२ ॥
सद्योजातस्य महिषीवत्सस्य मलमाहरत् । तलिलप्त्वा वेष्टयेदात्रौ केशान्वातारिपत्रत्रताः ॥ प्रातस्तप्तोदकै: शष्पा: पतंत्यामूलतोऽस्थितता: ॥ ८३ ॥
तत्कालमें उत्पन्न हुए भैंसके बच्चेका गोबर लावे रात्रिमें इसको बालोंपर लेपकर एरण्डके पत्तोंसे ढक देवें फिर प्रात:काल गरम पानीसे धोनेसे बाल जडसे गिरजाते हैं ॥ ८३ ॥
पिप्पलिकानां कृष्णानां स्थूलानां भृङ्गं हरेत् । छायाशुष्कं च तच्चूर्णं पच्चाहं लेपयेत्सदा ॥ पूर्ववत्खण्डकेशानां न पुन: रोहणं भवेत् ॥ ८४ ॥
बडी काली चैँटोके रहनेके स्थानकी मट्टी लाय छायामें सुखावे उसका चूर्ण करले फिर पांच दिन लेप करे तो पूर्वमें खण्ड हुए बाल फिर नहीं जमते हैं ॥८४॥५४॥
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शंखं तालं यवं गुज्जां काञ्जिकैः पेषयेत्सदा ।
लेपात्पतन्ति रोमानि पक्वपत्रमिव द्रुमात् ।
लेपानाद्रन्त केशांशच कटुतेलर्मनःशिला ॥ ८६ ॥
इति श्रीनित्यानाथविरचिते कामरत्ने गाढीकरनादिर्वणनं नाम सप्तमोपदेशः॥
शंखकीभस्म, हरताल, इन्द्रजौ, गुंजा इनको काँचीके साथ सदा पोस इसके लेपसे तथा बालोंपर कडुवा तेल और मनःशिलाका लेप करनेसे बाल गिरजाते हैं । इति लोमशातन ॥ ८६ ॥
इति श्रीनित्यानाथविरचते कामरत्ने पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृत- भाषाटीकायां गाढीकरणादि वर्णनं नाम सप्तमोपदेशः ॥ १ ॥
अष्टमोपदेशः
अथ शण्डीकरणम्
तच्छमनं च
नरो मूत्रयते यत्र कृष्णं तत्र तु वृश्चिकम् ।
निखन्याज्जायते शण्ड उद्धृतेऽ तु पुनः सुखी ॥ १ ॥
जहां मनुष्य मूत्र करता है वहां काला बिच्छू गाड देनेसे नपुंसक हो जाता है फिर उखाडनेसे सुखी होता है ॥१॥
अजामूत्रेण संभाव्यं निशि शड्बिन्दुचूर्णितम् ।
खानपानप्रयोगेण शण्डत्वं जायते नुणाम् ॥ २ ॥
षड्बिन्दुका चूर्ण बकरीके मूत्रमें भावना देकर रात्रिमें खान पानमें प्रयोग करनेसे मनुष्यको नपुंसकता होती है ॥ २ ॥
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तिलगोक्षुरयोश्चूर्णं छागदुग्धेन पाचितम् । शीतलं मधुना युक्तं पिबेत् षण्ढत्वशान्तये ॥ ३ ॥ तिल, गोखरूका चूर्ण, बकरेके दूधमें पकाय शीतल कर शहदके साथ पिये तो षण्ढपन शांत हो जाता है ॥ ३ ॥
जलौकादग्धचूर्णं तु नवनोतेन भक्षितम् । यावज्जीवं न सन्देहः षण्ढत्वं प्राप्तुयान्नरः ॥ ४ ॥ जलौका और कतृणका चूर्ण मक्खनके साथ भक्षण करनेसे मनुष्य जीवनपर्यन्त षंड हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ४ ॥
धत्तूरपुष्पभक्ष्येण पुनः संपद्यते सुखम् ॥ ५ ॥ फिर धतूरेके फूलोंका भक्षण करनेसे सुखी होता है ॥ ५ ॥
यो गोविषाणं पतितं च घृष्ट्वा लिपेदतौ स्वस्य मनोभवास्त्रे । एकांतकं तत्कुरुतेत्थं यपत्र्या नोत्तिष्ठते तामपहाय पत्नीम् ॥ ६ ॥ गिरे हुए गौके सींगको घिसकर रति करनेके समय कामास्त्र (शिश्न) पर लेप करनेसे फिर वह उस स्त्रीको छोड़कर कभी दूसरसे रति नहीं कर सकता है ॥ ६ ॥
अत्युन्नतं चापरगोविषाणं घृष्ट्वा पुनस्तेन विलिप्य लिङ्गम् । प्रयाति भयः प्रकृतं तदङ्गदृष्टो नररेश सदा प्रयोगः ॥ ७ ॥ फिर उससे बड़े दूसरे सींगको घिसकर कामास्त्रपर लेप करनेसे फिर अपनी प्रकृतिको प्राप्त होता है, यह प्रयोग देखा हुआ है ॥ ७ ॥
निशाविचूर्णं घनसारचूर्णं समोकृतं बस्तपयो- वियुक्तम् । भक्तं निपीतं कुरुते निकां नरस्य षण्ढत्वमिति प्रसिद्धम् ॥ ८॥
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हलदीका चूर्ण, कपूरका चूर्ण ये समान भाग लेकर दूधसे पान करनेसे मनुष्यको षंड अर्थात् हिजडा कर देता है,इसमें सन्देह नहीं ॥ ८ ॥
तिलस्य दण्डाविटपस्य चूर्णं प्रसाधित रम्भापयसोद्द्भासनं । सतप्तकं शर्करयावितं च पीत्वा हरेत् षण्डकतामवाप्य ॥ ९ ॥
तिल और नागबलाका चूर्ण करके केलेके रसमे लाक्षा रसके सहित भावित करे, यह आधे महीनेतक शर्कराके साथ पीनेसे षंडपन दूर होजाता है ॥ ९ ॥ इति षंडीकरणं तच्छ्रुतमिच ॥
अथ दुष्टस्त्रीकृतध्वजपातोत्थापनम्
भूमिचम्पकमूलं च सगुवाकं समं तथा । तद्रूक्षणाद् वत्सदयो लिङ्गोत्थानं न संशय: ॥ १० ॥
रक्तशालिमलिमूलं तु शिवं दुर्गा विनायकम् । सम्पूज्य विविधैर्द्रव्यैर्मंत्रै निशि संयतः ॥ ११ ॥
प्रातस्त्वचं हरत्सम्यक् शुष्कं कुर्याच्च चूर्णकम् । घृतेन पेषितं कृत्वा सैन्धवेन सदा रुचि: ॥ १२ ॥
प्रातर्भुक्त्वा च किंचित्तु भोक्तव्यं प्रहरावधि । पतितस्य भवेल्लिङ्गस्योत्थानं नात्र संशय: ॥ १३ ॥
अयोमयं भवेल्लिङ्गं कोद्रवानं विजयेतु । भुईचम्पेको जड़ और सुपारो इनको बराबर लेकर भक्षण करनेसे ध्वजा शीघ्र उत्थित होती है ॥
शिव, दुर्गा और गणेशाको विधिपूर्वक पूजनकर जिटेंद्रिय हो लालसेमलकी मूलको रात्रिमें निमंत्रण कर प्रभातकालमें रक्तसेमलकी छाल लाकर उसे सुखाय चूर्ण करे, उसको पोसकर उसमें घी और सेंधा मिलाकर कुछ प्रभातसमय फिर पतितस्य भवेल्लिङ्गस्योत्थानं नात्र संशय: ॥
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पहरभरके पीछे खाय तो पतित हुई ध्वजा उठेगी तथा लोहेके समान होजायगी इस प्रयोगमें कोडों अन्न न खाय, दुष्ट स्त्रीका प्रयोग दूर होगा ॥ १०-१३ ॥
अथ योनिबन्धन मोक्षणं
पूर्वोऽथं लांगलीमूलं वामपादस्य पांसुकम् । एकत्र कार्येद्दिमान्द्रयेन शुक्रिसंपुटे ॥ लेपयेद्दृढ़बन्धः स्यात्तत्रः प्रक्षाल्य मुच्यते ॥ १४ ॥
पूर्वमें उगो हुई लांगलोकी जडको और (साध्याके) वामचरणकी धूरिको एकत्र कर बुद्धिमान् इन दोनोंसे दो सीपको लेपित करें, इसके लेप करनेसे योनि बन्धन होती है, फिर मट्ठेसे प्रक्षालन करनेसे छूटती है ॥ १४ ॥
ईशानचैलमादाय वामपादस्य पांसुकम् । सन्ध्यायां बन्धयेत्तेन पोटली भगबन्धनी ॥ १५ ॥
ॐ अमुकीभगं बध्नामि विस्फुरय रन्ध्रशोणितम् । मयाकृतं भगबन्धं नास्ति लोके चिकित्सकः ॥ १६ ॥
पतिव्रा पतिमन्त्रो वा येचान्ये भगमर्दका: । सर्वे वै विमुखं यान्ति वर्जयेत्कामुकस्तथा ॥ १७ ॥
ॐ *चिठिचिठखचिटिलचिटिठ:ठ:: प्रयोगद्वयस्यायंमन्त्र: ईशानमन्त्रसे वस्त्र लावे उसमें (साध्याके वामचरणके नीचेको धूरि मिलाकर सन्ध्याके समय पोटली बांधनेसे योनिका बन्धन होता है । "अमुकी भगंबध्नामि विस्फुरय रन्ध्रशोणितम् ॥ मयाकृतं भगबंधनं नास्ति लोके चिकित्सक:।" इत्यादि ऊपर लिखा मन्त्र पढ़े कि, मैंने
ॐ चिट् २ खचिटि ठ: ठ: इति च पाठः ।
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(१४८)
अमुक स्त्रीकी योनिबन्धन की है इससे रन्ध्रशोणित स्कुरना रहित होगा, इस मेरी किये बन्धनका लोकमें कोई चिकित्सा करनेवाला नहीं है, पति वा पतिके मंत्र वा और भगमर्दक चिकित्सा आदि ये संपूर्ण विमुख हो जांयगे, इस कारण कामुक इसमें मौन हैं ॥१॥ अ आ ई ई उ ऊ क प चिठिचिठि खिचिठि२ ठ: ठ: यह दोनों प्रयोगोंका मंत्र है ॥१५-१७॥ इस मंत्रको कुंकुम गोरोचनसे लिख कटमें बांधे तो बन्धन होगा, खोल देनेसे मोक्षरण होगा ।
वचेलाचन्दनक्षोरे: प्रक्षाल्यामर्दये दृढम् । यन्त्रमन्त्रादितन्त्रेण यत्किञ्चच्चछत्रुणा कृतम् ॥ १८ ॥
तत्तस्यैव भवेदेन सिद्धिमन्त्रस्य उच्चते ॥ साप्तभिमन्त्रितं तोयं शुद्धं पूतं पिबेतु यः । तस्य शत्रुकृतो दोष: शत्रुगेहे भविष्यति ॥ १९ ॥
वच, इलायची, चन्दन इनको पीस दूधमें मिलाय योनिको प्रक्षालन मर्दन करे तो यन्त्र मन्त्र तन्त्र जो कुछ शत्रुने किया है वह सब इस सिद्ध प्रयोगको मन्त्रसहित करनेसे दूर होता है । नीचे लिखे मन्त्रको सात वार अभिमन्त्रित कर जो जल पिये उसके शत्रुका किया हुआ दोष शत्रुकहां मन्दिरम होगा॥१८॥१९॥
मंत्र:-“ॐ वज्रमुष्टि वज्रकीलाडी वज्रबान्धौ दश-द्वार वज्रपाणीपिबेच्छाड़े डाकिनी डापिनी रक्षोव सर्वज्ञे मंत्रजयो शत्रुभयो डाकिनीवान् जानुवायौ कालि कालि शामनते ब्रह्माकी घोषुसाशु डाकिनी मिलिकरि वरेयो मोरो जोडुभातकरती
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पत्ने पानोकरे गुआ करे याने करे सूते करे परिहासेकर नयन कटाक्ष करे आपोन हाथे परहाते जियति संचारेँ किलनी पोतनि अनिन्तुष्वरोकरेँ एते विज्ञान अहिन्नगेयो मोहिकरेत्साराकुठितत्स्केमसरुपद्रे । "ॐ मोसिद्धि गुरुपायस्वोइलंगं महादेवकी आज्ञा ॥" मंत्र-"! वज्रमुष्टि वज्रकिवाडी वज्रबांधे दश द्वार वज्रपाणी पिबेत चांगे डाकिनी डापिनी रक्षोव सर्वांगे मन्त्रजयो शत्रु भयो डापिनी वावों जानुवायो कालिकालि शामनते ब्रह्माके धोशु शासु डाकिनी । मिली करिवरे योगा रौजीडुभातेकरेती पत्नेपानी करे गुआकरे याने-करेँ मुतेकरेँ परिहासेकरेँ नयन कटाक्षकरेँ आपोन हाथेपर हाथेँ जयति संचारेँ किलनी पोतनी अनितु पवरो करेँ एते विज्ञान अहिन्नगँ योमोहि करेत्साराकुठित तित्स्के मसरुपद्रे । "! मोसिद्धि गुरुपाय स्वोइलंगं महादेवकी आज्ञा ॥"
एलाफलं वासगोपचूणं गुप्तं क्षिपेद्योषिदुस्यस्थमार्गे । तस्यैव लिंगस्य वरप्रवेशं स्यातत्र नान्पस्य कदाचिदेव ॥ २० ॥
पूर्वो इलायचो,इन्द्रगोप (वारबहूटा) को चूर्ण जो स्त्रोंक मदन- मंदिरके मार्गमें गुप्त डालदे तो उससे वह डालनेवाला पुरुषही रति कर सकता है अन्य कदापि कर नहीं सकता है ॥ २० ॥
गव्येन दध्ना मथितं विधाय प्रक्षालयेततेन तदड्मुच्चे: । भवेधरार्जं प्रकृतं युक्त्या इत्याह कर्ता हरमेखलाया: ॥२१॥
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(१५०)
कामरत्न
अष्टम—
गौके दहोको मथकर उससे कामसदनको प्रक्षालन करनेसे फिर पूर्ववत् होजाताहै, यह वचन हरमेखलाके कर्ताने कहा है ॥ २१ ॥
आकाशदेशे पतितं गृहीत्वा योषित्स्रखं दन्तमलं सुपिष्ट्वा । लिप्त्वा ध्वजं तेन रमेततो या तस्य—विनाश: पुरुषान्तरेण ॥ २२ ॥
आकाश देशमें गिरेहुए स्त्रीके नख, दांतके मैलको ग्रहण कर फिर पीसकर कामध्वजापर लेप करे तो उसको पुरुषान्तरकी इच्छा नहीं होती है ॥ २२ ॥
निर्घृतलोहस्य जलेन भूय: प्रक्षालनं कामगृहस्य कुर्वीत् पुन: समासाद्यात् प्रदृष्टं नारी तद्र्ज्ञ खलु पूर्ववत् ॥ २३ ॥
विना घात किये लोहके जलसे कामस्थानका प्रक्षालन करे तो पतिसंभोगमें स्त्री पूर्ववत् प्राप्त होती है इसमें सन्देह नहीं ॥ २३ ॥
मुहर्मुहुया मथितेन नारी प्रक्षाल्येत्सप्तदिनान्नित्यनात् । तस्यास्तद्र्ज्ञं पुनरेव भूयात्पूर्वानुरुपं नोह सङ्जयोसित ॥ २४ ॥
वारंवार जो स्त्री मथित (उपरकी मलाई निकालकर बिना पानोका बिलोया हुआ छाछ) से गुप्त स्थानको सात दिनतक प्रक्षालन करे तो उसका गुद्स्थान पूर्ववत् होजाताहै इसमें सन्देह नहीं ॥ २४ ॥
निर्वान्तलोहस्येति वा पाठ:
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इति योनिबन्धन श्रौर उसका मोक्षण
अथ गृहकोदरकनिवारणम्।
वघूटनीयमूलं तु तस्या हस्तेन बन्धनात्।
गृहकोदरकं न स्वाधीनतत्त्वे बन्धनम् ॥ २५ ॥
वघूटनी (गौरीसर) की जड़ हाथमें जबतक बांधे रहे तबतक गृहकोदरक नहीं रहते हैं ॥ २५ ॥
इस यंत्रको गोरोचन कुंकुमसे भृङपत्र-पत्रपर लिखकर धान्य राशिमें स्थापन करनेसे गृहमें कोटि दोष नहीं होते है।
अथ नष्टपुष्पाया: पुष्पकरणम्
ज्योतिष्मतीकोमलपत्रसमौ भृष्ट जपापौ: कुषुमञ्च पिष्टम् । गृहाम्बुना पोर्तमिदं युवत्या: करोति पुष्पं स्मरमन्दिरस्य ॥ २६ ॥
ज्योतिष्मती (मालकंगनी) के कोमलपत्तोंको अग्निमें भूनने और जपा कुसुमसे पीसकर जी स्त्री पान करती है उसका नष्टराज फिर प्रवतित होता है ॥ २६ ॥
लाङ्गलोन्दचूर्णीं वा अपामार्गस्य मूलकम् ।
इन्द्रवारुणिकामूलं धानैस्तु पुष्पयोनिमुत् ॥ २७ ॥
पारावतपुरीषं च मधुना संपीबेतु य: ।
रजस्वला भवेन्त्रारी मूलदेवन भाषितम् ॥ २८ ॥
तिलमूलकषायं तु ब्रह्मदण्डीयमूलकम् ।
यष्टो त्रिकटुकं चूर्णं क्वाथयुक्तं च पाययेत् ।
पुष्परोधे रक्तगुल्मे स्त्रीणां सद्य: प्रशस्यते ॥ २९ ॥
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कलिहारी औषधिको कन्दका चूर्ण वा चिरटेकी जड वा इन्द्रायणकी जड योनिमें रखनसे रजका बंधन छूटजाता है॥ कबतरकी बीठ जो शहदमें मिला-कर पीवे वह स्त्री अवइय रजस्वला होती हैॐ ऐसा मूलदेवने कहा है॥ तिलके मूलका काढा वा ब्रह्मदंडीकी जड, मुलेठी, त्रिकुटा इनका चूर्ण क्वाथ करके जो पान करे तो रक्तका रोध, योनिकी ग्रंथी यह शोध नष्ट होजातो है ॥ २७-२९ ॥
तिलक्वाथे गडं त्र्यषणं तिलभागयतं पिबेत । क्वाथं रक्तभवे गुल्मे नष्टपुष्पे च योजयेत् ॥ ३० ॥
तिलके क्वाथमें गुड, सोंठ, मिरच, पीपल तिलके भागके साथ पीवे अर्थात क्वाथ बनाय पिये तो गुल्म, नष्टपुष्प सब दूर होजाते हैं ॥३०॥
दूर्वादलं तन्दुलतुल्यभागं निष्पिष्य पिष्टं पर-पाचितच्च । तदृक्षयित्वा वनिता प्रनष्टं पुष्पं लभेत स्वबलानुरुपम् ॥ ३१ ॥
दूर्वादल और चावल बराबर पोसकर भूने उसे खानेसे स्त्री नष्ट हुए पुष्पको अपने बलके अनुरुप प्राप्त कर लती है यानी रजोवती होती है ॥ ३१ ॥ इति रजस्वलाकरणम् ॥
अथ गर्भस्रावणम्
तत्राभिनवगर्भस्रावणम्
कृते जारे क्षिपेद्योनौ तिलतैलावतरैन्धवम् । द्रवते तत्क्षणादेव शुक्रपुष्पं स्रवत्यपि ॥ ३२ ॥
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अथ गर्भपातनम्
जो विधवाके जारसे तत्कालका गर्भ हो तो तिलके तेलमें सैंधेको गोला कर योनिमें धरे तो उसी समय शुक्र पुष्पका मेल पृथक् हो खाव हो जाता है ॥ ३२ ॥
काण्डमेरण्डपत्रस्य योनावष्टाड्गुलं क्षिपंत् । चातुर्मास्यो भवेद्गर्भः स्वते तत्क्षणादपि ॥ ३३ ॥
अरंडके पत्तोंका मूठा योनिमें अष्ट अंगुल पर्यन्त रखनेसे चार महीनेका गर्भ उसी समय पतित होजाता है ॥ ३३ ॥
देवदालीयचूर्णं तु वर्षेकं तोयपेषितम् । पिबेद्गर्भभवंती नारी गर्भं सरवति तत्क्षणात् ॥ ३४ ॥
देवदालिका चूर्ण एक वर्ष (सोलह मास) गर्भवती स्त्री पवे तो उसी समय गर्भ पतित होजाता है ॥ ३४ ॥
धत्तूरमूलिका पुष्ये गृहीता कटिसंस्थिता । गर्भं निवारयत्येव रंडावेश्यादियोषिताम् ॥ ३५ ॥
राजिकां तिलतैलञ्च पिष्ट्वा नारी ऋतौ पिबेत् । त्रिदिनं तेन गर्भस्य संभवा नैव जायते ॥ ३६ ॥
पुष्य नक्षत्रमें लाई धत्तुरेकी जड कमरमें बांधनेसे रंडा वेश्यादिका गर्भ दूर करती है। राई, तिलका तेल पीसकर स्त्री ऋतुसमयमें तीन दिन पान करे तो फिर गर्भ नहीं रहता ॥ ३५ ॥ ३६ ॥
बब्बूलस्य तु पुष्पाणि गोदुग्धेन पिबेदृतौ । या नारी गर्भसंभवात् पुनस्तस्या न जायते ॥ ३७ ॥
पिबेत्प्रसूतिसमये काञ्ज्जियुक्तं जयाभवम् । पुष्पं न सा प्रसूंत च धत्ते नो गर्भसंभवः ॥ ३८ ॥
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बबूलके फूल गौके दुग्धसे ऋतुकालमें पीनेसे गर्भ नहीं रहता ॥ प्रसूति समयमें कांजीके सहित नोल दूर्वा पीनेसे गर्भ नहीं रहता ॥ ३७ ॥ ३८ ॥
गृहीतं रेवतीरक्षे पिप्पलस्य च वन्दकम् । गोदुग्धे सोडपि भोक्तारं महागर्भं निवारयेत् ॥ ३९ ॥
रेवति नक्षत्रमें पीपलका बन्दा लाकर गौदूधके साथ पीनेसे महागर्भं निवारण होता है ॥ ३९ ॥
निर्गुण्डीद्रवसंपीष्टं चित्रमूलं मधुप्लुतम् । कर्षं भुक्त्वा पातयति गर्भं रण्डाकुलोद्भवा ॥ ४० ॥
निर्गुण्डी (सिन्धुवार) के रसमें चौतेकी जड़ पौस शहद मिलाय एक कर्ष मात्र खाय तो उसी समय रंडाका गर्भ गिर जाता है ॥४०॥
इति गर्भंसावणम्
अथ रक्त-निवारणम्
धात्रों च पथ्यांच रसाञ्जनं च कृत्वा विचूर्णं सजलं निपोतमम् । अत्यन्तरक्तोत्थितमुप्रवेगं निवारयेत् सेतुनिवाम्बपूरणम् ॥ ४१ ॥
आमले, हरड, रसौंत इनका चूर्ण कर जलके साथसे पीने अत्यन्त रक्त जिसका जाता हो वह निवारण हो जाता है ॥४१॥
शेलुत्वचा मिश्रिततन्दुलेन विधाय पिष्टं विन-योजनोयम् । कन्दर्पंगेहे मृगलोचनाया रक्तं निह्न्याशु हृदेन योगः ॥ ४२ ॥
शेलु (लहसौड) वृक्षको त्वचा और सांठीके मिलाकर मृगलोचनीके योनिमें रखनेसे रक्तका वेग निवारण होता है ॥ ४२ ॥
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मूलं तु शरपुङ्खाया: पेषयेत्नुलोदकै: | पाययेत्कर्षमात्रं तदितरकतप्रशान्तये ॥ ४३ ॥
सरफोंकेकी जड चावलके जलके साथ पीसकर कर्षमात्र पीनेसे अधिक रक्त शान्त होजात है है ॥ ४३ ॥
कुशस्य मूलं कदलीदलं वा बला सिफा वा बदरीफलं वा । गुडूचिफा तण्डुलवारिपीता स्त्रीणामनेकं रधिरं जयेच्च ॥ ४४ ॥
कुशकी जड, केलेका पत्ता, खिरैंटी, जटामांसी, गुडूची, बदरीफल इनको चावलके जलके साथ पीनेसे रधिरका अधिक निकलना बन्द होता है ॥ ४४ ॥
कुरण्टकस्य मूलानि मधुक: श्वेतचन्दनम् | युक्त्या* * पिष्ट्वाक्षमात्रं तु पाययेत्नुलाम्बुना॥४५॥
कुरंट (कुटज) की जड, मुलहटी, श्वेत चन्दन इनको बारोक पीस चावलके जलके साथ अक्षमात्र पीवे ॥ ४५ ॥
सकृत्पोतवा माषयूषं प्रदरात्परिमुच्यते । घृतभृष्टं माषयूषभोजनं श्वेतचन्दनम् ॥ ४६ ॥
चन्दनं क्षौरसयुक्तं सघृतं पाययेहद्रुषक् शर्करामधुसंयुक्तमसकृत्प्रविनाशनम् ॥ ४७ ॥
एक बारही उडदोंका क्वाथ कर उसका रस पीनेसे प्रदरसे छूट जाती है । घीमें भुना हुआ यह उडदोंका युष और श्वेतचन्दन लेना चाहिये । क्षीरके सहित लालचन्दन और घृत पान करनेसे अथवा शकंरा और मधु पान करनेसे रधिर पित्तविकार शान्त हो जाते हैं । इसमें जहां चन्दन है वहां लालचन्दन लेना ॥ ४६ ॥ ४७ ॥
- अक्षमात्रम्—कर्षमात्राम् ।
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दार्वोरसाजनवृषाब्दकिरातबिल्वभल्लातकैरथ कृतो मधुना कषाय: । पीतो जयत्यतिबलं प्रदरं सशूलं पीतं वितारुणविलोहितनोलकृष्णम् ॥ ४८ ॥
देवदारु, रसौत, चिरायत, बेल, भिलावा, अडूसा, नागरमोथा इनका क्वाथ, कर घृत मधु डालकर पीवे तो कठिन शूल सहित पीत, श्वेत, अरुण, लाल, नील, कृष्ण सब प्रकार प्रदरके उपद्रवकी शान्ति हो जाती है ॥ ४८ ॥
अशोकस्य त्वचा सिद्धं क्षीरं रक्तहरणं पिबेत् । पेटारिकाया: पत्रं च माषचूर्णेन संयुतम् ॥ ४९ ॥
रम्भादलैर्वेष्टयित्वा दाहयेच्च प्रयत्नत: । तस्य भस्मप्रयोगेण ह्वातिरक्तनिवारणम् ॥ ५० ॥
अशोककी छाल, वच इनसे सिद्ध किया दूध पोनेसे रक्तनाशा हो जाता है । पेटारिकाके पत्ते उडदोंके चूर्णके सहित केलेके दलेसे वेष्टन करके यत्नपूर्वक जलावे, इसके भक्षणमात्रसे अतिरक्तकी निवृत्ति होती है ॥ ४९ ॥ ५० ॥
तन्मूलं तन्दुलै: पिष्टवा पिष्टकं भर्ज्जयेद्बुध: । तस्य भक्षणमात्रेण रक्तादिविकृतिं हरेत् ॥ ५१ ॥
इसे पेटरिकाकी जड चावलोंके साथ पीसकर इस पिट्ठीको भूनकर खाय तो खानतेही रक्तादि विकृति दूर होजाती है ॥ ५१ ॥
तस्य वल्कलचूर्णं तु भृष्टतन्दुलचूर्णकम् । भक्षणादेव तद्रक्तं स्त्रियोणां शमयति ध्रुवम् ॥ ५२ ॥
इसोके छालका चूर्ण तथा भूने चावलोंका चूर्ण मिलाकर भक्षण करनेसे अवश्यही स्त्रियोंका अतिरधिर निकलना बन्द होजाता है ५२
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शतावर्ग्यास्तु मूलस्य निजद्रावं समाहरत् ।
चत्वारिंशत्पलान्येवं वस्त्रपूतं प्रयत्नतः ॥ ५३ ॥
द्रवतुल्यगवां क्षीरं क्षीरस्य त्रिगुणं घृतम् ।
जीवन्कीटिलमन्दारो अतसीं क्षीरकाकुली ॥ ५४ ॥
मुद्गपर्णी माषपर्णी महामेदा शतावरी ।
द्राक्षापाशुकयोष्टिजरकं प्रतिकाष्ठकम् ॥ ५५ ॥
पलाद्धि मधुकं पुष्पं सर्वमेकत्र पाचयेत् ।
घृतशेषं समुत्थायें शीतें जाते च निक्षिपेत् ॥ ५६ ॥
शतावरीकी जडका स्वरस चालीस पल ले वस्त्रसे छानलेवे, इस द्रवके तुल्य गौका क्षीर ले दूधसे दूना घृत ले और जीवन्ती, कोलमन्दार, अलसी, क्षीरकाकोली, मुद्गपर्णी, माषपर्णी, महामेदा, शतावरी, दाख, मुनक्का, मुलहठी, जीरा इनको एक एक कर्ष, आधापल महुएके फूल इन सबको एकत्र कर पकावे । जब घृतजाय तब उतार ले ठंडा होने पर पात्रामें रख छोडे ॥ ५३-५६ ॥
पलाष्टकं कणाचूर्णी क्षौद्रं वा पिप्पलाष्टकम् ।
सितादशपलं योज्यमिदं शतावरौघृतम् ॥ ५७ ॥
पीपलका चूर्ण आठ पल अथवा शहद आठ पल, मिश्री दस पल इसमें ड़ाल दे तो यह शतावरी घृत सिद्धि होता है ॥ ५७ ॥
लेह्यं कर्षं शमेदाशु दुःसाध्यमतिरक्तजं ।
दोषं क्षयं च मन्दाग्निं हृद्रोगं ग्रहणीग्रहम् ।
कामलां वातरोगांश्च अश्मरिं च शिरोग्रहम् ॥ ५८ ॥
१ जीवंतीशेलुमज्जा च घातकी क्षीरकाकुली इति वा पाठः ।
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(१५८)
कामरत्न अष्टम—
इसका एक कर्ष सेवन करे तो रक्तदोष दूर होता है । क्षतक्षय मन्दाग्नि हृद्रोग ग्रहणीरोग दूर होता है तथा कामला वातरोग अस्मरी रोग दूर होता है ॥ ५८ ॥ इति रक्त निवारण ॥
जन्मवन्ध्या काकवन्ध्या मृतवत्सा वर्चितस्त्रयः । तासां पुत्रोदयार्थाय शम्भुना सूचितं पुरा ॥ ५९ ॥ वन्ध्या कई प्रकारकी होती हैं अर्थात् जन्मवन्ध्या काकवन्ध्या मृत- वत्सा ( जिनके बालक नहीं जाते हैं ) । उनके पुत्र होनेके निमित्त शिवजीने विधान सूचित किया है ॥ ५९ ॥
तब प्रथमं जन्मवन्ध्याचिकित्सा
समूलपत्रां सर्पाक्षीं रविवारे समुद्दरेत् । एकवर्णगां क्षीरं कन्या हस्तेन पिबयेत् ॥ ६० ॥
ऋतुकाले पिबेद्र्रवन्ध्या पलाढ़ं तदिनेदिने । क्षीरशाल्यमुद्गं च लघ्वाहारं प्रदापयेत् ॥ ६१ ॥
एवं सप्तदिनं कुर्याद्रवन्ध्या गर्भिणी भवति । उद्वेगं भयशोकं च दिवानिद्रां विवर्ज्जयेत् ॥ ६२ ॥
पहले जन्मवन्ध्याकी चिकित्सा कहते हैं—जड़ पत्ते सहित सुगन्ध रास्नाको रविवारके दिन उखाड़कर लावे, उसको एक रंगवाली गौके दूधमें कन्या के हस्तसे पिलवावे । ऋतुकालमें वन्ध्या प्रतिदिन दो दो पल इसको पान करे । दूध, शालिधान्य, मुंग आदि लघु आहार करे । इस प्रकार सात दिन करनेसे वन्ध्या स्त्री भी गर्भिणी होजाती है । औषध सेवनके समय उद्देग भय शोक और दिनमें सोना त्याग दे ॥ ६०-६२ ॥
न कर्म कारयेत्किचिन्न च्छिद्रर्जये च्छोभातपम् । न तया परमां सेवां कारयेत्पूर्ववत्क्रियाम् ।
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उपदेश: ८.
हिन्दीटीकासहित
(१५९)
पतिसङ्गजगदर्भलाभो नात्र कार्यां विचारणा ॥६३॥
कोई काम न करे, शीत घामादिको न सहे और न कोई सेवा करावे। पूर्ववत् फिर दूसरे महीने क्रियाको करे । फिर पतिके संगसे वह गर्भको प्राप्त होतो है । इसमें सन्देह नहीं ॥ ६३ ॥
इस यंत्रको गोरोचन कुंकुम और लाखसे भोजपत्रपर साध्यानाम सहित लिख पंचामृतमें स्थापन करे तो वह वन्ध्या गर्भिणी हो, पुत्रवती हो और गर्भं रक्षा भी होती है, यह सत्य है ॥
६४ । एकमेव तु रुद्राक्षं शपाक्षिकेशमात्रिकम् ॥ ६४ ॥
पूर्ववच्च गवां क्षीरेऋतुका ले प्रदापयेत् । महागणेशमन्त्रेण रक्षां तस्याबुबन्धयेत् ॥ ६५ ॥
एवं तत्तदिनं कुयाद्विन्द्रह्या भर्वात पुत्रिणो । ॐ ददन्महागणपते रक्षामृतं मत्सुतं देहि ॥ ६६ ॥
एक रुद्राक्ष और एक कर्ष सुगन्धरास्ना इनको पूर्ववत्ऋतुकालमेंगौ के दूधसे पीस कर और महामागेशिके मन्त्रसे रक्षा करे । इस प्रकार सात दिन करनेसे वन्ध्या पुत्रिणी होती है । महागणपति रक्षा देते हैं ॥ ६४-६६ ॥
इस यंत्रको गोरोचन और कुंकुमसे भोजपत्रपर साध्यानाम सहित लिख कण्ठमें धारण करे तो गर्भकी महा रक्षा होती है ॥ यह महागणपति विद्या ।
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(१६०)
पत्रमेकं फलाशस्य गर्भिणोपयस्सान्वितम् । पोतवां च लभते पुत्रं रूपवन्तं न संशयः । पथ्यमुक्तं यथापूर्वं तद्त्सप्तदिनावाधि ॥ ६७ ॥
एक कोमल ढाकके पत्रको गर्भिणोके दूधके साथ पीनेसे रूपवान पुत्रको प्राप्त करती है इसमें सन्देह नहीं । पथ्य-जैसे पूर्वमें कहा है उसी प्रकार सात दिन पर्यन्त करे ॥ ६७ ॥ इस
यन्त्रको गोरोचनसे भोजपत्रमें जिस (साध्या) का नामसहित लिख भुजामें धारण करे तो वह वन्ध्या गर्भिणी होती है, निश्चित पुत्र होती है ॥ देवदालीयमूलं तु ग्राहयेत्पुष्यभास्करे ॥ ६८ ॥
निष्कत्रयं गवां क्षोरैः पूर्ववत्क्रमयोगतः । वन्ध्या च लभते पुत्रं देयं पथ्यं यथापुरा ॥ ६९ ॥
जब पुष्य नक्षत्रमें सूर्य आवे तो देवदाली (बड़ी तोरई) की मूल ग्रहण करे । उसे गौके दूधसे तीन मासे पिये, पूर्ववत क्रियाके योग करे तो पूर्ववत पुत्रको प्राप्त होतो है । पथ्य पूर्ववत् दे ॥ ६८ ॥ ६९ ॥
इस यन्त्रको गोरोचनसे भोजपत्रपर साध्या- नामसहित लिख बाहु कंठ या कमरमें धारण
करनेसे वन्ध्या पुत्रिणी होती है ।
शोततोयेन संपिष्टं शरपुंखोयमूलकम् । कर्षं पोतवा लभेद्गर्भी पूर्ववत्क्रमयोगतः ॥ ७० ॥
शरफोंकेकी जड शीतल जलसे पोसे उस पूर्वक्रमसे एक कर्ष पीकर वन्ध्या स्त्री पुत्रको पासकती है ॥ ७० ॥
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मुस्ता प्रियंगुसौवौरं लाक्षाक्षौद्रं समं पिबेत् । कर्ष तन्दुलतोयेन वन्ध्या भवति पुत्रिणो । पथ्यमुक्तं यथापूर्वं तद्वत्सप्तदिनं पिबेत् ॥ ७१ ॥
मोथा प्रियंगु, सौवौर, लाख, शहद सब समान लेकर चावलके जलसे एक कर्ष पीकर सात दिन पथ्यसे रहे तो वन्ध्या पुत्रवती होती है ॥ ७१ ॥
समूलां सहदेवों च संगृह्य पुष्यभास्करे ॥ ७२ ॥ छायाशुष्कं च तच्चूर्णमेकवर्णगवां पयः । पूर्ववत्पिबते नारी वन्ध्या भवति गववणी ॥ ७३ ॥
जब सूर्य पुष्यनक्षत्रमें हो तब जडसहित सहदेईको ग्रहण करछायामें सुखाय चूर्ण कर । उसे गौके दूधसे वन्ध्या स्त्री पिवे तो गर्भिणी होती है ॥ ७२ ॥ ७३ ॥
मूलं शिफा वा किल लक्ष्मणाया ऋतौ निपीय त्रिदिनं पयोभिः । क्षीरान्नचर्या नियमेन भुङ्क्ते पुत्रं प्रसूते वनिता न चित्रं ॥ ७४ ॥
लक्षणा (श्वेतकटेरी) की जड और जटामांसीके पत्ते इनको ऋतुकालमें दूधसे तीन दिन स्त्री पान करे और दिनमें भी क्षीरादि लघु आहार करें तो उसके पुत्र होता है, इसमें आश्चर्य नहीं ॥ ७४ ॥
सपिप्पलीकेशरशृङ्ग्वेरं क्षुद्रोपणं गव्यघृतेन पीतम् । वन्ध्यापि पुत्रं लभते हठेन योगस्तु सोऽयं मुनिभिः प्रदिष्टः ॥ ७५ ॥
पीपल, नागकेशर, अदरक, छोटी गोल मिर्च इनको गौके घीसे
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पान करनेसे वन्ध्याभी पुत्रको प्राप्त होती है, यह योग मुनियोंने कहा है ॥ ७५ ॥
तुरङ्गन्धा घृतवारिसिद्धमाज्यं पयः स्नानदिने च पोतवा । प्राप्नोति गर्भं नियमं चरन्ती वन्ध्या च नूनं पुरुषप्रसङ्गात् ॥ ७६ ॥
असगन्धको घृतसे भूनकर या जलसे ओटाकर घृत और दूधके साथ स्नानके दिनमें पान कर नियमसे रहनेसे अवश्य वन्ध्यास्त्री पुत्रवती होती है ।
इसको शयनकालमें पीवे ॥ ७६ ॥
पुष्यार्कयोगोद्भृतलक्षणमाया मूलं तथा वज्रतरोश्च पिष्टवा । अप्येकवर्णापियसा निपीतं स्त्रियः स्मृतं पुत्रकरं मतोदितः॥ ७७ ॥
पुष्य और सूर्यके योगमें लक्ष्मणाकी जड और सेहुंड वा थूहरकी जड उखाडकर लावे, इनको पीसकर एकरंगकी गौके दूधके साथ पीनेसे अवश्य पुत्र होता है ॥ ७७ ॥
कन्दमूलं घृतैः पिष्टवा ऋतौ सा गर्भिणी भवेत् ॥७८॥
जो ऋतुमें वाराहीकन्दकी जडको पीस घीके साथ खाय तो वह गर्भिणी होती है ॥ ७८ ॥
पुष्याहृते लक्ष्मणमेव चूर्णं पुष्पं निपीतं सगृृतं स्मृतं निपोतथ् । क्षीरोदनं प्रातः पतिप्रसङ्गाद्गर्भं विदध्यात्रुणी न चित्रं ॥ ७९ ॥
पुष्य नक्षत्रमें उखाडी हुई लक्ष्मणाका चूर्ण कर उसे घीके साथ पानकर पोछे दूधपान करे तो तरुणी अवश्य गर्भवती होती है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ७९ ॥
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कृष्णापराजितामूलं वस्तक्षीरेणसंपिबेत् । ऋतुस्नाता त्रिधा या तु वन्ध्या गर्भधरा भवेत् ॥ ८० ॥
कालो विष्णुक्रांताकी जड़ दूधसे पोसकर ऋतुसे स्नान कर तीन दिन पिये तो वंध्याभी गर्भ धारण करती है ॥ ८० ॥
नागकेशरकं चूर्णं नूतनं गव्यदुग्धतः । पिबेत्सप्तदिनं दुधं घृतैर्भोजनमाचरेत् । तदृत्तौ लभते गर्भं सा नारी पतिसंगता ॥ ८१ ॥
नागकेशरक चूर्ण ताजे गायके दूधके साथ सात दिन पर्यन्त पीवे और अधिक घृतयुक्त भोजन करे तो वह स्त्री पतिका संग करके अवश्य पुत्रको प्राप्त होती है ॥ ८१ ॥
पुत्रजीवकपत्रैकं पिबेत्क्षीरान्तरेहृतौ च या । पतिसङ्गाच्च सा नारी सत्यं पुत्रवती भवेत् । तस्य मूलं चैकवर्णक्षीरैः पीत्वा च पुत्रिणी ॥ ८२ ॥
जो स्त्रीऋतुमें जियेंपोतेका एक पत्र दूधके साथ पान करती है वह स्त्री पतिके संगसे अवश्य पुत्रवती होती है अथवा इसकी जड़ एक वर्णवाली गायके दूधसे साथ बहुत महीन पीसकर पीनेसे पुत्रवती होती है ॥ ८२ ॥ ८३ ॥
काकोल्यौ लक्षणामूलं षष्टिटकस्य च तन्दुलम् । नारिकवर्णापियसा पीत्वा गर्भवती ऋतौ ॥ ८४ ॥
क्षीरकाकोली, काकोली, श्वेत कटेरोकी जड़ और साठीके चावल ऋतु कालमें महीन पीस कर पूर्ववत् दूधके साथ पीनेसे गर्भवती होती है ॥ ८४ ॥
अश्वत्थां बोधिवृक्षस्य वन्दाकं ग्राहयेद्बुधः । गोक्षीरे: पानमात्रेण वन्ध्या पुत्रवती भवेत् ॥ ८५ ॥
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अश्विनी नक्षत्रमें पीपलके वृक्षका वन्दा ग्रहण कर गौके दूधसे पीवे, इसके पानमात्रसे स्त्री गर्भवती होती है ॥ ८५ ॥
तिलरसगुडकं वै गोपुरीषाग्नियोगात् तरुणवृषभमत्रं प्रस्थयवतं विपक्ववम् । ऋतुदिवसविमध्ये सप्तवारैश्च पीतं जनयति सुतमेकं निश्चितं पुष्पितैव ॥ ८६ ॥
तिलरस, गुड, तरुण बैलका मूत्र एक सेर इनको गौके गोबरके उपलोंकी अग्निमें पकावे इसका ऋतुके दिनोमैं सात वार पीवे तो अवश्य उत्तम पुत्र होता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ८६ ॥
कदम्बपत्रं इवेतं च बृहतीमूलमेव च । एतानि समभागानि ह्रदजाक्षीरेण पेषयेत् ॥ ८७ ॥
त्रिरात्रं पञ्चरात्रं वा पिबेदेतन्महौषधम् । ऋतौ निपीयमाने तु गर्भो भवति निश्चितम् ॥ ८८ ॥
कदम्बपत्र, इवेतचन्दन, कटेरीकी जड इनको बराबर ले बकरोके दूधसे पीसे इस महौषधिको ऋतुके अन्तमें तीन रात या पांच रात पीनेसे अवश्य गर्भवती होती है ॥ ८७-८८ ॥
गोक्षुरसस्य तु बीजं च पिप्पेल्याङ्गुणिडकारसै: । त्रिरात्रं सप्तरात्रं वा वन्ध्या भवति पुत्रिणी ॥ ८९ ॥
निर्गुण्डीके रसयुक्त गाखरूके बीज तौन वा सात रात पीनेसे वन्ध्या अवश्य पुत्रवती होती है ॥ ८९ ॥
कर्कोटबीजचूर्णं तु एकवर्णं गवां पय: । ऋतौ निपीयमाने तु गर्भो भवति निश्चितम् ॥ ९० ॥
कर्कोटकके बीजोंका चूर्ण बारीक कर एकरंगकी गौके दूधसे रात्रीमैं पीवे तो अवश्य गर्भवती होती है ॥ ९० ॥
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भगाख्ये चैव नक्षत्रे वटवृक्षस्य मूलकम् । हस्ते बध्द्वा लभेत्पुत्रं सुन्दरं कुलवर्द्धनम् ।। ९१ ।।
भगदेवतावाले नक्षत्र (पूर्वाफाल्गुनी) में वटको जड हाथमें बांधनेसे वन्ध्या उत्तम पुत्र पाती है ।
अश्वत्थस्य तु वन्दाकं पूर्वेद्युः सुनिमंत्रितम् । ऋतुस्नाते तु पोतं स्यादपि वन्ध्या लभेत्सुतम् ।। ९२ ।।
एकवर्णसवत्साया गोः क्षीरेण सुपोषितम् । भावितं वटवन्दाकं पोतं वन्ध्या सुतं लभेत् ।। ९३ ।।
पपीतके वन्देको पहले दिन निमंत्रण कर दूसरे दिन लाकर ऋतु स्नानकर पीनेसे वन्ध्या पुत्रवती होती है । एकवर्ण बछडेवाली गौके दूधमें बछडेको भावना देकर पीवे वन्ध्याके पुत्र होता है ।। ९३ ।।
काकवन्ध्याचिकित्सा
पूर्वं पुत्रवती या सा वर्चचिद्रून्ध्या भवेददि । काकवन्ध्या तु सा ज्ञेया चिकित्सास्यास्तु कथ्यते ।। ९४ ।।
जो पहले पुत्रवती होकर यदि फिर वन्ध्या हो जाय उसकी काकवन्ध्या कहते हैं । उसकी चिकित्सा इस प्रकार कही जाती है ।
विष्णुक्रान्ता समलां तु पिष्टवा दृढघस्त माहिषे: । महिषीवनोतेन कृतुकाले तु भक्षयेत् ।। ९५ ।।
विष्णुक्रांताको जडसहित भैसके दूधमें पीसकर और भैंसके मक्खनके साथ ऋतुकालमें भक्षण करे ।
एवं सप्तदिनं कुर्यात्पथ्यमुक्तं च पूर्ववत् । गर्भं सा लभते नारी काकवन्ध्या सुशोभनम् ।। ९६ ।।
इस प्रकार सात दिन करे और पथ्यसे रहे तो वह काकवन्ध्या अवश्य गर्भवती होती है ।। ९५ ।। ९६ ।।
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(१६६)
कामरत्न
अष्टम-
इस यन्त्रको गोरोचन, कुंकुम और लाखसे जिसका नाम सहित लिख पंचामृतमें स्थापन करे तो काकवंध्या प्रसूती गर्भवती होती है ।
अश्वगन्धीयमूलं तु ग्राहयेत्पुष्यभास्करे ।। ९७ ।। पेषयन्महिषीक्षीरैः पलार्द्ध भक्षयेत्सदा । सप्ताहाल्लभते गर्भ काकवन्ध्या चिरायुषम् ।। ९८ ।।
पुष्य नक्षत्रमें सूर्य हो तो असगंधकी जडको ग्रहण करके भेंसके दूधसे पीसकर आगे पल भक्षण करे तो सात दिनों काकवंध्या गर्भवती हो चिरायु पुत्रको उत्पन्न करती है ।।९७।।९८।।
इस यन्त्रको गोरोचनसे भोजपत्रमें जिसका नामसहित लिख हाथमें धारण करे तो काकवंध्या प्रसूती होती है तथा दुर्भगा सुभगा होती है ।।
अथ मृतवत्साचिकित्सा
गर्भ संजातमात्रेण पक्षान्मासाच्च वत्सरात् । श्रियते द्वित्रिवर्षाद्दा यस्या: सा मृतवत्सका ।
तत्र योग: प्रकर्त्तव्यो यथा शड्करभाषितम् ।। ९९ ।।
जिसके बालक उत्पन्न होतही पक्ष, महीने, वर्ष, दो वर्ष वा तीन वर्षमें मर जाते हैं वह मृतवत्सा कहलाती है । इसमें शंकरका कहा योग करना चाहिये ।। ९९ ।।
मार्गशीर्षेऽथवा ज्येष्ठे पूर्णायां लेपिते गृहे ।। १०० ।।
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नूतनं कलशं पूर्ण गन्धतोयेन कारयेत्।
शाखाफलसमायुक्तं नवरत्नसमन्वितम् ॥ १०१ ॥
सुवर्णसूत्रिकायुक्तं षट्कोणमण्डले स्थितम् ।
तन्मध्ये पूजयेद्देवोमेकान्ती नाम विश्रुताम् ॥ १०२ ॥
गन्धपुष्पाक्षतैर्धूपैर्पाद्यैर्वेद्यैसंयुतैः ।
अर्चयेद्भक्तिभावेन मद्यमांसैः समत्स्यकः ॥ १०३ ॥
मार्गशीर्ष अथवा ज्येष्ठको पूर्णिमाको अपना घर लोपकर नये कलशमे जल भरकर उसमें सुगन्धित द्रव्य डाले । आचारशाखा तथा नवरत्न उसमें डाले । सुवर्णसूत्रिका सहित छः कोण मण्डलकी रचना करे । उसके मध्यमें एकान्ती नाम देवीकी पूजा करे । गन्ध पुष्प अक्षत धूप दीप नैवेद्यसे संयुक्त कर भक्तिभावसे अर्चन करे । मत्स्य भी दे
॥ १००-१०३ ॥
ब्राह्मी माहेश्वरी चैव कौमारो वैष्णवी तथा ।
वाराही च तथेन्द्राणी षट्सु पत्रेषु मातरः ॥ १०४ ॥
ब्राह्मी माहेश्वरी कौमारो वैष्णवी वाराही इन्द्राणी यह छः माता है ॥ १०४ ॥
पूजयेन्त्रान्त्रबिजैश्च* फँकारैरैनामविश्रुतः ।
पूजामन्त्र:-“ओं ह्रीं फें एकान्तदेवतायै नमः ।”
अनैन मन्त्रेण पूजा जपश्च कार्यः ॥
दधिभक्तैश्च पिण्डानि सप्तसंख्यानि कारयेत् ॥१०५॥
षट्संख्याः षट्सु पत्रेषु मातृभ्यः कलपयेत्पृथक् ।
बिल्वार्घं सप्तमं पिण्डं शुचिस्थाने बहिःक्ष-पेत् ॥ १०६ ॥
- 'प्रोंकारण विधि श्लुतः' इति वा पाठः ।
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तद्भुक्त्वा गृहमागच्छेच्चक्राग्रे यागमाचरेत् । कन्यका योगिनी वामा भोजयेत्सकुटुम्बकै: ॥ १०७ ॥
दक्षिणां दापयेत्सां देवताग्रे च नान्यथा । विसृज्य देवतां साध नद्यांतकलशोदकम् ॥ १०८ ॥
सकुलं वोक्षयेद्र्दौमाच्छुभेन शुभमादिशेत् । विपरोते पुन: कार्यं यावत्तावत्सुसिद्धिदम् ॥ १०९ ॥
× प्रतिवर्षमिदं कुुर्याद्दीर्घजीवोसुतं लभेत् ॥ ११० ॥
इनको "ॐ हों फें एकान्तदेवताये नमः" इस बीजमंत्रसे छः पत्रोंमें पूजन कर फैंकारका उच्चारण करे और सात पिण्ड दद्भक्तके निर्माण कर जप भी करे । छः तो छहों माताओंको पत्रोंमें प्रदान कर और बेलके समन सातवां पिण्ड पवित्र स्थानमें बाहर रख्खे फिर उसको भक्षण कर घरमें आवे और उस चक्रके आगे याग करे फिर कन्या योगिनी वामा स्त्रियोंको सकुटुम्ब भोजन दे और देवताके आगे उनको दक्षिणा दे फिर देवताको विसर्जनकर उस कलशके जलको नदीमें डाल दे और कुटुम्ब सहित बुद्धिमान् उसको देखे । शुभ देखे तो शुभ कहना, विपरीत देखे तो फिर करना । जबतक सिद्धि न हो तबतक करे । प्रतिवर्ष ऐसा करे तो दीर्घंजीवी
होती है ॥ १०७-११० ॥ इस यन्त्रको कुंकुमसेभोजपत्रपर साध्या नाम सहित लिख उस स्त्रिके हाथमें बांधे तो मृतवत्सा जीव-त्पुत्रिणी होती है ।
हों क्ष: ह्रीं क्ष: हों क्ष:
ह्रीं क्ष:
- चक्राझं यावदाचरेत् । इति पाठान्तरम् । प्रतिमासम् ऐसा पाठ है । अर्थ—प्रत्येक महीने ऐसा करे ।
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प्राड्मुखी कृतकितात्रक्षे वन्ध्याकर्कोटकिं हरेत् ।
तत्कन्दं पेषयेतोयैः कर्षमात्रं सदा पिबेत् ।
ऋतुकाले तु सप्ताहं दीर्घजीवी सुतो भवेत् ॥ १११ ॥
कृतकितां नक्षत्रेऽष्टमी पूर्वादिकां मुख कर
वन्ध्या स्त्री कर्कोटकीकं लावे । उसकी
जडको जलसे पीसकर एक कर्ष सदा
पीवे इस प्रकार सात दिन ऋतुकालमें
करनेसे दीर्घजीवी पुत्रकी प्राप्ति
होती है ॥ १११ ॥
इस यंत्रको गोरोचनसे साध्या नामसहित भोजपत्र पर लिख धारण
करे तो मृतवत्सा जोवत्सा तथा ऋतुमती गर्भवती और सौभाग्यवती
होती है ॥
या बीजपूरद्रुममूलमेकं क्षोरेग्ण सिद्धं हविषा
वमिश्रं । ऋतो तु पीतवा सुर्पांत प्रयाति दीर्घा-
युषं सा तनयं प्रसूते ॥ ११२ ॥
जो स्त्री बीजपूरकी एक कर्ष जडको दूधमें सिद्धि कर हविष अन्नमें
मिलाय ऋतुकालमें पान कर पतके निकट
जाती है वह दीर्घायु पुत्रको उत्पन्न करती
है ॥११२॥ इस यंत्रको गोरोचन, कुंकुम
और लाख रंगसे जिसका नाम सहित लिख
पंचामृतमें स्थापन करे तो मृतवत्सा पुत्रिणी
होती है ॥
फलघृतम्
मञ्जिष्ठा मधुकं कुष्ठं त्रिफला शर्करा बला
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मेदा * पयस्या काकोली मूलं चैवारवगन्धजम् ।
अजमोदा हरिद्रे द्वे हिङ्गु: कटुकरोहिणी ॥ ११३ ॥
× उत्पलं कुमुदं द्राक्षा काकोल्यौ चन्दनद्वयम् ।
एतेषां कार्षिकैर्भागैर्घृततप्रस्तं विपाचयेत् ॥ ११४ ॥
शतावरीरसं क्षीरं घृतं देयं चतुर्गुणम् ।
सर्पिरेतन्नर: पौत्वा नित्यं स्त्रीषु वृषायते ॥ ११५ ॥
मञ्जिष्ठा मुलहठी कुठ त्रिफला मिश्री खरंटी महामेदा क्षोरकाकोली
असगंधको मूली अजमोदा दोनों हल्दी हिङ्गु कुटकी नीलकमल कुमुद
दाख काकोली क्षीरकाकोली दोनों चन्दन इन सबको एक कर्ष लेकर
एक सेर घी में पकावे, शतावरीका रस दूध घी यह चौगुना डाल विद्ध
करे इस घृतको पान करके मनुष्य रतिमें स्त्रीसे प्रबल होता
है ॥ ११३-११५ ॥
पुत्राज्जनयते नारी मेधाविप्रियदर्शनान् ।
या चैवार्थरगर्भा स्याद्या नारी जनयेन्त्रम् ॥ ११६ ॥
अल्पायुयं वा जनयेद्या च कन्यां प्रसूयते ।
योनीदोषे रजोदोषे गर्भस्रावे च नश्यते ॥ ११७ ॥
स्त्री इसके सेवनसे बुद्धिमान् पुत्रोंको उत्पन्न करती है जो प्रिय
दर्शन होता है । जिस स्त्रीका गर्भ स्थिर न रहता हो वा जिसके
मृतक सन्तान होती हो वा जिसके अल्पायु सन्तान होती हो वा जिसके
कन्या ही होती हो वा जिसके योनि और रजमें दोष हो वा जिसके गर्भ-
स्राव होता हो उन सबके निमित्त यह प्रयोग उत्तम है । वैद्य लोग
इसमें लक्ष्मणावी जड़ भी डालते हैं ॥ ११६ ॥ ११७ ॥
*पयस्या-क्षीरयुक्ता भूमिकुष्माण्डा । ×उत्पलम्—नीलम् ।
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प्रजावर्द्धनमायुष्यं सर्वग्रहणिवारणम् । नाम्ना फलघृतं ह्रिप्रद्रहस्यं परिकोर्तिततम् ॥ ११८ ॥ जीवद्रत्सैकवर्णाया घृतमत्र तु दीयते । अरण्यगोमयनत्र बह्निर्ज्वाला प्रदीयते ॥ ११९ ॥ यह प्रजाका बढानेवाला आयुदाता सब ग्रहका निवारण करनेबाला फलघृत है, अश्विनीकुमारोंका कहा हुआ है । जोते बछडेवाली और एक वर्णवाली गौका घी इसमें लेना चाहिये । इसको अरण्य उपलोंकी आंचसे बनावे । घृतपात्र शेष रहनेसे उतार ले, सेवन करे ॥ ११८ ॥ ११९ ॥
वन्ध्यानां सर्वारिष्टनिवारणयन्त्रम्
इस यंत्रको गोरोचन और कुंकुमे भोजपत्रपर साध्याका नामसहित लिख कंठ या शिरमें धारण करनेसे मृतवत्सा तथा वंध्या (अपु- त्रिणी) के सब अरिष्ट दूर होते हैं। ज्वर भो नष्ट होता है ॥
अथ गर्भरक्षा अकस्मात्प्रथमे मासि गर्भे भवति वेदना । गोक्षीरैः पेषयेतुल्यं पचककोशीरचन्दनम् । पलमात्रं पिबेन्नारी त्र्यहाद्गर्भः स्थिरो भवेत् ॥१२०॥ पहले महीनेमें—अकस्मात् गर्भमें वेदना होती है तो उस समय
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पद्माख, खस, लाल चन्दन इनको गौके दूधमें पीसकर एक पलमात्र तीन दिन पान करनेसे गर्भ स्थिर हो जाता है ॥ १२० ॥
अथवा मधुकं दारु शाकवृक्षस्य बीजकम् । क्षीरकाकोलीं पिबेत्क्षीरस्तु गर्भवतः ॥ १२१ ॥
अथवा मुलहठी, देवदारु, शाकवृक्षके बीज और क्षीरकाकोलो इनको पीस गौके दूधसे पान करे ॥ १२१ ॥
नीलोत्पलं मृणालं च यष्टीमधुकं शृङ्गिका । गक्षीरस्तु द्वितीये च पीतवा शाम्यन्ति वेदना:॥१२२॥
दूसरे महीनेमें—नीलकमलकी जड़, मुलैठी, काकडासिंगी इनको बराबर ले गौके दूधके साथ पिये तो दूसरे महीनेकी वेदना शान्त हो जाती है ॥ १२२ ॥
अथवाइवस्थवल्कं च तिलं कृष्णं शतावरोम् । मध्वाजठ्ठासहितां पिष्ट्वा पिबेत्क्षीरेचतुर्गुणे: ॥ १२३ ॥
अथवा पोपलकी छाल, काले तिल, शतावरी, मञ्जोठ इनको बराबर ले पीसकर चौगुने दूधके साथ पीवे ॥ १२३ ॥
श्रीखण्डं तगरं कुष्ठं मृणालं पद्मकेसरम् । पिबेच्छततिक: पिष्ट तृतीय वेदनावती ॥ १२४ ॥
तीसरे महीनेमें—चन्दन, तगर, कुष्ठ, मृणाल (कमलकी जड़), कमल केशर इनको ठंडे जलके साथ पिये तो तीसरे महीनेकी वेदना शान्त हो जाती है ॥ १२४ ॥
अथवा क्षीरकाकोलीं बलां पिष्ट्वा पय: पिबेत् ॥१२५॥
अथवा क्षीरकाकोली और मुगंधवाला जलसे पीवे ॥ १२५ ॥
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नीलोत्पलं मृणालानि गोक्शुरं च कशेरुकम् । तुर्यमासे गवां क्षीरैः पिबेच्छास्यति वेदना ॥ १२६ ॥
चौथे महीनेमे—नीलोत्पल, कमलकी जड, गोखरू, कसेरू इनको पीसके गौके दूधके साथ पीनेसे चौथे महीनेकी वेदना शान्त होजाती है ॥ १२६ ॥
अथवा मधुकं रास्ना श्यामा ब्राह्मण्यष्टिका: अनन्तां पेशयित्वा तु गवक्षीरैैरच संपिबेत् ॥ १२७ ॥
अथवा मुलेठी, इयामक, ब्राह्मण्यष्टि, अनन्तमूल इनको पोसकर गौके दूधके साथ सेवन करे तो चतुर्थमासकी वेदना शान्त हो जाती है ॥ १२७ ॥
पुनर्नवां शाकोलिं तगरं नीलमत्पलम् । गोक्शुरं पञ्चमे मासे गर्भक्लेशहरं पिबेत् ॥ १२८ ॥
पंचममासमें—पुनर्नवा, काकोली, तगर, नीलोत्पल इनको लेकर गौके दूधसे पिये तो पंचममासकी वेदना दूर होती है ॥ १२८ ॥
अथवा बृहतीयुग्मं यज्ञाज्ञं *कुट्टमलं वरम् । गोघृतं क्षीरसंयुक्तं पिबेत्पिष्टवा च पञ्चमे ॥ १२९ ॥
अथवा दोनों कटेरी, ब्राह्मण्यष्टिका, कमलनाल गौके घी और दूधके साथ पञ्चाम मासमें सेवन करे ॥ १२९ ॥
सितां कपित्थमज्जां च शीततोयेन पेशयेत् । षष्ठे मासि गवां क्षीरैः पिबेत्क्लेशानिवृत्तये ॥ १३० ॥
छठे महीनेमें—मिश्री, कैथका गूदा, ठंडे जलके साथ पीसकर पिये वा गौके दूधके साथ पीनेसे वेदना शान्त होती है ॥ १३० ॥
- कटकत्वच् भी पाठ है, अर्थात् कुटकी तज ।
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अथवा गोक्सुरं शिग्रुमधुकं पृष्णिर्पानिकाम् । बलायुक्तं पिबेत्पिष्टवा गोदुग्धे: पष्टमासके ॥ १३१ ॥
अथवा गोखरू, संहजनां, मुलहठी, पृशिनपर्णी, खरेंटी इनको दूधसे पोस छटे महीनेमें सेवन करे ॥ १३१ ॥
कशेरुं पौषकरं मूलं शृङ्गाटं नीलमुत्पलम् । पिष्ट्वा च सप्तमे मासिक्षीरै: पीत्वा प्रशाम्यति॥१३२॥
सातवें महीनेमें–कसेरु, पुष्करमूल, सिंघाडा, नीलोफर इनको पीसकर दूधके साथ पीनेसे सातवें मासकी व्यथा शान्त हो जाती है ॥ १३२ ॥
अथवा मधुकं द्राक्षा शृङ्गाटञ्च कशेरुकम् । मृणालं शर्करायुक्तं क्षीरै: पेयं तु सप्तमे ॥ १३३ ॥
अथवा मुलहठी, दाख, सिंघाडा कसेरु, कमलकी जड इनको मिश्रीके साथ दूधमें मिलाय पान करे ॥ १३३ ॥
यष्टी पद्माक्षकं मुस्तं केशरं गजपिप्पलीम् । नीलोत्पलं गवां क्षीरै: पिबेदष्टममासके ॥ १३४ ॥
आठवें महीनेमें–मुलहठी, पद्माख, मोथा, नागकेशर, गजपोपाल, नीलोत्पल इन सबको गौके दूधमें पिये ॥ १३४ ॥
अथवा बलवमूल तु कपित्थं बृहतीफलम् । इक्षुपटोलयोर्मूलमेभि: क्षीरं प्रसाधयेत् ॥ १३५ ॥
अथवा बेलकी जड, कैथ, दोनों कटेरी अर्थात् छोटी बडी, गन्नेका रस, पटोलकी जड इनको दूधमें सिद्ध करे इस दूधको जलके साथ पोनेसे आठवें मासकी गर्भकी पोड़ा शान्त हो जाती है ॥१३५ ॥ १३६॥
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विशालाबीजकंकोलं मधुना सह पेशयेत् । वेदना नवमे मासि शान्तिमाप्नोति नान्यथा ॥ १३७ ॥
नौवें महीनेमें-इंद्रायनके बीज, क्षीरकाकोली (शीतल चीनी), शहदके साथ पीनेसे नववें महीनेकी वेदना शान्त होजातो है ॥ १३७ ॥
अथवा मधुकं इयामा ह्यनन्ता क्षीरकाकुली ॥ एभिःसिद्धं पिबेलक्षीरं नवमे वेदनावती ॥ १३८ ॥
अथवा मुलेठी, गुडूची, अनन्तमूल, प्रियंगु इनसे सिद्ध किये हुए दूधको पीनेसे नौवें महीनेकी वेदना शान्त होती है ॥ १३८ ॥
शर्करा गोस्तनी द्राक्षा सक्कौद्रं नीलमुत्पलम् । पाययेदश्रमे मासि गवां क्षोरैः प्रशान्तये ॥ १३९ ॥
दशवें महीनेमें-मिश्री, मुनक्का, शहद, नीलकमल इनको गौके दूधसे पान करे तो वेदना शान्त होती है ॥ १३९ ॥
अथवा शुण्ठिसंस्कृद्धं गोक्षीरं दशमे पिबेत् । अथवा मधुकं दारु शुण्ठिक्षीरेण संपिबेत् ॥ १४० ॥
अथवा सोंठसे सिद्ध कर गौका दूध दशवें महीनेमें पान करे अथवा मुलेठी, देवदारु, सोंठ गौके दूधसे पिये ॥ १४० ॥
सामान्यचिकित्सा
धात्र्यझजनं सावरयष्टिकाक्ष्यं त्र्यहं निपोतं प्रमदा हठेन । सप्ताहमात्रं विनियोज्य नारी स्तम्भनाति गर्भं चलितं न चित्रम् ॥ १४१ ॥
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जो नारी लोध (वा आमला) सौवोरांजन, मुलेठी सात दिन सावधान होकर पोती है तो उसका गर्भ स्तंभित होता है फिर चलाय मान नहीं होता । वा धनियां, रसौत, लोध, मुलेठी पीवे ॥ १४१ ॥ क्षौद्रं वृषं चन्दनसिन्धुजातं महेन्द्रमाज्यं पयसा सुपिष्टम् । गर्भं क्षरन्तं प्रतिहन्ति शोघ्रं योगाद्युक्तः किल मूलदेवैः ॥ १४२ ॥
शहद अडूसा, चन्दन, सेंधा, इन्द्रजौ, घृत इनको जलसे पीसकर देनेसे गिरता हुआ गर्भ शीघ्र थम जाता है, यह योग मूलदेवने कहा है ॥ १४२ ॥
कुलालहस्तोद्भवकर्दमस्य वत्सीपयः क्षौद्रयुतस्य मात्रम् । गर्भच्युतिं शूलमयीं निवार्य करोति गर्भं प्रकृतं हठेन ॥ १४३ ॥
कुम्हारके चाकपर बर्तन बनाते समय जो पतली मिट्टी हाथमें लगती है उसको ले बकरीके दूधमें डालकर शहदके साथ पिये तो शूलयुक्त गर्भका गिरना बन्द होकर गर्भस्र्थापन होता है ॥ १४३ ॥
करोष्ट्रकृज्जाटकजोरकाणि पयोघनैरणडशतावरीभिः । सिद्धं पयःशर्करया विमिश्रं संस्थापयेद्गर्भमुदस्य शूलम् १४४
करोऊ, सिघाडा, जीरा, नागरमोथा, एरण्ड और शतावरी इनसे सिद्ध किया हुआ जल मिश्रित डालकर पानसे शूल निवारण करता है और गर्भको गिरनेसे रोकता है ॥ १४४ ॥
कन्दं कौमुदकस्य माक्षिकयुक्तं क्षीराज्यमिश्रं पिबेत् सप्ताहं सत्तया सुपक्वसबलाशीतीकृतं वायुना । गर्भखावमरेचकं सपवनं शोको त्रिदोषं वर्जं ॥ १४५॥
शूलं सर्वविधं निहन्ति नियमादेवं च यत्तत्स्मृतम् ॥ १४५॥
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उपदेश: ८.
हिन्दीटीकासहित (१७७)
कुमुदके कन्दको शहद, घी दूध मिलाकर पिये अर्थात् इसमें मिश्री डालकर ठण्डा कर इनको नियमसे सात दिन पिये तो गर्भस्राव, आरोचक, वातरोग, सूजन, त्रिदोष, चमचमाहट, शूल ये सब नष्ट होजाते हैं ॥ १४५ ॥
होबरातिविषामुस्तामरिचे: संशृतं जलम् । दध्यादगर्भे प्रचलिते प्रदरे कुक्षिरुज्यपि ॥ १४६ ॥
होबर, अतोस, मोथा, मोचरस, कुटज, जो इनका क्वाथ कर गिरते हुए गर्भमें, प्रदरमें और कोष्ठरोगमें देनेसे शूलादि नष्ट होजाते हैं ॥ १४६ ॥
कवलयकन्दं सतिलं पीतवा क्षोरेग मधुसितायुतम् । गुरुतरदोषैरचलितं गर्भं संस्थापयेदाहु ॥ १४७ ॥
कमलका कंद, काले तिल इनको शहद मिश्रीयुक्त दूधके साथ पीनेसे भारीदोषसे गिरते हुए गर्भको भी शीघ्र स्तम्भन करता है ॥ १४७ ॥
नीलोत्पलमृणालानि मधुकं शर्करातिला: । द्रवमाणेषु गर्भेषु गर्भेस्थापनमुत्तमम् ॥ १४८ ॥
नील कमलकी नाल, मुलहठी, मिश्री, बड़ी कटेरी ये गिराते हुए गर्भको स्थापन करती हैं ॥१४८॥
इस यन्त्रको गोरोचनसाध्या-नामसहित भोजपत्रपर लिख भुजा या कंठमें धारण करे तो गर्भस्रावकी रक्षा होती है और दुर्भगा सुभगा होती है ॥ इति गर्भकावरक्षा ॥
'मोचकै: शृतं जलम्' यहभी पाठ है । अर्थ—कदली, कुटजवृक्ष ।
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अथ गर्भशुष्कनिवारणम्
गोक्शीरं शर्करायुक्तं गर्भशुष्कप्रशान्तये । पिबेद्वा मधुकं चूर्णं गर्भारोफलचूर्णकम् । समांशं शर्करायुक्तं गुवाकीं तु ततः पिबेत् ॥ १४९ ॥
शर्कराके सहित गौका दूध सेवन करनेसे शुष्कगर्भकी शान्ति होती है । अथवा गर्भारोके फलका चूर्ण वा मुलहठी चूर्ण शहदके साथ पान करे । अथवा गाभिणी स्त्री व जिसका गर्भ सूखता हो वह गायका दूध सेवन करे ॥ १४९ ॥
अथ सुखप्रसर्विधि:
श्वेतपुनर्नवामूलचूर्णं योनौ प्रवेशयेत् । क्षणात्प्रसूयते नारी गर्भेऽतिप्रपीडिता ॥ १५० ॥
श्वेत पुनर्नवा की जड़के चूर्णको स्त्रीकी योनिमें प्रवेश करावे तो तत्काल प्रसव होता है और गर्भकी पीडा नहीं होती है ॥ १५० ॥
उत्तराभिमुखं ग्राह्यं श्वेतगुज्जोयमूलकम् । कटचां बद्ध्वाविमुक्तं च गर्भपुत्रं तु तत्क्षणात् ॥ १५१ ॥
वासकस्य तु मूलं तु चोत्तरस्थः समुद्ररेत् । कटचां बद्धवा सप्तसूत्रैः सुखं नारी प्रसूयते ॥ १५२ ॥
उत्तरको ओर मुख कर श्वेत चोटीको जड़ ग्रहण करके कमरमें बंधनेसे सन्तान सुखसे प्रसव होती है । अथवा जड़को उत्तर मुख प्रहण करके उसे सात सूतसे कमरमें बांधे तो स्त्री सुखसे प्रसववती होती है ॥ १५१ ॥ १५२ ॥
उत्तरे च समालोड्यं श्वेतगुज्जाफलं कियत् । सुखप्रसवाम्नोतति तत्क्षणान्नात्र संशयः ॥
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योनीं वा लेपयेत्न सा सुखेन प्रसूयते ॥ १५३ ॥
उत्तरकी ओरका श्वेत चौंटलीका फल केशोंमें बांधनेसे सुखसे प्रसव करती है इसमें सन्देह नहीं । योनिमें लेप करनेसे सुखसे सन्तान उत्पन्न होती है ॥ १५३ ॥
सहदेवायाश्चमूलं वा कटिस्थं प्रसवेत्सुखम् ॥ १५४ ॥
सहदेई या खरेटीकी जड कमरमें बांधनेसे स्त्रीके सुखसे बालक उत्पन्न होता है ॥ १५४ ॥
अपामार्गस्य मूलं तु ग्राहयेच्चतुरङ्गुलम् । नारो प्रवेशयेद्योनौ तत्क्षणात्सा प्रसूयते ॥ १५५ ॥
चिरचिटेकी जड चार अंगुलकी ग्रहण कर योनिमें रखनेसे स्त्री सुखसे बालक उत्पन्न करती है ॥ १५५ ॥
तोयेन लाञ्छनं घृष्ट्वा योनीं प्रलेपयेत् । *नारिक्भ च लेपयेत्न तत्क्षणात्मूयते ध्रुवम् ॥ १५६ ॥
कलिहारीकी जडको पिसकर प्रलेप करे तो बहुत शीघ्र सन्तान होती है । या नारियलकी जड जलमें पीस लेप करे ॥ १५६ ॥
गुज्जाफलाद्र्धखण्डं च तोयपूरं तथार्द्धकम् । पिबेदवा तोयपिष्टं च सा सुखेन प्रसूयते ॥ १५७ ॥
चौंटली आधे पल, खंड आधे पल, सुपारी इनको जलके साथ पीसकर पीनेसे सुखसे स्त्री प्रसव करती है ॥ १५७ ॥
गुज्जातरोमूलयुगं विधानादुत्पाटच पुष्ये च रवौ निबद्धम् । कटीतले मूर्द्धनि नीलसूत्रैः शोभनं प्रसूंति कुरुतेज्जनाया: ॥ १५८ ॥
चौंटलोकी जड और चौंटली इन्हें विधिपूर्वक रविवारके दिन
- नालिकेरस्य मूलं । इति पाठान्तरम्
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पुष्य नक्षत्रमें लावे । उसको कमरके नीचे वा शिरमें नीलेसूत्रसे बांधनेसे स्त्री शीघ्र प्रसव करती है ॥ १५८ ॥
अगारधूमं गृहवारिणा वा पीत्वाडबलं शीघ्र तरणं प्रतूते । अलबुचामूलमस्थिो निबद्ध शोषधियां मातृ-रित्यवादितं ॥१५९ ॥
समातुलुंगं मधुकस्य चूर्णं मध्याज्यामिश्रं प्रमदा निपीय । व्यथाविहीनं प्रसवं हठेन प्राप्नोति नैवात्र विकलपबुद्धिः ॥ १६० ॥
अत्र मातुलुङ्गस्य मूलं योज्यं, न तु फलं क्वाथयित्वा पेयं ॥ गृहके धूमको जलके साथ पीनेसे स्त्री शीघ्र प्रसव करती है अथवा लज्जालुकी जड़ कमरमें बांधनेसे शीघ्र प्रसव होता है । यह राजाने कहा है । मातुलुंग (नींबू) और मुलहठीके चूर्णको शहद और घीसे मिलाकर स्त्री पान करे तो व्यथाके विनाही सुखसे सन्तान होति है । इसमें सन्देह नहीं । इसमें मातुलुंगकी जड़ ग्रहण करनी, फल नहीं क्वाथ करके पीना चाहिये ॥ १५९ ॥ १६० ॥
दशमूलीषृतं तोयं घृतसैन्धवसंयुतं । शूलातुरा पिबेश्रारो सा सुखेन प्रसूयते ॥ १६१ ॥
दशमूलकाढ़ा घृत और सैन्धवक सहित पिलानेसे शूलसे व्याकुल स्त्री सुखसे प्रसववती होती है ॥ १६१ ॥
सुखप्रसवमन्त्रः "ॐ मन्मथ ॐ मन्मथ ॐ मन्मथ मन्मथवा-हिनि लम्बोदर मुच्च मुच्च स्वाहा" अनेन मन्त्रेण जलं सुतप्तं पातुं प्रदेयं शुचिना
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नरेण । तोयाभिपानात् खलु गर्भवत्या प्रसूयते शौचत्रतं मुखेन ॥ १६२ ॥
"ॐ मन्मथ ॐ मन्मथ ॐ मन्मथ मन्मथवाहिनी लम्बोदर मुंच-मंच स्वाहा" इस मन्त्रसे पवित्र होकर जल गरम कर स्त्रीको पिलावे तो इस जलके पान करनेसे स्त्री सुखसे प्रसव करती है ॥ १६२ ॥
ॐकारं च हंकारं च आकारेण सुपूजितम् । ॐकारं शिरसं कृत्वा अन्ते नमस्त्रीमूर्त्तये ॥ १६३ ॥
"अं ॐ हां नमस्त्रीमूर्त्तये" ।
अनेनैव तु मन्त्रेण जप्तव्यं सूतिकागृहे । सुखं प्रसवमाप्नोति सा पुत्रं लभते ध्रुवम् ॥ १६४ ॥
ॐ कार हंकार आकारसे युक्तकर अंकार शिरपर कर अन्तम् त्रिमूर्त्तये नमः लगावे । 'अं ॐ हां नमस्त्रीमूर्त्तये' यह मन्त्र है । इस मन्त्रको प्रसूतिकागे घरमें जपे तो सुखसे प्रसव करती है और सुपुत्रको प्राप्त होतो है ॥ १६३ ॥१६४ ॥ इति सुखप्रसवविधि ॥
अथ बालानां सर्वग्रहणिवारणम्
बिल्वमूलं देवदारं च*गोशृङ्गं च प्रियङ्गु च । मार्जारस्य मलं कुष्ठं वंशतृगजमत्रकैः ॥ १६५ ॥
पिष्टवा धूपो निहन्त्याशु ग्रहभूतज्वरादयः । "ॐ इन्द्रावितं तपे ठं ठः स्वाहा" अनेन धूपं दद्यात् ।
डाकिनी राक्षसा: प्रेताः पिशाचा ब्रह्मराक्षसाः ॥
ऐकाहिको द्वचाहिकस्त ज्वरो नश्यति तत्क्षणात् ॥ १६६
- गो: शृङ्गम् इति च पाठः
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बेलकी जड, देवदारु, बबूर, प्रियंगुफूल, रक्तचीतेकी जड, बिल्लोका मल, कूठ और बांसकी छाल इन सबको बकरेके मूत्रमें पीसकर ॐ द्रावितं तापे ठंठः स्वाहा, इस मंत्रसे धूप देनेसे ग्रह, भूतज्वर, डाकिनी, राक्षस, प्रेत पिशाच ब्रह्मराक्षस दूर होते हैं। एकतरा तिजारी दूर होते हैं।॥१६६॥इस यंत्रको गोरोचन कुंकुमसे भोजपत्रपर लिख (प्रसूताके) बाहु वा कंठमें धारण करे तो डाकिनी प्रेतबाधा और ज्वरादिक नष्ट होजाते हैं। यह अमृतविजया विद्या है ॥
श्रीवासं सर्षपं कुष्टं वचा तैलं घृतं वसा । धूपो बालग्रहे देयो बालानां ग्रहशांतये ॥ १६७ ॥ चन्दन, सरसों, कूठ, वच, तेल, घी, चरबी इनका धूप बालिकाओंके ग्रहशान्तिके निमित्त देना चाहिये ॥ १६७ ॥
शिरोषनिम्बयो: पत्रं गोष्ठज्नस्य त्वचा वच: । वंशत्वक् शिखिपिच्छंच कंगुनाच समं घृतम् ॥ १६८ ॥ धूपो बालग्रहान् हन्ति स्वयं मन्त्रेण मन्त्रयेत् । धूपमन्त्र:-“ॐद्रुतं मुंच २ उडुमरेस्वर आज्ञापयति स्वाहा ॥” ॥ १६९ ॥
शिरस, नीमक पत्त, गोक सिंगकी त्वचा, वच, बासकी छाल मोरपंख, मालकांगनीके समान घृत इन सबको एकत्र कर “ॐ द्रुतं मुंच २ उडुमरेस्वर आज्ञापयति स्वाहा” यह मंत्र पढ इनकी धूप देनेसे बालग्रह दूर होते हैं ॥ १६८ ॥ १६९ ॥
पुनर्नवा|निम्बपत्रसर्षपघृतविरचितो धूप: । गर्भिण्या बालानां सततं रक्षाकर: कथित: ॥ १७० ॥
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पुनर्नवा, नीमके पत्ते, सरसों और घी इनकी धूप मंत्र पढ़कर देनेसे गर्भिणी और बालकोंकी रक्षा होती है ॥ १७० ॥
दाडिमस्य तु वन्दाकं ज्येष्ठात्रक्षे समुद्ररत् ।
द्वारे बद्धं तु बालानां सर्वग्रहणिवारणम् ॥ १७१ ॥
ज्येष्ठा नक्षत्रमं दाडिमकां वन्दे लब्ध्वा, उसकी बालकौ घरके द्वारमें बांधनेसे सब ग्रहोंका निवारण होता है ॥ १७१ ॥
पुष्याकं श्वेतगुज्ज्जाया मूलमुद्रुत्य धारयेत् ।
बालानां कण्ठदेशे च डाकिनीभयनाशनम् ॥ १७२ ॥
रविवारसहित पुष्यनक्षत्रमें श्वेत चौंटलोकी जड़ उखाड़कर धारण करावे, बालकोंके कंठमें बांधनेसे डाकिनोका भय नाश होजाता है ॥ १७२ ॥
वह यंत्र गोरोचनसे लिखकर धारण करनेसे वैश्वानरमुखी रक्षा बालकोंके सब ग्रह नाशिनी है, और बाल ग्रहोंसे तिर-
स्कृत हुओंको परम रक्षक है ॥
श्वेतापराजितापत्रं जयपत्रं द्वयो रसम् ।
नस्यं कुुर्यात्पलायान्ते डाकिनोदनान्वादय: ॥ १७३ ॥
श्वेत विष्णुक्रान्ताके पत्ते और गुडहर (जयन्ती) के पत्ते इन दोनोंके रसका हुलास देनेसे डाकिनी दान-
वादी पलायन कर जाते हैं ॥ १७३ ॥
इस यंत्रको भोजपत्रपर गोरोचनसे लिख कण्ठमें धारण करे तो पिशांच, डाकिनी,
कूष्मांड आदि, बालग्रह, उवर, अपस्मा रादिरोग शोघ्र नष्ट होते है
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सर्पत्क्कीशखिजारिष्टपललवं रजनो वचा । रसोनं हिंगु गोलेमशृङ्गोमरिचमाक्षिके: । धूप: सर्व्जवरघ्नोड्यं कुमाराणां ज्वरापह: ॥ १७४ ॥ सांपकी कंचली, सोसम, नोमके पत्ते, हल्दी वच, लहसन, हिंगु गौके लोम (वाल) काकडासिंगी, काली मिचर, शहद इनकी धूप सम्पूर्ण ज्वर तथा कुमारोंका ज्वर हरनेवाली है ॥ १७४ ॥
छुच्छुन्दरो मलं मांसं हरिद्राबिल्वपत्रकम् । इन्द्रजं सर्षपं पत्रं धूपयोगेन योजितम् । निहन्ति रोदनं रात्रौ बालस्याशु न संशय: ॥ १७५ ॥ छुचुंदरका मल, मांस, हलदी, बेलपत्र, इन्द्रजौ, सरसों, तेजपात इनको धूप देते रात्रमें बालकका रोदन थम जाता है, इसवें संदेह नहीं ॥ १७५ ॥१७६॥
मत्स्यराजस्य पित्तेन मरिचे भावयेद्बुध: । रविवारे रौद्रशुष्कमञ्जनात्सर्वभूतह्त् ॥ १७७ ॥ मत्स्यराजके पित्तमें कालोमिरचकी भावना दे, रविवारके दिन इसको सुखाय आंजनसे सब ग्रह दूर होते हैं ॥ १७७ ॥
नृसिंहस्य मन्त्रं तु सकृदुच्चारितं हरेत् । डाकिनीग्रहभूतानि तमः सूर्य्योदये यथा ॥ १७८ ॥ नृसिंहका मन्त्र एकबारभी पदे तो डाकिनी ग्रह भूतादि ऐसे भाग जाते हैं जैसे सूर्यके उदयमें अंधकार भाग जाता है ॥ १७८ ॥
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नरसिंह मन्त्र:
"ॐ नरसिंहाय हिरण्यकशिपुत्रवक्षःस्थलविदारणाय त्रिभुवनव्यापकाय भूतप्रेतपिशाचडाकिनीकुलोन्मलनाय स्तम्भोद्भवाय समस्तदोषान् हर हर विसर २ पच २ हन २ कम्पय २ मथ २ हौं ३ फट् २ ठः ठः एहि २ रुद्र आज्ञापयति स्वाहा ।"
"ॐ होंहोंहोंहूंहूंफट् स्वाहा" ।
अनेन वर्षपरमभिमन्त्रितं कृत्वा रोगिणं प्रहरयेत् तदा सर्वे ग्रहाः पलायन्ते ॥
"ॐ नरसिंहाय हिरण्यकशिपुवक्षःस्थलविदारणाय त्रिभुवनव्यापकाय भूतप्रेतपिशाचडाकिनीकुलोन्मलनायस्तंभोद्भवाय समस्तदोषान् हर हर विसर २ पच २ हन २ कम्पय २ मथ मथ हौं ३ फट् २ ठःठःठः एहि एहि रुद्र आज्ञापयति स्वाहा", "ओं हों हौं हौं हौं हं हं हं हूं फट् स्वाहा" इन मन्त्रों से सरसोंको पढ़कर मारे ताली बजावे तो सम्पूर्ण ग्रह भाग जाते हैं
बालग्रहाभिभूतानां बर्लि यत्नेन कल्पयेत् । शुचि पकत्वा तु सप्ताहं मत्स्यं मांसं सुराफलम् ॥ १७९ ॥
पुष्पधूपाक्षतं गन्धं दीपं च दक्षिणोदकम् । चतुष्पथे क्षिपेदात्रौ शुद्धे नूतनखर्परे ॥
शनौ वा कुजवारे वा बालदोषोपशान्तये ॥ १८० ॥
बलिदानमन्त्रः-"ॐ सर्वभूतेभ्योर्बलिंगृह्लु २ स्वाहा ।
जब बालकों को ग्रह आक्रान्त करले तो यत्नसे उनकी बलि कल्पित करे । सात दिन पर्यन्त पवित्र हो मत्स्य मांस, सुरा, फल, पुष्प, धूप, अक्षत, गंध, दीप, दक्षिणा यह सब वस्तु रात्रि में शुद्ध और नये
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सिकोरेमें लेकर शनिवार या मंगलको चौराहेमें "ॐ सर्वभूतेभ्यो बृंल गृहाण २ स्वाहा" यह मंत्र पढ रख आवे ॥ १७९ ॥ १८० ॥
इति बालानां सर्वग्रहणिवारणम् ।
अथ बालस्याहितण्डिकादिनिवारणम्
चन्द्रग्रह्रे शिखीमूलं विधानेनोदरेद्बुधः । बद्धं गले च जघने बालोऽहितुण्दिकां जयेत् ॥ १८१ ॥
चन्द्रग्रहण में कलिहारीको जड़को विधिपूर्वक लावे, उसको बालकके गलेमें या कमरमें बांधनेसे अहितुंडिका दूर होती है ॥ १८१ ॥
इवेताकमलं संगृह्य गृहस्तम्भे च बन्धयेत् । पुष्याके वा रवेर्वारे बालोऽहितुण्दिकां जयेत् ॥ १८२ ॥
पुष्यतिथियुक्त रविवारमें वा रविवारके दिन इवेत आककी जड़ लाकर घरके खम्भेमें बांधनेसे बालकका अहितुंडरोग दूर होता है ॥ १८२ ॥
उदुम्बरभवं मूलं शिशुकटचां च बन्धयेत् । बृंहल्क्ष्मांडवृत्तं वा तेनाहितुण्दिकां जयेत् ॥ १८३ ॥
गुलरकी जड़ लाकर बालककी कमरमें बांधे अथवा बडे पेठेकी डंठलो बांधनेसे अहितुंडिका रोग दूर होता है ॥ १८३ ॥
अथ स्त्रीणां पुष्पपरक्षार्थः
पलाशराजादनयोः फलानि पुष्पाण्यथो शाल्मलिपादपस्य । आज्येन मासाद्दिनं पिबंन्ति रक्षा भवे-त्रिशिवतमेव पुष्पे ॥ १८४ ॥
ढाक और क्षोरिणीवृक्षके फल सेमलके फूल यह घीके साथ पन्द्रह दिन पान करनेसे निश्चयहि स्त्रीकें पुष्पकी रक्षा होती है ॥ १८४ ॥
तुषाम्बुना पावकवृक्षमूलं निःक्षाथयित्वा नियमं
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चरन्तो । ऋतवन्तकाले त्रिदिनं पुरन्ध्री रक्षा भवेदामरणान्तमेव ॥ १८५ ॥
चौतेकी जड़ लेकर तुषके जलसे काढा कर नियमसे ऋततुके अन्त तिन दिन पीना करनसे जनम्पयन्त स्त्रीक आर्तवकी रक्षा होती है । कहिं ऋतुसमयमें तीन दिन पोना कहा है ॥ १८५ ॥
फलं कदम्बस्य च माक्षिकानि तुषोदकेन त्रिदिनं सकुद्दा । स्नानावसाने नियमेन पोतवा रक्षामवश्यं कुरुतेऽहuten ॥ १८६ ॥
कदमबके फल, सोनामखी इनको तुषके जलसे पीसकर स्नानके अन्तमें तीन दिन या एक बार इसे नियमसे सेवन करनेसे ऋतुकी रक्षा होती है ॥ १८६ ॥
त्रैहान्यं वा गुडमच्त नित्यं पलप्रमाणं वनिताद्धमासम् । जीवान्तिकं निश्चितमेव तस्या वन्ध्यात्वमुक्तं कविपुङ्गवेन ॥ १८७ ॥
जो स्त्री पन्द्रह दिन तक नित्य तीन वर्षके पुराना गुडका चार तोले प्रमाण सेवन करती है वह वन्ध्या होजाती है, ऐसा कवि पुंगवोंने कहा है ॥ १८७ ॥
कर्षद्रयं राक्षसवृक्षबीजं सप्ताहमात्रं सितशालिधान्यम् । ऋतौ निपीतं मृगशावकाक्ष्या रक्षार्थमेत्तत्रियतं प्रदिष्टम् ॥ १८८ ॥
दो कर्ष राक्षसवृक्षके बीज तथा शालिधान्य यह ऋतुके अन्तमें सात दिन तक पान करनेसे अवश्य पुष्पकी रक्षा होती है ॥ १८८ ॥
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अथ दुर्भंगाकरणम्
ज्येष्ठानक्षत्रे निम्बवनदाकं यस्या अर्द्धे दोयते सा दुर्भगा भवति ॥ १८९ ॥
ज्येष्ठानक्षत्र में नीमका वन्दा जिसके अङ्गमें डालाजाय वह दुर्भागा होती है ॥ १८९ ॥ इति दुर्भंगाकरणम् ।
दातृशक्तिप्रदयन्त्र
इन यंत्रोंको गरोचन और अनामिका (कनउँगुली) के रक्तसे भोजपत्रपर साध्यनामसहित लिख शहुत या घृतमें स्थापन करे तो अदातापन छूटकर दाता होजाता है, यदि इनके प्रभावसे सब कुछ अर्थात् बेहद देने लगे तो नीचे लिखे हुए यन्त्रको विधिपूर्वक बांधनेसे दातापन छूट जायगा ॥
दातृशक्तिनिवारणयन्त्रम्
साध्य (दाता) के चरणकी धूलिको हरितालके साथ मिलाय भोजपत्रपर इस यन्त्रको लिख पाटल मध्य (देवदत्तस्थान) में साध्यके दोनों हाथ लिख भांडमें रख उसपर मूत्रकर धर देवे तो हस्तस्तम्भन होता है यानी किसीको कुछ नहीं देता है ॥
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उपदेश: ८.
हिन्दीटीकासहित
(१८९)
अथ कलहकरनम्
विभोतकं तु शाखोटमूलपत्रेण संयुक्तम् । स्थापयेददगहद्दारे तस्य वै कलहो भवेत् ॥ १९० �
बहेड़ा,सिहोरेको जड़ पत्ते सहित जिसके घरके द्वारमें स्थापित करे, उसके यहां सदा कलह होता है ॥ १९० ॥
मार्जारमूषिकद्विजदिगम्बराणां लोमभिःध्रूपात । आद्र्रायां यत्र गृहे तत्र वै जायते वैरम् ॥ १९१॥
बिलाव, चूहा, ब्राह्मण, दिगंबर इनके लोमकी धूप आद्रा नक्षत्रमें जिस घरमें दे उस घरमें कलह होता है ॥ १९१ ॥
विशाखा नक्षत्रे निम्बवृक्षस्योत्तरमूलं विवस्त्री विमुखीभूय उत्पाद्य मुखेन यस्य च आलये क्षिपेततस्य गृहे प्रतयहं कलहो भवति ॥ शाखोट-मूलं पत्रं च एकीकृत्य स्थापयेत् । तथा दूरोकृते तु तद्गृहे भद्रं भवति । तत्रनक्षत्रे शाखोटबदरीबिज-द्वयमेकीकृत्य यस्य गृहे स्थापयेततस्य नितयं कलहो भवति ॥ १९२ ॥
विशाखानक्षत्रमें नीमके पेडकी जड़ उत्तरकी ओर मुखकर नग्न होकर मुखसे उखाड़े । उस जिसके यहां फेंक दे तो प्रतिदिन उसके यहां कलह होता है ॥ सिहोरेकी जड़ और पत्ते मिलाकर रखनेसे भी कलह होता है, दूर करनेसे दूर होता है ॥ विशाखानक्षत्रमें शाखोट और बेरकी दो गुठली एकत्र कर जिसके घरमें डाले उसके यहां नित्य क्लेश होता है ॥ १९२ ॥
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(१९०)
ब्रह्मदण्डीं समूलां च काकमाचीसमन्विताम् ।
जातोपूषपरसैः पिष्ट्वा सप्तरात्रं पुनः पुनः ॥ १९३ ॥
एष धूपः प्रदातव्यः शत्रुगोत्रस्य मध्यतः ।
यथागोत्रं समाध्रातः पिता पुत्रः समं कलिः ॥ १९४ ॥
इति श्रीनित्यनाथविरचिते कामरत्ने षण्ढीकरणादिकलहकरणान्त-
वर्णनं नामाष्टमोपदेशः ॥ ८ ॥
बल सहित ब्रह्मदण्डी, काकमाची (मकोया) इनको जाईके फूलोंके रसमें सात रात्रितक वारंवार पीसे । यह धूप शत्रुके गोत्रमेंदे इस धूपको सूंघनेमात्रसेही पितापुत्रमें भी कलह होजाता है ॥ १९३ ॥
इति श्रीनित्यनाथविरचितकामरत्ने पौडितज्वालप्रसादामिश्रकृतभाषा-
टीकायां पष्ठीकरणादिकलहकरणान्तं नामाष्टमोपदेशः ॥ ८ ॥
नवमोपदेशः
अथसर्वारिष्टनाशार्थं रक्षाविधिः
ईश्वरेण पुरा देव्यै यदत्तत्कथितं तथा ।
कादिद्रवसानं च ह्याक्षरं स्वरसयुतम् ॥ १ ॥
ईकारेणापि संपूज्य अधो रफत्रान्वितम् ।
ॐ कारशिरसं कृत्वा जप्तव्यं सिद्धिमिच्छता ॥ २ ॥
मन्त्रः-“ॐ हौंहौंहौंहों कींक्रोंवा”
“ॐ कीं खीं श्रीं ॐ ठीं थों फों हौं”
स्वसंयमनमन्त्रोयं शताद्रिं जपमात्रतः ।
अशेषारिष्टनाशः स्यादित्याह पुरूषोत्तमः ॥ ३ ॥
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ईश्वरने पार्वतीके प्रति जो कुछ कहा है वह यह है। आदि हकार अक्षर और स्वरके सहित वह हकारके सहित और नीचे रेफसे संयुक्त तथा आदिमें ओंकार लगाकर सिद्धिको इच्छा करनेवालेको जपना, चाहिये “ॐ हौं हौं हौं ॐहौं कों खौं क्षौं ॐ ठौं श्रौं फौं हौं” इस मन्त्रको ५० वार कहनेसैहि मन्त्र सिद्ध होजाता है और सम्पूर्ण अरिष्टको नाश करता है ऐसा शंकरने कहा है ॥ १-३ ॥
कपरं चपरं चैव ठपरं तपरं तथा । पपरं वर्णमाहुल्य इकारेण सुपूजितम् । अधोरेफ़समायुक्तमङ्कारशिरसं तथा ॥ ४ ॥
मन्त्र:——“ॐ खं ठं ठूं थं फं ह्म् । वा ॐ खों ठों ठूं श्रौं फौं हौं” (शुद्धम्) श्रद्धया तु महामन्त्रं ये पठन्ति सदा मुने । सर्वथा तस्य पुंस: स्यात्सर्वारिष्टविनाशनम् ॥ ५ ॥
ककार चकार टकार टकार पकार इनसे पर (द्वितीय) जो ख़ादि वर्ण हैं उनको और हकारको ईकार व उसके नीचे रेफ लगाय प्रथम आकार उच्चारण करे। मन्त्र यह है-“ॐ खों ठों छों हौं थों फों हौं” (शुद्ध) हे मुने ! इस महा मन्त्रका जो सदा श्रद्धासे उच्चारण करते हैं उनके सब अरिष्ट नाश हो जाते हैं ॥ ४ ॥ ५ ॥
हस्तेन रक्तपुष्पेण प्रथितया च माल्या । अभिमन्त्र्य शतेनापि दद्याद्देव्यै सदाङ्घे ॥ ६ ॥
यावज्जीवं शुभं तथ्य सर्वलाभो दिनेदिने । न गृहे निष्ठपात: स्यालिलिखितवा स्थापने डपि च ॥ ७ ॥
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हाथमें लाल फूलको माला लेकर इस मन्त्रको सौ बार अभिमन्त्रित कर देवको चढाते हैं जन्मपर्यन्त शुभ होता है अर्थात् दिनदिन अर्थलाभ होता है, इसे लिखकर स्थापन करनेसे घरमें अरिष्ट नहीं होता है ।।७।। इस यन्त्रको गोरोचनसे भोजपत्रपर लिख धारण करे (या घरमें रखलेवे) तो सब अरिष्टों (उपद्रवों) से रक्षा होती है ।
अक्षरांमान्त्यवर्णेन्लिलिखित्वा पचधाड्नघे अधोरेफसमायुक्तमोडकारशिरसं तथा ॥ ८ ॥ हकारेण च सम्पूज्यमन्ते फडक्षरं स्मृतम् । ईकारेण च सम्पूज्य अन्ते फडक्षरान्तिम् । "ॐ क्ष्रीं क्ष्रीं क्ष्रीं क्ष्रीं फट" ॥
मन्त्रोयं मम रुपस्य ध्यान जापं तथैव च । समैव हृदयं तस्य सदा तद्गतमनसः ॥ ९ ॥ सदा स्यात्तद्गृहे क्षेमं सहस्त्राईस्य जापतन् । त्रैलोक्ये तत्समो नास्ति नित्यं फलमवाप्नुयात् ॥ १० ॥
अक्षरोक् अन्त्य वर्णको पंचावधिस करके नोचें रेफ मिलाकर ॐ कार सहित उच्चारण करे । ईकार युक्तकर अन्तमें फट् लगावे । 'ॐ क्ष्रीं फट्' यह मन्त्र है । मेरेही रूपका ध्यान करे और जप करेऔर (तद्गत मन हो) मुझमेंही अपना मन लगावे । इस मन्त्रका पांच सौ जप करनेसे उसके घरमें सदा आरोग्यता रहती है, इसके समान त्रिलोकीमें कुछ नहीं, यह नित्य फलका देने वाला है ॥ ८।१० ॥
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जन्मान्तरे सुखी प्राणी श्रृणु देवि महाफलम् ।
नित्यं सम्पद्यते राज्ञा पत्नीया पुत्रेण बान्धवैः ।। ११ ।।
ज्ञातिभिः सज्जनैश्चापि शत्रुभिश्च विशेषतः ।
हे देवि ! इसका महाफल सुनो-जन्मान्तरमे भी वह सुखी होता है ।
इससे राजा स्त्री पुत्र बंधुओंके सहित नित्य सम्पत्तिमान होता है ।
ज्ञाति सज्जन शत्रु सबकी दृष्टिमें विशेष होता है ।। ११ ।।
अन्तद्वयं समागृह्य अधोरेफसमन्वितम् । १२ ।।
ॐकारसंयुक्तं कृत्वा रेखाबिन्दुसमायुतम् । १३ ।।
"ॐ क्षौं क्षौं" मन्त्रोयम् ।
अनेनैव तु मन्त्रेण ये जपन्ति महाजनाः ।
ते सर्वे *क्षेममायान्ति सततं तस्य जपान्ति ।। १४ ।।
अन्तके दो अक्षर ग्रहण करे। उसको रेफ लगावे, ॐकारसंयुक्त
करके रेखाबिन्दुके सहित मन्त्रोद्वार करे । मन्त्र यह है- 'ॐ क्षौं क्षौं'
इस मन्त्रको जो महाजन जप करते हैं वे निरन्तर
इस जपके फलसे क्षेम शान्तिको प्राप्त हो जाते
हैं ।। १२-१४ ।। इस यन्त्रको गोरोचनसे भोज-
पत्रपर लिख दक्षिण भुजामें धारण करे तो क्षेम,
शांति और रक्षा होती है
इशेतार्कमूलं पुष्यावर्के समुद्रृत्य विधारयेत् ।
बाहुम्र्यां व्याधयो न स्युःस्वरिष्टानि विशेषतः ।। १५ ।।
रविवार युक्त पुष्यनक्षत्रमें श्वेत आककी जड लावे । उसको
भुजामें बांधनेसे व्याधि और अरिष्ट नहीं होता है ।। १५ ।।
- शान्तिमायान्ति । इति पाठान्तरम् ।
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तद्दर्शनेन नश्यन्ति डाकिनीदानवादयः ।
तदुपेन पलायन्ते प्रेताद्या दूरतो ध्रुवम् ॥ १६ ॥
उसके दर्शनसेही डाकिनी अथवा दानव आदि नष्ट होजाते हैं
और इसको ध्यपसेही प्रेतादि दूरसे भाग जाते हैं ॥ १६ ॥
पूर्वाभाद्रपदात्रक्षे वन्दाकं तु शिरोऽजम् ।
संगृह्य शिरसि क्षिप्ते हृभयं भवति ध्रुवम् ॥ १७ ॥
पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रमें शिरका वन्दा लावे, उसको शिरपर रखनेसे
निरचयसे अभय होता है ॥ १७ ॥
विष्णुक्रान्ताभवं मूलं हस्तस्थं चौरभीतिजित् ।
- नरसिंहस्य मन्त्रेण सकृदुच्चरिते हरेः ।
डाकिनोग्रहभूतानि तेनः सूत्रोऽयमे वथा ॥ १८ ॥
विष्णुक्रान्ताकी जड हाथमें स्थित रखनेसे चोरका भय नहीं होता
है और नृंसिंहके मन्त्रसे सब दु:ख हर जाते हैं एवं डाकिनी ग्रह भूत
ऐसे नष्ट होजाते हैं जैसे सूर्यके सम्मुख अंधकार नहीं रहता ॥ १८ ॥
भूतप्रेतपिशाचादिभये स्मृत्वा नरोज्जयः ।
भैरवो तु महापूर्वी भवेदेव न संशयः ॥ १९ ॥
प्रेत पिशाचादिके भयमें महाभैरविको स्मरण कर मनुष्य अभय हो
जाता है, इसमे सन्देह नहीं ॥ १९ ॥
इस यन्त्रको गोरोचनसे भोजन
पत्त्रपर साध्य नामसहित लिख कंठमें
धारण करें तो उसके अरिष्ट
संबंधी सब जवर नाश होते हैं ॥
हीं | हीं | हीं
हीं देवदत्त हीं
हीं हीं हीं
- नरसिंह मन्त्रः १७२ पृष्ठे लिखितः ।
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उपदेश: ९. हिन्दीटीकासहित (१९५)
अथ निद्राकरणम्
निगडे चौरिकायां च पठित्वात्रयं मनुम् । सर्वे प्रहरिका यान्ति निद्राया वशमेव च ॥ २० ॥
चोर बेडीको तीन वार घन्ट्र्मे अभिमंत्रित करे तो सब पहरा करने- वाले सो जायेंगे ॥ २० ॥
मन्त्र:-“ॐकालकालिका महिषासुरनाशिनी योग- निद्राणी अमुकारपुरियादेवी कालिकामालायोग- निद्राणी उदयपाना ॥ नन्दीकाल मायाधरी नाग- निद्राणी या अमुकारपुरीदण्डपहरी भूपै लोटै कालिकार आज्ञा गडागडी पोठे कालिकार आज्ञा ॥”
इति लौकिकमन्त्र: ॥
“ॐकालकालिका महिषासुरनाशिनो योगनिद्राणी अमुकारपुरिया देवी कालिकामालायोगनिद्राणी उदयपाना ॥ नन्दीकाल मायाधरो नागनिद्राणी या अमुकारपुरी दंडपहरी भूपं लोटै आज्ञा गडागडी पीठे कालिकार आज्ञा ॥” इति लौकिकमन्त्र ॥
अथ निगमोक्तम्
“ॐ हौं चण्डाचण्ड उप्रचण्डारिका कालिका निद्रय निद्रय । इति मन्त्रेण महारात्रौ भवति ॥ एतन्मन्त्रं पठित्वा तस्य गृहे वा पठित्वा धूलिकृतवा क्षिपेत् । कालिका विद्या काल मोहै देवासुरनरके हो स्थिर लहै ॥ कालिका त्रिभुवन जगत कालिकार दासो पहरि । जागंतालि निद्र गेल महि मन्द्रभे यशो । कालिकार आज्ञा निद्राली लागे उदय देशि ।
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आनिन्द्रभागे ॥ गुवाकं खादित्वा तस्यावशिष्टं विवरं कृत्वा संयोज्य तत्र प्रक्षावयेत । तस्मिन् वाटिका-यामायाति तस्यानेन मन्त्रेण निद्रां करोति ॥ २१ ॥
अथ शास्त्रमन्त्र-ॐ 'हीं चण्डांड उग्र चण्डारिका कालिकानिद्रय २, इस मन्त्रसे महानिद्रा होती है । यह मन्त्र पढकर उसके घरमें विद्या निक्षेप करे । वह विद्या यह है-,'कालिका विद्या काल मोहै देवासुर नरतकहो स्थिर लहै, कालिका त्रिभुवन जगत कालिकार दासोपहारि-जागंतालि निद्रा गेल महि संदर्भे यशो कालिकार आज्ञा निद्राली लागे उदय देखि आनिन्द्र भागे '। सुपारी खाकर उसके अवशिष्टको विवर करके संयुक्त कर उसपर (प्रक्षाव) मूत्र कर उसे वाटिकामें रखदे । जो वहां उस वाटिकामें ऊपर जायेगा उसको निद्रा होगी ॥ २१ ॥
काकजंघाजटा निद्रां जनयेच्छरसि स्थिता । मूलं वा काकमाचीच कृष्णायास्तद्गुणं स्मृतम् ॥२२॥ घुंघुची और रुद्रजटा शिरपर डालनेसे निद्रित कर देती है अथवा काकमाची (मकोयकी) जड़, पोपल शिरपर डालनेका भी यही गुण है ॥ २२ ॥
मुनिखण्डकशाकं वा शय्यास्थाने खनेथ । करञ्जमूलं शिरसि बन्धनात्कुरुते तथा ॥ २३ ॥ बकवृक्ष (इक्षु विशेषका शाक) शय्यास्थानमें खोदकर गाड देनेसे अथवा करंजुकी जड शिरपर बांधनेसे नींद आजाती है ॥२३॥
निद्राकरणमन्त्र: "ॐ शुद्धे २ महायोगिनि महानिद्रे स्वाहा" मन्त्र- 'ॐशुद्धे२महायोगिनि महानिद्रेस्वाहा' यह महानिद्रायणोका मन्त्र है ।
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उपदेश: ९.
हिन्दीटीकासहित
(१९७)
मंत्र है, इसका ३०० जपकर इमशानकी गोमूत्रसे प्लावित मृत्तिका घरमें डालनेसे निद्रा होती है । यह निद्राकी विद्या संक्षेपसे कहो है ॥ नीलोत्पलं समरिचं नागकेशरमूलकम् ।
पिष्ट्वा तद्रजयेच्चक्षुर्निद्रामाप्नोत्यसंशयम् ॥ २४ ॥ नीलोफर, कालीमिरच, नागकेशर इन सबको बारोक पीसकर नेत्रोंमें आंजे तो अवश्य नींद आती है ॥ २४ ॥
निद्रानाशनम्
कुष्माण्डं महिषीभृङ्गं पिष्ट्वा तत्समभागकम् । लेपयेद्दक्षिणे पृष्ठे तस्य निद्राक्षयो भवेत् ॥ २५ ॥
पेठा और महिषीशृङ्ग इन दोनोंको बराबर भाग लेकर दहिनी ओर लेप करनेसे निद्राका क्षय होता है ॥ २५ ॥
शोभाञ्जनस्य बीजानि नीलोत्पलसुपुष्पकम् । समनागेशवरं पिष्ट्वा निद्रां मुर्च्छति चाञ्जनात् ॥ २६ ॥
सहिजनके बीज, नील कमलका पुष्प और नागकेशर इनको समान भाग ले पीसकर आंजनसे निद्राको छोड़ देता है ॥ २६ ॥
बृहत्पक्वफलंक पिष्ट्वा च मध्युष्टिभिः । क्षीरोत्कटेरोके पक्के फल (मधु) शहद वा मुलेठीसे पीस जिसके नेत्रेडञ्जनं दद्यात्तस्य विनिर्ऋति: ॥ २७ ॥
कटेरोके पक्के फल (मधु) शहद वा मुलेठीसे पीस जिसके नेत्रमें आंजे उसकी निद्रा क्षय होती है ॥ २७ ॥
कनकधत्तूरमूल मृताभ्रकेतकीपुष्परज: । एतानि पिष्ट्वा कपटनेषेन खादयेनिद्राभंजनं भवति ॥ २८ ॥
- कृष्णधत्तूरमूलम् ।
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कृष्णधतुरेको जड शोधा अभक केतकोक फूलोंका रस इन सबको पीसकर इवेत कटेरीके रसमे खवावे तो नींद नही आती है॥ २८ ॥
बन्धनयन्त्रम्
साध्यके पैरोंकी धुलि और हरताल इनसे साध्यका नीं नीं नी नी नाम सहित इस यन्त्रको लिख बरतनमें स्थापन करे इमशानमें गाडे तो अवश्य वह बंध जाता है॥
देवदत्त नीनीनीनि
अथ बन्धमोचनम्
मार्गशीर्षस्य पूर्णिण शिखिमूलं समुद्धरेत। बन्धनान्मुच्यते तेन शिखाबद्धो न संशयः॥ २९ ॥ मार्गशीर्ष महीनेकी पूर्णिमाको शिखी (चित्रक) की जड उखाड कर लेवे और उस शिखामें बांधनेसे अवश्य बंधनसे छूट जायगा। इसमें सन्देह नही॥ २९ ॥
बन्धमोचनमन्त्रः
"ॐ नमः कनकपिंगले * रुद्रदयांङ्के रौद्रास्थ-धारिण तिष्ठ तिष्ठ सरसर सर्वन्मोहय २ भगवति शिविजे तिमिरे महामाये स्वाहा॥" अष्टोत्तर-शतम जप्त्वा शिखायां पूर्वोक्तधं बन्धयेत ततः सिद्धिः। + प्लक्षांशेन ककारांतं लिखद्बन्धनमोचिनम्॥ ३० ॥
मन्त्र यह है-ॐ नमः कनकपिंगले रुद्रहृदयांङ्के रौद्रास्थधारिणि तिष्ठ तिष्ठ सर सर सर्वान्मोहय २ भगवति शिविजे तिमिरे महामाये स्वाहा।' यह मन्त्र एक सौ आठ वार जपकर शिखामें औषधी बांध-नसे सिद्धि होती है॥ प्लक्षांशसे ककार पर्यन्त मन्त्र लिखनेसे बन्ध-मोचन होता है॥
- रुद्रदयाङ्के वेतालासिद्धारिणि + लक्षवर्ण ककारं च इत्यपि पाठः
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उपदेश: ९.
हिन्दीटोकासहित (१९९)
मोचन होता है अथवा कवर्ण एक लाख लिखनेसे बन्धनसे मुक्त होता है ॥ ३० ॥
बन्धमोचनयन्त्राणि
इस यन्त्रको हलदी हरतालसे शिलापट्टपर लिख अधोमुख धर दे तो बन्धनसे मुक्त होगा ।
गोरोचनसे भोजपत्रपर साध्य नामसहित इस यन्त्रको लिख,,सुख नामा पिशाची अमुक हनहने पञ्च पञ्च शीद्रं वशमानय स्वाहा" इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित कर संपूटमें स्थापनकर उपरोक्त मन्त्र जपे तो बन्धनसे छूट जाता है ।
इस यन्त्रको गोरोचनसे भोज-पत्रपर लिख शिखामें बाँधे तो बन्धनसे मुक्त होजायगा ।
इस यंत्रको गोरोचनसे भोजप पत्र पर साध्यनामसहित लिख ग्रीवा या शिखामें धारण करे तो निश्चय बन्धनसे मुक्त होजाता है।
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अथ निगडादिभंजनम्
हस्तार्क सेन्दुवारस्य मूलं चोत्तरगं हरेत् । स्पर्शानं बन्धविच्छेदं कुरते शीघ्र मार्तः ॥ ३१ ॥
हस्तनक्षत्रे युक्त रविवारको उत्तर दिशाम् जाकर सिन्धुवार (सिम्हालु) की जड लावे, उसके स्पर्शमात्र से निगड भंग हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ३१ ॥
मांसो रक्तोत्पलं तुल्यं कृकलासे च भोजयेत् । तन्मलैर्गुटिकास्पर्शात्तालयन्त्रं भिनत्यलम् ॥ ३२ ॥
जटामांसी (बालछड) लाल कमल इनको बराबर ले कृकलास (घिरघट) को भोजन करावे । उसकी बीटको गुटिका के स्पर्श करक लगाने से तालयंत्र टूट जाता है ॥ ३२ ॥
सुपक्वमिष्टिकां कृष्णवस्त्री ग्राह्यास्तु योगिभिः । सूक्ष्मचूर्णं तु तां कृत्वा लोहीकिट्टमथापि वा ॥ ३३ ॥ सूत्रे रज्जुं दृढीकृत्य तिलतैलेन लेपितम् । तच्चूर्णं लोडितं कृत्वा महालोहं भिनत्त्यलम् ॥ ३४ ॥
सुपक्व इष्टिका (ईंट) और थूहर का रस लावे, उसका सूक्ष्म चूर्ण करके अथवा लोहीकिट्ट को लेकर सूत्र का रस्सी दृढ करके तिलक तेल से लिप्त करे । उस चूर्ण को लगावे तो यह महालोह को क्षण में तोड देता है ऐसा योगिराजों ने कहा है ॥ ३३ ॥ ३४ ॥
निगडभंजनमंत्रः
"ॐ नमो भगवते रुद्राय उडुमारे श्वराय बहुरुपाय नाना रुपधराय हस २ नृत्य नृत्य तुद २ नानाकौ-
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तुकेन्द्र जालदर्शकाय ठः ठः स्वाहा ।” अननेन सर्वयोगाभिमन्त्रणात् सिद्धिर्भवति ॥ ३५ ॥
ॐ नमो भगवते रुद्राय उड्डामरेश्वराय बहुरूपाय नानखधराय हस हस नत्य नत्य तुद तुद नाना कौतुकेन्द्रजालदर्शकाय ठः ठः स्वाहा’ इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित करनेसे सब सिद्धि होती है ॥ ३५ ॥
वाघवाहिनो 𑂮िहे या कालि २ कत्वामिका आर्यादेवी मन्त्रतोरदासरणे २ नाहिथिलशतो इदवोत्रिभुवनमातु चौसठ्ठिमि निबन्धन भागि आपला चण्डाचण्डचामुण्डोचामुण्डविकटका-
लिकामादशन आगो अमुकाबन्धनभाङ्ड्न्या आपलाँ बाँधव २ थायापयेनिञ्चुलचौसष्टोबन्धनविरकालो कामाछांडे हुंकारः चौसष्टीबन्धनकाचारंभागीभइ-
लल्या इखमकालिककारआज्ञा । अथवा जाआजा देविमैंचतोवदासरसेवान्नाहिविनासन्तोम्बो देво त्रिभुवनरणरमापचौसृटिबन्धनभागीओम्वेला । चं-
डाचंडचामुण्डाविकटृ कालिकामादनआगेमुका रबन्धभागीआँफेलावबा धवाघपायात्रनियन चौ-
सष्टोबन्धन मेलवरलोकिकालिकामै हुँकार चौ-
सठबन्धनकाठारभाद्रीभरलक्षारस्वारकालिका रआज्ञा । अथवा ॐ अग्निमुखीओपिपाचीअमुकंहन पच पच शोग्रंमेवशमानयस्वाहा” एतन्मन्त्र
द्रयं पूर्वमष्टोत्तरशतं जप्त्वा सप्तवारं जप्तेो नानाविध बन्धनच्छेदो भवति ।
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"ॐ वाघ वाहिनी-सिद्धे पाकादि लिका लायि । आआ जा देवीमे चिन्तो वदा सरसे बान नांहिं विनाशं तोम्बदेवी त्रिभुवन रणरमा पाचौ सृष्टि बन्धन भागी आभपेला चण्डा चण्ड चामुण्डा विकट कालिका मदन आगे अमुकार वन धन भायी आफेला व वाघ वाघ पायात्रानि पन चौसठि बन्धनमल विरला कासिका माछडे हूंकार चौसठि बन्धन कार ठार भाद्रि भाल क्षार स्वार कालिका आज्ञा ॥ यह दोनों मन्त्र पहले एकसौ आठ वार जपै फिर सातवार जपे तो अनेक प्रकारके बन्धन छेदन होजाते हैं ॥
"ॐ दं हूं ॐ" एतन्मन्त्रं पठित्वा करांगुल्या प्रहारे द्वारि दत्ते द्वारं मुक्तं भवति ॥ 'ॐ हूं हूं ॐ' यह मन्त्र पढकर हाथको अंगुलीके प्रहारसे द्वार मुक्त होता है ॥
"आय, आय चिच्चिर्चिठिचिठिहांलावज्रनन्दिकाकलिका" ।। अनेन मन्त्रेण श्वेतसर्षपं केतोदुम्बरपुष्पं त्रिः पठित्वा प्रथमद्वारे क्षिपेत् सर्वद्वाराणि भञ्जन्ति ॥ ३६ ॥इति निगडभञ्जनम् ।
'आय आय ंचि चिठि चिठि हांल वज्र नन्दिका कालिका' इस मन्त्रसे श्वेत सरसों । श्वेत उदुम्बरके फूल तीन वार पढकर पहले द्वारपर फेके तो सब द्वार भग्न होजाते हैं ॐ देवदत्तस्य निगड स्फोटय २ ता तुर ३६ ॥ इस यन्त्रको गोरोचन और कुंकुमसे भोजपत्रपर लिख शंख सम्पुटमें स्थापनकर त्रिकाल पूजाकर शिरमें धारण करे तो निगड भंजन होगा॥
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अथ गृहक्लेशनिवारणम्
तक्रपिष्टेन तालेन लेपयेत्पुत्रिकाकृतिम् । तामाग्राय गृहायान्ति मक्षिका नात्र संशयः ॥ ३७ ॥
हरतालको छाछक साथ पौंस्कर एक पुतली बनाय उस पुतलोक शरीरमें लेपकर रख्खे, उसको सूंघनेसे मक्खी नहीं आती, इसमें संदेह नहीं ॥ ३७ ॥
श्वेतार्कदुग्धकुलमाषं तिलचूर्णसमन्वितम् । अर्कपत्रेषु विन्यस्तं मूषकान्तकरं गृहे ॥ ३८ ॥
सफेद आकका दूध, कुलमाष (कुल्थी) उड़द वा काँजी, तिल इनका चूर्ण कर आके पत्तेपर रखनेसे मूषे नष्ट होजाते हैं ॥ ३८ ॥
तालकं छागविमूत्रं पलाण्डुं सह पेषयेत् । आलिप्य मूषिकं तेन जीवितं च विसर्जयेत् ॥ तं दृष्टवा च गृहं व्यक्त्वा पलायन्ते हि कौतुकम् ॥ ३९ ॥
हरताल, छागकी विष्ठा और मूत्र इसको प्याजके साथ पीसे, उससे मषिकाको आलेपन करके जीताहुआही छोड दे । उसको देखकर घरसे और चूहे कौतुकपूर्वक पलायन कर जाते हैं ॥ ३९ ॥
मार्जारस्य मलं तालं पिष्टवा मुषिकमालिपेत् । तमा ग्राय गहं त्यक्त्वा सद्यो निरीयान्ति मषिका: ॥ ४० ॥
मार्जारका मल, हरताल इनको पीसकर मूषकपर लेपेट छोड़ दे, उसको सूंधकर घर छोड़ चूहे अन्यत्र चले जाते हैं ॥ ४० ॥
गन्धकं हरितालं च ब्राह्मीतृटुसंयुतम् । छागलीमूत्रतः पिष्टवा पूर्ववन्मूषिकं लिपेत् ॥ ४१ ॥
गन्धक, हरताल, ब्राह्मी, त्रिकुटा छागलोके मूत्रसे पीसकर मूषकपर लेपेटकर छोड़ दे तो चूहे भाग जाते हैं ॥ ४१ ॥
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मघायां बृधनकं क्षेत्रे स्थापयेन्मधुकोटु.डूवम् । मक्षिकामुषकानां च जायते तुण्डबन्धनम् ॥ ४२ ॥
मघानक्षत्र्यं इवेत आककी जड़ मुलेठोके साथ शुभक्षेत्रमे स्थापन करे तो मषक और मघुमक्षिको तुण्ड बन्धनमे हो जाती है ॥ ४२ ॥
मूषकाकर्षको दीपः सावरोगुडतैलजः । गुड, तेल, सावररी पडा हुआ हो उसका दीपक मषक निवारण करता है ॥ ४३ ॥
"पूर्वे ब्रह्मा मे बद्धः पशिचमे विष्णुमें बद्धः उत्तरे रुद्रो मे बद्धः दक्षिणे यमो मे बद्धः पाताले वासुकी मे फणिसहस्त्रे बद्धः हूं अङ्गुष्ठाय नमः" । कर-सम्पुट कृत्वा तालत्रय दद्यात् । ततः मषिक- मषकनिवारणं भवति ॥ ४४ ॥
'पूर्वे ब्रह्मा मे बद्धः पशिचमे विष्णुमें बद्धः उत्तरे रुद्रो मे बद्धः दक्षिणे यमो मे बद्धः पाताले वासुकी मे बद्धः फणिसहस्त्रे बद्धः हूं अङ्गुष्ठाय नमः' इस मन्त्रसे करसंपुट कर तीन ताली दे तो मच्छडोंका निवारण होता है ॥ ४४ ॥
रोहिपतृणपुष्पं तु वर्तिमध्ये निवेशयेत् । तदृदोपदर्शानादेव क्षिप्र नश्यन्ते मत्कुणाः ॥ ४५ ॥
बहेडेका तृण और फूल बतौके बीचमें रख्खे, उसके द्वारा दीपक जलावे तो उस दीपकके दर्शनमात्रसे तत्काल खटमल नष्ट होजाते हैं ॥ ४५ ॥
अर्कतूलमयोवर्तिभावयेतावकेन च ।
*भावयेदावकेन च ऐसा पाठ है । अर्थ महारकरी भावना दे ।
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दीपं तत्कटुतैलेन निःशेषा यान्ति मत्कुणाः ।। ४६ ।। आके तुल्की बत्तीको कडवे तेलसे संयुक्त कर दीपकमे जलावे तो सब प्रकार खत्मल नष्ट हो जाते हैं ।। ४६ ।।
अर्जुनस्य फलं पुष्पं लाक्षा श्रीवासगगालम् । इवेतापराजितामूलं भल्लातकविडङ्कम् ।। ४७ ।।
धूपं सर्जरसोपेतं प्रदेयं गृहमध्यतः । सर्पाइच मत्कुणा मूषा गन्धाद्यांति दिशो दश ।। ४८ ।।
अर्जुनवृक्षके फल और पुष्प, लाख, इवेत, चन्दन,गूगल इवेत अापरा जिताकी जड, भिलावा, वायविडङ्ग, सर्जररस (राल) इनका चूर्ण कर घरमें धूप दे इसकी गंधसे सर्प चूहे खत्मल सब नष्ट हो जाते हैं ।। ४७ ।। ४८ ।।
गुडश्रीवासभल्लातविडङ्ङं त्रिफलायुतम् । लाक्षारसोज्कपुष्पं च धूपो वृश्चिकसर्पहृत ।। ४९ ।।
गुड, इवेतचन्दन वा चावल, भिलावा, वायविडङ्ग, त्रिफला, लाखका रस, आकका फूल इनकी धूप देनेसे घरमें सर्प और बिच्छू नहीं रहते हैं ।। ४९ ।।
मुस्तासिद्धार्थेभल्लातकपिच्छफलं गुडम् । चूर्णं भानुफलोपेतं दहेत्सर्जरसैः समम् ।। ५० ।।
मत्कुणा मशका: सर्पो मूषिका विषकोटका: ।। ५१ ।। पलायन्ते गृहं त्यक्त्वा यथा युद्धेषु कातराः ।
मोथा, सरसों, भिलावा, करञ्ज, कौञ्कके फल, गुड इनका चूर्ण कर आकके फलसे संयुक्त करे और उसके साथ रालको भस्म मिलाय धूप दे तो खत्मल मच्छर सर्प मूसक विषक केट ये सब युद्धमें कातर हुए मनुष्यके समान घरको छोडकर भाग जाते हैं ।। ५० ।। ५१ ।।
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सज्जररस: *शक्रमेदोज्जुनमूलमरुबककेतकनखबद्ध: । एतैर्धूपो रचित: कीटभुजगमशकमक्षिकादिहर: ॥५२॥
राल, कुडा, मेदा, अर्जुनकी जड, महुआ, केतकी, मूल, नखी इनकी धूप देतेसे कीट, सर्प मशक, मच्छर, शलदकी मक्खी ये भाग जाती हैं ॥ ५२ ॥
राजवृक्षफलं बद्धं खटवायां मत्कुणापहम् । लाक्षासर्ज्जरसोशीरं सर्षप: पत्रकं परम् ॥ ५३ ॥
खाटमें कारणिकार वा अमलतासका फल बांधनेसे खटमल रहने नहीं पाते । लाख, राल, खस, सरसों यह सब (दुःख) दूर करते हैं ॥ ५३ ॥
सोमराजस्य वृक्षस्य पल्लवाग्रेण वार्तिकाम् । कृत्वा दीपं प्रकुर्वीत मत्कुणैश्च विनिर्जयेत् ॥ ५४ ॥
सोमराज वृक्षके पत्तेके अगभाग द्वारा बत्ती बनाकर उसका दीपक जलानेसे खटमलोंका नाश होजाता है ॥ ५४ ॥
भल्लातकविडङ्गानि विशकं पुष्करं तथा । जम्बुलो मशकं हन्ति धूपाद्वा गृहमध्यत: ॥ ५५ ॥
बहेड़ा, वायविडंग, सोंठ, पुष्करमूल और जम्बु इनकी धूप देनेसे मशक दूर होते हैं ॥ ५५ ॥ इति गृहखलेशनिवारण॥
अथ क्षेत्रोपद्रवनाशनम्
अथ क्षेत्रस्य शस्यानां सर्वोपद्रवनाशनम् । वालुकाश्वेतसिद्धार्थान् प्रक्षिपेत् क्षेत्रमध्ये त: ॥ ५६ ॥
शलभ: सर्पकोटाश्च वराहमृगमूषिकाः । मशकास्तत्र नो यान्ति मन्त्रविद्याप्रभावत: ॥ ५७ ॥
- कल्कमेद: । ऐसा पाठ है अर्थ-मांसरोहिणी ।
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उपदेश: ९.
हिन्दीटीकासहित
(२०७)
अब खेतीके सम्पूर्ण उपद्रव नाश करनेवाला विधान कहते हैं-
वालुका, श्वेतसरसों इनको खेतके बीचमें डालदे तौ शलभ सर्प कीड़े वराह मृग मूषक खरगोश ये सब इस मन्त्रविद्याके प्रभावसे वहां नहीं आते हैं ॥ ५६ ॥ ५७ ॥
मन्त्र:-“ॐ नमः सुरेभ्यः बलजः जपपरि परिपरिरजपरिपरिमिल स्वाहा ॥ओं सुरेभ्यो नमः ॥”
“नम-स्कृत्य इमां विद्यां प्रयोजयेत् ॥ “विद्यां प्रयोजयामोति विद्या मे सिद्धचतु स्वाहा । अखिलजम्बू-कानां मृगाणां शशकानामन्येषां प्राणिनां शल-भादीनामन्येषां प्राणिनां तुण्डबन्धनं करोमोत्यत्र प्राणे कृतघ्नस्य तेन पापेन लिप्यते यत्र मन्त्रं व्य-तित्क्रमति स्वाहा ॥
एतन्मन्त्रद्वयेन वालुकाभिः सह श्वेतसर्षपान्सप्तवारमभिमन्त्र्य क्षेत्रमध्ये क्षिपे-त्सर्वोपद्रवो नश्यति ॥
मूषजम्बूककीटानां कुर्वते तुण्डवेधनम् ।
‘ॐ नमः सुरेभ्यः बलज जप परि परि परि रज परि परि मिलि स्वाहा ॐ सुरेश्योनमः’ इस प्रकार देवताओंको नमस्कार कर इस विद्याका प्रयोग करे । ‘विद्यां प्रयोजयामोति’ इन दो मन्त्रोंसे वालके साथ इ्वेत सरसोंको सात वार अभिमन्त्रित कर क्षेत्रके मध्यमें डालनेसे सब उपद्रव शांत होजाते हैं ॥ मूषक गोदड कीटादि जीवोंकी तुण्ड-बंधित होजाती है ॥
विद्यामडःकुशनाथस्य मन्त्रं वा भैरवस्य च ॥
"नमोनगरनाथाय हयहरहरशिल २ सर्वेषां प्राणिनां
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तुण्डबन्धनं कुरुकुरु हुंफट्स्वाहा उज्जयन्तीनगरों भैरवोले महादेवभण्डारफूलबोले हनुमन्तसाक्षी अस्तअस्तु" अनेन मन्त्रेण सप्ताथिमत्रितं चन्दनं वाटिकामध्ये निःक्षिपेत् । पुष्पफलं समस्तं निरुपद्रवं भवति ॥ ५८ ॥
अंकुशनाथी विद्या या भैरवका मंत्र पढ़े-ॐ नमो नागरनाथाय हय हरहर शिलशिल तदेवां प्राणिनां तुण्डबन्धनकुरु २ हं फट् स्वाहा । उज्जरनीनगरी भैरव बोले महादेव भंडार फूल बोले हनुमन्त साक्षी अस्ति अस्तु' इस मंत्रसे सात वार अभिमंत्रित कर चन्दन बगीचेके मध्यमें डालनेसे पुष्प फल सब निरुपद्रव होते हैं ॥ ५८ ॥
देवदालीं च सिद्धार्थं गुटिकां कार्येद्बुधः ।
क्षेत्रमध्ये तु निक्षिप्य सर्वपक्षिभयं हरंत् ॥ ५९ ॥
देवदाली सरसों इन दोनों वस्तुओंकी गुटिका करे । खेतके मध्यमें डाल देनेसे सब पक्षियोंका भय बुद्धिमान् दूर कर सकता है ॥ फूलवा-डोमं भो यह डालनेसे सब उपद्रव शान्त होजाते हैं ॥ ५९ ॥
पूर्वाषाढाख्यरत्नक्षे तु वन्दांं विभीतवृक्षजाम् । शस्यमध्ये क्षिपेत्केन शस्यवृद्धिभवेद्धुवम् ॥ ६० ॥
पूर्वाषाढा नक्षत्रमें बहेड़ेका बन्दा लेकर खेतोके मध्यमें डालनेसे शस्यकी वृद्धि होती है ॥ ६० ॥ इति शस्यबिके सर्व उपद्रवनाशन ॥
अथ गोमहिष्यादिदुग्धवदनम् "ॐ हुंकारणोपसव ॐ शोतलम्" अनेन सप्तवारं तृणादिकमभिमन्त्र्य भोक्तुं दद्यात् तदा बहुलं दुर्धं प्रस्रवति ॥ ६१ ॥
इति श्रीनित्यानाथविरचिते कामरत्ने नवमोपदेशः ॥
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उपदेश: १०.
हिन्दीटोकासहित
(२०९)
'ॐ हुंकारिणी प्रसव ॐ शीतलम्' इस मन्त्रसे तृण आदिको सातवार अभिमंत्रित कर गौ आदिके खानेको दे तो बहुत दूध गौ भैंस आदि देवेंगी ॥ ८१ ॥
इति गोमहिष्यादिदुग्धवर्द्धन ॥
इति श्रीनित्यानन्दविरचिते कामरत्ने पंडितजयालालत्रिसदामिश्रकृतभाषाटीकायां अरिष्टनाशादिशस्योप्रदवनाशानं गोमहिष्या दिदुग्धवर्धनं नाम नवमोपदेश: ॥ ९ ॥
अथ दशमोपदेश:
अथोच्चाटनम्
मङ्गलवारे रातरौ इमशानाद्झारं कृष्णवस्त्रेण कृत्वा रक्तसूत्रेण संवेष्ट्य च यस्य गृहोपरि क्षिप्येत्स्तथाभ्यन्तरे तस्योच्चाटनं भवति ॥
पञ्चाड्गुलं चित्रकस्य कोलं ग्राह्यम् पुनर्वसौ सप्ताभिमन्त्रितं गेहे खनन् ।
उच्चाटनं भवेत् ।
"ॐलोहितमुखेस्वाहा" अस्य अष्टोत्तरसहस्राजपेन पुरश्चरणम् ॥ १ ॥
मंगलके दिन रातको इमशानसे काले वस्त्रमें अंगार लावे । लाल सूतमें लेपेट जिसक घरमें डाले उसका उच्चाटन सात दिनमें हो ॥
पुनर्वसुनक्षत्रं चित्रक (अण्ड) को पांच अंगुल को लॆ । सात वार मंत्र पढकर जिस घरमें डाले उसे उच्चाटन होजायगा ॥
'ॐ लोहितमुखे स्वाहा'इसको १००८ जप पुरश्चरण करे ॥११॥
इमशानके अंगारसे इमशानके (चैल) वस्त्रपर इष्यन्त्रको लिख शत्रुके स्थान पर रखदे तो एक रात्रिमें ही उच्चाटन हो जाता है ॥
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(२१०) कामरत्न दशम-
भरण्यामंगुलैकं तु उलूकस्यास्थिकीलकम् । सप्ताभिमन्त्रितं यस्स्य खनेदुच्चाटनं भवेत् ।
मन्त्र:-‘ॐ दहदहहलहलस्वाहा ।। २ ।।’
भरणीनक्षत्रे एक अंगुल उल्की अस्थि लेकर सात वार मन्त्र पढकर जिसके यहां गाडदे उसका उच्चाटन होजाताहै । यह मन्त्र पडे
‘ॐ दह दह हल हल स्वाहा ।। २ ।।’
काकोलूकस्य पक्षांस्तु हुत्तवा हस्तोत्तरं शतम् । यन्नाम्ना मन्त्रयोगेन समस्तोच्चाटनं भवेत् ।।
‘ॐनमो भगवते रुद्राय दंष्ट्राकरालाय अमुकं सपुत्रबान्धवैः सह हन २ दह २ पच २ शोघ्रं उच्चाटय २ हुं फट् स्वाहा ।। ३ ।।’
कौए और उल्लूके पंख एकसौ आठ लेकर जिसके नामसे मन्त्र पढ हवन करे, उसका अवश्य उच्चाटन होगा । मन्त्र यह है-‘ॐ नमो भगवते रुद्राय दंष्ट्राकरालाय अमुकं सपुत्रबांधवैः सह हन २ दह २ पच २ शीघ्रं उच्चाटय २ हुं फट् स्वाहा ठःठः’ ।। ३ ।।
विष, राई, धतूरा, लवण और निम्बसे साधकाका नाम उहित
इमशानके वस्त्रपर इस यन्त्रको लिख इमशानमें गाड देनेसे उसका
उच्चाटन होता है, इसमें सन्देह नहींहै, इसका मन्त्र यहहै कि, ‘ॐ तारे २ ॐ तु रे स्वाहा’ ।
लेपयेत्काकपित्तेन कौलमंगु लसम्भवम् । निखनेद्यस्य भावने तस्यचोच्चाटनं भवेत् ।
‘ॐ ह्रीं दंडिन् २ महादण्डिन्रमोस्तुते ठः ठः’ ।। ४ ।।
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उपदेश: १०.
हिन्दीटीकासहित
(२११)
कौएके पित्तसे एक अंगुल कीलको लिप्त करे और उसे लिखकर जिसके द्वारपर डालदे उसका उच्चाटन हो जाता है। मन्त्र-ॐ हौं दंडिन् २ महादण्डिन् नमोस्तु ते ठ: ठ: ॥ ४ ॥
इस यन्त्रको उलूकके रोध्रसँ ध्वजवस्त्रपर पक्ष-को लेखनीसे लिख कागके गलमें बांध छोडदे तो उच्चाटन होजाता है।
नरास्थिकीलकं द्वारे निखन्याच्चतुरंगुलम् । मन्त्रयुक्तमरेद्वारी सत्यमुच्चाटनं भवेत् ॥ ॐॐॐ "ॐनमो भगवते रुद्राय अमुकं गृहूण २ पच २ त्रासय २ त्रोतय २ नाशय २ पशुपतिराज्ञापयति ठ: ठ:" ॥ ५ ॥
मनुष्यकी अस्थि (हड्डी) चार अंगुल मंत्र पढकर जिस शत्रुके द्वारपर गाडदे उसका अवश्य उच्चाटन होजायगा। मन्त्र यह है-ॐ नमो भगवते रुद्राय अमुकं गृहूण २ पच २ त्रासय २ त्रोतय २ नाशय २ पशुपतिराज्ञापयति ठ: ठ: १५।
स यन्त्रको बहेडेके पत्तोंके रससे भोज-पत्रपर जिसका नामसहित खरमंत्रमें डालकर तपा दे तो शीघ्र उसका उच्चाटन होता है॥
मृतकस्य पुरुषस्य निर्माल्यं चैलमेव च । प्रेतालयात् समागृह्य यस्मै गेहे निधापयेत् ॥ अष्टम्यां च चतुर्दश्यां तस्यैवोच्चाटनं भवेत् । एष योगो मया ख्यातो विना मन्त्रेण सिद्धचालित । उद्दृते सति शान्तिर्भवति ॥ ६ ॥
८
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मृतक पुरुषका निर्माल्य और चैलवस्त्र मरघटसे ग्रहण करके वैरोके घरमें डालदे । अष्टमी और चौदस्के दिन यह कृत्य करनेसे उसका उच्चाटन होजाता है, यह योग विनाहो मन्त्रके सिद्ध होता है । उखाडनेसे शान्ति होती है ॥ ६ ॥
श्वेतलाज्जलिकामूलं स्थापयेद्यस्य वेइ्मनि । निखनेतु भवेतस्य सद्य उच्चाटनं ध्रुवम् ॥ ७ ॥
श्वेत कल्हारोकी जडको जिसके घरमें डालदे, वा गाडदे उसको उस समय शीघ्र ही उच्चाटन होता है ॥ ७ ॥
सिद्धार्थी शिवनिर्माल्यं यदगेहे निखनेदबुधः । उच्चाटनं भवेतस्य हृदद्रुते तु पुनः सुखी ॥ ८ ॥
सरसों और शिवका निर्माल्य इनको जिसके घरमें गाडदे उसका उच्चाटन होजाता है और उखाडनेसे सुखी होता है ॥ ८ ॥
इस यन्त्रको रक्तसे ध्वजपीठ- पर लिखकर देवदत्तके स्थानमें साध्य नाम लिखकर,उसे काकके गलेमें बांध काको छोड़ दे ' तो उसका उच्चाटन होजाता है,
इस यन्त्रको बहेडेके पत्तोंके रससे भोजपत्रमें साध्यनामसहित लिखकर गधेके मूत्रमें डाल तपावे तो उसका उच्चाटन होजायगा ।
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उपदेशः १०.
॥हन्दो़कासहित॥
(२१३)
आकके पत्तेके रससे भोजपत्र-पर साध्यका नाम सहित इस मन्त्रको लिखकर मध्युमे स्थापन करे तो उसका उच्चाटन होगा।
इस यन्त्रको बहेडेके रस व खर-मूत्रमे भोजपत्रपर साध्यनाम सहित लिखे उसका उच्चाटन होगा।
संगृह्य वृक्षात्कार्न्य निलयं प्रदहेच्च तम् । चिताग्नौ भस्मत: शत्रोर्दत्त शिरास सुन्दरी ॥ तमुच्चाटयते देवि श्रृणु योगमनुत्तमम् । उच्चाटनं भवेत्स्य उद्धृतै च पुन: सुखी ॥९॥
वृक्षपरसे कौएका घोंसला लाकर उसे जलादे । उस चिताकी भस्म शत्रुके शिरपर डालनेसे अवश्य उच्चाटन हो जाता है । हे देवि ? यह उत्तम योग है; फिर उसको वहांसे अलग करनेसे सुखी होता है ॥ ९ ॥
हरतालसे पोपलक पत्रपर इस यन्त्रको लिख रखे तो जिसके नामसे लिखा है उसका उच्चाटन होजाता है ॥
कोलमौदुम्बरं शिन्या मन्त्रितं चतुरङ्लम् तं यस्मिन्खननेदगेहे तस्यैवोच्चाटनं भवेत् ॥ १० ॥
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(२१४)
'ॐ शिनी २ स्वाहा' इस मन्त्रसे उदुंबरको चार अंगुल कील जिसके घरमें गाड दे उसका उच्चाटन होता है॥ १० ॥
अथ उच्चाटनप्रकारान्तरमाह
उच्चाटनविधौ वक्ष्ये यथोक्तं श्रीमतोत्तरे।
निम्बपत्रे लिखेत्नाम महिषाश्वपुरीषकैः।
काकपक्षस्य लेखन्या लेखनीयमनन्तरम्।
मन्त्रस्तु-"ॐकाकतुण्डिधवलामुखि देइ अमुक-मुच्चाटय अमुकमुच्चाटय हूं फट् स्वाहा"॥ ११ ॥
एतं मन्रं महादेवी लिखित्वा पूर्ववस्तुभिः
निम्बकुक्षिस्थितं सर्वं काकगेहं नलेनथ।
इमशानबाह्ममानोय धत्तूरकाष्ठदीपितम्।
वन्ध्दा कृत्वा महातैलैरथवा कटु वस्तुभिः।
पूर्वोक्तमनुना तस्य होमयेद्रिधिपूर्वकम्॥ १२ ॥
अब दूसरी उच्चाटन विधिको कहते हैं। भैंसे और घोड़े की लीद से कौए के पंख की कलम से नीम के पत्ते पर शत्रु का नाम लिखे ,'ॐकाकतुंडि
यह मंत्र पढकर पूर्व वस्तुओं से लिखकर नीम के पेड पर स्थित कौए का घोसला लाकर धतूरे की लकडियों में उसको आग लगावे। महातेल अथवा कटु वस्तुओं से उपर लिखे मंत्र से विधिपूर्वक होम करे॥ ११-१२ ॥
धवलामुखीं च संपूज्य पञ्चोपचारयोगतः।
तस्माद्दूसं प्रक्षिपेच्च शत्रोश्च मदिरोपरि।
उच्चाटनं भवेततस्य सपुत्रपशुबान्धवैः॥ १३ ॥
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उपदेश: १०. हिन्दीटोकासहित (२१५)
धवलामुखी देवोका पंचोपचार योगसे पूजन करे, उसमेंसे भस्म लेकर शत्रुके मन्दिरपर डाले तो पुत्र पशु बांधव सहित उसका उच्चाटन होगा ॥ १३ ॥ इस यंत्रको कौएके रक्तसे सध्यनाम सहित धतूरेके पत्ते या धजवस्त्रमें लिख कौएके गलेंमें बांध पशिचम दिशामें प्रेषण अरे तो उस शत्रुका उच्चाटन हो जाता है ॥
धवलाध्यानम्
धूश्रवर्णा महादेवों त्रिनेत्रां शशिशेखराम् । जटाजूटसमायुक्तां व्याघ्रचर्मपरिच्छदाम् । कुण्डलेभ्यस्थितमलां च कर्त्तिकां च तथाम्बुजाम् ॥ १४॥ कोटाराक्षीं भोमदण्डां पातालसदृशोदराम् । स्वान्ते ध्यात्वा पूजयेद्द्रै योगध्यानपरो जन: । एष योगविधि: ख्यातो वीरतन्त्रे महेश्वरी ॥ १५ ॥
देवोका ध्यान यह है कि, धूश्रवर्णा महादेवो तीन नेत्र, मस्तकपर चन्द्रमा, जटाजूटसे युक्त, व्याघ्र चर्म धारण किये, कुशाशरीर, अस्थिमाला पहरे, कतरनी कमल लिये, खड्गोडलके समान नेत्रवाली भयंकर डाढें, पातालवत् गंभीर उदर है ऐसा ध्यान कर पूजे, हे महेश्वरी ? यह योग वोरतंत्रमें लिखा है
॥ १४ ॥ १५ ॥ बहेड़ेके पत्तोंमें रससे भोजन-पत्रपर साध्यका नाम सहित इस यंत्रको लिख गधेके मूत्रमें स्थापन करे तो उसका उच्चाटन होजाता है ॥ इत्युच्चाटनम् ॥
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अथ विद्वेषणम्
कपिरोमहिंगुदार्वोखरचर्माणि चूर्णयेत् ।
तच्चूर्णं मन्त्रसंजप्तं नामकर्मविदाभितम् ।
त्रिसहत्रं पुनस्तेन स्निग्धयोरस्तरालमनोः ।
धूपैरव विद्विष्टौ स्निग्धावाप भविष्यत: ॥ १६ ॥
वानरके रोम, हिंगु, दारुहल्दी, गर्दभवर्म इन सबको चूर्ण करे उस चूर्णको शत्रुके नाम सहित ३००० तीन हजार बार जपकर धूप देनेसे अति स्नेहयुक्त मित्रोंकाभी परस्पर द्वेष होजात है ॥ १६ ॥ इस यंत्रको भोजपत्र-
पर काक उलूकके रुधिर और लाक्षा रससे जिनदोनोंके नाम लिख विषम स्थापन कर उन दोनों का विद्वेषण होगा ।
तालपत्रे लिखेनमन्त्रं नामकर्मविदाभितम् ।
कृतप्राणप्रतिष्ठान्तं प्रजप्तं त्रिसहत्रकम् ।
विषालिप्तं द्विधा कृत्वा निखनेत्सन्धुरोधसि ।
स्निग्धयोराशु विद्वेष: स्यादुमेशानयोरपि ॥ १७ ॥
तालपत्र पर मंत्र लिख शत्रुका नाम कर्म लिखे उसकी प्राणप्रतिष्ठा कर ३००० मंत्र जपे उसे विष लिप्तकर दो खण्ड कर समुद्रके किनारे गडा दे तो शिव-शिवकाभी विद्वेष हो जाय और तो क्या है ? ॥ १७ ॥
एकहस्ते काकपक्षमूलकस्य तथापरे ।
मन्त्रीतवा मिलित्वाग्रं कृष्णसूत्रेण बन्धयेत् ॥ १८ ॥
अज्जलि च जले चैव तर्पयेद्दस्तपक्षक: ।
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उपदेश: १०.
हिन्दीटीकासहित (२१७)
एवं सप्तदिनं कु्र्यादष्टोत्तरशतं जपेत् । विद्वेषो जायते तत्र महाकौतुकमद्भुतम् ॥ १९ ॥
एक हाथमें काकपक्ष, दूसरेमें उल्लूका पंख ले मंत्रसे इनके अपमृत्यु मिलाय काले सूत्रसे बांधे फिर उस पक्ष सहित हवनसही होमसे सात दिन तर्पण कर १०८ वार जपे तो विद्वेषण होगा ॥ १८ ॥ १९ ॥
विप्रके जलसे कौआ और उलूक लिखे इनका जैसा वैर है
वैसा हो 'ॐ देव-देवयज्योस्त्वाहा' इस मंत्रसे एक घरमें नित्य जपकर भोजपत्रपर लिखे तो विद्वेषण होगा । तथा विष और बिडालके राधिरसे इमशानके अंगारसे जिनका नाम लिख ,काकोल्कोये यादृशं वैरं तादृशं वैरं देवदत्तयज्ञतत्योभवतु स्वाहा इस मंत्रसे काक उलूकको भोजपत्रपर लिखे तो विद्वेषण होगा ॥
मार्जारमाषिकाविष्टासाध्यपुत्तलिका कृता । नीलवस्त्रेण संवेष्टच मन्त्रयित्वा शतेन च ॥ विद्वेषो जायते तत्र त्रातरौ तातपुत्रकौ ।
मन्त्र:-"ॐ नमो महाभैरवाय च इमशानवासिन्ये अमुकामुकर्योवि्द्वेषं कुरु कुरु क्रीं फट" ॥ २० ॥
बिलाव और मूषक विष्ठासे साधकी पुतली बनाय नीले वस्त्रसे लपेट सौबार मंत्र पढे तो भाता पिता पुत्रमेंभी विद्वेष हो । मंत्र- ,ॐ नमो महाभैरवाॅयच इमशानवासिन्यै अमुकामुकर्योव्द्वेषं कुहु२ क्रीं फट्" ॥ २० ॥
एकहस्तेच काकपक्षमूलूकस्य तथापरे ।
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(२१८)
दर्भेण धारयेदत्नात् त्रिसप्ताहं जलाञ्जलिम् । रक्ताइबमारपुष्पैकं मन्त्रयुक्तं जलाञ्जलिम् ॥ २१ ॥
नित्यं नित्यं प्रदातव्यमष्टोत्तरसहस्रकम् । परस्परं भवेद्द्वेष: सिद्धयोगे उपर्हित: ॥ २२ ॥
एक हाथमें काक, दूसरेमें उल्लूका पंख ले कुशके साथ धारण कर तीन सप्ताहतक जलकी अंजलि दे। देतेवार लाल कनेरका फूल एक लेकर मन्त्र पढकर हाथमें धारण कर एक सहस्र आठ बार नित्य अंजली दे तो परस्पर द्वेष होजाताहै, यह सिद्धयोग कहा है॥ २१ ॥ २२ ॥
निवापाञ्जलिमन्त्र:
"ॐ नम: कटोटनीप्रमोटनीकी गौरी गौरी अमुकस्यामुकेन सह काकोलूकादिवल्कुरू २ स्वाहा"
ॐ नम: कटोटनी प्रमोटनीकी गौरी २ अमुकस्यामुकेन सह काकोलूकादिवत्कुरु: स्वाहा"। यह जलांजलिका मन्त्र है ॥ इति विद्वेषणम् ॥
अथ व्याधिकरणम्
तत्रिवारणं च
"ॐ अमुकं हन २ स्वाहा" अननेन मन्त्रेण कटुतैलाक्तं त्रिकटुं जुहुयात्तवा शत्रुबन्धिरो भवति ॥ २३ ॥
'ॐ अमुकं हन हन स्वाहा' इस मन्त्रसे कडुवे तेलके साथ त्रिकटुका हवन करनेमे शत्रु बहरा हो जाता है ॥ २३ ॥
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उपदेश: . १०
हिन्दीटीकासहित ( २१९ )
भल्लातकरसैर्गुज्जां कु्र्यादतिसूचूणिताम् । क्षिपेद्गात्रे भवेत्कुष्टं सिताक्षीरं पिबेत्सुखी ॥२४॥
भिलावेका रस और गुंजा इनका बहुत महीन चूर्ण करके जिसके शरीरपर फेक वह कुष्टी होता है, फिर मिश्री और दूध पीनेसे सुखी होता है ॥ २४ ॥ इस मंत्रको नोमके रससे भोजनपत्रपर लिख उसे शत्रुके द्वारपर गाडे तो शत्रुका गात्र सिकुड जाता है ॥
वानरीफलरोमाणि विषं भल्लातचूर्णकम् । गुज्जायुतं क्षिपेदगात्रे स्याल्लूता वेदनान्विता ॥
उशीर चन्दन च्व प्रियंगु रक्तचन्दनम् । तगरं पेषयेत्योयेल्पलूता दिनाशनम् ॥ २५ ॥
कौंचकी फलीके रोम, विष और भिलावेका चूर्ण इनमें चौटली मिलाकर जिसके शरीर डाल दे उसके गात्रमें महानोडयुक्त मकडीके फैलनेकी समान वेदना होतो है । खस, चन्दन और प्रियंगु, लालचन्दन और तगर यह चलेसे पीसकर लगावे तो लूताकी वेदना शान्त होजायगी ॥ २५ ॥
अथ ज्वरानयनम्
"ॐ चामुण्डे हन हन दहर पच पच मथ २ चल्ह २ अमुकं गृहू ण २ स्वाहा" अनेन कटुतेलनावर्तिनि- स्मपत्राणि यस्य नामा हूयन्ते तस्य शोघ्रं ज्वरो भवति । चित्रकपुष्पसहस्रं हुनेत् चातुर्थिक्ज्वरो भवति । लवणमष्टाधिकसहस्रं हुनेत् दाहज्वरो भवति ॥
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(२२०)
कामरत्न
दशम-
‘ॐ चामुंडे हन २ दहदह पच पच मथ २ चल्ह २ अमुकं गृहूण गृहूण स्वाहा’ यह मन्त्र पढकर कडुवे तेलके साथनीमके पत्तोंसे जिसका नाम लेकर हवन किया जाय उसको तत्काल ज्वर होता है; चीतके फूल एक वार लवण हवन करनेसे दाहज्वरहोत है ॥२६॥ यह यन्त्र कुंकुम गोरो-
वनसे भूर्जपत्रपर लिखे कंठमें बांधनेसे तिजारी नष्ट होती है ।
इस यन्त्रको चीतके फूलके रससे भोजपत्रपर जिसका नाम लिख आकी नलिका में करे उसे ज्वर होगा ।
इस यन्त्रको चित्रक पुष्पके सहित रससे भोजपत्रपर लिख आकी नलिका में रखने से तत्काल ज्वर होता है ।
इस यन्त्र को कोपलाके दूधसे साध्य का नाम सहित लिखकर कहीं गुप्त स्थान में रख्खे तो ज्वर हो ।
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उपदेशः १०.
हिन्दीटोकासहित
(२२१)
ॐचामुण्डे हन २ हं दह पच २ अमुकं गृहीग्रह स्वाहा" अनेन मन्त्रेण निम्बपत्रकटुतेलं साध्यनाम गृहीत्वा जuhuyात्स ज्वरेण गृह्यते। अनेन लवणाहुतिरष्टसहस्रं जuhuyात्स शूलन गृह्याते॥ २७ ॥
'ॐ चामुण्डे हन हन दह २ पच२ अमुकं गृहू ण २ स्वाहा इस मन्त्रसे नोमके पत्ते लेकर कडुवे तेल्द्वारा साधकका नाम लेकर हवन करे तो ज्वरसे ग्रसित होता है, इसी मन्त्रसे लवणकी आहुति अष्टोत्तर सहस्र हवन करनेसे शूलसे और ज्वरसे ग्रसित होता है ॥ २७ ॥
हींहींहींहीं सांहींहींहींहींहींहींहींहीं सोहींहींहींहींहींहींहींहींहींहींहींहींहीं
सिंहजना, विष ,रुधिर, और राईको एकत्रकर जिसका नाम लिख संहजनकी नलिका में डालकर तपावे तो वह ज्वरसे गृहीत होता है अथवा उपरोक्त वस्तुओंमें राई भी मिलावे । यह अनुभव किया है।
तेनैव वेत्नपत्रमष्टसहस्रं जuhuyात्स चतुर्थज्वरेण गृह्यते। रक्तपुष्पचित्रकरसेन यस्य नामाभिलिख्य भूर्जे॥ अर्कलतिकायां स्थापयेत्स दाहज्वरेण गृह्यते ॥
मन्त्र:-"ॐनमः श्रीर्न्सिहाय देवाय दनुजारये नमः कृष्णाय"॥ २८॥
वेत्नपत्र आठ सहस्र हवन करनेसे चारुथिकज्वरसे ग्रसित होता है। लालफूल और चीतके रससे जिसका नाम लिख भोजपत्रको आर्की बेलपर स्थापन कर दे उसे दाहज्वर होगा। मन्त्र-"ॐ नमः श्रीर्न्सिहाय देवाय दनुजारये नमः कृष्णाय" ॥ २८ ॥
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*स्नुक्पयोलेपनेनैव पानेन श्वेतकुष्ठकृत्। ताम्बूले इन्दगोपं च दत्त्वासौ श्वेतकुष्ठजित्। पीत्वा यत्ने यथापूर्वं भक्षेद्धा सोमराजिकाम् ॥ "ॐनमो भगवते हद्राय उद्दामरेश्वराय अमुकं रोगेणगृहू ण २ पच २ ताडय २ क्लेदय २ हूं फट् स्वाहा ठः ठः"उक्तयोगानामयं मन्त्रः ॥ २९ ॥
थूहरके दूधसे लेपवा पानसे श्वेत कुष्ठ होता है ताम्बूलमें वीरबहूटी खाय फिर सोमराजीके पीनेसे श्वेतकुष्ठ दूर होता है ॥ मन्त्र यह है-"ॐनमो भगवते हद्राय उद्दामरेश्वराय अमुकं रोगेणगृहू ण २ पच २ ताडय २ क्लेदय २ हूं फट् स्वाहा ठः ठः" उपरोक्तयोगोंका यह मन्त्र है ॥ २९ ॥
क्षिपेदृक्षे मृगशिरे तिन्तिडीकाष्ठस्य कीलकम्। पञ्चांगुलं रिपोगेहे वह्निमानद्य प्रजायते ॥ ३० ॥
सामुद्रं लवणं वह्नि केवलं वा समुद्रजम्। बन्धकया उदरं न्यस्तं सर्वमन्तः पुटे पचेत् ॥ ३१ ॥
मृगशिर नक्षत्रमें पांच अंगुल तेंदूवृक्षके काठकी कील शत्रुके घरमें डालनेसे अनिष्ट सनद होता है । समुद्रलवण चीता अथवा केवल सेधा-नोन बन्धककीमें रखकर सब अन्तरपुटसे जलादे ॥ ३० ॥ ३१ ॥
करवीरार्द्रकाष्ठेन तमादाय सुचूर्णयेत्। खाने पानेडपयेद्यस्य तस्य चक्षुः प्रणश्यति ॥३२॥
*सूकरस्य पयस्तैललेपेन इति वा पाठः । अर्थात् सूकरका दूध और तेल यह एकत्र कर शरीरमें लगाने और पीनेसे श्वेतकुष्ठ हो जाता है ।
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उपदेश: १०. हिन्दीटीकासहित (२२३)
कनेरके गोले काष्ठाद्वारा उसको लेकर चूर्ण करे जिसके खान पानमें डालदे उसके नेत्र नाश होजाते हैं ॥ ३२ ॥ दृष्टिके स्तम्भयितुं तस्य मरिकाक्षफलं वचा । हृष्टिके स्तम्भ करनेको कालोमिर्च बहेडेका फल और वच है ॥ करवीरपुष्पमष्टसहस्रमुक्तमन्त्रेण हुनेत् । अक्षिरोगो भवति ॥
आठ सहस्र कनेरके फूल उक्तमन्त्रसे वत्रूका नाम ले हवन करनेसेनेत्ररोग होता है ॥ उल्लूकमस्तकं ग्राह्यं लवणेन प्रपूरयेत् । मृत्पात्रस्थं सप्तवस्त्रमकक्षकाष्ठेन चालयेत् ॥ ३३ ॥
उल्लूका मस्तक लेकर लवणसे पूर्ण करे । सात दिनतक मृत्तिके पात्रमें रखकर बहेडेकी लकडीसे घोटे तो नेत्ररोग होता है ॥ ३३ ॥ अथ शत्रुश्रामणम्
अश्वत्थकोलमशिन्यां यस्य गेहे दशाङ्गुलं स्थापयेद्दोर्घयात्रा स्यात्तस्यापि न हि संशय: ॥ ३४ ॥ अश्विनीनक्षत्रमें पीपलकी दश अंगुलकी कील जिसके घरमेंस्थापित कर दे उसकी दोर्घ यात्रा होजातां है । इसमें सन्देह नहीं ॥३४॥ इस यंत्रको रक्तसे शवके उडाया हुआ वस्त्रमें लिख देवदत्त स्थानमें साध्यनाम अंकितकरवाव्य दिशामें डालनेसे वैरीश्रमताफिरेगा ॥
शृगालस्यास्यकोलं च स्थाप्यं स्याच्चतुरङ्गुलं । रिपोर्गेहे सोमत्रक्षे दीर्घयात्रा च तस्य वै ॥ ३५ ॥
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सोमदेवताके नक्षत्र मृगशिरमें शत्रुके त रमेंचार अंगुलकी गोदडकी अस्थिस्थापन करनेसे दीर्घयात्रा होजाय, इसमें हन्देह नहीं ॥ ३६ ॥
अथ उन्मत्तीकरणम् ।
तालकं धूतबीजं च घनचूर्णं तु भक्षयेत् । दत्त्वोनमत्तो भवेच्छत्रु: सिताक्षोरै: पुन: सुखी ॥ ३६ ॥
हरताल, धतूरेके बीज, मोथेका चूर्ण इनको देतेही शत्रु उन्मत्त हो जाता है। फिर मिश्री और दूध पीनेसे सुखी होता है ॥ ३६ ॥
तालकं लशुनं मूर्ध्नि क्षिप्तं यस्मै पिशाचकृत् । सुरामांससिताक्षोरं भक्षणाच्च सुखावहम् ॥
हरताल और लहसन जिसके ऊपर डालाजाय वह पिशाच तल्य होजाता है। सुरामांस सिता (मिश्री) औय दूध पान करनेसे उसी समय सुखी होता है। धतूरेके रस और काकके रुधिरसे धतूरेके पत्रपर साध्यनामसहितइस यंत्रको लिख धारण करे तो उन्मत्त होजायगा यह अनुभव किया है सत्य है ॥
मध्वाज्याभ्यां स्वर्णमाक्षीं पिष्टवा तत्कृतकज्जलम् । दत्तं यस्मैजनं नेत्रे उन्मत्तोऽसौ प्रजायते ॥ ३७ ॥
मधु घृत इनसे सोनामखीको पीसकर इसका काजर कर अंजन करनेसे वह उत्तम होजाता है ॥३७ ॥
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गोघृतं सैन्धवं तुल्यं वाराहस्य तु पित्तकम् । अजाक्षीरेण संयोज्यं पानेनोन्मत्तनाशनम् ॥ ३८ ॥ गौका घी, सैंधा यह बराबर ले वाराहका पित्त बकरीके दूधके साथ सेवन करनेसे उन्मत्तपन नाश होजाता है ॥ ३८ ॥
मयूरपारावतकुक्कुटानां ग्राह्यं पुरोषं कंकं च तालम् । तन्मूर्ध्नि दत्तं कुरुतेऽपि पिशाचवद्वत्रिते मुण्डितमस्तकेन ॥ ३९ ॥ मोर, कुक्कुट (मुरगा), कबूतरकी बीट इनको ग्रहण कर और हरतालको शिरपर डालनेसे वह प्राणी पिशाचवत् हो फिर शिर मुण्डानेसे सुखी होता है ॥ ३९ ॥
गुडं करञ्जबीजं च घनचूर्णं समंसमम् । फलस्यान्ते प्रदातव्यमुनत्तो भक्षणाद्द्ववेत् ॥ ४० ॥ गुड, करंजुएके बीज,माथेका चूर्ण इनको समानभाग लैकर फलमें दे तो भक्षण करतेही उन्मत्त होजाता है ॥ ४० ॥ शर्कराराजपुष्पाज्यक्षीरपाने सुखावहम् ॥ शक्कर, सोफ घृत, दूध इनका पान करनेसे सुखी होता है
"ॐ नमः उन्मत्तकारिणी विद्ये ठः ठः । उक्तयोग- गानामयमेव मन्त्रः ॥ ४१ ॥ ‘ॐ नमः उन्मत्तकारिणी विद्ये ठः ठः’ पूर्वोक्त योगोंका यही मन्त्र है ॥ ४१ ॥ इति उन्मत्तीकरण ।
अथ मारणम् नरास्थिकीलकं पुष्ये गृह्णीयाच्चतुरङ्गुलम् । निखननेदस्य गेहे तु भवेतस्य कुलक्षयः ॥ ४२ ॥
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"ॐ हूं हौं फट् स्वाहा" ॥ पुष्यनक्षत्रमें मनुष्यकी अस्थिकोलक चार अंगुलकी ग्रहण कर, ॐ हूं हौं फट् स्वाहा' से जिसके घरमें गाडदे उसका कुलक्षय हो जाता है ॥ ४२ ॥
अश्वारिस्थकोलमशिन्यां निखनेच्छतुरंगुलं । शत्रुगेहे निहन्यास्य कुुटुम्बं वैरिणां कुलम् ॥ "हुं हूं फट् स्वाहा" सप्ताभिमन्त्रितं शत्रुगेहे निखनेत् कुलक्षयं याति ॥ ४३ ॥
घोडेकी अस्थि कोल चार अंगुलकी अद्विनीनक्षत्रमें ग्रहणकर शत्रुके घरमें गाडनेसे वैरीके कुटुंब और कुलका नाश होजाता है 'हुं हुं फट् स्वाहा'इससे सात वार मन्त्र पढकर गाडे तो कुलक्षय हो ॥ ४३ ॥
"ॐ डं डां डि डौं डं डूं डे डौं डः अमुकं गृह्ल २ हुं हुं ठः २" अनेन नरास्थिकोलकं सहस्राभिमन्त्रितं चितामध्ये निखनेत् स ज्वरेण नश्यति ॥
'ॐ डं डां' इस मन्त्रसे मनुष्यकी हडडीकोल सहस्रवार अभिमन्त्रित कर चितामें गाडनेसे ज्वरसे नष्ट होता है । वा जिसका नाम लेकर जिसके घर वा इमशान में गाडे उसका नाश हो ॥
गोरोचनसे भोज-पत्रपर शत्रुके नाम-सहित लिख पात्रमें रख दूधसे प्लावित कर जलमें डाल दे तो शत्रुकी शांति अर्थात् मरण हो ॥
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उपदेश: १०.
हिन्दीटीकासहित
(२२७)
"ॐ णं णां णिं णीं णुं णूं णे णै णों णौं णं णः ठः ठः"
अनेन नरास्थषड्गुलकोलकं सहस्राभिमंत्रितं
यस्य नाम्ना गृहे इमशाने वा निखनेऽत्तस्य सर्व-
नाशो भवति ।।
ॐण्णणां' इस मन्त्रसे छः अंगुल नरास्थकोल ले हजारवार पढ़कर
जिसके नामसे घर वा इमशानमें गाडे तो उसका
नाशहो।।भोजपत्रमें इष्टटका,
हरिद्रा और हरितालसे
जिसका नामसहित इस
यन्त्रको लिख प्रच्छन्न स्थान
करे वह नष्ट होजायगा
निकालनसे स्वस्थहोगा नष्ट
मन्त्र और यन्त्र दोनोंहीके
करनेसे शीघ्र सिद्धि होती है.
निजनिज विधिके मन्त्र विधिसे समझ लेना चाहिये ।।
"ॐसुरेश्वराय स्वाहा"
सर्पास्थ्यड्गुलमेक तु चाश्लेषाया रिपोगृहे ।
निखनेत्सप्तधा जप्तं मारयेद्रिपुसंततिम् ।। ४४ ।।
आइलेषानक्षत्रमें सांपकी हड्डी एक अंगुलकी लेकर 'ॐ सुरेश्वराय
स्वाहा' यह मन्त्र सात वार जपकर शत्रुके घरमें गाडनेसे शत्रुके
सन्तानका नाश होजाता है ।। ४४ ।।
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"ॐ सों शोषणे स्वाहा"
निम्बषड्बिन्दुकौ ग्राह्यौ विषं त्वग्वानरोफले ।
एतच्चूर्णं प्रदातव्यं शत्रुशय्यासनादिषु ।
जायते स्फोटकास्तत्र दशाहामरणं भवेत् ॥ ४५ ॥
निंब, षड्बिन्दु, विष, कौंचके फल और छाल इनका चूर्ण ,ॐ सों शोषणे स्वाहा' इस मन्त्रसे जपकर शत्रुकी शय्या आसनादिमें प्रदान करे तो तीव्र स्फोटक हो जाते हैं; जिससे दशही दिनमें मरण हो जाता है ॥ ४५ ॥
स्नानभूमृत् भूमृत्स्नां सर्पवक्त्रे विनिक्षिपेत् ॥ ४६ ॥
वेष्टयेत्कृणसूत्रेण मार्गमध्ये ह्यधोमुखम् ।
निखननं कुर्यात् शत्रुस्समुत्थानं सुले भवेत् ॥ ४७ ॥
शत्रुके स्नानस्थान मूत्रस्थानकी मट्टीको सर्पके मुखमें डाल उसे काले सूत्रसे वेष्टित करके मार्गके मध्यमें नीचेको मुख कर डाले तो शत्रु मरने लगता है और उखाड़े तो मुखी होता है ॥ ४६ ॥ ४७ ॥
बामदन्तं कुलोरस्य ह्यद्योभागस्य चाहरेत् ।
शराग्रे फलकं कुर्यादिनुष्चित्रकेन्द्रनैः ॥४८॥
गवां शिरागुणं कृत्वा शत्रुं कुर्याच्च मृन्मयम् ।
तद्रज्जातेन बाणेन त्रियते तत्क्षणाद्रिपुः ॥ ४९ ॥
केंकड़के नीचेका बायां दांत लावे, उसको बाणके आगे फलमें लघावे और सावधानीसे रक्षा करे, चित्रकबा धनुष बनावे । धेनुकी शिराका डोरा डाले । शत्रुकी मट्टीकी मूर्त बनाकर उसपर इस बाणका प्रहार करे तो उस बाणसे प्रहार करतेही उसी समय शत्रु मरजाता है ॥४८॥४९॥
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आद्रायां निम्बवृन्दाकं शत्रोः शयनमन्दिरे ।
निखनेनेह्रयते शत्रुरुद्धृते च पुनः सुखी ।। ५० ।।
शत्रोर्हृदये स्थापयित्वा रिपोनाशो भविष्यति ।। ५१ ।।
आद्रानक्षत्रे नीमका वन्दा लाकर शत्रुके शयनस्थानमें गाडनेसे शत्रु मरजाता है, उखाडनेसे सुखी होता है । उसी प्रकार शिरसका वंदा लाकर उसी नक्षत्रमें शत्रुके घरमें स्थापन करनेसे शत्रुका नाश हो जाता है ।। ५०-५१ ।।
कृष्णवृषभरकतेन गडामृत्तिकया सह ।
तिलकं भालदेशे च कृत्वा सम्भावयेतु यम् ।। ५२ ।।
विद्धः स्वास्तिकमध्ये च प्रेतैश्च शुभं भवेत् ।। ५२ ।।
काले बैलका रक्त और गंगाकी मृत्तिकाका माथेपर तिलक कर जिसको सम्भावित करे वह विद्ध होता है । फिर तिलकको दूर करनेसे शुभ होता है ।। ५२ ।।
कृष्णछागस्यपादस्य खुरस्थं रोमकं हरेत् ।। ५३ ।।
कृष्णकुक्कुटकास्य प्राह्यां पक्षचतुष्टयम् ।
सर्वं दग्धवा तु भाण्डान्तस्तदूस्म जलसंयुतम् ।। ५४ ।।
ललाटे तिलकं कृत्वा वामहस्तेन निष्ठ्यया ।
यं शिरो नम्यते तस्य वेधो भवति निश्चितम् ।। ५५ ।।
काल बकरे और घोडेके पैरोंके खुरके बाल और काले मुरगे तथा कौएके चार पंख लेकर इन्हें जलाय इसको भस्म बरतनमें धरे । उसे पानीमें मिलाय वाम हाथकी अनुलीसें माथेपर तिलक कर जिसके आगे झुके उसका अवदय वेध होगा ।। ५३-५५ ।।
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ऊर्णनाभिश्च षड्बिन्दु: समांशं कृष्णवृश्चिकम् ।
यस्याङ्गे तत्क्षपेचूर्णं सप्ताहात्स्फोटकं भवेत् ।
मयूरपुच्छनोलाब्जं पिष्टवा लेपे: सुखावहम् ॥ ५६ ॥
ऊर्णनाभि ,षड्बिन्दुकोटे और उसकी बराबर काले वृश्चिकका
चूर्ण कर जिसके शरीरमें डाले तो सात दिनमें फोडे होजाते हैं । फिर
मोरपिच्छ और नीलकमलका लेप करनेसे वह सुखी होता है ॥५६॥
रिपुविष्टां वृश्चिकं च खनित्वा भुवि नि:क्षिपेत् ॥ ५७ ॥
आच्छाद्य प्रावरेनाथ तत्पृष्ठे मृत्किकां क्षिपेत् ।
स्रियते मलरोधेन उद्दृते च पुन: सुखी ॥ ५८ ॥
वृश्चिक और शत्रुकी विष्ठा पृथ्वोंमें खोदकर डाल दे तो शत्रुका
मल रुक जायगा, वह मृत्युकों प्राप्त होगा । उखडनेसे सुखी
होगा ॥ ५७ ॥ ५८ ॥
ॐ" ह्रीं क्ष: अमुकं क्षम" । अनेन मन्त्रेण राज-
कालवणशिवनिर्माल्यानी कटुतेलैसहहो-
मातृ शत्रुवध: ॥ ५९ ॥
'ॐ ह्रीं क्ष: अमुकं क्षम' इस मन्त्रसे राई, नोन, शिवनिर्माल्य
इनकी कटु तेलके साथ सहत्र आहुति देनेसे शत्रुका वध होता
है ॥ ५९ ॥
इस यंत्रको साधके रक्त से (शत्रुका) नाम सहित भोजपत्रपर
लिखे सिकोरमें डाल ज्वलित अग्निमें
स्थापन करे तो उभी समय शत्रु
नष्ट होजायगा ॥
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अथ अश्वनाशनम्
कृष्णजोरकचूर्णेन अञ्जिताश्वो न पर्यति । तक्रेण क्षालयेच्चक्षुः सुस्थो भर्वात घोटकः ॥ ६० ॥
काले जीरेका चूर्ण आंखमें डालनेसे घोडा अंधा होजाता है, फिर मट्ठेसे आखें धोनेसे स्वस्थ हो जाता है ॥ ६० ॥
घ्राणे छछुंदरचूर्ण दत्ते पतति घोटकः सुस्थिरचनदनपानेन नस्यं प्राप्य न संशयः ॥ ६१ ॥
मरो छछुंदरको सुखाय उसका चूर्णकर सुंघातेही घोडा गिरजाता है । फिर चन्दनकी नस्य देनेसे वा पान करनेसे स्वस्थ होजाता है । इसमें सन्देह नहीं ॥ ६१ ॥
अश्वास्थिकोलमथिन्यां कुर्यात्सप्तांगुलं पुनः । निखनेदश्वशालयां मारयत्येव घोटकान् ॥ ६२ ॥
अश्विनोनक्षत्रमें घोडेकी अस्थिको कील सात अंगुली बनावे उसे अश्वशालामें गाडनेसे घोड़े मर जाते हैं ॥ ६२ ॥
भरण्यामुक्तमन्त्रेण चितिकाष्ठस्य कीलकम् । अष्टांगुलं तु निखनेदश्वशाला विनश्यति ॥ ६३ ॥
ॐ नमो भगवते रुद्राय ॐ अश्वान् हन २ स्वाहा ॐ पच पच स्वाहा
भरणीमें आगे लिखे हुए मन्त्रसे चितिकाष्ठकी अष्टांगुल कीलक अश्वशालामें गाडनेसे घुडसाल नष्ट होती है । मन्त्र यह है- ॐ नमो भगवतेरुद्राय ॐ अश्वान् हन २ स्वाहा ॐ पच पच स्वाहा ॥ ६३ ॥
इति अश्वनाशन
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अथ सस्यानाशनम्
पुनर्वसौ चित्यकाष्ठकोलकं त्र्यंगुलं क्षिपेत् । शताभिमन्त्रितं क्षेत्रे सस्यं तत्र विनश्यति ॥ ६४ ॥
"ॐ लोहितमुखे स्वाहा" । पुनर्वसुनक्षत्रे (चित्यके) चिताके काष्ठकी कील तीन अंगुलके प्रमाणकी लावे उसका सौ वार "ॐ लोहितमुखे स्वाहा" इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित कर खेतमें डालनेसे खेती नष्ट होजाती है ॥ ६४ ॥
आर्द्रायां निःक्षिपेत्कीलं भल्लूकस्यास्थिसम्भवम् । क्षेत्रमध्ये तदा शत्रोः शस्यं सर्वं विनश्यति ॥ ६५ ॥
आर्द्रानक्षत्रमें भल्लूककी अस्थिकी कील शत्रुकी खेतोंमें डाल तो सब खेतो नष्ट होजाती है ॥ ६५ ॥
विशाखायां कालिकाष्ठकोलमष्टांगुलं क्षिपेत् । कदलीवटिकामध्ये नाशयेत्कदली फलम् ॥ ६६ ॥
विशाखानक्षत्रमें बेरोके काष्ठकी आठ अंगुली कदलीकी वाटिकामें डालनेसे केलेकी फली नष्ट होजाती हैं ॥ ६६ ॥
अथ रजकस्य वस्त्रनाशनम्
पूर्वोफाल्गुनिनक्षत्रे जातकाष्ठस्य कोलकम् । अष्टांगुलप्रमाणं तु निखनेद्रजकस्थले । शताभिमन्त्रितं तेन तस्य वस्राणि नाशयेत् ॥ ६७ ॥
"ॐ कुम्भं स्वाहा" । पूर्वाफाल्गुनिनक्षत्रे जातोफलकाठकी आठ अंगुली प्रमाणकी कोल 'ॐ कुंभं स्वाहा' इस मंत्रसे सौ वार अभिमन्त्रित कर धोबीके घरमें
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गाडनेसे रजकके वस्त्र नष्ट होजाते हैं ॥ ६७ ॥ इति रजकवस्त्रनाशनम् ॥
अथ धीवरस्य मत्स्यनाशनम्
संग्राह्य पूर्वफाल्गुन्यां बदरीकाष्ठकोलकम् । अष्टांगुलं च निखनेत्राश्रयेद्देवरे गृहे ॥ ६८ ॥
"ॐ जले स्वाहा ॥ ॐ मत्स्यका स्वाहा" ।। मन्त्रद्वयस्य तुल्यं फलम् ।
पूर्वाफाल्गुनीनक्षत्रे बेरोकी लकडी आठ अंगुलकी कील ग्रहण कर धीवरके घरमें गाडनेसे मछ्छयोंका नाश होजाता है । 'ॐ ज्वल स्वाहा अथवा ॐ जले स्वाहा' 'ॐ मत्स्यका स्वाहा' । इन दोनों मन्त्रोंका समान फल है ॥ ६८ ॥
सप्तांगुलं मघात्रक्षे भल्लातं काष्ठकोलकम् ॥ ६९ ॥ गृहीत्वा दाशगेहे तु देयं मत्स्यान् विनाशयेत् ।
मघा नक्षत्रमे सात अंगुलका भिलावेका काष्ठ धीवरके घरमें गाडनेसे मच्छयोंका नाश हो जाता है ॥ ६९ ॥
कृतिकायामर्ककाष्ठकोलकं त्र्यंगुलं क्षिपेत् । शत्रोर्वापीहृदादौ च मत्स्यस्तत्र विनश्यति ॥ ७० ॥
कृतिकानक्षत्रमे आर्ककी लकडी तीन अंगुलकी लेकर शत्रु धीवरके बावडी वा हृदादिमें डालनेसे उसमेंकी मछली नष्ट होजाती हैं ॥ ७० ॥
अथ कुम्भकारस्य भाण्डनाशनम्
हस्ते वै त्र्यंगुलं कीलं करवीरस्य काष्ठजम् । निखनेत्कुम्भकारस्य शालायां भाण्डनाशकृत् ॥ ७१ ॥
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हस्तनक्षत्रमें तीन अंगुल कनेरकी लकडी लेकर कुम्हारके घरमें गाडनेसे उसके बरतन टूट जाते हैं ॥ ७१ ॥
पच्चांगुलं निम्बकोलं तद्रक्षे पूर्ववत्फलम् ॥ ७२ ॥
पूर्वोक्त नक्षत्रमें पांच अंगुल नीमकी कील गाडनेसे पूर्ववत् फल होता है ॥ ७२ ॥
गोक्षुरं मेषशृङ्गं च बीजं वा कोकिललक्षणम् । शूकरस्य मलं वाथ मूलं वा इवेतगुञ्जकं । पाकस्थाने तु भाण्डानां क्षिप्तं स्फोटयते ध्रुवम् ॥ ७३ ॥
गोखरू, मेढ़ाशृंगी, तालमखाने, शूकरका मल अथवा इवेत चौंट लीकोी जड़ डालनेसे अवश्य बरतन फूटजाते हैं ॥ ७३ ॥
तैलं करञ्जबीजं च टडंकणन समन्वितम् । कृतवा भाण्डार्फुटत्येवमुक्तानां मन्त्र उच्यते ॥ ७४ ॥
हरताल और करंजके बीज, सुहागा यह सब वस्तु डालनेसे आवेके बरतन टूट जाते हैं इन प्रयोगोंके मन्त्र कहते हैं ॥ ७४ ॥
"ॐ मद मद स्वाहा" ॥ "ॐ गुरु हर स्वाहा" अथवा "ॐदमन्य दमन्य स्वाहा" मन्त्रत्रयस्यतुल्यं फलम् ॥
मन्त्र-‘ॐ मद मद स्वाहा, ॐ गुरु हर स्वाहा’ ‘ॐ दमन्य दमन्य स्वाहा’ इन तीनों मंत्रोंका बराबर फलं है । इति कुंभकारभाण्ड-
नाशन ॥
अथ तैलिकस्य तैलनाशनम्
मधुकस्य तु कोलं तु चित्रायां चतुरंगुलम् ! निखनेत्तैलशालायं तैलं तत्र विनश्यति ॥ ७५ ॥
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चित्रानक्षत्रमें चार अंगुल मुलेठोको कोल तेल शालामें डालनेसे तेल नष्ट हो जाता है ।। ७५ ।। "ॐ दह दह स्वाहा" सहस्रजप: ।। मल्लातकाष्ठं चित्रायां निखनेत्सालिक गृहे ।। अष्टांगुलं तदा तत्र ग्राहको नहि गच्छति ।। ७६ ।। 'ॐ दह दह स्वाहा' इस मन्त्रका सहस्र जप कर भिलावेकी लकड़ी चित्रा नक्षत्रमें आठ अंगुलको तेलोके घर गाडदे तो उसके यहां कोई ग्राहक नहीं जाता ।। ७६ ।। अथ गोपानां गवां क्षीरनाशनम् निक्षेपद्नुराधायां जम्बुकाष्ठस्य कोलिकम् ।। अष्टांगुलं गोपगृहं गाडुदुग्धं च विनश्यति ।। ७७ ।। अनुराधा नक्षत्रमें जामुनकी कोल आठ अंगुलको घोसीके घरमें डालनेसे उसका दूध नष्ट हो जाता है ।। ७७ ।। अथ ताम्बूलपर्णनाशनम् नवांगुलं पूरकाष्ठकोलकं निक्षिपेद्गृहे ।। ताम्बूलिकस्य क्षेत्रे वा ऋक्षे शतभिषाहये ।। तदा तस्य च ताम्बूलं नाशमायाति निश्चितम् ।। ७८ ।। नौं अंगुलको सुपारोके काठको कोल शतभिषा नक्षत्रमें तंबोलेके घरमें या तांबूलके खेतमें डालनेसे अवश्य ताम्बूलोंका नाश हो जाता है ।। ७८ ।। अथ शाकनाशनम् गन्धकं चूर्णकं तत्र क्षिपेज्जलयुतेन वै ।। नश्यन्ति सर्वशाकानि शेषाण्यल्पबलानि च ।।७९।।
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गन्धककाचूर्ण जलके साथ डालनेसे खेतमेंके सर्व शाक नष्ट हो जाते हैं ऋमसे निस्तेज हो शाक सूख जायगा ॥ ७९ ॥
अथ तन्तुवायस्य सूत्रनाशनम्
अश्विन्यां जाम्बरं काष्ठं तन्तुवायगृहे क्षिपेत् ।
द्वादशांगुलमानं तु सूत्रं तत्र विनश्यति ॥ ८० ॥
अश्विनोनक्षत्रमें बारह अंगुल जंबोरीकी लकड़ी जुलाहेके घरमें डाल-
नेसे उसके ताने नष्ट हो जाते हैं ॥ ८० ॥
अथ शौण्डिकस्य मदिरानाशनम्
कृत्तिकायामरककाष्ठं षोडशांगुलकं क्षिपेत् ।
शौण्डिकस्य च गेहे च मदिरा तत्र नश्यति ॥ ८१ ॥
कृत्तिका नक्षत्रमें आकोकी लकड़ी सोलह अंगुल कलालके घरमें
डालनेसे उसकी मदिरा नष्ट हो जाती है ॥ ८१ ॥
अथ कर्मकारस्य लोहनाशनम्
रोहिण्यां बदरो काष्ठं कौलमेकादशांगुलम् ।
कर्मकारगृहे क्षिप्तं लोहं तप्तं भवेत्प्रभु ॥ ८२ ॥
रोहिणोनक्षत्रमें बेरोके काष्ठकी ग्यारह अंगुलकी कोल लुहारकी
दूकानमें गाडनेसे लोहा तप्तन हों होता है ॥ ८२ ॥ इति कर्मकार-
लोहनाशन ।
शरीरवेधमोचनमंत्र:
अत्र* पारीसंभ्रमणकाय बन्धच्छेदकज्ञानविज्ञानन-
फूटे । अमुकारकायंहंकालिकाचण्डीतुमारेम-
फूटे अमुकारगाय हूंकाचण्दीतो हमारेमाशिल पाठरपरे अमुकार गासे मारैस-
समारे मुमारै रोडांब उलटावेधे विरुपाक्ष विराली उलटावेधे पिंडोमानापै ।
मोरे पिडेकर घाउलटावेधे डांकतुलखा: फोड २ दण्डी बिरुपाक्षरे आज्ञा वारत्रय
पडिआ प्रात:काल तीन गण्डूष पानी पिय ।
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शिलपाथरपडे अमुकारगामे नारससमारइ पुत्री-
मारौं तारकउलटावेधे विरुपाक्षरिवानी उलटा-
वेधे पित्र पानी जे मोर पिडे करे घाउलटावेधे
ताकफततुजी ला फोटफोटण्डीरिबुपेधेर
आज्ञा" वारत्रयं पठित्वा प्रतिप्रातः त्रिगण्डूषजलं
पेयम् यदि केनापि विद्धं स्यात् शरीरं तदैव
तेन कार्यमिति ॥ ८३ ॥
इति श्रीनित्यनाथविरचिते कामरत्ने उच्चाटनादिर्वर्णन
नाम दशमोपदेशः ॥ १० ॥
मंत्र-अमु पानीरा शाम्भुकाय वेध छेदक ज्ञान विज्ञानाफूटे
अमुकार कायं हूं कलिका चंडोतु इमोरमा शिल पाथरपडे अमुकार
गामे नार ससमारइ पुत्री मारौं तारक उलटा वेधे विरुपाक्ष रिबानी
उलटावेधे पित्र पानी जे मोर पिडे करे । घा उलटा वेधे ताक ताकतुजी
खा फोट फोट डण्डी विरुपाक्षेर आज्ञा । यह तीन बार प्रति प्रातःकाल
पढे और तीन घूंट जल पिये जो किसोसे विद्ध हो तो शरीरका वेध
छूट जाता है ॥ ८३ ॥
इति श्रीनित्यनाथविरचिते कामरत्ने पण्डितज्वालाप्रसादिमिश्रकृत
भाषाटीकासहित उच्चाटनादिर्वर्णन नाम दशमोपदेशः ॥१०॥
एकादशोपदेशः
प्रथ नानाकौतुकम्
शिखिनस्तु शिखाचूर्णं भोजयेऽहिनसप्तकम् ।
तद्विष्ठालिप्तहस्तस्य द्रव्यं लुप्यति तत्क्षणात् ॥ १ ॥
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मोरको मोरकी शिखा (कालिहारी) का चूर्ण सात दिनतक भोजन करावें उसकी विष्ठासे हाथ लपेटनसे तत्काल द्रव्य लुप्तरूप होजाता है ॥ १ ॥
सप्ताहं तिलतैलेन भावयेदातपे खरे । अडकोल्बीजचूर्णं तु योज्यं पेष्यं पुनः पुनः ॥ २ ॥
तत्तैलं ग्राहयेदात्रतैलकारस्य यन्त्रतः । अथवा कांस्यपात्रे डह तेन कल्केन लेपयेत् ॥ ३ ॥
उत्थाप्य स्थापयेद्रमें सम्मुखन्तु परस्परम् । तयोर्धः कांस्यपात्रे पतितं तैलमाहरन् ॥ ४ ॥
सात दिनतक तिलके तेलसे ढेराके बीजोंके चूर्णको भावना देकर धूपमें सुखावे और वारंवार सुखाय पीसे ॥ उसके तेलको कोल्हूमं पिलवा ले अथवा कांसीके दो पात्र उसके कल्कसे लेप करे फिर इसको उठाकर धूपमें रख्खे और सामने रख्खे उसके नीचे कांसेका बर्तन रखदे, उसमें जो तेल गिरे उसे ग्रहण करले ॥ २-४ ॥
इदमेवाडगुलीतैलं विध्रं सर्वत्र योजयेत् । लिप्तमडगुलितैलेन मण्डितं तत्क्षणाद्दिशेत् । सफलो जायते वृक्षस्तक्षणात्तत्र सश्चयः ॥ ५ ॥
यह अंगुली तेल सिद्ध और सब कार्य योगोंमें प्रयोग करे । उँगलीमें तेल लगाकर फेरनेसे उसी समय मण्डन होता है । वृक्षपर लगानेसे उसी समय वृक्ष सफल हो जाता है । इसमें सन्देह नहीं ॥ ५ ॥
पद्मिनोबीजचूर्णं तु भाव्यमडगुलितैलतः । न्यस्तं जले महाश्चर्यस्तत्क्षणात्पद्यसम्भवः ॥ ६ ॥
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एक अंगुली तेलमें कमलगटृकी भावना दे जलमें रखनेसे उसी समय कमलकी उत्पत्ति हो जाती है ॥ ६ ॥
यानि कानि च बीजानि जलजस्थलजानि च । अङ्गुलीतैललिप्तानि तानि तान्युद्भवान्ति च ॥ ७ ॥
जितने जलस्थलके वृक्षोंके बीज हैं एक अंगुली तैल मात्र लगानेसे उसी समय जम जाते हैं ॥ ७ ॥
यत्किञ्चिच्काण्डमूलोथ्यं पत्रपुष्पफलादिकम् । अङ्गुलीतैललिप्तं तु तुल्यरूपं भवेद्ध्रुवम् ॥ ८ ॥
जो कुछ काण्ड मूलसे उठे हुए पत्र पुष्प फल आदिका हैं, वे अंगुली तेलमात्र लगादेनेसे निश्चित तुल्यरूप हो जाते हैं ॥ ८ ॥
गुज्जाफलाम्बुपिष्टं च लेपयेत्पादुकाद्वयम् । विना क्लेशं नरो गच्छेत् क्रोशमेकं न संशय: ॥ ९ ॥
जलमें चौटली पीसकर खड़ाउंओपर उसका लेप करनेसे उसके ऊपर मनुष्य चढकर एक कोश जा सकता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ९ ॥
लघु दारुमयं पीठं गुज्जापिष्टेन लेपयेत् । शुष्कमन्तर्जले: सृदृश्यपुष्टं न मज्जति ॥ १० ॥
छोटी काठकी चौकीको चौंटली पीसकर लेपित करे और सुखाकर जलमें चौंकीपर बैठनेसे चौकी नहीं डूबती है ॥ १० ॥
गुज्जाबीजं त्वचोन्मुक्तं चूर्ण भाव्यं नृमूत्रकैः । सप्तवारं ततः काष्ठं लिप्तमड्गुलिसम्भवम् ॥ ११ ॥
तैलमादाय तल्लिप्तं पूर्ववत्पादुकागति: ॥ १२ ॥
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चौँटलीके बीजोंकी छाल अलग कर मनुष्यके मूत्रमें चूर्ण कर सातवार काठ पर लेप कर अंगुली तेल लेकर पूर्ववत् दोनों खडाउोंको लिप्त करे तो पूर्ववत् खडाउपर जासक्ता है ॥ ११ ॥ १२ ॥
वर्तिसर्ज्जरमैः पूर्णा तैललिप्ता जले स्थिता । ज्वालिता दीपवत्स्तु ज्वलत्येव न संशयः ॥ १३ ॥
रालकी बत्ती कर तेलसे लिप्तकरके जलाय जलमें रखनेसे वह बत्ती बराबर जलती रहेगी, इसमें संदेह नहीं ॥ १३ ॥
कटुतुम्ब्यत्थतैलेन पारावतचटोःड्कम् । मलं च शिखिमूलं च पेषितं गर्भभासिनाम् ॥ १४ ॥
ललाटे तिलकं तेन कृत्वा संदृश्यते पुनः । दशास्यो नात्र सन्देहो यथा लङ्केश्वरो नृपः ॥ १५ ॥
जो कड़वी तुम्बीके तेलसे कबूतर और चटककी बीट तथा मूलशिखाकी जड गर्दभकी हड्डीके साथ पीसकर माथेपर तिलक लगावे वह पुरुष दश शिरके रावणके समान निश्चयहों दीखता है ॥ १४ ॥ १५ ॥
शिग्रुबीजोत्थितं तैलं पारावतपुरीषकम् । वराहस्य वसादुप्तं शिखिमूलं समं समम् ॥ १६ ॥
ललाटे तिलकं तेन यः करोति स वै जनः । दृश्यते पञ्चवक्त्रोऽसौ यथा साक्षान्महेश्वरः ॥ १७ ॥
सहँजनैके बीजोंका तेल और कबूतरकी बीट सुअरकी चरबी शिखिमूल इनको समान भाग लेकर जो मनुष्य माथेपर तिलक करे वह पांच मुखवाला साक्षात् महेश्वरके समान दीखता है ॥१६॥१७॥
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रात्रौ कृष्णचतुर्दश्यां मयूरास्ये विनि:क्षिपेत् । भूर्जबीजमद: कृष्णां कृष्णभौमौनिवापयेत् ॥ १८ ॥ तज्जातभस्म संग्रह्य तया कुर्यात् रज्जुकम् । तद्रज्जुबद्ध: पुरुषो मयूरो दृश्यते जन: ॥ १९ ॥
कृष्ण चतुर्दशीको रात्रिमें मोरके मुखमें अतिविषाके बीज, सोमराजी, भारंगी इनको डालकर उन्हें काली मिट्टीमें बोवे । जब वह उत्पन्न होजाय तब उसकी रस्सी वटकर जिस मनुष्यको उससे बाधे वह मनुष्योंको मोर दीखता है ॥१८॥१९॥
तद्योगे कृष्णमाजीरवण्णे वैरण्डबीजकम् । तज्जातैरण्डबीजामेकवण्ण धारयेत् । तं प्रपश्यन्ति माज्जारं मनुष्या नात्र संशय: ॥ २० ॥
उसी योगमें कृष्ण बिलावके मुखमें अंडके बीजबोवे, उससे उत्पन्न हुए अंडके बीजोंको एककरके मुखमें धारण करे तो उसका मनुष्य बिलावकी सूरतका देखते हैं, इसमें संदेह नहीं ॥२०॥
शृगालरवामेषांच यदिने वापयेत्पृथक् । मयूरास्ये यथा भस्मीं याति सिद्धिर् तादृशी ॥२१॥
गोदड कुत्ता, मेढा इनके मुखमें पृथक् पृथक् डालनेसे मोरके मुखमें जैसे भृंगो सिद्ध होती है वैसी सिद्धि होती है ॥२१॥
रक्तगुज्जाफलं वाप्यं स्त्रीकपालेऽथ सेचयेत् । जातं फलं क्षिपेद्रज्जे स्त्रीरूपो दृश्यते पुमान् ॥२२ ॥
लाल चौंटलीके फलको धोकर स्त्रीके कपालमें बोकर उसका सोंचन करे,उससे जो फल उत्पन्न हो उसे मुखमें रखनेसे स्त्रीरूप दीखता ह॥२२
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नरादिसर्वजन्तूनां ग्राह्यं सद्योहितं शिरः।
तच्च कृष्णचतुर्दश्यां सर्वबीजान्वितं वपेत्॥ २३ ॥
भृङ्गीोधत्तरबीजानि * गुज्जानवीरकसंयुतम्।
निखननकृष्णभूम्यां तु बलिपूजान्वितम्॥ २४ ॥
सेचयेत्पलपर्यन्तं यावद्बीजानि चाहरेट्।
तत्तद्बीजे कृते वक्त्रे तत्तद्रूपं भवेध्रुवम्॥ २५ ॥
इत्येवं कौतुकं लोके नानारूपस्य दर्शनम्।
मुक्तबीजो भवेत्स्वस्थो नात्र कार्या विचारणा॥ २६ ॥
मनुष्यादि सम्पूर्ण जन्तुओंका तत्काल हित हुआँ शिर ग्रहण कर कृष्णपक्षको चौदसको उसमें सब प्रकारके बीज बोवे, भाँगरा, धतूरा, एरण्ड, चौँटली यह सब एकत्र कर कृष्णभूमिमें बलिपूजाके सहित उसको गाडे और फलपर्यन्त सींचता रहे। उसीके समान बीजोंको लेकर जैसे जैसे बीज मुखमें रखते जाय वैसे २ रूप दीखता है, इस प्रकार लोके रखते अनेकरूपका दर्शन होता है। बीजोंको त्यागनेसे स्वस्थ हो जाता है, इसमें संदेह नहीं॥२३–२६॥
हरितालं शिलाचूर्णमंगुलीतैलभावितम्।
तत्तद्वस्त्रं शिरस्सि स्थितं पहरति वन्हिवत्॥ २७ ॥
तथैव वाडकोलतेलैन स्फुरत्येव न संशयः॥ २८ ॥
हरिताल, मनशिलका चूर्ण मालकांगनीके तेलमें भावित कर उसे वस्त्रपर ल्गाय शिरपर धारण करे तो अग्निके समान दीखता है। इसी प्रकार अंकोलके तेलसेभी दीखता है, इसमें सन्देह नहीं॥२७॥२८॥
- गुल्मं निम्बफलं युक्तम् इति पाठान्तरम् ।
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सिन्दूरं गन्धकं तालं समं पिष्ट्वा मनःशिलाम् ।
तल्लिप्तवस्त्रधृक् चासौ रात्रौ संदृश्यतेsग्निवत् ॥ २९ ॥
सिंदूर और गंधक हरताल मनशिलको पोसकर उसे कपडेमें लगाय धारण कर रात्रमें जाय तो अनिके समान दीखता है ॥ २९ ॥
दूरेऽपि स्थितलोकैश्च रात्रौ तु कौतुकं महत् ।
खद्योतभूलताचूर्णं ललाटे तिलके कृते ।
रात्रौ संदृश्यते ज्योतिस्तस्मिन्नस्थाने तु कौतुकम् ॥ ३० ॥
इससे दूरसे स्थित हुए पुरुषोंको रात्रिमें बडा कौतुक दीखता है । खद्योत और हरतालके चूणको माथेपर तिलक करने से रात्रिमें बडी ज्योतिसी दीखेगी और कौतुक होगा ॥ ३० ॥
मुनिपुष्परसैः पुष्पैरष्टवाजनं ततः ।
अञ्जनताक्षो नरः पश्येन्मध्याह्ने तारकामयम् ॥ ३? ॥
अगस्त्यके फूलोंके रससे या फूलोंसे श्वेत अंजन घिसकर आँखोंमें लगानेसे मनुष्यको मध्याह्नसमयमें तारे दीखने लगते हैं ॥ ३? ॥
वाण्यं वार्ताकुबीजं च नृकपाले मृदा सह ।
तज्जातबीजमूलं वा मुखं प्रक्षिप्य मानवः ।
शतयोजनपर्यन्तं पश्येत्सर्वं यथान्तिकम् ॥ ३२ ॥
बैंगनके बीज मनुष्यकी खोपडीमें मिट्टीके साथ बोदेबे उससे उत्पन्न बीज वा जडको मुखमें रखे तो सौ योजनकी वस्तु निकट दीखने लगती है ॥ ३२ ॥
'स पर्येद्गरुडो यथा' इति पाठः ।
९.
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(२४४) कामरत्न एकादश- वारि मक्षिकया साधं तज्जलं यस्म भक्षणे । दोयते नि:शरत्तस्य हृाधोवायौ तु कौतुकम् ॥ ३४ ॥ जल मक्षिकाके साथ जिसे भक्षण करने को जल दिया जाय, उसको अधोवायुं यही मक्खी निकलती है यह कौतुक है ॥३४॥ उपरोक्तयोगानां मंत्र "ॐ नमो भगवते रुद्राय उड्डुमरेश्वराय * बहुरुपाय नानारूपधराय हसहस नृत्यनृत्य तुत्तुद नाना कौतुकेन्द्रजालदर्शकाय ठ: ठ: स्वाहा " ॥ anेन सर्वयोगानामभिमंत्रणे सिद्धि: अष्टो- त्तरशतजपे न पुरश्चरणम् ॥ ३५ ॥ 'ॐ नमों भगवते रुद्राय उड्डुमरेश्वराय बहुरुपाय नानारुपाय हस हस नृत्य नृत्य तुद तुद नानाकौतुकेन्द्रजालदर्शकाय ठ: स्वाहा इस मंत्रको एक सौ आठ बार नित्य जपकर पुरश्चरण करनेसे मंत्रकी सिद्धि होती है, इस मंत्रकी सिद्धिसे उपरोक्त योगोंकी सिद्धि अवश्य होजाती है ॥ ३५॥ इति नानाकौतुकसिद्धि: ॥ अथ खड्गस्तम्भनम् "सिद्ध +वस्तु सुमति मोहरमाचान्द्र सुरज मोहो- वरभाई मोहो वरं आगे कोप खण्ड फूटे रक्षा- कर देवी कालिका चण्डी आई चान्दसुरज तुजि मलेमुजि फूटे रामेर आज्ञा सिद्धि" अनেন
- 'वज्रुपाय' इति वा पाठ. । + सिद्धिवंसुमतिमोहीरमावादसुरजमोहोर माइमोरअंगे कोप खाडाफूटबहुकशकरेंदेवीकालिकाचंडीआई। चंदसुरजइमई लेमुइफटरोमेर आज्ञासिद्धहलव इति पुस्तकान्तरे पाठोस्ति ।
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उपदेश: ११.
हिन्दीटीकासहित
(२४५)
वारत्रयाभिमन्त्रितम धूलिना प्रोक्षिते गात्रे कृपा-
णधारा रेखा भवति नान्यथा ॥ ३६ ॥
इति श्रीनित्यानाथविरचिते कामरत्ने नानाकौतुकंनामेकादशोपदेश:
॥ ११ ॥
"वस्तु सुमते महरिमाचन्द्र सुरज मही वर भाई महह वर आगे
कोप खांडा फूट रक्षाकर देवी कालिका चण्डी आई चांसुरनतुजि
मले मुजि फूट रामेर आज्ञा सिद्धि " इस मन्त्रसे तीनबार अभिमन्त्रित
कर धूरिसे शरीरको आच्छादित करे तो कृपाण धारा रेखा हो
जाती है, इसमें अन्यथा नहीं है अर्थात् खड्ग बन्धन हो जाता है ॥३६॥
सर्वार्थसिद्धिप्रदयन्त्रम
यह यन्त्र कुंकुमसे भोजपत्रपर लिख दक्षिण भुजामें धारण करे तो
सर्वार्थसिद्धि देता है, इसमें सन्देह नहीं है।
इति श्रीनित्यानाथविरचिते कामरत्ने पंडितज्वालाप्रसादमिश्र-
कृतभाषाटीकायां नानाकौतुकं नामैकादशोपदेश: ॥ ११ ॥
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द्वादशोपदेशः
अथ काम्यसिद्धिः
पुष्याके तु समागृत्य मूलं श्वेतार्कसम्भवम् ।
अङ्गुष्ठमितां तस्य प्रतिमां तु प्रपजयेत् ॥ १ ॥
गणनाथस्वरूपां च भक्त्या रक्ताश्वमारजे:
कुसुमैश्चापि गन्धाद्यैर्हविष्याशी जितेन्द्रियः ॥ २ ॥
- पूजयेन्नाममन्त्रैश्च तद्वीजानि नमोडन्तकैः:
यान्यान्प्रार्थयते कामान्मासैकेन तु लभ्यते ॥ ३ ॥
प्रत्येकं काम्यसिद्ध्यर्थं मासमेकं प्रपूजयेत् ॥ ४ ॥
रविवार पुष्यनक्षत्रमें श्वेत आककी जड ग्रहण कर उसकी एक अङ्गुष्ठके समान प्रतिमां बनाकर भक्तिभावसे ललित कनेरकी कुसुम और गन्धादि उपचारों से पूजन कर हविष्य अन्न खाय जितेन्द्रिय रहे ; नाम मन्त्रसे पूजा करे और बीजादिके अन्तमें 'नमः' लगावे इस प्रकार पूजन करे तो जिस वस्तुकी इच्छा करे व एक मासमें पूर्ण होगी । प्रत्येक कामनाकी सिद्धिके निमित्त एक महीनेभर पूजा करे ॥१-४॥
गणेशबीजमाह । "पञ्चान्तकं ऐं अन्तरिक्षायस्वाहा
हो ।" अनেন पूजयेत् । पञ्चान्तकं गणेशाशिर्धरं
बीजं गणपर्तेऽवदु: । "ओंहीं पूर्वद्यां ओं ह्रीं फट्
स्वाहा ।" अनेन मन्त्रेण रक्ताश्वमारपुष्पाणि
घृतक्षौद्रयुतानि जुहुयात् वांछितां ददाति ॥
- वाममन्त्रैरिति च पाठः ।
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"'ॐ हौं श्रीं मानसेसिद्धिकरि हौं नमः ।' अनेन मन्त्रेण रक्तकुसुममेकं जपित्वा नद्यां क्षिपेत् । एवं लक्षं जपेतत्तो भागवती वरदा अष्टगुणानामेकं गुणं ददाति ॥
गणेशबीज कहते हैं-'ॐ पंचांतकं ॐ अंतरिक्षाय स्वाहा' इससे पूजन करे । पांच अक्षर नीचे लिखे यह गणपतिबीज हैं 'ॐहीं पूर्व-दयां ॐ हौं फट्स्वाहा' इस मन्त्रसे लाल कनेरका फूल घृत और शहदके सहित हवन करनेसे मनोवांछित फलकी प्राप्ति होती है । 'ॐ हौं श्रीं मानसेऽ सिद्धिकरि हौं नमः' इस मन्त्रसे एक लाल फूल मन्त्रित कर नदीमें डाले । इस प्रकार लक्ष जप करनेसे देवी वरदायिनी होती है, और अष्टगुणोंमें एक गुण देती है ॥ इति काम्यसिद्धि: ॥
अथ वाक्सिद्धि:
कृत्तिकायां स्नुहीवृक्षवंदाकं धारयेत्करे । वाक्यसिद्धिरभवेत्स्य महाश्चर्यमिदं स्मृतम् ॥ ५ ॥
कृत्तिकानक्षत्रमें सेहुंड (थूहर) नामके वृक्षका वंदा हाथमें धारण करनेसे वाक्यसिद्धि होती है यह महाश्चर्य है ॥५॥
मन्त्रं ग्रहियत्स्वातिनक्षत्रे बदराभिवमम् । वंदाकं तत्करे धृत्वा यदस्तु प्रार्थ्यते नरै: ॥ ६ ॥
तत्क्षणात्प्राप्यते सर्वं मन्त्रमत्रैव कथ्यते ॥ ७ ॥
"ॐ अंतरिक्षाय स्वाहा" ।
अनेन ग्राहयेत । इति वाक्सिद्धि:॥
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स्वातीनक्षत्रमें बेरकी वन्दाको मंत्रसे ग्रहण करे उसे हाथमें धारण कर मनुष्योंसे जो जो प्रार्थना करे वह वह सब प्राप्त कर सकता है। मंत्र यह है-'ॐआन्तरिक्षायस्वाहा'इससे ग्रहण करे।इति वाक्सिद्धिः।१६७।
अथ गुप्तधनगुप्तवेषचौरादिप्रकाशनम्
धानानि यत्र वा सन्ति ये वा चौरादिकास्तथा । गुप्तवेषा महात्मानो गन्धर्वा यक्षीश्वराः ॥ ८ ॥
जन्तुर्धातुस्तथा वृक्षाद्या मर्त्यलोके स्थिता ध्रुवम् । प्रकाशं जायते सर्वं तच्छृणुष्व समाहितः ॥९॥
हे देवि ? जो मनुष्यलोक (पृथ्वीमे) जहाँ धनादिक, चौरादिक, तथा गुप्तवेष (योगीश्वरादि), गन्धर्व यक्षीणी और ईश्वर आदि यावन्मात्र जन्तु वा लोहादि वृक्षपर्यन्त जो जो छिपे रहते हैं उन सबोंका जिस प्रयोगसे प्रकाश हो जाय वह प्रयोग कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन ॥८।९॥
- वन्दा शाखोटचूतस्था गोक्शुरं लवणं पदम् । अजाक्षीरेण संपेष्य ललाटे तिलके कृते ॥
गुप्ता प्रकाशमायान्ति तत्क्षणात्रात्र संशयः ॥ १० ॥
शाखोटका वन्दा, आमका वन्दा, गोखरू इनका चौथाई भाग लवण इन सबको बकरीके दूधमें पीसकर माथेपर तिलक करे तो सब गुप्त वस्तु उषो क्षणमें प्रकाश होजाते हैं कुछ संदेह नहीं है ॥१०॥
आइलेषायां शनैवारे सायं दाडिमबीजकम् । रसं संगृह्य तुवरों कृष्णाष्टम्यां तु भूमिजे ॥
- वन्दा शाखोटवृक्षस्था गोक्शरं लक्ष्मणापदम् । ता लक्ष्मणापद्मितिपाठः ।
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उपदेशः १२.
हिन्दीटीकासहित (२४९)
पद्ममूलं मड़.लेज्जह्यज्जनं कारयेत्सुधीः । प्रकाशं पूर्ववत्सवं जायते नात्र संशयः ॥ ११ ॥
आइलोषानक्षत्रयुक्त शनिवारके दिन सायंकालमें दाडिमके बीजका रस ग्रहण कर अष्टमी मङ्गलवारको कमलकी जड़ और शतावरका रस ग्रहण करे । इसे शुद्ध कर अंजन बनाय लगावे तो पूर्ववत् सब प्रकाश होजाताहै इसमें सन्देह नहीं ॥११॥इति गुप्तधनगुप्तवेष्टचौरादि प्रकाशनम् ॥
अथ धनुर्विद्या
इन्द्रेण पुरार्जुनं प्रति या विद्या कथिता सा सप्त- विशत्यक्षरौ-“ॐ कालायुतां रक्ताघोरां ॐ कार- शतगुणआधारे एकादशशतसहस्त्र इन्द्र आज्ञा ।” एतन्मन्त्रेण शरं धृत्वा नवधा पठित्वा आकर्षणपूर्वक- धनुषि शरं मेलयेत् ॥ सहरथा भवति ॥ कलौ दशधा । महादेवेन इन्द्रं प्रति या कथिता सा सप्त- दशाक्षरा ॥ “चांद्रधनुर्गुणरेखा काण्डब्रह्म ज्ञान ॐ ॐॐ” एतन्मन्त्रं पठित्वा पञ्चवारं तदा क्षिप्तपूर्व- वद्दूव्रति ॥ १२ ॥
इन्द्रने जो विद्या पहले अर्जुनसे कही है वह सत्ताइस अक्षरकी है । 'ॐ कालायुतां रक्ताघोरा ॐ कारशतगुण आधारे एकादशशत सहस्त्र इन्द्रआज्ञा' । इस मन्त्रसे धनुषपर बाण धारण कर कर्णपर्यन्त नौबार पढकर खींचे तो सहरकप्रकार बाण होता है । कलियुगमें दश प्रकारसे होता है । महादेवजीने जो इन्द्रसे कही है वह सत्रह अक्षरकी विद्या
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है। 'चान्धानुरेखाकाण्ड ब्रह्मज्ञान ॐ ॐ ॐ' यह मन्त्र पांचबार पढकर बाण चढाये तो पूर्ववत् होता है।॥१२॥
सर्पे: कवलितं भेकमधंमात्रं समुद्दरेत् । छित्वा सर्वस्य मुण्डं च आतपे क्षिपेत्पृथक् ॥ १३ ॥
पिष्टवा पृथग्वटी कार्या लक्ष्यलाभप्रदा स्मृता । लक्ष्ये तु भेकतिलकं शराग्रे सर्पमुण्डजम् ॥ १४ ॥
दत्वा तिलकमाकर्ण गुणं धनुषि वेधयेत् । लक्ष्यस्य तिलकं बाणो विन्दत्येव न संशय: ॥ १५ ॥
सर्पसे अर्ध खाये मेंडकको और सर्पके शिरको काटकर लावे। उसे गरमोमें सुखाय पीस गुटिका करे। यह लक्ष्यलाभकी देनेवाली है। लक्ष्यमें मेंडकको तिलक, बाणिक अभ्रभागमें सर्पके मुण्डको तिलक करे। फिर डोरा धनुषपर चढाय निशाना लगाय कानतक खेंच कर छोडे तो अवश्य लक्ष्यके तिलकको बाण वेधेगा, इसमें सन्देह नहीं ॥१३-१५॥
" ॐ रकते धनुरक्ते काण्डरकते हिलजा मा मारो अमुकार अमुकाङ्ग आमुकटाई मारों त्रिदशदेवगणरुद्रा साक्षीअमुकार मारो देवेन राखी अर्जुन कृष्णभावानीर आज्ञा।" एतन्मन्त्रं पठितवा यस्य यदेष्टं मारियत्तदेष्टां विध्यात् ॥
किन्तु प्रथमपर्या क्षायां शनिमड़लाहनि मृतस्य ब्राह्मणस्य वंशाम्नोय धनु:काण्डं सज्जीकृतवा तत्प्राणं गुणं दत्वा तत्र तत्समये वा पुषपहारमेकं दत्वा मुष्टिस्थाने हंसजीवमेकं भृजयित्वा एकनारिकेलजलेन प्रक्षाल्य काण्डत्रयेण लक्ष्यं विद्धवा साधयेत्। यदा द्रुतं
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धनुःकाण्डेन लक्ष्यं शत्रोरड्र्समीपे वेधयेत् तदा वृथा न स्यात् ॥
"ॐ रक्ते धनुरक्ते काण्डरक्ते हालिजामामारो ग्रामुकार ग्रामुकं श्रामुकटाई मारों त्रिदशदेव गणरुद्र साक्षी ग्रामुकार मारो देवनराक्षो अर्जुन कृष्ण भवान्ीरो ग्रामुज्ञा ।" यह मंत्र पढकर जिनके शरोर में जहाँ मारे वहाँ अंग विद्ध होगा । किन्तु पहली परीक्षामें शनि मंगलके दिनमें मृतक हुए ब्राह्मणकी अर्थीके बाँसका धनुष बनाय उसको उसके प्रमाणके डोरेमें चढाकर एक पुष्पहार प्रदान कर मुष्टिस्थानमें हंसरिशु भेजन कर नारियलके जलसे धोख तीन काण्डसे लक्ष्य बेधकर साधे तो वृथा नही होगी। ॥इति धनुर्विद्या॥
अथ धनधान्याक्षयकरणम्
ऋक्षे च पूर्वफाल्गुन्यां दाडिमीवृक्षसम्भवम् । वृक्षादनी धने देयमक्षये भवति ध्रुवम् । वन्दाकं तु मघात्रक्षं बहुवारकवृक्षजम् । धान्यागारे प्रदातव्यमक्षयं भवति ध्रुवम् ॥ १६ ॥
पूर्वफाल्गुनीनक्षत्रमें दाडिमके वृक्षका तथा विदारीकंदका बंदा रखनेसे धन अक्षय होता है । मघानक्षत्रमें बहुवारके वृक्षका बंदा लाकर धान्यमें रखनेसे अवश्य धान्य अक्षय होता है ॥ १६ ॥
शेफालिकायां वन्दाकं हस्तक्षे च समुद्ररत् । धान्यमध्ये तु संस्थाप्यं तद्धान्यमक्षयं भवेत् ॥ १७ ॥
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हस्तनक्षत्रमें निर्गुण्डो वा हारसिंगारका वन्दा ग्रहण कर धान्यमें रख्खे तो धान्य अक्षय होता है ॥१७॥
भरण्यां कु शलवन्दाकं गृहीत्वा स्थापयेद्बुधः । सम्पूर्ण ध नधान्यान्तस्थः करोत्यक्ष यं ध्रुवम् ॥ १८ ॥
भरणोनक्षत्रमें कुशका वन्दा लेकर स्थापन करनेसे सम्पूर्ण धन धान्य अक्षय होता है ॥१८॥
उदुम्बरस्य वन्दाकं रोहिण्यां ग्राहयेद्बुधः । स्थापयेत्संचितार्थ तु सदा भवति चाक्षयम् । मन्त्रेण मन्त्रितं कृत्वा मंत्रोप्यत्रैव कथ्यते । "ॐ नमो धनदाय स्वाहा" ॥ १९ ॥
रोहिणीनक्षत्रमं गूलरका वन्दा ग्रहण करे "ॐ नमो धनदाय स्वाहा" इस मंत्रसे अभिमंत्रित कर धन धान्यमें स्थापन करे तो अवइय अक्षय होता है, ॥१९॥ इति धनधान्याक्षयकरण ॥
श्रुतिधरविद्यादिकारणाम्
पथ्या पाटा कणा शुण्ठी सैन्धवं मरिचं वचा । शिग्रु प्रतिपलं चूर्ण द्वात्रिंशतिपलं घृतम् ॥ २० ॥ घृताच्चतुर्गुणं क्षीरं द्रवा सर्व विपाचयेत् ।
- घृतशेषं समुत्ताय्य लिहेद्ब्रह्मविद्यायकम् ॥२१॥
हरड, पाठा, पोपल, सोंठ, कालीमिर्च, सैंधा निमक, वच, सिहं-जना ये सब एक एक पल तथा घो बत्तीस पल ले घीसे चौगुना दूध लेकर इन सबको एकत्र पात्रमें पकावे, जब रस जल जाय घृतमात्र
१ घृतशेष पिबेदित्यं वाड्मेधा स्मृति इतिबुद्धिदम् । इति पाठान्तरम् ।
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उपदेश: १२.
हिन्दीटीकासहित (२५३)
शेष रहजाय तब उतार ले, नित्य इनके पानसे वाणी बुद्धि और स्मृती बढती है ॥ २० ॥ २१ ॥
अथ ब्राह्मीघृतम्
वचा ब्राह्मी फलं कुष्ठं सैन्धवं तिलपुष्पकाः । चूर्णयित्वा द्रवैर्भाव्यं मण्डूकीब्राह्मीसम्भवे: ॥ २२ ॥
दिनमेकांततः पाच्यं कल्काच्चतुर्गुणं घृतम् । घृताच्चतुर्गुणं देयं क्षीरं ब्राह्मी नियोजितम् । घृतशेषं समुत्थार्य लिहेद्ग्राग्बुद्धिदायकम् ॥ २३ ॥
वच ब्राह्मी, फल, कुठ, सैंधा, तिलपुष्प, वा लालचन्दन इनको चूर्ण करे इसको मण्डूकपर्णा और ब्राह्मीक रसको भावना दे इस प्रकार एक दिन इसको पकाकर इसके कल्कसे चौगुना घी डाले घीसे चौगुना गौका दूध और ब्राह्मी डाले जब रस जल जाय घृत मात्र रह जाय तब उतार ले इसको चाटनेसे बुद्धि बढती है । तीन मासेकी मात्रा है ॥२२॥ २३॥ इति ब्राह्मीघृत ॥
द्वे हरिद्रे वचा कुष्ठं पिप्पली विश्वभेषजम् । अजाजी चाजमोदा च यष्टी मधुसंयुतम् ॥ २४॥
एतानि समभागानि शुक्रचूर्णानि कारयेत् । तच्चूर्णं सर्पिषा लेह्यं कर्षेकं वाक्यशुद्धिकृत् ॥ २५ ॥
भक्षयेन्त्रमासेकं तु बृहस्पतिसमो भवेत् ।
दोनों हलदी, वच, कुठ, पीपल, सोठ, जीरा, अजमोद मुलेठी ये बराबर भाग ले सुखाकर चूर्ण करे यह चूर्ण घृतके साथ एक कर्ष लेनेसे वाक्यसिद्धि होती है । एक महिने इनके सेवनसे बृहस्पतिके समान होती है ॥२४॥२५॥
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ब्राह्मी मुण्डी वचा शुण्ठी पिप्पली समचूर्णकम् । मधुरा भक्ष्येतेकर्षं स्पष्टवाग्जायते ध्रुवम् ॥ २६ ॥
ब्राह्मी, मण्डी, वच, सोंठ, पीपल इनको समान ले चूर्ण कर शहदके साथ एक कर्ष सेवन करनेसे मनुष्य स्पष्ट बोलनेवाला हो जाता है इसमें सन्देह नहीं ॥२६॥
वचास्थि कारवी गुन्द्रा मुशली मधुकं बला । अपामार्गस्य पचवाटं क्षौद्रेण पूर्ववत्फलम् ॥ २७ ॥
अपामार्गवचाशुण्ठी विडङ्गं शृङ्गपुष्पिका । शतावरी गुडूची च समं चूर्णं हरोतकी । घट्टेन भक्ष्येतेकर्षं नित्यं ग्रन्थसहस्रधक् ॥ २८ ॥
वचकौ मींगी, हिंगुपुत्री, भद्रमोथा, मुसली, मुलहठी, खरेंटी, चिरचिटेका पंचांग ,बच, सोंठ, वायविडंग, शंखपुष्पी, शतावरी, गुडूची हरड इनको समान भाग ले चूर्ण कर घीर्तके साथ एक कर्ष प्रतिदिन खाय तो सहस्र ग्रन्थका धारण करनेवाला होता है ॥ २७ ॥ २८ ॥
अश्वगन्धाजमोदा च पाटा कुष्टं कटुत्रयम् ॥ २९ ॥ शतपुष्पी विश्वबीजं सैन्धवं च समं समम् । एतददद वचा चूर्णितं मधुसर्पिषा ॥ ३० ॥ भक्ष्येतेकर्षमात्रं तु जोर्णान्ते क्षीरभोजनम् । सहस्रग्रन्थधारी स्यान्मूकऽपि वाक्पतिर्भवेत् ॥३१॥
असगन्ध, अजमोद, पाटा, कुटकी (कूठ) त्रिकुटा, सोंफ, सोंठ, सैंधा यह समान भाग लेकर चूर्ण कर इससे आधी वच ले शहद और घोमें मिलाय एक-कर्ष खाय उपरसे दूधका भोजन करे तो यह सहस्र ग्रन्थका धारण करनेवाला वाक्पति होता है ॥ २९-३१ ॥
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लिहेज्ज्योतिष्मतीतैलं बलया वचया सह। स्तोकं स्तोकं ऋमेणैव यावन्निष्कचतुष्टयम् ॥ निर्वाते मधुसेवी स्याद्ब्रह्मचारी क्विभवेत् ॥३२॥
मालकांगनिके तेलको खरेटी और वचके सहित चाटे थोड़ा २ कमसे चार निष्कतक बढ़ावे । निर्वातिस्थानमें रहे शहद चाटे वह ब्रह्मचारी कवि होता है ॥३२॥
सूर्यस्य ग्रहणे वन्दे: समन्त्रामाहरेद्रवचाम्। चूर्णितां सगृतां भुक्त्वा सप्ताहे वाक्पतिर्भवेत् ॥३३॥
सूर्य वा चन्द्रग्रहणमें मन्त्रके सहित वचका वन्दा लावे । इसे चूर्ण कर घीके साथ खान्तसे एक सप्ताहमें वाक्पत्ति होता है ॥३३॥
इत्येवमादि योगानां मन्त्रराज: शिवोदित: । जप्त्वायुतं च सिद्ध: स्यात्पुनश्चात्तैरैव भक्षयेत् ॥३४॥
"ओं हूँ हयशीर्षवागीश्वराय नमः ।"
इन योगोंको मन्त्रराज 'ॐ हूँ हयशीर्षवागीश्वराय नम:' शिवने कहा है । इस मन्त्रको १०००० वार जपनेसे सिद्धि होती है । पीछे इस मन्त्रसेही उक्त पदार्थ भोजन करे ॥३४॥
धात्रिफलरसैरर्भाव्यं वचाचूर्ण दिनावधि । घृतेन लेहयेत्निष्कं वाक्सुधृतिस्मृतिबुद्धिकृत् ॥३५॥
वचका चूर्ण आमलेके रसमें एक दिन भावित कर एक निष्क घृतके साथ चाटनेसेवाणीक शुद्धि और बुद्धि स्मरण शक्ति होती है ॥३५॥
वचाचूर्ण क्षिपेत्क्षीरे पुनर्मन्त्रेण मन्त्रितम् । भोज्यं क्षौरे शालयत्रं सप्ताहे वाक्पतिर्भवेत् ॥३६॥
वचका चूर्ण दूधमें डालके पुनः मन्त्रसे अभिमन्त्रित करे । इसको शालिचावलके साथ खाय एक सप्ताहमें वाक्पत्ति होता है ॥३६॥
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उक्त मन्त्रको पढकर वचका चूर्ण दूधके साथ लेनसे वाक्पति होता है ॥ ३६ ॥
सप्तमे अष्टमे चैव साक्षाच्छुतिर्धरो भवेत् । वचाचूर्णं पोबेत्क्षीरार्घृतैः क्षोद्रैश्च यत्पुनः । सप्ताहक्रमयोगेन लेहं स्यात्पूर्ववत्फलम् ॥ ३७ ॥
सात दिन वा आठ दिन इसे सेवन करनेसे वेदका धारण करनेवाला होता है, अथवा वचका चूर्ण शहद और घृतके साथ चाटनेसे सप्ताहमें बुद्धि तोव हो जाती है ॥ ३७ ॥
पुष्याकियोगे संगृह्य इवेताकस्य तु मूलकम् । छायाशुष्कं च तच्चूर्णं मन्त्रेणैवाभिमन्त्रितम् ॥ ३८ ॥
कर्षमद्धी पलं वापि प्रातरुत्थाय संपिबेत् । "ॐ महेश्वराय नमः" अनेन मन्त्रेणाभिमन्त्र्य पिबेत्॥
तक्रेण सर्पिषा वापि जोर्णान्ते क्षीरभोजनम् ॥ ३९ ॥
एवं सप्ताहमात्रेण कविर्भवति बालकः ॥ ४० ॥
पुष्यनक्षत्रमे इवेत आकको जड ग्रहण कर उसे छायामें सुखाय चूर्ण कर एक कर्ष वा आधे पल प्रातःकाल उठकर "ॐ महेश्वरायनमः" इस मन्त्रसे अभिमन्त्रण कर मटठके साथ या घीके साथ खावे । यह औषधि पचनपर दूध भात खावे । ऐसा सात दिन खानेसे बालकभी कवि हो जाता है ॥ ३८-४० ॥
अथ किन्नरीकरणम्
हरिद्रा च वचा कुष्ठं पिप्पली च यवानिका । मरिचं सैन्धवं शुण्ठी चैषां चूर्णं तु कारयेत् । मधुना सहितं चूर्णं पेषयित्वा शिलातले ॥ ४१ ॥
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दिनेश्च सप्तभिश्चैव भक्षितव्यं निरन्तरम्।
जायते सुस्वरः पुंसां किन्नरैः सह गीयते ॥ ४२ ॥
हलदी, वच, कूठ, पीपल, अजवायन कालीमिर्च, सैंधानोन,
सोंठ इनका चूर्ण कर इसको शहदसे मिलाय पथ्थरमें पीस सात दिन
निरन्तर खानेसे किन्नरोके समान कंठ होता है ॥ ४१ ॥ ४२ ॥
विभीतकं कणा शुण्ठी सैन्धवं त्वक्समं समम् ।
गोमूत्रेण पिबेत्कर्ष किन्नरैः सह गीयते ॥ ४३ ॥
बहेड़ा, पीपल, सोंठ, सैंधा, तज ये समान भाग ले एक वर्ष गो-
मूत्रके साथ पान करनेसे किन्नरोंके साथ गान कर सकता है यानी
उनके समान स्वर हो जाता है ॥ ४३ ॥
जातिपत्रं कणा लाजां मातुलुङ्गदलं मधु ।
पलं लेहयं भवेशादः किन्नराधिक एव च ॥ ४४ ॥
जाती वृक्षके पत्ते, जीरा, खीलें और बिजौरेंके पत्ते इनको मर्दन
कर ८ तोले शहदसे चाटनेसे किन्नरसेभी उत्तम स्वर होता है ॥ ४४ ॥
देवदारुकणाचव्योषं शताह्वा पत्रकं निशा ।
वचा सैन्धवशिग्रूस्थं मूलं पेष्यं समंसमम् ॥ ४५ ॥
कर्षेकं मधुरसोपभ्यां मासमात्रं सदा लिहेत् ॥
कण्ठशुद्धिर्भवेतस्य किन्नरैः सह गीयते ॥ ४६ ॥
देवदारु, सोंठ, मिर्च, पीपल, जीरा, सोंफ, पत्रज, हलदी, वच,
सैंधानिमक, सहँजनेकी मूलो ये सब वस्तु समान भाग लेकर एक कर्ष
मधु और घृतके साथ एक महीने चाटे तो कंठकी शुद्धि होती है
किन्नरोंके साथ गा सकता है ॥ ४५ ॥ ४६ ॥
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(२५८)
जुष्टी च शर्करा चैव क्षौद्रेण सह संयुक्ता । कोकिलस्वर एव स्याद्गुटिकाभुक्तिमात्रतः ॥ ४७ ॥
सोंठ और मिश्री शहदके साथ मिलाय इसकी गोली बनाय सेवन करे तो स्वर कोकिलाके समान अच्छा होजाताहै ॥ ४७ ॥
आर्द्रकं भृङ्गकोरण्टवासा ब्राह्मी वचा तथा । वचाचूर्णं समांशेन पलेकं वारिणा पिबेत् ॥ ४८ ॥
*मासि मासि चतुर्दश्यां कृष्णपक्षे द्विसप्तकम् । गन्धर्वदृशं गानं कोकिलानां स्वरो यथा ॥ ४९ ॥
अदरख, भांगरा, आडूसा, ब्राह्मी, वचका चूर्ण ये समान भाग ले जलके साथ एक कर्ष पीवे, पीतेबार महीने २ कृष्णपक्षकी चतुदर्शीतक चोदह दिन खाय तो गन्धर्व और कोकिलाके स्वरके समान गान कर सकताहै ॥ ४८ ॥ ४९ ॥
निर्गुण्डीचूर्णं तु तितलतैलेन यो लिहेत् । कण्ठशुद्धिर्भवेत्सस्य किनरैः सह गीयते ॥ ५० ॥
निर्गुण्डीकी जडका चूर्ण तिलके तेलके साथ चाटनेसे कंठकी शुद्धि होतीहै किन्नरोंके साथ गा सकताहै ॥ ५० ॥ इति किन्तरोकरण ॥
अथ चक्षुष्यम्
वर्षाकाले काकमाची समूला तालपाचिता । खादेत्समासतरचक्षुर्ग्र दृड्रष्टिसमं भवेत् ॥ ५१ ॥
वर्षाकालमॆ समूल काकमाचीको तेलमें पकावे, इसे एक महीने खानेसे गृध्रके समान दृष्टि होतीहै ॥ ५१ ॥
- माघमासि चतुर्दश्यां । इति पाठान्तरम् ।
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श्वेतं पुनर्नवामूलं घृतघृष्टं सदाऽञ्जयेत्। जलस्तावं निहत्याशु तन्मूलं तु निशायुतम् ॥ ५२ ॥
श्वेतपुनर्नवाको जड़ घी पोसकर सदा आंजनसे नत्रास जलका निकलना बंद हो जाता है । अथवा यही जड़ दारुहलदीके साथ नेत्रमें आंजे तो किसी प्रकारसे नेत्ररोग नहीं होता है ॥ ५२ ॥
द्र्विनिशा सेन्धवं त्रिकुटं बीजं कारञ्जकं समम् । भृङ्गीद्रवैर्युतं वापि तिमिरं पटलं हरेत् ॥ ५३ ॥
दोनों हलदी, सैंधा, त्रिकुटा, करंजके बीज यह समान भाग लेकर अतीसके रसमे बत्ती बनाय नेत्रोंमें आंजनसे तिमिर दूर होता है ॥५३॥
शम्बूकं वा वराहं वा दर्धी शुष्कं विचूर्णितम् । अञ्जयन्नवनीतेन हन्ति पुष्पं चिरन्तनम् ॥ ५४ ॥
घोंघा या कौडो इन्हें जलाय चूर्ण कर मक्खनके साथ नेत्रोंमें आंजे तो बहुत दिनों का फूला दूर होता है ॥ ५४ ॥
अजामूत्रेण भूतात्री मूलं पिष्ट्वा च वर्तिका । नवनीतसमायुक्ता हन्ति पुष्पं चिरन्तनम् ॥ ५५ ॥
छागके मूत्रमें भुईआमलकी जड़ पीस उसकी बत्तीको मक्खनके साथ लगानेसे पुराना फूल नष्ट हो जाता है अथवा शहदके साथ सोनामक्खी मिलाय आंजनसे फूला नष्ट हो जाता है ॥ ५५ ॥ ५६ ॥
अञ्जनानाशयेत्पुष्पं क्षौद्रैर्द्वा स्वर्णमाक्षिकम् ॥ ५६ ॥
मरिचैर्मर्दने रक्ते वर्तिं रात्र्यन्धताऽऽजयेत् । जयन्ती वाभया वाथ घृष्ट्वा स्तन्यैर्निशाऽन्धहत् ॥ ५७ ॥
शोणितं चर्मकोपं च मांसवृद्धिं च नाशयेत् ॥ ५७ ॥
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कालीमिर्चके साथ चोनेको मर्दन कर बत्ती बनाय लगावे तो नेत्रोंका रतौंधा दूर होता है अथवा जयन्ती वा हरडको पीस लगावे तो रतौंधा दूर होजाता है । हृधिर विकार चर्मकोप और मांसवृद्धि भी इससे दूर होती है ॥ ५७ ॥
कृष्णाजस्य च मांसान्तः पिप्पलीं मर्चि च क्षिपेत् । कार्यितवा घृते पच्याद्घटिकान्ते तमुद्धरेत् । मध्याज्यस्थनिसंपिष्टं रात्र्यन्धहरमञ्जनम् ॥ ५९ ॥
काले बकरीके मांसमें पोपल और कालीमिर्च डाले । फिर एक घडी तक घीसे पकाय उसकी वटिका बनावे । उसे शहद घी या स्त्रोके दूधसे पीस लगावे तो रतौंधा दूर हो जाता है ॥५८॥५९॥
अजापित्तगते व्योषि धूमस्थानं विशोधयेत् । चिरबिल्वरसैघृष्टं रात्र्यन्धहरमञ्जनम् ॥ ६० ॥
बकरोके पित्तमें रखा हुआ सोंठ मिरच पीपल इनको धूमस्थानमें सुखावे । करंजके रसमें इसे घिसकर लगावे तो रतौंधा दूरहो जाता है ॥ ६० ॥
घृतेन पुष्पं मधुनाश्रुपातं तैलेन कण्डू तिमिरं जलेन । राज्यान्धकं काञ्जिकया निहन्ति *पुनर्नवा नेत्रपुनर्नवा डकरो ॥ ६१ ॥
पुनर्नवाको घृतसे लगावे तो फूला, शहदसे अश्रुपात, तेलसे खुजली, जलसे तिमिर, कांजीसे रतौंधा दूर होताहै । पुनर्नवा नेत्रोंको फिर नवीन कर देती है । इसमें इशेतपुनर्नवा लेनी ॥ ६१ ॥
- अत्र इशेतपुनर्नेवा ग्राह्या ।
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उपदेश: १२.
हिन्दीटीकासहित (२६१)
चन्द्रोदया वटी
हरोतिकी वचा कुष्ठं पिप्पली म्रिचानि च ।
कालो विभीतकस्य मज्जा च शंखनाभिमृन्मथिता ॥ ६२ ॥
सर्वमेतत्समं कृत्वा गव्यक्षीरेण पेषयेत् ।
नाशयेतिमिरं कण्डू पिटकान्यर्बुदानि च ॥ ६३ ॥
अपि द्विवार्षिकं पुंष्पं मासेकेनैव नाशयेत् ।
अधिकानि च मांसानि यश्च रात्रौ न पर्यति ॥ ६४ ॥
वर्तिरचन्द्रोदया नाम नृणां दृष्टिप्रसादिनी ।
छायाशुष्का वटी कार्या नाम्ना चन्द्रोदया वटी ॥ ६५ ॥
हरड़, वच, कुष्ठ, पीपल, कालीमिर्च, बहेड़े की मज्जा, शंखनाभि, मैन- शिल यह सबको बराबर ले गौके दूध से पीस लगावे तो तिमिर, अर्बुद, दो वर्षका फूला जो नेत्रों में अधिक मांस बढजाता है तथा जो रात्रि में नहीं देखता है ये सब रोग एक मास में अवश्य नष्ट होजाता है ।
मनुष्यों की दृष्टि को शुद्ध करने वाली इस वटिका की छाया में सुखाकर मनुष्य को प्रयोग करनी चाहिये ।। ६२-६५ ।। इति चन्द्रादयावटी ।
यस्त्रिफल चूर्णमपथ्यवर्ज्य सायं समझन्नाति हवि- मंधुभ्यां ।
सम्युञ्च्यते नेत्रगर्तौ विकारेभृङ्गैर्यथा क्षोणधनो मनुष्यः ॥ ६६ ॥ इति चक्षुष्यम् ।
जो मनुष्य त्रिफले के चूर्ण को संध्या समय घृत और शहद के साथ खाता है उसको नेत्र विकार ऐसा छोड़ देता है जैसे धन हीन पुरुष को नौकर छोड़ जाते हैं ।
६६ ।। इति चक्षुरोगनिवारण ।।
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अथ कर्णस्य बधिरत्नानाहनाम्
शिरारक्षकर्जलेन तत्कृतकल्केन सहितं तिलजम्। apहरति कर्णनादं बाधिर्यं चापि पूरणात् ॥ ६७ ॥
चिरचिरेके खारयुक्त जलसे वा इसौके साथ तिलके तेलका कल्क कर कानोंमें डाले तो बधिरता नाश होती है ॥ ६७ ॥
दशमूलीकषायेण तैलप्रस्थं विपाचयेत् ।
एतत्कल्कं प्रदायैव बाधिर्ये परमौषधम् ॥६८ ॥
- देशमूल्के काठेको एक सेर तेल्में पकाहे जब तेल्मात्र रहजाय तो उतारले । कर्णबधिरता नाश करनेकी यह परम औषधी है ॥६८॥
नीलोत्रप्तरसस्तैल सिद्धकौञ्जकसयुतम् । कटुण्यपूरणात्कर्णे निःशेषकृमिनाशनः ॥ ६९ ॥
नोली, आक वृक्षको जड़ कांजीमें मिलाकर तेल्में पकाय कुञ्च नोली गरमा गरम कानोंमें पूरण करनेसे सब कृमि नाश होजाते हैं ॥ ६९ ॥
दन्तेन चर्वयेत्मूलं xन्यान्यावर्त्तपलाशकम् ।
तत्कालीपुरिते कर्णे ध्रुवं गोमक्षिकाजयेत् ॥ ७० ॥
धव, सोनामक्खी और पलाशकी जड़ इनको दांतोंसे चबानेसे वा उसका रस कर्णमें पूरित करनेसे ग्मेमक्खिका दूर होती है (कहीं तगर और ढाकको चबाना लिखा है ) ॥ ७० ॥
ताम्बूलभक्षणं कृत्वा तत्र सन्दापयेद्बुधः । तत्र स्थितास्तु कृमयो नाशमायान्ति निश्चितम् ॥७१॥
- बेल, सोनापाठा, कमारी, पाढल, अरણી, सरवन, पिठवन, छोटी कटेरी और गोबरू ये दश मूल हैं । x तगरं च पलाशकम् इति पाठांतरम् ।
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उपदेश: १२.
हिन्दीटीकासहित (२६३)
तांबूल भक्षण कर सेवन करे तो कानके कृमि अवश्य नाश हो जाते हैं ॥ ७१ ॥
मूषलीबाकुचीचूर्णं खादेदबाधिर्यशान्तये । मनः शिलापामार्गेऽथ मूलं चूर्णं मधुप्लुतम् । भक्षयेत्कर्षमात्रं तु वधिरत्वप्रशान्त्यर्थम् ॥ ७२ ॥
मूषली और बाकुचीका चूर्ण खानेसे बधिरता नाश हो जाती है । मैनशिल अपामार्गके मूलका चूर्ण इनको शहतमैं मिलाकर एक कर्षमात्र खानेशे बहरापन शान्त हो जाता है ॥ ७२ ॥
लशुनामलकं तालं पिष्ट्वा तैले चतुर्गुणे ॥ ७३ ॥
तैलाच्चतुगुणं क्षारं पश्चात्तैलावशेषतम् । तत्तैलं निक्षिपेत्कर्णों बाधिर्यं च विनाशयेत् ॥ ७४ ॥
लहसन, आंवला, हरताल इनको पीसकर इससे चौगुना तेल ले तेलसे चौगुना दूध डालकर इसको पकावे । जब रस जल जाय तेल मात्र रहजाय तब उतारलेवे, इस तेलको कानमें डालनेसे बहरापन शान्त हो जाता है ॥ ७३ ॥ ७४ ॥
अथ कर्णपालीवर्द्धनम्
सिद्धार्थ बृहती चूर्ण हैपामार्गे समं समम् । छागी क्षौरे: प्रलेपोयं कर्णपाली विवर्द्धयेत् ॥ ७५ ॥
सफेद सरसों, कटेरी, चिरचिटा इनको समान भाग लेकर चूर्णकर बकरोकै दूधसे लेप करे तो कर्णपाली बढती है ॥ ७५ ॥
मूषलोन्मत्तचूर्णं च महिषीक्षौरसंयुतम् । लोडयेत्स्निग्धभाण्डे तु धान्यराशौ निवेशयेत् । सप्ताहादुत्थिते लेप्यं कर्णपाली विवर्द्धते ॥७६॥
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मूशलोكنदकाचूर्ण कर भैसके दूधके साथ बरतनमें मिलाय धान्यराशि में धरे। फिर सात दिनमें निकाल लेप करनेसे कर्णपाली बढती है॥ ७६ ॥
गुज्जामूलकृतं चूर्ण महिषोक्षोरसंयुतम्॥ ७७॥ श्रुतं दधि ततः कुर्यात्रवनोतीं तदुद्रवम्। कर्णयोलीप्ये त्रितयं वृद्धये त्रात्र संशयः॥ ७८ ॥
चौंटलोको जडकाचूर्ण कर उसमें दूध मिलाय दही जमाय उसका मक्खन निकालकर कानों पर लेप करे तो कर्णपाली बढती है॥७७७८
अश्वगन्धा वचा कुष्ठं गजपिप्पलिका समम्। महिषीक्षीरवने तेन लेपात्कर्णो विवर्द्धते॥ ७९ ॥
असगन्ध, वच, कूठ, गजपीपल इनको भैंसके मक्खनके साथ मिलाय लेप करनेसे कान बढता है॥ ७९ ॥
वराहोथेन तैलेन लेपः कर्णविवर्धनः। चर्मचटकस्य रक्तेन लेपात्कर्णो विवर्द्धते॥ ८० ॥
बराहके तेलका कानों पर लेप करनेसे कान बढता है अथवा चर्मचटका चिड़ीका रक्त लेप करने से कर्णवृद्धि होती है॥ ८० ॥
अथ दन्तदृढीकरणम्
यर्मचि चाजयापुङ्खामूलं वा हयमारजम्। चलदन्ता दृढायन्ते प्रत्यहं दन्तधावनात्॥ ८१ ॥
इमली, जयन्ती, शरफोंका, कनेरकी जड इनसे रोज दन्तधावन करनेसे कैसे भी दांत हिलते हों सो दृढ होजाते हैं॥ ८१ ॥
ताम्रपात्रे क्षणं पाच्यमभया चूर्णकं मधु। पिष्टवा च गुटिका कार्या दन्तैर्धर्यी कुमीन् हरेः॥ ८२ ॥
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हरडका चूर्ण और शहद इनको तांबके पात्रमें क्षणमात्र पका गुटिका कर दांतोंमें धारण करे तो दांतोंके कृमि नष्ट होते हैं ॥ ८२ ॥
दन्तेर्धार्य स्नुहोमूलं क्रिमिनाशं करोत्यलम् । काशीसं वृत्तसंपक्वं धार्यं दन्तव्याधिपहम् ॥ ८३ ॥
थूहरकी जड वा कसीस्की जड दांतोंमें धारण करनेसे कृमि नाश होजाते हैं । कसीस्को घृतमें पकाकर दांतोंमें धारण करनेसे दांतोंकी व्यथा दूर होती है ॥ ८३ ॥
विशाल्यो: पलं चूर्ण तप्तलोहे परिक्षिपेत् । तदूमस्पृष्टदन्तानां कीटपातो भवन्त्यलम् ॥ ८४ ॥
इन्द्रायण और महेन्द्रवारुणोका चूर्ण एक पल तप्त लोहेपर डाल दे । उसका धुआं छूतहे दांतोंके कीड़ा मरजाते हे ॥ ८५ ॥
जातिकोरकपत्रं च चर्वयेत् प्रातरुत्थितः । स्थिरा: स्युइचञलता दन्तासत्काष्ठदन्तभावनात् ८५॥
प्रात:काल उठकर जाती और कंकोल मिर्चके पत्तोंको चबावे तो हिलते हुए दांत स्थिर हो जाते हैं । इन्हीं वृक्षोंकी दंतौन करे ॥ ८५ ॥
गुंजामूलं तु कर्णाभ्यां बद्धं दन्तकृमि प्रणुत् । त्रिसूतं रौप्य मेकं तु जम्बीररसर्मदितम् ।
जम्बीरफलमध्येस्थ वस्बद्ध्वाऽस्येह पचतं । क्षोरमध्ये समुद्रुत्य गुटिकां तां ततः पुनः ॥ ८७ ॥
भावितं भानुदुग्धेन तालकं सूक्ष्मपेषितम् । तान्मध्ये गुटिकां दिक्षत्वा वस्त्रे बद्धवा दिनत्रयम् ॥
मधुभाण्डगतं पाचादुद्रता वास्यधारिता । घर्षणाच्चलितान् दन्तांस्तत्क्षणात्कुरते दृढान् ॥ ८८ ॥
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चोंटलीकी जड़ कानोमें बांधनेसे दांतके कीडे नष्ट होजाते हैं । एक रूपयेभर पारा जंबीरीके रसमें मर्दित करे, फिर उसे जंबीरी नोंबूमें रख वस्त्रमें बांध तीन दिनतक दूधमें पकावे फिर उसे निकाल गुठिका करे । इसे काली मिर्च, आकका दूध और हरतालसे सूक्ष्म पीसकर गुठिका बनाय वस्त्रमें तीन दिन बांध रख्खे, फिर शहतके पात्रमें रख्खे । फिर इसको निकालकर दांतोंमें घिसे तो हिलते हुए दांत दृढ हो जाते हैं ॥ ८६-८८ ॥
तालकं भानुदुग्धेन दिनमेकं विमर्दयेत । तद्गर्भरसहोमोत्थां पिडिकां तारसंयुक्ताम् ॥ ८९ ॥
जंबीरफलमध्येस्थां दोलायंत्रे त्र्यहं पचेत् ॥ ९० ॥
तैलक्षौद्रयुक्ते भाण्डे समुद्रृत्य विधारयेत । दन्तरोगान् हरेत्सर्वान् घर्षणाच्चलिता दृढा: ॥ ९१ ॥
हरतालको आकके दूधमें एक दिन खरल करे, फिर उसको पारेके साथ पिंडी करके एक स्थानमें रख्खे और जंबीरीके फलके बीचमें रखकर तीन दिन दोलायंत्रमें पचावे । फिर तेल और शहद मिलाय इसको बरतनमें रख छोडे । इसको मलतेही सम्पूर्ण दांतोंके रोगोंको दूर करता है ॥ ८९-९१ ॥
चलद्रदन्तस्थिरकरं कार्यं बकुलचर्वणम् । बकुलकी चबाना दांतोको स्थिर और बलयुक्त करता है ॥
बकुलस्य तु बीजं तु पिष्टवा कोष्णेन वारिणा । मुखे च धारयेद्दीमान् दन्तदाढ़च करं परम् ॥ ९२ ॥
बकुल (मौलसिरी) के बीजको कुछ गरम पानीके साथ पीसकर बुद्धिमान् धारण करे तो दांत दृढ हो जाते हैं ॥ ९२ ॥
बकुलस्य त्वचा क्वाथमुष्णं वत्नेण धारयेत् ।
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उपदेश: १२.
हिन्दीटीकासहित
(२६७)
दृढा: स्युइचलिता दन्ता: सप्ताहान्नात्र संशय: ॥९३॥
बकुल (मौलसिरो) की छालका क्वाथ गरम गरम मुखमें धारण करनेसे हिलते हुए दांत सात दिनमें दृढ होजाते हैं । इसमें सन्देह नहीं ॥९३॥
इति दन्तदृढीकरणम् ॥
अथ गण्डमालानिवारणम्
कर्कन्धुकोलामलकप्रमाเ: कक्षांसमन्यागलवक्ष-
เषु । मेद:कफाभ्यां चिरमन्दपाकै: स्याद्गण्डमाला
बहुभिश्च गण्डै: ॥
कोखमें, कन्धोंमें अथवा खवोंमें, नाडके पीछे मऩ्यानाडीमें, गलेमें तथा वङ्क्षण स्थानमें मेद और कफसे छोटे बेरके समान या बडे बडे बेरके समान बहुतसी गांठें उत्पन्न हों उन्हें गण्डमाला कहते हैं, ये गांठें बहुत दिनों में थोड़े थोड़े पकते हैं ॥
काचनारतकच: क्वाथ: शुण्ठीचूर्णेन संयुक्त: ।
माक्षिकाढच: सकृत्पीत: क्वाथो वरुणमूलक: ।
गण्डमालां हरत्याजु चिरकालानुबन्धिनीम् ।
कचनारकी छालका क्वाथ बनाकर उसमें सोंठका चूर्ण डालकर पीवे तो एकही बारमें गण्डमाला नष्ट होती है । वरनकी जडका क्वाथ बनाकर उसमें शहद डालकर पीवे तो एकही बारमें बहुत दिनों की पुरानी गण्डमाला तत्काल नष्ट होती है ॥
इस यन्त्रको गोरोचन और लाल चन्दनसे भोजपत्रपर लिख (रोगीके नामदेवदत्तस्थानमें लिखकर) रोगीके कंठमें बांधे तो गण्डमाला (कण्ठमाला) दूर होती है ॥
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अथ आहारकरणम्
बध्नकेनापि वृक्षस्य पीठं कृत्वा इवाने: स्थितः । योज्सौ भुङ्क्ते घृतैः सार्द्धं भोजनं भोमसेनवत् ॥९४॥
आके वृक्षका पोठा कर झने: झने: उसपर बेठ घृतक सहित भोजन करे तो भोमसेनके समान भोजन करेगा ॥ ९४ ॥
*संध्यायामात्रवृक्षस्य कर्तव्यमभिमंत्रितम् । प्रात: पुष्पाणि संगृह्य मालां धारसि धारयेत् ॥
कौपीनं संपरित्यज्य भुङ्क्तेऽसौ भोमसेनवत् ॥ ९५ ॥
संध्याके समय आमके वृक्षको अभिमंत्रित कर प्रात:काल उसके मौरकी माला शिरपर धारण करे । (कहीं प्लक्षका अभिमंत्रण कहा है ) कौपीन त्याग भोजन करनेसे बैठे तो भोमसेनके समान भोजन करे ॥ ९५ ॥
उदश्रान्तपत्रमादाय कपिला इवानदन्तकम् । कटचामेव हयं बद्धवा भुङ्क्तेऽसौ भोमसेनवत् ॥९६॥
मूषकपर्णोके पत्तोंको रेणुका इवानदन्त इनके साथ कमरमें बांधे तो भोमसेनके समान भोजन करे ॥ ९६ ॥
गृहीत्वा मान्त्रितान् मन्त्रा विमलतेज:प्रबोधनान् । आकर्षण दक्षिणां जङ्घां विﬞत्याहारभुग्भवेत् ॥९७ ॥
मंत्रका जाननेवाला मन्त्रपूर्वक बहेड़ेके पत्तेको दहिनी जांघसे आकर्षण कर ग्रहुण करे अर्थात जांचके तले रखकर भोजन करनेसे बीसगुना भोजन करनेवाला होता है ॥ ९७ ॥
- सन्ध्याया प्लक्ष इति वा पाठ: ।
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"ॐ नमः सर्वभूताधिपतये ग्रस २ शोषय २ भैरवो आज्ञापर्यंति स्वाहा ।" उक्तयोगानामयं मन्त्रः ।। मन्त्र- 'ॐ नमः सर्वभूताधिपतये ग्रस २ शोषय २ भैरवो आज्ञा पर्यंति स्वाहा' उपरोक्त योगोंका यह मन्त्र है ।।
अधरं कुकलासस्य शिखास्थाने बिबन्धयेत् । वायुपुत्र इवाऽऽइचर्यमसौ भुड्क्ते न संशयः ।। ९८ ।। "ॐ नाभिवेगेभ्य उर्वशो स्वाहा ।।"
गिरगटके अधरको शिखास्थानमें बांधनेसे भीमसेकें समान भोजन करता है, इसमें सन्देह नहीं "ॐ नाभिवेगेन उर्वशो स्वाहा" यह मन्त्र है ।। ९८ ।। इति आहारकरणम् ।।
अथान्नाहारकरणम्
अन्न्राणि कुकलासस्य मज्जां कारञ्जबीजकाम् । पिष्टवा तद्गुटिकां कुर्यात त्रिलोहेन तु वेष्टिताम् ।।९९।। तां वक्त्रे धारयेद्यस्तं क्षुत्पिपासा न बाधते ।। "ॐ * सांसांशशरीरममृतमाकर्षय स्वाहा ।"
गिरगटकी अन्त्र और करंजके बीजोंकी मींगी पीसकर उसकी गुटिका बना चांदी सोने अथवा तांबेमें मढाकर मुखमें धारण करनेसे भूख और प्यास नहीं लगती है 'ॐ सांसांशशरीरममृतमाकर्षय स्वाहा' ।। ९९ -।। १०० ।।
पद्मबीजमहाशाली छागोदुधेन पाचयेत । साज्यं च पायसं भुक्त्वा द्वादशाहं क्षुधापहम ।। १०१ ।।
- शां चां इति वा पाठः
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कमलगट्टकी गिरी महाशालिचावल इनको छागीके दूधसे पकावे । घृत सहित वह खोर खाय तो बारह दिनतक भूख नहीं लगती है।१०१
उदुम्बरस्य जम्बीरशालिशिम्बीकारोषजम् । बीजं संचूर्ण्य चाज्येन भुक्तवा पक्षं क्षुधापहम् ॥ १०२ ॥
गूलर, जम्बीरी, शालिचावल, शिम्बी, शिरहके बीज इनका चूर्ण कर घीके साथ खानसे पन्द्रह दिन भूख नहीं लगती है ॥ १०२ ॥
उदुम्बरफलं पक्वमिड्गुदोतेलभावितम् । भुक्त्वा मासं क्षुधां हन्ति पिपासां च न संशय: ॥१०३॥
गूलरका पक्का फल इंगुदीके तेलमें भावित कर खानसे एक महीनेतक भूख और प्यास नहीं लगती है । इसमें सन्देह नहीं ॥ १०३ ॥
अपामार्गस्य बीजानि त्वग्वङ्ग्येन प्रपाचयेत् । पायसं छागलोक्षीरैर्भुक्तं मासक्षुधापहम् ॥ १०४ ॥
"ॐ नमो भगवते रुद्राय अमृतार्कमध्ये संस्थ-ताय मम शरीरे अमृतं कुरु कुरु सः स्वाहा" उक्तयोगानामयं मन्त्रः ॥ १०५ ॥
अपामार्गके बीजोंका छिलका दूर कर बकरीके दूधमें पकाय इसको खोर बनाय खानसे एक महीनेतक भूख नहीं लगती ॥ 'ॐ नमो भग-वते रुद्राय अमृतार्कमध्ये संस्थताय मम शरीरे अमृतं कुरु कुरु सःस्वाहा उपरोक्त योगका यह मन्त्र है ॥१०४॥१०५॥ इत्याहारकरणम् ॥
अथ पादुकासाधनम् । अश्वनालांगुलीतैलैः पेषयेच्छ्वेतसरषपम् । तल्लिल्पपादहस्तस्तु योजनान शतं ब्रजेत् ॥ १०६ ॥
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अश्वनाल, अंगुलीका तेल इनके साथ श्वेत सरसों पीसे उसको हाथ पैरोंमें सम्यक् लपेटकर सौ योजन जा सकता है ॥ १०६ ॥
अङ्कोलस्य तु मूलं तु तिलतेलेन पाचयेत् ।
पादौ तु जानुपर्यन्तं लिप्त्वा दूराध्वगो भवेत् ॥ १०७ ॥
अंकोलके जड़ तिलके तेलमें पकावे उसको जंघापर्यन्त लेप करे तो मनुष्य बहुत दूरतक जासकता है ॥ १०७ ॥
"ॐ ह्रीं नमः ॐ नमश्चंडिकायै गगनं गगनं चालय चालय वेशय हिली २ वेगवाहितीहीं स्वाहा ।" उक्तयोगह्रयस्यापमेव मन्त्रः ॥
"ॐ नमश्चंडिकायै गगनं २ चालय२ वेशय हिली २ वेगवाहिती ह्रीं ह्रीं स्वाहा" उक्त योगोंका यह मन्त्र है ॥
काकस्य हृदयं नेत्रे जिह्वा चैव मनःशिलाम् ।
गैरिकं सिन्धुजं चैव अजामारी च मालती ॥ १०८ ॥
समं रुद्रजटा चैव विदार्या सह पेषयेत् ।
तत्लिप्तपादः सहसा सहत्रं योजनं व्रजेत् ॥ १०९ ॥
वलीपलितनिर्मुक्तः यावदाभूतसंप्लवम् ॥ ११० ॥
काकका हृदय, नेत्रों और जिह्वा, मनःशिल, गैरिक, सोंधानों, शूक शिम्बी, मालती इनके समान हृद्रजटा, विदारीकन्द इन सबको पीसकर उसको हाथ पैरोंमें लपेटकर सहत्र योजन दूर जा सकते हैं । वलीपलितसे निर्मुक्त होकर प्रलयतक विचरण करेगा ॥ १०८-११०
"ॐ नमो भगवते रुद्राय नमो हरितगाधराय त्रासय २ क्षोभय २ चालने २ स्वाहा ॥"
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कारजिह्वा ब्रह्मचारी गुडलोहेन वेष्टयेत् ॥ मुखे प्रक्षिप्य गच्छन्ति योजनं शतमेव च ॥ १११ ॥ आगच्छन्ति तदा तूर्णं ते नरा नात्र संशयः ॥ ११२ ॥
"ॐ नमो भगवते हृद्राय नमो हरितगदाराय त्रासय २ क्षोभय २ चालनं २ स्वाहा" कारजिह्वा, भारगी, गुड इनको लोहिस वेष्टित कर मुखमें डालकर सौ योजन जा सकते हैं और बहुत शीघ्र आसक्ते हैं इसमें संदेह नहीं ॥ १११ ॥ ११२ ॥
अडकोलतैलसंपीष्टां हवेतसर्षपलेपिताम् । पादुकामृष्टचर्मोस्थ्यां समारुह्य शतं व्रजेत् ॥ ११३ ॥
अंकोलके तेल और सरसोंके तेलसे ऊंटके चर्मकी पादुका लेपन कर उसपर चढ सौ कोस जा सकता है ॥ ११३ ॥इति पादुकासाधन ।
दो ईंटें संपुटकर उसपर इमशानकी अंगारसे इस यंत्रको लिखकर स्थापन कर देवे । यह यंत्र मेघोंको स्तंभन कर देता है, इससे अनावृष्टि हो जाती है ॥
अनावृष्टिहरणम्
'हूं हैं' (अथवा) 'हूं श्रीं हूं' इमं मन्त्रं जलमध्ये प्रविश्य यदि जपेत् तदा अनावृष्टिं हरति ।
महावृष्टिट्भवति ॥
इति श्रीनित्यानाथविरचिते कामरत्नं काम्यसिद्ध्यादिकथनं नाम द्वादशोपदेशः ॥ १२ ॥
'हूं श्रीं हूं' इस मंत्रको जलके मध्यमें खडा होकर जपे तो अनावृष्टि हरति ।
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वृष्टि जाती रहती है महावृष्टि होती है ॥
इति श्रीनित्यानाथविरचिते कामरत्ने पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां काम्यसिद्ध्यादिकथनं नाम द्वादशोपदेशः ॥ १२ ॥
त्रयोदशोपदेशः
अथ निधिदर्शकमंत्रजनम् ।
अज्ञजनानां तु सर्वेषां मन्त्रं साध्यमघोरकम् ।
विना मन्त्रेण विद्यांच नाशयन्ति पदेपदे ॥ १ ॥
सब अंजनोमैं अघोरमंत्र साधन करना उचित है । बिना मन्त्रके पद पदमे विद्या नष्ट होती है ॥ १ ॥
*अम्बिकायन्त्रमाश्रित्य जपेदष्टहसककम् ।
ततः सर्वविधानानि सुसाध्यानि च प्रारभन्त् ॥ २ ॥
अंबिकामूर्तिके आश्रित होकर आठ सहस्र जप करे तो सब निधि उसको सुखपूर्वक विदित हो जायगी ॥ २ ॥
यह चन्दनकर्पूर लेप देकर दर्भांकुर मूल नाम यन्त्र लिखकर वलयाकार करे "ॐ सिद्धो लं नमः ॐ हं सो लं नमः ॐ यं शो लि नमः ॐ कं को लं नमः ४ ॐ खिद खिद विन्दु विन्दु जोलीनमहानन्द २ महा धरण-
वर्णने नमः सर्व सुखदाराय धरण मड तो रोमा धरण ॐ हौं अम्बिके ॐ हौं अंबिके नमः "इति यन्त्रमध्ये लिलित्वा
पश्चात् 'ॐ अम्बे अम्बाले अम्बिके अवतारय ठः ठः स्वाहा' इस मन्त्रसे (३६०००) छत्तीस सहस्र जपनसे सिद्धि होती है,फिर जपकर २१ चमे
- यक्षिणामूर्तिमाश्रित्य इति पाठान्तरम् ।
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लोके फूल यन्त्रपर अम्बिकाकी मूर्तिपर रख्खे तो दोपमें प्रसन्नमुखी दोखती है कुमारोके मुखसे अम्बिका देवी शुभाशुभ कहती है, फिर अम्बिके देवी हुँ हुँ हों क्षौं यूं क्लों पढकर विसर्जन करो॥
ॐ बहुरूपं विश्वरूपं विद्याधरमहेश्वरम् । जपाम्यहं महादेवं सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥ ३ ॥
'ॐ बहुरूप विश्वरूप विद्याधर महेश्वर' सब सिद्धिके देनेवाले महादेवका मैं जप करता हूँ ॥ ३ ॥
"ॐ नमो रुद्राय रुद्ररूपाय नमो बहुरुपाय नमो विशवरूपाय नमो विश्वात्मने नमः तत्पुरुषयक्षाय नमो यक्षरूपाय नम एकस्मै नम एकाय * नम एक रौरवाय नम एकयक्षाय नम एकेक्षणाय नमो यक्षाय नमो वरदाय नमःतुदतुद स्वाहा" सोपवासो जितेन्द्रियोभूत्वा महेशपूजां कृत्वा इं मं मन्त्रं जपेत् ततः सिद्धिर्भवति ॥
'ॐ नमो रुद्राय रुद्ररूपाय नमो बहुरुपाय नमो विश्वरूपाय नमो विश्वात्मने नमः तत्पुरुषयक्षाय नमो यक्षरूपाय नम एकस्मै नम एकाय नम एकरौरवाय नम एकयक्षाय नम एकेक्षणाय नमो यक्षाय नमो वरदाय नमः तुद तुद स्वाहा" उपवास रहकर जितेन्द्रिय हो शिवकी पूजा कर इस मन्त्रको जपनेसे सिद्धि होती है ॥
कज्जलानां पातनार्थे ग्राह्यो यत्नेन पाकः । दीक्षतस्य गृहे श्रेष्ठं चितायां तु विशेषतः । × रजकस्य गृहद्र्वापि तस्करस्य गृहाच्च यः ॥ ४ ॥
- एकरोमाय नमो वा पाठः । × तक्षकस्य गृहाच्चापि इति वपाठा ।
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उपदेश: १३. हिन्दीटोकासहित (२७५)
काजरके पारनेको यत्नपूर्वक अग्नि ग्रहण करे । दीक्षितके घरकी अग्नि श्रेष्ठ है वा विशेष कर चिताग्नि उत्तम है अथवा धोबीके घरसे वा चौरके यहांसे लावे ॥ ४ ॥
"ॐ ज्वलितविद्युद्भाय स्वाहा" ॥ अयमग्निग्रहणमन्त्रः । वा ज्वलितविद्युते स्वाहा "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय बन्धबन्ध श्रोपतये स्वाहा ।" अनेन मन्त्रेण वत्मभिमन्त्रयेत् ॥ "ॐ नमो भगवते सिद्धसाधकाय ज्वल २ पच २ पातय २ बन्धय २ संहर २ दर्शय २ निर्दिंध नमः ॥"
अनेन दीपं ज्वालयेत् । "ॐ ऐं मन्त्रः सर्वसिद्धेश्यो नमो *विच्चेभ्य: स्वाहा ॥" अनेन कज्जलं ग्राह्यम् । "ॐ कालि कालि महाकालि रक्षेदमजनं नमो विश्वेभ्य: स्वाहा ॥" अनेन मन्त्रेण यत्कञ्चिदजनद्रव्यमभिमन्त्रयेत् ॥"ॐ सर्वे सर्वहिते क्लिं सर्वे सर्व-हिते सर्वोषधि प्रयाहि ते ॥ विरते नमोनम: स्वाहा ॥" अनेन मन्त्रेणाञ्जनयोग्यां मूलिकाम-भिमन्त्रयेत् ।
आदौ केवलहेमशालाकया नेत्रमज्जयित्वा ततस्तथैव शलाकया अञ्जनेन्द्रिय-मञ्जयित्वाञ्जनं पश्चात्सप्तधारस्य पत्रकमु । बन्धयेत् प्रतिनेत्रं तु अच्छिद्रं तदधोमुखम् ॥ ५ ॥
"ॐ ज्वलितविद्युद्भाय स्वाहा ।" यह अग्निग्रहणका मन्त्र है । "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय धरधर बन्ध बन्ध श्रोपतये स्वाहा" इस * विच्चेभ्य: इति वा पाठ: ।
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मंत्रसे बचीको अभिमंत्रित करे। 'ॐ नमो भगवते सिद्धसाधकाय ज्वल २ पच २ पातय २ बन्ध २ संहर २ दर्शयदर्शय निर्दिंध नमः। इस मंत्रसे दीपक जलावे। 'ॐ ऐं मंत्रः सर्वसिद्धेभ्यो नमो विरवेभ्यः स्वाहा' इस मंत्रसे कज्जल ग्रहण करे। 'ॐ कालि कालि महाकालि रक्ष रक्ष मां ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल तं तं फट् स्वाहा' इस मंत्रसे अंजन द्रव्यको अभिमंत्रित करे। 'ॐ सर्वे सर्वहिते क्लिं सर्वे सर्वहिते सर्वौषधी प्रियाहि ते विरते नमो नमः स्वाहा' इस मंत्रसे अंजन योग्यर्वातिको अभिमंत्रित करे। प्रथम सुवर्णशलाकासे नेत्रोंको आंजकर उस शलाकासे अंजन द्रव्यको अभिमंत्रित करे। इस प्रकार अंजनको आंजकर सातधारके पत्रको प्रतिनेत्रको अच्छिद्र और अधोमुख बंधित करे॥ ५ ॥
तस्योपरि सितं वस्त्रं पट्ट्र्जं चापि बन्धयेत्। नान्ज्याधिदाहटिकटीनां इतवस्त्रं नाविन्दधकम् ॥ ६ ॥
उसके ऊपर सम्यक् प्रकारसे रख्खे हुए इतवस्त्रको वेष्टन कर वा रेशमीवस्त्रको बांधे। और उस अंजनको अधिक और हीन अंगवालोंको न आंजे तथा इतदृष्ट अग्निदग्धको न आंजे॥ ६ ॥
सम्पूर्णाड्गं शुचि स्नात्वा द्विदिनं नक्तभोजनम्। भोक्तव्यं क्षीरशाल्यन्नं त्रिदिनान्ते ततोऽञ्जयेत् ॥७॥
सम्पूर्णं प्रकारसे पवित्र हो स्नान करके दो दिनपर्यन्त रात्रिमें नक्त भोजन करे। दूध शालिधान खाय। इस प्रकार तीन दिनके उपरान्त फिर आंजे। ७ ॥
अञ्जतस्य शिखाबन्धं कर्त्तव्यं मन्त्र उच्चते ॥८॥ 'ॐ नमो भगवते रुद्राय तुलतुल महेश्वर माहेश्वर नुज्वल २ विज्वल २ मिज्वल २ हर २
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यक्षरक्षपूजिते यक्षकुमारि सुलोचने स्वाहा॥ ॐ नमो भगवते रुद्राय ॐ नन्न २ महेश्वरविहेन्रमिहेन्र २ हरहररक्ष २ पूजिते यक्षकुमारिसुलोचने स्वाहा॥
यक्षाणां मूर्तिमाश्रित्य उदयास्तं मनुं जपेत् । पूर्वमेव समाख्यातं नशिखाबन्धं शिवोदितम् ॥ ९ ॥ इदं सर्वज्ञने ज्ञातव्यम् ।
आंजकर शिखाबंधन करे। उसका मंत्र कहते है- ॐ नमो भगवते रुद्राय तुल तुल महेश्वर माहेश्वर तुज्वल २ विज्वल २ मिज्वल २ हर २ यक्षरक्ष पूजिते यक्षकुमारि सुलोचने स्वाहा’ यक्षोंकी मूर्तिके आश्रित होकर उदय और अस्तमें इसका जप करे। शिखाबंधन शिवने पूर्वंही कह दिया है॥ यह सब अंजनमें जानना चाहिये॥९॥
शरत्काले तु संप्राप्या भूतला रक्तवर्णका। सिन्दूरपूरितां कृत्वा वर्तिं तूलन वेष्टयेत् ॥ १० ॥ अतिकृष्णतिलातैलं प्राहयेद्रक्षयेत्सुधीः । तैलवर्त्याः प्रयोगेण कज्जलं चोत्तरायणे ॥११॥ ग्राहयित्वाऽऽजनं चक्षुर्नाधि पर्य्यति साधकः । प्रमाणां च विजानाति गृहीत्वा न यथेप्सितम् ॥ १२ ॥
शरत्कालमें पृथ्वीसे इन्द्रगोप (वीरबहूटी) ग्रहण करनी चाहिये उसमें सिंदूर पूरित करके आंकी हुईको बत्ती करे और बहुत काले तिलोंका तेल लेकर उसको रक्षित करे। उसो प्रयोगसे बत्ती बाल उत्तर-रायणमें कज्जल ग्रहण करके आंजे तो निधिका दर्शन होता है और उसका प्रमाण जानकर यथेष्ट ग्रहण कर सकता है ॥ १०-१२ ॥
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अत कृष्णस्य काकस्य जिह्वामांसं समाहरेऽ । वेष्ट्यद्रवितूलेन वति तेनैव कारयेत् ॥ १३ ॥
अजागृतेन दीपं तु प्रज्वाल्यादाय कज्जलम् । अज्ञताक्षो नरस्तेन निंधि पर्यति पूर्ववत् ॥ १४ ॥
बहुत काले कोएको जिह्वाका मांस लावे उसका आंकी रुईसे लेपेटकर बत्तीके समान कर बकरीके घीमें उसका दीपक जलाय कज्जल ग्रहण करे । उसका लगानेसे मनुष्य अज्ञात निधिको पूर्ववत् देबता है ॥ १३ ॥ १४ ॥
सप्तधा पद्मसूत्राणि भावयेदिक्षुजे रसेः । उदृत्य ज्वालयेदीपमडगुलोतेलसंयुतम् ॥ १५ ॥
ग्राहं कुष्णत्रयोदश्यां कज्जलं निधिदर्शकम् । सर्वाजनमिदं सिद्धं शम्भुना परिकीर्तितम् ॥ १६ ॥
ईखके रसमें पद्मसूत्रको सात बार भावना दे । फिर उसे लेकर अंगुलीके तेलसे दीपक जलावे । कुष्णपक्षकी त्रयोदशीको कज्जल ग्रहण करनेसे निधिका दर्शन होता है । यह सर्व सिद्ध अंजन शिवजीने कहा है ॥ १५ ॥ १६ ॥
दीपकज्जलयोः पात्रं कर्त्तव्यं नरमुण्डजम् । तथैव कज्जलं तु सत्यं स्वाच्छव्मवस्थितम् ॥ १७ ॥
परन्तु इस सब प्रकारके दीपक और काजर पारनेका पात्र मनुष्यकी खोपडो ग्रहण करनी चाहिये । यह शिवजीने कहा है ॥ १७ ॥
रक्तेन कृकलासस्य भावयित्वा मनशिलालम् । तेनैवर्जितनेत्ररतु निंधि पर्यति पूर्ववत् ॥१८॥
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गिरगटके रक्त से मनशिलाको भावना देकर उससे नेत्र रंजित करके पूर्ववत् निधिको देख सकता है॥ १८ ॥ गृहीत्वा चानुराधायां वन्दां शाखोटवृक्षजाम् । गोरोचनसंं पिष्ट्वा त्वचजनं निधिदर्शकं ॥ एतत्सर्वाञ्जनं ध्यानं प्रसिद्धं शिवभाषितम्॥ १९ ॥ शाखोटवृक्षकी वन्दा अनुराधानक्षत्रमें ग्रहण करके गोरोचनके साथपोसकर आंजनसे निधिका दर्शन होता है। यह सब अंजन प्रसिद्ध और शिवजीके कहे हुए हैं॥ १९ ॥ अगस्त्यवृक्षजां कुर्यात्पादुकां निधिदर्शकाम्॥ पादुकाञ्जनयोगेन सिद्धयोगा भवन्ति वै ॥ “ॐ नमो भगवते रुद्राय उड्डामरेश्वराय शिलि २ धूमरे नागवेतालिनी स्वाहा ।” अनेन पादुका- महिमंत्रयेत्॥ २० ॥ अगस्त्यके पेडकी पादुका बनानेसे निधिका दर्शन होता है। पादुका अंजनके योगसे सिद्धयोग होता है॥ ‘ॐ नमो भगवते रुद्राय उड्डामरेश्वराय शिलि २ धूमरे नागवेतालिनी स्वाहा’ इससे पादुकाको अभिमंत्रित करे॥ २० ॥ तुलसीसूलिकां पुष्ये शनिवारे समुद्धरेत् । निष्पिष्य काञ्जिकेनाथ मधुना पुनरञ्जयेत् ॥ २१ ॥ पादजातं कुमारं वा कन्यका वा तदा निधि: । दृश्यते नात्र संदेहः पातालं गतवानपि ॥ २२ ॥ तुलसीकी जड पुष्यनक्षत्र शनिवारके दिन ग्रहण करे। उसे कांजीमें पोस शहतमैं मिलाय आँजे, अंजन उन्ही लोगोंको लगाना चाहिये कि,
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जो उलटे उत्पन्न हुए हों ऐसे कुमार चा कन्याको पातालपर्यन्तगतभी निधिका दर्शन हो सकता है । इसमें सन्देह नहीं है ॥२१॥२२॥
ॐ नमोभगवते रुद्राय कज्जललेपाञ्जनं दर्शय २ स्वाहा ठःठः । अननेन मन्त्रेण कज्जललेपाञ्जनमभिमन्त्रयेत् ॥
खन्यमाने च सर्पाइच निस्सरन्ति पदे पदे ॥ २३ ॥
ॐनमो भगवते रुद्राय कज्जललेपांजनं दर्शय २ स्वाहा ठः ठः ।
इस मन्त्रसे कज्जललेपांजनको अभिमन्त्रित करे । फिर खनन करनेसे पद पदमें बडे बडे सर्प निकलते हैं ॥ २३ ॥
औषधेन बिना तेभ्यो भयं स्थानमन्त्रणामपि ।
तस्मादौषध्ययोगेन पादलेपेन ताञ्जयेत् ॥ २४ ॥
औषधीते बिना मन्त्रवालोंको भी इनसे भय हो सकता है इस कारण औषधके योगसे चरणमें लेप करके इनको जय करे ॥ २४ ॥
अर्कस्य करवीरस्य *पनसस्य तु मूलिकाम् ।
पिष्टवा पादप्रलेपाच्च दूरे गच्छन्ति पन्नगाः ॥ २५ ॥
आक, करवीर और पनसकी जडको पीसकर चरणोंमें लेप करनेसे सर्प दूर भागजाते हैं ॥ २५ ॥
अथ अदूर्यकरनम्
चतुलक्ष्मिमं मन्त्रं रिमशाने प्रजपेच्छुचिः ।
नग्नवृत्तस्ततस्ततस्तुष्टा पटं यच्छति यक्षिणी ॥ २६ ॥
तेनावृतो नरोड्रुयो विचरेद्वसुधातले ।
निंधि पश्यति गृह्लाति न विघ्नः: परिभूयते ॥ २७ ॥
- पनसोत्पलमूलिकम् ऐसा पाठ है वहाँ कमलकी जड लेना ।
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पवित्र होकर आगे कहाहुआ मन्त्र इमशानमें नग्न होकर ४००००० जपे तब यक्षिणी इसको एक वस्त्र देती है। उससे आवृत मनुष्य किसीको न दीखता हुआ पृथ्वीतलमें विचरता है और निधि देखकर ग्रहण करसकता है कहीं विध्नोंसे इसका तिरस्कार नहीं होता है ॥ २६ ॥ २७ ॥
"ॐ हां ह्रीं स्फ्रें इमशानवासिनी स्वाहा ।" निशाचरीं निशि ध्यात्वा जप्त्वा वामेन पारणां । अदृश्यकरिणों विद्यां लक्षजाप्ये प्रयच्छति ॥ २८ ॥
'ॐहां हों स्फ्रें इमशानवासिनी स्वाहा' रात्रिमें ध्यान कर बामहाथसे जप करता हुआ एक लक्ष जप करके इस अदृष्टकारिणो विद्याको प्राप्त होता है ॥ २८ ॥
"ॐ नमो निशाचरमहामहेश्वर मम पर्यटत: सर्वलो-कलोचनानि बन्धय २ देव्याज्ञापयति स्वाहा । रात्रौ कृष्णचतुर्दश्यां इमशानान्तः शिवालये । बलिना चोपहारेण कुर्यादर्चनमुत्तमम् ॥ २९ ॥
ततो दीपाड्गुलितैलैर्वातिः स्याद्र्क्तान्त्रुभिः । प्रज्वाल्य नृकपालेन तु तत्पात्रे धृतकज्जलम् । अञ्जयेत्नेत्रयुगलं देवैरपि न दृश्यते ॥ ३० ॥
'ॐ नमो निशाचर महामहेश्वर मम पर्यटत: सर्वलोकलोचनानि बन्धय बन्धय देव्याज्ञापयति स्वाहा' कृष्णचतुर्दशीकौ रात्रिमें इमशानके बीच शिवालयमें बलि उपहार आदिसे उत्तम अर्चन करे ॥ फिर अंगुलौके तेलसे युक्त आकके तन्तुओंकी वत्ती बनावे, मनुष्यक खोपडीमें बालकर खोपडीपरही काजल पारे, उसको दोनों आंखोंमें लगानेसे देवताओंकोभी नहीं दीखता है ॥ २९ ॥ ३० ॥
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अर्कांशाल्मलिकार्पासपट्पञ्जतन्तुभिः ॥ ३१ ॥
पञ्चाभिर्वर्तिकाभिश्च नृपपालेषु पञ्च च ।
*नवनीतेन दीपाः स्यु: कज्जलं नृपालतः ॥ ३२ ॥
प्रहयैवर्जनमेतस्य पूजाविधौ विधीयते ।
पञ्चवस्तान्नीयजातं तु एकीकृत्य तं पुनः ।
मन्त्रित्याद्ज्जयेस्नेत्रे देवैरपि न दृश्यते ॥ ३३ ॥
" ॐ हूँफट्स्वाहाकालि २ महाकालि मांसशोणित-
अक्षिणि रक्तकृष्णमुखे देवी मा मे परयतु मानुषेति
ॐ हूँ फट् स्वाहा ।" एतन्मन्त्रायुतजपात्सिद्धि-
भंवति । उक्तादृशप्रयोगणामयमेव मन्त्रः ।
अनेन मन्त्रेणाष्टोत्तरशताभिमन्त्रिताड्गुलितैल-
प्रयोगात्सिद्धा भवन्ति ॥ ३४ ॥
आक, शोमल, कपास, वस्त्र, कमलके तन्तु इनसे पांच वत्ती करके अलग २ पांच मनुष्योंकी लोपडीमें मक्खनके घीसे वा नरतेलसे काजर पारे ॥ इन पांचोंको पूर्ववत् शिवालयमें पांचों स्थानों से लेकर फिर उसे एकत्र करे ॥ फिर इस मन्त्रसे अभिमन्त्रितकर नेत्रोंमें लगानेसे देवताओंकोंभी नहीं दीखता हँ । मन्त्र—ॐ हूँ फट् स्वाहा कालि२महा-कालि मांसशोणिताक्षिणि रक्तकृष्णमुखे देवी मामे पदयतु मानुषेति ओं हूँ फट्स्वाहा" इस मन्त्रको १०००० जपनसे. सिद्धि होती है । यह मन्त्र सब अदृश्यकरणके प्रयोगमें जानलेना । इस मन्त्रसे एक सौ आठ वार अभिमन्त्रित अंगुली तेलके प्रयोगसे सब सिद्ध होते हैं ॥३१-३४॥
- नरतेलैन इति वा पाठ: । अर्थ—नरका तेल ।
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उपदेशः १३. हि्नोटीकासहित (२८३)
अंगुलीतैलसंसिक्ता यवा: सप्तदिनावधि । त्रिलोहेवेष्टितास्तेभ्यां गुटिकां कारयेच्छुभाम् ॥ ३५ ॥ अदृश्यकरिणी मता तु मुखस्था नात्र संशय: ॥
अंगुली (गजगणों) के तेलसे सात दिनपर्यन्त जौको सिंचन करे और उसका त्रिलोहे वेष्टित कर सुन्दर गुटिका बनाय उसको मुखमें रखनेसे अदृश्य हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ३५ ॥
तत्तैले सर्पप: श्वेतास्त्रिलोहेन तु वेष्टिता: गुटिका मुखमध्येस्था सादृश्यकरिणी मता ॥ ३६ ॥
तत्तैले श्वेतास्तिलोहेन तु वेष्टिता: गुटिका मुखमध्यस्था सादृश्यकरिणी मता ॥ ३६ ॥
उस तेलमें श्वेत सरसोंको पूर्ववत् भावना दे गुटिका बनाय (चाँदी तांबे आदि) से मुखमें रखनेसे अदृश्य होजाता है ॥ ३६ ॥
कृठणकाकस्य हृदिरं पित्तं गोमायुसम्भवम् । काकारिनखचूर्ण्वापि समभागं विचूर्णयेत् ॥ ३७ ॥
ऋक्षे पुनर्वसौ वर्त्ति कृत्वा नेत्रे च रंजयेत् । अदृश्यो भवति क्षिप्रे सर्वकार्यप्रसाधक: ॥ ३८ ॥
काल कौएका हृदय, गीदड़का पित्ता, उलूकके नख, चोंच इनको समान भाग लेकर चूर्ण करे और पुनर्वसु नक्षत्रमें इसको बत्ती बनाय नेत्रोंमें आज तो वह शोघ्र अदृश्य हो जाता है तथा सब कार्यको सिद्ध हो कर सकता है ॥ ३७ ॥ ३८ ॥
कृष्णकुक्कुटपुच्छाग्रं निर्माल्यं मृतकस्य च । काकानेत्रं च मरिचं पिष्ट्वा कार्यम् च मूत्रकि: ॥ ३९ ॥
कलायार्द्ध प्रमाणेन वटों कृत्वा प्रशोषयेत् । तेनैवाञ्जितनेत्रस्तु अदृश्यो भवति ध्रुवम् ॥ ४० ॥
शंकरस्य च ।
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(२८४)
काले मृग्गीकी पूछका अगभाग, मृतकका निर्माल्य, कौएका नेत्र, काली मिचीं, अश्वबला इनको गोमूत्रके साथ पीसकर बेरकी बराबर गोली बनाकर सुखाले । इससे नेत्रोंको आंजन तो निश्चयह्री अदृश्य हो जाता है ॥ ४१ ॥ ४२ ॥
कृष्णमार्जारांतरस्थं रक्तं संगृह्याभावयेत् । नक्तमालस्य तेलेन तत् श्वेताक्षसूत्रजाम् ॥ ४१॥ वर्तित प्रज्वाल्य वज्रस्य* दले संगृह्य कज्जलम् । तेनाज्जनेन मनुजस्त्वदृश्यो भवति ध्रुवम् ॥ ४२॥
काली बिल्लीका रक्त ग्रहण कर नक्तमाल (करंज) तेलद्वारा भावना दे यत्नपूर्वक श्वेत आक्की कपासकी वत्ती बालकर वज्रवृक्ष (सेहुण्ड) के पतमेंं काजल कर उससे अंजन करनेसे अवश्यही मनुष्य अदृश्य हो जाता है॥ ४१ ॥ ४२ ॥
सुकृष्णं चैव मार्जारं मारयित्वा चतुष्पथे ॥ ४३ ॥ प्रक्षणं कारयित्वा तु दिनानां पंचविंशति: । तत्संगृह्य प्रयत्नेन क्षालयेच्छीतवारिणा ॥ ४४ ॥
यदस्य च श्रोत्रभेदी स्यादग्राह्यं यत्नतोऽभयम् । पूज्यितवा महाकालीं गोरोचनसमन्वितम् ॥ ४५ ॥
नकुलस्य तु पित्तेन भावयित्वा प्रपेषयेत् । तद्द्वात्ततिलकादेव नरोडदृश्यो भवेद्ध्रुवम् ॥ ४६ ॥
चौराहेमें काली बिल्लोको वध कर पच्चीस दिनपर्यन्त उसे प्रक्षरण करे अर्थात ग्रहण कर शीतल जलसे धोवे । यदि अस्थि श्रोतभेदी हो तो यत्नसे ग्रहण कर महाकालोकी पूजा और जप कर गोरोचनसे
- बदरस्य इति च पाठान्तरम् ।
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उपदेश: १३.
हिन्दीटीकासहित (२८५)
उसे नौलेकी पित्तेको भावना देकर पीसे उसकी बत्तीसे तिलक करे तो अवश्यही मनुष्य अदृश्य हो जाता है ॥ ४३-४६ ॥
नमांसं च शिवामांसं यत्नतो ग्राहयेद्ध्रुवं ।
प्रथमरजस्वलायाच्च रधिरेण वटीं कुरु ॥ ४७ ॥
त्रिलोहवेष्टिता सा तु मुखस्थाड्ृयकारिणी ॥ ४७ ॥
मनुष्य और गोदडीका मांस यत्नसे ग्रहण करके प्रथम रजस्वला हुई स्त्रीके रधिरसे उसकी वटिका बनावे । उसे चांदी तांबे अथवा सोनेसे मढाकर मुखमें रखनेसे मनुष्य अदृश्य हो जाता है ॥ ४७ ॥
कृष्णमाज्जारमुण्डे तु कृष्णगुज्जां प्रवापयेत् ।
तत्फलं वक्त्रस्थं हि साधयेद्ृश्यकारकम् ॥ ४८ ॥
काली बिल्लोके मुण्ड (खोपडी) में काली चोंटली बोवे । उससे उत्पन्न हुआ उसका फल मुखमें रखनेसे मनुष्य अदृश्य होजाता है॥४८॥
कोकाया नयनं वामं त्रिलोहेन प्रवेशयेत् ।
सा वटी मुखमध्ये ऽदृश्यं कुरते ध्रुवं ॥ ४९ ॥
कोयलके बायें नेत्रकी वटी बनाय त्रिलोहसे वेष्टित कर मुखमें रखनेसे प्राणो अदृश्य होजाता है । ४९ ॥
दिवाभीतस्य नयनं त्रिलोहेन प्रवेशयेत् ।
मुखस्थं कुरुतेऽदृश्यं यथेच्छं विचरेन्महीम् ॥ ५० ॥
उल्लूके नेत्रको चांदी सोने आदिसे मढाकर मुखमें रखनेसे मनुष्य अदृश्य होजाता है । फिर जहां इच्छा हो वहां विचरने लगे ॥ ५० ॥
ऋक्षे चैवानुराधायां वन्दां रासलवृक्षकाम् ।
मुखे प्रक्षिप्य च नरौद्ृश्य: स्यात्त्राहि संशय: ॥ ५१ ॥
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अनुराधानक्षत्रमें रोहित वृक्षका वन्दन ग्रहणकर मुखमें रखनेसे मनुष्य अदृश्य होजाताहै इसमें सन्देह नहीं ॥५१॥
शाखोटस्य च वन्दाकं नक्षत्रे मृगशिर्षके ।
गृहीत्वा पानपात्रेण अदृश्यों जायते नर: ॥ ५२ ॥
मृगशिरनक्षत्रमें शाखोट वृक्षके वन्दाको पानपात्रहारा ग्रहण करके मुखमें रखनेसे मनुष्य अवश्यही अदृश्य होजाता है ॥ ५२ ॥
भरण्यां तु समागृह्य वन्दां कार्पाससम्भवाम् ।
हस्ते बद्धवा हृदृश्य: स्याद्वात्यानां वा निम्बवृक्षजाम् ।
पिबेदुत्तरषाढायामशोकवृक्षसम्भवाम् ॥ ५४ ॥
वनदां तदा अदृश्य: स्यादश्विन्यां बिल्ववृक्षजाम् ।
वनदाकं वा कर धृत्वा अदृश्यों जायते नर: ॥ ५५ ॥
भरणीनक्षत्रमें कपासका वन्दा लेकर हाथमें बांधनेसे मनुष्य अदृश्य होजाता है अथवा स्वातीनक्षत्रमें नीमका वन्दा ग्रहुण करे तथा उत्तराषाढामें अशोकवृक्षका वन्दा ग्रहुण कर पोवे एवं अश्विनीनक्षत्रमें बेलके पेडका वन्दा लावे और इनको हाथमें धारण करनेसे मनुष्य अदृश्य होजाता है ॥ ५३-५५ ॥
इति अदृश्यकरन ।
अथ मृतसञ्जीवनी
मृतसञ्जीवनोवियां प्रवक्ष्यामि समासत: ।
लिङ्गगमडक़ोलवृक्षाध: स्थापयित्वा प्रपूजयेत् ५६ ॥
सक्षेपसे मृतसंजीवनी विद्याको कहता हूँ—ढेरके वृक्षके नीचे शिव-लिंगको स्थापन कर पूजा करे ॥ ५६ ॥
नवं घटं च तत्रैव पूजयेल्लिङ्गासंनिधौ ।
वृक्षं लिङ्गगं घटं चैव सूत्रेनकेन वेष्टयेत् ॥ ५७ ॥
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उन्होके निकट नवीन कलश वा घटको स्थापन करके पूजन करे । उस वृक्ष लिंग और घटको एकही सूत्रसे वेष्टित करे ॥ ५७ ॥
चतुर्भिस्साधकैर्नित्यं प्रणिपत्य ऋमेणतु । एवं *द्विद्दिदिनं कुर्वादघोरेण समर्चयेत् ॥ ५८ ॥
ॐ अघोरेभ्योथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः । सर्वतः सर्व सर्वेभ्यो नमस्ते रुद्ररूपेभ्यः । उक्तयोगानामयंमन्त्रः ॥
चार साधकोंसे नित्य प्रणाम करके दो दिन बराबर यह विधान कर 'अघोरेभ्यो' इस मन्त्रसे शंकरका आराधन करे । कहीं दो तीन दिन करना कहा है ॥इस प्रयोगमें यह अघोर मन्त्रकाही विधान है॥५८॥
पुष्पादिफलपाकान्ते साधनं कार्यतेद्बुधैः । फलानि पक्वान्यादाय पूर्वोक्तं पूरयेद्घटम् ॥ ५९ ॥
पुष्प फल पाकतक इस साधनको करे अर्थात फूल फल लाकर पूर्वोक्त घटको समर्पणकर पूर्ण करे ॥ ५९ ॥
तद्घटं पूजयेत्नित्यं गन्धपुष्पाक्षतादिभिः । तुषवर्ज्जं ततः कुुर्याद्दोजानां घट्र्येन्तुमुखम् ॥ ६० ॥
उस घटको नित्य गन्ध अक्षतसे पुजन करे और छिलका रहित बीजोंको मुखपर ढकदे ॥ ६० ॥
तन्मुखं बृंहणं वृत्तं किंचित् किंचित्प्रलेपयेत् । विस्तीर्णमुखभागान्तः कुम्भकारकरोद्रुबाम ॥ ६१ ॥
सुख वृद्धि में किंचित किंचित लेप करे-कुमहारके हाथ में रखी हुई (मिट्टी) लाय ॥ ६१ ॥
द्विद्दिदिनम् इत्थपि पाठः ।
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(२८८)
मृत्तिकां लेपयेतत्र तानि बीजानि रोपयेत् । कुंडल्याकारयोगेन यत्नादूर्ध्वमुखानि वेः ॥ ६२ ॥
उसपर मृत्तिका लेपन कर पइचात बीजोंका रोपण करे अर्थात कुण्डलोक आकार बोवे ॥ ६२ ॥
शुष्कं तं ताम्रपात्रोदूर्ध्वं भाण्डं देयमधोमुखम् । आतपे धारयेतैलं ग्राहयेतं च रक्षयेत् ॥ ६३ ॥
जब वह सूख जाय तब उसपर तांबेका पात्र रखकर नीचेको उसका मुख कर दे आतपमें रखकर उससे तेल ग्रहण कर उसकी रक्षा करे ॥ ६३ ॥
मासाद्रौ चैव ततैलं मासाद्रौ तिलतैलकम् । नस्यं देयं मृतस्यैव कालदष्टस्य तत्क्षणात् ॥ ६४ ॥
आधा मासा यह तेल और आधा मासा तिलका तेल ग्रहण कर इनको नास देनेसे कालरुपी राक्षसका काटा पुरुष जीवित होजाता है ॥ ६४ ॥
अथवा-पुंशुक्रं पारदे तुल्यं तेन तेलेन मर्दयेत् । नस्यं देयं मृतस्यैकं कालदष्टस्य वा क्षणात् ॥ ६५ ॥
तत्क्षणवा जीवयते मृत्यं गतेनापि यमालयम् । रोगपमृत्युसर्पादिमृतो जीवति हि स्वयम् । जीवमार्याति नो चित्रं महादेवन भाषितम् ॥ ६६ ॥
अथवा पुरुषका शुक्र, पारा रस यह तेलमें मर्दन कर नास दे तो काल दष्ट हुआभी जीवित होजाता है यमालयको गया हुआ तथा अपमृत्यु रोग और सर्पादिका काटा हुआभी अच्छा होता है, इसमें सन्देह नहीं। यह महादेवजीने कहा है ॥ ६५ ॥ ६६ ॥
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उपदेश: १३.
हिन्दीटीकासहित
(२८९)
पुष्यभास्करयोगेन गुडूचीमूलमाहरत् । कर्षमुष्णजले: पीतो .मृते मृत्युहरो भवेत् ॥ ६७ ॥
इति श्रीनित्यानाथविरचित्ते कामरत्ने निधिदर्शनांजनादिमृत्युसंजी- वनी कथन नाम त्रयोदशोपदेश: ॥ १३ ॥
पुष्यनक्षत्रसे जब सूर्यक योग हो तब गिलोयकी जड लावे इसको आठ कर्ष जलके साथ पीनेसे मृत्युक भय दूर होजात है । ६७ ।।गोरोचन कुंकुमसे भोजपत्रमें इस यन्त्रको लिख भुजामें धारण करे तो अपमृत्यु दूर हो, 'मृत्युंज्जयानम:' यह मूल मंत्र है ।यह यन्त्र सिद्धिदायक है ।
ति श्रीनित्यानाथत्र विरचते कामरत्ने पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृत भाषाटीकायां निधिदर्शनांजनादिमृत्युसंजीवनी कथनं नाम त्रयोदशोपदेश: ॥ १३ ॥
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अथ विषनिवारणम्
शम्भुनोक्तं समासेन विषं स्थावरजङ्गमम् । कृतत्रिमं योजञ्चैव वृश्चिकाद्यं तु सम्भवम् ॥ १ ॥
शिवजीने जो संक्षेपसे स्थावर, जंगम, कृतिम, योगसे उत्पन्न तथा वृश्चिकादि विष कहा है॥ १ ॥
ऋमालक्षणमेतेषां मन्त्रक्युतं वदाम्यहम् । नाम वक्ष्ये विषाणां तु शम्भुना कीर्तितं पुरा ॥ २ ॥
क्रमसे उनके लक्षण और मन्त्र वर्णन करताहूं तथा उन विषोंके नाम कहताहूं जो पहले शिवजीने कहे हैं॥ २ ॥
दरदो वत्सनाभश्चमुस्तकं पुष्करं विषम् । कूरं शाठं कर्मठं च हरिद्रं कालकूटकम् ॥ ३ ॥
इन्द्रबीजं चित्रबीजं हरितं गालवं विषम् । भृङ्गी कर्कटभृङ्गी च च मेषभृङ्गी हलाहलम् ॥ ४ ॥
शाकूटं रक्तभृङ्गी च ह्राजनं पुण्डरोकम् । संकोचं मघुपाकं च रोहिणं मधुरं तथा ॥ ५ ॥
पंचविंशतिभिर्भेदैर्द्विविध्ज्ञेयं स्थावरं विषम् । एतन्मध्ये ह्यतिकरू संकोचं कालकूटकम् ॥ ६ ॥
दरद (हिंगुल), वत्सनाभ, मुस्तक, पुष्कर, कूर, शाठ, कर्मठ-हरिद्र, कालकूट, इन्द्रबीज, चित्रबीज, हरित, गालवविष, भृङ्गी, कर्कटभृङ्गी, मेढ़ाभृङ्गी, हलाहलविष, शाकूट: रक्तभृङ्गी, अंजन, पुण्ड-
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उपदेश: १४.
हिन्दीटीकासहित
(२२१)
रोक, संकोच, मघुपाक, रोहिण, मेदीवर, ये नामवाले पच्चीस स्थावरविष जानने चाहिये। इनमें संकोच और कालकूट विष बड़ा तीक्ष्ण है॥ ३-६ ॥
भृङ्गी मुस्तं वत्सनामं पञ्चमं तु विषादिषम् ।
एषां देहप्रविष्टानां भृणु लक्षणमुच्यते ॥ ७ ॥
भृङ्गी मुस्त वत्सनामं विष पांचवां विषसे विष है। देहमेें प्रविष्ट हुए इन विषोंका लक्षण कहता हूं सुनो॥ ७ ॥
वान्तिमूर्छातिसारं च भ्रान्तिरशूलं च कम्पनम् ।
कासश्वासौ तीवदाहो लक्षणेद्गदगदस्वरम् ॥ ८ ॥
वान्ति, मूर्च्छा, अतिसार, भ्रान्ति, शूल, कम्प, खांसी, इवास, तोदय गद्गदस्वर होना यह विष खायेहुएका लक्षण हैं॥ ८ ॥
पुत्रजीवफलामज्जां शीततोयेन पेषयेत् ।
भोजने चाहजने पाने लेपे सर्वविषापहम् ॥ ९ ॥
स्थावरं जङ्गमं कूरं कृत्निमं योगजं तथा।
निष्कमात्रं न सन्देह: कालदष्टोडपि जीवति ॥ १० ॥
जिधापोतेकी मींगी शीतलजलके साथ पीसकर भोजन पान लेपम अंजनमें देनेसे सब प्रकारके विष दूर होजाते हैं तथा स्थावर, जंगम, कृत्रिम, योगज, आदि विष भी उपरोक्त औषधोके एक निष्क सेवन करनेसे जाते रहते हैं। बहुत क्या ? इसके प्रतापसे कालदष्टभी जीवित होता है ॥ ९-१० ॥
शाढवलं कड्कणं तुत्यं कट्फलं रजनी वचा ।
नरमूत्रेण संपोत्वा एकेकं तु विषं हरेत् ॥ ११ ॥
शाढवल, शुद्ध मुहागा, तूतिया, वटफल, हल्दी, वच, इनको मनुष्यके मूत्रमें पीस पीनेसे एक एक विषको भी दूर करते हैं॥ ११ ॥
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समूलपत्रं सपाक्षों तथैव देवदालिकाम् ।
गिरिकण्पांशच वा मूलं नरमूत्रेण पूर्ववत् ॥ १२ ॥
त्रिकटुं देवदारालिं च नस्स्थे सर्वविषापहम्
ब्रह्मदण्डीमूलं तु मधुना सह भक्षयेत् ॥ १३ ॥
पत्ते जडके सहित सहदेई और देवदाली अथवा विष्णुक्रान्ताकी जड
इनको मनुष्यके मूत्रसे पूर्ववत् पीसकर वा त्रिकुटा, देवदाली इनको
पीसकर नास लेनेसे भी सब विष दूर हो जाते हैं अथवा ब्रह्मदंडीकी
जड मधुके सहित भक्षण करे ॥ १२ ॥ १३ ॥
इवेताड्योलस्य मूलं तु मुखस्थे तिलकेडथवा ।
मुखस्थैरण्डमूलं वा छायाशुष्कं विषापहम् ॥ १४ ॥
इवेत अंकोलकी जड मुखमें रखनेसे अथवा तिलक करनेसे तथा
छायामें सुखाई अंडकी जड मुखमें रखनेसे विषको दूर करती है॥१४॥
टङ्कणं देवदार्लिं च जलै: पाने विषापहम् ।
नीलसर्पस्य पुच्छं तु कृकलासस्य पुच्छकम् ॥ १५ ॥
ताम्रेण वेष्टितं कृत्वा मुद्रिकां तां च धारयेत् ।
तया स्पृष्टजलं पोतं स्थावरं जङ्गमं हरेत् ॥ १६ ॥
सुहागा, देवदाली (घ॒घर बेल) इनको जलके साथ पानमें देनेसे
विषको दूर करनेवाली है । नीले साँपकी पुच्छ और गिरगटकी पूंछ
तांवसे लपेट मुद्रिका बनाय हाथमें धारण करे । उससे स्पर्श किया
जल पान करनेसे स्थावर और जंगम विष दूर होजाता है ॥१५॥१६॥
मन्त्र :-आतरथाकी यातरथा इलातोहाते उपजीलो
वृक्षमुंचचुलु करपापियो सिंदूरसावाणी कालकू-
टविष श्रीगोरक्षेर वाणीमुखे दिले हुये अमृतवाणी
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विषखाउ विषजारो विषकरोति भर विषहरि आछे त्रिदश ईश्वर महादेवेर आज्ञा गोरक्षेर वाणी
॥ १ ॥ सिन्दूरसार वाणो कालकट विषारीरमध्ये हया पानी श्रीगोरक्षेर आज्ञा
॥ २ ॥ खेदाय गुरु आदम सिख आमुकारे कान्देनाहो कालकूट विष
॥ ३ ॥ महादेवेर आज्ञा गोरक्षेर वाणी कालकूट विष शरीरमध्ये हयापानी
दृष्टि हन २ अं पार्णा। मन्त्राऽप्युक्तितं विषं मन्त्रेण वारत्रयमभिमन्त्रितं भक्षयेत्
॥ ४ ॥ यदिं किंचिस्थापि विक्रियते तर्हि चतुर्थमन्त्रेण वारत्रयम्
भिमन्त्रयेत् ॥ जलं वारत्रयं गण्डूषमात्रं पेयम् ॥
मन्त्र-' आतरथाकी यातरथा इलता हारत उपजोले वक्षमुज चलुक चिजा पिजो सिन्दूर सारणो कालकूट विष शरीर मध्य हयापानो श्रीगोरक्षेर आज्ञा । विषउखाड विषाजारो विषाकरोत भर विषहारी आछे त्रिदश ईश्वर महादेवेर आज्ञा गोरक्षेर वाणी सिन्दूर सारवाणी कालकूट विष शरीरमध्ये हयापानो' इस मन्त्रसे विष खायेहुएके मुखम तिनिवार मन्त्र पढकर जल दे और जो कुछ विकार होय तो चौथा मन्त्र पढकर तीनवार अभिमन्त्रित कर कुल्ले मात्र जल्पान करनेसे विष दूर हो जायगा ॥
भूनागसत्त्वसंज्ञतां मुद्रिकां धारयेत्करे। न तस्याक्रमते सत्यं विषं स्थावरजङ्गमम् । तत्स्पृष्टोदकपानेन विषं सर्वं विनश्यति ॥ १७ ॥
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गण्डूषपदी और भूनागके सत्वकी मुद्रिका हायथममें धारण करनेसे स्थावर जङ्गम विष इसको आक्रमण नहीं कर सकता है । इसी मुद्रिका का स्पर्श किया जलपान करनेसे सब प्रकारके विष नाश हो जाते हैं ॥ १७ ॥
शिरोधनकं ग्राह्यं रेवत्यां चन्द्रान्वितम् । तद्घृष्टं मर्दितं गात्रे तस्याङ्ङे विषनाशनम् ॥ १८ ॥
जब रेवती नक्षत्रमें चन्द्रमा हो तब शिरका वन्दा लावे, उसको घिसकर चंदनके साथ शरीरमें मलनेसे विष नाश होता है ॥ १८ ॥
वराहगोधानकुलशकुकुटुप्पत्तिकम् । इवेतायां गिरिकर्ण्याश्च फलमूलं विपेषयेत् ॥ १९ ॥
पाने सर्वविषं हन्ति मृतोप्युप्तिष्ठते क्षणात् । नाम्ना चामृतयोगोयं पुरा हि ह्रेण भाषितः ॥ २० ॥
शूकर, गवय, नौला खरगोश, कुत्ता, इन सबका पित्त तथा श्वेत विष्णुक्रान्तके फल और मूल दोनोंको पीसले इसके पान करनेसे सब विष दूर होकर मृतक पुरुष भी उसी समय उठ बैठता है, यह अमृतयोग प्रथम शिवजीने कहा है ॥ १९ ॥ २० ॥
पणवं पटहं चैव ह्यानेनैव प्रलेपयेत् । मृतोदिप विषयोगेन शृङ्खला वाद्यं प्रबुध्यते ॥ २१ ॥
पणव और पटह बाजेपर इसको लेप करे, विष योगसे मरा हुआ इस बाजेको सुनकर जाग उठेगा ॥ २१ ॥
श्वेतापराजितामूलं पीतवा दुर्ग्धेन मानवः । स्थावरं च विषं हन्ति उदरस्थं न संशयः ॥ २२ ॥
स्सिंधुकाञ्जिकं पीतवा स्थावरादिविषं हरत् ॥ २३ ॥
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उपदेश: १४. हिन्दोटोकासहित (२९५)
इबेत अपराजिताकी जड दूधके साथ पीसकर पान करनेसे उदरमें स्थित स्थावरविष दूर होता है इसमें सन्देह नहीं । सोंधानोंन मिलाय कांजोको पीनेसे स्थावर विष जाता रहता है इसमें संदेह नहींँ।२२।२३।
"ॐ नमो भगवते उड्डामरेश्वराय कुंचितामृतमर्चतजटाय ठ: ठ: स्वाहा ।" अनेन सर्वेषधम्-भिमंत्रयेत् । इति स्थावरविषनिवारणम् ।।
मन्त्र-'ॐ नमो भगवते उड्डामरेश्वराय कुंचितामृतमर्चतजटाय ठ: ठ: स्वाहा' इससे सब औषधियों को अभिमन्त्रित करे । इति स्थावर विष्णनि ० ।।
अथ (जङ्गम) सर्पविषनिवारणम् ।
जातीनां नाम रूपं च जंगमानामिहोच्यते । ब्राह्मणा: श्वेतवर्णा: स्यु: क्षत्रिया रक्तवर्णका: ।। वैश्यास्तु पीतवर्णाइच कृष्णवर्णास्तु शूद्रका: ।। २४ ।।
अब जंगमविषको जाति और स्वरूप कहते हैं-श्वेतवर्णका सर्प ब्राह्मण, लाल वर्णका क्षत्रिय, पीतवर्णका वैश्य और कृष्णवर्णका शूद्र होता है ।। २४ ।।
सर्पविषहरन्मन्त्र:
ॐ मेघमालेधिमाले हरहरविषवegं हाहाहाहासवा-रिहं अंबे लंम्बे सर्वविषनाशिनि महामाये हूं हूं लं स: ठ: ठ: स्वाहा । ज: ज: ज: सर्वविषनाशिनोमेघमाला नाम विद्याऽऽ प्रोठ: नोल कंठाय स्वाहा । ॐ नमो भगवति रक्ताङ्गे रक्तलोच्चने कपिलजटे कपिल-
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शरीरे कटकटकहकहभंजभंजशूलाग्रप्राणि उग्रचण्डतपेर्महार्तपे कृष्णे अतिकृष्णे इदं मानुषं शरीor मनुप्रविश्य श्रम २ श्रम २ श्रमय २ नृत्य २ बहुरुपे विलासिनिभक्ते कृष्णाग्जी पूरय २ वेशय २ विश्वरूपिणो रक्तपद्ट्रिद्रे आज्ञापर्यति हूं फट् ठः ठः एषा स्वास्थावेशाविद्या ॐ नमो भगवते पार्वयक्षाय हौं २ हूं २ धेनु २ कंप २ पुराणं दृष्ट्वा मावेशय २ स्वाहा""॥ २५ ॥
"ॐ मेघमाले" यह मन्त्र सर्पोकेविषको नाश करनेवाला मन्त्र है ॥२५॥
अनन्त: कुलिकश्चैव वासुकी शङ्खपालक: । तक्षकश्च महापद्म: कर्कोट: पद्म एव च । कुलनागाष्टकं होते तेषां चिन्हं शिवोदितम् ॥ २६ ॥
अनन्त कुलिक, वासुकी, शंखपालक, तक्षक, महापद्म, कर्कोटक, पद्म ये आठ कुलनाग हैं इनके चिन्ह शिवजिने कहे हैं ॥ २६ ॥
इवेतपद्ममनन्तस्य मूर्धिन पृष्ठे च दृश्यते । शङ्क: खं शेषस्य शिरसि वासुके: पृष्ठ उत्पलम् ॥ २७ ॥
अनन्तनागके शिर और पीठमें श्वेत पद्म देखा जाता है शेषके शिर पर शंखका चिन्ह, वासुकीके पृष्ठपर कमलका चिन्ह होता है ॥२७॥
त्रिनेत्राड्कस्तु कर्कोटस्तक्षक: शङ्काडिकृत: । ज्वलत्रिशूलचन्द्राद्रि शङ्खपालस्य मूर्द्धनि ॥ २८ ॥
कर्कोटक नागपर त्रिनेत्रका चिह्न, तक्षकपर शङ्कका चिह्न, शंखपालके शिरपर जलते हुए त्रिशूलका और अर्धचन्द्रका चिन्ह है ॥२८॥
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राजवत्तु समो बिन्दुर्महापद्मस्य पृष्ठतः । पद्मपृष्ठे च दृश्यन्ते सुरक्ताः पञ्चबिन्दवः ॥ २९ ॥
महापद्मको पीठपर राजाके समान बिन्दु होते है । पद्मनागको पीठ पर लाल पञ्चबिन्दु होते हैं इन लक्षणोंसे इन्हें पहचाने ॥ २९ ॥
एवं यो वेत्ति जात्यादिरामं बिन्दुं शिवोत्तम् । तस्य मन्त्रौषधाद्येव सिद्धयन्ते नान्यथा पुनः ॥ ३० ॥
दूरतस्तस्य सर्पाद्याः पतन्ति गरुडे यथा । कालाख्या नामतश्चिन्हं शिवेनोक्तं यथापुरा ॥ ३१ ॥
इस प्रकार शिवजोके कहे नाम बिन्दु जात आदिको जो जानता है उसोको मन्त्र औषधी सिद्ध होती है अन्यथा नहीं, सर्पादि उससे ऐसे दूर रहते हैं जैसे गरुडसे, यह वार्ता पूर्वमै शिवने कही है ॥३० ॥ ३१ ॥
दंशभेदाः
ज़ेयो दशविधो दंशो भुजङ्गानां भिषग्वरैः । भीतोन्मत्तः क्षुधार्तश्च आक्रान्तो विषद्रापितः ॥ ३२ ॥
आहारेच्छु: क्षुधार्तश्च स्वास्थ्यानपरिरक्षणः । नवमो वैरिसन्धानो दशमः कालसंज्ञकः ॥ ३३ ॥
सर्पोंका दंश दसविधका होता है, ऐसा वैद्योंको जानना उचित है । भीत, उन्मत्त, क्षुधादित, आक्रान्त, विषद्रापित, आहारकी इच्छावाला, भूखा, अपने स्थानको रक्षा करनेवाला, नवम वैरिसन्धान, दशम कालसञ्जक है ॥ ३२ ॥ ३३ ॥
स्थानभेदेन दशफलम्
उद्याने जीर्णकूपे च वटवृक्षेऽटचत्वरे । शुष्के वृक्षे इमशाने च प्लक्षाश्लेष्मातशिग्रुके ॥ ३४ ॥
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देवतायतनागारे तथा च शाकवृक्षे*। एषु स्थानेषु ये दष्टास्ते न जीविन्ति मानवाः ॥ ३५ ॥
भूमध्ये चाधरे मूर्धिनि जङ्घे नेत्रे भ्रुवौ तथा । प्रीवाेाचबुककण्ठषु करमध्ये च तालुकं ॥ ३६ ॥
स्तनयोः संधयोः कुक्षौ लिङ्गद्वृषणनाभिषु । मर्मसंधिषु सर्वत्र सर्पदष्टो न जीवति ॥ ३७ ॥
बगोचेमें, जीर्ण कूपमें, वट, शृङ्गाट, चौराहा, सूखे वृक्ष, इमशान, शेलुवृक्ष, संहिजने, देवताओंके स्थान, शाकवृक्ष इतने स्थानोंमें जो काटे गये हैं वे मनुष्य जीवित नहीं होसकते हैं । शाक-आकवृक्ष वा सेगुन वृक्ष, भूमध्य, अधर (होठ), शिर, जङ्घा, नेत्र, दोनों भौं, गर्दन, ठोडी, कंठ, हथेली, तालु, दोनों स्तनोंकी संधि, कक्ष, लिङ्ग वृषण, नाभि, सब मर्मको संधियोंमें सर्पका काटाहुआ नहीं जीता है ॥३४-३७ ॥
रवौ भौमे शनैै्वरारे सर्पदष्टो न जीवति । अष्टमो पंचमो पूर्णा ह्यमावास्या चतुर्दशी । अशुभभास्तिथयः प्रोक्तास्सर्पदष्टो न जीवति ॥३८॥
रवि, मंगल और शनिवारको सर्पका काटा नहीं जाता है । अष्टमी, पंचमी, पूर्णा, अमावास्या, चतुर्दशी यह अशुभ तिथि हैं, इनमें सर्पका काटा नहीं जाता है ॥ ३८ ॥
कृत्तिका श्वरणं मूलं विशाखा भरणी तथा । पूर्वास्त्रस्तथा चित्राइलेषाभेषु न जीवति ॥ ३९ ॥
कृत्तिका, श्ववण, मूल, विशाखा, भरणी, तीनों पूर्वा, चित्रा, आश्लेषा इनमें काटा हुआ नहीं जाता है ॥ ३९ ॥
- रसाल इति वा पाठ । अर्थ-आम ।
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मध्याह्ने सन्ध्ययोश्चैव हृद्रारात्रे निशात्यये । कालवेला वारवेला सर्पदष्टो न जीवति ॥ ४० ॥
सर्पस्य तालुमध्ये तु यो दन्तौड्कुशसन्निभः । विमुञ्चति विषं घोरं तेनायं कालसंज्ञकः ॥ ४१ ॥
चक्राकृतिश्च वा दंशः पङ्कजम्बूफलाकृति: । सुनील: श्वेतरक्तो वा त्रिदशोऽपि न जीवति । तत्रेन्त्रूपुरोषं वा हृच्छूलं छर्दिदाहकृत् ॥ ४३ ॥
सानुनासिकया वाक्यं सन्धिभेदमथापि वा । ताम्राभं नेत्रयुगलमथवा काकनीलकम् । वियोगो देवदष्टानां तं विद्यात्कालपाशगम् ॥ ४४ ॥
सेचनादुक्केनाङ्ङे शीतलेन मुहुर्मुहुः । रोमाञ्चो न भवेद्यस्य तं विद्यात्कालपाशगम् ॥ ४५ ॥
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जिसके शरीरमें शीतल जल छिड़कनेसे रोमांच न हो उसको कालपाशमें प्राप्त जानो ॥ ४५ ॥
वेदना दंशमूले वा नष्टदंशोदथवा भवेत् । तत्वषातिविदाहेन सोडपि कालेन भक्षितः ॥ ४६ ॥
जिसके दंशमें वेदना हो जिसके दंशमूल न देखा हो और जलन (महादाह-विसंञ्जा) हो उसे भी कालसे भक्षित जानो ॥ ४६ ॥
सोमं सूर्य यदा दीप्तं न परयति च तारकम् । दर्पणे सलिले वाथ घृततैलेन वा मुखम् ॥ न पर्यद्वैक्ष्यमाणोऽपि कालदष्टो न संशयः ॥ ४८ ॥
जब चन्द्रमा सूर्य दीप्तिमान् तारोंको न देखे तथा घृत तेल जलमें मुखकी परछाई जिसको न दीखे उस भी निःसन्देह कालकूट जानो ॥ ४७ ॥ ४८ ॥
ज्ञात्वा कालमकालं च पर्वादौ्रोषजमाचरेत् । सर्पदंसे विषं नास्ति कालदष्टो न जोवति ॥ ४९ ॥
तस्य तत्रापि कर्तव्या चिकित्सा जीवनावधि । रसदिव्यौषधीतां तु प्रभावात्कालजिद्ध्वेत् ॥ ५० ॥
काल अवकासको जानकर औषधी करनी चाहिये कारण कि, सर्पके काटमें विष नहीं है, परन्तु जिसको काल काट ले वह नहीं जीता है । तोभी प्राणोके जोनेतक चिकित्सा करे तो रस मात्रा तथा औषधि-योंके प्रभावसे काल भी जीता जा सकता है ॥ ४९ ॥ ५० ॥
सूतकं गन्धकं तुल्यं टङ्कणं रजनीसमम्
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देवदाल्या द्ववेभ्यां दिनं निष्कं तु भक्षयेत् ॥५१॥
कालशैलाशनिर्माम रसः सर्वविषापहः । नरमूत्रं पिबेच्चानु कालदष्टोपि जीवति ॥ ५२ ॥
शोधी पारी, गन्धक बराबर ले तथा हल्दी और सुहागा बराबर ले इसे देवदालीके रसमें युक्त कर प्रतिदिन एक कर्ष भक्षण करे । यह कालशैलाशनि नामक रस सब विषोंका हरनेवाला है, इसको मनुष्यके मूत्रके साथ लेनेसे कालका काटाभी जीवता है ॥ ५१ ॥ ५२ ॥
इवेतापराजितामूलं देवदालीयमलकम् । वारिणा पेषितं नस्यं कालदष्टोपि जीवति ॥ ५३ ॥
इवेत विष्णुक्रान्ताकी जड, देवदाली (बड़ी तोरई) की जड़ जल पीस नास देनेसे कालका काटाभी जी सकता है ॥ ५३ ॥
दधिमधुनवनोत्रं पिप्पलीभृष्ट्वेरं मरिचमपि च कुष्ठं चाष्टमं सैन्धवं स्यात् । यदि दशति सरोषस्तको वासुकिर्या यमसदनगतः स्यादनयेत् तत्क्षणेन ॥ ५४ ॥
दही, शहत, मक्खन, पीपल, अदरख, काली मिरच, कुठ्ठ इनसे आठवां भाग सैंधा मिलाया सेवन करनेसे साक्षात् तक्षक और वासुकीका काटाभी क्षणमें मृत्युसे लौट आता है ॥ ५४ ॥
कुटकी मुशलो मूलं पोतवा तोयैविषापहम् । वृश्चिकावारणामूलं लेपात्सर्वविषापहम् ॥ ५५ ॥
कुटकी और ताल मुशलीकी जड़ जलके साथ पीनेसे सब विष दूर होजाते हैं ॥ ५५ ॥
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वारिणा टङ्कणं पीतमथवार्कस्य मूलकम् । सन्धवं वा नृमूत्रेण प्रत्येकं विषनाशनम् ॥ ५६ ॥ जलके साथ मुहागा पीनेसे अथवा आककी जड पीनेसे अथवा मनुष्यके मूत्र सोधा पीसकर पान करनेसे विष नाश होजाता है ॥५६॥
इन्द्रवारुणिमूलं तु शुक्ता चाथ पुनर्नवा । वन्ध्याकरकोटीकमूलं मुशलोशिखिमूलकम् । तण्डुलोदक पानेन प्रत्येकं विषनाशनम् ॥ ५७ ॥ इन्द्रायणी, जड श्वेत पुनर्नवा, वन्ध्या, करकोटीकी मूली, तालमूली, अपामार्गकी जड इन प्रत्येकको चालवलके जलके साथ पान करनेसे विष दूर होता है ॥ ५७ ॥
गोक्षीरै रजनी कुष्ठं क्वाथपानं विषापहम् ॥५८॥ हलदी और कुठ इनका काढा कर गोके दूधमें मिलाकर पीनेसे विष दूर होता है ॥ ५८ ॥
भूृङ्गराजस्य मूलं तु त्रिशूलिन्यस्तु मूलकम् । तोयंव तण्डुलीमूलं प्रत्येकं विषजिद्द्रवेत् ॥ ५९ ॥ भांगरेकी जड, त्रिशूलिनी* की जड अथवाचौलाईकी जड जलके साथ पीनेसे विषको हरती है, चावलोंके जलके साथ प्रत्येक वस्तु विषहर होती है ॥५९॥
सोमराजीबीजचूर्णं सकृद्गोमूत्रभावितम् । वराच्चरविषघ्नं तन्मृतसंजीवनं पिबेत् ॥ ६० ॥ सोमराजीके बीजोंका चूर्ण कर एक वार गोमूत्रमें भावित करके दे तो यह चर अचर विषका नाशक एवं साक्षात् मृतसंजीवन है ॥६०॥
शिवालगी—औषधी ।
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कटुतुंब्युद्भवं मूलं सूक्ष्मं गोमूत्रपेषितम् । छायाशुष्कवटी मूत्रे: पानैलैपविषापहा ॥ ६१ ॥
गोमूत्रैनर्ममूत्रैर्वा पुराणेन घृतेन वा । हरिद्रापानमात्रेण विषं हन्ति चराचरम् ॥ ६२ ॥
गोमूत्रे वा नरमूत्रे वा पुराने घृतमें हलदीको मिलाकर पान मात्रसे स्थावर जंगमका विष दूर होजाता है ॥ ६२ ॥
दशवर्षात्परं सर्पि पुराणमिति कथ्यते । तत्पानादृंघ्रजन्त्वाद्विषं न संशय: ॥ ६३ ॥
यदि सर्पविषार्तानां सर्वस्थानगतं विषम् । दशवर्षके बाद घृत पुराना कहलाता है । यदि सर्पादिका विष सब शरीरमें प्राप्त हो गया हो तो भी उसको पीनेसे वा आंजनसे विष दूर hोता है यह निश्चय है ॥ ६३ ॥
गोक्षौरैरजनौक्वाथं पिबेत्सर्वविषापहम् । हरिद्राकुष्टमध्वाज्यं भुक्तं सर्वविषापहम् ॥ ६४ ॥
गौके दूधस हलदीको क्चाथ पीनसे सब विषको हरनेवाला है ॥ ६४ ॥ हलदी कुष्ठ, शहद, घृत यह खानसे सब विष दूर होते हैं ॥ ६४ ॥
मूलं तु श्वेतगुञ्ज्जाया वक्त्रस्थं विषनाशनम् । पुष्योद्भवतं तस्य मूलां नस्येन विषनाशनम् ॥ ६५ ॥
श्वेतचौंटलोकी जड़ मुखमें रखनेसे विष दूर होता है । पुष्यनक्षत्रमें उखाड़ी हुई इन्सीकी जडकी नास लेनेसे विषका नाश होता है ॥ ६५ ॥
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पाठाद्रवेण तमूलं पाने स्यात्कालकूटजित् । अर्कमूलेन संलिप्य दंशं विषहरं महत् ॥ ६६ ॥
पाठाके साथ उसकी जड पान करनेसे कालकूटको जीतनेवाली है । आर्की जडके साथ इसोका लेप करनेसे सर्पका विष दूर होता है॥६६॥
रक्त चित्रेन्द्रगोपाभ्यां तथा विषविनाशकम् । सर्पं हरितवर्णं च पुच्छाग्रे पाटयेच्छरः ॥ ६७ ॥
लाल चिता, वीरबहूटी ये भी विषका नाश करनेवाली हैं । हरित वर्ण सर्पकी पूंछ और शिर काटले इसे मुखले ॥ ६७ ॥
शुक्लं कृष्णं पृथक्कायैं नस्यं सर्वविषापहम् । शुक्लं शुक्ले दक्षिणांगे कृष्णं कृष्णे च वामके । मृतसञ्जीवनं होतत्कालदष्टेऽपि जीवति ॥ ६८ ॥
शुक्ल, कृष्ण इनकी पृथक् नास लेनेसे सब प्रकारका सर्पविष दूर होजाता है । शुक्लको शुक्ल दक्षिण अंगमे और कृष्णको कृष्ण वाम अंगमें न्यास करे । यह मृतसञ्जीवन है इसके प्रयोगसे कालका काटा हुआ भी जीता है ॥ ६८ ॥
तिक्तकोशातकीव्वाथं मध्याज्यसंयुतं पिबेत् । तत्क्षणादमयेद्रस्तु विषयोगाद्रिमुच्यते ॥ ६९ ॥
कुठा झिनोल्ताका काढा धृत शह्तक साथ पानिसे तत्काल वमन होता है इसे विषके संयोगसे छूट जाता है ॥६९॥
कुटकी जम्बुमूलं वा तक्राम्लैर्वा पिबेज्जलम् । तत्क्षणाद्रमते शोघ्रं विषयोगादिमुच्यते ॥ ७० ॥
कुटकी और जामुनवृक्षकी मूल तक्र और अम्ल पदार्थोंके साथ तत्क्षणाद्रमते शोघ्रं विषयोगादिमुच्यते ॥ ७० ॥
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पोसकर जलसे पिये तो उसो समय वमन कर विषके संयोगसे छूत जाता है ॥ ७० ॥
राजवृक्षत्वचं ग्राह्यं शुक्लं कृष्णं पृथक्पृथक् । शुक्लवृक्षे तु शुक्लान्तां हतुविषान्तिमिः सह ॥ ७१ ॥
मरिचैः पाननिष्ठस्य कृष्णे कृष्णत्वचं तथा । पौतवा तैर्नविषो दष्टः कथितं हरमेखले ॥ ७२ ॥
अमलतासवृक्ष की छाल ग्रहण करे जो शुक्ल और कृष्ण हों इनको पृथक्पृथक् ग्रहण करे । धववृक्षमें शुक्ल छालको चौबीस पूर्ण दक्षिणी मिरचोंके साथ पान करे और कृष्ण मिरचोंके साथ काली छालको पोनेसे निर्विष हो जाता है तो हरमेखलामें कहा है ॥ ७१ ॥ ७२ ॥
कुङ्कुमालक्तकलोध्र शिला चवाथ रोचनां । गुटिकालेपनाद्विनित विषं स्थावरजङ्गमम् ॥ ७३ ॥
कुंकुम, लाख, लोध, मनशिला, गोरोचन इनकी गुटिका बनाय लेप करे तो स्थावर, जंगम सब प्रकारका विष दूर हो जाता है ॥ ७३ ॥
द्दै हरिद्रे शिला तालं कुङ्कुमं कुष्ठकं* जलैः । गुटिका लेपमात्रेण विषं हन्ति महाद्भुतम् ॥ ७४ ॥
दोनों हल्दी, मैनशिल, ताल, कुंकुम कुठ (वामोथा) इनको जलसे गुटिका बनाय लप करनेसे स्थावर जगम विष दूर होता है ॥ ७४ ॥
पूतीकरञ्जबीजस्य मज्जानं कारवेल्लजं । पिष्ट्वा पिबेत्सरसापिकं विषं हन्ति न संशयः ॥ ७५ ॥
पूतोकरंजके बीजकी मोंग, करेलो इनको पीसकर घीके साथ पान करे तो सर्व विष अवदय दूर होते हैं इसमें सन्देह नहीं ॥ ७५ ॥
- मुस्तकं इति वा पाठः अर्थ-मोथा ।
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पिप्पलीं मरिचं कुष्ठं गृहधूमं मनःशिलाम् ।
तालकं सर्षपाः श्वेता गवां# पित्तेन लोडयेत् ॥७६॥
गुटिकाजननस्येन पानाभ्यां जनलेपनात् ।
तक्षकेऽपि दष्टस्य निर्विषीकुरते क्षणात् ॥७७॥
पीपल, कालीमिर्च, कुष्ठ, घरका धूप, मनशिल, हरताल, सफेद सरसों इनको गोपित्तके (वा गोके) दूधके साथ मिलाय इसकी गुटिका बनाय अंजन और नास तथा पान वा लेप करे तो तक्षकका कटा हुआ भी क्षणमात्रमें निर्विष होजाता है ॥ ७६ ॥ ७७ ॥
पथ्या+ क्षौद्रं मरिचं च पत्रं हिड्गु शिला वचा ।
जलেন गुटिकां नस्येत्कालदष्टोडपि जोवति ॥ ७८ ॥
हरड, शहद, कालीमिर्च, तेजपात, हिंगु, मनशिल, वच इनको जलस् पांस गुटिका कर नस्य लेनस कालिकटाहुआ भी जीवित हो जाता है ॥७८॥
अश्वगंधा मेघनादो गोमूत्रं महिषाक्षकम् ।
गृहधूमेन वा लेपः शिरःकण्ठविषं हरेत् ॥ ७९ ॥
असगंध, चौलाईको जड़, गोमूत्र, भैंसका मूत्र, गृहधूम इनका लेप शिर और कंठ तक प्राप्त हुए विषको दूर करता है ॥ ७९ ॥
पञ्चाङ्गमश्वगन्धायाश्चागोमूत्रेण पेषयेत् ।
लेपे पाने न सन्देहेा नानाविषनिविषनाशनम् ॥ ८० ॥
असगंधका पंचांग छागके मूत्रसे पीसकर इसका लेप और पान करनेसे नाना प्रकारके विष नाश होजाते हैं ॥ ८० ॥
शिला हिङ्गु वचा व्योषमभयात्वक् पत्रकम् ।
नस्ये वामुकदष्टस्य निर्विषं शीतवारिणा ॥ ८१ ॥
वां क्षीरेण लोडयेदिति पाठान्तरम् । + पत्रं पलमिति वा पाठः ।
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मनशिल, हिंगु, वच, सोंठ, मिर्च, पीपल, हरडकी बकली, तज, तेजपात इनकी ठंढे जलके सहित नास लेनेसे वासुकीका काटा हुआ भी निर्विष होजाता है ॥ ८१ ॥
पुत्रजीवफलान्मज्जां गवां क्षीरेण पेषयेत । लेपनाज्जननस्येन कालदष्टोऽपि जीवति ॥ ८२ ॥
जियापोतेके फलकी मिंग, गौके दूधसे पीसे उसके लेप अंजन और नाससे कालका काटा हुआ भी जो जाता है ॥ ८२ ॥
कृष्णधतूरमूलस्य चूर्णं ग्राह्यं पलोन्तम । करञ्जतैलकरर्षण वटीन् कृत्वा तु धारयेत । जम्बीरस्य रसे: पीत्वा रौद्रीविषनिवारणम ॥ ८३ ॥
काल वतूरका जडको एक पल चूर्ण लेकर एकरञ्जक कर्ष के तेलसे वटी बनाय रखे उसे जंबीरोके रससे पिये तो कठिन विष नाश होजाता है ॥ ८३ ॥
लज्जालुमूलं तिल्यां वा मूलं स्वच्छेन वारिणा । पोतवा रौद्रोविषं हन्ति लेपाद्गुञ्जाबलान्नत: ॥ ८४ ॥
गृहधूमं हरिद्रे द्वे समूलं तन्दुलीयकम । अपि वासुकिना दष्टा: पिबेद्धृघृतान्वितम ॥ ८५ ॥
लज्जावन्तीको जड अथवा नीलाको जड स्वच्छजलसे पीने से महाविष नाश होजाता है और चौंटली, खरेंटी, घरका धुआं, दोनों हलदी, चौलाईकी जड इनको दधि और घोके साथ पीनेसे वासुकोका काटा हुआाभी निर्विष होजाता है ॥ ८४ ॥ ८५ ॥
तन्दुलीयकमूलं तु पोतं तन्दुलवारिणा । तक्षकेणापि दष्टस्य निर्विषं कुरूते ध्रुवम ॥ ८६ ॥
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चौलाईकी जड चावलके जलके साथ पीनेसे तक्षकका काटा हुआआभो क्षणमें निविष होजाता है ॥ ८६ ॥
कुलिकामूलनस्येन कालदष्टोडपि जीवति ।
"ॐ आदित्यचक्षुषा दष्टोडहं हर विषं स्वाहा ॥"
अनेन मन्त्रेणोक्तयोगानभिमन्त्रयेत् ॥ ८७ ॥
कोकलावृक्ष के जडको नास लेनेसे कालका काटाभो जोता है । 'ॐ आदित्यचक्षुषा दृष्ट: दृष्टोडहं हर विषं स्वाहा' इस मन्त्रसे पिछले कहे योगोंको अभिमंत्रित करे ॥ ८७ ॥
अपराजितामूलं तु घृतेन त्वगतं विषम् ।
पयसा रक्तगं हन्ति मांसगं कुष्ठचूर्णत: ॥ ८८ ॥
अस्थिर्गं रजनीकृतं* मेदोगं लाडलोयतम् ।
मज्जगं पिप्पलीयक्तं चण्डालीमूलसंयुतम् ।
शुक्रगं हन्ति लौहित्यं तस्मादेयापराजिता ॥ ८९ ॥
अपराजिताकी जड-घृतसे युक्त पान करनेसे त्वचामें प्राप्त हुआ विष जाता रहता है, दूधके साथ पान करनेसे रक्तमें प्राप्त हुआ विष दूर होता है, कुष्ठके चूर्णके साथ पीनेसे मांसमें प्राप्त हुआ विष दूर होता है, हलदीसे युक्त कर पोनेसे हड्डीमें प्राप्त हुआ विष और कालिहारो (काकिली) की जडसे मेदमें प्राप्त हुआ, पिप्पलीसे मज्जामें प्राप्त हुआ और पचगुरियाकी जडके साथ वीर्यमें प्राप्त हुआ विष दूर होता है इस कारण अपराजिता देनी चाहिये ॥ ८८ ॥ ८९ ॥
इति भावो भवेद्यस्य आत्मरूपमिदं जगत् ।
तत्सकैर्विषकोटाद्यैर्भक्ष्यमाणो न बाध्यते ॥ ९० ॥
- काकलोयुतम इति वा पाठ: ।
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जो पुरुष ऐसा समझता है कि, यह जगत् आत्मस्वरूप हे उस पुरुषको किसी कीटादिका विष व्याप्त नहीं होता हे॥ ९० ॥
सध्य: सर्पेण दष्टस्य वामनासिकया कृतः । लेप: कर्णमलेनापि नमत्रे: सेचनेन वा ॥ ९१ ॥
स्तम्भते गरलं तेन नोद्वर्व धार्वाति धातुषु । वराहकर्णिकामूलं हस्ते बद्धं विषापहम् ॥ ९२ ॥
जिस समय सर्प काटे उसो समय हाथको अनामिका अंगुलीसे बांई नासिकाके मلكो दंशपर लेपन करनेसे अथवा न्रमोत्रसे सेचन करनेसे विष स्तंभित होजाता है, धातुओंमें फैलता नहीं। असगंधकी जड हाथ में बांधनेसे विषकी हरनेवाली है ॥ ९१ ॥ ९२ ॥
- शिरोषपुष्पस्वरस: सप्ताहं मरिचं सितम् । भावितं सर्पदष्टानां पाने नस्ये द्विजने हितम् ॥ ९३ ॥
शिरसके फूलके स्वरसमें सात दिन कालोमिरचको रख मिश्रीके साथ लेप करनेसे या पान करनेसे आंजनसे नस्यसे हितकारक है, सर्पविष उतरता है ॥ ९३ ॥
स्वच्छन्दभैरवो विद्या कथ्यते विषनाशिनी । " ॐ नमो भगवतो स्वच्छन्दभैरवो महाभैरवो काल-कृटविषं स्फोटय २ विस्फारय २ खादय २ अवतारय २ नास्ति विघ्नाहलाहलविषकृतं विषं संयोगविषं हृद्यग्रविषं स्थावरं विषं जङ्गमं विषं कालचञ्चुयाराइष्टंन्रस्तडदर्घायण इथ्यइथय ॐ कालाय महाकालाय कालर्म्हदेवी अमृत-* जयन्तो । इति पाठान्तरम् ।
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(३१०)
गर्भेदेवी 'ॐ ॐ फटफट् स्वाहा' अनेन मन्त्रेण मन्त्रथेत् ॥ सप्तधा नवधा जलमभिमन्त्र्य तेनाभि-
षिच्य तज्जलं पाययेच्च निर्विषंस्यादियं स्वच्छन्दभैरवो विद्या ॥"ॐ हूं हूं संस्वः हंसः ॥ वाऒं कूं कूं संस्वः हंसः।" अनेन मन्त्रेणाभिमन्त्रितपानी-
यपाननापि माउजनेन वा निर्विषः स्यात् ॥ स्वच्छन्दभैरवोविद्याको भो विष्णनाशानो कहा है 'ॐ नमो भगवती
स्वच्छन्दभैरवो कालकूठविषं स्फोटय स्फोटय विस्फारय विस्फारय खादय २ अवतारय २ नास्ति विष हालाहल विष कृतिमं विषं संयोज-
गजविषं हृत्युगविषं स्थावरं विषं जगमं विषं काल चंचुइयारा इष्टं त्रस्तडदघारियण इथय इथय ॐ कालाय महाकालाय कालमदेवी
अमृतगर्भेदेवो 'ॐ ॐ फट् फट् स्वाहा' इस मन्त्रस झाड़द । सात वार या नौवार जल अभिमन्त्रित कर दे तो निर्विष हो जायगा । यह
स्वच्छन्दभैरवी विद्या है । 'ॐ हूं हूं संस्वः हंस:' इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलके पानसे मार्जनसे मनुष्य विषरहित होजाता है ॥
देवदारु चित्रकं च करवीरार्कलज्जली । मूलानि वारिणा पिष्टवा कालदष्टहरं पिबेत् ॥ ९४ ॥
देवदारु, चीता, कनेर, आक, कलिहारी इनको जड़ जलसे पोसकर पनिसे कालदष्टभया जीवित होता है ॥ ९४ ॥
मन्त्रौषधिप्रयोगेण यदि दष्टो न जीवति । छेदयत्तीक्षणहास्त्रेण दंशस्थानं भिषग्वरः ॥
स्थावरं तु विषं दद्यादष्टो दष्टेन हन्यते ॥ ९५ ॥
जो काटाहुआ मन्त्र औषधीके प्रयोगसे न जिये तो काटे हुए
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स्थानको तोक्षण शस्त्रसे छेदन करदे, उसकेर स्थान पर विष दे, क्योंकि काटेसे काटा हुआ हनन होता है वा विषको विष मारता है ॥ ९५ ॥
यस्तु संरोषितः सर्पो धूमं वक्त्रादिमुचति । तुङ्डाग्रे पिशितं भुक्त्वा बहुशस्तेन दंशितः ॥ ९६ ॥
अशक्यमगदैर्न्यैर्विषणैश्च चिकित्सयेत् । जो क्रोधित सर्प मुखसे धूम निकालता होउसके मुखके आगे मांस रखकर उसका बहुतवार कटवादे । तो और औषधियोंसे अशक्य हो तो यह देकर विशेष चिकित्सा करनी ॥ ९६ ॥ ॥१९७ ॥
क्षीरक्षौद्रघृतैर्युक्तं द्विगुञ्जं पाययेद्विषम् । विषेण लेपयेदंशं कालदष्टोऽपि जीवति ॥ ९८ ॥
दूध शहत घीसे युक्त दो चौटली भर विष दे और काटे हुए पर विषका लेप करे तो कालका काटाहुआभी जोता है ॥ ९८ ॥
मृतसञ्जीवनं ख्यातं निर्गुण्डी तगरं विषम् । पिण्डोतगरमूलं च पुष्येणोत्पाटच योजितम् ॥ ९९ ॥
दंशो देशं मृतस्यापि दश्टो जीवति तत्क्षणात् । यह मृतसञ्जीवननामसे विख्यात है-निर्गुण्डी तगर विष गंधक और तगरका मूल पुष्यनक्षत्रमें उखाडकर उसमें मिलावे । जहां सर्पने काटा हो वहां यह वस्तु लगानेसे गुण होगा ॥ ९९ ॥
सर्पदष्टो यदा वीरस्तं सर्प दंशते स्वयम् । मुक्तोऽसौ त्रियते सर्पःस्वयं निर्विषतां व्रजेत् ॥ १०० ॥
जब सर्प काटता है तब धीर पुरुष उस सर्पको स्वयं काटले । तबयह विषसे छूटता है, सर्प मर जाता है और यह निर्विष होजाताहै। १००।
यद्रा तद्रा फलं दन्तैस्सर्पभावेन भक्षयेत् ॥ १०१ ॥
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दन्तैर्वा दंशयेद्र्दौं दण्डवत्पतितो नरः । सर्पभावे न सन्देहो न तस्य ऋमते विषम् ॥ १०२ ॥
सर्पको भावनासे किसी फलको चबाले, दंडके समान गिरकर दांतोंसे पृथ्वीको काटे और सर्पकी भावना करे । इसमें सन्देह नहीं, उसको विष नहीं चढेगा ॥ १०१ ॥ १०२ ॥
अत्यन्तविषयोगार्त्तं जलमध्ये विनिक्षिपेत् ॥ १०३ ॥ जो अत्यन्त विषसे व्याकुल हो उसे जलमें डालदे तो निविष हो ॥३०३॥
मूलं तन्दुलवारिणा पिबाति यः प्रत्यड्ढिरासम्भवं निष्पन्नं शुचि भद्रयोगदिवसे तस्याहिभोति: कुतः । दर्पदिव फणी यदा वर्षति तं मोहान्वितं मानवं स्थानेऽन तत्र सएव याति नियतं चक्रं यमस्याचिरात् ॥ १०४ ॥
जो इक्षेत्पुनर्न्नवाको चावलके पानीके साथ भद्रा मुहूर्त योगमें- पीता है उसका सर्पके काटनेका भय नहीं होता । जो मोहसे सर्प मनु ष्यको दंशित करता है तो वह शोघ्रही उसके बदले आपही यमर- जके लोकको जाता है ॥ १०४ ॥
आषाढशुक्लपञ्चम्यां कटचां शिरोष्मूलकम् । तन्दुलोदक पानेन सर्पदंशो न जायते । भ्रमाद्द्वा दशते सर्पस्तदा सर्पो विनश्यति ॥ १०५ ॥
आषाढशुक्ल पंचमोके दिन जो अपनी कमरमें शिरसकी जड बांधता है और तन्दुलका जल पान करता है उसकेो सर्पदंश नहीं होता है और जो कदाचित भ्रमसे सांप काट खाय तो वह सर्पही नष्ट होजाता है ॥ १०५ ॥
पुष्ये इशेतार्कमूलं तु इशेतवर्षाम्बुमूलकम् ॥ १०६ ॥
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संगृह्य पेयं तदृक्षे स्नात्वा तन्दुलवारिणा । सर्पभोति विनाशार्थं प्रतिसंवत्सरं नरैः ॥ १०७ ॥
पुष्यनक्षत्रमे इवेत आकौकी जड़ और इवेत पुनर्नवाकी जड़ लाकर क्षान कर तन्दुलक जलके साथ प्रतिवर्ष पिये तो उसको कभी सर्पसे भय नहीं होता है ॥ १०६ ॥ १०७ ॥
मसूरनिम्बपत्राभ्यां खादेनमेषगते रवौ । अब्दमेकं न भोति: स्यादृषिार्तस्य न संशय: ॥ अतिरोषान्वितस्तत्स्य तकक: किं करिष्यति ॥ १०८ ॥
मेषके सूर्यमे एक मसूरको दो निम्बके पत्तोंके साथ भक्षण करे तो एक वर्ष तक उसकी सर्पसे भीति नहीं होतो है । तकक भी क्रोधकर उसको क्या कर सकता है ? ॥१०८॥
कृकलासस्य दन्तांच इवेतसूत्रेण वेष्टयेत । बाहौ बध्वा विषं हन्ति विषं भुक्तवा न बाध्यते । सर्पवृश्चिकमूषाणां मुखस्तम्भः प्रजायते ॥ १०९ ॥
गिरगिटके दांतको इवेतसूत्रसे लपेटकर भुजामें बांधनेसे विष दूर हो जाता है, विष खानेंपर भी बाधा नहीं होतो तथा सॉप बिच्छू और चूहोंका मुख स्तंभित हो जाता है । मन्त्र यह है- 'ओं शबरों कीर्तिय संजाव संजाव स्वाहा' सहत्र जपसे सिद्धि होतो है । इस मन्त्रसे हस्ते बांधे ॥ १०९ ॥ ११० ॥
पातालगरुडी मूलं लम्बमानं गृहे स्थितम् । दृष्टवा गच्छन्ति ते दूरं सर्पाद्या विषकोटका: ॥ १११ ॥
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छिरहिताको जड़ घरमें लाकर रख देनेसे सर्पादि विषके कोडे उसे देखकर दूर पलायन करते हैं ॥ १११ ॥
" ॐ प्लः सर्पकुलाय स्वाहा ॥ वा अशेषसर्पकुलाय स्वाहा" अथेन सप्ताभिमन्त्रितां मृत्तिकां गृहमध्ये क्षिपेत्, तदा सर्पाः पलायन्ते ॥
'ॐ प्लः सर्पकुलाय स्वाहा' इस मन्त्रसे सात वार अभिमन्त्रित कर मिट्टी घरमें डाल देनेसे सर्पादिक दूरसे पलायन कर जाते हैं ॥
इति सर्पविषनिवारणम् ।
अथ वृश्चिकविषनिवारणम्
शिरोषबोज गोमेद दाडिमस्य तु मूलकम् । अर्कक्षीरयुतं हन्ति धूपो वृश्चिकजं विषम् ॥ ११२ ॥
शिरसके बीज, गोमेद, दाडिमकी, जड़ आकका दूध इनकी धूप विच्छूके विषको दूर करती है ॥ ११२ ॥
मयूरपारावतकुक्कुटानां ग्राह्यं पुरोषं सह भानुमूलेः। धूपौ निहन्त्याशु विषं समस्तं चतुर्विधं वृश्चिकसर्पजातम् ॥ ११३ ॥
मोर, कबूतर, मुरगा इनकी बीट और आककी जड़ लेकर धूप देनेसे वा लेपसे चार प्रकारके बिच्छू सर्पादिके विषको दूर करती है ॥
रजनोचूर्णधूपेन विषं वृश्चिककजं हरेत् । वस्त्रेणाच्छाद्य गात्राणि धूपधूपं च पाययेत् । दंशं च धूपयेच्छोत्रं सर्वधूपेष्वयं विधिः ॥ ११४ ॥
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उपदेश: १४.
हिन्दीटीकासहित
(३१५)
हलदीका चूर्ण कर उसकी धूप देनेसे बिच्छूका विष उतर जाता है। वस्त्रसे शरीरको ढककर धूपका धुआं प्यावे, शोघ्रतासे दंशपर धूप देनी चाहिये। सब धूपोंकी यही विधि है॥ ११४॥
तिलैर्वा नागरं नस्यं पिबेद्धि: सैन्धवं धृतम् । अर्कधत्तूरमूलं वा जलपाने विषापहम् ॥ ११५॥
जलके साथ सोंठको नास दे वा सेंधा और घृतको पान करे अथवा आक धतूरेकी जडको जलके साथ पान करनेसे विष दूर होता है॥ ११५॥
पुत्रजीवफलान्वितां* पलाशोस्थां† करञ्जामु । मज्जां तोय: प्रलेपोयं हन्ति वृश्चिकजं विषम् ॥११६॥
जियापोतेके फलोंकी मींग तथा ढाककी और करंजकी मींगको जलमें पीस लेप करनेसे बिच्छूका विष उतरता है॥ ११६॥
हिड्गु वा जललेपेन वृश्चिकोस्थं विषं हरेत् । तिलमात्रं विष खादेल्लेपाद्वा नाशयेद्विषम् ॥ ११७॥
होंगको जलसे घिस कर लेप करे तो बिच्छूका विष दूर हो जाता है अथवा तिलमात्र विष खाने वा लेपकरनेसे विष उतरता है॥ ११७॥
घृतार्कदुग्धलेपेन यष्टिका+ वा धूपितेन वा । बीजपूरकमूलस्य लेपाद्वापि हरीतकी ॥ ११८॥
सिक्थकं सप्तधा भाव्यं स्नुहीर्कपयसाSSदिते । तत्प्तं वह्निना स्पृष्टं दंशस्थाने विषं हरेत् ॥ ११९॥
घी और आकके दूधके लेपसे वा मुलेठीकी धूप देनेसे अथवा बिजौरेकी जड हरडके साथ पीस लेप करनेसे वा मोमको थूहर और
- त्यांकुरजलमिति वा पाठ: । + 'पश्याभिध्यूपितेन वा' इस पाठमें हरडोसे धूपज्ञ अर्थ जानना।
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आकके दूधको सात भावना देकर गरम कर काटे स्थानपर लगानेसे वृश्चिककका विष उतर जायगा ।। ११८ ।। ११९ ।।
लेपो जातोगुडाभ्यां वा हरिद्रालेपनेन वा । वृश्चिकस्य विषं हन्ति प्रत्येकं नैव संशयः ।। १२० ।।
जाती गुड वा हलदोके लेपसे बिच्छूका विष दूर हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं ।। १२० ।।
मातुलुङ्गस्य मूलं तु रविवारे समुद्दरेत् । उत्तराभिमुखेनैव ह्नूं (कूं) मन्त्रोच्चारणात्पृश्रोत् १२१ मातुलुंगाकीं जड रविवारके दिन लावे ओर उत्तरको मुख कर 'हूं वा कूं' मन्त्रको उच्चारण कर उसे स्पर्श करे ।। १२१ ।।
वामाङ्झे दक्षिणे दष्टे वामे दष्टे च दक्षिणे । मार्जनेन विषं हन्याद्दष्टप्रत्ययम् । सप्तधा मार्जनेनैव विषं वृश्चिकजं हरेत् ।। १२२ ।।
जो दहिने अंगमें काटा हो तो वाममें और वाममें काटा हो तो दक्षिणमें उससे मार्जन करनेसे विष उतर जायगा । यह देखा हुआ है । सात वार मार्जन करनेसे बिच्छूका विष नष्ट होजाता है ।।१२२।।
असगन्धोयमूलं तु मूलं इवेतपुनर्नवा । रविवारे समुदृत्य द्वाभ्यां वृश्चिकदंशनेम् ।।१२३।।
मार्जनेन विषं हरेत्यथवापदूषितं । कर्पासमूलं चवित्तवा विषजिल्कर्णफूत्कृते ।। १२४ ।।
असगन्धकी जड, श्वेत पुनर्नवाकी जड रविवारके दिन उखाडकर इन दोनोंको बिच्छूने जहां काटा हो जहां मार्जन करे तो अवश्य विष उतर जाता है, यह अनुमव देखा है । कपासकी जड जबाकर कानमें फूंक मारनेसे विष उतर जाता है ।। १२३ ।। १२४ ।।
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उपदेश: १४.
हिन्दोटीकासहित
(३१७)
ग्राह्यं हंसपदीमूलं प्रातरादित्यवासरे ।
मुखस्थं फूत्कृतं कर्णे विषं वृश्चिकजं हरेत् ॥ १२५ ॥
हंसपदीकी जड़को रविवारके दिन प्रात:कालमें लावे । उसे मुखमें रख कानमें फूंक मारनेसे बिच्छूका विष उतर जाता है ॥ १२५ ॥
" ॐ क्ष: फट्स्वाहा ।" अनेनापोमार्जयेत्नविषो भवति
'ॐ क्ष: फट्स्वाहा' इस मन्त्रसे मार्जन करनेसे निर्विष होता है ।
और भी तीन* मन्त्र लिखे हैं । तोसरसे करनेकाष्ठसे जल मार्जन
करे निर्विष होगा ॥
बकुलतवचबीजं वा निष्पोडच दंशन्स्थले ।
प्रलेपाद्वृश्चिकविषहरंणं चाभिमंत्रितात्॥ १२६ ॥
"ॐ झं हूं ऋंडं वं वं लं क्षं ऐं ओं औं हूं हं:
इति मन्त्रण अभिमन्त्र्यप्रलेपयेत् ।" हां हीं मं चं
ॐ इति मन्त्रेण ओलवृन्तमभिमंच्र्य तेन मार्जनात्
वृश्चिकविषनाशो भवति । अयं शिवेन भाषितो
योगो नावहेनीय: ॥
मौलसिरोकी छाल और बीज मसलकर पहिले मन्त्रसे दंशपर लेप
करनेसे बिच्छूका विष उतरता है, दूसरे मन्त्रसे जिमोकन्द और
१ 'आदित्यरथवगेन विष्णोर्बाहुबलैन च । गरुडपक्षनिपातेन भूम्यां गच्छ
महाविष ॥ ओंठ: ठ: ठ: उ: ज: ज: । ओं श्रीपक्षयोगिपादाझा' इति मन्त्र:।
दूसरा मंत्र ' -हिमवल्युततरे पाश्वें कपिलोनाम वृश्चिक: ।
तेनाहं प्रेषितो दूतो गच्छ गच्छ महाविष ॥ क्लीं क्लीं स्वाहा । डाकिनी
स्वाहा फट् इति ॥ इक्कीस वार दंशको छूकर छूकर कानमें जपे । अथव
'शांखा माखा साही खौहिन' अनेन गरुडमन्त्रेण वृश्चिकदष्टे करवीरकाष्ठेनापो
मार्जयेन्निविषो भवति ॥
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(३१८)
कामरत्न चतुर्दश-
बैगनको अभिमंत्रित कर मार्जन करे तो विष उतर जायगा । यह शिवका कहा अवज्ञाके योग्य नहीं है । म्यौंडोके पत्तोंको नास देनेसे मोह नाश होय । ज्वर कंप होय तो घृत सरदनसे छूटे । चंदन कर्पूर पानसे वायु छूटे ॥१२६॥ इति वृश्चिकविषनिवारणम्
शतपदी (कानखजुरेका) विषनिवारणम्
दीपकोत्सृष्टतैलं तु दंशस्थाने प्रलेपयेत् । धूपद्रव्या गुग्गुलेन अर्कपत्रं च वेष्टयेत् ॥ १२७ ॥ दियेके तेलको दंशपर लगावे अथवा गूगलको धूप दे । पीछे आके पत्ते लपेट बांधे विष छूटे ॥ १२७ ॥
अथ मूषकनिवारणम्
शिलातलकुष्टं च भाव्य निगुण्डिकाद्रवः । पानं मूषिक दष्टानां दत्तं तीव्रं विषं हरेत् ॥ १२८ ॥ मैनशिल, हरताल, कुष्ठ इनको निर्गुण्डीके रसमें भावित करक पान करनेसे मूसेका विष उतर जाता है ॥ १२८ ॥
गृहगोधां समाजय पिष्ट्वा तन्दुलवारिणा । लेपाद्रविष्टं हन्ति पिबेद्रा क्षीरपाचिताम् ॥ १२९ ॥ गृह गोधा लाकर चावलके जलसे पीस लेप करनेसे चूहेका विष शान्त हो जाता है अथवा क्षीर को पाचित कर पोनेसे चूहेका विष शान्त हो जाता है ॥ १२९ ॥
सर्षपं कुड्कुमं तत्रं समभागं घृतं पिबेत् । विषं मूषिकदष्टानां शममाप्नोति तत्क्षणात् ॥ १३० ॥ सरसों, कुंकुम, मट्ठा ये समान भाग लेकर घृतके साथ पान करे तो उसी समय चूहेका विष उतर जाता है ॥ १३० ॥
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उपदेश: १४. हिन्दीटीकासहित (३१९)
चिञ्चाफलसमायुक्तं गृहधूमं पलाद्रकम् । पुराणाज्येन सप्ताहं लिहेदाखुविष्णं हरेत् ॥ १३१ ॥
चिंचाफलके साथ आधे पल घरके धूमको पीस सात दिन पुराने घृतके साथ चाटे तो चहेका विष उतर जाता है ॥ १३१ ॥
अथ श्वानविषनिवारणम्
शिरोषस्य च बीजं वै स्नुहीक्षीरेण घृष्ततम् । तल्लेपेन वरारोहे नश्येत्कुक्कुरजं विषम् ॥ १३२ ॥
हे वरारोहे पार्वती ? शिरसके बीजको ठूहरके दूधमें पीसकर लेप करनेसे कुत्तेका विष दूर हो जाता है ॥ १३२ ॥
गुडं तैलार्कदुग्धं च लेपाच्छ्वानविषं हरेत् । पिष्टवापामार्गमूलं च कर्षेकं मधुना लिहेत् । श्वानदष्टविषं हन्ति लेपाल्कुक्कुटविष्ठया ॥ १३३ ॥
गुड तेल और आकका दूध इनको लेप करनेसे श्वानविष उतर जाता है अथवा चिरचिटकी जड पीस एक कर्ष शहतके साथ चाटे वा कुक्कुटकी विष्ठाका लेप करे तो कुत्तेकाविष उतर जाता है ॥ १३३ ॥
उन्मत्तश्वानदष्ट्राणां कुमारोदलसैन्धवम् । मुखोषणं बन्धयेत्पिण्डं त्रिदिनान्ते सुखावहम् ॥ १३४ ॥
उन्मत्त कुत्तेके विषपर घीकुंआरका पत्ता सेंधा कुछ गरम कर तीन दिन बांधनेसे विष उत्तर जाता है ॥ १३४ ॥
" ॐ हुं वड कुत्ता खडवड दांत कुत्तेकी बांधो सतौडाढ आवै नलाहू पाकै न घाव कुत्तेकादमन्रोच्चार वीरहनुमन्तकी दुहाई रामलच्छ- मनकी दुहाई फुरो मन्त्रईश्वरोवाच ॥"
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(३२०)
कामरत्न
चतुर्दश-
‘ॐ हड्’ इस मन्त्रसे सात बार गुड अभिमंत्रित कर कुत्तेके काटे हुएको खानको दे तो निर्विष हो जाता है ॥ इति श्वानविषनिवारण ॥
- शिरोऽभिलत्वक्सारैः पिबद्धृकोष्णोपहेम् ।
त्र्युष्माज्यं मेघनादो भेकमत्स्यविषा पहम् ॥ १३५ ॥
शिरसकी फली और मूल जलके साथ पोनेसे मेंडकका विष दूर होता है । सोंठ, मिरच, पोपल, घृत, चौलाई इनको पीवे तो मेंड्क व मत्स्यक विष दूर होता है ॥ १३५ ॥
श्रृङ्गीमत्स्यविषं स्वेदाघृताचिक्कां सपिण्डिताम् ॥१३६॥
काकडाङ्गकोको घृतसे घोटकर पीवे तो श्रृङ्गी मछलोका विष दूर होता है ॥ १३६ ॥
गृहगोधाविषं हन्यात्कासमीरफलनस्यतः ।
पिबेन्तमधुसितायुक्तं गृहगोधाविषं हरेत् ॥ १३७ ॥
गम्भारीके फलको नास देनेसे घरकी गायका विष शान्त होजाता है अथवा इसकोही शहत और मिश्रीके साथ सेवन करनेसे घरकी गoyका विष दूर करता है ॥ १३७ ॥
अथ व्याघ्रविषनिवारणम्
वृकदंष्ट्रादिनुग्रालस्यमललूकद्रवपञ्जिनाम् ।
रुधिरं स्तावयेदंशाह्दहेल्लोहशलाकया ॥ १३८ ॥
भेडिया, व्याघ्र, चीता, गोदड, रीछ, गोंडा इनके काटनेपर वहांका रुधिर निकाले वा उस काटे स्थानपर लोहलाकासे जलावे ॥१३८॥
- मिडीफलस्नुह्रीक्षीरं इति वा पाठः ।
- दक्षिनात्य करमीरिनाम हरकिडीरको कहते हैं ।
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उपदेश: १४.
हिन्दीटीकासहित
(३२१)
लेपात्सर्पविषं हन्ति मूलं श्वेतपुनर्नवा ।
किमत्र बहुनोक्तेन तत्क्षणाद्दष्टनाशनम् ॥ १३९ ॥
बहुत कहनेसे क्या है, उसी समय विष नाश होता है ॥ १३९ ॥
विडङ्गस्य च पानेन व्याघ्रव्यालविषं हरेत् ।
धत्तूरपत्रतोयेन चूर्णं त्रिकटुसम्भवम् ॥ १४० ॥
उदरस्थं विषं हन्ति व्याघ्रव्यालसमुद्भवम् ।
करञ्जतैललेपेन ज्वालां व्याघ्रनखाद्दवाम् ॥ १४१ ॥
वायविडङ्गके पानसे व्याघ्र और व्यालका विष दूर होजाता है ।
धतूरेके पत्तोंका अर्क और त्रिकुटा इनकोपानकरनेसे व्याघ्रविष,
व्यालविष पेट में प्राप्त होगया हो तो भी डर होता है । करञ्जके तैलको
लेप करनेसे व्याघ्रके नखोंकी ज्वाला शांत हो जाती है ॥१४०॥१४१॥
गोजिह्वामूलिकां पिष्ट्वा जलेन मधुना सह
लेपो हि सर्वजन्तूनां नखतुण्डविषं हरेत् ॥ १४२ ॥
गोजिह्वालताकी मूलिका शहद और जलके साथ पीस लेप करनेसे
सब जन्तुओंके नख और तुंडका विष दूर होजाता है ॥ १४२ ॥
तथा निम्बवचा चैव शमी वृक्षस्त्वचं तथा ।
उष्णोदकेन लेप: स्यात्खनखण्डविषापह: ॥ १४३ ॥
तथा दारुहरिद्राया लेपो दन्तविषापह: ॥ १४४ ॥
गोजिह्वा, गवेधुका, नीम, वच, शमीकी छाल इनका लेप गरम
जलसे करे तो सब जोवोंके नख और मुख लगनेका विष दूर होजाता
है । इसी प्रकार देवदारु हलदीका लेप करनेसे दांतोंका विष दूर
होजाता है ॥ १४३ ॥ १४४ ॥
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अथ कीटविषनिवारणम्
आज्येन तन्दुलीमूलं तुलसीमूलिकापि वा ।
तन्दुलोदकपानेन कीटकोत्यं विषं हरेत् ॥ १४५ ॥
वृत्तफे साथ चोइइका जड़ और तुलसीकी जड़ चावलक जलक साथ पान करनेसे कोटविष नष्ट होजाता है ॥ १४५ ॥
लाञ्जल्या: कटु तुम्ब्या वा देवदार निशापि वा ।
मूलं बीजं काञ्जिकेन लेप: कीटविषापह: ॥ १४६ ॥
कलिहारी, कड़वी तूम्बी, देवदारु, हलदी इनकी मूल बीजकांजोके साथ लेप करनेसे कीटविष दूर होजाता है ॥ १४६ ॥
तिलं च सर्षपं कुष्ठं बीजं करञ्जसम्भवम् ।
उद्वर्तनात्प्रलेपाद्वा सर्वकीटविषार्जितं ॥ १४७ ॥
तिल, सरसों, कूठ, करंजके बीज इनके उद्वर्तन वा लेपसेसब प्रकारके कीड़ोंका विष शांत होजाता है ॥ १४७ ॥
करञ्जबीजं सिद्धार्थं तिलैलैपो विषापह: ।
एरण्डतैललेपो वा सर्वकीटविषापह: ॥ १४८ ॥
करंजके बीज, सरसों, तिल इनका लेप करनेसे विष दूर होता है अथवा एरण्डके तेलका लेप करनेसे सब कीड़ोंके विषको दूर करता है ॥ १४८ ॥
निशा दारुनिशा चैव मञ्जिष्ठानागकेशरम् ।
एषां लेपो निहन्त्याशु विषं लूतादिसम्भवम् ॥ १४९ ॥
हलदी, देवदारु, मञ्जोठ, नागकेशर इनका लेपकरनेसे लूता (मकड़ो) आदिका विष दूर होता है ॥ १४९ ॥
इति कीटविषनिवारण
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अथ सर्वजन्तूनां विषनिवारणम्
पुत्रजीवफलान्मजां शीततोयेन पेषिताम्। लेपनाज्जननस्यैसु पानाद्वा निष्कमात्रतः॥ १५० ॥
व्याघ्रमूषकगोनासृश्चिकादिविषं हरेत्। दुस्सहं यदृिषं चाऽपु विस्फोटं च विनाशयेत्॥ १५१ ॥
जियापोताके फलको मोंगे शीतल जलके साथ पीस लेप करनेसे तथा अंजन करनेसे वा एक निष्कमात्र पान करनेसे व्याघ्र, मूषक गोनास (सर्प) वृश्चिकादिका विष दूर होजाताहै। यह दुस्सह विषसे उत्पन्न हुए विस्फोटक रोगकाभी नाश करता है॥१५०॥ १५१॥
वन्ध्याकर्कोटकीकन्दं जले: पिष्टवा प्रलेपयेत्। सर्पमूषकमाज्जारवृश्चिकादिदिविषं हरेत्॥ १५२ ॥
वन्ध्या कर्कोटकी (वनककोडा) का जड़ जलसे पीस लेप करनेसे सर्प, चूहा, बिलाव, वृश्चिकादिका विष दूर होजाताहै॥१५२॥
अथोपविषादिनिवारणम्
स्नुहीर्कोनमत्तकश्चैव करवीरश्च लाङ्गली। वज्र्री जैपालक: कृष्णकृष्ठं गुज्जा तथैव च॥ १५३ ॥
महाकालश्च इत्याद्या: स्मृतास्तूपविषा बुधै:। ससिन्धुं काञ्जिकं पीत्वा समस्तोपविषं हरेत्॥ १५४ ॥
स्नुही (थूहर), अक, धतूरा, कनेर लांगली (कलिहारी), हुडसंधारी (दूसरी थूहर), जलमालगोटे, सुरमा, कूठ, चौंटली, महाकललता ये वस्तु उपविष हैं। सैन्धा कांजीके साथ पान करनेसे सम्पूर्ण उपविषोंकी शान्ति होती है॥ १५३ ॥ १५४ ॥
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(३२४)
कामरत्न चतुर्दश-
करवीरविषं हन्ति घृतेनापि हरीतकी । निम्बपत्रं घृतं हन्ति घृतेन मधुपानतः ॥ १५५ ॥
घृत और हरडका सेवन करनेसे कनेरका विष शान्त हो जाता है। निम्क पत्रकाघृतस अथवा घृत और मधुपानिस दूर होजाता है ॥१५५
अनेक विषजीवानां चूर्णं ह्युपविषैर्युत्तम् । मिश्रितं नखकेशादिैलोहादिश्चूर्णसस्र्चयम् ॥ १५६ ॥
कृत्रिमं च विषं ख्यातं पक्षान्मासाद्विबाध्यते । । आलस्यं कुरते जाड्यं कासं श्वासं बलक्षयम् ॥
रक्तस्त्रावो ज्वर: शोष: पीतचक्षुरच लक्षयेत् ॥ १५७ ॥
अनेक विषले जीवोंका चूर्ण अर्थात् उनके नख केशादि मिलाकर तथा लोहादि चूर्णके सहित सेवन करनेसे कृत्रिमविष नष्ट होता है । इसका पखवारे तथा महीनेके आगे भी उपाय न करे तो आलस्यके
कारण, कास, श्वास होकर बलका क्षय होता है रक्तस्त्राव ज्वर शोष नेत्रोंमें पीतापन होजाता है ॥ १५६ ॥ १५७ ॥
मृतं सूतं मृतं स्वर्णं शुद्धं वै हेममाक्षिकम् । त्र्याणां गन्धकं तुल्यं मर्द्ध कन्याद्रवैर्दिनम् ॥ १५८ ॥
तच्च रूक्ष सिताक्षीभसिमक लिखत्सदा । वह्निमूलयुतं क्षीरं मनुष्यगरनाशनम् ॥ १५९ ॥
शोधा पारद, सोना, शोधी सोनामाखी इन तीनोंकी तुल्य गंधक घो- कुवारके रसमे एक दिन खरल करे उसको मुखाय मिश्री और शहदके
साथ एक महीनेतक सदाचाटे या पीपलामूल दूधमें औटाय खाय तो मनुष्यका विष नाश होजाता है ॥ १५८ ॥ १५९ ॥
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पुत्रजीवफलान्मजां निष्कमात्रं गवां पय: । पोतवा चोग्रग्रं हन्यान्नाकृतिमयोगजम् ॥ १६० ॥
जियापोताके फलकी मोंग एक निष्क और गौका दूध पान करनसे तीव्र कृतिम और योगजविष दूर होजाताहै ॥ १६० ॥
शठोपुष्करमूलस्य पानं मद्यविषापहम् ॥ १६१ ॥
कचूर, पुहकरमूल इसका पान करनेसे अत्यन्त मद्यका विष दूर होता है ॥ १६१ ॥
तत्पिबेत्क्षोरपानेनै गरतृष्णाज्वरापहम् । क्षोरं मुग्गयुतं पथ्यं शाल्यन्नं परमे हितम् ॥ १६२ ॥
पुहकर मूलको क्षीरके साथ पान करनेसे विषकी तृषा और ज्वर दूर होता है वारंवार दूध मूंग शालिअन्न यह इसपर पथ्य और परम हित है ॥ १६२ ॥
गृध्दूमं जलै: पिष्टवा तन्दुलीमूलतुल्यकम् । कल्काच्चतुर्गुणं चाज्यं घृतात्क्षोरं चतुर्गुणम् । घृतशेषं पचेत्सर्वं पिबेत्सवंगरापहम् ॥ १६३ ॥
घरका धुआं जलके साथ पीसकर तथा चौलाईको जडकोई मूलका कल्क कर कलकसे चौगुना घृत, उससे चौगुना दूध डाल पकावे, जब रस जल जाय घृतमात्र शेष रह जाय तब उतारलेवे । इसके खानसे सर्व प्रकारके विष दूर हो जाते हैं ॥ १६३ ॥
समूलपत्रां सर्पाक्षी जलेन क्वथितां पिबेत् । नरमूत्रैश्चैव पिष्टां पिबेत्सर्वंगरापहम् ॥ १६४ ॥
सर्पाक्षो (नाकुली कन्द) के मूल और पत्तोंका लेप करनेसे व तत्पिवे छ्छीतलेपाने । इस पाठमें वा शीतल ज्लके साथ पीवने ऐसा अर्थ करना ।
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(३२६)
क्वाथ कर पान करनेसे अथवा नरमूत्रके साथ पीसकर पान करनेसे सर्व विष दूर होता है।१६४॥
एलातालोशपत्राणि त्र्युषणं जीरकं समम् । चूर्णाद्दध्दिा सितया योज्या भुक्त्वा गरहेर भवतु ॥१६५॥
इलायची, तालीसपत्र, सोंठ, मिरच, पीपल, जीरा ये समान भाग ले चूर्णकर चूर्णसे दूनी मिश्री मिलाय खानेसे विष दूर होता ॥१६५॥
पयसा रजनोकुष्टं मध्वाज्यं गृहधूमकम् । तन्दुलीलूससंयुक्तं कर्ष गरहरं लिहितु ॥ १६६ ॥
दूधके साथ हलदी, कूठ, शहद, घृत, गृहका धूम, चौलाईकी जड़ इनको कर्षमात्र सेवन करनेसे विष दूर होता है ॥ १६६ ॥
अथ योगजविषनिवारणम्
तैलकर्पूरजंबीरसंयोगाद्योगजं विषम् । समांशेन तु मध्वाज्यमेव संयोज्यं विषम् ॥ १६७ ॥
नारिकेलाम्बु कर्पूरं संयोगाद्योगजं विषम् । मरोचतुम्बिकामूलं योगजं विषमेव तत् ॥ १६८ ॥
तेल कर्पूर और जम्बीरीके योगसे योगज विष होता है, बराबर शहद और घीसे योगज विष होता है, नारियलका जल कर्पूरके योगसे योगजविष होता है और कालीमिर्च कडवी तूंबीकी जडके योगसे योगज विष होता है, विषम योगसे उत्पन्न विष होता है ॥१६७॥ १६८॥
पुत्रं जीवफलेनैव रजनोमारनालके: । देवदालोनूमूत्रेर्वा सर्पाक्षी चेन्द्रवारुणी ॥ १६९ ॥
गिरिकर्णीयमूलं वा प्रत्येकं विषजिद्द्रवेत् । मध्वाज्य*काकजङ्घाया द्रवै: पिष्टवा विषं हरेत् ॥१७०॥
काकमाच्या वा इति पाठ: ।
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उपदेश: १४.
हिन्दीटीकासहित
(३२७)
गिरिकर्णी नागपुष्पो मुण्डीपनाद्विषं हरेत् ।। १७१ ।।
इन योगज विषोंको नीचे लिखी हुई विधिसे दूर करे-जियापोताके फलको लेकर जलके साथ पीसकर लेनेसे तथा हलदी कांजी और देवदाली मनुष्यके मूत्रके साथ, सर्पाक्षी इन्द्रवारुणी अथवा गिरिकर्णी (अपराजिता) की जड यह प्रत्येक विषको जीतनेवाली है और मधु घृतके साथ काकमाचोक रस पीनेसे विष दूर होता है तथा अपराजिता नागकेशर और मुण्डीके पानसे योगज विष दूर हो जाता है ।। १६९ -१७१ ।। इति योगजविषनिवारण ।
अथ भल्लातकविषनिवारणम्
भल्लाततेलसंपर्कात्स्फोट: सज्जायते नृणाम्उष्णामु नवनीतं तिलं पिष्ट्वा तल्लेपेन तु तं जयेत् ।। १७२ ।।
भिलावतेलके सम्पर्कसे मनुष्यके शरीरमें फोडे होजाते हैं, मक्खनके साथ तिलोंको पीस लगानेसे आराम हो जाता है ।। १७२ ।।
निम्बीपत्रप्रलेपाद्वा तं जयेततत्पदेन वा ।
भल्लातकस्य मूलस्य मृत्तिकाभिः प्रलेपनात् ।
तत्सर्जातविकारांश्च नाशयत्येव निश्चितम् ।। १७३ ।।
इति श्रीनित्यानाथविरचिते कामरत्ने विषनिवारणंनाम चतुर्दशोपदेश: ।।१४।।
नीमके पत्तोंका लेप करनेसे आराम होता है अथवा भिलावेकी जडका विष मृत्तिका लेपनेसे जाता है । यह मृत्तिका उसे उत्पन्न हुए विकारोंको अवश्य नाश करती है ।। १७३ ।।
इति श्रीनित्यानाथविरचिते कामरत्ने पंडितजवालाप्रसादमिश्रकृत-भाषाटीकायां विषनिवारणं नाम चतुर्दशोपदेश: ।। १४ ।।
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कामरत्न
पञ्चदशोपदेशः
अथ द्वात्रिशद्यक्षिणीसाधनम्
तत्र साधकनियमः
सर्वासां यक्षिणीनां तु ध्यानं कुर्यात्समाहितः । भगिनीमातृपुत्रीस्त्रीरूपं तुल्यं यथोपस्तम् ॥ १ ॥
यक्षिणो का साधन करे तो सावधान होकर करना चाहिये । इसमें सावधानी होनेसे सिद्धि होती है । अपनी इच्छानुसार किसोको भगिनी किसी को माता किसोको स्त्री तथा किसीको पुत्रीकी प्रकारसे सम्बोधन देकर ध्यान करे ॥ १ ॥
भोज्यं निरामिषं चात्रं वज्र्यं ताम्बूलभक्षणम् । उपविर्याजिनादौ च प्रातः स्नात्वा न कं स्पृशेत् ॥२॥
इसमें निरामिष अन्न खाना चाहिये, ताम्बलका भक्षण न करे, अजिम (मृगछाला) पर बैठे प्रातःकाल स्नान कर किसोको स्पर्श न करे और अपनी नित्यक्रिया करके निर्जन स्थानमें जप करे जबतक प्रत्यक्ष होकर मनवांछित न दे तबतक बराबर जप करता रहे ।
नित्यकृत्यं तु कृत्वा च स्थाने निर्जनके जपेत् । यावत्प्रत्यक्षतां यान्ति यक्षिणयो वाञ्छितप्रदा: ॥ ३ ॥
निर्भय और मौन होकर इशानमें नित्य दो लक्ष मन्त्रका जप करे और इसका घृत और गूगलका दशांश हवन करे तो यक्षिणी प्रसन्न होती है ॥२-४॥
जपेल्लक्षद्वयं मन्त्रं इमशाने निर्भयेो मुनिः । दशांशं गुग्गुलुं साज्यं हुत्वा तुष्यति यक्षिणी ॥ ४ ॥
यह नियम सब यक्षिणी साधनमें जाने ॥२-४॥
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उपदेश: १५.
हिन्दीटीकासहित
विभ्रमासाधनम् १
विध्रमासाधनं वक्ष्ये प्रथमं श्रृणु वल्लभे ।
विभ्रमायां प्रसन्नायां वाञ्छितार्थान्प्रयच्छति ।
पञ्चाशनमानुषाणां च ददाति भोजनं सदा।।
मन्त्र:-“ॐ ह्रीं वां विभ्रमरूपे एहि २ भगवति स्वाहा।
ॐ ह्रीं विभ्रमरूपे विभ्रमं कुरु एहोहि भगवति स्वाहा” (१)
हे वल्लभे पार्वति? उन यक्षिणीमें विभ्रमानामक यक्षिणीका
साधन पहिले कहता हूं सुनो, विभ्रमा यक्षिणी प्रसन्न होजावे तो सब
कामनाओं को देती है और ५० मनुष्योंको सदा भोजन देती है।
मन्त्र-‘ॐ ह्रीं वां विभ्रमरूपे एहि २ भगवति स्वाहा’ ‘ॐ ह्रीं विभ्रम-
रूपे विभ्रमं कुरु एहोहि भगवति स्वाहा, (१)
रतिप्रियासाधनम् २
शङ्खलिप्तपटे देवीं गौरवर्णां धृतोत्पलाम् ।
सर्वालङ्कारिणीं दिव्यां समालिख्यार्चयेत्तत: ।। ५ ।।
शंखलिप्त पटपर देवोको इस प्रकार लिखे कि, कमल धारण किये
गौरवर्ण, सम्पूर्ण अलङ्कारयुक्त, दिव्यमूर्ति है ऐसी बनाकरअर्चनकरे ५
जातिपुष्पैस्सोपचारै: सहस्त्रैकं ततो जपेत् ।
त्रिसंध्यं सप्तरात्रं तु ततो रात्रिषु निर्जपेत् ।। ६ ।।
अर्द्धरात्रे गते देवी समागत्य प्रयच्छति ।
पञ्चविंशतिदीनारान् प्रत्येकं तोषिता सती ।। ७ ।।
मन्त्र:-“ॐ ह्रीं कनकनक मैथुनप्रिये रतिप्रिये स्वाहा” २
षोडशोपचारसे चमेलोके फूलोंसे पूजन करे और एक सहस्र मन्त्र
जपे, सात दिनतक तीनों संध्याओंमें इसी प्रकार जप करे। फिर
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रात्रीमे भी इसी प्रकार जपे तो आधी रातके समय आकर देवी प्रत्यक्ष दर्शन देती है और नित्यप्रति पच्चोस दी नारों (अर्घाफियों) को संतुष्ट हो प्रदान करती है ॥६७॥ मंत्र-"ओं हीं कनकनकर्मैथुनपिये रतिप्रिये स्वाहा" वा ॐ हीं रतिप्रिये स्वाहा ॥ (३)
सुरसुन्दरीसाधनम् ३
एकलीङ्गं* महादेवं त्रिसंध्यं पूजयेत्सदा । धूपं दत्वा जपेन्मन्त्रं त्रिसंध्यं त्रिसहस्रकम् ॥ ८॥
मासमेकं ततो याति यक्षिणी\x सुरसुन्दरी । दत्वाघ्यं प्रणमेन्त्रो ब्रूते सात्वं किमिच्छति ॥ ९ ॥
देवी दारिद्र्यचदगधोस्म मे तन्नाशकरी भव । ततो ददाति सा तुष्टा वित्तायुश्चिरजीवितम् ॥ १० ॥
मन्त्र:-"ओं हीं आगच्छ २ सुरसुन्दरि स्वाहा" (३)
एक्लिंग महादेवका तीनों संध्याओंमें सदा पूजन करे और धूप देकर तीनों संध्याओंमें तीन सहस्र मन्त्र जपे ऐसा एक महीने जप करनेसे सुरसुन्दरी यक्षिणी आकर प्राप्त होती है । उसे अर्घ्य देकर प्रणाम करे । तब वह कहने लगती है कि, तू क्या इच्छा करता है ?जब देवो ऐसे पूछे तबक है कि, हे देवी ! मैं दारिद्रयादिसे जल रहा हूँ मेरे दारिद्रयादिका नाश करनेबाली हो, ऐसी प्रार्थना करे । तब वह प्रसन्न होकर वित्त, आयु और चिरकालतक जीवन प्रदान करती है । ॥८-१०॥
मन्त्र-'ओं हीं आगच्छ २ सुरसुन्दरि स्वाहा' (३) अनुरागिणीसाधनम् ४
कुङ्कुमेन समालिख्य भूर्पत्रे सुलक्षणाम् । प्रतिपत्तिथिमारभ्य पूजां कृत्वा जपेततत: ॥ ११ ॥
- कपूरांगमिति वा पाठ:। x प्रत्यक्षमिति वा पाठ:।
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भोजपत्रपर कुंकुमसे सुंदर लक्षणोंसे युक्त अनुरागिणी देवीको लिखे । शुक्ल प्रतिपदासे पूजा आरंभ कर जप करे ।१।११।। त्रिसंध्यं त्रिसहस्रं तु मासान्ते पूजयेत्निशि । संजप्तेष्टदशात्रिं तु समाप्याच प्रियचछति । दोनाराणां सहस्रेकं ददाती*परितोषिता ।१।१२।। "ॐ हौं हौं अनुरागिणि मैथुनप्रिये स्वाहा" (४) तीनों संध्याओंमें तौन सहस्र जप करे एक महीनेके उपरान्त रात्रिमें पूजन करे जप करनेसे अर्धरात्रिमें आकर मनोरथ पूर्ण करतो है प्रसन्न होकर एक सहस्र दीनार प्रतिदिन देती है ।१।१२।। मन्त्र- "ॐ हौं हौं अनुरागिणि मैथुनप्रिये स्वाहा (४) सामुद्रीसाधनम् ५
ध्यात्वा जपेत्ततो रात्रौ सागरस्य तटे शुचिः । लक्षजापे कृते सिद्धिदंते सागरचेटकः। रत्नत्रयं तथा भोज्यं सौम्यो मन्त्री सुखी भवेत् ।१।३।। "ॐभगवन् समुद्र देइह रत्नानि जलवासो हौं नमो- जस्तु ते स्वाहा" (५) ॐ भगवान् समुद्र देइह रत्नानि जलवासो ही नमोस्तु ते स्वाहा इस मन्त्रको ध्यान करके पवित्र होकर सागरके किनारे एक लाख जपे तो सिद्धि होनेसे सागर चेटक तीन रत्न बडे मोलके देता है भोजन देता है सौम्य रहनेसे मन्त्री सुखी भी होता है ।१।१३।। वटपक्षिणीसाधनम् ६
त्रिपथे तु वटस्थाने रात्रौ मन्त्री जपेत्स्वयम् ।
- प्रत्यह्मिति वा पाठः ।
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लक्षत्रयं ततः सिद्धा देवी च वटयक्षिणी ॥१४॥
वस्त्रालङ्कारं दिव्यं रससिद्धिरसायनम् ।
दिव्याजनं तु सा तुष्टा साधकाय प्रयच्छति ॥ १५ ॥
मन्त्रः 'ॐ ह्रीं वटवासिनि यक्षकुलपत्नि वटयक्षिणि एह्येहिस्वाहा' (६)
पवित्र होकर त्रिमार्गमें वटके नीचे रात्रिमें अकेला हो इस मन्त्रको तीन लक्ष जप करनेसे सिद्ध होकर देवी वटयक्षिणी वस्त्र दिव्यअलङ्कार रससिद्धि और रसायन दिव्य अंजन प्रसन्न होकर साधकके निमित्त देतो है ॥ १४॥१५॥
मन्त्र–'ह्रीं वटवासिनि यक्षकुलपत्नि वट-
यक्षिणि एह्येहि स्वाहा' (६)
वटयक्षिणीसाधनम् (९
ॐ वटवृक्षं समारुह्य लक्षमेकं जपेन्तनुम् ।
ततस्तप्ताभिमन्त्रेण काञ्जिके: क्षालयेन्तमुखम् ॥ १६॥
मास्त्रयं जपेद्रात्रौ वरं यच्छति यक्षिणी ।
रसं रसायनं दिव्यं क्षुद्रकर्म ह्यनेकधा ।
सिद्धानि सर्वकार्याणि नान्यथा शङ्करोद्भवित् ॥१७॥
मन्त्र:-“ॐ नमश्चन्द्राद्यावकारणकारण क्लीं स्वाहा ।
ॐनमो भगवते रुद्राय चण्डवेगिने स्वाहा' (७)
रातमें वटके वृक्षपर चढकर एक लक्ष मन्त्र जप करे । जप करने उपरांत सात बार अभिमन्त्रित कर कांजीसे मुख धोडाले । रात्रिमें तीनमहीने जपे तो यक्षिणी वर देती है और इसको दिव्य रसायन,अनेक क्षुद्रकर्म भोज्य पदार्थभी और सब कर्म सिद्ध हो जाते हैं, इसमें अन्यथा
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उपदेश: १५.
हिन्दीटीकासहित (३३३)
नहीं ऐसा शंकरने कहा है ॥ १६ ॥ ॥१७॥ 'ॐ नमश्चन्द्राद्यावाकर्णकारण क्लों स्वाहा ॥ वा ॐ नमो भगवते रुद्राय चण्डवेगिने स्वाहा' ७
अथ विशालासाधनम् ८
चिच्चावृक्षतले लक्ष्मीं मन्त्रमावर्त्तयच्छुचिः ।। १८ ।। शतपुष्पोद्भवैः पुष्पैः सगृतैर्होममाचरेत् ।।
विशाला च ततस्तुष्टा रसं दिव्यं रसायनम् । प्रसन्ना यच्छति ततः सर्वसिद्धिभर्विष्यति ॥ १९ ॥
मन्त्र:-"ॐ ऐं विशाले त्रां त्रीं क्लों स्वाहा । अथवा ॐ ऐं विशाले क्रीं ह्रीं त्रीं क्लों क्रीं स्वाहा " (८)
इमली वृक्षके नीचे बैठकर पवित्र होकर मन्त्रको जपे, इसको वा सौफके पत्र पुष्पोंसे घृतके साथ हवन करे । तब प्रसन्न होकर विशाला दिव्य रस रसायन देती है उससे सब सिद्धि होजायगी ॥१८॥१९॥
मन्त्रस्त्र-ॐ ऐं विशाले त्रां त्रीं क्लों स्वाहा" (८)
अथ महाभयासाधनम् ९
नरास्थिनिर्मिता माला गले पाणौ च कर्णयोः । धारयेज्जपमालां च तादृशों तु इमशानतः ॥ २० ॥
लक्ष्मेकं जपेमन्त्रं साधको निर्भयस्मृतिः । tतो महाभया यक्षी प्रयच्छति रसायनम् ॥ २१ ॥
तस्य भक्षणमात्रेण सर्वरत्नानि चालयेत् । वलोपालितनिर्मुक्ततिचरं जीवो भवेत्सरः ॥ २२ ॥
"ॐ ह्रीं त्रां महाभये क्लों स्वाहा ॥ वा ॐ क्रीं महा- भये क्लों स्वाहा" (९)
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मनुष्यकी अस्थिसे बनी मालाको गले हाथ और कर्णमें धारणकर पवित्र हो त्रिभय हृदयसे अकेला इशशानमें वास करे, नरास्थि माला- को हाथमें धारण कर एक लक्ष मन्त्र जपे । तब यह महाभया यक्षिणी प्रसन्न होकर साधको सिद्धिदायक रसायन देती है । उसके भक्षण- माससे सब रत्नोंको यथास्थानमें चलायमान करनेंमें समर्थ हो जाता है और वलीपलितसे निर्मुक्त होकर मनुष्य चिरंजीवी होता है ॥२०-२२॥ 'ॐ ह्रीं त्रां महाभये क्लीं स्वाहा' (९)
चन्द्रिकासाधनम् १०
शुक्लपक्षे जपेतावद्यावत्सन्दृश्यते विधु: । प्रतिपत्पूर्वपूर्णान्तं नवलक्ष्मिदं जपेत् ॥ २३ ॥
अमृतं चन्द्रिकादत्तं पीत्वा जीवोऽमरो भवेत् ॥ ३४ ॥ 'ॐ ह्रीं चन्द्रिक हूँ सः क्रीं क्लीं स्वाहा' (१०)
शुक्लपक्षकी प्रतिपदासे जप आरंभ करे तबतक जप करे जबतक आकाशमें चन्द्रमा दीखता रहे इस प्रकार प्रतिपदासे पूर्णातक नौ लक्ष इसको जप करे तब चन्द्रिका देवी प्रसन्न हो साधकको अमृत देती है उसके दिये अमृतको पान करनेसे अमर होजाता है ॥२३॥२४॥
अथ रक्तकमलासाधनम् ११
जयां भासत्रयं रक्तकमलां सोऽ प्रसोदति । मृतकोत्थापनं कुर्यात्प्रतिमां चालयेत् तथा ॥ २५ ॥ 'ॐ ह्रीं रक्तकमले महादेवी मृतकमुत्थापय प्रतिमां चालय पर्वतान्कम्पय २ नीलय नोलय वि हूँ हूँ' (११)
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उपदेशः १५.
हिन्दीटोकासहित
(३३५)
रक्तकमलाका मन्त्र तीन महीने जपने से लालकमला प्रसन्न होती है, इससे मृतके उत्थापन और प्रतिमाचालन कर सकता है॥२५॥
'ॐ ह्रीं रक्तमाले महादेवी मृतकमुत्थापय प्रतिमां-चालय पर्वतां-
स्कम्पय २ नीलय २ विलस २ हूँ हूँ' (११)
अथ विद्युज्जिह्वासाधनम् १२
अष्टोत्तरशतं जप्त्वा यत्किश्चित्स्वादुभोजनम् ।
तद्रलिद्र्दीयते तस्यै वटाधो मासमेकतः ॥ २६ ॥
ततो देवी समागत्य हस्ताद्गृह्लाति भोजनम् ।
तत्रैव सा वरं दत्ते नित्यं सान्निध्यकारकम् ॥ २७ ॥
अतीतानागतं कर्म स्वस्थास्वस्थं ब्रवीति सा।
प्रतिमा: पर्वतान्सर्वांश्चालयत्येव तत्क्षणात् ॥ २८ ॥
*ॐकारमुखे विद्युज्जहे।ॐ हूँ चेटके जयजय स्वाहा (१२)
उक्त मन्त्रको एकसौ आठ वार जप कर जो कुछ अपने निमित्त स्वादु भोजन है उसकी बलि वटके नीचे उस यक्षिणीके निमित्त दे ।
ऐसा एक मासपर्यन्त करे । तब देवी आकर अपने हाथ से उसका भोजन ग्रहण करती है और नित्य समीप रहती है । अतीत अनागत कर्मको स्वस्थ होकर वह कह देती है, जिससे प्रतिमा और सब पर्वतोंकोभी चलायमान कर सकता है॥२६-२८॥ 'ॐ कार मुखे०स्वाहा'मन्त्र है
करणपिशाचिनीसाधनम् १३
पूर्वमेवायुतं जप्त्वा कृष्ण कन्याभिमन्त्रितः ।
हस्तपादप्रलेपेन सुप्ते वक्ति शुभाशुभम् ।
- ॐ समुखे विद्युज्जहेोंहूं बटकेश + स्वाहा इति वा पाठः ।
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(३३६)
त्रैलोक्ये यादृशी वार्ता तादृशं कथयेत्फलम् ।। २९ ।। "ॐ हौं सः नमो भगवति कर्णपिशाचिनि चण्डवेगिनि वद वद स्वाहा अथवा ॐ क्रीं सनामशक्तिभगवति कर्णपिशाचिनि चण्डरोपिणि वदवद स्वाहा" (१३)
उक्तमन्त्रको पहिले दशसहस्र जप करके कृष्णकन्यासे अभिमन्त्रित कर हाथ पांवको लेप करके सोनेसे शुभ अशुभ त्रिलोकमें जो वार्ता है उसका फलाफल कहती है ।।२९।। 'ॐहीं स:' यह मंत्र है (१३)
चिंचिपिशाचिनी साधनम् १४
रोचनैः कुंकुमैः क्षौरे: पद्मं चाष्टदलं लिखेत् । नीरन्ध्रे भोजपत्रे च मायाबीज दलं दलं ।। ३० ।। लिखितवा धारयेन् मूर्धिन इमं* मन्त्रं ततो जपेत् ।। पूर्वमेवायुतं जप्त्वा चैवं कुुर्यात्प्रयत्नतः । अतोतनागतं सर्वं स्वप्ने वरदति देवता ।। ३१ ।। "ॐ हौं चिंचिपिशाचिनी स्वाहा" (१४)
गोरोचन, कुंकुम दूधसे आठ दलका कमल छिद्ररहित भोजपत्रमें लिखे, मायाबीज प्रत्येक दलपर लिखकर शिरपर धारणकर १०००० इस मन्त्रको पहिलेही जपे । सात दिन पर्यन्त इस कार्यको करे तो सोतेमें देवी भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों कालकी बात कहती है ।।३०।।३१।। "ॐ हौं चिंचिपिशाचिनी स्वाहा" (१४)
- सप्ताहं वा इतिपाठ ।
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उपदेशः १५. हिन्दीटीकासहित (३३७)
कर्णयक्षीसीधनम् १५
अलाबुमूलिकां पुष्ये तथा सर्पाक्षिमूलिकाम् । ग्राह्याभिमन्त्रितां यत्नाद्वक्तसूत्रेण वेष्टयेत् । मृत्तिकां बुद्ध्वा तथालुप्तं वदेत्यव शुभाशुभम् ॥३२॥ "ॐ नमो भगवत्ये रुद्राण्ये कर्णयक्षिण्ये स्वाहा"॥१५॥ पुष्यनक्षत्रमें कडवी तुम्बीकी मूल तथा सर्पाक्षीकी मूलको ग्रहण कर लाल सूत्रसे वेष्टन कर इसे शिरपर रखनेसे सोतेमें देवी सम्पूर्ण शुभाशुभ कथन करती है ॥ ३२ ॥ 'ॐ नमो भगवत्ये-' (१५)
स्वप्नावतीसीधनम् १६
मृद्गोमयैरलिपेद्भूमिं कुशांस्तत्र समास्तरत् । पञ्चोपचारवद्देवदेवों प्रपूजयेत् ॥ ३३ ॥ अक्षमूत्रं करे धृत्वा पूर्वमेवायुतं जपेत् । सूर्यकोटिसमां ध्यात्वा रात्रौ पाणितले जपेत् । अर्द्धरात्रे गते देवी वार्तां वक्ति शुभाशुभाम् ॥ ३४ ॥ "ॐ ह्रीं आगच्छ २ चामुण्डे श्रीं स्वाहा" ( १६ ) मिट्टी गोबरसे पृथ्वीको लीपकर कुशोंको बिछावें और पञ्चोपचार नैवेद्यसे देवदेवोका पूजन करे । अक्षमूत्र ( रुद्राक्षमाला ) हाथमें रखकर पहल दशसहस्र जप करे । कोटिसूर्यके समान प्रकाशमान देवीका ध्यान करे । आधी रातके समय सोने पर देवी शुभ अशुभ कहती है ॥ ३३॥३४॥ 'ॐ ह्रीं आगच्छ २ चामुण्डे श्रीं स्वाहा' ( १६ )
विचित्रासाधनम् १७
लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं वटवृक्षतले शुचिः । बन्धूककुसुमैः पञ्चान्मध्वाज्यैः क्षीरमिश्रितैः ॥ ३५ ॥
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दत्ते धूपे दशांशेन जुहुयात्पूर्णयानिवतम् । ततः सिद्धा भवेद्देवी विचित्रा वांछितप्रदा ॥ ३६ ॥ "ॐ विचित्रे विचित्ररूपे सिद्धिकुरू२ स्वाहा" (१७) मंत्र्री पवित्र होकर वट वृक्षके नीचे एक लक्ष मंत्र जपे । पीछे बंधूक (दुपहरियाके) फूल, मधु, घृत, दूध मिलाकर दशांश धूप दे, कुंडम हवन करे । तब विचित्रादेवी सिद्ध होकर विचित्र जपकी देनेवाली होती है ॥३५ ॥३६ ॥ 'ॐ विचित्रे विचित्ररूपे सिद्धं कुरु २ स्वाहा यह मंत्र है॥ (१७)
अथ हंसीसाधनम् १८ प्रविश्य नगरस्यान्तं लक्षसंख्यं जपेच्छुचिः । पद्मपत्रैः कृतो होमो घृतोपेतदशांशतः ॥ ३७ ॥ प्रयच्छत्यजनन हंसो यन्त्र परयाति भूतधीः । सुखेन तं च गृह्लाति न विध्नः परिभूयते ॥ ३८ ॥ "ॐ हंसि हंसिजने हौं क्लीं स्वाहा" ॐ नमो हंसिनि हंसगते मां स्वाहा इति वा । (१८) नगरके अन्तमें जाकर एक लक्ष मंत्र जपे, कमलपत्रोंयुक्त घृतसे दशांश हवन करे ऐसा करनेसे हंसी अंजन देती है, जिससे पृथ्वीका खजाना दीखता है और वह सुखपूर्वक ग्रहण कर ऐश्वर्यसे पूर्ण हो जाता है विघ्न नहीं होंते ।इसीलिए 'ॐ हंसिहंसिजने हौं क्लीं स्वाहा वा' 'ॐ नमो हंसिनि हंसगते मां स्वाहा' यह मंत्र है (१८)
मदनासाधनम् १९ लक्ष संख्यं जपेनमंत्रं राजद्वारे शुचिः स्थिरः । sक्षोरैर्मालतीपुष्पैघृतहोमो दशांशतः ॥ ३९ ॥
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मदना यक्षिणी सिद्ध गुटिकां सम्प्रयच्छति । तया मुखस्थयाडूर्ध्वस्थायी भवेत्न्रः ॥ ४० ॥ "ओं ऐं मदने मदनविद्रावणे अनङ्गसङ्जमं देहि २ कीं कीं स्वाहा" (१९)
पवित्र हो स्थिरतासे राजद्वारमें एक लक्ष मन्त्र जपे । दूध, मालतीके फूल और घृतसे दशांश हवन करे तो मदनार्यक्षिणी सिद्ध होकर गुटिका प्रदान करती है, उसको मुखमें रखनेसे मनुष्य अदृय हो और चिरस्थायो होता है ॥ ३९ ॥ ४० ॥ मन्त्र-'ओं ऐं मदने मदन-विद्रावणे अनङ्गसङ्जमंदेहि २ कीं कीं स्वाहा' (१९)
कालकर्र्णीसाधनम् २०
लक्षमसंख्यं जपेनमन्त्रं पलाशतरुजेनधने: । मधुनाज्यैः कृते होमे कालकर्र्णी प्रसीदति ॥ ४१ ॥ सैन्यधारास्त्रबन्ध च गतिस्तम्भकरो भवेत् । सततं तां स्मरेन्मन्त्री विविधैश्वर्यकारिणीम् ॥ ४२ ॥ "ओं ह्रीं क्लीं कालकर्णिके ठः ठः स्वाहा" (२०)
उक्त मन्त्र एक लक्ष धाक्के पेड़के नीचे बैठकर जपे और शहदसे होम करे तो कालकर्र्णी प्रसन्न होजातो है, प्रसन्न होकर सैन्यधारास्त्रबन्ध और गतिस्तम्भ करती है, मन्त्र जाननेवाला अनेक ऐश्वर्य करनेवाली भगवतीको निरन्तर स्मरण करे ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ 'ओं ह्रीं क्लीं कालकर्णिके ठः ठः स्वाहा' यह जपका मन्त्र है (२०)
लक्ष्मीयक्षिणीसाधनम् २१
स्वगृहे संस्थितो रक्तः: करवीरप्रसूनकैः । लक्ष्मावर्त्येनमन्त्रं होमं कुर्वाद्दशांशतः ॥ ४३ ॥
ओं ऐं मदने मदनविडम्बनिआलिङ्गय २ संगमंदेहि २ स्वाहा इति वा पाठः ।
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होमे कृते भवेत्सिद्धिलक्ष्मीन्नाम्नी च यक्षिणी । रसं रसायनं दिव्यं विधानं च प्रयच्छति ॥ ४४ ॥ "ऐं लक्ष्मीं श्रीं कमलधारिणीं कलहंसी स्वाहा" (२१) अपने घरमें स्थित हो लाल कनेरके फूलोंसे अर्चन कर और लक्ष मंत्र जप करके उसके वशांश हवन करनेसे लक्ष्मी नामक यक्षिणी सिद्ध होजाती है तथा दिव्य रसायन और विधानको प्रदान करती है ॥४३-४४॥ 'ऐं लक्ष्मी श्रीं कमलधारिणीं कलहंसी स्वाहा' यह मंत्र है (२१)
शोभनासाधनम् २२ रक्तताम्ब्याम्बरो मन्त्रं चतुर्दशिदिने जपेत् । ततः सिद्धा भवेद्देवी शोभना भोगदायिनी ॥४५ ॥ "ओं अशोकपल्लवाकारकरतले शोभनां श्रीः क्षः स्वाहा" (२२) ( लाल माला और लाल वस्र धारण कर यह मंत्र चतुर्दशोके दिन जपे तब शोभना भोगदायिनी देवी प्रसन्न होजाती है ॥ ४५ ॥ 'ओं अशोकपल्लवाकारकरतले शोभनां श्रीः क्षः स्वाहा' (२२)
नटीसाधनम् २३ पुण्याशोकतलं गत्वा चन्दनेन सुमण्डलम् । कृत्वा देवों समम्यर्च्य धूपं दत्वा सहस्रकम् ॥ ४६ ॥ मन्त्रमावर्तयेन्तासं नक्तभोजी नरस्तदा । रात्रौ पूजां शुभांकृत्वा जपेनमन्त्रं निशार्द्धके ॥ ४७ ॥ नटी देवी समागत्य निधानं रसमञ्जनम् । ददाति मन्त्रिणेमन्त्रं दिव्ययोगं च निश्चितम्॥ ४८ ॥ "ओं ह्रीं नटी महानटि स्वरुपवति स्वाहा" (२३)
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पदेशः १५
हिन्दीटीकासहित (३४१)
पवित्र हो अशोकवृक्षके नीचे जाकर चन्दनसे सुन्दर मण्डल कर देवीको पूज धूप दे सहस्र मन्त्र सदा जपे नक्त भोजन करे, रात्रिमें अच्छी प्रकार पूजा प्राप्त होकर निधियुक्त रस और अंजन मन्त्रीको देती है तथा दिव्य योग तथा मन्त्र देती है यह निश्चय है ॥ ४६-४८॥
'ॐ ह्रीं क्रों यटि महानटि स्वरूपवति स्वाहा' यह मन्त्र है (२३)
पदिनीसाधनम् २४
रक्तसुगन्धिगृहस्थाने चन्दनेन सुमण्डलम् ।
कृत्वा हस्तप्रमाणेन पूजयेतत्र पद्मिनीम् ॥ ४९ ॥
धूपं सगुगुलुं दत्वा जपेनमन्त्रं सहस्रकम् ।
मासमेकं ततः पूजां कृत्वा रात्रौ पुनर्जपेत् ॥ ५०॥
अर्द्धरात्रे गते देवी समागत्य प्रयच्छति ।
निधानं दिव्ययोगं* च तस्मान्मन्त्री सुखी भवेत्॥५१॥
"ॐह्रीं (वा क्रीं) पद्मिनो स्वाहा" (२४)
इति श्रीनित्यानाथविरचिते कामरत्ने यक्षिणीसाधनं
नाम पंचदशोपदेशः ॥ १५ ॥
माला सुगन्ध द्रव्य और चन्दनसे अपने स्थानमें सुंदर मंडल एक हाथके प्रमाणमें बनाय उसमें पद्मिनीका पूजन करे गुगुलुसहित धूप देकर एक सहस्र मन्त्र जपै, इस प्रकार एक महीने पूजकर रात्रिमें फिर जप करे आधी रात बीतनेपर देवी आकर निधि और दिव्य योग देती है उससे मन्त्र जपनेवाला सुखी होता है ॥ ४९-५१ ॥।मन्त्र यह है कि-'ॐ ह्रीं पद्मिनी स्वाहा' (२४)
आगे तन्त्रान्तरमें कहे हुए पुरसुन्दरी आदि आठ यक्षिणियों का साधन केवल भाषामेंही लिखा जाता है,उनका मूल तन्त्रान्तरोंमेंही देख लें ।
- बलं च इति वत्पाठः ।
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(३४२)
पुरसुन्दरो, मनोहरी, कलावती, कामेश्वरी, रक्तकरी, पद्मिनी, नटी, अनुरागिणी ये आठ यक्षिणी हैं ।
पुरसुन्दरीसाधन २५
"ॐ आगच्छ पुरसुन्दरी स्वाहा" इस मंत्रको पढ घर जाय गगनलकी धूप देकर तीनों संध्याओंमें उपरोक्त मंत्र सहस्रवार जपे तो एक महीनेमें आती है, उस समय चन्दन जलसे अर्ध्य दे । इसके तीन भाव हैं—माता, भगिनी, पत्नी जो माताका भाव करे तो वस्त्र द्रव्य रसायन देती है, भगिनी भावमें भी पूर्ववत् वस्त्र देती है, यदि भार्या हो तो महा ऐश्वर्य आश्चर्य करती है । इन सबको पूजन करे. इसमें दुसरे के साथ शयन तथा मैथुन न करे. यदि करे तो नाश होता है ।
मनोहरीसाधन २६
"ॐ आगच्छ मनोहरि स्वाहा" इस मंत्रको पढ नदीतटमें मंडल कर अगर धूप देकर महीने भर पूजन करे, सहस्र जप करे, जप आवे तब चन्द न अर्ध्य दे. फूल वाटिकामें एकचित्तसे अर्चन करे, आधीरातमें अवश्य आती है. आतेही कहे कि, सौभाग्य दे । तब सौ अशारफी प्रतिदिन देती है.
कलावतीसाधन २९
"ॐ ह्रीं कलावति मथुनप्रिय आगच्छ स्वाहा" वृक्षके नीचे मद्य मांस देकर सुराकी प्रार्थना सहित सात दिनतक जपे । आधो रातको सर्वालंकारसे भूषित परिवार सहित जब आती है तब भार्या होती है । बारह जनोंको वस्त्रालंकार भोजन है । आठ फल दिनमें देती है.
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उपदेश: १५.
हिन्दीटीकासहित (३४३)
कामेश्वरीसाधन २८
"ॐहीं आगच्छ कामेश्वरि स्वाहा" भोजनपत्रपर गोरोचनसे इसकी प्रतिमा लिखे । देवीका पूजन करे । शय्यामें चढकर एकमास सहस्रमन्त्र प्रतिदिन जपे । मासान्तमें देवीको पूजा करे । घटमधुयुक्त प्रतिरात्र दे, मौन हो जप करे आधीरातको अवश्य आती है । आनेपर इच्छा करे तो भार्या होती । शयनमें दिव्य अलंकारोंको छोडकर चलोजाती है. इसमें परस्त्रीसे मैथुन न करे.
रतिकरीसाधन २९
"ॐहीं आगच्छ रतिकरि स्वाहा" अय:पटमें चित्ररूपसे लिखकर कनक वस्त्रलंकारसे भूषितकर कमल हाथमें लिये कुमारोको पूजन करे, गूगल धूपदे, अष्ट सहस्र जप करे, मासान्तपयंत पूजाकर घृत धूपदे, तब आधीरातको आकर प्राप्त होती है. स्त्री भावसे कामना करे तो भार्या होती है । साधककी सकुटुम्ब रक्षा करती है. दिव्यकामनावाले भोजनको देती है.
पक्षिनीसाधन ३०
"ॐ हौं आगच्छ पक्षिनी स्वाहा" अपने घरमें मंडल कर गूगल धूप देकर एक सहस्र जप करै । पूर्णमासोको विधिपूर्वक पूजाकर जपे तो आधीराताको आती है, कामना करनेसे भार्या होती है । सब कामार्थ सिद्धि करती है । रस रसायन सिद्धिद्रव्य देती है
नटीसाधन ३१
"ॐ हौं आगच्छ नटी स्वाहा" अशोक वृक्षके नीचे जाय मांस उपहार गन्ध, पुष्प धूप दीपादि बलि देकर सहस्र जप करे तो एक महीनेमें अवश्य आती है. आनेपर यदि माता हो तो कामिक भोजन देतो है, वस्त्र सुवर्ण देती है, भगिनी हो तो सो योजनसे लक्ष्मी ला देती है
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(३४४) कामरत्न पञ्चदश- ती है। वस्त्र अलङ्कार भोजन रसायन देती है। जो स्त्री हो तो दिव्य रसायन आठ दिन स्थित हो देती है। अनुरागिणीसाधन ३२॥ "हीं आगच्छ अनुरागिणि स्वाहा" कुंकुमसे यह मन्त्र भृङ्जपत्र पर लिखे और प्रतिदिन गन्धादिसे पूजन कर सहस्र जप करे। तीनों कालमें एक महीना पूजा कर घृत दीप दे, सम्पूर्ण रात्रि जप करे एक महीने में अवश्य आती है, और सब पूर्ववत् करे। इति श्रीनित्यानाथविरचिते कामरत्ने पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृत- भाषाटीकायांक्षीणीसाधनं नाम पञ्चदशोपदेशः॥ १५ ॥
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श्री:
षोडशोपदेश:
अथ वाजीकरणादिप्रयोगसिद्धये
रसशोधनम्
पलान्न्यूनं न कर्तव्यं रससंस्कारमुत्तमम् । अघोरेणैव मन्त्रेण रसराजस्य पूजनम् ॥ १ ॥
ॐ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः । सर्वतः सर्वसर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥ २ ॥
एक पलसे न्यून पारेक संस्कार न करे ओर अघोरमंत्रसेही रस राजका पूजन करे ॥ १ ॥ ॐ अघोरित्यादि मंत्र है ॥ २ ॥
कुमार्याश्चनिशाचूर्णोर्दिनं सूतं विमर्दयेत् । पातयेत्पातनायंत्रे सम्यक्शुद्धो भवेद्रसः ॥ ३ ॥
घोकुवार और हलदीके चूर्णसे एक दिन पारेकी खरल करे और पातनायंत्रसे उसको पातन करे तो भलीप्रकारसे शुद्ध होता है॥३॥
अथवा हिंगुलाद्रुतसूत ग्रहणेनिभागते । पारिभद्रसे: पेशयं हिंगुलं याममात्रकम् ॥ ४ ॥
अथवा हिंगुल (सिंगरफ) मेसे पारा निकालें, उसके निकालनेकी विधि कहते है-निम्बके रसमे एक पहर हिंगुलकी डलोको खरल करे
जम्बीराणां द्वयैवर्थ पात्यं पातालयन्त्रके । तं सूतं योजयेयोगे सप्तकृत्वोऽथवा जितम् ॥ ५ ॥
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अथवा जम्बीरी नींबूके रसमें खरल कर पातालयंत्रसे पातन करे तो सात कँचलोसे वर्जित हुए उसे पारेको कार्यमें प्रयुक्त करे ॥ ५ ॥
सूतस्य दशमांशं तु गन्धं दत्वा विमर्दयेत् । जम्बीरौ तद्द्रवैर्यामं पात्यं पातालयंत्रके ॥ ६ ॥
पुनर्मर्द्यं पुनः पात्यं सप्तवारं विशुद्धये । इत्येवं शुद्धयः ख्यातास्तासामेकां तु कारयेत् ॥ ७ ॥
उपर्यापो हृधो वह्निमध्ये च रसपिष्टिका । ऋमादग्निर्निवदध्यात्तत्पाताल* यंत्रमुच्यते ॥ ८ ॥
पारसे दशमांश गंधक मिलाकर खरल करे तथा जम्बीरोके रसमैं एक पहर मर्दन कर पातालयंत्रमें पातन करे इस प्रकार फिर मर्दन कर फिर पातन करे सात वो विशुद्धिके निमित्त कृत्य करे इस प्रकार पारेकी शुद्धि कही है इनमेंसे कोई एक करे । ऊपर जल, नीचे अग्नि, बीचमें रस-की पोटली रखखे, ऋमसे अग्नि दे इसका नाम पातालयंत्र है ॥६-८॥इति रसशोधन ।
अथ रसमारणम् उक्तं सर्वस्य सूतस्य तस्मात् खल्वं विमर्दनम् । अजाशाकृतुष्णाग्निन तु भृंगेत त्रितयं क्षिपेत् ॥९॥ तस्योपरि स्थितं खल्वं तत्तखल्वमिदं भवेत् । खल्वं लोहमयं शस्तं पाषाणोषणमथापि वा ॥ १० ॥
पातनायंत्रमुच्यते इति पाठांतरम् ।
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अजोर्णं चाप्यबीजं वा यः सूतं घातयेत्नरः। ब्रह्महा सुदुराचारो मन्त्रद्रोही महेश्वरि ॥ ११ ॥
हे पार्वती उक्तसब प्रकार पारेकी तप्त खल्वमें मदन करना श्रेष्ठ कहा है। बकरेकी मेंगनसे, तुषाग्निसे तीन दिन पृथ्वीके गर्भमें पाचित करे, उसके ऊपर लोहेका खरल रख्खे यह तप्तखल्व कहलाता है, अच्छा खरल लोहेका है, वह न हो तो पाषाणकाभी उत्तर है। विनाजीर्ण किये अर्थात् अबीज और अजोर्ण पार जो मनुष्य घात (जारण) करता है, वह ब्रह्महत्या करनेवाला, दुराचारी और महाद्रोही है ॥ ९-११ ॥
रामठं पञ्चलवणं तथा क्षारचतुष्टयम् । त्रिकटुं भृङ्गवेरं च मातुलुङ्गं रसाप्लुतम् ॥ १२ ॥
पिण्डमध्ये रसं दत्वा स्वेदयेत्सप्तवासरान् । सारनाले तु मृद्राण्डे ग्रासार्थी जायते ध्रुवम् ॥ १३ ॥
एतदेव रसं यत्नाज्जम्बीरद्रवसंयुतम् । दिनैकं धारपेद्घमें मृत्पात्रे वा मृतो भवेत् ॥ १४ ॥
ग्रासं तत्रैव दातव्यं स्वर्णशुद्धिः शनैः शनैः । चतुःषष्ट्यादि तुत्र्यांशं देयं जीर्णञ्च चालयेत् ॥१५॥
होंग और पांचों नोन, चारों खार, सोंठ, मिरच, पीपल, अदरक, मातुलंग, (बीजपूर-बिजौरे) के रससे पोस इसको एक अंगुलके गाढे स्वच्छ कपडेमें लेप चर उसके मध्यमें पारेकी रखकर सात दिन स्वेदन (औटावे) संस्कार करे और फिर मृत्तिके बरतनमें रख कांजीके साथ ग्रास स्वीकार करता है इस प्रकारसे यत्नपूर्वक उस रसको जम्बीरोके रसमैं खरल कर एक दिन धूपमें सुखाय फिर मृत्तिके बरतनमें सुवर्णके
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शुद्धग्रास शनैः २ देने चाहिये और चोयालवां भाग शुद्ध सुवर्णका लै० १२-१५
चतुष्टचंशकं चादौ द्वादशतदनन्तरम् । पुनर्विशातिमं ग्राह्यं द्विरष्टद्वादशं क्रमात् ॥ १६ ॥
अष्टमांशं चतुर्थ वा अप्यर्द्ध चैव सामांशकम् । प्रतिग्रासे तप्तखल्वे दिनमम्लेन मर्दयेत् ॥ १७ ॥
तं क्षिपेच्चारणायंत्रे जम्बीरनोरसंयुतम् । तदयन्त्रं धारयेदघमे दिनं स्याज्जारितो रसः ॥ १८ ॥
तं छागक्षीरगोमूत्रस्नुकक्षीराम्लैः प्रलेपिते । दृढवस्त्रे बहिबंदध्वा मृदघटे स्वेदयेद्र्धः ॥ १९ ॥
पहले चौसठ, पोछे बत्तीस, फिर सोलह, फिर बारह इस कमसेप्रास देकर खरल करे । फिर आठवां अंश, चौथा अंश, आधा अथवा, बर-बर दे प्रतिप्रासको तप्त खरलमे अम्लवर्गके साथ एक दिन
खर करे । जम्बीरोके रसके सहित उसको चारणायंत्रमे डाले और उसको धूपमे रख्खेतो एक दिनमे रस बने फिर उसको छागके दूध, गोमूत्र, थहरके दूध, अम्लवर्गसे लिप्त करके वस्त्रमे दृढ बांधकर मृतिकाके घटमे स्वेदन
करे ॥ १६-१५
काञ्जिकाक्षारमुतैर्वा दोलायंत्रे तव्र्हानिशम् । तमुद्रुतं रसं देवी ! खल्वे संशोधयेत्क्षणात् ॥ २० ॥
संमर्द्य पूर्ववत्खल्वे यंत्रे लिप्तपुटे पुनः । कमेणान्त देवेशि त्रिभिग्रासैः प्रजोयते ॥ २१ ॥
हे देवि ! कांजी क्षार और गोमूत्रके साथ दोलायंत्रमे एक दिन-रात स्थित करे फिर उसमे से रसको निकालकर खरलमे शुद्ध
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करे। फिर पूर्ववत् खरल करे और वस्त्र आदिमें लपेटकर पुट दे हे देवि ? इस क्रमसे तीन प्रासों से जोर्ण हो जाता है॥२०॥२१॥
यावत्तेन यदा तस्मात्तावत्तेन विमर्दयेत्। प्रतिग्रासे तप्तखल्वे यथाशक्त्या च चारयेत् ॥ २२ ॥
जब तक ठीक न हो बराबर मर्दन करता रहे और प्रतिग्रासमें तप्त खरलमें यथाशक्ति जलावे ॥ २२॥
तं जोर्ण मारयेत्सूतं मारणं कथ्यते द्रवैः । तं हि सर्वरसोपेतं पिष्ट्वा खल्वे विमर्दयेत् ॥ २३ ॥
सूतं गन्धकसंयुक्तं दिनान्ते तन्त्रिरोधयेत् । पुटयेद्भूधरे यन्त्रे दिनान्ते तत्समुद्धरेत् ॥२४॥
उस जोर्ण हुए पारेको मारे। अब द्रवद्वारा उसके मारण कहते हैं उसको रसोंके साथ खरलमें डालकर घोटे, पारे और गन्धककी कजली कर पुट देकर भूधरयन्त्रमेंपचानसे पारा मर जायगा ॥२३-२४॥
कृष्णधत्तूरतेले सूतो मर्यो द्वियामकम् । दिनैकं तप्तचेष्टान्त्रे कच्छपाख्ये न संशयः ॥२५॥
मृतः सूतो भवेत्सद्यः सर्वरोगेषु योजयेत् । रसगन्धं समं मर्द्य दिनं निर्गुणिकाद्रवैः ॥
चक्रमूषान्विते धमाते भस्म सूतं भवेत्सलम् ॥ २६ ॥
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एक पैसे भर सिद्ध पारेमें काले धतूरेका रस डालकर कच्छपयंत्र। एक दिन घोटे, एक दिन नियामक औषधी (बन्दालकका पुटकलुक रस, आकका दूध, कबूतरकी वीठ, गोली हंसपदीका रस इन्द्रायनक फलका रस) इनमें घोटे, पीछे गोला बनाय कच्छपयंत्रमें रख आंच दे तो नि:सन्देह पारा मरे । इससे सबीज निर्बीज पारा मरता है इसे सब रोगमें दे । पारे जल गंधकको एक दिन निर्गुण्डीके रसमे मर्दन कर मुषामें रखकर फूंकनेसे पारेकी भस्म हो जायगी ॥२५॥ २६॥
टङ्कणं मधु* लाक्षा च कुर्णागुडजायुतो रस: ॥२७॥ मदयेद्भृङ्गद्राव्वादनैकं चान्धयेत्पुन: । ध्मातो भस्मत्वमाप्नोति श्रद्धा: स्फटिकसन्निभ: ॥ २८॥ सुहागा, शहद, लाख, पोपल, चौंटली, भांगरा इनके, रसमे पारेको खरल कर एक दिन अंधरा करे फिर फूंक देनेसे शुद्ध स्फटिकके समान भस्म होती है ॥ २७ ॥ २८॥
द्विपलं सूतराजस्य पलकं गन्धकस्य च । मर्दयेनमार्कद्राव्वादनकमेकं निरन्तरम् ॥ २९ ॥ रुद्ध्वा तद्भूधरे यन्त्रे दिनैकं मारयेत्पुटात् । इत्येवं जारितं सूतं मारणं परिकीर्तितम् ॥ ३० ॥ दो पल पारा, दो पल गंधक इनको निरन्तर एक दिन भांगरेके रसमें मर्दन करे और भूधरयन्त्रमें उसको एक दिन पुटित कर मारे इस प्रकार जारित पारेका मारण कहा है ॥२९॥ ३०॥
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अथवा ग्रासयोग्यं तु निहन्य्यात्सान्निवतं रसम् । सूतकं घनसत्त्वं च मर्दयेत्कंगुणीन्द्रवैः ॥३१॥
अथवा ग्रासयोग्य बलिष्ठ रसको (पारेको) मालकांगनीके रससे निरन्तर मर्दन करे ॥ ३१ ॥
दिनैकं गोलकं तं च शोषयेदातपे खरे । गर्भयन्त्रगतं पच्यात् त्रिदिनं हि तुषाग्निना ॥ ३२ ॥
इस प्रकार एक दिन मर्दन कर उसका गोला बनाय तीक्ष्ण धूपमें सुखावे फिर गर्भयन्त्रमें रखकर तीन दिन तुष अग्निसे पचावे ॥३२॥
करोषाग्नौ दिवारात्रौ पचेत् द्रूसमतां नयेत् । सूतं स्वर्णं व्योम राहुं समं रसभद्रर्वेदिनम् ॥ ३३ ॥
मर्दयेद्रौजसंयुक्तं वाष्पचारणयन्त्रके । सर्वकैर्मूलिकाद्रावान्मेकं तु मर्दयेत् ॥ ३४ ॥
एक दिनरात करोष (उपले गोबर सूखा) अग्निमें पचावे तो पारेकी भस्म हो जायगी । पारा, सुवर्ण, अभ्रक, केलेका रस और बीज इनके साथ मर्दन करे तथा चारणयन्त्रमें पारेको मूलिका रसोंके साथ एक दिन मर्दन करे ॥ ३३ ॥ ३४ ॥
गर्भयन्त्रगतं पाच्यं त्रियते पूर्ववद्रसः । बहुधान्डी मेघनादो चित्रकं कटुतुंबका ॥ ३५ ॥
वज्रवल्ली बला कन्या त्रिकुटार्क स्नुहोपरः । कन्दोरम्भा च निगुण्डी लज्जा जाती जयन्तिका॥३६॥
विष्णुक्रान्ता हसितशुण्ठी दद्रुच्नो भृङ्गराट् पटु: । गुडूची लाज्जली नीरकणा काली महोरगा ॥ ३७ ॥
कारकाची च दन्ती च एताः पारदमारकाः ।
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(३५२)
कामरत्न
पोडश-
व्यस्तत: समस्ता वा सर्वा देया हृष्टदशाधिका: । उक्तस्थाने प्रयोक्तव्या रसराजस्य सिद्धये ॥ ३८ ॥
गर्भयन्त्रमें रखकर पारेको पचावे तो वह पूर्ववत् मर जाता है। ब्रह्मदंडी, चौलाई, चीता, कड़वी तम्बू, वज्रवल्ली, खरेंटी, घीकुवार, सोंठ, मिर्च, पीपल, आक, थूहरका दूध, रंघान्द, निर्गुण्डी, लाजा (लज्जवन्ती जाती, जयन्ती, विष्णुक्रान्ता, हाथीशुण्ठी, पमाड, भांगरा, पित्तपापडा, गिलोय, कलिहारी, सुगन्ध वाला, नीलो, कट- सरैया, पीपल, सर्पाक्षी, वा तगर, काकमाची और दन्ती यह सब समस्त वा पृथक् २ पारेकी मारनेवाली अठारह मूलिका हैं । रसराज- की सिद्धिके निमित्त निजकथित स्थानमें प्रयोग करनी चाहिये३५-३८
अथ गर्भयन्त्रप्रकार: चतुरङ्गुलदोर्घा तु मृत्मयी दृढमूषिका । त्र्यङ्गुलोमध्यवितारे वर्तुलं कारयेत्मुखम् ॥ ३९ ॥
लोनस्य विंशातिभागा एको भागस्तु गुङ्गुलो: । सुलक्षणं पेशयित्वा तु तोयं दत्वा पुन: पुन: ॥ ४० ॥ mुखालेंपं तत: कुर्याद्रसं तत्र विनिक्षिपेत् । अन्ध्रधित्वा पुटं देयं गर्भयन्त्रमिदं भवेत् ॥४१॥
चार अंगुल दीर्घ और तीन अंगुल चौड़ी मिट्टीकी ढ़ मृणा बनावे । उसका गोल मुख करे, लोनेके बीस भाग, गूगल एक भाग महीन पीसकर मूषापर दृढ़ लेप करे, लवणादि मिट्टीमें प्रथम पारेकी पिट्ठी रबखे । पीछे मुख बन्द कर लेप करे । पीछे जमीनमें गढा खोदकर तुषाग्निसे मन्द मन्द स्वेदन करे तो एक दिनरात्रि वा तीन रात्रमें पारा भस्म होवे । यह गर्भयन्त्रविधान है ॥३९-४१ ॥ इति रसमारण ॥
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उपदेश: १६.
हिन्दीटीकासहित
(३५३)
अथ हिंगुलशुद्धि:
मेषोक्षीराम्लवर्गाभ्यां दरदं धर्मभावितम् ।
सप्तवारं प्रयत्नेन शुद्धिमायाति निश्चितम् ॥ ४२ ॥
हिंगुल (सिंगरफ) को मेषोक्षीर और अम्लवर्गों से भावना देनेसे हिंगुल शुद्ध होता है ॥ ४२ ॥
अथ गन्धकशुद्धि:
शुक्लपक्षसमच्छायो नवनीतसमप्रभः ।
मसृणः कठिनः स्निग्धः श्रेष्ठो गन्धक उच्यते ॥ ४३ ॥
शुक्ल पक्षके समान छायावान्, मक्खनके समान कान्तिमान्, एकसारकठिन और चिकना गन्धक श्रेष्ठ होता है ॥ ४३ ॥
घृतं भाण्डे पयः क्षिप्त्वा मुखं वस्त्रेण वेष्टयेत् ।
तत्पूर्वं चूर्णितं गन्धं क्षिप्त्वा तस्योपरि न्यसेत् ॥ ४४ ॥
कपालमेकमुक्तानं गन्धकस्यायियोगि तत् ।
दुग्धभाण्डं नयस्य भूमौ देयमूर्ध्वपुटं लघु ॥ ४५ ॥
घी डालकर और दूध डालकर उस हांडीका मुख वस्त्रसे ढकदे । आमलासार गन्धक १६ तोले पीसकर घीमें गलावे । गलनेपर वस्त्रपर डालदे, गंधक उस वस्त्रसे ठपकर दूधमें जम जायगी ॥ ४४॥ ४५॥
ततः क्षोरे दुतं गन्धं शुद्धयोगेषु योजयेत् ।
गन्धं घृते विपक्तव्यं यावत्तैलनिभं भवेत् ॥ ४६ ॥
वस्त्रेणान्तरितं कृत्वा चालयेस्त्रिफलाम्भसि ।
एवं गन्धकशुद्धिः स्यात्ततो योगेषु योजयेत् ॥ ४७॥
तब उस दूधसे निकली हुई शुद्ध गंधकको कार्यमें लावे । गन्धकको घृतमें तबतक पकावे जबतक कि, वह तेलके समान होजाय । उसे वस्त्रमें रखकर त्रिफलामें उबाले । इसप्रकार गन्धक शुद्ध होता है ॥ ४७॥
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फिर वस्त्रों छानकर त्रिफलेके जलमें डाल दे । इस प्रकारसे गन्धक शुद्ध कर योगोंमें लगाना उचित है ॥४६॥४७॥ इति गंधकशुद्धिः॥
अथ अभ्रक शुद्धिः
कृष्णः पीतः श्वेतरक्तो योज्यो योगरसायने । पिनाकं दर्दुरं नागं वत्रं चेति चतुर्विधम् ॥ ४८ ॥ काला, पीला, श्वेत, लाल अभ्रक, रसायनके योग्य है. पिनाक, दर्दुर, नाग और वत्र ये चार भेद काले अभ्रकके हैं ॥ ४८ ॥
पिनाकाद्यास्त्रयो वज्र्या वत्रं यत्नात्समाहरेत् । मुच्यतेऽग्नौ च निक्षिप्तः पिनाको दलसंचयम् ॥ ४९ ॥ इनमें पिनाकादि तीनोंको त्याग करके वत्र अभ्रकको यत्नसे ग्रहण करे, पिनाक अभ्रक अग्निमें डालनेसे दलसंचय अर्थात पत्तोंको छोडता है ॥ ४९ ॥
अज्ञानाद्द्रुक्षणात्तस्य महादुःखप्रदो भवेत् । दर्दुरोग्नौ विनिक्षिप्तः कुरुतेऽ दर्दुरध्वनिम् ॥ ५० ॥ इसको अज्ञानसे खानेसे महादुःखदायक कुष्ठ होता है, दर्दुर अभ्रक अग्निमें डालनेसे मेडककीसी ध्वनि करता है ॥ ५० ॥
तच्च भक्षणमात्रेण नानारोगान् प्रपचछति । नागद्रुक्षणमात्रस्थितः सधः फूत्कारं च विमुञ्चति ॥ ५१ ॥ उसके खानेसे अनेक रोग होते हैं. नाग अभ्रक अग्निमें डालनेसे सपवत् फूत्कार करता है ॥ ५१ ॥
स च देहगतो नित्यं व्याधि कुर्यादूगन्दरम् । वत्राभ्रकं तु वह्नौ च न किश्चिद्विद्रियां व्रजेत् ॥ ५२ ॥
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उपदेश: १६. हिन्दीटीकासहित (३५५)
उसको खानेसे भगंदर रोग होता है. वज्रास्रक अग्निमें रखनेसे कुछ भी विकारको प्राप्त नहीं होता है ॥ ५२ ॥
तस्माद्वज्राम्रकं योज्यं व्याधिवार्धक्यमृत्युजित् । धमद्वज्राम्रकं वह्नौ यावद्ग्निर्न भवेत् ततः ॥
सेच्यं गोक्शोरे च ततः सेच्यं गोक्शोरे च पुनः पुनः । भिन्न पात्रे च तत्कृत्वा मेघनाद्रवाम्बुना ॥ भावयेदष्टभिर्द्रव्यैश्च जायते दोषवर्जितम् ॥ ५४ ॥
इस कारण व्याधि बुढ़ापा मृत्युका दूर करनेवाला वज्राभ्रक प्रयुक्त करे, उसको अग्निमें फूंके । जब यह अग्निके समान होजाय तब इसपर गौका दूध वारंवार छिड़के अर्थात् इसमें बुझावे । फिर इसे अलग राख चालिए रसमें आठ पहर भावना दे तो दोषवर्जित होता है ॥५३५४॥
अथवाभ्रस्य भागौ हौ मुस्ता चैकं जलेश्वर । त्रिदिनं स्थापयेत्पात्रे ततः सूक्ष्मं प्रपेषयेत् ॥ ५५ ॥
एतदभ्रकचूर्ण तु निस्तुषं श्रीहिसंयुतम् । वस्त्रेण बद्धवा सारणाले भाण्डमध्ये विमर्दयेत् ॥ ५६॥
हस्ताभ्यां स्वयं मारति यावद्मलं तु रेणुताम् । अदोषाम्रगतं शुद्धं शुष्कं धान्याम्रकं भवेत् ॥ ५७ ॥
अथवा अभ्रक दो भाग, मोयेका एक भाग इनको जलके साथ तीन दिन पात्रमें स्थापन कर फिर सूक्ष्म पोस ले वह अभ्रकका चूर्ण भूसी रहित जोके सहित ले उसको वस्त्रमें बांध कांजीके साथ पात्रमें मर्दन करे । हाथसे तबतक मले जबतक वह सर्वथा चूर्ण होजाय तब वह दोषरहित शुद्ध अभ्रक होती है ॥ ५५-५७ ॥
धान्याम्रकं रविखोरे रविमूलद्रवैश्च वा ।
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दिनमर्धपुटे पच्यात्सप्तधैनं मृतं भवेत् ॥ ५८ ॥ धान्याभ्रकस्य भागेकं द्वौ भागौ टङ्कणस्य तु ॥ ५९ ॥ पिष्ट्वा तद्न्धमूषायां रुद्धवा तीव्राग्निना धमेत् । स्वभावशीतलं चूर्णं सर्वयोगेषु योजयेत् ॥ ६० ॥ धान्य अभ्रकको आंके दूधमें वा आंकी जडके रसमें आधे दिन पुट देकर पाचित करे । ऐसा सात वार करनेसे अभ्रक मरता है । धान्याभ्रकका एक भाग, सुहागा दो भाग दोनोंको पीस अन्ध-मूषाम रख धान्याभ्रक बन्द कर तीव्र अग्नि दे । जब स्वांगशीतल हो जाय तब निकाल चूर्ण कर सब योगोंमें दे ॥५८-६०॥ इति अभ्रकशुद्धिः ॥
अथामृतीकरणम् सर्वेषां धातितानां तु ह्यमृतीकरणं शृणु । त्रिफलोथकपायस्य पलान्यादाय षोडश ॥ ६१ ॥ गौघृतस्य पलान्यष्टौ मृताभ्रस्य पलान् दश । एकीकृत्य लोहेपात्रे पाच्येन्तु मृदुदर्वह्निना ॥ ६२ ॥ द्रवैर्जोर्णं समादाय सर्वयोगेषु योजयेत् ॥ ६३ ॥ अब सब मारी हुई धातुका अमृतोकरण सुनो—त्रिफलेका काढ़ सो-लह पल, गौका घी आठ पल, अभ्रक दश पल इन सबको एकत्र कर मृदु अग्निसे लोहेपात्रमें पकावे जब रस जल जाय अभ्रक मात्र शेष रहै तब सब योगाम युक्त कर ॥६१-६३॥ इति अमृतोकरणम् ॥
अथ अभ्रकसत्त्वपातनम् चूर्णीकृतं गगनपात्रमथारनाले धृत्वा दिनैकमथ शोष्य च सूरणस्य । भाव्यं रसस्तद्नु मूलरसे कदल्या वेदांशटङ्कणयुतं शफरीसमेतम् ॥ ६४ ॥
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पिण्डीकृतं तु बहुधा महिषीमलेन संशोध्य कोष्ठ- गतमाशु धमेधताग्नौ। भस्त्रीद्रयेन च ततो वमते हि सत्त्वं पाषाणधातुगतमात्रमसंशयोसित्॥६५॥
अभ्रकके चूर्णको एक दिन कांजी और एक दिन जमोइकंदके रसमैं भिगोदे। पीछे केलाकंदकै रसमैं भावना दे, चतुर्थांश मुहागा और छोटी मछली मिलाय भैंसके गोबरके साथ छोटी छोटी गोली बनावे। फिर धूपमें सुखाय कोष्ठिकामैं रख बंकनाल धौंकनीसे महा अग्नि देवे तो सत्व निकले। यह महारसायन जारणयोग्य तथा सब रोगोंको दूर करनेवाला है॥६४॥६५॥ इति अभ्रकसत्वपातनम्॥
अथ मनः शिलाशुद्धिः
जयन्तीभृङ्गराजोथ्यं रक्तागस्तिस्तरसैः शिलाम्॥ दोलायन्त्रे पचेद्यां छागोथ्यमूत्रकः। क्षालयेदारनालेन सर्वयोगेषु योजयेत्॥६७॥
हलदी, भांगरा, अगस्तिया इनके साथ मनःशिलको दोलायन्त्रमैं छागमूत्रके साथ एक पहरतक पकावे तो शुद्ध हो पीछे कांजीसे प्रक्षालन कर सबयोगोंमै प्रयोग करे॥६६॥६७॥ इति मनःशिलाशुद्धिः॥
अथ हरतालशुद्धिः
तालकं पोटलौं बद्ध्वा सचूर्णं कांजिके क्षिपेत्। दोलायन्त्रेण ग्राह्यं ततः कुष्माण्डजे रसे॥६८॥ तिलतैले पचेद्यां च त्रिफलाजले:। एवं यन्त्रै चतुर्थामं पाच्यं शुद्ध्यति तालकम्॥६९॥
हरतालको चूर्ण कर पोटली बांध कांजीमें डाल दे और एक पहर तक दोलायंत्रमें पकावे, फिर पेठेके रसमैं तिलके तेलसे एक पहर-
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तक पकावे, फिर एक पहर त्रिफलाजलसे पाचित करे तो चार प्रहरों- में हरताल शुद्ध होजाता है ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ इति हरतालशुद्धिः ।
अथ तुत्यशुद्धिः: विष्ठया मद्यतुत्यं भाजनकपातयोर् । दशांशं वडकणं दत्त्वा पाच्यं मृदुपुटे तु तत् । पुटं वध्ना पुटं क्षौद्रे देयं तुत्यं विशुद्धये ॥ ७० ॥
तुत्य (तूतिया) को बिलाव और कबूतरकी बीटमें मदन करे, उससे दशवां हिस्सा सुहागा डालकर मृदु पुटमें पचावे तथा इसकी शुद्धिके निमित्त दही और शहदको पुट देनी चाहिये ॥७० ॥
अथ काशीसशंखनाभिशुद्धिः: घर्म शुद्धचाति काशोशि दिन जम्बीरभावितम् । एक दिन जम्बोरोके रसमे भावना देकर धूपमें सुखावे तो काशीश शुद्ध होवे ॥ ७१ ॥
शङ्खनाभं च संदगधवा भाव्यमम्लेन सप्तधा । प्रक्षाल्यं ग्राहयेतावच्छुद्धिमायाति नान्यथा ॥ ७२ ॥
शंखनाभि (नाभिशंख) को लाकर सातवार अम्ल पदार्थसे भावना देकर प्रक्षालन करे तो शुद्ध हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं।७२।
अथ शातकुम्भादिधातुशोधनम् मृत्तिकामातुलुङ्गाम्ले: पञ्चवासरभाविता । सभस्मलवणैर्हेम शोधयेत्पुटपाकतः ॥ ७३ ॥
पांच प्रकार की मिट्टीका भस्मके साथ जम्बीरी अम्ल इनसे पुट- पाकहारा सुवर्णको शोधे ॥ ७३ ॥
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वल्मीकमृत्तिका धूमं गैरिकं चेष्टिका पटु: | इत्येता मृत्तिका: पञ्च जम्बीरैरररानालकै: || ७४ ||
पिष्टवा लिप्तस्वर्णपत्रं पुटेन परिशुद्धचति | नागेन टङ्कणेनव धूमे शुद्धचति रौप्यकम् || ७५ ||
बंमिकी मिट्टी, धूम, गेरु, इंट और लवण ये पांच मृत्तिका जंबीरी नींबूके रस और कांजीमें खरल कर उसके द्वारा स्वर्णके पत्तोंपर लेप कर पुटपाक करनेसे सुवर्ण भले प्रकारसे शुद्ध होजाता है। रुपा बग और सुहागेके साथ लयानसे शुद्ध होता है।
खटिका लवणं तर्कैरारनालैश्च पेषयेत् | तेन लिप्तं ताम्रपत्रं तप्तं तप्तं निषेचयेत् || ७६ ||
खड़िया और सेंधेनोनको तक्र और कांजीमें पीसकर तांबेके पत्रोंपर लेप कर वारंवार आगमें तपाकर शुद्ध करे।
खदिरारनालतकान्तनिगुण्डी न्न विशुद्धये | रोहणं राजवं चैवं तृतीयं च पुटोरकम् || इति तोक्षणं त्रिधा तं च शोधयेद्योगसिद्धये || ७८ ||
खैर तथा कांजी, मड़था और निगुडी, राजवृक्ष, रोहिण और पुटार कका प्रयोग करना चाहिये। इस प्रकार तीक्षण तीनवार शुद्ध कर योगोंमें लगावे।
अथ तुत्थटङ्कणकाचलोहशोधनम
राशिरक्तेन संलिप्तं त्रिवारं चाग्निपाचितमू | तुत्थटङ्कणकाचैर्वा धामितं शुद्धमुचछति || ७९ ||
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तीन वार*रक्तवर्गकी वा शशाके रक्तकी भावना देकर तीन वार अग्निमें पचावे, वारवार लेपकर अग्निमें रखनेसे तूतिया सुहागा और काच ये तापसे शुद्ध होते हैं ॥ ७९ ॥
अथवा लोहचूर्णं तु गोमूत्रे: पड्गुणै: प्रक्षालयेदार्नाले: शोध्यं शुद्धिमवाप्नुयात् ॥८०॥ अथवा लोहचूर्ण छ: गुने गोमूत्रमें पकाकर पीछे कांजीसे प्रक्षालन कर धूपमें सुखानेसे शुद्ध होता है ॥ ८० ॥
सर्वेषां मते मारणम्
शुद्धसूतं समं स्वर्णं खल्वे कुर्वाञ्च गोलकम् । अघोद्र्ध गन्धकं दत्त्वा सर्वतुल्यं निरुध्य च ॥ ८१ ॥ विंशद्रनोपलेर्देयं पुटान्येव चतुर्दश । निरुत्यं जायते भस्म गन्धं देयं पुन: पुन: ॥ ८२ ॥
शुद्धपारेके समान सोना लेकर खरल करे गोली बनावे । उससे आधा गन्धकका चूर्ण गोलेके नीचे धर गोलेको मृपामें रख बीस वनकी उपलोंके द्वारा चौदह वार पुट देनेसे स्वर्णकी भस्म बनजाती है । हरेक पुटमें गन्धकका चूर्ण देता जाय ॥ ८१ ॥ ८२ ॥
रौप्यं पत्रं चतुर्भागं गन्धं भागेन लेपयेत् । जम्बोरनरपिष्टेन पच्त्वांविंशद्रनोपले: ॥ ८३ ॥ वध्वा त्रिभि:पुटे पच्याद्गन्धं देयं पुन: पुन: ॥ ग्रियते नात्र सन्देहस्तत्कर्मणि योजयेत् ॥ ८४ ॥
- कसूम, खैर, लाख, मंजीठ, लालचन्दन, सहिजनां, दुपहरिया, कपूरगंधो, सोना । माखी ये रक्तवर्ग हैं ।
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चार भाग चांदीके पात्र, एक भाग गन्धक जम्बीरी नींबूके रसमें खरल कर उनपर लेप करे । फिर संपूटमें रख पच्चीस वनके उपलोंकी अग्निके द्वारा हरेक पुटमें गन्धक देकर तीन बार पुटपाक करे अवदय चांदीको भस्म होजायगी फिर कार्यमें लावे ॥ ८३ ॥
ताम्रतुल्येन गन्धेन हेम्लपिष्टेन लेपयेत् । कण्टवेधीकृतं पत्रमन्धयित्वा पुटे पचेत् ॥ ८५ ॥
उद्धृत्य चूर्णयेत्स्तिमन् पादांशां गन्धकं क्षिपेत् । जम्बीरैरर्रनालैर्वा पिष्ट्वा बध्वा पुटे पचेत् ॥ ८६ ॥
एवं चतुः पुटे: पाच्यं गन्धं देयं पुनः पुनः । मातुलुङ्गद्रवै: पिष्ट्वा पुटमेकं प्रदापयेत् ॥ ८७ ॥
तांबेके कंटकवेधी पत्र लेकर उसके बराबर गन्थको कांजीमें खरल कर उसको तांबेके पत्रोंपर लेपेटे, फिर उन कंटकवेधी तांबेके पत्रोंको गजपुटमें पचावे, फिर महीन पीस चूर्ण कर ले । इसके उपरान्त चौथा भाग गन्धक मिलाय जम्बीरीनींबू कांजीमें पृथक् पृथक् पीसकर गंधक मिलाय चार पुट दे और जंबीरीके रसमें पीसकर वा बिजौरेके रसमें पीसकर पुटपाक करनेसे भस्म होजाती है ॥ ८५- ८७ ॥
अथास्य दोषहराणम्
सितशर्करयाप्येकं पुटं देयं मृतं भवेत् ॥ ८८ ॥ मृतं ताम्रं तु जम्बीरैैर्रयामं खल्वे विमर्दयेत् । तद्गोलं सूरणे क्षिप्त्वा रुद्रध्वा सर्व च लेपयेत् । शुष्कं गजपुटे पाच्यं निर्दोषं सर्वरोगहृत् ॥ ८९ ॥ एक भाग तांबा और दो भाग पारद इनको जम्मोरीके रसमे खरल कर खांड मिलाय तीन बार पुटपाक करनेसे तांबेकी भस्म होजातो है ।
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मरे ताम्रको जम्बीरीके, रसमें एक पहर खरल कर गोला बनावे । उसके जिमीकन्दके बीचमें घर लेप कर गजपुटमें पचानसे सर्व रोगोंकी हरनेवाली भस्म होती है ॥ ८८ ॥ ८९ ॥
अथ लोहमारणम
नायं पचेत् पञ्चपलाद्वर्गूढद्रव्य त्रयोदश । आदौ मन्त्रस्तथा कर्म कर्तव्यं मन्त्र उच्चते ॥ ९० ॥
लोहमारण श्रेष्ठ कर्म है इससे प्रथम इसकोपांच पलसे तेरह पल पर्यन्त लोहेको लेकर पहले मन्त्र पढे फिर कर्म करे ॥ ९० ॥
"ॐ अमृतोद्भवाय स्वाहा" इति मर्दनमन्त्रः ।
अनेन मन्त्रेण लोहस्य तत्साधकस्य रक्षा कर्तव्या। "ॐ नमश्चण्डचण्डपाणये स्वाहा यक्षसेनाधिपतये नुरगुरुमहाविद्याबलाय स्वाहा ।"
अनेन मन्त्रेण बॉल वत्वा ततः कर्म कु्र्यात् ।
"ॐ अमृत।" इस मन्त्रको पढकर मर्दन करे । इस मन्त्रसे लोह और साधक की रक्षा करे और दूसरे "ॐ नमः।" इस मन्त्रसे बलि देकर कर्म करे ॥
दन्तीपत्रद्रवं तस्यां लोहचूर्ण दिनोदये । घर्मे धार्य दिनं कांस्ये द्रवं देयं पुनः पुनः ॥ ९१ ॥
रुद्रध्वा रात्रौ पुटे पाच्यं प्रातद्रवेश्च भावयत् । एवमष्टदिनं कुुर्यात्त्रिविधं म्रियते तु यः ॥ ९२ ॥
दन्तीके पत्तोंके रसमें लोहेका चूर्ण खरलकर तीन दिन धूपमें रक्खे बार बार इसको भावन दे, फिर रातमें लोहेको शरावसंपुटमें रक्खकर प्रातःकालमें पूर्वोक्त द्रवोंसे पचाना, इस प्रकार आठ दिन करनसे लोहा मर जाता है ॥ ९१ ॥ ९२ ॥
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मृतस्य लक्षणम्
मध्याज्यं मृतलोहं च रौप्यं सम्पुटके क्षिपेत् । रुद्धवा धमाते तु सङ्ग्राह्यं रौप्यं चेत्पूर्ववमानकम् ॥ तदा लोयं मृतं विद्यादन्यथा साध्यतयपुनः ॥ ९३ ॥
शहद, घो और मृत लोहेको रुपेके सम्पुटमें रख मुख बन्द कर अग्नि जलानेसे लोह भस्मी यदि पूर्ण हो रहे तो लोहेको मृत जान यदि न हो तो फिर पुटपाक करे ॥ ९३ ॥
अथ शोधनम्
गन्धकं तुल्यकं लोहं तुल्यं खल्वे विमर्दयेत् । ९४ । दिनैकं कन्यकाद्रावै रुद्धवा गजपुटे पचेत् । इत्येवं सवलोहानां कर्तव्यं स्यात्त्रिरुत्थनम् ॥ ९५ ॥
गन्धक और मृत लोहेको खरलमें डालकर एक दिन घीकुवारके रसमे मर्दन करे, फिर गोला बनाय सम्पुटमें रख गजपुटमें पचावे, इस प्रकार सब लोह शुद्ध हो जाते हैं ॥ ९४ ॥ ९५ ॥
अथास्यामृतकरणम्
घृततुल्यं मृतं लोर्हं लोहपात्रगतं पचेत् । जोर्णे घृते समादाय योगवाहेषु योजयेत् ॥ ९६ ॥
घृत और लोहेकी भस्मको बराबर लेकर लोहेके बासनमें पकावे । जब घी जोर्ण हो जाय तब उतार ले । इसको योगवाही योगोंमें प्रयोग करे । ९६।
इति लोहमारणम् ॥
अथ भूनागसत्त्वम्
सद्यो भूनागमादाय क्षालयेच्छथिलं बुधः । अथवा कुक्कुटं वीरं कृत्वा मन्दिरमाश्रितम् ॥ ९७ ॥
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मलमूत्रं गृहीतेन सद्यम्भु प्रथमांशकम् । आलोड्यच टङ्कं मध्याज्येघ्र्मे सर्वार्थमादरात् । मुग्चेतु ताम्रवत्स्वमेतद् नागस्त्वकम् ॥ ९८ ॥ प्रथम भनागको लाकर जो कि, वर्षाकालमैँ ताम्रभस्मिमें ह्वा हो उसको शालित करके अथवा देवकुड कनेर मिलाकर वा मुरगेकी बीटके साथ उसको मिलाकर अथवा गँके मलमूत्रके साथ जल मिलाय तत्कालके जलसे उसके चूर्णको शहद घृतमें मिलाय धूपमें घर दे । फिर मर्दन कर बकनालमें रख फूके तो ताँबे के समान सत्व निकले९७९८।
अथ लवणपञ्चकम् सामुद्रं सैन्धवं काचं चुल्लिका व सुवर्चलम् । मूलिका नवक्षारश्च क्षेयं लवणपञ्चकम् ॥ ९९ ॥ समुद्रलवण, सेँधा, काच, चूलिका, काला नमक, मूलिका और नवक्षार यह पाँच लवण जानने ॥ ९९ ॥ इति लवण पञ्चक ॥
अथ क्षारा: त्रिक्षारष्टङ्कणक्षारो यवक्षारश्च सर्व्जिका ॥ १०० ॥ सुहागा, जवाख़ार और सज्जीख़ार ये तीन क्षार है ॥ १०० ॥
अथ वृक्षक्षार: तिलापामार्गकदलीपलाशः शिग्रुपिण्डकौः । मूलकाद्र्कचित्राश्च सर्वमन्तः पुटेपचेत् ॥ १०१ ॥ समालोड्य जलैर्बंधवा वस्त्रे प्राह्यामषोजलम् । शोधयेत्पाचयेद्ग्नौमृदूद्र्डेन तु तज्जलम् । प्राह्यं क्षारावशेषं तु वृक्षक्षारमिदं स्मृतम् ॥ १०२ ॥
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उपदेश: १६.
हिन्दीटीकासहित (३६५)
तिल चिरचिटा, केला, ढाक, संहिजान, पौंड्रक, मूली, अदरक, चीता इनको, पृथक् अन्तःपुटमें पचावे । (कहीं पौंड्रकका अथं इक्खु है ( और जलमें अच्छी प्रकार आलोडित कर वस्त्रमें ग्रहण कर छान ले और उस जलको शोधन कर अग्निमें पचाय मिट्टीके वर्तनमें रख्खे फिर जो शेष रहे वह क्षार है यह वृक्षक्षार जानो ॥१०१॥१०२॥
अथ विड:
मूलिकाद्रकवह्नीनां क्षारं गोमूत्रयोजितम् । वस्त्र पूतं जलं ग्राह्यं गन्धकं तेन भावयेत् ॥ १०३ ॥
सप्तवारं खरे घर्मे बोजोऽस्यं हेमजारणे ।
कन्याहयारिधत्तूरदवैर्भाव्यं तु गन्धकम् ॥ १०४ ॥
शतवारं खरे धर्मे बोजोऽस्यं हेमजारणे ।
गन्धकं शड्खचूर्णं वा गोमूत्रे: शतभावितम् । बीजोऽस्यं जारणे श्रेष्ठो बीजानां द्रावणे हितः ॥ १०५ ॥
मूली, अदरक, चीता इनको गोमूत्रसे पीस वस्त्रसे छानले, उसमें गन्धककी भावना दे । इस प्रकार, सातवार कर कठिन धूपमें रखदे । यह सुवर्णके जारण करनेका बीज है । घोकुवार कनेर और धतूरोंके रस सहित गंधककी भावना देकर सातवार कठिन धूपमें रख दे यह भी सुवर्णके जारणेका बीज है गंधक और शंखके चूर्णको सौ वार गोमूत्रसे भावना दे । यह हेमजारणमें श्रेष्ठबीज है । बीजोंके द्रावणमें हित कारक है । (विरिया सौंचर नोनको भी विड कहते हैं) १०३-१०५
अथ अम्लवर्ग:
जम्बीरं नागरङ्गञ्च मातुलुङ्गाम्बुवेतसम् । चाङ्गेरी चणकुक्कुटच अम्लवर्ग: प्रकीर्तितः ॥ १०६ ॥
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(३६६)
कामरत्न षोडश-
जम्बीरनींबू, नागरंग (नारंगी), मातुलुंगी, बिजौरानींबू, अम्लवेतस, अम्ललौन, चना, चीता यह अम्लवर्ग है ॥१०७॥ इति अम्लवर्ग।
अथ वज्रभूषा
वल्मीकमृत्तिकाभागं गवास्थितुष्णभस्मनोः ।
भागं रसं समादायं वज्रभूषा विरच्य ते ॥ १०७॥
इति श्रीपार्वतीपुत्रनित्यानाथविरचित्ते कामरत्ने रसादिशोधनं नाम षोडशोपदेशः ॥ १६ ॥
तिनकोंकी राख दो भाग, बँमईकी मट्टी एक भाग, रस एक भाग लेकर अर्थात् लोहेका मेल एक भाग ले । बकरीके दूधसे पीसकर दृढ़ मषा बनावे, धपनमें सुखा ले उपरोक्त कल्क लेपन कर मुख बंध करे । वह वज्रमूषा है । इसमें उत्तम पारेकी भस्म होती है ॥ १०७॥
इस ग्रन्थमें जो तोलका प्रमाण आया है उसका प्रमाण
चार चौकी एक जौटली वा रत्ती होती है ।
छ: रत्तीका एक माशा वा धान्यक होता है ।
चार माशेको एक शाण वा टंक कहते हैं ।
दो टंकको एक कोल ( आठ माषे ) कहते हैं ।
दो कोलका एक कर्ष (तोला) होता है ।
दो कर्षका आधा पल होता है, इसे शुक्लित कहते हैं ।
दो पलकी एक प्रसृति (८ तोले) होती है ।
दो प्रसृतिकी एक अञ्जली और वही कुढव (१६तोले) है ।
इस प्रकार परिभाषा सम्झना चाहिये ।
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उपदेश: १६.
हिन्दीटीकासहित (३६७)
अथ दीर्घायुष्यकरणम्
नीमकी छाल ४ मासे, नीमकी जड ५, मोमके फूल ५, हरिद्रा ७, अपामार्ग (चिरचिटा) ५, त्रिकुटा, २ बेलकी जड १, २५, श्वेतचोता १ मासा, अजवाइन १ तोला, लहसुन, ५ मासे यह सब एकत्र कर तत्ते पानीसे वस्त्रमें शोधले ।तीन मासेकी गोली बनाकर प्रतिदिन एक गोली खायतो तीन सौ साठ वर्ष जिये ।
पहले महीने अग्निकी प्रबलता दूसरे महीने व्याधिनाश, तीसरेमें पुष्टि, चौथेमें जनकदृिष्टि, पांचमे सुन्दरता, छठेमें कोकिलास्वर, सातवेसे पलितनाश, आठवेमें वज्रकाय, नवेमे निद्रानाश, दसवेमें यशोवृद्धि, ग्यारहवेमे शृतिधर और बारहवेमे सर्वसिद्धि होवे ॥
"ॐ स्वस्तिनानन्दग्रामात्नानन्दग्रामात नानन्दगृहात नानन्दवि्हा रात्नानन्दकानाम भिक्षु एकीहिक, द्रव्याहिक, त्र्याहिक, चातुर्थिक नित्यज्वर, मासिक, वार्षिक द्विवार्षिक, हाकिनी, कृत्या, वार्तिक, पैत्तिक, इलैशिक, सन्निपातादीन सर्व्ज्वरान समादिशते भर्वादृ: प्रहतराजादेशश्रवणपत्रदर्शनात श्री अमुकस्य शरोरे मुहूर्तमपि न स्थातव्यं ज्वर रे रे फट फट हुं स्वाहा ।मारीच २ अमुकस्य ज्वरं हर २ उच्चाटय २ स्वाहा" इदं यंत्र लिखित्वा शिरसि बध्द सर्व्ज्वरान हन्ति ।
यह यंत्र लिख शिरपर बांधनेसे सब ज्वर दूर होते हैं ॥
इस यंत्र को काक और उल्लूक रक्तसे लिख शिरमें बांधे या कौएके गलमें बांध छोडदे तो ज्वर आदिका उच्चाटन होकर रोगी सुखी हो जायगा । यह सत्य है ॥
इति श्रीपार्वतीपुत्रनित्यनाथविराचिते कामरत्ने पण्डितज्वालाप्रसाद-मिश्रकृतभाषाटीकायां रसादिशोधनं नाम षोडशोपदेश:१६॥॥
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संवत गुणशर अंग विधु, पौष कृष्ण गुरूवार ।
सकल कामप्रद पंचमो, मन इच्छा दातार ॥ १ ॥
पूर्ण कियो शुभ ग्रन्थ, यह भाषा तिलक बनाय
लर्खाहिं सजन हिय लर्हाहिं मुद, काम अर्थको पाय ॥ २ ॥
कामरत्न सब कामप्रद, सर्वाहिं जो करइ नेम ।
ते पावर्हि सुख संपदा, बढ़हि वंशमें क्षेम ॥ ३ ॥
वसत राम गंगा निकट, नगर मुरादाबाद ।
तहां रहत हरिभजनरत, द्विज ज्वालाप्रसाद ॥ ४ ॥
तिन भाषाटीका कियो, गौरि गिरोश मनाय ।
भक्तन सुख दायक सदा, जनकी करैं सहाय ॥ ५ ॥
इति कामरत्नं समाप्तम् ॥
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