Books / Kamlatmika Lakshmi Tantra Sastra Rajesh Dixit

1. Kamlatmika Lakshmi Tantra Sastra Rajesh Dixit

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कमलातन्त्रिका

(लक्ष्मी) तन्त्रशास्त्र

पं राजेश दीक्षित

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कामला

तन्त्र

शास्त्र

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दशमहाविद्या तन्त्र ग्रन्थ माला, संख्या—७

कमलात्मिका (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

[भगवती कमला के विभिन्न मन्त्र तथा उनको प्रयोग विधि, लक्ष्मी-पूजा की सामान्य विधि, स्तोत्र, हृदय, कवच, सहस्रनाम, आरती एवं चालीसा के अतिरिक्त कामधेनु तन्त्र अपूर्व सङ्कलन ग्रन्थ]

सम्पादक :

विद्या-वारिधि, देवज्ञ-बृहस्पति आचार्य पं. राजेश दीक्षित

[सहस्राधिक ग्रन्थों के अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति लब्ध लेखक]

दीप पब्लिकेशन

कागन मार्केट, होलीपिटम रोड, आगरा- 282003

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प्रकाशक :

दीप पब्लिकेशन

कंचन मार्केट

अस्पताल रोड, आगरा-३

लेखक/सम्पादक :

आचार्य पं. राजेश दीक्षित

सर्वाधिकार : प्रकाशकाधीन

संस्करण :

प्रथम, १९९५ ई.

दीप पब्लिकेशन

हास्पिटल रोड, आगरा-३

मूल्य : स्वदेश में Rs. ३०/-

विदेश में : पाँच डालर

मुद्रक : सुमन कम्पोजिंग हाऊस, अमरपुरा, आगरा।

ब्रज प्रिटिंग प्रेस, नयाबांस आगरा-२

चेतावनी

भारतीय कापीराइट एक्ट के अधीन इस पुस्तक के सर्वाधिकार दीप पब्लिकेशन आगरा के पास सुरक्षित हैं। अतः कोई सज्जन इस पुस्तक का नाम, अन्दर का मैटर, डिजायन, चित्र व सैटिंग तथा किसी अंश का किसी भी भाषा में नकल या तोड़ मरोड़ कर छापने का साहस न करें अन्यथा कानूनी तौर पर हर्जे-खर्चे व हानि के जिम्मेदार होंगे।

प्रकाशक

KAMLATMIKA (LAXMI) TANTRA SHASTRA

By.

Pt. Rojesh Dixit

Rs. 30/-

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दो शब्द

‘दश महाविद्या तन्त्र ग्रन्थ माला’ की यह सातवीं तथा अन्तिम पुस्तक है। इसमें भगवती कमलात्मिका अर्थात् लक्ष्मी से सम्बन्धित विभिन्न मन्त्र तथा उनकी शास्त्रीय प्रयोग विधियों का उल्लेख किया गया है। इसके अतिरिक्त श्री लक्ष्मी की सामान्य पूजा-विधि, आरती, चालीसा, विविध स्तोत्र तथा सहस्रनाम आदि के अतिरिक्त अन्त में जिज्ञासु पाठकों के उपयोगार्थ मूल रूप में ‘कामधेनु तन्त्र’ भी संकलित किए गए हैं।

दश महाविद्यान्तर्गत भगवती कमलात्मिका आद्याशक्ति के तीन रूपों—महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती में से एक हैं। सामान्यतः ‘लक्ष्मी’ के रूप में जिन देवी की पूजा-अर्चना, विशेषतः दीपावली के दिन की जाती है, ये उनसे भिन्न हैं, परन्तु तत्त्वतः सभी देवियों में अभिन्नता होने के कारण ‘कमला-त्मका’ तथा ‘लक्ष्मी’ में कोई अन्तर भी नहीं मानना चाहिए।

प्रभु की असीम कृपा से आज यह ‘ग्रन्थमाला’ सम्पूर्ण हुई। इस सम्बन्ध में यदि कोई जिज्ञासा हो तो उसके लिए जवाबी पत्र-व्यवहार किया जा सकता है। यदि किन्हीं विज्ञ महानुभाव को कहीं कोई त्रुटि दिखाई दे तो वे उससे अवगत कराने का अनुग्रह करें, ताकि आगामी संस्करण में उसका निराकरण किया जा सके।

आशा है, जिज्ञासुओं के लिए यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी।

महाविद्याकालोनी, मथुरा वैशाखी, सं. २०४४ वि. —राजेश दीक्षित

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कमलात्मिका (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

साधक ध्यान रखें

पुस्तक को अध्ययन करते समय सर्वप्रथम निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखें—

अपने आत्म-विश्वास और कार्य-सिद्धि के ढंग पर ही आपके कार्य का फल निर्भर करता है । बिना विश्वास के कोई फल प्राप्त नहीं होता ।

तांत्रिक साधन उपचार और दुख निवारण के लिए ही प्रयोग करने चाहिए न कि निजी स्वार्थ के लिए ।

किसी अनिष्टकारक फल की प्राप्ति के लिए किया गया कार्य दूसरों की हानि की अपेक्षा स्वयं को अधिक हानिकारक होता है ।

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समर्पण

मोतीकटरा, आगरा निवासी,

तीयूषपाणि-चिकित्सक, अपने अपराज

पं० कालिकाचरण दीक्षित

को सादर

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विद्या-वारिधि, देवज्ञ-बृहस्पति

आचार्य पं. राजेश दीक्षित

द्वारा सम्पादित

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१०. भैरवी एवं धूमावती तन्त्र शास्त्र

११. बगलामुखी एवं मातङ्गी तन्त्र शास्त्र

१२. कमलात्मिका (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

प्रत्येक पुस्तक का मूल्य : ३० रुपये

(डाक खर्च ७ रु. अलग)

दीप पब्लिकेशन

कंचन मार्केट

अस्पताल रोड, आगरा-२

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विषय सूची

अंक

१. कमलात्मिका-तत्व महालक्ष्मी शक्ति, प्राकट्य-कथाएँ प्रतीक-रहस्य, भगवती की उपासना ।

२. श्रो लक्मी एकाक्षर बीज मन्त्र प्रयोग विनियोग, ऋष्यादिन्यास, करन्यास, हृदयादिषडङ्ग न्यास, ध्यान, पीठ-पूजा, आवरण-पूजा, द्वादशदेवता पूजन, अष्टदेवी पूजन, दश दिक्पाल पूजन, अस्त्र-पूजन, पुरश्चरण, प्रयोग-साधन ।

३. चतुरक्षर लक्ष्मी बीज-मन्त्र प्रयोग कर-न्यास, हृदयादिषडङ्गन्यास, ध्यान, पुरश्चरण तथा प्रयोग-विधि ।

४. दशाक्षर लक्ष्मी बीजात्मक मन्त्र प्रयोग विनियोग, ऋष्यादिन्यास, कर-न्यास, नेत्रत्रहीन पञ्चाङ्ग न्यास, पीठ-पूजा, आवरण-पूजा-अष्टदेवीपूजा, पुरश्चरण, प्रयोग-विधि

५. सप्तदशाक्षर महालक्ष्मी मन्त्र प्रयोग विनियोग, ऋष्यादि-न्यास, कर-न्यास, नेत्रत्रहीन पञ्चाङ्ग न्यास, पीठ-पूजा, आवरण-पूजा, अष्टदेव पूजा, अष्टदेवी पूजन, वाण-पूजन, पुरश्चरण, प्रयोग-विधि

६. द्वादशाक्षर महालक्ष्मी मन्त्र प्रयोग विनियोग, ऋष्यादि न्यास, कर-न्यास, मन्त्र वर्ण न्यास, सप्त-वर्ण न्यास, कर-न्यास, हृदयादि षडङ्गन्यास, उद्यान-स्मरण, ध्यान, आवरण-पूजा, षडङ्ग-पूजा, अष्टशक्ति पूजा, नवग्रह-पूजा, अष्ट दिक्पाल पूजा, पुरश्चरण, प्रयोग-विधि ।

७. सिद्धलक्ष्मी का दशाक्षर मन्त्र प्रयोग विनियोग, ऋष्यादि-न्यास, कर-न्यास, हृदयादि षडङ्गन्यास, ध्यान, पुरश्चरण ।

८. ज्येष्ठा लक्ष्मी मन्त्र प्रयोग विनियोग, ऋष्यादि-न्यास; कर-न्यास, हृदयादि षडङ्गन्यास,

पृष्ठांक

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मन्त्रवर्ण सर्वाङ्ग न्यास, ध्यान, पीठ-पूजा, आवरण-पूजा, अष्टमात्रका-पूजन, पुरश्चरण।

९. वसुधालक्ष्मो दान्त्र प्रयोग

विनियोग, ऋष्यादि-न्यास, कर-न्यास, पञ्चाङ्ग-न्यास, ध्यान, पीठ-शक्ति-पूजा, आवरण-पूजा, पुरश्चरण, प्रयोगविधि

१०. लक्ष्मी के अन्य मन्त्र

तेईस अक्षर का मन्त्र, त्रिशक्ति का मन्त्र, सर्वसाम्राज्या का मन्त्र, महालक्ष्मी मन्त्र-विधि, ध्यान, अर्ध-पूजा, पुरश्चरण।

११. सामान्य पूजा-विधि

लक्ष्मी-पूजन के नियम, सामान्य-पूजा विधि, दीपावली विशेष-पूजन, श्रीलक्ष्मी चालीसा, श्रीलक्ष्मीजी की आरती।

१२. श्रीकमला स्तोत्र, कवच आदि

(१) श्री कमलास्तोत्रम्

(२) श्री महालक्ष्यष्टक स्तव

(३) श्री लक्ष्मी स्तोत्रम्

(४) श्री सिद्ध लक्ष्मी स्तोत्रम्

(५) श्री लक्ष्मी सूक्तम्

(६) श्री सूक्तम्

(७) श्री कमला अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

(८) श्री कमला कवचम्

(९) श्री लक्ष्मी स्तोत्रम्

(१०) श्री महालक्ष्मी पंचजर स्तोत्रिम्

(११) श्री प्रसन्नवरदा श्री लक्ष्मी स्तोत्रम्

(१२) सत्यः फलप्रदा लक्ष्मीस्तव हृदयम्

(१३) श्री कमला स्तोत्रम्

(१४) श्री कमलात्मकोपनिषत्

(१५) श्री महालक्ष्मी हृदयम्

(१६) श्री लक्ष्मी सहस्रनाम स्तोत्रम्

१३. कामधेनु तन्त्रम्

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कमलात्मिका-तत्त्व

भगवती 'कमलात्मिका' दशम महाविद्या हैं। इन्होंने तीनों लोकों को वश में कर रखा है, अतः इन्हें 'त्रैलोक्य-माता' भी कहा जाता है। ये धन-धान्य प्रदान करने वाली, सौभाग्य-वर्द्धक, लक्ष्मी-प्रदात्री हैं। वस्तुतः इन्हें ही 'लक्ष्मी' रूपा कहा गया है। इनकी बंकिम-भ्रू मात्र से ही मनुष्य विषम विपत्ति में पड़ जाता है तथा इनकी छत्रच्छाया का अक्षय लेने वाला समस्त पापों से निवृत्त हो जाता है।

रोहिणी नक्षत्र इनका अधिष्ठान काल है। इस नक्षत्र में उत्पन्न व्यक्ति आजीवन सुखी तथा समृद्ध बना रहता है। भगवती कमला केवल सेवा तथा प्रेम-भाव से ही प्रसन्न हो जाती हैं। इनकी उपासना मानव बन कर नहीं, अपितु देवता बन कर करनी चाहिए। ये स्फूर्तिदायिका हैं तथा चारों युगों की रानी के रूप में प्रख्यात हैं। इनका अपर्नाम 'लक्ष्मी' है। ये महारात्रि विद्या हैं। इनके शिव 'सदाशिव विष्णु' हैं।

धूमावती तथा कमला में प्रतिस्पर्धा है। वह ज्येष्ठा हैं, ये कनिष्ठा हैं। वे अवरोहिणो थीं ये रोहिणी हैं। वे असुरी थीं, ये दिव्या हैं। वे दरिद्रा थीं, ये लक्ष्मी हैं।

रोहिणी नक्षत्र के ठीक पड़भान्तर (१५० अंश) पर 'ज्येष्ठा' है। जिस व्यक्ति का 'रोहिणी' नक्षत्र में जन्म होता है, वह आर्थिक-दृष्टि से समृद्ध बना रहता है।

महालक्ष्मी-शक्ति

शक्ति वह वस्तु है, जो कारण के साथ अपृथक् सिद्ध रहकर, कार्योत्पादन में उपयोगी होती है। विष्णु पुराण में उल्लेख मिलता है—

विष्णु शक्ति: परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथापरा । अविद्या कर्मसंज्ञा या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥

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२ । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

इस श्लोक में तीन शक्तियों का उल्लेख है—(१) पराविष्णु शक्ति, (२) अपरा क्षेत्र शक्ति तथा (३) अविद्या अर्थात् कर्म नामक शक्ति । केवल ये तीन ही शक्तियाँ नहीं हैं, बल्कि प्रत्येक भावपदार्थ में अलग-अलग शक्ति है, उनका न तो हम चिन्तन ही कर पाते हैं और न वे हमारे ज्ञान का विषय ही हो सकती हैं । जिस प्रकार कि अग्नि की उष्णता एवं जल की शीतलता आदि का चिन्तन नहीं किया जा सकता । चिन्तन करने पर भी उष्णता आदि हमारे ज्ञान का विषय नहीं हो सकतीं । इसी प्रकार ब्रह्म की भी सर्गादि अनेक शक्तियाँ हैं । इस प्रकार की अनेक शक्तियों में श्री महाविष्णु की 'अहंता' नाम की एक शक्ति है, वही महालक्ष्मी है ।

'लक्ष्मी तन्त्र' में महालक्ष्मी इन्द्र के प्रति कहती हैं—“उस परब्रह्म की जो चन्द्रमा की चांदनी की भांति समस्त अवस्थाओं में साथ देने वाली देवी स्वामंभूता अनपायिनी 'अहंता' नाम की परमा शक्ति है, वह सनातनी शक्ति में ही हूँ ।” इस शक्ति का ही दूसरा नाम 'नारायणी' है । उक्त तन्त्र में ही महालक्ष्मी कहती हैं—“मैं नित्य, निर्दोष, सीमातीत, कल्याणगुणों वाली 'नारायणी' नाम वाली वैष्णवी परासत्ता हूँ ।”

कारणों में अपृथक् सिद्ध रहने वाला कार्योपयोगी धर्म ही शक्ति है । वह शक्ति दो प्रकार की है—(१) केवल धर्ममात्र तथा (२) धर्म और धर्मी उभयरूप । अग्न्यादि भावों की उष्णता आदि शक्तियाँ केवल धर्म हैं । क्षेत्रज्ञ ईश्वर के प्रति विशेषण होकर धर्म बनते हुए भी स्वयं अनेक धर्मों वाला है—शक्तिमान् है ।

उक्त दो प्रकार की शक्तियों में श्रीमहालक्ष्मी द्वितीय कोटि की शक्ति है । स्वयं परमात्मा का विशेषण होती हुई धर्म होकर भी वह अनेक गुणधर्मवती एवं शक्ति भी है । पहले जो “विष्णु शक्ति ! परा प्रज्ञाता” इत्यादि 'विष्णु पुराण' के वचन उद्धृत किये गये थे, उनमें जो 'विष्णुशक्ति' कही गई है, वह क्या है ? इस विषय में व्याख्याकारों ने अनेक प्रकार के मत प्रदर्शित किये हैं, किन्तु हमारी सम्मति में वह विष्णु शक्ति ही 'अहंता' नाम वाली महालक्ष्मी है । उस वचन में अपराशक्ति तथा अविद्याशक्ति के विषय में जैसा स्पष्टीकरण किया गया है, वैसा स्पष्टीकरण विष्णु-शक्ति के विषय में नहीं किया गया है, केवल एक विष्णु-शक्ति का उल्लेख मात्र कर दिया गया है । परन्तु इसका स्पष्टीकरण 'अथर्वबुध्न्य संहिता' में किया गया है ।

जगत्तया लक्ष्मयाणा सा लक्ष्मीरिति गीयते । श्रयन्ती वैष्णवं भावं सा श्रीरन्त निषेव्यते ॥

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अव्यक्त कालपु भावात्सा पद्मा पद्मावलिनी। कामदानाच्च कमला पर्याय सुखयोगतः॥ विष्णोस्सामर्थ्य रुपतत्वा दृश्यतु शक्ति: प्रगीयते।

उक्त श्लोकों में उसी परब्रह्म शक्ति के लक्ष्मी, श्री, पद्मा, पद्मावलिनी, कमला आदि नाम निर्वचन पूर्वक बताकर, उसी को विष्णु-शक्ति बताया गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि विष्णुपुराणोक्त परा विष्णु-शक्ति श्री महालक्ष्मी ही हैं, जिनके कमला, पद्मा, श्री इत्यादि नामान्तर भी हैं। वे ही 'अहंता' नाम से भी जानी जाती हैं।

श्री महालक्ष्मीजी के पांच कार्य हैं—(१) तिरोभाव, (२) सृष्टि, (३) स्थिति, (४) संहार और (५) अनुग्रह।

सृष्टि, स्थिति और संहार तो सुप्रसिद्ध है ही। तिरोभाव कहते हैं—जीवात्मा के कर्म रूप अविद्या से तिरोहित अथवा आच्छादित होने को। 'अनुग्रह' मोक्ष को कहते हैं। यद्यपि ये पांच कर्म शक्ति रूप लक्ष्मीजी के बताये गये हैं, परन्तु वास्तव में ये हैं—परमात्मा के ही कर्म। परमात्मा के सृष्ट्यादि कार्यों में शक्ति का उपयोग होने के कारण ही ये शक्ति के कार्य कहे गये हैं।

'लक्ष्मी तंत्र' में श्रीमहालक्ष्मीजी कहती हैं— व्यापारस्तस्य देवस्य सोऽहमस्मि न संशयः। मया कृतं हि यत्कर्म तेन तत्कृतमुच्यते॥

अर्थात्—“मैं नित्य, निर्दोष निरवयव परब्रह्म श्रीमन्नारायण की शक्ति हूँ। उनके सब कार्यों में मैं ही करती हूँ। मैं उनका व्यापार रूप हूँ। अर्थात् मैं जो कार्य करती हूँ, वह उन्हीं का किया हुआ कहा जाता है।”

कहने का तात्पर्य यह है कि अग्नि का दाहक रूपी कार्य जैसे अग्निगत दाह-शक्ति के कारण होता है, उसी प्रकार परमात्मा के सृष्टि आदि कार्य परमात्मगत शक्तिरुपा महालक्ष्मी के कारण ही होते हैं।

ईश्वरीय सृष्ट्यादि के समस्त कार्यों में तटस्थ्किलत रूप महालक्ष्मीजी का उपयोग तो है ही। मोक्षदान रूप कार्य में भी इनका विशिष्ट रूप से उपयोग है। जीवों को मोक्षलाभ, श्रीमहालक्ष्मीजी के कारण ही होता है। यथा— लक्ष्म्यासह हषीकेशो देव्या कारुण्य रुपया। रक्ष कष्सर्वसिद्धान्ते वेदान्तेषु च गीयते॥

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४ । कमला (लक्ष्मो) तन्त्र शास्त्र

यहाँ 'रक्षा' शब्द से 'मोक्षदान' ही अभिप्रेत है । परमात्मा मोक्षप्रद है, यह सर्वसिद्धान्त है, परन्तु वह मोक्षप्रदत्व लक्ष्मीसहित नारायण का है, केवल नारायण का नहीं । मोक्षदान में मुख्य कर्तृत्व नारायण का होने पर भी उसमें लक्ष्मी का साथ प्रयोजक रूप में अन्तर्भूत है । लक्ष्मी के बिना मोक्षदान असंभव हो जाता है । भगवान्चरणागति में पुरुषकारकत्व अवश्यापेक्षित है । उसके बिना शरणागत कार्यकरी नहीं होती । विशिष्टा द्वैत-वैष्णव-सम्प्रदाय के मनीषी विद्वान् श्रीवेङ्कटाध्वरि ने 'लक्ष्मी सहस्र' में कहा है—

"नित्यं विशवं वशयति हरिनिग्रहानुग्रहाभ्यामध्ये शक्तिं विघटयति ते हन्त कारणपुरः:"

अर्थात्—"भगवान् किसी को दण्ड से और किसी को अनुग्रह से वशीभूत किये हुए हैं, परन्तु भगवान् की उस निग्रह-शक्ति को हे लक्ष्मीजी ! आपकी दया रोक देती है अर्थात् नारायण यदि किसी को दण्ड देना चाहते हों, परन्तु आप उस पर प्रसन्न हैं तो फिर हरि की निग्रह-शक्ति उस पर नहीं चलती ।

शौरिश्चकारितत् हृदयेषु शरीरभाजां तस्यार्पि देव हृदयं त्वमनुप्रविष्टा । पद्ये ! तवापि हृदये प्रथते दयेयं त्वामेव जाग्रदिबलातिशयां श्रयामः ॥

अर्थात्—'भगवान् विष्णु प्राणी मात्र के हृदय में रहते हैं और हे लक्ष्मीजी ! आप उन विष्णु के हृदय में विराजती हैं तथा आपके हृदय में दया रहती है, अतः हम सबसे अतिशयवोलिनी आपकी दया की ही आश्रय लेना चाहते हैं । शाक्त लोगों का विश्वास है कि शक्ति ही सबसे महान् शक्तिशालिनी हैं, जिसके बिना ब्रह्म भी कार्य का सम्पादन नहीं कर सकता उस महान शक्ति को 'महालक्ष्मी' के नाम से पुकारा जाता है । 'देवी माहात्म्य' में महालक्ष्मी से ही समग्र देवी-देवताओं की उत्पत्ति का वर्णन मिलता है । यथा—

सरस्वती लक्ष्मी महाकाली gौरी विष्णु लक्ष्मी हिरण्यगर्भ सरस्वती रुद्र

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कमलात्मकां-तत्व । ४

प्राकट्य-कथाएं

जिस प्रकार ईश्वर अवतार ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार श्रीलक्ष्मीजी देह धारण करती हैं । यथा—

"रामावत्के भवत्सीता रुक्मिणी कृष्ण जन्मनि । अन्येषु चावतारेषु विष्णोरेषानपायिनी ॥

अर्थात्-रामावतार के समय वे सीता तथा कृष्णावतार के समय रुक्मिणी के रूप में अवतरीत हुई एवं अन्य अवतारों में भी विष्णु की पत्नी के रूप में उनका प्राकट्य हुआ ।

'देवी भागवत' के अनुसार—भगवती लक्ष्मी बैकुण्ठ में 'महालक्ष्मी', क्षीर सागर में विष्णुजी की शिष्यश्र्या पर 'लक्ष्मी', इन्द्र के भवन में 'स्वर्ग लक्ष्मी', राजभवन में 'राजलक्ष्मी', गृहस्थों के यहां 'गृहलक्ष्मी' घरों में 'गृहदेव', समुद्र से उत्पन्न 'सुरभि' गाय तथा यज्ञ में 'दक्षिणा' रूप से सदैव विखमान रहती है ।

'ब्रह्मवैवर्त पुराण' में भगवती लक्ष्मी की अवस्थिति के स्थान तथा नाम इस प्रकार बताये गए हैं—

(१) बैकुण्ठ में—महालक्ष्मी । (२) त्रेलोक में—राधा । (३) स्वर्ग में—स्वर्ग लक्ष्मी । (४) गोलोक में—सुरभि । (५) चन्द्रमण्डल में—शोभा । (६) भूलोक में—राजलक्ष्मी । (७) यज्ञ में—दक्षिणा । (८) गृह में—गृहलक्ष्मी ।

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार 'गोलोक' से पचास करोड़ योजन दूर, दक्षिण ओर 'वैकुण्ठ लोक' की अवस्थिति है ।

प्रलयकाल में केवल ज्योति:पुञ्ज हो प्रकाशित होता है जो ज्योतिर्मय, नित्य, असंख्य विश्वों के कारण, स्वेच्छारुपधारी, सर्वव्याप्त परमात्मा का उज्जवल तेजोरूप है । तीनों लोक उसी तेजपुञ्ज के भीतर विद्यमान रहते हैं । इन तीनों लोकों से ऊपर 'गो लोक' की स्थिति है, जो परमपिता परमेश्वर की भांति ही 'नित्य' है । उसकी लम्बाई-चौड़ाई तीन करोड़ योजन है । इसी गोलोक के नीचे मण्डलाकार तथा एक करोड़ योजन विस्तार वाले 'वैकुण्ठ लोक' की अवस्थिति है, जहां भगवती लक्ष्मी सुन्दर रूप धारण किए श्री नारायण के साथ सदैव

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६। कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

विराजमान रहती हैं तथा अपनी विभूतियों द्वारा श्रीहरि के चरण-कमलों की सेवा करती रहती हैं। आद्या शक्ति भगवती महालक्ष्मी अनादि एवं अनन्ता है। वे सदैव विद्यमान रहती हैं, अतः उनके प्राकट्य का कोई काल नहीं है, तथापि अपने भक्तों की रक्षा हेतु समय-समय पर उन्होंने अवतरित होकर विभिन्न लीला-चरित्र किए हैं। यथा—

(१) 'श्रीमद्भागवत' के अनुसार—एकबार देवासुर-संग्राम में जब सब देवता दैत्यराज बलि द्वारा पराजित हो गये, तब उन्होंने श्री विष्णु के परामर्श पर दूरहष्टि का आश्रय ले उनसे मेल कर लिया तथा समुद्र-मंथन कर उसमें से रत्न-निकालने की योजना प्रस्तुत की। देवताओं की योजना से दैत्यगण सहमत हो गए। तब मंदराचल पर्वत की मथानी तथा वासुकि नाग को रज्जु (रस्सी) बनाकर समुद्र-मंथन की प्रक्रिया प्रारम्भ की गई।

दुर्बुद्धि दैत्यगण हमेशा उल्टा ही सोचते तथा विपरीत-कायँ करते हैं। अस्तु समुद्र-मंथन के समय श्री नारायण सहित देवताओं ने जब वासुकि नाग के मुंह वाले भाग को पकड़ा तो दैत्यों ने रुष्ट होकर देवताओं से कहा—नागराज के इस श्रेष्ठ नाग को तो हम लोग ही पकड़ेंगे, तुम लोगों को पूछ पकड़नी होगी। विष्णु और सब देवता तो यह चाहते ही थे। अतः वे वासुकि की पूंछ की ओर जा खड़े हुए। फलतः गर्षण के समय सर्पराज वासुकि के मुख से जो विष निकला, उसका दुष्प्रभाव भी दैत्यों को ही भोगना पड़ा।

मंथन के फलस्वरूप समुद्र के गर्भ से जो चौदह रत्न निकले, उनमें से एक भगवती लक्ष्मी भी थीं। लक्ष्मीजी ने प्रकट होते ही अपनी माया से सबको मोहित कर लिया। इन्द्र उनके लिए अद्भुत आसन लाये। ऋषियों ने उनका विधि पूर्वक अभिषेक किया। दिग्गजों ने कलश-भर कर जल से उनको स्नान कराया, समुद्र ने पीत वस्त्र तथा विश्वकर्मा ने दिव्य आभूषण भेंट किए। तदुपरान्त जब वे अपने लिए योग्य वर ढूंढने को आगे बढ़ीं तो सभी देवता एवं दैत्य उन्हें अपनाने को लालायित हो उठे, परन्तु उन्होंने श्री नारायण के कण्ठ में ही अपनी वरमाला डाली। इस प्रकार वे श्री विष्णु की अर्द्धांगिनो बनीं।

(२) 'देवी भागवत' के अनुसार एक बार देवासुर-संग्राम के समय देवताओं के पराजित हो जाने पर देवगुरु वृहस्पति तथा ब्रह्माजी ने देवराज इन्द्र से श्रीमहा-लक्ष्मी की आराधना करने का निर्देश दिया। तदनुसार इन्द्र ने जब लक्ष्मीजी के बीजमन्त्र का जप किया तो भगवती ने प्रकट होकर उन्हें 'अभयोप्सित-वर', प्रदान किया। जिसके फलस्वरूप देवताओं ने राक्षसों के साथ पुनः युद्ध करके उन पर विजय प्राप्त की।

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(३) 'मार्कण्डेय पुराण' के अनुसार—एक बार महिषासुर नामक एक प्रबल प्रतापी दैत्य ने युद्ध करके सब देवताओं पर विजय प्राप्त करली तथा स्वयं स्वर्ग का राजा बनकर उन्हें भाँति-भाँति के दुःख देने लगा, तब देवताओं ने एकत्र होकर भगवती की प्रार्थना की। उस समय सब देवताओं के सम्मिलित तेज के रूप में भगवती महालक्ष्मी का आविर्भाव हुआ और उन्होंने महिषासुर का वध करके देवताओं को भय-मुक्त बनाया।

(४) 'ब्रह्म वैवर्त पुराण' के अनुसार सरस्वती, गंगा तथा लक्ष्मी—ये तीनों ही श्री विष्णु की पत्नियाँ हैं। एक बार इनमें दाम्पत्य-प्रेम को लेकर परस्पर झगड़ा हो गया, तब सरस्वती ने गंगा को नदी रूपा तथा लक्ष्मी को वृक्ष रूपा होने का शाप दिया। उसे सुनकर गंगा ने भी सरस्वती को नदी रूपा होने का शाप दिया। लक्ष्मी अन्त तक शान्त बनी रहीं।

उक्त शाप के फलस्वरूप गंगा तथा सरस्वती भूतल पर नदी के रूप में अवतरित हुई तथा भाववती लक्ष्मी 'तुलसी' के रूप में राजा धर्मध्वज के यहाँ प्रकट हुई। कुछ समय बाद जब श्री विष्णु के अंश से 'शंखचूड़' का जन्म हुआ तो तुलसी उनकी पत्नी बनीं।

इस घटना के बाद से विष्णु ने गंगा को शिव के पास तथा सरस्वती को ब्रह्मा के पास भेज दिया तथा अपने साथ शान्तस्वरूपा लक्ष्मीजी को ही रखना स्वीकार किया।

इस प्रकार भगवती लक्ष्मी के अवतार की अनेक कथाएँ पुराणों में वर्णित हैं। धर्म की संस्थापना तथा अधर्म के विनाश हेतु भगवान् श्रीविष्णु जब-जब अवतार लेकर पृथ्वी पर आते हैं तब-तब उनकी शक्ति लक्ष्मी भी साथ ही आती हैं, यह बात पहले बताई जा चुकी है। इस प्रकार सीता-रुक्मिणी आदि अनेक अवतार भी श्री लक्ष्मी के ही हैं।

प्रतीक-रहस्य

लक्ष्मीजी का आसन कमल बताया गया है तथा उनके एक हाथ में भी कमल पुष्प विद्यमान रहता है। दो हाथी अपनी सूँड़ में जलपुरित स्वर्ण-कलश दवाये सदैव उनके दाँये-बाँये बने रहते हैं। उनका वाहन उल्लू है। उनके चतुर्भुजी रूप में एक हाथ में कमल, दूसरे में बिल्वफल, तीसरे में अभय तथा चौथे में वरमुद्रा रहती है।

कमल कीचड़ से उत्पन्न होता है, परन्तु वह कीचड़ से लिप्त नहीं होता। जल में रहते हुए भी उसके ऊपर जल का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अस्तु, कमल

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६। कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

के आसन पर बैठना तथा अपने हाथ में कमल पुष्प धारण किए रहना इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य को संसार में रहते हुए भी किसी विषय-वासना में लिप्त नहीं होना चाहिए तथा अपने हाथों से भी वही कर्म करने चाहिए जो सुन्दर तथा शुभ हों। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि कमल रुपी धन को हाथों में लेकर तथा कमल रुपी ऐश्वर्य-सिंहासन पर अमर होने के बाद भी धन-सम्पत्ति-ऐश्वर्य के मद से निर्लिप्त रहने का उपदेश ही भगवती करती हैं।

भगवती के हाथों में 'बिल्व-फल' ब्रह्माण्ड का प्रतीक है। उसे लिये रहने का आशय है कि वे ब्रह्माण्ड को अपने हाथों में सुरक्षित रखे हुए हैं। अर्थात् जो भी प्राणी उनकी शरण में जाता है, वह सुरक्षित बना रहता है।

वर तथा अभय मुद्राओं का तात्पर्य है कि भगवती अपने भक्तों को वर तथा अभय प्रदान करती हैं।

उल्लूक-वाहन से यह तात्पर्य है कि अज्ञानी मनुष्य के ऊपर जब सम्पत्ति का बोझ लद जाता है अर्थात् उसके पास अधिक सम्पत्ति हो जाती है तो वह अहंकार में अन्धा होकर शुभ-कर्म करने अर्थात् सम्पत्ति का सदुपयोग करने से वंचित हो जाता है। ऐसे व्यक्ति को लक्ष्मी-वाहन अर्थात् ऐश्वर्य से सम्पन्न होने पर भी उल्लू की भाँति समाज में कभी यश तथा सम्मान की उपलब्धि नहीं हो पाती तथा जिस प्रकार उल्लू दिन के प्रकाश में छिपा रहता है और रात्रि में सबकी दृष्टि से बच कर ही निकलता है, उसी प्रकार वह भी समाज में अपना मुँह नहीं दिखा पाता।

हाथी को अत्यन्त बुद्धिमान पशु माना गया है। दो हाथी लक्ष्मी के दाँये-बाँये स्वर्ण-कलश में जल भरे हुए उन्हें स्नान कराते रहते हैं, इसका तात्पर्य यह है कि बुद्धिमान मनुष्य धन तथा ऐश्वर्य पाकर उसे भगवती के ही श्रीचरणों में समर्पित करते रहते हैं अर्थात् शुभकार्यों में व्यय करते हैं। सभी शुभ कार्य 'श्री' अर्थात् लक्ष्मी के ही प्रतीक रुप हैं। अतः उनमें धन को व्यय करना भगवती की प्रसन्नता का कारण बनता है। फलतः ऐसे सद्वृत्ति वालों का कोष ठीक उसी प्रकार से कभी खाली नहीं होता, जिस प्रकार कि गजराजों की सूँड में स्थित स्वर्ण-घट कभी जल-रिक्त नहीं हो पाते।

स्मरणीय है कि लक्ष्मी, कमल तथा हाथी—इन तीनों का जन्म जल से ही हुआ है, अतः इन तीनों में पूर्वोक्त प्रकार का सामजस्य ही कल्याणकारी माना गया है। उल्लूक जैसा कर्म तो अपयश एवं दुःख का कारण ही बनता है।

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कमलात्मिका-तत्व | ५

भगवती की उपासना

दशमहाविद्याओं के अन्तर्गत आने वाली भगवती कमलात्मिका आद्याशक्ति हैं। ये उन लक्ष्मी से भिन्न हैं। जिनकी प्राकट्यकथाओं का उल्लेख पिछले पृष्ठों में किया गया है। तथापि, मूलतः सभी देवियाँ एक ही पराशक्ति के प्रतिरूपा होने से परस्पर अभिन्ना भी हैं। अतः लक्ष्मी के किसी भी रूप की पूजा अर्चना करने से समतुल्य फल ही प्राप्त होता है।

अगले प्रकरणों में भगवती महालक्ष्मी की उपासना सम्बन्धी विभिन्न मन्त्र तथा उनकी शास्त्रीय प्रयोग-विधि, सामान्य पूजा विधि तथा उनसे सम्बन्धित स्तोत्रादि का वर्णन किया गया है। यह पूजा-अर्चन विधि देवी के सभी स्वरूपों के लिए उपयोगी हैं।

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२ श्री लक्ष्मी एकाक्षर बीज मन्त्र प्रयोग

शारदा तिलक में श्री लक्ष्मी का एकाक्षर बीज मन्त्र इस प्रकार बतायागया है—

‘श्रीं’

उक्त मन्त्र के विनियोग, न्यास, ध्यान तथा आवरण-पूजा विधि आदि निम्नानुसार है—

विनियोग

अस्य मन्त्रस्य भृगुकृञ् ऋषि: । निवृृच्छन्द: । श्री लक्ष्मीर्देवता मम धनाप्त्यये जपे विनियोग: !

ऋष्यादि न्यास

भृगुकृञ् ऋषये नमः शिरसि । निवृृच्छन्दसे नमः मुखे । श्री लक्ष्मीर्देवतायै नमः हृदि । विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ।

(इति ऋष्यादि न्यास:)

करण्यास

ॐ श्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः । ॐ श्रीं तर्जनीभ्यां नमः । ॐ श्रूं मध्यमाभ्यां नमः । ॐ श्रै अनामिकाभ्यां नमः ।

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श्री लक्ष्मी एकाक्षर बीज मन्त्र प्रयोग | ११

ॐ श्रीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।

ॐ श्रः करतलकर पृष्ठाभ्यां नमः ।

(इति करऽ्यासः)

हृदयादि षडङ्गऽन्यासः

ॐ श्रीं हृदयाय नमः ।

ॐ श्रीं शिरसे स्वाहा ।

ॐ शृं शिखायै वषट् ।

ॐ श्रैं कवचाय हुं ।

ॐ श्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् ।

ॐ श्रः अस्त्राय फट् ।

(इतिषडङ्गऽन्यासः)

ध्यानम्

ॐ कात्यायन सन्निभा हिमगिरि प्रख्यैश्वर्यतुंगोज्ज्वल ह्स्तोतिक्ष्प्तहिरण्मयामृतघटैररासिच्यमाना श्रियं ।

बिभ्राणां वरमब्जयुग्ममभयं हस्तैः किरोटोज्ज्वलां द्यौःरागादिविचित्रवस्त्रविलसद्विलासैः वन्दे ५ रविन्दस्थिताम् ।।

पीठ-पजा

इस प्रकार ध्यान करके सर्वतोभद्र मण्डल में मण्डूकादि परतत्त्वान्त पीठ-देवताओं को स्थापित करके—

"ॐ मं मण्डूकादि परतत्त्वान्त पीठ देवताभ्यो नमः ।"

इस मन्त्र से पीठ-देवताओं की पूजा करके, पूर्व आदि आठ दिशाओं में निम्नलिखित नवपीठ शक्तियों की पूजा करें—

ॐ विभूत्यै नमः ।

ॐ उन्मन्यै नमः ।

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३२ । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

ॐ कान्त्यै नमः ।

ॐ सृष्ट्यै नमः ।

ॐ कीर्त्यै नमः ।

ॐ सन्मत्यै नमः ।

ॐ पुष्ट्यै नमः ।

ॐ उत्कृष्टयै नमः ।

पीठ मध्ये

ॐ ऋद्धयै नमः ।

उक्त मन्त्रों द्वारा पीठ शक्तियों का पूजन करने के बाद स्वर्णादि से निर्मित यन्त्र में अग्न्युत्तारण पूर्वक—

''श्रीं कमलासनाय नमः ।''

इस मन्त्र से पुष्पाद्यासन देकर, पीठ के मध्य संस्थापित कर, उसमें प्राण-प्रतिष्ठा करके, मूलमन्त्र से मूर्ति की कल्पना करके, आवाहन आदि से पुष्पांजलि-दान पर्यन्त उपचारों से पूजा कर, देवी की आज्ञा ले, निम्नानुसार आवरण पूजा करें ।

लक्ष्मी के एकाक्षर बीजयन्त्र के पूजन-यन्त्र का स्वरूप नीचे प्रदर्शित है—

(श्री लक्ष्मी एकाक्षर बीजमन्त्र का पूजन यन्त्र)

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श्री लक्ष्मी एकाक्षर बीज मन्त्र प्रयोग । १३॥

आवरण पूजा

सर्वे प्रथम षट्कोण की केसरों में निम्नानुसार मन्त्र बोलते हुए पूजन करें——

अग्निकोण में——

ॐ श्रां हृदयाय नमः ।

नैऋत्य कोण में——

ॐ श्रीं शिरसे स्वाहा ।

वायव्य कोण में——

ॐ श्रूं शिखायै वषट् ।

ईशान कोण में——

ॐ श्रें कवचाय हुम् ।

पूज्य तथा पूजक के मध्य में——

ॐ श्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् ।

देवी के पश्चिम में——

ॐ श्रः अस्त्राय फट् ।

(इतिषडङ्ग पूजा)

इसके बाद पुष्पांजलि लेकर मूल मन्त्र का उच्चारण करके——

“ॐ अभीष्ट सिद्धि मे देहि शरणागत वत्सले ।

भक्त्या सम्प्रये तुभ्यं प्रथमावरणार्चनम् ॥”

इसे पढ़कर पुष्पांजलि दें, तथा

“पूजिता स्त्वपिता: सुक्तु ।”

यह कहें ।

(इति प्रथमावरणं)

द्वादश देवता पूजन

इसके बाद पूज्य तथा पूजन के अन्तराल में प्राचीदिशा मान कर तदनुसार चारों दिशाओं तथा उप दिशाओं में द्वादश देवताओं का निम्नानुसार पूजन करें——

पूर्वं में——

ॐ वासुदेवाय नमः ।

वासुदेव श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ।

(इति सर्वत्रः)

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१४ | कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

दक्षिण में—

ॐ संकर्षणाय नमः ।

संकर्षण श्री पादुकां पूजयामि।

पश्चिम में—

ॐ प्रद्युम्नाय नमः ।

प्रद्युम्न श्री पादुकां पूजयामि।

उत्तर में

ॐ अनिरुद्धाय नमः ।

अनिरुद्ध श्री पादुकां पूजयामि।

अग्नि कोण में

ॐ दमकाय नमः ।

दमक श्री पादुकां पूजयापि।

निर्ऋति कोण में

ॐ सलिलाय नमः ।

सलिल श्रीपादुकां पूजयामि।

वायव्य कोण में

ॐ गुरुलाय नमः ।

गुरुल श्री पादुकां पूजयामि।

ईशान्य में

ॐ कुरंटकाय नमः ।

कुरंटक श्री पादुकां पूजयामि।

देवी के दक्षिण में

ॐ शंखनिधये नमः ।

शंखनिधि श्री पादुको पूजयामि।

ॐ वसुधाये नमः ।

वसुधा श्री पादुकां पूजयामि।

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देवी के वाम भाग में

ॐ पद्मनिधये नमः ।

पद्मनिधि श्री पादुकां पूजयामि ।

ॐ वसुमत्ये नमः ।

वसुमति श्री पादुकां पूजयामि ।

उक्त विधि से द्वादश देवताओं की पूजा कर, पुष्पांजलि दे, मूल-मन्त्र का उच्चारण करके—

ॐ अभीष्टसिद्धौ मे देहि शरणागत वत्सले ।

भवत्या सम्पूये तुभ्यं द्वितीयावरणाच्च नमः ॥

इसे पढ़कर पुष्पांजलि दें तथा “पूजितास्तरपिता सन्तु ।” यह कहें ।

(इति द्वितीयावरण)

अष्ट देवी पूजन

इसके बाद पत्ताग्रों में पूर्वादि क्रम से निम्नलिखित मंत्रों से अष्ट देवियों का पूजन करें ।

ॐ बलाकयै नमः ।

बलाकी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ।

ॐ विमलायै नमः ।

विमला श्री पादुकां पूजयामि ।

ॐ कमलायै नमः ।

कमला श्री पादुकां पूजयामि ।

ॐ वनमालिकायै नमः ।

वनमालिका श्री पादुकां पूजयामि ।

ॐ विभीषिकायै नमः ।

विभीषिका श्री पादुकां पूजयामि ।

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ॐ भालिकायै नमः ।

भालिका श्री पादुकां पूजयामि।

ॐ शार्ङ्गायै नमः ।

शार्ङ्गारी श्री पादुकां पूजयामि।

ॐ वसुमालिकायै नमः ।

वसुमालिका श्री पादुकां पूजयामि।

उक्त विधि से अष्ट देवियों की पूजा कर पुष्पांजलि से, मूलमन्त्र का उच्चारण करके—

ॐ अभीष्ट सिद्धि देहि शरणागत वत्सले ।

भक्तया समर्पये तुभ्यं तृतीयावरणार्चनम् ॥

इसे पढ़कर पुष्पांजलि दें तथा—

"पूजितास्तपिता सन्तु ।"

यह कहें ।

(इति तृतीयावरण)

दशदिक्पाल-पूजन

इसके बाद भूपुर के भीतर पूर्णादि ऋम से निम्नलिखित मन्त्रों से दिशदिक्पालों का पूजन करें—

ॐ लं इन्द्राय नमः ।

ॐ रं अग्नये नमः ।

ॐ मं यमाय नमः ।

ॐ क्षं नितिॠतये नमः ।

ॐ वं वरुणाय नमः ।

ॐ यं वायवे नमः ।

ॐ कुं कुबेराय नमः ।

ॐ हं ईशानाय नमः ।

ईशान एवं पूर्व के मध्य में—

ॐ आं ब्रह्मणे नमः ।

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श्री लक्ष्मी एकाक्षर बीज मन्त्र प्रयोग । १७

नित्यंन्ति एवं पश्चिम के मध्य में

ॐ ह्रीं अनन्ताय नमः ।

अस्त्र पूजन

फिर भू पुर के बाहर निम्नलिखित मन्त्रों से दिक्पालों के अस्त्र का पूजन करें—

ॐ वं वज्राय नमः ।

ॐ शं शक्तये नमः ।

ॐ दं दण्डाय नमः ।

ॐ बं खड्गाय नमः ।

ॐ पां पाशाय नमः ।

ॐ आं अंकुशाय नमः ।

ॐ गं गदाये नमः ।

ॐ त्रि त्रिशूलाय नमः ।

ॐ पं पद्माय नमः ।

ॐ चं चक्राय नमः ।

उक्त विधि से आवरण पूजा करके, धूपदान से लेकर नारोशन-पर्यन्त पूजा करके मन्त्र-जप करें ।

पुरश्चरण :

इस मन्त्र का पुरश्चरण १२,००,००० (बारह लाख) जप है । फिर १२,००० (बारह हजार) कमल पुष्पों को मधु, घृत तथा शर्करा से युक्त करके हवन करें । हवन का दशांश तर्पण, तर्पण का दशांश मार्जन तथा मार्जन का दशांश ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए । इससे मन्त्र सिद्ध हो जाता है ।

प्रयोग साधन :

पूर्वोक्त विधि से मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर, प्रयोगों को सिद्ध करना चाहिए । प्रयोग-साधन विधियाँ निम्नलिखित हैं—

(१) जो साधक पूर्वोक्त विधि से बारह लाख मन्त्र-जप तथा घृत-मधु-शर्करा युक्त बारह लाख कमल-पुष्पों से हवन करके विधिपूर्वक देवी की उपासना करता है, उसको धन-धान्य की समृद्धि प्राप्त होती है तथा वह यश समन्वित लक्ष्मी प्राप्त करता है ।

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१५ । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

(२) जो साधक वक्ष-प्रामाण जल में खड़ा होकर इस मन्त्र का तीन लाख की संख्या में जप करता है, उसे वांछित धन प्राप्त होता है ।

(३) जो साधक अशोक की समिधायों से प्रदीप्त अग्नि में घृत-सिक्त चावलों से होम करता है, वह तीनों लोकों को वश में कर लेता है ।

(४) जो इन्द्रियजयि राजपुत्र मदार की समिधाओं से प्रदीप्त शुद्ध अग्नि में चावल से दस लाख होम करता है, वह चिरन्तन राज्य भी प्राप्त करता है ।

(५)"जो साधक खैर की समिधा से प्रदीप्त अग्नि में मधु, घृत तथा शर्करा से युक्त चावलों से होम करता है, वह राजा को शीघ्र वश में कर लेता है तथा उसको सम्पत्ति बढ़ती है ।

(६) जो साधक वेल की छाया में बैठकर, वेल-मिश्रित हविष्य का आहार करता हुआ, दो वर्ष तक वेल अथवा कमल से होम करता है, उसे भगवती महालक्ष्मी के दर्शन प्राप्त होते हैं ।

(७) जो साधक घृत युक्त खीर तथा घृत युक्त हविष्य से दस लाख आहुति देता है, वह लक्ष्मी का प्राप्त करता है ।

(८) जो साधक मधु, घृत तथा शर्करा सिक्त लालकमलों द्वारा आदरपूर्वंक होम करता है, उसे लक्ष्मी कभी नहीं छोड़ती तथा सम्पूर्ण संसार उसके वश में हो जाता है ।।

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चतुरक्षर लक्ष्मी बीज मन्त्र प्रयोग

'शारदा तिलक' में भगवती लक्ष्मी का चार अक्षरो वाला लक्ष्मी बीजा-

त्मक मन्त्र इस प्रकार है—

"ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं ।"

इसके न्यास तथा ध्यान आदि निम्नानुसार हैं—

करण्यास :

ॐ श्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः ।

ॐ श्रीं तर्जनीभ्यां नमः ।

ॐ श्रूं मध्यमाभ्यां नमः ।

ॐ श्रैं अनामिकाभ्यां नमः ।

ॐ श्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।

ॐ श्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।

(इति करन्यासः)

हृदयादिषडङ्गन्यासः

ॐ श्रां हृदयाय नमः ।

ॐ श्रीं शिरसे स्वाहा ।

ॐ श्रूं शिखायै वषट् ।

ॐ श्रैं कवचाय हुमः ।

ॐ श्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् ।

ॐ श्रः अस्त्राय फट् ।

(इति हृदयादि षडङ्गन्यासः)

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२० | कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

उक्त विधि से 'न्यास' करके निम्नानुसार ध्यान करें—

ध्यान :

ऊँ माणिक्य प्रतिमप्रभांहिमनिशमै स्तुङ्गैश्चतुर्भर्गजै

हस्ताभ्यामितरत्नकुम्भसरिलै रासिच्यमानांमुदा ।

हस्ताञ्जैर्वरदानमम्बुज युगा-

भीतिद्धानां हरे: ।

कांतां कांक्षितपारिजातलतिकां वन्दे सरोजासनाम् ॥

उक्त प्रकार से ध्यान करके, पूजा की अन्य सभी विधियाँ पूर्ववर्णित एकाक्षर मन्त्र की भांति ही सम्पन्न करनी चाहिए ।

पुरश्चरण तथा प्रयोग विधि :

इस मन्त्र का पुरश्चरण बारह लाख है । साधक को हविष्याशी रहकर तथा जितेन्द्रिय होकर बारह लाख मन्त्रों का जप करके, लाल फूले हुए कमलों से बारह हजार की संख्या में जप करना चाहिए ।

तत्पश्चात् मन्त्र प्रयोग से विधियाँ स्वयं मूर्तिमती होकर साधक को सेवा करती हैं ।

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दक्षाक्षर लक्ष्मी बीजात्मक मन्त्र-प्रयोग

'शारदा तिलक' में श्रीलक्ष्मी का दशाक्षर मन्त्र निम्नानुसार कहा गया है—

"ॐ नमः कमलवासिन्यै स्वाहा।"

इस मन्त्र के विनियोग न्यास आदि निम्नानुसार हैं—

विनियोग :

अस्य मन्त्रस्य दक्षकृषिः विराट्‌छन्दः श्रीलक्ष्मीर्देवता सर्वेष्ट-सिद्ध्ये जपे विनियोगः।

ऋष्यादि न्यास :

दक्ष ऋषये नमः शिरसि।

विराट् छन्दसे नमः मुखे।

श्रियै देवतायै नमः हृदि।

विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे।

(इति ऋष्यादिन्यास)

करण्यास :

ॐ देयै नमो अञ्जलिभ्यां नमः।

ॐ पद्मिन्यै नमस्तर्जनीभ्यां नमः।

ॐ विष्णुपत्न्यै नमो मध्यमाभ्यां नमः।

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२२ । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

ॐ वरदायै नमोऽनामिकाभ्यां नमः ।

ॐ कमलायै नमः कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।

(इति करन्यासः)

नेत्रहृदयादिपञ्चाङ्ग न्यासः

ॐ देयै नमो हृदयाय नमः ।

ॐ पद्मनाभ्यै नमः शिरसे स्वाहा ।

ॐ विष्णुपत्न्यै नमः शिखायै वषट् ।

ॐ वरदायै नमः कवचाय हुम् ।

ॐ कमलाये नमः अस्त्राय फट् ।

(इति नेत्रहीन पञ्चाङ्गन्यासः)

न्यासोपरान्त निम्नानुसार ध्यान करें—

ॐ आसीनां सरसीरुहे स्मितमुखीं तस्ताम्बुजेविभ्रतीं

दानं पद्मयुगाभये च वपुषा सौदामिनि सन्निभा ।

मुक्ताहारविराजमानपृथुलो चुञ्जद्‌गत्नोत्भासिनीं

पायाद्रः कमलाकटाक्षविभवै रानन्दयन्तीं हरिम् ॥

पोठ-पूजा :

उक्त प्रकार से ध्यान करके, पूर्वोक्त पीठ-शक्तियों के साथ पीठ-पूजा करके स्वर्ण आदि से निर्मित यन्त्र को आसन-मन्त्र द्वारा पीठ के मध्य में रखकर, पुनः ध्यान करके मूल-मन्त्र से मूर्ति की कल्पना कर, आवाहनादि से लेकर पुष्पाञ्जलि दान पर्यंत उपचारों से पूजा कर, देवी की आज्ञा लेकर निम्नलिखित क्रम से षोडशोपचार पूजा करनी चाहिए ।

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दशाक्षर लक्ष्मी बीजात्मक मन्त्र-प्रयोग। २३

लक्ष्मी दशाक्षर मन्त्र के यन्त्र का स्वरूप नीचे प्रदर्शित है—

(लक्ष्मी दशाक्षर मन्त्र का प्रयोग)

आवरण पूजा :

सर्वप्रथम पटकोण केसरों में निम्नानुसार मन्त्रों से पूजा करें—

अग्निकोण में—

ॐ द्रं द्रां नमो हृदयाय नमः।

निरृति कोण में—

ॐ पद्धुमन्ये नमः शिरसे स्वाहा।

वायव्य कोण में—

ॐ विष्णुपत्न्यै नमः शिखायै वषट्।

ईशान कोण में—

ॐ वरदायै नमः कवचाय हुम्।

देवी के पश्च्चिम में—

ॐ कमलरूपायै नमोऽस्त्राय फट्।

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२४ | कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

उक्त विधि से पञ्चाङ्ग-पूजा करें। फिर पुष्पाञ्जलि लेकर मूल-मन्त्र का उच्चारण करते हुए—

ॐ अभीष्टसिद्धौ मे देहि शरणागत वत्सले।

भक्त्या समर्पये तुभ्यं प्रथमावरणार्चनम्‌ ॥

कहते हुए, पुष्पाञ्जलि देकर विशेष अर्घ से बिन्दु डालकर—‘पूजितास्तरपिता सन्तु’ यह कहें ।

(इति प्रथमावरणं)

अष्टदेवी पूजा :

इसके पाद पूज्य तथा पूजक के अन्तराल को पूर्व दिशा मानकर, तदनुसार अन्य दिशाओं की कल्पना करके, आठों दलों में पूर्व दिशा के क्रम से—

ॐ बलाक्यै नमः ।

ॐ विमलायै नमः ।

ॐ कमलायै नमः ।

ॐ वनमालिकायै नमः ।

ॐ विभोषिकायै नमः ।

ॐ मालिकायै नमः ।

ॐ शाङ्कर्यै नमः ।

ॐ वसुमालिकायै नमः ।

उक्त मन्त्रों द्वारा अष्टदेवियों की पूजा करें पूर्ववत् पुष्पाञ्जलि लेकर, मूल-मन्त्र का उच्चारण करते हुए—

ॐ अभीष्टसिद्धौ मे देहि शरणागतवत्सले ।

भक्त्या समर्पये तुभ्यं द्वितीयावरणार्चनम्‌ ॥

कहते हुए पुष्पाञ्जलि देकर विशेष अर्घ से बिन्दु डालकर—‘पूजितास्तरपिता सन्तु ।’ यह कहें ।

(इति द्वितीयावरणं)

इसके बाद भूपर में तूर्यादि क्रम से इन्द्र आदि देवताओं तथा वज्र आदि उनके अस्त्रों की पूर्ववत् पूजा करें 'तथा आवरण-पूजा सम्पन्न कर धूपदान से शीर्षराजन तक पूजा करके जप करें ।

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दशाक्षर लक्ष्मी बीजात्मक मन्त्र प्रयोग | २५

पुरश्चरण :

इसका पुरश्चरण १०,०००,००० (दस लाख) जप है। जप का दशांश होम, होम का दशांश तर्पण, तर्पण का दशांश मार्जन तथा मार्जन का दशांश ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए। ऐसा करने पर मन्त्र सिद्ध हो जाता है। मन्त्र सिद्ध हो जाने के बाद प्रयोगों को सिद्ध करना चाहिए।

प्रयोग विधि :

(१) मन्त्रविद् साधक जितेन्द्रिय होकर दस लाख की संख्या में मन्त्र का जप करें। जप का दशांश मधु, घी तथा शर्करा सिक्त लाल कमलों से होम करें तो समस्त कामनायें पूर्ण होती हैं तथा अखण्ड लक्ष्मी का लाभ होता है।

(२) जो साधक समुद्र में गिरने वाली नदी के अकण्ठ-जल में खड़े होकर मन्त्र-जप करके देवी की पूजा करता है, वह समस्त सम्पतियों का धाम बन जाता है।

(३) उत्तराषाढा, उत्तराभाद्रपद तथा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में माला तथा चन्दन आदि से देवी की पूजा करके तीन लाख की संख्या में मन्त्र-जप करने वाला साक्षात् कुवर बन जाता है। इसके पश्चात् वन्द्यावर्त पुष्पों से एक हजार होम करना चाहिए। पूर्णमासी में मधु-घृत तथा शर्करा युक्त बेलों से होम करना चाहिए। पञ्चमी को बड़े कमल पुष्पों से तथा शुक्रवार को सुगन्धित अन्य बड़े पुष्पों से हवन करना चाहिए। इसके बाद पूर्णमासी में घृत, मधु तथा शर्करायुक्त बेल के फलों से होम करना चाहिए। इस प्रकार जो साधक एक वर्ष तक साधना करता है, वह समस्त सम्पत्तियों का स्वामी बन जाता है।

टिप्पणी - इस मन्त्र के अन्य न्यास तथा पूजा विधि आदि एकाक्षर-मन्त्र के अनुसार समझने चाहिए।

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५ सप्तविंशत्यक्षर महालक्ष्मी मन्त्र प्रयोग

'शारदातिलक' में भगवती महालक्ष्मी का सप्तविंशत्यक्षर (सत्ताईस अक्षरों वाला) मन्त्र इस प्रकार कहा गया है—

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।

इसका विधान निम्नानुसार है—

विनियोग :

अस्य मन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषि: गायत्रीच्छन्द: श्रीमहालक्ष्मी देवता श्रीं बीजं नम: शक्तिः सर्वेष्ट सिद्धये जपे विनियोग:।

ऋष्यादि न्यास :

ॐ ब्रह्मा ऋषये नमः शिरसि।

ॐ गायत्रीच्छन्दसे नमः मुखे।

ॐ महालक्ष्मी देवतायै नमः हृदि।

ॐ श्रीं बीजाय नमः गुह्ये।

ॐ नमः शक्तये पादयो:।

ॐ विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे।

(इति ऋष्यादि न्यास:)

करण्यास :

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले श्रीं ह्रीं श्रीं अंगुष्ठाभ्यां नमः।

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सप्तविंशत्यक्षर महालक्ष्मी मन्त्र प्रयोग | २७

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमलालये श्रीं ह्रीं श्रीं तर्जनीभ्यां नमः ।

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं प्रसाद श्रीं ह्रीं श्रीं मध्यमाभ्यां नमः ।

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं प्रसाद श्रीं ह्रीं श्रीं अनामिकाभ्यां नमः ।

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्यै श्रीं ह्रीं श्रीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।

नेत्रहीन पचाङ्गन्यास :

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले श्रीं ह्रीं श्रीं हृदयाय नमः ।

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमलालये श्रीं ह्रीं श्रीं शिरसे स्वाहा ।

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं प्रसाद श्रीं ह्रीं श्रीं शिखायै वषट् ।

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं प्रसाद श्रीं ह्रीं श्रीं कवचाय हुम् ।

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्यै श्रीं ह्रीं श्रीं अस्त्राय फट् ।

(इति नेत्रहीनपचाङ्गन्यास)

उक्त विधि से न्यास करने के बाद ध्यान करें-

ध्यान :

ॐ सिन्दूरारुणकान्तिमञ्जवरसत सौन्दर्यवारान्निधिं

कोटीरांगदहार कुण्डलकटी सूत्रादिभिर्भूषिताम् ।

हस्ताब्जैर्वल्नजैः सुपत्रमणयुगलादर्शो वहन्तीं परामावीतातां

परिचारिकाभिरनिशं ध्यायेतित्रियां शार्ङ्गिणीम् ।

पोठ-पूजा :

उक्त विधि से ध्यान कर, पूर्ववत् पोठ-पूजा करके स्वर्णादि निर्मित यन्त्र से को अग्न्युत्तारण पूर्वक आसन-मन्त्र से आसन देकर, पोठ के मध्य में रखकर, पुनः ध्यान करके मूलमन्त्र द्वारा मूर्ति की कल्पना करके, आवाहन से लेकर पुष्पाञ्जलि दान तक सभी उपचारों से पूजा करके, देवी से आज्ञा लेकर, निम्नानुसार आवरण पूजा करें ।

सप्तविंशत्यक्षर लक्ष्मी मन्त्र के पूजन यन्त्र का स्वरूप अगले पृष्ठ पर प्रदर्शित है —

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२५। कमला(लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

(सप्तविंशत्यक्षर लक्ष्मी का यन्त्र)

आवरण-पूजा :

षट्कोण केसरो में आग्नेय कोण से आरम्भ करते हुए निम्नानुसार मन्त्रोच्चारण करें—

अग्निकोणे—

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले श्रीं ह्रीं श्रीं हृदयाय नमः।

निर्ऋति कोणे—

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमलालयै श्रीं ह्रीं श्रीं शिरसे स्वाहा।

वायव्ये—

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं प्रसोद श्रीं ह्रीं श्रीं शिखायै वषट्।

ईशान्ये—

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं प्रसोद श्रीं ह्रीं श्रीं कवचाय हुम्।

देवी के पश्चिम में—

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्यै श्रीं ह्रीं श्रीं अस्त्राय फट्।

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सत्त्वविशत्यक्षर महालक्ष्मी मन्त्र प्रयोग | २५

उक्त विधि से पञ्चाङ्गों की पूजा करने के बाद मूल मन्त्र का उच्चारण करके-

ॐ अभीष्टसिद्धि मे देहि शरणागतवत्सले ।

भक्त्यासमर्पये तुभ्यं प्रथमावरणार्चनमू ॥

यह पढ़कर तथा पुष्पाञ्जलि देकर-

"पूजितास्तरपिता: सन्तु"

यह कहें ।

(इति प्रथमावरणं)

अष्टदेव पूजा :

इसके बाद पूज्य तथा पूजक के बीच में पूर्व-दिशा प्रकल्पित करके पूर्वादि-क्रम से यन्त्र के आठों दलों में निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करते हुए पूजन करें-

ॐ श्रीधराय नमः ।

श्रीधर श्रीपादुकां पूजियामि तर्पयामि नमः ।

(इति सर्वत्र)

ॐ हृषीकेशाय नमः ।

हृषीकेश श्रीपादुकां……।

ॐ वैकुण्ठाय नमः ।

वैकुण्ठ श्रीपादुकां……।

ॐ विश्वरूपाय नमः ।

विश्वरूप श्रीपादुकां……।

ॐ वासुदेवाय नमः ।

वासुदेव श्री पादुकां……।

ॐ सङ्घर्षणाय नमः ।

सङ्घर्षणाय श्रीपादुकां……।

ॐ प्रद्युम्नाय नमः ।

प्रद्युम्न श्रीपादुकां……।

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२० । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

ॐ अनिरुद्धाय नमः ।

अनिरुद्ध श्रीपादुकां॰......।

इस प्रकार आठों की पूजाकर पूर्ववत् पुष्पांजलि प्रदान करें ।

(इति द्वितीयवरणं)

अष्टदेवो पूजन :

फिर अष्टदलों के मध्य पूर्वादि क्रम से निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करते हुए अष्ट देवियों का पूजन करें—

ॐ भारत्यै नमः ।

भारती श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ।

(इति सर्वत्र)

ॐ पार्वत्यै नमः ।

पार्वती श्रीपादुकां॰......।

ॐ चान्द्र्यै नमः ।

चान्द्री श्रीपादुकां॰......।

ॐ शच्यै नमः ।

शची श्रीपादुकां॰......।

ॐ दमकाय नमः ।

दमका श्रीपादुकां॰......।

ॐ सलिलाय नमः ।

सलिला श्रीपादुकां॰......।

ॐ गुगुलुवे नमः ।

गुगुलु श्रीपादुकां॰......।

ॐ कुरुण्टकाय नमः ।

कुरुणटक श्री पादुकां॰......।

फिर, पूर्ववत् पूजा करके पुष्पांजलि प्रदान करें ।

(इति तृतीयावरणं)

बाण पूजन :

इसके बाद अष्टदलाग्र में निम्नलिखित मन्त्रों से वाणों का पूजन करें—

ॐ अनुरागाय महालक्ष्मी बाणाय नमः ।

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सप्तविंशत्यक्षर महालक्ष्मी मन्त्र प्रयोग | ३१

ॐ संवादाय महालक्ष्मी बाणाय नमः |

ॐ विजयाय महालक्ष्मी बाणाय नमः |

ॐ दललभाय महालक्ष्मी बाणाय नमः |

ॐ मदाय महालक्ष्मी बाणाय नमः |

ॐ हर्षाय महालक्ष्मी बाणाय नमः |

ॐ बलाय महालक्ष्मी बाणाय नमः |

ॐ तेजसे महालक्ष्मी बाणाय नमः |

फिर, पूर्ववत् पूजा करके पुष्पांजलि प्रदान करें |

(इति चतुर्थावरण)

इसके पश्चात् भूपूर में पूर्वादि क्रम से इन्द्र आदि देवताओं तथा वज्र आदि उनके आयुधों का पूजन करें | इस प्रकार आवरण पूजा करके धूपदान से लेकर नैराजन तक पूजा करके जप करना चाहिए |

पुरश्चरण :

इस मन्त्र का पुरश्चरण एक लाख जप है | जप का दशांश होम, होम का दशांश तर्पण, तर्पण का दशांश मार्जन तथा मार्जन का दशांश ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए | ऐसा करने पर मन्त्र सिद्ध हो जाता है | मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर योगों को सिद्ध करना चाहिए |

जो लोग उक्त विधि से देवी की उपासना करते हैं, उनके घर में लक्ष्मी सदैव निवास करती है |

प्रयोग विधि :

(१) मधु, घृत तथा शर्करायुक्त बेल के फलों से दशांश होम तथा पूर्ववत् मन्त्र-जप करने वाले साधक के घर में लक्ष्मी का स्थायी-वास हो जाता है |

(२) यदि कोई राजा चन्दन के जल में एक लाख कमलों को सिक्त करके हवन करे तो वह बिना युद्ध किए ही शत्रु पर विजय प्राप्त कर लेता है |

(३) दूर्वा, सहदेई, लक्ष्मीबल्लो, विष्णुक्रान्ता, मधुत्रता, मुशली, इन्द्रवारुणी, नागरमोथा, लज्जालु, पीतचन्दन, कपूर, श्वेत चन्दन, बेल, अंकोल, गोरोचन, नागकेसर तथा कुठ को हल्दी के रस में पीस कर १०५ वार मन्त्र का जप करके तिलक लगाने से मन्त्रीगण साधक के वशीभूत हो जाते हैं तथा रात-दिन उसका हित-साधन करने के लिए तत्पर बने रहते हैं |

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३२ । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

(४) अधिक धन की इच्छा रखने वाले साधक को सत्याचरण करते हुए मन्त्र-जप तथा श्री सूक्त का भी जप करना चाहिए । पूर्व की ओर मुख करके भोजन करे तथा पूर्व की ओर मुख करके बैठे एवं सत्य बोले । शुद्ध तथा जितेन्द्रिय होकर गन्ध-पुष्पादि से नित्य पूजा करे । शय्या पर नित्य किसी युवती स्त्री के साथ शयन करे, अकेला न सोये । पानी में नग्न होकर न उतरे । तैल-मर्दन करके भोजन न करे । मुंह पर हल्दी का लेप न करें । कहीं अपवित्रावस्था में शयन न करे । व्यर्थ ही भूमि को न कुरेे । वेल, गूमा अथवा कमल को सिर पर धारण न करे तथा नमक अथवा तैल को अकेले न खाये । विन्दित अन्न न खाये । मलिन न रहे । गूमा, वेल तथा कमल को कभी पैरों से न लांघे । सहदेई, इन्द्रवारुणी, लक्ष्मीलता, विष्णुक्रान्ता, घी, क्वार, कमल तथा प्रवाल को सदैव मस्तक पर धारण करे ।

इस प्रकार के आचारों से युक्त तथा नित्य विष्णुभक्त एवं व्रत में निष्ठावान् साधक देव-दुर्लंभ महती समृद्धि को प्राप्त करता है ।

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द्वादशाक्षर महालक्ष्मी मन्त्र प्रयोग

'शारदा तिलक' में भगवती महालक्ष्मी का द्वादशाक्षर मन्त्र इस प्रकार बताया गया है—

"ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौं जगत्प्रसूत्यै नमः।"

इस मन्त्र के विनियोग, न्यास, ध्यान तथा पूजा-विधि आदि निम्नानुसार हैं—

विनियोग :

अस्य महामन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः गायत्रीच्छन्दः श्रीजगन्माता महालक्ष्मीर्देवता श्रीं बीजं सर्वेष्ट सिद्धये जपे विनियोगः।

ऋष्यादि न्यास :

ॐ ब्रह्मा ऋषये नमः शिरसि।

गायत्री छन्दसे नमः मुखे।

श्री जगन्माता महालक्ष्यै नमः हृदि।

श्रीं बीजाय नमः गुह्ये।

विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे।

(इति ऋष्यादि न्यासः)

करण्यास :

मूलमन्त्र से हाथ धोने के बाद—

ॐ ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।

ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः।

ॐ श्रीं मध्यमाभ्यां नमः।

ॐ क्लीं अनामिकाभ्यां नमः।

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३४। कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

ॐ सौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः।

ॐ जगत्प्रसूत्ये करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।

(इति करऽन्यास)

इसके बाद 'ऐं ह्रीं श्रों क्लीं सौं जगत्प्रसूत्ये नमः' से मस्तकादि चरणान्त व्यापक न्यास करना चाहिए।

फिर, निम्नानुसार मन्त्र वर्णऽन्यास कर—

मन्त्रवर्ण-न्यास :

ॐ ऐं नमः मूर्ध्नि।

ॐ ह्रीं नमः मुखे।

ॐ श्रीं नमः हृदये।

ॐ क्लीं नमः गुह्ये।

ॐ सौं नमः पादयोः।

इस प्रकार न्यास करके हृदय पर हाथ रखकर 'सप्तवर्गाऽऽन्यास' निम्न क्रमानुसार करें—

सप्तवर्ण न्यास :

ॐ जं नमः त्वचि।

ॐ ग्त् नमः रक्ते।

ॐ प्रं नमः मांसे।

ॐ सूं नमः मेदसि।

ॐ त्यं नमः अस्थि।

ॐ नं नमः मज्जायाम्।

ॐ मं नमः शुक्रे।

(इति मन्त्रवर्ण न्यासः)

करण्यास :

ॐ ऐं ज्ञानाय अंगुष्ठाभ्यां नमः।

ॐ ह्रीं ऐश्वर्याय तर्जनीभ्यां नमः।

ॐ श्रीं भक्तये मध्यमाभ्यां नमः।

ॐ क्लीं बलाय अनामिकाभ्यां नमः।

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द्वादशाक्षर लक्ष्मी मन्त्र प्रयोग | ३४

ॐ सौं वीर्याय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।

ॐ जगत्प्रसूत्यै नमस्तेजसे करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।

(इति करन्यासः)

हृदयादि षडङ्गन्यास :

ॐ ऐं ज्ञानाय हृदयाय नमः ।

ॐ हीं ऐश्वर्याय शिरसे स्वाहा ।

ॐ श्रीं शक्तये शिखायै वषट् ।

ॐ क्लीं बलाय कवचाय हुं ।

ॐ सौं वीर्याय नेत्रत्रयाय वौषट् ।

ॐ जगत्प्रसूत्यै नमस्तेजसे अस्त्राय फट् ।

(इति हृदयादि षडङ्गन्यासः)

उक्त प्रकार से 'न्यास' कर करके निम्नानुसार उद्यान का स्मरण करते हुए उसमें रत्नसिंहासन पर स्थित भगवती महालक्ष्मी का ध्यान करें ।

उद्यान-स्मरण :

चम्पकाशोक पुन्नागपाटलैरुपशोभितम् ।

लवङ्गमालती बिल्लदेवदारुनमेरुभिः ॥ १॥

मन्दारपारिजाताघे: कल्पवृक्षै: सुपुष्पितैः ।

चन्दने: कर्णिकारेश्च मातुलिङ्गैश्च मञ्जुलैः ॥ २॥

दाडिमीम्ल कुचैडोलै: पूगै: कुरव कैरपि ।

कदलीकुन्दमदारनालिकेलैरलंकृतै: ॥ ३॥

अन्यै: सुगन्धिपुष्पैश्च वृक्षसंघैश्च मण्डितम् ।

मालती मल्लिकाजातीकेतकीशत पत्रकै: ॥ ४॥

पारन्तीतुलसीनन्यान्वार्त्तैर्दमनकैरपि ।

सर्वर्त्तु कुसुमोपेतैर्नमर्दै रुपशोभितम् ॥ ५॥

मन्दभासुत संश्लिष्ट कुसुमावोदिदिग् मुखम् ।

तस्य मध्ये सदोत्फुल्लै: कुमुदोत्पल पङ्कजै: ॥ ६॥

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सौगन्धिं केशचकल्लाररैन्वे: कुवलयैरपि ।

हंस सारसकारण्डैभ्र मरै श्चक्रनामभि: ॥७॥

अन्यै: कलकलारावैविहंगै रुपशोभितम् ।

महासरसरत्नमध्ये पुलिनेऽतिमनोहरे ॥ ८॥

परित: पारिजाताच्यं मण्डपं मणिकुट्टिभम् ।

उद्यदादित्यसङ्काशं भास्वरं शशिशीतलम् ॥९॥

चतुद्वार समायुक्तं हेमप्राकार शोभितम् ।

रत्नोपक्लृप्त संशोभि कपाटाष्टक संयुक्तम् ॥१०॥

नवरत्न समाक्लृष्टं तुङ्गगोपुरतोरणम् ।

हेमदण्डसमालम्बद्धराजदलि परिष्कृतम् ॥११॥

नवरत्नसमावद्रस्तम्भराजि विराजितम् ।

सहस्रदीप संयुक्त दीपपण्डड विराजितम् ॥१२॥

तप्तहाटक संक्लृष्टवातायन मनोहरम् ।

नानावर्णसुकोद्बदधसुर्ण शतकोटिभि: ॥१३॥

किङ्किणीमल्लिकायुक्तपता काभिरलंकृतम् ।

जातरूपमयै रत्नविचित्रै रतिविस्तृतै: ॥१४॥

माणिक्य रत्नवैडूर्य स्वर्णमालावलीयुतै: ।

अन्तरान्तरसम्बद्ध रत्नैर्हि ष्ट मञ्जोहरै: ॥१५॥

विचित्रैश्शिवत्रवर्णैंशच वितानैरुपशोभितम् ।

सर्वरत्न समायुक्तं हेमकुट्टिममुज्ज्वलम् ॥१६॥

केतकी मालती जाती चम्पकोत्पलकेसरै: ।

मल्लिका तुलसी जाती नत्यानावर्तकदम्बकै: ॥१७॥

एतैरनैयैश्च कुसुमैर लंकृत महीतलम् ।

अम्बुकाश्मीर करतूरो मृगनाभितमालकै: ॥१८॥

चन्दनागुरुकर्पृ रैरामोदित दिगन्तरम् ।

एवं सज्जिचन्त्यमनसा मण्डपं सुमनोहरम् ॥१९॥

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द्वादशाक्षर महालक्ष्मी मन्त्र प्रयोग | ३७

तन्मध्ये भावयेन्त्री पारिजातं मनोहरम् ।

तस्याधस्तात्स्तात्सपरिन्मन्री रत्नासहासनं शुभम् ॥२०॥

तस्मिन्स्टिच्चिततये देवी महालक्ष्मीं मनोरमाम् ।

उक्त विधि से उद्यान का स्मरण करने के बाद निम्नानुसार देवी का ध्यान करें—

ध्यान :

बालार्कद्युतिमिन्दु खण्डविलसत्कोटीरहारोज्ज्वलां

रत्नाकल्प विभूषितां कुचनतां शालेः करैर्मञ्जरीम् ।

पद्मं कौस्तुभरत्नमप्यविरतं सम्भ्रभ्रतीं सस्मितां

फुल्लाम्भोज विलोचनभयुतां ध्यायेत्परां देवीताम् ॥१॥

सिङ्गन्मङ्गजी रसंशोभिपदाम्भोज विराजिताम् ।

नवरत्नगणाकीर्णकाञ्चीदाम विभूषिताम् ॥२॥

मुक्तामाणिक्य वैदूर्य समबद्धोदार बन्धनाम् ।

विश्राजमानां मध्येन बलित्त्रिय शोभिताम् ॥३॥

जाह्ववी सरिदावर्तं शोभिनाभि विभूषिताम् ।

पाटीरयड्कू कर्पूर कुंकुमालंकृतस्तनीम् ॥४॥

वारिवाहविनिर्मुक्त मुक्ता दामगरीयसीम् ।

वहन्तीनुत्तरासङ्ग दुकूल परिकल्पिताम् ॥५॥

तप्तकाञ्चन सन्नद्धवैदूर्याझद भूषणाम् ।

पद्मराग सुरद्रुर्ण कड़णाट्यकराम्बुजाम् ॥६॥

माणिक्य शकलाबद्धमुद्रिकाभिरलंकृताम् ।

तप्तहाटक संक्लृप्त मालग्रे वेय शोभिताम् ॥७॥

विचित्र विविधाकल्प कम्वुसंकाशक कन्धराम् ।

उद्यदिनकराकार मणिताटङ्क मणिडताम् ॥८॥

रत्नाढूतलस्वर्णकर्णपूरोप शोभिताम् ।

जयाविदुम लावण्य ललिताधर पल्लवाम् ॥९॥

दाडिमीफल बीजाभ दन्तपंक्ति विभूषिताम् ।

कलङ्ककाश्ये निर्मुक्त शरच्चन्द्रनिभाननाम् ॥१०॥

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३५ । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

पुण्डरीकदलाकार नयनत्रय सुन्दरीम् ।

भ्रूलताजितकन्दर्प कर कामुंक विभ्रमाम् ॥११॥

विलसत्किलपुष्पश्री विजयोद्यतनासिकाम् ।

ललाटकान्ति विभव विजितार्कसुधाकराम् ॥१२॥

सान्द्र सौरभ सम्पन्न कस्तूरीतिलकांकिताम् ।

मत्तालिमालाविलसदलकाढ्यमुखामुजाम् ॥१३॥

पारिजात प्रसूनश्रीवाहितम्मल्लबन्धनात् ।

अनघ्यिरत्न घटितमुकुटाढ्यत मस्तकाम् ॥१४॥

सर्वेलावण्य वरसत भवनं विश्रमश्रिय: ।

तेजसां जन्मभूमि तां महालक्ष्मीं मनोहराम् ॥१५॥

उक्त विधि से ध्यान करके सर्वतोभद्रमण्डल में पूर्ववत पीठ-पूजा करके स्वर्ण आदि से निर्मित यन्त्र को अनुत्तरारण पूषक आसन-मन्त्र से आसन दे, पीठ के मध्य स्थापित कर, पुनः ध्यान कर, मूल-मन्त्र से मूर्ति की कल्पना करके, देवी से आज्ञा लेकर आवरण-पूजा आरम्भ करनी चाहिए ।

द्वादशाक्षरर महालक्ष्मी मन्त्र के यन्त्र का स्वरूप नीचे प्रदर्शित है—

(द्वादशाक्षरर महालक्ष्मी मन्त्र यन्त्र)

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आवरण पूजा :

निम्न कमानुसार आवरण-पूजा करनी चाहिए।

देवी के दक्षिण भाग में—

ॐ शङ्करनन्दनाथ नम।

शङ्करनन्दन श्रीपादुकां पूज्यामि तर्पयामि नमः।

देवी के वाम भाग में—

ॐ पुष्पधन्वने नमः।

पुष्पधन्व श्रीपादुकां पूज्यामि तर्पयामि नमः।

इसके बाद पुष्पांजलि दे, मूल मन्त्र का उच्चारण करके,

"ॐ अभीष्ट सिद्धि मे देहि शरणागत वत्सले।

भक्त्या सम्पूये तुभ्यं प्रथमावरणार्चनम्॥

कहें कर पुष्पांजलि दें।

"पूजितास्त्वपिता: सन्तु ।"

यह कहें

(इति प्रथमावरणं)

षडङ्ग पूजा :

इसके बाद पटकोण केसरों में निम्नलिखित मन्त्रों से अङ्गदेवताओं को षडङ्ग पूजा करें—

अग्निकोण में—

ऐं ज्ञानाय हृदयाय नमः।

हृदय श्रीपादुकां पूज्यामि तर्पयामि नमः।

(एवं सर्वत्रः)

निरॠतिकोण में—

ॐ ह्रीं ऐश्वर्याय शिरसे स्वाहा।

शिर: श्रीपादुकां......

वायव्य कोण में—

ॐ श्रीं शक्त्यै शिखायै वषट्।

शिखा श्रीपादुकां॥

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४० | कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

ईशान कोण में—

ॐ क्लीं बलाय कवचाय हूँ।

कवच श्रीपादुकां॰॥१॥

पूज्य पूजक के मध्य में—

ॐ सौवीर्याय नेत्रत्रयाय वौषट्।

नेत्रत्रय श्रीपादुकां॰॥१॥

देवी के पशिचम भाग में—

ॐ जगत्प्रसूत्यै नमस्तेजसे अस्त्राय फट्।

अस्त्र श्री पादुकां॰॥१॥

पूर्वोक्त विधि से पड्देवों की पूजा कर पुष्पाञ्जलि प्रदान करें---

(इति द्वितीयावरणं)

इसके बाद अष्टदलों में पूज्य तथा पूजक के अन्तराल को पूर्व दिशा मान-

कर एवं तदनुसार अन्य दिशाओं की कल्पना करके पूर्वादि क्रम से आठ शक्तियों

की निम्नलिखित मन्त्रों से पूजा करें।

अष्टशक्ति पूजा :

ॐ उमाये नमः।

उमा श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः।

(एवं सर्वत्रः)

ॐ श्रियै नमः।

श्री श्रीपादुकां॰॥१

ॐ सरस्वत्यै नमः।

सरस्वती श्रीपादुकां॰॥१

ॐ दुर्गायै नमः।

दुर्गा श्रीपादुकां॰॥१

ॐ धरण्यै नमः।

धरणी श्रीपादुकां॰॥१

ॐ गायत्र्ये नमः।

गायत्री श्रीपादुकां॰॥१

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द्वादशाक्षर महालक्ष्मी मन्त्र प्रयोग । ४१

ॐ देव्यै नमः ।

देवी श्रीपादुकां॰॰।

ॐ उपाये नमः ।

उषा श्रीपादुकां॰॰।

फिर, पूर्वोक्त प्रकार से इन आठ शक्तियों की पूजा कर पुष्पांजलि प्रदान करें ।

(इति तृतीयावरणं)

इसके पश्चात् देवी के दक्षिण में—

ॐ जह॑ सुतायै नमः ।

जह॑सुता श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ।

(एवं सर्वत्रः)

देवी के बाईं ओर—

ॐ सूर्य सुतायै नमः ।

सूर्य सुता श्रीपादुकां॰॰।

फिर, देवी के दक्षिण में पुनः—

ॐ शंख निधये नमः ।

शंखनिधि श्री॰पादुकां॰॰।

फिर, देवी के बाईं ओर पुनः—

ॐ पद्मनिधये नमः ।

पद्मनिधि श्रीपादुकां॰॰।

इसके बाद पश्चिम में छत्रधारी वरुण की पूजा करके पुष्पांजलि प्रदान करें—

(इति चतुर्थावरणं)

नवग्रह पूजा :

इसके बाद अष्टदलाग्रों में पूर्वादि क्रम से—

ॐ सूर्याय नमः ।

सूर्यं श्रीपादुकां॰॰।

ॐ सोमाय नमः ।

सोम श्रीपादुकां॰॰।

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४२ । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

ॐ भौमाय नमः ।

भौम श्रीपादुकां…।

ॐ बुधाय नमः ।

बुध श्रीपादुकां…।

ॐ बृहस्पतये नमः ।

बृहस्पतित श्रीपादुकां…।

ॐ शुक्राय नमः ।

शुक्र श्रीपादुकां…।

ॐ शनैश्चराय नमः ।

शनैश्चर श्रीपादुकां…।

ॐ राहवे केतवे नमः ।

राहुकेतु श्रीपादुकां…।

उक्त मन्त्रों से नवग्रहों की पूजा कर पूर्वोक्त विधि से पुष्पाञ्जलि प्रदान करें ।

(इति पञ्चमावरणं)

अष्ट दिग्गज पूजा :

इसके बाद भूपुर के भीतर—

ॐ ऐरावताय नमः ।

ऐरावत श्रीपादुकां…।

ॐ पुण्डरीकाय नमः ।

पुण्डरीक श्रीपादुकां…।

ॐ वामनाय नमः ।

वामन श्रीपादुकां…।

ॐ कुमुदाय नमः ।

कुमुद श्रीपादुकां…।

ॐ अञ्जनाय नमः ।

अञ्जन श्रीपादुकां…।

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द्वादशाक्षर महालक्ष्मी मन्त्र प्रयोग । ४३

ॐ पुष्पदत्ताय नमः ।

पुष्पदन्त श्रीपादुकां । ।

ॐ सर्वभौमाय नमः ।

सर्वभौम श्रीपादुकां । ।

ॐ सुप्रतीकाय नमः ।

सुप्रतीक श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ।

उक्त मन्त्रों द्वारा आठ दिग्गजों की पूर्वोक्त विधि से पूजा कर, पुष्पांजलि प्रदान करें ।

(इति पष्ठावरण)

इसके बाद भूपुर में इन्द्र आदि देवताओं तथा उनके वज्रादि आयुधों की पूजा करनी चाहिए ।

पुरश्चरण :

उक्त विधि से आवरण-पूजा कर घूपादि दान से नीराजनान्त तक पूजा करके, पुनः ध्यान करके जप करें ।

इसका पुरश्चरण वारह लाख जप है । जप का दशांश घृत से होम करें । फिर वेल तथा कमल—प्रत्येक से दस-दस हजार होम करें । इसके बाद शुद्ध सुगन्धित तिल सहित जल से बीस हजार की संख्या में तर्पण तथा अनमोक्त विधि से सुगन्धित एवं सुन्दर फूलों तथा गन्ध, पुष्प, पाद्य आदि से देवी का आदरपूर्वक पूजन करें । 'सामान्य लक्ष्मी-पूजा विधि' प्रकरण में वर्णित पद्धति के अनुसार यह पूजा की जा सकती है ।

जब मन्त्र सिद्ध हो जाय तब प्रयोग सिद्धि करनी चाहिए ।

प्रयोग विधि :

(१) दीर्घायुुष्य-लाभ हेतु प्रदीप्त अग्नि में १००५ वार घृतसिक्त दूर्वा द्वारा दस रात्रि तक होम करना चाहिए ।

(२) घृतयुक्त गिलोय से सात दिनों तक १००५ बार होम करने वाला १०० वर्षों तक जीवित रहता है ।

(३) रविवार से प्रारम्भ कर दस रात्रि तक घृतसिक्त तिलों से होम करने वाला दीर्घायु प्राप्त करता है ।

(४) घृतसिक्त मदार की समिधाओं से होम करने वाला आरोग्य प्राप्त करता है ।

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(५) सूर्योदय के समय आकण्ठ जल में खड़े होकर दोनों हाथों को ऊपर उठाकर, देवी का ध्यान करके १००० आहुतियों से होम करने वाला आरोग्य प्राप्त करता है तथा उसकी कामनाएँ भी पूर्ण होती हैं ।

(६) चावलों से नित्य होम करने वाले को शीघ्र ही महती लक्ष्मी प्राप्त होती है ।

(७) वृत्तयुक्त लक्ष्मीवली (मेढ़ासिंगी) तथा नन्ध्यावर्त के पुष्पों एवं पीली सरसों से होम करने वाले साधक को अत्यधिक समृद्धि प्राप्त होती है, साथ ही वह सब प्राणियों में सम्मानित होता है ।

(८) खोर का आहार करने वाला, जितेन्द्रिय मन्त्रविद् यदि कालीमिर्च, जीरा तथा नारियल के चूर्ण युक्त गुड़ सहित वृत्त में पके हुए पुओं से १०५ आहुतियों द्वारा नित्य होम करें तो वह ४५ दिन में ही कुबेर के समान धनी हो जाता है ।

(९) गुड़ मिश्रित हविष्य से होम करने वाला साधक धनवान होता है ।

(१०) जपपुष्पों से १००५ बार होम करके उसकी भस्म को नागवल्ली (पान) से समन्वित कर, मत्त्य जप करके तिलक लगाने वाला साधक सभी को वश में कर लेता है ।

(११) पलाश को समिधाओं तथा पुष्पों से होम करने पर साधक ब्राह्मणों को वश में कर लेता है ।

(१२) चमेली के पुष्पों से होम करके साधक राजा को, लाल रंग के शुभ पुष्पों से होम करके वैश्यो को तथा नीले कमलों से होम करके शूद्रों को वश में कर लेता है ।

(१३) महुए के फूलों से होम करके साधक स्त्रियों को वश में कर लेता है ।

अभिषेक विधि :

यन्त्रभूषित नवपदातमकमण्डल को लिखकर सर्वसिद्धियों की प्राप्ति हेतु उसका विधिवत् अभिषेक करें, तत्पश्चात् प्रत्येक पद में चन्दन से सर्वाङ्गलिप्त एवं दूर्वा तथा अक्षतों से समन्वित उत्तम लक्षणयुक्त कलशों की स्थापना करें । फिर उन्हें रेशमी वस्त्रों से वेष्टित कर उनमें तीर्थों का जल भर दें ।

उत्तम आचार्य को उचित है कि वह एक कर्ष स्वर्ण से कल्पित तथा यन्त्र से संयुक्त पद्म को, मध्य कुम्भ में डाल दें । फिर चन्दन, उशीर, कपूर, जाती, कडुकोल, कुंकुम, कुठ, अगर, तकाल तथा एला—इन सबको समभाग ले पीसकर, सभी कुम्भों में घोल दें तथा रत्न भी डाल दें ।

लक्ष्मी, दूर्वा, सदामृत्‌ा, सहदेई, मधुपर्णीता, मुशली, शतावरी, कान्ति तथा अपामार्ग —इनके पत्तों को तथा प्रियंगु, मुद्ग, गोधूल, श्रीहि, तिल, यव, शालितण्डुल तथा माष (उड़द)—इन सबको धोकर उक्त कुम्भों में डाल दें ।

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द्वादशाक्षर महालक्ष्मी मन्त्र प्रयोग । ४५

धात्री, लकुच, बिल्व, कदली तथा नारियल के फलों को भी उनमें डाल दें । पद्म, सौगन्धिक, जाती, मल्लिका, वकुल, चम्पा, अशोक, पुन्नाग, हुलसी तथा केतिकी के पुष्प भी उनमें डालें । वट, अश्वत्थ, प्लक्ष तथा उदुम्बर वृक्षों के पत्तों तथा सफलान्वित चम्पय के साथ ब्रह्मकुर्च को भी डालकर उन घड़ों के मुँह वन्द करके क्षौमवस्त्रों से ढँक दें ।

वीच के कलश में लक्ष्मी का आवाहन करके उनकी पूजा करें । शेष आठ कलशों में उमा की पूजा करें । मनोहर गन्धमय पुष्पों से धूप-दोप के साथ भक्ष्य-भोज्य द्रव्यों को निवेदित उन कुम्भों का स्पर्श करके, मन्त्र का जप करें । तीन हजार वार जप के बाद साधक संयत साध्य को लाकर स्थण्डिल पर पोठ की स्थापना कर, उस पर उसे रम्य वस्त्राभूषणों से अलंकृत करके आदर-पूर्वक बैठाये तथा उसके ऊपर सुहागिन स्त्रियों द्वारा पुष्प तथा अक्षत (चावल) का प्रक्षेपण करायें ।

फिर पूजित विप्रों के आशीर्वाद सहित पाँच वाद्यों के वजाये जाने पर शुभ मुहर्त में महालक्ष्मी का स्मरण करते हुए, मध्य में स्थित कलश को उठाकर यजमान को स्नान कराके तत्पश्चात् इसी भाँति अन्य कलशों से भी कराये तथा गुरु अपने हाथ से यजमान के मस्तक का स्पर्श करते हुए—“तुम्हारा कल्याण हो, मङ्गल हो, लक्ष्मीजी तुम पर प्रसन्न हों, सभी देवता तुम्हारी रक्षा करें”—यह आशीर्वाद दे ।

फिर, यजमान स्नान करके उठे तथा दो वस्त्र धारण करे—(१) अधोवस्त्र तथा (२) उत्तरीय । तत्पश्चात् यथाविधि आचमन करके गुरु को दण्डवत् प्रणाम करे तथा वस्त्र, आभूषण, धन, धान्य, गाय, भैंस, दास, दासी आदि द्वारा देव बुद्धि से उनका सत्कार करें । तदनन्तर ब्राह्मणों को भोजन करायें । फिर निर्धन, अंधे, लंगड़े, लूले तथा अपंग लोगों को भोजन करायें । फिर अपने घर में वन्धु-बान्धवों सहित गीत-मंगल आदि के द्वारा भारी उत्सव करें ।

उक्त विधि से अभिषेक कराने वाला साधक स्वयं को कृतार्थ अनुभव करता है । वह अभिषिक्त होकर शत्रुओं को जीत लेता है । वन्ध्या-स्त्री अभिषिक्त होकर बुद्धिमान् पुत्र को जन्म देती है । महारोग, ऋतजा-द्रोह अथवा कोई दैवी-वाधा उपस्थित होने पर ‘अभिषेक’ करना चाहिए । यह मनुष्यों को समस्त सम्पत्तियाँ देने वाला, सब प्रकार के सौभाग्य तथा सिद्धियों को देने वाला, सब रोगों का शमन करने वाला, स्त्रियों के गर्भ का रक्षक, दीर्घायु दाता, शिशु-रक्षक, प्रसूता रक्षक, रजोधर्म में नष्ट हो जाने वाली स्त्रियों के पुष्प तथा गर्भ का रक्षक एवं भयभीत राजा के शत्रुओं को नष्ट करने वाला है ।

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सिद्धलक्ष्यैकादशाक्षर मन्त्र प्रयोग

भगवती सिद्धलक्ष्मी का एकादशाक्षर (ग्यारह अक्षरों वाला) मन्त्र निम्नानुसार है—

“ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं सिद्धलक्ष्यै नमः।”

इस मन्त्र का विधान निम्नानुसार है—

विनियोग :

ॐ अस्य श्रीसिद्ध लक्ष्मी मन्त्रस्य हिरण्यगर्भ ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्रीमहाकालो महालक्ष्मी महासरस्वत्यो देवता: श्रीं बीजं ह्रीं शक्तिः क्लीं कीलकं मम सर्वक्लेशपीडापरिहारार्थं सर्वदुःख दारिद्र्यनाशनार्थं सर्व कार्य सिद्धयर्थं च श्रीसिद्ध लक्ष्मी मन्त्र जपे विनियोगः ।

ऋष्यादि-न्यास :

ॐ हिरण्यगर्भ ऋषये नमः शिरसि ।

अनुष्टुप्छन्दसे नमः मुखे ।

श्री महाकालो महालक्ष्मी महासरस्वती देवताभ्योनमः हृदि ।

श्रीं बीजाय नमः लिङ्गे ।

ह्रीं शक्त्ये नमः पादयोः ।

क्लीं कीलकाय नमः नाभौ ।

विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे पु ।

(इति ऋष्यादि न्यासः)

४६

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कर-न्यास :

ॐ श्रीं अंगुष्ठाभ्यां नमः ।

ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः ।

ॐ क्लीं मध्यमाभ्यां नमः ।

ॐ श्रीं अनामिकाभ्यां नमः ।

ॐ सिद्ध लक्ष्म्यै कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।

ॐ नमः करतलकर पृष्ठाभ्यां नमः ।

(इति करन्यासः)

हृदयादि षडङ्गन्यास :

ॐ श्रीं हृदयाय नमः ।

ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा ।

ॐ क्लीं शिखायै वषट् ।

ॐ श्रीं कवचाय हुम् ।

ॐ सिद्धलक्ष्म्यै नेत्रत्रयाय वौषट् ।

ॐ नमः अस्त्राय फट् ।

(इति हृदयादि षडङ्गन्यास)

ध्यानम् :

ब्राह्मीं च वैष्णवीं भद्रां षड्भुजां च चतुमु खीम् ।

त्रिनेत्रां खड्गशूलाभी पद्मचक्र गदाधराम् ।।

पीताम्बरधरां देवीं नानालङ्कार भूषिताम् ।

तेजपुञ्जधरां श्रेष्ठां ध्यायेद्द्वाल कुमारिकाम् ।।

उक्त विधि से ध्यान कर, पूर्वोक्त विधि से पीठ-पूजा कर, स्वर्णादि से निर्मित यन्त्र अथवा मूर्त्त को ताम्रपात्र में रखकर, घृत से उसका अभ्यङ्ग कर, उस पर दूध तथा जल की धारा देकर, स्वच्छ वस्त्र से पोंछ डालें तथा “ॐ सिद्धलक्ष्मी पद्मपीठाय नमः ।”

इस आसन-मन्त्र से आसन देकर उसे पीठ के मध्य स्थापित कर, मूलमन्त्र द्वारा आवाहन से लेकर पञ्चोपचारों द्वारा पूजा कर देवी का ध्यान करके मूलष मन्त्र का जप करें ।

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४५ । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

पुरश्चरण :

इस मन्त्र का पुरश्चरण एक लाख जप है । जप का दशांश होम, होम का दशांश तर्पण, तर्पण का दशांश मार्जन तथा मार्जन का दशांश ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिए । इस विधि से मन्त्र सिद्ध हो जाता है । मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर प्रयोगों को सिद्ध करना चाहिए ।

चाँदी के दीपक में गौ घृत भरकर, उसमें ११ तन्तुओं वाली पुष्पवर्तिका डालकर ‘दोपं सम्पर्र्यामि’ कहते हुए उसे जलाकर रखे, फिर पूर्व दिशा की ओर मुख करके शक्कर का नैवेद्य देकर तथा स्फटिक की माला लेकर, देवी को हृदय में धारण कर, उनका ध्यान तथा मन्त्रार्थ को स्मरण करते हुए प्रातः, मध्याह्न तथा सायं तीनों संध्याओं में मूल मन्त्र का नित्य १०८ बार जप करें तथा जप के आरम्भ एवं अन्त में ‘सिद्ध लक्ष्मी स्तोत्र’ का पाठ करें । स्तोत्र आगे दिया गया है ।

।।

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ज्येष्ठा लक्ष्मी मन्त्र प्रयोग

'मन्त्र महोदधि' में ज्येष्ठा लक्ष्मी मन्त्र इस प्रकार कहा गया है-

"ऐं ह्रीं श्रीं ज्येष्ठालक्ष्मी स्वयंभुवै ह्रीं ज्येष्ठायै नमः ।"

यह सप्तदशाक्षर (सत्रह अक्षरों वाला) मन्त्र है ।

विनियोग :

अस्य ज्येष्ठा लक्ष्मी मन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषि: ।

अष्टिष्टच्छन्द: ।

ज्येष्ठालक्ष्मी देवता ।

हीं बीजं ।

श्रीं शक्ति: ।

समाभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोग: ।

इसके बाद मूल-मन्त्र से हाथ धोकर निम्नानुसार न्यास करें ।

ऋष्यादि न्यास :

ॐ ब्रह्मा ऋषये नमः शिरसि ।

अष्टिष्टच्छन्दसे नमो मुखे ।

ज्येष्ठालक्ष्मी देवतायै नमः हृदि ।

हीं बीजाय नमः लिङ्गे ।

श्रीं शक्तये नमः पादयो: ।

विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ।

(इति ऋष्यादि न्यास:)

करन्यास :

ऐं ह्रीं श्रीं अंगुष्ठाभ्यां नमः ।

ज्येष्ठा लक्ष्मी तर्जनीभ्यां नमः ।

स्वयंभुवै मध्यमाभ्यां नमः ।

४८

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५० । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

हीं अनामिकाभ्यां नमः ।

ज्येष्ठायै कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।

नमः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।

(इति करन्यासः)

हृदयादिपड्जन्यासः

ऐं ह्रीं श्रीं हृदयाय नमः ।

ज्येष्ठा लक्ष्मि शिरसे स्वाहा ।

स्वयंभुवे शिखायै वषट् ।

हीं कवचाय हुम् ।

ज्येष्ठायै नेत्रत्रयाय वौषट् ।

नमः अस्त्राय फट् ।

(इति हृदयादि पड्जन्यासः)

मन्त्रवर्ण सर्वाङ्गन्यासः

ॐ ऐं नमः शिरसि ।

ॐ ह्रीं नमः भ्रू मध्ये ।

ॐ श्रीं नमो मुखे ।

ॐ ज्येष्ठ लक्ष्म्यै नमः हृदि ।

ॐ स्वयंभुवे नमः नाभौ ।

ॐ ह्रीं नमः आधारे ।

ॐ ज्येष्ठायै नमः जानुनि ।

ॐ नमः नमः पादयोः ।

इसके बाद निम्नानुसार ध्यान करें—

ध्यान :

उद्यद्भास्कर सन्निभा स्मितमुखी रक्ताम्बरा लेपना

सद्कुम्भधनभाजनसृणिमथोपा शंकराबिभ्रती ।

पद्मस्था कमलेक्षणा हृदकुचा सौन्दर्यवाराम्निधि

धृतातिथ्या सकलाभिलषिफलदो श्री ज्येष्ठलक्ष्मीं भजे ॥

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ज्येष्ठा लक्ष्मी मन्त्र प्रयोग | ५१

पीठ पूजा :

इसके पश्चात् पीठादि पर रचित सर्वतोभद्रमण्डल में मण्डूकादि पर तत्वान्त पीठ-देवताओं को स्थापित करें—

"ॐ मं मण्डूकादि परतत्वान्त पीठदेवताभ्यो नमः ।"

इस मन्त्र से पीठदेवताओं की पूजा कर, नव पीठ शक्तियों की निम्नानुसार पूजा करें । फिर इन्हें वश्यमाण गायत्री-मन्त्र से आसन दें ।

यथा पूर्व दिशाविद् क्रम से—

ॐ लोहिताक्ष्यै नमः ।

ॐ विरुपायै नमः ।

ॐ कराल्यै नमः ।

ॐ नील लोहितायै नमः ।

ॐ समदायै नमः ।

ॐ वारुण्यै नमः ।

ॐ पुष्ट्यै नमः ।

ॐ अमोघायै नमः ।

मध्य में—

ॐ विश्वमोहिन्यै नमः ।

उक्त विधि से नवपीठ शक्तियों की पूजा करने के पश्चात् स्वर्णादि से निर्मित यन्त्र अथवा मूर्ति को ताम्रपात्र में रखकर घृत में उसका अभ्यज्न करें तथा उस पर दुर्गधाराऐं एवं जलधारा डालकर, स्वच्छ वस्त्र से पौंछकर निम्न-लिखित गायत्री मन्त्र द्वारा उसे पुष्पाद्यासन देकर पीठ के मध्य में स्थापित कर, प्राण-प्रतिष्ठा करें।

फिर मूलमन्त्र से मूर्ति की कल्पना करके पाद्यादिपुष्पपान्त उपचारों द्वारा पूजन कर, देवी की आज्ञा लेकर आवरण पूजा प्रारम्भ करें।

आसन प्रदान करने का गायत्री मन्त्र इस प्रकार है—

ॐ रक्तज्येष्ठायै विद्महे नील ज्येष्ठायै धीमहि । तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ।"

आवरण-पूजा :

सर्वप्रथम हाथ में पुष्पांजलि ले, मूलमन्त्र का उच्चारण करके,

ॐ संविभमये परे देवी परामृतरस प्रिये । अनुज्ञां देहि ज्येष्ठायै परिवाराच्चनाय मे ॥

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५२ । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

यह पढ़ते हुए पुष्पांजलि दें । फिर षट्कोण केसरों में, आग्नेय आदि चारों दिशाओं में तथा मध्य दिशा में निम्नानुसार मन्त्रों का उच्चारण करते हुए आवरण पूजा आरम्भ करें । ज्येष्ठा लक्ष्मी के पूजन का यन्त्र नीचे प्रदर्शित है—

(ज्येष्ठालक्ष्मी पूजन यन्त्र)

षडङ्गपूजा :

ऐं हीं श्रीं हृदयाय नमः । हृदय श्रीपादुकां पूजियामि तर्पयामि नमः ।

ज्येष्ठालक्ष्मी शिरसे स्वाहा । शिरः श्रीपादुकां पूजयामि॰॰।

स्वयंभुवे शिखाये वषट् । शिखा श्रीपादुकां पूजयामि॰॰।

हौं कवचाय हुम् ।

कवच श्रीपादुकां पूजयामि॰॰।

(इति सर्वत्रः)

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ज्येष्ठायै नेत्र त्रयाय वौष्ट् ।

नेत्र त्रय श्रीपादुकां पूजयामि॰॥

नमः अस्त्राय फट् ।

अस्त्र श्रीपादुकां पूजयामि॰॥

उक्त विधि से पादुकों की पूजा कर, पुष्पांजलि हाथ में ले, मूलमन्त्र का उच्चारण करके—

अभिष्टसिद्धौ देहि शरणागत वत्सले ।

भक्त्या समर्पये तुभ्यं प्रथमावरणार्चनम् ॥

यह पढ़कर पुष्पांजलि दें, तथा—

‘पूजितास्त्वपताः सन्तु’

यह कहें ।

(इति प्रथमावरणं)

षट्त्रमातृका पूजन :

इसके बाद पूजा तथा पूजक के अन्तराल को प्राची दिशा मानकर, तदनुसार अन्य दिशाओं की कल्पना करते हुए, प्राची क्रम से—

ॐ ब्राह्मयै नमः ।

ब्राह्मी श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ।

(इति सर्वत्रः)

ॐ माहेश्वयै नमः ।

माहेश्वरी श्रीपादकां॰॥

ॐ कौमार्यै नमः ।

कौमारो श्रीपादुकां॰॥

ॐ वैष्णव्यै नमः ।

वैष्णवी श्रीपादुकां॰॥

ॐ वाराह्यै नमः ।

वाराही श्रीपादुकां॰॥

ॐ इन्द्राण्यै नमः ।

इन्द्राणी श्रीपादुकां॰॥

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५४। कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

ॐ चामुण्डायै नमः । चामुण्डा श्रीपादुकां॰॰। ॐ महालक्ष्म्यै नमः । महालक्ष्मी श्रीपादुकां॰॰। उक्त विधि से अष्टमातृकाओं का पूजन कर, पूर्वोक्त प्रकार से पुष्पांजलि प्रदान करें ।

(इति द्वितीयावरणं) इसके बाद भूपुर में पूर्वादि क्रम से इन्द्रादि दिक्पाल तथा वज्रादि उनके आयुधों की पूजा कर पुष्पांजलि दें । आवरण पूजा समाप्त करके धूपदान से लेकर नमस्कारान्त उपचारों से पूजा और जप करें ।

पुरश्चरण : इस मन्त्र का पुरश्चरण एक लाख जप है । घृत युक्त खीर से जप का दशांश होम होम, का दशांश तर्पण, तर्पण का दशांश भोजन एवं भोजन की होने पर साधक प्रयोगों को सिद्ध करें । एक लाख जप करके उसका दशांश घृत मिश्रित खीर से होम करके वक्ष्यमाण पीठ पर महालक्ष्मी का पूजन करके, जप आदि करने से सिद्ध मन्त्र अभीष्ट फल देता है ।

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वसुधा लक्ष्मी मन्त्र प्रयोग

'मन्त्रमहोदधि' में वसुधा लक्ष्मी मन्त्र निम्नानुसार कहा गया है, साथ हो इसे 'ज्येष्ठा लक्ष्मी के वित्तीय मन्त्र' की संज्ञा दी गई है।

ॐ श्रीं अन्नं मह्यन्नमेदेहान्नाधिपतये ममान्नं प्रदापय स्वाहा श्रीं ग्लौं ॐ ।

विनियोग:

अस्य श्री ज्येष्ठा लक्ष्मी (अथवा-वसुधा ज्येष्ठा लक्ष्मी) मन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषि: निचृद्गायत्री छ्न्द: वसुधाश्रियौ दैवते ग्लौं बीजं श्रीं शक्त्ति: ममाभीष्ट प्राप्तो जपे विनियोग:।

इसके बाद निम्नानुसार न्यास करें।

ऋष्यादि न्यास :

ॐ ब्रह्मा ऋषये नमः शिरसि।

निचृद्गायत्रीछ्न्दसे नमो मुखे।

वसुधाश्री देवतायै नमो हृदि।

ग्लौं बीजाय नमो लिङ्गे।

श्रीं शक्त्तये नमः पादयो:।

विनियोगाय नमः सर्वाङ्गेषु।

(इति ऋष्यादिन्यास)

करन्यास :

ॐ अन्नं महि ग्लां श्रीं अण्ड़्‌ ठ्ठाभ्यां नमः।

ॐ अन्नं देहि ग्लौं श्रीं तर्जनीभ्यां नमः।

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५६ । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

ॐ अन्नाधिपतये ग्लौं श्रीं मध्यमाभ्यां नमः ।

ॐ ममान्नं प्रदापय ग्लौं श्रीं अनामिकाभ्यां नमः ।

ॐ स्वाहा ग्लौं श्रीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।

(इति करन्यासः)

पञ्चाङ्ग न्यास :

ॐ अन्तं महि ग्लां श्रीं हृदयाय नमः ।

ॐ अन्तं मे देहि ग्लीं श्रीं शिरसे स्वाहा ।

ॐ अन्नाधिपतये ग्लूं श्रीं शिखाये वषट् ।

ॐ ममान्नं प्रदापय ग्लें श्रीं कवचाय हुम् ।

ॐ स्वाहा ग्लौं श्रीं अस्त्राय फट् ।

उक्त प्रकार से न्यास करने के बाद निम्नानुसार ध्यान करें—

ध्यान :

कल्पद्रुमाधोमणि वेदिकायां समासि‌स्थते वस्त्र विभूषणाढ्ये ।

भूमिश्रियो वाञ्छितवामदक्षे सं‌चिन्तये‌देव मुनीन्द्र वन्धे ॥

भावार्थ—कल्पवृक्ष के नीचे मणि वेदिका पर वाम तथा दक्षिण भाग में विराजमान, वस्त्र तथा आभूषणों से अलंकृत एवं देवता तथा मुनियों से वन्दित भूमि एवं श्री का मैं ध्यान करता हूँ ।

पोठशक्तिपूजा:

ध्यानोपरान्त मानसोपचार से पूजन कर, विधिवत् शंख स्थापित कर, सामान्य पूजा पद्धति के अनुसार निम्नलिखित मन्त्रों द्वारा पीठ के मध्य पोठ-पीठ के मध्य में—

ॐ आधार शक्त्ये नमः ।

ॐ प्रकृतये नमः ।

ॐ कूर्माय नमः ।

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वसुधा लक्ष्मी मन्त्र प्रयोग | ५७

ॐ अनन्ताय नमः ।

ॐ पृथिव्यै नमः ।

ॐ क्षीर समुद्राय नमः ।

ॐ श्वेतद्वीपाय नमः ।

ॐ मणिमण्डपाय नमः ।

ॐ कल्पवृक्षाय नमः ।

ॐ मणिवेदिकायै नमः ।

ॐ रत्नासनाय नमः ।

फिर आग्नेय आदि कोणों में निम्नलिखित मन्त्रों से धर्मं आदि का पूजन करें—

ॐ धर्माय नमः—आग्नेये ।

ॐ ज्ञानाय नमः—नैऋत्ये ।

ॐ वैराग्याय नमः—वायव्ये ।

ॐ ऐश्वर्याय नमः—ईशान्ये ।

फिर, पूर्व आदि दिशाओं में अधर्म आदि का पूजन करना चाहिए, यथा—

ॐ अधर्माय नमः—पूर्वे ।

ॐ अज्ञानाय नमः—दक्षिणे ।

ॐ अवैराग्याय नमः—पश्चिमे ।

ॐ अनैश्वर्याय नमः—उत्तरे ।

इसके बाद पुनः पीठ के मध्य में निम्नलिखित मन्त्रों द्वारा अनन्त आदि का पूजन करना चाहिए । यथा—

ॐ अनन्ताय नमः ।

ॐ पद्माय नमः ।

ॐ सूर्यमण्डलाय द्वादश कलात्मने नमः ।

ॐ सोममण्डलाय षोडश कलात्मने नमः ।

ॐ वह्नि मण्डलाय दशकलात्मने नमः ।

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३८ । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

ॐ सं सत्त्वाय नमः।

ॐ रं रजसे नमः।

ॐ तं तमसे नमः।

ॐ आं आत्मने नमः।

ॐ हं अन्तरात्मने नमः।

ॐ पं परमात्मने नमः।

ॐ हीं ज्ञानात्मने नमः।

फिर, पूर्वादि केसरों में निम्नलिखित मन्त्रों द्वारा आठ दिशाओं एवं मध्य भाग में पोठ शक्तियों का पूजन करें। यथा—

ॐ विमलायै नमः।

ॐ उत्कर्षिण्यै नमः।

ॐ ज्ञानायै नमः।

ॐ क्रियायै नमः।

ॐ योगायै नमः।

ॐ प्रहायै नमः।

ॐ सत्यायै नमः।

ॐ ईशानायै नमः।

मध्य में—

ॐ अनुग्रहायै नमः।

इसके बाद—

"ॐ नमो भगवते विष्णवे सर्वभूतात्म संयोग योगपदं पीठ-त्मने नमः।"

इस मन्त्र द्वारा दोनों देवियों को इस पूजित पीठ पर आसन देकर, मूल-मन्त्र का आवाहन कर, पाद्यादि उपचारों से पञ्चपुष्पाञ्जलि दान पर्यन्त विधिवत् पूजन करें।

इतसे पश्चात् देवी से आज्ञा लेकर आवरण पूजा आरम्भ करें। तदुभा लक्ष्मी के पूजन यन्त्र का स्वरूप आगे प्रदर्शित है—

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वसुधा लक्ष्मी मन्त्र-प्रयोग । ५९

(वसुधा लक्ष्मी पूजन यन्त्र)

आवरण पूजा :

सर्वप्रथम केसरों में निम्नलिखित मन्त्रों से अष्टपूजा करें—

ॐ अन्नं महि ग्लां श्रीं हृदयाय नमः । हृदय श्रीपादुकां॥

ॐ अन्नं देहि ग्लीनं श्रीं शिरसे स्वाहा । शिरः श्रीपादुकां॥

ॐ अनाधिपतये ग्लौं श्रीं शिखायै वषट् । शिखा श्रीपादुकां॥

ॐ यमान्त्र प्रदापय ग्लें श्रीं कवचाय हुम् । कवच श्रीपादुकां॥

ॐ स्वाहा ग्लौं श्रीं अस्त्राय फट् । अस्त्र श्रीपादुकां॥

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६० । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

फिर पूर्व आदि दिशाओं में निम्नलिखित मन्त्रों द्वारा भूमि आदि का पूजन करें—

ॐ लं भूम्यै नमः ।

भूमि श्रीपादुकां०•••।

ॐ रं अग्नये नमः ।

अग्नि श्रीपादुकां०•••।

ॐ वं उदकेश्यों नमः ।

उदक श्रीपादुकां०•••।

ॐ वायवे नमः ।

वायु श्रीपादुकां०•••।

फिर आसनेय आदि कोणों में निम्नलिखित मन्त्रों से निवृत्ति आदि कलाओं का पूजन करें । यथा—

ॐ निवृत्त्यै नमः ।

निवृत्ति श्रीपादुकां०•••।

ॐ प्रतिष्ठायै नमः ।

प्रतिष्ठा श्रीपादुकां०•••।

ॐ विद्यायै नमः ।

विद्या श्रीपादुकां०•••।

ॐ शान्त्यै नमः ।

शान्ति श्रीपादुकां०•••।

फिर अष्टदलों में पूर्व आदि दिशाओं में निम्नलिखित मन्त्रों से बलाका आदि ५ शक्तियों की पूजा करनी चाहिए । यथा—

ॐ बलाकायै नमः ।

बलाका श्रीपादुकां०•••।

ॐ विमलायै नमः ।

विमला श्रीपादुकां०•••।

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वसुधा लक्ष्मी मन्त्र प्रयोग | ६१

ॐ कमलायै नमः ।

कमला श्रीपादुकां॰॥

ॐ वनमालायै नमः ।

वनमाला श्रीपादुकां॰॥

ॐ विभूषायै नमः ।

विभूषा श्रीपादुकां॰॥

ॐ मालिकायै नमः ।

मालिका श्रीपादुकां॰॥

ॐ शांकर्यै नमः ।

शांकरी श्रीपादुकां॰॥

ॐ वसुमालिकायै नमः ।

वसुमालिका श्रीपादुकां॰॥

इसके बाद भूपुर में पूर्वादि क्रम से इन्द्र आदि दश दिक्पालों की तथा वज्र आदि उनके आयुधों की पूजा करके मन्त्र-जप करें ।

पुरश्चरण :

इसका पुरश्चरण एक लाख जप है । जप का दशांश घृत-सिक्त अन्न का होम है । होम से दशांश तर्पण तथा तर्पण का दशांश मार्जन एवं मार्जन का दशांश ब्राह्मण भोजन करायें । इस विधि से मन्त्र सिद्ध हो जाता है । मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर साधक प्रयोगों को सिद्ध करें ।

प्रयोग विधि :

(१) एक लाख मन्त्रों का जप करके, जप का दशांश घृत-सिक्त अन्न से होम करके, वैष्णव पीठ पर वसुधा लक्ष्मी का पूजन करने से महती धन-सम्पदा प्राप्त होती है ।

(२) घृत-सिक्त तिल तथा वेल की समिधाओं से होम करने पर धन-लाभ होता है ।

(३) इस मन्त्र का जप करने वाले को प्रतिदिन घृत सहित खीर, वेलपत्र तथा फलों से होम करना चाहिए स्वयं कुबेर-मन्त्र —“ॐ वैश्रवणाय स्वाहा” से बेरगद की समिधाओं द्वारा दस बार होम करे एवं होम के समय अग्नि के मध्य कुबेर का निम्नानुसार ध्यान करें—

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६२। कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

कुबेर ध्यान मन्त्र :

घनपूर्य्य स्वर्णकुम्भं तथा रत्नकरण्डकम्।

हस्ताभ्यां विप्लुतं खर्वकरपादं च तुन्दिलम्॥

वटाधस्ताद्वनवीणेपविष्टं सुस्मिताननम्।

एवं कृत हुतो सन्न्री लक्ष्म्या जयति वित्तपम्॥

इसके बाद स्तोत्रादि का पाठ करना चाहिए।

इस मन्त्र के प्रयोग से साधक की दरिद्रता दूर होती है तथा विपुल धन-सम्पत्ति का लाभ होता है।

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लक्ष्मी के अन्य मन्त्र

तेईस अक्षर का मन्त्र

प्राकृत ग्रन्थ में लक्ष्मीजी का त्रयोविंशत्यक्षर अर्थात् तेईस अक्षरों वाला मन्त्र निम्नानुसार कहा है—

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं लक्ष्मी रागच्छागच्छ मम मन्दिरे तिष्ठ तिष्ठ स्वाहा ।

विधान—इस मन्त्र को नित्य १०८ बार जपने मात्र से ही लक्ष्मी प्रसन्न होकर साधक को धन प्रदान करती हैं ।

त्रिशक्ति का मन्त्र

श्रीं ह्रीं क्लीं ।

विधान—इस मन्त्र के साथ ‘श्रीपादुकां पूजयामि नमः’ लगाने से पूजन मन्त्र बन जाता है । इसको गणना ‘लक्ष्मी-पंचक’ की देवियों के मन्त्र के अन्तर्गत की जाती है ।

सर्व साम्राज्या का मन्त्र

श्रीं र्हीं क्लीं श्रीं ।

टिप्पणी—यह मन्त्र भी ‘लक्ष्मी पंचक’ की देवियों में एक का है । उक्त सभी मन्त्रों के साधन हेतु पूर्वोक्त किसी भी विधि का उपयोग किया जा सकता है ।

महालक्ष्मी-मन्त्र

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसिद प्रसिद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्यै नमः ।

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६४ | कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

विधि:

प्रातः कृत्यादि पूर्वोक्त 'ऋष्यादि न्यासन्त' समस्त कर्म करके 'कराङ्ग न्यास करें । यथा—

श्रीं ह्रीं श्रीं कमले श्रीं ह्रीं श्रीं अंगुष्ठाभ्यां नमः । " " " कमलालये श्रीं ह्रीं श्रीं तर्जनीभ्यां स्वाहा । " " " प्रसोद श्रीं ह्रीं श्रीं मध्यमाभ्यां वषट् । " " " प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं अनामिकाभ्यां हुं । " " " महालक्ष्मि श्रीं ह्रीं श्रीं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । " " नमः महालक्ष्मि श्रीं ह्रीं श्रीं अस्त्राय फट् ।"

इसी प्रकार 'हृदयादि पदाङ्गन्यास' करने के बाद निम्नानुसार ध्यान करें—

ध्यान :

सिन्दूरारुणकान्तिमञ्ज वर्‌साति सौन्दर्यवारां निधि कोटीरांगद हार कुण्डलकटी सूत्रादिभिर्भूषिताम् । hस्ताब्जैर्‌वसु पात्रमभ्जयुगलादर्शन् वहन्तीं परामवीतां परिचारिकाभिरनिशं ध्यायेत्‌प्रियाम् शार्ङिणः ।

उक्त विधि से ध्यान कर, मानसोपचारों से पूजा कर शंख-स्थापन करें । फिर पूर्ववत् पीठ-पूजा कर ध्यान-आवाहनादि पञ्चोपचारजलि दान, दान पर्यन्त समस्त काये कर, आवरण-पूजा आरम्भ करें । अन्यादि कोणों में, मध्य में तथा चारों दिशाओं में निम्नानुसार अङ्ग-पूजा करें—

अङ्ग-पूजा:

श्रीं ह्रीं श्रीं कमले श्रीं ह्रीं श्रीं हृदयाय नमः । " " " कमलालये श्रीं ह्रीं श्रीं शिरसे स्वाहा । " " " प्रसोद श्रीं ह्रीं श्रीं शिखायै वषट् । " " " प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं कवचाय हुं । " " " महालक्ष्मि श्रीं ह्रीं श्रीं नेत्र त्रयाय वौषट् । " " " नमः श्रीं ह्रीं श्रीं अस्त्राय फट् ।

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लक्ष्मी के अन्य मन्त्र | ६५

इसके बाद मूल-भाग में पूर्वादि क्रम से—

ॐ श्रीधराय नमः।

ॐ हृषीकेशाय नमः।

ॐ वैकुण्ठाय नमः।

ॐ विश्वरूपाय नमः।

ॐ वासुदेवाय नमः।

ॐ सङ्कर्षणाय नमः।

ॐ प्रद्युम्नाय नमः।

ॐ अनिरुद्धाय नमः।

इन देवताओं की तथा दलों के मध्य में—

ॐ भारतये नमः।

ॐ पार्वतये नमः।

ॐ चान्द्र्यै नमः।

ॐ शच्यै नमः।

ॐ दमकाय नमः।

ॐ सलिलाय नमः।

ॐ गुग्गुलवे नमः।

ॐ कुरुकुण्टकाय नमः।

इन देवताओं और दलों के अग्र भाग में---

ॐ अनुरागाय महालक्ष्मी वाणाय नमः।

ॐ विस्वादाय महालक्ष्मी वाणाय नमः।

ॐ विजयाय महालक्ष्मी वाणाय नमः।

ॐ वल्लभाय महालक्ष्मी वाणाय नमः।

ॐ मदाय महालक्ष्मी वाणाय नमः।

ॐ हर्षाय महालक्ष्मी वाणाय नमः।

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६६ । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

ॐ बलाय महालक्ष्मी वाणाय नमः ।

ॐ तेजाय महालक्ष्मी वाणाय नमः ।

इनके बाहर इन्द्रादि दिक्पालों तथा उनके वज्रादि अस्त्रों की पूजा करनी चाहिए । तदनन्तर धूपादि देकर विसर्जनान्त समस्त कर्म सम्पन्न करने चाहिए ।

पुरश्चरण :

इस मन्त्र के पुरश्चरण में एक लाख जप करना चाहिए । जप के अन्त में संस्कृत-अग्नि में घृत-मधु-शर्करा युक्त बिल्व फलों द्वारा पूर्वोक्त प्रणाली से क्रमशः दशांश होम, तर्पण, मार्जन तथा ब्राह्मण-भोजन करना चाहिए ।

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सामान्य पूजा विधि

लक्ष्मी पूजन के नियम

आद्याशक्ति के रूप में भगवती लक्ष्मी का पूजन सर्वप्रथम भगवान् विष्णु ने हो किया था। तत्पश्चात् ब्रह्मा, इन्द्र, कुबेर आदि देवताओं ने भी उनका पूजन किया। भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी से आरम्भ कर एक पक्ष अर्थात् पन्द्रह दिनों तक ब्रह्माजी ने लक्ष्मीजी का पूजन किया था। उसी समय से लक्ष्मी-पूजा तीनों लोकों में प्रचलित हुई है।

श्री विष्णु ने चैत्र, पौष तथा भाद्रपद मास में एवं महुमहाराज ने पौष मास की संक्रान्ति के दिन लक्ष्मी-पूजन किया था, अतः ये तीन महीने लक्ष्मी-पूजन के लिए विशेष शुभ माने जाते हैं। इन महीनों के शुक्ल पक्ष में वृहस्पतिवार के दिन लक्ष्मी-पूजन करना विशेष फलप्रद होता है। यदि वृहस्पतिवार को तिथि, नक्षत्र आदि का शुभ योग न हो तो इन महीनों के रविवार अथवा सोमबार को लक्ष्मी-पूजन करना चाहिए। पंचमी, दशमी अथवा पूर्णिमा तिथि वाले गुरुवार को लक्ष्मी-पूजन का विशेष माहात्म्य है।

पौष मास के शुक्ल-पक्ष की दशमी, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तथा भाद्रपद मास की पूर्णिमा-यह तिथियाँ लक्ष्मी-उपासना के लिए अत्यन्त शुभ मानी गई हैं।

जो व्यक्ति दीपावली को लक्ष्मी-पूजन करना चाहें, वे दिन में निर्जल-व्रत रखकर सन्ध्या के समय लक्ष्मी-पूजनोपरान्त केवल फलाहार अथवा दुग्धाहार करें। सन्ध्या हो जाने पर रात्रि से दूसरे दिन प्रातःकाल तक भगवती महालक्ष्मी की प्रसन्नता हेतु दीप-दान करना चाहिए। रातभर जागरण भी करना चाहिए तथा दीपकों के प्रकाश से अपने घर के प्रत्येक भाग को आलोकित बनाये रखना चाहिए।

दूसरे दिन दूध-दही से पार्वण श्राद्ध कर, भगवती की प्रसन्नता के लिए दीप-दान करना चाहिए तथा श्वेत वस्त्र धारण करके भोजन करना चाहिए। इसदिन

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६५ । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

लक्ष्मीजी का पूजन श्वेत कमलों तथा श्वेत रंग के अन्य पुष्पों से करना चाहिए एवं अपने शरीर पर श्वेत वस्त्र ही धारण करने चाहिए।

दीपावली की अमावस्या को प्रदोष-काल में लक्ष्मी-पूजन तथा दीप-दान करने का नियम है। यदि अमावास्या तिथि दो दिन हो तथा दूसरे दिन अमावस्या तिथि केवल एक दण्ड रात्रि तक ही रहे तो पहले दिन को छोड़कर दूसरे दिन ही लक्ष्मी-पूजन करना चाहिए।

दीपावली को लक्ष्मी-पूजन करने के लिए पूजनकर्ता को उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठना चाहिए तथा देवी की प्रसन्नता के लिए दीपावली की रात्रि को नदी, पर्वत, चौराहा, श्मशान आदि स्थानों में भी प्रज्ज्वलित दीपकं रखने चाहिए।

प्रतिपदा, चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी तथा अमावास्या को लक्ष्मी-पूजन का निषेध किया गया है, परन्तु कार्तिक मास की अमावास्या को महालक्ष्मी का पूजन करना विशेष शुभ माना गया है।

प्रथम मास, संक्रान्ति, अपराह्न काल तथा रात्रि के समय भी लक्ष्मी का पूजन करना वर्जित है, परन्तु दीपावली की रात्रि के समय ही लक्ष्मीजी की आराधना, उपासना तथा पूजन करने की आज्ञा शास्त्रों ने दी है।

श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा तथा पूर्वाभाद्रपदा--इन चारों नक्षत्रों में तथा कृष्णपक्ष में लक्ष्मी-पूजन का निषेध है, परन्तु कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की अमावास्या की रात्रि के समय लक्ष्मी-पूजन करना शुभ माना गया है।

भगवती लक्ष्मी की पूजा में घण्टा नहीं बजाना चाहिए। क्षीन्द तथा कांचन-पुष्प द्वारा भी लक्ष्मीजी का पूजन नहीं करना चाहिए। सामान्य लक्ष्मी-पूजन में लाल रंग के कमल पुष्प सर्वाधिक शुभ माने गये हैं। परन्तु दीपावली के पूजन में श्वेत-कमल अथवा श्वेत रंग के पुष्पों का ही प्रयोग करना चाहिए।

ऐसी मान्यता है कि दीपावली की रात्रि में भगवती लक्ष्मी विश्व-भ्रमण पर निकलती हैं तथा जिन स्थानों पर अपनी पूजा-आराधना होते हुए देखती हैं, वहीं-वहीं अपना निवास बना लेती हैं। अतः दीपावली को लक्ष्मी-पूजन अवश्य करना चाहिए। हमारे देश में दीपावली के दिन लक्ष्मी-पूजन की प्रथा सहस्रों वर्षों से प्रचलित हैं।

लक्ष्मीजी का आसन कमल है तथा उनका वाहन 'उलूक' पक्षी है। उनके शरीर का वर्ण स्वर्ण है तथा चार भुजाएं हैं। वे अपने मस्तक पर मुकुट तथा शरीर पर दिव्य वस्त्रालंकारों को धारण करती हैं।

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सामान्य पूजा विधि

सर्वप्रथम स्नानादि से निवृत्त हो, स्वच्छ तथा धुले हुए वस्त्र धारण कर, आसन पर उत्तर दिशा की ओर मुँह करके बैठें और शिखा में गांठ बांधें तथा नत्रीन यज्ञोपवीत धारण करें, भगवती महालक्ष्मी की प्रतिमा तथा इस पुस्तक के दूसरे पृष्ठ पर प्रदर्शित यंत्र को चौकी के ऊपर वस्त्र बिछाकर, स्थापित करें। पूजन-सामग्री को एकत्र कर समीप हो रख लें। कलश में जल भर कर उसे पूर्व दिशा की ओर स्थापित करदें तथा घृत का दीपक जला कर धूपवत्ती, अगरवत्ती आदि जलादें। तत्पश्चात् सर्वप्रथम गणेशजी का ध्यान करें, क्योंकि प्रत्येक शुभ कार्य की निर्विघ्न सम्पन्नता के लिए श्रीगणपति का प्रथम स्मरण करना चाहिए। तदुपरान्त स्वस्तिवाचन, भूत शुद्धि, पवित्रीकरण आदि प्रारम्भिक क्रियाएँ सम्पन्न करके यथा-विधि लक्ष्मीजी का पूजन करें। दीपावली को विशेष पूजन की विधि, जो आगे दी गई है, उसके अनुसार कार्य करें। पूजा की समाप्ति पर स्तोत्र, नालीसा, आरती आदि का पाठ करें। कमानुसार पूजन की विधि निम्नानुसार है—

"सर्वप्रथम हाथ में अक्षत, जल तथा पुष्प लेकर निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करते हुए श्रीगणेशजी का ध्यान करें। दीपावली को भी गणेशजी तथा लक्ष्मीजी दोनों का पूजन किया जाता है। गणेशजी की प्रतिमा को लक्ष्मीजी की प्रतिमा के वामाझ में रखना चाहिए, क्योंकि गणेशजी पार्वती-पुत्र होने के कारण लक्ष्मीजी के भी पुत्र समान ही हैं।"

श्री गणेश-ध्यान मन्त्र :

ॐ सुमुखश्चैकदतश्च कपिलो गजकर्णक: । लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायक: ॥ धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजानन: । द्वादशैतानि नामानि य: पठेच्छृणुयादपि ॥ विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा । संग्रामे संकटश्चैव विघ्नं तस्य न जायते ॥ शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्न वदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

श्रीगणेशजी का ध्यान करने के पश्चात् हाथ के अक्षत, पुष्प तथा जल को पूजा-चौकी पर श्रीगणेशजी के उद्देश्य से निक्षिप्त करदें। तदुपरान्त पुनः हाथ में जल लेकर अग्रानुसार 'स्वस्तिवाचन' का पाठ करें—

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७० । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

स्वस्ति-वाचन :

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्तिन: पूषा: विश्ववेदा: । स्वस्तिनस्ताक्ष्योऽरिष्ट नेमि: स्वस्तिनो बृहस्पतिर्‌धातु ।।१।।

ॐ पय: पृथिव्यां पय ओषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयोधा: । पय: स्वती: प्रदिश: सन्तु मह्यम् ।।२।।

ॐ विष्णोरराट्‌मसि विष्णो: इतप्रेष्ठो विष्णो: स्यूरसि विष्णोध्रुवोऽसि वैष्णवमसि विष्णववत्ता ।।३।।

ॐ अग्निदेवता वातो देवता सूर्यो देवता चन्द्रमा देवता वसवो देवता रुद्रो देवताडदित्या देवता मरुतो देवता विश्वेदेवा देवता बृहस्पतिदेवतेन्द्रो देवता वरुणो देवता ।।४।।

ॐ धौ: शान्तिरन्तरिक्ष ३ शान्ति: पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्तिर्वनस्पतय: शान्तीविश्वेदेवा: शान्तिब्रह्मा शान्ति: सर्व ३ शान्ति: शान्तिरेव शान्ति सामाशान्ति रेधि ।।५।।

ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव । यदूभद्रं तन्न आसुव ।।

ॐ शान्ति: शान्ति: शान्तिर्भवतु ।।

टिप्पणी—उक्त 'स्वस्ति-वाचन' में तथा आगे वर्णित मन्त्रों में जहाँ ॐ तथा ३ इस प्रकार के चिह्न हों, वहाँ 'ॐ' की भाँति उच्चारण करना चाहिए । जैसे— 'सर्व ३ शान्ति' का उच्चारण 'सर्वगं शान्ति' होगा।

स्वस्तिवाचनोपरान्त आगे लिखे मन्त्र का उच्चारण करते हुए जल से तीन बार आचमन करें तथा तीन वार अपने मस्तक पर थोड़ा-थोड़ा जल छिड़कें । तदुपरान्त दोनों हाथों को शुद्ध जल से धो लें ।

पवित्रीकरण का मन्त्र :

ॐ अपवित्र: पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपि वा । य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स वाह्याभ्यन्तर: शुचि: ।।

उक्त मन्त्र का उच्चारण करते हुए अपने मस्तक पर तीन बार जल छिड़ककर आचमन करें । फिर हाथ धो डालें । तदुपरान्त 'भूत-शुद्धि' के लिए निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें—

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भूत-शुद्धि का मन्त्र :

ॐ अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भुवि संस्थिताः । ये भूता विध्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया ॥

'भूत-शुद्धि' के उपरान्त दाँये हाथ में जल, अक्षत तथा यशोपवीत लेकर निम्नलिखित 'संकल्प-वाक्य' का उच्चारण करें—

संकल्प-वाक्य :

हरिः ॐ तत्सत् । नमः परमात्मने श्रीपुराण पुरुषोत्तमाय श्रीमद् भगवते महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य ब्रह्मणो द्वितीय प्रहरार्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्य्यावर्तान्तर्गत देशैक पुण्य क्षेत्रे षष्ठ संवत्सराणां मध्ये 'अमुक' नाम्नि संवत्सरे, 'अमुक' अयने, 'अमुक' ऋतौ, 'अमुक' मासे, 'अमुक' पक्षे, 'अमुक' तिथौ, 'अमुक' नक्षत्रे, 'अमुक' योगे, 'अमुक' वारसरे, 'अमुक' राशिस्थे सूर्ये, चन्द्रे, भौमे, बुधे, गुरौ, शुक्रे, शनौ, राहौ, केतौ एवं गुण विशिष्टायां तिथौ 'अमुक' गोत्रोत्पन्न, 'अमुक' नाम्नि शर्माण (वर्मा इत्यादि) उक्त धर्मार्थे काम मोक्ष हेतवे श्री लक्ष्मी पूजनमहं करिष्ये ।

टिप्पणी—उक्त 'संकल्प-वाक्य' में जहाँ-जहाँ 'अमुक' शब्द का प्रयोग हुआ है, वहाँ-वहाँ कमशः तत्कालीन संवत्सर, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, तिथि, नक्षत्र, योग, वार, सूर्यादि की राशि तथा अपने गोत्र, अपने नाम एवं अपनी जाति का उच्चारण करना चाहिए। जैसे—उत्तरायणे, ग्रीष्म ऋतौ, वैशाख मासे, शुक्ल पक्षे, द्वितीयां, भरणी नक्षत्रे, गुरु वासरे, वशिष्ठ गोत्रोत्पन्न ज्ञानेंद्र दीक्षित शर्माऽहं आदि । ब्राह्मण को अपने नाम के आगे 'शर्माऽहं', क्षत्रिय को 'वर्माऽहं', वैश्य को 'गुप्तोऽहं' तथा शूद्र को 'दासोऽहं' शब्द का उच्चारण करना चाहिए । 'संकल्प-वाक्य' के पश्चात् दाँये हाथ में चावल लेकर निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करते हुए श्रीलक्ष्मीजी का 'ध्यान' करना चाहिए—

ध्यान के मन्त्र :

या श्रीः पद्मासनस्था विपुल कटितटी पद्मपत्रायताक्षी । गंभीरावतंसाभ्यां च नुम्ब रनिमिताभ्यां ।। शुत्रवस्त्रास्तराभ्या॥

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७२। कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

या लक्ष्मी दिव्यरूपैर्मणिगणखचितैः स्थापितं हेम कुंभैः । सा नित्यं पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्वमाङ्गल्य युक्ता ॥१॥ ॐ श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्या वहोरात्रे पाश्वेनक्षत्राणि रूपम-

शिवनी व्याप्तं । इष्टन्ननिष्पाणम मडिषाण सर्वैकमडिषाण ॥ मक्ष्यै नमः ॥२॥

श्वेताम्बरधरे देवी नानालङ्कार भूषिते । जगत्स्थिते जगन्मातर्महारलक्ष्म नमोडस्तुते ॥३॥

पद्मासन स्थिते देवी परब्रह्म स्वरूपिणि । परमेशि जगन्मातर्महालक्ष्म नमोडस्तुते ॥४॥

नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते । श्रृङ्गारादिहस्ते महालक्ष्म नमोडस्तुते ॥५॥

ध्यानोपरान्त निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए लक्ष्मीजी का 'आवाहन' करें—

आवाहन का मन्त्र :

सर्वलोकस्य जननी वीणा पुस्तक धारिणी । सर्वदेवमयीमोशा देव्या मावाहयाम्यहं॥

'आवाहन' के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए भगवती को 'आसन' प्रदान करें—

आसन का मन्त्र :

तप्तकाञ्चनवर्णाभं मुक्तामणि विराजितम् । अमलं कमलं दिव्यमासनं प्रतिगृह्यताम् ॥

'आसन' के बाद निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करके 'पाद्य' देने हेतु पृथ्वी पर जल का निक्षेप करें—

पाद्य का मन्त्र :

"सर्वतीर्थ समुद्रभूतं पाद्यङ्गन्थादिभिर्युतम् । मयादत्तं गृहाणेदं भगवती भक्त वत्सले ॥

'पाद्य' के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए 'अर्घ्य' देने के लिए पृथ्वी पर जल का निक्षेप करें—

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अर्घ्य का मन्त्र :

अष्टगंध सभायुक्तं स्वर्णपात्र प्रपूritam् ।

अर्घ्यं गृहाणमदत्तं महालक्ष्म्यै नमोऽस्तुते ॥

'अर्घ्य' के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए 'आचमन' के निमित्त जल का निक्षेप करें—

आचमन का मन्त्र :

सर्वलोकस्य या शक्तित्र्या विष्णु शिवादिभि: ।

स्तुता तदाम्याचमनं महालक्ष्म्यै मनोहरम् ॥

'आचमन' के बाद 'स्नान' हेतु निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए जल का निक्षेप करें—

स्नान का मन्त्र :

पंचामृत समायुक्तं जाह्नवी सलिलं शुभम् ।

गृहाण विश्व जननी स्नानार्थं भक्तवत्सले ॥

टिप्पणी—यदि पंचामृत हो तो पहले उसी में लक्ष्मीजी की धातु-प्रतिमा, यन्त्र अथवा सिक्के को डुबकी देकर स्नान कराना चाहिए, तत्पश्चात् शुद्ध जल से स्नान कराना चाहिए। यदि मिट्टी की मूर्ति का पूजन किया जा रहा हो तो उस स्थिति में केवल जल का ही निक्षेप करना चाहिए। स्नानोपरान्त निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए 'वस्त्र का जोड़ा' समर्पित करना चाहिए—

वस्त्र युग्म का मन्त्र :

"दिव्याम्बरं नूतनंहि क्षौमंतवति मनोहरम् ।

दीयमानं मयादेवी गृहाण जगदम्बिके ॥"

'वस्त्र-युग्म' के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए 'उपवस्त्र' अर्थात् 'कंचुकी' समर्पित करनी चाहिए—

उपवस्त्र का मन्त्र :

कटचुकी उपवस्त्रं च नाना रत्नै: समन्वितम् ।

गृहाणलं मयादत्तं मुग्डला: जगदीश्वरी ॥

'उपवस्त्र' के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए 'मधुपर्क' समर्पित करें—

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७४ | कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

मधुपर्क का मन्त्र :

कपिलं दधि कुन्देन्दु धवलं मधु संयुतम् । स्वर्ण पात्र स्थितं देवि मधुपर्कं गृहाण मे ॥

'मधुपर्क' के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए 'आभूषण' समर्पित करें—

आभूषण का मन्त्र :

रत्नकङ्कणवैदूर्य मुक्ताहारादिकानि च । सुप्रसन्नेन मनसा दत्तानि स्वीकरुष्व मे ॥

'आभूषण' के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए 'श्वेत चन्दन' समर्पित करें—

श्वेत चन्दन का मन्त्र :

श्री खण्ड गृहि कर्पूरं श्रीगन्धाभि समन्वितम् । विलेपनं गृहाणत्वं नमोऽस्तुभक्तवत्सले ॥

'श्वेत चन्दन' के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए 'रक्त चन्दन' (लाल चन्दन) समर्पित करें—

रक्त चन्दन का मन्त्र :

रक्तचन्दन सम्मिश्रं पारिजात समुद्भवम् । मयादत्तं गृहाणाचु चन्दनं गन्ध संयुक्तम् ॥

'रक्त चन्दन' के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए 'सिन्दूर' समर्पित करें—

सिन्दूर का मन्त्र :

सिन्दूरं रक्तवर्णं च सिन्दूर तिलकं प्रिये । भक्त्यादत्तं मयादेवी सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम् ॥

'सिन्दूर' के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए 'कुंकुम' समर्पित करें—

कुंकुम का मन्त्र :

कुंकुमं कामद दिव्य कुंकुमं कामरूपिणम् । अखण्ड काम सौभाग्यं कुंकुमं प्रतिगृह्यताम् ॥

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सामान्य पूजा विधि । ७५

‘कुंकुम’ के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए ‘सुगन्धित तेल’ एवं ‘इत्र’ समर्पित करें—

सुगन्धित तेल का मन्त्र :

तैलानि च सुगंधीनि द्रव्याणि विविधानि च ।

मयादत्तानि लेपार्थं गृहाण परमेश्वरी ॥

‘सुगन्धित तेल’ के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए ‘अक्षत’ (चावल) समर्पित करें—

अक्षत का मन्त्र :

अक्षतान् निर्मलान् शुद्धान् मुक्तामणि समन्विताम् ।

गृहाण त्वं महादेवि देहि मे निर्मलाधियम् ॥

‘अक्षत’ के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए ‘पुष्प तथा कमल’ समर्पित करें—

पुष्प का मन्त्र :

मन्दार पारिजाताद्यं पाटलं केतकी तथा ।

मेऽह्वामोवारं चैव गृहणाशु मनोडसुतु ते ॥

‘पुष्प’ के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए ‘पुष्पमाला’ समर्पित करें—

पुष्पमाला का मन्त्र :

पद्ममशंखजपुष्पै: शतपत्रैर्विचित्रिताम् ।

पुष्पमालां प्रयच्छामि गृहणत्वं सुरेश्वरी ॥

‘पुष्पमाला’ के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए ‘दूर्वा’ समर्पित करें—

दूर्वा का मन्त्र :

विष्णुर्वाद सर्वदेवानां प्रियां सर्व सुशोभनाम् ।

क्षीरसागर सम्भूतां दूर्वां स्वीकरु सर्वदा ॥

‘दूर्वा’ के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए ‘अबोर-- गुलाल’ समर्पित करें—

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७६ । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

अबीर-गुलाल का मन्त्र :

अबीरं च गुलालं च चोबा चन्दनमेव च ।

अबीरेणार्चिता देवी ह्यतः शान्तिं प्रयच्छ, च ॥

'अबीर-गुलाल' के बाद निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए 'धूप' समर्पित करनी चाहिए—

धूप का मन्त्र :

वनस्पति रसोद्भूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः ।

आग्रेयोः सर्वदेवानां धूपोडयं प्रतिगृह्यताम् ॥

'धूप' के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए 'दीपक' प्रदर्शित करें—

दीपक का मन्त्र :

कर्पूर रवत्ति संयुक्तं घृत युक्तं मनोहरम् ।

त्मोनाशकरं दीपं गृहाण परमेश्वरी ॥

'दीपक' के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए 'नैवेद्य' समर्पित करें—

नैवेद्य का मन्त्र :

नैवेद्यं गृह्यतां देवी भक्ष्य भोज्य समन्वितम् ।

पडरसरन्नितं दिव्यं महालक्ष्म्यै नमोडस्तुते ॥

'नैवेद्य' के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए 'ऋतुफल' समर्पित करें—

ऋतुफल का मन्त्र :

फलैर्न फालितं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।

तस्मात् फल प्रदानेन पूर्णाः सन्तु मनोरथा: ॥

'फल' के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए 'आचमनीयं जल' का निक्षेप करें—

आचमनीय मन्त्र :

शीतलं निर्मलं तोयं कर्पूरेण सुसंस्कृतं ।

आचम्यतामिदं देवी प्रसीद त्वं सुरेश्वरी ॥

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सामान्य पूजा विधि | ७५

'आचमनीय जल' के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए 'ताम्बूल' समर्पित करें—

ताम्बूल का मन्त्र :

एलालवृं कपूर नागपत्त्रादिभिर्युतं तम्‌ । पूगीफलैन संयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्णताम्‌ ॥

'ताम्बूल' के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए 'दक्षिणा' समर्पित करें—

दक्षिणा का मंन्त्र :

हिरण्यगर्भं गर्भस्थं हेमबीजं विभावसौ: । अनन्तपुण्य फलदमत: शान्तिं प्रयच्छ मे ॥

'दक्षिणा' के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए 'नीराजन' (आरती) करें—

नीराजन का मन्त्र :

चक्षुदं सर्वलोकानां तिमिरस्य निवारणम्‌ । आरतिक्यं कल्पितं भक्त्या गृहाण परमेश्वरी ॥

'नीराजन' के पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए 'प्रदक्षिणा' करें—

प्रदक्षिणा का मन्त्र :

यानिकानि च पापानि ब्रह्महल्या समाना च । तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिणां पदे पदे ॥

'प्रदक्षिणा' के बाद निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए 'नमस्कार' निवेदित करें—

नमस्कार का मन्त्र :

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि । यत्पूजितं मयादेवी परिपूर्ण तदस्तु मे ॥

'नमस्कार' के बाद दोनों हाथों में पुष्प लेकर निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए 'पुष्पांजलि' प्रदान करें—

पुष्पांजलि के मन्त्र :

केतकी जाति कुसुमैर्मल्लिकामालती भवै: । पुष्पांजलिरिमंयादत्त्तावत्प्राप्त्यै नमो‌स्तुते ॥

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९५ । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

'पुष्पांजलि' के उपरान्त निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए 'प्रार्थना' करें—

प्रार्थना का मन्त्र :

सुरा सुरेन्द्रादिकिरीट मौक्तिक्रे

यु तं सदैस्तवपादपङ्कजम् ।।

परावरं पातु वरं सुगन्धिलं,

नमामि भक्त्या तव काम्य सिद्धये ।।

दीपावली पर विशेष-पूजन

दीपावली पर विशेष पूजन के समय बही-खाता, कलम-दावात, तराजू, तिजोरी, मानदण्ड (पैमाने) आदि का भी पूजन किया जाता है । बही-खाते तथा लेखनी को सरस्वती एवं दावात को कालीजी का प्रतीक माना जाता है । तिजोरी, तराजू, मानदण्ड आदि की पूजा कुबेर के प्रतीक रूप में की जाती है ।

इन वस्तुओं का पूजन करते समय इन पर रोली, चन्दन, चावल, पुष्प आदि छिड़क देने चाहिए । कलम, तराजू, मानदण्ड आदि में कलावा बाँध देना चाहिए और उन पर सिन्दूर अथवा रोली से स्वस्तिक-चिह्न बना देना चाहिए । दावात में बताशे का एक टुकड़ा तोड़कर डाल देना चाहिए । बही खातों के भीतर पहले पृष्ठ पर रोली या सिन्दूर से स्वस्तिक काढ़ने तथा सादा एवं साबुत पान रखने की भी प्रथा है । इनके पूजन के अवसर पर जिन विशेष मन्त्रों का उच्चारण किया जाता है, वे निम्नलिखित हैं—

बही खाता, पूजन का मन्त्र:

याकुन्तेन्दुतुषारहार धवलां या शुभ्रवस्त्रावृतां

या वीणा वरदण्डमण्डित करा या श्वेत पद्मासना ।।

या ब्रह्माच्युत शङ्कर प्रभृतिभिदेवैः सदा वन्दिता ।

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेष जाड्यापहा ।।

लेखनी पूजन मन्त्र :

लेखनी निर्मितां पूर्वं ब्रह्मणा परमेष्ठिना ।

लोकानां च हितार्थाय तस्मात्तां पूजयाम्यहम् ।।

लेखन्यै नमस्ते द्रुतु लोभिकत्र्य नमो नमः ।।

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पुस्तके चर्चिता देवी सर्व विद्यान्तदाभव । मद्गृहे थनधान्यादि समृद्ध कुरु सर्वदा ॥ कृष्णानने कृष्णजित्हे चित्रगुप्तकर स्थिते । पुष्पांजलि गृहाणत्वं सदैव वरदाभव ॥

श्रीकुबेर प्रार्थना मन्त्र : देविप्रियश्च नाथस्य कोषाध्यक्ष महामते । ध्यायेऽहं प्रभुं श्रेष्ठं कुबेरं धनदायकम् ॥ क्षमस्व मम दौःरात्म्यं कृपासिन्धो सुरःप्रियः । धनदोडसि धनंदेहि अपराधांश्च नाशय ॥ महाराज कुबेर त्वं भूयो भूयो नमाम्यहम् । दीनोऽपि च दया यस्य जायतुं वै महान् धनः ॥

तुला (तराजू) पूजन मन्त्र : त्वं तुले सर्वदेवानां प्रमाणामिह कीर्तिता । अतस्त्वां पूजयिष्यामि धमार्थ सुख हेतवे ॥ पदार्थ मानसिद्धयर्थे ब्रह्मणा 'कल्पिता पुरा । तुलानामेति कथितां संख्या रूपामुपास्महे ॥

तिजोरी पूजन का मन्त्र : धनदाय नमस्तुभ्यं निधि पद्मनिधिपाय च । भवन्तु त्वत्प्रदानं मे धन थान्यादि सम्पदा ॥ कुबेराय नमस्तुभ्यं नानाभाण्डार संस्थिताः । यत्र लक्ष्मीभवेद्देवि धनं चिह्न नमोस्तुते ॥

मानदण्ड (गज पैमाना आदि) पूजन का मन्त्र : ब्रह्मदण्डं त्वमेवासि ब्रह्मणानिर्मितं च तत् । तस्मात्स्व तत्पदे तुभ्यं मानदण्ड नमोस्तुते ॥

अन्य वस्तुओं के पूजन का मन्त्र : त्वमेव सर्वभूतानां साक्षी भूतं च वस्त्वसि । तस्मात्तुभ्यं नमः सद्यो ब्रह्माविष्णुशिवात्मकम् ॥

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दोहा—

मातुलक्ष्मी करि कृपा, करहु हृदय महँ वास । मनोकामना सिद्ध करि, पुरबहु जनकी आस ।

सौरठा—

यही मोर अरदास, हाथ जोरि बिनती करूँ । सब विधि करहु सुपास, जगत जननि जगदम्बिका ।

चौपाई—

सिन्धुसुता मैं सुमिरौं तोही । ज्ञान बुद्धि विद्या देहु मोही । तुम समान नहिं कोउ उपकारी । सब बिधि पुरबहु आस हमारी ।

जय जय जय जगत जननि जगदम्बा । सबकी तुमहीं ते हो अवलम्बा । तुमहीं हो घट घट की बासी । बिनती यही हमारी खासी ।

जगजननी जय सिन्धु कुमारी । दीनन की तुम हो हितकारी । बिनवौ नित्य तुमहि महरानी । कृपा करहु जग जननि भवानी ।

केहि विधि असतुति करौं तिहारी । सुधि लीजे अपराध बिसारी । कृपाहष्टि चितवहु मम ओरी । जगत जननि बिनती सुनु मोरी ।

ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता । संकट हरहु हमारे माता । क्षीर सिद्ध जब विष्णु मथायो । चौदह रत्न सिन्धु उपजायो ।

तिन रत्नन महँ तुम सुखबरासी । सेवा कीन्हि बनिं प्रभुदासी । जब जब जन्म जहँ प्रभु लीन्हा । रूप बदल तहँ सेवा कीन्हा ।

स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा । लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा । जब तुम प्रकटि जनकपुर माँहीं । सेवा कीन्हि हृदय पुलकाहीं ।

अपनावा तोहि अन्तर्यामी । विश्वविदित त्रिभुवन कर स्वामी । तुम सम प्रबल शक्त नहिं आनो । कहँ लगि महिमा कहहुँ बखानी ।

मग कम बचन करहु सेवकाई । मनवाञ्छित फल सहजै पाई ।

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तजि छल कपट और चतुराइ । पूजहि विविध भाँति मन लाई ॥

और हाल मैं कहहुँ बुझाई । जो यह पाठ करैं मन लाई ॥

ताकहँ कोऊ कष्ट न होई । मनवांछित फल पावै सोई ॥

त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि । त्रिविध ताप भव बन्धन हारिणि ॥

जो चालीसा पढ़ैं पढ़ावै । ध्यान लगावै सुने सुनावै ॥

ताकहँ कोउ न रोग सतावै । पुत्र आदि धन सम्पति पावै ॥

पुत्रहीन धन सम्पतिहीना । अन्थ बधिर कोढ़ी अति दीना ॥

विप्र बुलाइ के पाठ करावै । शंका मन महँ तनिक न लावै ॥

पाठ करावै दिन चालीसा । तपर कृपा करहिं जगदीशा ॥

सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै । कमी नाँहि काहू की आवै ॥

बारह मास करै जो पूजा । ता सम धनो और नाहि दूजा ॥

प्रतिदिन पाठ करै मन माँही । तासम जगत मनहुँ कोउ नाहीं ॥

बहुविधि का मैं करहुँ बड़ाई । लेहु परीक्षा ध्यान लगाई ॥

करि विश्वास करे ब्रत नेमा । होइ सिद्ध उपजे अति प्रेम ॥

जय जय जय लक्ष्मी महारानी । सब महँ व्यापक तुम गुणखानी ॥

सुम्हरो तेज प्रवल जग माँहीं । तुम सम कोउ दयालु कहुँ नाहीं ॥

मो अनाथ की सुधि अब लीजै । संकट काटि भक्ति बर दीजै ॥

भूलचूक करु क्षमा हमारी । दरसन दीजै दासा निहारी ॥

बिनु दरसन व्याकुल अति भारी । तुम्हहिं अक्षत पावत दुख भारी ॥

नहिं मोहि ज्ञान बुद्धि है तन में । सब जानते तुम अपने मन में ॥

रूप चतुर्भुज करि निज धारण । कष्ट मोर अब करहु निवारण ॥

केहि प्रकार मैं करहुँ बड़ाई । ज्ञान बुद्धि मोहि नहिं अधिकाई ॥

उठि कें प्रातः करै असनाना । जो कछु बनै करै सो दाना ॥

अष्टमि को व्रत करै जु प्राणी । हरपि हृदय पूजहि महारानी ॥

सोलह दिन पूजा विधि करहीं । आरधन कृष्ण जो अष्टमि परहीं ॥

ताकर सब छूटै दुख दावा । सो जन सुख सम्पत्ति नित पावा ॥

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बोहा :

नाहि त्राहि दुख हारिणी, हरहु बेगि सब त्रास । जयति जयति जय लक्ष्मी, करहु शत्रु को नास ॥१॥

श्रीलक्ष्मी जी की आरती

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता । तुमको निशिदिन ध्यावत, हर विष्णू थाता ॥ उमा रमा, ब्रह्माणी, तुम्हीं जगमाता ॥

सूर्य, चन्दमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता ॥ दुर्गारूप निरंजनि, सुख सम्पत्ति दाता ॥

जो कोई तुमको ध्याता, ऋद्धि सिद्धि पाता ॥ तुम पाताल निवासिनि, तुम हो शुभ दाता ॥

कर्में प्रभाव प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता ॥ जिस घर में तुम रहतीं, तहँ सद्गुण आता ॥

सब सम्भव हो जाता, मन नहिं घबराता ॥ तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न हो राता ॥

खान पान का वैभव, सब तुमसे आता ॥ शुभ गुण मन्दिर सुन्दर, श्रीरोगधि जाता ॥

रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहिं पाता ॥ लक्ष्मीजी की आरती, जो कोई नर गाता ॥

उर आनन्द समाता, पार उतर जाता ॥

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१२

श्री कमला स्तोत्र, कवच आदि

श्री कमला स्तोत्रम्

ओंङ्काररुपिणी देहि विशुद्धसत्त्वरुपिणी ।

देवानां जननी त्वं हि प्रसन्ना भव सुन्दरी ॥

तन्मात्राच्चैव भूतानि तव वक्षःस्थलं स्मृतम् ।

त्वमेव वेदगम्या तु प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

देवदानवगन्धर्वयक्षराक्षसकिन्नरैः ।

स्तूयसे त्वं सदा लक्ष्मि प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

लोकातीता द्वैतातीता समस्तभूतकेषिटता ।

विद्धुज्जननकीर्तिता च प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

परिपूर्णा सदा लक्ष्मि त्रात्री तु शरणार्थिषु ।

विश्वाच्या विश्वकर्त्री च प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

ब्रह्मरूपा च सावित्री त्वदीप्त्या भासते जगत् ।

विश्वरुपा वरेण्या च प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

क्षित्यप्तेजो मरुदूयोमपञ्चभूतस्वरूपिणी ।

बन्धादेः कारणं त्वं हि प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

महेशे त्वं हेमवती कमला केशवेऽपि च ।

ब्रह्मणः प्रेयसी त्वं हि प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

चण्डी दुर्गा कालिका च कौशिकी सिद्धिरुपिणी ।

योगिनी योगगम्या च प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

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बाल्ये च बालिका त्वं हि यौवने युवतीति च ।

स्थविरे वृद्धरुपा च प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

गुणमयी गुणातींता आद्या विद्या सनातनी ।

महत्तत्त्वादिसंयुक्ता प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

तपस्विनी तपःसिद्धिः स्वर्गसिद्धिदस्त्रदथिपु ।

चिन्मयी प्रकृतिस्त्वं तु प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

त्वमादिज्जगतां देवि त्वमेव स्थितिकारणम् ।

त्वमन्ते निधनस्थानं स्वेच्छाचारात्वमेव हि ॥

चराचराणां भूतानां वहिरन्तस्त्वमेव हि ।

व्याप्यव्यापकरूपेण त्वं भासि भक्तवत्सले ॥

त्वन्मायया हतज्ञानाः नष्टात्मानो विचेतसः ।

गतागतं प्रपद्यन्ते पापपुण्यवशात्सदा ॥

तावन्त्सत्यं जगद्धाति शुक्तिकारजतं यथा ।

यावन्न ज्ञायते ज्ञानं चेतसा नान्वगामिनी ॥

त्वज्ज्ञानात्तु सदा युक्तः पुत्रदारगृहादिपु ।

रमन्ते विषयान्सर्वान्ते दुःखप्रदां श्रु वम् ॥

त्वदाज्ञया तु देवेशि गगने सूर्यमण्डलम् ।

चन्द्रश्च भ्रमते नित्यं प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

ब्रह्मा शक्तिगुजननो ब्रह्माख्यो ब्रह्मसंश्रया ।

व्यक्ताव्यक्ता च देवेशि प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

लचला सर्वगा त्वं हि मायातीता महेश्वरि ।

शिवात्मा शाश्वता नित्या प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

सर्वकार्यनियन्त्री च सर्वभूतेश्वरीश्वरी ।

अनन्ता निष्कला त्वं हि प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

सर्वेश्वरी सर्ववन्द्या अचिन्त्या परमात्मिका ।

भुक्तिमुक्तिप्रदा त्वं हि प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

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ब्रह्माणी ब्रह्मलोके त्वं वैकुण्ठे सर्वमङ्गला ।

इन्द्राणी अमरावत्यामम्बिका वरुणालये ॥

यमालये कालरुपा कुबेरभवने शुभा ।

महानन्दा ग्निकोगो च प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

नैऋृ त्यां रक्तदन्ता त्वं वायव्यां सृगवाहिनी ।

पाताले वैष्णवीरुपा प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

सुरसा त्वं मणिद्दीपे ऐशान्यां शूलधारिणी ।

भद्रकाली च लज्जायां प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

रामेश्वरी सेतुबन्धे 'सहले देवमोहिनी ।

विमला त्वं च श्रीक्षेत्रे प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

कालिका त्वं कालिघट्टे कामाख्या नीलपर्वते ।

विरजा ओड्रदेशे त्वं प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

वाराणस्यामन्नपूर्णा अयोध्यायां महेश्वरी ।

गयासुरी गयाधाम्नि प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

भद्रकाली कुरुक्षेत्रे त्वष्ष कात्यायनी व्रजे ।

महामाया द्वारकायां प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

क्षुधा त्वं सर्वजीवानां वेला च सागरस्य हि ।

महेश्वरी मथुरायां प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

रामस्य जानकी त्वष्ष शिवस्य मनमोहिनी ।

दक्षस्य दुहिता चैव प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

विष्णुभक्तिप्रदा त्वं च कंसासुरविनाशिनी ।

रावणनाशिनी चैव प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

लक्ष्मीस्रोतस्तोत्रमिदं पुण्यं य: पठेदृचिकसंयुत: ।

सर्वौर्वश्रयं नश्येत्सर्वव्याधिनिवारणम् ॥

इदं स्तोत्रं महापुण्यमापदुद्धारणकारणम् ।

त्रिसंध्यामेकसंध्यं वा य: पठेत्सतत: नर: ॥

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६६ । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

मुच्यते सर्वपापेभ्यो तथा तु सर्वसङ्कटात् ।

मुच्यते नात्र सन्देहो भुवि स्वर्गे रसातले ।

समस्तं च तथा चैकं यः पठेद्‌दृक्तितत्परः ।

सु सर्वदुःखरं तीर्त्वा लभते परमां गतिम् ।।

सुखदं मोक्षदं स्तोत्रं यः पठेद्‌दृक्तिसंयुतः ।

स तु कोटितीर्थफलं प्राप्नोति नात्र संशयः ।।

एका देवी तु कमला यस्मस्तुष्टा भवेत्सदा ।

तस्याऽऽसाध्यं तु देवेश नाऽस्ति किंचिज्जगत्रये ।।

पठनादपि स्तोत्रस्य किं न सिद्ध्यति भूतले ।

तस्मात्स्तोत्रवरं प्रोक्तं सत्यं सत्यं हि पर्वति ।।

।। इति श्री कमला स्तोत्रम् ।

श्री महालक्ष्म्यष्टक स्तवः

इन्द्र उवाच :

नमस्तेडस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते ।

शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मीं नमोडस्तु ते ।।

नमस्ते गरुडारुढे कोलासुरभयंकरि ।

सर्वपापहरे देवी महालक्ष्मीं नमोडस्तु ते ।।

सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयंकरि ।

सर्वदुःखहरे देवी महालक्ष्मीं नमोडस्तु ते ।।

सिद्धिबुद्धिप्रदे देवी भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि ।

मन्त्रमूर्ते सदा देवी महालक्ष्मीं नमोडस्तु ते ।।

आद्यन्तरहिते देवी आद्यशक्ते महेश्वरि ।

योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मीं नमोडस्तु ते ।।

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स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्ति महोदरे ।

महापापहरे देवी महालक्ष्मि नमोडस्तु ते ॥

पद्मासनस्थिते देवी परब्रह्मस्वरूपिणि ।

परमेशि जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोडस्तु ते ॥

श्वेताम्बरधरे देवी नानालङ्कारभूषिते ।

जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोडस्तु ते ॥

महालक्ष्म्यष्टकस्तोत्रं यः पठेद्‌वक्तिमान्नरः ।

सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा ॥

एककालं पठेन्नित्यं महापापविनाशनम् ।

द्विकालं यः पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वितः ॥

त्रिकालं यः पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम् ।

महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा ॥

॥ इति इन्द्र कृतः महालक्ष्म्यष्टकस्तवः सम्पूर्णः ॥

श्री लक्ष्मीस्तोत्रम्

क्षमस्व भगवत्यम्ब क्षमाशीले परात्परे ।

शुद्धसत्त्वस्वरूपे च कोपादिपरिवार्जिते ॥

उपे सर्वसाधवोनां देवीनां देवपूजिते ।

त्वया विना जगत्सर्वं मृततुल्यं च निष्फलं ॥

सर्वसम्पत्स्वरुपा त्वं सर्वेषां सर्वरूपिणी ।

रासेश्वर्यदिदेवी त्वं त्वत्कला: सर्वयोजितः ॥

कैलासे पार्वती त्वं च क्षीरोदे सिन्धुकन्यका ।

स्वर्गे च स्वर्गलक्ष्मीस्त्वं मर्त्येलक्ष्मीश्च भूतले ॥

वैकुण्ठे च महालक्ष्मीर्देवदेवी सुरस्वती ।

गङ्गा च तुलसी त्वं च सावित्री ब्रह्मलोकत: ॥

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कृष्णप्राणाधिदेवी त्वं गोलोके राधिका स्वयं ।

रासे रासेश्वरी त्वं च वृन्दावनवने बने ॥

कृष्णप्रिया त्वं भाण्डीरे चन्द्रा चन्दनकानने ।

विरजा चम्पकवने शतशृङ्गे च सुन्दरी ॥

पद्मावती पद्मवने मालती मालतीवने ।

कुन्ददन्ती कुन्दवनने सुशीला केतकीवने ॥

कदम्बमाला त्वं देवी कदम्बकाननेsपि च ।

राजलक्ष्मी राजगेहे गृहलक्ष्मीर्गृहे गृहे ॥

इत्युक्त्वा देवता: सर्वे मुनयो मनवस्तथा ।

रुद्रदुर्नामवदना: गुष्टकर्णठोष्ठतालुका: ॥

इति लक्ष्मीस्तवं पुण्यं सर्वदेवै: कृतं शुभं ।

य: पठेत्प्रातरुत्थाय स वे सर्वैर्लभिद्रिध्दिभि: ॥

अभायोर्लभते भार्यां विनीतां च सुतां सतीं ।

सुशीलां सुन्दरीं रम्पामतिसुप्रियवादिनीं ॥

पुत्रपौत्रवतीं शुद्धां कुलजां कोमलां वरां ।

अपुत्रो लभते पुत्रं वैष्णवं चिरजीवनम् ॥

पर्मैश्वरययुक्तं च विद्यावन्तं यशस्विनम् ।

भ्रष्टराज्यो लभेद्राज्यं भ्रष्टश्रीर्लभते श्रियम् ॥

हतबन्धुलभेद्बन्धून् धनभ्रष्टो धनं लभेत् ।

कीर्तिहीनो लभेत्कीर्ति प्रतिष्ठां च लभेदूद्धवं ॥

सर्वमङ्गलदं स्तोत्रं शोकोसन्तापनाशनम् ।

हर्षनन्दकरं शश्वद्र्म्मोक्षसुहृद्प्रदम् ॥

॥ इति लक्ष्मीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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श्री सिद्धलक्ष्मी स्तोत्रम्

विनियोग :

ॐ अस्य श्रीसिद्धिलक्ष्मीस्तोत्र मन्त्रस्य हिरण्यगर्भऋषि:; अनु-ष्टुप्‌छन्द:, श्रीमहाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वत्यो देवता:, श्रीं बीजं, हीं शक्तिः, क्लीं कीलकं, मम सर्वक्लेशपीडापरिहारार्थं सर्वदुःखदारिद्र्य-नाशनार्थं सर्वकार्यसिद्ध्यर्थं च श्रीसिद्धलक्ष्मीस्तोत्रपाठे विनियोगः ।

ऋष्यादि-न्यास :

ॐ हिरण्यगर्भऋषये नमः शिरसि । अनुष्टुप्‌छन्दसे नमः मुखे । श्री महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती देवताभ्योनमो हृदि । श्रीं बीजाय नमो गुह्ये । हीं शक्त्ये नमः पादयौः । क्लीं कीलकाय नमो नाभौ । विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ।

कर-न्यास :

श्री सिद्धलक्ष्म्यै अंगुष्ठाभ्यां नमः । हीं विष्णुतेजसे तर्जनीभ्यां नमः । क्लीं अमृतानन्दायै मध्यमाभ्यां नमः । श्रीं दैत्यमालिन्यै अनामिकाभ्यां नमः । हीं तेजःप्रकाशिन्यै कनिष्ठिकाभ्यां नमः । क्लीं ब्राह्म्यै वैष्णव्यै रुद्राण्यै करतलकर पृष्ठाभ्यां नमः ।

हृदादि-न्यास :

ॐ श्रीं सिद्धलक्ष्म्यै हृदयाय नमः । ॐ हीं विष्णुतेजसे शिरसे स्वाहा । ॐ क्लीं अमृतानन्दायै शिखायै वषट् । ॐ श्रीं दैत्यमालिन्यै कवचाय हुं । ॐ हीं तेजःप्रकाशिन्यै नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ क्लीं ब्राह्म्यै वैष्णव्यै रुद्राण्यै अस्त्राय फट् ।

'ॐ श्रीं हीं क्लीं श्रीं सिद्धलक्ष्म्यै नमः'-मन्त्र से तालत्रय कर दिग्बन्धन करें । फिर ध्यान करें ।

ब्राह्मीं च वैष्णवीं भद्रां पद्मभुजां च सततं खीम् ।

खड्‌गत्रिशूलपद्मचक्रगदाधराम् ॥११॥

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पीताम्बरधरां देवीं नानालङ्कारभूषिताम् । तेजपुञ्जजधरीं श्रेष्ठां ध्यायेद्बालकुमारिकाम् ॥२॥

स्तोत्र :

उङ्कारं लक्ष्मीरूपं तु विष्णु हृदयमध्ययम् । विष्णुमानन्ददायकं होंकारं बीजरूपिणीम् ॥ १॥

क्लीं अमृतानन्दिनीं भद्रां सदात्ययानन्ददायिनीम् । श्रीं दैत्यशमनीं शक्तिं मालिनीं शत्रुमर्दिनीम् ॥२॥

तेजःप्रकाशिनीं देवीं वरदां शुभकारिणीम् । ब्राह्मीं च वैष्णवीं रौद्रीं कालिकारूपशोभिनीम् ॥३॥

अकारे लक्ष्मीरूपं तु उकारे विष्णुमध्ययम् । मकारः पुरुषोच्चैको देवीप्रणव उच्यते ॥४॥

सूर्यकोटिप्रतीकाशं चन्द्रकोटिसमप्रभं । तन्मध्ये निचरं सूक्ष्मं ब्रह्मरूपं व्यवस्थितम् ॥५॥

उङ्कारं परमानन्दं सदैव सुखसुन्दरीं । सिद्धलक्ष्मिम मोक्षलक्ष्मिम आद्यलक्ष्मिं नमोडस्तु ते ॥६॥

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोडस्तु तु ॥

प्रथमं त्र्यम्बका गौरी द्वितीयं वैष्णवी तथा । तृतीयं कमला प्रोक्ता चतुर्थ सुन्दरी तथा ॥८॥

पञ्चमं विष्णुशक्तिश्च पष्ठं कात्यायनी तथा । वाराही सप्तमं चैव अष्टमं हरिवल्लभा ॥९॥

नवमी खड्गिनी प्रोक्ता दशमं चैव देविका । एकादशं सिद्धलक्ष्मीर्दशं हंसवाहिनी ॥१०॥

एतस्तोत्रवरं देव्या ये पठन्ति सदा नराः । सर्वापद्भ्यो विमुच्यन्ते नात्र कार्य्या विचारणा ॥११॥

एकमासं द्विमासं च त्रिमासं मास्वतुष्टयं ।

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पञ्चमासं च पण्मासं त्रिकालं यः सदाऽपठेत् ।

ब्राह्मणः क्लेशितो दुःखी दारिद्र्यामयपीडितः ॥१२॥

जन्मान्तरसहस्रैस्तैर्मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ।

दारिद्रो लभते लक्ष्मीमपुत्रः पुत्रवान् भवेत् ॥१३॥

धन्यो यशस्वी शत्रुघ्नो वन्ध्यचौरभयेषु च ।

शाकिनीभूतवेतालसर्पग्राह्यादिपातने

राजद्वारे सभास्थाने कारागृहनिबन्धने ॥१४॥

ईश्वरेण कृतं स्तोत्रं प्राणिनां हितकारकं ।

स्तुवन्तु ब्राह्मणा नित्यं दारिद्रयं न च बाधते ॥१५॥

सर्वपापहरा लक्ष्मीः सर्वसिद्धिप्रदायिनी ।

इति श्री ब्रह्मपुराणे श्रीसिद्धलक्ष्मीस्तोत्रं ॥१६॥

श्री लक्ष्मी सूक्तं

सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांगुकगन्धमाल्यशोभे ।

भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ।

धनमगिनर्धनं वायुरधनं सूर्यो धनं वसु: ।

धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणं धनमश्विनौ ॥

वैनतेय सोमं पिव सोमं पिबतु वृत्रहा ।

सोमन्धंस्य सोमनो मह्यं ददातु सोमरिनः ॥

न क्रोधो न च मात्सर्य न लोभो नाशुभा मति: ।

भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां सूक्तजापिनाम् ॥

पद्मानने पद्मऊरु पद्माक्षि पद्मसम्भवे ।

तन्मे भजसि पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम् ॥

विष्णुपत्नीं दयां देवीं माधवीं माधवप्रियाम् ।

विष्णुप्रियां सखीं देवीं नमाम्यच्युतवल्लभाम् ॥

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७२ । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्निं च धीमहि ।

तन्नो लक्ष्मी: प्रचोदयात् ॥

पद्मानने पद्मिनि पद्मपत्रे पद्मामप्रिये पद्मदलायताक्षि । विश्व-

प्रिये विश्वमनोनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व ॥

आनन्द: कर्दम: श्रीदश्चक्लीत इति विश्रुता: ।

ऋषय: श्रीयपुत्राश्च मयि श्रीदेवी देवता ॥

ऋण रोगादिदारिद्रयं पापक्ष अपमृत्यव: ।

भयशोकमनस्तापा नशयन्तु मम सर्वदा ॥

श्रीवं चस्व मायुष्यमाविधाच्छोभमानं महीयते ।

धनं पशुं बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायु: ॥

॥ इति श्री लक्ष्मी सूक्तम् ॥

श्री सूक्तं

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजां ।

चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो ममावह ॥

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीं ।

यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पूरुषानहम् ॥

अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनाद-प्रमोदिनीं ।

श्रियन्देविमुपह्वये श्रीर्मा देवोर्जुन पताम् ॥

कांसोस्म तां हिरण्यप्राकारामाद्रै ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् ।

पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥

चन्द्रां प्रभासां यशसा जवलन्तीं श्रियां लोके देवजुष्टामुदाराम् ।

तां पद्मिनीमीं शरणमं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥

आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्व: ।

तस्य फलानि तपसानुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मी: ॥

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उपेतु मां देवसखः कीर्तिशच मणिना सह ।

प्रादुर्भू तोस्मिन् राष्ट्रोऽस्मिन् कीर्तिं वृद्धिं ददातु मे ॥

क्षुत्पिपासामला ज्येष्ठा अलक्ष्मीर्नाशयास्यहम् ।

अभूतिसम्मृद्ध च सर्वासिर्णुद मे गृहात् ॥

गन्धद्वारां दुराधर्षा नित्यपुष्टांकरीषिणीम् ।

ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥

मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि ।

पशूनां रूपमन्सस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥

कर्दमेन प्रजाभूता मयि सम्भ्रमकर्म्म ॥

श्रियं वासय मे कुलेऽमातरं पद्मामालिनीम् ॥

आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीतं वस मे गृहे ।

नि च देवीं मातरं श्रियम् वासय मे कुलेऽ ॥

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम् ।

सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो ममावह ॥

आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम् ।

चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो ममावह ॥

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।

यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम् ॥

यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् ।

श्रियः पद्मदलां च श्रोकामः सततं जपेत् ॥

॥ इति श्री सूक्त ॥

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श्री कमला अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

श्री शिव उवाच :

शताष्टोत्तरं नाम्नां कमलाया वरानने ।

प्रवक्ष्याम्यतिगुह्यं हि न कदापि प्रकाशयेत् ॥१॥

महामाया महालक्ष्मीर्महावाणी महेश्वरि ।

महादेवी महारात्रिर्महिषासुरमर्दिनी ॥२॥

कालरात्रि: कुहू: पूर्णानन्दद्या भद्रिका निशा ।

जया रक्ता महाशक्तिर्देवमाता कुशोदरी ॥३॥

शचीन्द्राणी शक्रनुता शङ्करप्रियवल्लभा ।

महाराहजननी मदनोन्मथिनी मही ॥४॥

वैकुण्ठनाथरमणी विष्णुवक्ष:स्थलस्थिता ।

विश्वेश्वरी विश्वमाता वरदाडभयदा शिवा ॥५॥

शूलिनी चक्रिणी मा च पाशिनी शङ्खधारिणी ।

गदिनी मुण्डमाला च कमला करुणालया ॥६॥

पद्माक्षधारिणी हंसा महाविष्णुप्रियङ्करी ।

गोलोकनाथरमणी गोलोकेश्वरीपूजिता ॥७॥

गया गङ्गा च यमुना गोमती गरुडासना ।

गणद्की सुर्यस्तापी रेवा चैव पयस्विनी ॥८॥

नर्मदा चैव कावेरी केदारस्थलवासिनो ।

किशोरी केशवसुता महेन्द्रपरिवन्दिता ॥९॥

ब्रह्मादिदेवनीर्माणकारिणी देवपूजिता ।

कोटिब्रह्मांडमध्यस्था कोटिब्रह्मांडकारिणी ॥१०॥

श्रुतिरुपा श्रुतिकरी श्रुतिस्मृतिपरायणा ।

इन्द्रा सिंहुनतया मातृद्ग लोकमातृका ॥११॥

त्रिलोकजननी तत्रा तंत्रमंत्रस्वरूपिणी ।

तरुणी च तमोहन्त्री मडलाल मडलायना ॥१२॥

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मधुकैटभमथनी शुम्भासुरविनाशिनी ।

निशुम्भादिहरा माता हरिशड्करपूजिता ॥१३॥

सर्वदेवमयी सर्वा शरणागतपालिनी ।

शरण्या शम्भुवनिता सिन्धुतीरनिवासिनी ॥१४॥

गन्धर्वगानरसिका गीता गोविन्दवल्लभा ।

त्रैलोक्यपालिनी तत्त्वरुपतारुण्यपूरिता ॥१५॥

चन्द्रावली चन्द्रमुखी चन्द्रिका चन्द्रमूजिता ।

चन्द्रा शड्करभगिनी गीतवाद्यपरायणा ॥१६॥

सृष्टिरुपा सृष्टिकरी सृष्टिसंहारकारिणी ।

इति ते कथितं देवी रमानाम-शताष्टकम् ॥१७॥

त्रिसन्ध्यं प्रयतो भूत्वा पठेदेतत्समाहितः ।

यं यं कामयते कामं तं तं प्राप्नोत्यसंशयः ॥१८॥

इमं स्तवं यः पठतीह मर्त्यो,

वैकुण्ठपदल्यानः परमादरेण ।

धनाधिपाद्यैः परिवन्दितः स्यात्

प्रयास्यति श्रीपद्मनत्कालि ॥१९॥

॥ इति कमलाया अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥

श्री कमला कवचम्

अथ वक्ष्ये महेशानि कवचं सर्वकामदम् ।

यस्य विज्ञानमात्रेण भवेत्साक्षात्सदाशिवः ॥१॥

नार्चनं तस्य देवेशि मन्त्रमात्रं जपेन्नरः ।

स भवेत्पावंतोः पुत्रः सर्वशास्त्रविशारदः ॥२॥

विद्यार्थिनां सदा सेव्या धनदात्रीविशेषतः ।

धनार्थिभिः सदा सेव्या कमला विष्णुवल्लभा ॥३॥

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विनियोगः

अस्याश्चतुरक्षरी विष्णुवल्लभाया: कवचस्य श्री भगवान शिव ऋषिरनुष्टुप्छन्दो वाग्भवी शक्तिदेवता वाग्भवं बीजं लज्जा रमा कीलकं कामबीजात्मकं वदनं मम सुपा ङिडितय-क दिङ्- सर्वसिद्धिसमृद्धये पा ठे विनियोगः ।

ऐड्‌कारो मस्तके पातु वाग्भवी सर्वसिद्धिदा ।

हीं पातु चक्षुषोर्मध्ये चक्षुर्युं ग्मे च शाङ्‌कुरी ॥४॥

जिह्वायां मुखवृत्ते च कर्णयोर्दन्तयोर्नसि ।

ओष्ठाघरे दन्तपङ्‌क्तौ तालुमूले हनौ पुनः ॥५॥

पातु मां विष्णुवदनिता लक्ष्मी: श्रीवर्णरूपिणी ॥६॥

कर्णयोर्मे भुजद्वये स्तनद्वये न पार्वती ।

हृदये मणिबन्धे च ग्रीवायां पाश्र्वयो: पुनः ॥७॥

पृष्ठदेशे तथा गुह्यो वामे च दक्षिणे तथा ।

उपस्थे च नितम्बे च नाभौ जङ्‌घाद्वये पुनः ॥८॥

जानुचक्रं पदद्वधे घुटिकेङ्‌गुलिमूलके ।

स्वधातुप्राणशक्त्यात्मसीमन्ते मस्तके पुनः ॥९॥

विजया पातु भवने जया पातु सदा मम ।

सर्वाङ्‌गे पातु कामेशी महादेवी सरस्वती ॥१०॥

तुष्टि: पातु महामाया उत्कृष्ट: सर्वदावतु ।

ऋद्धि: पातु महादेवी सर्वत्र शम्भुवल्लभा ॥११॥

वाग्भवी सर्गदा पातु पातु मां हरहोhिनी ।

रमा पातु महा देवी पातु माया स्वराड् स्वयं ॥१२॥

सर्वाङ्‌गे पातु मां लक्ष्मीविष्णुमाया सुरेश्वरी ।

शिवदूती सदा पातु सुन्दरी पातु सर्वदा ॥१३॥

शर्वी पातु सर्वत्र भैरवी सर्वदावतु ।

त्वरिता पातु मां नित्यमुप्रतारा सदावतु ॥१४॥

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पातु मां कालिका नित्यं कालरात्रिः सदावडतु ।

नवदुर्गा सदा पातु कामाक्षी सर्वदावडतु ॥१५॥

योगिन्यः सर्वदा पान्तु मुद्रा: पान्तु सदा मम ।

मात्रा पान्तु सदा देवयशक्रस्था योगिनीगणा: ॥१६॥

सर्वत्र सर्वकोपेषु सर्वकामेषु सर्वदा ।

पातु मां देवदेवी च लक्ष्मीः सर्वसमृद्धिदा ॥१७॥

इति ते कथितं दिव्यं कवचं सर्वसिद्धये ।

यत्र तत्र न वक्तव्यं यदीच्छेदात्मनो हितम् ॥१५॥

शठाय भक्तिहीनाय निन्दकाय महेश्वरौ ।

न्यूनींगे चातिरिक्तांगे दर्शयेत्न कदाचन ॥१६॥

न स्तवं दर्शयेदिव्यं सन्दर्श्य शिवहा भवेत् ।

कुलद्रोहाय महेच्छाय दुर्गाभक्तिपराय च ॥२०॥

वैष्णवाय विशुद्धाय दद्यात्मवचमुक्तमम् ।

निजशिष्याय शांताय धनिने ज्ञानीने तथा ॥२१॥

दद्यात् कवचमित्युक्तं सर्वतन्त्रसमन्वितम् ।

शनौ मङ्गलवारे च रक्तचन्दनकेस्तथा ॥२२॥

यावकेन लिखेन्त्रं सर्वतन्त्रसमन्वितम् ।

विलिख्य कवचं दिव्यं स्वयम्भुकुसुमैः शुभैः ॥२३॥

स्वशुक्रे: परशुक्रे वा नानागन्धसमन्वितैः ।

गोरोचना कुंकुमेन रक्तचन्दनकेन वा ॥२४॥

सुतिथौ शुभयोगे वा श्रवणायां रवर्दिने ।

आश्विन्यां कृत्तिकायां वा फाल्गुन्यां वा मधासुच ॥२५॥

पूर्वभाद्रपदायोगे स्वात्यां मङ्गलवासरे ।

विलखेत्प्रठेत्स्तोत्रं शुभयोगे सुरालये ॥२६॥

आयुष्मत्प्रितियोगे च ब्रह्मयोगे विशेषतः ।

इन्द्रयोगे शुभे योगे शुक्रयोगे तथैव च ॥२७॥

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कौलके बालके चैव वणिजे चैव सप्तमः । शून्यागारे श्मशाने च विजने च विशेषतः ॥२८॥

कुमार्यं पूजयित्वादौ यजेत्तद्वेव सनातनोम् । मत्स्यैमांसैः शाकसूपैः पूजयेत्परदेवताम् ॥२९॥

घृताद्यैः सोपकरणैः पुष्पधूपादिविशेषतः । ब्राह्मणान् भोजयित्वा च पूजयेत्तपरमेश्वरीं ॥३०॥

अखेटकमुपाख्यानं तत्र कुर्वीत दिनत्रयम् । तदाधरेन्महाविद्यां शङ्करेण प्रभाषिताम् ॥३१॥

मारणे द्रषणादीनि लभते नात्र संशयः । स भवेत्पार्वतीपुत्रः सर्वशास्त्रपुरस्कृतः ॥३२॥

गुरुदेवो हरः साक्षात्पत्नी तस्य हरिप्रिया । अभेदेन भजेत्स्तु तस्य सिद्धिरदूरतः ॥३३॥

पठति य इह मृत्योः नित्यमादरान्तरात्मा । जपफलमचुमेयं लप्स्यते यद्ध्विरेियम् ॥ स भवति पदमुच्चैः सम्पदां पादनम्र- क्षितिपमुकुटलक्ष्मीर्लक्षणानां चिराय ॥३४॥

॥ इति विश्वसारतन्त्रे कमलातिमका कवचम् ॥

श्री लक्ष्मी स्तोत्रम्

त्रैलोक्यपूजिते देवी कमले विष्णुवल्लभे । यथा त्वमचला कृष्णो तथा भव मयि स्थिरा ॥१॥

ईश्वरी कमला लक्ष्मीशचला भूतिर्हरिप्रिया । पद्मा पद्मालयां सम्पदुच्चैः श्रीः पद्मधारिणी ॥२॥

द्वादशेतानि नामानि लक्ष्मीं समपूज्य यः पठेत् । सस्थिरा लक्ष्मीर्भवेतस्य पुत्रदारादिभिः सह ॥३॥

॥ इति श्री लक्ष्मीस्तोत्रम् ॥

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विनियोग :

ॐ अस्य श्रीलक्ष्मी पञ्जर महामन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषि:, पंक्तिरच्छ्न्द:, श्रीमहालक्ष्मीदेवता, श्रीं बीजं स्वाहा शक्ति:, श्रीयै इति कीलकं, मम सर्वाभीष्टसिद्ध्यर्थे लक्ष्मी पञ्जर स्तोत्रजपे विनियोग: ॥

करन्यास :

ॐ श्रीं ह्रीं विष्णुवल्लभायै अंगुष्ठाभ्यां नम:। ॐ श्रीं ह्रीं जगज्जनन्यै तर्जनीभ्यां नम:। ॐ श्रीं ह्रीं सिद्धिसेवितायै मध्यमाभ्यां नम:। ॐ श्रीं ह्रीं सिद्धिदात्र्यै अनामिकाभ्यां नम:। ॐ श्रीं ह्रीं वाञ्छितपूरीकायै कनिष्ठिकाभ्यां नम:। ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं श्रियै नम: स्वाहेति करतल-करपृष्ठाभ्यां नम: ।

षडङ्गन्यास :

ॐ श्रीं ह्रीं विष्णुवल्लभायै हृदयाय नम:। ॐ श्रीं ह्रीं जगज्जनन्यै शिरसे स्वाहा। ॐ श्रीं ह्रीं सिद्धिसेवितायै शिखाये वषट्। ॐ श्रीं ह्रीं सिद्धिदात्र्यै कवचाय हुं। ॐ श्रीं ह्रीं वाञ्छितपूरीकायै नेत्राभ्यां वौषट्। श्रीं ह्रीं श्रीं श्रियै नम: स्वाहेत्यस्त्राय फट् ।

ध्यान :

ॐ वरदे लक्ष्म्यै परिशिवभ्रूयं शुद्धाज्ञानद्नदाभ्यां । तेजोरुपां कनकवसनां सर्वभूषोज्जवलाङ्गीं ॥ बीजापूरं कनककलश: हेमपद्यं दधानामध्यां । शक्त्ति भुक्ति सकलजननीं विष्णुवामाडूसंस्थाम् ॥१॥

शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि महालक्ष्मिन् हरिप्रिये । प्रसादं कुरु देवेशि मयि दुष्टेडपराधिनि ॥२॥

कोटिकन्दर्पलावण्यां सौन्दर्यै कस्वरुपताम् । सर्वमङ्गल-माङ्गल्यां श्रीरामां शरणं ब्रजे ॥३॥

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१०० | कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

मूलमन्त्र-षट्कमः

ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं नमो विष्णुवल्लभायै महामायायै कं खं गं घं डं नमस्ते नमस्ते मां पाहि पाहि रक्ष रक्ष धनं धान्यं श्रियां समृद्धिं देहि देहि श्रीं श्रियै नमः स्वाहा ।।१।।

ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं नमो जग-

उजनन्ये वातस्ल्यनिधये चं छं जं झं जं नमस्ते नमस्ते मां पाहि पाहि रक्ष रक्ष श्रियां प्रतिष्ठां वाकुसिद्धिं मे देहि देहि श्रीं श्रियै नमः स्वाहा ।।२।।

ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं नमः सिद्धि-सेवितायै सकलाभीष्ट-

दान-दीक्षितायै टं ठं डं ढं णं नमस्ते नमस्ते मां पाहि पाहि रक्ष रक्ष सर्वतोऽभयं देहि देहि श्रीं श्रियै नमः स्वाहा ।।३।।

ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं नमः सिद्धिदात्र्यै महा अचिन्त्यशक्तिक्कायै तं थं दं धं नं नमस्ते नमस्ते मां पाहि पाहि रक्ष रक्ष मे सर्वाभीष्टसिद्धिं देहि देहि श्रीं श्रियै नमः स्वाहा ।।४।।

ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं नमो वाङ्छितपूरिकायै सर्वसिद्धि-

मूलभूतायै पं फं बं भं मं नमस्ते नमस्ते मां पाहि पाहि रक्ष रक्ष मे मनोवाञ्छितां सर्वार्थभूतां सिद्धिं देहि देहि श्रीं श्रियै नमः स्वाहा ।।५।।

ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं कमले कमलालये मह्यं प्रसीद प्रसीद महालक्ष्मि

तुभ्यं नमो नमस्ते जगद्वितायै यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं नमस्ते नमस्ते मां पाहि पाहि रक्ष रक्ष मे वश्याकर्षण मोहनस्तम्भनोच्चाटनताडना-

चिन्त्यशक्तिवैभवं देहि देहि श्रीं श्रियै नमः स्वाहा ।।६।।

ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं धात्र्यै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं श्रीं बीजरूपायै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं विष्णुवल्लभायै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं सिद्ध्यै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं बुद्ध्यै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं धृत्यै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं मत्यै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं कान्त्यै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं शान्त्यै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं सर्वतोभद्ररूपायै नमः स्वाहा । ॐ नमो भगवति ब्रह्मादि-वेदमातर्वेदोद्भवे वेदगर्भे सर्वशक्तिशिरोमणे श्रीं हरि-

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श्री कमला स्तोत्र, कवच आदि । १०१

वल्लभे ममाभिष्टं पूरय पूरय मां सिद्धिभाजनं कुरु कुरु अमृतं कुरु कुरु अभयं कुरु कुरु सर्वं कार्येषु ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल मे सुतर्शक्ति दीपय दीपय ममाहितान्‌ नाशय नाशय असाध्य कायं साधय साधय ह्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं श्रीं श्रिये नमः स्वाहा ।

(इति लक्ष्मीमाला मन्त्रः १०५ जपं कुर्व्यात् ।।)

लक्ष्मी कवचम्‌ :

ॐ शिरो मे रक्षताद्‌ देवी पद्मा पद्माजधारीणी ।

भालं पातु जगन्माता लक्ष्मी: पद्मालया च मे ।१।।

मुखं पायान्महामाया हशौ मे भृगुनन्दका ।

ग्राणं सिन्धु सुरा पायात्ने त्रे मे त्रीष्णुबल्लभा ।२।।

कण्ठं रक्षतु कौमारी स्कन्धौ पातु हरिप्रिया ।

हृदयं मे सदा रक्षेत्सर्वशक्तिविधायिनी ।३।।

नाभिं सर्वेश्वरी पायात्सर्वभूतालयां च मे ।

कटिश्व कमला पातु ऊरू ब्रह्मादि देवता ।४।।

जंघे जगन्मयी रक्षेत्पादौ सर्व सुखावहा ।

श्री बीज वास निरता सर्वाङ्गे जनकात्मजा ।५।।

सर्वतोन्त्रदरुपा मामव्यू दिक्षु विदिक्षु च ।

विषमे सड्कटे दुर्गे पातु मां व्योमवासिनी ।६।।

इतीदं पञ्जरं लक्ष्म्या गुह्याद्‌ गुह्यतरं महत्‌ ।

गोपनीयं प्रयत्नेन न दद्यादस्य कस्य च ।

य: पठेत्प्रयतो नित्यं फलाहारी जितेन्द्रिय: ।७।।

ध्यायेल्लकष्मीषदं प्रीत्या, तस्य किञ्चित्‌ दुर्लंभं ।

विष्णोरनुज्ञा सहस्रेण समपुटीकृत्य य: पठेत्‌ ।८।।

पञ्चामृत प्रयत्नेन से सिद्धस्स्याद्विधा इह ।

विल्वपीठे लिखेद्यन्त्रं षट्कोणं मन्त्रसंयुतम्‌ ।९।।

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१०२ | कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

तत्र सम्पूज्यन्देवों तदग्रे पाठमाचरेत् ।

हरिद्रामालया सख्या कुर्यात्रित्यमतन्द्रितः ॥१०॥

सर्गसिद्धिमवाप्नोति यद्‍द्राच्छति सत्स्वरम् ॥११॥

॥ इति श्री अथर्वणरहस्ये श्रीलक्ष्मीपञ्जरस्तोत्रं समाप्तं ॥

श्री प्रसन्नवरदा श्रीलक्ष्मीस्तोत्रम्

जय पद्मपलाशाक्षि जय त्वं श्रीपतिप्रिये ।

जय मातर्महालक्ष्मि संसारार्णवतारिणि ॥१॥

महालक्ष्मि नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं सुरेश्वरी ।

हरिप्रिये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं दयानिधे ॥२॥

पद्मालये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं च सर्वदे ।

सर्वभूतहितार्थाय वसुवृष्ट सदैव कुरु ॥३॥

जगन्मातार्नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं दयानिधे ।

दयावति नमस्तुभ्यं विश्वेश्वरी नमोस्तु ते ॥४॥

नमः क्षीरार्णवसुते नमस्त्रैलोक्यधारिणि ।

वसुधिष्ठे नमस्तुभ्यं रक्ष मां शरणागतम् ॥५॥

रक्ष त्वं देवदेवेशि देवदेवस्य वल्लभे ।

दरिद्रात्राहि मां लक्ष्मि कृपां कुरु ममोपरि ॥६॥

नमस्त्रैलोक्यजननि नमस्त्रैलोक्यपावनि ।

ब्रह्मादयो नमन्ते त्वां जगदानन्ददायि॰न ॥७॥

विष्णुप्रिये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं जगद्धते ।

आतिहीना नमस्तुभ्यं सर्मृद्धि कुरु मे सदा ॥८॥

अञ्जवारे नमस्तुभ्यं चललायै नमो नमः ।

चञ्चलायै नमस्तुभ्यं ललितायै नमो नमः ॥९॥

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नमः प्रच्युस्नजननिमातस्तुभ्यं नमो नमः । परिपालय भो मातर्मातुभ्यं शरणागतम् ॥१०॥

शरण्ये त्वां प्रपन्नोऽस्मि कमले कमलालये । त्राहि-त्राहि महालक्ष्मि परित्रानपरायणे ॥११॥

पाण्डित्यं शोभते नैव न शोभन्ति गुणा नरे । शोलत्वं नैव शोभेत महालक्ष्मि त्वया बिना ॥१२॥

तावद्विराजते रूपं तावच्च्छील विराजते । तावद्गुणा नराणाच्च यावल्लक्ष्मी प्रसादति ॥१३॥

लक्ष्मी त्वयालंकृतमानवा ये पार्पाविमुखा नृपलोकमान्या: । गुणैर्विहीना गुणिनो भवन्ति दुःशीलिन: शीलवतां वरिष्ठा: ॥१४॥

लक्ष्मी:शून्यं पश्यते क्लम् । लक्ष्मीर्भू पश्यते विद्यां सर्वाल्लक्ष्मीविषिश्यते ॥१५॥

लक्ष्मीं त्वद्गुणकोर्तननेन कमला भूयात्यलं जिह्वतां, हृद्राद्या रवि चन्द्र देवपतयो वक्त्रुश्च नैव क्षमा: । अस्माभिस्तव रूपलक्षणगुणा वक्तुं कथं शक्यते, मातर्मां परिपाहि विश्वजननि कृत्वा ममेष्टं ध्रुवम् ॥१६॥

दीनार्तिभी:ल्तं भवतापपीडितं धनैर्विहीनं तव पाश्र्वमागतं । कृपानिधिपालयनं सततं धनश्रियान्वितं कुरु ॥१७॥

मां विलोक्य जननि हरिप्रिये निर्धनं तव समीपमागतं । देहि मे झटिति लक्ष्म कराग्र वस्त्राकाशनव रात्रिन्दिवं भुतम् ॥१५॥

त्वमेव जननी लक्ष्म पिता लक्ष्म त्वमेव च । भ्राता त्वं च सखा लक्ष्म विद्या लक्ष्म त्वमेव च ॥१६॥

त्राहि त्राहि महालक्ष्म त्राहि त्राहि सुरेश्वरी । त्राहि त्राहि जगन्मातर्दरिद्रिद्रात्राहि विगत: ॥२०॥

नमस्तुभ्यं जगद्धात्रि नमस्तुभ्यं नमो नमः । धर्माधारे नमस्तुभ्यं नमः सम्पत्तिदायिनी ॥२१॥

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दरिद्राणवमनोडहं निमग्नोडहं रसातले ।

मज्जन्तं मां करे धृत्वा सूददर त्वं रमे द्रुतम् ॥२३॥

कि लक्ष्म बहुनोक्तेन जल्पितेन पुनः पुनः ।

अन्यान्ये शरणं नास्ति सत्यं सत्यं हरीप्रिय ॥२४॥

एतच्छ्रुत्वागस्तिवाक्यं हृष्यमाणा हरिप्रिया ।

उवाच मधुरां वाणीं तुष्टाहं तव सर्वदा ॥२५॥

यस्त्वयोक्तमिदं स्तोत्रं यः पठष्यति मानवः ।

शृणोति च महाभागस्तस्याहं वशर्वदिनी ॥२६॥

नित्यं पठति यो भक्त्या तवलक्ष्मीस्तस्य नश्यति ।

ऋणक्षय नश्यते तीत्नं वियोगं नैव पश्यति ॥२७॥

यः पठेत्स्तोत्रमूथ्थीय श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।

गृहे तस्य सदा स्थास्ये नित्यं श्रीपतिना सह ॥२८॥

सुखसौभाग्यसम्पन्नो मनस्वी बुद्धिमान् भवेत् ।

पुत्रवान् गुणवान्श्रेष्ठो भोग भोक्ता च मानवः ॥२९॥

इदं स्तोत्रं महापुण्यं लक्ष्म्यगस्तिप्रकीर्तितम् ।

विष्णुप्रसादजननं चतुर्वर्गफलप्रदम् ॥३०॥

राजद्वारे जयश्चैव शत्रोश्चैव पराजयः ।

भूतप्रेतोपशान्तीनां व्याध्राणां न भयं तथा ॥३१॥

न शस्त्रानलतोयौघादुभयं तस्य प्रजायते ।

दुर्वृत्तानां च पापानां बहुहानिकरं परम् ॥३२॥

मन्दुराकरिशालासु गवां गोष्ठे समाहितः ।

पठेतद्दोपशान्त्यर्थं महापातकनाशनम् ॥३३॥

सर्वसौख्यकरं नृणामयुरारोग्यदं तथा ।

अगस्तिमुनिना प्रोक्तं प्रजानां हितकाम्यया ॥३४॥

॥ इत्यगस्तिविरचितं लक्ष्मीस्तोत्रं समाप्तम् ॥

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सत्यःफलदा लक्ष्मीस्तवहृदयम्

श्रीमत्सौभाग्य जननिं स्तौमि लक्ष्मीं सनातनीम् । सर्वकामफलदात्रीं साधनैकसुखावहाम् ॥१॥

श्रीवैकुण्ठस्थिते लक्ष्मीं समागच्छ ममाप्रतः । नारायणेन सह मां कृपाहस्त्यावलोकय ॥२॥

सत्यलोकस्थिते लक्ष्मीं त्वं समागच्छ सन्निधिम् । वासुदेवेन सहितां श्रसीद वरदा भव ॥३॥

श्वेतद्वीपस्थिते लक्ष्मीं शोभ्रमागच्छ सुव्रते । विष्णुना सहिते देवी जगन्मातः प्रसीद मे ॥४॥

श्रीरामविधसंस्थते लक्ष्मीं समागच्छ समाधवे । त्वत्कृपाहष्ठिसुधया सततं मां विलोकय ॥५॥

रत्नगर्भस्थिते लक्ष्मीं परिपूर्ण हिरण्मयी । समागच्छ समागच्छ स्थित्वा सुपुरतो मम ॥६॥

स्थिरा भव महालक्ष्मिं निश्चला भव निर्मले । प्रसन्ने कमले देवी प्रसन्ना वरदा भव ॥७॥

श्रोथरे श्रीमहाभूमे त्वदनुस्थ महानिधिम् । श्रीधरमूर्तिधरेय पुत्रः पदर्शनय सर्वथा ॥८॥

वसुन्धरे श्रीवसुधे वसुदोगधे कृपामयी । त्वत्कुक्षिगत सर्वस्वं शीतलं मे तु दर्शय ॥९॥

विष्णुप्रिये रत्नगर्भे समस्तफलदे शिवे । त्वदूर्गर्भगत हेमादीन् सम्प्रदर्शय दर्शय ॥१०॥

अत्रोपविश्य लक्ष्मीं त्वं सिथरा भव हिरण्मयी । सुस्थिरा भव सप्रेत्या प्रसन्नवरदा भव ॥११॥

सादरे मस्तके हस्तं मम तव कृपया पुनि । सर्वराजग्रहे लक्ष्मीं त्वत्कला मयि तिष्ठतु ॥१२॥

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यथा वैकुण्ठनगरे यथैव क्षीरसागरे ।

तथा मद्भवने तिष्ठ स्थिरं श्रीविष्णुना सह ॥१३॥

आद्यालक्ष्मिम महालक्ष्मिं विष्णुवामाङ्कसंस्थिते ।

प्रत्यक्षं कुरु मे रूपं रक्ष मां शरणागतम् ॥१४॥

समागच्छ महालक्ष्मीं धनधान्यसमन्विते ।

प्रसीद पुरतः स्थित्वा प्रणतं मां विलोकय ॥१५॥

दया सुरूप्ट कुरुतां मयि श्रीः ।

सुवर्णवृष्टिं कुरु मे गृहे श्रीः ॥१६॥

महालक्ष्मीः समुद्दिश्य निशि भागववासरे ।

इदं श्रीहृदयं जप्त्वा शतवारं धनी भवेत् ॥

॥ इति श्री सत्यःफलदा लक्ष्मी स्तव हृदयं ॥

श्री कमला स्तोत्रम्

श्रीपुरन्दर उवाच :

नमः कमलावासिन्यै नारायण्यै नमो नमः ।

कृष्णप्रियायै सततं महालक्ष्म्यै नमो नमः ॥१॥

पद्मपत्रेक्षणायै च पद्मास्यायै नमो नमः ।

पद्मासनायै पद्मिन्यै वैष्णव्यै च नमो नमः ॥२॥

सर्वसम्पत्स्वरूपिण्यै सर्वाराध्यै नमो नमः ।

हरिभक्तिगदात्र्यै च हर्षदात्र्यै नमो नमः ॥३॥

कृष्णवक्षःस्थितायै च कृष्णोष्ठायै नमो नमः ।

चन्द्रशोभायै रत्नपद्मे च शोभने ॥४॥

सम्पत्यधिष्ठातृदेव्यै महादेव्यै नमो नमः ।

नमो वृद्धिस्वरूपायै वृद्धिदायै नमो नमः ॥५॥

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वेकुण्ठे याऽऽलक्ष्मीर्यालक्ष्मी: क्षीरसागरे । स्वर्गलक्ष्मीरिन्द्रगेहे राजलक्ष्मीस्तु पालये ॥६॥

गृहलक्ष्मीश्च गृहिणी गेहे च गृहदेवता । सुरभि: सागरे जाता दक्षिणा यज्ञकामिनी ॥७॥

अदितिर्देवमाता त्वं कमला कमलालयाऽ। स्वाहा त्वं च हविर्दाने कव्यदाने स्वधा स्मृता ॥८॥

त्वं हि विष्णुस्वरुपा च सर्वाधारा वसुन्धरा । शुद्धसत्वस्वरुपा त्वं नारायणपरायणा ॥९॥

क्रोधहिसार्जिता च वरदा शारदा शुभा । परमार्थप्रदा त्वं च हरिहास्यप्रदा परा ॥१०॥

यया विना जगत्सर्वं भस्मीभूतमसारकम् । जीवन्मृतं च विश्वं च शाश्वत्सर्वं यया विना ॥११॥

सर्वेषां च परा माता सर्वबांधवरुपिणी । धर्मार्थकाममोक्षाणां त्वं च कारणरुपिणी ॥१२॥

यथा माता स्तनांधानां शिशूनां शैशवे सदा । तथा त्वं सर्वदा माता सर्वेषां सर्वरुपतः ॥१३॥

मातृहीन: स्तनांधस्तु स च जीवति दैवतः । त्वया हीनो जन: कोडपि न जीवत्येव निशिचतम् ॥१४॥

सुप्रसन्नस्वरुपा त्वं मां प्रसन्ना भवांबिके । वैरिग्रस्तं च विषयं देहि मह्यं सनातनि ॥१५॥

अहं याचस्वया हीनो बन्धुहीनश्च भिक्षुक: । सर्वसम्पद्धिहीनश्च तावदेव हरिप्रिये ॥१६॥

ज्ञानं देहि च धर्मं च सर्वसौभाग्यमोप्सितम् । प्रभावं च प्रतापं च सर्वाधिकारमेव च ॥१७॥

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१०५। कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

जयं पराक्रमं युद्धे परमैश्वर्यमेव च।

श्री नारायण उवाच :

इत्युक्त्वा च महेन्द्रश्च सर्वैः सुरगणैः सह ॥१६॥

प्रणमाम साश्रुनेत्रो मुद्रां चैव पुनः पुनः ।

ब्रह्मा च शक्रश्चैव शेषो धर्मश्च केशवः ॥१७॥

सर्वे चक्रुः परिहारं सुरार्थे च पुनः पुनः ।

देवेभ्यश्च वरं दत्वा पुष्पमालां मनोहराम् ॥२०॥

केशवाय ददौ लक्ष्मीः संतुष्टा सुरसंसदि ।

यपुदेवाश्च संतुष्टाः स्वं स्वं स्थानं च नारद ॥२१॥

देवी ययौ हरे: स्थानं हषटा क्षीरोदशायिनः ।

यतुश्चैव स्वगृहं ब्रह्मा शानौ च नारदः ॥२२॥

दत्वा शुभाशिषं तौ च देवेभ्यः प्रीतिपूर्वकम् ।

इदं स्तोत्रं महापुण्यं त्रिसन्ध्यं य पठेन्तर: ॥२३॥

कुबेरतुल्यः स भवेद्राजेश्वरो महान् ।

पश्ललक्षजपेनैव स्तोत्रसिद्ध्यर्भवेन्रीणाम् ॥२४॥

सिद्धस्तोत्रं यदी पठेन्मासमेकं तु सन्ततम् ।

महासुखी च राजेंद्रो भविष्यति न संशय: ॥२५॥

॥ इति श्री कमला स्तोत्रम् ॥

श्री कमलालिमकोपनिषत्

अथ लोकान् पर्यटन् सनत्कुमारो ह वैदेहः । पुण्यांचलाल्लोकानतीत्य वैष्णववंशाम दिव्यगणोपेतं । विद्रुमवेदिकामणिमुक्तागणाचितं प्राप ।

तत्रापश्यन् महामायां पराद्दूर्यवस्त्राभरणोत्तरीयां पर्यङ्कस्थां पारे चरन्तीमादिदेवं भगवन्तं परमेश्वरं हष्ठवा च तौ गद्गदवाक्-प्रफुल्लरसो स्तुतिमुपचक्रम ॥

वाचं मे दिशतु श्रीदेवी मनो मे दिशतु वैष्णवी । ओजस्तेजो

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बलं दाक्ष्यं बुद्धिवेभवमस्तु मे ॥ त्वत्प्रसादाद् भगवति प्रज्ञानं मे ध्रुवं भवेत् । शन्नो दिशतु श्रीदेवी महामाया । वैष्णवी शक्तिराद्या यामसाध्य स्वयमादिदेवो भगवान् परावरज्ञस्थितथा सम्भन्नो लोकांस्त्रीनू सृजत्यवत्यत्ति च । यद् भ्रूविक्षेपबलमापन्नो हृदजयोनिस्तदितरे चामरा मुख्याः सृष्टिचक्रप्रवर्तारः सम्बन्धूवः ये वै वरदस्त्वापीयं सुप्रसन्ना सुखयति सहस्रपुरुषान् ये लोकाः सन्ततमनन्ति शिरसा हृदये न च तामेकां लोकपूज्यां न ते दुर्गेति यान्ति भूताः ॥

अय महत्वया समृद्धया साम्राज्येन पुत्रैः पौत्रैरन्वितो भूमिपृष्ठे शतं समस्त इज्याभिरिष्टवा देवान् पितृन् मनुष्यानथ भूरिदक्षिणाभि-स्वतत्प्रसादान्महान्तो गच्छन्ति वैष्णवं लोकमनुभवाय ये राजर्षयो ब्रह्मपुण्यस्तेषपि चासत्कृतू त्वां प्रागसन्त एव सुखममनन्ति नान्यः पन्था विद्यतेsयनाय किं पुनरिहादिदेवो भगवान् नारायणस्त्वां सविधदेववितं करोति । किं वर्णये त्वां सहस्रकृत्वो नमस्ते ॥

य इमा ऋचः पठन्ति प्रातरुत्थाय भूरि दान तेभ्यां किमश्निदिह यावशिष्टय्यदैश्वर्यं दुल्लभं प्राणिनां हि ॥ इति कमलात्मकोपनिषत् सम्पूर्णा ॥

श्रीमहालक्ष्मी हृदयम्

विनियोगः

आद्यादि श्रीमहालक्ष्मीहृदयमालामन्त्रस्य भृगुव ऋषिः आद्यादि श्रीमहालक्ष्मीदैवता, अनुष्टुबादिनानाच्छन्दास, श्रीं बीजम्, हीं शक्तिः, ऐं कीलकम, आदादिमहालक्ष्मीप्रसादसिध्यर्थ जपे विनियोगः ।

न्यासः

ॐ भार्गव ऋषये नमः शिरसि । अनुष्टुबादिनानाच्छन्देश्यो नमः मुखे । आद्यादिमहालक्ष्म्यै देवतायै नमो हृदये । श्रीं बीजाय नमः गुह्ये ।

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हीं शक्तये नमः पादयोः। ऐं कोलकाय नमः नाभौ। ॐ विनियोगाय नमः सर्वाङ्गेषु।

कर-न्यास :

ॐ श्रीं अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ हीं तर्जनीभ्यां नमः। ॐ ऐं मध्यमाभ्यां नमः। ॐ श्रीं अनामिकाभ्यां नमः। ॐ हीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ ऐं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।

षडङ्गन्यास :

ॐ श्रीं हृदयाय नमः। ॐ हीं शिरसे स्वाहा। ॐ ऐं शिखायै वषट्। ॐ श्रीं कवचाय हूँ। ॐ हीं नेत्रत्र्याय वौषट्। ॐ ऐं अस्त्राय फट्।

'ॐ श्रीं हीं ऐं' इति दिग्बन्धः।

ध्यानम् :

हस्तद्वयेन कमले धारयन्तीं स्वलीलया । हारनूपुरसंयुक्तां लक्ष्मीं देवों विचिन्तये॥

सम्पूज्य प्रार्थयेत् :

शङ्खचक्रगदाहस्ते शुभवर्णे सुवासिनि । मम देहि वरं लक्ष्मि सर्वसिद्धिप्रदायिनि॥

'ॐ श्रीं हीं ऐं महालक्ष्म्यै कमलधारिण्यै सिहवाहिन्यै स्वाहा' इति मन्त्रं जपित्वा स्तोत्रं पठेत्।

वन्ते लक्ष्मीं परिशिवमयीं शुद्धजाम्बूनदाभां । तेजोरुपां कनकवसनां सर्वभूपोज्जवलाढ्याम्॥ बीजापूरं कनककलशं हेमपद्मं दधान- माद्यांशक्तिसकलजननीं विष्णुवामाङ्कसंस्थाम्॥११॥

श्रीमत्सौभाग्यजननीं स्तौमि लक्ष्मीं सनातनीं । सर्वकामफलावाप्ति साधने कुसुमावहां ॥१२॥

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स्मरामि नित्यं देवेशि त्वया प्रेरितमानसः । त्वदाज्ञां शिरसा धृतवा भजामि परमेश्वरीं ॥३॥

समस्तसम्पत्सुखदां महाश्रियम्, समस्तसौभाग्यकरीं महाश्रियम् । समस्तकल्याणकरीं महाश्रियम्, भजाम्यहं ज्ञानकरीं महाश्रियम् ॥४॥

विज्ञानसम्पत्सुखदां सनातनీं, विचित्रवाग्भूतकरीं मनोहराम् । अनन्तसामोदसुखप्रदायिनीं, नमाम्यहं भूतिकरीं हरिप्रियाम् ॥५॥

समस्तभूतान्तरसंस्थिता त्वं, समस्तभोक्त्रृश्वरेशी विभवरूपा । तन्नास्ति यद्वद्यतिरिक्तवस्तु, त्वत्पादपद्मं प्रणमाम्यहं श्रीः ॥६॥

दारिद्र्यदुःखौघतमोपहन्त्रीं, त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व । दीनार्तविच्छेदनहेतुभूते, कृपाक्षरांभोरभरिष्णु मां श्रीः ॥७॥

अम्ब प्रसादं करणसुविद्याद्रष्ट्रया, मां त्वत्कृपा-द्रविणगेहिमं कुरुष्व । आलोक्य प्राणतहृद्गतशोकहन्त्रीं, त्वत्पादपद्मयुगलं प्रणमाम्यहं श्रीः ॥८॥

शान्त्यै नमोऽस्तु शरणागतवत्सलायै, कान्त्यै नमोऽस्तु कमनीयगुणाश्रयायै । क्षान्त्यै नमोऽस्तु दुरितक्षयकारणायै, धात्र्यै नमोऽस्तु धनधान्यसमृद्धिदायै ॥९॥

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शक्त्यै नमोऽस्तु शशिशेखरसं स्तुतायै, रत्यै नमोऽस्तु रजनीकरसोदरायै ।

भक्त्यै नमोऽस्तु भवसागरतारकायै, मत्यै नमोऽस्तु मधुसूदनवल्लभायै ॥१०॥

लक्ष्म्यै नमोऽस्तु शुभलक्षणलक्षितायै, सिद्ध्यै नमोऽस्तु शिवसिद्धिपूजितायै ।

धृत्यै नमोऽस्त्वमितदुर्गतिभञ्जनायै, गत्यै नमोऽस्तु वरदूर्गतिदायकायै ॥११॥

देव्यै नमोऽस्तु दिवि देवगणाचितायै, भूत्यै नमोऽस्तु भुवनात्रिविनाशनायै ।

दात्र्यै नमोऽस्तु धरणीधरवल्लभायै, पुष्ट्यै नमोऽस्त पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥१२॥

सुतீत्र - दारिद्रय - विदु:ख - हन्त्र्यै , नमोऽस्तु ते सर्वभयापह:ङ्र्यै ।

श्रीविष्णुवक्ष:स्थलसंस्थितायै, नमस्सर्वविभूतिदायै ॥१३॥

जयतु जयतु लक्ष्मीर्लक्षणालंकृताड्गी, जयतु जयतु पद्मा पद्मासद्माभिवन्द्या ।

जयतु जयतु विद्या विष्णुवामाड्गसंस्था, जयतु जयतु सम्यक्सर्वसम्पत्करी श्री: ॥१४॥

जयतु जयतु देवी देवस:ङ्गाभिपूज्या, जयतु जयतु भद्रा भार्गवी भाग्यरूपा ।

जयतु जयतु नित्या निर्मलज्ञानवेद्या, जयतु जयतु सत्या सर्वभूतान्तरस्था ॥१५॥

जयतु जयतु रम्या रत्नगर्भान्तरस्था, जयतु जयतु श्रद्धा श्रुतिजास्सद्बतादाभा ।

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जयतु जयतु कान्ता कान्तिमदुभासिताड्‌डी, जयतु जयतु शान्ता शीघ्रमागच्छ सौम्ये ॥१६॥

यस्या: कलाद्या: कमलोद्भवाद्या, रुद्राश्राच शक्रप्रभुखाश्च देवा: । जीवन्ति सर्वा अपि शक्त्यस्ता:, प्रभृतमाप्ता: परमायुषस्ते ॥१७॥

लिलेख नितिले विधिरमंलिलिपिं विसृज्यान्तरं, विलिखितव्यमेतदिति तत्फलप्राप्तये । तदन्तरफलेऽस्फुटं कमलवासिनी श्रीरमां, सम्पीय समुद्रिकां सकलभाग्यसं सूचिकाम् ॥१८॥

कलया ते यथा देवी जीवंति सचराचरा:, तथाऽसम्पत्करां लक्ष्मीं सर्वदा सम्प्रसाद मे ॥१९॥

यथा विष्णुघु वे नित्यं स्वकलां सन्न्यवेशयत् । तथैव स्वकलां लक्ष्मिं मथि सम्यक् समर्पय ॥२०॥

सर्वसौख्यप्रदे देवी भक्तानामभयप्रदे । अचलां कुरु यत्नेन कलां मथि निवेधिताम् ॥२१॥

मुदास्तां मद्भाले परमपदलक्ष्मी: स्फुटकला । सदा वैकुण्ठश्रीनिवसतु कला मे नयनयो: ॥२२॥

वसत्सत्ये लोके मे वचसि लक्ष्मीविरकला । श्रियर्सर्वेतद्रूपे निवसतु कला मे स्वकलयो: ॥२२॥

तावन्नित्यं ममांगेपु क्षीराब्धौ श्रीकला वसेत् । सूर्याचन्द्रमसौ यावद्वाल्लक्ष्मीपत: श्रिया ॥२३॥

सर्वं झूलसम्पूर्णा सर्वेश्वर्यसमन्विता । आद्यादिश्रीमहालक्ष्मी त्वत्कला मयि तिष्ठतु ॥२४॥

अज्ञानतिमिरं हन्तुं शुद्धज्ञानप्रकाशिका । सर्वेश्वर्यप्रदामेतु त्वत्कला मयि सन्स्थितता ॥२५॥

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अलक्ष्मों हरतु:क्षिप्रं तमः सूर्यप्रभा यथा । वितनोतु मम श्रेयस्त्वक्ला मयि संस्थितता ॥२६॥

ऐश्वर्य-मड्‌डलोत्पत्तिस्त्वक्लायां निधीयते । मयि तस्मात्कृतार्थोऽसिम पात्रमस्मिन् स्थितेस्तव ॥२७॥

भवदावेशभाग्याहों भाग्यवानसिम भर्गवि । त्वत्प्रसादात्पवित्रोऽहं लोकमातर्नमोऽस्तु ते ॥२८॥

पुनासि मां त्वं कलयैवयस्मादत: समागच्छ ममाग्रतस्त्वम् । परमपदं श्रीभवसुप्रसन्ना मध्यच्युतेन प्रविशादिलक्ष्मीं ॥२९॥

श्रीवैकुण्ठिस्थिते लक्ष्मीं समागच्छ ममाग्रतः । नारायणेन सह मां कृपाहस्तयाड्‌वलोकय ॥३०॥

सत्यलोकस्थिते लक्ष्मीं त्वं ममागच्छ सन्निधिम् । वासुदेवेन सहितां प्रसाद वरदा भव ॥३१॥

श्वेतद्वीपस्थिते लक्ष्मीं शीघ्रमागच्छ सुव्रते । विष्णुना सहिते देवी जगन्मात: प्रसीद मे ॥३२॥

क्षीराम्बुधिस्थिते लक्ष्मीं समागच्छ समाधवे । त्वत्कृपाहृष्टमुदया सततं मां विलोकय ॥३३॥

रत्नगर्भस्थिते लक्ष्मीं परिपूर्णहिरण्मये । समागच्छ समागच्छ स्थित्वाड्‌ड्यु पुरतो मम ॥३४॥

स्थिरो भव महालक्ष्मी निश्चला भव निश्चले । प्रसन्ने कमले देवी प्रसन्नहृदया भव ॥३५॥

श्रीधरे श्रीमहाभूते त्वदन्त:स्थं महानिधिम् । श्रीग्रामुद्वद्‌ध्य परत: प्रदर्शय समर्पय ॥३६॥

वसुन्धरे श्रीवसुधे वसुदोग्र्रि कृपामयी । त्वत्कृपागतरस्वस्वं शीघ्रं मे सम्प्रदर्शय ॥३७॥

विष्णुप्रिये रत्नगर्भे समस्तफलदे शिवे । त्वद्गर्भोदितदानेऽदीन् सम्प्रदर्शय वार्षभ ॥३८॥

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रसातलगते लक्ष्मि शीघ्रमागच्छ मे पुरः ।

न जाने परमं रूपं मातरमे संपदर्शिय ॥३६॥

आविर्भेव मनोवेगाच्छीघ्रमागच्छ मे पुरः ।

मा वत्स भैरिहत्युकतवा कामं गौरिव रक्ष मामू ॥४०॥

देति शीघ्रं समागच्छ शरणागर्भसंस्थिते ।

मातस्त्वद्भूतभव्योऽहं मृगये त्वां कुतूहलात् ॥४१॥

उत्तिष्ठ जागृहि त्वंने समुत्तिष्ठ सुजागृहि ।

अक्षयां हेमकल्शान्तं सुवर्णेन सुपूरिताम् ॥४२॥

निक्षेपान् मे समाकृष्य समुद्दृत्य ममाप्रत: ।

समुन्नताना भूतानां समाधेहि धरान्तरात् ॥४३॥

मत्सन्निधिं समागच्छ मदाहितकृपारसात् ।

प्रसीद श्रेयसांदोग्रे लक्ष्मि मे नयनाभ्रवत: ॥४४॥

अन्नोपविसृं लक्ष्मि त्वं स्थिरा भव हिरण्मयी ।

सुस्थिरा भव सम्प्रीत्या प्रसीद वरदा भव ॥४५॥

आनीय त्वं तथा देवी निधीनं मे संपदर्शय ।

अद्य क्षणेन सहसा दत्वा संरक्ष मां सदT ॥४६॥

मयि तिष्ठ तथा नित्यं यथेष्टद्रविष्ट तिष्ठसि ।

अभयं कुरु मे देवी महालक्ष्मि नमोडस्तु ते ॥४७॥

समागच्छ महालक्ष्मि शङ्कजासनदप्रेमे ।

प्रसीद पुरतः स्थित्वा प्रणतं मां विलोकय ॥४८॥

लक्ष्मि भुवं गं गता भासि यत्र यत्र हिरण्मयी ।

तत्र तत्र स्थिता त्वं मे तव रूपं प्रदर्शय

क्रीडते बहुधा भूमौ परिपूर्णहिदण्मये ।

मम मूर्द्धनि ते हस्तमविलम्बितमरिंपुय ॥५०॥

फलदूभागयोदये लक्ष्मि समस्तपुरवासिनि ।

प्रसीद मे महालक्ष्मि परिपूर्णमना भवे ॥५१॥

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अयोध्यादिषु सर्वेषु नगरेषु समस्थिते ।

वैभवैर्विविधैर्युक्ता समागच्छ बलान्विते ॥५२॥

समागच्छ समागच्छ ममाग्रे भव सुस्थिरा ।

करुणारसनि:स्पन्द-नेत्रद्रय-विलासिनी ॥५३॥

सन्निधत्स्व महालक्ष्मि त्वत्पाणि मम मस्तके ।

करुणासुधया मां त्वमभिषिञ्च स्थिरीकुरु ॥५४॥

सर्वराजगृहे लक्ष्मि समागच्छ भुदान्विते ।

स्थितवाशु पुरतो मेsद्य प्रसादेनाभयं kuru ॥५५॥

सादरं मस्तके हस्तं मम त्वं कृपयार्पय ।

सर्वराजगृहे लक्ष्मि त्वत्कला मयि तिष्ठतु ॥५६॥

आद्यादि श्रीमहालक्ष्मि विष्णुवामाङ्कसंस्थते ।

प्रत्यक्षं कुरु मे रूपं रक्ष मां शरणागतम् ॥५७॥

प्रसीद मे महालक्ष्मि सुप्रसीद महाशिवे ।

अचला भव सम्प्रीत्या सुस्थिरा भव मद्गृहे ॥५८॥

यावत्तिष्ठन्ति वेदाश्च यावतत्त्वन्नाम तिष्ठति ।

यावद्विष्णुश्च यावर्स्वं तावत्कुरु कृपां मयि ॥५९॥

चान्द्री कला यथा शुक्ले वर्द्धते सा दिने दिने ।

तथा दया ते मय्येव वर्द्धतामभिवर्द्धताम् ॥६०॥

यथा वैकुण्ठनगरे यथा वै क्षीरसागरे ।

तथा मद्दूवने तिष्ठ स्थिरं श्रीविष्णुना सह ॥६१॥

योगिनां हृदये नित्यं यथा तिष्ठसि विष्णुना ।

तथा मद्दूवने तिष्ठ स्थिरं श्रीविष्णुना सह ॥६२॥

नारायणस्य हृदये भवतो यथास्ते नारायणोपि तव हृत्तकमले ।

यथास्सते । नारायणस्स्वमपि नित्यमुभौ तथैव तौ तिष्ठतां हदि ममापि दयावति श्री: ॥६३॥

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विज्ञानवृद्ध हृदये कुरु श्री: सौभाग्यवृद्धिं कुरु मे गृहे श्री: ।

दया सुवृद्धिं कुरुता मयि श्री: सुवर्णवृद्धिं कुरु मे गृहे श्री: ॥६४॥

न मां त्यजेथाः श्रितकल्पवल्लि सद्दृक्तचिन्तामणिकामधेनेो ।

विश्वस्य मातर्भव सुप्रसन्ना गृहे कलत्रेषु न पुत्रवर्गे ॥६५॥

आद्यादि माये त्वमजाण्डबीजं त्वमेव साकार-निराकृति स्वम् ।

स्वया धृताश्चाऽजभवाण्डसृष्ट्या चित्रं चरित्रं तव देिव विष्णो: ॥६६॥

ब्रह्मादिदेवो वेदाश्चापि न शक्नुयु: ।

महिमानं तव स्तोतुं मन्दोऽहं शक्नुयां कथं ॥६७॥

अम्ब त्वदृत्तसाक्यानि सूक्ता सूक्तानि यानि च ।

तानि स्वोकुरु सर्वज्ञे दयालुत्वेन सादरमू ॥६८॥

भवतिं शरणं गतवां कृ्तार्थी: स्यः पुरातनः ।

इति सक्षिन्न्त्य मनसा त्वामहं शरणं ब्रजे ॥६९॥

इति वेदप्रमा णाद्दि देिव त्वां शरणं ब्रजे ।

अनन्ता नित्यसुखिनस्त्वद्रूपा: स्वपरायणाः ॥७०॥

इति सक्षिन्न्त्य सक्षिन्न्त्य प्राणान्संधारयाम्यहं ।

तव प्रतिज्ञा मद्दृक्ता न नश्यन्तीत्यपि क्वचिदू ॥७१॥

त्वदधी नस्त्वहं मातस्त्वकृपा मयि विद्यते ।

यावत्सम्पूर्णकाम: स्या्त्तावदेहि दयानिधे ॥७२॥

क्षणमात्रं न शक्नोमि जीवितुं त्वत्कृपां विना ।

न जीवंतीह जलजा जलं त्यक्तवा जलग्रहा: ॥७३॥

यथाहि पुत्र वात्सल्याडजननी प्रस्तुतस्तनी ।

वत्सं त्वरितमागत्य सम्प्रीणर्यति वत्सला ॥७४॥

यदि स्यांतव पुत्रोऽहं माता त्वं यदि मामकी ।

दया पयोधरस्तन्य सुभाभिरभिशिश्व माम् ॥७५॥

मध्येो न गणलेशोऽपि मयि दोषैकमद्विदरे ।

पांसूनां वृष्टिविन्दूनां दोषाणाश्र नमेमित: ॥७६॥

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पापिनामहरिवान्यो दयालूनान् त्वमप्रणी: । दयनीयो मदन्योऽस्ति तव कोटत्र जगत्रये ॥७७॥

विधिनाह्न्न सृष्टश्चेन्न स्यात्तव दयालुता । आमयो वा न सृष्टश्चेदौषधस्य वृथोदय: ॥७८॥

कृपा मद्ग्रजा किं ते अहं किं वा तदग्रज: ! विचार्य देहि मे वित्तं तव देविऽ दयानिधे ॥७९॥

माता पिता त्वं गुरु सद्गति: श्रीस्त्वमेक सज्जीवनहेतुभूता । अन्यन्न मन्ये जगदेकनाथे त्वमेव सर्वं मम देविऽ सत्ये ॥८०॥

आद्यादिलक्ष्मीर्भव सुप्रसन्ना विशुद्वविज्ञानसुखैकदोग्ध्री । अज्ञानहन्त्री त्रिगुणातिरिक्ता प्रज्ञाननेत्री भव सुप्रसन्ना ॥८१॥

अशेषवाग् जाड्यमलाप हन्त्री नवन्तनं स्पष्ट सुवाक् प्रदायिनी । ममेह जिह्वाग्र सुरङ्ग नर्त्तकी भव प्रसन्ना बदने च मे श्री: ॥८२॥

समस्तसम्पद् विराजमाना, समस्ततेजश्चयभासमाना । विष्णुप्रिये त्वम् भव दीप्यमाना, वाग्देवता मे नयने प्रसन्ना ॥८३॥

सर्वं प्रदर्शे सकलार्थदे त्वं प्रभा सुलावण्य दया प्रदोग्ध्री । सुवर्णदे त्वं सुमुखी भव श्रीहिरण्मयी मे नयने प्रसन्ना ॥८४॥

सर्वार्थदा सर्वजगत्प्रसूति: सर्वेश्वरी सर्वभयाप हन्त्री । सर्वज्ञता त्वं सुमुखी भव श्रीहिरण्मयी मे नयने प्रसन्ना ॥८५॥

समस्त-विघ्नौघ-विनाशकारिणी समस्तभक्तोद्धरणे विचक्षणा । धनन्त-सौभाग्य-सुखप्रदायिनी हिरण्मयी मे नयने प्रसन्ना ॥८६॥

देविऽ प्रसीद दयनीयरतमाय मह्यं देवाधिनाथ भव देवगणाभि-वन्द्ये । मातस्तथैव भव सन्निहिता हशोरं पत्या समं मम मुखे भव सुप्रसन्ना ॥८७॥

मा वऽशभैरभयदानकरोऽपतस्ते मौलौ ममेति मम दीनदयानु-कम्पे । मात: समर्पय मुदा करुणाकटाक्षं माऽऽडम्बरैर्जमिह न: सृज जन्प्रमात: ॥८८॥

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कटाक्ष इह कामधुक्तव मनस्तु चिन्तामणि: कर: सुरतह: सदा सवनिधिस्तवमेवेन्दिरे। भवत्तव दयारसो मम रसायनं चान्वहं मुखं तब कलानिर्धीर्विविध वाच्छतार्थप्रदम् ॥५९॥

यथा रसस्पर्शनतोड्यसोपि सुवर्णता स्यादकमले तथा ते । कटाक्षसंस्पर्शनतो जनानामझलानामपि मडलं तवम् ॥६०॥

देहीति नास्तीति वच: प्रवेशादभीतो रमे त्वां शरणं प्रपद्ये । अत: सदाऽसिमन्न भयप्रदा त्वं महैव पत्या मयि सन्निधेहि ॥६१॥

कल्पद्रुमेण मझ्जना सहिताऽ सुरम्या श्रीस्ते कलामयी रसेन रसायनेन । आस्तां यतो मम न हंकु शिरपाणिपादस्पृष्टा: सुवर्णवपुष: स्थिररजोऽमा: स्यु: ॥६२॥

आद्यादिविष्णो: स्थिरधर्मपत्नी त्वमेव पत्या मयि सन्निधेहि । आद्यादिलक्ष्मिं त्वदनुग्रहेण पदे पदे मे निधिदर्शनं स्यात् ॥६३॥

आद्यादि लक्ष्मीहृदयं पठेद: स राज्यलक्ष्मीमचलां तनोति । महादरिद्रोऽपि भवेद्धनाढ्यस्तदन्वये श्री: स्थिरतां प्रयाति ॥६४॥

यस्य स्म रणमात्रेण तुष्टा स्यादू विष्णुवल्लभा । तस्याभीष्टं ददात्याशु तं पालयति पुत्रवत् ॥६५॥

इदं रहस्यं हृदयं सर्वकामफलप्रदम् । जप: पाठश्च नित्यं तु पुरश्चरणमुक्तये ॥६६॥

त्रिकालमेककलं वा नरो भक्ति-समन्वित: । य: पठेच्छृणुयाद्वापि स याति परमां श्रियम् ॥६७॥

महालक्ष्मीं समुदिश्य निशि भार्गववासरे । इदं श्रीहृदयं जप्त्वा पञ्चवारं धनी भवेत् ॥६८॥

अनेन हृदयेनान्तं गर्भिण्या अभिमन्त्रितम् । ददाति तत्कुले पुत्रो जायते श्रीपत: स्वयम् ॥६९॥

नरेण द्वादशाब्द्यां नोऽथ्यां लक्ष्मीहृदयमन्त्रितम् । जले पीते च तदंशे मन्दभाग्यो न जायते ॥१००॥

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य आश्विने मासि च शुक्लपक्षे रमोत्सवे सन्निहितेसु भक्त्यां ।

पठेत्तथैकोत्तरवारवृद्धया लभेत्स सौवर्णमयीं सुवृष्टिम् ॥१०१॥

य एकभक्तोन्वहमेकवर्षं विशुद्धधी: सप्ततिवारजापी ।

स मुन्दभाग्योऽपि रमाकटाक्षाद भवेत सहस्राक्षशताधिकश्री: ॥१०२॥

श्रीशांदिभर्भक्त हृरिदासदास्यं प्रसन्नमन्त्रार्थहृदैकनिष्ठाम् ।

गुरो: स्मृति निर्मलबोधबुद्धि प्रदेहि मात: परमं पदं श्री: ॥१०३॥

पृथ्व्योपतित्त्वं पुरुजोत्तमत्त्वं विभूतिवासं विविधार्थसिद्धिम् ।

संपूर्णकीर्ति बहुवर्षभोगं प्रदेहि मे लक्ष्मि पुन: पूनस्त्वम् ॥१०४॥

वादार्थसिद्धिं बहुलोकवश्यं वय: स्थरत्नं ललनाासुभोगं ।

पौत्रादिलबन्ध सकलार्थसिद्धिं प्रदेहि मे भाग्यवि जन्मजन्मनि ॥१०५॥

सुवर्णवृद्धिं कुरु मे गृहे श्रीविभूतिवृद्धिं कुरु मे गृहे श्री: ।

शिरोबीज—ॐ यं हं कं लं पं श्रीं ।

ध्यायेल्लक्ष्मीं प्रहसितमुखीं कोटिबालार्कभासां ।

विद्युज্জ्वर्णाम्बरवरधरां भूषणालङ्कृतां सुशोभाम् ॥१०६॥

बीजापूरं सरसिजयुगलं विभ्रतीं स्वर्णपत्रं ।

भर्त्रायुक्तां मुहरभयदां मह्यमश्यचुतश्री: ॥१०७॥

गुह्यागुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मृतं जपम् ।

सिद्धिं मे देहि त्वत्प्रसादान्मयी स्थिरा ॥१०८॥

॥ इति श्री अथर्वणरहस्ये श्रीलक्ष्मीहृदयस्तोत्रं समाप्तं ॥

श्रीलक्ष्मीसहस्रनामस्तोत्रम्

ॐ तामाह्वयामि सुभगां लक्ष्मीं त्रैलोक्यपूजिताम् ।

एह्येति देवी पद्माक्षि पद्माकरकृतालये ॥१॥

आगच्छागच्छ वरदे पश्य मां स्वेन चक्षुषा ।

आयाह्यायाहि धर्मार्थकाममोक्षमये शुभे ॥२॥

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एवंविधे: स्तुतिपदै: सत्यैसत्य्यार्थसंसतुता ।

कनीयसी महाभागा चन्द्रेण परमात्मना ॥३॥

निशाकरशच सा देवी भ्रातरौ द्वौ पयोनिधे: ।

उत्पन्नमात्रौ तावास्तां शिवकेशवसंश्रितौ ॥४॥

सनत्कुमारस्तमृषि समाभाष्य पुरातनम् ।

प्रोक्तञ्ज्ञानतिञ्जासं तु लक्ष्म्या: स्तोत्रमुत्तमम् ॥५॥

अथेह शान्महाधोराहि द्रियांनरकात्कथम् ।

मुक्तिभंवति लोकेडस्मिन् दारिद्रूयं याति भस्मताम् ॥६॥

सनत्कुमार उवाच :

पूर्व क्रतयुगे ब्रह्मा भगवान् सर्वलोककृत् ।

सृष्टिनानाविधा कृत्वा पश्चाच्चिन्तामुपेयिवान् ॥७॥

किमाहार: प्रजास्वेता: सम्भविष्यन्ति भूतले ।

तथैव चासां दारिद्रूयात्कथमुत्तरणं भवेत् ॥८॥

दारिद्रूयान्मरणं श्रेयस्त्वति सञ्चिन्त्य चेतसि ।

क्षीरोदस्योत्तरे कूले जगाम कमलोड्भव: ॥९॥

तत्र तीव्र तपस्तप्वा कदाचित्परमेश्वरम् ।

ददर्श पुण्डरीकाक्षं वासुदेवं जगद्गुरुम् ॥१०॥

सर्वज्ञ सर्वशक्तीनां सर्वावासं सनातनम् ।

सर्वेश्वरं वासुदेवं विष्णु लक्ष्मीर्पात प्रभुम् ॥११॥

सोमकोटिप्रतीकाशं क्षीरोदविमले जले ।

अनन्तभोगशयनं विश्रान्तं श्रोणिकेतनम् ॥१२॥

कोटिसूर्यप्रतीकाशं महायोगेश्वरेशवरम् ।

योगनिद्रारतं श्रीशं सर्वावास सुरेशवरम् ॥१३॥

जगदुत्पत्तिसहारस्थितिकारणकारणम् ।

लक्ष्म्यादिशक्तिकरणं जात मण्डल मण्डितम् ॥१४॥

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आयुधैर्हरिवदृश्य चक्रायैः परिवारितम् ।

दुर्निरीक्ष्यं सुरैः सिद्धैर्महायोनिशतैरपि ॥१५॥

आधारं सर्वशक्तीनां परं तेजः सुदुर्लभम् ।

प्रभुत्वं देवमोक्षाणां हृद्या कमलसम्भवः ॥१६॥

शिरस्यर्ज्जलिमाथाय स्तोत्रं पूर्वमुवाच ह ।

मनोवांछित सिद्धिं त्वं पूरयस्य महेश्वर ॥१७॥

जितं ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन ।

नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुषपूर्वज ॥१८॥

सर्वेश्वर जयानन्द सर्वावास परात्पर ।

प्रसीद मम भक्तस्य छिधि सन्देहजं तमः ॥१९॥

एवं स्तुतः स भगवान् ब्राह्मणायक्तजनमना ।

प्रसादाभिमुखः प्राह हरिविश्वान्तलोचनः ॥२०॥

श्री भगवानुवाच :

हिरण्यगर्भ तुष्टोऽस्मि ब्रूहि यत्तेऽभिवाञ्छितम् ।

तद्रक्ष्यामि न सन्देहो भक्तोऽसि मम सुकृत् ॥२१॥

केशवाद्दचनं श्रुत्वा करुणाविष्टचेतनः ।

प्रत्युवाच महाबुद्धिर्भगवन्तं जनार्दनम् ॥२२॥

चतुर्विधं भवस्यास्य भूतसर्गस्य केशव ।

परित्राणाय मे ब्रूहि रहस्यं परमाद्भुतम् ।

दारिद्र्यशमनं धन्यं मनोऽञ्जनं पावन परम् ॥२३॥

सर्वेश्वर महाबुद्धे स्वरूपं भैरवं महत् ॥२४॥

श्रियः सर्वातिशायिन्यास्तथा ज्ञानं च शाश्वतम् ।

नामानि चैव मुख्यानि यानि गौणानि चाच्युतः ॥२५॥

स्वधर्मवक्त्रकमलोथ्यानि श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।

इति तस्य वचः श्रुत्वा प्रतिवाक्यमुवाच सः ॥२६॥

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श्रीभगवानुवाच :

महाविभूतिसंयुक्ता षाड्गुण्यवपुरुष: प्रभो: ।

भगवद्वासुदेवस्य नित्यं चैषाड्गपारायणो ॥२७॥

एकैव वत्सीतद्भिन्ना ज्योत्स्नेव हिमदीधित: ।

सर्वशक्तिहिमका चैव विश्वं व्याप्य व्यवस्थितता ॥२८॥

सर्वेश्वर्यगुणोपेता नित्यशुद्धस्वरूपिणी ।

प्राणशक्ति: परा ह्यो पै सर्वेषां प्राणिनां शुभि ॥२९॥

शक्तीनां चैव सर्वासां योनिभूता परा कला ।

अहं तस्या: परं नाम्नां सहस्रविदमुत्तमम् ॥३०॥

श्रृणुष्वावहितो भूत्वा परमेश्वर्यभूषितम् ।

देव्याख्यास्मृतिमात्रेण दारिद्रयं याति भस्मताम् ॥३१॥

श्री: पद्मा प्रकृति: सत्वा शान्ता चिच्छक्तिरंगया ।

केवला निष्फला शुद्धा व्यापिनी व्योमविग्रहा ॥३२॥

व्योमपदाकृताधारा परा व्योमा मतोच्यते ।

निर्योममा व्योममध्ये स्था पश्चाद्व्योमपदाश्रिता ॥३३॥

अच्युता व्योमनिलया परमानन्दरूपिणी ।

नित्यशुद्धा नित्यतृप्ता निष्कलङ्का निराकृतिः ॥३४॥

ज्ञानशक्ति: कतुं शक्तिभोक्तृशक्ति: शिखावहा ।

स्नेहाभासा निरानन्दा विभूतिविमला कला ॥३५॥

अनन्ता वैष्णवी व्यक्ता विश्वानन्दा विकाशिनी ।

शक्तिविभिन्नसर्वात्मा समुद्रपरितोषिणी ॥३६॥

मूर्ति: सनातनी हार्दी निस्तरङ्गा निरामया ।

ज्ञानज्ञेया ज्ञानगम्या ज्ञानज्ञेयविकासिनी ॥३७॥

स्वेच्छान्दर्शकिगंहना निष्कम्पार्चि: सुनिर्मला ।

स्वरूपा सर्वगाडपारा वृहिणी सुगुणोज्ज्वता ॥३८॥

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अकलङ्का निराधारा निःसङ्कुल्पा निराश्रया ।

असङ्कीर्णा सुशान्ता च शाश्वती भासुरी स्थिरा ॥३९॥

अनौपम्या निर्विकल्पा निर्यन्त्रा यन्त्रवाहिनी ।

अभेद्या भेदिनी भिन्ना भारती वैखरी खगात् ॥४०॥

अग्राह्या ग्राहिका गूढा गम्भीरा विश्वगोपिनी ।

अनिर्देश्याड्प्रतिहता निर्बीजा पावनी परात् ॥४१॥

अप्रतर्क्याडपारमिता भवभ्रान्तिविनाशिनी ।

एका द्विरुपा त्रिविधा असंख्याता सुरेश्वरी ॥४२॥

सुप्रतिष्ठा महाधात्री स्थितिवृद्धिदृढा गति: ।

ईश्वरी महिमा ऋद्धि: प्रमोदा उज्ज्वलोदमा ॥४३॥

अक्षया वर्धमाना च सुप्रकाशा विहङ्गमा ।

नीरजा जननी नित्या जया रोचिष्मती शुभा ॥४४॥

तपोनुदा च ज्वाला च सुदीप्तशुमालिनी ।

अप्रमेया त्रिधा सूक्ष्मा परा निर्वाणदायिनी ॥४५॥

अवदाता सुबुद्धा च अमोघाख्या परम्परा ।

सन्धानकी शुद्धविद्या सर्वभूतमहेश्वरी ॥४६॥

लक्ष्यीस्तुष्टिर्महाधीरा शान्तिरपुनरोन वा ।

अनुग्रहाशक्तिरद्या जगज्ज्येष्ठा जगद्विधृत् ॥४७॥

सत्या प्रज्ञा क्रियायोग्या ह्यपराह्लादिनी शिवा ।

सम्पूर्णाह्लादिनी शुद्धा ज्योतिष्मत्यमतावहा ॥४८॥

रजोवत्यर्कप्रतिभाड्कर्षिणी कर्षिणी रसा ।

परा वसुमती देवी कान्तिः शान्तिमति: कला ॥४९॥

कला कलङ्करहिता विशालोद्दीपनी रतिः ।

सम्बोधिनी हारिणी च प्रभावा भवभूतिदा ॥५०॥

अमृतस्यनिदानो जीवा जननी खण्डिका स्थिरा ।

भूमा कलावती पूर्णा भासुरा सुवती रसा ॥५१॥

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शुद्धा ध्वनि: सृति: सृष्टिटविकृति: कृष्णतरेव च ।

प्रापणी प्राणदा प्रज्ञा विश्वा पाण्डुरवासिनी ॥५२॥

अवनिवंजनलिका चित्रा ब्रह्माण्डवासिनी ।

अनन्तरुपानन्तात्मानन्तस्थान्तसम्भवा ॥५३॥

महाशक्ति: प्राणशक्ति: प्राणदात्री रतिम्भरा ।

महासमूहा निखिला इच्छाधारा सुखावहा ॥५४॥

प्रत्यक्षलक्ष्मीनिष्कम्पा प्ररोहबुद्धि गोचरा ।

नानादेहा महावर्ता बहुदेहविकासिनी ॥५५॥

सहस्राणी प्रधाना च न्यायवस्तुप्रकाशिका ।

सर्वाभिलाषपूर्णेच्छा सर्वा सर्वार्थभाषिणी ॥५६॥

नानास्वच्छपचिद्दात्री शब्दपूर्वा पुरातना ।

व्यक्ता दिव्यतनुर्जीवकेशी सर्वेच्छापूरिता ॥५७॥

सड्कल्पसिद्धा सांख्येया तत्वगर्भा धरावहा ।

भूतरूपा चित्स्वरुपा त्रिगुणा गुणगर्विता ॥५८॥

प्रजापतीश्वरी रौद्री सर्वषारा सुखावहा ।

कल्याणवाहिका कल्या कलिकल्मषणाशिनी ॥५९॥

निरुपद्रवदृढसन्ताना सुयन्त्रा त्रिगुणालया ।

महामाया योगमाया महायोगेश्वरी प्रिया ॥६०॥

महास्री विमला कीर्तिजया लक्मीनिरंजन ।

प्रकृतिभंवर्नमाया शक्तिनिद्रा यशस्करी ॥६१॥

चिन्ता बुद्धिर्यश: प्रज्ञा शान्तिराष्टातिवर्द्धिनी ।

प्रद्युम्नमाता साध्वी च सुखसौभाग्यसिद्धिदा ॥६२॥

काष्ठा निष्ठा प्रतिष्ठा च ज्येष्ठा श्रेष्ठा जयावहा ।

सर्वातिशायिनी प्रीतिविश्वशक्तिमहाबला ॥६३॥

वरिष्ठा विजया वीरा जयन्ती विजयप्रदा ।

हृदग्राहा गोपनी गुप्ता गणगन्धर्वसेविता ॥६४॥

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योगेश्वरी योगमाया योगिनी योगसिद्धिदा ।

महायोगेश्वरवृता योगा योगेश्वरप्रिया ॥१६४॥

ब्रह्मेन्द्रद्रवनिमिता सुरासुरवरप्रदा ।

त्रिवर्गदा त्रिलोकस्था त्रिविक्रमपदोद्भवा ॥१६५॥

सुतारा तारणी तारा दुर्गा सन्तारणी परा ।

सुतारिणी तारयन्ती भूरितारेश्वरप्रभा ॥१६६॥

गुह्यविद्या यज्ञविद्या महाविद्यासुशोभिता ।

अध्यात्मविद्या विघ्नेशी पद्मस्था परमेष्ठिनी ॥१६७॥

आन्वीक्षिकी त्रियी वार्ता दण्डनीतिरनुत्तमा ।

गौरी वागीश्वरी गोष्ठ्री गायत्री कमलोद्भवा ॥१६८॥

विश्वम्भरा विशवरूपा विश्वमाता वसुप्रदा ।

सिद्धः स्वाहा स्वधा स्वस्ति सुधा सर्वार्थसाधिका ॥१६९॥

इच्छा सृष्टिरिति भूति तिः कीर्तिः श्रद्धा दया मतिः ।

श्रुतिः स्मृथा धृतिः हीः श्रीविद्या विबुधवन्दिता ॥१७०॥

अनसूया वृणा नोर्त्तिनिर्वृति कामदुधुकुरा ।

प्रतिज्ञासन्ततित भूः तिर्योः प्रज्ञा विश्वमातिनी ॥१७१॥

स्मृतिर् वाग्विश्वजननी पश्यन्ती मध्यमा समा ।

सन्ध्या मेधा प्रभा भीमा सर्वाकारा सरस्वती ॥१७२॥

काक्षी माया महामाया मोहिनी माधवप्रिया ।

सौम्याभोगा महाभोगा भोगिनी भोगदायिनी ॥१७३॥

सुधौतकनकप्रख्या सुवर्णकमलासन ।

हिरण्यगर्भा सुश्रोणी हारिणी रमणी रमा ॥१७४॥

चन्द्रा हिरण्मयी ज्योत्स्ना रम्या शोभा शुभावहा ।

त्रैलोक्यमण्डना नारी नरे श्वरवराचिता ॥१७५॥

त्रैलोक्यसुन्दरी रामा महाविभववाहिनी ।

पद्मस्था पद्मनिलया पद्ममालाविभूषित ॥१७६॥

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पद्मयुग्मधरां कान्ता दिव्याभरणभूषिता । विचित्ररत्नमुकुटा विचित्राम्बरभूषणा ॥७८॥

विचित्रमाल्यगन्धाढ्या विचित्रायुधवाहना । महानारायणी देवी वैष्णवी वीरवन्दिता ॥७९॥

कालसर्पविषापह्णी घोरा तत्त्वविकोषिणी कला । जगत्सम्पूरणी विश्वा महाविभवभूषणा ॥८०॥

वारुणी वरदा व्याख्या घण्टाकर्णविराजिता । नृसिंह भीरवो ब्राह्मी भास्करी व्योमचारिणी ॥८१॥

ऐन्द्री कामद्रुः सृष्टिः कामयोनिर्महाप्रभा । दृष्टा काम्या विशवशक्तिर्‌व्जगत्स्यात्मदर्शना ॥८२॥

गरुडारूढरहदया चान्द्री श्रीमद्धुरानना । महाग्रहुप्ता वाराही नारसिंही हेतासुरी ॥८३॥

युगान्तहुतभुज्वाला कराला पिङ्गुला कला । त्रैलोक्यभूषणा भीमा श्यामा त्रैलोक्यमोहिनी ॥८४॥

महोत्कटा महारक्ता महाचण्डा महासना । शड्‌खिनी लेभिनी वस्था लिखिता खेचरेश्वरी ॥८५॥

भद्रकाली चैव वीर कौमारी अवमानिनी । कल्याणी कामदुध्वालामुखी चोत्तमालालिका ॥८६॥

वालिका धनदा सूर्या हृदयोत्पलमालिका । अजिता वर्षिणी रीतिभेरंड गरुडासना ॥८७॥

वैश्वानरी महामाया महाकाली विभीषणा । महामन्दारविभवा शिवानन्दा रतिप्रिया ॥८८॥

उद्रीतिः पद्ममाला च धर्मवेगा विभावनी । सत्क्रिया देवसेना च हिरण्यरजताश्रया ॥८९॥

सहसावर्तमाना च हस्तिनादप्रबोधिनी । हिरण्यपत्प्रवर्णा च हरिभद्रा सुगुद्ररा ॥९०॥

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सूर्या हिरण्यप्रकटसहशी हेममालिनी ।

पद्मनना नित्यपुष्टा देवमाताडमृतोद्भवा ॥६१॥

महाथना च या श्रृङ्गी काञ्ची कम्बुकण्ठरा ।

आदित्यवर्णा चन्द्राभा गन्धद्वारा दुरासदा ॥६२॥

वरारोहा वरारोही वरेण्या विष्णुवल्लभा ।

कल्याणी वरदा वामा वामेशी विन्ध्यवासिनी ॥६३॥

योगनिद्रा योगरता देवकी कामरूपिणो ।

कंसविद्रावणी दुर्गा कौमारी कौशिकी क्षमा ॥६४॥

कात्यायनी कालरात्रिनिशितुप्ता सुदुर्जया ।

विरुपाक्षी विशालाक्षी भक्तानां परिरक्षिणो ॥६५॥

बहुरूपा स्वरूपा च विरूपा रूपवर्जिता ।

घण्टानिनादबहुला जीमूतद्वनिनिस्वना ॥६६॥

महादेवेंद्रमथिनी श्रृङ्गीटिकुटिलानना ।

सत्योपयाचिता चंका कौबेरी ब्रह्मचारिणो ॥६७॥

आर्या यशोदासुतदा धर्मकामार्थमोक्षदा ।

दारिद्र्यदु:खशमनी घोरदुर्गातिनाशिनी ॥६८॥

भक्तातिशयनी भव्या भवभर्गापहारिणो ।

क्षोराब्धितनया पद्मा कमला धरणीधरा ॥६९॥

रुक्मिणी राधिका सीता महालक्ष्मा यशस्विनी ।

प्रज्ञाधाराजमिताबुद्धिर्वेद माता यशोवतो ॥१००॥

समाधिर्भावना मंत्र्री करुणा भक्तवत्सला ।

अंतर्यंदी दक्षिणा च ब्रह्मचर्यपरायण: ॥१०१॥

दीक्षा वक्षा परीक्षा च समीक्षा वीरवत्सला ।

अम्बिका सुरभि: सिद्दा सिद्धविद्याधरार्चिता ॥१०२॥

सुदीप्ता लेलिहाना च कराला विश्वपूरणा ।

विश्वसंधारणी धैर्यस्तापना ताण्डवप्रिया ॥१०३॥

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श्री कमला स्तोत्र, कवच आदि। १२५

उद्भवा विरजा राझो तापनी विन्दुमालिनी।

क्षीरधारासुप्रभावा लोकमाता सुवर्चसा ॥१०४॥

हव्यगर्भा राज्यगर्भा जुह्हतो यज्ञसम्भवा ।

आप्यायनी पावनी च दहनी दहनाश्रया ॥१०५॥

मातृका माधवी मुच्या मोक्षलक्ष्मीमहार्षिदा ।

सर्वकामप्रदा भद्रा सुभद्रा सर्वमङ्गला ॥१०६॥

श्वेता सुशुक्लवसना शुक्लमाल्यानुलेपना ।

हंसा हीनकरी हंसी हृद्या हुत्कमलालया ॥१०७॥

सितातपत्रा सुश्रोणी पद्मपत्रायतेक्षणा ।

सावित्री सत्यसङ्ल्पा कामदा कामकामिनी ॥१०८॥

दर्शनीया हशा हश्या स्पृष्या सेव्या वराङ्गना ।

भोगप्रिया भोगवती भोगीन्द्रशयनासना ॥१०९॥

आर्द्रा पुष्करिणी पुण्या पावनी पापसूदनी ।

श्रीमती च शुभाकार परमैश्वर्यंभूतिर्दा ॥११०॥

अचिन्त्यानन्तविभवा भवभावविभावनी ।

निश्रेणिः सर्वदेहस्था सर्वभूतनमस्कृता ॥१११॥

बला बलाधिक देवी गौमती गोकुलालया ।

तोषणी पूर्णचन्द्राभा एकानन्दा शतानन्दा ॥११२॥

उद्यानवनराजद्रुमश्रृङ्गारम्योवनवासिनी ।

कूष्माण्डीदान्विता चण्डा किराती नन्दनालया ॥११३॥

कालायना कालगम्या भयदा भयनाशिनी ।

सौदामिनी मेघरवा दैत्यदानवमर्दिनी ॥११४॥

जगन्माता भयकरी भूतनाथी सुदुर्लभा ।

काश्यपी शुभदाना च वनमाला शुभा वरा ॥११५॥

धन्या धन्येश्वरी धन्या रत्नदा वसुर्द्धिनी ।

गन्धर्वी रेवती गौरी शकनी विमलानना ॥११६॥

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इडा शान्तिकरी चैव तामसी कमलालया ।

आज्यपा वज्रकौमारी सोमपा कुमुमाश्रया ॥११७॥

जगत्प्रिय! ह सरथा दुर्जया खगवाहना ।

मनोभवा कामचारा सिद्धचारणसेविता ॥११८॥

व्योमलक्ष्मीमहालक्ष्मीस्तेजोलक्ष्मी: सुजोव्वला ।

रसलक्ष्मीर्जगद्योनिर्निर्गन्धलक्ष्मीर्वनाश्रया ॥११९॥

श्रवणा श्रावणा नेत्रा रसनाप्राणचारिणी ।

विरिश्विमाता विभवा वरवारिजवाहना ॥१२०॥

वीर्या वीरेवरी वन्द्या विशोका वसुर्द्धिनी ।

अनाहता कुण्डलिनी नलिनी वनवासिनी ॥१२१॥

गान्धारिणीन्द्रनमिता सुरेन्द्रनमिता सती ।

सर्वमङ्गलमङ्गल्या सर्वकामसमृद्धिदा ॥१२२॥

सर्वानन्दा महानन्दा सत्कीर्ति: सिद्धसेविता ।

सिनीवालि कुहू राका अमा चानुमतिर्युति: ॥१२३॥

अरुन्धती वसुमती भार्गवी वास्तु देवता ।

मायूरी वज्रवेताली वज्रहस्ता वरानना ॥१२४॥

अनघा धरणिर्धीरा धमनी मणिभूषणा ।

राजश्रीरुपसहित ब्रह्म श्रीर्न्न्विता ॥१२५॥

जयश्रीर्जयदा जेया सर्गश्री: स्वर्गति: सताम् ।

सुपुष्पा पुष्टनिलया फलश्रीर्निष्कलप्रिया ॥१२६॥

धनुलक्ष्मीस्त्वमिलिता परक्रोधनिवारिणी ।

कद्रूर्द्धनायु: कपिला सुरसा सुरमोहिनी ॥१२७॥

महाश्वेता महानोला महामूर्तिविषापहा ।

सुप्रभा ज्वालिनी दीप्तिस्त्रिवर्ग्याप्ति: प्रभाकरि ॥१२८॥

तेजोवती पद्मबोध्या मदलेखा रुणावती ।

रत्ना रत्नावलीभूता शतधामा शतावहा ॥१२९॥

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श्री कमला स्तोत्र, कवच आदि । १३१

त्रिगुणा घोषिणी रक्ष्या नर्दिनी घोषवर्जिता । साध्यादितिदितिहेवे मृगवाहा मृगाड्डूगा ॥१३०॥

चित्रनीलोत्पलगता वृषरत्नकराश्रया । हिरण्यरजतदद्रा शुद्धभद्रासनस्थिता ॥१३१॥

गोमूत्रगोमयैकक्षीरदाधिसप्तलेश्रया । मरीचिशचीरवसना पूर्णा चन्द्राकविष्ठरा ॥१३२॥

सुसूक्ष्मा नित्यं तिस्थूला निवृत्तारातिरेव च । मरोचिज्वालिनी धूम्रा हृदयवाहा हिरण्यदा ॥१३३॥

दायिनी कालिनी सिद्धिः शोशिणी समप्रबोधिनी । भास्वरा संहतीक्ष्णा प्रचण्डज्वलनोज्ज्वला ॥१३४॥

साङ्गा प्रचण्डा दोप्ता च वैद्युति: सुमहायुतिः । कापिला नीरजा च सुभुम्ना विस्फुलिङ्गिनी ॥१३५॥

अर्चिष्मतो रिपुहरा दीर्घा धूमावली जरा । सम्पूर्णमण्डला पूषा सुंसिनी सुमनोहरा ॥१३६॥

जया पुष्टिकरी च्छाया मानसा हृदयोज्ज्वला । सुवर्णकारिणी श्रेष्ठा मृतसज्जीवनी रणे ॥१३७॥

विशल्यकरणी शुभ्रा सन्धिनी परमौषधिः । ब्रह्मिष्ठा ब्रह्मसहिता ऐन्दवी रत्नसम्भवा ॥१३८॥

विद्युत्प्रभा बन्दुमता त्रिस्वभावगुणान्विता । नित्योदिता नित्यहष्ठा नित्यकामकरीषिणी ॥१३९॥

पद्माढ्या वज्रजिह्वा व वक्रदण्डा विभासिनी । विदेहपूजिता कन्या माया विजयवाहिनी ॥१४०॥

मानिनी मड्‌डला मान्या मानिनी मानदायिनी । विश्वेश्वरी गणवती मण्डला मण्डलेश्वरी ॥१४१॥

हरिप्रिया भौमसुता मनोज्ञा मतिदायिनी । प्रत्यङ्गिरा सोमगुप्ता मनोभिज्ञा वदन्मतिः ॥१४२॥

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यसोधरा रत्नमाला कृष्णा त्रैलोक्यबन्धिनी ।

अमृताधारिणी हर्षा विनता वल्लकी शाची ॥१४३॥

संकल्पा भामिनी मिश्रा कादम्बर्यामृता प्रभा ।

आगता निगता वज्ञा सुहिता सहिताक्षता ॥१४४॥

सर्वार्थसाधनकरी धानुन्दारणिकामला ।

करुणाथारसम्भूता कमलाक्षी शशिप्रिया ॥१४५॥

सौम्यरुपा महादीप्ता महाज्वाला विकासिनी ।

माला काश्चनमाला च सद्ज्ञा कनकप्रभा ॥१४६॥

प्रक्रियापरमा भोक्त्री क्षोभिका च सुखोदया ।

विजृम्भणा च वज्ञाख्या श्रृङ्खला कमलक्षणा ॥१४७॥

जयंकरी मधुमतो हरिता शशिनी शिवा ।

मूलप्रकृतिरेशानी योगमाता मनोजवा ॥१४८॥

धर्मोदया भानुमती सर्वाभासा सुखावहा ।

घुरन्धरा च बाला च धर्मंसेग्या तथागता ॥१४९॥

सुकुमारा सौम्यमुखी सौम्यसम्बोधनोत्तमा ।

सुमुखी सर्वंतोभद्रा गुह्या शक्तिगृहालय ।

हलायुधा च कावोरा सर्वशास्त्रसुधारिणी ॥१५०॥

व्योमशक्तिमहादेवा व्योमगा मग्रन्मयी ।

गङ्गा वितस्ता यमुना चन्द्रभागा सरस्वती ॥१५१॥

तिलोत्तमोवंशी रम्भा स्वामिनी सुरसुन्दरी ।

वाणप्रहरणा बाला बिम्बोष्ठी चारुहा सिनी ॥१५२॥

ककुद्मिनी चारुपृष्ठा हस्ताहस्तफलप्रदा ।

काम्यचरी च काम्या च कामाचारविहारिणी ॥१५३॥

हिमशैलन्द्रसकाशा गजेन्द्रवरवाहना ।

अशेषसुखसौभाग्यसम्पदां योनिरुत्तमा ॥१५४॥

सर्वोत्त्कृष्टा सर्वमयी सर्वा सर्वेश्वरप्रिया ॥१५५॥

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सर्वाऽऽड्योनी: साडव्यक्ता सम्प्रधानेश्वरेश्वरी ।

विष्णुवक्ष:स्थलगता किमत: परमुच्यते ॥१५६॥

परा निर्महिमा देवी हरिवक्ष:स्थला श्रया ।

सा देवी पापनिहन्त्री च साक्षीध्यं कुरुतामिमम् ॥१५७॥

इति नाम्नां सहस्रं तु लक्ष्म्या: प्रोक्तं शुभावहम् ।

परावरेण भेदेन मुख्यगौरोन भागतः ॥१५८॥

यश्चैतत्कीर्तयेत्यत्र यं श्रृणुयादपि पठ्यज

शुचि: समाहितो भूत्वा भक्तिश्रद्धासमन्वित: ॥१५९॥

श्रीनिवासं समभ्यर्च्य पुष्पपूपानुलेपनै:

भोगेश्च मधुपर्काद्यैर्यथाशक्ति जगद्गुरुम् ॥१६०॥

तत्पाशवस्थां चिरं देवीं सेम्पूज्य श्रीपदां प्रियाम् ।

ततो नामसहस्रेण तोषयेत्परमेश्वरीम् ॥१६१॥

नानारत्नावलीस्तोत्रमिदं य: सततं पठेत् ।

प्रसादाभिमुखी लक्ष्मी: सर्वं तस्मै प्रयच्छति ॥१६२॥

यस्या लक्ष्म्यार्च सम्भूता: शक्तयो विश्वगा: सदा ।

कारणत्वं न तिष्ठन्ति जगत्यस्मिंश्चराचरे ॥१६३॥

तस्मात्प्रीता जगन्माता श्रीर्यस्याच्युतवल्लभा ।

सुप्रीता शक्त्यस्तस्य सिद्धिमेष्टां दिशान्ति हि ॥१६४॥

एक एव जगत्स्वामी शक्तिमान्च्युत: प्रभु: ।

तदंशशक्तिमन्तोऽन्ये ब्रह्मादयो यथा ॥१६५॥

तथैवैका परा शक्ति: श्रीस्तस्य करुणाश्रया ।

ज्ञानादिपञ्चगुणमयी या प्रोक्ता प्रकृति: परा ॥१६६॥

एकैकशक्ति: श्रीस्तस्या द्वितीयात्मनि वचन्ते ।

परा परेशी सर्वेशी सर्वाकारा सनातनी ॥१६७॥

अनन्तनामधेया च शक्तिचक्रस्य नायिका ।

जगच्चराचरमिदं सर्वं व्याप्य व्यवस्थिता ॥१६८॥

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तस्मादेकैव परमा श्रीजेयां विशवरूपिणी ।

सौम्या सौम्येन रूपेण संस्थिता नटजीवतू ॥१६७॥

योयो जगति पुंभावः स विष्णु रिति निश्चयः ।

याया तु नारीभावस्था तत्र लक्ष्मीर्यवस्थित । ॥१७०॥

प्रकृते: पुरुषाच्चैन्यस्त्रतीयो नैव विद्यते ।

अथ किं बहुनोक्तेन नरनारीमयो हरिः ॥१७१॥

अनेकभेदभिन्नस्तु क्रियते परमेश्वरः ।

महाविभूति दयितां ये स्तुवन्त्यच्युतप्रियाम् ॥१७२॥

ते प्राप्तुवन्ति परमां लक्ष्मीं संशुद्धचेतसः ।

पद्मयो निरविदं प्राप्य पठन्तस्तोत्रमिदं क्रमात् ॥१७३॥

दिव्यमष्टगुणैश्वर्यं तत्प्रसादाच्च लभ्वान् ।

सकामानातच फलदामकमानातच मोक्षदाम् ॥१७४॥

पुस्तकाख्यां भयत्रात्रों सितवस्त्रां त्रिलोचनाम् ।

महापद्मनिषण्णां तां लक्ष्मीमजरतां नमः ॥१७५॥

करयुगलगृहीतं पूर्णकुम्भं दधानां,

कवचिदूमलगतस्था शङ्खपद्माक्षपाणिः ।

कवचिदपि दयितार्जे चामरव्यग्रहस्ता,

कवचिदपि सृणिपाशं बिभ्रती हेमकान्तिः ॥१७६॥

॥ इति श्री ब्रह्मपुराणे काश्मीर वर्णने हिरण्यगर्भ हृदये सर्वकामप्रदायकं पुरुषोत्तम प्रोक्तं लक्ष्मीसहस्रनाम स्तोत्रं समाप्तम् ॥

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श्री पार्वत्युवाच :

देवदेव महादेव सर्वागम-विशारद ।

अधुना देवदेवेश पाश्वाश्रणमुक्तिमं ।

तत्वं रूपं महादेव कथयस्व दयानिधे ।

कृपया कथयेशान यद्यहं तव वल्लभा ।

श्री महादेव उवाच :

अधुना सम्प्रवक्ष्यामि रहस्यमतिगोपनं ।

येन विज्ञान-मात्रेण जीवन्मुक्तो भवित्त्रर: ।

अज्ञात्वा मन्त्रतस्वान्ति महाविद्यां जपेतु यः।

सर्वं तस्य वृथा देिव कि तस्य जपपूजनेः ।

ध्यानावधारणे चैव तथा योगसमाथिना ।

वर्णज्ञानं यदा नास्ति कि तस्य जपपूजना ।

मम कण्ठे स्थितं बीजं पाश्वाश्रणमदुभुतं ।

नानावर्ण-युतं शुद्धं तन्त्राणां सारमुत्तमम् ।

पाश्वाशनमात्रुकां देवीं नानाविद्यामयीं सदा ।

नानाविधोमियां देवीं महाविद्यां तथा ।

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१३६ । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

सर्ववर्णमयीं देवीं सर्वदेवमयीं परां ।

सर्वदेवमयीं सौम्यां ब्रह्माण्डजननीं परां ।

प्रणमस्य बहुधा भक्त्या निगदामि श्रुति प्रिये ।

अकारादि-शकारान्ता मातृकावीजखण्डिनी ।

विसर्गश्चैव विन्दुश्च त्रिशक्तिब्रह्मविग्रहः ।

वर्णात्तु जायते ब्रह्मा तथाऽपि विष्णुः प्रजायते ।

रुद्राश्च जायते देवी जगत्संहारकारकः ।

मम कण्ठस्थितता या सा शारदा वामलोचना ।

तस्याः गर्भस्थितता देवी वीजानि विविधानि च ।

विधृत्य कण्ठदेशे तु शिवोऽहं कमलानने ।

श्रृङ्गु तथ्यं अकारस्य अतिगोप्यं वरानने ।

शरच्चन्द्रप्रतीकाशं पश्र्कोणमयं सदा ।

पश्चदेवमयं वर्णं शक्तित्रय-समन्वितं ।

निर्गुणं त्रिगुणोपेतं स्वयं केवल्यमूर्तिमान् ।

विन्दुतत्त्वमयं वर्ण स्वयं प्रकृतिरूपिणी ॥अ१॥

॥ इति श्रीकामधेनुतन्त्रे देव-देवी-संवादे प्रथमः पटलः ॥

द्वितीय पटलः

श्री महादेव उवाच :

आकारं परमाश्र्यः शब्दज्योतिर्मयं प्रिये ।

ब्रह्मविष्णुमयं वर्णं तथा रुद्रः स्वयं प्रिये ।

पश्र्प्राणमयं वर्णं स्वयं परमकुण्डली ॥आ२॥

इकारं परमानन्दं सुगन्धकुसुमचर्चितं ।

हरिब्रह्ममयं वर्णं सदा रुद्रयुतं प्रिये ।

सदा शक्तिमयं देवी गुरुनब्रह्म स्वयं तथा ।

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सदाशिवमयं वर्णं परब्रह्म-समन्वितं ।

हरिब्रह्मात्मकं वर्णं गुणत्रय-समन्वितं ।

इकारं परमेशानि मूर्तिवै कुण्डली स्वयम् ॥१३३॥

ईकारं परमेशानि स्वयं परमकुण्डलि ।

ब्रह्मविष्णुमयं वर्णं तथा रुद्रमयं सदा ।

पश्वदेवमयं वर्णं पीतविद्युल्लताकृति ।

चतुर्ज्ञानमयं वर्णं पञ्चप्राणमयं सदा

उकारं परमेशानि तारः कुण्डलिनी स्वयं ।

पीतचम्पकसङ्काशं पश्वदेवमयं सदा ।

पञ्चप्राणमयं देवी चतुर्वर्गप्रदायकं ॥१३५॥

ऊकारं देवदेवेशि वीजं परमदुर्लभं ।

शङ्कु कुन्दसमाकारं स्वयं परमकुण्डली ।

पञ्चप्राणमयं वर्णं पश्वदेवमयं सदा ।

पञ्चप्राणयुतं वर्णं तथा त्रिगुणात्मकं ।

विन्दुत्रययुतं वर्णं पीतविद्युल्लतां तथा ।

धर्मार्थकाममोक्षं च सदा सुखप्रदायकं ॥१३६॥

ऋकारं परमेशानि कुण्डली मूर्तिमान् स्वयम् ।

अत्र ब्रह्मा च विष्णुश्च रुद्रश्चैव वदान्यते ।

सदाशिवयुक्तं वर्णं सदा ईश्वरसंयुतं ।

पञ्चप्राणमयं वर्णं चतुर्ज्ञानलयं सदा ।

रक्तविद्युल्लताकारं ऋकारं प्रणमाम्यहं ॥१३७॥

ऋकारं परमेशानि स्वयं परमकुण्डली ।

पीतविद्युल्लताकारं पश्वदेवमयं सदा ।

चतुर्ज्ञानमयं वर्णं पञ्चप्राणमयं सदा ।

चतुर्ज्ञानमय वर्णं पञ्चप्राणमयं सदा ।

त्रिशक्ति सहितं वर्णं प्रणमामि सदा प्रिये ॥१३८॥

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लूकारं चञ्चलापाद्दि कुण्डली परदेवता ।

अत्र ब्रह्मादयं सर्वे तिष्ठन्ति सततं प्रिये ।

पञ्चदेवमयं वर्णं चतुर्ज्ञानमयं सदा ।

पञ्चप्राणमयं वर्णं तथा गुणत्रयात्मकं ।

विन्दुत्रयात्मकं वर्णं पोतविद्युल्लतां तथा ॥लू३॥

लूकारं परमेशानि पूर्णचन्द्रसमप्रभं ।

पञ्चदेवात्मकं वर्णं पञ्चप्राणात्मकं सदा ।

गुणत्रयात्मकं वर्णं तथा विन्दुत्रयात्मकं ।

चतुर्वर्गप्रदं देवी स्वयं परमकुण्डली ॥लू १०॥

एकारं परमं दिव्यं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः ।

बन्धूकुसुमप्रभयं पञ्चदेवमयं सदा ।

पञ्चप्राणात्मकं वर्णं तथा विन्दुत्रयात्मकं ।

चतुर्वर्गप्रदं देवी स्वयं परमकुण्डली ॥ए११॥

॥ इति कामदेहेनु-तन्त्रे देव-देवि सम्वादे द्वितीयः पटलः ॥

तृतीय पटलः

एकारः परमं दिव्यं महाकुण्डलिनी स्वयं ।

कोटिचन्द्रप्रतीकाशं पञ्चप्राणमयं सदा ।

ब्रह्मविष्णुमयं वर्णं विन्दुत्रयसमन्वितं ॥ए१ २॥

ओकारं चञ्चलापाद्दि पञ्चदेवमयं सदा ।

रक्तविद्युल्लताकारं त्रिगुणात्मानमीश्वरं ।

पञ्चप्राणमयं वर्णं नमामि देवमातरं ।

एतद्वर्णं महेशानि स्वयं परमकुण्डली ॥ओ१ ३॥

रक्तविद्युल्लताकारं ओकारं कुण्डली स्वयं ।

अत्र ब्रह्मादयः सर्वे तिष्ठन्ति सततं प्रिये ।

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पञ्चप्राणमयं वर्णं सदाशिवमयं सदा ।

ईश्वरसंयुक्तं चतुर्वर्गप्रदायकं ॥औ१४॥

अंकारं विन्दुसंयुक्तं पीतविद्युत्समप्रभं ।

पञ्चप्राणात्मक वर्णं ब्रह्मादिदेवतामय ।

सर्वज्ञानमयं वर्णं त्रिन्द्रत्रयसमन्वितं ॥अं१५॥

शक्तित्रयमयं वर्णं स्वयं परमकुण्डली ।

अःकारं परमेशानि विसर्गसहितं सदा ।

अःकारं परमेशानि रक्तविद्युत्प्रभामयं ।

पञ्चदेवमयो वर्णः पञ्चप्राणमयः सदा ॥

सर्वज्ञनमयो वर्णः आत्मादितमसंयुतः ।

विन्दुमयमयो वर्णः शक्तित्रयमयः सदा ॥अः१६॥

किशोरवयसः सर्वे गीतवाद्यादितस्पराः ।

शिवस्य युवती एता मूर्तिमत्कुण्डली स्वयं ॥अः१६॥

अधुना सम्प्रवक्ष्यामि करतत्वमनुत्तमं ।

रहस्यं परमाश्चर्यं त्रैलोक्यानां च संश्रृणु ॥

वामरेखा भवेद्ब्रह्मा विष्णुर्दक्षिणविथिका ।

अधोरेखा भवेद्रुद्रो मात्रा साक्षान्महेश्वरी ॥

कुण्डली अंकुशाकार मध्ये शून्यः सदाशिवः ।

जवायवकषड्कुशा वामे रेखा वरानने ।

शरच्चन्द्रप्रतीकाशा दक्षरेखा च मूर्तिमान् ।

अधोरेखा वरारोहे महामारक्तवित्तिः ।

शब्दकुन्दसम कीर्तिन्मात्रा साक्षात् सरस्वती ।

कुण्डली अंकुश या तु कोटिवियुल्लताकृतिः ॥

कोटिचन्द्रप्रतीकाशा मध्ये शून्यं सदाशिव ।

शून्यगर्भे स्थिता काली कैवल्यपददायिनी ।

कककारो जायते सर्व कामं कैवल्यमेव च ॥

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अर्थश्च जायते देवी तथा धर्मश्च नान्यथा ।

ककारः सर्ववर्णानां मूलप्रकृतिरेव च ।

ककारः कामदा कामरूपिणी स्फुरदद्वयया ।

कामिनी तु महेशानि स्वयं प्रकृतिसुंदरी ।

माता सा सर्वदेवानां कैवल्यपददायिनी ।

ऊर्ध्वकोरो स्थिता कामा ब्रह्मशक्तिरितीरिता ।

वामकोरो स्थिता ज्येष्ठा विष्णुशक्तिरितीरिता ।

दक्षकोरो स्थिता विन्दु रौद्री संहाररूपिणी ।

ज्ञानार्था सा तु चावाद्ध केन चतुष्टयात्मिका ।

इच्छाशक्तिरभवेत् ब्रह्मा विष्णुश्च ज्ञानशक्तिमान् ।

क्रियाशक्तिरभवेत् रुद्रः सर्वः प्रकृतिसूनवान् ।

आत्मविद्या शिवैस्तत्त्वैः सदासाराप्रतिष्ठितैः ।

आसनं त्रिपुरादेव्या: ककारं पञ्चदेवतां ।

ईश्वरो यस्तु देवेशि त्रिकोणेऽतस्य संस्थितिः ।

त्रिकोणमेतत् कथितं योनिमण्डलमुत्तमं ।

केवलं प्रपदे यस्या: कामिनी सा प्रकृतिता ।

ॐ शयनागार-सिन्दूर-सदृशीं कामिनीं परां ।

चतुर्भुजां त्रिनेत्रां च बाहुवलीविराजितां ।

कदम्बककोरकाकारस्तनद्वयविभूषितां ।

रत्नके यूरारूद्धदेहच भूषणैरुपशोभितां ।

रत्नहारै: पुष्पहारै: शोभितां परमेश्वरिं ।

एवं हि कामिनीं ज्ञात्वा ककारं दशधा जपेत् ।

प्रफुल्लं च ततो ध्यात्वा जपस्य फलभाक् भवेत् ।

एतत्ते कथितं देवी ककारसतत्त्वमुत्तमं ।

॥ इति श्री कामधेनुतन्त्रे देवदेवीसंवादे तृतीय: पटल: ॥

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श्री महादेव उवाच :

ककारं परमेशानि कुण्डलीत्रयसंयुतं ।।क १।।

खकारं परमाश्चर्य शक्तिकुन्दसमप्रभं ।

कोगतश्वयुक्तं शून्यं विन्दुत्रयसमन्वितं ।

गुणत्रययुतं देवी पञ्चदेवमयं सदा ।

त्रिशक्तिसंयुतं वर्णं खकारं प्रणमाम्यहं ।।ख २।।

गकारं परमेशानि पञ्चदेवात्मकं सदा ।

निर्गुणं त्रिगुणोपेतं निरीहं निर्मलं सदा ।

पञ्चप्राणमयं वर्णं सर्वशक्त्यात्मकं प्रिये ।

अरुणादित्यसङ्काशं कुण्डलिं प्रणमाम्यहं ।।ग ३।।

गकारं चञ्चलापाङ्ग चतुष्कोणात्मकं सदा ।

पञ्चदेवमयं वर्णं अरुणादित्यसन्निभं ।

निर्गुणं त्रिगुणोपेतं सदा त्रिगुणसंयुतं ।

सर्वगं सर्वदं शान्तं घकारं प्रणमाम्यहं ।।घ ४।।

ङकारं परमेशानि स्वयं परमकुण्डलो ।

सर्वदेवमयं वर्णं त्रिगुणं लोललोचने ।

पञ्चप्राणमयं वर्णं ङकारं प्रणमाम्यहं ।।ङ ५।।

चवर्णं श्रृणु सुश्रोणि चतुर्वर्गप्रदायकं ।

कुण्डलीसहितं देवी स्वयं परमकुण्डली ।

सततं कुण्डलीयुक्तं पञ्चदेवमयं सदा ।

पञ्चप्राणमयं वर्णं पञ्चप्राणात्मकं सदा ।

त्रिशक्तिसहितं वर्णं त्रिविन्दुसहितं प्रिये ।।च ६।।

छकारं परमाश्चर्य स्वयं परमकुण्डली ।

सततं कुण्डलीयुक्तं पञ्चदेवमये सदा ।

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पञ्चप्राणमयं वर्णं त्रिशक्तिसहितं सदा । त्रिविन्दुसहितं वर्णं सदा ईश्वरसंयुतं । पीतविद्युल्लताकारं हृकारं प्रणमाम्यहं ॥६७॥ जकारं परमेशानि या स्वयं मध्यकुण्डली । शरच्चन्द्रप्रतोकाशं सदा त्रिगुणसंयुतं । पञ्चदेवमयं वर्णं पञ्चप्राणमयं सदा । त्रिशक्तिसहितं वर्णं त्रिविन्दुसहितं प्रिये ॥६८॥ झकारं परमेशानि कुण्डली मोक्षरूपिणी । रक्तविद्युल्लताकारं सदा त्रिगुणसंस्थितं । पञ्चदेवमयं वर्णं पञ्चप्राणात्मकं सदा । त्रिविन्दुसहितं वर्णं त्रिशक्तिसहितं सदा ॥६९॥ सदा ईश्वरसंयुक्त झकारं श्रृण सुन्दरी । रक्तविद्युल्लताकारं स्वयं परमकुण्डली । पञ्चदेवमयं वर्णं पञ्चप्राणमयं सदा । त्रिशक्तिसहितं वर्णं त्रिविन्दुसहितं सदा ॥७०॥ टकारं चञ्चलापाङ्गी स्वयं परमकुण्डली । कोटिविद्युल्लताकारं पञ्चदेवमयं सदा । पञ्चप्राणायुतं वर्णं गुणत्रयसमन्वितं । त्रिशक्तिसहितं वर्णं त्रिविन्दुसहितं सदा ॥७१॥ ठकारं चञ्चलापाङ्गी कुण्डली मोक्षरूपिणी । पीतविद्युल्लताकारं सदा त्रिगुणसंयुतं । पञ्चप्राणात्मकं वर्णं पञ्चप्राणमयं सदा । त्रिविन्दुसहितं वर्णं त्रिशक्तिसहितं सदा ॥७२॥ डकारं चञ्चलापाङ्गी सदा त्रिगुणसंयुतं । पञ्चदेवमयं वर्णं पञ्चप्राणमयं सदा । त्रिशक्तिसहितं वर्णं त्रिविन्दुसहितं सदा ।

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चतुर्जानमयं वर्णं आत्मादितत्त्वसंयुतं ।

पीतविद्युल्लताकारं डकारं प्रणमाम्यहं ॥ड १३॥

ढंकारं परमाराध्यं या स्वयं कुण्डली परं ।

पश्चदेवात्मकं वर्णं पश्चप्राणमयं सदा ।

त्रिगुणसंयुक्तं आत्मादितत्त्वसंयुतं ।

रक्तविद्युल्लताकारं ढकारं प्रणमाम्यहं ॥ढ १४॥

णकारं परमेशानि स्वयं परमकुण्डली ।

पीतविद्युल्लताकारं पश्चदेवमयं सदा ।

पञ्चप्राणमयं देवी सदा त्रिगुणसंयुक्तं ।

आत्मादितत्त्वसंयुक्तं महामोहप्रदायकं ॥ण १५॥

॥ इति श्रीकामधेनुतन्त्रे देवदेवीसंवादे चतुर्थः पटलः ॥

पञ्चम पटल

शो महादेव उवाच :

तकारं चञ्चलापाङ्गी स्वयं परमकुण्डली ।

पश्चदेवात्मकं वर्णं पञ्चप्राणमयं तथा ।

त्रिशक्तिसहितं वर्णं आत्मादितत्त्वसंयुतं ।

त्रिविन्दुसहितं वर्णं पीतविद्युत्समप्रभं ॥त १६॥

थकारं चञ्चलापाङ्गी कुण्डली मोक्षरूपिणी ।

त्रिशक्तिसहितं वर्णं त्रिविन्दुसहितं सदा ।

पञ्चदेवमयं वर्णं पञ्चप्राणात्मकं सदा ।

अरुणादित्यसङ्काशं थकारं प्रणमाम्यहं ॥थ १७॥

दकारं ऋणु चार्वङ्गी चतुवर्गप्रदायकं ।

पञ्चदेवमयं वर्णं पञ्चप्राणमयं सदा ।

त्रिशक्तिसहितं देवी त्रिविन्दुसहितं सदा ॥

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आत्मादितत्वसंयुक्तं स्वयं परमकुण्डली ।

रक्तविद्यु ल्लताताकारं दकारं हृदि भावय ॥द १६॥

धकारं परमेशानि कुण्डली मोक्षरूपिणी ।

आत्मादितत्वसंयुक्तं पञ्चदेवमयं सदा ।

पञ्चप्राणमयं देवी त्रिशक्तिसहितं सदा ॥१५॥

त्रिविन्दुसहितं वर्ण धकारं हृदि भावय ।

पीतविद्यु ल्लताकारं चतुर्वर्गप्रदायकं ॥थ १६॥

नकारं श्रृणु चार्वङ्गी रक्तविद्यु ल्लताकृति ।

पञ्चदेवमयं वर्ण स्वयं परमकुण्डली ।

पञ्चप्राणात्मकं वर्ण हृदि भावय पावंती ॥न २०॥

अतःपरं प्रवक्ष्यामि पकारं मोक्षदायकं ।

चतुर्वर्गप्रद वर्ण शरच्चन्द्रसमप्रभं ।

पञ्चदेवमयं वगं स्वयं परमकुण्डली ।

पञ्चप्राणमयं वर्ण त्रिशक्तिसहितं सदा ।

त्रिगुणात्मकं वर्ण आत्मादितत्वसंयुतं ।

महामोक्षप्रदं वर्ण हृदि भावय पार्वती ॥प २१॥

फकारं श्रृणु चार्वङ्गी रक्तविद्यु ल्लतोपमं ।

चतुर्वर्गप्रदं वर्ण पञ्चदेवमयं सदा ।

पञ्चप्राणमयं वर्ण सदा त्रिगुणसंयुतं ।

आत्मादितत्वसंयुक्तं त्रिविन्दुसहितं सदा ॥फ २२॥

बकारं श्रृणु चार्वङ्गी चतुर्वर्गप्रदायकं ।

शरच्चन्द्रप्रतीकाशं पञ्चदेवमयं सदा ।

पञ्चप्राणात्मकं वर्ण त्रिविन्दुसहितं सदा ।

त्रिशक्तिसहितं वर्ण सदा चामृतनिर्मितं ।

स्वयं कुण्डलिनी साक्षात् सततं प्रणमाम्यहं ॥ब २३॥

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भकारं श्रृणु चार्वङ्गि स्वयं परमकुङ्गली ।

महामोक्षप्रदं वर्णं अरुणादित्यसन्निभं ।

पञ्चप्राणमयं वर्णं पञ्चदेवमयं सदा ।

त्रिशक्तिसहितं वर्णं त्रिबिन्दुसहितं प्रिये ॥भ २४॥

मकारं श्रृणु चार्वङ्गि स्वयं परमकुङ्गली ।

अरुणादित्यसङ्काशं चतुवर्गम्प्रदायकं ।

त्रिशक्तिसहितं वर्णं त्रिबिन्दुसहितं सदा ।

आत्मादितत्त्वसंयुक्तं हृदिस्थं प्रणमाम्यहं ॥म २५॥

यकारं श्रृणु चार्वङ्गि चतुष्कोणमयं सदा ।

पलालधूमसङ्काशं स्वयं परमकुङ्गली ।

पञ्चप्राणमयं वर्णं पञ्चदेवमय सदा ।

त्रिशक्तिसहितं वर्णं त्रिबिन्दुसहितं तथा ।

प्रणमामि सदा वर्णं मूर्तिमान् मोक्षमवययं ॥य २६॥

॥ इति श्री कामधेनुतन्त्रे देवदेवीसंवादे पंचमः पटलः ॥

षष्ठ पटल

श्री महादेव उवाच :

रकारं चंचलापाङ्गि कुण्डलीद्वयसंयुतं ।

रक्तविद्युल्लताकार पंचदेवात्मकं सदा ।

पंचप्राणमयं वर्णं त्रिबिन्दुसहितं सदा ।

त्रिशक्तिसहितं देवी आत्मादितत्त्वसंयुतं ।

सर्वतेjomयं वर्णं सततं प्रणमाम्यहं ॥र २७॥

लकारं चंचलापाङ्गि कुण्डलात्रयसंयुतं ।

पीतविद्युल्लताकारं सर्वं रत्नप्रदायकं ।

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पंचदेवमयं वर्णं पंचप्राणात्मकं सदा । त्रिशक्तिसहितं वर्णं त्रिविन्दुसहितं हि सा ॥ आत्मादितत्त्वसहितं हृदि भावय सर्वदा ॥ २६॥ vकारं चंचलापाङ्ग कुण्डली मोक्षमवययं । पंचप्राणमयं वर्णं त्रिशक्तिसहितं सदा । त्रिविन्दुसहितं वर्णं आत्मादितत्त्वसंयुतं । पंचदेवमयं वर्णं पीतविद्यु ल्लतोपमं ॥ चतुर्वर्गमयं वर्णं सर्वसिद्धिप्रदायकं । त्रिशक्तिसहितं देवी त्रिविन्दुसहितं सदा ॥व २६॥ शकारं परमेशानि स्वर्णवर्णं शुचिस्मिते । रक्तवर्णप्रभाकारं स्वयं परमकुण्डली । चतुर्वर्गप्रदां देवी शकारं ब्रह्मविग्रहं । पंचदेवमयं वर्णं पंचप्राणात्मकं प्रिये । रजः सत्वतमोयुक्तं त्रिविन्दुसहितं सदा । त्रिशक्तिसहितं वर्णं आत्मादितत्त्वसंयुक्तं ॥श ३०॥ पकारं श्रृणु चार्वाङ्गि कोणपट्कमयं सदा । रक्तचन्द्रप्रतीकाशं स्वयं परमकुण्डली । चतुर्वर्गप्रदं वर्णं सुधार्णिमतविग्रहं । पंचदेवमयं वर्णं पंचप्राणमयं सदा । रजः सत्वतमोयुक्तं त्रिविन्दुसहितं परं । सर्वदेवमयं वर्णं हृदि भावय पार्वति ॥ष ३१॥ सकारं श्रृणु चार्वाङ्गि शक्तिबीजं परात्परं । कोटिविद्यु ल्लताकारं कुण्डलीत्रयसंयुतं । पंचदेवमयं देवी पंचप्राणमयं सदा । रजः सत्वतमोयुक्तं त्रिविन्दुसहितं सदा ।

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त्रिशक्तिसहितं वर्णं आत्मादितत्त्वसंयुक्तं ।

प्रणम्य सततं देवि हृदि भावय सुन्दरि ॥स ३२॥

हकारं श्रृङ्गु चार्वङ्गी चतुर्वर्गप्रदायकं ।

कुण्डलीत्रयसंयुक्तं रक्तविद्युल्लतोपमं ।

रजःसत्त्वतमोयुक्तं पञ्चदेवमयं सदा ।

पञ्चप्राणात्मकं वर्णं त्रिशक्तिसहितं सदा ।

त्रिविन्दुसहितं वर्णं हृदि भावय सुन्दरि ॥ह ३३॥

क्षकारं श्रृङ्गु चार्वङ्गी कुण्डलीत्रयसंयुक्तम् ।

चतुर्वर्गमयं वर्णं पञ्चदेवमयं सदा ।

पञ्चप्राणात्मकं वर्णं त्रिशक्तिसहितं सदा ।

त्रिविन्दुसहितं वर्णं आत्मादितत्त्वसंयुतम् ।

शरच्चन्द्रप्रतीकाशं हृदि भावय सुन्दरि ॥क्ष३४॥

अकारादि-क्षकारान्तं स्वयं परमकुण्डली ।

सर्वं चराचरं विश्वं वर्णात्तु जायते ध्रुवम् ।

नानाशास्त्रं पुराणं च इतिहासं च सुन्दरि ।

वेदं च स्मृतिशास्त्रं च अन्यानि यानि कानि च ।

अक्षरारज्जायते सर्वं परब्रह्म स्वयं शिवे ॥

॥ इति कामधेनुतन्त्रे देवदेवीसंवादे षष्ठः पटलः ॥

सप्तम पटल

श्री महादेव उवाच :

रहस्यं परमाश्चर्यं सदा मम हृदि स्थितं ।

अतःपरं प्रवक्ष्यामि मन्त्रतत्त्वं पृथक्-पृथक् ।

मातृकाया वरारोहे सावधानावधारय ।

अतः परं जपेनमन्त्रं पञ्चाशन्मातृकां पृथक् ॥

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अतस्त्वमविकारी स्वान्नात्र कार्याविचारणा ।

इति ते कथितं देविप्रयोगं मन्त्रमुत्तमं ।

एतन्मन्त्रे बिना देविष्टं मन्त्रं जपेत्नरः ।

सर्वं तस्य भवेद्यर्थं सर्वं व्यर्थकर्दनम् ।

एतन्मन्त्रे प्रथमतो दशधा प्रजपेत्प्रिये ।

ततस्तु प्रणवं दत्वा मातृकां प्रजपेत्पृथक् ।

प्रयोगं परमाश्चर्यं सावधानावधारय ।

तद्यथा—

ॐ अं ॐ ॐ आं ॐ ॐ ईं ॐ ॐ ईं ॐ ॐ उं ॐ ॐ ऊं ॐ ॐ ऋं ॐ ॐ ऋॄं ॐ ॐ लृं ॐ ॐ लॄं ॐ ॐ एं ॐ ॐ ऐं ॐ ॐ ओं ॐ ॐ औं ॐ ॐ अं ॐ ॐ अः ॐ । ॐ कं ॐ......

एवं हकारपर्यन्तं प्रणवः पुटितं सदा ।

प्रत्येकमेव चावृज्य दशधा दशधा जपेत् ।

प्रत्येकं जपमात्रेण प्रत्येकं ध्यानमाचरेत् ।

अथवा सर्ववर्णानामेकृत्य वरानने ।

प्रजपेद्दशधा मन्त्रं स्वमन्त्रं प्रजपेत्ततः ।

तथा च सर्ववर्णानां ध्यानं वक्ष्यामि संश्रृणु ।

कोटिचन्द्रप्रतीकाशां पुण्डरीकोपरीस्थिता ।

भ्रमदुभ्रमरलीलाभां नयनत्रयराजिता ।

नानाशस्त्रप्रवक्त्रिं च विद्याभ्यासमयीं सदा ।

नानावादमयीं देवों इवेतां शुक्लपरिष्कृतां ।

शुक्लाभरणदीप्ताढ्यां शुक्लवस्त्रोतरीयिणीं ।

ब्रह्माण्डं दरपणो यस्माद्वामहस्तस्य पार्वति ।

तद्रुचूष्मशिशुं प्रेक्ष्य क्षुद्रदरपणमुच्यते ।

एवं ध्यानवा जगद्धात्रीं मातृकां जगदम्बिकां ।

प्रजपेद्दशधा मन्त्रमेकथा वा जपेत्यः ।

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सर्वसिद्धिमवाप्नोति नात्र कार्य्या विचारणा ।

एषा ते कथिता विद्या मातृका परमात्मिका ।

यत्कृत्वा साक्षको याति दुर्लभं मोक्षमव्ययम्‌ ।

प्रत्येकनेतवा देवि एकैव बहुधा बरानने ।

रहस्यं श्रृणु चार्वङ्गि सुगोप्यं भुवनत्रये ।

इष्टविद्यां सकृत् स्मृत्वा मनसा परमेश्वरि ।

यस्य मन्त्रस्य यद् ध्यानं कृत्वा देवी प्रतिष्ठितः ।

तन्मन्त्रं दशधा जप्त्वा इष्टध्यानं ततः प्रिये ।

इष्टमन्त्रं प्रजप्त्वा वै सर्वसिद्धि ततः लभेत् ।

अनेन विधिना देवी मन्त्रश्चेतन्यमाप्नुयात् ।

चैतन्यरहितं मन्त्रमेकथा तु स्मरेतु यः ।

कोटिपुरश्चरं याति नान्यथा वरवर्णिनि !

श्री महादेव उवाच :

अपरं श्रृणु चार्वङ्गि वर्गाष्टकमनुत्तमम्‌ ।

वर्णाष्टकं विना देवी कोटिपुरश्वरं यदि ।

सर्वं तस्य वृथा देवी अनते च नरकं ब्रजेत् ।

अकचटतपयेश इत्यवष्टकलक्रम्‌ ।

मन्त्रस्यादौ च अन्ते आकारं बिन्दुसंयुतम्‌ ।

दत्त्वा तमेव भक्त्या च अष्टोत्तरशतं जपेत् ।

अनेन विधिना देवी आदित्याभं समाचरेत् ।

ताबज्जपेदरारोहे यावल्लक्षं समाप्यते ।

ततो मन्त्रं वरारोहे श्रृणु जीवत्वमाप्नुयात् ।

जीवत्वं हि विना देवी न पुरश्चरणं चरेत् ।

जीवत्वं हि विना देवी यदि कुर्वात् पुरश्चरम्‌ ।

विफला तस्य सा सर्वा पूर्वपुण्यं विनश्यति ।

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वर्गाष्टकैर्न सहितं प्रत्यहं प्रजपेत् शतम् । सदैव सहसा भद्रे सर्व मत्रं च सिध्यति ।। कि तस्य ध्यानपूजायां पुरश्चर्या च कि पुनः । कृत्वा तु जीवं मन्त्रस्यं विद्यां च वर्वाणीनं ।। विद्यायार्च तथाऽ देविऽ यः कुर्यात प्राणिणं यं । तत्क्षणाद् यान्ति चार्वङ्गी पुरश्चर्या शतं शतम् ।। विशेषतः कलियुगे जम्बुद्वीपस्य भारतेऽ । प्राणान्याऽस विनाऽ देविऽ न जपेत साधकः कवचित ।। वैष्णवेषु च मन्त्रेषु शैवेषु शक्तिमन्त्रेषु । गणेशसौरमन्त्रे च प्राणान्याऽस प्रशस्यते ।। कि तस्य जपपूजासु होमादिषु च कि प्रियेऽ । प्राणतत्वं महेशानि यो जानाति स पूजकः ।। प्राणतत्वं विना देविऽ देहिन्याऽस करोति यः । स द्रष्टा स च पापिष्ठो रौरवं नरकं ब्रजेत ।। आलोक्य तन्मुखं देविऽ सूर्यदर्शनमाचरेत् ।। इति कामधेनुतन्त्रे देवदेवीसंवादे सप्तमः पटलः ।।

श्री महादेव उवाच :

एतत्ते कथितं भद्रे रहस्यं परमं तु यत । तन्त्रोक्तं सर्वतन्त्रेषु मातृकाया: पृथक पृथक ।। पञ्चाशदर्णसंकेतं पञ्चाशत्तत्वमुत्तमं । सर्वदेवमयं तत्वं सर्वज्ञानमयं तथा ।। बिन्दुतत्वमयं देविऽ अहं तत्वमयं तथा । सर्वशक्तिमयं तत्त्वं सर्वप्राणमयं तथा ।।

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कामधेनु तन्त्रस् | १५१

गर्भंतत्त्वमयं देवी केवलं कलिका तथा ।

कुसुमस्य यदा देवी कलिकां गन्धसंयुतां ।

अदृश्यं सर्वभूतानां तथा गन्धं शुचिस्मिते ।

पुष्पस्य कलिकामध्ये यथा ज्योति: प्रदीप्यते ।

तथैव कलिकावीजे नवतत्त्वं च विद्यते ।

कोटिविद्युत्प्रतीकाशां मातृकां प्रणमाम्यहं ।

निरावाधां निर्गुणां च गुणानां गुणमातृका ।

माता सा सर्वविद्यानां सर्वगिमप्रतिष्ठता ।

सर्वासां वेदविद्यानां ब्रह्माण्डानां च पार्वति ।

माता सा गीयते देवी पंचाशन्मातृका च सा ।

मन्त्रतत्त्वं च विद्या च सर्वशक्तिनिरूपणम् ।

पंचाशदयुतोรูपा मातृका शवमयया ।

मातृका परमेशानि काली साक्षात् संशय: ।

कुतो ब्रह्मा कुतो विष्णु: कुतो रुद्रश्च ईश्वर: ।

सदाशिव: कुतो देवी ते सर्वे शववत् प्रिये ।

शववत् सर्वदेवं च ब्रह्माण्डं शववत् सदा ।

अतएव वरारोहे विष्णुमन्त्रं यथा तथा ।

शिवमन्त्रं यथा देवी गणेशं सौरमेव च ।

शक्तिमन्त्रं च विद्यां च पंचाशद् युवतीमयं ।

पुराणं च व तथा वेदं स्मृतिशास्त्रं तथैव च ।

एत्तत्त्वं वरारोहे युवतीरूपमद्भुतम् ।

ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिव: ।

ते सर्वे नंचलापाद्धि मातृका जायते प्रिये ।

समस्तजननी देवी मातकाजननी परा ।

कटाक्षलक्षसंयुक्ता महाशक्ति: प्रगीयते ।

मातृकावर्णरहितं ब्रह्माण्डं शववत् प्रिये ।

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गीतं वाचं श्रुति नाट्यं आलापं वर्णवर्णन ।

सर्वा हि युवतीरूपं ध्यानेमार्गे प्रतिष्ठितं ।

एतत्ते कथितं देवि कालिकावीजमुत्तमं ।

उभयो: सङ्गमं देवि प्रफुल्लं भवति प्रिये ।

बहव: संगमे देवि प्रफुल्लं मोक्षमव्रयन् ।

यत्र मन्त्रेपु विद्यासु प्रफुल्लं भवति ध्रुवं ।

प्रफुल्लं श्रृणु चार्गर्भ जपयज्ञं समाचरेत् ।

प्रफुल्लरहितं देवि विद्यामन्त्रं यदि प्रिये ।

केवलं कालिकावीजं वर्णंवर्णै: पृथक्-पृथक् ।

ध्यात्वा सिद्धिमवाप्नोति नान्यथा सुरपूजिते ।

प्रफुल्लात् कालिकाद्वापि कृष्णादीन् जायते ध्रुवं ।

युवती या समाख्याता सा महाकुण्डली परा ।

वर्णारूपमयी देवी कुण्डली परदेवता ।

पञ्चाशद्वर्णतत्त्वं च विद्या मन्त्रं जपेतु य: ।

सर्वं हि विफलं तस्य शववत् तज्जपं भवेत् ।

चैतन्यरहितं देवि तज्जपं शवमेव तत् ।

ज्ञात्वा प्रणम्य कुर्वीत जपपूजादिकं प्रिये ।

हरिहि निर्गुण: साक्षात् सगुणा परकुण्डली ।

तस्मात्तु युवतीदेहात् हरेरुत्पत्तिरेव च ।

सर्वासां देवदेवीनां बीजं जन्मस्थलं सदा ।

बीजात्तु जायते ब्रह्मा शून्यरूपि सनातन: ।

अतएव महेशानि ब्रह्मण: कारणं परा ।

ज्ञात्वा तन्मिदं देवि जप-पूजां करोति य: ।

प्रणत्यासर्वविधं कृत्वा जपपूजां करोति य: ।

स शिव: परमब्रह्म स एव पुरुषोत्तम: ।

स एव विद्यो वीरश्च स एव भैरव: स्वयं ।

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स एव धन्यो देवेशि त्रैलोक्ये स चराचरे ।

स सूर्यो देवी पूज्यश्च सद्गुरुश्च न चान्यथा ।

उद्‌दतं चैव संहृतं समर्थः सोपि नान्यथा ।

अशक्तो तत्र नोक्तस्तु जप्यञ्च करोति यः ।

सर्वं तस्य वृथा देवी पशुरेव न संशयः ।

सर्वेषु न गुरुदेवि शिष्योऽपि पशुवत् सदा ।

श्रुत्वा तस्य मुखे विद्यां मन्त्रं वा तग्निन्दनं ।

सिक्तो भवति चार्वङ्गी ऋ तस्य जप-पूजने ।

एवं विधं गुरुं त्यक्त्वा श्रुत्वा पशुमुखात् प्रिये ।

पूर्व मन्त्रं परित्यज्य गृहीयाद् गननापरं ।

स भ्रष्टः स न च पापिष्ठः कश्चिद् मन्त्रमुपास्महे ।

मन्त्रस्य गननादेवि यत् पापं प्राप्नुयात् नरः ।

तत् पापं शृणु चार्वङ्गि नरकं चोत्तरोत्तरं ।

यत् पापं प्राप्नुयादेवि स्वयम्भूलिङ्गचालने ।

तत् पापं कोटिगुणितं गननादेव मन्त्रयोः ।

तस्मात्तु गननां देवी वर्जयेन्‍न्मतिमान्नरः ।

त्यक्त्वा शैवगैषणवेपु सौरे गाणपतौ तथा ।

अन्यत् सर्वधियं विद्यातु गननाo वर्जयेत्‌ः ।

॥ इति श्री कामधेनुतन्त्रे देवदेवीसंवादेष्टमः पटलः ॥

नवम पटलः

श्रो महादेव उवाच :

अधुना सम्प्रवक्ष्यामि रहस्यं गुह्यमुत्तमं ।

यत्नं शक्तो साधको याति दुर्लभं महत्फलं ।

इडया पूरयेद्वायूं सुषुम्नान्तर्गतं ततः ।

रेचयेत् पिङ्गलामार्गे प्राणायामक्रमं प्रिये ।

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अनुलोमेन चार्वाङ्गी मातृकां युवतीं स्मरेत् ।

पञ्चाशन्मातृकावर्णं साविन्दुं नादसंयुतं ।

उच्चार्य पूरकेनैव ततः इष्टं समुच्चरेत् ।

ततस्तु मातृकावर्णं विलोमेन जपेत् प्रिये ।

सुषुम्ना-मध्यदेशे तु चित्रिणी सुवरानने ।

अनुलोम-बिलोमेन मातृकां युवतीं स्मरेत् ।

इष्टमन्त्रं ततः जप्त्वा विलोमं गुरु यत्नतः ।

अनेनैव विधानेन रेचयेत् पिङ्गला-पथे ।

एव द्वादशधा कृत्वा प्रत्यहं वरवर्णिनि ।

त्रिसन्ध्यां चञ्चलापाङ्गी यः कुर्यात् कमलानने ।

जीवन्मुक्तस्तस्य मन्त्रासिद्धेश्च नान्यथा ।

एकधा वा महेशानि कलौ संख्या चतुर्गुणां ।

प्रत्यहं दशधा कृत्वा शिवतुल्यो भवेत् नरः ।

॥ इति श्रीकामदेनुतन्त्रे देवदेवीसंवादे नवमः पटलः ॥

दशम पटलः

श्री महादेव उवाच :

ललाटतत्त्वं चार्वाङ्गी आकारं सर्वदा प्रिये ।

आकारं मुखतत्त्वं तु सृक्पुष्प वरवर्णिनि ।

इकारं दक्षनेत्राश्र ईकारं वामनेत्रके ।

उकारं दक्षकर्णे स्यादूकारं वामकर्णके ।

ऋकारं दक्षनासा च ऋकारं वामनासिके ।

लृकारं दक्षगण्डं स्यात् लृकारं वामगण्डके ।

एकारं अधरं तत्त्वं ऐकारं ओष्ठ एव च ।

ओकारं ऊर्ध्वदस्तं स्यात् औकारश्चाधदन्तकम् ।

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अंकारं शिरसस्तत्त्वं अःकारं मुखमण्डलम् ।

ककारादि पञ्चतत्त्वं दक्षबाहो प्रशस्यते ।

वामबाहो चकारादि पञ्चतत्त्वं च तिष्ठति ।

दक्षपादे टकारादि पञ्चतत्त्वं वदाने ।

तकारादि पञ्चतत्त्वं वामपादे प्रशस्यते ।

पकारं दक्षपाश्व॑ च फकारं वामपाश्व॑के ।

बकारं पृष्ठतत्त्व॑श्च भकारं नाभिरेव च ।

मकारं उदरं तत्त्वं यकारं हृदयं तथा ।

रकारं स्तन्थतत्त्व॑श्च लकारं वाममेव च ।

घाटतत्त्वं बकार॑श्च शकारं दक्षबाहुषु ।

वामबाहो षकार॑श्च सकारं दक्षपादकम् ।

वामपादे हकार॑श्च क्षकारं शिरसोपदि ।

अकारं बीजतत्त्वं च तकारं प्रणवेन च ।

मकार॑श्च सकार॑श्च मण्डितं हि तथैव च ।

अहंकारः पकारः स्यात फकारो मनसस्तथा ।

नकारं शब्दतत्त्व॑श्च दङ्ं रूपं प्रशस्यते ।

गकारं पादतत्त्व॑श्च छुकारोपस्थस्मेव च ।

उकारं आकाशतत्त्व॑श्च ऊकारं श्रोत्रमेव च ।

त्वक् तत्त्वं च जकारः स्यात झकारः पादमेव च ।

ककारः पृथिवीतत्त्वं खकारो ज्ञानतत्त्वकः ।

शकारं हत्पुण्डरीकं पकारं तत्त्वमण्डलं ।

सकार॑श्च तथा चन्द्रं रकारं वह्निमण्डलम् ।

परमेष्टि तथा तत्त्वं यकारं सुरपूजिते ।

लकारं पृथिवीतत्त्वं हकार॑श्च शिरसस्था ।

षकारं वायुतत्त्व॑श्च ककारं स्वर्गमेव च ।

एतयोयोगमासाद्य क्षकारं तत्त्वविग्रहम् ।

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१५६। कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

तेन अ त म स प फ न द थ ग छ उ ऊ ज झ क ख श प सर य ल ह क्ष।

अकारादि-क्षान्तवर्णं तत्त्वज्ञ पश्रीविशति।

सगुणतत्वगुरुं परमात्मा सुलोचने।

मातृकाया वरारोहे क्रमाण्यामनि संश्रुगु।

ब्रह्माणी चण्डिका रौद्री गौरोन्द्राणी तथैव च।

कौमारी वैष्णवी दुर्गा तथैव नारसिंहिका।

कालिका मुण्डमाला च शिवदूती तथा परा।

वाराही कौशिकी चैव तथा माहेश्वरी प्रिया।

शड्करी च जयन्ती च मङ्गला कलिमर्दिनी।

पालिका चैव मेधा च शिवरूपा च शाम्भवी।

भीमा शान्ता च उग्रा च भ्रामरी रुद्ररूपिणी।

अम्बिका बहुरुपा च क्षेमा क्षेमङ्करी तथा।

यात्रिरुपा स्वस्था स्वाहा तथैव वन्हिरूपिणी।

अपर्णा च तथा माया घोरूपा प्रियम्वदा।

ब्रह्माण्डवाणी ब्राह्मी च पशाश्चान्मातृका स्मृता।

इत्येतत कथितं सम्यक केवलं तव भक्तितः।

एतास्तु मातृकादेव्या ब्रह्माण्डं सचराचरम्।

व्याप्य तिष्ठति चार्वङ्गी नानामूर्त्तिस्थराव्यया।

शक्तिमन्त्रे विष्णुमन्त्रे शैवे सौर च पार्वति।

अन्यान्त सर्वेषु मन्त्रेषु गणेशे वरर्णिनि।

मातृका युवतीरुपा मन्त्रविग्रहरूपिणी।

ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः।

ते सर्वे चञ्चलापाङ्ग निश्चलाश्च निरिन्द्रियाः।

देवादीनां वरारोहे मन्त्रं नास्ति कदाचन।

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कामधेनु तन्त्रम् | १५७

शब्दब्रह्म यदा याति मन्त्रं तन्त्रं तदा भवेत् ।

पश्चाशत् युवती सर्वा शब्दब्रह्मस्वरूपिणी ।

ब्रह्मणः कारणं नास्ति प्रकृतेः परं भाविनि ।

प्रकृतेया वरारोहे सा दीक्षा सर्वसम्मता ।

दीक्षायां चक्रचर्चापि प्रशस्ता युवती कला ।

पश्चचाशन्मातृका या सा युवती परिगीयते ।

युवतीरहितं देवी कुतो विद्यां कुतो मनुम् ।

निर्गु णां परम ब्रह्म प्रधाना युवतीगणः ॥

॥ इति श्री कामधेनुतन्त्रे देवदेवीसंवादे दशमः पटलः ॥

एकादश पटलः

श्री शिव उवाच :

यथा ज्ञानं चंद्रसूर्यस्थथा मन्त्रे प्रतिष्ठिता ।

देवीनां ज्योतिषः पुंजो वर्तमान्ते प्रकृतेः कला ।

अथान्तरात्मा परमं ज्ञाना‌त्मा सुवरानने ।

वर्त्तन्ते युवतीरूपा षोडशप्रकृति परा ।

प्रकृ ति हि बिना देवी ज्ञात्वा ब्रह्म सनातन ।

अतएव वरारोहे स एव श्रीसदाशिवः ।

जा‌ग्रत्स्वप्नेषु मूर्त्तीया तुरीया वर्णानि ।

तास्ता सर्वा वरारोहे युवती परमा परा ।

कार्यंकरणकाले च गणनीया वरानने ।

शून्यात् शून्यं परं शून्यं शून्यरूपं निराश्रनम् ।

कोटिसूर्यप्रतीकाशं निर्मलं ज्ञानमुत्तमम् ।

हृदि भावय चार्वङि तेजःपूंजं महाप्रभम् ।

दलितार्तिजनं पुंजाभं वर्णराजं वरानने ॥

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त्रिभंगललिताकारं चारुचूडाविराजितम्‌ ।

शिखिपुच्छभयुतं चूडं भ्रमरैः शोभितं परम्‌ ।

पीतांशुकपरिधानं बनमाला विभूषितम्‌ ।

रत्नकुण्डलसंयुक्तं स्फुरदूगण्डमनोहरम्‌ ।

कदम्बकुसुमोपेतं श्रवणं जनमोहितम्‌ ।

With the mark of Shri Vatsa shining brightly, with arms that reach down to the knees.

आरक्तनयनन्द्धं कोटिविद्युल्सम्युत्तिम्‌ ।

आरक्तचरणद्वन्द्वं तुपुरारावसंयुतम्‌ ।

आरक्त-करतल-स्वच्छं गुन्जामाला-विराजितम्‌ ।

शब्दब्रह्ममयं विष्णुं ईकारं शब्दजल्पितम्‌ ।

एवं रूपं समुत्पन्नं हृदि मध्ये व्रजानने ।

जागते कामबीजातं शून्यमध्ये सुलोचने ।

शून्यमध्ये स्थिता देवी कामबीजस्वरूपिणी ।

लकारसंयुता या सा कृष्णमाता प्रगीयते ।

सर्वेषु विष्णुमंत्रेषु कामबीजं परात्परम्‌ ।

हृदि शून्ये महेशानि विष्णोमन्त्रं जपेत्प्रिये ।

ततो वै कामबीजात्तु जायते विष्णुमिग्रहम्‌ ।

अतः काममयं विष्णुं हृदि भावय पार्वति ।

कामिनी या महेशानि विष्णुमाता प्रगीयते ।

अतो विष्णुमात्रवर्णं वर्णराजमवाप्नुयात्‌ ।

ककारः कामिनो साक्षात्‌ लकारः पृथिवीश्वरी ।

रतिस्तु महिनी साक्षात्‌ नादस्तु योनिरूपिणी ।

बिन्दुः कुण्डलिनी रूपं शिवशक्तिमयं प्रिये ।

इदं बीजं महेशानि विष्णुमाता पराक्षरा ।

निरक्षरो विष्णुर्देवः अक्षरार्ज्जायते ध्रुवम्‌ ।

अतएव वरारोहे ब्रह्मणः कारणं परा ।

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क्लींकारबीजरूपा या सापरा परिसोयते ।

परात्परतरा सापि वर्ण्तिमण्डलसंयुता ।

कार्मिनी सा महेशानि पृथिवी तस्य आसनम् ।

कदाचित् पृथिवीमध्ये कदाचित् वर्ण्तिमण्डले ।

वसन्ते कार्मिनी देवी नादबिन्दुसमन्विता ।

जन्म लब्धवा महाविष्णुः कूर्चबीजं जपेत् प्रिये ।

अनेन प्रजपेन्मंत्रं हुंकारं वरवर्णिनि ।

विष्णोर्बिग्रहने तत्तु स्वयं प्रकृति मूर्तिमान् ।

प्रकृति: परमाराध्या देवानां नगनन्दिनी ।

हुंकारं परमाश्चर्यं बीजरत्नं श्रृणु प्रिये ।

षष्ठ स्वर: परिचयो विद्याद् बीजं शशिप्रभम् ।

तस्योपरि वरारोहे सदा बिन्दुं विभावय ।

काम-मथ-मन्मथ-कन्दर्प-अक्षर-ध्वजसंज्ञक: ।

मीनकेतुमहेशानि पञ्चबीजं प्रकीर्तितम् ।

माया कूर्चं वधूबीजं लक्ष्मीबीजं च पार्वति ।

प्रणवश्र्च महेशानि स्वयं चतुर्दशं तथा ।

संपिण्डवतथा देवी येषु यासु च विद्यते ।

तं मंत्रं अतिसिद्धं स्यात् पर: प्रकृतिरूपिणी ।

एवं बीजं सकृत् ध्यात्वा सर्वसां भवति प्रिये ।

तन्मंत्रं प्रजपेद्देवी बीजध्यानं पुन: प्रिये ।

एवं हि दशधा कृत्वा मंत्राणां बीजसाधनम् ।

तस्मात् बीजात् समाकृष्य देवतारूपमुद्रवम् ।

देवध्यानं तत: कृत्वा इष्टमंत्रं ततो जपेत् ।

पुनर्ध्यानं देवताया: पुनर्जापं कुरु प्रिये ।

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१६० । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

एवं हि दशधा कृत्वा देवादि नाम एवं च ।

ततः सप्तच्छदां जप्त्वा कुलुकां दशधा जपेत् ।

आचान्ते सेतुमन्त्रं च दत्वा अष्टोत्तरं जपेत् ।

तन्मन्त्रं प्रजपेद्देवी एवं सिद्धिमुपालभे ।

॥ इति श्रीकामधेनुतन्त्रे देवदेवीसंवादे एकादशः पटलः ॥

द्वादश पटल

श्री महादेव उवाच :

अपरीकं प्रवक्ष्यामि रहस्यमितिगोपनम् ।

अकृत्वा ध्यानतत्वं च अष्टतत्वं तथैव च ।

अकृत्वा व्यर्थतां याति नात्र कार्य्या विचारणा ।

ततो जीवत्वमाप्नोति मंत्रं सिद्धयति तत्क्षणात ।

अथवा परमेशानि मन्त्रवर्ण यथा तथा ।

प्रणवं पुष्टितं कृत्वा अनुलोमविलोमतः ।

तदैव परमेशानि जीवत्वं प्राप्यते मनुः ।

एकधा वा त्रिधा कृत्वा यदि कुयाद्दीरानने ।

तदा सिद्धिमवाप्नोति नान्यथा सुरपूजिते ।

जीवत्वं हि बिना देवी यं मंत्रं प्रजपेत् सुधीः ।

तज्जपं चश्वलापादि शवमेव न संशयः ।

सदा निद्रातुरो मन्त्री जीवहीनस्य पार्वति ।

……(श्री क्लीं ह्रीं हूं स्त्रीं श्रीं ॐ)……

कथं सिद्धिमवाप्नोति निद्रायां वरवर्णिनि ।

जीव न्यासेन चार्वद्धि निद्राभंगो भवेद्‌ध्रुवम् ।

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बिन्दुतत्त्वं प्रजप्याथ ज्ञानतत्त्वं च सुन्दरि ।

प्राणतत्त्वं च चार्वाङ्गि देवतत्त्वं तथैव च ।

जपतत्त्वं मन्त्रतत्त्वं ध्यानतत्त्वं सुलोचने ।

अक्षरे अक्षरे देवी अज्ञात्वा प्रजपेद्‌दि ।

संयोगे वियोगे प्रफुल्लः तदुदाहृतम् ।

केवलं कालिकाबीजं तद्र्णं सुरपूजिते ।

आगतं ममवक्त्राद्य उद्गतं तन्मुखे सदा ।

मतं श्रीवासुदेवस्य इति ते कथितं प्रिये ।

एतन्मन्त्रो महागुह्यं ईशानमुखसंयुतम् ।

एतन्मन्त्रप्रभावाद्धि कालकूटं पिवाम्यहम् ।

एतास्तु मातृकावर्णाः सुषुम्नामध्यवर्तिनी ।

एता वर्णा वरारोहे महायोगमयो मता ।

अक्षरं हि बिना देवी न योगं जायते मम ।

योगमार्गे भक्तिमार्गे मुक्तिमार्गे च सुन्दरि ।

ध्यानमार्गे तु पूजायां जपमार्गे तथैव च ।

एतास्तु युदतीवर्णा कार्यकरणरूपिणी ॥

एतन्मन्त्रविज्ञाय न जप्तव्यं कदाचन ।

एतन्मन्त्रविज्ञाय पुराणं संहितां स्मृतिम् ।

पठेन्नवरकथां नोति पित्रभिः सह नानयथा ।

सर्वधर्मेषु यद्दर्मं सर्वयज्ञेषु यत्फलम् ।

सर्वदानेषु तोर्थेषु यत्फलं प्राप्नुयाद्‌द्विजः ।

तत्फलं समवाप्नोति वर्णानां धयानमात्रतः ।

वर्णध्यानमविज्ञाय वर्णतत्त्वं तथैव च ।

पुराणो वाचको यस्तु ध्रुवं नरकमाप्नुयात् ।

कोटिवंशान् समासाद्य स द्विजो नरकं ब्रजेत् ।

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यथा वक्ता तथा श्रोता द्रयोरपि फलं समं ।

कथमज्ञानतो मूर्खोऽज्ञात्वा वण्‌-विनिर्णयं ।

पुराणानि पठित्वा वै निश्चयं नरकं ब्रजेत् ।

निश्चयं च महेशानि दारिद्रयं घोरमाप्नुयात् ।

निश्चयं रोगमाप्नोति जम्बूद्वीपस्य भारते ।

स स्यात् सनातनो देवी वाणी त्रिपुरसुन्दरी ।

सर्वासां युवतीनां च भवानी चाधिदेवता ।

ध्यायेदेवीं महामायां मातृकां जगदीश्वरीम् ।

रक्तपद्मासनगतां रक्तांशुक-परिष्कृताम् ।

रक्तचन्दनलिप्ताङ्गीं रक्तवस्त्रोत्तरीयिनीम् ।

रक्तविम्बफलाभासां राकाचन्द्रमुखीं पराम् ।

भ्रमद्भ्रमरलीलाभनयनत्रय-राजिताम् ।

कटाक्षशतसंयुक्तां चारुचूडामणिनोम् ।

रक्तालङ्कार-सुभगां त्रिभङ्ग-ललिताकृतिम् ।

हास्ययुक्तां प्रफुल्लास्यां ज्योत्स्ना-जाल-समच्छविम् ।

मृणालसदृशाकार-बाहुबली-बिराजिताम् ।

कञ्चुलसंयुक्तां रम्यां कदम्बकोरकस्तनीम् ।

नखानां किरणोद्भुनं परिमोहन ।

एवं ध्यात्वा महामायां भवानों शिवमोहिनोम् ।

अपरेकं प्रवक्ष्यामि रहस्यं परमाद्भुतम् ।

हृत्पद्म-द्वादशदले वराढ्ये परिभावयेत ।

यस्य देवस्य यद्बीजं प्रफुल्ल कलिकां तथा ।

ध्यात्वा देवों यथाशक्त्या तस्मादाविर्भवेत् स्वयम् ।

शक्तिर्‌वा विष्णुदेवो वा शिवो वा सूर्य एवं वा ।

बीजादुत्पद्यते देवी परब्रह्म निरञ्जनाम् ।

बीजध्यानं बिना देवी कथंमुत्पद्यते हरिः ।

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सदाशिवेा महादेवः कथमुत्पद्यते स्वयम्‌ ।

सदाशिवस्य जननी बीजरुपा सनातनी ।

इति यो वत्ति स ज्ञानी स एव वीरसत्तमः ।

गुरुयोग्यः स एव स्यात्‌ स एव परमः शिवः ॥

सर्वेषां चैव बीजानामेव ध्यानं समाचरेत्‌ ।

शुक्लविद्युत्समाकारां नयनत्रययथारणीम्‌ ।

कटाक्षविशिखैर्यु क्तां चतुर्बाहुसमन्विताम्‌ ।

त्रिभङ्ग-ललिताकारां चारुचूड-विराजिताम्‌ ।

पुण्डरीकोपविष्टां च राकाचन्द्रमुखीं पराम्‌ ।

नानागन्ध-प्रलिप्ताङ्गीं सुगन्धिमाल्यसंस्कृताम्‌ ।

नानाभरण-लिप्ताङ्गीं मेघांशुकपरिष्कृताम्‌ ।

वीणावाद्यविनो देन उल्लसन्ती जगत्त्रयम्‌ ।

आद्यां ब्रह्ममयीं देवीं षट्बीजास्वरुपिणीम्‌ ।

ब्रह्माद्यां देवता या स्वाच्चरणे पतिता भुवि ।

भजेऽहं मातृकादेवीं वेदमातां सनातनीम्‌ ।

अनेन विधिना ध्यात्वा सर्वासां भवति प्रिये ।

बीजमेतन्महेशानि प्रथमं दशधा जपेत्‌ ।

तन्मन्त्रं चर्च्चलापां गि आनन्दकूटने स्थितम्‌ ।

ततो ध्यात्वा पुनर्जप्त्वा दशधा वर वर्ण न्ति ।

एतत्तत्वमविज्ञाय प्रजपेद्‌दि पार्वति ।

सर्वपापमयं सोड्‌डपि भवेत्‌ शूकरवद्द्‌विजः ।

तत्त्वमेतन्महागुह्यं योगमार्गे स्थितं सदा ।

तव भक्त्या मयाख्यातं अतिगुह्यं सुलोचने ।

तन्त्राणां सारमेतत्तु सर्वसिद्धिप्रदायकम्‌ ।

स योगी योगवेत्‌ता च योगात्मा योगनायकः ।

योगाच्चार्यो योगमाया योगानन्दप्रदायकः ॥

॥ इति श्री कामधेनुतन्त्रे देवदेवीसंवादे द्वादशः पटलः ॥

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श्री महादेव उवाच :

अधुना संप्रवक्ष्यामि आनन्दपटलं प्रिये ।

शृणु तत्वं प्रवक्ष्यामि सुन्दर सुमनोहरम् ।

हृत्पद्मे द्वादशदले विद्युत्कोटि-सम्न्विते ।

भावयेन्मन्त्रबीजानि यस्य या इष्टदेवता ।

भावयेत प्रथमं बीजं वराटोपरि पावंती ।

अन्यानि सर्ववोजानि पत्रमध्ये पृथक्-पृथक् ।

एवं हि दशधा जप्त्वा बीजं जपेत्प्रिये ।

दशधा दशधा देवी प्रजपेद्बोजमुत्तमम् ।

ततस्तु बीजमध्ये तु ध्यायेदिष्टं सुलोचने ।

तस्माद्बोजाद्द्वारारोहे देवता जायते ध्रुवम् ।

तस्य देवस्य चार्वङ्गी निरीक्ष्य देहसुन्दरम् ।

चरणात् केश-पर्यन्तं नानावेषमयं प्रिये ।

निरोक्ष्य मनसा भक्त्या पुनर्ध्यानं समाचरेत् ।

ततस्तु प्रजपेद्बोजं वर्णानन्दस्वरूपिणीम् ।

प्रजपेत प्रथमं बीजं बीजध्यानं ततः परम् ।

एतस्तु प्रथमं बीजसाधनं दुर्लेभं प्रिये ।

सर्वासां बीजवर्णानां यदि जानाति साधकः ।

ध्यान परमकल्याणां वर्णे वर्णे पृथक् पृथक् ।

अज्ञात्वा चञ्चलापाङ्गी मातृकाध्यानमाचरेत् ।

तदेव सहसा देवी सर्वासां जायते ध्रुवम् ।

यस्य मन्त्रस्य यद्र्ण तस्य ध्यानं पृथक् पृथक् ।

बीजात्तु जायते विष्णुरवतारवरः प्रिये ।

बीजात्तु जायते रामा बीजात्कृष्णः प्रजायते ।

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स्थावरं जङ्गं देवि सर्व बीजात् प्रजायते ।

आज्ञाचक्रे विशुद्दौ च मूलाधारे तथैव च ।

स्वाधिष्ठाने ततो देवी मणिपुरे च पार्वति ।

अनेन विधिना देवी कुर्वन् साधक-सत्तमः ।

प्रत्यहं कुरते यस्तु स सिद्धः शिव एव सः ।

प्रत्यहं चक्रलापादौ षट्चक्र भ्रमयेतु यः ।

साधनाच्च महेशानि तस्मात् कुसुमतत् प्रिये ।

नित्यं हृदये कुुर्यादवश्यं वद किं प्रिये ।

बीजस्य चक्रलापादौ ध्यानं मन्त्रं पृथक्-पृथक् ॥

साक्षात् श्रीप्रकृतिद्देवी बीजरूपा सनातनी ।

सनातनस्य जननं सर्ववर्णमयो प्रिये ।

जपस्य प्रथमे काले बीजस्य तत्त्वमुच्चरेत् ।

ततस्तु प्रजपेनमन्त्रं स-सेतुं वरवर्णिनि ।

बीजतत्त्वमविज्ञाय प्रजपेदि कोटिथा ।

सर्वं तस्य वृथा देवी अरण्ये रोदनं यथा ।

तत्त्वत्रयं प्रकश्यामि मन्त्राणां श्रृणु सुन्दरि ।

विभाग्य नाभिपद्मेषु वायबीजं स-बिन्दुकम् ।

मन्त्रस्य प्रथमं वायूबीजं मध्ये विचिन्त्य वै ।

ध्यात्वा बीजं महेशानि प्रजपेदू बीजमुत्तमम् ।

दशधा प्रजपेदू बीजं दशधा बीजमेव च ।

दशतत्त्वयुतं मन्त्रं तदेव सहस्रा भवेत् ।

संशोध्य बीजं चार्वङ्गी वह्निबीजेऽ विचिन्त्य वै ।

हस्तपद्मे वह्निमध्ये तु ध्यात्वा बीजं हुताशनम् ।

दशधा प्रजपेन्मन्त्रं द था ध्यानमेव च ।

विशतत्त्वयुतं मन्त्रं तदेव सहस्रा भवेत् ।

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मातृस्वरात्ततो देवी गलितामृतधारया ।

आप्लाव्य बीजं चारुज्ञ सर्वावयवसंयुतम् ।

तदैव सहसा कृत्वा ललाटे बर्पाणये ।

भवतस्यु तु मध्ये तु तदबीजं भावयेत्प्रिये ।

दशधा च जपित्वा वै वीरश्र दशधा स्मरेत् ।

तदामृतमयं बीजं सहसा भवति प्रिये ।

विष्णुमन्त्रेषु देवेशि चन्द्रबीजेषु भावयेत् ।

अन्यत् सर्वेषु मन्त्रेषु भावयेद्रपाणये ।

त्रिशत्तत्त्वयुक्तं मन्त्रं तदैव भवति प्रिये ।

तत्त्वातीतं स्वधातीतं वाचा विद्यां जपेत्प्रिये ।

अनेन विधिहीनश्व तज्जपं विफलं सदा ।

तत्त्वहोनं जपेद्यस्तु विफलं सततं प्रिये ।

शोषणं दहनं देवी अमृतं ज्ञानसंज्ञकम् ।

एत्तत्त्वतत्वमयं भद्रे शीघ्रसिद्धिप्रदायकम् ।

यो जपेत्तत्त्वरहितं तस्य हानि: पदे पदे ।

तस्मात्तत्वं शुभाराध्य तस्मान्मन्त्रं जपेत्सुधी: ।

अनेन विधिना देवी सर्वतत्त्वमयं मनु: ।

कृष्णमन्त्रेषु रामेषु अवतार-वरेपु च ।

सौर-गाणपतौ देवी शक्तिमन्त्रे स्वयं प्रिये ।

शिवमन्त्रेषु चारुज्ञ अन्यतन्त्रे तथैव च ।

त्रिशत्तत्त्वयुक्तं कृत्वा मन्त्रबीजं सुलोचने ।

एवमेव विधानेन बीजे जीवत्वमाप्नुयात् ।

तस्मात् बीजाद्रारोहे रामकृष्णादपश्च ये ।

उत्पद्यन्ते वरारोहे नान्यथा वर्णनिन ।

एतन्मन्त्रं सकृत्कृत्वा प्रजपेदनिशं मनुम् ।

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कामधेनु तन्त्रम् | १६७

प्रजपे दनिशं विद्यां शौचाशौचं न चाचरेत् ।

मन्त्रे चाक्षरबुद्धिः स्याद् गुरौ तु मानवः प्रियः ।

देवताया वरारोहे प्रतिमा-बुद्धिस्तु जायते ।

कि तस्य जपपूजाभ्यां सर्थं कर्थनमू ।

इति ते कथितं देिव वीजतत्वं सु-गोपनम् ।

कस्य चिन्नैव वक्तव्यं यदि कल्याणामिच्छति ।

एतज्ज्ञानमविज्ञातः स कथं गुरुतां ब्रजेत् ॥

॥ इति कामधेनुतन्त्रे देवदेवीसंवादे त्रयोदशः पटलः ॥

॥ चतुर्दशः पटलः

श्री देव्युवाच :

देवदेव महादेव संसाराणव-तारक ।

कृपया कथयेशान वकार-तत्त्वमुत्तमम् ॥

श्री महादेव उवाच :

पूर्वोक्तं चञ्चलापाङ्ग गायत्रीतत्वमुत्तमं ।

गायत्री या वरारोहे ! नत्वंकार-संयता ।

कान्तं शेष-वकारं च वरुणं हृदि भावय ।

यवर्ग वायुबीजं च हृदि भावय पावंती ।

यकारं यस्तु देवेशि वायुबीजं तदुच्यते ।

यकारस्य चतुर्थो यो वारुणं बीजकोत्तमं ।

यकाराद्ध वायुबीजं मयैतत्प्रिशिचतं प्रिये ।

सर्वविद्यासु मन्त्रेषु वरुणं भावय प्रिये ।

वह्निजाया-युतानां च यवर्गं हृदि भावय ।

गायत्री-संहिता देिव पापोच्चाटन-कर्मणि ॥

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पूर्वोक्तध्यानमार्गेण भावना परीकीर्तिता ।

ध्यानभेदेन चार्वद्धि वकारं भावय प्रिये ।

अधुना सम्प्रवक्ष्यामि ककार-ध्यानमुत्तमम् ।

विशेषं श्रृणु वक्ष्यामि ककारस्यातिदुर्लभम् ।

यच्चोक्तमानेन्दपटलेऽधुना कथयामि ते ।

तद्धयात्वा साधको याति दुर्लभं मोक्षवम्‌मयम् ।

येन ध्यानप्रकाशेन मन्त्रं तन्त्रश् सिद्धयति ।

एवं तद्धयानमात्रेण शिवतुल्यो भवेत्‌ नरः ।

ककार-ध्यानमात्रेण सर्ववर्णी हि सिद्धयति ।

ककारभावनाच्चैव सर्वासां भावना भवेत् ।

तस्मात्‌ सर्वप्रयत्नेन ककारं हृदि भावय ।

ॐ प्रतरादित्यसंङ्काशां सिहप्रेतोपरिस्थिताम् ।

रक्ताभोपविष्टां च रक्तवस्त्रपरिधृताम् ।

चतुर्भुजां त्रिनेत्राश्च पञ्चबाण-धनुर्धराम् ।

वरदाभयदात्रीश्व पीततुण्डोपधराम् ।

मृणालसहशाकारचतुर्बाहु परि वृताम् ।

शङ्ख-कुण्डल-केयूर-अङ्गदैः परिशोभिताम् ।

सुगन्ध-मल्लिकाहारैः कुबरीमध्यशोभिताम् ।

त्रिभङ्गलतिकार-चारुचूडाविराजिताम् ।

शिखिपुच्छयुतां छूड़ां नानारत्नसमन्विताम् ।

ईषद्वास्यप्रसन्नास्यां मुक्तारत्नजतनसिकाम् ।

माणिक्यकिरणोद्योतदस्तपङ्क्ति विराजिताम् ।

पूर्णेन्द्रमसाभासनख पङ्क्तिमरुत्तमाम् ।

स्वर्णसूत्रयुतं हार-रत्न-चारुविभूषिताम् ।

कटाक्षविशिखोद्दीप्त-भू-लतापरिशोभितां ।

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तीर्थत्रययुक्तां रम्यां नयनत्रयराजिताम्‌ ।

रामरम्भाभसमाकार ऊरुद्वयविराजिताम्‌ ।

बहुलता सु संयुक्तरत्नकिङ्कलिशोभिताम्‌ ।

अष्टवर्गैस्सेविताश्व अष्टवर्गैः प्रपूजिताम्‌ ।

सिन्दूररतिलकालकामञ्जनाढूत लोचनाम्‌ ।

ललाटपङ्काशुभ्रअर्द्धचन्द्र परिधृताम्‌ ।

ब्रह्मादिदेवतावृन्दैः शिरसा धार्यंते च याम्‌ ।

क्रिमाख्यां कामिनीं साक्षात् ककारवररुपिणीम्‌ ॥

एवं ध्यात्वा वरारोहे प्रजपेद्‌द साधकः ।

तदैव सिध्यर्ज्जायते तस्य सुन्दरि ! ।

वर्णज्ञानं विना देवी न जपेत् पाशवः क्वचित् ।

कि तस्य ध्यानपूजायां पुरुषव्यर्याशतं शतम्‌ ।

कि तस्य जपहोमेन चन्द्रसूर्यस्य पर्वणि ।

वर्णज्ञानं विना देवी वैष्णवः शैव एव वा ।

एकदानोच्चरेद्देवि अज्ञात्वा वर्णदीपिनोम्‌ ।

सर्वासां मन्त्रविद्यानां दीपनी या प्रकटीत्तता ।

सर्वेषां शास्त्र-मध्येऽपि तु प्रशस्ता वर्णदीपिनी ।

शक्तिमन्त्रे तथा सौरे गरोष्मच्चर्यंते सदा ।

ज्ञात्वा तन्त्रं प्रकुर्वीत दीक्षां पूजां शुचिस्मतां ।

श्री महादेव उवाच :

रहस्यं तत्र वक्ष्यामि अत्यन्तगोपनं श्रृणु ।

यत्कृत्वा साधको याति परमं पदमुत्तमम्‌ ।

ललाटे तिलकं कृत्वा चन्दनेन सुगन्धिना ।

कर्पूर रागुरुकस्तूरीरोचनाकुङ्कुमैः प्रिये ! ।

तिलकं धारयेत् यत्नादेकीकृत्य मनोहरम्‌ ।

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त्रिकोणं सुन्दरं स्वच्छं तिलकं जनमोहनम् ।

एकीकृत्य पृथक् धापि नानावस्तुषु कारयेत् ।

राज्यार्थी रक्तवर्णेन मोक्षार्थी श्वेतचन्दनैः ।

वश्ये रोचतया देवी तिलकं कारयेत् सुधीः ।

मोहने चञ्चलापाङ्गि अगुरु-कुङ्कुमा मादिना ।

कृष्णाग्रन्यं वरारोहे शत्रोर्मारण-कर्मणि ।

ललाटे बाहुमूले च तथा स्कन्धद्वयेपु च ।

हृत्पद्म-पाश्वयुगले पृष्ठे नाभौ च सुन्दरि ।

ऊरुद्वये गण्डयुग्मे अधः पादद्वयेपु च ।

विलिखेत् यत्नतो देवी ककारवर्णमुत्तमम् ।

तत्र विन्दुयुतं कृत्वा विलिखेदर्वाणिनि ।

तदेव सहसा देवी विद्यामन्त्रश्व सिद्ध्यति ।

मोहयेदखिलान् लोकान् वश्येदिष्टदेवताम् ।

इष्टदेवं वशं कृत्वा एकदा प्रजपेद्‌वदि ।

तत्क्षणात् चञ्चलापाङ्गि देवत्वमुपजायते ।

देवत्वं हि विना देवी कुतः पूजा कुतो जपः ।

अन्यथा प्रेतवत् पूजा वृषणवे च विशेषतः ।

ललाटे तिलकं कृत्वा रोचनासु शुचिस्मते ।

तन्मध्ये विलिखेद्र्णि ककारं समनोहरम् ।

सामान्यमेतद् कथितं तिलकं जनमोहनम् ।

एतत्तु तिलकश्र्व वशयेदपि केशवम् ।

जपासनं दशाम्यां तु तदारेभ्य च प्रत्यहम् ।

एतद्र्णमविज्ञाय विषये समुपास्महे ।

स भ्रष्टः स च पापिष्ठः रौरवं नरकं व्रजेत् ।

॥ इति कामधेनुतन्त्रे देवदेवीसंवादे चतुर्दशः पटलः ॥

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पञ्चदश पटलः

श्री देव्युवाच :

देवदेव महादेव नीलकण्ठ त्रिलोचन । हन्तरं कथयशो यं च तं वल्लभां ।

श्री महादेव उवाच :

शृणु देवी प्रवक्ष्यामि ज्ञानं परम-दुर्लभं । येन विज्ञान-मात्रेण विष्णुः स्यादृष्णवः प्रिये ।

हृत्पद्मे द्वादशलले स्वविद्यां भावयेत्सुधीः । ककारं भावयेदादौ वराटोपरि पावंती ।

पत्त्रे पत्त्रे ततो देवी स्वविद्यां प्रजपेत्सुधीः । मन्त्राणां प्रथमं बीजं ध्यात्वादौ प्रजपेत्सुधीः ।

तस्मान्मन्त्रो ततो देवी जायते देवविग्रहः । देवतां च ततो ध्यात्वा तन्त्रोक्तध्यानवर्त्मना ।

ध्यानं च त्रिविधं देवी समानफलदायकं । कृत्वा ध्यानत्रयं देवी हृत्पद्मे परमेश्वरी ।

सहस्रदलपद्मान्तः मध्यस्थाने गुरोर्मुखात् । स्वविद्यां भावयेद्देवी कोटित्रिद्युत्समाकृति ।

भावयेदनिशं भक्त्या सिद्धो भवति तत्क्षणात् । बीजात्तु जायते देवी रामकृष्णादिदेशिकः ये ।

ते सर्वे चञ्चलापाङ्गी बीजात्तु जायते प्रभुः । ज्ञात्वा सनातनं तत्त्वं आनन्दपटले स्थितं ।

पूजा कार्या च चार्वङ्गी सर्वसिद्धिमयो भवेत् । इदं सनातनं तत्त्वं अज्ञात्वा नरकं ब्रजेत् ।

शूद्रः शूद्रमुखाच्छ्रुत्वा विद्यां वा मन्त्रमुचमं । रौरवं नरकं यं यं तं तमाप्त्नोति निशिचतं ।

न शूद्राय मति दद्यात्तु च शूद्रः कदाचन ।

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उभयोरनरकं देवी कोटिकुलसमाकुलम् ।

अनाचारो द्विजो यस्तु शूद्राणां गुरुरेव सः ।

यदि श्रद्रो भवेद्देवि सत्यवादी जितेन्द्रियः ।

स धर्मे निरतो भूत्या श्रुत्वा द्विजगुरोर्मुखात् ।

सर्वसिद्धिमवाप्नोति तेजः श्रेष्ठं देवमाप्नुयात् ।

यद्‌देशे विद्यते शूद्रः पातकी मन्त्रविक्रयी ।

तद्देशं पतितं मन्ये तस्य राजा च पातकी ।

स कथं निष्पलापात्की जिह्वायां प्रजपेन्मनुम् ।

तस्य जिह्वा वरारोहे मूत्रशोणितविटू यथा ।

तन्मुखं मूत्रविट्कूपं अन्नं विष्ठा समं सदा ।

तज्जलं शोणितं साक्षाच्चाण्डालसमजातिषु ।

पृथिव्यां यानि तीर्थानि तानि तस्य मुखे सदा ।

आलोक्य तन्मुखं तीर्थः तत्स्थानं त्यज्य गच्छति ।

तीर्थकोटिपलायन्ते दृष्ट्वा तन्मुखमण्डलम् ।

गङ्गा जलं परित्यज्य द्रुतं स्वस्थानमाप्नुयात् ।

महापातकिनो ये च ब्रह्महत्यादिसंयुताः ।

त्रैलोक्यपावनी गंगा तान्पुनाति न संशयः ।

मन्त्रविक्रयिनः शूद्राः सदा नरकगामिनः ।

कलौ तु भारते वर्षे भविष्यति न संशयः ।

मन्त्रविक्रयिनः सर्वाः व्याघ्रयोने प्रजायते ।

तत्ससर्गश्च यो विप्रश्चर्मकार स एव हि ।

चाण्डालसहशः सोडपि स एव वर्णसंकरः ।

स्वधर्म-निरतः शूद्रो विद्यामन्त्र श्रृणोति यः ।

स धन्यः पृथिवी-मध्यें स एव वंशवोत्तमः ।

स शाक्तः शिवभक्तश्च गाणेशः सौर एव च ।

एतत्‌तु कथितं देवी वर्णज्ञानवि निर्णयम् ।

॥ इति श्रीकामलार्थनुतन्त्रे देवदेवीसंवादे पञ्चदशः पटलः ॥

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षोडश पटलः

श्री महादेव उवाच :

अपरैकं प्रवक्ष्यामि रहस्यं परमाद्भुतम् ।

यत् कृत्वा चञ्चलापाङ्ग रावणाद्या निशाचरा: ।

अवाप्यमत्रिवृद्ध च त्रैलोक्याधिपतिप्रभु: ।

सांकेतं परमं गुह्यं अक्षराणां पृथक् पृथक् ।

एतत्तत्वं विजानाति हरिब्रह्मा पुरन्दर: ।

पक्षाशब्दसंकेतं सावधानावधारय ।

अकृत्वा साधको याति रौरवं नरकं ब्रजेत् ।

रौरवं नरकं याति पुनरावृत्तिदुर्लभं ।

विशेषं विष्णुमन्त्रेषु कुर्याद्वैषणसत्तमः ।

अकृत्वा वैष्णवो याति नरकान् नरकोटिश: ।

मासि मासि वरारोहे शनिभौमदिने प्रिये ।

प्रात:स्नानं समासाद्य कृत्वा संध्यां समाप्य च ।

सूर्यार्घ्याद्यं ततो दद्यात् पादप्रक्षालनाय च ।

यागमण्डपमासाद्य भूतशुद्धिविधाय च ।

कुर्यान्न्यासं मातृकाया: प्राणायामं तत: परम् ।

न्यासान्न्यासत: कुर्यात्तन्त्रमार्गेण पार्वति ।

शुक्लाम्बरधर: स्रग्वी गन्धालिप्तकलेवर: ।

रक्तासनं समासाद्य कुशासनस्थापि वा ।

प्रलिप्य ताम्रपात्रेषु सिन्दूरं रक्तचन्दनं ।

विलिख्य मातृकावर्णं हस्तिमन् पात्रे पृथक् पृथक् ।

अकारादिक्षकारान्तं सर्विन्दु चन्द्रसंयुतम् ।

महापद्मान्तरस्थानादानीय ब्रह्मवक्त्रकम् ।

वामनासापथेनैव इवासं पुष्पाञ्जलौ क्षिपेत् ।

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तत्पुष्पं चषलापाज्ञि कुर्व्यात् पुष्पस्य स्वयंम् ।

ध्यात्वा तु पूजयेदेवीन् ऋमेणैव पृथक् पृथक् ।

गन्धैर्नानाविधैर्देवीन् पुष्पैर्नानाविधैस्तथा ।

धूपैर्नानाविधैर्देवि दीपैर्नानाविधैस्तथा ।

नैवेद्यं विविधं देविचतुर्विधमयं तथा ।

दत्वा नानाफलादेश्च पूजयेत परमेश्वरम् ।

नानापुष्पमयैर्हारे: शुक्रादिगन्धसंयुतम् ।

महापद्मवनान्तस्थ अष्टोत्तरशतं जपेत् ।

प्रजपेत मातृकावर्‌ण वर्णे वर्णे पृथक् पृथक् ।

प्रतिपदं मे जपेन्मन्त्रं यस्मिन् पद्मेषु यत् स्थितम् ।

तत्सिम्न पद्मे वस्नानस्थ: स्वविद्यां प्रजपेच्छृणु ।

सुप्रसन्ना मातृका स्यात तदेव सहसा प्रिये ।

अकृतवा मातृकापूजां मासि मासि व्रानने ।

इष्टविद्यां जपेद्यस्तु तस्य हानि: शृणु प्रिये ।

चित्रानाड़ीगता भूत्वा मातृका जगदीश्वरी ।

सर्वेषां वैष्णवानां च शाक्तानां वरवर्णिनि ।

शैवानां च महेशानि अन्येषां चैव सुन्दरि ।

हरान्ति वैन्यवादीनां नान्यथा वचनं मम ।

प्रशस्ता मातृकापूजा दीक्षाया मत एव हि ।

पुरश्चर्या हि चार्वङ्गी पूजनীয়ा पृथक् पृथक् ।

माता सा सर्वविद्यानां मन्त्राणां च पृथक् पृथक् ।

यस्मादुत्पद्यते विद्या मन्त्रं च सुरवन्दिते ।

तस्मात्तु यन्त्रतोदेवी तासां पूजा विधीयते ।

नान्यथा निष्फला पूजा संवत्सरक्रता च या ।

अन्नेन विधिना देवि पूजयेत्त् यदि मातृकाम् ।

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प्रसन्ना मातृका दे व पुत्तत्वेनानुकल्प्यते ।

रहितो मातृकापूजा जपपूजनतत्परः ।

तस्य सर्व महामाया मातृका जगदीश्वरी ।

हरन्ति मन्त्रतेजांसि आयुर्विद्या यशो बलम् ।

अपरेकं प्रवक्ष्यामि रहस्यं परमाद्भुतम् ।

अनुलोमविलोमेन कथितं श्रृणु पार्वति ।

अनुलोमविलोमं च तथैव हि महेश्वरि ।

सर्वेषां जपयज्ञानां सहसा फलभाग् भवेत् ।

सहसा सिद्धिमाप्नोति धर्मं माप्नुयात् ।

सहसा अर्थमाप्नोति सहसा मोक्षमाप्नुयात् ।

पौर्णमास्याममावास्यां मासि मासि प्रयत्नतः ।

यः करोति प्रसन्नात्मा स एव श्रीसदाशिवः ।

ज्ञात्वा सद्दीपनिं विद्यां आनन्दपटले स्थितं ।

अज्ञात्वा दीपनिं विद्यां चतुर्वर्गफलप्रदाम् ।

रहस्यमेतदन्यच्च सर्वं च विफलं त्रिजित् ।

॥ इति श्री कामधेनुतन्त्रे देवदेवीसंवादे षोडशः पटलः ॥

सप्तदश पटल

श्री महादेव उवाच :

एतत्तत्वमविज्ञाय न भावो जायते प्रिये ।

न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणो च पावंति ।

भावेषु विद्यते देवी भावो मोक्ष-स्वरूपकम् ।

दिव्यभावो वीरभावः सदैव सहसा भवेत् ।

अन्यथा चञ्चलापाङ्ग पशुभावमयः सदा ।

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स्वभावेन विना देवी कथं सिद्धिर्भवेत् प्रिये ।

तस्मात् प्रयत्नतो देवी वीरभावमयो भवेत् ।

अनेनैव विधानेन मातृकां पूजयेतु यः ।

स एव दिव्यभावः स्याद् वीरभावः स एव हि ।

स धनी स गुणी लोके मातृकां यस्तु पूजयेत् ।

अपरैकं प्रवक्ष्यामि सामान्यं वरवर्णिनि ।

पूर्वोक्तध्यानमाचार्य प्रजपेन्मातृकामनु ।

ककारध्यानमात्रेण सर्वसिद्धिः प्रजायते ।

जप्त्वा ककारं चारुज्ञः सर्वासां भर्तित प्रिये ।

सर्वासां मातृकां जप्त्वा ककारं केवलं च वा ।

ककारं सर्ववर्णानां मूलप्रकृतिरूपिणी ।

तस्मात प्रयत्नतो देवी ककारं पूजयेत् प्रिये ।

प्रत्यहं पूजयेदेवां प्रथमं पूजयेत् सुधीः ।

सर्वासां फलमाप्नोति तदा भावमयो भवेत् ।

ककार-पूजनाद् भद्रे सर्वासां पूजनं भवेत् ।

प्रत्यहं कुरते यस्तु प्रतिमासि वरानने ।

दिव्यवीरः स एव स्यात् सर्वपूजाफल लभेत् ।

अकृत्वा चञ्चलापादौ मनसापि च संस्मरेत् ।

सर्वपूजामयः सोऽपि सर्वभावमयः सदा ।

भावतत्त्वमविज्ञाय विष्णुमन्त्रं कथं जपेत् ।

शक्तिमन्त्रं महेशानि स कथं पारमो जपेत् ।

शिवमन्त्रं च सौरं च गाणेशं स कथं जपेत् ।

भावतत्त्वं विना देवी प्रजपेद् यदि कोटिथा ।

सर्वं तस्य वृथा देवी नरकं च पदे पदे ।

स कथं चञ्चलापादौ दिव्यवीरगुरुभवेत् ।

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पशुवत सर्वदा देवि स एव पशुगुरु: प्रियं ।

भावतत्त्वेन रहित: स कथं पञ्चमं यजेत् ।

वैष्णवस्तु वरारोहे मकारं पञ्चमं यजेत् ।

देवताया वरारोहे शरीरं जायते ध्रुवं ।

एवं मन्त्र प्रवक्ष्यामि आनन्दपटलेऽतिस्थितम् ।

कालोचितादिविद्यां च त्रिशदुद्वारमयीं सदा ।

तदा सिद्धिमयं सोऽपि अन्यथा विफले सदा ।

इष्टध्यानं तत: कृत्वा हृदि मध्ये निरीक्षणं ।

प्रथमं कामिनीं ध्यात्वा प्रफुल्लां तदनन्तरं ।

प्रफुल्लाद्ध्यानमात्रेण जायते देवविग्रहं ।

प्रफुल्ला जायते देवि यस्या इष्टदेवता ।

तदिष्टं भावयेद्देवी मन्त्रोकध्यानवर्त्मना ।

देवताया: शरीरं च बोजादुत्पद्यते ध्रुवं ।

मन्त्रस्य प्रयमादू बीजाज्जायते नगनन्दिनि ।

पश्वाशनमात्रूका या सा सर्वा युवतिरुपिणी ।

तस्मात्तु युवतिदेहाज्जायते कृष्णविग्रहं ।

राम: पञ्चलाशाख: प्रफुल्लो जायते ध्रुवं ।

बोजादुत्पद्यते देवि परंब्रह्म सनातन: ।

बीजसयोगमात्रेण शब्दब्रह्म सनातन: ।

अपरैकं प्रवक्ष्यामि रहस्यं परमाद्भुतं ।

पश्वाशद्वरुणसंकेतं पश्वाशत्तत्त्वमद्भुतं ।

वर्णतत्त्वं विना देवि प्रजपेद् यदि कोटिधा ।

सर्वं तस्य वृथा देवि हानिस्तस्य पदे पदे ।

हृद्पद्मे द्वादशलदले वराटोपरि कामिनों ।

ध्यात्वा प्रफुल्लतो देवि तद्गर्भे वर्णभाने ।

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अकारादि-क्षकारान्तं त्रिकोणमध्ये मण्डले ।

अनुलोम विलोमेन कामिन्या गर्भपञ्जरे ।

एकंक भावयेद्देवी प्रतिवर्गे पृथक् पृथक् ।

सर्वासां देवदेवीनां ककारं सुरपूजिते ।

ध्यात्वा प्रयत्नतो देवी अनुलोम-विलोमतः ।

पश्चाश्चतत्वसंकेतं पश्चाशदर्णमेव हि ।

यः करोति नरो ज्ञात्वा शीत्क्रं विद्या प्रसिदति ।

किमसाध्यं बरारोहे यस्मै विद्या प्रसिदति ।

षट्चक्रे परमेशानि रहस्यं स्थानमुत्तमं ।

सहस्तारे गुरोः पादे पदंं ध्यात्वा प्रयत्नतः ।

पश्चाशदर्णसंकेतं यः कुुर्याद्न्मनः प्रिये ।

केशवं वश्ययेद्देवी स्हस्येनाधुनां ध्रुवं ।

मोहयेच्चक्षु्षलापाङ्गं रुद्रं कालानलप्रभं ।

सर्वं चराचरं विश्वं सहसा मोहमनयेत् ।

एतत्ते कथितं देवी वर्णमोहनमुत्तमं ।

अज्ञात्वा मोहनं तत्वं प्रजपेद् यदि पार्वति ।

तस्मै लोका गन्धर्वाश्च वैरभावं ब्रजन्ति वैं ।

प्रत्यक्षरमयं देवी कथितं वर्णमोहनं ।

अज्ञात्वा मोहनं तत्वं यः कुुर्याद्यमोहनं ।

सर्वं तस्य वृथा देवी नान्यथा तु कदाचन ।

एतत्तत्वप्रभावाद्धि अचिरात् सिद्धिमाप्नुयात् ।

गर्भमध्ये जपेन्मन्त्रं अनुलोम-विलोमतः ।

जपित्वा वर्णमेकं च स्वस्थानमानीयेच्च तं ।

पुनर्वर्णं समाकृष्य कामिनी-गर्भमध्यतः ।

प्रजपेदशरं देवी चन्द्रविन्दुसमन्वितं ।

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पञ्चाशदक्षरं चैव भावयेच्च पृथक् पृथक् ।

अनेन विधिना देवी यो जपेन् मन्त्रमुत्तमं ।

तस्य शीघ्रं भवेत सिद्धिरन्यथा विफला भवेत् ।

सम्भावं लिखितं देवी यथा भवति अक्षरं ।

तत्तदेव बरारोहे जपपूजां निरर्थकं ।

विशेषमन्त्रं वक्ष्यामि आनन्दपटले स्थितं ।

मन्त्रं श्रीमोहनं नाम पञ्चाशद्दर्शनसञ्जकं ।

ज्ञात्वा यः कुरते देवी तस्य सिद्धिरदूरतः ।

अन्यथा विफलं सर्वं रहस्यं सफलं न हि ।।

।। इति श्री कामधेनुतन्त्रे देवदेवीसंवादे षटदशः पटलः ।।

अष्टादश पटल

श्री महादेव उवाच :

अथान्यत् सम्प्रवक्ष्यामि रहस्यं परमाद्भुतं ।

अज्ञात्वा वैष्णवो याति रौरवं वरवर्णनि ।

एवं तत्त्वयुतं देवी यो जपेत् परमेश्वरं ।

नवतत्त्वमयीं विद्यां यदा जपति पावंती ।

सहसा सिद्धिर्जायते सुर-सुन्दरि ।

नवतत्त्वयुक्तं मन्त्रं ज्ञात्वा यः प्रजपेत् स्फुटं ।

तदेव सहसा देवी विष्णुतुल्यो भवेद् ध्रुवं ।

प्रथमं कामिनीं ध्यात्वा हृत्पद्मे कमलेक्षणे ।

उच्चरेत् प्रथमं बीजं कामिनीं तदनन्तरं ।

पुनर्वीजं द्वितोयं च उच्चरेद् यत्नतः सुभीः ।

कामिनीं च ततो ध्यात्वा तृतीयं बीजमुच्चरेट् ।

अनेन विधिना देवी कामिनी-ध्यान-सम्पुटं ।

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पुनर्ध्यानं ककारस्य अनुलोमेन पार्वति ।

अनुलोमं यथा देवी विलोमं च तथा कुरु ।

एवं ऋक्मेण देवेशि यद् यदक्षरं प्रिये ।

कृत्वा यत्नाद्रारोहे सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् ।

सर्वासां मन्त्रवर्णानां ध्यात्वा ध्यात्वा पृथक् पृथक् ।

आद्यन्तेकामिनी ध्यात्वा शिवशक्तिमयो भवेत् ।

अथवा चञ्चलापाद्भि हुत्पद्मे कमलानने ।

आदौ मध्ये तथा चान्ते बीजं दत्वा जप्त प्रिये ।

तदैव सहसा देवी जायते देवविग्रहं ।

सदा निद्रातुरो मन्त्रः कलिकाले च भारत ।

रहस्येडेन चार्वङ्गी निद्राभङ्गो तदा भवेत् ।

जपेदादौ वरारोहे त्रिवारमूलोमतः ।

विलोमेन त्रिवारं च ध्यात्वा जप्त्वा हृदाम्बुजे ।

अथान्यत् सम्प्रवक्ष्यामि निद्राभङ्गस्य लक्षणं ।

प्रथमं कामिनों ध्यात्वा अन्ते च तदनन्तरं ।

दशधा प्रजपेनमन्त्रं निद्राभङ्गाय पार्वति ।

ततस्तु प्रजपेद्देवी प्रफुल्लं विश्वमोहनं ।

रहस्याननेन चार्वङ्गी जायते विष्णुविग्रहं ।

शङ्खचक्रधरं देव शुद्धतत्त्वात्मकं प्रिये ।

पीताम्बरधरं शान्तं प्रसन्नं मुखपङ्कजे ।

आजानुलम्बितकरं वनमालाबिराजितं ।

त्रिभङ्गी ललिताकार चारुचूडाविभूषितं ।

श्रीवत्सकौस्तुभोद्धीस्तं जायते विष्णुविग्रहं ।

अवतारं स्वयं कृष्णं ललिताङ्गनचिक्कणं ।

गोपीमण्डलमध्यस्थं नानासुखमयं हरिं ।

अथवा जायते देवी तस्माद्दीजान्चुलिचिस्मिते ।

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कामिनो-ध्यानमात्रेण देवता जायते ध्रुवं ।

रहस्यमेतच्चावद्यं कर्तव्यं हृदि मध्यतः ।

रहस्यानां च सर्वेषां सारमेतत् संशयः ।

अथान्यत् सम्प्रवक्ष्यामि रहस्यं परमाद्भुतं ।

ध्यात्वा तु कामिनोनारिं प्रथमं हृदि मध्यतः ।

तद्गर्भे भावयेन्मन्त्रं मनसा नगनन्दिनि ।

तद्गर्भे भावयेद्देवं ध्यानमार्गेण सुन्दरि ।

पुनश्च कानिनों ध्यात्वा तस्मादाविर्भवेद्वरीः ।

हरिरित्युपलक्षणं देविऽ सर्वेषामेव निर्मितं ।

निद्रायुक्तं महेशानि विद्यामन्त्रं भवेत् सदा ।

तस्मात्तु निद्रारहितं प्रजपेद् यद् एकदा ।

जप्त्वैकत्रिगुणं भद्रे सहसा लभते ध्रुवं ।

वामबाहोऽयदा बाहुस्तदा निद्रातुरो मनुः ।

चलते च यदा बाहोर्दक्षिणो वरवर्णिनि ।

तदैव चक्षुपात्री त्यक्तनिद्रः सदा मनुः ।

अतएव वरारोहे त्यक्तनिद्रं जपेत् सुधीः ।

श्री देव्युवाच ।

पूजाकाले महादेव यदि निद्रातुरो भवेत् ।

तत्कथं सिद्ध्यते मन्त्रः कर्तव्यं तदा प्रभो ।

प्रजपेत् केन विधिना न जपेद्वा वद प्रभो ।

श्री महादेव उवाच ।

रहस्य-मन्रं वक्ष्यामि आनन्दपटले स्थितं ।

द्वादशार्णमयं मन्त्रः निद्राभङ्गस्य दीपनं ।

रहस्यमन्त्रं चावद्यं अज्ञात्वा विफलं भवेत् ।

॥ इति श्री कामधेनुतन्त्रे देवदेवासंवादे अष्टादशः पटलः ॥

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१५२ । कमला (लक्ष्मी) तन्त्र शास्त्र

उनविंश पटल

श्री महादेव उवाच :

सन्देहो नैव कर्तव्य: पूजाकाले शुचिस्मिते ।

तदेव रहस्यं देवि त्यक्तनिद्रा भवेत्स्मृतम् ।

प्रजपेद्‌शथा देवी हृदये मनसापि वा ।

पूजाकाले महेशानि सन्त्यजेद् यदि दक्षिणम् ।

प्रायश्चित्तं भवेत्सस्य मन्त्रस्य वरवर्‌णिनि ।

प्रायश्चित्तमिदं देवी कृत्वा मन्त्रं जपेद् यदि ।

कि तस्य दक्षिणो वाहुस्तस्य निद्रातुरेण कि ।

रहस्यमन्त्रं चार्विद्धि पूजाकाले निर्णयम् ।

रहस्यमन्त्रवार्विद्धि सर्वनिद्रासु मेदिनि ।

वामबाहो यदा वायुर्यदा च दक्षिणावह: ।

रहस्यमेतच्चार्विद्धि कृत्वा तु प्रजपेन्मनुम् ।

तदेव त्यक्तनिद्रा सा विद्या मन्त्रं च नान्यथा ।

योगनिद्रामयी विद्या योगनिद्रामयो मनु: ।

विशेषमन्त्रं वक्ष्यामि आनन्दपटले स्थितम् ।

अष्टाक्षरिं महाविद्यां दीपनिं मोक्षरूपिणीम् ।

सर्वसिद्धिमयीं भूत्या रहस्यफलभाक्‍नुयात् ।

प्रजपेद् यदि निद्रायां कि तस्य जपपूजने ।

रहस्याननेन चार्विद्धि निद्रां त्यक्त्वा सनातनीम् ।

सुपुम्नामध्यमाग्रेषु संस्थितता ब्रह्मरूपिणी ।

रहस्यमेलच्चार्विद्धि अज्ञात्वा यो जपेन्मनुम् ।

तस्य पापमहं वक्ष्ये सावधानावधारय ।

शूद्रेन लिखितं देवी पटलं यस्तु पठूयते ।

य यं नरकमाप्नोति तं तं प्राप्नोति मानव: ।

द्वात्रिशत्कोटिमध्येपु नरकेषु क्रमेण हि ।

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कोटिवंशानं समादाय पच्यन्ते मनुजाधमा:।

विप्रो वा क्षत्रियो वापि वैश्यो वा नगनिन्दिनि।

पच्यन्त्रके घोरे शूद्रस्य लिखनात् प्रिये।

तस्मात् सूत्रं न लिलिखितं पटलं न जपेत् सुधी:।

तस्मादावश्यकं देवि कामिनीध्यानमुच्चरेः।

ततः सिद्धो भवेद्देवि विद्या मन्त्र: न चान्यथा।

कामिनीध्यानमात्रेण सर्वसिद्धिमयो भवेत्।

एकनेव कृतार्थ: स्याद् बहुभि: किमुपासते।

तव भक्त्या मयाख्यातं यद् गोप्यं भुवनत्रये।

कामधेनुमिदं ज्ञात्वा यदि पूजां समाचरेत्।

सकला सा सफलैपूजा जपं च सफलं सदा।

अन्यथा प्रेतवत् दीक्षा पूजा च प्रेतवत् सदा।

प्रथमं कामिनीं ध्यात्वा जपपूजां समाचरेत्।

कामधेनो: फलं लभ्यं सदाशिवमयो भवेत्।

विष्णुरुपी स एव स्यान्महामाया स एव हि।

शिवमन्त्रे विष्णुमन्त्रे शक्तिमन्त्रे शुचि: स्मते।

कामधेनुमिदं मन्त्रं प्रशस्तं सुरपूजिते।

एतत्ते कथितं देवि सारात्सारं परात्पर।

यत्कृत्वा साधको याति दुर्लभं मोक्षमिन्द्रं।

विशेषमन्त्रं वक्ष्यामि विद्यां श्रीकामरूपिणीं।

अज्ञात्वा कामिनीध्यानं सहसा व्यर्थतामियात्।

तदध्यानं चञ्चलापाङ्गि आनन्दपटले स्थितं।

तस्मादावश्यकं जप्तव्यं सततं कामदीपनं।

॥ इति श्री कामधेनुतन्त्रे देवदेवीसंवादे ऊनविंश: पटल: ॥

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विंशतितमः पटल

श्री देव्युवाच :

मन्त्रसमर्पणं तत्वं कथ्यतां देवपूजित ।

कस्य सम्प्राप्येन्त्रं वद देव पुरा तव ।

अर्पयेन्तन्मन्त्रते जां सि देवेश यदि शूलधृक् ।

निस्तेजः साधको देव तदैव सहसा भवेत् ।

कि जप्येन च पूजायां पुरश्चर्ये च किं पुनः ।

तन्मे वद महाभाग कृपया परमेश्वर ।

श्री महादेव उवाच :

साधु पृष्टं त्वया भद्रे अधुना कथयामि ते ।

जपयित्वा चंचलापांङ्गि ध्यायेत परमकामिनीं ।

मन्त्रवर्णं वरारोहे कामिनी-गजगह्वर ।

चन्द्रविन्दुयुतं कृत्वा एकैकं दशधा जपेत ।

अनुलोमे यथा देवी विलोमेन तथा कुरु ।

अतः परं वरारोहे ध्यात्वा तु कामिनीं परां ।

वियद वृहा महेशानि कामिनों दशधा जपेत ।

कामिनी-गर्भमध्ये तु वियदवद्नितयं प्रिये ।

प्रजपेद दशधा भक्त्या बीजतत्वं तदा भवेत ।

ततस्तु कामिनी-तत्वं ललाटे परिचिन्त्य वै ।

एवं च मातृकास्थाने कामिनों भावयेल प्रिये ।

पश्चाशन्मातृकास्थाने प्रजपेन्त्रमातृकमन ।

वीजस्य ज्योतिःपुञ्जेषु कामिनीं सततं कुरु ।

दशधा प्रजपेदेवी कामिनीबीजमुत्तमं ।

कामिनोगर्भमध्ये तु ज्योतिस्तत्वं जपं कुरु ।

ज्योतिस्तत्वं वरारोहे स्वयं जीवः सनातनः ।

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कामिनी-जीवतत्वं च कृत्वा वे साधक: सुधी:।

सहस्रारे महापद्मे संस्थाप्य कामिनी परां।

गुह्यातिगुह्यगोत्री त्वमिति मन्त्रेण मन्त्रवित्।

देवस्य दक्षिणे हस्ते बाह्यपूजादि चार्पयेत्।

देव्या वामे वरारोहे समर्प्य फलभाग् भवेत्।

जपस्य सर्वते जां सि देवहस्ते यदि प्रिये।

समर्प्य परमेशानि तेजस्य साधको भवेत्।

कि तस्य पूजने भद्रे किं जापेन वरानने।

यत्किञ्चिद्धीयते देवी सर्वं ब्रह्माणि लीयते।

विद्यामन्त्रं जपेद्देवी तत्तेज उपजायते।

जीवतत्वं विना देवी देवहस्ते कदाचन।

नार्पयेच्चञ्चलापादि देव्या हस्ते विशेषतः।

तस्मात् प्रयत्नतो देवी जीवतत्वं कुरु ध्रुवं।

जीवतत्वं विना देवी यदेवं न समर्पयेत्।

जपं च विफलं देवी पूजा च विफला भवेत्।

गन्धपुष्पादिकं यद्यत् सर्वं देवे समर्पयेत्।

जपतत्त्वं वरारोहे सर्वते जोमयं तथा।

यदि तेजो वरारोहे देवै देवाय अर्पयेत्।

यस्तेज: सततं जीव: कथं सिद्धि: प्रजायते।

यस्तेजस्तव्पंयेद्देवी पुनरागमनं प्रिये।

दुर्लभं चञ्चलापादि तत्तेज: साधक च।

वृथामयं वरारोहे कुरते नरपामर:।

समर्पणविज्ञाय प्रजपेदू यदि कोटि वा।

देवता-तेजमध्ये तु तत्तेजोविशेषत प्रिये।

भावयेदू बहुयत्नेन यथा सर्वस्वसम्पुटं।

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एतत्ते कथितं देवी जीवतत्त्वं सुदुर्लंभं ।

यत् कृत्वा साधको याति दुर्लंभं ब्रह्मविग्रहं !

श्रुत्वा तन्त्रमिदं देवी रहस्यफलमाप्नुयात् ।

तन्त्रमेतद्वरारोहे श्रुणुयात् साधक: प्रिये !

॥ इति कामधेनुतन्त्रे देवदेवीसम्वादे विंशतितम: पटल: ॥

एकविंशतितम पटल

श्री महादेव उवाच :

चन्द्रसूर्योपचारागे च प्रजपेद्‌दि कामिनीं ।

तदेव सहसा निद्रिर्जायते नात्र संशय: ।

प्रथमं कामिनीं जप्त्वा सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् ।

अज्ञात्वा कामिनीतत्त्वं न जपेद्‌ ग्रहणे प्रिये !

न जपेत् ग्रहणे भद्रे अज्ञानाद् यदि मूढ़धी: ।

सर्वं तस्य वृथा देवी पूर्वधर्मो विनश्यति ।

चन्द्रपूर्वं सूर्यपूर्वं न विचार्यं कदाचन ।

सूर्यपूर्वं वरारोहे न पश्यद्‌दि पामर: ।

अस्तु तावत् परो धर्म: पूर्वधर्मो विनश्यति ।

न पश्यति यदि अज्ञानात् सर्वारिष्टमवाप्नुयात् ।

सर्वारिष्टमय: सोपि सर्वपापमय: सदा ।

तस्मादवश्यं कर्तव्यं चन्द्रपूर्वनिरीक्षणं ।

सूर्यपूर्व तथा देवी निरीक्ष्य मोक्षमाप्नुयात् ।

अज्ञात्वा यदि मूढात्मा राश्यादिगणनं प्रिये ।

विचार्य चानलापादि न पश्येद् ग्रहण यदि ।

पूर्व-पूर्वाजितं पुण्यं तत्क्षणादेव नश्यति ।

चन्द्रसूर्योपचारागं च तस्माद् यत्नात्रिरीक्षयेत् ।

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कि तस्य कामिनीं भद्रे रम्यानी च पुनरच कि ।

ग्रासादि-मुक्तिपर्यन्तं जप्तवा सिद्धीश्वरो भवेत् ।

न जपेद्यदि चार्वङ्गी रौरवं नरकं ब्रजेत् ।

तत्काले चञ्चलापांङि परब्रह्मस्वरूपिणी ।

तस्मिन् काले वरारोहे क्षत्रादिजातिभेदतः ।

आचण्डालप्रभृतयो द्विजतुल्या भवन्ति हि ।

द्विजास्तु चञ्चलापांङि साक्षाद्ब्रह्म न संशयः ।

तत्र मा गणना देवी चाण्डालानां वरानने ।

तस्माद् यत्नेन कर्तव्यं चन्द्रपर्वणिरीक्षणं ।

चन्द्रकोटिगुणं देवी सूर्यो दशगुणं भवेत् ।

तत्र यथात कृतं कर्म जपहोमादिकं प्रिये ।

अक्षयं तद्वदेदेवी वचनं मम निश्र्चितं ।

राश्यादि-गणन त्यक्त्वा यवनैर्ह शते यदि ।

यवनस्य तथा सिद्धिर्जायते पृथिवीतले ।

दीक्षितोदीक्षितो वापि हृष्ट्वा स्नानं समाचरेत ।

तदेवमक्षयं स्नानं गङ्गास्नानं भवेत प्रिये ।

विष्ठाकूपस्थितं तोयं गङ्गोदकसमं स्मृतं ।

प्रशस्तं ग्रहणे काले नान्यथा वचनं मम ।

षष्टममासाधकौ बालौ यदि स्वीयं वराणने ।

ग्रहणे चन्द्रसूर्यस्त तस्य स्नानं प्रशस्यते ।

अकृत्वा स्नानदानं च सहसा नरकं ब्रजेत ।

स भ्रष्टः स च पापिष्ठः सहसा शूद्रः प्रिये ।

तस्यात्रमुदकं देवी मूत्रं शोणितवत प्रिये ।

ज्ञायते नात्र सन्देहो मम वाक्यं वरानने ।

ब्राह्मणोऽब्राह्मणो वापि चन्द्रपर्वणि पार्वति ।

चण्डालशूद्रभृतिस्तु सर्वो ब्रह्मोत्रे प्रवर्त्तते ।

ब्रह्मोति नाम सर्वेषां राश्यादिगणनं कृतः ।

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तस्मात्तु विशालापांङ्गि सङ्कल्पं नेव कारयेत् ।

मासपक्षतिथीनां च निमित्तानि च पर्वन्ति ।

न विचार्य वरारोहे ग्रहणे चन्द्रमूर्धयोः ।

ग्रासादिमोक्षकाले तु कुतो मासः कुतस्तिथिः ।

स कालः परमं ब्रह्म सर्वपापक्षयो‌ऽवरः ।

तत् कथं पामरो लोको राश्यादिगणनं प्रिये ।

उपरागं परित्यज्य यश्चान्यं परिचिन्तयेत् ।

स भवेद्रौरवे मग्नो ब्रह्महत्याच्चानुमानतः ।

रौरवात पुनरागत्य पापयोनौ प्रवर्त्तते ।

निष्कृतिनिर्णितश्चार्वङ्ग तस्यापि च कदानन ।

तस्मात् सर्वं परित्यज्य चन्द्रपर्वनिरिक्षणं !

चन्द्रपर्वे यथा देवी सूर्यपर्वे तथा प्रिये ।

तत्र श्राद्धादिकं त्यक्त्वा विद्यां मन्त्रं जपेत् प्रिये ।

अन्यथा नरकं याति पितृणां सप्त नप्त्यधः ।

अपरैकं प्रयक्ष्यामि रहस्यं शृणु सुन्दरि ।

अकारादि-क्षकारान्तं प्रतिपदे निरीक्षयेत् !

ततस्तु प्रजपेत् शून्यं चन्द्रविन्दुसंयुतं ।

ततस्तु हृदयाकाशे शून्ये ज्योतिर्मयेषु च ।

अनुलोम-विलोमेन मातृकां प्रजपेद् सुधीः ।

ततस्तु साधको श्रेष्ठो वराटोपरि मातृकां ।

पद्मबीजं यथा देवी वर्णबीजं प्रभावयेत् ।

चन्द्रबीजं पुष्टं कृत्वा जपेद्वर्णं प्रसन्नधीः ।

अनुलोम-विलोमेन जप्त्वामृतमयो भवेत् ।

केवलं कामिनीं ध्यात्वा प्रफुल्लवदनान्तरं ।

वीजादुपपत्तो देवी देवी वा कमलेक्षणे ।

ततस्तु देवतां ध्यात्वा निरीक्ष्य देवविग्रहं ।

॥इति कामधेनुतन्त्रे देवदेवीसंवादे एकविंशतितमः पटलः समाप्तः॥

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( १५९ )

प्राचीनतम भारतीय तन्त्र महाग्रन्थ

हिन्दू तंत्र शास्त्र

ले० तन्त्राचार्य पं० राजेश दीक्षित

अप्राप्त ग्रन्थों को ढूंढकर उनके विशेष तन्त्रों का संकलन करके उनके साधुओं से प्रमाणित कराकर इस ग्रन्थ में दिया है । ऐसे तन्त्र जो आज तक प्रकाशित नहीं हुये । विधान सहित, पृष्ठ संख्या लगभग 220, सचित्र, पक्की बाइंडिंग मूल्य 30) रु० डाक खर्च 7) रु० अलग ।

जैन तंत्र शास्त्र

ले० यतीन्द्र कुमार जैन

भारत तथा विदेशों में रह रहे विद्वान जैन मुनियों द्वारा अपनी जिन्दगी में किये गये प्रयोगों को इस पुस्तक में दिया गया है । ऐसी विद्या कोई ऋषि या मुनि किसी भी कीमत पर नहीं बताते । पृष्ठ संख्या लगभग 200 सचित्र, मूल्य 30) रु० डाक खर्च 7) रु० अलग ।

इस्लामी तंत्र शास्त्र

ले० जनाब असगर अली

मुस्लिम धर्म में तन्त्र शास्त्र का इतना भण्डार भरा है कि जितना अन्य कहीं भी नहीं है लेकिन अभी तक छोटे-छोटे सिद्ध, मुल्ला, मौलवी ही इसका थोड़ा सा ज्ञान कर पाये हैं । हमने ईराक, ईरान, पाकिस्तान आदि देशों से तथा भारत की प्राचीन मस्जिदों में से उन ग्रन्थों को निकलवा कर यह पुस्तक तैयार कराई गई है जिसमें तन्त्रादि मूल अरबी तथा हिन्दी में अलग-अलग दिये गये हैं । पृष्ठ संख्या लगभग 230 सचित्र, मूल्य 30) रु० डाक खर्च 7) रु० अलग ।

शाबर तंत्र शास्त्र

ले० तन्त्राचार्य पं० राजेश दीक्षित

प्राचीन हस्त लिखित ग्रन्थों तथा गुप्त साधकों द्वारा प्राप्त विभिन्न कामनाओं की पूर्ति करने वाला शाबर प्रयोगों का सरल हिन्दी भाषा में सचित्र विवेचन किया है । हमारे इस ग्रन्थ में महान लेखक ने अपनी पूरी जिन्दगी का निचोड़ निकाल कर रख दिया है । 300 पृष्ठों की सचित्र पुस्तक का मूल्य 30) रु० डाक खर्च 7) रु० अलग ।

नोट—कोई भी पुस्तक मंगाने के लिये 10) रु० मनीआर्डर पहले अवश्य भेजें ।

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( १९० )

सम्पूर्ण दस महाविद्या तन्त्र महाशास्त्र

ले०—तन्त्राचार्य पं० राजेश दीक्षित

विश्व जनम नश में देवी भगवती के दस पौराणिक स्वरूप प्रचलित हैं यथा—काली, तारा, महाविद्या (पोडशी), भुवनेश्वरी, त्रिपुर भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामखी, मातंगी, कमलात्मिका (कमला)। ये सभी भगवती पराशक्ति के विभिन्न स्वरूप हैं। प्रस्तुत महाग्रन्थ में सभी देवियों के तान्त्रिक, काम्प प्रयोग दिये गये हैं जो सिर्फ महान सिद्ध-योगियों को ही ज्ञात रहते हैं तया न किसी भी कीमत पर उन्हें नहीं बताते। साथ में सम्बन्धित मन्त्र, यन्त्र, पूजा, जप, साधनविधि, उपनिषद सतजप, सहस्रनाम आदि विभिन्न विषयों को दिया गया है। देवी भक्तों को संकलन योग्य महान ग्रन्थ, सम्पूर्ण सुनहरी ठप्पेदार कपड़ा बाइन्डिंग सहित सचित्र ग्रन्थ का मूल्य 225) रु (दो सौ पच्चीस) रुपया।

नोट—डाक खर्च 15 रु. अलग 25 रु. अग्रिम भेजना आवश्यक है।

कालो तन्त्र शास्त्रा

ले०—विद्या वारिधि पं० राजेश दीक्षित

भगवती आद्याकाली का स्वरूप मन्त्र-जप एवं ध्यान-तत्व निरुपण सहित दक्षिणा काली, गुह्य काली; भद्रकाली, श्मशानकाली तथा महाकाली साधना के विविध मन्त्र पूजा-साधन, यन्त्र एवं पुरश्चरण की विधियाँ, कौलक, अगंल, कवच, स्तोत्र, हृदय, सहस्राक्षरी, शतनाम, सहस्रनाम आदि विविध विषय सम्पन्न काली-आराधना विषयक हिन्दी का सर्वोत्तम सचित्र ग्रन्थ।

बहुरंगी आफसेट लेमीनेटेड कवर सजिल्द मूल्य 30 रु।

डाकखर्च 7 रु. का अलग—10 रु. का मनीआर्डर पहले भेजें।

ग्रह-फल्‌ चन्द्रिका

ले०—जगदीश पंडित

राशि भाव, भावानुसार राशि स्थिति, उनका फल प्रतिपादन, आदि इस पुस्तक में दिया गया है। फलित ज्योतिष का अनुपम ग्रन्थ है। मूल्य 36 रु डाक खर्च 7 रु० अलग।

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( १६१ )

श्रीयन्त्र साधना

ले०---आचार्य वागीश शास्त्री

श्रीयन्त्र लक्ष्मी जी द्वारा प्रदान यन्त्र है धन-सम्पदा प्राप्त के लिये इसकी साधना प्रमुख मानी गयी है। इसीलिये इसे यन्त्रराज भी कहा जाता है। इस पुस्तक में श्री यन्त्र निर्माण विधि, उपासना विधि, कृति और ह्रदि विधियों का स्वरुप, नृतचक्र और वर्ण, समपूर्ण पूजा विधान तथा सम्बन्धित तन्त्र, मन्त्र, स्तोत्र, कवच आदि शास्त्रोक्त आधार पर दिये गये हैं। सचित्त्र व सजिल्द बहुरंगी आफसेट लेमीनेटेड कवर पुस्तक का मूल्य 45 रु० डाक खर्च 7 रु० अलग।

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कौतुकरत्न भण्डागार-वृहत् इन्द्रजाल

ले० - ओझा बाबा

आजकल बाजार में इन्द्र जाल बहुत मिलते हैं जिन्होंने इस विषय की गम्भीरता को खत्म प्राय कर रखा है। इस पुस्तक में परमसिद्ध ओझा बाबा ने सम्पूर्ण जीवन का ज्ञान निचोड़कर रख दिया है। दत्तात्रेय के सिद्धि देने वाले मन्त्र, यन्त्र, तन्त्र सम्मोहन, उच्चाटन, वशीकरण आदि विधि सविस्तार दिये गये हैं। सचित्त्र व सजिल्द बहुरंगी आफसेट लेमीनेटेड कवर पुस्तक का मूल्य 30) रु० डाक खर्च 7 रु० अलग।

नोट --10 रु० का मनीआडर पहले भेजें।

क्रियात्मक कुण्डलिनी तन्त्र

[सजीव अष्टांग योग सहित]

ले०—श्रीस्वामी पतेंद्र (डा० वाचस्पति) गहराना

इस पुस्तक में आत्म तत्व ज्ञान के सिद्धान्त, अष्टांग योग की क्रियात्मक व्याख्या, कुण्डलिनी योग के आसन एवं प्राणायाम बन्ध तथा मुद्रायें, शरीर मन्दिर के सौन्दर्य बढ़़ने व्यायाम, ऋतुओं के आधार पर आहार, धारणा और ध्यान के विशेष जातक, कुण्डलिनी के षट् चक्रों से आगे के विशेष विवरण, कुण्डलिनी से सेक्स उपयोग, काम कला से योग विलास आदि विषयों का मनोवैज्ञानिक एवं वैज्ञानिक विवरण दिया गया है। करीब 250 चित्र 8 रंगीन चित्र सजिल्द पृष्ठ संख्या लगभग 400 मूल्य 60 रु० डाक खर्च 10 रु० अलग।

नोट—10 रु० का मनीआडर पहले भेजें।

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( १६२ )

ज्योतिष की अनुपम पुस्तकें पढ़ें

वृहद अंक ज्योतिषविज्ञान—(अंक विद्या) केवल जन्म तारीख के आधार पर हजारों प्रश्नों के उत्तर इसमें पढ़िए, जैसे क्या आपकी भी लाटरी निकलेगी, क्या अपनी प्रेमिका से आपके सम्बन्ध बने रहेंगे, क्या आपका कार्य सिद्ध होगा

मूल्य 20/-

सरल सुथाम ज्योतिष - इस पुस्तक की सहायता से आप भी ज्योतिषी बन सकते हैं। इसे पढ़कर, लग्न निकालना, कुण्डली बनाना, जन्म पत्री बनाना, मुहूर्त्त निकालना, स्त्रियों के राशिफल व दशाओं के फल, शुभ-अशुभ शकुनों का विचार, स्वप्न विचार, मूक प्रश्न चमत्कार आदि का वर्णन किया गया है

मूल्य 20/-

भृगु प्रश्न शिरोमणि—(तत्काल भृगु प्रश्नोत्तरी) मन विचारों का घर है और ये चिन्तायें अनन्त हैं। गरीब को घर की, अमीर को सन्तान की, किसी को विवाह की, नौकरी की तरक्की की आदि 204 प्रकार की चिन्ताओं को अपने आप मिटायें

मूल्य 20/-

व्यापार अर्ध-मार्थण्य—ज्योतिप आधार पर व्यापारिक वस्तुओं की तेजी मन्दी का सच्चा उत्तर देने वाली एकमात्र पुस्तक। इस पुस्तक की सहायता से अब तक सैकड़ों व्यापारी मालामाल हो गए।

मूल्य 20/-

केरल ज्योतिष शास्त्र - केरल विद्या वह गुप्त विद्या है, जो प्रश्नकर्त्ता से फल, फूल या पक्षी का नाम कहलवाकर हर कार्यों में सफनता मिलेगी या नहीं इसका उत्तर मालूम हो सकता है। प्रामाणिक पुस्तक है।

मूल्य 20/-

ज्योतिष अंक विद्या, हस्त रेखायें एवं लाटरी—ज्योतिष अंक विद्या तथा हस्त रेखाओं द्वारा अपने पारिवारिक सदस्यों, मित्रों, पड़ोसियों, तथा अन्य लोगों का भूत भविष्य बताकर वाहवाही प्राप्त करें।

मूल्य 20/-

ज्योतिष सर्व संग्रह—इस पुस्तक में ज्योतिष सम्बन्धी समस्त प्रारम्भिक ज्ञान मूल संस्कृत तथा टीका सहित दिया गया है।

मूल्य 20/-

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प्रत्येक तन्त्र मन्त्र सेवी के लिये आवश्यक रूप से पठनीय एवं संग्रहणीय

प्रमाणिक तन्त्र साहित्य का हिन्दी में अभिनव प्रकाशन

विद्यावारिधि आचार्य पं. राजेश दीक्षित द्वारा सम्पादित

हिन्दू तन्त्र शास्त्र

जैन तन्त्र शास्त्र

प्राचीन एवं प्रामाणिक हिन्दू शास्त्रों में उल्लिखित विभिन्न कामनाओं के पूरक प्रयोगों का सरल हिन्दी भाषा में सचित्र एवं साजोपाङ्ग विवेचन

साजिल्द मूल्य ३०/-

प्राचीन एवं प्रामाणिक जैन शास्त्रों के संकलित विभिन्न कामनाओं की पूर्ति करने वाले प्रयोगों का सरल हिन्दी भाषा में सचित्र एवं साजोपाङ्ग विवेचन

साजिल्द मूल्य ३१/-

इस्लामी तन्त्र शास्त्र

शावर तन्त्र शास्त्र

प्राचीन पुस्तकों तथा चमत्कारी आभिलेखों द्वारा संकलित विभिन्न कामनाओं की पूर्ति करने वाले इस्लामी प्रयोगों का सरल हिन्दी भाषा में सचित्र एवं साजोपाङ्ग विवेचन

साजिल्द मूल्य ३०/-

अथर्ववेद में उल्लिखित ग्रन्थों तथा मुनी साधकों द्वारा प्राप्त विभिन्न कामनाओं की पूर्ति करने वाले शावर प्रयोगों का सरल हिन्दी भाषा में सचित्र एवं साजोपाङ्ग विवेचन

साजिल्द मूल्य ३०/-

चारों पुस्तकें एक साथ मँगाने पर डाक खर्च माफ/ आर्डर के साथ १०/-

पे यागी मेल से आवश्यक है /

दीप प्रकाशन, अस्पततालरोड आगरा-३।