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1. Katha Upanishad Sankara Bashyam Satyanda Dipika (Hiindi) Satyanand Sarasvati Ed. Sudhir Kumar Chaturvedi.djvu

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अथ

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श्रथति

सुधीर कुमार चतुर्वेदी

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उपनिषद् कृष्ण यजुर्वदीय कठशाखाके ग्रन्थर्गत एक महत्वपूर्ण उपनिषद् है । इसमें दो हैं, प्रत्येक श्राध्यायमें ३-३ वल्लियाँ हैं, इसमें यमराज श्रौर नचिकेताके संवाद श्रात्मविद्याका विशदवर्णन है, इसकी वर्णनशैली ग्रतिसुबोध एवं सरल है

वृहद्गोतामें भी इसके कई मन्त्रोंका कहीं शब्दतः श्रौर कहीं ग्रर्थतः उल्लेख है । अन्य उपनिषदोंकी भाँति जहाँ तत्त्वज्ञानका गम्भीर विवेचन है वहाँ नचिकेताके पाठकों के सामने एक श्रादर्शपम श्रादर्श भी उपस्थित करता है । जब वे देखते हैं कि

देनेके श्रयोग्य गौएँ ऋत्विजोंको दक्षिणारुपसे दे रहे हैं, तब पितृभक्त नचिकेता पाप करनेसे रोकनेके लिए उसके समीप जाकर कहा—‘तत् कस्मै मां दास्यसि तर पुनः पुनः पूछनेपर वाजश्रवसने क्रुद्ध हो ‘यमाय त्वां दास्यामि’ ऐसा कहाँ

चिकेताने पिताके द्वारा क्रोधवश कहे वचनकी उपेक्षा न कर उसका श्रक्षरशः किया । वत्समान युगमें भी ‘लोगोंकी इसप्रकारके श्रात्महिंसक एवं श्रतिदारुण कथानक रखनेके लिए इतना सरदर्दी मोललेना केवल पागलपन ही जान पड़ेगा किन्तु उन्हें

रहस्य समभनेके लिए कुछ गम्भीर विचारकी श्रावश्यकता है । योगदर्शनोंके साधनपादं, सत्य, श्रास्तेय, ब्रह्मचर्यं श्रौर श्रपरिग्रह’ इन पाँच यमोंका नाम निर्देंशकर कि ‘जातिदेशकालसमयानवच्छिन्ना: सार्वभौमा महाव्रतम्’ ( यो० २।३१ ) ‘जाति

ल श्रौर कर्तव्यानुरोधकी श्रपेक्षा न कर इनका सर्वथा पालन करना महाव्रत है’ तथा ग्रपेक्षासे पालन करना श्रल्पनत है । इस श्रल्पनजमें ही सुविधा श्रादिक है महानतमैं नहीं । महानतमैं पालन करनेसे ही ग्रभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है

को यमलोक गमन केवल उनके लिए नहीं, प्रत्युत उनके पिता श्रौर सौलोक पहुँचकर नचिकेताने सत्यनिष्ठाका परिचय दिया इसपर यमराजने तीन व तिथि सत्कारका महत्व प्रकट किया, श्रतिथिकी उपेक्षा करनेसे जो हानि होती हैं कठ० १ । १ । ७-५ ) स्पष्टरुपसे बतलायी गयीो है । नचिकेताने तीन वरोंमें

ऐसे पितृपरितोष, दूसरेसे स्वर्गंका साधन श्राग्निविद्या-यज्ञज्ञान श्रौर तृतीयसे श्रात्म

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श्रच्छन्दतः प्रार्थयस्व' (कठ० ११-२३-२४)इत्यादि प्रलोभन दिया, किन्तु नचिकेत मतयंस्य' इत्यादिसे ग्रानात्मपदाथोंमें दोषदर्शों दिखलाकर साधनचतुष्टयसम्पन्न श्रात्मा श्रपना परिचय दिया। इस प्रकार जब यसराजने श्रतुभव किया कि वे लौकिक एवं श्रोगोंमें सर्वथा उदासीन हैं, उसमें मुमुक्षारूपो श्राग्नि तजैसे धधक रही है तो श्रान्तिके लिए ज्ञानामृतकी वर्षा करनी पड़ी वह ज्ञानामृत वर्षा ही सभी लोगों श्रकतेनके लिए श्राज भी कठोपनिषद्के रूपमें विद्यमान है। विचुध्द बोधरूप श्रतुदयरूपी विश्रुध्द भस्ममें लपट हो सक्ता है जो नचिकेता के समान साधन च है । मेघ जल तो सब जगह बरसाते हैं, परन्तु परि्याम भिच-भिच्न भूमियों षुसार भिच-भिच्न होता है । ठीक यही बात शास्त्रोपदेशाके विषयमें भी है। ईदवररूपा तो सभीपर समान है परन्तु श्रात्मक्रपाकी न्यूनाधिकताके कारा उस परिरपामों में श्रन्तर रहता है । 'ज्ञानादेव तु कैवल्यस्म' 'ऋते ज्ञानाद्मुक्ति:

श्रुतिवाक्य तत्वज्ञानसे ही मोक्षकी प्राप्ति कहते हैं, श्रत: उसे प्राप्त करनेके लि सम्पादन करनी चाहिए, क्योंकिं 'इदं वेदवेदैदथ सत्यमस्ति न चेदिहा श्रिनष्ट:' (केन० २.५ ) इस श्रुतिके श्रनुसार मानवजीवनका परम ल उपयागिता ) श्रात्मप्राप्तिमें ही है। श्रत: श्रात्माको यथाथरूसे जानना ही प्रयम कतव्य है ।

ग्रन्थ उपनिषद्के समान इस उपनिषद्पर भी भगवत्पाद जगद्गुरु श्रीमद श्चार्यने संस्कृतभाषामें सरल एवं सुबोधभाष्यकी रचना की है, संस्कृतमें होने जनसाधारणको उससे पूरा लाभ होना कठिन है, श्रत: मत्रों के प्रत्येक वगों पर्याय देकर उसका हिन्दी श्रनुवाद भी किया गया है। तथा भाष्यका सरल सु श्रनुवादकर भाष्यके तात्पयको श्रतिस्पष्ट करनेके लिए उसपर ग्रनेकदशों एवं टी श्राधारपर हिन्दीभापमें 'सत्यनन्ददीपिका' प्रस्तुत की गयी है, श्राशा है कि इस ग्रन्थरत्नसे पूरा-पूरा लाभ उठा सकें।

उपनिषद् शबदाथों

श्रुत चोपनिपच्द्धो ब्रह्मविद्यै कगोचर: । तच्च्छब्दद्यावयार्थस्य विद्यायामेव संब उपोसर्ग: सामीप्ये तत्पतीचि समाप्यते । सामीप्यतारतम्यस्य विश्रान्ते: स्वातमनोक्ष त्रिविधस्य सदथोंय नि:शब्ददोपि विशेषगम् । उपनोयेममातमानं ब्रह्मादुपास्तद्वयं निह्नत्यविद्यां तज्ज च तस्मादुपनिषद्ववेत् । निह्नत्यनथोमूलं साड्विद्यां प्रत्यक्ततया गमयत्यसत्सम्भेदमतो वोपनिषद्ववेत् । प्रवृत्तिहेतोस्त्रिच्छो षांस्तन्मूलोच्च्छेदकत्व यतोऽवसादयेदविद्या तस्मादुपनिषद्ववेत् । यथोक्तविद्याहेतुत्वादग्रन्थोऽपि तद्भे

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पादपद् शब्दका श्रथ ब्रह्मात्मैकतव विज्ञान है 'उपनिषद् भो ब्रूहि' इस प्रकार ग्री उपनिषद् शब्दका प्रयोग पाया जाता है। 'एकार्थंतवसंभवति ग्रनेकर्थ-व्य्यर' इस न्यायसे भी उपनिषद् एकार्थंक ही है ग्रनेकार्थंक नहीं। इसलिए थमें 'उपनिषद्' शब्दका प्रयोग ग्रनुचित है। उपनिषद्का श्रवयवर्थं भी ग्री संभव है। यथा--उपनिषदूमैं चार श्रवयव हैं--'उप, नि, सद् ग्रौर क्तिप्' तम है ग्रौर दोष तीन विद्यमान हैं। उप-सामीप्य, नि-निश्र्रय, 'सद्' धातुका ग, गति ग्रौर ग्रवसादन है, ग्रौर 'क्तिप्' प्रत्ययका ग्रर्थ कर्ता है। 'श्रत: शुद्धं थंसामीप्योपलक्षितं ब्रह्म निश्श्रितं नित्सवा-स्वरूपं ग्राह्यित्वा-सकार्यां समूलां थलयति नाशयति या सा उपनिषद्' इस प्रकारकी व्युत्पत्तिसे शुद्ध-ग्रविद्यादि जीवको सामीप्योपलक्षित ब्रह्मके पास ले जाकर ब्रह्मास्वरूपका बोध कराकर मूल ग्रविद्याका जो नाश करती है वहं उपनिषद् है ॥ २ ॥

थं सामीप्य दो प्रकारका है--सातिशय ग्रौर निरतिशय । जैसे बाह्यक्षा शरीर ग्रात्माके समीप है, उसकी ग्रपेक्षा इन्द्रियाँ, उनकी ग्रपेक्षा मन । ग सातिश्रय है ग्रौर निरतिशय समीप तो ग्रात्मस्वरूप है । 'मुख्यार्थसंभवे व्य:' 'मुख्यार्थंका संभव हो तो गौण ग्रर्थंका ग्रहण ग्रनुचित है' श्रत: तम्यकी विश्वस्ति निरतिशय सामीप्यमें ही होतीं है वह निरतिशयस्वरूप । इसलिए यहां सामीप्योपलक्षिता स्वरूप विवक्षित है । 'कादाचित्कत्वे चमुगलक्षणगत्वम' 'उपलक्षण वह है जो कभी लक्ष्यमें रहकर ग्रविद्यमान-र व्यावर्तंक हो' जैसे 'पुस्तकपाणिरिच्छात्र:' यहां पुस्तक उपलक्षण है सदा नहीं रहता, वैसे ही संसारदशामैं काल्पनिक धर्मधर्मिभाव ब्रह्ममें है, श्रत: भी काल्पनिक है, परमार्थदशामैं काल्पनिक सामीप्यके न रहनेपर भी तुपलक्षित करनेमें कोई बाधक नहीं हैं ॥ ४ ॥

'श्रथं विशारग, गति ग्रौर ग्रवसादन है। उपसर्गं धात्वर्थंका शोधक होता है 'पूर्वं धातुरुपसर्गैरगण पुज्यते के ग्रर्थका प्रथम धात्वार्थमें ग्रन्वय होता है 'पूर्वं धातुरुपसर्गैरगण' इत्यादि लिखते निश्चय गति, विशरण ग्रौर ग्रवसादनरूप त्रिविध सदर्थमें विशरण है उसके ग विशोपरग है, क्योंकिं विशोपरगाताप्रयोजकत्वरूप विशोपरगाल्व निश्शब्दमें भी गति, निश्शित विशारग ग्रौर निश्शित ग्रवसादन यहं श्रर्थ हुग्रा । 'विशोध्य विशोपरगम' इस न्यायसे निश्शब्दार्थं विशोचित सदर्थमें उप-शब्दार्थ विशोपरग

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४। अनथमूल श्रावद्या श्रार उसके कार्य जगतको समूल निवृत्त कर चैतन्य परब्रह्मास्वरूपताका बोध कराती है वह विद्या उपनिषद् है। कुछ दार्शनिक विद्या शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार बतलाते हैं—‘उपनिषद्यते सर्वानर्थंसंसारं संसारकारग्रभूतामविद्यां च शिधिलयति ब्रह्म च गमयति च’ इस प्रकार ब्रह्म उपनिषद् नामसे कहा गया है। 'वेदान्तो नाम उपनिषद्प्रमाणां तदुपकारेण सूत्रादीनी च' दु:खजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरपाये तदनन्तरापाये चादपवर्ग: इस न्यायसूत्रके श्रनुसार मिथ्याज्ञान ही संसारका कारण है, क्योंकि मिथ्याज्ञानसे द्वेष मोह श्रादि दोष होते हैं। 'प्रवर्त्तनालक्ष्यग्रा दोष:' इस सूत्रके श्रनुसार इ शुभ प्रवृत्ति, उससे जन्म श्रौर जन्मसे इनकी पुन: उत्पत्ति। इस प्रकार समान इस प्रवाहका उच्छेद नहीं होता। जन्म होनेपर दु:ख श्रवश्यंभावी है। : दु:खका उच्छेद ही मोक्ष है, परन्तु वह तभी संभव है जब संसारके मूलभूत मिथ्या ज्ञानकी निवृत्ति हो, मिथ्याज्ञानकी निवृत्तिसे सब दोषोंकी निवृत्ति स्वतः सिद्ध है मतमें 'प्रभाप्रभेयंसंशायप्रयोजनहेयान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्यणयवादजल्पवितण्ड सच्छलजातिनिग्रहस्थानानां तत्वज्ञानाच्छ्रेयोधिगम:' (न्याय० १ । १) इन सोलह ज्ञान तत्स्वज्ञान है, वैशेषिकमतमें 'द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाभाव पदर्थ:' इन सात पदाथोंका सामान्य विशेष ज्ञान तत्स्वज्ञान है। सांख्यमतमें 'मू: र्निकृतिमर्हदाद्या: प्रकृतिविकृतय: सप्त। प्रकृतिरविकृति: सा । पोढाकस्तु विकारो न प्रकृतिन विकृति: ( सां० ३ ) '९ मूलप्रकृति वह किसोका विकार-कायँ नहीं है, महत्, श्राहङ्कार ३ तन्मात्राएँ सात कार्यकारणरूप हैं, श्राकाशादि पाँचभूत श्रौर ग्यारह इन्द्रियां ये १६ रूप हैं, कार्यकारणरभावसे रहित १ पुरुष) इत पचीस तत्वोंका ज्ञान-विवेकश्याति है। योगमतमें ईश्वर सहित सांख्योक्त पदाथोंका ज्ञान तत्वज्ञान है। शून्यवादी बौद्ध श्रौर विज्ञान ही तत्व विज्ञानवादी बौद्ध कहते हैं। जीव श्रौर दो तत्व श्राहंत जिन मानते हैं। जीवब्रह्मैक्य ज्ञान हो तत्वज्ञान है ऐसा ग्रा कहते हैं। इसलिए ग्रात्मैकत्वज्ञान प्रयत्नस्यादिके मूलभूता रागादिदोष सहित ग्र नाशाकर स्वाश्रिव ब्रह्मरूप मोक्षकी प्राप्ति कराता है, ग्रहत: 'गमयति बोधयति-प्रव साक्षात्कारयति' यह श्रथ है, क्योंकि 'यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म' ऐसी श्रुति है। इससे र शब्दका मूल्यार्थ ब्रह्मविद्या ही है, परन्तु 'तादथ्योतिच्छब्द: 'इस न्यायसे ब्रह्मा प्रतिपादक होनेसे ग्रन्थमें भी उपनिषद् शब्दका गौण प्रयोग होता है। इसमें एक है—‘लाज्जलं जीवनम्' 'कृपणका जीवन हल है' हल तो वस्तुत: जीवन नहीं जीवनका साधन है। यथा 'ग्रत्नं वै प्राण:' यह वैदिक दृष्टान्त है। ग्रत्न प्र साधन होनेसे 'ग्रनन्नं वै प्राण:' ऐसा प्रयोग कियाग्रर है।

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द्वेते विपरिणमते ग्रपक्षीयतेऽथ विनश्यति' ग्रपक्षय-ग्रवयव चौथिलयके ग्रनन्त होना । इस वचन श्रौर लोकानुभवसे यह कम सिद्ध होता है कि ग्रवयव शौथिल्यं ग्रवसादन-विनाश होता है । यह कोई ऐकान्त नियम नहीं है कि धातुके सर पत् होने चाहिए । ग्रवयव शौथिल्य कहनेका प्रयोजन यह है कि तत्त्वज्ञानी दें होते हैं—जीवन्मुक्त ग्रौर परममुक्त ! जीवन्मुक्तमें किश्चित्करपसे ग्रविद्या रहर्ता । उसकी भिक्षादिमें प्रवृत्ति नहीं होगी । तत्त्वज्ञान उत्पन्न होकर भी यदि वः कार्य ग्रविद्याका निवर्त्तक न हुग्रा तो विद्यामें ग्रविद्यानिवर्त्तकत्व सिद्ध नहीं हागी वेद्यानिवर्त्तंक विद्याकी प्राप्तिके लिए श्रध्यात्मशास्त्रके श्वरा श्रादिमें भी किसीं तह्न होगी, इसलिए विद्याके दो कार्य हैं ग्रविद्या-शौथिल्य ग्रौर ग्रविद्यानाश । में नाश सहित विद्या ग्रविद्याकी निवृत्तिका है ग्रौर प्रारब्धकर्म सहित विद्या शौथिल्य संपादिका है । जीवन्मुक्तमें नाश प्रतिनब्धक प्रारब्धकर्म सहित विद्यां नाश न होनेपर भी नाश प्रागवस्थारूप ग्रवयव शौथिल्य ग्रवश्य होता है तें हृदयप्रन्थिविध्वयन्ते सर्वसंशया:। क्षीयन्ते चाशु कर्मारिण तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥ (मु० २।२।८) 'ज्ञानाग्नि: सर्वकर्मारिण भस्मसात्कुरुते तथा' (गी० ४१३७) इत्यादि ति वचनोंसे रत्नुज्ञान सर्वकर्मनाशक प्रतोत होता है तों प्रारब्धकर्मंका नाश वः । 'तस्य तावदेव चिरं यावच्च विमोक्ष्येेऽथ संपत्स्ये' (छां० ६।१४।२) 'ना|भुक् कर्म कल्ककोटिशतैरपि' इत्यादि श्रुति, स्मृति वाक्योंसे पूर्वोक्त वचनोंके विरोेधं ये प्रारब्धकर्मीतरिक्त कर्मनाशात्कवर्म्मैं इन वचनोंका तात्पर्यं मानना चाहिए श्रथव । मेंँ ही यावत्कर्म नाशात्त्व है श्रौर उसके पूर्वज्ञानमें ग्रविद्याशौथिल्य जनकतथ नहीं, चरमज्ञानेके तात्पर्यसे 'भिद्यते' इत्यादि वाक्य हैं श्रौर पूर्वज्ञानके तात्पर्यं वेदैव' इत्यादि वाक्य हैं । इस प्रकार विषयभेद होनेसे दोनों वाक्योंमें परस्पर नेवृत्त हो जाता है । जीवन्मुक्तावस्था तो माननी चाहिए श्रनथ्या तत्त्वज्ञानोत्पाद निर्मित्य ही ग्रसंंभव हो जायगा, क्योंकि यदि तत्त्वज्ञानोत्पत्तिकालमें ही यावत्क होनेके कारण शरीर पात हो जाय तो शरीरेइन्द्रियादिके न होनेपर शास्त्रक हैसे होगा साथ साथ तत्त्वज्ञानका संप्रदाय भी नष्ट हो जायगा, कोई भी तत्त्व द्व नहीं होगा, ब्रतएव जीवन्मुक्तावस्था ग्रवश्य माननी चाहिए ।

श्रद्धैतवाद व्यादिका विचार मान जगत्का मूलतत्व प्रकृति, द्रष्टा जीव ग्रौर ब्रह्म ये तीनों पदार्थ ग्रनादि हैं । ईश्वरवादी दार्शनिक मानते हैं । परन्तु इनके स्वरूपनिरपेक्ष ग्रौर तत्त्वनिरपेक्ष ईश्वरवादियोंमें श्रद्धैतवाद. विशेषाद्वैतवाद

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श्रद्धेतवादके श्रनेक भेद हें-ग्रौपनिषद् श्रद्धेतवाद । श्रभा०११४७ । तैत्ति०२ ।,

तैतवाद, शब्दाद्वैतवाद, शून्याद्वैतवाद श्रादि ।

श्रद्धेतवाद-ग्रौपनिषद् श्रद्धेतवाद वा ब्रह्माद्वैतवाद-'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' 'ब्रह्मन् सत्, चित्, ग्रानन्त श्रौर ब्रह्मानन्दरूप है' 'तत्त्वमसि, श्रहं ब्रह्म

ये श्रुतिवाक्य कहते हैं कि जीव ब्रह्म है । श्रौपाधिक भेद होनेपर भी तत्त्वतः

ब्रह्मरूप ही है । नित्य निरतिशय ब्रह्मानन्दस्वरूप ब्रह्मकी प्राप्ति श्रौर श्रविद्या सहित हःसोंकी श्रविद्यन्त निवृत्ति मोक्ष है, उसका साधन जीवब्रह्मैक्य ज्ञान है । माया महद्-

विलक्षण श्रग्रिनिर्वचनीय श्रौर परतन्त्र तत्त्व है । 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव न श्रपि

एसा होते भी जगत्को व्यावहारिक सत्य मानते हैं ।

विशिष्टाद्वैत--यह श्रीमद्ररामानुजाचार्यंका मत है--जीव, जगत् श्रौर ईश्वर ये तत्त्व सत्य हैं । यद्यपि ये परस्पर भिन्न हैं, तो भी एक दूसरेको छोड़कर नहीं रह सव

जीव चित्-चेतन श्रौर जगत् श्रचित्-जड़ है दोनों ईश्वरके शरीर हैं, श्रतः चिदचिद्-वि

ईश्वर एक है यही विशिष्टाद्वैत है । जीव ब्रह्मरूप नहीं हैं किन्तु ईश्वरका ग्रंश

श्रंगु है । ईश्वर सगुण सविशेष श्रौर साकार है उसमें ही वेदान्तोंका तात्पर्य है नित्यं

नहीं, क्योंकि नित्यशुद्ध वस्तुका प्रतिबिम्बन्य संभव है । शक्ति श्रौर प्रतिबिम्ब-ग्राकार

प्रसन्न हो ईश्वर भक्तको मोक्ष देता है । वैकुण्ठलोकमें दासभावसे रहकर दिव्यलीला-

दर्शन करना ही मोक्ष है ।

शक्तिविशिष्टाद्वैत--श्रीपति पण्डितका है, यह शैव संप्रदायके ग्रनुसार है ।

शुद्धाद्वैतवाद--इसके प्रचारक श्रीमद्वल्लभाचार्य हैं इसके मतमें ब्रह्म नित्य शुद्ध मुक्त

निर्गुण, निर्विशेष है शुद्ध लीला निकेतन श्रखण्ड रसामृत सिन्धु गोलोकाधिपति

कृष्णाचन्द्र ही वह्म हैं वही वेदान्तैकवेद्य सच्चिदानन्दरूप है, जैसे कल्पवृक्ष, का-

चिन्तामरिग श्रादि स्वविकारके विना प्रभोष्ट वस्तुको उत्पन्न करते हैं वैसे ही श्र

ब्रह्मसे जगत् उत्पन्न होता है । शुद्धाद्वैंतमें ब्रह्म ही जगत् है श्रौर सत्य है 'हरिरेव

जगदेव हरिः:' । जगत् ब्रह्मका रूपान्तर है । जगत् श्रौर संसार एक नहीं किन्तु भिन्न

हैं, संसार ग्रविद्याजन्य व जीवाश्रित है । जीव ब्रह्मका श्रंगिन्-चिनगारियोंके समान

है, श्रंगु श्रौर नित्य है । यद्यपि वस्तुतः जीव शुद्ध सच्चिदानन्दस्वरूप है, तथापि

दशामें कर्ता, भोक्ता श्रादि है । मुक्तावस्थामें जीव-जगत संसारका नाश होनेपर सः

जाता है, शुद्ध जीवका ब्रह्मके साथ श्रभेद है । दोनोंके श्रभेदको शुद्धाद्वैत क

'स्थितिवैकुण्ठविजयः' पोषरगं तदनुग्रः' ( भाग० २१०१४ ) गोलोकमें गोपी

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तवाद-इष्टक प्रकारक त्राभमव्यापाय ह । स्वतन्त्र मार अल्पायन मपत य । ईश्वर ( विष्णु ) स्वतन्त्र है और जगत् एवं जीव परतन्त्र हैं । जगत्के उत्पत्त्या-रसे होते हैं, वह वैकुण्ठाधिपति विष्णु है । जगत् सत्य और परिणामी नित्य है । में पाँच भेद हैं-जीव ईश्वर भेद, जीव जड़ भेद, ईश्वर जड़ भेद, जीवोंका परस्पर भेद । ये पाँचों भेद सत्य हैं, इनका ज्ञान मुक्तिके लिए आवश्यक जीव श्रृंगु और प्रत्येक शरीरमें भिन्न है । भक्तिद्वारा भगवान्के श्रनुग्रहसे सालोक्य , सामीप्य एवं सायुज्य मुक्ति प्राप्त होती है ।

ताद्देतवाद-यह श्रीमैम्वाचार्योंका मत है—यद्यपि जीव, जगत् और ईश्वर ये तीनों भिन्न हैं, तथापि जीव और जगत् व्यापार तथा ग्रस्तित्व ईश्वरेच्छा ग्राधीन है स्वतन्त्र मच्त्र हैं । ईश्वरके चार रूप हैं—१. परम-रम तत्व, २. ग्रपर श्रमूर्त्त—ईश्वर सर्वद्रष्टा सर्वशक्तियोंका उद्गमस्थान, ३. परमूर्त्त-ग्रर्भं सब व्यक्त रूपोंका मूल स्त्रोत है, ४. ग्रपरमूर्त्त—श्रव्यक्त भिन्नरूप जीव है । इस ब्रह्म द्वैत और ग्रद्वैत दोनों हैं । मुक्तावस्थामें जीव ग्रपन और जगत् ब्रह्मके साथ अनुभव करता है, मुक्तिका साधन भक्ति है ।

द्वैतवादके प्रचारक एवं प्रसारक भगवत्पाद श्राचार्य थे । वे सातवीं शताब्दोमैं उत्पन्न हुए थे । विशिष्टाद्वैतके प्रचारक श्रीरामानुजाचार्य १२वीं शताब्दीमें, वादके प्रचारक श्रीमदनु स्वार्कोचार्य १३वीं शताब्दीमें, द्वैतमतके प्रचारक 'श्राचार्य १३वीं शताब्दीमें और शुद्धाद्वैतवादके प्रचारक श्रीमद्बल्लभाचार्य १६वीं शताब्दोमैं हुए हैं ।

पाश्चात्य विद्वानोंपर उपनिषदोंका प्रभाव पनिषदोंके सिद्धान्त इतने गूढ़ एवं सार्वभौम हैं कि उनका विद्वानोंपर चाहे वे किसी नेवांसों और किसी धर्मके अनुयायी क्यों न हों गहरा प्रभाव पड़ा है । किसी में—ग्रन्थको इतरधर्मावलम्बियोंोंसे ऐसा व इतना हार्दिक एवं श्रकृत्रिम श्रादर प्राप्त प्रा है । हमें यह स्मरणा रखना चाहिए कि उपनिषद् भारतियोंके सर्वश्रेष्ठ धार्मिक प्रातिमक ग्रन्थरत्न है । प्रत्येक भारतीय चाहे वह वैष्णव, शैव, शाक्त ग्रादि किसी 'का क्यों न हो, उपनिषदोंको सबसे ग्रधिक प्रामाणिक ग्रन्थरूपसे ग्रादर स्वीकार है । प्रत्येक हिन्दुके धार्मिक विश्वासका ग्राधार वेद हैं और वे ग्रपौरुषेय हैं, भ्रतएव कैसी प्रकारके भ्रम एवं प्रमादकी तान्त्रिक भी संभावना नहीं की जा सकती । वेदोंके सारभाग हैं । वेदोंके संहिता एवं ब्राह्मग्राभागोंमें श्रधिकतर कर्म एवं उपनिषद् तो परापरब्रह्म, जीवात्माके स्वरूप. ब्रह्म साक्षात्कारके उपाय. ब्रह्म साक्षात्कार . त्मके

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श्रथवा दर्शनों में या तो उन्हें मिला ही नहीं श्रौर यदि मिला भी तो बहुत रूपमें। उदाहरार्थ——ग्रहह्म श्रथवा ईश्वरका स्वरूप क्या है ? जोवात्मा किस कम तक एवं कैसे रहती है श्रौर पश्चात् कैसे होती है ? देहकी रचनाके पू श्रस्थितत्व था क्या ? कुछ जन्मसे सुखी श्रौर कुछ जन्मसे दुःखी क्यों ? इ प्रकारके ग्रनन्य प्रश्न ऐसे हैं जो सूक्ष्म दृष्टिसे दर्शनशास्त्रका श्रवलम्बन कर व्यक्तिके मनमें उठते हैं। वेदान्तदर्शनमें इनका इतनी पूरी वैज्ञानिक उत्तर है कि जिसका प्रत्येक जिज्ञासुके मनपर प्रभाव पड़े बिना रह नहीं सक

वेदान्तदर्शनकी महिमा व गरिमापर मुग्ध होनेवाले विदेशी विद्वानों थे श्ररबदेशीय ग्रालबेरुनी। ये ११ वाँ शताब्दीमें भारत ग्राये श्रौर श्राध्ययनकर उपनिषदोंकी साररूपा गीतापर मुग्ध हो गये। उन्होंने उपनिषद् किया कि नहीं, पर गीताकी जो उन्होंने प्रचारकी उसे उपनिषदोंकी ही प्र चाहिये।

मुगल सम्राट् शाहजहाँका ज्येष्ठ पुत्र दाराशिकोह उपनिषदोंकी महिम प्रभावित हुग्रा कि उसने राज-पण्डित जगन्नाथसे संस्कृतका भली-भाँति ग्रहण उपनिषदोंका फारसीमें ग्रनुवादकर डाला। इस फारसी ग्रनुवादका फां ग्रनुवाद हुग्रा। इस फ्रांसीसी श्रनुवादकी एक प्रति-कापो जर्मनीके प्रसिद्ध हरके हाथ लगी। समस्त विदेशी विद्वानों में उन्होंने इन ग्रन्योंको सबसे की। वे कहते हैं——१. सम्पूर्णा विश्वमें उपनिषदों के समान जीवनको ऊँच कोई ग्रनन्य ग्राध्ययनका विषय नहीं है। उनसे मेरे जीवनको शान्ति श्रौर मृत्यु मिलेगी। शोपेनहारके इन्हीं शब्दोंको उद्धृत करते जर्मनीके विद्वान् मैक्समूलर २. शोपेनहारके इन शब्दों के लिए यदि किसी समर्थनकी श्रावइयकता जीवन भरके श्राध्ययनके श्रोपरांत में उनकी सहर्ष समर्थन कहूँगा। उपनिषदों

  1. In the whole world, there is no study elevatin of the UPANISADS. It has been the solace of It will be the solace of my death.

  2. If these words of Schopenhauer required al rmation, I would willingly give it as a result o lnn at....l..

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ग्राद्भुत सिद्धान्तोंका उल्लेख करत शापनहरन फर कह--३. व सद्दान्त पत ह प्रकारके ग्रपौरषेय ही हैं । वे जिनके मस्तिष्ककी उपज हैं उन्हें निरे मनुष्य का ७ है ।

४. वेद मनुष्य रचित नहीं हैं इस मान्यताका कैसा ग्रनूथा ग्रनुमोदन है । पालड़ा क एक ग्रन्थ जर्मंनी विद्वानोंने उपनिषदोंका मूल-संस्र्कतमध्ययनकर उपनिषद्-त :लासफी ग्राफ ही उपनिषद् ) नामक ग्रपनी प्रसिद्ध पुस्तकका निर्माण कि :हैने लिखा है कि उपनिषदोंके भीतर जो दार्शनिक मीमांसा है वह भारतमें ग्रद्धि :है, सम्भवतः सम्पूर्ण विश्वमें श्रातुलनीय है ।

५. डायसनने यह भी कहा कि कांट ग्रौर शोपेनहरके विचारोंकी उपनिषदोंने , कल्पना कर ली थी तथा सनातन दार्शनिक सत्यकी ग्रभिव्यन्जना मुक्तिदायनी ग्र के सिद्धान्तोंसे बढ़कर निश्चयात्मक एवं प्रभावपूर्ं रूपमें कदाचित् ही हुई । ( उपनिषदर्शनाम् )

६. 'मैवडानेलने लिखा है-मानवीय चिन्तनके इतिहासमें पहले पहल बहुदार नेषूमें ही ब्रह्म ग्रथवा पूरांतच्वको ग्रहण कर उसकी यथार्थं व्यन्ज्जना हुई है ।

७. फ्रांसीसी दार्शनिक विद्वान् विक्टरकाजन्स् लिखते हैं---जब हम पूर्वंकी ग्रौर :

Almost Superhuman Conceptions whose originat can hardly be said to be mere-men. Philosophical conception unequalled in India or pe aps anywhere else in the world. Eternal philosophical truth has seldom found m decisive and striking expression, than in the doctı of the emancipating knowledge of the Atma. Brahman or absolute is grasped and definitely ex] ssed for the first time of the history of the Hur thought in the BRHADARANYAKA UPANISAD When we read the poetical and philosophicalmc ments of the East, above all those of India. we di ver there any truths so profound and which make s a contrast with the result at which the European C :ina had some time. stonned that we are constrained.

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करते हैं, तब हमें ऐसे महानेक गम्भीर तथ्यों-सत्योँका पता चलता है, जिनकी उ० तुलना करनेपर, जहाँ पहुँचकर यूरोपोय प्रतिभा कभी-कभी रुक गयी है, हमें ज्ञाने के ग्रागे घुटना टेक देना पड़ता है ।'

५. जर्मनीके एक दूसरे लेखक श्रीर विद्वान् फ्रे डरिखश्लेगल लिखं श्रादर्शवादके प्रचर प्रकाश पुष्ककी तुलनामें यूरोपवासियोंका उच्चतम तर ही लगता है, जैसे मध्याह्न सूर्यके व्योमव्यापी प्रतापकी पूर्ण प्रखरतामें टिग श्रनलशिखाकी कोई श्रादि किरण जिसकी ग्रस्थिर शिखा निरस्तेज ज्योति ऐसी मानो श्रव बुझे की तब ।

इस प्रकार उपयुक्त पाश्चात्य विद्वानोंके विचारोंसे उपनिपदोँकी महत् है । श्राशा है कि पाठकगण उपनिषदूकी महिमा व गरिमाको ग्रवश्य स

उठायँगे ।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया: । सर्वे भद्रारिण पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत् ॥

स्वामी सत्यानन्

  1. Even the lofttiest philosophy of the Europeans in comparison with the abundant light of idealism like a feeble promethean spark in food of the heavenly glory of the moonday. Sur ing and feeble and ever ready to be extinguish

  2. From every sentence deep, original and sublin ghts arise and the whole is pervaded by a h holy and earnest spirit in the whole world no study, except that of the originals, so ben and so elevating as that of the oupnekhat, it h the solace of my life, it will be solace of my de

  3. In India our religion will now and never stri The primitive wisdom of the human race wi be pushed aside by the event of Galilee. On trary, Indian wisdom will flow back upon : produce a thorough change in our knowi

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विषय-सूची

विषय

१. शान्त पाठ

२. सम्बन्ध-भाष्य

प्रथमा वल्ली

३. वाजश्रवसका दान

४. नचिकेता की शङ्का

५. पिता-पुत्र-संवाद

६. यमलोक में नचिकेता

७. यमराज का वरप्रदान

८. प्रथम वर-पितृप्रीतिष

९. स्वर्गस्वरूपप्रदर्शनं

१०. द्वितीय वर-स्वर्गसाधनभूत श्रग्निविद्या

११. नान्चिकेत श्रग्निचयन का फल

१२. तृतीय वर-श्रात्मरहस्य

१३. नचिकेता की स्थिर बुद्धि

१४. यमराज का प्रलोभन

१५. नचिकेता का विषयदोषदर्शनं

द्वितीया वल्ली

१६. श्रेय-प्रेयविवेक

१७. श्रविद्याप्रस्तों की दुर्दशा

१८. श्रात्मज्ञान की दुर्लंभता

१९. कर्मफल की अनित्यता

२०. नचिकेता के त्याग की प्रशंसा

प्रथम अध्याय

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विषय

२३. श्रवणारोपदेश

२४. श्रात्मस्वरूपनिरूपण

२५. श्रात्मा श्रात्मरूपासाध्य है

२६. श्रात्मज्ञानका श्रज्ञानधिकारी

तृतीया वल्ली

२७. प्रथमा श्रौर प्राप्तव्य-शेषसे हो शान्ति

२८. शरीरादिसे सम्बन्धित रथादि रूपक

२९. श्रविवेकीकी विवशता

३०. विवेकीकी स्वाधीनता

३१. श्रविवेकीकी संसारप्राप्ति

३२. विवेकीकी परमपदप्राप्ति

३३. इन्द्रियादिका तारतम्य

३४. श्रात्मा सूक्ष्मबुद्धिग्राह्य है

३५. लयप्रतिन्तन

३६. उद्बोधन

३७. निर्विशेष श्रात्मज्ञानसे श्र्रमृतत्वप्राप्ति

३८. प्रस्तुत विज्ञानकी महिमा

द्वितीय अध्याय

प्रथमा वल्ली

३९. श्रात्मदर्शनका विघ्न—इन्द्रियोंकी बहिमुंखता

४०. श्रविवेकी श्रौर विवेकीका श्रन्तर

४१. श्रात्मज्ञकी सर्वज्ञता

४२. श्रात्मज्ञकी नि:शोकता

४३. श्रात्मज्ञकी निर्भयता

४४. ब्रह्मज्ञका सार्वात्म्यदर्शन

४५. श्राग्यास्य श्रग्रिनमें ब्रह्मदृष्टि

४६. प्राणमें ब्रह्मदृष्टि

४७. मंददष्टिको निन्दा

४८. वतयपत्तनगरीकश्य वना

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विषय

पृष्ठ

श्रभेददर्शनकी कर्तव्यता

११

द्वितीया वल्ली

११२-१३

प्रकारान्तरसे ब्रह्मानुसंधान

११

देहस्थ आत्मा ही जीवन है

११

मरणोत्तरकालमें जीवकी गति

११

गुह्य ब्रह्मोपदेश

१२

आत्माका उपाधिप्रतिरूपत्व

१२

आत्माकी ग्रसड़ता

१२

आत्मदर्शी ही नित्य सुखी है

१२

सर्वप्रकाशक ब्रह्म

१२

तृतीया वल्ली

१३३-१४

संसाररूप ग्रश्वत्थवृक्ष

१३

ब्रह्मज्ञानसे ग्रशमरत्वप्राप्ति

१३

सर्वंशासक परमेश्वर

१३

ब्रह्मज्ञानके बिना पुनर्जन्मप्राप्ति

१३

स्थानभेदसे ब्रह्मादर्शनमें तारतम्य

१३

आत्मज्ञानका प्रकार ग्रौर प्रयोजन

१४

परमपदप्राप्ति

१४

आत्मोपलब्धिका साधन सद्बुद्धि ही है

१४

ग्रमर कब होता है ?

१४

उपसंहार

१४

शान्तिपाठ

१४

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ॐ शं नो मित्रः । शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा

शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

उद्धारार्थं सुपुत्तोररचितं पुरा ब्रह्मसूत्राभिप्रायं कृष्णद्वैपायनेन श्रुतिपरमतिनाड्मनायशीर्षोऽर्थवक्त्रा

कृत्वा भाष्यं तदीयं निखिलबुधनुतं गूढतत्त्वोपदेश

निर्द्वैतानन्ददायि जगति विजयते शाङ्करो देशिकेन्द्रः

वाक्पारमाथ्थं यमेव नित्यां सरस्वती स्वार्थसमन्विताडडत्मतत्त्वं

निरस्तदुस्तर्ककर्कशाङ्कपङ्कं नमामि तं शाङ्करमर्चिताङ्घ्रिम्

श्रुतिस्मृतिपुराणामालयं करुणालयम् ।

नमामि भगवत्पादं शाङ्करं लोकशाङ्करम् ॥

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ॐ तत्सद्ब्रह्मार्पयो नमः

शाङ्करभाष्योपेता

कठोपनिषद्

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत—

मन्त्रार्थ, भाष्यानुवाद, सत्यानन्ददीपिका सहित

ॐ सह नाववतु । सह नो भुनक्तु । सहवीर्यं करवावहै ।

तेनस्वी नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ।

ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

ॐ पदवाच्य परमेश्वर हम ( श्राचार्य और शिष्य ) दोनोंकी साथ साथ रक्ष करें । हम दोनोंका साथ साथ पालन करें । हम साथ साथ विद्या सम्बन्धी सामर्थ्य करें । हम दोनोंका श्रध्ययन तेजस्वी हो । हम दोनों परस्पर द्वेष न करें ।

श्राध्यात्मिक, श्राधिभौतिक एवं श्राधिदैविक तापत्रय की शान्ति हो ।

ॐ नमो भगवते वैवस्वताय मृत्यवे ब्रह्मविद्याचार्याय नचिकेतसे च ।

ॐ ब्रह्मविद्याके श्राचार्य सूर्यपुत्र भगवान् यम और नचिकेताको नमस्कार है ।

अथ कठकोपनिषदल्लीनां सुखार्थप्रबोधनार्थमल्पभन्था वृत्तिरारभ्यते

भाष्यानुवाद

धन्यं यच्छ्रुतिमौलिभव्यवचसां ज्ञानं शिवं सुन्दरं

संसारार्णविसग्ननमूढजनताज्ञानान्धकारापहम् ।

तस्यैतान् जननान् कठोपनिषदं सन्तो भजन्तां मुदा

सत्यानन्दसरस्वती रचितया भाषाविवृत्यन्विताम् ॥ १ ॥

भक्त्या प्रहस्म्य भगवत्पादानाचार्यतल्लाज्ञन् ।

सभाष्यस्य कठस्याहं व्याख्यां कुर्वे यथामति ॥ २ ॥

नानन्ददीपिकया कठोपनिदृ युतां । भवतत्त्वज्ञानसंहन्त्रीं विश्वनाथानुकम्पया

रं शाङ्कराचार्य ब्रह्मविद्दृःसमाहृतम् । जगद्गुरूं यतिवरं वन्दे शाङ्कररुपिणाम

व्रत कनोऽनिषदर्की चनिलयौङ्का' जिताशसजनोंको सखपर्यंक संगमतासे ज्ञान सम्पाद

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सदेर्धोतोर्विशरणपगतयवसादनार्थस्योपनिपूर्वस्य किप्रत्ययान्तस्य र दिति । उपनिपचछ्वदेन च वयाचिरल्यासितग्रन्थप्रातिपद्यवेद्य विदयोच्यते । येन पुनरर्थयोगेन उपनिपचछ्वदेन विदयोच्यत इत्युच ※ये सुमुक्षवो हृद्ग्रन्थिश्रविकविषयवितृष्णा: सन्त उपनिषच्छब्द्यमागालचगां विद्यासुपसद्योपगम्य तन्निष्ठतया निश्चयेन करानेके लिए संक्षिप्त ग्रन्थवाली वृत्ति श्रारम्भ की जाती है ।

विभारषु (नाश श्रवसादन (शिथिलीकरण) इन तीन प्रथयोंवाली तथा 'उप' 'नि' उपसर्ग 'किप्' प्रत्ययान्त 'सद्' धातुका 'उपनिषद्' यह रूप बनता है । जिस ग्रन्थकी करना चाहते हैं उसके प्रतिपाद्य श्रोर वेद्य ब्रह्मारूप वस्तु विषयक विद्या शब्दसे कही जाती है । पुनः किस श्रर्थके योग (सम्बन्ध) से उपनिषद् शब्दसे कही जाती है ग्रन्थाद् किस श्रर्थके सम्बन्धसे उपनिषद् शब्दसे ब्रह्मविद्याका जाता है । इसपर कहते हैं--

जो मुमुक्षु पुरुष लौकिक श्रोर पारलौौिक शब्दादि विषयोंसे विरक्त शब्दद्वाच्य वक्ष्यमागां लक्षणवाली विद्याके समीप जाकर श्रर्थात् प्राप्त सत्यनिन्दादिपिको

यहांँ 'ग्रन्थ' शब्द मेङ्जलार्थंक है, क्योंकि 'श्रोंकारश्रद्वाथशब्ददर्श द्वावेतौ ब्रह्मण: पुरा । कण्ठं भित्वा विनिर्यातौ तस्मान्मेङ्जलिकादुभौ ॥

ऐसी स्मृति है । 'ग्रन्थसमासिकामो मेङ्जलमाचरेत् इस स्मृतिवाक्य श्रुतिके श्राधारपर मेङ्जल करना चाहिए । इससे ग्राचार्य माङ्लकरने ग्रास्तिक वृ करनेके लिए श्रोर शिष्टाचार परिपालनार्थ 'ॐ नमोॐ' श्रोर 'ग्रन्थ' शब्दसे : किया है ।

※सिद्धार्थ ज्ञातसम्बन्ध्यं श्रोंतुं श्रोताः प्रवर्तन्ते । शास्त्रादौ तेन वस्तुन्य: सम्वन्ध: सु

मारते हैं ग्राचार्ये तो निर्दोष होते हैं । इस माङ्क्षके निर्वृत्यर्थ 'भगवते' पद व 'उत्पत्ति च विनाशां च भूतानामार्गति गतिम । वेदि विद्यामविद्यां च भगवन्निति ॥' इस स्मृतिवचनके श्राधारपर करामलकवद् ब्रह्मसाक्षात्कार यावत् याम्यपदका श्रधिकर प्राप्त है तब तक प्रारब्ध कर्मका प्रतिबहन करं ब्रह्मात्मतत्वके बलसे भूतयातनादि दोषोंसे कदापि लिप्त नहीं होते । '८ कर्माणि निवरंषन्ति धनञ्जय' (गी० ५।१८९) 'श्रारोरस्थोऽपि कौन्तेय न करोत

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माविद्यादेः संसारबीजस्य विशरणाद्विसनादू विनाशानादित्यनेनार्थयोगे ता उपनिषदित्युच्यते। तथा च वद्यति—'निचाय्य तं मृत्युमुखात्प्रमुच्यते उ० १३६१४) इति।

अथ पूर्वोक्त उसका परिशीलन करते हैं उनके श्रविद्या श्रादि संसार बीजका विशरण अथवा विनाश करनेके कारन इस श्रर्थके योगसे विद्या उपनिषद् शब्दसे कही जाती है श्रागे भी कहेंगे—‘उसे साक्षात् जानकर पुरुष मृत्युसे मुक्त हो जाता है ।’

सत्यनिदान्दसरस्वती

महापुरुषोंकी इस उक्ति के ग्रनुसार शास्त्रके श्रारम्भमें यदि विषय, प्रयोजन, कारो श्रौर सम्बन्धका प्रतिपादन न किया जाय तो उसमें विझ्ञपुरुषोंकी प्रवृत्ति नह ; इसलिए शास्त्रके श्रारम्भमें उनका निरूपण करना श्रावश्यक है । ग्रन्थमें प्रवृत्त जक श्रनुबन्ध चतुष्टयको सूचित करनेके लिए ‘उपनिषद्’ शब्दसे कार्य सहित ग्रविदनेवात्तिका ब्रह्मविद्याका ग्रहण किया गया है। ब्रह्मविद्या सकार्य ग्रविद्याकी निवृत्ति तभी हो सकती है जब जगद्रूप कार्य सहित श्रविद्या मिथ्या ‘नेह नानास्ति किञ्चन’ ‘ज्ञाते दृष्टं तु विच्यते’ ‘तरति शोकमात्मवित्तं’ इत्यादि श्रुतिवचनोंसे बंध मिथ्या होता है। इससे द्वैताद्वैत जगद्रूप कार्यके साथ श्रविद्याकी निवृत्ति श्रौर स्वरूपभू निरतिशय श्रानन्दकी प्राप्तिरूप प्रयोजन भी सिद्ध होता है। इस प्रयोजनकी कामप्रधिकारी कहा जाता है। वह ‘ये तु मुङ्खत्सवः’ से कहा गया है। इस पदसे ऐहना चाहिए कि विषयासक्त पुरुष इस फलका श्रधिकारी नहीं है ।

‘यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयते एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते’ (छा० ८।१।६) ( जैसे यहाँ कमौसे उपार्जित ग्रन्न श्रादि मोग्य पदार्थ क्षीण हो जाते हैं वैसे एक-पुण्यकमौसे सम्पादित स्वर्गादि भोग भी नष्ट हो जाते हैं ) ‘ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणं पुण्यं मर्त्यलोकं विशन्नि’ (गी० ९१२१ ) ( वे उस विशाल स्वर्गलोकमें भोग कर पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकको प्राप्त होते हैं ) ‘जन्ममृत्युजरारव्याधिदुःखदोषान्‌ नमः’ ( गी० १३।८ ) इसलिए विषयेच्छा पुरुष इन विषयोंमें रस्पृह न होष्यंक पार ग्रनुसन्धान कर इससे विरक्त हो जाता है। इस प्रकार विवेक, वैराग्य श्रादि सम्पन्न व्यक्ति इस विद्याका श्रधिकारी कहलाता है। जीवब्रह्मैक्य उपनिषदु

है । प्रपञ्च-प्रापक-प्रतिपादकभाव श्रादि सम्बन्ध हैं। इस प्रकार श्रनुसन्धान य सिद्ध होनेपर ग्रन्थका श्रारम्भ सर्वथा युक्त है ।

उप, नि उपसर्ग पूर्वक ‘सद्’ घातुसे कतुँ श्रर्थमें ‘किप्’ प्रत्यय हो उपनिषद् शाठ न दृश्यते है। यहाँ उपनिषद् शब्दका श्रर्थ ब्रह्मविद्या—ब्रह्मसाक्षात्करत्व ज्ञान है । ‘उपति

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†पूर्वोक्तविशेषाणामुमुक्षूणां परं ब्रह्म गमयतीति ब्रह्मयोगाद्ब्रह्मविद्योपनिषद् । तथा च वद्यति--"ब्रह्म प्राप्तो विरजोऽ ( कठ० उ० २।३।१८ ) इति । लोकादिर्हि ब्रजिद्दों योगग्निरस्तद्विष्याद्वितीयेन चरेऽ आध्यात्मानाया: स्वर्गालोकफलप्राप्तिहेतुत्वेन गर्भेवाऽपद्रवचून्दस्य लोकान्तरे पौनःपुन्येन प्राप्तस्यावसादयितृत्वेन पादनेन धात्वर्थयोगाद्गिनविद्यास्युपनिषदित्युच्यते । तथा च श्रथवो [ शान्ते दान्ते ] श्रद्धाे पूर्वोक्ते विशेषणे युक्ते मुगुमुक्षूणा परब्रह्माके पास पहुँचा देती है श्रर्थात ब्रह्मसाक्षात्कार करा देती है । इस प्रकार करानेवाली होनेके कारण इस श्रर्थके योगसे ब्रह्मविद्या 'उपनिषद्' कहेगी । जो ब्रग्रिन् भूः, भुवः श्रादि लोकोंसे पूर्व सिद्ध ब्रह्मसे उत्पन्न तद्विष्यक विद्या जो दूसरे वरसे माँगो गयी है श्रौर स्वर्गलोक रूप फलकी प्राप्ति से लोकान्तरोंमें पुनः-पुनः प्राप्त होनेवाले गर्भवास, जन्म, वृद्धावस्था समूहका श्रवसादन-रीङ् शीलयापादनके द्वारा वह ब्रग्रिन् विद्या भी 'सद्' धातु उपनिषद् कही जाती है ।(दर्शयालोकको प्राप्त होनेवाले पुरुषव्याक्यानु . सत्यानन्दीदीपिका

'षद् भो ङून्हि' इस प्रकार ब्रह्मविद्यामें ही उपनिषद् शान्दका प्रयोग पाय 'एकार्थत्वसंभवेनैकार्थकल्पना ग्रन्थयाग्या' ऐसा न्याय भी है । उपनिषद् भी ब्रह्मविद्यामें संभव है । यथा---उपनिषद् शब्दमें चार श्रव्यय हैं 'उप. किप्' श्रन्तिम तो लुप्त है । शेष उप-सामीप्य, नि-निश्चय, सद् धातुका गति श्रौर श्रवसादन है श्रौर किप् प्रत्यय कर्तृँ ब्रर्थमें है । 'ग्रनः शुद्धं र्ज सामीप्योपलक्षितं ब्रह्म निश्चितं नोचवा सत्स्वरूपं ग्राह्यित्त्वा सकार्यां समू शिशिलयति नाशयति या सा उपनिषद्' इस प्रकारकी व्युत्पत्तिसे शब्द जोव - पलक्षित ब्रह्मके पास ले जाकर ब्रह्मारूपका बोध कराकर कार्य सहित समूल शिशिल कर नाश करती है वह उपनिषद्? है ।

†ब्रह्मविद्यासे जगद्रूप कार्य सहित ग्रवविद्या नित्यत्तिरूप यह प्रयोजनांश ; सकता है जब कार्य सहित ग्रवविद्या मिथ्या ( कल्पित ) हो, कल्पितकी ज्ञानसे निवृत्ति होती है श्रकलिपत की नहीं । जैसे रज्जुज्ञानसे रज्जुमें श्रध्य नितृत्ति ( बाध ) हो जाती है ।

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दृच्यात ] भाषानुवाद-सत्यानन्ददीपिका ५ 'स्वर्गालोका श्रामृतत्वं भजन्ते' (कठ० उ० ११११३ ) इत्यादि । ननु चोपनिषच्छब्दे नाधीयेतारो ग्रन्थमध्ये ऽपिलपन्ति । उपनिषद्मधीमहे डध्यापयाम इति' च । एवं नैप दोषोडविद्यादिसंसारहेतुविशरणपादे: सद्विद्यात्वर्येथे ग्रन्थ- मातृडसम्भवादिचायां च सम्भवात् । ग्रन्थस्थ्यापि तादृग्येन तच्छछदस्वोपपत्ते;, 'आयुरु घृतम्' इत्यादिवत् । तस्माद्विद्यायां मुख्यय्चा वृत्त्योपनिषच्छब्दो वतंतें ग्रन्थे तु भक्त्येति ।

एवमुपानिप्रतिवचनैनेव विशिष्टोडधिकारी विद्यायामुस्कलः । विषयश्र्च विशिष्ट उत्को विद्याया: परं ब्रह्म प्रत्यगात्मभूतम् । प्रयोजनञ्चाश्या उपनिषद् श्रात्यन्तिक संसारनिवृत्तिरिति श्रप मिलद्यपा समबन्धञ्चैवंभूतप्रयोजनहेतुकोत्कः । श्रातो यथोक्ताधिकारीविषयप्रयोजनसमबन्धाया विद्याया: करतलन्यस्तामल- प्राप्त करते हैं, ऐसा कहेंगे । परन्तु 'उपनिषद् पढ़ते हैं' इत्यादि भ्रान्ति पढ़ाते हैं' इस प्रकार प्रधययन करनेवाले ग्रन्थको भी उपनिषद् शब्दसे कहतें हैं ? यह दोष नहीं है, यद्यपि संसारके हेतुभूत श्रविदिके विशरण-नाश श्रादि जो 'सद्' धातुके श्रर्थ हैं वे ग्रन्थमात्र में तो संभव नहीं हैं किन्तु विद्यामें संभव हैं, फिर भी घी जैसी श्रायुयुद्धमें उपयोगी होने के कारन 'घी आयु है' ऐसा कहा जाता है वैसे ही ग्रन्थ भी विद्याके लिए है, श्रतः वह भी उपनिषद् शब्दसे कहा जा सकता है । इसलिए 'उपनिषद्' शब्द ब्रह्मविद्यामें तो मुख्यवृत्तितसे प्रयुक्त होता है किन्तु ग्रन्थमें गौणवृत्तितसे ।

इस प्रकार 'उपनिषद्' याब्दका निर्वाचन करनेसे ही विद्याका विशिष्ट श्रधिकारी भी कहा_ गया है, 'त्वं' पद लक्षित प्रत्यगात्मभूत परब्रह्म विद्याका भ्रसाधारण्य विषय कहा गया है । इस प्रकार इस विद्याका सांसारिक श्रात्यन्तिक निवृत्ति एवं नित्य निरतिशय श्रानन्दस्वरूप ब्रह्माकी प्राप्तिरूप प्रयोजन है । इस प्रकारके प्रयोजनके

सत्यानन्ददीपिका ⁹नैक्यज्ञानं यद्योत्पन्नं महावाक्येन चातमनः । तदा श्रविद्या स्वकार्येण नश्यत्येव न संशयः ॥ 'जब तत्त्वमसि श्रादि महावाक्योसे प्रत्यगभिन्न ब्रह्माका ऐक्य ज्ञान हो जाता है, तभी कार्य सहित श्रविद्या निवृत्त हो जाती है इसमें संशय नहीं है' । 'मायां तु प्रकृति विद्यात्' 'एकमेवाद्वितीयम्' ( छा० ६।२।१ ) 'नेह नानास्ति किञ्चन' 'ज्ञाते हि तु न विद्यते' 'नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा' 'नासद्रूपा न सद्रूपा माया नैवोभयात्मक । श्रनिवर्च्या ततः शेया भेदबुद्धिप्रदायिनी॥ 'मायिनो मायया भेदं पश्यन्ति परमार्थतः । तस्मादृश्रां त्यजेद्योगान्मुमुक्षुर्द्विजोत्तम ॥ नश्वरं भासते चैतद्विशं मायोद्भवं नूप । यथा शुक्तौ रौप्याभासः काचभूस्मां जलस्य च ॥ एकः सन् भिद्यते वाक्स्या मायया न स्वभावतः । तस्माद्दृश्रं तमेवाहुः श्रुति; 'परमार्थतः ॥

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कवल्यकारकत्वेन विशिष्टाधिकारिविषयप्रयोजनसम्बन्धा एतद्भवन्तीति, ऋतस्ता यथाप्रतिभानं व्याचक्ष्महे---

कथनसे प्रतिपाद्य-प्रतिपादकभाव, प्राप्य-प्रापकभाव श्रादि सम्बन्ध भी यथोक्त श्राधिकारी, विषय, प्रयोजन श्रौर सम्बन्ध विशिष्ट विद्याको करण शित करनेवाली होनेसे ये कठोपनिषद्की वल्लियाँ विशिष्ट श्राधिकारी विषसम्बन्धवाली हैं, सो हम उनकी यथामति व्याख्या करते हैं---

सत्यानन्दीदीपिका

श्रतो हि तं समध्यस्तमद्वितीये परात्मनि । श्रद्धैतं परमानन्दं ब्रह्मावस्तु श्रद्ध्यस्तं सर्पवस्त्रं विश्वमेतत्प्रकाशाते । विश्वस्यास्मिन्नपि चान्वेति निर्विकारसर्व ऋत्वैन नानात्वं नास्तीति निगमा जगु: । यदज्ञानाजाद्भाति यत्सिमृड

इत्यादि श्रुति, स्मृतिसे यह सिद्ध होता है कि माया और तत्कार्य विशिष्ट लक्षणा श्रनिवर्चनीय-मिथ्या है, श्रत: उसकी नित्यता नह्याविद्याद्दे ही ? माया तत्कार्या जगत्को सत् श्रादि माननेवालोंके मत खण्डन सम्भू प्रकार प्रयोजन सिद्ध होनेपर श्राधिकारी श्रादि भी सिद्ध हो जाते हैं ।

१. कल्पलताके समान श्रभीष्ट फलप्रद होनेसे कठोपनिषद्के भागोंको :

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प्रथमाॅध्यायस्य

प्रथमावल्ली

ॐ उशन्‍ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ ।

तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥ १ ॥

वाजश्रवसः ( वाजमन्नंतहदानादिनिमित्तं श्रवो यशो यस्स सः, वाजश्रवा: तस्मा-

(जश्रवसः ) स उदानू ह वै ( ह वै ऐतिह्यस्ममारको निपातो, स्वर्गलोकमिच्छन् ) सर्व-

सर्वस्वं ) ददौ ( द्रव्यस्येभ्यो दत्तवान् ) तस्य ह ( प्रसिद्धस्य वाजश्रवसस्य ) नचि-

केतो नामा ) पुत्र श्रास ( श्रासीत् ) ॥१॥

प्रसिद्धि है कि यज्ञफलके इच्छुक वाजश्रवाके पुत्रने [ विश्वजित् यज्ञमें ] स-

र्वस्व दान दे दिया । उसका नचिकेता नामक एक प्रसिद्ध पुत्र था ॥१॥

तत्राख्यायिका विद्यासुल्यर्थी । उशन्कामयमानः, ह वा इति वृत्तार्थ-

पार्थौ निपातौ । वाजमन्नं तहदानादिनिमित्तं श्रवो यशो यस्स स वाज-

श्रवा वा । तस्याप्तं वाजश्रवसः किल विश्वजिता सर्वमेधेनेजे त-

स्मिन्कृतौ सर्ववेदसं सर्वस्वं धनं ददौ दत्तवान् ।

यजमानस्य ह नचिकेता नाम पुत्रः किलास बभूव ॥ १ ॥

यहाँ यह श्राख्यायिका विद्यार्थीकी स्तुतिके लिए है । उशन् स्वर्गफलकी कामनाव

है' और 'वै' ये निपात श्रतीत वृत्तान्तका स्मरण्य करानेके लिए हैं । वाज

श्रदानादिनिमित्तक जिसका श्रव-यश हो वह वाजश्रवा नामवाला हो सकता है । उस वाजश्रवाके पुत्र-

वाजश्रवस उद्दालकने यजमानासे जिसमें सर्वस्व दिया जाता है ऐसा विश्वजित् नामक यागसे यजन कि

उस यजमें उसने सर्ववेदसं श्रथात् श्रपना सारा धन दे दिया । उस यजमानका नचि-

केता नामक प्रसिद्ध पुत्र था ॥ १॥

सत्यनन्‍दी-दीपिका

वेद तथा वेदसमत शाखोंमें तीन प्रकारकी वृत्तियाँ शौली पाई जाती है, वह स-

लौकिकी श्रौर परकीया भाषा कहुलाती है । समाधि गम्य श्राख्यातिमक रहस्य प्र-

भाषा समाधि भाषा भाषा है । समाधि गम्य श्राख्यातिमक रहस्य को लौकिकरीतिसे प्र-

करनेवाली भाषा लौकिकी भाषा है और जो भाषा समाधिगम्य श्राख्यातिमक र-

गाथाद्वारा हृदयंगम कराती है वह तीसरी श्रथात् परकीया भाषा कहुलाती है,

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त॒ ह कुमाल॑ सन्त् दक्षिणा॑सु नी॒यमा॑नासु श्रद्धा॑विवेश सोऽमन्यत:॥ २ ॥

दक्षिणा॑सु नी॒यमा॑नासु ( पितृा जी॒र्णा॑सु गोषु ब्राहृ॑णेभ्यो दक्षिणा॑य॒ दी॑ त॒ कुमार॑ सन्त् ( बा॒ल्मे वय॑सि स्थित॑ं न॒चिके॑तस॒ ) श्रद्धा ( श्रा॑स्ति॒मत॑यबु॑द्धि:; ( प्रवि॑वेशा ) स॒ ( न॒चिके॑ता: ) श्र॒मन्॑यत ( मना॑सि चिन्तय॑त् ) ॥२॥

ऋ॒त्विजो॑के लिए दक्षिणा॑स्व॒रुप गौ॓ओंको ले जाते देख उस कुमार न॑चि॒वे॒ता॑का॒ मन॒ ह॒ष्रा॑ वह मन ही मन सोचने लगा ॥२॥

त॒ ह न॑चि॒के॑तस॒ कुमार॑ं प्रथ॒मव॑यस॒ सन्त॑मग्राम॑जननशा॒क्ंि बा॒ल॒ स्ति॒क्यबु॑द्धि: पितु॒र्हित॑काम॒प्रयु॑क्ता॒विवे॑श प्रवि॒श्र॑वती । क॒स्मि॑न्का॒ल॒ ऋ॒त्वि॑ग्भ्य: सद॒स्ये॑भ्य॒श्‍च दक्षिणा॑सु नी॒यमा॑नासु विभा॑गे॒नोप॑नी॒यमा॒न्‌ पा॒र्था॑सु गोषु स श्रा॑वि॒ष्ट॑श्र॒द्दो न॑चि॒के॑ता श्र॒मन्॑यत ॥ २ ॥

पी॒तोद॑का जग॒धतृ॑णा दु॒र्‌ध॑दो॒हा नि॒रि॑न्द्रि॑या: । अ॒न्न॑न्दा नाम ते लो॒का॑स्त॒न्‌ ग॑च्छ॒ति ता॒ द॑दत् ।

पिताका॒ हित॑काम॒नासे॑ प्रयु॒क्त श्र॑द्धा-श्रा॑स्ति॒मत॑य बु॒द्धि प्र॑वि॒ष्ट श्र॒र्था॒न्‌ उत॑पन्न: सम॒य ? कहते हैं—जिस समय ऋ॒त्वि॑क् और सद॒स्य ग॑णोंके लिए दक्षिणा॑ रही थीं ग्र॒थ्या॒व्‌ दक्षिणा॑के लिए विभा॑गकर गौ॒एँ लायी जा रही थीं, उस ॠ॒ यु॑क्त हो न॑चि॒के॑ताने मनमें विचार किया ॥२॥

किस प्रकार विचार किया ? सो 'पी॒तोद॑का' श्रादिसे कहते हैं—

स॒त्य॒ान॑न्दी॒दी॒पिका

द्र॒व्य॑य॒ज्ञा॑स्त॒पो॑य॒ज्ञा यो॑ग॒य॒ज्ञा॑स॒थाप॑रे । स्वा॒ध्याय॑य॒ज्ञा॑न॒य॒ज्ञा॑श्र यत॑य: सं॒शि॑त॒व्र॒ता:॥१॥

'य॒ज्ञो॒ वै वि॒ष्णु:'॑, 'य॒ज्ञो दा॒न्‍ त॒प॑श्‍चै॒व पा॒व॑नानि मनी॒षि॑णाम्‌' (गीता १८: ५)

इस प्रकार श्र॒ने॑क य॒ज्ञोंका विधान है । परन्तु स्व॒र्ग॑फ॒लक॑ामी उद्धा॑लकने यजे॒त' इस विधि॑वा॒च्यके श्र॒नु॑सार 'वि॒श्व॑जि॒त' नामक याग किया जिसमें होता, श्र॒त्वि॑यु, उद्गाता और ब्राह्मा ये चार य॒ज्ञके मुख्य ऋ॒त्वि॑ज हैं,

४८-४९ गौ॒एँ दक्षिणा॑में देनेका विधान है । प्र॒शा॑स्ता, प्रति॒प्र॑स्ता॒ता, न॒ह्ँहा॑, प्र॒स्तो॑ता इनमेंसे प्रत्येकको १६-१६ और ग्रा॒व॑स्तुत् नेतॄ, श्र॒न्नो॑ ष॒ड़्‌ ग्रा॒व॑स्तत् नेतॄ॒र॒ ये॑षा॒म्‌

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तॄ॥ऽ॥ तॄ॥ण॒ । तॄ॥ण॒व॒ । त॒ । त॒ण॒ । त॒ण॒ । त॒ । द॒र्गधदोहः ( दुग्धमेव दोहो (क्षीरं) यासां ताः ) निरिन्द्रियाः ( इन्द्रियशक्तिशू॒द्राः ) ताः ( उत्कृष्टा गाः ) ददत॒ ( प्रयच्छन् ) सः ( पुष्पः ) ते लोकाः, म्रन सुवरहिताः ) तान् ( लोकान् ) गच्छति ॥ ३ ॥

जिन्होंने जल पी लिया है, जिन्होंने तृण-घास-खा लिया है, जिनका लिया गया है श्रौर जिनमें प्रजननसामर्थ्य नहीं रही ऐसौ जीर्णशरीरं गौऔंका न करता है वह दाता जो श्रानन्दरून्य लोक हैं उन्हेंको जावत है ॥३॥

ददृिग्रार्थौ गावौ विशेष्यान्ते पीतमुदकं याभिस्ताः पीतोदकाः, ड वितं तृणं याभिस्ता जग्धतृणाः, दुग्धो दोहः द्वीराख्यो यासां ता दुग्धदो॒रिन्द्रिया ऋप्रजननसमर्थो जीर्णां निष्फलाः गाव इत्यर्थः । यास्ता एत॒ऋ॒ङ्ग॒ ऋत्विग्भ्यो ददृिग्रावुद्॒यया दद॒त्प्रयच्छ॒ञ्ज॒नन॒दा आनन॒दा श्रसुखा नामे॒ ये ते लोकास्तान्स यजमानो गच्छति ॥ ३ ॥

स होवाच पितरं तत् कस्यै मां दास्यसीति । द्वि॒न्तीयं तॄ॒तीयं त॒न् होवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ॥ ४ ॥

सः ( नचिकेता॒ः ) ह ( एत॒द्यो॒त॒क॒म॒न्य॒य॒स्मै ) पितॄस॒म् [ उपग॒म॒स॒ ] उवाच, हे तात ! ) क॒स्य॒मै ( न॒हि॒वि॒ज॒ ) मां दास्यसि इति द्वि॒तीयवार॒ तॄ॒तीयवार॒म् वाच ग्रन॒न्त॒रं पित॒ा कृ॒द॒ध्न॒ सन॒ त॒न् ( पु॒त्रं हि॒किल ) उवाच, त्वा ( त्वां ) मृ॒त्य॒वे ( य॒माय ) ददामीति ॥४॥

त॒ब् वह श्रा॒पने पितासे बोला—हे तात ! श्राप मुझे किस ऋत्विगकूको दान करें श्री प्रकार उसने द्वितीयवार, तृतीयवार भी कहा । त॒ब पिताने क्रुद्ध हो उससे 'मैं शु-यम को देता हूँ' ऐसा कहा ॥४॥

तदेवं ऋत्विग्सम्पत्तिनिमित्तं पितृनिष्ठं फलं मया पुत्रेण सता निवार॒दक्षिणाके लिए लायीं हुई गौऔंको विशेषित करते हैं श्रर्थात ऋत्विक् ग्रा॒हक॒रणारुपसे दी जानेवाली गौएं कैसी थीं यह बतलाते हैं—जिन्होंने जल पी लिया था, जिन्होंने तृण-घास जगध-म॒क्षि॒त श्रर्थात खा लिया था जिनमें श्रौर दूध देनेमें समर्थ नहीं हैं वे 'दुग्धदोह॒थात् जिनमें श्रौर घास खानेकी शत्ति नहीं रही है वे 'जगधतृणाः' हैं । जिनका था निरिन्द्रिया जो सन्तान उत्पन्न करनेमें श्रसमर्थ जीर्ण निष्फल-मरण॒ ये हैं ऐसा श्रर्थ है । दे॒ता है वह यजमान श्रानन्दरहित-सर्वबाधा॒न्व यज् लोक हैं उन्हेंको प्राप् दो॒नर है ॥

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मात्सप्रदानेनापि ऋतुसम्पत्तिं कृतवेत्येचं मत्स्वा पितरसुपगम्य स होवाच पितरं हे तत तात कस्मै ऋत्विग्विरंशोऽपां दनिष्याथे मां दास्यसि प्रयच्छसीत्येतत् । एवमुक्तेन पित्रोपेक्ष्यमाणोडपि द्वितीयं वृतीयमप्युवाच कस्मै मां दास्यसि कसमै मृत्यवे वैकस्वताय त्वां त्वां वदासीति ॥ ४ ॥

सु उपुक्तः पुत्रः प्रकृतान्ते परिदेवेच्छृणोकार । कथम् ? इत्युच्यते— वहूनामेमि प्रथमो वहूनामेमि मध्यमः । किंस्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाद्या करिष्यति ॥ ५ ॥

वहूनां ( शिष्यपुत्रदीनां मध्ये ) प्रथम: ( मुख्य: ) एमि, यमस्य किंस्वित् कर्तव्यं ( तत् प्रयोजनम् ग्रासित्व ) यत् ( प्रयोजनम् ) ग्रह्य मया करिष्यति ( सम्पादयिष्यति ) ॥५॥

मैं बहुतसे शिष्यों वा पुत्रोंमें तो मुख्य वृत्तिसे प्रथमताको प्राप्त हूँ और बहुतोंमें मध्यम हूँ । यमका ऐसा क्या कार्य-प्रयोजन है जिसे पिता ग्राज मेरे द्वारा सिद्ध करेंगे ॥५॥

होनेवाला घनिष्टफल शुभ जैसे मुंहपत्तकको ग्राह्य-तुल्य जानकर भी नित्य करना चाहिये, ऐसा विचार कर नचिकेता पिताको समीप जाकर बोला— हे तात ! मुझे दक्षिणारूपसे किस ऋत्विग्विवरोषको देंगे ? नचिकेताके ऐसा कहनेपर पिता द्वारा उपेक्ष्यमाण होकर भी उसने पुनः द्वितीयवार फिर तृतीयवार पूछा मुझें किसको देंगे, मुझे किसको पिताने उस पुत्रसे कहा——मैं तुम्हे सूर्यपुत्र मृत्यु-यमको देता हूँ ॥४॥

पिताद्वारा इस प्रकार कहे जानेकपर वह पुत्र एकाग्रमें बैठकर ध्यानुताप करने लगा । किस प्रकार ? कहते हैं—

सत्यानन्ददीपिका ऋद्धिपि होकर भी उद्दालकने पुत्र मोहसे मोहित हो श्रच्छी-स्वस्थ गौएँ पुत्रके लिये और मर्यादासे गयेँ नष्ट्रिजोंको दक्षिणामें देनी चाहिं। यही यजमें नैगायन था । जिससे उत्पन्न म्रनिष्टसे रक्षा करनेके लिये नचिकेताने पिताको सचेत किया । क्योंकि 'पुत्रा- म्नो नरकात्रायेत इति पुत्र:' यही सत्पुत्रका लक्षण है । परन्तु पुत्रमोहवशा विद्धृत बुद्धि हो जानेके कारण उद्दालकने धार्मिक पुत्रके बाल सुलभ, पितृभक्ति पूर्ण धर्म भावसिक्त वचनोंका मर्म न समभ् प्रत्युत कुद्ध हो 'मृत्यवे त्वा ददामी' ऐसा कहा । क्रोधसे क्या अनर्थ होता है, गीता २।६३ में इसका स्पष्टोकरशु इस प्रकार है——

क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशान्नश्यति ॥४॥

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बहूनां शिष्याणां पुत्राणां वैमि गच्छामि प्रथमः । सन्सुष्ट्यया शिष्यादिवृत्त्येत्यर्थः । मध्यमानां च बहूनां मध्यमो मध्यमस्थैव वृत्तैवमि । नाधमया कदाचिदपि । तमेवं विशिष्टगुरुमपि पुत्रं मां मृत्यवे त्वा ददामीत्युक्तवान्पिता । स किंस्रिदूर्यमस्य कर्तव्यं प्रयोजनं भया प्रत्तोन करिष्यति यकर्तव्यमस्य ? नूनं प्रयोजनमनपेक्ष्यैव क्रोधवशादुक्तवान्पिता । तथापि तस्मात्पुर्वचो मृपा मा भूदित्येवं मत्वा परिदेवितुमार्पकमाह पितरं शोकाविष्टं किं सयोग्यमिति ॥ ५॥

अनुपपद्य यथा पूर्वं प्रतिपद्य तथापरे । सस्यमिव मृत्युःपच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥ ६ ॥

पूर्वं ( पूर्ववर्तिनः ) तथा, अन्रुपपद्य ( पूर्वक्रमेण श्रालोचय ) तथापरे ( वर्तमानः साधवः ) प्रतिपद्य ( विचारय ) मर्त्यः; ( मनुष्यः ) सस्यमिव पच्यते ( श्रियते ) सस्यमिवाजायते पुनः ( उत्पच्यते ) ॥ ६ ॥

जिस प्रकार पूर्वं मुख बयवहार करते ये उसका विचार कीजिए तथा वर्तमान कालिक ग्रन्थलोग प्रवृत्त होते हैं उसे भी देखिये । मरनधर्मा मनुष्य खेतीकी भाँति पकता ( वृद्ध हो मर जाता ) है श्रोड़ खेतीकी तरह पुनः उत्पन्न हो जाता है ॥ ६ ॥

मैं बहुतेरे शिष्यों अथवा पुत्रोंमें मुख शिष्यादि वृत्तिसे प्रथम होता श्राया हूँ । ऐसे श्रर्थ है । बहुतेरे मध्यमोंमें मध्यमवृत्तिद्वारा मध्यम स्थान प्राप्त करता श्राया हूँ, किन्तु श्रथम वृत्तिद्वारा श्रथम कभी नहीं हुग्रा हूँ । ऐसे विशिष्ट गुरु सम्पन्न उस मुख पुत्रको भी पिताने 'तुझे यमको देता हूँ' ऐसा कहा : परन्तु यमका ऐसा कौन-सा कर्तव्य-प्रयोजन इन्हें पूर्र्ण करना है जिसे ये इस प्रकार दिये हुए मुखसे श्राज सम्पन्न करेंगे ? निश्चित किसी प्रयोजनकी श्रपेक्षा न कर ही पिताने क्रोधवशा ऐसा कहा है, तथापि पिताका 'मृत्यवे त्वा ददामि' वह वचन मिथ्या न हो ऐसा विचारकर उसने श्रपने पितासे जो यह शोचकर कि 'मैंने क्या कह दिया ?' शोकाकुल थे खेद पूर्वंक कहा ॥५॥

सत्यानन्ददीपिका

तच्चिकेता ग्रन्थ शिष्योंके साथ पितासे ही विद्याध्ययन भी करते थे । इससे तच्चिकेता श्रपने पिताके शिष्य भी थे । यथा समय गुरुकृपा इष्ट समभकर उसमें प्रवृत्त होना यह मुख्यवृत्ति है श्रोड़ ग्राहाद्वारा प्रवृत्त होना मध्यमवृत्ति है । इन दोनोंमें पूर्र्ण होनेसे तच्चिकेता उत्तम एवं मध्यम श्र्र्रेणीके पुत्र व शिष्य थे । गुरु व पिताकी श्राज्ञाका पालन न करना श्रधमवृत्ति है इससे तच्चिकेता सर्वथा मुक्त थे । उत्तम गुरु सम्पन्न होते भी तच्चिकेता श्रपने पिताकी श्राज्ञा पालन करना श्रपना मुख्य कर्तव्य समकते थे । दूसरी श्रोड़ पिताने जब यह कहा—'मृत्यवे त्वा ददामि' इसके श्रनन्तर उसे ग्रनुताप हुग्रा

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अनुपश्यालोच्य निभालयानुक्रमेण यथा येन प्रकारेण वृत्तः पूर्वडतिद्रान्तः पितृपितामहादयस्तव । तान्द्रश्रु च तेषां वृत्तमास्थातुमर्हसि । वर्तमानाश्च-परे साधवो यथा वर्तन्ते तांश्च प्रतिपश्यालोचय तथा न च तेषु मृषाकरणं वृत्त* वर्तमานं वास्ति । तद्धि:परीतमसतां च वृत्तं मृषाकरणं । न च मृषा कृत्या कश्चिदजरामरो भवति । यतः सस्यमिव मर्त्यो* मर्त्यः पच्यते जीर्यो जीर्यो त्रियते । मृत्यो च सस्यामिव ब्राजिता इत्यमेवाति पुनरपि मनुष्य: पालय द्वात्मनः सत्य्यं । प्रेपय मां यमालयत्यभिप्रायः ॥ ६ ॥

ग्रापके पिता, पितामह श्रादि श्रनुक्रमसे श्रतिद्रान्त-पूर्व पुरुषोंने जिस प्रकारके वृतका श्रवलम्बन किया था उसकी श्रालोचना कीजिए उसपर विचार कीजिए श्रर्थात् उसपर दृष्टि डालिये । उन्हें देख श्रापको भी उनके वृत-श्राचारका श्रवलम्बन करना उचित है श्रोर वर्तमान श्रन्य साधु पुरुष जैसा श्राचरण करते हैं उनका भी श्रालोचन-विचार कीजिए । उन लोगोंमें किसी प्रकारका भी मिथ्याकरण नहीं था श्रोर न वर्तमानमें ही है । किन्तु इसके विपरीत श्रसत्पुरुषोंका श्राचरण-व्यवहार ही मिथ्याकरण-श्रसत्यकरगा है । परन्तु श्रसत्य श्राचरण कर कोई भी भो श्रज्ञर भ्रमर नहीं हो सकता, क्योंकि मर्त्य-मनुष्य खेतीके समान पकता ध्यर्थात् जीर्ण हो कर मर जाता है तथा मरकर खेतीकी शांति पुनः उत्पन्न-श्राविर्भूत हो जाता है । इस प्रकार इस श्रनित्य जीवलोकमें मृषा श्राचरणसे लाभ ही क्या है ? श्रत: श्रापने सत्यका पालन कीजिए मुझे यमके यहाँ भेज दीजिए, यह श्रभिप्राय है ॥ ६ ॥

सत्यानन्दीदीपिका

कि मैंने सर्वगुरु सम्पन्न श्रापने पुत्रको यमके प्रति जानेकी कैसे कह दिया । इस प्रकार शोकाकुल पिताके पास जाकर खेद पूर्वक नचिकेताने कहा ॥ ४ ॥

धर्मनिष्ठ नचिकेता योंकाकुल पिताको 'मृत्यवे त्वा ददामि' इस वचनसे विचलित न होनेकी प्रार्थना करते हैं—'सत्यं वद धर्मं चर' 'सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्‌' । श्रश्वमेधेऽसहस्र* च सत्यं च तुलया धृतम् । श्रश्वमेधेसहस्रात्तु सत्यमेव विशिष्यते ॥

इत्यादि श्रुति स्मृति भी हैं । इसलिए भूत, भविष्यत्, वर्तमान तीनों कालोंमें भी महान् पुरुष सत्यसे विचलित नहीं होते । यदि किसी दोषवश मिथ्याभाषण करेंगे तो उससे किंचिदपि लाभ नहीं प्रत्युत श्रनिष्टकी ही प्राप्ति होती है । इसलिए श्राप दुःखी व शोकातुर न हो श्रापने मुखसे निकाले 'मृत्यवे त्वा ददामि' इस वचनको सत्य करें, धर्म श्रोर सत्यपालनसे ही स्वर्गपित्य प्राप्त होता है, श्रत: मुझे यमके प्रति भेज सत्यका पालन कीजिए ॥ ८ ॥

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स एवमुक्तः पितातमनः सत्यतायै प्रेष्यामास । स च यमभवन्तं गत्या तिर्यो रात्रीरुवास यमे प्रोषिते । प्रोष्यागातं यमममात्या भार्यां वा ऊचुर्वो-ध्यान्तः—

वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिं ब्राह्मणो गृहान् । तस्यैततां शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतौदम् ॥ ७९ ॥

आहुण्य श्वातिथौ ( सन् ) वैश्वानरः ( श्रभिनरिव दहन् दहति ) गृहान् प्रविशति । तस्य ( श्रभिनरिव प्रविशतस्य श्रातिथ्ये: ) एतां ( शास्त्रोक्तां पाद्यासनादिरूपां ) शान्तिं कुर्वन्ति । हे वैवस्वत !( सूर्यपुत्र !) उदकं ( पाद्यार्थं जलं ) हर ( ग्राह्य एनं पूजय ) ॥७॥

आहुण्य श्वातिथि होकर श्रभिन ही घरमें प्रवेश करता है । साधु पुरुष उस श्रातिथिकी यह ( शास्त्र्यपाद्यादानरूपा ) शान्ति किया करते हैं, श्रत; हे सूर्यपुत्र ! [ इस आहुण्य श्रातिथिकी शान्तिके लिए ] जल ले जाइये ॥ ७ ॥

वैश्वानरोऽन्नरिव साक्षात्वविशत्यतिथि: सम्ब्राह्मणयो गृहान्दहन्निव तस्य दाहं शामयन्त इवार्गनिरेतां पाद्यासनादिदानलच्यां शान्तिं कुर्वन्ति सन्तोऽति-थेयतोऽतो हराहर हे वैवस्वत उदकं नचिकेतसे पाद्यार्थम् । यतश्चाकरष्ये प्रत्यवायः श्रूयते ॥ ७ ॥

श्राशाप्रतीक्षे संगतँसुनृतां च इष्टापूर्तें पुत्रपशून्सर्वान् । एतद्वृङ्कनते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्ननन्वसति ब्राह्मणो गृहेँ ॥८॥

ब्राह्मणः घनघननु ( श्राहुज्ञातःसन् ) यस्य गृहे वसति [ तस्य ] श्रल्पमेधसः ( श्रल्प-बुद्धे: ) पुरुषस्य श्राशाप्रतीक्षे ( श्राशा च प्रतीक्षा च ते ) सज्ज्ञतं ( तसँयोगर्ज फलं ) सुनृतां ( प्रियवाचं ) इष्टापूर्तें ( इष्टं च पूर्तं च ते ) [ इष्टे योगर्ज फलं, पूर्तं तड़ागोद्या-नादिकर्मजंफलं सवाँनु पुत्रपशून् च ( पुत्रान् पशूँश्च ) एतद ( सर्वं ) वृङ्कनते ( नाशयति ) ॥ ५ ॥

पुनद्वारा इस प्रकार कहे जानेकपर पिताने श्रपनी सत्यताके रक्षार्थ उसे यमराजके पास भेज दिया । यमराजके बाहर ( ब्रह्मलोक ) जानेके कारण उसने यमराजके भवनमें पहुँचकर तीन रात निवास किया । प्रवाससे लौटे यमराजको उनकी पत्नी श्रयवा मन्त्रियोंने सम्भाषते हुए कहा—

ब्राह्मण श्रातिथि होकर साक्षात् वैश्वानर श्रभिन ही दरवज करता हुग्रा-सो घरोंमें प्रवेश करता है । उस श्रभिनके दाहको मानों शान्त करते हुए ही साधु-गृहस्थजन श्रातिथि की पाद्य श्रासन श्रादि दानरूप शान्ति किया करते हैं । श्रत; हे सूर्यपुत्र ! नचिकेताके पाद्य-पाद प्रक्षालनार्थ जल ले जाइये, क्योंकि ऐसा न करनेसे प्रत्यवाय सुना जाता है ।७।

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कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [ग्र० १ व० १ म० ५

जिसके घरमें निराहार हो ब्राह्मण श्रद्धा सहित वास करता है उस श्रात्मबुद्धि पुरुषकी ज्ञात और अज्ञात प्राप्तव्य वस्तुओंकी प्रासिकि प्रार्थनाएं, उनके संयोगसे उत्पन्न फल, प्रिय वाणियों प्रयुक्त फल, यागादि इष्ट एवं तालाब आदि पूर्व्त कर्म जन्म फल, पुत्र, पशु श्रादि सबको वह नष्ट कर देता है ॥ ५ ॥

श्राशाप्रतीचीभ्यांडनिजींतप्राप्त्यर्थप्रार्थनातदर्थप्रतीच्छा ते श्राशाप्रतीचीभ्यां, संगतं तत्संयोगजं फलम्, सूक्ततां च सूक्तता हि प्रिया वाक्कथिमित्तं च, इष्टापूर्त्ते इष्टं यागजं पूर्व्तमारामादिक्रियाजं फलम्, पुत्रपशुश्राद्ध सर्वोनेतत्सर्वं यथोक्तं हृढं तु श्रावर्जयति विनाशयतीत्येतत्पुरुपस्याल्पमेध-सोडल्पप्रज्ञस्य यस्यादनशनन्रजुजानो ब्राह्मणो गृहे वसति । तस्मादनुपेक्षणीय:

एवमुक्तो मृत्युरुवाच नचिकेतससुपगमन्य पूजारुपुरःसरम्—

तिस्रो रात्रीर्यंदवात्सीगृहे मे ग्रनननन्नब्रह्मन्नितिथिनंमस्यः । नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन्स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात्प्रति त्रीनवरान्वृणीष्व ॥५॥

जिसके घरमें निराहार हो ब्राह्मण श्रद्धा सहित वास करता है उस श्रात्मबुद्धि पुरुषके 'श्राशा-प्रतीक्षा' श्राशा-प्रज्ञात प्राप्तव्य इष्ट पदाथोंकी प्रार्थना तथा ज्ञात प्राप्त पदाथोंक प्रतिक्षा-प्रतीक्षा एवं उनके संयोगसे उत्पन्न फल, प्रियवाणियों श्रौर तद्विषयक फल, 'इष्टापूर्त्त' -इष्ट-यागजन्यफल, पूर्व्त-यज्ञानादि कर्मजन्य फल, सम्पूर्ण पुत्र, तथा पशु पूर्वोक्त इन सबको वह नष्ट कर देता है । श्रत: तात्पर्य यह है कि श्रद्धा सभी श्रवस्थाश्रोंमें श्रनुपेक्षणीय है ॥ ५ ॥

मन्त्री श्रादि द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर यमराजने पूजा पुरःसर नचिकेताके समीप जाकर कहा—

सत्यानन्दीदीपिका

'इष्टं मे सूयात' इस प्रकार ज्ञात ग्रननुभूत इष्ट पदाथर्की प्रार्थना श्राशा है । श्रग्रिनहोत्रं तपससत्यं वेदानां चानुपालनम् । श्रातिथ्यं नैश्वदेवं च इष्टमित्यऽभिधीयते ॥ वागीकूपतड़ागादि देवतायतनानि च । श्रलप्रदानेमारामः पूर्व्तमित्यभिधीयते ॥

ग्रग्रिनहोत्र, तप, सत्य, वेदोंका संरक्षण, श्रातिथि सत्कार श्रौर वैश्वदेव 'इष्ट' कहलाता है । वावड़ी, कुएँ, तालाब, देवालय, वाग लगवाना तथा श्रन्नदान करना 'पूर्व्त' कहलाता है । इत्यादि कर्मजन्य फल उस श्रात्ममति पुरुषका नष्ट हो जाता है जिसके घरमें ब्राह्मण श्रद्धा सहित निराहार हो वास करता है, श्रत: श्रद्धा कदापि उपेक्षणीय नहीं है । इस मन्त्रमें पांच यज्ञोंमेंसे श्रद्धा पूजनरूप न्यायशास्त्रकी महिमा बतलाई गई है ॥ ५ ॥

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हे ब्रह्मन् ! [ त्वं ] व्रतिथि:, नमस्य: ( पूजार्हः ) सन्नपि यत् मे गृहे तिस्र: रात्र्यः ( दिनत्रयम् ) वीतधनन ( प्रभुजान:) वीतास्यो: ( वासकाष्ठोः ) तस्माद् हे ब्रह्मन् ! ते ( तुम्हें ) नमः अस्‍तु । मे ( मघ* ) स्वसित ( मङ्गलम् ) प्रस्‍तु, प्रति ( तिस्र; रात्र्यः प्रति ) तीन् वरान् वृणीष्‍व ( एकैकां रात्रिं प्रति एकैकं वरं यथाभिलाषं प्रार्थयस्व ।।५।। हे ब्रह्मन् ! तुम्हें नमस्कार हो, मेरा कल्याण हो, तुम नमस्कार के योग्य व्रतिथि होकर भी मेरे घरमें तीन रात्री भोजन किये बिना रहे व्रत: एक एक रात्री के लिये एक एक वर मुझसे तीन वर मांग लो ।। ६ ।।

तिस्रो रात्रीर्यवादवात्सींरुपितवानसि गृहे मे ममानननन्हे ब्रह्मन्‌व्रतिथि: सन्नमस्यो नमस्काराहै तस्माद्‌व्रतस्थे तुभ्यमस्‍तु भवतु । हे ब्राह्मन्स्‍वसित भद्रं मेड्‌स्तु तस्माद्‌वृतोदनशनेन् मद्‌गृहवासनिसमित्ताहोषात्तथ्याद्‌युपशमेन् । यथापि भवद्‌तुगृहेऽपि सर्वं मम स्वसित स्यात्‌थापि त्वद्‌धिकसंप्रसादनार्थंमनशनेनोपो- वितासमेकैकां रात्रिं प्रति तीन्‌वरान् वृणीष्‍वाभिप्रेतार्थविशेषार्थ्येस्‍व मत: ।।७।। नचिकेतास्वाह——यदि दिसुर्‌व्‌रान्—

प्रथमवर-—पितृपरितोष

सान्त्वसंकल्प: मुनिना यथा स्याद्‌रीतस्‍तथ्यर्गौंतमो मा अभि मृत्यो ।

त्वत्‌प्रसृष्ट* मानिवदेतप्रतीत एतद्‌त्र्यायार्ं प्रथमं वरं वृणे ।।९०।। हे मृत्यो ! गौतमो ( मम पिता ) शान्तसड्‌गुलप: सुमनाः ( प्रसन्नमनाः ) मा अभि ( मां प्रति ) वीतसन्‍यू: ( विगतकोपश्र ) यथा स्याद्‌ व्रतौत: ( स एवायं मम पुत्र: समागात् इत्‌येव लब्‌धस्‍मृतिच: सः ) त्वत्‌प्रसृष्ट ( त्वया प्रेषितं ) मा अभि ( मां प्रति ) यथा वदेत्, एतद्‌त्र्यायार्ं ( वरार्ं मघये ) प्रथमं वरन् वृणी ।।९०।।

हे मृत्यो ! जिस्‍छे मेरे पिता गौतम मेरे प्रति शान्तसकुलप, प्रसन्नचित्त व क्रोध रहित हों, तथा श्रापके द्वारा भेजे जानेपर मुझे पहचान सकें एवं मुझसे बात चीत करें यह मैं [ श्रापके दिये ] तीन वरोंने प्रथम वर मांगता हूं ।। ९० ।।

हे ब्रह्मन् ! ऋषयोंन् व्रतिथि श्रौद्र नमस्य:——नमस्कार योग्य होकर भी तुम तोन रात्री ( तीन दिन ) बिना कुछ भोजन किये मेरे घरमें रहे हो, व्रत: तुम्हें नमस्कार हो । हे ब्रह्मन् ! मेरे घरमें बिना भोजन किये श्रापके निवास निमित्तक दोषसे, उससे प्राप्‍त श्रानिष्ट फलको शान्ति द्वारा मेरा स्वसित-मङ्‌गल-शुभ हो । यद्यपि श्रापके व्रतनुग्रहसे मेरा सब प्रकार कल्याण हो जायगा, तथापि श्रापकी श्रधिंक प्रसन्नताके लिये बिना भोजन किये निवास की गई एक एक रात्रीके प्रति तुम मुझसे तीन वर—श्रापने श्रभीष्ट पदार्थ- शेष मांग लो ।। ८ ।।

तचिकेताने कहा——यदि वर देना चाहते हैं, तो——

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शान्तसंकल्प उपशान्तः संकल्पयो यस्य मां प्रति यमं प्राप्त्य किं नु करिष्यति मम पुत्र इति स शान्तसंकल्पः सुमनाः प्रज्ञानाश्रया यथा स्याद्व्रीतमन्युविगत-रोपद्र गौतमो मम पिता माभि मां प्रति हे मृत्यो किं च त्वत्प्रसृष्टं त्वया विनिर्मुक्तं प्रेपितं गृहं प्रति मामभिवदेत्यतस्तो लब्धस्मृतिः स एवायं पुत्रो ममागत इत्येवं प्रत्यभिजानाति नित्यार्थः एतद्योजयतं न्रियार्षां प्रथसमाधौ वरं दृशे प्रार्थ्ये यत्पितुः परितोषणायम् ॥ १०॥

मृत्युरुवाच— सुष्वं रात्रीः शयिता वीतमन्युस्वां दशशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ॥ ११ ब्रह्मलकि ( ब्रह्मणस्यापतयं पुमान् ) प्रोद्वालकिः ( उद्दालक एव प्रोद्वालकिः ) पुरस्तात् ( यमालये प्रागमनात् प्राक् ) [ स्वयि ] यथा प्रतीतः ( सनेहान् प्रासौत् ) मत्प्रसृष्टः ( मया प्रहूज्ञातः सन् ) मृत्युमुखात् ( मम ग्राधिकारात् ) प्रमुक्तं ( विमुक्तं ) त्वां दद्शिवान् ( दृष्टवान् सन् ) वीतन्युः ( गत क्रोधः भविता स्वात् ) रात्रीः सुःखे पायिता ( सुखेन निद्रितो भविता ) ॥ ११ ॥

मुझे प्रेरित हो तुम्हारे पिता श्रौद्दालकि तुम्हे पूर्ववत् पहिचान लेगा मोर दोष रात्नियोंमें सुखपूर्वक सोवेगा, क्रोध रहित हो तुम्हको मृत्युसुखसे मुक्त हुमा देदेगा । ११ १९ ॥

जिस प्रकार मेरे पिता मेरे प्रति शान्तसङ्कल्प उपशान्त सङ्कल्पवाला हों—‘न जाने मेरा पुत्र यमराजके पास जाकर क्या करेगा’ सुमनाः—प्रसन्नचित्त मौर वीतमन्यु-क्रोध रहित हों मोर हे मृत्यो ! आपपक्षे भेजे हुए वरकी मोर जाननेके लिए विमुक्त किये मुभसे विशिष्ट लब्ध स्मृतिः हों कि ‘यह वही मेरा पुत्र मेरे पास म्राया है’ ऐसा जानकर मेरे साथ सम्भाषषा करें’ यह म्रापने पिताका प्रसन्नतारूप प्रयोजन हीं मैं म्रापने तीन वरोंमेंसे प्रथम वर मांगता हूं ॥ १० ॥

मृत्युकं कहाँ— सत्यनन्ददीपिका मेरे पिता ‘मेरा पुत्र यमके पास जाकर क्या करेगा’ इस प्रकारकी मोहजन्य उद्विग्नता एवं मुभपर किया क्रोध दोनोंसे रहित हो मोर म्रापके द्वारा मुक्त हुये घर चले जानेकर यह न समभे कि यह प्रेत होकर म्राया है किन्तु यह वही मेरा नचिकेता पुत्र है, ऐसा समभकर मेरे साथ पूर्ववत् स्नेह व्यवहार करे । प्रथमवरसे यह माँगता हूं । इस मन्त्रसे पिताके प्रति पुत्रकी कर्तव्यनिष्ठा सुचित की गई है ॥ १० ॥

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व० ९ ] भाषानुवाद-सत्यानन्ददीपिका १७

यथा युद्धिसत्वयि पुरस्तात् पूर्वमासीत्स्वेहसमन्वितता पितुस्तत्व भविता प्रीतिसमन्विततस्तव पिता तथैव प्रतीतवान्सङ्घौदालकि; उद्दालक एयौदालकि: । अरुपास्यापत्यमार्घपि:, दृश्यमुख्यायास्पो वा । मत्प्रसृष्टे मत्प्रयानुज्ञात: सन् इतरां न्रपि रात्रिं: सुखं प्रसन्नमनाः शयिता स्वप्ना वीतमन्युर्विगतमन्यु: भविता स्थात्वा पुत्रं ददर्शवान्स्वान्स मूलमुखवान्सत्यरोचतार्यमुक्तं सन्ततम् ॥ १? ॥

नचिकेता उवाच—

स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति न तत्र त्वं न जरया विभेति । उभे तीर्त्वाशानायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥१२॥

स्वर्गलोके किञ्चन ( किञ्चिदापि ) भयं नास्ति । तत्र ( स्वर्गलोके ) त्वं ( मृत्यो: ) न, न च जरया ( वृद्धावस्थया युक्त: सन् ) विभेति । उभे श्रान्त्यायापिपासे तीतर्वा ( अतिक्रम्य ) शोकातिग: ( योक्तुम् श्रतिक्रान्त: सन् ) स्वर्गलोके मोदते ( हृष्यति-सुखमनुभवति ) ॥ १२ ॥

हे यम ! स्वर्गलोकमें कुछ भी भय नहीं है । वहाँ श्राप नहीं हैं श्रर्थात् दापक भी प्रभाव नहीं है श्रौर जरासे कोई नहीं डरता, पुर्हल स्वर्गलोकमें मुख्य-प्राण दोनोंका श्रतिक्रमए कर योगसे मुक्त हो श्रानन्दित होता है ॥ १२ ॥

तुम्हारे पिताकी बुद्धि जिस प्रकार पूर्वं तुम्हारे प्रति स्नेह युक्त थी उसी प्रकार मुझसे धनुज्ञात हो श्रनुग्रह प्राप्त कर जाननेपर वह श्रौदालकि प्रीतियुक्त हो तुम्हारे प्रति विश्वस्त हो जायगा । यहाँ उद्दालक ही श्रौदालकि है तथा श्रग्रश्रेणका पुत्र होनेसे वह ग्राहृयपि है, श्रथवा यह भी हो सकता है कि वह दृश्यमुख्यायास्पो हो । वह शेष रात्रियोंमें भी सुलं पूर्वंक-प्रसन्नमनसे शयन करेगा श्रौर क्रोध रहित हो जायगा, तथा वह तुम पुत्रको मृत्युमुखसे-मृत्यु भयदिकरसे मुक्त दृश्टा देखनेवाला हांगा ॥ ११ ॥

नचिकेता बोला—

सत्यानन्ददीपिका

वयस् एव वायसके समान उद्दालक एव श्रौदालकि यहां भी स्वार्थमे ही तद्धित प्रत्यय है श्रथवा जो किसी प्रसिद्ध व्यक्तिका पुत्र श्रौर दूसेरे द्वारा गोद ( दत्तक ) लिया हो वह 'दृश्यमुख्यायास्पो' कहलाता है । एक हो पुत्र दो पिताग्रोंद्वारा श्रपनानुत्तरा-धिकारी निश्चित किया जाता है । वह एक ही दोनों पिताग्रोंकी सम्पत्तिका स्वामी श्रौर पिण्डदान देनेका श्रधिकारो होता है, श्रत: श्रकेले वाजश्रवसकौ श्रौदालकि श्रौर 'दृश्यमुख्यायास्प:' कहनेसे यह सम्भव है कि वह उद्दालक श्रौर श्रग्रश्रेण दो पिताग्रोंका उत्तर-

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स्वर्गों लोके रोगादिनिमित्तं भयं किंचन किंचिदपि नास्ति न च तत्र त्वं मूलयो सहस्रं प्रभवस्यतां जरया मुक्त इहं लोकवर्त्तो न बिभेति कुतश्चित्तत्र । किंचोभे प्रशनायापिपासे तीव्रोतिक्रम्य शोकसमृत्य गच्छतींति शोकातिगः; मन्त्रानसेन दुःखेन वर्जितो मोदते हृप्यति स्वर्गलोकेSसि्वये ॥ १२ ॥

स त्वमात्मनिन्द्रैः स्वर्गयेमध्येSपि मृत्युं प्रजहि त्वं श्रद्धानाथ मह्यं । स्वर्गलोका ग्रामृतस्वं भजन्त एतदद्वितीयेन वरोS वरेण ॥१३॥

हे मूलो ! स त्वं स्वर्गयं ( स्वर्गासाधनम् धर्मिनम् , श्रद्धयेपि जानासि ) [ तम् श्रमिणं ] श्रद्धानाय ( श्रद्धावते ) मह्यं त्वं प्रणुहि ( कथय ) स्वर्गलोका: ( स्वर्गों लोको येषां ते श्रामृतस्वं ( देवरवं ) भजन्ते ( प्राप्तुवन्ति ) एतद् प्रतिविधानं ) द्वितीयवरेण वरोSपे वृणेपे ( प्रार्थंयेयाम ) ॥ १३ ॥

स्वर्गलोकां रागादि निवर्त्तकं किल्किलादियं मया नहि । मो सहसा प्रभाव नहिं पड़ता, नत: इस लोके सपान नहिं वृद्धावस्थासे मुक्त हो किसी प्रकार भी कोई यातना भोगीभूत नहीं होता । किन्तु पुरुप भूख प्यास दोनोका प्रतिक्रमण कर एवं शोकको श्रदिक्रान्ततत् शोकातीत हो घ्रथ्यात् मानसिक दुःखसे रहित होकर दि्वष्य स्वर्गलोकोंमें ह्वपित होता है घ्रथ्यात् सुखका अनुभव करता है ॥१२॥

सत्यानन्दीदीपिका इम मन्त्र्रोंमें स्वर्गलोकोंकी विविधता कही गई है। दुःखल बाहुल्य लोक नरक श्रौर सुख तारलम्पयो पुण्यायापा लोग क्र्मशः; मुचः स्वः ( स्वादि दि्वष्य लोकोंमें सुख भोगार्थ जाते हैं । ते मव लोंक उत्तररोत्तर श्रधिक दि्वद्र एवं सुख पूर्ण हैं। स्वर्ग सुखकी विविध्रता यह है कर्त्ता पुण्यात्मायोंकी श्रभिलाषा विविध्रादि वेपद्र्शेक उपभोगका जोव कमशः इच्छा होती है उस्स समय वर सत्न उपलम्ध हो जाता है, वहांके विषय एवं भोगायतन शरीर मो दि्वष्य होते हैं प्रार्तः दि्वष्य विषयोंको भोगनेके लिए उन पुण्यात्मायोंको दि्वष्य शरीर प्राप्त होते हैं । मृत्युलोकोंके समान किसी पदार्थके प्रभाव जन्य दुःखका श्रनुभव नहो होता ।

ईम विपयमें शास्त्रोंमें ऐसां कहा गया है— यो मृत्ु कु.ल्मे मिलित न च ग्रहणमनन्तरम् । श्रभिलाषोपनीतं च तत्सुखं स्वः पदास्पदम् ॥ जो मृत्ु कु.ल्मे मिलित नहीं है, विद्नन वाघाध्रोंसे ग्रस्त भी नहीं है, इच्छा करते पक्षा प्राप्त हो जाता है वह मुख स्वर्ग पद्याच्य है ॥ १२ ॥

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एवंगुरूपविशिष्टस्य स्वर्गलोकस्य प्राप्तिसाधनभूतमप्ति स तुं मृत्युरध्येषि रसि जानासील्यर्थः, हे मृत्यो यतस्त्वं प्राप्तोऽसि ऋत्विजा श्रद्धानाय श्रद्धावते मह्यं त्वाग्निना येनाग्निना चित्तेन स्वर्गलोका: स्वर्गो लोको येषां ते स्वर्गलोका: जघाना श्रमृतत्वमस्मरतां देवत्वं भजन्ते प्राप्तुवन्ति । तदेतदग्निविज्ञानं तृतीयेन वरेण वृणे ॥ १३ ॥

मृत्यो: प्रतिज्ञेयम्- प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यां सर्गिन् नचिकेतः प्रजानन् । श्रानन्तलोकान्निस्थो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतां निहितं शुभायाम् ॥ १४ ॥

हे नचिकेता: ! [ श्रहं ] स्वर्ग्यं सर्गिन् प्रजानन् ( विशेषेण जानन् ) ते ( तुभ्यं ) ब्रवीमि ( प्रवचिम ) तदु ( एतत् ) मे ( मत्सकाशात् ) निबोध, स्वर्ग्यम् ( उत्तमदयम् 'नम्' ) श्रानन्तलोकान्निस्थो ( स्वर्गलोकस्य प्राप्तिसाधनम् ) श्रथो ( श्रपि ) प्रतिष्ठां ( जगत्पयें ) गुहायां ( चितुषां बुद्धौ ) निहितं ( नितरां स्थितम् ) विद्धि ( जानोहि ) ॥ १४ ॥

हे नचिकेता ! स्वर्गकं साधनभूतं श्रग्रिनको भली-भाँति जानता हुश्रा मैं तो कहता हूँ । तुम समाहितचित्त हो उसे मुभसे श्राच्छी तरह जानो । इसे तुम 'ते लोककां प्राप्तिका साधन, उसके श्राचार्य बुद्धिरूप गुहायां रिथत जानो ॥ १४ ॥

प्र ते तुभ्यं पन्रवीमि, यथत्वया प्रार्थितां तदु मे मम वचसो निबोध बुद्ध्यबलै-हं सस्थित्यर्थः । पन्रवीसि तव्रियोधेति च शिष्यबुद्धिसमाधानार्थ वचनम् ।

हे यम ! श्राप [ भय, मरण, भूख प्यास, शोकादिहत ] ऐसे गुहा ( विशिष्ट स्वर्गकी प्राप्तिके साधनभूत श्रग्रिनको स्मरण रखते हैं श्रर्थात् जानते हैं ऐसे श्रर्थ है । की स्वर्गाणां श्रद्धालु मुभको उसका वरद्‌ान कीजिए । जिस श्रग्रिनके चयनेसे स्वर्गको करनेवाले श्रर्थात् स्वर्गलोक है जिनका ऐसे स्वर्गलोको-यजमान भ्रमृतत्व-श्रमरतासंयुक्त 'बको प्राप्त हो जाते हैं । इस श्रग्रिनविज्ञानको मैं द्वितीय वरसे माँगता हूँ ॥ १३ ॥

हे नचिकेता ! जिसके लिए तुमने पार्थना की थी उस स्वर्ग्य-स्वर्गकं लिए हितरूप श्रग्रिनको तू एकाग्रचित्त हो मेरे वचनसे निबोध-भली-भाँति पन्रवीमि तन्रिबोध 'मैं कहता हूँ तू उसे जान' ये वाक्य शिष्यकां बुद्धिको समाहित सत्यानन्ददीपिका

[ श्रादि लोकोंकी श्रपेक्षा द्विगुणकाल स्थायी होनेसे स्वर्गलोकको श्रनन्त कहा श्राभूतसंप्लववममृतत्वं प्रचक्षते ] ( प्रलय पर्यन्त स्थायी होनेसे स्वर्गलोकको श्रमृत

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श्रधुनापिन्न स्तौति । श्रानन्तलोकामिन्न स्वर्गलोकफलप्राप्तिसाधनमित्येतत्, श्रथं श्रापि प्रतिष्ठामाश्रयं जगतो विराड्रूपेप्सा, तमेतमग्निं सयोग्यमानं विद्धि। जानीहि त्वं निहितं स्थितं गुहायां विदुपां बुद्धौ निविष्टमित्यर्थः ॥ १४ ॥

इदं श्रुतेर्वचनम्—

लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका ईपिता वीर्यैः यथा वा । स चापि तत्प्रत्ययवदद्यथोक्थमथास्य मृत्यु: पुनरेषवाह तुष्टः ॥ १५ ॥

[ यमः ] तस्मै ( नचिकेतसे ) लोकादिं ( लोकानां श्रादि: प्रथमं ) तं ( प्रसिद्धं श्रग्निन् ( श्रग्निविज्ञानं ) उवाच ( उक्तवान् ) या: ( यत्स्वरूपा: ) यावतो: ( या रसंभ्यकाः ) या इष्टका: ( चेतव्याः ) यथा ( येन प्रकारेण ) वा । [ श्रग्नि: चीयते सः ] सः ( नचिकेताः ) च श्रापि ततु ( मृत्योना कथितं ) यथोक्तं ( यथावतु ) प्रत्ययवद् ( श्रद्धादितवान् ) श्रथ ( श्रग्नूितकान् ) श्राह ॥ १५ ॥

तब यमराजाने लोकोंके श्रादि प्रथम उस श्रग्निका तथा उसके चयन करनेमें जो प्रौर जितनी इष्टें होती हैं तथा जिस प्रकार उसका चयन किया जाता है उन सब नचिकेताके प्रति वर्णन कर दिया । उसे नचिकेताने श्रद्धा जैसी उसे यमराजने कहा था वह सब सुना दिया, इससे प्रह्लाद हो मृत्यो नचिकेतासे फिर भी बोला ॥ १५ ॥

लोकादिं लोकानामादि: प्रथमशरीरित्वादिग्निं तं प्रकृतं नचिकेतसा प्रार्थय सुवाच्योक्तान्मृत्युसस्तमै नचिकेतसे । किं च या इष्टकारचेतन्या: स्वरूपे

करनेके लिए हैं । प्रथ उस श्रग्निको स्तुति करते हैं जो श्रानन्तलोकामि-स्वर्गलोकफलको प्राप्तिका साधन तथा विराड्रूपेपसे जगत्की प्रतिष्ठा-ग्राश्रय है । मेरे द्वारा हुए उस इष्ट श्रग्निको तू गुहामें श्रर्थात् विद्वानोंकी बुद्धौ-निविष्ट जगत्का धारक है ॥ १४ ॥

यह स्तुतिका वचन है—

प्रथम शारीरी होनेके कारण श्रोकोंके श्रादिभूत नचिकेतासे प्रार्थित उस प्रश्निकों यमराजने उस नचिकेताके प्रति कह दिया । तथा स्वरूपसे जिसे प्रकारिका

एवं श्राननस्त कहा गया है ) यह पुराणवचन है । श्रातः स्वर्गमें सापेक्ष श्रानन्तरत्व 'श्राननतलोकामध्यो प्रतिष्ठां' 'श्रग्निन् जगत्की प्रतिष्ठा है' यमराजकी इस प्रतिज्ञा आधार यह श्रुतिवाक्य है—-'स नेधाऽऽडल्मानं व्यकुलुस:' उसने श्रपनेको तीन प्रकार फ

द्रार्थात श्रग्निन्, वायु श्रौर श्रादित्यरूपसे समष्टिरूप विराड् ही श्रवस्थित है । इस प्रकार नचिकेता ग्रादि श्रग्ननेरुपसे श्र श्रुतः नक्न्रादि श्रग्नेकरूपसे श्र

ही जगत्की प्रतिष्ठा कही गई है । श्रुतः: नक्षत्रादि श्रग्नेकरूपसे श्र श्रथं श्रापि प्रतिष्ठामाश्रयं जगतो विराड्रूपेप्सा, तमेतमग्निं सयोग्यमानं विद्धि। जानीहि त्वं निहितं स्थितं गुहायां विदुपां बुद्धौ निविष्टमित्यर्थः ॥ १४ ॥

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२२

कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य

केतसः सञ्ज्ञया प्रसिद्धः ) भविता ( भविष्यति ) इमाम् पनेकलरूपां ( विभिन्नां ) सूक्ष्माम् महात्मा यमः प्रसन्न हो उससे कहा—प्रभव में इस विषयमें पुनः तुम्हें एक प्रश्न भी प्रदान करता हूँ । यह श्रभिन तेरे ही नामसे प्रसिद्ध होगी श्रोरे तू इस पनेक रूपवान् मालाके रहस्य कर ॥ १६ ॥

तं नचिकेतोऽथसाव्याधीः शिष्ययोग्यतां पश्यन्नप्रेयसाङ्गाः प्रीतिमह्अश्वन्महामालाच्चतुर्द्द्रवैर्द्रवैः तथा चतुर्थेऽभिह प्रीतिनिमित्तमघेदानां ददामि भूः पुनर् प्रयच्छामीति । तथैव नचिकेतसो नाम्ना विधानेन प्रसिद्धो भविता मथोच्यते नोड्यमस्मिन् । किं च सृज्जां शब्दवतीं रत्नमयीं मालामिमामनेकलरूपां विचित्रां गृहाण स्वीकुरु । यहा सृज्यामकुल्यतां गतिं कर्मसुयं गृहयाए । ध्यान्यदरी कर्मविज्ञानमनेकरफलहेतुत्वात्स्वीकुरवित्यर्थः ॥ १६ ॥

किस प्रकार कहा—

अपने शिष्यककी योग्यताको देखकर प्रसन्न हुए प्रीतिक अनु भाव करते हुए महात्मा चतुर्थ वर देते हैं । मेरे द्वारा कही गयी यह प्रार्थना तुझे पुनरपि यह श्राप्त होगी । तथा तू ईस श्राप्त करनेवालो रत्नमयी श्रनेकलरूपा विभिन्नवत्या मालाको म्रग्रहण-स्वीकार कर । तात्पर्य यह है कि श्रनेक फलका कारणा होनेसे तू मुझसे श्रनन्य कर्मविज्ञानको स्वीकरकर चाहते हैं ॥ १६ ॥

सत्यानन्ददीपिका

जीवकर्म कहाँ है, इन दोनोंसे पृथक् ऐश्वर्य है जिसमें नचिकेताको यमरराज ने जान्ना चाहते हैं ॥ १६ ॥

यमराजकी कृपसे नचिकेताको देवत्व प्राप्त होनेके कारणा उसे माला दो जा रही है, मोत, पौत श्रादि पनेक रूपोंवाली होनेसे माला श्रनेकवर्णी है । गतार्थक सजघातमक सृज्या मादन ( निष्पन्न हुयी है, श्रतत् वह श्रनन्विततां गत-धूमादि श्रोर श्राचिरादिगति द्वारा श्रनेक फलोंको प्राप्त करानेवाली है ! फल भेदसे श्रनेकलूप धास्त्र प्रसिद्ध कर्मविज्ञानके भी ग्रहण कर श्रर्थात् प्रसन्न होकर यमराजाने नचिकेताको समस्त कर्मविषयक ज्ञान प्रदान किया । जब श्रसाधारण्य पृथप्मूलो जीव श्रपने प्रसाधारण्य कर्मोंद्वारा देवत्व श्रादि में प्रतिष्ठ होता है । तब वह देवभाव प्राप्तकर ऐश्वर्यमके ग्रन्यों-

हो जाता है । जिस कर्मद्वारा दैवजगत्की मूल्ला स्थिर रहती है उसे ऐश्वर्य कहा गया है। जिस नियमके श्रनुसार सूर्य, चन्द्रमाक उदय-ग्रस्त, ऋतुओंका परिवर्तन

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व० ९ ] भाषानुवाद-सत्यानन्ददीपिका २३

पुनरपि कर्मस्तुतिमेवाह—

त्रियाचिकेतस्त्विभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत्तत्परति जन्ममृत्यू ।

ब्रह्माज्ञां देवमीड्यां विदित्वा निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १७॥

त्रिमिः ( त्रिभिः सह ) सन्धिं ( सन्धानं सम्वन्धम् ) एत्य ( प्राप्य ) त्रियाचिकेतः ( त्रिःकृत्वः नाचिकेतः श्राग्निः चितः येन सः ) त्रिधर्मकृत् ( त्रिकार्यकर्त्ता ) तत्त्परति ( तत्परायणः ) जन्ममृत्यू ( जन्ममृत्यु वरति ) ( अतिक्रामति ) इहैव ( स्तुयर्थे ) ब्रह्माज्ञां ( ब्रह्म जिज्ञासा ) देवं ( देवं ) विदित्वा ( ज्ञात्वा ) निचाय्य ( ध्यात्वा ) इमां शान्तिम् ( श्रान्तिभावेन ) अत्यन्तम् ( एति ) ( अत्यन्तं प्राप्नोति ) ॥ १७ ॥

त्रियाचिकेतः श्राग्निना तीन वार चयन करनेवाला मनुष्य [ माता पिता और ग्राचार्य इन ] तीनोंसे सम्बन्धको प्राप्त होकर जन्म म्रृत्युक्का व्यतिक्रम कर जाता है तथा ब्रह्मसे उत्पन्न ज्ञानवान् एवं श्रोतिययोग्य देवको जानकर और उसे आत्मरूपसे प्रतिभवकर इस स्वर्गुबुद्धिप्रत्यक्ष श्रात्यन्त शान्तिको प्राप्त हो जाता है ॥ १७ ॥

त्रियाचिकेतसि: कृत्यो नाचिकेतोड्निंचित्तो येत स त्रियाचिकेतस्ततद्विज्ञा-

नस्तदध्यानस्तदनुष्ठानवान्चा । त्रिभिमोक्तिपित्राचायैरेभिस्त्रि प्राप्य सन्धिं सन्धानं

सम्बन्धं मात्रापितुश्चा सनं यथावस्त्वाप्ययेत्येतत् । तद्वित् प्राप्यस्यकर्त्तरां श्रुत्यन्त-

रादवगाम्यते यथोक्तं 'पुरुषान्नप्तृमान्नाचार्यवच्श्रनुयात्' ( तैत्तिरीय आारारण्य ) इत्यादि ।

यमरार्ज फिर भी कर्मकी स्तुति हो करते हैं—

जिसने तीन वार नाचिकेत श्राग्निक्का चयन किया है वह त्रियाचिकेता है । श्रथवा

उसका ज्ञान, श्रद्धा यजन श्रौर अनुष्ठान करनेवाला त्रियाचिकेता है । वह त्रियाचिकेत

माता, पिता तथा ग्राचार्य इन तीनोंसे सन्धि-सन्धान-सम्बन्धको प्राप्त होकर यथाविधि माता ग्रादिके द्वारा उपदेश-शिक्षा प्राप्तकर, क्योंकि एक श्रात्म्य श्रुतितसे उनका

उपदेश धर्मज्ञानको प्रामाणिकवमें हेतु अवगत होता है, जैसा कि 'माता, पिता और

होता है और ब्रह्मषि, द्वादश श्रादित्य, एकादश रुद्र तथा स्वयम् यमरार्ज महत्त्

देवपदवीं प्राप्तकर अपने धर्मंका पालन करते हैं, वे सब ऐश्वर्यंकें श्राधीन हैं ।

श्रथ तक नचिकेतार्कौ नैकका जपकरनेवाले जयकर्मके धनुसार मृत्युलोककें भोगपयोगी कर्मंगतिसे सम्बन्धित थे

श्रथ यमरार्जके श्रनुग्रहसे वह देवत्वके श्रधिकारी हो गये, उनका सम्बन्ध श्रथ ऐश्वर्यंकें

साथ हो गया, उनके नामसे विशेष श्रागिन श्रभिहित होगी तथा यज्ञादिमें भी उनके

नामका सम्वन्ध रहैगा ॥ १६ ॥

यज्ञ-ज्योतिष्टोमादि याग, यथा 'दर्शंपौर्णमासाभ्यां यजेत' 'ज्योतिष्टोमेन यजेत'

इत्यादि यागोंका विधान है । 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इस स्वाध्यायविधिसे वेदाध्ययनका

विधान है । 'बहिर्वेदिर्दीयमानं दानम्' यज्ञवेदिसे बाहर दिया धन श्रादि दान और यज्ञ-

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२४ कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [श्लो १

वेदस्मृतिप्रतिपादितैः प्रत्यत्तातुमनालागमैः, तेभ्यो हि विशुद्धिः प्रत्यत्ता, त्रिकर्म-कृतदिध्यायनतद्वानातां कर्त्तं तर्त्तव्यतिकार्मति जन्ममृत्यू। किं च ब्रह्मजज्ञं ब्रह्मासो हिरण्यगर्भाज्जातो ब्रह्मजः, ब्रह्मजश्रेष्ठौ ऋश्शेती ब्रह्मजज्ञः सर्वज्ञो ह्यसौ। तं वैराजं पद्म-जात्मभाज्ज्वे स्वधुद्धिप्रत्यक्ज्ञानां शान्तिसुपरतितमत्या न्तमोत्यतिशयेनैति। वैराजं पद्म-जानकर्मसुच्याद्यनुप्राननेन प्राप्तोतीत्यर्थः॥ १७ ॥

उक्तानि तानि विज्ञाननिचयनफलसुपसहृदौ प्रकर्ष च— त्रिगुणविभिन्नतयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वाञ्छिचनुते नाचिकेतम्। नो मुग्युपाशपुरुतः प्रयोय शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके॥ १५॥

नः ( न+अः =निरसनं ) हि अमुं ( यमोक्षं ) श्रेयं विदित्वा ( ज्ञात्वा ) नाचिकेतसम् (प्रश्निम्‌ ) । इयं ! मां प्रकारेण ) विदानुं चिनुते ( निवर्त्तयति ) सः पुरुतः (पारारपातात्पूर्वं ) श्रावार्याद्वात् श्रेयान्‌योभयांसे शिंक्षित पुरुष कहे' ह्यादि श्रुति है। श्रद्धया वेद, स्मृति श्रोर ऋषियों अथवा प्रत्यक्ष, श्रनुमान श्रोर श्रागमसे समबन्ध प्राप्तकर यज्ञ, श्रधययन, दान यत् दोनों कमोंका कर्त्ता जन्ममृत्युक श्वतत्कर्मण कर जाता है, क्योंकि तीनोंसे शुद्धि होती है। 'ब्रह्मजज्ञ' ब्रह्मसे-हिरण्यगर्मसे उत्पन्न होने श्र ब्रह्मज है वह इन्द्र यो हिर्ज्येष्ठ है, प्रकाशमान होनेसे देव, ज्ञानादिगुण विशिष्ट होनेसे ईड्य-स्तुतिके योग्य है, ज्ञानी होने इस श्रात्मनिक श्रान्त-उपरतिको प्रतिपाद्यसे प्राप्त हो जाता है श्रर्थात्‌ श्रम-उपासन श्रोर कमके समुच्वय श्रनुष्ठान करनेसे वैराजपदको प्राप्त हो जाता है इति १७॥

सत्यानन्दीदीपिका दक्षिणा कहलाता है। 'विंशत्यधिकानि संवरमरस च प्राप्तःसांयंकःलयोःसुगुड़ीयमानःध्यनिहोत्राणि 'पंचस्मरं प्रातः श्रोर सांयकालमें श्रनुष्ठित श्रग्निहोत्रोंकी संख्या यागमें इष्टकाग्रोंकी संख्या सी ७२० है। जिस प्रकार दृष्ट- विधान है, तथा शास्त्रोंमें फलभेदसे श्रनेक कमोंका विधान है, नचिकेताने भी उन सबको भली- भांति धर्मादि श्रतोद्रिय हैं, श्रतः उनका ज्ञान वेदादि द्वारा ही होता है ॥ १७ ॥

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वेदस्मृत्यनुशिष्टैर्यो प्रत्यक्षादुमान्नागमैर्वा, तेष्यो हि विशुद्धिः प्रत्यक्षात्, त्रिकर्मकृत् स्यादध्ययनदानानां कर्ता तरत्यतिक्रासति जन्मस्मृत्यो। किं च ब्रह्मजज्ञो ब्रह्मण्यो भवत्यज्ञानतो ब्रह्मजः, ब्रह्मजश्रसौ झश्वेति ब्रह्मजज्ञः सर्वेभ्यो वृषसौ। तं वै मोक्षान्नादानादिगुणगणान्तर्मीड्यं स्तुत्यं विदित्वा शास्ततो निचाय्य हृद्यं ज्ञानसाधनभिः स्वाध्युद्रपत्यक्षं शान्तिमुपरतिमत्यन्तमेल्यतिशयेनैति। वैराजं पद्मारिकर्मसंज्ञोयुप्राप्तेनैन प्राज्नोत्योत्तम्यर्थः ॥ १७ ॥

एतदात्मविद्याविज्ञानचयनफलमुपसंहरति प्रकर्षां च—

नाचिकेतमुपयन्तमेतद्द्विद्राऽऽधिचिनुते नाचिकेतम् । यः पूरुषगतं मृतः प्रज्ञोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गंलोके ॥ १८ ॥

तं ( परं यथोक्षं ) नयम् विदित्वा ( ज्ञात्वा ) नाचिकेतसम् ( प्रमाणम् ) यः प्रमादतः ( विपरीतं ) विदन् चिनुते ( निर्वर्तयति ) सः पूरतः ( पारंपर्यात्पूर्वं ) पुरुषात् ( परमपुरुषात् ) परः ( परतरः ) कह्यते इत्याहुः । श्रुतौ वेद, स्मृतौ शास्त्रे, यज्ञे श्रद्धायन, ग्रहयज्ञन, श्राद्धयजन, यत्, श्राद्धयजन्ति, एवं निःश्रेयसं करणं जन्मसत्यका श्रुतिकथया कर ज्ञातु है, यद्यपि तीनोंसे वेद हेतु है। 'ब्रह्मजज्ञ' ब्रह्मासे-हिरण्यगर्भंसे उत्पन्न हुमा ब्रह्मज्ञ है वह हिरण्यगर्भंसे उत्पन्न है, प्रकाशमान होनेसे देव, ज्ञानादिगुण विशिष्ट होनेसे इंद्रिय-स्तुतिको भी यज्ञ है, प्रकटमान होनेसे देव, ज्ञानादिगुण विशिष्ट होनेसे इंद्रिय-स्तुतिको भी यज्ञ है, प्रकटमान होनेसे देव, ज्ञानादिगुण विशिष्ट होनेसे इंद्रिय-स्तुतिको भी यज्ञ है, प्रकटमान होनेसे देव, ज्ञानादिगुण विशिष्ट होनेसे इंद्रिय-स्तुतिको भी यज्ञ है, प्रकटमान होनेसे देव, ज्ञानादिगुण विशिष्ट होनेसे इंद्रिय-स्तुतिको भी यज्ञ है, प्रकटमान होनेसे देव, ज्ञानादिगुण विशिष्ट होनेसे इंद्रिय-स्तुतिको भी यज्ञ है,

मत्र्यादिन्द्री दीपिका

इति यथा वसिष्ठा कहल्याता है । 'विश्वत्यधिकानि गेयस्सरम्य च प्राप्तःसायंकलयोमुद्धीयमानान्यग्निहोत्रादि यत् प्राजः सायंकालमे भणुशिल तदङ्गैः सहितं हव्यकामोंको संख्या भी ७२० है । जिस प्रकार इष्ट-विधि या शास्त्रोंमें फलश्रुति अनेक कमोंका विधान है, नचिकेताने भी उन सबको भली-भाँति श्रयथा प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे धर्मविद्या भलीभाँति धमांदि श्रुतोऽन्वित है, व्रतः उनका ज्ञान वेदादि द्वारा ही यार्षान्न पुरुषयोक्त' ( छां० ) इत्यादि स्मृति भी है ॥ १७ ॥

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मृत्युपाशान् ( मृत्युके बन्धनों ) प्रप्रोद् ( निरस्य ) प्रोक्षितः ( शोकातीतः सन् ) स्वर्गलोके मोदते ( सुखं प्राप्नोति ) ॥ १५ ॥

जो नाचिकेत विद्वान् श्रप्तिनके इस त्यको ( कैसी इष्टें हों, कितनी संख्यामें हों और किस प्रकार श्रप्तिनका चयन किया जाय इसको ) जानकर नाचिकेत श्रप्तिनका चयन करता है, वह देहपातसे पूर्व श्रधर्मोदि मृत्युवन्धनोको छिन्नाकर शोकसे मुक्त हो स्वर्गलोकमें शान्तिसहित होता है ॥ १५ ॥

त्रिपाचिकेतस्त्रयं यथोक्तं या इष्टका यावतीर्वा यथा वेदैतेद् विदित्वा|वगम्य यश्चैवमात्मानमुपेत्यार्चिन्त विद्ध्यक्षिश्रुते निर्वर्तते|ति नाचिकेतमपिं कृतं स मृत्युपाशान्धर्मोञ्जानुरागद्वेषादिलञ्चानुपुरतः च्छ्रप्तः: पूर्वमेव शरीरपातादित्यर्थ:; प्रप्रोद्यापहाय शोकातिगो मानसेधु:खैर्वर्जित इत्येतत्। मोदते स्वर्गलोके वैराजे विराडात्मस्वरूपमाप्तिप्त्या ॥ १८ ॥

एष तेऽग्निर्नचिकेतः स्वर्ग्यो यमवद्रुपी|था द्वितीयेन वरेण । एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासस्तृतीयां वरं नचिकेतो वृणो|ष्व ॥१९॥

हे नचिकेतः ! ते ( तुभ्यम् ) एष स्वर्ग्य: ( स्वर्गसाधनभूतः ) अग्नि: ( श्रग्नि: समिध: वरः ) द्वितीयेन वरेण श्रद्धाविधिना [ दत्तः ] ये ( वरं ) द्वितीयेन वरेण श्रद्धाविधान् श्रप्ति: जनास: ( जना: ) एतम् श्रग्निं तव एवं प्रवक्ष्यन्ति । [ ग्रथ्नुना ] हे नचिकेतः तृतीयं ( श्रवणिष्ठं ) वरं तुभ्यो|ष्व ॥ १९ ॥

हे नचिकेता ! तूने द्वितीयवरसे जिसका वरर्ण किया था या स्वर्गके साधनसूत उस इस श्रप्तिनका उपदेश तुझे कर दिया । लोग इस श्रप्तिनको तेरे ही नामसे कहेंगे । हे नचिकेता ! श्रव श्रवणिष्ठ तृतीय वर माँगले ॥ १९ ॥

श्रव श्रप्तिनविज्ञान तथा उसके चपनके फलकं श्रौर इस प्रकारराका उपसंहार करते हैं— जो त्रिपाचिकेत श्रप्तिनके यथोक्त त्रयको—जो इष्टें हों जितनी हों श्रौर जिस प्रकार श्रप्तिनका चयन हो श्रर्थात् इष्टोंका स्वरूप, संख्या श्रौर चयन प्रकारादिको जानकर उस श्रप्तिनका श्रात्मारुपसे जाननेवाला विद्वान् चयन करता है श्रर्थात् जो विद्वान् नाचिकेत श्रप्तिनका ऋतु-ध्यान-सं-पादन करता है वह श्रधर्म, श्रज्ञान, रागद्वेषादिरूप मृत्युके बन्धनोका पुरतः श्रग्रतः शरीरपातसे पूर्व ही नाशाकर शोकसे मुक्त हुंश्रा स्वर्गलोकमें—वैराजलोकमें विराडात्मस्वरुपकी प्राप्ति होनेसे श्रानन्दित होता है ॥ १५ ॥

हे नचिकेता ! द्वितीयेन वरसे तूने श्रप्तिनका वरर्ण किया था जिसके लिये तूने

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२६ कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [ ग्रा० १

प्रार्थितवानसि द्वितीयेन वरेण सोऽग्निर्वरो दत्त इत्युक्तोपसंहारः । किंचैतस्मिन्न त्वै नात्मा प्रवस्यन्ति जनासो जना इत्येतत् । एष वरो दत्तो मया चतुर्थ-स्तुप्टेन । ऋततीयें वरं नचिकेतो वृणीष्व । तस्मिन्न््यादत्त ऋषीणामनहमित्य-भिगायः ॥ १९ ॥

एतावद् यत्क्रान्तेन विधिप्रतिपेधार्थेन मन्त्रब्राह्मणैःपेनावगन्तव्यं यद्‌धार्मिक्रियाकाण्डेन वसु । नोऽसतत्क्रत्वादिविधियाथालव्यविद्यानम् । एतौ विधिप्रतिपेधार्थ-त्रिपयस्यान्तनि क्रियाकारकफलाध्यारोपितस्याऽऽस्य स्वाभाविकस्याज्ञानस्य संसार-वीजस्य निवृत्त्यर्थं तदुपरीतद्राज्ञात्सैकत्यविज्ञानं क्रियाकारकफलाध्यारोपित-लच्छयाश्रयण्यालन्तकिनिःश्रेयसप्रयोजनं वक्तव्यमित्युत्तररो ग्रन्थ आरभ्यते । तस्मिन्न्स्थे द्वितीयवरप्राप्त्याऽप्यकृतार्थत्वं तृतीयवरगोचरमात्मज्ञानमन्तरेप्योत्था-

प्रार्थना की थी वह स्वर्ग प्रापिका साधनभूत यह ब्राग्नि विज्ञानरूप वर मैंने तुम्हें दे दिया । इस प्रकार उपर्युक्त ब्राम्निविज्ञानका उपसंहार कहा गया, यही नहीं, लोग इस ब्राम्निकको तेरे ही नामसे कहेंगे । प्रसन्न हुए मैंने तुम्हें यह चौथा वर दिया । हे नचिकेता ! श्रव तू तीसरा वर मांग ले, क्योंकि उसे बिना दिये मैं ऋणी हूँ, ऐसा श्रभिप्राय है ॥ १९ ॥

विधि प्रतिषेध प्रयोजनवाले एवं उपर्युक्त मन्त्रब्राह्मणैः द्वारा इन दोनों वरोंसे सूचित जो वस्तु ज्ञातव्य है वह ब्रात्मतत्त्व विषयक-यथार्थज्ञान विषयक नहीं है, श्रतएव विधि प्रतिपेधार्थविषयक, ब्रात्मामें क्रिया, कारक, फलका श्रध्यारोप करना ही है लक्षण जिसका ऐसे संसारके बीजरूप ब्राविच्छक-ग्रज्ञानकी निवृत्तिके लिये उसके विपरीत क्रिया, कारक, फलाध्यारोप लक्षण श्रुयं ब्रात्म्यन्तिक निःश्रेयस प्रयोजनवाले ब्रह्मात्मसंकरत्व ज्ञानको कहना चाहिए, इसके लिये उत्तर ग्रन्थका श्रारम्भ किया जाता है । इसो श्रर्थं-बातको ग्राह्याध्यिकाद्वारा विस्तृत करते हैं—तृतीय वर विषयक श्रात्मज्ञानके बिना द्वितीय-वरकी प्राप्तिसे श्रकृतार्थता ही है, क्योंकि पूर्वोक्त कर्मीविषयक साध्य-साधनरूप श्रनित्य

सत्यानन्ददीपिका

पिताके सौमनस्यसे लेकर स्वर्गलोक पर्यन्त जो दो वरोंसे सूचित किया गया है, यह सब संसाररूप है, वही कर्मकाण्डका उपनिषद् प्रतिपाद्य ब्रात्मामें श्रध्यारोपित है उसका निवर्तक श्रात्मज्ञान है । इस प्रकार श्रध्यारोप श्रौर श्रापवादृपसे पूर्वोत्तर ग्रन्थका स्वरस् । 'स्वर्गकामो रजेत, सुतां न पिवेत' इस प्रकार उपनिषद् व्यतिरिक्त मंत्रब्राह्मणैः 'विधि, प्रतिषेध द्वारा प्रवृत्ति, निवृत्ति प्रयोजनवाला है । संसारका बीज

प्रमाान् प्रमेयादिको ब्रात्मामें श्रारोपित किया जाता है श्रर्थात् मैं यज्ञादि क्रियाओंका कर्ता, कर्म ब्रादि कारकों, स्वर्गादि फलों तथा

कर्ता श्रोत्र स्वर्गादि फलोका भोक्ता हूँ, इस प्रकार श्रात्मामें श्रारोप करता है,

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स्वयति यतः पूर्वं स्मात्कर्मं गोचरात्साध्यसाधनलक्ष्यादनित्याद्विनेडधिकार इति तत्रिन्द्रियं पुताद्युपन्यासेन प्रलोभनं क्रियते । तत्तीयं वरं नचिकेतो दृप्टिपेक्ष्ययुक्तः सन्— विचिकित्सा मनुष्येऽसृतीत्येके नायमस्तीति चैके । ।२०।। [मनुशिष्टस्त्वयाहं वराग्राभेष वरस्तृतीयः: ] (तृतीय वरके ) प्रेते ( मृतेः सति ) या ( सर्गजनयचिद्विता ) इयं ( प्रत्यक्षसिद्धा ) शङ्कामने ) प्रापते ( मूते सति ) या ( सर्थजनयचिद्विता ) इयं ( प्रत्यक्षसिद्धा ) शङ्कामने ) प्रापते ( मूते सति ) या ( सर्थजनयचिद्विता ) इयं ( प्रत्यक्षसिद्धा ) शङ्का

यः ) श्रमे ( परलोकगामिन्यां श्राशा ) नप्रस्ति इति एके ( केचन वादिनः: हति व एके ( केचिद्व वदन्ति ) ब्रह्मै स्वयाम् श्रनुप्राप्तः: ( उपदिष्टः सन् ) वं) विधाम्(विजानीतां) वराग्रां (मध्येऽः तृतीयः वरः ।।२०।। विषयमें जो यह संदेह है कि कोई कांहते हैं कि ग्रात्मा हैं श्रोर कोई

T नहीं है । आपसे उपदिष्ट ह्यात्मा में इसे जान सकूं, 'वरोंमें यह ० । केत्सा संशयः प्रेते मृते मनुष्येऽसृतीत्येकेडस्ति शङ्काऽस्त्यमनो- देहान्तरसम्बन्धात्मकेन न्यायमस्तीति चैके न्यायसेनिविधोडस्तीति

ह न प्रत्येत्येष नापि वानुमानेन निरीश्वरविज्ञानमेवाद्वैज्ञानाधीनो

षका ही श्राद्मज्ञानमें श्राधकार है । इसलिए उनकी निन्दाके लिए से तचिकेताको प्रलोभित किया जाता है । हे नचिकेता ! 'तुम तृतीय

प्रकार यमराजद्वारा कहे जानेपर नचिकेता बोला— :यके विषयमें जो यह संदेह है कि कोई लोग तो ऐंसा कहतें हैं कि देह, र बुद्धिरो श्रतिरिक्त देहान्तरसे सम्बन्ध रखनेवाला ग्रात्मा है श्रोर

: कि इस प्रकारका कोई श्रात्मा नहीं है, मृत्; इसके विषयमें हमें धानुमाने भी ऐंसा निश्चित ज्ञान नहीं होता श्रौर परम पुरुषार्थ इस

सत्यनन्ददीपिका

जारयो शिनन् श्रात्मार्गंकृत्य श्रुत्याश्रयं ज्ञान ही श्राप्त्यनितक नि:श्रेयस

fच्याकी निवृत्ति तथा परमानन्दक्री प्राप्तिरूप प्रयोजनवाला है, श्रतः: [ सात्तिषाय फलेभ्यः विरतं पुरुषं ही श्रात्मज्ञानमने श्राधकारी है, दंसी

T हैं— 'वट् प्रासिमात्रेण बोधक है । वादियोंको विप्रतिपत्तौ-विरुद्धवचन हो

यथा—'स्थूललोइहं कुशोऽडहम्' इत्यादि लौकिक प्रतीतिसे देहात्मवादी

मा सिद्ध द्रष देहसे भिन्न श्रात्मा नहीं है । 'शुचौपि, परमामि' 'सुनता

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हि परः पुरुपार्थ इत्यत एतद्वियां विजानीतामहामुनुशिष्टो ज्ञापितस्त्वया । वराग्नासेप वरसूततीयोगवशिष्ठः ॥ २० ॥

क्रियमेकान्ततो निःश्रेयससाधनात्मज्ञानाहों न वेत्येतत्परीक्ष्यपार्थस्माह—देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुज्ञेयमरपुरेश धर्मः । ग्रन्थं वरं नचिकेतो वरोपिष्ठ मां मरोत्सरीति मां सृजैनम् ॥२१॥

देवैः श्रेष्ठ श्रात्मन् ( श्रात्मविषये ) पुरा ( पूर्व ) विचिकित्सितं ( संशयितम् ) एष ( यत्मा ) धर्मः ( यमदूधररूशः ) श्र्रतुः ( सूक्ष्मः ) हि ( यतः ) न सुज्ञेयः ( ज्ञातः ) ह नचिकेतः ! ग्रन्थं वरेण क्रणोपिष्ठ मा ( मां ) मा उपरोत्सीः ( उपरोधं-प्रतिषयाम्रहं मा ) कार्पीं: मा ( मां प्रति ) एतत् ( वरम् ) श्र्रतिसृज ( परित्यज ) ॥ २१ ॥

पूर्वकल्पमें देवताओंको भी इस विषयमें सन्देह हुमा था, क्योंकि यह सूक्ष्म धर्मी सुगमतासे जानने योग्य नहीं है । हे नचिकेता ! तू दूसरा वर मांगले, मुझसे इस विषयमें धनुरोध-ग्रग्रहण न कर, तू मेरे लिये यह वर छोड़ दे ॥ २१ ॥

विज्ञानके प्रभेद हैं । इसलिये श्रापसे उपदिष्ट-विचारपित हो मैं इसे भलीभाँति जान सकूँ । यही मेरे वरमें श्रेष्ठिप्ठ यह तृतीय वर है ॥ २० ॥

सत्यानन्ददीपिका

हैं, देखता हूँ' इत्यादि प्रतीतके श्राधारपर 'इन्द्रिय ही श्रात्मा है' ऐसा इन्द्रिय श्रात्मवादो कहते हैं । 'मन इत्यन्ये' इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति मनके अधीन है श्रौर 'ध्यान्योऽन्तर क्षरयिकविज्ञान-ग्रानन्दको श्रात्मा मानते हैं, 'ध्यान्योन्तर श्रात्मा विज्ञानमयः' ऐसी श्रुति भी है, श्रत: मन हो श्रात्मा है । 'बुद्धिरित्यपरे' विज्ञानवादी भी हैं । कोई श्रात्माको कर्ता भोक्ता, कोई केवल भोक्ता श्रात्मादि मानते हैं । यदि इस प्रकारकी विप्रतिपत्तिमें मंशय हो तो स्वयं हो निर्णय कर लेना चाहिए इस विषयमें प्रश्न करना व्यर्थ है । यदि यह सत्य है, परन्तु जैसे स्वार्समें प्रत्यक्षसे 'यह श्रात्मा है' ऐसे श्रात्माके श्रस्तित्वमें सन्देहके विद्वान होनेपर प्रत्यक्षसे निर्णय नहीं हो सकता श्रौर परलोक सम्वन्धी श्रात्मस्वरूप लि‌खने न होनेपर श्रनुमानसे भी निश्चय नहीं हो सकता, श्रत: इस विषयमें प्रश्न सार्थक है । श्रात्मविषयक विज्ञान निःश्कल भी नहीं है, क्योंकि इससे हो श्रविद्या निवृत्ति पूर्वक दुःखोंकी श्रत्यन्त निवृत्ति श्रौर नित्य निरतिशय प्रानन्दकी प्राप्तिरूप परम पुरुषार्थ सिद्ध होता है ॥ २० ॥

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भावानुवाद-सत्यानन्ददीपिका

देवैरप्य त्रैतस्मिन्वस्तुनि विचिकित्सितं संशयितं पुरा पूर्वं न हि सुज्ञयं सुष्ठु ज्ञेयं श्रुतमपि प्राकृतैर्ज नैतयोऽग्नु: सूत्र्म एष आत्मालव्यो धर्मोऽडितोऽन्यमसंदृश-फलं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मां सोपरोल्सीरुपरोधं मा कापीरंधमस्रोमिवोत्त-मसौ: । घ्यातिस्नुज चिसुचैनं वरं मा मां प्रति ॥ २९ ॥

एतस्मिन्न चिचिकेता आह—

देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यत्न सुज्ञेयमाप्त्य । वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित्॥२२॥

हे मृत्यो ! शास्त्र ( श्रास्मिन् विषये ) किल देवैः अपि विचिकित्सितं ( संदिग्धं ) त्वं च यत्न ( उद्योगं ) सुज्ञेयमाप्त्य ( सुगमतया ज्ञातुम् ) वक्ता च अस्य त्वादृक् ( त्वत्सदृशः ) न लभ्यो नान्यः वरस्तुल्यः ( अन्यः ) एतस्य कश्चित् वरः न ( नास्ति ) ॥ २२ ॥

हे मृत्यो ! निश्चय ही देवताओंने भी इस विषयमें सन्देह किया था, ग्राप भी ऐसा कहते हैं कि यह तरक सुझोध्य नहीं है । इस श्रात्मतत्त्वका वक्ता श्रापके समान श्रन्य मिलना भी संभव नहीं है है। श्रतः इस वरके समान कोई श्रेष्ठ वर भी नहीं है ॥२२॥

पूर्वकालमें देवताओंको भी इस श्रात्मरूप वस्तुमें विचिकित्सा—संशय हुआ था । साधारगा पुरुपोंतोंरी सुना हुग्रा भी यह तत्त्व सुगमतया भलीभाँति जानने योग्य नहीं है, क्योंकि यह श्रात्मा नामक धर्म श्रग्रस्पष्टिसुस्क्ष्म-दुर्जिज्ञेय है, श्रतः हे नचिकेता ! इससे भिन्न कोई निश्चित फलवाला वर मांग ले, जैसे ऋषिग्रा देनेवाला धनी छद्रगीको वाध्य करता है वैसे तू मुझे वाध्य मत कर, इस वरको तू मेरे लिए छोड़ दे ॥ २१ ॥

सत्यानन्ददीपिका

छान्दोग्योपनिषद्के श्रुत्तम ग्रध्यायमें श्रात्मविषयक सन्देहका विवरण इस प्रकार है—'य श्रात्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्यु विद्वोकोऽ.....ह प्रजापतिस्वाच' ( ७।३ ) 'जो श्रात्मा धर्मावर्म्म आदि रूप पापशून्य, जरारहित, मृत्युहीन, शोकरहित, सत्य काम श्रौर सत्यसङ्कल्प है, वह ज्ञातव्य है वह विशोष जिज्ञासितव्य है । जो उस श्रात्माको शास्त्र व गुरु उपदेशानुमार खोजकर जान लेता है वह सब लोकों व सब भोगोंको प्राप्त कर लेता है ऐसा प्रजापतिने कहा' प्रजापतिके इस वाक्यको देवता प्रौर प्रसुरोंने परम्परासे सुना । 'हम उस श्रात्माको जानना चाहते हैं। ( जिसके जाननेपर जीव सब लोकों श्रैर समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है ' ऐसा निश्चितकर देवताओं श्रौर प्रसुरोंकी श्रोरसे प्रतिनिर्धितुपसे इन्द्र श्रौर विरोचन हाथोंमें समिधाएँ लिए दोनों

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देवैरचाप्येतस्मिन्वस्तुनि विचिकित्सितं किलेति भवत एव नः श्रुतम् । त्वं च मृत्यो यथास्सास्त्र सुज्ञेयेSमाततस्माथ कथयसि, श्रातस्तु परिडतैरन्यवेदनोय-स्वादस्तथा चास्य धमस्य स्वाहकत्व्यतुल्योऽन्यः परिडतस्त्व न लभ्योऽन्विष्यमाणोऽपि । श्रग्रं तु वरो निःश्रेयसमाप्तिहेतुः। श्रातो नान्यो वरस्तुल्यः सहश्रोऽस्त्येतस्य कश्चिदन्योनित्यफलत्वादन्यस्य सर्वस्यैवेत्यभिप्रायः ॥ २२ ॥

एवमुक्तोऽपि पुनः प्रलोभ्यनुवाच मृत्युः—

शातायुषः पुत्रपौत्रान्बहून्पश्यूनहस्तिहिरण्यमक्षान् । भूमिमेर्हदायतनं वूरोपीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥२३॥

शातायुषः ( शाते वर्षाणि श्रायुषि येषां तान् ) पुत्रपौत्रान् वूरोपीष्व, तथा बहून्पश्यून् ( गवादीन् ) हस्तिवहिरण्यं ( हस्तिन च हिरण्यं च तत् ) प्राप्नुहि, भूमीः ( पृथिव्याः ) महत् ( विस्तीर्णम् ) श्रायतनं ( साम्राज्येन ) वूरोपीष्व, स्वयं च ( स्वयं अपि ) यावत् शरदः ( वर्षाणि ) [ जीवितुम् ] इच्छसि, [ तावत् ] जीव ( शरीरं धारय ) ॥२३॥

हे नचिकेता! तू सौ वर्षकी श्रायुष्यवाले पुत्र, पौत्र, बहूले पशु, हाथी, सुवर्ण श्रौर घोड़े माँग ले, विशाल भूमण्डल भी माँग ले, स्वयं भी जितने वर्ष इच्छा हो जीवन धारण कर ॥ २३ ॥

यह बात हमने धर्मो श्रापसे ही सुनी कि इस श्रात्मवस्तुमें देखलिये जाने में भी सन्देह किया था श्रौर हे मृत्यो ! श्राप यह भी कहते हैं कि यह श्रात्मतत्त्व सुगमतासे जानने योग्य नहीं है, श्रत पण्डितोंद्वारा श्रात्मतत्त्व होनेके कारण इस श्रात्मरूप धर्मंका वक्ता श्रापके समान श्रात्मतत्त्वका अन्य वक्ता संसारमें नहीं मिल सकता श्रौर यह वर निःश्रेयस-मोक्ष प्राप्तिका हेतु भी है, श्रतः इसके समान कोई धन्य वर भी नहीं है, क्योंकि धन्य सभी वर अनित्य फल वाले हैं, यह श्रभिप्राय है ॥ २२ ॥

नचिकेताके इस प्रकार कहनेपर भी यम उसे प्रलोभित करता हुत्रा पुनः बोला—

सत्यवानन्ददीपिका

प्रजापतिके पास ग्रापये, ( यहाँ उन्होंने तीस वर्षतक ब्रह्मचर्य वास किया ) प्रजापतिने दोनोको 'य एषोऽन्तरात्मा हृश्यते ऽसौ श्रात्मा' इस प्रकार प्रकृतिपुरुषका उपदेश किया श्रौर जलपूर्णं सिकोरमें देखनेको कहा । इससे विरोचनको विपरीतज्ञान-देहमें श्रात्मबुद्धि हुर्ई श्रौर इन्द्रको सन्देह उत्पन्न हुत्रा ॥ २१ ॥

'वक्ता चास्य त्वागन्यो न लभ्यः' इस श्रुतिवाक्यसे ऐसा श्रर्थ श्रवनित होता है कि यमके समान श्रात्मतत्त्वका अन्य वक्ता संसारमें नहीं है, परन्तु इस वाक्यका यह श्रभिप्राय नहीं है, क्योंकि लोकमें यमसे भिन्न श्रौर भी ब्रह्मवेत्ता हैं, किन्तु ये सन्निहित नहीं थे, यमरार्ज सन्निहित थे इस श्रभिप्रायसे यह श्रुतिवाक्य है ॥ २२ ॥

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शतायुष: शतं वर्षाण्यग्रुषि येषां तावश्शतायुष: पुत्रपौत्रान्व्युपैष्व । किंच गवादिलात्वगान्वहूनपशून्हस्तिहिरण्यं हस्ती च हिरण्यं च हस्तिहिरण्यम्, ऋत्विजांक्ष किं च भूमे: पृथिव्या महद्रिस्तिर्थ्यैर्मायतानमाश्रयें भवतलं राज्यं वृणीष्व । किंच सर्वैम्पेयतदनर्थकं स्वयं चेदल्पायु:परित्य्यत श्रायं-स्वयं च जीव त्वं जीव धारय शरीरं समग्रेन्द्रियकलापं शरदो वर्षाणि यावदिच्छसि जीवितुम् ॥ २३ ॥

एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च । महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥२४॥

हे नचिकेतः ! यदि एतत्तुल्यंम् ( उत्तंवरसदृशम् श्रपरं कस्यचिन् ) वरं मन्यसे [ तदा तमपिं वृणीष्व ] [ श्रपि च ] वित्तं चिरजीविकां ( चिरजीवितं ) च [ वृणीष्व ] महाभूमौ ( विस्तृतभूभागे ) त्वम् एधि ( राजा भव ) त्वां ( त्वां ) कामानां ( दिव्यानां मानुष्यां च काम्यमानानां ) कामभाजं ( कामभाजिनं ) करोमि ॥ २४ ॥

हे नचिकेता ! यदि तू इसौके समान कोई अन्य वर समभता हो तो उसे श्रग्रण्या धन प्रौर विरसप्यिनी जीवीका मांग ले । इस विस्तृत भूमिमें वृद्धि को प्राप्त हो, मैं तुम्हें काम्यफलोंका भोग-भाजन किये देता हूं ॥ २४ ॥

एतत्तुल्यमतेन यथेष्टपदिष्टेन सदृशश्रवण्यस्मपि यदिं मन्यसे वरं तमपिं वृणीष्व । किंच वित्तं प्रभूतं हिरण्यरत्नादि चिरजीविकां च सह्ह विस्रेन वृणीध्वेत्येतत् ।

सौ वर्ष हो श्रायु बिनकी ऐसे सौ वर्ष श्रायुबाले उन पुत्र, पौत्रोंको तू मांग ले, तथा गौ श्रादि बहुतेरे पशु, हाथी श्रौर स्वर्णं तथा श्राश्व श्रौर पृथिवीका महान् विस्तृत प्रायत्तन-ग्राश्रय-मण्डल-राज्य, श्रश्र्वत् साम्राज्य मांग ले । परन्तु यदि स्वयं श्रल्पायु हो तो ये सब व्यर्थ ही हैं, इसलिए कहाते हैं—तुम स्वयं भी जितने वर्ष जीवित रहना चाहें उतने वर्ष जीवित रह, शरीर श्राश्रथात् सशक्त, श्राविकाल समग्र इन्द्रिय कलापको धारण कर श्राश्रथात् इन्द्रिय पाठव श्रादिसे श्रान्त्य जीवन व्यर्थ है, इसलिए श्रपने-श्रपने विषय ग्रहणें श्रादिमें सम्यक् श्रानन्दयुक्त जीवन हो सार्यक है, इस कारनु भगवाने माध्यकारने यहां 'समग्र' शब्दका प्रयोग किया है ॥ २३ ॥

इस यथोपदिष्ट उपर्युक्त वरके समान यदि तू श्रग्र्य वर समभता हो तो उसे भी मांग ले, किन्तु यहां नहीं, घन-प्रचुर सुवर्णं रत्न श्रादि तथा उस धनके साथ चिर-

सत्यानन्ददीपिका

यहां 'तुल्य' शब्द श्राधिकका भी उपलक्षण है । खुलोक सम्वन्धी रम्भा, उर्वशी, कल्पलताक्ष, कामधेनु श्रादि दिव्ययोग कहे जाते हैं श्रौर मनुष्य सम्बन्धी माल, चन्दन,

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कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य

[ ग्रा० १

किं वहुनामहत्यां भूमौ राजा नचिकेतस्त्वमेवि भव । किंचान्यानृतकामानां दिव्यानां मानुपागां च त्वां कामराजं कामभागिनं कामाह करोमि सत्य-संकल्पो ह्राहं देवः ॥ २४ ॥

ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान्कामांरिच्छन्ततः प्रार्थयस्व । ईश्वरो वामः सत्यसृतो न हिर्हैषा लभ्यते मनुष्यैः । ग्राभिमन्त्रयस्वाभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः ॥२५॥

मृत्युलोके ( मृत्युलोके ) ये ये कामाः ( भोगाः ) दुर्लभाः ( दुष्खेन लभ्यं शक्त्या ) [ तान् ] सर्वान् कामान् ( भोग्यपदार्थान् ) छन्दतः ( स्वेच्छानुसारेण ) प्रार्थयस्व, हमाः सत्या: सत्यसृतः ( रथ्यादिदिसमाश्रिताः ) रामाः द्विधा ( ब्रह्मसरसो वा ) ईहशाः ( एवंविधा ) मृष्यैः नहि लभ्यनेयाः ( नैव प्राप्तव्याः ) हे नचिकेतः ! स्वाभिः महत्तराभिः ( मदृश्ताभिः ) परिचारयस्व ( ब्रास्मतनः परिवर्या कारय ) मरणं ( मरणविषयं प्रश्नं ) मानुप्राक्षीः ( नैव पृच्छ ) ॥२५॥

मृत्युलोकमें जो जो भोग्य विषय दुर्लभ हैं उन सब भोगोंको तू स्वेच्छानुसार माँग ले, यहाँ रथ वाजि यन्त्रों सहित ये रमणियाँ हैं, इन रमणियों मनुष्योंको प्राप्त न होने योग्य हैं, मेरे द्वारा दो हुई इन कामिनियोंसे तू अपनी परिचर्या करा । परन्तु हे नचिकेता ! तू मरण विषयक प्रश्न मत पूछ ॥ २५ ॥

स्थायिनी जीविका ( जीवन ) भी मांग ले, ग्रधिक क्या, हे नचिकेता ! इस दृष्टृ्ट भूमिमें राजा हो ध्र्य्यातां राज्यको प्राप्त हो, और तो क्या, मैं तुझे देवों भ्रौर मानुषी सभी कामनाओं-भोगोंका काम-भागी ध्र्य्यातां इच्छानुसार भोगने योग्य कर देता हूँ, क्योंकि मैं सत्य सक्कूलप देवता हूँ ॥ २४ ॥

इस मृत्युलोकमें जो जो प्रार्थनीय-भोग्य पदार्थ दुर्लभ हैं उन सबको छन्दतः; स्वेच्छानुसार भोग ले, इनके भोक्तारक्त ये रामाः जो पुरुषोंके साथ रमण करती हैं ऐसी वलिता यान्ति मानुष भोग कहे जाते हैं । इन भोगोंको प्राप्तकर उन्हें भोगने योग्य किये देता हूँ । यहाँ यह प्रश्न उठता है कि इस प्रकारके न किये कमोंका फल पुरुषको कैसे प्राप्त हो सकता है ? तो इसके उत्तरमें यमने 'सत्यसङ्कल्प' कहा है प्रार्थन्त मैं देवता हूँ, मतः ब्रप्रतिहत ज्ञान, ऐश्वर्य, तेज श्रौर बलवान् होनेसे मैं सत्यसङ्कल्प हूँ । श्रपने सत्य संकल्पसे यह सब दे सकता हूँ ॥२४॥

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व० १ ] भावानुवाद-सत्यानन्ददीपिका ३३

सह रथैर्वर्तन्त इति सर्थाः सतूर्थ्यः: सवादिस्थास्ताश्र न हि लम्भनीयाः प्राप्तव्योभया ईहशा पन्थविधा मनुष्यैर्मेतैयरस्मादिदप्रसादमन्तरेश । व्याश्रित्यमेलनस्याश्रितस्याभिमेतस्याभिमेत्या दत्ताभिः परिचारिभिः परिचारयस्व श्रात्मानं पादप्रक्षालनादिशुश्रुपां कार- यात्र मन इत्यर्थः। नचिकेतो मरयां मरसामबन्धं श्रश्रनं प्रेतेऽस्ति नास्तीति काकदन्तपररीक्षारूपं मातृग्रामोर्मेवं प्रश्नुमर्हसि ॥ २५ ॥

एवं प्रलोभ्यमानोडपि नचिकेतो महाहादवददच्दोभ्य श्राह—

श्रश्रोभावा मतयेऽस्य यदान्तकैतत्सर्वेन्द्रियार्पां जरयन्ति तेजः । ग्रपि सर्व जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्त्व नृत्यगोते ॥२६॥

हे ग्रन्थक ! ( मृत्यो ! ) श्रो भावाः ( श्र: श्रागामिनि दिवे सङ्कम्पित न वा भावः सत्ता येषां, तथा भूताः ) मर्यस्य ( मनुष्यप्रस्य ) यदनेनत् सर्वेन्द्रियाणां तेजः ( सामर्थ्यं ) जरयन्त ( शिथिलीकुर्वन्ति ) सर्वमपि जींविते ( श्रायु: ) श्रल्पमेव [ सन्तु ] नृत्यमोहे च तव [ एव स्लाघ्यं ] नृत्यगीतौ च तवैव [ श्रश्वरथादियः ] वाहास्त्व नृत्यगोते ॥ २६ ॥

हे यमराज ! ये भोग श्रोभावाः 'कल रहेंगे श्रथवा नहीं?' इस प्रकारके हैं श्रोरे मनुष्य के सब इन्द्रियोंको तेजको जीर्णोकर देते हैं । यह सारा जीवन भी श्रल्प ही है । श्राश्वरथादि वाहन श्रोरे नृत्यगीत श्रापके ही पास रहें ॥ २६ ॥

ये दिव्य ग्रप्सराएं रखोंके साथ श्रोरे वादयन्त्रोंके साथ विद्यमान हैं । हम जैसे देवताग्रोंकी कृपाके बिना ऐसी रमणीयां मरकधर्मा मनुष्यांको प्राप्त होने योग्य नहीं हैं । मेरे द्वारा दी हुई इन परिचारिकाओंोंसे श्रपनी परिचर्या श्रर्थात् पाद प्रक्षालनादि सेवा कराओ, यह प्रार्थन है, किन्तु हे नचिकेता ! मरयां श्यर्थात् मरस्यान्तर 'ग्रात्मा है श्रथवा नहीं?' ऐसा कार्दन्तों की परीक्षाके समान मरण समन्वन्धी प्रश्न मत पूछ ! तुम्हें ऐसा प्रश्न पूछना उचित नहीं है ॥ २५ ॥

इस प्रकार प्रलोभित किये जानेपर नचिकेता ने महान् सरोथरके समान श्रम्रुद्ध होकर कहा---

सत्यानन्ददीपिका

भवबन्धनसे मुक्ति चाहनेवाले ब्रह्म जिज्ञासुका 'शान्तोदान्त उपरतस्तितिक्षुः' इत्यादि मुक्तिमें इस प्रकार लक्ष्य किया गया है । इस श्राधारपर इन तीनों मन्त्रोंमें यमराज नचिकेता विवेक, वैराग्यादि साधन सम्पन्न है श्रथवा नहीं ? निश्चित करनेके लिये ऐहिक, पारलौकिक जड़, चितन उमयात्मक विषय भोगोंका प्रलोभन देखकर परीक्षा करना चाहते हैं ॥२५॥

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श्रुतिर्भविष्यन्ति न भविष्यन्ति वेति संशयेऽमान एव श्रेष्ठं भावो भवनं त्वयोर्न्यस्तान् भोगानां ते श्रुोभावाः किं च मृत्योः स मनुष्यस्यान्तक हि मृत्यो तदेतत्सर्वेन्द्रियाणां तेजस्तत्त्वरयन्नस्यपच्यमानस्य संस्रः प्रभृतययो भोगाः श्रुानस्थोयैवैते धर्मवीर्येणप्रज्ञाते जोयशःप्रभृतितीनां त्यागयितत्वात्। यां चापि दीर्घंजी विकां त्वं दित्सासि तत्रापि श्रुणु । सर्वे यदृत्त्रह्यपोडपि जीवितमायुरल्पमेव किसुतास्मदादिदीर्घंजीविका । श्रतस्तदवै तिष्ठन्तु बाहा रथातयः तथा नृत्यगीते च ॥ २६ ॥

किंच— न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्वा । जीवित्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरराघः स एव ॥२७॥

आपके द्वारा जिन भोगोंका उल्लेख किया गया है वे तो श्रुोभाव हैं—जिनका भाव — अस्तित्व ‘कल रहेगा कि नहीं’ इस प्रकार सन्देह युक्त हो वे श्रुोभाव कहे जाते हैं, किं च है ग्रन्थक—श्रुो ! ये प्रपञ्च श्रादि भोग तो मर्त्य—मनुष्यका जो यह इन्द्रिय तैज है उसे जीर्ण—प्रकाश कर देते हैं, श्रत; वर्म, वीर्य, प्रज्ञा, तेज, यश श्रादि क्षय करनेवाले होनेसे भ्रानर्थके ही हेतु हैं और जो श्रापको दोर्घ जीवन देनेकी इच्छा उसके विषयमें भी सुनिये ! ब्रह्माका जो आयु जीवन—श्रायु है वह भी श्रल्प ही शान्त है, चि अस्मदादिके दीर्घ जीवनकी तो बात ही क्या है ! श्रत: रथ श्रादि वाहन तथा नृत्य गीत श्रापके ही रहें ॥ २६ ॥

सत्यनन्दीदीपिका दोनों प्रकारके भोग पुरुषका उपकार नहीं प्रत्युत श्रपकार ही करते हैं, इसी बातष नचिकेता ‘श्रुोभावा:’ इत्यादिसे स्पष्ट करते हैं—प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे भी यहाँ सिद्ध हो है कि प्रपञ्च श्रादि भोग विषयों पुऱषके धर्म—धनपुत्रादि, वीर्य—शरीर सामर्थ्य, प्रज्ञा प्रास्त्रावगाहन शक्ति, तेज—प्रागल्भ्य वा त्वचागत दोष्ति विशेष यश—कीर्ति श्रादि नाश करते हैं, इसलिए ये सब विषय ब्राञ पु्रषके श्रानर्थके हेतु हैं। यहाँ नचिकेतो हिरण्यगर्भका ग्रहण है । क्योंकि उसकी श्रायुर्मे सबको श्रायुका ग्रन्थभाव है ‘चतुस्त्रु सहस्राणि दिवा भवन्ति’ इत्यारमभ ‘वसस्रातं नहमामानेन नहूरणः परमायुः प्रम' सहस्रयुगपर्यन्तमहर्वद्रह्मणो ऽविदुः' । ( गो० ८१७ ) इत्यादि प्रमाणों प्राहारपर ब्रह्माकी श्रायु निश्चित होती है । परन्तु परिमित होनेसे वह भी श्रल्प ही तो ग्रस्मदादिके श्रायुके विषयमें फिर कहना ही क्या है ? इस प्रकार नचिकेताने सम भोगोंमें क्षयित्य श्रादि दोषोंको बतलाकर श्रपनेको श्रमदित सिद्ध किया । ‘न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके ऽमृतत्वमानशुः’ ( न यज्ञादि क न प्रजया न धनसे प्रभुतत्वकी प्राप्ति होती है, केवल एक त्यागसे ही प्रभुतत्व प्र

होता है । यह श्रुति भी ऐसा ही कहती है ॥ २६ ॥

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व० १ ] भाषानुवाद-सत्यानन्ददीपिका

३५

मनुष्यः वित्तेन ( धनैः ) न तृप्यनीयः स्वां ( त्वां ) चेद् श्रद्धाक्षमं ( दृष्टवन्तः समः ) [ तत्र ] वित्तं लभ्यामहे ( प्राप्स्यामहे ) तव्व यावत् जीवविष्यामः ( तस्मात् ) वरस्तु स एव ( प्राग् याचित एव ) मे ( मम ) वरणीयः ( प्रार्थनीयः ) ॥ २७ ॥

मनुष्य धनसे तृप्त नहीं हो सकता । श्रद्धा यदि प्रापका दर्शनकर लिया है तो धन तो हम पा ही लेंगे । जब तक श्राप याम्यपदका स्वासन करेंगे निश्चित हम जीवित रहेंगे, किन्तु हमारा प्रार्थनीय वर तो वही है ॥ २७ ॥

न प्रभूतैः वित्तैः तर्पणीयो मनुष्यः। न हि लोके वित्तलाभः कस्य-चित्रुपिकरो दृश्यः । यदि नामास्माकं वित्ततृष्णा स्याल्लब्ध्यामह इत्येतद्वितमद्वाद्म दृष्टवन्तो वर्यं चेत्यां त्वाम् । जीवीतमपि तथैव । जीवविष्यामो यावच्याम्ये पदे त्वमीशिष्यसीशिष्यसे प्रभुः स्याः । कथं हि मर्त्यस्य्वा समेत्याल्पधनायुरसंवेत् । वरस्तु मे वररणीयः स एव यदात्मविज्ञानम् ॥ २७ ॥

यतश्च—

प्रजीयंताममृतानामुपेत्य जीर्यंतन्मर्त्यः कथमःस्थः प्रजाननं ।

श्रीमद्भ्योऽनवरारातप्रभवोदान्नोतदीर्घे जीयिते कोऽरमत तिरश्चः ॥

[ हे मृत्यो ! ] वचधः स्थः ( कुः पृथिवी वृथा ग्रान्तरक्ष लोकापेक्षया तस्यां तिष्ठति वचधः स्थः ) जीर्यन्त् मर्त्यः ( जरामरराशीलः मनुष्यः ) प्रजीयंतां ( जरारहितानाम् ) अमृतानाम् ( देवानाम् ) उपेत्य ( उपगम्य ) प्रजाननं वर्योरंतिमोदान् ( चित्त-यन्त् ) श्रातिदीर्घे जीयिते को रमेत ? ॥ २५ ॥

किश्च् मनुष्य श्रधिक धनसे भी तृस होने योग्य नहीं है, लोकमें धनलाभ किसी वृत्ति करनेवाला नहीं देखा गया है, श्रच् जब कि हम श्रापको देख चुके हैं तो यदि हमें धनकी लालसा होगी तो उसे हम प्राप्त कर ही लेंगे, इसी प्रकार दीर्घ जीवन भी, जब तक श्राप याम्यपदके श्रापक-नियामक स्वामी रहेंगे तब तक हम भी जीवित रहेंगे । मर्त्य कोई भी मनुष्य श्रापके सामने श्रल्पायु एवं श्रल्पधन वाला कैसे हो सकता है ? किन्तु वर तो वह जो श्रात्मज्ञान है वही हमारा वररणीय प्रार्थनीय है ॥ २७ ॥

क्योंकि—

सत्यानन्ददीपिका

वैराग्यकी हृदताके लिए पूर्वोक्त ये सब निम्दनीय हैं, इस बातको ‘किश्च’ श्रादि श्लोकसे कहते हैं । मन्त्रमें ‘जीविष्यामः’ यह परस्मैपद छान्दस है श्रन्यथा ‘जीविष्यसि’ होना चाहिए ॥ २७ ॥

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३४

कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [ श्रो १

श्वो भविष्यान्त न भविष्यान्ति वेति संदिद्यमान एय येभां भावो भवन्तं स्वयोभन्यस्तानां भोगानां ते श्रोभावाः किं च मृत्यस्य मनुष्यस्यान्तक हे मृत्यो तदेतत्स्वेन्द्रियाणां तेजस्तज्जरयन्त्यपत्नयन्त्यप्सरः प्रहृतयो भोगाः ध्यानथोयैवैते धर्मवीर्यप्रज्ञातेजोयशःप्रभृतितां नापयितत्वात्। यो चापि दीर्घंजीविकां त्वं हिल्सति तत्प्रति श्रृणु। सर्वं यदन्राङ्गपोडपि जीवितमायुरल्पमेव किमुतास्मदादिदीर्घंजीिवका। श्वतस्तवैव तिष्ठन्तु वाहा रथादयः तथा नृत्यगीते च ॥ २६ ॥

किंच— न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे विचिकित्सामे चेत्वा । जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरसीयः स एव ॥२७॥

आपके द्वारा जिन भोगोंका उल्लेख किया गया है वे तो श्रोभाव हैं—जिनका भाव—प्रस्तुतव 'कल रहेगा कि नहीं' इस प्रकार सन्देह युक्त हो वे श्रोभाव कहे जाते हैं, किंच हे श्रान्तक—मृत्यो ! ये व्रभस्सरा श्रादि भोग तो मृत्य-मुनुष्यका जो यह इन्द्रियों का तेज है उसे जीर्ण-प्रप्रकाशय कर देते हैं, श्रतः धर्म, वीर्य, प्रज्ञा, तेज, यश श्रादिकों क्षय करनेवाले होनेसे भ्रनर्थके हेतु हैं । जो श्रापको दीर्घ जीवन देनेकी इच्छा है उसके विषयमें भी सुनिये ! ब्रह्माका जो सारा जीवनकाल है वह भी श्रल्प ही है, फिर प्रस्मदादिके दीर्घ जीवनकी तो बात ही क्या है ? श्रतः रथ श्रादि वाहन तथा नृत्यगीत श्रापके ही रहें ॥ २६ ॥

सत्यनन्ददीपिका

दोनों प्रकारके भोग पुरुषका उपकार नहीं प्रत्युत श्रनर्थ ही करते हैं, इसी बातको नचिकेता 'श्रोभावाः' इत्यादिसे स्पष्ट करते हैं—प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे भी यही सिद्ध होता है कि श्रापसरा श्रादि भोग विषयी पुरुषके धर्म-ह्रासप्रीतक, वीर्य-शारीर सामर्थ्य, प्रज्ञा-प्रास्त्रावगाहन शाक्ति, तेजः-प्रागल्भ्य वा त्वचागत दीसि विशेष यश-कीर्ति श्रादिकों नाशा करते हैं, इसलिए ये सब विषय प्रज्ञा पुरुषके श्रनर्थके हेतु हैं । यहांँ ब्रह्माशानन्दसे हिरण्यगर्भका ग्रहण है । क्योंकि उसकी श्रायुर्में सभी श्रायुका श्रान्तर्भाव है 'वर्तुर्युग-सहस्रान्ति मदाप्रो दिवा सबस्ति' इत्याद्रुप 'वस्सरान् ब्रह्मानोति महायुः' ( गी० ८।१७ ) इत्यादि प्रमाणोंके प्राधारपर ब्रह्माकी श्रायु निश्चित होती है । परन्तु परिमित होनेसे वह भी श्रल्प ही है तो प्रस्मदादिके दीर्घ जीवनकालकी तो बात ही क्या है ? इस प्रकार नचिकेताने समस्त भोगोंमें कषित श्रप्रति दोषोंको बतलाकर श्रापनेको सम्माप्त तत्वज्ञानमें श्रधिकारी सिद्ध किया । 'न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागनेकेनैवामृतत्वमानशुः' ( न यज्ञादि कर्मोंसे न प्रजोंसे, न धनसे श्रमृतत्वकी प्राप्ति होती है, केवल एक त्यागसे ही श्रमृतत्व प्राप्त होता है ) यह श्रुति भी ऐसा ही कहती है ॥ २६ ॥

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व० १ ] भाषानुवाद-सत्यानन्ददीपिका

मनुष्य: वित्तेन ( धनेन ) न तर्पयीय: स्वा ( त्वां ) चेद् श्रद्धाक्षम ( दृढवन्तः स्मः ) · [ तर्हि ] वित्त' लभ्यामहे ( प्राप्त्यामहे ) र्वै यावत् ( यावद् ) ईशिष्यसि ( यास्ये पदे स्थास्यसि ) तावत् जीवविष्याम: [ तस्मात् ] वरस्तु स एव ( प्राग् याचित एव ) स मे ( मम ) वररगीय: ( प्रार्थनीय: ) ॥ २७ ॥

मनुष्य धनसे तृप्त नहीं हो सकता । श्रद्धा यदि प्राप्तका दर्शनकर लिया है तो धन तो हम पा ही लेंगे । जब तक श्राप यास्यपदका शासन करेंगे निश्चित हम जीवित रहेंगे, किन्तु हमारा प्रार्थनीय वर तो वही है ॥ २७ ॥

न प्रभूतेन वित्तेन तर्पयीतयो मनुष्य:। न हि लोके वित्तलाभ: कस्य- चित्तुमिकरो दृश्ट:। यदि नामास्माकं वित्ततृष्णा स्यात्तल्पस्यामह इत्येतद्वित्तमद्वाराम दृष्टवन्तो वयं चेत्वा त्वाम्। जीविष्यामपि तथैव । जीविष्यामो यावच्यामये पदे वरस्तु मे वररगीय: स एव यदात्मविज्ञानम् ॥ २७ ॥

यतश्र—

भ्रजीयंताममृतानामुपेत्य जीर्यंतमर्त्यं: क्रथ:स्थ: प्रजानन् । श्रोभिध्योतिस्वरागतिमोक्षमार्गदर्शानन्दानन्दीदृशो जीविष्य कोऽर्थ: ॥२८॥

[ हे मृत्यो ! ] कवचभ स्पथ (कु: पृथिवीं ब्रह्म ब्रह्मांतरिक्षलोकापेक्षया तस्यां तिष्ठति स्वधा: स्थ: ) जीर्यन्न् मर्त्य: ( जरामरणशील: मनुष्य: ) भ्रजीयर्ता ( जरारहितानाम् ) प्रमृतानां ( देवानाम् ) उपेत्य ( उपगम्य ) प्रजानन् वरंञरतिमोदान् श्रभिष्यायनन् ( चिन्त- यन् ) श्रतिदीर्घे जीवते कोऽर्थेत ? ॥ २८ ॥

किञ्च मनुष्य श्रधिक धनसे मो तृप्त होने येष्य नहीं है, लोकमें धनलाभ किसोकी तृष्णि करनेवाला नहीं देखा गया है, श्रद्धा जब कि हम श्रापको देख चुके हैं तो यदि हमें धनकी लाळसा होगी तो उसे हम प्राप्त कर ही लेंगे, इसी प्रकार दीर्घ जीवन भी, जब तक श्राप यास्यपदके शासक-नियामक स्वामी रहेंगे तब तक हम भी जीवित रहेंगे । भला कोई भी मनुष्य श्रापके समीपमें श्राकर श्रालस्य एवं श्रालस्यघटनसे वहाँ कैसे हो सकता है ? किन्तु वर तो वह जो श्रात्मज्ञान है वही हमारा वररगीय प्रार्थनीय है ॥ २७ ॥

क्योंकि—

सत्यानन्ददीपिका

वैराग्यकी हढताके लिए पूर्वोक्त ये सब निन्दनीय हैं, इस बातको ‘किञ्च’ श्रादि माध्यसे कहते हैं । मन्त्रमें 'ईशिष्यसि' यह परस्मैपद छान्दस है श्रन्यथा 'ईशिष्यसे' होना चाहिए ॥ २७ ॥

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२६ कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [ग्रा०

जरा रहित ग्रामरों-देवोंके समीप पहुँचकर नीचें पृथिवीपर रहनेबाला कौन जराम्र विवेकी मनुष्य होगा जो केवल श्रारौरक वर्गोंके रागसे प्राप्त ( श्रोरमात्र श्रादि ) सुखों क्षत्रिय ग्रान्ति जानकर भी श्रातिदीर्घ जीवनमें रक्षा करेगा ? ॥ २५ ॥

व्रजीयोस्तां वयोऽहैनिमग्राप्तनुवताममृतानां सकाशमुपेत्ययोगपगाम्यात्मन् उत् प्रयोजनान्तरं प्राप्यं तेष्यः प्राजापत्यपलभमानः; स्वयं तु जीयत्नमत्यो जरासमर वान्क्षःस्थः कु: पृथिव्यां श्रधरश्चान्तरिदिलोकापेक्षया तस्यां तिष्ठतीति क स्थः सनक्थमेवमविवेकिभिः प्रार्थनीयं पुत्रवित्तहिरण्याद्यैस्थिरं दृश्यते ।

क तदास्थ इति वा पाठान्तरम् । श्यसिन्पद्यो चाद्रयोजना-तेषु पु द्रष्ट्यासङ्डस्थितिः तत्पर्येण वर्तनं यस्य स तदास्थः । ततोडधिव पुरुषार्थे दु:प्रापमपि प्रापिपद्युपुः क तदास्थो भवेद्र कश्चित्तदसारज्ञस्त स्यादित्यर्थः सर्वो ह्यपर्यपेक्षैव लुब्धो भवति । तस्माद्र पुत्रवित्तादिलोभैः श्योऽहम् । किंचान्यत् । प्रसुखाद्यन्वयपरत्रिमोदाननरयस्थितरुपतथाभिध्याय रूपान्यथावदतिदीर्घ जीविते को विवेकी रमत् । ॥ २८ ॥

वयोऽहानिरूप जीर्यंताकी प्राप्त न होनेवाले ग्रामरों-देवोंके सार्निध्यमें पहुँचकर प्राप्त होने योग्य अपने धन्य उत्तम प्रयोजन-प्रासव्यको जानता-प्राप्त करता भी जो कां होनेवाला श्रौर मरयाधर्मा मनुष्य कः-कु-पृथिव्यो ग्रनतरिक्ष श्रादि लो अपेक्षा ऋषः-नीचे होनेके कारणु 'कः' है, उपर रहनेबाला 'क स्थः' है, होकर भी इस प्रकार श्रविवेकियों द्वारा प्रार्थनीयों पुत्र, धन, सुवर्यं श्रादि श्रस्थिर-श्र पदाथोंको कैसे मांगेगा । कहहीं 'कः स्थः' के स्थानमें 'क तदास्थः' ऐसा पाठान्तर है । इस पक्षमें श्राक्षरोंकी योजना इस प्रकार है—उन पुत्र श्रादि पदाथोंमें श्र 'मनस्थिति श्रथ्यांत् तत्परता पूर्वक जो प्रवृत्ति वह 'तदास्थ' है । जो उन पुत्र श्रादि उत्कृष्टतर श्रौर दु:प्राप्य पुरुषार्थ पानेको इच्छुक है वह उनमें श्रास्था रखनेवाला होगा ? श्रथ्यांत् उन्हें समकनेवाला कोई भी पुरुष उसका श्रार्थी-इच्छुक न: सकत, यह श्रथ्य है, क्योकि सभी लोग उत्तरोत्तर उससे ही होना चाहते हैं, श्रत : वित्त श्रादि श्रस्थिर होनेवाले श्रप्सरा श्रादिके सम्पकसे प्राप्त होनेवाले सुखोंकी श्रनवस्थिति रूपसे म करता हुया उन्हें यथावत ( मिथ्यारूपसे ) समभता हुया कौन विवेकी पुरुष श्रा जीवनमें प्रेम करेगा ? ॥ २८ ॥

सत्यानन्ददीपिका

लौकिक तथा पारलौकिक विषय भोगोंके सार-ग्रासारको न जाननेवाला श्रा पुक्रष गीत तथा कीडासे जग्य सुखको ही इचछा करता है । परन्तु इन क्षयाभाज्जु

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श्रातो विद्हायानित्यैः कामैः प्रलोभनं यन्मया श्रार्थितम्‌— यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्परायै महति श्रूयि नस्तत् । योडयं वारो गूढमनुपविष्टो नान्यं तस्माद्विचिकेतो वृणीते ॥२५॥

है मृत्युो ! यस्मिन् ( विषये ) इदं ( श्रात्मा श्रस्ति न वेति ) यद् ( यस्माद् ) विचिकित्सन्ति ( सन्देहवन्तः ) तत् ( श्रात्मतत्त्वं ) महति साम्पराये ( परलोकविषये ) नः ( श्रस्मभ्यं ) वृधि ( उपदिश ) योडयं वारः; गूढम् ( गोप्यम् ) श्रतुपविष्टः ( प्राप्तः ) यस्माद् ( वरात् ) श्रन्यं ( वरं ) न विचिकेतो न वृणीते ॥ २५ ॥

है मृत्यो ! जिस परलोकके विषयमें लोग 'श्रात्मा है वा नहीं' ऐसा सन्देह् करते हैं तथा जो महान् परलोकके विषयमें [ निश्चिलत ] है वह हमसे कहिये । यह जो महानता को प्राप्त हुया वर है इसे श्रन्य कोई वर नचिकेता नहीं मांगता ॥ २५ ॥

यस्मिन्न्रपेतद् इदं विचिकित्सनं विचिकित्सन्ति श्रस्ति नास्तिल्येवंकारं है मृत्यो साम्परायै परलोकविषये महति महत्व्योजननिमित्ते श्रात्मनो निरर्णय-विज्ञानं यत्तदूँमूहि कथय नोस्सम्भव्यम्। किं बहुना योडयं प्रकृत श्रात्मविषयो

श्रातः मुखे इत् श्रात्मनः-सिद्ध्याभोगौसे प्रलोभित करना छोड़कर जिसके विषयमें मैंने प्रार्थन्ता की है——

है मृत्युो ! जिस परलोकगत जीवके विषयमें ऐसे सन्देह् करते हैं कि 'प्रेते' मरखा-तनंतर 'श्रात्मा है श्रथवा नहीं' उस महान् प्रयोजनके निमित्तसूत साम्परायै-परलोकके सम्बन्धमें उस श्रात्माका जो निश्चिलत विज्ञान है वह हमसे कहिये । श्रथिकं यत् ? यह श्रात्मनिषयक प्रकृत वर है वह गूढ-गहन-दुर्विवेचनीयताको प्राप्त है ।

सत्यानन्ददीपिका

हीन पदार्थोंसे भी अत्युत्तमश्रेष्ठ परम पुरुषायं रूप प्रयोजन जिसे श्राप जैसे देवताआोंके प्रसाद से प्राप्त होता हो वह इन पदार्थोंकी इच्छा कभी नहीं करेगा । ये हि सेम्वप्संज्ञा भोगा दुःखयोनिय अथ ते । श्राश्राद्यनन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ (गी० ५१२२) 'इन्द्रियोंसे सम्बन्धित जो भोग हैं वे निश्चिलत दुःखके ही हेतु हैं श्रौर उत्पत्ति विनाश शोल हैं, श्रतः हे कौनतेय ! विवेकी पुरुष उनमें रमण नहीं करता ।' ऐसी स्मृति भी है । इस प्रकार नचिकेताेने इन तीन मन्त्रोंोसे श्रात्मनेको साधन चतुष्टय सम्पन्न प्राधिकारी सिद्ध किया ॥ २६ ॥

'येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्यान्ति चैकै' ( कठ० १।२० ) इस्से उपक्रमकर 'यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति' ( कठ० ११२५ ) इस्स मन्त्रतकं नचिकेताके श्रात्मविषयक प्रश्न यमराजद्दारा श्रात्मज्ञानके श्राधिकारीकी परीक्ष्ा लेनेके लिये पुत्र

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२५

कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य

[ श्लो १

वरो गृहं गहनं दुरविवेचनं प्राप्तोडनुप्रविष्टः । तस्माद्वारादनन्यमविवेककिमपि प्रार्थ-

नीयमनित्यविषयं वरं नाचिकेता न वृणीते मनसापीति श्रुतेर्वचनमिति ॥२५॥

शाङ्करभगवत्पाद कृत शाङ्करभाष्यं प्रथमावल्ली समाप्त ॥ १-१ ॥

वरसे अन्य श्रुतिवेदीकी पुरुषों द्वारा प्रार्थनीय श्रनित्य वस्तु विषयक वर नचिकेता मनसे भी नहिं मांगता, यह श्रुत्यर्थ है ॥ २५ ॥

कठोपनिषद्के प्रथमाध्यायकी प्रथमवल्लीका 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' कृत

भाषानुवाद समाप्त ॥ १ ॥

सत्यानन्दीदीपिका

वित्त क्षयादि क्षनेक प्रकारके पदार्थोंका प्रलोभन दिया जाना, नचिकेता द्वारा क्षयिर्

ग्रादि श्रनेक दोषोंको बतलाकर उनमें पूर्ं वैराग्य दिखलाकर ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिमें श्रप

योग्यता का परिचय दिया जाना बतलाया गया है । नचिकेताको निमित्तकर ग्रन्थके .

ग्राधिकार निरूप्यार्थ संवाद रहित शुध्दिका वचन है श्रथात् साधन चतुष्ट्य सम्पन्न पु'

ब्रह्मज्ञान प्राप्तिमें श्राधिकारि है ॥ २९ ॥

कठोपनिषद्के प्रथमाध्यायकी प्रथमवल्लीकी स्वामी सत्यानन्द सरस्वती

कृत-सत्यानन्दीदीपिका समाप्त ॥ १-१ ॥

प्रथमाध्यायस्य द्वितीयावल्ली

श्रेय-प्रेय विवेक

परीक्ष्य शिष्यं विचारयोग्यतां चावगम्याह—

ग्रन्थपच्छेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषं सिनीतातः ।

तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हितेर्ड्योः श्रथो प्रेयो वृणीते ॥ १

[ यम श्राह ] श्रेयः (निः श्रेयसम्) ग्रन्थत् ( पृथक् ) प्रेयः उत ( प्रियत

पुत्रवित्तादिकाऽ्यममानम् ) ग्रन्थत् एव । ते उभे (श्रेयः प्रेयसी) नानार्थे (भिन्नप्रयोजनने

इस प्रकार शिष्यकी परीक्षणकर उसमें विद्याकी योग्यता जान यमराजने कहा—

सत्यानन्दीदीपिका

'दीर्ष्घायुरोमांसनिष्ठो नानूचानाय नोतरागापदिषेतं' स्वाध्यायविधिहीनं 'ग्रनिममानं

पोर विषयोंमें रत पु्रष हा ग्रन्थार्थ नजानल्मनिअहा उरदेश न करे' । 'ग्रस्मा इमाल्प-

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पुर्हयं ( देहिनं ) सिनीतम् ; ( बध्नीतः ) तयोः ( श्रेयः प्रेयसोमध्येः ) श्रेयः ( ब्रह्मविद्याम् ) श्रावदानास्य ( उपासीनस्य ) साधु ( संसारमोचनात्मकं कल्याणं ) भवति । य उ ( यः पुनः ) श्रेयः ( पुत्रवित्तादिकामं ) वृणीते ( उपावदते ) ( सः ) श्रथ्यान्तं ( परमपुरुषार्थान्त हीयते ) ( च्युतो भवति ) ॥ १ ॥

श्रेयः ( ब्रह्मविद्या ) श्रेयसे मित्रं है और श्रेय श्रेयसे पृथक् है, ये दोनों मित्र प्रथक् होनेपर भी पुरुषको बांधते हैं । जिन्होंने श्रेयका ग्रहण करने वालेको शुभ होता है और जो श्रेयका वर्णन करता है, वह परमपुरुषार्थसे च्युत हो जाता है ॥ १ ॥

ध्यान्यत्पृथगेव श्रेयो नि:श्रेयसं तथान्यदुताश्रयेच प्रेयः प्रियतरमपि । ते श्रेयः- श्रेयसी उमे नानार्थे भिन्नप्रयोजने सती पुरुषमधिकृत्य वर्षाश्रमादिविशिष्टं सिनीतो बध्नीतस्तताभ्यामकर्तव्यतया प्रयुज्यते सर्वः पुरुषः । श्रेयःप्रेयसोः- श्रेयुदयामृतत्वार्थी पुरुषः प्रवर्तते । श्रतः श्रेयःप्रेयःप्रयोजनकर्तव्यतया ताभ्यां बद्ध इत्युच्यते सर्वः पुरुषः ।

ते यद्यप्येकैकपुरुषार्थेसंबन्धिनीनां विद्याविद्यारुपतया द्विर्द्धे इत्यन्यतरापर- श्रेयो-नि:श्रेययस मन्यत-भिन्नं हीहै तथा प्रेयः-प्रियतर वस्तु भी पृथक् ही है । ये श्रेय और प्रेय दोनों नानार्थे- विभिन्न प्रयोजनवाले होनेपर भी वर्षाश्रमादि विशिष्ट श्रधिक्त पुरुषको बांधते हैं । उन्हीं विद्याविद्यारुपी श्रेय और श्रेयके द्वारा श्रनेक कर्तव्यरुपसे सब नियुक्त हो जाते हैं । श्रेयुदयार्थी पुरुष प्रेयमें और मोक्षार्थी पुरुष श्रेयमें प्रवृत्त होता है, श्रतः श्रेय और प्रेय इन दोनोंके प्रयोजनोकी कर्तव्यतया- कृति- साधयताके कारण सब लोग उनसे बद्ध हैं ऐसा कहा जाता है । यद्यपि वे एक एक पुरुषार्थेसंबन्धिनीनां विद्या श्रविद्यारुप होनेसे परस्पर विरुद्ध हैं, श्रतः दोनोंमें एकका परित्याग किये बिना एक पुरुष द्वारा दोनोंका साथ साथ श्रनुष्ठान न

सत्यानन्ददीपिका

सन्नात्र्य सम्पकपरिकष्य वेदाववैशद्योमासन्निष्ठाग्राम् इत्यादि श्रुतिके श्राधारपर यमराजने नचिकेताके मलिनात्मपरित्यागकर उसे श्रात्मविद्यानिष्ठावशक जिसलोकाकी प्राप्तिकर उसे उपदेश देना श्रारम्भ किया—

त्रिविध दु:खोंकी घ्रत्यन्त निवृत्ति तथा नित्य निरतिशय श्रानन्दकी प्राप्तिका नाम नि:श्रेयस-मोक्ष है, नि:श्रेयसका साधन होनेसे ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञान को भी नि:श्रेयस कहा गया है । प्रियतर ब्रह्मयुदयके साधन भूत ज्योतिष्टोमादि श्रेयसे भिन्न हैं और वे श्रविद्याकृत हैं । बह्नविद्याका प्रयोजन मोक्ष है और श्रविद्याका प्रयोजन जन्ममरणरुप संसार है । वे दोनों वर्षाश्रमादि विशिष्ट पुरुषको इस प्रकार बांधते हैं—'ग्राहय्यो

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त्यागेनैकेन पुरुषेण सहात्मुष्णातुमशक्यत्वात् तयोर्हित्वाविद्यारुपं प्रेयः श्रेय एव केवलमाददानस्योपादानं कुर्वत् साधु शोभनं शिवं भवति। यस्त्वदूरदर्शी विमूढो हीयते वियुज्यते डस्मादर्थात् पुरुषार्थात् पारमार्थिकाध्ययनात्रिल्या-त्प्रच्युत इत्यर्थः। कोडसौ य उ प्रेयो दृश्यते उपादत्त इत्येतत्॥ १ ॥

यद्यपि कर्तुं स्वायत्ते पुरुषेण किंमर्थं प्रेयः एव अदत्ते वाहुल्येन लोक एतच्यते-

हो सकनेके कारण्य उनमेंसे श्रविद्यारुप प्र'यका त्यागकर केवल श्रेयका ही ग्रहण करने वालेंका साधु-शुभ-फलयाफल होता है। जो मूढ-ग्रविवेकी दूरदर्शी नहीं है वह इस ग्रथं-पुरुषार्थ ग्रध्यात्म पारमार्गिक मोक्षरुप नित्य प्रयोजनसे च्युत हो जाता है। ऐसा ग्रथं है वह कौन है ? जो प्रेयका वररण ग्रर्थात ग्रहण करता है, यह इसका तात्पर्य है॥ १ ॥

यदि विद्याविचाररुपक श्रेय और प्रेय इन दोनोंका करना भी पुरुषके ग्रधीन है तो लोग ग्रधिकतर प्रेयको ही क्यों ग्रहण करते हैं ? इसपर कहा जाता है—

सत्यानन्दीदीपिका

बृहस्पतिसखेन यजेत' ( बाह्याग्नि बृहस्पति सच नामक याग करे ) 'राजा राजसूयेन यजेत' ( क्षत्रिय राजा राजसूयनामक याग करे ) यह वर्णो विशिष्टका ग्रधिकार है। 'गृहस्थः संहतिं भजेत्सुप्रतीकां' ( बृहस्पतिस्थानीय गृहस्थाश्रमों होनेवाला श्रयने सहधा पत्नीकों प्राप्त करे ) यह गृहस्थाश्रम विशिष्टका ग्रधिकार है। 'जातपुत्रः कृष्णाकेशोऽग्नीनादधीत' ( उत्पन्न पुत्र व काले केसोंवाला ग्रर्थात ४० वर्षको ग्रायु वाला पुरुष श्रग्निकों ग्राधान करे ) यह वय-ग्रायु विशिष्टका ग्रधिकार है। 'ग्रविन्चिकित्सितग्याधरम्भ प्रवेधो वा' ( श्रसाघ्यव्याधिवाला जलमें प्रवेश करे ) यह प्रवृत्तिविशिष्टका ग्रधिकार है। विहित कमोंमें वरनाश्रमादि विशिष्ट पुरुष ग्रधिकारी है और ग्रध्यात्मविद्यामें साधन वतुस्यय सम्पन्न पुरुष ग्रधिकारी है। इस प्रकार श्रग्र्युदयार्थी श्रग्र्युदयके साधनोंमें प्रवृत्त होता है और ग्रोर मोक्षार्थी मोक्षके साधनोंमें प्रवृत्त होता है। ग्रोर उनसे बंध जाता है। इस विषयमें—

यतु चित्तस्थ सततमर्थे श्रेयसी वन्वनम् । ज्ञानीयोग्यस विशेषः सर्वसंसिद्धिकरः शिवः ॥ लोकेरम्प्रतिबन्धाय निष्ठा पुंसः प्रक्ती मयादृशा । ज्ञानीयोगेन सौख्यांनि कर्मयोगेन योगिनाम्॥ ( गी० ३।३५ )

इत्यादि श्रुति, स्मृतिवचन भी प्रमाण हैं। मोक्षको भी स्वर्गादिमेंसे श्रग्र्यतम मानने से श्रनित्य हैं और ग्रात्मस्वरुप मोक्ष श्रज्ञान्य होनेसे नित्य है। ज्ञान तो केवल ग्रज्ञानकी निवृत्तिमात्र करता है, ग्रात्मानन्दरुप मोक्ष तो नित्य सिद्ध है, श्रत; श्रग्र्युदयार्थिसि मोक्षार्थी श्रव्यत्तम है॥ १ ॥

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श्रेयक्ष प्रेयक्ष मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः । श्रेयो हि धीरोऽसि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्तो योगक्षेमादवृणीते ॥२॥

श्रेयश्च प्रेयश्च [ द्वौ एव ] मनुष्यम् एतः ( प्राप्तः तिष्ठतः ) धीरः ( विवेकी ) तौ ( श्रेयः प्रेयः पदाथौं ) सम्परीत्य ( सम्यक् प्रालोच्य ) विविनक्ति ( पृथक्करोति ) धीरः ( धीमान् ) प्रेयसः ( पुत्रादिसः ) श्रेयः हि ( ब्रह्मविद्याम् एकम् ) अभिवृणीते मन्तः ( श्रद्धालुपुद्धिः ) योगक्षेमाद् ( योगक्षेमनिमित्त* ) प्रेयः ( वित्तादि ) वृणीते ॥ २ ॥

श्रेय और प्रेय | [ परस्पर मिलितसे होकर ] मनुष्यको प्राप्त होते हैं । उन दोनोंको बुद्धिमान् पुरुष भलीभांति विचारकर श्रेयको श्रेय करता है । विवेकी पुरुष प्रेयके सामने श्रेयका ही वररण करता है, किन्तु मन्तबुद्धि पुरुष योगक्षेमके लिए प्रेयका वररण करता है ॥ २ ॥

सत्यं स्वायत्ते तथापि साधनतः फलतश्र मन्तबुद्धीनां दुर्विवेकरूपे सती व्यामिश्रीभूते इव मनुष्यमेतं पुरुषसमा इतः प्राप्नुंतः श्रेयक्ष प्रेयश्च । ऋषतों हंस इवाम्भसः पयस्तौ श्रेयःप्रेयःपदाथौं सम्परीत्य सम्यक्परिगम्य मनसालोच्य गुरुतरागवं विविनक्ति पृथक्करोति धीरो धीमान् । विविच्य च श्रेयो हि श्रेय एवार्भिवृणीते प्रेयसोऽड्यहितत्वात् । कौटस्थौ? धीरः! यस्तु मन्तोऽल्पबुद्धिः

यह बात ठीक है कि वे दोनों मनुष्यके श्रधीन हैं, तो भी श्रेय और प्रेय मन्तबुद्धि पुरुषोंके लिए साधन और फलकी दृष्टिसे भ्रांतिकठिनतासे पृथक् होने योग्य परस्पर मिले हुएसे ही इस मनुष्य-जीवको प्राप्त होते हैं, ऋतः सुतरां धीर पुरुष जलसे पृहक् को प्रहण करनेवाले हंसके समान श्रेय और प्रेय पदार्थोंका भली प्रकार परिगमन-मनसे आलोचनकर गौरव और लाघवका विवेक-पृथक्करण करता है । इस प्रकार श्रेयका विवे-चन कर वह प्रेयकी श्र्रपेक्षा श्रेष्ठ होनेके कारण श्रेयका ही ग्रहण करता है ।

सत्यानन्ददीपिका

यज्ञादि कमौंनुठानमें श्रेष्ठ, श्रधिकार श्रादिका ही श्रधिकार है । यदि धनादिकी शक्ति है तो निकृष्ट जाति श्रादि होनेसे यज्ञादि कमौंमें उसका श्रधिकार नहीं है । यदि श्राह्मण्यादि श्रादि उत्तम जाति है तो यज्ञादि श्रंपादन करनेमें धन श्रादिका सामर्थ्य नहीं है । यदि सब प्रकारके सामर्थ्य श्रौर श्रधिकार श्रादि भी हैं तो कमौंनुठानमें परिश्रम श्रधिंक श्रौर फल श्रल्प-ग्रनितय दु:ख मिश्रित है, किन्तु विद्या प्राप्त होनेपर श्राविद्याकी निवृत्ति होनेसे दु:खकी श्राथन्त निवृत्ति एवं परमानन्दरूप नित्य सिद्ध मोक्षकी प्राप्तिमें कोई परिश्रम नहीं है, इस प्रकार गौरव श्रौर लाघवका विचार कर मोक्षार्थी श्र्रेयका ही समर्पादन करता है ॥ २ ॥

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स विवेकासामर्थ्ययोगरत्नेमायोगरत्नेमनिमित्तं शारीरारूपचयरत्नगतानिमित्तमिल्ये-तत्स्रेयः पशुपुत्रादिलच्त्रयं दृप्तीतॆ ॥ २ ॥

स त्वं प्रियान्प्रियरुपाᳫँश कामानभिध्यायश्चिकेतोदित्यसाक्षीः । नैताᳫँसृतᳫँ वित्तमयीमवासो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥३॥

है नचिकेता ! उस त्वं [ मधा प्रलोभ्यमानोऽपि ] प्रियान् ( प्रीतिप्रदातॄन् पुत्रादीᳫँ ) प्रियहूपान् च ( स्वभावतो रमणीयान् च ) कामान्त् ( काम्यमानान् भोगान्‍ ) श्रमिध्यायन् ( धनित्यसनेन चिन्तयन् ) श्रात्मसाक्षीः ( श्यकत्वात् श्रमि ) वित्तामयीं ( धनप्रायाम् ) एतां ( सᳫँरहिततराᳫँ ) सृतᳫँ ( मालां ) न स्वासीत् ( न स्वीकृतवानसि ) बहवो मनुष्याः यस्यां मज्जन्ति ( सोदनन्ति ) ॥ ३ ॥

है नचिकेत ! उस तुने पुत्रवित्तादि प्रिय तथा प्रीष्षरा श्रादि प्रियरूप भोगोंᳫँक उनका घ्रसारत्व चिन्तनकर त्याग दिया है । जिसमें बहुतसे मनुष्य डूब जाते हैं उस धनप्राया निमिᳫँद गतिको तू प्राप्त नहीं हुवा ॥ ३ ॥

स त्वं पुनः पुनर्मेया प्रलोभ्यममानोऽपि प्रियान्मुत्रादीᳫँन्प्रियरुपाᳫँश्राप्सर प्रभृतीलच्त्रयाश्रकामानभिध्यायᳫँश्चिन्तितयᳫँस्तेपामनित्यतावासरत्वादिदोषाᳫँ है नचि केतोडत्यस्नाक्षी त्वं । नैतासमवाप्तभोगान्न सृतᳫँ सृतीᳫँ कुत्रितस्तां मूढजनप्रवृत्तां वित्तमयीं धनप्रायाम् । यस्यां सृतौ मज्जानि सोदनन्ति चेहवोडनेके मूढा मनुष्याः ॥ ३ ॥

तयोः श्रेय श्राददानस्य साधु भवति होतेऽर्थोᳫ उ प्रेयो दृप्तीत इत्युक्त तत्कसमाद्यतः—

परन्तु वह कौन है ? बुᳫँद्धिमान् व्यक्ति । इसके विपरीत जो श्रल्प बुद्धि है वह विवेक सामर्थ्यका श्रभाव होनेके कारण योगक्षेमके निमित्त-शारीर श्रादिकी वृद्धि तथा रक्षादि के लिए पशु पुत्र श्रादि रूप उस प्रेयका ही वरᳫा करता है ॥ २ ॥

है नचिकेता ! यह तेरी बुᳫँद्धिमत्ता है जो कि जिस तुमने मेरे द्वारा बारम्बार प्रलोभित करके जानबूझकर भी पुनादि प्रिय तथा श्रात्मार्ष प्रियरूपमें भोगोंᳫँक उनका धनित्यता-श्रसारता श्रादि दोषोंᳫँक विचारकर परित्याग कर दिया, जिसमें मूढजन प्रवृत्त होते हैं उस चित्तामयी-धनप्राया ( धनप्रचुर ) निमिᳫँद गतिको तू प्राप्त नहीं हुया जिस मार्गमें श्रनेक मूढजन निमग्न हो रहें हैं ॥ ३ ॥

उनमें श्रेयको ग्रहण करनेवालेका शुभ होता है प्रेय जो प्रेयका वरᳫा करता वह स्वार्थसे दूषित हो जाता है, ऐसा जो [ इस वल्लीके प्रथम मᳫँत्रमें ] कहा गया है सो क्योᳫँ ? ( यमराराज कहते हैं ) क्योᳫँकि—

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दूरमेते पिपरीते विषूची श्रविद्या या च विद्देति ज्ञाता । विद्याभीषिषनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोडलोलुपन्त ॥४॥

दूरं दूरेशा महतन्तरेपैते विपरीते श्रन्योंन्ययायृत्तरूपे । विवेकानविवेकात्म-कल्वात्तम: प्रकाशाविव । विषूची विषूच्यो नानागती मिथ्यफलेड संसारमोक्ष-हेतुल्लनेत्लयेतसु । के ते इत्युच्यते या श्रविद्या प्रयोविष्या विद्यात च श्रेयोविपया ज्ञाता निर्ज्ञातावगता परिडते:। तत्न विद्यााभीषिषनं विद्यार्थिनं नचिकेतसं त्वामहं मन्ये । कस्माद्यस्मादविद्वद्बुद्धच श्रप्रलोमिन: कामा श्रप्रसर: प्रभृतयोड बहवोडलो-लुपन्त त्वा त्यां नालोलुपन्त न विच्छलेदं कृतवन्तः श्रेयोमार्गादाल्मोपभोगाभिवाञ्छा-संपादनेन । श्रृतो विद्यार्थिनं श्रेयोमाज्ञानं मन्य इत्यस्मै ।॥ ४ ॥

या श्रविद्या ( श्रेयोविपया ) च विद्या ( श्रेयोविपया ) ज्ञाता, एते दूरं ( प्रतिषयेन ) विपरीते ( श्रन्योंन्यमृथक्स्वभावे ) विषूची ( मिथ्याफले ) नचिकेतसं त्वा ( त्वां ) विद्याभीषिषनं ( विद्याभिलाषिणं ) मन्ये ( जानामि ) [ यतः ] बहव: कामा ( भोगा: ) [ त्वां ] न श्रलोलुपन्त: ( श्रेय: पथाद् न विचलिते कृतवन्त: ) ॥ ४ ॥

जो विद्या और श्रविद्यारूपसे परिज्ञात हैं ये दोनों ही प्रत्यक् विपरीत स्वभाववाली और विपृथक् फलप्रद हैं हैं । इन तुम नचिकेताको विद्यााभिलाषी माना है, क्योंकि बहुत काम भोग भी तुम्हें प्रलोभित श्रथाव श्रेयोमार्गसे विचलित नहीं कर सके ॥ ४ ॥

ये तु संसारभाजनाः- वर्त्माना: स्वयं धीरा: पण्डितंन्यमानाः । दन्द्रम्यमार्गा: परियन्ति मूढा ग्रन्थेनेव नीयमाना यथान्धा: ॥५॥

प्रकाश श्रौर श्रप्रकाशके सनान ये दोनों विवेक श्रौर श्रविवेकरूप होनेसे 'दूरम्' महान् ग्रनतरके साथ विपरीत हैं—परस्पर-एक दूसेरेते व्यावृत्तरूप हैं । विषूची-नानागतिवाले श्रथाव संसार श्रौर मोक्षके हेतु होनेसे विमिन्न फलवाले हैं । वे कौन हैं ? इसपर कहते हैं—जो कि पण्डितोंद्वारा श्रेयको करनेवाली श्रविद्या तथा श्रेयोविपयक विद्यारूपसे जानी गयी हैं । उनमें तुम्हें नचिकेताको विद्यााभिलाषी-विद्यार्थी मानता हूँ । क्यों ? क्योंकि श्रविवेकियोंकी बुद्धिको प्रलोभित करनेवाले श्रप्रसरादि बहुत-से भोग भी तुम्हें लुञ्छ नहीं कर सके—उन्होंने तेरे हृदयमें अपने भोगकी इच्छा उत्पन्न कर तुम्हें श्रेयो-ज्ञानमार्गसे विच्छिन्न-विच्युत नहीं किया, श्रृतः मैं तुम्हें विद्यार्थी-श्रेय पात्र-ग्राधिकारो समभक्ता हूँ, यह माभिप्राय है ॥ ५ ॥

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श्रविद्याथ्याम् अन्‍तरे ( मध्ये ) वल्‍तमानाः स्वयङ्घोराः ( घोरम्‍त: ) पणिडतं मन्यमानाः ( श्राद्मानं पणिडतं च श्रवगण्‍छन्‍त: ) दन्‍द्रम्‍यमानाः ( वक्‍तृतय कुडिलस्‍वभावाः ) मूढाः ( श्रविद्वेकिन: ) परियन्ति ( परिगच्‍छन्‍ति ) धन्‍धैव नौयमानाः ( परिभालिताः ) ग्रन्‍था: यथा ॥ ५ ॥

वे श्रविद्याके भौतर विध्‍यान् श्रपनेको महान् बुद्धिमान् श्रो पणिडत-शाङ्कुरुशाल माननेवाले, कुडिल गतिका श्रवलम्‍बन करनेवाले मूढ पुखव श्रग्रधेसे ही परिचालित ग्रन्‍थेके समान ग्रननेक कुडिल गतियोंको प्राप्त होते हैं ॥ ५ ॥

श्रविद्यायामन्‍तरे मध्‍ये घनीभीरुत इव तमसि वर्तमाना वेष्टच्‍यमानाः पुत्र-पश्‍वादितृष्‍णापाशशरतैः । स्वयङ् वयङ्घोराः प्रज्ञानव्‍न्तः पणिडताः: शाङ्कुरुशालाश्‍चैति मन्‍यमानासते दन्‍द्रम्‍यमानाः श्रत्यर्थं कुडिलामनुसरन्‍तपां गतिमिच्‍छन्‍तो जरामरणा-रोगादिदुःखेः परिणन्‍ति परिगच्‍छन्‍ति मूढा श्रविद्वेकिनोडन्‍धेनैव हस्‍तिविहीनैनैव नीममानां विषमे पथि यथा बहचोडन्‍धा महान्‍तमर्‍थमुच्‍छन्‍ति तद्‍वत् ॥ ५ ॥

श्रत एतच मूढत्‍वात्‍— न साम्परायः प्रतिब्‍हाति बालं प्रमादान्तं वित्‍तमोहेन मूढम् । श्रीयं लोको नास्‍ति पर इति मान्‍नी पुनर्वंशामापद्यतें में ॥ ६ ॥

वे घनीभीरुत ग्रन्‍थकारके समान श्रविद्यामें विध्‍यमान पुत्र, पशु श्रादि सैकड़ों तृष्‍णा पाशोंसे परिवेष्‍टित हुए जिस प्रकार ग्रन्‍धे-हस्‍ति हीनपुखवसे विषममार्गेंमें प्रचालित बहुतसे ग्रन्‍धे महान् ग्रन्‍थश्‍कों प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार 'हूम बडे श्रो- बुद्धिमान् श्रो पणिडत-शाङ्कुरुशाल हैं, इस प्रकार श्रपनेको माननेवाले वे मूढ श्रविद्वेवी पुखव नाना-प्रकारकी ग्रत्‍यान्‍त कुडिल गतियोंकी इच्छा करते हुए जरा, मरन्‍या, रोग श्रादि (जनित) दु:खोंसे सदैव श्रो भटकते रहते हैं ॥ ५ ॥

श्रतएव मूढताके कारण—

सत्यानन्‍ददीपिका

श्रविद्या जन्ति देहादिप्रतियद कार्यकर्‍या मुखच्‍छन्‍ते तादृश्‍याभिमान करनेवाले श्रविद्वेकि-जन संसारके योग्य माने जाते हैं । हस्‍तिहीन व्‍यक्‍तिसे प्रचालित ग्रन्‍थे कण्टकाकीर्णमार्ग, गर्तादिमें गिरकर जैसे महान् क्लेशका श्रनुभव करते हैं, वैसे ही तत्त्वज्ञानरहि‍त हस्‍तिहीन श्रज्ञानीपुरुषसे प्रचालित श्रविद्वेवी जनतोंकी विविध योनियोंको प्रापकर वही दशा होती है । इस विषयमें थेः—

इच्छ्यादेषसमुर्‍थेन द्रन्द्रमोहेन जन्‍तवः । घराविवरसमन्‍नारां कीटानां समतां गताः । यह मन्‍त्र भी है ॥ ५ ॥

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साम्परायः ( परलोकसाधनविशेषः ) बालं ( बालसहायं श्रद्धाविवेकिनं ) वित्तमोहेन ( वित्तनिमित्तेनाविवेकेन ) मूढं ( तमसाच्छन्नं ) श्रतंएव प्रतिमाद्यन्ति ( प्रमाणोपेतं ज्ञानं ) प्रति न भाति ( प्रतीतिविषयो न भवति ) ध्रयं ( हृदयमानः ) लोकः ( मृत्युलोकः ) श्रस्ति, परः ( स्वर्गादिलोकः ) न श्रस्ति, इति मानो पुत्रः पुत्रः मे ( मम यमस्य ) वशाम् ( श्रधीनताम् ) श्रापचते ( श्राधीनोऽस्ति ) ॥ ६ ॥

धनके मोहसे मूढ प्रमादग्रस्त भावविकोको परलोककी सोषण प्रतिभाति नहीं होता 'यह लोक है परलोक नहीं है' ऐसा माननेवाला मुख पुत्रः पुत्रः मेरी श्रधीनताको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥

न साम्परायः प्रतिभाति । सम्पर ईयत इति सम्परायः परलोकस्तत्त्वाप्तिप्रयोजनः साधनविशेषः शास्त्रीयः साम्परायः । स च बालभावविवेकिनं प्रति न प्रतिभाति न प्रकाशते नोपतिष्ठत इत्येतत् । प्रमाणादन्तं प्रमादे कुर्वन्तं पुत्रपश्वादिप्रयोजनेष्वासक्तमनसं तथा वित्तमोहेन वित्तनिमित्तेनाविवेकेन मूढं तमसाच्छन्नं सन्तम् । ध्रयमेव लोको योडयं हृदयमानः सृत्यनिदानादिविशिष्टो नास्ति परोडहश्रो लोक इत्येवं मननशीलो मानो पुत्रः पुनर्जनितवा वशं मद्धीनतामापचते मे मृत्योर्मम । जननमरपपादिलचापादुःखप्रबन्धारूढ एव भवतील्यर्थः । प्रायेण ह्यवैविध्य एव लोकः ॥ ६ ॥

उसे साम्पराय प्रतिभासित नहीं होता । देहपातानन्तर जो सम्यग्ज्ञूपसे प्राप्त किया जाय वह सम्पराय-परलोक है, उसके प्राप्ति प्रयोजनवाला शास्त्रीय साधनविशेष साम्पराय है, वह श्रद्धाविवेकीके प्रति प्रकाशित नहीं होता, क्योंकि वह प्रमादी पुत्र, पशु श्रादि प्रयोजनमें श्रासक्त मनवाला तथा वित्तमोह-घन निमित्तक श्रद्धिवेकसे मूढ ( श्रज्ञानसे श्राधुत ) है श्रथात् वह उसके चित्तके समुपस्थित नहीं होता । यह जो थो, श्रज्ञान पानादि विशिष्ट हृदयमान लोक है बस यही है, इससे श्रग्रन्य श्रहष्ट-स्वर्गादि लोक नहीं है ऐसा माननेवाला मुख पुत्रः पुनर्जन्म लेकर मुख मृत्युकों श्रधीनताको प्राप्त होता है श्रथात् जन्ममरणादिरूप दु;ख प्रवाहपर ही श्रारूढ रहता है पाया । लोग ऐसे ही हैं ॥ ६ ॥

प्रारब्धक्षयानन्तर जो सम्यग्ज्ञूप-परापर ब्रह्मरूप प्राप्त किया जाय वह सम्पराय है उसकी प्राप्ति प्रयोजनवाला जीवन्मुक्तिय ज्ञान श्रथवा श्राकार ध्यानादि साम्पराय है, वह शास्त्रीय साधन विशेष पुत्रादिमें श्रासक्तमनवाले श्रद्धिवेकी पुरषको प्रकाशित नहीं होता श्रथीत पुत्र, पशु श्रादि विषयोंमें श्रासक्त श्रद्धिवेकी पुरुष उस शास्त्रीय साधन विशेषका श्रनुष्ठान नहीं करता । इससे वह विविध यमयातनाआंकों भोगता है । इस विषयमें—

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आत्मज्ञानकी दुर्लमता

यस्तु श्रेयोऽर्थी सहृदेव कश्चिदेवात्मविद्भूत्वति तद्विद्धो यस्मात्— श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः श्रृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्धु: । आश्रयों वक्ता कुशलोडस्य लब्धाऽऽश्रयो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥७॥

यः (ज्ञानार्) बहुभिः (श्रवणैः न लभ्यः) श्रृण्वन्तः अपि बहवः (श्रवणके जना:) यं न विद्धु: (न जानै:) यम् ( आत्मानं ) न विद्धु: (न जानन्ति) श्रस्य (आत्मनः) वक्ता (यथावत्स्वरूपोपदेष्टा ) श्राऽऽश्रयः: (दुर्लभः ) श्रस्य ( आत्मनः ) लब्धा, कुशाल (निपुणः ) कुशलानुशिष्टः (कुशलेन श्राचार्येण उपदिष्टः ) ज्ञाता (बोध्ता ) श्राऽऽश्रयः: (दुर्लभः ) [ प्रस्ति ] ॥ ७ ॥

जो बहुतोंको सुननेके लिए भी प्राप्त होने योग्य नहीं हैं, जिसे बहुतसे सुनकर भी नहीं समभ सकते, उस आत्मतत्त्वका उपदेष्टा भी श्राश्रयरूप है, उस आत्माको प्राप्त करनेवाला भी कोई निपुण पुरुष ही होता है तथा कुशल श्राचार्यद्वारा उपदेश किया हुधा ज्ञाता भी श्राश्रयरूप है ॥ ७ ॥

श्रवणायापि श्रवणार्थी श्रोतुमपि यो न लभ्य आत्मा बहुभिरनेकैः श्रृण्वन्नोऽपि बहवोऽनेकैर्नकैः यमात्मानं न विजानीयू: किंचाश्र वक्ताऽपि श्राश्रयोऽदूसुतवदेवानेकेषु कश्चिदेव भवति । तथा श्रुत्वाऽप्यस्य आत्मनः कुशालो निपुण एवानेकेषु लब्धा कश्चिदेव भवति ।

श्रेयकाऽऽभिलाषी तेरें समान तो सहलोंमें कोई ही आत्मवेत्ता होता है, क्योंकि— जो आत्मा श्रवणेकोंको सुननेके लिए भी प्राप्त होने योग्य नहीं है तथा श्रनन्य श्रवणेभ्र शुद्ध चित्तवाले पुरुष जिस आत्माको सुनकर भी नहीं जान पाते । यही नहीं, किन्तु इस आत्मतत्त्वका उपदेष्टा भी श्राश्रयर्ं श्रथात् श्रद्धुत-साँ श्रवणेकोंमें कोई होता है । तथा श्रवणाऽ कर भी इस श्रात्माका लब्धा-प्राप्त करनेवाला तो श्रवणेकोंमें कोई एक निपुण

सत्यानन्ददीपिका

श्राश्रयैरनेकैरपि मूढैर्जन्मानि जन्मानि । मोक्षमप्राप्य कुन्त्यस्तत्तो यान्त्यधमां गतिम् । ( गी० १६।२० ) ऐसों स्मृति भी है ।

ग्राश्रयैरयंवत्प्रप्यति कश्चिदेवाऽऽमार्यवदहदति तथा चान्यः । ग्राह्यैरयंच्चनुमन्यः श्रृणोति शुश्रूषति शुश्रूष्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥' (गी०२।२९)

'कोई इस श्रात्माको श्राश्रयँ-साँ श्रनुभव करता है, कोई श्रात्माको श्राश्रयवत् कधनन करता है, दूसरा उसका श्राश्रयवंत श्रवणण करता है श्रौर सुनकर भी कोई उसे जान नहीं पाता ॥ यह श््रष्त गीतावचन भी है ॥ ७ ॥

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यस्मादाचार्यों ज्ञाता कश्चिद्देव कुशलातुशिष्टः कुशलेन निपुणेनाडचर्येणानु-

, शिष्टः सन् ॥ ७ ॥

कस्मात्—

न नरेशावरेपां प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः । ग्रन्थन्यप्रोक्के गतिरत्त नास्त्यप्यीयान्ह्यतक्यंसरगुप्रमाण्यात् ॥ ५ ॥

एष ( आत्मा ) श्रवणेऽपि ( प्राकृतबुद्धिजनैः ) नरैण ( मनुष्यैः ) प्रोक्तः ( उपदिष्टः ) सुविज्ञेयः ( सम्यग्ज्ञातुं शक्यः ) न भवति । बहुधा ( श्रुतिः नास्ति इत्याद्यनेकप्रकारेण ) चिन्त्यमानः [ वादिभिः ], ग्रन्थन्यप्रोक्ते ( ग्रप्रथदर्शनेन श्रुताचार्येण उपदिष्टे ) ग्रन्थ ( ग्रात्मनि ) गतिः ( ग्राप्तिः नास्ति इत्यादितमका चिन्ता ) नास्ति, हि ( यस्मात् ) श्रुत्युप्रमाण्यात् ( श्रुतिप्रमाणतोऽतिप्र ) श्रुत्यीयान् ( प्रतिसूक्ष्मः ) अतक्यं ( तर्का- विषयः ) ॥ ५ ॥

वादियोंद्वारा कई प्रकारसे कल्पित किया हुया यह श्रात्मा साधाररग बुद्धिवाले पुरुषसे उपदिष्ट होनेपर सम्यग्ज्ञान गोचर नहीं हो सकताः क्योकि, श्रभेददर्शी श्राचार्यّ द्वारा उपदिष्ट इस श्रात्मामें श्राप्ति नास्ति श्रादिरूप गति-चिन्ता नहीं है, क्योंकि यह सूक्ष्मपरमार्थविषयोंमें भी सूक्ष्म द्वार तत्वोपदेश-शून्यनय है ॥ ५ ॥

न हि नरेशा मनुष्येषावरेपां प्रोक्तोऽवरेषा हीनेन माक्तबुद्धिना इत्येतदुक्तं एष श्रात्मा यं त्वं मां पृच्छसि । न हि सुष्ठु सम्यग्विज्ञेयो विज्ञातुं शक्यो

पुरुष ही होता है, क्योंकि श्रात्मदर्शनमें कुशल श्राचार्यंद्वारा उपदिष्ट हुया ज्ञाता भी ग्राश्र्यरूप कोई ही होता है ॥ ७ ॥

क्योकि—

यह श्रात्मा तुम मुभसे जिसके विषयमें पूछते हो, किसी श्रवर-हीन-साधाररग बुद्धिवाले मनुष्यसे उपदिष्ट होनेपर सम्यग्ज्ञानसे जानने योग्य नहीं होता, क्योंकि वह प्राप्ति नास्ति कर्ता श्रकर्त्तां श्र्रकत्तः शुद्ध श्रशुद्ध इत्यादि श्रनेक प्रकारसे वादियोंद्वारा चिन्तन

मनुष्यारणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥ (गी० ७१३) सहस्र-श्रनेक मनुष्योंमें तत्वज्ञानरूप सिद्धके लिए कोई विशेष ही यत्न करता है । उन यत्नशील सिद्धोंमें भी मुझे यथार्थरूपसे कोई भाख्यशाली ही जानता है ॥'

'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्समित्पारिणः । श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठं' ( मु० ११२१२ ) इत्यादि श्रुतिके श्रनुसार श्राचार्यंद्वारा उपदिष्ट श्रात्मा साधन- चतुष्ट्य सम्पन्न श्रात्मजिज्ञासुसे ज्ञात व प्राप्त हो सकता है, किन्तु प्राकृतबुद्धिना-'प्रकृतिच-

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४८.

कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [ श्लो० १

यस्माद् बहुधास्ति नास्ति कर्ताकर्ता शुद्धोडशुद्ध इत्याद्यनेकधा चिन्त्यथमानो वादिभिः। कथं पुनः सुविज्ञेय इत्युच्यते—ऽथनन्यप्रेक्षेतनन्येनापूर्वगर्दशिनाSSचार्येण प्रतिपाद्यत्रह्मात्मभूतेन प्रोक्त उक्त श्रात्मनि गतिरनेकधास्ति नास्तीतिवादिलत्प्राप् चिन्ता गतिरत्रास्मिन्नात्मनि नास्ति न विवर्ते सर्वैकलपरगतिप्रत्यस्तमितत्व-

दात्त्वन्। श्रथवा स्वात्मभूतेऽनन्यस्मिन्नात्मनि प्रोक्तेऽनन्यप्रोक्ते गतिरत्रान्याव-

गतिननास्ति इत्यस्याऽनन्यस्माद्वान्। ज्ञानस्य ह्युपरि निष्ठा यदात्मैकत्वविज्ञानेन। श्रात्मोऽवगन्तव्याभावान्न गतिरत्राशिष्यते। संसारगतिवद् अनन्य श्रात्मनि प्रोक्ते तान्तरीयकत्वात् द्विज्ञानफलस्य मोक्षस्य। श्रथवा प्रोच्यमानब्रह्मात्मभूते-

प्रोक्ते श्रात्मन्यगतिरनवबोधोऽपरिज्ञानमात्रे नास्ति। भवत्येवावगति-

स्तद्विषया श्रोतुस्तदस्य ह्मित्याचार्यस्यैवेल्यर्थः। एवं सुविज्ञेय श्रात्माऽSशास-

किया जाता है। तो पुनः यह सम्प्रदायसे विशिष्ट कैसे हो सकता है? इसपर कहते हैं—

ग्रन्थ्यप्रोक्ते—वेदान्त प्रतिपाद्य ब्रह्मस्वरूपको श्रात्मरूपसे प्राप्त हुए श्राप्रतिगद्दी-ग्रभेददर्शी

ग्राचार्यद्वारा कहे हुए इस श्रात्मामें श्रस्ति नास्ति (है वा नहीं ) इत्यादि रूप गति-

चिन्ता नहीं है, क्योंकि श्रात्मा समस्त विल्कल्पोंकी गतिसे रहित है।

ग्रथवा [‘गतिरनास्ति’ इसका यह श्रर्थ भी हो सकता है।] ग्रन्थ्यप्रोक्ते-

ग्रापने नय्यादिसूत्र ग्रन्थन्य श्रात्माका ग्राचार्यद्वारा उपदेश किये जानेपर ग्रन्थ्य गतित-

ग्रगति श्रर्थात् ग्रनन्य वस्तुका ज्ञान नहीं होता, क्योंकि ग्रन्थ्य श्रेयोवस्तुका श्रभाव

है। जो श्रात्माका एकत्व विज्ञान है यही ज्ञानकी पराकाष्ठा है। ज्ञातः जानने

योग्य वस्तुका श्रभाव होनेसे पुनः यहाँ कोई ग्रन्थ्यगति नहीं रहती। ग्रथवा ग्रन्थन्य-

स्वरूपपूत श्रात्माका उपदेश किये जानेपर सांसारकी गति नहीं रहती, क्योंकि उस

ग्रात्मविज्ञानका मोक्षरूप फल तो उसके ग्रनन्तर श्रावश्यकमावी है।

ग्रथवा ग्रागे कहे जानेवाले ब्रह्मात्मभूत प्राचार्यद्वारा उपदिष्ट इस श्रात्मामें पुनः

ग्रगति-ग्रनवबोध-ग्रपरिज्ञान नहीं रहता ग्राचार्यके समान उस श्रोताको भी

यह श्रारमविवेक ज्ञान हो ही जाता है कि ‘वह ब्रह्म मैं हूँ’ यह श्रर्थ है। इस प्रकार

शाङ्कर श्राचार्यद्वारा ग्रन्थन्यरूपसे उपदिष्ट श्रात्मा सुविज्ञेय होता है, नहीं तो श्रर्थात्

सत्यानन्ददीपिका

श्रागतेऽपि पश्वाद्विध्यभिमानरूपा बुद्धिरस्य सः ‘प्राकृतस्मुबुद्धिस्तेन’ ‘प्रकृतिसे प्राप्त पशु श्रादि

की सी बुद्धिवाला श्रथवा देहाश्मबुद्धिवाला मनुष्य प्रकृतबुद्धि कहलाता है, उससे उपदिष्ट

ग्रात्मा सुविज्ञेय नहीं होता’ चार्वाककेसिवा श्रास्तिक सांख्यादि मतोंमें देहपातानन्तर

ग्रात्माका श्रस्तित्व माना गया है, किन्तु उसके स्वरूपमें कुछ विप्रतिपत्तियाँ हैं। जैसे-

सांख्यमतमें श्रात्मा केवल भोक्ता है, नैैयायिक मतमें कर्ता भोक्ता है, कोई श्रात्माको परस्पु

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व० २ ] भाषानुवाद-सत्यानन्ददीपिका ४८

वताइSSचार्यैः श्राननन्यतया प्रोक्तः । इतरथा ह्यात्मीयात्मसुग्रामादौपि सक्पद्यत आत्मा । श्रात्मकृत्म्मतत्कृतः स्वबुद्ध्याSSहृत्योहेन केशलेन तर्केण, तर्क्येस्रभेद्यपरिमार्गे केनचित्स्थापित आत्मनि ततो ह्यात्मुतरमन्योSन्योध्यूर्हति ततोSन्योन्योद्गुतममिति न हि कुतर्कस्य निष्ठा कचिद्विद्यते ॥ ५ ॥

नैषा तर्केण मतिरापनेेया प्रोक्तार्येनैव सुज्ञानेन तेष ।

यां त्वमापः सत्यधृतिबंतासि स्वाहृदनो भूयात्राचिकेतः: प्रष्टः ॥५॥

हे प्रेष्ठ ! ( प्रियतम ! ) त्वं यां ( मतिम् ) ग्रापः ( प्राप्तवानसि ) एषा मतिः तक्रेण ( स्वबुद्धिपरिकल्पितेन ) न ग्रापनेया ( न प्राप्या चां न हातव्या ) ग्रन्येन ( बह्मखोडनन्योऽहमिति जानता श्रात्मविल्यं ) प्रोक्ता ( तदुपदेशज्ञया ) सुज्ञानेन ( सम्यग्ज्ञानेन ) [ भवति ] हे नचिकेतः ! सत्यधृतिः ग्रासि, बत ( ग्रनुकम्पायां ) त्वाहक ( तवतुल्यः ) प्रष्टा ( पृच्छकः ) नो ( न श्रात्मस्थं ) भूयाद ( भवेत् ) ॥ ५ ॥

हे प्रियतम ! सम्यग्ज्ञानके लिये शुद्ध तर्कोंकसे भिन्न श्रास्वाद्य ग्राचायंद्वारा उपदिष्ट-प्रतिपादित यह बुद्धि जिसे तू प्राप्त हुया है, शास्त्र ह्यसम्पत् तर्कैसे प्राम होने योग्य नहीं है । ग्राहो, तू सद्गुराधारख्यवाला है । हे नचिकेता ! हमें तेरे समान प्रश्नकर्ता प्राप्त हो ॥ ५ ॥

भेददर्शी ग्राचायंद्वारा उपदिष्ट तो यह ब्रसुप्रमाण यस्तुग्रोंसे भी ब्रसुप्र-सूक्ष्म हो जाता है प्रयंन्त ज्ञात नहीं होता । श्रग्रणी बुद्धिसे उत्पन्न-ग्रारोपित केवल तर्कैसे भी इसका यथार्थज्ञान नहीं हो सकता । यदि कोई पुरष तर्कद्वारा तर्किंत ब्रसुपरिमार्ग ग्रात्माको स्थापित भी करे तो अन्य उसे तर्कैसे ब्रस्मुतर, उसे भी अन्य उसे तर्कैसे ब्रस्मुतम स्थापित कर देगा, क्योंकि कुतर्ककी दृष्टि कहीं भी नहीं है ॥ ५ ॥

सत्यानन्ददीपिका

कोई मध्यम परिमार्ग, कोई विष्णु, कोई जड़, कोई चेतन, कोई उभयात्मक ग्रादि मानते हैं । चार्वॉक जीवित देहको ही श्रात्मा कहते हैं । इत्यादि कल्पनाएँ ब्रह्मभूत श्रात्मामें नहीं हैं, क्योंकि श्रात्मा निर्विकल्प है । 'श्रृणु नह्यास्मि' इस प्रकार श्रात्माका ज्ञान होनेपर श्रन्य वस्तुका ज्ञान नहीं रहता, क्योंकि 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' 'नेह नानास्ति किञ्चन' 'नाड्योऽस्ति दृष्टा' इत्यादि श्रुतियां ब्रह्मात्मैकत्वे प्रतिरिक्त जोयवस्तुका ग्रभाव प्रतिपादन करती हैं । श्रथवा श्रुति-भेददर्शनो गुहद्वारा ब्रह्मात्मैकत्वका उपदेश किये जानेपर श्रात्मामें पुनः संसारका सद्रूपसे श्रववास नहीं होता, यदि होता है तो वह मी मध्यादूपसे 'श्रोतव्यो मन्तव्य:' इस प्रकार यद्यपि श्रुतिमें श्रुति सह्हाय तर्कका स्थान है तो भी श्रुति-सह्हाय तर्को कुतर्क कहा गया है, 'तर्काप्रतिष्ठानाद' ( बृ० सू० २।१।११ ) इस सूत्रमें

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छ्रतोऽन्यप्रोक्तं श्रात्मन्युत्तमंस्थां येयंमागमप्रतिपाद्यात्ममतिनैपाश तक्रेऽपि स्वबुद्धथ्यसूत्रमात्रेयापनेया न प्राप्यतेयर्थः। नापनेतव्या वा न हातव्या तार्किको ह्यनारम्भः स्वबुद्धिपरिकल्पितं यत्किचिद्धिदेव कथयति। छ्रत एव च येयंमागमप्रभूता मतिरन्यैर्नैवागमााभिज्ञैराऽऽचार्यैरैव तार्किकैरप्रोक्ता सती तुश्शानाम्य भवति हे प्रेष्ठ पियतम। का पनः सा तर्कागम्या मतिरिद्यचच्यते-यां त्वं मतिं मद्रप्रदानैनेनाऽऽप: प्राप्नवानसि। सत्यार्थविधयविषया धृतिर्यस्य त्वं सत्यधृतिरितिर्वता सील्यनुकम्पयप्राप्ताह मृत्युर्‌ञ्चिकेतसं वच्यमाणाविज्ञानस्तुतये । त्वाऽऽकृत्वतुल्यो नः ऽ्रमस्मभ्यं भुयाद्द्वाद्वाताद्‌द्वचवन्यः पुत्रः शिष्यो वा प्रष्टा, कीदृग्यादृक्ल्वं हे नचिकेतः प्रष्टा ॥ ५ ॥

पुनरपि तुष्ट आह—

श्रत: श्रवेदवर्शिना श्राचार्यद्वारा उपदिष्ट श्रात्मामें उपस्थित जो यह शास्त्र प्रतिपाद्य श्रात्मविषयक मति है, वह तर्कसे—अपनी बुद्धिके उद्धापोह—माग्रसे प्राप्त होने योग्य नहीं है यह श्रर्थ है, श्रथवा यह श्रात्मविषयक बुद्धि तर्कसे प्राप्तनेतव्य—बाधयोग्य नहीं है, क्योंकि तो श्रनात्ममेकत्व प्रतिपादक शास्त्रके श्रनभिज्ञ होता है, वह श्रपनी बुद्धि से परिकल्पित जो कुछ चाहे कहना रहता है । 'श्रत: हे प्रष्ट—प्रष्टतम ! यह जो शास्त्र जनित बुद्धि है वह यदि तार्किकसे—भिन्न श्राचार्यके प्रतिपादक शास्त्रके ज्ञाता श्राचार्यं द्वारा उपदिष्ट हो तो सभ्यग्ज्ञानके—श्रनात्मैकत्व ज्ञानके लिए होती है । श्रच्छा तो फिर तर्कसे प्राप्त न होने योग्य वह बुद्धि—ज्ञान कौन—सी है ? इसपर कहते हैं—जिस मतिको तूने मेरे वर प्रदानसे प्राप्त किया है । सत्य—यथार्थ पदाथों विषयक धृति धारणा है जिसकी ऐसी तू सत्यधृति है । इस प्रकार धनुकम्पा करते हुए यमराज श्राने कहे जाने वाले विज्ञानकी स्तुतिके लिए नचिकेतासे कहते हैं—हे नचिकेता ! हमें तेरे समान प्रश्न—कर्ता श्रोत्र भी पुत्र वा शिष्य हो जैंसा कि तू प्रश्न करनेवाला है ॥ ५ ॥

सत्याऽऽनन्दीपिका

बादरायण महर्षिने श्रुति ऋसहाय तर्कक्फी द्वप्रतिष्ठा कही है, श्रतएव श्रुतत्व तर्केंका श्राविषय होनेसे प्राप्ताको प्रतकर्य कहा गया है ॥ ५ ॥

'तत्त्वमसि, श्रहं ब्रह्मास्मि, ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति, तस्मिन् शोकमात्रंनिवृत्‌' इत्यादि श्रुति जनित श्रात्मैकत्व ज्ञान केवल बुद्धि जन्य तर्कसे प्राप्य नहीं है श्रथवा किसी तर्क द्वारा बाध्य भी नहीं है, श्रत: श्रवेदवर्शिना श्राचार्यद्वारा उपदिष्ट तत्त्वज्ञान ही प्रारम्भ—सार्कारका हेतु है 'तर्कप्रतिष्ठानात्' ( न० सू० २।१।११ ) इस सूत्रसे भी धृति भस— ह्वाय तर्क अप्रतिष्ठित कहा गया"है ॥ ६ ॥

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बो २] भाषानुवाद-सत्यानन्ददीपिका

जानाम्यहँ शौचधिरित्यनित्यं न हि कामुकेः । म्रक्ष्यते हि ध्रुवं तत् ।

ततो मया नाचिकेतश्वितोडग्निरनित्यैरप्यैश्वर्यप्राप्त्यर्थम् । प्राणत्यागं नित्यम् । १०१

शौचधि: ( निधि:-कर्मफललक्षणः ) श्रानित्येऽपि ( श्रानित्ये ) द्रौतं श्रहं जानामि । हि ( यतः ) ध्रुवं ( शाश्वतं तत् -नित्यं ) श्रध्रुवं ( अनित्यं ) श्रानित्यैर्द्रव्यैः ( चयनसाधनैः ) नाचिकेतः श्रनिनः ( नित्योऽनित्योः विरोधेनः ) चित्तं ( सम्पादितः ) [ तेन ] निरयम् ( श्रापेक्षिकनित्यं याम्यपदं ) प्राप्नवानस्मि ।। १० ।।

मैं यह जानता हूँ कि कर्मफलरूप निधि श्रनित्य है, क्योंकि श्रनित्य साधनोंद्वारा वह नित्य ( शाश्वातमा ) प्राप्त नहीं किया जा सकता । तब मेरेद्वारा नाचिकेत श्रधिनका चयन किया गया, उन श्रनित्यद्रव्योंसे ही मैं [ श्रापेक्षिक ] नित्य ( याम्यपद ) को प्राप्त हुवा हूँ ।। १० ।।

जानाम्यहँ शौचधिनिधि: कर्मफललद्रूपो निधिरिव प्रार्थ्यत इति । श्रसावेनित्यमनित्य इति जानामि । न हि यसमादनित्यै: श्रध्रुवैवैनित्यं ध्रुवं तप्राप्यते परमात्मैकव्य: शौचधि: । यस्वनित्यसुखवात्मक: ' शौचधि: स एवानित्यैद्रव्यै:

कर्मफलरूप निधि ही 'शौचधि' है वह वह निधिके समान प्रार्थित है, यह श्रनित्य है ऐसा मैं जानता हूँ, क्योंकि इन श्रनित्य यज्ञादि साधनोंसे वह परमात्मा नामक नित्य-शाश्वत निधि प्राप्त नहीं की जा सकती । जो श्रनित्य सुखात्मक निधि है वह श्रनित्य

सत्यानन्ददीपिका

स्वर्गादिके साधनभूत यज्ञादि कर्म ग्रसयधिक प्रयत्न साध्य हैं, ऐसा मैं जानता हूँ, परन्तु तुमने उस कर्मका फल भी ग्रहण नहीं किया, इससे तुम मुखसे भी श्रधिक प्रज्ञ हो, इस प्रकार सन्तुष्ट होकर तुमने फिर कहा....

यद्यापि 'शौचधि' शब्द निधिका पर्याय है तो भी कामना विषयस्व गुरण योगसे 'शौव धि' शब्द कर्मफलमें भी विधमान है 'तद्यथेह कर्मंजितो लोकः क्षीयते एवमेवामुन् पुण्यजितो लोक: नाश्रयकृतक्रतै:' ( छा० ८।१।६ ) ( जैसे हस्त पाद श्रादि क्रियाश्रोंसे सम्पादित

मेह लोक-पदाथौं दोषी हो जाता है वैसे ही पुण्यकर्मसे सम्पादित स्वर्गादि लोक भी नष्ट हो जाता है, पता: श्रकृतनित्य यज्ञादि-कर्मसे सम्पादित नहीं होता ) 'एतच्छ्रेयो येडभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापियन्ति' ( जो प्रेय पदार्थो श्रेय मानकर प्रसन्न

होते हैं वे मूढ पुनरपि जरा मृत्युको प्राप्त होते हैं ) 'क्षीरो पुण्य मस्यान्ति' ( पू० ८।२१ ) ( पुण्यक्षीण हो जानेपर पुनः मृत्युलोकको प्राप्त होते हैं ) 'गतागतं कामकामा लभन्ते' ( गी० ह।२१ ) ( विषयभोगोंकी कामनावाले गमनागमनको प्राप्त

करते हैं ) इत्यादि श्रुति स्मृति कमंफल स्वर्ग श्रादि सुखको श्रनित्य कहतीं हैं । श्रतः

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प्राप्यते। हि यतस्ततस्तस्मान्मया जानतापि नित्यमनित्यसाधनेनैनं प्राप्त्यत इति नाचिकेतश्रितोऽग्निः। ध्यानित्येऽहर्निशम्: पश्चादिदिवि: स्वर्गस्युसुखसाधनभूतोडग्निर्निर्वर्तित इत्यर्थः। तेनाहमधिकारापन्नोऽस्मि नित्यं यास्यं स्थानं स्वर्गाख्यं नित्यमापेक्षिकं प्राप्तवानस्मि ॥ १० ॥

नाचिकेतस्त्र्याग्निं प्रपञ्चे।

कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां कृतोर्नास्त्यमभयस्य पारम् । स्तोममहदुग्रगायं प्रतिष्ठां हृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोज्ज्वलत्क्षीः १ ९

हे नचिकेता ! [ त्वं ] धृत्या ( धैर्येण ) धीरः ( धैर्यवान् सन् ) कामस्य ( कामि-लक्षितार्थस्य ) ध्यान्तिं ( समापत्तिं ) जगतः प्रतिष्ठां ( श्राश्रयं ) क्रतोः ( यज्ञस्य वा उपासनाया: ) अनन्त्यम् ( अनन्तफलम् ) अभयस्य पारं ( परां निष्ठां ) स्तोममहदुग्रं ( स्तोमे: स्तुतिं, महत्-महाराजिमवादिस्वर्यमयम् ) उत्कायै ( प्रकाशते ) प्रतिष्ठां ( श्राश्रयं ) दृष्ट्वा ( विचार्य ) नचिकेतोज्ज्वलत्क्षीः ( त्यक्तस्वानसि ) ॥ १९ ॥

हे चचिकेता ! तूने बुद्धिमान् होकर भोगोंकी प्राप्ति-समाप्तिको, क्योंकि इस मर्त्यलोके श्रनित्यत्वे, भोगानां परिणामित्वात्, स्वल्पो धीर: महता श्रशुभादिदुःखविपरीतया गति तथा प्रतिष्ठाकी देखकर-विचारकर भी उक्के धैर्य पूर्वक त्याग दिया ॥ १९ ॥

त्वं तु कामस्याप्तिं समासिम, अचिन्तैवेहैव सर्वे कामाः परिक्षमाप्ताः, जगतः साध्यात्माधिमूताधिदैवैः: प्रतिष्ठामाश्रयैः सर्वात्मकत्वात्, क्रतोः फलं हैरययगर्भं

द्रव्योंसे प्राप्त की जाती है, क्योंकि श्रनित्य साधनोंसे नित्यकों प्राप्ति नहीं होती ऐसा जानतें हुये भी मैंने नाचिकेत श्रग्निका चयन किया श्रर्थात् पुनः श्रादि श्रनित्य द्रव्योंसे स्वर्ग सुखैक साधन भूत श्रग्निका सम्पादन किया, यह श्रर्थ है। उससे मैं श्रधिकार संपन्न हो धापेक्षिक नित्य स्वर्ग नामक यास्यस्थानको प्राप्त हुये हैं ॥ १० ॥

हे नचिकेता ! तूने तो बुद्धिमान् हो भोगोंकी प्राप्ति-समाप्तिको, क्योंकि इस [ हिरण्यगर्भं ] में ही सम्पूर्ण कामनाएँ समाप्त होती हैं तथा सर्वात्मक होनेके कारण

सत्यानन्ददीपिका

कर्म और उपासना का फल जन्य होनेसे श्रनित्य है, इसलिए यज्ञादि कर्मंजनन्य यास्यपद भी श्रनित्य है, उसमें नित्यशब्दका प्रयोग श्रस्मदादिलोकोंकी श्रपेक्षा श्रधिक काल स्थायी होनेसे किया गया है । वस्तुतः श्रात्ममैवय ज्ञानसे ही श्रात्मसाक्षात्काररूप नित्य फल प्राप्त होता है ॥ १० ॥

हिरण्यगर्भंपदसे भी विरक्त पुरुषका हो श्रात्मविद्यामें श्रधिकर है, इसको दिखलानेके लिए यमराज नचिकेताकी 'त्वं' श्रादिसे प्रशंसा करते हैं । समष्टि सूक्ष्म दृष्टिके

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व० २ ]

भाषानुवाद-सत्यानन्ददीपिका

५३

पद्मनत्न्यसमानत्न्यम्, ब्रह्मयस्य च पारं परां निष्ठाम्, स्तोमं स्तुत्यं महादरिममा-वैशार्याभ्यानेकगुणासंहतं स्तोमं च तन्महद्ध निरतिशयत्यास्तोमसहत्त, उरगनायं विस्स्तीर्यां गतिम्, प्रतिष्ठां स्रिथातिमात्मनोऽनुत्तमामपि दृश्यां धृत्या धैर्येण धीरो धीमानन्नचिकेतोज्ज्वलसराध्ची: परमेश्वाकांन्नतिसृप्टवानसि खर्व्वमेतत्संसारयोग-जातम्। ग्राहो वताऽऽनुच्तमगुरूप्रसादि ॥ ११ ॥

य त्वं ज्ञानुमिच्छसि यात्मानम्---

आत्मज्ञानकाः फल

तं दुर्दर्शं गूढमरुपविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराराम् । ग्राद्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्या धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥१२॥

दुर्दर्शं ( दुःखेन द्रष्टुं शाक्यं ) गूढम् ( ग्रनभिव्यक्तस्वरूपम् ) ग्रनुपविष्टं ( सर्वंजग- दन्तः प्रविश्टं ) गुहाहितं ( गुहायां स्थितं ) गह्वरेष्ठं ( विषमस्थाने स्थितं ) पुरारामं ( ग्राद्यात्म-ग्राधिभूत एवं ग्राधिदैववदि रुप जगत्की प्रतिष्ठा-प्राश्रयको, यज्ञ-ग्रपसनाके ग्रननत्तय-ग्रानन्त्य ग्रर्थात् ग्रनन्तफल हिरण्यगर्भपदको, ग्राह्यके पार-परानिष्ठ्रको, स्तोम- स्वत्न्य तथा महत्त- ग्राश्रयमादि ऐश्वर्य ग्रादि शक्तेः श्रोतुं योगीन्से युक्त, इस प्रकार जो स्तोम महत्त भी है ऐसे सर्वोत्तम होनेके कारण स्तोम महत्त उरगनाय-विस्तीर्णगति तथा प्रतिष्ठा ग्रपनी उत्तम स्थितिको देखकर भी धैर्य पूर्वक त्याग दिया । केवल परवस्तु-ग्रात्मवस्तुको ग्राकांक्षा करते हुए इस सम्पूर्ण सांसारिक भोग समूहका परित्याग कर दिया । ग्राहो ! तुम ग्रात्म्युत्तम गुरू सम्पन्न हो ॥ ११ ॥

सत्यानन्ददीपिका

ग्राभिमानिको ग्राश्रवा समष्टि सूक्ष्म उपाधिवालेको हिरण्यगर्भ कहा जाता है । 'स प्राशम-सृजत' ( प्रश्न० ६।४ ) 'यो ग्रात्मायं विदधाति पूर्व्वम्' ( कारण मायोपाधि ईश्वरने पहले हिरण्यगर्भको उत्पन्न किया ) इत्यादि श्रुतियां हिरण्यगर्भको प्रथम घारोरे श्रोरे स्थूल जगत्का स्रष्टा कहती हैं । इससे हिरण्यगर्भ में ब्रह्मयारम, ग्राधिभूत तथा ग्राधिदैव संपूर्ण जगत्का कारण होनेसे महत् संबोधक है, क्योंकि कार्य करिशीतलक है । हिरण्यगर्भकी प्राप्तिसे सभी कामनाओंकी प्राप्ति-समाप्ति कही जाती है । हिरण्यगर्भंपदकी प्राप्तिरूप फल भी ग्राप्तेष्टिक ध्यानान्त कहा गया है । 'ग्रनेककालावस्यायि-हिरण्यगर्भंपदं गत्वा इति व्युत्पत्त्या विस्तीर्णांगतिरित्युच्यते' 'ब्रत्यधिक काल स्थायी हिरण्यगर्भंपदको प्राप्त किया जाता है इस व्युत्पत्तिसे विस्तीर्ण गति कही जाती है' हिरण्यगर्भंपद पर्यन्त सम्पस्त भोग्य समुदायको ग्रननित्य, ग्रसारहष्टिसे त्याग करने वाला नचिकेता वस्तुतः प्रकाशान्नीय है । ब्रह्मविद्याके लिए ऐसा ही ग्राधिकारी उपयुक्त है ॥११॥

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कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य

[अ० १

( सनावत् ) तं देखें श्रद्धयात्मयोगाधिगमेन मत्वा ( ज्ञात्वा ) धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥

कठिनतासे दीख पड़नेवाले, श्रनुभव्यतत्स्वरूप, सर्वान्तः प्रविश्ट, बुद्धिरूपो गुद्दोमें स्थित, विषय स्थानमें स्थित, पुरातन, प्रकारूप उस परमात्मदेवको श्रद्धात्मयोगद्वारा जानकर धीर-ज्ञानी पुरुष हर्ष शोकका त्याग करता है ॥ १२ ॥

तं दुर्दर्शं गुह्येन दर्शनमसयैति दुर्दर्शोऽतिसूक्ष्मत्वात्, गूढ़ं गहनमनुप्रविष्टं प्राकृतविषयविकारविचारविज्ञानैः प्रच्छन्नमिल्येततं, गुहागहितिं गुहायां बुद्धौ स्थितं तत्रोपल॑भ्यमानत्वात्, गह्वरेष्ठं गह्वरे विषमेऽनेकानर्थसंकटे तृष्णातीति गह्वरेष्टम् । यत् एवं गूढमरुप्रविष्टो गुहागहितंश्रातो गह्वरेष्टः । तं पुराणं पुरातनमश्र्यात्मयोगाधिगमेन विपयेप्टचःः प्रतिसंहृत्य चेतः श्रात्मनि समाधानम्‌ध्यात्मयोगस्तस्याधिगमस्तेन मत्वा देवमात्मानं धीरो हर्षशोकावात्मन् उत्कर्षी पकर्षयोत् श्रभावाज्जहाति ॥ १२ ॥

जिस श्रात्माको तुम जानना चाहते हो, श्रतिसूक्ष्म होनेके कारण दुर्दर्श-जो कठिननतासे दर्शन होने योग्य हो उसे दुर्दर्शी कहते हैं । यह गुढ़-गहन स्थानमें श्रनुप्रविष्ट श्रर्थात् शब्दादि प्राकृत विषय विकाररूप विज्ञानोंसे श्रावृत है । गुढा-बुद्धिमें स्थित होनेसे ही उपलभ्य होता है । तथा गह्वरेष्ट-गहन-विषम-प्रनेक ग्रनर्थोंसे सङ्कुलित तृष्णातीति गह्वरेष्टम् ।

प्रकारके गूढ़ स्थानमें श्रतुप्रविष्ट है श्रोर बुद्धिमें स्थित है, ग्रतः वह गह्वरेष्ट है, गह्वरेष्ट होनेसे ही दुर्दर्शी है । उस पुराण-पुरातन सनातन प्रकारूप श्रात्मदेवको श्रश्रद्धात्मयोगाधिगमेन-चित्तको विषयोंसे हटााकर श्रात्मामें स्थिर कर देना श्रद्धात्मयोग है उसर्के द्वारा जानकर-साक्षात्कारकर धीर पुरुष श्रात्मामें उत्कर्ष, उपकर्षक्‌।

श्रभाव होनेके कारण हर्ष योकका परित्याग कर देता है ॥ १२ ॥

सत्यानन्ददीपिका

इस मन्त्रमें श्रात्मज्ञानका फल कहा जा रहा है—जो तुमने देखेसे मिल श्रात्माने विषयमें प्रश्न किया है उसका परमार्थ स्वरूपज्ञान कारणा सहित संसारका निवर्त्तक्‌।

तथा परमानन्द प्राप्तिका साधन है इससे मित श्र श्रेयका साधन नहीं है । इस प्रकार यमराज पृष्ट वसुक्री प्रश्नसाङ्घारा प्रश्नकर्ता नचिकेताकी भी 'यं त्वं ज्ञातुमिच्छसि हत्सादिसे प्रश्नोंसाङ्घ करते हैं । 'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः' 'ज्ञानदेव तु कैवल्यम्' इत्यादि श्रुतियोंमें भी मोक्षका साधन तत्वज्ञान हो कहा गया है । 'कक्ष्रिन्मां वेधि तत्वतः' (गी० ७१९६) ( मुझे तत्वताः

( गी० ७१३ ) 'बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते' (गी० ७१९९ ) ( मुझे विरला हो जानता है, बहुत जन्मोंके ग्रनन्तर श्रभितम जन्ममें ज्ञानवान् होकर

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किं च—

एतच्छुत्वा संपरीग्रह्य मर्त्यः प्रवृहा धस्म्यमरुमेतमाध्य । स मोदते मोदनीयं हि लब्ध्वा विवृतं सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३ ॥

मर्त्य: ( मनुष्य: ) एतत् ( यह ) श्रुत्वा, धस्म्यम् ( श्रेष्ठम् ) अरुम् ( अत्यन्तदुर्लभम् ) एतम् ( परमात्मानम् ) आध्य ( आत्मनि ) प्रवृढा ( प्रवृत्तः ) संपरीग्रह्य ( श्रद्धावान्‌ सम्यक्‌ उपास्य ) स एनं मोदनीयम् ( श्रात्मानम् ) श्राप्तम् ( प्राप्तः ) हि ( निश्चयेन ) लब्ध्वा ( साक्षात्कृत्य ) मोदते 'नचिकेतसं त्वां प्रति सद्म ( ब्रह्मास्थानं-ब्रह्मास्वरूपं ) विवृतं ( श्रप्रकटद्वारं-श्रप्रकटतद्रूपं ) मन्ये-जानामि ॥ १३ ॥

एतदात्मतत्त्वं यदहं वद्यामि तच्छ्रु त्वाचार्यप्रसादात्सम्यगात्मभावेन परिगृह्योपादाय मर्त्यो मरसाधर्मो धर्मादनपेतं धर्म्यं प्रवृहोध्यम्य पृथकृत्य

इसके सिवा

यह श्रात्मतत्त्व जिसके मैं श्रवण कहूँगा, उसे सुनकर श्राचार्यकी कृपासे भली-भाँति श्रात्मभावसे ग्रहणकर, मरसाधर्मों मनुष्य इस धस्म्य-धर्ममें निष्ठ श्रात्माको शरीरादिसे

सत्यनन्ददीपिका

मुझे-मुफ ब्रह्मास्वरूपको प्राप्त होता है । इस प्रकारकी स्मृति भी श्रात्मदर्शनको प्रसन्नता-

यास साध्य कहती है । यथ्योंकि 'ग्रात्मन् श्राकाशात्' सेनूसूतः' परम सूक्ष्म श्राकाशका भी कारण होनेसे श्रात्मा श्रतिसूक्ष्म है श्रत् दुर्दर्श है । गूढ, श्रनुप्रविष्ट तथा गुहाग्रहितत्व गहरेरेतस्रवमें हेतु हैं श्रौर गहरेरेतस् दुर्दर्शोंमें । यद्यपि श्रात्मा व्यापक है तो भी संस्कृतबुद्धि ही श्रात्मदर्शनका स्थान कहा गया है । श्रपने श्रात्माके उत्कर्षसे सुखादि ग्रन्थके उत्कर्षसे

दुःखादि, श्रपने श्रापकर्षसे दुःखादि श्रौर परापकर्षसे सुखादि इनका श्रात्मचित्तमें प्रभाव है, क्योंकि इसका सम्बन्धघ श्रात्मासे रहता है श्राकाशसे नहीं । 'ग्रसङ्जो हि सृज्यते' (श्रसङ्गो हि नित सृज्यते' इत्यादि श्रुति

ग्रात्माको श्रसङ्ज कहती हैं । श्रतत् 'वरति शोकमस्मवित्' ( श्रात्मवित् शोकसे मुक्त हो जाता है ) यहाँ 'धीर शान्तद्वसे श्रवण, मनन विशिष्ट पुरुषका ग्रहण है, श्रध्यात्मयोग

शब्दसे निदिध्यासन कहा गया है, इस प्रकार वह पुरुष श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन द्वारा श्रात्मसाक्षात्कार कर हर्ष श्रौर योकसे मुक्त हो जाता है ॥ १२ ॥

ग्रात्मतत्त्वज्ञाने संसारके बीजभूत ग्रज्ञानकी निवृत्ति हो जानेपर ब्रह्मवित् पुरुषको

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शारीरदेरेपु सूक्ष्मसमेतमात्मानात्म्य प्राप्य स मर्त्यो विद्धान्मोदते मोदनीयं हर्षेणीयमात्मानं लब्ध्वा । तदेतेदेवंविधं ब्रह्मसद्म भगवान् नचिकेतसं त्वां प्रत्यपाद्वत्तद्वारं विद्यतामभिसुखीभूतं मन्ये मोक्षायै त्वां मन्य इत्यभिप्रायः ॥ १३ ॥

सर्वानन्दोत्सवसुतविषयकं प्रसन्नं

ग्रान्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् ।

ग्रान्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्धद ॥१४॥

धर्माच्च ग्रन्यत्र, श्रधर्माच्च ग्रन्थप्राप्त ( धर्माधर्मोंतोतभिति ) ग्रस्मात्कृताकृतात् ( ऋते-कार्यम्-ऋकृतं कार्यरूपं ग्रस्मात् ) ग्रन्यत्र ( उभयविलक्षणं ) भूताच्च ( भविष्यत; ) च ( वर्तमानात् ) ग्रन्थप्राप्त ( कालत्रयविलक्षणं ) तत् ( प्रसिद्धं ) यत् ( वस्तु ) पद्यसि ( जानासि ) तद्धद ( मह्यामिति शेषः ) ॥ १४ ॥

जो धर्मसे पृथक्, श्रधर्मसे पृथक् तथा इस कार्य कारण रूप प्रपञ्चसे पृथक्

प्रवृत्त्या-उदयम्य-प्रयुक्कर तथा इस ग्रह्यस्य सूक्ष्म ग्रात्माको प्राप्तकर और मोदनीय-हर्ष योग्य ग्रात्माको उपलब्धकर ध्यानानन्द हो जाता है । ऐस प्रकारसे तुझे नचिकेताके प्रति मैं ब्रह्मैव सद्म ब्रह्मासद्म श्रर्थात् ब्रह्म भवन-स्वरूपको खुले द्वारा वाला-ग्रभिमुख हुग्रा मानता हूँ यह है कि तुम्हे मोक्षके योग्य समकता हूँ ॥ १३ ॥

नचिकेता—भगवन् ! यदि मैं योग्य हूँ और ग्राप मुझेवर प्रदान हैं तो—

सत्यामनदीपिका

संसारमें पुनः पहलेएक समान सत्यस्व प्रतोत नहीं होता, प्रत्युत मिथ्यातत्व निश्चित हो जाता है, जैसे स्फटिक मरिणमें जपाकुसुमकी लालिमा । ऐसा दिखलाकर श्रागे श्रानन्दकी प्राप्तिका साधन 'किञ्च' इत्यादिसे कहलाते हैं । 'वक्ष्यामि' इसे 'न जायते' इत्यादिसे १६ वें मन्त्रसे कहेंगे, 'ग्राचार्यवान् पुरुर्षो वेद, समित्पाणिगुरुमेवाभिगच्छेत् श्रोत्रियं महाव्रतनिष्ठं, ग्राचार्याद्देवच विद्या विदिता सादिच्छ्रां प्रापयति, तद्विद्धि प्राजापतेन' ( गी० ४।३४ ) इत्यादि श्रुतिसे स्मृतिसे यहीं सिद्ध होता है कि ऋषिहविद् श्राचार्य द्वारा उपदिष्ट तत्त्वज्ञानसे ब्रास्मसाक्षात्कार होता है ग्रन्थथा नहीं । 'मनुष्यानुचिकरोति शास्त्र' इस वचनसे प्रायः मनुष्यों हीं शास्त्र श्रधिकृत करता है, इस श्रभिप्रायसे मन्त्रमें 'मर्त्यः' शब्दका ग्रहण है । देहादिसे पृथक्‌करणका श्रर्थ निश्चित है और प्राप्तिका ग्रर्थ साक्षात्कार । इससे विद्धान् निरतिशय श्रानन्द स्वरूप ग्रात्मको प्राप्त होता है । इस प्रकार प्रमरराज वस्तुकी प्ररक्षा कर 'तदेतेदेवंविधं' इत्यादिसे प्रष्टाकी प्ररक्षा करते हैं ॥ १३ ॥

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है और जो भूत, भविष्यत् एवं वर्तमानसे भी ग्रान्य है, ऐसा ग्राप् जिसे जानते हैं वह मुफसे कहिये ॥ १४ ॥

ग्रान्यच्र धर्मोऽचिछ्रास्यीयाद्वयोमुग्रानातत्फलातत्कारके:ष्यक्ष पृथग्रभूतासित्यर्थः । तथान्यत्राथर्मोऽतथान्यत्रास्मात्कृताकृतात्, कृतं कार्यमकृतं कारणासम्भावन्यात् । कि चान्यत्र भूताख्यातिकालतात्कालाद्द्वयस्य भविष्यततथ्र तथा वर्तमानात्; काल-ग्रन्येया यत्न परिचिच्छेदात् इत्यर्थः । यदीदृशं वस्तु सर्वधयवहारगोचरातीतं पश्यसि जानासि तद्वद् मह्यम् ॥ १४ ॥

इत्येवं पृष्टवते मृत्युुरुवाच पृष्टं वस्तु विशेषेणान्तरं च विवरण—

श्रोन्तरोपदेश

सर्वे॑ वेदा यत्पदमामनन्ति तपाँ॑सि सर्वाणि च यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि॥यो मिल्येतत् ॥ १५॥

सर्वे॑ वेदा यत्पदमामनन्ति (प्रतिपादयन्ति) सर्वा॑णि तपाँ॑सि यद् वदन्ति (यत् प्रासयथे निहिता॑नि ) यत् इच्छन्तः, ब्रह्मचर्य्यं चरन्ति (ग्राचरन्ति ) तत्त् पदं ते ( तुभ्यं ) संग्रहेएण (सङ्क्षेपेएा ) ब्रवीमि श्रोम्, इति एव तत् ( तत्त् पदम् श्रोम् इत्यच्यते ) ॥ १५ ॥

सारे वेद जिस पदका प्रतिपादन करते हैं, सब तपोंकों जिसकी प्रासिके साधक कहते हैं जिसकी इच्छा करते हुए मुमुक्षुजन ब्रह्मचर्यंका पालन करते हैं, उस पदकों मैं तुग्रसे संक्षेपसे कहता हूँ । 'ॐ' यही वह पद है ॥ १५ ॥

इस प्रकार पूछनेवाले न्चिकेतासे पूछी वस्तु तथा उसके ग्रान्य विशेषका—श्रोकार

जो धर्मसे ग्राख्यीय धर्मानुग्रान, उसके फल तथा कर्ता करणादि कारकोंमे ग्रान्यच्र-पृथग्रभूत है जो अधर्मसे भिन्न है श्रर्थात् विहिताकरथा तथा ग्राख्यानिषिद्ध ब्रह्महत्यादि, उसके साधन, फल एतद् कारकादिसे भिन्न है और कृत-कार्य, प्रकृत-कारएा इस प्रकार कार्य कारण ( स्थूल-सूक्ष्म प्रपञ्च ) से भी भिन्न है। किन्तु भूत भविष्यत्त तथा वर्तमानकालसे भिन्न है श्रर्थात् जो तीनों कालोंमे परिचिच्छन्न नहीं है, ऐसी जिस सम्पूर्णं व्यवहार विषयसे शातीत वस्तुको ग्राप् जानते हैं वह मुफसे कहिये ॥ १४ ॥

सत्यानन्ददीपिका

'येऽयं प्रेतेः' (कठ १।१।२०) इस प्रकार पूर्वं पूछे गये देहातिरिक्त ग्रात्माका यथार्थ ज्ञान ही मोक्षका साधन है, तो वही मुफसे कहिये 'यचाहं योग्र्य:' इत्पादिसे न्चिकेताने यमराससे कहा । जैसे ब्रह्मभिन्न ग्रनात्मपदार्थ देहः; काल तथा वस्तुसे परिचिच्छन्न है वैसे ब्रह्मात्मा नहीं है, म्योकि ब्रह्म तो ग्राखण्ड एक रस चिन्मय है ॥ १४ ॥

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५८ कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [ ख० १

सर्वे वेदा यत्पदं पदनीयं गमनोयमविभागोनामनन्ति प्रतिपादयन्ति तपांसि सर्वोणि च यद्वदन्ति यत्प्राप्यर्थोऽनुष्ठीयर्थः । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं गुरुकुलवास-लत्नपमन्यद्वा ब्रह्मप्राप्त्यर्थं चरन्ति तत्ते तुभ्यं पदं यज्ञातुमिच्छलसि संग्रहेण संप्रेपतो ब्रवीमि । श्रोमिल्येतत् । तदेतत्पदं यद्ब्रहुसुलितस्तं त्वया । यदेतदो-मित्योऽद्वा॒न्योम॑शब्द॑प्रतीकं च ॥ १५ ॥

व्रतः—

एतदक्षरं ब्रह्म एतदक्षरं परम् । एतदक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥१६॥

एतद् ( ओंकाररूपम् ) ओंकारम् एव ब्रह्म, एतदेव हि ओंकारं परम् एतदेव हि ओंकारं ज्ञात्वा यः यद् इच्छति ( कामयते ) तस्य तत् भवति ॥ १६ ॥

सारे वेद जिस पद-पदनीय-गमनोय-प्राप्त्य स्थानका श्रविभाग-एक रूपसे श्रामनन्ति-प्रतिपादन करते हैं, सब तपोंको भी जिसके लिए कहतें हैं श्रर्थात् सब तप जिसकी प्राप्तिके लिए हैं, जिसकी इच्छा करते हुए गुरुकुलवासरूप ब्रह्मचर्य श्रथवा ब्रह्मप्राप्तिमें उपयुक्त कोई व्रतय साधन करते हैं उस पदको जिसे तू जानना चाहता है मैं संक्षेपसे कहता हूँ 'ॐ' यही वह पद है, यह जो 'ॐ' श्रर्थात् जो ॐ शब्दका वाच्य ॐ हो जिसका प्रतीक है वही यह पद है जिसे तू जानना चाहता है ॥ १५ ॥

सत्यानन्ददीपिका

१९५० शब्दरूप चारों वेदोंके एक देश शिरोभाग उपनिषदका यहाँ वेद शब्दहसे ग्रहण है, वे ही मोक्षके साधनसाधन ब्रह्मविद्या‍ऐकत्व ज्ञानका प्रतिपादन करते हैं । जैसे कि 'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि' ( उस उपनिषद् प्रतिपाद्य पुरुषको मैं पूछता हूँ ) 'श्रुत्वा ह्येव न तद्विदितादथोडविदितादधि' ( ब्रह्मविदितसे तद्र्विदित है और श्रविदितसे भी भिन्न है, 'सम्माननमसदन्यत' ब्रह्ममात्रमसदनिधि' 'ज्ञद्ब्रेवेद सर्वम्', श्रात्मैवेद सर्वम्, सर्वंखल्विदं ब्रह्म, इत्यादि उपनिषद् वाक्य उस प्राप्त स्थानका प्रतिपादन करते हैं । तप-कर्म में चित्त शुद्ध द्वारा ज्ञानोत्पत्तिमें सहायक हैं । जिस शब्दके उच्चारणमें जो श्रर्थ स्फुरित होता है वह उसका वाच्य है, सहित चित्तवालेकी श्रोंकारके उच्चारणममें जो साक्षीकी प्रतीति होती है उस श्रोंकारका श्रालम्बनकर श्रोंकार वाच्य सर्व प्रधन मायाच्छिन्न श्रोंकारोपाचिक 'ज्ञह्म ब्रह्मस्मि' ऐसा ध्यान करे । यदि उसमें समर्थ न हो तो श्रोंकारमें ब्रह्मदृष्टि करे । इस प्रकार श्रोंकारद्वारा वाच्य वाचकके श्रभेदरूपसे तथा प्रतीकरूपमें उपासना कही गयी है ॥ १५ ॥

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व० २ ]

भाषानुवाद- सत्यानन्ददीपिका

५८

यह् ॐ ( ग्रोंकार ) अक्षर ही ब्रह्मा है यह् अक्षर ही परब्रह्म है । इस अक्षरको ही जानकर जो जिस प्राप्यकी इच्छा करता है वही उसको प्राप्त हो जाता है ॥ १६ ॥

एतद्रूपेवाच्चं ब्रह्मापरमेतद्रूपेवाच्चं परं च । तद्योहि प्रतीकमेतदच्चरम्, एतद्रूपेथेवाच्चं ज्ञात्वोपास्यब्रह्मेति यो यदिच्छति परमपरं वा तस्य तदृश्यति । परं चैज्ञातच्यमपरं चेत्यामनव्यम् ॥ १६ ॥

यत् एवम्‍सत:-

एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।

एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥१७॥

एतत् ( ग्रोंकाररूपम् ) आलम्बनं श्रेष्ठ* ( प्राशस्यतरम् ) एतदालम्बनं परम, एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ( पूज्यो भवति ) ॥ १७ ॥

एतदालम्बनमेतद्ब्रह्मप्राप्त्यालालम्बनानां श्रेष्ठं प्रशस्यतमम, एतदालम्बनं

यह् ॐ अक्षर ही ब्रह्मपर बहु है और यह् अक्षर ही परमब्रह्म है । यह् अक्षर उन दोनों का प्रतीक है । इस अक्षरको ही 'यह्‍ी उपास्य ब्रह्मा है' ऐसा जानकर जो पर ब्रथवा ब्रपर जिस ब्रह्माकी इच्छा करता है उसे वही प्राप्त हो जाता है । यदि परब्रह्म् उपास्य है तो वह् ज्ञानीद्वारा ज्ञातव्य है यदि ब्रपर ब्रह्मा है तो उपासना द्वारा प्राप्तव्य है ॥१६॥

यह् ग्रोंकाररूप ब्रालम्बन ब्रह्म प्राप्तिके लिए ( गायत्री ग्रादि ) सभी .ग्रालम्बनोंमें से श्रेष्ठ ग्रधिक प्रशंसनीय है । पर और ब्रपर ब्रह्म् विषयक होनेसे यह् ग्रालम्बन पर वयोंकि ऐसी बात है, इससे

सत्यानन्ददीपिका

तत्त्वज्ञानमें ग्रन्थकर्तोंके लिए ग्रोंकारकी उपासना कहकर और उसका फल दिखलाकर 'भ्राता' शब्दसे ग्रोंकारकी स्तुति करते हैं—

यह् ॐ अक्षर ब्रह्माका वाचक और प्रतीक है । वाच्य वाचकके प्रभेद ग्रभिप्रायसे यह् ॐ अक्षर ब्रपर-विराट् हिरण्यगर्भं एवं ईश्वरात्मक ब्रह्म् प्रणव स्थूलादि भागत्रयो-

पाधिकारैक होनेसे ग्रात्मस्वरूप ज्ञान रहित ग्रज्ञानियोंको प्रतीकरुपसे उपास्य है । ब्रह्मोंके लिए यह्‍ी अक्षर परमब्रह्म है । वह् ब्रह्म् प्रथक्वकी ग्रर्थमात्राके ग्रसृजुरुपसे उस अक्षरके भागात्रयके ग्रप्रतिष्ठानरुपसे ब्रह्मोंके लिए ग्रालम्बनरुप है, भ्रतत् प्रणवोपासक यदि सगुण ब्रह्माकी इच्छा करे तो सगुणगति-सालोक्य सालुप्य, सामीप्य गतिको, यदि निर्गुंण ब्रह्माकी इच्छा हो तो वह् क्रयमुक्तिसे निर्गुंण ब्रह्म्गतिको प्राप्त करता है ॥ १६ ॥

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परसपरं च परापरं च विपयत्यतान् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते परसिम्ब्रह्माणि । अग्रपरसिमश्र ब्रह्मभूतो ब्रह्मवदुपास्यो भवतीत्यर्थः ॥ १७ ॥

ज्ञान्यग्रे धर्मोदित्यादिना पृष्टस्यात्मनोऽशेषविशेषरहितस्यात्मस्वान्तर्गतलम्बनस्यात्मनः साक्षात्स्वरूपनिर्द्धारयिष्येदमुच्यते—

न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् ।

अ्रजो नित्यः शाश्वतोडयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥१५॥

न जायते ( न उत्पद्यते ) म्रियते वा ( न म्रियते ) श्रयं ( तत्त्वज्ञः ) कुतश्चित् (कारणान्तरात् ) न बभूव ( न जातः ) कश्चित् ( कदाचित् ) ।

अ्रजो नित्यः ( जन्ममरणरहितः ) शाश्वत ( प्रविचारेण शाश्वतः ) श्रयं ( श्रात्मा ) शरीरे ( श्रात्मनि उपाधिभूते देहे ) हन्यमाने ( सति, स्वयम् ) न हन्यते ( न हन्यते विपश्चित् श्रात्मा ) ॥ १५ ॥

यह विपश्चित् मेधावी श्रात्मा न उत्पन्न होता है न मरता है, यह न तो श्रग्र कारणसे ही उत्पन्न होता है श्रौर न स्वतः ही कदाचित् ( श्रात्मनन्तररूपतया ) जात है । यह् श्रज, नित्य, शाश्वत श्रौर पुरातन है तथा शारीरके मारे जानेपर भी नहीं मरता ॥१५॥

न जायते नोत्पद्यते म्रियते चोत्पत्तिमतो वस्तुनोनित्यस्यात्मने कव्रियास्ति

सामान्येन जन्मविनाशलचयो विक्रिये इहात्मनि प्रतिषिध्येते प्रथमं सर्वविक्रिया

श्रोर श्रग्रपर रूप है । इस श्रालम्बनको जानकर साधक ब्रह्मलोक-परब्रह्ममें स्थित होकर महानताको प्राप्त होता है तथा श्रग्रपर सगुण ब्रह्ममें ब्रह्मत्वको प्राप्त होकर ब्रह्मके समीप उपास्य होता है, यह श्रार्य है ॥ १७ ॥

उपर्युक्त 'ग्रात्मन्य धमदि' इत्यादि मन्त्रसे लचीकृत्या द्वारत पूछे गये सर्वं विशेष ( जाति गुणादि विशेष ) रहित श्रात्माके तथा मन्द मेध्यम उपासकोंके लिये श्रग्र श्रौ ब्रह्माके श्रालम्बनरूपसे तथा प्रतीकरूपसे श्रोंकारका निर्देश किया गया । श्रव श्रोंकार-ग्रालम्बन-उपासकवाले उस श्रात्माके स्वरूपका साक्षात् ( उपाधिरहित ) निरूपणके इच्छासे यह कहा जाता है—

यह श्रात्मा न उत्पन्न होता है श्रौर न मरता है । उत्पन्न होनेवाली ग्रनित्य वस्तुके श्रनेक विकार होते हैं । श्रात्मामें उन सब विक्रियाश्रोंका प्रतिषेध करनेके लि

सत्यानन्ददीपिका

मन्त्र में परशब्द श्रग्रपरका भी उपलक्षण है 'ब्रह्मीच लोक ब्रह्मलोक:' ! उसमें भी ब्रह्मज्ञ पूज्य होता है ॥ १७ ॥

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प्रतिषेधार्थं न जायते श्रियते वेति। विपश्चिन्मेधावी श्रविपरिलुप्तचैतन्यस्वभावात्। किं च न त्यमात्मा कुतश्चित्काररान्तराद्भवः। स्वस्मादात्मनो न वभूव कश्चिदर्थोऽन्तर्भूतः। श्रतोड्यमात्माजो नित्यः शाश्वतोऽप्ययविवर्जितः। यो दृश्याश्वतः सोडपचीयते, श्रय तु शाश्वतोऽप्य एव पुराणः पुरापि नव एवेति। यो ह्रावयवोपचयादारेषाभिनिर्वर्त्यते स इदानीं नवो यथा कुम्भादिः। तद्विपरीत-स्वात्मा पुराणो दृढिरविवर्जित इत्यर्थः। यत एवमतो न हन्यते न हिंस्यते हन्यमाने शखादिभिः शरीरे। ततस्थ्योड्याकाशवदेव ॥ १८॥

'न जायते श्रियते वा' ऐसा कहकर सबसे पहले उनमेंसे जन्म और विनाशरूप श्रादि और ग्रन्थकी विक्रियाओंका प्रतिषेध किया जाता है । कभी लुप्त न होनेवाले चैतन्यरूप स्व-भावके कारण यह आत्मा विपश्चित्-मेधावी है। तथा यह आत्मा कहाँसे-किसी अन्य कारणसे उत्पन्न नहीं होता और न श्रथान्तररूपसे स्वयं अपनेसे ही होता है, श्रत: यह नित्य तथा शाश्वत—प्रकट रहता है, क्योंकि जो श्रशाश्वत होता है वही क्षर होता है, परन्तु यह तो शाश्वत है श्रतएव पुराण भी है श्रथवा पराश्वीन होकर भी नवीन है । जो पदार्थ श्रवयवोंके उपचय-क्षयसे निष्पन्न किया जाता है वह इस समय नवीन है ऐसा कहा जाता है जैसे घट श्रादि । परन्तु श्रात्मा तो उससे विपरीत स्वभाववाला है—पुराण वृद्धिरहित है, ऐसा श्रर्थ है, क्योंकि ऐसा है, श्रत: शस्त्रादि द्वारा शरीरके मारे जानेपर भी वह नहीं मरता—उसकी हिंसा नहीं होती श्रर्थात् शरीरमें स्थित हुवा वह श्राकाशके समान निर्लिप्त हो है ॥ १८ ॥

सत्यानन्ददीपिका

श्रात्मस्वरूपका वर्णन—'श्रास्ति जायते वर्धते विपरिणममते श्रप्रक्रीयते विनश्यति' ( निस्स्त ) (है, जन्मता है, बढ़ता है, परिरगामको प्राप्त होता है, श्रप्रकट श्रौर नष्ट होता है ) इस प्रकार शरीर श्रादिमें छः भाव विकार होते हैं । इनमेंसे जन्ममरणादि श्रादि और ग्रन्थकी विक्रियाओंका निषेध किये जानेपर 'कटाहकुण्डलन्याय'से मध्यको चारों विक्रियाओंका भी स्वतः निषेध हो जाता है, श्रात्माको चैतन्यस्वरूप कहकर जड़ देहादि श्रात्मा है वा श्रात्मा जड़ है इस मत का खण्डन किया है । श्रात्मा - श्र्रज होनेके कारण किसी भी कारणसे उत्पन्न नहीं होता । प्रध्रुव एवं विभु होनेसे श्रथान्तररूप हो स्वयं श्रपनेसे भी उत्पन्न नहीं होता । शरीरका छेदन करनेपर जैसे शरीरस्थ ब्राकाशका भी छेदन हो सकता है ? इसका 'ततस्थ्यो-ड्याकाशवत्' इससे समाधान करते हैं, जैसे शरीरस्थ श्राकाश प्रास्त्रादिसे प्रभावित नहीं होता वैसे श्रात्मा भी शरीरस्थ हो शस्त्रादिसे प्रभावित नहीं होता, क्योंकि वह 'ग्रसङ्गो न हि सज्जते' ऐसी श्रुति है ।

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हन्ता चेन् मन्यते हन्तु म् हत र् श् चे न् मन्यते हत म् । उभौ तौ न विजानीतो नाय म् हन् ति न हन्यते ॥१५॥

हन्ता ( हननकारी जनः ) चेत् ( यदि ) हन् तु म् ( हनिष्यामि एनम् इति ) मन्यते ( चिन्तयति ) हतः ( तथा ) चेत् हत म् ( ग्राह्माणं ग्रन्येत विनाशितम् ) मन्यते ( चिन्तयति ) [ तर्हि ] तौ उभौ न विजानीतः । श्रात्मन् ( ग्राह्मा ) न हन् ति न हन्यते ॥ १५ ॥

यदि हननकर्ता-मारणनेवाला श्रात्माको मारनेका विचार करता है श्रौर मारा जानेवाला उसे मारा गया समझता है तो वे दोनों ही उसे नहीं जानते, क्योंकि यह न तो मरता है श्रौर न मारा जाता है ॥ १५ ॥

एवं भूतम् न्याल्मानं शरीरम् ात्र्मा त्मदृ ष्टि हन् ता चेयदि मन्यते चिन्तयति हन् तु म् हनिष्यामि एनम् इति योज् न्यो हत ः सो ऽपि चेन् मन्यते हत म् ाल्मानं हतो ऽह मि त्युभावफि तौ न विजानीतः स्व म् ात्मानं यतो नाय म् हन् ति ऽप्र विक्रिया त् वादात्म् स्तथा न हन् यत ऽप्राकाश वद् विक्रियात् वादेव । श् ततो ऽनात्मज्ञ विषय एव धर्मों - धर्मो दि ल्क्षा ः संसारो न ब्रह्मज्ञस्य । श्रुति स्मृ तिभिर् न्यायै र् याच छ् धर्मो ऽधर्मो ऽपि -

कष्युपपत्ते ः ॥ १५ ॥

एवं श् तु -ग्रसङ्ग स्व भाव ग्राह्माणां भो देहदृष्टि वात् ही ष्रात्मदृ ष्टि रक्षकने वाला हनन कर्ता पुरुष यदि मारनेका विचार करता है यह वह सोचता है कि मैं इसे मारू गा तथा ग्रहण मारा जानेवाला भी यह समझकर कि मैं मारा गया हूँ अपने ( प्रात्मा ) को मारा गया मानता है, तो वे दोनों ही अपने प्रात्माको नहीं जानते, क्योंकि श्रात्मा श्रविकारी है, इसलिए यह मार नहीं सकता श्रौर प्राकाशके समान श्रविकारी होनेसे ही मारा भी नहीं जा सकता, श् तथ ष्रत ः धर्माधर्मादिरूप संसार ग्रज्ञानाल्मक ही है न ब्रह्मज्ञ विषयक नहीं, क्योंकि श् रुति प्रमाण श्रौर युक्तिसे भी ब्रह्म-ग्रात्मामें घर्माधर्मादि नहीं हो सकते ॥१५ ॥

सत्यातनदीपिका

न जायते ऽम्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूय ः । श्रजो नित्य ः शाश्वतो ऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरेः ॥ नै नं छिन्दन्ति शस्त्राणि नै नं दहति पावक ः । न चै नं क्लेदयन्त्य् ापो न शोषयति मारुत ः ॥ ( गीता २-२०, २३-२४ ) इत्य् आदि स्मृति भी श्रु ति यनु सारि श् ग्रर्थ कहती हैं ॥ १५ ॥

'प्रथाकामयमान ः' यह श् रुति ब्रह्ममें संसारका धर्मभाव कहती है जिसके ज्ञान -

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श्रग्रोररगीयान्महतो महीयानात्मास्य जन्तोरनिहितो गुहायाम् । तमक्नुः पश्यति वीतरागो धातुप्रसादान्महिमानात्मनः ॥२०॥

श्रग्र्योः ( सूक्ष्माद् परमात्मप्रभृतेः ) श्रग्र्णीयान् ( सूक्ष्मतरः ) महत् ( महत्तरः परिमाणात् ) महीयान् ( महत्तरः ) श्रात्मा ( पूर्वोक्तलक्षणः ) श्रग्र्य जन्तोः ( प्राणिनः ) गुहायां ( हृदये ) निहितः ( स्थितः ) श्रक्रतुः ( श्रकामः-वैराग्यवान् ) धातुप्रसादात् ( इन्द्रियप्रसादात् ) श्रात्मनः, तं ( पूर्वोक्तं ) महिमानं पश्यति ( श्रयमहिमसमीपिति साक्षात् विजानाति [ ततः ] वीतरागः भवति ॥ २० ॥

श्रग्र्यसे भी श्रग्र्यतर श्रौर महानुससे भी महत्तर श्रात्मा प्राखीकी हृदयरूप गुह्ह्यमें स्थित है, निष्काम पुरुष श्रात्माकी इन्द्रियोंके प्रसादसे श्रात्माकी उस महिमाको देखता है ततः शोक रहित हो जाता है ॥ २० ॥

श्रग्र्योः सूक्ष्मादग्र्यग्याख्यामाकादेरग्र्यतरः । महतो महत्तरः श्रग्र्यगु महद्र्रयदस्ति लोके वस्तु तत्तेनैवात्मना नित्येनानु- त्सवत्संभवति । तदात्मना विनिर्मुक्तकमलख्त्संपघते । तस्माद्रावेवात्माख्योररीया- न्महतो महीयान्सर्वेधनासमहुपवस्तूपाधिकत्वात् । स चात्मास्य जन्तोरग्र्यादिसत्म- पर्यन्तस्य श्रात्मैवजातस्य गुह्ह्यां हृदये निहित श्रात्मभूतः स्थित इत्यर्थः ।

श्रात्मा श्रग्र्यसे भी श्रग्र्यतर श्रथवा सूक्ष्म पदार्थो [ एष मे श्रात्मान्तर्हृदयेऽप्य- यान् क्रीडहेवं] ऐसी श्रृति है ] से भी सूक्ष्मतर तथा महानुससे भी महत्तर श्रर्थात् पृथ्व्वी श्रादि महत्परिमाणवाले [ पृथिव्या श्राद्यौ, यह श्रृति है ] पदार्थोससे भी महत्तर है । संसारमें श्रग्र्य श्रथवा महत् परिमाणवाली जो कुछ वस्तु है वह उस नित्यस्वरूप श्रात्मा से ही प्राप्तवान्-स्वरूप सत्ता युक्त हो सकती है उस श्रात्मासे परत्यक् हो तो श्रग्रत् [ गगनकुसुमवत् ] सत्ताऽशून्य हो जाती है श्रर्थात् नामरूपात्मक यह सभी वस्तु श्रात्माकी

से प्रवृत्ति होती है उसके ही ज्ञानसे वह पुनः नहीं होती, यथा भुक्तिके श्रज्ञानसे कलिप्त रजतमे रजतार्थी की प्रवृत्ति होती है परन्तु भुक्तिके ज्ञानसे वह पुनः नहीं होती, वैसे धर्माऽधर्मादिरूप संसारके विषयमें भी समभना चाहिए, यह न्याययुक्ति भी है । 'स्थित- प्रज्ञस्य का भाषा' ( गीता २।५४ ) 'स्थितप्रज्ञाकी भाषा क्या है श्रथवा क्या लक्षण है ?' विदेही सर्वदा मुक्तः कुत्र्यतो नासित कर्त्तता । ध्यलेपवादमाश्रित्य श्रोकृष्णुज्ञानको यथा ॥ कर्त्तुं स्वभोक्तृत्वादि धर्मः स्वज्ञानपरिकल्पितः । स्वज्ञानवश स्पष्टीभूत स्वज्ञों तदृश्शया तदस्संभवत् ॥ श्रात्मववन्तं न कर्मारि निबधनन्ति धनञ्जय । (गीता० ४।८१) इत्यादि स्मृति भी श्रात्मज्ञानमें सांसारिक का प्रभाव कहती हैं ॥ १६ ॥

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तदात्मानं दर्शयित्वैवासन्नतविज्ञानलिङ्गमकृतुरकामो दृष्टाहष्टश्रवाब्दविषयोपरतबुद्धि रित्यर्थः। यस्तु चैवं तदा मनश्चादीनि करणानि धातु: शारीरस्य धारयिता-सीदन्ति तस्मिंस्तथ्येन प्रसादादात्मनो महिमानं कर्मनिमित्तश्रृद्धिन्त्यथरहितं परं त्ययमहस्मीति साधाद्विजानाति। ततस्तु शीतशोको भवति ॥ २० ॥

ध्यान्यथा तुर्विजेयोऽयमात्मा कामिभिः प्राकृतपुरुषेभ्यः, यस्मात्—

उपाधिर्हि प्रातःनामरूपात्मक सर्व वस्तु उपाधिविहालो हि नेसे यह आत्मा श्रग्रुतेः श्रग्रुतर श्रौर महानसे महत्तर है। वह आत्मा जन्मोः स्तन्म्बपर्यन्त इस सम्पूर्ण प्राणी समुदायककी गुहा-हृदयमें निहित ध्यांतरात्मरूपसे स्थित है, यह श्रर्थ है ।

तात्पर्य यह है कि दर्शनार्थ श्रवण, मनन श्रौर निदिध्यासनरूप साधनवाला ज्ञानी-निष्काम दृश्ट-ऐहिक श्रौर श्रदृष्ट-पारलौौकिक वाह्या विषयोंसे उपरत बुद्धिवाला पुरुष उस श्रात्माको देखता है जिस समय ऐसी स्थिति होती है उसी समय मन श्रादि इन्द्रियां जो कि शारीरको धारण करनेके कारण धातु कहलाती हैं, प्रसन्न होती हैं सो इन धातुओं-इन्द्रियोंके प्रसादसे वह श्रपने श्रात्माकी कर्म निमित्तक श्रृद्ध श्रौर क्षय-रहित महिमा को देखता है। प्रथमतः साक्षात् जानता है कि ‘यह मैं हूँ’ तो इससे वह शोक रहित हो जाता है ॥ २० ॥

ध्यन्यथा सकामी प्राकृत जनेंके लिए यह आत्मा दुविझ्ञेय है, क्योंकि—

सत्यानन्ददीपिका

श्रकामत्वाद साधनान्तर विधिनके लिए ‘कथम् पुनः’ इस वाक्यको प्रवृत्तरित करते हैं ‘श्रग्रौःश्रपीयाममहतो महीयान्‌’ इस श्रुतिवाक्यसे एक श्रात्मामें श्रग्रुत श्रौर महत्त्व परस्पर विरुद्ध धर्मोका कथन यद्यपि श्रुतिसंगत है तथापि श्रुत्युत्क श्रादि श्रध्यासका श्रधि-ध्यान होनेके कारण उसमें कल्पित-ग्रौपाधिक श्रग्रुत्यादि व्यवहार होता है, जैसे भ्रमस्थ-लमें रजस्तत्व श्रध्यासके श्रध्यासान्भूत शुक्तिमें ‘इदं रजतम्‌’ ऐसा कल्पित व्यवहार होता है। श्रात्मा सबका श्रध्यक्ष होनेसे सर्वोत्तमक है । ‘तम्‌’ श्रादिसे प्रत्यक्षग्रह्य दर्शंनका साधन कहते हैं । श्रात्मदर्शनमें केवल कामरहितत्व हेतु नहीं है किन्तु श्रात्मदर्शनके उद्देश्यप्रयसे विहित जो ‘श्रात्मा वा श्रद्रे श्रोतव्यः’ इस प्रकार श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन भी ब्रह्मादर्शनके प्रतिबन्धक-सन्देह श्रौर विपरीतभावनाके निरासद्वारा साधन कहे गये हैं । कामरहितत्व इन्द्रियप्रसादमें हेतु है । यद्यपि ध्यातु शब्द शारीरस्थ रस, रक्त, शुक्रादि धातु-ग्रोंमें प्रयुक्त होता है तो भी ‘धारणाद धातु:’ इस यौगिक वृत्तिसे इन्द्रियोंमें भी प्रयुक्त हो सकता है, कर्म निमित्तक वृद्धि, क्षयादि शारीरमें होते हैं श्रात्मामें नहींं, क्योंकि ‘न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः’ ऐसी श्रुति है । श्रौर ‘तरति शोकमात्मवित्तु‌’ यहु फल बोधक श्रुति है ॥ २० ॥

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ग्रासीनो हूरं ब्रजति शयानो याति सर्वतः । करतं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमहंती ॥ २९ ॥

ग्रासीनः ( ग्रसन् एष सन् ) हूरं ( गच्छति ) ब्रजति । शयानः ( उपरतक्रियां सन् ) सर्वतः ( याति, मदामदं ( मदो-हर्षः, श्रमदः हर्षाभावः, तद्विशिष्टम् एवं विरुद्धधर्मवर्ती ) देवं ( प्रकाशमानं ) तम् ( आत्मानं ) मदन्यः ( मदनः कः, ज्ञातुं ( विज्ञातुं ) ग्रहीतुं ( शक्नोति ) ) २९।

वह ग्रासस्थित हुंआ भी दूरतक जाता है, शायान करता हुंआ भी सब ओर पहुंचता है । मद-हर्ष युक्त ग्रोर मदरहित उस देवको मला मेरे बिना ग्रोर कौन जान सकता है ? ॥ २९ ॥

ग्रासीनोऽवस्थतोऽचल एव सन्‍दूरं ब्रजति । शयानो याति सर्वत एतत्सावात्मा देवो मदामदः समदोऽमदश्र सहर्षोऽहर्षश्च विरुद्धधर्मान्तोऽशक्यतया-ज्ञातुं कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमहंती ? ग्रस्मदादिरेव सूक्ष्मबुद्रेः पण्डि-तस्य सुविज्ञेयोऽध्यात्म स्थितिगतिन्तिल्यान्तियादिविरुद्धाने कधर्मोपाधि कृत्याद्वि-रुद्धधर्मवत्त्वाद्द्वैश्वरूप इव चिन्तामपि यद्‌वद्‌व्यभासते । ग्रतो विविधोऽयं दर्शंयति कस्तं मदन्यो ज्ञातुमर्हतीति । करस्पानुपरश्रमः शयानं करणजनितसैकदेश-

ग्रासोन-ग्रवस्थित-प्रचल होता हुंआ भी दूर चला जाता है तथा सोता हुंआ भी सब ग्रोर पहुंचता है । इस प्रकार वह प्रात्मा-देव समद-हर्षयुक्त ग्रोर श्रमद हर्षरहित विरुद्ध धर्मवाला है, ग्रतः जाननेमें न ग्रासकनेके कारण उस हर्षयुक्त ग्रोर हर्षरहित देवको मेरे सिवा ग्रोर कौन जान सकता है ? यह ग्रात्मा हम जैसे सूक्ष्मबुदि पण्डितोंके लिए ही सुविज्ञेय है । स्थिति, गति तथा नित्य, ग्रनित्य ग्रादि विरुद्ध ग्रनेक धर्मरूप उपाधि-वाला तथा विरुद्ध धर्मवाला होनेसे यह चिन्तामपिके समान द्विश्वरूप-सा भासता है, ग्रतः मेरे सिवा उसे ग्रोर कौन जान सकता है, [ यमराज ] ऐसा कहकर उसकी दुर्दि-ज्ञेयता दिखलाते हैं । इन्द्रियोंका शांत हो जाना शायन है, शायन करनेवाले पुरुषका

सत्यानन्ददीपिका

ग्रन्वय-व्यतिरेकसे करमरहितत्वको ग्रात्माके सुज्ञेयत्व ग्रोर दुविच्जेयत्वमें 'ग्रन्वयथा' प्राप्तिसे हेतु कहा गया है ।

जाग्रत ग्रोर स्वप्नमें मन ग्रादिके व्यापारके साक्षिरूपसे कूटस्थ हो स्थित है, विषय-देशमें मन ग्रादिकी वृत्तियोंको जाननेपर तत्तन्मतिबिम्बरूपसे जाता है यहीं 'दूरं ब्रजति'का प्रथं है । इन्द्रियोंके 'यह घट है' इत्यादि ग्राकाररूप विशेष विज्ञानका ग्रभभाव शयन-सुषुप्ति है । स्वरूप सूक्ष्म विजत्ति सामान्यरूपसे ग्रवस्थित होनेसे सर्वत्र जाता है ऐसा कहा जाता है, वस्तुतः व्यापक होनेके कारण यह स्वरूपसे तो सर्वत्र व्याप्त है । यथा

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६६ कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य [ग्रा० १

विज्ञानस्योपशामः शयानस्य भवति । यदा चैवं केवलतसामान्यविज्ञानत्वात्सर्वंतो यातो यदैव विशेषविज्ञानस्थः स्वेन रूपेणैव स्थित एवं सन्नमन्यादिगतिषु तदुपाधिकत्वादूरं ब्रजतीव । स चेहैव वर्तते ॥ २१ ॥

क्रमशोभयं शारीराभ्यां वस्व्यभ्यास्यवस्थाभ्यां क्रियत इत्युपक्रमः ।

महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥२२॥

श्रानवस्थ्येऽपि ( तद्रशेषेऽपि ) शारीरेऽपि श्रववस्थितम्, श्राशरीरं, महान्तं ( देशतः कालतः वस्तुतः ) तत्त्व श्रपरिच्छिन्नं ( सर्वव्यापिनम् ) श्रात्मानं मत्वा ( ज्ञात्वा ) धीरोऽपि ( धीमान्‌ ) न शोचति ॥ २२ ॥

जो शरीरमें शरीर रहित तथा ग्रनित्योंमें नित्य स्वरूप है उस महान् शौर सर्वव्यापक श्रोत्माको जानकर बुद्धिमान्‌ पुरुष शोक नहीं करता ॥ २२ ॥

श्राशारीयं स्वेन रूपेण श्राकाशकल्प श्रात्मा तमशारीरं शारीरेऽपि देहपित्तेन्द्रिय जनित एकदेश सम्बन्ध्यो विज्ञान ध्यात हो जाता है, जिस समय ऐसी श्रवस्था होती है उसे समय केवल सामान्य ज्ञाने ( सर्वव्यापीच ध्यातूयुक्त स्वरूपैक्यविज्ञान ) होनेसे वह सब शोर जाता हृदया-सा जान पड़ता है और जब वह विशेष विज्ञान ( इन्द्रियादि जनित वस्तु विषयक विशेष विज्ञान )-में स्थित होता है तो स्वरूपसे श्रविचल होता भी मन श्रादि उपाधियोंवाला होनेसे उन मन श्रादिको गतियोंमें दूर जाता हृदया-सा जा पड़ता है, वस्तुतः तो वह यहीं ( देहमें ) रहता है ॥ २१ ॥

ग्राब यह भी दिखलाते हैं कि उस श्रोत्माके विज्ञानसे शोकका ग्रन्त हो जाता है—ग्रात्मा अपने स्वरूपसे श्राकाशतुल्य है ग्रत! शाशरीर है, पुनः ग्रनवस्थित-श्रवस्थित-श्रात्मा श्रपने स्वरूपसे श्राकाशतुल्य है ग्रत! शाशरीर है

सत्यानन्दीदीपिका

विश्वरूप मखि नाना रूपसे ग्रवभासित होती है, वैसे ही नाना उपाधियोंके सम्बन्धवशे श्रात्मा भी नाना रूपसे भासता है स्वतः नहीं, श्रथवा यथा चिन्तामणि जैसेजैसे चिन्तन किया जाता है वैसे-वैसे ही तत् तत् चिन्तनोपाधिवाली भासित होती है; वैसे ही स्थिति गति, नित्यानित्यादि ग्रनेक विरुद्ध धर्मं विशिष्ट धर्मैकुपसे उपाधिसे श्रात्मा भी विरुद्ध धर्मवाला-सा भासता है । उपाधिके कल्पित निश्चेत होनेपर विवेकीको सुविचोय है ( गीता० १७१३ ) यह स्मृति भी प्रमाए है ॥ २१ ॥

घट, पट आदि ग्रनेक ग्रनित्य उपाधियोंमें ग्रसज्जू नित्य विभु एक श्राकाशके समगृ

१. विश्यानि नानाविधानि नीलपीतादीनि रूपाणि यस्य स मधिविधेषः ।

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व० २ ] भाषानुवाद-सत्यानन्दीदीपिका ६७

मनुष्यादिशरीरेष्वन्तवस्थेष्ववस्थितिरहितेष्ववस्थितं नियमविकृतिमित्येतत्, महान्तं महत्त्वस्यापेक्षितत्वशब्दोयामाह-विभुं व्यापिनमात्मानम् । आत्मशब्द: प्रत्यगात्मविषय एव मुख्यस्तमोच-शोकौपपत्ति: ॥ २२॥

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।

यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ २३ ॥

नायम् आत्मा प्रवचनेन ( श्रध्ययनादिना ) लभ्य: ( जेय:-दर्शनीय: ) न मेधया ( ग्राह्यधारणाख्यया ) न बहुना श्रुतेन । रहित देव पितृंमनुष्यादि ऋनित्य नाशीरोंमें अवस्थित-नित्य-प्रविष्ट है । तथा महान् है [ किससे महान् है ? इस प्रकार ] महत्त्वस्यै श्रात्मनकी श्रपेक्षा विषयक श्राश्राद्धू होनेपर कहते हैं—उस विभु-व्यापक श्रात्माको यहाँ 'ग्रात्मा' शब्दकी प्राप्ति अपनेसे ब्रह्माकी श्रभि-ज्ञता प्रदर्शाथ्रत करनेके लिए है, क्योंकि 'ग्रात्मा' शब्द: प्रत्यगात्मविषयमें ही मुख्य है, ऐसे उस श्रात्माको 'यह मैं हूँ' ऐसा जानकर धीर-बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता, कारण कि इस प्रकारके श्रात्मवितमें शोक युक्त नहीं है ॥ २२ ॥

यद्यपि यह ग्रात्मा दुर्बिज्ञेय है तथापि उपायसे तो सुविज्ञेय ही है, इसपर कहते हैं—

सत्यानन्दीदीपिका

ग्रात्मा भी नामरूपात्मक श्रनेक ग्रनित्य देवादि शरीररूपो उपाधियोंमें श्रसद् नित्य विभु श्रद्वितीय होनेसे श्रग्राह्य है । श्रात्माको 'ग्रात्मा' कहनेसे स्थूल, सूक्ष्म श्रोत्र कारण सापेक्ष महत्त्वका भी निराकरणा किया गया है, क्योंकि 'नित्यं विशु' सर्वंगतत्व नित्य' इत्यादि श्रुति हैं । साधियमत श्रुतिप्रतिपादित प्रत्येक शरीरमें ग्रात्मा होनेसे श्रनेक पुरुषवादका एक वचन 'प्रशरीरम्' श्रोत्र 'विशुम' कहकर खण्डन किया गया है । अपने शरीरमें कूटस्थरूपसे विद्यमान ग्रात्मा प्रस्यगात्मा कहलाता है उसका 'ग्रय' शब्दसे ग्रहण किया गया है, क्योंकि प्रथम उसीकी श्रपरोक्ष श्रानुभूति होती है श्रनन्तर 'ग्रय' श्रात्मा श्रहं' 'श्रहं ब्रह्मास्मि' 'तत्वमसि' श्रादि महावाक्योंसे 'मैं ब्रह्म हूँ' यह श्रभेद ज्ञान होता है । उस श्रभेद ज्ञानसे श्रविद्या जनित भेद दर्शनोंकी निवृत्ति होने-पर तत्कार्या शोकादिक्री निवृत्ति भी स्वाभाविक है । 'तत्र को मोह: क: शोक एक-त्वमनुपश्यत:' ( ईश० ७ ) यह श्रुति श्रभेददर्शनोंका फल कहती है ॥ २३ ॥

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६३

कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य

[ च्या० ९

एष ( साधकः ) एव ( श्रात्मनेव ) दृश्यते ( श्रात्मदर्शनाय वरयति ) तेन ( श्रात्मना) ( लभ्यः । एष श्रात्मा, स्वात् ( स्वकीयां पारमार्थिकीं ) तनुं ( मूर्तिम् ) तस्मै ( श्रात्मकाम-

मस्य दृश्युते ( प्रकाशयति ) ॥ २३ ॥

न धारराशक्तिरौ न प्रचिक्

श्रवयसे प्राप्य होने योग्य है, यह साधक जिस-श्रात्माका वरएा करता है उसे श्रात्मासे

ही यह ज्ञात हो सकता है । उसके प्रति यह श्रात्मा श्रपने यथार्थ स्वरूपको प्रकाशित-

श्रभिव्यक्त कर देता है ॥ २३ ॥

नायमात्मा प्रवचनेनालोनेकवेदस्वीकारेण लभ्यो नापि मेधया ग्रन्थार्थ-

धारराशक्त्या । न वहुना श्रव्रतेन केवलेन । केन तर्हि लभ्य इत्युच्यते-यमेव

स्वात्मानमेष साधको दृश्युते प्रार्थ्यते तेनैवात्मना वृत्त्या स्वयमात्मा लभ्यो

ज्ञायत एवमिलेतत् । निष्कामस्यात्मानमेव प्रार्थ्यते श्रात्मनैवात्मा लभ्यत

इत्यर्थः । कथम् लभ्य इत्युच्यते-तस्यात्मकामस्यैष श्रात्मा विध्रुपुते प्रकाशयति

पारमार्थिकों तनुं स्वां स्वकीयां स्वयाथात्म्यमिल्यर्थः ॥ २३ ॥

किं चानन्य—

यह श्रात्मा प्रवचन श्रर्थात् ऋगादि ग्रनेक वेदोंके स्वविकारसे प्राप्त-जानने योग्य

नहीं है, न मेधा-ग्रन्थ धारराशक्तिद्वारा जानने योग्य है और न केवल बहुत श्रवरा करनेसे

ही, तो फिर किस उपायसे लभ्य है? इसपर कहते हैं—यह साधक जिस श्रपने श्रात्माका

वरएा-प्रार्थना-श्रवणद्वारा श्रनुसन्धान करता है उसी वरएा करनेवाले श्रात्माद्वारा यह

ग्रात्मा स्वयं ही लभ्य है श्रभिलष्यत् ‘यह ऐसा है’ ऐसा जाना जाता है । केवल श्रात्मलाभके

लिए प्रार्थंना करनेवाले निष्काम श्रात्मकाम पुरुषको श्रात्माद्वारा ही श्रात्माकी उपलब्धि

होती है यह श्रर्थ है । -किस प्रकार उपलब्ध होता है? इसपर कहते हैं—उस श्रात्मकामके

प्रति यह श्रात्मा श्रपने पारमार्थिक स्वरूपको श्रपने याथात्म्यको विद्धृत्-प्रकाशित कर देता

है, यह श्रर्थ है । २३ ।

इसके श्रभिप्ररिक हूसरी बात यह भी है—

सत्यानन्दतीर्थीका

ऋग् श्रादि चारों वेदोंके पठन पाठनको यहाँ प्रवचन समभना चाहिए । न ब्रह्मा-

त्वैक्य प्रतिपादक उपनिषद्विचारसे श्रतिरिक्त शास्त्र श्रवयसे श्रात्मा लभ्य है श्रौर न

ब्रह्मविद्याचार्य उपदेश रहित शास्त्र श्रवयसे । ईश्वर श्रौर श्राचार्य श्रनुप्रहसे साधकको

ग्रात्मा लभ्य है, जो श्रधिकारी प्रत्ययवच्चे तनय रूप ग्रपने श्रात्माका वेदान्त महावाक्योंके श्रवरा

कालमें ही ‘प्रत्यग्रह्म मैं हूँ’ ऐसा श्रनुसन्धान करता है उसीके प्रति श्रात्मा श्रपने यथार्थ

स्वरूपको श्रभिव्यक्त करता है श्रर्थात् ईश्वर श्रौर श्राचार्यसे श्रनुगृहीत ‘श्रहं ब्रह्मास्मि

इस प्रकार श्रनुसन्धाता श्रात्मसाक्षात्कार कर सकता है ॥ २३ ॥

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ब्रात्मज्ञानका ग्रनथिकारी

नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः । नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ २४ ॥

दुश्चरितात् ( शास्त्रनिषिद्धाचाररत ) प्रविरतः ( मनुपरतः ) न, प्रशान्तः ( ग्रसं- पादितेन्द्रियनिग्रहः ) न, ग्रसमाहितः ( विक्षिप्तचित्तः ) न, प्रशान्तमानसः ( विषय- भोगे श्रलसबुद्धिरहितः ) न, प्रज्ञानैन ( ब्रह्मज्ञानिनः ) एनम् ( श्रात्मानम् ) श्राप्नुयात् ( प्राप्तुमर्हति ) ॥ २४ ॥

जो पाप कमोंसे निवृत्त नहीं है, संयतेन्द्रिय नहीँ हैं, समाहित चित्त नहीँ है और प्रशान्त मनवाला है, वह उस श्रात्माको ब्रह्मज्ञानद्वारा प्राप्त नहीँ कर सकतार २४

न दुश्चरितात्प्रतिषिद्धाच्चलु तिस्मृत्यविहितात्प्रकर्मयोगेऽविरतः श्रनुपरतो नापि निद्र्यललौलयादशान्तोडुपरतो नाप्यसमाहितोडनेनाग्रमना विचिलिप्तचित्तः, समाहितचित्तोडपि सन्समाधानफलार्थित्वाच्छ्राप्यशान्तमानसे व्याप्तचित्तःप्रज्ञा- तेन ब्रह्माविज्ञाननेनं प्रकृतात्मानमाप्नुयात् । यस्तु दुश्चरिताद्विरत इन्द्रिय- लौल्याच्च समाहितचित्तः समाधानफलादप्युपशान्तमानसश्चाचार्यवान्प्रज्ञानेन यथोक्तमात्मानं प्राप्तुमर्हत्यर्थः ॥ २४ ॥

जो दुश्चरित-प्रतिषिद्ध-श्रादि तिस्मृतिसे श्रविहित पापकमोंसे श्रविरत-श्रनुपरत है-उपररत नहीं है, जो इन्द्रियोंके चापल्यके कारण प्रशान्त-उपरति रहित है, प्रशमाहित-जो एकाग्र मनवाला नहीं है श्रर्थात् विक्षिप्तचित्त है । तथा समाहित चित्त होते भी एकाग्र- ताके फलका इन्छुक होनेके कारण प्रशान्तमना है श्रर्थात् व्याप्त चित्तवाला है, ऐसा पुरुष ऐस प्रकृत श्रात्माको ग्रज्ञान- ब्रह्मज्ञान द्वारा प्राप्त नहीँ कर सकतार किन्तु जो अप कर्म और इन्द्रियोंके चापल्यसे विरत है, समाहित चित्त है और श्रोर समाधन-एकाग्रताके फलसे भी उपशान्तमना है, वह श्राचार्यवान् साधक हो ब्रह्मज्ञानद्वारा यथोक्त श्रात्माको प्राप्त करतार है, ऐसा श्रर्थ है ॥ २४ ॥

सत्यानन्ददीपिका

ज्ञानी और श्रज्ञानी दोनोंमें श्रात्मा सम है, श्रत्रः ज्ञानौके समान प्रज्ञानौको भी ब्रह्म- की प्राप्ति होनी चाहिए ? इसपर ‘नाविरतः' श्रादिसे कहते हैं— देहसे उत्पन्न पाप दुएचरित है, नेत्रादि इन्द्रियोंकी विषयोन्मुखतादिका नाम चापल्य है, इससे विपरीत श्रावरखवाला श्रात्माको प्राप्त करतार है, इसे 'यस्तु' श्रादिसे कहतें हैं ॥ २४ ॥

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यस्त्वनेवं भूतः—

यस्य ब्रह्मा च क्षत्रं च उभे भवत श्रोदनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्याह वेद यत्र सः ॥ २५ ॥

यस्य ( आत्मनः ) ब्रह्मा ( ब्राह्मणजातिः ) च क्षत्रं ( क्षत्रियजातिः ) च उभे भवतः श्रोदनः ( अन्नं ) भवतः । मृत्युः ( सर्वप्राणिसंहारकः ) यस्य उपसेचनम् ( उपकरसं पाकस्थानोयं ) सः ( एवं जगत्संहर्त्तृगुणः ) यत्र ( स्वमहिम्नि तिष्ठति ) [ तम् ] इत्याह ( इत्यथर्वपेअ ) को वेद ( जानाति न कोऽपि वेदितुं भवः ) ॥ २५ ॥

जिस आत्माके ब्राह्मण क्षत्रिय ये दोनों भ्रोदन-भोजन हैं तथा प्राणिसंहारक मृत्यु जिस आत्माका उपसेचन- पाकस्थानोय है, वह जहाँ स्वमहिमामें है उसे कौन ( ब्रज्ञपुरुष ) इस प्रकार ( उपर्युक्त साधन सम्पन्न ब्रधिकारीके समान ) जान सकता है ॥ २५ ॥

यस्यात्मनो ब्रह्मच्त्रे सर्वधर्मान्विधारके ऽभिप सर्वत्राभूते उभे भ्रोदनौडशनं भवतः स्याताम्, सर्वहरोडपि मृत्युर्यस्योपसेचनमिवौदनस्य, ऋशनत्वेऽप्य-दृष्टा-

किन्तु जो साधक ऐसा नहीं है वह ब्रज्ञात् उत्कृष्ट साधन सम्पन्न नहीं है। उसके सिध्यमें श्रुति कहती है—

सब कर्मोंको धारण करनेवाले तथा सबका रक्षकूप होते भो ब्राह्मण क्षत्रिय ये दोनों भला जिस श्रात्माके भ्रोदन-भोजन हैं तथा सब प्राणियोंका संहारक मृत्यु भो जिसका भात्के लिए उपसेचन-आकादिके समान है प्रथात् भोजनके लिए भो पर्याप्त नहीं हैं, उस श्रात्माको जहाँ कि वह है, ऐसा कौन पूर्वोक्त साधन रहित

साधन सम्पन्न साधकद्वारा जो ब्रह्मा ज्ञेय है उसका 'यस्य' श्रादिसे निर्देश करते हैं, सर्वधर्मं विचारकत्व सर्वत्रायमें हेतु है । ब्रज्ञाे धर्म उपदेश द्वारा श्रौर क्षत्रिय प्राणियोंको कर्ममें नियुक्त करनेसे रक्षक है । इसप्रकार जगत्के रक्षार्थ दोनों सर्वोपरि माने गये हैं, ऋ्रपने स्वरूपमें स्थित श्रात्माको जैसे साधनसम्पन्न पुरुष जानता है वैसे साधन रहित प्राकृत बुद्धि पुरुष नहीं जान सकता है, भ्रतः श्रात्मशब्दार्थ साधनसंम्पत्तता श्रपेक्षित है ॥ २५ ॥

कठोपनिषदके प्रथमाध्यायकी द्वितीयवल्लीकी स्वामो सत्यानन्द सरस्वती विरचित सत्यानन्ददीपिका समाप्त ॥ २ ॥

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व० ३ ] भाषानुवाद-सत्यानन्ददीपिका ७९

पर्याप्तं प्राकृतबुद्धिद्रिर्यथोक्तसाधनरहितः सन् इत्था इथ्थमेव यथोक्तसाधनवा-निवेत्यर्थे, वेद विजानाति यत्न स आत्मेति ॥ २५ ॥

शाङ्करभाष्य भगवत्पाद विरचित शाङ्करभाष्य कठोपनिषद् द्वितीयवल्ल्यां समाप्त ॥ १-२ ॥

श्रोर साधारण बुद्धिवाला पुरुष जो इस प्रकार यथोक्त साधन सम्पन्न पुरुषके समान जान सकता है ॥ २५ ॥

कठोपनिषदैक प्रथमाध्यायको द्वितीयवल्लोका स्वामी सत्यानन्द सरस्वतीकृत भाषानुवाद समाप्त ॥ १-२ ॥

प्रथमाध्यायस्य तृतीयावल्ली

मात्र और प्राप्तव्यभेदसे दो आत्मा

ऋतं पिबन्तावित्यस्यक्वथाः सम्स्वन्वः । विधाविधो नानाविकल्पे कल्प्यते न तु सफलते ते यथावस्थितीते; तद्विग्रह्यार्थी रथरूपककल्पना, तथा च प्राप्तप्राप्यग्रन्थान्तर्गतव्यविवेकार्थं द्वावात्मानौ उपन्यास्येते—

ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिसाचिकेताः ॥ १॥

लोके ( श्रमिन् शरीरे ) सुकृतस्य ( कर्मणाः ) ऋतं ( सत्यं फलं ) पिबन्तौ ( भु-ज्ञानो ) गुहां ( गुहायां बुद्धौ ) परमे ( व्याप्यतिरेकाश्रयपेक्षया अतिकृष्टे ) परार्धे ( परस्य ब्रह्मणः स्थानकल्पे हृदयाकाशे ) प्रविष्टौ, छायातपौ ( इव विलक्षणयो ) ब्रह्मविदः वदन्ति ( कथयन्ति ) ये च पञ्चाग्नयः ( परस्य ब्रह्मणः ) त्रिसाचिकेताः ( त्रिः इत्यादिना निश्चिता:) ॥ १ ॥

'ऋतं पिबन्तौ' इस तृतीयावल्लीका सम्बन्ध इस प्रकार है—नाना प्रकारके विरुद्ध कलवाली विद्या और प्रविद्या है ऐसा उल्लेखमात्र किया गया है किन्तु उनका फलसहित यथावत् निर्णय नहीं किया गया है। उनके निर्णयार्थ [ इस वल्लीमें ] रथ रूपककी कल्पना की गई है, ऐसा करनेसे उनके सम्पकनेमें सुगमता हो जाती है। इस प्रकार [सा-प्रासङ्ग्य । गन्ता-गन्तव्यके विवेकार्थ दो आत्माओंका उपन्यास करते हैं—

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७२

कठोपनिषद्-शाङ्करभाष्य

[ पृ० ९

बहुभि लोग कहते हैं कि शरीरमें बुद्धिरूप गुहाके भीतर उत्तम ब्रह्मस्थान-हृदयपकार-

हृमें प्रविश्ट अपने कर्मफलको भोगनेवाले छायाफोर घामके समान परस्पर विलक्षण दो

( जीव और ईश्वर ) हैं। यही बात तान वार नचिकेत श्रभिनिकां चयन करनेवाले तथा

वे पञ्चाग्नितक्वि उपासना करनेवाले मी कहते हैं ॥ ९ ॥

ऋतं सत्यमवश्यंभावित्वात्कर्मफलं पिबन्तौ, एकसत्र कर्मफलं पिवति

मुत्तेते नेतरः; तथापि पात्सत्यसंप्रतिपत्तिप्राप्तान्नाविलक्षणत्वेन लक्षितव्यौतेन, मुक्तत्वात्

स्वयंकृतस्य कर्मणाऋततमिति पूर्वेण सम्बन्धः; लोकेऽस्मिन्मृशरीरे गुहां गुहायां

चुद्रो प्रतिष्ठौ, परमे वाह्यपुरुषाकारासंस्थानापेक्षया परमं, परस्य ब्रह्मणोऽधिष्ठानं

परार्थं, तस्मिन्निह परं ब्रह्मोपलभ्यते, छततस्तस्मिन्नपरे पारार्थं हृदौकाशे

ऋत- प्रावृष्यंभावी होनेके कारण सत्कर्मफलका पान करनेवाले दो श्रात्मा [प्राप्ति]

उनमेंसे केवल एक कर्मफलका पान-भोग करता है दूसरा नहीं, तथापि पान करनेवाले

से सम्बन्ध होनेके कारण यहाँ छत्रिन्यायसे दोनोंके लिए 'पिबन्तौ' कर्मफलका भोग

करते हैं, ऐसा कहा जाता है। सुकृत-स्वयंकृत कर्मफलको भोगते हुए यहाँ 'सुकृतस्य'

शब्दका पूर्ववर्ती 'ऋतस्य' शब्दके साथ सम्बन्ध है। लोक-इस शरीरमें बुद्धिरूप गुहाके

भीतर परम-बाह्य देहाद्वाश्रित श्राकाश संस्थानीकी श्रध्रपक्षा उत्कृष्ट परब्रह्मके श्रध्र-स्थान-परा-

धमें प्रविश्ट है, क्योंकि उसमें परब्रह्म उपललब्ध होता है, छतः तात्पर्य यह है कि उस

सत्यानन्ददीपिका

इस मन्त्रमें तीन श्रधिकारोंका वर्णन है इनमें प्रथम 'सर्व खल्विदं ब्रह्म' इस प्रकार

श्रनुमव करनेवाले ब्रह्मविद्, द्वितीय-जो गाहंर्पत्य, दक्षियाग्नि, श्राहवनीय, सत्य श्रौर

ग्रावासद्यम् इस प्रकार पांच श्रभियोंका सेवन करते हैं श्रायवा स्वर्ग, पर्जन्य, पृथिवी,

पुरुष तथा लोक इनमें श्रभिन दृष्टि करते हैं, तृतीय-नाचिकेत श्रभ्रिका तीनवार चयन

करनेवाले इनमें प्रथम उत्तम है । श्राख्या—श्रारमशब्द चेतनवाची है, छतः यहां दो चेतन

प्रतीत नहीं होते किन्तु केवल ऋतपानकर्तृत्वं प्रतोत होता है । समाधान-कर्मफल मोक्षका

जीव एक चेतन तो प्रतिष्ठ है द्वितीयके श्रधान्वेष्यमें दो संख्याके श्राकारसे 'द्वितीय गो-

द्वितीयोऽन्वेष्यः' इस गौका द्वितीय ग्रधान्वेषणा करना चाहिए। इस कथनसे सामान्य

जातीव्य दूसरी गौका ग्रधान्वेषण किया जाता है श्राख्यका नहीं। इस प्रकार यहां चेतन ही दूसरा

ऋतपानकर्ता प्रतीत होता है, श्रतएव दोनोंमें प्रयुक्त श्रारमशब्दसे कोई विरोध नहीं

है। यद्यपि इस वाक्यमें जीव और ईश्वर दो चेतन उपन्यासत हैं उन दोनोंमें कर्मफलका

सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि ईश्वरमें कर्मफलका सम्बन्ध नहीं है तो 'पिबन्तौ' यह कैसे कहा

गया है ? समाधान-छत्रिन्यायसे-जैसे लोकमें 'छत्रिणो यान्ति' ( छातेवाले जाते हैं )

छातेवाले और बिना छातेवाले दोनोंके लिए वे छातेवाले लोग जा रहे हैं,

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प्रविष्टावित्यर्थः। तौ च च्छायातपाविव विलच्यौ संसारित्वा संसारित्वेन ब्रह्मविदो वदन्ति कथयन्ति। न केवलमकर्मीया एवं वदन्ति, पाश्चाग्नययो गृहस्थाः ये च त्रिषाचिकेता: त्रि:कृत्वो नाचिकेतोऽग्निंश्रितो यैस्ते त्रिषाचिकेताः॥ ९ ॥ यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम्‌। श्रभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतं शकेमहि ॥ २ ॥ ईडानां ( यजनशीलानां कर्मिणां ) यः ( नाचिकेतः श्रग्निः ) सतुः ( दुःखसंसार-खार्यंध्वालसेतुरीश ) तं ( नाचिकेतमग्निं श्रभिनं ) शाकेमहि ( चेतुं, ज्ञातुं शक्नुमः ) श्रभयं ( भयहरिते ) पारं ( संसारसागरस्येतत् ) तितीर्षतां ( तर्तुं मिच्छतां ज्ञानिनां ) श्राश्रय- सूतं यत् श्रक्षरं परं ब्रह्मा ( तदपि ज्ञातुं शकेमहि ) ॥ २ ॥

यजन करनेवालों के लिए सेतु-प्रतिहार भूत नाचिकेत श्रग्निनको हम जानने एवं चयन करनेमें तथा भयघून्य क्षेम और संसारको पार करनेके श्रभिलाषी पुरुषोंका श्राश्रयभूत उस परब्रह्मको जाननेमें हम समर्थ हों ॥ २ ॥ यः सेतुरीव सेतुरीजानानां यजमानानां कर्मिणां दुःखसंतररपार्थत्वान्नाचि-केतोडग्निसतं वयं ज्ञातुं चेतुं च शकेमाहि शक्नुवन्तः। किंच यद्याभयं भयघून्यं संसारपारं तितीर्षतां तर्तुंमिच्छतां ब्रह्मविदां यत्परमाश्रयमश्वरमात्माख्यं ब्रह्म

परम परार्थ-हृदयाकाशमें प्रविष्ट हैं। वे दोनों संसारी और संसारसिरूप होनेके कारणा छाया और धामके समान परस्पर विलक्षण हैं, ऐसा ब्रह्मज्ञ लोग कहते हैं, केवल श्रकर्मी ही ऐसा नहीं कहते किन्तु जो त्रिप्राचिकता-तीनबार नाचिकेत श्रग्निनका चयन करनेवाले तथा जो पाश्चाग्निकी उपासना करनेवाले गृहस्थ भी ऐसा कहते हैं ॥ ९ ॥ दुःखको पार करनेके साधन होनेसे जो नाचिकेत श्रग्निन यजमान-कर्मियोंके लिए सेतुके समान होनेके कारणा सेतु है। उसे हम जानने व चयन करनेमें समर्थ हों। तथा जो श्रभय-मय रहित है और संसारके पार जानेकी इच्छावाले ब्रह्मवेताओंग्रोंका परम श्राश्रय श्रविनाशी श्रास्मा-नामक ब्रह्मा है उसे भी हम जाननेमें समर्थ हो सकें। श्रथवा

सत्यानन्ददीपिका ऐसा वाक्य प्रयोग होता है, यह छायात्रिन्याय है। इस प्रकार यहाँ भोक्ता जीवके सदृशन्यसे ईश्वरको भी भोक्ता कहा गया है। श्रुतिमें 'शुकृतं' शब्द 'दुष्कृतं'का भी उपलक्षण है ॥ १ ॥ जैसे नदी, नालोंद्वारा श्रवृद्र मार्गों पार करनेमें सेतु गन्ताके लिए सहायक साधन है, वैसे नाचिकेत श्रग्निन सब प्रकारके यार्जिकोंके लिए सेतुरुप है। श्रधियति मुमुक्षुको परब्रह्म प्राप्तिके लिए शास्त्रविदिहित निष्काम यज्ञादि कर्म चित्त शुद्धिद्वारा ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान

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तच्च ज्ञातुं शकेमहि शक्नुवन्तः । परापरे ब्रह्मणसी कर्मब्रह्मविदाश्रये वेदितव्ये इति वाक्यार्थः । एतयोरेव ह्युपन्यासः ऋृत ऋतंतं पिबन्ताविति ॥ २ ॥

तत्र य उपाधिॠषृतः संसारी विद्याविद्ययोरधॠतू मोक्षगमनाय संसारगमनाय च तस्य तदुभयगमने साधनो रथः कल्प्यते—

शारीरारादिसे सम्बद्ध रथादि रूपकं

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथं च तु ।

बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३ ॥

आत्मानं ( शरीररूपी रथाततारेंजजीवं ) रथिनं ( रथस्वामिनं ) विद्धि ( जानीहि ) शरीरं ( देहं ) तु ( पुनः ) रथं ( रथस्थानीयम् ) एव ( हि ) [ विद्धि ] बुद्धिं तु सारथिं ( शरीररथपरथचालकं ) [ विद्धि ] मनः ( सज्जल्पविकल्पलक्षणं ) च ( अपि ) प्रग्रहम् ( अश्वरसंयमनरज्जुं ) [ विद्धि ] ॥ ३ ॥

शरीर१ लक्ष आतमाको रथी-रथ स्वामी जान, शारीरको रथ, बुद्धिको सारथि और मनको प्रग्रह-लगाम जान ॥ ३ ॥

तत्र तमात्मानमृतपं संसारियां रथिनं रथस्वामिनं विद्धि जानीहि । शरीरं रथमेव तु रथवद्धयस्थानीयैरिन्द्रियैःरुच्यमाणैतरस्स्य । बुद्धिं तु श्रध्य-वसायलक्षणगां सारथिं विद्धि । बुद्धिनेत्रप्रधानत्वाच्छरीरस्य सारथिनेत्रप्रधान इव

कर्मंवितॄका श्रात्माय परपर झह्म और ब्रह्मविदका श्रात्माय परकह्म ये दोनों ही ज्ञातव्य हैं यह वाक्यार्थ है । ‘ऋतंतं पिबन्तौ’ इस मन्त्रमें इन दोतों ( परापर ब्रह्मा ) का ही उल्लेख किया गया है ॥ २ ॥

उन दोनोंमें जो उपाधि परिच्छिन्न संसारी-जीव मोक्ष एवं संसारके प्रति गमन करनेके लिए विद्या और श्रविद्यामें श्रधॠकृत है । उसके लिए उन दोनोंके प्रति गमनके साधनभूत रथकी कल्पना की जाती है—

पूर्वोक्त उन दोनोंमें उस श्रात्माको-कर्मफल भोक्ता संसारीको रथी-रथस्वामी जान, शरोररको तो रथ हो समझे, क्योंकि शारीररथसम जुत हुए श्रश्वैव स्थानीय इन्द्रियाँस खींचा जाता है । निश्चयात्मक बुद्धिको सारथि जान, क्योंकि सारथि नेत्रत्व प्रधान रथके समान यह शरीर भी बुद्धिनेत्रत्व प्रधान है । देहगत सभी कार्य प्रायः बुद्धिके ही

संपादनमें सहायक साधन हैं । ‘आत्मा ह्यविविदर्शन्ति यज्ञ्ञेन’ ( बृह० ४-४-२२ ) ऐसी श्रुति भी है ॥ ३ ॥

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रथः । सर्वे हि देहगतं कार्यं बुद्धिकरत्वाद्यमेव प्रायेण । मनः संकल्पविकल्प-द्वन्द्वग्नं प्रभहं रशनां विद्धि । मनसा हि प्रगृहीतानी श्रोत्राणि करणानि प्रवर्तन्ते रशनयैवाश्वाः ॥ ३ ॥

इन्द्रियार्थे हयानाहुर्विषयाँस्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४ ॥

मनीषिणः । ( विद्वांसः ) इन्द्रियार्थे हयान् ( श्रवणादीन् ) श्राःहुः ( कथयामासुः ) विषयान् ( शब्दादीन् ) ( इन्द्रियेषु ) मार्गान् ( विषयभूतान् ) [ आहुः ] आत्मेन्द्रिय-मनोयुक्ते ( शरीरेन्द्रियमनोभिः सहितम् ) आत्मानं ( मोक्तारं संसारिणम् ) भोक्ता इति श्राहुः ॥ ४ ॥

इन्द्रियार्थे चजुरावीने हयानाहू रथकल्पनाकुशालाः । शारीरस्थाकर्षयासा-न्यात् । तेष्वेवेन्द्रियेषु हयत्वेन परिकल्पितेषु गोचरान्मर्गानुपादीन्त्विष्या-न्विद्धि । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं शरीरेन्द्रियमनोभिः सहितं संयुक्तमात्मानं भोक्तेति कर्त्तव्य है । सङ्कल्पविकल्पात्मकं मनको प्रग्रह-लगाम समकक्ष, क्योंकि जैसे श्रश्व लगामसे नियामित्न हो चलते है, वैसे ही श्रोत्र श्रादि इन्द्रियाँ मनसे नियामित्न हो अपने अपने विषयमें प्रवृत्त होती हैं ॥ ३ ॥

रथकी कल्पना करनेमें कुशल पुरष शारीररूपी रथके खींचनेमें साहश्य होनेसे वधु प्रापि इन्द्रियको श्रश्व कहते हैं । रूपादि विषयोंको श्रश्वरूपसे परिकल्पित उन इन्द्रियोंके गोचर-विचरष्ण पथ जानो । मनोऽभिग्न शारीर, इन्द्रिय श्रैर मन सहित-युक्त श्रात्माको

सत्यानन्ददीपिका

भाष्यमें संसारी पद ईश्वरीक व्याख्यास्तिक्के लिए है श्रैर मुक्त जीवकी व्याख्यास्तिक्के लिए 'विद्यादि' कहा गया है । विद्यामें श्रधिष्ठित जीव मोक्ष श्रैर श्रविद्यामें श्रधिष्ठित जीव संसार गमनके लिए है, ऐसा विभाग है ।

शारीररूपो रथतादात्म्याभिमानो जीव रथी कहलाता है । जैसे रथमें शारीरिका नेत्रृत्व है वैसे शरीरमें बुद्धिक्रा नेत्रृत्व है, क्योंकि देहगत गमनागमन श्रादि सव व्यवहार प्रायः बुद्धिद्वारा ही संपादित होते हैं । 'ईदमेव करिष्ये' यह वृत्ति सङ्कल्प श्रैर 'स्थास्येर्वा पुरुषोवा' इत्यादि संयात्मक वृत्ति विकल्प है । बुद्धिद्वारा निप्रित किये जानेपर मनसे इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति होती है, श्रत; मन लगामसडघ है । जैसे प्रग्रहसे रथका संचालन होता है, ठीक वैसे ही इन्द्रियोंद्वारा शारीरक संचालन होता है । वस साइशपसे इन्द्रियोंको श्रश्व कहा गया है ॥ ३ ॥

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उपाधि कृतमेव तस्य भोक्तृत्वम् । तथा च श्रुत्यन्तरं केवलस्यापि दर्शयति-'ध्यायतिव लेलायतीव' ( बृह० ४।३।७ ) इत्यादि । एवं वृध्यमात्रथकल्पनया वैषम्यावस्य पदस्यात्मतया प्रतिपत्तिरुपपद्यते स्वभावानतिक्रमात् ॥ ४ ॥

ध्रुविवेकीकी विचभता

यस्तवविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ ५

यस्तु ( पुनः ) अश्रुतेन ( अश्रमादिहीनेन ) मनसा ( चित्तेन ) [ सदा श्रविज्ञानवानुप ( प्रवृत्तिनिवृत्तिविषये विवेकहीनः ) [ भवति ] सारथे तस्य इन्द्रियाणि अवश्यानि ( उन्मार्गगामीनि ) [ भवन्ति ] ॥ ५ ॥

किन्तु जो बुद्धिरुपसारथि भ्रसंयत चित्तसंयुक्त हो प्रवृत्ति श्रोैर नि विवेकहीन होता है उसकी इन्द्रिय सारथीके दुष्ट अश्वोंकी भाँति उसके रहते हैं ॥ ५ ॥

तत्रैषं सति यस्तु बद्धाश्वः सारथिरविज्ञानवान्निपुणोऽविवेक नित्रित्तौ च भवति यथेतरो रथचर्योयामयुक्ततेनाप्रग्रुहीतेनासमाहितेन ?

'यह भोक्ता संसारी है' ऐसा कहते हैं । केवल निरुपाधिक श्रात्मा तो भो उसका भोक्तृत्व तो बुद्धि श्रादि उपाधि निमित्तक है । इसी प्रकार 'ध्यान सा, चेष्टा करता दृश्या-सा' इत्यादि श्रन्य श्रुति केवल श्रात्माका श्रभोक्तृत्व है, ऐसा होनेपर-श्रोपाधिक भोक्तृत्व होनेपर ही वृध्यमात्र रथकल्पना पदकी श्रात्मभावसे प्राप्ति बन सकती है, श्रन्यथा नहीं, क्योंकि स्वभाव नहीं सकता ॥ ४ ॥

किन्तु ऐसा होनेपर ( श्रात्मामें श्रसंसारित्व श्रात्मभाविक होनेपर ) सारथि श्रविज्ञानवान्-श्रकुशल रथसंचालनमें श्रग्रनिपुण श्रन्य सारथिके समान श्रश्रोंको ] प्रवृत्ति-निवृत्तिमें विवेक रहित है । जो सर्वदा प्रग्रह-लगाम स्था

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भ्रम्निके उभयत्वादिके समान श्रात्माके स्वाभाविक संसारित्वादि सकते तो उनकी निवृत्तिके बिना स्वाभाविक श्रसंसारित्व श्रपरिच्छिन्नत्व भी उस श्रात्माको प्राप्त नहीं हो सकतां, श्रत: श्रात्मामें संसारित्व श्रादि

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१ सदा युक्तो भवति तस्याकुशलस्य बुद्धिसारथेरिन्द्रियैरश्वस्थानोया-न्यशक्यनिवारणानि दुष्टाश्वा श्रदान्ताश्वा इवेतरसारथेःभवेंन्ति ॥४॥

यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाणि बध्यानि सदश्वा इव सारथे ॥ ६ ॥

; सदā युक्तेन ( समाहितेन ) मनसा विज्ञानवान् भवति, तस्य इन्द्रियाणि, अश्वा: ( शिक्षिताश्वा: ) इव वश्यानि [ भवन्ति ] ॥ ६ ॥

न स तत्पदमानोति सन्निसारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥

( पुनः ) प्रविज्ञानवान् ( विवेकहीनः ) प्रमनस्कः ( प्रमुग्रीतमनाः ) सदा अशुचिः : तत् ( प्रसिद्धं वैष्णवं ) पदं न प्राप्नोति ( प्राप्नोति ) संसारम् अशुचिगच्छति ॥७॥

-विक्षिप्तचित्तस्ते युक्त है, उस प्रकुशल बुद्धिरूपसारथिके श्रश्वस्थानीय इन्द्रियाँ यथेक बेकाबू दुष्ट अश्वोंकी भाँति श्रधीन नहीं होतीं श्रथवा कुमार्गसे हटायो नहीं

॥ ६ ॥ ; जो (बुद्धिरूप सारथि) पूर्वोक्त सारथिसे विपरीत विज्ञानवान् कुशल प्रग्रुहीत

अर्थात् सदā समाहित चित्तवाला होता है उसकी अश्वस्थानीय इन्द्रियाँ कर्त्तव्य

तत्त्वमें क्रमसे प्रवृत्त एवं निवृत्ति की जा सकती हैं जिस प्रकार सारथिके

प्रश्व ॥ ६ ॥ पूर्वोक्त प्रविवेकहीन बुद्धिरूप सारथिवाले रथीके लिए शृणु यह फल कहती है-

सत्यानन्ददीपिका

ह शृण्वय-ध्यसिरेकशा 'तत्' ग्रापिसे उपसंहार करते हैं । नियमन श्रोरे ग्रनिय-

रवहारमें प्रकृशाल जिसको बुद्धिरूप सारथिका मनरूपी अश्वग्राम वशामें नचों है

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किंतु जो पुनः विवेकहीन भ्रसंयतमनाः और सदा अश्रपवित्र रहनेवाला पदको प्राप्त नहीं कर सक्ता, प्रत्युत जन्ममरणात्मक संसारको प्राप्त होता है ॥ यस्त्वविज्ञानवान्भवति, अ्रमनस्कोडपग्रहोऽतरमनस्कः स तत् एवं आशु न स र्थी तत्पूर्वोक्तमचारं यत्परं पदमाप्नोति तेन सारथिना। न के नाप्नोति संसारं च जन्ममरणात्मकश्चैवमधिगच्छति ॥ ७ ॥

विवेकीकी परमपदप्राप्ति

यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः । स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥ ५ ॥

यः तु ( पुनः ) विज्ञानवान् समनस्कः ( युक्तमानसः ) सदा शुचिः स तत्पदं ( वैष्णवपदं ) प्राप्नोति ( प्राप्नोति ) यस्मात् ( पदात् ) भूयः न ज किंतु जो सद्विवेक संयतचित्त और सदा पवित्र रहनेवाला होता है, पदको प्राप्त होता है, जहाँसे वह पुनः उत्पन्न नहीं होता ॥ ५ ॥

यस्तु द्वितीयो विज्ञानवान्विज्ञानवत्सारथ्युयेतो र्थी विद्वानितरं मनाः समनस्कः स तत् एवं सदा शुचिः स तु तत्पदमाप्नोति, यस्माद्भूयः पुनर्नं जायते संसारे ॥ ८ ॥

किं तत्पदं इत्याह—

जो पुनः विवेकहीन भ्रसंयतमनाः और सदा अश्रपवित्र रहनेवाला है, द्वारà वह जीवरूप र्थी उस पूर्वोक्त अश्वारथी परम पदको प्राप्त नहीं होता । एवं प्राप्त नहीं होता केवल इतना ही नहीं प्रत्युत जन्ममरणात्मक संसार होता है ॥ ७ ॥

किंतु जो द्वितीय र्थी या विश्ञानसम्पन्नं विद्यान् सारथिसंयुक्त और सभं है भ्रतख़ वह सदा ही पवित्र रहनेवाला है, वह तो उस पदको प्राप्त कर ले प्राप्त पदसे च्युत होकर पुनः संसारमें जन्म नहीं लेता ॥ ५ ॥

वह पद क्या हैं ? इसपर कहते हैं—

सत्यानन्ददीपिका

इस मन्त्रमें सुमुखशुका लक्ष्य और लक्ष्य कहा गया है। वह सुमुखु उस

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विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्तरः । सोडध्वानः पारमाप्नोति तद्विषयोः परमं पदम् ॥ ८ ॥

नरः विज्ञानसारथिः ( विवेकसम्पन्नाबुद्धिसारथिः यस्स सः ) मनः प्रग्रहवा'न प्रग्रहः इन्द्रियाश्वसंयमनरञ्जु यस्य, सः ) सः अध्वनः ( संसारगते ) पारं 'नं ) विष्णोः ( व्यापकस्य ब्रह्मणः ) तत् ( प्रसिद्धं ) परमं पदं ( स्थानं ) धाप्नोति ( प्राप्नोति ) ॥ ८ ॥

मनुष्य विवेक सम्पन्न बुद्धिरूप सारथिवाला और इन्द्रियरूप अश्वोंको संयम मनरूपी लगामवाला है, वह संसारगतिके पार-पार्यन्तवसात्मक-समासि विष्णुप्र को प्राप्त करता है ॥ ८ ॥

ज्ञानसारथिर्यस्तु यो विवेकबुद्धिसारथिः पूर्वोक्तो मनः प्रग्रहवान्प्रगृहीतमाहितचित्तः सङ्घुचिन्रेरो विद्वान्सोडध्वानः संसारगते पारं परमे तत्त्वमित्येतदाप्नोति मुख्यते सर्वसंसारबन्धनैः तद्विषयो व्यापनशीलस्य परमात्मनो वासुदेवाख्यस्य परमं प्रकृष्टं पदं स्थानं सतत्त्वमित्येतद्-वेति विद्वान् ॥ ८ ॥

यत्परं गन्तव्यं तस्येन्द्रियास्पि स्थूलान्वारभ्य सूक्ष्मतारतम्येन मतयाज्ञिगमः कर्तव्य इत्येवमर्थमिदमारभ्यते—

पूर्वोक्त विद्वान् पुरुष विवेक सम्पन्न बुद्धिरूप सारथिसे युक्त, मन प्रग्रहवान्-न-समा'हितचित्त होनेसे पवित्र है वह विद्वान् संसारगतिके पर पार जो मध्य-ज्ञातव्य है उसे परमात्माको प्राप्त कर लेता है प्रथमतः सर्वसंसार बन्धनोंसे मुक्त होता है । उस विष्णु-व्यापनशील सर्वव्यापक ब्रह्मरूप वासुदेव संज्ञक पर-जो परम-उत्कृष्ट पद-स्थान-स्वरूप है उसे वह विद्वान् प्राप्त कर लेता है ॥८॥

जो सतत्त्व-प्रेमवै-ज्ञेय परम पद हैं, स्थूल इन्द्रियासे प्रारम्भकर सूक्ष्म अभसे प्रस्यगात्मरूपसे उसका ज्ञान प्राप्त करना वाहिए, इसलिए उसो ग्रथंक्या किया जाता है —

सत्यानन्दोद्दीपिका

यति भूतानि स्वविमत्तित चासु स चासौ देवप्रद दीप्त इति स्वप्रकाशो

इससे 'तत्' पदका वाच्यार्थ कहा गया है और 'परमम्' इसस लक्यार्थ है । 'विष्णोः परमं पदम्' ( उत्कृष्टाख्यस्वरूप ) ग्रहा 'निरपेक्ष .

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इन्द्रियादिका तारतम्य

इन्द्रियेभ्यः परा ह्यार्था ग्रर्थेभ्यश्च परं मनः ।

मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः ॥ १० ॥

इन्द्रियेभ्यः ( इन्द्रियोंकी ) ग्रर्थाः ( विषयाः ) पराः ( सूक्ष्माः-उत्कृष्टाः ) ग्रर्थेभ्यः ( विषयेभ्यः ) च ( ग्रपि ) मनः ( संकल्पविकल्पात्मकं ) परं ( सूक्ष्मं ) परा, बुद्धेः महान् ग्रात्मा परः ( सूक्ष्मः-उत्कृष्टः ) ॥ १० ॥

इन्द्रियोंकी ग्रपेक्षा उनके विषय श्रेष्ठ हैं, विषयोंसे मन श्रेष्ठ, मनसे बुद्धि श्रेष्ठ है तथा बुद्धिसे भी महान् ग्रात्मा-महत्त्व उत्कृष्ट है॥ १० ॥

स्थूलानि तावदिन्द्रियाणि तानि यैरथैरात्मप्रकाशनायारब्धानि येभ्यः स्वकार्येभ्यस्ते परा ह्यार्थाः सूक्ष्मा महान्तश्च प्रत्यगात्मभूताः प्रत्यर्थेभ्यश्च परं सूक्ष्मतरं महत्त्वत्यगात्मभूतं च मनः । मनःशब्दव्यारम्भकं भूतसूक्ष्मं संकल्पविकल्पाद्यारम्भकत्वात् । मनसोडपि

इन्द्रियाणि स्थूल हैं, वे जिन ग्रर्थों ( शब्द स्पर्शादि ) तन्मात्राश्रों द्वारा ग्र प्रकाशित करनेके लिए उत्पन्न की गईं हैं वे विषय ग्रहण करने कार्यभूत इन्द्रिय

महान् एवं प्रत्यगात्मभूत हैं। उन विषयोंसे भी पर-सूक्ष्म महान् एवं प्रतयगात्मभूत बुद्धि है । ग्रर्थात् ग्रध्यवसायात्मक बुद्धि ग्रारम्भक भूतसूक्ष्म मन शब्दवाच्य है, मनसे पर-स्थूल

सत्यानन्ददीपिका

शब्दादि ग्रर्थोंसे मनके ग्रारम्भक भूत-सूक्ष्म-पर है, उनसे बुद्धिके ग्रा पर हैं, यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि कार्यकी ग्रपेक्षा उपादानकारण व्यापक श्रौर ध्रुवपायिस्वरूप प्रसिद्ध है जैसे घटादिके प्रति मृत्तिकादि, भूतोंके परस्पर कार्यकारण भावमें कोई क्रमशः नहीं हैं। यद्यापि यह

व्यापकता कल्पित की गई है । कोई मनको परमार्थंतः ग्रात्मा मानते निवृत्तिके लिए भाष्यमें ‘मनः शब्दवाच्यम्’ ग्रादि कहा गया है । ‘श्रात्मसंय

( छां० ६।७।६ ) इत्यादि श्रुति मनको मोतिक कहती है, भ्रत? ग्रौर्मी ग्रात्मा नहीं हो सकता है । संकल्पादिरूप मन श्रध्यवसायात्मक बुद्धिसे नि

बुद्धि मनसे पर है । ‘बुद्धिरात्मा’ इस विज्ञानवादी मतका ग्रपनयन करते

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तत्र प्रत्यात्मभूता च बुद्धिर्बुद्धिशाब्दवाच्यमध्यगतसायाद्वारस्मभकं भूतभृद् बुद्धेरात्मा सर्वप्रकाशिबुद्धीनां प्रत्यात्मभूतत्वादात्मा महान्सर्वस्मह-

। ग्राह्यक्त्वाद्यात्मप्रथमं जातं हैरएयगर्भं तत्त्वं बोधाबोधात्मकं महानात्मा गर इत्युच्यते ॥ १० ॥

महतः परमव्यक्तमनव्यक्तात्पुरुषः परः ।

पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ११ ॥

'हेतुः श्रव्यक्तम् ( श्रव्याकृतं ) परम्, श्रव्यक्तात् भव्याकृतात् ) पुरुषः (सर्वापेक्षयात् ) परः (परमात्मनः ) परं किंचित् न ( ग्रस्ति ) सा काष्ठा ( श्रवधि: ) सा गतिः ॥ ११ ॥

हेतुत्वसे श्रव्यक्त-श्रव्याकृत मूलप्रकृति़ पर है और श्रव्यक्तसे भी पुरुष पर है, पर श्रन्य कुछ नहीं है, वही सूक्ष्मतत्वकी पराकाष्ठा-श्रवधि है वही उत्त्कृष्टगति है ॥ ११ ॥

हतोऽपि परं सूक्ष्मतरं प्रत्यात्मभूतं सर्वस्महत्तरं चाऽव्यक्तं सर्वस्य जगतो

तमव्याकृतनामरूपसतत्त्वं सर्वकार्यकरणाशक्तिसमाहाररूपमव्यक्ततांव्याशादिनासवाच्यं परमात्मन्योंत्प्रोतभावेन समाश्रितं वट्कल्पिकायामिव

शक्तिः । तस्मादव्यक्तात्परः सूक्ष्मतरः सर्वकार्यकरणाशक्तिवात्प्रत्यगात्म-

द्वसे भी समस्त प्राणियोंकी बुद्धिका प्रत्यगात्मभूत होनेसे प्रात्मा महान् है, वह सबसे महान् है । श्रव्यक्तत्से प्रथमोत्पन्न हिरण्यगर्भतत्व है । जो ( ज्ञानशक्ति

याशक्तिसे सम्पन्न होनेके कारण ) बोधाबोधात्मक वह महान् श्रात्मा बुद्धिसे -सूक्ष्म श्रेष्ठ है, ऐसा कहा जाता है ॥ १० ॥

हत्वसे पर सूक्ष्मत्तर प्रत्यगात्मभूत सद्से महान् श्रव्यक्त है, जो सारे जगतके बीज

।याकृत नामरूपका स्वरूप, सम्पूर्णं कार्यकारणशा शक्तिका संघात श्रव्यक्त-श्रव्याकृत

प्रकाशादि शब्द-तत्वदृष्ट तथा वटतत्वमें श्राश्रित वटवृक्षकी शक्तिके समान

रामें श्रोनप्रोतभावसे प्राश्रित है । उस श्रव्यक्तत्की प्रपेक्षा सर्वकारणोंका कारण

सत्यानन्ददीपिका

है । भूतादिमें जो उत्तरोत्तर परतत्वकी भलंपना की गई है वह केवल परमपुरुषार्थंकों

। इच्छ्वासे न कि उनमें परतत्व प्रतिपादनकी इच्छ्वासे, क्योंकि ऐसा करनेसे कोई

नहीं है ॥ १० ॥

बद श्रौर श्रर्थक शक्तिरूप सम्बन्ध नित्य है इसका निर्वाह करनेके लिए

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त्वाख्य महांक्ष, श्रुत एवं पुरुपः सर्वपूर्णरुपात् । ततोऽन्यसस्य परस्य प्रस यन्नाह-पुुरुषाथ परं किंचिदिदति । यस्माद्रास्ति पुरुषाद्विन्मात्रघनात्प वस्त्वन्तरं तस्मात्सूक्ष्मतमतवमहत्वप्रत्यगात्मत्वानां सा काष्ठा निष्ठा प श्रुत्व हीनद्रयेप्य श्रारण्य सूक्ष्मत्वादिपरिसमाप्तिः । श्रत एवं च ग गतिमतां संसारिणां परा प्रकृष्टा गतिः 'यदूगत्वा न निवर्तन्ते' ( ९५१६ ) इति स्मृतेः ॥ ९९ ॥

ननु गतिविशेषविदांल्यापि अवतिलभ्यम्‌। कथम्‌ वस्मादभयो न ज नैष दोषः, सर्वस्य प्रत्यगात्मत्वादवगतिरेव गतिरित्युपचर्यते । प्रत्य दर्शितोर्मिन्द्रियसमवबुद्धिपरत्वेन । यो हि गन्ता सोऽगतंप्रतयग्रूपं गन होनेसे पुुुष पर-सूक्ष्मतर एवं महान् है, श्रतएव वह होनेसे पुुुष शब्द वाच्य है । इसमें 'पर' किसी श्रन्य वस्तुंके प्रसङ्गका न कहनेते हैं—पुम्रपसे पर श्रन्य कुछ नहीं है, सभोंfिचदचिन्माात्र पुुरुषसे श्रन्य न नहीं है, श्रतएव वहो सूक्ष्मतनच, महत्व श्रौर प्रत्यगात्मत्वकी पराकाष्ठा-निष्ठ है । इन्द्रियोंसे श्रागममकर इस श्रात्मामें ही सूक्ष्मत्वादिकी समाप्ति होतीं है । सव गमन करनेवाले गतिशील संसारियोंकी परा-श्रकृष्टगति है, क्योंकि

( जिसे प्राप्तकर-जानकर पुनः संसारावर्तमें नहीं लौटते ) ऐसों स्मृतिमभं गतिशब्दसे यथाश्रुतार्थका ग्रहणकर श्राख्या करते हैं—ग्रद्वैत वेदान्तपदके है तो वहांससे श्रागमन भी होना वाहिए, तो पुनः 'जिससे पुनः जन्म नहीं ले कहा जाता है ? यह दोष नहीं है, क्योंकि सबका प्रत्यगात्मा है, श्रतएव उस उपचारेसे गति कहा जाता है । इन्द्र्रिय, मन श्रौर बुद्धिसे परतवरुपसे श्रात्माका दिखलाया गया है, जो गमनकर्ता है वह श्रपनसे भिन्न श्रनात्मभूत 9

स्मृतिस्थले ' मायाविकाश ऋतोक्क प्रोतप्रोथ' ( बहृ0 ) 'मायां तु प्रकृतिं विद्धि तु महेशवरम्‌' ( श्रवे० ४१९० ) ( तब यह श्रव्याकृत हो था, श्ररे गार्गि ! पद वाच्य श्राकाश-परमात्ममें यह श्र्रोत प्रोत है । मायाको सबका कारण महेशवरको मायावी-माया स्वामी जानो ) इत्यादि श्रुतिसे श्रव्यक्त प्रसिद्ध श्रव्यक्तत्को सांख्याभिमत प्रधानतसे 'परमात्मनि' श्रादि भाष्यसे विलक्षण कह सांख्याभिमत प्रधान जगत्का स्वतन्त्र कतृंककारण है जब कि श्रव्यक्त-माया जगत्का कारण है । श्रव्यक्त ईशवरकी शक्त्ति है पृथगसतत्व नहीं है, क्योंकि स

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तथाप्येयेषा । तथा च श्रुति:-‘आनन्दघनाः श्रद्धासु पारयिष्णवाः' इत्याद्या । श्रंयाति प्रत्यगात्मत्वं सर्वस्य—

एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽत्मा न प्रकाशते । दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥१२॥

एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽत्मा न प्रकाशते । हृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥

भूतेषु ( ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु ) गूढः ( निहितः ) एषः आत्मा न प्रकाशते ( न विभाति ) । सूक्ष्मदर्शिभिः आत्मप्रज्ञया सूक्ष्मया बुद्ध्या न हृश्यते ॥ १२ ॥

तोंमें गूढ यह आत्मा प्रकाशमान-प्रत्यक्ष नहीं होता । यह तो सूक्ष्मदर्शी पुरुषों पैनी एवं सूक्ष्म बुद्धिसे देखा जाता है-‘अनुभव किया जाता है । ॥ १२ ॥

ऋषिः सर्वेषु ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु भूतेषु गूढः सङ्क्तो दर्शने श्रवणादि-मायाच्छन्नश्रोत्रत एवं आत्मा न प्रकाशते । आत्मत्वेन कस्यचित् । अथाहो दुर्वगाह्या विचित्रा माया चेयं यदयं सर्वो जन्तुः परमार्थतः तत्त्वोदयेऽपि बोध्यमानोडहं परात्मेति न गृह्यत्यानात्मानं देहेन्द्रियादि-

करतां हैं इससे विपरीत नहीं । तथा 'आनन्दघनाः' ( संसार मार्गसे पार आवाले पुरुष मार्ग रहित होते हैं ) इत्यादि श्रुति है । इस प्रकार श्रागमकी सबका प्रत्यगात्मा है, दिखलातो है—

ऋषि-आत्मा ब्रह्मादिसे लेकर स्तम्बपर्यन्त सब भूतोंमें गूढ-आवृत छिपा हुया था यदि कर्मकरनेवाला तथा श्रविद्या-मायासे आच्छन्न-आच्छादित है, अतएव ऋषिभ्यो ! यह माया अत्यन्त दुर्वगाह्या विचित्रा माया चेयं यदयं सर्वो जन्तुः परमार्थतः तत्त्वोदयेऽपि बोध्यमानोडहं परात्मेति न गृह्यत्यानात्मानं देहेन्द्रियादि-

सत्यानन्ददीपिका

—यदि आत्मा प्रत्यग्रूप है तो वह सबका सदैव सम्बन्धी स्वरूप है । ऐसे स्थितिमें लिए ज्ञानादि साधन व्यर्थ होंगे ? समाधान-श्रवणादि देहादि भ्रानात्म-तत्भावसे प्राप्त जो प्रधिक्षारी है, वह विध्याद्वारा आत्मभावको निवृत्तकर ही प्राप्त होता है, अतः ज्ञानादि साधन व्यर्थ नहीं है ।

'ऋष्यते' आत्मा किसेिकों प्रकाशित-अनुभूत नहीं होता, इससे यह सिद्ध होता 'पुरुष, वृद्धयापुत्रादिके समान नहीं है ? ऐसा नहीं, क्योंकि लिङ्गका दर्शन से देखता हूँ, इसका श्रवण करता हूँ, यह कार्य करता हूँ' इत्यादि लिङ्ग-

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संघातमात्मनो हृश्यमानमपि घटादिवदात्मतत्त्वेनाहमसुख्य पुत्र इत्यतु गृद्यति। नूनं परस्यैव मायया सोऽसृज्यमानः सर्वो लोको वम्भ्रमेति स्मरराम-'नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः' (गीता ७।२५ नतु विरुद्धमिदमुच्यते 'मत्या धीरो न शोचति' (कठ २।१४) ' (कठ १३।१२) इति च। नैतदेवम्। श्रासंस्कृतबुद्धे रविझ्नेयत्व इत्यक्तम्। हृश्यते तु संस्कृतया श्राग्रश्रया श्रागमिश्रयाग्रच्या तया, एकत्रेतत्, सूक्ष्मया सूक्ष्मवरत्निफलरूपाभ्रया, कैः ? सूक्ष्मदर्शिभिः

[ श्राख श्रौर श्राचार्यद्वारा ] इस प्रकार बोध कराये जाननेपर भी 'मैं परम पुरुष हूँ' ऐसा ग्रहण नहीं करता प्रत्युत देह, इन्द्रियादि संघात घटादिके समान श्र ग्रन्थमाको किसोंके न कहनेपर भी 'मैं इसका पुत्र हूँ' इस प्रकार श्रात्म करण करता है। निश्चय परमात्माकी मायासे मोहित हुग्रा यह सारा जगत् श्र भ्र्र्र्रहै। तथा 'नाहं प्रकाशः'० (योगमायासे श्रावृत हुग्रा मैं सबको प्रकाशित होता ) इत्यादि स्मृति भी है। पू०---परन्तु 'मत्या०' (उसे ग्रनुभवः पुरुष शोक नहीं करता ) 'न प्रकाशते'० (प्रकाशित नहीं होता ) यह तो ज्ञाता है ? सि०---ऐसा नहीं है, श्रात्मा श्रसंस्कृतबुद्धि पुरुषके लिए श्रवि 'न प्रकाशते' ऐसा कहा गया है। वह तो संस्कृत-दीक्ष्या किसो पैनोनौकके हो ऐसी एकाग्रता युक्त एवं सूक्ष्मवस्तुके निष्परिगान्त-निरीक्षण परामया तीव्र ग्रनुभव किया जाता है। किनके द्वारा ? सूक्ष्मदर्शियों द्वारा। 'इन्द्रियोंके ! उनसे सूक्ष्म हैं' इत्यादि प्रकारसे सूक्ष्मताकी परम्पराका दर्शन-विचार है

सत्यानन्दीदीपिका

होता कि प्रविद्या प्रतिबन्धक है, मायासे श्रावृत है, इससे यह श्रपने ब्रह्मरूपसे नहीं जानता श्रौर 'मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ' ऐसा ठयचहार योग्य भी प्रविय्या विद्यासे निवृत्त श्रौर मिथ्या है तो भी ऐसी दुरवगाह्या एवं विचि श्रौर श्राचार्य द्वारा 'तत्त्वमसि' 'पर एवं श्रात्मा नासि संसारी?' (तू परमा नहीं है ) ऐसा वार बार प्रतिबोधित किये जाने पर भी 'मैं ब्रह्मा हूँ' ऐस प्रत्युत श्रपने हृश्यमान ग्रनात्म-देहेइन्द्रियादि संघातको 'त्वं देवदत्तस्म प इस प्रकार प्रतियोधिल न होते भी 'मैं इसका पुत्र हूँ' ऐसा ग्रहण कर विषयमें 'नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः' (गीता ७।२४ ) वचन भी है। 'इन्द्रियोंसे लेकर श्रव्यक्त पर्यन्त जो सूक्ष्मतत्व, महत्तव, एवं

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शिनस्तैः सूक्ष्मदर्शिभिः पपिडतैरित्येतत्॥१२॥

लयचिन्तन

तेपत्युपायमाह— यच्छेद्वाड्मनसी प्राज्ञस्तद्याच्छेज्ज्ञान आत्मनि। ज्ञानमाति महति नियच्छेत्तद्याच्छेच्छान्त आत्मनि॥१३॥

( विवेकी ) वाकू ( वाणी ) मनसी ( नियच्छेत् ) तत् ( मनः ) ज्ञाने (प्रकाश- गात्मनि ( बुद्धौ ) यच्छेत्। ज्ञानं ( बुद्धिं ) महति ( महत्तत्वे ) तृं ( महत्तत्वं ) शान्ते ( विकाररहते ) प्राज्ञात्मनि (परमात्मनि ) यच्छेत्॥१३॥ ते पुरुष वाक् इन्द्रियका मनमें उपसंहार करे, उसका प्रकाशस्वरूप बुद्धिमें द्विको महत्तत्वरूप ग्रात्मामें लीन करे ग्रौर महत्तत्वको शान्त ग्रात्मामें

त्रियनच्छेदुपसंहरेत्याद्यो विवेकी, किम्? वाग्वाचम्। वागन्त्रोपलञ्गगार्थो द्रयायाम्। क ? मनसी। मनसीतिच्छान्तं सै दैर्ध्यम्। तद्वच मनो ते प्रकाइाशक्तिको बुद्धौात्मनि। बुद्धिर्दि मनश्चेदकरूपान्नोन्या- त्यक् तेषाम्। ज्ञानं बुद्धिमात्मनि महति प्रथमजे नियच्छेत्। प्रथम-

स्तुकों देखनेका स्वभाव हो गया है वे सूक्ष्मदर्शी हैं, उन सूक्ष्मदर्शी पणिडतों जातो है यह ग्रर्थ है॥१२॥ तसकी प्राप्तितका उपाय कहते हैं ग्रर्थात् ग्रात्मप्राप्तितका साधन कहते हैं— ते पुरुष 'यच्छेत्' ग्रर्थात् नियुक्त करे।उपसंहार करे, किसका ? वाक्-वाणीका सब इन्द्रियोंका उपलक्षणग्रार्थक है, कहांँ उपसंहार करे ? मनमें 'मनसी' पदमें ते हस्व इकारके स्थानमें 'एै-सी' दीर्घ प्रयोग वैदिक है, उस मनको ज्ञान- रूप बुद्धि ग्रात्मामें नियुक्त करे, बुद्धि ही मन ग्रादि करणोंको व्याप करतो

तत्ा है तब 'तत्समसी' ग्रादि महावाक्योन्द्रोद्वारा 'ग्रहं ब्रह्मास्मि' ऐसी बुद्धि- न होती है ग्रौर उसमें ग्रभिव्यक्त ग्रहंताभाव स्वतः प्राप रौकस्वरुपसे व्यवहृत

१२॥ 'वाचम्' यहां वाक् वैदिक प्रयोग है। विवेकी पुरुषको ग्रपने इन्द्रिय समुदायको करनेके लिए सर्वी प्रथम वाणीका निग्रह् करना चादितो। वाग्रोमें तम्म

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जयत्स्वच्छस्वभावकमात्मना विज्ञानमापादयादित्यर्थः। त च महायञ्च्छेच्छान्ते सर्वविशेषप्रत्यस्तमितरुपेडविक्रियें सर्वान्तरे सर्वसाधितोपी मुख्य आत्मनि ॥ १३ ॥

एवं पुरुष आत्मनि सर्वं प्रविलाप्य नामरूपकर्मन्त्रयं यत्नमध्ये म्भितं क्रियाकारकफललद्यं स्वात्मयाथात्म्यज्ञानैन मरीच्युदककरजुर् मलानीव मरीचिरजुगगनस्वरूपदर्शनेनैव स्वस्थः प्रशान्तात्मा कृतकृत्यो यतोडतस्तद्धोधनार्थेम्—

उद्बोधन

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्त्य वरान्निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ १४ ॥

[ हे मुमुक्षवः ! ] उत्तिष्ठत ( आत्मज्ञानोन्मुखा: भवत ) जाग्रत ( मोहनिद्रां वरान् ( श्रेष्ठान् श्राचार्यान् ) प्राप्य ( समीपं गत्वा ) निवोधत ( नितरां निशिता ( तीक्ष्णीकृता ) दुरत्यया ( दुःखेन अतिक्रमितुं शक्या ) क्षुरस्य ( के साधनस्य ) धारा ( मार्गः ) दुर्गं ( दुःखेन गन्तुं शक्यं ) तत् ( तं ) पथ कवयः ( विद्वांसः ) वदन्ति ॥ १४ ॥

है इसलिए वह उनका आत्मा-प्रत्यक्षस्वरूप है। उस ज्ञानरूप बुद्धिको प्रथमोत्र आत्मामें लय करे श्रर्थात् प्रथम उत्पन्न महत्तत्त्वके समान आत्माको स्वच्छ विज्ञान प्राप्त करे ऐसा श्रर्थ है। और उस महान् श्रात्माको सर्व विशेषोंसे रहित सर्वान्तर तथा बुद्धिके सर्वप्रत्ययोंके साक्षी शान्त मुख्य श्रात्मामें नियुक्त करे ॥

मृगतृष्णया, रजु और श्राकाशके स्वरूपज्ञानसे मृगजल, रजुसर्पं और मालिन्यकका बाधकर जैसे बाह्याशनतरेङ्गद्रियव्यापार रहित हो पुरुष स्वस्थ व जाता है, वैसे ही मिथ्याज्ञानसे संपादित जो यह सर्वं प्रपञ्चन-नाम, रूप एवं तीनोंको, जो क्रिया, कारक और फलरूप हैं, स्वात्माके यथार्थ ज्ञानद्वारा पुरू लीनकर विवेकी स्वस्थ प्रशान्तचित्त एवं कृतकृत्य हो जाता है, क्योंकि ऐसा उसका साक्षात्कार करनेके लिए—

सत्यानन्ददीीपिका

मिलता और मनको भी श्रन्य शब्दोंके सोचनेका प्रवसर कम मिलता है, एवं संयम हो जाता है। क्यपि बुद्धिका समाधि तन्मात्र घटनाद्रव्ये न वा शोकादि न वा चित्ते वा

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नापच्चा प्रस्त लाङ्। ! उच्। [ ऋष्यानन्द्रम् ] जागा मार श्रात्म श्राचायैंको समोप ज्ञान प्राप्त करो, जैसे छुरेकी धार तोक्षण व दुस्सर होती है, तत्त्वज्ञानी लोग उस वैसा ही कहते हैं ॥ १४ ॥

मनाद्यविद्याप्रसुप्ता उत्तिष्ठत हे जन्तव श्रात्मज्ञानाभिमुखा भवत, जाग्रताद्वाया घोररूपाया: सर्वोन्यर्थेविभूताया: त्वयं कुरुत । कथम् ? ग्राह्यो-चरनू प्रकृष्टानचार्योस्तादृशद्रष्टदुपदिष्टं सर्वान्तरमात्मानमहंमस्मीति तादृगच्छन्त । न ह्युपेक्षितव्यमिति श्रुतितनुकम्पया हि मातृवत् । श्राति-प्रन्द्रियविषयत्वाज्जेयरस । किमिच सूक्ष्मसङुद्विदीर्यतेऽचते; छुरस्य धाराग्र-पा तीक्ष्णीकृतता दुरत्यया दुःखेनाल्र्ययो यस्मा सा दुरतय्या । यथा सा दुर्गमनौया तथा दुर्गं दु:सम्पाद्यमित्येतत्पथ: पन्थानं तत्त्वज्ञानलङ्घनं कवयो मेधाविनो वदन्ति । झ्रेयस्यातिसूक्ष्मत्वात्तद्विषयस्य ज्ञानमार्गेस्य राघत्वं वदन्तीत्यभिप्राय: ॥ १४ ॥

तकथमातिसूक्ष्मत्वं झ्रेयस्येत्युच्यते, स्थूला तावदियं मेदिनी शब्दसस्पर्श-गन्धोपचिता सर्वेन्द्रियविषयभूता तथा शरीरम् । तच्चैकैकगुणापकर्षगा नारद श्रविद्वासे सोये हुए जीवो ! उठो, श्रात्मज्ञानके श्रभिमुख होश्रो तथा घोर-तान निद्रासे जागो वह सपूर्णं ग्रनथोंकी बीजसूत है, उसका क्षय करो । किस ? श्रेष्ठ-उत्कृष्ट श्रात्मज्ञानौ:श्राचायौंके पास जाकर । उनके द्वारा उपदिष्ट सर्वान्तर सो 'मैं यही हूँ' ऐसा जानो । उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए ऐसा माताके मनुकम्पां कर श्रृ ति कहती है, क्योंकि वह झ्रेयपदार्थ श्रातिसूक्ष्म बुद्धिका विषय सूक्ष्म बुद्धि कैसी है ? इसपर कहते हैं—निशिता-तीक्ष्णा की हुई छुरेकी धार-र । जैसे दुरत्य होती है—जिससे कठिनतासे पार किया जा सके वह दुरत्यय है । उ पैरोंसे दुर्गमनीय है वैैसे ही यह तत्त्वज्ञानउपमार्ग श्रत्यन्त दुर्ग- दु:खप्राप्य है, चिन्मेधावी पुरुष कहते हैं । श्रभिप्राय यह है कि झ्रेय श्रत्यन्त सूक्ष्म है श्रतॊ तद्-गान मार्गौ भी दु:खसाध्य कहते हैं ॥ १४ ॥

उ झ्रेय श्रातिसूक्ष्म कैसे है ? इसपर कहते हैं—शब्द, स्पर्श, रूप, रस एैच गन्ध ( पाँच विषयों ) से बुद्धिको प्राप्त हुइं तथा सब इन्द्रियौंकी विषयभूत यह पृथिवी ऐसा यह झारोर भी है । उन गन्थादि गुणोंमेंसे एक एक गुणका श्रपकर्ष ( कम)

सत्यातनदीपिका

'नमुत्रयुजराद्याविधुद्रवदोषानुदर्शनम्' ( गी० १३।१५ ) इस प्रकार विषयदोष दर्शानेसे मन ग्रात्ति मथो इहिन्गोंके नाशतत् नोत्पन्न होता है

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श्रामिति ते गन्धादयः सर्वे एव स्थूलत्वाद्विकाराः शब्दान्तः यत्र न तस्य सूक्ष्मत्वादिनिरतिशयं वक्तुमित्यमिते तदर्शयति श्रुति:- निर्विशेष ब्रात्मतत्त्वानसे श्रमृतत्वप्राप्ति

श्रशब्दमस्पर्शमरुपमवद्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत् । ग्रन्थान्तन्तं महतः परं ध्रुवं निश्चित्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ( मृत्योर्मुखात् प्रमुच्यते ) ॥ यद् ( ब्रह्म ) अशब्दं ( शब्दगुणरहितम् ) अस्पर्शम् ( स्पर्शगुणरहितम् ) अरूपं ( रूपगुणरहितं ) तथा अरसं ( रसगुणरहितं ) नित्यम् ( निर्विकारं ) तथारसं ( रसगुणारहितं ) नित्यम् ( भवति ) । ग्रन्थान्तन्तं ( ब्रान्तमहतः परं ( बुद्धितत्त्वात् विलक्षणं ) ध्रुवं ( शाश्वतं ) तम् ( ब्रात्मानं ( श्रवणाद्यैः ) मृत्युमुखात् ( कामादिनन्धात् ) मुच्यते ( मुक्तो भवति ) ॥ जो शब्द, रूपादि एवं गन्धरहित प्रग्रवगम्य तथा रसहीन, नित्य और गन्ध

जो ग्रनादि, ग्रननत, महुतत्त्वसे विलक्षण और ध्रुव-निश्चल है उस प्रात्मतत्त्वसे पुरुष मृत्युमुखसे मुक्त हो जाता है ॥ १५ ॥

श्रथाऽऽदिममस्पर्शमरुपमवद्यरां तथारसं नित्यमगन्धवच यत्, यत्तु ग्रहाद्यनयमु यदित्थं शब्दादिमस्तत्त्वादूढ्येतिं त्वशब्दादिमत्त्वादूढ्ययं न त्वयेति श्रुत एवं च नित्यम् । यदित्थं त्वयेति तदनित्यमिदं तु न त्वयेत्यतो नित्य- ममनाऽध्याविद्यमान स्वादिः कारएमस्य तदिदमनादि ।

होनेसे श्राकाश पर्यन्त जलादि चार भूतोंमें सूक्ष्मत्व, महतत्व, विशुद्धत्व एवं का तारतम्य देखा गया है शब्दपर्यन्त वे गन्धादि समी स्थूल होनेसे विका- जिसमें ये श्राकादि पर्यन्त गन्धादि विकार नहीं हैं उसके सूक्ष्मत्व श्रादिकी नि- विषयमें क्या कहा जाय ? यही बात श्रागेकी शृति दिखलाती है—

जो शब्द रहित, स्पर्शा रहित, रूपरहित, ग्रग्रहय तथा रसरहित, नि- रहित है ऐसीी जिसकी व्यास्या की जाती है वह ब्रह्म श्रग्रहय-ग्रविनाशी है, पदार्थ शब्दादि भुक्ता होता है उसका व्यय-क्षय होता है किन्तु यह ब्रह्म या न होनेके कारखय ग्रग्रहय है । इसका व्यय-क्षय नहीं होता। इसलिए यह नित्य

सत्यानन्ददीपिका सूक्ष्मतत्व तारतम्यकी विश्वान्तिका स्थान होनेसे श्रेय श्रात्मा श्रतिसूक्ष्म है, 'उच्यते' से कहते हैं । जितने जितने ग्रणयोंका श्रग्रहय ( ग्रनयनता ) होता

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२५ वृ पञ्चकारञ्चपञ्चादिकारञ्चक-

नित्यं. न तस्य कारणामस्ति यस्मिन्नप्रलीयेत । तथान्तमनविद्यमानोऽन्तः-

स्य तदनन्तम् । यथा कदल्यादेः फलादिकार्योत्पादनेनाप्यनित्यत्वं ह्रष्टं न

थाप्यन्तवत्वं ब्रह्मणः; ऋतेरपि नित्यम् । महतो महत्तव्वाद् बुद्ध्वा चाख्या-

विलचयां नित्यविज्ञानिस्वरुपत्वात्सर्वेसान्ति हि सर्वभूतातमत्वाद् ब्रह्म ।

हे ‘एष सर्वेषु भूतेषु’ (कठ १।२।१२) इत्यादि । ध्रुवं च कूटस्थं नित्यं न

यादिवदापेदिकं नित्यत्वम् । तदेवंभूतं ब्रह्मात्मानं निचाय्यावगम्य तमा-

मृत्युमुवान्मृत्युंगाणवरादविन्द्याक मकर्मलत्तलगपातमसुच्यते विमुच्यते ॥ १५ ॥

स्तुतविज्ञानस्तुत्यर्थमाह श्रुति:—

प्रस्तुत विज्ञानकी महिमा

नचिकेतमुपास्यानं मृत्युप्रोक्तं सनातनम् ।

उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मालोके महीयते ॥१६॥

पका व्यय होता है वह अनित्य होता है, इसका व्यय नहीं होता श्रतएव नित्य

है इससे भी नित्य है, क्योंकि श्रनादि है । इसका श्रादि-कारण विद्ममान नहीं है

है श्रनादि है, कयोंकि जो पद्यार्थ श्रनादि है, वह कार्यरूप होनेसे श्रनित्य होता

है ग्रहण करने कारणमें लीन हो जाता है जैसे पृथवी श्रादि, किंतु यह श्रात्मा तो

कारण होनेसे श्रकार्य है और श्रकार्य होनेसे नित्य है, इसका कोई कारण नहीं

लीन हो ।

ग्रात्मा श्रनन्त भी है, जिसका श्रनन्त-कार्य विद्यमान न हो वह श्रनन्त है,

कार्य उत्पन्न करनेसे भी कदली श्रादि जैसे श्रनित्य देखे गये हैं वैसे ब्रह्मका

'च नहीं है, इसलिए भी वह नित्य है, नित्यविज्ञासि स्वरूप होनेके कारण बुद्धि-

महत्तत्त्वसे पर-विलक्षण है, क्योंकि ब्रह्म सम्पूर्ण भूतोंका श्रन्तरात्मा होनेके कारण

साक्षी है । यह बात 'एष सर्वेषु' (यह श्रात्मा सभी भूतोंमें गूढ है, श्रत:

त नहीं होता ) इत्यादि श्रुतिमें कही गई है । इसी प्रकार वह ध्रुव-कूटस्थ नित्य

साक्षी नित्यस्ता पृथवी श्रादिके समान श्रापेक्षिक नहीं है । इस प्रकारके उस ब्रह्म

को जानकर साक्षात्कारकर पुरुष मृत्युमुखसे-ग्रविद्या, काम श्रौर कर्मरूपमृत्यु-

बन्धनसे ग्रतिच्छ्दी तरह मुक्त हो जाता है ॥ १५ ॥

'व प्रस्तुत विज्ञानकी स्तुतिके लिए श्रुति कहती है—

सत्यानन्दीदीपिका

भाव है, 'केवलो निर्गुणश्च' ( श्वे० ६।११ ) इत्यादि श्रृति भी है ।इससे ब्रह्ममें

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नचिकेतं यमुना|तं ( यमुन् अनतं ) सनातनं ( वरन्तनं ) नाचिकेतं ( सम्बद्धम् ) उपाध्यायनं उक्त्वा ( मुमुक्षवे व्याख्याय ) [ स्वयं ] च श्रुत्वा महीयते ( उपास्यो भवति ) ॥ १६ ॥

नचिकेताद्वारा प्राप्त तथा यमसे प्रतिपादित इस सनातन विज्ञानको क सुनकर मेधावी पुरुष ब्रह्मलोकमें महिमान्वित होता हैं ॥ १६ ॥

नाचिकेतं नाचिकेतसा प्राप्तं नाचिकेतं मृत्युना प्रोक्तं मृत्युप्रोक्तमिदं रुपाध्यानं वल्लीत्रयात्मक्च्यां सनातनं चिरन्तनं हिैकत्वादुक्त्वा श्रुत्वाचैर्यभ्यो मेधावी ब्रह्म व लोको ब्रह्मलोकस्तस्मिन्महीयत आत्मभूत भवतीत्यर्थः ॥ १६ ॥

य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद्ब्रह्मसंसदि । प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते ॥ १७ ॥

यः (जनः) प्रयतः (पवित्रसन्) परमं (उत्कृष्टं) गुह्यं ( गोप्यं ) इमं (उ ब्रह्मासंसदि (ब्राह्मणसमायां) श्राद्धकाले वा श्रावयेत्, तदा (श्राद्ध* श्रवणां वा) श्रान्तफलोऽपत्वे ( श्रवणफलोऽनन्तये ) कल्पते ( सम्पद्यते ) ॥ १७ ॥

जो पुरुष इस परम गुह्य ग्रन्थको पवित्र हो ब्राह्मणोंकी सभामें प्रयथा श्रव सुनाता है उसका श्राद्ध वा श्रवण ग्रनन्त फलवाला होता है ग्रनन्त फलवाला है

यः कश्चिदग्रन्यं परमं प्रकृष्टं गुह्यं गोप्यं श्रावयेद् ग्रन्थतोडर्थतः। श्राद्धकाले वा श्रावयेद् मु ग्यानां संसदि ब्रह्मसंसदि प्रयतः शुचिभूत्या।

नचिकेताद्वारा प्राप्त [ को नाचिकेत कहते हैं ] श्रीर नचिकेताके प्रति उच तीन वल्लीरूप उपाख्यानको जो वैदिक होनेके कारण सनातन-चिरन्तन है, इ कहकर तथा श्रावणोंसे सुनकर मेधावी पुरुष ब्रह्म हि लोक है उस ब्रह्मलोक मान्वित होता है यह श्रवणत सबका आत्मभूत हो उपास्य होता है ऐसा श्रव्यं है ॥ १७ ॥

सत्यानन्ददीपिका

सनातन ब्रह्मका प्रतिपादक होनेसे यह उपाख्यान भी सनातन है । 'यद्ब्रह्म तया लोक्यते ज्ञायते इति सोऽयं ब्रह्मालोकः' 'जो ब्रह्म साक्षित्नहुपसे ही जाना जात ब्रह्मलोक है' श्रर्थात् 'ब्रह्माचिद्न्रह्मैव भवति' 'ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति' (ब्रह्मवेत्ता ब्र ही है ) यह ब्रह्मविद्की महिमा है ॥ १६ ॥

यमराज क्षौर नचिकेताेऽक ममामन्थनततत

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श्रद्धमत्यानन्त्यायानन्तफलाय कल्पते सम्पद्यते । इदंवैचनम् श्राध्यायपरिस्यर्थम् ॥ १७ ॥

ऊँरभगवतः कृतौ कठोपनिषद्‌्राध्ये प्रथमोऽध्याये तृतीयवह्नीबाध्यं समासम् ॥ ३ ॥

इति कठोपनिषदि प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ॥ ९ ॥

यों श्रथवा श्राद्धकालमें भोजन करने बैठे ब्राह्मणोंके प्रति पाठमात्र और श्रर्थकृत् ।

है उसक वह श्राद्ध ब्रनन्त फलवाला होता है । श्रघ्याय परिसमाप्यर्थे यह नन्थ्याय कल्पते' यह वाक्य दो वार कहा गया है ॥ १७ ॥

कठोपनिषदुके प्रथमाध्यायकी तृतीयवह्लोका स्वामी सत्यानन्द सरस्वती

कृत भाष्यानुवाद समाप्त ॥ १-३ ॥

सत्यानन्ददीपिका

करनेसे उनसे जन साधारऩ भी लाभ उठाकर मानव जीवन सफल कर सकत है ।

तलमें श्राद्धतः और श्रथंतः श्रवण करानेसे प्रेतात्आत्माओंको भी श्रालम्य लाभ होता।

इस मन्त्रसे यह भी सिद्ध होता है कि श्राद्ध वैदिक है केबल स्मातं नहीं ॥ १७ ॥

कठोपनिषदुके प्रथमाध्यायकी तृतीयवल्लोकी स्वामी सत्यानन्द सरस्वती

कृत-सत्यानन्ददीपिका समाप्त ॥ १-३ ॥

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अथाकृतौयाध्यायस्यप्रश्नप्रतिवचनी

आत्मदर्शनका विधान इन्द्रियोंकी बहिर्मुखता

एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते हृश्यते त्वग्रभया बुद्धया, इह कः पुनः प्रतिबन्धैर्बुद्ध्यैव तदभावादात्मा न हृश्यत इति नकारणप्रदर्शनार्थों वलल्यान्रभ्यते। विज्ञाते हि श्रेयःप्रतिबन्धकारणे तन्नाय यत्न आरभ्यं शक्यते नान्यथेति—

पराङ् ख्यानि व्यतृणात्स्वयंभूस्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन् ।

कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥

स्वयंभूः ( स्वयमेव भवति इति स्वयंभूः-स्वतन्त्रः परमेश्वरः ) ख्यानि ( पश्यति ) पराङ् ( परागि वाङ्मुखस्तुति श्रद्धान्ति मच्चद्भिरिति पराङ्मुखानि ) ( हननं कृतवान् )। तस्मात् ( कारणात् ) पराङ् ( बाह्यादिद्वाद्विषयान् ) पश्यति न [ पश्यप्रति ] कश्चिद्धीरः ( धीरः ) अमृतत्वं ( निःश्रेयसंहितच्छन्, श्रावृतचक्षुः ( सर्वविषयेभ्यः प्रत्यावृतसर्वेन्द्रियः सन् ) प्रत्यगात्मानं ( ब्रह्म ऐक्षत ( पश्यति ) ।। ९ ।।

स्वयंभू - परमात्माने इन्द्रियोंको बहिमु’खकर हिंसितकर दिया है, इस बाह्यविषयोंको देखता है ग्रान्तरात्माको नहीं, ग्रमृतत्वकी इच्छा करते जिसने इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे रोक दिया है ऐसा कोई धीर पुरुष हो प्रत्यगात्म पाता है ॥ ९ ॥

सम्पूर्णं भूतोंमें छिपा हुग्रा यह ग्रात्मा प्रकाशित नहीं होता वह तो एकाङ ही देखा जाता है, ऐसा पहले ( कठ० १।३।१२ में ) कहा गया है। श्रुति प्रश्न होता है कि एकाग्र बुद्धिका ऐसा कौन प्रतिबन्धक है जिससे कि उस एक का ग्रभाव होनेसे ग्रात्मा दिखाई नहीं देता ? श्रत: श्रात्म-ग्रदर्शनोंके कारण लानेके लिए यह वल्ली ग्रारम्भ की जाती है, क्योंकि श्रेयके प्रतिबन्धक ज्ञान होनेपर ही उसकी निवृत्तिके लिए यत्न ग्रारम्भ किया जा सकता है ग्रन्यथा

सत्यानन्ददीपिका

पहले ( कठ० १।३।१२ ) इस मन्त्रमें ब्रह्मात्मसादात्कारमें ग्रनादि ग्रविद

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पराक्षि परागन्नान्ति गच्छन्तीति । खानि तदुपलब्धितानि श्रोत्रानीनीनि ॥ खानीन्त्युश्चयन्ते । तानि पराड्मुख्येव शब्दादिविषयप्रकाशनाय प्रवर्तन्ते तदेवं स्वाभाविकानि तानि व्यतृप्याडि:सितवान्हननं कृतयान्यर्थः सौ ? स्वयंभूः परमेश्वरः स्वयमेव स्वतन्त्रो भवति सर्वदा न परतन्त्र इति तत्पराड्‌ पराग्रूपाननात्मभूताःशब्दादीन् पश्यत्युपलब्धत उपलब्धा, नान्तरात्नानिमित्यर्थः । एवं स्वभावेडपि सति लोकस्य कश्चिद्राः प्रतिषोत नासिव धीरो धीमान्विवेकी प्रत्यगात्मानं प्रत्येक्क्षणावात्स्था चेति प्रत्य ॥

प्रतीच्येयेवात्मशब्दो रूढो लोके नान्यस्मिन् । क्युत्पत्तिपक्षे डपि ततैव बद्धो वर्तते । 'यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह । यच्चास्य सन्ततस्तस्मादात्मेति कीयते' । इत्यात्मशब्दव्युत्पत्तिस्मर्यात् । तं प्रत्यगात्मा

जो पराक्-बाहरकी ओर अग्रज्ञान-गमन करती हैं वे 'पराक्षि' कहो जाती हैं । 'ख खानि' कहो जाती हैं, उनसे उपलब्ध श्रोत्रादि इन्द्रियां 'खानि' कहो जाती हैं । वे बहिर्मुख होकर हो शब्दादि विषयोंको प्रकाशित करनेके लिए प्रवृत्त होती हैं, क्योंकि स्वभा्‌वज्ञी ऐसी हैं, इसलिए उन्हें हिंसित कर दिया है अर्थात् उनका हननथार दिया है ऐसे हैं । वह कौन हैं ? स्वयंभूः-परमेश्वर जों स्वतः हो सर्वदा स्वतन्त्र हैं परतन्त्र नहीं हैं 'ए उपलब्धा सर्वदा' पराक्-बहिःस्वरूप ज्ञानात्मभूत प्राणादि विषयोंको देखता-उपकरता है 'नान्तरात्मन्' ज्ञान्तरात्माको नहीं, ऐसा अर्थ है ।

यद्यपि लोकका ऐसा स्वभाव है तो भी कोनो धोर बुद्धिमान् विवेकी पुरुष हो नदोर्क प्रवाहके विपरीत दिशामें प्रवृत्त कर देनेंके समान [ इन्द्रियोंको विषयोंकी ओर र ] उस श्रापने श्रात्माको देखतां हैं । प्रत्येक्‌-जो सम्पूर्ण विषयोंका साक्षी ग्रो र ] हो वही प्रत्यगात्मा है । लोकमें श्रात्माशब्द 'प्रत्यक्' में रूढ हैं ग्रन्थमें नहीं त्ति पक्षमें भी श्रात्माशब्दकी प्रवृत्ति उसीमें-प्रत्यक् श्रर्थमें हो है । जैसा कि 'कयोंडनुप्रवेशिनो' ( वह संबोधि व्याप्ति करता है, ग्रहण्गो करता है, जो इस लोकमें विषयोंको पनितो॥

॥ है तथा इसका सर्वदा सन्द्राव है इसलिए यह श्रात्मा कहा जाचता है ) इ॑ : श्रात्मशब्दको व्युत्पत्तिमें स्मृति है । उस प्रत्यगात्माने श्रपने स्वरूपको 'ऐक्षत श्रर्थात् देखा है ऐसा श्रर्थ है । वैदिक प्रयोगमें कालक नियम न होनेके कारनु जैसे कातंबोयं श्राधित्स्ने नर्मदा श्रादि नहीं प्रवाहका विपरीत प्रवतन् किया है वैरेे अनेक जन्मसिद्ध पुरुष इन्द्रियोंकी विषयोंकी श्रोर स्वाभाविक प्रवृत्तिरूप नदो

सत्यानन्ददीपिका

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स्वभावमैत्रादपश्यत्पश्यतीत्यर्थः; छन्दसि कालानियमात् । पश्यतीतीत्युच्यते 'वृत्तचक्षुरावृत्तं व्यावृत्तं चक्षुः; श्रोत्रादिकमिन्द्रियजातमशेषविषयाद्यस्य वृत्तचक्षुः स एवं संस्कृतः प्रत्यगात्मानं पश्यति । न हि बाह्याविषयालोचने त्वं प्रत्यगात्मेति चैतन्यं संभवति । किमर्थं पुरुषार्थं महता प्रयासेन भावप्रवृत्तिनिरोधं कृत्वा धीरः प्रत्यगात्मानं पश्यति इत्युच्यते, व्यमृततर रसाधर्मत्वं नित्यस्वभावतामिच्छन्नात्मन इत्यर्थः ॥ ९ ॥

यै तावत्स्वाभाविकं पराग्यमानात्मदर्शनं तदित्मदर्शनस्य प्रतिबन्धकारणं भवति ।

'वर्तमानकालके अर्थमें भूतकालकी क्रिया 'ऐक्षत' का प्रयोग हुआ है । वह है ? इसपर कहते हैं—'ग्रावृत्तचक्षुः' व्यावृत्तचक्षुर ग्रर्थात् जो श्रोत्रादि हैन्द्रिय द्रायकों सँपूर्ण विषयोंसे रोकनेवाला है वह ग्रावृत्तचक्षु है । वह इस प्रकार संस्कृतमन्द्रिय, संस्कृतमन हुग्रा पुरुष प्रत्यगात्माको देखता है । एक ही पुरुषके दृग् विषयोंकी ग्रालोचनापरता ग्रौर प्रत्यगात्माका साक्षात्कार करना [युगपत्] ये दोनों नहीं हैं । तो इस प्रकार महान् परिश्रमसे इन्द्रियोंकी स्वाभाविकृ प्रवृत्ति रोककर धीर पुरुष प्रत्यगात्माको किस लिये देखता है ? इसपर कहते हैं—'व्यमृततर रसाधर्मत्व-ग्रात्माके नित्यस्वभावत्वकी इच्छा करत हुग्रा [उसे देखता है । यह ग्रर्थ है ॥ ९ ॥

जो स्वभावसे ही बाह्य भनात्मदर्शन है वही ग्रात्मदर्शनके प्रतिबन्धकी कारग्रा ग्रनविद्या है, क्योंकि वह उस-ग्रात्मदर्शनके प्रतिकूल है । इसके ग्रतिरिक्त ग्रनविद्या

सत्यानन्ददीपिका

'दि में जो ग्रात्मशब्दका प्रयोग है वह तादात्म्याभिमानके कारग्रा है, ग्रतएव 'प्रतीच्येयवास्मशब्दो रूढो लोके' इस प्रकार प्रत्यक्षमे ही ग्रात्मशब्द रूढ कहलाता है 'व्युत्पत्तिपक्षेऽपि' इस प्रकार योगिग्रनुत्तिसे भी दिखलाते हैं—'यच्चाम्ना प्लव्यास्रों' इस श्रातु ग्रर्थके ग्रनुगमसे ग्रात्मशब्दका ग्रर्थ व्यापक है । 'यस्मादादहरन्ति स्वात्मन्येव सर्वं' जो ग्रपनेमें सबको संहार करे, इससे ग्रात्मा लयका ग्राधार है । 'कार्यका कारग्रामें लय' इस ग्रन्य व्युत्पत्तिसे ग्रात्मामें जगत्की उपाद्र रस्र्पता उपलब्ध होती है । 'विषयान्तर्गत्यात्मा' जो विषयोंको भोगता है, इस चैतन्यााभाससे ग्रात्मा उपलब्धा सिद्ध होता है । इस जगत्को जिससे निरन्तर प्राप्त हो ग्रर्थात् प्रसित, माति ग्रौर प्रियता प्राप्त हो, इससे श्रधिष्ठानसे मर्ति

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तृणात्कूलत्वात्। या च पराद्वेवाविद्योपमदर्शितेऽपु हृदयेऽप्टेऽपु भोगेऽपु तृष्णा !विध्यालृप्याभ्यां प्रतिबद्धात्मदर्शना:—

प्रविबेकिनो धीर विवेकिनां ग्रन्थर पराच: कामानुनयेन्ति बालास्ते मृत्युना येन्ति विततस्य पाशम् । प्रथ धीरा ध्रमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमन्धं वेधिवद् न प्रार्थयन्ते ।२।

[ ] बाला: ( श्रविवेकिनः ) पराच: ( बाझ्यान् ) कामान् ( विषयान् ) ग्रनुयेन्ति ( अनुवर्तन्ते ) ते विततस्य ( बहुकालाविपिनः ) मृत्युना:, पाशं ( बन्धं ) येन्ति ( प्राप्नु- प्रथ ( तस्माद ) इह ( लोके ) धीरा: ( विवेकिनः ) ध्रुवम् श्रप्रृतत्वं ( मोक्षं ) ( ज्ञात्वा ) श्रध्रुवं वेधु ( श्रस्थिरेषु विषयेषु ) न प्रार्थंयन्ते ( इच्छान्ति ) [पि ]।२।

जे पुरुष बाझ्यविषयोंका श्रनुगमन करते हैं, वे मृत्युके सर्वत्र फैले वा बहुकाल ऋष-बन्धनमें पड़ते हैं । किन्तु विवेकीपुरुष श्रमरतत्वको ध्रुव-निश्चल जानकर प्रतिनियत पदाथोंमेंसे किसीकी इच्छा नहीं करते हैं।२।

चो वहिरगंतानेव कामान्काम्यान्निष्यान्नयानुनयेन्ति श्रनुगच्छन्ति बाला तेऽनु कारकत्वात् मृत्युना्वियाकास्मकर्मसमुदायस्य यन्ति रच्लन्ति विस्तीर्प्यस्य सर्वतो यथामस्य पाशां पाशयते बध्यते येन तं न्द्रियादिसंयोगावियोगलच्ञांम् । श्रज्ञानवरतजन्यम्रप्रसङ्जराजरारोगाय- ग्रातं प्रतिपद्यन्त इत्यर्थ:। यत एवस्मात्तस्माद्धीरा विवेकिन:

हृद् धौर श्रहष्ट बाह्य भोगोंमें जो तृष्णा है, श्रविद्या श्रोर तृष्णा इन दोनों हों से मातमदशंनवाले—

-ग्रापलपज्ञ मन्तद्मति पुरुष पराक्-बाझ्याकामनाभोगै:-बाझ्याकास्म्यविषयोंका ही श्रनुगमन हसी कारणसे वे श्रविद्या, काम श्रोर कर्म समुदाय रूप मृत्युके वितत-विस्तर्थ- पाशको प्राप्त होते हैं । जिससे जीव पाशित होता है बांधा जाता है उस दके संयोग वियोगरुप पाशमें पड़ते हैं, निरन्तर जन्म, मरण, जरा, रोग श्रादि थं समुदायको प्राप्त होते हैं ऐसा श्रथं है । यतः ऐसा है, इसलिए धीर-विवेकी

दयो येडर्थ श्रनर्थ इव ते स्थिता:। येषां सक्तस्तु भूतात्मा न स्मरेच्च परं पदम् । जो शब्द, स्पर्शा श्रादि पाँच विषय हैं वे श्रनर्थरूप ही स्थित हैं, जिसमें श्रासक्त

मातमङ्गप परं पदको भी स्मररपा नहीं करते) 'ये हि संसर्गजा भोगा दुःखयोनय

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प्रत्यगात्मस्वरूपावस्थानलक्षणाममृततत्वं ध्रुवं विदित्वा, देवाच्यामृततत्वं तु प्रत्यगात्मस्वरूपावस्थानलक्षणां 'न कर्मणा वर्धते नो कनीयन' (ऋृग् इतित ध्रुवम् । तदेवंभूतं कूटस्थमविचाल्यममृतत्वं विदित्वाध्रुवेषु र नित्येषु निर्धार्य ब्राह्मण इह संसारेऽनर्थप्राये न प्रार्थ्यन्ते किन्चिदपि दर्शनेप्रतिकूलत्वात् । पुत्रवित्तालोकैषणााभ्यो व्युतिष्ठन्त्येवेत्यर्थ: ॥ १ ॥

यदििज्ञानार्थं किन्चिदन्यत्पार्थ्यन्ते ब्राह्मणाः । कथं तदधिगम इत्यु पुरुष प्रत्यगात्मस्वरूपे तिष्ठति-रूप श्रमृतत्वको ध्रुवं-निञ्चल जानकर-देवाः तो श्रद्धा व है किन्तु यह प्रत्यगात्मस्वरूपमें तिष्ठति-रूप श्रमृतत्व तो 'न कम न कर्मसे बढ़ता है और न घटता है ) इस प्रकार ध्रुव है । इस प्रकारके चाल्य श्रमृतत्वको जानकर वे ब्राह्मण-ब्रह्मवेत्ता लोग इस श्रनर्थ प्रायः संसार अनित्य पदार्थोंमेंसे किसीकी इच्छा नहीं करते, क्योंकि वे सब तो दर्शानके विरोधी हैं, इससे वे पुत्र, वित्त और लोकैषणााओंसे ऊपर उठ जाते सबका त्यागकर देते हैं ऐसा श्रर्थ है ॥ २ ॥

ब्रह्मवेत्ता लोग जिसका विज्ञान हो जानेसे किसी श्रनित्य पदार्थकी काम उसे ब्रह्मका बोध किस प्रकार होता है ? इसपर कहते हैं—

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भोगोंमें श्रोभनाद्याश होनेपर इनमें श्रासक्त पुरुष पुनः पुनः जन्म-मरण प्राप्त होता है । प्रारब्धसे प्राप्त भोगायतन-स्थूलशारीर ( श्रन्नमयकोश ) म त्यागकर प्राज्ञमय, मनोमय, विज्ञानमय और श्रानन्दमय इन चारों कोश जीव लोकान्तरमें पहुँचकर वहाँ सुखादि भोगार्थ तत्-तत् कर्मानुसार तत्-तत् स्थूल शरीरको प्राप्त करता है, उसका नाम जन्म है मृत्युलोकमें प्राप्त त्यागको मृत्यु-मररण कहते हैं, यह श्राधिभौतिक मृत्यु है, इसी प्रकार दुःखदेहादि-व्याधिको श्राधिदैविक और बुद्धिनाशको श्राध्यात्मिक मृत्यु कहते हैं 'तत्र्राप्यते' (गीता २१६३) इत्यादि स्मृति प्रमाणसे भी यही सिद्ध होता सक्तित दुःखका हेतु है ।

परन्तु जो भोगविरागी धीर पुरुष हैं, 'एतं वै तमारमाणं विदित्वा ब्राह्म याश्र वित्तैषणाायाश्र लोकैषणाायाश्र न्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति' ( निःश्रेय उस श्रात्माको जानकर वे ब्राह्मण पुत्रैषणा वित्तैषणा एवं लोकैषणा कर अनन्तर भिक्षाचर्य करते हैं-संन्यास ग्रहण करते हैं ) इस प्रकार वे

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यत् रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शांंश् मैथुनान् । एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्‌वै तत् ॥३॥

७ एतेनैव ( ज्ञानस्वरूप श्रात्मना ) रूपं रसं गन्धं शब्दान्‌ स्पर्शान्‌ मैथुनान्‌ जानाति ( स्पष्टं जानाति लोके ) श्रत्र ( प्रसिद्धं लोके ) [ श्रविज्ञेयं ] किं श्रते ? [ न किंचिद्‌विशेषार्थः ] एतत्‌ वै तत् ॥ ३ ॥ 'स ज्ञानस्वरूप श्रात्माके द्वारा पुरुष रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श श्रौर मैथुन जन्य तृप्तिचये पूर्वक जानते हैं [ उस श्रात्मासे श्रविज्ञेय ] इस लोकमें श्रौर क्या रह गया ? [ तुम्हें निश्चेतांसे पूछा हुग्रा ] वह तत्व यही है ॥ ३ ॥

न विज्ञानस्वभावेनात्मना रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शांंश् मैथुनान्मैथुननि- मुखप्रत्ययान्विजानाति स्पष्टं जानाति सर्वो लोकः । ननु नैवं प्रसिद्ध- ' श्रात्मना देहादिविलक्षणयोनाहं विजानामिति । देहादिसंघातोडहं विजा- ' नु सर्वो लोकोडचिच्छति । न त्वेवम् । देहादिसंघातस्यापि शब्दादि- ग्राविशेषाद्विज्ञेयत्वाविशेषाच्च न युक्तं विज्ञातार्तम् । यदिं हि देहादि- रूपाद्यात्मकः सनरूपादीन्विजानीयादाद्वाद्या श्रपि रूपादयोऽन्योन्यं स्वं च विजानीयु

न च विजानीयः । न तु चैतदार्ति । तस्माहेदिलनसांश्रय रूपादीनतेनैव देह- रोक ( जिस विज्ञान स्वरूप श्रात्मासे [ चक्षु श्रादि करण्यों द्वारा ] रूप, रस, गन्ध ' श्र्रोैर मैथुन जनित सुख प्रत्ययोंको स्पष्टतया जानता है [ वह ब्रह्म है ] यद्य्रा- कमेें ऐसी कोई प्रसिद्धि नहीं है कि मैं देहादिसे विलक्षण श्रात्मा द्वारा शब्दादि । जानवता हूं । सब लोग तो यही समझते हैं कि देहादि संघातरूप ही मैं शब्दादि । जानवता हूं । समानार्थ-ऐसा तो नहीं है, क्योंकि देहादि संघात भी समानरूपसे :प तथा विज्ञेयरूप है, श्रत्रः उसे ज्ञाता मानना उचित नहीं है, यह देहादि उपाद्यात्मक होकर भी रूपादिको जाने तो बाह्य रूपादि भी परस्पर एक

सत्यानन्दीदीपिका तर्द्धिगमः' कया वेदप्रतिपादित होनेनै धर्मके समान परोक्षरूपसे श्रथवा दिके समान प्रत्यक्षरूपसे ब्रह्माका श्रधिगम होता है? इसका 'यद्विज्ञानान्न'

तर कहते हैं—श्रात्मा ब्रह्म है, इस प्रकार ब्रह्माका श्रपरोक्षरूपसे ज्ञान ही सम्प- ' यस्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म' ऐसी श्रुति भी है । इस बातको श्रागे 'येन', ईस मन्त्रसे

दि संघातसे श्रवतिरिच्च चैतन्यस्वरूप श्रात्मासे हो यह सब हृश्यजात वेध है सा श्रविवेकी पुरुषोंमें प्रसिद्ध नहीं है । तथापि यद् नान त्रिविधतया नाना

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दिव्यातिरिक्तेनैव विज्ञानस्वभावेनात्मना प्वेजानांते लोकः । यथ दहति सोडग्निरिति तद्वत् । श्रात्मनोडविज्ञेयं किंचित्रासिंमल्लोके प किंचित्परिशिष्यते । सर्वमेव त्वात्मना विज्ञेयम् । यस्यात्मनोडविज्ञे तपरिशिष्यते स श्रात्मा सर्वज्ञः । एतद्वै तत् । किं तद्यन्नचिकेतसा भिरपि विचिकित्सितं धर्मोदेष्ट्योडन्यदृष्टिस्थः परमं पदं यस्मात्परं एतद्विगतमतित्यर्थः ॥ ३ ॥

प्रतिसूक्ष्मत्वाद्दुर्विज्ञेयमिति मत्चैतस्मेयार्थे पुनः पुनराह—

स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपरिशयति । महान्तं विभुमात्मानं मत्चा धीरो न शोचति ॥

दूसरेको तथा श्रपने श्रपने रूपको जान लेंगे, कित्तु बात ऐसी नहीं है । श्रत्मस्वरूप हुपादिको देहादिसे भिन्न विज्ञानस्वभाव इसी श्रात्मामसे हो जा प्रकाश लोलोा जिसको द्वारा जलतोलोा है वह श्रभिन्न है, इसी प्रकार । श्रात्मामसे संसारमें कया शेष रह जाता है । जिस श्रात्मामसे कुछ भी श्रविज्ञेय शेष न वह श्रात्मा सर्वज्ञ है श्रौर यही वह है । वह कौन है ? जिस विषयक प्रश्न किया है तथा जो देवादिसे भी सन्देहास्पद है जो धर्मादिसे इ परम पद है जिससे श्रेष्ठ कुछ भो नहीं है वही यह [ ब्रह्मपद ] श्रथिगम्य श्रर्थ है ॥ ३ ॥

प्रतिसूक्ष्म होनेसे दुर्विज्ञेय है ऐसा मानकर जसी श्रथंको पुनः पुन कहते हैं—

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तस्यांसित वेष्टा' ( श्वेता० ३११५ ) ऐसा श्रृति भी कहतीो है । इसलि यत्व' शान्दसे सिध्दवत परामर्श विरुध्द नहीं है । देहादिके विज्ञातुत्वके श्रभ इत्यादि भाष्यसे दो हेतुभोंको कहते हैं—गुरु गुणीके धर्मेद होनेसे देहादि रुप ही देखा जाता है, श्रतत् 'देहिकादि' शान्दादयो न स्वात्मानमन्ये च विज त्वाद् हश्यत्वाद्व बाध्यावत्' ( देहसंबन्धी शब्द, स्पष्टोक्त न श्रपनेको श्रौर जान सकते हैं, कयोंकि उनमें भी शान्दादित्व श्रौर हश्यत्व समान है जैर

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आत्मना । मनुपश्यात [ तं ] महान्तं विभुं श्रात्मानं मत्वा ( विज्ञाय ) घोरो रति ॥ ४ ॥

वणनहस्य शोर जाप्रदहस्य ये दोनो ंजिसके द्वारा देखे-जाने जाते हैं, उस महान् विभु आत्माको जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ ४ ॥ वण्नान्तं स्वण्नमध्ये य स्वण्नविज्ञेयमित्यर्थः; तथा जागरितान्तं जागरितमध्यं य इतद्विज्ञेयं च; उभौ स्वप्नजागरितान्तौ येनात्मनानुपश्यति लोक इति वेअत । तं महान्तं विभुमात्मानं मत्वावगम्यात्मभावेन साक्षादहमस्मि मेति घोरो न शोचति ॥ ४ ॥

आत्मष्की निर्भयता

य इमं मध्वदं वेद श्रात्मानं जीवमन्तिकात । ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्ैव तत् ॥५॥

इमं मध्वदं (कर्मफलभुजं ) जीवम् श्रात्मानं भूतभव्यस्य ( भूतभाविनः ) ( ईशितारम् ) ध्यस्तिकात् (समीपे ) वेद ( जानाति [ सः ] ततः (वदिज्ञानात् ) न जुगुप्सते ( न गोपायितुमिच्छति श्रात्मानम् श्रनयतो भयेन ) एतदैव तत् ॥ ५ ॥

| श्रधिकारो पुरुष इस कर्मफल भोक्ता एवं प्रारब्धके धारयिता श्रात्माको उसके हकर भूत, भविषयत् (तथा वर्तमान ) के शासकरूपसे जानता है, वह बैस हो जानेके श्रनन्तर उस श्रात्माकी रक्षाकी इच्छा नहीं करता, निश्चय यही मतत्स्व है ॥ ५ ॥

वण्नान्त-स्वप्नमध्य मर्थात् स्वप्नावस्थामें ज्ञेय तथा जागरितान्त-जाग्रत मध्य जाग्रत् अवस्थामें जानने योग्य इन दोनों स्वप्न शोर जाग्रत्के ज्ञेय पदाथोंको 'स श्रात्माके द्वारा देखते हैं [ वही कर्ता है ] इस वाक्यकी श्रन्य सारी व्याख्या के समान करनी चाहिए । उस महान् विभु श्रात्माको जानकर 'यह परमात्मा सा श्रात्मभावसे साक्षाद मनुभवकर घोर पुरुष शोक नहीं करता ॥ ४ ॥

सत्यानन्ददीपिका

: मन्य श्रात्माको स्वयं प्रकाश एवं द्रष्टा कहता है । जाग्रत शोर स्वप्नावस्थामें श्रनुभव श्रात्माके हो होता है, श्रात्मा स्वप्नहष्यकका भी प्रकाशक है, इसमें पुरुषः स्वयं ज्योति:' ( बृह० ४-३-९ ) इत्यादि श्रुति भी प्रमाण है । महान्त-

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यः कश्रिद्विमें मध्यवदं कर्मफलभुजं जीवं प्राण्प्रादिकलापंस्य धात्‌ त्मानं वेद विजानात्यनित्यादन्तिके समीप ईशानमीशितारं भूतभव्य- यस्य ततस्तद्विज्ञानादूर्ध्वंमात्मानं न विजुगुप्सते न गोपायितुमिच्छ- त्वान्। यावद्धि भयमध्यस्थोडनित्यमात्मानं मन्यते तावद्गोपायितु- त्मानम्। यदा तु नित्यमद्वैत्मात्मानं विजानाति तदा किं कः कुतो वा तुमिच्छेत्। एतद्ै तदिति पूर्व्ववत् ॥ ५ ॥

यः प्रत्यगात्मेश्वरभावेन निर्दिष्टः स सवात्मतद्र्श्यत- यः पूर्व्व तपसो जातमद्भ्यः पूर्व्वमजायत । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत ॥ एतद्ै तत्

जो कोई इस मध्यव्रद-कर्मफल भोक्ता श्रौर जीव-प्राणादि समुदायवै ग्रात्माको समीपसे भूत, भविष्यत् ( एंव वर्त्तमान ) तीनों कालोंके शासकहै । वह ऐसा विज्ञान हो जाननेके ग्रनन्तर उस ग्रात्माकी रक्षा करना न क्योंकि वह प्रभयको प्राप्त हुग्रा होता है । जव तक भयके मध्यमें स्थित ग्रात्माको ग्रानित्य मानते है तबतक ग्रात्माकी रक्षा करना चाहतेहै । जब नित्य-म्रद्वैत जान लेता है, तब कौन किसको कहाँसे रक्षा करनेकी इच्छ निश्रय यही वह ग्रात्मतस्व है, ऐसा पूर्व्वत् समझना चाहिए ॥ ५ ॥

सत्यानन्ददीपिका

कर्मफल भोक्तृत्व श्रौर प्राण्प्रादिकलाप धारयितृत्वसे उपलक्षित 'तव्र' ग्रात्माको कालत्रय वस्तु परिच्छेद्यत्वके ईशितृत्वसे उपलक्षित 'तत्' पद लक्ष्य है ग्रथात् जब दोनोंको ग्रभेददशंपसे जो साक्षात्कार कर लेता है तब वह ग्र' मरग्रादि भयसे रक्षा करना नहीं चाहता । इस वातको प्रकारान्तरसे 'किं तु' 'मध्यु-कर्मफलमत्तीति मध्यवदं; तं मध्यवदम्' इस व्युत्पत्तिसे 'मध्यवदम्' कर्मफल- प्राण्प्रादिफररएा कलापके प्रभप्रक्शको तीनों कालोंके शासिताके रूपसे 'मैं ही प्रकार ग्रभेददशंपसे जानता है, तब वह ग्रज्ञान जनित भयादि द्वन्द्वसे मुर है, 'ग्रभयं वै प्रामोर्ड्र्स जनकः' ( वृह० ४।२।४ ) इत्यादि श्रुति है । इसी बात इस भाष्यसे ग्रन्वय-व्यतिरेकद्वारा स्पष्ट करते हैं । नचिकेताने देवादिसे

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। ॐओं, ॐ । अथ ॐ । तपसि जातम् ( उत्पन्नम् ) श्रद्दूयः ( पञ्चभूतेभ्यः ) प्रे ) प्रजायत, गुहां ( सर्वप्राणिहृदयं ) प्रविश्य तिष्ठन्तं भूतेर्भि ( कार्यकरणहृ तिष्ठन्तं सन्तं ) यः वयपश्यत ( पश्यति ) एतद् वै तत् ॥ ६ ॥

मुमुक्षु पहले तपसे उत्पन्न हुए [ हिरण्यगर्भ ] को जो कि जलादि भूतोंसे पहले है, भूतों सहित बुद्धिरूप गुहामें स्थित हुये देखता है, निश्चय यही वह है ॥ ६ ॥

काश्चिन्मुखुः: पूर्वं प्रथमं तपसा श्लाघ्यादिलक्षणया हिरोर्ज्जात-इत्यगर्भम्; किमपेक्ष्य पूर्वमित्याह-ऽऽदृश्यः; पूर्वमपसहितेभ्यः पञ्चभूते-कवलाश्योडदृश्य इत्यभ्रायः, प्रजायत उत्पन्नो यस्तं प्रथमजं देवादि-ऋतपाद्य सर्वप्राणिगुहां हृदयाकारं प्रविश्य तिष्ठन्तं शब्दादितुपलभमानं तैः कार्यकररालक्षणैः सहृ तिष्ठन्तं यो व्यपश्यत यः पश्यतीत्येतत् । य ति स एतदेव पश्यति यत्तत्प्रकृतं ब्रह्म ॥ ६ ॥

। प्राज्ञेन संभव्यदितिदेवतामयी । हृदां प्रविक्रय विधत्तां मा भूतेभिर्याज्यायत ॥ पृथक् है तत् ॥ १० ॥

नोऽई मुमुक्षु पूर्वं-प्रथम तपसे-शानादिलक्षणया ब्रह्मणः उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भंको ? ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं—जलसे पूर्वं देखा पूर्वं उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भंको ?

। सहित पाँचों भूतोंसे पहले उत्पन्न हृया है न कि केवल जलसे पूर्वं, ऐसा है । उस प्रथम उत्पन्न हिरण्यगर्भंको देवादि -पारियोंको उत्पन्नकर सब गुहा-हृदयाकारमें प्रविष्ट हो देहेन्द्रियरूप भूतों सहित शब्दादि विषयोंको अनुभव करते स्थित हुएको जो देखता है । वास्तवमें जो इस प्रकार देखता है निता है जो कि यह प्रकृत ब्रह्मा है ॥ ६ ॥

सत्यानन्ददीपिका

। पश्यति स एतदेव पश्यति यत्तत्प्रकृतं ब्रह्म, ‘तपसे प्रथम उत्पन्न हिरण्यगर्भंको है वह प्रकृत ब्रह्मको देखता है’ ऐसा सम्बन्ध है । शाब्दू—यहाँ हिरण्यगर्भंका दसे भिन्न प्रकृत ब्रह्मका दर्शन कैसे हो सकता है ? समाधान—जैसे सुवर्णंसे

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( स्रंप्रभवज्ययते ) या च भूतेमिः ( भूते॔: सहितवा ) व्यजायत ( उत्पन्ना ) गुहां प्रतेहन्तीं [ तां यः पश्यति ] एतद् वै तत् ॥७॥

जो देवतामयी श्रदिति प्राणरूप-हिरण्यगर्भरूपसे प्रकट होती है तथा जो बुद्धिरूपमें प्रविष्ट होकर रहनेवाली प्रौर भूतोंके साथ ही उत्पन्न हुई है [ उसे देखो ] वही वह तत्त्व है ॥ ७ ॥

या सर्वदेवतासरी सर्वदेवतात्मिका प्राणेन हिरण्यगर्भरूपेण परस्माद्ब्रह्मर्रंभवंति शब्दादानिमदनादौतितस्ताः पूर्ववद्गुहां प्रविशेय तिष्ठन्तीमादातृमेव विशिनष्टि-- या भूतेमिः भूते॔: समन्विता व्यजायत उत्पन्ना इत्येतत् । ग्र्ररक्ष्यस्थ ग्र्रमिंं नहार्हास्ति

किंच-- ग्र्ररण्योर्निहतो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भभरोभिः । दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिरहैवि॒श्वे॒मद्र॒म॒नुष्ये॒भिरग्निः ।एतद्‌दै त

जो सर्व देवतामयी-सर्वदेवतस्वरूपा श्रदिति प्राण-हिरण्यगर्भरूपसे परब्रह्मसे च उत्पन्न होती है । शब्दादि विषयोंका ग्र्रहण-त्याग करनेसे वह श्रदिति है । बुद्धिरूप ऋत्विजोंके द्वारा [ यज्ञमें ] देवत्‌ प्रविष्ट होकर स्थित हुई उस श्रदितिको [ देखो ] उस श्रदितिको ही विराजते हैं—जो भूतों सहित श्रर्थात् भूतोंसे समन्वित हो उत्पन्न हुई है, वही तेरा श्रद्व है ॥ ७ ॥

सत्यानन्ददीपिका

इस मन्त्रमें हिरण्यगर्भका ही विशेषरूपसे निर्देश किया गया है । 'यो जा॒ञ्चदधाति पूर्वं॑' ( श्वेता० ६।१५ ) 'स प्राणमसृजत ( प्र० ६।१४ ) ( जिस परमा श्रहले हिरण्यगर्भको उत्पन्न किया ) इत्यादि श्रुति परमात्मासे ही हिरण्यगर्भको उत्पन्न करती है । यह हिरण्यगर्भं सूक्ष्म भूतों सहित परमेश्वरसे उत्पन्न होता है । यही स सूक्ष्म प्रपञ्चका कारण है श्रौर स्थूल जगत्‌ इसका कार्य है इसका कार्य है इसीलिये वातको 'स प्रा॒णजूत् प्राणाच्छ्रु॒द्रां खे॒ वायु॒र्ज्योति॒रापः' ( उस परमात्माने प्राण-हिरण्यगर्भको उत्पन्न किया, उस प्राणसे श्रद्धा, आकाश, वायु, ग्रग्रनि, जल, पृथिवी इन्द्रियं मनः०' ( उस परमात्माने

ग्राण-हिरण्यगर्भको उत्पन्न किया, उस प्राणसे श्रद्धा, आकाश, वायु, ग्रग्रनि, जल, पृथिवीमें समस्त कार्यजगत्का ग्रभि उत्पन्न हुए ) यह श्रुति भी कहती है । प्रलयकालमें समस्त कार्यजगत्का ग्रक्षय--ग्रपनमें लय करनेके कार‌ण हिरण्यगर्भ श्रदिति कहलाता है श्रौर देवतादि प्रपञ्चको उत्पन्न करनेसे भी श्रदिति कहलाता है । स्थूल श्रौर सूक्ष्म सारे जगव्यापार हिरण्यगर्भसे होता है, श्रदिति इसे प्राणशब्दसे कहा गया है । ग्रदन्तक‌र‌ण

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ऋऋभिः (गभंवतीभिः) सुभृतः (परितोषितः) गर्भ इव मरण्योः (उत्तरानिहितः स्यातः (यः) जातवेदाः श्रग्निः (जातं सर्वं वेत्ति हवति जातवेदाः) जाग्रद्भिः (जागरूकशीलैः योगिभिः) हविर्हद्भिः (हवनसामग्रीसम्पन्नैः) (प्रतिदिनम्) ईड्यः (स्तुत्यः) एतत् वै तत् ॥ ५ ॥

योषी स्त्रियौ द्वारा भलीभाँति पोषित हुए गर्भके समान जो जातवेदा-श्रग्नि : श्रघर दोनोँ धाररियोंके मध्यमें स्थित है तथा जो प्रमादरहित एवं होमक योंगी पुरुषों द्वारा नित्यप्रति स्तुतिके योग्य है यहाँँ बह्मा है ॥ ६ ॥

धेयज्ञ उत्तराधारारण्योर्निहितः स्थितो जातवेदा श्रग्निः पुनः सर्वहविषां तमं च योगिभिरर्गेभिरनन्तरार्तिहान्नपानभोजना-1 गर्भेः सुभृत्तः सुभृशु सम्यग्भृत्तो लोक इवेत्थमेवत्किं श्रभर्योयोगिभिश्र पेतत्। किंच दिवे दिवेऽहन्यहनीयौच्यः स्तुल्यो वच्य श्रभिकर्मिभिर्योगिभिदये च जाग्रद्विद्रिजागरराशीलघद्विरप्रमत्तैरिल्येतत्, हविष्माद्विराज्या-नेनभावनावद्विदिश मनुष्येभिमनुष्यैरग्निरेतदै। ततदेव प्रकृतं बहल्म ॥७॥

प्राणमें ब्रह्मादृष्टि ऋषोदेति सूर्योदस्तं यत्र च गच्छति । देवा सर्वे श्रग्रपितास्तदु नात्येति कश्चन ॥ एतदै तत् ॥८॥

तवेदा-श्रग्नि श्रधियज्ञादुपसे उत्तर श्रौर श्रघर श्रधररियोंमें निहित श्रर्थात प्रोैर समस्त हव्य पदार्थोंका भोक्ता है, श्रध्या1त्मह्मपमें जैसे लोकमें माँभक्षी स्त्रियाँ शुद्ध श्रन्न पान भोजनादि द्वारा श्रपने गर्भंका बहुत श्रच्छी तरह पोषण-1 हैं, वैसे ही याजिकोंँ तथा योगीजनों द्वारा भलीभाँति धारण किया जाता न श्रादि होम सामग्री युक्त कर्मोंपरायणु एवं जागररूकशील प्रमादरह्य याज्ञिक ड्यात्मभावनायुक्त योगियों द्वारा क्रमशः यज्ञ श्रौर हृदय देशमें वह श्रग्नि ध्या एवं स्तुत्य है । ऐसा जो ( विराटरूप ) श्रग्नि है, वही निश्चय यह प्रकृत 5 ।।

  • सत्यानन्ददीपिका

ती श्रधररियोंका सम्बन्ध दिखाकर ज्ञानयोग प्रोैर कर्मयोंगका रहस्य बताया गया !तत व अप म1त्रोंँ (ग--1र--म--), --- --। -- --।

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सूर्यः यतः ( यस्मात् ) उदेति, यत्र च ( यस्मिन् च ) अस्तं गच्छति । तं श्वपितातः ( तम् श्राश्रितय स्थितातः ) तत् ( तं सर्वदेवाश्रयेण ) कक्ष्वन् ( कोटिप्रतयेति ( श्रतिक्रामति ) एतद् वै तत् ॥ ५ ॥

जहाँसे सूर्य उदित होता है और जहाँ वह ग्रस्त होता है, उस प्राणात्मा व्यादि और वागादि ) सभी देवता श्रंपित हैं, उसका कोटि भी उल्क्षड़घन नहीं क यह वही प्रकृत ब्रह्म है ॥ ५ ॥

यतश्च यन्मात्प्राणादुदेति ज्जिष्ठति सूक्ष्मोभिसंल्लोचतं यत्र यच प्राप्योडह्न्यहनि गच्छति तं प्राणात्मानं देवा ऋग्भिः यद्योजधिदैवं वाग् ध्यातं सर्वे विश्रेडा हव रथनाभावर्पिता: संप्रवेशिता: स्थिथात्कारं ब्रह्मैव । तदेतत् सर्वात्मकं ब्रह्म । तदु नात्येति नातीत्य तदात्मकतां गच्छति कक्ष्वन् कक्ष्रिदपि । एतद् वै तत् ॥ ५ ॥

यदू ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु वर्त्तमानं तत् तदुपाधिल्वाद् ब्रह्मवद् वभासमान न्यत् परस्माद् ब्रह्मण इति मा भूलकस्य चिदाशङ्केतिदमाह—

जिससे-जिस प्राणसे - हिरण्यगर्भसे सूर्य उदित-उदय ( सम्मुख : होता है और जिसकी प्राणमें प्रतिदिन ग्रस्तभाव ( दृष्टिगोचर ) को प्राप्त उस प्राणात्ममें स्थितिकालमें प्राशिन श्रादि ऋषिधिदैवं प्राण दैवगण इस प्रकार श्रंपित है श्रथातृ संप्रविष्ट है जिस प्रकार रथकी नाभिमें र यह प्राण भी ब्रह्म है । वही यह सर्वात्मक ब्रह्म है । उसका श्रतिक्रमए कोई करता श्रथंत् उसके ब्रह्मके तदात्मकभावकेी पार-त्यागकर कोई भी उससे श्रन्य नहीं होता, यही वह ब्रह्म है ॥ ५ ॥

जो ब्रह्मासे लेकर स्थावर पर्यन्त सभी सूतोंमें वर्त्तमान है और भिन्न-भिन्न उपाधियोंके कारण ब्रह्मावत् श्रवभासित हुंमा है । वह संसारी जीव परब्रह्मसे ऐसे ( किसीकी शङ्का ) न हो । इसलिये यमरोज इस प्रकार कहतें हैं—

'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, तद् ब्रिजिज्ञासस्व तद् ब्रह्मेति' ( तैत्ति इस श्रु तिके श्रनुसार 'यतः' उस तत्स्थकारण ईश्वरसे सूर्योपरलक्षित सारा ज होता है । उसमें ही स्थिति और लयभावको प्राप्त होता है । इस प्रकार का प्रभेद प्रतिपादित है । 'सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति' ( छा० ६।१९ ) कालमें यह जीव सद्ब्रह्मके साथ सम्पन्न-एकताको प्राप्त होता है ) इंश्याः

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भेददृष्टिको निन्दा

यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्वेह । मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १० ॥

(प्रसिमन् लोके, संघाते जीवे वा) यत् (ग्रात्मवस्तु) प्रमुत्र (परलोके, परमात्मनि तदेव) (तथा) ग्रमुत्र ( परलोके ) यत् (ग्रात्मवस्तु) इह ( प्रसिमन् लोकेडपि ग्रनुगतं न ततो भिन्नं ) यः ( जनः ) इह ( ग्रात्मचैतन्ययोः ) नाना इव भेदावि (भिन्नामव ) पश्यति सः ( भेददर्शी ) मृत्योः मृत्युम् ( मरसात् मरसं ) प्राप्नोति ॥ १० ॥

तत्त्व इस (देहेन्द्रियसंघात ) में भासता है वह् ग्रन्यकृत ( देहादिसे परे ) भी है वस्तु घ्रन्यकृत है वह् ही इसमे है, जो मनुष्य इस तत्वमें नाना सा देखता है वह् युक्तो प्राप्त होता है ॥ १० ॥

तदेव कार्यकरसोपाधिसमन्वितं संसारधर्मवददवभावसमानमविवेकिनां तदेव । |ममुत्र नित्याविज्ञानघनस्वभावं सर्वसंसारधर्मवर्जितं ब्रह्म । यच्चासुत्रा-

|त्मनि स्थितं तदेवेह नामरूपकार्यकरसोपाधिसमुचिभावव्यमानं नान्यत् । स्यपाधिस्वभावसददशिलत्नयाविध्या मोहितः सन् य इह ब्रह्मसत्यारस्मादन्योऽहं मत्तोऽन्यत्परं ब्रह्मोति नानेव भिन्नमिव पश्यत्युपलभते

सत्यानन्ददीपिका

इस लोकमें कार्यकरस (देहेन्द्रिय ) रूप उपाधिसे युक्त हो प्रविवेकियोंको युक्त भास रहा है सव-स्वरूपमें स्थित वही ब्रह्मा ग्रन्यकृत-इस देहादि संघातसे विज्ञानघन स्वरूप और सम्पूर्ण संसार घर्मोसे रहित है । तथा जो ग्रमुत्र-उस

रमात्मभावमें स्थित है वह् ही इस लोकमें नाम, रूप एवं कार्यकरसूप उपाधिके ।।समान ग्रात्मतत्त्व है ह्रास्य नहीं है ।

होनेपर भी जो पुरष उपाधिके स्वभाव और भेददृष्टिरूप ग्रविद्यासे मोहित भिन्नरूप-एकरूप ब्रह्ममें 'मैं परमात्मासे भिन्न हूँ और परमात्मा मुझसे भिन्न है' मिन्न है

भावको मोर मक्षार्थी केवल जीवब्रह्मैक्यज्ञान द्वारा ब्रह्मभावको प्राप्त इस प्रकार कोई मो ब्रह्मभावका त्यागकर ग्रन्यकृत्को प्राप्त नहीं हो सकतां, वं खल्विदं ब्रह्म' इत्यादि श्रुति ब्रह्ममें ही सर्वात्मकभाव दिखलाती है ॥ ६ ॥

ह कहा गया है कि ब्रह्म सर्वात्मक है, वह् ठीक नहीं है, क्योंकि भिन्न-भिन्न उपाधियुक्त चैतन्य जीव संसारी है और ब्रह्मा प्रसंसारी है, श्रतः ग्रल्पज्ञ

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। मृत्युोमेरगान्मररां मृत्युमं पुनः पुनर्जन्मसमरराभावमाप्नोति प्रतिपद्यते । तत् था न पश्येत्। विज्ञानैकरसं नैरन्तर्येगां आकाशवत्परिपूर्णां ब्रह्म वाङ्मस्म श्येदिति वाक्यार्थः ॥ ९० ॥

प्रागेकत्वविज्ञानादाचार्योSमसंस्कृतेन—

मनसैवेदमात्रव्यं नेह नानास्ति किंचन । मृत्युोः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ९१ ॥

मनसा एव इदम् प्राप्यम् ( उपलब्ध्यम् ) इह ( ब्रह्मण्य ) किंचन ( किञ्चिद् भेदः ) नास्ति, यः इह नाना इव पश्यति, स मृत्युोः मृत्युं* गच्छति, एतद्वैतवत् । मनसे ही यह तत्व प्राप्त करने योग्य है, इस ब्रह्मत्वमें नाना कुछ भी नहीं ये पुरुष इसमें नानात्व-सा देखता है, वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है, यही त्व है ॥ ९१ ॥

स प्रकार नाना इव-भिन्न-सा उपलब्धष करता है वह मृत्युसे मृत्युको अर्थात् पुनः र्मरराभावको प्राप्त होता है, अतः ऐसी उपलब्धि नहीं करनी चाहिए, किंतु श्बच्रुपसे प्रकाङ्क्षके समान परिपूर्णां श्रोद विज्ञानैकरस ब्रह्म हूं" ऐसा देख-प्रनुभव हो वाक्यकका बर्थ है ॥ ९० ॥

एकत्व विज्ञान होनेसे पूर्वं श्राचायों श्रोद शास्त्र उपदेशसे संस्कृत हुए—

सत्यानन्ददीीपिका

जैसे एक घटको एक स्थानसे अन्यत्र ले जानेसे सब् स्थानोंमें वही सर्वगत महा टाकारश्रुपसे प्राप्त होता है, वैसे ही सर्वगत एक श्रद्वितीय चिन्मय श्रात्मा ग्रनत्करर पाधिके स्मरणागमन होनेपर मी सर्वत्र समानश्रुपसे प्राप्त है । ग्रनत्करस्यादि उपाधि द्रष्टि श्रनिवचंनीय श्रद्विच्छाके बिना नहीं हो सकती, इससे जीव श्रोद ईश्वरका भे

।।विध्यक्-ग्रोपाधि होनेसे कल्पित है, स्वरुपसे दोनोंमें भेद नहीं है । जैसे स नानात्मस्वभाव प्रत्यात्मामें नानात्वका श्रध्याारोपकर 'स्वप्नदृष्ट पदार्थं सत्य हैं' इस ! तय्वार्भिनिवेशासे ब्यवहार करता है, वैसे जाग्रत्में भी नानात्वका श्रध्याारे

जाग्रद् जगद् सत्य है' इस प्रकार सत्यत्व श्रभिनिवेशासे ब्यवहार करता है । उसके 'योडवथा सन्तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते । किं तेन कृतं पापं चौरेयात्मापहारिरे निरय ग्राखण्ड एक रस श्रात्माको जो मन्दमति श्रनित्य परित्यक्त जनमररावि नानता है, उस श्रात्माके यथार्थस्वश्रुपका ग्रपहरणा करनेवाले उस चोरने कां

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नसेदं ब्रह्मैकरसमाप्त्रभ्यमात्मैव नान्यदस्तीति । प्राप्ते च नानात्व थापिकाया अ्रविद्याया निवृत्ततत्त्वादिह ब्रह्मणो नाना नास्ति किश्चनारूपे । यस्तु पुनरवियातिमिरहष्टिं न मुञ्चति नानेव पश्यति स मृत्योर्मृं त्युमेव स्वल्पमपि भेदमध्यारोपयन्नित्यर्थः ॥ ९ ॥

हृदयपुङररीकस्थ ब्रह्म

ररपि तदेव प्रकृतं ब्रह्माह—

कृत मनके द्वारा ही यह एक रस ब्रह्म 'एक मात्र श्रोत्र है उससे भिन्न कोई 'है' ईस प्रकार प्राप् करने योग्य है । इस प्रकार उसकी प्राप्ति हो जानेपर भेदहष्टिका स्थापित करनेवाली अ्रविद्याके निवृत्त हो जानेसे इस ब्रह्मात्मस्वरुपे प्रखुमात्र भी नानात्व नहीं रहता । किन्तु जो पुरुष अ्रविद्यारुप तिमिरहष्टिकों करता प्रस्युत नानात्व-सां देखता है । इस प्रकार एक प्रखितोय ब्रह्ममें अ्रत्पतत्व भेद आरोपित करता है वह मृत्युस मृत्युको प्राप्त होता ही है ॥ ९ ॥

ई भी उस प्रकृत ब्रह्मका ही वर्णन करते हैं—

सत्यानन्ददीपिका

रसं ब्रह्मणि ज्ञानत्रयप्रभावं कस्मै । ते 'प्रागेकस्वविज्ञानात्' ऐसा कहा है, अ्रर्थात आत्मैकत्व ज्ञानसे पूर्व अ्रज्ञके गपत भेदको लेकर कहा गया है, ब्रत: कोर्द दोष नहीं है । ग्रनात्मभावापन्न संसकृत कहा जाता है । 'नेह नानास्तिकिञ्चन' ( इस प्रकार आरोप और प्रपञ्चके श्रधि-रात्म्यापन्न ब्रह्ममें नाना-भेद नहीं है ) इस प्रकार आरोप और प्रपञ्चके श्रधि- ब्रह्मका अनुभव करना चाहिए ।

नास्त्येव नो सन्तं नो स्थितं जगत् । वित्त' प्रपञ्चमित्याहुनास्त्येव सर्वदा ॥

प्रपञ्च है ही नहीं, न उत्पन्न हु्रा है पौर न जगत् विद्यमान है, यह वित्त हो प्रतिभाति विद्वानों सर्वदा ऐसा कह्ते हैं कि प्रपञ्च है ही नहीं ।

यदि विद्येत निवर्तेत न संशयः । मायामात्रमिदं द्वैतमहैतें परमार्थंतः ॥ ( मा० का० १७ )

यदि होता तो निवृत्त हो जाता इसमें संदेह नहीं; किन्तु वास्तवमें यह द्वैत मात्र-मिथ्या है, परमार्थतः तो अ्रद्वैत हो है । ब्रत: निष्प्रतियोगिक ब्रह्ममात्रमें भी द्वैतत्प्रपञ्च सत्परूपसे वा मिथ्यारुपसे 'ग्रस्ति-नास्ति' ऐसा भ्रम नहीं है ।

प्रखितोय ब्रह्ममें नाना-सा देखनेवाला जन्म-मरणरुप भयको प्राप्त होता है ।

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श्रंगुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य श्रात्मनि तिष्ठति । ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ॥ एतद्‌ऐ तत् । श्रङ्गुष्ठमात्रः ( श्रङ्गुष्ठपरिमाणः ) पुरुषः ( श्रात्मा ) मध्ये श्रात्मनि ( श्रतिष्ठति' ( सः ) ईशानः ( शासिता ) भूतभव्यस्य ( भूतस्य श्रनागतस्य च ) न जुगुप्सते ( श्रात्मानं न कुतश्चित् गोपायितुम् एतद्‌ऐ तत् ॥ ११ ॥ जो श्रङ्गुष्ठपरिमाणः पुरुष शरीरके मध्यमें स्थित है, उसे भूत, भविष्य वर्तमान] का शासक जानकर वह् उस श्रात्मस्वरूपके ज्ञान होनेके कारण श्रपं किसोसे भी रक्षा करना नहीं चाहता, निश्चय यही वह् ( ब्रह्मतत्त्व ) है ॥ ११ ॥ श्रङ्गुष्ठमात्रोडङ्गुष्ठपरिमाणः । श्रङ्गुष्ठपरिमाणां हृदयपुण्डरीकं तन्न तःकरसो‌पाधिरु‌पुष्ठमात्रोडङ्गुष्ठमात्रवंश‌पवर्गेमध्यवर्त्येन्‌बरवत्, पुरुषः सर्वमिति मध्य श्रात्मनि शरीरे तिष्ठति यस्तस्मात्‌नमीशानं भू विदित्वा न तत् इत्यादि पूर्ववत् ॥ १२ ॥ किंच श्रङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः । ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्र्वः ॥ एतद्‌ऐ तत् । श्रङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः ( श्रात्मा ) श्रधूमकः ( भूमरहितं ) ज्योतिः ( तैत्ति- ) रीयके ) ईशानः ( शासिता ) भूतभव्यस्य स एव ( पुरुषः ) श्रद्य ( वर्तमान ) श्र्वः ( श्रोग्रपि ) सः ( वर्तमानो‌भयत इत्यते ) एतद्‌ऐतत् ॥ १३ ॥ श्रङ्गुष्ठमात्र-श्रङ्गुष्ठपरिमाण, हृदयकमल श्रङ्गुष्ठके समान परिमाणवाले हृदयकमलके छिद्रमें श्रनवस्थित श्रन्तःकरण‌ोपाधि‌क श्रङ्गुष्ठमात्र-श्रङ्गुष्ठके समान मायावाले बांस पर्वकके मध्यवर्ती श्राकाशके समान श्रङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाले शरीरके मध्यमें स्थित है, उससे सारा शरीर पूर्‌ण है, इसलिए वह पुरुष है भूतभव्यद्‌ भविष्यत् कालके शासक श्रात्माको जानकर [ तस्माद्विच्च् अपनेको सुरक्षित इच्छा नहीं करता ] इत्यादि शेष पदकी पूर्ववत् व्याख्या करनी चाहिए ॥ १३ ॥ सत्यानन्द‌दीपिका शरीरान्तर्वर्तीं हृदयकमलमें प्रत्यग्भावसे स्थित श्रोत्र लोक प्रसिद्ध जीवका 'तत्‌स्वमसि' यह श्रुतिवाक्य उसमें ब्रह्मभावका विधान करता है, यद्यपि जीव

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ग्रधूममात्र पुरुष धूमरहित ज्योतिके समान है, यह भूत, भविष्यत्कका ग्रासद ग्राज ( वर्तमानकालमें ) है और वह कल-भविष्यत्में भी रहेगा और निश्वल ब्रह्मातस्व है ॥ १३ ॥

कृष्णमात्र: पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकोऽधूमकमिति युक्तं ज्योतिष्परत्वात् लक्षितो योगिभिर्हृदय ईशानो भूतभव्यस्य स नित्य: कूटस्थोऽव्येदान्तं वर्तमान: स उ श्वोऽपि वर्तमानविषयते न्याय्यसत्समोडन्यास्व जनिष्यत इत्यर्थ: परयमस्तीति चैक इत्ययं पद्यो न्यायतोऽपामोदपि सुवचनैर श्रुत्या प्रत्यक्षाभङ्ङवादश्र ॥ १३ ॥

भेदापवाद

रपि भेददर्शनेनापवादं ब्रह्माह— यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति । एवं धर्मान्पृथक्पश्यन्तानेवानुविधावति ॥ १४ ॥

ग्रधूममात्र पुरुष धूमरहित ज्योतिके समान है । मूलमन्त्रमें जो 'ग्रधूमक:' पद ( नपुंसकलिङ्ग ) है उसका परक अर्थात् ज्योति: शब्दका विशेषण होनेके कारण ' ग्रधूमकम् ' ऐसा पदना चाहिये । जो योगियोंको हृदयमें लक्षित होता है, वह भूत एवं ग्राज ( वर्तमान ) है और वही कल ( भविष्य ) भी रहेगा । 'नान्यस्ततोऽन्य जनिष्यत इत्यर्थ:' [ १।१।२० ] मन्त्र में उक्त यह पक्ष न्यायसे ग्रग्राह्य है, तो भी उसका क्षयाऽऽभङ्ङवादका खण्डन मृतिने सुवचनसे कर दिया है ॥१३॥ जो भेददृष्टि की जाति हैं उसका ग्रपवाद-निषेध स्मृति फिर भी कहती है--

सत्यानन्ददीपिका

मस्तीति चैक:' इस द्वितीय पक्षके उत्तरार्धपरे उक्तवाक्यका 'किश्च' पद करते हैं । मन्त्रमें 'ज्योतिः' शब्द नपुसकलिङ्ग है, अतः उसका विशेषण 'ग्रधूमकम्' पद भी 'ग्रधूमकम्' इस प्रकार नपुसकलिङ्गसे होना युक्त है । मन्त्रमें 'उ' पदका श्रर्थ 'श्रपि' है । भूत, भविष्यत्का ग्रासिता दृ मैं हूँ' ऐसा अपने हृदयमें मुमुक्षुजन ग्रनुभव करते हैं । वह इदानीं ब्रह्मासे श्रपर्यन्त सभी प्राणियोंमें वर्तमान है वही कल भी रहेगा । 'नायमस्तीति चैक:' यह न्यायवाद और क्षयाऽऽभङ्ङवादपक्ष 'कृतनाशाऽकृताभ्यागम' दोषरूप लौकिक

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दुर्ग ( दुर्गस्थाने ) वृष्टं उदकं यथा पवंतेपु ( निम्नप्रदेशेपु ) विषावां या धावति ) एवं धर्मानु ( ग्रात्मनो भिन्नान् ) पृथक् पश्यन् ( जानन् ; ( तहर्शानान्तरमेव ) विधावति ( प्राप्नोति ) जिस प्रकार ऊँचे स्थानमें बरसा जल पर्वंतोंमें (पर्वंतोय निम्नदेशोंमें) बह जाता है, उसी प्रकार ग्रात्मासे भिन्न धर्मोको प्रत्येक शरीरमें भिन्न-भिन्न उन्हींको ही प्राप्त होता है ॥ १४ ॥ yथोेदकं दुर्गे दुर्गोमें देश उच्छलिते वृष्टं सिक्तं पर्वतेषु पर्वतव प्रदेशेपु विधावति विकर्ष सद्दिनिश्यति एवं धर्मोनात्मनो भिन्नान्पृक प्रतिशरीरं पश्यस्तानेव शरीरभेदानुरुधातिनोडनुविधावति । शरीरभेदमे पुनः प्रतिपच्यत इत्यर्थः: ॥ १४ ॥ यस्य पुनर्विद्यावतो विध्वस्तोपाधिॄृतभेदर्शंनस्य विशुद्धदवि समदृयमात्मानं पश्यतो विजानंतो मुनेमे'ननशीलस्यात्मस्वरूपं कथ त्युच्यते—

प्रभेददर्शनकी विशेषता यथोेदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं ताहगेव भवति । एवं मुनीविजानंत आत्मा भवति गौतम ॥ १५

जिस प्रकार दुर्ग-दुर्गं स्थान ग्रर्थात् ऊँचाईपर बरसा जल पर्वंतों-प्रदेशोंमें विधावति-फैलकर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार धर्मो-ग्रात्माभोंकं शरीरमें भिन्न-भिन्न देखता हुग्रा पुरुष उन्हीं-शारीरभेदोंकं ग्रनुसारश्र्रा जाता है ग्रर्थात पुनः पुनः शरीर भेदको प्राप्त होता है है ऐसा ग्रर्थ है ॥ १४ ॥ उपाधिॄृत भेददृष्टिको नष्ट करनेवाले, विशुद्ध विज्ञानधनैकरस श्रद्वितीय देखनेवाले विद्वान् विज्ञानी मननशील उस मुनिका ग्रात्मस्वरूप कैसा होत कहा जाता है—

सत्यानन्दीपरिक स्वरूप भूत ग्रात्माके ग्रज्ञानके कारण यह ग्रज्ञान जीव श्रद्वितीय चिन्मय नात्व-शारीरभेदसे ग्रात्मभेदको देखठा है, इससे वह 'भिन्न-भिन्न शरीर-जन्मम' होता है, यही इसका विनाश्र है । ऐसा 'इहं चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिह वेदीद महती विनष्टिः ( केन० २।४ ) ( दस मनुष्यजन्ममें यथोक्त साधन सम्पन्न ब्रह्मविद्या श्रवण स्वातिरिक्क विदितार्विदित कल्पनातीत निष्प्रतियोगिक स्वसत्तामात्र ब्रह्मा रूपसे यदि ग्रनुभव किया तो सत्य-स्वतः प्रकाशरूप ब्रह्मको प्राप्त होता है, यह

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ह ॥१४तम ॥यथा शुद्ध उदकं शुद्धे ( खच्छे उदके ) ग्राहसितं (निक्षिमें सद्) वाऽह शुद्धमेव ) भवति, विजानतः ( एकत्वं पश्यतः ) मुनेः ( मननशीलस्य ) आत्म अंतःकृताहुस्वरूपम् एव भवति ॥ १४ ॥

जिस प्रकार शुद्ध जलमें डाला हुवा शुद्ध जल वैसा ही हो जाता है, उसीप्रका म ! ग्राह्मस्स्वरूपको जाननेवाले मुनिके आत्मा भी हो जाता है ॥ १४ ॥

प्रथोदकं शुद्धे प्रसन्ने शुद्धं प्रसन्नमासिक्तं प्राप्सामेकरस्मेव नान्यथा ताद श्वत्यात्मन्येवमेव भवत्येकत्वं विजानतो मुनेःमननशीलस्य हे गौतम !

कुतोऽधिकभेददृष्टिं नास्तिककुतदृष्टिं चोद्भयत्वा मात्रप्रितॄसहस्रेभ्योदपि हितं वेदेनोपदिष्टमात्मैकत्वदर्शनं शान्तदपैरादरनीयमित्यर्थः॥ १५ ॥

भगवतःकृती कठोपनिषद् द्वितीयाध्याये प्रथमवल्लीभाध्यं समासम् ॥ २-१ ॥

तस प्रकार शुद्ध-स्वच्छ जलमें ग्राह्सिक्त-प्रक्षिप्त शुद्ध-स्वच्छजल उसके साथ मिलक' हो जाता है 'श्रर्थात' वैसा ही हो जाता है--तद्रूप ही हो जाता है उससे विपरीड 'में नहीं रहता; उसी प्रकार है गौतम ! एकत्वको जाननेवाले मुनी-मननशीस ध्रात्मा भी वैसा ही हो जाता है। इसलिए कुतार्किककी भेददृष्टि और नास्तिक-

द्रष्टिका परित्यागकर सहस्रों माता-पितारोप्रोंसे भी श्राधिक हितैषीं वेदके द्वारा उपदेशा त्मैकत्व दर्शनका ही ग्रभिमान रहित हो आदर करना चाहिये ऐसा श्रर्थ है ।१५।

कठोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्यायस्य प्रथमवल्लोकाः 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती'

इवंत भाषानुवाद समाप्त ॥ २-१ ॥

सत्यानन्ददीपिका

` चतुर्थंवल्ल्योके १०, ११, १४ मन्त्रोंमें बन्धजीवकी दशाका दिग्दर्शन कराया गया इस मन्त्रमें मुक्तात्माके विषयमें कहा जाता है --- जैसे प्रकाशसे पतित दृष्टि जल में पड़ तद्रूप हो जाता है उससे पृथक् दिखाई नहीं देता, क्योंकि वह पृथिवीकी

ग्रादि उपाधिसे रहित है, वैसे ही 'ब्रह्मविद्रह्मैव भवति' विमुक्तश्व विमुच्यते' ने हि द्रष्टा स्वयंकेबलरूपतः! यु श्रात्मन् कपिकाह्वल् कहा है मु मुक्त हो जाता है ।

ग्रात्मैकत्व ज्ञान द्वारा श्रविद्या श्रादि उपाधिसे रहित हो मुक्त हो जाता है ।

ने हि द्रष्टा ( नेहि दृष्टा स्वयंकेबलरूपतः! यु श्रात्मन् कपिकाह्वल् कहा है मु

वितत् स्वयं ब्रह्मा है ) 'केबलब्रह्ममात्रस्वान्नास्त्यनात्मेति निश्चिनु:' ( केवल है, ब्रत! ब्रह्मात्मा है ही नहीं, ऐसा निश्चयकर ) 'वेदार्थः परमर्हेतं नेतरसुर- सुरपुज्जोव ! वेदका श्रर्थ परम श्रद्धा त है उससे भिन्न नहीं श्रर्थात वेदका तात्पयं रह्यमें है ग्रन्थमें नहीं) 'एकमेवाद्वितीयम्, सर्वं खल्विदं ब्रह्म, नेह नानास्ति किंचन' (ति ब्रह्माद्वैतक निषेध करती हैं) 'श्रत! ब्रह्माविन्त ब्रह्मस्स्वरूप हो है ॥१५॥

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प्रकारान्तरसे ब्रह्मानुसंधान

पुनरपि प्रकारान्तरेsपि ब्रह्मतत्त्वनिरधारणार्थोड्यमारम्भो दुर्विज्ञेयत्वाद्ब्रह्मपुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः । ग्रन्थाय न शोचति विमुक्तश्व विमुच्यते ॥ एतदै तत् ॥ १ ॥

एकादशद्वारं पुरं ( देहम् ) अवक्रचेतसः ( श्रवकं प्रकुर्वतां नेतो विज्ञानमयेतिं रकाशरूपस्थ ) ग्रजस्य [ तम् ] ग्रन्थाय ( ध्यात्वा ) न शोचति, विमुक्तः ( धन्वन्तनु ) विमुच्यते ( कैवल्यं प्राप्नो भवति ) एतदै तत्॥ १ ॥

उस नित्य विज्ञानस्वरूप ग्राजन्मा-ग्रात्माका एकादश द्वारवाला पुर-नगरी है, ग्रामका सम्यक्ज्ञान पूर्वक ध्यानकर पुरुष शोक नहीं करता और वह मुक्त हुश्रा ही हो जाता है । निश्चय यही वह ( ब्रह्म ) है ॥ १ ॥

पुरं पुरमिव पुरम् । द्वारपालाधिष्ठात्राद्यनेकपुरोपकरगासम्पत्तिदर्शनेन तस्मात् पुरं च सोपकरगां स्वात्मनासहिततत्त्वप्रस्थान्तरयेष्टम्, पुरसामान्यादनेकोपकरगासंहतं शरीरं स्वात्मनासंहतराजस्थानীয়स्वाम्यर्थः तस्मात् ।

तच्चेदं शारीराख्यं पुरमेकादशद्वारमेकादश द्वारैयस्य सप्त इत्यानि नाम्या सहार्वोक्षि त्रीणि शिरस्येकं तैरेकादशद्वारं पुरम् । कस्याह्मतिहुद्विज्ञो य है, मतः पुनरपि ब्रह्मतत्त्वका प्रकारान्तरसे निश्चय करनेकेलह श्रागेका ग्रन्थ ( वल्ली ) श्रारम्भ किया जाता है—

[ यह शरीररूप ] पुर-पुर नगरके समान होनेसे पुर कहलाता है । द्वारपाधिष्ठाता ग्रादि धानेकों पुर सम्बन्धी उपकरगा-सामग्री दिखाई देनेके कारण शारीरपुर सम्पूर्ण साधन सामग्री सहित प्रत्येक पुर श्रपने ग्रसंहत-ग्रसम्बद्ध राजस्थानोयस्वामीके उपभोगार्थं देखा जाता है, उसी प्रकार पुरसे साधर्म्य होनेकेलमन्येक साधन सामग्री सम्भद यह शरीर भी श्रपने ग्रसंहत-ग्रसम्बद्ध राजस्थानीयःवामीके लिए होना चाहिए ।

सत्यानन्ददीपिका

ग्रात्मतत्त्व प्रतिपाद्विज्ञो य है श्रत उसे प्रकारास्तरसे कत्ना जाता है। ग्रत्रमे ग्रा

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क्रियारहितस्यात्मनो राजस्थानीयस्य पुरधर्मविल्दतस्यास्य । आवक्रमकुटिलभादित्यप्रकाशवशित्यमेवायस्थितमेकरूपं चेतो विज्ञानमस्ये-'स्तस्यावकचेतसो राजस्थानीयस्य ब्रह्माः । यस्मैदं पुरं तं परमेश्वरं मनुष्याथ ध्यात्वा, ध्यानं हि तस्यातुच्छानं सम्यग्ज्ञानपूर्वकम, तं सर्वेःपृक्तः सन्सर्गं सर्वभूतस्थं ध्यात्वा न शोचति । तद्विज्ञानादभयग्रामेः 'भावात्कुतो भयेत । इहैवाविद्याकृतकामकर्मबन्धनैविमुक्तो भवति । नत्विमुच्यते पुर्नः शरीरं न गृह्णातीयर्थः ॥ १ ॥ नैकशरीरपुरवर्त्यात्मा किं तर्हि सर्वपुरवर्ती । कथम्——

सः शुनिषद्वसुरत्रिरक्षसद्वोता वेदिषददतिथिद्दुरोगासत् । ऋरसहतसद्वचोमसदजा गोजा ऋतजा ऋद्विजा ऋततं बृंहत् ।२।

।मक पुर एकादश द्वार-चौदरह द्वारोंवाला है [ दो श्रोनि, दो नेत्र, दो ना-एक मुख इस प्रकार ] सात मस्तक सम्बन्धी, नाभि सहित [ पिशन और तीन निम्नदेशीय तथा [ब्रह्मारन्ध्ररूप] एक शिररन्ध्र ईस प्रकार इन सब द्वारों को कारण यह पुर एकादश द्वारवाला है । यह पुर कितने का है ? प्रजापतिविलक्षणा जन्मादि ह्र स्वभावतः राजस्थानीय श्रात्माका । इसके श्रवणरहित-श्रवक्रमकुटिल श्रादित्य प्रकाशके समान नित्यावस्थित एकरूप चित्त-प्रवणचित्त है, उस श्रवणकचित्तवाले राजस्थानीय ब्रह्मात्मका [ यह पुर है ] । पुर है उस पुर स्वामी परमेश्वरकका ध्यानद्वारा, क्योंकि सम्यग्ज्ञान पूर्वक ध्यान ध्यान है, श्रत: संपूर्ण एषणाओंसे मुक्त हो उस सम सर्वभूतस्थ ब्रह्मात्मका ध्यान-शोक नहीं करता ! ब्रह्माके विज्ञानसे प्रभय प्राप्त हो जानेसे शोकका श्रवसर न भयदर्शन भो कहाँ हो सक्ता है ? श्रत: वह इस शरीरमें हो श्रविद्याकृत बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है । इस प्रकार वह मुक्त हु्रा हो मुक्त होता शरीर ग्रहण नहीं करता ॥ १ ॥

। श्रात्मा तो केवल एक हो शरीररूप पुरमें नहीं है किन्तु सभी पुरोंमें प्रकार ?

सत्यानन्ददीपिका

पथ्यं वक्तव्यम्' (फिर भी पथ्य कहना नाहिये ) इस न्यायसे प्रकार-ज्ञातव्य है । 'तदोपाया एव भिद्यन्ते नोभेयस्य भेदोऽस्ति' (उपाय-साधन

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हँ स, शुचिषत्, वसुः, ग्रन्तरिक्षसत्, होता, वेदिषत्, प्रतिष्ठि:, दुरोणासत्, वरसत्, ऋतसत्, व्योमसत्, गृढजाः गोजाः, ऋतजा:, प्रतिजाः, ऋततं, बृहत् ॥ २

वह गमन करनेवाला-ग्राकाशमें चलनेवाला सूर्य है, वसु है, ग्रन्तरिक्षमें वि वायुरूपसे व्याप्त करनेवाला वायu है, होता-ग्रग्नि है, पृथिवीमें स्थित होनेसे वह वेदिविष्ट है, द सोम होकर कलशमें स्थित होनेके कारण द्रोणासत् है श्रथवा प्रतिष्ठिरूपसे घरोंमें होनेसे द्वाह्यण द्रोणासत् है, मनुष्योंमें रहनेसे नृपसत् है, वरों-देवताओंमें विद्यमान कारणसे व्रतसत्, तनू या यज्ञमें गमन करनेसे ऋतसत् है, ग्राकाशमें स्थित व्योमसत् है, जल, पृथिवी, यज्ञ एवं पर्वतोंसे उत्पन्न होनेवाला तथा सयं महान् है ॥ २ ॥

हंसो हन्ति गच्छतीति । शुचिपचछुचौ दिव्यादित्यात्मना सौदत वसुर्वासयति सर्वानिति । वाय्वात्मनान्तरिक्षे सौदत इत्यन्तरिक्षसत् । होत 'अग्निरें होता' इति श्रुते: । वेद्यां पृथिव्यां ( ऋ० सं० २१३।२० ) इत्यादिमन्त्रवणात् । श्रा सोम: सन्दुरोगो कलशे सीदतीति दुरोणासत् । द्वाह्यण: प्रतिथिरूपे दुरोगेप गृहेषु सीदतीति । तपत्तनु मनुष्येषु सीदतीति नृपत् । व्रतसद् देवेषु सीदतीति, ऋतत्सहर्तं सत्यं यज्ञो वा तनिसन्सीदतीति । तद्यो:

वह गमन करता है, इसलिए 'हंस' है, शुचि-ग्राकाशमें सूर्यरूपसे चलत इसको 'शुचिषत्' है, सबको व्याप्त करता है, श्रत: 'वसु' है, वायुरूपसे ग्रन्तरिक्ष-श में चलता है, इसलिए 'ग्रन्तरिक्षसत्' है, 'ग्रग्निरें होता' इस श्रुतिसे होता-ग्रा कहते हैं । वेदिमें-पृथिवीमें गमन करता है, श्रत: 'वेदिषत्' है, क्योंकि इस विषयमें वेदि पृथिवी ( यज्ञभूमि ) का उत्कृष्ट मध्य भूभाग है' इत्यादि मन्त्रवर्‌ हैं, यह श्रा सोम होकर दुरोण-कलशमें स्थित होता है, इसलिए 'दुरोणासत्' है श्रथवा ऋ प्रतिष्ठिरूपसे दुरोणोंमें-घरोंमें रहता है, श्रत: वह 'प्रतिष्ठि: दुरोगासत्' है, वह मनु देवेषु सीदतीति, ऋतत्सहर्तं सत्यं यज्ञो वा तनिसन्सीदतीति । तद्यो:

'पुरम्' ( पुर ) इस प्रकार विशेषतया देनेसे ऐसा प्रतीत होता है कि एक शरोरें होनेसे ग्रात्मामें परिचिछन्नत्व प्रसक्त होगा ? इस प्रकारकी ग्राझ्ञाकर ग्राकांक्षा 'सत्' इत्यादि भाष्यसे उतरका ग्रावतर करते हैं । 'तु' शब्द ग्राझ्ञाकी निश्चितिके लिए ग्राद्याण्डके विशेष-विशेष भागोंमें सर्वव्यापक ब्रह्मसत्का वर्णन करनेसे ग्रात्मज्ञानकी प्राप्तिमें सहायता मिलती है, इसलिए वह प्रकार इस मन्त्रमें वर्णित

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वथ्याकाशा सोंदतोंतं व्योमसत्। श्रृण्जा श्राप्सु शाङ्खशुक्तिमकरादिरूपे मत इति । गोजा गरविः पृथिव्यां श्रीहियवादिरूपेगा जायते इति । श्रृथतज्ज्ञरूवेग जायते इति । श्रद्रिजा: पर्वतेश्यों नद्यादिरूपेना जायते इति त्मापि सन्नृतमवितथस्वभाव एव । वृहन्महान्सर्वकारणरात्मवान् । यदेत्य एव मन्त्रेएोच्यते तदाप्यस्यात्मस्वरूपत्वमदित्यस्येत्यज्ञःश्र्चिततत्व। गौऽ्यारडयानेड्यविरोधः । सर्वेऽ्याप्येक एवात्मा जगतो नात्मभेद इथां र्थः ॥ २ ॥

व्यात्मन: स्वरूपाधिगमे लिख्यमुख्यते—

है, श्रृत: 'नृषद:' है, वरों-देवोंमें रहता है, वह 'वरसत:' है, व्योम-ग्राकाशमें रहनत इति 'व्योमसत्' है । श्रृप्-जलमें शाङ्ख, सीप, मकर श्रादिरूपसे उत्पन्न होता है ए 'श्रृण्जा' है, गो-पृथिवीमें श्रीहि यव श्रादिरूपसे उत्पन्न होता है, श्रृत: 'गोजा' है जज्ञारूपसे उत्पन्न होता है, इसलिए श्रृथतजा है, नदी श्रादि रूपसे श्रद्रि-पर्वतों रूप होताहै, श्रृत: श्रद्रिजा' है, इस प्रकार सर्वात्मा होकर भी वह श्रृथत-श्रादितथस्वभाव रूप ही है । तथा सबका कारण होनेसे वृहद्-महान् है । 'ग्रसौ वा श्रादित्यो हंस:' इत्यादि ग्रन्थके अनुसार यदि इस मन्त्रसे श्रादित्यकाही वर्णन किया गया [ इस चराचरका ] व्यात्मस्वरूप है, ऐसा ग्रहण किया होनेके कारण उस व्यात्मा ग्रन्थकी व्याख्यायसे भी श्रद्विरोष ही है । श्रृत: इस मन्त्रका यही ग्रंथ जगत्का एक ही सर्वव्यापक व्यात्मा हैं, व्यात्मभेद नहीं हैं ॥ २ ॥

न व्यात्माका स्वरूपज्ञान करानेमें लिख् कहा जाता है—

सत्यानन्ददीपिका

, मैं दक्षिण, मैं उत्तर श्रौर यह सब मैं ही हूँ ) इत्यादि श्रुति है । सर्वश्रूतोंमें , मालामें सूत्रके समान ग्रन्थ होनेसे वृहद् 'वस' है । यज्ञमें जो प्रसिद्ध वेदि है वह ा उत्कृष्ट भाग होनेसे ग्रौर पृथिवीतत्त्व स्वभाव होनेसे पृथिवीओं वेदि शब्दसे कहा । 'ग्रसौ वा श्रादित्यो हंस: मुचिषत्' इस व्याह्यणमन्त्रसे यद्यपि श्रादित्यकात इति ब्रह्माका नहीं, तथापि 'यदाड्यादित्य एव' इस भाष्यसे तथा 'सूर्य ग्रात्म-स्थुश्रु' इस मन्त्रसे श्रादित्यमण्डलसे उपलक्षित चेतन व्यात्माका हो यहाँ ग्रहेप कि वह सर्वात्मा है, 'सर्वश्रूतान्तरात्मा' ऐसी श्रुति भी है, परन्तु श्रादित्यमण्डल त्मा नहीं हो सकताहै, 'ब्रह्मैवेदं सर्वम्, ग्रात्मैवेदं सद्मू, एकमेवाद्वितीयम्' एको देवः

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ऊर्ध्वं प्राणायुमन्नयत्पानं प्रत्यगस्यति । मध्यये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ॥ ३ ॥

प्राणां ( प्राणवायुं ) ऊर्ध्वं ( उपरि ) उन्नयति ( गमयति-प्रे रयति ) प्राणानं च ( प्राणव त्यक्त्र ( ग्राधो ) श्रधस्पति ( क्षिपति ) मध्ये ( हृदि ) श्रासीनम् ( श्रवस्थितं ) तं र भजनोयं ) विश्वे ( सदृशं ) देवा: ( चक्षुरादय: ) उपासते ॥ ३ ॥

जो प्राणाको उपररक्षी ग्रोर ले जाता है श्रौर श्रपानको नीचेकी श्रोर ढकेलता इयेक मध्येमें श्रवस्थित उसे वामन-भजनोयोंके सर्वे चक्षुरादि देवा उपासनी करते हैं

ऊर्ध्वं हृदयात्प्राणां वायुमुन्नयत्यत्यूध्वं गमयति । तथापानं द घोडयति द्विपाति य इति वाक्यशेष: । तं मध्ये हृदयपुएडरीकाश श्राद् द्वाव्मिव्यक्तविज्ञानप्रकाशनं वासतं संबजनोयं सर्वे विशे देवाश्चक्षुरादि रुपादिविज्ञानं बलिसुपाहरन्तो विश इव राजानमुपासते । तादृश्येन तल्यापारा भवन्तीत्यर्थ: । यदर्थो यत्प्रयुक्तोSअ्र सर्वे वायुकर्गाव्याप रिन्य: सिद्ध इति वाक्यार्थ: ॥ ३ ॥

जो हृदय देहासे प्राणा-प्राणवृत्तिरूप वायुको ऊर्ध्व-ऊपरकी श्रोर ले जाता है, निकले नोचेकी श्रौर ढकेलता है । 'य:' ( जो ) यह पद इस वाक्यको शोष है । लाकाशके भोतर विद्यमान बुद्धिमें श्राभिव्यक्त विज्ञानरूप प्रकाशरूपी उस वा रिनोकी चक्षु श्रादि सभी देव-इन्द्रियाँ रूप, रस श्रादि विज्ञानरूप उपहार इसन। करते हैं जैसे वैषयग्रण उपहारदिसे राजाकी उपासना करते हैं । वे चक्षु श्रा के लिए हो उपरतल्यापारवाले नहीं होते । श्रत: जिसके लिए ग्रोर जिसकी प्रेरेर क हुए सब प्राण श्रौर इन्द्रियाँ ब्यापारवाली होती हैं वह उनसे श्रत्नय सिद्ध है, यार्थ है ॥ ३ ॥

सत्यानन्ददीपिका

'येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये' ( कठ० १।१।२० ) इस मन्त्रे पहले जो सन्देह ड गया है वह भी चिन्मूल है, इसे दिखलानेके लिए 'ग्रात्मन:' इत्यादि से देहसे f माका श्रस्तित्त्व सिद करते हैं—

जैसे प्रजा विविध उपहारादिसे राजाकी उपासना करती है वैसे हो रूप योंका ज्ञान संपादन करती हुई चक्षु श्रादि इन्द्रियाँ भी श्रात्माकी उपासना करती रैं 'सर्वे चक्षुरादिकरगाव्यापारा: चेतनार्थासततप्रयुक्ताश्र भवन्तुमर्हन्ति, जड़चेष्टार् दिवेच्छावदिति' ( जैसे जड़रथादिकी चेष्टा रथी सार्थी श्रादि चेतनके लिए प्रोेर उ क है, क्योंक जड़की चेष्टा है वैसे हो चक्षु श्रादि करणोंके ब्यापार भी चेतनोर्थ व

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तत्त्व—

ग्रास्य विसंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः । देहादिमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते ॥ एतद्‌द्वै तत्त्व ॥ ४ ॥

शरीरस्थस्य ग्रास्य देहिनः ( देहवतः ) चित्सं‌समानस्य ( देहं सृजतः ) देहात्‌ इयमानस्य ( विमुक्तस्य सतः ) शिष्य ( देहे ) किं परिशिष्यते ? ( न किंचदपि तत्त्व ॥ ४ ॥

इस शरीरस्थ देहीके भ्रष्ट हो जानपर इस देहसे विमुक्त हो जानपर भला इस देहं शेष रह जाता है ? [ अर्थात् कुछ भी नहीं ] यही वह ( ब्रह्म ) है ॥ ४ ॥

ग्रास्य शरीरस्थस्यात्मनो विसंसनसमानस्यावसंसमानस्य श्रंशामानस्य देहिनं तः; विसंसनशब्दार्थमाह—देहादिमुच्यमानस्येति किमत्र परिशिष्यं- |दिकलापे न किंचन परिशिष्यते। शिष्य देहे पुरस्वामिविद्रवतैव पुर ।नां यस्यात्मनोडपरामे त्यागमात्रात्कार्यकरराकलतापरुपं सर्वमिदं हतवत्- स्तं भवति विनष्टं भवति सोऽन्यः सिद्धः ॥ ४ ॥

तथा—

इस शरीरस्थ देही-देहवान्‌ शरीरमाके विसंसमान-श्रावसंसं‌ समान-भ्रष्ट हो जानपर इ- दिकरराआ समुदायसे भला क्या शेष रह जाता है? अर्थात् कुछ भी नहीं। 'देहादि- मानस्य' ऐसा कह‌ कर श्रुति विसंसन्त शब्दका अर्थ कहती है। नगरं ।के चले जानपर जैसे पुरवासी विछवस्त हो जाते हैं, वैसे ही इस देहसे जिस- ।के चले जानपर एक क्षयमें यह कार्य-करराआ-शरीर-इन्द्रिय कलापरुप सबका सर- न·विछवस्त-नष्ट हो जाता है, वह इस कार्यंकलापसे भिन्न ही सिद्ध होता है ॥ ४ ।

सत्यानन्ददीपिका

वधु श्रादि इन्द्रियोंसे शरीरको पृथक् सिद्धकर श्रुति देहाव्दि कार्यसे भी 'तत्त्व' से सिद्ध करती हैं—

जैसे पुरस्वामी राजाके चले जानपर पुरवासी श्रनयत्न चले जाते हैं श्रथवा इतसतत्- 'ष्ठ हो जाते हैं, वैसे शरीर-कधु श्रादि इन्द्रिय समुदाय भी । इसमें 'शरीरं चेतनशेषं मे भोगान्हर्वाद्राजपुरवत्‌' ( यह शरीर चेतनका शेष है, कयोंकि उसके देहसे

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स्थान्मता अप्यापानाद्यपगमादवेदं वेधवस्तुं भवति न तु तदूड्यां त्मापगभात्यादिभिरेव हि मर्त्यो जीवतीति, नैतदस्ति—

न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५ ॥

कश्चन ( कश्चिदपि ) मर्त्यः ( मर्याधर्मः मनुष्यः ) प्राणेन न जीवति श्रप्राणः न [ जीवति ] तु ( पुनः ) इतरेण ( तद्विलक्षणेन ) जीवन्ति ( प्राणादि धार् यदिमन् एतौ ( प्राणापानौ ) उपाश्रितौ ( तदधीनतया वर्त्तते ) ॥ ५ ॥

कोई भी मनुष्य न तो प्राणसे जीवित रहता है और न श्रप्राणसे ही, किन्तु जिसमें ये दोनों श्राश्रित हैं ऐसे किसी अन्यसे ही जीवित रहते हैं ॥ ५ ॥

न श्रप्राणेन नापानेन चतुरादिना वा मर्त्यो मनुष्यो देहवान्कथचन न कोऽपि जीवति न ह्योभ्यां परार्थाभ्यां संहतस्यकारित्वराङ्जीवनहेतुत्वमुप' स्वार्थेनासंहतैतैन परेए केनचित्रमयुक्तं संहतानामवस्थानं न दृष्टं गृहादीनां तथा प्राप्तादीनामपि संहतत्वादृवितुमर्हन्ति ।

अ्रत इतरेएव संहतप्राणादिविलक्षणोऽनु तु सर्वे संहता: सन्तो ज्

यदि किसीका यह मत हो कि यहु शरीर, प्राण श्रप्राण श्रादिके चले जानेकी हो जाता है, किन्तु उन प्राणादिके मिन्न किसी श्रात्माके चले जानेकीसे नहीं, प्राणादिके द्वारा ही यहु मनुष्य जीवित रहता है, परन्तु ऐसी बात नहीं है, [ कंर

कोई भी मर्त्यो-मनुष्य देहधारी न तो प्राखसे ही जीवित रहता है श्रौर न श्रप्रथवा चक्षु श्रादि इन्द्रियोंसे ही, क्योंकि परस्पर मिलकर प्रवृत्त होनेवाले तथा शेष भूत घ्रन्यके लिए होनेवाले ये इन्द्रिय श्रादि जीवनके हेतु नहीं हो सकते ।

किसी स्वतन्त्र धौर श्रप्रसंहत श्रात्म चेतनके प्रेरणाके बिना गृहु श्रादि संहत पद् सिथति नहीं देखी गई है, वैँस ही संघातरूप होनेसे-प्राणादिकी सिथति भी स्वतन्त्रः हो सकती, श्रत: संहततुरप ये सब प्राखादि संहत पदार्थोंसे विलक्षणए किसी ग्रन्थके

सत्यानन्ददीपिका

'स्थान्मतम्' इससे ग्रन्थार्थासिद्धिको शङ्का करते हैं । 'नैतत्' से प्राक्षका सम करते हैं—

श्रव श्रात्मामें प्रकारान्तरसे प्राणादिका श्राश्रितत्व इस मत्रसे प्रतिपादन किया है । लोकमें इस श्रप्रत्यक्षसे यहु प्रसिद्ध है कि देहमें प्राणादिके रहते जीव

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प्राणापानौ दिभि: संहृतावुपाश्रितौ, यस्यासंहृतस्यार्थे प्राणापानादि: स्वल्प्यापारं तत्ते संहृत: सन् स: ततोऽन्य: सिद्ध इत्यभिप्राय: ॥ ६ ॥

मरराकोत्तरकालमें जीवकी गति हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् । यथा च मररां प्राप्य श्रात्मा भवति गौतम ॥ ६ ॥

गोतम ! हन्त त इदं (तुभ्यमिदं) गुह्यं सनातनं ब्रह्म प्रवक्ष्यामि, श्रात्मा मररां यथा भवति [तच्च प्रवक्ष्यामि ]॥ ६ ॥

गौतम ! श्रब मैं किर भी तुम्हारे प्रति उस गुह्य और सनातन ब्रह्मका वर्णन तथा [ ब्रह्मको न जाननेसे ] मरराको प्राप्त होनेपर श्रात्मा जैसा हो जाता है मी बताऊँगा ] ॥ ६ ॥

नेदानों पुनरपि ते तुभ्यमिदं गुह्यं गोप्यं ब्रह्म सनातनं चिरन्तनं मि यदृदृज्ञानात्सर्वेसंसारोपरमो भवति, श्रविज्ञानाच्च यस्य मररां प्राप्य भवति यथा संसरेति तथा श्रृणु हे गौतम ॥ ६ ॥

वह रहते हैं-प्राणादि धारण करते हैं । संहृत पदार्थोसि विलक्षरां जिस सत्स्वरूप रहते ही ये प्राप्य, प्रपान्त्, चक्षु श्रादि संहृत हो श्राश्रित हैं श्रर्थात् जिस प्रसंहृत लिए प्राप्, प्रपान श्रादि संहृत हो श्रपने ( दर्शंनादि ) व्यापारोंको करते हुए रते हैं वह श्रात्मा उनसे भिषा सिद्ध है ॥ ५ ॥

श्रब मैं तुम्हें किर भी इस गुह्य-गोपनीय सनातन-चिरन्तन ब्रह्मको कहूँगा, वेज्ञानसे समग्र संसारकी निवृत्ति हो जाती है तथा जिसके विज्ञान न होनेके मरराको प्राप्त होकर श्रात्मा जैसा होता है श्रर्थात् वह जिस प्रकार जन्म-मरणरूप प्राप्त होता है, हे गौतम ! उस प्रकार सुन ! ॥ ६ ॥

सत्यानन्ददीपिका

श्रादि सब जिसके श्राश्रित हैं वह इन सबसे विलक्षरां चेतन श्रात्मा सिद्ध है ।५। 'हन्ते प्रेते विचिकित्सा'० ( कठ० १।१।२० ) इस मन्त्रमें प्रष्टाने परलोक विषयक हूँ श्रभिप्रक्त किया है, उसके निघृरयर्थ 'हन्तेदानीम्' से कहते हैं । 'ग्रन्यच्छ्रेयो' प्रेय:० ( कठ० १।२।१ ) इतयादि मन्त्रों द्वारा यमराजने ब्रह्मा विषयक नर्वचन कियाा है फिर भी नचिकेताके प्रति कहते हैं, क्योंकि ब्रह्म श्रप्रतिगोपनीय

इस मन्त्रमें ब्रह्माके ज्ञान और प्रज्ञानका फल कहा गया है श्रर्थात् जिस ब्रह्मके नममररां रूप संसारकी निवृत्ति होगी व्रतनयेजम्मररार्तनि ---

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पुनःपुन्य्य् प्रपद्यन्ते शारीरत्वाय देहिनः। स्थावरान्न्येडनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ ७ ॥

ग्रन्थे ( केचन ) देहिनः यथाकर्म यथाश्रुतं ( स्वस्वकर्म विद्यानुसारेण ) शारीरस्य शरीरग्रहणार्थं योनिं प्रपद्यन्ते । ग्रन्थे ( देहिनः ) स्थास्यं ( स्थावरदेहम् ) अनुसंप्राप्नुवन्ति ॥ ७ ॥

ग्रन्थे कर्म श्रोत्र ज्ञानेके ग्रनुसार कितने हो देहधारी तो शारीर ग्रहणार्थं तिनीकों प्राप्त होते हैं और कितने हो स्थारभावको प्राप्त होते हैं ॥ ७ ॥

योनिं योनिद्वारं शुक्रबीजसमन्विताः सन्तोडन्ये केचिदविद्यावन्तो म देहिन्ते शारीरत्वाय शारीरग्रहणार्थे देहिनो देहवन्तः; योनिं प्रविशन्तीत्यर्थे तस्यं वृत्तादिस्थावरभावमन्येडन्यान्ताधमा मरसां प्राप्यानुसंयन्त्यानुगच्छन्ती त्कर्मे यथास्य कर्मं तथ्यथाकर्मे यैर्यैर्दृशं कर्मेह जन्मनि कृतं तद्दर्शनेत्येतत त च यथाश्रुतं याश्रयं च विज्ञानमुपार्जितं तदजुरुपमेव शरीरं प्रतिपद्य थे:। "यथाप्रज्ञं हि संभवा:" इति श्रुत्यन्तरात् ॥ ७ ॥

ग्रन्थ कुछ प्रतिविद्यावान् महत् ( ग्रन्थिन्तेवीं ) देहधारी शारीर ग्रहण करनेंके लिये शुक्र बीजसे संयुक्त होकर योनि-योनिद्वारको प्राप्त होते हैं श्रर्थात् किसी योनि प हो जाते हैं, ऐसा श्रर्थ है । दूसरे कोई ग्रतपन्न श्रधम पुरुष मृत्युकों प्राप्त ह याकर्म यथाश्रुतम् स्थास्यं-शुक्रादि स्थावरभावका ग्रनुगमन करते हैं श्रर्था तको प्राप्त होते हैं । तात्पर्य यह है कि यथाकार्य-जिसका जो कर्म है श्रथव न्ममें जिसने जैसा कर्म किया है उसके श्रधीन हो स्थावर श्रादि भावको प्राप्त हो त्या यथाश्रु त श्रर्थात् जिसने जैसा विज्ञान ( उपासना ) उपार्जित किया है उसां प हो शारीरको प्राप्त होते हैं, ऐसा श्रर्थ है । 'जन्म ग्रपनकी ग्रपन बुद्धिके ग्रनुसार करता है' एक ऐसा ग्रन्थ श्रोतिसे भी यही प्रमाणित होता है ॥ ७ ॥

सत्यानन्ददीपिका

इस मन्त्रमें 'देहिनः' इस विशेषणसे वार वार शरीर ग्रहण ग्रोर उसका प्राप्तव ज्ञान सूचित होता है । 'मनुष्याणांश्रधिकरति शास्त्रम्' 'द्विविधश्रमके ग्रनुसार मनुष्यों त कर्म करनेमें शास्त्र श्रधिकृत करता है ।' इसलिये विहिताविहित कर्मं मनुष्य से ही सम्पादित होते हैं ग्रोर उन कर्मफलकों भोगार्थ स्थूल शारीरग्रहण करनेके योनिद्वारमें प्रवेश होता है । 'भोगायतनं शारीरम्' 'यह स्थूल शरीर शुभाशुभ नित सुख, दुःख-रूप भोगाका स्थान है' श्रथवा

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ततज्ञात ब्रह्म वस्त्यामातं तदाह—

गुह्य ब्रह्मोपदेश

एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः । तदेव ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तस्मिंल्लोका: श्रिता: त्रें तदु नात्येति कश्चन । एतद् वै तत् ॥ ५ ॥ पुरुषः सुप्तेषु कामं ( भोगविषयं ) कामं ( स्वेच्छानुसारेण ) निर्मिमाणः ( रचनां करोति, sन् ) जागर्ति, तत् तु ( सः पुरुषः ) एष शुक्रः ( शुद्धः* ) तद् ब्रह्म, तत् तु श्रामृतम् ( ) उच्यते । सर्वे लोका: तस्मिन् ( परमकारणभूतेऽपि ब्रह्मण्यै ) श्रिताः ( प्राश्रिताः ) कश्चिदपि तत् ( ब्रह्म ) न श्राति येति ( श्रातिक्रम्य न यतते ) एतद् वै तत् ॥ ५ ॥ यदि इन्द्रियौके सुप्त हो जानेपर जो यह पुरुष अपने इष्ट पदार्थोंको T हुद्रा जागता रहता है, वही शुक्र-शुद्ध वह ब्रह्म और वही अमृत कहा पब लोक उसके श्राश्रित हैं, कोई भी उसका उल्लंघन नहीं कर सकता, निप्रचय ब्रह्म ) है ॥ ५ ॥

सुप्तेषु प्राण्यादिषु जागर्ति न स्वपिति । कथं तु? कामं कामं तं स्वाच्छन्द्येन भावयतिर्निर्मिमीतोनिमित्तो पुरुषो यस्माद् शुक्रं तद्- ब्रह्म न्यायद् गुह्यं ब्रह्मास्ति । तदेवामृतमविनाश्युच्यते सर्व- किंच पृथिव्यादयो लोकास्तस्मिन्नेव सर्वे ब्रह्मण्याश्रिताः सर्वलोक- स्य । तदु नात्येति कश्चनैत्यादि पूर्ववदेव ॥ ८ ॥ ते यह प्रतिज्ञा की गई थी 'मैं तुम्हे गुह्य ब्रह्म बतलाऊंगा' ग्राब उसे कहते हैं— प्राण्यादि-चक्षु श्रादि इन्द्रियौके सुप्त हो जानेपर जागता रहता है सोता T प्रकार ? श्रविद्याके योगसे अपने अपने इष्टष्ट स्त्री श्रादि पदार्थों हरता हुद्रा श्रर्थात् उन्हें निप्पन्न करता हु श्रा जो पुरुष जागता है वही शुक्र- यह बदा है, उससे भिन्न ब्रह्म कोई वस्तु नहीं है, वही सब शोकोंसे श्री कहा जाता है । किन्तु पृथिवी श्रादि सब लोक उसी ब्रह्मके श्राश्रित हैं, भी लोकोंका कारण है,' श्रत: उसका कोई भी श्रातिक्रमया नहीं कर सकत। वह ब्रह्म है ] इत्यादि पूर्ववत् समभना चाहिए ॥ ८ ॥

सत्यानन्ददीपिका प्राप्तको समाश्तकर ग्राब 'यत्प्रतिज्ञातम्' इस वाक्यसे प्रकृतकका प्रतिपादन

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श्रनेकतार्किककुरुद्धिद्विचालितान्तःकरणानां प्रमाणोपपत्तिमन्यात्मैव ज्ञानमसकृदुच्यमानमप्यनुजुञ्जद्दीनां ब्राह्मणानां चेतसि नाधीयत इति रपादन श्रादरस्ती पुनः पुनराहु श्रुति:-

आत्मैक उपाधिप्रतिबिम्बपत्व

श्रभिनर्वर्थैकौ भुवनं प्रविश्टौ रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ॥ ६

यथा एकः श्रात्मा भुवनं प्रविश्टः [ मनु ] रूपं रूपं प्रति प्रतिरूपः ( तथा सहेशप्रकाशः ) सभूव, तथा सर्वभूतान्तरात्मा एकः [ एक सन् ] रूपं रूपं ( प्रतिरूपः ( ततदेवोपाधयुनुरूपः ) बहिः च [ स्वयमविऋृत एवं ] ( तिष्ठति ) जिस प्रकार सम्पूर्ण भुवनमें प्रविष्ट हुग्रा एक ही ग्रभिन्न प्रत्येक रूप ( रूपवा के अनुरूप हो जाता है, उसी प्रकार सभी भूतोंमें एक ही ग्रनतरात्मा उन अनरूप हो रहा है तथा उनसे बाहर भी है ॥६॥

श्रनेक शङ्किनां की कुरुद्धिद्वारा विचालित चित्तवाले तथा ऋजु (सरल) बुद्धि ब्राह्मणोंके चित्तमें प्रमाणोंसे युक्त भी श्रात्मैकत्व विज्ञान वारम्बार उपदिष्ट हो स्थिर नहीं होता, ग्रतः उसके प्रतिपादनमें श्रादर ( तात्पर्य ) रखनेवाली श्रुति कहती है—

सत्यानन्ददीपिका

श्रभिमानो विश्वनाशक जीव उनके साथ नहीं सोता कितु जागता रहता है, वही वस्तु में श्रविद्याके द्वारा काम्यमान हृी श्रादि पदार्थोंकी रचना भी करता है, ह ब्रह्मा है, ‘श्रग्रायं पुरुषः स्वयं ज्योति:’ यह श्रुति भी है ॥ ५ ॥

प्रत्येक प्राणौके जन्म-मरण श्रौर चक्षु श्रादि करण भिन्न-भिन्न हैं एवं सः साथ प्रकृति भी नहीं होती तथा कोई सात्विक कोई राजस श्रौर कोई ताम गोचर होते हैं, इन्हीं हेतुग्रोंसे श्रात्मा और बुद्धि श्रात्माका भी भेद सिद्ध होता है सब शरीरोंमें एक श्रात्माका होना संभव नहीं है, इस प्रकारकी श्राशङ्काकर म भेद होनेपर सिद्ध साधन श्रौर स्वाभाविक भेद होनेपर श्रनेकान्तिकत्व-द दर्शनके लिए श्रारम्भकर 'श्रनेकतार्किक०' इत्यादि भाष्यसे कहते हैं । शाशु लम्बन न कर केवल तर्कका श्रवलम्बन करनेवाले तार्किक कुबुद्धि कहे जाते हैं द्वारा स्वमतोपन्यासादिसे जिनका चित्त श्रेयोमार्गसे विचलित हो गया है, ऐसे चित्तमें प्रमाण 'तर्कर्मास' श्रादि वेदान्तवाक्यों द्वारा प्रतिपाद्य जीवग्रहैक्य ज्ञा

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एतयैवैक एवं प्रकाशात्मा सन्भुवनं भूतन्यस्मिन्भूतानांति भुवनमयं मिमं प्रविश्टोऽनुप्रविष्ट:। रूपं रूपं प्रतिदार्ंविदिदाहाभेदेन प्रतीत्यर्थे; प्रतिरूप: प्रतिरूपवान्दाहाभेदेन बहुविधो बभूव; एक एव तथा सर्वभूतान्तरात्मा नूतानामभ्यन्तर छात्मातिसूक्ष्मस्माद् द्वार्ंदिदृशिव सर्वदेहं प्रति प्रविश्टरूपो बभूव बहिद्धा स्वेन ब्यविकृतेन स्वरूपेणाकाशवत्॥ ९ ॥

अन्यो दृष्टान्त:-

यथाैको भूतानं प्रतिष्ठो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । कस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूप बहिद्धा ॥१०॥

[ एव ] वायु: यथा भुवनं प्रविष्ट: [ सन् ] रूपं रूपं प्रतिरूप: बभूव, तथा [ व ] सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं ( प्रतिदेहं ) प्रतिरूप: बहिः च ( स्वेनं व्यविकृत: तिष्ठति )॥१०॥

प्रकार इस लोकमें प्रविष्ट हुया एक ही वायु प्रत्येक द्रुत्के भानुरूप हुया है, सब भूतोंका एक ही ग्रान्तरात्मा प्रत्येक देहके भ्रानुरूप हुया बाहर भी है ॥१०॥

प्रकार एक ही ग्रात्मा प्रकाशस्वरूप होकर भी भुवनमें-'इसमें सब भूत होते यह लोक भुवन कहा जाता है । उसी इस लोकमें ग्रात्मप्रविष्ट हुया रूप-रूपके तू काष्ठ ग्रादि प्रत्येक द्रुत्य विशेपके प्रति प्रतिरूप-उस उस पदार्थके ग्रनुरूप ग्रभेदसे ग्रनेक प्रकारका हो जाता है, उसी प्रकार सभी भूतोंका एक ही ग्रान्तरिक ग्रात्मा ग्रतिसूक्ष्म होनेके कारणमे काष्ठादिमें प्रविष्ट ग्रग्रिनके समान पसे बाहर भी है ॥ ९ ॥

एक ग्रन्य दृष्टान्त मो है—

सत्यानन्ददीपिका

की सर्वव्यापक ग्रात्मा निलिमसत्ताका ग्रनुभव करानेके लिए ग्रब ग्रग्रिनका दृष्टान्तसमझाते हैं । जैसे ग्राकाशादि पाँच तत्त्वोंमें मध्यम ग्रग्रिन-नूतात्मक सृष्टिमें सर्वत्र व्याप है जब वह ग्रग्रिन प्रकट होती है तब ग्रपने हे ग्रनुसार दीर्घ काष्ठादि ग्रनेक रूपोंमें प्रतीममान ( लक्षित ) होती है, वैसे ही ग्रात्मा विभिन्न देहादि उपाधिसे नाना रूपोंमें लक्षित होता है । सब स्तरत्वमें ग्रतिसूक्ष्मतम हेतु है, जो वस्तु ग्रतिसूक्ष्म होती है वह सबके ग्राभ्यन्तर विकारमें प्रविष्टकी विकृति हो सकती है ? इस हेतुकी निवृत्तिके लिए

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वायुर्यथैक इत्यादि । प्राणात्मना देहेऽव्यानुप्रविष्टे रूपं रूपं प्रतिरूपो त्यादि समानम् ॥ १० ॥ एकस्य सर्वोत्तमत्वे संसारदुःखित्वं परस्यैव तदिति प्राप्तमत्र मुख्यते ध्यात्माकी ग्रसड्रता

सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैरबाह्यदोषैः । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ।। ११ ।। यथा सूर्यः सर्वलोकस्य चक्षुः ( चक्षुर्नयन्त्रुवेन चक्षुरन्तस्थः सन् ग्रापि ) लोकबाह्यदोषैः न लिप्यते, तथा सर्वभूतान्तरात्मा एकः [ सन् ग्रापि ] लोकदुःखेन बाह्यः ( ग्रसड्रस्वभावत्वात् ) ॥ ११ ॥

जिस प्रकार सर्वलोकका चक्षु होकर भी सूर्य नेत्र सम्बन्धी बाह्यदोषोंसे नहीं प्रत्यूत् उससे बाह्य है ॥ ११ ॥

सूर्यो यथा चलत्प्रालोकेनोपकारं कुर्वन्मूत्रपुरीषाद्यशुचिप्रद तद्दर्शनः सर्वलोकस्य चनुरापि सन्न लिप्यते चान्त्रपैशुच्यादिदर्शनैरिमिरे तिमिरैः पापदोषैरैश्राशुच्यादिसंसर्गदोषैः । एकः सस्तथा सर्वभूतान

जिस प्रकार एक ही वायु प्राणादिरूपसे देहोंमें ग्रनुप्रविष्ट होकर प्रत्येक रूपपरे हो रहा है [ उसी प्रकार सब भूतोंका एक ही ग्रनतरात्मा प्रत्येक रूपके ग्र

रहा है ] इत्यादि पूर्ववत् ही समभना चाहिए ॥ १० ॥ इस प्रकार एककी ही सर्वश्रेष्ठता होनेपर ग्राभ्यन्तुबाद संसारके सब दुःख

होना भी परमात्माको ही होता है । ऐसी ग्राशङ्का प्राप्त होती है, इसलिए रे जाते है---

जैसे सूर्य ग्रपने प्रकारसे नेत्रका उपकार करता हुआ मूत्रपुरीषादि वस्तुओंको प्रकाशित करनेसे उन्हें देखनेवाले सभी लोकोंका नेत्ररूप होकर भी

ग्रपवित्र पदार्थोंके दर्शन-निर्मित्तक ग्राश्यन्तरिक पापदोषों तथा ग्रपवित्र सत्यानन्ददीपिका

'परमात्मा दुःखी स्वातं दुःख्यभिन्नत्वात् लोकवत्' 'परात्मादुःखी होना क्योंकि दुःखी जीवोंसे ग्रभिन्न है जैसे लोक ( संसार ) है' इस प्रकार 'एकस्य

से ग्राशङ्का करते हैं

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लोकदुःखेन बाह्यः। लोको ह्यविद्यया स्वात्मन्यध्यस्तया कामकर्मो-। मनुभवति। न तु सा परमार्थतः स्वात्मनि। यथा रज्जुशुक्तिको-। सर्परजततोदकसल्लानि न रज्ज्वादीनां स्वतो दोषरूपाणि सन्ति। । विपरीतबुद्ध्यध्यासनिर्मितास्ततदोोषवद्भाव्यन्ते। न तदोेषैस्तेषां । विपरीतबुद्धिरध्यासबाध्या हि ते। । मानि सर्वो लोकः क्रियाकारकफलात्मकं विज्ञानं सर्पादिस्थानीयं । ध्यस्य तथाभिज्ञं जन्ममरणादुदुःखमनुभवति। न तावता सर्वलो- । कनिवरीताध्यारोपनिर्मित्तेन लिप्यते लोकदुःखेन। कुतः? बाह्यः । रदेव विपरीतबुद्ध्यध्यासबाधो हि स इति॥ ९१ ॥

बाह्यादोषोंसे लित्त नहीं होता, वह एक सब प्राशियोंका ग्रन्तरात्मा । लित्त नहीं होता, क्योंकि वह उससे बाहर है। लोग अपने ग्रात्मामें । विद्या द्वारा कर्म और कर्मजनित दुुःखका श्रनुभव करते हैं। किन्तु वह । मार्थतः स्वात्मनि नहीं है। जैसे कि रजु, शुक्ति, मरस्थल और ग्राहादि । सर्प, रजत, जल और मलिनता, ये उन रजु, श्रादि में स्वाभाविक दोषरूप । तु संसर्गमें ग्राये पुरुषमें विपरीत बुद्धि जनित ग्रध्याससे दोष प्रतीत होते । दोषोंसे वे लित्त नहीं होते, क्योंकि वे विपरीत बुद्धि जनित ग्रध्याससे बाहर- । हैं।

तकार सब लोग भी ग्रध्याससे [ रजु आदि में ग्रध्यासतत् ] सर्पादिके समान । त्ममें क्रिया, कारक और फलरूप विपरीत ज्ञानका ग्रारोपकर उस निमित्तसे । त्म-मरखा ग्रादि दुुःखोंका ग्रनुभव करते हैं, सम्पूर्ण लोगोंका ग्रन्तरात्मा हो । त्मा तो विपरीत ग्रध्यारोप निमित्तके लोक दुुःखसे लित्त नहीं होता, । सैसे कि वह उससे बाहर है श्रर्थात् रजु श्रादि के समान वह विपरीत बुद्धि । त्से बाहर-प्रतीत ही है॥ ९१ ॥

सत्यानन्ददीपिका

त्मा तो निर्विद्य एवं दुुःखसाधन शून्य है, भ्रत? वह न दुुःखी है और न । जक हेतु ही है, क्योंकि रजु श्रादिके समान चेतन उपाधिस्वरूपसे ग्रध्यास । नेेेे मन ने fिम-- ---। ---।---- ^

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श्रात्मदर्शी नित्य मुखी है

एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥

वशी ( सर्वनियन्ता ) यः सर्वभूतान्तरात्मा एकः । एकम् [ एवं सन् ] एकम् [ रूपं ] बहुधा करोति, श्रात्मस्थं ( स्वहृदयप्रकाशानं ) तम् ( श्रात्मानं ) ये धीराः ( साक्षात् श्रतुभवन्ति ) तेषाम् [ एव ] शाश्वतं सुखं [ भवति ] इतरेषां न

जो एक सबको नियंता धीर सब भूतोंको ग्रन्तरात्मा अपने एकरूपको ही प्रकटका कर लेता है, अपने बुद्धिदिस्थ उस श्रात्माका जो विवेकी पुरुष साक्षात्का' हैं उन्हींको शाश्वतनित्य सुख प्राप्त होता है ग्रन्योको नहीं ॥ १२ ॥

स हि परमेश्वरः सर्वगतः स्वतन्त्र एको न तत्वसमोडभ्यधिको वान्ये वशी सर्वं ह्यस्य जगद्वशे वर्तते । कुतः ? सर्वभूतान्तरात्मा । यत एकमेव रसमात्मानं विशुद्धविज्ञानरूपं नामरूपाद्यशुद्धोपाधिभेदवशेन बहुधानेक यः करोति स्वात्मसत्तामात्रेप्याचिन्त्यशक्तित्वात् । तमात्मस्थं स्वशरीर

काशे बुद्धौ चैतन्यकारेश्वाभिव्यक्तमित्येतत् ।

न हि शरीरव्याधृत्यादिव्यतिरिक्तः, श्याकाशावदहंकृतौ, व्यादर्शस्थ मुग्धो हि स्वातन्त्र्य प्रोैर सर्वगत परमेश्वर एक है, उसके समान श्रथवा उससे ब' कोई नहीं है, वह वशी है, क्योंकि यह सारा जगत् उसके वशीं है । किससे

कि वह सब भूतोंका ग्रन्तरात्मा है । क्योंकि जो श्राचिन्त्य शक्तिसम्पन्न नित्य विशुद्ध विज्ञानस्वरूप हो ग्रपननेको नाम, रूप ग्रादि शुद्ध उपाधि भेदवश श्रपने

मात्रसे बहुधाग्रनेक प्रकारका कर लेता है । उस श्रात्मस्थग्रपने शारीरसस्थ हृदाकाशे

चैतन्यस्थपसे ग्रभिव्यक्त ग्रात्माका जो विवेकी पुरुष ग्रनुभव करते हैं उन्हींको सुख प्राप्त होता है ।

ग्राकाशाके समान ग्रभूर्तं होनेसे ग्रात्माका श्राधार शारीर नहीं है ग्रर्थात्

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स्वापेक्षा परका उत्कर्ष दर्शन ग्रैर ग्रपनमें परतन्त्रता इस प्रकार की दु:खका कारणा लोक प्रसिद्ध है- परन्तु वह परमात्ममें नहीं है, इसलिए प' दु:खी नहीं है, ग्रतएव परमात्माका प्राप्तिरूप परम पुरुषार्थ हो सकता है, 'किंतु' से कह्ते हैं—

न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । परास्य शक्तिः विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥ (श्वेत।

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तमेतमीश्वरमात्मानं ये निवृत्तबाह्यवृत्तयोडनुपश्यन्ति ध्याचार्योङ्गसोमु साक्षादनुभर्वन्ति धीरा विवेकिनस्तेषां परमेश्वरभूतानां शाश्वतं नित्यं मानन्दलत्नानि भवन्ति; नेटरेषां बाह्यासक्तचुद्दीनामविचेकिनां स्वात्मभूतघानन्यवधानात्॥ १२ ॥

च—

रोडनित्यानां चेतनरुचेतनानामेको ब्रूहूनां यो विदधाति कामान्। तमस्थं येडनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम्॥ १३ ॥

गत्यानां ( विनाशशीलानां ) नित्यः ( ग्रविनाशी ) चेतनात् चेतनः? यः एकः ब्रूहूनां ( संसारिणां ) कामान् ( ग्रभिलषितार्थान् ) विदधाति ( प्रयच्छति ) तं धीराः ( धारणशीलाः ) ग्रनुपश्यन्ति, तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषां न ॥१३॥

तं ये धीराः ग्रनुपश्यन्ति, तेषाम् ( एवं ) शाश्वती शान्तिः इतरेषां न ॥ १३ ॥

जैसे दर्पप्रतिबिम्वित मुखका ग्राधार दर्प नहीं है। निवृत्त बाह्यवृत्ति धीर-विवेकी पुरुष उस ईश्वर-ग्रात्माको देखते हैं—ग्राचार्य ग्रौर शास्त्रके तर साक्षात् ग्रनुभव करते हैं, परमात्मस्वरूपताको प्राप्त हुए उन पुरुषोंको ग्रानन्दरूप शाश्वत-नित्य सुख प्राप्त होता है, किन्तु बाह्य पदार्थोंमें ग्रासक्त ग्रन्य ग्रविवेकी पुरुषोंको यह सुख ग्रात्मभूत होते भी ग्रविद्यारूप व्यवधानके 'म नहीं हो सकता ॥ १२ ॥

ग्रनित्येषु विनाशशीलेषु नित्यं ग्रविनाशो हि, चेतनश्चैतद् ब्रह्मादि ग्रनित्यचेतनित्येषु विनाशिनाम्। चेतनश्चेतनानां चेतयितव्यां ब्रह्मादिगणानामोग्नानां सदैकत्वमनन्यनिमित्तकं दाहकत्ववदेकत्वं परिनिर्मित्तक

है। जैसे दर्पप्रतिबिम्बित मुखका ग्राधार दर्प नहीं है। निवृत्त बाह्यवृत्ति धीर-विवेकी पुरुष उस ईश्वर-ग्रात्माको देखते हैं—ग्राचार्य ग्रौर शास्त्रके

सत्यानन्ददीपिका

चिक ज्ञान, बल क्रियारूप है ) यह ग्रन्य श्रुति भी है। जब प्रकृति परमात्माके तो प्रकृतिके विलासरूप यह सारा जगत् भी परमात्माके वशमें होना स्वाभा-जैसे दर्पमें प्रतिबिम्बसे 'दर्पस्थमुख' ऐसा उपचार होता है वैसे 'घीरस्थ

ता उपचार होता है ॥ १२ ॥

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मित्तमेव चेतयित्वमन्येषाम्, किंच स सर्वज्ञः सर्वेश्वरः कामिनां : कर्मानुरूपं कामफलानि स्वानुरग्रहनिर्मित्तांश्च कामान्‌य एको बहून् मनायासेन विधायाति प्रयच्छति-तीत्येतत्। तमात्मस्थं येडनुपश्यन्ति शान्तिरुपरति: शाश्वती नित्या स्वात्मभूतैव स्यान्नितरामनेवंविधानात् तदेतदिति मन्यन्तेऽनिदेश्यं परमं सुखम्। कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा ॥ १४ ॥

ग्रनिदेश्यं ( निर्देशेष्टुमशक्यन्‌ ) परमं सुखं ( ग्रात्मानन्दलक्षणं ) तत् तु मन्यन्ते, तु ( वितर्के ) कथं केन प्रकारेण, तत् ( परमं सुखं ) विजानीयाम् ( श्रा कुर्याम्‌ ) भाति किमु ( प्रकाराते किम्‌ ? ) विभाति वा ॥ १४ ॥

उसी ईस [ ग्रात्मविज्ञानस्वरूप ] को हो विवेकी पुरुष ग्रानिर्वाच्य परम हैं, उसे मैं कैसे जान सकूँगा, क्या वह प्रकाशित ( हमारी बुद्धिसे गम्य ग्रथवा नहीं ॥ १४ ॥

यत्तदात्मविज्ञानं सुखमनिदेश्यं निर्देशेष्टुमशक्यं परमं प्रकृष्टं प्र है वैैसे ही श्रग्रंण्य प्राक्षियमें चेतयितत्व ग्रात्मचैतन्यनिमित्त ही है। किंच तथा सर्वेश्वर भी है, क्योंकि वह श्रकेला ही बिना किसी प्रयासके ग्रनेक सक! पुरुषोंको कर्मानुरूप कर्मफल तथा स्वानुरग्रह रूप निमित्तसे भोग विधान क देता है । जो धीर-विवेकी पुरुष श्रपनी बुद्धिमें श्राभिव्यक्त उस श्रात्माका करते हैं उन्हें शाश्वती-नित्य स्वात्मभूता शान्ति-उपरति प्राप्त होत जो ऐसे नहीं हैं उन्हें प्राप्त नहों होती ॥ १३ ॥

यह जो ग्रात्मविज्ञानरूप सुख है वह ग्रनिदेश्य-निर्देश करने प्रयोश्य, सत्यानन्दीदीपिका

सूर्य ग्रौर चन्द्रमाकी रचनाकी ) इत्यादि। श्रुतिसे प्रकृताभ्यागम श्रौर व प्रसङ्गका परिहार किया गया है, क्योंकि प्रलीन कल्यान्तरभावोंकी कल्पा तीरहपसे उत्पत्ति होती है, इसलिए सृष्टि प्रवाहरपसे ध्यायदि कही गर्ई है स्तम्भपर्यन्त सब प्राक्षियमें जो चेतयितत्व है वह चैतन्यानिमित्त है, वह चैत है । 'स: सर्वज्ञ: सर्ववित्' 'कर्माध्यक्ष:' इत्यादि श्रुति श्रौर 'विमतं कर्म फलं द भोक्ते'न दीयमानं व्यवहितफलत्वात् सेवादिफलवत्' 'विवादास्पद कर्मफल उसकं जाननेवाले द्वारा दिया जाता है, क्योंकि व्यवहित फल है' जैसे सेवानप श्रनुमानसे ईश्वर सर्वेश्वर श्रौर कर्मफलदाता सिद्ध होता है ॥ १३ ॥

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नसयोरगोचरमपि सत्रिवृत्तैषणा ये ब्राझ्मणास्ते यत्तदेतत्प्रत्यच्तमेवेति ते । कथम् तु केन प्रकारेण तस्मुखमहं विजानीयाम् । इदमित्यात्मबुद्धि-मापादयेयं यथा निवृत्तैषणा यतयः । किं तद्ब्राति दीध्यते प्रकाशात्मकं डस्मद्बुद्धिगोचरत्वेन विभाति विरस्पष्टं दृश्यते किं वा नेति ॥ १४ ॥ नत्रोत्तरमिदं भाति च विभाति चेति । कथम् ?

सर्वप्रकाशकत्वात्

नतत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नैमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । व भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १५ ॥

तै ( तस्मिन् ब्रह्मणि ) सूर्यः न भाति, चन्द्रतारकं ( चन्द्रः तारकसमुदायः ) व ( न ) भान्ति, इमा ( इश्यमाना ) विद्युतः न भान्ति, श्रयम् श्रग्निः कुतः ? भान्तं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १५ ॥

धारणा पुरुषोंकी वाणी श्रौर मनका विषय भी है, तो भी निवृत्त एष्णाश्रोंवाले यतियोग हैं वे उसे प्रत्यक्ष ही मानते हैं । उस श्रात्मसुखको मैं किस प्रकार जान सकता हूँ ? निवृत्त एष्णावाले यतियोंके समान 'वह यहीं है' इस प्रकार उसे मैं 'द्रष्टा' विषय कैसे संपादन कहलँगा ? वह प्रकाश स्वरूप है सो क्या वह भासता है ? बुद्धिकी विषयस्वरुपसे स्पष्ट दिखलाया देता है अथवा नहीं ॥ १४ ॥

का उत्तर यही है कि वह भासता है श्रौर विशेषरूपसे भासता है । किस प्रकार?

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'बका' त्यागकर जिन यतियोंने श्रात्मैकत्व दर्शोनकर परमानन्दकी प्राप्ति की है, लोग भी एषणा त्र्यताग पूर्वक श्राचार्य श्रौर शाख्रद्वारा श्रात्मैकत्व प्रतिपादक ' श्रादि वेदान्त वाक्योंके उपदेशसे श्रात्मानन्दका श्रनुभव कर सकते हैं ।

वके विषयमें 'यतो वाचो निवर्तन्तेऽप्राप्य मनसा सह' 'वाणी भी मनके साथ कर लौट श्राती है' इत्यादि श्रुतिसे तो ऐसा प्रतीत होता है कि श्रात्मदर्शन, परन्तु 'दृश्यते त्वग्रया बुद्धचा सक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः' ( कठ० २१३ ) दृश्यव्य:' ( विशुद्ध मनद्वारा ही वह दर्शान योग्य है )

समाधिनिर्धूतमलस्य चेतसो निवेशितस्यात्मनि यत्सुखं लभैत् । न शक्यते वर्णयितुं गिरा तदा स्वतन्तः करसोन गृह्यते ॥

।।धिद्वारा निर्मल हुए विशिशष्टचित्तसे जो श्रात्मामें सुख प्राप्त होता है वह वाणींन नहीं कहा जा सकता, किन्तु उस कालमें वह श्रात्मसुख ग्रान्तः-री वृत्ताँन नहीं क्यिा जा सकत, कित्नु उस कालमें वह श्रात्मसुख ग्रान्तः-१ ही गृहीीत होता है ) 'बुद्धग्राह्यमतीन्द्रियम्' ( गीता ६-२१ ) ( ग्रतीन्द्र्रिय

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प्रकाशमानं ) तम् ( आत्मानम् ) एव ग्रनु ( ग्रनुस्वरूप ) सर्वं ( सूर्यादिकं ज्योति रृत ( प्रकाशो लभते ) इदं सर्वं ( जगत् ) तस्य ( आत्मज्योतिषः ) भासा ( दीप्तिर्भाति ( प्रकाशते ) ॥ १४ ॥

उस ब्रह्म स्वरूपमें सूर्य प्रकाशित नहीं होता, चन्द्रमा और तारागण भी प्रकाश नहीं होते और न यह विद्युत् ही प्रकाशित होती हैं, फिर इस भ्रग्निकी तो बात क्या है ? उसके प्रकाशमान होते हुए ही सब कुछ प्रकाशित होता है और उसके प्रकाशसे ही यह सारा जगत् प्रकाशित है ॥ १५ ॥

न तत्र तस्मिन्स्वात्मभूते ब्रह्मणि सर्वावभासकोऽपि सूर्यो भाति तदृश्र काशयतेऽर्थः । तथा न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमस्मदूरोचरोडग्निः । किं बहुना यदिदमादिकं सर्वं भाति तत्तमेव परमेश्वरं गीयमानमनुभात्यनुदीप्यते । यथा जलोल्मुकाद्यग्निसंयोगादग्निर्दहन्न इति न स्वतस्तद्धतस्यैव भासा दीप्त्या सर्वमिदं सूर्यादि विभाति । य

वहाँ उस स्वरूप ब्रह्ममें सबका प्रकाशक होकर भी सूर्य प्रकाशित नहीं होता 'ह भी उस ब्रह्मको प्रकाशित नहीं करता । इसी प्रकार ये चन्द्रमा, तारे और नो प्रकाशित नहीं होते, फिर हमारी दृष्टिके विषय भूत इस भ्रग्निकी तो बात क्या है ? श्राधक क्या कहा जाय ? यह सूर्य आदि जो सब प्रकाशित हो रां ब उस प्रकाशरूप परमात्मासे प्रकाशित होते हुए ही श्रनुदीप्त-श्रनुभासित हो र जस प्रकार जल और उल्मुक ( जलते काष्ठ ) श्रादि प्रभिनके संयोगसे श्रभ्रग्निके प्रदीप्तेहोते- दहन करते हैं स्वयं नहीं, उसी प्रकार उसके प्रकाश-तेजसे सूर्यादि सब प्रकाशित होते हैं, क्योंकि ऐसा है, इसलिये वही ब्रह्म प्रकाशित ह और विशेषरूपसे प्रकाशित होता है । सर्वगत नानाप्रकारके प्रकाशसे उस

सत्यानन्ददीपिका यहु मन्त्र 'ग्रात्मानं स्वयं ज्योतिः स्वरूपं कृत्वा' ( श्रात्मा साक्षी चेता केवलो निर्गुणाश्रयः ) श्रु० ६।१९ ) सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मा० न तत्र चन्द्रार्कावभायुल् प्रकाशते न वान्ति वाताः सकला देवताश्च । स एवं देवः ऋतभावभूतः स्वयं विशुद्धो विरजः प्रकाशते ॥ सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परम् प प्रदादित्यगमत् तेजो जगद्व्याप्तमयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रद्मसि यचाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ ( गी० १५ | १२-९४ )

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व ब्रह्म भाति च विभाति च । कार्यंगतेन विविधेन भाषा तस्य ब्रह्मणः पत्वं स्वतोडवगम्यते । न हि स्वतोडविद्यमानं भासनमन्यस्य कतुं शक्यम् । दीनामन्याावभासक्त्वादर्शनाद्द्रासनरूपाप्यां चादित्यादीनां तदर्शनात् । १४ ।

ग्राद्धूरभगवत्कृतो कठोपनिषद्भाष्ये द्वितीयवल्लीभाष्यं समाप्तम् । । २-३ ।।

ग्रास्वरूपता स्वतः श्रभगत होती है, क्योंकि जिसमें स्वतः प्रकाश नहीं है व को प्रकाशित नहीं कर सकता । जैसे घटादिका श्रभ्रयोंमें प्रकाशात्म्क नहीं देखे गये पर प्रकाशरूप श्रादित्यादिका घटाद्योंको प्रकाशित करना देखा जाता है । । १४ ।

ग्रनिषद्के द्वितीयाध्यायकी द्वितीयवल्लीके ग्राद्धूरभाष्यक 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत भाषानुवाद समाप्त । । २।३ ।।

सत्यानन्ददीपिका

ज चन्द्र्रमें और ग्रग्रिनमें स्थित है वह तेज मेरा ही जान ) इत्यादि श्रुति स्मृति ग्रतमाको ज्ञानस्वरूप स्वयंप्रकाश प्रतिपादन करती हैं, इसलिए ब्रह्म सच्‍चिदानन् । र है और वही सबका ग्राश्रमा है । । १५ ।

कठोपनिषद्के द्वितीयाध्यायकी द्वितीयवल्लीकी 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' कृत 'सत्यानन्ददीपिका' समाप्त । । २।२ ।।

द्वितीयाध्यायस्य तृतीयावल्ली

संसरारूप प्रपञ्चस्थवृक्ष

मूलाविधारयन् मूलाविधारेण वृक्षस्य क्रियते लोके यथा, एवं संसारकार्य-रधारेण तन्मूलस्य ब्रह्मणः स्वरूपाविधारयिष्येयं षष्ठी वल्ली यारभ्यते— ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः । तदेव शु्रकं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तस्मि्ल्लोका: श्रिता: सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् । १ ।

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एषः ( संसारवृक्षः ) ब्राश्वत्थ ऊर्ध्वमूलः ( ऊर्ध्वं मूलं यस्स सः ) प्रवावशाखः ( प्रवृक्षाः शाखा यस्स सः ) सनातनः ( अनादिप्रवाहरूपः ) तं प्र. हृदयाङ्ग्र्शः पूर्ववत् ॥ ९ ॥

उपरकी ओर मूल तथा नीचेकी ओर शाखाओंवाला यह संसाररूप ब्राश्वत्थवृक्ष तन-प्राणादि है । वहो विशुद्ध ज्योति: स्वरूप है, वही ब्रह्म है और वही ऽमृत क 'T है, सब लोक उसके श्राश्रित हैं, कोई भी उसका श्रप्रतिकृत्य नहीं कर सक्ता, य 'य वह ( ब्रह्म ) है ॥ १० ॥

ऊर्ध्वमूला ऊर्ध्वं मूलं यत्तद्विद्रष्पोः परमं पद्मस्येऽति सोऽध्यात्ममशक्तादिस्थं तः संसारवृद्र ऊर्ध्वमूलः । वृद्रशश्र ब्रश्रनात् । जन्मजरामरणशोकाद्यैः श्रोत्मकः प्रतिद्यामनन्यथास्वभावो मायामरीचियुदकगन्धर्वनगरादिवदूदृश्ं शपत्वादवसानेऽपि वृद्रवद्भावात्मकः कदलीस्तम्भवत्निः सारोऽनेकशातपारमुद्धिविकल्पार्पदस्त्वविजिन्याऽसुभिरनिधारितेदंसतत्त्वो वेदान्तनिर्धोऽरिद्झमूलसारोडवियाचाकमकर्मोऽयक्तबीजप्रभवोऽपरब्रह्मविज्ञानक्रियाशक्तिदर्श हिरण्यगर्भोऽकुरः सर्वप्रपञ्चलिङ्ङभेदस्कन्धस्त्रष्याजलावसेकोद्भूतद निन्द्रयविषयप्रवालाकू रः शतिस्मृतिन्यायविद्योपदेशपलाशो यज्ञदा पूजु

उद्र्वं ( उपरकी ओर ) श्रर्थात् जो वह विष्णुका परम पद है वही इस है ऐसा यह श्रप्रत्यक्षे स्थावरपर्यन्त संसार वृक्ष 'उडूर्वमूल' है, इसका 'ब्रश्र ' होनेके कारण यह वृक्ष कहा जाता है । जो जन्म, जरा, मरण, शोक श्रादि श्र 'रूप प्रतिक्रया ग्रन्थ्याभावको प्राप्त होनेवाला, माया-मृगतृष्णाके जल व निगरादिके समान हष्ट-नष्ट-स्वरूप होनेसे ग्रन्थमें वृक्षके समान श्रभावरूप ताला, केलके खम्भके समान नि:सार और सैकड़ों पाखणिडयोंकी वृद्धिके विकलपों प है । तत्त्वजिज्ञासुभोंद्वारा जो 'तत्त्व' 'इदं' रूपसे श्रनिद्रारित है, वेदा- नित परबह्म ही जिसका मूल और सार है, जो माविच्छा, कर्म, क्रिया ये दो प्राक्तिरूप श्रपर-श्रव्यरूप हिरण्यगर्भ श्रंकुरवाला है बीज ' होनेवाला श्रर्थात् ज्ञान, क्रिया ये दो शक्तियोंवाला हिरण्यगर्भ जिसका ग्राङ्कुर राङ्गियोंके लिङ्ङशरीरों विशेप ही जिसके स्कन्ध ( शाखामूल ) हैं, जो तृष्णारूप क नसे वृद्धिको प्राप्त तेजवाला, ज्ञानेन्द्रियोंके विषय-शब्द, स्पर्श, रूप, रसादिरूप नूत

सत्यानन्ददीपिका

कार्यँ श्रवश्य काररप मूलक होता है, ऐसा नियम है । जैसे शाल्मली श्रादि तू

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आध्यात्मिकासुपुष्पः सुखदुःखवेदनानेकरसः प्राप्युपजीव्यानन्तफलस्तत्संलिलारवसेकप्ररुढजडीकृततहृदबद्धमूलः सत्यनामादिसम्प्रलोककब्रह्मादितनिकृतनोडः प्राप्तिसुखदुःखोद्भूतहर्षशोकजातनृत्यगीतवादित्रस्ववेलिगोटितहसिताकृष्टरुदितहाहासमुखमुखचेत्याधानेकरब्धकृततुसलीभतमहारवो - तवेहिततब्रह्मात्मदर्शिनासङ्गशस्त्रकृतोच्छेद एष संसारवृत्तोऽस्वस्थोऽ- यत्कासकर्मवातेरितनित्यप्रचलितस्वभावः, स्वर्गनरकतियंकप्रेतादिभिः शिरवाक्शाखाः सनातनोडनादित्याचिरं प्रभूतः ।

ओंके श्रद्धुरोंवाला, श्रुति, स्मृति, न्याय प्रौर ज्ञानोपदेशरूप पत्तोंवाला, यज्ञ, दान, तद् धनैक क्रिया-कलापरूप सुन्दर पुष्पोंवाला । सुल, दुःख श्रौर वेदनारूप विविध युक्त प्राप्तियोंकी श्राज्जीविकारूप भ्रान्त्त फलोँवाला तथा फलोँके वृक्षणारूप जलके से वृद्धिको प्राप्त हुए श्रौर [ सात्त्विक श्राद्ध भावोँसे ] मिश्रित एवं हृदयतापूर्वंक [ कर्मवासनार्द्ररूप ववान्तर ] मूलोँवाला है, ब्रह्मादि पक्षियोंने जिसपर सत्य ( भूः भुवः स्वः महः जनः तपः और सत्यम् ) नामोंवाले सातलोकरूप घोंसले खड़े हैं, जो प्राप्तियोंके सुख दुःख जनित हर्षं शोकसे उत्पन्न नृत्य, गान, वाचाक्रीडा टन ( खम ठोकना ) हैंसी, प्राक्तनदन रोदन, हाय हाय, छोड़ छोड़ इत्यादि प्रकारके शान्दोँको मूलस्वनिसे श्रत्यन्त गुञ्जायमान हो रहा है तथा वेदान्तविहित दर्शनरूप व्रसड्रू शाखासे जिसका उच्छेद होता है ऐसा संसाररूप वृक्ष श्रश्र्वत्थ वृक्षके समान कामना श्रौर कर्मरूप वायुसे प्रेरित हु्रा नित्य चलन वाला है । स्वर्ग नरक तिर्यक् श्रौर प्रेत श्रादि शाखाओंके कारण नीचेकी श्रौर 'खाधोँवाला है तथा सनातन-भ्रनादि होनेके कारण चिरकालसे चला श्रा

सत्यानन्ददीपिका

सूर्यके प्रचण्ड प्रकाशमें विद्यमान होते भो तक्षण्ण स्थूल-दृष्टिवालेकी दृष्टिगोचर थे, वैसे हो स्थूल दृष्टिवालोँको भी सर्वत्र व्याप्त भावरूप ब्रह्म भ्रनुभवमें नहीं श्राता, अहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ( गीता ७।२५ ) ( अपनी योगमायासे मैं सबको प्रकाशित नहीं होता हूँ ) यह स्मृति भी है । भ्रतः यहाँँ कार्यँसे निश्चय करनेके लिए इस वल्लोका श्रादरम्भ है—

वान् भाष्यकार संसारमें वृक्ष-शब्दकी प्रभृत्तिमें निमित्त कहते हैं—‘वृक्षनात्’ रत्ति प्रौर ‘ऽपमचूच्छेदने’ इस धातुतुसे स प्रत्ययान्त वृक्ष शब्द निष्पन्न हुग्रा है । इससे थैं नाला लेोनेनेरन्न है ।

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यदस्य पश्यारद्रस्य मूलं तदव शु्क शुब्र शुद्ध ज्यातस्य ज्योति:स्वभावं तदेव ब्रह्म सर्वंमहत्त्वात् । तदेवासृतमविनाशस्वं कध्यते सत्यत्वात् । वाचारम्भणं विकारो नामधेयमृतमन्यदतो तस्मिन्परमार्थेसत्ये ब्रह्मण्ये लोका: गन्धर्वनगरमरीच्युदकं परमार्थेर्दर्शनाभासावगमनाः श्रिता आाश्रिता: सर्वे समस्ता उत्पत्तिस्थि तदु तद्ब्रह्म नात्येति नातिवर्तंत इव मृदादिमिव घटादिकार्ये कश्रदपि एतद्रै तत् ॥ ९ ॥

यद्विज्ञानादमृता भवन्तीत्युच्यते जगतो मूलं तदेव नास्ति ब्रह्मा नि:सृतामिति । तथ—

ब्रह्मज्ञानासे मम्ररत्स्वप्राप्ति

यदिदं किँच जगत्सर्वं प्राण एजति नि:सृतम् । महद्रयं वज्रसुदृं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ :

इस संसार वृक्षका जो मूल है वही शुक्र शुभ्र-शुद्ध ज्योतिमय ज्योति:स्वभाव उपोदि:स्वभाव है, वही सबसे महान् होनेके कारण ब्रह्म है, वही सत्यस्वरूपमात्र श्रेष्ठत श्राश्रित श्रविनाशी स्वभाववाला कहा जाता है । विकार वारणीका वि केवल नाममात्र है, प्रातः उस ब्रह्मसे भिन्न सब मिथ्या है और नाशवान् है । दर्शंनके श्रभावसे प्रतीतमान गन्धर्वनगर, मरीचिकाजाल और मायाके समान ये उत्पत्ति, स्थिति और लयदशामें उस परमार्थसतत्यब्रह्ममें श्राश्रित हैं । वि घटादिकार्ये मृतिकार्ये प्रातिक्रमं नहों कर सकते, उसी प्रकार कोई भी ब्रह्मका श्रातिक्रमंया नहीं कर सकत । निश्चय यही वह ( ब्रह्म ) है ॥ ९ ॥

शाङ्खा——जिसके विज्ञानसे मम्रर हो जाते हैं ऐसा जिसके विषयमें कहा ज' जगत्का मूलभूत ब्रह्म तो वस्तुत: है ही नहीं, यह सब तो ग्रसत्से प्रादुर्भूत समाशान-ऐसा नहीं है, [ क्योंकि ]

सत्यानन्ददीपिका

प्रहण है । मायादिके समान प्रतिबिम्ब ग्रानयथास्वभाववाला है, क्योंकि इस प्रतीति होती है उत्तर कालमें नहीं, इसे संसारको मायादिके समान दृष्ट-न वाला कहा गया है । लोक प्रसिद्ध वृक्ष जैसे 'स्थास्नुवां पुर्षो वा' : विकलपोऽस्पद है, वैसे यह संसार भी 'सङ्घात है, परंपरया व आश्रय है, सत् प्रसत्' इत्यादि ग्रनेक पाखण्ड-बुद्धिकी कल्पनाका विषय है । परन्तु 'व विकारो नामधेयं मत्तिकेयेव सत्यम' ( छा० ६।९।२ ) इत्यादि श्रुतिमे तनो

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तम् (उत्पन्नं) एतत् प्राणाद्यं ब्रह्म महद् भयं ( भयानकम् ) उद्यतं वज्रं (वज्रमिव दृढ्ं; ( जानन्ति ) ते ब्रमृताः ( मुक्ताः ) भवन्ति ॥ २ ॥

यह जो कुछ् सारा जगत् है प्राण-ब्रह्मके श्रासितत्वसे चेष्टा कर रहा है, उसीसे 'उत्पन्न है वह ब्रह्म महान् भयरूप और उठे हुए वज्रके समान है, जो इसे जानतेः भ्रमर हो जाते हैं ॥ २ ॥

यदिदं किंच यत्किंचिदं जगत्सर्वं प्राणो परस्मिन्ब्रह्मणि सत्येजाति कम्पते एव निःसृतं निर्गतं सत्प्रचलति नियमेन चेष्टते। यदेवं जगदुत्पत्त्यादिकारणं तन्महद्‌दूयम् । महच्च तद्‌दूयं च निभेत्यस्मादिति महद्‌दूयम्‌; वज्रमुच्यते- मिव वज्रम् । यथा वज्रोद्यतकरं स्वामिनमभिमुख्योभूतं दृष्ट्वा भृत्या नियमेन

यह जो कुछ है-यह जो कुछ् जगत् है वह सब प्राण परब्रह्मके होनेपर ही उसीसे तत्-उत्पन्न होकर एजत्-कम्पन-गमन श्रथोत् नियमितञ् चेष्टा कर रहा है। इस प्रकार हू जगत्की उत्पत्ति श्रादिका कारण है वह महान् भयरूप है, इससे सब भय हैं, इसलिए वह 'महद्‌दूयम्‌' है 'वज्रमुच्यतम्‌' उठाये हुए वज्रके समान है, भाव यह है जिस प्रकार अपने सामने वज्र उठाये स्वामीको हाथमें वज्र उठाये देखकर सेवक लोग [नुसार उसकी श्राज्ञामें प्रवृत्त होते रहते हैं। उसी प्रकार चन्द्रमा, श्रादित्य, ग्रह

सत्यानन्ददीपिका

नर्यका शून्यपर्यन्त नाश होता है, भ्रत् भसत् पूर्वक ही इसका जन्म है, इससे हि मूलभूत ब्रह्म नहीं है, 'तदैक श्राहुरसदेवेदमग्र ग्रासीत्‌केमव द्वितीयं तस्मादसतः ( छा० ६।२।१ ) ( कोई कहते हैं कि पहले यह एक श्रद्वितीय भसत् ही था, मसत्से सत् उत्पन्न हूआ है ) यह श्रुति है। इस श्रुत्तिको 'यदिदं जानात्‌' से कहते : 'तत्' इससे समाधन करते हैं ॥

ह लोक प्रसिद्ध कि गगनकुसुम, शशविषाण श्रादि प्रसत् पदार्थोंसे कहिं भी ताथंको उत्पत्ति नहीं होती किन्तु सत्से ही 'होती है, भ्रत् सद्‌रूप ब्रह्म जगत्का रप है । 'कुतस्तु खलु सोम्पैवं स्यादिति होताच कथमसत्; सज्जायेतेऽसति, सत्स्वेव मग्र ग्रासीत्‌केमवद्वितीयं तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय' ( छा० ६।२।२३ )

तदेक्षत बहुत्स्यां प्रजायेयेत्' ( छा० ६।२।३ ) (यह ऐसा कैसे हो सकता है, भ्रसत्से सत्की उत्पत्ति कैसे हो है ? हे सौम्य ! पहले यह एक श्रद्वितीय सत् ही था, उसने ईक्षरण किया । बहुत त्पस् होऊं ) 'नासतो विच्यते भावः' (गी०) इत्यादि शुति, स्मृतिसे भी यही सिद्ध ! कि सद्‌रूप ब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति होती है । 'सदेव सोम्पेदमग्र ग्रासीत्‌केमव-

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तच्छासनं वतन्त तथैव चन्द्रादित्यम्रहैर्नॄत्तारकादिलत्न्रां जगत्सेश्वरं द्र्ष्यामप्यविश्रान्तं वर्तन्त इत्युक्तं भवति । ये एतद्विदुः स्वात्मप्रयुक्तिस मेकं ब्रह्मामृता श्वरस्न्राधर्मौऽस्ते भवन्ति ॥ २ ॥

कथं तदूयाज्ञगद्र्तंत इत्याह—

सर्वशासक परमेश्वर

भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः । भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ ३ ॥

ग्रग्निनः ग्रस्न्य ( रथ्याया: ) सयात् तपति, सूर्यः भयात् तपति, [ ग्रस्न्य इन्द्रश्च, वायुश्च, पञ्चमः । मृत्युः धावति ( स्वध्या पारं करोति ) ] ॥ ३ ॥

इस परमेश्वरके भयसे ग्रग्नि तपता है, इसके भयसे सूर्य तपता है, तथा इस भयसे इन्द्र, वायु और पांचवां मृत्यु अपने अपने कार्यमें संलग्न रहते हैं ॥ ११६

भयाद्वीत्या परमेश्वरस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यो भयादिन्द्रश्व वायुश्च पञ्चमः ।

मृत्युर्धावति पञ्चमः । न होश्वरायां लोकपालानां समथोंनां सतां नक्षत्र, तारा ग्रादि रूप यह सारा जगत् ग्रपने श्चिष्ठिताश्रोंके सहित एक विश्राम न लेकर नियमित उसकी ग्राज्ञामें वर्त्तता है । ग्रपने ग्रास्त.करतॄएको साक्षोभूत इस एक ब्रह्मको जो लोग जानते हैं ये श्रमरराधर्म-ग्रमर हो जाते हैं ।

उसके भयसे जगत् किस प्रकार व्यापरकर रहा है ? उसे ऋषिहते हैं—

इस परमेश्वरके भयसे ग्रग्नि तपता है, इसके भयसे सूर्य तपता है तथा इसी भयसे इन्द्र, वायु और पञ्चम मृत्यु दौड़ता है । यदि ईशनशील समर्थ लोकपालोंका हा

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'ब्रक्षरस्न्र प्रशासने गार्गि ! सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठत:' (बृह० ३।८।९) (याज्ञव ल्क्यसे हे गार्गि ! इस ब्रह्मके प्रशासनमें सूर्य और चन्द्रमा विधृत हुए स्थित हैं ।

श्रुति ऐसा कहती है कि सब ब्रह्मके प्रशासनमें रहते हैं । इस ब्रह्मको प्रत्यगभिन्नसाक्ष जान्ते हैं वे मुक्त हो जाते हैं ॥ २ ॥

जैसे एक साम्राज्यके राजप्रतिनिधिगण राजाज्ञा एवं राजनिर्मित नियम करनेके कारन राजपदसे च्युत तथा दण्डार्ह होते हैं, वैसे ही सूर्य ग्रादि पदोंके ग्रधोश्वरगण ग्रपने पदसे च्युत न हों इसलिए सर्वशक्तिमान् परमेश्वरके नियम तत्पर रहते हैं और कदापि उसका भङ्ग न हो इससे सर्वदा भयभीत रहते हैं ।

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त्रायतकरवच स्यात्स्वासिमभयभीतानामिव भृत्यानां नियता प्रवृत्तिरूपे ॥ ३ ॥

तत्र—

इह चेदशकद्बोधं प्राक्शरीरस्य विस्रसः । तत: सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ८ ॥

इह ( अस्मिन् देहे ) चेत् ( यदि ) बोधदृं ( ज्ञानतत्पुम् ) प्रशकतुं ( शक्तो भवेत् ) [ शरीरस्य विस्रस: (विसंसनात् पतनात् ) प्राक् ( पूर्वमेव ) मुच्यते ( मुक्तो ) तत: ( ज्ञानबोधादेव ) सर्गेषु ( लोकेषु ) शरीरत्वाय ( देहलाभाय ) ॥ ८ ॥

यदि इस देहमें इसके पतनसे पूर्वं हो ब्रह्माको जाननेमें समर्थ हुमा तो संसार बन्धनसे मुक्त जाता है और यदि नहीं जान पाया तरे जन्ममरणादि-शील लोकोंमें वह शरीर-

। प्राप्त होनेमें समर्थ होता है ॥ ४ ॥

ह जीवन्नेव चेद्यशकचछुक्ननोति शक्त: सज्ञानात्येतद्रूयकारसां ब्रह्म मवर्गन्तु प्राक्पूर्व शरीरस्य विस्रसोडविसंसनात्पतनोत्सिसेसारबन्धनादि- । न चेदशकद्बोधं तत: ज्ञानबोधात्सर्गेषु सृज्यन्ते येघु स्वाश्रया:

एखनेबाले [ इन्द्र ] के समान कोई नियमिता न होता तो स्वामीसे भीत हुए सेवकोंके उनकी नियमित कायँ प्रदृत्ति नहीं होती ॥ ३ ॥

तर उस ( भयके कारय स्वरूप ब्रह्म ) को— दे इस देहमें ध्रव्यात ( जिनित रहतेँ हो शरीरका पतन-मरण होनेसे पूर्वँ साधक

  • सूर्योदिके भयकें हेतुभूत ब्रह्मको जाननेमें समर्थं हुमा तो वह संसार बन्धनसे जाता है और यदि उसे जाननेमें असमर्थ रहा तो उसका ज्ञान न होनेके कारय

सत्यानन्ददीपिका

लदाता यम है, इसकी राजधानी पितृलोकमें है। ये देवगण समर्थ होते भी भयसे नियमित अपने म्रप्रने कार्योंमें रत रहते हैं। इस विषयमें—

महासत्त्वा: स्वतन्त्रा। बाहुधालिन: । यस्य भीत्या प्रवर्तन्ते स्वे स्वे कर्मणि भृत्यवत् । त भी है ॥ ३ ॥

वैदिकदय सत्यमस्ति न चेदिहावेदोन्महती विनष्टि: (केन० २१५ ) ( सर्वो-

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ग्राय कलपते समर्थो भवति शरीरं गृृहीतातीयर्थः। तस्माच्छरीरविषसंघसन गातमबोधाय यत्नं श्रपास्येयः ॥ ४ ॥

यस्मादिहैवात्मनो दर्शानमादर्शास्थस्येव मुखवस्य स्पष्टमुपपघते न लोकेनन्तरे लोकेनन्यत्र, स च दुःप्रापः, कथम् ? इत्युच्यते— स्थानभेदसे ब्रह्मादर्शानमें तारतम्य

ग्रथादर्शे तथात्सरनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । ग्रथाप्सु परीरव दहशो तथा गन्धर्वलोके छायातपयोरिव ब्रह्मालोके ।४ ग्रादर्शो ( दर्पणे ) [ मुखं ] यथा हृश्यते, श्रात्मनि ( बुद्धौ ) [ परमात्मा ] तथा दहशो ( परिदृश्यते ) स्वप्ने यथा पितृलोके तथा । ग्राप्सु ( जले ) यथा गन्धर्वलो परिदृश्यो इैव ब्रह्मलोके छायातपयोः ( प्रकारान्धकारयोः )"इव [ श्रात्मानात्मं तं भवंति ] ॥ ५ ॥

प्रकार दर्पणेमें उसी प्रकार निर्मल बुद्धिमें श्रात्माका स्पष्ट दर्शान होता है और जैसे में वैसा ही पितृलोकमें, श्रौर जैसा जलमें वैसा ही गन्धर्वलोकमें उसका [ ग्रस्पष्ट होता है, किंतु ब्रह्मलोकमें तो छाया श्रौर प्रकाशके समान वह् [ सर्वथा स्प ष्ट होता है ] ॥ ५ ॥

सर्गोंमें जिनमें स्थूल्य प्राधियोंकी रचना की जाती है उन पृथिवी श्रादि लोकों: तत्व-शरीरभावको प्राप्त होनेमें समर्थ होता है । श्रर्थात् शरीर ग्रहण करता है, य है । श्रत: शरीरपातसे पूर्व ही श्रात्मज्ञानके लिए यत्न करना चाहिए ॥ ६ ॥

क्योंकि जिस प्रकार दर्पणमें मुखका प्रतिबिम्ब स्पष्ट पड़ता है उसी प्रकार इ प्रदेहमें ही श्रात्माका दर्शान स्पष्ट उपलब्ध हो सकता है, वैसा दर्शान ब्रह्मलोक कर अन्य किसी लोकमें नहीं हो सकत। श्रौर वह ब्रह्मलोक दुःप्राप्य भी है, सो कि र ? इसपर कह्ते हैं—

सत्यानन्ददीीपिका

महपसे नहीं जाना तो उसने श्रपना महान् विनाश किया श्रर्थात् पुनः पुनः विविध योंमें जाकर विविध क्लेशोंका भागी होता है ) वस्तुतः इस पुण्यमय मनुष्य शारी महत्व तभी है जब श्रात्मतत्वका श्रनुभव करे, भोग इस जीवनका मुख्य उद्दे है वह तो विविध योनियोंमें प्राप्त ही है, 'ये के चात्महनो जनाः' ( ईश० ३ ) य जावतय प्रारमाको न जाननेवालोंको श्रात्मघाती कहा है । श्रत: श्रात्मतत्त्वस

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॥ आदर्शोऽत्रिमलाभूताभ्यां विवक्तमात्मनो दर्शं भवतीत्यर्थः। यथाविविक्तं जाग्रद्वासनोद्भूतं तथा पितृलोकेsपि विविक्तमेव दर्शनमात्मनः सोपभोगासक्तत्वात्। यथा चाप्सु ग्रविभक्तावयवमात्मरूपं परीव दृश्यते यत इव तथा गन्धर्वलोकेsपि विविक्तमेव दर्शनमात्मनः। एवं च लोकान्तःशास्त्रप्रामाण्यादेवागम्यते। द्वायातपयोः सिवात्यन्तविविक्तं ब्रह्मलोक एवै-

स प्रकार लोग दर्पणे प्रतिबिम्बभूत स्वप्ने स्वापकां प्रत्यन्त स्पष्टरूपसे देखते हैं चार दर्पणाके समान पतिनिर्मलाभूत स्वपनी बुद्धिमें स्वात्माका स्पष्टरूपसे दर्शन , ऐसा अभिप्राय है। जैसे स्वप्नमें जाग्रद्वासनामोंसे प्रकट हुमा दर्शन स्पष्ट वैसे ही पितृलोकमें भी अस्पष्ट आत्मदर्शन होता है, क्योंकि वहां जीव कर्मफलके भोगमें भासक्त रहता है। जिस प्रकार जलमें स्वप्न स्वविभक्त-नावयव-दृश्यते है उसीप्रकार गन्धर्वलोकमें भी स्वात्माका दर्शनमात्र होता है ) एकमात्र ब्रह्मलोकमें ही छाया ग्रात्मप्रतिबिम्बाकार-होता है। किन्तु स्वप्नत्कार ध्याके समान वह स्वात्मदर्शन अत्यन्त स्पष्टरूपसे होता है,

सत्यानन्ददीपिका उपकरणके अवस्थाभेदसे और लोकोंके भेदसे इस मन्त्रमें चार अवस्थाओंकों त्या गया है। प्रथम-दर्पणाके साथ बुद्धिकी अवस्था का उदाहरण दिया गया जितना मलिन वा स्वच्छ होता है तदनुसार ही उसमें प्रतिबिम्बित वस्तु देती है, उसी प्रकार बुद्धि भी जितनी श्रावरणरहित होती है उतना ही आत्माका स्वरूप प्रकाशित होता है, विषयमलसे मलिन बुद्धिमें आत्मज्योति रहती है। दूसरा उदाहरण स्वप्न और पितृलोकका है—जिसप्रकार स्वप्नमें

पकी विस्मृति रहती है वैसे पितृलोकमें भी, क्योंकि वहां भी वासनाओंसे कमंफलोपभोगमें भासक्त होता है। तीसरी अवस्था जल और गन्धर्वं दाहररसे कही गई है-जिस प्रकार जलमें सूर्यादिका प्रतिबिम्ब स्पष्ट दिखाई ट। वैसे ही गन्धर्वलि लोकोंमें ग्रात्मदसवरूप ग्रात्मा वैषयिक-सुखसे मिश्रित में भ्राता है स्पष्टरूपसे नहीं, चौथा उदाहरण छाया और ग्रात्मप्रतिप्रन्थकार और प्रकाश प्रतिस्पष्ट ग्रनुभवमें भाते हैं, वैसे ब्रह्मलोकमें आत्मा और ग्रात्मात्मक ग्रनुसव होता है. परन्त वद

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तस्मादात्मदर्शीहैव यत्नः कर्तव्य इत्यभिप्रायः ॥ ५ ॥

कथमसौ बोधव्य्यः किं वा तद्बोधे प्रयोजनमित्युच्यते—

इन्द्रियाणां पृथगभावमुदयास्तमयौ च यत् । पृथगुत्पद्यमानानां मतत्वा धीरौ न शोचिति ॥ ६ ॥

पृथग् उत्पद्यमानानां इन्द्र्रियाणां पृथगभावं ( श्रात्मनो भिन्नत्वम् ) उदयास्तमयौ ( धीरः ( धीमान् ) एवं मतत्वा ( ज्ञात्वा ) न, शोचिति ( शोकं न करोति ) ॥६॥ पृथक् पृथक् भूतोंसे उत्पन्न हुई इन्द्रियोंके जो विभिन्न भाव तथा उनकी उत्पत्ति एवं प्रलय हैं उन्हें जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ ६ ॥

इन्द्र्रियाणां श्रोत्रादीनां स्वस्वविषयग्रहणप्रयोजनेषु स्वकार्येष्वेभ्य श्राकर्षण्यः पृथगुत्पद्यमानानामत्यन्तविशुद्धात्मकेवललाञ्चिन्मात्रात्मस्वरूपात्पृथग्भावधिलनङ्गात्मकतां तथा तेषामेवेन्द्र्रियाणामुदयास्तमयौ चोत्पत्तिप्रलयौ तत्त्वावावस्थाप्रेक्ष्यौ नातमन् इति मतत्वा ज्ञात्वा विवेकतो धीरौ धीमा'ष्ट कर्म शौर ज्ञान-उपासना से साध्य होनेके कारण वह ब्रह्मलोक तो दुष्प्राप्य है 'धभिप्राय यह है कि इस मनुष्य शरीरमें ही श्रात्मदर्शनार्थ प्रयत्न करना चाहिये । उस श्रात्माको क्यों जानना चाहिए उसके जाननेमें क्या प्रयोजन है ? इसपर हैं—

श्रपने-ग्रपने ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस श्रौर गन्ध ) विषयोंका ग्रहणरूप प्रयोजनते श्रपने कारणआदि श्राकाशादि भूतोंसे पृथक् पृथक् उत्पन्न होनेवाली श्रोत्राादिरोंका जो विशुद्धहप केवल चिन्मात्र श्रात्मस्वरूपसे पृथक्त्व श्रर्थात् स्वाभाविक रहरुपता है उसे तथा जाम्रत् श्रौर स्वप्नकी श्रपेक्षा उन इन्द्रियोंके उदयास्तमयौ ( उत्पत्ति और प्रलयको ) जानकर श्रज्ञात् विचार पूर्वक यह् सब समझकर कि ये इन्द्रियोंको करने चाहिए ।

सत्यानन्ददीपिका

'ग्रात्मा वा श्ररे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः' ( , २४५ ) इत्यादि श्रुति मो इैसा ही कहती है ॥ ५ ॥

ग्राकाशादि पाँच भूतोंसे श्रोत्रादि इन्द्रियोंका उत्पत्तिक्रम यह है—ग्राकाशसे श्रोत्र शब्द, वायुसे त्वक्-विषय स्पर्श, ग्रग्निसे नेत्र-विषय रूप, जलसे रसना विषय रस, पृथ्वीसे घ्राण-विषय गन्ध, इस प्रकार इन्द्रिय उत्पन्न होती श्रौर ग्रपने-ग्रपने

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आत्मनो नित्यैकस्वभावस्याल्पविचाराच्छोककार्मात्वानुपपत्तेः । तथा रम् 'तरति शोकमात्मवित्' ( छा० ७।१।३ ) इति ॥ ६ ॥ दात्मन इन्द्रियार्थां पृथग्भाव उत्तो नासौ बहिरधिकान्तव्यो यस्मा- । स सर्वस्य । तत्कथमित्युच्यते— इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तममम् । सत्त्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमममम् ॥ ७ ॥

यः मनः परं ( श्रेष्ठं ) मनसः [ ग्रपि ] सत्त्वं ( बुद्धिः ) उत्तमम्, महान् अधि ( श्रधिकः ) श्रव्यक्तं महतः उत्तमम्' ॥ ७ ॥ से मन पर-उत्कृष्ट है, मनसे बुद्धि श्रेष्ठ है, बुद्धिषे महत्त्व ( हिरण्यगर्भकी बुद्धि ) श्रधिक है तथा महत्तवसे श्रव्यक्त उत्तम है ॥ ७ ॥

भ्यः परं मन इत्यादि । यथोक्तानामिहेन्द्रियसमन्वजातीयत्वादिन्द्रिय-

ग्रात्माकी नहीं, भीर-बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता, क्योंकि नित्य एक ग्रात्माका कभी व्यभिचार न होनेके कारण शोकका कोई कारण कता । जैसा कि 'तरति शोकमात्मवित्' ( ग्रात्मवित् शोकको पार कर जाता है ) ऐसी है ॥ ६ ॥

तमासे इन्द्रियोंका पृथग्भाव कहा गया है वह कहीं बाहर है ऐसा चाहिए, क्योंकि वह सबका ग्रनतरात्मा है, सो किस प्रकार ? इसपर

मत श्रेष्ठ है [ तथा मनसे बुद्धि श्रेष्ठ है ] इत्यादि । इन्द्रियोंके सजातीय का ग्रहण करनेसे ग्रन्योन-विषयोंका भी ग्रहण हो जाता है । ग्रन्य स इन्द्रियां ज्ञापदवस्थांमे तो ग्रपने ग्रपने विषयों ग्रहण करती हैं किन्तु नहीं, ग्रत्रत इनका व्यभिचार प्रसिद्ध है, परन्तु ग्रात्मा मनः प्रवृत्तिनाशोंमें

उसका कहीं भी व्यभिचार नहीं है । शोकका कारण श्रविद्या मूलक विद्या की ग्रह्मविद्याविद्यसे निवृत्ति होनेपर 'भिद्यते हृदयप्रतिष्ठितः' (मु० २।१।८) थ टूट जाती है) इस प्रकार भेदबुद्धि के निवृत्त होनेसे शोकका श्रवसर

'तत्न को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः' ( ईशा० ७ ) ( ज्ञानावस्थामें वाले उस ब्रह्मवित्को मोह कहां श्रौर शोक कहां प्रर्थात् एकत्वदर्शीको होते ) ऐसी श्रृति भी है ॥ ६ ॥

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हरौनैव ग्राह्याम् । पूर्ववदन्यत् । सत्त्वशब्दाद्बुद्धिरिहोच्यते ॥ ७॥

अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च ।

यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ५ ॥

व्यापकः लिङ्गः एव पुरुषः तु ( पुनः ) अव्यक्तात् च ( आपि ) परः । स मनुष्यः ) यं ( पुरुषं ) ज्ञात्वा ( प्राधिगम्य ) मुच्यते ( मुक्तो भवति ) ऽमृतत्वं च अध्यगच्छति ( प्राप्नोति ) ॥ ५ ॥

अव्यक्तत्ते पुरुष श्रेष्ठ है, वह व्यापक तथा लिङ्ग है । जिसे जानकर मनुष्य जाता है और ऽमृतत्वको प्राप्त हो जाता है ॥ ५ ॥

अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकस्याप्याकाशादेः सर्वस्य कारणं

तत् । लिङ्गो लिङ्गं गयते गम्यते येन तत्त्वज्ञः बुद्ध्यादि तद्विद्यामानमसं

वित् ( कठ० १।३।१० के समान ) समभना चाहिए । सत्त्व शब्दसे यहाँ बुद्धि

ती है ॥ ७ ॥

अव्यक्तत्ते पो पुरुष श्रेष्ठ है, वह ऽऽकाशादि सब व्यापक पदाथोंका भी कारण हो

पक है । लिङ्ग है-जिसके द्वारा कोई वस्तु जानी जाती है वह बुद्धि ऽऽदि वि

जातें हैं, परन्तु वह पुरुषमें विद्यमान नहीं है, इसलिए वह लिङ्ग ही है ऽप

इन्द्रियोंसे श्रेष्ठ है । मनसे बुद्धि श्रान्तर और सूक्ष्म है, बुद्धिसे महत्तत्त्व-हिरण्य

यमप् महान् ऽपोर श्रेष्ठ है । इस प्रकार कमशः पूर्वसें पर श्रेष्ठ कहा गया है ॥ ७

'आत्मन ऽाकाशः संभूतः' ( ऽआत्मासे ऽाकाश उत्पन्न हु्आा ) इत्यादि श्रुति श्रा

काशादिका कारण कहती है, ऽपोर 'सर्वगतश्र नित्यः' यह श्रुति ऽऽत्माको सर्व्व्या

र नित्य कहती है । प्रकृति-मायाकी दो ऽवस्थाएँ हैं—एक ऽव्याकृत-व्यक्त ऽपोर दो

स्राकृत-प्रव्यक्त, प्रकृतिकी व्यक्तावस्थाके हो बुद्धि, मन, इन्द्रियादि लिङ्ग-कार्य स

ये सब प्रकृतिकी विशेषावस्थाके परिणाम हैं । मायाकी साम्यावस्था ऽव्याकृत द

वी है, महाप्रलयमें यह सारा जगत् ऽव्याकृतमें लय होता है ऽप्रथात जगत्की कार

गा हो ऽव्याकृत है । परिन्घामिनी होनेसे वह लिङ्गभावसे युक्त है । परन्तु ।

तीय सर्व्वव्यापक चिन्मात्र ऽआत्मा लिङ्गभावसे रहित होनेके कारण ऽलिङ्ग द

सुखदुःखादयः साक्षय गुणत्वाद् रूपवत्' ( बुद्धि सुख दुःखादि साक्ष्य-ग्राश्रयव

पण होनेसे रूपके समान ) ऐसा वैशेषिक ग्रनुमान करते हैं । साक्ष्यत्व मात्र स

में तो सिद्ध साधन दोष है, क्योंकि 'कामः सकल्पः'...…'सर्वं मन एव' ऽपादि श्र

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प्रलिङ्ग एव । सच्चिदानन्दधर्मवर्ज्जित इत्येतत्त् । यं ज्ञात्वाSSडचर्यंत: शास्त्रमुच्यते जन्तुरविद्यादिहृदयग्रन्थिभिर्‌ज্জीवन्नेव पतितेऽपि शरीरेऽसृततत्त्वं च । ति सोलिङ्ग: परोक्षव्यक्तात्पुरुष इति पूर्वैरेव सम्बन्ध: ॥ ८ ॥

कथं तर्होलिङ्गस्य दर्शनमुपपद्यत इत्युच्यते— न संदृशो तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पर्यति कश्चनैनम् । हृदा मनीषा मनसाSSभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ८ ॥

नस्य ( पूर्वोक्तस्य श्रात्मनः ) रूपं ( स्वरूपं ) संदृशो ( दर्शनेन विषयेः ) न तिष्ठति, कश्चन ( कोऽपि ) एनं ( पुरुषं ) चक्षुषा न पश्यति । मनीषा ( विकल्परहितया ) ( हृदयस्थबुद्धि‌धा ) मनसा ( मननेन—सम्यग्दर्शननेन ) SSभिकल्प्तः ( SSभिप्रका- शितः भवति ) ये ( जाता: ) एतद् ( ब्रह्म ) विदुः ( जानन्ति ) तेSSमृताः

भवन्ति ॥ ८ ॥ स भात्माका रूप हृद्में नहीं ठहरता, भ्रतएव उसे नेत्रोंसे कोई भी देख नहीं सकता । 'मा तो मनका नियमन करनेवाली हृदयस्थ बुद्धिद्वारा मननरूप सम्यग्दर्शनसे तं हुमा ही ज्ञात हो सकता है । जो इसे [ ब्रह्मारूपसे ] जानते हैं वे भ्रमर हैं ॥ ८ ॥

संमार धर्मोंसे रहित है । जिसे शास्त्र श्रौर प्राचार्य द्वारा जानकर पुरुष जीवित । श्रविद्या श्रादि हृदयकी ग्रन्थियोंसे मुक्त हो जाता है तथा शरीरका पात होनेपर रत्को प्राप्त हो जाता है वह पुरुष श्रलिङ्ग है श्रौर परोक्षव्यक्तसे भी पर है । इस 'फिर इस लिङ्ग आत्माका दर्शन कैसे संभव होगा ? सो कहा जाता है—

सत्यानन्ददीपिका कहनेवाली श्रुति‌से विरोध होगा श्रौर श्रात्माके साथ बुद्धि श्रादिका श्रविनाभाव ही है, श्रतएव श्रात्मा नि‌गु‌ण नि‌ष्क्रिय होनेसे श्रलिङ्ग है । 'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवा- त्' ( मुण्ड० १।१२ ) इत्यादि श्रु‌ति शास्त्र श्रौर ग्राचार्यसे प्राप्त तत्त्वज्ञानसे हृदयग्रन्थि: प्रवि‌द्या श्रादि हृदयकी ग्रन्थि टूट जाती है । 'श्रतञ्चैव भवति' ( मुण्डक० ३।९ ) 'श्रात्मैव ब्रह्म सम्पश्‌ते'

' सदैव मुक्तः ऋताथ्यो ब्रह्मवित्तमः । उपाधि‌नाशाद्‌ज्ञात्‌ज्ञत्वं सन्‌ ब्रह्माण्येति नि‌र्द्वयम् ॥ स्वेऽप्यभिमानहानाद्‌ज्ञह्यात्म‌वित्‌च ब्रह्मैव भवेत्‌ चान्यः । 'श्राभतो ब्रह्मनि‌र्वाण- दितास्मनाप्त' ( गीता ५।२६ ) 'शरीररूप लयार्धि नित्योन .

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न सदृशं दर्शनेनाप्यथ न तत्त्व्वात प्रत्यगात्मनोऽस्य रूपम् । श्यतोः सर्वेन्द्रियैषा चञ्जुमर्हास्योपलच्त्यार्थत्वात्, पश्यति नोपालभते कश्चन श्येनं प्रकृतमात्मानम् । कथं तर्हि तं पश्येदित्युच्यते । हृदा हृत्स्थया मनीषा मनसः सङ्कल्पादिरूपस्यैष्टे नियन्न्रृवेनैति मनीट तया हृदा मः कलपयित्वा मनसा मननरूपेगा सम्यगदर्शनेन शनैः शनैः प्रभिक्लुष्टमोडभिसर्मा प्रकाशित इत्येतत् । श्यात्मा ज्ञातुं शक्यत इति वाक्यशेषः । त ब्रह्म तद्ये धिदुरस्सलास्से भवन्ति ॥ ५ ॥

इस प्रत्यगात्माका रूप दर्शनेन-दृष्टिके विषयमें सिथर नहीं होता; श्यतः की प्रत्यगात्माको चक्षुसे-सब इन्द्रिययोंसे श्रग्र्यथात् सभी इन्द्रिययोंमेंसे किसोसे भी नहीं दे उपलबध नहीं कर सकता । यहाँ चक्षु ग्रहण श्याद्य सभी इन्द्रिययोंका उपलक्ष [ श्यतः चक्षु इन्द्रियके ग्रहणसे सभी इन्द्रिययोंका ग्रहण है ] तो फिर उसे कि देखे ? इसपर कहते हैं—हृदा-हृत्स्थ युब्बिसे, जो सङ्कल्पादिरूप मनकी नियन ईशान करनेके कारण 'मनीट' है । उस विकल्प शून्य बुद्धिसे मन श्यग्र्यथात मननरू दर्शंन ( जीवब्रह्मैक्यज्ञान ) द्वारा सब प्रकार सम्प्रविष्ट-श्रभिप्रकाशित हृदया च जाना जा सकता है, यह वाक्यशोष है, उस श्यात्माको जो लोग 'यह ब्रह्म जानतें हैं वे श्रमर हो जाते हैं ॥ ५ ॥

सत्यानन्ददीपिका 'कथं तर्हि दशंनमुपपचते' तब उस प्रत्यगात्माका दर्शन कैसे हो सकता है प्रश्नकर्ताका श्यभिप्राय विषयरूपसे दर्शन है श्रथवा श्यविविषयकदसे ? प्रथम तो ' श्रशब्दमसरूपमशब्दमगन्धयन्...' ( क० १।३।१५ ) श्रादि श्रुति से कहते हैं । 'श्रव्यक्तम्' श्रुतितः रूपादि रहित कहती है, श्यतः रूपादि पांचों गुग्णोंसे व्यतिरिक्त प्रत्यात्मा चक्षु श्रादि ग्रहण योग्य नहीं है । द्वितीय विकल्पको 'कथं तर्हि' से कहते हैं । चक्षु श्रादि व समुदाय उपरत होनेपर जब मन विषयोंका संकल्प करता है तब मुमुक्षुकी बुद्धि नियनस्त्री होती है—हे मन ! किसलिए तू पिशाचके समान इतस्ततः दौड़ता है, विषय तथ जड़ है, श्यत: उनसे श्यभीष्ट प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकत, इसलिए विषय शून्य 'ब्रह्मास्मि' इस प्रकार भाविष्यदुपसे ही ब्रह्मभावको श्रभिव्यक्त करनेवाला ब्रह्मास्मि' 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्योंसे उत्थ बुद्धि-कृतिके प्रत्यगात्मस्वरूप सकता है । मुखसे देखे जानेवाले जैसे बाह्या घटादि मैं नहीं हैं वैसे ही शरीर श्रादि भी दृश्य होनेके कारण मैं नहीं हूं, किन्तु सबका साक्षी चेतन हूं, ऐसा निश्वयर वाला श्रमर हो जाता है 'तमेवं ज्ञात्वा विद्वांस मर्त्येऽमृतं नयन्ति' न्नैनेन श्रुति

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सा हंसनोट् कथं प्राप्यत इति तदर्थो योग उच्च्यते—

यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।

बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥

यदा पञ्च ज्ञानानि (ज्ञानिन्द्रियाणि ) मनसा स श्रावतिष्ठन्ते (विषयेष्य व्यावृत्तं मुखतया तिष्ठन्ति ) बुद्धिश्च न विचेष्टते (विषयव्यापारं न करोति ) तां परां गतिं

१ (वदन्ति ) ॥ १० ॥

जिस समय पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ मनके साथ [ आत्मामें ] स्थित हो जाती हैं और बुद्धि भी चेष्टा नहीं करती उस अवस्थाको परम गति कहते हैं ॥ १० ॥

यदा यस्मिन्काले सविषयेभ्यो निवर्तिन्तान्यात्मनोयेऽपञ्च ज्ञानानि-ज्ञानार्थ-

छोत्रादीनोन्द्रियाणि ज्ञानानुच्यान्ते, श्रवतिष्ठन्ते सह मनसा यदनुगतानि संकल्पादिग्र्यावृत्तेनान्तःकरणेन, बुद्धिश्चाध्यवसायलतया न विचेष्टते स्व-

मारेषु न विचेष्टते न व्यापार्ते तामाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥

यह हंसविषयक सङ्कल्प पूण्य बुद्धि कैसे प्राप्त होती है ? इसके लिए योगसाधन जाता है—

जिस समय श्रपने श्रपने विषयोंसे निवृत्त हुई पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ-ज्ञानार्थक होनेके

'श्रोत्र श्रादि इन्द्रियाँ 'ज्ञान' कहलाती हैं, मनके साथ श्रर्थात् जिसका श्रनुवर्तन

हैं उष सङ्कल्पादि व्यापारसे निवृत्त हुए श्रान्तःकरण सहित श्रात्मामें स्थित हो

और निश्चयात्मक बुद्धि भी श्रपने व्यापारोंमें चेष्टा नहीं करती-व्यापार नहीं

उस श्रवस्थाको परम गति कहते हैं ॥ १० ॥

सत्यानन्ददीपिका

।दान्त वाश्योंके श्रवण करनेपर भी जिनमें 'प्रहं ब्रह्मास्मि' इस प्रकार स्थित बुद्धि

हो जाती, इससे यह सिद्ध होता है कि उनमें कोई प्रतिबन्धक है, उसकी

के लिए 'सा हंसनोट्' श्रादिसे उपायान्तर कहलते हैं—

।दान्तके श्रवण, मननसे यद्यपि प्रमेय विषयक श्रज्ञानभावना निवृत्त हो चुकी है फिर

ताके पनेकाप्रतारूप दोष प्रतिबन्धकके निवृत्त्यर्थं मतुष्टेय योगका उपदेश किया

है । 'ज्ञायतेऽनेनार्थ' ( जिससे विषय ज्ञात होता है ) इस करण-

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तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् । ग्रप्रमततस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११ ॥ ताम् ( उत्तलक्षणां ) स्थिराम् ( निश्चलाम् ) इन्द्रियधारणां 'योगम्' इति मन्यं- ते । ग्रप्रमतः ( प्रमादरहितः ) भवति । हि ( यस्मात् ) योगः प्रभवाप्ययौ ( उ- ग्रायधर्मको ) भवंति ॥ ११ ॥ us स्थिर इन्द्रियधारणाको ही योग कहते हैं । उस समय पुरुष 'प्रमादरहित' होता है, क्योंकि योग उपपति श्रौर लय के धर्मवाला है ॥ ११ ॥

तामीदृशं तदवस्थां योगमिति मन्यन्ते वियोगमेव सन्ततम् । सर्वानर्थेसंये- ग्रोगलचया हीयमवस्था योगिनः । एतस्यां ह्यवस्थायामविद्याधियारोपिताव- ष्टुपप्रतिष्ठ श्रात्मा । स्थिरामिन्द्रियधारणां स्थिरमचलामिन्द्रियधार- ग्रान्तःकरणानां धारारामित्यर्थः । श्रप्रमतः प्रमादवर्जितः समाधियानं प्र- यं यत्नवांस्तदा तस्मिन्काले यदैव प्रवृत्तयोगो भवतीति सामर्थ्यादवगम्यं-

उस ऐसी ग्रवस्थाको जो वस्तुतः वियोग ही है योग मानते हैं, क्योंकि योगकी था सब प्रकारके ग्रनर्थसेयोगकी वियोगरूपा है । इस ग्रवस्थामें ही श्रात्मा प्रवि- द्यारोपसे रहित श्रपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित रहता है । उस ग्रवस्थाको ही स्थिर दी- एा कहते हैं । स्थिर-ग्रचल इन्द्रियधारणां श्रर्थात् बाह्या ग्रौर ग्रान्तरिक करणोंका धार- T ऐसा श्रर्थ है । तब साधक पुरुष ग्रप्रमत्-प्रमादरहित ग्रप्राप्त चित्त समाधायक प्र- ' सर्वदा सम्पन्न रहता है, जिस समय कि वह योगमें प्रवृत्त होता है [ उस सर- स्थिति होती है ] ऐसा वाक्यकी सामर्थ्यसे ग्रवगत होता है, क्योंकि बुद्धि ग्रादि-

सत्यानन्ददीपिका सर्वानर्थके वियोगको ही विशिष्टलक्षणासे योग कहा गया है । जैसे बाह्या घटादि- ' 'मैं नहीं हूँ' वैसे देहादि संघातमें भी जो जो विषय है वह 'मैं नहीं हूँ' किन्तु इ- समुदायका साक्षी सर्वगत् प्रत्यगभिन्न ब्रह्म मैं हूँ । ऐसी बुद्धिकारवृत्ति संपाद- चाहिए । यदि कदाचित् विषयोंसे चित्त विक्षिप्त हो तो उसे विषयदोष दशां- त करे । इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनेकहंकार एव च । जन्ममृत्युजराराग्यदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ( यो । १९१८ ) ऐसा गीतावचन भी है । विषयोंसे व्यावृत्त मन यदि रागादि- हो तो वह उसकी कषायावस्था है । उससे निरुद्ध चित्त न जागता न सोता स्यावाला ग्रौर न रसस्वादयुक्त केवल ब्रह्माभासरूपसे जब क्षीर-

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द्व॑यादि॑चेष्ट्राभावे प्रमादसंभवोऽस्ति। तस्मा॑त्प्रागेव बुद्ध॑ यादि॑चेष्ट्रोपर-

दो विधी॑यते। ऽथवा यदै॑वेन्द्रि॑यासां स्थिरा धार॑णा तदा॑नीमेव निर॑कुश-

चमित्यतोऽमिधीयतेप्रमत्तस्तदा भवती॑ति। कुतः ? योगो हि यस्मा॑त्र-

भावुपजनापायधर्मक इत्यर्थोऽटतोऽपायपरिहाराया॑प्रमा॑दः कर्त॑व्य इ॑त्यभि-

११॥

ऽथादि चेष्ट्रविषयं चेद् ब्रह्म॑दं तदिति विशेषतो गृहीत॑ बुद्ध॑ यादुपरमे च

रसा॑भावाद॑नुपल॑भ्यमानं नास्त्येव ब्रह्म। यद्य॑ि कर॑ण॑गोचरं तदस्ती॑ति

जो॑के विपरी॑तं चासदित्यत॑ज्ञान॑र्थको योगोऽनुपल॑भ्यमा॑नत्वा॑द्रा नास्ती-

ग्र॑॑यं ब्रह्म॑त्येवं प्राप्त इ॑दमुच्यते—सत्यम्,

श्राद॑मो॑पल॑ब्धका साधन सद्बुद्धि॑ ही है

तैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा।

श्रस्ती॑ति बुद्ध॑तो॑ड॑न॑त्र कथं तदुपल॑भ्यते ॥ १२ ॥

व॑ष्यमें चेष्ट्राका श्र॑भाव हो जानेपर प्रमादका संभव नहीं है, भ्र॑त॑ बुद्धि॑ प्रा॑दिकॊ

परत होनेसे पूर्व ही श्रप्रमादका विधान किया जाता है। प्रथ॑वा जिस समय

श्रधारणा स्थिरा होती है उसी समय निर॑कुश श्रप्रमत्तत्व होता है, इसे कार॑ण

मय श्रप्रमत्त होनेका विधान किया जाता है, क्यो॑कि योग भी प्रम॑ख

मत्ति और लयरूप धर्मवाला है, भ्र॑त॑ भाव यह है कि प्रय॑य-लयकी निवृत्तिके

लद करना चाहिए श्र॑थ॑ात् योगीको प्रमादरहित होना चाहिए, एसा॑ श्रभि-

११॥

ब्रह्म॑ बुद्धि॑ श्रा॑दिकॊ चेष्ट्राका विषय होता तो 'यह ब्रह्म॑ है' ऐसा विशेषरू॑पसे

'T, किन्तु बुद्धि श्रा॑दिके उपरत हो जानेपर तो उसे ग्रह॑ण करनेके कार॑णका

'से उपल॑ब्ध न होता हुअा वह ब्रह्म॑ है ही नहीं, क्यो॑कि लोकमें जो वसु॑

र होता है वह 'है' ऐसी प्रती॑तका विषय होती है और इसके विपरीत-

रि वसु॑ 'भ्रसद्' कहा जाता है, भ्र॑त॑ योग भ्र॑नर्थक-ऽर्थॊ है भ्रथ॑वा उपल॑ब्ध-

से ब्रह्म॑ 'नहीं है' ऐसा जानना चाहिए, एसा प्राप्त होनेपर यह कहा जाता

सत्यानन्ददीपिका

शा॑रो ह्यात्मा ब्रह्म॑त॑ल॑क्ष्यसुच्यते। श्रप्रमत्ते॑ने वेद॑॑ग्र॑य॑ मारवस्तन्मयो भवेत्॥

मारो तु विडनान्यायान्ति वै बलात्। भ्र॑नुसंधानराहि॑त्यमा॑लस्यं भोगलालस॑म्पू

विक्षेप॑स्तेजः स्वेदा॑ग्र शून्यता। एवं विडनबाहुल्य॑ं त्याज्यं ब्रह्म॑वि॑शारदैः॥

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वाचा ( शब्दन ) न एव, मनसा ( ग्रह्नःकरोऽन ) न, चक्षुषा न प्राप्तुं ( इष्टं वस्तु ) इति बुध्यते: ( ब्रह्मास्तित्ववादिनः ) अन्यत्र ( नास्तिकवादिनि ब्रह्मास्वरूपं ) कथम् उपलब्ध्यते ॥ १२ ॥

यह् ब्रह्मा न तो वाच्योसे, न मनसे श्रोत्र न नेत्रसे प्राप्त किया जा सकता है' ऐसा कहनेवालोंसे अन्यत्र भिन्न पुरुषोंको कैसे उपलब्ध हो सकता है ? ॥ १२

नैव वाचा न मनसा न चक्षुषा नान्यैरपीन्द्रैयः प्राप्तुं शक्यत इत्य यदि सर्वाविशेषेणैवेहेष्टोऽपि जगता भूलोमलत्यवेद्यत्वादेव कार्योपलब्धौ यास्तित्यनिष्षत्त्याद् । तथा हीदं कार्यं सूक्ष्मतारतम्यपारम्पर्र्येणानुगम्य दुर्बुद्धिनिष्षामेवागमयति । यदापि विषयप्रविलापनेन प्रविलाप्यमाना इदापि सा सत्प्रतीत्यैव विलीयते । बुद्धिर्हि न: प्रमायां सदसतोर्याथात गमे ।

मूलं चैज्जगतो न स्यादसदन्वितमेवेदं कार्यमसकृत्येवं गृह्येत न त्वेतत् तसदित्येव तु गृह्यते; यथा मृतादिकार्यं घटादि मृताद्यन्वितम् । तस्माज्ज

यद्यपि वह ब्रह्मा न तो वाच्योसे, न मनसे न नेत्रसे श्रोत्र न अन्य इन्द्रियोंसे मे किया जा सकता है, यही तात्पर्य है । यद्यपि सर्वाविशेष रहित होता भी तत्का मूल है' ऐसा प्रवगत होनेसे वह है ही, क्योंकि कार्यका विलय स्स्थितत्व होता है । इस्सीप्रकार सूक्ष्मताकी तारतम्यपरम्परासे ब्रह्नुगत होनेवाला यह काय बुद्धि निष्षाकों ही प्रवगत कराता है । जब भी विषयविलय करते बुंद्धिका विलय f ता है उस समय भी वह सत्प्रत्यय गम्भिता हुई ही लीन होती है । तथा सत् 'तत्का यथार्थ स्वरूप जाननेमें तो हमारे लिए बुद्धि ही प्रमाआ है । यदि जगत न होता तो यह कार्यवर्ग असदन्वित हुश्रा 'प्रसत् है' ऐसा गृहीत होता, परन्तु i

सत्यानन्ददीपिका

शब्द, स्पर्श, रूप, रस श्रोत्र गन्ध इन पाँच विषयोंका ज्ञात क्रमशः श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना श्रोत्र गन्ध इन्द्रियोंसे होता है । ब्रह्मा शब्दादिसे रहित है, भ्रत: वह श्रोत्रे श्रोत्रादि इन्द्रियसे गृहीत नहीं होता, 'शशब्ददसस्पर्शमरूपमध्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत् । ( बृ० ३।१४ ) इत्यादि श्रुति भी ब्रह्ममें शब्दादिका निषेध करती है । इससे र पता नहीं है ऐसा नहीं कहा जा सक्ता, क्योंकि घटादिस्थूल कार्यका विलय होनेपर सूक्ष्म कारणरूपसे विद्धमान है । उसका विलय होनेपर उससे भी सूक्ष्मकारणपकार सूक्ष्म तारतम्यपरम्परासे मनुभूयमान कार्यका विलय ही पुरुषके लिए सदसद्

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फस्मात् ! अस्तात् श्रपतारस्तत्पवादप्त आाङ्ग-सारिः श्रद्धधानद्नयत्र नास्तिकवादिनि नास्ति जगतो मूलमाल्मा निर-बेदं कार्यमभावान्नं प्रविलीयते इति मन्यमाने विपरीतदर्शिनो कर्थं | तत्त्वत उपल्म्यते न कथञ्चनोपलभ्यत इत्यर्थः ॥ १२ ॥

:मादपोध्यासद्वादिपदमासुरम्— g्रस्तीत्येवोपल्मध्यस्यस्तस्वभावेन चोभयोः । g्रस्तीत्येवोपल्मध्या नच भानः प्रसीदति ॥ १३ ॥

भयोः ( सोपाधिर्निरुपाधिकयोः ) तत्त्वभावेन ( तत्त्वबुपे ) ग्रस्त ( सद् ) उपलब्धव्यः 'ग्रस्त' इति ( एबम् ) उपलब्धव्य ( ज्ञातव्य ) तत्त्वभावः ॥ १३॥

ई आत्मा 'है' इस प्रकार ही उपलब्ध किया जाना चाहिए तथा उसे तत्त्वभावसे जाना चाहिए । इन दोनों प्रकारकी उपलब्धियोंमेंसे जिसकी 'हैं' इस प्रकारकी हो गयी है, तत्त्वभाव उसके श्राभिमुख हो जाता है ॥ १३ ॥

स्तीत्येवात्मोपलञ्ध्यः सत्कार्यों बुद्धि यादुपाधिः । यदा तु तद्रहितोऽवि-"" हहै, यह जगत् 'है' इस प्रकार गृहीत होता है, श्रतएव 'जगत्का मूल आत्मा है' उपलब्ध करना चाहिए । क्यों ? क्योंकि आत्मा 'है' इस प्रकार कहनेवाले श्राख्या-प्रदालु ग्रास्तिक पुरुषोंसे भिन्न नास्तिकवादियोंको जो ऐसा मानते हैं कि जगत्का मा नहीं है, यह कार्यवर्ग कारणसे श्रभिन्नवत्-ग्रसम्बद्ध हुम्रा श्रभाष पर्यन्त लीन । है ऐसे उन विपरीत दर्शियोंको वह ब्रह्म किस प्रकार तत्त्वत उपलब्ध हो ? श्रर्थात् किसी प्रकार भी उपलब्ध नहीं हो सकता है ॥ १२ ॥

' ग्रसद्वादियोंके ग्रासुरेपक्षका निराकरनङ्कर— कार्य बुद्धि ग्रादि उपाधिवाले प्रारम्भको 'है' इस प्रकार ही

सत्यानन्दीदीपिका विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत्? ( गी० २१६ ) यह स्मृति वचन भी । कार्य जगत्का विनाश नह्मा तक होता है, इससे वह लय सद्ब्रह्मनिष्ठ है । 'जो "ह ग्रसत है जैसे स्वर्ण हस्य' इस व्यामिदर्शनसे श्रप्तस्तत्त्वेन सब हस्य ग्रसत् सकौ सद्बुद्धि भी नहीं होंगे ऐसी प्राज्ञाका निवारण 'यदापि' से करते हैं । में सद्बुद्धि भी नहीं है ऐसा प्रत्यय श्रद्यवय स्वीकार करना चाहिए, अन्यथा वहार नहीं होगा। इसलिए श्रदन्ततोगत्वा सद्बुद्धि स्वीकार करनी चाहिए ।

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तत्र तत्त्वं तु नास्ति 'वाचारम्भणः विकारो नामधेयम् मृत्तिकेत्येव सत्यम्' ( छा० ६।१।४ ) इति श्रुतेः । तद् यस्मिन् निरुपा तिर्ज्ञस्य सदसदादिप्रत्ययविषयत्ववर्जितस्यात्मनः तत्त्वभावो भवति तेन तमोपलङ्धनय इत्यानुवर्तते । तत्रात्मभयोः सोपाधिकनिरुपाधििकयो- स्तत्त्वभावयोःनिर्धारणे सार्थो पश्चाद्-पूर्वमस्तित्वयेवोपलब्धस्यात्मनः सत्कृतासितत्त्वप्रत्यये नोपलब्धधस्य इत्यर्थः । पश्चाद् प्रत्यक् सत् तमितसर्वोपाधिरूप- नसतत्त्वभावो विदिताविदिताभ्यामन्योऽद्वैतस्य स्वभावः 'नेति नेति' ( बृह्ह २।८।६ ) इति 'आत्मूलमन्ववहंस्वम्' ( बृह ३।९।२६ ) 'अद्रश्ये नात्म्येऽनु'

उपलब्ध करना चाहिए । जिस समय श्रात्मा इस बुद्धि ग्रादि उपाधिसे रहित निर्विकार जाना जाता है तथा कार्यवर्ग 'विकार वार्णोंका विलास श्रीर नाम केवल मृत्तिका ही सत्य है' इस श्रुतिके श्रनुसार श्रपने कारणसे भिन्न नहीं निश्चित होता है, उस समय जिस निरुपाधिक श्रलिङ्ग सदसद् ग्रादि प्रतीतिके रहित प्रात्नाका तत्त्वभाव होता है । उस तत्त्वस्वरूपसे ही श्रात्माको उपलब्ध करना चाहिए इस प्रकार यहाँ 'उपलब्धव्य' पदकी श्रनुवृत्ति की जाती है । सोपाधिक श्रोर निरुपाधिक तत्त्वभाव इन दोनोंमेंसे यहाँ 'उभयोः' इस पदमें पृथक् निर्धारणे है, पहले तो 'है' इस प्रकार उपलब्ध हुए श्रात्माका श्रध्यस्त सत्कार्यरूप उपाधि हुए श्रस्सितत्त्व प्रत्ययसे उपलब्ध हुए श्रात्माका पश्चाद् निवृत्त हुए सम्पूर्ण उपाधि जो ज्ञात एवं श्रज्ञातसे भिन्न श्रद्धतीय स्वरूप है, उसे 'नेति नेति' ( यह नहीं यह नहीं 'श्रास्तूलम्०' ( जो न स्थूल न श्रणु श्रीर न ह्रस्व है ) 'अद्रहये०' ( जो श्रदृश्य श्रनात्ममें, श्रनु- वधाननीयमें श्राधार रहितमें ) इत्यादि श्रुतियोंसे निर्दिष्ट श्रतत्त्वभाव प्रसादित--श्रभिमुख होता है जिसे पहले 'है' इस प्रकार श्र

सत्यानन्ददीपिका लोकमें प्रत्येक पदार्थ श्रस्सित, भाति, प्रिय, नाम श्रीर रूपसे हृदयंगम होता है । निध्यं तन्न संबन्ध श्रनुस्यूत होनेसे श्रात्मस्वरूप हैं श्रीर श्रन्तिम नाम, रूप दोनों ही श्रोर उनमें व्यवभिचार निश्चित है, ब्रतत् जगद्रूप नाम, रूप मिथ्या है । उन प्रथम को पहले 'श्रात्मा श्रस्सित' 'श्रात्मा है' ऐसा निश्चित होता है भ्राति श्रीर । श्रनुभूति होती है श्रर्थात् श्रात्माका यथार्थस्वरूप सत्-चित्-ग्रानन्द है । इस f सत्यं ज्ञानमनन्तं बहु' 'प्रयमात्मा ब्रह्मा सर्वानुभूः' 'सदान्तोऽध्यात्माश्रयाः सव' 'व हि । नाविद्यास्तीन नो माया शान्तं वह्नौदमक्लयम्' ।। इत्यादि श्रुति भी है । श्रनुभूति तो निरुपाधिक श्रद्धतीय चिन्मय श्रात्मतत्त्वसे होती है । सोपाधिक हृदय नो

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मस्तीत्युपलब्धवत्ता इत्येतत् ॥ १३ ॥

भ्रमर कब होता है ?

परमार्थदर्शिनोः—

यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिता: । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ १४ ॥

[ (विदुषः) हृदि श्रिता: (प्राप्तुं योग्यतया) सर्वे कामा: (वासनाः) यदा प्रमुच्यन्ते (निवर्तन्ते) , अथ (ग्रनन्तरं) मर्त्योः (मरकणशीलः मनुष्यः) अमृतो (मुक्तो) अत्र (श्रस्मिन्देहे) ब्रह्म समश्नुते (भवति) ॥ १४ ॥

जिस समय इसके हृदयग्राश्रित सब कामनाएँ छूट जाती हैं, उस समय वह मर्त्यर हो जाता है और इस शरीरमें ही ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ १४ ॥

यस्मिन्काले सर्वे कामा: कामयितव्यस्यान्नस्याभावात्प्रमुच्यन्ते विशी-ष्य प्राक्प्रतिबोधाद्दिवुपो हृदि बुद्धौ श्रिता आाश्रिता: । बुद्धिरहि कामा-यो नातमा । 'कामः संकल्प:' (बृह० १४।३) इत्यादिश्रुत्यन्तराच्च ।

हो गई है उसे अपना स्वरूप श्रभिव्यक्त करनेके लिये यह तत्त्वभाव श्रभिमुख-होता है ॥ १३ ॥

प्रकार परमार्थदर्शिनो—

जिस समय सब कामनाएँ कामनायोग्य श्रग्रन्य पदार्थोंका श्रभाव होनेके कारण छूट हैं; छूटने मित्र हो जाती हैं, जो कि तत्त्वज्ञान होनेसे पूर्व इस विद्वान्के हृदय-ग्राश्रित रहती हैं, क्योंकि बुद्धि ही कामनाओंका श्राश्रय है ग्रात्मा नहीं, कारण

कि: सङ्कल्प:···[ यह सब मन ही है ] इत्यादि श्रग्रन्य श्रुति भी है । तब फिर जो

सत्यानन्ददीपिका

योंके विचारमें हेतु है । सौपाधिक ब्रह्मा उपास्य है श्रौर निरुपाधिक ब्रह्मा ज्ञेय

के ज्ञानसे मुक्ति संभव है, इसमें 'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः' 'ज्ञानादेव तु कैवल्यम्'

श्रुति प्रमाण है ॥ १३ ॥

प्राप्ति श्रौर श्रग्रनिष्ठ निवृत्तिके लिए ही कामना उत्पन्न होती है । तत्त्वबोधसे

यही समभता है कि इष्टकी प्राप्ति इष्ट पदार्थकी प्राप्तिसे श्रौर श्रग्रनिष्ठकी निवृत्ति

तार्थके निवृत्त होनेसे होती है, श्रतः उनकी प्राप्ति श्रौर परिहारके लिए बाह्म

प्रवृत्ति श्रौर निवृत्ति करता है । परन्तु जब इष्ट प्राप्तिका सधो साधन-ग्रारम्भ करव

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नादस्य वादासात्स प्रबाधात्तरकालमावेद्याकामक- रास्य मृत्योर्विनाशावशृत्तो भवति । गमनप्रयोजकस्य मृत्योर्विनाशाद्गम पत्तेरत्रेहैव प्रदीपनिर्वाणीयावत्सर्वेऽबन्धनोपशमाद् ब्रह्मा समरश्नुते ब्रह्मैव तीत्यर्थः ॥ १४ ॥

कदा पुनः कामनां मूलतो विनाश इत्युच्यते— यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः । अथ मृत्योऽमृतो भवत्येतावद्बन्धनुशासनम् ॥ १५ ॥

दहन् ( देहे ) सर्वे ग्रन्थयः यदा प्रभिद्यन्ते ( विनश्यन्ति ) ग्रन्थः ( तदा ) मृत्युः ( मुक्तः ) भवति । एतावद् हि ( एव ) अनुशासनम् ( उपदेशः ) ॥ १४ ॥ जिस समय इस जीवनमें हो इसके हृदयकी सभी ग्रन्थियोंका भेदन हो जाता है समय यह मरनधर्मा जीव अमृत हो जाता है, वस सभी वेदान्तोंका इतः पदेश है ॥ १५ ॥

यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते भेदमुपयान्ति विनश्यन्ति हृदयस्य बुद्धेरिह जीवत् नथयो ग्रन्थिवद् हृढबन्धनरूपा व्रविद्याप्रत्प्रया इत्यर्थः । ग्राहम्भिदं शरीरं रससाक्षात्कारसे पूर्वं मरणधर्मा था वह जीव ब्रात्मज्ञान होनेके श्रानन्तर श्रति मनः श्रौर [ यतादि ] कर्मरूप मृत्युका नाश हो जानेसे ब्रमर हो जाता है । परं गमनके प्रयोजक मृत्युक विनाश हो जानेसे वहाँ गमन भ्रसंभव होनेके कारख देहमें दीप-निर्वाणके समान सभी बन्धनोके उपशान्त-नष्ट हो जानेसे ब्रह्माभा त् हो जाता है श्रथन्त् ब्रह्म ही हो जाता है ॥ १४ ॥

परन्तु कामनाओंका मूलतः विनाश कब होता है ? इसपर कहते हैं— जिस समय जीवित रहतें हो इसके हृदयकी-बुद्धिकी सब ग्रन्थितयाँ-प्रन्थियोंके स त् बन्धनरूप प्रविद्याजनित प्रतोतियाँ 'छिन्न भिन्न होती-भेदको प्राप्त होतीं-बि

सत्यानन्ददीपिका ग्रोपासककी सभी कामनाएँ शान्त हो जाती हैं और ब्रह्मस्वरूप हो जाता है; 'ब्रह्मा व भवति' ऐती श्रुति है । 'कामा येऽस्य हृदि श्रिताः' यह श्रुति वाक्य वैशेषिक ग्र का खण्डन करता है जो आत्माको कामनाओंका श्राश्रय मानते हैं, 'कामः सङ्कल्प० निकित्सा श्रद्धाडश्रद्धा धृतिरधृतिरित्यौधीः श्रितयेतस्स्र्च मन एत ( बृह० १।५।३ ) श्रन्य श्रुति भी ऐसा कहती है कि 'ये सब मनकी वृत्तियाँ हैं' ॥ १४ ॥

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दुःखी चाहर्मित्येवमादिलद्गयास्तद्विपरीतब्रह्मात्मप्रत्ययोपजननाद् सेम ग्रसंसारीति विनष्टेष्वविद्याग्रन्थिरु तन्न्रिमिता: कामा मूलंतो । श्राथ.मत्योंड्मृतो भवत्येतावद्र ध्येतावदेवैतावन्मात्रं नाधिकमस्ती- कर्तंव्या। श्रनुशासनमनुशिष्टिरुपदेश: सर्व्वेदान्तानामिति वाक्य- ॥

शेषविशेषज्ञयापि्रब्रह्मात्मप्रतिपत्त्या प्रभिन्नसमस्ताविद्यादिग्रन्थेर्जीवत् स्त्य विदुषो 'न गतिरिव्यधित्' इत्युक्तमन्त्र ब्रह्म सम्रश्नुत इत्युक्तत्वात् । 'या उत्कामन्ति ब्रह्मैव सन्ब्रब्माप्येति' ( बृह् ४।४।६ ) इदि श्रुत्यन्त- पा

यह् प्रथं है—'यह शरीर मैं हूँ' यह धन मेरा है, मैं सुखी हूँ, दुःखी हूँ' एके श्रनुसव श्रविद्या प्रत्यय हैं । उसके विपरीत ब्रह्मात्मभावके श्रनुभवकी ग्रसंसारी ब्रह्म हूँ" ऐसे तत्त्वज्ञान द्वारा श्रविद्याजनित ग्रन्थियोंके विनष्ट हो 'मित्तक कामनाे' भी मूलत: नष्ट हो जाती हैं, तब वह मृत्युं प्रसर हो इतना ही सम्पूर्ण वेदान्तोंका उपदेश है, इससे श्रधिक कुछ श्रोे है ऐसी करनी चाहिए यहाँ 'सर्व्वेदान्तानाम्', यह वाक्यशेष है। ॥ १५ ॥

सम्पूर्ण गुण क्रिया आदि विशेषोंका श्रभाव है उस सर्व्वव्यापक ब्रह्मको जान लेनेके कारण जो श्रविद्या श्रादि समस्त ग्रन्थियाँ नष्ट हो गयी हैं ही ब्रह्मभावको प्राप्त हुए ऐसे विद्वान्का कहीं गमन नहीं होता, ऐसा त है, क्योंकि 'ब्रात्र ब्रह्म समश्नुते' ( कठ० ६।१४ ) ( इस शरीरमें ही म हो जाता है ) ऐसा कहा गया है । 'न तस्य०' ( उस ब्रह्मवेत्तके प्राप्त करते, वह् ब्रह्मविद् तुध्या ही ब्रह्ममें लीन हो जाता है ) यह ग्रन्थ श्रुति जो मन्द ब्रह्माज्ञानी हैं श्रौर ग्रन्थविद्या-उपासनााका परिशीलन करनेवाले के प्राधिकारो हैं श्रथवा जो उनसे विपरीत जन्ममरणरूप संसारके भागी

सत्यानन्ददीपिका

तमा श्रौर धन्तकऱण श्रादि ग्रनात्मा इन धर्मियों श्रोर इनके धर्मोंका तो ग्रन्थोंमें तादात्म्याध्यास है, वही चिद्जडग्रन्थि है । (निथिश्छद्यन्ते सर्वसंशया:। क्षीयन्ते चास्य कर्मार्णि तस्मिन््हष्टे परावरे॥) (उस ब्रह्मका साक्षात्कार होनेपर उस ब्रह्मवेत्तकी ग्रविद्या श्रोर तजनित ग्र हो जाती है, ब्रात्मविषयक सभी संशय निवृत्त हो जाते हैं श्रोर कर्म

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च । य पुनर्नन्दन्रक्षावद। वद्यान्तरशालनक्ष्र ब्रह्मलाकभाजा य च तादृश ताः संसारभाजस्तेथामेव गतीविशेष उच्चयते प्रकृतोत्तम्रक्षाविद्याफलसुतरे ज्ञानद्गिनविद्या पुष्टा प्रयुक्ता च । तस्याश्र फलप्राप्तिप्रकारो वक्तव्य ईदृशारम्भः । तत्र—

शातं चैकं च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्ध्नि(मूर्ध्नि)निःसृतैका । तयोध्वंमायच्श्रुतत्वमेति विश्ववडु़न्या उत्क्रमरो भवन्ति ॥ १ हृदयस्य शतं च एकं च (एकोत्तरशतं) नाड्यः [ सान्त ] तासां ( मध्ये ) एक (प्रति) निःसृता (मूर्धापर्यन्तगता) तथा ऊर्ध्वमू प्राप्नुवन् ( गच्छन्तः ) प्रमृता(प्राणनाद्यः ) विश्वमुन्क्रमयो ( लोकान्तरगमनेन ) भवन्ति ॥ १६ ॥

इस हृदयकी एक सौ एक नाडियां हैं, उनमेंसे एक मूर्धोंका भेदनकर बाहर कली है, उसके द्वारा ऊर्ध्व-उपरकी ओर गमन करनेवाला पुरुष अमरत्वको प्राप्त है । शेष विभिन्न गति युक्त नाडियां उत्क्रमपे-प्राप्योर्गतिमें हेतु होती हैं ॥ १६

शातं च शतसङ्ख्याका एका च सुषुम्ना नाम पुरुषस्य हृदयाद्विनिःसृता नाडीरास्तासां मध्ये मूर्धीनं भित्वाभिनिःसृता सुषुम्ना नाम । तथा तले हृदय आत्मानं वशीकृत्य योजयेत् । तथा नाड्योध्वसुपर्य्यनुगच्छल्लां

पद्वारेऽप्यामृतत्वसमरागधर्म्मत्त्वमापेक्षिकम् । ‘ग्राभूतसंप्लवं स्थानममृतत्वं’

। उन्होंने किसी गति विशेषका वर्णन यहां प्रकारशा प्राप्त ब्रह्मविद्याके उत्तम फरतिके लिए किया जाता है । इसके प्रतिरिक्त ग्रनिनविद्याके विषयमें नचिकेताके पू यमराजने उसका वर्णन किया प्रो उस ग्रनिनविद्याके फलकी प्राप्तिका प्र कहनां चााहिए, इस ग्राभिप्रायसे इस मन्त्रका श्रारम्भ किया जाता है । वहाँ [ क है है कि—]

पुरुषके हृदयसे सौ प्रो सुषुम्ना नामकी एक इस प्रकार एक सौ एक नाडि तराएं निकली हैं । उनमें सुषुम्ना नामकी नाडी मध्योंका भेदनकर निकली है । त लमें उसके द्वारा ग्रात्मा-मनको अपने हृदय देशमें वशीभूतकर समाहित करे । टडीके द्वारा ऊर्ध्व-उपरकी प्रो जाकर जीव ग्रादित्यमण्डलके द्वारा प्रमृतत्व-मापे मरमधर्मत्त्वको प्राप्त होता है, क्योंकि 'ग्राभूतसंप्लवं' ( सब भूतोंके क्षय-प्रलयप

सत्यानन्ददीपिका

प्रकारए विच्छेद द्वारा उत्त सम्बन्धको 'निरस्ताशेषो' इत्यादिसे दिखलाते हैं— हृदादि सौ प्रो सुषुम्ना-नझ्नानाडी एक इस प्रकार एक सौ एक नाडी पुरुषके हृृराश्रित होकर रहती हैं । 'एकोत्तरन्ताडीगतं तथा मड्ये पगर विथनर । मतनार म

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१त’ ( तव पु० राधः१५७ ) ज्ञाते स्मृते। ब्रह्मरगा वा सह कालान्तरेगा समृततत्वमेति भुक्त्वा भोगाननुपमानब्रह्मलोकगतान् । विष्णुना नानाविध-रोडन्या नाडच उत्क्रमयेऽ निमित्तं भवन्ति संसारप्रतिपत्त्यर्था एय भवन्ती-॥ १६ ॥

इदानों सर्ववल्लभ्यथोपसंहारार्थेमाह—

प्रगुष्टमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः । तं स्वाच्छरोरात्प्रवहेन्मुज्जादिवेषोकां धैयैरसा ॥ तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रमृतमिति ॥ १७ ॥

इड्गुष्टमात्रः पुरुषः प्रनतरात्मा सदा जनानां (प्राणिनां) हृदये सन्निविष्टः (सुष्तुम्ना-मुखान्त ( तदाद्यतुएात ) इद्रिकां ( गर्भस्थदलम् ) इव स्वातः शरीरात् तं धैयैरसा-सींकके समान उसे धैयं पूर्वंक अपने शरीरसे बाहर निकाले श्रर्थात् शरीरसे र ग्रनुभव करे। उसे शुक्र शुद्ध प्रोएड श्रमृतरूप जाने, उसे शुक्र प्रोएड श्रमृत-ने ॥ १७ ॥

जा स्थान श्रमृतत्व कहा जाता है ) ऐसी स्मृति भी है। श्रथवा ब्रह्मालोक स्थित भोगोंको भोगकर कालान्तरमें ब्रह्माके साथ मुख्य श्रमृततत्वको प्राप्त होता है । गतिवाली श्रम्या नाडियाँ केवल प्राणा प्रयागमें हेतु हैं श्रर्थात् वे संसार प्राप्तिके होती हैं ॥ १६ ॥

ते सब वक्ष्यिोंके श्रेष्ठका उपसंहार करनेके लिये कहती हैं—

सत्यानन्ददीपिका

हो मूर्छोका भेदनकर निकली है । विद्यान् मरेशा समय अपने हृदयमें ग्रान्तः-वशकर सुपुम्ना नाडी द्वारा मूलाधार ग्रादि षट्चक्र भेदन पूर्वंक उर्ध्व सहस्रार भी भेदनकर अपने ग्रान्तःकरएके साथ सूर्यद्वारा ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है, क्षिक श्रमृतत्व है। सुपुम्ना नाडी द्वारा प्रयाग करनेवाले उपासककी यह गति कही ष नाडियाँ तो केवल प्राणा परगमनें देत हैं

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अ्रड़गुष्मात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निधत्ते हृद् यथाऽऽख्यायते स्तं स्वादात्मीयाच्छरीरात्पृथग्‍हृदयच्‍छलेनिकर्षेत्पृथक्‍कु किमिवेत्यच्युतं मुहुर्जातिव इषीकामन्तःस्थां धैर्यैःप्रपादेन । तं श चिन्मात्रं विचाद्विजानीयाच्छुक्रमसृतं यथोक्‍तं ब्रह्मेति । द्विर्वचनर् समाप्यर्थंमितिशब्दद्रश् ॥ १७ ॥

विद्यास्त्यर्थोऽड्यमार्ग्यायिकार्थोपसंहारोऽघुनोच्यते— मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोड्य लब्‍ध्वा। विद्यांभितां योगविधिं च कृत्त्वा ब्रह्मप्राप्तो विरजोभूद्विमृत्युरन्योडप्येवं यो विदद्‌ध्यात्ममे

ग्रथ ( प्रनन्तरं ) नचिकेतः मृत्युप्रोक्तां ( येन कथिताम् ) एतां योगविधिं च लब्‍धवा ( प्रधिगम्य ) विरजः ( निद्वन्द्वः ) विमृत्युः ( मृत्युर् ब्रह्म प्राप्तः ब्रह्मभूत् । ग्रन्थोऽपि यः ( कश्रित् ) एकमध्यात्मम् एवंवितत् ( ! प्राप्तमानं वेत्ति-जानाति ) ॥ १५ ॥

मृत्यु-प्रसे कही इस विद्या श्रोैर सम्पूर्ण योगविधिको पाकर नचिकेता प्राप्तकर विरज-धर्माङ्गर्मं रहित श्रोैर मृत्यु हीन हो गया । ग्रन्थ भी जो कें सत्‍वको इस प्रकार जानैगा वह भी वैसा ही हो जायगा ॥ १५ ॥

मृत्युप्रोक्तां यथोक्‍तामेतां ब्रह्मविद्यां योगविधिं च कृत्स्नं समस्तं सफलमित्येतत्‌ ; नचिकेता वरप्रदानान्मृत्योलेह्‍वा प्राप्येत्यर्थः; कि

भ्रड़गुष्मात्र पुंस-भ्रड़गुष्मपरिमाण् पुंस ग्रन्थरात्मरूपसे सदा मनुष्य सन्निविष्ट-विद्यमान है, जिसकी व्याख्या पहले ( कठ २।११।१२-१३ ) में उसे अपने शरीरसे बाहर करे उपर नियन्‍त्रित करे श्रर्थात् शरीरसे पृथक् ग्रर्थं है। किसकी तरह ? इसपर कह्‍तें हैं—धैर्यैः-श्रमाद पूर्वंक जैसै मूँजसै र सोंक निकाली जाती हैं । शरीरसै पृथक् किये उस भ्रड़गुष्ममात्र पुरुष्को

चिन्मात्र विशुद्ध श्रोैर श्रमृतमय ब्रह्म जाने । यहांँ 'तं विद्याच्‍छुक्रममृतम्‌' द्विरुक्ति श्रोैर 'इति' शब्‍द उपनिषद्की समाप्तिके लिए हैं ॥ १७ ॥

ग्रब विद्याकी स्तुति के लिए यंह श्राङ्ग्यायिकाके श्रर्थक उपसंहार किया , मृत्युसे कही हुई इस पूर्वोक्त ब्रह्मविद्या श्रोैर सम्पूर्ण योगविधि उसके सफलहित वरदानके कारण यमराजसे प्राप्तकर नचिकेता क्या हो गया ?

सत्यानन्‍ददीीपिका

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सभून्मुक्तोऽभावदित्यर्थः। कथं ? विद्याप्राप्त्या विरजो विगतधर्माधर्मं युर्विगत कामाविद्याशेष संपूरीभवत्यर्थः। न केवलं नचिकेता एवान्योऽपि केतोवादात्मविद्याध्यात्ममेव निरुपचारितं प्रत्यक्षस्वरूपं प्राप्य तत्त्वमेवेत्यभि- ; नान्यद्रूपमप्रतिम्रम्। तदेवमध्यात्ममेवमुक्तप्रकारेण वेद विजानातीये सोऽपि विरजः सन्निद्वाप्राप्त्या विमृत्युर्भवतीति वाक्यशेषः॥ १४॥ शेष्याचार्योः प्रमादकृतान्यान्येन विद्यामहसाप्रतिपादननिमित्तदोषप्रशम- ं शान्तिः उच्चयते——

ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै॥ १५ ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

रमात्मा हम [ आचार्य और शिष्य ] दोनोंकी साथ साथ रक्षा करे। दोनोंका साथ पालन करे। हम दोनों साथ साथ विद्याकृत सामर्थ्य संपादित-प्राप्त करें। नोंका किया हुया प्रधान तेजस्वी हो। हम परस्पर द्वेष न करें ॥ १६ ॥ यह नावावतु पालयतु विद्यास्वरुपप्रकाशनेन। कः ? स एव परमेश्वर नत्प्रकाशितः। किं च सह नौ भुनक्तु तत्फलप्रकाशनेन मा पालयतु। मां विद्याकृतं वीर्यं सामर्थ्यं करवावहै निष्पादयावहै। किंच तेजस्विनौ गया ऋषीभतू मुक्त हो गया। सो किस प्रकार ? [ कहते हैं—] विद्याकी प्राप्ति हले विरज-धर्माधर्म रहित और विमृत्यु-काम और मविद्यार्से रहित हो [ मुक्त 1] ऐसा तात्पर्य है। केवल नचिकेता ही नहीं प्रत्युत नचिकेताके समान श्रन्थ विद्या विद उपचार शून्य देहादिके प्रधिष्ठाता प्रत्यक्षस्वरूपको प्राप्तकर यहीं तत्त्व रूप नहीं, क्योंकि वह प्रत्यमग्रूप नहीं है ऐसा जानता है, ऐसा अभिप्राय है। प्रकारसे ग्रापने (उसी श्रध्यासमूलपको जानता है, जो उसी प्रकार जाननेवाला है विरज ( धर्माधर्म रहित ) होकर ब्रह्मप्राप्ति द्वारा मुक्त रहित हो जाता है। यह शेष है॥ १५॥

ध्य और आचार्यके ने मादकृत ग्रन्यासे विद्याके पहुरण और प्रतिपादनमें होनेवाले निवृत्तिके लिए श्रनन यह शान्ति कहाँ जाती है — ग्राके स्वरुप प्रकाशन द्वारा हम दोनोंकी साथ साथ रक्षा करे। कौन ? उप- प्रकाशित वह परमेश्वर ही। तथा उसके फल प्रकाशनसे वह हम दोनोंका साथ न करे। हम दोनों अपने विद्याकृतवीर्य-सामर्थ्यंका साथ साथ संपादन करें- सत्यानन्ददीपिका

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तेजास्विनोरावयोर्थीदधीतं तत्संधीतमतु । श्रथवा तेजस्वि नावावाभ्यां तदतीव तेजस्वि वीर्यवदस्तु इत्यर्थः । मा विद्विषावहै शिष्याचार्यावनयोर्न्य कृतान्यायाध्ययनाध्यापनदोषनिमित्तं द्वेषं मा करवावहै इत्यर्थः । शान्तिः शान्तिरिति त्रिरवचनं सर्वदोषोपशमनार्थमित्योमिति ॥ १६ ॥

इति श्रीमदाचार्यशङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये हितीयोध्यायः समाप्तः ॥ २ ॥

प्राप्त करें । हम दोनों तेजस्वियोंका जो श्रध्ययन किया हुआ है वह भ्रतयन्त तेजस्वी-वीर्यवान् हो यह ! हम शिष्य और श्राचार्य परस्पर विद्वेष न करें श्रर्थात् हम प्रमादकृत ग्रन्याॅयसे ! ग्रध्यापनमें दोष निमित्त प्रत्ययोदयसे द्वेष न करें ऐसा तत्पर्यार्थ है । 'शान्तिः शान्तिः शान्तिः' इस प्रकार शान्ति शब्दका तीन वार कथन ग्रध्यात्मिकादि सब i शान्तिके लिए है, इत्योम् ॥ १६ ॥

कठोपनिषद्के द्वितीयाध्यायकी तृतीयवल्लीकां 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' कृत 'भाषानुवाद' समाप्त ॥ २३ ॥

है । श्रौैरादि मार्गोंन्य जो स्थान है उसकी प्राप्तिसे वह संयोग वियोगवाला है; उससे विमृत्यु नहीं होती ॥ १५ ॥

शून्यचयम्बरनेत्रसंमिततने संवत्सरे वैक्रमे पौषे मास्यसिते दले विधुदिने श्रीसोमवत्याi तिथौ काश्यां जाह्नुसुतातटे भगवतः शम्भोः प्रसादादियं सत्यानन्दसरस्वतीविरचिता व्याख्याग्रन्थपूर्वार्ङ्गताम् ॥ ९ ॥ सत्यानन्ददीपिकया शाङ्करभाष्यभाषया । तनोतूद्वासिता ज्ञानं काठकोपनिषन्नृपाम् ॥ २ ॥

कठोपनिषद्के द्वितीयाध्यायकी तृतीयवल्लीकां 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' कृत 'सत्यानन्ददीपिका' समाप्त ॥ २३ ॥

समाप्तश्रायं ग्रन्थः

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तीकान्ति व० म० पृ० मन्त्रप्रतीकान्ति व० म० पृ०

ईंधिको भुवनम् ४ ६ १२२ एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा ५ १२ १२

सात्र: पुरुष: ४ १२ १०६ एतच्छ्र त्वा संपरिष्वृक्त्या २ १३ ४

'' '' १३ १०६ एतत्सुल्यं यदि मन्यसे १ २८ ३

'' '' ६ १७ १४५ एतदालम्बनमे श्रेष्ठम् २ १७ ४१

तीरमूर्तीनाम् १ २५ ३४ एतद्वैच वाक्षरं ब्रह्म २ १६ ४२

गीयात्मह्र त: २ २० ६३ एष ते ऽग्नि नं चिकेत: १ १२ २४

' यथा पूर्वे १ ६ ११ एष सर्वेषु भूतेषु ३ १२ ४२

' योज्यतं २ १ ३६ कामस्याप्ति जगत: २ १९ ४२

नमदिन्यत्र २ १४ ५६ जानाम्यहं शैवाधि: २ १० ४९

नं हित: ४ ५ १०२ तं ह कुमारं सन्तम् १ २ ५

नन्तरे २ ४ ८३ तदेतदिति मन्यते १ १८ १२५

ऊ पर: ६ ८ १८२ तमब्वोते प्रीयमाया: १ १६ २९

परशं ३ १४ ५५ तं द्रङ्शे गुहं ३ १२ ४३

' शरीरेपु २ २२ ६६ तां योगमिति मन्यते ६ ११ १४६

नेपलब्धव्य: ६ १३ १४६ तिस्रो रात्रीर्यंदवात्सी: १ ८ १८

' समानस्य ४ ८ ११७ त्रिप्राचिकेतष्ठायम् १ १५ २८

' राथिनम् ३ ३ ७४ त्रिप्राचिकेतष्ठिभ: १ १७ २३

' शै संगतम् १ ५ १३ दूरमेते विपरीते २ ७ ४३

' रं व्रजति २ २१ ६५ देवेपु त्वम् विचिकित्सितम् १ २१ २५

पृथगभावम् ६ ६ १८० '' '' १ २२ २६

. हयानाह: ३ ४ ७५ न जायते ऽप्रियते वा २ १५ ६०

परं मन: ६ ७ १८१ न तत्र सूर्यो भाति ४ १४ १२६

परा ३ १० ५० न नरेषावरेषां २ ५ ४७

डबोद्धुम् ६ ४ १३७ न प्राणेन नापानेन ४ ४ ११५

प्रत ३ १४ ५५ न वित्तेन तर्पणीय: १ २७ ३४

वाजश्रवस: १ १ ७ न संद्धो तिष्ठति ६ ८ १८३

मुननवति ४ ३ ११६ न सांपराय: प्रतिभाति २ ६ ४८

वशाख ६ १ १३१ नाचिकेतमपह्नु=मन्त्र - -

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नित्योदनित्यानाम्

यस्मिन्दं विचिकित्सन्ति १

नैव वाचा न मनसा

यस्य क्रतुं च क्षत्रं च २

नैषा तर्केण मतिः

यः पूर्वं तपसः

पराचः कामानुयत्ति

यः सेतुरीजानानाम्

पराध्चि खानि व्यतृणहत्

या प्राणेन संभवति

पीतोदको जगतूः प्राणः

येन रूपं रसं

पुरमेकादशारं

तैर्य प्रेते विचिकित्सा

प्र ते बवीमि तद्ु

ये ये कामा दुलंभाः

बहूनांमेभि प्रथमः

योनिमन्ये प्रपद्यन्ते

भयादस्याग्निस्तपति

लोकादिमसनिनम्

मनसैवेदमाप्तव्यं

वायुर्यंको भुवनम्

विज्ञानसारथिर्यस्तु

महंतः परमव्यक्तम्

वैश्वानरः प्रविशाति

मृत्योः प्रोत्कां नाचिकेतः

शतं चैका च हृदयस्य

य इमं परमं

शतायुः पन्थानप्त्रान्

य इमं मध्वदं

शान्तसंकल्पः सुमनाः

य एष सुप्तेषु जागर्ति

श्रवणायापि बहुभिः

यच्े्छद्राड्मनसः

श्रेयस्च प्रेयश्च

यतश्रोदन्ति सूर्यः

श्रवोभावा मतयंस्य

यथादर्शों तथा

स त्वमग्निं स्वर्ग्यम्

यथा पुरस्तादृदृशिता

स त्वं प्रियान्प्रियान्रिययरूपान्स्त्व

यथोदकं दुर्गे वृष्टः

स त्वं प्रियात्प्रियात्प्रियतररूपार्स्त्व

यथोदकं शुद्धे शुद्धम्

सर्वे वैदा यत्पदम्

यदां पश्यावतिष्ठन्ते

सह नाववतु

यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते

स होवाच पितरम्

यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते

सूर्यों यथा सर्वलोकस्य

यदिदं किंच जगत्सर्वम्

स्वप्नालं जागरितान्तम्

यदेवेह तदमुत्र

स्वर्गं लोके न भयम्

यस्तु विज्ञानवान्

हन्तः शुचिषदसुः

" "

हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि

यस्त्वविज्ञानवान्

हन्ता वैन्त्यते