Books / Katharudra Upanishad

1. Katharudra Upanishad

Text (part 1)

1.0

देवा ह वै भगवन्तमब्रुवन्नधीहि भगवन्ब्रह्मविद्याम्। स प्रजापतिरब्रवीत् ॥ ||१||

devā ha vai bhagavantamabruvannadhīhi bhagavanbrahmavidyām। sa prajāpatirabravīt ॥

The Gods, it is said, requested of the venerable (Brahma): Venerable Sir, impart to us the spiritual knowledge. He, the creator (Prajapati), replied:

एक बार समस्त देवगण भगवान् प्रजापति ब्रह्माजी के समीप जाकर बोले-हे भगवन्! आप कृपा करके हम लोगों को ब्रह्मविद्या का उपदेश करें; तब प्रजापति ने कहा- ॥


2.0

सशिखान्केशान्निष्कृष्य विसृज्य यज्ञोपवीतं निष्कृष्य ततः पुत्रं दृष्ट्वा त्वं ब्रह्मा त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोंकारस्त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं धाता त्वं विधाता। अथ पुत्रो वदत्यहं ब्रह्माहं यज्ञोऽहं वषट्कारोऽहमोंकारोऽहं स्वाहाहं स्वधाहं धाताहं विधाताहं त्वष्टाहं प्रतिष्ठास्मीति । तान्येतान्यनुव्रजन्नाश्रुमापातयेत्।यदश्रुमापातयेत्प्रजां विच्छिन्द्यात्। प्रदक्षिणमावृत्त्यैतच्यैतच्या-नवेक्षमाणाः प्रत्यायन्ति। स स्वर्ग्यो भवति ॥

saśikhānkeśānniṣkṛṣya visṛjya yajñopavītaṃ niṣkṛṣya tataḥ putraṃ dṛṣṭvā tvaṃ brahmā tvaṃ yajñastvaṃ vaṣaṭkārastvamoṃkārastvaṃ svāhā tvaṃ svadhā tvaṃ dhātā tvaṃ vidhātā। atha putro vadatyahaṃ brahmāhaṃ yajño'haṃ vaṣaṭkāro'hamoṃkāro'haṃ svāhāhaṃ svadhāhaṃ dhātāhaṃ vidhātāhaṃ tvaṣṭāhaṃ pratiṣṭhāsmīti । tānyetānyanuvrajannāśrumāpātayet।yadaśrumāpātayetprajāṃ vicchindyāt। pradakṣiṇamāvṛttyaitacyaitacyā-navekṣamāṇāḥ pratyāyanti। sa svargyo bhavati ॥

After removing the hair including the tuft and discarding it, and after removing the sacred thread, looking at one's son (the following shall be uttered): 'Thou art the scripture , thou the sacrifice, thou the Vasatkara, thou the syllable Om, thou art Svaha, thou Svadha, thou the doer and thou the creator'. Then the son shall say: 'I am the scripture , I am the sacrifice, I am the Vasatkara, I am the syllable Om, I am Svaha, I am Svadha, I am the doer and I am the creator, I am the divine architect (Tvastir), I am the base'. These are the words (to be uttered). While parting (from the son) he shall not shed tears. Should he shed tears, the line of progeny will be broken. Circumambulating clockwise (his village) and not looking at anything he shall depart. Such a one is fit for the world of Brahman.

शिखा के साथ बालों का मुण्डन कराकर और यज्ञोपवीत का परित्याग करके, अपने पुत्र को देखकर उससे स प्रकार कहे कि ‘तुम ब्रह्मा हो, तुम यज्ञ हो, तुम वषट्कार हो, तुम ॐकार हो , तुम स्वाहा हो, तुम स्वधा हो, तुम धाता हो, तुम विधाता हो’। ऐसा सुनने के बाद पुत्र कहे कि ‘मैं ब्रह्मा हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं वषट्कार हूँ, मैं ॐकार हूँ, मैं स्वाहा और स्वधा हूँ, मैं ही धाता, विधाता, त्वष्टा भी हूँ तथा प्रतिष्ठा भी मैं ही हूँ।’ इस प्रकार से परिव्राजक (संन्यासी) होकर घर से बाहर निकलने पर जब पुत्र-पत्नी आदि पीछे-पीछे गमन करें, तो उन्हें देखकर के अश्नुपात न करे। यदि अश्नुपात करेगा, तो उसकी संतान विनष्ट हो जायेगी। तदनन्तर वे समस्त परिवारीजन संन्यासी की प्रदक्षिणा करने के पश्चात् उसे बिना देखे ही यदि वापस लौट जाते हैं, तो इस तरह का संन्यासी देवलोक का अधिकारी होता है॥ [पिता द्वारा पुत्र से दुरवाये जाने वाले वाक्यों के पीछे उनका महत्त्वपूर्ण मन्तव्य है। सद्गृहस्थ जब संन्यासी बने, तो पुत्र को दायित्व सौपने के साथ उसे आत्म गौरव का बोध करा दे; ताकि पिता का संरक्षण हट जाने पर भी वह आत्महीनता से ग्रस्त न हो,जाग्रत आत्मविश्वास के साथ अपने दायित्वों का आदर्शनिष्ट ढंग से निर्वाह कर सके। बिना अश्नुपात के विदाई के पीछे भी मोह मुक्त और आत्म विश्वास युक्त होकर होने का भाव है।]


3.0

ब्रह्मचारी वेदमधीत्य वेदोक्ताचरितब्रह्मचर्यो दारानाहृत्य पुत्रानुत्पाद्य ताननुरूपो पाधिभिर्वितत्येष्ट्वा च शक्तितो यज्ञैस्तस्य संन्यासो गुरुभिरनुज्ञातस्य बान्धवैश्च ।सोऽरण्यं परेत्य द्वादशरात्रं पयसाग्निहोत्रं जुहुयात्।द्वादशरात्रं पयोभक्षः स्यात्।द्वादशरात्रस्यान्ते-ऽग्नये वैश्वानराय प्रजापतये च प्राजापत्यं च वैष्णवं त्रिकपालमग्निम्। संस्थितानि पूर्वाणि दारुपात्राण्यग्नौ जुहुयात्। मृण्मयान्यप्सु जुहुयात्। तैजसानि गुरवे दद्यात्। मा त्वं मामपहाय परागाः । नाहं त्वामपहाय परागामिति। गार्हपत्यदक्षिणाग्न्याहवनीयेष्वरणिदेशाद्भस्ममुष्टिं पिबेदित्येके। सशिखान्केशान्निष्कृष्य विसृज्य यज्ञोपवीतं भूः स्वाहेत्यप्सु जुहुयात्। अत ऊर्ध्वमनशनमपां प्रवेशमग्रिप्रवेशनं वीराध्वानं महाप्रस्थानं वृद्धाश्रमं वा गच्छेत्। पयसा यं प्राश्नीयात्सोऽस्य सायंहोमः। यत्प्रातः सोऽयं प्रातः । यद्दशैं तद्दर्शम्। यत्पौर्णमास्ये तत्पौर्णमास्यम्। यद्वसन्ते केशश्मश्रुलोमनखानि वापयेत्सोऽस्याग्निष्टोमः ॥

brahmacārī vedamadhītya vedoktācaritabrahmacaryo dārānāhṛtya putrānutpādya tānanurūpo pādhibhirvitatyeṣṭvā ca śaktito yajñaistasya saṃnyāso gurubhiranujñātasya bāndhavaiśca ।so'raṇyaṃ paretya dvādaśarātraṃ payasāgnihotraṃ juhuyāt।dvādaśarātraṃ payobhakṣaḥ syāt।dvādaśarātrasyānte-'gnaye vaiśvānarāya prajāpataye ca prājāpatyaṃ ca vaiṣṇavaṃ trikapālamagnim। saṃsthitāni pūrvāṇi dārupātrāṇyagnau juhuyāt। mṛṇmayānyapsu juhuyāt। taijasāni gurave dadyāt। mā tvaṃ māmapahāya parāgāḥ । nāhaṃ tvāmapahāya parāgāmiti। gārhapatyadakṣiṇāgnyāhavanīyeṣvaraṇideśādbhasmamuṣṭiṃ pibedityeke। saśikhānkeśānniṣkṛṣya visṛjya yajñopavītaṃ bhūḥ svāhetyapsu juhuyāt। ata ūrdhvamanaśanamapāṃ praveśamagripraveśanaṃ vīrādhvānaṃ mahāprasthānaṃ vṛddhāśramaṃ vā gacchet। payasā yaṃ prāśnīyātso'sya sāyaṃhomaḥ। yatprātaḥ so'yaṃ prātaḥ । yaddaśaiṃ taddarśam। yatpaurṇamāsye tatpaurṇamāsyam। yadvasante keśaśmaśrulomanakhāni vāpayetso'syāgniṣṭomaḥ ॥

After studying the Vedas as a celibate student and performing the duties prescribed in the scriptures, after marrying and begetting sons and providing them with suitable means, having performed sacrifices according to ability, he who has been permitted by elders and relatives shall take to renunciation. Reaching the forest he shall perform the Agnihotra sacrifice for twelve nights by pouring oblations of milk into the fire; for twelve nights he shall subsist on milk. At the end of twelve nights, the wooden vessels, being no more of use, shall be offered to the fire (with the mantra): 'This is the oblation of cooked rice to the Vaishvanara fire, to Prajapati, (this is) the oblation appointed in three potsherds to Vishnu and Agni'. The clay pots shall be consigned to the waters; the metal ones shall be given to the teacher, with the mantra: 'May you not desert me while parting from me, may I not desert you while I part from you'. He shall prostrate before the three fires - the household-fire, the southern-fire and the fire in which the oblations are offered. Some say that he shall consume a handful of ashes from the place where the fire-kindling sticks stand. After removing the hair including the tuft and discarding it, he shall abandon the sacred thread in the waters with the mantra, 'Bhuh Svaha'. Therefore, he shall resort to starvation or drowning in water or entering fire, or betake himself to the battle field; or he shall journey forward until he falls and dies or he shall enter a hermitage of elderly ascetics. He shall consume milk as the repast (of the evening). That shall be his offering for the evening. That (milk which he takes) in the morning is his morning (offering); that of the new-moon-day, the new-moon-day sacrifice; that of the full-moon-day, the full-moon-day sacrifice. The shaving of the hair, beard, etc., and cutting of nails in the spring comprise his Agnishtoma sacrifice.

ब्रह्मचारी द्वारा वेद-शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मचर्य का पालन करने के बाद विवाह करके गृहस्थ धर्म का निर्वाह करते हुए पुत्रोत्पत्ति के पश्चात् उनको सुसंस्कृत बनाकर, अपनी शक्ति के अनुसार यज्ञ-हवन आदि करने के उपरान्त अपने इष्ट-मित्रों तथा गुरुजनों से आज्ञा लेकर संन्यास ग्रहण किया जा सकता है। इस प्रकार संन्यास आश्रम में प्रवेश करने वाला वन में जाकर द्वादश रात्रियों तक दुग्ध से अग्निहोत्र करे और साथ ही द्वादश रात्रियों तक केवल दुग्धाहार पर रहे। द्वादश रात्रियों के पश्चात् विष्णु एवं रुद्र से सम्बन्धित चरु को, जो तीन कपाल (मिट्टी के पात्रों) पर सिद्ध किया (पकाया) गया हो; वैश्वानर अग्नि तथा प्रजापति के उद्देश्य से हवन कर दे। अग्निहोत्र में उपयोग किये हुए काष्ठ पात्रों को भी अग्नि में आहुति रूप में समर्पित कर दे। मिट्टी के पात्रों को जलाशय में समर्पित कर दे और स्वर्णादि के बने पदार्थों को अपने गुरु को दे दे। उस समय (गुरु के प्रति) इस प्रकार कहे ‘तुम मुझे छोड़कर दूर गमन न करना तथा मैं तुम्हें त्याग कर दूर नहीं जाऊँगा।’ कुछ शास्त्रों का मत है कि इसके पश्चात् गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि और आहवनीय इन तीन प्रकार की यज्ञाग्नियों से अरणियों के पास से एक मुट्ठी भस्म लेकर पान (ग्रहण) करे। शिखा के साथ बालों का मुण्डन कराके तथा यज्ञोपवीत को उतार कर ‘ॐ भूः स्वाहा’ मंत्र को पढ़ते हुए जलाशय में विसर्जित कर देतत्पश्चात् अनशन, जल प्रवेश, अग्नि प्रवेश, वीरों के मार्ग का अनुसरण करके महाप्रस्थान को या फिर किसी वृद्ध संन्यासी के आश्रम में निवास हेतु गमन करे । दुग्ध अथवा जल के सहित जो कुछ भी वह भोजन को, वही भोजन उसका सायंकालीन यज्ञ है और प्रात:काल के समय में जो भोज्य पदार्थ ग्रहण करे, वही उसका प्रात:कालीन हवन है। अमावस्या के दिन जिस भोजन को ग्रहण करता है, वही उसका दर्शयज्ञ है। पूर्णिमा को जो भोजन ग्रहण करता है, वही उसका पौर्णमास्य यज्ञ है और वसन्त ऋतु में जो वह केश, दादी, मूंछ, रोएँ, नख आदि कटवाता है, वही उसका अग्निष्टोम कहा गया है॥ [संन्यासी कर्मकाण्डपक अग्निहोत्र का त्याग करके जीवन की प्रत्येक क्रिया को यज्ञ रूप बनाये, यह भाव यहाँ स्पष्ट है।उच्चस्तरीय जीवन साधना अपनाये बिना केवल कर्मकाण्ड त्याग कर संन्यास धर्म की पूर्ति संभव नहीं है।]


4.0

संन्यस्याग्निं न पुनरावर्तयेन्मृत्युर्जयमावहमित्यध्यात्ममन्त्राञ्जपेत्। स्वस्ति सर्वजीवेभ्य इत्युक्त्वाऽऽत्मानमनन्यं ध्यायन् तदूर्ध्वबाहुर्विमुक्तमार्गों भवेत्। अनिकेतश्चरेत्। भिक्षाशी यत्किंचिन्नाद्यात् । लवैकं न धावयेज्जन्तुसंरक्षणार्थं वर्षवर्जमिति । तदपि श्लोका भवन्ति ।।

saṃnyasyāgniṃ na punarāvartayenmṛtyurjayamāvahamityadhyātmamantrāñjapet। svasti sarvajīvebhya ityuktvā''tmānamananyaṃ dhyāyan tadūrdhvabāhurvimuktamārgoṃ bhavet। aniketaścaret। bhikṣāśī yatkiṃcinnādyāt । lavaikaṃ na dhāvayejjantusaṃrakṣaṇārthaṃ varṣavarjamiti । tadapi ślokā bhavanti ।।

After renunciation he shall not resume the fire-rituals. He shall recite the spiritual mantra: 'For I have become Death and would enter that which is coming into being (i.e. Brahman-knowledge)', etc. Saying 'Welfare to all beings', and contemplating the Self and naught else, lifting up the arms, he shall be one who has abandoned the (usual) path; he shall move about without any (fixed) abode. He shall subsist on alms, and shall not give any (gift). He shall not wear even scant (apparel) save during the rainy season for the protection of the animal body. Here are the verses (to support this):

संन्यास ग्रहण करने के पश्चात् पुनः अग्नि का आधान अर्थात् अग्नि की स्थापना नहीं करनी चाहिए। केवल ‘मृत्युर्जयमावहम्’ आदि आध्यात्मिक मन्त्रों का जप करना चाहिए। समस्त भूत-प्राणियों का कल्याण हो, ऐसा कहकर केवल आत्मतत्त्व का चिन्तन करता हुआ, ऊर्ध्व की ओर हाथों को उठाये हुए (परमात्मा के अतिरिक्त और किसी से साधन प्राप्त होने की कामना से मुक्त होकर) प्रपञ्च रहित मार्ग में गृहहीन होकर विचरण करे। भिक्षा के द्वारा प्राप्त अन्न के अतिरिक्त और कुछ भी ग्रहण न करे। एक स्थान पर क्षण-मात्र भी न रूके, सतत विचरण करता रहे। जीव-हिंसा से बचे रहने के लिए वर्षाकाल में विचरण की प्रक्रिया को विराम दे दे। इस संदर्भ (संन्यासी की मर्यादा) में कुछ श्लोक भी हैं॥


5.0

कुण्डिकां चमसं शिक्यं त्रिविष्टपमुपानहौ। शीतोपघातिनीं कन्थां कौपीनाच्छादनं तथा ॥

kuṇḍikāṃ camasaṃ śikyaṃ triviṣṭapamupānahau। śītopaghātinīṃ kanthāṃ kaupīnācchādanaṃ tathā ॥

The water-pot, the ladle, the sling (to carry his effects), the staff, foot-wear, covering to protect from the cold, the loin-cloth, the garment (to cover the body), the ring of Kusa grass, the bath towel, as well as the upper cloth, the sacred thread and the scriptures - all these an ascetic shall renounce.

संन्यास ग्रहण करने वाले मनुष्य को चाहिए कि वह कुण्डिका, चमस (यज्ञीय पात्र) और शिक्य (झोली) आदि को एवं तिपाई, जूते, (जाड़े को दूर करने वाली) कन्था (कथरी), कौपीन के ऊपर अङ्गाच्छादन करने वाला वस्त्र, कुश की बनी हुई पवित्रो, स्नान के पश्चात् धारण करने वाले वस्त्र, उत्तरीय वस्त्र, यज्ञोपवीत तथा वेदाध्ययन आदि सभी का परित्याग कर दे। वह अपना स्नान, पान एवं शौच आदि कृत्य पवित्र जल से सम्पन्न करे । नदी के तट पर अथवा देव मंदिर में जाकर शयन करे। वह अधिक विश्राम न कोरे अथवा अधिक परिश्रम से शरीर को व्यर्थ में कष्ट न दे। वह दूसरों के द्वारा अपनी प्रशंसा श्रवण करके न प्रसन्न हो तथा न निन्दा या अपमान किये जाने पर गाली अथवा शाप दे ॥


6.0

पवित्रं स्नानशाटीं च उत्तरासङ्गमेव च। यज्ञोपवीतं वेदांश्च सर्वं तद्वर्जयेद्यतिः ॥

pavitraṃ snānaśāṭīṃ ca uttarāsaṅgameva ca। yajñopavītaṃ vedāṃśca sarvaṃ tadvarjayedyatiḥ ॥

The water-pot, the ladle, the sling (to carry his effects), the staff, foot-wear, covering to protect from the cold, the loin-cloth, the garment (to cover the body), the ring of Kusa grass, the bath towel, as well as the upper cloth, the sacred thread and the scriptures - all these an ascetic shall renounce.

संन्यास ग्रहण करने वाले मनुष्य को चाहिए कि वह कुण्डिका, चमस (यज्ञीय पात्र) और शिक्य (झोली) आदि को एवं तिपाई, जूते, (जाड़े को दूर करने वाली) कन्था (कथरी), कौपीन के ऊपर अङ्गाच्छादन करने वाला वस्त्र, कुश की बनी हुई पवित्रो, स्नान के पश्चात् धारण करने वाले वस्त्र, उत्तरीय वस्त्र, यज्ञोपवीत तथा वेदाध्ययन आदि सभी का परित्याग कर दे। वह अपना स्नान, पान एवं शौच आदि कृत्य पवित्र जल से सम्पन्न करे । नदी के तट पर अथवा देव मंदिर में जाकर शयन करे। वह अधिक विश्राम न कोरे अथवा अधिक परिश्रम से शरीर को व्यर्थ में कष्ट न दे। वह दूसरों के द्वारा अपनी प्रशंसा श्रवण करके न प्रसन्न हो तथा न निन्दा या अपमान किये जाने पर गाली अथवा शाप दे ॥


7.0

स्नानं पार्न तथा शौचमद्भिः पूताभिराचरेत्। नदीपुलिनशायी स्याद्देवागारेषु वा स्वपेत् ॥

snānaṃ pārna tathā śaucamadbhiḥ pūtābhirācaret। nadīpulinaśāyī syāddevāgāreṣu vā svapet ॥

With purified water he shall bathe and wash and also drink of the same. He shall sleep on the sands of a river (bank) or in temples.

संन्यास ग्रहण करने वाले मनुष्य को चाहिए कि वह कुण्डिका, चमस (यज्ञीय पात्र) और शिक्य (झोली) आदि को एवं तिपाई, जूते, (जाड़े को दूर करने वाली) कन्था (कथरी), कौपीन के ऊपर अङ्गाच्छादन करने वाला वस्त्र, कुश की बनी हुई पवित्रो, स्नान के पश्चात् धारण करने वाले वस्त्र, उत्तरीय वस्त्र, यज्ञोपवीत तथा वेदाध्ययन आदि सभी का परित्याग कर दे। वह अपना स्नान, पान एवं शौच आदि कृत्य पवित्र जल से सम्पन्न करे । नदी के तट पर अथवा देव मंदिर में जाकर शयन करे। वह अधिक विश्राम न कोरे अथवा अधिक परिश्रम से शरीर को व्यर्थ में कष्ट न दे। वह दूसरों के द्वारा अपनी प्रशंसा श्रवण करके न प्रसन्न हो तथा न निन्दा या अपमान किये जाने पर गाली अथवा शाप दे ॥


8.0

नात्यर्थं सुखदुःखाभ्यां शरीरमुपतापयेत्। स्तूयमानो न तुष्येत निन्दितो न शपेत्परान् ॥

nātyarthaṃ sukhaduḥkhābhyāṃ śarīramupatāpayet। stūyamāno na tuṣyeta nindito na śapetparān ॥

He shall not make the body endure the extremes of comfort or hardship. He shall not exult when praised, nor curse others when blamed.

संन्यास ग्रहण करने वाले मनुष्य को चाहिए कि वह कुण्डिका, चमस (यज्ञीय पात्र) और शिक्य (झोली) आदि को एवं तिपाई, जूते, (जाड़े को दूर करने वाली) कन्था (कथरी), कौपीन के ऊपर अङ्गाच्छादन करने वाला वस्त्र, कुश की बनी हुई पवित्रो, स्नान के पश्चात् धारण करने वाले वस्त्र, उत्तरीय वस्त्र, यज्ञोपवीत तथा वेदाध्ययन आदि सभी का परित्याग कर दे। वह अपना स्नान, पान एवं शौच आदि कृत्य पवित्र जल से सम्पन्न करे । नदी के तट पर अथवा देव मंदिर में जाकर शयन करे। वह अधिक विश्राम न कोरे अथवा अधिक परिश्रम से शरीर को व्यर्थ में कष्ट न दे। वह दूसरों के द्वारा अपनी प्रशंसा श्रवण करके न प्रसन्न हो तथा न निन्दा या अपमान किये जाने पर गाली अथवा शाप दे ॥


9.0

ब्रह्मचर्येण संतिष्ठेदप्रमादेन मस्करी। दर्शनं स्पर्शनं केलिः कीर्तनं गुह्यभाषणम्॥

brahmacaryeṇa saṃtiṣṭhedapramādena maskarī। darśanaṃ sparśanaṃ keliḥ kīrtanaṃ guhyabhāṣaṇam॥

The one who bears a staff (ascetic) shall be un-falteringly firm in celibacy. Looking at, touching, sporting, talking about, entering into secret dialogue, imagining, thinking about, or physical enjoyment (with women) - this is what the learned call the eightfold cohabitation. Brahmacharya [celibacy] is the contrary. It should be observed by those who seek Liberation.

संन्यासी को आलस्य प्रमाद से रहित होकर संयमपूर्वक ब्रह्मचर्य व्रत धारण करते हुए जीवनयापन करना चाहिए। स्त्रियों का दर्शन, स्पर्श, क्रीड़ा, चर्चा, गुह्य (काम तत्त्व से सम्बन्धित) विषयों की बात-चीत, काम सङ्कल्प, सम्भोग के लिए प्रयत्न तथा सम्भोग की क्रिया-ये आठ प्रकार के मैथुन विद्वान् पुरुषों के द्वारा बताये गये हैं। उक्त आठ प्रकार के मैथुन के त्याग रूप ब्रह्मचर्य का पालन मोक्ष प्राप्ति की इच्छा रखने वाले लोगों को करना चाहिए ॥


10.0

संकल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिवृत्तिरेव च। एतन्मैथुनमष्टाङ्गं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥

saṃkalpo'dhyavasāyaśca kriyānivṛttireva ca। etanmaithunamaṣṭāṅgaṃ pravadanti manīṣiṇaḥ ॥

The one who bears a staff (ascetic) shall be un-falteringly firm in celibacy. Looking at, touching, sporting, talking about, entering into secret dialogue, imagining, thinking about, or physical enjoyment (with women) - this is what the learned call the eightfold cohabitation. Brahmacharya [celibacy] is the contrary. It should be observed by those who seek Liberation.

संन्यासी को आलस्य प्रमाद से रहित होकर संयमपूर्वक ब्रह्मचर्य व्रत धारण करते हुए जीवनयापन करना चाहिए। स्त्रियों का दर्शन, स्पर्श, क्रीड़ा, चर्चा, गुह्य (काम तत्त्व से सम्बन्धित) विषयों की बात-चीत, काम सङ्कल्प, सम्भोग के लिए प्रयत्न तथा सम्भोग की क्रिया-ये आठ प्रकार के मैथुन विद्वान् पुरुषों के द्वारा बताये गये हैं। उक्त आठ प्रकार के मैथुन के त्याग रूप ब्रह्मचर्य का पालन मोक्ष प्राप्ति की इच्छा रखने वाले लोगों को करना चाहिए ॥


11.0

विपरीतं ब्रह्मचर्यमनुष्ठेयं मुमुक्षुभिः । यज्जगद्धासकं भानं नित्यं भाति स्वतः स्फुरत् ॥

viparītaṃ brahmacaryamanuṣṭheyaṃ mumukṣubhiḥ । yajjagaddhāsakaṃ bhānaṃ nityaṃ bhāti svataḥ sphurat ॥

The one who bears a staff (ascetic) shall be un-falteringly firm in celibacy. Looking at, touching, sporting, talking about, entering into secret dialogue, imagining, thinking about, or physical enjoyment (with women) - this is what the learned call the eightfold cohabitation. Brahmacharya [celibacy] is the contrary. It should be observed by those who seek Liberation.

संन्यासी को आलस्य प्रमाद से रहित होकर संयमपूर्वक ब्रह्मचर्य व्रत धारण करते हुए जीवनयापन करना चाहिए। स्त्रियों का दर्शन, स्पर्श, क्रीड़ा, चर्चा, गुह्य (काम तत्त्व से सम्बन्धित) विषयों की बात-चीत, काम सङ्कल्प, सम्भोग के लिए प्रयत्न तथा सम्भोग की क्रिया-ये आठ प्रकार के मैथुन विद्वान् पुरुषों के द्वारा बताये गये हैं। उक्त आठ प्रकार के मैथुन के त्याग रूप ब्रह्मचर्य का पालन मोक्ष प्राप्ति की इच्छा रखने वाले लोगों को करना चाहिए ॥


12.0

स एष जगतः साक्षी सर्वात्मा विमलाकृतिः । प्रतिष्ठा सर्वभूतानां प्रज्ञानघनलक्षणः ॥

sa eṣa jagataḥ sākṣī sarvātmā vimalākṛtiḥ । pratiṣṭhā sarvabhūtānāṃ prajñānaghanalakṣaṇaḥ ॥

The self-effulgent light which illumines the world ever shines. It is indeed the witness of the world, the Self of all, pure in form, the basis of all beings, whose nature is pure consciousness.

जो जगत् को प्रकाश देने वाला है, नित्य प्रकाश रूप में स्वप्रकाशित है, वही समस्त जगत् का साक्षी है, निर्मल आकृति वाला (वह) सभी की आत्मा है। वह प्रज्ञानघन के रूप में है, समस्त प्राणि- समुदाय उसी ब्रह्म में प्रतिष्ठित हैं। मनुष्य परब्रह्म परमात्मा को न कर्म के द्वारा, न सन्तान के द्वारा और न ही दूसरे अन्य किसी साधन के द्वारा पा सकता है; अपितु वह उस परब्रह्म को ब्रह्मानुभव के द्वारा ही प्राप्त कर सकता है ॥


13.0

न कर्मणा न प्रजया न चान्येनापि केनचित्। ब्रह्मवेदनमात्रेण ब्रह्माप्नोत्येव मानवः ।।

na karmaṇā na prajayā na cānyenāpi kenacit। brahmavedanamātreṇa brahmāpnotyeva mānavaḥ ।।

Not by action, not by (begetting) children, not by anything else, only by knowing Brahman, man attains Brahman.

जो जगत् को प्रकाश देने वाला है, नित्य प्रकाश रूप में स्वप्रकाशित है, वही समस्त जगत् का साक्षी है, निर्मल आकृति वाला (वह) सभी की आत्मा है। वह प्रज्ञानघन के रूप में है, समस्त प्राणि- समुदाय उसी ब्रह्म में प्रतिष्ठित हैं। मनुष्य परब्रह्म परमात्मा को न कर्म के द्वारा, न सन्तान के द्वारा और न ही दूसरे अन्य किसी साधन के द्वारा पा सकता है; अपितु वह उस परब्रह्म को ब्रह्मानुभव के द्वारा ही प्राप्त कर सकता है ॥


14.0

तद्विद्याविषयं ब्रह्म सत्यज्ञानसुखाद्वयम्। सारे च गुहावाच्ये मायाज्ञानादिसंज्ञिके ॥

tadvidyāviṣayaṃ brahma satyajñānasukhādvayam। sāre ca guhāvācye māyājñānādisaṃjñike ॥

That Brahman, which is without a second, and which is Truth, Knowledge and Happiness, is the object of (real) knowing. The best of the twice-born, who know Brahman residing in the cave which is called the highest heaven, during his transmigratory existence known as 'illusion', 'ignorance', etc., attain all desired things instantaneously.

वह सत्य-ज्ञान-आनन्द स्वरूप अद्वितीय ब्रह्म इस माया, अज्ञान एवं गुहा आदि नामों से कहे जाने वाले संसार में विद्यमान है। उस ब्रह्म को मात्र विद्या (साद्ज्ञान) के माध्यम से ही जाना जाता है। जो मनुष्य परम व्योम रूपी नित्य धाम में विद्यमान इस अविनाशी ब्रह्म को जानता है, वह (द्विजों में श्रेष्ठ) ब्राह्मण क्रमानुसार समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। उसकी सभी इच्छाएँ पूर्ण हो जाती है। अज्ञान एवं माया शक्ति के साक्षीरूप प्रत्यगात्मा को जो मनुष्य ‘मैं एक ब्रह्मस्वरूप हूँ’ इस प्रकार जानता है, वह (मनुष्य) स्वयं ही ब्रह्मस्वरूप हो जाता है ॥


15.0

निहितं ब्रह्म यो वेद परमे व्योग्नि संज्ञिते । सोऽश्नुते सकलान्कामान्क्रमेणैव द्विजोत्तमः ॥

nihitaṃ brahma yo veda parame vyogni saṃjñite । so'śnute sakalānkāmānkrameṇaiva dvijottamaḥ ॥

That Brahman, which is without a second, and which is Truth, Knowledge and Happiness, is the object of (real) knowing. The best of the twice-born, who know Brahman residing in the cave which is called the highest heaven, during his transmigratory existence known as 'illusion', 'ignorance', etc., attain all desired things instantaneously.

वह सत्य-ज्ञान-आनन्द स्वरूप अद्वितीय ब्रह्म इस माया, अज्ञान एवं गुहा आदि नामों से कहे जाने वाले संसार में विद्यमान है। उस ब्रह्म को मात्र विद्या (साद्ज्ञान) के माध्यम से ही जाना जाता है। जो मनुष्य परम व्योम रूपी नित्य धाम में विद्यमान इस अविनाशी ब्रह्म को जानता है, वह (द्विजों में श्रेष्ठ) ब्राह्मण क्रमानुसार समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। उसकी सभी इच्छाएँ पूर्ण हो जाती है। अज्ञान एवं माया शक्ति के साक्षीरूप प्रत्यगात्मा को जो मनुष्य ‘मैं एक ब्रह्मस्वरूप हूँ’ इस प्रकार जानता है, वह (मनुष्य) स्वयं ही ब्रह्मस्वरूप हो जाता है ॥


16.0

प्रत्यगात्मानमज्ञानमायाशक्तेश्च साक्षिणम्।एकं ब्रह्माहमस्मीति ब्रह्मैव भवति स्वयम्॥

pratyagātmānamajñānamāyāśakteśca sākṣiṇam।ekaṃ brahmāhamasmīti brahmaiva bhavati svayam॥

He who realizes his own Self, which is the witness of the power called ignorance and illusion, knowing 'I am Brahman alone' becomes Brahman Itself.

वह सत्य-ज्ञान-आनन्द स्वरूप अद्वितीय ब्रह्म इस माया, अज्ञान एवं गुहा आदि नामों से कहे जाने वाले संसार में विद्यमान है। उस ब्रह्म को मात्र विद्या (साद्ज्ञान) के माध्यम से ही जाना जाता है। जो मनुष्य परम व्योम रूपी नित्य धाम में विद्यमान इस अविनाशी ब्रह्म को जानता है, वह (द्विजों में श्रेष्ठ) ब्राह्मण क्रमानुसार समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। उसकी सभी इच्छाएँ पूर्ण हो जाती है। अज्ञान एवं माया शक्ति के साक्षीरूप प्रत्यगात्मा को जो मनुष्य ‘मैं एक ब्रह्मस्वरूप हूँ’ इस प्रकार जानता है, वह (मनुष्य) स्वयं ही ब्रह्मस्वरूप हो जाता है ॥ [ब्रह्मराक्षात्कार का लेने वाले साधक को यह गुढ़ तथ्य समझ में आने लगता है कि अव्यक्त आत्मतत्व से किस प्रकार व्यक्त सृष्टि प्रकट होती है। सृष्टि का यह क्रम आगे के मंत्रों में स्पष्ट किया गया है।]


17.0

ब्रह्मभूतात्मनस्तस्मादेतस्माच्छक्तिमिश्रितात्।अपञ्चीकृत आकाशः संभूतो रज्जुसर्पवत्॥

brahmabhūtātmanastasmādetasmācchaktimiśritāt।apañcīkṛta ākāśaḥ saṃbhūto rajjusarpavat॥

From this Self which is one with Brahman and which is possessed of power (i.e. maya) arose the un-manifest ether (Akasa) like a rope-serpent.

शक्ति सम्पन्न इस ब्रह्म रूप आत्मा से उसी प्रकार अपञ्चीकृत आकाश अर्थात् शब्द आदि तन्मात्राएँ उत्पन्न हुई, जिस प्रकार रज्जु (रस्सी) में सर्प को प्रतोति होती है। इसके पश्चात् पुनः आकाश से वायु संज्ञक अपञ्चीकृत स्पर्श-तन्मात्राओं की उत्पत्ति हुई। तदनन्तर वायु से अग्नि की उत्पत्ति, अग्नि से जल की उत्पत्ति और जल से पृथिवी की उत्पत्ति हुई। उन सूक्ष्म भूतों को शिवस्वरूप ईश्वर ने पञ्चीकृत करके उन्हीं से ब्रह्माण्ड आदि की रचना की। ब्रह्माण्ड के उदर में समस्त भूत-प्राणियों के पूर्वकृत कर्मानुसार देव, दानव, यक्ष, किन्नर, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि योनियों की सृष्टि-रचना हुई ॥ [रस्सी में साँप की प्रतीति तभी तक होती है, जब तक देखने वाले की दृष्टि यथार्थ तक नहीं पहुंच पाती। पदार्थ की रचना की प्राथमिक इकाई परमाणु है। सभी पदार्थों के परमाणु इलैक्ट्रॉन, प्रोट्रॉन, न्यूट्रॉन आदि के विविध संयोगों से ही बने हैं। उन उपकणों (सबएटामिक पॉर्टिकल्स) को देख सकने वाले के लिए सभी पदार्थों का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। इस प्रकार मूल तत्व आत्म तत्त्व को देख पाने वाले के लिए यह संसार एक भ्रम जैसा ही रह जाता है।]


18.0

आकाशाद्वायुसंज्ञस्तु स्पर्शोऽपञ्चीकृतः पुनः ।वायोरग्निस्तथा चाग्नेराप अद्भ्यो वसुन्धरा ॥

ākāśādvāyusaṃjñastu sparśo'pañcīkṛtaḥ punaḥ ।vāyoragnistathā cāgnerāpa adbhyo vasundharā ॥

Then from the ether emerged the un-manifest touch which is named 'air' (Vayu). Then from air emerged fire; from fire, water; and from water, the earth. 19. Then after dividing and compounding all those subtle (elements) into five, from them alone the auspicious Lord created the cosmic egg. 20. Enfolded in the cosmic egg are gods, anti-gods, Yakshas, Kinnaras, human beings, animals, birds, etc., in accordance with (the result of) their own actions.

शक्ति सम्पन्न इस ब्रह्म रूप आत्मा से उसी प्रकार अपञ्चीकृत आकाश अर्थात् शब्द आदि तन्मात्राएँ उत्पन्न हुई, जिस प्रकार रज्जु (रस्सी) में सर्प को प्रतोति होती है। इसके पश्चात् पुनः आकाश से वायु संज्ञक अपञ्चीकृत स्पर्श-तन्मात्राओं की उत्पत्ति हुई। तदनन्तर वायु से अग्नि की उत्पत्ति, अग्नि से जल की उत्पत्ति और जल से पृथिवी की उत्पत्ति हुई। उन सूक्ष्म भूतों को शिवस्वरूप ईश्वर ने पञ्चीकृत करके उन्हीं से ब्रह्माण्ड आदि की रचना की। ब्रह्माण्ड के उदर में समस्त भूत-प्राणियों के पूर्वकृत कर्मानुसार देव, दानव, यक्ष, किन्नर, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि योनियों की सृष्टि-रचना हुई ॥ [रस्सी में साँप की प्रतीति तभी तक होती है, जब तक देखने वाले की दृष्टि यथार्थ तक नहीं पहुंच पाती। पदार्थ की रचना की प्राथमिक इकाई परमाणु है। सभी पदार्थों के परमाणु इलैक्ट्रॉन, प्रोट्रॉन, न्यूट्रॉन आदि के विविध संयोगों से ही बने हैं। उन उपकणों (सबएटामिक पॉर्टिकल्स) को देख सकने वाले के लिए सभी पदार्थों का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। इस प्रकार मूल तत्व आत्म तत्त्व को देख पाने वाले के लिए यह संसार एक भ्रम जैसा ही रह जाता है।]


19.0

तानि सर्वाणि सूक्ष्माणि पञ्चीकृत्येश्वरस्तदा। तेभ्य एव विसृष्टं तद्ब्रह्माण्डादि शिवेन ह॥

tāni sarvāṇi sūkṣmāṇi pañcīkṛtyeśvarastadā। tebhya eva visṛṣṭaṃ tadbrahmāṇḍādi śivena ha॥

शक्ति सम्पन्न इस ब्रह्म रूप आत्मा से उसी प्रकार अपञ्चीकृत आकाश अर्थात् शब्द आदि तन्मात्राएँ उत्पन्न हुई, जिस प्रकार रज्जु (रस्सी) में सर्प को प्रतोति होती है। इसके पश्चात् पुनः आकाश से वायु संज्ञक अपञ्चीकृत स्पर्श-तन्मात्राओं की उत्पत्ति हुई। तदनन्तर वायु से अग्नि की उत्पत्ति, अग्नि से जल की उत्पत्ति और जल से पृथिवी की उत्पत्ति हुई। उन सूक्ष्म भूतों को शिवस्वरूप ईश्वर ने पञ्चीकृत करके उन्हीं से ब्रह्माण्ड आदि की रचना की। ब्रह्माण्ड के उदर में समस्त भूत-प्राणियों के पूर्वकृत कर्मानुसार देव, दानव, यक्ष, किन्नर, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि योनियों की सृष्टि-रचना हुई ॥ [रस्सी में साँप की प्रतीति तभी तक होती है, जब तक देखने वाले की दृष्टि यथार्थ तक नहीं पहुंच पाती। पदार्थ की रचना की प्राथमिक इकाई परमाणु है। सभी पदार्थों के परमाणु इलैक्ट्रॉन, प्रोट्रॉन, न्यूट्रॉन आदि के विविध संयोगों से ही बने हैं। उन उपकणों (सबएटामिक पॉर्टिकल्स) को देख सकने वाले के लिए सभी पदार्थों का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। इस प्रकार मूल तत्व आत्म तत्त्व को देख पाने वाले के लिए यह संसार एक भ्रम जैसा ही रह जाता है।]


20.0

ब्रह्माण्डस्योदरे देवा दानवा यक्षकिन्नराः। मनुष्याः पशुपक्ष्याद्यास्तत्तत्कर्मानुसारतः ॥

brahmāṇḍasyodare devā dānavā yakṣakinnarāḥ। manuṣyāḥ paśupakṣyādyāstattatkarmānusārataḥ ॥

शक्ति सम्पन्न इस ब्रह्म रूप आत्मा से उसी प्रकार अपञ्चीकृत आकाश अर्थात् शब्द आदि तन्मात्राएँ उत्पन्न हुई, जिस प्रकार रज्जु (रस्सी) में सर्प को प्रतोति होती है। इसके पश्चात् पुनः आकाश से वायु संज्ञक अपञ्चीकृत स्पर्श-तन्मात्राओं की उत्पत्ति हुई। तदनन्तर वायु से अग्नि की उत्पत्ति, अग्नि से जल की उत्पत्ति और जल से पृथिवी की उत्पत्ति हुई। उन सूक्ष्म भूतों को शिवस्वरूप ईश्वर ने पञ्चीकृत करके उन्हीं से ब्रह्माण्ड आदि की रचना की। ब्रह्माण्ड के उदर में समस्त भूत-प्राणियों के पूर्वकृत कर्मानुसार देव, दानव, यक्ष, किन्नर, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि योनियों की सृष्टि-रचना हुई ॥ [रस्सी में साँप की प्रतीति तभी तक होती है, जब तक देखने वाले की दृष्टि यथार्थ तक नहीं पहुंच पाती। पदार्थ की रचना की प्राथमिक इकाई परमाणु है। सभी पदार्थों के परमाणु इलैक्ट्रॉन, प्रोट्रॉन, न्यूट्रॉन आदि के विविध संयोगों से ही बने हैं। उन उपकणों (सबएटामिक पॉर्टिकल्स) को देख सकने वाले के लिए सभी पदार्थों का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। इस प्रकार मूल तत्व आत्म तत्त्व को देख पाने वाले के लिए यह संसार एक भ्रम जैसा ही रह जाता है।]


21.0

अस्थिस्न्नाय्वादिरूपोऽयं शरीरं भाति देहिनाम्। योऽयमन्त्रमयो ह्यात्मा भाति सर्वशरीरिणः ॥

asthisnnāyvādirūpo'yaṃ śarīraṃ bhāti dehinām। yo'yamantramayo hyātmā bhāti sarvaśarīriṇaḥ ॥

The bodies of beings which appear in the form of (a framework of) bones, sinews, etc., is the self of the nature of food for the all-pervading Self.

अस्थि, स्नायु आदि से निर्मित यह समस्त जीवों का शरीर भी अपने कर्मानुसार ही प्रकाशित हो रहा है। सभी शरीर धारण करने वालों का यह जो अन्नमय आत्मा स्थूल शरीर के माध्यम से प्रकाशित हो रहा है, उससे पृथक् एक प्राणमय आत्मा और है, जो कि इस अन्नमय आत्मा के अन्दर विद्यमान है। इससे भी सूक्ष्म और भिन्न मनोमय आत्मा है, जो प्राणमय के अन्दर स्थित है। इससे सूक्ष्म विज्ञानमय आत्मा है, जो मनोमय आत्मा के अन्दर विद्यमान है। इससे भी अतिसूक्ष्म आनन्दमय आत्मा है, जो विज्ञानमय आत्मा के अन्दर स्थित है। अन्नमय आत्मा प्राणमय से परिपूर्ण है, वैसे ही प्राणमय आत्मा स्वभावानुसार मनोमय आत्मा से पूर्ण है। मनोमय आत्मा विज्ञानमय से पूर्ण है तथा सदा सुखस्वरूप विज्ञानमय आत्मा आनन्दमय से परिपूर्ण रहता है। आनन्दमय आत्मा अपने से अलग साक्षिरूप सर्वत्र व्याप्त, अन्तर्यामी ब्रह्म के द्वारा परिपूर्ण है। वह ब्रह्म किसी दूसरे के द्वारा नहीं; वरन् अपने आप ही सभी तरफ से परिपूर्ण है ॥ [यहाँ पंच कोश और पंचात्मा का मर्म स्पष्ट किया गया है। हर काया को आकार अन्नमय से, ऊर्जा प्राणमय से, कामना मनोमय से, नैसर्गिक विभूतियाँ आदि विज्ञानमय से तथा आनन्दानुभूति आनन्दमयकोश से प्राप्त होती है। किसी स्थूल माध्यम से व्यक्त होने के कारण उसे आत्मा तथा किसी सूक्ष्म से परिपूर्ण होने के नाते उसे कोश कहा गया है।]


22.0

ततः प्राणमयो यात्मा विभिन्नश्चान्तरस्थितः । ततो मनोमयो ह्यात्मा विभिन्न श्चान्तरस्थितः ॥

tataḥ prāṇamayo yātmā vibhinnaścāntarasthitaḥ । tato manomayo hyātmā vibhinna ścāntarasthitaḥ ॥

Then, further within, is the self of Prana [vital energy] split (into five). Still further within is the self of the nature of mind which is different (from the others).

अस्थि, स्नायु आदि से निर्मित यह समस्त जीवों का शरीर भी अपने कर्मानुसार ही प्रकाशित हो रहा है। सभी शरीर धारण करने वालों का यह जो अन्नमय आत्मा स्थूल शरीर के माध्यम से प्रकाशित हो रहा है, उससे पृथक् एक प्राणमय आत्मा और है, जो कि इस अन्नमय आत्मा के अन्दर विद्यमान है। इससे भी सूक्ष्म और भिन्न मनोमय आत्मा है, जो प्राणमय के अन्दर स्थित है। इससे सूक्ष्म विज्ञानमय आत्मा है, जो मनोमय आत्मा के अन्दर विद्यमान है। इससे भी अतिसूक्ष्म आनन्दमय आत्मा है, जो विज्ञानमय आत्मा के अन्दर स्थित है। अन्नमय आत्मा प्राणमय से परिपूर्ण है, वैसे ही प्राणमय आत्मा स्वभावानुसार मनोमय आत्मा से पूर्ण है। मनोमय आत्मा विज्ञानमय से पूर्ण है तथा सदा सुखस्वरूप विज्ञानमय आत्मा आनन्दमय से परिपूर्ण रहता है। आनन्दमय आत्मा अपने से अलग साक्षिरूप सर्वत्र व्याप्त, अन्तर्यामी ब्रह्म के द्वारा परिपूर्ण है। वह ब्रह्म किसी दूसरे के द्वारा नहीं; वरन् अपने आप ही सभी तरफ से परिपूर्ण है ॥ [यहाँ पंच कोश और पंचात्मा का मर्म स्पष्ट किया गया है। हर काया को आकार अन्नमय से, ऊर्जा प्राणमय से, कामना मनोमय से, नैसर्गिक विभूतियाँ आदि विज्ञानमय से तथा आनन्दानुभूति आनन्दमयकोश से प्राप्त होती है। किसी स्थूल माध्यम से व्यक्त होने के कारण उसे आत्मा तथा किसी सूक्ष्म से परिपूर्ण होने के नाते उसे कोश कहा गया है।]


23.0

ततो विज्ञान आत्मा तु ततोऽन्यश्चान्तरः स्वतः।आनन्दमय आत्मा तु ततोऽन्यश्चान्तरस्थितः ॥

tato vijñāna ātmā tu tato'nyaścāntaraḥ svataḥ।ānandamaya ātmā tu tato'nyaścāntarasthitaḥ ॥

Next, even further within and different is the self of the nature of knowledge. Then, in the interior, distinct, is the self of the nature of bliss.

अस्थि, स्नायु आदि से निर्मित यह समस्त जीवों का शरीर भी अपने कर्मानुसार ही प्रकाशित हो रहा है। सभी शरीर धारण करने वालों का यह जो अन्नमय आत्मा स्थूल शरीर के माध्यम से प्रकाशित हो रहा है, उससे पृथक् एक प्राणमय आत्मा और है, जो कि इस अन्नमय आत्मा के अन्दर विद्यमान है। इससे भी सूक्ष्म और भिन्न मनोमय आत्मा है, जो प्राणमय के अन्दर स्थित है। इससे सूक्ष्म विज्ञानमय आत्मा है, जो मनोमय आत्मा के अन्दर विद्यमान है। इससे भी अतिसूक्ष्म आनन्दमय आत्मा है, जो विज्ञानमय आत्मा के अन्दर स्थित है। अन्नमय आत्मा प्राणमय से परिपूर्ण है, वैसे ही प्राणमय आत्मा स्वभावानुसार मनोमय आत्मा से पूर्ण है। मनोमय आत्मा विज्ञानमय से पूर्ण है तथा सदा सुखस्वरूप विज्ञानमय आत्मा आनन्दमय से परिपूर्ण रहता है। आनन्दमय आत्मा अपने से अलग साक्षिरूप सर्वत्र व्याप्त, अन्तर्यामी ब्रह्म के द्वारा परिपूर्ण है। वह ब्रह्म किसी दूसरे के द्वारा नहीं; वरन् अपने आप ही सभी तरफ से परिपूर्ण है ॥ [यहाँ पंच कोश और पंचात्मा का मर्म स्पष्ट किया गया है। हर काया को आकार अन्नमय से, ऊर्जा प्राणमय से, कामना मनोमय से, नैसर्गिक विभूतियाँ आदि विज्ञानमय से तथा आनन्दानुभूति आनन्दमयकोश से प्राप्त होती है। किसी स्थूल माध्यम से व्यक्त होने के कारण उसे आत्मा तथा किसी सूक्ष्म से परिपूर्ण होने के नाते उसे कोश कहा गया है।]

Text (part 2)

24.0

योऽयमन्त्रमयः सोऽयं पूर्णः प्राणमयेन तु । मनोमयेन प्राणोऽपि तथा पूर्णः स्वभावतः ॥

yo'yamantramayaḥ so'yaṃ pūrṇaḥ prāṇamayena tu । manomayena prāṇo'pi tathā pūrṇaḥ svabhāvataḥ ॥

That (self) of the nature of food is pervaded by (the self) of the nature of vital energy; similarly (the self of) vital energy is by the nature (pervaded) by (the self) of the nature of mind

अस्थि, स्नायु आदि से निर्मित यह समस्त जीवों का शरीर भी अपने कर्मानुसार ही प्रकाशित हो रहा है। सभी शरीर धारण करने वालों का यह जो अन्नमय आत्मा स्थूल शरीर के माध्यम से प्रकाशित हो रहा है, उससे पृथक् एक प्राणमय आत्मा और है, जो कि इस अन्नमय आत्मा के अन्दर विद्यमान है। इससे भी सूक्ष्म और भिन्न मनोमय आत्मा है, जो प्राणमय के अन्दर स्थित है। इससे सूक्ष्म विज्ञानमय आत्मा है, जो मनोमय आत्मा के अन्दर विद्यमान है। इससे भी अतिसूक्ष्म आनन्दमय आत्मा है, जो विज्ञानमय आत्मा के अन्दर स्थित है। अन्नमय आत्मा प्राणमय से परिपूर्ण है, वैसे ही प्राणमय आत्मा स्वभावानुसार मनोमय आत्मा से पूर्ण है। मनोमय आत्मा विज्ञानमय से पूर्ण है तथा सदा सुखस्वरूप विज्ञानमय आत्मा आनन्दमय से परिपूर्ण रहता है। आनन्दमय आत्मा अपने से अलग साक्षिरूप सर्वत्र व्याप्त, अन्तर्यामी ब्रह्म के द्वारा परिपूर्ण है। वह ब्रह्म किसी दूसरे के द्वारा नहीं; वरन् अपने आप ही सभी तरफ से परिपूर्ण है ॥ [यहाँ पंच कोश और पंचात्मा का मर्म स्पष्ट किया गया है। हर काया को आकार अन्नमय से, ऊर्जा प्राणमय से, कामना मनोमय से, नैसर्गिक विभूतियाँ आदि विज्ञानमय से तथा आनन्दानुभूति आनन्दमयकोश से प्राप्त होती है। किसी स्थूल माध्यम से व्यक्त होने के कारण उसे आत्मा तथा किसी सूक्ष्म से परिपूर्ण होने के नाते उसे कोश कहा गया है।]


25.0

तथा मनोमयो ह्यात्मा पूर्णो ज्ञानमयेन तु। आनन्देन सदा पूर्णः सदा ज्ञानमयः सुखम्॥

tathā manomayo hyātmā pūrṇo jñānamayena tu। ānandena sadā pūrṇaḥ sadā jñānamayaḥ sukham॥

The mind-self is pervaded by the self of knowledge. The ever-happy self of the nature of knowledge is always pervaded by bliss.

अस्थि, स्नायु आदि से निर्मित यह समस्त जीवों का शरीर भी अपने कर्मानुसार ही प्रकाशित हो रहा है। सभी शरीर धारण करने वालों का यह जो अन्नमय आत्मा स्थूल शरीर के माध्यम से प्रकाशित हो रहा है, उससे पृथक् एक प्राणमय आत्मा और है, जो कि इस अन्नमय आत्मा के अन्दर विद्यमान है। इससे भी सूक्ष्म और भिन्न मनोमय आत्मा है, जो प्राणमय के अन्दर स्थित है। इससे सूक्ष्म विज्ञानमय आत्मा है, जो मनोमय आत्मा के अन्दर विद्यमान है। इससे भी अतिसूक्ष्म आनन्दमय आत्मा है, जो विज्ञानमय आत्मा के अन्दर स्थित है। अन्नमय आत्मा प्राणमय से परिपूर्ण है, वैसे ही प्राणमय आत्मा स्वभावानुसार मनोमय आत्मा से पूर्ण है। मनोमय आत्मा विज्ञानमय से पूर्ण है तथा सदा सुखस्वरूप विज्ञानमय आत्मा आनन्दमय से परिपूर्ण रहता है। आनन्दमय आत्मा अपने से अलग साक्षिरूप सर्वत्र व्याप्त, अन्तर्यामी ब्रह्म के द्वारा परिपूर्ण है। वह ब्रह्म किसी दूसरे के द्वारा नहीं; वरन् अपने आप ही सभी तरफ से परिपूर्ण है ॥ [यहाँ पंच कोश और पंचात्मा का मर्म स्पष्ट किया गया है। हर काया को आकार अन्नमय से, ऊर्जा प्राणमय से, कामना मनोमय से, नैसर्गिक विभूतियाँ आदि विज्ञानमय से तथा आनन्दानुभूति आनन्दमयकोश से प्राप्त होती है। किसी स्थूल माध्यम से व्यक्त होने के कारण उसे आत्मा तथा किसी सूक्ष्म से परिपूर्ण होने के नाते उसे कोश कहा गया है।]


26.0

तथानन्दमय श्चापि ब्रह्मणोऽन्येन साक्षिणा। सर्वान्तरेण पूर्णश्च ब्रह्म नान्येन केनचित्॥

tathānandamaya ścāpi brahmaṇo'nyena sākṣiṇā। sarvāntareṇa pūrṇaśca brahma nānyena kenacit॥

In the same way, the self of bliss is pervaded by Brahman, the witness, the innermost of all. Brahman is not (pervaded) by anything else.

अस्थि, स्नायु आदि से निर्मित यह समस्त जीवों का शरीर भी अपने कर्मानुसार ही प्रकाशित हो रहा है। सभी शरीर धारण करने वालों का यह जो अन्नमय आत्मा स्थूल शरीर के माध्यम से प्रकाशित हो रहा है, उससे पृथक् एक प्राणमय आत्मा और है, जो कि इस अन्नमय आत्मा के अन्दर विद्यमान है। इससे भी सूक्ष्म और भिन्न मनोमय आत्मा है, जो प्राणमय के अन्दर स्थित है। इससे सूक्ष्म विज्ञानमय आत्मा है, जो मनोमय आत्मा के अन्दर विद्यमान है। इससे भी अतिसूक्ष्म आनन्दमय आत्मा है, जो विज्ञानमय आत्मा के अन्दर स्थित है। अन्नमय आत्मा प्राणमय से परिपूर्ण है, वैसे ही प्राणमय आत्मा स्वभावानुसार मनोमय आत्मा से पूर्ण है। मनोमय आत्मा विज्ञानमय से पूर्ण है तथा सदा सुखस्वरूप विज्ञानमय आत्मा आनन्दमय से परिपूर्ण रहता है। आनन्दमय आत्मा अपने से अलग साक्षिरूप सर्वत्र व्याप्त, अन्तर्यामी ब्रह्म के द्वारा परिपूर्ण है। वह ब्रह्म किसी दूसरे के द्वारा नहीं; वरन् अपने आप ही सभी तरफ से परिपूर्ण है ॥ [यहाँ पंच कोश और पंचात्मा का मर्म स्पष्ट किया गया है। हर काया को आकार अन्नमय से, ऊर्जा प्राणमय से, कामना मनोमय से, नैसर्गिक विभूतियाँ आदि विज्ञानमय से तथा आनन्दानुभूति आनन्दमयकोश से प्राप्त होती है। किसी स्थूल माध्यम से व्यक्त होने के कारण उसे आत्मा तथा किसी सूक्ष्म से परिपूर्ण होने के नाते उसे कोश कहा गया है।]


27.0

यदिदं ब्रह्मपुच्छाख्यं सत्यज्ञानाद्वयात्मकम् । सारमेव रसं लब्ध्वा साक्षाद्देही सनातनम् ॥

yadidaṃ brahmapucchākhyaṃ satyajñānādvayātmakam । sārameva rasaṃ labdhvā sākṣāddehī sanātanam ॥

By realizing directly this Brahman, which is named the Support (the Tail puccha), which is of the nature of truth, knowledge and non-duality, the essence, the joy, the eternal, the dweller in the body becomes happy everywhere. Where from otherwise can there be happiness?

जो यह ज्ञान एवं सत्य के रूप में अद्वितीय परब्रह्म है, वही सबका आश्रय-स्थल है। यह सबका सार एवं रसस्वरूप है । उस सनातन तत्त्व को पाकर के यह देही (जीवात्मा) सर्वत्र सुखानुभव प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त अन्यत्र सुख का भाव कहाँ है? सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के आत्मस्वरूप इस परानन्द (परमानन्द) ब्रह्म के उपस्थित न रहने पर भला कौन मनुष्य जीवित रह सकता है अथवा कौन-सा प्राणी नित्य चेष्टा करता है? अतः जो सर्वान्तर्यामी रूप से सभी के चित्त में प्रतिभासित होता है, वही परब्रह्म अविनाशी परमात्मा दुःखों से घिरे हुए जीवात्मा को सदैव आनन्द प्रदान करता है। जो अदृश्यत्व आदि लक्षणों से युक्त इस पर-तत्व से अभेदरूप परम अद्वैतरूप ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है, वहीं महायति (संन्यासी) है। देश-काल एवं पात्र से अपरिच्छिन्न, सत्यस्वरूप परब्रह्म ही अभयपद, परम अमृततुल्य एवं कल्याणमय है। जब तक मनुष्य को इसमें थोड़ा भी व्यवधान दृष्टिगोचर होता है, तब तक उसे (जन्म-मृत्यु का) भय बना रहता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। छोटे से छोटे क्षुद्र तृण से लेकर भगवान् विष्णु तक सभी तारतम्य के अनुसार आनन्द रूप कोश से नित्य ही आनन्द की अनुभूति करते हैं। इस लोक और परलोक के भोगों से विरक्त, प्रसन्नमना श्रोत्रिय को यह स्वरूप भूत- आनन्द स्वयमेव अनुभूत होता है। यह अनुभूति उस परमात्म पद के अनुरूप ही होती है, वह शब्दों में व्यक्त नहीं हो सकती; क्योंकि शब्द तो किसी आश्रय के सहारे ही व्यक्त होता है। परातत्व में निमित्त का अभाव होने के कारण वाणी वहाँ से वापस लौट आती है। जो सभी विशेषों से रहित परानन्दरूप तत्त्व है, वहाँ पर शब्द की प्रवृत्ति किस प्रकार से हो? इसलिए यह मन अतिसूक्ष्म और सीमित शक्ति से युक्त होकर इधर-उधर सभी जगह गमन करता रहता है; क्योंकि श्रोत्र, त्वक् एवं नेत्रादि ज्ञानेन्द्रियाँ और शब्द स्पर्शादि उनके विषय तथा वाणी, हाथ-पैर आदि कर्मेन्द्रियाँ सीमित शक्ति वाली हैं॥


28.0

सुखी भवति सर्वत्र अन्यथा सुखिता कुतः। असत्यस्मिन्परानन्दे स्वात्मभूतेऽखिलात्मनाम्॥

sukhī bhavati sarvatra anyathā sukhitā kutaḥ। asatyasminparānande svātmabhūte'khilātmanām॥

By realizing directly this Brahman, which is named the Support (the Tail puccha), which is of the nature of truth, knowledge and non-duality, the essence, the joy, the eternal, the dweller in the body becomes happy everywhere. Where from otherwise can there be happiness?

जो यह ज्ञान एवं सत्य के रूप में अद्वितीय परब्रह्म है, वही सबका आश्रय-स्थल है। यह सबका सार एवं रसस्वरूप है । उस सनातन तत्त्व को पाकर के यह देही (जीवात्मा) सर्वत्र सुखानुभव प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त अन्यत्र सुख का भाव कहाँ है? सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के आत्मस्वरूप इस परानन्द (परमानन्द) ब्रह्म के उपस्थित न रहने पर भला कौन मनुष्य जीवित रह सकता है अथवा कौन-सा प्राणी नित्य चेष्टा करता है? अतः जो सर्वान्तर्यामी रूप से सभी के चित्त में प्रतिभासित होता है, वही परब्रह्म अविनाशी परमात्मा दुःखों से घिरे हुए जीवात्मा को सदैव आनन्द प्रदान करता है। जो अदृश्यत्व आदि लक्षणों से युक्त इस पर-तत्व से अभेदरूप परम अद्वैतरूप ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है, वहीं महायति (संन्यासी) है। देश-काल एवं पात्र से अपरिच्छिन्न, सत्यस्वरूप परब्रह्म ही अभयपद, परम अमृततुल्य एवं कल्याणमय है। जब तक मनुष्य को इसमें थोड़ा भी व्यवधान दृष्टिगोचर होता है, तब तक उसे (जन्म-मृत्यु का) भय बना रहता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। छोटे से छोटे क्षुद्र तृण से लेकर भगवान् विष्णु तक सभी तारतम्य के अनुसार आनन्द रूप कोश से नित्य ही आनन्द की अनुभूति करते हैं। इस लोक और परलोक के भोगों से विरक्त, प्रसन्नमना श्रोत्रिय को यह स्वरूप भूत- आनन्द स्वयमेव अनुभूत होता है। यह अनुभूति उस परमात्म पद के अनुरूप ही होती है, वह शब्दों में व्यक्त नहीं हो सकती; क्योंकि शब्द तो किसी आश्रय के सहारे ही व्यक्त होता है। परातत्व में निमित्त का अभाव होने के कारण वाणी वहाँ से वापस लौट आती है। जो सभी विशेषों से रहित परानन्दरूप तत्त्व है, वहाँ पर शब्द की प्रवृत्ति किस प्रकार से हो? इसलिए यह मन अतिसूक्ष्म और सीमित शक्ति से युक्त होकर इधर-उधर सभी जगह गमन करता रहता है; क्योंकि श्रोत्र, त्वक् एवं नेत्रादि ज्ञानेन्द्रियाँ और शब्द स्पर्शादि उनके विषय तथा वाणी, हाथ-पैर आदि कर्मेन्द्रियाँ सीमित शक्ति वाली हैं॥


29.0

को जीवति नरो जातु को वा नित्यं विचेष्टते । तस्मात्सर्वात्मना चित्ते भासमानो ह्यसौ नरः ॥

ko jīvati naro jātu ko vā nityaṃ viceṣṭate । tasmātsarvātmanā citte bhāsamāno hyasau naraḥ ॥

If this supreme bliss which is the very Self of all beings were not existent, which human being can be alive? Who can ever be active?

जो यह ज्ञान एवं सत्य के रूप में अद्वितीय परब्रह्म है, वही सबका आश्रय-स्थल है। यह सबका सार एवं रसस्वरूप है । उस सनातन तत्त्व को पाकर के यह देही (जीवात्मा) सर्वत्र सुखानुभव प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त अन्यत्र सुख का भाव कहाँ है? सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के आत्मस्वरूप इस परानन्द (परमानन्द) ब्रह्म के उपस्थित न रहने पर भला कौन मनुष्य जीवित रह सकता है अथवा कौन-सा प्राणी नित्य चेष्टा करता है? अतः जो सर्वान्तर्यामी रूप से सभी के चित्त में प्रतिभासित होता है, वही परब्रह्म अविनाशी परमात्मा दुःखों से घिरे हुए जीवात्मा को सदैव आनन्द प्रदान करता है। जो अदृश्यत्व आदि लक्षणों से युक्त इस पर-तत्व से अभेदरूप परम अद्वैतरूप ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है, वहीं महायति (संन्यासी) है। देश-काल एवं पात्र से अपरिच्छिन्न, सत्यस्वरूप परब्रह्म ही अभयपद, परम अमृततुल्य एवं कल्याणमय है। जब तक मनुष्य को इसमें थोड़ा भी व्यवधान दृष्टिगोचर होता है, तब तक उसे (जन्म-मृत्यु का) भय बना रहता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। छोटे से छोटे क्षुद्र तृण से लेकर भगवान् विष्णु तक सभी तारतम्य के अनुसार आनन्द रूप कोश से नित्य ही आनन्द की अनुभूति करते हैं। इस लोक और परलोक के भोगों से विरक्त, प्रसन्नमना श्रोत्रिय को यह स्वरूप भूत- आनन्द स्वयमेव अनुभूत होता है। यह अनुभूति उस परमात्म पद के अनुरूप ही होती है, वह शब्दों में व्यक्त नहीं हो सकती; क्योंकि शब्द तो किसी आश्रय के सहारे ही व्यक्त होता है। परातत्व में निमित्त का अभाव होने के कारण वाणी वहाँ से वापस लौट आती है। जो सभी विशेषों से रहित परानन्दरूप तत्त्व है, वहाँ पर शब्द की प्रवृत्ति किस प्रकार से हो? इसलिए यह मन अतिसूक्ष्म और सीमित शक्ति से युक्त होकर इधर-उधर सभी जगह गमन करता रहता है; क्योंकि श्रोत्र, त्वक् एवं नेत्रादि ज्ञानेन्द्रियाँ और शब्द स्पर्शादि उनके विषय तथा वाणी, हाथ-पैर आदि कर्मेन्द्रियाँ सीमित शक्ति वाली हैं॥


30.0

आनन्दयति दु:खाढयं जीवात्मानं सदा जनः । यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्यत्वादिलक्षणे ॥

ānandayati du:khāḍhayaṃ jīvātmānaṃ sadā janaḥ । yadā hyevaiṣa etasminnadṛśyatvādilakṣaṇe ॥

Therefore it is this Being, shining fully in the consciousness, that ever makes happy the individual self, which is otherwise full of sorrow.

जो यह ज्ञान एवं सत्य के रूप में अद्वितीय परब्रह्म है, वही सबका आश्रय-स्थल है। यह सबका सार एवं रसस्वरूप है । उस सनातन तत्त्व को पाकर के यह देही (जीवात्मा) सर्वत्र सुखानुभव प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त अन्यत्र सुख का भाव कहाँ है? सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के आत्मस्वरूप इस परानन्द (परमानन्द) ब्रह्म के उपस्थित न रहने पर भला कौन मनुष्य जीवित रह सकता है अथवा कौन-सा प्राणी नित्य चेष्टा करता है? अतः जो सर्वान्तर्यामी रूप से सभी के चित्त में प्रतिभासित होता है, वही परब्रह्म अविनाशी परमात्मा दुःखों से घिरे हुए जीवात्मा को सदैव आनन्द प्रदान करता है। जो अदृश्यत्व आदि लक्षणों से युक्त इस पर-तत्व से अभेदरूप परम अद्वैतरूप ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है, वहीं महायति (संन्यासी) है। देश-काल एवं पात्र से अपरिच्छिन्न, सत्यस्वरूप परब्रह्म ही अभयपद, परम अमृततुल्य एवं कल्याणमय है। जब तक मनुष्य को इसमें थोड़ा भी व्यवधान दृष्टिगोचर होता है, तब तक उसे (जन्म-मृत्यु का) भय बना रहता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। छोटे से छोटे क्षुद्र तृण से लेकर भगवान् विष्णु तक सभी तारतम्य के अनुसार आनन्द रूप कोश से नित्य ही आनन्द की अनुभूति करते हैं। इस लोक और परलोक के भोगों से विरक्त, प्रसन्नमना श्रोत्रिय को यह स्वरूप भूत- आनन्द स्वयमेव अनुभूत होता है। यह अनुभूति उस परमात्म पद के अनुरूप ही होती है, वह शब्दों में व्यक्त नहीं हो सकती; क्योंकि शब्द तो किसी आश्रय के सहारे ही व्यक्त होता है। परातत्व में निमित्त का अभाव होने के कारण वाणी वहाँ से वापस लौट आती है। जो सभी विशेषों से रहित परानन्दरूप तत्त्व है, वहाँ पर शब्द की प्रवृत्ति किस प्रकार से हो? इसलिए यह मन अतिसूक्ष्म और सीमित शक्ति से युक्त होकर इधर-उधर सभी जगह गमन करता रहता है; क्योंकि श्रोत्र, त्वक् एवं नेत्रादि ज्ञानेन्द्रियाँ और शब्द स्पर्शादि उनके विषय तथा वाणी, हाथ-पैर आदि कर्मेन्द्रियाँ सीमित शक्ति वाली हैं॥


31.0

निर्भेदं परमाद्वैतं विन्दते च महायतिः । तदेवाभयमित्यन्तं कल्याणं परमामृतम् ॥

nirbhedaṃ paramādvaitaṃ vindate ca mahāyatiḥ । tadevābhayamityantaṃ kalyāṇaṃ paramāmṛtam ॥

Only when the great ascetic realizes his complete unity without any difference from this, which is described as unseen, etc., he attains total fearlessness. This is the ultimate Good, supreme Immortality, absolute Existence, transcendent Brahman, beyond the three divisions (of time).

जो यह ज्ञान एवं सत्य के रूप में अद्वितीय परब्रह्म है, वही सबका आश्रय-स्थल है। यह सबका सार एवं रसस्वरूप है । उस सनातन तत्त्व को पाकर के यह देही (जीवात्मा) सर्वत्र सुखानुभव प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त अन्यत्र सुख का भाव कहाँ है? सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के आत्मस्वरूप इस परानन्द (परमानन्द) ब्रह्म के उपस्थित न रहने पर भला कौन मनुष्य जीवित रह सकता है अथवा कौन-सा प्राणी नित्य चेष्टा करता है? अतः जो सर्वान्तर्यामी रूप से सभी के चित्त में प्रतिभासित होता है, वही परब्रह्म अविनाशी परमात्मा दुःखों से घिरे हुए जीवात्मा को सदैव आनन्द प्रदान करता है। जो अदृश्यत्व आदि लक्षणों से युक्त इस पर-तत्व से अभेदरूप परम अद्वैतरूप ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है, वहीं महायति (संन्यासी) है। देश-काल एवं पात्र से अपरिच्छिन्न, सत्यस्वरूप परब्रह्म ही अभयपद, परम अमृततुल्य एवं कल्याणमय है। जब तक मनुष्य को इसमें थोड़ा भी व्यवधान दृष्टिगोचर होता है, तब तक उसे (जन्म-मृत्यु का) भय बना रहता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। छोटे से छोटे क्षुद्र तृण से लेकर भगवान् विष्णु तक सभी तारतम्य के अनुसार आनन्द रूप कोश से नित्य ही आनन्द की अनुभूति करते हैं। इस लोक और परलोक के भोगों से विरक्त, प्रसन्नमना श्रोत्रिय को यह स्वरूप भूत- आनन्द स्वयमेव अनुभूत होता है। यह अनुभूति उस परमात्म पद के अनुरूप ही होती है, वह शब्दों में व्यक्त नहीं हो सकती; क्योंकि शब्द तो किसी आश्रय के सहारे ही व्यक्त होता है। परातत्व में निमित्त का अभाव होने के कारण वाणी वहाँ से वापस लौट आती है। जो सभी विशेषों से रहित परानन्दरूप तत्त्व है, वहाँ पर शब्द की प्रवृत्ति किस प्रकार से हो? इसलिए यह मन अतिसूक्ष्म और सीमित शक्ति से युक्त होकर इधर-उधर सभी जगह गमन करता रहता है; क्योंकि श्रोत्र, त्वक् एवं नेत्रादि ज्ञानेन्द्रियाँ और शब्द स्पर्शादि उनके विषय तथा वाणी, हाथ-पैर आदि कर्मेन्द्रियाँ सीमित शक्ति वाली हैं॥


32.0

सद्रूपं परमं ब्रह्म त्रिपरिच्छेदवर्जितम् । यदा ह्येवैष एतस्मिन्नल्पमप्यन्तरं नरः ॥

sadrūpaṃ paramaṃ brahma triparicchedavarjitam । yadā hyevaiṣa etasminnalpamapyantaraṃ naraḥ ॥

Only when the great ascetic realizes his complete unity without any difference from this, which is described as unseen, etc., he attains total fearlessness. This is the ultimate Good, supreme Immortality, absolute Existence, transcendent Brahman, beyond the three divisions (of time).

जो यह ज्ञान एवं सत्य के रूप में अद्वितीय परब्रह्म है, वही सबका आश्रय-स्थल है। यह सबका सार एवं रसस्वरूप है । उस सनातन तत्त्व को पाकर के यह देही (जीवात्मा) सर्वत्र सुखानुभव प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त अन्यत्र सुख का भाव कहाँ है? सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के आत्मस्वरूप इस परानन्द (परमानन्द) ब्रह्म के उपस्थित न रहने पर भला कौन मनुष्य जीवित रह सकता है अथवा कौन-सा प्राणी नित्य चेष्टा करता है? अतः जो सर्वान्तर्यामी रूप से सभी के चित्त में प्रतिभासित होता है, वही परब्रह्म अविनाशी परमात्मा दुःखों से घिरे हुए जीवात्मा को सदैव आनन्द प्रदान करता है। जो अदृश्यत्व आदि लक्षणों से युक्त इस पर-तत्व से अभेदरूप परम अद्वैतरूप ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है, वहीं महायति (संन्यासी) है। देश-काल एवं पात्र से अपरिच्छिन्न, सत्यस्वरूप परब्रह्म ही अभयपद, परम अमृततुल्य एवं कल्याणमय है। जब तक मनुष्य को इसमें थोड़ा भी व्यवधान दृष्टिगोचर होता है, तब तक उसे (जन्म-मृत्यु का) भय बना रहता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। छोटे से छोटे क्षुद्र तृण से लेकर भगवान् विष्णु तक सभी तारतम्य के अनुसार आनन्द रूप कोश से नित्य ही आनन्द की अनुभूति करते हैं। इस लोक और परलोक के भोगों से विरक्त, प्रसन्नमना श्रोत्रिय को यह स्वरूप भूत- आनन्द स्वयमेव अनुभूत होता है। यह अनुभूति उस परमात्म पद के अनुरूप ही होती है, वह शब्दों में व्यक्त नहीं हो सकती; क्योंकि शब्द तो किसी आश्रय के सहारे ही व्यक्त होता है। परातत्व में निमित्त का अभाव होने के कारण वाणी वहाँ से वापस लौट आती है। जो सभी विशेषों से रहित परानन्दरूप तत्त्व है, वहाँ पर शब्द की प्रवृत्ति किस प्रकार से हो? इसलिए यह मन अतिसूक्ष्म और सीमित शक्ति से युक्त होकर इधर-उधर सभी जगह गमन करता रहता है; क्योंकि श्रोत्र, त्वक् एवं नेत्रादि ज्ञानेन्द्रियाँ और शब्द स्पर्शादि उनके विषय तथा वाणी, हाथ-पैर आदि कर्मेन्द्रियाँ सीमित शक्ति वाली हैं॥


33.0

विजानाति तदा तस्य भयं स्यान्नात्र संशयः । अस्यैवानन्दकोशेन स्तम्बान्ता विष्णुपूर्वकाः ।।

vijānāti tadā tasya bhayaṃ syānnātra saṃśayaḥ । asyaivānandakośena stambāntā viṣṇupūrvakāḥ ।।

When an individual experiences even a slight difference in this (identity) he will have fear; there is no doubt.

जो यह ज्ञान एवं सत्य के रूप में अद्वितीय परब्रह्म है, वही सबका आश्रय-स्थल है। यह सबका सार एवं रसस्वरूप है । उस सनातन तत्त्व को पाकर के यह देही (जीवात्मा) सर्वत्र सुखानुभव प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त अन्यत्र सुख का भाव कहाँ है? सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के आत्मस्वरूप इस परानन्द (परमानन्द) ब्रह्म के उपस्थित न रहने पर भला कौन मनुष्य जीवित रह सकता है अथवा कौन-सा प्राणी नित्य चेष्टा करता है? अतः जो सर्वान्तर्यामी रूप से सभी के चित्त में प्रतिभासित होता है, वही परब्रह्म अविनाशी परमात्मा दुःखों से घिरे हुए जीवात्मा को सदैव आनन्द प्रदान करता है। जो अदृश्यत्व आदि लक्षणों से युक्त इस पर-तत्व से अभेदरूप परम अद्वैतरूप ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है, वहीं महायति (संन्यासी) है। देश-काल एवं पात्र से अपरिच्छिन्न, सत्यस्वरूप परब्रह्म ही अभयपद, परम अमृततुल्य एवं कल्याणमय है। जब तक मनुष्य को इसमें थोड़ा भी व्यवधान दृष्टिगोचर होता है, तब तक उसे (जन्म-मृत्यु का) भय बना रहता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। छोटे से छोटे क्षुद्र तृण से लेकर भगवान् विष्णु तक सभी तारतम्य के अनुसार आनन्द रूप कोश से नित्य ही आनन्द की अनुभूति करते हैं। इस लोक और परलोक के भोगों से विरक्त, प्रसन्नमना श्रोत्रिय को यह स्वरूप भूत- आनन्द स्वयमेव अनुभूत होता है। यह अनुभूति उस परमात्म पद के अनुरूप ही होती है, वह शब्दों में व्यक्त नहीं हो सकती; क्योंकि शब्द तो किसी आश्रय के सहारे ही व्यक्त होता है। परातत्व में निमित्त का अभाव होने के कारण वाणी वहाँ से वापस लौट आती है। जो सभी विशेषों से रहित परानन्दरूप तत्त्व है, वहाँ पर शब्द की प्रवृत्ति किस प्रकार से हो? इसलिए यह मन अतिसूक्ष्म और सीमित शक्ति से युक्त होकर इधर-उधर सभी जगह गमन करता रहता है; क्योंकि श्रोत्र, त्वक् एवं नेत्रादि ज्ञानेन्द्रियाँ और शब्द स्पर्शादि उनके विषय तथा वाणी, हाथ-पैर आदि कर्मेन्द्रियाँ सीमित शक्ति वाली हैं॥


34.0

भवन्ति सुखिनो नित्यं तारतम्यक्रमेण तु । तत्तत्पदविरक्तस्य श्रोत्रियस्य प्रसादिनः ॥

bhavanti sukhino nityaṃ tāratamyakrameṇa tu । tattatpadaviraktasya śrotriyasya prasādinaḥ ॥

Because of this sheath of bliss, from (God) Vishnu to a pillar - all always realize happiness though in different degrees.

जो यह ज्ञान एवं सत्य के रूप में अद्वितीय परब्रह्म है, वही सबका आश्रय-स्थल है। यह सबका सार एवं रसस्वरूप है । उस सनातन तत्त्व को पाकर के यह देही (जीवात्मा) सर्वत्र सुखानुभव प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त अन्यत्र सुख का भाव कहाँ है? सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के आत्मस्वरूप इस परानन्द (परमानन्द) ब्रह्म के उपस्थित न रहने पर भला कौन मनुष्य जीवित रह सकता है अथवा कौन-सा प्राणी नित्य चेष्टा करता है? अतः जो सर्वान्तर्यामी रूप से सभी के चित्त में प्रतिभासित होता है, वही परब्रह्म अविनाशी परमात्मा दुःखों से घिरे हुए जीवात्मा को सदैव आनन्द प्रदान करता है। जो अदृश्यत्व आदि लक्षणों से युक्त इस पर-तत्व से अभेदरूप परम अद्वैतरूप ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है, वहीं महायति (संन्यासी) है। देश-काल एवं पात्र से अपरिच्छिन्न, सत्यस्वरूप परब्रह्म ही अभयपद, परम अमृततुल्य एवं कल्याणमय है। जब तक मनुष्य को इसमें थोड़ा भी व्यवधान दृष्टिगोचर होता है, तब तक उसे (जन्म-मृत्यु का) भय बना रहता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। छोटे से छोटे क्षुद्र तृण से लेकर भगवान् विष्णु तक सभी तारतम्य के अनुसार आनन्द रूप कोश से नित्य ही आनन्द की अनुभूति करते हैं। इस लोक और परलोक के भोगों से विरक्त, प्रसन्नमना श्रोत्रिय को यह स्वरूप भूत- आनन्द स्वयमेव अनुभूत होता है। यह अनुभूति उस परमात्म पद के अनुरूप ही होती है, वह शब्दों में व्यक्त नहीं हो सकती; क्योंकि शब्द तो किसी आश्रय के सहारे ही व्यक्त होता है। परातत्व में निमित्त का अभाव होने के कारण वाणी वहाँ से वापस लौट आती है। जो सभी विशेषों से रहित परानन्दरूप तत्त्व है, वहाँ पर शब्द की प्रवृत्ति किस प्रकार से हो? इसलिए यह मन अतिसूक्ष्म और सीमित शक्ति से युक्त होकर इधर-उधर सभी जगह गमन करता रहता है; क्योंकि श्रोत्र, त्वक् एवं नेत्रादि ज्ञानेन्द्रियाँ और शब्द स्पर्शादि उनके विषय तथा वाणी, हाथ-पैर आदि कर्मेन्द्रियाँ सीमित शक्ति वाली हैं॥


35.0

स्वरूपभूत आनन्दः स्वयं भाति परे यथा। निमित्तं किंचिदाश्रित्य खलु शब्दः प्रवर्तते ॥

svarūpabhūta ānandaḥ svayaṃ bhāti pare yathā। nimittaṃ kiṃcidāśritya khalu śabdaḥ pravartate ॥

For him who is versed in the scriptures, disinterested in attaining any position, and happy, the bliss which is his very nature shines forth by itself.

जो यह ज्ञान एवं सत्य के रूप में अद्वितीय परब्रह्म है, वही सबका आश्रय-स्थल है। यह सबका सार एवं रसस्वरूप है । उस सनातन तत्त्व को पाकर के यह देही (जीवात्मा) सर्वत्र सुखानुभव प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त अन्यत्र सुख का भाव कहाँ है? सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के आत्मस्वरूप इस परानन्द (परमानन्द) ब्रह्म के उपस्थित न रहने पर भला कौन मनुष्य जीवित रह सकता है अथवा कौन-सा प्राणी नित्य चेष्टा करता है? अतः जो सर्वान्तर्यामी रूप से सभी के चित्त में प्रतिभासित होता है, वही परब्रह्म अविनाशी परमात्मा दुःखों से घिरे हुए जीवात्मा को सदैव आनन्द प्रदान करता है। जो अदृश्यत्व आदि लक्षणों से युक्त इस पर-तत्व से अभेदरूप परम अद्वैतरूप ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है, वहीं महायति (संन्यासी) है। देश-काल एवं पात्र से अपरिच्छिन्न, सत्यस्वरूप परब्रह्म ही अभयपद, परम अमृततुल्य एवं कल्याणमय है। जब तक मनुष्य को इसमें थोड़ा भी व्यवधान दृष्टिगोचर होता है, तब तक उसे (जन्म-मृत्यु का) भय बना रहता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। छोटे से छोटे क्षुद्र तृण से लेकर भगवान् विष्णु तक सभी तारतम्य के अनुसार आनन्द रूप कोश से नित्य ही आनन्द की अनुभूति करते हैं। इस लोक और परलोक के भोगों से विरक्त, प्रसन्नमना श्रोत्रिय को यह स्वरूप भूत- आनन्द स्वयमेव अनुभूत होता है। यह अनुभूति उस परमात्म पद के अनुरूप ही होती है, वह शब्दों में व्यक्त नहीं हो सकती; क्योंकि शब्द तो किसी आश्रय के सहारे ही व्यक्त होता है। परातत्व में निमित्त का अभाव होने के कारण वाणी वहाँ से वापस लौट आती है। जो सभी विशेषों से रहित परानन्दरूप तत्त्व है, वहाँ पर शब्द की प्रवृत्ति किस प्रकार से हो? इसलिए यह मन अतिसूक्ष्म और सीमित शक्ति से युक्त होकर इधर-उधर सभी जगह गमन करता रहता है; क्योंकि श्रोत्र, त्वक् एवं नेत्रादि ज्ञानेन्द्रियाँ और शब्द स्पर्शादि उनके विषय तथा वाणी, हाथ-पैर आदि कर्मेन्द्रियाँ सीमित शक्ति वाली हैं॥


36.0

यतो वाचो निवर्तन्ते निमित्तानामभावतः। निर्विशेष परानन्दे कथं शब्दः प्रवर्तते ।।

yato vāco nivartante nimittānāmabhāvataḥ। nirviśeṣa parānande kathaṃ śabdaḥ pravartate ।।

It is well known that word functions dependent upon a base (like jati, dravya, kriya, guna). Because of the absence of any (such) base, words recoil (from Brahman). For how can the word function in respect of the absolute bliss devoid of any base?

जो यह ज्ञान एवं सत्य के रूप में अद्वितीय परब्रह्म है, वही सबका आश्रय-स्थल है। यह सबका सार एवं रसस्वरूप है । उस सनातन तत्त्व को पाकर के यह देही (जीवात्मा) सर्वत्र सुखानुभव प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त अन्यत्र सुख का भाव कहाँ है? सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के आत्मस्वरूप इस परानन्द (परमानन्द) ब्रह्म के उपस्थित न रहने पर भला कौन मनुष्य जीवित रह सकता है अथवा कौन-सा प्राणी नित्य चेष्टा करता है? अतः जो सर्वान्तर्यामी रूप से सभी के चित्त में प्रतिभासित होता है, वही परब्रह्म अविनाशी परमात्मा दुःखों से घिरे हुए जीवात्मा को सदैव आनन्द प्रदान करता है। जो अदृश्यत्व आदि लक्षणों से युक्त इस पर-तत्व से अभेदरूप परम अद्वैतरूप ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है, वहीं महायति (संन्यासी) है। देश-काल एवं पात्र से अपरिच्छिन्न, सत्यस्वरूप परब्रह्म ही अभयपद, परम अमृततुल्य एवं कल्याणमय है। जब तक मनुष्य को इसमें थोड़ा भी व्यवधान दृष्टिगोचर होता है, तब तक उसे (जन्म-मृत्यु का) भय बना रहता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। छोटे से छोटे क्षुद्र तृण से लेकर भगवान् विष्णु तक सभी तारतम्य के अनुसार आनन्द रूप कोश से नित्य ही आनन्द की अनुभूति करते हैं। इस लोक और परलोक के भोगों से विरक्त, प्रसन्नमना श्रोत्रिय को यह स्वरूप भूत- आनन्द स्वयमेव अनुभूत होता है। यह अनुभूति उस परमात्म पद के अनुरूप ही होती है, वह शब्दों में व्यक्त नहीं हो सकती; क्योंकि शब्द तो किसी आश्रय के सहारे ही व्यक्त होता है। परातत्व में निमित्त का अभाव होने के कारण वाणी वहाँ से वापस लौट आती है। जो सभी विशेषों से रहित परानन्दरूप तत्त्व है, वहाँ पर शब्द की प्रवृत्ति किस प्रकार से हो? इसलिए यह मन अतिसूक्ष्म और सीमित शक्ति से युक्त होकर इधर-उधर सभी जगह गमन करता रहता है; क्योंकि श्रोत्र, त्वक् एवं नेत्रादि ज्ञानेन्द्रियाँ और शब्द स्पर्शादि उनके विषय तथा वाणी, हाथ-पैर आदि कर्मेन्द्रियाँ सीमित शक्ति वाली हैं॥


37.0

तस्मादेतन्मनः सूक्ष्मं व्यावृत्तं सर्वगोचरम्। यस्माच्छ्रोत्रत्वगक्ष्यादिखादिकर्मेन्द्रियाणि च ।।

tasmādetanmanaḥ sūkṣmaṃ vyāvṛttaṃ sarvagocaram। yasmācchrotratvagakṣyādikhādikarmendriyāṇi ca ।।

This subtle mind which makes all things its object turns back from That, from which retreat also (the senses), hearing, touch, sight, etc., as well as the organs of actions; they are not capable of reaching the Supreme.

जो यह ज्ञान एवं सत्य के रूप में अद्वितीय परब्रह्म है, वही सबका आश्रय-स्थल है। यह सबका सार एवं रसस्वरूप है । उस सनातन तत्त्व को पाकर के यह देही (जीवात्मा) सर्वत्र सुखानुभव प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त अन्यत्र सुख का भाव कहाँ है? सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के आत्मस्वरूप इस परानन्द (परमानन्द) ब्रह्म के उपस्थित न रहने पर भला कौन मनुष्य जीवित रह सकता है अथवा कौन-सा प्राणी नित्य चेष्टा करता है? अतः जो सर्वान्तर्यामी रूप से सभी के चित्त में प्रतिभासित होता है, वही परब्रह्म अविनाशी परमात्मा दुःखों से घिरे हुए जीवात्मा को सदैव आनन्द प्रदान करता है। जो अदृश्यत्व आदि लक्षणों से युक्त इस पर-तत्व से अभेदरूप परम अद्वैतरूप ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है, वहीं महायति (संन्यासी) है। देश-काल एवं पात्र से अपरिच्छिन्न, सत्यस्वरूप परब्रह्म ही अभयपद, परम अमृततुल्य एवं कल्याणमय है। जब तक मनुष्य को इसमें थोड़ा भी व्यवधान दृष्टिगोचर होता है, तब तक उसे (जन्म-मृत्यु का) भय बना रहता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। छोटे से छोटे क्षुद्र तृण से लेकर भगवान् विष्णु तक सभी तारतम्य के अनुसार आनन्द रूप कोश से नित्य ही आनन्द की अनुभूति करते हैं। इस लोक और परलोक के भोगों से विरक्त, प्रसन्नमना श्रोत्रिय को यह स्वरूप भूत- आनन्द स्वयमेव अनुभूत होता है। यह अनुभूति उस परमात्म पद के अनुरूप ही होती है, वह शब्दों में व्यक्त नहीं हो सकती; क्योंकि शब्द तो किसी आश्रय के सहारे ही व्यक्त होता है। परातत्व में निमित्त का अभाव होने के कारण वाणी वहाँ से वापस लौट आती है। जो सभी विशेषों से रहित परानन्दरूप तत्त्व है, वहाँ पर शब्द की प्रवृत्ति किस प्रकार से हो? इसलिए यह मन अतिसूक्ष्म और सीमित शक्ति से युक्त होकर इधर-उधर सभी जगह गमन करता रहता है; क्योंकि श्रोत्र, त्वक् एवं नेत्रादि ज्ञानेन्द्रियाँ और शब्द स्पर्शादि उनके विषय तथा वाणी, हाथ-पैर आदि कर्मेन्द्रियाँ सीमित शक्ति वाली हैं॥


38.0

व्यावृत्तानि परं प्राप्तुं न समर्थानि तानि तु। तब्रह्मानन्दमद्वन्द्वं निर्गुणं सत्यचिद्धनम् ॥

yāvṛttāni paraṃ prāptuṃ na samarthāni tāni tu। tabrahmānandamadvandvaṃ nirguṇaṃ satyaciddhanam ॥

Realizing that Brahman which is Bliss, without a second, devoid of attributes, the solidarity of truth and consciousness, as one's own Self, one fears naught.

इसलिए परमात्म तत्त्व को प्राप्त करने में ये समस्त इन्द्रियाँ समर्थ नहीं हैं। जो पुरुष उस द्वन्द्वातीत, निर्गुण, सत्यस्वरूप और विज्ञानघन ब्रह्मानन्द को ‘यह मेरा ही स्वरूप है’, ऐसा जान लेता है, उसे कहीं पर भी भय नहीं व्याप्त होता। इस तरह से जो भी जितेन्द्रिय मनुष्य अपने गुरु के उपदेश द्वारा आत्म साक्षात्कार के माध्यम से ब्रह्मानन्द को प्राप्त कर लेता है, वह सत्य-असत्य कर्मों के द्वारा कभी भी संतप्त नहीं होता । विषय भोग तापक हैं और चित्त ताप्य है, चित्त एवं उसके विषयों से यह सम्पूर्ण विश्व विभासित हो रहा है ॥ [पदार्थ विज्ञान ने पदार्थ के स्पन्दनों के अनुभव करने वाले माध्यम ( सैन्सर्स) खोजे हैं, भाव स्पन्दनों का अनुभव करने वाला माध्यम ( सैन्सर) चित्त है। विषय-भोगों द्वारा स्पंदन उत्पन्न करने तथा चित्त द्वारा उनका अनुभव किए जाने की क्षमताओं का संयोग ही भासित होने वाले विश्वका मूल कारण है, अन्यथा कुछ नहीं है। जैसे पदार्थ द्वारा प्रकाश का परावर्तन तथा आँख द्वारा उसका अनुभव करने की क्षमता के संयोग से हर दृश्य-रूप बनता है।]


39.0

विदित्वा स्वात्मरूपेण न बिभेति कुतश्चन। एवं यस्तु विजानाति स्वगुरोरुपदेशतः ॥

viditvā svātmarūpeṇa na bibheti kutaścana। evaṃ yastu vijānāti svagurorupadeśataḥ

He who knows thus from the teaching of his Guru, who becomes master of himself, never suffers from the impact of good or bad actions

इसलिए परमात्म तत्त्व को प्राप्त करने में ये समस्त इन्द्रियाँ समर्थ नहीं हैं। जो पुरुष उस द्वन्द्वातीत, निर्गुण, सत्यस्वरूप और विज्ञानघन ब्रह्मानन्द को ‘यह मेरा ही स्वरूप है’, ऐसा जान लेता है, उसे कहीं पर भी भय नहीं व्याप्त होता। इस तरह से जो भी जितेन्द्रिय मनुष्य अपने गुरु के उपदेश द्वारा आत्म साक्षात्कार के माध्यम से ब्रह्मानन्द को प्राप्त कर लेता है, वह सत्य-असत्य कर्मों के द्वारा कभी भी संतप्त नहीं होता । विषय भोग तापक हैं और चित्त ताप्य है, चित्त एवं उसके विषयों से यह सम्पूर्ण विश्व विभासित हो रहा है ॥ [पदार्थ विज्ञान ने पदार्थ के स्पन्दनों के अनुभव करने वाले माध्यम ( सैन्सर्स) खोजे हैं, भाव स्पन्दनों का अनुभव करने वाला माध्यम ( सैन्सर) चित्त है। विषय-भोगों द्वारा स्पंदन उत्पन्न करने तथा चित्त द्वारा उनका अनुभव किए जाने की क्षमताओं का संयोग ही भासित होने वाले विश्वका मूल कारण है, अन्यथा कुछ नहीं है। जैसे पदार्थ द्वारा प्रकाश का परावर्तन तथा आँख द्वारा उसका अनुभव करने की क्षमता के संयोग से हर दृश्य-रूप बनता है।]


40.0

स साध्वसाधुकर्मभ्यां सदा न तपति प्रभुः।तप्यतापकरूपेण विभातमखिलं जगत् ।।

sa sādhvasādhukarmabhyāṃ sadā na tapati prabhuḥ।tapyatāpakarūpeṇa vibhātamakhilaṃ jagat ।।

The whole world which appeared formerly as the inflicter and the inflicted now shines as one's own Self, owing to the knowledge arising from the Vedantic teaching.

इसलिए परमात्म तत्त्व को प्राप्त करने में ये समस्त इन्द्रियाँ समर्थ नहीं हैं। जो पुरुष उस द्वन्द्वातीत, निर्गुण, सत्यस्वरूप और विज्ञानघन ब्रह्मानन्द को ‘यह मेरा ही स्वरूप है’, ऐसा जान लेता है, उसे कहीं पर भी भय नहीं व्याप्त होता। इस तरह से जो भी जितेन्द्रिय मनुष्य अपने गुरु के उपदेश द्वारा आत्म साक्षात्कार के माध्यम से ब्रह्मानन्द को प्राप्त कर लेता है, वह सत्य-असत्य कर्मों के द्वारा कभी भी संतप्त नहीं होता । विषय भोग तापक हैं और चित्त ताप्य है, चित्त एवं उसके विषयों से यह सम्पूर्ण विश्व विभासित हो रहा है ॥ [पदार्थ विज्ञान ने पदार्थ के स्पन्दनों के अनुभव करने वाले माध्यम ( सैन्सर्स) खोजे हैं, भाव स्पन्दनों का अनुभव करने वाला माध्यम ( सैन्सर) चित्त है। विषय-भोगों द्वारा स्पंदन उत्पन्न करने तथा चित्त द्वारा उनका अनुभव किए जाने की क्षमताओं का संयोग ही भासित होने वाले विश्वका मूल कारण है, अन्यथा कुछ नहीं है। जैसे पदार्थ द्वारा प्रकाश का परावर्तन तथा आँख द्वारा उसका अनुभव करने की क्षमता के संयोग से हर दृश्य-रूप बनता है।]


41.0

प्रत्यगात्मतया भाति ज्ञानाद्वेदान्तवाक्यजात् । शुद्धमीश्वरचैतन्यं जीवचैतन्यमेव च।।

pratyagātmatayā bhāti jñānādvedāntavākyajāt । śuddhamīśvaracaitanyaṃ jīvacaitanyameva ca।।

The pure (Brahman), God, the individual self, the knower, the means of knowledge, the object of knowledge and the result - thus, for empirical purposes, is the sevenfold distinction made.

वेदान्त-शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि वह प्रत्येक आत्मा के रूप में है। सात तरह के जिन तत्वों का वर्णन किया गया है, वे ब्रह्म, ईश्वर, जीव, प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और फल हैं, इसमें व्यावहारिक दृष्टि से भेद माना गया है। परम परमात्मा तो शुद्ध-चैतन्य स्वरूप हैं. वह माया के द्वारा निर्मित उषाधियों से सदा-सर्वदा मुक्त रहता है। मायारूप होने से वह ईश्वर है एवं अविद्या (अज्ञान) के वश में होने के कारण वह जीव हो जाता है। उसका अन्त:करण से सम्बन्ध होने से वही प्रमाता (ज्ञाता) कहा जाता है। उसके चित्त द्वारा अनुभूति के सम्बन्ध से वह प्रमाण संज्ञा को प्राप्त होता है। वह चैतन्य युक्त ब्रह्म जब तक खोजा जाता है, तब तक प्रमेय है। और वही जब ज्ञात हो जाता है, तब फल संज्ञक हो जाता है॥


42.0

प्रमाता च प्रमाणं च प्रमेयं च फलं तथा। इति सप्तविधं प्रोक्तं भिद्यते व्यवहारतः ।।

pramātā ca pramāṇaṃ ca prameyaṃ ca phalaṃ tathā। iti saptavidhaṃ proktaṃ bhidyate vyavahārataḥ ।।

The pure (Brahman), God, the individual self, the knower, the means of knowledge, the object of knowledge and the result - thus, for empirical purposes, is the sevenfold distinction made.

वेदान्त-शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि वह प्रत्येक आत्मा के रूप में है। सात तरह के जिन तत्वों का वर्णन किया गया है, वे ब्रह्म, ईश्वर, जीव, प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और फल हैं, इसमें व्यावहारिक दृष्टि से भेद माना गया है। परम परमात्मा तो शुद्ध-चैतन्य स्वरूप हैं. वह माया के द्वारा निर्मित उषाधियों से सदा-सर्वदा मुक्त रहता है। मायारूप होने से वह ईश्वर है एवं अविद्या (अज्ञान) के वश में होने के कारण वह जीव हो जाता है। उसका अन्त:करण से सम्बन्ध होने से वही प्रमाता (ज्ञाता) कहा जाता है। उसके चित्त द्वारा अनुभूति के सम्बन्ध से वह प्रमाण संज्ञा को प्राप्त होता है। वह चैतन्य युक्त ब्रह्म जब तक खोजा जाता है, तब तक प्रमेय है। और वही जब ज्ञात हो जाता है, तब फल संज्ञक हो जाता है॥

Text (part 3)

43.0

मायोपाधिविनिर्मुक्तं शुद्धमित्यभिधीयते। मायासंबन्धश्चेशो जीवोऽविद्यावशस्तथा ॥

māyopādhivinirmuktaṃ śuddhamityabhidhīyate। māyāsaṃbandhaśceśo jīvo'vidyāvaśastathā ॥

(The Consciousness) devoid of the condition of Maya [cosmic nescience] is termed 'pure' (Brahman). When related to the cosmic nescience, it is God. Under the influence of the individual nescience (Avidya) it is the individual self. When related to the internal organ it is called the knower. In relationship with the modifications of the internal organ, it is called the means of knowledge.

वेदान्त-शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि वह प्रत्येक आत्मा के रूप में है। सात तरह के जिन तत्वों का वर्णन किया गया है, वे ब्रह्म, ईश्वर, जीव, प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और फल हैं, इसमें व्यावहारिक दृष्टि से भेद माना गया है। परम परमात्मा तो शुद्ध-चैतन्य स्वरूप हैं. वह माया के द्वारा निर्मित उषाधियों से सदा-सर्वदा मुक्त रहता है। मायारूप होने से वह ईश्वर है एवं अविद्या (अज्ञान) के वश में होने के कारण वह जीव हो जाता है। उसका अन्त:करण से सम्बन्ध होने से वही प्रमाता (ज्ञाता) कहा जाता है। उसके चित्त द्वारा अनुभूति के सम्बन्ध से वह प्रमाण संज्ञा को प्राप्त होता है। वह चैतन्य युक्त ब्रह्म जब तक खोजा जाता है, तब तक प्रमेय है। और वही जब ज्ञात हो जाता है, तब फल संज्ञक हो जाता है॥


44.0

अन्त:करणसंबन्धात्मातेत्यभिधीयते। तथा तवृत्तिसंबन्धात्प्रमाणमिति कथ्यते ॥

anta:karaṇasaṃbandhātmātetyabhidhīyate। tathā tavṛttisaṃbandhātpramāṇamiti kathyate ॥

(The Consciousness) devoid of the condition of Maya [cosmic nescience] is termed 'pure' (Brahman). When related to the cosmic nescience, it is God. Under the influence of the individual nescience (Avidya) it is the individual self. When related to the internal organ it is called the knower. In relationship with the modifications of the internal organ, it is called the means of knowledge.

वेदान्त-शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि वह प्रत्येक आत्मा के रूप में है। सात तरह के जिन तत्वों का वर्णन किया गया है, वे ब्रह्म, ईश्वर, जीव, प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और फल हैं, इसमें व्यावहारिक दृष्टि से भेद माना गया है। परम परमात्मा तो शुद्ध-चैतन्य स्वरूप हैं. वह माया के द्वारा निर्मित उषाधियों से सदा-सर्वदा मुक्त रहता है। मायारूप होने से वह ईश्वर है एवं अविद्या (अज्ञान) के वश में होने के कारण वह जीव हो जाता है। उसका अन्त:करण से सम्बन्ध होने से वही प्रमाता (ज्ञाता) कहा जाता है। उसके चित्त द्वारा अनुभूति के सम्बन्ध से वह प्रमाण संज्ञा को प्राप्त होता है। वह चैतन्य युक्त ब्रह्म जब तक खोजा जाता है, तब तक प्रमेय है। और वही जब ज्ञात हो जाता है, तब फल संज्ञक हो जाता है॥


45.0

अज्ञातमपि चैतन्यं प्रमेयमिति कथ्यते। तथा ज्ञातं च चैतन्यं फलमित्यभिधीयते ॥

ajñātamapi caitanyaṃ prameyamiti kathyate। tathā jñātaṃ ca caitanyaṃ phalamityabhidhīyate ॥

The Consciousness which is not known is termed 'object'; and the consciousness which is known is called 'result'. The intelligent man should meditate upon his own Self as devoid of all conditioning.

वेदान्त-शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि वह प्रत्येक आत्मा के रूप में है। सात तरह के जिन तत्वों का वर्णन किया गया है, वे ब्रह्म, ईश्वर, जीव, प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और फल हैं, इसमें व्यावहारिक दृष्टि से भेद माना गया है। परम परमात्मा तो शुद्ध-चैतन्य स्वरूप हैं. वह माया के द्वारा निर्मित उषाधियों से सदा-सर्वदा मुक्त रहता है। मायारूप होने से वह ईश्वर है एवं अविद्या (अज्ञान) के वश में होने के कारण वह जीव हो जाता है। उसका अन्त:करण से सम्बन्ध होने से वही प्रमाता (ज्ञाता) कहा जाता है। उसके चित्त द्वारा अनुभूति के सम्बन्ध से वह प्रमाण संज्ञा को प्राप्त होता है। वह चैतन्य युक्त ब्रह्म जब तक खोजा जाता है, तब तक प्रमेय है। और वही जब ज्ञात हो जाता है, तब फल संज्ञक हो जाता है॥


46.0

सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं स्वात्मानं भावयेत्सुधीः। एवं यो वेद तत्त्वेन ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥

sarvopādhivinirmuktaṃ svātmānaṃ bhāvayetsudhīḥ। evaṃ yo veda tattvena brahmabhūyāya kalpate ॥

He who knows this in reality becomes Brahman itself.

इसलिए बुद्धिमान् पुरुष, अपने आपको ‘मैं सब उपाधियों से मुक्त हूँ' ऐसा मानकर मुक्तावस्था का सतत चिंतन को। इस प्रकार जो तत्वतः जानता है, वह ब्रह्मत्व को प्राप्त करने में सदा ही समर्थ होता है। मैंने वेदान्त के सर्वसिद्धान्तों का सार यथार्थरूप में कहा है। अपने कर्मों से जीव स्वयं ही उत्पन्न होता है, स्वयं ही मृत्यु को प्राप्त होता है और स्वयं ही अवशिष्ट रूप में बचा रहता है। यह सब आत्मा का ही खेल है, आत्मा के अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा तत्व नहीं है। यही इस उपनिषद् का रहस्य है॥


47.0

सर्ववेदान्तसिद्धान्तसारं वच्मि यथार्थतः । स्वयं मृत्वा स्वयं भूत्वा स्वयमेवावशिष्यते ॥

sarvavedāntasiddhāntasāraṃ vacmi yathārthataḥ । svayaṃ mṛtvā svayaṃ bhūtvā svayamevāvaśiṣyate ॥

Now I speak of the true essence of the teaching of all Vedanta: dying oneself, becoming oneself, one yet remains oneself. Thus (ends) the Upanishad.

इसलिए बुद्धिमान् पुरुष, अपने आपको ‘मैं सब उपाधियों से मुक्त हूँ' ऐसा मानकर मुक्तावस्था का सतत चिंतन को। इस प्रकार जो तत्वतः जानता है, वह ब्रह्मत्व को प्राप्त करने में सदा ही समर्थ होता है। मैंने वेदान्त के सर्वसिद्धान्तों का सार यथार्थरूप में कहा है। अपने कर्मों से जीव स्वयं ही उत्पन्न होता है, स्वयं ही मृत्यु को प्राप्त होता है और स्वयं ही अवशिष्ट रूप में बचा रहता है। यह सब आत्मा का ही खेल है, आत्मा के अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा तत्व नहीं है। यही इस उपनिषद् का रहस्य है॥