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1. Kavi Rahsya Ganganath Jha

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Barcode : 99999990243026 Title - Kavi Rahsya Author - Jha, Gnaganath Language - hindi Pages - 125 Publication Year - 0 Barcode EAN.UCC-13

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कवि-रहस्य

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कवि-रहस्य

अरथात् प्राचीन समय में कवि-शिक्षा-प्रणाली

व्याख्यानदाता महामहोपाध्याय गङ्गानाथ भा, एम० ए०, डि० लिट्0

प्रकाशक

हिन्दुस्तानी एकेडेमी, संयुक्त प्रान्त, प्रयाग।

१E२-६

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Published by The Hindustani Academy, U.P. Allahabnd.

FIRST EDITION

Price, Rs. 14, or 3 Shillings

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विषयसूची

विषय पृष्ठ

उपोद्धात १

वाङ्मय! स्वरूप १

'काव्य पुरुष'- 'साहित्य वधू'-संयोग 'शिष्य' भेद १३ 'काव्य' की उत्पत्ति १६ ... 'कवि' लच्ग तथा भेद २६ 'शब्द' स्वरूप ३० (काव्य' पढ़ने के ढंग ... 'काव्यार्थ' के मूल ... ४० 'साहित्य' का विषय ४७ 'कवि' का कर्त्तव्य .. ५२ ... राजा' का कर्त्तव्य ७१ .. .. 'चोरी' ... ७५ .. "कदि समय' ... ... देश विभाग .. !काल विभाग ... ६१ ... नाना शासत्र परिचय ... ...

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उपोद्घात

गत वर्ष किसी विषय पर तीन व्याख्यान देने की आज्ञा सुझे 'हिन्दुस्तानी एकेडेमी' से मिली। जब कभी मुझे हिन्दी में व्याख्यान देने की आज्ञा होती है तो मुझे बड़ा संकोच होता है। क्योंकि असल में हिन्दी मेरी मातृ-भाषा नहीं है। मेरी मातृ-भाषा वह मैथिली भाषा है जिसका दस, बारह बरस पहले तक घृणा की दृष्टि से नाम रक्खा गया था 'छ्िकाछिकी'। पर जब से लोगों का कृपाकटाक् विद्यापति ठाकुर के काव्यों पर पड़ा है तब से मैथिली भी हिन्दी-परिवार के अन्तर्गत समझी जाती है। इवना होने पर भी यह बात नहीं भूलती कि चिरकाल से हिन्दी के अनभिज्ञों में सबसे ऊँचा स्थान बंगालियों का था, उसके बाद विहारियों का, और फिर विहारियों में भी मैथिल तो सबसे गये बीते थे। किन्तु भाग्यवश मेरे जीवन का अधिकांश काशी की ही छाया में बीता। इससे कभी कभी हिन्दी लिखने या बोलने का साहस हो भी जाता है। इसी कारग भी कुछ दिन हुए पटना में मेरे व्याख्यान हिन्दी में हुए। तब से साहस और बढ़ा और अब हम वह हो चले हैं जिसे ठेठ।. थिली में 'घेथर' कहते हैं। अर्थात् 'एकां लज्जां परित्यज्य त्रैलोक्यविजयी भवेत्'। भाषां के विषय में मैं अपराधी अवश्य हूँगा। क्योंकि जिस काशी के प्रसाद से मुझे हिन्दी से कुछ परिचय हुआ है उसी के प्रसाद से मेरी हिन्दी संस्कृतप्रचुरा हुई है। यद्यपि बहुत दिनों तक *सरकारी 'खिचढ़ी भाषा' के प्रादुर्भावचक्र में भी मैं पड़ा था पर उसका फल विपरीत ही हुआ। मेरा संस्कार दृढ़ होगया कि साहित्यच्ेत्र में

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( २) दोनों भाषायें, हिन्दी तथा उर्दू, एक कभी नहीं हो सकतीं। एक- भाषावादी मुझे च्षमा करें। व्याख्यान का विषय मैंने 'कवि-रहस्य' रक्खा है। क्योंकि कविकृत्य, काव्य, एक ऐसा विषय है जिसके सम्बन्ध में जो कुछ चाहे आदमी कह सकता है। वेदान्तियों के 'ब्रह्म' की तरह 'अवाङ्मनसगोचर' होते हुए यह 'सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा' भी है। पर काव्य के प्रसंग में इतना लिखा गया है कि मैंने कुछ नवीन विषय संग्रह करने का विचार किया। दो ग्रन्थ मुझे ऐसे मिल गये जिनके आधार पर मैं कुछ लिखने का साहस कर सका। एक राजशेखरकृत काव्यमीमांसा (जो समस्त रूप में एक विश्वकोष कहा जा सकता है पर जिसका अभी एक अंश-मात्र उपलब्ध हुआ है) और दूसरा च्ेमेन्द्रकृत कविकण्ठाभरण। दोनों ग्रन्थ हज़ार वरस से अधिक पुराने हैं। विषय तो मेरा होगा 'कवियों की शिक्षाप्रयाली', पर इसके सम्बन्ध में राजशेखर ने कई नई बातों का उल्लेख किया है, इनका विवरस भी कुछ करना ही होगा। कवियों के प्रसंग में यह कहा जाता है कि The Poet is born not made । यदि ऐसा है तो यह प्रश्न उठेगा कि यदि जन्मना कवि होते हैं तो फिर कवि की शिक्षा कैसी ? पर हमारे देश का सिद्धान्त यह रहा है कि यद्यपि कविता का मूल कारण है प्रतिभा, और प्रतिभा पूर्व-जन्म-संस्कार-मूलक ही होती है, तथापि बिना कठिन शिक्षा के, केवल प्रतिभा के सहारे कवि सुकवि क्या कुकवि भी नहीं हो सकता। इसलिए कवित्व-सम्पादन के लिए शिक्षा आवश्यक है। और आगे चल कर यह स्पष्ट होगा कि कवि को वैसा ही 'Jack of all trades' होना पड़ेगा जैसा कि I. C. S. बालों को होना पड़ता है। भेद इतना ही है कि I C. S. में option अ्ररनेक हैं पर कवि के लिए सभी Suhject Compulsory हैं।

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(१ )

काव्यमीमांसा के अनुसार 'वाङ्मय' (Literature) दो प्रकार का होता है-(१) 'शास्त्र' तथा (२) 'काव्य'। बिना 'शास्त्र'-ज्ञान के 'काव्य' नहीं बन सकता। इसलिए पहले शास्त्रों ही का ज्ञान सम्पादन करना आवश्यक है। 'शास्त्र' दो प्रकार का है-(१) 'पौरुपेय' तथा (२) 'अपौरुषेय'। अपौरुपेय 'शास्त्र' केवल 'श्रुति' है। मन्त्र और ब्राह्मण-रूप में श्रुति पाई जाती है। जिन वाक्यों में कर्त्तव्य कर्म के अ्रंग सूचितमात्र हैं उन्हें 'मन्त्र' कहते हैं। मन्त्रों की स्तुति निन्दा तथा उपयोग जिन ग्रन्थों में पाया जाता है उन्हें 'ब्राह्मय' कहते हैं। तकू, यजुः, साम-ये तीन वेद 'त्रयी' के नाम से प्रसिद्ध हैं। चौथा वेद 'अथर्व' है। जिन मन्त्रों में अर्थ के अनुसार पाद व्यवस्थित हॉ उन्हें 'ऋक्' मन्त्र कहते हैं। वे ही ऋक-मन्त्र जब गान- सहित होते हैं तो 'साम' कहलाते हैं। जिन मन्त्रों में न छन्द है न गान वे 'यजुष्' मन्त्र कहलाते हैं। इतिहासवेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद, आयुर्वेद ये चारों 'उपवेद' हैं। इनके अतिरिक्त एक 'गेयवेद' भी माना गया है जिसे द्रौहिगि ने 'वेदोपवेदात्मक सार्ववर्णिक' बतलाया है। अर्थात् चारों वेद तथा चारों उपवेदों का सारांश इसमें है और इसके पढ़ने-पढ़ाने में सभी जाति अधिंकारी हैं। (१) शिक्षा, (२) कल्प, (३) व्याकरण, (४) निरुक्त, (५) छन्दोविचिति, (६) ज्योतिष, ये छः वेदाङ्ग हैं। इनके त्र्प्रतिरिक्त

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( २ ) 'अलङ्कार' नाम का सातवाँ अंग भी माना गया है-क्योंकि इससे बड़ा उपकार होता है। इन अ्रंगों के ज्ञान के विना वेद के अर्थ का समझना असम्भव है। (१) वर्गों के उच्चारण-स्थान, करण, प्रयत्न इत्यादि के द्वारा जिस शास्त्र से उनके स्वरूप की निष्पत्ति होती है उस शास्त्र को 'शिक्षा' कहते हैं। इसके आादिप्रवर्तक हैं आपिशलि। (२) नाना वेदशाखाओं में पाये हुए मन्त्रों के विनियोग जिन सूत्रों से वतलाये जाते हैं उन्हें 'कल्प' कहते हैं। इसे 'यजुर्विद्या' भी कहते हैं। (३) शब्दों के 'अन्वाख्यान' तर्थात् विवरस को 'व्याकरय' कहते हैं। (४) शब्दों के 'निर्वचन' अथनिरूपण को 'निरुक्त' कहते हैं। (५) छन्दों का निरूपर जिस शास्त्र से होता है वह 'छन्दोविचिति' है। (६) ग्रहों के गणित का नाम है 'ज्योतिष'। 'अलंकार' किसे कहते हैं सो आगे वतलाया जायगा। ये हुए 'अपौरुपेय' शासतर। 'पौरुपेय' शास्त्र चार हैं, (१) पुरास, (२) आन्वीत्तिकी, (३) मीमांसा, (४) स्मृततितन्त्र। इनमें (१) पुराण उन ग्रन्थों का नाम है जिनमें वैदिक 'आख्यान' कथाओं का संग्रह है। पुराण का लच्षगा यों है- सर्गच्च प्रतिसंहार: कल्पो मन्वन्तराखि वंशविधि:। जगता यत्र निवद्धं तद् विजञेयम्पुरणमिति।। अरथात् 'उसको पुराए समझना जिसमें सृष्टि, प्रलय,कल्प (युगादि), मन्वन्ता: राजाओं के वंश वर्गित हों'। इतिहास भी पुराण के अन्तर्गत है-ऐसा कुछ लोगों का सिद्धान्त है। इतिहास के दो प्रभेद हैं- 'परिकृति', 'पुराकल्प'। इन दोनों का भेद यों है- परिक्रिया पुरकल्प इतिहासगतिद्विधा। स्थानेकनायका पूर्वा द्वितीया बहुनायका ॥ [आज-कल पण्डितों में पूर्वमीमांसासूत्र ६।७।२६ के अनुसार 'परिक्रिया' की जगह 'परक्रिया' या 'परकृति' नाम प्रचलित है]।

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( ३ ) जिस इतिहास में एक ही प्रधान पुरुष नायक हो उसे 'परिक्रिया' कहते हैं। जैसे रामायग-इसके नायक एक श्रीराम हैं। जिसमें अ्नेक नायक हों उसे 'पुराकल्प' कहते हैं-जैसे महाभारत। इसमें युधिष्ठिर, अरजुन, दुर्योधन, भीष्म कई पुरुष नायक कहे जा सकते हैं। मीमांसासूत्र के अनुसार किसी पुरुष-विशेष के चरित्र के वर्णन को 'परकृति' और पुरुषनामोल्लेख के बिना 'किसी समय में ऐसा हुआ' ऐसे आर्यान को 'पुराकल्प' कहते हैं। २. 'आान्वीचिकी'-तर्कशाख। ३. वैदिक वाक्यों की १,००० न्यायों द्वारा विवेचना जिसमें की जाती है उस शास्त को 'मीमांसा' कहते हैं। इसके दो भाग हैं-विधि- विवेचनी [जिसे हम लोग 'पूर्वमीमांसा' के नाम से जानते हैं] और न्रह्मनिदर्शनी [जिसे हम लोग 'ब्रह्ममीमांसा' या 'वेदान्त' कहते हैं]। यद्यपि १,००० के लगभग 'न्याय' वा अधिकरग केवल पूर्वमीमांसा में है। ४. स्मृतियाँ १८ हैं । इनमें वेद में कही हुई बातों का 'स्मरय' है-अर्धात् वैदिक उपदेशों को स्मरय करके ऋृषियों ने इन ग्रन्थों को लिखा है-इसी से ये 'स्मृति' कहलाते हैं। इन्हीं दोनों (पौरुषेय तथा अपौरषेय) 'शास्त्र' के १४ भेद हैं- वेद, ६ वेदांग, पुरारा, आान्वीतिकी, मीमांसा, स्मृति। इन्हीं को १४ 'विद्यास्थान' कहा है-

वेदा: स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश।। (याज्ञवल्क्य) [इसमें न्याय= आन्वीत्िकी; धर्मशास्त्र=स्मृति] तीनों लोक के सभी विषय इन १४ विद्यास्थानों के अन्तर्गत हैं। 'शास्त्र' के सभी विद्यासथानों का एक-मात्र आधार 'काव्य' है- जो 'वाङ्मय' का द्वितीय प्रभेद है। काव्य को ऐसा मानने का कारय

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'( ) यह है कि यह गद्यपद्यमच है, कविरंचित है, और हितोपदेशक है। यह 'काच्य' शास्त्रों का अनुसरण करता है।। कुछ लोगों का कहना है कि विद्यास्यान १८ हैं। पूर्वोक्त १४ और उनके अतिरित्-१५ वार्ता, १६ कामसूत्र, १७ शिल्पशास्त्र, १८ दण्डनीति। [वार्ता = वागिज्य-कृषिविद्या, दण्डनीति=राजतंत्र] । आन्वीत्िकी, त्रयी, वार्ता, दण्डनीति-ये चारों 'विद्या' कहलाती हैं। इनके अतिरिक्त पाँचवीं 'साहित्यविद्या' है। यह चारों विद्याओों का 'निष्यन्द' अर्थात सारांश है। इन्हीं के उपयोग से धर्म का ज्ञान होता है इसी से ये 'विद्या' कहलाती हैं। इनमें 'न्रयी' वेदों का नाम है। आन्वीतिकी या तर्कशास्त्र के दो अ्ंश हैं-पूर्वपत्त तथा उत्तर- पक्ष। आ्रस्तिक दार्शनिकों के लिए बौद्ध, जैन तथा लोकायत पत्त "पूर्व- पत्त' हैं और सांख्य, न्याय, वैशेषिक 'उत्तरपत्त' हैं। इन तर्कों में वीन तरह की कथा होती है-वाद, जल्प, वितंडा। दो आदमियों में किसी को एक पत्त में आग्रह नहीं है-असली बात क्या है फेवल इसी उद्देश्य से जब ये शास्त्ार्थ या बहस करते हैं तो उसे 'वाद' कहते हैं। इसमें किसी की हार जीत नहीं होती। जब दोनो को अपने अपने पक्ष में आगह है और केवल एक दूसरे को हराने ही के उद्देश्य से वहस की जाती है-उसे 'जल्प' कहते हैं। दोनों आदमियों में एक तो एक पक्ष का आग्रहपूर्वक अ्रवलन्वन करता है-पर दूसरा किसी भी पक्ष का अवलम्बन नहीं करवा-इसलिए वह अपने पत्त के स्थापन के लिए चहस नहीं करता-केवल दूसरे के पक्ष को दूषित करने का यत्न करता है-इस कथा को 'वितंडा' कहते हैं। कृषि (खेती), पशुपालन, वागिज्य, इनको 'वार्ता' कहते हैं- आन्वीत्िकी-त्रयी-वार्ता इन तीनों के व्यवसाय की रत्ता के लिए 'दण्ड' की आवश्यकता होती है-इसी दण्डशास्त्र को 'दण्डनीति' कहते हैं।

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1 ( ५ ) इन्हीं विद्यानं के अधीन सकल लोकव्यवहार है। और इनका विस्तार नदियों के समान कहा गया है-आरम्भ में स्वल्प फिर विपुल, विस्तृत ।. "सरितामिव पवाहास्तुच्छाः प्रथम यथेोत्तरं विपुलाः" इन शास्त्रों का निबन्धन सूत्र-वृत्ति-भाष्यादि के द्वारा होता है। विषय का सूत्रग-सूचना-मात्र-जिसमें हो उसे 'सूत्र' कहते हैं- स्वल्पाक्षरमसन्दिग्धं सारवद्विरवतोसुखम्। अस्तोभमनवद्यं च सूत्र सूत्रकृतो विदुः ॥ जिसमें अत्तर कम हों-जिसका अर्थ स्पष्ट गम्भीर तथा व्यापक हो-उसे सूत्र कहते हैं। सूत्रों के सारांश का वर्गन जिसमें हो उसे 'वृत्ति' कहते हैं। सूत्र और वृत्ति के विवेचन (परीक्षा) को 'पद्धति' कहते हैं। सूत्र वृत्ति में कहे हुए सिद्धान्तों पर आन्ेप करके फिर उसका समाधान कर उन सिद्धान्तों का विवरण जिसमें हो उसे 'भाष्य' कहते हैं। भाष्य के बीच में प्रकृत विषय को छोड़ कर दूसरे विषय का जो विचार किया जाय उसे 'समीक्षा' कहते हैं। पूर्वोक्त सभों में जितने अर्थ सूचित हों उन सभों का यथासम्भव 'टीकन'-उल्लेखं जहाँ हो उसे 'टीका' कहते हैं। पूर्वोक्त ग्रन्घों में जो कहीं कहीं कठिन पद हों उन्हीं का विवरश जिसमें हो उसे 'पज्जिका' कहते हैं। जिसमें सिद्धान्त का प्रदर्शन-मात्र हो सा 'कारिका' है। मूल ग्रन्थ हों क्या कहा गया, क्या नहीं कहा गया, कौन सी बात उचित रीति से नहीं कही गई-इत्यादि विचार जिस ग्रन्थ सें हो वह 'वार्तिक' है। इनमें से आज भी सूत्र-वृत्ति-भाष्य- वार्तिक-टीका-कारिका इतने तो भली भाँति प्रसिद्ध हैं। पंजिका बीस बरस पहले तक अज्ञात थी। पर १८०७ ईसवी में विलायत से Colonel Jacob ने मेरे पास एक पुस्तक भेजी-जिसका नाम 'ऋजुविमला' तो हम सबों को ज्ञात था-पर उसकी पुष्पिका में 'भाष्य'

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( ६ ) 'टीका' इत्यादि नहीं लिख कर 'पञ्जिरा' लिखा था। तन से उस ग्रन्थ को लोग 'पजिजिकामीमांसा' या 'मीमांसापजजका' भी कहने लगे हैं। [इस ग्रन्थ से मुझे अपनी प्रभाकरमीमांसा लिखने में बड़ी सहायता मिली थी-अव यह काशी में छप रहा है]। पर 'पज्जिका' पद का क्या असल अर्थ है सो ज्ञात नहीं था-नाना प्रकार के तर्क हम लोग किया करते थे। राजशेखर के ही ग्रन्थ को देखकर यह पता चला कि एक प्रकार की टीका ही का नाम 'पजिजिका' है। पर इतना कहना पड़ता है कि 'पजजिका' का जैसा लक्षण ऊपर कहा है-जिसमें केवल विषम पदों के विवरण हों-सो लक्षर उक्त ग्रन्थ में नहीं लगता। यह ग्रन्थ बहुत विस्तृत है। उसके मूल प्रभाकररचित वृहती के नहाँ १०० पृष्ट हैं तहाँ ऋजुविमला के कम से कम ५०० पृष्ठ होंगे । ऐसे ग्रन्थ को हम 'विषमपदटिप्पणी' नहीं कह सकते। शास्त्र के किसी एक अंश को लेकर जो ग्रंथ लिखा गया उसे 'प्रकरख' कहते हैं। ग्रन्थों के अवान्तर: विभाग 'अध्याय' 'परिच्छेद' इत्यादि नाम से प्रसिद्ध हैं। 'साहित्य' पद का असली अर्थ क्या है सो भी इस ग्रन्थ से ज्ञात होता है। 'शब्द और अर्य का यघावत् सहभाव' अर्ात् 'साथ होना' यही 'साहित्य' पद का यौगिक अर्थ है-सहितयो: भाव: (शब्दा- ' र्थयो:) । इस अर्थ से 'साहित्य' पद का न्ेत्र बहुत विस्तृत हो जाता है। सार्थक शब्दों के द्वारा जो कुछ लिखा या कहा जाय सभी 'साहित्य' नाम में अन्तर्गत हो जाता है-किसी भी विषय का ग्रन्थ हो या व्याख्यान हो-सभी 'साहित्य' है।

२ ) .: साहित्य के विषय में एक रोंचक और शिक्षाप्रद कथानक है। पुत्र की कामना से सरस्त्रतीजी हिमालय में तपस्या कर रही थीं।

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ब्रह्माजी के वरदानं से उन्हें एक पुत्र हुआ-जिसका नाम 'काव्यपुरुष' हुआ (अर्थात् पुरुष के रूप में काव्य)। जन्म लेते ही उस पुत्र ने यह श्रोक पढ़कर माता को प्रणाम किया- "यदेतद्वाङ्मयं विश्वमथ मूर्त्या विवर्तते। सोऽस्मि काव्यपुमानम्व पादौ वन्देय तावकौ ।।" अर्थात्-'जो वाङ्म्यविश्व (शब्दरूपी संसार) मूर्तिधारण करके विवर्तमान हो रहा है सो ही काव्यपुरुष मैं हूँ। हे माता तेरे चरखों को प्रणाम करता हूँ।' इस पद्य को सुनकर सरस्वती माता प्रसन्न हुईं और कहा-'वत्स, अब तक विद्वान् गद्य ही बोलते आये आ्रज तूने पद्य का उच्चारण किया है। तू बड़ा प्रशंसनीय है। अब से शब्द-अर्थ-मय तेरा शरीर है-संस्कृत तेरा मुख-प्राकृत बाहुं-अप- भ्रंश जाँघ-पैशाचभाषा पैर-मिश्रभाषा वत्ःस्थल-रस आत्मा- छन्द लोम-प्रश्नोत्तर, : पहेली इत्यादि तेरा खेल-अनुप्रास उपमा इत्यादि तेरे गहने हैं। श्रुति ने भी इस मन्त्र में तेरी ही प्रशंसा की है-

'चत्वारि शृङ्गास्त्रयाडस्य पादा द्व शीर्षे सप्तहस्तःसोडस्य। त्रिधा वद्धो दृप्भो रोरवीति महो देवो मत्यीँ आविवेश॥" ऋग्देद ३/८।१०।३।

इस वैदिक मन्त्र के कंर्द अर्थ किये गये हैं। (१) कुमारिल- कृत तन्त्रवार्तिक (१।२।४६) के अनुसार यह सूर्य की स्तुति है। 'चार 'शृङ्ग'दिन के चार भाग हैं। तीन 'पाद' तीन ऋतु-शीत, ग्रीष्म, वर्षा। दो 'शीर्ष' दोनों छः छः महीने के अयन। सात 'हाथ' सूर्य के सात घोड़े। 'त्रिघाबद्ध' प्रातः मध्याह्न-सायं-सवन (तीनों समय से सोमरस खींचा जाता है)। 'वृषभ' वृष्टि का मूल कार प्रवर्तक। 'रोरवीति,' मेध का गर्जन। 'महोदेव' बड़े

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( ८ ) देवता-सूर्य जिनको सभी लोग प्रत्यक्ष देवतारूप में देखते हैं। (२) सायणाचार्य ने ऐसा अर्थ किया है-इसमें यज्ञ-रूप अग्नि का वर्शन है। चार 'शृङ्ग' हैं चारों वेद। तीन 'पाद' तीनों सवन- प्रातः मध्याह्न सायं। दो 'शीर्ष' ब्रह्मौदन और प्रवर्ग्य। सात 'हाथ' सातो छन्द। 'त्रिधाबद्ध' मन्त्र-कल्प-ब्राह्मणा तीन प्रकार से जिसका निबन्धन हुआ है। 'वृषभ' कर्मफलों का वर्षण करनेवाला। 'रोखवीति' यज्ञानुष्ठान काल में मन्त्रादिपाठ तथा सामगानादि शब्द कर रहे हैं। (३) सायगचार्य ने भी इसे सूर्यपक्ष में इस तरह लगाया है-चार 'शृङ्ग' हैं चारो दिशा। तीन 'पाद' तीन वेद। दो 'शीर्ष' रात और दिन। सात 'हाथ' सात ऋतु-वसन्तादि छः पृथक् पृथक और. एक सातवाँ 'साधारस'। 'त्रिधाबद्ध' पृथिवी आदि तीन स्थान में अग्नि आदि रूप से स्थित-अथवा ग्रीष्म-वर्षा-शीत तीन काल में बद्ध। 'वृषभ' वृष्टि करनेवाला। 'रीरवीति' वर्षाद्वारा शब्द करता है। 'महो देव' बड़े देवता। 'मर्त्यान् आविवेश' नियन्ता आरत्मा रूप में सभी जीवों में प्रवेश किया। (४) शान्दिकों के मत से इस मन्त्र में शब्द रूप ब्रह्म का वर्णन है-जिसको विशद रूप से पतञ्जलि ने महाभाज्य (पर्पशाहनिक पृ० १२ ) में बंतलाया है। चार 'शङ्ग' हैं चारों तरह के शब्द, नाम-आख्यात-उपसर्ग- निपात [उद्योत के मत से परा-पश्यन्ती-मन्यमा-वैखरी]। तीन 'पाद' तीनों काल, भूत भविष्यत् वर्तमान। दो 'शीर्ष' दो तरह के शब्द-नित्य-अ्नित्य, अर्थात् व्यंग्य व्यंजक (प्रदीप)। 'सात' हाथ, सात विभक्तियां। 'त्रिधा बद्ध' ह्ृदय-कण्ठ-मूर्धा इन तीनों स्थानों में वद्ध। 'वृपभ' वर्षर करनेवाला। 'रोखीति' शब्द करता है। 'महो देवः' वड़ा देव, शब्दन्रह्म। मर्त्यान् 'आविवेश' मनुष्यों में प्रवेश किया। (५) भरत नाट्यशास्त्र (अ० १७) में लिखा है-सप्त स्वराः, त्रीमि स्थानानि (कंठ- हृदय-मूर्धा), चत्वारो वर्णाः, द्विविधा काकुः, पडलंकारा:, पहंगानि'।.

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1 (f) इतना कह कर सरस्वतीजी चली गई। उसी समय उशनस् (शुक्र महाराज ) कुश और लकड़ी लेने जा रहे थे। बच्चे को देख कर अपने आश्रम में ले गये। वहाँ पहुँच कर बच्चे ने कहा-

या दुग्धाऽपि. न दुग्धेव कविदोग्धृभिरन्वहम्। हृदि नः सन्निधत्तां सा सुक्तिधेदुः सरस्वती॥

अ्र्र्थात् 'सुभापित की धेनु-जो कवियों से दुही जाने पर भी नहीं दुही की तरह बनी रहती है-ऐसी सरस्वती मेरे हृदय में वास करें'। उसने यह भी कहा कि इस श्रोक को पढ़कर जो पाठ आरम्भ करेगा वह सुमेधा बुद्धिमान् होगा। तभी से शुक्र को लोग 'कवि' कहने लगे। 'कवि' शब्द 'कवृ' धातु से बना है-जिससे उसका अर्थ है 'वर्न करनेवाला'। कवि का कर्म है 'काव्य'। इसी मूल पर सरस्वती के पुत्र का भी नाम 'काव्यपुरुष' प्रसिद्ध हुआ। इतने में सरस्वतीजी लौटीं, पुत्र को न देखकर दुखी हुईं। वाल्मीकि उधर से जा रहे थे। उन्होंने बच्चे का शुक्र के आश्रम में जाने का व्यौरा कह सुनाया। प्रसन्न होकर उन्होंने वाल्मीकि को छन्दोमयी वाणी का वरदान दिया। जिस पर दो चिड़ियों में से एक को व्याध से मारा हुआ देख कर उनके मुँह से यह प्रसिद्ध श्रोक निकल आया।

मा निपाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वतीः समा:। यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥

इस ग्लांक को भी वरदान दिया कि कुछ और पढ़ने के पहले यदि कोई इस फोक को पढ़ेगा तो वह कवि होगा। मिथिला में अब तक बच्चों को सबसे पहले यही श्ोक सिखलाया जावा

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( १० ) है। इसी के साथ साथ एक और शोक सभों को सिखलाया जाता है सा ते भवतु सुभीता देवी शिखरवासिनी। उग्रे तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः ॥ फिर इसी 'मा निपाद' श्ोक के प्रभाव से वाल्मीकि ने रामायग रचा और द्वैपायन ने महाभारत। एक दिन ब्रह्माजी की सभा में दो ब्रह्मर्पियों में वेद के प्रसंग शासत्रार्थ हो रहा था उसमें निरगेत्री होने के लिए सरस्वतीजी बुलाई गई। काव्यपुरुष भी माता के पीछे हो लिये। माता ने मना किया-विना ब्रह्माजी की आज्ञा के वहाँ जाना उचित नहीं होगा। इस पर रुष्ट होकर काव्यपुरुष कहीं चल दिये। उनको जाते देख उनके मित्रं कुमार (शिवजी के पुत्र) रोने लगे। उनकी माता ने काव्यपुरुष को लौटाने के लिए एक उपाय सोचा। प्रेम से दृढ़ बन्धन प्रागियों के लिए कोई दूसरा नहीं है ऐसा विचार कर उन्होंने 'साहित्यवधू' रूप में एक स्त्री को सिरना और उससे कहा- 'वह तेरा धर्मपति काव्यपुरुष रूठ कर चला जा रहा है-उसके पीछे जा उसे लौटा ला'। ऋषियों से भी कहा 'तुम भी काव्यपुरुष की स्तुति करते हुए इनके पीछे जाओ। ये ही तुम्हारे काव्यसर्वस्त्र होंगे। सब लोग पहले पूरब की ओर चले-जिधर श्रंग-ंग-सुम्ह-पुंडू इत्यादि देश हैं। इन देशों में साहित्यवधू ने जैसा वेशभूषा धारण किया उसी का अनुकरण उन देशों की स्त्रियों ने किया। जिस वेशभूषा का वर्णन ऋषियों ने इन शब्दों में किया- आर्द्रार्द्रचन्दनकुचापि तमूत्रहार: सीमन्तचुम्विसिचय: स्फुटवाटुमूल:।

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( ११ ) दूर्वापकाण्डमचिरास्वगरूपभोगात् गौडाङ्गनासु चिरमेप चकास्तु वेप: ।। [चन्दनचर्चितकुचन पर विलसत सुन्दर हार। सिरचुम्त्ी सुन्दर वसन वाुसूल उघरार॥। अगुरु लगाये देह में दूर्वा श्यामल रूप। शोभित सन्तत हो रही नारी गौड अनूप ।।] उन देशों में जाकर काव्यपुरुष ने जैसी वेशभूषा धार की वहाँ के पुरुपों ने भी उसी का अनुकरण किया। उन देशों में जैसी भापा साहित्यवधू बोलती गई वहाँ वैसी ही बोली बोली जाने लगी। उसी वोल चाल की रीति का नाम हुआ 'गौडी रीति'-जिसमें समास तथा अनुप्रास का प्रयोग अधिक होता है। वहाँ जो कुछ नृत्य गीतादिकला उन्होंने दिखलाई उसका नाम हुआ 'भारतीवृत्ति'। वहाँ की प्रवृत्ति का नाम हुआ 'रौद्रभारती'। वहाँ से सब लोग पाश्चाल की ओर गये। जहाँ पाश्चाल-शूरसेन- हरि्तिनापुर-काश्मीर-वाहीक-वाह्लीक इत्यादि देश हैं। वहाँ जो वेषभूषा साहित्यवधू की थी उसका वर्णन ऋषियों ने यों किया-

मानाभिलम्वििदरदोलिततारहारम्।

वेपं नमस्यत महस्व्यसुन्दरीणाम् ॥ [तडकी चश्चल फूलती सुन्दरगोलकपोल। नाभीलम्वित हार नित लिपटे वस्त्र अमोल ।] इन देशों में जो नृत्यगीतादिकला साहित्यवधू ने दिखलाई इसका नाम 'सात्वतीवृत्ति' और वहाँ की बोल-चाल का

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( १२ ) नाम हुआ 'पाच्चाली रीति' जिसमें समासों का प्रयोग कम होता है। वहाँ से अवन्ती गये। जिधर अ्वन्ती-वैदिश-सुराष्ट्र-मालव- अर्दुद-भृगुकच्छ इत्यादि देश हैं। वहाँ की वृत्ति का नाम हुआ 'सात्वती-कैशिकी'। इस देश की वेषभूपा में पाश्चाल और दक्षिग देश इन दोनों का मिश्रण है। अरथात् यहाँ की स्त्रियों की वेषभूपा दाच्तिणात्यस्त्रियों के समान-और पुरुषों की पाश्चालवासियों के समान था। यहाँ की प्रवृत्ति का नाम 'आ्वन्ती' हुआ। अवन्ती से सव लोग द्तिया दिशा को गये-जहाँ मलय-मेकल- कुन्तल-केरल-पालमञ्जर-महाराष्ट्र-गङ्ग-कलिङ्ग इत्यादि देश हैं। वहाँ की स्त्रियों की वेषभूषा का वर्गन ऋपियों ने यों किया है- आमूलतो वलितकुन्तलचारुचूड- इचूर्णालकमचयलाञ्छितभालभाग: । कक्षानिवेशनिविडीकृतनीविरेष वेषश्चिरं जयति केरलकामिनीनाम्॥ [वाँधे केश सुवेश नित चुकनी रज्जित भाल। नीवी कच्छा में कसी, विलसत दक्षिसवाल॥] यहाँ की प्रवृत्ति का 'दात्ियात्य वृत्ति' नाम हुआ। साहित्यवधू ने यहाँ जिस नृत्यगीतकला का उपयोग किया उसका नाम 'कैशिकी' हुआ। बोलचाल की रीति का नाम 'वैदर्भी' हुआ जिसमें अनुप्रास होते हैं, समास नहीं होता। 'प्रवृत्ति' कहते हैं वेषभूषा को, 'वृत्ति' कहते हैं नृत्यगीतादिकला- विलास को-और 'रीति' कहते हैं वोलचाल के क्रम को। देश तो अ्नन्त हैं परन्तु इन्हीं चार विभागों में सभों को विभक्त किया है- प्राच्य-पाश्चाल-अवन्ती-दात्तिणात्य। इन सभों का सामान्य

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१३ नाम है 'चक्रवर्तिक्त्र' जो दत्तिण समुद्र से लेकर उत्तर. की ओरर १,००० योजन (४,००० कोस) तक प्रसरित है। इस देश में जैसी वेश- भूषा कह आये हैं वैसी ही होनी चाहिए। इसी में अन्तर्गत एक विदर्भ देश है जहाँ कामदेव का क्रोड़ास्थान वत्सगुल्मनामक नगर है। उसी नगर में पहुँचकर काव्यपुरुष ने साहित्यवधू के साथ विवाह किया और लोट क़र हिमालय आये जहाँ गौरी और सरस्वती उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं। इन्होंने वधूवर को वर दिया कि सदा कवियों के मानस में निवास करें। यही काव्यपुरुष की कथा है।.

३ )

शिष्य तीन तरह के होते हें-(१) बुद्धिमान् (२) आहार्यबुद्धि (३) दुर्वुद्धि। जो स्वभाव ही से बिना किसी की सहायता से बिना अभ्यास के शास्त्रगहण कर सके उसे 'बुद्धिमान्' कहते हैं। जिसको शास्त्रज्ञान शास्त्र के अभ्यास से होता है उसे 'आहार्यबुद्धि' कहते हैं। इन दोनों से अतिरिक्त 'दुर्बुद्धि' है। ये सामान्यतः शिष्य के विभाग हैं। काव्यशिष्य के विभागों का निरूपण कविकण्ठाभरण के अनुसार आगे होगा। बुद्धि तीन प्रकार की होती है- स्मृति, मति, प्रज्ञा। अतीत वस्तु का ज्ञान जिससे होता है वह है 'स्मृति'। वर्तमान वस्तु का ज्ञान जिससे होता है सो है 'मति'। और आगामी (भविष्यत्) वस्तु का ज्ञान जिससे होता है सो है 'प्रज्ञा'। तीनों प्रकार की बुंद्धि से कवियों को मदद मिलती है। शिष्यों में जो 'बुद्धिमान्' है वह उपदेश सुनने की इच्छा से- उसे सुनता है-उसका ग्रहण करता है-धारण करता है-उसका विज्ञान (विशेष रूप से ज्ञान) सम्पादन करता है-ऊह (तर्क) करता है-अपोह (जो बातें मन में नहीं जँचतीं उनका परित्याग) करता है-

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( १४ ) फिर तत्त्व पुर स्थिर हो जाता है। 'आहार्यबुद्धि' शिष्य का भी यही व्यापार होता है। परन्तु उसके केवल उपदेष्टा की आवश्यकता नहीं हैं-उसे एक प्रशास्ता (शासन करनेवाला, बरावर देख-भाल करने वाला) की आवश्यकता रहती है। प्रतिदिन गुरु की उपासना दोनों तरह के शिष्यों का प्रकृष्ट गुए समझा जाता है। यही उपासना वुद्धि के विकास में प्रधान साधन होती है। इस तत्वज्ञानप्रक्रिया का संग्रह यों किया गया है- (१) प्रथयति पुरः प्रज्ञाज्योतिर्यथार्थपरिग्रहे (२) तदतु जनयत्यू हापोहक्रियाविशदं मनः । (३) अभिनिविशते तस्मात् तत्त्वं तदेकसुखोदय® (४) सहपरिचयो विद्यादद्धेः क्रमादगृतायते ।। (१) पहले त्र्रथों के यथावत् ज्ञान के योग्य प्रज्ञा उत्पन्न होती है-(२) उसके वाद ऊहापोह (तर्क वितर्क) करने की योग्यता मन में उत्पन्न होती है-(३) फिर एकान्त वस्तुतत्वमात्र में मन लग जाता है-(४) ज्ञानवृद्ध सज्जनों का परिचय क्रमेण अमृत हो जाता है। 'बुद्धिमान्' शिष्य तत्त्व जल्दी समझ लेता है। एक बार सुन लेने ही से वह बात समझ लेता है। ऐसे शिष्य को कविमार्ग की (कवि का क्या रास्ता होना चाहिए इसकी) खोज में गुरु के पास जाना चाहिए। 'आहार्यवुद्धि' शिष्य एक तो पहले समझता नहीं- और फिर समझाने पर भी मन में नाना प्रकार के संशय रह जाते हैं। इसको उचित है कि अज्ञात वस्तु को जानने के लिए और संशयों को दूर करने के लिए आचार्य के पास जाय। जो शिष्य 'दर्बद्धि" है वह सभी जगह उलटा ही समभेगा। इसकी तलना काले कंपड़े के साथ की गई है-जिस पर दूसरा कोई रंग चढ़ ही नहीं सकता। ऐसे आरादमी को यदि ज्ञान हो सकता है तो केवल सरस्वती के प्रसाद से।

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इसके प्रसंग में एक कथा कालिदास की मिथिला में प्रसिद्ध है। कालिदास उन्हीं शिष्यों में से थे जिनका परिगरन 'दुर्वुद्धि' की श्रेणी में होता है। गुरु के चौपाड़ पर रहते तो थे पर वोध एक अक्षर का नहीं था। केवल खड़िया लेकर ज़मीन पर घिसा करें-अक्षर एक भी न बने। मिघिलां में एक प्राचीन देवी का मन्दिर उचैठगांव में है। वहाँ अव तक जंगल सा है। कालिदास नहाँ पढ़ने को भेजे गये थे वह चीपाड़ इसी मन्दिर के कोस दो कोस के भीतर कहीं था। एक रात को स्र्पन्धकार छाया हुआ था, पानी जोर से बरस रहा था। विद्यार्थियों में शर्त होने लगी कि यदि इस भयंकर रात में कोई देवीजी का दर्शन कर आवे तो उसे सब लोग मिल कर या तो स्याही बना देंगे या काग़ज़ वना देंगे। [स्गाही बनाने की प्रक्रिया तो तब भी देहातों में चलती है सो तो सभी को ज्ञात होगा। विद्यार्थी लोग काग़ज़ कैसे बनाते थे सो प्रक्रिया अब इधर ३०, ४० वर्पों से लोगों ने नहीं देखी होगी। नेपाल में बाँस से एक प्रकार का काग़ज़ वनता है। यह बड़ा पतला होता है-यद्यपि बड़ा ही मज़बूत। पतला बहुत होने के कारण पुस्तक लिखने के योग्य नहीं होता। यद्यपि और सब तरह की कागज़ी काररवाई अब तक भी नेपाल में उसी से चलती है। इस काग़ज़ को पुस्तक लिखने के योग्य बनाने की प्रक्रिया यह थी। बाल्यावस्था में मैं भी इस प्रक्रिया में मदद किया करता था इसी से अच्छी तरह स्मरग है। चावल का मांड वनाकर काग़ज़ उसमें डाल दिया जाता है-अक्सर मांड में हरताल छोड़ देते हैं-जिससे काग़ज़ का रंग सुन्दर पीला हो जाता है और काग़ज़ में कीड़े लगने की सम्भावना भी कम हो जाती है। मांड में थोड़ी देर रखने के वाद काग़ज़ धूप में फैलाया जाता है। अच्छी तरह सूख जाने पर काग़ज़ मोटा हो जाता है पर खुरखुरा इतना रहता है कि लिखना असम्भव होता है। इसका उपाय कठिन परिश्रमसाध्य होता है।

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( १६ ) एक जंगली वस्तु काली सी होती है-प्रायः किसी बड़े फल का वीज है-जिसे मिथिला में 'गेल्ही' कहते हैं। पीढ़े पर काग़ज़ को फैला कर इसी गेल्ही से घंटों रगड़ने से काग़ज़ खूब चिकना हो जाता है।] किसी भी विद्यार्थी को इस शर्त के स्वीकार करने का साहस न हुआ। कालिदास उजड्डु तो थे ही-कहा मैं जाऊँगा। फिर मन्दिर में गया-इसका प्रमाण क्या होगा इसका यह निश्चय हुआ कि जो जाय सो स्याही लेता जाय मन्दिर की दीवार में अपने हाघ का छापा लगा आवे। कालिदास गये। पर मन्दिर के भीतर जाने पर उन्हें यह सन्देह हुआ कि दीवार में हाथ का छापा लगावें तो कदाचित् पानी के वौछार से मिट जाय। इस-डर से उन्होंने यही निश्रय किया कि देवी की मूर्ति के मुँह में ही स्याही का छापा लगाया जाय तो ठीक होगा। ज्योही हाथ बढ़ाया त्यों ही मूर्ति खिसकने लगी। कालिदास ने पीछा किया। अन्ततो गत्ा देवी प्रत्यक्ष हुई और कहा 'तू क्या चाहता है'? भगवती के दर्शन से कालिदास की आँखें खुलीं, उन्होंने कहा-'मुझे विद्या दो मैं यही चाहता हूँ।' देवी ने कहा-'अच्छा-तू अभी जाकर रात भर में जितने ग्रन्थ उलटेगा सभी तुम्हें अभ्यस्त हो जायँगे।' कालिदास ने जाकर विद्यार्थियों के तो सहज ही गुरुजी की भी जितनी पुस्तकें थीं सब के पन्ने उलट डाले। और परम पण्डित हो गये। दुर्दुद्धि के लिए इसी तरह यदि सरस्वतीजो की कृपा हो सो छोड़ कर और उपाय नहीं है।

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काव्य की उत्पत्ति का प्रधान कारण है 'समाधि'-अर्थात् मन' की एकाग्रता। जब तक मन एकाग्र समाहित नहीं होता तब तक बाबें नहीं सूभतीं। दूसरा कारण है 'अभ्यास'-अर्थात्, वारम्बार

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1 ( १७ . ): परिशीलन। इसका प्रभाव सर्वव्यापी है। इन दोनों में भेद यह है कि 'समाधि' है आभ्यन्तर (मानसिक) प्रयत्न और 'अभ्यास' है बाह्य प्रयत्न। समाधि और अभ्यास-इन दोनों के द्वारा 'शक्ति' उद्भासित होती है। 'शक्ति' ही एक काव्य का हेतु है-ऐसा ही सिद्धान्त माना गंया है। मम्मट ने भी काव्यहेतु में पहला स्थान 'शक्ति' ही को दिया है। शक्तिर्निपुणता लोककाव्यशास्त्राद्यवेक्षणात्। काव्यज्ञशिक्षयाऽभ्यास इति हेतुस्तदुंदरवे।। यहाँ 'शक्ति' का अर्थ है 'कवित्ववीजरूप संस्कारविशेष जिसके विना काव्य का प्रसार हो ही नहीं सकता-यदि हुआ भी तो हास्या- स्पद होगा'। इस 'शक्ति' का प्रसार, विस्तार, व्यापार होता है 'प्रतिभा' और 'व्युत्पत्ति' के द्वारा। जिसमें 'शक्ति' है उसी की 'प्रतिभा' या 'व्युत्पत्ति' चरितार्थ होती है। 'प्रतिभा' वह है जिंसके द्वारा शब्द-अर्थ-अलंकार तथा और वचन- विन्यास के सम्वद्ध विषय हृदय में भासित हों। जिसे 'प्रतिभा' नहीं उसे पदपदाथों का साक्षात् ज्ञान नहीं हो सकता-उसका ज्ञान सदा परोक्ष ही रहेगा। और जिसे 'प्रतिभा' है वह जिस पदपदार्थ को नहीं देखेगा उसका भी ज्ञान उसे प्रत्यक्ष ही होगा। इसी 'प्रतिभा' के प्रसाद से मेधाविरुद्र-कुमारदास-प्रभृति जन्मान्ध पुरुष भी बड़े कवि हो गये हैं। इसी 'प्रतिभा' के प्रसाद से कवियों ने नित्य अदृश्य और अदष्ट पदार्थों का-तथा देशान्तर की परिस्थितियों का भी-बिना सान्षात् देखे भी वर्णन किया है। इसके दष्टान्त में राजशेखर ने कालिदास ही के श्रोक उद्ध त किये हैं। (१) पराणांनामनिलेन वृत्तिरुचिता सत्कल्पदृक्षे वने तोये काश्चनपदरेखुंकपिशे पुण्याभिषेकक्रिया। F.3

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( १८ )

ध्यान रत्नशिलागृहेषु विदुधस्त्रीसननिधौ संयमो यत् काङक्षन्ति तपोभिरन्यमुनयस्तस्मिंस्तपस्यन्त्यमी। शकुन्तला (७।१२) यहाँ कालिदास ने लोकान्तर (स्वर्गलोक) की परिस्धितियों का वर्गन किया है जिसे उन्होंने कभी देखा नहीं। (२) अनेन सार्द्धं विहराम्युराशेस्तीरेषु तालीवनमर्मरेपु। द्वीपान्तरानीतलवङ्गपुप्पैरपाकृतस्वेदलवा मरुद्दिः ।। रघुर्वंश (६।५७) यहाँ द्वीपान्तरीय लवंगपुप्प का वर्णन बिना देखे किया गया है। (३) इरोऽपि किश्चित्परिवृटत्तधैर्यश्चन्द्रोदयारम्भ इवाम्बुराशिः । उमासुखे विम्बफलाधरोष्डे व्यापारयामास विलोचनानि॥ कुमारसम्भव (३।६७) यहाँ शिवजी और पार्वतीजी का वर्न है-जिन्हें कवि ने कभी नहीं देखा। ऐसे तो अदष्ट वस्तु का वर्णन सभी लोग करते हैं। पर चमत्कार इसमें है कि अदष्ट वस्तु का वर्णन होते हुए भी वर्णन स्वाभाविक ज्ञात हो और यह न भासित हो कि कवि बिना देखे ही काल्पनिक वर्णन कर रहा है। सच्चे कवि की कल्पना और मामूली पुरुषों की कल्पना में यही भेद है कि कवि की कल्पित वस्तु कल्पित नहीं-तात्विक ही-जान पड़ता है। शकुन्तला के अभिनय के समय दर्शक यह भूल जाते हैं कि अभिनय देख रहे हैं-तत्काल उन्हें यही भासित होता है कि सान्षात् शकुन्तला-दुष्यन्त ही सामने हैं। 'प्रतिभा' का लक्षर और ग्रंथों में इससे अच्छा मिलता है- 'प्रज्ञा नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभा मवा'। जिस प्रज्ञा के द्वारा नई

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1 ( १६) नई कल्पना होती हैं उसे 'प्रतिभा' कहते हैं। प्रायः यह वही शक्ति है जिसे अँगरेज़ी में Intuitive Faculty, Poetic Sense, Imagination कहते हैं। ।प्रतिभा दो प्रकार की मानी गई है-'कारयित्री' तथा 'भावयित्री'। जिस 'प्रतिभा' से कवि काव्य करता है वह है 'कारयित्री'- काव्य करानेवाली। और जिस प्रतिभा से लोग काव्य का आस्वादन करते हैं वह है 'भावयित्री'-बोध करानेवाली। कारयित्री प्रतिभा तीन तरह की है-सहजा, आहार्या, औपदेशिकी। पूर्व जन्म के संस्कार से जो प्राप्त है सो 'सहजा' स्वाभाविकी है। इस जन्म के संस्कार से जो प्राप्त है सो 'आहार्या', अर्जिता है। मन्त्र, शास्त्र, आदि के उपदेश से जो प्राप्त है सो 'औपदेशिकी' उपदेशप्राप्त है। अर्थात् इस जन्म में किश्चिन्मात्र संस्कार से जो प्रतिभा उद्भूत होती है उसे 'सहजा' कहते हैं। यह लगभग पूर्ण- रूप से पूर्वजन्मसंस्कारंद्वारा पुरुष में वर्तमान रहती है, केवल किश्चिन्मान्न उद्धोधक की आवश्यकता रहती है। जैसे बैटरी में वैद्य त अग्नि पूर्ण रूप से वर्तमान है-केवल एक घुंडी दबाने ही से पूरी तौर से उद्भूत हो जाता है। जिस प्रतिभा के उद्भूत होने में इस: जन्म में अरधिक परिश्रम की अपेका हो उसे 'आहार्या' कहते हैं- जैसे राखी के ढेर में कहीं एक चिनगारी आग की पड़ी है-उसको प्रज्वलित करने और उसे काम के योग्य बनाने में बड़े परिश्रम की अपेक्षा होती है। और तपदेशिकी प्रतिभा वह है जिसका अड्डर भी पूर्वजन्म सम्पादित नहीं है-इसी जन्म के उपदेश और परिश्रम से जो संस्कार उत्पन्न होता है उसी से यह प्रतिभा उद्भूत होती है- जैसे जहाँ आग का लेश भी नहीं है बड़े परिश्रम से लकड़ी के टुकड़ों को रगड़ कर अग्निकर उत्पन्न करके आग जलाई जाती है।

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(. २० ) इन सीन तरह की प्रतिभाव्ाले कवि भी तीन तरह के होते हैं-जिनका नाम है 'सारस्त्रत', 'आभ्यासिक', 'औपदेशिक'। जन्मान्तरीय संस्कार से जिसकी सरस्वती प्रवृत्त हुई है वह बुद्धिमान् 'सारस्वत' कवि है। इसी जन्म के अभ्यास से जिसकी सरस्त्रती उद्धा- सित हुई है वह आहार्यबुद्धि 'आभ्यासिक' कवि है। जिसकी वाक्य- रचना केवल उपदेश के सहारे होती है वह दुर्बुद्धि 'शपदेशिक' कवि है। कुछ लोगों का सिद्धान्त है कि सारस्वत और आभ्यासिक कवि को शाल्ाभ्यास के पीछे नहीं पड़ना चाहिए। पर यह सिद्धान्त ठीक नहीं है। क्योंकि एक ही कार्य के लिए यदि दो उपाय किये जायेँ तो कार्य द्विगुरा अच्छा होता ?। किसी प्रकार का कवि हो जिसमें उत्कर्ष है वही श्रेष्ठ है। और उत्कर्ष एक गुग से नह्ीं होता- भनेक गुणों के सन्निपातों से होता है। जैसे- (१) बुद्धिमत्त्वं च-(२) काव्याङ्गविद्यास्वभ्यासकर्म च। (३) कवेश्चोपनिपच्छत्तित्त्रयमेकत्र दुलभम्:॥ अर्थात्-वुद्धिमत्ता-कव्याङ्गविद्या का अभ्यास-कवि का असल रहस्य शक्ति-ये तीनों एकत्र दुर्लभ हैं। काव्यप्रकाश में ये तीन कहे हैं- (१.) शक्ति :- (:) काव्यशास्त्राद्यवेत्तणात् निपुणता (३) काव्यज्ञशिक्षया अ्भ्यास:। तीनों प्रकार के कवियों में एक प्रकार का और भेद बतलाया है- एकस्य तिष्ठति कवेगह एव काव्य- मन्यस्य गच्छति सुहृद्धवनानि यावत्। न्यस्याविदग्धवदनेषु पदानि शश्वत्ः कस्यापि सश्चरति विश्वकुनूहलीव।।

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( २१ ) अर्थात् सबसे न्यून दरजे के कवि का काव्य उसके घर ही में रहता है। मध्यम श्रेणी के कवि का काव्य उसके मित्रों: के घर तक पहुँचता है। उत्तम कवि का काव्य संसार भर में फैल जाता है। यह हुई 'कारयित्री प्रतिभा'।' 'भावयित्री प्रतिभा' वह है जो कवि के परिश्रम और अभिप्राय का बोध करावे। इसी से कवि का व्यापार सफल होता है। यदि समझनेवाला न हुआ तो काव्य ही क्या, और काव्य समझने के लिए भी लगभग उतनी ही प्रतिभा की आवश्यकता है जितनी काव्य करने के लिए। कुछ लोगों का कहना है कि जो ही भावक है वही कवि भी है। पर यह ठीक नहीं। दोनों का स्वरूप भी भिन्न है विषय भी भिन्न है। इस पर यह श्रोक है-

कश्चिद्वाचं रचयितुमलं, श्रोतुमेवापरस्तं कल्याणी ने मतिरुभयथा विस्मयं नस्तनोति। नहयेकस्मिन्नतिशयवतां सन्निपातो गुणानाम् एक: सूते कनकमुपलः, तत्परीक्षाक्षमोऽन्यः।। अर्थात्-कोई आदमी केवल वाक्य-रचना ही में समर्थ होता है-कोई उसके सुनने ही में। ये दोनों तरह की बुद्धि हमारे मन में आश्चर्य उत्पन्न करती हैं। एक ही मनुष्य में अनेक विशिष्ट गुसों का सन्निपात नहीं होता। सोने को उत्पन्न करनेवाला पत्थर और होता है और उसकी परोक्षा में समर्थ दूसरा ही। भावक चार प्रकार के होते हैं-(१) विवेकी-(२) अविवेकी (३) मत्सरी-(४) तत्वाभिनिवेशी। विवेकी भी दो प्रकार के होते हैं-स्त्रभाव से ही गुण दोष जानने के सामर्थ्यवाले और विद्या सीखकर गुर-दोष जाननेवाले। मत्सरी भावक को सौन्दर्य भासित होने पर भी नहीं भासित सा है-क्योंकि वह उसे प्रकाश नहीं

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( २२ ) करता। ज्ञाता होकर मत्सर-रहित विरले ही होते हैं। जैसा इस श्लोक में कहा है-

कस्त्वं भो :- कविरस्मि-काप्यभिनवा सूक्ति: सखे पठ्यताम्- त्यक्ता काव्यकथैव सम्मति मया-कस्मादिद-श्रूयताम्- यः सम्यग्विविनंक्ति दोपगुणयोः सारं स्वयं सत्कविः सोऽस्मिन् भावक एव नास्त्यथ भवेददवान्न निर्मत्सरः।

एक कवि से किसी ने पूछा-भाई तुम फौन हो? कवि-मैं कवि हूँ। पुरुष-कोई नई कविता पढ़ो। कवि-अव तो मैंने काव्य की चर्चा ही छोड़ दो है। पुरुष-यह क्यों ?

कवि-सुनो। जो सत् कवि स्व्रयं दोष गुग के सार की विवेचना कर सकता है सो भावक नहीं होता। यदि होता भी है तो निर्मत्सर नहीं होता। तत्त्वाभिनिवेशी भावक तो हज़ार में एक मिलते हैं। विना भावक के काव्य भी नीरस और निष्फल रह जाता है। वैसे तो घर घर काव्य पड़े हैं। काव्य वही है जो भावकों के हृदय में अंकित हो गया है। एक दिन राजा भोज के दर्वार में एक कवि और भावक (टीकाकार) में विवाद हुआ। भावक ने कहा "काव्य को भावक ही चमत्कारक और सरस बनाता है"। कवि ने इसे सवीकार नहीं किया, कहा "यदि काव्य को कवि ने सरस नहीं वनाया तो भावक उसे कैसे सरस बना सकता है" । भावक ने कहा-"अच्छा कुछ काव्य :

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२३ ) कहिए" । शाम को बाग़ में लोग टहल रहे थे-हवा चल रही थी। श्रम का वृक्ष हवा में डोल रहा था। इसी पर कवि ने कहां- 'इयं सन्ध्या, दूरादहमुपगतो हन्त मलयात् तवैकान्ते गेहे तरुखि वत नेष्यामि रजनीम्। समीरेणोक्तवं नवकुसुमिता चूतलतिका धुनाना सूर्धानं नहि नहि नहीत्येव कुरुते। अर्थात् वायु ने आन्रलतिका से कहा-'सन्ध्या होगई है मैं दूर मलयगिरि से आ रहा हूँ-तुम्हारे घर में, हे तरुशि, मैं रात भर विश्राम करूँगा। इस प्रकार वायु के कहने पर नई फूली हुई चूत- लतिका ने सिर हिलाकर कहा नहीं नहीं नहीं। भावक ने पूछा-यहाँ आपने तीन बार 'नहि' पद का प्रयोग क्यों किया ? कवि ने उत्तर दिया-'यदि मैं तीन बार नहि-पद का प्रयोग न करता तो छन्द में कमी रह जाती"। भावक-'जी नहीं। तीन बार नहिपद के प्रयोग करने में कवि का आशय यह है कि चूतलतिका का तात्पर्य यह है कि . तीन दिन तक तुम.मेरे घर न ठहरो। ऐसा गूढ़ आशय समस्त पद्य का है सो 'नवकुसुमिता' तथा 'एकान्त' इन दोनों विशेषणों से भासित होता है।" यह उदाहरण तो हुआ सरसहृदय भावक का। कुछ भावक तो अपनी भावकता के मद में मत्त होकर शब्दों का ऐस तोड़- मरोड़ करते हैं कि चित्त को विरक्त कर देते हैं। बिहारी का दोहा है-

मानडु मुखदिखरावनी दुलहिन करि अनुराग। सासु सदन मन ललन हूँ सौतिन दियो सुददाग।।

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(. '२४ ) इसका 'यंथार्थ अर्थ रत्नाकरजी ने यों बतलाया है-नई दुलहिन विवाहित होकर आई है। आते ही उसकी सुघराई तथा शील पर रीझ कर सासु ने घर का प्रभुत्व, नायक ने उसके रूप तथा गुगों पर अनुरक्त होकर अपना मन, एवं सौतों ने अपने को उसके बराबर न समझ कर प्रियतम का प्यार दे दिया। यह सब उसको ऐसे अल्प काल ही में प्राप्त होगया-मानो सुखदिखाई में मिल गया। यह तो है सीधा और अत्यन्त सरस अर्थ। एक टीकाकार इस अर्थ का ऐसा अनर्थ करते हैं-विदग्धा नायिका अपनी दशा अनागत नायक को सूचित करती है-'मानहु'-मेरी प्रार्थना मान जात्र-'अनुराग करि' प्रेम करके-'मुख दिखराव' अपना मुँह सुझे दिखाओ-क्योंकि 'नींदु लहि न' रात मुझे नींद नहीं आई-आज आने में बाधा नहीं है-क्योंकि 'सासु सदन मन' मेरी सास घर में नहीं हैं और 'ललन हूँ' मेरे स्वामी ने भी-'सौतिन दियो सुद्दाग' मेरी सौत के पास गये हैं। भावक सज्जन स्वयं समझ लें इन दोनों में कौन सा अर्थ हृदय- ग्राही है। एक उदाहरग टीकाकारों के मीलिमाशिक्य मल्विनाथ का लीजिए। दुर्योधन पांडवों को वनवास दिलाकर भी सदा उनके डर से चकित रहता है-इस बात का वर्णन करते हुए कवि ने कहा है-

कथामसङ्गेन जनैर्दाहृतादनुस्मृताखण्डलसूनुविक्रमः । तवाभिधानाद्व्यथते नताननः सुदुस्सहान्मन्त्रपदादिवेरगः ॥ इसका सीधा अर्थ यों है-वनेचर युधिष्ठिर से कहता है- "आपस में बातंचीत करते हुए लोग जब कभी आपका नाम लेते हैं

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( २५ ) सब दुर्योधन अर्जुन के पराक्रम का स्मरण करके सिर नोचा कर लेता है-जैसे प्रबल मन्त्र के प्रभाव से सर्प की फणा गिर जाती है।" टीकाकार ने इस श्लोक में जितने विशेषण हैं सभो को उपमान- उपमेय दोनों में लगाने की गरज से सर्पपन्त में विशेषणपदों का अर्थ यों करते हैं। (१) 'भन्त्रपदात् उरगः नताननः'-'सर्प मन्त्र के प्रभाव से सिर नीचा करता है'-यह मुख्य वाक्य हुआ। अब विशेषणों को 'मन्त्रपदात्' में लगाता है-पहला विशेषण है 'कथाप्रसङ्गेन जनरुदाहृतात्'-अर्थात् मन्त्र उच्चारित होता है उन लोगों से-'जनैः'-जो 'कथाप्रसङ्गों में'-विषवैद्यों में-'इन' श्रेष्ठ हैं। दूसरा विशेषण है 'तवाभिधानात्' अर्थात् जिस मन्त्र में 'त' (तक्षक) तथा 'व' (वासुकि) के 'अभिधान' नाम हैं। अब एक पद वाक़ी रहा 'अनुस्मृताखण्डलसृनुविक्रमः' । इसका 'उरगः' के साथ लगता हुआ अर्थ है-'अनुस्मृत' है-'आखण्डलसूतु' (इन्द्र के छोटे भाई विषु) के 'वि' (पत्ती-गरुड़) का 'क्रम' (चलना) जिसको। ऐसी टीका टीकाकार के पाण्डित्य को अवश्य सूचित करती है-पर सहृदयहृदयग्राहक नहीं होती। शक्ति से प्रतिभा और व्युत्पत्ति उत्पन्न होती हैं। इनमें प्रतिभा का विवरण हो चुका। 'व्युत्पत्ति' का विचार बाक़ी है। उचित अ्रनुचित के विवेक को 'व्युत्पत्ति' कहते हैं। प्रतिभा और व्युत्पत्ति में आानन्द ने प्रतिभा को प्रधान माना है। अव्युत्पत्तिकृतदोष तो प्रतिभा के बल से ढक जाते हैं-अप्रतिभाकृतदोष बहुत जल्द व्यक्त हो जाता है। पर मङ्गल ने व्युत्पत्ति ही को प्रधान माना है। पर असल बात यह है कि प्रतिभा और व्युत्पत्ति दोनों परस्पर मिल ही F.4 -

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( २६ ) कर प्रधान होती हैं। जैसे बिना लावण्य के केवल शरीरसौष्ठव-अथवा ' बिना शरीरसौ्ठव के केवल लावण्य-सच्चा सौन्दर्य नहीं होता। ( ५ ) प्रतिभा और व्युत्पत्ति दोनों जिसमें है वही 'कवि' है। 'कवि' तीन प्रकार के होते हैं-(१) शास्त्रकवि, (२) काव्यकवि, (३) शास्त्रकाव्योभयकवि। कुछ लोगों का सिद्धान्त है कि इनमें सवसे श्रेष् शासत्रकाव्योभयकवि, फिर काव्यकवि, फिर शास्त्रकवि । पर यह ठीक नहीं। अपने अपने क्षेत्र में तीनों ही श्रेष्ठ हैं-जैसे राज- हंस चन्द्रिका का पान नहीं कर सकता पर नीरन्तीरविवेक वही करता है। कोई अपनो सहृदयता ही के द्वारा काव्यमर्म समझता है- कोई काव्य से उत्पन्न सात्त्विकादि अनुभावों के द्वारा समझता है। फिर कोई भावक ऐसा होता है जिसकी दृष्टि केवल दोष ही पर जाती है-किसी की दृष्टि गुणों ही पर-और किसी की दृष्टि जाती है दोनों पर, किन्तु गुखों का तो वह आदर करता है और अवगुों का परित्याग-जैसा एक पुरानी उक्ति में कहा है- गुणादोपौ बुधो गृहन् इन्दुक्ष्येडाविवेश्वरः। शिरसा श्लाघते पूर्व परं कण्ठे नियच्छति॥ पण्डित गुर-दोप दोनों का ग्रहस करके गुम की प्रशंसा करके व्यवहार करते हैं पर दोष को अपने हृदय के भीतर ही डाल देते हैं। जैसे शिवजी ने समुद्मन्थन-काल में चन्द्रमा और विष दोनों का ग्रहग किया-पर चन्द्र को तो सिर पर रक्खा और विष को शरीर के अन्दर। चकोर यद्यपि नीरक्षीरविवेक नहीं कर सकता तथापि चन्द्रिका का पान वही कर सकता है। इसी तरह जैसे शास्त्र-कवि. के काव्य में रससम्पत्ति नहीं होती उसी तरह काव्यकवि के काव्य

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1 ( २७ ) में शास्त्रानुसार तर्क-युक्ति नहीं होती। असल में दोनों बराबर ही हैं- और दोनों को एक दूसरे की सहायता की आवश्यकता होती है। बात यों है कि शास्रज्ञान से जो संस्कार उत्पन्न होता है सो संस्कार काव्यरचना में मदत करती है परन्तु शास्त्र में तन्मय बुद्धि काव्य- रचना में बाधा डालती है। इसी तरह काव्यपरिशीलनजनित संस्कार शास्त्रज्ञान में उपकारक होता है-पर काव्य में तन्मय होना शास्रज्ञान में वाधक होता है।

शास्त्रकवि तीन प्रकार के होते हैं-(१) जो शास्त्र का निबन्धन करते हैं-(२) जो शास्त्र में काच्य का सम्मिश्रण करते हैं (जैसे लोलिम्बराज का वैद्यक ग्रन्थ)-(३) जो काव्य में शास्त्रार्थ का सम्मिश्र करते हैं (जैसे नैषधचरित में दर्शनसर्ग, या शिशुपालवध में राज- नीतिसर्ग) 15 . काव्यकवि के आठ प्रभेद हैं-(१) रचना-कवि (२) शब्द- कवि (३) अर्थ-कवि (४) अलङ्कार-कवि (५) उक्ति-कवि, (६) रस- कवि (७) मार्ग-कवि (८) शास्त्रार्थ-कवि। (१) रचना-कवि के काव्य में शब्द का चमत्कार रहता है। अनुप्रास, लम्बे समास, आरभटी रीति इत्यादि। (२) शब्द-कवि तीन तरह के होते हैं-एक जो नाम- शब्द (संज्ञा) का प्रचुर प्रयोग करते हैं। दूसरे आख्यात (क्रिया) का तधिक प्रयोग करते हैं। और तीसरे में नाम आख्यात दोनों का प्रचुर प्रयोग रहता है। (३) अर्थ-कवि के काव्य में अर्थ का चमत्कार- (४) अलङ्कार-कवि के काव्य में अलङ्गारों का चमत्कार-(५) उक्ति- कवि के कान्य में उक्ति का चमत्कार-(६) रस-कवि के काव्य में रस का चमत्कार-(७) मार्ग-कवि के काव्य में मार्ग (ढङ्ग) का चमत्कार-और (८) शास्त्रार्थ-कवि के काव्य. में शास्त्र के गूढतत्त्वों को सरस रूप में कहने का चमत्कार रहता है।

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(. २८ ) इन आठोंगुणों में से दो या तीन गुग जिस कवि के काव्य में हों वह नोचश्रेगी का कवि है। जिसके काव्य में पाँच गुर हों वह मध्यम श्रेणी का कवि है। जिसके काव्य में सभी गुग हों वह 'महाकवि' है। कवियों की दस अवस्थायें होती हैं। इनमें सात तो 'वुद्धिमान्' और 'आहार्यवुद्धि' कवियों में और तीन 'औपदेशिक' कवि में। ये दसों अवस्थायें यों हैं- (१) काव्यविद्यास्नातक-जो कवित्व-सम्पादन की इच्छा से काव्य-विद्या और उपविद्या पढ़ने के लिए गुरु के पास जाता है। (२) हृदय-कवि-जो मन ही मन काव्य करता है, उसे व्यक्त नहीं करवा। (३) अन्यापदेशी-काव्य-रचना करके कहीं लोग दुष्ट न कह दें इस डर से दूसरे की रचना कह कर प्रकाश करता है। (४) सेविता-काव्य करने का अभ्यास हो जाने पर पुरवासी कवियों में से किसी एक की रचना को आदर्श मान कर उसका अनुकरण करता है। (५) घटमान-जो शुद्ध फुटकर कवितायें तो करता है पर कोई प्रबन्ध नहीं रचता। (६) महाकवि-जो किसी एक तरह का काव्य-प्रबन्ध रचता है। (७) कविराज-जो अ्र्प्रनेक भाषाओ्र्रं में भिन्न भिन्न रसों के काव्य- प्रबन्धों की रचना करता है। ऐसे कवि संसार में बहुत कम होते हैं। (८) आवेशिक-जो मन्त्रादि उपदेश के बल से सिद्धि प्राप्त करके जिस समय उस सिद्धि का प्रभाव रहता है तब तक कान्य करता है।

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(२६ ) -- (E) अविच्छेदी-जो जभी चाहे निरवच्छिन्न कविता कर सकता है। (१०) संक्रामयिता-जो मन्त्र-सिद्धि के बल से अपनी सरस्वती (कवित्व-शक्ति) का कन्याओ्ं या कुमारों में संक्रमण कर सकता है। मन्न्नसिद्ध कवियों के दो उदाहरग प्रसिद्ध हैं। पर नाम उनका ज्ञात नहीं है। एक वे जो सभाओं में जाकर जो बात करें सब भुजङ्गप्रयात छन्द में। उनकी प्रतिज्ञा होती थी। अस्यां सभायां ममैपा पतिज्ञा भुनङ्गपयातै्चिना वाडन वाच्या। दूसरे काश्मीर राजा की सभा में.जाकर शास्त्रार्थ करने लगे- सभी बात पद्यों ही में कहे। उनके प्रतिवादी कई कक्षा के बाद गद्य में बोलते हुए भी शिथिल पड़ने लगे। तब सिद्धजी ने कहा- अनवद्ये यदि पद्ये गद्ये शैथल्यमावहसि। तत्कि त्रिभुवनसारा तारा नाराधिता भवता ॥ अर्थात्-मेरे अनवद्यपंद्यों के सामने गद्य कहते हुए भी आप शिथिल हो चले, सो क्या आपने श्रीतारादेवी की आराधना कभी नहीं की ? कविता के सतत अभ्यास से सुकवि की रचना परिपक्क होती है। कविता का 'परिपाक' क्या है इसमें मतभेद है। वामन का मत है कि जब कविता के शब्द ऐसे ठीक वैठ जायँ जिससे एक अक्षर का भी उलट फेर होने से सब बिगड़ जाय तो उस कविता को 'परिपक्त' समझना। पर अवन्तिसुन्दरी का मत है कि यह तो एक प्रकार की कवि में न्यूनता है कि अपने काव्य को केवल एक ही तरह की शब्द-रचना में निबद्ध कर सकता है। महाकवियों की तो ऐसी शक्ति होती है कि एक ही भाव को नाना प्रकार के शब्दों में प्रदर्शित कर सकते हैं। इसलिए उचित लक्षरा यही है कि वर्यनीय रस के योग्य शब्द और अरथ का निबन्धन जब ही तभी कवित्व को

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( ३० ) 'परिपक्व' समझना चाहिए। और ऐसा परिपाक हुआ या नहीं इसमें सहदयों का हृदय ही प्रमा हो सकता है। यह परिपाक नव प्रकार का होता है-(१) आदि में और अन्त में जो विरस है उसे 'पिचुमन्दपाक' कहते हैं। (२) आादि में विरस अन्त में मध्यम उसे 'वदरपाक'। (३) आदि में विरस अन्त भें सरस उसे 'मृद्वीकापाक'। (४) आदि में मव्यम अन्त में विरस 'वार्ताकपाक'। (५) आदि में और अन्त में मध्यम 'तिन्तिडीपाक'। (६) आदि में मध्यम अन्त में सरस 'सहकारपाक'। (3) आदि में सरस अन्त- में विरस 'क्रमुकपाक' । (८) आदि में सरस अन्व में मध्यम 'त्रपुसपाक'। () आदि में अन्त में सरस 'नारिकेलपाक'। इनमें (१), (४), (७) सर्वथा त्याज्य हैं। (२), (५), (८) का संशोधन करना। औौर बाक़ी (३), (६), (८) का ग्रहण करना चाहिए। ( ६ ) व्याकरणशास्त्र के अनुसार जिसका रूप निर्गीत हो उसे 'शब्द' कहते हैं। निरुक्तनिघंटु-कोश आदि से निर्दिष्ट जो उस शब्द का अभिधेय है-वही उसका 'अर्थ' है। शब्द और अर्थ दोनों मिलकर 'पद' कहलाते हैं। इससे यह स्पष्ट है कि जब तक हम किसी शब्द का अर्थ नहीं जानते तव तक हमारे लिए वह 'पद' नहीं है। पदों की वृत्ति पाँच प्रकार की हैसुबवृत्ति, समासवृत्ति, तद्धितवृत्ति, कृद्वृत्ति, तिङ्वृत्ति। सुबवृत्ति के भी पाँच भेद हैं। (१) जातिवाचक-'गाय' 'घोड़ा' 'पुरुष' 'हाथी'। (२) द्रव्य (व्यक्ति) वाचक-'हरि', 'हिरण्यगर्भ', 'काल', 'आकाश' 'दिक्'। (३) गुगवाचक-'श्वेत', 'कृष्ण', 'लाल', 'पीला'। (४) असत्ववाचक (जो किसी वस्तु का वाचक नहीं है)- जैसे प्रादि उपसर्ग । (५) कर्मप्रवचनीय-'को,' 'पर' इत्यांदि। यह पाँच प्रकार की सुबदृत्ति समस्त वाङ्मय की 'माता' कहलाती हैं।

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( ३१ ) सुबधृत्ति ही समासवृत्ति है। भेद इतना ही है कि सुबवृप्सि में शब्द व्यस्त रूप में-अलग अलग-रहते हैं और समासवृत्ति में समस्त-मिले हुए-रूप में इसके छः भेद हैं। इनके नाम चमत्कार के साथ इस श्लोक में कहे गये हैं- 'द्वन्द्वो द्विगुरपि चाहं मद्गेहे नित्यमव्ययीभावः । तत्पुरुष कर्मधारय येनाहं स्यां बहुव्रीहिः॥ इसका व्यंग्य अर्थ ऐसा है-'मैं घर में द्वन्द्वू (दो प्राणी, स्त्री- पुरुष) हूँ। द्विगु हूँ (दो बैल मेरे पास हैं)। मेरे घर में नित्य अव्ययी- भाव रहता है (खरचा नहीं चलता) । तत्पुरुष (इसलिए हे पुरुष महाशय) कर्मधारय (ऐसा काम करो) जिससे मैं बहूव्रीहि (अधिक अन्नवाला) हो जाऊँ 1 इसी व्यंग्यार्थ के द्वारा छः समासों के नाम भी वतलाये गये हैं। तद्धितवृत्तियाँ अ्र्प्रनन्त हैं। ये वृत्तियाँ प्रातिपादिकसम्बन्धी होती हैं। जैसे 'सिन्धु' से 'सैन्धव', 'लोक' से 'लौकिक' 'मुख' से 'मौखिक' इत्यादि। कृद्वृत्ति धातु-सम्बन्धी होती है। 'क' धातु से 'कर्त्ता, 'ह' धातु से 'हर्ता' इत्यादि। 'तिववृत्ति'-दसों लकार लटू लिटु इत्यादि द्वारा-दस प्रकार की होती है। इसके भी दो प्रभेद हैं-शुद्ध-धातुसम्बन्धी-जैसे 'करोति' 'हरति' इत्यादि-और नामधातु-सम्बन्धी जैसे 'पल्लवयति' 'पुत्रीयति' इत्यादि। ये पाँच प्रकार के पदं परस्पर अन्वित होकर अनन्त रूप धारण करते हैं। इसी अनन्त रूप के प्रसंग यह उक्ति प्रसिद्ध है कि- 'बृहस्पति वक्ता थे, इन्द्र श्रोता, १००० दैवी वर्ष तक कहते रहे-पर- शब्दराशि का अन्त नहीं हुआ'।

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( ३२ ) विदर्भदेश के वासी अपने बोल-चाल और लेखेों में सुववृत्ति का अधिक अवलम्वन करंते हैं-गौडदेशी समासवृत्ति का-दच्तिरा-देश- वासी तद्धितवृत्ति का-उत्तर-देशवासी कृद्वृत्ति का-और तिवदृत्ति सभी देश में पसन्द है। जिस अर्थ का कहना इष्ट है उस अर्थ के बोधक पदों के समूह को 'वाक्य' कहते हैं। वाक्य के बोधन प्रकार तीन हैं-वैभक्त, शाक्त, तथा शक्तिविभक्तिमय। प्रतिपद के साथ जो उपपद या कारक, विभक्ति लगी हैं उनके द्वारा जो बोध होता है सो 'वैभक्त' है। जहाँ विभक्ति लुप्त हैं-जैसे समासों में-तहाँ जो बोध होता है सो केवल शब्दों के शक्ति द्वारा-इससे इसे 'शाक्त' कहते हैं। जिस वाक्य में दोनों तरह के पद हैं वहाँ शत्तिविभक्तिमय है। वाक्य के दस भेद हैं :- (१) एकाख्यात-जिसमें एक ही क्रियापद है। (२) अ्नेकाख्यात-जिसमें अ्र्नेक क्रियापद हैं। यहाँ अ्रनेक क्रियापद होने के कारण यद्यपि अनेक वाक्य भासित होते हैं तथापि परस्पर सम्बद्ध होने के कारस ये मिलकर एक ही वाक्य समझे जाते हैं। (३) आवृत्ताख्यात-जिसमें एक ही क्रियापद बारम्बार आया है। (४) एकाभिधेयाख्यात-जिसमें एक ही अर्थ के कई क्रियापद हैं। जैसे- हृष्यति चूनेषु चिरं, तुष्यति वकुलेषु, मोदते मरुति। (५) परिणताख्यात-जिसमें एक ही क्रियापद कई बार आ्रावे पर स्वरूप-भेद से जैसे- 'साडस्मिन्जयति जीवातुः पञ्चेषोः पश्चमध्वनिः । ते च चैत्र* विचित्रैलाकक्कोलीकेलयोऽनिलाः॥

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( २२ ) यहाँ 'अनिलाः' का क्रियापद 'जयन्ति' होगा-जो पहली पंक्ति के 'जयति' पद का परिणत रूप है। (६) अनुवृत्तास्यात-जिसमें पूर्व वाक्यगत क्रियापद द्वितीय वाक्य के साथ पहले ही स्वरूप में अन्वित होता है। जैसे- 'चरन्ति चतुरम्भोधिवेलोद्यानेषु दन्तिनः । चक्रवालाद्रिकुञ्जेपु कुन्दभासो गुणाश्च ते'॥ यहाँ 'चरन्ति' क्रियापद का उसी रूप में 'गुगाः' के साथ भी अन्वय है। (७) समुचिताख्यात-जहाँ एक ही क्रियापद ऐसा चुनकर रक्खा गया जो उपमान उपमेय दोनों में यथावत् लगता है। जैसे- 'परिग्रहभराक्रान्तं दौर्गत्यगतिचोदितम् । मनो गन्त्रीव कुपथे चीत्करोति च याति च'।। (८) अध्याहृताख्यात-जहाँ क्रियापद स्पष्ट नहीं है पर अध्याहृत हो सकता है-जैसे 'चन्द्रचूड: श्रिये स वः' यहाँ 'भूयात्' अध्याहृत है। (६) कृदभिहिताख्यात-जहाँ क्रियापद का काम कृदन्तपद देवा है-जैसे 'अभिमुखे मयि संहृतमीक्षितम्' यहाँ 'ईच्ितं समहार्षीत्' की जगह 'ईचितं संहतम्' है। (१०) अनपेत्िताख्यात-जहाँ क्रियापद के उल्लेख की आवश्यकता नहीं है। जैसे- 'कियन्मान्' जलं विश्र' यहाँ 'अस्ति', 'भवति' का प्रयोजन नहीं है।

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( ३४ ) गुय और अलंकारसहित वाक्य ही को 'काव्य' कहते हैं। क़ाव्य के लक्षणा के प्रसंग ग्रंथों में त्र्प्रनन्त शासत्ार्थ है। इस विचार का यहाँ अवसर नहीं है। काव्य के विरुद्ध कई आन्षेप किये जाते हैं। (१) "काव्यों में प्रायः सिथ्या ही बातों के वर्गान पाये जाते हैं। इसलिए काव्य का उपदेश अनुचित है- ['उपवीशयन्ति परमप्सरसो नृपमानसिंह तव दानयशः। सुरशाखिमौलिकुसुमस्पृहया नमनाय तस्य यतमानतमाः ।।' मानसिंह की प्रशंसा में कवि कहता है-'अप्सरा लोग आपके दान का यश गाती हैं-दन्यों ?- कल्पद्रम की ऊपरवाली डारों में जो फूल लगे हैं उनको वे तोड़ना चाहती हैं-ज़ब तक पेड़ का सिर नोचा नहीं होगा तव तक यह नहीं हो सकता-इसलिए कल्पतरु से अधिक दानी के यश का वर्णन सुनकर उनका माथा अवश्य नीचा होगा फिर फूल चुनना सुकर हो जायगा। यहाँ सभी बातें मिथ्या हैं-न अप्सरायें ऊपर के फूल चुनना चाहती हैं-न मानसिंह के दानयश को गाती हैं। ] पर यह आन्ेप ठीक नहीं। किसी की स्तुवि में यदि अर्थवाद का प्रयोग किया जाय तो वह मिथ्या नहीं कहा जा सकता। विशेष कर जब स्तुत पुरुष स्तुति का पात्र है। और फिर ऐसी काल्पनिक उक्तियों तो काव्यों ही में नहीं-श्रुति और शास्त्रों में भी अनेक पाई जाती हैं-जैसे 'यस्तु प्रयुडक्ते कुशलो विशेषे शब्दान् यथावद् व्यवहारकाले। सोऽनन्तमामनोति जयं परत्र वाग्योगविद्दुष्यति चापशब्दैः ।।' यहाँ कहा है कि जो शुद्ध शब्दों का प्रयोग करता है सो परलोक में अ््रनन्त फल पाता है। यहाँ अत्युक्ति स्पष्ट है।

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( ३५ ) (२) फाव्य के प्रति दूसरा आनेप यंह है कि काव्यों में अस- दुपदेश पाये जाते हैं। जैसे कोई व्यभिचारिणी सत्री त्रपनी कन्या से कहती है-'न मे गोत्रे पुत्नि कचिदपि सतीलाञ्छ्नमभूत्' (मेरे कुल में कभी पवित्र होने का कलंक नहीं लगा है)। इसका समाधान यह है-यह केवल उल्टा उपदेश का प्रकार है। सच्चरित्र होना उचित है, इस सीधे उपदेश का उतना प्रभाव नहीं पड़ता जितना उलटे उपदेश की हँसी उड़ाने का। इसी उपदेशप्रकार का अवलम्वन ऐसे श्लोकों में किया जाता है। जैसे-किसी ने अपने मित्र की बड़ी हानि की-तिस पर जिसकी हानि हुई वह कहता है- उपकृतं बहु मित्र किसुच्यते· सुजनता प्रथिता भवता परा। विद्धदीदशमेवं सदा सखे सुखितमास्स्व ततः शरदां शतम् ॥ 'आपने वड़ा उपकार किया-अपनी सज्जनता प्रकट की। ऐसा ही उपकार करते हुए आप चिरंजीवी हों। (३) तीसरा आप्रान्ेप काव्य के प्रति यह है कि इसमें अश्लील शब्द और अर्थ पाये जाते हैं। इसका समाधान यह है-जहाँ जैसा प्रक्रम आ जाय वहाँ वैसा दर्गन करना उचित ही है। अश्लील काव्यों के द्वारा भी शच्छे अच्छे उपदेश हो सकते हैं। और अश्लील वाक्य तो वेदों में और शास्त्रों में भी पाये जाते हैं। फिर काव्यों ही पर यह आच्ेप करना उचित नहीं है।

वाक्य ही को 'वचन' 'उक्ति' कहते हैं। कहनेवालों के भेद के अनुसार वचन तीन प्रकार के माने गये हैं-न्राह्म, शैव, वैष्याव ।

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( ३६ ) औ पुपुराष आदि पुराखों में जो वचन ब्रह्मा के कहे हुए मिलते हैं उन्हें 'शाह्म' कहते हैं। इन ब्राह्म वचनों के पाँच प्रभेद हैं-सवायम्भुव,. ऐश्वर, आर्प, आर्षोक, आर्षिपुत्रक। 'स्वयम्भू' हैं ब्रह्मा-उनके वचन 'ब्राह्म' हैं। ब्रह्मा के सात मानसपुत्र-भृगु (अथवा वसिष्ठ), मरीचि, अंगिरस, अत्नि, पुलस्त्य, पुलह, क्तु-का नाम है 'ईश्वर'-इनके कह्े हुए वचन 'ऐश्वर' हैं। इन ईश्वरों के पुत्र हैं ऋृपिगरा-इनके वचन हैं 'आर्ष'। ऋपियों की सन्तान हैं ऋषीकगरा-इनके वचन हैं 'आर्षिक'। शृषीकों के पुत्र हैं ऋषिपुत्रकइनके वचन हैं 'आर्षिपुत्रक'। इन पाँचों वचनों के लक्षण यों हैं- (१) सर्वभूतात्मकं भूतं परिवाद च यद् भवेत्। क्वचिन्निरुक्तमोक्षार्थ वाक्यं स्वायम्भुवं हि तत् ॥ अर्थात्-'खायम्भुव' वाक्य वह है जो सकल जीव जन्तु के प्रसंग यथावत् उक्ति है और कहीं कहीं मोच का भी साधक है। (२) व्यक्तक्रममसंक्षिप्तं दीप्षगम्भीरमर्थवत्। पत्यक्षं च परोक्षं च लक्ष्यतामैश्वरं वच: ॥ 'ऐश्वर' वचन वह है जिसका क्रम स्पष्ट हैं-संतिप्त नहीं है- उज्जवल-गम्भीर-अर्थ से भरा-प्रत्यक्ष भी है और परोक्ष भी। (३) यत् किञ्चिन्मन्त्रसंयुक्तं युक्तं नामविभक्तिभिः । प्रत्यक्षाभिहितार्थ च तदपीणां वचः स्मृतम् ॥ 'आर्प' वचन वह है जिसमें कुछ मन्त्र मिले हैं-नाम और विभक्ति से संयुक्त है-और जिसका अरथ स्पष्ट उक्त है। (४) नैगमैविविधैः शब्दैरनिपातवहुलं च यत्। न चापि सुमहद्दाक्यमृषीकारां वचस्तु तत्।।

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1 ( ३७ ) 'आर्षाक' वचन वह है जिसमें वैदिक शब्द नाना प्रकार के हैं- निमात शब्दों का अ्धिक प्रयोग है-और बहुत विस्तृत नहीं है। (५) अविस्पष्टपदपाय यच्च स्याद् बहुसंशयम्। ऋषिपुत्रवचस्तत् स्यात् सवपरिदेवनम्॥ 'आर्ष्पुत्रक' वचन वह है जिसमें बहुत से पद स्पष्ट नहीं हैं- जो बहुत सन्दिग्ध है-और सब लोगों के परिदेवन के सहित है। इनके प्रत्येक के उदाहर पुरागों में मिलते हैं। वचन के विषय में प्राचीन 'सारस्वत' कवियों का सिद्धान्त ऐसा है- ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, गुह्द, वृहस्पति, भार्गव इत्यादि ६४ शिष्यों के प्रति जो उपदेश वाक्य है उसे 'पारमेश्वर' कहते हैं। वही पारमेश्वर वचन क्रम से देव और देवयोनियों में यथामति व्यवहृत होने पर 'दिव्य' कहलाया। देवयोनि हैं-विद्याघर, अप्सरा, यत्, रच्स्, गन्घर्व, किनर, सिद्ध, गुह्यक, भूत और पिशाच। इनमें पिशाचादि- जो शिव के अनुचर हैं-अपने स्थान में संस्कृत मोलते हैं पर मर्त्य- लोक में जब उनके वचन लिखे जायँगे तो भूतभाषा में। अप्सराओं की उक्ति प्राकृत भाषा में। यह 'दिव्य' वचन चार प्रकार का होता है-वैबुध, वैद्याधर, गान्धर्व, और योगगिनीगत। इनमें (१) 'वैबुध' वचन समस्त और व्यस्त दोनों प्रकार के पद सहित हैं-शृगार और अद्भुतरस से पूर्-अनुप्रास सहित-और उदार। (२) 'वैद्याधर' वचन अनुप्रास की छाया-मात्र-समेत, चतुर उक्ति से पूर्ग, प्रसादगुरासम्पन्न और लम्बे समाससहित। (३) 'गान्धर्व' वचन बहुत पर छोटे समासों से भरा-जिसके तत्त्वार्थ समझने के लायक हैं। (४) 'योगिनीगत' वचन समास और रूपक से परिपूर्ण-गम्भीर अर्थ और पदक्रम

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( ३८ ) सहि -- रिद्धान्तों के बानुसार। 'भौगंग' वचन भी प्रभावशाली होने के कारग 'दिव्य' माना गया है। इसमें प्रसादगुगयुक्त मधुर उदात्तपद समस्त तथा व्यस्तरूप से रहते हैं। इसमें ओजत्त्री शब्द नहीं रहते। इन 'दिव्य' वचनों का उपदेश इसलिए आवश्यक है कि नाटकों में जब कवि इन देवताओं या देवयोनियों की उत्तियों को लिखेगा तो उनके वचन किस प्रकार के होने चाहिए सो जाने बिना कैसे लिख सकेगा ? यह वात प्रसिद्ध है कि मर्त्यलोक में त्वतार लेने पर जैसे वचनों में भगवान् वासुदेव की अभिरुचि थी वही 'वैष्व' वचन है-उसी को 'मानुष' वचन भी कहते हैं। इस 'वैष्सव' या 'मानुप' वचन के तीन भेद हैं-जिसे तीन 'रीति' कहते हैं। इनके नाम हैं-वैदर्भी, गौडी, पांचाली। इसके त्र्रतिरित्त 'काकु' अ्रनेक प्रकार की होती है। 'काकु' ध्वनि (उचारण) के विकार का नाम है। राजशेखर ने इसका लक्षणा लिखा है 'अभिप्रायवान् पाठधर्म: काकु:'-अर्धात् किसी अर्प्रभित्रायविशेष से यदि उच्चारग के स्वरादि में कुछ विलच्त परिवर्तन कर दिया जाय उसी को 'काकु' कहते हैं। यह दो प्रकार की होती है- साकांन, निराकांत। जिस काकु के समझने में दूसरे वाक्य की अपेक्ा होती है वह काकु साकांक है। जो काकु वाक्य के वाद स्वतन्त्र रूप से भासित हो सो निराकांन है। साकांत काकु तीन प्रकार की है- आत्तेपगर्भ, प्रश्नगर्भ, वितर्कगर्भ । निराकांत काकु भी तीन प्रकार की है-विधिरूप, उत्तररूप, निर्णयरूप। इनके अ्रतिरिक्त मिश्रितकाकु के तनन्त प्रकार हैं। जैसे अनुज्ञा-उपहास-मिश्रित, अ्रभ्युमगम-अतुनय- मिश्रित इत्यादि। जो अर्थ का चमत्कार केवल शब्दों से नहीं निकलता सो काकु से निकलता है।

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( ३६ ) काव्य प्रायः लोग संस्कृत ही भाषा में करते हैं। पर उसके पढ़ने का ढंग वही जानता जिसके ऊपर सरस्ती की कृपा होती है। और यह पढ़ने का ढंग अ्नेक जन्म के प्रयास से सिद्ध होता है। प्रसन्नता पर स्वर को सन्द करना उचित है, अप्रसन्नता पर तीव्र। ललित-काकुसहित-उज्जल-अर्थ के अनुसार पदच्छेदसहित सुनने में सुखकर-रंपष-ऐसे पाठ की कवि प्रशंसा करते हैं। ऋतिशीय-अ्रतिविलम्बित-अधिक उच्च स्वर में-बिलकुल नादहीन-पदच्छेद रहित-बहुत धीमा-ऐसे पाठ की निन्दा होती है। गम्भीरता-अनश्वर्य-तारमन्द का समुचित प्रयोग-संयुक्त वर्णों की कोमलता-ये पाठ के गुग हैं। जिस पाठ में विभक्तियाँ स्पष्ट हों, समासों में गड़बड़ी न की जाय, पदसन्धि शुद्ध परिस्फुट हो-ऐसा पाठ प्रतिष्ठित समझा जाता है। पढ़ने के समय विद्वान को चाहिए कि जो पद पृथक हैं उनको मिला न दें, या जो समस्त हैं • उनको अलग न कर दें, औौर आख्यातपद को मन्द न कर दें। शब्द या शब्दार्थ नहीं भी जानता हो यदि पढ़ने का ढंग अच्छा है तो लोगों को सुनने में अच्छा लगता है। देशभेद से पढ़ने के ढंग में भेद पाया जाता है। काशी से पूरब मगधादि देशवासी संस्कृत अच्छी तरह पढ़ते हैं-प्राकृत के पढ़ने में ये कुण्ठित हो जाते हैं। गौडदेशवासी प्राकृत गाथा को अच्छी तरह नहीं पढ़ सकते। इनका पढ़ना न अस्पष्ट न खूब स्पष्ट, न रूक न कोमल, न धीमा न ऊँचा है। कोई भी रस हो, कोई भी रीति, कोई भी गुग-कर्गाट देशवाली सभी को गर्व और टंकार के साथ पढ़ते हैं। द्रविडंदेशवासी गधय, पद्य तथा मिश्रित गद्यपद्य सभी को गाने के सुर में पढ़ते हैं। लाट देशवासी संस्कृत से द्वेष रखते हैं वे प्राकृत मधुर रीति से पढ़ते हैं। सुराष्ट्रादि देशवासी संस्कृत में कहीं कहीं अपभ्रंश मिलाकर सुन्दर रीति से पढ़ते हैं। काश्मीरवासी

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(४० ) शारदा के प्रसाद से ऐसे अच्छे ढंग से पढ़ते हैं कि ऐसा मालूम होता है कि उनके में गुडुचो का पानी भरा है ( !! ) उसके आगे उत्तरा- पथ के वासी अधिक सानुनासिक उच्चारण-पूर्वक पढ़ते हैं। पाच्चाल- प्रान्त-वासियों के पाठ में रीतियों का अनुसरण वर्णरचना का पूर्ण और स्पट्ट उच्चारण, यति के नियमों का परिपालन-ये सव गुम रहते हैं। और उनके सुनने से ऐसा भान होता है कि कान में मधु पड़ रहा है। अच्छे पाठ का ढंग यही है कि सभी वर्ण अपने अपने समुचित स्थान से उच्चरित हों और अपने समुचिव रूप में और उनमें वाक्यों के अर्थ के अनुसार विराम हो।

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काव्यार्थ के-अर्थात् काव्य के विषय के-१६ चोनि या मूल हैं- (१) श्रुति, (२) स्मृति, (३) इतिहास, (४) पुराए, (५) प्रमार- विद्या-अर्थात् मीमांसा और न्याय-वैशेषिक, (६) समयविद्या- अर्थात् अवान्तर दार्शनिक सिद्धान्त, (७) अर्थशास्त्र, (८) नाट्यशास्त्र, (E) कामसूत्र, (१०) लौकिक, (११) कविकल्पित -कथा, (१२) प्रकीर्णक, (१३) उचितसंयोग, (१४) योक्तसंयोग, (१५) उत्पाद्य- संयोग, (१६) संयोगविकार। इनके कुछ दष्टान्त यहाँ दिये जाते हैं- (१) श्रुति में लिखा है-'उर्वशी हाप्सरा: पुरूरवसमैलं चकमे' इतने मूल पर समस्त विक्रमोर्वशी नाटक बना। (२) स्मृति में नियम लिखा है कि यदि किसी के ऊपर त्र्रधिक ऋृख् का दावा किया जाय-वह सवका इनकार करे-तो बादी यदि ऋष के कुछ भी श्रंश को प्रमागित कर सके तो अभियुक्त को कुल दावा देना होगा। इसी आधार पर विक्रमोवशी का यह श्लोक है।

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( ४१ ) 'हंस प्रयच्छ मे कान्तां गतिस्तस्यास्त्वया हुंता। विभावितैकदेशेन देय यदभियुज्यते' ॥ *उर्वशी से वियुक्त राजा हंस को कहता है-'हे हंस मेरी प्रियतमा को तुम दे दो। तुमने उसकी गति ली है। और जव कुछ श्ंश का लेना तुम्हारा प्रमागित होगया तब तुम्हें सब दावा चुकाना होगा'। (३) इतिहास (रामायण में) रामचन्द्रजी सुग्रीव से कहते हैं- 'न स सङ्कचितः पन्था येन वाली हतो गतः। समये तिष्ठ सुग्रीव मा वालिपथमन्वगाः॥ 'अर्थात् जिस मार्ग के आश्रयग से बालि मारा गया उस मार्ग का अनुसरण मत करो अपनी प्रविज्ञा पर स्थिर रहो। इसी आधार पर यह श्लोक है- 'मद' नवैश्वर्यलवेन लम्भितं विसृज्य पूर्वः समयो विमृश्यताम्। जगज्जिघत्सातुरकण्ठपद्धतिर्न वालिनैवाहततृप्िरन्तकः'॥ सुग्रोव को लन्मराजी कहते हैं-'अभी जो नया राज्य तुम्हें मिला है इसके मद को त्याग कर पहले जो तुमने प्रतिज्ञा की थी उसका विचार करो। यमराज की संसार-संहारेच्छा केवल बालि के मरने से तृप्त नहीं हुई।' (४) पुरासों में लिखा है-'जिन जिन दिशाओं की ओर हिरण्य- कशिपु हँसकर देखता था उन उन दिशाओं को भयभीत देवता लोग नमस्कार करते थे'। इसी आधार पर कवि ने लिखा है- स सञ्चरिष्णुसु वनत्रयेऽपि यां यदच्छयाऽशिश्रियदाश्रया श्रिय: । F. 6

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( ४२ ) अरकारि तस्यै मुकुटोपलंस्खलत्- करैस्त्रिसन्ध्य त्रिदशैदिये नमः ॥ इसके प्रसंग में यह कहा गया है कि कवि जैसे जितना वेद, स्मृति, पुरास, इतिहास का आश्रयर करता है वैसे ही उतनी ही प्रशंसा का पात्र होता है। (५) मीमांसा का सिद्धान्त है कि शब्द का अ्र्रभिधेय सामान्य- जाति-है-फिर विशेष भी उसका अर्थ हो जाता है-इसी आधार पर कवि कहता है- 'सामान्यवाचि पदमप्यभिधीयमानं मां प्राप्य जातमभिधेयविशेषनिष्ठम्। स्त्री काचिदित्यभिहिते सततं मनो मे ताभेव वामनयनां विपयीकरोति'॥ 'सामान्यवाची भी पद मेरे प्रति विशेषवाची हो गया ? सामान्यतः स्त्रीपद का प्रयोग जहाँ होता है तहाँ हमको उसी वामनयना (मेरी प्रियतमा) का भान होता है!' फिर न्याय क़ा यह सिद्धान्त है, कि 'निरतिशय ऐश्वर्य से युक्त हो ही कर ईश्वर जगत् का कर्ता होता है।' इसी आधार पर कवि कहता है- 'किमीहः कि कायः स खलु किमुपायस्त्रसुवनं किमाधारो धाता सजति किमुपादान इति च। अतक्यैश्वर्य त्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः कुतर्कोऽय कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगतः ।।' (६) समयविद्याओं में वौद्धसिद्धान्त के आधार पर यह श्लोक है-

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( ४३ ) 'कलिकलुपक्कतानि यानि लोके मयि निपतन्तु विमुच्यतां स लोक:। मम दि सुचरितेन सर्वसत्त्वा: परमसुखेन सुखावनीं पयान्तु।।' वोधिसत्त्व कहते हैं-'जितने पाप के फल हैं सब मेरे ऊपर गिरें और मेरे जितने पुण्य हैं उनसे संसार के सब प्रासी सुखी होवें। (७) अर्थशास्त्र के सिद्धान्त के आ्र्प्राधार पर- 'बहुव्याजं राज्यं न सुकरमराजमणिधिभि:' 'राजकार्य छल से भरा हुआ है-बिना चारों के काम नहीं चल सकवा'। (८) नाट्यशास्त्र के सिद्धान्त के आधार पर- पार्वती को नृत्य की शिक्षा देते हुए शिवजी की उक्ति- 'एवं धारय देवि वाडुलतिकामेव कुरुष्वाङ्गकं मात्युच्चैर्नम कुञ्चयाग्रचरण मां पश्य तावत्स्थितम्।' 'हे देवि इस तरह बाहु को फैलाओ-शरीर को ऐसा करो- बहुत नीचे न झुको-पैर को ज़रा मोड़ लो-मैं जैसे खड़ा हूँ सो देखो'। (E) कामशास्त्र के आधार पर- नाश्चर्य त्वयि यल्लक्ष्मीः क्षिप्त्वाऽघोक्षजमा गता। असौ मन्दरतस्त्व' तु पाप्तः समरतस्तया ।।' 'लच्मी विष्ए को छोड़कर जो तुम्हारे पास शई'-इसमें कुछ आश्चर्य नहीं। विष्णु मन्दर पर्वत से आये (मन्द-रत हैं) और तुम समर (लड़ाई) से आये (सम-रत) हो।'

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( ४४ ) (१०) लौकिक-

पियाधरावदशानि मधूनि द्रविडाङ्गना: ॥।' 'मिर्च और पान से स्वच्छ मुख द्वारा द्रविड स्त्रियाँ अपने प्रियतम के अधरों में लगा हुआ मद्य पीती हैं'। (११) कवि-कल्पित कथा के आधार पर- 'अस्ति चित्रशिखो नाम खङ्गविद्याधराधिपः। दक्षिस मलयोत्सङ्गे रत्नवत्याः पुरः पतिः ॥ तस्य रत्नाकरसुता श्रियो देव्या: सहोदरी। स्वयंवरविधावासीत् कलत्र' चित्रसुन्दरी ।।' 'मलय के दत्तिस भाग में रत्नवती नगर के खङ्गविद्याधराधिप राजा हैं। रत्नाकर की लड़की लक्ष्मी देवी की सहोदर वहिन चित्र- सुन्दरी नाम की स्वयंवर विधान से उनकी पत्नी हुई।' (१२) प्रकीर्य-धनुर्वेद के आधार पर-

नतांसमाकुञ्चितसत्यपादम्। ददर्श चक्रीकृतचारुचापं पहतु मभ्युद्य तमात्मयोनिम्।।' 'शिवजी ने कामदेव को देखा जिस समय कामदेव दचिपानेत्र में सुष्टि लगाये कन्धे को भुकाये बायें पैर को मोड़े धनुष खींचे उनको बाण मारने को उद्यत थे।' (१३) उचितसंयोग के आाधार पर- 'पाण्ड्योऽयमंसार्पितलम्वहारः क्लृप्ताङ्गरागो हरिचन्दनेन ।

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( ४५ ) आभाति वालातपरक्तसानु: सनिर्भरीद्गार इवाद्रिराज: ॥ 'पांड्य राजा के कन्धे .पर (लाल) माला पड़ी है-और शरोर में हरिचन्दन का लेप लगा हुआ है। मालूम होता है जैसे नवोदित सूर्य के किरणों से लाल शृंग समेत जल के भरनों से सुशोभित हिमालय हों।' (१४) योत्तसंयोग- 'कुर्वद्िः सुरदन्तिनो मधुलिहामस्वादु दानोदकं तन्वानैर्नमुचिद्र हो भगवतश्चक्ष: सहस्रव्यथाम्। मज्जन् स्वर्गतरद्रिणीजलभरे पङ्कीकृते पांसुभि- र्यद्यात्राव्यसनं निनिन्द दिमना: स्वर्ल्लोकनारीजनः ॥" 'स्वर्ग की स्ति्रियाँ राजा की सवारी से जो उपद्रव हुआ उसकी निन्दा करती गई। उस सवारी से इतनी धूल उड़ी कि देवताओं के हाथियों की मद-धारा धूल से भरी हुई मधुमक्खियों को कुस्वादु लगने लगी-भगवान् इन्द्र की हज़ारों आँखों में पीड़ा होने लगी-जिस स्वगगङ्गा के जल में वे स्त्रियाँ नहाती थीं उसका जल पंकमय होगया।' (१५) उत्पाद्यसंयोग- 'उभौ यदि व्योम्नि पृथक्मवाहौ आकाशगङ्गापयसः पतेताम्। तेनोपनीयेत तमालनील- मामुक्त मुक्तालतमस्य वक्षः। 'नील आकाश में यदि स्वर्गगङ्गाजल की दो धाराएँ गिरतीं तो उससे भगवान् कृष्ण की मुक्तामालाशोभित वत्तःस्थल की उपमा हो सकती।'

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( ४६ ) (१६) संयोगविकार- 'गुणानुरागमिश्रेण. यशसा तव सर्पता। दिग्वधूनां मुखे जातमकस्मादर्घकुङ्कुमम् ।" 'गुगानुराग (लाल) से मिश्रित तुम्हारा (श्वेत) यश जव सर्वत्र फैला तब दिशारूपी स्त्रियों के मुख-कुङ्डम आधा ही रजित से हुए (आधा श्वेत ही भासित हुआ)।' काव्य के 'विषय' या 'पात्र' सात प्रकार के होते हैं- (१) 'दिव्य', स्वर्गीय-जहाँ इन्द्र, शची, अप्सरा इत्यादि के वर्गन स्र्ग ही के सम्बन्ध में-होता है। (२) 'दिव्यमानुष' -सवर्गीय होते हुए मर्त्यलोक-सम्बन्धी। इसके चार प्रभेद हैं- स्वर्गीय पुरुष का मर्त्यलोक में आना तथा मर्त्य पुरुष का स्वर्ग जाना-जैसे शिशुपालवध में नारद का द्वारका आना, अर्जुन का इन्द्र के पास जाना। स्वर्गीय व्यक्ति मर्त्य हो जाय तथा मर्त्य स्वर्गीय हो जाय-जैसे श्रीकृषा का तवतार और गंगातट पर मरे हुए मनुष्यों का विमान पर स्वर्ग जाना। सवर्गीय वृत्तान्त की कल्पना-जैसे दो गन्धवों के वार्तालाप की कल्पना। किसी व्यक्ति का स्वर्गीय भाव उनके प्रभाव से आविर्भूत हुआ-जैसे श्रीकृष्ण ने यशोदा की गोद में साये हुए स्वप्र में कुछ ऐसी वातें कहीं जिससे उनका दिव्य-भाव सूचित हुआ। (३) मर्त्य (मानुष)-मनुष्यों की घरेलू घटनाओं का वर्णन। (४) पातालीय-नागलोक में तन्तकादि नागों के चरित्र का वर्णन। (५) मर्त्यपातालीय-कर्सार्जुन युद्ध में कर्स के शर में प्रविष्टनाग जब दोबारा उनके पास आया और कहा फिर भी मैं

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४७ तुम्हारे शर में प्रवेश करता हूँ तुम उस शर को चलाओ। तब कर्ा (मनुष्य) ने नाग (पातालीय) से कहा कि 'यह समझ रक्खो कि कंर्स दोबारा एक वाग को नहीं चलाता-तुम देखो मैं अभी मामूली मर्त्यलोकतम्बन्धी शरों ही से अर्जुन को मार गिराता हूँ'। (६) दिव्यपातालीय-शिवजी (दिव्य) के शरीर पर नाग- राज (पातालीय) का वगेन। (७) स्वर्गमर्त्यपातालीय-जनमेजय के सर्पयज्ञ के सम्बन्ध में आस्तीक ऋषि (मनुष्य), तच्तकनाग (पातालीय) और इन्द्र (स्वर्गीय) का वर्गनं।

साहित्य का विषय अनन्त तथा निस्सीम है। पर दो प्रभेद में सभी अन्तर्गत होते हैं-'विचारितसुस्थ' तथा 'अविचारित- रमगीय'। 'विचारितसुस्थ' दल में सभी शास्त्र हैं और 'अविचारित- रंमगीय' दल में काव्य। ऐसा उद्भट का सिद्धान्त है। पर तत्त्व यह है कि शास्त हो या काव्य, निवन्धन में वही उपयोगी होगा जो जैसा प्रतिभासित (ज्ञात) होगा। और काव्यों में रसयुक्त ही विषय होना चाहिए-नीरस या विरस नहीं। यह अनुभव की बात है कि कई विषय रस को पुष्ट करते हैं और कई उसे बिगाड़ते हैं। पर काव्यों में कवियों की उक्तियों में रसवत्ता शब्दों में है या अरथों में सो अन्वय- व्यतिरेक ही से ज्ञान हो सकता है। अर्थात् किसी काव्य को देखने या सुनने पर यदि हम देखें कि जो शब्द इनमें हैं ये जहाँ जहाँ रहते हैं तहाँ तहाँ ही रस हैं-जहाँ ये शब्द नहीं हैं तहाँ रस नहीं हैं- तो ऐसे स्थल में शब्द ही से रस माना जायगा। जहाँ अर्थ ही के प्रसंग में ऐसा भान होगा तहाँ अर्थ ही से रस माना जायगा। कुछ लोगों का मत है कि वर्णित वस्तु कैसी भी हो-रस का होना या न

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( ४८ ) होना वक्ता के स्वभाव पर निर्भर होता हैं। जैसे अनुरागी पुरुष जिसी पदार्थ की प्रशंसा करेगा विरक्त पुरुष उसी की निन्दा करेगा। वस्तु का स्वभाव स्वतः नियत नहीं है चतुर वत्ता की वाक्यशैली पर बहुत कुछ निर्भर रहता है। ऐसा सत अवन्तिसुन्दरी का है। इनका कहना है-

'वस्तु स्वभावोऽत कवेरतन्त्रों गुणागुणावुक्तिवशेन काव्ये।

निन्दंस्तु दोषाकरमाइ घूर्तः।।' कवि वस्तुस्वभाव के अधीन नहीं है। काव्य में वस्तुओं के गुप या दोष कवि की उक्ति पर ही निर्भर रहता है। चन्द्रमा एक ही वस्तु है। पर चतुर कवि जब उसकी प्रशंसां करता है तो उसको अमृतांशु (अमृतंमय किरखवाला) कहता है-और जव उसी की निन्दा करता है तो दोपाकर (दोषों का आकर) कहता है'। पर असल में दोनों पक्ष ठीक हैं। काव्य का चमत्कार वर्गित वस्तु के स्वभाव पर भी निर्भर होता है और वस्तुओं के दोष-गुए कविकृत वर्णन पर भी निर्भर होते हैं।। काव्य का विषय दो प्रकार का होता है-मुक्तकविषय तथा प्रबन्धविषय। इन दोनों के प्रत्येक पाँच पाँच प्रभेद हैं-शुद्ध, चित्र, कथोत्थ, संविधानकभू, आ्र्ाख्यानकवान्। सज्जनों के मनोविनोदार्थ यहाँ उदाहरण मैथिली भाषा के दिये जाते हैं। (१) मुक्तक-शुद्ध-जिसमें शुद्ध एक मात्र वृत्तान्व है-जैसे गरभनिवास त्रास इम विसरल पसरल विषयकमीति। • (२) मुक्तक-चित्र-जिसमें वृत्तान्त प्रपश्व सहित है -·

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(8e) बांधल छलहुँ गरभघर, जे प्रभु कथल उधार। तनिक चर नहि अरचह, की गुनि गरब अपार ।। कोन छन की गति होएत, से नहि हृदय विचार। एकरूप नहि थिररह, विषम विषय संसार ।। मरमवेधि सहि वेदन, आस तदपि विसतार। विषय मनोरथ नव नव करम क गति के टार ।।

(३) सुक्त्तक-कथोत्थ-जहाँ एक वृत्तान्त से उत्थित दूसरा वृत्तान्त है-

हे शिव छुटल हमर मन त्रास। गिरिजावल्लभ चरणक भेलहु अन्तिम वयस में दास ।। जनम जनम कुकरम जत अरजल-से सभ होइछ हरास। हमरहु हृदय भक्ति सुरलतिका, अविचल लेल निवास।। भन कविचन्द शिवक अनुकम्पा, सब जग शिवमय भास। उतपति पालन प्रतय महेश्वर, सभ तुनर भृकुटिविलास ।। (४) सु्तक-संविधानकमू-जहाँ वृत्तान्त सम्भावित है- भारी भरोस अहाँक रखैछी, कहैछी महादेव सत्य कथा। दान कहाँ सकरू कर द्रव्य न, एको देखैछी न पुण्य कथा॥ अपने दयाक दरिद्र वनी तँ, छूटै कहाँ लोकक आधिव्यथा। यदि नाथ निरंजन सर्व अहाँ, दुखभार पड़ै किए मोर मथा॥ (५) मुक्तक-लोकाख्यानकवान्-जिसमें वृत्तान्त परिकल्पित है- आएल वसन्त वनिजार-पसरल प्रेम पसार युवयुवती जन आाव-हृदय अरपि रस पाव। F. 4.

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(५० ) (१) निवन्ध-शुद्ध- कत कत हमर जनम गेल-कयल न सत उपचार। तकर पराभव अनुभव-भेलहुँ जगत के भार॥ सेवलहुँ हम ने उमावर, केवल छल व्यवहार। करुणाकर दुख सुनथि न, दुस्सह दुख के टार।। (२) निवन्ध-चित्र- अनकर अनुचर दनि हम रहलहुँ, सहलहुँ शिव हे नित अपमान। अनुचित करम उचित कै जानल, आनल शिव हे पतितक दान । धरम सनातन एक न मानल, ठानल शिव हे मलिन पमान। चन्द्र विकल मन पतित के मोर-सन-करु जनु शिव हे हृदय पखान।। (३) निबन्ध-कथोत्य- भलू भेल भल भेल त्यागल वास छुटिगेल मोर मन दुरजन त्रास। भल भल लोकक वैसव पास सपनहुँ सुनव न खल उपहास। मन न रहत मोर कतहु उदांस 'शिव' 'शिव' रटव जखनधरि श्वास। (४) निदन्ध-संविधानकभू शिव पिय अभिनव गीति ्रीति सँ रचितहुँ शिवतट विगतविकार भक्ति सँ नचितहुँ। महोदार करुणावतार काँ यचितहुँ अन्त समय हम काल कराल सं नचितहुँ। अछिि भरोस मन मोर दया प्रभु करता शरसागत जन जानि सकल दुख हरता।

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(५१) (५) निबन्ध-आ्रख्यानकवान् -· सखित्र सखित्र ललित समय लखु भोर- नागर नागरि रैंनि रंग करि सयन करे पिश्र् कोर। धीवर अंक मयंक तरखि चढ़ि शशिकर जाल पसार उडगए मीन वकाय चलल जनि गगनपयोनिधिपार। काव्य सभी भाषाओं में हो सकता है। भाव चाहिए। कोई एक ही भाषा में काव्य कर सकता है-कोई अनेक भाषाओं में- संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, पैशाची इत्यादि। एकोडर्थ: संस्कृतोक्त्या स सुकविरंचनः प्राकृतेनापरोऽस्मिन् अन्योऽपभ्रंशगीर्भि: किमपरमपरो सतभाषाक्रमेण। द्वित्राभि: कोऽपिवाम्भिभ वंति चतसटभि: किश्च कश्चिद् विवेत्तुं यस्येत्थं धीः प्रपन्ना स्नपयति सुकवेस्तस्य कीतिर्जगन्ति॥

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कविचर्या-राजचर्या

कवि का कर्तव्य

(१) काव्य करने के पहले कवि का कर्तव्य है उपोगी विद्या तथा उपविद्याओं का पढ़ना और अनुशीलन करना। नामपारायण, धातुपारायरा, कोश, छन्दःशासत्र, अलंकार-शास्त्र-चे काव्य की उपयोगी विद्याएँ हैं। गीत-वाद्य इत्यादि ६४ कलाएँ 'उपविद्या' हैं। इनके अतिरिक्त सुजनों से सत्कृत कवि की सन्निधि (पास बैठना), देशवार्ता का ज्ञान, विदग्धवाद (चतुर लोगों के साथ वातचीत), लोक- व्यवहार का ज्ञान, विद्वानों की गोष्ठी और प्राचीन काव्य-निवन्ध- ये काव्य की 'माताएँ' हैं। आठ कान्य-माताओं का परिगसन इस पद्य में है- स्वास्थ्यं प्रतिभा डभ्यासो भक्तिवि द्वत्कथा बहुश्रुतता। स्मृतिदान्य मनिवरे दश्च मातरो Sष्टौ कदित्वस्य।। शरीर स्वस्थ, तीव्र प्रतिभा, शास्त्रों का अ्भ्यास, देवता तथा गुरु में भक्ति, विद्वानों के साथ वार्तालाप, बहुश्रुतता, [शास्त्रों के अतिरिक्त बहुत कुछ वृद्धजनों से सुन सुनाकर जो ज्ञान उपलब्ध होता है ], प्रवल स्मरसशक्ति, अनिर्वेद [प्रसन्न चित्त-खेद से शून्य]-ये आठ काव्य की 'माताएँ' हैं। इसके अतिरिक्त कवि को सदा 'शुचि' रहना आवश्यक है। 'शौच' तोन प्रकार का है-वाकूशौच, मनःशौच, शरीरशौच।

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( ५३) वाणी की शुद्धि और मन की शुद्धि तो शास्त्रों के द्वारा होती है। शरीर-शुद्धि के सूचक हैं-हाथ पैर के नख साफ़ हों, मुँह में पान, शरीर में चन्दन का लेप, कीमती पर सादे कपड़े, सिर पर माला। कवि का जैसा स्रभाव है दैसा ही उसका काव्य होता है। लोगों में कहावत भी है-'जैसा मसव्वर वैसी तसवीए'। कवि को स्मितपूर्वाभिभाषी होना चाहिए-जब बोले हँसता हुआ बोले। बातें गम्भीर अर्वाली कहे। सर्वत्र रहस्य, असल तत्त्व का अन्वेषण करता रहे। दूसरा कवि जब तक त्रपना काव्य न सुनादे तब तक उसमें दोषोद्भावन न करे-सुनाने पर जो यथार्थ हो सो कह देवे। कवि के लिए घर साफ़ सुथरा-सब ऋतु के अनुकृल स्थान, नाना वृत्त-मूल-लतादि से सुशोभित बग़ीचा, क्राडा- पर्दत, दीर्घिका पुष्करिी, नहरें, क्यारियाँ, मयूर, मृग, सारस, चक्रवाक, हंस, चकोर, क्रौंच, कुरर, शुक, सारिका-गरभी का प्रती- कार, फ़व्वारे, लता कुजज, झूला इत्यादि अपेतित हैं। काव्य- रचना से धक जाने पर-मन की ग्लानि दूर करने के लिए आज्ञा- कारी मूक सेवक सहित या एक-दम निर्जन स्थान चाहिए। परि- चारक अपभ्रंशभाषा-प्रवीण और परिचारिकाएँ मागधीभाषा-प्रवीष हों। कवि की खियों को प्राकृत तथा संस्कृत भाषा जाननी चाहिए। इनके मित्र सर्व "भाषाज्ञाता हों। कवि को स्वयं सर्व भाषा-कुशल शीघ्रवाकू, सुन्दर अत्तर लिखनेवाला, इशारा समभनेवाला, नाना लिपि का ज्ञाता होना चाहिए। उसके घर में कौन सी भाषा लोग बोलेंगे सो उसी की आज्ञा पर निर्भर होगा। जैसे-सुना जाता है मगध में राजा शिशुनाग ने यह नियम कर दिया था कि उनके अन्वःपुर में ट, ठ, ड, ढ,ऋ, प, स, ह इन आठ वर्गों का उच्चारग कोई न करे। शूरसेन के राजा कुविन्द ने भी कटुसंयुक्त अक्षर के उच्चारण का प्रतिषेध कर दिया था। कुन्तलदेश में राजा

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(५४ ) सातवाहन की आज्ञा थी कि उनके अन्तःपुर में केवल प्राकृत भापा बोली जाय। उज्जयिनी में राजा साहसांक की आज्ञा थी कि उनके अन्दःपुर में केवल संस्कृत बोली जाय। पेटी, पाटी, खडिया, वन्द करने के लायक़ दावात, रोशनाई, कलम ताडीपन्र या भूर्जपत्र, तालपत्र, लोहकंटक, साफ़ मजी हुई दीवार, इतनी चाज़ें सतत कवि के सन्निहित रहनी चाहिए। सबसे पहले कवि को अपनी योग्यता का विचार कर लेना चाहिए-मेरा संस्कार कैसा है, किस भाषा में काव्य करने की शक्ति मुझमें है, जनता की रुचि किस शर है, यहाँ के लोगों ने किस तरह की किस सभा में शिक्षा पाई है, किधर किसका मन लगता है, यह सव विचार करके तन्र किस भाषा में काव्य करेंगे इसका निर्याय करना होगा। पर यह सब भाषा का विचार केवल उन कवियों को आवश्यक होगा जो एकदेशी आंशिक कवि हैं। जो सर्वतन्त्रस्वतन्त्र हैं उनके लिए जैसी एक भाषा वैसी सब भाषा। पर इनके लिए भी जिस देश में हों उस देश में जिस भाषा का अधिक. प्रचार हो उसी भाषा का आश्रयया करना ठीक होगा। जैसे कहा है कि गौडादि देश में संस्कृत का अधिक्र प्रचार था, लाट देश में प्राकृत का, मरुभूमि में सर्वत्र अपभ्रश का, अवन्ती, पारियात्र, दश- पुर में पैशाची का, मध्यदेश में सभी भाषा का। जनता को क्या पसन्द है क्या नापसन्द है यह भी पता लगा. कर जो नापसन्द हो उसका परित्याग करना। परन्तु केवल सामान्य जनता में अपना अपयश सुनकर कवि को आत्मग्लानि नहीं होनी चाहिए, अपने दोष-गुख की परीक्षा स्वयं भी करना चाहिए। - इस पर एक प्राचीन. श्लोक है-

जनस्तु यद्वद स तद् वदिष्यति।

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(५५ ) जनावनायोद्यमिनं जनार्दनं जगरक्षये जीव्यशिवं शिव वदन् । अर्थात् "अपनी समभ में अनुचित कार्य नहीं करना। सामान्य जनता को तो जो मन आावेगा कहेगा। जगत् की रक्षा में तत्पर हैं भगवान् विष्णु उनको तो लोग 'जनार्दन' (लोगों को पीड़ा देनेवाला) कहते हैं। और जगत् के संहारकर्ता हैं महादेवजी उनको 'शिद' (कल्यायकारक) कहत हैं"। खासकर प्रत्यक्ष-जीवित कवि के काव्य का सत्कार बहुत कम होता है। प्रत्यक्षकविकाव्य च रूपं च कुलयोषित: । शृहवैद्यस्य विद्या च कस्मैचिददि रोचते।। सपर्थात् जीवित कवि का काव्य, कुलवधू का रूप और घर के वैद्य की विद्या-कदाचित् ही किसी को भाती है। बालकों के, स्ति्ियों के और नीच जातियों के काव्य बहुत जल्दी सुख से मुख फैल जाते हैं। परिव्राजकों के, राजाओ्ं के, और सद्य:कवि [तत्वर कांव्य करनेवाले ] के काव्य एक ही दिन में दर्शोंदिशा में फैल जाते हैं। पिता के काव्य को पुत्र, गुरु के काव्य को शिष्य और राजा के काव्य को उनके सिपाही इत्यादि बिना विचारे पढ़ते हैं और तारीफ़ करते हैं। कवियों के लिए और कई नियम बताये गये हैं। जब तक काव्य पूरा नहीं हुआ है तब तक दूसरों को सामने उसे नहीं पढ़ना। नवीन काव्य को तकेले किसी आदमी को सामने नहीं पढ़ना। इसमें यह डर रहता है कि वह आदमी उस काव्य को अपना कहकर ख्यात कर देगा-फिर कौन सान्ती दे सकेगा कि किसकी रचना है ? अपने काव्य को मन ही मन उत्तम न समझ बैठना, न उसका डीड हाकना। अहंकार का लेशमात्र भी सभी संस्कारों को

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(५६ ) नष्ट कर देता है। अपने काव्य को दूसरों से जँचवाना। यह वात प्रसिद्ध है कि गुण दोप जैसे पत्तपात-रहित उदासीन पुरुष को जँचते हैं वैसे स्वयं काम करनेवाले को नहीं। जो अपने को बड़ा कवि लगावे उसकी रच के अनुसार उसके चित्त को प्रसन्न कर देना ही ठीक है-फिर अपने काव्य को ऐसे कविम्मन्य के सामने नहीं पढ़ना। एक तो वह उसका गुप ग्रहस नहीं करेगा, दूसरा यह भो सम्भव है कि वह उसे अपना हकर ख्यात फर दे। कवि के लिए काल के हिसाव से कार्यक्रम के भी नियम बनाये गये हैं। 'दिन को और रात की चार चार पहरों में वाँटना। प्रात :- काल उठकर सन्या-पूजा करके सारस्वतसूक्त पढ़ना। फिर एक पहर तक विद्याभवन में आराम से बैठ कर काव्योपयोगी विद्या और उपदिद्याओं का अनुशीलन करना। ताज़ा संस्कार से बढ़कर प्रतिभा का उद्धोधक दूसरा नहीं है। दूसरे पहर में काव्य की रचना करना। मध्याह के लगभग जाकर सनान करके शरीर के अनुकूल भोजन करना। भोजन के वाद काव्यगोफी का अधि- वेशन। प्रश्नों के उत्तर-समस्या-पूर्ति-मातकाभ्यास और चित्र- काव्य प्रयोग इत्यादि तीसरे पहर तक करना। चौथे पहर में तकेले या परिमित पुरुषों के सङ्ग बैठकर प्रातःकाल जो काव्य रचा है उसकी परीक्षा करना। रस के आवेश में जो काव्य रचा जांता है उस समय गुण-दोष विवेक करने की वुद्धि नहीं चलती। इसलिए कुछ समय वीतने ही पर स्व्ररचित काव्य की परीत्षा हो सकती है। परोक्षा करने पर यदि कुछ अंश अधिक भासित हो तो उसे हटाना- जो कमी हो उसकी पूर्ति करना-जो उलटा पलटा हो उसका परिवर्तन करना-जो भूल गया हो उसका अतुसन्धान करना। साचं- काल सन्ध्या करना और सरस्व्रती की पूजा। इसके वाद दिन में जो काव्य परीचिंत और परिशोधित हो चुका है उसको प्रथम पहर

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(पूं७) के अन्त तक लिखवाना। द्वितीय तृतीय पहर में सुख से सोना। सुचित्त सोने से शरीर नीरोग रहता है। चतुर्थ पहर में जागना और ब्राह्ममुहूर्त में प्रसन्न मन से सब पुरुषार्थों का परिचिन्तन करना। काल के हिसाब से भी चार प्रकार के कवि होते हैं। (१) 'असूर्यम्पस्य'-जो गुफाओं के भीतर या भीतर घर में बैठ कर ही काव्य करता है और वड़ी निष्ठा से रहता है-इसकी कविता के लिए सभी काल हैं। (२) 'निषण्ण'-जो काव्य-रचना में तन्मय हो ही कर रचना करता है पर उतनी निष्ठा से नहीं रहता है- इसके लिए भी सभी काल हैं। (३) 'दत्तावसर'-जो स्वामी की आज्ञानुसार ही काव्य-रचना करता है-इसके लिए नियमित काल हैं। जैसे रात के द्वितीय पहर का उत्तरार्घ (जिसे सारस्वत मुहूर्त कहते हैं)। (४) 'प्रायोजनिक'-जो प्रस्ताव विशेष पाकर प्रस्तुत विषय लेकर काव्य-रचना करता है। इसके लिए काल का नियम नहीं हो सकता। जभी कोई विषय प्रस्तुत होगा तभी वह काव्य करेगा। पुरुषों की तरह तितयाँ भी कवि हो सकती हैं। कारर इसका स्पष्ट है। बुद्धि, मन इत्यादि का संस्कार आत्मा में होवा है, और आत्मा में स्त्री पुरुप का भेद नहीं है। कितनी राज-पुत्नियाँ, मन्त्रि- पुत्नियाँ, वेश्याएँ शास्त्रों में पण्डिता और कवि हो गई हैं। शीला- भट्टारिका, विकटनितम्बा, विजयांका तथा प्रभुदेवी-इन चार स्रोकवियों के नाम प्रसिद्ध हैं। जब प्रबन्ध तयार होगया तो उसकी कई प्रतियाँ करा लेनी चाहिए। क्योंकि काव्य-प्रबन्धों के पाँच नाशकारण और पाँच महापद होते हैं। (१) निक्षेप-किसी दूसरे के पास धरोहर रखना । (२) विक्रय-बेचना। (३) दान-किसी को दे डालना । F.8

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( ५८) (४) देशत्याग-स्वयं कवि देश छोड़ कर देशान्तर चला जाय। (५) अल्पजीविता-ल्प ही घवस्था में कवि का सर जाना। ये पाँच काव्य के नाश के कारण होते हैं। (१) दरिद्रता। (२) व्यसनासक्ति-द्यव. आदि व्यसनों में लगा रहना। (३) अवज्ञा-(४) मन्द भाग्य-(५) दुष्ट और द्वेपियों पर विश्वास-ये पाँच 'महापद' हैं। 'अभी रहने दें फिर समाप्त कर लूँगा'-'फिर से इसे शुद्ध करूँगा'-'मित्रों के साथ सलाह करूँगा'-इत्यादि प्रकार की यदि कवि के मन में चंचलता हो तो इससे भी काव्य का नाश होता है। [कवियों को तर्कादिशास्त्र का ज्ञान भी आवश्यक है-ऐसा सिद्धान्त राजशेखर का है। ठीक भी यही है। पर कुछ लोगों का कहना है कि तर्कादिशास्त्र का परिशीलन कवित्वशक्ति का वाधक होता है। इसके प्रसंग में एक कथा पंडितों में प्रसिद्ध है। एक बड़े कवि थे-कहने पर तत्तरा ही श्लोक बना लेसे थे । काग़ज़ कलम की आवश्यकता नहीं होती थी। शभी भी ऐसे कवि हैं जिन्हें 'घटिकाशतक' की उपाधि है-अर्थात् एक घंटा में १०० श्लोक बना लेते हैं। उक्त कवि ने किसी राजा के दरबार में जाकर अपने आशुकवित्व के द्वारा बड़ी प्रतिष्ठा पाई। राजा के सभापंडित को पूछा गया-'आप लोग इतना शीघ्र श्लोक क्यों नहीं वना सकते'? पंडित ने कहा-'जो पंडित शास्त्र पढ़ेगा वह इतना शीघ्र श्लोक नहीं बना सकेगा। इन कवि महाशय को भी यदि शास् पढ़ाये जायँ तो यही दशा होगी'। राजा ने कवि से कहा-'आप कुछ दिन शास्त्र पढ़ कर फिर भइए'। कवि पंडितजी के पास गये। पंडितजी उन्हें तत्व-चिन्तामगि का प्रामाण्यवाद पढ़ाने लगे। .दस दिन के बाद राजसभा में गये-समस्या दी गई। वो आप लगे सिर

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खुजलाने-और कुछ सोच विचार कर क़लम काग़ज़ माँगने लगे। किसी तरह श्लोक बनाया-अच्छा बना'। दस दिन के बाद फिर आये तो बहुत देर तक प्रयत्न करने पर भी प्रस्तुत विषय पर श्लोक नहीं बन सका। बड़ी देर में केवल आंधा अनुष्टुपू बना सके। "नमः पामाण्यवादाय मत्कवित्वापहारिऐ"- "मेरी कवित्वशक्ति के नाश करनेवाले प्रामाण्यवाद को नमस्कार"] वार्किक कवियों में सबसे प्रसिद्ध प्रसन्नराघवनाटककर्ता जयदेव हैं। तार्किक कवि कम होते हैं इस विश्वास को दूर करने के उद्देश्य से इस नाटक में पारिपारश्वक के द्वारा यह प्रश्न है कि 'ये कवि तार्किक होते हुए भी कवि हैं यह आश्चर्य है'। इस पर सूत्रधार कहता है-'इसमें आश्चर्य क्या है- येपां क्ोमलकाव्यकौशलकलालीलावती भारती तेपां कर्कशतर्कवकरचनोद्गारेऽपि कि हीयते। यैः कान्ताकुच कुडएले कररुहाः सानन्दमारोपिता- स्तैः कि मत्तकरीन्द्रकुम्भशिखरे नारोपणीया: जराःः ॥ तात्पर्य यह है कि 'जो कवि कोमल काव्य-कला में निपुय है सो क्या कठिन तर्क में निपुण नहीं हो सकता। जो पुरुष अपने हाथों से कोमल केलि करवा है सो क्या उन्हीं हाथों से बाग नहीं चला सकता'। इन्हीं जयदेव की एक और गौरवोक्ति मिथिला में प्रसिद्ध है -- नर्केषु कर्कशधियो वयपेव नान्य: । काव्येपुं कोमलधियो वयमेव नान्य: ।। कान्तासुरज्जितधियो वयमेव नान्यः। कृष्से समर्पितधियो वयमेव नान्य: ।।

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(६० ) (२) चेमेन्द्र ने कवित्व-शिक्षा के विषय में एक छोटा सा ग्रन्थ लिख डाला है जिसका नाम 'कविकण्ठाभरख' है। इसके अनुसार शिक्षा की पाँच कक्षायें होती हैं-(१) 'अरकवेः कवित्वाप्तिः' कवित्वशक्ति का यत् किच्चित् सम्पादन। (२) 'शिन्ना प्राप्तगिर: कवेः', पदरचनाशक्तिसम्पादन करने के बाद उसकी पुष्टि करना। (३) 'चमत्कृतिश्र शिक्षाप्तौ'-कविता-चमत्कार। (४) 'गुगदोपोद्गतिः' काव्य के गुण-दोषप का परिज्ञान। (५) 'परिचयप्राप्ति'-शालों का परिचय। (१) त्रकवि की कवित्वप्राप्ति के लिए दो तरह के उपाय हैं- 'दिव्य'-यथा सरस्वती देवी की पूजा, मन्त्र, जप इत्यादि-तथा 'पौरुष'। पौरुष प्रयत्न के सम्बन्ध में तीन तरह के शिष्य होते हैं। 'अल्पप्रयत्नसाष्य'-थोड़े प्रयत्न से जो सीख जाय। 'कच्छसा्य'- जिसकी शिक्षा के लिए कठिन परिश्रम की अपेन्षा है। 'असाष्य'- जिसकी शिक्षा हो ही न सके। अल्पप्रयत्नसाध्य शिष्य के लिए ये उपाय हैं- (क) साहित्यवेत्ताओं के सुख से विद्योपार्जन करना। शुष्क तार्किक या शुष्क वैयाकरण को गुरु नहीं वनाना। ऐसे गुरुओं के पास पढ़ने से सूक्ति का विकास नहीं होता। [शुष्क तार्किक तथा शुष्क वैयाकरण के प्रसंग कई कहानियाँ प्रसिद्ध हैं। किसी पंडित के पास एक तार्किक और एक वैयाकरस पढ़ता था। दोनों की बुद्धि जाँचने के लिए एक दिन घर में जाकर लेट गये अपनी कन्या को कहा-यदि विद्यार्थी आवें तो कह देना 'भट्टस्य कटयां शरटः प्रविष्टः' (भटृजी की कमर में छिपकली मैठ गई है)। व्याकरण का विद्यार्थी आया। कन्या की बात सुनकर वाक्य को व्याकरस से शुद्ध पाकर चला गया।

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न्यायशास्र का विद्यार्थी आया-उससे भी कन्या ने वही वात कही। पर उसने विचार करके देखा तो समझ गया कि यह तो. असम्भव है कि मनुष्य की कमर में छिपकली घुस जाय। गुरुजी बाहर निकले और कहा कि न्यायशास्त्र ही बुद्धि को परिष्कृत करती है निरा व्याकरग नहीं। एक दिन दोनों विद्यार्थी कहीं जा रहे थे। रास्ते में शाम होगई-पंक वृक्ष के नीचे डेरा डालकर आग जलाकर एक हंडिये में चावल पानी चढ़ा दिया। वैयाकरग रसोई बनाने लगा। नैयाचिक वाज़ार से घृत लाने गया। जब चावल आधा पकने पर हुए तो 'दुभ् टुभु' शब्द होने लगा। वैयाकर ने धातुपाठ का पारायग करके विचारा कि 'दुभु' धातु तो कहीं नहीं है-यह हंडिया अशुद्ध बोल रही है। यस ढेर सा बालू उसमें डाल दिया-बोली बन्द होगई-वैयाकरग प्रसन्न होगये-अशुद्ध शव्दोब्वारण अब नहीं होवा। उधर नैयायिक महाशय एक दोना में घृत लेकर आ रहे थे तो उनके मन में यह तर्क उठा कि-इन दोनों वस्तुओं में कौन आधार है, कीन आधेय-अर्थात् घृत में दोना है या दोने में घृत। इस बात की परीक्षा करने के लिए उन्होंने दोने को उलट दिया। घृत ज़मीन पर गिर पड़ा-आप बड़े प्रसन्न हुए कि शङ्का का समाधान होगया-दोना ही घृत का आधार था। डेरे पर पहुँचे तो हंडिया में बालू भरा पाया। पूछने पर वैयाकरण ने जवाब दिया-"यह पात्र अशुद्ध वोल रहा था इससे मैंने इसका मुँह वन्द कर दिया- पर तुम घृत कहाँ लाये हो ?" नैयायिक ने कहा, मैंने आज एक बड़े जटिल प्रश्न को हल किया है-"दोना ही घृत का आधार है-घृत दोने का नहीं"। दोनों अपनी अपनी चतुरता पर प्रसन्न होकर भूखे घर लौट आये I] (ख) व्याकरग पढ़कर-नाम, धातु तथा बन्दों में विशेष परिश्रम करके फिर काव्यों के सुनने में यत्न देना। विशेषकर देशभापा के

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( ६२ ) सरस गोत और गाथाओं को बड़े भ्यान से सुनना। इस तरह सरस काव्यों के सुनने से और उनके रसों में मग्न होने से कवित्व का अङ्घर हृदय में उत्पन्न होता है। दूसरे दरजे का शिष्य है 'कृच्छसाध्य'। उसकं लिए ये उपाय हैं- कालिदास के सब ग्रन्थों की पढ़ना और उनके एक एक पद, श्लोक- पाद और वाक्यों का एकचित्त होकर परिशीलन करना। कालिदास के पद्यों का कुछ हेर-फेर कर कुछ पद वा पदांश को छोड़कर अपनी ओर से उनकी पूर्ति करना। छन्द के अभ्यास के लिए पहले-पहल विना अर्थ के ही वाक्यों की छन्दोबद्ध रचना करना-जैसे- ग्रानन्दसन्दोहपदार विन्दकुन्देन्दुकन्दोदित विन्दुष्टन्दम्।

[इस चाल की शिक्षा आज-कल के एक परम प्रसिद्ध कवि पण्डित की हुई है। वाल्यावस्था ही में उनके पिता ने उनको सरल छन्दों का ज्ञान करा दिया था-फिर उन्हें कहें 'श्लोक बना'। टूटे फूटे शब्दों को जोड़ कर छन्दोबद्ध पद्य बन जाता था-भाषा भी ऊटपटांग ही होती थी। फिर पिताजी उन श्लोकों की टीका बना लेते थे।. इस कार्य में पिताजी ऐसे दक् थे कि किसी भाषा के कैसे भी वाक्य हों उनका संस्कृत व्याकरण के अनुसार वे अर्थ निकाल लेते थे। रघुवंश के द्वितीय सर्ग की उन्होंने एक टीका लिखी जिसके अनुसार समस्त सर्ग का यह अर्थ निकलता है कि दिलीप वशिष्ठ की गाय को चुरा ले गये। यह टीका सुप्रभात पत्र में छप रही है। ] इसके अनन्तर प्रसिद्ध प्राचीन श्लोकों में हेर फेर कर उनकी प्रकारान्तर से पूर्ति करना। जैसे रघुवंश का पहला श्लोक है-

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( ६३ ) आागर्थाविव सम्पृक्तौ वांगर्थभतिपत्त ये। जगतः पितरौ चन्दे पार्वतीपरमेश्वरी॥ इसका अनुकरग- वाण्यर्थाविव संयुक्तौ वाण्यर्थमतिपत्तये। जगतो जनकौ वन्दे शर्वाणीशशिशेखरौ।। तृतीय प्रकार के शिष्य हैं 'असाध्य'। इसके प्रसंग में क्षेमेन्द्र का सिद्धान्त है कि जो मनुष्य व्याकरण या न्यायशास्त्र के पढ़ने से पत्थर के समान जड़ हो गया है-जिसके कानों में काव्य के शब्द कभी नहीं घुसे-ऐसे मनुष्य में कवित्व कभी भी नहीं उत्पन्न हो सकता- कितनी भी शिक्षा उसे दी जाय। दृष्टान्त- 'न गर्दभो गा्यते शिक्षितोऽपि सन्दर्शितं पश्यति नार्कमन्धः'।

(२) पद-रचना-शक्ति-सम्पादन करने के बाद उसके उत्कर्ष- सम्पादन के उपाय यों हैं-गयपतिपूजन, सारस्वतयाग करना, तदनन्तर छन्दोबद्ध पद्यरचना का अभ्यास, अन्य कवियों के काव्य को पढ़ना, काच्याङ्ग विद्याओं का परिशीलन, समस्यापूर्ति, प्रसिद्ध कवियों का सहवास, महाकाव्यों का त्रस्वादन, सौजन्य, सज्जनों से मैत्री, चित्त प्रसन्न तथा वेषभूषा सौम्य रखना, नाटकों के अभिनय देखना, चित्त श गाररस में पगा हो, अपने गान में मग्न रहना, लोकव्यवहार का ज्ञान, आख्यायिका तथा इतिहासों का अनुशीलन, सुन्दर चिंत्रों का निरीक्षरा, कारीगरों की कारीगरी को मन लगाकर देखना, कवियों को यथाशक्ति दान देना, वीरों के युद्ध का निरीक्षया, सामान्य जनता के वार्तालाप को ध्यान से सुनना, श्मशान तथा जंगलों में घूमना, तपस्वियों की उपासना, एकान्तवास, मधुर तथा स्निग्ध भोजन, रात्रिशेष में जागना, प्रतिभा तथा स्मरणशक्ति का समुचित

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( ६४ ) उद्धोधन, आराम से वैठना, दिन में कुछ सोना, अधिक सर्दी तथा गरमी से वचना, हास्यविलास, जानवरों के स्वभाव का परिचय, समुद्र, पर्वत, नदी इत्यादि की स्थिति (भूगोल) का ज्ञान, सूर्य, चन्द्रमा तथा नक्तत्रादि (खगोल) का ज्ञान, सब ऋतुओं के स्वभाव का ज्ञान, मनुष्य-मंडलियों में जाना, देशी भापाओं का ज्ञान, पराधीनता से बचना, यज्ञमंडपों में, सभागृहों में तथा विद्या-शालाओं में जाना, अपनी उन्नति की चिन्ता न करना, दूसरों ही की उन्नति की चिन्ता करना, अपनी तारीफ़ में संकोच, दूसरों की तारीफ़ का अनुमोदन, अपने काव्यों की व्याख्या करना ("जीवत्कवेराशयो न वर्णनीयः'), किसी से वैर या डाह न करना, व्युत्पत्तिसम्पादन के लिए सभी लोगों का शिष्य होना, किस समय कैसा काव्य पढ़ा जाय अथवा कैसे ओोताओं को कैसा काव्य रुचिकर होता है इत्यादि ज्ञान-अपने काव्यों का देशान्तर में प्रचार, दूसरों के काव्यों का संग्रह, सन्तोष, याचना नहीं करना, कहा भी है- विद्यावतां दातरि दीनता चेत् कि भारती वैभववित्रमेण। दैन्यं यदि मेयसि सुन्दरीणां धिक् पौरुषं तत् कुसुमायुघस्य।। आ्रम्य (गँवार) भाषा का प्रयोग नहीं करना-काव्य-रचना में खूब परिश्रम करना, पर बीच वीच में विश्राम अवश्य करना, नये नये भावों और विचारों के लिए प्रयत्न, कोई अपने ऊपर आचेप करे तो उसे गम्भीरता से सह लेना, चित्त में नोभ नहीं लाना, ऐसे पदों का प्रयोग करना जिनका समझना सुलभ हो, समरत तथा व्यस्त पदों का यथोचित यथावसर प्रयोग-जिस काव्य का आरम्भ किया उसे पूर् त्रदश्य करना। (३) इस तरह जो कवि शिक्ित हो चुका उसके काव्य में चमत्कार या रमणीयता परम आवश्यक है। बिना रमगीयता के

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काव्य में काव्यत्व नहीं आता। पंडितराज जगन्नाथ ने इसी लिए काव्य का लक्षण ही ऐसा किया है-'रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्'। यह रमणीयता दस प्रकार की होती है, (१) अविचारित-रमगीय, जिस काव्य के आशय समझने या उसके अन्तर्गत रस के तस्वादन में विशेष सोचने की ज़रूरत नहीं होती-जैसे श्रीकृष्ण की मूर्ति के प्रति तुलसीदास की उत्ति- सीस सुकुट कटि काछनी भले बने ह। नाथ। तुलसी माथा तव नमै धनुष वाण लेहु हाथ।। इसके आाशय तथा अन्तर्गत भक्ति-भाव के समझने में विलम्ब नहीं होता। (२) विचार्यमाण रमणीय-जिसके रसास्वादन में कुछ सोचने की ज़रूरत होती है। जैसे बिहारी की उक्ति- मानहु सुख दिखरावनी दुलहिन करि अनुराग। सासु सदन मन ललनहुँ सौतिन दियो सुहाग॥ इसमें कुछ विचारने ही से अन्तर्गत भाव का बोध होता है। प्रथवा- नयना मति रे रसना निज गुण लीन्ह। कर तू पिय भफकारे अपयस लीन्ह ।। (३) समस्वसूक्तव्यापी-जो सम्पूर्ण कविता में है-उसके किसी एक आध खण्ड में नहीं। जैसे उक्त बिहारी का दोहा। अथवा तुलसीदासजी का दोहा- उदित उदयगिरिमंच पर रघुवर वालपतंग। विकसे सन्तसरोजवन हरषे लोचनमृग॥ यहाँ समस्त दोहा में भाव व्याप्त है-किसी एक खंड में नहीं। F. 9.

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( ६६ ) (४) सूक्तकदेशदृश्य-जो कविता के किसी एक अरंश में भासित हो। जैसे कुमारसम्भव के श्लोक में। द्वयं गतं सम्मति शोचनीयतां समागममार्थनया कपालिनः। कला च सा चान्द्रमसी कलावतस्त्वमस्य लोकस्य च नेत्रकौमुदी॥ पार्वतीजी से बटु कहता-है-'कपाली शिवजी के साथ रहने की इच्छा करती हुई तू तथा चन्द्रमा की कला दोनों शोचनीय दशा को प्राप्त हुई' । इस पद्य का समस्त भाव 'कपालिनः' पद में है। शिवजी का सहवास शोचनीय क्यों है ?- क्योंकि वे कपाली हैं, भिखारी हैं। जैसा साहित्य-ग्रन्थों में लिखा है 'कपालिनः' पद के स्थान में यदि उसी अर्थ का पद 'पिनाकिनः' होता तो भाव पुष्ट नहीं होता। हिन्दी में यह एकदेशरमणीयता कवित्तों में अधिक पाई जाती है। यथा-एक कवित्त के पूर्वार्द्ध में विरहिणी वसन्त की शोभा का वर्सन करती हुई अन्त में कहती है-'बिन प्यारे हमें नहि जात सही' इसका उत्तरार्द्ध यों है-(यह कविता मेरे भाई की है)-पूर्वार्द्ध मुझे समरण नहीं है। 'यदुनन्दन आयेो अरी सजनी एक औचक में सखि आथ कह़ी। सुनि चैौकि चकी उभकी हरखाय उठी मुसुकाय लजाय रही। अथवा पद्माकर का कवित्त- लपटै पट पीतम को पहिरयो पहिराय दिये चुनि चूनर खासी .... कान्ह के कान में आँगुरि नाय रही लपटाय लवंगलता सी। (५) शब्दगतरमणीयता। इसके उदाहरसा पद्माकर के काव्य में अधिक पाये नाते हैं-यथा वसन्त-वर्णन- कूलन में केलि में कछारन में कुंजन में क्यारिन में कलिन कलीन किलकंत है। कह़ै पदमाकर परागन में पानहूँ में

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'( ६७) पानन में पीक में पलाशन पतंग है। द्वार में दिशान में दुनी में देश देशन में देखो दीप दीपन में दीपत दिगंत है। वीथिन में व्रज में नवेलिन में वेलिन में वनन में वागन में वगरयो वसंत है।

तन सकोच मन परम उछाहू गूढ़ मेम लखि परै न काहू। जाइ समीप राम छवि देखी रहि जनु कुचरि चित्र अवरखी। पझ्माकर -- जैसी छवि श्याम की पगी है तेरी आँखिन में ऐसी छवि तेरी श्याम आँखिन पगी रहै। कहै पदमाकर ज्यों तान में पगी है त्यौंही तेरी मुसुकानि कान्ह प्राण में पगी रहै। धीर धर धीर घर कीरति किशोरी भई लगन इतै उतै वरावर जगी रहै। जैसी रटि तोहि लागी माधव की राधे ऐसी राधे राधे राधे रट माधव लगी रहै।। यहाँ न शब्द की छटा है न अलंकार का चमत्कार-पर भाव कैसा प्रगाढ़ है ! (७) शब्दार्थोभयगतरमणीयता। (बिहारी ३२) समरस समर-सकोच-बस विवस न ठिकु ठद्दराय। फिर फिर उभकति फिरि दुरति दुरि दुरि उभकति जाय।।

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( ६= ) यहाँ समानलज्जामदना मध्या का स्वाभाविक चिन्न हरदय- आाही है। साध साथ शब्द-लालित्य भी है। तथा पद्माकर- औरे रस औरे रीति औरे राग औरे रंग औरे तन औरे मन औरे वन है गये।। (८) अलंकारगत रमणीयता- कहँ कुम्भज कहं सिन्धु अपारा सोखेड सुयश सकल संसारा। रचि मंडल देखत लघु लागा उदय तासु त्रिसुवन तम भागा। मन्त्र परम लघु तासु वस विधि हरि हर सुर सर्व। महामत्त गजराज कहँ वश कर अंकुश खर्व ।। कैसी उपमाओं की शृहला है! फिर व्यतिरेक और उत्प्रेत्ता की छटा रामायम ही में- गिरा मुखर तनु अर्ध भवानी रति अति दुखित अततु पति जानी। विप वारुनी बन्धु मिय जेही कहिय रमासम किसु वैदेही। जो छविसुधापयोनिधि होई परम रूपमय कच्छप सोई। शोभा रजु मन्दर शृंगारू मथै पाणिपंकज निज मारू। एहि विधि उपजै लच्छि जब सुन्दरता सुखमूल। तदपि सकोच समेत कवि कहहिं सीय समतूल। (६) रसगत रमणीयता। (विहारी १४)

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( ६६.) स्वेद सलिल रोमांच कुस गहि दुलहिन अरु नाथ। दियो हियौ सँग नाथ के हाथ लिये ही हाथ।। आपात्मसमर्पण का कैसा सुन्दर चित्र है! पझ्माकर- चन्दकला चुनि चूनरि चारु दई पहिराय सुनाय सुहोरी वेंदी विशाखा रंची पदमाकर अंजन आँजि समारि कै गोरी। लागी जबै ललिता पहिरावन कान्ह को कंचुकि वेसर बोरी हेरि हरे मुसकाय रही अंचरा मुख दैं वृषभान-किसोरी।। हास्य का भी रमणीय वर्णन पद्माकर ने किया है- हँसि हँसि भजैं देखि दूलह दिगम्बर को पाहुनी जे आवै हिमाचल के उछाह में। कहै पदमाकर सुकाहूसौं कहै को कहा जोई जहाँ देखै सा हँसेई तहाँ राह में। मगन भयेई हँसें नगन महेश ठाढ़े औरे हँसेऊ हँसा हँस के उमाह में शीश पर गंगा हँसै सुजनि भुजंगा हँसै दास ही को दङ्गा भयो नंगा के विवाह में।। (१०) रसालङ्कारोभयगतरमणीयता-के भी ये ही उदाहरग हैं।। (४) कवि शिक्षा की चौथी कत्ता है गुग-दोष-ज्ञान। यहाँ (१) शब्दवैमल्य (२) अर्थवैमल्य (३) रसवैमल्य ये तीन 'गुए' हैं, और (१) शब्दकालुष्य (२) अर्थकालुष्य (३) रसकालुप्य-ये तीन 'दोष' हैं। शब्दवैमल्य। यथा पद्माकर- राधामयी भई श्याम को सूरत इ्गाममयी भई सधिका डोलैं।

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शब्दकालुष्य-के उदाहरण वे होंगे जहाँ शृगार या करुगा- रस के वर्णन में विकट वर्णों का प्रयोग होगा -- या वीररस के वर्णन में कोमल वर्णों का प्रयोग। इस शब्दवैमल्य का विलक्ष उदाहरण भवभूति के उत्तररामचरित में मिलता है- यथेन्दावानन्दं त्रजति समुपोढे कुमुदिनी तथैवास्मिन् दृष्टिमम (यहाँ तक मैत्री भाव है इसलिये कोमल शब्द हैं। इसके आगे वीररस है तदनुकूल उद्भटवर्सा हैं)-कलहकाम: पुनरयम् भाणत्कारक्र रक्कणित गुणगुञ्ज द्गुरुधनुर्ध त- प्रेमा वाहुर्वि कचविकरालोल्वखरसः॥

भोजन समय तुलावत राजा। नहि आवत तजि वालसमाजा ॥ कौशिल्या जब वोलन जाई। डुमुकि दुधुकि प्रश्ु चलहिं पराई॥ निगम नेति शिव अन्त न पाई। ताहि धरै जननी हठि धाई।। धूसर धूरि भरे तनु आये। भूपति विहँसि गेद बैठाये।। गृहस्थ सुख का कैसा हृदयग्राही चित्र है। अर्थकालुष्य-इसी वर्णन में यदि यह कहा होता कि 'भागते- बालक को पकड़ कर माता ने दो थप्पड़ लगाया-जिस पर बालक चिल्लाने लगा-और पिताजी क्रुद्ध होकर पत्नी को भला दुरा कहने लगे,-तो चित्र विलकुल कलुपित हो जाता। रसवेमल्य-विहारी (७०१)- ज्यौं है हौं त्यौं होउँग। हो हरि अपनी चाल। हद्ठ न करौ, अति कठितु है मो तारिवो गुपाल ।। इसी के सदृश पंडितराज जगन्नाथ की उक्ति गंगाजी के प्रति है-

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(७१) बधान द्रागेव द्रढिमरमणीयं परिकर किरीटे वालेन्दु निगडय दंढ़ं पन्नगगणौ: । न कुर्यास्त्वं हेलामितरजनसाधारणधिया जगन्नाथस्यार्यंसुरधुनिसमुद्धारसमयः ॥ (३) रसकालुष्य-यथा काज निवाहे आपने फिरि आवेंगे नाथ। वीते यौत्रन ना कभी फिर आ्वत है हाथ।। योवन की अस्थिरता का वर्गन शृङ्गाररस को कलुषित कर देता है।

(५) कवि शिक्षा की पाँचवीं कक्षा है 'परिचय'। 'परिचय' से यह तात्पर्य है कि कवि को इतने शास्त्रों का परिचय (ज्ञान) आवश्यक है- न्याय, व्याकरण, भरतनाट्यशास्त्र, चागक्यनीतिशास्त्र, वात्स्यायन- कामशास्त्र, महाभारत, रामायए, मोत्तोपाय, आत्मज्ञान, धातुविद्या, वादशास्त्र, रत्नशास्त्र, वैदयक, ज्योतिष्, धनुर्वेद, गजशास्त्र, अश्वशास्त्र, पुरुषलक्तरा, द्यत, इन्द्रजाल, प्रकीर्पशास्त्र। अर्थात् बिना सर्वज् हुए कवि होना असम्भव है।। यह तो हुआ राजशेखर तथा नेमेन्द्र के अनुसार कवियों की शिक्षा और उनके कर्त्तव्य।

२ )

राजा का कर्त्तव्य यह है कि कवि-समाज का आयोजन करे। इसके अधिवेशन के लिए एक सभा-Hall-बनना चाहिए। जिसमें सोलह खम्भे चार द्वार और आठ मत्तवारसी (अटारियाँ) हो। इसी में लगा हुआ राजा का क्रीड़ा-गृह रहेगा। सभा के बीच में चार खम्भों को छोड़कर एक हाथ ऊँचा एक चबूतरा होगा। उसके

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(७२ ) ऊपर एक मगि-जटित वेदिका। इसी वेदिका, पर राजा का श्रासन होगा। इसके उत्तर की ओर संस्कृत भाषा के कवि बैठेंगे। यदि एक ही आदमी कई भाषा में कवित्व करता हो तो जिस भाषा में उसकी तधिक प्रवीयाता होगी वह उसी भाषा का कवि समझा जायगा। जो कई भाषाओं में बराबर प्रवीण है वह उठ उठ कर जहाँ चाहे बैठ सकता है। इनके पीछे वैदिक, दार्शनिक, पौराणिक, स्मृतिशात्त्री वैद्य, ज्योतिषी इत्यादि। पूरव की ओर प्राकृत-भापा के कवि। इनके पीछें नट, नर्तक, गायन, वादक, वाग्जीवन ('वाक्' 'वोलना' से जिनकी जीविका होर, Professional Lecturer, आरज कल के उपदेशक), कुशीलव, तालावचर (ताल देनेवाला-तबला या मृदंगवाला) इत्यादि। पश्चिम की ओर अपभ्रंश भाषा के कवि-इनके पीछे चित्रकार, लेपकार, मगि जड़नेवाले, जौहरी, सोनार, वड़ही, लोहार इत्यादि। दच्ति की ओर पैशाची भापा के कवि। इनके पीछे वेश्यालम्पट, वेश्या, रस्सों पर नाचनेवाला, जादूगर, जम्भक (?), पहलवान्, सिपाही इत्यादि। इस सभा में काव्यगोष्ठी करके राजा काव्यों की परीक्षा करेगा। वासुदेव, सातवाहन, शूद्रक, साहसाङ्क इत्यादि प्राचीन राजाओं की चलाई हुई व्यवस्था के अनुसार यह परीक्षा होगी। सभा में चैठनेवाले सब हष्ट-पुष्ट होंगे। सभा ही में पारितोपिक भी दिये जायेँगे। यदि कोई काव्य लोकोत्तर चमत्कार का निकले तो तदनुसार ही उस कवि का सम्मान होगा। ऐसी गोष्वियाँ लगातार नहीं होंगी। कुछ दिनों के अन्तर पर हुआ करेंगी। [दरभंगा के भूतपूर्व महाराज लक्ष्मीश्वरसिंह प्रति सोमवार पंडितों की ऐसी सभा करते थे ]। इन गोष्ठियों में काव्य-रचना तथा शासतार्थ हुआ करेंगे। काव्य और शास्त्र की चर्चा समाप्त होने पर विज्ञानियों की बारी आवेगी। देशान्तर से जो विद्वान आवें उनका शास्त्रार्थ देशी

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'(७३ .- ) पंडितों के साथ करांकर यथायोग्य पुरस्कार दिये जायँगे। इनमें यदि कोई नौकरी चाहें तो उनको रख लेना उचित है। इस व्यवहार का अनुसरस राजकर्मचारी भी यथाशक्ति करेंगे। [अकधर के समय में राजा मानसिंह तथा टोडरमल के मकान में पंडितों की सभा हुआ करती थी। ] बड़े वड़े शहरों में काव्यशासत्र-परीक्षा के लिए ब्रह्मसभा की जायगी। इनमें जो लोग परीक्षोत्तीर्स होंगे उनको 'ब्रह्मरथयान' तथा 'पट्टवन्ध' पारितोषिक मिलेगा। यह सम्मान उज्जयिनी में कालिदास, मेंठ, अंमर, रूपसूर, भारवि, हरिचन्द्र, चन्द्रगुप्त का-और उससे भी पहले पाटलिपुत्र में उपवर्ष, वर्ष, पाशिनि, पिंगल, व्याडि, वररुचि, पतंजलि का हुआ था। रथ पर बैठाकर पंडित को राजा स्वयं उस रथ को खींचकर ले जाते थे इसे 'ब्रह्मरथयान' कहते हैं। सोने का मुकुट या बहुमूल्य पगड़ी पंडित के सिर पर बाँधी जाती थी- इसे 'पट्टबन्ध' कहते हैं।

पेशवाओं के समय में जिस पंडित पर पेशवा अधिक प्रसन्न होते थे उसे एक लाख दच्िया देकर पालकी पर बिठाकर उसमें स्वयं अपना कंधा लगाकर बिदा करते थे। ऐसा सत्कार मैथिल-नैयायिक सचल मिश्र का पूना में हुआ था। इनके प्रपौत्र अभी वर्तमान हैं। जबलपुर ज़िला में भूमि भी इनको दी गई जो अब तक इनके सन्तान के हाथ में है।

यह तो हुआ राजा-द्वारा पंडित-परीक्षा की व्यवस्था। जनता- कृत पांडित्य-परीक्षा की प्रथा मिथिला में १५०, २०० वर्ष पहले तक थी। जब कोई पंडित देश-देशान्तर से धन-प्रतिष्ठा लाभ कर अपने . देश लौटता था तब यदि वह अपने को तद्योग्य समझता था तो अपने देशवालों को कहता था-अब मैं सर्वत्र से प्रतिष्ठा लाभ कर आया 5 10

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( ७४ ) हूँ। पर 'किं तया हतया राजन् विदेशगतया ्रिया अरयो यां न पश्यन्ति या न भुञ्जन्ति वान्घवाः' उन्नति जो परदेश में सो उन्नति केहि काज। जाको शत्रु न देखिहैं वन्धु न आवत काज।। इसलिए मुझे अपने देश की प्रतिष्ठा की लालंसा है। इस देश के सवसे ऊँची प्रतिष्ठा 'सरथन्त्र' की है। यह परीक्षा मेरी हो यह मेरी अभिल्ाषा है। इस परीक्षा का क्रम यह था। पहले तो देश भर के पंडित कठिन से कठिन प्रश्न पूछते थे -- केवल एक शास्त्र का नहीं सभी शास्त्रों का। इन सब प्रश्नों का सन्तोपजनक उत्तर देना पढ़ता था। पंडित लोगों के सन्तुष्ट हो जाने पर सामान्य जनता प्रश्र पूछती थी। जिसके जो मन आता था पूछता था। सभों का सन्तोषजनक उत्तर करना पड़ता था। सभी लोग एक एक कर सन्तुष्ट हो गये तव यह प्रतिष्ठा मिलती थी। इस 'सरयन्त्र' पद का अर्थ क्या है सो अब किसी को मालूम नहीं है। पर प्रथा का नाम तक अब भी प्रसिद्ध है। दो सौ बरस हुए गोकुलनाथ उपाध्याय एक बड़े पंडित हुए-उनके रचित ग्रन्थ -- न्याय, वेदान्त, साहित्य, काव्य, ज्योतिष, कर्मकांड के अब तक मिलते हैं-यहाँ तक कि एक ग्रन्थ इनका 'पारसीप्रकाश' नाम का है, जिसमें फारसी शब्दों के अर्थ संस्कृत में दिये हैं। इनकी सरयन्त्र परीचा हुई। इसमें इनसे पूछा गया-'विष्ठा का स्वाद कैसा है' ? कुछ विचार कर इन्होंने उत्तर दिया 'कटु'-। 'यह कैसे विश्वास करूँ ?' प्राश्निक ने पूछा। उत्तर मिला, 'सूतर जब विष्ठा खाता है तब उसकी आँखों से आसू बहता है, यह केवल कटु पदार्थ ही के खाने से होता है'। पूछनेवाला सन्तुष्ट होगया। मिथिला में जब से पंडिताई की दत्िया में राज्य मिला तब से पंडितों की परीक्षा महाराज के दरवार में होती है। दरवारी प्रधान

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'( ७५,) पंडित परीक्षा लेते हैं-उत्तीर्स पंडितों को महाराज के सामने शालार्थ करना पड़ता है। पारितापिक में प्रतिष्ठासूचक एक जोड़ा धोती का मिलता है-और महाराज की ओर से या और मिथिलास्थ धनियों की ओर से जब कभी पंडितों का निमन्त्रण होगा तो इन्हीं धोतीवालों का होगा। यह प्रथा अब तक जारी है।

३ दूसरों के रचित शब्द और अर्थ का अपने प्रबन्ध में निवेश करना 'हरस' 'चोरी' 'Plagiarism' कहलाता है। शब्द की 'चोरी' पाँच प्रकार की होती है-एक पद का, श्लोक के एक पाद का, श्लोक के दो पादों का, सम्पूर्ण श्लोक का, सम्पूर्ण प्रबन्ध का। परप्रयुक्त पदों का बचाना असम्भव है। इसी तात्पर्य से कहा है- नास्त्यचौरः कविजनो नास्त्यचौरो वशिग्जनः । उत्पादक: कविः कश्चित् कश्चिच्च परिवर्तक: ॥ आच्छादकस्तथा चान्यस्तथा संवर्गकोऽपरः। अ्रधात्-कोई भी बनिया ऐसा नहीं जो चोर नहीं है, कोई भी कवि ऐसा नहीं जो चोर नहीं है। कोई कवि 'उत्पादक' होता है, नई रचना करता है, कोई 'परिवर्तक', अर्थात् दूसरों की रचना में फेर-वदल कर अपना बनाता है, कोई 'आच्छादक', अर्थात् दूसरों की रचना को छिपाकर तत्सद्दश अपनी रचना का प्रचार करता है, कोई 'संवर्गक', अर्थात् डाकू, खुल्लमखुल्ला, दूसरे के काव्य को अपना कहकर प्रकाश करता है। इस विषय में पण्डितों में यह श्लोक प्रसिद्ध है-

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(७६ ) 'कविरनुहरतिच्छायामर्थ कुकविः पदादिकं चौरः। सर्वपवन्धहत्र साहसकत्र नमस्तस्मै ॥।' अर्थात् जो दूसरों के काव्य की छाया-मात्र का अतुकरण करता है सो 'कवि' है। जो अर्थ या भाव का अनुकरण करता है सो 'कुकवि' है। जो पदवाक्यादि का अनुकर करता है सो 'चोर' है। जो समस्त प्रबंध, पदवाक्य, अर्थ, भाव सभी का अनुकरस करता है ऐसे साहस करनेवाले को नमस्कार है।।"

इस सम्बन्ध में कविकण्ठाभरण में छः दर्जे के कवि कहे गये हैं- "छायोपजीवी, पदकोपजीवी, पादोपजीवी सकलोपजीवी। भवेदथ पाप्तकवित्वजीवी स्त्रोन्मेषतो वा भ्ुवनोपजीव्यः ।" अर्थात्-(१) दूसरे के काव्य की छाया-मात्र लेकर जो कविता करे। (२) एक आध पद लेकर (३) श्लोक का एक पाद लेकर (४) समग्र श्लोक लेकर (५) जो कवि शिक्षा प्राप्त कर ऐसी शिक्षा के बल से कविता करे (६) अपनी स्वाभाविक प्रतिभा के बल कविता करे।।

कुछ लोगों का कहना है कि प्राचीन कवियों के काव्यों का भलीभाँति परिशीलन करने की आवश्यकता है क्योंकि यही एक उपाय है कि परोच्छिष्ट भावों को हम बचा सकें-या उन भावों को हम उलट फेर कर अपने काव्य में उपयोग कर सकें। पर असल में कवि की प्रतिभा अवाङ्मनसगोचर दष्ट तथा अदृष्ट वस्तुओं को जान लेती है-और उनका उचित-अनुचित विभाग भी कर लेती है। कवियों के ऊपर सरस्वतीजी की ऐसी कृपा है कि जो वस्तु और लोगों के लिए जाग्रत् अवस्था में अदृश्य है सो भी कवियों को

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स्वप्नावस्था में भासित हो जाता है। इसी कृपा के प्रसाद से दूसरों के शब्द और भाव के प्रसंग में कवि अन्धा होता है-उनके अतिरिक्त में उनकी दिव्य दृष्टि होती है। कवियों के मतिदर्पण में समस्त संसार प्रतिबिम्बित होता है। शब्द और अर्थ सभी कवियों के सामने स्वयं उपस्थित होते रहते हैं, इस आशा से कि कविजी मेरा ही ग्रहण करेंगे। इतना होते हुएं भी कवियों को तीन प्रकार के अर्थ जानने का प्रयत्न करना होगा। ये तीन हैं-अन्ययोनि, निहृतयोनि और अयोनि। इनमें 'अन्ययोनि', जिसकी उत्पत्ति दूसरों से हैं, दो प्रकार के होते हैं, 'प्रतिबिम्बकल्प' (अर्थात् प्रतिबिम्ब के सददश) और 'लेख्यप्रख्य' (अर्थात् चित्र के सद्दश)। 'निहृतयोनि' भी दो प्रकार का है, तुल्यदेहितुल्य और परपुरप्रवेशसद्दश। 'अररयोनि' के ग्यारह भेद हैं। जिसमें अर्थ बिलकुल वही है केवल शब्द-रचना का भेद है उसे 'प्रतिबिम्वकल्प' कहते हैं। जिसमें थोड़ा सा हर-फेर इस चतुराई के साथ किया गया है कि वही भाव नवीन सा मालूम होता है- उसे 'आलेख्यकल्प' कहेंगे। दष्टान्त- ते पान्तु वः पश्ुपतेरतिनीलभास: कण्ठम्देशघटिताः फणिन: स्फुरन्तः । चन्द्रामृताम्बुकणसेकसुख परुढे -- चैरङ्गरैरिव विराजति कालकूटः ॥ (प्राचीन) इसका 'प्रतिबिम्बकल्प' अनुकरण होगा- जयन्ति नीलकण्ठस्य नीला: कण्ठे महाहय: । गलद्गङ्गाम्वुसंसिक्तकालकूटाङ्कुरा इव।।

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( ७८ ) और 'आलेख्यप्रख्य' अनुकरण होगा-

जयन्ति धवलव्याला: शम्भोर्जटावलम्बिनः ।

जहाँ पर दोनों उत्तियों में इतना सादृश्य हो कि भेद रहते हुए अभेद ही भासित हो, उसे 'तुल्यदेहितुल्य' कहते हैं। जहाँ दो उक्तियों का मूंल एक हो पर और वातें सब भिन्न है।- उसे 'परपुरप्रवेशसद्ृश' कहते हैं। परोकिहरण के नाना प्रभेद के आधार पर कवि के ये चार प्रभेद माने गये हैं। पाँचवाँ वह है जिसे 'अदष्टचरार्थदर्शी' कहते हैं, अर्धात् जिसने ऐसी बातें कहीं जो और किसी ने कभी नहीं कही। पहिले चार 'लौकिक' हैं, पाँचवाँ 'अलौकिक'। चारों लौकिक कवि के नाम हैं, 'भ्रामक', 'चुम्बक', 'कर्षक', 'द्रावक'। अरलौफिक का नाम है 'चिन्तानमणि' । (१) पुरानी बात को भी जो नई समझ कर 'प्रदर्शित करे वह 'भ्रामक कवि' है। (२) जो दूसरे की कही बात को थोड़ा स्पर्श करती हुई अपनी उक्तियाँ कहे सो 'चुन्बक' है। (३) दूसरे की उक्ति को खाँच कर जो अपने प्रवन्ध में किसी लेख के द्वारा घुसेड़े सो 'कर्षक' है। (४) जो दूसरी की उक्ति के मूलार्थ का सार लेकर अपनी उक्ति में इस प्रकार कहे कि प्राचीन रूप उसका जाना न जाय सो 'द्रावक' है। (५) जिसके भाव रस उत्पन्न करनेवाले हैं और जिस भाव का ज्ञान किसी भी प्राचीन कवि को नहीं हुआ- उसे 'चिन्तामगि कवि' कहते हैं। जिसके भाव 'अयोनि' हैं अर्थात् विलकुल नये ऐसे कवि के तीन प्रभेद हैं-जौकिक, अलौकिक, लौकिक-अलकिक- मिश्रित ॥

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७६.) भ्रामक, चुम्बक, कर्षक, द्रावक इन चारों के प्रत्येक आाठ.त्रराठ त्रवान्तर भेद हैं। इससे कुल संख्या ३२ होती है। ये आाठ प्रवान्तर भेद ये हैं। (१) पुरानी उक्ति के दो अंशों के पौर्वापर्य को बदल देना-इसे 'व्यस्तक' कहते हैं। (२) पुरानी उक्ति लम्बी चौड़ी है-उसमें से कुछ अंश ले लेना-इसे 'खण्ड' कहते हैं। (३) पुरानी उक्ति संचिप्त है उसी को विस्तृत रूप में कहना- इसे 'तैल विन्दु' कहते हैं। इसका उदाहरण है- (प्राचीन)- 'यस्य तन्त्रभराक्रान्त्या पातालंतलगामिनी। महावराहदंष्ट्राया भूय: सस्मार मेदिनी ॥' (नवीन)-

कलान्ते पत्यावहीनां चलदचलमहास्तम्भसम्भारभीमा। सस्मार स्फारचन्द्रद्युतिपुनरवनिस्तद्धिरण्याक्षवक्ष :- स्थूलास्थिश्रे खिशाणानिकषण सितमप्याशु दंष्ट्राग्रमुग्रम्'॥। (४) पुरानी उक्ति जिस भाषा में है उसी को दूसरी भाषा में कहना-इसे 'नटनेपथ्य' कहते हैं। (५) केवल छन्द बदल देना-इसे 'छन्दोविनिमय' कहते हैं। (६) पुरानी उक्ति में जो किसी वृत्तान्त का कारण कहा गया है उस वृत्तान्त का. दूसरा कारग कहना-इसे 'हेतुव्यत्यय' कहते हैं। (७) देखी हुई वस्तु को अन्यत्र ले जाना-यह 'संक्रान्तक' है।

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( 50 ) : (८) दोनों वाक्याथों का उपादान है 'सम्पुट'। इस तरह के परोक्ति का अपहरग कवि को 'अकवि' बना देता है। इससे यह सर्वथा त्याज्य है।। ये सव प्रभेद 'प्रतिबिम््रकल्प' के हैं। 'आरलेख्यप्रख्य' रूप अपहरग के निम्नलिखित भेद हैं- (१) 'समक्रम'-प्राचीन उक्ति के सदश रचना करना। (२) 'विभूषसमोष'-प्राचीन उक्ति में जो अलंकार समेत है उसे अलंकार-रहित बनाकर कहना। (३) 'व्युत्कम'-प्राचीन उक्ति में जिस क्रम से बातें कही हैं उनको क्रम वदल कर कहना। (४) 'विशेषोक्ति'-प्राचीन उक्ति में जो सामान्यरूप से कहा है उसे विशेषरूप से कहना। (५) 'उत्तंस'-जो उपसर्जनभाव से कहा है उसे प्रधानभाव से कहना। (६) 'नटनेपथ्य'-बात वही कहना पर थोड़ा वदल कर। (७) 'एकपरिकार्य'-जो प्राचीन उक्ति में कारण-सामग्री कहा है सो ही सामग्री कहना पर कार्य दूसरा बदल देना। (८) 'प्रत्यापत्ति'-जो विकृतिरूप से कहा है उसे प्रकृतिरूप में कहना। ये मार्ग ऐसे हैं जिनका अवलन्धन अनुचित नहीं है। 'तल्यदेहितल्य' अर्थहरण के भेद यों हैं। (१) 'विषयपरिवर्त'-पहले कहे विषय में विषयान्तर मिलाकर उसका स्वरूपान्तर कर देना। (२) 'हन्द्वविच्छित्ति'-जिस विषय का दो रूप वर्गित पहले का है उसका एक ही रूप लेकर वर्गन करना। .:

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'( ८१.) (३) 'रत्नमाला' प्राचीन अर्थों का अर्थान्तर करना। (४) 'संख्योल्लेख'-एक ही विषय की पूर्वोक्त संख्या को बदल देना। (५) 'चूलिका'-पहले जो सम कहा गया -- उसे विषम कहना। या पहले जो विपम कहा गया उसे सम कहना। (६) 'विधानापहार'-निषेध को विधि रूप में कहना। (७) 'मागिक्यपुज्ज'-बहुत अथों का एकत्र उपसंहार। (८) 'कन्द'-कन्द (समष्टि) रूप अर्थ को कन्दल (व्य्टि) रूप में कहना। इस मार्ग का भी अवलम्बन उचित है। 'परपुरप्रवेश' रूप अरथापहरण के भेद यों हैं। (१) 'हुडयुद्ध'-एक प्रकार से उपनिबद्ध वस्तु को युक्ति-पूर्वक बदल देना। उदाहरग -- (प्राचीन)- कथमसौ न. भजत्यशरीरतां हतविवेकपदो हतमन्मथः। महरतः कदलीदलकोमले भवति यस्य दया न वधूजने ।। कोमल सी शरीर पर प्रहार करने के कारग यहाँ मन्मथ की निर्विवेकता-मूलक निन्दा है। (नवीन)- कथमसौ मदनो न नमस्यतां स्थितविवेकपदो मकरध्वज: । मृगद्दशां कदलीललितं वपु- यर्दभिहन्ति शरैः कुसुमोद्वैः। F it

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(घ२) स्त्रियों के कोमल शरीर पर कोमल फूलरूपी ही शर के प्रददार करने में मन्मथ अपनी विवेकिता सूचित करता है-यह उसकी प्रशंसा है। [और उदाहरण-कुमारसम्भव में हिमालय के वर्गन में श्लोक- श्रनन्तरत्वपभवस्य तस्य हिमं न सौभाग्यविलोपि जातम् । एकोऽपि दोपो गुएसन्निपाते निमज्जतीन्दोः किरोप्विवाङ्क:॥ अर्थात् हिमालय से अनन्त रत्न उत्पन्न होते हैं-इसलिए हिम रूप दोप होते हुए भी उनके सौभाग्य में कोई हानि नहीं पहुँचाता। जैसे चन्द्रमा में यद्यपि कालिमा है तघापि यह दोष और गुगों के समूह में दब जाता है। इसके विपरीत नवीन कवि की उक्ति है- एकोऽपि दोषो गुरसन्निपाते निमज्जतीन्दोरिति यो वभाषे। तेनैव नूनं कविना न दृष्ट दारिद्य दोपो गुरराशिनाशी।। 'एक दोष गुगासमूह में दब जाता है यह कहनेवाले ने यह नहीं देखा कि दरिद्रता एक ऐसा दोप है जो अनेक गुग-समूह को नष्ट कर देवा है।' तीसरा उदाहरय-पत्नी अपने विदेशस्थ पति को लिखती है- पारेश विज्ञप्तिरिय मदीया तंत्र व नेया दिवसाः कियन्तः ।

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( ८३ ) सम्मत्ययोग्यस्थितिरेष देशः करा हिमांशोरपि तापयन्ति ॥ 'हे प्राणेश मेरी विज्ञप्ति यह है कि अभी आप वहौं ठहरें-यह देश अभी रहने योग्य नहीं है-क्योंकि चन्द्रमा के भी किरग सन्तापक लगते हैं।. . इस पर पति उत्तर देता है- 'करा हिमांशोरपि तापयन्ति नैतत् पिये सम्मति शङ्कनीयम्। वियोगतप्त हृदयं मदीय तत्र स्थिता त्व परितापिताऽसि॥ 'हे प्रिये यह शंका मत करो कि चन्द्रमा के किरय सन्तापक हैं-बात यह है कि तेरे वियोग से मेरा ह्ृदय सन्तप्त हो रहा है- औौर उसी हृदय में तुम बैठी हो-इसी से तुम मेरे हृदय के ताप से तपाई जा रही हो' ।] (२) 'प्रतिकञचुक'-एक तरह के वस्तु को दूसरी तरह का वनाकर वर्शन करना। (३) 'वस्तुसच्वार'-एक उपमान को दूसरे उपमान में बदल देना। (४) 'धातुवाद'-शब्दालंकार को अर्थालंकार बना देना। (५) 'सत्कार'-एक ही वस्तु को उत्कृष्ट रूप में बदल देना। (६) 'जीव जीवक'-पहले जो सदश या उसे असद्दश कर देना। (७) 'भावसुद्रा'-प्राचीन उक्ति का आशय लेकर प्रबन्ध लिखना। (८) 'तद्विरोघी'-प्राचीन उक्ति के विरुद्ध उक्ति। ये ३४ भर्थहरण के प्रकार हैं।

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काव्यों में कुछ ऐसी बातें आती हैं जो न शास्त्रीय हैं न लौकिक किन्तु अनादि कोल से कवि इनका व्यवहार करते आये हैं। ये 'कविसमय', Poetical Convention, के नाम से प्रसिद्ध हैं। ये वातें एकदम अशास्रोय हैं वा अलौकिक हैं यह सहसा कह देना कठिन है- जव हम इनको अनादि काल से व्यवहृत पाते हैं। शास्त् अनन्त हैं- देश अ्नन्त हैं-लोकानुभव भी अनन्त हैं। फिर यह कहने का साहस किसको हो सकता है कि यह वात शास्त्रों में कही नहीं है-या ऐसा अनुभव कभी किसी का नहीं हुआ ? इसी विचार से इन कवि-समयों का प्रयोग दुष्ट नहीं समझा जाता। ये कवि-समय तीन प्रकार के हैं-स्वर्ग्य, भौम, पातालीय। इन तीनों में भौम प्रधान है। ये तीनों प्रत्येक तीन प्रकार के होते हैं- असत् वात का कहना, सत् का नहीं कहना, अनियत को नियत करना। (१) भाम-असत् बात का कहना। नदी में कमल का वर्णन (वहता जल में कमल नहीं होता)-तलाशय-मात्र में हंस का वर्गन (हंस केवल मानसरोवर में रहते हैं)-सभी पर्वतों में सोना रत्न इत्यादि की उत्पत्ति का वर्णन (असल में सब पर्वतों में ये. सब चीज़ें उत्पन्न नहीं होतीं) स्त्री के कमर को 'सुष्टिग्राह्य', सुट्ठी भर, वर्णन करना-अन्धकार को 'सूचीभेद्य', सूई से छोदने के लायक, वतलाना- चक्रवाकों की जोड़ी रात को अलग रहती है, चकोर चन्द्रकिरों को पीता है। इत्यादि (२) भौम-सत् का नहीं कहना। वसन्त ऋतु में मालवी का वर्गान नहीं करना-चन्दन वृक्ष के फूलों का वर्णन नहीं करना -- अशोक वृक्ष के फलों का वर्णन नहीं करना-यद्यपि कृष्णापक्ष भर में चाँदनी उतने ही घंटों तक रहती जितना शुक्कपत्त में तथापि कृष्पन्ष

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(८५:) में चाँदनी का वर्शन नहीं करना-उसी तरह शुभ्कपक्त में अन्धकार का वर्णन नहीं करना-दिन में नील कमल के विकास का वर्गन नहीं करना-शेफालिका (हरसिंगार) फूल का रात्रि समय के कारण वृक्ष से नहीं गिरने का वर्णन। (३) मौम-अनियत को नियत करना। मगर यद्यपि सभी बड़े जलाशयों में पाये जाते हैं तथापि केवल गंगा में इनका वर्शन करना- मोती यद्यपि अ्नेक जलाशयों में मिलता है तथापि केवल ताम्रपर्णी नदी में इसका वर्णन करना-चन्दन-वृक्ष यद्यपि सर्वत्र हो सकते हैं तथापि मलयपर्वत ही में इनका वर्णन करना भूर्जपत्र यद्यपि अ्नेक उच्च पर्वतों में मिलता है तथापि केवल हिमालय में इसका वर्यन करना-कोकिल की कूक यद्यपि त्रोष्मादि ऋतु में भी सुन पड़ती है तथापि केवल वसन्त में इसका वर्णन करना-मयूर यद्यपि और समयों में भी नाचते गाते हैं तथापि वर्षा ही में इनका वर्णन करना। [ऐसे ही कवि-समयों का एक यह संग्राहक श्लोक प्रसिद्ध है- स्त्रीणां स्पर्शात पियङ्गवि कक्षति वकुलः सीघुगण्डूषसेकात् पादाघातादशोकस्तिलककुरवकौ वीक्षणालिङ्गनाभ्याम्। मन्दारो नर्मवाक्यात्पट्मघुहसनाच्चम्पको वक्तूवातात् चूता गीतान्नमेरुविकसति हि पुरोनर्तनात् कर्णिकारः। अर्थात्-प्रियंगु स्त्रियों के छूने से फूलता है, बकुल स्त्रियों के मुख से दिये हुए मद्य के छींटे से, अशोक उनके पैर के आघात से, तिलक उनके ताकने से, कुरवक उनके आलिङ्गन से, मन्दार उनके मधुर वचन से, चम्पक उनके कोमल हँसी से, आम उनके मुखवायु से, नमेरु उनके गोत से, कर्णिकार उनके नाचने से ] ये हुए द्रव्यों के प्रसंग कवि-समय। गुणों के प्रसंग कवि-समय यों हैं-

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(द६ ) (१) असत् गुद्ध का वर्णन। पुण्य, यश और हास को श्वेत कहना, अयश और पाप को काला-क्रोध, अनुराग इत्यादि को लाल। (२) सत् गुग का नहीं कहना। कुन्द फूल की कलियाँ यद्यपि लाल-सी होती हैं तथापि इनकी लालिमा का वर्णन नहीं करना- कमल की कली चद्यपि हरी होती है तघापि इस हरियाली का वर्णन नहीं करना। (३) अनियत गुग को नियत करना - सामान्यतः मगियों को लाल कहना, फूलों को श्वेत, मेघ को काला। यद्यपि मगि और फूल नाना रंग के होते हैं और मेघ भी सभी काले नहीं होते। इनके अतिरिक्त और कई तरह के कवि-समय भी हैं। कृणा- नील को एक कहना, इसी तरह कृप्ण-हरित को, कृष्ण-श्याम को, पीत-रक्त को, शुक्ठ-गौर को। फिर नेत्रादि को नाना वर्स करके वर्णान करना। आँखों के वर्गान में कहीं शुकता, कहीं कृष्ता, कहीं मिश्रवर्ण का वर्णन पाया जाता है। स्वर्गीय विषयक कवि-समय ये हैं। (१) चन्द्रमा के वर्गन में शश और हरिया को एक करना। (२) कामदेव के चिह्न में मगर और मत्स्य को एक करना। (३) 'अत्निनेत्रससुत्पन्न' और 'चन्द्र' को समानार्थ करना। (४) शिवभालस्थचन्द्रमा की उत्पत्ति हुए हज़ारों वर्ष हुए तथापि उनका वर्णन 'वाल' (बच्चा) ही करके होता है। (५) काम है इच्छाविशेष, इसे शरीर नहीं है, तघापि इसके शरीर धनुष, तीर इत्यादि का वर्णन। (६) सूर्य है १२, पर वर्णन एक ही करके होता है। (७) 'लद्मी'-'सम्पत्' तुल्यार्थ समभे जाते हैं। पातालीय विषयक कविसमय-(१) नाग और सर्प को एक मानना। (२) दैत्य, दानव, तसुर यद्यपि भिन्न हैं वथापि एक मान

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() कर ही दर्गित होते हैं। यथार्थ में हिरण्यान्, हिरण्यकशिपु, प्रह्लाद, विरोचन, बाए इत्यादि दैत्य थे। विप्रचित्ति, शम्बर, नमुचि, पुलोम, इत्यादि 'दानव' थे-और दल, वृत्र, विचुरस्त, वृषपर्व इत्यादि 'असुर' थे।

( ५ ) कवि को देश, काल के विभागों का ज्ञान आवश्यक है। समर्त जगत् को-और जगत् के भाग को भी-'देश' कहते हैं। 'जगत्' किसे कहते हैं-इसके प्रसंग में नाना मत हैं-(१) स्वर्ग और पृथिवी दोनों मिलकर 'जगत्' है। (२).स्वर्ग एक 'जगत्' है पृथिवी दूसरा 'जगत्'। (३) जगत् तीन हैं, स्वर्ग, मर्त्य, पाताल । इन्हीं के नाम 'भू' 'भुव', 'स्व', भी हैं। (४) जगत् सात हैं, भू, भुव, स्व्र, मह, जन, तप, सत्य। (५) ये सात और ये ही सात वायुमंडल के-यों १४ 'जगत्' हैं। (६) ये १४ सात पातालों के साथ २१ 'जगत्' हैं। इनमें पृथिवी 'भू' लोक है। इसमें सात महाद्वीप हैं, सबके बीच में (१) जम्बूद्वीप, उसको घेरे हुए क्रम से-(२) प्ृत्त, (३) शाल्मल, (४) कुश, (५) क्रौंच, (६) शाक, (७) पुष्कर । समुद्र ७ हैं-(१) लवय, (२) रस, (३) सुरोदक, (४) घृत, (५) दधि, (६) जल, (७) दुग्ध। कुछ लोगों का सिद्धान्त है कि लवए ही एक-मात्र समुद्र है। और लोगों के मत से ३, किसी के मत से ४।

जम्बू द्वीप के मध्य में मेरु-पर्वत है-यह सब ओषधियों का निधान है-यहीं सब देवता रहते हैं। यही मेरु पहला वर्षपर्वत है। मेरु की

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( S5) चारों ओर इलावृत्तवर्ष है। मेरु के उत्तर में नील, श्वेत श गवान् ये तीन वर्षगिरि हैं। इनसे क्रमशः सम्बद्ध तीन 'वर्ष' हैं -रम्यक, हिरण्मय, उत्तरकुरु। मेरु के दच्तिा में भी तीन वर्षगिरि हैं-निषध, हेमकूट, हिमवान्। इनसे क्रमशः सम्बद्ध तीन वर्ष हैं-हरि, किन्पुरुष, भारव। यह हमारा देश भारतवर्ष है। इसके प्रदेश हैं-इन्द्रद्वीप, कसेरुमान्, वाम्रपर्स, गभस्तिमान्, नागद्ोप, सौम्य, गन्धर्व, वरुष, कुमारीद्वीप। दत्तिए समुद्र से लेकर हिमालय तक १,००० योजन होता है। इसे जो जीते वह 'सम्राट्' कहलायेगा। कुमारीपुर से विन्दुसर- पर्यन्त १,००० योजन को जीवने से 'चक्रवर्ती' कहलायेगा। कुमारीद्वीप के सात पर्वत हैं-विन्ध्य, पारियात्र, शुक्तिमान्, मृत्त, महेन्द्र, सह्य, मलय। पूर्व समुद्र और पश्चिम समुद्र के बीच में, हिमालय-विन्ध्य के वीच में, आर्यावर्त है। इसी देश में चार वर्गों की और चार आश्रमों की व्यवस्था है, तन्मूलक ही सदाचार भी। प्रायः यहाँ के जो व्यवहार हैं वही कवियों का होना चाहिए।। काशी के पूर्व का भाग 'पूर्व देश' है। इसमें इतने जनपद हैं-अंग, कलिंग, कोसल (?), तोसल, मगध, मुद्रर, विदेह, ,: नेपाल, पुण्डर, प्रागूज्योतिष, ताम्रलिप्तक, मलद, मल्लवर्तक, सुह, व्रह्मोत्तर इत्यादि। [यहाँ 'कोसल' का नाम लेखप्रमाद से अन्तर्गत होगया है, किसी भी प्रमाण के अनुसार कोसल देश काशी के पूरब में नहीं माना गया है। इन नामों में कुछ ऐसे हैं जिनके नाम आज कल भी परिचित मालूम होते हैं परन्तु इसी के बल से दोनों को एक मान लेने में भ्रम की सम्भावना है। जैसे

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( 56") सुद्रर (मुंगेर), ताम्रलिप्तक (तामलूक), मलद (मालदह), मल्लंवर्तक (मालवा), त्रह्मोत्तर (ब्रह्मपुत्रप्रान्त) ।]-इस प्रान्त के पर्वत हैं- वृहद्गृह, लोहितगिरि, चकोर, दर्दुर, नैपाल, कामरूप इत्यादि। शोग, लाहित्य दो नद हैं। गंगा, करतोया, कपिशा इत्यादि नदियाँ। लवली, ग्रन्थिपर्राक, अगरु, द्राक्षा, कस्तूरिका यहाँ उत्पन्न होते हैं। माहिष्मती (मंडला) से दच्तिर का देश दत्तिणापथ (Deccan) है। इसके अन्तर्गत ये जनपद हैं- महाराष्ट्र, माहिषक, अश्मक, विदर्भ, कुन्तल, क्रथकैशिक, सूर्पारक, कांची, केरल, कावेर, मुरल, वानवांसक, सिंहल, चोल, दंडक, पांड्य, पल्लव, गांग, नाशिक्य, कोंकश, कोल्लगिरि, वह्लर इत्यादि। यहाँ के पर्वत हैं-विन्ध्य का दत्तिख भाग, महेन्द्र, मलय, मेकल, पाल, मंजर, सह्य, श्रीपर्वत इत्यादि। नदियाँ-नर्मदा, तापी, पयोष्णी, गोदावरी, कावेरी, भैमरथी, वेणा, कृष्णवेणा, वञ्जुरा, तुंगभद्रा, ताम्रपर्णी, उत्पलावती, रावणगंगा इत्यादि। देवसभा के पश्चिम 'पाश्चात्यदेश' है। इसके जनपद हैं-देवसभ, सुराष्ट्र, दशेरक, त्रवण, भृगुगच्छ, कच्छीय, आनर्त, अर्ुद, ब्राह्मयवाह, यवन इत्यादि। नदियाँ-सरस्वती, श्वभ्रवती, वार्तघ्नी, मही, हिडिम्बा इत्यादि। करीर, पीलु, गुग्गुल, खर्जूर, करभ यहाँ उत्पन्न होते हैं। पर्वत यहाँ के-गोवर्धन, गिरनार, देवसम, माल्यशिखर, अर्वुद इत्यादि। पृथूदक के उत्तर 'उत्तरदेश' है। इसके जनपद हैं-शक, केकय, बोकार, हय, बाणायुज, काम्बोज, बाह्लोक, वह्लव, लिम्पाक, कुलूत, कीर, तंगए, तुषार, तुरुष्क, बर्बर, हरहूव, हहुक, सहुड, हंसमार्ग, गमठ, करकंठ इत्यादि। पर्वत-हिमालय, कलिन्द, इन्द्रकील, F. 12

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(f ) चन्द्राचल इत्यादि। नदियाँ-गंगा, सिन्धु, सरस्वती, शतद्रु, चन्द्रभागा, यमुना, इरावती, वितस्ता, विपाशा, कुहू, देविका इत्यादि। यहाँ उत्पन्न होते हैं-सरल, देवदारु, द्रात्ा, कुंकुम, चमर, भ्जिन, सौवीर स्नौतोंजन, सैन्धव, वैदूर्य, तुरंग इत्यादि। इन सभों के वीच में, अर्थात् काशी से पश्चिम, माहिप्मती से उत्तर, देवसभा से पूरव, और पृथूदक से दच्िय, जो देश है उसे 'मध्यदेश' कहते हैं। ऐसा कवियों का व्यवहार है। शास्त्र के अनुसार ही यह व्यवहार मालूम होता है। क्योंकि मनुस्मृति में लिखा है-

हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्ये यत् भाग विनशनादपि। पत्यगेव प्रयागाच्च मध्यदेशः प्रकीर्तितः ।।

विनशन (कुरु्तेत्र) और प्रयाग-गङ्गा, यमुना-के वीच का देश 'अन्तर्वेदि' है। इसी को केन्द्र मान कर दिशाओं का विभाग करना ऐसा आचार्यों का सिद्धान्त है। इसमें भी विशेष करके महोदय को केन्द्र मानना। इसके प्रसंग कई तरह के मत हैं। पौरागिक मत है-इन्द्र देवता से अधिष्ठित दिशा 'पूर्व', अग्नि देवता की आ्ग्नेय, यम की 'दच्तिरा', नितति की 'नैन'त्य', वरुण की 'पश्चिम', वायु की 'वायव्य', कुवेर की 'उत्तर', ईशान की 'ऐशान', ब्रह्मा की 'ऊर्ध्व', नाग की 'अधः'। वैज्ञानिक सिद्धान्त में वाराओं के अतुसार यों है-चित्रा, स्वाती के बीच 'पूर्व', उसके सामने (पश्चिम), ध्र व दारा की ओर 'उत्तर', उसके सामने 'दक्तिय'। इनके बीच में अरवान्तर दिशाएँ हैं। कवियों में ये सब व्यवहृत हैं। जिस देश की जैसी स्थिति, पर्वत, नदी इत्यादि हैं वैसा ही वर्गान करना उचित है।

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(६१) भिन्न मिन्न देशवासियों के शरीर के रंग के प्रसंग में राजशेखर- सिद्धान्त यों है- पूर्वदेशवासी 'श्याम', दच्िरादेशवासी 'कृष्ण', पश्चिमदेशवासी 'पांडु', उत्तरदेशवासी 'गौर'। मध्यदेशवासियों में तीनों पाये जाते हैं। चहाँ यह समरग रखना चाहिए कि कवियों के व्यवहार में 'कृष्ण' और 'श्याम' तथा 'पांडु' और 'गौर' में भेद नहीं किया जाता है। यह वर्ग का नियम केवल आपाततः कहा गया है। क्योंकि पूर्व-देशवासी सभी काले नहीं होते। यहाँ की राजकन्या इत्यादि का वर्ण 'पांडु' या 'गौर' पाया जाता है। ऐसा ही दच्तिय देश में भी।

(६)

देश-विभाग की तरह काल-विभाग का भी ज्ञान आवश्यक है। १५ निमेष की 'काष्ठा' ३० काष्ठा की 'कला' ३० कला का 'मुहर्त' ३० मुहूर्त की 'अद्दोरात्र' (दिन रात) यह हिसाब चैन्र और आश्विनमास का है (जब रात दिन बराबर होते हैं)।. चैन्र के बाद तीन महीने तक प्रतिमास एक मुहूर्त करके दिन की वृद्धि होती है और रात का ह्रास। फिर उसके बाद तीन मास तक प्रतिमास एक मुहूर्त रात की वृद्धि, दिन की हानि होती है। इस तरह आश्विन में जाकर रात दिन बराबर हो जाते हैं। आश्विन के बाद तीन महीने तक प्रतिमास एक मुहूर्त दिन का हास रात की वृद्धि। उसके वाद तीन मास तक रात्रि का ह्रास दिन की वृद्धि। इस तरह चैन्र में फिर रात दिन बराबर हो जाते हैं। जितने काल में सूर्य एक राशि से दूसरे राशि में जाता है उतने काल को 'मास' कहते हैं। वर्षा ऋतु से छः महीने 'दत्तिसायन'

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(सूर्य दच्तिय की ओर) रहते हैं, और शिशिर ऋतु से छः महीने 'उत्तरायग'। दो अयनों का 'संवत्सर' (वर्ष)-यह काल का मानं 'सौर' (सूर्य के अनुसार) कहलाता है। १५ अहोरात्र का 'पक्ष'। जिस पक्ष में चन्द्रमंडल प्रतिदिन बढ़ता है उसे. 'शुक्कपत्त', जिसमें घटता है उसे 'कृषणापत्' कहते हैं। दोनों पत्षों का एक 'मास' जिसके आदि में शुक्कपत्त पीछे कृष्णपक्ष होता है। यह मान 'पिन्य' कहलाता है। वैदिक क्रियाएँ सब इसी मान के अनुसार होती हैं। 'पित्र्य' मास के पत्षों का व्यत्यास कर देने से 'चान्द्र' मास होता है, जिसके आदि में कृष्णपत्त पीछे शुक्कपत्त होता है। आर्यावर्त के वासी और कवि इसी चान्द्रमास का अवलम्वन करते हैं। ऐसे दो प्षों का 'मास', दो मासों का 'ऋतु', छः ऋतुओं का 'संवत्सर'। संवत्सर चैत्र मास से आरम्भ होता है ऐसा ज्योतिपियों का सिद्धान्त है, श्रावरा से सारम्भ होता है ऐसा लोकव्यवहार प्रसिद्ध है। नभ-नभस्य (श्रावण-भादों) वर्पा-ऋतु। इप-ऊर्ज (आश्विन-कार्तिक) शरत्। सह-सहस्य (अगहन-पूस) हेमन्त।: तप-तपस्य (माघ- फाल्गुन) शिशिर। मधु-माधव (चैत-वैशाख) वसन्त। शुक्र-शुचि (जेठ-असाढ़) त्रीष्म। वर्षा-ऋतु में पूर्वीय हवा बहती है, ऐसी कवि प्रसिद्धि है। वस्तु- स्थिति ऐसी नहीं भी हो तथापि वर्णन ऐसा ही होना चाहिए। शरत् ऋतु में किधर की वायु होगी सो नियमित नहीं है। हेमन्त में पश्चिम वायु-ऐसा कुछ लोगों का सिद्धान्त है। कुछ लोग 'उत्तर' कहते हैं। असल में दोंनों ठीक है। शिशिर में भी हेमन्त की तरह पश्चिम वा उत्तर, वसन्त में दत्तिण वायु बहती है। वसन्त में वायु का नियम नहीं है ऐसा कुछ लोग कहते हैं। कुछ लोग 'नैन'त' बतलाते हैं। ऋतुओं के वर्णन में इनकी चार अवस्थाओं का वर्णन उचित है। ये अवस्थाएँ हैं-सन्धि, शैशव, प्रौढि, अनुवृत्ति। दो ऋतुओं के वीच

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६३ ) के समय को 'ऋतुसन्धि' कहते हैं। [ 'शैशव' है आ्र्रम्भ का समय, 'प्रौढि' पूर्ण परिगतावस्था का समय। एक ऋतु के बीतंने पर भी जिस समय कुछ कुछ उसके चिह्न दिखाई देते हैं उसे बीते ऋतु की 'अनुवृत्ति' कहते हैं। जैसे कमल फूलने का ऋतु है श्रीष्म-' पर कभी कभी कहीं कहीं वर्षा के आने पर भी कमल फूलते देखे जाते हैं ]

यह तो हुई प्राचीनों के अनुसारं कवि-शिक्षा-प्रणाली। पर आज-कल के उत्साही कवियों को इससे हतोत्साह नहीं होना चाहिए। संस्कृत में १००, १५० बरस का पुराना एक ग्रन्थ है 'कविकर्प-टिका'। इसमें ग्रन्थकार की प्रतिज्ञा है- यत्नादिमां कण्ठगतां विधाय श्रुतापदेशाद्ँ विदितापदेशः । ज्ञातशब्दार्थविनिश्चयोऽपि श्लोकं करोत्येव समासु शीघ्रम्।। अरथात् इस ग्रन्थ को जो कण्ठस्थ कर लेगा सो शब्दार्थ को नहीं जानते हुए भी सभाओं में शीत्र श्लोक बना सकेगा। इसका प्रकार यों है। अनुष्टपू छन्द में चन्द्रमा का वर्गन करना है। इसके लिए बहुत से समुचित शब्दों का संग्रह है। (१) आदि के पाँच अक्षर के शब्द-'कर्पूरपूर': 'पिण्डीरपिण्ड', 'गङ्गाप्रवाह' इत्यादि। (२) तदुत्तर तीन अत्तर के शब्द-'नीकाशं', 'संकाशं,' 'संस्पर्धि' इत्यादि। (३) द्वितीयपाद में दो अत्तर के-'वपुः', 'तेजः', 'दीप्तिः' "इत्यादि। (४) द्वितीयपाद में इसके बाद-'यस्य', या 'तस्य' (५) फिर तीन अक्षर के पद-'प्रसाद्यते', 'विलोक्यते', 'प्रतीच्यते' इत्यादि। (६) ृतीयपाद

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६४ ) में आदि के तीन अत्र-'चन्द्रोडयमू',। (७) फिर तृतीयपाद में पाँच अक्षर-'राजते रम्यः', 'शोभते भद्र:' 'भासते भारवान्'। (८) चतुर्थपाद के आदि तीन अत्तर-'नितान्तम्', 'नियतं', 'सुवरामू'। (E) चतुर्थपाद के अन्तिम पाँच अत्तर-'कामिनीप्रियः' 'ननवल्लभः', 'प्रीतिवर्धनः'। इतना जिसे अभ्यास रहेगा सो मनुष्य सभा में चन्द्रवर्गान के प्रस्ताव में शीघ्र ही ये तीन श्लोक पढ़कर सुना देगा। कपू रपूरनीकाशं चपुर्यस्य पसाद्यते। चन्द्रोऽयं राजते रम्यो नितान्त कामिनीप्रिय:॥१॥ पिण्डीर पिण्डसंकाशं तेजो यस्य विलोक्यते॥। चन्द्रोऽयं शोभते भद्रो नियत जनवल्लभः ॥२॥ गङ्गाप्रवाहसंस्पधि दीप्तिर्यस्य पतीक्ष्यते। चन्द्रोऽयं भासते भास्वान् सुतरां प्रीतिवर्धनः ॥३। इसी तरह और लम्वे छन्दों की पदावली दी गई है। कवि होने का कैसा सुगम मार्ग है!

नाना शास्त्रों का ज्ञान कवि को आवश्यक होता है। इसके उदाहरगा में कुछ पद्य यहाँ उद्ध त किये जाते हैं। जिनसे यह ज्ञात होगा कि यह आवश्यकता केवल कपोलकल्पित नहीं है, हमारे हिन्दी के भी जो मौलिक कवि होगये हैं उन्हें इन शास्त्रों का अच्छा ज्ञान था और बिना ऐसे ज्ञान के वे ऐसे आदर्श-कवि नहीं होते। ये उदाहरस केवल दिङमात्रप्रदर्शन के लिए हैं। जितने पद्यों में ऐसे शास्त्र-ज्ञांन भासित हैं उन सभों का संग्रह करना असम्भव है। -

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( ६) [इन उदाहरणों के संकलन में मुझे मेरे शिष्य श्रीयुत धीरेन्द्र वर्माजी से वड़ी सहायता मिली है ]।

वैद्यकपरिचय रावन सो राजरोग बाढ़त बिराट उर, दिन दिन. विकल सकलमुखराँक सो। नाना उपचार करि हारे सुर सिद्ध मुनि, होत न विसोक शत पावै न मनाक सो। राम की रजाय तें रसायनी समीरसूतु उत्रि पयोधिपार सोधि सरवाक सो। जातधान बुट, पुटपाक लंकं जातरूप, रतन जतन जारि कियो है मृगांक सो।। [तुलसीदास-कवितावली उत्तरकांड २५]

रामायणापरिचय धूर धरत नित शीश पर, कहु रहीम किहि काज। जिह रज मुनिपत्नी तरी सो ढूढ़त गजराज।। [ रहीम ] जैसी हो भवितव्यता तैसी बुद्धि प्रकास। सीता हरिवै तैं भयो रावगकुल कौ नास।। [वृन्द ] भारतपरिचय जो पुरुषांरथ ते कहूँ सम्पति मिलति रहीम। पेट लागि बैराटघर सपत रसोई भीम।। [ रहीम ]

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( ६६ ) छल वल समै विचारि कै अरि हनियै अनयास। कियौ अकेले द्रोनसुत निस पांडव कुलनास।। [वृन्द] द्य तपरिचय मन तू समकि सोच विचार। भक्ति विन भगवान दुर्लभ कहत निगम पुकार। साध संगति डारि फासा फेरि रसना सारि। दाव अवकें परयो पूरो उतरि पहिली पार॥ वाक सन्रे सुनि अठारे पंच ही कों मारि। दूर ते तजि तीन काने चमकि चौक विचार। काम क्रोध जंजाल भूल्यो ठग्यो ठगनी नारि। सूर हरि कें पद भजन बिन चल्यो दोउ कर भार॥ [ सूरदास ] वृक्ष, पक्षी इत्यादि परिचय तरु तालीस तमाल ताल हिंवाल मनोहर, मंजुल बंजुल तिलक लकुच कुल नारिकेलवर। एला ललित लवंग संग मुंगीफल सोहैं, सारी शुक कुल कलित चित्त कोकिल अलि मोहैं। शुभ राजहंस, कलहंस कुल, नाचत मत्त मयूरगन ।। अति प्रफुलित फलित सदा रहै केशवदास विचित्र वन ।। [केशवदास -- रामचंद्रिका ] ज्योतिषपरिचय उदित अगस्त पंथ जल सोखा। जिमि लोभहि सोखै संतोषा।।

[तुलसीदास-मानस ]

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श्रवस मकर-कुंडल लसत, मुख सुखमा एकत्र। शशि समीप सोहत मनो अवस मकर नक्षत्र ।I

[ केशवदास-रामचंद्रिका (राम का नखशिख)]

भाल विसाल ललित लटकन.वर, बालदसा के चिकुर सोहाये। मनु दोउ गुरु सनि कुजं आगे करि ससिहि मिलन तम के गन आये।। [ तुलसीदास-गीतावली]

चायाक्य (कूटनीति) परिचय जाकी धन धरती लई ताहि न लीजे संग। जो संग राखे ही बनै तो करि डारु अपंग।। तौ करि डारु अपंग फेर फरकै सो न कीजै। कपट रूप वतराय तासु को मन हर लीजै। कह गिरिधर कविराय खुटक जै है नहि वाकी। कोटि दिलासा देव, लई धन धरती जाकी।। [गिरिधर कविराय]

तेरह मंडल मंडित भूतल भूपति जो क्रम ही क्रम साधै। कैसेहु ताकहँ शत्रु न मित्र सुकेशवदास उदास न वाघै। शत्रु समीप, परे तेहि मित्र से, तासु परे जो उदास कै जोवै। विग्रह संधिन दाननि सिंधु लौं लै चहुँ श्ररनि ता सुख सोवै।। [केशवदास-रामचंद्रिका] मोक्षोपायपरिचय मुक्तिपुरी दरबार के, चारि चतुर प्रतिहार। साधुन को सतसंग, सम, अरु संतोष, विचार।। F. 13

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(E ) चारि में एकहु जो अपनावै। तौ तुम पै प्रभु आवन पावै।। [केशवदास-रामचंट्रिफा ]

सात्मज्ञानपरिचय माधव! मोह फाँस क्यों टूटै ? वाहिर कोटि उपाय करिय, अभ्यंतर ग्रंथि न छूटै।। घृत पूरन कराह अंतरगत ससि-प्रतिबिंब दिखावै। ईंधन अनल लगाइ कलप-सत शटत, नास न पावै।। तरु कोटर महँ बस विहंग, तरु काटे मरै न जैसे। साधन करिय विचार-हीन मन सुद्ध होइ नहिं जैसे।। अंतर मलिन, विषय मन अति तन पावन करिय पखारे। मरै नं उरग अनेक जतन बलमीक बिबिध बिधि मारे।। तुलसिदास हरि-गुरु-करुना-बिनु बिमल बिबेक न होई। बिनु बिबेक संसार घोर निधि पार न पावै कोई॥

[तुलसीदास-विनयपत्रिका ] ११५.

विवेकपरिचय दुख में सुमिरन सब करै, सुख-में करै न कोय। जो सुख में सुमिरन करै, तो दुख काहे होय। नाम भजो तो अब भजो, बहुरि भजोगे कब्ब। हरियर हरियर रुखड़े, ईधन हो गये सब्ब ।।

[कबीर-साखी ]

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( e) कितक दिन हरि सुमिरन विंतु खोये। पर निंदा रस में रसना के जपने परत उबोचे॥। तेल लगाइ कियो रुचि सर्दन वस्त्रहिं मलि मलि धोये। तिलक लगाइ चले स्वामी बनि बिषयनि के मुख जोये।। कालबली ते सब जग कंपत ब्रह्मादिकहू रोये। 'सूर' अ्धम की कहौ कौन गति उदर भरे परि सोये॥

[सूरदास]

धनुर्षेदपरिचय सूरज मुसल, नील पहारी, परिघ नील, जामवंत असि, हनू तोमर प्रहारे हैं। परशा सुखेन, कुंत केशरी, गवय शूल, विभीषण गदा, गज भिंदिपाल तारे हैं। मोगरा द्विविद,तीर कटरा, कुसुद नेजा, अंगदशिला, गवात्त विटप विदारे हैं। अ्रंकुश शरभ, चक्र दधिमुख, शेष शक्ति, बाग तिन रावस श्रीरामचंद्र मारे हैं।।

[केशवदास-रामचंद्रिका ]

देशपरिचय राज राज दिगबाम, भाल लाल लोभी सदा। अति प्रसिद्ध जग नाम, काशमीर को तिलक यह।

[केशव -- रामचंद्रिका ]

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(१०० ) आछ्े आछ्े असन, बसन, वसु, बासु, पशु, दान, सनमान, यान, वाहन बखानिये। लोग, भोग, योग, भाग, बाग, राग, रूपयुत भूषननि भूषित सुभाषा सुख जानिये। सातो पुरी तीरथ, सरिव, सब गंगादिक, केशोदास पूरस पुराय, गुन गानिये। गोपाचल ऐसे गढ़, राजा रामसिंह जूसे देशनन की मणि, महि मध्यदेश मानिये।। [केशव-कविप्रिया ] हय-गज-लक्षणापरिचय तरल, तताई, तेजगति, मुख सुख, लघु दिन देखि। देश, सुवेश, सुलचगौ, वरनहु वाजि विशेखि।। मत्त, महाउत हाथ में, मंद चलनि, चलकर्ष। मुक्तामय, इभ, कुंभ शुभ, सुंदर, शूर, सुवर्स।। [ केशव-कविप्रिया ] योगपरिचय हमरे कौन जोग व्रत साधै ? मृगत्वच, भत्म, अधारि, जटा को, को इतनो अवराधै ? जाकी कहूँ थाह नहिं पैये अगम अपार, अगाधै। गिरिधरलाल छवीले मुख पर इते बाँध को बाँघै? आसन, पवन, विभूति, मृगछाला, ध्याननि को अवराधै ? सूरदास मानिक परिहरि के राख गाँठि को बाँधै ? संगीतपरिचय अब मैं नाच्यो बहुत गोपाल। काम क्रोधं को पहिरि चोलना, कंठ विषय की माल॥

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(१०१ महामोह के नूपुर बाजत, निंदा शब्द रसाल। भरम भरयो मन भयो पखावज, चलत कुसंगति चाल ॥ तृस्ना नाद करत घट भीतर नाना विधि दै ताल। माया को कटि फेंटा बाँध्यो, लोभ तिलक दै भाल।। कोटिक कला कांछि देखराई, जल थल सुधि नहिं काल। सूरदास की सवै अविद्या, दूरि करौ नंदलाल।।

चेमेन्द्र ही का एक और ग्रन्थ बड़े चमत्कार का है, 'औचित्य- विचारचर्चा'। इसमें एक एक पद्य उदाहरस देकर दिखलाया है कि रचना में कवि को कितनी सावधानता अपेक्ित है। और इस सावधानता से सामान्य वाक्यों में भी कैसी सरसता -और थोड़ी ही असावधानता से कैसी विरसता-आ जाती है। इनके कुछ उदाहरणार्थ हिन्दी-कवियों के कुछ पद उद्धृत किये जाते हैं। गुप-सौचित्य (परशुरामगर्वोक्ति-ओररोज') भूपमंडली प्रचंड चंडीस-कोदंड खंड्यौं चंड बाहुदंड जाको ताही सों कहतु है।। कठिन कुठार धार धारिबे की धीरताहि, वीरता विदित ताकी देखिए चहतु हौं। तुलसी समाज राज तजि सो बिराजै आजु, गाज्यो मृगराज गजराज ज्यों गहतु हौं छोनी में न छाँत्यो छप्यौ छोनिप को छो ना छोटो, छोनिप-छपन बाँको विरुद बहतु हौं।। [तुलसीदास-कवितावली]

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(१०२ ) (माधुर्य-प्रसाद) नूपुर कंकन किंकिन करवन मंजुल सुरली ताल मृदंग उपंग चंग एकै सुर जुरली। मृदुल मधुर टंकार, ताल भंकार मिली धुनि, मधुर जंत्र की तांर भँवर गुंजार रली पुनि। तैसिय मृदुपद पटकनि चटकनि कर तारन की, लटकनि मटकनि भलकनि कल कुंडल हारन की। साँवरे पिय के संग नृतत यों न्रज की वाला, जनु घन-मंडल-मंजुल खेलति दामिनिमाला॥

पद-सौचित्य सीस-मुकुट, कटि काछिनी, कर-मुरली उरमाल। इहिं बानक मो मन सदा, बसौ बिहारीलाल।। [विहारी-सतसई ] इस वर्णन के लिए कृष्ण के नामों में 'बिहारीलाल' नाम सबसे अधिक उपयुक्त है। करौ कुवत जगु, कुटिलता तजों न दीन दयाल। दुखी होहुगे सरल हिय वसत, तिभंगीलाल।। [बिहारी-सतसई ]' इस वर्न के लिए 'त्रिभङ्गीलाल' नाम ही उचित है। कोई दूसरा नाम रखने से भाव नष्ट हो जायगा। पद-पनोचित्य सिद्ध सिरोमणि संकर सृष्टि संहारत साधु समूह भरी है [केशव-कविप्रिया ]

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(.१०३. ) यहाँ संहार के वर्णन में 'संकर' पद का प्रयोग उचित नहीं है। पलंकार-औौचित्य अलि नवरंगजेव, चम्पा सिवराज है। [भूषण-शिवाबावनी] इन रूपकों का प्रयोग अत्यन्त उचित हुआ है। औरंगज़ेब शिवाजी के पास नहीं जाता यह भाव अलंकार से स्पष्ट हो जाता है।. राधे सोने की मँगूठी, स्याम नीलम नगीना है। [अज्ञात] रस-सौचित्य (रौदर वर्गन में हास्य की सहायता) निपट निदरि वोले वचन कुठारपानि, मानि तास शनिपन मानौ मौनता गही। रोपे मापे लषन अकनि अनखौहीं वातैं, तुलसी विनीत नानी बिहँसि ऐसी कही। "सुजस तिहारो भरो भुवननि, भृगुनाथ ! प्रगट प्रताप आपु कही सो सबै सही। ट्ृट्यौ सो न जुरैगो सरासन महेसजी को, रावरी पिनाक में सरीकता कहा रही ?" [ तुलसीदास-कवितावली ] रस-पनौचित्य (वनवास के करुण वर्गन तथा आश्रमों के शांत वातावरय में निम्नलिखित हारय-रस उचित नहीं मालूम होता) बिंध्य के बासी उदासी तपोव्रतधारी महा, बितु नारि दुखारी। गौःतम तीय तरी, तुलसी, सो कथा सुनि भे सुनिवृ द सुखारी।

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( ?eg ) ह्वैं हैं सिला सब चंद्रमुखी परसे पद-मंजुल कंज तिहारे। कीन्हीं भली रघुनायक जू करुना करि कानन को पगुधारे॥ [ तुलसीदास -- कविवावली ] देश-पौचित्य सकल जन्तु अविरुद्ध, जहाँ हरि मृग संग चरही, काम क्रोध मद लोभ रहित लीला अनुसरहीं। सव ऋतु सन्त वसन्त कृष अवलोकन लोभा, त्रिभुवन कानन जा विभूति करि सोभित सोभा। श्रीतनन्त महिमा अनन्द को वरनि सकै कवि, संकरवन सो कळ्चुक कही श्रीमुख जाकी छवि। देवन में श्रीरमारम नारायय प्रभु जस, कानन में श्रीवृन्दावन सब दिन सोभित अस।

कृप्ण की रासलीला के स्थल वृन्दावन का यह वर्गन उपयुक्त है। बेई सुर-तरु प्रफुलित फुलवारिन मैं वेई सरवर हंस वोलन मिलन को। वेई हेम-हिरन दिसान दहली जन मैं वेई गजराज हय गरज-पिलन को। द्वार द्वार छरी लिये द्वार पौरिया हैं खरे, बोलत मरोर बरजोर त्यों भिलन को। द्वारिका तें चल्यो भूलि द्वारका ही आयों नाथ माँगियो न मो पै चारि चाउर गिलन को।। [ नरोत्तमदास-सुदामाचरित्र ] नोट-सुदामापुरी का द्वारिकापुरी के समान यह वर्णन उपयुक्त है। ..

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(१०५ ) देश-पनौचित्य मरु सुदेश मोहन महा, देखहु सफल सभाग। श्रमल कमल कुल कलित जहँ, पूरग सलिल तड़ाग॥ [केशवदास द्वारा दोष का उदाहरण] निपात-शौचित्य चितु दै देखि चकोर त्यों, तीजै भजै न भूख। चिनगी चुगै अँगार की, चुगै कि चन्द्रमयूख।। [बिहारी-सतसई ] यहाँ 'कि' का उपयोग उचित हुआ है। निचात-श्नौचित्य राम राम जव कोप कर्यो जू लोक लोक भय भूरि भर्यो जू। वामदेव तब आपुन आये रामदेव दोऊ समुझाये।। [केशव-रामचंद्रिका ] यहाँ 'जू' का प्रयोग केवल छन्द की पूर्ति के लिए हुआ है। काल-सौचित्य कोठ कहै अहो स्याम चहत मारन जो ऐसे, गिरि गोबरधन धारि करी रत्ता तुम कैसे? व्याल, अनल, विष ज्वाल ते राखि लई सब ठौर, अब बिरहानल दहत हौ हँसि हँसि नन्दकिसोर चोरि चित लै गये। नन्ददास-त्रमरगीत ] :F.14

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(१०६ ) कृष्ण के वियोग में उद्धव के सनमुख गोपियों के इस वचन में - भूत तथा वर्तमान काल का प्रयोग उचित हुआ है। काल-विरोध दोष इस काल से भिन्न प्रकार का है। केशव ने कविप्रिया में इसका उदाहरस निम्नलिखित दिया है :-

प्रफुलित नव नीरज रजनि, वासर कुमुद विशास। कोकिल शरद, मयूर मधु, वरपा मुदित मराल॥ विशेषण-सौचित्य यों रहीम सुख होत है, वढ़त देखि निज गौत। ज्यों बड़री अँखिया निरखि, आँखिन को सुख होत।। [ रहीम]

यहाँ 'बड़री' विशेषण से विशेष सौंदर्य आगया है।

लोक परलोक हूँ, तिलोक न विलोकियत तो सो समरघ चप चारिहूँ निहारिए। कर्मकाल, लोकपाल, अग जग जीवजाल, नाथ हाथ सब, निज महिमा विचारिए। खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर तुलसी सो, देव ! दुखी देखियव भारिए। बाहु तरुमूल, बाहुसूल कपिकच्छु वेलि उपजी, सकेलि, कपि, खेलही उखारिये।। 1

[तुलसीदास-हनुमानवाहुक ] तुलसीदास के बगल में बड़ी पीड़ा है। हनुमान से उसे दूर करने की प्रार्थना कर रहे हैं। पीड़ा की तुलना 'कपिकच्छुवेल' से

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(१०७) करना अत्यन्त उपयुक्त है क्योंकि कहा जाता है कि इस विशेष बेल को बन्दर देखते ही उखाड़ डालता है। अतः 'बेल' के साथ 'कपिकच्तु' विशेषण उपयुक्त है।

इस कवित्त की अन्तिम पंक्ति में कपि शब्द का प्रयोग भी सार्थक है।

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शब्द-सूची।

शब्द पृष्ठ शष्दू पृष्ठ

थगर्वं ापिशलि २ आभ्यासिक २०

अध्याय ६ थार्प ३६

मध्याहनास्यात ३३ आपिपुत्रक ६७ अन्द योनि भाजेख्यप्ररुय 05, 50 अन्यापदेशी २८ आावन्ती ९२ धनपेपिताख्यात आवृत्ताखयात २२ सनुवृत्ति अविचारित रमगीय ... ४७,६₹ w अनुटृत्तास्यात ३३ अविच्छेदी २६ चनेकाल्यात ३२ आावरेशिक २८ भपौरुपेय आाहार्या भभ्यास १६,१७ इतिहास २,४०.४१ धयोनि ७७ उचित सयोग ४०,४४ चर्थ ३० उत्पाद्य संयोग ४०,४k अ्थकालुष्य ६६,७० उत्तंस अर्थगत रमखीयता ... . ६७ उत्तरपथ अर्थचमल्य ६६,७० उपविदा ५२ अर्थशासत्र ४०,४२ सपवेद मनंकार ... २ एकपरिकार्य अलंकारगत रमगीयता ६म एकांत २३ भवंकारशासत एकाख्यात ३२ सलौकिक एकाभिघेयास्यात ३२ असूर्यपश्य पश्वर २६ भायपात २ मपदेशिकी १६,२० भात्वीपिकी शचित्य विधारचर्षा ...

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(आ्रा )

शब्द पृष्ठ शब्द पृंछ्

खंड ७६ ... ऋतुसंधि ६३ गांघर्व ३७

कंद गीत-वाद्य ५२

कपक ७८,७६ गेयवेद १

कल्प १,२ गौडी रीति कवि २६ घटमान ... कविकंठाभरण चक्रवतिक्षत्र .. ६० ... कवि चूलिका कविकपटिका ६३ चिंतामणि ७म कविराज चुम्बक ७८,७६ कविसमय छन्दोविचिति १,२ कविकल्पित कथा ४०,४४ छंदोविनिमय ७६

काकु ३८ छुन्दःशासत्र ५२

कामसूत्र ४,४०,४३ जल्प ... कारिका ज्योतिप १,२ कारयित्री १६ जीवंजीवक कारयित्री प्रतिभा २१ टीका कालिदास तद्धितवृत्ति ३०

काव्य 7,३,४,६,३४ तद्विरोधी ६३ कान्यकचि २६,२७ त्रयी काव्यपुरुप ७, ह त्रिघाबद्ध काव्यप्रकाश २० तिडन्वृत्ति ३० काव्यार्थ तुल्यदेहितुल्य काव्यविद्यास्नातक २८ तैल बिंदु ७६ कैशिकी ९२ दंडनीति 2 कोश -५२ दत्तावसर ५७ कृद्वृत्ति ३० १२ कृदभिहिताख्यात ... ३३ द्वन्द्वविच्छिति चमेंद्र ६०,६३,१०१ दावक ... ७८,७६

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(इ) ..

शब्द / पृष्ठ शब्द. - पृष

दिव्य ... ३७,३८,४६ परिच्छेद ६ ... दिव्य मानुप ४६ परिचय .. ७९

दिव्यपातालीय ४७ परिणताख्यात ३२

देवयोनि ३७ परिपाक ३०

धातुपारायय ५२ पांचाली रीति १२

धातुवाद पातालीय ४६,८४ नटने प् ७६,८० पात्र ४६ नवकुसुमिता २३ पाद ना्यशास्त्र ४०,४३ पारमेश्वर ३७ नानपारायण ५२ २, ३ निवंध-आख्यानकवान् ५१ पुराकल्प २,४०,४१ निबंध-कधोत्थ ५० पुराख

निबंधचित्र ४० पूर्व पच्च

निबंध-शुद्ध ४० पूर्वमीमांसा - ... ३

निबंध-संविधानकभू ५० परुपेय १,२ ६ निरुक्त १,२ मकरण ...

निषण्स प्रकीर्णाक. ४०,४४

निहृतये।नि प्रतिकंचुक दरे ... ७७ पंजिका प्रतिबिं बकल्प ७७,८०

पंजिकामीमांसा ६ प्रतिभा ... १७, १८,१६

पट्टवंध ७३ प्रत्यापत्ति .. पद ३० प्रमाणविद्या ४०

पद्धति मबंध विपय

परकृति २,३ प्रवग्य *

परक्रिया .२ पयोजनिक

परपुरप्रवेश बह्मरथयान ... ७३

परपुरप्रवेश सदश ७८ बरह्मौदन

परिक्रिया २,३ ब्रह्ममीमांसा ३

परिक्कृति २ नाहा ३४,३६

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(ई )

शब्द पृष्ठ शष्द पृष्ठ शन्द . चाहण ... यजु: बुद्धि 1३ यजुविद्या २

भारतीनृत्ति रत्तमाना 49

भावक २१ रसकालुष्य ६६,७१ वृपभ

भावमुद्गा रसगत रमणीयता ६६ भावयित्री रसवैमल्य ६६,७० भावयित्री प्रतिभा २१ रसालंकारोभयगत रमयीयता ६६

भाष्य रौद्रभारती शकि ... भोज, राजा २२ लौकिक ... ४०,४४,७८ भौजंग ३६ वचन ३५ गृद्द कानुप्प

भौम वस्तुसंचार ८३ राज्द्गत रमगीयता

भ्रामक ७८,७2 वाक्य ३२

मंत्र वाडमय 1,2 शब्दार्योभयगत (Hग. ... ज्ञाक मध्य ४ ६ वार्त्ता मव्यपातालीय ४६ वात्तिक महाकवि २८ वाद -: मानुप वचन विचारित सुस्थ ४७

मागिक्यपुंज विचाय माय-रमग्रीय ६५ शिदा ... माताएं १२ वितंडा शिक्पशास्त मीमांसा २,३,४२ विद्यास्थान ३, ४ शिशुनाग, राजा - मीमांसापंगिका ६ विधानापहार शिष्य

मुर्त फ-कथोस्थ विभूययामोप 50 शीर्द

मुक्तक चित्र विशेपोक्ति शुचि मुक्तविपय विपयपरिवर्त Co शुफ मुक्तक शुरधू वेदोपवेदात्मक सार्थवर्मिक शेव ... AY मुक्तफ-लोकारयानकचान् वे दांत मुक्तक-संविधानकभ् चैदयाघर ३७ भ्रति योकसंयोग ४०,४k ३७ संशांतक योग गिनीगत पैष्यव ३ संकाममित्ता 11 1.

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1 ( इ)

शब्दू पृष्ठ शब्द पृष्ठ

वैप्णववचतन ३८ संपुट वृत्ति संख्योल्नेख =9

दृपभ म संयोगविकार ४०,४६ व्यस्तक ७६ सत्कार व्युक्कम समक्रम व्याकरण १,२ समस्त सूक्तव्यापी शक्ति ६७ समय विद्या ४०,४२ शब्द ३० ३० शब्दु कालुष्य ६६,७० समासवृत्ति १६,१७ माव्दुगत रमयीयता समाधिं .. ६६ शब्दुवैमल्य समीक्षा ६६ ३३ शब्दार्थोंभयगत रमयीनता समुचिताखयास ६७ शाक्त ३२ सरयंत्र सहजा १६ शास्त शास्त्रकवि २६,२७ सात्वती कैशिकी १२

शास्त्रकाव्योभयकवि २६ सातवाहन, राजा

शिंक्षा १,२ सास्वतीवृत्ति ११

साम 9 शिल्पशास्त्र शिशुनाग, राजा ५३ 8 सारस्वत

शिष्य १३ साहसांक शीर्प म साहित्य ६

शुचि ५२ साहित्यविद्या ४

सुघ्वृत्ति, ३० w शुफ शैव ३५ सूक्ैकदेश दृश्य ६६

मृंग सूत्न श्रति 1,४0 सेविता २६

संक्ांतक स्मृति ३,४० संक्रामपिता २६ स्मृतितंत्र २

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(ऊ )

शब्द पृष्ठ शब्द पृष्ठ

स्वग्य ... हुडयुद्ध ... स्वर्गमत्यपातालीय ... ४७ स्वायंसुव हेतुव्यत्यय ७६ ... हरस हदयकवि २६