1. Kavya Darsa Dandin amp Tibetan Texts
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KĀVYĀDARSA
EDITED BY ANUKUL CHANDRA BANERJEE, M.A.
UNIVERSITY OF CALCUTTA 1939
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KĀVYĀDARSA
SANSKRIT AND TIBETAN TEXT
EDITED BY
ANUKUL CHANDRA BANERJEE, M.A
CALCUTTA UNIVERSITY
GIT CAI
TTA
ONIN NCEMENY OF LEA
PUBLISHED BY THE UNIVERSITY OF CALCUTTA
1939
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Printed by J. C. Sarkhel at the CALCUTTA ORIENTAL PRESS Ltd. 9, Panchanan Ghosh Lane CALCUTTA.
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HUMBLY DEDICATED
TO
DR. SYAMAPRASAD MOOKERJEE, M.A., B.L., D.LITT., M.L.A., BARRISTER-AT-LAW,
PRESIDENT,
COUNCIL OF POST-GRADUATE TEACHING IN ARTS,
IN TOKEN OF
ESTEEM AND GRATITUDE
OF THE EDITOR FOR THE KEEN PERSONAL
INTEREST ALWAYS EVINCED BY
HIM IN HS TIBETAN STUDIES
AND RESEARCHES.
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Printed by J. C. Sarkhel at the CALCUTTA ORIENTAL PRESS Ltd. 9, Panchanan Ghosh Lane CALCUTTA.
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HUMBLY DEDICATED
TO
DR. SYAMAPRASAD MOOKERJEE, M.A., B.L., D.LITT., M.L.A., BARRISTER-AT-LAW,
PRESIDENT,
COUNCIL OF POST-GRADUATE TEACHING IN ARTS,
IN TOKEN OF
ESTEEM AND GRATITUDE
OF THE EDITOR FOR THE KEEN PERSONAL
INTEREST ALWAYS EVINCED BY
HIM IN HIS TIBETAN STUDIES
AND RESEARCHES.
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CONTENTS
Preface ... ... X1
CHAPTER I Slo!
मङ्गलाचरण
वाकप्रशंसा (कना सत्रमार' प) ...
काव्यप्रशंसा (8र पवसष्माराय) ...
दुष्टकाव्यनिन्दा (दया त) काव्यलक्षण (अटना सी मालनरा) ...
काव्यभेद (करस्ना मो र5ेम) ...
महाकाव्यलक्षण (ुटना कर मकद म) गद्यकाव्यभेद (झमाम झकटननों दकेष)
श्लेषगुण (शुरपरे पंदडव) ...
श्लेषगुण लक्षण (हुरबर पददवनो बकन' ना) प्रसादगुणलक्षण (TATEर अवया पत5वयो सकत मा) समतागुणलक्षण (मम म ऊे- पव 59 मो माकव का)
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viii CONTENTS
Śloka
चटूपमा (महर नरे रसे) 35
तत्त्वाख्यानोपमा (रकरहर घारे रसे) 36
असाधारणोपमा (इक कोट रोक ठरे रसो) 37
अभूतोपमा (55 अेव रसे) 58 ...
असम्भावितोपमा (स्ेद्' व रोघरे रसे) 39 ...
बहुपमा (माहकरे ररे) 40
विक्रियोपमा (इकारपुरु 'रूषे) 41
मालोपमा (खेदघरे रसे) 42
वाक्यार्थोपमा (जस' रवर से) 43
प्रतिवस्तूपमा (मेर म) 46 ...
तुल्ययोगोपमा (महुद्स'यदया बर बार रसे) 48
हेतूपमा (मुकरो) 50
उपमादोषविचार (रसे जी मुके मदयाय) 51
उपमाबोधकशब्द (रस जे रअरहना हर केंना) 57
रूपकलक्षण (मतुनातमे नाकक' म) 65
समस्तरूपक (मामुमारा उन्" सत्ार य) 65
व्यस्तरूपक 66 ( 미 행 키 지 " 여 )" 지 ' 그 정 적 : 지 )
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CONTENTS ix xi
Śloka loka
समस्तव्यस्यरूपक 67 146
सकलरूपक 69 148
अवयवरूपक 71 150
अवयविरूपक 72 152
एकाङ्ररूपक (जक्र. अना ना रेना मातुवार उक) 74 154
युक्तरूपक (रमनाका यक्ष अन यारे मानुपारा उ) 76 156
अयुक्तरूपक (र अो' बेरा पारे मा हुमा रा उ) 77 158
विषमरूपक 160 ... 78
सविशेषणरूपक ([53र55 मउर मा8ुपारा उर) 80 162 ...
विरुद्धरूपक (Qमअमतकपुर मत्रुपासऊन) 82 164
84 166 हेतुरूपक (मा रैं सहुवाका उर) ...
ललिप्रूपक (बरमार बाब्रुपारा'ऊ) 86 167
177 उपमाव्यनिरेकरूपक (55 अमा उ तेक्ष धरे वसुवार उन) 87 178
आक्षंपरूपक .90 180
समाधानरूपक 91 182
रुगकरूपक 92
न र्यापद्यरूपक (235श्षरपत्रनार'उन) 93 83
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CONTENTS
Śloka
दीपक (मारावरन) 96
मालादीपक। 106
विरुद्धा्थंदीप ... 108
एकार्थदीपक ... 110
ल्िष्टार्थदीपक (शुरपरे रमो मारालडे) ... 112
आवृत्तिभेद (मषेर बरे रेम) 115 ***
आक्षेपभेद 119
धर्माक्षेप (केन' अपीसाय) .*. 127
धर्म्याक्षेप 128 ..*
कारणाक्षेप (कु' रोमय) 130 ***
कार्याक्षेप (REN'5"R मौन'र) 133
अनुज्ञाक्षेप (हेत'माकट र मोनान) ... 134
प्रसुत्वाक्षेप (रत० मोर Qोमा य) 130
अनादराक्षेप (मगुर रामा ऊयोना' य) 138
आशीर्वचनाक्षेप (चेकषरह एेस (मीना य) 140 ...
परुषाक्षेप (हुत्र मरा (पोना' य) 142
साविव्याक्षेप (मेरडे गरेन (पोना ) ... 144
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CONTENTS xi
Śloka यत्राक्षेप (3य5 ए2 3सोनार) 146
परवशाक्षेप (म@नन55 3सोमा' व) 148
उपायाक्षेप (ममश गुर (सोना य) 150
रोपाक्षेप (मिशक' Qसोना'य) 152
अनुकोशाक्षेप (क्र छत' Rबीनाय) 154
अनुशयाक्षेप (शधन एारा (सोमा य) 156
संशयाक्षेप (प्रे केन (नोना न) 158
श्रिप्टाक्षेप (बुर मरा 2 बीमान) 160
अर्थान्तराक्षेप (ना ब ोना) 162
हेत्वाक्षेप (कुक' दरखीनाघ) 164
अर्थान्तरन्यास (र नाबनचोरि) 166
अर्थान्तरन्यासमेद (रवaओ परे 50) 167
व्यतिरेक (हमा रउन) 177 एकव्यतिरेक (माडेना मो अमा ना उन) 178
उभयव्यतिरेक (गाकेमर बनापऊ) ... 180
... 182
साक्षेप सहेतुव्यतिरेक (3ममन उव.55959 केंनारा
... 183
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xii CONTENTS
Śloka
प्रतीय मानसादृश्यव्यतिरेक (हेय अर गु रु राम सुंदरक 186
सादृश्यव्यतिरेकमेद (महुंसतयरे अना यउवकें 55'2) 189
विभावना (झेन ए ठ) 196
समासोक्ति (बNनरह' 4) 202
समासोक्तिमेद (बडास' माहन नरे 5९म) 205 ...
अपूर्वसमासोक्ति (शरेक मेद सडार र कह्रर" ") 210
अतिशयोक्ति (225 5525 7र'") 211
217
उत्प्रेक्षा (र5 हैमा'य) 218
... 231
हेतुमेद (बुर र57) 232
सूक्ष्म (यू'न) ... 257
लेश ( ) ... 262
क्रम (रमठ) 270
प्रेयरसव दूर्जसििलक्षण (ब3मर य मतरि सहर मे माकर ' का) 272
पर्यायोक्त (इन माइन राहद य) 292
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CONTENTS xiii
Śloka
समाहित (मुव'ऊ'अरन) 295
उदात्त (मु के) 297
अपह्नति (रहुदररु) 301 ...
शरेष (पुरुष) 306 ...
श्ेयमंद (शुरमरे द8े7) 311 ...
विशेषोकि (155'5र'2ईर 4) 320 ...
तुल्ययोगिता (मातुदस पर 'पुरु' ए) 327 ...
विरोध (आसाअम) ... 330
अप्रस्तुतप्रशंसा (शENS'म्र मत तध्ुद य) 337 ...
व्याजस्तुति (त्त गोस' मध्द् य) ... 340
निदर्शन (देशवरवड्ुरन) ... 345
सहोकि (ह्तदेगपडर4) 348
परिवृत्ति (जेन्स महेश) 348 ...
आशिस (मेश्ष मह्र) 354
संसृष्ि (मुतत) 356 ...
संसृप्टिमेद (झअमर रेप) ... 357
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xiv CONTENTS
Śloka
भाविक (सोरचठ) 360
भाविकमेद (मदतय उवयो रे5) 361
CHAPTER III
यमक (ढुर'झक) 1 1
गोमुत्रिका (म'ग5वाठेव) ... 78
अर्द्धभ्रम (छेन" श मिर') 80
सर्वतोभद्र (गुव'5' Tत स) 80
स्वरस्थानवर्णनियम (552रमकN'र5 जो मीइनक्ष' मे देक् 83
प्रहेलिका (माय'केना) 96
प्रहेलिकास्थान (मायकेंना नों मावनक) 97
समागता प्रहेलिका (गुम5 कै नार न मात केना) 91
वश्चिता प्रहेलिका (RAनर मारकेंग) ... 91
व्युत्क्रान्ता, (रेमम इसम) 99
प्रमुषिता (र इठम) ... 99
समानरूपा (वाजुक करे बा तुनारा ) 100
परुषा (दूप'मे) ... 100
संख्याता (त्ररश ऊे) ... 101
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CONTENTS XV
• प्रकल्पिता (रतब5 नार फेन) Śloka
101
नामान्तरिता (म5535435) 102
निवृता (मजैय7) 102
समानशब्द (मबुकराज) 103
संमूढ (मटन 4) 103
परिहारिका (जहन सुरसन) 104
एकच्छन्ना 104
उभयच्छन्ना 105 ...
संकीर्णा (जटन कु'ररन) 105 ...
दोषविभाग (मेन मो पोइन सरपोष) 125 ...
अपार्थ (दव ऊमार) 128
व्यर्थ (रससान) 131
एकार्थ (र ना डे ना' घ) 135
ससंशय (प्रे केन उन) 139
अपक्रम 144 ...
शब्दहीन (लऊमरान) ... 148
यतिभ्रष्ट (माडेस म ईमारा ऊमाका य) 152 ...
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xvi CONTENTS
Śloka वृत्तभङ्ग (कम बर उनर' य) 156
विसन्धि (माकमार बर मनाम) 159
देशकालकलालोकन्यायागमविरोध (UNTE5NSEA2552
162 ...
देशविरोधोदाहरण (जलररRयTरे ररे) 165,166
कालविरोधोदाहरण (5N/T53अकरे रसे) 167,168
कलाविरोधोदाहरण (बहअरRआनचरे रसे) 170
लोकविरोधोदाहरण 172
न्यायविरोधोदाहरण 174,175
आगमविरोधोदाहरण (3T5539नम252) 177,178
देश विरोधगुण (CतTE' RAनवरे जोव 59) 180
कालविरोधगुण (5Nर53मनक2 जोव59) 181 ...
कला विरोधगुण (8यरER5नमर जोवदन) 182
लोकविरोधगुण (Qडैम दव55'3Aअकर चाव 59) ... 183
न्यायविरोधगुण ... 184
आगमविरोधगुण (355-39अहर जान 59) 185
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PREFACE
It is not without a feeling of joy that I am offering in the following pages a new edition of the Kavyadarsa of Dandin. It is on the basis of a Tibetan manuscript, a portion of which was copied out by the late Rai Sarat Chandra Das Bahadur, C.I.E. I rejoiced not only to get hold of but to utilize Das's manuscript preserved in the University Tibetan Seminar. The Kavya- darsa was translated into Tibetan by Śrilaksmīkara and Śon. ston. Lo. tsa. ba and others in the great Sa-skya monastery of Western Tibet. It is collected in Tanjur, Mdo, Vol. Se of the Sde.dge. edition; Cordier, III, p. 465. This xylograph contains both the transliteration of the Sanskrit text in the Tibetan script as well as its Tibetan translation. The Sanskrit text presented in this volume is taken from this xylograph. It is compared with the Tibetan version. There is also an independent Tibetan commentary on the text by Mi. pham. dge. legs. rnam. rgyal. As it came into my hands when the printing of the present text neared its completion, it could not be utilized by me. Of the different editions of the Sanskrit text of the Kāvyādarsa I have mainly used that of the Bibliotheca Indica, 1863. The manuscript from which the xylograph was made appears to have been written by more than one hand; so there is a lack of uniformity in the xylograph. In order to give an idea of the method of transcribing the Sanskrit text adopted by the scribe I have followed him excepting some cases noted below.
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xviii PREFACE
In Buddhist Sanskrit texts at the end of a sentence m is generally changed to anusvara. This is, however, not always found in the present work. The consonants after r are sometimes found doubled; e.g., I. 95 उद्गीरार्ण ; 103 मार्गगः, II. 9 वरार्ण, 10 घूरिर्णातेक्षणः ; etc. Though such doubling of consonants is sanctioned by the rules of grammar, I have dispensed with it in this edition. Besides, there are several inaccuracies that have been corrected by me; c.g. Chap. I. 30° for JN्; 42° एषां विपर्ययः for एषाम्बिपर्ययः ; 83b बध्रन्त्योजखिविनीगिरः ; for बभ्रन्त्योज्विनीगिर: 90° पातधौत for पातःधोत. Chap. II. 5० उत्प्रेक्षा for उत्प्रेक्षो : 6 व्याज for व्यज ; ।" बन्नन्नङ्गेषु for वधून्नङ्गेषु : 14° प्रपञ्चोयं for प्रपञ्चायं ; 202 पद्मन्तावत् for षद्मान्तावत् ; 244-"पद्मं सुभ्रु for पद्ममुद्ध ; 27" निर्णयोपमा for निर्ल्लयोपमा ; 28b रA for पतEN;38" प्रभासार: for प्रभासारं ; 47" पारिजातस्य for परिजातः ; 49" रक्षायै for राक्ाये; 491 सावलेपा for सावलेया ; 54" सौभाग्यं for सौभग्यं : 58° संवादि for सम्बादि ; 81% 55517 for 55'51; 87° रूपकद्वितयं for रूपकाद्वितयं ; 100" दैवतर्यः for देवतर्घयः ; 1201 पुष्पैः for पौष्पैः ; 152° अयतापि for अयातापि ; 1564 सकलं वयः for सकलम्बयः ; 158b किंवा for किम्बा ; 159° संवादि for ०सम्बादि; 165° दिशान्येपि for दिशन्येपि; 1882 र5वर for रे5मार; 234° उददिष्टं for दृष्टं ; 274° धृतिः for वृत्तिः; 2818 र for NAN्;3020पयरा for 5स]; 3290 मृगाच्षीणां for मृगाक्षीनान्. Chap. III. 84 किन्न्विदं for कीन्निदं ; 23d दशां for देशां ; 118' कलभाषिसि for कलभाषिणी; 134° म for पक्ष ; 174°-1 संस्कृताभङ्गः [सत्यमेवोदितोऽपि चेत् ] for संस्कारभङ्गं सत्येन च च्िताहिवै; 176°-D गतिर्न्यायविरोधस्य सैषा सर्वत्र
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PREFACE xix
दृश्यते for न्यायावपि च विरोधमादशिता यमत्ययं-which can in no way be supported. The Tibetan text supports the reading in the printed text. 176°- अथागमविरोधस्य प्रवेश उपदिश्यते for अथागमविरुद्धं ते प्रवेशावपि दर्शिता :- which does not give any suitable sense, nor is correct grammatically. Sanskrit readings found in the Tibetan xylograph differ in many places from those known to us in the printed edition referred to; e.g. Chap. I. 1° दीर्घ for नित्यं ; 2" उपलद््य for उपलभ्य ; 10" अलंकार: for अलंकारा :; 12° विवित्तां for तितीर्षूणां ; 13° अंश for अंग : 15° आयत्तं for उपेतं; 19" सर्गान्तैः for वृत्तान्तैः; 19' रञ्जनं for रञ्जकं ; 20" वज्यते for दुष्यति ; 22 कथनं for वर्णनं ; 25" काररां for लक्षणां ; 26" साश्वासत्वं for सोच्छ्रासत्वं ; 27'आश्वास: for उच्छासः ; 29' न ते for नते ; 32 आरप्ताः for आर्य्या: ; 36b स्थिति: for स्मृताः ; 350 शास्त्रे for शास्त्रेषु; 37" स्कन्घकादि यत् for स्कन्धका- दिकं; 37" ओसरादीनि for आसारादीनि; 38" कथादि for कथाहि ; 386 पठ्यते for वध्यते ; 38° त्वाहु: for प्राहुः ; 39" शाम्यादि for शल्यादि ; 421 लक्ष्यते for दृश्यते ; 49' आननं for मुखं ; 50° वव्ृते for वत्ृधे ; 5।" स्थितः for स्थितिः ; 52° तद्रपादि for तद्रपाहि; 53" तदा for ततः; 54" ईप्सितं for इष्यते ; 57 कर्तु for हन्तुं ; 63' वैरस्यायैव कल्पते for वैरस्याय प्रकल्पते ; 67" परं for खरं ; 69 हि for तुः 71" मुखं for मनः; 72° क्षपितः for च्यितः 78° अन्यच्च for अन्यल ; 85" विद्यते for दृश्यते ; 89 यथा for जनाः ; 97" मतो for स्मृतो ; 99° इह for इमे ; 99 अन्यत for श्रप्यत्न. Chap.II. 2° प्रतिसंस्कर्नुम् for परिसंस्कर्तुम् ; 34 अरद्य for अरन्यत् ; 6" श्िष्ट for श्लेष; 7" संसृष्टिः for सक्कीर्णाम् ; 10" परित्िप्य for परिभ्रम्य ; 144 प्रदर्श्यते
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XX PREFACE
for निदरश्यते ; 15व प्रकाशनात् for प्रदर्शनात् ; 17" त्वद् for तव ; 28" मता for स्मृता ; 30 मता for स्मृता ; 31 इष्यते for उच्यते ; 33 उदिता for मता ; 40° प्रथयन्ती for बोधयन्ती ; 420 एव सा for मता ; 48° समाहृत्य for समीकृत्य ; 50d स्मृता for मता ; 54" इत्येवमादि for इत्येवमादो ; 54 च for एव ; 56° त्वल for तत् ; 60° अन्यूनार्थवाचिनः for अन्यूनार्थवादिनः ; 62a संरुन्े for सन्धत्ते ; 64° सादृश्यसूचिन: for सादृश्यसूचकाः, 65" इप्यते for उच्यते ; 718 धर्म्माम्बु for घर्म्मोम्भः, 74° मुग्धे for मुग्धः ; 75" च for अपि ; 82° पश्यति for कल्पते ; 97° नवाय च नताङ्गीनां for स एवावनताङ्गीनां ; 1004 देवतर्धयः for दैवतर्धयः ; 1052 वर्णात्पलं for नीलोत्पलं ; 1130 अपि for तथा ; 114 अनुगति for अवगति ; 115b इत्यपि for एव च ; 1165 कुटजोङ्गमाः for कुटजद्रुमाः; 117 वर्ग for धृन्दं ; 117° अद for एप ; 1184 अद् for अत ; 128° तत नाश्रय: for न तदाश्रयः ; 1290 अत for एव and तद् for यद् ; 1321 न्त्रहं for न्विदं ; 137° प्रत्याचक्ाएया for इत्या- चत्ाराया ; 1370 विबन्धिनः for अनुबन्धिनः ; 137 ईदृशः for उच्यते ; 1444 प्रतिबन्धिन: for परिपन्थिनः ; 145" एकान्तरक्तया for एवानुरक्तया ; 146" मत्प्रियं for त्वत्प्रियं and त्वत्प्रियषिणी for मत्प्रियैषिणी ; 149 उपसूचनात् for उप- दर्शनात् ; 153 निवार्यते for निषिध्यते; 154व जीण for नीलं ; 161° दर्श- यित्वेति for दर्शयित्वेह ; 162b तृप्यति for शाम्यति ; 163b अ्रप्रयं निवर्त्यते for यन्निवार्य्यते ; 1724 आह्लादयति for आनन्दयति; 180 च्छविः for द्ृतिः ; 182° इयता for अयन्तु ; 182° जलात्मा for जडात्मा ; 186 सोनुविधीयते for सोप्यभिधीयते ; 190a लोलदृष्टि for लोलनेत्ं ; 192b वियदम्भसो: for चन्द्र- हंसयोः ; 1924 चन्द्रहंसयोः for वियदम्भसोः ; 195े अदर्शयत् for अद्शि यत् ; 197° सूक्ष्म for शुद्ध ; 1996 हेतुकं for हेतुजं ; 207° सच्छायः for सुच्छायः,
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PREFACE xxi
215° अनुपपत्त्यैव for नोपपद्यते ; 215" स्थितेः for स्थितिः ; 219 उत्सुक: for उद्यतः ; 2220 चैवन्तु for वेत्येवं ; 222 कथ्यते for वरार्यते ; 224" जन्यते for जायते ; 226 अनुन्मत्तो for उन्मत्तो ; 230" उत्प्रेकित for उत्प्रेक्षत and इतीष्यते for इतीष्यतां ; 236" मनोज्ञारोचके for मदनाग्न्यातुरे ; 240" कृतां for स्थितां ; 243 व्याक्रियन्ते for व्याह्ियन्ते ; 245"ं आश्रये for आथ्रमे ; 260" त्वदर्पित for मदर्पित ; 2660 एव for एष ; 276े अनुगम्यतां for अवगम्यतां, 277° सैवावन्ती for सैषा तन्त्री ; 283° देवी for तन्वी ; 29।" इति मुझ्ः for एवमुक्त्वा ; 295" दैववलात् for दैववशात् ; 296" तस्याः for अरस्याः ; 296b नमस्यतः for पतिष्यतः ; 300° ततिव्यक्त for इति प्रोक्त ; 302 शीता किल for मयि शीता ; 304" नाम नो for नामतो ; 3।।0 वा for च ; 323" कुलं for बलं ; 325' जगन्रयं for नभस्तलं ; 326 कल्प्यते for कल्पने ; 327 स्मृता for मता; 329° अपि for च ; 335" लोचनम् for लोचने ; 337" तप्रक्रान्तेप्सिता for त्र्प्रभक्रान्तेपु या ; 3441 प्रविस्तरः for विस्तरः ; 346" एव for एष ; 348" सह- भावस्य for सहभावेन ; 3481 यथा for स्मृता ; 349° पारडरा: for पाएडराः; 350" अश्नुभिः for असुभिः; 352 निरूपएं for निदर्शनं ; 353 पाराडरं for पाराडुरं ; 355" कीर्तितं for दर्शितं ; 356d संसृष्टिः कथ्यते पुनः for सक्कीगर्णन्तु निगद्यते ; 360 यः स्थितः for संस्थितः.
Chap. III. 6" साम्प्रतं for सत्पतिं ; 8" किन्न्विदं for किंनु ते ; 210 वा for च ; 38h ईप्सिता: for ईहिताः ; 4।" आमोद for आ्रनन्द ; 41 न मे फलं किंचन for प्रयोजनं नास्ति हि ; 55d तापनेन for तायनेन ; 63 पिष्टपस्य for विष्टपस्य ; 80" आ्हु: for प्राहुः; ।।।" तायवो for वायवो ; 117" जनं for नरं ; 119b रुषा for क्रुधा ; 127" च for वा ; 129"-b सोयमहमद्य for देवैरहमस्मि ; 129' एरावतः for एरावणः ; 132" कुलं for बलं ; 1320 न च ते कोपि for तव नैकोऽपि ; 1374
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xxii PREFACE
अलङ्कतिः for अलङ्किया ; 1450 अजाः for अमी ; 146" न दोषं सूरयो यथा for सूरयो नैव दूषरां : 153 एष for एवं : 156° यत्र for तत्र ; 158° वियुक्का for विमुक्ा ; 158° मदनबाणणा for स्मरस्य बाणा ; 1580 मृगेक्षणा for वामेक्षणा; 160° अस्मन्मनस्यपि for अस्मद्वपुष्यपि ; ।61 न्यङ्गं for न्यस्तं ; 165" अस्पर्शी for अमर्श ; 174°- सुगतैः संस्कृताभङ्गः [सत्यमेवोदितोऽपि चेत् ] for सत्य- मेवाह सुगतः संस्कारानविनश्वरान् ; 176° प्रवेश उपदिश्यते for प्रस्थानमुपदिश्यते ; 184° सकलः for सफलः and निष्कलः for निष्फलः ; 185" कन्यका for पुत्रिका. The differences between our readings of the text and those of Dr. F. W. Thomas ( JRAS., 1903, pp. 349-354 ) are noted below for comparison :- Chap. I. 12° विविन्णां for तितीर्षणां ; 13° अंश for अंग ; 20° उपात्तेपु सम्पत्तिः for उपात्तार्थसम्पत्तिः ; 600 नियच्छति for निगच्छति : 620 एनं for एतं ; 80° एतद for तद्. Chap.II. 2° प्रतिसंस्कर्तु for परिसंस्कर्तु ; 10° परित्तिप्य for परिवृत्य; 62" संरुन्धे for सन्धत्ते ; 64व सूचिन: for सूचकः ; 82व पश्यति for यस्यति ; 134° यातव्यं for याहि त्वं ; 142° रन्ध्रावेच्षेणा for रन्ध्रान्वेषण ; 148° त्वं for ते ; 149अस्यार्थस्य for तस्यार्थस्यैव ; 155" सानुक्रोशमिवोत्पले for सानुक्रोशोऽयमाच्ेपः ; 182" इयता for अयं तु ; 197° सूत्ष्माम्बु for शुद्धाम्बु ; 255° रागबालातपः for रविवालातपः; 300° अतिव्यक्क for प्रोक्त ; 3100 यद् for यत्तु ; 343" संसक्ता for संक्रान्ता ; 350" अश्रुभि: for असुभि: ; 3642 एष for एव. Chap. III. 38 वरार्यन्ते for वच्यन्ते ; 4। आमोद for आ्रनन्द ; 70" तस्यापि for तत्ापि ; 158° मदनबाणा for स्मरस्य बाणा.
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PREFACE xxiii
With reference to the xylograph used by Dr. F. W. Th om a s he himself observes that in some cases ( viz. II. 155, 362, and III. 128) it is scarcely decipherable. Sometimes he has given the Tibetan readings only, and not also the Sanskrit ones; as for instance, II. 109, 118; III. 141. There is a peculiar word in the Tibetan transliteration which should be noted here. In II. II6" we read कुटजोन्मा: for कुटज़द्रुम It seems that ungama in Kutajongama is from Sanskrit udgama through Prakrit uggama owing to spontaneous nasalisation. Cf. pungala in Buddhist Sanskrit for pudgala. The word udgama, literally 'shootingforth' appears to mean 'a bud.' Asterisks are put to indicate the difference between the two texts, Sanskrit and Tibetan. According to the printed Sanskrit text, onc line in II. 56 and another in II. 65 are not to be found in the Tibetan xylograph, and consequently the number of the slokas has differed in the two .. Thus the śloka II. 65 in our text is II. 66 in the printed Sanskrit text, and so on. Again, ślokas II. 155, 156 and 362 are omitted in our xylograph. Discrepancy is also noticed in the arrangement of some of the ślokas; e.g. II. 156, 160 and 161 in our text are II. 161, 159 and 160 respectively in the printed text. Again according to the printed Sanskrit text, both the Sanskrit and Tibetan of a line in III. 161 are missing, but the Sanskrit has been adjusted in our text omitting the Tibetan and consequently there have been put some dots in the Tibetan portion to indicate the omission. In a rare instance, e.g., in śloka III. 64, the second line
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xxiv PREFACE
in the xylograph stands as third, and the third line as second in the printed Sanskrit text. Incidentally it may be observed here that the Kavyadarsa is not the only Sanskrit text transliterated in Tibetan script; it is just one of the many. The study of the remaining works may prove equally useful and interesting. Before concluding this preface, I have to fulfil the agrecable duty of acknowledging my indebtedness to Mahāmahopādhyāya Professor Vidhushekhara Bhattacharya, Asutosh Professor of Sanskrit, Calcutta University, who initiated me into Tibetan Studies and has provided me with facilities for work in various ways. Thanks are due to Lama Lobzang Mingyur Dorje, Instructor in Tibetan, Calcutta University, for kindly revising the text in proofs. I must also thank my friends Mr Durgadas Mookerjee, M.A., and Mr Ajit Ranjan Bhattacharya, M.A., for their occasional assistance. Lastly I must also express my thanks to Mr. J. C. Sarkhe l, Manager, Calcutta Oriental Press and his staff who have never been found lacking in courtesy while this work was being seen through the press.
The University of Calcutta, ANUKUL CHANDRA BANERJEE July, 1939.
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KĀVYĀDARSA
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SANSKRIT AND TIBETAN TEXTS
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[1b] नम आय्यमञ्जुश्रीकुमारभूताय
चतुर्मुखमुखाम्भोजवनहंसवधूर्म्मम। मानसे रमतां दीर्घं सव्वंशुक्का सरसती।१।।
मरेह नबे मारेह मों शर कंशा हो।
5ररम के मिसिजे।
पूर्व्वशास्त्राणि संहत्य प्रयोगानुपलक्ष्य व। यथासामर्थ्यमस्माभि: क्रियते काव्यलक्षणं ।।२।।
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6 KĀVYĀDARSA [I.4
ह'डुर'वरा' नर्बव" एर ना मोरा वे।
इह शिष्टानुशिष्टानां शिष्टानामपि सव्चथा। वाचामेव प्रसादेन लोकयात्रा प्रवर्त्तते ।।३।।
रँव वक माकेसा इकारा जोका।
इदमन्धन्तमः कृत्स्' जायते भुवनत्रय'। यदि शब्दाह्वय ज्योतिरासंसारं न दीप्यते ॥४॥
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1.7] KĀVYĀDARSA. 7
आदिराजयशोबिम्बमादर्श प्राप्य वाङ्गयं। तेषामसन्निधानेपि न स्वयम्पश्य नश्यति ॥५।।
गौगों: कामदुधा सम्यक प्रयुक्ता स्मर्यंते बु[2a]घैः। दुष्प्रयुक्त पुनर्गोत्व प्रयोत्तु: सैव शंसति॥६॥
तदल्पमपि नोपेक्ष्य काव्ये दुष कथश्चन। स्याद्वपुः सुन्दरमपि श्वित्रेणैकेन दुर्भगं ।।9।।
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8 KĀVYĀDARSA [I.9
- 158'(ग' 3
355 शोकन कोंड सुक्षकाहर गुर।
गुणदोषानशास्त्रज्ञः कथं विभजते जनः । किमन्धस्याधिकारोस्ति रूपभेदोपलब्धिषु ।।८।
अतः प्रजानां व्युत्पत्तिमभिसन्धाय सूरयः । वाचां विचित्रमार्गाणां निबबन्धुः क्रियाविधिम्॥६॥।
देेर आारक्ष यर्रमें रना दकाक्ष।
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I.11] KĀVYĀDARSA 9
इनरमअनइन केना इनारा थे।
तैः शरीरं च काव्यानामलंकारञ्च दशितः । शरीरं तावदिष्टार्थव्यवच्छिन्ना पदावली।१०।।
अुब्ष वें केबेना ररहया जो।
रव सो इूना मठर केना मो रर 1120
पद्य' गद्यश्व मिश्रध्व तत्तिधैव व्यवस्थितम्। पद्यश्चतुष्पदी तञ्च वृत्त जातिरिति द्विधा ।११।।
2
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10 KĀVYĀDARSA [I.14
छन्दोविचित्यां स[2b]कलस्तत्प्रपञचो निदशितः । सा विद्या नौविविक्षूणां गम्भीरं काव्यसागर ॥१२।।
इमो रहता रर इबाका गेयु 1 92
मुक्तकं कुलकङ्गेषः संघात इति तादशः । सर्गबन्धांशरूपत्वादनुक्त: पद्यविस्तरः ।।१३।।
रुषय बेकाडा देर जो।
स्गबन्धो महाकाव्यमुच्यते तस्य लक्षण। आशीर्नमष्क्रिया वस्तुनिर्देशो वापि तन्मुख ॥१४॥
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I.16] KĀVYĀDARŚA 11
रेजो अबन 3र सह्ूेद बर 5।
इतिहासकथोद्ूतमितरद्वा सदाश्रय। चतुर्व ग्गफलायत्त चतुरोदात्तनायक ।१५।।
ब बुर यरना अर गुरु बरमा।
मेंनबें अइरमुदे र5गु 551
नगरार्ण वशैलर्तुचन्द्रार्कोदय वर्णनेः। उद्यानसलिलक्रीडामधुपानरतोत्सवः ॥१६॥
के बरकर परे प्रत्मारत 551
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12 KĀVYĀDARŚA [1.18
ब535 स42 कर 5ा2 89551120
मन्त्रदूतप्रयाणाजिनायकाभ्युद्यैरपि ॥१७"
ANT 559 89'51551
अलंकृतमसंक्षिप्त' रसभावनिरन्तरं। सर्गैरनतिविस्तीणैः श्रव्यवृत्तैः सुसन्धिमि: ॥।१८।।
उमसा कर अतुरय रसा बीका मादना 2
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I.21] KĀVYĀDARSA 13
सर्वत्र भिन्नसर्गान्त[3a]रुपेतं लोक:रञ्जनं। काव्यं कल्पान्तरस्थायि जायते सद्लंकृति ॥१६!
न्यूनमप्यत्र यैः कैश्रिदंगैः काव्यं न* वज्यंते। यद्युपात्तेषु सम्पत्तिराराधयति तद्विदः ॥।२०:।
रवे अइसा मेन का जोड।। 20
गुणतः प्रागुपन्यस्य नायकं तेन विद्विषां। निराकरणमित्येष मार्गः प्रकृतिसुन्दरः ॥२१।।
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14 KĀVYĀDARSA [I.23
वंशवीर्यश्रुतादीनि वर्णयित्वा रिपोरपि। तज्यान्नायकोत्कर्षकथनञ्च धिनोति नः ॥।२२॥
अपादपदसन्तानो गद्यमाख्यायिका कथा। इति तस्य प्रभेदौं द्वौ तयोराख्यायिका किल ॥२३॥
15' मो करे केंना कुव के।
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I.25] KĀVYĀDARSA 15
बक्षय देजो रबर के पकेश।
रअर३य क केक्ष के 1122
नायकेनव वाच्यान्या नायकेनेतरेग वा। स्वगुणाविष्क्रिया दोषो नात्र भूतार्थशंसिनः ॥२४॥
अपि त्वनियमो द्वृष्टस्तत्राप्यन्यैरुदीरणात्। अन्यो वक्ता[3b] स्वयं वेति कीदग्वा भेदकारणं ।।२५।।
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16 KĀVYĀDARŚA [1.28
वक्तञ्चापरवक्त्व साश्वासत्वश्च भेदकं। चिह्नमाख्यायिकायाश्चेत्प्रसङ्गेन कथास्वपि ॥२६॥
सबदें मे 55 माबन में र51
रुयजो हुषारा जोव क!
(ब-मोरा माडमा इनार सससजार 1135
आर्यादिवत्प्रवेशः किं न वक्रापरवक्रयोः । भेद्श् दृष्टो लम्भादिराश्वासो वास्तु किन्ततः ॥२७॥
(अवा'का कमारा तबेव मे ररके।
नबनमोमे इसा केस मे रहुना।
P.
तत्कथाख्यायिकेत्येका जाति: संज्ाद्वयाङ्गिता। तत्रैवान्तर्भविष्यन्ति शेषास्त्वाख्यानजातय: ।२८॥
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I.30] KĀVYĀDARSA 17
देयर माहम रर सहदय बेका।
रोट नाकेश ससा मोक इेमार माठेना ठाकेक।
कन्याहरणसंग्रामविप्रलम्भोदयादयः। सर्गबन्धसमा एव न ते वैशेषिका गुणाः ।।२६।।
कविभावकृत चिह्नमन्यत्रापि न दुष्यति। मुखमिष्टार्थसंसिद्धौ कि हि न स्यात्कृतान्मनाम्।३०।
3
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18 KĀVYĀDARSA [1.32
मिश्राणि नाटकादीनि तेषामन्यत्र विस्तरः। गद्यपद्यमथी कापि चम्पूरित्यभिधीयते ॥३१॥
तदेतद्वाङ्गयम्भूयः संस्कृतम्प्राकृतन्तथा। [4a]अपभ्रंशश्च मिश्रश्चत्याह्ुराप्ताश्चतुर्विधं ।।३२।।
बुर'कना रुकषना बेकषाहुय।
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- 35 ] KĀVYĀDARŚA :19
संस्कृत नाम दवी वागन्वाख्याता महर्षिभिः । तद्गवन्तत्समन्देशीत्यनेक: प्राकृतक्रमः ॥३३॥
최 う 9:5 月 、 バ パ み す ご グ · 引 십 「 초 一
महाराष्ट्राश्रयाम्भाषां प्रकृष्टम्प्राकृत विदुः । सागर: सूक्तिरतानां सेतुबन्धादि यन्मयं।३४।।
IE'म(व अर्कमाक शुरुसर हया 12
सौरसेनी च गौडी व लाटी चान्या च ताद्दशी। याति प्राकृतमित्येव व्यवहारेषु सन्निधि॥ ३५॥
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20 KĀVYĀDARSA [ I. 37
का'रस्षेव मेह रू।
आभीरादिगिर:काव्येष्वपभ्रंश इति स्थितिः । शास्त्र तु संस्कृतादन्यद्पभ्र शतयोदित ॥३ ६॥
T'SEह अश्षेमाककारे केया।
अवससा बा पुरु कना हेका माकरा।
मबवरा हुर कना अनतु रहर 1125
संस्कृत सगबन्धादि प्राकृत स्कन्धकादि *यत्। ओसरादोन्यपभ्रंशो नाटकादि तु मिश्रकं ॥।३७।।
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- 39 KĀVYĀDARSA 21.
पुरुकमा अश समारदे।
बेतमर असषनाक रहकय। 25
कथादि सर्वभाषाभि: संस्कृतेन च पठ्यते। भूतभाषामयीं त्वाहुरद्गतार्था' वृहृत्क[4b]थां ।३८।।
लोमारा पर मोस गुर मठलनराहे।
लास्यच्छलितर्शाम्यादि प्रेक्ष्यार्थमितरत्पुनः । श्रव्यमेवेति सैषापि द्यी गतिरुदाहृता ॥३६।
क्षेत 55 रम 55 कमर अक्षनान।
Rजर अुमारा अकेक रसा5 सहरु 11 22
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22 KĀVYĀDARSA [I. 42
अस्त्यनेको गिरां मार्ग्गः सूक्ष्मभेद: परस्परं। तत्र वैदर्भगौडीयौ वण्येंते प्रस्फुटान्तरौ ॥।४०।
रिव मे रहु रूवे।
श्रेषः प्रसाद: समता माधुर्य सुकुमारता।
इति वैदर्भमार्गस्य प्राणा दशगुणाः *स्मृताः । एषां विपर्य्ययः प्रायो लक्ष्यते गौडवर्त्मनि ॥४२।।
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1: 44 ] KĀVYĀDARŚA 23
रेरसा सत केर समेना एार के। बें तरीअम दसा नार्केदय जोन 11.02
ल्िष्टम स्पृष्टशैथिल्यमल्पप्राणाक्षरोत्तरं। शिथिलं मालतीमाला लोलालिकलिला *यथा ।४३।।
इना कुर जो नो गहन के।
अनुप्रासधिया गौडैस्तदिष्ट बन्धगोरवात्। वैदर्भैमालतीदाम लंघित भ्रभरैरिति ॥।४४।।
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24 KĀVYĀDARŚA [I. 46
प्रसादवत्प्रसिद्धार्थमिन्दोरिन्दीवरद्युति। लक्ष्म लक्ष्मीन्तनोतीति प्रतीतिसुभगं वचः ।।४५।।
रA55N94 सपाररवठ। बनरे मक मां जाडत थो।
व्युत्पन्नमिति गौडीय र्नातिरूढ मपीष्यते। यथानत्यर्जुनाब्जन्मस[5a]दक्षाङ्को बलक्षगुः ॥४६॥
देस केना फा ेर म तम।
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1.49] KĀVYĀDARŚA 25
समं बन्धेष्वविषमन्ते मृदुस्फुटमध्यमाः ।
ब्ुरुम रइम पुम प्रुम जो।
कोकिलालापवाचालो मामेति मलयानिलः। उच्छलच्छीकराच्छाच्छनिर्म रांभ:कणोक्षितः।।४८।।
चन्दनप्रणयोद्गन्धिर्मन्दो मलयमारुतः। स्पर्द्धते रुद्धमद्धर्यो वररामाननानिल:॥४६।। 4
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26 KĀVYĀDARSA [1.51
इत्यनालोच्य वैषम्यमर्थालंकारडम्बरौ। अपेक्षमाणा *ववृते पौरस्त्या काव्यपद्धतिः ।।५०।। बक्ष'रा मोआाऊमा का बहवार हर। रव को छ कर कैनारा रना न। हुकवरार सुमारान रया 2।
मधुरं रसवद्दाचि वस्तुन्यपि रसः स्थितः। येन माद्यन्ति धीमन्तो मधुनेव मधुव्रताः ॥५१॥ अ"य उबार डव केना रर के।
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I. 53 ] KĀVYĀDARSA 27
यया कयापि श्रुत्या यत्समानमनुभूयते। *तद्रूपादिपदासत्तिः सानुप्रासा रसावहा ॥५२।।
एष राजा यदा लक्ष्मीम्प्राप्तवान् ब्राह्मणप्रियः । तदा[5b]प्रभृति धर्मस्य लोकेस्मिन्नुत्सवोऽभवत् ।।५३।।
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28 KĀVYĀDARŠA [1.56
इतीदं *नाहत' गौडरनुप्रासस्तु तत्प्रियः । अनुप्रासादृपि प्रायो वेदभैरिदमीप्सित ॥५४॥
हेक्ष रहे मँ तम मो ररु।
वर्णावृत्तिरनुप्रासः पादेषु च पदेषु च। पूर्व्वानुभवसंस्कार बोधिनी यद्यदूरता।।५५।।
मारय दूमारा रू केंना कूकारा न।
चन्द्र शरन्निशोत्तंसे कुन्दस्तवकविभ्रमे। इन्द्रनोलनिभं लक्ष्म सन्दधात्यलिनः श्रियम् ॥५६॥
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I. 58 ] KĀVYĀDARŚA 29
नाकवका जवब्रेद काहुरता।
चारु चान्द्रमसं भीरु विम्बम्पश्येदमम्बरे। मन्मनो मन्मथाक्रान्तं निर्दय *कर्तुमुद्यत ॥५७॥
मा्हेरन नकरय बुनजो।
इत्यनुप्रासमिच्छन्ति नातिदूरान्तरश्रुतिम्। न तु रामामुखाम्भोजसहशश्च्न्द्रमा इति ।५८।।
ठेक्षय सेवन मो रहमर।
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30 KĀVYĀDARSA [1.60
स्मर: खरः खलः कान्तः कायः कोषश्च नः कृशः। च्युतो मानोधिको रागो मोहो जातोसवोगता:॥५६॥
असनया बेक ने इना इूमका कर 11re
इत्यादि बन्धपारुष्य शैथिल्यथ्च नियच्छति। अतो नैव[6a]मनुप्रासं दाक्षिणात्याः प्रयुञ्जते॥६०॥
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I.63] KĀVYĀDARŠA 31
आवृत्तिमेव संघातगोचरं यमकम्बिदुः । तन्तु नैकान्तमधुरमतः पश्चाद्विधास्यते ॥६१॥
जाइ साडेनाक कुकारा कोना।
कामं सर्वोप्यलंकारो रसमर्थे निषिन्चति। तथाप्यप्राम्यतेवैनम्भारम्वद्ृति भूयसा ॥६२॥
कन्ये कामयमानं मान्त्वं न कामयसे कथ। इति ग्राम्योयमर्थात्मा वेरस्यायव कल्प्यते ॥६३।।
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32 KĀVYĀDARA [1.65
कामं कन्दपचएडाला मयि वामाक्षि निदय:। त्वयि निर्मत्सरो दिष्ट्य त्यप्राम्योर्थो रसावद्द:।।६४।।
शब्देपि ग्राम्यतास्त्येव सा सभ्येतरकीतनात्। यथा यकारादिपद' रत्युत्सवनिरूपणे ॥६५॥
5 वे अनाकनरे केना खेरा मानाका।
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I.67 ] KĀVYĀDARSA 33
पद्सन्धानवृत्त्या च वाक्यार्थत्वेन वा पुनः। दुष्प्रतीतिकरं ग्रम्यं यथा या भवतः प्रिया॥६६॥
केना मो अ कमार मेर बोरा बुनारा र5।
छर58 ब्रिज नबीन 1150
परं प्रहृत्य विश्रान्तः पुरुषो वीर्यवानिति। एव[6b]मादि न शंसन्ति मार्गयोरुभयोरपि॥६७॥।
मेर झरपारे में पुकु:।
देछुछु शमारा अमारत के। माहेर मव छह पत्रनार का जोक ।1 50
5
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34 KĀVYĀDARŚA [1. 70
भगिनीभगवत्यादि सर्वत्रैवानुमन्यते। विभक्तमिति माधुर्यमुच्यते सुकुमारता ॥६८॥
रपुर अकय कूनाशरथो।
अनिष्ठुराक्षरप्राय सुकुमारमिहेष्यते। बन्धशैथिल्यदोषो हि *दर्शितः सर्वकोमले॥ ६६।।
मण्डलीकृत्य वर्हाणि कण्ठैर्मधुरगीतिभिः। कलापिनः प्रनृत्यन्ति काले जीमूतमालिनि ॥9०॥
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I. 72] KĀVYĀDARSA 35
मंकजो के माहुषा कारया।
इत्यनूर्जित एवार्थो नालंकारोपि तादशः । सुकुमारतयैचैतदारोहति सतां मुखं।श१॥
दीसमित्यपरर्भूम्रा कृच्छ्रोद्यमपि बध्यते। न्यक्षेण पक्षः क्षपितः क्षत्रियाणां क्षणादिति ।।७२।।
मरत मोर माबवरता सतकेर के।
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36 KĀVYĀDARSA [1.75 सुंब रेमारा इूमाकष गे सुमारा अधर रन। श ठेनानोर के उनाक्षयर ुर 1212
अर्थव्यक्तिरनेयत्वमर्थस्य हरिणोद्दृता। भू: खुरक्षुण्णनागासृगलोहितादुदधेरिति।।७३।।
मही महावराहेण लोहितादुद्धृतोद्धेः। इतीयत्ये[7a]व निर्दिष्टे नेयत्वमुरगासृजः।।७४।।
बेक्षना रे ऊेर सकुकर के।
नेदशम्बहु मन्यन्ते मार्गयोरुभयोरपि। न हि प्रतीतिः सुभगा शब्दन्यायविलङ्डिनी ॥७।॥
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I. 77] KĀVYĀDARŚA 37
श ीकुा रबोदन पुरु र। 35 सक केर सबेर अा जोक 11 er
उत्कर्षवान्गुणः कश्चिदुक्ते यस्मिन्प्रतीयते। तदुदाराह्वय तेन सनाथा काव्यपद्धतिः।७६।।
अर्थिनां कृपणा दृष्टिस्त्वन्मुखे पतिता सकृत्। तदवस्था पुनर्देव नान्यस्य मुखमीक्षते।।७9।।
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38* KĀVYĀDARSA [1.79
इति त्यागस्य वाक्येस्मिन्नुत्कर्षः साधु लक्ष्यते। अनेनैव पथान्यञ्च समानन्यायमूह्यताम् ।।9८।।
उक्षय केरणे केंना रहेषा।
श्ाध्येविशेषणैर्युक्तमुदारं कैश्चिदिष्यते।
अवया मंकेरे Qबर बेना रदह। रतकारि क श्रेा हेारे का के। จส รอิ ลา ม มก มาย จดิต 11 ขอ
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I. 82 ] KĀVYĀDARSA 39
ओजः समासभूयस्त्वमेतद्गद्यस्य जीवितम्। पद्येप्यदाक्षिणात्यानामिद्मेकम्परायणम्।।८०॥
रहदय केंना इर बादयो ऊ। रैवे क्षुमान रना नी मारक। केमारा परअा ज ुसुनारा थ। अकया उरे के माठेवा डु सबर 1110
तद्गुरूणां लघू[7b]नाश्च बाहुल्याल्पत्वमिश्रणैः। उश्चावचप्रकारं सद्दश्यमाख्यायिकादिषु ॥८१॥
अध्र रुकाव को के दमहा हे।
अस्तमस्तकपर्यस्तसमस्ताकींशुसंस्तरा। पीनस्तनस्थिताताघ्रकम्रवस्त्रेव वारुणी ।।८२।।
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40 KĀVYĀDARŚA [1.84
इति पद्येपि पौरस्त्या बव्रन्त्योजस्विनीर्गिरः। अन्ये त्वनाकुलं हृद्यमिच्कन्त्योजो गिरां थथा।८३।।
केना इमारा बहेदकर उहहर दहर 1122
पयोधरतटोत्संगलग्नसन्ध्यातपांशुका। कस्य कामातुरं चेतो वारुणी न करिष्यति ।।८४॥।
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I. 86] KĀVYĀDARSA 41 कुअ नजोड डजी जोरI
कान्तं सर्वजगत्कान्तं लौकिकार्थानतिक्रमात्। तञ्च वार्ताभिधानेषु वर्णनास्वपि विद्यते ॥=५॥
नाररर उत् मुक अ हाह घारे।
गृहाणि नाम तान्येव तपोराशिभवाद्शः । सम्भावयति यान्येव पावनैः पादपांशुभिः ॥८६।।
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42 KĀVYĀDARŚA [1.89
अनयोरनवद्याद्गि स्तनयोर्ज म्भमाणयोः। अवकाशो न पर्याप्रस्तव बाहुलतान्तरं ।।८७॥1
' मरनकुक उरे रना मोका।
इति [8a]संभाव्यमेवैतद्विशेषा ख्यानसं स्कृतं ्। कान्तं भवति सर्वस्य लोकयात्रानुवतनः ॥।८८॥
बेक्ष2 165515 रर्हर जोन।
लोकातीत इवात्यर्थमध्यारोप्य विवक्षितः । योर्थस्तेनातितुष्यन्ति विदग्धा नेतरे यथा ॥८६।।
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I.91 ] KĀVYĀDARSA 43
रहमा देव रू० मबैव बहर रहरु गेक्ष।
रजोक आसकषय मेजद के। केमउपपुर केना खेर का जोन दुबेर 1120
देवधिष्ण्ययमिवाराध्यमद्यप्रभृति नो गृहम् । युष्मत्पादरज:पातधौतनिःशेषकिल्विषम् ॥६०॥।
अल्पन्निर्मितमाकाशमनालोच्यैव वेधसा। इदमेवंविधम्भावि भवत्याः स्तनजृम्भणम् ।६१।।
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44 KĀVYĀDARŚA [I ... 94
इदमत्युक्तिरित्युक्तमेतद्रौडोपलालितं। प्रस्थानं प्राक् प्राणीतन्तु सारमन्यस्य वर्त्मनः ॥६२।।
अन्यधर्मस्ततोन्यत्र लोकसीमानुरोधिना। सम्यगाधीयते यत्र स समाधिः स्मृतो यथा ॥।६३।।
हएरहन 5565'9 5551102
कुमुदानि निमीलन्ति कमलान्युन्मिषन्ति व। इति नेत्रक्रियाध्यासालब्धा [8b]तद्वाचिनी श्रुतिः ।६४।।
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I. 96 ] KĀVYĀDARŚA 45
रेजे सह्द क बरना देर 1120
निष्ठू तोद्गीर्णवान्तादि गौणवृत्तिव्यपाश्रयं। अतिसुन्दरमन्यत्र ग्राम्यकक्षां विगाहते ॥६५।।
He 37
श्रुमार शेमार बदमार करे रहुता बदेकय।
म्ेततकरये कुक्षष वरदेन 11 er
पद्मान्यर्कांशुनिष्ठूताः पीत्वा पावकविप्रुषः । भूयो वमन्तीव मुखरूद्गीणारूणरेणुभिः ॥६६।।
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46 KĀVYĀDARŠA [1.98
मजोक्षरना क ब्रेका रया।
इति हृद्यमहद्यन्तु निष्ठीवति बधूरिति। युगपन्न कधर्माणामध्यासञ्च मतो यथा॥६७।।
गुरुगर्भभराकान्ता: स्तन त्योमेधपङ्क्तयः। अचलामित्यकोत्सङ्गमिमा: समधिशेरते ॥८॥
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I. 101 ] KĀVYĀDARŚA 47
उत्संगशयनं सख्याः स्तननं गौरवक्कमः । इतीह गर्भिणीधर्मा बहवोन्यत्र दशिताः ॥६६।।
हेक्षय उदेरे के आाइय डाक नारे।
तदेतत्काव्यसर्वस्वं समाधिर्नाम यो गुणः । कविसार्थः समग्रोपि तमेनमनुगच्कृति॥१००॥
कैमरा बर रे जे ह ररर 11200
इति मार्गदूयं भिन्न तम्नितरणात्। तद्भ दास्तु न शक्यन्ते वक्रुम्प[9a]तिकवि स्पिताः ॥१०१।।
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48 KĀVYĀDARSA [ 103
इक्षुक्षीरगुड़ादीनां माधुर्यस्यान्तरम्महृत्। तथापि न तदाख्यातु सरस्त्यापि शक्यते ॥१०२॥
आदर यफेन वें 650र के।
55551 39 , क15् 1र वक कज्क 11203
नैसर्गिकी व प्रतिभा श्रुतश्च बहु निर्मलं। अमन्दश्चाभियोगोस्याः कारणं काव्यसम्पदः ॥१०३।।
शकना स हाम कें नारा कारिक 11202
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I. 105 ] KĀVYĀDARSA 49
न विद्यते यद्यपि पूर्ववासना गुणानुबन्धि प्रतिभानमद्गुतं। श्रुतेन यतेन च वागुपासिता ध्रुवङ्गरोत्येव कमप्यनुग्रह ॥१०४॥
मबमापुर पार समर छेता रहेंनडे 11700
तदस्ततन्द्रैरनिशं सरस्वती क्रमादुपास्या खलु कीर्त्तिमीप्सुभिः। कृशे कवित्वेपि जना: कृतश्रमा विदग्धगोष्ठीषु विहर्तुमीशते॥१०५॥
दरिडन: कृतौ काव्यादर्शे मार्गविभागो नाम प्रथमः परिच्छेदः॥
7
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CHAPTER II
काव्यशोभाकरान्धर्मानलंकारान्प्रचक्षते। ते चाद्यापि विकल्प्यन्ते कस्तान् कात्स्त्येन [9b]वक्ष्यनि ।।१।।
देवे उहुररू इन देता है। ररना बासुरा हुरा रतर नह। I
किन्तु बीजं विकल्पानां पूर्वाचार्यैः प्रदशितं। तदेव प्रतिसंस्कर्तुमयमस्मत्परिश्रमः ॥२॥ रतर इमा हैना कासेव के।
काश्चिन्मार्गविभागार्थमुक्ता: प्रागप्यलंक्रियाः । साधारणमलंकारजातमद्य प्रदश्यते ॥३।।
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- 5] KĀVYĀDARSA 51
म के इनाबर 55ोद5। कुम उनर बेन के पूर पाठ वड्ुक।
स्वभावास्यानमुपमा रूपकं दीपकावृती। आक्षेपोर्थान्तरन्यासो व्यतिरेको विभावना ॥४।।
रखमा 55 रसाबन सोदय र5ु।
समासातिशयोत्प्रेक्षा हेतुः सूक्ष्मो लवः क्रमः। प्रेयो रसवदूज्जंस्वि पर्यायोक्त समाहितम् ।।५।।
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52 KĀVYĀDARŚA 11.7
57ा2. 55 अवा क वात्रे शहरज।
विरोधाप्रस्तुतस्तोत्रे व्याजस्तुतिनिदर्शने ।। ६॥
E5 g55 551
सहोक्ति: परिवृत्त्याशीः संसृष्टिरथ भाचिकं। इति वाचामलंकारा दशिता: पूर्वसूरिभिः॥७॥
रक्षेत दकर सरकरऊ। रंरना केंना इमाका रना यो के।
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II. 10 ] KĀVYĀDARŠA 53
नानावस्थं पदार्थानां रूपं साक्षाद्विवृण्वती। [10a] स्वभावोक्तिश्च जातिश्चेत्यादा सालङ्कतियथा।८।।
तुण्डैराताम्रकुटिलै: पक्षैर्हरितकोमलैः। त्रिवर्णराजिभि: कण्ठैरेते मञ्जुगिर: शुकाः॥६॥
वतु के रबक बेद गुनाका ररू। मासेनान गूर बे माऊवना रर।
कलक्णितगर्भेण कण्ठेनाघूणितेक्षणः । पारावतः परिक्षिप्य रिरंसुश्चुम्बति प्रियाम् ॥१०॥
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54 KĀVYĀDARŚA 111. 12
वघ्नन्नङ्गेषु रोमाश्च' कुर्वन्मनसि निर्वृति। नेत्रे चामीलयन्नेष प्रियास्पर्शः प्रवतंते ॥११।।
कण्ठे काल: करस्थेन कपालेनेन्दुशेखरः। जटाभिः स्निग्धताम्राभिराविरासीद् वृषध्यजः ॥१२।।
अमोव वव अाना व बेर थ के।
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II. 14] KĀVYĀDARŚA 55
2
शास्त्रेष्वस्यैव साम्राज्यं काव्येष्वप्येतदीप्सितम् ।१३।।
यथा कथंचित्साहश्यं यत्रोद्धूतम्प्रतीयते। उपमा नाम सा तस्याः प्रपश्चोय *प्रदर्श्यते ॥१४॥
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56 KĀVYĀDARŚA [11. 17
अम्भोरुहमिवाताम्र मुग्धे करत [10b]लन्तव। इति धर्मोपमा साक्षात्तुल्यधमप्रकाशनात्।। १५।।
राजीवमिव ते वक्त नेत्रे नीलोत्पले इच। इति प्रतीयमानकधर्मा वस्तूपर्मैय सा ॥१६॥
ตา วิ จรัย จฐู จิ จกิร1
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1I. 19 ] KĀVYĀDARŚA 57
तवाननमिवाम्भोजमम्भोजमिव ते मुखं। इत्यन्योन्योपमा सेयमन्योन्योत्कर्षशंसिनी ॥१८॥
तेक्ष इक्र हु 155'2समाक के।
त्थन्मुखं कमलेनैव तुल्य नान्येन केनचित। इत्यन्यसाम्यव्यावृत्तेरियं सा नियमोपमा ॥१९॥
मावें. ार बेना रहुजा रोक।
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58 KĀVYĀDARSA [ 1I. 21 बेक्षय महुषकय्य मावस पक्ेना हक।
पद्मन्तावत्तवान्वेति मुखमन्यअ्त ताद्गशं। अस्ति चेदस्तु तत्कारीत्यसावनियमोपमा ॥२०॥
समुच्चयोपमाप्यस्ति न कान्त्यंव मुमन्तय। ह्ादनाख्येन चान्वेति कर्मणेन्दुमितीदृशी।।२१।।
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11.24] KĀVYĀDARSA 59
त्वय्येव त्वन्मुखं दृष्ट दृश्यते दिवि चन्द्रमाः । इयत्येव भिदा [11a]नान्येत्यसावतिशयोपमा ।२२।
मय्येवास्या मुखश्रीरित्यलमिन्दोर्विकत्थनैः। पद्मेपि सा यदस्त्येवेत्यसावुत्प्रेक्षितोपमा ।।२३।।
लिक्षय रे के रबबदमारर से1122
यदि किञ्चिद्धवेत्पद्म सुन्नु विभ्रान्तलोचनं। तस मुखश्रियन्ध त्तामित्यसावद्भुतोपमा ॥।२४।।
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60 KĀVYĀDARSA [ 11.26
ข้า ซิ จดิ รพิ รจม ' จริง 5ิ 1
शशीत्युत्प्रेक्ष्य तन्वद्गि त्वन्मुखन्त्न्मुखाशया। इन्दुमप्यनुधावामीत्येपा मोहोपमा स्मृता॥२५॥।
किम्पझःपर्भ्रान्तालि किस्ते लोलेक्षण मुखं। मम दोलायते वित्तमितीय संशयोपमा॥।२१॥
सिर मारेद व अीना मार्जे रम है।
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II. 28 ] KĀVYĀDARSA 61
ररना मों सेमान के इूमयर माजे।
अतस्त्वन्मुखमेवेदमित्यसौ निर्णयोपमा।।२७।।
शिशिरांशुप्रतिदवन्दि श्रीमत्सुरभिगन्धि च। अम्मोजमिथ ते वक्तुमिति श्लेषोपमा मता ॥२८।
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62 KĀVYĀDARSA :11. 31 सरूपशब्दवाच्यत्वात् सा समानोपमा यथा। [1।b]बालेवोद्यानमालेयं सालकाननशोभिनी ॥।२६।।
पदम' बहुरजश्चन्द्रः क्षयी ताम्यान्तवाननम्। समानमपि सोत्सेकमिति निन्दोपमा +मता ॥३०।।
ब्रह्मणोप्युद्भवः पमशन्द्र: शम्मुशिरोधृतः। तौ तुल्यौ त्वन्मुखेनेति सा प्रशंसोप+मेप्यते ॥।३१।।
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!1. 33] KĀVYĀDARŚA 63
चन्द्रेण त्वन्मुखं तुल्यमित्याचिख्यासु मे मनः। सगुणो वास्तु दोषो वेत्याचिख्यासोपमां विदुः ॥३२।।
बिर नारे बय महुरत बक्षय।
सक्/'य अहदरदरसे बेक्ष कया । 23
शतपत्रं शरब्न्द्रस्त्वदाननमिति त्रयम्। परस्परविरोधीति सा विरोधोपमोदिता ।।३३।।
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64 KĀVYĀDARSA 111. 35
न जातु शक्तिरिन्दोस्ते मुखेन प्रतिगजितुम। कलड्गिनो जडस्येति प्रतिषेधोपमैव सा ।।३४।।
उेक्षय दसाया करिरसे फेर् हे । 2
तथापि सम एवासौ नोत्कर्षीति चटूपमा ॥३५॥
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II. 38 | KĀVYĀDARSA 65
न पम्म' मुम्मेवेद न भृङ्गौ चक्ुपी[।2a] इमे।
उदइन चुरब ताफीद कोया। हेझय रवदय प्हुम्खम अर।
चन्द्रारविन्दयो: कान्तिमतिक्रम्य मुखन्तव।
नष बहु सनमी दे।
सर्वपस्मपमासार: समाहत इव क्वचित्। स्वदाननं विभातोति तामभूतोपमां विदुः ।।३८।। 9
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66 KĀVYĀDARSA [ II. 40
5 ये बाहद वे इना काहेक बका।
इन्दुविम्बादिव विषं चन्दनादिव पावकः । परुषा वागितो वक्तादित्यसम्भावितोपमा ।।३६।।
बनरि मातुमारा अक्ष कुना नवव क5।
बय उें अक में कुनमोर केना।
चन्दनोदकचन्द्रांशुचन्द्रकान्तादिशीतलः। स्पशस्तवेत्यतिशयं प्रथयन्ती बहुपमा ॥४०॥
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II. 42 ] KĀVYĀDARSA 67
चन्द्रविम्बादिवोत्कीर्ण पद्मगर्भादिवोद्धृतम्। तव तन्वङ्गि वदनमित्यसौ विक्रियोपमा ॥४१॥
बक्षत र में बन रबुर रहे॥7
पुष्ण्यातप इवाह्वीय पूषा व्योम्नीव वासरः। विक्रमस्त्वय्यधालक्ष्मीमिति मालोपमैव सा ।४२।।
रुपेक्ष के नबेन केना जोना।
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68 KĀVYĀDARŠA [ Il.45
वाक्यार्थेनव वाक्यार्थः [12b]कोपि यद्युपमीयते। एकानेकेवशब्दत्वात् सा वाक्यार्थोपमा द्विधा॥४३।।
माठेवा कर कुकाका के इका माकरर 1102
त्वदाननमधीराक्षमाविर्दशनदीधिति। भ्रमद्भङ्गमिवालक्ष्यकेसरं भाति पङ्कजं ।।४४।।
हर मारेह कोमा के केरहन बेर।
रून केत्र सुकय मार्णीश के।
नलिन्या इव तन्वङ्गयास्तस्याः पद्ममिवाननम्। मया मधुवतेनेव पायम्पायमरम्यत।४५।।
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II. 47 ] KĀVYĀDARSA 69
एकू मबवक रेजो बारर।
वस्तु किश्चिदुपन्यस्य न्यसनात् तत्सधर्मणः । साम्यप्रतीतिरस्तीति प्रतिवस्तूपमा यथा ॥४६॥।
ए जोकेरा वाझुक रुमकद य। अऊनतहनक हेवारा या ठ।
नैकोपि त्वादशोदापि जायमानेषु राजसु। ननु द्वितीयो नास्त्येव पारिजातस्य पाद्पः ।४७।।
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70 KĀVYĀDARŚA [II. 49
अधिकेन समाहृत्य हीनमेकक्रियाविधौ। यद्त्रुवन्ति स्मृता सेयन्तुल्ययोगोपमा यथा ॥४८।।
दिवो जागर्त रक्षायै पुलोमारिर्भुवो भवान्। असुरास्तेन हन्यन्ते सावलेपा नृपास्त्वया॥४६।।
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II. 52 ] KĀVYĀDARSA 71
कान्त्या चन्द्रमसं [13a]धास्ता सूर्यन्धर्येण चार्णवम्। राजन्ननुकरोषीति सैषा हेतूपमा स्मृता ॥५०॥
मात्रे मेवशेर के केना र5।
न लिङ्गवचने भिन्न न हीनाधिकतापि वा। उपमादूषणायालं यत्रोद्वेगो न धीमतां ।।५१।।
ट'यर इसे जो भेंक रता के। शक5 595 र5 केंमा नओ!
स्त्रीव गच्छति षण्ढोयं वक्तेयषा स्त्री पुमानिव। प्राणा इव प्रियोयम्मे विद्या धनमिवार्जिता ॥५२।।
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72 KĀVYĀDARSA [ II.54
भवानिव महीपाल देवराजो विराजते। अलमंशुमतः कक्षामारोदुन्तेजसा नृपः ॥५३॥
मो एरसा मात्रे जोक्ष २र वरु व्ष 1 ४2
इत्येवमादि सौभाग्यं न जहात्येव जातुचित्। अस्ति च कचिदुद्वेगः प्रयोगे वाग्विदां यथा।५४॥।
बक्षम रेकषुत अक्षमार।
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HI. 56 ] KĀVYĀDARSA 73
हंसीव धवलश्चन्द्रः सरांसीवामलं नभः । भ्तृभक्तो भटः श्वेव खद्योतो भाति भानुवत् ।।५५।।
मार्के इसारा नबीवर शकर देठोर।
ईद्वशं वज्यंते सद्भि: कारणं त्वत्र चिन्त्यताम्। इववद्वायथाशब्दाः समाननिभ[13b]सन्निभाः ॥५६॥।
10
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74 KĀVYĀDARSA [ II. 59
तुल्यसंकाशनीकाशप्रकाशप्रतिरूपकाः । प्रतिपक्षप्रतिद्वन्द्विप्रत्यनीकविरोधिनः ।५७।।
सदक्सदृशसंवादिसजातीयानुवादिनः । प्रतिविम्बप्रतिच्छन्दसरूपसमसम्मिताः ॥५८।।
सलक्षणसद्ृक्षाभसपक्षोपमितोपमाः । कल्पदेशीयदेश्यादि: प्रख्यप्रतिनिधी अपि ॥५६॥।
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II.61 ] KĀVYĀDARSA 75
सवर्णतुलितौ शब्दौ ये चान्यूनार्थवाचिनः । समासश्च बहुवीहिः शशाङ्कवद्नादिषु ॥६०॥
स्पर्धते जयति द्वेष्टि द्रुह्यति प्रतिगर्जति। आक्रोशत्यवजानाति कदर्थयति निन्दति ॥६१।८
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76 KĀVYĀDARŚA [II.63
विडम्बयति संरुन्धे हसतीर्ष्यत्यसूयति। तस्य सुष्णाति सौभाग्य' तस्य कान्ति विलुम्पति ॥६२॥
तेन सार्धं विगृह्णाति तुलान्तेना]।4a]घिरोहति। तत्पदव्यां पदं धत्ते तस्य कक्षां विगाहते ॥६३।
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II.66 ] KĀVYĀDARŚA 77
तमन्वेत्यनुबघ्नाति तच्छीलन्तन्निषेधति। तस्य चानुकरोतीति शब्दाः सादृश्यसूचिनः ।६४॥।
रजोहेत कुडो उेन करे।
उपमैव तिरोभूतभेदा रूपकमिष्यते। यथा बाहुलता पाणिपद्मश्चरणपल्लवम् ।६५॥।
शर इर कोक गुरु दा जो।
अंगुल्यः पल्लवान्यासन् कुसुमानि नखाचिषः । बाहूलते वसन्तश्रीस्त्वन्नः प्रत्यक्षचारिणी ॥६६॥
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78 KĀVYĀDARSA [II.68
अना हरेररे म रोर मो इनारा।
इत्येतदसमस्ताख्य समस्त पूवरूपकं। स्मितम्मुखेनदोर्ज्योत्स्नेति समस्तव्यस्तरूपकं ।।६७।।
ताम्राङ्गुलिदलश्रेणि नखदीधितिकेसरं। ध्रियते मूर्ध्नि भूपालैरभवच्चरणपङ्कजं ।६८॥
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I1. 70 ] KĀVYĀDARŚA 79
किर थे बकन मे हुशेवे। र शे दमरा ने बेबर रहेंन 11 Sk
अंगुल्यादौ दलादित्वं पादे चारोप्य पद्मताम्। तद्योग्यस्थानविन्यासादेतत्सकलरूपकम् ।६६।।
रे के नबर रसा सात्रवारा न कैर । 50
[14b] अकस्मादेव ते चरिड स्फुरिताधरपल्लवम्। मुखं मुक्तारुचो धत्ते घर्माम्भ:कणमञ्जरीः।।७०।।
म5न में श्रसुर करतु के। ि मद माहू जो जायरून माजी।
दमय नदरेना रू उव रहैंक 1100
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80 KĀVYĀDARSA [Il. 73
मञ्जरीकृत्य धर्माम्बु पल्लवीकृत्य चाधर।
मरह वे इनाया माबव नगुरा।
वल्ितभ्रु गलद्वमजलमालोहितेक्षणम्। विवृणोति मदावस्थामिदं वदनपङ्गजम् ॥9२।।
अविकृत्य मुखाङ्गानि मुखमेवारविन्दताम्।
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II. 75 ] KĀVYĀDARŚA 81
मद्पाटलगण्डेन रक्तनेत्रोत्पलेन ते। मुखेन मुग्धे सोप्येष जनो रागमयः कृतः॥9४॥
एकाङ्गरूपकश्चैतदेवं द्विप्रभृतीनि च। अङ्गानि रूपयन्त्यत्र योगायोगौ भिदाकरौ ।।७५।
11
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82 KĀVYĀDARSA [II. 77
3र-के- जाक आाना ना हेना वा त्रुवारा उर।
स्मितपुष्पोज्ज्वलं लोलनेत्रभृंगमिदं मुख। इति [15a] पुष्पद्विरेफाणं सङ्गत्या युक्तरूपकं ॥७:॥
गदद रे रहनकरे मों देना रबर। नाजोकरे मोना मो बुदखठन। बेक्षT मोदेना शुफय रा।
इदमाद्रस्मितज्योत्स्' स्न्रिग्धनेत्रोत्पलं मुखं। इति ज्योत्स्नोत्पलायोगादयुक्तन्नाम रूपकम्॥७9॥
डकादारि बोना मों आडूलउर।
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Il. 80 ] KĀVYĀDARŚA 83
रूपणाद्द्गिनोङ्गानां रूपणारूपणाश्रयात्। रूपकं विषमं नाम ललितं जायते यथा॥७८॥
जन अन उ सुनारा जान बाना इकारा।
रहेवन को अऊनाय खेराकारे।
मदरक्तकपोलेन मन्मथस्त्वन्मुखेन्टुना। न्तिते भ्रूलतेनालं मदितुम्भुवनत्रयं ।।७६।।
हरिपाद: शिरोलग्नजहु कन्याजलांशुकः। जयत्यसुरनिःशंकसुरानन्दोत्सवध्वजः ।।८०।।
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84 KĀVYĀDARSA [HI.82
विशेषेणसमग्रस्य रूपं केतोर्यदीदृशं। पादे तदर्पणादेतत् सविशेषणरूपकं ॥८१॥।
र9े म5 न सोद हे।
न मीलयति पद्मानि न नभोप्यवगाहते। त्वन्मुखेन्दुर्ममासूनां हरणायव प [15b] श्यति ।।८२।।
एक इकारा वे कोतुन बेद।
Page 112
11.84] KĀVYĀDARSA 85
अक्रिया चन्द्रकार्याणामन्यकार्यस्य च क्रिया। अत्र सन्दश्यंते तस्माद्विरुद्धन्नाम रूपकं ।।८३।
पाहरता रमुण हें में जो ेर।
गाम्भीर्येण समुद्रोसि गौरवेणासि पर्वतः। कामदत्वाच्च लोकानामसि त्वं कल्पपाद्पः ।।८४।।
डिर के इ राक्ष कु नर्के 55।
उहमा देव इकाका ा रहहहा के।
Page 113
86 KĀVYĀDARŚA [ll.87
गाम्भीर्यप्रमुखैरत्र हेतुभिः सागरो गिरि:ः। कल्पद्रुमश्च क्रियते तदिदं हेतुरूपकं ।८५॥
ैवे शुयो मा हुसारा उन के 11 Ax
राजहंसपभोगारह भ्रमरप्रार्थ्यसौरभं। सखि वक्ताम्बुजमिदन्तवेति श्विष्टरूपकं ॥।८६।।
5े बैमा चुर रारा दव आकररु हिका।
बेक्षन पुर परे माहुमारा उन कें 11 A5
उपमाव्यतिरेकासूय रूपकद्वितय यथा॥८७॥
Page 114
1I. 89 ] KĀVYĀDARSA 87
मार्हे मे र६ के सबसान। केरा आायुन केना नो अाधुन अषेद बरा।
अयमालोहितच्छायो मदेन मुखचन्द्रमाः । सन्नद्वोदयरागस्य चन्द्रस्य प्रतिगजति ।।८८।।
59E'य सबेद में बत रहे।
AT2A 5553551144
चन्द्रमा: पीयते देवमया त्वन्मुखचन्द्रमाः। असमग्रोप्यसौ [16a] शश्वदयमापूर्णमएडलः।।८६।
क् इनरा ग्ेश वें बन उुरर।
Page 115
88 KĀVYĀDARŚA [ II.91
मुखचन्द्रस्य चन्द्रत्वमित्थमन्योपतापिनः । न ते सुन्दरि संवादीत्येतदाक्षेपरूपकं ।।६०।।
रेवे रकारे आहुपारा 3न के 1100
मुखेन्दुरपि ते चरिड मां निदहति निदयं। भाग्यदोषान्ममैवेति तत्समाधानरूपकं ।।६१।।
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Il.94 ] KĀVYĀDARŚA 89 मुखपङ्गजरङ्गेस्मिन् भ्रूलतानतकी तव। लीलानृत्यं करोतीति रम्यं रूपकरूपकं ।।६२।।
नैतन्मुखमिदम्पझ्' न नेत्रे भ्रमराविमौ। एतानि केसराण्येव नैता दन्तार्चिषस्तव ।।६३।।
मुखादित्वं निवर्त्यैव पदमादित्वेन रूपणात्।
12
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90 KĀVYĀDARSA [II.96
बादेद अक्षेनाकायक रहेना है।
스 リ : 고 、 然 리 스 , 결 仙 시 스 ,D 보 , 시 丛 一
न पर्यन्तो विकल्पानां रूपकोपमयोरतः । दिङ्गात्र' दशितं धीरेरनुक्तमनुमीयताम् ।।६५।।
महुमारा उव रसे जो इन हेना कूठार।
बे इक इनक्ष मे सुनारा उमा पकुक।
[16b] जातिक्रियागुणद्रव्यवाचिनैकत्र वर्त्तिना। सर्ववाक्योपकारश्चेत् तमाहुर्दोपकं यथा ॥६६॥
कैंना वाठेना अके मावकान जोक्ष।
Page 118
II. 98 ] KĀVYĀDARSA 91
पवनो दक्षिण: पर्ण जीर्णं हरति वीरुधाम्। नवाय च नताङ्गीनाम् मानभङ्गाय कल्पते ॥६७॥
चरन्ति चतुरम्भोधिवेलोद्यानेषु दन्तिनः । चक्रवालाद्रिकुञ्जेषु कुन्दभासो गुणाश्च ते ।।६८।।
नुरे कुमादे वबी दसारा थे।
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94 KĀVYĀDARSA [11. 105
जलं जलधरोद्गीरणंड्ुलड्गहशिखण्डिनां। चलश्च तडितान्दाम बलं कुसुमधन्वनः ।१०४।।
कुर डेवे मोता के रहमादरकु।
त्वया कर्णोत्पलं कर्णे स्मरेणास्त्र शरासने। मयापि मरणे चेतस्त्रयमेतत्समं कृतं ।१०५।।
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II. 108 ] KĀVYĀDARŚA 95
शुक: श्वेताचिषो वृद्धय पक्षः पञ्चशरस्य सः। स च रागस्य रागोपि यूनां रत्युत्सवश्रियः ॥१०६॥
इत्यादिदीपकत्वेपि पूर्वपूर्वव्यपेक्षिणी। वाक्यमाला प्रयुक्तेति तन्मालादीपकं मतं ॥१०७।
बेना शोनाका माराजा मो जोन क गृर।
अवलेपमनङ्गस्य वर्धयन्ति वलाहकाः । कर्शयन्ति तु धर्मस्य मारुतोद्धतशीकराः ॥१०८॥
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96 KĀVYĀDARŚA [II.110
इअमे रतके क्षेतपर डेर 1120%
अवलेपपदेनात्र वलाहकपदेन च। क्रिये विरुद्धे संयुक्त [176]तद्विरुद्धार्थदीपकं ॥१०६।।
हरत्याभोगमाशानां गृह्णाति ज्योतिषां गणम्। आदत्ते वाद्य मे प्राणानसौ जलधरावली ॥११०॥
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II. 112 ] KĀVYĀDARŚA 97
शरअ जो के कैनारा दूमारा रहेंक।
अनेकशब्दोपादानात् क्रियवैकात्र दीप्यते। यतो जलधरावल्यास्तस्मादेकार्थदीपकं ॥१११॥
दयेर ए ना ठेया मा रान डोरन र 1122
हृद्यगन्धवहास्तुङ्गास्तमालश्यामलत्विषः । दिवि भ्रमन्ति जीमूता भुवि चैते मतंगजाः ॥११२।
तार केव रेसा काजार 11223 13
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98 KĀVYĀDARŚA [ II. 115
अत्र धर्मैरभिन्नानामभ्राणां दुन्तिनामपि। भ्रमणेनैव सम्बन्ध इति श्िष्टार्थदीपकं ॥११३॥
अनेनैव प्रकारेण शेषाणामपि दीपके। विकल्पानामनुगतिविधातव्या विचक्षणैः ॥११४॥
झनान इमारा गुर हेता रत्ो जोका।
अर्थावृत्तिः पदावृत्तिरुभयावृत्तिरित्यपि। दीपकस्थान एवेष्टमलंकारत्रय यथा ।११५॥
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II. 117] KĀVYĀDARŚA 99
दव'अशेर 55 वे केमा वश्र र5।
विकसन्ति कदम्बानि स्फुटन्ति कुटजोङ्गमाः। उन्मीलन्ति च [18a] कन्दल्यो दलन्ति ककुभानि च ॥११ ६॥
यड 4ार मोरा वर गुरु 1122
उत्कएठयति मेघानां माला वर्गङ्कलापिनां। यूनां चोत्कण्ठयत्यद्य मानसम्मकरध्वजः ॥११७।।
सवमों सेमन रा मोर के।
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100 KĀVYĀDARŚA [II. 119
वकुर इनारा फोन 3र इव को 11220
जित्वा विश्वम्भवानद्य विहरत्यवरोधनेः । विहरत्यप्सरोभिस्ते रिपुवर्गो दिवं गतः ।११८॥
बहुंद में दूकाक क5 के मरझेर।
क्षमे इनारा ए5 केयर डोर 112/
अथास्य पुनराक्षेप्यभेदानन्त्यादनन्तता ।११६।।
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II. 122] KĀVYĀDARŠA 101
अनङ्ग: पश्चभि: पुष्पैर्विश्वंव्यजयतेषुभिः। इत्यसंभाव्यमथवा विचित्रवस्तुशक्तयः ॥१२०॥
अक्ष कोन मे कें कोदेना थो।
ठेक्ष'य मोठ्षेन पाहव के। रहस'"र वक्षत इना र कम 11720
इत्यनङ्गजयायोगबुद्धिर्हेतुबलादिह। प्रवृत्तैवं यदाक्षिप्ता वृत्ताक्षेपस्तदीदृशः ॥१२१॥
बेक्षना र१ वे मं बेवर गेर।
रेहुर पुर बगाया बहमो शेरु। 5554 5 3835 11722
कुतः कुवलयं कर्णे करोषि कलभाषिणि। किमपाङ्गमपर्याप्रमस्मिन्कर्मणि मन्यसे ॥१२२॥
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102 KĀVYĀDARSA [ II. 124
म'यके जाइत रहुआा। अर्ष रहेय में हुर होना रना।
स वर्तमानाक्षेपोयं कुर्वत्ये [186] वासितोत्पलं। कर्णे काचित्प्रियेणैवं चाटुकारेण रुध्यते ॥१२३।
आस बेना एर कोन दुल।
少 에 시 5 燃 A ダ · 弘 ル グ , ゆ 기 A 一
सत्यं ब्रवीमि न त्वम्मान्द्रष्टुं वल्लभ लप्स्यसे। अन्यचुम्बनसंक्रान्तलाक्षारक्तेन चक्षुषा ॥१२४।
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II. 126 ] KĀVYĀDARSA 103
डिर प्रेस साबेट बर'उतर' का अनार 11 720
सोयं भविष्यदाक्षेपः प्रागेवातिमनस्विनी। कदाचिदपराधोस्य भावीत्येवमरुन्ध यत् ॥१२५।।
2-35 9995 न इन कारा। वमा बेना 2रे जोका अवर का हना। 255373551
तव तन्वद्गि मिथ्यैव रूढमङ्गेषु मार्दवं। यदि सत्यम्मृदून्येव किमकाण्डे रुजन्ति मां ॥१२६॥।
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104 KĀVYĀDARSA [II.129
धर्माक्षेपोयमाक्षिप्तमङ्गनागात्रमार्दवं। कामुकेन यदत्रैवं कर्मणा तद्विरोघिना॥१२७॥
के 55 आब बरेबक ग्रेश के 11220 क कद बुक्ष उे रहमय रया।
सुन्दरी सा नवेत्ये विवेक: केन जायते। प्रभामात्रं हि तरलं दृश्यते तत्र नाश्रयः ॥१२८॥
देवे आाईर नारना, जोव बेका।
सायद सर शुरु शों हेव काजोक 11 231
धर्म्याक्षेपोयमाक्षिप्तो धर्मीधर्मं प्रभाह्वयं। अनुज्ञायात्र तद्रपमत्याश्चर्यं विवक्षता ।।१२६।।
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II. 131 ] KĀVYĀDARŚA 105
चक्षुषी [19a] तव रज्येते स्फुरत्यधरपल्लवः। भ्रुवौ च भुगे न तथाप्यदुष्टस्यास्ति मे भयं ॥१३०।।
कुरय ओर यक्ष तरता कों रहेनार 11220
स एष कारणाक्षेपः प्रधानं कारणं भियः। स्वापराधो निषिद्धोत्र यत्प्रियेण पटीयसा ॥१३१।।.
14
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106 KĀVYĀDARŚA [ ll. 133
अमारया जोने म जोना ठै।
दूरे प्रियतमः सोयमागतो जलदागमः । दृष्टाश्च फुल्ला निचुला न मृता चास्मि किं न्वहं ॥१३२।।
कुरहेंे स झव रदे के रहना।
कार्याक्षेपः स कायस्य मरणस्य निवर्तनात्। तत्कारणमुपन्यस्य दारुणं जलदागमं ।।१३३।।
3 加 だ 、 ぬ 、 R ぷ 1! り ツ す 公 ッ 心 ハ 一
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II. 136 ] KĀVYĀDARSA 107
न चिरं मम तापाय तव यात्रा भविष्यति। यदि यास्यसि यातव्यमलमाशंकयात्र ते ॥१३४।।
माखरं वावेनाराव माखवनारायर आाहर।
1552 0125 2552'2551 ररक फिन वे दवारा ने 3कंल 11220
इत्यनुज्ञामुखेनव कान्तस्याक्षिप्यते गतिः। मरणं सूचयन्त्येव सोनुज्ञाक्षेप उच्यते ॥१३५॥
बक्षय उकेन मारत मेराक। हननवर कररये शवन के।
धनञ्च बहु लभ्यन्ते सुखं क्षेमं च वर्त्मनि। न च मे प्राणसं[19b]देहस्तथापि प्रिय मास्म गाः ॥१३६॥
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108 KĀVYĀDARSA [ II. 138
दर के आद से ह उधर बेर। आान3 जार वें करे बेद हयी।
दतुर आइर मे उत्ं के5 11225
प्रत्याचक्षाणया हेतून् प्रिययात्राविबन्धिनः । प्रभुत्वेनैव रुद्धस्तत्प्रभुत्वाक्षेप ईद्रशः ।१३७।।
जीविताशा बलवती धनाशा दुबेला मम। गच्छ वा तिष्ठ वा कान्त स्वावस्था तु निवेदिता ॥१३८॥।
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II. 140 ] KĀVYĀDARŚA 109
माहंर मे माखेनार रम बुवारा अनाररान।
असावनादराक्षेपो यदनादरवदचः । प्रियप्रयाणं रुन्धत्या प्रयुक्तमिह रक्तया।१३६।।
म3र उररेवे कना इन कार।
र१के नगुर एहा अनोना कारे 11220
गच्छ गच्छसि चेत्कान्त पन्थानः सन्तु ते शिवाः। ममापि जन्म तत्रैव भूयाद्यत्र गतो भवान् ॥१४०।
महR में नासमे मावेनाशक सबुर। र ये अनवें खेरगुर हेया। 95515 के माखवेवाराह रेरु।
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110 KĀVYĀDARSA [Il. 143
इत्याशीर्वचनाक्षेपो यदाशीर्वाद्वर्त्मना। स्वावस्थां सूचयन्त्यैव कान्तयात्रा निषिध्यते ॥१४१॥
रेहर वेरइहनअम मोरा बर।
यदि सत्यैव यात्रा ते काप्यन्या मृग्यतां त्वया। अहमद्यैव रुद्धास्मि रन्ध्रापेक्षेण मृत्युना ।।१४२।।
इत्येष [20a] परुषाक्षेपः परुषाक्षरपूर्वकम्। कान्तस्याक्षिप्यते यस्मात्म्रस्थानं प्रेमनिघ्नया॥१४३॥
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II. 145: ] KĀVYĀDARŚA 111
गन्ता चेद्गच्छ तूर्णन्ते कर्ण यान्ति पुरा रवाः। आर्त्तबन्धुमुखोद्गीर्णाः प्रयाणप्रतिबन्धिनः ॥१४४।।
मानमें वावेवाकन गुरुकु मबुर। खे वक्ष माऊव अुन अुवारा नर सकष।
साचिव्याक्षेप एवैष यदत्र प्रतिषिध्यते। प्रियप्रयाणं साचिव्यं कुर्वत्येकान्तरक्तया।।१४५।।
मपुर. र९रवे सबर माठया5।
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112 KĀVYĀDARŚA [II. 147
मोत कर प्रेनके नाबार 1120r
गच्छेति वक्तुमिच्छामि मत्प्रियं त्वत्प्रियैषिणी। निर्गच्छति मुखाद्वाणी मा गा इति करोमि किम् ॥१४६॥
यत्नाक्षेपस्स यत्नस्य कृतस्यानिष्टवस्तुनि। विपरीतफलोत्पत्तेरानर्थक्योपदर्शनात् ॥१४७।।
3त2 3 से छे बिना रामेद कक्षा।
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II. 150 ] KĀVYĀDARSA 113
क्षणदर्शनविघ्नाय पक्ष्मस्पन्दाय कुप्यतः। प्रेम्ण: प्रयाणन्त्वं ब्रूहि मया तस्येष्टमिष्यते ॥१४८।
श ठेना हुघरे मोनार छोर कारे।
अयं परवशाक्षेपो यत्प्रेमपरतन्त्र [20b]या। तया निषिध्यते यात्रेत्यस्यार्थस्योपसूचनात् ॥१४६।।
र के म99555 2ना 2 रे 11208
सहिष्ये विरहं नाथ देह्यदृश्याञ्जनं मम। यद्क्तनेत्राङन्दर्प: प्रहन्तुं मां न पश्यति ॥१५०॥ 15
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114 KĀVYĀDARŚA [ II. 152
मा5'मोका मोना रझेश शरमानाके।
दुष्करं जीवनोपायमुपन्यस्योपरुध्यते। पत्युः प्रस्थानमित्याहुरुपायाक्षेपमीदृशं ।१५१।।
प्रवृत्तव प्रयामीति वाणी वल्लभ ते मुखात। अयतापि त्वयेदानीम् मन्दप्रेम्णा ममास्ति किम् ॥१५२॥
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lI. 154 ] KĀVYĀDARSA 115
रोषाक्षेपोयमुद्रिक्त स्ने ह ा निर्यन्त्र णात्मया । संर्धया प्रियारब्धं प्रयाणं यन्निवार्यते ॥१५३॥
कवाऊ5 त्िवन बहर मे जो।
नाघ्ातं न कृतं कर्णे स्त्रीभिर्मधुनि नापितं। त्वद्दिषां दीर्घिकास्वेव विशीर्णश्जीर्णमुत्पलं ।।१५४।।
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116 KĀVYĀDARŚA [ II. 157
असावनुक्रोशाक्षेपः सानुक्रोशमिवोत्पले। व्यावर्त्त्य कर्म तद्योग्यं शोच्यावस्थोपदर्शनात्।१५५॥।
अर्थो न संभृत: कश्चिन्न वि[2la]द्या काचिदर्जिता। न तपः संचितं किचिदूतश्च सकलं वयः ॥१५६॥
रवे आचार के नारा का गुरा।
असावनुशयाक्षेपो यस्मादनुशयोत्तरं। अर्थार्ज्जुनादेर्व्यावृत्तिर्दशितेह गतायुषा ।१५७।।
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II. 159 ] KĀVYĀDARŚA 117
र अक्षनाका नोनानाके। अतुद क मार्कमेर एव सेर क।
किमय शरदंभोद: किं वा हंसकदम्बकम्। रुतन्नूपुरसंवादि श्रूयते तन्न तोयदः ॥१५८।।
जाह व 552 के माह क्षम है।
इत्ययं संशयाक्षेपः संशयो यन्निवत्यते। धर्मेण हंससुलभेनास्पृष्टघनजातिना ॥१५६।।
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118 KĀVYĀDARSA [II.161 म. बेना में कैना बेना डोर का। े बे कैन ोना यरे। e
अमृतात्मनि पद्मानां द्वेष्टरि स्न्निग्धतारके। मुखेन्दौ तव सत्यस्मिन्नपरेण किमिन्दुना ॥१ ६०॥
नन नव ग्रेता डेबेन 511250
इति मुख्येन्टुराक्षिप्ो गुणान्गौणेन्दुर्वात्तनः । तत्समान्दर्शयित्वेति श्विष्टाक्षेपस्तथाविधः ॥१६१॥
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- 164 ] KĀVYĀDARŚA. 119
चित्रमाक्रान्तविश्वोपि विक्रमस्ते न तृप्यति। कदा वा दृश्यते तृप्तिरुदीर्णस्य हविर्भु[21b]ज:॥१६२।।
केमयरना के वन बेना अतर 11253
अयमर्थान्तराक्षेपः प्रक्रान्तोयं निवर्त्यते। विस्मयोऽर्थान्तरस्येह दर्शनात्तत्सधर्मणः ।१६३।।
3९वे दव माबक अोमायरि 11, 352
न स्तूयसे नरेन्द्र त्वं ददासीति कदाचन। स्वमेव मत्वा गृह्न्ति यतस्त्वद्धनमर्थिनः ॥१६४॥
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120 KĀVYĀDARSA [ II.166
मेवनय बेना कनाजार दे।
इत्येवमादिराक्षेपो हेत्वाक्षेप इति स्मृतः । अनयैव दिशान्येपि विकल्पाः शक्यमूहितुं ॥१६५॥
ठेक्षय अश्षिनान उोमानावे।
श्ेयः सोर्थान्तरन्यासो वस्तु प्रस्तुत्य किश्चन। तत्साधनसमर्थस्य न्यासो योन्यस्य वस्तुनः । १६६॥।
625
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II. 168 ] KĀVYĀDARŚA 121
ररेष मे माववरना सोर करे।
दवसवन ौर सेकषर511255
विश्वव्यापी विशेषस्थः श्रेषाविद्धो विरोधवान्। अयुक्तकारी युक्तात्मा युक्तायुक्तो विपर्ययः ॥१६७॥
मेरिकष के र5 रक कारे बरना।
इत्येवमादयो भेदाः प्रयोगेष्वस्य लक्षिताः । उदाहरणमालैषां रूपव्यत्तये निदश्यंते ॥१६८॥
3े इमाका र5 वबेन मरानकारेयेर।
16
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122 KĀVYĀDARSA [ II. 171
भगवन्तौ जगन्नेत्रे सूर्यचन्द्रमसावपि। पश्य गच्छत ए[22a]वास्तं नियतिः केन लङ्डयते ॥१६६।।
रोमारा वव अमन इनरा गें होना।
पयोमुच: परीतापं हरन्त्येते शरीरिणां। नन्वात्मलाभो महतां परदुःखोपशान्तये।।१७०।।
माबव में झासासतत बे कपुरे 1 200
उत्पादयति लोकस्य प्रीतिं मलयमारुतः। तनु दाक्षिण्यसम्पन्नः स्व्वस्य भवति प्रियः ॥१७१॥
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II. 173 ] KĀVYĀDARŚA 123
नंनजा जोुमोरा वे।
जगदाह्लादयत्येष मलिनोपि निशाकरः। अनुगृह्णाति हि परान् सदोषोपि द्विजेश्वरः ॥१७२।
मकेमे ररर सें बे झक चाह।
मधुपानकलात्कण्ठान्निर्गतोप्यलिनां ध्वनिः। कटुर्भवति कर्णस्य कामिनां पापमीदूशम् ।१७३।।
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124 KĀVYĀDARSA [ 11. 175
3द झव इकारा मे होना 35 3511202
अयं मम दहत्यङ्गमम्भोजदलसंस्तरः। हुताशनप्रतिनिधिर्दाहात्मा ननु युज्यते॥१७४॥
बरना मी सुक्षा उके मा5ु5 बर छेर।
क्षिणोतु कामं शीतांशुः किं वसन्तो दुनोति मां। मलिनाचरितं कर्म सुरभेर्नन्वसाम्प्रतम् ॥१७५।।
555
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II. 178 ] KĀVYĀDARSA 125
कु[22b]मुदान्यपि दाहाय किमङ्ग कमलाकरः। न हीन्दुगृह्येषूग्रेषु सूयंगृह्यो मृदुर्भवेत् ॥१७६।।
शब्दोपात्ते प्रतीते वा साहश्ये वस्तुनोद्वयोः। तत्र यद्भेदकथनं व्यतिरेक: स कथ्यते ।७9॥
मरहनायरम हेवारया जोरा। एहेशये माकेशकें ठाकुपर शुरुष।
रवे बनासउव बेक्ष सह्ेद 11 200
धैर्यमाहात्म्यलावण्यप्रमुखैस्त्वमुदन्वतः। गुणैस्तुल्योसि भेदस्तु वपुषैवेद्टशेन ते ॥।१७८।।
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126 KĀVYĀDARŚA [ II. 180
तर बुमर्के मामुरत शररु। डन तना रद5 कर ग्रेशष क्षे 11202
इत्येकव्यतिरेकोयं धर्मेणैकत्र वर्तिना। प्रतीतिविषयप्राप्तर्भेदस्योभयवर्त्तिनः ॥।१७६।।
माठेना अा मवनपरे केरा गेकष के।
3१े माठेना मो होमारा उन 11202
अभिन्नवेलौ गम्भीरावम्बुराशिर्भवानपि। असावञ्जनसङ्काशस्त्वन्तु चामीकरच्कविः ॥१८०॥।
अाकनारा अत्र नेरुR शहे।
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II. 182 ] KĀVĀDARŚA 127
िन वे पाशोर मों आरना उन के 11240
उभयव्यतिरकोयमुभयोर्भेदकौ गुणौ। कार्ष्ण्यं पिशंगता चोभौ यत्पृथग्दर्शिताविह ।१८१।।
सर बेदन'वे बरक प्श्न।
त्वं समुद्रश्च दुर्वारौ महासत्त्वसतेजसौ। इयता युवयोर्भेद: स ज[23a]लात्मा पटुर्भवान् ।१८२।।
दवे कुबरना मिर आामक को 11223
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128 KĀVYĀDARŚA [ II,185
स एष श्लेषरूपत्वात् सश्लेष इति गृह्यतां। साक्षेपश्च सहेतुश्र दर्श्यते तद्पि द्य ॥१८३।।
रहे केबूरकरे हुब बनोर।
स्थितिमानपि धीरोपि रत्नानामाकरोपि सन्। तव कक्षां न यात्येव मलिनो मकरालयः ॥१८४।।
इनअवय कुझनावना। हिर पो रनुर3गुर क जोक 11220
वहन्नपि महीं कृत्सां सशेलद्वीपसागराम्। भर्तृभावाद्ुजंगानां शेषस्त्वत्तो निकृष्यते ।।१८५॥
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II. 187] KĀVYĀDARSA 129
इश्री कुनकर मठक नजो।
शब्दोपादानसादृश्यो व्यतिरेकोयमीदशः । प्रतीयमानसादृश्योप्यस्ति सोनुविधीयते ॥१८६॥
त्वन्मुखङ्कमलं चेति द्वयोरप्यनयोर्भिदा। कमलं जलसंरोहि त्वन्मुखं त्वदुपाश्रयं ।।१८७।।
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130 KĀVYĀDARŚA [II.189
अभ्रविलासम स्पृष्टमदरागम् मृगेक्षणं। इदन्तु नयनद्वंद्वं तव तद्गणभूषितम् ॥१८८।
इेननाका कोमान झेन केना रर।
हिर को रोना के नाकेश न रहे।
पूर्व्वस्मिन्भेदमात्रोक्तिर स्मिन्नाधि क्ा दर्श [ 23b]नं। साद्ृश्यव्यतिरेकश्च पुनरन्यः प्रद्श्यते ॥१८६॥
टूमर एेवठमा बेना वश्ुक।
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l1. 192 ] KĀVYĀDARŚA 131
त्वन्मुखम्पुएडरीकश्च फुल्ले सुरभिगन्धिनी। भ्रमद्गमरमम्भोजं लोलदृष्टि मुखन्तु ते ॥१६०.।
िर मे नादद अ कोना रतराजो 11200
चन्द्रोयमम्बरोत्तंसो हंसोयन्तोयभूषणं। नभो नक्षत्रमालीदमिदमुत्कुमुदम्पयः॥१६१॥
प्रतीयमानशकयादिसाम्ययोवियदम्भसोः। कृतः प्रतीतशुद्धयोश्च भेदोस्मिंश्चन्द्रहंसयोः ॥१६२॥
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132 KĀVYĀDARŚA [ II. 194
पूर्वत्र शब्दवत्साम्यमुभयत्रापि भेदकम्। भृङ्गनेत्रादि तुल्यन्तत्साद्वशव्यतिरेकता ॥१६३।।
अरतालोकसंहार्यमवार्यं सूर्यरश्मिभिः। दृष्टिरोधकरं यूनां यौवनप्रभवन्तमः ॥१६४॥
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II. 196 ] KĀVYĀDARSA 133
अर कें अक्ष चुर व कुरयी। कु.र कप्ररो र 3र 11200
सजातिव्यतिरेकोयन्तमोजातेरिदन्तमः । दृष्टिरोधितया तुल्यं भिन्नमन्यैरदर्शयत् ।१६५।।
प्रसिद्धहेतुव्यावृत्त्या यत्किश्चित्कारणान्त[24a]रं। यत्र स्वाभाविकत्वं वा विभाव्यं सा विभावना ॥१६६।।
मर रवे झेदर उन 11205
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134 KĀVYĀDARŚA [ II. 199
अपीतक्षीवकादम्बमसंमृष्टामलाम्बरं।
अप्रसादितसूक्ष्माम्बु जगदासीन्मनोहरम् ।१६७।।
अनञ्जितासिता दृष्टिर्भ्रूरनावर्जिता नता। अरज्ञितारुणश्चायमधरस्तव सुन्दरि ॥१६८।।
अ ना सबा हार दगर अ कोया।
यद्पीतादिजन्यं स्यात् क्षीवत्वाद्यन्यहेतुकं। अहेतुकश्च तस्येह विवक्षेत्यविरुद्धता ॥१६६।।
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II. 201 ] KĀVYĀDARŚA 135
मुरश केन क्षेनाका कंमावन ठन।
अ 3र वे आस न रोर 11200
वक्तू निसर्गसुरभि वपुरव्याजसुन्दरं। अकारणरिपुश्रन्द्रो निर्निमित्तसुहृत्स्मरः॥२००॥
र5 मबव केरा के 1स डे बेना।
निसर्गादिपदरत्र हेतुः साक्षान्निवत्तितः। उक्तश्च सुरभित्वादिफलं तत्सा विभावना ॥२०१।।
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136 KĀVYĀDARSA [ 11.203
2 शेर रठ 11207
वस्तु किश्चिदभिप्रेत्य तत्तल्यस्यान्यवस्तुनः। उक्तिसंक्षिप्तरूपत्वात् सा समासोक्तिरिष्यते ॥२०२॥
[24b]पिबन्मधु यथाकामं भ्रमर: फुल्लपङ्डजे। अप्यसन्नद्धसौरभ्यं पश्य चुम्बति कुङ्खलं ॥२०३॥
इबेन कुरााना जोन पार।
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II. 206 ] KĀVYĀDARSA 137
इति प्रौढाङगनाबद्धरतिलोलस्य रागिणः । कस्याश्चिदिह बालायामिच्छा वृत्तिविभाव्यते ॥२०४॥
चुमे आनर बेना सान कार।
विशेष्यमात्रभिन्नापि तुल्याकारविशेषणा। अस्त्यसावपराप्यस्ति भिन्नाभिन्नविशेषणा ॥२०५॥
5545-255955 8े91
रूढमूल: फलभरैः पुष्णन्ननिशमर्थिनः । सान्द्रच्छायो महावृक्ष: सायमासादितो मया ॥२०६॥ 18
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138 KĀVYĀDARŚA [ HI. 208
5755 35552 15- पेर 9े1
3ेवे इदना नोका पाठरता देरा11205
अनल्पविटपाभोग: फलपुष्पसमृद्धिमान्। सच्छायः स्थैर्यवान्दवादेष लब्धो मया द्रुमः ॥२०७॥
जन मारि छ्िन के को हुर ब।
उभयत्र पुमान्कश्चिद्वक्षत्वेनोपवर्णितः। सर्वे साधारणा धर्मा: पूर्व्वत्रान्यत्र तु दयं ।।२.८।
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II.210 ] KĀVYĀDARŚA 139
निवृत्तव्यालसंसर्गो निसर्गमधुराशयः । अयमम्भोनिधि: कष्टङ्कालेन परिशोष्यते ॥२०६॥
गेम कु जे मदेर रे के।
इत्यपूर्व्वसमासोक्ति:[25a] पूर्व्वधमंनिवर्त्तनात्। समुद्रे तत्समानस्य पुंसो व्यावृत्तिसूचने ॥२१०॥
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140 KĀVYĀDARŚA [11. 213
विवक्षा या विशेषस्य लोकसीमातिवत्तिनी। असावतिशयोक्तिः स्यादलंकारोत्तमा यथा ॥२११॥
रहम देव माठगका आाक्षा सन शुरू क।
मल्लिकामालभारिण्यः सर्व्वाङ्गीनार्द्रचन्दनाः। क्षोमवत्यो न लक्ष्यन्ते ज्योत्स्नायामभिसारिकाः ॥२१२।।
बहोा जो सेर कैवारा उन। बुरा खुकामन वरि उंकन वावेर।
चन्द्रातपस्य बाहुल्यमुक्तमुत्कर्षवत्तथा। संशयातिशयादीनां व्यक्त्य किश्चिन्निदर्श्यते ॥२१३॥
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II. 215 ] KĀVYĀDARŚA 141
वे कैन सूयकुर 2 रोनारा गुर।
स्तनयोर्जघनस्यापि मध्ये मर्ध्य प्रिये तव। अस्ति नास्तीति संदेहो न मेद्यापि निवर्त्तते ॥२१४॥
सार द5 कोन केका बरता नी के। वे कैन एत-मसाकशुर 1122
निर्णेतुं मध्यमस्तीति शक्यन्तव नितम्बिनि। अन्यथानुपपत्त्यैव पयोधरभरस्थितेः ॥२१५॥
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142 KĀVYĀDARSA [ll. 217
अहो विशालम्भूपालभुवनत्रितयोदर। माति मातुमशक्योपि यशोराशिर्यदत्र ते ॥२१६।।
सिदन रसा जोना सेवड़ फाइर 11225
अलंकारान्तराणा[25b]मप्याहुरेकं परायणं। वागीशमहितामुक्तिमिमामतिशयाह्वयाम् ॥२१७। इसा मो. रबर दोका मकर गुरु। सुनपर बेरा का रहुदन रे।
माहेना हु रसमाऊेव केद5 रहद।1 220
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II. 220 ] KĀVYĀDARŚA 143
अन्य्थव स्थिता वृत्तिश्चेतनस्येतरस्य वा। अन्यथोत्प्रेक्ष्यते यत्र तामुत्प्रेक्षां विडुयेथा ॥२१८॥ रोठाका इव इसा नाका उेना खेका गेर। बूका ना नाबनक माकर राव हुआ।
मध्यन्दिनार्कसन्तप्तः सरसीं गाहते गजः। मन्ये मार्तएडगृह्याणि पद्मान्युद्धर्तुमुत्सुक: ।२१६।।
ताहक रना वे नार्केर रहुषा य।
स्नातुं पातुं विसान्यतुं करिणो जलगाहनम्। तद्वरनिष्क्रयायेति कविनोत्प्ेक्ष्य वर्ण्यंते॥२२०।
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144 KĀVYĀDARŚA [II. 222
BN'55 55555 558° 571 वर र अन अव कुर रहनाका। रेवे वव अव इव छेर बेरा।
कर्णस्य भूषणमिदं मदायतिनिरोधिनः । इति कर्णोत्पलं प्रायस्तव दृष्ट्या विलङ्ड्यते ॥२२१॥.
िर मों कोना मोका नजो।
अपा ङ्गभागपातिन्या दवष्टेरंशुभिरुत्पलं। स्पृश्यते वा नचैवन्तु कविनोत्प्रेक्ष्य कथ्यते ॥।२२२।।
होमाहुर कर वे शुरु ष।
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II. 224 ] KĀVYĀDARSA 145
लिम्पतीव तमोङ्गानि वर्षतीवांजनं नभः । इतीदमपि भूयिष्ठमुत्प्रेक्षालक्षणान्वितं ।।२२३।।
अन'या बर न 3541य नबेव।
बक्षरे पर हे इत हेता यो।
केषांचिदुपमाभ्रान्ति [26a]रिवश्रुत्येह जन्यते। नोपमानं तिडन्तेनेत्यतिक्रम्याप्तभाषितं ॥।२२४।।
दे जो मबर जोक रसो का जोक।
बक्षम जोन केरा माहारत रुर करा।
19
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146 KĀVYĀDARSA [ Il. 227
उपमानोपमेयत्वं तुल्यधर्मव्यपेक्षया। लिम्पतेस्तमसश्चासौ धर्मः को नु समीक्ष्यते ॥२२५॥
यदि लेपनमेवेष्टं लिम्पतिर्नाम कोपरः। स एव धर्मो धर्मी चेत्यनुन्मत्तो न भाषते ॥२२६॥।
बेक्षय अशुत उकर कां जोन 11335
कर्त्ता यद्युपमानं स्यान्न्यग्भूतोसौ क्रियापदे। स्वक्रियासाधनव्यत्रे नालमन्यद्वयपेक्षितुं ।।२२७।
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I1. 229 ] KĀVYĀDARŚA 147
म9व मे हुरर मेदतुर ई॥ 22
यो लिम्पत्यमुना तुल्यं तम इत्यपि शंसतः। अङ्गानीति न सम्बद्धं सोपि मृग्यः समो गुणः ॥२२८।।
नकना काकुरत बेरा मों क काए। अुक्षत बेक्षन नारबेत हे।
iC
यथेन्द्रुरिव ते वक्तमिति कान्तिः प्रतीयते। न तथा लिम्पतौ लेपादन्यदत्र प्रतीयते ॥२२६॥
रNयN महNय हैयानाउतुर हे।
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1.48 KĀVYĀDARSA [II. 231
र5याय अका माबव हेशारा का जोक 11 232
तदुपश्लेषणार्थोयं लिम्पतिर्धानन्तिकर्तृकः। अङ्गकर्मा च पुंसैवमुत्प्रेक्षित इतीष्यते ॥२३०॥
कपपुर द बेकतु जोक्षा|
मन्ये श[26b]ङ्क ध्रुवं प्रायो नूनमित्येवमादिभिः। उत्प्रेक्षा व्यज्यते शब्दरिवशब्दोपि ताहशः ॥२३१॥
मैं जोक्ष रनबदमार मारान मर डोर।
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11.234 ] KĀVYĀDARSA 149
हेतुश्च सूक्ष्मलेशौ च वाचामुत्तमभूषणं। कारकज्ञापकौ हेतू तौ च नैकविधौ यथा॥२३२
केना इराका रसायों मँन मों ठठेया।
अयमान्दोलितप्रौढ़चन्दन दुमपल्लवः। उत्पादयति सर्वस्य प्रीति मलयमारुतः ॥२३३।।
अानजा जो कू मोका के।
गुन मो सबार बे बर क 11 222
प्रीत्युत्पादनयोगस्य रूपस्यात्रोपवृंहणं। अलंकारतयोद्दष्टं निवृत्तावपि तत्समं ॥२३४।।
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150 KĀVYĀDARŚA [II. 236
कु क- प्रेम्ष के रबबम्णहे। बमय रसा गर रेर६मकुरक 11220
चन्दनारण्यमाधूय स्पृष्ट्रा मलयनिज्मरान्। पथिकानामभावाय पवनोयमुपस्थितः ॥।२३५।।
अभावसाधनायालमेवम्भूतो हि मारुतः । विरहज्वरसंभूतमनोक्षारोचके जने ॥२३६॥
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II. 238 ] KĀVYĀDARŚA 151
निर्वत्ये च विकाय च हेतुत्वन्तदपेक्षया। प्राप्ये तु कर्मणि प्रायः क्रियापेक्षैव हेतुता ॥२३७॥
खन चर यक्ष या सत केर वे। 54 2 क4 झ32* 11 220
हेतुनिवर्त्तनीयस्य दर्शितः शेषयोर्यो:। दत्त्वो[27a]दाहरणद्वन्द्व ज्ञापको वर्णयिष्यते।।२३८।।
सरुवे ुमाना मकेश से जो। रसक. यह्ूद माकेश के अमोनहुर करा।
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152 KĀVYĀDARSA [ II. 241
उत्प्रबालान्यरण्यानि वाप्यः संफुल्लपङ्गजाः। चन्द्रः पूर्णश्च कामेन पान्थदवृष्टिविषङ्कतं ।२३६।।
मानयोग्यां करोमीति प्रियस्थाने कृतां सखीम्। बाला भ्रूभङ्गजिहमाक्षी पश्यति स्फुरिताधरं ॥२४०।
मु के को राहसा कोमाजोव मोरषा।
गतोस्तमर्को भातीन्दुर्यान्ति वासाय पक्षिणः । इतीदमपि साध्वेव कालावस्थानिवेदने ॥।२४१।।
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II. 243 ] KĀVYĀDARŚA 153
मौ सर छेदय सोवाकाय ऊर 11207
देहोष्मभिः सुबोधं ते सखि कामातुरं मनः ॥२४२॥
लयरे ब्रे गोक मो बेना रो। डब- कु जोडा को रत रा।
इति लक्ष्या: प्रयोगेषु रम्या ज्ञापकहेतवः । अभावहेतवः केचिद्वयाक्रियन्ते मनोहराः।।२४३।।
जोनरर चेकाछन का रसा मार्केक। 20
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154 KĀVYĀDARŚA [ Il. 245
अनभ्यासेन विद्यानामसंसर्गेण धीमतां। अनिग्रहेण चाक्षाणां जाय[27b]ते व्यसनं नृणां ।।२४४।।
ऐमाना दुमाक केंामोकाक र5।
गतः कामकथोन्मादो गलितो यौवनज्वरः। क्षतो मोहश्च्युता तृष्णा कृतं पुण्याश्रये मनः ॥२४५॥
अह' कें जो के इमान रना उठाक।
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II. 248 ] KĀVYĀDARSA 155
वनान्यमूनि न गृहाण्येता नद्यो न योषितः । मृगा इमे न दायादास्तन्मे नन्दति मानसं ॥२४६॥
दमान कंल रररना ऐोन काजोक।
अत्यन्तमसदार्याणामनालोचितचेष्टितं। अतस्तेषां विवर्धन्ते सततं सर्वसंपदः ॥२४७।।
रसमाकाय इूनारा अा जर का फोक।
उद्यानसहकाराणामनुद्धिन्ना न मज्जरी। देयः पथिकनारीणां सतिलः सलिलाञ्जलि: ॥२४८॥
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156 KĀVYĀDARSA [Il. 250
3रन से दूराका मे बुर ठोर के।
प्रागभावादिरूपस्य हेतुत्वमिह वस्तुनः । भावामावस्वरूपस्य कार्यस्योत्पादनम्प्रति ॥२४६।।
जोर रू कोरहरे रहमाबेव थो।
रदेतय जो वे माँ रेद रे। 200
दूरकार्यस्तत्सहज: कार्यानन्तरजस्तथा। अयुक्तयुक्तकारी चेत्यसंख्याश्चित्रहेतवः ॥२५०।।
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II. 252 ] KĀVYĀDARŚA 157
तेमी प्रयोगमार्गेषु गौण[28a]वृत्तिव्यपाश्रयाः। अत्यन्तसुन्दरा दृष्टास्तदुदाहृतयो यथा।२५१।।
त्वद्पाङ्गाह्वयं जैत्रमङ्गजास्त्रं यदंगने। मुक्तन्तद्न्यतस्तेन सोप्यहं मनसि क्षतः ॥२५२॥
सुरुठ छिन कोनापुरु ठेत क।
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158 KĀVYĀDARŚA [II. 255
आविर्भवति नारीणां वयः पर्यस्तशैशवं। सहैव विविधैः पुंसामङ्गजोन्मादविभ्रमैः ॥२५३॥
पश्चात्पर्यस्य किरणानुदीर्णश्चन्द्रमण्डलं। प्रागेव हरिणाक्षीणामुदीर्णो रागसागरः ॥२५४।।
ून जे वे रणेनदबर र 112ve
राजां हस्तारविन्दानि कुझलीकुरुते कुतः। देव त्वच्चरणद्वन्द्वरागबालातपः स्पृशन् ।२५५।।
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I1. 257 ] KĀVYĀDARŚA 159
कुलये इूमारा में अनान जो।
पाणिपद्मानि भूपानां संकोचयितुमीशते। त्वत्पादनखचन्द्राणामच्चिषः कुन्दनिर्मलाः॥२५६।।
रुे- मुव'क ड्ेकोन इकारा।
इति हेतुविकल्पस्य दर्शिता गतिरीदृशी। इद्गिताकारलक्ष्योर्थः सौक्ष्म्यात्सूक्ष्म इति स्मृतः ।।२५७।।
सुनारा के अ535 म45 वक्ुक।
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160 KĀVYĀDARSA [ II. 259
कदा नौ[28b]सङ्गमो भावीत्याकीर्णे वक्तुमक्षमः । अवेत्य कान्तमबला लीलापझमं न्यमीलयत् ।२५८॥
कमा बेना उउना अमक'रतुर बेक्ष।
मे हुनबारु कुरु 11 2VK
पद्मसंमीलनादत्र सूचितो निशि सङ्गमः । आश्वासयितुमिच्छन्त्या प्रियमंगजपीडितम्॥२५६॥।
सुरा मेर कसा मोक मत्ेरन थो।
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II.262 ] KĀVYĀDARSA 161
त्वदर्पितद्वशस्तस्या गीतगोष्ट्यामवर्धत। उद्दामरागतरला च्छाया कापि मुखाम्बुजे ॥२६०॥
म5र'प2 मरहयोकुकेा ररु। कमाकषय उतर बेद मुका हा जो। अईक'न हेंजर 5ुमरगुर 1 250
इत्यनुद्भिन्नरूपत्वाद्रत्युत्सवमनोरथः । अनुलङ्गयैव सूक्ष्मत्वमभूदत्राप्यवस्थितः ॥२६१।।
सूनो केर अक अांश काजोक 11257
लेशो लेशेन निर्भिन्नवस्तुरूपनिगूहनं। उदाहरण एवास्य रूपमाविर्भविष्यति ॥२६२।। 21
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162 KĀVYĀDARSA [Il. 264
राजकन्यानुरक्तं मां रोमोद्वेदेन रक्षकाः । अवगच्छेयुरा ज्ञातमहो शीतानिलं वनम् ॥२६३।
मुलमोर मुमे ब कनाक' ररया।
रक्षेतपारइव जोन र खेकष ।353
आनन्दाश्रु प्रवृत्तं मे कथं द्वृष्टू व कन्यकाम्। अक्षि [29a] मे पुष्परजसा वातोद्धूतेन दूषितं ॥/२६४।।
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II. 266 ] KĀVYĀDARŚA 163
हूa मेरा मरता कोया हु सुरूदै। 250 6 길 6 백
इत्येवमादौ स्थानेऽयमलंकारोतिशोभते। लेश*मेकेचिदुन्निन्दां स्तुति वा लेशतः कृतां ॥२६५॥
बक्षT अक्षनाक शयकाकुा के।
युवव गुणवान् राजा योग्यस्ते पतिरूर्जितः। रणोत्सवे मनः सक्त यस्य कामोत्सवादपि॥ २६६ ॥
रदहघरे चार ऐव शार गुर कनाका। मत्रेवूव बाह कें पन 59छ1
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164 KĀVYĀDARSA [ 1l. 269
वीर्योत्कर्षस्तुतिर्निन्दैवास्मिन् भावनिवृत्तये। कन्थायाः कल्पते भोगान्निर्विविक्षोर्निरन्नरान्।
चपलो निर्दयश्चासौ जनः किन्तेन मे सखि। आगःप्रमार्जनायैव चाटवो येन शिक्षिताः ॥ २६८
स्ोमारा मो र जोना स5माना के ।1 25K
दोषाभासो गुणः कोपि दर्शितश्चादुकारिता। मानं सखीजनोद्िष्ट कर्तु रागादशक्तया ॥ २६६॥।
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II. 271 ] KĀVYĀDARŚA 165
श्र मे ब्रोनारा अश रतवश्ुव सिोहका। कमार योर डोरन कावर करा।
उद्दिष्टानां पदार्थानामनुदेशो यथाक्रमं। यथासंख्यमिति प्रोक्तं संख्यानङ्गम इत्यपि॥ २७०
[29b] भूवन्ते चोरिता तन्वि स्मितेक्षणमुखद्यु तिः। स्नातुमम्भ:प्रविष्टायाः कुमुदोत्पलपङ्डजैः ॥ २७१॥
ENअ रुन वें र बुनारान।
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166 KĀVYĀDARSA [ Il. 273
प्रेयः प्रियतराख्यानं रसवत् रसपेशलं। ऊर्ज्जस्वि रूढाहंकारं युक्तोत्कर्ष च तत्रयं ॥। २७२।।
अद्य या मम गोविन्द जाता त्वयि गृहागते। कालेनैषा भवेत्प्रीतिस्तवैागमनात्पुनः ॥ २७३॥
592722945 1851
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II. 276 ] KĀVYĀDARŚA 167
इत्याह युक्त विदुरो नान्यतस्तादशी धृतिः । भक्तिमात्रसमाराध्यः सुप्रीतश्च ततो हरिः ॥२७४ ॥
सोम: सूर्यो मरुद्भमिर्व्योम होतानलो जलं। इति रुपाण्यतिक्रम्य त्वां द्रष्टु देव के वयम् ॥ २७५॥
मेव मोना के क5 मे का कु।
इति साक्षात्कृते देवे राजो यद्राजवर्मणः । प्रीतिप्रकाशनं तञ्च प्रेय इत्यनुगम्यतां ॥ २७६
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168 KĀVYĀDARA [ll.278
मृतेति प्रेत्य संगंतु यया मे मरणम्मतम्। सैवावन्ती मया[30a]लब्धा कथमत्रव जन्मनि ॥१७७।।
प्राक्प्रोतिदर्शिता सेयं रतिः श्रंगारतां गता। रूपबाहुल्ययोगेन तदिदं रसवद्चः ॥२७८।।
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11.280 ] KĀVYĀDARSA 169
निगृह्य केशेष्वाकृष्टा कृष्णा येनाग्रतो मम। सोयं दुःशासनः पापो लब्धः किं जीवति क्षणं ॥२७६।।
मा5" मोरा कना कों एरना कानुककरा।
श ठेना बकैयर गुरु रम है। 300
इत्यारुह्य परां कोटीं क्रोधो रौद्रात्मतां गतः भीमस्य पश्यतः शत्रुमित्येतद् रसवद्दचः ॥२८०।।
हेक्षय उचमाका को रत दबा न। हुपरे बिन महना मो सबर।
22
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170 KĀVYĀDARSA [II.283
अजित्वा सार्णवामुर्व्वीमनिष्ट्रा विविधैर्मखैः। अदत्वा चार्थमर्थिभ्यो भवेयं पार्थिवः कथम् ॥२८१॥
मार्केर वठस कत्र नकृुन बेर।
इत्युत्साह: प्रकृष्टात्मा तिष्ठन्वीररसात्मना।
रसत्त्ववङ्गिरामासां समर्थयितुमीश्वरः ॥२८२।।
कैंना ररता के रब5म जोक 11 2 1
यस्याः कुसुमशय्यापि कोमलाङगया रुजाकरी। साधिशेते कथं देवी हुताशनवतीं चिताम्॥ २८३॥
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II. 285 ] KĀVYĀDARŚA 171
इति कारुण्यमुद्रिक्तमलं[30b]कारतया स्मृतम्। तथा परेपि बीभत्सहास्याद्ुतभयानकाः ॥२८४॥
केक्षय हहे कुतराजा। 583ु9 525 5.951
पायं पायं तवारीणां शोणितं करसंपुटै: । कौणपाः सह नृत्यन्ति कबन्धैरन्त्रभूषणाः ॥ १८५।
कुबर रमुनदारे सेन से इकारा।
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172 KĀVYĀDARŚA [II.287
इदमल्लानमालाया लग्न' स्तनतटे तव। छाद्यलासुत्तीयेय नवन्नखपदं सखि ॥ २८६ ॥
मोमारा को कोदेना काकदराना।
अंशुकानि प्रबालानि पुष्पं हारादिभूषणं। शाखाश्च मन्दिराण्येषां चित्र पबदूनशाखनं।।२८७।
Wयरूत 8537 गुरूु मा मंकर 11242
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Il. 290 ] KĀVYĀDARSA 173
इदं मघोन: कुलिशं धारासंनिहितानलं। स्मरणं यस्य दैत्यस्त्रीगर्भपाताय कल्पते॥ २८८॥
डेम दसा'या को मवका ह।
वाच्यस्याग्राम्यता योनिर्माधुर्ये दशितो रसः। इह त्वष्रसायत्ता रसवत्ता स्मृता गिरां ॥२८६॥
अपकर्त्ताहमस्मीति हृदि ते मा स्म भूद्भयम्। विमुखेषु न मे खङ्ग: प्रहर्तु जातु वाञ्छति ॥ २६० ॥
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174 KĀVYĀDARSA [Il. 292
०रूना'वे अवत तकोते बेना।
रन चाह उहकारायर रहह का जोक 11300
[3la ] इति मुक्तः परो युद्ध निरुद्धो दर्पशालिना। पुंसा केनापि तजज्ञयमूर्जस्वीत्येवमादिकं॥ २६१॥
बक्षम बुरात इबाराइन खगर।
मत्रे रहे अवयर खेक्ष बर 31 20
अर्थमिष्टमनाख्याय साक्षात्तस्यैव सिद्धये। यत्प्रकारान्तराख्यानं पर्यायोक्तन्तदिष्यते ॥ २६२॥
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I1. 294 ] KĀVYĀDARSA 175
दशत्यसौ परभृतः सहकारस्य मञ्जरोम्। तमहं वारयिष्यामि युवाभ्यां स्वेरमास्यताम् ॥ २६३ ॥
र वे वम मोक्ष' प्रम्षिया बर कये।
संगमय्य सखीं यूना संकेते तद्रतोत्सवम्। निर्वत्तयितुमिच्छन्त्या कयाप्यपसृतं ततः ॥ २६४॥
ससाR एव बनक साबुना र् राहा। RमR बेन रेका रद न गुरु 11200
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176 KĀVYĀDARŚA [II. 297
किंचिदारभमाणस्य कार्य दैवबलात्पुनः। तत्साधनसमापत्तिर्या तदाहुः समाहितम्॥ २६५ ।।
5'4 372 बन दुनराय। श्रनजो के बुक बारा गुर। रजीबन क सव कैमाका मा।
मानन्तस्या निराकर्तुं पादयोमे नमस्यतः । उपकाराय दिष्ट्येदमुदीणं घनगजितं ॥ २६६॥
सिइन T नाबिनथेर रेजो के।
रतना मो मै रे मसार 4र गुरु 11305
आशयस्य विभूतेर्वा यन्महत्त्वमनुत्त [31b]2। उदात्तं नाम तम्प्राहुरलंकारं मनीषिणः ॥२६७।:
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II. 299 ] KĀVYĀDARŚA 177
वकका या रन कें अमर'न को!
5 वे मं के बेका ना जो।
गुरो: शासनमत्येतुं न शशाक स राघवः । यो राव शरच्छेदकार्यभारेप्यविक्कवः ॥ २६८।।
P
रत्तभिन्तिषु संक्रान्तैः प्रतिविम्बशतैर्वृतः। ज्ञातो लड्श्वरः कृच्छ्रादाब्जनेयेन तत्त्वतः ॥ २६६॥
म8ुवारायक्षत एकु फोर्ष वश्र गुरु ष। 23
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178 KĀVYĀDARSA [ Il. 301
सुव्यञ्जितमतिव्यक्तमुदात्तद्वयमप्यदः॥ ३००
55'5 मारायपर मार्केकय फोन 11200
अपह्ुतिरपह्ुत्य किश्चिदन्यार्थदर्शनं। न पञ्चेषुः स्मरस्तस्य सहस्र' पत्रिणामिति ॥३०१॥
कव रररसा के अहुव गुरा करा।
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II. 304 ] KĀVYĀDARŚA 179
चन्दनं चन्द्रिका मन्दो गन्धवाही च दक्षिणः। सेयमग्निमयी सृष्टिश्शीता किल परान्प्रति ॥३०२।
के मुनारा केजो सबेकन ररे। को को रEवबिव कषेत्र हे।
शैशियमभ्युपेत्यैवं परेष्वात्मनि कामिना। औष्णप्रदर्शनात्तस्य सैषा विषयनिह्न तिः॥३०३॥
अमृतस्यन्दि[32a]किरणश्चन्द्रमा नाम नो मतः। अन्य एवायमर्थात्मा विषनिष्यन्दिदीधितिः ॥३०४॥
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180 KĀVYĀDARSA [ ll. 306
इति चन्द्रत्वमेवेन्दोरनिवर्त्यार्थान्तरात्मना। उक्तं स्मरात्तनेत्येषा स्वरूपापह्न तिर्मता।३०५॥
उपमापह्न तिः पूर्वमुपमास्वेव दशिता। इत्यपह्नु तिभेदानां लक्ष्यो लक्ष्येषु विस्तरः ॥३०६॥
इसे जो अदररु हर करतु।
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II. 308 ] KĀVYĀDARSA 181
श्लिष्टमिष्टमनेकार्थमेक रूपान्वितं वचः। तद्भिन्नपदं भिन्नपद्प्रायमिति द्विधा।३०७॥
श रT मचुपार म ठेया अवकरे केना।
235 केना 35' इनाए माकेर 11200
असावुद्यमारूढ: कान्तिमान् रक्तमएडलः। राजा हरति लोकस्य हृदयं मृदुभिः करैः ॥३०८॥
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182 KĀVYĀDARŚA [II. 311
दोषाकरेण सम्बद्धनक्षत्रपथवत्तिना। राज्ञा प्रदोषो मामित्थमप्रियं किन्न बाधते ॥३०६॥
उपमारूपकाक्षे[32b]पव्यतिरेकादिगोचराः। प्रागेव दर्शिताः श्लेषा दश्यन्ते केचनापरे ॥३१०॥
रसे 55 महुनार उव रयानाया र5।
माबकत आसद बेना पहुन बर 5 11290
अस्त्यभिन्नक्रियः कश्चिदविरुद्धक्रियोपरः। विरुद्धकर्मा वास्त्यन्यः श्लेषो नियमजानपि॥३११॥
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I. 313 ] KĀVYĀDARSA 183
खT Eयठ W5 95 11227
नियमाक्षेपरूपोक्तिरविरोधी विरोध्यपि। तेषां निदर्शनेष्वेव रूपमाविर्भविष्यति ॥३१२।
वक्रस्वभावमधुराः शंसन्त्यो रागमुल्वणम्। दृशो दूत्यश्च कर्षन्ति कान्ताभि: प्रेषिताः प्रियान् ॥३१३॥
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184 KĀVYĀDARŚA [ II. 315
मधुरा रागवर्धित्यः कोमलाः कोकिलागिरः। आकण्यन्ते मदकलाः श्लिष्यन्ते चासितेक्षणाः ॥।३१४।।
हा कुना कें के बूका गुरु दे।
रागमादर्शयन्नेष वारुणोयोगवर्धितः। पराभवति घर्मा शुरङ्गजस्तु विजम्भते ॥३१५॥
कंपे ठन ररे बुकधुर के।
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II. 318 ] KĀVYĀDARSA 185
निस्त्रिंशत्वमसावेव धनुष्येवास्य वक्रता। शरेष्वेव नरेन्द्रस्य [33a] मार्गणत्वञ्च व्त्तते ॥३१६॥
पझ्मानामेव दण्डेषु कएटकस्त्वय रक्षति। अथवा दृश्यते रागिमिथुनालिंगनेष्वपि ॥३१७।।
करे जुन ऊदबरे।
महीभृद्गरिकटकस्तेजस्वो नियतोद्यः। दक्ष: प्रजापतिश्चासींत् स्वामी शक्तिधरश्च सः ॥३१८।। 24.
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186 KĀVYĀDARSA [ II. 320
रारहेंद नतमा माह बेर। मत्रेनक अवया हक शार रर।
अच्युतोप्यवृषोच्छेदी राजाप्यविदितक्षयः । देवोप्यविबुधो जज्ञे शंकरोप्यभुजंगवान् ॥३१६।।
गुणजातिक्रियादीनां यद्वकल्यदर्शनं। विशेषदर्शनायैव सा विशेषोक्तिरिष्यते॥३२०॥
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II. 322 ] KĀVYĀDARŚA 187
न कठोरं न चातीक्ष्णमायुधं पुष्पधन्वनः । तथापि जितमेवासीदमुना भुवनत्रयं ।३२१।।
न देवकन्यका नापि गन्धवकुलसंभवा। तथाप्येषा तपोभङ्ग विधातुं वेधसोप्यलं ।।३२२।।
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188 KĀVYĀDARSA [ Il. 325
न बद्धा भ्रुकु[33b]टिर्नापि स्फुरितो दशनच्दः। न च रक्ताभवद्ृष्टिर्धर्वस्तञ्च द्विषतां कुलं ।।३२३।।
न रथा न च मातंगा न हया न च पत्तय:। स्त्रीणामपाङ्गदृष्टयैव जीयते जगतां त्रयं ॥३२४।।
ुर अना ऊेर गेक्ष छुर को इनाकषा।
एकचक्रो रथो यन्ता विकलो विषमा हयाः। आक्रामत्येव तेजसवी तथाप्यर्को जगस्तरयं ॥३२५।।
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II. 327 ] KĀVYĀDARŚA .189
सकय अनर हको नउम। रेछव पार मात्रे छेठन।
सेषा हेतुविशेषोक्तिस्तेजस्वीतिविशेषणात्। अयमेव क्रमोन्येषां भेदानामपि कल्प्यते ॥३२६॥
मात्रे कव उव रनारा 155र4र।
इनाय उरे जोन नावव हो दे।
विवक्षितगुणोत्कृष्टैर्यत्समीकृत्य कस्यचत्। कीर्त्तनं स्तुतिनिन्दार्थ सा स्मृता तुल्ययोगिता ॥३२७।
महुरलयार मुर वकष आनार बेना के।
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190 KĀVYĀDARŚA [ II. 329
नक्षे खवक नारान मार।
यम: कुबेरो वरुणः सहस्राक्षों भवानपि। बिभ्रत्यनन्यविषयां लोकपाला इति श्रुतिम् ॥३२८॥
W2/799मेर बर: इना बर रहक -11 ३32
संगतानि मृगाक्षीणां तडिद्विलसितन्यपि। क्षणद्वयन्न तिष्ट [34a]ति घनरब्धान्यपि स्वयं ॥३२६।।
त्रना मो हेदाRरय 55 के।
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II. 332 ] KĀVYĀDARSA 191
विरुद्धानाम्पदार्थानां यत्र संसर्गदर्शनं । विरोधसाधनायैव स विरोध: स्मृतो यथा ॥३३०॥
दे वे उसअम रवर कें दबेक 11 220
कूजितं राजहंसानां वर्द्धते मदमञ्जुलं। क्षीयते च मयूराणां रुतमुत्क्ान्तसौष्ठवं ।।३३१।।
प्रावृषेण्यर्जलधर रम्बरं दुर्दिनायते। रागेण पुनराक्रान्तं जायते जगतां मनः ॥३३२॥
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192 KĀVYĀDARSA [ I1. 334
कयाकय जोक्ष गुर रक्ेन जो।
तनुमध्यं पृथुश्रोणि रक्तौष्ठमसितेक्षणं। नतनाभि वपुः स्त्रीणां कं न हन्त्युन्नतस्तनं ।।३३३।।
माकुरमार कोना के रर5 होक। क्रेम रकार बेर वन रारे। क ऊ बक्षा गेन का ना मठेन।| ३22
मृणालबाहु रम्भोरु पद्मोत्पलमुखेक्षणं। अपि ते रूपमस्माकं तन्वि तापाय कल्पते॥३३४॥
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I1. 336 ] KĀVYĀDARSA 193
उद्यानमारुतोद्वूताश्चूताश्चम्पकरेणवः। उद्श्रयन्ति पान्यानामस्पृशन्तोपि लोचनम् ॥३३५॥
कृष्णार्जु नानुरक्तापि दृष्टि: कर्णा[34b]वलम्बिनी। याति विश्वसनीयत्वं कस्य त कलभाषिणि ॥३३६॥
अार ना बिर थे होना।
25
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194 KĀVYĀDARSA [Il. 339
इत्यनेकप्रकारोयमलंकार: प्रतीयते। अप्रस्तुतप्रशंसा स्यादप्रक्रान्तेप्सितास्तुतिः।३३७।।
सुखं जीवन्ति हरिणा वनेष्वपरसेविनः।
सेयमप्रस्तुतवात्र मृगवृत्तिः प्रशस्यते। राजानुवर्त्तनक्क शनिविषणेन मनस्विना ॥३३६।।
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II. 341 ] KĀVYĀDARSA 195
पेवड़ बमे जो उव गोा।
यदि निन्दन्निव स्तौति व्याजस्तुतिरसौ स्मृता। दोषाभासा गुणा एव लभन्ते ह्यत्र सन्निधिं॥३४०॥
तापसेनापि रामेण जितेयं भूतधारिणी। त्वया राज्ापि सैवेयं जिता मा भून्मदस्तव ।३४१।।
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196 KĀVYĀDARSA [ Il. 343
रर छिन वे शुनारा नां रहर ।12007
पुंसः पुराणादाच्किद् श्रीस्त्वया परिभुज्यते। राजन्निक्ष्वाकुवंशस्य किमिदं तव युज्य[35a]ते ॥।३४२।।
भुजंगभोगसंसक्ता कलत्रं तव मेदिनी। अहंकार: पराङ्कोटिमारोहति कुतस्तव ॥३४३॥
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II. 346 ] KĀVYĀDARSA 197
इति श्लेषानुविद्धानामन्येषां चोपलक्ष्यताम्। व्याजस्तुतिप्रकाराणामपर्यन्तः प्रविस्तरः॥३४४॥
अर्थान्तरप्रवृत्तेन किश्चित्तत्सट्ृशं फलं। सदसद्वा निदश्येत यदि स्यात्तन्निदर्शनं ॥३४५॥
अशके इमाबन रहना न जोन।
मा केना माना माकेसा अोक अव छे का।
उद्यन्नेव सविता पद्मेष्वर्पयति श्रिय। विभावयितुमृद्वीनां फलं सुहदनुग्रहं ॥३४६॥
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198 KĀVYĀDARSA [ II. 348
सक कै बारा इकारा एे रतता सुरुना।
याति चन्द्रांशुभि: स्पृष्टा ध्वान्तराजी पराभवं। सद्योराजविरुद्धानां सूचयन्ती दुरन्ततां।३४७।।
सहोक्ति: सहभावस्य कथनं गुणकर्मणां। अर्थानां यो विनिमयः परिवृत्तिस्तु सा यथा ॥३४८॥ जोव 5व अक इूमारा झक हेना थो।
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II. 350 ] KĀVYĀDARSA 199
सह दीर्घा मम[35b] श्वासैरिमाः संप्रति रात्रयः। पाएडराश्च ममैवाङ्ग: सह ताश्चन्द्रभूषणा:।३४६ू/।
बनाेकु इव का दूकारा गुर।
वर्द्धते सह पान्थानां मूच्छया चूतमञ्जरी। पतन्ति च समन्तेषामश्रुभिमलयानिलाः।३५०॥।
3शक से दमारा मे अनन रहू।
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200 KĀVYĀDARSA i Il. 353
कोकिलालापसुभगा: सुगन्धिवनवायवः। यान्ति सार्ध जनानन्दैर्वृद्धिं सुरभिवासराः ॥३५१।
इत्युदाहतयो दत्ता: सहोक्तेरत्र काश्चन। क्रियते परिवृत्तेश्च किश्चिद्रपनिरूपणं ॥३५२॥।
रेहुर अ्षव हेना रहद र जो। 5स बइ5 3यR बेना र९े०' मुक्षमे।
शस्त्रप्रहारन्ददता भुजेन तव भूभुजां। चिरार्जितं हृतं तेषां यशः कुमुदपाएडरं ॥३५३॥
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II. 355 ] KĀVYĀDARSA 201
आशीर्नामाभिलषिते वस्तुन्याशंसनं यथा। पातु वः परमज्योतिरवाङ्गनसगोचरम् ३५४।।
अनन्वयससंदेहावुपमास्वेव दर्शितौ। उपमा रूपकं[36a]चापि रूपकेष्वेव कीत्तितम्।३५५।।
मसुसा र. उ इमाकाअ हेयर वत्रवारा 11 2४Y 26
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202 KĀVYĀDARSA [ Il.358 उत्प्रेक्षाभेद एवासावुत्प्रेक्षावयवोपि च। नानालंकारसंसृष्टिः संसृष्टिः कथ्यते पुनः ।३५६।।
अङ्गाङ्गिभावसंस्थानं सर्वेषां समकक्षता। इत्यलङ्कारसंसृष्टौ लक्षणीया दयी गतिः।३५७।
आक्षिपन्त्यरविन्दानि तव मुग्धे मुखश्रियं। कोषदण्डसममराणां किमेषामस्ति दुष्करं ।।३५८।।
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II. 360 ] KĀVYĀDARŚA 203
श्लेषः सर्वासु पुष्णाति प्रायो वक्रोक्तिषु श्रियं। भिन्न द्विधा स्वभावोक्तिर्वक्रोक्तिश्चेति वाङ्गयं ॥३५६।।
भाविकत्वमिति प्राहुः प्रबन्धविषयं गुणः । भाव: कवेरभिप्रायः काव्येष्वासिद्धि यः स्थितः ॥३६०॥
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204 KĀVYĀDARSA [ II.362
परस्परोपकारित्वं सर्वेषां वस्तुपर्वणाम्। विशेषणानां व्यर्थानामक्रिया [36b] स्थानवर्णनं ॥ ३६१
मामुर बककाक वष्मारय 55 11259
व्यक्तिरुक्तिक्रमबलाद्गम्भीरस्यापि वस्तुनः । भावायत्तमिदं सर्वमिति तं भाविक विदुः । ३६२
हद'हम बुसन अर रहकाहे के।
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II. 364 ] KĀVYĀDARSA 205
यञ्च सन्ध्यङ्गवृत्त्यङ्गलक्षणाद्यागमान्तरे। व्यावर्णितमिदं चेष्टमलङ्कारतयेव नः॥ ३६३
पन्था स एष विवृतः परिमाणवृत्त्या संहृत्य विस्तरमनन्तमलंक्रियाणां। वाचामतीत्य विषयं परिवर्त्तमानानभ्यास एव विवरीतुमलं विशेषान्॥ ३६४
मे के सायरजातमशश करत बुरुहायो।
इत्याचार्यदण्डिन: कृतौ काव्यादर्शेऽर्थालङ्कारो नाम द्वितीयः परिच्छेद्ः॥
2!
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CHAPTER III
अव्यपेतव्यपेतात्मा व्यावृत्तिवर्णसंहतेः। यमकं तञ्च पादानामादिमध्यान्तगोचरं ।।१।।
जो नी कैमारयशर नके।
एकद्वित्रिचतुष्पादयमकानां विकल्पनाः। आदिमध्यान्तमध्यान्तमध्याद्याद्यन्तसर्वतः ॥।२।।
माडेना माकेश बाहाक नबें महनजो। टुरझक इकरा ऐे इम हेता के।
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1II. 5 ] KĀVYĀDARSA 207
[37a] अत्यन्तबहवस्तेषां भेदाः संभेदयोनयः । सुकरा दुष्कराश्च्ैव दर्श्यन्ते तत्र केचन ।।३।
दरसा ककेष ववतु कार।
मानेन मानेन सखि प्रणयोभूत्प्रिये जने। खरिडता कएठमाश्िष्य तमेव कुरु सत्रपम्॥।४॥
मेघानादेन हंसानां मदनोमदनोदिना। नुन्नमानं मनः स्त्रीणां सह रत्या विगाहते ।।५।।
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208 KĀVYĀDARŚA [ III. 7 E5'5'इमाका एें इनाक रहमानय। मेन मे मा जोना मुहा डोन के।
राजन्वत्यः प्रजा जाता भवन्तं प्राप्य साम्प्रतं। चतुर चतुरंभोधिरसनोर्वीकरग्रहे ॥६।।
क जोअना र5२हन आायक।
अरण्यं कैश्िदाक्ान्तमन्यैः सद्म दिवौकसां। पदातिरथनागश्वरहितैरहितैस्तव ।।७।।
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III. 9] KĀVYĀDARSA 209
रच९ बेना काकाकर माबवरता के।
मधुरं मधुरम्भोजवदने वद नेत्रयोः । विभ्रमम्भ्रमरभ्रान्त्या विडम्बयति किब्निदं ॥८॥
कुमे माद अन कोना रना यो।
वारुणो वा रणोद्दामो हयो वा स्मरदुर्धरः। न यतो नयतोऽन्तं नस्तदहो वि[37b] क्रमस्तव।।६।।
र कि मो इन नकद माकर 11-18 27
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210 KĀVYĀDARŠA [III. 12 राजितैरा जितक्ष्ण्येन जीयते त्वाद्ृशनृपैः। नोयते च पुनस्तृप्ति® वसुधा वसुधारया ॥१०॥
केननरना गुर वेस सर पर 1120
करोति सहकारस्य कलिकोत्कलिकोत्तरं। मन्मनोमन्मनोप्येष मत्तकोकिलनिस्वनः॥११॥
कथं त्वदुपलम्भाशा विहताविह तादृशीं। अवस्था नालमारोदुमङ्गनामङ्गनाशिनी ॥१२॥
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III. 14 ] KĀVYĀDARSA 211
व/शरक अुक्ष कें अद्न कोर कक।
निगृह्य नेत्रे कर्षन्ति बालपल्लवशोभिना। तरुणा तरुणान्कृष्टानलिनो नलिनोन्मुखाः।१३।
सहूर आार्ईव कषुनार सुकनजोका।
विशदा विशदामत्तसारसे सारसे जले। कुरुते कुरुतेनेयं हंसो मामन्तकामिषं॥१४॥
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2:12 KĀVYĀDARA [ Ill.16
5599े न के आ क क 1120
विषमं विषमन्वेति मदनं मदनन्दनः । सहेन्दुकलयापोढमलया मलयानिल: ।१५।।
देतन बूबारे करना रर। झ्व ठेना नानजाजोह।
मानिनी मानिनीषुस्ते निषङ्गत्वमनङ्ग मे। हारिणी हारिणी[38a]शर्म्म तनुतां तनुतां यतः ॥१६।।
पधुर कना अप्ोमार इे सुक्ष कार्हर 1125
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III. 19] KĀVYĀDARSA 213
जयता त्वन्मुखेनास्मानकथ न कथ जितं। कमलं कमलंकुवदलिमद्दलिमत्प्रिये ।।१७।।
कुजो मन मुर सुदमठन।
रमणी रमणीया मे पाटलापाटलांशुका। वारुणीवारुणीभूतसौरभा सौरभास्पदं ॥१८।
कुमं बबन पतान।
इति पादादियमकमव्यपेतं विकल्पितं। व्यपेतस्यापि वण्यन्ते विकल्पास्तत्र केचन ।१६।।
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214 KĀVYĀDARŚA [III.21
मधुरेणद्टशां मानं मधुरेण सुगन्धिना। सहकारोद्गमेनैव शब्दशेषं करिष्यति॥२०।।
5573े जोरे कोना उनहो। सिदनक बोजे कषुनाकार डर1120
करोऽतिताम्रो रामाणान्तन्त्रीताडनविभ्रमं। करोति सेष्यं कान्ते वा श्रवणोत्पलताडनं ।।२१।। रसाद कारे अाना ना सेवड दबार।
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III. 23 ] KĀVYĀDARSA 215
सूना रता इक वना बाहर से बर।
सकलापोलसनया कलापिन्याऽनुनृत्यते। मेघाली नर्त्तिता वातैः सकलापो विमुश्चति ॥२२॥
स्वयमेव गलन्मानकलि कामिनि[38b]ते मनः। कलिकामथ नीपस्य दष्ट्रा कां नु स्पृदृदशेशां ।।२३।।
नना हर र5 के अनाक्ष रत्ुर दे।
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216 KĀVYĀDARSA [ III. 26
आर्ह्याक्रीडशैलस्य चन्द्रकान्तस्थलीमिमां। नृत्यत्येष लसच्चारुचन्द्रकान्तः शिखावलः ॥२४।।
हेआनाे रेजोररुथे।
उद्धृता राजकादुर्वी ध्रियतेद्य भुजेन ते। वराहेणोद्दता यासौ वराहेरुपरि स्थिता ॥२५।।
नार बेसा जाता मार्केना छो मावका ेद।
करेण ते रणेष्वन्तकरेण द्विषतां हताः। .
करेणवः क्षरद्रक्ता भान्ति सन्ध्याघना इव ॥२६॥।
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I[1. 28 ] KĀVYĀDARSA 217
परागतरुराजीव वातर्ध्वस्ता भटश्रमूः। परागतमिव क्वापि परागततमम्बरं ।२७।।
पातु वो भगवान्विष्णुः सदा नवघनद्युतिः । स दानवकुलध्वंसी सदानवरदन्तिहा ॥२८।
सोनारा वर कुरहेंक माररु थारेदहु।
28
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218 KĀVYĀDARŚA [ III. 30
कर अम बाहमें मार्ठेमा एठेना का।
कमलेस्समकेशन्ते कमलेर्ष्याकरं मुखं। कमलेख्यं करोषि त्वं कमले[39a]वोन्मदिष्णुषु ॥।२६॥
मुदा रमणमन्वीतमुदारमणिभूषणाः। मद्भ्रमदृशः कतुमदभ्रजघनाः क्षमाः॥३०॥
57222954513
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III. 33 ] KĀVYĀDARSA 219
उदितैरन्यपुष्टानामारुतैर्मे हतं मनः । उदितैरपि ते दूत्ति मारुतैरपि दक्षिणैः ॥३१॥
कजो ुनान मे मोका गुर।
सुराजितह्नियो यूनां तनुमध्यासते स्त्रियः। तनुमध्या क्षरत्स्वेदसुराजितमुखेन्दवः ।।३२।।
5ुछ'कोन कह मोका हेक एठेमा।
इति व्यपेतयमकप्रभेदोप्येष दर्शितः । अव्यपेतव्य पेतात्मा विकल्पोप्यस्ति तद्यथा॥३३॥
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220 KĀVYĀDARŚA [ lII.35
रस'5587 र4ा5 वकुक
सालं सालंबकलिकासालं सालं न वीक्षितु । नालीनालीनवकुलानालो नालीकिनीरपि ॥३४॥
श्रात पह़ुकर में को कुका।
कालं कालमनालक्ष्यतारतारकमीक्षितुं। तारतारम्यरसित कालं कालमहाधनं ॥३५॥।
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III. 37 ] KĀVYĀDARŚA 221
याम यामत्रयाधीनायामया मरण निशा। यामयाम धि[39b]याऽस्वर्त्याया मया मथितैव सा ।३६।।
माकन में जोर्ष ने बरता से हेना।
र वे बसर बरमा मोश एठेन 1125
इतिपादादियमकविकल्पस्येद्टशी गतिः। एवमेव विकल्प्यानि यमकानीतराण्यपि ॥३७॥
इून हैता बानारा के उरे० के।
इम देवा माबवना इनारा गुरहे 1 20
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222 KĀVYĀDARSA [ III. 40
न प्रपश्चभयान्भेदाः कार्त्स्न्येनाख्यातुमीप्सिताः। दुष्कराभिमता एव वर्ण्यन्ते तत्र केचन ॥३८॥।
स्थिरायते यतेन्द्रियो न हीयते यतेर्भवान्। आमायतयतेप्यभूत्सुखाय ते यते क्षयं ।।३६।।
सभासु राजन्नसुराहतमु ्खैर्महीसुराणां वसुराजितः स्तुताः। न भासुरा यान्ति सुरान्न तेगुणा: प्रजासु रागात्मसु राशिता गताः ।।४०।।
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III. 42 ] KĀVYĀDARSA 223
तव प्रियासच्चरित प्रमत्तया विभूषणं धार्यमिहांशुमत्तया। रतोत्सवामोदविशेषमत्तया न मे फलं किंचन कान्तिमत्तया ॥४१॥
भवादशा नाथ न जानते न ते रसं विरुद्ध खलु[40a]सन्नतेन ते। य एव दीनाः शिरसा नतेन ते चरन्त्यलं दैन्यरसेन तेन ते ।।४२।।
र0कअफन ए5 अार्कडमा फे दसा वे ऐर राय।
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224 KĀVYĀDARSA [ III. 44
लीलास्मितेन शुचिना मृदुनोदितेन व्यालोकितेन लघुना गुरुणा गतेन। व्याजुम्भित न जघने न च दशितन सा हन्ति तेन गलित मम जीवितेन ।।४३।।
भूमानमानमत यः स्थितिमानमान नामानमानमतमप्रतिमानमानं ।।४४।।
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III. 47 ] KĀVYĀDARŚA 225
सारयन्तमुरसा रमयन्ती सारभूतमुरुसारधरा तं। सारसानुकृतसारसकाश्ची सा रसायनमसारमवैति ।४५।।
नयानयालोचनयानयानया नयानयान्धान्विनयानयायते। न यानयासीजनयानयानया नयानयांस्तान् जनयानयाश्रितान् ॥४६॥
[40b]रवेण भौमो ध्वजवर्तिवारवेरवेजि संयत्यतुलास्त्रगौरवे। रवेरिवोग्रस्य पुरो हरेरवेरवेत तुल्यं रिपुमस्य भैरवे।।४७॥। 29
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226 KĀVYĀDARSA [ III. 49
Rर'S5 मजन अा रत्रा वे बना रह महुरत पर हेया॥यय
मयामयालम््यकलामयामयामयामयातव्यविरामयामया। मयामयार्त्ति निशयाऽमयामयामयामयामूं करुणामयामया ।४८।।
मतांधुनानारमतामकामतामतापलब्धाग्रिमतानुलोमता। मतावयत्यु त्तमता विलोमतामताम्यतस्ते समता नवामता॥४६।।
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III. 51 ] KĀVYĀDARSA 227.
कालकालगलकाल कालमुखकालकाल कालकालपनकालकालघ नकालकाल। कालकालसितकालका ललनिकालकाल कालकालगतु कालकाल कलिकालकाल ॥५०।।
5रपर बो महुर उु करे मार्के में महेश दारे सन हो कारकें।
संदष्टयमकस्थानमन्तादि पा[41a]दयोर्ईयोः। उक्तान्तर्गतमप्येतत् स्वातन्त्र्येणात्र कीत्यते ।।५१॥
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228 KĀVYĀDARŠA [ III. 54
उपोढरागाप्यबला मदेन सा मदेनसा मन्युरसेन योजिता। न योजितात्मानमनङ्गतापिता गतापि तापाय ममास नेयते ॥५२।।
इूस क्ष कोन इसा 'बोका माय गर गुर।
अर्थाभ्यासः समुद्र: स्यादस्य भेदास्त्रयो मताः। पादाभ्यासोप्यनेकात्मा व्यज्यते स निदर्शनैः ।५३।।
नास्थेयःसत्वया वज्यः परमायतमानया। .
नास्थेयः स त्वया वर्ज्यः परमायतमानया॥५४॥
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III. 56] KĀVYĀDARŚA 229
नरा जिता माननया समेत्य न राजिता माननयासमेत्य। विनाशिता वै भवतापनेन विनाशिता वैभवतापनेन ॥५५॥
अेदूसार कुलरर दकुन उनर कुरा रहा।
कलापिनां चारुतयोपयान्ति वृन्दानि लापोढघनागमानां। वृन्दानिलापोढघनागमानां कलापिनां चारुतयोऽप[41b]यान्ति।।५६॥
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230 KĀVYĀDARŚA [ III. 58
न मन्दयाऽवर्जितमानसात्मया नमन्दयाSवर्जितमानसात्मया। उरस्युपास्तीण्णेपयोघरद्वयं मया समालिङ्ग्यत जीवितेश्वरः ।५७।।
सभा सुराणामबला विभूषिता गुणैस्तवारोहि मृणालनिर्मलैः। स भासुराणामबला विभूषिता विहारयन्निर्विश सम्पदः पुराम् ॥५८॥
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III. 61 J KĀVYĀDARSA 231
कलङ्गमुक्तं तनुमध्यनामिका स्तनद्वयो व तह्ते न हन्त्यतः । न याति भूतङ्गणने भवन्मुखे कलङ्गमुक्तं तनुमध्यनामिका ॥५६॥
िस' अक् माबकन सबेना ना रठिन केजोोर। 35म व अ सनन बि न कोनना।
यशश्च ते दिक्षु रजश्च सैनिका वितन्वतेऽजोपम दंशिता युधा। वितन्वतेजोपमदं शितायुधा द्विषां च कुर््वन्ति कुलन्तरस्विनः ॥६०।
बिभर्त्ति भूमेर्वलयं भुजेन [42a] ते भुजंगमोमा स्मरतो मदश्चितं। शृणूक्तमेकं स्वयमेत्य भूधरं भुजंगमो मा स्म रतो मदश्चित ॥६१।।
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232 KĀVYĀDARŚA [III. 63
59 अव ररमा अा सककरे केना माठेया मारन कर काह।
रजोरलेय रामर इनारहेव देयु कमाबेरहेक।
स्मरानलोमानविवर्धितो यः स निवृतिं ते किमपाकरोति। समन्ततस्तामरसेक्षणे न समन्ततस्तामरसे क्षणेन ।६२।।
प्रभावतो नामन वासवस्य प्रभावतो नाम नवासवस्य। प्रभावतो नाम न वा सवस्य विच्छित्तिरासीत्त्वयि पिष्टपस्य।६३।।
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III. 65 ] KĀVYĀDARŠA 233
2'कT कर 45 नगुर *। 52
परम्पराया बलवा रणानां धूलीस्थिलीव्योस्नि विधाय रुन्धन्। परम्पराया बलवारणानां परम्परायाबलवारणानां ॥६४॥
न श्रद्दधे वाचमलज मिथ्या भवद्विधानामसमाहितानां। भवद्विधानामसमाहितानां भवद्विधानामसमाहितानां ।।६५।।
इन माकेश मो नऊन ससमोन दनार केया।
30
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234 KĀVYĀDARŠA [III.68
सन्नाहितोमानमराजसे[42b]न सन्नाहितोमानम राजसे न। सन्नाहितो मानम राजसेन सन्ना हितोमानमराजसेन॥ ६६ ॥
सकृद्विस्त्रिश्च योऽभ्यासः पादस्यैवं प्रदर्शितः । श्रोकद्वयन्तु युक्तार्थ श्रोकाभ्यासः स्मृतो यथा॥ ६७ ॥
केंनका एठर मबुस्षया जोनड़े दबरु। Sv
विनायकेन भवता वृत्तोपचितबाहुना। स्वमित्रोद्धारिणाSभीता पृथ्वीयमतुलाश्रिता ॥६८॥
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III. 70 ] KĀVYĀDARŚA 235
बन बे कुर नरें अाना चछक।
विनायकेन भवता वृत्तोपचितबाहुना। स्वमित्रोद्धारिणाडभीता पृथ्वी यमतुलाश्रिता ॥६६।।
एकाकारचतुष्पादं यन्महायमकाह्वयं। तस्यापि दृश्यतेऽभ्यासः सा परा यमकक्रिया॥७०॥
सर5बे इम ना माठेना का बार।
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236 KĀVYĀDARŚA [ III. 72
समानयास मानया समानयासमानया। समानया समानया समान या समानया॥७१॥
सिइन रामाउना इून कुलरोन रना।
घराघराकारघरा धराभुजां भुजा महीं पा[43a]तुमहीनविक्रमाः। क्रमात्सहन्ते सहसा हतारयो रयोद्ुरा मानघुरावलम्बिनः ॥७२।
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III. 75 ] KĀVYĀDARŚA 237
आवृत्ति: प्रतिलोम्येन पादार्घश्रोकगोचरा। यमकं प्रतिलोमत्वात् प्रतिलोममिति स्मृतं ॥७३।।
या मताश कृतायासा सायाता कृशता मया। रमणारकता तेऽस्तु स्तुतेताकरणामर ।।७४।।
नादिनोSमदनाधी खा न मे काचन कामिता। तामिका न च कामेन स्वाधीनादमनोदिना॥७५॥।
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238 KĀVYĀDARSA [ III. 77
55'555 11555' 59125 2े5 1108
यानमानय माराविकशो नानजनासना। यामुदारशताधीनामायामयमनादि सा ॥७६॥
सा दिनामयमायामा नाधीता शरदामुया। नासनाजनना शोकविरामायनमानया।७9।
केक से जोरने माते गुरु छर। कुल के सेक्षम दे जोक के।
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III. 79 ] KĀVYĀDARŚA 239
गर अ क सिदन नहेद 1100
वर्णानामेकरूपत्वं यद्य कान्तरमर्ध[43b]योः। गोमूत्रिकेति तत्प्राहुर्दुष्करं तद्विदो यथा ॥७८॥
माशने झेन गेजोनो इुकाका।
मदनो मदिराक्षीणामपाङ्गास्त्रोजये दयं। मदेनो यदि तत् क्षीणमनङ्गायाञ्जलि दधे॥७६॥
क5252 कोना घूव पुर कोना थो। मार्केद मोस रर्रुय से बाब हे। मशदे बरनागुर होनात क।
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240 KĀVYĀDARSA . [ III.82
आहुरर्धभ्रमं नाम श्रोकार्धभ्रमणं यदि । तदिष्ट सर्वतोभद्र भ्रमणं यदि सर्वतः ॥८०॥
माशरसे केनारा इठर छेर शसेरक।
मनोभव तवानीकं नोदया य न मानिनी। भयादमेयामामावावयमेनोमया न ते ॥८१॥।
सामायामामायामासामारानायायानारामा। यानावारारावानायामायारामामारायामा।।८२।।
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III.84] KĀVYĀDARSA 241
यः स्वरस्थानवर्ण्णानां नियमो दुष्करेष्वसौ। इष्टश्चतुःप्रभृत्येष दश्यते सुकरः परः ॥८३॥
म9वके 515 355 1112
आम्नायानामाहान्त्या वाग्गीतीरीतीर्भीतीः प्रीतीः। भोगो रोगो मोदो मोहो ध्येये धेच्छे देशे क्षेमे।।८४॥
हा'कर जावान'वु हशाका रनाक जोक्ष। 31
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242 KĀVYĀDARSA [ III. 86
क्षितिविजितिस्थितिविहिति [44a]वतरतयः परगतयः। उरु रुरुधुगुरु दुधुवुः खमरिकुलं युधि कुरवः ॥८५॥
6294 सहु बुमारा' बा कसार मार्कया हेमारा गुठुराका। माजुालक रससीं रत्रा जो रेमाका इुनाका के।
श्रीदीप्षी ह्रीकीर्तो धीनीती गीःप्रीतीः। पधेते द्वे द्वे ते ये नेमे देवेशे ॥८६॥। 54मत्रे द क अमाक र5।
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III. 89 ] KĀVYĀDARŚA 243
सामायामामाया मासा मारानायायानारामा। यानावारारावानाया माया रामा मारायामा ।८9।
नयनानन्दजनने नक्षत्रगणशालिनि। अघने गगने दृष्टिरङ्गने दीयतां सकृत् ।८८॥
श केमारा इकारा रन मो नाकका।
अव केना कोना वे बेन बार कारईर 11 1k
अलिनीलालकलतं कन्न हन्ति घनस्तनि। आननं नलिनच्छायनयनं शशिकान्ति ते ।।८६।।
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244 KĀVYĀDARSA [ IlI. 91
बडुर माईसयाका हा ना सकन 1120
सदानघ सदानन्दनताङ्गासङ््सङ्गतः।६0।।
रारा एा कुआाक रेनवरगुर 1100
अगा गांगाङ्गकाकाकगाहकाSधककाकहा। अहा[44b]हांग स्वगाङ्कागकंकागखगकाकक।।६१।।
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III. 93 ] KĀVYĀDARŚA 245
गाहन नारा नाहरेररहता होया।
किङ्ककाकाकुक: काको मामा मामम मामम ॥६२॥
3Eमक परोमाना हे के कर रय।
देवानां नन्दनो देवो नोदनो वेदनिन्दिनः। दिवं दुदाव नादेन दाने दानवनन्दिनः ।६३।।
जोक अप र दह नारा यर गुरु 12
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246 KĀVYĀDARŚA [ III. 96
सूरि: सुरासुरासारिसारः सारससारसाः। ससार सरसीः सीरी ससूरू स सुरारसी॥६४।।
2स बुस करे े सोनारा उन। क5 मो क अव मावेन रहेन के। 5ब5म नर्के ह सद 1100
नूनं तुन्नानि नानेन नाननेनाननानि नः। नानेना ननु नानूनेनैनेनानानिनो निनीः।६५।।
จดิ ริย พย5 ม จริม มิด 1
इति दुष्करमार्गेपि किश्चिदादर्शितः क्रमः । प्रहेलिकाप्रकाराणां पुनरुद्दिश्यते गतिः ॥६६॥
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III.98] KĀVYĀDARŚA 247
रेपुर 5 ररअनय 4ार।
मात कैना रना यो इनाहा जो।
क्रीडागोष्ठीविनोदेषु तज्शैराकीप्णमन्त्रणे। परव्यामोहने चापि सोपयोगा: प्रहेलिकाः ॥६७॥
रेखवेकष कमारकु माराद में क5।
आहुः समागतां नाम गूढार्था पदसन्धिना। वश्चि[45a]ताऽन्यत्र रूढेन यत्र शब्देन वश्चना ॥६८।।
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248 KĀVYĀDARSA [ IlI.100
(नअ ममानकारमेरना मोका।
व्युत्क्रान्तातिव्यवहित प्रयोगान्मोहकारिणी। सा स्यात्प्रमुषिता यस्यां दुर्बोधार्था पदावली ।६६।।
केना से देवे- नवस जोक 1100
समानरूपा गौणार्थारोपितर्ग्रथिता पदैः। परुषा लक्षणास्तित्वमात्रवयुत्पादितश्रुतिः ॥।१००।
य21459वे रायुक दार महुआाका।
इकवर केना के दुरमैर। 200
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III. 103] KĀVYĀDARŚA 249
संख्याता नाम संख्यानं यत्र व्यामोहकारणं। .
अन्यथा भासते यत्र वाक्यार्थः सा प्रकल्पिता ॥१०१।
सा नामान्तरिता यस्यां नास्नि नानार्थकल्पना। निवृता निवृतान्यार्था तुल्यधर्मस्पृशा गिरा। १०२।
केंना के केर महुरतअ रमा यरा।
समानशब्दोपन्यस्तशब्दपर्यायसाधिता। संमूढा नाम या साक्षान्निर्दिष्टार्थापि मूढये।१०३।। 32
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250 KĀVYĀDARSA [ IlI.105
हरत कुर देरवे अस बेक्षह11703
योगमालात्मकन्नाम यस्याः सा परिहारिकी। एकच्छन्नाश्रितं व्यज्य यस्यामाश्रयगोपनं ॥१०४।।
[45b]सा भवेदुभयच्छन्ना यस्यामुभयगोपनं । संकीर्ण्णा नाम सा यस्यां नानालक्षणसंकरः॥१०५।।
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III. 107 ] KĀVYĀDARSA 251
मर.व अबंन कर ककैनाना रहेरा। 5वे जइनरइर बेकष51120r
एता: षोडश निर्दिष्टाः पूर्वाचार्यैः प्रहेलिकाः।
ब7बे रेराइनक1गे 8511205
दोषानपरिसंख्येयान् मन्यमाना वयं पुनः। साध्वीरेवाभिधास्यामस्ता दुषा यास्त्वलक्षणाः ॥१०७।।
इम र जार एर मा उन मोरष।
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252 KĀVYĀDARA [ III. 110 न मयागोरसाभिज्ं चेतः कस्मात्म्रकुप्यसि। अस्थानतुंदितैरेभिरलमालोहितेक्षणे ।।१०८।।
कुब्जामासेवमानस्य यथा ते वर्धते रतिः । नवं निर्विशतो नारीममरस्त्रीविडम्बिनीः ॥१०६।।
दण्डे चुम्बति पद्मिन्या हंस: कर्कशकरटके। मुखं वल्गुरवं कुर्व्वम्तुण्डेनाङ्गानि घट्टयन्॥११०।
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III. 112 ] KĀVYĀDARŚA 253
ख्यातयः कनि काले ते स्फातयः स्फीतवल्गवः । चन्द्रे साक्षाङ्भवन्त्य[46a]त्र तायवो मम धारिणः ॥१११।।
र591 मी.कना के वदन का फोर 1227
अत्रोद्याने मया दष्टा वल्लरी पश्चपल्लवा। पल्लवे पल्लवे चार्द्रा यस्या: कुसुममश्जरी॥११२॥
मो देवा कनहरे हवाएठ।
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254 KĀVYĀDARSA [Ill. 114
सुराः सुरालये स्वैरं भ्रमन्ति दशनाच्चिषा। मज्जन्त इव मत्तास्ते सौरे सरसि संप्रति ॥११३॥
नासिक्यमध्या परितश्चतुर्वण्ण विभूषिता। अस्ति काचित्पुरी यस्यामष्टवण्णाह्हया नृपाः ।११४।
मो बरना जोना समु ओर उस बार 11270
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III. 117 ] KĀVYĀDARSA 255
गिरा स्खलन्त्या नम्रेण शिरसा दीनया दशा। तिष्ठन्तमपि सोत्कम्प्यं वृद्धे मां नानुकम्पसे ॥११५॥
कानो से 5ु5'छेर कोना रबवका।
आदौ राजेत्यधीराक्षि पार्थिवः कोपि गीयते। सनातनश्च नैवासौ राजा नैव सनातनः ॥११६।
कुतदो काजोन 154'3872911225
हतद्रव्यं जनं त्यक्ता धनवन्तं व्रजन्ति काः । [46b]नानाभङ्गिशताकृष्टलोका वैश्या न दुर्धराः॥११७॥
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256 KĀVYĀDARSA [ III. 119
जितप्रकृष्टकेशाख्यो यस्तवाभूमिसाह्वयः । स मामद्य प्रभूतोत्कं करोति कलभाषिणि ॥११८।
शयनीये परावृत्त्य शयितौ कामिनौ रुषा। तथैव शयितौ रागात् स्वैरं मुखमचुम्बताम् ॥११६॥
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[1I. 121] KĀVYĀDARŚA 257
विजितान्नभवद्वेषिगुरुपादहतो जनः। हिमापहामित्रधरर्वर्याप्तं व्योमाभिनन्दति ॥१२०॥
न स्पृशत्यायुधं जातु न स्त्रीणां स्तनमण्डलं। अमनुष्यस्य कस्यापि हस्तोयं न किलाफल: ॥१२१॥
अना के R501 को5 रोक के थ। 227
33
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258 KĀVYĀDARŚA [ III. 124
केन कः सह सम्भूय सर्वकार्येषु सन्निधिं। लब्ध्वा भोजनकाले तु यदि दृष्टो निरस्यते ॥१२२॥
का बेना मार र उमोमारका जोन।
सहया सगजा सेना सभटेयन्न चेजिता। अमात्रिको[47a]यं मूढः स्यादक्षरक्षश्च नः सुतः ॥१२३॥
क उरे मानमे कुशक।
अ वे जोनी चेरा गूर सुक 11222
सा नामान्तरितामिश्रा वश्चितारूपयोगिनी। एवमेवेतरासामप्युन्नेयः संकरक्रमः ॥१२४॥।
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III. 126] KĀVYĀDARSA 259
पतन2जोवे महुनारर2क
रुतयर इमन सेक्षयर5 11220
अपार्थ व्यर्थमेकार्थ ससंशयमपक्रमं। शब्दहीनं यतिभ्रष्टं भिन्नवृत्तं विसन्धिकं ॥।१२४।।
इक उनाका एव उसाय रव ना ठेना या।
देशकालकलालोकन्यायागमविरोधि च। इति दोषा दशवैते वर्ज्याः काव्येषु सूरिभिः ॥१२६॥
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260 KĀVYĀDARSA [ III. 128
प्रतिज्ञाहेतुदृष्टान्तहा निर्दोषो नचेत्यसौ। विचार: कर्कशः प्राथस्तेन लीढेन कि फलं ।।१२७।। 521232. आ5व केना रसें ऊकाक्षका।
समुदायार्थशून्यं यत्तदपार्थमितीष्यते। तन्म त्तोन्मत्तबालानामु क्तेरन्यत्र दुष्यति ।।१२८॥
रे वे एव ऊनाका बेकादार उसु।
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III. 130 ] KĀVYĀDARSA 261
समुद्रः पीयते सोयमहमद्य जरातुरः। अमी गर्जति जी[47b]मूता हरेरेरावतः प्रियः ॥१२६॥ रेवे माँ बार्कें खु=छेररे। रपा के सरद बाबरा, मात्रैर।
इदमस्वस्थचित्तानामभिधानमनिन्दितं। इतरत्र कविः को वा प्रयुञ्जीतैवमादिकं ॥१३०॥ 2े स्ेमान दूअक को मानका हालि
एकवाक्ये प्रबन्धे वा पूर्वापरपराहतं। विरुद्धार्थतया व्यर्थमिति दोषेषु पठ्यते ॥१३१।
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262 KĀVYĀDARSA [Ill. 132
एसा माठेया मान वे शुबब कार।
जहि शत्रुकुलं कृत्स्नं जय विश्वंभरामिमां। न च ते कोपि विद्वेष्टा सर्व्वभूतानुकम्पिनः ॥१३२।।
इकैमारा र ररे कुदशुर हेया।
अस्ति काचिद्वस्था सा साभिषंगस्य चेतसः। यस्यां भवेदभिमता विरुद्धार्थापि भारती॥१३३॥
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III. 135 ] KĀVYĀDARŚA 263
कैना गूर आार्ईद बर ररु सरु कगुर 11222
परदाराभिलाषो मे कथमार्यस्य युज्यते। पिबामि तरलन्तस्या: कदा नु दशनच्छदं ॥१३४।।
अविशेषेण पूर्व्वोक्तं यदि भूयोपि कीर्त्यते। अर्थतः शब्दतो वापि तदेकार्थ मतं यथा ॥१३५॥
र वे इव माठेया बर' रु दहेर 122४
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- KĀVYĀDARŚA [IlI. 138 उत्का[48a]मुन्मनयन्त्येते बालां तदलकत्विषः । अम्भोधरास्तडित्वन्तो गम्भीराः स्तनयितवः ॥१३६॥
रेजी अनचुरि र बेर उ।
अनुकम्पाद्यतिशयो यदि कश्चिद्विवक्ष्यते। न दोष: पुनरुक्तोपि प्रत्युतेयमलंकृतिः ॥१३७॥
मानसे Rार बेन रह्द रद कें।
हन्यते सा वरारोहा स्मरेणाकारडवैरिणा। हन्यत चारुसर्वाङ्गी हन्यते मञ्जुभाषिणी ॥१३८॥
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III. 140 ] KĀVYĀDARSA 265
5ुर ' कोन मार्केना कें सकिन पर गुर। जा आामा गुन माहेर सकन कर गुरु। Rइन12र अनारा' ना सहक सर गुरु 11 222
निर्ष्णयार्थम्प्रयुक्तानि संशयं जनयन्ति चेत्। वचांसि दोष एवासौ ससंशय इति स्मृतः ॥१३६।।
केना इबारा के र पेर माय हेन। वे कैन केशरके व रहे। वेकैनस बडा 555295 1122
मनोरथप्रियालोकरसलोलेक्षणे सखि। आराद्वत्तिरसौ माता न क्षमा द्रष्टुमीदृशं॥१४०।
र.य. कोन माजी प्रोमाका कोरर। 34
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266 KĀVYĀDARSA [ III. 142
२१35६85522ीव 11700
ईदशं संशयायैव यदि जातु प्रयुज्यते। स्यादलंकार एवासौ न दोषस्तत्र तद्यथा॥१४१
पश्याम्यनङ्ग जातङ्कलङ्गितां तामनिन्दिताम्। कालेनैव क[48b]ठोरेण ग्रस्तां कि नस्त्वदाशया ॥१४२॥ बार केता अवदार माकुरर जे।
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I1I: 145 ] KĀVYĀDARŚA 267
कामार्त्ता धर्म्मसन्तप्तेत्यनिश्चयकरं वचः । युवानमाकुलीकर्तुमिति दूत्याह नर्मणा ॥१४३।
रयक अतेर रमा के यक्ष नाुर।
ए. 3र. पक मेत रा र 11202
उद्देशानुगुणोऽर्थानामनुदेशो न चेत्कृतः। अपक्रमाभिधानन्तं दोषमाचक्षते बुधाः ॥१४४।।
इमाया उनक यर आार्हद रहद हबे। 895. 28 5952 50511700
स्थितिनिर्माणसंहारहेतवो जगतामजाः। शम्भुनारायणाम्भोजयोनयः पालयन्तु वः॥१४५॥
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268 KĀVYĀDARŚA [ I1I. 147 अम्रै ब इरारा में माकका'न रर।
यत्ः सम्बन्धविज्ञानहेतुः कोपि कृतो यदि। क्रमलङ्डनमप्याहुरन दोषं सूरयो यथा ॥१४६॥
नासक न इूसार केके दसर 11205
बन्धुत्यागस्तनुत्यागो देशत्याग इति त्रिषु। आद्यान्तावायतक्केशौ मध्यमः क्षणिकज्वरः ॥१४७॥
जाल मदेद बेक्षय महानहे थ।
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11I. 149 ] KĀVYĀDARSA 269
शब्दहीनमनालक्ष्यलक्ष्यलक्ष्यणपद्धतिः । पदप्रयोगो शिष्टेष्टो न शिष्टेष्टस्तु दुष्यति॥१४=।।
रर्3 वे अु का जोन 11201
[49a]अवते भवते वाहुर्महीमर्ण्णवशक्करीं। महाराजन्नजिज्ञासौ नास्तीत्यासां गिरां रसः ॥१४६।।
मबे मुराकरेमारा ठन।
केना रदय के उनाक फठ रोक 11200
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270 KĀVYĀDARŠA [IHI. 152 दक्षिणाद्रेरुपसरन् मारुतश्चूतपादपान्। कुरुते ललिताधूतप्रबालांकुरुशोभिनः ।१५०॥
इत्यादिशास्त्रमाहात्म्यदर्शनालसचेतसां। अपभाषणवद्भाति न च सौभाग्यमुज्फति ॥१५१॥
श्रोकेषु नियतस्थान पदच्छेदं यति विदुः। तदपेतं यतिभ्रष्टं श्रवणोद्ेजनं यथा॥१५२।।
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III. 153 ] KĀVYĀDARA 271
कैंशा मो अाठेर का कंमारा दयकरो रेया।
स्त्रोणां संगीतविधिमयमादित्यवंशो नरेन्द्रः पश्यत्यक्किष्टरसमिह शिष्टरमेत्यादि दुष्टं। कार्याकार्याण्ययमविकलान्यागमेनैव पश्यन् वश्यामुवीं वददति नृप इत्यस्ति चौष प्रयोग: ।।१५३।।
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272 KĀVYĀDARSA [ lII. 156
लुप्ते पदान्ते [49b]शिष्टस्य पदत्वं निश्चितं यथा। तथा सन्धिविकारान्तं पदमेवेति वर्ण्यते ॥१५४॥
हेछर केंनाकपर मुरानान। झ्षनाना केना ऊरकु दक ना।
केना कर हेका के रहद राजोन 1122
तथापि कटु कर्ण्णानां कवयो न प्रयुख्जते। ध्वजिनी तस्य राज: केतूदस्तजलदेत्यदः ।।१५५।
वर्ण्णानां न्यूनताधिक्ये गुरुलघ्वयथास्थितिः । यत्र तद्भिन्नवृत्तं स्यादेष दोषः सुनिन्दितः ॥१५६॥
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III. 158 ] KĀVYĀDARŚA 273
2े नपुर अनकषम है।
इन्दुपादा: शिशिरा: स्पृशन्तीत्यूनवर्ण्णता। सहकारस्य किसलयान्यार्द्राणीत्यधिकाक्षरम् ॥१५७॥
कामेन बाणा निशिता वियुक्ता मृगेक्षणास्वित्ययथागुरुत्वं। मदनवाणा निशिता: पतन्ति मृगेक्षणास्वित्ययथालघुत्वं ।।१५८।।
35
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274 KĀVYĀDARSA [ III. 160
न संहितां विवक्षामीत्यसन्धानं पदेषु यत्। तद्विसन्धीति निर्दिष्टं न प्रगृह्यादिहेतुकं ।।१५६।।
मन्दानिलेन चरता अङ्गनागएडमएडले। लुप्तमुद्रेदि [50a] धर्माम्भो नभस्यस्मन्मनस्यपि ॥१ ६॥
ह9मेकुकु2 रनमरपोर 11250
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III. 163 ] KĀVYĀDARSA 275
[मानेरप्ये इह शीर्येते स्त्रीणां हिमऋतौ प्रिये।] आसु रात्रिप्विति प्राशेरक्षातं न्यङ्गमीदशं।।१६१।।
गहयN उनरयर रेनानेक11'57
देशोऽद्रिवनराष्ट्रादि: कालो रात्रिन्दिवर्त्तवः। नृत्यगीतप्रभृतय: कला कामार्थसंश्रयाः ॥१६२॥
शरु2करनहनस 11252
चराचराणां भूतानां प्रवृत्तिर्लोकसंशिता। हेतुविद्यात्मको न्यायः सस्मृतिः श्रुतिरागमः ॥१६३॥
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276 KĀVYĀDARSA [ III. 165
रहुमाय रह्ेना देव और रब के। ईमा रा 2 माकव केंमाक' करय ब्म कार
तेषु तेषु यथारूढं यदि किंचित्प्रवर्त्तते। कवेः प्रमादाद्ेशादिविरोधीत्येतदुच्यते ॥१६४॥
अवसर मायसे रूहबुनारात।
कर्पूरपादपास्पर्शी सुरभिर्मलयानिल:। कलिङ्वनसंभूता मृगप्रायमतंगजा ॥१६५॥
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III. 167 ] KĀVYĀDARŠA 277
चोला: कालागुरुश्याम: कावेरीतीरभूमयः। इति देशविरोधिन्या वाचः प्रस्थानमीद्वशम् ॥१६६॥
अअमेरे देगर कारे।
पग्मिनी नक्तमुन्निद्रा स्फुटत्यहि कुमुद्ूती। मधुरुत्फुलनिचुलो निदाघो[50b] मेघदुर्दिनः॥१६७।
य5उवे अकन में मुंा।
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278 KĀVYĀDARSA [ III. 170 श्रव्यहंसगिरो वर्षाः शरदामत्तवर्हिणी। हेमन्तो निर्मलादित्यः शिशिर: श्ाध्यचन्दनः ॥१६८।
इति कालविरोधस्य दर्शिता गतिरीहशी। मार्ग: कलाविरोधस्य मनागुद्दिश्यते यथा ॥१६६॥
वीरशङ्गारयोर्भावौ स्थायिनौ क्रोधविस्मयौ। पूण्ण सप्तस्वरः सोयं भिन्नमार्गः प्रवर्त्तते ॥१७०॥
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III. 172 ] KĀVYĀDARSA 279
इत्थं कलाचतुःपष्टो विरोध: साधु नीयतां। तस्या: कलापरिच्छेदे रूपमाविर्भविष्यति ॥१७१।।
आधूनकेशरो हस्ती तीक्ष्णशंगस्तुरंगम: । गुरुसारोयमेरडो निःसार: खदिरद्रुमः ॥१७२॥ बूर स रुनाके रय माजे।
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280 KĀVYĀDARSA [ III. 174
इति लौकिक पवायं विरोधः सर्वगर्हितः। विरोधो हेतुविद्यासु न्यायाख्यासु निदश्यंते ॥१७३।। छेN्षय ररके रछ्ेत देवय।
सुगतैः संस्कृताभङ्ग: सत्यमेवोदितोऽपिचेत्। तथापि सा चकोराक्षी स्थितैवाद्यापि मे हाद ॥१७४॥
उ पौरर. जो कोना उद हे। एरमा मो ोटन 555 माकर 11200
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III. 177 ] KĀVYĀDARSA 281
कापिलैरसदुद्भतिः [5la]स्थान एवोपवर्ण्यते असतामेव दृश्यन्ते यस्मादस्माभिर्द्भ्रवाः।।१७५।।
गतिर्न्यायविरोधस्य सैषा सर्वत्र हश्यते। अथागमविरोघस्य प्रवेश उपदिश्यते॥ ॥१७६॥
अनाहिताझयोप्येते जातपुत्रा वितन्वते।
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असावनुपनीतोपि वेदानधिजगे गुरोः ।। स्वभावशुद्ध: स्फटिको न संस्कारमपेक्षते ॥१७८॥।
र्के कमा नमूर गृर।
विरोध: सकलोप्येष कदाचित्कविकौशलास्। उत्क्रम्य दोषगणानां गुणवीथिं विगाहते ॥।१७६।।
शरेव वे आायर रया ररे वा पह।
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यवदव रम वे इनसर रहेंद 11 200
तस्य राज्: प्रभावेन तदुद्यानानि जज्िरे। आर्द्रीशुकप्रबालानामास्पदं सुरशाखिनां ।।१८०।।
कुनय रेजो आाधुजोक्ष के।
राक्षां विनाशपिशुनश्चचार खरमारुतः । घुन्चन्कदम्बरजसा सह सप्तच्छदोद्रमान् ।१८१।।
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कामिनां लयवैषम्याद्गेयं रागमवर्धयत्।१८२।।
कमारापरना कें Rसनबर सोर 11/
ऐन्दवादच्चिषः कामी शिशिरं हव्यवाहनं। अबलाविरहङ्टेशविह्लो गणयत्ययं ।।१८३।।
नपर रदतेर अक्ष बहोयय। अक्षेमा 5 रहकबर रददन हे।
प्रमेयोप्यप्रमेयोसि सकलोप्यसि निष्कलः। एकस्त्वमप्यनेकोसि नमस्ते विश्वमूतये ।।१८४।।
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III. 186] KAVYADARSA
पवानां पाण्डुपुभानां पक्षी पाजालकम्यका। गनीनामप्रणोध्ामीदैयो हि विधिरीहशः ।।२८५।।
गम्ार्धामंकियासित्रा मार्गा: सुकरदुष्कराः। गुणा शंवाक् काड्यानामिति संक्षिप्य दशिता: ॥१८१॥
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व्युत्पन्नबुद्धिरमुना विधिदशितन मार्गेण दोपगुणयोर्वशवर्तिनीभिः। वाग्भि: कृताभिसरणो मदिरेक्षणाभि र्धन्यो युवेव रमते लभते च कीर्तिम्॥ १८७
इत्याचार्यदण्डिन: कृतौ काव्यालंकारे दुप्करदोषयिभागो नाम तृतीयः परिच्छेदः समाप्तः॥
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CORRIGENDA
Chap.1. 17" : वर्णनैः for वर्रानैः; 27° W,ND for 392 साम्या (?) for शाम्या in Tib. transliteration; 85 विद्यते for *2र; 86' ्भवादृश for भवादृश ; 98h रतनन्त्यो for स्तनत्यो. Chap. Il. 1455 for 55;370 mRE for 5755; 40° स्पर्श for स्पश: 45" मार for =रा; 66" नखाचिषः for नखाचिषः ; 772 इदमार्द्र for इद- माद्र ; 9' नर्निते for नतिते ; 861 राजहंसो for राजहंसा ; 86° वक्का for वक्का ; 86" ब5 for 5; 91" निर्दहृति for निदहति and निर्दयं for निदयं; 125 व95 for सेन5; 1420 मानदे for मान5: 1820 कसर for *'3[5; 206' सोयं for सायं; 207" 3 for 35; 233 उक for ई5; 234 रित for दम237 विकार्य for विकाय: 279 for ' रN्ष; 282' रगवत्व for रसस्वत्र ; 2874 मृरु"य for पुरुक् ; 3060 दर्शिता for दशिता : 312' 5सेर पहईेद for 5सेबर हैर; 3130 वर 21 2र रैक for
Chap. III. 17 55 for 55; 19° वरर्यन्ते for वरायन्ते ; 131 स्पृशेदृशां for स्प्रदशेशा : 31 55 for 55; 39° Afor N;54" वर्ज्यः for वज्यः;
68" 55'5 for 55'5 :690 गुरु for 515 : 800 7ु95 for
Mुन5 : 83'for158वfor ारण; 184 विश्वमूर्त्तये for विश्वमूलये : 185 पाराड्वपुत्राणां for पाराङ्गपुत्रानां.