Books / Kavya Darsa Dandin Prakasa Sanskrit Hindi Vyakhya Ramachandra Mishra Chaukhamba

1. Kavya Darsa Dandin Prakasa Sanskrit Hindi Vyakhya Ramachandra Mishra Chaukhamba

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॥ श्री: ॥ विद्याभवन संस्कृत प्रस्थमाला

काव्यादर्श: 'प्रकाश' संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेतः

व्यास्याकारा आचार्य श्रीरामचन्द्रमिश्रः (प्राध्यापक : धमंसमाज संस्कृत कालेज, मुजफ्फरपुर)

चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी २२१००१

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प्रकाशक- चौखम्ना विद्याभवन (भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के प्रकाशक तथा वितरक ) चौक (बनारस स्टेट बैंक भवन के पीछे), पो० बा० नं० १०६९ बा रा ण सी २२१००१

इरमाव : ३२०४०४

सर्वाभिकार सुरकित द्वितीय संस्करण १९९६ प्रथम परिच्छेद २५-०० १-२ ५०-०० सम्पूर्ण ७५-०० नग्य प्रासिस्मान- यौखम्बा सुरभारती प्रकाश्चन के० ३७/११७, गोपालमन्दिर लेन पोस्ट बाक्स नं० ११२९ वारामसी २२१००१

इरमान : ३३३४३१

पौखम्मा संस्कत प्रतिष्ठान १८ बू. ए., जवाहरनमर, बंनको रोड बिस्सी ११००.७ दूरभाष: २३६३९१

मुद्रक फूल प्रिण्टर्स बारागसी

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THE VIDYABHAWAN SANSKRIT GRANTHAMALA 37

KĀVYĀDARSA

OF

MAHĀKAVI DANDİ

Edited with 'Prakasha' Sanskrit & Hindi Commentaries

By Acharya Ramchandra Mishra Ex. Professor, Dharma Samaj Sanskrit College, Muzaffarpar.

CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN VARANASI

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C CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN . Oriental Publishers & Booksellers) CHOWK ( Behind The Benares State Bank Bullding) Post Box No. 1069 VARANASI 221001

Also can he had of CHAUKHAMBA SURBHARATI PRAKASHAN K. 37/117, Gopal Mandir Lane Post Box No. 1129 VARANASI 221001

CHAUKHAMBA SANSKRIT PRATISHTHAN 38 U. A., Jawabarnagar, Bunglow Rocd DBLHI 110007

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विंशशतान्द्यामपि महाकाव्यखण्डकाव्यचम्पूविविघटीका- निर्माणयश:शालिनां सफला्यापनप्रथितकीर्त्तीनां मैथिलश्रोत्रियविद्वद्वरकविशेखरपण्डितश्रीयुत, बदरीनाथझाशर्मणां

करकमलयोः सादरं समर्पयति निजां कृति काव्यादर्शव्याख्यामिमां तस्य साहित्यविद्याद्रोणाचार्थस्यैकलव्यः

शिष्य: रामचम्त्र:

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अवतारणा अथायमुपक्रम्यते प्रकाशयितुं महाकविदण्डिविरचितः सव्याख्यश्व काव्यादर्श:, अलक्गारशास्त्रे प्रविविक्षतां कृते अ्रन्थोऽयमतीवोपकारकः सरसमधुरया शैल्याऽलक्कार- शास्त्रीयतत्त्वनिवहप्रकाशश्वेति न तिरोहितं सुधियाम्। इदमीयगुणगणगौरवमेवास्य चिरप्रणीतत्वेऽ्रवि सर्माघकसुधीसमुदयाकर्षणकारणत्वं कलयति। यद्यप्यस्य बहवो व्याख्याः प्रथन्ते, यथा-१. तरुणवाचस्पतिकृता टीका, २. एस्.के. बेलबलकरेण कता टीका, एन्. बी. रेडीशास्त्रिकृता, ३.प्रेमचन्द्रकृता, ४. जीवानन्दकृता, ५. विश्वेधरसुतहरिनाथकता, ६. नरसिंहकृता, ७. भगीरथकृता, ८. विजयानन्दकृता, ९. त्रिभुजनाचार्यकृता १०. कृष्णकिंकरकृता, ११. जगनायतनय- मल्लिनाथकृता, १२. रङ्काचार्यकृता च। एतदतिरिक्त अपि अज्ञातकर्तृ कास्तिस्रष्टीका: कृष्णमाचार्येंण स्वीये संस्कृतसाहित्येतिहासनामके अ्रन्थे स्मर्यन्ते। आधुनिकसमयेऽप्यत्र ग्रन्थे बजरत्नदासमहोदयेन हिन्दीव्याख्या तथा वी. नारायणऐयरमहाशयेनाङग्लानुवाद: क्रिरिियतेस्म। तदेवं भूयांसि व्याख्यानानि प्रन्थस्यास्य गौरवं सडिण्डिमनादं ख्यापयन्ति। तासु टीकासु कतीनामनुपलम्भात् कतिपयानां च संक्षिप्ततमत्वादन्यासां चासम्बद्धाधिकार्था- भिधायित्वादेक। वर्त्तमानसमयोपयुक्ता टीकाऽपेक्ष्यते स्म। तन्निमित्त एव ममाय- मुपकमः। मया टीकाकरणकाले पञ्चषा व्याख्या निपुणमालोचितास्तत्र रक्वाचार्यकृता टीका मुख्या, अन्याश्च जीवानन्द-प्रेमचन्द्र-व्रजरत्नदास-वी. नारायणऐयरप्रभृतिसम्पादिताः। सर्वास्ताष्टीका यथामति समालोच्य मयाऽयं अ्रन्थष्टीकितो यत्र संस्कृतव्याख्यया सह हिन्दीव्याख्यापि समावेशिता विद्यते। संस्कृतव्याख्यापेक्षया हिन्दीव्याख्याया- मधिका अर्थाः समावेशयितुमिष्टा मया, तथा साधारणाध्येतृजनानामघिकं सौविष्यमा- धीयेत। आशासे मदीयेन प्रयासेनास्य ग्रन्थस्याध्येतारश्छात्रास्तदध्यापकाश्वाकलेशमिमं हृदयावर्जकं अ्रन्थं तत्त्वतो विज्ञाय मदीयं श्रमं सर्वात्मना सफलयिष्यन्तीति शम्। विन यावनतः श्रीरामचन्द्रमिभ:

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पस्तावना

अलकुारशास काव्यशाख समाज का चित्र माना जाता है, कवि अपनी प्रतिमाके द्वारा समाजका सर्वाज्गीण चित्र अपने काव्यों में उपस्थित करते हैं, उसके नियमोंका, स्वरूपका, दोष-गुणका और उसमें अपेक्षित रीति आदिका विवेचन भी काव्यके करने तथा यथार्थरूपमें समझनेके लिये आवश्यक हो जाता है। इसी तरहकी विवेचनाके लिये प्रस्तुत ग्रन्थोंकी गणना साहित्यशाख- के विभागमें की जाती है। साहित्य शास्त्र का ही परिमार्जित रूप या संक्षिप्त रूप अलक्कारशास्त्र माना जाता है। आलोचक विद्वान् अपनी प्रतिभाके आधारपर काव्यके दोषों, गुणों तथा अन्यान्य उपयोगी अभ्गोंकी विवेचना करके काव्यको समझनेकी सुविधा उत्पन्न कर देते हैं। इस तरह अकक्वारशास्त्र काव्याङ् होता है, अत एव साहित्यदर्पणकारने अपने ग्रन्थमें लिखा है :- 'अस्य ग्रम्थस्य काव्याङ्तया काव्यफलैरेव फलवर्वम्' काव्यका फल भी उन्होंने इस प्रकार कहा है :- चतुबंगंफलप्राप्ति: सुखादवयधियामपि। काय्यादेव यतस्तेन ततस्वरूपं निरूप्यते।। इसका प्रतिपदविवेचन साहित्यदर्पणमें देखें। अलक्कार-शब्दार्थ अलक्कार शब्दका अर्थ भूषण माना जाता है। जिससे अङ्गकी तथा उसके द्वारा अङ्गीकी शोभावृद्धि होती है उसे अलद्कार कहते हैं। अलक्कारका लौकिक प्रयोग-विषय जितना प्रसिद्ध है, शास्त्रीय प्रयोग-विषय भी उतना ही प्रसिद्ध है। जिस प्रकारसे शरीर-शोभा-वर्धन द्वारा शरीरी- की शोभा बढ़ानेवाले हारादि अलद्कार कहे जाते हैं उसी तरह शब्दार्थस्वरूप शरीरशोभा-वर्धन द्वारा रसरूप शरोरीकी शोभा बढ़ानेवाले उपमादि अलद्कार कहे जाते हैं। आचार्योंने स्वीकार किया है :-

अलक्कारों का आविर्भाव अलक्टारोंका आविर्माव कब हुआ ? इस प्रसक्गमें विचार करनेसे प्रतीत होता है कि मानव- समाजकी आदि भाषामें भी इसका प्रयोग अवश्य होता रहा होगा। मानव-समाजकी आदिम भाषा कौन थी, इसका निर्णय अवश्य कठिन है, परन्तु उसमें अलद्टारोंका प्रयोग अवश्य होता रहा होगा, क्योंकि इम देखते हैं कि संसारकी कोई भी ऐसी भाषा नहीं है, जिसमें आलक्कारिक प्रयोग नहीं होते हों। जहाँ तक उपलभ्यमान भाषाओंका संबन्ध है, लोगोंकी मान्यता यही है ऋग्बेदका प्राचीनत्व सिद्ध है। ऋग्वेदमें अलद्टारोंके प्रयोग प्रचुर रूपमें पाये जाते हैं :- चस्वारि भङ्ञा त्रयो अस्य पादा हेशीष सप्त हस्तासो अस्य। त्रिधा बड़ो वृषभो रोरवीति महोदेवो म्स्यां आविवेश॥ (ऋगू० ४।५८।३) सिंहा इव मा नदक्ति प्रचेतस: पिशा हव सुधिश: विभ्ववेव्सः॥। (ऋग्० १।६४।८) तहिष्णो: परभं पर्द-दिवीयनपुराततं, सदा पश्यम्ति सूरय: ॥(ऋगू० १।२२।२०) इन मन्त्रांशोंमें रूपक एवं उपमाके प्रयोग स्पष्ट हैं।

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उसके बादके ग्रनथेंमें तो अकदारोंके प्रयोग होते ही थे। इस प्रसन्नमें उदाहरण-प्रदर्शन मनावश्यक है।

जम किसी वस्तुका प्रयोग होने लगता है, उसकी ओर बक्ता-श्रोताको रचि बढ़ने लगती है, तब उसकी परिभाषा आदि शासीय विवेचन प्रस्तुत किये जाने लगते हैं जिसे हम तत्तव शासके नाम से पुकारते हैं। अलद्वार शास्रके विषयमें यही बात लागू हुई होगी। हमारी प्राजीन परम्पराके अनुसार शाज होनेके लिये सूत्र, वृत्ति और भाव्यका होना अपेक्षित है। तदनुसार अलक्कार शाखमें इन वस्तुओंका होना अपेक्षित है। अलद्ारशास्तके सूत्र, वृत्ति तथा माध्यग्रन्थ कौन-कौनसे हैं, इस सम्बन्धमें विचार करनेपर पता चलता है कि इसका सूत्रग्रन्थ शोदोदनिका सूत्र है, केशवमिश्रने अपने अलक्धारसेसरमें लिखा है :- 'अलट्कारविद्यासूत्रकारो भगवान् शोडोदनि: काव्यस्य स्वरूपमाह' गौड़देशके आचार्यगण काव्यप्रकाशकारिकाको भरतमुनिकृत काव्यालक्गारसूत्ररूपमें स्वीकार करते है-साहित्यकौमुदी नामक स्वकिखित अन्थमें बलदेव विध्याभूषण ने लिसा है :- काव्यप्रकाशस्य ह्रावंशो; कारिका, बुत्तिक्, भरतमुनित्रणीत ना कारिका सा अलड्ार- सूत्रमाक्ना-ध्यवहियते, मम्मटप्रणीता या वृत्ति: सैव काव्यप्रकाशनामभाक़।' अन्यान्य आचार्यगण भी काव्यप्रकाशस्थ कारिकाओंको सूत्र नामसे व्यवहृत करते हैं, देखिये :- महेशर-उदाहरणेपु रहत्वाल् सूत्रानुक्तमपि प्रमेदहयमाह। भीमसेन-सूत्रे प्रभोत्तरपदं पूर्वापरवाक्योपलचकम्।

गोबिन्दठकुर-'सुन्ने विभाग उपलचणपरः। नागेशमट्ट-सूत्रं चोपलचणपरतया योज्यम। यथ्यपि केशव मिश्रने अलक्गारशेखरमें शौद्धोदनिके सूत्रको सूत्र माना है, परन्तु काव्य- प्रकाशकी कारिकाको ही बदुमतसे सूत्र मानना उचित प्रतीत होता है। अन्यान्य वामनादि- प्रणीत सूत्रोंको अव्यापक होनेसे सूत्रग्रन्थ कहलानेका गौरव नहीं प्राप्त हो सका। कुछ अज्ञातकसृंक या यशकरकृत अलभ्ठारसूत्रों पर बारहवीं शताब्दीमें उत्पन्न होनेवाले शोभाकरने ग्याख्या लिसी है, परन्तु इन सूत्रोंको भी वह ्याति नहीं मिल सकी जो काव्य- प्रकाशाद्त सूत्रोंको मिली है। इस प्रकारसे सूतरोंके विषयमें विचारकर लेनेपर वृत्तिके विषयमें यही कहना होगा कि उन्हीं सूनोंपर लिखी गई व्याख्यायें वृस्तियाँ मानी जा सकती हैं। अलक्कारशास्त्र का क्रम-विकास अलद्टारोंके क्रम-विकासपर बिचार कर नेसे जात होता है कि इसके प्रयोगात्मक स्वरूपमें विकास होनेमें जितना अधिक समय लगा होगा, लक्षणोदाहरणनिरूपणरूप विवेचनात्मक कमविकासमें उतना समय नहीं लगा होगा। जितना समय वस्तुके बननेमें लगता है उतना समय उसके नाम- करणमें भी लगे, यह उच्ित नहीं है। मरतमुनिकत नाट्यसासमें केवल चार ही अलकारोंका उलेक हो पाया है, इसके बाद अगिपुराणमें १६ अलद्ारोंके नाम आये हैं। अधिपुराणके समयके सम्बन्धमें वड़ा सन्वेह

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है, कुछ लोग पुराण-शब्द-प्रथाके आवारपर उसे प्राजीनतम और कुछ लोग अन्तरक्- परीक्षाके आधारपर अनतिप्राचीन मानते हैं, अतः उसमें लिखे गये अलस्रोंका कौन क्रम होगा, यह मी सन्दिग्य है। वास्तवमें अभिपुराण तकका अळक्कारविभाग प्रामाणिक रूपमें नहीं है। अभिपुराणके बाद मलक्कार ग्रन्थ मामहका अलक्कारसूत्र माना जाता है। उसमें निम्नकिखित अलक्कार निरूपित हुए है :- १. अतिशयोक्ति, २. अनन्वय, ३. अनुप्रास, ४. अपछुति, ५. अप्रस्तुतप्रशंसा, ६. अर्थान्तर- न्यास, ७. आक्षेप, ८. आशी:, ९. उत्प्रेक्षा, १०. उत्प्रेक्षावयव, ११. उदात्त, १२. उपमा, १३. उपमा- रूपक, १४. उपमेयोपमा, १५. ऊर्जस्वी, १६. तुख्ययोगिता, १७. दीपक, १८. निदर्शना, १९. पर्या- योक्त, २०. परिवृत्ति, २१. प्रेय:, २२. भाविक, २३ यथासंख्य, २४. यमक, २५. रसबत्, २६. रूपक, २७. विभावना, २८. विरोध, २९. विशेषोक्ति, ३०. व्यतिरेक, ३१. व्याजस्तुति, ३२. श्लेष, ३३. सन्देह, ३४. समासीक्ति,३५. समाहित, १६. संसरि,३७. सहोकि, ३८.स्यभावोक्ति। इस प्रकार मामहने ३८ अलक्कारोंका निरूपण किया है। दण्डीने इनमें कुछ घटा-बढ़ाकर ३७ अलक्कार स्वीकार किये हैं :- श्वभावात्यानमुपमा रूपकं दीपिकावृती। आजेपो्डर्थान्तरन्यासो व्यतिरेको विभावना॥। समासातिशयोक्ेत्ा हेतु: सुष्मो लवःक्रमः । प्रेयो रसवदूवर्जस्वि पर्यायोंकं समाहितम् ॥। उदात्तापक्वतिक्रेपविशेषास्तुव्ययोगिता । विरोधाप्रस्ततस्तोत्रे व्याजस्तुतिनिदर्शने॥ सहोकिः परिवृष्याशीः, सट्टीर्णमथ भाविकम्। इति वाचामलट्टारादर्शिता: पूर्वसूरिभिः॥ काश्िम्मार्गविमागार्थमुक्ता: प्रागप्यलंक्रियाः । (काग्यादर्श २३-७) वामनने केवल ३१ अलक्कार ही निरूपित किये हैं, जिनके नाम ये हैं :- १. अतिशयोत्ति, २. अनन्वय, ३. अनुप्रास, ४. अपहुति, ५. अप्रस्तुतप्रशसा, ६. अर्थान्तर- न्यास, ७. आक्षेप, ८. उत्प्रक्षा, ९. उपमा।, १०. उपमैयोपमा, ११. तुल्ययोगिता, १२. दीपक, १३. निदर्शना, १४. परिवृत्ति, १५. प्रतिवस्तूपमा, १६. यथासंख्य, १७. यमक, १८. रूपक, १९. वक्रोक्ति, २०. विभावना, २१. विरोष, २२. विशेषोक्ति, २३. ग्यतिरेक, २४. व्याजस्तुति, २५. व्याजोक्ति, २६. श्लेष, २७. सन्देह, २८. समासोक्ति, २९. समाहित, ३०. संसृष्टि, ३१. सहोकि। इसी प्रकार रुद्रटने २६ अलक्कार तथा उद्भटने ४१ अल्गार स्वीकार किये हैं। इस प्रसङ्गमें उन सभी आचार्यों द्वारा स्वीकृत अलक्कारोंकी सूची प्रस्तुत करना अनावश्यक है, इससे इतना ही पता लगाना है कि क्रमशः अलक्कारोंके सम्बन्धमें उपयुक्त विचार करके आचार्योंने अलक्वारोंकी संख्या घटाई या बढ़ाई। सर्वाधिक प्रभावशाली, प्रामाणिक तथा वाग्देवतावतार प्रकाशकारने अपने काव्यप्रकाशमें ६९ अलक्कार स्वीकार किये हैं :- उपमानन्वयस्तावदुपमेयोपमा ततः । उत्प्रेवा व ससदेहो रूपकापडुती सथा।। अप्रस्तुतप्रशंसातिशयोकी परिकीसिते। श्ळेवस्तथा समासोकि: प्रोक्का चव निदसंना।। प्रतिबस्तूपमा तड्दू रटाम्तो दीपकं तथा। तुक्ययोगितया चव व्यतिरेक: प्रकीिंतः॥। आंसेपो विभावना क विशेषोक्तिस्तथेव च। यथासंख्यमर्थान्तरम्यास: स्यातां विरोधवद्।। स्वभावोकिस्तथा म्याजस्तुति: प्रोका सहोकिवत्। बिनोकिपरिवृत्ती क अाबिकं काव्यकितवय्।। पर्यायोकमुदासं व समुखय उदीरितः। पर्यावक्ञानुमानं व प्रोकः परिकरस्तथा ॥ म्याजोकिपरिसंस्ये व विज्ञेये हेतुमालया। अम्योऽम्यमुत्तरं सूष्मसारी तहदसङ्रतिः।। समापिस्तु समेन स्पादिषमसवचिकेन न। प्रत्यनीकं मीलितं क स्यातामेक्राइली स्मुती।।

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माम्तिर्मास्तु प्रतीपेन सामान्यं च विशेषवत्। तद्शु गातद्गुणौ सैव व्याधान: परिकी्सित:।। संसटिसंकरी चैवमेकपटिक्दीरिता:। इस प्रदीपोक्ति के अनुमार ६१ अर्थालद्कार और ८ शब्दालक्कार (योग ६९) हुए। इस प्रकार तुरनात्मक दृष्टिकोणसे विचार करनेपर यह भी ज्ञात होता है कि लगग ईसा का बारहवीं शताब्दी तक अलक्कारोंके विषयमें एक प्रकारकी निश्चिन्तता भा गई थी। इस विषय- में इयत्तावधारण करना तो संभव नहीं है; क्योंकि वाग्भङ्गीके मेदसे नये-नये अलक्गार उत्पन होते रहते हैं और वागभङ्गीका नियन्त्रण करना संमव भी नहीं है, वक्ताकी बुद्धिके भेदसे बाग्भङ्गी सदा बदलती रह सकती है, इसीलिये कहा है :- काध्यशोभाकरान् धर्मानलशगारान् प्रचचते। ते चाद्यापि विकल्प्यन्ते, कस्तान् कातसम्येन वच्यति ॥ (काव्यादर्श २-१) 'सहचशो हि महारममिरन्यलक्वारप्रकार: प्रकाशिताः, प्रकाश्यम्ते च।' (ध्यन्या० १) आगे चलकर अलक्गारोंकी संख्या बहुत अधिक वेगसे बढ़ने लगी, १२वीं शताब्दी ईस्वीके बाद और १८वीं ईस्वीं शताब्दीके बीचमें बने हुए ग्रन्थोंमें अपनाये गये अलक्कारोंका विवरण इस प्रकार है। जयदेवने चन्द्रालोकमें ८ शब्दालकुर और ८१ अर्थालक्कार कुल मिलाकर ८९ अलक्कार निरूपित किये हैं। मम्मट द्वारा स्वीकृत अलक्गारोंमें संकर, संसृष्टि, सूक्ष्म नामक तीन अलक्कारोंको छोड़कर शेष ६६ अलक्कार जयदेवने मान लिये हैं और शेष स्वीकृत अलक्कार खुद उन्धावित किये हैं। साहित्यदर्पणकार विश्वनाथने १२ शब्दालक्कार, ७० अर्थालक्गार और ७ रसवदादि अलक्गार कुल ८९ अलद्कारोंका निरूपण किया है। उनके द्वारा निरूपित अलक्कारोंमें ८४ अलक्गार ऐसे हैं, जिनका निरूपण उनके पूर्ववर्त्ती आचार्यों द्वारा किया जा चुका था, ५ अरद्गारोंकी उद्भावना उन्होंने स्वयं की है। द्वितीय वाग्मटने अपने का्यानुशासनमें अन्य और अपर नामक दो अलह्ार उद्धावित किये हैं। अप्पय्यदीक्षितने सब मिलाकर ११८ अलक्कार माने हैं। पण्डितराज जगन्नाथ का रसगङ्गाधर अपूर्ण है, अतः उनके द्वारा स्वीकृत अलद्गारोंकी संख्या नहीं निर्णीत की जा सकती है। इस सम्बन्धमें एक बात और जाननी चाहिये कि सभी आचार्योंने सूचित अलक्कारोंकी सूचीको वर्गोंमें विभक्त कर दिया है, जैसे शब्दालक्ार, अर्थालक्कार और उभयालक्वार। एक दूसरे प्रकार का वर्गीकरण भी पाया जाता है, जैसे सादृश्यमूलक, कार्यकारणभावमूलक आदि। नवीनतम आलोचकोंने निस्नलिखित रूपसे अलद्धारों का वर्गीकरण किया है। १. उपमामूलक-उपमा, उपमेयोपमा, अनन्वय, स्मरणादि। २. आरोपमूलक-रूपक, परिणाम, सन्देह, भ्रान्तिमान् आदि। १. अध्यवसायमूलक-उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति आदि। ४. गम्यमान साहरयमूलक-तुल्ययोगिता, दीपकादि। ५. मेदमूळक-यतिरेक, विनोक्ति आदि। ६. विशेषणादिवैचिभ्यमूलक-समासोक्ति, परिकरादि। 4. विरोधमूळक-विरोष, विभावना, व्याघात आदि।

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८. तर्कमूलक-अनुमान, काव्यलिक्गादि। ९. काव्यन्यायमूलक-यथासंख्य, पर्याय आदि। १०. लोकबृत्तोपन्यासमूलक-मीलित, सामान्य, तद्गुणादि। ११. गूडार्थाभिष्यक्तिमूलक-सूक्ष्म, व्याजोक्ति। १२. रसादिसम्बन्धमूलक-रसवत्, प्रेयः आदि। काव्यादर्श-परिचय काव्यादर्श एक रीतिसम्प्रदायका साहित्यशास्त्र सम्बन्धी ग्रन्थ है। उपलब्ध होने वाले प्राचीन लक्षणग्रन्थों में भामहके बाद दण्डीका काव्यादर्श ही मिलता है। काव्यादशमें तीन परिच्छेद हैं। प्रथम परिच्छेद में काव्यपरिभाषा, काव्यभेद, महाकाव्यादिके लक्षण, गद्यके प्रभेद, कथा, आख्यायिका. मिश्रकाव्य, भाषाप्रभेद और वैदर्भमार्ग एवं अन्यान्य मार्ग तथा अनुप्रास, गुण काव्यकारण आदिका विवेचन किया गया है। द्वितीय परिच्छेदमें ३५ अर्थालक्कारोंके भेदप्रभेदके साथ लक्षणोदाहरणादि निरूपित किये गये हैं। तृतीय परिच्छेदमें यमकप्रपक्न, गोमूत्रिकादि चित्रबन्ध, प्रहेलिका तथा दोषोंका निरूपण विस्तार के साथ किया गया है। काग्यादर्श ही एक ऐसा अ्रन्थ है जिसमें पूर्ववत्ती सभी अलक्गार-ग्रन्थोंसे अधिक अलक्कारोंके उपभेदों एवं रीति तथा गुणादिका विस्तृत विमर्श किया गया है। अन्यान्य अलक्कारशास्त्री (१) भामह-भामहने काव्यालक्कार नामक ग्रन्थकी रचना की है, जिसमें ३८ अल्गारों का निरूपण किया गया है। उद्भट, आनन्दवर्धन और मम्मट जैसे प्रतिष्ठित आचार्यों ने भामइ- का नाम तथा मत गौरवके साथ लिया है। भामहका न्यायदोषप्रकरण अत्यन्त विवेचनापूर्ण है। (२) धमकीर्नि-धर्मकीतिने भी अलक्कारशास्त्रपर कुछ लिखा था, उनका लिखा हुआ ग्रन्थ यद्यपि नहीं मिलता है, तथापि-'अलक्वारो नाम धमकीर्तिकृतो ग्रन्थविशेषः' इस प्रकारके शिवरामलिखित अवतरणसे पता चलता है कि धर्मकीतिने अलक्गारशास्त्रपर भी कुछ लिखा था। उनका बौद्धशाखत्रीय प्रबन्ध तो प्रथित ही है। वामन-वामनने अपने काव्यालक्कारसूत्रमें ३२ अलक्कार निरूपित किये हैं। वामनके काव्यालक्कारसूत्रमें रीतिसम्प्रदायका समर्थन किया गया है, जिसकी आलोचना मम्मटने की है। (४) उब्बट- उद्ट्रटका 'काव्यालक्कारसारसंग्रह' एक प्रसिद्ध ग्रन्थ है, जिसमें ४१ अलक्गारों का निरूपण किया गया है। उन्गट काश्मीरनरेश जयपालके सभास्तार थे, जिसके सम्बन्धमें कल्हणने राजतरद्गिणीमें लिखा है :- 'विद्वान् दीनारलकेण प्रग्यहं कृतवेतनः। भट्टोऽभ्दुद्लटस्तस्य भूमिभर्तः सभापतिः॥' जयपालका समय ७७९ से ८१३ ई० माना जाता है, उद्धटका भी वही समय है। (५) लोहट-लोलटने नाव्यशास्त्रपर टीका लिखी थी, जिसका अव पता नहीं लगता है, केवल अभिनवगुप्त द्वारा किये गये खण्डनके प्रसङ्गमें लोलटके मतका प्रसङ्ग आया है। राजा, शेखरने भी लोलटके मतकी आलोचना की है, जिसमें राजशेखरने लोलटको 'अपराजित' का पुत्र कहा है। अपराजितका समय राजशेखर के समयसे मिकता-जुलता है।

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(६) संुक - सांसुकके रससम्बन्धी विचारकी आलोचना अभिनवगुपतने की है, शंखुक काइमीरी राज अजितापीड़के समयमें वर्समान थे, अजितापीड़का काल ८१४- ८५१ ई० माना जाता है। शंसुकने भावनाम्युदय नामक काव्य भी लिखा है। (७) घण्ठक-घण्टक नामक आचार्यके मतकी आलोचना अमिनवगुप्तके लोचनमें भई है, घण्टकका नाम नाटकसंबन्धी अन्थकरताके रूपमें लिया है। (८) आनन्य्वधन-आनन्दवर्धनका नाम ध्वन्यालोककारके रूपमें प्रसिद्ध है। आनन्द- वर्धन अवन्तिवर्मा नामक राजाके समयमें थे, जिनका समय ८५५ से ८८४ ई० माना जाता है। (९) भहनायक-मट्टनायकका मत मी अभिनवगुप्त द्वारा आलोचित हुआ है। भट्ट- नायक भी अवन्तिवर्माके दरवारी कवि माने जाते हैं, अतः उनका समय भी ८५५-८८४ माना या सकता है। (१०) मुकुक-मुकुलका 'अभिधावृत्तिमातृका' नामक अन्थ प्रसिद्ध है, उनका समय भी ८५५-८८४ ही है। (११) राजशेखर-राजशेखर का साहित्यिक आलोचनासन्बन्धी 'काव्यमीमांसा' नामक ग्रन्थ अतिप्रसिद्ध है। राअशेखर आलोचक होनेके साथ ही उत्तम कवि मी थे। राजशेखरका रचनाकाल ८८४ से ९२५ ई० तक प्रमाणित है। (१२) रुज्रट-रुद्रट काश्मीरी थे, उनके लिखे दो ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं, काव्यालक्वार तथा श्रक्गार- तिलक। रुद्रटका समय नवम शताब्द्ीका उत्तर भाग माना जाता है। रुद्रटका काव्यालक्गार आर्याछन्दमें लिखित तथा सोलह अध्यायोंमें विभक्त है। अलक्गारोंको रुद्रटने वास्तव, औपम्य, पतिस, और इ्लेष नामक नामविभागोंमें विभक्त किया है। (१३) नमिसाधु-नमिसाधु नामक श्वेताम्बर जैनने रुद्रटके काव्यालकवार पर टीका किसी है। वह टीका ११२५-११५६ के बीच लिखी गई है। (१४) बनअय -पनजयका लिखा हुआ दशरूपक नामक ग्रन्थ प्रसिद्ध है। धनजय प्रतिहारेन्दुराज द्वितीयके समयमें थे, अतः उनका काल ९७४ से ९९५ तक माना जाता है। (१५) अमिनवगुप्त-अभिनवगुप्त एक प्रतिष्ठित आचार्य थे। उनके लिखे हुए 'अमिनव- भारती' तथा 'लोचन' नामक ग्रन्थ अलकारशाख्रके लिये प्रमाणभूत माने जाते हैं। अभिनव गुप्ताचार्यका समय ९७०-१०५० माना जाता है। (१६) उत्पलदेब-उत्पलदेव अभिनवगुप्तके गुरुओंमेंसे थे। उनका लिखा हुआ प्रत्यमिज्ञा दशनविषयक अ्रन्थ प्रसिद्ध है। उनका समय १०म शतकका आदि भाग है। (१७) भक्टतीत-मट्ठतौतविरच्ित काव्यकौतुक नामक ग्रंथ अब अप्राप्य हो गया है, परन्तु उसका उदरण माणिक्यचन्द्रने अपने ग्रन्थमें किया है, जिससे पता चलता है कि वह अ्रन्थ साहित्य- शाखका था। उनका समय भी दशम शतकका प्रारम्भ माना जा सकता है, क्योंकि उनके मतका डलेख लोचनमें भी आया है। (१८) भहेन्दुराज-मट्टेन्दुराजका कोई स्वतन्त्र अन्थ अग नहीं पाया आाता है, परन्तु उनका उस्केल क्षेमेन्द्रवरचित औनित्यविचारचर्चामें आया है। मट्टेन्दुराजका समय ९म शतक हो सकता है। (१९) तीरस्वामी-धीरस्वामी भटेन्दुराजके शिष्य थे, उनके द्वारा विरचित 'अभिनय- रायद' नामक अन्य का अवतरण रामयन्द्रने दियां है। उनका समय ९म झतक हो सकता है।

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(२०) भोज-पारावीश महाराज भोजका सरस्वतीकण्ठामरण तथा शरङ्गारप्रकाश नामक अ्रन्थयुगळ साहित्यशाखमें विखयात है। भोजका समय एकादश शतकका आदि भाग निश्चित है। ( २१) अजितसेन-अजितसेनने अलक्गारचूड़ामणि नामक अन्थ अलक्गारपर तथा श्रक्गार- मजरी नामक ग्रंथ रसशास्त्र पर लिखा था। उनके ग्रंथ पद्यबद्ध थे। वह १०म शतकमें विद्यमान थे। (२२) श्रेमेन्द्र-क्षेमेन्द्रविरचित औचित्यविचारचर्चा नामक अ्रन्थ औचित्यसम्प्रदाय- प्रवर्त्तकतया स्वनामख्यात है। क्षेमेन्द्रका समय लगभग १०५० ई० है। (२३) कुम्तक-कुन्तकविर चित 'वक्रोक्तिजीवित' वक्रोक्तिसम्प्रदायका प्रथान ग्रन्थ माना जाता रहा है। कुन्तकने ध्वनिको वक्रोक्तिस्वरूप माना है। कुन्तकका समय १०म शतक और ११ शतकका मध्य भाग है। (२४) महिमभट्ट-महिमभट्टने अपने समयके प्रसिद्ध ग्रन्थ ध्वन्यालोकका खण्डन अपने 'व्यक्तिविवेक' नामक अन्थमे बड़े जोरदार सब्द्ोंमें किया है, उनका भी एक अपना ख़ास व्यक्तित्व है। काव्यालोचकों में महिममट्ट की महिमा विख्यात है। उनका समय ९१ शतक का आदि भाग है। (२५) मम्मट-मम्मटका नाम वागदेवतावतार के रूपमें प्रसिद्ध है। इनका काव्यप्रकाश स्वनामख्यात है। उनका समय एकादश शञतक निश्चित है। (२६ ) माणिक्यचन्द्र-माणिक्यचन्द्र काव्यप्रकाशके सर्वप्रथम टीकाकारके रूपमें प्रसिद्ध है। उनकी सक्केल नामक टीका ११६० ई० में लिखी गई थी, अतः उनका समय वही माना जाता है। काव्यप्रकाशकी टीकाओंमें सक्केतके अतिरिक्त सरस्वतीतीर्थ्कृत टीका (समय १२४२ ई०), जयन्तभटटकृत जयन्ती टीका (समय १२६४ ई०), श्रीवत्सलाञ्छनकृत टीका (समय १६वीं शताब्द्री), सोमेश्वरकृत टीका (समय १४ शतक), साहित्यदर्पणकर्त्ता विश्वनायकृत टीका (समय १४ शतक ), चण्डीदासकृत टीका, चक्रवत्तीकृत टीका (समय १५ शतक), महेश्वर न्याया- लक्कारकृत टीका (समय '६ शतक ), आनन्दराजानककृत शिवपक्षीय टीका (समय १७६५ ई०), कमलाकरकृत टीका (समय १६१२ ई० ), नृसिंहठाकुरकृत टीका (समय १७ शतकका पूर्वार्द्ध), विधानाथकृत टीका (समय १७ शतकका परार्ध), मीमसेनकृत टीका (समय १७२३ ई०), रत्नकण्ठरचित मारसमुच्चय टीका (समय १७ श शतकका उत्तरार्थ ) गोविन्द ठाकुर- कृत काव्यप्रदीप (समय १६ वीं शताब्दी) अपने प्रामाणिकत्वके लिये प्रसिद्ध है, अतः इन टीका- कारोंकी गणना अलक्कारशाख्तियोंमें की जाती है। काव्यप्रकाशकी अन्य टीकायें व्याख्यामात्र है, अतः उनके विषयमें विवरण नहीं दिया जा रहा है, उनकी संख्या बहुत बड़ी है। (२७) ब्रेमेन्द्र-हेमचन्द्रका काव्यानुशासन प्रसिद्ध अलक्गारग्रन्थ है। उसकी रचना १०८८-११७४ के बीचमें हुई है। इन्हींके समसामयिक जयमझलने कविशिक्षानामक ग्रन्थ तथा नागवर्माने काव्यालोचन नामक ग्रन्थ लिखा है। (२८) वाग्मट-वाग्मटने बाग्मटालट्गार नामक ग्न्थ १०९४-११४३ के बीचमें लिखा है। (२९ ) देवेशवर-देवेश्वरने कविकल्पलता नामक ग्रन्थ लिखा है, उनका समय १३०० ई० के रगभग माना गया है। (३०) बाग्भट (द्वितीय)- वाग्मट (द्वितीय) ने काव्यनुशासन नामक ग्रन्थ लिसा है, उनका समय न्रयोदश अतकका अन्त समझा जाता है।

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(३१) वय्यक-रव्यककृत अलक्कार-सर्वस्व एक प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसका पाण्डित्य- गौरव प्रख्यात है। इस अन्थके दो भाग हैं, सूत्र और वृत्ति। इतिहासक्ोंका मत है कि रुय्य ने सूत्रमात्र बनाये हैं, वृत्तिभाग मङ्गकी कृति है। इस वृत्तिग्रन्थ पर जयरथकृत टीका प्रसिद्ध है। (३२) मलयज पण्डित-मलयज पण्डितकी रचना साहित्यसार हे, जो लगमग ११६८ ई० में लिखा गया है। ३३ ) राजराज-राजराज नामक विद्वान्ने 'राजराजीयम्' नामक अलक्कारग्रन्थ लिखा है। उसका निर्माण १२ वाँ शतक है। (३४) आशाधर-आशाधरका समय १२४० ई० माना गया है, उनकी बहुत-सी कृतियों- में त्रिषष्टिस्मृतिशाख्र प्रसिद्ध है। (३५) अमंदास-धर्मदास एक बौद्ध विद्वान् हुए हैं। उनकी कृति विदग्धमुखमण्डन प्रसिद्ध है। उनका जीवनकाल १३९३ से १३०९ तक प्रमाणसिद्ध है। (३६) शरदातनय-शारदातनयका 'भावप्रकाशनम्' नामक ग्रन्थ प्रख्यात है। उनका समय १२-१३ वें शतक का मध्य माना जा सकता है। (३७) शोभाकर-शोभाकरविरचित अलभ्काररल्ाकर यशकरविरचित मूल ग्रन्थकी व्याख्याके रूपमें है। ये १३ वें रतकमें विधमान थे। (३८) सिंगभूपाल-सिगभूपाल १४ वीं शताब्दीमें दक्षिण-भारतमें विद्यमान थे। उनके दो ग्रन्थ मिलते हैं, जिनमें एक रस पर तथा दूसरा नाटक पर है। (३९) विश्वनाथ-साहित्यदर्पण-निर्माता विश्वनाथ अतिप्रसिद्ध हो गये हैं, उनका समय १४ वाँ शतक अभ्रान्नरूप में निर्धारित हो गया है। (४०) विश्वनाथ (द्वितीय)-धारासुरनिवासी विश्वनाथ प्रसिद्ध विश्वनाथसे भिन्न आचार्य थे। उनका लिखा 'साहित्यसुधासिन्धु' नामक ग्रन्थ मिलता है। उनका समय अनिश्चित है, परन्तु उन्होंने अपने ग्रन्थ में काव्यप्रकाशके व्याख्याकार चण्डीनासको याद किया है, जिसमे उन्हें चण्डीदासके बादका ही मानना होगा। (४१) भानुदृत्त - भानुदत्त मिश्र मिथिलानिवासी तथा रसमंजरीके निर्माता के रूपमें प्रसिद्ध हैं। (४२) जयदेव-जयदेवका चन्द्रालोक एक प्रसिद्ध अन्थ है। इनका समय क्या है ? इस सम्बन्धमें मतभेद पाया जाता है। यदि चन्द्रालोककारको ही प्रसन्नराघवका निर्माता मान लिया जाय तो इनका समय १२ वीं और १३ वीं शताब्दीके मध्यमें हो सकता है, और यदि मैथिल सम्प्रदायके मन्तव्योंके अनुसार प्रसननराघवके प्रणेता और चन्द्रालोकके प्रणेतामें भेद माना जाय तो उनका अर्वाचीन होना ही युक्तिसङ्गत माना जायगा। (४३) सुखलाल-सुखलाल मिश्रने चन्द्रालोककी कारिकाओंको आधार बनाकर अलक्कार- मंजरी नामक ग्रन्थ लिखा है। उनका समय १८ वीं शताब्द्रीका मध्य माना जा सकता है। (४४ ) वेमभूपाल-वेमभूपालका लिखा साहित्यचिन्तामणि नामक अलङ्गारग्रन्थ उपलब्ध होता है। उनका समय १५ वीं शताब्द्रीका प्रारम्भ माना गया है, क्योंकि १४२० में उनका देहाबसान बताया जाता है। (४५) अनुरथमण्डन-अनुरथमण्डन नामके एक जैन विद्ान् हो गये हैं उनके द्वारा किसे गये दो ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं-जल्पकश्पलता और मुग्धमेधाकर। उनका समय १८ वीं शताब्दीका मध्यभाग निश्चित है।

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(४६) पुअराज-पुञ्जराज एक राजा थे जो मालबामें शासक थे। उनके द्वारा अपने भाई मुजके लिये राज्यत्यागकी बात प्रसिद्ध है। पुजराजकी रंचनाओंमें ध्यनि-प्रदीप और शिश- प्रबोधाकक्ार नामक अन्थ प्रसिद्ध है। उनका समय १५ वीं शताब्दीका अवसान भाग माना जाता है। (४७) अप्पयद्दीचित-अप्पयदीक्षितका कुवलयानन्द तथा चित्रमीमांस। नामक ग्रन्थ अलक्कार शास्त्रमें अतिप्रसिद्ध है। अप्पयदोक्षितका समय १५५४-१६१३ ई० है। (४८) कृष्णसुधी-कृष्णसुधीका 'काव्यकलानिषि' नामक अन्थ प्रसिद्ध है। उनका समय १८ वीं शताब्दीका प्रारम्भ माना जाता है। (४९) कृष्णशर्मा-कृष्णशर्माका मन्दारमण्डनचम्पू नामक ग्रन्थ अलक्गारका अच्छा-प्रन्थ है। यद्पपि नाममें चम्पू शब्द जुड़ा हुआ है, परन्तु उसे अलक्कार तथा रसके लिये विश्वकोष समझा जाता है। उनका समय १७ वीं शताब्दी है। (५०) प्रभाकर-प्रभाकरका रसप्रदीप १५८३ ई० में लिखा गया, जिसमें तीन अध्याय है। इनमें क्रमशः, काव्य, रस, ध्वनिकी विवेचना है। (५१) बलदेव-बलदेव विद्याभूषण चैतन्यमहाप्रभुके अनुयायी थे। उनके लिखे हुए साहित्यकौमुदी तथा काव्यकौस्तुभ नामक अ्रन्थ विख्यात है। वे जयसिहके समय में १८ वीं शताब्दी में विदयमान थे। (५२) विश्वेशवर-विश्वेश्वर पर्वतीय अल्मोड़ाके रहनेवाले तथा अतिप्रतिमाशाली थे। वे ३४ वर्षकी अवस्थामें ही स्वर्गीय हो गये। उनके लिखे ग्रन्थोंमें-अलक्वारकौस्तुम, अलक्काराभरण, आर्यासप्तशती, अलक्वारप्रद्वीप, अलक्कारमुक्तावली आदि प्रसिद्ध हैं। उनकी दशमी पीढ़ीके लोग आज भी विद्यमान है, इसीसे उनके समयका अन्दाज लगाया जा सकता है। (५३) राजशेखर -१९ वीं शताब्दीमें दक्षिण देशमें उत्पन्न राजशेखर नामक एक विद्वान्- ने ८१ स्तवकोंमें विभक्त साहित्यकल्पद्रुम नामक अलक्कारग्रन्थ लिखा है। (५४) रत्भूषण-रल्षभूषण नामक एक वङ्गीय विद्वान्ने १८५९ ई० में काव्यकौमुदी नामक एक ग्रन्थ लिखा है, जिसके अगले अध्यायोंमें आलक्कारिक विवेचन है। (५५) शीशैल नरसिंहाचार्य-श्रीशैल नरसिंहाचार्यका अलक्कारेन्दुशेखर लक्षणमालिका नामक ग्रन्थकी व्याख्या होकर भी अलक्कारके निरूपणमें अपना स्थान रखता है। नरसिहाचार्य- का समय १७ वीं शताब्दी हो सकता है। (५६) रामसुम्नक्ण्यम्-रामसुब्रह्मण्य शास्त्रीने अलक्कारशास्त्रविलास नामक एक अन्थ लिखा है। उनका देदान्त १९२२ ई० में हुआ। (५७) मुडुम्बई नरसिंहाचार्य-ये विजयानगर महाराजके समापण्डित हो गये हैं। इन्होंने अलक्वारपर काव्यसूत्रवृप्ति, काव्योपोद्धात, काव्यप्रयोगविधि एवं अलक्गारमाला नामक ग्रन्थ लिखे है। ये ६९ वीं शताब्दी के प्रारम्भमें विद्यमान थे। (५८) विद्यानाथ-विद्यानाथका प्रतापरुद्रयशोभूषण एक प्रसिद्ध अन्थ है। उनका समय १२६८-१३२८ ई० माना गया है। (५९ ) विद्याधर-विद्यावरने एकावली नामक ग्रन्थ लिसा है। उनका समय ११ वी शताब्दीका आदि भाग माना जाता है।

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(५०) भर्मंसुची-धर्मसुषी नामक एक तैलक विद्वान्ने साहित्यरलाकर नामक ग्रन्थ लिखा है। उनका समय १८ वीं शताब्दीका आदि भाग माना गया है। (६१) शाठकोपाचार्य-शाठकोर्पाचार्यें नामप्रसिद्ध वैष्णव सन्तके ने संबद् शठकोप कह्ारपरिचय नामक अलक्कारग्रन्थ मिलता है, जिसके निर्माताका नाम अविदित है। (६२) सुधीन्द्रयोगी-सुधीन्द्रयोगी नामक एक विद्वान्ने अलक्कारविकाश नामक एक अर्थालक्कारनिरूपणपरक अ्रन्थ प्रसिद्ध किया है। वे सत्रहवीं शताब्दीमें विद्यमान थे। (६३) वीरनारायण-साहित्यचूडामणि नामक जो अ्न्थ १५ वीं शताब्दीमें लिखा गया, उसीके रचयिता वीरनारायण हैं। (६४) श्रीकृष्ण-श्रीकृष्णापर नामक परकाल स्वामी आचार्यने अलक्कार मणिहार नामक ग्रन्थ लिखा है। उनका समय १७ वीं शताब्दी है। (६५) कर्णपूर-गोस्वामी कर्णपूरने अलक्कारकौस्तुभ नामक ग्रन्थ लिखा है। कर्णपूर का समय सोलहवीं शताब्दीका उत्तर भाग है। (६६ ) रूपगोस्वामी - रूपगोस्वामीका उज्ज्वलनीलमणि िना रसविषयक ग्रनंन् थ है । उसका रचनाकाल १५ वीं शताब्दी है। (६७) आचार्य केशव-किसी बौद्धाचार्यने शौद्धोदनि नामसे अलक्कारपर कारिकायें लिखी थीं जिन्हें आधार बनाकर केशव मिश्रने अलङ्कारशेखर नामक वृत्तिग्रन्थ बनाया है। केशव मिश्रका समय १६ वाँ शतक है। उनके द्वारा व्याख्यात कारिकाओंका समय १२ वाँ शतक माना जाता है। (६८) पण्डितराज-पण्डितराज जगननाथका रसगङ्गाघर अपनी पाण्टित्यपूर्ण विवेचना- पद्धतिके लिये प्रसिद्ध है। उनका समय १७ वीं शताब्दीके आदिसे तृतीयचरण तक माना जाता है। (६९) मुरारिदान तथा सुमण्यम्-मेवाड़नरंश यशवन्तसिंहके नामको अमर बनानेके लिये कविराजा मुरारिदान तथा सुब्रह्मण्यशास्त्रीने यशवन्तयशोभूषण नामक अ्रन्थकी रचना की। उनका समय १९ वीं शताब्दीका परार्ध माना गया है। इनके अतिरिक्त अलक्कारशाख्रके कुछ और भी अ्रन्थों तथा उनके रचयिताओंके नाम दिये जा रहे हैं। उनका कालनिर्देश सन्दिग्ध होनेसे नहीं किया जा रहा है। प्रग्थनाम मिर्मावृनाम (१) काव्याकक्कारसूत्र यास्कमुनि, अखिलानन्दाश्रमकृत टीका ( २) अरुक्कारविचार ( ३) अलक्कारप्रकाशिका जीवनाथ (४) अलक्ारशेक्षर (५) अलङ्कारशिरोभूषण कुण्ड लाचार्ये ( ६) अलद्टारकर माला दामोदरभट्ट (७) अलङ्कारकौमुदी वल्लभभट्ट (८) अलक्कारसार नृसिंह (९) अल्क्ारकोस्तुभ बेकुटाचार्य (१०) अकक्वारसूत्र चन्द्रकान्त तर्कालक्गार (११) अलक्कारचन्द्रिका (१२) अलक्कारकारिका

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(१३) अलक्कारकोमुदी ( १४) अलक्कार मयूख (१५) अलङ्कारानुक्रमणिका (१६) अलक्कार प्रकरण (१७) अलक्कार प्रकाशिका बालकृष्ण (१८) शताल क्वारानुक्रमणिका (१९) अलक्कारसारसंग्रद्द ( २०) अलङ्कारग्रन्थ (२१ अलक्गारवादार्थ ( २२ ) अलक्कारसार (२३ ) अलक्कार मजजरी त्रिमल्लभट्ट (२४) अलक्कार मअूषा देवशक्कर (२५) अलक्कारसमुद्गक शिवराम (२६ ) काव्योल्लास नीलकण्ठ (२७) काव्यसार संग्रहत्रय श्रीनिवास (२८) काव्यचन्द्रिका रामचन्द्र न्यायवागीश (२९) काव्यवृत्तरलावली नारायण (३०) काव्यकण्टकोद्धार नरसिंह शाख्त्री यत्र-तत्र पुस्तकालयोंकी पुस्तक-सूचियोंमें कुछ अज्ञातकसृक तथा अनुपलभ्यमान अन्यान्य अलक्कारग्रन्थोंके भी नाम उपलब्ध होते हैं जिनका नाम मैंने नहीं लिखा है। दण्डीका काल तथा अन्य वृन्तान्त दण्डीके समयपर विचार करते समय निम्नलिखित बातोंपर ध्यान दिया जाता है :- (१) दशम शताब्दीमें उत्पन्न अभिनवगुप्ताचार्यने लोचनमें लिखा है :- 'यथा दण्डी-गद्यपद्यमयी चम्पूः' (तृतीय उदोत, ७ म कारिकाकी वृत्ति) (२) दशमशनक पूर्वाद्धमें उत्पन्न प्रतिहारेन्दुराजने उद्भटरचित काव्यालक्कारसारसंग्रहकी लघुवृत्तिमें लिखा है :- -अत एव दण्डिना-'लिम्पतीव' इत्यादि। (३) कन्नड भाषामें 'कविराजमार्ग' नामक ग्रन्थ है, वह राष्ट्रकूटके राजकुमार अमोधवर्षका लिखा है। उसे स्पष्टतः काव्यादर्शपर आधारित माना जा सकता है। उसका निर्माणकाल ८१५ से ८७५ ई० तक माना गया है। (४ ) सिंहली भाषामें प्रथम राजासेनने 'सियाकसलकार' (स्वभाषालक्कार) नामक ग्रन्थ लिखा है। महावंशके अनुसार उसकी रचनाका काल ८४६-८६६ ईस्वी है। उस ग्रन्थपर काव्यादर्शका प्रभाव ही नहीं, काव्यादर्शका नाम भी उललिखित है। (५) वामनने अपने काव्यालक्गारसूत्र में जिस रीतिको काव्यकी आत्मा बताकर विस्तृत विवेचन दिया है, वह मार्ग शब्दसे दण्डीके ग्रन्थमें वर्णित है। दण्डीके समयमें रीति शब्दका पता नहीं था। दण्डीने दो हो मार्ग माने थे। वामनने उसकी जगहपर तीन रीतियाँ स्वीकार की हैं। इससे स्पष्ट है कि दण्डी वामनके पूर्ववरतती थे। वामनका समय जयापीड़ का राज्यकाल ७७९ से ८१३ ई० माना जाता है।

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इन बातोंसे दण्डीके समयकी उत्तरी सीमा अष्टम शतक निश्चित है। इसी प्रकार पूर्वी सीमापर विचार करते समय निम्नलिखित बातोंपर ध्यान दिया जाता है :- (१) शायधरपद्धतिमें महारानी विब्जिकाके नामसे एक शरोक है :- नीळोप्पकद्ळरयामां विजिकां मामजानता । वृथेव दण्डिना प्रोक्ता सर्वशुक्का सरस्वती।। यह आक्षेप काव्यादशंके मङलक्लोकमें 'सर्वशुक्का सरस्वती' यह कथन देखकर ही किया गया था। विज्जिका चन्द्रादित्यकी रानी थी। चन्द्रादित्यद्वितीय पुलकेशीका पुत्र था, जिसका समय ६६० ई० नियत है। इससे प्रमाणित होता है कि दण्डी उससे पहले विद्यमान रह चुके थे। (२) 'वासवदत्ता' नामक प्रसिद्ध गद्यग्रन्थके रचयिता सुबन्धु नामक कविवर छठी शताब्दी- में हुए थे। उन्होंने-दण्डी द्वारा निमित या आहत-'छनदोविचित्यां सकलस्तत्प्रपञ्नः प्रदर्शितः द्वारा स्मृत 'छन्दोविचिति' नामक ग्रन्थका उल्लेख बार-बार किया है :- इन्दोविचितिरिव कुसुमविचित्रा। छन्दोविचितिरिव मालिनी सनाथा॥ इस तरह दण्डीके समयकी पूर्वसीमा छठी शताब्दी मानी जा सकतीं है। इन्हीं सब बातोंपर विचार करके मि० मैक्समूलर, वेबर, मैकडोनल, कर्नल जेकब प्रभृति पाश्चात्य विद्ान् दण्डीका समय छठी शताब्दी ही मानते हैं। काव्यादर्श में एक श्रोक आया है :- रत्नभित्तिषु संक्रान्तैः प्रतिबिम्बशतैर्वृतः। ज्ञातो लट्टेशरः कृष्ठ्रादाअनेयेन तत्वतः ॥ (काव्यादर्श २-३०२) इसकी समता माघके निम्नलिखित क्लोकसे है :- रवस्तम्भेषु सडक्रान्तप्रतिमास्ते चकाशिरे। एकाकिनोऽपि परितः पौरुषेयवृता इव ॥ (माघ २-४ ) काव्यादर्शका श्रोक :- अरव्ालोकसंहार्यमचार्य सुर्यरश्मिमिः । रष्टिरोधकरं यू्ना यौवनप्रभवं तमः॥ वाणभट्टकृत कादम्बरीगत शुकनासोपदेशमें वर्नमान :- अभानुभेधमरत्ालोकोच्छ्ेद्यमप्रदीप प्रभापनेयमतिगहनं हि तमो यौवनप्रभवम्। इन्हीं तुलनाओंके आधारपर कुछ आलोचकोंने दण्डीका समय माघ तथा बाणके बाद मान लिया है, परन्तु मेरे विचारमें इस समानतामात्रके आधारपर कुछ दृढ़तापूर्वक नहीं कहा जा सकता। एक और भी तर्क उपस्थित किया जाता है-अवन्तिसुन्दरीकथामें लिखा है कि द्रण्डी भारवि- के वंशधर थे। भारविके पिता नारायण स्वामी पहले गुजरातमें रहते थे। वहाँसे वे दक्षिणके अचलपुरमें आ बसे। इसी अनलपुरको अब एलिचपुर कहते हैं। नारायणस्वामीके पुत्र भारवि (दामादर) के पुत्रोंमें अन्यतम मनोरथके पुत्र वीरदस्तसे गौरी नामक जननीसे दण्डीका जन्म हुआ। भारविका समय ६३४ से पूर्वका माना जाता है। प्रत्येक पीढ़ीके लिए यदि २० वर्षका समय भी मानें तो इस तरह दण्डीका समय ७ वीं शतान्दीका अन्तिम भाग सिद्ध होता है। काव्यादर्शनें कुछ वारतें ऐसी भी आई हैं जिनसे दण्डीके समयपर प्रकाश पड़ता हे। द्विनीय परिच्छेद में 'इति साक्षारकृने देवे रजो यद्धातवर्मणः ऐसा उल्लेख है। इसमें रानवर्मा के स्थानपर राजवर्मा यह पाठभेद पाया जाता है। यह रानवर्मा या राजवर्मा पल्वनरेश द्वितीय नृसिहवर्माका नामान्तर था। काश्चीके राजदरबारमें दण्डी रहते भी थे। उसी परिच्छेदमें अवन्तीकी राजकन्याका भी उल्लेख है- सैवावम्ती मया लब्धा कथमत्रैव जम्मनि।

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तृतीय परिच्छेदगत-'वराहेणोडता यासौ वराहेरुपरि स्थिता' में 'बराइ' पदका श्लेष चालुक्यवंशीय राजाओंके राजचिह्का धोतक है। इसी प्रकार यमकप्रपश्चमें आनेवाले- 'कालकाल' शब्दसे काशीके नरसिंहवर्माकी उपाधि व्यजित की गई है। तृतीय परिच्छेदमें प्रहेरिका-प्रकरणमें काश्ी तथा पल्लवनृपतिका नामोल्लेख आया है। इन सारी बातोंपर ध्यान देनेसे दण्डी का समय निश्चित रूपसे नहीं तो विशेष सम्भावित रूपमें ७ म शतकका अन्त भाग माना जा सकता है। दण्डीका देश जैसा कि पहले बताया गया है, दण्डीके पूर्वज गुजरात प्रान्तके आनन्दपुरसे आकर दक्षिण देशके अचलपुरमें बस गये। वहाँ आनेवाले उनके वृद्ध प्रपितामह थे। उनके दाक्षिणात्य होने में-काकी, कावेरी, चोल, कलिक, मलयानिल आदि दक्षिण में प्रसिद्ध स्थानोंके उल्लेखको ही साक्षी बनाया जाता है। उनके दाक्षिणात्य होनेके विषयमें यह भी प्रमाण उपस्थित किया जाता है कि काश्मीरी आल- कारिकोंने उनका उद्धरण प्रायः नहींके बराबर दिया है। खण्डन-मण्डनके रूपमें उनका उल्लेख बिलकुल नहीं किया है जिससे स्थानकृत पक्षपात तथा आपसी प्रतिद्वन्द्विताभाव व्यक्त होता है, और दण्डीको सुदूरदक्षिणनिवासी प्रतीत कराता है। दण्डीका जीवनवृत्त 'अवन्तिसुन्दरी कथा' और 'अवन्तिसुन्दरीकथासार' नामक उपलभ्यमान ग्रन्थोंके आधारपर बताया जा सकता हैं कि नारायणस्वामी नामक विद्वान्के पुत्र भारवि (किरातार्जुनीयकार) के तीन पुत्र हुए, जिनमें मध्यम पुत्रका नाम मनोरथ था। मनोरथके चार पुत्रोंमें सबसे छोटे पुत्रका नाम वीरदत्त था। वीरदत्तकी खरीका नाम गौरी था। वही वीरदत्त तथा गौरी दण्डीके पिता-माता माने जाते हैं। दण्डी कौशिक गोत्रके ब्राह्मण थे। ये अपने प्रपितामह भारविके आश्रयदाता नृपवंशके आश्रयमें काज्चीमें रहा करते थे। कान्जीमें जब पर राजाका आक्रमण हुआ तब ये जङ्गलमें जा छिपे। यह विप्वव ६५५ ई० में हुआ था। उस समय दण्डीकी अवस्था बहुत कम थी। इससे यही सिद्ध होता है कि दण्डीका समय सप्तम शताब्दीका उत्तरार्ध तथा अष्टम शताब्दी- का आदिभाग है। दण्डीका असली नाम क्या था, इसका पता नहीं चलता। दशकुमारचरितके मङगला- चरणके -'ब्रह्माण्डष्छत्रदण्डः शतष्तिभवनाम्भोरहो नालदण्डः' इस श्रोकमें बरावर दण्ड शब्दके प्रयोगसे प्रसन्न होकर किसीने इन्हें दण्डी कहकर सम्बोधित किया होगा, और यही नाम प्रचलित हो गया होगा, जैसा कि भवभूति-माघ आदि कवियोंके विषय में प्रसिद्ध है। दण्डीका पाण्डित्य और उन के ग्रन्थ जाते जगति वाश्मीको कविरित्यभिघाभवद्। कवी इति ततो ष्यासे कवयस्तवयि दण्डिनि॥ उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थगौरवम्। दण्डिनः पदलालित्यं माघे सन्ति त्रयो गुणाः ।। इन प्राचीन शोकोंसे दण्डीके उद्दाम कवित्वका परिचय प्राप्त होता'है। दण्डीके प्रस्र पाण्डित्यका पता इतनेसे ही लगाया जा सकता है कि जब अलक्कारशाखत्रपर कुछ खास ग्रन्थ नहीं बन सके थे, उस समय भी उन्होंने अपने ग्रन्थमें अलक्वारशाख्तरकी नीव दृढ़ करनेवाले ग्रंथका प्रणयन किया और अपनी कृतिको अत्यन्त सरल एवं सरस बनाकर विद्वानोंको सुग्य कर दिया।

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यदि काव्यादर्शकी अन्तरक् समीक्षा की जाय तो दण्डीका उत्कट पाण्डित्य प्रमाणित किया ना सकता है। दण्डीने कर्मके निर्वश्य, विकार्य, प्राप्य आदि मेदोंका वर्णन करने तथा 'लिम्पतीव तमोङ्गानि' इस प्रकरणके शास्त्रार्थमें महाभाष्यका साक्ष्य प्रस्तुत करके अपने वैयाकरणत्वका परिचय प्रदान किया है, साथ ही हेतुविद्याविरुद्धता आदि दोषोंके स्वरूप बतानेके प्रसङ्गमें अपने न्यायपाण्डित्यकी सूचना दी है। अन्यान्य शास्त्रोंके विषयमें भी जहाँ-तहाँ अपना विचार व्यक्त करके दण्डीने अपने पाण्डित्यका चतुरस्त्रत्व अभिव्यक्त किया है। अलक्कारशाख्तमें दण्डी- के समान प्रौढ़ पाण्डित्यसमन्वित सुन्दर कवित्वका पात्र कोई दूसरा हुआ है, यह सन्दिग्ध ही है। यथपि मद्भट, राजशेखर तथा मम्मट जैसे प्रतिष्ठित साहित्याचार्योंने भामहके मतका उल्लेख जितने गौरवके साथ किया है, उतना गौरव दण्डीके प्रति नही प्रकट किया, परन्तु इसका कारण यह नहीं माना जा सकता दण्डीके ग्रन्थका महश्व भामहके ग्रन्थसे कम है। तुलनात्मक दृष्टिसे विचार किया जाय तो यदि भामहका न्यायदोषप्रकरण दण्डीसे अधिक विशद है तो दण्डीकी अलक्कार, गुण, रीतिकी विवेचना भामइसे कहीं अधिक परिष्कृत है। उ्द्रट, राजशेखर, मम्मट आदि द्वारा सादर समुल्लेख नहीं किये जानेका तो कारण उनका काश्मीरक पक्षपात ही :माना जाना चाहिये। भामह काश्मीरक होनेके कारण उनके अधिक आदरपात्र थे और सर्वगुणसम्पन्न होनेपर भी दण्डी दाक्षिणात्य होनेसे उनके लिये उपेक्षाके पात्र थे। आत्मीयताका लाभ तो मिलना ही चाहिये। त्रयोऽ्ग्नबख्तयो वेदाखयो देवास्त्यो गुणाः। त्रयो दृण्डिप्रबण्घाक् त्रिषु लोकेषु विश्रुताः ॥ यह फोक 'पीटर्सन्'ने राजशेखर के नामसे उद्धृत किया है। इसके अनुसार दण्डीके तीन ग्रन्थ प्रमाणित होते हैं-१. काव्यादर्श, २. अवन्तिसुन्दरीकथा, ३. दशकुस्ारचरित। जैसे काव्यादर्शका दण्डिरचित होना सदासे प्रसिद्ध है, उसी तरह दशकुमारचरितका भी। अवन्ति- सुन्दरोकथा भी इधर दक्षिणभारतग्रन्थावलीमें मुद्रित होकर प्रसिद्ध हो गया है। 'छान्दोविचित्यां सकलस्तत्प्रपञ्तः प्रदशितः' इस प्रकारका उल्लेख पाकर कुछ लोगोंने 'छन्दोविचिति' नामक चतुर्थ ग्रन्थ भी दण्डीका माना है, परन्तु यह स्वतन्त्र अ्रन्थ बना था या नहीं, यह किसी तरह सिद्ध नहों होता है। इसके अतिरिक छन्दोविचिति शब्द पिङ्गलका छन्द :- सूत्रपरक भी हो सकता है। 'तस्याः कलापरिच्छेदे रूपमाविर्भविष्यति' इस उल्लेखके आधार पर कलापरिच्छेद'नामक ग्रन्थकी कल्पना भी इसी तरह है। कुछ लोगोंने-आगशे आदिने-इस आधारपर दशकुमारचरितके दण्डिकृत होनेमें सन्देह प्रकट किया है कि दण्डीने जिन दोषोंको परिहेय बताया है, ये दोष दशकुमारचरितमें पाये जाते है, अतः दशकुमारचरित दण्डीकी रचना नहीं हो सकती। इस शंकांका समाधान दो प्रकारोंसे किया जाता है- १. यह कि यह कोई नियम नहीं है कि दोषनिर्णय करनेवालेके ग्रन्थमें वह दोष हो ही नहीं। हम देखते हैं कि औनित्यविचारचर्चा में क्षेमेन्द्रने दोषोंके उदाहरण अपने ग्रन्थोंसे नामोल्लेखपूर्वक दिये हैं। इस स्थितिमें दशकुमारमें उपरब्ध दोष उसके दण्डिकृतत्वका खण्डन करनेमें पर्याप्त नहीं माने जा सकते। २. यह कि दण्डीने साहित्यसेवा-जीवनके प्रारम्भमें दशकुमारकी रचना की होगी। उस समय शाताचातरूपमें वे दोष आ गये होंगे बादमें परिष्कृतबुद्धि होकर उन्होंने दोषोंका निरूपण किया होगा। इस प्रकार सब तरइसे देखनेपर दण्डीके तीन अ्रन्थ माने जा सकते हैं जिनके नाम ऊपर बता दिये गये है।

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दण्डी और भामह दण्डी और भामहमें कौन पूर्ववर्त्तीं है इस विषयमें बड़ा मतमेद है। साहित्यशास्त्रमें यह एक समस्या है कि इन दोनोंमें किसका अवतार पहले हुआ। इन दोनों आचार्योंकी उक्तियोंमें समानता ही इस संशयकी जननी है। समताका संक्षिप्त निदर्शन भामह- दण्डी- १. 'सर्गबन्धो महाकाव्यम्' १।१९ 'सर्गबन्धो महाकाव्यम्' ११४ २. 'मन्त्र दूत प्रयाणाजिनायकाम्युदयैक्ष 'मन्त्रदून प्रयाणाजिनायकाभ्युदयैरपि' यतू' १।२० ११७ m १।२७ १।२९ ४. 'अद्य या मम गोविन्द जाता स्वयि गृहागते। 'अद्य या मम गोविन्द जाताश्वयि गृहागते।' कालेनेषा भवेत् प्रीतिस्तवैवागमनात् पुनः॥।' कालेनैषा भवेत् प्रीतिस्तवैवागमनारपुनः' ३।५ २।२७६ ५. 'भाविकश्वमिति प्राहुः प्रबन्धविषयं 'तन्जाविकमिति प्राहुः प्रबन्धविषये गुणम्' गुणम' ३।५३ २ २६४ ६. 'अपार्थ व्यर्थमेकार्थ ससंशयमपक्रमम। 'अपार्थ व्यर्थमेकार्थ ससंशयमपक्रमम्। शब्दहीनं यतिभ्रष्टं भिन्नवृतं विसन्धि च॥' शब्दहीनं यतिभ्रष्टं भिन्नवृत्तंविसन्धिकम्॥' ४19 ३।१२५ ७. 'समुदायार्थशून्यं यत्तदपार्थकमिष्यते' 'समुदायार्थशून्यं यत्तदपार्थमितीष्यत' 816 ३।१२८ ८. 'गतोऽस्तम्कों भातीन्दुर्यान्ति वासाय गतोस्तमर्को पत्तिणः' २८७ भातीन्दुर्यान्ति वासाय

'आक्षेपोऽर्थान्तरन्यासो व्यतिरेको विभावना' पक्षिण:' २।२४४ 'आक्षेपोऽर्थान्तरन्यासो व्यतिरेको विभा- २/६६ वना' २४ इन समताओंके आधार पर इस सन्देहकी पुष्टि होती है कि इन दोनोंमें कौन पूर्वकालमें था तथा किसने किसकी उक्ति अपने ग्रन्थमें संयोजित कर ली ह। इस स्थितिमें भिन्न-भिन्न आलोचना- शास्त्रियोंने भिन्न-भिन्न विचार व्यक्त किये हैं। श्रीनृसिंहाचार्य आयंगर दण्डीको भामइसे प्राचीन मानते हैं। श्री पी० वी० काणे भी सन्दिग्ध रूपमें दण्डीको भामहसे पूर्ववर्त्ती माननेके पक्षमें मत देते हैं, परन्तु प्रो० पाठक, एस० के० दे, जेकोवी तथा त्रिवेदी आदि भामहको ही दण्डीसे प्राचीन सिद्ध करते हैं। दण्डी से भामहको प्राचीन माननेवाले निम्नलिखित तर्क उपस्थित करते हैं- १-काव्यादर्शके टीकाकार तरुणवाचस्पति (बारहवीं शताब्द्री) लिखते है कि दण्डी मामहके मतकी आलोचना कर रहे है। २-भामह कथा और आख्यायिकामें भेद मानते हैं, दण्डीने दोनोंमें कोई भेद नहीं माना है, यह भामके मतकी आलोचना है। ३- उद्दट ग्रन्थके टीकाकार नमिसाधुने भामहका नाम पहले लिखा है, दण्डीका बादमें। संभव है उन्होंने समयक्रमसे ही नाम लिखा हो। ४-भामहने उपमाके तीन ही भेद किये हैं और दण्डीने बदुतसे भेद किये हैं, जिससे दण्डी- की नवीनता प्रमाणित होती है।

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मामहको दण्डीसे नवीन माननेवाले आलोचक इन तर्कोंका विरोषमात्र कर सकते है; केवल इतने तर्कसे किसीके पौर्वापर्यका निश्चय करना प्रामाणिक नहीं हो सकता। मेरी नम्र सम्मतिमें दण्डी भामहके बाद ही उत्पन्न हुए थे, क्योंकि उनके द्वार। यत्र-तत्र आलो- चित मत भामहके ही मालूम पढ़ते हैं। किसी अन्य आचार्यके ग्रन्थकी आलोचना दण्डी-द्वारा की गई है भामइके मतकी नहीं, यह बात तबतक किस प्रकार मान ली जाय जबतक वह ग्रन्थ प्रसिद्ध न हो जाय। दण्डीके समय तक का कोई दूसरा ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता जिसे हम दण्डीका आलोच्य बता सकें। ऐसी स्थितिमें भामइको दण्डीसे पूर्ववर्त्ती मान लेना ही चातुर्य है। दण्डीका कवित्व पण्डितराज जगन्नाथने 'निर्माय नूतनमुदाहरणानुरूपं काव्यं मथात्र निहितं न परस्य किश्ित' कहकर जिस अभिमानको व्यज्जित किया है, दण्डीने भी मूकभावसे आचरणद्वारा उसी अभिमानको व्यज्जित किया है। मुझे तो ऐसा लगता है कि पण्डितराजके कुछ अंशोंमें दण्डी पथ- प्रदर्शक बने थे। जहाँ तक मेरा अनुमान है-पण्डितराजने काव्यलक्षणनिवचनमें भी 'इषटार्थ- व्यवच्छिया पदावली' को ही परिष्कृत करके 'रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः' का रूप प्रदान किया है। इसी प्रकार दण्डीद्वारा अवलम्बित स्वकृतोदाहरणप्रदर्शनपद्धतिसे प्रभावित होकर ही पण्डितराजने 'निर्माय नूतनमुदाहरणानुरूपम्' कहा है। जहाँतक कवित्वका सम्बन्ध है, दण्डीने अनुष्टप् छन्दमें भी बड़ा उत्तम कवित्व प्रदर्शित किया है। कुछ उदाहरण दिये जाते हैं :- शब्दप्रयोगकी उपयोगिताके संबन्धमें दण्डीने कहा है :- इदमन्धंतमः कृर्श्नं जायेत भुवनत्रयम्। यदि शब्दाभिधं उयोतिरासंसारं न दीष्यते। कैसी सुन्दर सरस उक्ति है। दृष्टान्तका यह प्रयोग कितना चमत्कारक है :- गुणदोषानशासत्रज: कथं विभजते नरः। किमन्धस्याधिकारोस्ति रूपभेदोपलन्धिषु॥। अनुप्रासकृत चारुत्वसे काव्यकी शोभा बढ़ानेमें दण्डीकी चतुरता स्तुत्य है :-

अलक्कारोंके दाहरणमें कविने बड़ा सुन्दर काव्य-निर्माण किया है। यहाँ बहुतसे उदाइरण न देकर कुछ ही छन्द प्रदशित किये जाते हैं- स्वभावोक्ति- सुण्डैराताम्रकुटिलै: पप्हरितकोमलैः । त्रिवर्णराजिमि: कण्ठैरेते मञुगिर: शुकाः॥ संशयोपमा- कि पभमम्तर्भरान्तालि किन्ते लोलेचणं मुखम। मम दोलायते चित्तमितीयं संशयोपमा॥ ललितरूपकम्- हरिपाद: शिरोलमजह कन्याजलांशुकः। = इन उदाहरणोंसे स्पष्ट है कि दण्डी केवल आलोचक विद्वान् ही नहीं, उत्कृष्ट कोटिके सहृदय कवि भी थे, इसीलिये तो उन्होंने उदाहरणके लिये भी दूसरोंके पद्य नहीं अपनाये हैं। इससे भी बड़ी बात उनके ग्रन्थमें यह है कि परमतखण्डन तथा स्वमतसमर्थन आदि शास्त्रीय शास्त्रार्थको भी उन्होंने कवित्वपूर्ण भाषामें इस आसानोके साथ समझाया है कि वह प्रसन् भी कवित्वमय मालूम पड़ता है। जन्माष्टमी, २०१५} रामचन्द्र मिथ्र

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विषय-सूची

विषया: पृष्ठाक्का: विषया: पृष्ठाक्ा: प्रथम: परिच्छेद: उदारख्म ६०

इष्टदेवताप्रार्थना ओज: ६१

प्रतिज्ञावाक्यम् कान्ति: ६३ २

संबन्धचतुष्टयम् ३ समाधि: ६६

शब्दमाहाष्म्य पूर्व क काव्यमाहात्म्य म मार्गनिरूपणोपसंहार: ७०

दोषनिन्दा ६ काव्य संपद: कारणम् ७१

शास्त्न प्रयोजनम् ७२ ८ काव्यशब्दाभिधेयम् द्वितीय: परिच्छेद: ९

काव्यशरीरविवेचनम् अलक्कारस्व रूपम् ७४

काव्यस्य त्रैविध्यम् १४ अलक्काराणां समुद्देश: ७६

सगबन्धलक्षणम् १५ स्वभावोचि: ७७

सर्गबन्धे वर्ण्यविषया: १६ उपमासामान्यलचणम् ७९

सर्गबन्धे वृत्तविचार: २० धर्मोपमा ८0

सर्गबन्धे नायकप्रतिनाथकविचार: २३ वस्तूपमा

गय्यप्रभेदी २४ विपर्यामोपमा ८१

आख्यायिकाकथाभेदविचार: २५ अन्योन्योपमा "

कथाख्यायिकयोरेकजातित्वम् २६ नियमोपमा ८२

वाहमयस्य संस्कृतादिभिश्नातुर्विध्यम ३० अनियमोपमा

महाराष्ट्रभाषाप्रशंसा ३१ समुच्चयोपमा ८३

प्रबन्धविशेषे भाषानियम: ३३ अनिशयोपमा "

प्रेचयश्रव्यादिविचार: ३४ वदर्भंगौडीयमार्गविचार: ३५ अन्भुनोपमा ८४

वेदर्भमार्गस्य दश गुणा: ३७ मोहोपमा ८५

शेष: ३८ संशयोपमा

प्रसाद: ४० निर्णयोपमा ८६

समता ४२ शरेषोपमा

माधुर्यम ४५ समानोपमा

श्रुतिसाम्येन माधु्यम् ४६ निन्दोपमा ८9

वर्णानुप्रासः ४७ प्रशंसोपमा

यमकमू् ५१ आचि्यासोपमा

" विरोधोपमा भाग्यता ५३ प्रतिषेधोपमा आाभ्यनापवाद: ५४ असाधारणोपमा सुकुमारता ५५ चाटूपमा "

अर्थव्यक्ति: ५८: तश्वाख्यानोपमा ९०

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विषया: पृडाक्ा: विषया: पृष्ठा क्ा:

अभूनोपमा ९० अन्तवाक्यगतजातिदीपकम् ११५

असंभावितोपमा अन्तदीपकं क्रियागतम् ११६

९१ मालादीपकम् " बहुपमा विक्रियोपमा विरुद्धार्थदीपक म्

मालोपमा एकार्थदीपकम "

वाक्यार्थोपमा ९२ किष्टाथंदीपकम् ११८ दीपकोपसंहार: ११९ प्रतिवस्तूपमा ९३ नुश्ययोंगोपमा अर्थनृश्यलक्कार: ९४ हेतूपमा उपभादोषापवाद: पदावृत्ति: १२० ९५ " उपमादोषाणामुदाहरणानि ९६ उभयावृत्ति: आसेपालक्कार: "

उपमावाचक: ९७ रूपकलक्षण म् वृत्ताक्षेप: १२१ १०० रूपकोदाहरणानि वर्तमानाक्षेप: १२२

असमस्त रूपकमू १०१ भविष्यदाक्षेप: "

समस्तव्यस्तरूपकम् १०२ धर्मासेप: १२३

सकलरूपकम् धर्ग्याद्षेप: " " स्षवयत्र रूप कमू १०३ कारणाचेप: १२४

अवयवविरूपकम् १०४ कार्याच्षेप: "

एकाङ्ररूपकम् अनुज्ञाक्षेप: १२५ "

युक्त्तरूपकम् १०५ प्रभुशासेप: १२६

अयुक्तरूपकम् अनादगद्षेप: " "9

विपमरूपकम् आशीवचनाल्षेप: १२७

सविशेषणरूपकम् १०६ परुषाक्षेप: "

विरुद्ध रूपकम् १०७ साचिव्याक्षेप: १२८

हेतुरूपकम् यत्राच्तेप:

छिष्टरूपकम् परवशास्तेप: १२९ १८ उपायाक्षेप: १३० उपमारूपकम् "

व्यतिरेकरूपकम् रोषाक्षेप: " १0९ १३१ आयेपरूपकम् मूर्च्छाखेप: " " समाधान रूपकम ११० सानुक्रोशाथेप:

रूपक रूपकम् लिष्टसेप: १३२

सर्वापह्वव कूपकम अनुशयासेप: १३३

दीपकलक्ण म् ११२ संशयापेप: "

जातिदीपकत् ११३ अर्थान्तराज्षेप: १३४

क्रियादीपकम .. हेस्वाश्ेप:

गुणद्ीपकम " " आसेपालद्वारोपसंहार:

दण्यदीपकम अर्थान्तरम्यास: १३५

मध्यवाक्यगतजातिदीपकम् " विश्वव्याप्यादयो भेदा:

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(२७ )

विषया: पृष्ठाक्षा: विषया: पृष्ठाक्का:

१३७ १६६

" विकाय हेतवलक्कार: १६७

विरोधार्थान्तरन्यास: प्राप्य हे त्वल क्कार: १६८ " " अयुक्ककारी अर्थान्तरन्यास: १३८ युक्तात्मा अर्थान्तरम्यास: १६९ " " युक्तायु क्कार्थान्तरन्यास: १३९ अन्योभ्याभाव हेत्वलक्कार: १७० " व्यतिरेकालङ्कार: १४० "

एकष्यतिरेक: १४१ अभावप्रतियोगिक हेत्वलङ्वारः "

उभयव्यतिरेक: दूरकाय हेत्वलक्कारः १७३ " " सक्षेषध्यतिरेक: १४२ सापेक्षव्यनिरेक: कार्यान्तरजहेत्वलङ्कार: १४३ सहेतुकष्यतिरेक: अयुक्त कार्यहेत्वलक्कार: १७४ युक्तकार्यहेत्वलङ्कार: "'

विरुद्धुघर्भेण प्रतीय मानसाडश्य- १७५ इद्ि तलचयार्थ सूचमालह्ार: " व्यति रेक: १४४ शब्दोपात्त माहश्य्य तिरेक: १७६ लेशालक्कारलचणम् " १४५ १७७ सजातिव्य ति रेक: लज्जानिगू हनारमकलेशालक्ार: १४६ विभावनालक्कार: स्तुतिष्याजेन निम्दारूपलेशालक्कार: १४७ 1७८

कारणन्तरविभावना निम्नाब्याजेन स्सुतिरूपलेशालंकार: " " स्वाभातरिकविभावना १४९ यथामंखयालक्कार: १८० शाब्दस्वाभाविकविभावना प्रेयोलंकार: " समासोक्त्यलप्वार: रसवद्लंकार: १८३ "

कार्यसान्यघटितसमासोि: १५० ऊजस्थयलं कार: १८८

विशेष "साध्यघटित समासोकि: पर्यायोकश्यलक्कार: १८९

सुक्यविशेषणा समासोक्ति: १५१ समाहितालक्कार: १९०

भिन्नाभिभ्नविशेषणा समासोकि: १५२ उदासालक्कार: १९१

अपूर्वममासोकि: १५३ महाशयव्णनरूपोदात्तालक्कार: "

अतिशयोक्ति: विभूतिमहत्ववणनरूपोदात्तालक्ार: १९२ "

निर्णयातिशयोकति: १५५ अपहुस्यळक्कार: १९३

उत्प्रेब्ालक्कार: विषयापहतिः " १५६ १५७ स्व्रकपापङति: १९४

अचेत नोत्प्रेक्षा १५८ शलेपालक्वार: १९५

लिम्पनीवेश्य त्रोर्प्रेच्चोपमाविचार: १५९ अभिन्नपदश्लेष: १९७

उत्प्रे सावा चका: शब्दा: १६४ मिन्रपद्क्षेष: "

अभिश्रक्रियालेष: १९९

प्रवृत्तिकारक हेत्वल क्वारः १६५

निवतिकार कटेर वळकार: विस्दकियाखेप: "

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( २ )

विषया: पृष्ठाक्का: विषयाः पृष्ठाक्का: सनियमश्लेप: २०० हूपादुणताथ्यपतथमकमद् २२५ त्रिपादृगताध्यपेतयमकमेदाः २२७ अविरोधिश्लेष: २०१ सर्वंपाद्गताव्यपेतयमकमेदाः २२९ विरोमिश्लेष: " व्यपेतविजातीययमकभेदा: २३४ विशेषोकि: २३६ गुणवैकक्य विशेषोकि: २०२ चतुष्पाद्यमकभेदाः २३७

जातिव कक््य विशेषोकि: संदषट्यमकप्रभेव: " २४२

२०३ अर्धाभ्यासयमकप्रभेद:

दव्यवैकश्यविशेषोकि: श्लो काभ्या सयमकमेदाः २४८

हेतुविशेषोक्ति: महायमकम् २४९

२०४ गोमूत्रिका बन्ध: २५२

स्तुतितुक्ष्ययोगिता २०५ अर्धभ्रम: २५४

निम्दातुश्ययोगिता सवंतोभद्रम् २५७

विरोधालक्वार: २०६ स्वरनियमा: स्थाननियमा: २५८ २५९ क्रियाविरोधालक्वार: २०७ वर्णनियमा: प्रहेलिकाभेदा: २६१ २६३ अव यवग तगुणविरोधालद्वार: काव्यदोषा: विषमविरोधालक्कार: २०८ अपार्थदोषविवेचनम् २७५

असंगतिविरोष: २७६ र्लेष मूलविरोध: एकार्थदोष विवेचनम् २७७ अप्रम्तुतप्रशंसालक्कार: २०९ २१० संशय दोषविवेचनम् २७९

निदर्शनालक्कार: २१२ अपक्रमदोषविवेचनम् २८१

सहोक्त्यलप्वार: २१३ शब्दहीनदोषविवे ननम् २८२

क्ियासहोकि: २१५ यतिभङ्दो षविवेचनम् २८४ २८६ "

आशिरलक्कार: २१६ विसंधिदोषविवेचनम २८७

२१८ देशकालादिविरोधविवेचनम् २८८ भाविकालक्कार: २२० देशविरोधोदाहरणम् २८९ अलक्वारो पसंहरणम २२१ कालविरोधोदाहरणम् "

तृतीय: प कला विरोधोदाहरणम् २९०

यमकलक्णम् २२३ लोकविरोधोदाहरणम् २९१ यमकभदा: " प्रमथपादगतयमकमेदाः २२४ हेतुविद्याविरोधोदाहरणम् "

द्वितीयपाद्गतयमकभेदाः २२५ आगमविरोधोदाहरणम् विरोधापवादा: २९२ .. तृतीयपादगतयमकभेदाः उपसंहार: २९५ चतुर्थपादगतयमकभेदाः श्लोकानुक्रमणिका २९७

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। श्रीः।।

काव्यादशः

'प्रकाश' संस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतः

प्रथम: परिच्छेद: चतुर्मुख्मुखाम्भोजवनहंसवधूर्मम। मानसे रमतां नित्यं' सर्वशुक्का सरस्वती॥१॥ भूतेशे नियमाय मौनिनि गते दूरं क्वचिन्नन्दिनी म्लाने वालविधौ तथाऽमृतभुजां सिन्धौ भजन्त्यां क्रुधम्। यस्मिन हैमवती बबन्ध विविधां भावानुबन्धोद्धुरां चेतोनृत्तिमसौ कृषीष्ट कुशलं देवो द्विपेन्द्राननः॥ श्रद्धानतेन शिरसा पितरं 'मधुसृदनम्'। प्रसूं 'जयमणि' चाहं प्रणमामि पुनः पुनः ॥। आचार्यदण्डिर चनाभावानवबोधबद्धवेमुख्यान्। मन्ये कतिचन बालान् प्रोःसाहयिता प्रकाशोऽयम्।। अथ सकलशास्त्रपारदृश्वाऽचार्यदण्डी काव्यलक्षणपरिचायकं काव्यादर्शनामकमिम प्रन्थमारभमाण: 'मङलादीनि मङ्गलमध्यानि मङ्गलान्तानि च शास्त्राणि प्रथन्ते वीरपुरुषाणि च भवन्त्यायुप्मत्पुरुषाणि चाध्यतारश्च महलयुक्ता यथा स्युः इत्यनुशिष्टविधेयताकमाचार- परम्पराप्राप्त च मङ्लं चिकीर्षुः सरस्वतीं स्तौति-चतुर्मुखेति। चत्वारि मुखानि यस्यासौ चनुर्मुखो व्रद्मा तस्य मुखान्येवाम्भोजानि कमलानि तेषां वनं समूहस्तत्र हंसवधू: हंसीव सर्वशुक्ला सर्वतः इ्वेता शुक्लावर्णा सरस्वती विद्याधिष्ठातृद्ेवता नित्यं सर्वेदा मम मानसे हृदय रमता प्रीतिमाधाय वसतु। हंसी हि कमलवनवासरसिका, अतः सरस्वत्या हंसीन्विन रूपणे व्रह्ममुसानां कमलल्ेन रूपणमावद्यकम्। यथा हंसी कमलवने विहरति तथा व्रणो सुखेषु स्वच्छन्दविहारिणीयं वाणीति रपकाथः। ब्ङ्ममुखविदारिण्या वाण्या वेदरूपतया निरस्त4मस्तपुंदोषतया सचछुकला नितान्तनिर्दोषेत्युक्तम्। काव्यलक्षणप्रपम-

१. पाठान्तरम्-दोघं। २. सवशुभा।

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२ काव्यादर्श:

केडत्र प्रन्थे सरस्वत्या: स्तुतिरतिसमुचिता। अत्र सरस्वत्यां हंसवधूत्वारोपं प्रति ब्रह्ममुखेऽ- म्भोजवनत्वारोपो हेतुरिति परम्परितरूपकमलक्कारः, मुखमुखेति छेकानुप्रासक् ॥ १॥ हिन्दी-काव्यलक्षणात्मक अपने 'काव्यादर्श' नामक ग्रन्थकी समाप्ति एवं प्रचारकी कामनासे आचाय दण्डीने ग्रन्थारम्ममें सरस्वतीकी वन्दना की है। सरस्वती म्रह्माके मुखकमलसमूहमें सतत बास करने के कारण निर्दोष हे, वेदरूपा वाणी बह्मुखवासके कारण निरस्तस्मस्तपुंदूषणतया निर्मल है, वह वाणी हमारे हृदयमें रमण-सप्रेम निवास-करे। काव्यलक्षण प्रपश्चात्मक ग्रन्थ बनानेके लिये तत्पर आचार्यके लिये सबसे आवश्यक वस्तु यही है कि उसके हृदयमें निर्दोष वाणोका निवास हो, इसीलिये वाणोसे ऐसी प्रार्थना की गई है। 'चतुमुख' को अम्भोजवन कहकर इंसीस्वरूपा सरस्वतीके विहारकी योग्यता ध्वनित की गई है। एक बात और ध्यान देनेके योग्य है कि ऐसी शुक्कवर्णा होती है, अतः इंसीत्वेनाध्यवसिता सरस्वती मी शुक्कवर्णा हो, इसीबिये सर्वश्रक्का विशेषण दिया गया है। सरस्वतीकी शुक्कुवर्णताके विषयमें लिखा है :- आविरबंभूवर तत्पश्चान्मुखतः परमात्मनः । एका देवी शुक्कवर्णा वीणापुस्तकषारिणी।। कोटिपूर्णेन्दुशोमाढ्या शरत्पक्कजलोचना। (मह्वैवत्त) किसी-किसी टीकाकारने 'मम सरस्वती शिष्याणं मानसे रमताम्' ऐसा अध्याहार करके यह अर्थ किया है कि हमारी वाणी विद्यार्थियोंके हृदयमें विहार करे, परन्तु यह अर्थ ठीक नहीं है, क्योंकि ग्रन्थ बनानेवाले आचार्यकी पहली कामना यही हो सकती है कि वाणीका प्रकाश हमारे हृदयमें हो जिससे ग्रन्थ अच्छी तरह लिखा जाय। विद्यार्थियों के हृदयमें अपनी वाणीके निवासकी कामना तो ग्रन्थके बननेके बाद की जा सकती है। दूसरी बात जो सबसे अधिक खटकनेवाली है वह यह है कि इस अर्थमें 'मानसे' का एकवचन बाधक है, 'विद्यार्थियों' पहुवचन है, उनका एक मन कैसे होगा ? इस छोकमें म्झ्मा के मुखको कमलवनसे रूपक दिया है, वह तभी सज्न होग। जब वाणीको इंसीका रूपक दिया जाय, अतः परम्परितरूपक नामक अर्थाकक्गार तथा 'मुखमुख' शब्दसाम्यसे छेकानुपरास शब्दालक्कार हे इसी छोकमें 'सर्वशुक्का' विशेषण देखकर-'विब्जिका' नामक विद्यागर्विना महारानीने कहा था- 'नीलोत्पलदलश्यारमा विस्जिकां मामजानता। वृथैव दण्डिना प्रोक्ता सर्वशुक्का सरस्वती।।' 'सर्वशुक्का' विशेषणसे सरस्वतीका निर्दोषत्व ही प्राधान्येन अभिप्रेत है। प्रेमचन्द्र तर्क- बागीश् नामक व्याखयाकारने इसे वंणपरक मानकर करचरणनयनादिमिन्न अक्ञोंमें श्रैत्यको स्वीकार किया है। परन्तु मेरी रायमें कोई भी अङ् उजला नहीं अच्छा होगा, कवियोंने सुन्दरी खोके रूपमें किसी भी शरीरावयवको श्रेत नहीं वर्णित किया है, अतः उनका यह कहना कि-'सति वाये सक्टोचस्यादरणीयत्वेन सर्वपदस्थ करचरणतलाधरनयनादिमिन्नाङ्गपरस्वादुपपत्रम्' ठोक नहीं मालूम पढ़ता है। १ ।। पूर्वशास्त्राणि संहत्य प्रयोगानुपलक्ष्य' च। यथासामर्थ्यमस्माभि: क्रियते काव्यलक्षणम् ॥२॥ पूर्वेषां प्राचां शिलालिभरतप्रभृत्याचार्याणां शास्त्राणि तैविरचितानि नाव्यसूत्रप्रभृत्तीनि १. उपकभ्य ।

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प्रथम: परिच्छेद: ३

संहृत्य समुन्धित्य संक्षिप्य तान्यर्थतः संगृह्येत्यर्थः, प्रयोगान् व्यासवाल्मीकिकालिदास- प्रभृतिमहाकविभ्रन्थेषु स्थितानि तत्प्रयुक्त्तानि लक्ष्याणि च उपलक्ष्य सूक्ष्मेक्षिकया विभाव्य निपुणमालोच्य यथासामर्थ्यम् स्वबुद्धिवैभवानुकूलम् अस्माभि: दण्डिना काष्यलक्षणम् इतरव्यवच्छेदकं काव्यपर्याप्तवृत्तिधमविशेषरूपं लक्षणं काव्यपरिचायकं वस्तुवणनम् कियते विधीयते। अयमाश्यः-यथासामर्थ्यमित्यनेन नम्रता प्रदर्शिता, काव्यलक्षणं कियते इत्यनेन काव्यपरिचायकं वस्तु निरुच्यते इति विवक्षा। लक्ष्यते शञायते स्वरूपमनेनेति लक्षणम्, तथ् द्विविर्ध स्वरूपलक्षणं तटस्थलक्षणं च, यथा ब्रह्म किमिति जिज्ञासायां-यतो जगतो जन्मादि तत्तदिति तटस्थलक्षणं, सच्चिदानन्दं ब्रद्मेति तत्स्वरूपलक्षणम्। एवमिहापि काव्यस्य स्वरूपलक्षणं वत्त्यत इति बोध्यम्। अनेनास्य प्रन्थस्य प्रतिपादं प्रदर्शितम्। तथा च काव्यस्वरूपं प्रतिपाद्यम्, तञ्जिज्ञासुरधिकारी, व्युत्पत्ति: प्रयोजनम्, प्रतिपाद्यप्रति- पादकभावश्च सम्बन्ध इति चतुष्टयमनुबन्धस्य सूचितम् ॥२ ॥ हिन्दी-पूर्तां चार्य शिलालिमरतप्रमृति द्वारा निर्मित नाट्य-सूत्रादिका संग्रह करके उनके द्वारा किये गये विवेचनोंका संक्षेपरूपमें संग्रह कर के औस व्यास वाल्मोकि कालिदास प्रमृति महाकवियोंकी कवितामें उनके उदाहरणोंको सूक्ष्म दृष्टिसे विचार कर के, मैं (इण्डी) अपनी युद्धिके अनुसार काव्य- लक्षणका निर्वचन करूंगा। इसमें अपनी पुद्धिके अनुसार कहनेसे नम्रता प्रकट की गई है। 'पूर्व- शाख्त्राणि सगृद्य' कहकर आचार्ये दण्डीने स्वोक्त अर्थका कपोलकल्पितस्व निरास करके उपादे- यत्व सूचित किया है। 'पूर्वश्ञान्ताणि संगृद्त' 'प्रयोगानुपलूक्ष्य च' इन दोनों विशेषणोंसे यह सिद्ध होता है कि इस ग्रन्थमें कहे गये पदार्थ केवल लक्षणानुमोदित हो नहीं, लक्ष्यानुसारी भी है। रूक्षण शब्दका अर्थ 'इतरव्यवच्छेदक' होता है, वह वस्तु लक्षण है जिसके कहे जानेपर जिसका लक्षण किया जाय उससे अनिरिक्त पदार्थोंका व्यवच्छेद-पृथकरण-हो जाय। जैसे घटका लक्षण किया- 'कम्युग्रीवादिमस्व' इस लक्षगके द्वारा पटाठि पदार्थका व्यवच्छेद हो गया। लक्षण दो तरहके होते है, १-स्वरूपलक्षण, २-तटस्वलक्षण। जैसे ब्रह्मका स्वरूपलूक्षण-'सचिदानं्द ग्ह्म'। तटसप- लक्षण-'जन्मावस्य यतः' है। प्रकुनमें आचार्यने काव्यका स्वरूपलक्षण ही किया है जो आगे कहा जायगा। इस फोकसे अनुवन्धचतुष्टय मी प्रदशित हो जाता है काव्यस्वरूप प्रतिपाथ विषय, जिज्ञासु जन अविकारी, काव्यस्वरूपज्ञान प्रयोजन एवं प्रतिपायप्रतिपादकमाव ही सम्बन्य है । २ ।। इह शिष्टानुशिष्टानां शिष्टानामपि सवथा। वाचामेव प्रसादेन लोकयात्रा प्रवर्त्तते।।३।। इह अनादिविविधविचित्ररचनाप्रपच्चचारुतरेऽत्र संसारे शिष्टैः शब्दशास्त्रप्ररूठ- मतिभिः पाणिनिवररुचिप्रमृंतिभिः अनुशिष्टानां प्रकृतिप्रत्यय विभागादिभिव्युत्पादितानाम् साध्वसाध्वनुशासनविधया वा शासितानां संस्कृतप्राकृतानाम्, शिष्टानाम् केनापि प्रकारेण अनुशासनं न प्राप्तानां संस्कृतप्राकृतभिन्नानां देशभाषाणाम्, वाचाम् एतत्रितयरूपा्णां गिरामेव प्रसादेन अनुग्रहेण लोकानां देवानारभ्य पामरपर्यन्तानां प्राणिनां यात्रा व्यवहार: प्रवर्सते सिद्धयति। इह संसारे त्रिविधा वाच उपलभ्यन्ते-संस्कृता, प्राकृताः, देश्यक। तत्राथा पाणिन्यादिभिरनुशिष्टा, द्वितोया वररुचिना कृतानुशासना, शिष्टा व देशी बाडू। एता एव वाच आधारीकत्य देवादिपामरान्तमिदं विश्वमुन्बावचव्यवहारमातनोति, वाचाम- भावे कः क्थ स्वाभिप्रायं स्वरेतरजनवेद्यं विधांतुमीशीत। इदमेव मनसिकृत्योकं भर्तृहरिणा-

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४ काव्यादशः

'न सोषस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमाहते। अनुविद्धमिच ज्ञानं सवे शब्देन भासते।।' सर्वेषां ज्ञानानां शब्दानुविद्धत्वकथनेन व्यवहाराणं शब्दनरपेत्येणासम्भवतोक्ता। तत्रोत्तमानां संस्कृतभाषया मध्यमानां प्राकृतयाऽधमानां च देशभाषया व्यवहार: सिद्धयतीति यथायथमवगन्तव्यम् ॥ ३॥ हिन्दी-शिष्जन-अनुशासनके जाननेवाले पाणिनि, वररुचि आदि-से अनुशिष्ट-प्रकृतिप्रत्यय- विभागस्ञापनद्वारा साधित संस्कृत और प्राकृन, तथा इनके अतिरिक्त शिष्ट-अशासित-देशी वचनोंके प्रसादसे ही यह लोकयात्रा-देवादिपामरान्त जनसमूहका समस्त व्यवहारकलाप-चला करता है। संसार में वाणियोंको दो बर्गोमें विभाजित किया जा सकता है-शिष्टानुशिष्ट तथा तद्भिन्न। शिष्ानु- शिष्ट कहनेसे संस्कृत-प्राकृत वाणियाँ ली जा सकती हैं क्योंकि उनका अनुशासन है। शिष्ानु- शिष्टमिन्न देशी भाषा मानी जानी है, इन्हीं तीनों प्रकारकी वाणियोंसे इस देवादिपामरान्त जनसमूहका व्यवहार प्रवृत्त होता है। उत्तम लोक संस्कृतमे, मध्यम लोक प्राकृतसे तथा अधम लोक देशी वाणासे अपना व्यवहार चलाते हैं। इसी बातको मतृंहूरिने वाक्यपदीयमें कहा है :- 'न सोडस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते।. अनुविद्धमिय ज्ञानं सर्वे शब्देन मासते । ३॥ इदमन्धंतमः कत्स्नं जायेत भुवनत्रयम्। यदि शब्दाळ्यं ज्योतिरासंसारं न दीप्यते। ४ ॥ इदं कृत्स्नं समस्तं भुवनत्रयम् लोकत्रितयम् अरन्धंतमः गाढान्धकारव्याप्तं जायेत यदि शब्दाह्वयं शब्दाभिधानम ज्योतिः प्रकाशकरम् किमपि तत्त्वम् आसंसारम् सृष्टि- कालात् आरभ्य न दीप्यते न प्रकाशेत। शब्दाभिधानस्य त्योतिष एवायं महिमा यदयं लोको व्यवहारषु न मुह्यति, यदि शब्दा न स्युस्तदा लोकोडयं व्यवहारं कर्त न पारये- ततदधीनतवात्मदव्यवहाराणाम्। यथाहि सर्यादिज्योतिरभावे सर्वे. पदार्थास्तमसा व्याप्ता लुप्ता इव भवन्ति तथव शब्दाभिधज्योतिरभावे तन्मात्रसम्पाद्यानां व्यवहाराणामनभ्युपा- यनया लोकोऽयमन्ते तमसीव मग्नो विलुप्तसकलव्यवहारश्र जायेतेत्याशयः पूर्वेश्लोकेन शब्दानां व्यवहारसाधनत्वमन्वयमुखेनोकं तदेवात्र व्यतिरेंकमुखेनोक्त्तम् ।। ४ ॥ हिन्दी-यह भुवनत्रय गाढ अन्धकार से व्याप्त हो जाय। जैसे अन्धकार में व्यवहारकी असा- ध्यना उत्पन्न हो जाती है उसी तरह सभी तरह के व्यवहार लुप्त हो जाँय, यदि शब्दरूप ज्योति सृष्टिकालसे ही अपना प्रकाश न फैलाती रहे। यह शब्दरूप ज्योतिका ही महत्व है कि यह संसार व्यवहार-लोपको प्राप्त करके अन्धकारनिमम्र-सा नहीं हो जाता है, 'आसंसारं न दीप्यते' इसमें 'असंसारम्' पदका आह अभिव्यापक अर्थमें ह, 'संसारकी उत्पत्तिस लेकर अन्ततक' यह उसका तास्पर्य है, जो यह बोतित करता है कि सृष्टि करनेवाला 'नामरूपे व्याकरवाणि' ऐसी इच्छा कर के रूपसे पहले नामकी ही सृष्टि करता है जिससे नामरूप शब्द्रज्योतिकी सहायतासे समस्त व्यवहार निर्याष चला करते है। किस: वस्तुका कथन दो प्रकारसे होता है-अन्बयमुखसे तथा व्यतिरेकमुखसे। जैसे किसी लड़कैको अध्ययनामिमुख करनेके लिये कहा जाता है कि 'पढ़ांगे तो आरामसे रहोगे' यह अन्वयमुखसे कथन है, इसी अर्थको यदि कहें कि 'नहीं पढ़ोगे नो कैहमें पढ़ोगे यह व्यतिरेकमुखसे कयन हुआ। इसी तरह पूर्वक्रीक द्वारा शब्दका व्यवहा- रोपयोगित्व अन्ययमुखेन कहा गया था, इस फोक द्वारा वही वस्तु व्यतिरेकमुखसे कही गई

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प्रथम: परिचछेद:

है। अतः पौनरुक्त्य नहीं है। इस श्रोकमें आचार्यने शब्दको ज्योति कहा है, 'अयोतिर्योतनाव' प्रकाशक तश्व ज्योति कहा जाता है, अनः शब्द मी सकलव्यवहारप्रकाशकतया ज्योति कहा जा सकता है, बृहदारण्यकोपनिषद्में आया है :- 'वाचेवायं ज्योतिषा आस्ते'। इसी व्यवहारप्रवर्तकरवको दृष्टिमें रखकर कवियोंने वाीको बड़े आदरसे स्मरण किया है, सुबन्धुने कहा है :- 'करबदरसद्टशमखिलं भुवननलं यत्प्रसादतः कवयः। पश्यन्ति सूक्ष्ममतयः मा जयनि सरस्वती देवां'॥ इन दो कोकों द्वारा आचार्य दण्डीने अन्ययमुख एवं व्यतिरेकमुखसे वाणीके महत्वका प्रति- पादन किया है, इसमें वाणीसामान्य का महत्व प्रतिपाद्ित हुअ है, काव्य वाणीविशेष है, उसका महत्व आगे बता रहे हैं॥ ४ ॥ आदिराजयशोबिम्बमादर्श प्राप्य वाङ्मयम्। तेषामसन्निधानेऽपि न स्वयं पश्य नश्यति॥५॥ आदिकालीना: प्राचीनसमयजाताः ये राजानः इत्वाकुमान्धातृदिलीपप्रमृतयस्तेषां यशोरूपं बिम्बं प्रतिरूपं छायान्मकप्, वाङमयम् कविकतकाव्यप्रबन्धरूपमादर्शम् दर्पणं प्राप्य इदानीम् तेषां राज्ञाम् असन्निवाने समवधानाभारेऽ्पि न नश्यति न विलीयते, इति स्वयम् आत्मनैव पश्य विभावय। इदमत्र बोध्यम्-किमपि बिम्बान्तरमादर्शप्रति- बिम्बितं सत् तावदेव प्रकाशते यावननत्र तिष्ठति, त्रिम्बापगमे प्रतिबिम्बापगमनेयन्यान, इह तु काव्यात्मकं दर्पणं प्राप्ं प्राच राजा यशोबिम्बं मदैव प्रतिबिम्बसष्टें करोति, बिम्बस्थानीये यरासि गतेऽपि काव्यदपणे तत्प्रतिबिम्बं भासमानमेव तिष्ठति। एतेना- तीनानां राज्ञां यश:रूपापनं काव्यप्रयाजननुक्तम्, इदमुपलक्षगम्, काव्यकतुस्तद्रोडुश्वापि यशःप्रमनीनि काव्यप्रयोजनानि बोध्यानि। तथा चोक्तं काव्यप्रकाशे- 'काव्यं यशसेऽर्यकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये। मयःपरनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे॥ भामहृस्तु सर्वानपि पुरुनार्थान् काव्यनिबन्धनफल वेनोपगतवान, तदुक्तं तेन- धर्मार्थकाममोक्षेषु वैचक्षण्यं कलाम करोति कीर्ति ग्रीतिं च साधुकाव्यनिषेवणम्।। अत्र श्लोके उपमानभूनलौकिकादर्शापेक्षयोपमेयभूतवाङमयाद शस्याधित्यवर्णनान् व्यति- रेकोऽलद्रारः, तच्चावित्रयमत्र बिम्बापगमेऽपि प्रतिबिम्बप्रकाशनात् प्रत्येयम् ॥ ५॥ हिन्दी-जो राजागण कालकमानुमार व्यनात हो चुके हैं, इहलोकलोला समाप्त कर कालधर्मको प्राप्त हो गये हैं, उनका यशरूप बिम्न इस शब्दरूप दर्पणमें अब भी प्रतिबिम्बरूपमें भासमान हुआ करता है, नष्ट नहीं होने पाता है, इस बानको आप स्वयं देख लें। लोकमें बिम्बप्रनिबिम्ब- मावका साधारण क्रम यहो है-यावत्कालपर्यन्त बिम्य सम्मुखाव्स्थित रहना है। तावस्कालपर्यन्त ही प्रनिबिम्ब दर्पगादिपतिबिम्बग्रहणसमर्थद्रव्यमें प्रतिबिम्धित हुआ। करता है, बिम्बापाय हो जानेपर प्रतिबिम्बका मी अपाय अवश्य हो जाया करता है, परन्तु इस शब्दरूप वर्पणर्में प्राक्तन नृपतिथोंके यशरूप विम्न्रका प्रतिबिम्ब विम्वापाय हो जानेपर मो प्रतिबिम्बातमना मासमान ही रहता है, नष्ट नहीं होता है, इस बातको आप स्व्रयं देख लें। इसमें अन्यप्रतिबिम्बापेक्षया यह विशेषता है कि यह बिम्वापाय हो जानेपर मा प्रतिबिम्बरूपमें सदा शब्दरूप दर्पणमें प्रति-

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६ कान्यादर्श:

विम्बित कुन्म करता है। 'स्वयं पश्व' कहकर आचार्यने अपने कबनमें प्रमाण दे दिया है, इसमें गोष्यजनक प्रत्यक्ष ही प्रमाण हे, अतः यह बात असन्दिग्यरूपमें मान्य है। इससे अतीत नृपतियोंका वशःस्थापन काव्यका प्रयोजन है यह बात कही मई। यह उप- कथ्षन है, काम्यनिर्माण करनेयाके तथा उसके जाता के व्च: प्रभृतिको भी काव्यप्रकाशकार आदि परबंची आाचायोंने काव्यप्रयोखन माना है। काम्यं बझ्सेऽर्यकृते व्यवहारबिदे शिवेतरक्षतये। सब:पर निपृतये इस कारिकामें आचार्य मम्मटने काव्यके छः प्रयोधन प्रतिपादित किये हैं, १-बश, २-अर्थ, १-माचारम्ान, ४-अमझकनिवारण, ५-रसानुमवजन्यानन्द और ६-उपदेश। थाचार्य मामहने अपने काष्याकद्टारमें लिखा है :- "धर्मार्थकाममोक्षेपु वैचक्षण्य कलामु थ। करोति कौचि प्रीति च साधुकाष्यनिषेवणम्'॥ इनके मतानुसार काव्यके तीन प्रयोजन है, १-ततच्छासन्ञानप्राप्ति, २-कीति और ३-रसानुभव। इन आयार्योने समय-प्रवाहमें काव्यप्रयोजनतया प्रतीत होनेवाले यषासम्भव अषिकतम विषयोंको समाविष्ट करनेका प्रयास किया है। आचार्य रुद्रटने भी अपने 'काव्यालक्ुार' में काव्यप्रयोजनका प्रतिपादन बड़े विशद शष्दोंमें किया है- 'अवळदुज्ज्वलवाक्प्रसरः सरसं कुबंम् महाकविः काव्यम्। स्फुटमाकश्पमनश्पं प्रतनोति यशः परस्थापि। अर्थमनर्थोपशमं सममसममथवा मतं यदेवास्य। बिरचितवचिरसुरस्तुतिरखिलं लमते तदेव कवि:॥ तदिति पुरुषार्थसिद्धि साधुविषास्यद्भ्िरविकलां कुशलैः । अषिगतसकलथे यै: कर्सव्यं काव्यममळमरम्'॥ इन उद्धरणोंसे काव्यका प्रयोजन विशवरूपमें अवगत हो जाता है। पाश्मात्य आलोचकोंने काव्यका प्रयोजन इस प्रकार लिखा है :- 'Delight is the Chief, if not the only end of the poetry. Instruction can be admitted in the Seoond place, for poetry only instructs as it delights'. इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि प्रायः सभी आचार्योंने कीर्तिको काव्यप्रयोजन माना है। ६ाँ, उसके साथ अन्यान्य प्रयोजन मी ययाबद वर्णिति हुए है ।। ५।। गौगौंः कामदुघा सम्यक् प्रयुक्ता स्मर्यंते बुधैः। दुष्प्रयुक्ता पुनर्गोत्वं प्रयोक्: सैव शंसति ॥६॥। इतः पूर्व वाचः सप्रयोजनकत्वमुक्त्वा सम्प्रति तस्या निर्दोषतायां यतनीयमित्य भिषास्यति, तत्र प्रथमं सुप्रयोगकुप्रयोगयोवै लक्षण्यमाह-गोर्गीरिति। सम्यक दूषण- राहित्येन गुणालश्ारादिपूर्णतया च प्रयुक्त व्यवहता गौः वाक बुधैः पण्डितैः कामदुषा सर्वकामप्रदात्री स्मर्यते आख्यायते, तदुरं महाभाष्ये- 'एकः शब्दः सम्यग ज्ञातः शाशान्बितः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधुग भवति' इति, तदेवं सुप्रयोगस्य सर्वफल- इत्यमुकम्, दुष्प्रयोगे दोषमाह-सैब गौः दुष्प्रयुक्ता स्वरवर्णमात्रादिवैगुण्येन सन्दर्भ- स्देतावविचारजया चोचारिता सती प्रयोकुः दुष्टप्रयोगकर्तुः कवेः वक्तुश्च गोत्वं

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प्रथम: परिच्छेद:

बलीवर्दत्वं मूर्खभावम् शंसति प्रथयति, एतदप्युक्तम्-'बाग्योगविद् दुष्यति नापशन्दैः' इति। अनेन सुप्रयोगस्य सकलफलप्रदरवेन कामदुषात्वस्य कुप्रयोगस्य च मूर्खताप्रथकत्व- स्याभिधानेन दोषाणां परिहेयत्वम्, गुणानां च संभ्रहणीयभाव उच्यते ॥ ६ ॥ हिन्दी-अमोतक वाणोके और तद्िशेषरूप काव्य के प्रयोजन बतलाये गये थे, अब उनकी निर्दोषताके विषयमें सावधान करनेके लिये सुप्रयोग तथा दुष्प्रयोगमें भेद कहने या रहे हैं। गौ्गोरिति। सम्यक-मलीभाँति, दोषोंसे बचाकर और गुणालद्तारादिसे युक्त करके प्रयोग की गई वाणी विद्वानों द्वारा कामदुषा-कामजेनु-सकलामिमतार्थदानी कही गई है, और बही वाणी यदि दुष्प्रयुक्ता-स्वरवर्णमात्रादि वैगुण्यसे सन्दर्भसद्केतादि दोषसे अथवा अन्य किसी प्रकार के दोषसे युक्त प्रयुक्त होती हे तब प्रयोग करनेवाले की मुर्खना प्रकट करती है। यदि आपने शब्दों- का सुप्रयोग किया तब तो वह आपके िये सकलाभिमतार्थदात्री कामणेनु सिद्ध होगा, यदि आपने वैसा नहीं किया, उसमें स्वरमान्नासन्दर्मसक्केतादिका दोष उत्पन्न करके प्रयोग किया, तब वह आपको मूर्ख प्रस्यापित करेगा, इस बातकी महामाष्यकारने प्रमाणित किया है :- 'एकः शब्दः सम्यग ज्ातः शाखन्वितः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामयुग मबति' और 'वाग्योग- बिद्दुष्यति चापशब्दैः'। यह कथन मुझे कवीर के एक दोहेका स्मरण दिलाता है :- 'साधु कहावन कठिन हे लम्भा पेड़ सजूर। चहै तो चाखे प्रेमरस गिरे तो चक़नाचूर'॥ इन अवतरणों तथा कथनोंमे यह सिद्ध होता है कि दोषों के त्याग तथा गुणोंके संग्रहमें प्रयत्न करना आवश्यक है। ६ ।। तदल्पमपि नोपेक्ष्यं काम्ये दुषट कथश्चन। स्यादपुः सुम्दरमपि श्वित्रेणैकेन दुर्भगम्।।७॥ दोषाणां हेयत्वं गुणानां संग्राह्यत्वं च समर्थितं सामान्येन, सम्प्रति विशिष्य दोषाणां हेयत्वं दृष्टान्तद्वारा विशदयति-तद्ल्पमिति। तत् तस्मात् दोषस्यानेकविधायशःप्रख्या- पकत्वाद् निषिद्धत्वाच्च काव्ये अल्पम् पदपदांशगतमपि (किं पुनः शब्दार्थरसगतम्) दुष्टं दोष: कथश्वन केनापि प्रकारेण नोपेक्यम् न परित्यक्तव्यम्, सवथैव दोषाण।ं स्वल्पा- नामपि परिहाराय यत्न: करणीय इत्यर्थ:, ननु स्वल्पो दोषो गुणसन्निपाते चन्द्रकरेष्वक् इव निमङ्च््यति, कृतं तत्परिहारप्रयासेनेत्यत्राह-स्यादिति। यथा सुन्दरमपि सुविभक्त- सुगठितसर्वाज्गशालितया यथोचितपरिधानपरिष्कृततया च सुन्दरमपि रमणीयमपि वपुः शरीरम् एकेन कुत्राप्यज्नविशेषेऽवस्थितेन लघुना श्वित्रेण श्वेतकुष्ठेन दुर्भगं सौभाग्यवर्जितम् निन्दापात्रं स्यात् जायेत, यथा शरीरे क्वचनाअभेदेऽवस्थितेन श्वेतकुष्ठेन सुन्दरमपि शरीरं दुर्भगं जायते तद्वत् स्वल्पेन क्वचन पदांशे स्थितेन दोषेण काव्यमेव सकलं निन्दापात्रं भवति, अतः सर्वथा तत्परिहाराय यतनीयमिति भावः। दुष्टमिति भावे कः, दोष इत्यर्थः । दोषस्यात्यन्तपरिहार्यत्वे प्रक्रान्ते भामहेनाप्युक्तम्- 'सर्वथा पदमप्येकं न निमाद्यमवद्यवत्। विलक््मणा हि काव्येन दुःसुतेनेव निन्धते'॥ अत्रोपमानोपमेयभूतयोः पूर्वोत्तरवाक्ययोः बिम्बप्रतिबिम्बभावेन भिननधर्मनिर्देशाद् दृष्टान्तो नामालङ्कारः।।७।।

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काव्यादर्श:

हिन्दी-सगुण शब्दका सुप्रयोग करनेवाका प्रशंसाका पात्र होता है और सदोष शब्द का प्रयोग करनेवाला मू्ख कहा जाता है, अतः काव्यमें (जो शब्दकी उत्तम श्रेणीमें है) थोढ़ेसे दोषकी भी, पद-तदंशगन दोषकी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये ऐसा नहीं सोचना चाहिये कि बहुतसे गुणोंमें वर्ततमान छोटा-सा दोष क्या कर सकेगा, 'एको हि दोषों गुणसन्निपाते निमब्जतीन्दोः किरणेण्विवाक्ु:', सब जगह यह न्याय काम नहीं करता, देखिये-एक सुन्दर शरोरवाले तथा बढ़िया वखा पहने हुए बालकके किसी अङविशेषमें श्वेतकुष्ठका धब्बा दीख पड़ता है तो यह घृणाका पात्र बन जाता है। शरोरके एक भागमें वर्त्तमान वह श्वेतकुष्ठ जैसे सभी गुणोंके समव- धानमें भी उस सुन्दर बालकको घृणाका पात्र बना देता है, उसी तरह एक मागमें वर्स- मान थोड़ासा भी दोष काव्यकी उत्कृष्टताको समाप्त कर डालता है, इससे यह सिद्ध होता है कि काव्यमें दोष न आ पड़े इसके लिये पूर्ण सतक रहना चाहिये। इसी प्रसङ्गमें कही गई भामइकी उक्ति ऊपर संस्कृन व्याख्यामें लिखी जा चुकी है।। ७।। गुणदोषानशास्रज्ञः कथं विभजते जनः । किमन्धस्याधिकारोऽस्ति रूपभेदोपलब्धिषु॥ ८॥ दोषाणां परित्यागो गुणानां संग्रहथ्च कार्यत्वेनोक्त, ते च ज्ञाताः सन्त एव हया उपा- देयाश्च भवितुं शंक्नुवन्ति, तज्ज्ञानं च शास्त्रैकसम्पाद्यमित्याह-गुणदोषानिति। अशास्त्रज्ञः गुणदोषपरिचयप्रदसाहित्यशास्त्रज्ञानविधुरो जनो लोकः गुणान् उपादेयधर्मान्, श्लेषः प्रसाद इत्यादिना वक््यमाणान् (काव्यशोभाजनकतयोपादेयान, अनुप्रासोपमा- दीनलक्काराँश्र), दोषान् हेयतयोक्तान अपार्थत्वादीन कथं विभजते केन प्रकांरण इमे गुणा इमे च दोषा इति प्रातिस्विकरूपेण परिचिनुयात्, शब्दानुशासनादिज्ञानसम्पन्नः कथं- चित्पदतदर्थज्ञानं लब्धुं क्षमोऽपि भवेत्, परं यावत्तस्य साहित्यशास्त्रज्ञानं न भवति, तावद् गुणान् दोषॉश्च परिच्क्रेतुमसौ नैव क्षमेतेत्यर्थः। अ्रसुमेवार्थ दृष्टान्तेन विशदयति- किमिति। किं रूपस्य चक्षुरिन्द्रियमात्रप्राह्यगुणविशेषस्य भेद: श्वेतपीतादिरूपः तदुप- लब्धिषु तत्परिज्ञानेषु अन्धस्य चक्षुरिन्द्रियविकलस्य अधिकारः क्षमत्वम् अस्ति ? नास्ती- त्यथः । अप्रयमभिप्रायः-यथा चक्षुरिन्द्रियविकलो जनो रूपभेदान् श्वंतपीतादीनवधार- यितुमशक्तो भवति, तद्वत्साहित्यशास्रज्ञानविधुरो जनो गुणदोषविभागाक्षमो भवति, विभज्य तज्ज्ञानं चावश्यकं पूर्वोदीरितफलवश्वादतः साहित्यशास्त्रं सप्रयोजनमित्यावेदितं बोध्यम्। पूर्वश्लोकवदत्रापि दष्टान्तोऽलद्कारः॥ ८ ।। हिन्दी-जिसे साहित्यशाख्त्रका परिचय नहीं प्राप्त होगा, वह गुण दोषका विभाग किस प्रकार कर सकेगा? क्या रूपभेतको परखनेका अधिकार अन्धोको होता है? जिसको साहित्य- शाखका ज्ञान नहीं है, उसे (शब्दानुशासनका ज्ञान रहनेपर) पठपदार्थका ज्ञान कदाचित् हो भी जाय, परन्तु उपादेयतया निर्दिष्ट श्लेष, प्रसाद आदि गुण तथा वर्जनीयतया कथित अपार्थत्व प्रभृति दोघोंका विमक्ततया ज्ञान कैसे संभव होगा? उसको दोषगुणका पृथक पृथक परिचय नहीं प्राप्त सो सकेगा, जैसे चक्षुरिन्द्रियविकल व्यक्तिको रूपभेद (श्वेतपीतादिका विमक्ततया ब्ञान) होना संमव नहीं है। इस इ्लोकसे साहित्यशास्त्रका प्रयोजन कहा गया है। यहाँ दृष्टान्त अलक्कार ३ै।। ८ ।। अतः प्रजानां' व्युत्पत्तिमभिसन्धाय सूरयः। १. पदाना।

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प्रथम: परिचछ्छेद:

वाचां विचित्रमार्गा्णां निषबन्धु: क्रियाविधिम्॥९॥ तैः शरीरं च काव्यानामलक्काराश्च' दर्शिताः। अतः गुणदोषविभागज्ञान रूर्वककाव्यपरिशीलनजन्यानन्दस्य साहित्यशास्रज्ञानाधीन- त्वात् सूरयः भरतादयो विद्वांसः प्रजानां लोकानाम् व्युन्पनिम् काय्यतो व्यवहारपरिज्ञान- कौशलम् तद्विरचनचातुर्यम् वा अभिसन्धाय उद्दिश्य-एते लोकाः काव्यतो व्यवस्थित- व्यवहारज्ञानवन्तो भवेयुः काव्यं कनुच वा क्षमेरन्निति प्रजान्युत्पत्तिमीहमाना: मन्न इत्याशयः, विचित्रनार्गाणाम् नानाप्रकाराणाम् वैदर्भगौडीयादिरोतिभेदेन शब्दार्थालद्वार- भेदेन च भिद्यमानरचनाप्रकाराणाम् वाचाम् काव्यान्मरुगिराम क्रियाविधिम् निर्मागपदवर्ति निबबन्धुः शास्त्रपरिभाषया विरचयामासुः। अत्र सूरयो निवबन्धुरिति तदुकीनामप्रमाद- त्वसंभावना, तया च तदनुसारिणो ममाप्युक्त: सारवत्त्वमिति ध्वनितम् ॥ ९ ॥ तैः पूर्वसृरिभि: भरतादिभिः काव्यानाम् इष्टाथयुनवाक्यानाम् गद्यप्यमिश्रादेभेदेन भिन्नानाम् शरीरम् आत्मस्थानीयेष्टार्थाश्रयो देहः, अलङ्काराः अनुप्रासोपमादयः च दर्शिताः, प्राश्चो भरतादयः सूरयोऽभीष्टार्थमात्मानम्, तदाश्रयं शब्दस्तोमं देहम्, तत्प्रसाधनपटूनलङ्गाराननुप्रासोपमादीन, चकाराद्दोपाँश्च प्रदशितवन्त इत्याशयः। गुणास्तु श्लेषादयो वेदर्भरोतेः प्राणतया मता अतः पदावलीसंस्थानविरोषानमकवैदर्भरीतेः शराररूप- तया लाहशरारीरनिरुक-येव निरुक्ता इति पृथगत्र गुणपदानुक्तावपि न्यूनत्वं नाशङ्कनीयम्। हिन्दी-गुण तथा दोषका विभागपूर्वक ज्ञान-ये गुण है, ये दाघ हैं, इस प्रकारका धर्म- भेदप्रकारक ज्ञान-साहित्यशास्त्रज्ञानके बिना नहीं हो सकता, इमलिये प्राकन आचार्य मरत आदि विद्वानोंने लोकको व्यवस्थित व्यवहार्ञान मिल सके इमलिये नाना प्रकारोंमें-वैदमीं- गौडीप्रमृति रीतियों एवं शब्दरार्थालक्कारादि प्रभेदसे भिन्न-काव्यात्मक वाणीके निर्माणका प्रकार बताया है। मरत आदि आचार्योंने देखा कि सकल जनको व्यवहार-ब्ञान व्यवस्थित रूपसे काव्यके द्वारा हो हो सकना है, अतः उन्होंने वेदमीं, गौड़ी आदि गीतियों तथा शब्दार्थालक्गारा- दिकोंके प्रभेदसे बहुधा विभक्त इस काव्यात्मक वाणीके निर्माण-प्रकारका यथावद वर्णन कर दिया है। ९ ॥ मरतादि प्राचीन बाचार्योंने काव्यका स्वरूप बताया है, काव्यका लक्षण प्रदशित कर दिया है और काव्यकी विशिष्टता प्रकट करनेवाले अलक्कारोंका मी निवेचन करके बनाया है। यहाँ अलद्कार शब्द उपलक्षण है अतः अलक्कार से उपस्कारकमात्र-रीति तथा गुणादि भी लिये जा सकते हैं। शरार-निवेचन से दी प्राणभून रीतियोंका निर्वचन हो जाता है।। शरीरं तावदिष्टार्थव्यवच्छिन्ना पढावली॥ १० ॥ ताबदिति पदं वाक्यालङ्करणाय प्रयुज्यमानं बोध्यम्, इषाः अभिलषिताः सरसतया मनोहरतया च वर्णयिनुमुद्दिष्टाः ये अर्थाः कविप्रतिभाप्रतिफलिताः सुन्दराः पदार्थाः तै्व्यवच्छिनना युक्ता पदावली शब्दसमूहः शरीरं काव्यशरीरम्, इष्टार्थः पदममुदयः कांव्यमिति यावत्। नन्व्रेवं काव्यस्येष्टार्थपदसमूहृत्वेन परिचेयत्वे 'कामिनी कमलं चन्द्रः क्षीरोदधिरहस्करः' इत्यादिपदसमुदयस्य काव्यन्वापतिरिति वेन्न, पदसमूहस्य माकाडक्ष- स्यैव काव्यशरीरत्वेन प्रतिपादयितुमिष्टनवात्। अत्र गुन्दरपदार्थकानामप्येषां पदानां

१. अलङ्कारश्व। २. दशिंत:।

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१० काव्यादर्श:

परस्परनिराकाकक्षत्वात्। न च साकाउक्षपदसमुदयस्यैव काव्यशरीरत्वेनोपादानं निष्प्र- माणकमिति शङ्कनीयम्, तादृशपदसमुदयस्यैवेष्टार्थव्यवच्छिनत्वस्य संभवेन तादृशस्यैव पदसमुदयस्यात्र भ्रहीतुं योग्यत्वात। इष्टार्थत्वं च चमत्कृतिबहुलत्वम्, चमत्कारक्ष लोकोत्तर आहाद: आहलादगतं लोकोत्तरत्वं च कविप्रतिभयोपस्थापितेनालौकिकसामग्री- विशेषेण सम्पादितः सृखत्वव्याप्योऽनुभवसाक्षिको जातिविशेषः । तेन 'पुत्रस्ते जातः' 'धनं ते दास्यामि' इति वाक्यार्थधीजन्यस्यानन्दस्य न लोकोत्तरत्वमतो न तद्वाक्ययोः काव्यत्वप्रसक्तिः। ताइशाह्लादं प्रति शब्दार्थानां कारणत्वं व्यअ्ञयविशेषद्वारेण दोषाभावोप- स्कृतगुणालक्कारकृतसौन्दर्येण च, तेन काव्यस्य त्रैविध्यं फलति, यत्र वाच्यचमत्कृतेः व्यभ्यचमत्कृतिः प्रधानतया परिस्फुरति तत्र ध्वनिकाव्यत्वव्यपदेशः, यत्र व्यप्तयचमत्कृ- तिर्वाच्यचमत्कृतिसमाविष्टा सत्यप्गभावं भजते तत्र गुणीभूतव्यज्ञयत्वव्यवहारः, यत्र व्यज्गथ- चसत्कृतिनिरपेक्षा वाच्यचमत्कृतिसतत्र चित्रकाव्यत्वप्रथा ॥ १०॥ हिन्दी-काव्यका शरीर-स्वरूप क्या है? काव्य किसे कहते हैं? इस प्रश्नका उत्तर इस कारिकार्धमें दिया गया है-शरीरमिति। ३2-सर्स मनोहरतया वर्णन करनेके लिये अभिप्रेत अर्थसे युक्त शब्दको काव्यका शरीर कहा जाता है। इष्ट अर्थसे युक्त पदसमुदायको काव्य कहते हैं। यहाँ पर इतना जानना आवश्यक है कि इषाथयुक्त पद होना-मर हो काव्यशरीर कहलाने- के लिये पर्याप्त नहीं है, उन-पदोंका साकाकूक्षत्व-योग्यत्वादि अपेक्षित है, अतएव 'कामिनी कमल' आदि निराकाह पदसमुदायको काव्य नहीं कहा जा सकता। यह साकाहल्वनिवेश कोई निष्प्रमाणक बात नहीं है, रष्टार्थव्यवच्छित्नत्वान्यथानुपपत्या सिद्ध ही है। इष्टार्थत्वसे यहाँ पर चमत्कारयुक्तत्व अभिमत है, चमत्कारका अभिप्राय लोकोत्तर आहादसे है, और आह्ादगत लोकोत्तरत्व कविप्रतिभोपस्थापित लौकिक सामग्रीसे सम्पादित सुखत्वव्याप्य अनुभषसाक्षिक जातिविशेषस्वरूप है, अतएव 'पुत्रस्ते जातः' 'धनं ते दास्यामि' इत्यादि लौकिक- वाक्यार्थदुद्धिजन्य लोकिक आहाइसे इस वाक्यसमूहको काव्यस्वप्राप्तिका अधिकार नहीं मिलता। उस अलौकिक आहलादके प्रति शब्द तथा अर्थकी कारणना तोन प्रकारोंसे संभव है, १-मुख्य व्यङ्रयविशेष द्वारा, २-अमुख्य व्यक्रयविशेष द्वारा, ३-दोषासंपृक्त गुगालक्कारसमुद्भावित चमत्कार द्वारा। अतः काव्यके तीन भेद शुद्ध होते हैं, जहाँ पर वाच्यार्थसौन्दर्यापेक्षया व्यक्थार्थ सौन्दर्य प्रधानतया प्रकाशित होता हो वहाँ पर ध्वनिकाव्यश्वव्यवहार होता है, इसमेंःमुख्य- व्यप्यविशेषद्वारक आहाद है, जहाँ पर व्यक्षयार्थं सौन्दर्य वाच्यार्थसौन्दर्यापेक्षया गुणीभूत हो जाय, वाच्यार्थ सौन्दर्य कुक्षिप्रविष्ट-सा हो जाय उसे गुणीभूत व्यक्षय काव्य नामसे व्यवहन करते हैं, इसमें अमुख्यव्यङ्रयद्वारक आह्ाद है, और जहाँ पर दोषाभावके साथ गुणसद्भाव हो तथा वाच्यार्थमात्रकृत आहाद हो उसे चित्रकाव्य कहा जाता है। कुछ आचार्योंने चित्रकाव्यके दो भेद माने हे, अर्थचित्र तथा शब्दचित्र। अर्थचित्रका स्वरूप तो यही माना है जो हम यहाँ कह आये हैं, शब्दचित्रका स्वरूप उन्होंने यह कहा है-यदि अर्थकी विशेष चिन्ता न करके शब्दको सजाकर उपस्थित करनेका प्रयाम किया जाय, जैसा कि नवाभ्यासी कवि लोग किया करते है तो वह चित्र शब्दचित्र है। इस प्रकार रष्टार्थव्यवचषिन्न पदावलीको काव्यशरीर माननेवाले दण्डीके मतमें रमणीयार्थ- युक्त वाक्य हो काव्य होता है, वाक्य उस पदसमुदायको कहते हैं, जो योग्यता, आकाक्षा और आमतिसे युक्त हो। अतः इनका कक्षण शब्दकाव्यवादी सिद्ध होता है। काव्य सब्दका अर्थ क्या है? शब्दाधयुगल अथवन केवल रमणीयोर्थयुक्त शब्द ? इस विषयमें

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प्रथम: परिचछेद: ११

पक्षमेद चला आता रै-कुछ आचार्य सब्दाथयुगळको काव्य माननेके पक्षमें हैं और कुछ कोग रमणोयार्थक शब्दको हो काव्य मानते हैं, जैसे- मामह-'शब्दार्थों सहितौ काव्यं गय पद्य व तद दिया'। वामन-'काव्यशब्द्रोडयं गुणालद्दारसंस्कृतयोः शब्दार्थयोबतते'। रुद्रट-'शब्दायों काव्यम्'। मम्मट-'तद्दोषौ शब्दारथों सगुणावनलंकृती पुनः कापि'। आनन्दवर्धन-'शब्दार्थशरीरं तावत्काष्यम्'। हेमचन्द्र-'अदोषौ सगुणौ सालकारी च शब्दाथौं काव्यम्'। बाग्मट-'शब्दार्थों निर्दोपी सगुणौ प्रायः सालक्वारौ च काव्यम्'। विदयानाथ-'गुणालक्कारसहितौ शब्दार्थों दोषवजितौ काव्यम्'। विदयाधर-'शब्दार्थों वपुरस्य तत्र विदुधेरातमाभ्यायि ध्वनिः'। यहाँ इमने कुछ आचार्योंके काव्यलक्षण उद्धृत कर दिये हैं, यह शब्दार्थयुगलकाव्यत्व- समर्थक आचार्योंके वचन हैं। इन लोगोंने शब्दार्थयुगलको काव्य क्यों माना ? इस विषय पर विचार करनेसे मालूम पड़ता है कि शाखत्रविमुख सकुमारमति राजपुन्रादिकोंको शिक्षित करनेके लिये ही प्राषान्येन काव्यकी आवश्यकता होती है, अतः उन रझ्रूटोंको गुड़जिहिकया उपदेश प्रदान करनेवाले काव्योंमें हृदयहारी अर्थ तथा मनोरम शब्दाबैलीका होना अपेक्षित था। अतः काव्यफलत्वेनाभिमत विनेयराजपुत्रादिशिक्षणकार्यमें शब्त तथा अर्थका समप्रांशान्येन उपयोग देखकर आचार्योंने शब्दार्थयुगलको काव्य मान लिया। परन्तु शब्दमात्रको काव्य माननेवाले आचार्य इस मतके विरोधमें यह तर्क उपस्थित करते हैं कि 'काव्य जोरोंसे पढ़ा जा रहा है', 'काव्यसे अथ समझा जाता है,' 'मैंने काव्य तो सुन लिया परन्तु अर्थ नहीं समझा' इत्यादि सर्वलोकप्रचलित व्यवहारोंसे काव्य शब्दका अर्थ शब्दमात्र ही निर्धारित होता है, और वागव्य- बहार में शब्दको ही प्राधान्य प्राप्त है, इसकिये मी अर्थोपस्कृत शब्दको ही काव्य माना जाना चाहिये। पूर्वोक्त व्यवहारोंको उपपन्न करनेके लिये शब्दार्थयुगलैकदेश शब्द या अर्थमें (अग्रमात्र हस्तावयवमें इस्तोडयम् इस व्यवहारकी तरह) लक्षणा कर ली जा सकती है यह कहना सक्कत नहीं है, क्योंकि लक्षणा तो तब होगी जब कि काव्यपदकी शक्ति शब्दार्थयुगलमें निर्धारित हो गई हो, और उसीके चलते मुख्यार्थबाध होता हो। यहाँ तो अमी शब्दार्थयुगलमें काव्यपदकी शक्ति निर्धारित नहीं हुई है, इस स्थितिमें लक्षणा कैसे होगी? एक बात और ध्यान देने योग्य है कि 'वेद' 'पुराण' आदि संज्ञा शब्द भी जब शब्दमात्र- परत्वेन व्यवस्थापित हैं, तब तत्सजातीय इस 'काव्य' शब्दको भी शब्दमात्रपरक हो होना चाहिये, शब्यार्थयुगलपरक नहीं होना चाहिये। इसके अतिरिक्त शब्द्रार्थयुगल-काव्यतावादो यह तो बतावें कि काव्यपद प्रवृत्तिनिमित्त (काव्यश्व ) शब्द्रार्थयुगलमें व्यासज्यवृत्ति (शब्दार्थोमयपर्याप्वृत्ति) मानते हैं या प्रत्येकमें (शब्द तथा अर्थमें मलग अरग ) पर्याप्तवृत्ति मानते हैं ? इसमें पहला कल्प इसलिये असक्त है कि यदि काव्यत्वको शब्दार्थयुगलव्यासज्यवृत्ति कहते हैं तो जैसे 'एको न दौ' यह व्यवहार होता है, उसी तरह 'फोकवाक्यं न काव्यम्' यह व्यवहार भी होने लग जायगा। यदि द्वितीय पक्ष-भर्थाव शब्द तथा अर्थमें अरग अलग र्याप्त काव्यत्व-मानते हैं तो शब्दार्थीशमेदसे एक ही काव्यको आप दो काव्य भी स्वीकार करनेको वाषित हो जाते हैं। अतः काव्यपद का अर्थ केवळ शब्द ही माना बाय। इस पक्षमें भी बहुतसे आचार्य है। जैसे-

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१२ काव्यादर्श:

अग्निपुराण-'रक्षेपाद् वाक्यमिष्टार्थव्यवच्छिन्ना पदावली काव्यम्'। दण्डी-'शरीरं तावदिष्टार्थव्यवच्छिन्ना पदावली'। शोद्धोदनि-'रसादिमद् वाक्यं काव्यम्'। विश्वनाथ-'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्'। जगन्नाथ-'रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्') जयदेव-'निर्दोषा लक्षणवती सरीतिर्गुणभूषिता'

माणिक्य चन्द्र-'काव्यं रसादिमद्धाक्यं श्रुतं सुखविशेषकृत'। इस तरह हम देखते हैं कि काव्यके लक्षणमें बड़ा भारी मौलिक मतभेद है। कुछ लोग जितनी दृढताके साथ शब्दार्थयुगलको काव्य मानते हैं, कुछ अन्य लोग उतनी ही दृढताके साथ शब्द- मात्रको काव्य स्वीकार करते हैं। यहाँ पर सोचना यह है कि आखिर कौन पक्ष अधिक युक्तिसक्गत है? मेरो युद्धिमें शब्द- मात्रको काव्य कहनेवाला पक्ष हो ोक है, क्योंकि वागव्यवहारमें शब्दमात्रका प्राधान्य है, वह अर्थापेक्षया अधिक व्यापक है, अतः वागव्यतहारविशेषरूप काव्यमें शब्दका प्राधान्य होगा। उसके समकशरूपमें अर्थका निवेश कर देना उचित नहों है। यदि अर्थनिवेश कर देते हैं तो तुत्यन्यायसे वेदादि लक्षणोंमें भी अर्थनिवेश करना पड़ जायगा, और तब 'वेदः पठितः परमर्थों नावगतः' यह पतीति अनुपपन्न हो जायगी। अनः जैसे वेद-शब्दसे केवल शब्दविशेष समझा जाता है उसी तरह काव्य-शब्दसे भी केवल शब्द ही लिया जाना चाहिये। हाँ, यह जरूर है कि अर्थोपस्कृत हो शब्द काव्य होंगे, परन्तु लक्षणमें अर्थ पदका समावेश अनावश्यक है। यहाँ पर एक शक्का यह की जा सकती है कि यदि शब्दमात्रको काव्य कहा जाय तब 'काव्यं बुद्धम्' इत्यादि प्रतीति कैसे उत्पन्न होगी ? इस प्रसक्गमें यह उत्तर देना चाहिये कि इस प्रतीति-मधुरवर्ण अनुपासजन्य श्रुतिचमरकारनुभव-को ही यहाँ पर 'बुद्धम्' पदसे स्वीकार किया गया है। जिसको अर्थज्ञान नहीं होना है वह भी अनुपासादिसौन्दर्यके प्रमावसे जो मानसिक तृप्ति प्राप्त करता है, उसी तृप्तिको उसने 'बुद्धम्' पढसे व्यक्त किया है। अनुभत् साक्षी है कि-

कङ्कणाङ्कभुजा भान्ति जितानक तवाक्रनाः' ॥ अथवा

मधुकगङ्गनया मुद्ठुरुन्मदध्वनिभृना निभृनाक्षर मुज्जगे'॥ इस तरह की मधुरकोमलकान्नपदावलोको पढ़कर या मनकर बिना अर्थ समझे मी लोग यह समझ लेने हैं कि यह काव्य है। यदि अर्थ काव्य होता तब तो जिस प्रकार-'कामिनी व्याहरति' 'नीरसनरुरिह विलसति' यह वाक्य काव्य कहे जाते हैं, उसी नरह 'सो व्रने' 'गुष्को वृक्षस्तिष्ठनि' ये वाक्य भी काव्य कहे जाते, क्योंकि दोनों वाक्ययुगलोंमें अर्थ तो समान हो है, अतः काव्यकक्षणमें अर्थका समावेश दुरवंक ही है। यह नो काव्यलक्षणकी व्याख्या हुई, अब थोडा अर्थको मी लक्षणघटक बनानेवाले आचार्यो- के दलपति आचार्य मम्मटके लक्षणको देखिये। उनका लक्षग इस प्रकार है-'तददोषौ शब्दार्थौं सगुणावनलंकृनी पुनः क्वापि'। इस लक्षगमें 'शष्द्रार्थौं काव्यम्' मान लिया गया है, और उममें तोन विशेषण लगाये गये है, उनमें पहला विशेषण है-'अदोषौ'। यदि निर्दोष शष्ट्ार्थको हो काव्य माना जायगा तब-

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प्रथम: परिच्छेद: १३

'न्यकारो धयमेव मे यदरयस्तन्राप्यसौ तापसः सोडप्यजैव निहन्ति राक्षसकुलं जीवत्यहो रावणः। विग्धिक शकजितं प्रबोधितवता कि कुम्भकर्णेन वा स्वर्गग्रामटिकाविलुण्ठनवृथोच्छूनैः किमेभिर्भुऊैः ॥ इस फ्लोकमें विधेयाविमश नामक दोष होनेके कारण लक्षणकी अव्याप्ति होगी। इसे काव्य नहों ही मानें यह बात नहीं कही जा सकती है, क्योंकि स्वयं काव्यप्रकाशकारने इसे ध्वनियुक्त कहकर उत्तम काव्य माना है (ऐसा लक्षण है कि उत्तमकाव्यतया अभिमत पद्यको काव्य तक नहीं बनने दे रहा है), एक बान और होगों कि यदि निर्दोष ही को काव्य माना जायगा तब कान्यका विषय बहुत कम रह जायगा, या यो काहिये कि काव्य नामक वस्तु हस्तनक्षत्रका खजन बन जायगी, क्योंकि मर्व्था निर्दोष होना नितान्न कोठिन होना है। यही नहीं, यदि निर्दोष को ही काव्य माने नत 'दुष कष्यन्' यह प्रतीति नहीं होगा, क्योंकि नोषयुक्तकी तो आप काव्य मानते हो नहों, फिर 'दुष काव्यम्' आप किस प्रकार कहेंगे। दूसरा विशेषण है 'मगुणौ'। यह मी ठांक नहीं है, क्योंकि काव्यप्रकाशकारने गुणोंको स्वयं रसर्म कहा है-'ये रसस्याङ्गिनो धर्माः शौर्यादय श्वात्मनः'। गुण तभी रहेंगे जब रम रहेगा, अतः 'सगुणौ' से 'सरसौ' विवक्षित ऐसा नहीं कहा जा सकना है, क्योंकि इस तरह कहना तो एक प्रकार की पहेली हो जाती है, 'प्राणिमान् देश है' इम अभिप्रायसे 'शौर्यादिमान् देश है' ऐसा कहनेकी प्रथा नहीं है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि यदि 'सगुणौ शब्दाथौं काव्यम्' ऐसा मान लेते हैं तब 'उदितं मण्डलं विषो:' 'गतोडस्तमर्कः' इत्यादि वाक्यको काव्यत्व नहीं प्राप्त होता क्योंकि इनमें गुण नहीं है। तीसषरा विशेषण है 'सालक्वारौ'। यह तो और अविचारित है, क्योंकि हारादिवद अल- शर तो शोभावर्धनके लिये धारण किये जाते हैं, उनका शरीरावयव होना कैसे उचित होगा। इस प्रधान मतकी आलोबनासे ही शब्दरार्थोमयकाव्यतावादो सभी आचार्योंके मतकी आलो- चना हो जाती है। शब्द्रकाव्यताबादी आचार्योमें भी कुछ आचार्य ऐसे हैं जिनके मत पर कुछ विचार करना है, उनमें विश्वनाथने-'रसात्मकं वाक्यं काव्यम्' कहा है, शौद्धोदननिके मतमें 'रसादि- मत' कहा गया है, इन दोनों आचार्योंने रसके बिना काव्यत्व नहीं स्वोकार किया है, परन्तु इस पक्षमें वस्त्वलक्कागप्रधान काव्योंमें काव्यलक्षण नहीं सङ्गत होगा, यह अव्याप्तिदोष होगा, उन्हें आप काव्य नहीं माने यह तो ठीक नहीं होगा, क्योंकि महाकवियोंने जलप्रवाह प्रपात, कपिविलसित, बाललीलाके वर्णन किये हैं, और उन्हें सहृदय जन काव्य मानते आये हैं। वस्तव- लक्कारप्रधान काव्योंमें मो (कर्थाव्चत-परम्परया) रसस्पर्श है अतः ये उसी रसस्पर्शके बलपर काव्य कहे जा सकते हैं, यह बात ठीक नहीं जँचती है क्योंकि यदि इस तरह रसस्पशसे वाक्य काव्य कहे जाने लगेंगे तब तो 'गौश्वरति' इसे भी काव्य कहना पड़ेगा। संसार के समी पदार्थ कहीं न कहीं विभावादिस्वरूप होते ही हैं, उनके द्वारा रसस्पर्श सव्त्र मानना पड़ जायगा। इस प्रकार मैं देखता हूँ कि इस पक्षमें भी कुछ दोष है। अन्त्में दण्डीका लक्षण ही ऐसा रह जाता है जिसे इम रसगक्गाधर के प्रौढ लक्षणके रूपमें विवृत पाते हैं। इम प्रसक्में जिज्ञासुजनोपकाराथ इतना और कह देना चाहता हूं कि यर्दाप दण्डी तथा आलोचनारसिक जगनाथने शब्दमात्रको काव्य कहनेके लिये बहुत प्रयाम किया है, परन्तु आलोचनाका अन्त यहोँ ही नहीं है, जिन्हें इस प्रसममें और जानना हो वह सुज्ञवर्ग नागेशकृत गुरुमर्मप्रकाशनामक रसगङ्गावरव्याख्या, म. म. गङ्गाधरशाख्त्रीकृत रसगङ्गाधरटिप्पणी, म. म. गोकुलनाथोपाध्यायकृत काव्यप्रकाशव्याख्या तथा म. म. गोविन्दठककुरकून काव्यप्रदीप अवश्य देखें।

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१४ काव्यादर्श:

गरध' पद्यं च मिशं च तत् त्िधैव व्यवस्थितम्। पद्यं चतुष्पदी तब वृत्तं जातिरिति द्विधा ।। ११।। काव्यस्वरूमुक्तं प्राग, इदानीं प्रोक्तस्वरूपस्य काव्यस्य भेदानाह-गद्यमिति• गद्यते स्वाभाविकरूपेण स्वाभिधेयार्थबोधनाय लोकरुच्चार्यत इति गद्यम्, पद्यम् श्लोक- चरणमर्हतीति पद्यम्, मिश्रम् गद्यपद्योभयमिलितम्-एवं गद्यपद्यमिश्रनामकप्रकार- त्रयेणोपलक्षितं तत् काव्यं त्रिधैव त्रिष्वेव प्रकारेषु व्यवस्थितम् नियतम्, काव्यस्य त्रय एव भेदा: संभवन्ति, गद्यपद्योभयरूपत्वात्। एवं भेदत्रयमभिधाय तत्र प्रथमं भेदं लक्षयति-पद्यमिति० काव्यभेदेषु प्रथमं पद्यम् श्लोकात्मकम् चतुष्पदी चतुर्भिः पादै- श्वरणै्निबद्धम् भवति, चतुर्णा पदानां समाहारक्षतुष्पदी, पादचतुष्टयात्मकं पद्यमित्यर्थः । यद्यषि वेदे द्वित्रिपद्यादयोऽपि दृश्यन्ते, तथापि केवललौकिकवृत्तपरत्वादत्र चतुष्पदीत्युक्तम्। वस्तुतस्तु चतुष्पदीत्युपलक्षणम्, तेन षट्पद्यादयोऽपि संप्राह्याः । तच्च पद्म्-वृत्तम् जातिः इति प्रकारदवयेन द्विधा द्विप्रकारक्म्। तत्र अक्षरसमख्यातं वृत्तम्, मात्रासडख्याता जाति:, तदुक्तम्- 'पद्यं चतुष्पदी तच्च वृत्तं जातिरिति द्विधा। वृत्तमक्षरसङ्ख्यातं जातिर्मात्राकता भवेत्'॥ छन्दोमजरी॥ ११ ॥ हिन्दी-जिस काव्यका स्वरूप इम निकक्त कर आये है वह काव्य तीन प्रकारका होता है- गय, पद्य और मिश्र (मिलित-गययपद्य उभयरूप)। गय उसे कहते है जिसे एम स्वभवतः बोळते है, जिसमें राग नहीं होता है, जो केवल अपना भाव प्रकाशित करनेके लिये स्वभावतः प्रयुक्त होता है। साहित्यदर्पणकार ने गयके लक्षण तथा भेद इस प्रकार कहे हैं- 'वृस्तगन्धोजिसितं गद्यं मुक्तकं वृत्तगन्धि च । भवेदुस्कलिकाप्रायं चूर्णकं च चतुविषम्'॥ इस लक्षणमें 'वृत्तगन्धोज्झितं गद्यम्' यह गद्यका स्वरूपकथन है। मुक्तक, वृत्तगन्दि, उत्क- किकाप्राय और चूर्णक ये चार उसके भेद हैं। इन चारों भेदों के मो लक्षण उसी जगह बताये गये हैं, जैसे -- 'आयं समासरहितं वृत्तमागयुतं परम्। अन्यद्दोर्घसमासाढ्यं, तुर्य चाछपसमासकम्।' मुक्तकमें समास विश्कुल नहीं रहता है, वृत्तगन्धिमें छन्दोबन्धके कुछ अंश हो, परन्तु उनका कम कायम नहीं रह पाता हो, उत्कलिकाप्रायमें लम्बे-लम्बे समास किये गये हों और चूर्णकमें समास हो परन्तु कम। इनके उदाहरण ये है- मुक्तक-'गुरुवचसि पथुरुरसि अजुंनो यशसि'।

यहाँ 'कुण्डलीकृतकोदण्ड' यह अनुष्टप् का चरण है।

ताषरोकृत लोकाकिप्यमानकाइ्मी (जद्वदरबिकसदर विन्दानाम्'। चूर्णक-'गुणरलसागर, जगदेकनागर, कामिनीमदन, जनरजन'। पथका लक्षण कहा है-'छन्दोवदपदं पथयम्'। छन्द अनेक प्रकार के होते हैं-मालिनी, शिख्षरिणी, वसन्ततिकक आदि। यह पद प्रायः बार चरणोंका होता है, इसीलिये आचार्य दण्डीने 'पय चतुष्पदां' कहा है। वस्तुतः पबके चरणोंकी संख्या नियत नहीं होतो है, विश्व-

  1. पर्दं गर्य च।

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प्रथम: परिच्छेद: १५

विद्वित गायत्री तोन हो चरणोंकी है, इनना ही नहीं, 'षट्पदी' नामक वृत्त भी प्रसिद्ध है, अतः 'चतुष्पदी' पद उपलक्षण मानना चाहिये। पथके दो प्रकार होते हैं-वृत्त एवं आति। अक्षरसंख्यात चरणको वृत्त तथा मात्रासकखयात चरणको जाति कहते हैं। उदाहरणके किये स्र्बग आदि पृत्त है और आर्या आदि जाति हैं। वृत्तोंके मी सम, अर्धसम, विषम आदि भेद कहे गये हैं। सम- वृत्त जैसे-स्ग्वरा, अर्धसम-पुष्पिताग्रा, विषमवृत्त-वैतालीय। मिश्र शब्से गय्यपयोभयमिश्रण विवक्षित है। नाटक, चम्पू आदि इस प्रभेदमें आते हैं। अन्धान्य आचार्योंने काव्यके मेद इस प्रकार बताये हैं, 'दृश्यश्रव्यत्वभेदेन पुनः काव्यं द्विषा मतम्'। उनके अनुसार काव्य दो प्रकारके है-दृश्य और श्रव्य। श्रव्यके मेद काव्य, आख्यायिका, चम्पू आादि। दृश्यके भेद नाटक, रूपक, घ्हसनादि ॥ ११ ॥ छन्दोविचित्यां सकलस्तत्प्रपश्चो निदर्शितः। सा विद्या नौस्तितीर्षूणां' गभीरं काव्यसागरम् ॥१२॥ वृत्तविभागस्य वक्तव्यतायाः प्रकरणप्राप्ततया तद्विषये वक्तव्यमाह-छन्द इति। छन्दांसि विचीयन्ते लक्षणत उदाहरणतो भेदप्रभेदतक्ष निरुध्यन्ते यस्यां सा छन्दोविचिति- र्नाम छन्दःशास्त्रविषयकः प्रबन्धः, तस्यां सकलः समग्रः तन्प्रपश्चः वृनजात्योर्विस्तार: निदशिंतः उदाहृतः, उक्थादयः समाधसमविषमादयो वृत्तभेदाः आर्यागीत्यादयो जार्ति- भेदाक्ष तत्र सामप्रथेण विवेचिताः, अतश्छन्दोज्ञानार्थ तादृश एव प्रन्थः परिशीलनीय इत्यर्थः । सा विद्या छन्दोविचित्यादिप्रन्यसम्पार्दं छन्दःशास्त्रविषयकं ज्ञानम् गभीरम् दुरवगाहम् काव्यसागरं काव्यरूपं महोदधि तितार्षूणाम् पारं जिगमिषूणाम् नौः पोतः भवतीति शेषः। यथाहि सागरपारं जिगमिषुर्जनः नावमवलम्बते, तत्र तन्मात्रस्योपायत्वा- तथा छन्दोविवेकज्ञानाय छन्दःशास्त्रमेव परिशीलनीयं तस्य तदेकोपायकन्वात् छन्दोज्ानं हि काव्यस्य करणे परिशीलने चोपयुङ्क इन्याशयः। 'छन्दोविचितः' नाम छन्दोग्रन्थो दण्डिना प्रणीत इति बहव आहु:, 'त्रयो दण्डिप्रबन्धाश्च' इति च ते तदुपोद्वलकं स्मारयन्ति॥ हिन्दी-वृत्तजाति आदि छन्दोभेदका विस्तारपूर्वक विवेचन 'छन्दोविचिति' नामक छन्दो- ग्रन्थमें विस्तारपूर्वक किया गया है, अतः उसका ज्ञान उसी ग्रन्थसे करना चाहिये क्योंकि काव्यरूप सागरमें (शब्द्रार्थरूप रल पानेकी इच्छासे) तरण करनेवालोंके लिये छन्दोज्ञान मौकारूप है। जिस प्रकार नौका लेकर समुद्रमें जानेवाले अव्यापन्नभावसे स्वामीष्ट रसानिसंग्रहणमें समर्थ हुआ करते हैं अन्यथा असफल रहते हैं, उसी तरह छन्दोज्ञान सम्पन्न जन काव्यसागरमें शब्दार्थरलका संग्रह कर पाते हैं अन्यथा नहीं। 'छन्दोविचिति' नामक एक छन्दोग्रन्थ दण्डिकृत था (जो अब अप्राध्य हो गय। है) उसीका नाम इस पबमें आया है, हसीके आधार पर लोग 'त्रयो दण्डिप्रबन्धाश्ष' मानते हैं ॥ १२ ॥ मुक्तकं कुलकं कोष: सङ्गात इति ताडशः। सगबन्धांशरूपत्वादनुक्तः पद्यविस्तरः॥१३।। 'गद्यं पद्यं च मिश्रश्चे'ति काव्यत्रैविध्यमुत्तम्, तत्र पद्यकाव्यस्य बहवो भेदाः प्रथन्ते, 'मुक्तकम्', 'कुलक्म्', 'कोषः', 'सङ्वातः' इत्यादयः, सर्देषां तेषां विस्तारेणात्र वर्णनं न चिकीषितं सर्वेषामपि तेषां महाकाव्यांशरूपत्वान्महाकाव्यवर्णनेनैव तेषामपि वर्णनस्य १. विवक्षणां, विविक्षणां। २. बन्धाङ्ग- ।

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१६ काव्यादर्श-

कृतप्रायत्वात्, तदाह-मुक्क्कमिति। मुर्तकम्-'मुक्तकं श्लोक एवैकश्चमत्कारक्षमः सताम्' यथा-अमरुशतकादिः। कुलकम्- 'द्वाभ्यां तु युग्मकं सन्दानितकं त्रिभिरिध्यते। कलापकं चतुर्भिश्व पश्चभिः कुलकं मतम् ॥' यथा-तन्र तत्र काव्यादौ वर्णनविशेषाः। कोष :- 'कोष: इ्लोकसमूहृस्तु स्यादन्योन्यानपेक्षकः। व्रज्याक्रमेण रचितः स एवातिमनोरमः ॥' यथा-आर्यामप्रशत्यादिः। सङ्घातः-'यत्र कविरेकमर्थ तृतनकेन वर्णयति काव्ये सङ्वातः स निगदितः।' यथा-वृन्दावन मंघदूतादि:। एवंलक्षणलक्षिता: पद्यप्रभेदाः पृथगत्र न प्रपश्चिताः, तेषं सर्वेषां सर्गबन्धांशरूपत्वांत् सगबन्धा-मकमहाकाव्यांशरूपत्वात्, तत्र मुक्तककुलकी नामाद्यभेदौ साक्षादंशरूपौ, अन्त्यो कोषसङ्वातौ तु महाकाव्ये तत्तदुच्चावचवणने सम्भवत एवोत पृथगत्र न प्रपश्चिता ।।१३॥ हिन्दी-मुक्तक, कुलक, काष, संधात आदि पद्यविस्तरका इस ग्रन्थमें विस्तृत विवेचन नहीं किया गया है क्योंकि वे सभी सर्गबन्धात्मक महाकाव्यके अङ्गभूत है, इनमें मुक्तक तथा कुलक साक्षाद् अङ्र हैं और कोष तथा संघात तरतद्ूर्णनमें अङ्ग हो जाया करते हैं। मुक्तकका लक्षण ह-'अन्यानपेक्ष एकश्लोकनिबन्धो मुक्तकम्'। कुलक-'अनेकपधेनेकक्रियाऽन्विते नैकवाक्यार्थकथनं कुलकम्'। कोष :- 'असंहतार्थानाम् एककवेरनेककवीना वा वाक्यानां काव्यात्मना निषन्ध: कोष:'। संघातः- 'कर्पितवस्तुकः एकच्छन्दोनिव्यूंढः पद्यसमुदयः संघातः'। इस तरह सभी भेदोंके लक्षण अलग-अरुग बताये गये हैं, ये सभी महाकाव्यके अङ्रभूत हैं, अतः इनका विस्तुत वर्णन यहाँ पर नहीं दिया जा रहा है।। १३ ।। सर्गबन्धो महाकाव्यमुच्यते तस्य लक्षणम्। आशीर्नमस्क्रियावस्तुनिर्देशो वाषि तन्मुखम्॥१४॥ मुक्तककुलकादीनां काव्यप्रभेदानां सर्गबन्धांशरूपत्वमुदीरितं, तत्र सगबन्धस्य स्वरूपं जपयितुमवशिध्यते, तदाह-सर्गबन्ध इत्यादिना। महाकाव्यमित्युद्देश्यपदम्, सर्गबन्ध इति च विधेयम्, कहाकाव्यं नाम सर्गबन्धपदाभिलप्यमिति तदाशयः। सर्गः अरवान्तर- प्रकरणविशेषः, तत्कृतः बन्धो रचना महाकाव्यम्, यत्र प्रकरणानि सर्गपदेन व्यवच्छि दन्ते तादशी रचना महाकाव्यम्, तस्य लक्षणम् इतरव्यावृत्तिकरं चिह्नम् उच्यते वक््य- माणेनेति शेप:। आशीर्नमस्कियेत्यारभ्य जायते सदलङ्कृतीति पर्यन्तेन सन्दर्भेण काव्यं लक्ष्यत इत्यर्थ:। तन्मुखम् तस्य महाकाव्यस्य मुखम् प्रारम्भः आद्याकृतिः आरशी: नमस्किया वस्तुनिर्देशोऽपि वा एतत्त्रितयान्यतमद्वारा तत्प्रारम्भ: क्रियत इत्यर्थः। तत्र आशीर्नाम स्वेष्टजनस्प स्वस्य वा शुभारंसनम्। एके तु स्वेष्टजनस्य शुभाशंसन- मात्रमाशिषमाह:, तदुत्तम्- 'वात्सल्याद्यत्र मान्येन रुनिष्ठस्याभिवीयंत। इषाववारकं वाक्यमाशीः सा परिकीर्तिता॥ नमस्क्रिया-मदपेक्षया त्वमुत्कृष्ट इति परोत्कर्षसूचनपूर्वकस्वापकर्षबोधनानुकूलो व्यापार- विशे: स च करशिर:संयोगादिरूपस्तत्तंदशविशेषभिन्नः। स चात्र शब्दोपनिबद्धो वेदि-

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प्रथम: परिच्छेद: १७

तव्यः । वस्तुनिर्देशः वर्णनीयकथाभागस्य प्रकारेण केनचिदुपनिबन्ध:, स च क्निभायक- निर्देशेन क्चिसदावासदेशनिर्देशादिप्रकारेण वा क्रियते॥ १४॥ हिन्दी-पहले फोकमें मुक्तक, कुलक आदि काव्योंको महाकाब्यांश मान लिया गया है, उसी का लक्षण इस शोकसे लेकर उन्नीसवें शोक तक बता रहे हैं। सगवन्य शब्दसे महाकाष्य लिया जाता है, उसकी रचना मर्गोंके आधार पर की गई होती है, इसीकिये वह सरगवन्म कहलाता है, उस महाकाव्यका मुख-प्रारम्भ तीन प्रकारोंसे किया जाता है-भशी:, नमस्क्रिया और वस्तुनिर्देश। आशी: से आशीर्वादकी विवक्षा है, आशोर्वाद शब्दका अर्थ होता है स्वेटजन अथवा अपने शुभकी इच्छा प्रकट करना, 'पुत्रस्ते मवतु', 'बनं मे स्याद' इत्यादि वाक्योंसे वैसा ही माव प्रकट होता है। केवल अन्यशुमेच्छा मात्रको आशी: पदार्थ समझनेवाकोंके मतमें 'धर्न मे स्याद' इत्यादि प्रतीतियों कैसे बनेंगी। नमस्क्रियाका अर्थ हैं अपनी अपकष्टताके साथ दूसरेका उर्कर्ष प्रदशित करनेवाला व्यापारविशेष, वह व्यापार कहीं पर करशिर:संयोगात्मक होता है, कहीं पर शिरोभूमिसंयोगात्मक या अन्य किसी प्रकारका। वस्तुनिर्देसका अर्थ है कथाभागका निर्देश करना, वह कई प्रकारोंसे किया जाता है, कहीं नायकनिर्देंशदारा और कहीं पर नायक- के आवासदेशकालादि निर्देशदारा और कहीं पर कथा-मागागत वस्तु निर्देशदारा। उनके उदाहरणके लिये निम्नकिखित काव्योंके उद्धरण दिये जाते है- आशीर्वाद-(स्वेष्टजनशुभाशंसन)- 'त्रियं क्रियाच्यस्य सुरागमे नमत्सुरेन्द्रनेत्रप्रतिबिम्बलाष्छिता। सभा बमौ रल्नमयैमंहोत्पलै: कृतोपहारेव स वोडम्रजो जिनः'॥

स्वशुभाशंसन-'पूतं स्वतः पूततरं ततो यद् गाङं पयः शहरमौळिसक्ाव। (चन्द्र प्रमाकाष्य)

तत्पातु मातु: प्रणयापराधपादाहतैः पूततम ततो नः॥ (सिवकीळाणंद) नमस्कार-'वागर्थाविव संपृक्ती वागर्थप्रतिपसये। जगतः पितरौ बन्दे पार्वतीपरमेशरौ'॥

वस्तुनिर्देश (नायकनिर्देश)- (रपुवंश्)

'ियः पतिः श्रीमति शासितुं अगव्जगन्निवासो वसुदेवसधनि। मुनि हरिः ॥ (शिश्ुपाळषषं) (नायकस्थानादिनिर्देश)- 'राकासुधाकर सित दुतिदीव्यमानसौषावकीविलसिता मपुरामिषाना। आसीद शेष विभवैरपचीयमानैरयुक्ता पुरा यदुकुलोतमराजवानी॥ (कृष्णविमय) (कथाभागनिर्देश)- अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगापिरांयः। पूर्वापरी तोयनिषी वगातय स्थितः पृथिग्या हव मानदण्डः ॥ (कुमारसंभव) इन्हीं प्रकारोंमैंसे अन्यतमका अवलम्बन करके महाका्योंका प्रारम्भ किया जाता है। वह निर्वचन लक्ष्यानुसारी है, यदि कोई कवि वसन्तवर्णनसे ही किसी, महाकाव्यका प्रारम्भ करे तो कोई बाषा नहीं होगी॥ १४ ॥ इतिहासकथोद्भूतमितरद्ा सदाश्रयम्। चतुषगफलायेतं चतुरोदात्तनायकम्॥१५॥ १. कलोपेतं।

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१८ काव्यादर्श:

इतिहासेति। इतिहासकथोद्भूतम् इतिहासवर्णितकथामाधारीकृत्य प्रबद्धम्, इति हास :- महाभारतं रामायणं च, अन्यद्वा राजतरजिण्यादि। सदाश्रयम्-इतरद्वा, सता- मापामरप्रसिद्धसद्भावानां बुद्धादीनां कथामाश्रित्य प्रवृत्तम्, यथ।श्वघोषकृतबुद्धचरितादि। इतिहासप्रसिद्धकथां विहायापि प्रसिद्धस्य सत आश्रयेण प्रवृत्तं महाकाव्यं भवति, यथा प्रोक्तवुद्धचरितादि। चतुर्वगफलायत्तम्-चतुर्णां धर्मार्थकाममोक्षाणं वर्गः समूहः तत्र फले आयसं तत्फलमुद्दिश्य प्रणीतम्, तत्र काव्याद्धमप्राप्तिर्भेगवन्नारायणचरणारविन्द- स्तवादिना, अर्थप्राप्तिथ्व प्रत्यक्षसिद्धा, कामप्राप्तिथ्वार्थद्वारा, मोक्षप्राप्तिश्वैतज्जन्यफलाननु- सन्धानात्। चतुरोदात्तनायकम्-चतुरो व्यवहारकुशलः उदात्तः धीरोदात्तो नायक- कथाप्रधानपुरुषो यत्र तादृशम्। इदं महाकाव्यलक्षणघटकम् ॥ १५॥ हिन्दी-इतिहासकी कथापर आधारित होना, अथवा इतिहासप्रसिद्धिको छोड़कर किसी सरपुरषकी कथाका आशय लेना, धर्म अर्थ-कामू-मोक्षकी सिद्धिरूप फंलको उद्देश्य करके बनाया जाना एवं चतुर तथा उदात नायकका कथाका मुख्य पात होना महाकाव्यमें अपेक्षित है। इतिहास पइसे महाभारत, रामायण तथा अन्यान्य पुराण परिगृहीत होते हैं, इनमें वर्णित पुरुषको महाकाव्यों में प्रधान नायक बनाया जाता है। यह कोई अनुष्लंघनीय नियम नहीं है, इतिहास- प्रसिद्धि के नहीं रहनेपर मी किसी सतपुरुषको प्रधान नायक बनाकर महाकाव्यकी रचना की जा सकती है, जैसे अश्वघोषने भगवान् बुद्धको नायक बना कर 'बुद्धचरित' नामक महाकाव्य बनाया। महाकाव्यका फल वर्मार्यकाममोक्षरूप चतुर्वरगको सिद्धि मानी गई है। इसी फलको उद्देश्य बना कर महाकाव्यकी रचना की जाती है। उममें-धर्मकी प्राप्ति भगवान्के चरणारविन्दोंकी स्तुतिदारां, अर्थकी प्राप्ति प्रस्यक्षसिद्ध, कामप्राप्ति अर्थद्वारा तथा मोक्षप्राप्ति काव्यजन्य धर्मायेकामरूप फलोंके विषयमें अनासक्ति करनेसे सिद्ध होती है। महाकाव्योंमें नायकको चतुर तथा उदास होना चाहिये। नायकका लक्षण शाखकारोने इस प्रकार बताया है- साहित्यदर्पण- 'त्यागी कृती कुकौन: सुश्रीको रूपयौवनोरसाहो। दक्षोडनुरक्तलोकस्तेजोवे दन्ध्यशीलवान्नेता'॥ दशरूपक- 'नेता बिनोतो मपुरस्त्यागी दक्षः प्रियबद:। रक्तलोक: शुचिर्वाग्मी रूढवंशः स्थिरो युवा।। पुर्ुयुत्साहस्मृति प्रशाकलामानसमन्वितः । शूरो दृढश् तेजस्वी शाखचक्षुश्र धार्मिकः॥। इस प्रकार कक्षित नायक धारोदास, धीरोद्वत, धीरललित, धीरप्रशान्त-भेदसे चार प्रकारके होते हैं। महाकाव्यमें चारों प्रकारके नायक लिये जाते हैं, अतः उदात पदको उपलक्षण समझना चाहिये। नायक कहीं एक देव, कहीं एक सद्वंशज क्षत्रिय, तथा कहीं एकवंशज बहुतसे क्षत्रिय हुआ करते हैं, जैसे-शिशुपालवप में एक देव शकृष्ण, नैषषीयचरितमें सदवशज एक क्षत्रिय नल, एवं रघुनंशमें एकपंशज बहुतसे क्षत्रिय दिलीपादि अग्निवर्ण पर्यन्त॥ १५।। नगरार्णवशैलचुचन्द्रार्कोदयवर्णनैः । उद्यानसलिलकीडामचुपानरतोत्सवैः ॥ १६ ॥ नगराणवेति। नगरं नायकाध्युषितं पुरम्, तद्वर्णनं यथा शिशुपालवधे तृतीयसर्गे द्वारकावर्णनम्, अर्गवः सागर:, तद्वर्णनं यथा रघुवंशे त्रयोदशसर्गे। शैलः पर्वतस्तद्वर्णनं यथा कुमारसम्भवस्य प्रथमे सर्गें शिशुपालवधस्य चतुर्थे च सगें। ऋतवो वसन्तादयः, निवानायमघा कस मर्मे। चन्दाकों चन्द्रमस्सूर्यों तयो,अये-

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प्रथम: परिच्छेद: १६

नास्तमयमपि बोष्यत उपलक्षणविषया, तथा चन्द्रसूर्यमोरदयास्तमयवर्णन फलितं, वद्यथा-किरातार्जुनीये नवमसर्गे शिशुपालवधे च नवमैकादशसर्गयोः। उद्यानमुपवनं सलिलं जलाधार: सरिदादिस्तत्र कीडाविहार:, तद्वर्णनं शिशुपालवधस्याष्टमसर्गे। मधुपानं मद्यसेवनं तद्वर्णनं, यथा-किरातार्जुनीये नवमसगें। रतं सम्भोगभज्वारस्तद्वर्णनं यथा- रघुमाघादी तत्र तत्र। अत्र तृतीयान्तपदं वत्यमागेनाषदशरलोकगतेनालम्कृतमिति पदेनान्वेति। तथा चैभिवर्णनविशेषरलडकृतं कार्व्यं कल्पान्तस्थायि यशोजनकं जायत इति पर्यवसितोऽर्यः ॥१६ ॥ हिन्दी-महाकाव्यमें नगरका, समुद्रका, पर्वतका, ऋतुओंका, चन्द्रोदय-सूर्योदय एवं चन्द्रास्त-सूर्यास्तका, उधानविहारका, अकक्रीड़ाका, मचुसेवन तथा संभोगका वर्णन होना चाहिये। उदाहरणस्वरूप तत्तत काव्योंके स्वळ ऊपरकी व्याख्यामें बता दिये गये हैं। प्रसन्गपन्र यहाँ यह जानना चाहिये कि किस वस्तुके वर्णनमें क्या होना चाहिये। नगरवर्णन- 'पुरेषटृपरिखावप्रपतोकीतोरणादयः। प्रासादाण्वप्रपारामवाप्यो बेश्या सतीस्वरी'।। अर्णववर्णन-

शैल वर्णन-

*तुवर्णन-

पीष्मे पाटलमलीतापसरःपथिकशोषवाता्यः। सक्तुप्रपाप्रपाखोमृगतृष्णाम्रादिफरपाकाः' ॥ 'वर्षास घनशिखिस्मयहंसगमा: पङ्ककन्दकोद्मेद्री। जातीकदम्य केतकक्षष्सानि कनिव्रगा इडिप्रोतिः'॥

'हेमन्ते दिनलघुना शीतयवस्तम्बमरुवकहिमानि'। 'शिशिरे करीषधूमः कुमुदाम्युबदाहशिखिरतोत्कर्णः। सूर्योदयवणन- सूर्येडरणता रविमणिच क्राम्मुजपधिक लोचनप्रोतिः। तारेन्दुदीपकौ षषिघू कतमऔौर चन्द्रकुळटासिंः'। पन्द्रोदयवर्णन- 'चन्द्रे कुळटाचक्राम्पुरुदविरहितमोहानिरौज्जवश्यम्। जलविजनिनेत्रकैरवचकोर चन्द्राश्मदम्पतिप्रीतिः। उद्यानवर्णन- 'उदयाने सरणि: सर्वफलपुष्पलताद्रुमाः । पिकालिकेकिहं साधाः क्रीडावाध्यध्यगस्थितिः'॥ सकिलक्रोडावर्णन- 'अळकेलौ सरःक्षोमचक्हंसापसर्पणम् । पथ्मक्कानिः पयःक्षेपो दुभागो भूवण्युतिः॥ मधुपानवर्णन- 'सुरापाने विकळता स्खलनं बचने गतौ। कब्जमानच्युतिः प्रेमाभिष्यं रक्तेक्षणभ्रमः' ॥ रतोस्सववर्णन- 'सुरते सारिवका मावा: सीस्कार: कुड्मकाक्षता। कालीकटणमशररबोडगरनसक्षते'।। इसी प्रकार के वर्णन होते हैं। इसमें कविगण अपनी रुचिके अनुसार परिवर्तन-परिवर्षन किया करते है, परन्द्र सामान्य प्रकार ऐसा हो हमा करता है. अजिवेश्थार्ये इमने गर

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२० काव्यादर्शः

विप्रलम्मैर्विवाहैश्व कुमारोद्यवर्णनैः। मन्नदूतप्रयाणाजिनायकाभ्युदयैरपि॥ १७॥ विप्रलम्भैरिति। विप्रलम्भो चिप्रलम्भारः, 'यत्र तु रतिः प्रकृष्टा नाभीष्टमुपैति विप्रलम्भोडसो' इति लक्षितः । स च 'पूर्वरागमानप्रवासकरुणात्मकतया चतुविध' इति दोतनायेवात्र बहुवचनप्रयोग:, तत्र पूर्वरागो नैषधीयचरिते चतुर्थसर्गे, मानो यथा कृष्णवैभवे राधायाः, प्रवासो यथा तत्रव, करुणो यथा कादम्बयाँ महाश्वेतायाः। विवाहः पाणिभ्रहणम्, तद्वूर्णनं यथा रघुवंशेऽजेन्दुमत्योः। कुमारोदयः पुत्रोत्पत्तिः, तद्वर्णनं यथा रघुवंशे तृतीयसर्गे। मन्त्र: मन्त्रणा, रिपुजयार्थ प्रधानपुरुषैः, सह गुप्तसंभाषणं, तद्- वर्णनं यथा शिशुपालवधस्य द्वितीयसगें। दूतः प्रेष्य:, सच निसष्टार्थमितार्थसन्देश- हारकभेदेन त्रिविधः, तत्रादो यथा उद्योगपर्वणि वासुदेवः, मितार्थो यथा रामायणेऽप्दः, सन्देशहारको यथा कादम्ब्यांँ केयूरकः। प्रयाणं विजययात्रा, तद्वर्णनं यथा रघुवंशे चतुर्थसर्गे। आजिः समरप्रसभ्गः, तद्वर्णनं यथा किरातार्जुनीये पश्चदशसर्गे। नायका- भ्युदय: प्रधाननायकस्य विजयावाप्तिः, तद्वर्णनं यथा शिशुपालवधे श्रीकृष्णस्य विजयः । तत्र मन्त्रप्रयाणाजिविजयाः क्रमश एव वर्णनमहन्तीति बोध्यम्॥१७॥ हिन्दी-विप्रलम्भ शरुक्गारका वर्णन महाकाव्यमें होना चाहिये क्योंकि बिप्रलम्भके बिना शृज्गारकी पुष्टि नहीं होती है, लिखा है- 'न बिना विप्रलम्मेन संमोग: पुष्टमश्नुते। कमायिते हि बखादौ भूयान् रागो विवर्धते।' विप्रळम्म शरृक्गार की चार दशायें होती है-मान, प्रवास, पूर्वराग, करण। इन चारों प्रमेदोंका वर्णन यथावत किया माता है। विप्रलम्ममें वर्णनीय- 'विरहे तापनिःव्वासचिन्ता मौनं कशाङता। अब्बशय्या निशादैष्यं बागरः शिरिरोष्मता।।' विवाइका वर्णन, उसमें वर्णनीय- 'विवाहे सानगुभाङभूपालू कुत्यीरवाः। बेदी सीमन्ततारेक्षा काजामनकवर्शनम्।।' कुमार में वर्णनीय- 'कुमारे शखशाखम्रीककावलगुणोच्छू याः । वाझ्यालीखुरकीराजभक्तिः सुभगतादयः ।।' दूतमें वर्णनीय- 'दूते स्वस्वामितेज:मीविकमौन्नस्यकुहचः । शयुक्षोभकरी चेट्ा वाटर्यं दाक्ष्यममीरता ।I'. प्रयाणमें वर्णनीय-

युद्धमें वर्णनीय-'युद्धे तु वर्मबलवीररर्जासि तुर्यनिःश्वासनादशरमण्डपरक्तनयः। छिन्ातपत्र थचामरकेतुकुम्मिमुक्तामरीवृतभटाः सरपुष्पवर्षाः ॥' इस प्रकार प्रोक्त वर्णनसे युक्त होना महाकाव्यकी शोभाको बढ़ाता है। इन वर्णनों में सबका होना नितान्त अपरिहायं नहीं है, कुछ अंशमें कमी क्षम्य होती है।। १७ ।। रसभावनिरन्तरम्। सर्गैरनतिविस्तीर्णैः 'श्रव्यवृत्तैः सुसग्धिमिः।।१८।।

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प्रथम: परिच्छेद: २१

अलड्कृतमिति। नगरादारभ्य अ्र्भ्युदयपर्यन्तमुक्तानां वस्तूनां वर्णनैः अलक्कृत- मिति योजना असक्क्षिप्तम्-अतिसबद्तेपवर्णितं हि वस्तु न स्वदते, यथा-'वमुदेवात्स- मुत्पद्य पूतनां विनिपात्य च। कंस हत्वा द्वारकायामुषित्वा स्वगतो हरिः' इति कृष्णकथानक न रोचते। रसा :- भ्गारादयो नव, भाव :- 'रतिर्देवादिविषया व्यभिचारी तथाजितः। भाव: प्रोक्तः' इति लक्षितस्वरूपः। तै रसैर्भावश्व निरन्तरम् पूर्णम्। अनतिविस्तीणैः- साधारणतया विस्तारभाग्भिरपि समरसतास्पृक्तवेन वैरस्यमनावहद्धिः, श्रव्यघृततैः हत- वृत्ततादिदोषास्पृष्टच्छन्दोनिबद्धैः, सुसन्धिभि :- मुखप्रतिमुखगर्भविमशनिर्वहणनामकैः स- न्धिभि: साधुसमुपयोजितयक्तः सर्गैरपेतमिति वत्यमाणेनान्वयः ॥।१८॥ हिन्दी-नगरसे लेकर नायकाम्युदयपर्यग्त कहे गये विषयोंके वर्णनोंसे युक्त सर्ग हों, उन सर्गोंमें सर्वत्र रसभावकी सत्ता हो, उनका विस्तार अनतिवृद्त हो, छन्द ऐसे हों जिनमें इतवृत्तता आदि दोष नहीं आते हों, सन्धियोंका समावेश मलीमाँति हो सका हो, ऐसे सर्गोंसे काव्यका उत्कर्ष सिद्ध होता है। महाकाव्योंमें किस तरह्के सर्ग हों इसका विचार इस कोकमें किया गया है। साहित्यवर्पणकारने सर्गोंके विषयमें इस प्रकार कहा है -- 'एकवृत्तमयेः पदैरवसानेऽन्यवृत्तकैः। नातिस्वष्पा नातिदीर्षाः सर्गा अषाधिका हढ।। नानावृत्तमयैः कापि स्गः कश्षन दृश्यते। सर्गान्ते भाविस्गरम कथायाः सूचनं भवेत ॥' अनतिविस्तीण सग कहकर दण्डीने कविके सामर्थ्यपर इसके विस्तारको निर्भर कर दिया है, कुछ लोगोंका कहना है कि प्रतिसरगमें तोससे अन्यून तथा दो सौसे अनधिक छोक हों। सन्धियोंका समावेश होना चाहिये, उनमें साक्निर्वाह ही सुश्लिष्टत्व माना जाता है।। १८ ।। सर्वत्र भिन्नवृत्तान्तैरुपेतं लोकरअकम्। काष्यं कल्पान्तरस्थायि जायते सदलङ्कृति॥१९॥ सर्वत्रेति। सर्वत्र भिन्नवृतान्तैः प्रतिसरग भिद्यमानकथैः, अथवा सर्वेषां सर्गाणा समाप्ती विपरीतच्छन्दोभिरित्यर्थः, पूर्ण सर्ग केनचिदेकेन च्छन्दसा निर्मायावसाने भिद्यमानेन वृत्तेन निर्माणमत्राभिप्रेतं बोष्यम्। तदुक्तमन्यत्र-'एकवृत्तमयैः पद्ैर- वसानेऽन्यवृत्तकैः' इति। एतत्प्रायिकं, नानावृतमयसगस्यापि दर्शनात्। यथा शिशु- पालवधे चतुर्थः सर्गः। सदलङकृति-सत्यः शब्दार्थशोभाजननद्वारा रसोपकारिका अलडकृतयो यमकानुप्रासोपमोत्प्रेक्षादयो यत्र तादृशम्, एतेनालक्कारसष्टिं प्रति कवेर- भिप्रायो निवेदितः। एतावत्पर्यन्तं महाकाव्यस्य लक्षणं प्रोक्तं, सम्प्रति तक्षक्षणलक्षितं काव्यं प्रशंसन् तस्य निर्माणे प्रवृत्तिमुपश्लोक्यति-लोकरअकमिति। तादग्लक्षणर्क हि कार्व्यं लोकरञ्कं भवति, श्रोतृजनहृदयावजनक्षमं भवति, कल्पावसानपर्यन्तस्थायि च जायत इत्यर्थः। एतेनाक्षयकीर्त्तिप्राप्तथभिलाषेण कविभिरत्र यतनोयम् इत्युक्त्तम्॥१९॥ हिन्दी-महाकाव्यके सर्गोंमें भिन्न मिन्न वृत्तान्त-घटनाओं का वर्णन होना चाहिये, अथवा 'मिन्नवृत्तान्तैः' का यह अर्थ है कि प्रत्येक सर्गके अन्त में दूसरे प्रकारके वृत्तका उपयोग किया जाय, जिस छन्दमें पूरा सर्ग लिखा गया हो अन्तिम श्लोकोंमें उससे कोई दूसरा छन्द चुना जाय। जैसे रघुवंशके द्वितीय सर्गमें पूरा सर्ग उपजाति छन्दमें किखा गया हैऔर अन्तिम क्ोक माळिनीछन्दका बनाया गया है। महाकाव्यमें एक अपेक्षित गुण- 'सदलक्कृति' होना है, अलक्वारों-शष्डार्थालद्टारों-यमक, उप़मा आदिका सुन्दर समावेश्व होना आवश्यक है, ऐसा होनेसे का्य श्रोतृवर्गका मनोरजक होता है और वैसा हो काम्य

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२२ का्यादरो

स्ल््पाम्रपर्यन्द स्वायी कीचि प्रवान करनेवाका हुआ करत है। अतः कश्पान्तस्थायी पशकी भ्रमना रखनेवाळे कवियोंको तत्तकक्षणयुक्त काव्यके प्रत्ि सोधोम होना चाहिये।। १९।। म्यूनमप्यन यैः कैश्िदनै: काव्यंन दुष्यति। यधुपाचयु' सम्पत्तिराराघयति तद्धिदः॥ २० ॥

काव्येष्वपि दृश्यन्तेऽतः खण्डकाव्येषु तल्लक्षणप्रसक्तिरय तद्वारणाय सामस्त्येन तप्तद्गुण- समावेशो विवच्यते चेदांशिक्यां न्यूनतायां सत्यां महाकाव्यान्यपि स्वलक्षणेन न व्याप्ये- रमिति प्रसज्यमानानामुभयतः पाशां रज्जुमपनोदितुमाह-न्यूनमिति। अत्र पूर्वोक्त- वर्णनीयसमुदयमध्ये कैब्बिदजैन्यूनं रहितमपि कार्व्यं महाकाव्यम् न दुष्यति न दूषणीयं भवति, यदि उपातेषु वर्णयितुमन्वीकृतेषु शैलादिषु सम्पत्तिः पूर्णताजनितो रसपोषः तद्विदः काव्यरहस्यश्ञात्न् विदुषः आराषयति प्रसादयति, अयमाशयः-महाकाव्येषु वर्णनीय- तयोकाना तेषां तेषां वस्तूनां कतिचिद् वस्तूनि व्णितानि, कतिचिन्व हीनानि, न तावता कापि क्षतिर्भवति यदि वर्णयितुमुपात्ताः पदार्थाः: साधु वर्ण्यमाना: सन्तो रसपरिपोर्ष जनयेयु:, रसपरिपोष एव हि तैर्वर्णनश्िकोर्षितः, स हि यद्यल्पसकख्यकवस्तुवर्णनेनैव सम्पायते तदा नास्ति सर्वेषामेवोदिष्टानां वस्तूनां वर्णनस्य नितान्तावश्यकतेति। यथा यदि कमापि महाकाव्ये शैलर्तुवर्णनेनैव रसपरिपोष: सम्पादते, तदा तत्र कुमारीदय- मन्त्रवृतवणेबवैकस्येऽमि न कापि क्षतिरिति, तथा बोकं भोजराजेन- 'नावर्णन नगर्यादेर्दोषाय विदुषां मतम्। यदि शैलर्तुरात्र्यादेवर्णनेनैय तुष्यति'॥ तथा च तशदूर्णनीयवस्तूपन्यासोऽन्यतमत्वेन विवक्षितो बोष्य:, प्राधान्येन रस- पोवस्य यावता निष्पत्तिस्तावद्वश्यमपेक्षितं मन्तव्यमिति। खण्डकाव्ये महाकाव्यलक्ष- मातिव्याप्तिशड्टा तु चमत्कास्वैलक्षण्यन वारणीया ॥ २०॥ हिन्दी-महाकाव्यके किये मितने वर्णनीय विषय बताये गये हैं उनमें यदि कुछ विषयोंके बर्णन नहीं भी किये गये हों, परन्तु जिनका वर्णन किया गया हो, उतने विषयोंके वर्णनसे हो बदि भोता तथा अध्वेता आदि रसपुरिका अनुभव करते हो तो वह न्यूनता नहीं मानी नायमी। महाकाव्यमें तत्तदूर्णनीय वस्तुआतका वर्णन सामप्रधेण नहीं अपेक्षित है, अन्यतमरवेन मभिकत्वेन या अपेक्षित है ऐसा समझना चाहिये। यद किसी कविने अपने निर्मेय महकाग्यके किये कुछ विषयोंका वर्णन किया, कुछको कोड़े भी दिया, तो यहाँ यह नहीं देखा बायगा कि इनहोंने तत्तव वस्तुका वर्णन नहीं किया, अतः इनका महांकाव्य दुष्ट हे, परन्तु वह देखा बायगा कि जितने विषयोंका वर्णन किया गया है उतनेमें रसकी पुष्टि होती है या नहीं ! यदि रसकी पुष्ि हो बाती है तम उस न्यूनताका कोई मूक्ष्य नहीं है। यहाँ पर वह ध्यान देनेकी बात है कि यदि कुछ विषयोंका वर्णन न्यून रह जायगा तो भी यदि महाकाष्य मानने रगेंगे तब खण्डकाव्य भी महाकाव्य कहे जाने लगेंगे, क्योंकि उन्हें भी वो 'खण्डकाष्यं महाकाव्यस्येकदेशानुसारि यद' इस लक्षण द्वारा ही निरकत किया गया है। इसका कतर यह समझना चाहिये कि महाकाव्य तथा खण्डकाव्यमें चमत्कारवैलक्षण्यकुत भेद है जो कसे असद्ीणं बनाये रखता है। महाकाव्य तथा खण्डकाव्यके चमत्कार भिन्न- मिन्न प्रकारके हुआ करते है, अतः वर्णनीयविषयसाम्यकृत अतिव्याप्तिका भय नहीं है॥ २ ॥

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प्रथम: परिच्छेद: २३

गुणतः प्रागुपन्यस्य नायकं तेन विद्विषाम्। निराकरणमित्येष मार्गः प्रकृतिसुन्दरः ॥ २१॥ गुणत इति। पूर्वोक्ते काव्यलक्षणे 'चतुरोदात्तनायक' मित्युक्तम्, तत्र नायकपर्दं प्रतिनायकस्याप्युपलक्षणं मन्यले, एतेन नांयकप्रतिनायकयोरुत्कर्षापकर्षौ महाकाव्ये वर्णनीयावित्यायातं, तत्र द्वयी गतिः, प्राकू नायकस्य वर्णन ततः प्रतिनायकस्य, तदनन्तरं नायककृतः प्रतिनायकपराजयः इत्येकः प्रकारः, अन्यक्ष पूर्व प्रतिनायकस्य वर्णनं ततो नायकवर्णनपुरस्कृतस्तत्कृतस्तदुच्छेद इति, तत्रानयो: प्रकारयोः प्रथमः प्रकारो रामायणे, द्वितीयक्च महाभारते, तत्र स्वमतं प्रकारं प्राधान्यं प्रापयितुं प्राकप्रचलितं प्रकावं दर्शयति-गुणत इति। प्राक प्रथमम् गुणतः नायकगुणवणनद्वारा नायकं काव्यनेतारं प्रधानपुरुषम् उपन्यस्य अभिधाय, तेन तथा वणितेन नायकेन विद्विषाम्। प्रतिनायकानाम् निराकरणम् उच्छेद: (वर्ण्येत), एषः मार्गः प्रकारः (प्राङ्नायकं वर्णयित्वा पश्चात्तदुच्छेद् प्रतिनायकवर्णनपुरस्कृतो नायकरचिततदुच्छेदवर्णनम् इत्थंभृतः प्रकार:) प्रकतिसुन्दरः स्वभावमनोरमः। काव्यस्य प्रधानमुद्देश्यं सदुपदेशः, सच सत्पुरुषाभ्युदयासत्पुरुषविनिपातप्रतिपादनेनैव प्रकटीकृतो भवति, तदर्थ तयो: क्रंमशो वर्णनमपेक्षितं भवति, यथा रामायणे प्राग रामस्य वर्णनं ततो रावणस्य वर्णनसहचरी तदुच्छेदकथा, तेनैवं वर्णनेन रामादिवत्प्रवर्त्तितव्यं न रावणादिवदिति सदुपदेशो गृहीतो भवति, तेनास्य मार्गस्य स्वभावसुन्दरत्वमावेदितं भवति ॥ २१॥ हिन्दी-महाकाव्यके स्वरूपनिवंचन-प्रसक्में पहले कहा गया है-'चतुरोदासनायकम्" इस विशेषणमें आनेवाला नावकपद प्रतिनायकका भी अपलूक्षण माना जाता है, फतः यह सिद्ध हुआ कि महाकाव्यमें नायक. प्रतिनायक, उमयका वर्णन अपेक्षिन है, उसमें विचारणीय यह है कि किसका वर्णन पहले किया जाय ? इस सम्बन्ध में दो प्रकार आश्रित होते आाये है, पह्ला प्रकार यह है कि पहले नायकके गुण-शोर्य-कुल-समृद््यादिका विशद वर्णन करके बादमें प्रतिनायकका वर्णन किया जाय और नायकके द्वारा उसके निराकरण-उच्छेदका वर्णन किया जाय। यह प्रकार स्वमावतः सुन्दर होता है, क्योंकि काव्यका सर्वोच प्रयोजन 'सदुपदेश' माना जाता है, वैसा वर्णन करनेसे वह सिद्ध होना है। जैसे रामायणमें पहले रामचन्द्रका वर्णन किया गया है, बादमें रावणका वर्णन, तथा रामके द्वारा उसके उच्छेदका वर्णन किया गया है, जिससे यह उपदेश गृहीत होता है कि 'रामकी तरह आचरण करना भका है, रावणकी तरए आचरण करना मला नहीं है'।। २१॥। वंशवीर्यश्रुतादीनि वर्णयित्वा रिपोरपि। तज्जयान्नायकोत्कर्षकथनं' च धिनोति न: ॥२२।। वंशवीर्येति-नायकवर्णने प्रकारद्वयमिति प्रागभिहितं तत्रैकः प्रकारः पूर्वश्लोक प्रदर्शितः, सम्प्रत्यनेन श्लोकेन द्वितीयं प्रकारं प्रस्तौति-दंशवीर्येति। वंशः कुलम, वीर्यम् पराक्रमप्रकर्ष:, श्रुतं शात्रज्ञानम्, आदिनौदार्यनीतिज्ञत्वादिपरिभ्रह्टः। रिपोः प्रतिनायकस्य अपि वंशवीर्यश्रुतादीनि वर्णयित्वा तव्वयात् तादृशस्य प्रतिनायकस्य जयाद उच्छेदात् नायकोत्कर्षस्य नायकश्रेष्ठत्वस्य कथनम् वर्णनम् नः अस्मान् विनोति १. वर्णनं।

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२४ काव्यादर्श:

प्रीणयति। अयमाशयः-नायकवर्णनात् प्राक प्रतिनायकवंशवीर्यश्रुतादीनि वर्णयित्वा तत्पश्चात् तादृशस्यापि प्रतिनायकस्य नायकद्वारोच्छेदो वर्ण्यमानो नायकस्यैव सारव- सातिशयं पुष्णातीति पक्षोऽयमस्मान् सविशेषमानन्दयति, यतो विजेतव्योःकर्षवर्णनं हि विजेतुरुत्कर्षातिशयं गमयति। अयं च प्रकार: किरातार्जुनीये समादृतः, तत्र हि दुर्योधननीत्यादिवर्णनपूर्वकं पाण्डवानामुत्कर्षप्रतिपादनं कृतम्। 'धिनोति नः' इत्युक्खात्र स्वरुचिः प्रदर्शिता, तत्कारणं त्वत्र प्रकारे वस्तुवृत्तस्यानपलापो भवतीति, प्रतिनायक- वर्णनपूर्वकनायकवर्णनेन कविप्रतिभाचमत्कारश्च भवति स्फुटं इति च बोध्यम् ॥२२॥ हिन्दी-नायकके वंशादिवर्णनके पहले प्रतिनायकके कुर, पराक्रम, शाखश्ञान आदि सत्कर्षका वर्णन कर लिया जाय, पीछे नायकका वर्णन हो और प्रतिनायकके संहारका भी वर्णन किया जाय, यह प्रफार मुझ (दण्डी) को बहुत अच्छा लगता है। नात्य यह है कि पह्के प्रतिनायकंक। पूरा वर्णन कर लिया जाय, पीछे नायकके वर्णनसे प्रारम्भ करके उसके द्वारा प्रतिनायकके उच्छेदनकका वर्णन कर लिया जाय, यह दूसरा प्रकार मुझे अधिक पसन्द है, क्योंकि इस प्रकारमें विजेतव्योत्कर्ष-वर्णन भी फलतः विजेनाके उत्कर्ष-वर्णनमें ही पर्यवसित होता है, इस प्रकारका वर्णन किरातारजुनीयमें किया गया है। यहाँपर एक आपति उ०ाई जा सकती है कि प्रतिनायकका लक्षण तो निम्न प्रकारका बताया गया है- 'लुब्धो धीरोदतः स्तब्धः पापकृद् व्यसनी रिपुः।' (दशरूपक) 'धीरोद्तः पापकारी व्यसनी प्रतिनायकः' (साहित्यदर्पण) 'अन्यायवाँस्तदुष्छेय उद्धतः प्रतिनायकः' (नाव्यदर्पण) फिर आप 'वंशवोरयश्ुनादीनि' का वर्णन प्रमुख रूपसे प्रतिनायकमें किस तरह करना चाहते है ? इस आपत्िका समाधान यह है कि माग्यवश प्रतिनायकका जन्म बड़े कुकमें हुआ, पूर्वसंस्कारवश उसने शाखत्र मी पढ़े, परन्तु अपने अविनय-अविवेकके कारण सकल अन्य गुणों के होते हुए मी उसका विनिपात हुआ, यह सदुपदेशप्रदान इस प्रकारके परिग्रहमें अनायास सिद्ध होता है। वंशवीर्यश्रुतादिगौरवसम्पन्न शोकर अविवेकपुरस्कार करनेवरालेका पराभव अवश्यंभावी हे इस बानको प्रमित करानेके कारण ही आचार्य दण्डीने इस प्रकारकी स्वाभिमत कहा है। इस प्रकार में एक विशिष्टता यह मी है कि इसमें वास्तविकताका अपलाप नहीं करना पढ़ता। इसके अतिरिक्त इस प्रकारके आभ्यणसे कविकी प्रतिभाका चमस्कार मी प्रकट होता है।। २२ ।।। अपाद: पद्सन्तानो गद्यमाख्यायिका कथा। इति तस्य प्रभेदो द्व तयोराख्यायिका किल ॥ २३॥ एवं महाकाव्यं निरूप्य क्रमप्राप्तं ग्द्य निरूपयति-अपाद इति। पादो गणमात्रा- नियमित: पद्यतुरीयांशः तद्भिनः अपादः गणमात्रानियमवर्जित इत्यर्थः। एतादृशः पदसन्तान: सुप्रिउन्तपदसमुदयो गद्यमित्याख्यायते। अस्य गद्यस्य-मुक्तकतृत्तगन्धि- चूर्णकोत्कलिका प्रायनामकाश्वत्वारो भेदा: सन्ति, तेऽपि कथाख्यायिकयोरेवान्तर्भवन्तीति ताननुपन्यस्य कथाख्यायिकारूपं भेदद्वयं निर्वक्ति-इति तस्येति। तस्य गद्यस्य द्वौ प्रमेदौ, कथा, आख्यायिका चेति। तत्र प्राचीनोक्तं कयाख्यायिकयोर्लक्षणमयं दृषयिष्यति, तदुप- कमते-तयोरिति। तयो: कथाखयायिकयोर्मध्ये आख्यायिका एवंलक्षणा प्राचीनैरुक्तेति भाव: । प्राचीनमतानुसारिणा भामहेन कथाख्यानिकयोर्लक्षणमधिकृत्योक्तम्-

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प्रथम: परिच्छेद: २५

"प्रकृतानाकुलश्रव्यशब्दार्थपदघृत्तिना। गद्येन युक्तोदात्तार्था सोच्छासाख्यायिका मता॥ वृत्तमाख्यायते यस्यां नायकेन स्वचेष्टितम्। वश्त्रं चापरवक्त्रं च काले भाव्यर्थशंसि च ।। कवेरभिप्रायकृतरङ्कनः कैश्विदङ्ढिता। कन्याहरणसङ्ग्रामविप्रलम्भोदयान्विता ॥ न वक्त्रापरवक्त्राभ्यां युक्ता नोच्छ्ासवत्यपि। संस्कृतंसंस्कृता चेष्टा कथापत्रंशभाक तथा ॥ अन्यैः स्वचरितं तस्यां नायकेन तु नोच्यते। स्वगुणाविष्कृति कुर्यादभिजातः कथ जनः ॥ अनिबन्धं पुनर्गाथाश्लोकमात्रादि तत् पुनः। युक्तं वक्त्रस्तभावोकत्या सर्वमेवैतदिष्यते॥ तदेवं प्राचीना: कथाऽडाव्यायिकयोलेक्षणमाख्यातवन्तः । त्रत्रास्य लक्षणभेदस्य स्वान- भिमतत्वसूचनाय किलशब्दप्रयोगो बोध्यः ।। २३॥। हिन्दी-गणमात्रानियत पद्यतुरोयभाग पाद कहा नाता है, उससे रहित पद-सुबन्त- तिकन्त समुदाय-को गदय कहते हैं, अर्थात जिस सुबन्त-निडन्त-पद-समुदायमें गणमात्नानियत पाद नहीं हो, उसको गद्य कहते हैं। उसके दो भेद हैं-आख्यायिका एवं कथा। उनमें आख्यायिकाका लक्षण यह है (जो आगेके छोकमें कहेंगे)। प्राचीनोक्त आख्यायिका तथा लक्षणोंकी अतिप्रसिद्धतासूचनार्थ इस भेदप्रकाशक श्रोकमें 'किल' शब्दका प्रयोग किया गया है, उसके स्वानभिमतत्वको वही किल शब्द प्रकट करता है। २३॥ नायकेनैव वाच्यान्या नायकेनेतरेण१ वा। स्वगुणाविष्क्रियादोषो नात्र भूतार्थशंसिनः ॥ २४।। प्राचीना: कथाख्यायिकयोर्भेंदं स्वमुखवाच्यत्वतदभावाभ्यां प्रयोजयतः अर्ात् कथाख्यायिकयोराख्यायिका स्वयं नायकेन वाच्या, अन्या कथा नायकेन तदितरेण वा केनापि पुरुषेण वाच्या। एवं च आख्यायिकायां नायकमात्रस्य वत्तृता, कथार्या त्वंशभेदेन नायकस्य तदितरस्य च पुरुषस्य वक्तृतेति प्राचीनाभिमतलक्षणाशयः । नन्वेवं प्राचीनलक्षणे नायकेन निजवृत्तकथनं स्वविकत्थना स्यात्, तच न युज्यते, यथोक्तमत्र प्रसस्ने भामहेन-'स्वगुणाविष्कृतिं कुर्यादभिजातः कथं जनः' इति चेत्तत्राह- स्वगुणाविष्क्रियेति। भूतार्थशंसिनः यथार्थव्याहारिणो नायकस्य स्वगुणाविप्क्रिया निज- गुणवर्णनम् न दोष:, स हि यथार्थवक्तृत्वेन स्वमपि गुणमाविष्कुवेन्न दुष्यति, स्वगुणस्य प्रसभ्ञागतस्य वस्तुसतश्चाभिधानस्यात्मविकत्थनानन्तगतत्वात्, असति प्रसञ्ने श्रतिशयो- किपूर्वकं स्वगुणख्यापनमेव दोषाय भवति, न तुसति प्रसक्ने वास्तवगुणाभिधानं दोषा- येति। एतावत्पर्यन्तं कथाख्यायिकयोः प्राचीनं लक्षणं व्याख्यातम्॥ २४॥ हिन्दी-कुछ लोग ऐसा भेद मानते हैं कि आख्यायिकामें नायक अपनी कथा अपने मुँइसे कहता है और कथामें नायक स्वयं भी कहता है या दूसरे ही कहते हैं। इस तरह यह सिद्ध हुआ कि कथामें नायक अपने मुँहसे अपनीं वर्णना कर लेता है। यहाँपर कुछ कोग यह आशक्का प्रकट करते हैं कि उच्चवंशीय कथानायक अपने मुँहसे अपना वर्णन किस प्रकार करेगा ? आरमश्लाघा करना भले आदमीको किस प्रकार पसन्द आवेगा? इसी शक्काके उत्तरमें आचार्य दण्डीने पूर्वोक्त श्लोकका उत्तरार्ध कहा है, उसका अर्थ यह है कि अपनेमें वस्तुतः वर्तमान गुणोंका वर्णन तो आत्मश्लाधा नहीं है। आत्मश्ल षा तो

१. नायकादितरेण।

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२६ काव्यादर्श:

अवसंमानगुणप्रस्थापनको कहते हैं, वस्तुसद्गुणोंका वर्णन करनेसे नायकमें आत्मश्लाषाक्ा दोष नहीं लगेगा। इस तरह कथा एवं आख्यायिकामें प्राचीनोक्त भेद बताया गया। भागे के श्लोकमें इस मतका विरोष किया जायगा॥ २४ ॥ अपि त्वनियमो दष्टस्तत्राप्यन्यैरुदीरणात्। अन्यो वक्ता स्वयं वेति कीढग् वा भेदलक्षणम् १॥२५॥ प्राचीनैः कथाऽऽख्यायिकयोर्लक्षणनिरूपणप्रवृतैः कथायां नायकस्य वक्तृत्वं तथाSS- ख्यायिकायां तदितरस्य तथात्वमज्जीकृतं, तदितः पूर्वमुपपादितं सम्प्रति तदपनुदति- अपि स्विति। तत्राख्यायिकायामपि अन्यैः नायकभिन्नैरुदीरणात् वर्णनात् अ्नियम: आरुयायिका नायकेनेव वाच्येति प्राचीनोक्तनियमभअः अपि दृष्टः। अयमाशय :- आख्यायिकायां नायक एव वर्णयेदिति नियमो न व्यावहारिकोऽन्यैरंपि वर्णनस्य कृतस्य दर्शनान, एवं च नायं नियम इति। ननु नायकेतरकृतवर्णनसद्भावात् कथात्वमेव घटतां मास्तु तथाभूतस्य गद्यकाश्यस्याख्यायिकारूपत्वं तत्राह-अन्यो वक्तेति। कथायामन्यो वक्ता तयाऽऽख्यायिकायां स्वयं वक्ततेति भेदकारणं भिन्नत्वप्रत्ययहेतुः वा कीटक्? न युक्तमिदं भेदकथनम्। स्वल्पवैलक्षण्यकृत एवानयोर्भेंदो युक्त्त:, न वक्तृ- वैलक्षण्यकृत इत्याशयः ॥२५॥ हिन्दी-प्राचीनोंने कथा और आख्यायिकामें यही भेद बताया है कि आख्यायिकाका नायक स्वयं अपनी कहानी प्रस्तुत करता है और कथामें कहीं नायक स्वयं अपनी कहानी कहता है और कहीं दूसरे भी उसकी कथाका वर्णन कर लेते हैं, यह भेद सङ्गत नहीं है, क्योंकि देखा गया है कि आख्यायिकामें भी दूसरेके द्वारा कथा प्रस्तुत की गई है। यहाँपर यह शक्का हो सकती है कि जिस आख्यायिकामें दूसरेके द्वारा वर्णन किया गया है उसे कथा ही में अन्तर्भूत कर लिया जाय ? इसका उत्तर यह है कि कथाख्यायिकामें जब वकतृव्यवस्था हो तब न ऐसा माना जाय, एकमें यह वक्ता दूसरेमें वह वक्ता इस तरहका भेदक धर्म क्यों माना जाय? स्वरूप-भेद ही इनके भेदक हैं, वक्तृभेद नहों।। २५।। वक्त्रं चापरवक्त्रं च सोच्छासत्वं च भेदकम्। चिह्हमाख्यायिकायाश्ेत्प्रसङ्के न कथास्वपि॥ २६॥ एवं प्रागुक्तश्लोकेन वक्तृभेदकृतं कथाख्यायिकयोभेंदं निषिध्य वक्त्रापरवक्त्रच्छन्दो- निवेशादिकतं भेदमपि प्रतिषेद्धुमुपक्रमते-वषत्रश्चेति। वक्त्रम् अपरवक्त्रमिति च छन्दो- भेदा 'ववत्रं नाद्ानसौ स्यातामब्धयोऽनुष्टुभि ख्यातम्' इति वक्त्रलक्षणम्। 'अयुजि ननरला गुरुः समे तदपरवक्त्रमिदं नजौ जरौ' इति वापरवक्त्रलक्षणम्। केचित- 'वेतालीयं पुष्पितायां चेच्छन्त्यपरवत्त्रकम्' इत्याहुः। उच्छवास: कथांशव्यवच्छेदसंज्ञा, स एव क्वचिदाश्वास इत्युक्त तत्सहितत्वं सोच्छासत्वम् (एतत्त्रयम्) भेदकम् कथात आख्यायिकाया वैलक्षण्यप्रत्यायकम् चिहमिति चेत् तन युक्तियुतं वच: प्रसम्गतः कथायामपि वक्त्रापरवक्त्रयोर्निवेशस्य सम्भवात्। अयमाशयः-कथायामार्या निबन्धुमध्यवसितस्य कवेर्मनसि 'आर्या वक्त्रापवक्त्राणं छन्दसा येन केनचित्' इति

१. कारणम्।

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प्रथम: परिच्छेद: २७

स्मृत्वा वक्त्रापवक्त्रयोनिबन्धस्य प्रवृत्तिर्यदि जायते तदा सा नैव दोषाय भवति, कथायां वक्त्रापवक्त्रयोरनिवेशस्य मुखंतः केनाप्यशिष्टत्वात् अपितु-'आर्या वक्त्रापवक्त्राणां छन्दसा येन केनचित्' इति सामान्यत एव नि्दिष्टत्वात्। एवमेव सोच्छ्ासत्वमपि न भेद- निर्णयकरम्, लम्भः कथायाः परिच्छेदस्य संज्ञा, उच्छासश्च आख्यायिकायाः परिच्छेदस्य संज्ञेति विशिष्य न व्यवस्थितम्, तयोः संजयोभिन्नत्वेऽपि संशिनोरभिन्न- त्वात्, न हि कलशघटरुपसंज्ञाभेदेन घटरूपसजिभेद: प्रतीयते। रूपभेदो हि घटपटयो- रभेदको न संज्ञाभेद:, संज्ञाभेदेऽपि कलशघटयोरभिन्नत्वात्। तस्मादेतत् भेदकरणमृजुधिया- मृजुधीत्वमात्रप्रत्यायकमेवेति। तदेव वच्त्यति पुरः तदिति ॥ २६ ॥ हिन्दी-प्राचोनाचार्योने कथा तथा आख्यायिकामें भेद करनेके लिये यह व्यवस्था की थी कि आख्यायिकामें परिच्छेदोंको उच्छवास शब्दसे व्यवहृत किया जाता है और कथामें कम्मक आदि अभिधानों से, इसी प्रकार आर्या छंदसे आख्यायिकामें काम लिया जाता है और वश्त्र तथा अपरवक्त्र छंदोंसे कथामें व्यवहार किया जाता है, परन्तु यह व्यवस्था सक्गत नहीं हैक्योंकि यह भेदचिह कथाकी तरह आख्यायिकामें भी निबद्ध हो सकते हैं, इनके भेदसे वस्तुभेद नहीं हो सकता। कथानिर्माणमें प्रवृर्ठ कवि यदि इन चिह्होंसे काम लेता है, तो वही कवि आस्यायिकामें यदि भिन्न चिह्होंका प्रयोग करे तो इससे आख्यायिका तथा कथामें कुछ अन्तर नहीं होता ॥ २६॥ आर्यादिवत् प्रवेशः किं न वक्त्रापरवक्त्रयोः। भेदश् दृष्टो लम्भादिरुच्छवासो वास्तु किं ततः ॥ २७॥ कथायामपि आर्यादिवत् वक्त्रापरवक्त्रयोः प्रवेशे किं बाधकम्? प्रसज्गतः कदाचिदार्यानिबन्धने प्रसत्त: कविववत्रस्मरणेन तयोनिंबन्धनं कुर्याच्चेत् न तह्ोषाय जायते। कथा वक्त्रापरवष्त्ररहितैव स्यादस्यार्थस्य स्पष्टं केनाप्यनुक्ते:। एवमेव लम्भादिकृतभेदस्यापि अयुक्तत्वं बोध्यम्॥२७॥ हिन्दी-कथाकाव्यमें भी आर्या आदिकी तरह वक्त्र तथा अपरवक्त्र नाम छन्दोंके समावेशमें कुछ वाधक नहीं है। फरतः कथा तथा आख्यायिका उमयन्र आर्या, वक्त्र, अपरवक्त्र इन तीनों पुत्तोका यथेच्छ प्रयोग किया जा सकता है। इसी प्रकार लम्भक, उच्छवास आदि भी इनमें भेद नहीं सिद्ध कर सकते। कथामें मी लम्भक, उच्छवास आदि संब्ञासे प्रकरणविच्छेद किया जा सकता है और आख्यायिकामें भी, इस अवान्तर भेदोंसे कथा तथा आख्यायिकामें कुछ भेद सिद्ध होते नजर नहीं आते है। इस प्रकार आचार्य दण्डीने कथा तथा आख्यायिकामें कुछ भेद नहीं माना है, संज्ञाभेदको घटकलशादिभेदवद अप्रयोजक बताया है। २७। तत् कथाSडख्यायिकेत्येका जाति: संक्ञा दयाङ्गिता। अत्रैवान्तर्भविष्यन्ति तत् तस्मात् संज्ञाभेदस्याप्रयोजकत्वात् कथा आख्यायिका चेति संझाद्वयाङ्किता नोमद्वितयाभिधीयमाना एका जाति: तुल्यः पदार्थः। कथाया आख्यायिकायाक्ष भेदो नास्ति, नामभेदस्त्वप्रयोजक इत्यर्थः । एवं कथाऽडख्यायिकयोरभेदं प्रतिपाद्य खण्डकथा, परिकथा, कथालिका, इत्यादीनामपि परैरुक्तानां कथायामेवान्तर्भावं बोधयितुमाह- १. प्रयोग:। २. लम्बादिर्।

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२८ काव्यादर्श:

अन्रैवेति। शेषा उक्ताया: कथाया अतिरिक्ा आख्यानजातयो गद्यकाव्यानि श्रत्र कथायामेय अन्तर्भविष्यन्ति समावेत््यन्ति। ता अपि नाममात्रभेदभाजः कथा एवेत्यर्थः। अग्निपुराणे-कथादिरूप प्रस्तावे पक्चप्रकारता गय्यकाव्यानाममिहिता, तथा चोक्त तेनैव- 'आरूयायिका कथा खण्डकथा परिकथा तथा। कथालिकेति मन्यन्ते गद्यकाव्यश्च पच्चधा ।।' दण्डी तु सर्वानपि गद्यभेदान् कथायामेवान्तर्भावयति, तदिदं तस्य प्रौढिवादमात्रम्, सम्प्रदायपरिपन्थित्वात्तथाऽभिधानस्येति बोध्यम्॥ २८॥ हिन्दी-कथा और आख्यायिका यह केवल संशामेद है, संजाओके मिन्न होनेसे भी संज्ञी- वाध्य अर्थमें भेर नहीं होता, जैसे घट-कलशरूप संबाभेद होनेपर मो वाध्यार्थरप कमु- श्रीवादिमत्दार्थविशेषमें कोई अन्तर नहीं पड़ता है, उसी तरह कथा-अखयायिकारू संजाभेद रेनेपर भी गद्यकाव्यरूप वाच्याथमें कुछ भी अन्तर नहीं है। इसी प्रकार खण्डकथा, परिकथा, कथालिका आदि गद्यप्रबन्भोंका मी आख्यायिकानें हो अन्तर्मान समझना चाहिये॥२८॥ कम्याहरण संग्राम विप्रलम्भोद्याद्यः 1 सर्गबन्घसमा एव नैते वैशेषिका गुणाः।। २९॥ केचिदाचार्या :- 'कन्याह रणसंग्रामवि प्रलम्भोदयान्विता' इति प्राचीनोक्तिमनुसन्दधानाः कन्याहरणादीनि विशिव्यार्यायिकायां वर्णनीयत्वेन स्वीकुर्वन्तो वर्णनीयकन्याहरणादि- भेदेन कथाऽडव्यायिकयोर्भेंदमातिष्ठन्ते, तदपि न युक्तम्, इत्याह-कन्याहरणेति। कन्याहरणमसम्पन्नपाणिभ्रहणां कन्यां बलाद् हत्वा तया सह किगमाणो विवाहः' स हि राक्षसविवाहनाम्ना स्मृतिषु व्यपदिश्यते-यथोक्तं मनुना- 'हत्वा छिर्वा च भिश्वा च क्रोशन्ती रुदती हठात्। प्रसत्य कन्याहरणं राक्षसो विधिरुच्यते'॥ (३. ३३.) समरः-युद्धक्रिया। स च विप्रकारक, समः, विषमः, समविषमश्च। तन्र समौ द्वन्द्वयुद्धे चनुरतयुद्धं च। द्वन्द्वयुद्धं यथा रामरावणयोः। चनुरयुद्वं यथा कुरुपाण्डवानाम्। विषमो यथा-रामस्य खरदूषणत्रिशिरोभिः सह। समविषमो यथा-महेश्वरार्जुनयोः किरातार्जुनीये। विप्रलम्भ :- 'यत्र तु रतिः प्रकृष्टा नाभीष्टमुपैति विप्रलम्भोऽसौ' इति लक्षगलक्षितः। स च पूर्वरागमानप्रवासकरुणात्मकश्चवुर्धा स्यात्। अरयं विप्रलम्भः संभोगस्याप्युपलक्षकः, विप्रलम्भस्य संभोगवर्गनसापेक्षत्वात्। उदयः-सूर्याचन्द्रमसोः, नायकस्य वाडभ्युदयः । एते गुणाः सर्गबन्धसमाः महाकाव्यसदृशाः। एते हि वर्णनीय- विधया महाकाव्य इव। यद्येते विषयाः महाकाव्ये पत्यप्रबन्धविरोषेऽपि संभवन्ति तदा गद्यकाव्यभेदभृते कथारूपे किमिति न भवेयुः। एषां वर्णनं नाख्यायिकामात्रे करियते किन्तु पद्यप्रबन्धेऽपि, तदिदं भेदकथनं न युक्तमिति भावः ॥२९॥ हिन्दी-आख्पायिकामें 'कन्याहरणसंपरामवरिप्रलम्मोदयान्विता' इस प्रावीनोक्तिके अनुसार- कन्याहरण-राक्षसविवाह, युद्ध, वियोग (संभोग), चन्द्रसूर्योदय, आदिका वर्गन होता है अतः इस वर्णनीय मेइसे कथा और आखपायिकामें भेद सिद्ध है, इस तर्कका मो खण्डन इस कारिकामें किया गया है। यदि कन्याइरणादि वस्तु आख्यायिकामात्रनिष्ठ होते तब यह मेदक हो सकते

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प्रथम: परिच्छेद: २६

ये, परन्तु यह कन्याहरणादि तो महाकाव्योंमें भी वर्णनीयतया स्वीकृत है, अतः इनके वर्णनसे आख्यायिका और कथाका भेद प्रमाणित नहीं किया जा सकता ।। २९॥ कविभावकृतं चिह्नमन्यत्रापि' न दुष्यति। मुखमिष्टार्थसंसिद्धी® किं हि न स्यात् कृतात्मनाम्॥ ३०। 'कवेरभिप्रायकृतैरङ्कनैः वैशविदद्किता' इति प्रतिपादयता भामहाचार्येण कथायां किश्वित्तादृशं चिहं कविना निवेशनीयं येन कथाऽड्यायिकयोर्भेद: प्रमित: स्यादित्युक्ततं, तद्दूषयितुमियं कारिका। अन्यत्र कथातो भिनने पद्यप्रबन्धे महाकाव्यादौ। कविभाव- कृतम्-कविना स्वेच्छ्या निबद्धम्। तथा हि दृश्यते महाकाव्येषु, शिशुपालवधे प्रतिसर्गान्ते श्रीशन्दप्रयोगात् श्रयङ्कत्वम्, किराताजुनीये च लक्षम्यद्ततवम्। यथा महाकाव्यादी कवि: स्वेच्छ्या श्रयङ्कतवादिकं निवेशयत तद्न् कथाभिन्नं आख्यायिकादौ यदि किमपि स्वाभिमतं चिहनं निवेशयेत्तेन न कापि त्रुटिः, तथा च न च तादृश- शालित्वं कथामात्रनियतं, महाकाव्यादौ तद्दर्शनादतो न तादृशं चिह्नं कथा- ख्यायिकयोर्भेदप्रमापकम्। तदियता परिकरण कथाऽख्यायिकयोर्भेंदो निरस्तः। तादृशचिहस्य न कथाSऽरयायिकयोभेंदमात्रज्ञापनपरत्वं येन वैयथ्य शङ्कयंत, किन्तु मफलादन्य प्रयोजनप्रमापकत्वमपत्याह-मुखमिति। कृतारमनाम् कृतिनाम् सूरिणाम् इष्टार्थससिद्धी मझ्लादिरपाभिमतार्थसम्पादने, मुखम्-उपायः, किल्न स्यात्, तारदृर्श चिह्न मजलाधर्थ कृतं वेदितव्यम्, कथाख्यायिकयोर्भेंदं बोधयितुमित्यर्थः ॥ ३०॥ हिन्दी-आचार्य भामइने 'कवेरमिप्रायकृतैः कथनैः वैशिकिता' के अनुसार यह माना है कि कथामें कवि अपनी इच्छाके अनुकूल कुछ चिह्न रगाते हैं (जैसे माघने अपने काव्यमें प्रतिसर्गान्तश्लोकमें भी शब्द लगाया, या करातार्जुनीयमें मारबिने लक्ष्मी शब्द बोड़कर उसे लक्ष्म्यक बनाया) यही कथा तथा अख्यायिकामें भेद मानना चाहिये, परन्तु यह बात यदि कथामावमें देखी जाती तम हम इसे कथासे आख्यायिका का भेद समझते परन्तु ऐसा नहीं है। इस तरहके चिह्न तो पद्यप्रबन्ध महाकाष्योंमें मी दीखते हैं, तब मला इनसे कथा तथा आख्यायिका में भेद वैसे निर्णीत किया जा सवेगा। कवि लोग इस तरहके चिह्न कथामें, आख्यायिकामें या महाकाव्यमें यहाँ जी चाहे लगाया करते हैं, तन इससे कुछ फलू मामहके मतमें नहीं होता। कृती कविगण चाहे जिस सरह्के शब्द-प्रयोग द्वारा अपना अमीष अर्थ मनकादिकी सिद्धि कर लिया करते हैं, उनकी वाणीपूजमें इतना सामर्थ्य होता है कि ये चाहे जिस शब्दसे अभिप्रेत अर्थ साध लिया करते हैं॥ ३०॥ मिश्राणि नाटकादीनि तेषामन्यत्र विस्तरः। गद्यपद्यमयी काचिञ्चम्पूरित्यभिधीयते।३१॥ आचार्यदण्डिना 'गदं पद्यं च मिश्रं च तत् त्रिधेव व्यवस्थितम्' इति काव्यभेदकथन- प्रस्तावे प्रतिपादितम्, तत्र गद्यपद्ययोः प्रभेदेषु निरुच्यमानेषु सम्प्रति क्रमप्राप्तं मिश्रं नाम प्रभेदं जिज्ञपशिषुराह-मिश्राणीति। नाटकादीनि दृश्यकाव्यानि मिश्राणि गद्यपद्योभयात्मकतया मिश्राणि तन्पदव्यपदेश्यानि, तेषां नाटकादिदश्यकाव्यानाम् अन्यत्र नाव्यशास्त्रादी विस्तरः साऊं सरहस्यं च प्रतिपादनं कृतमस्तीति शेषः, १. अन्यद्वापि। २. संसिद्धये।

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३२ काव्यादर्श:

हिन्दी-प्राकुत अनेक प्रकारके है-महाराष्ट्री, शौरसेनी, गोडी, मागवी आदि। उनमें महाराष्ट्री-प्राकृन सर्वोत्तम है, ऐसा विद्वान् कहा करते हैं, क्योंकि उसी प्राकृतप्रभेद महाराष्ट्रीमें 'प्रवरसेन' नामक कविने 'सेतुबन्ध' नामक काव्य की रचना की है, 'सततसई' प्रभृति ग्रन्थ भी सी प्राकनमें लिखे गये हैं, जिन अ्रन्थोंमें चमस्कारपूर्ण उक्तियाँ भरी पड़ी हैं। 'सेतुबन्', 'सत्तसई' प्रभृति उत्तम ग्रन्थोंकी भाषा होनेके कारण ही महाराष्ट्री प्राकृत सर्वंश्रेष्ठ प्राकृत मानी जाती है। उन ग्रन्थोंको शरेष्ठता इसलिये कही जाती हैं कि उनमें चमत्कारपूर्ण उक्तियाँ बहुतायतसे प्राप्त होतो है·। ३४ ।। शौरसेनी च गौडी च लाटी चान्या च ताहशी। याति प्राकृतमित्येव1. व्यवहारेषु सन्निधिम्॥३५॥ शूरमेनो नाम ऋष्णमातामह: प्रसिद्धस्तदधिकृतो मथुरासन्निहितो देशो भवति शूर- सेनः, तदुक्त भागवते- 'शूरसेनो यदुपतिर्मथुरामावसन पुरीम्। माथुराज शूरसेनाँश्च विषयान बुभुजे पुरा।। शूरसेन पदमत्र तहेशवासिषूपचर्येते, तथा च शूरसेनाभिधदेशवासिजनव्यवहार्या प्राकृत- भाषा शोरमेनी बोध्या। गोडी प्राकृतभापा सा कथ्यते या गौउदेशवामिभिर््यवहियते, गौडो नाम वज्गसमीप- वर्सी देशविशेष:, यदुक्तं शब्दकन्पद्गमे- 'वन्नदेशं समारभ्य भुवनेशान्तगं शिवे। गौडदेशः समाग्यातः सर्वविद्याविशारदः'॥ लाटी लाटजनव्यवहार्या, लाटक्ष कर्णाटसन्निहितो देशविशेष:, तथा चोक्तम्- 'ददौ तस्मै सपुत्राय प्रीत्या वीरवराय च। लाटदेशे ततो राज्यं स कर्णाटयुतो नृपः' ॥ तादृशी महाराष्ट्रयादिसदृशी तत्तद्ेशनाम्रोपलक्षिता अन्या मागधी अवन्तिजा प्राच्या वा, तदुक्तं नाव्यशास्त्रे- 'मागध्यवन्तिजा प्राच्या शूरसेनार्धमागधी। बाह्लीका दाक्षिणात्या च सप्तभाषाः प्रकीर्तिताः॥ एताः सर्वा अपि भाषा: प्राकृतमिति, एवं प्राकृतनाम्ना एव व्यवहारेषु नाव्यशास्र- साहित्यशास्त्रादिव्यवहारेषु सन्निधिं याति प्राप्नोति, आचार्याः सर्वा अपीमा भाषा: प्राकृत- पदेनैव व्यपदिशन्तीति भावः ॥ ३५॥ हिन्दी-शरसेन नामके राजा कृष्णमातामए्के रूपमें प्रसिद्ध हैं, उनके द्वारा शासित भूखण्डको शूरसेन कहा जाता है, यह मथुरापुरोके आसपास है, वहोँकी जनता जिस प्राकृतका प्रयोग करती है, उसे 'शौरसेनी' प्राकृत कहते हैं। इसी तरह लाटदेशस्य जनताद्वारा व्यवहृत भाषा लाटी कही जाती है। गीड देशकी भाषा गौडी कही जाती है, ये सभी देशनामोपलक्षित भाषायें नाव्यशास्त्र तथा साहित्यशाख्तरके व्यवहारोंमें प्राकृतनामसे व्यवहृत होती है। ३५ ।। आभीरादिगिर: काव्येष्वपभ्रंश इति स्मृताः। शास्त्रेषु *संस्कृतादन्यद्पभ्रंशतयोदितम्"॥ ३६।। देशनामोपलक्षिता भाषा: प्राकृतपदाभिलप्या इत्युक्त्वा सम्प्रति जातिनामोपल- क्षितभाषाणामपभ्रंशत्वमुपपादयति-आभीरति। भाभीरा गोपास्तदादयः आमीर- १. इत्येवं। १. सन्निषिः। ३. काव्ये। ४. अ्रंश शतीरिताः।

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प्रथम: परिचछेदः ३२

शबरशकचाण्डालादय:, तेषां गिरस्तद्व्यवहार्या भाषा: भाभीरीशावर्यादयोऽपभ्रंश इति स्मृता: काव्येषु अपभ्रंशपदबोष्या। आभीरादिगिरां केवलं काव्ये एवापभ्रंशपद्वाध्यत्वं, शास्त्रेषु तु व्याकरणादिषु च्युतसंस्कृतीनाम् संस्कृतादन्यासां सर्वासामेव भाषाणं प्राकृतादीनामपभ्रंशपदबोध्यत्वमिति। शास्त्रे संस्कृतमपभ्रंशश्ेति द्वावेव प्रभेदौ, तत्र संस्कृतभिन्नमखिलमपि अपभ्रंशशब्दप्रतिपाद्यमिति भावः ॥ ३६॥ हिन्दी-इससे पहलेवालो कारिकामें देशनामोपलक्षित सभी माषाओोंको प्राकृत-प्रमेद कडा गया है, जैसे महाराष्ट्री, शौरसेनी, मागषी आदि। अब जातिनामोपरक्षित माणाओोको अपम्रंक् कह रहे हैं। काव्यमें आमीर आदि जातियों द्वारा व्यवहत दोनेवाकी माषायें अपभ्रंस मानो जाती है। परन्तु यह केवल काव्यविषयक नियम है, व्याकरणादि साखमें तो अपभरंश संस्कृतसे भिन्न माषासामान्यको कहा जाता है। पतअञलिने स्पट कहा है कि यदि व्याकरणकक्षणदीन भाषाका प्रयोग होगा तो वह माषा अपभ्रंश होगी, तथा उसके प्रयोक्ता म्लेच्छ समझे बायेंगे। देखिये-'बाह्मणेन न म्लेक्कितवे नापमाचितवे, म्लेच्छो ह वा यष यदपशब्दन म्लेष्छा मा भूमेत्यष्येयं व्याकरणम्' (महामाष्य-१-१-१)॥ ३६ ॥। संस्कृतं सगबन्धादि प्राफृतं स्कम्धकोदि यद्। ओोसरादिरपभ्रंशो नाटकादि तु. मिथकम्॥३७॥ भाषाभेदमभिधाय तत्तद्भाषाभेदेन पद्यप्रबन्धान् लक्षणमुखेन व्यवस्थापयति- संस्कृतमिति। सगबन्धादि महाकाव्यादिकम्-संस्कृतम्-संस्कृतभाषायामेव निबन्धनीयं भवति, महाकाग्यखण्डकाव्यादि संस्कृतभाषायामेव विरच्यते नान्यस्यामिति प्रथम- पादार्थ:। तथा चोकमाग्नेये- 'सर्गबन्धो महाकाव्यमार्धं संस्कृतेन यत्। तद्दूवं न विशेत्तत्र तत्समं नापि किवन'॥ यथा-रामायणादि। स्कन्धकादि स्कन्धकः छन्दोविशेषस्तद्विरचितं काव्यमपि स्कन्धकं, तत्प्राकृतम् प्राकृतभाषायामेव निबन्धनीयमिति द्वितीयपादार्थः। उर्क चान्यत्र 'छन्दसा स्कन्धकेनैतत् क्वचिद्ठलितकैरपि'। अस्योदाहरणं सेतुबन्धादि। भोसरो नामच्छन्दोभेद:, तद्भ्रथितं काव्यमपत्रंशभाषायामेव विधातव्यम्, एतादशे व काष्ये सर्गा: कुडवकाभिधा भवन्ति, तदुक्तमन्यत्र- 'अपभ्रंशनिबन्धेऽस्मिन्सर्गा: कुडवकाभिधाः। तथापभ्रंशयोग्यानि च्छन्दांसि विविधानि च'।। अपरभ्रंशभाषायां निबद्धं काव्यम्-कर्णपराक्रमादि। नाटकादि तु मिश्रकम्-नाना- भाषाभिमिश्रितं विधेयमिति यावत्। नाटकादौ पात्रमेदेन भाषानियम उक्तो यबा साहित्यदर्पणे- 'पुरुषाणामनीचानां संस्कृतं स्यात् कृतात्मनाम्। शौरसेनी प्रयोक्तव्या तादृशीनां च योषिताम्।। आसामेव तु गाथासु महाराड्ट्री प्रयोगयेत्। १. स्कान्धादिकम्।

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३४ काव्यादर्श:

अरत्रोक्ता मागधो भाषा राजान्तःपुरचारिणाम्।। चेटानां राजपुत्राणां श्रेष्ठिनां चार्धमागधी। प्राच्या विदूषकादीनां धूर्ताना स्यादवन्तिका।। योधनागरिकादोनां दाक्षिणात्या हि दीव्यताम्। शबराणां शकादीनां शाबरी सम्प्रयोजयेत्'॥ तदेवं भाषाभेदेन काव्यलक्षणानि निरुक्तानि, तथा च महाकाव्यं संस्कृतमयम्, स्कन्धकं प्राकृतमयम्, ओसरादिरपरभ्रंशमयः, नाटकादि तु नानाभाषामयमिति॥ ३७॥ हिन्दी-इससे पूर्वमें भाषाका विभाग बताया गया है, इस कारिकामें भाषा-भेवसे पद्यप्रबन्धों के रक्षण स्थिर किये जाते हैं। सगबन्ध अर्थात महाकाव्य-खण्डकाव्य संस्कृतमें हो लिखे जाते हैं, स्कन्पक-एक प्रकार का वृत्त, उसमें लिखे गये काव्य प्राकृतमय ही होते हैं, इसी तरह ओसर आदि छन्दोंमें किखे गये काव्योंकी भाषा अपभ्रंश माषा ही होती है, नाटकोंमें समी तरहकी भाषाओंका प्रयोग किया जाता है। नाटकोंमें पात्रभेदसे विविध माषाका प्रयोग होता है, जिसकी व्यवस्था कपरकी टीकामें दी गई है।। ३७।। कथा हि सर्वभाषाभि: संस्कृतेन च बध्यते। भूतभाषामयीं प्राहुरद्भुतार्थो वृहत्कथाम्॥३८ ॥ महाकाव्ये संस्कृतमेव भाषा, स्कन्धकादिवृतनिबद्ध प्राकृतमेव, ओसरादौ पुनरपभ्रंश इति काव्यप्रभेदप्रथमे पद्यकाव्ये भाषानियमं कृत्वा गद्यकाव्यगतं तन्नियममुपक्रमते- कथा हीति। कथालक्षणं प्रागुक्त, सा हि कथा सर्वभाषाभिः सर्वविधाभिः प्राकृतभाषाभि: संस्कृतेन च बध्यते विरच्यते, कथायां भाषानियमो नास्तीत्यर्थः । तत्र मंस्कृतभाषा- निबद्धकथोदाहरणं कादम्बर्यादि प्रसिद्धमेव। संस्कृतेतरभाषानिबद्धकथोदाह रणप्रदर्शना- याह-भूतभाषेति। भूतभाषामयीम् पैशाचभाषयोपनिबद्धाम् अद्भुतार्थाम् रमणीयवृत्त- घटिताम् बृहत्कथाम् नाम अ्रन्थमाहुः। इयं वृहत्कथा सम्प्रति नोपलभ्यते, तदनुवादभुता बृहत्कथामञञर्यादयो प्रन्था: प्रथन्ते॥ ३८ ॥ हिन्दी-महाकाव्यकी माषा नियमनः संस्कृत हो, स्कन्पकच्छन्दमें निर्मित काव्यकी भाषा प्राकृत हो, ओसर प्रभृति छन्दोंके योग्य माषा अपभ्रंश होती है, इस प्रकार पद्यकाव्योंकी भापाके विषय में निश्चय किया गया है, अंब इस कारिकामें गद्यकाव्य-कथाकी भाषाके विषयमें अपना विचार प्रकट करते हैं। कथामें माषाका कुछ नियम नहीं है, कथा संस्कृत माषामें तथा अन्यान्य माषाओंमे समानरूपसे लिखी जाती है। उदाहरणार्थ संस्कृतमाषानिबद्ध कथा 'कादम्वरी' एवं भूतमापानिबद्ध कथा 'बृहत्कथा' उपस्थित की जा सकती है। बृहतकथा गुणाढ्यकी रचना है, वह अपने मूल रूपमें प्राप्य नहीं है, उसके अनुवाद-बृहत्कथामजरी एवं कथासरित्सागर आदि मिलते है। ३८ ॥ लास्यच्छलित शम्पादि प्रेक्षार्थम् इंतरत् पुनः। श्रैव्यमेवेति सैषाऽपि इयी गतिरुदाहता ॥ ३९ ॥ स्रीजनकृतं शभ्ताररसप्रधानं नृत्यं लास्यम्, तथा चोक्म्- 'लासः स्त्रीपुंसयोर्भावस्तदह तत्र साधु वा। लास्यं मनसिजोल्लासकरं मृद्धम्वहासवत्।

.. कथापि। २. पठ्ध ते। १. शश्यादि, साम्यादि, शम्पादि। ४. प्रेक्ष्यार्थम्। ५. आध्यम्। ६. सैवेषा।

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प्रथम: परिचछेष: ३४

देव्ये देवोपदिष्टत्वात् प्रायः स्त्रीभि: प्रयुज्यते'। इति। 'कोमलं मधुरं लास्यं शज्ताररससंयुतम्। गौरीतोषकर चापि स्त्रीनृत्यं तु तदुच्यते'॥ इति न। छलितं पुंनृत्यम्, तदुक्तं प्रेमचन्द्रेण-'पुंनृत्यं छलितं प्राहुः' इति। केचित् छलिक़- मिति पाठं प्रकल्फयन्त :- 'छलिकं छघ्ना वृत्तं सूरयस्तद्विदो विदुः' इति च्छलिकलक्षणमुप- स्थापयन्ति। शम्पा पूर्वरज्ञान्तर्गतः वादप्रयोगविशेषः, तदुक्तं नाव्यशाखे- 'शम्पा तु द्विकला कार्या तालो द्विकल एव च। पुनश्चैककला शम्पा सन्निपातः कलात्रयम्' ॥ इति। आदिना ताण्डवह ल्लीशरासकानां प्रहणम्, तत्र ताण्डवलक्षणमु्ततं यथा- 'वीररौद्ररसाधारमद्भुतं शङ्करप्रियम्। पुरुषेण समारब्धं नृत्यं ताण्डवमुच्यते॥ अन्यच्थ 'उद्धतं तु महेशस्य शासनात् तण्डुनोदितम्। भरताय ततः ख्यातं लोके ताण्डवर्सज्ञया'। हल्लोशकलक्षणं यथा- 'मण्डलेन तु यत् स्त्रीणां नृत्यं हक्लीशकं तु तत्। तत्र नेता भवेदेको गोपस्रीणां यथा हरिः' ॥ हल्लीशमेव तालबन्धविशेषयुक्तं रासकमिति प्रेमचन्द्रशर्माणः। एतत् सर्व लास्यादि प्रेक्षार्थम् अवलोकनमात्रफलम्, दृश्यं काव्यमिति यावत्। इतरत्-इतः प्रेक्षार्थाल्लास्यादे- रभिन्नम् महाकाव्यादि श्रव्यमेव श्रवणमात्रलक्षणम्। उत्तश्वायमर्थो भोजराजेन यथा- 'श्रव्यं तत्काव्यमाहुर्यन्नेक्ष्यते नाभिनीयते। श्रोत्रयोरेव सुखदं भवेत्तदपि षडविधम्'॥ २ - १५२ एवम् एषा अपि द्वयी गतिः द्विप्रकारा पद्धतिः प्राचीनैः कथिता। 'दृश्यश्रव्यत्वभेदेन पुनः काव्यं द्विधा मतम्' इत्यादिना प्राचीनैः काव्यस्य भेदद्वयमुक्तमिति भावः ॥३९॥ हिन्दी-लास्य-खोजनद्वारा प्रस्तुत किया गया शङ्गारगसप्रधान नृत्य लास्य कहा जाता है। छलित-पुरुषों द्वारा प्रस्तुत नृत्य छलित शब्द्रसे व्यवहृन होता है। शम्प-पूर्वरकके अन्तर्गत वाद्यप्रयोगविशेषको शम्पा कहते हैं। आदि पदसे ताण्डव इलीशक तथा रासकका ग्रहण होता है, ताण्डव-उस नृत्यका नाम है जिसका आषार वीर, रौद्र तथा अङ्भुत रस हो, नो शिवजोका अमीष्ट हो एवं पुरुषों द्वारा प्रस्तुत किया गया हो। हलीश उस नृत्यका नाम है जिसमें बहुत-सी ख्रियोँ एक पुरुषको नेता बनाकर मण्डलाकारमें खड़ी हो नृत्य प्रस्तुत करती हों। रासक-इलोश नामक नृत्यप्रभेदमें जन खास तालबन्धका प्रयोग होता है तब वह रासक कहा जाता है। यह सकल-लास्यच्छलितशम्मादि केवल प्रेक्षार्थ-दृश्य है, इनके अतिरिक्त काव्य श्रव्य है, इस प्रकारसे प्राचीनोंने काव्यके दो प्रभेद कहे हैं। इससे पूर्व आचार्य दण्डीने-'गर्च पद्य च मिश्रं च तत्रिषैव व्यवस्थितम्' गद्य, पद एवं मिश्र कहकर काव्यके तीन प्रभेद बवाबे थे, उसी प्रसक्गको समाप्त करते समय प्राचीनों के मत भी बता दिये गये है॥ ३९॥ अस्त्यनेको गिरां मार्ग: सूक्ष्मभेद: परस्परम्। तत्र वैदर्भगौडीयौ वण्येंते प्रस्फुटान्तरी।। ४० ।। 'वाचां विचित्रमार्गाणाम्' इत्यादिना पूर्व वागवैचित्र्यमुपकान्तमियता परिकरेम व्युत्पादितं सम्प्रति तासामेव वाचां रीतिभेदेन भिज्नतां बोधगितमुमकमते-मलनेक

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३६ काव्यादशें:

इति० परस्परं सूक्ष्मभेद: स्थूलबुद्धिजनावेद्यपार्थक्य :- केवलं परिपक्बुद्धिविभवमात्राय- गम्य पार्थक्य :- गिरां वाचां मार्ग: रचनाप्रकार: अ्नेकः बहुविधः भस्ति, तंदुककं बामनेन-रीतिरात्मा काव्यस्य, विशिष्टपदरचना रीतिः सा च त्रिविधा-वैदर्भी, गौडी, पाशाली चेति। विश्वनाथस्तु रीतीनां चातुर्विध्यमाह- 'पदसकुटना रीतिरसंस्थाविशेषवत्। उपकर्त्री रसादीनां सा पुनः स्याच्चतुरविधा॥ वैदर्भी चाथ गौडी च पाश्ाली लाटिका तथा'। सरस्वतीकण्ठाभरणे रीतीनां षड्विधत्वमुक्तम्- 'वैदर्भी साथ पाश्ाली गौडीयावन्तिका तथा। लाटीया मागधी चेति षोढा रीतिर्निगद्यते'। आसां पुना रीतीनां लक्षणोदाहरणानि पुरो भाषाटीकायामुच्यन्ते। तत्र एतादृशीषु तिसूषु चतसूषु घट्सु या रीतिषु वैदर्भगौडीये एव रीती प्रस्फुटान्तरे स्फुटभेदे, अन्यास्तु मिश्रिता:, अतः स्वल्पभेदानामन्यासां रोतोनां विशेषवर्णनं विहाय सुकुमारविकटबन्धात्मक- तयाऽत्यन्तविसदृशौ वैदर्भगौडीये रीती वर्ण्येते इत्याशयः ॥४० ॥ हिन्दी-'वाचा विचिन्नमार्गाणं निषबन्धुः क्रियाविधिम्' ऐसा कहकर जिस बाग्वैचित्र्यका उपक्रम किया गया था, वह रीतिमेदसे ही सम्भव होता है, रीतियोंके भेदके विषयमें बामनने तीन भेद माने हैं-वंदभी, गौडी और पाझाली। विश्वनाथ कविराजके मतमें रीतियाँ चार है- 'वैदर्मी चाय गौडी च पाशाली लाटिका तथा'। मोजराजने छः रीतियों कहो हैं- वैदभों साथ पाश्ाली गौडीयाऽडवन्तिका तथा। लाटीया मागधी चेति पोठा रीतिनिंगबते'॥ उन रीतियों के लक्षण-उदाहरण इस प्रकार है- वैदभीं- लक्षण-'माधुर्यव्यअकैरवंणैं रचना कलितास्मिका। अह्पपृत्तिरवृत्तियां वैद्भी रोतिरिष्यते'। उदाहरण-'मनोषिता: सन्ति गृहेपु देवतास्तपः क वत्से क च तावकं वपुः। पदं सहेत भ्रमरस्य पेळवं शिरोषपुषपं न पुनः पतत्रिणः॥ गोडीया- लक्षण-ओज:प्रकाशकेर्व नैबन्ध आडम्बर: पुनः। समासवड्ला गौडी ...... '

सतयानावनखघनशोणितशोणपाणिक तंसविष्यति कचाँस्तव देवि मीमः'।. पाख्चाकी- रक्षण -....... वरणैः शेषेः पुनर्दये1 समस्तपश्रमपदो बन्मः पाश्ाकिका मता'। उदाहरण-'मपुरया मयुबोचितमाथवीमयुसमृद्धिसमेपितमेपया। मधुकराऊनया मुहुडन्मदध्वनिंभृता निभृताक्षरमुब्जगे'॥ लाटी- लक्षण-'लाटी तु रीतिवेंदमी पाश्ाश्योरन्तरे स्थिता'। उदाहरण-'अयमुदयति मुद्रामशनः पतचिनोनामुक्यगिरिवनाळीवाळमन्दारपुष्पम्।

भावन्तिका- कक्षण- भन्तराके त पाश्ाकीवेदभ्योयवतिषते। साबन्तिका समस्तैः स्वाद् द्विनैबियतुरै: पदैः॥

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प्रथम: परिच्छेद: ३७

उदाहरण-'रतानि निस्सहतनोरसमअसानि शून्यं मनः पिशुनयन्ति पदानि तस्याः। एते च वर्र्मंतरवः प्रथयन्ति तापमालम्बितोज्शितपरिग्लपितैः प्रवालैः॥' मागपी- कक्षण-'पूर्वरी तेरनिवहि खण्डरीतिस्तु मागषी।' उदाहरण-'करिकवलनशिटैः शाखिरिशाखाम्रपत्रैररणसरणयोडमी सर्वंतो भोषयन्ते।

यहाँ रीतियों के लक्षण तथा उवाहरण दिये गये हैं, इनके विषयमें अधिक जानना हो तो 'सरस्वतीकण्ठाभरण' आदि ग्रन्थोंमें देखिये॥। ४० ॥ श्लेष: प्रसाद: समता माधुर्ये सुकुमारता। अर्थव्यक्तिरुदारत्वमोजः कान्तिसमाघयः।।४१॥ इति वैदर्भमार्गस्य प्राणा दशगुणा: स्मृताः। एषां विपर्ययः प्रायो दश्यंते गौडवर्त्मनि ॥ ४२ ॥ 'तत्र वैदर्भगौडीयौ वर्ण्येते प्रस्फुटान्तरौ' इति प्रतिज्ञातं लक्षणादिनोपपादयति-श्लेष इत्यादिभ्यां द्वाभ्यां कारिकाभ्याम्। श्लेषादीनां लक्षणानि वच्यति। एते दशापि गुणा अत्रोदिष्टाः। इति एते दशगुणा: श्लेषादयः वैदर्भमार्गस्य प्राणाः प्राणवत् स्थितिहेतवः स्मृता: भरतादिभि: स्वीकृताः, तदुक्तं भरतेन- 'श्लेषः प्रसाद: समता समाधिर्माधुर्यमोजः पदसौकुमार्यम्। अर्थस्य च व्यक्तिरुदारता च कान्तिश्व काव्यार्थगुणा दशैते।।' एवं च श्लेषादिगुणगणशालिनी पदरचना वैदर्भीरीतिरिति लक्षणं पर्यवसल्नम्। एवं वैदर्भी निरूप्य गौडीं रीति निरूपयितुमाह-एषामिति। गौडवर्त्मनि गौडमार्गे गौडीय- रीतौ एषां गुणानाम् विपर्ययः व्यत्यासः, स च कुत्रचिदत्यन्ताभावरूपः कुत्रचिदंशतः सम्बन्धरूपक्ष प्रायशो दृश्यते। प्राय इति वैदर्भगौडीयरीत्यो: क्वचिद् अनवसेयभेदत्व- मपीति बोधयति, यथा आम्यत्वानेयत्वादिविषये द्वयोरेकविधत्वम्, यथोच्यते-'एवमादि न शंसन्ति मार्गयोरुभयोरपि', 'नेदृशं बहु मन्यन्ते मार्गयोरुभयोरपि'। अत एव गौढी असमस्तपदेति केचित्प्रदर्शितवन्तः। इत्थं च वैदर्भी विरुद्धगुणवती पदरचना गौडीति लक्षणं पर्यवसितम्। तादृशविरुद्धधर्मवत्वं च दीर्घसमासपरुषाक्षरप्राचुर्यौद्धत्ययोगिरचना- विशेषशालित्वं बोध्यम्। उत्त- 'समस्तात्युद्धटपदामोजः कान्तिगुणान्विताम्। गौडीयेति विजानन्ति रीति रीतिविचक्षणाः'॥ पुरुषोत्तमोऽप्येवमाह- 'बहुतरसमासयुक्ता सुमहाप्राणाक्षरा च गौडीया। रीतिरनुप्रासमहिमपरतन्त्रा स्तोभवाक्या च।।' तद्यमत्र विवेक :- एघु प्रागुक्ेषु दशसु गुणेषु श्लेषः, समता, सुकुमारता, ओोजः इति, चत्वारः शब्दगुणाः, प्रसाद: अर्थव्यक्ति, उदारता, कान्तिः, समाधि: एते पच्चार्थगुणा:, माधुर्य तूभयगुण इति दण्डिनो मतम्। वामनादयस्तु शब्दगुणा अर्थगुणाश्च प्रत्येकं दशेति बदन्ति ॥ ४१-४२॥ १. रइपते।

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३५ काव्यादर्श:

हिन्दी-रेष- चिशमस्पूष सेवित्यम स्पप्राणाक्षरोत्रम्। ज्िषिकं माळतीमाणा कोळाकिकलिका यया'॥ प्रसाद- 'प्रसादवत्प्रसिद्धार्थमिन्दोरिन्डीवरधुति। लक्ष्म लक्ष्मी तनोतोति प्रतीतिक्ुभगं वचः ॥ समता- 'सम बन्मेष्वविषमं ते मृदुस्फुटमध्यमाः । बन्धा मृदुस्फुटोन्मिश्रवर्णविन्यासयोनयः।। कोकिकालापवाचाको मामैति मलयानिलः'। सकुमारता- 'अनिष्ठुराक्षर प्रायं सुकुमार मिहेष्यते। मण्डलीकृत्यवर्ाणि कण्ठैमपुरगीतिभिः। ककापिनः प्रनृत्यन्ति काले जीमूतमालिनि'। अर्थव्यक्ति-

बवारता- 'उत्कर्षंवान् गुणः कब्रिधस्मिन्तुक्के प्रतीयते। तदुदाराहयं तेन सनाथा काव्यपद्धतिः। अररविनां कपणा दूटिस्त्वन्मुखे पतिता सफृत। तदवस्था पुनर्देव नान्यस्य मुखमीक्षते'॥ माधुर्य- 'मपुरं रसवदाचि वस्तुन्यपि रसस्थितिः । येन माधन्ति धीमन्तो मधुनेव मधुव्रताः॥ ओज :- 'जोजः समासभूयस्त्वमेतद्वध्यस्य जीवितम्। पदेडव्यदाक्षिणात्यानामिद मेंकं परायणम्'॥ कान्ति :- 'कान्तं सर्वनगत कानतं लौकिकार्थानतिक्रमाव।' समापि- अन्यवर्मस्ततोऽन्यत्र लोक्रसीमानुरोधिना। सम्यगाधीयते यत्र स समाधिः स्मृतो यथा। कुमुदानि तिमीकन्ति कमलान्युन्मिपन्ति च । इति नेत्रक्रियाध्यासालृम्पा तद्ाचिनी श्रुतिः ।।' इस तरह इन दश गुणोंके लक्षण-उदाहरण इसी ग्रन्थमें यथास्थान लिखे गये हैं। इस प्रकार बताये गये यही दश गुण वैद्मी रीतिके प्राण-जीवनाधायक (स्वरूपोपपादक) कहे गये है। यह प्राचीन वशगुणवादी मत नाव्यसूत्रकार मरतसमर्यित है, मरतने-'काष्यार्थगुणा दश्षेते कहकर अपनी राय साफ बता दी है, अतः 'माधुयौँज:प्रसादाख्याख्त्रयस्तेन पुनर्दश' यह काव्यप्रकाशकारका साटोप कथन सम्प्रदायविरुद्ध मानना चाहिये। इन दशविष गुणोंमें इ्लेष, समता, सकुमारता, ओज ये चार शब्दगुण है। प्रसाद, अर्थव्यक्ति, उदारता, कान्सि, समाधि ये पाँच अर्थगुण है, और माधुर्य शब्दार्योभय गुण है। ऐसा ही दण्डीका मत है। वामन आादि प्राचीन आचार्योने दश शब्दगुण और दश अर्थगुण पृथक्-पृथक स्वीकार किये हैं, इस पिषयमें उनका ग्रन्थ दरष्टव्य है। इन गुणोंका होना वैदर्भी रीतिका प्राण माना गया है। गौडी रीविमें इन गुणोंका विपर्यय होता है, विपरयय शब्दसे यहाँ अत्यन्तामाव और आंशिक सम्बन्ध दोनों विबक्ित हैं। गोडी रीतिमें इन गुणोंका सर्वात्मना बमाव भी होता है, और कुछ स्थलोंमें नंजत: इन गुणों का समोवेश् भी होता है। 'प्रायः' कहने से कुछ अंक्षोंमें दोनों रीतिओंकी समण मानी बाती है, जैसे 'आाम्यस्व' दोनों रीतियोंमें अवश्य परिहायं दोष माना गया है॥४१-४२।।

विथितं मालतीमाला जोलालिकलिला यथा॥ ४३॥

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प्रथम: परिच्छेद: ३६

अस्पृष्टशैथिल्यम् अंशतोऽपि शैथिल्यमस्पृशत् यत् तत् श्लिष्टम् श्लेषगुणोपेतम्, यत्र वाक्य शिथिलो वर्णविन्यासो न भवति तद् वाक्यं श्लिष्टमित्यर्थः । शिथिलताविरहः श्लेष इत्युक्तं तत्र शैथिल्यमेव किमित्यपेक्षायामाह-अव्पभ्राणेति। अल्पप्राणाः वर्गाणं प्रथमतृतीयपश्चमा यरलवाश्च ते उत्तरा: प्रधांना बहुला वा यत्र तादृशम् अल्पप्राणा- क्षरोत्तरम् शिथिलम् , तदुदाहरणं यथा-मालतीमालेति। लोलालिकलिला सारभाहरण - चपलभ्रमरव्याप्ता मालतीमाला तदाख्यपुष्पस्त्रक भातीति शेषः। अत्रोदाहरणेडसंयुक्ताल्प- प्राणवर्णबाहुल्याच्छैथिल्यं स्पष्टम्। जगन्नाथपण्डितराजस्तु 'श्लिष्टमस्पृष्टशैथिल्यम्' इति दण्डिलक्षणमुपन्यस्य तदित्थं परिष्करोति-'शब्दानां भिन्नानामपि एकत्वप्रतिभान- प्रयोजकः मंहितयेकजातीयवर्णविन्यासविशेषो गाढत्वापरपर्यायः श्लेषः। उदाहरति च-

हिन्दी-जिस वाक्यमें शिथिलता अंशतः भी नहीं आयी हो उसे छिष्-्ेषगुणयुक्त कहते हैं। शिथिलताकी परिभाषा यह है कि-अषिकसंख्यामें अल्पप्राण वर्ण हो। उसका उदारण यही है-'मालतीमाला लोलालिकलिला'। इस उदाहरणमें असंयुक्त अल्पप्राणवर्णवाहुस्य विद्यमान है। भेषगुणके सम्बन्धमें आचार्योंने अलग-अलग अपने मत प्रकट किये हैं, भरताचार्यने स्वभावस्पष्ट किन्तु विचारगहनवचनको श्लेष कहा है- उनका लक्षण यों है- 'विचारगहनं यत्स्यात्सफुटं चैव स्वमावनः । स्वतः सुप्रतिबद्धं च शिलिष्ट तत परिकीतिंतम्'। इसका उदाहरण दिया है :- 'स्थिता: क्षणं पक्ष्मसु ताडिताधराः पयोधरोत्सेषनिपातचूर्णिताः । बलीषु तस्या: स्खलिताः प्रपेदिरे चिरेण नामि प्रथमोदबिन्दवः॥ इस लक्षणमें वामनादि आचार्योको यह अरुचि मालूम पढ़ी कि यह तो अभिषानाभिधेय पद्ति है सन्दर्भरचना नहीं, इसी अरुचिको हृदयमें रखकर वामनादिने कहा- 'मसृणत्वं श्लेषः, मसृणत्वं नाम यस्मिन् सति बहूनि पदानि एक पदवद् भासनते'। कहा है- यत्रैकपद व्दावः पदाना भूयसामपि। अनालक्षितसन्धीनां स श्लेष: परमो गुणः॥ इसका उदाहरण- अस्युत्तर स्या दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाविराजः । पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः।। मोजराजने-'गुणः सुश्लिष्टपदता इ्लेष इत्यभिषीयते'। ऐसा लक्षण कहकर उदाहरण दिया है- 'उभौ यदि व्योम्ि पृथक प्रवाहावाकाशगङ्गापयसः पतेताम्। तदोपमीयेत तमालनीकमामुक्तमुक्तालतमस्य वक्षः॥ काव्यप्रकाशकारने- 'बहूनामपि पदानामेकपदवद्धासनात्मा इ्लेषः'। यह रूक्षण लिखा है। इस श्लेष नामक गुणका अर्वाचीन आचार्योने ओोजमें अन्तर्माब माना है, साहित्यदर्पणमें लिखा है- 'इलेषः समाधिरौदार्य प्रसाठ इति ये पुनः। गुणाश्चिरन्तनैरुक्ता ओजस्यन्तसंबन्ति ते'॥ मोजराजने इसी इ्लेषको अर्थगुण भी माना है। ४३।। अनुप्रासघिया गौडैस्तदिष्टं बन्घगौरवाल्। बैवर्मैर्मालतीदाम लहितं भ्रमरैरिति।।४४।।

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४० काव्यादर्श.

प्रागुदाहतस्वरूप शैथिल्यं वैदर्भा नाद्रियन्ते, किन्तु गोडास्तच्छैथिल्यं केवलमनुप्रासा- नुरागेण बहु मन्यन्ते, एतदुक्तमत्र कारिकायाम्-अनुप्रासधिया गौडैस्तविष्टम् इत्यंशेन। वैदर्भास्तु शैथिल्यरहितं शिलिष्ट बन्धगौरवादांद्रियमाणा: श्लेषमुदाहरन्ति, माततीदाम लह्वितं भ्रमरैरिति। अ्रत्र संयुक्तमहाप्राणवर्णविन्यासात् शैथिल्यं नास्ति। ततथ्वास्पृष्टशैथिल्यतया भवतीदं श्लेषोदाहरणमिति बोष्यम्॥। ४४ ॥ हिन्दी-इससे पूर्वकी कारिकामें श्ळेवगुणके निर्वचनप्रसङ्में शिथिलताका लक्षण-उदाहरण बताबा गया है, यह शियिलता गौड़ कोगोंको पसन्द है क्योंकि गौड़ लोग अनुप्रासके प्रेमी होते हैं। वैद्म लोगोंको वह शिथिलता मली नहीं लगती, अतः शियिलतारहित वर्णविन्यास- फिक-श्लेषगुणयुक्त-बन्धगौरवके कारण उन्हें अधिक प्रिय होता है। श्लेषका उदाहरण- 'माकती दाम कडितं अ्रमरैः। इस वाक्यमें संयुक्त महाप्राणवर्णबादुश्य है, अतः यह इलेषगुण- युक है॥ ४४ ॥ प्रसादवत् प्रसिद्धार्थमिन्दोरिन्दीवरधुति। लक्ष्म लक्ष्मीं तनोतीति प्रतीतिसुभगं वचः ॥। ४५॥ प्रसादं नाम गुणं लक्षयति-प्रसादेति। प्रसिद्धार्थम् उभयार्थकशब्दस्याप्रसिद्धेडयें प्रयोगे सति निहतार्थतारूपो दोष आपतेत्तद्वारणाय यत्र प्रसिद्धाथकपदप्रयोग:, तादृर्शं प्रसिद्धार्थमू, अत एव च प्रतीतिसुभगं बोधसुन्दरम् अधिकपदत्वकष्टत्वादिदोषपरिहारेण झटित्यर्थोपस्थापकं वचः प्रसादवत् प्रसादाख्यगुणोपेतम्, यथा-इन्दोरिति। इन्दोः चन्द्रमसः इन्दीवरद्युतिनीलकमलाभम् श्यामम् लक्ष्म कलकुः लक्षमी तनोति शोभां विस्तारयति। अ्त्रेन्दीवरादयः शब्दाः प्रसिद्धष्वर्थेषु प्रयुक्ततया श्रुतिमात्रेणार्थबोधकाः अत्रत्यमुदाहरणं कालिदासीयं-'मलिनमपि हिमांशोर्लक्ष्म लक्ष्मी तनोती'ति पर्दयं स्फुट- मनुहरतीति विद्वांसो विभावयन्तु ॥ ४ ५ ॥ हिन्दी-जिस वाक्यमें ऐसे शब्दोंका प्रयोग किया गया हो जो सुनते ही अपना अर्थ प्रकट कर दें, वेसा वाक्य प्रसादगुण युक्त माना जाता है। अतः प्रसाद गुण का लक्षण यह है- 'प्रसिद्धार्थकपदप्रयोगेणार्थप्रतीतौ चेतः सन्तोषापादको गुणः प्रसादः। उदाहरण-'इन्दोरिन्दी- बरकुति क्ष्म लक्ष्मी तनोति' इस वाक्यके सभी शब्द शोघ्र अर्थप्रतीति करानेमें समर्थ है, क्योंकि इनमें कहीं भी निह्तार्थत्वादि दोष नहीं है। प्रसादगुणका लक्षण भरतने यह कहा है- भवानुक्तो पुमेयंत्र शब्दादर्थ: प्रतीयते। सुखशम्दार्थसंयोगाव प्रसाद: परिकीर्श्यते'। उदाहरण दिया ह- यस्यादुरतिगम्मीरजळदप्रतिमं गरम्। स वः करोतु निस्सङ्मुदयं प्रति मङ्गलम्'॥ बानने प्रसादगुणमें शिथिकता तथा ओजका मिश्रण माना है, और कक्षण यह कहा है- 'शकयत्वमोजसा युक्त प्रसादं च प्रचक्षते'। उदाहरण दिया है- 'कुसमशयनं न प्रत्यग्रं न चन्द्रमरीचयो न च मळयर्जं सर्वाज्ीर्ण न वा मणियष्टयः॥ यहाँ एक सन्देह होता है कि जैसे विरुद्ध-धर्म तेज-तिमिरका एक स्थानमें समावेश नहीं होता है उसी प्रकार शिषिलता और ओज इन दो विरद्ध वर्मोंका एक वाक्यमें समावेश् किस प्रकार हो सकेगा? इसका उत्तर बामनने यह दिया है कि जैसे करण रसके नाटकोंको देखनेसे डन बवा हस दोनोंक् उदब एक साथ होता है, यहाँ पर वि्यससदुःशोमयसामानाविकरण्य

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प्रथम: परिच्छेद: ४१

होता है, उसी प्रकार प्रसादमें शिधिकता तथा ओज इन दोनों विरुद् वस्तुओोंका एकाभिकरण्य मान किया बायगा। उनका वचन है- करुणपरेक्षणीयेषु सम्परवः सुखदुःखयोः । यथाऽनुमवतः सिद्धस्तथेवौबःप्रसादयोः॥ मोबराजने प्रसाद के कक्षण उदाहरण इस प्रकार बताये हैं :- लक्षण-'प्रसिद्धार्थपदत्वं यव स प्रसादो निगयते'। उदाहरण-'गाहन्ता महिषा निपानसलिलं शरज्ैमुंहुस्ताडितम्'। काव्य प्रकाशकारने प्रसादके लक्षण उदाहरण यों कहे हैं :- लक्षण - 'श्रुतिमात्रेण शब्दात्तु येनार्थप्रत्ययो मवेद्। साधारणः समग्राणां स प्रसादो गुणो मतः'॥ उदाहरण- 'परिम्लानं पीनस्तनजघनसक्गादुमयतः स्तनोमध्यस्यान्तः परिमिलनमप्राप्य हरितम्। इदं व्यस्तन्यासं अथभुजलताक्षेपवकनैः कृशानया: सन्तापं वदति विसिनीपत्रशयनम्'॥ वाग्भट-'झटित्यर्थापकरवं यत प्रसत्तिः सोच्यते युधेः'। विश्वनायने-'चित्तं व्याप्नोति यः क्षिप्रं शुष्केन्धनमिवानलः। स प्रसाद: समस्तेषु रसेषु रचनास्ष च'।। यथा-'सूचोमुखेन सकृदेव कृतव्रणस्खवं मुक्ताकलाप लठसि स्तनयोः प्रियायाः। बाणैः स्मरस्य शतशो विनिकृत्तमर्मा स्वप्नेऽपि ता कथमहं न विलोकयामि'। यह कक्षण-उदाहरण दिया है। पण्डितराज जगननाथने प्रसादका लक्षण-उदाहरण इस प्रकार लिखा है :- लक्षण-'गाढत्वशैथित्याभ्यां व्युस्क्रमेण मिश्रणं बन्धस्य प्रसादः॥ उदाहरण-'कि बुमस्तव बीरता वयममी यस्मिन् घराखण्डल, कीडाकुण्डलितमु शोणनयने दोर्मण्डलं पश्यति॥। माणिक्यावलिकान्तिदन्तुर तरभूंषासहस्त्रोत्करै-

उपर्युक्त प्रसाद शब्दगुण है। अर्थगुण प्रसाद भी कुछ आचार्योंने माना है। ग्युत्पन्नमिति गौडीयैर्नातिरूढमपीष्यते। यर्थानत्यर्जुनाव्जन्मसरक्षाङ्को वलक्षगुः ॥४६॥ गौडानामत्रप्रसादे नात्यादरस्ते हि तदभावेऽपि काव्यत्वमातिष्ठन्ते, तदाह-व्युत्प- श्रमिति। गौडीयेः गौडदेशवासिभिः नातिरूढम् अनतिप्रसिद्धम् अपि निहृतार्थतादिदोष- युक्तमपि व्युत्पन्नम व्युत्पत्तियुतम् अवयवार्थयुक्क्म् इति हेतोः इष्यते काव्यत्वेन स्वीक्रियते, एतद्वाक्यं प्रसादगुणविरहितमतो न काव्यमिति गौडा न मन्यन्ते, ते हि बन्धगाढ़त्वसद्भावे प्रसादराहित्येऽपि काव्यत्वमभ्युपगच्छन्तीति भावः। तदुदाहरति-अनत्यरजुनेति। अनत्यर्जुनम् अनतिधवलम् नीलं यदब्जन्मकमलं तेन सदृक्ष: समः अद्टः कलङ्को यस्य तादृशः नीलकमलोपमकलक्कधारी वलक्षगुः शुभ्रकरश्न्द्रो भातीति शेषः । अ्र्रत्रार्जुनशब्द: कार्त्तवीर्यतृतीयपाण्डवयो: प्रसिद्ध:, श्वेते तु निहतार्थ:, अब्जन्मशब्द: कमलार्थेऽवाचकः, उपमागभबहुब्रोहिणैव तदर्थबोधसंभवात् सदशशब्दोऽ्रधिकपदतादोषदुष्टः, श्रुतिकटुब,

१. रदमितीष्यते। ९. अनम्वर्जुंन।

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काव्यादर्श:

वलक्षगुशन्दोऽप्रयुक्ततादोषयुतः एवंविधबहुदोषयुक्तापीयं रचना व्युत्पन्ना अवयवार्थादिना अर्थबोधिकेति गौडास्तामाद्रियन्त इत्यर्थः । इत्थमत्र विचार्यते, प्रसादाभावेऽपि काव्य- त्वमिति गौडा बाढमाद्रियन्ताम्, परं सदोषाणामपि तैः काव्यत्वे स्वीक्रियमाणे रीतिप्रवा- होच्छेदः स्यादत एतादृशीयमाचार्यदण्डिन उक्तिस्तदधिक्षेपमात्रदृष्टयति। उक्तं च प्रेमचन्द्रमहाशयेन-'वस्तुतस्तु वैदर्भपक्षपातितयेव मुक्तं अ्रन्थकृता, गौडानामपि दोषा- जीकारादिति ॥४६ ।। हिन्दी-प्रसाद गुणका स्वरूप इससे पहलेवाली कारिकामें बताया गया है, उसी प्रसङ्गमें गौड़सम्प्रथयका मत इस कारिकामें प्रद्शित किया जा रहा है। गौड़ लोग 'नातिरूढम्-अनति- प्रसिद्धम् नेयार्थत्वादिदोषयुतम् आप'-जिसमें नेयार्थत्वादि दोष हो, ऐसे काव्यको भी व्युरपन्न- योगाथंघटित-किसा प्रकारसे स्वार्थबोधक होनेके कारण काव्य मानते हैं। उनके मतमें नेयार्थत्वादि गेष के सद्भावर्में-प्रसाद के अमात में भी यौगिकार्थके निकलते रहनेके कारण काव्यत्व अव्याइत रहता है, जैसे-अनत्यर्जुनाजन्म। इत्यादि। इस पद्याशमें अनत्यर्जुन-अनतिधवल, नील, अब्जन्म-कमल के समान कलकगधारी श्यामलक्रमलोपमकलक्कशाली-वलक्षगुंः-शुभ्रांशु चन्द्रमा इम तरह अर्जुन पद कार्त्तवीय तथा पाण्डवमें प्रसिद्धार्थ है और श्वेनमें निर्तार्थ है, अब्जन्म पद कमल अर्थमें अप्रसिद्ध है. उपमागर्भ बहुब्रीहिसे ही काम चल जाना, अनः सदृक्ष पद अिक है, श्रुतिकद्ठ भी है, वलक्षणुः पद अप्रयुक्ततादोषयुक्त है, इस तरह नाना दोषयुक्त होने पर भी गौड़ लोग इसे योगार्थघटित होनेके कारण काव्य मानने है। उनके सम्प्रदायमें प्रसादके होने न होनेका को महत्व नहीं है। बन्की गाढ़तामात्रसे काव्यत्व अबाधित हाना चाहिये। आचार्य दण्डीन स्वयं वैदर्भमार्गपक्षपानी होनेके कारण गौड़ोंको इम कारिकामें निन्दित किया है। वस्तुतः गौड़लोग मी दोषका आदर करके काव्यत्वके पक्षपाती नहीं हुआ कर ते, उनके मतमें प्रसादका होना अनिवार्य नहीं है, परन्तु इससे दोषका स्वीकार किया जाना नहीं सिद्ध होता, आचार्य दण्डीने गौडोंको नीचा दिखानेके लिए प्रौढिवाद के रूपमें ऐसा कह दिया है॥ ४६॥ समं बन्धेष्वविषमं ते मृदुस्फुटमध्यमाः। बन्धा मृदुस्फुटोन्मिश्रवर्णविन्यासयोनयः।।४७।। अथावसरप्राप्तां समता लक्षयति-सममिति। बन्धेषु काव्यसङ्घटनामु अविषमम् अविभिन्नम्, यादशो बन्धः प्रारम्भे तादृश एव बन्धो यत्रोपसंहारे तादृशं वाक्यम् समम् समतानामकगुणोपेतमिति यावत्। एवश् येन बन्धेनोपक्रम्यते तेनैव बन्धेन समापनं समतेति पर्यवस्यति। तेषां बन्धानां भेदानाह-त इति। ते बन्धाः मृदुः कोमल:, स्फुटो विकटः, मध्यमः तदुभयमिश्रः. तदेवं त्रिविधो बन्धः, तेषां स्वरूपमभिधातुमुपक्रमते- बन्धा इति। मृदुवर्णविन्यासयोनिर्मृदुः, स्फुटवर्णविन्यासयोनि: स्फुटः, मिश्रवर्णविन्यास- योनिश्व मिश्रः, मृदवो वर्णाः हस्वस्वरवर्गान्त्यदन्त्यव्यञजनरूपाः, स्फुटा विकटा वर्णा दीर्घ- स्वर्रोष्ठयठडशपसहाः, एषां मिश्रणे मिश्रा मध्यमाः, एषां विन्यासो योनि: कारणं येषां ते तथोक्ताः। अत्र वर्णशब्दोऽसमासदीर्घसमासमध्यमसमासानामप्युपलक्षकः, एवच त्रिविधवर्णसमासघटितानां बन्धानां त्रैविध्यात् तदुद्भाविता समताऽपि त्रिविधा, तत्र मृदुतायोनिं समतामुदाहरति-

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प्रथम: परिच्छेद: ४३

विकटतायोनिं समतामुदाहरति-

द्राक् पर्यस्तकपालसंपुटमिलद्ब्रह्माण्डभाण्डोदर- भ्राम्यत्पिण्डितचण्डिमा कथमहो नाद्यापि विश्राम्यति। मिश्रवर्णयोनिं समतामुदाहरति- 'मधुरया मधुबोधितमाधवीमधुसमृद्धिसमेधितमेधया। मधुकराङनया मुहुरुन्मदध्वनिभृता निभृताक्षरमुज्जगे'॥ एवञ्च वर्णानां समासानां च त्रैविध्येन प्रबन्धत्रैविध्यम्, मृदुस्फुटमध्यमाभिधम्, तत्र मृदुतायोनिषु वैदर्भी रीतिः, विकटताख्यस्फुटतायोनिषु गौडीरीतिः, मिश्रतायोनिषु च पाञ्चालीतिं फलति॥४७॥ हिन्दी-समता नामक गुणकी परिभाषा बताते हैं-समम्-काव्यसङ्टटनाको जिस नरहके बन्धसे प्रारम्म करें उसी तरहके बन्धसे यदि समाप्त करें तब समता नामक गुण होना है, बन्ध तीन प्रकारके है-मृदु, स्फुट (विकट) एवं मिश्र, इनमें मृदुबन्ध उसे कहते हैं जिसमें मृदुवर्णविन्यास हो, मृदुवर्श है-हस्व स्वर, वर्गके अन्त्याक्षर एवं दन्त्य व्यअ्ञन। स्फुटवर्णविन्यासवाले बन्घको स्फुट या विकट विन्यास कहते हैं, सफुटवर्ण हैं-दीर्घस्वर, ओष्ठयवर्ण एवं ठडशषसह। इन दोनोंके मिश्रित वविन्यासको मिश्रवर्ण कहने हैं। यहाँ पर मृदु, स्फुट, मिश्रवर्ण-विन्यासमे क्रमशः असमास, दोघसमास एवं अत्पसमासका मी उपलक्षण जानना चाहिये। इस प्रकार त्रिविधवर्णविन्यास एवं समाससे उद्दावित होनेवाली समता मी तीन तरह की होगी। यही तीन तरहको समता क्रमशः वैदर्भी, गौड़ी एवं पाञ्चाली रीतियोंका कारण बनती है। इनके उदाहरण ऊपर दिये जा चुर्क है।। ४७।। कोकिलाSSलापवाचालो मामैति मलयानिलः। उच्छलच्छीकराच्छाच्छनिर्झराम्भ:कणोक्षितः ।।४८।। मलयमारतः । पूर्वोक्तस्वरूपायाः समताया उदाहरणत्रयं दर्शयति-कोकिलालापेति। कोकिला- नाम् आलापो मधुरध्वनिस्तेन वाचाल: स शब्द: मलयमारुतो मामू इति मदभिमुखम् आगच्छति, अत्र मृदुबन्धेन प्रारब्धस्य सन्दर्भस्य तेनैव बन्धेन समापनान्मृदुबन्धात्मिका समता। उच्छलदिति। उच्छलन्तः उत्सर्पन्तो ये शीकराः जलबिन्दवस्तैरच्छाच्छम् अतिनिर्मलं यन्निर्झराम्भ: तस्य कणैबिन्दुभिरुक्षितः सिक्त, अत्रापि मलयमारुतो मामेतीति सम्बन्धनीयम्। अत्र विकटात्मकस्फुट बन्धेनोपकान्तस्य सन्दर्भस्य तेनैव समापनात्स्फुट- बन्धविषया समता मध्यमसमतामुदाहरति-चन्दनेति। चन्दनप्रणयेन चन्दनकानन- संसर्गेण उदन्धिः उद्तसौरभः मन्दः अनत्युल्वणः मलयमारुतः 'मामेति' इति क्रिययाऽन्वयः । अत्र प्रारम्भे स्फुटो बन्धश्रमे च मृदुरिति मिश्रबन्धता॥४८ ॥। हिन्दी-समता नामक गुणके तीनों प्रभेदोंके उदाहरण बताते है-कोकिकेति। कोयलोंकी कूकसे मुखरित मलयानिक मुझे छू रहा है।2 इस पद्यार्थभागमें मृदुबन्धसे प्रारम्भ किये 2. प्रमतो।

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४४ काव्यादर्श:

गये अर्थको उसी बन्धसे समाप्त किया गया है, अतः मृदु समता है। उच्छरूदिति। उछलनेवाले जलकणोंसे रमणीय दोखनेवाले निझरजलसे सिक्त यह मलयमारुत मेरी तरफ आा रहा है। यहाँ पर विकटात्मक स्फुटबन्धसे उपक्ान्त सन्दभ उसी बन्बसे समाप्त किया गया है, भतः यह स्फुट समताका उदाहरण है। चन्द्रनेति०। चन्दन बनके सम्पकसे सुगन्धिपूर्ण तथा धीरे बहनेवाला मलयमारत हमारी ओर आ रहा है इस पर्याशमें मिश्रसमता है क्योंकि स्फुटबन्बसे प्रारम्भ कर के मृदुबन्धसे समाप्त किया गया है। इस प्रकार आचार्य दण्डीने समताके तीन भेद बताये हैं। आचार्य भरतने समनाकी परिभाषा यह कही है- 'नातिचूर्णपदेर्युक्ता न च व्यर्थामिधायिभिः। न दुर्वोवा तैश्व कृना समरवातसमता मता'॥ तथाच-परस्परविभूषणो गुणग्रामः समतेति लक्षणं फलति। इसका उदाहरण दिया है- 'स्मरनवनदीपूरेणोढा मुद्गुंरुसेतुभियंदपि विधृना दुःखं तिष्ठन्त्यपूर्णमनोरयाः। तदपि लिखितप्रख्येरः परस्परमुन्मुखाः नयननलिनीनालानीतं पिर्वान्त इसं प्रियाः॥ बामनके मतर्में 'मार्गाभेद: समता' यही लक्षण है। उदाहरणमें दिया है- 'अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाभिरायः। पूर्वापरौ तोयनिषी वगाह स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः ॥ भोजराजने समताका लक्षण कहा है- 'यन्मृदुपरस्फुटोन्मिशवर्णबन्धविधि प्रति। अवैषम्येण भणनं समता साडभिषीय ते।' उदाहरण-'यच्चन्द्रकोटिकरकोरकभारभाजि बभ्राम वक्रुणि जटापटले हरस्य। तद्: पुनावु हिमशैलशिलानिकुअ्जझक्टारडम्बरविरावि सुरापगाम्मः॥ अविषमबन्धरवं समतेति बाग्मटः, उदाहरण :- 'मसृगचरणपातं गम्यरता भूः सदर्भा विरचय सिचयान्तं मूग्नि धर्मः कठोरः। तदिति जनकपुत्रो लोचनैरश्पूर्णैः पथि पथिकवधूभिवीक्षिता शिक्षिता च'। पण्डितराज जगननाथने समता के लक्षण-उदाहरण इस प्रकार बताये है- लक्षण-'प्रक्रमभग्गेन अर्थघटनातमकमवैषम्यं समता'। उदाहरण- 'इरिः पिता इरिर्माता हरिर्यरता इरि: सुहृद। हरि सर्वंत्र पश्यामि हरेन्यन्न माति मे'। आचार्य मम्मटने-समताके विषयमें अपनी राय यह प्रकट की है कि समता जहाँपर मार्गामेशस्वरूप है वहाँ तो वह गुणके दोष हो हो जानी है, हॉँ, जहाँपर वह मार्गामेइस्वरूपाति रिक्तस्वरूप है, वहाँपर उसको प्रबन्धानुसार माधुर्योजःप्रसादन्यतमान्तर्भून मान लिया जायगा, उनका वचन परवर्ती कतिपय आचार्योंने मो माना, तदनुसार विशवनाथ तथा हेमचन्द्रने भी समताको पृथक् गुण नहीं माना, विश्वनाथने लिखा है- 'कचिदोषस्तु समता मार्गामेदस्वरूपिणी। अन्यथोक्तगुगेष्वस्या अन्तःपातो यथायथम्॥४८॥ स्पर्धते रुद्धमद्धैर्यो वरामीमुखानिलैः॥४९॥ इत्यनालोच्य वैषम्यमर्थालक्कारडम्बरौ। अंपेक्षमाणा वतृधे पौरस्त्या काव्यपद्धतिः॥५०॥ रुद्धमद्धैर्य इति। रुद्धमपसारितं मम धैये गभीरत्वं येन तादृशः (मळयमारुतः) बररामाणां पध्मिनीनां रमणीनां मुखानिलै: मुरभिमुखपवनैः स्पर्द्धते, मदीयस्य धैर्यस्य लोपकरो दक्षिणानिल: पध्मिनीनायिकामुखपवनेन समं सौरभे स्पर्द्वत इत्यर्थ इति अत्रोदा-

१. रामानना । २. हम्बरम्। ₹. अवेश्य, अवेक्ष।

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प्रथम: परिच्छेद:

हरणे 'स्पर्धते रुद्धमद्धैर्यः' इत्यंशे स्फुटो विकटो बन्धः, 'वररामामुखानिलः' इत्यंशे मृदु: तदेवम् वैषम्यम् मृदुस्फुटयोर्बन्धयोविंषमताम् अनालोच्य अविचार्य अरयस्य अत्युक्तिरूपस्य अलङ्कारस्य वर्णानुप्रासस्य च डम्बरी उत्कर्षो अपेक्षमाणा काडक्षन्ती पौरस्त्या गौडीया काव्यपद्धतिः पद्यरचनासरणिः वधृधे। अयमाशयः-गौडाः कवयः केवलानुप्रासप्रवणमतयः मृदुस्फुटरचनाशालितया विषमगुणामपि रचनां बहाद्रियन्ते, काव्यत्वेन च स्वीकुवन्ति, वैदर्भास्तु अर्थाशे दत्तदष्टयोऽनुप्रासं च न बहुमन्यमाना विषमे पूर्वोक्तसदृशे प्रबन्धे नादरं पुष्णन्ति इदमेव वैषम्यं बोधयितुमयं प्रन्थः ॥ ४९-५०॥ हिन्दी-'स्पर्द्धते रुद्मदैयः' इस अंशमें विकटबन्ध है, और 'वररामामुखानिलैः' इस अंशर्मे मृदुबन्ध है, इस प्रकार इस पद्यार्थेमें दोनों बन्धोंको एकमें समाविष्ट कर दिया गया है, यह दोनों बन्ध एक दूसरेके विरुद्ध हैं परन्तु गौड़ीरीतिके प्रवर्सक गौड़देशवासी आचार्यगण इस वेषम्यकी चिन्ता नहीं करते, वह केवल अर्थ तथा अलक्ारपर दृष्टि रखते है, उनके विचारमें इस पद्यार्धमें यदि अत्युक्तिरूप चमत्कारी अर्थ तथा अनुप्रासरूप सब्दालद्दार विद्यमान है, तो इसे काव्य कहनेमें कुछ आपत्ति नहीं होनी चाहिये। इसा तरडकी विचारणाराको पृष्ठभूमिमें रखकर गौड़ीरीतिकी काव्यसरिता प्रवाहित होती रही है। इस स्थलमें गौडीय सम्प्रदाय तथा वैदर्भीय सम्प्रदायका अन्तर ध्यानमें दिलवानेका प्रयास किया गया है, गौड़ सम्प्रदायके प्रवत्तकगण इस बातकी चिन्ता नहीं रखते कि बन्धवैषम्य होगा, उन्हें विरुद्ध विषम बन्धवाली कवितामें भी यदि अतिशयोक्तिरूप आर्थिक चमस्कार और अनुप्रासरूप शाब्दिक चमत्कार मिल जाय तो उसका आदर वह अवश्य करेंगे, परन्तु वैदभ लोग, जो अनुपासको कविताका प्राण नहीं मानते, बन्धविषमता स्थलमें काव्यत्वको स्वीकार करनेमें सहमत नहीं होते॥ ४९-५० ॥ मधुरं रसवद् वाचि वस्तुन्यपि रसस्थितिः। येन माधन्ति धीमन्तो मधुनेव मधुमताः॥५१॥ माधुरय नाम गुणं लक्षयति-मधुरमिति। रसवत् सरसं वाक्यम् मधुरम् माधुर्या- ख्यगुणशालि, एतेन रसो माधुर्यमिति तयोरभेद: पर्यवस्यति, माधुर्य नाम गुणः, गुणा- स्तावच्छन्दार्थनिष्ठतया साक्षात् परम्परया वा रसोपकारकाः समभ्युपगता, न तु रसा- भिन्नता गुणानां तत्कथमत्र माधुर्यगुणस्य रसात्मकत्वमुच्यते, तत्राह-वाचीति। वाचि शब्दे वस्तुनि अर्थे चापि रसस्थितिः व्यञ्जकतया संबन्धः, तेन वाक्यस्य रसव्यञ्जकवर्ण- रचनाशालित्वं रसव्यञ्जकार्थयुक्तत्वं वा माधुर्यमिति सिद्धम्। ननु रसस्वरूपमेव न श्ञायते, तत्कथं प्रागुक्तं माधुर्यलक्षणमवगच्छेमेत्यत्राह-येनेति। यथा मधुव्रता भ्रमरा मधुना पुष्परसेन माद्यन्ति आह्लादमनुभवन्ति, तथा येन वस्तुना धीमन्तो बुद्धिमन्तः सहृदया मादन्ति स रस: काव्यार्थानुशीलनजन्मा चमत्कारापरपर्यायो लोकोत्तराह्वाद एव रसः, एवं च यस्य काव्यस्यासकृत्परिशीलनेऽपि सहृदया न वैरस्यमासादयन्ति, तत् मधुरं काव्यम्, इति स्वयमुलेयस्वरूपं माधुर्य सिद्धथति॥५१॥ हिन्दी-रसबत वाक्यको मधुर कहा जाता है, फलतः रस तथा माधुयं एक वस्तु है। गुणको आचार्योंने साक्षाद परम्परया वा रसका उपकारक माना है, तब यहाँपर माचुर्य नामक गुणको रसस्वरूप कैसे कहा जाता है इसी प्रश्नका उत्तर देनेके किये-'वाचि वस्तुन्यपि रस- स्थिमि: यह अंत कहा है। श्ष्द तथा अर्थ दोनोंमें व्यख्नकतया रस रहता है, तब रस व्यचक

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४६ काव्यादर्श:

वर्णरचनाशाकित्व या रसव्यअकार्थशालित्व, यही माधुर्यंका लक्षण सिद्ध होगा। रसका स्वरूप बताने के लिये एक उपमा प्रस्तुत की गई है-'येन माधन्ति षीमन्तो मधुनेव मपुव्रताः' अरिगण जैसे पुष्पासवसे मत्त हा उठते हैं, उसी तरह जिस शब्दार्थजन्य आहादातिरेकसे सहदयगण आनन्दित हो, मत्त हो उठे, उसे ही रस कहा जाता है। इस प्रकार माधुर्यंको रसस्थानीय मानकर लुक्षणोदाहरण प्रस्तुत किया गया है। भामहने माधुर्यका लक्षण इस प्रकार कहा है :- 'श्रव्यं नातिसमस्तार्थ काव्यं मपुरमिष्यते'। भरतने- 'बदुशो यच्तुतं काव्यमुक्तं वापि पुनः पुनः। नोद्वेजयति तस्माद्ि तन्मापुर्यमुदाहतम्'। यह लक्षण कहा है, परन्तु काव्यप्रकाशकार प्रभृति इस तरहके लक्षणोंका विरोध करते हैं, उन लोगोंने स्पष्ट कहा है- 'ओोजःप्रसादयोरपि श्रग्यत्वान्नतल्क्षणं निर्दोषम्'। आचार्य वामनने-शब्दगत माधुर्यंका लक्षण इस प्रकार बताया है- 'यापृथकूपदता वाक्ये तन्माधुर्यमिति स्मृतम्'। इसका उदाहरण दिया है- 'स्थिता: क्षणं पक्ष्मसु ताडिताधराः पयोषरोरसेनिपातचूणिताः। वलाषु तस्या: स्खलिता: प्रपेदिरे चिरेण नाभि प्रथमोदविन्दवः ।। परन्तु वामनका यह लक्षण सक्गत नहीं है, क्योंकि समासस्थलमें भी माधुर्यका स्वाद मिलता हैं, अतः पृथक्पदत्वको माधुर्य कहना ठीक नहीं है, देखिये- 'अनवरतनयनजललवनिपतनपरि मुषितपत्र ले खान्तम् । करतकनिषण्णमवले वदनमिदं किन्न तापयति'।। इस श्लोकमें समासबादुल्य हानेपर भो माधुयं स्पष्ट है। काव्यप्रकाशकारने- 'आह्लादकत्वं माधुये शरङ्गारे द्रुतिकारणम्। करुणे विप्रलम्भे त्छान्ते चातिशयान्वितम्'। इस प्रकार अपना मत प्रकट किया है। आचार्य वाग्भटने भा- 'यत्र आनन्दमन्दं मनो द्रवति तन्माधुर्य, तथ् रसभेदेन विविषम्'। ऐसा कहकर उनके ही पदाक्कोंका अनुसरण किया है। दर्पणकारने कहा है-'चित्तद्रवीभावमयो ह्रादो माधुर्यमुच्यते'। पण्डितराजने भर्थगत माधुर्यका लक्षण या उदाहरण इस प्रकार बताया है- लक्षण-'एकस्या एवोक्तेर्भकयन्तरेण पुनःकथनात्मकमुक्तिवेचित्र्यं माधुर्यम्'। उदाहरण- 'विषतां निःसक्कूं निरवधिसमाषि विविरहो सुखं शेषे शेतां हरिरविरतं नृत्यतु हरः। कृतं प्रायश्चित्तेरलमय तपोदानयजनैः सवित्री कामानां यदि जगति जागति भवती॥ इस प्रकार भिन्न-मिन्न आचार्योंने अपने-अपने मत व्यक्त किये हैं॥५१॥ यया कंयाचिच्छुत्या यत्समानमनुभूयते। तद्रूपों हि पदासत्ति: सानुपरासा रसावहा ।। ५२॥ 'माधुर्यलक्षण निरुच्यमाने वाचि रसस्थितिः' इत्युक्त्या विशिष्टवर्णविन्यासस्य रस- व्यअकत्वमुक्त्म्, तत्र वैदर्भाभिमतं श्रुत्यनुप्रासं निरूपयति यया कयाचिदिति। यया २. तुद्रपादि ।

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प्रथम: परिच्छेद:

कयाचित् कण्ठ्यया तालव्ययाऽन्यया वा श्रुत्या उच्चारगोन यत् समानम् पूर्वोच्चारितव- रणसदृशम् अनुभुयते आस्वाद्यते तद्रूपा तादृशसादृश्यकरी पदासत्तिः अव्यवहितपदप्रयोगः सानुप्रासा श्रुत्यनुप्रासयुता (अतश्च) रसावहा रसपुष्टिकरी। एवश्च कण्ठतान्वाद्यनेक- स्थानोच्चार्यतया व्यञ्जनानां सादश्यं श्रुत्यनुप्रास इति फलितम्। अलङ्कारस्यास्यात्र निरू- पणं वैदर्भगोडसम्प्रदायभेद कथनप्रस्गातः कृतम्। तदग्रे वच््यति-'काश्चिन्मार्गविभागार्थ- मुक्ता: प्रागप्यलडक्रियाः॥५२॥। हिन्दी-इससे पहली कारिकामें 'वाचिरसस्थितिः' कहकर बताया गया था कि रसकी व्यजनामें विशिष्टवर्णविन्यासको साधन माना जाता है। इस कारिका में उसी सम्बन्धमें बताना है कि वैदर्भमार्गानुगामी विद्वद्धण जिस श्रुत्यनुप्रासको रसव्यञ्जक मानते हैं उसका क्या स्वरूप है। जिस पदसमुदायमें समानकण्ठादिस्थानजन्य वर्णोंकी अव्यवधानेन श्रुतिउच्चारण किया गया रो, उसको श्रुत्यनुप्रासयुक्त कहते हैं, वैसा पदसमुदाय रसव्यक्षक होता है। मोजराजने श्रुत्यनुप्रामकी बड़ी प्रशंसा की है- 'आवृत्तिर्या तु वर्णाना नातिदूरान्तर स्थिता। अलक्कारः स विद्वद्भिरनुप्रामः प्रदर्श्यते॥ प्रयेण श्रुत्यनुप्रासस्तेष्वनुप्रासनायकः । सनाथव हि वैदभी भाति तेन विचित्रिता'॥ 'यथा ज्योत्स्ना शरच्चन्द्रं यथा लावण्यमङ्गनाम् । अनुप्रासस्तथा काव्यमलकुत्तमिह क्षमः' ॥ यद्यपि यह प्रकरण अलक्कारनिरूपणका नहीं था, अलक्कारोंका निरूपण अन्यत्र किया जायगा, तथापि वैद्भगौड़मार्गभेदप्रदर्शनार्थ प्रसङ्गतः यहाँ श्रुत्यनुप्रासका लक्षण-उदाहरण बता दिये गये हैं। इसीलिए आगे चलकर कहा गया है कि-'काश्चिन्मार्गवि भागार्थमुक्ताः प्रागप्य लबुक्रियाः ।। ५२।। एष राजा यदा लक्ष्मीं प्राप्तवान् ब्राह्मणप्रियः । तदा प्रभृति धर्मस्य लोकेऽस्मिन्तुत्सवोऽभवत्॥ ५३॥ एष ब्राह्मणप्रियः दानादिना विप्रप्रींतिकरो राजा यदा लक्ष्मीं प्राप्तवान शासनाधि- रूटः सन्समृद्गश्रीकोऽभवत्, तदाप्रभृति ततः कालात् अस्मिन लोके धर्मस्य उन्सवः उत्कर्षः अर्प्रभवत्। अरस्मिन् राजनि सति धमः समेधमानोऽभूदिन्यर्थः । अरप्रश्रेष राजत्यंशे षकाररेफी मूर्दधन्यौ, जकारयकारो च राजापनेत्यत्र तालव्यो, यदा लक्षमीम् इन्यत्र दकारलकारी दन्त्यौ, एवम् अपरात्रापि ते ते वर्णाः समानस्थानीया इति स्थानसाम्या- चछ्रुत्यनुप्रासः, तदुक्तं साहित्यदर्पण- 'उच्चार्यत्वाद्यदैकत्र स्थाने तालुरदादिके। सादृश्यं व्यञ्जनस्येष श्रुत्यनुप्रास उच्यते'॥ हिन्दी-यह ब्राह्मणप्रिय राजा जबसे शासनाधिरूढ़ दुआ है, तबसे धर्मकी अधिकाधिक उन्नति होने लग गई है, यही उदाहरणार्थ है। इस उदाहरणमें स्थानसाम्यवाले वर्णोंका विन्यास शुत्यनुप्रासप्रयोजक है॥ ५३॥। इतीदं नाष्टतं गौडेरतुप्रासस्तु तत्प्रियः । अनुप्रासादपि प्रायो वैदर्भैरिदमिष्यते ।।५४॥। इति एवंभुतम् पूर्वप्रदर्शितप्रकारं रचनावस्तु श्रुत्यनुप्रासयुतं काव्यं गौडैः पौरस्यैः नादृतम् माधुयेगुणशालितया नाभ्युपगतम् समानश्रुतिवर्णानां रसोपकारकचमत्कारशून्यतया

१. राम्यं। २. ततः । १. उद्ूरः। ४. ईप्सितम्, भावुतम् ।

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काव्यादर्श:

नायमलक्कारोऽतोऽत्र सत्यपि माधुर्य नाम गुणो नोपपद्यत इति गौडानामाशयः। गौडाः श्रुत्यनुप्रास नाद्रियन्ते, किन्तु अनुप्रासः वर्णावृत्तिरनुप्रास इति वक्त्यमाणलक्षणः तत्प्रियः गौडानां हृदयप्मः, ते हि सदशवर्णोच्चारणजां चमत्कृतिं रसावहां मन्यन्ते। वैदर्भास्तु अनुप्रासादपि श्रुत्यनुप्रासमधिकमाद्रियन्ते, तदाह-अनुप्रासादपि इति। 'तस्य तदेव हि मधुरं यस्य मनो यत्र संलग्नम्' इति दिशा गौडवैदर्भाणामत्र रुचिभेद एव निबन्धर्न, न त्वस्य क्षोदक्षमं किमपि तत्वमिति भावः ॥५४॥ हिन्दी-इस श्ुत्यनुप्रासको गौड़ लोग अभिक महश्व नहीं देते हैं, उनके मतमें समानस्थान जन्य वर्णोंके सन्निवेशविशेषसे रसोपकारक चमरकृति नहीं उत्पन्न होती, अतः श्ुत्यनुप्रास होनेसे माधुयं नामक गुण नहीं होता है, उनके मतमें वर्णावृत्तिरूप अनुप्रास अभिक रसावह- रसव्यञ्ञक होता है, अत्ः वे अनुप्रासस्थलमें ही माधुयंगुण मानते हैं। ठीक इसके विपरीत वैदर्भसम्प्रदायवाले आचार्य अनुप्राससे मी अधिक मुत्यनुप्रासका बदर करते हैं, यह तो रचिमेद का स्थान है, इसमें कुछ युक्ति तो दी जाती नहीं है॥ ५४ ॥ वर्णावृत्तिरतुप्रास: पादेशु च पदेषु । पूर्वानुभवसंस्कारबोघिनी यद्यदूरता ॥५५॥ पादेषु श्लोकचतुर्थभागेषु पदेषु सुपतिउन्तरूपेषु च वर्णावृत्तिः वर्णस्य वर्णयोः वर्णा- नाम् वा आवृत्ति: पुनःपुनरुच्चारणम् अनुप्रासः पुनःपुनरुच्चारणजन्या वर्णानां साम्य- प्रतीतिरनुप्रासः, तदुक्तं प्रकाशकृता-'वर्णसाम्यमनुप्रासः' अ्रत्र वर्णपदं व्यञ्ञनपरकम् केवलस्वराणामावृत्तौ चमत्कारविरहात्। सादृश्यस्य भेदगरभतया वर्णेषचारणकालसम्बन्ध कृतो भेदो बोध्य:। वर्णावृत्तिश्व समीपस्यैव चमत्कारिणी भवति, न दूरस्थति बोधयितु माह-पूर्वेति। पूर्वस्य पूर्वोच्चारणविषयस्य वर्णस्य योऽनुभवः श्रावणप्रत्यक्षम् तज्जनित यः संस्कारो भावनाविशेषस्तस्य बोधिनी उद्धोधकरी अदूरता द्वितीयवर्णादीनां निकट स्थिति: यदि स्यात्। चमत्कारजननी एव सादृश्यप्रतीतिर्वर्णावृत्तिरूपालङ्कारस्तत्र साद श्यप्रतीतिद्वित्रिवर्णमात्रव्यवधानं सहते, नाधिकवर्णव्यवधानम्, इति भावः। अस्यानुप्राससत भेदा: काव्यप्रकाशादिप्रन्थतोऽवसेयाः॥।५५।। हिन्दी-वर्ण-व्यअ्ञक भक्षरोंकी आवृत्िसमानश्रुतिको अनुप्रासे नामक अलकार कहते ै यह पाद तथा पदमें होता है, काव्यप्रकाशमें, 'वर्णसाम्यमनुप्रासः' यही कक्षण दिया गया है सादृश्य भेदगभं होता है, अतः एक ही वर्णके आवृत्तिस्थकमें उन व्णोंमें उननारण-काळ-भेद- भेद मानकर सादृश्य माना जाता है। आवृत्ति समीपस्थ रहने पर ही चमत्कारकारिणी होर है। अतः द्वित्निवृर्णव्यवधानसे अधिक व्यवधान रहनेपर अनुप्रास नहीं मानते। इसी वातव बतानेके लिये-'पूर्वानुभवसंस्कारयोषिनी यधदूरता' कहा गया है। यदि समकुति उच्चारणवा वर्णोकी दूरता इतनी अधिक न हो जिससे पूर्वोक्चारित वर्णशावणप्रत्यक्षपात संस्कार समाप्त । जाय। इसका स्पषट आशप यह हे कि अमी जिस व्यजनका उच्चारण किया गया, उसके सुनने बात संस्कार जबतक मिटा नहीं है, तमी तक यदि दूसरा तत्सम वर्ण हमारित किया जाय, त अनुप्रासनामक अलक्ार होता है।। ५५ ॥ चन्द्रे शरमिशोसंसे कुन्दस्तवकविभ्रमे। इन्द्रनीलनिमं लक्ष्म संद्धात्यतिनं: भियम्॥५६॥ 2. मत्रिमे। १. अनिरः।

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प्रथम: परिचछेद: ४६

कुनदस्तबकवित्रमे कुन्दनामकपुष्पगुच्छवत्सन्दरे शरनिशोत्तंसे शारदरात्रिभूषणायमाने चन्द्रे इन्द्रनीलनिरभ श्यामलं लक्ष्म कलङ्गः अलिनः त्रमरस्य श्रियम् शोभाम् सन्दधाति उत्पादयति, इन्द्रनीलमणिसमानकान्ति: (श्यामः) शशिनः कलक्ग: स्वच्छतया कुन्दपु- प्पानुहारिणि चन्द्रमसि भ्रमर इव भासते इत्यर्थः । अत्र चतुष्वपि पादेषु 'चन्द्र' 'इन्द्र' 'कुन्द' 'सन्द' इत्यंशेषु नकारदकाररेफाण नकारदकारयोर्वाऽडवृत्ति: कृतेति पादगतोऽ- यमनुप्रासः। स चायमनुप्रासः स्ववण्यश्भ्गारविभावभूतं चन्द्रमुपस्कुर्वाणः शद्गारं पुष्णाति, इत्यर्थनिष्टं माधुर्य बोध्यम् ॥५६ ॥ हिन्दी-शरत्कालकी रातके अलक्कारस्वरूप तथा कुन्दपुष्पके गुच्छकी तरह दीखनेवाले धवल चन्द्रबिम्बमें वत्तमान इंद्रनीलसमानवर्ण कलडूका धम्ना भ्रमरकी शोभा धारण करता है। शरत्कालके चुले हुए आकाशमें चमकता हुआ चन्द्रमा कुनदस्तबककी तरह प्रतीत होता है और उसमें वत्तंमान कलकू भ्रमरकी शोभा धारण करता है। इस फोकमें चारों चरणोंमें चन्द्र, इन्द्र, कुंद, सन्द्र, आदि पदोंमें नकार, दकार, रेफ तथा नकार-दकारकी आवृत्ति होनेसे पादगत अनुप्रास है॥ ५६ ॥ चारु चान्द्रमसं भीरु बिम्बं पश्यैतद्म्बरे। मम्मनो मन्मथाक्रान्तं निर्दयं हन्तुमुद्यतम्॥५७॥ हे भीरू भयभीतनयने ! चारु त्वदीयचिन्तनरसक्षालितम् मन्मनः मम चित्तम् निर्दयं यथा तथा क्रूरतापूर्वकम् हन्तुम् प्रहर्तुम् एतत् चान्द्रमसम् ऐन्दवम् बिम्बम् अम्बरे व्योमनि पश्य अवलोकय। कस्यचित्कामुकस्य कुपितां नायिकां प्रत्युक्तिरियम्। अत्र चतुर्षु पादेषु प्रथमे 'चारु-चन्द्र-भीर' इति पदेषु 'चा' 'रु'वर्णयोरावृत्या वृत्त्यनुप्रासः, द्वितीये पादे मकारवकारयोः संयुक्तयोरावृत्तिरिति च वृत्यनुप्रासः, स च पदगतः। पूर्वत्रोदाहरणे पादे पादे तेषामावृत्तिरत्र तु पदे पदे इति तथा॥५७ ॥ हिन्दी-हे मयग्रस्तनेत्रे वाले, तुम्हारी चिन्ता करनेके कारण नितान्त पवित्र इस हमारे हृदयको निदयतापूर्वक सतानेको उद्यत यह आकाशस्थित चन्द्रबिम्ब देखो। मैं तुम्हारे लिये चिन्तित हूँ, चन्द्रमा इमको सता रहा है, इसपर ध्यान दो। इस कोकमें प्रथम पादमें चारु चान्द्रमस पदोंमें 'चा' एवं 'चारु मीर' पदोंमें 'रु'का अनुप्रास है, वह पदगत है, अतः यह पदगत पृभ्यनापरसका उदाइरण हुआ॥ ५७ ॥ इत्यनुप्रासमिच्छन्ति नातिदूराम्तरश्षुतिम्। न तु रामामुखाम्भोजसहँशश्नद्रमा इति ॥५८ ॥ अनुप्रासलक्षणे पूर्व निरुच्यमाने-'पूर्वानुभवसंस्कारबोघिनी यद्यदूरता' इत्युक्कं सम्प्रति तदेव प्रत्युदाहरणप्रदर्शनविधया प्रपश्यति-इत्यनुभ्रासमिति। इति एवंप्रकारक नाति- दूरान्तरश्रुतिम् नातिविलम्बेनोच्ार्यमाणसदृदशवर्णम् (यावता पूर्वानुभूतवर्णजनितः संस्कारी न निवर्सते तावदत्रानतिदूरम्) अनुप्रासम् इच्छन्ति, न तु अतिदूरान्तरश्रुतिम, तावता विलम्बेनोचारणे पूर्वानुभवजातस्य संस्कारस्य विलोपात्। तदेवोदाहरति-न त्विति अत्र रामापदगतमाशब्दश्रवणजः संस्कारथन्द्रमाःपदघटकमाशब्दश्रवणपर्यम्तं नावतिष्ठते

4 १. कर्तम्। २. स्थितिम्। १. सदृक्ष।

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४० काव्यादर्श:

दूरत्वात्, अत ईदर्श दूरान्तरश्रुतिम् अनुप्रासं नेच्छन्ति ॥४८॥ हिन्दी-अनुपरासलक्षणमें कहा गया था-'पूर्वानुभवसस्कारबोधिनी यद्यदूरता', अर्थाद अनुप्रास वहीं पर माना जाता ह जहाँ पर प्रथमोक्वारित वर्णजन्य संस्कार तत्सदृश दूसरे वर्णके उभ्वारणतक बना रहे। तमी समानश्ुतिक वर्णोंके बच्चारणसे अनुप्रास होता है, फलतः 'रामामुखाम्मोजसटटशश्च न्द्रमा:' इस पद्यार्थमें 'रामा' पद के 'मा' का संस्कार 'चन्द्रमा'पदगत 'मा' के उस्चारणकाल तक नहीं रह पाता है अतः यहाँ पर अनुप्रास नामक अलक्ार नहीं हुआ। अतिदूरान्तर श्षुति होने के कारण यह अनुप्रास नहीं है॥ ५८ ॥ स्मर: खरः खल: कान्त: काय: कोपश्च नः कुशाः। च्युतो मानोधिको रागो मोहो जातोऽसवो गवाः ॥ ५९॥ इत्यादि बन्धपारुष्यं शैथिल्यं च नियच्छति। अतो नैवमनुप्रासं दाक्षिणात्या: प्रयुखते॥ ६० ॥ अलक्कारशास्त्रे प्रस्थानद्वयमेकं वैदर्भाणामपरख गौडानां तयोराधे बन्धपारुष्यशैथिल्ययोः सद्भावे सत्यपि समानवर्णोभ्बारण न तत्तदलक्वारस्वीकारः, गौडानां मते तु सतोरपि बन्धपारुष्यशैथिल्ययोः केवलं समानश्रुतिवर्णोच्चारणे भवन्त्यल्वाराः, तदेतन्मतवैषम्यं स्पष्टयति कयुत इत्यादिना कारिकाद्वयेन। स्मरः कामः खरः तीच्णः, कान्तः प्रियतमः खलः निष्ठुरः, नः अस्माकम् कायः शरीरम् कोप: कान्तविषयः परस्तीसंगादिजन्मा क्रोधश् कृशः क्षीण:, मानः स्वीयगौरवरिरक्षिषा च्युतः गलितः, रागः संभोगाभिलाषोऽधिक: समुत्कटः, मोहः चित्तवैक्लव्यम् जातः प्रादुर्भूतः, असवः प्राणा गताः। अत्र प्रथमचरणे रेफखकारयोः द्वितीये पादे ककाराणां चावृश्या वृत्यनुप्रासः, तृतीयचतुर्थपादयोर्दन्त्यवर्णानां निवेशात् श्रुत्यनुप्रासः। प्रथमार्धे विसर्गबाहुल्यात् पारथ्यं द्वितीयार्धे संयुक्तवर्णविरंहकृतं शैथि- ल्यम्। अ्त्र वृत्त्यनुप्रासश्रुत्यनुप्रासयो: पारुष्यशैथित्यदोनग्रस्तत्वान्नेमौ अलक्कारतां प्राप्तुतः। अतश्राभ्यां विप्रलम्भशद्वारस्यानुपकृतत्वान्नात्र माधुर्यगुणः। तदेतत्कण्ठत आरह-इत्या- दीति। इत्यादि पूर्वोक्तम् उदाहरणद्वयम् (आद्यपादयोबन्धपारुध्यम् अन्त्यपादयोः शैथिल्यं च) नियच्छति समर्पयति, विसर्गबाहुल्यादाद्यपादयोः पारुष्यम्, तदुक्तम्-'अनु- स्वारविसगौं तु पारुष्याय निरन्तरौ' इति। अन्तिमपादयोस्तु संयुक्तवर्णाभावात् शैथिल्यम्। ईदृशं सदोषमलक्कारं दाक्षिणात्या नाद्रियन्ते-गौडास्तु केवलमनुप्रासलुब्धाः सदोषमपि तभज्ीकुर्वन्तीति भावः ॥५९-६० ॥. हिन्दी-इस मकटार में दोष के रहने पर क्या होगा, अलक्ार माना जायगा या नहीं? इसी प्रश्नका उत्तर इन दो कारिकाओंमें दिया गया है। कुछ आचार्य इस प्रकारके सदोष स्वकमें अलदार मानते हैं, उन्हें अलक्वार-लोम है, कुछ लोग रसानुपकारकत्रया इन सदोष अकद्टारों को अलक्कारताविरहित समझते हैं। 'स्मरः खरः' इस शोकके प्रथम दो चरणोंमें विसरगंबाहुश्य होनेसे बन्पारुव्य है, क्योंकि रीतिशाखयोंने कहा है-'अनुस्वारविसगौं तु पारष्याय निरन्तरो। इसा प्रकार उत्तराषमें संयुक्त वर्णके नहीं होनेसे शैविश्य दोष है। इस प्रकार सदोष इन अळटारोंका बादर दक्षिणास्य-वेद्भ लोग नहीं करते। गौड़ कोग इसका भी भवर करते है। ५९-६०॥

१. रोगो। २. निगच्छति।

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प्रथम: परिच्छेद: x१

आवृरति वर्णसङ्गातगोचर्रा कवयो विदु:। तचु नैकान्तमधुरमतः पश्चाद्विधास्यते।६१॥ यथा वर्णावृत्तिरूपोऽनुप्रासो रसपोषकमावुर्यगुणशाली मन्यते तथा पदाजडातिरुपं यम क्मपि तथा मन्यते न वेत्यपेक्षायामाह-आवृत्तिमिति। वर्णसङ्गातगोबरां पूर्वोक्कन- र्णसमुदायविषयाम् आवृत्तिम् भूयो भूय उच्चारणं-यथानुरपूर्वीकाणां स्वरव्यज्ञनसमुदायानाम् असकृदुपादानं यमकं नामालक्कारमालङ्ारिका आहु:, तदुकं प्रकाशकृता 'सत्ममें पृथगर्षायाः स्वरव्यज्ञनसंहते: । क्रमेण तेनैवाषृत्तिर्यमक विनिगद्यते' इति। अनुप्रासे बहूनां कचिदेकस्य- रसहितस्य व्यजनस्यावृत्ति:, यम के तु स्वरसहितानां व्यजनानां कमेण तेन तयेवानुपूर्ण्याद- त्तिर्भवतीत्युभयोर्भेद:। तत् यमकं तु नै कान्तमधुरं नात्यन्तमनोहरम्, अतः पथात् माधुयगु- णनिरूपणानन्तरं शब्दालक्कारप्रस्तावे विधास्यते। अनुप्रासे-अपसारय बनसारं कुरु हारं दूर एव किं वलयैः इत्यादौ यादृशी चारुता न तादृशी यमके-'नवपलाशपलाशवर्न पुरः' इत्यादौ। अपि च वर्णसङ्गातावृत्तौ अर्थावगम: क्लेशेन भवति, न तथाऽनुप्रास इत्य- नुप्रासापेक्षयाऽत्र माधुर्यस्य न्यूनत्वं बोध्यम्॥ ६१॥ हिन्दी-वर्णावृत्तिरूप अनुप्रास रसपोषक माधुर्यंशाली माना जाता है, उसी तरह पदावृतिरूप यमक भी माधुर्यंशाली माना जाय, इस प्रसङ्ग में निषेषात्मक उत्तर देते है-आवृत्तिमिति। वर्णसङ्घातको आवृत्तिको यमक माना जाता है, वह अतिशय मधुर नहीं होता, अतः उसका साङगोपाद् विवेचन माधुर्यंगुणनिरूपणके बाद शब्दालक्टारनिरूपण-प्रसन्गमें किया बायगा। दण्डीके मतमें अनुप्रास और यमकमें अनुप्रास अधिक रसमाधुर्यपोषक होता है, यमक उतना रसपोषक नहीं होता, जैसे विजातोय पुष्पसशीणं पुष्पमाला अधिक रमणीय होती है, तदपेक्षया एकप्रकारक पुष्पमाला कम रमणीय होती है। अनुप्रासस्थरमें मध्य-मध्यमें मिन्न-मिन्न वर्णोंके समाबेशके हो जानेसे उसका चमत्कार बढ़ जाता है, जैसे-'अपसारय घनसारं कुर हारं दूर एव किं बलयैः' इत्यादि स्थलमें। यमकस्थलमें एक प्रकारसे वर्णसङ्कातकी आवृत्ति हुई रहती है वह उतना आकर्षक नहीं होतो, जैसे-'नवपलाशपलाशवनं पुरः, स्फुटपरागपरागतपङ्रुजम्' इत्यादि शोकमें ॥ ६१॥ कामं सर्वोडप्यलङ्कारो रसमर्थे निश्श्चितुं। तथाप्यग्राम्यतैवैन भारं वहति भूयसा ॥ ६२ ॥ 'मधुरं रसवद् वाचि वस्तुन्यपि रसस्थितिः इत्युद्देशवाक्ये वस्तुनि-अर्थे रसस्थि- तिरुका, तेनार्थगतं माधुर्य निदिहं, तदिदानी, प्रपथ्यति-काममिति। सर्वः प्रर्बत्र- कारक: शब्दगतोऽर्यगतस्तदुभयगतशालङ्कारः। कामं यथायोगमर्ये वाच्यलत्ष्यव्य्यात्मके वस्तुनि रसं चमत्कारविशेषं निषिश्वतु उपपादयतु, काममर्थास्तैस्तैरलद्ठार रसपुष्टिमासा- दयन्तु, परन्तु तथापि तत्तदलङ्काराणां रसोपकारकत्वे सत्यपि अभ्राम्यता हालिकादिव्य- वहारविमुखता विदग्धजनव्यवहारः भूयसा प्राधान्येन बाहुल्येन इमं रसोद्वोधकतालक्षणं भारं वहति। अयमाशय :- यद्यप्यलक्वाराणामस्ति रसपोषकत्वं तथापि प्राम्यतारहितेष्वेव स्थलेषु ते रसपोषकतां विश्रति, न प्राम्येषु अभ्राम्यव्यवहारसमृद्धान्येव वाक्यानि प्राधान्येन रसं पुष्णन्तीति भावः ॥। ६२॥ १. आधृतिमेव संघात। २. निविश्वति। १. एवं।

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X२ काव्यादशे:

हिन्दी-इससे पहले माधुयंगुण के निरूपण-प्रारम्भमें 'मधुरं रसवद्वाचि वस्तुन्यपि रसस्थिति:' यह कहकर वाध्यकक्ष्यव्यम्यार्मक अर्थमें रसस्थिति कही गई थो, फलतः अर्थगत माधुर्यकी स्वीकृतिकी ओर इद्वित मिलता है, उसी अर्थमाधुयंका विशद स्वरूप इस कारिका द्वारा बताते हैं। इसका अर्थ यह है कि मके ही सभी प्रकार के अलक्ठारगण (शब्दार्थ तदुभयगतं तततदलक्कार) अर्थमें रसका निषेक (आषान) करें, परन्तु बाहुश्येन प्रायः करके अर्थमें रसनिषेकका मार बग्राम्यता ही ढोती है। सात्पर्य यह है कि यद्यपि अलद्वारोंके कारण मी अर्थ रसोद्वोथक होते है, परन्तु बाडुल्येन वही अर्थ रसोदोष-समर्थ होते हैं जिनमें ग्राम्यता नामक दोषका विरह-अग्राम्यता हो। काव्यके हृदय- रूप विदग्ण व्यवहारके हो जानेपर अलक्कारोंकी जरूरत नहीं रह जाती। ऐसा देखा जाता है कि निरककठार शष्दार्थमें मी रसपोषकता है। इस कोकमें प्रतियोगिविधया निर्दिष्ट ग्राम्यता पद अकीलता आादिका भी उपलक्षक है। इस कारिकामें 'भूयसा' कहकर आचार्यने सक्ृत किया है कि कहीं-कहीं भाम्यता और अश्ठीकता मी दोषस्वरूप नहीं होती। इसी बातको ध्यानमें रखकर विश्वनापने कहा है-'सुरतारम्मगोष्ठ्यादावकोलरवं गुणो भवेव'। इस प्रसङ्गमें यह भी जानना आवश्यक है कि भाग्यता कई सरइसे होती है, जैसे अवेदग्ध्यग्र।म्यत्व- 'स्वपिति यावदयं निकटे जनः स्वपिति तावदह किमपैति ते। इति निगब शनैरनुमेखलं मम करं स्वकरेण ररोध सा'।

'मह्मवर्योपतप्तोडएं त्वं च क्षीणा बुसुक्षया। भद्रे मजस्त मां तूर्ण तव दास्याम्यहं पणम्'॥६२॥ कन्ये कामयमानं मां ने त्वं कामयसे कथम्। इति प्राम्योऽयमर्थात्मा वैरस्यायं प्रकल्पते॥ ६३॥ कामं कन्दर्पचाण्डालो मयि वामाक्षि निर्दयः। त्वयि निर्मत्सरो दिष्टयेत्यग्राम्योऽर्थो रसावह्यः॥ ६४।। भभ्राम्यताऽर्थगर्त माधुर्य भूयसा सृजतीत्युक्तं, तत्रप्राम्गतास्वरूपबोधनाय तदपेक्षितां प्राम्यतां प्रथममुदाहरति-कन्ये इति। हे कन्ये, कामयमानं रतये समुत्कण्ठमानं मां त्वं कथ न कामयसे, अत्र कन्यापदं दुहितृपरतया प्रसिद्धमिति प्रथममेवानुचितप्रयुक्त्या वैरस्यमावहति एवमेवात्रत्यः सर्वोऽप्यर्थो विस्पष्टमभिधीयमानतया सभ्यानां लज्जामुत्पादयन् रसास्वादवैमुख्यननकः । अतश्वेदशोऽर्यः सर्वथाऽनादरणीयः । अत्र यद्यपि शज्गारानुकूलयोः ककारमकारयोरावृत्या वृत्यानुप्रासी वर्तत इति शक्यते कथयितुं तथापि नासावनुप्रासो वर्ज्यमपि प्राम्यार्थेन निकृष्टीभवन्तं शरभ्ञारं प्रभवत्युपकर्तुम। अतोऽत्र प्राम्यतादोषसद्धावो माधुर्यमपनयति तदेवं भ्राम्यतामुदाहृत्य तद्विरुद्धस्वभावामभ्राम्यतामाह-काममिति। हे वामाक्षि रमणीयायतलोचने, कन्दर्पचाण्डाल: क्रूरप्रहारी कामः मयि निर्दयः अतिरुष्टतया नितान्तकुपितः, दिष्य्या भाग्येन त्वयि निर्मत्सरः अपगतरोषः इति एतादृशः अभ्ाम्यः विदग्धजनव्यवहारविषयोऽर्थः रसावहः रसव्यअ्ञकतया माधुर्यगुणोपेत इत्यर्थः। श्रनेनाग्राम्ये- णार्थेन विप्रलम्भ: पुष्यते ॥ ६३-६४॥ हिन्दी-हे कन्ये, मैं कामसे पीढ़ित हूँ, तुम मुझे क्यों नहीं चाहती हो ? इसमें जो ग्रम्प- असभ्यजनव्यवहारय-अर्थ प्रयुक्त हुआ है वह ओताके हृदयमें वैरस्य-विमुसताको उत्पन्न करता है। इस फोकमें स्वप्रथम 'कन्या' पद आया है, जो कढ़कोके लिये प्रयुक्त होता है, इसके

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प्रथम: परिचछेद:

प्रयोगसे बड़ी विरसता आ गई है। इसी प्रकार इसमें प्रयुक्त अर्थ सुछकर किये गये रति-निवेदनके कारण विदग्ध जनोंके हृदयोंमें लज्जाकी उत्पत्ति करता हुआ विरसता उत्पन्न करता है, अतः यह ग्राम्य है। इसी अर्थको यदि सम्यजनव्यवहाय भाषामें कहेंगे, तब वह अग्राम्य होगा, तथा उससे रसकी पुष्टि होगी, इसका उदाहरण दिया है-कामम् हत्यादि। दे सुन्दर नयनोंवाळी रमणी, कन्दप चाण्डाल मेरे ऊपर निदय है, परन्तु माग्यवश वह तुम्हारे विषयमें उतना अधिक कुपित नहीं है। कामदेवके निदय प्रहारोंसे मैं जर्जर हो रहा हूँ, परन्तु तुम नहीं, इस तरह कहे गये इस अथमें सभ्यजनव्यवहाय अर्थका प्रयोग हुआ है, जो विप्रलम्म शरृ्गारकी पुष्टि करता है। इसमें यही अर्थ है जो पूर्वोक्त ग्राम्यतोदाहरणवाले पद्यमें है, परन्तु अपने-अपने कथनप्रकारसे मिन्न तरहके कार्य करता है॥ ६३-६४॥ शब्देऽपि ग्राम्यताऽस्त्येव सा सभ्येतरकीर्सनाद्। यथा यकारादिपदं रत्युत्लवनिरूपणे ॥ ६५॥ पद्सन्धानवृश्या वा वाक्यार्थत्वेन वा पुनः। दुष्प्रतीतिकरं आ्रम्यं यथा यो भवतः प्रिया॥६६॥ माधुर्यप्रतिबन्धकमर्थगतं प्राम्यत्वमुक्तं, सम्प्रति शब्दगतं तननिरूपयति-शष्देऽपि इति। सभ्येतरस्य असभ्यस्य सभायामुच्चारणायोग्यस्य शब्दस्य कोर्तेनात. उभ्चारणात् शब्देऽपि प्राम्यता नाम दोष: अस्त्येव, यथा रत्युत्सवनिरूपणे रतिक्रीडाप्रसज्े यकारादि 'याभ'पदम्। 'यभ्' मैथुने इत्यतो धातोर्निष्पन्नं याभपर्द नितान्तग्राम्यं, तद्धि श्रवण- समकालमेव वैरस्यं समापादयद् ग्राम्यम्। सुरतनिधुवनादिपदानि रत्यर्थकान्येव सन्त्यपि प्राम्यतां न स्पृशन्ति, तदर्थकमेव च याभपदमश्लीलं ग्राम्यं च भवतीति शब्दस्वभावः । अयं च नार्थगतः किन्तु शब्दगतो दोष इति बोभ्यम्। सोयं आ्रम्यतादोषो विशिष्टपद- निष्ठः केवलं विशिष्टपद एव नायम्, पदानां साननिध्यविशेषेण वाक्यार्थविशेषेण चापी- दमीयः प्रतिभासः, तदाह-पदसन्धानेति। पदानां सन्धानेन सन्धिना वृत्या सत्तया पदानां परस्परसन्धौ सति प्राम्यतोदयते, यथा-'चलं डामरचेष्टितम्' इत्यत्र सन्धौ सति लण्डापदम्, अत्र पदसन्धानेनासभ्यार्थत्वम्। एवमस्योदाहरणं कारिकागतं याभवतः प्रिया 'या भवतः' इति विच्छिय पाठे न भ्राम्यतयाऽश्लीलत्वं, तस्यैव 'याभवतः' इति पदसन्धानेन पाठे याभवतः सततमैथुनानुरकतस्य भवतः प्रिया सततसुरतप्रदानेन प्रीण यित्रीत्यर्थेनासभ्यत्वम्॥६५-६६॥ हिन्दी-माधुर्यंप्रतिबन्धक अर्थगत आ्रग्यत्वका स्वरूप पहछे बताया गया है, इन दो कारिकाओों द्वारा शब्दगत ग्राम्यरवका स्वरूप बताया जाता है। सम्येतर-असम्य समामें उ्चरणके अयोग्य अर्थके कीर्त्तन-अभिधानसे शब्दमें भी असभ्यताकी प्रतीति होती है, जैसे यकारादि 'बन्' धातुनिष्पन्न पदोंके उच्चारणसे। यह शब्दगत आ्भ्यता दो प्रकारसे समन है-पदसन्वानपृति एवं वाक्यार्थंतया दुष्प्रतीतिकर। पदसन्धान वृत्िसे मतलब यह है कि पदोंके समोपल्व होनेसे जो असम्य हो जाय, जैसे-या, भवतः ये दो पद अलग-अलग रहनेपर ग्रम्य नहीं है, परन्त हन्हीं दोनों पदोंको यदि सन्निधानवृत्ति समीपस्थता सन्यि हो जय तब, 'यामवतः' हो जानेसे सततमैथुनानुरक्त रूप अर्थ होने लगता है जो नितान्त ग्राम्य है। इस कारिकामें दो प्रकारसे आ्यताका संभय होना कहा है, पदसन्धानवृत्ति तथा वाक्यार्थत्य। उसमें पदसन्नानपुचिका १. पदसंवात। २. वा।

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x8 काव्यादर्श:

उवाहरण 'बामवसः प्रिया' कहा गया है। वाक्यार्थर्वेन दुष्प्रतीतिकररूप आम्यत्वका उदाहरण उ्कर कारिकामें।। १५-१६।। चरं प्रहत्य विभान्त: पुरुषो वीर्यवानिति। एवमादि न शंसन्ति मार्गयोरुभयोरपि॥ ६७ ।। बीर्यवान् पराक्रमशाली पुरुषो दाशरथी रामः खरं तन्नामकं दैत्यमेदं प्रहृत्य हत्वा विश्रान्तो विश्रमं प्राप्तः। एषः प्राकरणिकोऽर्थः प्रथमं प्रतीयते, पश्चात्-वीर्यवान् गादशुक्र: पुरुषः कशन कामुकः खरं गाढं प्रहृत्य मदनध्वजेन मदनमन्दिरं ताडयित्वा विश्रान्तः ग्लानि प्राप्त इत्यसभ्योऽर्थः प्रतीयते। एवं वाक्यार्थगताश्लीलदोषेण दुष्टत्वाभ्ात्र- माधुयम् ॥।६७।। हिन्दी-'भगवान् रामने सर नामक दानवको मार करके विश्राम लिया', यह इस म्दाहरणनाक्यका प्रधान अर्थ है, परन्तु प्रधान अर्थकी प्रतीतिके पश्चात यह भी अर्थ प्रतीत होता है कि बीर्यवान् किसी युवा कामुकने मदनध्वम द्वारा कामशालोक्त भगताद़न कर के विश्राम किया, इस अर्थमें असम्यता है, इस तरहके अर्थकी प्रशंसा न वैदर्भेमार्गमें है न गौड़मा्गमें। दोनों सम्मदापके आचार्य इंस आ्म्यस्वदोषको देय मानते हैं॥ ६७ ॥ भगिनीभयवत्यादि सर्वत्रैवानुमन्यते। विभक्मिति माधुर्यमुध्यते सुकुमारता ॥ ६८ ॥ भगिनीभगवत्यादि पदं योनिलिम्ादिग्राम्यार्थप्रतिपादकशब्दघटितमपि सर्वत्रव गौळवैदर्भमार्गयो: सर्वविधेषु काव्येषु च अनुमन्यते निर्दुष्टतया शिष्टः स्वीकियते। एषां शिष्टपरिगृहीतानां भगिनीभगवतीशिवलिन्जविश्वयोनिप्रभृतिशब्दानां प्रयोगः सर्वत्र व्यवहारे काव्येषु वैदर्भ्यादिषु रीतिषु च अनुमन्यते निर्दोषतया स्वीक्रियते। तथा चोकं भोजराजेन- 'प्राम्यं घृणवदश्लीलामझ्लाथे यदीरितम्। तत्संवीतेषु गुप्तेषु लक्षितेषु न दुष्यति'॥ 'संचीतस्य हि लोकेऽस्मिन न दोषान्वेषणं क्षमंम् । शिवलिज्गस्य संस्थाने कस्यासभ्यत्वभावना'। तदेवं माधुय नाम गुणः सप्रपश्यमुपदर्शितः, सम्प्रति क्रमप्राप्तां सुकुमारता निरूपयितु- झुपक्रमते, तदाह-उच्यते सुकुमारतेति ॥६८॥ हिन्दी-माम्यता-अकीकताके वर्णनप्रसङ्गमें कुछ अपवादस्थल बतानेके लिये यह कारिका किसी गई हैं। मगिनी, मगवती, विशवयोनि, शिवकिद् आदि पद कोकम्यवहार, काव्य, बैदभी आादि रीतियाँ, सभी बगड निर्दोष माने बाते हैं, उनके प्रयोगमें कुछ मी बाषा नहीं है। मोज- राबने इस प्रसनमें असभ्यार्थक शब्द-समुदायके निर्दोष होनेके तोन प्रभेद बताये हैं- 'वत्संवीतेयु गुप्तेपु कक्षितेषु न दुष्यति'। संबीतसे अभिप्राय है अपुष्तया स्वीकृतसे। अपुट्तया बह्ीइतका हो संगीत कहते हैं। इसका बदाहरण- 'सस्मे हिमाद्रे: प्रयर्ता तनूवां यतात्मने रोचवितुं यतस्वर। र्बोविर्स तहीयनिवेकभूमि: सेव क्षमेत्यार्मभुवोपदिट्टम्'॥ गुप्त उसको कहते है नहां प्रसिद्ध अर्थसे अप्रसिद्ध असम्य अथका गोपन हो आय, यथा- 'सदुसयया वययपि अन्मभूमि: गनैरसंवाधमयां बभूवे। स तेडनु नेय: सुभगोड्भिमानी मगिन्ययं न प्रथमामिसन्धिः॥

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प्रथम: परिचछेद:

यहाँ जन्मभूमि, संवाध, सुमग, भगिनी आदि पद अपने जन्मस्थान, संकट, सुम्दर, बहन आदि प्रसिद्ध अर्थोमें प्रयुक्त हुए है, उनके अप्रसिद्ध अर्थ योनि, जीभग आदि शुप्त हो गये है, अतः इनका प्रयोग सर्ववादिसिद्ध है। इसी तरह कक्षित होनेपर भी आ्रम्यता नहीं होती :- 'ब्झ्माण्डकारणं योडप्सु निदधे बीजमार्मनः। उपस्थानं करोम्येष तस्मै शेषादियायिने'। इस शोकमें ब्रहमाण्ड, उपस्थान शब्दोंसे यद्यपि असम्य अर्थका स्मरण हो आता है तथापि यहाँ इन पदोंकी लक्षणा अन्य अर्थोमें हो गई है, अतः इन्हें ग्राम्य नहीं माना बाता। इस प्रकार माधुर्यंका सविस्तर वर्णन गौड़वैदर्भमा्गमें यथायोग्य किया गया है। इसके बाद सुकुमारता नामक गुणका निरूपण करेंगे। सारांश यह है कि गौड़सम्प्रदायवाळे आचार्य वृश्यनु- प्रासप्रधान प्रबन्धको मधुर मानते हैं, एवं वैदर्भसम्प्रदायानुगामी आचार्यगण भुस्यनुप्रासप्रमान काव्यको मधुर कहते हैं, इस प्रकार माधुर्यं विमागदयमें अवस्थित है। उस माचुर्यका भन्त से गया, अब सुकुमारता नामक गुणका वर्णन क्रमप्राप्त होनेके कारण किया जा रहा है॥ ६८ ।। अनिष्ठुराक्षरप्रायं बन्धशैथिल्यदोषोऽपि दर्शितः सर्वकोमले ॥६९॥ अनिष्ठुराणि श्रुतिकटुत्वदोषास्पृष्टानि कोमलानि प्रायः बाहुल्येन यत्र तत् अनिष्ठुरा- क्षरप्रायम् बाहुल्येन कोमलवणघटितमिति यावत्, तादृर्श.वाक्यं सुकुमारम् इह साहित्य- शास्त्रे हुष्यते कविभिरास्थीयते। सुकुमारतयाऽभिमते काव्ये केवलं कोमला एव वर्णा: स्युर्नेदं नितान्तमपेद््यते, किन्तु भूयसा सुकुमाराण्यक्षराणि स्युरेव, केवलकोमलाक्षर- विन्यासे तु क्रियमाणे न केवलं लक्षणाव्याप्तिरेव, अपि त्वनर्थान्तरमपि स्यात्, तथाहि सति सर्वकोमले बन्धशैथिल्यदोषोऽपि प्रसज्येत-तदाह-बन्धेति। तथा चोकं शिथिलता- लक्षणप्रस्तावे-शिथिलमल्पप्राणाक्षरोत्तरम्, यथा-'मालतीमालालोलालिकलिला' इति। एवं च यत्र कोमलाक्षराणं मध्ये मध्ये परुषाक्षरविन्यासेन मुक्तामालाया अन्तरान्तरा रन्र- गुम्फनेनेव जायमानं किमपि चारुत्वं सुकुमारत्वमिति बोध्यम्। न चैवं सति प्रागुक्तस्वरूपस्य श्लेषाख्यगुणस्यास्य सुकुमारत्वस्य चैक्यापत्ति: उभयोर्लक्षणसाम्यादिति वाच्यम्, श्लेषस्य महाप्राणमिश्रिताल्पप्राणाक्षरविन्यासविशेषेण सुकुमारतायाश्वानिष्ठुराक्षरप्रायत्वेन द्वयोः परस्परभिन्नत्वात्। काव्यप्रकाशकारादयस्तु सौकुमार्य श्रुतिकटुत्वदोषाभावस्वरूपं मन्यमाना इदं पृथग गुणत्वेन नाभ्युपगच्छन्ति, एवमेव तदनुगामिनो विश्वनाथप्रभृतयः। सौकुमार्यलक्षण- प्रसजे भरत :- सुखप्रयोज्यैर्यच्छन्दर्युक्तं सुश्लिष्टसन्धिभिः। सुकुमारार्थसंयुक्तं सुकुमारं तदिष्यते॥ एतदुदाहरणं यथा- 'अज्ञानि चन्दनरजःपरिधूसराणि ताम्बूलरागसुभगोड़धरपल्लवय। अच्छाजने च नयने वसनं तनीयः कान्तासु भूषणमिदं विभवावशेषः ॥ भोजराजेन तु दण्डिन एव लक्षणोदाहरणे स्वीकृते। वामनस्तु अजरठरत्वं सौकुमार्य तथ्वापारुष्यस्वरूपं मन्यते, 'अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा' इत्यादि कालिदासीयं च पद्यं-सुकुमार बन्धमुदाहरति। १. हदोष्यते। २. दोगो हि।

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X६ काव्यादर्श:

जगलाथपण्डित राजस्तु-अकाण्डे शोकदायित्वाभावरूपमपारुष्यं सुकुमारता, यथा- 'त्वरया याति पान्योऽयं प्रियाविरहकातरः' अत्र 'प्रियामरणकातर' इति पाठे पारुष्यं तद्र- हितत्वात्सुकुमारतेति। आचार्यदण्डी सौकुमार्य शब्दगुणमभिप्रैति, परे त्विदमर्थगुणं गृणन्ति। वस्तुतस्तु अर्थसौकुमार्यस्यामन्लरूपाश्लीलताख्यदोषाभावस्वरूपत्वेन न गुणत्वं तदुक्तं दर्पणकृता-'भ्राम्यदुःश्रवतात्यागात् कान्तिक्ष सुकुमारता' इति ॥६९॥ हिन्दी-जिसमें प्रायः करके-बाडुल्येन अनिष्ठुर, श्रुतिकदत्व दोषसे रहित अक्षर हों, अर्थाद कोमळ वर्णोसे जिसका समठन किया गया हो, वैसे वाक्यको सुकुमार-अर्थाव सुकुमारता नामक गुणसे भूषित कहा जाता है। 'प्रायः' पद इस लक्षण में बड़ा उपयोगी है, उससे यह अभिप्राय निकलता है कि सुकुमार वाक्यमें यह कोई नियम नहीं है कि सभी अक्षर अकठोर ही हों, इतना अवश्य चाहिये कि बाहुश्य कोमक बर्णोंका ही हो, जैसे मुक्तामाला में यदि बोच-बीच में रल्लान्तर कगा दिये जाते हैं तो उसकी शोभा और बढ़ जाती है. उसी तरह सुकुमार वाक्योंमें बीच-बोच में एकाष परुष वर्णके हो खानेसे कोई क्षति नहीं होती, प्रत्युत लाभ ही होता है। इसी बातको बतानेके लिये उत्तरार्धमें स्पष्ट कहा गया है कि यदि सभी वर्ण कोमल हो रहेंगे, तब बम्पशैविश्यदोष उपस्थित

इस सौकुमार्य गुणको काव्यप्रकाशकार आदि परवत्तों आचार्योंने श्रुतिकटश्वरूप दोषका अमावस्वरूप मानकर इस गुणको अस्वीकृत कर दिया है। कुछ लोग सौकुमार्यको अर्थगुण भो मानते हैं, उनके मतमें अर्थगत सौकुमार्य वह है जिसमें अर्थगत पारुष्य नहीं आया हो, जैसे 'प्रियामरणंकातरः' की जगहपर 'प्रियाविरहकातरः' कहकर पारुष्य से पृथक रखा गया है। वस्तुतः यह अर्थगत सौकुमार्य गुण भी अमङलरूपाश्ीलतादोषाभावस्वरूप ही है, अतः यह भी आवश्यक नहीं माना आयगा ॥ ६९ ।। मण्डलीकृत्य बर्दाणि कण्ठैर्मघुरगीतिभि:। कलापिनः प्रनृत्यन्ति काले जीमूतमालिनि॥ ७0 ॥ पूर्वकारिकायां लक्षितस्य सुकुमारतानामकस्य गुणस्योदाहरणमुपन्यस्यति-मण्ड. लीति। जीमूतमालिनि मेघमेदुरे काले बर्हाणि स्वीयपिच्छानि मण्डलोकृत्य मण्डलाकारेण विस्तार्य मधुरगीतिभि: मधुरं शब्दायमानैः कण्ठः कलापिनो मयूराः प्रनृत्यन्ति, नृत्यमार- भन्ते, ध्वनत्सु जलधरेषु तद्ध्वनिश्रवणसन्तुष्ट मयूराः स्वोयानि पिच्छानि मण्डलाकारेण वितत्य सानन्दं नृत्यन्तीत्यर्थः । अ्त्र निष्ठुराक्षरपरित्यागात्सुकुमारतागुणः ॥७० ॥ हिन्दी-वर्षोकालके उपस्थित होनेपर मधुर शब्द करनेवाले अपने कण्ठोंसे शब्द करते हुए गीत-सा गाते हुए एवं अपनी पूँछको मण्डकाकारमें फैलाये हुए यह मयूर नृत्य करने लगते हैं। इस माक्यमे परुष वर्णका अप्रयोग है, प्रायः कोमल अक्षरोंके ही प्रयोग हो पाये हैं, अतः सुकुमारता नामक गुग माना आता है।। ७० ।। इत्यनूर्जित पवार्थो नालक्कारोऽपि ताडश:। सुकुमारतयैवैतदारोहति सर्तां मनंः ।७॥ सुककमारताख्यस्य पूर्व लक्षितस्योदाहृतस्य न गुणस्यावश्यस्वीकार्यत्वे युक्तिमुपन्य- स्यति-इत्यनूर्जित इति। इति भस्मन् पय्ये भर्थः अनूर्जितः रससम्पर्कशून्यतयानति-

१. मुखम्।

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प्रथम: परिच्छेद:

स्फुट एव अलङ्कारोऽपि न तादृशः अतिशययुतः, समासोकि: सत्यपि नातिरसस्पृक, (तथाऽपि अरथालक्कारयोरनतिप्रस्फुटत्वेऽपि) एतत्पथम् सुकुमारतयैव सौकुमार्यनामकगुण- सद्भावेनैव सतां मनः आरोहति, सद्भिरिदं यत्काव्यत्वेनाभ्युपेयते, तत्र केवलं सुकुमारता- नामकगुणसद्भाव एव कारणं, नार्थविशेष:, तस्यानूर्जितत्वात्, नाप्यलक्गारविशेष:, तस्याप्य- परिनिष्ठितत्वात्, अतश्च सौकुमार्यमवश्यं गुणत्वेनास्थेयमिति भावः॥७१॥ हिन्दी-पूर्वलक्षित एवम् उदाहृत सुकुमारता गुणके विषयमें मतभेद है, कुछ लोग इसे स्वीकार करते हैं और कुछ लोग इसको श्रुतिकद्वत्वरूपदोषाभावस्वरूप मानते हैं। मरतमुनिने सकुमारताको गुण माना है, परन्तु कुछ प्राचीन तथा तदनुवत्तीं अर्वाचोन आचार्य इसे गुण नहीं मानते, उनका कथन है कि जब तक अर्थचमत्कृति न होगी, तब तक सुकुमारताका कोई लाभ नहीं है, वह स्वतः दोषामावस्वरूप हो है, इसी मतका खण्डन इस कारिकामें किया गया है। दण्डीका कहना कि पूर्वोक्त उदाहरणशोकमें अर्थ अनूर्जित-अनतितेजस्वी है, इसी तरह अलङ्कार मी अनति- प्रस्फुट है, फिर भो यह पद्य सज्जनोंको मला लगता है, इसका एकमात्र कारण सौकुमार्य गुणका सद्भाव ही है, इस स्थितिमें सौकुमायं गुणका माना जाना उचित है। दण्डीने अलद्टारापेक्षया और अर्थापेक्षया भी गुणोंको काव्यमें प्रधान अङ्ग माना है, उनके मनमे यह बात बैठ गई थी- 'तया कवितया कि या कि वा वनितया तया। पदविन्यासमात्रेण यया नापहतं मनः'॥ दण्डोका स्पष्ट आशय मालूम पड़ग है कि गुणवैचित्यके नहीं रहनेपर अर्थ और अलक्कार रहकर भी काव्यकी शोमा नहीं बढ़ाते हैं, दण्डीको एक अच्छे समर्थक मिल गये हैं-मोजराज। उनका कथन है :- 'अलंकृतमपि श्रव्यं न काव्यं गुणवजितम्'। 'यदि भवति वचश्च्युनं गुणेभ्यो वपुरिव यौबनवन्ध्यमजनायाः । अषि जनदयितानि दुर्भगतवं नियतमलक्करणानि संश्रयन्ते'॥ जैसे किसी खोके शरीरमें सभी अककार सजा दिये गये हों परन्तु यौवन नहीं हो तो वह आकर्षक नहीं होती, उसी तरह यदि काव्यमें गुण नहीं हो, किन्तु अलक्कार हो तो वह काव्य फीका हो लगता है।। ७१ ॥। दीप्तमित्यपरर्भूम्ा कृुच्छ्रोदमपि बध्यते। न्यक्षेण क्षेपितः पक्षः क्षत्रियाणां क्षणादिति ॥७२॥ अपरैः गौडकविभि: दीप्षम् दीप्तियुतम् दीप्तिसंज्ञकौज्ज्वल्ययुक्तम् इति हेतोः कृच्छो- दयम् कष्टोच्चार्यमपि पदं बध्यते काव्ये प्रयुज्यते। शजस्विरचनानुकूलतया परुषवर्णघटितमत एव कष्टोच्चार्यमपि बध्यते गौडैः, एतदुदाहरणेन विशदीकरोति-न्यक्षेणेति। न्यक्षेण- निर्गतनेत्रेण जन्मान्धेन धृतराष्ट्रण क्षत्रियाणां समस्तराजन्यानां पक्षः समूहः क्षणेन अन्पकालेन क्षपितः विनाशितः, दुर्मन्त्रद्वारा महाभारतयुद्ध विनाशं गमित इत्यर्थः । अत्र धृतराष्ट्रस्यायुध्यमानतया न वीररसप्रसन्नः, वस्तुतस्त्वत्र करुणो रसः, तत्र चौज :- प्रधानरचनायाः अयुक्तत्वाप्त केवलमुच्चारणेनापि तु रसप्रसङ्गेनापि कृच्छ्रोयमिदं गौडा आाद्रियन्ते।। ७२॥

१. सयितः ।

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काव्यादर्श:

हिन्दी-गौड़ लोग सौकुमार्य की अपेक्षा नहीं करते, इसी बातका वर्णन सोदाहरण इस कारिकामें किया गया है। अपर-गौड़ सम्प्रदायके कविगण दीप्त-ओजोगुणयुक्त मान कर कहोषारये वर्णगुम्फित काव्यका भी निर्माण करते है। उदाहरण-न्यक्षेणेत्यादि। जन्मान्व घृष्टरा्ट्रने क्षत्रियोंके समूहको थोड़े समयमें समाप्त करवा दिया, अपने पुत्र दुर्योवनादिको ऐसी दुदुद्धि दी जिससे अन्ततः सारे क्षत्रिय कट मरे। इस पद्मार्थमें करणरस है, वीर नहीं क्योंकि धृतराष्ट्र तो युद्रत था नहीं, ऐसी झकतमें यहाँपर ऐसा कटोचार्य पढकदम्ब नहीं प्रयुक्त करना चाहिये। लेकिन गौड़ जन केवळ ओजके लोमसे ऐसा प्रयोग भी किया करते हैं।। ७२॥ अर्थव्यक्तिर नेयत्वमर्थस्य हरिणोद्धृता। भू: खुरक्षुण्णनागासग्लोहितादुद्घेरिति।।७३ ।। कमप्राप्तमर्थव्यक्तिनामकं गुणं निरूपयति-अर्थव्यक्तिरिति। अर्थस्य पदप्रतिपाद्यस्य अ्नेयत्वम् अध्याहारादिकल्पनां विनैव प्रत्येयत्वम् अर्थव्यक्तिर्नाम शब्दगुण:, अर्थात् यावन्तोडर्या अन्वयबोधौपयिकतयाऽपेच््यन्ते तद्बोधनाय तावतां पदानां विन्यासोऽर्य- व्यक्तिः, उदाहरणं यथा-हरिणा वराहरूपभृता भगवता विष्णुना खुरेण स्वशफेन क्षुण्णा: ताडिताः ये नागाः रसातलस्थाः सर्पास्तेषामसग्भिः शोणितैः लोहितात् रक्तात् उदधे: सागरात् भू: उद्धृता उपरि नीता। अत्र सागरपयोरज्जनकारणीभूतो नागासरकसम्पर्कः पृथगुक्तिमन्तरा नेयः स्यात् अतः पृथगुक्त इति नात्र नेयत्वमिति भवत्यर्थव्यक्तिः। तदनुक्ती तु नेयार्थत्वेन नार्थव्य्तिः, अभिधास्यति तदप्रेतनोदाहरणेन॥ ७३ ॥ हिन्दी-जिस वाक्यमें विवक्षित अर्थ समझनेके लिये अध्याहारादि कषट कर्पनायें नहीं करनी पढ़ें, समी शब्द वाक्याथबोधमें अपेक्षित अर्थोको स्पष्टतया बताते हों उस वाक्यमें अर्थव्यक्तिनामक गुण माना जाता है। जैसे-हरिणा इति। भगवान् विष्णु वराहावतारमें अपने खुरसे कुचले गये नागोंके शोणितसे रक्तवर्ण समुद्रके जलसे इस पृथ्वीको ऊपर ले आये अर्थाव पृथ्वीका उद्धार किया, प्ररयकालमें जलमझ हुई इस पृथ्वीको पानीसे बाहर निकाला। इसमें सागरका पानी लाल क्यों हुआ ? इसका कारण यदि नहीं कहा गया होता तो नेयार्थ हो जाता, जैसे आगे कहे गये प्रत्युदाहरणफोक-'मही महावराहेण लोहितादुद्धृतोदपेः' में सागरके लाल होनेमें कारण नहीं कहनेसे नेयार्थ हो गया है। यह अर्थव्यक्ति शब्दगुण है ऐेसा दण्डीका मत है, इस अर्थव्यक्ति नामक शब्दगुणका लक्षण अन्यान्य आचार्योंके अनुसार इस प्रकार है :- भरत- 'सप्रसिद्धा धातुना तु लोककर्मव्यवस्थिता। या क्रिया क्रिय ते काव्यें सार्थव्यक्ति: प्रकीततिंता'॥ भोजराज-'यत्र संपूर्णवाक्यत्वमर्थव्यक्ति वदन्ति ताम्'॥ यथा- 'वागर्थाबिव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपतये। अगतः पितरौ बन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ'॥ वाग्मट-'यत्र सुखेनार्थंप्रतीतिः सार्थम्यक्तिः'। यया- वाले तिलकलेखेयं माळे मिल्ीव राजते। मळताचापमाकृष्य न विश्: कं हनिष्यति'। रपण्डितराज जगनाय- सटिति प्रतीयमानार्थान्वयकत्वमर्थव्यक्ति:, इति सब्दगताडर्यग्यक्ति:, अर्थी स्वर्थव्यत्ति :- वर्णनीय स्वासाधारणक्रियारूपयोवर्णनमर्थव्यक्ति:। काव्यप्रकाशकारने इस अर्थका स्वमापोक्तिमें

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प्रथम: परिच्छेद:

अन्तर्भाव माना है। उनका कहना है-'अमिषास्यमानस्वभावोक्त्यकक्टारेण वस्तुस्वभावसफुट- स्वरूपार्थव्यकि: स्वीक्कता'। साहित्यद पंणकार ने अर्थव्यक्तिका अन्तर्भाव प्रसाद गुणमें किया है। कहा है :- 'अर्थव्यक्तेः प्रसादाख्यगुणेनैव परिग्रष्ः'। इस प्रसङ्में साफ-साफ यहै समझना चाहिये कि शब्दी अर्थव्यक्तिका प्रसाद गुणमें अन्तर्भाव मानते हैं औौर आबी अर्थव्यक्तिको स्वमावोकत्यलक्कारस्वरूप। इस प्रकार दोनों तरहकी अर्थग्यक्तिका अपलाप कर लेते है॥। ७१ ॥ मही महावराहेण लोहितादुद्धृतोद्धे:। इतीयत्येष निर्दिष्टे नेयत्वमुरगाजः ॥। ७४॥ पूर्वकारिकायामर्थव्यक्तिनिरूपणप्रस्तावेऽनेयार्थत्वमवश्यमपेच््यतवेन स्वीकृतं, तज्ज्ञानस्य नेयार्थत्वज्ञानाभावे सम्पत्तुमशक्यतया सम्प्रति सोदाहरणं नेयार्थत्वमाह-महीति। अर्थः प्रागुक्त: अत्र केवलम्-खुरक्षुण्णनागासगिति नोकं, यदभावेऽम्बुधिलौहित्यमित्यनुपपद्य- मानं कष्टकल्पनादिनोन्नेयं प्रसज्यत इतीदं नेयार्थम्। उत्तथायमर्थो भोजराजेन- 'वाक्यं भवति नेयार्थमर्थव्यक्तेविपर्ययात्। महीमहावराहेण लोहितादुद्धृतोदघेः। इतीयत्येव निर्दिष्टे नेया लौहित्यहेतवः ॥ काव्यप्रकाशकारादयस्तु-रूढिप्रयोजनाभावादशक्तिकृतं लक्ष्यार्थप्रकाशनं नेयार्थत्वमाहुः॥७४॥ हिन्दी-'मही महावराहेण' इस उदाहरणमें सागर के लाल होनेका कारण नहीं बताया गया है, अतः कषटकल्पना द्वारा लाल होनेके कारणका उन्नयन किया जाता है अतः यह नेयार्थ होनेके कारण अर्थव्यक्तिरहित है। यहाँ इतना बता देना अप्रासझिक नहीं होगा कि लक्षणा दो प्रकारसे की जाती है-निरूरक्षणा और प्रयोजनलूक्षणा। निरूढलक्षणा एक तरहसे अभिषाकी तरह होती है, क्योंकि वह प्रसिद्धिसे उद्भूत होती है, इसीलिये उसे अनादितात्पर्यमूलक कहते हैं, जैसे 'कर्मणि कुशलः'। इसी तरह प्रयोजनवती लक्षण किसी खास वस्तुको बतानेके लिये की जाती है, जैसे 'गङ्कारयां घोषः'। इसमें शैत्यप्रतीति प्रयोजन है। इन दोनों लक्षणाओंको दुष्ट नहीं कहा माता है। इनके अतिरिक्त कुछ लक्षणायें ऐसी मी की जाती हैं, जिनके मूकमें शष्दोंकी अशक्ति उभ्भारित पदोंका विवक्षितार्थप्रत्यायनाक्षमत्व होता है। इस तरहको अशक्तिमूलक लक्षणा नहीं करनी चाहिये, वैसा करनेसे नेयार्थत्व दोष होता है, इसी बातको दृष्टिमें रखकर आचार्योने नेयार्थता दोषके स्वरूपनिवचनकाकमें कहा है-'रूढिप्रयोजनाभावादशक्तिकृतं लक्ष्यार्थप्रकाशनं नेयार्थख्वम्', व्दाहरण दिया- शरत्कालसमुल्लासिपूर्णिमाशवंरीप्रियम्। करोति से मुखं तन्वि चपेटापातनातिथिम्।। यहों पर 'चपेटापातनातिथि' शब्दसे 'जित' अर्थ लक्षित किया गया है, जिसे रूढि या प्रयोजन दो में से कोई भी बल प्राप्त नहीं है। यह सारी बात कुमारिल ने स्पष्ट कह दी है- 'निरुढा कक्षणा: काश्िव सामर्थ्यादभिधानवद। क्रियन्ते साम्प्रतं काश्षिव काश्चिन्नैव स्वशक्तितः'॥ इस कारिकामें अन्तिम चरणद्वारा जिसका निषेध किया गया है, उसी लक्षणाके अवलम्बनमें नेयार्थत्वका उदय होता है।। ७४ ॥। नेडशं बहु मन्यन्ते मार्गयोरुमयोरपि। नहि प्रतीतिः सुभगा शष्दन्यायविलङ्गिनी॥ ७५॥

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६० काव्यादर्श: ईदृशं नेयार्थम् वाक्यम् उमयोरपि गौडवैदर्भमार्गयोराचार्या न बहु मन्यन्ते नाद्रियन्ते, उभयोरपि सम्प्रदाययोराचार्या नेयार्थत्वं न युक्ततयाऽतिष्ठन्त इत्यर्थः, तत्र कारण- सुपम्यस्यति-शब्दन्यायः शाब्दबोधपद्धतिः वृत्त्युपस्थितानामेवार्थानां बोध इत्येवं रूपो व्यवहारस्तद्विलं्िनी तत्प्रतिकूला प्रतीतिः (नेयार्थप्रतीतिः) नहि सुभगा न रमणीया, अत एव तादृश्याः प्रतीतेरहृद्यत्वमभ्युपेत्य संप्रदायद्वयेऽपि नादरो नेयार्थग्रहण प्रयोगा- देरिति भावः।। ७५॥ हिन्दी-इस तरहके नेयार्थ वाक्यका कहीं भी आदर नहीं होता है, गौड़ या वैदर्भ किसी भी सम्प्रदायके आचार्य उसका आदर नहीं करते, क्योंकि शाब्दबोषके नियम-वृश्युपस्थापित, अर्थोका हो अन्वय हो-इस तरहके नियमका उल्लडून करनेवालो प्रतीति सुन्दर नहीं हुआ करती। जिस बोषमें शाब्दबोधके सिद्धान्तोंकी अवहेलना को जाती है वह बोष हृथ नहीं होता है, इसीलिये गौड़वेदमे दोनों सम्प्रदायके आचा्यगण नेयार्थका श्याग ही अभोष मानते है॥७५॥ उत्कर्षवान् गुण: कश्धिद्यस्मिन्तुक्ते प्रतीयते। तदुदाराह्यं तेन सनाथा काव्यपद्धतिः॥७६॥ यस्मिन वाक्ये उक्ते अभिहिते सति कश्चित् उत्कर्षवान् वर्णनीयवस्तुमहत्तासूचकंः गुणो धर्मविशेष: प्रतीयते झ्ञायते, तद्वाक्यम् उदाराह्वयम् उदारम् उदारतानामकगुणयुक्तम् तेन उदारतानामकगुणेन काव्यपद्धतिः काव्यरीतिः सनाथा कृतार्था चमत्कृतेत्यर्थः, भवतांति शेषः। येन वाक्येन प्रसुज्यमानेन सता वर्णनीयस्य वस्तुनः कोऽपि महिमातिशयो बुद्धिगोचरो भवति तदुदारं वाक्यमित्याशयः, तत्र महिमातिशय उत्कर्षख्यापनेन आकर्षख्यापनेन चोभयथा संभवति, चमत्कारस्योभयथा समुत्पाद्यत्वात्। अ्रयं चार्थगुणः, नाक्यस्यार्थद्वारव गुणव्यञ्जकत्वात्। वामनस्तु विकटन्वस्वरूपमुदारत्वं शब्दगुणमेवाह, विकटत्वं तु पदानां नृत्यत्प्रायत्वम्, यया -'सुचरणविनिविष्टैनपुरनर्त्तकीनां झणिति रणित- मासीतत्र चित्रं कलश्'॥ ७६ ॥ हिन्दी-जिस वाक्यके प्रयुक्त होसेपर उस वाक्यार्थके द्वारा वर्णनीय वस्तुके लोकोत्तर चमत्कार की अवगति हो, उसमें उदारता नामक गुग होता है, उससे काव्यमार्ग सफल होता है, काव्यका प्रयोजन चमस्कार ही माना जाता है, उदारतासे चमस्कारका पोषण होता है, अतः उदारताको काव्यका जीवन माना गया है। यहाँ पर यह समझना चाहिये कि वाक्य जब गुणव्यजक होंगे तब स्वीय अर्थ द्वारा ही; इससे यह अर्थगुण हुआ, वामनादि ने जो एक उदारता मानी है वब विकटत्वस्वरूप है अतः वह शब्दगुण़ है। मरतने उदारताकी यह परिमाषा की है- 'दिग्यभावपरीतं यच्छम्ञाराद्मुतचेष्टितम्। अनेकमावसयुक्तमुदारं तव प्रकीत्तितम्'॥ मोजराजने कहा है-'विकटाक्षर बन्धरवम।यैरौदार्यमुख्यते'। 'भूत्युस्कर्षमुदारता' इसमें पहला लक्षण शब्दगुण-उदारताका है और दूसरा लक्षण अर्थगुण-उदारताका। ६ उदारताको अर्वाचीन आचार्यगण गुणरूपमें नहीं मानते, उनका आशय है कि शम्गुण-उदारता भोजमें अन्तर्माव होता है और अर्थगुण-उ द्वारता अग्राम्यतादोषामावस्वरूप है।। ७।

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प्रथम: परिच्छेद: ६१

अर्थिनां कृपणा दृष्टिस्त्वन्मुखे पतिता सकतू। तद्वस्था पुनर्देव नान्यस्य मुखमीक्षते।। ७७॥ इति त्यागस्य वाक्येस्मिन्नुत्कर्षः साधुं लक्ष्यते। अनैनैध पथान्यक्च सामानन्यायमूह्यताम्॥७८॥ पूर्वोक्तलक्षणमौदार्य दृष्टान्तेन विशदयति-अर्थिनामिति। हे देव महाराज अरर्थिनां याचकानां कृपणा दीना दृष्टिः त्वन्मुखे सकृत् एकदा पतिता सती पुनः पश्चात् तदवस्था दीना भूत्वा अन्यस्य दात्रन्तरस्य मुखं नेक्षते न पश्यति, त्वयैच पूरिताभिलाषा दीना न याचनाय दात्रन्तरमुपसर्पन्तीत्यर्थ:, एवमश्रोदाहदणे लक्षणसप्गमायाह-इतीति। इति एवं वाक्येऽ्रस्मिन् पूर्वोक्त श्लोकवाक्ये त्यागस्य दानस्योत्कर्षः साधु सफुटं लक्ष्यते, एवमेव क्वचिदन्यस्य बलरूपादेरप्युत्कर्षप्रतीतावुदारत्वं शक्यसंभवमिति बोधयति- अनेनैवेति। अनेनैव त्यागोत्कर्षदर्शनसजातीयेन पथा प्रकारेण समानन्यायम् एतुल्यम् उदाहरणान्तरम् ऊह्यताम् तर्क्यताम्॥७७-७८॥ हिन्दी-पूर्वोक्तलक्षण उवारनाका उदाहरण तथा उसका सङ्गमन इन दो शोकों द्वारा किया गया है। जो याचक दीनभावसे एक बार आपका मुख देख लेता है उसे फिर कमी किसीका मुख याचकके रूपमें नहीं देखना पड़ता। आप उसे इतना धन दे देते हैं कि उसकी आर्थिक दीनता दूर हो जाती है। यही है इसका अर्थ। इस फोकमें राजाके दानका उत्कर्ष प्रतिपादित हुआ है अतः उदारता गुण है, इसी तरह अन्यान्य वस्तुओंके उस्कर्षप्रतिपाठन होने पर भो उदारता गुण होगा।। ७७-७८॥ श्लाध्यैर्विशेषणर्युक्तमुदारं कैश्धिदिष्यते।

स्वाभिमतमुदारतालक्षणं निरुच्य सम्प्रति परकीयं तल्लक्षणोदाहरणादि बोधयति- श्लाध्यैरिति। इदमग्निपुराणीयस्य लक्षणस्य कीर्तनम्, तत्र हि-'उत्तानपदतौदार्य युतं श्लाध्यैविशेषणैः'इत्युक्तम्। तदुदाहरणं यथा-लीलाम्बुजेति। अत्र लीलाम्बुजपदे- नाम्वुजे लीलेति विशेषणेन वर्णाकारसौरभातिशयशालित्वम्, क्रीडासरःपदे सरसः क्ीडा- विशेषणेन कमलसारसविहारनोकासनाथत्वम्, एवम् हेमानदपदस्थहेमपदेन रलखचित्त्वं प्रतीयते, एवमेव मणिनूपुर-रल्काश्वी-कनककुण्डलादिपदेषु ॥। ७९ ॥ हिन्दी-दण्डी स्वामिमत उदारताळक्षण बताकर अब अग्निपुराणोक्त उदारतालक्षण प्रद्शित कर से हैं। काध्य विशेषणोंसे युक्त वाक्यका उदार कहा जाता है, जैसे लोलाम्युजादि। यहाँ अम्मुजमें लीकाविशेषण लगानेसे उसके आकार-वर्ण-सौरम आदि गुणोंका सत्कर्ष प्रतोत होता है, इसी तरह करीड़ामर, हेमाऊद आदि पदोंमें मी॥७९ ॥ ओज: समासभूय स्त्वमेतद्गद्यस्य जीवितम्। पद्येऽप्यदाक्षिणात्यानामिद्मेकं परायणम्।। ८० ।। ओजोगुणं निरूपयति-ओोज इति। समसनम् द्वयोबहूनां वा पदानाम् एकपदत्व- प्राप्ति: समास:, समासभूयस्त्वम् समासबाहुल्यम् शरोजो नाम गुण:, बहुपदसमास ओज

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६२ काव्यादर्श:

इत्यर्थ, एतत् समासभूयस्त्वम् गद्यस्य जीवितम् प्राणस्वरूपम्, अस्मिन्हि सति गयमतीव स्वदते इत्यर्थः। अदाश्षिणात्यानां पौरस्त्यानां गौडानाम् पदेऽ्पि (अपिर्गय्समुचायक:) इदं समासबाहुल्यम् एकं परायणम् अवलम्बनम्। गौडीवैदर्भाश्ोभयेऽपि श्रजोगुणमा- द्वियन्ते, नात्र तयोर्वैंमत्यम्, तत्र गौडा गद्ये पथ्ये च समानभावेनौजः समाद्रियन्ते, वैदर्भास्तु गद्यमेौजसा भूषणीयं जीवनीयं च मन्यन्त इति विशेषो बोध्यः ।। ८0। हिन्दी-समासकी बहुलता होनेपर ओज गुग माना जाता है। इस गुगके संबन्ध में गौड़वैदभ सम्प्रदायों में सहमति है, दोनों सम्प्रदाय इसे माननेवाले है, अन्तर इतना ही है कि वैदर्भ लोग ओजगुणको गद्यमात्रका जीवन कहते हैं और गौड़ सम्प्रदायवाले गय तथा पद्य दोनों प्रकारकी रचनाके लिये इसे समानरूपसे अवळम्बन मानते हैं। समास शब्दगतं वस्तु है, अतः यह भोज शभगुण है, ऐसा दण्डीका मत प्रतीत होता हे क्योंकि उनहोंने 'समासभूयस्त्वम् ओोअः' यहो लक्षम कहा है। बामनने 'अर्थस्य प्रोटि: ओवः' ऐसा लक्षण कर के अर्धगत भोग भो माना है, उनहोंने इसे पाँन प्रकारका बताया है। शब्दगत ओजका कक्षण वामनने 'गाठयन्वत्नमोजः' कहा है। भोजराज, वाग्मट, हेमचन्द्र, जगन्नाथ इत्यादि आचार्योने मी ओजको शब्दगत तथा अर्थगत मानकर लक्षण-उदाहरण दिये हैं। कांव्यप्रकाशकारने-'ओजशितस्य विस्ताररूपदीप्तत्वजनकम्' ऐसा लक्षण किया है, और 'वोरबोमत्सरौद्रेवु करमेणाविक्यमस्य तु' स्वीकार किया है, तदनुसार तीन उदाहरण भी दिये बाते है। विशवनाथ कविराजने भी उन्होंके पदचिह्का अनुसरण किया है॥ ८० ॥ तद्गुरुणां लघूनां च बाहुल्याल्पत्वमिश्रणैः। उद्यावचप्रकारं तद् दश्यमाख्यायिकादिषु॥८१॥ तत् शज: गुरूणाम् दीर्घवर्णानाम् लघूनाम् हस्ववर्णानां च बाहुल्येन आधिक्येन अल्पत्वेन न्यूनत्वेन मिश्रणेन उभयविधवर्णसां्क्कर्येण च त्रिधा भवति, कचित् दीर्घा एव वर्णा भूयांस:, क्वचिच्च लघव एव तथा क्वचिन्व तयोमिश्रणं तदेवमिदमोज उच्बावचप्रकारं नानाविधं तथ आख्यायिकादिषु गद्यप्रबन्धेषु दृश्यम् द्रष्टव्यम्। अ्त्रादिपदं चम्पूविरुदा-

हिन्दी-पूर्वोक्त ओज गुण नानाप्रकारके होते हैं, कहीं गुरु वर्णोंकी बहुळता होती है, कहीं कपु व्णोंकी बदुलता होती है, और कहीं दोनों प्रकारके वर्णोंको मिलाबट (मिश्रण) होती है, इस प्रकारसे अवान्तर भेदोंके होनेके कारण ओज अनेक प्रकारका होता है। ओज गुणका विशेष प्रयोग आख्यायिका, विरुद, चम्पू बगैरह गय्यप्रचुर अ्रन्थोंमें देखनेको मिलता है।। ८१ ।।

पीनस्तनस्थिताताम्रकम्रवस्त्रेव वारुणी ॥ ८२।। इति पद्येऽपि पौरस्स्या बध्नन्त्योजस्विनीर्गिर:। अंन्ये त्वनाकुलं हधमिच्छन्त्योजो गिरां यथा।। ८३॥

कस्य कामातुरं चेतो वारुणी न करिष्यति॥८४॥।

१. प्रकारेण। २. मब्टकग।

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प्रथम: परिच्छ्ेद: ६३

अस्तम् भस्ताचलस्तस्य मस्तके शिखरदेशे पर्यस्ताः व्याप्ताः प्रसता ये समस्ता अर्कांशवः सायंकालिकसूर्यकिरणा: तैः संस्तरः आच्छादनं यस्याः सा तादृशी वारुणी पश्चिमाशा पीनः पुष्टो यः स्तनस्तस्मिन् स्थितम् आताम्रम् ईषल्लोहितम् कम्रम् सुन्दरम् च वस्त्रं यस्या: सा तादृशी इव भातोति शेषः। पश्चिमाशाया वर्णनमिदम्, सन्ध्याकाले सूर्यस्य रक्ताभाः किरणाः पश्चिमाचलशिखरे प्रसरन्ति, मन्ये वारणो दिशा नायिका पीनस्तनभागे रक्तं वस्त्रमिव धारयति इत्याशयः। अनुप्रासपूर्णतया गौडा इदमोजस उदाहरणं मन्यन्ते। इति एवम् पद्यऽपि पौरस्त्या गौडा शजस्विनीः शजोगुणयुताः गिरः बध्नन्ति प्रयुजते, अनुप्रासरसिका गौडा ओजोगुणं पद्येऽप्याद्रियन्त इत्यर्थः । अन्ये वैदर्भास्तु गिराम् वाचाम् अनाकुलम् अनाकुलत्वम् सुखोच्चारयत्वम हृद्यम् मनोहरम् ओजः ओजोगुणम् इच्छन्ति। तदुदाहरणम्-पयोधरति। पयोधरो मेघ एव पयोधरः स्तनस्तस्य तटं प्रान्तदेशस्तदुत्सन्ने मध्यभागे लग्नं सन्ध्यातपः सायंकालिकसूर्यकिरणा एव अंशुकं रक्तवासो यस्या: सा एतादृशी वारुणी पश्चिमदिशा नायिका कस्य जनस्य चेतो हृदयं कामातुरम् अनम्पीडायुतं न करिष्यति सर्वमपि जनं कामातुरं करिष्यतीत्यर्थः। अत्र यद्यपि ओजोगुणायापेक्षितः समासोऽस्ति, परन्तु पूर्वोदाहरण इव क्लिष्टपदं नास्तीति वैदर्भा अभिमन्यन्ते। इदमत्र बोध्यम्-अयमोजोगुणो गौडवैदर्भयोर्भयोरपि सम्प्रदाययोरिष्टः, परं गौडसम्प्रदायानुगामिनोऽनुप्रासलोभात् कष्टपदबहुलसमासविन्यामने श्रोतृणां बुद्धीर्व्यामोहयन्ति, वैदर्भास्तु बन्धपारुष्यशैथिल्यादिदोषपरिहारेण प्रसन्नार्थक- पदानां समासेन बुद्धो: प्रसादयन्ति, समांसभूयस्त्वमुभयोः समानम्, परन्तु कष्टत्वमार- ल्यमात्रे भेद इति॥ ८२-८४ ॥ हिन्दी-सूयके समस्त किरणजासे आच्छादित अस्ताचल पर बिखरी हुई शोभासे युक्त पश्चिम दिशा उस नायिकाके समान मालूम पड़ रही थी, जिसने एक्त बखसे अपने पोन कुचोंको आच्छादित कर किया हो। इस प्रकारसे गौड़ लोग पद्ममें मो ओजोगुणयुक्त वाणोका प्रयोग करते है, वैदभंसम्प्रदायवाले गाणोमें ओनगुण तभी पसन्द करते हैं जब वह स्पष्टार्थ तथा सरळतया हृदयग्राहिणी होती है। सन्ध्याकालिक सूर्यके किरणजालसे बादलोंके तटों (स्तनोंके ऊपरी भाग) को आष्कादित कर पश्रिम दिशा (बाला) किसके मनको कामातुर नहीं कर देगो॥ ८२-८४॥ कान्तं सर्वजगत्कान्तं लौकिकार्थानतिक्रमात्। तब वार्ताभिधानेषु वर्णनास्वपि दश्यते ॥। ८५॥ लौकिकस्य लोकप्रसिद्धस्यार्थस्य वस्तुनः अनतिकमात् अपरित्यागात् सर्वजगत्कान्तम् सर्वप्रियम् आरपामरप्रसिद्धार्थोपनिबन्धनात् सर्वजनहृद्यं वाक्यम् कान्तं कान्तिनामकगुणयुनम्, एवं च लोकप्रसिद्धार्थवर्णनं कान्तिरिति फलितम्। अ्रयं च कान्तिगुणः श्रचार्यदण्डिमतेना- र्थगुणः, अर्थानुसन्धानतः पूर्वमस्यानुदयात्, तथ्च कान्तिगुणोपेतं वाभ्यं वार्सताभिधानेषु लौकिकोपचारवचनप्रयोगेषु तथा वर्णनासु प्रशंसापरकवाक्येषु च दृश्यते॥ ८५॥ हिन्दी-लोकप्रसिद्ध वस्तुका अतिक्रमण-स्याग-नहीं करनेके कारण जो सर्बलोकप्रिय हो, आपामरप्रसिद्ध अर्थके प्रयोगसे जो सबको अक्छा लगे, उसे कान्त अर्थाद कान्तिगुणयुक्त मानते

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६४ का ्यादर्श:

हैं, उस गुणकी अधिकता कौकिक उपचारमें-प्रशंसापरक वचनोंमें मिलती है। भचार्य दण्डी कान्सिको-कान्ति गुणको-अर्थगुण स्वीकार किया है क्योंकि अर्थातुसन्धान होने पर ही उस सवंहंबता प्रतीत होगी। मरतने कान्तिका लक्षण यह कहा है- यन्मनःश्रोत्रविषयमाहाद्यत हीन्दुवत। लोकाचर्थोपपन्नां वा ता कान्ति कबयो विदुः।। इसका उदाहरण हेमचन्द्रने दिया है- दद्शुर्दारदेशस्था सीरता वल्कलधारिणीम्। अप्गदाहादनप्गत्य रति प्रत्रजञितामिव॥ वामनोक्त कान्तिकक्षण यह है- औज्जवल्यं कान्तिः, औज्ज्वव्यं नाम नवमतिभाप्रकर्ष:, यदमावे, पुराणीबन्धच्छायेयमि व्यपदिशन्ति। मोजराजने-'यदुज्जवलत्वं बन्स्य काव्ये सा कान्तिरच्यते'। कान्तिका इस प्रकार लक्षण कर यह उदाइरण दिया है- 'निरानन्द: कौन्दे मधुनि विधुरो वालवकुले न साले सालम्यो लवमपि लवडे न रमने। प्रियक्ौ नासकं रचयति न चूते विचरति स्मरँलक्ष्मीलीलाकमलमधुपानं मधुकरः'॥ काव्यप्रकाशकारने कान्ति गुणको आ्म्य्वदोषाभावरूप माना है, इसे पृथक् गुण नहीं स्वीक किया। पण्डित राजने-'अविदग्धवैदिकादिप्रयोगयोग्यानां पदानां परिदवारेण प्रयुज्यमानेषु पदेपु लो सरशोभारूपमौउ्जवव्यं कान्तिः' ऐसा लक्षण कहा है और यह उदाहरण दिया है- 'नितरां परुषा सरोजमाळा न मृणालानि विचारपेशलानि। यदि कोमलता तवाङ़कानामथ का नाम कथाऽपि पल्लवानाम्'॥ - गृहाणि नाम तान्येव तपोराशिर्भवाडशः। संभावयति यान्येवं पावनैः पादपांसुभिः॥८६॥ अनयोरनवद्याक्रि स्तनयोर्जृम्भमाणयोः। अवकाशो न पर्याप्तस्तव बाहुलतान्तरे ।। ८७ !! इति सम्भाव्यमेवैतद्विशेषाख्यानसंस्कृतम्। कान्तं भवति सर्वस्य लोकयात्रानुवर्ततिनः ॥ ८८॥ तानि एव गृहाणि गृहपदवाच्यानि प्रशस्तानि गृहाणि, भवादशी युम्मत्सद: तपोराशिः तपस्वी यानि गृहाणि पावनेः पवित्रतासम्पादकैः पादपांसुभिः चरणरर्जो संभावयति आादरभाजनं करोति, यत्र भवादृशस्य तपस्विनः पदधूलि: पतति ताने गृहाणि धन्यानि, तदितराणि त्वधन्यानि तादृशसौभाग्यभाजनत्वाभावादिति भावः अत्र सत्पुरुषचरणसम्पर्केण गृहाणां प्राशस्त्यवर्णनं लोकप्रसिद्धमेवेतीव वार्नाभिधा रूपा कान्तिः। वर्णनारूपां कान्तिमुदाहरति-अनयोरिति। हे अनवद्याक्ि सर्वानिन तनो सुन्दरि, तव बाहुलतान्तरें हस्तद्वयस्य मध्ये वक्षोदेशे जम्भमाणयोः वर्धमान स्तनयो: कुचयोः अवकाशः स्थानम् न पर्याप्तः न अलम्, विशालयोः कुचयोरवस्था बोग्यं स्थानं नास्ति तव वक्षसि, तेन तदानत्यविशालत्वे व्यजिते। अत्र वर्णना कान्तिगुणः ।

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प्रथम: परिच्छेद: ६x

इति एतत्पूर्वदर्शितं स्थलद्वयम् वार्त्ताविषयं वर्णनाविषयं चोदाहरणद्वयम् सम्माम्यम् लोकप्रसिद्धतया संभवदुक्तकिकम्, न तु कविप्रतिभामात्रकल्पितम्, तदेवेदं स्वतनसम्मनि विशेषाख्यानसंस्कृतम् विशिष्टप्रकारककथनेन संस्कृतम् उपश्लोकितं रजितं सत् सर्वस्य लोक- यात्रानुवर्त्तिन: लोकव्यवहारनिपुणस्य जनस्य कान्तं रमणीयं भवति, वार्त्तावर्णनयो: करणी ययो: केवलं सामान्यपद प्रयोगेण कथने सति न कान्तिगुणः अपितु विशिष्टवर्णनात्मक- प्रकारेणैव कान्तिगुण इति भावः ॥ ८६-८८।। हिन्दी-वास्तवमें बेही गृह गृह है-सौमाग्यशाली गृह है-जिन गृडोंको आपके समान तपस्वी जन अपने चरण की धूलिसे गौरवशाली बनाते हैं। इस श्लोकमें सरपुरषचरणधूळिसे गृह को सौभाग्यशालिताका वर्णन किया गया है, जो कोकव्यवहारप्रसिद्ध है, अतः यहाँ पर वार्सानिषानरूप कान्ति गुण है। दूसरा उदाहरण देते हैं-हे अनिन्यसर्वावयवे सुन्दरि । इन तेरे दोनों बढ़ ते हुए स्तनोंके लिये कताके समान तेरे दोनों हाथोंके मध्यमागमें वमःस्थलपर पर्याप्त स्थान नहीं है, इन उभरे हुए कुचोंके लिये जितना स्थान पर्याप्त रूपमें अपेक्षित है, उतना कम्बा चौड़ा तुम्हारा वक्षःस्थल नहीं है। इस वर्णनमें लौकिक अर्थको बढ़ाकर कहा गया है, अतः क्रान्ति गुण है। इन दोनों उदाहरणोंमें जो बात कही गई है वह संमाव्य है-सेभवदुकिक है, कहा जा सकता है, उसीको विशिषट प्रकार-वर्णन-प्रशंसाके लिये कहनेके कारण रोचक हो गया है, अतः इस तरहका कथन लोकव्यवहारनिष्णात जनके छिये हृध होता है।। ८६-८८।। लोक्ातीत इवात्यर्थमध्यारोप्य विवक्षितः। योऽर्थस्तेनातितुष्यन्ति विदग्धा नेतरे जनाः ।। ८९।। देवधिष्ण्यमिवाराध्यमद्यप्रभृति नो गृह्म्।

अल्पं निर्मितमाकाशमनालोच्यैव वेधसा। इदमेवंविधं भावि भवत्याः स्तनजम्भणम्॥९१॥ इदम त्युक्तिरित्यु कमेतदुगौडोपलालितम्। प्रस्थानं प्राकूप्रणीतं तु सारमन्यस्य वर्त्मेनः ॥ ९२॥ अत्यर्थम् लोकातीतः अत्यन्तं लोकप्रसिद्धिमतिकान्त इव योऽर्यः अध्यारोप्य कवि- प्रतिभया कल्पितः सन् विवक्षितः वसुमिष्टो भवति. यं कमपि कल्पनामात्रनिष्पभ्स्वरूपं वस्तुविशेषम् कवयो विवक्षन्ति, तेन तादृशेन कल्पितार्थेन विदग्याः चतुरा गौडा एव अतितुष्यन्ति नितरां प्रीतिमावहन्ति, इतरे जनाः वैदर्भाः न, अ्रतितुष्यन्तीत्यर्थः। लोकप्रसिद्धि मतिक्रम्य स्थितेन कविकल्पितेनार्थेन केवलं गौडा एव सन्तुष्यन्ति, न वैदर्भा:, सेयं वस्तुस्थितिः । तत्र कान्तिगुणप्रकमे कविप्रतिभामात्रकल्पितेऽर्यें वार्ताप्रशंसयो- रुदाहरणद्वयं दर्शयति-देवधिष्ण्यमिति । अल्पमिति च । अद्यप्रभृति अदारम्य युष्मत्पादरजसां भवञ्रणधूलीनाम् पातेन पतनेन धौतं क्षालितं निःशेषं किस्बिषं सकलं पातकं यस्य तादृशम् नो गृहम् अस्मदीयमागारम् देवधिष्ण्यम् देवमन्दिरमिव भाराष्यम् अजायतेति शेष:, यथा देवागारं लोका बहाद्रियन्ते, तथैव भवचरणधलिपतनसन्नात- पातकनिवृत्तीदं मम गृहं लोका बहुमानेन संभावयिष्यन्तीत्यर्थः । अत्र हि कविकल्पित-

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६६ काव्यादर्श:

वस्तुना लोकप्रसिद्धिरतिक्रम्यते, लोके हि सत्पुरुषचरणरजःसंपर्केण गृहस्य पवित्रतैव प्रसिद्धा नैव देवागारवदाराध्यता, सा तु तत्र कविनाऽध्यारोपिता। अत्र लौकिकार्था- तिक्रमान्नेयं वैदर्भाणां मते कान्तिः, किन्तु गौडा इमां कान्तिमाहुः। वर्णनायां गौडा- भिमतां कान्तिमाह-भवत्याः इदं पुरतो दृश्यम् स्तनजम्भणम् कुचकलशविकास: एवं- विधम् समस्ताकाशव्यापकम् भावि भविष्यत् अनालोच्य मनसाऽप्यचिन्तयित्वा वेधसा ब्रह्मणा आकाशम् अल्पम् स्वल्पविस्तारम् निर्मितम्। यस्मिन्नाकाशाभोगे मेरुमन्दरा- दयोऽसंबाधमासते तत्रापि व्योमनि वर्द्धमानयोः स्तनयोरवकाशाप्राप्त्या ब्रह्मण स्तनयो- विस्तारमविचिन्त्यैवाल्पं व्योम निमितं, यदि भवदीययोः स्तनयोविस्तारं ब्रह्मा पूर्वमचिन्त- थिष्यत्तदा नेतादृशमल्पं व्योम निर्माय कृतित्वम्कलयिष्यदित्यर्थः। इदं वर्णनमतिशयोकि- रूपम्, इदमपि गौडा एव कान्तत्वेनोदाहरन्ति, न वैदर्भा इति बोध्यम्। एवं गौडवैदर्भयोः कान्तिविषयं सिद्धान्तभेदं निरूपयति-इदम् पूर्वोत्तस्वरूपं काव्यम् अत्युक्तिः अ्रति- शयोक्तिरूपम् इत्युक्तम् अलक्कारशास्त्रनिष्णातः एतत् अतिशयोक्तिरूपतया स्वीकृतम्, एतत् गौडोपलालितम् गौडैः कान्तिगुणत्वेनाभ्युपेतम्, प्राक प्रणीतं पूर्वोक्तम्-कान्तं सर्वजगत्कान्तमित्यादिना पूर्व निरूपितम् प्रस्थानं मार्ग: अरन्यस्य वर्त्मनः गौडभिन्नस्य वैदर्भसम्प्रदायस्येत्यर्थः ॥ ८९-९२॥ हिन्दी-जिस काव्यमें लोकातीत-लोकप्रसिद्धिसे बाहरके अर्थ कविकल्पनाद्वारा अध्या- रोपित होकर प्रयुक्त हों, उससे विदग्ध-चतुर गौड़ लोग ही अतिशय सन्तोषका अनुभव करते हैं, वैदर्भ लोग नहीं। वार्ता-लोकोपचार-विषयमें या प्रशंसा-विषयमें जहाँ पर लोकप्रसिद्धिको छोड़कर कविगण अतिरजनसे काम लेते हैं, वैसे काव्यसे अपनेको अत्यधिक दुद्धिमान् समझने वाले-विदग्ध-गौढ़ लोगही सन्तुष्ट होते हैं, विदर्भमार्गके अनुयायी नहीं। गौड़ाभिमत कान्ति गुणके दो उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, उनमें पहला उंदाहरण लोकोपचारका तथा द्वितीय उदाहरण वर्णनाका है। इमारा गृह आजसे देवस्थानके समान सवंपूज्य हो गया, क्योंकि आपके पदरजके गिरनेसे इस घरका समस्त पाप धुक गया है। हे सर्वानवध्गात्रे, आपके स्तन इतने बड़े होंगे इस बातको नहीं ध्यानमें रखा, अत एव मझाने आकाशको इतना छोटा बनाया, यदि म्रह्ाकी बुद्धिमें आपके स्तनोंके मावी विस्तारकी बात भाती, तो वह अवश्य इसको छोटा न बनाकर थोड़ा बड़ा बनाते। यह अत्युक्ति है, अतिशयोक्ति है, जो गौढ़ लोगोंको अधिक प्रिय है, इससे पूर्वमें-'कान्त सर्वलगत्कान्तम्' इत्यादि द्वारा को सोदाहरण कान्तिगुण बताया है वह विदभ संप्रदायका सार है। ८९-९२ ॥ अन्यधर्मस्ततोऽन्यत्र लोकसीमानुरोघिना। सम्यगाधीयते तत्रं स समाधि: स्मृतो यथा ॥ ९३ ॥ कुमुदानि निमीलन्ति कमलाम्युन्मिषन्ति ध। इति नेत्रक्रियाध्यासाल्लब्धा तद्वाचिनी श्रुतिः!९४॥। समाधि नाम गुणं लक्षयति-अन्यधर्म इति। लोकसीमानुरोधिना लौकिकमर्या- दापालनजांगरूकेण कविना अन्यधर्मः अप्रस्तुतगतो गुणः ततोऽ्न्यत्रार्थात् प्रस्तुते यत्र

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प्रथम: परिच्छेद: ६७

वाक्यार्थे सम्यग् आधीयते साध्यवसानलक्षणका प्रत्याय्यते सः समाधिर्नाम गुणः स्मृतः आचार्य: कथितः। इत्यं च प्रस्तुतस्य धर्म तिरोषाय तत्र सदृशतया अप्रस्तुतघर्मस्य तादात्म्याध्यवसानं समाधिरिति फलितोऽर्यः। अयं समाधिरर्यगुणः, अरयें अर्ान्तरारोपात्। उदाहरणमाह-क्रुमुदानीति। कुमुदानि स्वनामख्यातानि पुष्पाणि निमीलन्ति सक चन्ति, कमलानि सरोजानि च उन्मिषन्ति विकसन्ति। इति अनयोः वाक्ययोर्नेत्रक्रिययोः निमीलनोन्मीलनयो: संकोचविकासरूपयोरथयोरध्यासाद् आरोपात् तद्वाचिनी श्रुतिः तत्प्रतिपाद्यता तच्छब्दवाच्यता लब्धा, अयमाशय :- निमोलनोन्मीलने नयनधमौं, कुमुद- सङ्कोचकमलविकासयोः प्रतिपादयोर्निमीलनोन्मीलनशब्दावुचार्यमाणी सादृश्यातिशय- महिम्ना सङ्कोचविकासयोरुपचर्येते, सादृश्यमूलकमेव च तयोरेकशब्दप्रतिपाद्यत्वम्, तद्वाचिनी श्रुतिः तच्छब्दवाच्यता ॥ ९३-९४॥ हिन्दी-लोकसीमाके पालनमें तत्पर कविदारा अब अप्रस्तुत वस्तुके धर्म प्रस्तुत वस्तुपर आरोपित किये जाते हैं तब उसको समाधि गुण कहते हैं। यह अर्थगुण है क्योंकि एक अर्थपर दूसरा अर्थ आरोपित होता है। वामन आदिने आरोहवरोहक्रमरूप समािको शष्दगुण स्वीकार किया है। अन्यान्य आचार्योंके लक्षण उदाहरण निम्नलिखित है :- भरत- 'अभियुक्तैविशेषस्तु योऽर्थस्यैवोपलम्यते। तेन चार्येन सम्पन्नः समाभि: परिकीर्ष्यते॥' भोजराज-'समाधिः सोऽन्यवर्माणां यदन्यश्राषिरोपणम्'। (उदाहरण )- प्रतीच्छत्याशोकीं किसलयपरावृत्तिमधरः कपोलः पाण्डुत्वादवतरति ताकीपरिणतिम्। परिम्कानप्रायामनुवदति दृष्टिः कमलिनीम्, इतीयं माधुर्ये स्पृशति म तनुत्वं च मजते॥। यहाँ पर प्रतीच्छति, अवतरति, अनुवदति, इत्यादि चेतनक्रियाओंका अचेतन अवरादि पर आरोप किया गया है, अतः समाभि गुण है। वाग्मट-'अन्यस्य धर्मो यत्रान्यभारोप्यते स समाभिः'। पण्डितराज जगननाथने समाधिको अर्थगुण नहीं मानकर एक विचित्र लक्षण. बता दिया है जिससे यह कविताका नहीं कविका गुण हो जाता है, उनका लक्षण है-'अवर्णितपूर्वोडयमर्य: पूर्ववणितकछायो वेति कवेरालोचनं समाविः। 'समाधिस्तु कविगतः काव्यस्य कारणं, न तु गुण:, प्रतिभाया अपि काव्यगुणत्वापतेः'। आचार्य दण्डीने जिसे अर्थगुण कहा है उस समाधिका उदाहरण दिया है-कुमुदिनीति। कुसुढिनी बन्द हो रही है, (निमीलित-संकुचित हो रही है) और कमल खुरू रहे हैं ( उन्मि- पित हो रहे हैं-खिल रहे हैं) इसमें आँखकी क्रियाओं (निमीलन और उन्मेष) का कुसुदिनी एवं कमलकी क्रियाओंपर आरोप किया गया है, इसीलिए उसी क्रियाको प्रकट करनेवाले सष्द प्रयुकत हुए है॥। ९३-९४।। निष्ठ्तोद्गीर्णवान्तादि गौणवृत्तिव्यपाश्रयम्। अतिसुन्दरमन्यत्र ग्राम्यकक्षां विगाहते ॥ ९५॥ पद्मान्यर्कोशुनिष्ठथूता: पीत्वा पावकविभुषः। भूयो वमन्तीव मुरुखैदगीर्णारुणरेणुभिः॥९६॥ इति हद्यमषटद्यं तु निष्ठीवति वधूरिति।

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६: काव्यादर्श:

इतः पूर्व समाधिगुणप्रस्तावे साध्यवसानलक्षणयाऽन्यदीयधर्मस्यान्यत्रारोपो भवती- त्युकम्, तत्प्रसक्गेन कानिचित्पदानि गौणवृश्त्यैव शोभातिशयं वहदन्ति, नतु मुख्यवृत्त्ये- त्यभिघातुमाह-मिष्ठ्यूतेत्यादि। निष्ठयूतोद्गीर्णवान्तादि निष्ठथतम् उद्गीर्णम् वान्तम् इत्यादि पदम् गौणवृत्तिव्यपाश्रयम् लाक्षणिकम् लक्षणावृत्त्याश्रयम् एवं सत् अतिसुन्दरम् सहृदयमनोहरम् (तथा सत्येव समाधिगुणोदयात्) अरन्यत्र मुख्यया वृत्त्या प्रयुक्तत्वे तु आ्रांम्यकक्षां विगाहते प्राम्यत्वदोषपूर्ण भवतीत्यर्थः । उदाहरणमाह-पद्मानि कमलानि अर्काशनिष्ठथता: सूर्यकरक्षिप्ताः पावकविप्रुषः वहिस्फुलिज्ञान् पीत्वा उद्ीर्णारुणरेणुभिः बहिस्त्यकरक्त्परागैः भूयो वमन्तीव। सांध्यपवनकम्पितस्खलत्परागपद्मवर्णनमिदम्। सूर्यनिष्ठयूताग्निकणपायिनो जलजसमूहाः र्खलत्परागतया उद्गीर्णारुणरेणुभिमुखैः पुनरपि पीतपूर्वान् अग्निकणान् वमन्तीवेति भावः। अत्र निष्ठथूतपदं बहिःक्षिप्ते, पानपदं ग्रहरो, वमतिक्रिया बहिःत्ेपे, उद्गीर्णपदं निर्गमे, एवमेतानि पदानि लाक्षणण- कानि। इति हृद्यम् एतत् सहृदयमनोहरम्, आ्राम्यकक्षविगाहितयाऽहृयं तु यथा निष्ठीवति बधुरिति। निष्ठथूतपदं तथान्यदपि च तादृशं पदं लाक्षणिकत्वे सति चमत्कार।तिशयं पुष्णाति। तथा प्रयुक्तं महाकविसुबन्धुना-'अविदितगुणाऽपि सत्कविभणितिः कर्णेषु वमति मघुधाराम्'। तथा चैतानि निष्ठथूतादिपदानि लक्षणायां कृतायामेव शोभातिशयं पुष्यन्ति इति प्रतिज्ञातं समर्थितम् ॥९५-९६॥ हिन्दी-कमळ सूर्यंकी किरणों से थूके हुए (निकलते हुए) अग्निकणोंका पान करके अपने मुखोंसे काक परागरेणुओंको निकालते हुए (वमन करते हुए) ऐसे दीख पढ़ते हैं, मानो वमन कर रहे हों। इस इ्लोक में सान्ध्य पवनसे कम्पित तथा परागपाती कमलका वर्णन किया गया है। यहाँ निष्ठयूत पदका मुख्यार्थ है थूकना, लक्ष्यार्थ निकलना, वमन्ति का मुख्यार्थ-वमन करना, जक्ष्याथे बाहर निकालना, उद्दीणका मुख्यार्थ उगरना, लक्ष्यार्थ गिराना है। इससे यह निष्कर्ष निकाला गया है कि थूकना, उगलना, वमन आदि शब्द यदि मुख्याथं छोड़कर गौण पृत्तिके द्वारा अन्यार्थंका बोष करावें तो सुन्दर होते हैं, लाक्षणिक प्रयोग हा जानेके कारण समाषि गुणके उद्भूत हो बानेसे चमत्कारयुक्त हो जाते हैं, जैसे यहों पूर्वोक्त उदाहरणमें; और जहाँ पर मुख्यार्थमें ही रहते हैं वहाँ इन पदोंके प्रयोग होने पर ग्राम्यत्व दोष होता है। वैसा होनेपर वह असुन्दर हो जाता है, जैसे बधू: निष्ठोबति ॥९५-९६।। युगपम्नैकधर्माणामध्यासश् स्मृतो यथा ॥९७॥ शुरुगर्भभरंकलान्ता: स्तनन्त्यो मेघपङ्क्यः । अचलाधित्यकोत्सङ्गमिमाः समघिशेरते ॥९८॥ उत्सङशयन सख्या: स्तननं गौरवं क्लमः । इतीमे गर्मिणीधर्मा बहवोऽप्यत्र दर्शिताः ॥९९।। 'अन्यधर्मस्ततोऽन्यत्रे' त्यादिकारिकया समाधिर्नाम गुणो लक्षितः, तत्र किमेकधर्मारोप एव समाधिरुतानेकधर्मेंऽपीति शङ्कायामाह-युगपदिति। नैकधर्माणाम् अन्यदीयगुण- क्रियारूपा नेकधर्माणाम यगपत सरैब पध्यामः श्ागेष्थ ममाधि: =मतः तथा चैकम्मिन्ध में

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प्रथम: परिच्छेद: ६६

आरोप्यमाण इवानेकस्मित्रपि धर्म आरोप्यमाणे समाधिर्नाम गुणो भवतीति निष्कर्षः । तत्रैकधर्मारोपे समाधिरुदाहतपूर्वः, सम्प्रति बहुधर्मारोपरूपसमाघिमुदाहरति-गुरुगर्भेति। गुर्व्यः एकत्र मेघमालायां जलेनापरत्र गर्भिण्यां गर्भभारेण च स्थूला:, एवं गर्भभरेण अन्तर्गतजलेन भ्रूणेन च क्लान्ताः मन्दीभूताः, स्तनन्त्यः शब्दायमानाः क्लान्ति- सूचकशब्दं कुर्वत्यश्च, एतादृश्यो मेघपङ्क्तयः घनमाला: (गर्भिण्यक्) इमाः अचला- धित्यकायाः पर्वतोर्ध्वदेशस्य (सख्याश्व) उत्सतम् क्रोडं समधिशेरते संश्रयन्ते, यथा गर्भिण्योऽज्नना: स्थूलोदरा क्लान्ताः सशब्दाक्च सख्युत्सन्ने शेरते, तर्थेव मेघमाला जलपूर्णा मन्दाः स्तनन्त्यश्च पर्वतोर्ध्वदेशमाश्रयन्तीति भावः। अत्र मेघपठिक्तषु तत्तद्ध्म- निगरणेन बहूनां गौरवादीनां गर्भिणीधर्माणां युगपदध्यासात् समाधिर्नाम गुणः। तदेवोप- पादयति-उत्सक्केति। 'सख्या उत्सञ्ने शयनं स्तननं गौरवं क्लमः' इतीमे बहचो गर्भिणी- धर्मा दर्शिताः आरोपेण मेघमालायां कर्थिताः। स्तननादेगर्भिणीधर्मत्वमाह वाग्भट :- क्षामता गरिमा कुक्षी मूर्च्छा छर्दिररोचकम्। जुम्भाप्रसेक: .॥ इत्यादि। (शारीरस्थाने १. ५०) अत्र स्तनितशब्दः सामान्यव्वनिपरो न मेघशब्दपरः, तथा सति तस्य गर्भिणीधमेत्वा- प्रसक्त्े:॥।९७-९९॥ हिन्दी-पूर्वोक्त समाधिलक्षणमें 'अन्यवर्मस्ततोऽन्यत्र' इस प्रकार सामान्यतः अन्य धर्म कहा गया है, उसमें एक धर्मका अध्यास या अनेक धर्मका अध्यास हो यह बात स्पष्ट नहीं की गई है उसीको स्पष्ट करते हैं-युगपदिति। अनेक धर्मोंका एक साथ आरोप भी समावि नामक गुण है। उसका उदाहरण-गुरुगर्भेति। यह मेघमाला (सगर्भा नायिका) भारी जळ (गर्मभार) से मन्दीभूत रोकर गरजती (सिसकती) है, और अचलावित्यकाकी (सखीकी) गोदमें सोती है। इस श्लोकमें सखीकी गोदमें सोना, शब्द करना, मन्दता, गौरव आदि अनेक गर्मिणोषर्मोंका मेघमालामें आरोप किया गया है। यद्यपि-'स्तनितभणितादि सुरते' इस अमरके अनुसार स्तनित का अर्थ सुरत-शब्द ही होता है, तथापि यहाँपर-'आत्तंस्तनितसंनादे रविराम्बुहशकुले' इत्यादि हरिवंशस्थ प्रयोगके देखनेसे स्तनित शब्द सामान्य ध्वनिमें प्रयुक्त हुआ है॥ ९७-९९ । तदेतत्काव्यसर्वस्वं समाघिर्नाम यो गुणः। कविसार्थः समग्रोऽपि तमेनमनुगच्छति॥ १०० ॥ समाधि प्रशंसन गुणनिरूपणमुपसंहरति-तत् तस्मात् प्रोक्तदिशा काव्यचमत्कृतिजन- नात् समाधिर्नाम यो गुणः पूर्वमुक्त एतत् काव्यसर्वस्वम् काव्ये जोवनस्वरूपतयाऽवश्यम- पेक्षणीयम्। तमेनं समाधि समप्रोऽखिलोऽपि गौडवैदर्भसम्प्रदायविभक: कविसार्थः कविगणः एनम् समाधिम् अनुगच्छति आद्रियते, साभिनिवेशं स्वकाव्येषु योजयितुं यतते॥ १०॥ हिन्दी-इस प्रकार वर्णित यह समाधि गुण काव्यमें चमस्कार उत्पन करनेके कारण काव्यका जीवन है, अतः अवश्य उपादेय है, गौड़ तथा वैदर्भ दोनों सम्प्रदायोंके अनुगामी कविगण इसे अपनाते हैं। गुणके सम्बन्धमें प्राचीन तथा भर्वाचीन आयार्यीमें बड़ा मारी मतमेद है, प्राचीन नाम- नाथाचार्योने- 'इलेग: प्रसाद: समत् माधुव सुकमारता। अर्थव्यकिवदारत्मोब:कान्तिसमामः।। :

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७० काव्यादर्श:

इन दश अर्थगुणोंको तथा इसी नामवाले दश शष्दगुणोंको स्वीकार करते हैं। सनके अरग- नरुग कक्षण-उदाहरण भी उन्होंने दिये हैं। मम्मट आादि नवीन आचार्योंने इन बीस गुणोंकी जगह पर केवल तीन गुण माने हैं। उनका कहना है कि- 'केचिदन्तर्मवन्त्येषु दोषत्यागाव परे त्रिताः । अन्ये मजन्ति दोषत्वं कुत्रचिन्र ततो दश ॥' इस प्रकार मम्मटने दश शाष्दगुणों को अस्वीकृत कर दिया है, उन्होंने-इलेष, उदारता प्रसाद और समाभि नामक चार शब्दगुणोंको ओजोष्यजक घटनामें अन्त्भूत बताया है। माधुर्यको व्वन््थमापुर्य गुणव्यअ्ञक रचनास्वरूप ही कहा है। समताको जो मार्गाभेदस्वरूप है, उसे अनवीकृतत्वरूप दोष बताया है। कान्ति और सुकुमारताको ग्रम्यत्व और कषटत्वरूप दोषाभावस्वरूप कहा है, एवं अर्थव्यक्ति नामक गुणको प्रसादमें अन्तर्भूत बताया है। इस प्रकार प्राचीनोक्त दश गुणोंका माधुर्यं, ओम, प्रसाद नामक स्वाभिमत गुणन्रयमें अन्तर्माव बताया गया है, 'माधुयौज :- प्रसादाख्याख््रयस्ते न पुनदश'। यह दुआ शब्दगत दश गुणोंका विवेचन। अर्थगत दश गुणोंका मो इस प्रकार अन्तर्भाव किया गया है- श्ळेव तथा ओजोगुणके प्राचीनोक्त चार भेद वैचित्र्यमात्र हैं, अतः उन्हें गुण नहीं मानना चाहिये। प्रसादगुण अधिकपदस्वरूप दोषामावस्वरूप है। मापुर्य उक्तिवेचित्र्यमात्र है। इसे अनवीकृतत्वरूप दोषामावस्वरूप कहा गया है। सुकुमारता अमनकरूपाश्लीलस्वदोषामावरूप है। उदारता ग्राम्यत्वरूप दोषाभावस्वरूप है। समता मग्नप्रक्रमत्वरूप दोषाभावस्वरूप है। साभिप्रायविशेषणत्वरूप ओजका पक्चम प्रकार अपुष्टार्थत्वरूप दोषाभावस्वरूप है। अर्थव्यक्तिका स्वमावोकि नामक अलक्वारमें अन्तर्माव होता है। कान्तिको रसध्वनिरूप या रसवदलक्काररूप माना है। समानिको कविका गुण माना गया है, काव्यगुण नहीं। इस प्रकार दशविध अर्थगुणोंको भी विवेचना की गई है। फलतः तीन-माधुयौजःप्रसाइ नामक गरुण ही अर्थगत हैं। दण्डीने अपना विचार मरतके अनुसार कायम रखा है॥। १०० ॥ इति मार्गळ्वयं भिन्नं तत्स्वरूपनिरूपणात्। तद्भेदास्तु न शक्यन्ते वक्तुं प्रतिकविस्थिताः ॥१०१॥ इक्षुमीरगुडादीनां माघुर्यस्यान्तरं महत्। तथापि न तदाख्यातुं सरस्वत्यापि शक्यते ॥ १०२ । इति प्रागुक्तप्रकारेण तयोः गौडवैदर्भमार्गयोः स्वरपस्य असाधारणधर्मस्य निरूप- णात्-'इति वैदर्भमार्गस्य प्राणा दशगुणाः स्मृताः। एषां विपर्ययः प्रायो दृश्यते गौड- वर्त्मनि ॥' इत्यादिना भिन्नतया प्रतिपादनात् मार्गद्वयं गौडवैदर्भप्रस्थानद्वथम् भिन्नम् अत्यन्तविसदृशम् । प्रतिकविस्थिता: तद्भेदाः तयेगौंडवैदर्भमार्गयोरवान्तरप्रकारा भावन्तिकीलाटीमागध्यादयः वत्तुं न शक्यन्ते। तयोर्मार्गयोरवान्तरभेदोऽशक्यनिरूपण- स्तत्र कारणं दृष्टान्तेन विशदयति-इक्षुक्षीरेति। इक्षुः, क्षीरं पयः, गुड इक्षुविकार- स्तदानीनां इक्षक्षीरगडशकेराखर्जरप्रभतिमधरपदार्थानां यात्रगध्य प्रभववाज्ा स=त

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प्रथम: परिच्छेद: ७१

वाचामधिष्ठात्र्याऽंप आख्यातुं वक्तुं न शक्यते तथैव गौडवैदर्भसम्प्रदाययोविद्यमानानां लाटीमागध्यादीनां प्रभेद विशेषाणं विशिष्टं भेदतारतम्यंवचुमशक्यमिति भावः॥१०२-१०२। हिन्दी-इस प्रकार परस्पर मिन्न दो मार्ग-सम्प्रदाय चलते आा रहे हैं, इनके स्वरूपका निरूपण कर दिया गया, इनमें अवान्तर प्रभेद कविभेदसे अनन्त है, उनका वर्णन असंभव है। जिस प्रकार ईख, दूध एवं गुड़में वत्तमान माधुयंमें अन्तर है, वह अन्तर महान् है, परन्तु उसका वर्णन सरस्वती भी नहीं कर सकती, उसी प्रकार गौड़वैदर्भ-सम्प्रदायान्तगत उपभेदों के बीच वर्तमान महान् भेदका वर्णन अशक्य है॥ १०१-१०२॥ नैसर्गिकी च प्रतिभा श्रुतं च बहु निर्मलम्। अमन्दश्राभियोगोऽस्या: कारणं काव्यसम्पद्ः॥ १०३॥। एतावता प्रन्थेन काव्यस्वरूपमभिधाय सम्प्रति तत्कारणमाह-नैसर्गिकीति। नैस- र्गिंकी स्वभावसिद्धा पूर्वजन्मसंस्कारासादिता प्रतिभा प्रज्ञा तथा संशयादिमलसम्प्र्करहितम् बहु नानाशास्त्रविषयं परिशीलनं श्रुतम् शास्त्रान्यसनम्, तानि च शास्त्राणि पदवाक्य- प्रमाण साहित्यच्छन्दोऽलद्कारश्रुति स्मृतिपुराणेति हासागमनाव्याभिधान कोशकामार्थयोगशास्त्रा- दिरूपाणीति परिगणितमाचार्यैः, तथा अ्मन्दः महान् अभियोग: काव्यविच्छिक्षया पुनः पुनः काव्यकरणप्रवृत्तिरित्येतत्त्रयं काव्यसंपद: काव्यसम्पत्तेः साधुकाव्यनिर्मिते कारणम्। कारणमित्येकवचनेन कारणता व्यासक्ता न तु प्रत्येकपर्याप्तेति बोधितम्॥१०३ ॥ हिन्दी-यहाँ तक सोपोद्वात काव्यस्वरूपवर्णन किया गया, अब इस कारिकासे काव्यका कारण बताते हैं। पूर्वजन्मसंस्कारासादित प्रतिमा, नानाशाखत्रपरिशोलन और काव्य करनेका सतत अभ्यास ये ही तीन वस्तु मिलितरूपमें काव्यके प्रति कारण हैं। कारणपदमें एकवचन विभक्ति सम्मिलित कारणताकी अमिव्यक्ति करती है। यहाँ पर अन्यान्य आचार्योंके मतरमें काव्यकारणत्वका जो विचार किया गया है, वह भी संक्षेपमें प्रस्तुत किया जाता है। अतिप्राचीन भालक्ारिक भामहने कहा है- 'काव्यं तु जायते जातु कस्यचिव प्रतिभावतः। शब्दाभिधेये विज्ञाय कृत्वा तविदुपासनम्॥ विलोक्यान्यनिबन्धांश्च कार्यः काव्यक्रियाऽडदरः'। इन शब्दोंमें मामइने प्रतिभा, काव्यश्वशिक्षा और विविध शास्तरज्ञानको कारण माना है। यहाँ इतना स्पष्ट समझ लेना चाहिये कि भामइने प्रतिमाको प्राधान्य दिया है और काव्यज्ञ- शिक्षा तथा अभ्यासको सहायक माना है परन्तु दण्डीने तीनोंको समान मावसे कारण पदपर आसोन किया है। वामनने कहा है-'लोको विद्या प्रकीणक्चेति काव्याङ्गानि'। 'लोकवृत्तं लोकः, शब्दस्मृश्यमि- धानकोशच्छन्दोविचितिक लाकामशाखरदण्डनीतिपूर्वा विद्याः, लक्ष्यज्ञत्वममियोगो वृद्सेवावेक्षणं प्रतिमानमवधानक् प्रकीणम्, कवित्वबीजं प्रतिमानम्, जन्मान्तरगतसंस्कारविशेष: कक्षित, यस्ष्मा- द्विना काव्यं न निष्पधते, निष्पन्नं वा हास्यायतनं स्याव'। इस प्रकार वामनने मामदके पक्षमें ही अपना साक्ष्य दिया है ऐसा प्रतीत होता है, रुद्रटने अपने काव्यालक्कार में इस प्रकार कहा है- 'त्रितयमिदं व्याप्रियते शक्तिव्युंत्पत्तिरभ्यासः'। रुद्रटके इस वचनसे काव्यप्रकाशकारके मतकी पुष्टि होती है, काव्यप्रकाशकारने कहा है-

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७२ काव्यादर्श:

इससे काव्यकारणता व्यासव्यवृश्या त्रितयगत है यह दण्डोका मत प्रमाशित किया जाता है। पीयूषवर्षी जयदेवने कहा है- 'प्रतिमेव झुताम्याससहिता कवितां प्रति। हेतुमृंदम्पुसम्बद्धबीअव्यक्तिलंतामिन'॥ इस प्रसङ्में एक बात ध्यान देने योग्य है कि तरितयकारणताबादी लोगों में दो सम्प्रदाय है, एक समान भावसे कारणतावादी, दूसरे प्राधान्येन प्रतिमाकारणवादी होकर भी व्युत्पत्ति तथा अम्यासको सहायक माननेवाले। प्रथम पक्षमें स्पष्टतः काव्यप्रकाशकार, दण्डी आदि आते हैं और द्वितीय पक्षमें वामन, रद्रट, जयदेव आदि। पण्डितराज नगनायने केवल प्रतिमाको कारण माना है, वह कहते हैं- 'तस्य च कारणं केवला कविगता प्रतिमा, नतु न्रवमेव, वाळादेस्तौ (व्युत्पर्यम्यासौ ) विनापि केवलान्महापुरुषप्रसादादपि प्रतिभोत्परेः'। पण्डितरायको अपने सिद्धान्तका बीज राजशेखर के अ्रन्थ काव्यमोमांसामें मिक् था, वहाँ कहा है- 'सां अक्तिः केवलं काग्ये हेतुरिति यायावरोयः। विप्रसृतिश्च सा व्युत्पश्यम्यासाभ्याम्। शक्ति- ककेसृँ हि प्रतिभाम्युत्पन्तिकमणी। शक्तस्य प्रतिमाति। शक्तश्र व्युरपधते' ॥ १०३ ॥ न विद्यते यद्यपि पूर्ववासनागुणानुबन्धिप्रतिमानमङ्भुतम्। ध्रुतेन यत्नेन च वागुपासिता ध्रुवं करोत्येव कमप्यनुग्रह्म् ॥१०४॥ यद्यपि सहजा प्रतिभा पुरुषप्रयत्नसंपाधा न भवति, तथाऽपि सहजप्रतिभाऽभावेऽपि कवित्वम् संभवति तदाह-न विद्यत इति। अद्भुतम् अलौकिककवि ताप्रकटीका रेणा- वर्यावहम् पूर्ववासनागुणानुबन्धि प्राक्तनसंस्कारसंबद्धम् प्रतिभानम् प्रतिभाशक्ति: यद्यपि न विद्यते, तथापि श्रुतेन तत्तच्छात्त्रपरिशीलनेन यत्नेन काव्यज्ञशिक्षया काव्यकरणाभ्या- सेन च उपासिता सेविता वाकू कमपि अनुप्रहम् काव्यकरणसामर्थ्यरूप प्रसादम् करोत्येव। ध्रुवमित्यनेन व्यभिचारशङ्का निरस्ता। प्रतिभाऽभावेऽपि शास्त्राभ्यासकवितानिर्माणप्र- वृत्तिभ्यां जायते काव्यकरणसामर्थ्यमिति भावः। एतेन प्रतिभाऽभावेऽपि कालिदासादयः प्राक्नप्रतिभाऽभावेऽपि देव्याराधनादिना प्रतिभां प्रादुर्भावयामासुरिति यत्रस्य सार्थ- क्यमुक्तम्॥। १०४ ॥ हिन्दी-पच्यपि वह अद्भुत प्रतिभा, जो पूर्व्रकी वासना-प्राक्तन संस्कारसे सत्पन्न होती है, न मी हो, तवापि पठन तथा काव्याभ्यासके द्वारा सरस्वतीकी सेवा करने वालोंके ऊपर सरस्वती अवश्य अनुग्रह् करती है। प्राक्तनसंस्कार वशोन्मिषित प्रतिमाके न रहने पर मो यदि सकोंका अध्ययन तथा काव्य करनेका अभ्यास जारी रखा जायगा, तो सरस्वती अवश्य कविता- निर्माणमें साफस्यरूप अनुग्रह करेगी॥ १०४ ॥ वदस्तन्द्रैरनिशं सरस्वति श्रमादुपास्या खलु कीर्तिमीप्सुभिः। कशे कवित्वेऽपि जना: कृतश्रमा विद्ग्धगोष्ठीषु विद्दर्तुमीशते ॥ १०५॥ इत्याचार्यदण्डिनः कृतौ काव्यादर्शे मार्गविभागो नाम प्रथम: परिच्छेदः।

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प्रथम: परिच्छेद: ७३

तत् तस्मात् (सेविता सरस्वती निश्वयेन दयते इति हेतोः) अस्ततन्द्रैः आलस्यरहितैः कीर्तिमोप्सुभिः कवित्वादिजनितशयोऽभिलाषशालिभि: अ्निशं सततम् सरस्वती उपास्या खलु निश्चयेनाराध्या। कदाचित् कवित्वे काव्यनिर्माणे कृशे स्वल्पे अपि कृतश्रमाः कृतकाव्यनिर्माणाभ्यासा जना: विदग्धगोष्ठीषु सहृदयसमाजेषु विहत्तु सरसतया काव्य- रहस्यजञत्वेन यथायर्थं काव्यानि बोद्धुम् ईशते क्षमन्ते, प्रतिभाया अभावेप्पि यदि लोकोडनलस: सन् काव्यकर्मणि व्याप्रियते, तदाऽसत्यपि काव्यनिर्माणप्रावीण्ये काव्यार्थ- इञत्वमासाद्य सरसजनसमाजे दक्षतामुपयाति, सरस्वत्युपासनं व्यर्थ नैव जायते, अतः सर्वथा सरस्वत्युपासनीयेति भावः ॥। १०५॥ हिन्दी-इसलिये कीतिकी कामना रखने वाकोंको चाहिये कि वे आलस्यका त्याग करके परिश्रमपूर्वक सरस्वतीकी उपासना-राख्त्राध्ययन तथा काव्यकरणाभ्यास में तत्पर रहे, (प्रतिमाके नहीं रहनेके कारण शाख्रज्ञान और अभ्यासके होने पर भी यदि) कवित्वका उद्धव अत्यरप- मात्रामें होगा, नहींकी मात्रामें होगा, तथापि सरस्वदीकी निरन्तर उपासना करने वालोंको रसिक जनगोष्ठोमें काव्यार्थज्ञानशक्तिसे यथोचित व्याहार तथा व्यवहारकी क्षमता प्राप्त से जायगी, सरस्वतीकी उपासना व्यर्थ नहीं हो सकती है, कवि न हो, काव्यश होकर रहेंगे॥ १०५॥ इति मेथिल पण्डित श्रीरामचन्द्रमिश्रशर्मप्रणी ते काम्यादर्श प्रकाशे' प्रथमपरिच्छेद् 'प्रकाशः'।

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द्वितीय: परिच्छेद: काव्यंशोभाकरान् धर्मानलक्कारान् प्रचक्षते। ते चाद्यापि विकल्प्यन्ते कस्तान् कारत्स्न्येन वक्ष्यति॥१॥। अथावसरप्राप्तान अलङ्काराननिरूपयितुकामो दण्डी प्रथममलङ्कारसामान्यलक्षणमाह- काव्यशोभेति। काव्यस्य इष्टार्थव्यवच्छिना पदावलि; काव्यमिति लक्षितस्वरूपस्य शोभाया: रमणीयतायाः कराः सम्पादका ये धर्मा अनुप्रासोपमादयस्तान अल्कारान् प्रचक्षते आहुः प्राचीना इति शेषः। यथा सौन्दर्यमण्डितस्य वपुषो हारादय: शोभामति- शाययन्ति, तथा गुणवतः काव्यस्यानुप्रासोपमादयः शोभां पुष्यन्ति इत्याशयः, एतेना- लङ्ढाराणां शब्दार्थगतत्वं प्रतीतितं कृतम्। स्फुटीभविष्यति चेदमग्रे-'इति वाचामलक्काराः पश्चैवान्यैरुदाहृताः' इत्युपक्रमे, 'गिरामलङ्कारविधिः सविस्तरं स्वयं विनिश्चित्य धिया मयोदितः' इति चोपसंहारे। भरतेनाप्यत्र प्रसङगे इत्थमेवोक्तम्-'काव्यस्यैते ह्यलद्वारा- श्वत्वारः परिकीर्तिताः'। वामनोऽप्याह-'काव्यशोभायाः कर्त्तारो धर्मा गुणाः, तदति- शयहेतवस्त्वलङ्घाराः' । अयमेव च गुणालङ्कारयोर्भेंदो यद् गुणा नित्याः, तैर्विना काव्यशो- भानुपपत्तेः, अलङ्कारास्तु चलस्थितयः। एतच्चालङ्कारलक्षणनिर्वचनप्रसङगे प्रतिपादितमा- चार्यैः, तथा च काव्यप्रकाश :- 'ये रसस्याद्विनो धर्माः शौर्यादय इवात्मनः। उत्कर्षहे- तवस्ते स्युरचलस्थितयो गुणाः ॥l उपकुर्वन्ति तं सन्तं येऽमद्वारेण जातुचित्। हारादिवद- लङ्कारास्तेऽनुप्रासोपमादयः ॥' काव्यप्रदीपकारोऽपि लक्षणनिर्वचनवर्त्मनार्थमिममावर्त्तयति- 'रसोपकारकत्वे सति तदवृत्तित्वं, तथात्वे सति रसव्यभिचारित्वम्, अ्रनियमेन रसोप- कारकत्वं चेति सामान्यलक्षणत्रयमलङ्काराणाम्।' एतावताऽलङ्कारसामान्यं लक्षितम्, सम्प्रति तत्तदलङ्काराणां बहुप्रभेदत्वं विभाव्य तद्विवेचने स्वस्यासामथ्य सविनयमुपन्यस्यति- ते चाद्यापीति। ते च अलङ्काराः अद्यापि सम्प्रति अपि विकल्प्यन्ते विविधकल्पनाभिः नवनवा उद्भाव्यन्ते, तथा चोक्तं ध्वन्यालोके-'सहस्रशो हि महात्मभिरन्येरलङ्कारप्रकाराः प्रकाशिता: प्रकाश्यन्ते च' इति। अतः कः तान् अलक्कारान् कात्स्न्येन वक्यति साकल्येन निरूपयिष्यति। मेधाविनां कल्पनायाः कदापि विरामाभावात् कल्पनाप्रभविनामलङ्कारा- णामियत्तया परिच्छिद निरूपणमशक्यमिति तात्पर्यम् ॥१॥ हिन्दी-काव्यकी शोभाको समृद्ध करनेवाले धर्मोको अलक्कार कहते हैं, पूर्वोक्तस्वरूप काव्यकी शोभा जिनसे बड़े ऐसे धर्म अलद्कार कहे जाते हैं। जैसे सौन्द्यमण्डित शरीरको हारादि अलद्कार अधिक सशोभित करते हैं उसी तरह गुणयुक्त काव्यको अनुप्रासोपमादि अधिक शोभासम्पन्न बनाते हैं। काव्यप्रकाशकारने अलक्वारका जो लक्षण दिया है उससे प्रसङ्ग स्पष्ट हो जाता है, उन्होंने लिखा है- 'उपकुर्वन्ति तं सन्तं येऽजद्वारेण जातुचित। दारादिवदलक्कारास्तेऽनुप्रासोपमादयः। अर्थाद जैसे हार आदि आभूषण कण्ठ आदि अङ़गके सौन्दर्यवर्धक हुआ करते हैं, उसी तरह उपमा आदि अलकूार शब्द और अर्थरूप अङ्गके सौन्दर्यवर्षक हुआ करते हैं।

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द्वितीय: परिच्छेद: ७५

इस प्रसम्नमें इतना जान लेना आवश्यक है कि प्राचीन आचार्यगण अलद्धारोंको शब्दार्थगत मानते थे, दण्डीने भी इसी बातको स्वीकार किया है, उन्हें अळक्टारोंसे रसोत्कर्षकी चिन्ता नहीं थी, परन्तु बादके आचार्योंने अलद्धारोंसे रसको उत्कृष्ट बनानेकी दिशामें ध्यान दिया। काव्य- प्रकाशकारने कहा है- 'ये वाच्यवाचकलक्षणाङ्गातिशयमुखेन मुख्यरसं सम्भविनमुपकुर्बन्ति ते कण्ठाबज्ञानामुत्कर्षा- धानद्वारेण शरीरिणोऽ्युपकारका हारादय इवालक्काराः। यत्र तु नास्ति रसस्तत्रोक्तिवचित्रयमात्र- पर्यवसायिनः'। इसका अनुवाद इस प्रकार किया गया है- 'कविताके अलक्कार वे हुआ करते हैं जो कविताके वाचक और वाच्य-शब्द और अर्थरूप अङ्गों के सौन्दर्यकी वृद्धि किया करते हैं, और उसी प्रकार किया करते हैं जैसे हार आदि आभूषण किसी सुन्दरीके कण्ठ आदि अङ्गों की। किन्तु अलद्धारोंसे वाच्यवाचकरूप अग्गोंकी सौन्दर्य- वृद्धि तभी संभव है जबकि कविताका व्यक्तित्व-कविताका रसरूप आत्मतत्व सुन्दर हो, क्योंकि आभूषणोंसे भी कण्ठ आदि अङ्गोंकी श्रीवृद्धि तमी हुआ करती है जब कि उन्हें चारण करने वाली स्त्री सुन्दरी हो, अन्यथा तो जैसे किसी कुरूप स्त्री के हार आदि आभूषण देखने वालोंके लिये दृष्टिवैचित्र्यसे लगने लगते हैं, वैसे हो नीरस कविताके अनुप्रास आदि अलक्कार पढ़ने वालोंके लिये वैचित्र्यमात्र प्रतीत होते हैं। इस प्रकार अलङ्कारका लक्षण बताया गया, अब उसका समग्रमावसे वर्णन करना संमव नहीं है क्योंकि वे तो प्रतिदिन नये-नये बनते हैं, अतः किसकी क्षमता है कि उनका समग्र मावसे निरूपण कर सके, यह बात उत्तराधसे कही गई है। आचार्य दण्डोने इस कारिकार्धसे अपनी नम्रता प्रकट की है, उनका कहना है कि ध्वनिकारके शब्दोंमें-'सहस्रशो हि महात्ममिरन्यैरलक्कारप्रकाराः प्रकाशिता: प्रकाश्यन्ते च' प्रतिदिन मेधावियोंकी कल्पनायें नयी-नयी कक्पनाओं द्वारा नये-नये अलक्कारोंको प्रस्तुत किया करती हैं, इस दशामें अलक्कारोंका समग्रभावसे वर्णन कर सकना किसीके लिये संभव नहीं है, फळतः मैं भी वैसा नहीं कर सकूंगा ।। १॥। किन्तु बीजं विकल्पानां पूर्वाचार्यैः प्रंदर्शितम्। तदेव प्रति संस्कर्ततुमयमस्मत्परिश्रमः ॥२॥ 'कस्तान् कारत्स्न्येन वच्यति' इति प्रागलङ्काराणामानन्त्यादसंभवदुक्तिकत्वं निरूपितं, ततश्चायमुद्यमो माकारीति चेत्तत्राह-किन्त्विति। किन्तु तथापि अलङ्काराणामानन्त्येपि विकल्पानाम् अरवाचीनकृत कल्पनाप्रभवाणामलङ्काराणां बीजं सामान्यमूलम् पूर्वाचार्यः भर- तादिभिः प्रदर्शितम उत्तम्, तदेव प्राचीनोक्तं विकल्पबीजं प्रतिसंस्कर्तत सम्यक्तया स्फुटी- कर्त्तुम् अयम् एतद्ग्रन्थप्रणयनरूपोऽस्मत्परिश्रमः आयासः। यथा नवीनैरुद्भाविता- नामुपमाभेदानां बीजं भरतेन 'उपमा नाम सा ज्ञेया गुणाकृतिसमाश्रया' इत्युपन्यस्तम्, तद्धदास्तु तदेव बीजमाधारीकृत्यान्येः कल्पिताः तदेव तादृशं बीजजातमन्विष्य प्रति- संस्कर्त्तुमहमुद्यतोऽस्मीति भावः ॥ २ ॥ हिन्दी-पूर्वाचारय भरत आदिने नये-नये आविष्कृत किये जाने वाले अलक्धारोंके बीज- संक्षिप्तरूप से बतलाये हैं, यह मेरा एतद्अन्थनिर्माणरूप परिश्रम इसीलिये हो रहा है कि प्राचीनोक्त धलकार बीजोंका विाद विवेचन किया जाय।

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७६ काव्यादर्श:

इससे पहली कारिकामें विकश्यों को अनन्त बता कर अलक्टारोंका समग्र विवेर्चन असाध्य कहा गया था, उसपर यह शङ्ट्रा की जा सकती थी कि जब अलक्कारनिवचन असाण्य कार्य है तब चन्द्रविम्बाहरणकी तरह उसे छोड़ ही क्यों न दिया जाय, इसी शक्काका उत्तर प्रकृत कारिकामें दिया गया है। इस कारिकामें दण्डीने बताया है कि जो अलक्टारबीज प्राचीनोंने बताये हैं, मैं उनका विशद विवेचन प्रस्तुत करनेके लिये यह अ्न्थ लिख रहा हूँ।। २॥ काश्चिन्मार्गविभागार्थमुक्ता: प्रागप्यल ङक्रियाः। साधारणमल क्कार जातमन्यत् प्रकाश्यते॥ ३ ॥ तदित्यं सामान्यतोऽलक्ारनिरूपणस्योपक्रान्तत्वं समर्थितम्। इतः पूर्व प्रसन्गतो निर्णीतानां श्रुत्यनुश्रसादीनामलक्वाराणां निरूपणमसम्बद्धमस्थानगतं च मा प्रसाङक्षी- दिति स्पष्ट्यति-काश्चिदिति। काश्षित् श्रुत्यनुप्रासवृत्त्यनुप्रासयमकादयः अलड्वक्रियाः अलद्काराः मार्गविभागार्थम् गौडदैदर्भमार्गयोर्भेदस्य स्फुटीकरणार्थम् प्राग इतः पूर्वमपि प्रथमपरिच्छेदे उक्ताः, अतः परतस्तदवर्णनेषि न न्यूनता। अन्यत् पूर्वोक्तालक्कार- भिन्नम् साधारणम् उभयसम्मतम् गौडवैदर्भमागद्वयसमानम् अलङ्कारजातम् अलङ्कार- समुदयः प्रकाश्यते लक्षणोदाहरणादिना विशदीक्रियते ॥ ३॥ हिन्दी-इससे पहले प्रथम परिच्छेद्में मो हमने श्त्यनुप्रास आदि अलक्ारोंके निरूपण किये थे, वह प्रसक्गवश किया गया था, क्योंकि गौड़ वैदमरूप प्रस्थानद्यके निरूपणमें उनक्रा परिचय अपेक्षित था, क्योंकि श्रत्यनुप्रास वैदर्भमागंसम्मत है, गौढ़में नहीं, इत्यादि बातें बिना अलक्कार-स्वरूप-परिचयके स्पष्ट नहीं हो सकती थीं, अतः प्रसङ्गवशात कुछ अलक्कारोंका परिचय कराया गया था, अब इस परिच्छेदमें साधारण-उमयमार्गानुमोहित-गौड़ वैदर्भ दोनों प्रस्थानों में समान भावसे आद्रियमाण अन्य अलक्कारोंके निरूपण किये जायेंगे। १॥ स्वभावाख्यानमुपमा रूपकं दीपकावृती। आक्षेपोऽर्थान्तरन्यासो व्यतिरेको विभावना॥।४॥ समासातिशयोत्प्रेक्षा हेतु: सूक्ष्मो लवः क्रमः । प्रेयो रसवदूर्जस्वि पर्यायोक्तं समाहितम् ॥ ५॥ उदात्तापछ्द्तुतिश्लेष विशेषास्तुल्ययोगिता। विरोधाप्रस्तुतस्तोत्रे व्याजस्तुतिनिदर्शने ॥६॥ सहोक्ति: परिवृत्त्याशीः संक्कीर्णमथ भाविकम्। इति वाचामलक्वारा दर्शिता: पूर्वसूरिभिः।।७।। अलक्कारेषु लक्षणीयेषु तान्नामप्राहं गणयति-स्वभावाख्यानमिति। स्वभावाख्यानं स्वभावोक्तिः उपमा रूपक्रम् दीपकं च आवृत्तिश्व दीपकावृती आवृतिपदं वृतेः कित्प्रत्ययेन निवृत्तम्, आवृत्तिदीपकं नामालक्कारं बोधयितुं प्रयुज्यते। आच्ेप:, अर्थान्तरन्यासः, व्यतिरेको, विभावना, समासो नाम समासोकि, अतिशयः अतिशंयोकि उत्प्रेक्षा, हेत: सूकष्म:, लव :- लेश:, क्रमः, यथासकख्यम, प्रेयः, रसवत्, ऊर्जस्वि, पर्यायोकम्, समाहितम् समाधिपरनामकम्, उदात्त: अपह्नुति:, श्लेष:, विशेष:, विशेषोकिन

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द्वितीय: परिच्छेद: ७७

तुल्ययोगिता, विरोध:, अप्रस्तुतस्तोत्रम्, अप्रस्तुतप्रशंसा, व्याजस्तुतिः, निदर्शना, सहोकि:, परिवृत्तिः, आाशीः, संकीर्णम्, संसष्टिः भाविकम्, इति एते वाचाम् अलद्ढाराः पूर्वसृरिभिः दर्शिताः। एतेषां पञ्चत्रिंशत्सक्ख्यकानामुददिष्टनामकानामलक्वाराणामर्यालक्कारत्वे स्थितेऽ्पि वाचामलङ्कारा इति कथनं शब्दार्थयोवै याकरणाभिमतमभेदमारोप्य कृतम्, पूर्वसूरिभिद्शिता इति कथनेन प्राचीननिर्दिष्टा एवालक्कारा मया लक्षणोदाहरणादिना विव्रियन्ते नतु स्वयम- लङ्कारा: कल्प्यन्ते, तादृशकल्पनाप्रसूतानामलक्काराणामानन्त्यादिति प्रकाशितम्॥।४-७॥ हिंन्दी-अळक्धारोंका निरूपण करना है, अतः पहके उनके नाम निर्देश कर दिये जाते हैं : १-स्वमावोक्ति, २-उपमा, ३-रूपक, ४-दीपक् ५-आयृत्िदीपक, ६-आक्षेप, ७-अर्थान्तर- न्यास, ८-व्यतिरेक, ९-विभावना, १०-समासोकि, ११-अतिशयोक्ति, १२-उतप्रेक्षा, १२-हेत्रु, १४-सूक्ष्म, १५-लेश, १६-यथासक्तय, १७-प्रेयः, १८-रसवद, १९-ऊर्जर्व, २०-पर्यायोक्त, २१-समाधि; २२-उदात्त. २३-अपछ्नुति, २४-श्लेष, २५-विशेष, रव-तुश्ययोगिता, २७-विरोष, २८-अप्रस्तुतप्रशंसा, २९-व्याजस्तुति, २०-निदशना, ३१-सहोकि, ३२-परिवृत्ति, ३२-भजीः, ३४-संसृष्टि, ३५-माविक। यही पैंतीस अलक्कार प्राचीन आचार्योने माने है, ये अलद्गार यध्यपि अर्थगत हैं, तथापि इन्हें वाणीका-शष्दका अलक्कार इसलिये कहा जाता है कि शब्द और अर्थमें अभेद माना जाता है, शब्दार्थतादात्म्य वैयाकरणोंका सिद्धान्त है॥ ४-७॥ नानावस्थं पदार्थानां रूपं साक्षाद्विवृण्वती। स्वभावोक्तिश्च जातिश्चेत्याद्या सालडकृतिर्यथा॥८॥ क्रमप्राप्तेलक्कारनिरवचने प्रथमपरिगणितां स्वभावोकि लक्षयति-नानावस्थमिति। आद्या अल्कारनामनिर्देशावसरे प्राथम्येनोद्िष्ा अलङ्कृतिः स्वभावोकिः जातिश्वेति नामद्वयवती। तल्लक्षणं तु नानावस्थमिति। पदार्थानां तत्तद्भेदभिन्नानाम् पदार्बानां स्थावरजअमात्मकवस्तूनाम् नानावस्थम् जातिगुणवियाद्रव्यवशेन विविधप्रकारकम् रूपम् स्वरूपविशेषम् साक्षात् विश्रुण्वती सूक्ष्मत्वाद् दुर्दशमपि प्रत्यक्षमिव दर्शयन्ती (स्वभावोक्ति: र्नामालडकृतिर्भवतीति शेष: ) एवञ्च वस्तुनो यथावत् स्वरूपस्फुटीकरणसमर्थमसाधारण- धर्मवर्णनं स्वभावोक्तिरिति लक्षणं फलितम्। अलङ्कारसामान्येऽपेक्षितं चमत्कारकत्व त्वत्रापि निक्षयेनापेक्षितम्, अतक्ष- 'दीघपुच्छश्रतुष्पाद: ककुद्माँल्लम्बकम्बलः । गोरपत्यं बलीवर्दस्तृण मत्ति मुखेन सः'॥ इत्यादी नायमलङ्कारः, अलङ्कारजीवातोश्षमत्कारस्यानुपलब्घेः ॥ ८॥ हिन्दी-मिन्न मिन्न अवस्थाओंमें स्थित पदार्थोंके रूपमें स्थित, पदार्थोंके रूपको प्रत्यक्ष करके दिखलानेवाली अरुड्कृति स्वमावोक्ति या जाति नाम से प्रथित है, अर्थाद जिसमें पदार्थोका ऐसा सजीव स्वामाविक वर्णन हो जिससे उनका प्रत्यक्ष-सा दर्शन होने कगे उस अळक्गारका नाम स्वभावोक्ति या जाति है, वह आदिम है अर्थाद इस अन्थमें प्रथम गृहीत है। इस तरह स्वमावोक्तिका यह लक्षण प्रकट होता है कि किसी वस्तुका बथावत् स्वरूप-स्फुटीकरणसमर्थ भसाधारणवर्म-वर्णन स्वमावोक्ति अलक्कार है। यहँ पर इतना अवश्य ध्यानमें रखना चाहिये कि सभी अलक्टारों में अलकार सामान्यापेक्षित चमत्कार आवश्यक है, अतः यहाँ भी स्वरूपवर्णन में यदि चमत्कार नहीं होगा तो मलक्वार नहीं होगा, जैसे- சலை 1 சிசான் ச்கச்ானி் க்க் 2! 11

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50 काव्यादर्श:

प्रतोपते मम्यते अमिधादिवृत्त्या प्रतीयते सा उपमा नामालक्कार:, तथा च काव्यनिष्ठं भमत्कारजनकं द्वयो: सादृश्यमुपमेति लक्षणं सिद्धयति चमत्कारविरहे सादृश्यं नोपमा, यथां गौरिव गवय इत्यत्र। उक्तव रसगन्नाधरे-'सादृश्यं सुन्दरं वाक्यार्थोपस्कारक- मुपमा, सुन्दरमिति सादृश्यविशेषणम्, सौन्दर्य च चमत्कृत्याधायकत्वम्, चमत्कृतिश्वा- नन्दविशेषः । तस्या उक्तलक्षणाया उपमाया अयं सदो वत्त्यमाणलक्षणः प्रपश्वो विस्तरः प्रदर्श्यते उदाहरणादिना प्रकाश्यते॥ १४॥ हिन्दी-उद्देशकमप्राप्त उपमालक्वारका लक्षण बताते हैं, जिस काव्यमें यथाकथश्रित जिस किसी तरएसे गुंणक्रियादि द्वारा स्फुट सादृश्य प्रतीत हो वह उपमा है, अर्थाद दो वस्तुओंक। सादृश्य उपमालक्कार है। इस सादृश्य में चमत्कारयनकत्व होना आवश्यक है, अतरव- 'गौरिव गवयः' इस वाक्यमें स्फुट सादृश्य रहने पर भी उपमाकक्कार नहीं होता है क्योंकि चमस्कार नहीं है। उपमाडलकारके चार अज्त होते है-उपमान, उपमेय, साधारण धर्म, उपमावाचक। सादृश्य प्रतियोगी उपमान कहा जाता है और सादृश्यानुयोगी उपमेय कहा जाता है। उपमान और उपमेय इन दोनोंमें रहनेवाका समान धर्म साधारण धर्म कहलाता है। इवादि शब्द उपमावाचव कहलाते है। जैसे-'कमलमिव मुखं मनोक्म्' इस वाक्यमें मनोशतारूप धर्मके द्वारा कमलवे साथ मुखकी छपमा दी गई है। अतः मनोशतव सावारण धर्म हुआ, कमल उपमान, मुख उपमेर और इव शब्द उपमाका वाचक शब्द हुआ ॥ १४॥ अम्भोरुह्मिवाताम्रं मुग्धे करतलं तव। इति धर्मोपमा साक्षाचुल्यधर्मप्रदंर्शनाव्॥१५॥ हे मुग्धे सुन्दरि, तव करतलम् पाणितलम् अम्भोरूहमिव कमलतुल्यम् आता रक्तम् इति एताटक साधारणधर्मप्रयोगात्मा धर्मोपमानामोपमाप्रपकः, तत्र हेतुमाह- साक्षादिति। साक्षात् शब्दतः तुल्यधमस्य द्वयोः समानस्य धर्मस्य आताम्रत्वर प्रदर्शनात् प्रकाशनात्। अत्रेवशन्दश्रवणाच्छ्रौत्युपमा। उपमानोपमेयसाधारणधर्मसादृश्य वाचकानां प्रयोगाच्च पूर्णेयमुपमा ॥१५॥ हिन्दी-रे मुग्बे, तुम्हारा करतक कमलके समान रक्तवर्ण है, यह धर्मोदमा हुई, क्योंकि श वाक्यमें शब्दतः भाताम्रत्वरूप तुश्यधर्म प्रकाश्षित किया गया है। उपमाके चारों अङ्ग जहां पर उपास् रहते हैं वह पूर्णोपमा है, जहां पर एक, दो या तीन अनुपादान होता है, वह लुप्तोपमा होती है, इस प्रकार के भेद अर्वाचीन आचार्योंने बताये हैं, परन दण्डीने प्राचीनाभिमत भेद ही स्वीकार किये हैं। धर्मोपमा और वस्तूपमाका वर्णन अग्निपुराण भी किया गया है- 'वत्र साधारणो धर्मः कथ्यते गम्यतेऽयवा। से धर्मवस्तुप्राषान्याद्षमंवस्तूपमे ठमे॥ २५॥ राजीवमिष ते वषत्रं नेत्रे नीलोत्पले इव। हयं प्रतीयमानैकधर्मा वस्तूपमैध सा।।१६।। राजीवमिवेति। ते तव वक्त्रं मुखम् राजीवम् कमलम् इक, नेत्रे नयने नीलोत्प नीलकमले डव, इयं निर्दिश्यमानस्वरूपा उपमा प्रतीयमानः शब्देनानुच्यमानत

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द्वितीय: परिच्छेद:

गम्यमान: एकधर्मः साधारणधर्मों यस्यां सा वस्तूपमा भवतीति शेषः। यत्रोपमानोपमे- योपमावाचकानां शब्दत उपादानं साधारणधर्ममात्रं तु गम्यमेव सा वस्तूपमेति फलितार्थः, तदुदाहरणमेतदुक्त्तम्। इमामर्वाचीना धर्मलुप्तोपमापदेनाभिलपन्ति ॥१६॥ हिन्दी-तुम्हारा मुख लाल कमलके समान है, और तुम्हारे नयन नील कमलके समान हैं, इस पद्यार्थमें वस्तूपमानामक अलक्कार है क्योंकि इसमें उपमान और उपमेयका साधारण वर्म शब्दोपात्त नहीं है प्रतीयमान है। आशय यह है कि जिस वाक्यमें उपमान, उपमेय और उपमा- वाचक शब्दका प्रयोग रहे, परन्तु साधारण धर्म शब्दोपास नहीं हो, उसकी प्रतीति (किसी तरह) हो जाती हो, उसे वस्तूपमा कहते हैं, जैसे-'राजोवमिव' इस पदार्धमें कमल तथा मुखका साधारण धर्म मनोकता प्रतीयमान है। अर्वाचोन आचार्य इस तरहकी उपमाको वस्तूपमा नहीं कह कर धर्मलुप्तोपमा नामसे पुकार ते हैं॥ १६ ॥

सा प्रसिद्धिविपर्यासाद्विपर्यासोपमेष्यते । १७॥ स्वदाननमिति। उभनिद्रम् प्रबुद्धम् विकसितं कमलम् त्वदाननमिव त्वदीयमुखमिय अभूत् आसीत, इति प्रसिद्धे: ख्यातेः-कमलमुपमानं भवति, मुखं चोपमेयं भवतीति प्रसिद्धे: विपर्यासात् वैपरीत्यात् विपर्यासोप्रमा नामालक्कार इष्यते। प्रस्तुतत्वेन वर्णनीयानां मुखादीनामुपमेयत्वम्, तदुत्कृष्टताप्रतिपादनाय न्यस्ताना चन्द्रारविन्दादीनामुपमानत्वं भवतीति कवित्वमार्गप्रसिद्धिः, यत्र काव्ये उपमेयोत्कर्षप्रतिपदनाय विपर्यासः उपमेयोप- मानभाव।वेपर्ययः क्रियते सा विपर्यासोपमा कथ्यत इत्याशयः ॥१७॥ हिन्दी-विकसित होनेपर कमल तुम्हारे मुखके समान हो गया, इस वाक्यमें प्रसिद्धिका विपर्यास हो गया है-अर्थात् प्रस्तुन मुखको उपमेय एवं कमलको उपमान रूपमें वर्णित होना चाहिये, वैसा नहीं करके मुखको हो उपमान एवं कमलको उपमेय बना दिया गया है, अतः यह विपर्यासोपमा हुई। नवीन आचार्य गण इस तरह के अलक्कार को 'प्रतोप' कहते हैं-कुवलयानन्द कारने लिखा है- 'प्रतोपमुपमानस्थोपमेयत्वप्रकम्पनम्। त्ल्लोचनसमं ं स्वद््सदृशो विुः॥ पण्डितराजने भी इसका यह उदाहरण दिया है- कि अश्पसि सुम्धतया इन्त ममार्झ सुवर्णवर्णमिति। तथ्दि पतति दुताशे तवा इताशे तवाङ्वर्ण स्याद'॥ १७॥ तर्वाननमिवाम्भोजम म्भोजमिव ते मुखम्। इस्यन्योन्योपमा सेयमन्योन्योत्कर्षशंसिनी ।।१८।। तवाननमिति। तब आननं मुखमिव अम्भोजम् कमलम्, अम्भोजमिव ते मुखम् इति एवम् अन्योन्यस्य परस्परस्य उत्कर्षस्य गुणगौरवस्य शंसिनि कथयित्रीयम् अन्यो- न्योपमा नाम अलङ्कारः। अयमाशयः-यत्र तृतीयसदृशव्यवच्छेदार्थम् उपमानोपमेययो: परस्परसादृश्यं निबध्यते साऽन्योन्योपमा नाम। उपमानं कमलम् उपमेयं मुखं च निबद्धय तयोः पुनः कमलम् उपमेयम् मुखश्वोपमानं इत्येवं यत्र परस्परौपम्यप्रतिपादनं साऽन्योन्यो- पमेति भावः । अत्र द्वयोरपि मुखाम्भोजयो: प्रस्तुतत्वं बोभ्यम्, अम्भोजस्याप्रस्तुतत्वे तडु- • डलिनी।

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काव्यादर्श:

स्कर्षप्रतिपादनवैयर्थ्यात्। अप्पय दीक्षितोऽपि 'धर्मोडर्य इब पूर्णश्रीरर्थों धर्म इब त्वयि' इत्यु- भयप्रस्तुतत्वमेवोदाहृतवान् ॥ १८॥ हिन्दी-तुम्हारे सुखके समान कमल है, और कमलके समान तुम्हारा मुख है, इस वाक्यमें परस्पर उत्कर्षप्रतीति को जाती है अतः यह अन्योन्योपमा नामसे प्ररयात है। प्रस्तुतको उपमेय एवं अप्रस्तुत को उपमान बनाया जाता है, वहाँ पर दोनों ही प्रस्तुत हों वहाँ पर दोनों ही कमशः उपमेय और उपमान बनाये आाते है, इससे तृतीय सदृझका व्यवच्छेन पर्यवसित होता है, सुम्हारा मुख कमलके समान हे और कमल तुम्हारे मुखके समान है, इससे कमल और मुखके समान तोसरा कोई पदार्थ नहीं है यह प्रतीत होता है, इस तरहकी तुलनाको अन्योन्योपमा कहते है। अप्पभ्यदीक्षितने मी इस प्रसन्गमें उमयप्रस्तुतत्व स्वीकार किया है, जैसा कि 'धर्मोडर्यें हब पूर्णनीरथों धर्म हव स्वयि' इस उदाहरणसे स्पष्ट है। पण्डितराज जगनायने इसको अन्य अर्वाचीन आचार्योंकी तरह उपमेयोपमा नामसे व्यवहन किया है। उमके मतानुसार तृतीय सदृशष्यवच्छेद मात्र इसका फल है, और यह उभय प्रस्तुतमें ही हो ऐसा कोई बन्पन नहीं है, प्रस्तुताप्रस्तुतमें भी यह हो सकता है, उदाहरण के लिये उन्होंने किसा है- कौमुदीब मवती विभाति मे कातराक्षि मवतीष कोमुदी। अम्बुजेन तुलितं विलोचनं लोचनेन च तवाम्बुजं समम्॥ १८॥ त्वम्मुखं कमलेनैव तुल्यं नान्येन केनचिद्। इत्यन्यसाम्यव्यावृत्तेरियं सा नियमोपमा ॥१९ ॥ त्वनमुखमिति। त्वन्मुख कमलेनैव तुल्यम् अन्येन केनचिचन्द्रादिना तुल्यं न, तेषां तदपेक्षया हीनत्वात्, इति अत्र वाक्ये अन्यसाम्यव्यावृरेः अन्येषां चन्द्रादीनां सादृश्यस्य निषेधात् इयं नियमोपमा नामालङ्कारः। एकस्य वस्तुनो बहूपमानसद्भावे हीनताप्रत्यय इति सदशान्तरव्यवच्छेदपूर्वक यत्र क्वचनैकत्र सादृश्यं निबध्यते सा नियमोपमेति भावः॥१९॥ हिन्दी-तुम्हारा मुख कमलके समान है, दूसरी किसी मी वस्तुके समान नहीं है, १ह वाक्यमें दूसरी वस्तुओोंसे सादृश्यका प्रतिषेष हो जाता है अतः इसे नियमोपमा नामक अलद्ार कहते हैं। किसी भी वर्णनीय वस्तुका यदि उपमानवाहुश्य हो तो उसका अपकर्ष प्रतीत होत है, इसी दृष्टिकोणसे यदि एक उपमान बताकर उपमानान्तरप्रतिषेष कर दिया जाय तब उ नियमोपमा नामसे व्यवहृत किया जाता है। १९॥ पममं तावत्तवान्वेति मुखमन्यच ताडशम्। अस्ति चेदस्तु तत्कारीत्यसावनियमोपमा ॥२०॥ अनियमोपमां लक्षयति-पभ्ममिति। तावदिति वाक्यालक्चारे पद्म कमलम् त मुखम् अन्वेति अनुकरोति, अन्यत् कमलादितरत् चन्द्रादि तत्कारि त्वदीयमुखानुर्का अस्ति चेदस्तु, इति एवं नियमाभावात् उपमानविषये नियमाभावात् इयम् अ्रनियमोपम नामालक्कार इत्यर्थ: ॥। २० ॥ हिन्दी-कमल तो तुम्हारे मुखका अनुकरण करता हो है, यदि कमलातिरिक्त चन्द्रादि नोज् वयको यनिययोष्मा कहते हैं. क्योंकि इसमें उपमा

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द्वितीय: परिच्छेद:

समुचचयोपमाऽप्यस्ति न कान्त्यैव मुखं तव। हादनाखयेन चान्वेति कर्मणेन्दुमितीडशी॥ २१॥ समुचयोपमां लक्षयति-समुखयोपमेति। तव मुखं कोमलं कान्त्या एव न अपि तु हादनाख्येन अनुरजनाभिधेन कर्मणा क्रिययापि इन्दुम् चन्द्रम् अन्वेति, न केवलं कान्तिमात्रेण तव मुखं चन्द्रानुकारि किन्तु लोकनयनसन्त्पणाख्यकर्मणापीति एतादृशी समुच्चयोपमाऽपि अस्ति। अत्र गुणस्य कान्तेः हवादनाख्यस्य कमणश्च समुचयेन समुच्च- योपमानाम्ना व्यवहारः। ईदृशीतिकथनायथात्र गुणक्रिययोः समुच्चयस्तथा क्वचिदुदाहररो साधारणधर्मसमुचचयेऽपीयं भवतीति व्यजितम् ॥२१॥ हिन्दी-तुम्हारा मुख केवळ कान्सिसे हो नहीं, हादनरूप-लोकानुरखन रूप कमसे भी चन्द्रमाका अनुकरण करता है, केवल सौन्दर्यमात्रही नहीं कोकनेत्रप्रसादनरूप किया में भी तुम्हारे मुखको चन्द्रमाकी तुलना प्राप्त है, इस वाक्यमें समुचयोपमा है, क्योंकि इसमें गुण-कान्ति और क्रिया-हादनका समुचय है। इस कारिकामें 'इदृशी' कहा गया है जिसका अभिप्राय यह है कि ऐसी और मी समुचयोपमा होती है उसका साधारण नर्म समुखयमें संबय है।। २१। त्वय्येव त्वन्मुखं एष्ट दश्यते दिवि चन्द्रमाः । इयत्येव भिदा नान्येत्यसावतिरायोपमा ।।२२।। अतिशयोपमां लक्षयति-त्वय्येवेति। त्वन्मुखं त्वयि एव रष्टम्, दिवि भाकाशे चन्द्रमा: दृश्यते, इयती एव भिदा, एतावानेव भेद:, अन्य भिदा मेदो न, इति एवम् अतिशयोपमा भवतीति शेषः। उपमानोपमेययोर्महत्यपि भेदे वर्तमाने किश्िद्भेदं प्रदर्श्य नान्यो भेदो वर्तत इति अभिन्नताध्यवसानेनोपमेयस्य गुणक्रियातिशयो वर्णित इतीयमतिश- योपमा। अन्रेवादिशब्दा प्रयोगात्साम्यं व्यजनगम्यम् न चात्र रूपकथ्वनिः, आश्रयभेदस्य स्पष्टतयाभिधानेनाभेदप्रतीतेरभावात्। नापि व्यतिरेकः, उपमानादुपमेयाधिक्यस्याप्रतीतेः । तस्मादियमुपमैव ॥। २२॥ हिन्दी-तुम्हारा मुख केवल तुम में ही दोखता है, और चन्द्रमा आकाशमें दीखता है दोनोंमें केवल आश्रयमात्रकृत भेड ह नन्य भेद नहीं है, यह अतिशयोपमा कहलाती है। उपमान चन्द्र और उपमेय मुखमें यर्द्ाप बहुत भेद है, तथापि आश्रयभेदमात्रका प्रदर्शन करके अन्य भेद छिपा दिये गये है, और भभेदाध्यवसाप कर दिया गया है, जिससे उपमेय गुण-क्रियाका अतिशय प्रतीत होता हे इसीलिये इसे अतिशयोपमा कहते हैं। यहाँ साम्य व्यज्ञनगम्य है क्योंकि उसका वाचक हवादि शब्द प्रयुक्त नहीं है। इसको रूपकध्वनि नहीं कहा जा सकता है क्योंकि आश्रयभेदके स्पष्ट प्रतिपादित होनेसे अमेदप्रतीति नहीं होती है। इसे आप व्यतिरेक भी नहीं कह सकते क्योंकि इसमें उपमानापेक्षया उपमैयकी अधिकता नहीं प्रकाशित होती है। अतः यह उपमाका ही प्रभेद है।। २२।। मय्येवास्या मुखधीरित्यलमिन्दोर्विकत्थनैः। पभ्मेऽपि सा यदस्त्येवेत्यसावुत्प्रेक्षितोपमा॥२३॥ मय्येवेति। अस्या: प्रस्तुतनायिकाया मुखश्रीः मुखशोभासमा शोभा मयि इन्दौ एव विद्यते इति ईदशैः इन्दोविकत्थनैः आत्मश्लाघाभिः अलम् न किमपि फलम्, यत् १. धर्मेण।

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काव्यादशः

यस्मात् असौ एतदीयमुखशोभासमा शोभा पद्ये कमलेऽपि अस्त्येव, असौ उत्प्रेक्षितो- पमा। चन्द्रमा: पूर्वोक्तप्रकारकं विकत्थनं म कुरुते, नायक एव चाटूक्तये तथोत्प्रेक्षत इतीयमुत्प्रेक्षया लब्धास्पदत्वादुत्प्रेक्षितोपमा कथ्यते ॥२३॥ हिन्दी-इस नायिकाके सुखकी शोभाके सदृश शोमा केवल मुझमें ही है इस प्रकार चन्द्रमाक्री आरमशलाधा व्यर्थ हे क्योंकि कमलमें मी इसके मुखकी शोमाके समान शोभा वर्त्तमान है, इस वाक्यमें उत्प्रेक्षितोपमा नामका अलद्वार है। चन्द्रमामें इस तरहकी आत्मश्लाघाकी संभावना तो केवल नायककी चाटूक्तिपरायणतासे हो हुई है, अतः इसे उत्प्रेक्षितोपमा कहते हैं॥ २३ ॥ यंदि किश्चिद् भवेत् पभमं सुभ्रु विभ्रान्तलोचनम्। तस्े मुकशियं धत्तामित्यसावद्भुतोपमा।२४॥ यदीति। हे सुभ्रु सुन्दरि, यदि पद्मम् किश्चित् मनाक् विभ्रान्तलोचनम् घूर्णितनेत्रम् भवेत् जायेत, तत् तर्हि ते तब मुखश्रियं धत्ताम् प्राप्नोतु। यदि कमले नेत्रसंयोगो घटेत तदा तत्त्वन्मुखश्रियमधिगन्तुमीशीत, इयमसौ अद्भुतोपमा। विभ्रान्तलोचनत्वादयो धर्मा मुखस्यैव, तेषां सम्भावनया पघ्चे कल्पितत्वेन मुखसादृश्यवर्णनं चमत्कारातिशयाय भवतीति अद्भुतोपमालक्कारोऽयम् ॥ २४॥ हिन्दी-हेसभ्ु सन्दरी, यदि कमल चख्नलनयन हो जाय, तब वह तुम्हारे मुखकी शोमा प्राप्त करे, यह अन्भुतोपमाऽलंकार है। चञ्रलनयनत्व धर्म मुखका ही है। चाटूक्तिपरायण नायकने संभावनाद्वारा उसे कमलमें कहा है, यही चमत्कार का स्थान है इसे दण्डी अद्भुतोपमा कहते हैं। प्राचीन अन्य आचार्योंने मी इसे अद्भुतोपमा नामसे ही कहा है-

काव्यप्रकाशकार के मतमें यह अतिशयोक्ति ही है, उनका लक्षण है- 'प्रस्तुतस्य यदन्यत्वं यथ्यर्थोक्ती च कल्पनम्। विज्ञेयातिशयोक्तिः सा ...... ॥ उदाहरण यह दिया गया है- 'राकायामकलकूं चेदमृतारमंवेदपुः। तस्या मुखं तदा साम्यपराभवमवाप्नुयाल'॥ यहाँ पर इतना समझ लेना आवश्यक है कि जिस वाक्यमें संभावना करके भी औपम्यकी अनिष्पत्ति ही कविको अभिप्रेत होती ह वहाँ उपमा न होकर अतिशयोक्ति ही होती है, जैसे- 'राकायाम्' इत्यादि पूर्वोक्त उदाहरणमें चन्द्रशरीरका कलक्मुक्त होना असंभव है अतः उसके द्वारा मुखसाम्यप्राप्ति भी असंभव ही है, अतः मुखसाम्यमें कविका अभिप्राय हो नहीं सकता है, अतः यह उपमा नहीं, अतिशयोक्ति हो है। 'पुष्पं प्रवालोपहितं यदि स्यान्मुक्ताफलं वा स्फुटविदुमस्थम्। ततोऽनुकुर्याद् विशवस्य तस्यास्ताम्रोष्ठपर्यस्तरच: स्मितस्य'॥ इस श्लोकमें अतिशयोक्ति नहीं है, क्योंकि फूलका प्रवालोपहित होना संभव है। यहां पर कवि औपम्यका अभाव नहीं देखता है। संमावना केवल चारतातिशय-प्रकाशनके लिये की गई है। अरुः प्राचीनोने इसे अतिशयोक्ति नहीं कह कर उत्पाधोपमा कहा है। आचार्य दण्डीके मतानुसार 'राकायाम्' और 'पुष्पं प्रवालोपहितम्' दोनों जगह असुतो- पमा ही है। २४ ॥

१. सर्य इकोक: कनिव्रास्ति।

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द्वितीथ: परिच्छेद: ak

शाशीस्युत्प्रक्ष्य तन्वक्नि त्वम्मुखं त्वम्मुखाशया। इन्दुमप्यनुधावामीत्येषा मोहोपमा स्मृता ॥२५॥ शशीति। हे तन्वत्ञि कृशात्ि, त्वन्मुखम् शशी चन्द्र इति इत्यम् उत्प्रेच्य संभाव्य (अनन्तरं त्वद्विरहे) त्वन्मुखाशया त्वद्वदनस्पृहया त्वन्मुखमेवेदमिति भ्रान्त्या इन्दुम् अपि अनुधावामि अनुसरामि तद्दर्शनबद्धादरो भवामि, इत्येषा मोहोपमा स्मृता, कवि- भिरिति शेषः । मोहो भ्रान्तिः सादृश्येन इन्दौ मुखभ्रमस्तन्मूलकतया मोहोपमेयम्। तदुक्तम् अरग्निपुराणे- 'प्रतियोगिनमारोप्य तदभदेन कीर्तनम्। उपमेयस्य यन्मोहोपमासी परिकीर्तिता' ॥ २५ ॥। हिन्दी-हे तन्वान, तुम्हारे मुखको मैंने चन्द्रमा समझ लिया और तुम्हारे विरहमें तुम्हारे मुखको देखनेकी स्पृहासे चन्द्रमाका अनुधावन किया करता हूँ, इसमें मोहोपमा नामके अकक्टार है। मोह-भ्रम-सादृश्यवशात चन्द्रमामें मुरभ्रम, तम्मूलकतया इसे मोहोपमा कहते है। यह प्राचीनोंका नामकरण है। अर्वाचीन आचार्योने इसे 'भ्रान्तिमान्' नामक अलक्कार कहा है। अप्पय्यदीक्षितने लिखा है- 'कनिसंमतसाटृश्याद्विषये पिहितात्मनि। आरोप्यमाणानुभवो यत्र स भ्रान्तिमान् मतः' ॥ उनके द्वारा प्रस्तुत भ्रान्तिमान् के उदाहरण भी बड़े चमर्कार पूर्ण हैं- 'कपाले मार्जारः पय इति करॉंल्लेटि शशिनः सरुच्छिद्रप्रोतान् विसमिति करी सङ्कूलयति। रतान्ते तल्पस्थान् हरति वनिताऽ्प्यंश्ुकमिति प्रभामत्तश्चन्द्रो जगदिदमहो विभ्रमयति'॥ एक ऐसा भी उदाहरण है जिसमें उत्तरोत्तर भ्रान्ति पलवित होती गई है- 'वल्लालक्षोणिपाल, स्वदहितनगरे सम्नरन्ती किराती कोर्णान्यादाय रक्षान्युकतरखदिराज्ञारशङ्काकुलाशी। कृतवा श्रीखण्डखण्डं तदुपरि मुकुकोभूतनेत्रा धमन्ती

कि पश्मन्तर्धरराम्तालि किन्ते लोलेक्षणं मुखम्। मम दोलायते चित्तमितीयं संशयोपमा ॥ २६॥ कि पद्ममिति। अन्तर्भ्रान्तालि मध्ये भ्रमद्त्रमरयुगलमिदं पञ्नं कमलं किम् ? अथवा ते तव लोलेक्षण चलनेत्रं मुखं किम्? इति मम चित्तं दोलायते द्वैधमिवानुभवति, इतीयं संशयोपमा नामालङ्कारः। मध्ये भ्रमद्भ्रमरपन्मत्वप्रकारकं त्वत्सम्बन्धिमुखत्वप्रकारकंच संशयात्मकं ज्ञानं (त्वदीयमुखे) जायत इत्यर्थः । तदत्र संशयस्य चमत्कारकतया संशयोपमा नामालक्कारः। एकस्मिन् धर्मिणि विरुद्धनानार्थावमर्शः संशयः, अस्य प सादृश्यपर्यवसायितयोपमाभेदे संग्रहः ॥ २६॥ हिन्दी-शया यह मध्यमागमें घूमते हुए अमरसे युक्त कमर है या चश्ररनेत्रों वाला तुम्हारा मुख है? इस दुविधामें हमारा हृदय धूम रहा है। यहाँ पर संक्योपमा नामक उपमा- भेद होता है। अर्बाचीन आचार्यगण इसे सन्देशलक्कार मानते हैं। कविराबने कहा है-

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काव्यादर्श:

'अविरोप्य हरस्य इन्त चापं परितापं प्रशमव्य वान्यवानाम्। परिणेष्यति वा न वा युवायं निरपायं मिथिकाषिनाथपुत्रीम्॥ २६॥

अतस्त्वन्मुखमेवेद्मित्यसौ निर्णयोपमा॥२७॥ निर्णयोपमां लक्षयति-न पत्मस्येति। इन्दुनिप्राह्यस्य चन्द्रेण कृताभिभवस्य पद्मस्य इन्दुलज्ाकरी चन्द्रसङ्कोचकारिणी द्युतिर्न संभवति, यत्पयनं चन्द्रमसाऽभिभूतपूर्व तस्य द्ुतिश्चन्द्रमसं स्वजेतारं सक्टोचयेदिति न संभवति, अतः इदं चन्द्रलज्जाकरी ध्ुति बिभ्रत् त्वन्मुखमेवेति असौ निर्णयोपमा नामालक्ारः। अत्रेदं पद्मं मुखं वोते संशयः पूर्वमवतारणीय,

तथा गोकं तत्र-'उपमेयस्य संशय्य निश्वयाभनिक्योपमा'। नि्योपमा निणयोपमा इति मानर्धान्तरम् ॥। २७॥ हिन्दी-बिस पथको चन्द्रमाने अभिभूत कर दिया था उस पद्मकी कुति चन्द्रमाको कव्जिस करने बाळी नहीं हो सकती है, अतः यह सुम्हारा मुख ही है, इसको निर्णयोपमा कहते हैं। अगिपुराणमें इसीको निशयोपमा सब्दसे कहा गया है। इसका उदाइरणान्तर यह दिया या सकता है- 'किन्तावव सरसि सरोजमेतदारादाहोस्विन्मुखमवभासते तवण्याः । संश्ञय्य क्षणमिति निश्चिकाय कश्िद्विव्योकेवेंकसहवासिना परोक्षेः॥ विषनाथ आादि भर्वाचीन माचार्य इसे निश्रयान्त संदेह कहते है। २७ ॥। शिशिरांशुप्रतिस्पर्धि श्रीमत्सुरमिगन्धि च। अम्भोजमिष ते वक्त्रमिति श्लेषोपमा स्मृता ॥२८॥ शिशिरेति। ते तव वश्त्रम् अम्भोजं कमलमिव शिशिरांशुप्रतिस्पर्धि चन्द्रप्रतिद्वन्द्वि, (अत्र मुखपच्े शिशिरांशोः प्रतिस्पर्धीति विभ्रहः, अम्भोजपक्षे तु शिशिरांशुः प्रति- स्पर्धी यस्येति विग्रह इति बोध्यम्। श्रीसत् प्रशंसनीयशोभम्, सुरभिगन्धि घ्राणतर्पण- गन्घयुरत च। अत्र विशेषणत्रयमपि श्लेषद्वारा मुखे कमले चोभयत्रान्वेतीति इयं श्लेषो- पमा स्मृता। श्लेषथात्रार्थश्लेषः। अत्र श्लेषस्य विद्यमानत्वेऽपि न श्लेषालक्कारः, सादृश्यजन्यचमत्कारे श्लेषचमत्कारस्य लीनतया तस्यालक्कारकत्वायोगात्। अरतबात्र श्लेषानुप्राणितोपमा जञेया ॥ २८ ॥ हिन्दी-सुम्दारा मुख कमलकी तरह चन्द्रप्रतिपक्षि, भीमत एवं सुरभिगन्ययुत है, इसमें स्ेपोष्मा नामक अकटार है, यहाँ पर चन्द्रप्रतिस्पर्रि, श्ीमत और सुरमिगन्धि यह तीनों विश्ेषण शकट है अतः इसे श्केयोपमा नामक अकटार कहा जाता है।। २८ ।। सरपशम्ट्वाच्यत्वात् सा समानोपमा यथा। बाले बोद्यानमालेयं सालकाननशोमिनी॥ २९॥ समानोपर्मां निर्वकि-सरूपेति। सरूपम् समानम् सत्यप्यर्थभेदे समानाकृति, मविमानयात जा ययाशोगया यतनीति प्रेष् :.

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द्वितीय: परि छेद:

यश्रेति तदुदाहरणोपन्यास:, इयम् उद्यानमाला वनपक्कि: बाला वधूरिव सालकेन चूर्ण- कुन्तलललितेन आननेन शोभिनी सशोभा, वनपज्किरयया सालानां वृक्षाणां काननेन वनेन शोभायुता तथा बालापि सालकाननेम (चूर्णकुन्तलयुक्तमुखेन) शोभायुता, तदत्रोप- मायां भिन्नयोरपि उपमानोपमेयधमयोः समांनशब्दवाच्यत्वात्साधारण्यम्। अस्यां च शब्दश्लेषो हेतुः, वृक्षकाननेति परपदप्रयोगे उपमाभावात् ॥२९॥ हिन्दी-जहाँ पर उपमान और उपमेयगत धर्म समानानुपूर्वीक शब्दद्वारा बताया गया हो, अर्थभेदेन भिन्न होनेपर भी उपमानोपमेयगत वर्मोपस्थापकशब्दसमानाकृतिक हो, उसे समानो- पमानामक उपमाभेद मानते है। जैसे-यह बाला उद्यानमालाकी तरह साळकाननशोमिनी है। यहोँ पर 'सालकाननशोमिनी' शब्दका उपमानभूत उद्यानमालापक्षमें-सालवृक्षोंके वनसे शोमायुक्त, तथा उपमेय वाकपक्षमें-चू्णकुम्तकसे तुक मुखसे शोषायुक्त यह नर्थ है, परन्तु दोनों अर्थोंके उपस्थापक श्ब्द-'साककानमसोमिनी' में समानता, सरपता, एकानुपूर्वीकत्न होनेसे यहाँ समानोपमा है।। २९॥

पथमं बहुरजन्धन्द्र: क्षयी तार्म्यां तवाननम्। समानमपि सोस्सेकमिति निम्दोपमा स्मृता ॥। ३० ।। पत्ममिति । पद्मम् कमलम् बहुरजः परागधूसरम्, चन्द्र: क्षयां कृष्णपच्ते नश्यद्- द्ुतिः, (कमलं धूलिपूरण क्षयी चन्द्रः) ताभ्यां कमलचन्द्राभ्यां समानम् तुलितमपि तवा- ननं त्वन्मुखम् सोत्सेकम् सगर्वम्। यत्तव मुखं धूलिपूर्णेन कमलेन. क्षयिणा चन्द्रमसा च सादृश्यमावहति तस्यापि सगर्वता? नोचितस्तस्य गर्व इत्यर्थः । इति एषा निन्दोपमा स्मृता कविभिरुक्ता। अत्र साम्यमात्रपर्यवसायित्वात् तस्येव कविसंरम्भगोचरत्वात् प्रतीयमानेऽपि भेदे तस्य प्राधान्याभावान्न व्यतिरेकः । प्राधान्येन भेदस्य चमत्कृतिजन- कत्व एव तस्य निश्चितत्वात् ॥ ३० ॥ हिन्दी-कमलमें परागरूप धूल भरी पढ़ी है, चन्द्रमा कृष्णपक्षमें क्षीण हो जाता है, उन्हीं दोनोंसे समता रखता है यह तुम्हारा मुख, फिर भी इसे अपनी रमणीयतापर पूरा गर्वं है? इसे निन्दोपमा कहा गया है। यह निन्दा साम्यपर्यवसायिनी है, साम्य ही कविका अतिप्रेत मौ है, अतः भेदप्रधानरूपमें विवक्षित नहीं है, इसीलिये यहाँ व्यतिरेक नामक अरुदार नहीं हुजा, क्योंकि जहाँ पर प्राधान्येन भेद चमस्कारक हो, वहीं व्यतिरेक माना जाता है । ३० ॥ ब्रह्मणोSप्युव्भवः पभभन्द्र: शम्भुशिरोघुव:। तौ तुल्यौ त्वम्मुखेनेति सा प्रशंसोपमोष्यते ।३१॥ ब्रह्मण इति। पद्म: कमलम् ब्रह्मणोऽपि उद्भवः उत्पत्तिस्थानम्, चन्द्र: शम्यु- शिरोघृतः शम्भुना मस्तके निधाय कृतादरः, तौं पद्मचन्द्री त्वन्मुखेन तुल्यौ इति सा प्रशंसोपमा उच्यते। पद्मचन्द्रौ महद्भ्यां ब्रह्मशिवाभ्या प्रभवस्थानत्वे शिरोभूषणत्वे च क्रमश आश्रिती इति तयोर्महत्ता, तावेव च जगत्त्रितयरोचनेन तव मुखेनापि तुलिता- वित्यहो तयोः प्रकर्षः इत्यं, पम्मचन्द्री अधिकगुणतयोपमानभूतेन मुखेन प्रशंसितापिति मुखस्य गुणातिशयो व्यजितः। अत्र विपर्यासोपमासमेघिता प्रशंसा, तत्र प्रशंसाया:

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६० काव्योदर्श:

न पर्थ मुखमेवेदं न भृन्नी चक्षुषी इमे। इति विस्पष्टसाटश्यात् तत्त्वाख्यामोपमैव सा॥।३७॥ न पद्ममिति। इंदं पुरो दृश्यमानम् पद कमलं न किन्तु मुखमेव, इमौ भृजौ भ्रमरौ न किन्तु चक्षुषी नयने एव, इत्येवं विधिनिषेधप्रकाशनवत्मना विस्पष्टसादृश्यात् सादृश्यस्य स्पष्टीकरणात् इयं तत्त्वाख्यानोपमा ज्ेया। भ्रमनिरासाय भ्रमविषयस्य तत्वस्य यथार्थ- स्वरूपाविष्करणं तत्त्वाख्यानम्, तन्मूलकत्वादस्यास्तत्वार्यानोपमानाम्ना व्यवहारः । निर्णयोपमायां संशयपूर्वकं तत्वाख्यानम्, अत्र तु भ्रान्तिपूर्वकं तत्वाख्यानमित्यनयो- रभेंद:॥ ३७॥ हिन्दी-यह कमल नहीं है मुख शे है, यह भ्रमर नहीं हैं नयन ही है, इस प्रकार विषि- निषेषोभयाभिधान द्वारा सादृश्य स्पष्ट करनेके कारण इसे सस्वाकयानोपमा कहते हैं। निणयो- पमामें संशयपूर्वक तत्वाल्यान रहता है, और यहाँ भन्तिपूर्वक तत्वास्यान रहता है, यही इन दोनोंमें अन्तर है॥ ३० ।। सर्वपभमभासारः समाह्ृत इव कचित्। त्वदाननं विभातीति तामभूतोपमां विदुः॥ ३८ ॥ सर्वपग्मेति। कचित् एकत्रस्थाने विधात्रा समाहृतः एकत्रीकृत्य स्थापितः सर्वपद्म- प्रभासारः सकलकमलकान्तिपुज इव त्वदाननं विभाति तामिमाम् (कवयः) अभूतोप- मामू विदुः आहुः। अभूतेन अनिष्पन्नेन उपमानेन औपम्यस्य वर्णनम् अभूतोफ्मा, नात्रेवशब्द: सम्भावनायाम् अपितु साधर्म्यवाचकः, तेन समाहृत इत्यस्य संभावनया समाहरणेऽपि उत्प्रेक्षावाचकाभावात् केवलसंभावनाचमत्कृत्यपेक्षया तादृशसंभावना- निष्पन्नोपमानसादृश्यवर्णनचमत्कृतेः प्राधान्यादन्रोपमैव ज्ञेया। अविद्यमानस्य केवलं कविप्रतिभया कल्प्यमानस्य धर्मिणो यत्र वर्णनं तत्राभूतोपमा, स्वयं विद्यमानस्य धर्मिणो यत्रान्यधर्मिणां सम्मेलनक्ल्पनया साम्यवैचित्र्यवर्णनं तत्राद्भुतोपमेत्युभयोर्भेदः ॥ ३८॥ हिन्दी-तुम्हारा मुख ऐसा मालूम पड़ता है मानो बह्माने सकल कमलकान्तिपुष्जको एक स्थानपर पकत्रित कर दिया हो, इसे अभूतोपमा कहते हैं। अभूत-अनिष्पन्र उपमानके साथ सादृश्यप्रकाशन होनेके कारण इसे अभूतोपमा कहते हैं। अभूतोपमामें कविकल्पित अभूतधर्मीका उपन्यास होता है और स्वयं विधयमान धर्मीका अन्य धर्मीके साथ मिळन होनेसे जहाँ वैचित्र्यवर्णन होता हे वह अद्भुतोपमा है, यही दोनोंमें भेद है।। ६८ ।। चन्द्रबिम्बादिष विषं चन्दनादिव पावकः। परुषा वागितो वक्तादित्यसंभावितोपमा।।३९।। चन्द्रबिम्बादिति। इतः एतस्मात तव वक्त्रात् परुषा कठोरा वाक वाणी चन्द्र- बिम्बात् शशाङ्कमण्डलात् विषं गरलम् इव, चन्दनात् पावकोऽग्निरिव। अत्र उपमान- भूताभ्यां चन्द्रचन्दनाभ्यां विषपावकनिगमस्येव तव वदनात् परुषवाकनिस्सरणस्यासंभा- वितत्वादियमसम्भावितोपमाऽलक्कारः ॥ ३९॥ दिल्यी ड अमारे गससे सरोड शहोका विकलता रमो पकार रोगा जैसे चन्दमण्ड कसे

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द्वितीय: परिच्छेद:

बिष और आगका निकलना संमव हो, तभी तुम्हारे मुखसे कठोर वाणोका निकलना संमव दो सकता है। इसमें असंभावित वस्तुके साथ सादृश्यवर्णन करिया गया है अतः यह असंभावितो- पमा है॥ ३९ ॥

स्पर्शस्तवेत्यतिशयं बोधयन्ती बहुपमा ॥। ४० ॥ चन्दनोद्केति। चन्दनोदकं मलयाज्गरागः, चन्द्रांशवः शशिकराः चन्द्रकान्तः स्वनामप्रसिद्धो मणिभेद:, एतदादिशीतलः एतत्प्रभृतिसुखकरस्तव स्पर्शः, इति अरतिशयं बोधयन्ती उपमानान्तरावस्थितशैत्यगुणापेक्षया प्रस्तुते विशेषं गमयन्ती इयं बहूपमा नामोपमाप्रभेद:। अर्वाचीना इमां मालोपमामाहुः॥४०॥ हिन्दी-चन्दनजल, चन्द्रकिरण, चन्द्रकान्तमणि प्रभृति वस्तुओंकी तरह तुम्हारा ल्व्थ अतिशीतल है, इसमें शेत्योपमानतया प्रसिद्ध कदश्यादिसे प्रस्तुत वस्तुमें अतिसय प्रतीत होता है अतः इसे बहूपमा कहते हैं। अर्वाचीन आचार्यगण इसे मालोपमा कहते हैं, उनका लक्षण- उदाहरण यह है, कक्षण-'मालोपमा यदेकस्योपमानं बड्डु दृश्यते'। उदाहरण- 'वारिजेनेव सरसी शश्िनेव निशीयिनी । यौवनेनेव वनिता नयेन ओमंनोहरा'॥ ४०॥

तव तन्याङ्ग वदनमित्यसौ विक्रियोपमा ॥ ४१ ॥ चन्द्रबिम्बादिति। हे तन्वत्ि कृशगान्रि, तव वदनं मुखम् चन्द्रबिम्बात् शशि- मण्डलात् उत्कीर्णम् इव उट्टक्कितम् इव, पद्मगर्भात् उद्धृतम् इव, इति इयम् विक्रियो- पमानामालद्वारः। अत्रोपमानभूतौ इन्दुबिम्बपद्मगर्भौ प्रकृती वदनथ् विकृतिः। प्रकृति- विकृत्योश्वास्ति साम्यमिति विक्रियोपमा। एतदुक्तमग्निपुराणे- 'उपमानविकारेण तुलना विक्कियोपमा'। अन्यत्राप्युक्तम्- 'उपमेयस्य यत्र स्यादुपमानविकारता। प्रकृतेविकृतेः साम्यात् तामाहुविक्रियोपमाम्'॥४१॥ हिन्दी-हे कशाि, तुम्हारा मुख ऐसा लगता है मानो चन्द्रमण्डलसे उस्कीण-खचित हो, कमलपुष्पगर्मसे निकाला गया हो, इसे विक्रियोपमा कहते हैं। यहाँ पर उपमानभूत चन्द्रबिम्य और पद्मगर्भ प्रकृति हैं और वदन विकृति है, प्रकृतिके साथ विकृतिका साम्य अवश्यंभावी है, अतः यह विक्रियोपमा हुई ॥ ४१॥ पूष्ण्यातप इवाह्वीव पूषा ग्योम्नीघ वासरः। विक्रमस्त्वय्यधाल्लक्ष्मीमिति मालोपमा मता ॥ ४२ ॥ पृष्णीति । परथा आतपः प्रकाश: पूष्णि सूर्ये (लक्ष्मीमधात्), पूषा अह्धि दिबसे (लक्ष्मीमधात्), वासरो दिवसश्व व्योम्नि आकाशे (लक्ष्मीमधात्) तथा विक्रम:

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६२ काव्यादर्श:

पातस्य पदार्थस्य तदुतरवाक्ये कर्तृतयोपादानम्, एवमग्रेऽपि, तदियं मालासाम्या- न्मालोपमापदेनोक्ता। पूर्व निरुक्तायां-'चन्दनोदकचन्द्रांशुचन्द्रकान्तादिशीतलः। स्पर्श- स्तवेत्यतिशयं बोधयन्ती बहूपमा' इति स्वरूपायां बहूपमायां केवलमुपमाबाहुल्यम्, अस्यां तु पूर्ववाक्यस्थपदस्योत्तरवाक्ये सम्बन्धस्ततश्रोपमाबाहुल्यमपीत्युभयोर्भेदः । नव्यास्त्वत्र तत्रोभयत्रापि मालोपमामेव मन्यन्ते ।॥ ४२ ॥ हिन्दी-जैसे प्रकाशने सूर्यको लक्ष्मी दी है, सूयने दिनको लक्ष्मी दी है, और दिनने आकाश को लक्ष्मी दो है उसी तरह पराक्रमने आपको लक्षमो दी है। यह मालोपमा मानी जाती है। जैसे मालामें गुथे गये एक फूलका दूसरेसे, दूसरेका तोसरेसे संबन्ध होता है, उसी तरह इसमें प्रथम वाक्यमें अधिकरणतया गृहीत पदार्थका तदुत्तरवाक्यमें कतृतया सम्बन्ध होता है, जैसे 'पृष्ण्यातप दव' इस प्रथम वाक्यमें अविकरणतया गृहीत पूषाका तदुत्तरवाक्य-'अह्वीव पूष्ा'में- कतृँतया सम्बन्ध हुआ है, इसी प्रकार आगे मी हुआ है, अतः इसे मालासाम्य होनेके कारण मांलोपमा कहते हैं। बहूपमामें केवल उपमानवाहुत्य होता है, इस मालोपमामें पूर्ववाक्यस्थ पदका उत्तरवाक्यमें अन्वय तथा तदनन्तर उपमानवाहुल्य होता है, यही दोनोंमें भेद है। नवीन आचार्यगण बहूपमाको और इसको भी मालोपमा ही मानते हैं। ४२॥ वाक्यार्थेनैव वाक्यार्थः कांडपि यद्युपमीयते। एकानेकेव शब्दत्वात्सा वाक्यार्थोपमा हिधा॥ ४३॥ वाक्यार्थेनैवेति। यदि कोपि वाक्यार्थः वाक्यार्थेन परेण वाक्यार्थेन एव उपमीयते, तदा वाक्यार्थोपमा नामालङ्कारो भवति। वाक्यार्थयोरुपमानोपमेयभावेन साम्यस्य वर्णनात् वाक्यार्थोपमेति नामकरणम्। सा चेयं वाक्यार्थोपमा द्विप्रकारा-एकेवशब्दघटिता अने- केवशब्दघटिता च। तत्रायं विवेक:, यदा वाक्यस्थिताखिलपदार्थसाम्यप्रत्यायनेच्छा तदा प्रत्युपमानमिवशब्दप्रयोग: इत्यनेकेवशब्दघटिता सा, यदा तु प्रधानपदार्थबोधोतरं पश्चात् पर्यालोचनया अवान्तरपदार्थानां साम्य प्रतीतमिवावभासते तदा प्रधानोपमानपुरत एवेव- शब्दप्रयोगेणैव सकलसाम्यप्रतीतिरित्येकेवशब्दप्रयोगघटिता सा ।।४३।। हिन्दी-जब एक वाक्यके अर्थसे दूसरे वाक्यके अर्थकी उपमा दी जाती है तब वाक्यार्थों- रमा नामक अलकार होता है। यह दो प्रकारका होता है १-एक इव शब्द्रघटित और २-अनेक एव शब्दघटित। जब वाक्यस्थित सभो पदार्थोंमें साम्यबोषनेच्छा होती है तब प्रत्येक उपमानके साथ इव शब्द लगा दिया जाता है। उम स्थितिमें यह अनेक इव शब्दसे घटित होती है, और जब प्रधानपदार्थान्वयवोपोत्तर पर्यालोचन करनेपर अवान्तर पदार्थोका साम्य स्तःप्रतीत-सा मालूम पड़ता है, तब प्रवानोपमानके साथ हो एकमात्र इव शब्दका प्रयोग होता है, उस स्थितिमें यह एक इव शब्दघटित होती है।। ४३ ।। त्वदाननमधीराक्षमाविर्दशनदीघिति। भ्रमन्भृक्गमिवालक्ष्यकेसरं भाति पङ्कजम् ॥४४ ॥ एकेवशब्दर्घटितां वाक्यार्थोपमामुदाहरति-त्वदाननमिति। अधीराक्षम् चब्चल-

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द्वितीय: परिच्छेद:

साम्यमुपमानोपमेयात्मकवाक्यद्वयेन निबड्धम्। अतथ्चयं वाक्यार्थोपमा, अत्र य विशिष्ट- योरेवोपमानोपमेयत्व प्रतीतिरिष्टेत्येकेवशब्दप्रयोगः ।। ४४।। हिन्दी-चश्रर नेत्रोंसे युक्त और प्रकाशित होनेवाली दन्तधुतिसे मण्डित यह तुम्हारा मुख मँडराते हुए भ्रमरसे युक्त तथा लक्ष्यकिञ्जल्क कमलके समान शोभित होता है। इसमें पूरे मुखको पूरे कमरसे उपमा दी गई है, यह बात दूसरो है कि प्रधानवाक्यार्थोषोत्तर नेत्रका भ्रमरसे और दन्तघुतिका किअल्कसे साम्य मालूम पड़ जाता है। यह एक इ्व शब्दघटिंत वाक्यार्थोषमाका उदाहरण है।। ४४ ।। नलिन्या इव तन्वक्यास्तस्या: पभ्मभिवाननम्। मया मधुवतेनेव पायं पायमर्यत ।४५॥ अनेकेवशब्दघटितां वाक्यार्थोपमामाह-नलिन्या इति। मयुव्रतेन भ्रमरेण इव मया नलिन्याः पद्मलताया इव तस्याः तन्वप्ञथाः कृशकायलतायाः सुन्दर्या: पम्रम् इव आननम् पायं पायम् असकृत्पीत्वा अरम्यत रतिरासाद्यत। यथा भ्रमरः पद्मिन्याः पह पीत्वा पीत्वा रमते तथाहमपि तस्याः कृशाप्नथा मुखं पीत्वाऽरंसीति भावः । अत्रानेकेवशब्दप्रयोग: सर्वाज्साम्यं बोधयति॥४५ ॥ हिन्दी-नलिनालताके समान उस कुशाङ़ो सुन्दरीके कमलसदुश मुखका अमरके समान मैं बार-बार पान (चुमबन) करके आनन्दमन्न हो गया। यहाँ पदमिनीकता-नायिका, कमल-मुख, और मधुकर तथा मैं इनमें उपमानोपमेयभाव पृथक-पृथक हव शब्दोंसे प्रकट किया गया है। अनेक इ्व शष्दोंवाली वाक्यार्थोपमाका यह उदाहरण है॥४५॥ वस्तु किञ्चिदुपन्यस्य न्यसनासत्सघर्मणः । साम्यप्रतीतिरस्तीति प्रतिधस्तूपमा यथा ॥ ४६ ॥ प्रतिवस्तूपमां निर्वत्तुमारभते-वस्तु किश्चिदिति। किश्चित् प्रकृतं वस्तु उपन्यस्य प्रथममभिधाय तत्सधर्मेणः प्रकृतवस्तुसमानस्य अप्रकृतस्य न्यसनात् प्रकृतसमर्थनार्थम् वाक्यान्तरेण प्रतिपादनात् साम्यप्रतीतिः विनापीवादिशब्दप्रयोगं सादृश्यबोधो भवति, तत्र प्रतिवस्तूपमा नामालद्कारः। प्रतिवस्तु प्रतिपदार्थम् उपमा समानधर्मो यस्यां सा प्रति- वस्तूपमा, एतम्म सधर्मण: इति लक्षणघटकेन-अप्रस्तुतवाक्येऽपि धर्मोपादानमावश्यक- मिति सृचयता विवृतम्। 'यत्रोपमानोपमेयवाक्ययोरेकः समानो धर्मः पृथक निर्दिश्यते सा प्रतिवस्तूपमे'ति कुवलयानन्देऽप्पयदीक्षिताः। काव्यप्रकाशे तु-'प्रतिवस्तूपमा तु सा। सामान्यस्य द्विरेकस्य यत्र वाक्यद्वये स्थितिः' इत्याहुमम्मटभद्टाः । पृथक् प्रतिपादनं च भिन्नशव्देनैव, तत्पदावृतौ कथितपदत्वरूपदोषप्रसक्तः । अत्र लक्षणनिरुक्ती साम्य- प्रतीतिरस्तीति वदतो दण्डिन उपमाजीवातुभूतस्य साम्यस्यात्र प्राधान्येन भानात उपमा- प्रपथ्च एवास्या अ्न्तर्भावो युक्त इत्याशयो व्यज्यते ॥४६॥ हिन्दी-किसी एक प्रस्तुत वस्तुका कुछ वर्णन करके यदि तरसमानवर्मवाले किसी अप्रस्तुत वस्तुका वर्णन किया जाय तो प्रतिवस्तूपमा होती है॥ ४६ ।।

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३४ काव्यादर्श:

प्रतिवस्तूपमामुदाहरति-नैकोऽपीति। अद्यापि जायमानेषु अद्ययावद् प्राप्तजन्मसु राजसु भूपालेषु एकोऽपि त्वादृशः तव तुल्यो नास्ति, ननु निक्चये, पारिजातस्य पादपो वृक्षो द्वितीयो नास्त्येव। अत्र पूर्ववाक्ये त्वत्सदृशो नास्ति, परवाक्ये च द्वितीयो नास्ति, इत्येक एव सादृश्यप्रतिषेधाख्यो धर्मः शव्दान्तरेण वाक्यद्वये निर्दिष्ट इति प्रति- वस्तुपमा॥। ४७।। हिन्दी-प्रतिवस्तूपमाका उदाहरण देते हैं-पेदा होनेवाले भूपोंमें आजतक कोई तुम्हारे ऐसा नहीं हुआ, निक्षय ही पारिजातवृक्षका द्वितीय ओड़ा नहीं होता है। यहाँ पर प्रस्तुत राजाका निर्देश करके तर्सवर्मा पारिजातका निर्देश किया गया है। यहाँ पर पूर्वषाकयमें 'त्वस्सदृश नहीं हुआ' कहा है और उत्तरवाक्यमें 'द्वितीयो नास्ति' कहा है, एक ही वस्तु दो तरहसे कही गई है, 'सामान्यस्य एकस्य वाक्यदये दविर्सस्थतिः' यह काव्यप्रकाश भी इसके अनुकूल हो है।। ४७ ।। अधिकेन समीकृत्यं हीवमेकक्रियाविधौ। यव्श्रुवन्ति स्मृता सेयं तुल्ययोगोपमा यथा॥४८॥ तुल्ययोगोपमां लक्षयति -- अधिकेनेति। हीनं न्यूनगुणं पदार्यम् अधिकेन गुणा- धिकपदार्थेन समीकृत्य तुलनामानीय यद्ब्रुवन्ति सा इयं तुल्ययोगोपमा स्मृता। हीना- धिकयोस्तुल्यत्वेन योगे यदौपर्म्यं सा तुल्ययोगोपमेति भावः ॥४८ ॥ हिन्दी-न्यून गुणवाले पदार्यको अधिक गुणवाले पदार्थके साथ तुलना देकर समानकार्य- कारितया कहा जाय तो तुल्ययोगोपमा होती है। प्रकृत तथा अप्रकृत पदार्थका एकपर्मामि- सम्बन्धरूप तुल्ययोगिता दूसरी है। तुव्ययोगितामें प्रकृत तथा अप्रकृत समीका समकक्षभावसे वर्णन होता है, अतः वहां पर उपमानोपमेय भावकी अपेक्षा नहीं होती है, अतः वहाँ वाच्य अथवा व्यक्चय साम्य नहीं होता है। इस तुव्ययोगोपमामे प्रकृत और अप्रकृतमें उपमानोपमेय- भाव विवक्षित रहा करता है। यहां साम्य मी प्रतीत होता ही है, वाध्य या व्यक्थरूपमें। एक बात और है कि तुश्ययोगिताकी प्रवृत्ति स्तुति या निन्दाके लिये होती हे और तुश्ययोगोपमा की प्रवृत्ति केवळ साम्यप्रतिपादनार्थ होती है, यही सब भेद इन दोनोंमें है।। ४८ ।। दिवो जागर्ति रक्षायै पुलोमारिरभुवो भवान्। असुरास्तेन हन्यम्ते सावलेपास्त्वया नराः ॥४९॥ उदाहरणमाह-दिवो जागर्स्तीति। पुलोमारि: इन्द्र: दिवः स्वर्लोकस्य रक्षायै जागर्ति, भवान् भुवः रक्षाये जागर्त्तीत्यत्रापि योजनीयम्। तेन इन्द्रेण असुराः दैत्याः हन्यन्ते, त्वया सावलेपाः गर्वोद्धताः नृपा हम्यन्ते। अत्र हीनस्य प्रस्तुतस्य राह: गुणाधिकेन महेन्द्रेण सह तुल्यताप्रतिपादनासुल्ययोगोपमा। अ्त्र साधम्य व्यप्रयमेव, इवाद्यप्रयोगात्॥।४९।। हिन्दी-इन्द्र स्वर्गकी रक्षाके लिए सतक रहा करते हैं और आप पृष्वीकी रक्षाके लिये। वह असुरों का नाश करते हैं और आप उद्धत नृयोंका। यहां पर हीन गुणवाले प्रस्तुत राजाकी गुणाषिक महेन्द्रके साथ सुस्यता बताई गई हे अतः वृश्वयोगोपमा अलक्कार हुआ ॥। ४९ ॥ कान्त्या चन्द्रमसं धाम्ना सूर्य धैर्येण चार्णवम्। राजअनु करोषीति सैषा हेतूपमा मता ॥। ५० ॥ . शरEया| ४. स्वता

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द्वितीय: परिच्छेद:

हेतूपमामाह-कान्त्या देहप्रभया चन्द्रमसमनुकरोषि, धाम्ना प्रतापेन सूर्यमनुक- रोषि, धैर्येण अर्णवमनुकरोषि, इयं हेतूफमा, चन्द्रादिभि: समं नृपसादृश्यस्य हेतूनां कान्त्यादीनां निर्दिष्टत्वात्॥५० ॥ हिन्दी-हे राजन् ! आप कान्तिसे चन्द्रमाका, तेजसे सूर्यका और धैयंसे समुद्रका अनुकरण करते हैं, यह हेतूपमा है, क्योंकि इसमें चन्द्रादिके साथ राजाकी तुलनाके हेतु कान्त्यादि निर्दिट है। ५०॥ न लिङ्गवचने भिन्ने न हीनाधिकतापि वा। उपमादूषणायालं यत्रोद्वेगो न धीमताम्।।५१।। इयता परिकरेण विविधभेदामुपमां निरुच्य सम्प्रति तद्गतान्दोषान्विवक्षुरादौ दोषाणां तेषां व्यवस्थितविषयत्वमुपपादयति-न लिङ्ेति। यत्र धीमताम् उद्वेग: प्रतीतिविघातजन्या व्याकुलता न भवति तत्र भिन्ने उपमानसम्बन्धिलिन्वचनापेक्षयाS- र्तिरिके लिगवचने हीनाधिकता उपमानस्य न्यूनता अधिकताऽपि वा उपमादूषणाय अलम् समर्था न भवन्ति। अयमाशयः-भिन्नं लिगं, भिननं वचनम्, उपमानहीनता, उपमानाधिकता चेति सत्यमुपमादोषाश्चत्वारः परन्तु नैषां तत्र दोषत्वं यत्र सन्यपि लिश्वचनभेदे सत्यपि वा हीनाधिकन्वे धीमतामुद्रेगो न जायते। उद्वेगस्यव दूपकतया तदभावे दोषाभ्युपगमनैरर्थक्यात्। प्रायो भिन्नलिश्ञव वनयोरुपमानोपमेययोः सतोरेक- तरलिङ्गवचनानुगतेन समानधर्मेणोभयोः सम्बन्धो दुर्घटो भवति, एतादृशी उपमा सामान्यत उद्वेगं जनयति, किश्व उपमानस्य हीनतायामुपमेयस्यानुत्कर्षः, अरधिकतायां च तदपेक्षयोपमानस्य निकृष्टतरतया वैरस्यमिव जायते इत्यमी दोषा उद्वेगजनकतया हेयत्वेनोक्ताः, परन्तु यत्र धीमतामुद्वेगो न स्यात्, केनापि प्रकारेणोपमानोपमेययोलिंग्- वचनभेदे हीनाधिकत्वे च वा सत्यपि साधारणधमतया विवक्षितस्य धर्मक्रियादेर्यद्युभय- त्रान्वयः संभवति तदा नास्ति दोषत्वम्। अदोषतोदाहरणव्याख्यायामिदं स्पष्टी- भविष्यति॥५१॥ हिन्दी-प्राचोन आलक्ारिक मामहने उपमाके सान दोष गिनाये है- 'होनताऽसम्मवो लिङ्रवचोभेदो विपर्ययः। उपमानाषिकश्वं च तेनासदृशताऽपि वा । त एते उपमादोषा: सप्त मेवाविनोदिता:।' (काव्यालक्कार २. ३९-४०) वामनने भो मामटका ही अनुसरण किया है-

वामनने विपययको छोड़ दिया है, शेष छः दोष स्वीकार किये हैं। आचार्य इण्डीने-भामहोक्त दोषसप्तकरमें-विपयंय, असादृश्य, असंभव इन तीन दोषोंको नहीं माना है, क्योंकि उनके उपमालक्षणमें-'सांदृश्यं यत्रोद्भूतं प्रनीयते' कहा गया है, उद्भूत सादृश्यस्थलमें इनका संभव नहीं है। शेष चार दोषोंके विषयमें उनका वक्तव्य है कि यदि लिङ्भेद, वचनभेद, हीनता और अधिकता रहने पर भी किसी कारणवश श्रोतुजन

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६६ कात्यादर्श:

स्त्नीय गच्छति षण्डोऽयं वक्येषा स्त्री पुमानिव। प्राणा इव प्रियोऽयं मे विद्या धनमिवार्जिता।५२॥। लिशवचनभेदस्यादोषतां निदर्शयति-स्त्रीवेति। अयं षण्ढः क्लीबः स्त्रीव गच्छति, एषा स्त्री पुमानिव वक्ति, एतस्मिन् वाक्यदये साधारणधमत्वेनोपात्ताया गमनव वनक्रियाया भिन्नलिन्तयोरप्युपमानोपमेययोः सुखमन्वेतुमर्हतया प्रतीतिविघातजन्यत्रासरूपोद्वेगाभावात् लिग्भेदस्य नोपमादूषकत्वम्। एवम्-अयं जनो मे प्राणा इव प्रियः, मया विद्या धनम् इवाजिंता, अनयोरुदाहरणयोः प्राणशब्दो नित्यबहुवचनान्तः, धनशब्दो नित्य- नपुंसक:, अतोऽगतिकगत्या-यथा प्राणाः प्रियास्तथाऽयं मे प्रियः, यथा च धनमर्जितं तथा विद्याऽर्जितेति लिप्विपरिणामेनान्वयः सम्पाद एवेति नात्र सहृदयानामुद्वेग इति नोपमादोषः। इत्थमेव चन्द्र इच मुखम्, सुधावदधरः इत्यादिस्थलेऽपि प्रतीतिविघात- विरहानोपमादोष इति ॥ ५२॥ हिन्दी-यह नपुंसक स्रीकी तरह जाता है, यह खी पुरुषके समान बोलती है। इन उदाहरण वाक्योंमें लिङवचनभेदरूप दोष नहीं है, क्योंकि यहां उपास साधारण धर्म गमन तथा वचनका उपमान और उपमेय दोनोंमें अन्वय सम्मव है, अतः यहाँ दोष नहीं है। इसी तरह-यब मुझे प्राणोंके समान प्रिय है, इसने धनकी तरह विद्या अजिंत की है, इन वाक्योंमें प्राणशब्द नित्यबद्धवचनान्त है और धन शब्द नित्य नर्पुंसक है, उसका अन्वय बिना लिङ्-वचन विपर णामके संभव नहीं है, अतः अगत्या लिक््वचन-विपरिणाम करके ही अन्वय करना होगा यहँ मो सहद्योंको उद्रेग नहीं होता है, यह भी दोष नहीं है।। ५२।। भवानिव महीपाल देवराजो विराजते। अलमंशुमतः कक्षामारोढुं तेजसा नृपः ॥५३॥ उपमानस्य हीनत्वाधिकत्वयोरदोषतामुदाहरति-भवानिति। हे महीपाल भवानिव देवराजो विराजते, अत्र नृपतेमनुष्यतया देवतास्वरूपादिन्द्राद् हीनत्वं, तथा। नृपतेर्देवांशसंभवतया नोद्वेगकरत्वमस्या उपमायाः। एवम् -- तेजसा नृपः अंशुम सूर्यस्ष्य कक्षाम् साम्यम् आरोदुम् प्राप्तुम् अलम् समथः, अत्र जात्याधिकोंऽशुमानुपमान कृतः परन्तु नृपस्य देवांशतया नोद्ेग इति न दोषः ॥ ५३॥ हिन्दी-हे राजन्, आपकीही तरह इन्द्र शोभा पाते है, इस उदाहरणमें उपमान नृप मनु होनेके कारण उपमेय इन्द्रसे होन है, अतः हीनस्व दोष होना चाहिये, परन्तु राजा देवांश हं है, उसकी दीनता उद्ेगजनक नहीं है, अतः यह दोष नहीं है, इसी तरह-यह राजा प्रता सूर्य की समता पानेमें समर्थ है, इस वाक्यमें उपमान सूय जात्या अभिक है, परन्तु पूर्वोक्त प्रका उद्वेग नहीं हो पाता है, अतः यह भी दोष नहीं माना जाता है॥ ५१॥ इत्येषमादी सौभाग्यं न जहात्येव जातुचिद्। अस्त्येषं कचिदुद्वेगः प्रयोगे तद्विदां यथा॥५४ ॥ उपसंहरति-इत्येवमिति। इति एवमादौ एतादृशे उदाहरणनिवहे -- सत लिपवचनभेदे हीनत्वेऽधिकत्वे च सौभाग्यं न जहाति वैचित्र्यं न नश्यति, अतो

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द्वितीय: परिच्छ्ठेद: १७

दोष: । न चैवमेषां दोषाणां सर्वथा विरह एव प्रसज्यत इत्यत्राह-न सवथेषां दोषा- णामभाव एव, किन्सूद्वेगसापेक्षतादोषाणामिति भावः । क्कचित् प्रयोगे वाग्विदां सहृदया- नाम् उद्वेग: प्रतीतिमान्धर्यकृता विकलता अस्त्येव, अतस्तत्रावश्यं दोषसत्तेति, तदुदाहरण सदो वक््यते ।। ५४ ॥ हिन्दी-ऊपर दिये गये उदाहरणोंमें उद्रेग नहीं है, यह वैचिनर्यरूप सौभाग्यसे हीन नहीं हो सके हैं, अतः यहाँ पर पूर्वोक्त उपमादोष नहीं होते हैं। नीचे ऐसे उदाहरण दिये जायेंगे जिनमें सहदयोंको उद्देग होता है जिससे उन्हें दुष्ट माना जाता है॥ ५४॥ हंसीव घवलम्न्द्र: सरांसीवामलं नमः। र्तृभक्को भटः श्वेव सद्योतो भाति भानुवत् ॥ ५५॥ उपमादोषस्थलमुदाहरति-हंसीवेति। 'चन्द्र: हंसीव धवलः' अत्रोपमानोपमेययो- हँसीचन्द्रयोलिंग्भेद:, 'सरांसीय नभः अ्रमलम्' इत्यत्र वचनभेद:, 'भर्तृभक्तः स्वामिभक्तो भटः शूरः श्वा इव' अनोपमानस्य शुनो निकृष्टजातित्वात् जातिन्यूनता, 'खद्योतो भानुषत् भाति' इत्यत्र खद्योतसूर्ययोरन्तरस्यात्यन्तमहत्तयाऽधिकता॥५५॥ हिन्दी-इंसीके समान चन्द्रमा शुभ है, इसमें उपमान इंसी और उपमेय चन्द्रमामें लिक् भेद है, सरोवरोंके समानं आकाश स्वच्छ है, इस वाक्यमें उपमान सरोवर और उपमेय आकाशमें वचनभेद है, स्वामिभक्त शूर कुप्तेकी तरह है, इसमें उपमान कुत्तेकी जाति हीन है और जुगनू सूर्यकी तरह चमक रही है, इसमें उपमान जात्या अधिक है। इस प्रकार लिङ्गभेद, वचनभेद, जातिहीनता और जात्यधिकतारूप उपमाके चार दोषोंके उदाहरण दिये गये॥ ५५॥ ईदश' वज्यंते सन्दिः कारणं तत्र चिन्त्यताम्। गुणदोषविचाराय3 स्वयमेव मनीषिभि: ॥५६॥ ईदशमिति। ईदशं पूर्वोक्तोदाहरणसमानं सद्भिः काव्यशाख्त्रनिण्णातः वज्यते त्यज्यते, तत्र कारणं प्रतीतिमान्थर्यजननद्वारा वैरश्योत्पादकत्वं चिन्त्यताम् स्वयमूद्यताम्, तथाकृते सति मनीषिभिगुणदोषविचार: सुसम्पादो भवतीत्याह-गुणदोषविच्यारायेति। स्पष्टमन्यत् ॥५६ ॥ इस तरहके दोषोंका सहृदय लोग त्याग करते हैं, उस त्यागमें प्रतीतिमान्थर्यकृत उद्गेगरूप कारणका कह स्वयं करें, बुद्धिमान् लोग गुण-दोषका दिचार करनेके लिये दूषकताबीजका विचार करें ॥ ५६ ॥ इववद्ायथाशब्दा: समाननिभ सन्निभाः ।

  • सडकूसदशसंवादिसजातीयानुवादिनः ॥५८।। प्रतिबिम्बप्रतिच्छन्द्सरूपसमसं म्मिताः।

कल्पदेशीयदेश्यादि: प्रख्यप्रतिनिधी भपि। सवणंतुलिती शब्दौ ये "चान्यूनार्थवादिनः ॥ ६० ।। १. ईदृशो। २. स्वन्न। ३. इदं श्लोकार्धे कचिन्ोपलभ्यते। ४. चछन्। ५. सप्रभाः। ६. देश्यादि। ७. य तल्यार्थ।

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काव्यादर्श:

समासश्च बहुवीहि: शशाक्कवद्नादिधु। स्पर्धते जयति द्ेष्टि द्रुव्यति प्रतिगर्जति ॥६१ ॥ आक्रोशत्यवजानाति कदर्थयति निन्दृति। विडम्बयति सन्घते हसतीर्ष्यत्यसूयति ॥६२॥ तस्य मुष्णाति सौभाग्यं तस्य कान्ति विलुम्पति। तेन सार्ध विगृद्ाति तुलां तेनाधिरोहति॥ ६३॥ तत्पद्ष्यां पदं घर्ते तस्य कक्षां विगाहते। तमन्वेत्यनुबध्नाति तच्छीलं तन्निषेधति॥६४ ॥ तस्य चानुकरोतीति शब्दा: साश्यसूचकाः। उपमायामिमे प्रोक्ताः कवीनां वुद्धिसौख्यदाः ॥ ६५॥ (इत्युपमाचक्म्') इववद्वेति। पर्यवसित उपमाभेदप्रस्तावः, सम्प्रति तद्वाचकान्निर्देष्टमयमुपक्रमः । अभिधालक्षणाव्यञ्जनाभिश्व तत्प्रतीतिः तत्र वाचकलक्षकव्यज्ञकान्सहैव निर्दिष्टवान् दण्डी। श्रत्यार्थ्यादिप्रविभागाभावेन तच्चिन्तामुक्ततयेत्थं कृतम्। अथाप्यादौ वाचका एव निर्दिष्टाः। इवशब्द: प्रसिद्धः, 'वत्' इति द्विविधस्यापि वतिप्रत्ययस्य संग्राहकः। अन्यत्स्पष्टम् ॥ ५७-६५॥ हिन्दी-इव, वत्, वा इत्यादि शब्द उपमाके प्रकाशक हैं, इनमें कुछ अभिधाद्वारा, कुछ लक्षणाद्वारा और कुछ व्यजनाद्वारा उपमाको प्रकाशित करते हैं। यहाँ पर निर्दिष्ट सभी उपमावाचक शब्दोंका लक्ष्यमें प्रयोग उदाहरणोंद्वारा स्फुट प्रतिपत्त्यर्थ प्रदशित किया जा रहा है। १ इवशब्द (निपात-अव्यय)- 'इंसीव कृष्ण ते कीत्तिः स्वर्गङ्गामवगाहते'। २ बठ्-यह तद्धितप्रत्यय है, यह दो प्रकारका होता है, एक-'तत्र तस्येव' इस सूत्रसे विहित, दूसरा-'तेन तुल्यं क्रिया चेदतिः' इस सूत्रसे विडित। क्रमशः एकही श्लोकमें दोनोंके उदाहरण दिये जाते हैं :- 'गाम्भीर्यगरिमा तस्य सत्यं गङ्गाभुजङ्गवत्। दुरालोकः स समरे निदाघाम्बररमवद्'॥ ३ वाशब्द-'मणीवोष्ट्रस्य लम्बेते प्रियौ वत्सतरौ मम'। ४ यथाशब्द- 'धन्यस्यानन्यसामान्यसौजन्योत्कर्षशालिनः । करणीयं वचश्रेतः सत्यं तस्यामृतं यथा'॥ ५ समानशब्द-'भुजे भुजङ्ेन्द्रसमानसारे भूयः स भूमेर्धुरमाससञ्ञ'। ६ निभशब्द-'प्रदुद्धपुण्डरीकाक्षं बालातपनिभांशुकम्'। ७ सन्निमशब्द-'भगवान् यज्ञपुरुषो जगर्जागेन्द्रसन्निभः'। ८ तुल्यशब्द-'अवेहि मां किङ्करमष्टमूर्तेः कुम्भोदरं नाम निकुम्भतुल्यम्'। ९ संकाशशब्द-'विमाने सूर्यसङ्गाशे रघुराजो व्यराजत'। १० नीकाशराष्द- 'आकाशनीकाशतटां तीरवानीरसकुलाम्। बभूव चरतां हर्षः पुण्यतीर्थी सरस्वतीम्'॥ १. संबन्धे। २. कक्ष्यां। ३. सूचिनः। ४. इदं श्लोकार्ष कचिन्नोपलभ्यते।

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द्वितीय: परिच्छेद:

११ प्रकाशशब्द-'चन्द्रप्रकाशं वदनं तरुण्या भाति सुन्दरम्'। १२ प्रतिरूपकशब्द-'वाग्भिः सुधायाः प्रतिरूपकाभिस्तनोति मोदं हृदि मेऽनिशं या'॥ ५७॥ १३ प्रतिपक्षशब्द-'पङ्केरुहश्री प्रतिपक्षभूतनेत्रप्रभाभि: स्पृहणीयशोभम्'। १४ प्रतिद्वन्द्विशब्द-'चन्द्रप्रतिदन्द्वि विभाति बालामुखं निशायां ललितोत्सवेषु'। १५ प्रत्यनीकशब्द-'कामस्य प्रत्यनीकोऽयम्'। १६ विरोधिन्शब्द-'त्वं रतेश्च विरोधिनी'। १७ सद्ृकशब्द-'न त्वया सदृगन्योऽस्ति त्रैलोक्येऽपि मनोरमः'। १८ सद्ृशशब्द-'सुधाकरश्रीसदृशी च कीतिः'। १९ संवादीशब्द-'विभाति बालावदने स्मितश्रीः संवादिनी शारदचन्द्रिकायाः'। २० सजातीयशब्द-'कृष्णागुरुसजातीयम्'। २१ अनुवादीशब्द-'पीयूषस्यानुवादिनम्'॥ ५८॥ २२ प्रतिबिम्बशब्द-'चन्द्रस्य प्रतिबिम्बं सत्सकं सन्तापहं श्रये'। २३ प्रतिच्छन्दशब्द-'जामदग्न्यप्रतिच्छन्दः'। २४ सरूपशब्द-'सरूपो यः किरीटिनः'। २५ संमितशब्द-'सम्मितो रघुनाथस्य शिवराजो विराजते'। २६ समशब्द-'पाणिः पल्लवेन समस्तव'। २७ सलक्षणशब्द-'इन्दुसलक्षणवदने'। २८ सदृक्षशब्द-'सुधासदृक्षोऽधरस्य रसः'। २९ आभाशब्द-'ज्योत्साभाः स्मितमधुरा नर्मालापाः'। ३० सपक्षशब्द-'दलद्राक्षानिर्यद्रसभरसपक्षा भणितयः'। ३१ उपमितशब्द-'राक्षसोपमिता वाग्भि: खला दीनांस्तुदन्त्यलम्'। ३२ उपमाशब्द-'साथवस्तोषयन्त्यन्यांस्ताभिरेव सुरोपमाः' ॥५९॥ ३३ कल्पप्रत्यय-'पूर्णेन्दुकल्पवदना'। ३४ देश्यप्रत्यय-'मृणालीदेश्यदोर्लता'। ३५ देशीयप्रत्यय-'चक्रदेशीयजघना सा स्वप्रेऽ्रपि न दृश्यते'।

३७ प्रतिनिधिशब्द- 'भयोत्सष्टविभूषाणां तेन केरलयोषिताम्। अलकेषु चमूरेणुश्वूर्णप्रतिनिषिः कृतः' ॥ ३८ सवर्णशब्द-'ग्रथितमौलिरसौ वनमालया तरुपलाशसवर्णतनुच्छदः'। ३९ तुलितशब्द-'मुखं श्लेष्मागारं तदपि च शशाङ्टेन तुलितम्'॥ ४० अन्यूनार्थवाचक सभी शब्द उपमाप्रत्यायक होते हैं, जैसे-अन्यून, अनून, अह्दीन इत्यादि। क्रमशः उदाहरण- (क) अन्यूनशब्द-'सुधाऽन्यूनानि गङ्गाया जलानि'। (ख) अनूनशब्द-'अमृतानूनरसाधरा प्रिया'। (ग) अहीनशब्द-'अहदीनं चन्द्रमण्डलात्-तन्मुखम्'॥६० ॥ ४१ बहुजीहिसमास-'कमलकरा करभोरु: कुवलयनयना'। ४२ कर्मधारयसमास-'शोणाधरांशुसंभिन्नास्तन्वि ते वदनाम्बुजे'। ४३ स्पर्धते-'स्पर्धते रुद्धमद्दयों वररामामुखानिलैः'। ४४ जयति-'जिग।य जम्बूजनितश्रियः श्रियं सुमेरु-शङ्गस्य तदा तदासनम्'। . ी 'अगायसं देषि मधाकामत्पापेन लोके दयतें कलडम'।

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१०० काव्यादर्श:

४६ द्रु्यति-'द्ुधन्ति तल्लोचनमम्युजानि ततो निमीलन्ति निशाद्ठ तानि'। ४७ प्रतिगर्जति-'न जातु शक्तिरिन्दोस्ते मुखेन प्रतिगजितुम्' ॥६१॥ ४८ आक्रोशति-'अम्बुजमाक्रोशति ते मुखम्'। ४९ अवजानाति-'अवजानाति ते वक्त्रं पभम नेयं कथा मृषा'। ५० कदर्थयति-'कदर्थयति कान्ताया मुखं मे फुल्लपङ्कजम्'। ५१ निन्दति-'निन्दत्यवरश्च बन्धूकम्'। ५२ विडम्बयति-स एवमुक्त्वा मघवन्तमुन्मुखः करिष्यमाणः सशरं शरासनम्। अतिष्ठदालीढविशेषशोमिना वपुःप्रकर्षेण विडम्बितेश्वरः'॥ ५३ सन्धरे- 'चन्दन: शीततां घत्ते, सौरम्यं कमलं, शशी। लावण्यं, त्वन्मुखं वाले सन्धत्ते तभ्नयं कथम्'॥ ५४ इसति-'अकलकतया वक्त्रं इसन्तीन्दुं कलक्किनम्'। ५५ ईष्यति-'ईर्ष्यति कपिचेष्टाय चपलमतियों यदीयदुश्चरितम्'। ५६ असूयति-'नित्यमसूयति वानरवदनाय नमः खलाय शतशस्ते' ॥६२॥ -- ५७ तस्य मुष्णाति सौभाग्यम्- ५८ तस्य कान्ति विलुम्पति- इन छः वाक्योंमें कविने उदाहरणकी - ५९ तेन सार्ध विगृलाति- ६० तुलां तेनाधिरोहति- रचना स्वतः कर दी है, इनके उदाहरण . . ६१ तत्पदव्यां पदं धत्ते- अलगसे देनेकी आवश्यकता नहीं है॥६३।

६२ तस्य कक्षां विगाहते- ६३ तमन्वेति-'पभ्ममन्वेति ते मुखम्'। ६४ तमनुबध्नाति-'शशाङ्कमनुवध्नाति मुखमित्यमृषा कथा'। ६५ तच्छीलम्-'शीलं धत्ते पयोजस्य राधाचरणयोर्युंगम्'। ६६ तन्निषेधति-'निषेधति मुखं बाले तव फुहं कुशेशयम्'॥ ६४॥ ६७ तस्यानुकरोति-'सर्वदेवमयस्य प्रकटितविश्वरूपाकृतेरनुकरोति भगवतो नारायणस्य'। ऊपर गिनाये गये शब्द सादृश्यसूचक हैं, इनमें अभिधा, लक्षणा और व्यक्षनावृत्तिद्वारा सादृश्यको प्रकाशित करनेकी क्षमता है, इनमें इव, वद, यथा आदि शब्द अभिधाद्वारा सादृश्यका ज्ञान कराते हैं, तुल्यादिशब्द सादृश्यमें शक्त न होकर सादृश्यविशिष्टमें शक्त हैं अतः उनवे द्वारा अर्थसादृश्यकी प्रतीति होती है। निषेधति, अतूयति आदि शब्द सादृश्यके लक्षक हैं और अनुकरोति आदि सादृश्यके व्यक्षक हैं। इन उपमासूचक शब्दोंका सझ्जयन कवियोर्क बुद्धिको सुख (क्लेशराहित्य) प्रदान करनेके लिये किया गया है। यहॉँ इतना और बता देना आवश्यक है कि यह उपमावाचकोंका परिगणन नहीं है, या तो निदर्शनमात्र है, इसके अतिरिक्त रूपमें भी उपमा प्रकाशित की जा सकती है, जैसे- अनुहरतिशब्दसे-'अनुहरति मनोजबाणलक्ष्मी सुभगतनो तव चज्चलः कटाक्षः'। सहाधीति शब्दसे-'अवधृत्य दिवोऽपि यौवतैन सहाधीतवतीमिमामइम्' सतीर्थ्यशब्दसे-'कमलसतीर बदनं कुमुदसहाध्यायिनो हासाः।६५ ॥ उपमेव तिरोभूतमेदा रूपकमुष्यते। यथा बाहुलता पाणिपमं धरणपलमः ।।६६।।

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द्वितीय: परिच्छेद: १०१

उपमानन्तरं रूपक लक्षयति-उपमैवेति। तिरोहितः निगूहितः विद्यमानोऽपि सादृश्यातिशयप्रकाशनाय कविना निह्ुतो भेद: प्रस्तुताप्रस्तुतयोवैंधम्य यस्यां तादृशी उपमा सादृश्यमेव रूपकं नामाऽलद्ठारः। रूपयति उपमानोपमेययोरेकरूपतामापादयति तदूरूपकमिति तदक्षरार्थः। यथा मुखं चन्द्र इति। अत्र मुखचन्द्रपदाभ्यां मुखत्वचन्द्र- त्वरूपपरस्परविरुद्धघमत्वेनोपस्थितयोरपि मुखचन्द्रयोर्भेंदनिगूदनेनाभेद प्रतिपत्तिः । इयं चाभेद प्रतीतिराहार्यरूपा। परिष्कृत लक्षणं जगभायम्य यथा-उपमेयतावच्छेदकपुरस्कारे- णोपमेये शब्दाभ्निश्षीयमानमुपमानतादात्म्यं रूपकम् इति। उपमेयतावच्छेदकपुरस्कारेयेति विशेषणादपहुतिभ्रान्तिमदतिशयोकिनिरासस्तवाहि अपछुती स्वेच्छया निषिष्यमानत्वात, भ्रान्तिमति भ्रान्तिजनकदोषेणैव प्रतिबष्यमानत्वात्, भतिशयोक्तिनिदशनयोक्ष साभ्य- वसानलक्षणामूलत्वादुपमेयतावच्छेदस्य पुरसकारी नास्ति। शब्दादिति विशेषणाव् मुखमयं चन्द्र इति प्रात्यक्षिकाहायनिश्वयगोचरचन्द्रतादात्म्यव्यवच्छेदः। निश्चीयमान- मिति विशेषणात्संभावनात्मनो नूनं मुखं चन्द्र इत्युत्प्रेक्षाया व्यापृत्तिः, उपमानो- पमेयविशेषणाभ्यां सादृश्यलाभात् 'सुखं मनोरमा रामा' इत्यादि शुद्धारोपतादात्म्य- निरासः। उदाहरणमाह-बाहुलतेति। बाहुरेव लता, पाणिरेव पद्मम्, चरण एव पक्लव इत्युपमानप्रधानो मयूरर्व्यंसकादित्वात्समास: ॥६६॥। हिन्दी-यदि अतिशय सादृश्य बतानेके लिये उपमान और उपमेयका भेद छिपाकर दोनोंमें अभेद-सा बताकर कहा जाय तो उस सादृश्यको रूपक कहा जाता है। रूपकशब्दकी व्युतपत्ि है-रूपयति तद्रूपतां नयति-उपमानोपमेये सादृश्यातिशयद्योतनद्वारा एकतां नयतीति रूप- वान्। अभिप्राय यह है कि उपमान और उपमेयके मिन्नस्वरूपमें प्रकाशित होने पर भी दोनोंमें अत्यन्त साम्यके प्रदर्शनके लिये काल्पनिक अभेदका किया जाना ही रूपक है। मैसे 'मुखं चन्द्रः' इस वाक्यमें मुख और चन्द्रमाके अपने-अपने स्वरूपमें प्रकाशित होने पर भी दोनोंमें अभेदका आरोप किया गया है। यह अभेदारोप भी जब चमत्कारयुक्त होगा तब ही इसे अलक्कार माना जायगा, अत एव 'लोष्टः पाषाणः' इस अभेदारोपमें रूपक नहीं होगा। उदाहरण- बाहुलता, चरणपक्कज, पाणिपल्लव। इन उदाहरणों में 'बाहुरेव लता, चरण एव पड्कजम्, पाणिरेव पल्लवः' इस प्रकार उपमान प्रधान मयूरव्यंसकादि समास हुआ है। 'मुखपभ्मम्' इत्यादि समासस्थलमें यदि विशेषण प्रावान्येन उपमानगत होगा तब रूपक माना जायगा, जसे 'विकसितं मुखपझ्मम्' यहाँ विकास पभ्मधर्म है, पत्म उपमान है अतः इसे रूफक कहा जायगा। वही विशेषण यदि उपमेयगत होगा तब उसको उपमा माना जायगा, जैसे 'सहासं मुखपभ्म्', यहाँ हास उपमेयभूत मुखका धर्म है अतः उपमा है। इस प्रकार उपमारूपकका साङ्कूर्य अविशेषणकस्थलमें बना ही रहता है॥ ६६ ॥ अङ्गल्य: पल्लवान्यासन् कुसुमानि नखस्विषं:। बाहू लते वसन्तशरीस्त्वं नः प्रत्यक्षचारिणी॥ ६७ ।। पूर्वकारिकायां समस्तरूपकस्थलान्युदाहतानि सम्प्रति व्यस्तस्थलीयरूपकाण्युदा- हरति-अङ्कल्य इति। अङ्ुल्यः अक्ल्यभिधया प्रथिता: करशाखाः पल्लवानि किसल- यानि, नखत्विषः नखमयूखाः कुसुमानि प्रसूनानि, बाहू करो लते इव, तदित्थं त्वं नः प्रत्यक्षवारिणी दर्शनविषयीभूता वसन्तश्रीः वासन्ती शोभा। उपमास्थले इव रूपकेऽपि १. नखाचिष:।

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१०२ काव्यादर्श

सहृदयहृदयीद्वेगाभावे उपमानोपमेययोर्भिल्नलिम्तादोषाय न भवतीति सूचनाय पूर्वोक- वाक्यत्रये भिन्नलिम्योरुपमानोपमेययोनिंर्देशः । एवमेव क्वचिदूपके वचनभेदोपि न दोषाय, यथा प्रयुज्यते-शास्त्राणि चक्षुर्नेवमिति ॥६७॥। हिन्दी-पूर्वकारिकामें-'बाहुलता', 'चरणपङ्कज', 'पाणिपल्लव' यह समासस्थलगत रूपकके उदाहरण बताये गये हैं, इस कारिकामें असमस्तस्थलीय रूपकके उदाहरण बताते हैं-अङ्गुल्य इत्यादि। तुम्हारी अश्गुलियाँ पल्लव हैं, तुम्हारें नखोंकी कान्तियाँ फूल हैं, तुम्हारें बाहु लता हैं, इस प्रकार तुम हम लोगोंके सामने प्रत्यक्षचारिणी वसन्तशोभा हो। उपमाके निरूपणप्रसङ्गमें यह बात कही गई है कि यदि सहृदयोंको खटके नहीं तब उपमान और उपमेयका लिङ्गभेद दोष नहीं माना जाता है, वही बात रूपकमें भी मान्य है, अतः 'अङ्ुल्यः पल्लवानि', 'कुसुमानि नखत्विषः', 'बाहू लते' इन उदाहरणोंमें लिङ्गभेद अविचार- णीय है। इसी तरह वचनभेद भी क्षम्य है, जैसे-'शस्त्राणि चक्षुर्नवम्' इसमें सकलशास्त्र- प्रवीणता बतानेके लिये-उसके द्वारा चमत्कार उत्पन्न करनेके लिये 'शास्त्राणि' यह विशेषण बहुवचनान्त प्रयुक्त किया गया है, यह दोषाधायक नहीं है ॥ ६७ ॥ इत्येतद्समस्ताख्यं समस्तं पूर्वरूपकम्। स्मितं मुखेन्दोर्ज्योत्स्नेति समस्तव्यस्तरूपकम् ॥६८ ॥ इति एतत् अव्यवहितपूर्वोक्तम्-'अङ्गल्यः पल्लवानी'ति रूपकत्रयम् असमस्ताख्यम् असमस्तरूपकसंज्ञकम्, पूर्वरूपकम् पूर्वकारिकायामुक्तं रूपकम् बाहुलता पाणिपल्लवादि- रूपम् समस्तम् समस्तरूपकसंज्ञकम्, उपमानोपमेययोस्समासासमासकृतोऽयं भेद:। सम्प्रति तृतीयं प्रकारं समस्तव्यस्तरूपकमुदाहरति-स्मितमिति । मुखेन्दोः मुखमे- वेन्दुश्न्द्रस्तस्य स्मितं किश्चिद्धसितम् ज्योत्स्ना इति अत्र मुखेन्दोरिति समस्तम्, स्मितं ज्योत्स्नेति व्यस्तं तदिदं संहत्य समस्तव्यस्तरूपकं नाम ।। ६८ ।। हिन्दी-यह पूर्वकथित-'अङ्गुल्यः पल्लवानि' इत्यादि रूपकत्रय असमस्तरूपक हैं, और पहले वाली कारिकामें उक्त-'बाहुलता' 'चरणपङ्कज' आदि रूपक समस्तरूपक हैं, 'स्मितं मुखेन्दोज्योत्स्ना' यह समस्तव्यस्तरूपक है, क्योंकि इसमें 'मुखेन्दोः' पदमें समास है और 'स्मितं ज्योत्स्ना' में सनास नहीं है॥ ६८॥ ताम्राक्कुलिदलश्रेणि नखदीधितिकेसरम्। ध्रियते मूर्ण्नि भूपालैर्भवश्चरणपङ्कजम्॥६९॥ सम्प्रति सकलरूपकमुदाहरति-ताम्रेति। ताम्राङ्गुल्यो रक्ता अङुलयः दलश्रणिः पत्रावलि: यत्र तादृशम्, नखानां दीधितयः किरणा एव केसराणि किजल्कानि यस्मि- स्तादशच भवचरणपङ्कजम् त्वत्पदकमलम् भूपालैसत्वद्वशवत्तिराजभिमूध्नि ध्रियते शिरसा उद्यते ॥ ६९॥ हिन्दी-लाल-लाल अज्गुलियाँ पत्रावली हैं, नखकी श्वेत रक्तकान्ति केशर है, इस तरहके आपके चरणको वशवत्ती राजागण अपने शिरपर रखते हैं, आज्ञा मानते हैं ॥ ६९ ॥ अङ्गुल्यादौ दलादित्वं पादे चारोप्य पद्मताम्। तद्योग्यस्थानविन्यासादेतत् सकलरूपकम् ॥। ७० ।। लक्षणं सम्गमयति- अङ्गुल्यादाविति। अङ्लुलिषु दलत्वम्, नखकिरणेषु केसरत्वम्,

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द्वितीय: परिचछ्छेद: १०३

रूपकम्, सर्वावयवरूपणं हि सकलरु पकत्वार्थमपेक्षितम्, तथात्र दलकेसररूपसर्वावयव- रूपणादुपपन्नम्। इदमेव साडगं, सावयरवं रूपकमिति नवीना आहुः तथा चोक्तं पण्डित राजेन- परस्परसापेक्षनिष्पत्तिकानां रूपकाण सक्कांतः सावयवम्। यथा :- 'सुविमलमौक्तिकतारे धवलांशुकचन्द्रिकाचमत्कारे। वदनपरिपूर्णचन्द्रे सुन्दरि राकासि नात्र सन्देहः॥ इदं सकलरूपकमपि द्विविर्ध-समस्तासमस्तभेदात्, तत्रेदं-'ताम्राङुलिदलश्रेणि' इत्यादि पर्द्य समस्तसकलरूपकोदाहरणम्, 'अङुल्यः पल्लवान्यासन' इति च पूर्वोक्तमसमस्तसकलरूप- कोदाहरणमिति बोध्यम्॥। ७० ॥ हिन्दी-इस श्लोकमें अङ्गुलियोंमें पत्रावलीका रूपण किया गया है, नखकान्तिमें केशर का रूपण किया गया है, और चरणमें पद्मका रूपण किया है जिससे पादपद्मको राजाके मस्तकरूप योग्य स्थानपर प्रतिष्ठित किया जा सके, वह सकलरूपक है क्योंकि इसमें कमलके सभी अवयव रूपित किये गये हैं। इसी सकलरूपकको नवीन आचार्यगण साङ्ग या सावयव रूपक कहते हैं। यह सकलरूपक दो प्रकारका होता है-समस्त सकलरूपक और असमस्त सकलरूपक। उसमें 'ताम्राज्गुलिदलश्रेणि' यह समस्त सकलरूपक है, और 'अङ्गुल्य पल्लवानि' यह असमस्त सकल- रूपक है।। ७० ॥। अकस्मादेव ते चण्डि स्फुरिताधरपल्लवम्। मुखं मुक्तारुचो धत्ते धर्माम्भ:कणमअ्रीः ॥७१॥ अवयवरूपकमुदाहरति-अकस्मादेवेति। हे चण्डि कोपने, अकस्मात् सहसा एव स्फुरिताधरपल्लवम् चलदोष्ठकिसलयं ते तव मुखम् मुक्त्तारुच: मौक्तिकाकारा: धर्माम्भ :- कणमञ्जरीः स्वेदोदकबिन्दुरूपाः मजरीः धत्ते धारयति, कोपयुक्तायास्तव मुखं स्विद्यति, स्वेदकणाश्च मुक्तावदवभासन्ते इत्यर्थः॥।७१॥ हिन्दी-हे मानशीले, सहसा तुम्हारे (मुखपर) पसीनेकी बूँदे मअ्जरकी तरह दीखने लगीं, तुम्हारे अधरपल्लव हिलने लगे, तुम्हारे कोपका उदय हो आया॥ ७१॥ मअरीकृत्य धर्माभ्भः पल्लवीकृत्य चाधरम्। नान्यथा कृतमत्रास्यमतोऽवयवरूपकम् ।।७२॥। मश्जरीति। अत्र प्रस्तुतोदाहरणे धर्माम्भ: मजजरीकृत्य कर्णमअ्जरीत्वेन रूपयित्वा अधरस पल्लवीकृत्य पल्लवतया रूपयित्वाऽपि आस्यम् मुखं न अन्यथा कृतम् पद्मत्वेन रूपितमिति अतः अवयवरूपकमेतत्। अवयविनो मुखस्य पद्मत्वेनारूपणेऽपि अवयवानां धर्माम्भ:कणाधरादीना मज्जरीत्वपल्मवत्वादिना रूपणादवयवरूपकमिदम् । अर्वाश्वस्त्वा- चार्या इदमेकदेशविवर्त्तिरूपकनाम्ना व्यवहरन्ति। तत्रायं विशेष :- दण्डिनोऽवयवरूपके- डवयवानां रूपणे कतेऽपि निश्चयेनावयविनो रूपणस्याभावः, नवीनाभिमतैकदेशविर्वास्त- रूपके तु अवयवानामन्यतमस्यापि रूपणस्य विरहः, अवयविन एव रूपणस्य विरह इंत्यु- भयोरन्यतरः प्रकार आस्थितो भवति ॥ ७२॥ हिन्दी-इस उदाहरणमें स्वेदबिन्दुको मअरीसे रूपण दिया गया है, और अधरको पल्लवका रूपक किया गया है, परन्तु मुखको किसी दूसरे रूपमें (पअ्मरूपमें) रूपित नहीं किया गया है,

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१०४ काव्यादर्श:

अतः यह अवयवरूपक है। अवयवरूपकस्थलमें अवयवमात्रका रूपण किया जाता है, अवयवीको योही छोड़ दिया जाता है, एकदेशविवत्ती रूपकमे अवयव या अवयवी किसी एकका रूपक छुटा रहता है, यही अन्तर है। नवीन आचार्यगण अवयवरूपककी जगह एकदेशविवति रूपक ही मानते हैं। ७२॥ चल्गितम्र गलदमजलमालोहितेक्षणम्। वितृणोति मदावस्थामिदं वदनपङ्टजम् ।।७३।। भवयवरूपकं निरूप्य सम्प्रत्यवयविरूप कमाह- चल्गि तम्रु इतति । वल्गित भ्रु चललित - भ्रुक्ुटि, गलद्धर्मजलम् प्रस्नवत्स्व्रेदवारि आलोहितेक्षणम् रकनयनम् इदं दृश्यमानम् वदनपळ्ुजम् तव मुखरूपं कमलम् मदावस्याम् मद्यपानजनिताम् विक्ृतिम् विव्ृणोति प्रक्ा- शयति, भ्रूचापलस्वेदप्रवृत्िर कनेत्रतादि का धर्मास्तस्या मदोपयोगं व्यज्यन्तीत्यर्थः॥७३॥ हिन्दी-जिसमें भ्रुकुटियाँ चजक हो रही हैं, पसोने को बूँदें टपक रही हैं, आँखें लाल हो रही है, ऐसा यह तुम्हारा वहनतकज तुम्हारो मदावस्था-मद्योपयोगजनित विकृतिको प्रकटित करता है।। ७३ ॥। भविकृत्यं मुखाक्गानि मुखमेवारविन्वताम्। आसीद्ृमितमत्रेद्मतोऽवयवि रूपकम् । ७४॥ उदाहरणमुपपादयति-अविक्ृत्येति। अत्र उक्तोदाहरणे मुखाज्ञानि त्रुकुटिधर्म- जलनयनादोनि अवयवानि अविकृत्य तदवस्यान्येव स्यापयित्वा (उपमानाज्नत्रमरादिभि- ररूपयित्वा) मुखम् अवयविभूतम् वदनम् एव अरविन्दताम् गमितम् कमलत्वेन रूपित- मासीदत इदमवयविरूपक्रम्। नवानानां मते इदमप्येकदेशविवर्ति रूपकम्॥७४ ॥ इस उदाहरण में मुखाज्-प्रुकुटि, स्वेदजल, रक्तयन आदिका भ्रमर, पत्म, मधु आदिके साथ रूपण नहीं किया गया, केवल मुखको कमलके रूपमें रूपित कर दिया गया है अतः यहाँ पर अवयव्री मुखका रूपण होनेसे अवयवरूपक होता है। नवीनोंके मतमें यहाँ भी एकदेशविवर्ति रूपक माना जायगा, निरङ्गरूपक तो इसमें नहीं कहा जा सकता क्योंकि इस उदाहरणमें अवयवी मुखके अनयत भ्रू, स्वेद, नयन तो निर्दिष हो हैं, कमलरूप आरोप्यमाणके अवयव भ्रमरादि का निर्देश नहों किया गया है। निरक्रूनक होता तब तो मुखके अवयत्र भो नहीं निर्दिष् होते ॥ ७४॥ मदपाटलगण्डेन रकनेत्रोस्प लेन ते। मुखेन मुग्धः सोऽप्येष जनो रागमय: कृतः।७५॥ अवयवरूपकस्य भेदानभिधातुमुपक्रममाण एकाज्तरूपकमाह-मदेति। मदेन मदयोपयोगेन पाटलो श्वेतरक्तौ गण्डौ कपोलदेशौ यत्र तादृशेन, एवं रक्तम् अरुणवर्णम् नेत्रमेवोत्पलं वत्र तेन ते तव मुखेन एषः मज्जक्षणो मुग्धः त्वतसौन्दर्यमोहितो जनः रागमयः अनुरकः (लोहितक्ष) कृतः। खदायं मदवित्रमं वोद्य मम रागो नितरां प्रवुद्ध इत्यर्थ:।।७५।। हिन्दी-मदपान करनेके कारग लाल कपोल, और कमलरूप रक्तनेत्रोंसे युक्त तुम्हारे मुखपर मोहित होकर यइ आदमी (मैं) रागमय (लाल-अनुरक्त) हो गया, तुम्हारें मस्ती भरे चेहरेको देखकर मैं मोडित हो गया।। ७५।।

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द्वितीय: परिच्छेद: १०४ एकानरूपकं चैतदेवं द्विप्रभृतीम्यपि। अद्गानि रपयम्स्यत्र योगायोगी भिदाकरौ॥। ७६ ॥ पकाक्ेति। एतत् व पूर्वोक्तमुदाहरणम् एकाज्रूपर्क नाम, यतोऽत्र 'रकनेत्रोत्पले- ने ति एकान एव रूपणं कृतं नान्यत्र मदपाटलगण्डेनेत्यादौ। एवम् आयेद दिशा द्विप्रमृतीनि अपि द्वित्रिचतुःपश्सङ्कथकानि अपि अमानि (कवयः) रूपयन्ति, ततथ् इथम्रूपकश्र्यप्रूपकचतुरक्ुरूपकादीनि बहूनि रूपकाणि भवन्ति। अरपस्मिन्नेकाम्रूपकेऽपि योगायोगो युकतायुकत्वे मिदाकरी भेदकरौ भवतः। इदमेकावरूपकमपि युक्तरूपकायुक- रपकमेदेन द्विधा भिद्यत इत्यथं: ।। ७६ ।। हिन्दी-यह एकाऊ रूपकका उदाहरण हुआ, क्योंकि यहाँपर 'नेत्रोत्पल' मात्रमें रूपण किया गया है। इसी तरह द्यक्, त्र्यङ्, चनुरत रूपक भी होते हैं। इनका भी युक्तरूपक और अयुक्त- रूपक नामसे भेद किया जाता है। इस तरहके भेदके कारण योग और अयोग होते हैं, यहाँ योगका अर्थ है आरोपणयोग, और अयोगका अर्थ है आरोपणायोग ॥ ७६ ॥ स्मितपुष्पोज्ज्वलं 'लोलनेत्रभृङ्गमिदं मुखम्। इति पुष्पद्विरेफाणां सक्त्या युक्तरूपकम् ॥७७॥ युक्तरूपकमयुक्तरूपकं चेति भेददवयं प्रति पूर्वकारिकायामित्ितं कृतं, सम्प्रति तयोर्युक्क रूपकाख्यं प्रथमं भेदमुदाहरति-स्मितेति। स्मितम् ईषद्धसितमेव पुष्पं, तेन उज्जवलम् कान्तिमन, लोले चजे नेत्रे एव भृग्गी यत्र ताहशब इदम् मुखम् अस्तीति शेषः। इति अत्र पुष्पाणां द्विरेफाणाथ क्पशः स्मितेषु चलनेत्रेषु चारोप्यमाणाना समत्या परस्परसम्बन्धस्योचित्येन इदं युक्तरूपकं नामालङ्कारः।। ७७। हिन्दी-फूलरूपो मुस्कुराइटसे कान्तिशाली और चज्नलनेत्ररूप भ्रमरवाला यह मुख है, इस उदाहरणमें स्मितमें पुष्पत्व तथा नेत्रनें भ्रमरत्वका आरोप किया गया है, इसनें आरोप्यमाण पुष्प और भ्रमरका योग संगत है अतः इसे युक्तरूपक कहा जाता है॥ ७७॥ हदमार्द्रस्मितज्योत्स्नं स्निग्धनेत्रोत्पलं मुखम्। इति ज्योत्स्नोत्पलायोगादयुक्त नाम रूपकम् ॥ ७८ ॥। क्रमप्राप्तमयुक्तरूपक पुदाहरति-इद्मिति। आरई प्रमाई स्मितमेव ज्योत्हना चन्द्रिका यत्र तादशम्, स्निग्घे स्नेइपूर्णे नेत्रे एव उत्पने कमजे यत्र तादशब मुखम्। प्रस्वीति शेषः। अत्र ज्योत्स्नोत्पलयोरयोपाद्-आरोप्यमाणयोश्रन्दिकाकमलयो: परस्पर- विरोधितयाऽसम्बन्धात् अयुकरूपकं नामालक्वार इति भावः॥।७८। हिन्दी-प्रेमपूर्ण हँसोरूप चन्द्रिकासे युक्त एवं स्नेहयुक्त नेत्ररूप कमलसे अलङ्कृत यह तेरा मुख है' इस उदाहरगमें चन्द्रिका और कमकरा आरोध्यमाग पदार्थाे परस्रविरोधी होनेके कारण योग नहीं होनेसे अयुक्तरूपक अलक्कार है॥ ७८ ॥ रूपणाद्क्विनोऽक्गानां रूपणाऊूपणाश्रयात्। रूपकं विषमं नाम ललितं जायते यथा।। ७९ ॥

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१०६ काव्यादर्श:

विषमरूपकं लक्षणमुखेन निरूपयति-रूपणादिति। अज्िनः प्रधानस्य वर्णनीयस्य रूपणात्, तथा अज्ञानां तदवयवादीनामप्रधानानाम् रूपणस्य अरूपणस्य चाश्रयाद, अम्ञानां मध्ये केषांचिद्रूपणात् केषाश्चिच्चारूपणात् ललितं विचित्रतया सहृदयहृदयावर्जक- मिदं विषमं नाम विषमरूपकारयं जायते इत्यर्थः ॥ ७९॥ हिन्दी-जिस रूपकमें वर्णनीयतया उपात्त अङ्गी-प्रधान-का रूपण किया गया हो परन्तु अङ्ग-अप्रधान-अवयवोमें से कुछका रूपण हो और कुछका रूपण न हो, तब रूपण और अरूपण दोनों प्रकारोंके आश्रयणके कारण ललित -- अर्थात् सहृदयहृदयाकर्षक इस रूपकको विषमरूपक कहा जाता है॥ ७९॥ मदरक्तकपोलेन मन्मथस्त्वन्मुखेन्दुना। नच्तिंतभूलतेनालं मर्दितुं भुवनत्रयम्।। ८० ।। विषमरूपकमुदाहरति-मदरक्तेति। मदरक्तकपोलेन मद्यपानसज्ञातारुण्यशालि- कपोलेन, नत्तितभ्रूलतेन चलितभ्रूलतेन त्वन्मुखेन्दुना त्वदीयमुखचन्द्रेण मन्मथः कन्दर्पः भुवनत्रयं मदितुं पराभवितुम् अलम् समर्थः। मदपानजनितारुण्यशालिकपोलभृता चलितभ्रुकुटिरूपलतेन तव मुखचन्द्रेण कन्द्रर्पो भुवनत्रयमपि जेतुमीश इत्यर्थः। अ्रत्र अज्ञिनि मुखे चन्द्रत्वारोपः कृतः अज्ञेषु ध्रुवोर्लतात्वारोपोऽपि कृतः, परन्तु मदरक्त- कपोलयोन कस्याप्यारोपः कृत इति अज्ञानां रूपणारूपणाश्रयात् इति लक्षणं समन्वेयम्। तदिदं विषमरूपकं नामालङ्कारः।। ८० ।। हिन्दी-मदरक्त कपोलोंवाले, चब्रल भरूलताशाली तुम्हारे मुखचन्द्रसे कन्दर्प तीनों लोकोंको मसल देने -- जीत लेनेमें समर्थ हो सकता है। इस उदाहरणमें अङ्गी-प्रधान-मुखमें चन्द्रत्वका आरोप किया गया, अङ्गोंमें भी भ्रुमें लताका आरोप हुआ, परन्तु मदरक्त कपोलमें किसी वस्तुका आरोप नहीं किया गया है, अतः इसे विषमरूपक कहा जा सकता है॥। ८० ।। हरिपाद: शिरोलग्जहुकन्याजलांशुक:। जयत्य सुरनि:शङ्कसुरानन्दोर्सवध्वजः ।।८१।। सविशेषणरूपकं नाम रूपकभेदं निरूपयन्प्रथममुदाहरणमाह-हरिपाद इति। शिरसि अभ्रभागे (पादस्य ध्वजस्य च ) लग्ना संसका या जहुकन्या गज्गा तस्या जलम् एव अंशुकम् श्वेतपताका यत्र तादृशः, असुरेभ्यः निःशङ्काः गतभयाः ये सुराः तेषाम् आनन्दोत्सवस्य ध्वजः केतुरिव हरिपादः वामनस्य भगवतश्वरणो जयति। अत्र बलिनिभ्रहेण देवा असुरेभ्यो निःशक्का अजायन्त, ते च उत्सवं द्योतयितुं ध्वज- सुच्िक्षिपुः स इव प्रतीयते स्म भगवतः पादो यत्र गज्ञा ध्वजपट इव भासते, गज्नाया विष्णोः पादात्प्रसूतेर्धावल्यान्व ध्वजपटत्वारोप इति ध्येयम् ॥ ८१ ॥ हिन्दी-बलिके निगृहीत हो जानेपर असुरोंसे निःशक्क देवोंके आनन्दोत्सव-ध्वजके समान प्रतीत होने वाले भगवान् वामनके चरणकी जय हो जिसके अग्रभागमें संसक्त गङ्गाका जल- ध्वजाग्रवर्त्ती वस्त्रकी तरह दीखता था ॥ ८१॥ विशेषणसमप्रस्य रूपं केतोर्यदीडशम्।

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द्वितीय: परिच्छेद: १०७

उदाहरणं सज्मय्य विशदयति-विशेषणेति। विशेषणेन शिरोलग्नेति विशेषणेन समप्रस्य युक्तस्य केतोः यदीदर्शं रूपम् सपताकष्वजरूपम् पादे भगवतश्चरणे तस्य सपताकध्वजस्य समर्पणात् विशेषणविशिष्टस्य पदार्थस्यारोपात् सविशेषणरूपकमेतत् ॥८२॥ हिन्दी-जिस विशेषणसे युक्त ध्वजका रूप बतलाया गया है वह पूर्ववर्त्ती विशेषण है, उसीका चरण पर आरोप हुआ है अतः यह सविशेषण रूपक है। तात्पर्य यह है कि पैरमें ध्वज- दण्डका आरोप है, उसमें वस्त्र भी होना चाहिये वह है गङ्गा, इस प्रकारसे विशेषणसमग्रध्वज- त्वका रूपण चरणमें किया गया है अतः यह सविशेषण रूपक है ॥ ८२ ॥। ने मीलयति पभ्मानि न नभोऽप्यवगाहते। त्वन्मुखेन्दुर्ममासूनां हरणायैव कल्पते ।। ८३ ।। विरुद्धरूपकमाह-तवन्मुखेन्दुः तव वदनचन्द्रमाः पद्मानि कमलानि न मीलयति न सङ्कोचयति, नभः व्योम अपि न अवगाहते नाश्रयति, केवलं ममासूनां मदीयप्राणानां हरणाय कल्पते प्रवत्तते। वियोगावस्थायामधिककष्टप्रदानेन प्राणहरत्वोफतिः ॥ ८३ ॥ हिन्दी-तुम्हारा मुखरूपी चन्द्रमा ने कमलोंको सङ्कचित करता है और न आकाशमें जाता है, केवल हमारे प्राणोंको हरनेमें उद्यत रहता है॥ ८३॥ अक्रिया चन्द्रकार्याणामन्यकार्यस्य च क्रिया। अत्र सन्दश्यते यस्माद्विरुद्धं नाम रूपकम् ॥ ८४ ॥ उदाहरणं वितृणोति-अक्रियेति। चन्द्रकार्याणाम् चन्द्रमःसम्पाद्यकायतया प्रथि- तानाम् पद्मसङ्कोचनव्योमगमनादीनाम् अक्रिया अननुष्ठानम्, अन्यस्य चन्द्रातिरिक्तस्य चाण्डालादे: कस्यचित् कार्यस्य क्रिया अनुष्ठानम्, यस्मादत्रोदाहरणे सन्दश्यते निबध्यते, तस्मादिदं विरुद्धरूपकं नाम। रूपके उपमानाभिन्नतया रूपितस्योपमेयस्य (अ्त्र चन्द्रा- भिन्नतया रूपितस्य मुखस्य) तत्कार्यकरत्वमेवौचित्यसिद्धम्, परमत्र तद्विपरीतकार्यक- रत्वादिदं विरुद्धरूपकम् इति भावः ॥ ८४॥ हिन्दी-इस उदाहरणमें विरुद्धरूपक नामक अलक्कार है-क्योंकि मुखरूप चन्द्रमा चन्द्रमाकार्य-कमलसक्कोचन और आकाशाश्रयण नहीं करता है, वह तो अचन्द्रमा का-किसी चाण्डालादिका कार्य-प्राण लेना-करता है, अतः इसको विरुद्धकार्यकरतया विरुद्धरूपक कहा जाता है:। ८४।। गाम्भीर्येण समुद्रोऽसि गौरवेणासि पर्वतः। कामदत्वाञ्च लोकानामसि त्वं कल्पपादृपः ।। ८५॥। हेतुरूपकमाह-गाम्भीर्येणेति। गाम्भीर्येण अगाधतया समुद्रोऽसि, गौरवेण सारवत्तया पर्वतोऽसि, लोकानां कामदत्वात् वाञ्छितफलदायित्वात् कल्पपादपः कल्पवृक्ष: असि ॥। ८ ५ ॥ हिन्दी-महाराज, आप गाम्भीर्यके कारण समुद्र, गौरवके कारण पर्वंत और लोगोंकी इच्छाको पूर्ण करनेके कारण कल्पवृक्ष हैं॥ ८५॥ गाम्भीर्यप्रमुखैरत्र ह्वेतुभि: सागरो गिरिः। कल्पद्रुमश्च क्रियते तदिदं हेतुरूपकम्॥८६॥

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११० काव्यादर्शे:

है। इसे आप व्यतिरेकालक्वार नहीं मान सकते हैं, क्योंकि इसमें सादृश्यप्रतीति नहीं होती है, अपहुति भी नहों कह सकते हैं क्योंकि इसमें प्रस्तुतका निषेध नहीं हुआ करता है।। ९१॥। मुखेन्दुरपि ते चण्डि मां निर्दद्ृति निर्दयम्। भाग्यदोषान्ममैवेति तत्समाधानरूपकम्॥९२॥ समाधानरूपकं नाम रूपकप्रकारमुपन्यस्यति-मुखेन्दुरपीति। हे चण्डि कोपने, ते तव मुखेन्दुरपि मुखचन्द्रोऽपि मां निर्दयम् अकरुणभावेन निर्दहृति सन्तापयति, तत्र स्वयं समाधानमाह -- ममेव भाग्यदोषादिति। तदित्थं स्वयं समाधानात्समाधानरूपक- मेततू ॥ ९२। हिन्दी-हे मानिनि, तुम्हारा मुख चन्द्र (होकर भी) मुझे निर्दयतापूर्वक सन्तापित किया करता है, इसमें मेरा अभाग्य ही कारण है, इसे समाधानरूपक कहते हैं, क्योंकि इसमें स्वयं समाधान किया गया है ॥ ९२ ॥ मुखपङ्कजरङ्गेडस्मिन भूलतानतंकी तव। लीलानृत्यं करोतीति रम्यं रूपकरूपकम् ॥ ९३ ।। रूपकरूपकं नाम प्रभेदं निर्दिशति-मुखपक्कजेति। मुखमेव पङ्कजं कमलं तदेव रमः नृत्यशाला तत्र, तव भ्रूलतानर्तकी भ्रूरेव लता सा एव नर्त्तकी नृत्यकारिणी लीला- मृत्यम् सविलासं नर्त्तनं करोतीति रम्यं रमणीयं रूपकरूपकं नामालङ्कारभेदः। समाख्या- बीजं तु एकेन रूपितस्यान्येन रूपण यथा मुखमत्र पङ्कजत्वेन रूपितं सदपि रज्तवेन पुना रूप्यते, एवमेव भूर्लतात्वेन रूपणं गताऽपि रजत्वेन रूप्यत इति। इदं च रूपकं समास एव संभवति, वाक्ये तु एकस्मिन् वस्तुनि बहूनामारोपे हेतूपादाने सति पूर्वोकस्वरूपं हेतुरूपकम्, हेत्वनुपादाने मालारूपकम्। अ्रत्र रम्यमिति लक्षणे निवेशात् यत्र रूपक- रूपणे रम्यत्वं चमत्कारकत्वं नास्ति तत्र नायमलङ्कारः, यथा -- 'नारीबाहुलताव्यालीपरि- रब्ध: सुखी कुतः' अत्र बाही लतात्वं तत्र च व्यालीत्वमारोप्यमाणमपि न चमत्कार- कमिति ॥ ९३॥ हिन्दी-तुम्हारे इस मुखकमलरूपी रङ्गस्थलपर भरूलतारूपी नर्त्तकी विलासनृत्य कर रही है, यह चमत्कारकारक होनेसे रूपकरूपक कहा जाता है। इस उदाहरणमें सुखका पङ्कजमें रूपण किया गया और फिर उसी मुखपङ्कजको रङशालाका रूपक दिया गया है, एवं -- भ्रूको लतारूपमें रूपित करके पुनः उसी भ्रूलताको नर्त्तकीका रूपक दिया गया है, अत इसको रूपकाश्रितरूपक होनेके कारण रूपक-रूपक कहते हैं। 'रम्यम्' यह विशेषण लक्षणमें कडा गया है अतः जहाँपर रूपकाश्रितरूपक होनेपर भी चमत्कार नहीं होगा, उसे रूपक-रूपक नहीं मानेंगे, जैसे -- 'नारीबाहुलताव्यालीपरिरब्धः सुखी कुतः' नारीके बादुरूप लतास्वरूप सर्पिणीसे लिपटा हुआ जन सुखी कैसे हो सकता है, यहाँपर नारीवादुको लतासे और उसे व्यालीसे रूपक दिया गया है परन्तु चमत्कार न होनेसे यह अलक्कार नहीं है॥ ९३ । नैतम्मुखमिदं पममंन नेत्रे भ्रमराविमौ। पतानि केसराण्येव नैता दम्तार्चिषस्तव॥ ९४ ॥

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द्वितीय: परिच्छेद: १११

तत्त्वापह्लवरूपकं वित्ृणोति-नैतदिति। एतत् दृश्यमानं तब मुरख न, इदं पद्मम् कमलम्, इमे नेत्रे न अपि तु इमा भ्रमरौ, एताः दन्तार्चिषः दशनद्युतयः न, अपि तु केस राणि किञ्जल्का एव ।। ९४।। हिन्दी-यह तुम्हारा मुख नहीं है कमल है, ये तुम्हारी आँखें नहीं भ्रमर हैं, और ये तुम्हारे दाँतोंकी कान्ति नहीं हैं यह केसर है॥ ९४॥। मुखादित्वं निवर्त्यैध पद्मादित्वेन रूपणात्। उदूभावितगुणोत्कर्षे तत्त्वापह्मवरूपकम्॥ ९५॥ मुखादित्वमिति। मुखनेत्रदन्तदुतीनाम् वर्णनीयपदार्थानाम् मुखादित्वम मुखत्न- नेत्रत्वदन्तदुतित्वम् निवत्त्य प्रतिषिध्य एव पम्रादित्वेन पद्मत्वत्रमरत्वकेसरत्वादिना रूपणात् आरोपस्य करणात् उद्धावितगुणोत्कर्षम् रूपकान्तरापेक्षया प्रकृष्टचमत्कार- प्रकाशकमिदम् तत्त्वापहवरूपकम्, तत्वस्य वस्तुधमस्य मुखत्वादेरपह्ववेन रूपणात्तत्वा- पहवरूपकमिति समाख्याकरणम्। 'शुद्धापह्ुतिरन्यस्यारोपार्थो धर्मनिह्रवः' इति कुबलया- नन्दे लक्षिताऽपह्ुतिर्नेयम्, तस्या धर्मनिह्ववविषयत्वात्, अत्र तु धर्मिणं मुखादिकं प्रति- षिष्य धर्म्यन्तरस्य मुखादिकस्यारोप इन्यवधेयम्। दर्पणकृतस्य 'प्रकृतं प्रतिषिध्यान्यस्थापनं स्यादपहुतिः' इति सामान्यतो (धर्मस्य धर्मिरणो वा ) प्रतिषेध सूर्वकारोपे अपहुति कथ- यन्ति, तन्मतेऽत्रापहुतिरेव। तन्मतं रूपकलक्षणमत्र न समन्वेति -- 'रूपकं रूपितारोपो विषये निरपह्नवे' इति लक्षणस्य तेनोकेः ॥ ९५॥ हिन्दी-इस उदाहरणमें मुख, नेत्र, दन्तधुतिरूप वर्णनीय पदार्थोंके मुखत्व-नेत्रत्व-दन्तद्युतित्व- रूप धर्मका प्रतिषेध करके पभ्मत्व, भ्रमरत्व और कमलकिअ्जल्कत्वका आरोप किया गया है, अतः रूपकान्तरापेक्षया अधिक चमत्कारक होनेके कारण यह तत्त्वापह्ववरूपक कहा जाता है। तत्त्व वस्तुधर्म, मुखत्व आदिका अपहव करके रूपण किया गया है इसीसे इसका नाम तत्त्वापह्व- रूपक रखा गया है। कुवलयानन्दकारके अपह्ुतिलक्षणके अनुसार धर्मापह्रवमें होने वाली अपकुति यह नहीं है क्योंकि यहाँ धर्मोका ही निषेध करके धर्म्यन्तरका रूपण किया गया है। साहित्यदर्पणके अनुसार यहाँ अपकुति ही है॥ ९५॥ न पर्यम्तो चिकल्पानां रूपकोपमयोरतंः। दिक्रमान्रं दर्शितं घीरैरतुक्तमनुमीयताम् ॥ ९६॥ (इति रूपकचक्रम्) रूपकमुपसंहरति -- न पर्यन्त इति। रूपकस्य उपमायाश्वेति रूपकोपमयोः विकल्पा- नाम् प्रकाराणाम् पर्यन्तः समाप्तिर्नास्ति, अतः समप्रभेदानां व्णयितुमशक्यत्वात् दिड्मार्त्र दर्शितम्, धीरैः बुद्धिमद्भिः अनुक्त्म् अपि ह्यताम् उन्नीयताम्। दर्शितोदाहरणद्वारा जागरितधियो विद्वांस: स्वयमेवानुक्तानपि प्रकारान् ऊहेरक्षिति भावः ॥९६॥ हिन्दी-रूपक और उपमाके प्रमेदोंका अन्त नहीं है, अतः इमने यहाँपर दिग्दर्शनमात्र करा दिया है, साहित्यविद्याके मर्मश्ञ बुद्धिमान् लोग अनुक्त प्रकारोंका भी स्वयं ऊह कर लें, प्रदर्शित प्रकारसे कल्पना कर लें। रूपकके यहाँ कहे गये प्रभेदोंमें अन्तर्भूत न होने वाले कुछ प्रकार ये हो सकते हैं -- १. रपि।

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११४ काव्यादर्श:

अत्र श्यामला इति गुणवाचकपदस्य पूर्ववाक्य इष परतोऽ्पि चकारानुकृष्टतयाऽन्वयाव् गुणदीपकम् ॥ १०० ॥ हिन्दी-वर्षाकालिक जलदमालासे दिशायें श्यामल-काली-हो रही हैं, और कोमल नवीन घासोंसे धरती काली हो उठी है, यहाँ पूर्ववाक्यस्थ गुणवाचक श्यामलपद चकारानुकृष्ट होकर उत्तरवाक्यमें भी अन्वित होता है अतः इसे गुणदीपक कहते हैं॥ १०० ॥ विष्णुना विक्रमस्थेन दानवानां विभृतयः। कापि नीता: कुतोऽप्यासन्नानीता दैवतर्जयः।१०१॥ द्रव्यदीपकमाह-विक्रमस्थेन बलिनिभ्रहसमये त्रिपादविकरमं प्रकटयता वामनावतारेण विष्णुना दानवानां बलिप्रमुखाणां विभूतयः सम्पदः क्वापि नीताः क्षणमात्रेणापहृताः, तथा दैवतर्द्धय: इन्द्रादीनां श्रियः कुतोऽपि आनीताः भासन, भतर्कितमेव समुपनमिता इत्यर्थ:। अत्रैकम्यक्तिवाचकतया द्रव्यवाचकस्य विष्णुपदस्य पूर्ववाक्मस्थस्यापि काकाक्षि न्यायेनोत्तरवाक्येऽप्यन्ययात् द्रव्यदीपकम् ॥।१०१॥ हिन्दी-बलिनिग्रहकालमें त्रिपाद विक्रम प्रकट करनेवाले विष्णुने दानवोंकी समृद्धियोंको न जाने कहाँ भेज दिया, और न जाने कहाँ से उन्होंने देवगणकी वह सारी समृद्धियां ला दों। बहाँपर एकव्यक्तिवाचकतया द्रव्यवाचक विष्णुपदका-जो पूर्ववाक्यस्थ है-उत्तर वाक्यमें भी अन्यय हुआ है, अतः यह द्रव्यदीपक कहा जाता है। १०१॥ इत्यादिदीपकान्युक्तान्येवं मध्याम्तयोरप। वाक्ययोदशयिष्याम: कानिवित्तानि तदथा॥ १०२॥ उक्तानि चत्वारि दीपकानि आदिदीपकानि, यतस्तेषां प्रथमवाक्ये उक्तानां पदानाम- प्रिमवाक्येऽन्वयः, एवमेव मध्ये तेषां जात्यादिवाचकपदानामुपादाने सति परत्र सम्बन्धे मध्यदीपकानि, तथाऽन्ते तेषामुपादाने सति परत्र सम्बन्धे वान्तदीपकान्यपि सम्भवन्ति, कानिचित कतिचित् तानि मध्यदीपकान्यन्तदीपकानि च दशयिष्याम इत्याशयः। तदेवं प्रोकानि चत्वार्युदाहरणान्यादिदीपकस्य मध्यदीपकस्यान्तदीपक्य चाप्रे वद्यन्त इत्यायातम् ॥ १०२ ॥ हिन्दी-आदिदीपकके उदाहरण बताये गये, इसी तरह मध्यदीपक और अन्तदीपक भी सम्भव हैं, उनके भी उदाहरण बताये जायेंगे। तात्पर्य यह है कि दीपकके चार उदाहरण जाति- क्रियागुणद्रव्य-भेदसे दिये गये, उन सभी उदाहरणोंमें प्रथमवाक्योपात् पदोंका अग्रिम वाक्योंमें अन्वय हुआ है अतः वे सभी आदिदीपक नामक प्रभेदके हुए। इसी प्रकार जहाँ मध्यवाक्यस्थ जात्यादिवाचक पदका अन्यत्र अन्वय किया जायगा वह मध्यदीपक होगा, एवं अन्तवाक्यस्थ जात्यादिवाचक पदका पूर्वमें अन्वय होनेपर वह अन्तदीपक होगा, इनके उदाहरण भी यथासम्भव बताये जायेंगे॥। १०२ ।। नुत्यन्ति नियुलोत्सजे गायम्ति व कलापिन:। वधम्ति व पयोदेशु रशो हर्षाभुगर्मिणीः॥१०३॥ मध्यगतं बातिदोपकमुदाहरति-मुत्यम्नीति। कलापिनो मयूरा: निचुलोत्सजे मेवसरजामोदेशे इत्पन्ति, यायन्ति, पयोदेषु स्वसुहृत्सु मेघेषु व तदागमनदृष्टतया हर्वायुगर्मिणीर्दशो वष्नन्ति सानन्दाभुपूणंदष्टिमिस्त पश्यन्ति। अ्त्र कजापिम इति

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द्वितीय: परिच्छ्ेद: ११५

मध्यवाक्यवर्त्ति पदं पूर्वत्र परत्र चान्वेतीति मध्यगतं जातिदीपकमिदम्। कलापिनो जातिपदत्वादिदं जातिदीपकं मध्यगतरवाच्च तथेति भावः ॥। १०३ ॥ हिन्दी-वेतसकुअमें मयूर नाच रहे हैं, गा रहे हैं और आनन्दाश्रुपूर्ण नयनोंसे मेघों की ओर देख रहे हैं। इस उदाहरणमें जातिवाचक कलापीपद मध्यगत है अतः इसे मध्यगत जातिदीपक कहा जाता है॥ १०३ ॥ मन्दो गन्धवहः क्षारो वहिरिन्दुश्ध जायते। चर्चाचन्दनपातश्च शस्त्रपातः प्रवासिनाम् ॥ १०४॥ क्रियागतं मध्यदीपकमुदाहरति-मन्दो गन्धवह इति। प्रवासिनां विदेशस्थितानां वियोगिनाम् मन्दो गन्धवहः मन्दानिल: क्षारः क्षते क्षारवद्व्यथकः, इन्दुः वहिवहि- वत्सन्तापकः, चर्चाचन्दनपातः अङ्गचर्चार्थ सम्भृतस्य मलयजरसस्य सम्बन्धक् शत्त्रपातः शस्त्रपातवत्कष्टकर इति। अत्र सर्ववाक्यान्वयिनः 'जायते' इति क्रियापदस्य मध्यगतत्वा- न्मध्यगतं क्रियादीपकमिदम् ॥ १०४ ॥ हिन्दी-वियोगियोंके लिये मन्दवायु क्षतमें क्षारकी तरह पीड़ाकर, चन्द्रमा आगकी तरह सन्तापक और शरीरमें लगानेके लिये लाया गया चन्दन शस्त्रप्रहारके समान लगता है। इसमें 'जायते' यह क्रियापद मध्यवाक्यगत है जिसका सर्वत्र अन्वय हुआ है, अतः यह मध्यगत क्रियादीपक हुआ। आचार्य दण्डीने मध्यगत दीपकके चार भेदोंमें केवल दो भेदोंके ही उदाहरण लिखे हैं, मध्यगत गुणदीपक और मध्यगत द्रव्यदीपकके उदाहरण नहीं लिखे हैं। प्रेमचन्द्र शर्माने इसी ग्रन्थकी टीकामें अनुक्त दोनों भेदोंके उदाहरण दिये है, उन्हें यहाँ उद्धृत किया जाता है। मध्यगत गुणदीपक- 'तडिद्भिर्वारिवाहाणां योगः स्त्रीभिः प्रवासिनाम् । लताभिः पादपानां च समापाते घनागमे'। इस उदाहरणमें 'योगः' इस मध्यगत गुणवाचक शब्दका सर्वत्र अन्वय हुआ है, अतः यह मध्यगत गुणवाचकका उदाहरण है। मध्यगत द्रव्यदीपक- 'मुडुर्विश्वं मंसृजति बिभत्ति च मुडुहरिः। मुहुश्च नाशं नयति बालक्रीडनकौतुकी'॥ इसमे 'हरिः' यह द्रव्यवाचक शब्द मध्यगत होकर भी सर्वत्र अन्वित होता है अतः यह मध्यगत द्रव्यदीपक है॥ १०४ ॥ जलं जलधरोद्गीर्ण कुलं गृद्दशिखण्डिनाम्। चलं च तडितां दाम बलं कुसुमधन्नः ॥ १०५॥ अन्तगतं जातिदीपकमुदाहरति-जलमिति। जलधरैः मेघैः उद्गीर्ण वान्तम् सृष्टमित्यर्थ: जलम् गृहशिखण्डिनाम् प्रासादवत्तिमयूराणां कुलं समूहः, चलम् चपलम तडितां विद्युतां दाम च एतत् त्रितयं कुसुमधन्वनः बलम् कामदेवस्य सैन्यम्। वर्षाजल- प्रासादशिखरस्थमयूरकुलचपलादामभिरेव बलैः कामो विश्वं विजयत इत्यर्थः। अत्र बलपदं सैन्यपरं तथ जातिवाचकं तस्यान्त्यवाक्यस्थस्य सर्वत्रान्मयादिदमन्तगतं आतिदीपकम्॥।१०५॥

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११६ काव्यादर्श:

हिन्दी-मेघका जल, प्रासादशिखरस्थमयूरोंका दल और चज्जल विधुद्दाम-ये तीनों कामदेवके सैन्य हैं। इसमें अन्तगत बल शब्द जातिपरक होकर सर्वंत्र अन्वय पाता है अतः यह अन्तगत जातिदीपक हुआ॥ १०५॥ त्वया नीलोत्पलं कर्णे स्मरेणासत्रं शरासने। मयाऽपि मरणे चेतसत्रयमेतत् समं कृतम् ॥ १०६॥ अन्तगतं क्रियादीपकमाह-त्वयेति। कस्यचिच्वाटकारस्येयमुक्तिः, त्वया कर्षे नीलोत्पलम्, स्मरेण शरासने अस्न्रम्, मया।पे मरणे चेतः, एतत् त्रयं समं युगपत कृतम्। अत्रान्त्यवाक्यस्थितेन कृतमिति क्रियांवाचकपदेन इतरवाक्यसम्बन्धात भन्तगतमिदं क्रियादीपक्रम् ॥१०६॥ हिन्दी-हे प्रिये, तुमने अपने कानमें नीलकमल, कामदेवने अपने धनुष पर बाण औ मैंने मरणमें मन एक ही साथ किया। इसमें अन्तिमवाक्यस्थ 'कृतम्' इस क्रियापदका सर्वत्र अन्वः होता है अतः यह अन्तगत क्रियादीपक है। यहाँ भी दण्डीने अन्तगत गुणदीपक और अन्तगत द्रव्यदीपकके उदाहरण नहीं दिये हैं, प्रेमचन्द्र शर्माकी टीकासे दिये जा रहे हैं- अन्तगत गुणदीपक- 'इदमुज्जम्भ ते बिम्बं भानोस्तापयितुं जगत्। ममेव हृदयं चण्डि मुख च तव लोहितम्'॥ यहाँ अन्त्यवाक्यगत 'लोहित' इस गुणवाचक पदका अन्यत्र भी अन्वय हुआ है अतः य अन्तगत गुणदीपक है। अन्तगत द्रव्यदीपक- 'सत्यं विश्वं सन्तपति सत्यं कर्षति वै रसान् । तमांसि तु निहन्तीति प्रार्थनीयोदयो रदिः॥ इसमें अन्त्यवाक्यगत 'रविः' इस द्रव्यवाचकका सर्वत्र अन्वय हुआ है अतः यह अन्तगत द्रव्यद पकका उदाहरण है॥ १०६ ॥ शुक्क: श्वेतार्चिषो वृद्धथै पक्षः पञ्चशरस्य सः। सच रागस्य रागोऽपि यूनां रत्युत्सवश्रियः॥१०७ ॥ इत्यादिदीपकत्वेऽपि पूर्वपूर्वव्यपेक्षिणी। वाक्यमाला प्रयुक्तेति तम्मालादीपकं मतम् ॥ १०८ ॥ मालादीपकमाह-शुक्क इति। शुक्र: पक्षो मासस्यादिमो धवलो दलः श्वेताचि चन्द्रस्य वृद्धथै परिपोषाय भवति, सः श्वेताचिः पञ्चशरस्य कामदेवस्य वृद्धथै भवति, पश्चशरो रागस्य वनिताविषयासके: बृद्धथे भवति, स च रागः यूनां तरुणानां रत्युत्सवश्रि बिलासलक््म्या वृद्धथै भवति॥ १०७॥ इत्यादीति। इति अत्रोदाहरणे आदिदीपकत्वे 'बृद्धथे' इति प्रयमवाक्यस्थस्य पद सकलवाक्यान्ययितयाऽदिदीपकलक्षणक्रान्तत्वे सत्यपि पूर्वपूर्वव्यपेक्षिणी स्वोपकारकत पूर्वपूर्ववाक्यमपेक्षमाणा वाक्यमाला वाक्यावलि: प्रयुक्ेति हेतोरिदं मालादीपकलाम ८१०. हिन्दी-शुक्पक्ष चन्द्रमाकी वृद्धिके लिये होता है, चन्द्रमा कामदेवकी वृद्धिके लिये हं 2ै. कामठेव स्रीविषयक आसक्तिके लिये होता है, और वह आसक्ति युवजनोंके रागरक्ककी र्थृ

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द्वितीय: परिच्छेद ११७

इस उदाहरणमें 'वृद्धयै' यह प्रथमवाक्यस्थ पद सभी वाक्योंमें अन्वित हुआ है अतः यह आदिदीपक है, तथापि इसमें पूर्वपूर्ववाक्यकी अपेक्षा करनेवाली वाक्यमाला प्रयुक्त हुई है, अतः इसे मालादीपक मानते हैं। यह मालादीपक-सभी वाक्योंमें अन्वित होनेवाला पद सापेक्ष वाक्यस्थित हो तभी होता है यह कोई खास आवश्यक बात नहीं है, अतएव काव्य- प्रकाश कारने- 'संग्रा माङ्गणमागतेन भवता चापे समारोपिते देवाकर्णय येन येन सहसा यद्यत्समासादितम्। कोदण्डेन शराः शरैररिशिरस्तेनापि भूमण्डलं तेन त्वं भवता च कीतिरतुला कीर्त्या च लोकत्रयम्'॥ यह उदाहरण मालादीपकका दिया है, इस उदाहरणमें निरपेक्षवाक्यगत 'आसादितम्' इस क्रिया- पद के साथ सभी वाक्योंमें अन्वय कराया गया है, यदि सर्ववाक्यान्वयी पदका सापेक्षवाक्य- स्थितत्व आवश्यक रहता, तब यह उदाहरण कैसे दिया जाता ?॥ १०८॥ अवलेपमनन्नस्य वर्द्धयन्ति बलाहकाः। कशयन्ति तु घर्मस्य मारुतोद्धूतशीकराः॥१०९॥ विरुद्धार्थदीपकमाह-अवलेपमिति। बलाहकाः मेघाः अनपस्य कामदेवस्य अव- लेपं गर्व वर्द्धयन्ति समेधयन्ति। मारुतोद्धूतर्शीकर वायुनोरिक्षपा: जलकणाः येषां तादृशाथ् ते बलाहकाः धर्मस्य श्रीष्मस्य अवलेपं क्रशयन्ति कृशतां नयन्ति, दूरीकुवन्ती- त्यर्थ: ॥। १०९ ॥ हिन्दी-यह मेघ कामदेवके गर्वको बढ़ाते हैं और हवासे जिनके जलकण ऊपर उड़ रहे हैं ऐसे यही मेघ ग्रीष्मके गर्वको घटा रहे हैं॥ १०९॥ अवलेपपदेनात्र बल।हकपदेन क्रिये विरुद्धे संयुक्ते तद्विरुद्धार्थदीपकम्॥ ११०॥ च।

अवलेपेति। अत्रोदाहरयी कर्मभूतेन अवलेपपदेन कर्त्तृभूतेन बलाहकपदेन च विरुद्धे किये वर्द्धनकृशीकरणरूपे संयुक्ते समानाधिकरणे कृते तत् एतत् विरुद्धार्थेदीपकम्। अयमाशयः-अत्रावलेपपदं कर्मभूतम्, तदर्थश्च बलाहकरनङ्सम्बन्धितया वृद्धि नीयते, श्रीष्मसम्बन्धितया च कृशत्वं नीयते, इत्यत्रैवावलेपे कर्मणि सम्बन्धिभेदमहिम्ना वृद्धिकृश- त्वरूपयोर्विरुद्धयो: क्रिययो: समावेशेन, तथा चात्र बलाहकाः कर्त्तारः, तेऽनज्ञसम्बन्धि- तया गर्वस्य वृद्धिकर्त्तारः, श्रीष्मसम्बन्धितया च तस्येव कृशत्वकर्त्तार इत्येकत्र बलाहकेषु कर्त्तृषु विरुद्धयोर्षृद्धिकृशत्वक्रिययोः समावेशेन च विरुद्धार्थदीपकमिदम् ॥११० ॥ हिन्दी-इस उदाहरणमें अवलेप कर्म है, उसमें अनङ्गसम्बन्ध होनेपर वृद्धिक्रिया की जाती है, और ग्रीष्मसम्बन्ध होनेपर कृशत्वक्रिया की जाती है, अतः एकमें विरुद्धक्रियायें होनेसे विरुद्धार्थदीपक है, एवं जलाइक कर्ता है, उसमें अनङ्गसम्बन्धितया गर्ववृद्धिक्रिया और ग्रीष्म- सम्बन्धितया गर्वकृशत्वक्रिया कही गयी है अतः एक कर्त्ता बलाहकमें विरुद्धक्रियासमावेश होनेसे विरुद्धार्थदीपक हुआ। यह आदिदीपकप्रभेद है, क्योंकि आदिवाक्यस्थ अवलेप और बलाइकपद उत्तरवाक्यमें अन्वित हुआ है। इस उदाहरणमें-अवलेप गणवाचक है और बलाइक जातिवाचक है अतः गुणवाचक और जातिवाचकका सक्कर है॥ ११० ॥ हरत्योभोगमाशानां गुड्ाति ज्योतिषां गणम्। आादचे चाय मे प्राजानसी जलघरावली ।।१११॥।

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११ काष्यादर्श:

एकर्वदीपकमुदाहरति-हरतीति। असौ जलघरावली मेघमाला आशानाम् दिशाम् आमोगम् हरति सङ्ोगयति, ज्योतिषां प्रहाणां गणम् गृह्णाति तिरोदधाति, अद्य मे मम (विरहृदग्घस्य) प्राणान् भादत्ते विपादयति।। १११ ॥। हिन्दी-यह मेघमाला दिशाओंके विस्तारको सङ्कचित करती है, ग्रहनक्षत्रोंको छिपाती है, औौर हमारे प्राणको हरती है। यहाँ 'हरति' 'गृक्ाति' 'आदत्ते' इन तीनों क्रियाओंसे 'लोप करना' रूप एक ही अर्थ प्रतीत होता है।। १११ ।। अनेकशब्दोपादानात् क्रियेकैवान दीप्यते। यतो जलधरावल्या तस्मादेकार्थदीपकम्॥११२॥ अनेकेति। अत्र अस्मिमदाहरणे यतः जलधरावल्या एका एव क्रिया लोपनरूपा अनेकेषाम् हरणप्रहणादानात्मनाम् उपादानात् दीप्यते उज्ज्बलोकियते नानाशन्दैरेकैव किया प्रकाश्यते, अत इदमेकार्थदीपकं नाम। अनेकशब्दप्रतिपाद्यस्य एकार्थस्य दीपनात् एकार्थेदीपकमिदमिति बोध्यम्॥१1२॥ हिन्दी-इस उदाहरणमें अनेक शब्दों द्वारा एक ही लोपनरूप क्रिया प्रकाशित की गई है मतः इसे एकार्थदीपक कहते हैं। मनेक क्रियाओंमें एक कारक हो-'अथ कारकमेकं स्वादनेकासु क्रियासु चेत्' तब जो दीपक प्रकाशकारने स्वीकार किया है वह इससे भिन्न ही है, क्योंकि उसमें एकार्थक अनेकक्रिया नहीं हुआ करती है, जैसे- स्विद्यति कूणति वेल्ति विचलति निमिषति विलोकयति तिर्यक्। अन्तर्नन्दति चुम्बितुभिच्छति नवपरिणया वधू: शयने'॥ यही एक कारककी अनेक क्रियावाले दीपकका उदाहरण काव्यप्रकाशमें दिया गया है, इसमें एकार्थक अनेक क्रिया नहीं है, प्रकृत एकार्थदीपकमें तो लोपनार्थक अनेक 'हरति गृहाति आदत्ते' क्रियायें हैं। ११२ ॥

दिषि भ्रमन्ति जीमूता भुवि चैते मतङजाः ॥ ११३॥ श्लिष्टार्थदीपकमाह-हद्ेति। दिवि आकाशे जीमूता: मेघाः भ्रमन्ति, कीदृशा मेघाः ? हद्यगन्धवहाः मनोरमपचनानुगता तुद्ा उभताः तमालश्यामलत्विषः तमाल- तरुकृष्णकान्तय: भुवि च एते मतन्जजाः गजा भ्रमन्ति, कीदृशा: गजाः? हृयः घ्राणतर्पणो यो गन्धो दानवारिसौरभम् तद्वहा: तस्य धारिण:, तुद्ना इत्यादि पूर्ववत्॥।११३ ।। हिन्दी-मनोरम पवनसे प्रेरित, उन्नत तथा. तमालतरुश्यामल मेथ आकाशमें भ्रमण कर रहे हैं, और घ्राणतर्पण दानवारिसुगन्धिसे युक्त, उन्नत एवं तमालश्यामल दन्ती पृथ्वी पर घूम रहे हैं।। ११३।। मत्र धर्मरमिध्ानामभ्रनाणां दन्तिनां तथा। स्रमणेनेच सम्बन्ध इति निथ्यर्थदीपकम्।११४। अत्र धमरिति। अत्र पूर्वेकोदाहरणे धर्मे: हृधगन्घवहत्वादिरपेः अ्भिन्नानाम् एकशाब्दवाच्यतया समानानाम अभ्राणों तथा दन्तिनाम् भ्रमणेनैव भ्रमतिक्रियया एव सम्बन्ध इति रिलिछशव्दोपस्थापितसाधारणघर्मवतोर्जीमूतमतन्जयोः भ्रमन्तीति कियया दोपनादिद रिलट्टवंदीपकम्। तत्र हदयगन्मवहा इति श्लिष्टमन्यन समं विशेषणमू।।११४।।

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द्वितीय: परिच्छ्ेद: ११६

हिन्दी-इस उदाहरणमें हृद्यगन्धवहत्व, तुङ्गत्व तथा तमालश्यामलत्वरूप धर्मोंसे एकशब्द- प्रतिपाधत्वेन अभिन्न मेघ तथा दन्तिओंका भ्रमणरूप एक क्रिया में अन्वय हुआ है अतः इसे किष्टार्थदीपक कहते हैं, क्योंकि श्विष्टशब्दप्रतिपाद् साधारण धर्मवाले मेघ तथा हस्तीका एकमें अन्वय हुआ है॥। ११४ ।। अनेनैध प्रकारेण शेषाणामपि दीपके। विकल्पानामवगतिर्विधातव्या विचक्षणैः ॥ ११५॥ (इति दीपकचक्रम्) अनेनेति। अ्रनेन पूर्वदर्शितप्रकारेण दीपके नामालद्कारे शेषाणाम् अनुक्तानाम् अपि विकल्पानाम् प्रकाराणाम् अरवगतिः ज्ञानम् विचक्षणैः सुधीभिः कर्त्तव्या। अत्रोकं भोजराजेन- 'अर्थावृत्ति: पदावृत्तिरुभयावृत्तिरावली। संपुटं रशना माला चक्रवालं च तद्ग्िदाः' इति ॥११५॥ हिन्दी-इसी तरह दीपकके शेष प्रकारोंकी भी जानकारी सुधीगण कर लें। भोजराजने इस प्रसङ्गमें लिखा है :- 'अर्थावृत्तिः पदावृंत्तिरुभय।वृत्तिरावली। संपुट रशना माला चक्र रवालं च् तद्िदाः' ॥ उनमें अर्थावृत्ति, पदावृत्ति और उभयावृत्तिको आचार्य दण्डीने आवृत्त्यलक्कारके रूपमें अभी आगे स्वीकार किया है, आवलीका उदाहरण- 'त्वमर्कस्त्वं सं।मस्त्वमसि पवनसत्वं हुतवहस्त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च'। संपुटका उदाहरण- 'नवपल्लवेषु लोलति घूर्णति विटपेषु चलति शिखरेषु। स्थापयति स्तबकेपु चरणे वसन्तश्रीरशोकस्य'॥ रशनादीपक और मालादीपक बताया जा चुका है, चक्रवाल चमत्कारी नहीं होता है।११५॥ अर्थावृत्ति: पदावृत्तिरुभयावृत्तिरेव च। दीपकस्थान एवेष्टमलङ्कारत्रयं यथा ॥ ११६ ॥ आवृत्त्यलङ्कारं भेदकथनेनाह-अर्थावृत्तिरिति। दीपकस्थाने दीपकप्रसज्ग एव अर्थावृत्ति:, पदावृत्तिः, उभयावृत्तिः च एतदलङ्कारत्रयम् विद्वद्भिरिष्टम् अभिमतम्, तत्रेदं बोध्यम्-दीपके पदस्यानुषङ्गः, अन्त्वावृत्तिरेव। अत एव चास्य दीपकस्थानी- यत्वम् ॥११६ ॥ हिन्दी-दीपकके स्थानमें अर्थावृत्ति, पदावृत्ति और उभयावृत्ति नामके तीन अलक्कार कवियोंने माने है। दीपकमें पदका अनुषङ्ग होता है, इसमें आवृत्ति होती है॥ ११६ ।। विकसन्ति कदम्बानि स्फुटन्ति कुटजदगुमाः। उम्मीलन्ति च कन्दल्यो दलन्ति ककुभानि च ॥ ११७॥ अर्थावृत्तिमुदाहरति-विकसन्तीति । कदम्बानि नीपकुसुमानि विकसन्ति। कुटजद्रुमा: स्फुटन्ति उद्धिन्ना भवन्ति। कन्दल्यः वर्षाकालभवाः पुष्पभेदाः उन्मीलन्ति विकसन्ति। ककुभानि अर्जुनकुमुमानि दलन्ति स्फुटन्ति। अत्र विकसम्ति, स्फुटन्ति; उन्मीलन्ति, दलन्ति इति चत्वार्यपि पदानि भिन्नरूपाण्यपि एकार्थानीति अर्थावृत्ति- रियम्॥ ११७॥

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१२० काव्यादर्श:

हिन्दी-कदम्ब विकासित हो रहे हैं, कुटजके फूल खिल रहे हैं, कन्दली फूल रही है और अर्जुनमें फूल निकल रहे हैं। यहाँपर एक ही अर्थमें भिन्नरूप चार पद प्रयुक्त हुए हैं, यह अर्थापत्ति है। यह वर्षाकां वर्णन है, वर्षाके प्रसङ्में कालिदासने भी इन फूलोंके विकासका वर्णन किया है। 'नीपं दृष्टा हरितकपिशं केशरैरर्द्धरूढैः' 'आविर्भूतप्रथममुकुलाः कन्दलीश्चानुकच्छम्'। 'स प्रत्यगैः कटजकुसुमैः कल्पितार्घाय तस्मै' 'कालक्षेपं ककुमसुरभौ पवते पर्वते ते'॥ ११७॥ उत्कण्ठयति मेघानां माला वृन्दं कलापिनाम्। यूनां चोत्कण्ठयत्येष मानसं मकरश्वजः ॥ ११८ ॥ पदावृत्तिमुदाहरति-उत्कण्ठयतीति। मेघानां माला जलघरावलिः कलापिनां मयूराणां वृन्दम् उत्कण्ठयति स्वदर्शनार्थमुद्ग्रीवं करोति, एषः मकरण्वजः कामक् यूनां युवकानां मानसम् उत्कण्ठयति बिलासोत्सुकं करोति। अत्र 'उत्कण्ठयति'पदस्य उभयत्र भिन्नार्थकत्वेन केवलं पदावृति: ।। ११८॥ हिन्दी-मेघमाला मयूरोंके समूहको उत्कांण्ठत करती है (मेघदर्शनार्थ उद्ग्रीव-उत्थित- ीव-बनाती है), यह कामदेव युवकोंके मनको विलासोत्सुक बनाता है। इस पद्यमें उत्कण्ठयति पद एकाकार होने पर भी मयूरके साथ दूसरे अर्थमें और युवकोंके मनके साथ दूसरे अर्थमें है अतः पदावृत्ति है॥ ११८॥ जित्वा विश्वं भवानद्य विहरत्यवरोधनैः । विहरत्यप्सरोभिस्ते रिपुवर्गो दिवं गतः ॥ ११९ ॥ (इत्यावृत्तिचक्रम् ) उभयावृत्तिमुदाहरति-जिर्वेति। अत्र मर्त्यलोके भवान् विश्वं संसारं जित्वा स्वरा- यत्तीकृत्य अवरोधनैः स्वान्तःपुरस्थरमगीभिः विहरति क्रीडति ते तव रिपुवर्गः रणे भवता हतः सन् दिवं गतः अप्सरोभि: विहरति क्रीडति। अत्र विहरतीति पदस्य तदर्थस्य चावृत्तिरित्युभयावृत्ति: ।। ११९॥ हिन्दी-आप संसारको जीतकर अन्तःपुरकी स्त्रियोंसे विहार करते हैं, और आपके शत्तु स्वर्ग जाकर (वीरगति प्राप्त कर) अप्सराओंसे विहार करते हैं, यहाँ 'विहरति' पदकी तथा उसके अर्थकी भी आवृत्ति होनेसे उभयावृत्ति है। इस पद्यमें विहरति पद दो बार आया है, तथापि पुनरुक्ति-कथित-पदता दोष नहीं है, क्योंकि वह उद्देश्यप्रतिनिर्देश्यभावातिरिक्तस्थलमें ही होता है, जैसे-'उदेति सविता ताव्रस्ताव्र एवास्तमेति च' इसमें दोष नहीं होता, उसी तरह यहाँ भी वह दोष नहीं है। ११९।। प्रतिषेधोकिराक्षेपस्त्रैकाल्यापेक्षया त्रिषा। अथास्य पुनराक्षेष्यभेदानम्त्यादनन्तता । १२०॥ भातेपालद्वारं निरूपयति-प्रतिषेधोकिरिति। प्रतिषेधस्य निषेधस्य उक्ति: कथन- मात्रम् (नतु वास्तविकः प्रतिषेधः) प्रतिषेधाभास: आत्षेपः आाच्ेपालड्कारः। इयम प्रतिषेधोक्ति किमपि फलमभिसन्धायेव करिष्यते, तच्च फलं विशेषाभिधानरूपम्, प्रतिषेधोऽपि इष्टार्थस्यैव, तस्यैव प्रतिषेधे चमत्कारोदयसम्भवात, तथा च विशेषाभिधाने चछयेष्टस्यार्थस्य प्रतिषेधाभास भानेप इति लक्षणं फलति। स चायमाचेपलौकाल्यापेक्षया

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द्वितीय: परिच्छेद: १२१

त्रैकालिकपदार्थसम्बन्धितवेन त्रिधा, तथा च अतीताक्षेपो वर्ततमानान्षेपो भविष्यदाक्षेप- क्रेति भेदत्रयं सिद्धथति, तदित्यं भेदत्रयविशिष्टस्याप्यस्यान्तेपस्य आन्षेप्यस्य निषेधविषयस्य र्मधर्मिकार्यकारणादिरूपस्य भानन्त्यात् भनन्तता पयवस्यति ॥ १२० ॥ हिन्दी-विशेषाभिधानेच्छासे रष्टवस्तुके निषेधाभासको आक्षेप नामक अलक्कार मानते हैं, यह तीन प्रकारका है क्योंकि निषेध तीनकालसम्बन्धिपदार्थोंका सम्भव है, अतः-अतीताक्षेप, वर्त्तमानाक्षेप और भविष्यदाक्षेप नामक तीन भेद सिद्ध हुए। इन तीन भेदोंके भी अनन्तभेद किये जा सकते हैं क्योंकि निषेध्यपदार्थ धर्मधमिकार्यकारणादिभेदसे अनन्त हो सकते हैं। इस आक्षेपका लक्षण अभिपुराणमे इस प्रकार कहा गया है- 'शब्देनार्थेन यत्रार्थः कृत्वा स्वयमुपार्जनम्। प्रतिषेध हवेष्टस्य यो विशेषाभिधित्सया।। तमाक्षेपं त्रुवन्त्यत्र इसमें भेदकी चर्चा नहीं है। काव्यप्रकाशकारका लक्षण भी इसी तरहका है- 'निषेधो वक्तुमिष्टस्य यो विशेषाभिधित्सया। वक्ष्यमाणोक्तविषयः स आक्षेपो द्विधा मतः'॥ काव्यप्रकाशकारने 'वक्ष्यमाणोक्तविषयः' कहकर अतीताक्षेप और भविष्यदाक्षेप नामके दो ही मेद माने हैं, दण्डीने एक वर्त्तमानाक्षेप भी माना है, इसके अतिरिक्त धर्मधर्मिकार्यकारणादि आक्षेप्योंकी अनन्ततासे अन्तहीन भेदराशिकी भी कल्पना की है, यह काव्यप्रकाशमें नहीं है॥१२०॥ अनङ्: पञ्चभि: पोष्पर्विश्वं ध्यजयतेपुभि:। इत्यसम्माव्यमथवा विचित्रा वस्तुशकयः ।।१२१।।

प्रवृश्तेष यदाक्षिप्ता वृत्ताक्षेप: स ईडशः ॥१२२ ॥ आात्ेपालक्कारस्यातीताच्षेपं नाम प्रथमं भेदमुदाहरति-अनक इति। अनअ्गः काम- देव: पौष्पेः पुष्पमये: पश्भिः पश्सकव्यकैरिषुभिः बाणैरविश्वं समस्तं संसारं व्यजयत जितवान्, इत्यसम्भाव्यम् न सम्भवविषया, अथवा वस्तुशक्तयः पदार्थानां कार्यसम्पादक- सामर्थ्यानि विचित्राः अचिन्त्यवैभवाः। अत्रासम्भाव्यमित्यन्तेन कन्दर्पकर्त्तृकविश्वविजया- चुपपत्ति: स्थिरीकृता. सा चाप्रे निषिद्धा।। १२१। लक्षणं स्मयति-इतीति। इति अन्ोदाहरणे अनज्नजयायोगबुद्धिः कामकर्त्तृक- विश्वविजयासम्भवत्वज्ञानम् इह हेतुबलात् विचित्रा वस्तुशक्तय इति कारणप्रदर्शनात् प्रवृत्ता एव यत् आक्षिप्ता प्रतिषिद्धा, स ईदशो वृत्ताक्षेप इति। अत्र कन्दर्पकर्त्तृकपुष्पमय- बाणकरणकसकल संसारकमेकजय स्यासम्भाव्यतावुद्धि: प्रवृत्ता सती वस्तुमाहात्म्यघोषणया प्रतिषिष्यत इत्तीदशोऽयं घृताक्षेपो नामान्ेपभेद इति भावः। अत्र प्रतिषेधो वाचकशब्दा- भावात् प्रत्येय एव ।। १२२॥ हिन्दी-अनङ होकर मी कामदेवने फूलके बने हुए अपने केवल पाँच वाणोंसे ही इस विश्वको जीत लिया, यह असम्भव है, अथवा वस्तुकी शक्तियाँ अद्भुत हुआ करती है ॥ १२१।। इस उदाहरणमें बिना अङ्गवाला कन्दर्प कर्त्ता है, फूलके बाण विजयके साधन हैं, यह सारा संसार लक्ष्य है, फिर भी उसने हरि-हर-विरञ्चिसमेत इस विश्वको जीत लिया, इस असम्भवतया प्रतीत वस्तुका प्रतिषेष वस्तुशक्तिकी विचित्रतारूप हेतु बताकर किया गया है, अतः यह वृस्ताक्षेप (अतीताक्षेप) नामक आक्षेपप्रभेद हुआ। इस उदाहरणमें प्रतिषेध व्यक्षय होगा, क्योंकि वाचकशब्दका अभाव है।। १२२ ॥।

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१२२ काव्यादर्श:

कुतः फुवलयं करणें करोषि कलभाषिणि। किमपाङमपर्याप्मस्मिन् कर्मणि मम्यसे ॥ १२३ ॥ स वतमानाकेपोडयं कुर्वत्येवासितोत्पलम्। कणें काचित् भ्रियेणैवं चाटुकारेण रुध्यते।। १२४ ।। वर्तमानाच्ेपमुदाहरति-कुत इति। हे कलभाषिणि, मधुरालापे, कुतः कस्मात् कारणात् कर्णे कुवलयं नीलकमलं करोषि? धारयसि ? किम् त्वम् आत्मनः अपाप्गम् नेत्रप्रान्तम् अस्मिन कर्णशोभासम्पादनरूपे अपर्याप्तम् अरशक्तं मन्यसे ? कर्णायतलोचनाया- स्तवापाञ्ेनैव कर्णशोभासम्पादनसंभवे तव स्वकर्णे कुवलयधारणे प्रयोजनं नावधारयामीति भावः। अत्र कर्णे कुवलयधारणस्य क्रियमाणस्यव कुत इत्यनेन प्रतिषेध: कृतः ॥१२३॥ उदाहरणमुपपादयति-स इति। यतः काचित् नायिका कर्णे असितीत्पलं कुवलयम् कुर्वती एव (न तु कृतवती न वा करिष्यन्ती) चाटुकारेण प्रियामनोऽनुकूलनाय मिष्ट- भाषिणा प्रियेण एवम् पूर्वोक्तरूपम् रुध्यते निषिद्धयते, अतथात्र वर्समानकालिकस्य कुवलय- धारणस्य निषेधात् वर्तमानान्ञेपोऽयम्॥१२४॥ हिन्दी-हे मधुरभाषिणि, तुम अपने कानोंमें नीलकमल क्यों धारण कर रही हो? क्या तुम अपने नेत्रप्रान्त (कटाक्ष) को इस कर्णशोभासम्पादनरूप कार्यमें अक्षम मानती हो?॥ १२३ ॥ यहाँ पर नील कमलका धारण करती हुई कोई सुन्दरी ठकुरसुद्दाती बोलनेवाले प्रियतमके द्वारा नीलकमल धारण करनेसे रोकी जा रही है, इसमें वर्त्तमान कालमें होते हुए नीलकमलधारणरूप कार्यका प्रतिषेध किया गया है, अतः यह वर्त्तमानाक्षेप नामक आक्षेपप्रभेद हुआ॥१२४॥ सत्यं श्रवीमि न त्वं मां दषटुं वल्लम लप्स्यसे। अन्यसुम्बनसऊक्रान्तलाक्षारक्तेन चक्षुषा॥ १२५॥ भविष्यदाच्षेपमुदाहरति-सत्यमिति। हे वह्लभ प्रिय, अन्यस्याः मदतिरिक्काया नायिकायाश्चुम्बनेन नेत्रचुम्बनव्यापारेण सरक्रान्तया लग्नया लाक्षया अधरलिप्तया रफेन अरुणीकृतेन चक्षुषा स्वनेत्रेण त्वं मां दषुं न लप्स्यसे प्राप्स्यसि, अन्यां नायिकां जुषमाणस्त्वं तत्कृते नयनचुम्बने तदधरलाक्षया रजितनयनः सन् मदन्तिकमागत्य मां द्रष्टुं न शच्यसि, एतत् सत्यं ब्रवीमि, न मृषा भाषे इत्यर्थ: ।। १२५॥ हिन्दी-हे प्रिय, मैं सत्य कहती हूँ, तुम दूसरी नायिकाके नेत्रचुम्बन करने पर उसके अधरलिप लाक्षाद्वारा रजित हुए नेत्रोंसे मुझे देखनेका अवसर नहीं पा सकोगे, जमी मुझे पता होगा कि तुमने मुझसे दूसरी नायिकाके साथ सम्पर्क स्थापित किया है, तमी मैं तुमको अपने पास नहीं फटकने दूँगी॥ १२५॥ सोऽयं भविष्यदासेप: भरागेवातिमनस्विनी। कदाचिद्पराघोऽस्य भावीत्येवमरुन्ध यत् ॥१२६ ।। उदाहरणं सम्गमयति-सोऽयमिति। अत्र अतिमनस्विनी सातिशयमानशालिमी काचित नायिका कदाचित् अस्य नायकस्य अपराधः अन्यनायिकोपसरणलक्षणः भावी भविष्यति इति सम्भाव्य प्रागेव अपराधोत्पत्ते: प्रागेव अरुन्ध वारितवती, अतोऽयं भविष्य- दाक्षेप:।। १२६ ।।

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द्वितीय: परिच्छेद: १२३

हिन्दी-इस उदाहरणमें अतिमानिनी नायिकाने अपने प्रियको पहले ही मना कर दिया है जिससे वह दूसरी नायिकाके साथ सम्पर्कस्थापनारूप अपराध न कर सके, इसमें भविष्यमें किये जानेवाले अपराधका ही प्रतिषेध किया गया है, अतः यह भविष्यदाक्षप है॥ १२६ ॥ तव तन्वक्ि मिथ्यैव रूढमङ्गेषु मार्दवम्। यदि सत्यं मृदून्येव किमकाण्डै रुजन्ति माम् ॥१२७॥ एवमाच्तेपस्य सामान्यभेदत्रयमुदाहृत्य तदीयसूक्ष्मभेदानामानन्त्येनाशक्यनिरूपण- त्वेऽपि शिष्यबुद्धिवैशद्यार्थ कतिपयभेदप्रदर्शनप्रशृत्त आचार्यो धर्मान्षेपमुदाहरति- तवेति। हे तन्वत्ि कृशगात्रि, तव अभ्रेषु रूढं स्थितं (लोकेस्त्वदञवर्त्तितया प्रसिद्धिं गमितम्) मार्दवं सौकुमार्य मिथ्यैव असत्यभूतमेव, यदि सत्यं तर्हि तादृशानि मृदूनि एव तेडम्ानि अकाण्डे सहसा मां किं कुतो रुजन्ति व्यथयन्ति, सत्यमृदुत्वे व्यथकत्वायोगा- स्वदप्ानां मार्दवं मृषेति भावः ॥। १२७॥ हिन्दी-हे कृशाद्ि, तुम्हारे अङ्गोंकी प्रसिद्ध मृदुता मिथ्या है, यदि तुम्हारे ये अङ्ग यथार्थमें सूकुमार होते तो मुझे सहसा क्यों पीड़ित करते? मृदु तो पीड़ा नहीं किया करते॥ १२७॥

कामुकेन यद्त्रैवं कर्मणा तद्विरोघिना। १२८। उदाहरणं योजयति-धर्माक्षेप इति। यत् यतः अत्रोदाहरणे एवम् कौशलद्वारा कामुकेन तस्यां नायिकायामनुरक्तन तद्विरोधिना मार्दवप्रतिकूलेन व्यथाकरणरूपेण कर्मणा अशनायाः तस्या रमण्या गात्राणं मार्दवं सौकुमार्यम् आक्षिप्तं प्रतिषिद्धम्, तस्मादयं मार्दवरूपधमस्याच्षेपात् धर्मान्तेप इति॥१२८ ॥ हिन्दी-इस प्रकार इस उदाहरणमें कामुक नायकने अङ्गोंके सुकुमारताविरुद्ध व्यथाकरणरूप कर्मसे उस नायिकाके शरीरकी सुकुमारताका प्रतिषेध किया है, अतः यह धर्माक्षेप है, यहाँ पर नायिका-गात्रमार्दवरूप धर्मका आक्षेपप्रतिषेध हुआ है॥ १२८॥ सुम्दरी सो ने वेत्येष विवेक: केन जायते। प्रभामान्रं द्वि तरलं दश्यते न तदाश्रयः ॥ १२९ ॥ धर्म्याक्षेपमुदाहरति-सुम्दरीति। सा प्रभाकरनिमत्रा नवगम्यमानकरचरणद्यवयवा सुन्दरी न वा विद्यते न वा इति एषः विवेक: निश्चयात्मकमेकतरकोटिज्ञानं केन जायते? कथं भवति, यतः तरलं सर्वतः प्रसमरतया दृष्टिविघातकम् प्रभामात्रं केवला प्रभा एव दृश्यते, तदाश्रयः तस्याः प्रभाया आधारः (तत्सुन्दरीशरीरम्) न दृश्यते ॥ १२९ ॥ हिन्दी-यह निश्चय कैसे किया जाय कि वह सुन्दरी नायिका है या नहीं ? केवल तरल प्रभा ही तो दीख रह्ी है, उस प्रभाका आश्रय नायिकाशरीर तो दीख ही नहीं रहा है।। १२९।। धर्म्या्षपोऽयमाक्षितो धर्मी धर्मे प्रभाह्यम्। अनुश्ायैध यदरूपमत्याश्चर्य विवक्षता ॥ १३०॥ उपपादयति-धम्या्षपोऽयमिति। अत्र अत्याश्चय स्वप्रभया शरीरतिरोधायकं रूपं तथायिकासौन्दर्य विवक्षता प्रतिपिपादयिषता नायकेन प्रभाह्गयं प्रभानामकं धर्मम् १. पा। २. भवत्येवं। ३. कस्य। ४. अनुश्ायेव। ५. तद्रूपम्।

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१२४ काव्यादर्श:

नायिकागुणम् अ्नुज्ञाय स्वीकृत्य एव यत् यतः धर्मी नायिकारूप: आक्षिप्तः प्रतिषिद्धस्तदयं धर्म्याक्षेपरूप आत्तेपभेदः ॥ १३०॥ हिन्दी-यहाँ अत्यन्त आश्चर्यकर प्रभामात्रदृश्य रूपका प्रतिपादन करनेकी इच्छा रखनेवाला नायक नायिकाके प्रभारूप धर्मको स्त्रीकार करके नायिकारूप धर्मोंका प्रतिषेध करता है अतः यह धर्म्याक्षिप है॥ १३०।। वक्षुषी तव रज्येते स्फुरत्यधरपल्लवः। भ्रवौ च भुझे न तथाप्यदुष्टस्यास्ति ते भयम् ॥१३१ ॥ कारणाच्ेपमाह-चक्षुषी इति। तव चक्षुषी नयने रज्येते कोपोदयाद्रक्त्तवर्णता गच्छतः अधरपक्लवः पल्लवोपमौष्ठः स्फुरति कोपेन कम्पते, भ्रुवौ भुग्ने कुटिलतां गते, तथाऽपि एवं सत्यपि अदुष्टस्य नायिकान्तरसम्पर्करूपानराधरहितस्य मे मम भयं न भव- तीति शेषः।। १३१ ॥ हिन्दी-तेरी आँखें लाल हो रही हैं, तेरे अधरपल्व स्फुरित-चपल हो रह हैं, और तेरी मौहें भी टेढ़ी हो रही हैं, फिर अनराधी न होनेके कारण मुझे भय नहीं हो रहा है, नायिकान्तर- सम्पर्करहित होनेसे मैं निर्भय हूँ।। १३१।। स एंष कारणाक्षेपः प्रधानं कारणं भियेः। स्वापराधो निषिद्धोऽत् यत्प्रियेण पटीयसा।१३२॥ उदाहरणं सन्मयति-स एष इति। पटीयसा चतुरतमेन प्रियेण नायकेन भिय: नायिकाऽपादानकस्य भयस्य प्रधानं कारणं स्वापराधो निषिद्धः-अदुष्टस्येति स्वविशेषण- द्वारा प्रतिषिद्धः अतः कारणान्षेपोऽयम्। अत्र 'न भयम्' इति कथनेन भयरूपक्ार्यस्य प्रतिषेधादयं कार्याक्षेपोऽपि, तदनयो: कारणाक्षेपकार्याच्ेपयोरत्र सङ्करः ॥ १३२॥ हिन्दी-इस उदाहरणमें चतुर नायकने भयके प्रधान कारण-नायिकान्तरसम्पर्कजन्य स्वा- पराधका प्रतिषेध कर दिया है अतः इसे कारणाक्षेप कहते हैं। कुछ लोग यहाँपर कार्य 'भय' के प्रतिषेध होनेसे कार्याक्षेप भी मानते हैं, उनके अनुसार यहाँ कारणाक्षेप और कार्याक्षेपका सक्कर होगा। जो लोग इस तरहका सक्कर मानते हैं, उनके मतमें शुद्ध कारणाक्षेपका उदाहरण निम्नलिखित है- 'अस्माकं सखि वाससी न रुचिरे मैवेयकं नोज्जवलं नो वक्रा गतिरुद्धतं न हसितं नैवास्ति कश्चिन्मदः। किंत्वन्येपि जना वदन्ति सुभगोऽप्यस्याः प्रियो नान्यतो दृष्टि निक्षिपतीति विश्वमियता मन्यामहे दुःस्थितम्'॥ यहाँ उत्तरार्धद्योत्य पतिवशीकरणकके कारण वसनरुचिरत्वादिका प्रतिषेध किया गया है। प्रधान- कारणनिषेध कारणाक्षेपका विषय होता है, और अप्रधानकारणाभाव विभावनाका विषय होता है। यहाँपर भयके कारण रक्तनेत्रत्वादि शब्दतः कहे गये हैं विभाव्य नहीं हैं, अतः यहाँ विभावना नहीं है, क्योंकि- 'प्रसिद्धहेतुव्यावृत्त्या यत्किश्चित् कारणान्तरम्। यत्र स्त्राभाविकत्वं वा विभाव्यं सा विभावना।।' विभावनाका यही लक्षण दण्डीने स्वीकार किया है॥ १३२ ॥ दूरे प्रियतमः सोऽयमागतो जलदागम:। रषाथ् फुलला निचुला न मृता चास्मि किन्चिदम् ॥१३३।। १. पलवम्। भुभौ। ३. एव। ४. डिय:

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द्वितीय: परिच्छेद: १२५

कार्याक्षेपमाह-दूरे प्रियतम इति। प्रियतमः दूरे विदेशेऽस्तीति शेष:, सोऽयं विरहिजनघातकतया प्रसिद्धो जलदागमः वर्षाकालः आगतः, फुल्लाः कुसुमिताः निचुलाः वेतसत रव: दष्टाः प्रत्यक्षमचलोकिताश्च, एवं मरणसाधनानां पतिदूरत्ववर्षागमफुल्लनिचुल- दर्शनानां जातत्वेऽपि न मृतास्मि जीवामि एव, किन्विदम्, कथमिदं जायते, आश्चर्यमिद- मिति भाव: ॥। १३३ ॥। हिन्दी-प्रियतम दूरदेशमें हैं, विरहिघातकतया प्रथित वर्षाकाल आ गया, विकसित वेतसतरु मैंने प्रत्यक्ष देखे, फिर भी मैं मरी नहीं, यह क्या बात है ?॥ १३३ ॥ कार्याक्षेप: स कार्यस्य मरणस्य निवर्सनात्। तत्कारणमुपन्यस्य दारुणं जलदागमम्॥ १२४ ॥ उदाहरणमुपपादयति-कार्याक्षप इति। तस्य मरणस्य कारणं दारुणं विरहासहं जलदागमं तत्सहचरितं च पतिदूरत्वादिकम् उपन्यस्य अभिधाय, कार्यस्य मरणस्य निवर्त- नात् प्रतिषेधात् सोडयं कार्याच्षेपो नाम। अप्रसिद्धकारणोपन्यासे कार्याभावो विशेषोक्ति- रिति ततोऽस्य भेद: ॥ १३४ ॥ हिन्दी-यहाँपर मरणके कारण-दारुण वर्षाकालके आनेके साथ पतिवियोगादि कहा गया, परन्तु मरणरूप कार्यका प्रतिषेध कर दिया गया, अतः यह कार्याक्षेप है। यहाँ विशेषोक्ति नहीं हो सकती, क्योंकि दण्डीके अनुसार अप्रसिद्ध कारणके उपन्यस्त रहने पर भी कार्याभाव ही उसका निदान है॥ १३४ ॥ न चिरं मम तापाय तव यात्रा भविष्यति। यदि यास्यसि यातव्यमलमाशङ्कयात्र ते ॥१३५॥ अनुज्ञान्षेपमुदाहरति-न चिरमिति। तव यात्रा विदेशगमनम् चिरं बहुकाल- पर्यन्तं मम तापाय वियोगजनितसन्तापप्रदानाय न भविष्यति, त्वद्विरहे झटित्येव मम प्राणात्यये सति मया कष्टानुभवो न करिष्यते, अतः यदि यास्यसि तहि त्वया यातव्यम् गन्तव्यम्, अत्र विषय ते तव आशक्कया चिरहे कथमियं स्थास्यतीति मद्विषयकचिन्तया अलम्, न किमपि चिन्तायाः प्रयोजनम्, त्वद्विरहे मम मरणस्यावश्यं भावित्वादिति भाव:॥ १३५॥। हिन्दी-तुम्हारी विदेशयात्रा चिरकालतक मेर सन्तापका कारण नहीं बनी रह सकेगी, तुम्हारे वियोगमें मैं अधिक काल तक जीवित नहीं रह सकूंगी, फ़िर सन्ताप होगा किसे? अतः यदि तुमको जाना है तो जाओ, यहाँ के लिये चिन्ता करना व्यर्थ है॥ १३५॥ इत्यनुज्ञामुखेनैव कान्तस्याक्षिप्यते गति:। मरणं सूचयम्त्येति सोऽनुक्ताक्षेप उच्यते ॥ १३६ ।। उदाहरणं सप्मयति-इत्यनुक्चेति। इति अत्रोदाहरणे अनुज्ञामुखेन गमनानुमति- प्रदानविधयेध मरर्ण सूचयन्त्या तद्विरहेऽवर्श्यं भाविनं स्वप्राणात्ययं व्यजयन्त्या नायिकया कान्तस्य गतिः विदेशयात्रा आक्षिप्यते प्रतिषिध्यतेऽतोऽनुशाच्ेपोऽयम्॥१३६॥ a

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१२६ काव्यादर्श:

हिन्दी-इस उदाहरणमें गमनानुशाप्रदान करनेके द्वारा अपने मरणकी सूचना देनेवाली नायिकाने अपने कान्तकी यात्राका प्रतिषेध किया है अतः इसे अनुश्ञाक्षेप नामक आक्षेप मानते हैं। अनुज्ञाके द्वारा प्रतिषेध किया गया है, अतः यह अनुज्ञाक्षेप कहा गया है। साहित्यदर्पणकारने इस तरहके प्रसङ्गमें विध्याभास नामक अलक्कार माना है, और उसका लक्षण यह कहा है :- 'अनिष्टस्य तथार्थस्य विध्याभासः परो मतः' ॥१३६॥ धनञ् बहुलभ्यं ते सुखं क्षेमं च वर्स्मनि। म ध मे प्राण सन्देह्स्तथापि प्रिय मा स्म गाः॥ १३७ ॥ प्रभुत्वाच्ञेपमाह-घनमिति। अस्यां विदेशयात्रायाम् बहुधनं सम्पत्त्यादि ते तव लभ्यम् अत्र यात्रायां स्वकोशलेन ्त्वं बहुधनमर्जय्यसि,ेत्मनि मार्गे सुखम् समयस्यानुकूलतया सौविध्यम्, चेमश्च कुशलमपि, न च मे प्राणसन्देहः त्वद्वियोगकाले मम मरणम् इत्यपि न, सत्यपि कष्टे प्राणाः प्रयास्यन्त्येवेति नाशङ्कनीयम्, तथापि तव धनला- भस्य तथा सुखन्षेमयोर्दृढसम्भावनाविषयत्वे, मम प्राणसन्देहस्य चाशङ्कुनीयत्वे सत्यपि हे प्रिय, मा स्म गा: न गच्छ, अत्र केवलं प्रेमप्रकर्षेण यात्रा निरुध्यते। १३७।। हिन्दी-इस यात्रामें आपको बहुत धन मिलेगा, रास्तेमें भी सब प्रकारका सुख तथा मझल प्राप्त होता रहेगा, और इस प्रवासावधिके भीतर मेरे प्राणोंका संशय भी नहीं है, फिर भी हे प्रिय, तुम जाओ मत ॥ १३७ ॥ इत्याचक्षाणया हेतून् प्रिययात्रानुबन्धिनः। प्रभुत्वेनैव रुद्धस्तत् प्रभुत्वाक्षेप उच्यते ॥ १३८॥ उदाहरणं योजयति-इत्याचक्षाणयेति। इति प्रोक्तप्रकारेण प्रिययात्रानुरोधिनः नायकप्रवासौचित्यसमर्थकान् हेतून् धनलाभादीन् आचक्षाणया कथयन्त्या कान्तया प्रेमप्रभावोत्पन्नेन स्वाधीनपतिकत्वरूपेण प्रभुत्वेनैव कान्तो रुद्धो गमनाभिवारित इति तत प्रभुत्वाच्ेपोऽयम् ॥१३८॥ हिन्दी-इस उदाहरणमें प्रियकी यात्राके औचित्यका समर्थन करनेवाले धनलाभ, सुख, कुशल, स्वप्राणसंशयविरह, इन सभी कारणोंको कह कर भो नायिकाने प्रेमजनित प्रभुत्वके द्वारा नायककी यात्राका प्रतिषेध कर दिया है, अतः यह प्रभुत्वाक्षेप कहा जाता है॥ १३८॥ जीविताशा बलवती धनाशा दुषला मम। गच्छ वा तिष्ठ वा कान्त स्वावस्था तु निषेदिता ॥ १३९॥ अनादराक्षेपमुदाहरति-जीविताशेति। हे कान्त, प्रियतम, मम जीविताशा त्वयि समोपस्थे सति जीवितुमिच्छा बलवती धनाशापेक्षया प्रबला, धनाशा त्वां विदेशे प्रस्थाप्य धनकामना दुबला जीवितापेक्षया न्यूना, अहं त्वया सह स्थित्वा जीवितुमिच्छामि, न च त्वया विरह्य्य धनम्, अस्यां स्थिती गच्छ या तिष्ठ वा, मम न तत्र कोऽपि निबन्ध: केवलं स्वावस्था निजा स्थितिस्तु निवेदितोक्का ॥ १३९ ॥ हिन्दी-मेरे हृदयमें आपके साथ रहकर जीने रहनेकी इच्छा बलवती है, धनकी आशा उतनी प्रबल नहीं है, आप चाहे जॉय या रहें, मैंने अपनी स्थिति बता दी। आपके रहने पर ही मैं जी सकती हूँ। और मैं जीना ही चाहती हूँ धन नहीं चाहती, यही मेरी मनोदशा है, इस स्थितिमें आप चाहें तो जा सकते हैं, चाहें तो रुक भी सकते हैं। १३९॥ १. प्रत्याच। २. सरोपिनः । ३. तु।

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द्वितीय: परिच्छेद: १२७

असावनादराक्षेपो यद्नादरवहय:। प्रियप्रयाणं रुन्धत्या प्रयुक्तमिह रक्तया। १४० ॥। उदाहरणमुपपाद्यति-असाविति। इह अत्रोदाहरणे प्रियप्रयाणं नायकस्य विदेशप्रस्थानं रुन्धत्या प्रतिषेधन्त्या रक्त्या प्रेमपरायणया नायिक्या यत् यस्मात् अनादरवत् गच्छ या तिष्ठ वा इति स्वौदासीन्यसूचकं वचनं प्रयुक्तम्, ततः असौ अना- दराक्षेपो नाम ।। १४० ।। हिन्दी-इस उदाहरणमें नायककी यात्राका प्रतिषेध करनेवाली अनुरक्ता नायिकाने अनादर- पूर्ण-जाइये या रहिये-ये अनादरयुक्त वचन कहे हैं, अतः इसे अनादराक्षेप कहा जाता है। अनादर द्वारा प्रतिषेध होनेसे अनादराक्षेप हुआ। अनादर यहाँ औदासीन्यस्वरूप है॥ १४० ॥ गच्छ गष्छसि चेत् कान्त पन्थान: सम्तु ते शिवाः । ममापि जम्म तन्रेव भूयाद्यन्र गतो भवान् ॥ १४१ ।। आशीर्वचनाच्ेपमुदाहरति-गच्छेति। हे कान्त, प्रियतम, गच्छसि चेत् त्वया गन्तव्यं चेतु तहि गच्छ, पन्थानः मार्गाः ते तुभ्यं शिवाः कमाणप्रदाः सन्तु जायन्ताम्। यत्र भवान् गतः (भविष्यति ) तत्रैव ममापि जन्म भूयात्। त्वयि गते मम त्वदायत- जीविताया मरणमवश्यं भावि, मरणात्परतक्ष पुनर्जन्मनः प्रसस्े यत्र भवदास्थितिस्तत्रैव जन्माशासे, येन भवदर्शनजन्या तृप्तिरासाद्येतेति भावः ॥ १४१ ॥ हिन्दी-हे कान्त, आप जाते हैं तो अवश्य जायँ, भगवान् आपके मार्गको कल्याणमय करें, मेरी भी यही इच्छा है कि (आपके चले जानेपर विरहकी असह्यतासे प्राणत्याग करनेके बाद) मेरा जन्म उसी स्थानपर हो जहाँ आप गये हों ॥ १४१॥ इत्याशीर्वच्नाक्षेपो यदाशीर्वाद्वतमना। स्वावस्थां सूचयन्त्यैव कान्तयात्रा निषिध्यते ।१४२। उक्तमुदाहरणं सम्मयति-इतीति। इति अन्रोदाहरणे कान्तया आशीर्वादवत्मना ममापि तत्रैव जन्म भूयाद्यत्र भवान् गतः स्यादिति स्वजन्मार्शसापद्धत्या स्वावस्थाम् विरहे प्राणधारणस्याशक्यत्वं सूचयन्त्या एव कान्तयात्रा निषिध्यते इति आशीर्वचना- क्षेपोऽयम् ।। १४२॥। हिन्दी-इस उदाहरणमें नायिकाने आशीर्वादके रास्ते-मेरा भी जन्म वहीं हो जहाँ आप गये हों-इस इच्छाको व्यक्त करनेके द्वारा अपनी अवस्था-विरहमें प्राणधारण करनेकी अक्षमताको सूचित करके कान्तकी यात्राका प्रतिषेध किया है अतः यह आशीर्वेचनाक्षेप है॥ १४२॥ यदि सत्यैव यात्रा ते काप्यन्या मृग्यतां त्वया। अहमदैव रुद्धास्मि रन्धांपेक्षेण मृत्युना ।। १४३ ।। इत्येष परुषाक्षेपः परुषाकरपूर्वकम्। कान्तस्यासिप्यते यस्माल् प्रस्थानं प्रेमनिम्रया॥ १४४॥ परुषान्ेपमुदाहरति-यदीति। यदि ते यात्रा सत्या एव यदि तब विदेशयात्रा निश्चिता तदा कापि अन्या त्वदीयवियोगेऽपि जीवितभारणक्षमा त्वया भृग्यताम् भार्या- १. रन्भान्वेषेण।

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१२८ काव्यादर्श:

पदारोपायान्विष्यताम्, यतः अहम् अद्यैव त्वत्प्रस्थानरजन्यामेव रन्घ्रापेक्षेण छिद्रान्वे- षिण्ा मृत्युना रुद्धास्मि घ्रिये। त्वयि प्रस्थितमात्रे मम मरणस्यावश्यभावितया त्वया कापि परा ली क्रियतां या त्वदीयं विरहं सोढुं क्षमेतेत्यर्थः ॥ १४३॥ उदाहरणमुपपादयति-इतीति। प्रेमनिघ्नया प्रेमाधीनया कान्तया यस्मात् परुषा- क्षरपूर्वकम्-त्वया काप्यन्या मृग्यताम्-इति कठोरवचनकथनद्वारेण कान्तस्य प्रस्थानम् प्रवासगमनम् आक्षिप्यते, इत्येष: परुषाच्ेपो नाम ।। १४४॥ हिन्दी-यदि आपका जाना निश्चित है तो आप किसी दूसरी सीका वरण करके ही विदेश जाइये (जो आपके वियोगमें जीती रह सके), मैं तो छिद्रान्वेषण करनेवाली मृत्युसे आज ही पकड़ ली गई, मरी ॥ १४३॥ इस उदाहरण में प्रेमपराधीना नायिकाने अपने प्रियतमकी विदेशयात्राका कठोर शब्द- जाना निश्चित हो तो दूसरी स्त्री करके जाइये-इस निर्मम भाषणके द्वारा प्रतिषेध करती है अतः इसे परुषाक्षेप कहा जाता है॥। १४४ ।। गन्ता वेदृगच्छ तूर्ण ते कर्णौ यान्ति पुरा रवाः।

साचिष्याक्षेप पवेष यद्त्र प्रतिषिध्यते। प्रियप्रयाणं साचिव्यं कुवत्येवातिरक्या॥१४६॥ साचिव्यान्षेपं विवरीतुमुदाहरणमाह-गन्ता चेदिति। त्वं गन्ता चेत् अबश्यं प्रबासगामी चेत् तूर्ण शीघ्रं गच्छ प्रस्थानं कुरु, पुरा यावत् आर्तबन्धुमुखोद्ीर्णाः मन्मृ- त्युङ्ग:खिव्रितवान्धवजनमुखनिर्गता: प्रयाणपरिपन्थिनः यात्राप्रतिबन्धकाः रवाः मन्मरणो परान्तकन्दनध्वनयः कर्ण यान्ति ते श्रुति प्रवेत्यन्ति। यदि गन्तव्यमेव तर्हि शीर्घ्रं गच्छ यावन्मम मरणेन पीडितानां बान्धवानां कन्दनध्वनयस्तव कर्ण प्रविश्य यात्रां न प्रति- बध्नन्ति, तेषु श्रयमाणेषु तव यात्रा विहता स्यादिति भावः ॥ १४५॥ नामकरणं योजयति-साचिव्येति। यत् यस्मात् अत्र उदाहरणेऽस्मिन् साचिष्यं कुर्वत्या तूण गच्छेति कथनेन गमने सहायतां विरचयन्त्या इव अतिरक्त्या सातिशयप्रेम- परायणया नायिकया प्रियप्रयाणं नायकस्य परदेशप्रस्थानं प्रतिषिध्यते भाविस्वमृत्युसूचनया निषिध्यते, तस्मादेष: साचिव्यान्ेपः सहायतापूर्वकनिषेधद्वारा साचिव्याच्ेपनामा प्रभेद इति ॥ १४६ ॥ हिन्दी-यद्ि आपको जाना है तो शीघ्र जाइये, जिससे इमारे मरने पर वान्धबरोंके मुखोंसे निकलनेवाली रोदनध्वनि आपके कानोमें पैठकर आपकी यात्राका प्रतिबन्ध नहीं कर सके ॥ १४५॥ इस उदाहरणमें नायिका नायकके जानेमें सहायता करती हुई-सी प्रतीत होती है, परन्तु वह भावि स्वमरणबोधनद्वारा वस्तुतः नायककी यात्राका प्रतिषेध कर रही है, अतः इसे साचिन्याक्षेप कहते हैं क्योंकि इसमें साचिव्य-सहायता कर के ही प्रतिषेध किया गया है ॥१४६॥ गच्छेति वक्तुमिच्छामि मत्मियें स्वतिप्रयैषिणी। निर्गच्छति मुलादणी मा गा इति करोमि किम्॥ १४७ ॥ १. जनोद्वीर्णांः। २. प्रतिपन्थिनः। ३. कुर्बन्यन। ४. स्वत्प्रियं मत्मियै।

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द्वितीय: परिच्छेद: १२६

यजाक्षेप: स यज्स्य कृतस्यानिष्ट्वस्तुनि।

यत्नाच्षेपमुदाहरति-गच्छेतीति । हे मत्प्रिय मम प्राणवल्लम, त्वत्त्रियेषिणी त्वदी- यप्रियं कामयमावा भहम् गच्छ इति वक्तुमिच्छामि त्वदीयं गमनमनुमन्तुमभिलषामि, परन्तु मुखात् मा गा इति निषेधपरा वाणी वाक निर्गच्छति बहिर्याति। किं करोमि? प्रयत्ने कृतेऽप्यसाफल्यादुपायरहितास्मि संघृत्तेति भावः ॥१४७॥ उदाहरणमुपपादयति-यत्नाक्षेप इति। अनिष्टवस्तुनि स्वानभिमतेऽपि गच्छेवि वचनोच्चारणरूपे पदार्थे कृतस्य यत्नस्य स्वचेष्टायाः विपरीतफलोत्पत्ते: मा गाः इति वचनो बारण रूपान्यथाफलदर्शनात् आनर्थक्योपदर्शनात वैयर्थ्यप्रकाशनात् सोडयं यत्नाक्षेपो नाम। अयमाशय :- अत्र नायिकया कान्तं प्रति गच्छेति वक्तुकामया मया तथा वकतुमि- ष्यते, किन्तु तद्विपरीतं मा गा इत्येवोभार्यते इति स्वीयप्रयत्नस्य वैफल्यं विपरीतफलोत्पत्ति- प्रकाशनविधया प्रकाश्यते, तत्र तया प्रियेच्छानुसरणयत्न: कृतस्तेन व विपरीतं फर्ल जनयता गमनं प्रियेष्टं प्रतिषिध्यते इति ॥१४८ ॥ हिन्दी-हे भेरे प्रियतम, तुम्हारा प्रिय चाहनेवाली मै यद्यपि 'जाओ' यही कहना चाहती हूँ, परन्तु मेरे मुखसे निकलती है 'नहीं जाओ' यह वाणी। मैं क्या करूँ, मैं यल करती हूँ कि 'जाओ' कहूं, परन्तु उस यलके द्वारा मेरे मुखसे वाणी निकलती है कि 'मत जाओ'। इस स्थितिमें मैं क्या कर सकती हूं॥ १४७॥ इस उदाहरणमें नायिका ने स्वानभिमत-'जाओ' इस शब्दको मुखसे निकालनेका प्रयास किया, परन्तु फल विपरीत हुआ-मुखसे निकला नहीं जाओ, उसे प्रयल्में विफलता मिली। इस तरह किये गये प्रयलसे नायककी प्रवासयात्राका प्रतिषेध हुआ है, अतः यह यला- क्षेप है॥ १४८।। क्षणं दर्शनविघ्याय पक्ष्मस्पन्दाय कुप्यतः। प्रेम्ण: प्रयाणं त्वं' ऋ्रहि मया तस्येष्टमिष्यते॥ १४९॥ सोऽयं परवशाक्षेपो यत्प्रेमपरतन्त्रया। तया निषिध्यते "यात्राऽन्यस्यार्थस्योपसूचनात्।। १५०।। परवशाच्तेपमुदाहरति-क्षणमिति। हे प्रिय, क्षणं स्वल्पकालम् दर्शनविष्नाय त्वदवलोकनपरिपन्थिने पत््मस्पन्दाय निमेषाय कुप्यतः निमेषमप्यसहमानस्य प्रेम्ण: अनुरागस्य (समीपे) त्वं निज प्रयाणं ब्रूहि निवेदय, मया तस्य प्रेम्णो यदिष्टं तदेवेप्यते। गन्तुकामेन त्वया त्वद्विलोकनविघ्नकारितया निमेषमप्यसहमानः प्रेमेय स्वयात्राविषये वक्तव्यः, मां तु वृथेवानुज्ां याचसे, यतो मया तु तस्य प्रेम्णो यदिष्टं तदेवेष्यते, प्रेमपरामी- नाया ममानुमतेर्याचनयाऽलमिति भावः ॥१४९॥ उदाहरणं सप्मर्यत-सोऽयमिति। यत् यस्मात् प्रेमपरतन्त्रया स्नेहवशीभूतया तथा नायिकया अन्यस्य स्वापेक्षया भिभ्नस्य अनुज्ञायाचनोपयुकतस्यार्वस्य प्रेमरुपस्योपसुच- नात् यात्रा कान्तस्य प्रस्थानं निषिध्यते सोऽयं परवशाकेपो नाम। अत्र स्वस्या: प्रेमपर- वशां प्रदर्श्य नायिकया कान्तयात्रा प्रतिषिद्धेति परवशादेपोऽ्यमिति भादः।।१५० ॥ १. सचनादू। २. क्षणदर्शन। ई. हे। ४. अवं। ५. यात्रेत्वसवार्य।

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१३० अष्यादर्श

हिन्दी-हे प्रिय, आप जानेके सम्बन्धमें मेरे उस प्रेमते ही अनुमति मांमिये जो क्षणभरके लिये आपके दर्शनमें विघ्न उत्पन्न करने वाले निमेधपर भी कुपित होता रहता है, मैं तो उस प्रेमके इष्टको ही पसन्द करूंगी। मैं प्रेमपराधीन हूँ, मेरी अनुमति कोई वस्तु नहीं है, आप प्रेमसे ही अनुज्ञा सांगे ॥ १४९ ॥ इस उदाहरणमें प्रेमपरतन्त्र उस नायिकाने स्वभिन्न प्रेंमसे अनुज्ञा मांगनेको कहा, अन्य- स्वमिन्न-प्रेमरूप अर्थको अनुक्ञायाचनपात्रतवेनोपयुक्त बताया, इस तरह अपनी परवशता दिखाकर नायककी यात्राका निषेध किया, इसे परवशाक्षेप कहते हैं॥। १५०।। सहिष्ये विरहं नाथ देहाडश्याअनं मम। 'यदकनेत्रां कन्दर्पः प्रहर्त्ता मां न पश्यति ॥१५१। डुष्करं जीवनोपायमुपन्यस्योपरुध्यते।

उपायाच्षेपमुदाहरति-सहिष्य इति। हे नाथ, (अहम्) विरहं त्वद्वियोगं सहिष्ये, तदर्थम् मम अदृश्याञ्जनम् अदृश्यतासम्पादकं कब्जलम् (यदक्तनेत्रो नान्येर्दश्यते ) देहि, यदक्तनेत्रां येन अदृश्याअनेनाजितनयनां मां प्रहर्त्ता उत्पोडनकरः कन्दर्पो न पश्यति न वीक्षते ॥१५१ ॥ उदाहरणमुफ्पादयति-दुष्करमिति। ईदशं दुष्करं कठिनम् जीवनस्य नायिकाजी- वनधारणस्य उपायम् अदृश्याज्जनप्रदानम् उपन्यस्य कथयित्वा पत्युः प्रस्थानं यात्रा उप- रुध्यते, सति गमनस्यावश्यकत्वे सिद्धाञ्जनं महां प्रदाय प्रस्थेयमिति कठिनं यात्रोपायमभिधा- योपायस्यासाध्य तया यात्रा निषिध्यत इत्ययमुपायाच्ेप इति कवय आहुः॥ १५२॥ हिन्दी-हे नाथ, मैं आपका विरह सह लूंगी परन्तु आप मुझे अदृश्याअ्न देते जाइये, जिस अजनको आँखोंमें लगानेके बाद प्रहार करनेवाला कामदेव मुझे नहीं देख सकेगा। अदृश्याअञन एक प्रकार का मन्त्रसाधित कज्जल होता है उसे जो अपनी आँखोंमें लगा लेता है उसे दूसरे नहीं देख पाते है। इस अदृश्याञ्जन की गणना अष्टसिद्धियोंमें की जाती है, भारतेन्दु हरिश्चन्द्रने सत्यहरिश्चन्द्रमें-अअ्ञन, गुटिका, पादुका, धातुसिद्धि वेताल, मोहिसिद्ध इहिकाल' में इसीकी गणना की है।। १५१।। इस उदाहरणमें अदृश्याअ्ञन-प्रदानरूप अतिकठिन जीवनोपाय बताकर प्रियतम की बात्राका प्रतिषेध किया गया है, इस तरह के आक्षेपको उपायाक्षेप कहते हैं।। १५२ । प्रवृचेष प््यामीति वाणी वल्लम ते मुखात्। अयताऽपि त्वयेदानी मन्प्रेम्णा ममास्ति किम् ॥१५३॥

संरब्घया प्रियारण्वं प्रयाणं यन्निषिध्यते ।। १५४।। रोवाज्ेपमुदाहरति-प्रवृत्तवेति। हे वक्ञभ, ते तव मुखात् प्रयामि गच्छामि इति काणी एतादशमरुन्तुदम् वचनम् प्रवुत्ता एव, निगता एव, अतीवाश्यजनकमेतद्यत्वं मां वक्षमां मन्यमानोऽपि प्रयामीति प्राणहरं वचनमुदचारयः इति। इदानीम्-अयता केनापि प्रतिबन्धेन अगचछता अपि मन्दप्रेम्णा प्रयामीति कथनानुमितानुरागशैथिल्येन त्या मम वच्चें। २. प्रखुं। १. यंन्त्रणा। ४. निवा्यते।

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द्वितीय: परिच्छो १३१

किम् (प्रयोजनम् ) अ्स्ति । शिथिले प्रेमणि प्रमापिते गच्जामीति कबनेन, त्वं तिष्ठ गच वा, नास्ति मम कोषपि विशेष इत्यर्थ:।१५३ ॥ सन्मयति-रोषाक्षेपोडयमिति। उद्रिकः परां काष्ठामारढो यः स्नेहस्तेन नियन्त्रितः प्रियगमनवृत्तश्रवणे सति विह्लीकृत आत्मा यस्यास्तया संर्घया कुपितया नायिकया प्रियारब्धं नायकेन करियमाणं प्रयार्ण विदेशगमनम् यत् यस्मात निषिध्यते तदयम् रोवां- क्षेपो नाम। रोषेणाचेपो रोषाप्षेपः । अत्र व्यप्ञय एव प्रतिषेषो बोध्य: ॥१५४॥ हिन्दी-हे वल्लभ, जब तुम्हारे मुखसे 'जाता हूँ' यह बात निकल ही गई, तन अब तुम जाओ या ठहरो, तुम्हारे प्रेममें तो शिथिलता आ ही गई है (जिसका प्रमाण यही है कि तुम 'जाता हूँ' यह शब्द कह सके, यदि प्रेममें शिथिलता नहीं आई रहती तो तुम ऐसा कह ही नहीं सकते थे), फिर तुमसे मुझे क्या प्रयोजन है, नहीं जानेपर भी तुमसे मुझे क्या मतलब रह गया। १५३॥ इस उदाहरणने अतिप्रगाढ़ प्रेमसे विहलहृदय होकर कुपित हो गई है, और अपने कोपसे अय मुझे तुमसे-शिथिलस्नेह तुमसे-क्या प्रयोजन है, यह कहलानेवाले क्रोधसे प्रियके प्रस्थानको रोका है-प्रतिषिद्ध कर दिया है, अतः यह रोषाक्षेप है।। १५४।। मुग्धा कान्तस्य यात्रोक्तिश्वणादेव मूच्छिता। बुद्ध्वा वक्ति प्रियं' रष्ट्रा किं चिरेणागतो भवान् ॥१५५।। इति तत्कालसंभूतमूच्छयाSSल्षिप्यते गतिः। कान्तस्य कातराक्ष्या यम्मूच्छा्षिपः स ईडशः । १५६।। मूर्च्छाच्तेपमुदाहरति-मुग्धेति। मुग्धा सुन्दरी नायिका कान्तस्य स्वप्रियतमस्य यात्रोक्तिश्रवणात् प्रयाणसूचकवचनाकर्णनात् एव (प्रयाणात् प्राक तदुक्तिश्रवणमात्रात्) मूच्छिता अचेतनतां गता, (कृतेषु बन्वुभिव्यजनपवनजलप्रोक्षणादिषु ) बुद्ष्या मूर्च्छा- पगमे संज्ञां लब्ध्वा प्रियं च (तत्रस्थितं ) दृष्ट्रा किं भवान् चिरेणागत इति वक्ति प्रियं पृच्छति ।। १५५।। उदाहरणमुपपादयति-इति तत्कालेति। इति एवं प्रकारेण तत्कालसंभृतमूच्छया प्रियप्रयाणोक्तिश्रवणसमकालोत्पन्नमोहेन (करणेन) कातराच्या अ्धीरलोचनया तया सुन्दर्या (कर्तृभूतया) कान्तस्य गतिः भाक्षिप्यते प्रतिषिध्यते, तदयं मू्च्छया गतेरादोपान्मूच्छा- क्षेपो नामालकारः॥। १५६ ॥ हिन्दी-प्रियतमकी यात्राकी बात सुनते ही वह भोली नायिका मूर्च्छित हो गई, (उसका प्रियतम नहीं जा सका, उपचार करने पर जब ) वह चेतनामें आई, तब उसने अपने प्रियंतमसे पूछा कि आप बड़ी देरसे आये हैं या अभी आ रहे हैं, आपको आये कितन्हा समय हुमा ॥१५५॥ इस उदाहरणमें कातरनयना वह मोली नायिका प्रियतमके जानेकी बात सुनते ही मू्छित होकर प्रियतमके गमनका प्रतिषेध सघ:सआञात स्वमूर्च्छा द्वारा करती है अतः इसे मूर्च्छाकेप कहा जाता है॥ १५६ ॥। नाघातं न कृतं करणें स्रीमिर्मधुनि नार्पितम्। स्वद्द्विषां दीर्घिकास्वेव विशीर्ण नीलमुत्पलम्।। १५७।।

१. प्रियासिष्ा। २. तहियां।

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१३२ काव्यादर्श:

सानुकोशमिवोस्पले। व्यावस्य कर्म तदयोग्यं शोष्यावस्थोपदर्शनात्॥ १५८॥ सानुकोशाचेपमाह-माम्रातमिति । त्वद्द्विषां त्वदरीणां जीभि: नीलमुत्पलम् नीलकमलं नाघ्रातम्, न कर्मे कृरत कर्णालद्वारतां गमितम्, न मधुनि मदेऽर्पितं सुगन्ध- वर्दधनाय व्यस्तम्, एकम् तद् नीलोत्पलम् दीर्षिकासवेव वापीप्वेव विशीर्णम् कालपरि- गामात् क्षयं गतम्। इदं राजस्तुतिपरं पद्यम्। तत्र च कविना वर्णनीयस्य राजो दीर्घिका- विकसितनीलोत्पलव्यर्थजीर्णतावर्णनेन तद्रिपुर्त्रीणां वैधव्यं व्यजितं, वनगमनं वा, उभयथापि नीलोत्पलानुपयोगसम्भवात्॥।१५७॥ उपपति विशदयति-असाविति। उत्पलने नीलकमले सानुक्रोशं दयापूर्वकम्- अनुपयुकस्य तस्य शोच्यताप्रकाशनपूर्वकम्-तद्योग्यं नीलकमलाह कर्म स्त्रीजनकर्त का- घ्राणकर्णभूषणीकरणमद्यन्यसनादि व्यावरत्य प्रतिषिध्य शोच्याचस्थोपदर्शनात् तृथा विशीर्ण- त्वरूपावस्थावर्णनात् अ्रसौ पूर्वदर्शितोदाहरणोऽनुक्रोशाच्ेपो नाम। अनुक्रोशपूर्वकम् नाध्रातमित्यादि निषेधदर्शनादनुक्रोशाच्ेप इति संज्ञा ॥ १५८॥ हिन्दी-आपके शत्रुओंकी वापीमें (बात्लीमें) खिलनेवाले नीलंकमलको आपकी शत्रुस्त्रियोंने न सूंधा, न कानोमें अलक्ाररूपमें धारण किया और न मधको सुवासित करनेके लिए उसमें ही डाला, वह नीलकमल उस वापीमें कालक्रमसे यों ही विशीर्ण हो गया, झड़ गया॥ १५७॥ इसे अनुक्रोशाक्षेप कहा गया है, क्योंकि नीलकमलका कोई उपयोग नहीं हुआ, इसलिये उसकी दयनीयावस्था बताकर उसके योग्य कार्य आघ्राण, अलङ्काररूपमें कर्णन्यसन और मद्यसुवा- सनार्थ मथमें स्थापन का प्रतिषेध किया गया है। अनुक्रोश-दयाके द्वारा आक्षेपप्रतिषेध हुआ अतः इसे अनुक्रोशाक्षेप कहा गया ॥१५८ ॥। अमृतात्मनि पद्मानां द्वेष्टरि स्निग्घतारके। मुखेन्दौ तव सत्यस्मिन्नपरेण किमिन्दुना ॥ १५९॥ इति मुख्येन्दुराक्षिप्तो गुणान् गौणेन्दुवर्ततिनः । तत्समान् दर्शयित्वेह न्िष्टाक्षेपस्तथाविधः३॥ १६० ।। श्लिष्टाक्षेपमुदाहरति-अमृतात्मनीति। अ्मृतात्मनि परमाह्ादकतयाऽमृतस्वरूपे पच्ानां कमलानां द्वेष्टरि सौन्दर्यातिशयकतेन द्वेषेण शत्रौ, लिग्धतारके सिग्धाक्षिकनीनिका- शालिनि अस्मिन पुरोवर्तिनि तव मुखेन्दी मुखरूपे चन्द्रे सति विद्यमाने अपरेण आकाशगतेन इन्दुना किम् ? नास्ति किमपि प्रयोजनम् ? अत्र पूर्वोक्तानि मुखेन्दुविशेषणानि अमृतात्म- नीत्यादीनि चन्द्रेऽपि विभककिविपरिणामेन योज्यानि, तत्रामृतात्मनि इत्यस्ष्यामृतमय इति, पद्यानां द्वेष्रि स्ोचनपरे, सिग्धतारके इत्यस्य चानुकूलतारारूपभार्ये इत्यर्थः ॥। १५९ ॥ उदाहरणं विष्णोति-इतीति। इह अन्नोदाहरणं इति भनेन प्रकारेण गौणेन्दु- वर्तिनो मुसरूपचं्दे स्थितन् गुणान् अमृतात्मत्वादीन् तत्समान् मुर्येन्दुगुणसदृशान् दर्शयित्या प्रकाश्य श्लिष्टविशेषणद्वारा प्रकल्प्य मुख्येन्दुराकाशस्थश्चन्द्र आक्षिप्त: कमर्थ्येन प्रतिबिद् इति रिलष्टान्षेपोऽयम्। श्लिष्टपदन्यासेन आ्रक्षेप: श्लिष्टाक्षेप इति नाम- करणबीजम्।। १:0॥ १. सानुक्रोशोयमाक्षेपः। २. पवर्णनात्।- ३. विषि:।

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हिन्दी-अमृतसमान स्वादुसरस, कमलके द्ेषी, चिकनी कनीनिकाओंसे युक्त इस मुखचन्द्रके रहते अन्य आकाशस्थ चन्द्रमाकी क्या आवश्यकता है, आकाशस्थ चन्द्रमा्में भी अमृतमयता, पभसक्कोचकत्व, स्नेहशील तारारूप खरीसे युक्तत्व रूप तीनों विशेषण विभक्तिविपरिणामसे लगाये जा सकते हैं॥ १५९ ॥ इस उदाहरणमें गौणचन्द्र-मुखचन्द्रमें रहने वाले अमृतात्मत्व, पभ्रद्वेष्टृत्व, ल्निग्धतारकत्व रूप धर्मोंको मुख्यचन्द्रवसि धर्म समान बताकर-श्लिष्ट विशेषणोपन्यास द्वारा दोनों चन्द्रोंके धर्ममें समानताकी कल्पना करके-मुख्यचन्द्रमाका कैमर्थ्येन प्रतिषेध किया गया है, किप्रयोजनं कहकर आक्षेप हुआ है, अतः यह श्लिषाक्षेप है॥ १६०॥ अर्थो न संभृतः कश्िन्न विद्या फाचिदर्जिता। न तप: सश्ितं किश्चिद्वतं व सकलं वयः ॥१६१॥ असावनुशयाक्षेपो अर्थार्जनादेव्यवृत्तिदशितेह' यस्मादनुशयोत्तरम्। गतायुषा ॥ १६२ ॥। अनुशयात्तेपं वितृणोति-अर्थों नेति। कक्षित् मृवर्णादिररयों न संमृतो न संचितः काचित विद्या पदवाक्यप्रमाणादन्यतमशास्त्रज्ञानम् न अर्जिता, किश्चित् तपः कृच्छूसान्तप- नादिकम् न सश्चितम नानुष्ठितम्, सकलक्ष वयः जीवनं गतम् ॥ १६१ ॥ उदाहरणं सप्मयति-असाविति। यस्मात् इह अत्रोदाहरणे अनुशयोत्तरं पश्चात्ता- पाद्नन्तरम् गतायुषा वृद्धेन केनचित् अर्थार्जनादेः घनविद्यातपस्सश्वयप्रमृतेः व्यावृत्ति: स्वीयाऽकृतकार्यता दशिंता व्यजिता, अरतोऽसावनुशयाकेपो नाम। अनुशयपूर्वक आच्ेपोऽनुशयाच्तेप इति संज्ञारहस्यम ॥ १६२॥ हिन्दी-न कुछ धन एकत्र किया, न विद्याध्ययन कर सका और न कुछ तपस्या ही की। इस प्रकार मेरी सारी जिन्दगी व्यर्थ चली गई ॥ १६१ ॥ यह अनुशयाक्षेप नामक अलक्कार है क्योंकि इस पथमें बूढ़ा आदमी पश्चासाप करनेके बाद वनादि-सश्रयका प्रतिषेध करता है। अनुशयपूर्वक आक्षेप अनुशयाक्षेप है यही इस नामसे व्यक्त होता है।। १६२ ।। किमयं शरदम्मोद: किं वा हंसकदम्बकम्। रुतं नूपुरसंवादि भूयते तन्न तोयदः ॥। १६३।। इत्ययं संशयाक्षेपः संशयो यन्निवर्त्यंते। धमेंण इंससुलमेनास्पृष्टघनजातिना ॥ १६४ ।। संशयान्षेपमाह-किमयमिति। भ्यं वियति हश्यमानः शरदम्भोद: शरत्कालिक: स्वच्छो मेघ: किम्? किंया अथवा हंसकदम्बकम् हंससमूहः? ( यतः) नूपुरसंवादि नपुरशब्दसद्ृशम् रुतं शब्द: श्रूयते, तत् ततोऽयं तोयदो मेघो न भवति। पारिशेष्यादयं हंससमृद एव, तस्येव तादृशशब्दयुतत्वादिति भावः ॥। १६३॥ उदाहरणं सप्तमयति-इतीति। इति उक्तरूपोऽयं संशयाक्षेपो नाम, यतोऽन अस्पृष्टवनजातिना मेघसामान्यमस्पृशता तदसंबद्धेन हंससुलमेन हंसेषु प्रतीतेन धर्मेच नृपुरसंवादिरुतेन संशयो मेघोडयं हंसनिवहो वेत्येवंरूपः सन्देहः निवस्यते दूरीकियते, १. दश्ितेयं। २. निषायत।

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काज्यादसे:

संशयस्येकतरकोटिनिर्णयावमिजीबितित्वात्, नूपुरशब्देन हंसत्वनिणये संशयनिवृत्तेरव- शयंभावादिति भावं: ।। १६४ ।। हिन्दी-क्या यह शरद समयका मेघ है या मानससे लौटने वाला इंससमूह है? नूपुरके शब्दसे मिलता-जुलता सा शब्द सुनाई पड़ रहा है, अतः यह मैध नहीं है। १६३॥ यह संशयाक्षेप कहा जाता है क्योंकि इसमें मेघजातिके साथ कमी नहीं देखा जानेवाला और इंसजातिमें देखा जाने वाला नूपुरशब्दसदृश शब्द संशयको निवृत्त कर देता है॥ १६४॥ चित्रमाक्राम्तविश्वोऽपि विक्रमस्ते न तृप्यति'। कढा वा हश्यते वृप्तिरुदीर्णस्य दविर्भुज: ॥ १६५॥ अयमर्थान्तराक्षेपः प्रक्रान्तो यन्निवायते। दर्शनासत्सधर्मणः॥ १६६ ॥ अर्थान्तराच्तेपमुपस्थापयति-चित्रमिति । आक्रान्तविश्वः वशीकृतसकलसंसार: अपि ते तव विक्रमः न तृप्यति न सन्तुष्यति इति चित्रम् आश्चर्यस्। वा अरथवा उदीर्णस्य दीप्रस्य हविभुजो वहेः कदा तृप्तिः दृश्यते न कदापि वहेस्तृप्तिस्तथैव तव पराक्रम- स्यापीति भाव: ॥ १६५॥। उदाहरणं योजयति-अयमिति। इह पूर्वोक्तोदाहरणे तत्सधर्मणः विक्रमसमानस्य अर्थान्तरस्य उदीर्णहविर्भुजः दर्शनात् उपस्थापनात् प्रक्रान्तो विस्मयः यत् निवार्यते, अतोऽयमर्थान्तराक्षेपो नाम॥ १६६ ॥ हिन्दी-सारे संसारको आक्रान्त करके भी आपका पराक्रम तृप्त नहीं हो रहा है, अथवा क्या उद्दीप्त वह्निकी तृप्ति भो कहीं देखी गई है। १६५ । यह अर्थान्तराक्षेप कहा जाता है क्योंकि इसमें पराक्रमके समान तेजस्वितारूप धर्मसे युक्त प्रदीप्त पावकरूप अर्थान्तरका उपस्थापन करके प्रकृत विस्मयका आक्षेप-प्रतिषेध किया गया है ॥१६६॥ न स्तूयसे नरेन्द्र त्वं ददासीति कदाचन। स्वमेव मत्वा गृहन्ति यतस्त्वद्धनमर्थिनः ॥ १६७ ॥ इत्येवमादिराक्षेपो हेत्वाक्षेप इति स्मृतः। अनयैव दिशाऽन्योSपि विकल्पः शक्य ऊहितम् ॥ १६८।। (इत्याक्षेपचक्रम्) हेत्वा्षेपमुपन्यस्यति-न स्तूयस इति। हे नरेन्द्र, राजन्, त्वं दंदासीति कृत्वा कदाचन कदाचिदगि न स्तूयसे न प्रशस्यसे, यतः अर्थिनो याचकास्तव धनं स्वं निज- स्वत्वास्पदम् एव मत्वा झात्वा गृहन्ति। एवस स्वं धनं गृहतां कुतः स्तुतिप्रवृत्तिरिति भाव:॥ १६७।। उदाहरणं सभ्मयति-इत्येवमिति। इति एषमादि: एतत्सदृशः आक्षेपः हेत्वा- क्षेप:, प्रस्तुतस्य नरेन्द्रस्तवस्य 'स्वमेव मत्वा गहन्ति त्वद्धनमर्थिनः' इति हेतुमुपन्यस्ष्य भाचेपात्। पूर्वोक्ते कारणादोपे कारणस्यान्ेप: अत्र तु कारणेन प्रस्तुतस्यार्थान्तरस्या-

१. शाम्यति। २. निवस्यते। ३. श्रूयसे। ४. अन्बेष्पि विकल्पाः तमनमूहितुम्।

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द्विवीक पशिछ्ेद:

ज्ेप इति द्वयोर्भेंदः। अनया पूर्वदर्तितया एव दिशा पदस्याऽन्योपि विकल्प: आरोया- लक्ारप्रभेद: (बुद्धिमद्भिषहितुं शक्यः) ।। १६८।। हिन्दी-हे नरेन्द्र, आपकी प्रशंसा दान देते रहने पर मी इसलिये नहीं को जाती है कि याचकवृन्द आपके धनको अपना ही धन मानकर लेते हैं। आपके धनमें याचकों को स्वत्व मालूम पड़ता है, अतः आपके द्वारा दान दिये जाने पर भी आपकी स्तुति नहीं की जाती है॥ १६७ ।। इस तरहके आक्षेप हेत्वाक्षेप कहे जाते हैं, क्योंकि इसमें प्रस्तुत नरेन्द्रस्तवका 'याचकवृन्द आपके धनको अपना धन समझके ले जाते है' यह हेतु बताकर प्रतिषेध-आक्षेप किया गया है। इसी प्रकार आक्षेपालह्कार के अन्य प्रभेदोंका भी बुद्धिमान् जन स्वयम् ऊड कर लेंगे॥ १६८॥ क्षेय: सोऽर्थान्तरन्यासो वस्तु प्रस्तुत्य किश्चन। तत्साधनसमर्थस्य न्यासो योऽन्यस्थ वस्तुनः ॥१६९॥ कमप्राप्तमर्थान्तरन्यासं नामालक्कारं लक्षयति-क्षेय इति। किशन किमपि वस्तु प्रकृतम् प्रस्तुत्य उपन्यस्य, तस्य प्रस्तुतस्य साधने सोपपत्तिकतयोपपादने समर्थस्य (असंभाव्यतया सन्दित्यमानस्य प्रकृतार्थस्य सोपपत्तिकतयोपपादने कुशलस्य) अन्यस्य अप्रकृतस्य यः न्यास: निवेशः सोऽयमर्थान्तरन्यासो नामालङ्कारः। कस्यापि प्रस्तुतस्य वस्तुनः पूर्वमुपन्यासे कृते (तस्यासम्भाव्यतायां तर्कितायां) तत्साधनसमर्थस्याप्रस्तुतस्य वस्तुन उपन्यास एवार्थान्तरन्यास इति भावः॥ १६९॥ हिन्दी-किसी प्रस्तुत वस्तुका उप्न्यास करके (उसकी अनुपपदमानताकी सम्भावना होने पर) उस प्रस्तुत अर्थके साधन-उपपादनमें समर्थ अप्रस्तुत वस्तुके उपन्यासको ही अर्थान्तरन्यास नामक अलक्कार जानना चाहिये। इस मूल लक्षणमें 'किश्चन प्रकृतं वस्तु प्रस्तुत्य अन्यस्य अप्रकृतस्य वस्तुन उपन्यासः' ऐसा अन्वय किया जाता है, जिससे यह ध्वनि निकल सकती है कि प्रस्तुतका पूर्वमें उपन्यास हो और अप्रस्तुतका बादमें, तभी अर्थान्तरन्यास होगा, परन्तु यह बात नहीं है, अप्रस्तुतका भी पूर्वोपन्यास और प्रस्तुतका पश्चादुपन्यास होने पर आचार्योंने अर्थान्तरन्यास माना है, जैसे- 'प्रतिकूलतामुपगते हि विधौ विफलत्वमेति बडुसाधनता। अवलम्बनाय दिनभर्तुरभूत्न पतिष्यतः करसहस्रमपि॥' यह सन्ध्यावर्णन है, उत्तरवाक्यार्थ ही प्रस्तुत है, पूर्ववाक्यार्थ उसके समर्थनके लिये है, वह अप्रस्तुत है। यदि प्रस्तुतका पूर्वनिर्देश अवश्यापेक्षित होता तब इसमें अर्थान्तरन्यास कैसे माना जाता। इससे यह सिद्ध हुआ कि पूर्वमें या आगे, कहीं भी रहनेवाले प्रस्तुतके समर्थनके लिए अप्रस्तुतके उपन्यासको अर्थान्तरन्यास कहा जायगा। समर्थ्य-समर्थकभावमें अर्थान्तरन्यासवादी काव्यप्रकाश- कारने समर्थ्य और समर्थक वाक्यार्थोंमें सामान्य-विशेषभाव आवश्यक माना है। उनके अनुसार कार्यकारणभावस्थलमें काव्यलिन होता है। दण्डीने कान्यलिङ्ग अलक्कार नहीं माना है, फलतः वह दोनों स्थलोंमें अर्थान्तरन्यास ही मानते हैं। इस प्रसङको और स्पष्ट करते हुए काव्यप्रकाशकारने हेतुके तीन प्रभेद स्वीकार किये हैं।- शञापक, निष्पादक और समर्थक। श्ञापक हेतु रहने पर अनुमानालक्कार होता है, निष्पादक हेतु रहनेपर काव्यलिङ और समर्थक हेतुस्थलमें अर्धान्तरन्यास। इस प्रकार असाङ्डर्य प्रतिपादित किया गया है। उद्योतकारने लिखा है कि अनुपपथमानतया संभाव्यमान अर्थके उपपादनार्थ अर्धान्तरके न्यासको अर्थान्तरन्यास कहा जाता है। दृदन्समें सामान्यका मामान्यसे और विशेषका विशेषसे

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समर्यन होता है, इसमें सामान्यका विशेषसे या विशेषका सामान्यसें, यही दोनोंमें अन्तर है। अनुमानमें व्याप्त्यादि कही जाती है, यहाँ पर उसकी आवश्यकता नहीं होती है। इसके लक्षणमें प्रायः सभी आचार्य सिद्धान्ततः एकमत हैं, परन्तु उदाहरण-भेद-प्रदर्शनमें मतभेद है। काव्यप्रकाशकार ने केवल चार भेद स्वीकार किये हैं। साहित्यदर्पणकार आठ भेद मानते हैं, इस मतभेदका कारण •स्पष्ट है, काव्यप्रकाशकार कार्यकारणभावस्थलमें अर्धान्तरन्यास मानते ही नहीं हैं, फलतः ४ भेद कम होगा ही। साहित्यदर्पणकार कार्य-कारणभावमें भी अर्था- न्तरन्यास मानते हैं, अतः आठ मेद कहे हैं॥ १६९ ।। विश्व्यापी विरोषस्थ: श्लेषाविद्धो विरोधवान्। अयुक्तकारी युकात्मा युक्तायुक्तो विपर्यय: ॥।१७०।। इत्येवमाद्यो मेदा: प्रयोगेष्वस्य' सक्षिताः। उदाहरणमालेषां रूपव्यक्त्यै निदश्यंते॥१७१॥ सामान्यतो लक्षितस्यार्थान्तरन्यासालक्टारस्य समर्थकार्थभेदेन संभविनो भैदान् निर्दि- शति-विश्वव्यापीति। विश्वव्यापी सर्वत्रसंभवी, विशेषस्थः क्वचन वस्तुविशेषे एव विद्यमान:, श्लेषाविद्धः-श्लेषो वस्तुसाम्यं तेनाविद्धो युरतत :- अविरुद्धार्थसमर्थकेन समर्यित इत्यर्थ: । विरोधवान् प्रकृतविरोधी, अयुक्तकारी प्रकृत्यवानुचितकरणशीलः, युक्कात्मा शचि- त्ययुक:, युक्कायुक्क: युक्तोऽप्ययुक्तकारी, विपर्ययः एतद्विरुद्धोऽयुक्तोऽपि युक्ककारी॥ १७० ॥ इत्येवमिति। इत्येवमादय: इत्यादयः अस्य समर्थकार्थस्य (अर्ान्तरन्यासप्रभेद- करस्य) मेदा: प्रयोगेपु महाकविप्रयोगेषु लक्षिता: प्रतीताः। एषाम् समर्थकार्थानाम रूप- व्यक्त्ये स्वरूपस्फुटताये उदाहरणमाला उदाहरणततिः निदश्यते॥१७१ ॥ हिन्दी-इन दो श्रोकोंमें अर्थान्तरन्यासके प्रभेदोंके आधारभूत समर्थक अर्थोंके भेद गिनाये गये हैं। प्रथम क्रोकमें उनके नाम हैं, जैसे-विश्वव्यानी अर्थात् सर्वत्रसंभवी, विशेषस्थ-किसी सास वस्तुमें होनेवाला, इलेषाविद्ध-अविरुद्धार्थ-समर्थकसे युक्त, विरोधवान्-प्रकृतविरोधी, अयुक्तकारी-प्रकृत्या अनुचितकारी, युक्तात्मा-औचित्ययुक्त, युक्तायुक्त-युक्त होकर भी मयुक्कारी, विपयय-अयुक्त होकर भी युक्त्तकारी॥ १७० ॥। इस तरहके' समर्थक अर्थके प्रकार (जिनके आधारपर अर्थान्तरन्यासके भेद किये जा सकते है) महाकविप्रयोगमें लक्षित होते हैं, उनके स्वरूपको स्फुट करनेके लिये उदाहरणमाला पस्तुत की जा रही है।। १७१।। भगवन्तौ जगनेजे सूर्याचन्द्रभसावपि। पश्य गक्छत पवास्तं नियति: केन लहयते ।। १७२।। भर्यान्तरन्याक्षप्रमेदेषु प्रथमं विश्वव्यापिनमुदाहरति-भगवन्ताविति। भगवन्तौ सर्वस्ामथ्यशालिनी जगन्नेत्रे सकलपदार्थप्रकाशकतया जगतः संसारस्य नयनस्थानीयौ सूर्यानन्द्रमसौ सूर्यकन्द्रमापि (का कथाऽन्येषाम्?) अस्तं गच्छत एव नियमेनास्तौ मवत इत्ययुनापि क्मः अश्यार्थस्यासंभाव्यतामाशक्थ निराकरोति-नियतिरिति। नियति: दैवं केन लभ्पते भतिक्रम्यते। विश्वव्यापी नामायमर्थान्तरप्रभेद:, समर्थकार्थस्य

१. विफलेपु.। २. रूपन्यततौ। ६. नियबते।

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द्विताय पारच्छढ: १३७

विश्वव्यापित्वात्, तेन चतुर्थपादार्थेन सामान्येन पादत्रयगतो विशेषार्थोऽतर समर्यितो बोष्य:।। १७२ ॥। हिन्दी-सकलसामर्थ्यशाली, संसारकी आँखोंके समान ये सूर्य और चन्द्रमा भी अस्त होते ही है, देखिये, भाग्यका अतिक्रम कौन कर सकता है! इस उदाहरणमें विशेषभूत आद्यपादत्रयार्थका सामान्यभूत चतुर्थपादार्थसे समर्थन किया गया है, इस समर्थनके बिना वह पादत्रयार्थ असंभव-सा लगता। इसमें चतुर्थपादोक्त समर्थक अर्थ विश्व- व्यापी है-भाग्यका अनुल्लङ्गनीयत्व ब्रह्मासे लेकर पिपीलिकापर्यन्त समान है, अतः इसे विश्वव्यापी अर्थान्तरन्यास कहा गया है॥ १७२ ॥। पयोमुच: परीतापं हरन्त्येवं शरीरिणाम्। नन्वात्मलाभो महतां परदुःखोपशान्तये॥। १७३॥ विशेषस्थमर्थान्तरन्यासमाह-पयोमुच इति। पयोमुच: मेघा: शरीरिणां स्थावर- जज्मात्मकानां प्राणिनाम् परीतापम् तपत्तुप्रभवं सन्तापं हरन्त्येव अपनयन्त्येव, उक्त्मर्थ- मुपपस्या द्रढयति-नन्विति। महताम् आत्मलाभः जन्मभ्रहणम् परेषां दुःखस्य उप- शान्तये प्रशमनाय, ननु निश्चितमिदम्। अत्र समर्थकार्थे महतामित्युक्तेर्न साधारणप्राणिनां किन्तु महतामेवेति विशेषस्थता, उत्तरवाक्यार्थेन सामान्येन पूर्ववाश्यार्थस्य विशेषस्य समर्थनाद् विशेषस्थो नामायमर्थान्तरन्यासप्रभेदः ॥ १७३॥ मेघ स्थावर-जङ्गम सभी शणियोंके ग्रीष्मकृत सन्तापको अवश्य ही दूर करता है, बड़ोंका जन्म ही दूसरोंके सन्तापको दूर करनेके लिये हुआ करता है। इस उदाहरणमें विशेषभूत प्रथम वाक्यार्थका सामान्यभूत द्वितीय वाक्यार्थसे समर्थन किया गया है, और समर्थकार्थ विशेषस्थ है क्योंकि उसमें 'महताम्' कहा है। अतः यह विशेषस्थ नामक अर्थान्तरन्यासका दूसरा प्रभेद हुआ है॥१७३। उत्पाद्यति लोकस्य प्रीति मलयमारुतः। ननु दाक्षिण्यसम्पन्नः सर्वस्य भवति प्रियः॥१७४॥ श्लेषाविद्धं नामार्थान्तरन्यासमुदाहरति-उत्पादयतीति। मलयमारुतः मलया- चलप्रवृत्तः पवनः लोकस्य समस्तस्य संसारस्य प्रीतिम् आनन्दम् उत्पादयति करोति, उत्तमर्थमुपपादयति-नन्विति। ननु निश्चयेन दाक्षिण्यसम्पन्नः कौशलपूर्णः सर्वस्य प्रियो भवति, अयमपि मलयानिलो दाक्षिण्येन दक्षिणदिगुद्भघत्वेन सम्पन्न इति युक्त्तवास्य लोक- प्रीतिजनकता। दाक्षिण्यपदं श्लिष्टम्, तेन श्लेषमूलकतयोत्तरवाक्यार्थेन पूर्ववाक्यार्थस्य समर्थनाi श्लेषाविद्धो नामायमर्थान्तरन्यासप्रभेदः ॥१७४॥ हिन्दी-'मलयानिल लोगोंके आनन्दको उत्पन्न करता है, दाक्षिण्यसम्पन्न आदमी सबका प्रिय होता है, यह निश्चित है।' यहाँ पर 'दाक्षिण्यसम्पन्न' शब्दके श्रेषमूलक दो अर्थ माने गये हैं, एक- कौशलयुक्त, दूसरा-दक्षिणदिशामें उत्पन्न, इसी श्रेषको आश्रित करके उत्तरवाक्यार्थ पूर्ववाक्यार्थका समर्थक होता है, अतः इसे श्रेषाविद्ध अर्थान्तरन्यास कहते हैं॥ १७४॥ जगदानम्द्यत्येष मलिनोऽपि निशाकरः। अनुगृह्ाति दि परान् सदोषोऽपि द्विजेश्वरः।।१७५।। विरोधवन्तमर्थान्तरन्यासमुदाहरति-जगादेति। एषः प्रत्यक्षदृश्यः मलिनः कलङ्क- युतः अपि (सदोवश्चेति ध्वन्यते) निशाकरः चन्द्रः जगत् भानन्दयति प्रमोदयति, १. हरन्त्येते। २. दक्षिण। ३. आवहृति प्रियम्। ४. आहादयति।

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अव्यादर

सकमर्थ समर्थयति-अनुणृद्तातीति। सदोबर स्वयं सौवपूर्ण मकिमाचारोऽपि दिजेवर: म्राह्मणश्रेष्ठः परान अन्यान् अनुगृह्ाति उपदेशादिना दयते। मत्र निशाकरस्यापि द्विन- राजत्वेन द्विजेश्वरानुप्रहरूपेण सामान्येन विशेषस्य सदोक्चमत्रकृतजमदाहादनस्य समर्थनं क्रियते, तथ समर्थनं सदोषत्वानुभ्राहकत्वयोविरुद्धधर्मयोः सामानाधिकरण्याद्विरोघयुक्तमिति विरोधवदर्यान्तरन्यासोऽयम् ॥१७५॥ हिन्दी-यह सकलक्क चन्द्रमा जगत्को आनन्दित करता है, दोषपूर्ण होने पर भी द्विजराज अन्योंको अनुगृहीत करता ही है। द्विजेश्वर-ब्राह्मणश्रेष्ठ, चन्द्रमा भी। यहाँ सामान्य द्विजेश्वरसे सदोष रहने पर भी अन्योपकाररूप सामान्य द्वारा विशेष-चन्द्रकृत जगदाह्ादन-का समर्थन किया गया है। इसमें समर्थक वाक्य सदोषत्व और अनुग्राहकत्वरूप विरुद्ध धर्मोंसे युक्त है अतः इसे विरोधवान् अर्थान्तरन्यास कहते हैं॥ १७५ ॥ प्रधुपानकलात् कण्ठान्निर्गतोSप्यलिनां ध्वनिः। कटुर्भवति कर्णस्य कामिनां पापमीहराम्॥ १७६ ।। अयुर्तुकारिणमर्थान्तरन्यासमुदाहरति-मधुपानेति। मधुपानेन मकरन्दास्वादनेन कलषात् मधुरतां गत्तात् अलोनां भ्रमराणां कण्ठा (जातावेकवचनम्) निर्गतोऽपि ध्वनिः शब्द: कामिनाम् विरहिकामुकानाम् कर्णस्य (अत्रापि जातावेकवचनम्) कटुः व्यथको भवति, तदेतत् सामान्येन समर्थयति-पापमिति। पापम् विषयासक्तत्वम् ईदृशं सुखदवस्तु प्रत्यासत्तावपि दुःखदं भवतीति भावः। अत्र पापस्य दुः्खप्रदत्वरूपसामा- न्यार्थेन भ्रमररुतस्य दुःखदत्वरूपविशेषार्थस्य समर्थनात समर्थकार्थस्य कटुत्वरूपायु क्तसंपा-

हिन्दी-मधुपान करनेसे मधुरताको प्राप्त करने वाले भ्रमरकण्ठोंसे भी निकलती हुई ध्वनि विरही कामियों को कर्णकटु लगा करती है क्योंकि पाप (विषयासंक्तत्व) ऐसा ही हुआ करता है। यहाँ पर पापका दुःखप्रदत्वरूप सामान्यसे भ्रमरध्वनिके दुःखप्रदत्वरूप विशेषका समर्थन हुआ है और समर्थकार्थ-कटत्वरूप उपयुक्त अर्थका संपादन करता है, इसे अयुक्तकारी अर्थान्तरन्यास कहा जाता है॥ १७६ ।। अयं मम दहत्यक्मम्भोजदलसंस्तरः। हुताशनप्रतिनिधिर्दाहात्मा ननु युज्यते ।। १७७ ।। युक्त्ात्मनामानमर्थान्तरन्यासमुदाहरति-अयमिति। अयम् मयाऽण्युष्यमाणोड- म्भोजदलसंस्तरः कमलपत्रनिर्मितं शयनीयम् मम वियोगिन: अज्ञम् शरीरावयवम् दहति स्वस्पर्शेन सन्तापयति-ननु शीतलतया प्रथितानां कमलदलानां सन्तापकत्वं कथ- मित्यनुपपति निराकरोति-हुताशनेति। हुताशनप्रतिनिधिः उज्ज्वलरकाकारतया वहे: प्रतिकतिभूतः अम्भोजदलसंस्तरः दाहात्मा दाहकत्वस्वभावयुक्त इति युज्यते उचितमेव। यो यत्प्रतिनिधिस्स तत्कार्यकारीति लोकप्रसिद्धयाऽमिप्रतिनिधे: कमलदलसंस्तरस्य युकतमेव सन्तापकत्वमिति भावः । अत्र हुताशनप्रतिनिधित्वरूपसामान्यार्थेन तत्प्रतिनिधिविशेषस्या- म्भोजदलसस्तरस्यान्नदाहकतवे युक्त्तत्वं समर्थ्यत इति हुताशनप्रतिनिधेर्दाहकत्वस्य युक्ततया

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हिन्दी-कमलपुष्पकी पछसुट़ियोंसे निमित यह शयनीय मुझे सन्तापित करता है, श्रेत- रक्तकान्तिशाली अत एव आगके प्रतिनिधिसमान लगने वाले इस कमल-नयनीयका दाहप्रदत्व उचित ही है। यहाँ पर अभिप्रतिनिधिसामान्यके दाहकत्वसे अभ्निप्रतिनिधिविशेष कमलदलसंस्तरका दाह- कत्व समर्थित हुआ है, और अभिप्रतिनिधिका दाहकत्व उचित ही है, अतः यह युक्तकारी अर्थान्तरन्यास हुआ॥ १७७॥ झ्षिणोतु कामं शीतांशुः किं वसम्तो दुनोति माम्। मलिनाचरितं कर्म सुरभेर्नेन्घसा्प्रतम् ॥ १७८॥ युक्तायुक्तं नामार्थान्तरन्यासप्रभेदमाह-क्षिणोरवति। शीतांशुधन्द्रमाः (मां) कामं यथेच्छम् क्षिणोतु पीडयतु, (तस्य कलङ्टितया युक्क्तं परपीडनम्), वसन्ती मधुमास: किं कथं मां दुनोति सन्तापयति, तथाहि सुरभे: वसन्तस्य (विख्यातनामघेयस्य च तस्य) मलिनाचरितं कलक्किलोकानुष्टितं परपीडनरूपं कर्म असाम्प्रतम् अयुक्तं ननु । 'मधौ कामदुघायाच्च विख्याते सुरभिद्धयोः' इति नानार्थरलावली। अ्त्र सामान्येन विशेष- समर्थनं स्पष्टम्। अत्रोत्कृष्टस्य सुरभेरपकृष्टकर्माचरणे युफ्केनायुक्ताचरणमिति युक्तायुक्तना-

हिन्दी-भले ही शीतांशु (कलक्की होनेके कारण) मुझे पीड़ित किया करे, वसन्त मुझे क्यों सताता है, कलक्की द्वारा किया जाने वाला सन्तापनरूप कार्य सुरमि वसन्त (ख्यातनामा) के लिये उपयुक्त नहीं है। वसन्त सुरभि-ख्यातनामा है, उसके लिये चन्द्रमा-कलङ्की द्वारा किया गया कार्य उचित नहीं कहा जा सकता। यहाँ सामान्यसे विशेषका समर्थन और उत्कृष्ट सुरभिका अपकृष्ट सन्तापनरूप युक्तका अयुक्ताचरण है, अतः युक्तायुक्त नामक अर्थान्तरन्यास हुआ॥ १७८॥ कुमुदान्यपि दाहायं किमयं कमलाकर:। नहीन्दुगृह्येषूप्रेषु सूर्यगरह्यो मृदुर्भवेस्॥ १७९॥ (इत्यर्थान्तरन्यासचक्रम्) यिपर्ययनामार्थान्तरन्यासमुदाहरति-कुमुदानीति। कुमुदानि चन्द्रकरविकासीनि (शीतकरविकामितया शीतत्वेन संभावनीयानि ) अपि दाहाय (मम) सन्तापाय भवन्ति, तदा अयं कमलाकर: पद्मवनम् (सूर्यविकासितयाऽवश्यंभाविसन्तापकत्वस्वभावः) किम् किमु वक्तव्य इत्यर्थः। उक्त्मय द्रठयति-इन्दुगृहेषु चन्द्रपक्षीयेषु कुमुदेषु उप्रेषु सन्तापकेषु सत्सु सुयगृह्य: सूर्यपक्षगतः कमलाकर: मृदुः शीतलः नहि भवेत्। शीतलतया संभाव्य- मानानां कुमुदानां सन्तापकत्वे उप्रत्वेन संभावितस्य कमलाकरस्योचितमेव सन्तापकस्वमि- त्याशयः। अत्र सामान्येन विशेषसमथने समथ्येवाक्ये कुमुदेश्युककारिता, कमले च युर्त्तकारिता इति युक्कायुक्नामायमर्थान्तरन्यासः।।१७९।। हिन्दी-कुमुद भी जब मुझे सन्ताप देते हैं तब कमलोंकी क्या बात है, वह तो सन्ताप देंगे ही, (शीतकर) चन्द्रमाके पक्षवाले कुमुद जब उग्र-सन्तापकर हो रहे हैं तब (उष्णकर) सूर्यके पक्षवाले क्यों शीतल होने लगे? यहाँ कुमुदमें अयुक्तकारिता और कमळमें युक्तकारिता का वर्णन है अतः यह युक्तायुक्तकारी अर्थान्तरन्यास है। १. तापाय। २. किमङ्।

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काठ्यादश

यहाँ ध्यान देना चाहिये कि जितने अर्थान्तरन्यासके उदाहरण दिये गये हैं वह सभी साधर्म्यके उदाहरण है, वैधर्म्यका अर्थान्तरन्यास निम्नलिखित है- 'वक्षोजकुम्भनिवहाद्वनिताजनानां ग्रीष्मर्तुना विनिहितं अहराजपुत्री। तापं पितुः स्वमहरत् तरलोमिंहस्तैरन्यं न याति हि विभूतिरपत्यभाजाम् ।।' यहाँ सामान्यभूत-'सन्तानयुक्त जनकी सम्पत्ति दूसरोंके पास नहीं जाती है'-इस अर्थस 'यमुनाने अपने पिता सूर्यकी तापरूप सम्पत्ति ले ली' यह समथित होता है, यहाँ समर्थक अर्थ निषेधमुख है, अतः यह वैधर्म्येण अर्थान्तरन्यास है ॥१८९॥ शब्दां पासे प्रतीते वा सादृश्ये वस्तुनोई्योः। तत्र यन्ेदकथनं व्यतिरेकः स कथ्यते॥८॥ शब्दोपासे इति। द्वयोर्वस्तुनोः उपमानोपमेययोः सादृश्ये शब्दोपासे वाचके वादि- शन्देन प्रतिपादिते तुन्यादिशब्दप्रयोगे सति लक्षणया प्रतीते, पूर्वापरपर्यालोचनया वा प्रतीते मति, तत्र सादृश्ये यद्ेदनकथनं केनचिद्धर्मविरोषेणोपमानादुपमेयस्योत्कर्षय भेद- प्रतिपादनं स व्यतिरेक: तन्नामालद्कार इति लक्षणम्। स चायं व्यतिरेकः उपमेयोत्कर्षो- पमानापकर्षयोद्रयोरुपादानात् द्वयोरेकम्य वानुपादानात् चतुर्विधः। उपमानोपमेययो- भेदकथनश्व क्वचिन्नवादिभिः, क्रचिट्टिरुदवधर्मोपादानमात्रेण, क्वचिच्च तात्पर्यपर्यालोचनया भवति, तन्सवमपि प्रदर्शयिष्यमाणोदाहरणप्रसस्ने स्फुटीभविष्यति॥१८० ॥ हिन्दी-जहाँ पर उपमान और उपमेय का सादृश्य इवादि वाचकशब्दप्रयोगके होनेसे शब्दतः कथित हो, अथवा तुल्यादिशब्दप्रयोग होनेसे लक्षणाद्वारा प्रतीत हो, या पूर्वापर पर्यालो- चनासे प्रतीत हो, वहाँ यदि भेन कहा जाय-किसी धर्नविशेषसे उपमानापेक्षया उपमेयका उत्कर्ष बतानेके लिये अन्तर कहा जाय तब व्यतिरेक नामक अलक्कार होता है। यह व्यतिरेक चार प्रकार का होता है। १-उपमानका अपकर्ष और उपमेयका उत्कर्ष दोनोंके उपादानमें। २-उपमानके अपकर्षमात्रोपादानमें। ३-उपमेयके उत्कर्षमात्रोपादा नमें। ४-उभयानुपादानमें। रुय्यक प्रभृति कुछ आचार्य उपमेयके अपकर्ष-कथनमें भी व्यतिरेक अलक्कार स्वीकार करते हैं और उदाहरण देते हैं :- 'क्षीणः क्षीणोऽपि शशी भूयो भूयोडभिवद्धते नित्थम्। विरम प्रसीद सुन्दरि, यौवनमनिवति यातं तु।' यहाँ पर उपमेयभूत यौवनका उपमानभूत चन्द्रापेक्षया-चले जाने पर फिर नहीं लौटनारूप अपकर्ष बताया गया है। आचार्य दण्डीको यह व्यतिरेक स्वीकार्य नहीं था, इसीलिये इस तरहका उदाहरण नहीं दिया। मम्मटने भी उपमानापेक्षया उपमेयकी उत्कृष्टतामें ही व्यतिरेक माना है, भपकृषटतामें नहीं। 'उपमानायदन्यस्य व्यतिरेक: स एव स;' व्यतिरेक आधिक्यम् (काव्यप्रकाश)। सर्वाधिक चमत्कार तब उत्पन्न होता है जब हम देखते हैं कि मम्मटने उपमेयापकर्षप्रतिपादनमें व्यतिरेका- लक्कारवादी रुय्यकके ही उपमेयापकर्षव्यतिरेकोद्राहरण-'क्षीणः क्षीणोऽपि शशी' इसी शोकको उपमेयाविक्यका उदाहरण सिद्ध किया है, उनका वक्तव्य यों है :- 'क्षीणः क्षीणोऽपि' इत्यादावुपमानस्योपमेयादाधिक्यमिति केनचिदुक्तं, तदयुक्तमत्र यौवनगता- स्थैर्याधिक्यं दि विवक्षितम्'। १. उच्यते।

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द्वितीय: परिच्छेद: १४१

ध्यान देनेकी बात है कि रुय्यकप्रभृतिने यौवनकी अस्थिरताको अपकर्ष-न्यूनता समझा है और उसी अनिवत्तिता-अस्थिरताको मम्मटने उसकी अधिकता मानी है, यह तो विवक्षा है-'यौवन- गतास्थर्याधिकयं हि विवक्षितम्' यहाँ जगन्नाथने भी मम्मटका साथ दिया है। व्यतिरेकमें स्पष्टतया भेदकथन अपेक्षित है, अतएव-'मुखमिव चन्द्रः' इस प्रतीपोदाहरणमें मुखमें उपमानीकरणप्रयुक्त आधिक्य के गम्यमान होनेपर भी व्यतिरेक नहीं माना जाता है, वहाँ खासकरके भेदबोधक कोई शब्द नहीं है, यही इन दोनों अलक्कारोंमें अन्तर समझना चाहिये॥ १८० ॥

गुणैस्तुल्योसि भेदस्तु वपुषैवेद्टशेन ते ।। १८१ ॥। व्यतिरेकमुदाहरति-धैयेति। धैय धृतिः अचाश्चल्यं च, लावण्यं सौन्दर्य लवण- मयत्वं च, गाम्भीर्यम् गूढाभिप्रायशालित्वं दुरवगाहत्वं च, एतत्प्रमुखैः एतदादिभि: गुणैः त्वम् उदन्वतः समुद्रस्य तुल्यः समानोऽसि, भेदस्तु पार्थक्यं तु ईदृशेन मनोहरकरचरणादि- शालिना वपुषा एव। धै्ये गाम्भीय लावण्यं च यद्यपि तव सागरे च तुल्यं परं तव वपुर्म- नोहरं तन्न तथा समुद्रस्येति वपुर्मात्रकतं पार्थेक्यमिति भावः ॥ १८१ ॥ हिन्दी-धीरता, लावण्य और गम्भीरता आदि गुणोंमें आप सागरके समान ही है, यदि भेद है तो केवत आपके इम प्रत्यक्षदृद्य शरीरमें ही। यहाँ पर धैर्य-समुद्रमें धीरता और वर्णनीय राजामें अचश्जलता, लावण्य-राजामें सौन्दर्य और सागरमें खारापन, गम्भीरता-राजामें गूदाशयत्व और सागरमें अगाधता यह श्लेपमे समझा जाता है ॥५८१॥ इत्येकव्यतिरेकोऽयं धर्मेणैकत्रवर्त्तिना। प्रतीतिविष यप्राप्तंर्भेदम्योभयवर्ततिनः ॥१८२।। उदाहरणमुपपादयति-इत्येकेति । एकत्र उपमेयमात्र वर्तिना स्थितेन धर्मेण सुन्दरवपुःशालित्वेन उभयर्वात्तनः उपमानोपमेयावगाहिन: (प्रतियोगित्वानुयोगिन्याभ्यामु- भयस्पृशः) भेदस्य वैधर्म्यस्य प्रतीतिविषयप्राप्तः प्रतीयमानन्वात् हेतोः अयम् पूर्वोक्तस्वरूपः एकव्यतिरेकः। अयमाशयः-अतरोदाहरणे एकत्रोपमेये स्थितेन सुन्दरवपुष्टवेन धर्मेण उप- मानोपमेययोरद्वयोरपि भेद: प्रतीतिमवगाहत इत्ययनेकव्यतिरेको नामालङ्कार इति ॥१८२। हिन्दी-उक्त उदाहरणमें उपमेयभूत राजामात्रमें वर्त्तमान सुन्दरशरीरशालित्वरूप धर्मसे उपमान सागर और उपमेय राजाका नेद प्रतीत होता है, अतः इसे एकत्यतिरंक नामक व्यतिरेक- प्रभेद कहा जाता है॥ १८२।। अभिन्नवेलौ गम्भीरावम्वुराशिर्भवानपि। असावअनसक्काशस्त्वं तु चामीकरदयुतिःै।।१८३।। उभयव्यतिरेकमुदाहरति-अभिन्नेति। अम्बुराशिः सागरः भवांश उभौ द्वौ अपि अभिन्नवेलौ सागरोऽप्यनतिक्रान्ततीरः भवानपि अनुल्लङ्गितमर्याद:, उभावपि गम्भीरौ- सागरोऽगाधः भवानपि गूढाभिप्रायः, तदित्यं सत्यपि युवयो: साम्ये अम्बुराशिः नीलाभज- लत्वादजनसङ्काशः कजलमलिन:, त्वं पुनश्ामीकरदुतिः सुवर्णवर्णः ॥। १८३ ॥ हिन्दी-आप दोनों-सागर और आप गम्मीर हैं (सागर अगाध है आप गूढाभिप्राय हैं), आप दोनों ही अभिन्नवेल हैं (सागरने वेला-तटका अतिक्रमण नहीं किया है आपने वेला- माहाल्य। २. तल्योपि। ३. प्रतीत । ४. चछविः

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१४२ मम्मादर्श

मर्यादाका व्ून नहीं किया है)। इस प्रकार दोनों समान हैं परन्तु भेद यह है कि आप सुवर्ण- वर्ण हैं और सागर मीलजलशाली होनेसे अजनपुज-सा है॥ १८३ ॥

का्ष्ण्ये पिशङ्मता चोमौ यत् पृंथग्दर्शिताविद्॥।१८४।। उभयेति। अरयम् उदाहृतः उभयव्यतिरेको नाम, यत् यस्मात् इह उभयोः उपमा- नोपमेययो: भेदकौ इतरव्यावर्त्तकौ गुणी उभी का्व्य पिशजता व कृष्णत्वपीतवर्णत्वरूपौ पृथक् दर्शिता॥। १८४ ।। हिन्दी-यह उभयव्यतिरेक है क्योंकि इसमें उपमान और उपमेय-समुद्र और वर्णनीय राजा दोनोंके भेदक गुण क्रमशः कालापन और पिशऊंता अलग-अलग बताये गये हैं ॥ १८४॥ त्वं समुदश्च दुर्वारौ महासत्वौ सतेजसौ। अयं तु युवयोभेंद: स जडात्मा पटुर्मवान्॥१८५॥ स एषं श्लेषरपत्वात् सम्लेष इति गृहताम्। साक्षेपद्च सहेतुञ्ञ दर्श्यते तद्पि हयम्॥१८६ ॥ सश्लेषव्यतिरेकमाह-त्वं समुद्रश्चेति। त्वं समुद्रश्च दुर्वारौ, त्वं दुर्वारो रोदुमशक्यः अपराजेय:, समुद्रब् दुर्वाः दुष्टमनास्वादं वा: वारि यस्य तादृशः, त्वं महासत्वः सामर्थ्या- तिशययुक्त, समुद्रश् महद्भि: सत्त्वैस्तिमित्ञिलप्रभृतिभिर्युतः, त्वं सतेजाः तेजस्वी, समुद्रश् तेजसा वडवानलेन सहितः, तदेवमुभाववि समानौ, अयं तु युवयोर्भेद: पार्थक्यं यत् सः सागरो जडात्मा जलमयः, भवान् पटुः चतुरः, अन्यधर्माणां श्लिष्टपदोपस्थापितानां साम्येऽ्पि जडात्मत्वपाठवाभ्यां भेदः ॥१८५॥ स एष इति। स एषः उपरिदर्शितो व्यतिरेक: श्लेषरूपत्वात् जडात्मा पटुः इति श्लिष्टपदेन वैधर्म्यप्रकाशनात् सश्लेवो नाम व्यतिरेकप्रभेद इति गृह्यताम् ज्ञायताम्। अन्यदपि मेददयमाह-साक्षेप इति। आन्षेपो विरुद्धधर्मोपन्यासेन सादृश्यप्रति- षेधः, सहेतुः-हेतुः पक्चम्यन्तपदरूपस्तत्कृतः, तदपि साक्षेपसहेतुरूपं भेदद्वयं दर्श्यत उक्ा- हियते ॥ १८६ ॥ हिन्दी-आप और सागर दोनों दुर्वार-अपराजेय एवं खारे पानीसे युक्त, महासत्व-अति- बलशाली एवं बड़े-बड़े प्राणियोंसे पूर्ण, सतेजस-तेजस्वी एवं बड़वानलरूप तेजसे युक्त हैं, आप दोनोंमें-समुद्र और आपमें-भेद इतना ही है कि वह सागर जड़ात्मा-जलमय (मूर्ख) है, आप पटु-चतुर हैं॥ १८५॥ यह श्लेषव्यतिरेक है क्योंकि इसमें 'स जडात्मा पटर्भवान्' इससे श्लेषद्वारा वैधर्म्यप्रतिपादन किया गया है। साधारण धर्भवाचक दुर्वारादिपदमें श्लेष है इसने इसे श्लेषव्यतिरेक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उन विशेषणोंसे तो सादृश्यबोध होता है, वैधर्म्यप्रतिपादनमें उनका कुछ उपयोग नहीं होता। इस वैध्म्यचमत्कृतिप्रधान व्यतिरेकालक्वारमें वध्म्यसूचक विशेषणोंके शलिष्ट होनेपर ही श्लेषव्यतिरेक मानना उचित है; यदि साधर्म्योपपादक विशेषणोंमें श्लेष होनेपर भी श्लेषव्यतिरेक मानने लगेंगे तब तो समी व्यतिरेकप्रभेदोंको श्लेषव्यतिरेक कहना पड़ेगा। इस प्रकार श्लेषव्यति- रेकका उदाहरण दिया गया। साक्षेप और सहेतु व्यतिरेकोंके भी उदाहरण दिये जा रहे हैं। साक्षेप- १. पृथक्त्बेन दशितौ। २. इयता। ३. एव। ४. दृश्यते।

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द्वितीय: परिच्छेद: १५३

व्यतिरेक वह है जिसमें आक्षेप-विरुद्धधर्मोपन्याससे सादृश्यप्रतिषेध होता हो और सहेतुव्यतिरेक वह है जिसमें पञ्चम्यन्त पदरूप हेतुसे वैधर्म्यप्रकाश कराके सादृश्यप्रतिषेध होता हो ॥१८६॥ स्थितिमानपि धीरोऽपि रज्नानामाकरोऽपि सन्। तव कंक्षां न यात्येव मलिनो मकरालयः।।१८७।। साक्षेपव्यतिरेक्रमुदाहरति-स्थितिमान अनुज्फितमर्याद: अपि, धीरः प्रशान्तः अपि, रत्नानाम् मणीनाम् आकरः उत्पत्तिस्थानम् सन्नपि भवनपि मकरालयः सागर: मलिन: नीलजलतया श्याम इति हेतोः तव कक्षाम् तुलनां नैव याति। अत्रोपमान- द्मूतसमुद्रगतेन मालिन्यरूपधर्मेण नृपसादृश्यान्तेपः, तेन नृपस्योत्कर्ष इति साक्षेपव्यति- रेकोऽयम्॥ १८७ ॥ हिन्दी-मकरालय स्थितिमान्-मर्यादायुक्त है, धीर-प्रश्नान्त है, रलोंकी खान है, फिरभी मलिन-नीलाभजलयुक्त होनेसे आपकी तुलना नहीं कर सकता है, यहाँ पर उपमानभूत समुद्रगत मालिन्यरूप धर्मसे नृपसादृश्यप्रतिषेध होता है और उससे नृपका उत्कर्ष सिद्ध होता है, अतः इसे साक्षेप-सप्रतिपेध-व्यतिरेक कहा गया है॥ १८७।। वहनपि मही कत्स्नां सरौलद्वीपसागराम्। भतृ भावान्दुजद्गानां शेषसवत्तो निकृष्यते ।। १८८ ॥ सहेतुव्यतिरेक्मुदाहरति-वहन्नपीति। शैलैः पर्वतैः द्वीपैः जम्बूद्वीपादिपदाभिलप्येः भूखण्डेः सागरैः समुद्रश्च सहिताम् सशलद्वीपसागराम् कृत्नाम् सकलां महीं पृथिवीं वहन् शिरसा धारयन्नपि शेष: शेषनागः त्वत्तः त्वदपेक्षया निकृष्यते भपकृष्टः सिद्धयति, तत्र हेतुमाह-मर्त्तृ भावादिति। भुजज्ञानां सर्पाणां जाराणाश्च भर्तृभावात् स्वामित्वात् इति। शेषः सर्वथा त्वत्सादृश्याहः सन्नपि भुजन्नायकत्वात् त्वदपेक्षया निकृष्ठत्वं याती- त्यथः। अत्र पश्चम्यन्तहेत्पस्थाप्यस्य धर्मस्य भुज्पतित्व( जारपतित्व)रूपस्योपमानापक- षहेतुत्वात् हेतुव्यतिरेकोऽयम् ॥ १८८ ॥ हिन्दी-पर्वत, द्वीप एवं समुद्रोंसे सहित इस समस्त पृथ्वीका वहन करता हुआ भी शेषनाग आपसे निकृष्ट है क्योंकि वह भुजन्ों (सपो, जारों) का नायक है, इसमें पश्चम्यन्त पदसे उपस्था- पित जारपतित्वरूप हेतु उपमानके अपकर्षको बताता है, अतः इसे हेतुव्यतिरेक कहते हैं ॥१८८॥

प्रतीयमानसाडश्योऽप्यस्ति सोऽ्यभिघीयते ।।१८९। शम्दोपादानेति । व्यतिरेकलक्षणनिरूपणावसरे-'शब्दोपाने प्रतीते वा सादश्ये' इत्युकतं, तेन शब्दोपात्तसादृश्यव्यतिरेकः प्रतीयमानसादृश्यव्यतिरेकश्चेति व्यतिरेकस्य भेदद्वयं पुरः स्फुरति, तयोः अयमीदृशः सम्प्रति यावदुदाहृतः शब्दोपादानसादृश्यः शब्दोपास- सादृश्यव्यतिरेकः, स चोक एव, प्रतीयमानसादृश्यव्यतिरेको नाम प्रभेदोऽपि अस्ति, सोऽप्यभिधीयतेऽनुपदमेवोध्यते इत्यर्थः ॥ १८९॥ हिन्दी-व्यतिरेकके लक्षणमें कहा था कि जहाँपर शब्दोपान्तसादृश्य या प्रतीतसादृश्य रहनेपर भेदकथन हो उसे व्यतिरेक कहते हैं, फलतः शब्दोपात्तसाट्टश्यव्यतिरेक, प्रतीयमान -- १. कक्ष्यां। २. अनुविधीय ।

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१४४ काव्यादर्श.

सादृश्यव्यनिरेक यह दो व्यतिरेकभेद दुए, उनमें शब्दरोपात्तसादृश्यव्यतिरेक इस तरहका है (जो कहा गया), प्रतीयमान सादृटश्यव्यतिरेकके उदाहरणादि बताये जा रहे हैं ॥ १८९ ॥ त्वम्मुखं कमलं चेति इयोरणयनयोर्मिदा। कमलं जलसंरोदि त्वन्मुखं त्वदुपाश्रयम् ॥। १९० ।। प्रतीयमानसादृश्यव्यतिरेकमुदाहरति-त्वम्मुखमिति। त्वन्मुखं कमर्लं चेति अनयो- दयोरपि भिदा भेद: अयमेव यन-कमलं जलसंरोहि पानीयप्रभवम्, त्वन्मुखं त्वदुपाश्रयम् त्वदाधारम्। श्रत्र जलं कमलस्याधारः सुखस्य च त्वम् इति विभिन्नाधारतया कविप्रसिद्धि- गतं कमलमुखयोः सादृश्यं निरस्यते, समानधर्मानुपादानात् प्रतीयमानमत्र सादृश्यमिति बोध्यम्॥१९०॥ हिन्दी-तुम्हारे मुख तथा कमलमें केवल यही अन्तर है कि तुम्हारे मुखके आश्रय तम हो, और कमल पानीमें पैदा हुआ है, उसका आश्रय पानी है। यहाँपर आश्रयभेद बताकर मुख तथा कमलके सादृश्यका प्रतिषेध किया गया है। समान धर्मके अनुपादानसे इसे प्रनीयमान सादृश्य कहा गया है॥ १९० ।। अभ्रविलासमस्पृष्ट'मदरागं मृगेक्षणम्। इदं तु नयनद्वन्द्वं तव तद्गुणभूषितम् ॥१९१॥ प्रतीयमानसादृश्यव्यति रेकस्यापरमुदाहरणमाह-अभ्रूविलासमिति। मृगेक्षणम् हरिणनेत्रम् अभ्रूविलासम् भ्रूविलासानभिज्ञम्, अस्पृष्टमदरागं मदिरापानोपजातरक्तिमर- हितश्व, तव त्विदं पुरो दृश्यमानं नयनद्वन्द्वम् तद्गुणभूषितम् ताभ्यां भ्रूविलासमदरागनाम- काम्यां गुणाभ्यां भूषितं युक्तम् अस्तीति शेषः। पूर्वोदाहरणे समानवर्मानुपादानमत्र त विरुद्रधर्मोपादानमिति भेदः ॥ १९१॥ हिन्दी-हरिणोंके नयन भ्रुविलाससे अपरिचित तथा मदिरापानोपजान रक्त्तासे रहित हुआ करने हैं- परन्तु आपकी यह आंखें उन गुगोंसे-भ्रविलासपरिचय और मदिरापानजन्य रक्त्ततासे भूषित हैं ॥ १९१ ॥ पूर्वस्मिन् भेदमात्रोक्तिरस्मिन्नाधिक्यदर्शनम्। सहशव्यतिरेकश्च पुनरण्य: प्रदश्यंते ॥ १९२॥ उदाहरणद्वयदानमुपपादयति-पूर्वस्मिन्निति। पूर्वस्मिन् प्रथममुदाहृने-'त्वन्मुखं कमलख' त्यादुदाहरणे भेदमात्रोक्ति: उपमानोपमेययोः कमलमुखयोर्भेंदकस्याधारभिन्नता- रूपस्य धममात्रस्योक्ति:, नतु उत्कर्षस्यापकर्षस्य वोकि:, अस्मिन्ननन्तरोक्तं तूदाहरणे- 'अभ्रविलास'मित्यत्र आधिक्यस्योपमानोपमेययोनिकर्षोत्कर्षरूपस्य दर्शनम्, अत्रेदं बोध्यम्, भेदो द्विधा भवति-विरुद्धधर्माध्यासेन कारणभेदेन च, तत्र पूर्वोदाहरणे कारणभेदकतो भेद:, अत्र च विरुद्धधर्माध्यास इति। अन्यक्ष प्रोक्तद्वितयविलक्षणः सदृशव्यतिरेकः प्रदर्श्यते उदाहियते॥ १९२ ॥ हिन्दी-'तवन्मुखं कमलं च' इस प्रथम उदाहरणमें भेदमात्र-उपमान-उपमेयभूत कमल और मुखमें भेद करने वाले आधारभेद रूप धर्ममात्रकी उत्ति है, उत्कर्षापकर्षकी उक्ति नहीं है,

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द्वितीय: परिच्छेद: १४४

'अभ्रूविलासम्' इस उदाहरणमें आधिक्य-उपमान-उपमेयके निकृष्टत्व-उत्कृष्टत्वका कथन है। यहाँ यह जानना है कि भेदके दो प्रकार भगवान् शक्कराचार्यने बताये हैं-विरुद्धवर्माध्यास और कारणमेद, उनमें पूर्वोदाहरणमें कारणभेदकृत भेद है, और इस दूसरेमें विरुद्धधर्माध्यास- कृत भेद है। इसी बातको स्पष्ट करनेके लिये आचार्य दण्हीने प्रतीयमान सादृश्यव्यतिरेकके दो उदाहरण दिये हैं॥१९२॥ त्वन्मुखं पुण्डरीकं च फुल्ले सुरभिगन्धिनी। भ्रमदूंख्मरमम्भोजं' लोलनेत्रं मुखंतुर ते ॥ १९३॥ सदृशव्यतिनेकश् पुनरन्यः प्रदर्श्यत इति प्रतिज्ञातं, तत्र शाब्दं सदृशव्यतिरेकमुदा- हरति-त्वन्मुखमति। त्वन्मुखं कमलश्व फुल्ले विकसिते, एकत्र विकास: स्मित- शोभिताऽन्यत्र दलविदलनम्, तथा सुरभिगन्धिनी घ्राणतर्पणगन्धयुते। अत्र फुल्लत्व- सुरभिगन्धित्वयोः साधारण्येन सादृश्यं शाब्दम्। व्यतिरेकमाह-स्रमदिति। अम्भोर्ज कमलम् भ्रमद्ध्रमरम्, ते तव मुखं तु लोलनेत्रं विलासचपलनयनयुतम्। अत्र सदृशाभ्या- मेव भ्रमरनयनाभ्यां मुखक्मलयोत्र्यतिरेकः प्रकाश्यते इति सदशव्यतिरेकोऽयम् ॥१९३॥ हिन्दी-तुन्हारा मुख और कमल विकसित तथा सुगन्धिपूर्ण है, अन्तर इतना ही है कि तुम्हारा नुख चञ्चल नयनचुक्त है और कमल चपलभ्रमरयुक्त है। इसमें फुल्लत्व सुरभिगन्धत्व मुख तथा कमलनें समान है अतः सादृश्य शाब्द है। यहाँ समानभूत भ्रमर नयनसे ही कमल और मुखनें नेद किया गया है इसीसे इसे सदृशव्यतिरेक कहा गया है ॥ १९३ ॥ चन्द्रोऽयमम्बरोत्तंसो हंसोऽयं तोयभूषणम्। नभो नक्षत्रमालादमुत्फुल्लकुमुद पयः ॥१९४ ॥ आर्थ सदृशव्यतिरेकमुदाहरति-चन्द्रोऽयमिति। अयं चन्द्र:अम्बरोसंसः आकाश- भूषणम्, अयं हंस: तोयभूषणम् जलाशयशोभासम्पादकः। इदं नभो व्योम नक्षत्रमालि तारागणमण्डितम् इदं पयः उत्फुल्लकुमुर्द विकसितकुसुमसनाथम्। अत्र चन्द्रहंसयो- राकाशपयसोश्चोपमानोपमेयभूतयोः सादृश्यमार्थमति सदृशव्यतिरेकोऽयमार्थः ॥१९४॥ हिन्दी-यह चन्द्रमा आकाशका अलक्गार है, यह इंस जलाशयका भूषण है। आकाश तारागणसे मण्डित है और जल विकसित कुमुदपुष्पसे भूषित है। इस उदाहरणमें हंस चन्द्रमा और जल- आकाशरूप उपमेय और उपमानका सादृश्य आर्थ है अतः यह आर्थ सदृशव्यतिरेक हुआ ॥१९४॥ प्रतीयमानशौक्ल्यादिसाम्ययोर्वियदम्भसोः। कृत: प्रतीतशुद्धयोश्च भेदोऽस्मिश्रनद्रहंसयोः"।। १९५। पूर्वोक्तमुदाहरणद्वयं स्पष्टयति-प्रतीयमानेति। अत्र 'चन्द्रोऽय' मित्यादि पूर्वश्लो के प्रतीयमानम् वाचकशब्दाभावेन वर्णनानुरोधवशात् कथशिदुन्नीयमानम् शौक्ल्यादि शुक्क त्वनिर्मलत्वादि तेन साम्यं ययोस्तादृशयोवियदम्भसोः, प्रतीतशुद्धथोः ख्यातघावल्ययोबन्द्र- हंसयोक्ष भेद: कृतः प्रथमस्थले अम्बरतोयाभ्याम, अपरत्र च नक्षत्रकुमुदाभ्यां सादृरय- निषेधः कृतः ॥१९५॥ हिन्दी-'चन्द्रोडयमम्बरोत्तंसः' इस पूर्वोक्त उदाहरणमें आकाश-जलका, एवं चन्द्र-इंसका व्यतिरेक है, उसमें आकाश-जलका साम्य शुकत्व निर्मलत्वादि शब्दप्रतिपाद नहीं है कल्पनीय

10 १. लोलदृष्टि। २. च । ३. इदमुत्कुमुदं। ४. सौक्ष्म्यादि। ५. इंसचन्द्रयोः । १० का०

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१४६ काव्यादर्श:

है, किन्तु चन्द्रमा और हंसका साम्य प्रतोत है-धतलतया साम्य सर्वविदित है। इन दोनों स्थानोंमें प्रथममें अम्वर त्तोयसे और द्वितीय में नक्षत्र-कुमुदसे सादृश्यनिषेध हुआ है, उनका सादृश्य स्फुट है अतः यह सदृशव्यतिरेक ही है॥ १९५॥ पूर्वत्र शष्द्वत् साम्यमुभयत्रापि भेवकम्। भृग्गनेत्रादितुल्यं तत् सहशव्यतिरेकता ॥१९६ ॥ पूर्वत्र 'त्वन्मुखं पुण्डरीकं च' इति पूर्वोक्तोदाहरणे शब्दवत् समानधर्मवाच कशब्दो- पस्थापितं साम्यं फुल्लत्वादि अरस्ति। उभयत्र शब्दोशत्तप्रतीयमानसादृश्योदाहरगद्वये-भेदकं वैधर्म्यप्रतिपादकम् भृग्न- नेत्रादि (अम्बरतोयनक्षत्रकुमुदानि चादिपदबोध्यानि ) तुन्यम् समानम् (भिनशब्द- प्रतिपादनेन भिन्नत्वावभासेऽपि वस्तुत एकस्वरूपम्) तन अ्रस्य उदाहरणद्वयस्यापि सह- राव्यतिरेकता बोभ्या ॥। १९६ ।। हिन्दी-'तवन्मुखं पुण्डरीकं च' इस पूर्वोक्त उदाहरणमें साम्य फुल्लत्वादि शब्दवत् समान- धर्मवाचक शब्द्रोपस्थापित है। शब्दोपात्त सादृश्यव्यतिरेक और प्रतीयमान सादृश्यव्यतिरेक नामक प्रभेदोंके पूर्वोक्त दोनों उदाहरगोंमें नेदक-वैधर्म्यप्रतिपादक भृक्गनेत्र अम्बरतोय नक्षत्रकुमुद समान है-मिन्नशब्दद्वारा कहे जानेपर मिन्न मले लगते हों किन्तु उनमें समता ही है, अतः दोनों ही उदाहरणोंमें सदृशव्यतिरेक है॥ १९६ ॥। अरत्नालोकसंहार्यमहार्य सूर्यरश्मिभिः। दृष्टिरोघकरं यूनां यौवनप्रभवं तमः ॥१९६॥ संजानिष्य तिरेकोडयं नमोजातेरिदग्तमः। दष्टिरोधितया तुल्यं भिन्नमन्यैरदर्शि यत् ॥१९८।। (इति व्यतिरेकचक्रम्) सजातिव्यतिरेकमाह-अरत्नालोकेति। रत्नालोकैः मणिकरिरणैः संहार्यम् अपनेयं न भवतीत्यरत्नालोकसंहार्यम्, सूर्यरश्मिमिः सूर्यकिरणैः (अपि) अहार्यम् अविनाश्यम्, यूनां युवजनानाम् दृष्टिरोधकरं कर्तव्यदर्शनशक्तिहरम् यौवनप्रभवं तमो भवतीति शेष:, योवनोत्पन्नेन तमसा अन्धकारेण मोहेन युवानो विवेकविधुराः क्रियन्ते, तेषां च तत्तमो न रत्नप्रभाभिर्दूरीकत शक्यं न सूर्यरश्मिभिरपनेयं भवतीति भावः। अत्र यौवनतमो- इन्धकारयोरद्ृष्टिरोधकत्वं साम्यम्। तथ शाब्दम्। उपमेयमात्रगतं रत्नकिरणाद्यनाश्यत्वं य भेदकम् ।। १६७ ॥ उदाहरणं सज्जमयति-सजातिव्यतिरेक इति। यतः दृष्टिरोधितया दक्शकिप्रति- बन्धकतया इदं योवनप्रभवं तमः तमोजातेः तुल्यम् समम्, तत् तमः अन्यैररत्नालोक- संहार्यत्वादिभिर्ध मैं: भिन्नम् उत्कर्षवत् शदर्शि निबद्धमतोऽयं सजातिव्यतिरेको नाम ॥१९८॥ हिन्दी-युवकोंकी सदसद्विवेक बुद्धिरूप दृष्टिको हर लेनेवाला यौवनमें प्रकट होनेवाला तम मोह-अन्धकार न रत्नकी प्रभासे दूर होता है, न सूर्यकी किरणोंसे नष्ट होता है। १९७ । १. अवायं। २. स्त्रजाति।

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द्वितीय: परिच्छेद: १४०

दृक्शक्तिप्रतिबन्धकतया यह यौवनप्रभव तम तमोजाति के समान है, उसे ही अरतालोक संहार्यत्वादि धर्मोंसे उत्कृष्ट दिखलाया गया है, अतः यह संजातिव्यतिरेक है॥ १९८ ॥ प्रसिद्धिहेतुष्यावृत्त्या यत् किश्चित् कारणान्तरम्। वत्र स्वाभाविकत्वं वा विभाष्यं सा विभावना।। १९९।। क्रमप्राप्तं विभावनालक्कारं लक्षयति-प्रसिद्धेति। प्रसिद्धस्य लोकविदितस्य हेतोः कारणस्य व्यातृतत्या अभावप्रदर्शनेन यत्किश्चित् किमपि कविकल्पितं कारणान्तरं विभाव्यं फलान्यथानुपपत्त्या मन्तव्यं तन, स्वाभाविकत्वं कस्यापि कारणस्याननुसन्धाने सति कार्यस्य स्वभावसिद्धत्वं वा विभाव्यं सा विभावना नामालक्ारः।१९९॥ हिन्दी-जहाँ पर प्रसिद्ध कारणका अभाव बताकर कुछ कविकल्पित कारणका अनुसन्धान किया जाय, अथवा किसी भी कारणके नहीं श्ञायमान होनेसे कार्यके स्वाभाविकस्वका अन्दाज किया जाय, उसे विभावना नामक अलक्कार कडा जाता है। प्रसिद्ध हेतुके अभावको बताकर अप्रसिद्ध कविकल्पित कारणान्तर अथवा सर्वथा कारणाभावमें कार्यके स्वाभाविकत्व की भावना ही विभावना है, इस तरहकी परिभाषामें विभावना पदका भी सामजस्य रहता है। काव्यप्रकाशकार तथा उनके अनुयायियोंने-'क्रियायाः प्रतिषेधेऽ्रपि फलव्यक्तिविभावना' यह लक्षण कहा है, इस तरह के लक्षणमें विभावना पदका सामजस्य नहीं है॥ १९९ H

अप्रसादित शुद्धाम्बु जगदासीन्मनोहरम्॥। २०० ॥ कारणान्तरविभावनामाह-अपीतेति। अपीताः अकतमद्यपाना अपि क्षीवाः मत्ताः कादम्बा हंसा यत्र तादृशम्, असंमृष्टम अप्रक्षालितम् अपि अमलम् निरत्रतया स्वच्छम् अम्बरम् यत्र तादृशम्, अपि च अप्रसादितम् कतकादिनिर्मलीकरणद्रव्यद्वारा अशो- वितिम् अपि शुद्धम् अम्बु जलं यत्र तादशम् जगत् मनोहरम् आसीत्। अत्र कादम्बक्षी- बत्वाम्बरामलत्व जलप्रसादितत्वानां मद्यपानसम्माजनप्रसादनानि प्रसिद्धानि कारणानि, तानि नञा व्यावत्तितानि, तेषामभावेऽपि तादृशफलोत्पत्ति: किमपि कारणमपेक्षेतव, तदि- भावनाच शरद्रपं कारणान्तरं कल्पयति विभावयति, तथ विभाव्यमानं शरद्रूप कारणम- त्रार्थमेव शब्दानिवेदितत्वात् ॥ २००॥ हिन्दी-जिसमें विना मद्यपान किये ही हंसगण मत्त हो रहे हैं, जिसमें बिना साफ किये ही आकाश स्वच्छ हो रहा है और जिसमें निर्मली आदि साफ करनेवाली वस्तुयें डालकर स्वच्छ नहीं करने पर भी पानी शुद्ध हो रहा है, ऐसा (शरत्कालिक) नगत् मनोहर हो रहा था। इस उदाहरणमें मत्तता, निर्मलता और शुद्धताके कारण मद्यपान, संार्जन और प्रसादनके अभावमें भी उन कार्योंकी उत्पत्ति होती है, कार्य-कारण तो होना चाहिये, अतः शरव रूप कारण की विभावना-कल्पना की जाती है, यही कारणं है कि इसे विभावनाडलंकार कहा जाता है॥२००। अनजितासिता डष्टिर्भूरनावर्जिता नता। १अरखितोSरुणश्चायमधरस्तव सुम्दरि॥ २०१॥ उदाहरणान्तरमाह-अनजितेति। हे सुन्दरि, तब दृष्टिः अनजिता भनाकलित- कज्जला अपि असिता श्यामा, तव भ्रूः अनावर्जिता अनाकृष्टा भपि नता बकीभूता, १. अरज्ञितारुणः ।

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१४८ काव्यादर्श:

तव अयम् श्धरथ अरजित: रजनद्रव्येणारक्तोकृतोऽपि अरुणः रक्तकान्तिः, सर्वत्रास्तीति- पदमष्याहृत्यान्वयः । अत्रासितत्वनतत्वरूपाणि कार्याणि अरजञनावर्जनरञञनस्वरूपैः प्रसिद्धैः हेतुभिर्विना दर्शितानि, स्वाभाविक्त्वं व्यजयन्ति ॥२०१॥ हिन्दी-हे सुन्दरि, काजल नहीं लगानेपर भी तुम्हारी आँखें काली हैं, आकृष्ट नहों होने पर भी तुम्हारी भ्रुकुटियों नत हैं और बिना रंगे भी यह तुम्हारा अधर रक्तवर्ण है। इस उदाहरणमें कालापन, नतत्व और लालीके प्रसिद्ध कारण अंजन लगाना, आकृष्ट करना और रंगना निषिद्ध कर दिये गये हैं, इससे उन कार्योंकी स्वाभाविकता विभावित होती है। इसको स्वाभाविक विभावना कहते हैं। विभावनाके लक्षणमें दण्डीने-'कारणान्तरं स्वाभाविकत्वं वा विभाव्यते' कहा है, तदनुसार ही उदाहरण भी प्रस्तुत किये हैं, 'अपीतक्षीव' यह कारणान्तर विभावनाका उदाहरण है और 'अनजितासिता' यह स्वाभाविक विभावनाका उदाहरण है॥२०१॥ यदपीतादिजन्य' स्यात् क्षीबत्वाद्न्यहेतुजम्। अहेतुकं च तम्येह विवक्षेत्यविरुद्धता॥२०२॥ विभावनाया उदाहरणद्वयं प्रदर्शितं, सम्प्रति तत्सज्गतिमाह-यदपीतेति। पूर्वोदा- हरणे 'अपीतक्षीबकादम्बम्' इत्यत्र अपीतादिजन्यम् पानादयजन्यम् क्षीबत्वादि अन्यहेतु- जम् शरत्कालरूपकारणान्तरजन्यम्, द्वितीयोदाहरणे 'अनज्ञिनासिता' इत्यत्र अज्नाद- जन्यम् असितत्वादि अहेतुकं स्वभावजम्, एवमुदाहरणद्वये तस्य अन्यहेतुजत्वस्य अहेतुकत्वस्य च विवक्षा, अतः अविरुद्धता विरोधाभावः। अयं भावः अत्रोभयत्रापि विभावनोदाहरणतयोपस्थापिते पद्य अपाने मत्तता अनअनेऽसितत्वमुच्यते, न चेदं सम्भवति मतततारूपं कार्य प्रति पानम्यासितत्वरूपं च कार्य प्रति कज्जलाकलनस्य च कारणत्वेनाभ्युपगतेः, कारणाभाे कार्य कथमिव जायते, तथा सति सर्वत्र सर्ववस्तुप्रसप्गः, इमामेवाशङ्कां मनसिकृत्याचार्यः परिहारमाहात्र। पूर्वोदाहरणे क्षीबत्वं पानाजन्यमपि शरत्कालजन्यमिति कारणान्तरं विभाव्यत एव, परत्र चोदाहरणेऽहेतुकत्वेनोच्यमानं स्वभावजमिति विभाव्यते, तथा च स्वभाव एव तत्र कारणमिति द्वयोरपि स्थलयोः कारणजन्यमेव कार्य न तद्विरुद्धमिति नास्ति कोऽपि सिद्धान्तविरोध इति ॥ २०२ ॥ हिन्दी-विभावनाके दो उदाहरण दिये गये हैं, उनके विषयमें यह शक्का की जाती है कि 'अपीतक्षीबकादम्बम्' इसमें अपीतादिजन्य-पानाद्यजन्य क्षीवता कैसे होगी, क्योंकि कारणके बिना कार्य कैसे होगा ? इसका उत्तर यह है कि पानरूप प्रसिद्ध हेतुका निषेध करके भी उसे अन्यहेतुक शरत् रूप कारणान्तरजन्य कहा जाता है, इस अवस्थामें वह बिना कारणका कार्य कैसे हुआ। जो कारण दूसरे लोग कहते हैं कवि उसका प्रतिषेध करके चमत्कारी कारणोपन्यास करता है, वह वैसा ही कहना चाहता है, फिर इसमें अकारणे कार्यरूप शास्त्रसिद्धान्तका विरोध कहाँ है? दूसरे उदाहरणमें 'अनजिताऽसिता दृष्टिः' में असितत्वके कारण अंजनका प्रतिषेध करके असितत्वको अहेतुक कहा है, अहेतुक-स्वाभाविक। यहाँ का असितत्वरूप कार्य कारणके बिना ही नहीं हो गया है, वह स्वभाव रूप अलौकिक कारणसे जन्य बताया गया है, अतः यहाँ भी कारणाभावशाली शक्का नहीं उठती, 'अपीतादिजन्यम् यत् क्षीबत्वादि (तत्) अन्यहेतुजं

१. पीत्यादि जन्म।

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द्वितीय: परिच्छेद: १४६

स्यात् अहेतुक च स्यात्, तस्य (अन्यहेतुजत्वस्य अहेतुकत्वस्य च) हह विवक्षा, इति अविरुद्धता' इस तरह अन्वय करके अर्थ करना चाहिये॥ २०२॥ वक्त्रं निसर्गसुरभि वपुरब्याजसुम्दरम्। अकारणरिपुश्चन्द्रो निर्निमित्तासुहत् स्मरः॥ २०३ ॥ निसर्गादिपदैरत्र हेतु: साक्षान्निवर्तितः । उक्तं च सुरभित्वादि फलं तॅत्सा विभावना॥ २०४॥। (इति विभावनाचक्रम्) शब्दं स्वाभाविकं विभावनाभेदमुदाहरति-वक्त्रमिति। वक्तं मुखं निसर्गसुरमि स्वाभाविकसौरभशालि, वपुः शरीरम् अव्याजसुन्दरम् निष्कपटरमणीयम्, चन्द्र: अका- रणरिपुः अहेतुकः शत्रु:, स्मरः निर्निमित्तामुहृत् अकारणशत्रुः अस्तीति शेषः ॥। २०३ ॥ उदाहरणं योजयति-निसर्गादीति। अत्र प्रदर्शितोदाहरणे निसर्गादिपदैः निसर्गा- व्याजाकारणनिर्निमित्तशब्द: हेतु: तत्र तत्र कारणतया मताः हेतवः कर्पूरभूषाधारण- मात्सर्यादय: साक्षान्निवर्त्तितः स्फुटं प्रतिषिद्धः, तत्सम्पार्द च सौरभसौन्दर्यशत्रुत्वादिक- मुक्तम्, तत् तस्मादियं विभावना ॥ २०४॥ हिन्दी-मुख स्वभावतः सुगन्धियुक्त है (कर्पूरधारणसे सुगन्धित नहीं है). शरीर अकृत्निम सौन्दर्ययुक्त है (भूषण धारण करके सुन्दर नहीं हुआ है), चन्द्रमा स्वाभाविक शत्रु है (किसी कारणसे शत्रुता नहीं हुई है), इसी तरह कामदेव भी बिना कारणके शत्रु हो रहा है॥ २०३।। इस उदाहर गर्मे निसग, अव्याज, अकारण और निनिमित्त शब्दोंसे सौरभ, सौन्दर्य और शत्रुताके कारणोंका, कर्पूरधारण, भूषणग्रहण, मत्सरिता आदिका, व्यावर्त्तन कर दिया गया है परन्तु उनके कार्य सौरभ, सौन्दर्य और शत्रुतादि कहे गये हैं अतः यहाँ विभावना है। इसमें स्वाभाविकत्व शाब्द है, पहले वाले 'अनजितासिता' इसमें स्वाभाविकत्व अर्थवललम्य है, इसी भेदको स्पष्ट करने के लिए यह पुनः उदाहरण दिया गया है॥ २०४॥ वस्तु किञ्चिदभिप्रेत्य तत्तुल्यस्यान्यवस्तुनः। उक्तिः "संक्षेपरूपत्वात् सा समासोक्तिरिष्यते॥ २०५॥ क्रमप्राप्तां समासोक्तिं लक्षयति-वस्तु किश्चिदिति। किश्चित् प्रस्तुतमप्रस्तुतं वा वस्तु अभिप्रेत्य विनैव वाग््यापारं प्रतिपादयितुमभिलष्य तत्तुल्यस्य प्रतिपादयितुमभिल षितेन वस्तुना सदृशस्य कस्यचित् वस्तुनः प्रस्तुतस्य अप्रस्तुतस्य वा वस्तुनः उकति: समासोक्ति:, तादृशनामकरणे कारणं निर्दशति-संक्षेपरूपत्वादिति। एकस्याभिधानेन द्वयोरभिधानं संच्ेप:, संच्ेपः समास इति चानर्थान्तरम्। तथा च प्रस्तुताप्रस्तुतयोरन्य- तारस्य प्रयोगेण तदन्यस्य प्रतीतिः समासोक्तिरिति लक्षणं फलितम् । एकस्य प्रस्तुताप्रस्तुतयोरन्यतरस्य शब्देनाभिधानेऽन्यस्य जायमानोऽशान्दो बोधथम- त्कारविशेषं जनयति, तदेवास्या अलङ्कारतायां निदानम् ॥२०५॥ हिन्दी-किसी प्रस्तुत या अप्रस्तुत वस्तुकी अभिलाषा करके, बिना शब्दव्यापारके ही कहनेकी इच्छाका विषय बनाकर, तत्सदृश कथनीयतया अभिलषितार्थसमान किसी प्रस्तुत या अप्रस्तुतकी उक्तिको समासोक्ति नामक अलक्कार कहते हैं, इसमें संक्षेपेण उक्ति रहती है-अर्थात् एकके कथनसे दो समझे जाते हैं अतः इसे समासोक्ति नामसे व्यवहत किया जाता है। एक १. रत्यन्त। २. सुहृत् स मे। ३. सुरभीत्यादि। ४. तस्मातू। ५. संबिर्स।

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१५० काव्यादर्श:

वाक्यमें-प्रस्तुत-अप्रस्तुत दोनोंमें से एकके कथनसे तदन्यकी प्रतीतिको समासोक्ति कहते हैं। एक अर्थके शब्दप्रतिपादित रहने पर दूसरा अर्थ यदि प्रतीत होता है तो एक प्रकारका वैचित्र्य उत्पन्न होता है, वही वैचित्र्य इस अलक्गारका बीज है। समासोक्ति प्राबीन अकङ्गारोमेंसे है, भामइने इसका लक्षण कहा है :- 'प्रकृतार्थेन वाक्येन तत्समानविशेषणैः । अप्रस्तुतार्थकथनं समासोक्तिः ॥' (काव्यालक्कारसारसंग्रह २.१०.) इसका अभिप्राय यह है कि समान विशेषणके साम्थ्यसे प्रकृतपरक वाक्यद्वारा अप्रकृत अर्थके अभिधानको समासोक्ति कहा जाता है। राजानक रुय्यकने अलक्गारसर्वस्वमें- 'विशेषणानां साम्यादप्रस्तुतस्य गम्यत्वे समासोक्तिः ।' ऐसा लक्षण कहा है, इसी लक्षणके पदचिहोंपर चलकर मम्मटने कहा है :- 'परोक्तिभेंदकैः शलिष्टैः समासोक्तिः' मम्मटने स्पष्ट कर दिया है कि विशेषणसाम्यमें ही समासोक्तिका जीवन निहित है, विशेष्य- साम्यकी अपेक्षा नहीं की जाती है। भोजराजने कुछ,दूसरा ही लक्षण प्रस्तुत किया है :- 'यत्रोपमानादेवैतत् उपमेयं प्रतीयते। अतिप्रसिद्धेस्तामाछु: समासोक्ति मनीषिणः ।' साहित्यदर्पणकारने- समासोक्ति: समैयंत्र कार्यलिङ्गविशेषणैः । व्यवहारसमारोपः प्रस्तुतेऽन्यस्य वस्तुनः ॥' यह लक्षण कडकर समासोक्तिका क्षेत्र बढ़ा दिया है॥ २०५॥ पिवन्मधु यथाकामं भ्रमरः फुल्लपङ्कजे। अप्यसन्नद्धसीरभ्यं पश्य चुम्बति कुड्मलम् ॥ २०६॥ समासोक्तिमुदाहरति-पिबन्निति। भ्रमरः फुल्लपङ्कजे विकसिते कमले यथाकामं यथेच्छं मधु पुष्परसं पिबन् असभद्धसौरभ्यं कालप्रतीक्षयाऽनुरजातसुगन्धम् यु.ड्मलम् कलिकां चुम्बति, इति पश्य। वाश्यार्थः कर्म ॥ २०६ ॥ हिन्दी-विकसित कमलमें यथारूचि मकरन्द पान करनेवाला यह भ्रमर कालकी प्रतीक्षासे अनुत्पभ्नगन्ध इस कलीको चूम रहा है। इस बातको देखिये॥ २०६ ॥। इति प्रोडाकनाबद्धरतिलीलस्य रागिणः। कस्यांशिदिह्ट वालायामिच्छावृत्तिर्विभाव्यते ॥। २०७।। उदाहरणं योजयति-इतीति। इति अतोदाहरणे प्रौढाअनाबद्धरतिलीलस्य प्रौढ़- वनितानुरकस्य कस्यचित् रागिण: कामिनः कस्यांचित् बालायाम् अज्ञातंयोवनायाम् इच्छावृत्ति: सुरताभिलाषोदयो विभाव्यते प्रतीयते। अत्राप्रस्तुतभ्रमरवृत्तान्तेन प्रोढाजना- रतिशालिन: कामुकस्य बालासुरतासत्तिस्समासोक्त्या प्रतीयते। अत्र कार्यसाम्यं प्रत्यायनबीजम् ॥२०७ ॥ हिन्दी-इस उदाइरणमें प्रौढ़वनिताके साथ यथेच्छ रतिक्रीड़ा करते हुए किसी कामुककी जवातयौवना किसी बालवनिताके साथ सुरतकी इच्छा प्रतीत होती है। यहाँ पर अप्रस्तुत भ्रमर रचान्वसे अप्रस्तुत नायकवत्तान्तकी प्रतीति होती है। यह कार्य साम्यमूलक समासोक्ति है॥२०७। विशेष्यमात्रमिआ्नापि तुल्याकारविशेषणा। अस्त्यसावपराध्यस्ति मिन्नाभिन्नविशेषणा ॥ २०८ ॥

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द्वितीय: परिच्छ्ेद: १५१

समासोके: प्रभेदं विशदयति-विशेष्येति। तुल्याकारविशेषण श्लेषादिना प्रस्तुता- प्रस्तुतोभयगामिविशेषणा विशेष्यमात्रभिन्ना श्लेषाभावेन यत्र विशेष्यमात्र नोभयपर्यव सायि किन्त्वेकार्थबोधकं तादृशी, असौ एतादृशी समासोफतिरस्ति, अपरापि भिन्नाभिन्न विशेषणा यत्रांशे न श्लेषस्तत्र भिल्नविशेषणा यत्र च श्लेषस्तत्राभिन्नविशेषणा, तदुभयो- रेकत्र समावेशे भिन्नाभिन्नविशेषणाऽपि समासोक्तिरस्ति। अयमाशय :- समासोक्र्भेंद- द्वयमस्ति, एक :- यत्र विशेषणानि श्लेषेणोभयाथबोधकानि केवलं विशेषणं न श्लिष्टमिति तदेकार्थम्। अन्यक्ष यत्र कतिचनविशेषणानि श्लेषेणाभिन्ञानि, कतिचिन्व श्लेषाभावेन भिन्नानि। तदिदं भेदद्वयमपि पुर उदाहरणप्रसस्े स्फुटीभविष्यति॥२०८॥ हिन्दी-समासोक्तिके दो प्रकार हैं, एक वह जिसमें विशेष्यवाचक पद अश्लिष्य माण होता है अतएव विशेष्यभिन्न एकार्थवाचक होता है और विशेषणवाचक पदोंमें श्लेषके होनेसे विशेषणतुल्या- कार उभयार्थक हों, दूसरा प्रभेद वह होता है जिसमें कुछ विशेषण तो श्लेष नहीं होनेसे भिन्न होते हैं और कुछ विशेषण श्लिष्टपदोपस्थाप्य होनेसे अभिन्न होते हैं। इनमें प्रथम प्रभेद विशेष्य- मात्रभिन्ना और दूसरा प्रभेद भिन्नाभिन्नविशेषणा कहलाती है। इन प्रभेदोंमें श्लेषशब्दसे शब्दश्लेष और अर्थश्लेष दोनों तरहके श्लेष लिये जाते हैं, शब्द- श्लेषमूलक विशेष्यमात्रभिन्ना तुल्याकारविशेषणा समासोक्ति का उदाहरण दण्डीने स्वयं दिया है, अर्थश्लेषमूलक तुल्याकारविशेषणा समासोक्तिका उदाहरण यह है- 'विलिखति कुचावुच्चैर्गाढं करोति कचग्रहं लिर्खात ललिते वक्त्रे पत्रावलीमसमअसाम्। क्षितिप खदिरः श्रोणीबिम्वाद्विकर्षति चांशुकं मरुभुवि हठाव्नश्यन्तीनां तवारिमृगीदृशाम्।' यहाँ पर कुचविलेखन, कचग्रहण आदि पदोंमें अर्थश्लेष द्वारा ही खदिर वृक्ष तथा हठ नायक दोनों में साधारण्य होता है, इसमें उन्हीं साधारण विशेषणोंसे इठ नायककी प्रतीति होती है। यह तुल्याकार विशेषणत्व औपम्यगर्भत्वमें और सारूप्यमें भी होता है, उनमें औपम्यगर्भका उदाहरण यह है- 'दन्तप्रभापुष्पचिता पाणिपल्लवशोभिनी। केशपाशालिवृन्देन सुवेशा हरिणेक्षणा।।' यहां पर नायिकावृत्तान्तसे लताकी परिस्फूति हुई है, अतः समासोक्ति है। नायिकापक्षमें 'दन्त- प्रभापुष्पाणीव' इत्यादि उपमितसमास होगा, और लतापक्षमें 'दन्तप्रभासदृशैः पुष्पैक्चिता' इस तरह समास किया जायगा। सारूप्यमें उदाहरण है :- 'पुरा यत्र स्रोतः पुलिनमधुना तत्र सरितां विपर्यासं यातो घनविरलभावः क्षितिरुहाम्। बहोर्दृष्टं कालादपरमिव मन्ये वनमिदं निवेशः शैलानां तदिदमिति बुद्धिं द्रढयति'॥ यहाँ पर सारूप्य द्वारा वनसे कुटुम्बियों को प्रतीति होती है॥ २०८।। रुढमूल: फलभरैः पुष्णभनिशमर्थिनः । साम्द्रच्छायो महावृक्ष: सोऽयमासादितो मया ॥ २०९॥ तुल्याकारविशेषणां समासोत्तिमाह-रूढमूल इति। रूढं प्रुद्धं मूलं शिफा मूलवनम यस्य तादृशः, फलभरैः नानाविधेः फलैः तथा वाञ्छितार्थलाभैः अनिशं सदा भर्थिनः याचकान् पुष्णन योजयन्, सान्द्रच्छायः घनच्छायः प्रसन्नकान्तिथ सोऽयं महावक्षो मयाSSसादितो लब्धः । अरत्र सर्वाण्यपि विशेषणानि श्लिष्टतया तुल्याकाराणि वृक्षमद्दा- पुरुषोभयगामीनि, केवलं महावृक्ष इति विशेष्यपदमेकार्थम्। अत्र वृक्षोक्त्या महापुरुषस्व प्रतीतिरिति समासोकिः ॥ ३०९॥

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१२२ काव्यादर्श:

हिन्दी-जिसका मूल (जढ़) बढ़ा हुआ है और जिसका मूलधन बहुत बढ़ा हुआ है, फल- राशिसे औौर वाष्छितार्थलामसे जो याचककोंकी तृप्ति करता है, जिसकी छाया बड़ी घनी है, और जिसकी वदनकान्ति प्रसन्न है, ऐसे महावृक्षको (महापुरुषको) मैंने प्राप्त कर लिया है। इसमें महावृक्षोक्तिसे महापुरुषकी प्रतीति है अतः यहाँ समासोक्ति अलक्गार हुआ, उसमें भी यहाँ समी विशेषण श्कष है अतः वृक्ष पुरुष दोनोंमें अन्वित होते हैं, केवल विशेष्य मिन्र है अश्लिष्ट है, अतः इस भेदको विशेष्यमात्रमिन्ना तुव्याकारविशेषणा समासोक्ति कहते हैं॥ २०९॥ अनल्पविट पामोगः फलपुष्पसमृद्धिमान्। 'सोच्छायः स्थर्यवान् दैवादेष लब्धो मया दुमः ॥ २१०॥ भिन्नाभिजविशेषणां समासोक्तिमुदाहरति-अनल्पेति। अनल्पः अधिको विटपानाम् शाखानाम् आभोगो विस्तारो यश्य तादृशः फलपुष्पसमृद्धिमान् फलैः पुष्पैक्च पूर्ण:, सोच्छ्राय: महोन्नतः स्थयवान् दृढमूलक्ष एषः महाद्रुमो मया दैवात् लब्धः। अत्र वृक्षस्य चत्मारि विशेषणानि, तेषु द्वे केवलं वृक्षगते इति भिन्ने, अन्तिमे च द्वे विशेषयो सोच्छाय: स्पैर्यवानिति च, उच्छायो विभूतिमर्वं स्थेर्यवान् दृढनिश्चय इत्यर्थेन महापुरुषेऽपि योजयितुं शक्येते, तेनेमे अभिन्ने एवश भिन्नाभिन्नविशेषणा समासोफ्तिरियम् ॥२१०॥ हिन्दी-जिसकी शाखाओंका विस्तार बहुत बड़ा है, जो फलपुष्पसे समृद्ध है, जो बहुत ऊँचा है, जिसकी जड़ दृढ़ है, ऐसे वृक्षको मैंने भाग्यवश प्राप्त कर लिया है। यहाँ पर वृक्षसे किसी महापुरुष की प्रतीति होती है, अतः यह समासोक्ति है। इस उदाहरणमें वृक्षके चार विशेषण हैं, जिनमें पहले दो विशेषण श्लेषासम्पृक्त होनेके कारण भिन्न हैं, सोच्छराय और स्थैर्यवान् यह दो विशेषण श्लिष है, महापुरुषपक्षमें इनका अर्थ उन्नतियुक्त तथा दृढ़निश्चय यह किया जाता है, अतः ये दोनों विशेषण अभिन्न हुए, इस प्रकारसे यह उदाहरण भिन्नाभिन्नविशेषण समासोक्ति का हुआ॥ २१०॥ उभयत्र पुमान् कश्विद् वृक्षत्वेनोपवणितः। सर्वे साधारणा धर्माः पूर्वभान्यत्र तु दयम् ॥ २११॥ उदाहरणद्वयगतं विशेषमाह-उभयत्रेति। अनन्तरोक्तं उदाहरणद्वये उभयत्र कश्चित् पुमान् वृक्षत्वेनोपवर्णितः पृक्षोपमानतया निर्दिष्टः, तयोः पूर्वत्र प्रथमे सर्वे रूढमूल- त्वादयो धर्मा: साधारणा: श्विष्टतयोभयान्वयिनः, अन्यत्र द्वितीय उदाहरणे तु (चतुर्षु विशेषणषु) द्वयम् अरन्तिमविशेषणद्वितयम् साधारणम् उभयनिष्ठम् अरत एव व प्रथमस्य तुल्याकारविशेषणतया चरमस्य च भिन्नाभिन्नविशेषणतया व्यपदेशः ।।२११। हिन्दी-ऊपर बताये गये दोनों उदाहरणोंमें-'दृढमूलः' इत्यादि तथा 'अनल्पविटपाभोगः' इत्यादिमें-किसी महापुरुषको वृक्षत्वेन स्तुत किया गया है, वृक्षका वर्णन करके किसी महापुरुषकी प्रतीति कराई गई है, यह दोनों समासोक्तिके उदाहरण हैं। इनमें पहले 'दुढमूलः' इत्यादि उदाहरणमें सभी विशेषण समान है। अर्थात् श्लिष्टतया वृक्ष और महापुरुष दोनों में अन्वित होते हैं, दूसरे उदाहरण-'अनल्पविटपाभोगः' में कथित चार विशेषणोंमें से केवळ दो ही-'सोच्छायः', 'स्थेर्यवान्' विशेषण श्लिष्ट होनेसे उंभयान्वयी हैं। यही कारण है कि पहला उदाहरण तुस्याकारविश्वेषण समासोक्ति का है, और दूसरा उदाहरण मिन्नामिन्नविशेषणा समासेकि का ॥। २११ ॥ १. सज्छानः।

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द्वितीय: परिच्छेद: १५२

निवृत्तव्यालसंसर्गो निसर्गमचुराशयः । अयमम्भोनिधि: कष्टं कालेन परिशुष्यति'॥।२१२।। इत्यपूर्वसमासोक्ति: पूर्वधमनिवर्त्तनात्। समुद्रेण' समानस्य पुंसो व्यापत्िसूचनात्।। २१३।। (इति समासोक्तिचक्रम्) अपूर्वसमासोक्तिमुदाहरति-निवृत्तेति। निवृत्तः दूरीभूतः व्यालानां सर्पाणां संसर्ग: सम्बन्धो यत्र तादृश: (सागरः ) खलानां संसर्ग इति च प्रतीयमाने पुरुषेऽर्थः, निसर्ग- मधुराणां जलानामाशयः आधार: (सागरः) निसर्गमधुरचित्तवृत्तिश् पुरुषः । एतादृशः अयम् (अद्भुततयाऽयू्वः ) अम्भोनिधि: सागरः कालेन समयक्रमेण (चमेन च) परिशुष्यति नाशं गमिष्यति। कष्टं दुःखप्रदमिदम्। अत्र सागरेणोक्तेन कक्षन महान्पुरुषः प्रत्याय्यते ॥ २१२ ॥ उदाहरणं योजयति-इतीति। इति सेयमुदाहता समासोक्तिः अपूर्वसमासोकिर्नाम, तत्र हेतुमाह-पूर्वधर्मनिवर्त्तनादित्यादिना। पूर्वयोः संसारे! समुद्रवर्त्तितया प्रसिद्धयोः व्यालसंसगक्षा रजलत्वयो: निवत्तनात् व्यालासंसष्टत्वमधुराशयत्वोक्त्या समुद्रो प्रसिद्धधर्म- विरुद्धधर्मयोर्निवेशनात्, निवृत्तव्यालत्वादिगुणैः समुद्रेण समानस्य पुंसो व्यापत्तिसूचनात् नाशस्य बोधनादियमपूर्वसमासोकतिः ॥२१३॥ हिन्दी-जो साँपोंके संसगसे रहित है, या दुर्जनसंसर्गसे रहित है, जिसमें स्वभावतः मधुर- रसवाले जल भरे हैं, या जिसकी मनोवृत्ति कोमल है, ऐसा वह जलनिधि (सत्पुरुष) कालके प्रभावसे (मृत्युसे ) सूख जायगा ( नष्ट हो जायगा) ॥ २१२ ॥ यह अपूर्वसमासोक्तिका उदाहरण है क्योंकि इसमें संसारप्रसिद्ध सागरधर्म सर्पयुक्तत्व और क्षारजलत्वका तिरस्कार करके (अपूर्वधर्मका आरोप करके) समुद्रसे सनता रखनेवाले सत्पुरु षके नाशकी प्रतीति कराई गई है॥ २१३ ।। विवक्षा या विशेषस्य लोकसीमातिवर्तिनी। असावतिशयोक्ति: स्यादलङ्कारोत्तमा यथा ॥ २१४॥ अतिशयोक्तिं लक्षयति-विवक्षेति। विशेषस्य प्रस्तुतवस्तुगतस्योत्कर्षस्य लोकसीमा- तिवत्तिनी लौकिकमर्यादातिक्रान्ता अद्भुतवर्णनानुगता विवक्षा-विवक्षया वर्णना साति- शयोक्तिर्नाम। प्रस्तुतस्य विशेषस्यातिबलं वर्णनमतिशयोक्तिरित्यर्थः। सा चैयमतिशयोक्ति- रलद्कारोत्तमा, वैचित्यमूलकेष्वलङ्कारेषु अतिवेलवर्णनमेव प्रायशो बीजभूतं तदेवात्र प्रधान- मिति युज्यतेऽतिशयोक्तेरलक्कारोत्तमत्वमिति बोध्यम् ॥ २१४॥ हिन्दी-प्रस्तुन वस्तुको असाधारणरूपसे बढ़ा-चढ़ाकर कहना ही अतिशयोक्ति नामका अलक्कार है। वह सभी अलद्गारोंमें श्रेष्ठ है, क्योंकि वैचित्र्यमूलक अलक्कारोंमें जो विचित्रता रहा करती है वह बढ़ाकर कहनेसे ही, उसीकी प्रधानता उसमें रहती है। प्रस्तुत वस्तुका उत्कर्षवर्णन अभेदाध्यवसानादि कतिपय रूपमें किया जा सकता है, उन्हीं स्फुट मार्गोको आधार बनाकर अर्वा- चीन आचार्योंने अभेदाध्यवसानको प्राधान्येन अतिशयोक्ति स्वरूप ही मान लिया है। अतिशयोक्तिमें प्रस्तुत वस्तुका लोकसीमातिक्रान्तरूपमें वर्णन किया जाता है, अतः दशविष गुणोंमें अन्यतम कान्तिगुणका तो अभाव अतिशयोक्तियुक्त काव्यमें अवश्यमेव हो जायेगा, क्योंकि १. परिशुष्यते। २. द्र तत्समा। ३. वर्तिनः । ४. रोमो।

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१४४ काव्यादर्श:

कान्तिगुणके लक्षणमें-'कान्तं सर्वजगत् कान्तं लौकिकार्थानतिक्रमात' कहा है, वह आशक्का यहाँ उठाई जा सकती है, इसका उत्तर दो प्रकारसे दिया जायगा, एक तो यह कि कान्तिनामक गुणका स्थान-वार्त्तामिधानादि सीमित है अतः अतिशयोक्तिवाले काव्यमें उसके नहीं रहनेसे मी कोई क्षति नहीं होगी, दूसरा उत्तर यह है कि कान्तिगुण धर्मीके यथार्थ वर्णनकी अपेक्षा करता है, अतिशयोक्तिमें विशेष अर्थात् धर्मविशेषका ही अलौकिक रूपमें वर्णन किया जायगा, फलतः अतिशयोक्तिसे कान्तिगुणमें कुछ बाधा नहीं ही सकेगी। अतिशयोक्तिका लक्षण अग्निपुराण में इस प्रकार कहा गया है :- 'लोकसी मातिवृत्तस्य वस्तुधर्मस्य कीर्त्तनम्। भवेदतिशयः .. भामहने काव्यालक्कार नामक अपने ग्रन्थमें अतिशयोक्तिका यह लक्षण दिया है :- 'निभित्ततो वचो यत्तु लोकातिक्रान्तगोचरम्। मन्यन्तेऽतिशयोक्तिं तामलक्गारतया बुधाः ।' वामनने-'संभाव्यधर्मतदुत्कर्षकल्पनातिशयोक्तिः' यह लक्षण कहा है। दण्डीने जो लक्षण कहा है वह प्रकृत ही है, इन सभी लक्षणोंमें एक ही बात है, सभी आचार्य वर्णनीय वस्तुको बढ़ा- चढ़ा कर कहने की ही अतिशयोक्ति मानते हैं। इस तरह हम देखते हैं कि दण्डीके कालतक अतिशयोक्तिका लक्षण बहुत स्थूल रहा है, आगे आकर इस विषयमें क्रमशः परिष्कार हुआ है। 'निमित्ततो वचो य्तु' इस भामहके लक्षणमें थोड़ा और जोड़ कर उद्भटने अतिशयोक्तिके लक्षण का थोड़ा परिष्कार किया, उनका लक्षण है :- निमित्ततो वचो यत्तु लोकातिक्रान्तगोचरम्। मन्यन्तेऽतिशयोक्तिं तामलक्गारतया बुधाः । भेदेऽनन्यत्वमन्यत्र नानात्वं यदि बध्यते। तथाऽसंभाव्यमानार्थनिबन्धेऽतिशयोक्तिगीः॥ कार्यकारणयोयंत्र पौर्वापर्यविपर्ययात्। आशुभावं समालम्ब्य बध्यते सोडपि पूर्ववत्।' मुझे मालूम पड़ता है कि इसमें बताई गई दिशा ही काव्यप्रकाशकारकी अतिशयोक्तिपरि- भाषाकी प्रवर्तिका बनी है। उनकी परिभाषामें 'निगीर्याध्यवसानम्' वाली बात अपनी है, जिसे अनन्तरोत्पन्न सभी आचार्य स्वीकार करते आये हैं, औरों की तो बात जाने दीजिये, पण्डितराजने भी- 'विषयिणा विषयस्य निगरणमतिशयः, तस्योक्तिरतिशयोक्तिः' कह कर काव्यप्रकाशका ही मत स्वीकार किया है॥ २१४॥ मल्लिकामालभारिण्यं: क्षौमवत्यो न लक्ष्यम्ते ज्योत्स्नायामभिसारिकाः ॥२१५॥ अतिशयोक्तिमुदाहरति-मल्लिकेोत। मलिलकापुष्पाणां माधवीकुसुमानां माला: बित्र- तीति मल्निकामालभारिण्यः सर्वाग्गीणाद्रचन्दनाः सर्वाभ्जलिप्तमलयजद्रवाः क्षौमवत्यः सित- बसना अभिसारिण्यः कान्तमभिसरन्त्योऽजना: ज्योत्स्नायां न लक्ष्यन्ते पृथकृतया न शञायन्ते। अ्रत्र ज्योत्स्नायाः श्वेतत्वं मल्लिकापुष्पाद्यभिन्नतया वर्ण्यमानं समधिकश्वेततया प्रतीयत इत्यतिशयोकिः ॥ २१५॥ हिन्दी-माधवीपुष्पकी माला धारण करनेवाली एवं सर्वाङ्गमें चन्दन लेप करनेवाली धवल- वसनपरिधाना अभिसारिकायें चौंदनी रातमें लाक्षित नहीं होती हैं। यहाँ पर चाँदनीका ही वर्णन करना है, चाँदनीकी श्वेतता मलिकाकुसुमचन्दनादिकी श्वेतता से मिलती-जुलती है ऐसा कहनेसे चांदनीकी प्रशंसा होती है। १. मल्लिकामाल्यवारिण्यः । २. भेणा्द्र।

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द्वितीय: परिच्छेद: १५५

काव्यप्रकाशकारादि नवीन आचार्योने ऐसे स्थलमें एक स्वतन्त्र मीलित नामक अलक्कार स्वीकार किया है, जिसका लक्षण यह कहा है :- 'समेन लक्ष्मणा वस्तु वस्तुना यन्निगूह्यते। निजेनागन्तुना वापि तन्मीलितमिति स्मृतम्' ॥२१५॥ चन्द्रातपस्य बाडुल्यमुक्तमुत्कषवत्तया। संशयातिशयादीनां व्यंक्त्यै किश्चिनिदरश्यंते ॥ २१६॥ उदाहरणं योजयति-चन्द्रातपस्येति। अत्रोदाहरणे चन्द्रातपस्य चन्द्रिकायाः बाहुत्म्यम् समधिकं धावल्यम्। उत्कर्षवत्तया मल्लिकादिधावल्याभेदेन समधिकतया उक्तम्, भतः इदमतिशयोक्त्युदाहरणम्। भेदान्तरं दर्शयितुमाह-संशयातिशयादीनामिति। संशयातिशयादीनां संशयातिशयोक्तिनिर्णयातिशयोक्तिप्रभृत्यतिशयोक्तिप्रकाराणां व्यक्त्ये स्फुट प्रतिपत्तये किश्चित् स्वल्पं निदश्यते उदाहियते ॥ २१६ ॥ हिन्दी-इस उदाहरणमें चन्द्रिकाकी धवलता मल्लिकाकुसुमाभिन्नतया अतिधवल रूपमें वर्णित हुई है, अतः यह अतिशयोक्ति है। इसके बाद संशयातिशयोक्ति आदि प्रभेदोंको स्पष्ट करनेके लिये कुछ उदाहरण दिये जायेंगे॥ २९६ ॥ स्तनयोर्जघनस्यापि मध्ये मध्यं प्रिये तव। अस्ति नास्तीति सन्देहो न भेऽदयापि निवर्त्तते ॥२१७॥ संशयातिशयोक्तिमुदाहरति-स्तनयोरिति। हे प्रिये, तव स्तनयोः जघनस्य अपि मध्ये अन्तराले तव मध्यं कटिदेशः अस्ति नास्ति वा इति मे संदेहः संशयः अद्यापि चिर- सहवासे जातेऽपि न निवत्तते नापैति। अ्त्र संशयेन मध्यस्यातिकृशत्वं वर्ण्यत इति संशया- तिशयोक्तिरियम्॥ २१७॥ हिन्दी-हे प्रिये, तुम्हारे, इन तुक्गोन्नत स्तनों और चक्राकारविशाल जघनके बीचमें तुम्हारा मध्य-कमर है या नहीं यह मेरा सन्देह आज भी दूर नहीं हो सका है। इसमें संशयद्वारा मध्यका कृशतातिशय वर्णित हुआ है, यह संशयातिशयोकि है॥ २१७ ।। निर्णेतुं शक्यमस्तीति मध्यं तव नितम्बिनि। अन्यथामुपपर्यैव पयोधरभरस्थितेः॥। २१८। निर्णयातिशयोक्तिमाह-हे नितम्बिनि प्रशस्तनितम्बे, पयोधरभरस्य कुचविस्तारस्य स्थितिः सत्ता तस्याः अन्यथानुपपत्त्या निरालम्बनस्थित्यनुपपत्या एव तव मध्यम् अस्तीति निर्णेतुं शक्यम्। तव मध्यमतिकृशतयाऽस्ति नाहित वेति संदेहे पयोधरभरस्या- न्यथानुपपत्तिरेव संशयापासिका, यदि मध्यं न स्यातदा कुचभरः क्वावतिष्ठेतातोऽस्ति मध्यम् इति निर्णीयते इत्याशयः । अत्र पयोधरभरान्यथानुपपश्या मध्यं कल्प्यते, तेन तस्यातिकृशत्वं वर्ण्यत इति ॥२१८॥ हिन्दी-हे नितम्बिनि, तुम्हारा मध्यदेश है इसका निश्चय इसीसे होता है कि तुम्हारे कुच- विस्तार है, यदि मध्यदेश नहीं रहता तो यह कुचभार कहाँ रहते? इसी अन्यथानुपपत्तिसे मध्य- देशकी कल्पना होती है। यह निर्णयातिशयाक्ति है, क्योंकि मध्य की स्थितिका निर्णय जिस प्रकारसे अवतीर्ण हुआ है वह कृशतातिशयका बोधक है॥२१८ ॥ अहो विशालं भूपाल भुवनत्रितयोदरम्। माति मातुमशक्योपि यशोराशिर्यदत्र ते । २१९॥ १. व्यक्तौ। २. मध्यमस्तीति। ३. नोपपदेत। ४. स्थितिः। ५. भवन।

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१४६ काव्यादर्श:

आाश्रयाधिक्येऽतिशथोकिमुदाहरति-अहो विशालमिति। हे भूपाल, राजन्, भुवनत्रितयोदरम् त्रिभुवनमध्यम् विशालम् महत्, अहो आश्चर्यम् ! अस्य भुवनत्रयोदरस्य विशालत्वमाश्वयजनकम् इत्यर्थः । आर्रश्वर्यकारणमाह-यदिति। यत् यस्मात् अ्र्त्र त्रिभुवनोदरे मातुम् समावेष्टम् अशक्यः अयोग्यः अपि ते यशोराशिः कीर्तिभरः माति समाविशति। अन्राश्रयस्य त्रिभुवनोदरस्य विशालताप्रतिपादनेन तत्राश्रितस्य यशोराशेरा- धिक्यवर्णनात् आश्रयाधिक्यातिशयोकिरियम् ॥२१९॥ हिन्दी-हे भूपाल, यह त्रिभुवनोदर अतिविशाल है, इसकी विशालता आश्चर्यजनक है, क्योंकि इस त्रिभुवनोदरमें तुम्हारा यश भी समाविष्ट हो गया है जो कहीं भी समाविष्ट नहीं हो सका था। इस उदाहरणमें त्रिभुवनोदर रूप आश्रयके आधिक्यसे आश्रित यशोराशिका आधिक्य वर्णित होता है, अतः यह आश्रयाधिक्यातिशयोक्ति है। नवीन आचार्यगण इसे अधिक अलक्गार मानने हैं, उसका लक्षण उन लोगोंने इस प्रकार कहा है :- 'महतो यन्महीयांसावाश्रिताश्रययो: क्रमात्। आश्रयाश्रयिणौ स्यातां तनुत्वेऽप्यधिकं तु तत्' ॥२१९॥ अलक्कारान्तराणामप्येकमाड्ठु: परायणम्।

(इत्यतिशयोक्तिचक्रम् ) वागीशमहिताम वृहस्पतिनाप्यादृताम् परमश्रेष्ठाम् इमाम् वर्णितस्वरूपाम् अतिशया- हयाम् उक्तिम् अतिशयोक्तिम् अलद्कारान्तराणाम् अन्येषां विविधालक्काराणाम् अपि परायणम् परममाश्रयम् आ्रहुः, यथोक्तं भामहेन- 'इत्येवमादिरुदिता गुणातिशययोगतः । सवैवातिशयोक्तिस्तु तर्कयेत्तां यथागमम्'॥ २२०॥ हिन्दी-बृहस्पतिके द्वारा प्रशंसित परमश्रेष्ठ यह अतिशयोक्ति अन्यान्य विविध अलक्गारों का भी आश्रय होती है। इसका तात्पर्य यह है कि शब्दार्थवैचित्र्य ही अलक्कार है, वह वैचित््य अतिशयोक्त्यधीन है, अतः सभी अलक्कारोंमें सामान्यतः अतिशयोक्ति रहती है, परन्तु तत्तद्वैचित्र्यविशेषके कारण भिन्न-भिन्न नामसे व्यवहार होता है। जहाँ पर दूसरे प्रकारकी विचित्रता नहीं रहती है वहाँ अतिशयोक्ति होती है। इसी सिद्धान्तको हृदयमें रख कर कहा गया है :- 'कस्याप्यतिशयस्योक्तिरित्यन्वर्थविचारणात्। प्रायेगामी अलद्कारा भिन्ना नातिशयोक्तितः' ॥२२०॥ अन्ययैव स्थिता वृत्तिश्चेतनस्येतरस्य वा। अन्यथोत्प्रेक्ष्यते यत्र तामुत्प्रेक्षां विदुर्यथा ।। २२१॥ उत्प्रेक्षां लक्षयति-अन्यथैवेति। चेतनस्य मनुष्यादेः अचेतनस्य तर्वांदेर्वा अन्यथा स्वभावनिष्पन्नतया स्थिता वर्त्तमाना गुणक्रियास्वरूपा वृत्तिः अन्यथा स्वरूपमपहाय भिन्न- रूपेण यत्र उत्प्रक्ष्यते उत्कटकोटिकसंभावनाविषयीक्रियते, बुधास्तामुतप्रेक्षां नामालक्कारं विदुः। अयमाशयः-यत्र प्रस्तुतस्य चेतनस्याचेतनस्य वा स्वाभाविकी स्थितिरप्रस्तुतान्यथा- भावेन संभाव्यते सोत्प्रेक्षा। प्रकाशकारादय :- 'संभावनमयोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य परेण यत' इति लक्षयन्ति। तश्रोत्कटैककोटिक: संशयः संभावनपदार्थ:, तत्रापि उत्कटा कोटिरप्रस्तुत- १. मप्याहुरेक। २. यन्तु

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द्वितीय: परिच्छेद: १५७

स्येव भवति, सा चाप्रस्तुतद्वारा प्रस्तुतस्य निगरणेन, तथ द्विधा, क्वचित् प्रस्तुतस्यानु- पादानेन, क्वचिच्व तस्य तिरस्कारेण भवति, तदुक्तम्- 'विषयस्यानुपादानेऽप्युपादानेऽपि सूरयः । अधःकरणमात्रेण निगीर्णत्वं प्रचक्षते ।।' इति ॥ २२१ ॥ हिन्दी-वर्णनीय चेतन अथवा अचेतन वस्तुकी स्वाभाविक स्थितिको यदि अप्रस्तुत वस्तुके रूपमें संभावित किया जाय तब उत्प्रेक्षाऽलक्कार होता है। यदि उपमेयमें उपमानकी संभावना की जाय तब उत्प्रेक्षा होती है, यही आशय हुआ। यहाँ संभावना शब्दसे उत्कटैककोटिक मंशय विवक्षित है। अप्रस्तुतकी ओर यदि अधिक झुकाव हो तो ऐसी संभावनामें उत्प्रेक्षा होती है। संभावनापेक्षित संशयकी उत्कटैककोटिकता दो प्रकारसे होती है, विषयमें-उपमेयके अनुपादानमें, और उपमेयके उपादीयमान होने पर भी उपमानद्वारा तिरस्करणमें। यह संशय आहार्य ही होता है, अतः भ्रमस्थलमें उत्प्रेक्षा नहीं होती। रूपकालक्कारमें निश्चय ही होता है संशय नहीं, अतः वहां उत्प्रेक्षा नहीं कही जा सकती है। संदेहालक्गारमें समकोटिक संशय होता है उत्प्रेक्षामें उत्करे ककोटिक। नवीन आचार्योंने उत्प्रेक्षा- लंकारलक्षण-प्रभेदादि इस प्रकार कहे हैं- 'भवेत्संभावनोत्प्रेक्षा प्रकृतर्य परात्मना। वाच्या प्रतीयमाना सा प्रथमं द्विविधा मता॥ वाच्येवादिप्रयोगे स्यादप्रयोगे परा पुनः । जातिर्गुणः क्रिया द्रव्यं यदुत्प्रेक्ष्यं द्वयोरपि॥ तदष्टधापि प्रत्येवं भावाभावाभिमानतः । गुणक्रियास्वरूपत्वान्निमित्तस्य पुनश्च ताः ॥ दात्रिंशब्धितां यान्ति ....... .।' भामहन उत्प्रेक्षाके भेदमें चुप्पी लगा रखी थी, उन्हींके पदचिह्रों पर चलनेवाले काव्यप्रकाशकारने भी उत्प्रेक्षाके भेद नहीं किये है। उदभटने-'मावाभावाभिमानतः' वाले भेदोंको माना है, अलक्कार- सर्वस्वकारने तो बहुतसे प्रभेद बताकर अन्तमें इसे अन्तहीन भेदवाली कहा है। वास्तविक दृष्टिमें इसके प्रभेदोंका कथन आवश्यक था, मौनधारणको अन्धानुकरण कहा जा सकता है॥ २२१॥ मध्यन्दिनार्कसन्तप्तः सरसीं गाहते गज:। मन्ये मातण्डगृह्याणि पम्मान्युंद्धर्सुमुधतः ।। २२२।। स्नातुं पातुं बिसान्यसुं करिणी जलगाहनम्। तव्वैरनिष्कयायेति कविनोत्प्रेक्ष्य वर्ण्यंते ॥। २२३ ॥ चेतनगतामुत्प्रेक्षामुदाहरति-मध्यन्दिनेति। मध्यन्दिनार्कसन्तप्तः मभ्याहसूर्य- किरणजनितसन्तापः गजः सरसी जलाशयं गाहते अवतरति, मन्ये, मार्ततण्डगृह्याणि सूर्यपक्षपातीनि पद्मानि उद्धर्त्तुम उन्मूलयितुम् उद्यत इव। अत्र चेतनस्य गजस्य स्नानपानाद्यर्थ सरसीमज्जनं सर्स्य सन्तापकारित्वेन शत्रुभूततया तत्पक्षपातिकमलो- न्मूलन हेतुत योत्प्रेचयते। केचिर्वत्र प्रत्यनीकालङ्कारलक्षणं योजयन्ति, तदया- 'प्रत्यनीकमशक्तन प्रतीकारे रिपोर्यदि। तदीयस्य तिरस्कारस्तस्यवोत्कर्षसाधकः ॥' वस्तुतस्तु-यत्र तत्पक्षापकारो वास्तवतया कविना विवच््यते तत्रैव प्रत्यनीकालङ्कारः, अत्र तु संभावनामात्रमिति नास्ति तत्संभावनेति विभावनीयम् ॥ २२२ ॥ उदाहरणमुपपादयति-स्नातुमिति। स्नातुम् स्नानं कर्त्तुम्, पातुम् जलपानेन तृषं शमयितुम्, बिसानि कमलनालानि अत्तुम् भक्षयितुम् (करिणा क्रियमाणम्) करिणो १. मार्ताण्ड। २. न्याहर्तुम्। ३. उत्सुकः ।

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काव्यादर्श:

जलगाहनम् जलेऽवतरणं तस्य वैरम् सूये स्वशत्रुत्वं तक्ष्य निष्क्रयाय प्रतिशोधनाय, इति एवम् कविना उत्प्रच्य संभाव्य वर्ण्यते। मध्यन्दिने सूर्यकरसन्तप्तस्य करिणः स्नानादुद्दिश्य कृतमपि जलावगाहनं सन्तापकसूर्यपक्षगतकमलोन्मूल नहेतुलया संभाव्यत इति भवत्युत्प्रेक्षा- लक्षणसंगतिः।।२२३ ।। हिन्दी-दोपहरके सूर्यकी किरणोंसे सन्तापित गज पानीमें प्रवेश करता है, ऐसा लगता है मानों वह अपने सन्तापक सूर्यके पक्षपाती (सूर्य कमलका मित्र माना जाता है) कमलोंको उखाड़नेके लिये ही जलमें प्रवेश कर रहा हो॥ २२२॥ इस उदाहरणमें नहाने, पानी पीने या कमलनाल-भक्षणके लिये हाथी द्वारा किया गया जला- वगाइन सूर्यपक्षगत कमलोन्मूलनहेतुतया संभावित करके वणित हुआ है, अतः इसे उत्प्रेक्षा मान सकते हैं। यहाँ पर चेतन गजगत वृत्तिको-स्वाभाविक जलावगाहनको अन्य रूपमें- स्वसन्तापक शञ्रुभूत सूर्यपक्षगामी कमलकुलोन्मूलनार्थत्वरूपमें संभावित किया गया है, अतः यह उत्प्रेक्षा है, इसमें उत्प्रेक्षाके सभी अङ्ग हैं, उत्प्रेक्षाविषय-जलावगाहन, उसका कारण मध्यन्दिनार्क सन्ताप, उत्प्रेक्षावाचक-मन्येशब्द, अन्यथा संमावना-सूर्यपक्षीय कमलोन्मूलनहेतुत्वेन संभा- वना ॥ २२३ ॥ कर्णस्य भूषणमिदं ममायाति विरोधिनः। इति कर्णोत्पलं प्रायस्तव दष्टया विलङ््यते ॥ २२४॥ अपाङ्भागपातिन्या दृष्टेरंशुभिरुत्पलम्। स्पृश्यते वा ने वेत्येवं कविनोत्प्रेक्ष्य वर्ण्यते ॥ २२५॥ अचेतनगतोत्प्रेक्षा मुदाहरति-कर्णस्येति। तव दृष्टथा नयनेन (कतृपदम्) मम दष्टयाः आयतेः दर्ध्यविस्तारस्य विरोधिनः बाधकस्य कर्णस्य इदम् उत्पलं भूषणमिति संभाव्यैव प्रायः कर्णोत्पलं विलक्वयते निजांशुभिः प्रताडयते। यथयं कर्गो नाभविष्यत्तदा मदीयो विस्तारोऽधिक्ोऽभविष्यदिति स्वीयविस्तारविरोधितया कर्णा मतः, तस्यैव चेदमुत्प- लमलक्करणमिति संभाव्येव तव दृष्टिः स्वप्रभयोत्पलं ताडयतीति भावः ॥ २२४ ॥ उदाहरणं योजयति-अपाभ्गभागेति। अपाप्नभागपातिन्याः 'गतागतकुतूहलं नयन- योरपाद्रावधि' इत्युक्ततया नेत्र प्रान्तमात्रे प्रसरणशोलाया: दृष्टेः नयनस्य अंशुभि: नीलाभ- किरणै: उत्पलम् कर्णाभरणीभूतं स्पृश्यते वा न वा स्पृश्यते (स्पर्शमात्रमपि मनाकर्सभावना- दूरगतम्) इति एवम् अस्यामेव स्थितौ तदीयदृगंशुभिः उत्पलस्ष्य पराभवः कल्पनयो:प्रेद्यत इति भवति लक्षणसपतिः। पूर्वोदाहरणे चेतनस्य गजस्य जलावगाहनकियोत्प्रेक्षाविषयी- कृताऽन्र तु अचेतनस्य नयनगुणः (श्यामत्वं ( कविनोत्प्रेक्षाविषयीकृत इति ॥ २२५ ॥ हिन्दी-तुम्हारे नयन, यह उत्पल हमारे विस्तारको रोकने वाले इन कानोंके भूषण हैं, यही समझ कर (स्वशत्रूपकारकतया वैरी मान कर) अपनी श्यामल प्रभासे इन उत्पलोंको अभिभूत किया करते हैं॥। २२४।। इस उदाहरणमें नेत्रप्रान्तमें फैलने वाली आँखोंकी श्यामलता उत्पलको छूती है या नहीं छूती है, परन्तु कविने उसी श्यामलतासे उत्पलका अभिभव वर्णन किया है, इस उदाहरणमें अचेतन नयनविष्ठ श्यामत्व गुणका उत्पलाभिभव कतृतया उत्प्रेक्षित किया गया है। यहाँ प्रायः शब्द उत्प्रेक्षावाचक है।। २२५ ।। १. निरोपिन: । २. स्पृश्येत । ३. न वैवं तु।

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द्वितीय: परिचछ्ेद: १५६

लिम्पतीव तमोऽक्गानि वर्षतीवाखनं नमः । इतीद्मपि भूयिष्ठमुत्प्रेक्षालक्षणान्वितम् ॥२२६॥ मन्ये शंके ध्रुवं प्राय इत्यादय: शब्दा उत्प्रेक्षावाचका, इवशब्द उपमावाचक:, इति प्रवादमाधारीकृत्य प्रूढं लिम्पतीवेत्यादिश्लोके उपमेवालज्ञार इति मतं दृषयितुमाह- लिम्पतीवेति। वर्षासमयकृष्णप्रदोषवर्णनप्रसकगे मृच्छकटिकनाटके पद्यं विद्यते- 'लिम्पतीव तमोSप्ञानि वर्षतीवाजनं नभः । असत्पुरुषसेवेव दृष्टिर्निष्फलतां गता ॥' तदेवात्र विवेचनाय प्रक्रान्तम्। तमः अज्ञानि लिम्पतीव, नभः अजनं कज्जलं वर्षतीव, इति इदं पद्यार्धमपि भूयिष्ठं प्राचुर्येण उत्प्रेक्षालक्षणान्वितम् उत्प्रेक्षाया लक्षणेन युक्त्तम्। तथाहि अत्र तमसो व्यापनरूपो धर्मो लेपनेन सैभावितः, तस्यैव चाधःप्रसरणरूपो धर्मः नभ:कर्तृकाजनवर्षणरूपतयोत्प्रेक्षितः । उभयत्रापि विषयस्य संभावनाधिकरणस्यानुपादानं समानम्। अत्रत्य इवशब्द: सम्भावनार्थकः, दूरस्थोऽयं देवदत्त इव भातीत्यत्रेवशब्दवत्। तथाचोत्प्रेक्षालक्षणाक्रान्ततयात्रोत्प्रेक्षेव, नोपमेति ॥२२६।। हिन्दी-कुछ प्राचीन आचार्य ऐसा विचार रखते थे कि मन्ये, शक्के, भ्रुवं, प्रायः-इन शब्दोंके रहनेपर उत्प्रेक्षालक्कार होता है, और इव शब्दके रहनेपर उपमालक्कार होता है, इसी स्वसिद्ान्तके अनुसार 'लिम्पतीव' इस श्लोकमें उपमा ही मानते हैं, उनके मतका खण्डन करनेके लिये यहाँ से उपक्रम किया गया है। इस श्लोकमें वर्षाकालके कृष्णपक्षीय प्रदोषकालका वर्णन है। यहाँ पर अन्धकारके फैलनेको अङ्गलेपन रूपमें संभावित किया जाता है और अन्धकारके अधःप्रसरणको आकाश द्वारा किये गये अंजनवर्षणके रूपमें संभावित किया जाता है। इस उदाहरणमें अधिकांशमें उप्रेक्षाका लक्षण संगत होता है। अतः इस पद्यार्थमें उत्प्रेक्षा अलङ्कार ही है, उपमालक्कार नहीं। इसी तरह- 'पिनष्टीव तरङ्गाग्रैरुदधि: फेनचन्दम्। तदादाय करैरिन्दुलिंम्पतीव दिगङनाः ॥' इस पद्ममें भी उत्प्रेक्षालक्कार ही मानना चाहिये। कुछ अन्य आचार्य इसे सादृश्यमूलक उत्प्रेक्षा मानते हैं, परन्तु दण्डीने तो यहाँ स्पष्ट उत्प्रेक्षा स्वीकार की है। २२६ ॥

नोपमानं तिडम्तेनेत्यतिक्रम्याप्तभाषितम् ।। २२७।। पूर्वकारिकया स्वसिद्धान्त उक्तः, सम्प्रति प्रतिपक्षमतं खण्डयति-केषाश्चिदिति। केषाश्ित् परेषाम् आचार्याणाम् इह अन्रोदाहते पद्यार्घे उपमात्रान्तिः उपमैवेति संदेह इवश्रुत्या इवशब्ददर्शनेन जायते, तथाविधा भ्रान्तिथ्व निर्मूलेति पूर्वार्धभागार्थः। तत्र बाधकमाह-नोपमाजमिति। तिळन्तेन तिउन्तशब्दप्रतिपाद्येन न उपमानम् न उप- मानबोध इति आप्तभाषितम् अनुल्लक्टनीयवचनस्याचार्यस्य पतञ्ञलेर्भाषितम् वचनम- तिक्रम्य उल्लक्ध्य जातत्वादेवतादृशं ज्ञानं भ्रम इति। भाष्यकृता 'न तिग्न्तेनोपमानमस्ती'-

१. इतः प्राकू निम्नपधं कचिद् दृश्यते- 'असत्पुरुषसेवेव दृष्टिर्निष्फलतां गता। पिनट्टीव तर्ाग्रैरुदधि: फेनचन्दम्। तदादाय करैरिन्दुलिंग्पतीव दिगडनाः॥'

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१६० काव्यादर्श:

त्युक्तम्, तस्यायमाशय :- तिक्न्तप्रतिपाद्यस्य साध्यत्वमिति शास्त्रविदः स्वीकुर्वन्ति, तथा च स्मर्यते-'असत्वभुतो भावथ तिमपदरभिधीयते' इति। सिद्धस्यैव चोपमानत्वमिति च सर्वेसम्मतम्, यदुकम्- 'सिद्धमेव समानार्थमुपमानं विधीयते। तिकन्तार्थस्तु साध्यत्वादुपमानं न जायते ।' इति। एवश तिकन्तप्रतिपाद्यस्य लेपनादेरुपमानत्वायोगान्नास्ति कथमप्यत्रोपमा, 'किन्तु तत्र संभावनार्थक इवशब्दः इति पूर्वोक्तभाष्यव्याख्यास्थित कैयटभ्रन्थानुसारेण तत्रो- त्प्रेक्षेव युक्कतेति॥।२२७ ।। हिन्दी-इस कारिकामें दण्डीने प्रतिपक्षीके मतका खण्डन किया है, जो लोग यहाँ पर उपमालक्कार मानते हैं उनका कहना है कि इसमें-'लिम्पतीव तमोङ्गानि' इन्यादि पूर्वोक्त पद्यमें इव शब्द है, अतः यहाँ उपमा होगी, उन्हें यह नहीं मालूम है कि ऐसा कहना परमाप्त पतंजलिकी आशञाका उल्लंघन करना है, पतंजलिने-'धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा' इस सत्रके भाष्यमें स्पष्ट कहा है कि-'न तिडन्तेनोपमानमसि्ति'। इस भाष्यपङ्गिका अभिप्राय यह है कि तिडन्तपदोपस्थाप्य सिद्धावस्थापन्न नहीं होता है, वह साध्यस्वरूप रहता है अतः वह उपमान नहीं हो सकता है, क्योंकि- 'सिद्धमेव समानार्थमुपमानं विधीयते। तिहन्तार्थस्तु साध्यत्वादुपमानं न जायते ।' अतः यदि इसमें उपमा अलक्कार माना जाय तो यह बात आप्तभाषित-भाष्यवचनके विरुद्ध होगी, अनः यहाँ उत्प्रेक्षालक्कार ही मानना चाहिये। जो लोग पूर्वोक्त उदाहरणमें उपमा मानते हैं उनका तर्क यही है कि इस पधमें इव शब्द है, इव शब्द सादृश्यवाचक है अतः यहाँ उपमा है, इस तर्कका भी उत्तर पूर्वोक्त भाष्य ग्रन्थकी त्याख्यामें कैयट ने दे दिया है, उन्होंने कहा है कि-'किन्तु तत्र संभावनार्थक इवशब्दः' संभावनार्थक इव शब्द मानने पर तो उपमाकी बात ही उठ जाती है। तिडन्तके साथ उच्चरित होनेवाला इव शब्द संभावनार्थक ही हुआ करता है सादृश्यार्थक नहों होता है, फलतः यहाँ उपमाकी संभावना नहीं है॥ २२७।। उपमानोपमेयत्वं तुल्यधर्मव्यपेक्षया। लिम्परेस्तमसश्चासौ धर्मः कोऽन्ं समीक्ष्यते ॥ २२८॥ पूर्वोक्तपये उपमालङ्कारानग्गीकारे उपोद्वलकान्तरमाह-उपमानोपमेयत्वमिति। सादृश्यप्रतियोगिं उपमानम् , सादृश्यानुयोगि चोपमेयम्, तयोर्भाव उपमानोपमेयत्वं तुल्य- धर्मव्यपेक्षया समानधर्ममपेक्ष्य भवति, सम्बन्धकस्य समानधर्मस्याभावे न भवत्युपमानोपमेय- भाव: स चात्र न संभवति, तदाह-लिम्पतेरिति। लिम्पतीति तिउन्तार्थस्य तमसश् असौ समान: धर्मः कः समोक्यते ? उभयानुगतस्य कस्यापि समानधमस्याप्रतीती तदालम्बनस्य तयोरलिंम्पत्यर्थतमसोरुपमानोपमेयत्व स्याशक्यकल्पनकत्वेऽनुपपन्नैवात्रोपमेति भावः ॥२२८॥ हिन्दी-'लिम्पतीन' इत्यादि पूर्वोक्त उदाहरणमें उपमा नहीं हो सकती है, क्योंकि उपमानो- पमेयभावमें समान धर्मकी अपेक्षा होती है, विना समान धर्मके उपमान और उपमेयका सादृश्य किस प्रकार नियत किया जायगा ? फलतः उपमान और उपमेयमें समानधर्मका होना आवश्यक है, वह यहाँ क्या होगा ? लिम्पतिरूप तिडतार्थलेपनक्रिया और तममें क्या समान धर्म हो सकता हैं, उभयानुगत समान धर्म कुछ है नहों, अतः यहाँ उपमानोपमेयमावकी कल्पना निरो भ्रान्ति है। १. को नु।

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द्वितीय: परिच्छेद: १६१

यदि लेपनमेवेष्टं लिम्पतिर्माम कोमडपर:। स एव धर्मों धर्मी 'चेत्यनुम्मत्तो न भाषते । २२९॥ पूर्वपक्षी यदि लेपनमेव समानं धर्ममातिष्टेत, तदा संभवत्युपमानोपमेयभाव:, तत्रा- पत्तिमाह-यदीति। यदि लेपनम् एव तमोलिम्पत्यर्थयोः समानधर्मतया स्वीक्रियते, तदा लिम्पतिपदार्थस्य लेपनस्य धर्मतया ग्रहरी तदाश्रयः को धर्मी मन्येत? लिम्पति- पदस्य 'भावप्रधानमाख्यातं सत्वप्रधानानि नामानी'ति यास्कसिद्धान्तेन लेपनमेवार्थः, तब्ब धर्मतयाऽडस्थितं, तद्भिक्वः कोडस्ति लिम्पतिपदार्थो यो धर्मितया स्वीकृतः स्यात्? स एवैको लिम्पतिपदार्थों धर्मों धर्मी चोभयं भविष्यतीति कथनं तून्मत्तजल्पितमेवेति न शक्यतेऽत्रोपमा निरूपयितुमिति भावः । नच यथात्मात्मानं जानातीत्यत्र एक एवात्मपदार्थ: कर्त्तृत्वं कर्मत्वं चोभयं जुषते तथाऽत्रापि लिम्पतिपदार्थो धर्मो धर्मी च स्यादिति वाच्यम्, तत्र भिन्नपदोपस्थापितयोरात्मनोः समानत्वेऽि कर्तृत्वकर्मत्वे कथश्विद् भवितुमहतः अत्र त्वेकेन लिम्पतिपदेन समुपस्थापितस्य लेपनस्य धर्मेत्वधर्मित्वयोरभ्युपगन्तुमशक्य- त्वादिति॥ २२९॥ हिन्दी-यदि पूर्वपक्षी यह कहें कि लेपन ही समान धर्म मान लिया जाय, तो इसका उक्तर यह है कि 'लिम्पति' इस तिबन्तका अर्थ ही तो लेपन है, यहाँ पर उसीको उपमान बनाया जायगा तब उपमा प्रतिष्ठित की जायगी, इस अवस्थामें लिम्पति पदार्थ तो उपमानरूप धर्मी होगा, उसे आप धर्म किस तरह बना सकेंगे, धर्म-धर्मी एक नहीं होते, दोनों को एक मानना उन्मस्ता है। लिम्पति तिडन्त है, 'भावप्रधानमाख्यातम्' इस वैयाकरणाभिमत सिद्धान्तके अनुसार उसका अर्थ, है लेपन, उसीको उपमान मानकर आप उपमा मानने चले हैं, और उसी लेपनको आप समान धर्म भी कहते हैं, एक ही वस्तुको धर्म और धर्मी दोनों बनाना चाहते हैं यह तो सनक है। यहाँ पूर्वपक्षी यदि यह कहें कि जिस प्रकार 'आत्मा आत्मानं जानाति' इस वाक्यमें एक ही आत्माको कर्त्ता और कर्म दोनों माना जाता है उसी तरह एक हा लेपनको धर्म और धर्मी दोनों मान लेंगे, इसका उत्तर यह है कि 'आत्मा आत्मानं जानाति' इसमें विभिन्नपदोपस्थाप्य आत्मद्वयमें एकको कर्म और एकको कर्त्ता माना जा सकता है, परन्तु यहाँ तो एक ही लिम्पति पदसे एकमात्र लेपन अर्थ प्रतीत होता है, उसे कैसे धर्म और धर्मी दोनों रूपमें स्वीकार किया जायगा ॥ २२९ ॥ कर्ता यद्युपमानं स्यान्न्यग्भूतोऽसौ क्रियापढे। स्वक्रियासाधनव्यग्रो नालमन्यद्पेक्षितुम् ॥ २३० ॥ उपायान्तरमुद्भाव्य दूषयति-कर्त्ता यदीति। तिरब्थस्य कर्तुरुपमानत्वं, कर्तृगतस्य लेपनव्यापारस्य च साधारणधर्मत्वमेवमुपमा भवितुमहतीति शङ्का, तदुत्तरमाह-यदि तिडुपस्थाप्यस्याश्रयस्य कर्त्तरुपमानत्वं कल्प्यते तदाइसी कर्त्ता क्रियापदे लिम्पति-करिया- पदेन विशेष्यतया प्रतिपादये व्यापारे न्यग्भृतः विशेषणतयाऽन्वितोऽसौ कर्त्ता (यतः) स्वक्रियासाधनव्यग्रः स्वव्यापारस्य विशेष्यतया बोधाय उपसजनतामापनः अन्यद अपेक्षितुम् पदार्थान्तरविशेष्यकबोधे प्रकारीभवितुम् न अलम् न समर्थः । अ्रयमाशंय :- अत्रेयमाशड्का-न तिक्न्तेनोपमानमस्तीति भाष्यात लेपनस्योपमानत्वं न संभवत्तीति स्वी- 11 १. चेत्युन्मत्ोपि।

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१६२ काव्यादर्श:

कारेप्रपि लिम्पतीति तिम्धस्य कर्तृषपमानत्वमस्तु, तथा व लिम्पतिकर्तसदशतमःकर्तृक व्यापनमिति शक्यते उपमां समर्थयितुमिति, एतदुत्तरमिद यत्-अत्र वैयाकरणमतानुसा- रेण तिमन्तपदार्थव्यापाराश्रयस्य कर्तृर्धातुप्रतिपादये व्यापारे विशेषणतयाऽन्वयो भवति, भतोऽसी कियापदे तिकन्तोपस्थाप्ये व्यापारे न्यग्भूतो विशेषणतां गतः, ततक्ष स्व्रक्रिया- साधनव्यभ्रः स्वक्रियायाः स्वनिष्ठविशेषणतानिरूपित विशेष्यताशालिन्या: क्रियायाः व्या- पारस्य साधने विशेष्यतया बोधे व्यग्रः प्रकारीभूतोऽसौ कर्ता अन्यत पदार्थान्तरम् अपेक्षितुम् स्वप्रकारकान्वयबोधे विशेष्यतयाऽवलम्बितुम् न अलम्, लेपनव्यापारे विशे- षणतया अन्वितस्य कर्तुरपमानसम्बन्धेन परत्रान्वयो न संभवति, तदुक्तं नागेशभट्टै :- 'एकत्र विशेषणत्वेन गृहीतशक्तिकस्य ज्ञातस्य वा अपरत्र विशेषणत्वायोगः, अत एव राज्ः पुरुषोऽव्वश्चेतिवत् राजपुरुषोश्वश्चेति ने'ति।२३॥ हिन्दी-'लिम्पतीव' इत्यादि पूर्वोक्त पद्यार्थमें उपमा माननेवाले यदि यह आशक्ा करें कि तिब्थ कर्त्तांको ही उपमान माना जाय, और धात्वर्थ लेपनको समान धर्म स्वीकार करें, तब तो छिम्पतिकर्तृसद्श तमःकर्तृक लेपन (व्यापन) इस तरहकी उपमाके होनेमें कुछ दोष नहीं है, इसका उत्तर यह है कि तिडर्थव्यापाराश्रय कर्त्ता धात्वर्थव्यापारमें विशेषणतया अन्वित है, वह कर्चा स्वविशेष्यव्यापारको प्राधान्येन बोधित करने के लिये अपनेको विशेषण बना चुका है, अतः उसका उपमानसंबन्धसे (सादृश्यसे) दूसरे पदार्थमें अन्त्रय करना सकगत नहीं होगा, क्योंकि एक जगह जो विशेषणतया गृहोतशक्तिक अथवा ज्ञात रहता है उसका दूसरेके साथ विशेषणतया अन्वय नहीं हो सकता है। मजूषामें नागेशने लिखा है-'एकत्र विशेषणत्वेन गृहीतशक्तिकस्य शतस्य वा अगरत्र विशेषगत्वायोग:, अनएत राजः पुरुषोऽश्वश्चेतिवद् राजपुरुषोडश्वश्चेति न'। फलतः तिब्थे कर्त्ता जब धात्वर्थव्यापारमें विशेषणतया अन्त्रित है तब आप उसे सादृश्यसंबन्धसे तम आदि अन्यपदार्थमें अन्वित नहीं कर सकते हैं, इस हालतमें उपमा कैसे होगी ॥२३०॥ या लिम्पत्यमुना तुल्यं तम इत्यपि शंसतः। अङ्गानीति न सम्बद्धंसोऽपि' मृग्य: समो गुणः ।।२२१॥ वैयाकरणमतानुकूल प्रक्रियायामुपमासंभवो निराकृत:, सम्प्रति नैयायिकमतेऽपि तद- संभवत्व व्यवस्थापयति-यो लिम्पवीति। यो लिम्पति अमुना तुल्यं तमः-'लेपन- कर्तृस्दश तम' इत्यपि एवमपि शंसतः कथयतः प्रथमान्तमुख्यविशेष्यकबोधस्वीकारे िम्पतिपदस्य लेपनकर्ता-लेपनानुकूलकतिमानित्यथें, लेपनकर्तुसदृदर्श तमः इति स्वी- कमुनेयायिकानुगस्य अपि मते अज्ञानीति पदं सम्बर्द्ध न भवति, उपमेयगतलेपने नान्वेति, तेनाअकर्मकल्तेपनं समानधर्मों भवितुं नार्ईतीति समः साधारणो धर्मः मृग्य: अन्वेषणीय एव। एवबाजानीत्यस्य असंबन्धेन, ततकृतेन च साधारणधर्मानुपलम्भेन नास्त्युपमासैभव इति भाव: ।। २३१। हिन्दी-आ्यपारमुख्यविशेष्यक बोधवादी वैयाकरणोंके मतानुसार 'लिम्पतीव' इस पद्ार्थमें उपमा नहीं हो सकती है, इतनी ही बात नहीं है, प्रथमान्तार्थमुख्यविशेष्यक बोधवादी नैयायिकोंके मतर्में भी यहाँ उपमा नहीं बनती है क्योंकि 'जो लेपनका कर्ता है उसके समान अन्धकार'लेपन- कचृसष्टशतम इस प्रकारके अन्वययोषमें उपमाकी आशा रखनेवाले नैयायिकानुगाभियोंको भी- १. शंसिन:। २. सम्पक्ः, सम्बन्धः ।

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द्वितीय: परिचछेद:

'अङ्गानि' यह असंबद्ध रहता है, 'अक्षानि' इस पदका उपमेयगत लेपनमें अन्बय नहीं हो पाता है, और इस स्थितिमें अङ्गकर्मक लेपन समान धर्म नहीं होने पाता है, समान धर्म अन्वेषणीय ही रह जाता है, इस स्थितिमें उपमा कैसे मानी जायेगी? ॥ २११॥ यथेम्दुरिध ते वक्त्रमिति कान्ति: प्रतीयते। न तथा लिम्पतेर्लेपादग्यदत्र प्रतीयते।। र२ः॥ ननु साधारणगुणासंम्भवे मास्तु पूर्णोपमा, लुप्तोपमा तु साधारणधर्मनिरहेऽ्रपि संभव- दात्मकामेति शहां निराकरोति-यथेश्दुरिवेति। यथा 'इन्दुरिव ते वक््त्रम्' इत्युप- मायां साधारणधर्मतया कान्तिः प्रतीयते वावकशब्दविरहेष्रपि कान्तिमतया प्रसिद्धस्ये- न्दोरुपमानत्वाद गम्यते, तथा अत्र लिम्पतेः उपमानसमर्पकात् लिम्पतिपदात् लेपाव स्ववाच्याद्विलेपनव्यापारात् अन्यत् औपम्यनिर्वाहकं साधारणं धर्मान्तरम् न प्रतीयते, लेपनं तूपमानमेव, लिम्पत्यन्तर्गतत्वात्। अतो नात्र लुप्तोपमाया अपि संभव इति भाव:।। हिन्दी-पूर्वपक्ष किया जा सकता है कि जिस प्रकार 'इन्दुरिव ते वक्त्रम्' तुम्हारा मुख चन्द्रमाके समान है-इस वाक्यमें साधारणवर्मवाचक शब्दके अभावमे भी उपमान चन्द्र साइश्यसे कान्तिको साधारणधर्म समझ लिया जाता है, अतः लुप्तोपमा होती है, उसी तरहः 'लिम्पतीव' इस उदाहरणमें भी साधारणवर्मके नहीं रहने पर भी लुप्तोपमा-धर्मलुप्तोपमा मानने में क्या बाधा है? इसका उत्तर यह दिया जा रहा है कि यहाँ पर 'लिम्पति' पदसे लेपनरूप अर्थके अतिरिक्त कुछ साधारण धर्म प्रतीत नहीं होता है, (प्रतीयमान साधारण धर्मके विरहमें) लुप्तोपमा भी कैसे मानी जा सकती है। तात्पर्य यह है कि लुप्तोपमाका वह विषय है जहाँ उपमान और उपमेयका सावृश्य शब्दानुक्त होनेपर भी लोकप्रसिद्धतया प्रतीतिविषय हो जाता है, जैसे 'तुम्हारा मुख चन्द्रमाके समान है' इस वाक्यमें उपमानभूत चन्द्रमा कान्तिमत्तया प्रसिद्ध है, उसके सादृश्यसे कान्तिरूप- साधारणधर्म अनुक्त होनेपर भी प्रतीत हो जाता है, परन्तु यहाँकी स्थिति भिन्न है, यहाँ तो लेपनकर्त्तारूप उपमान और तमरूप उपमेयमें कोई साधारणधर्म प्रतीत. नहीं होता है, अतः यहाँ लुप्तोपमा भी नहीं मानी जा सकती है।। २३२।।

अनकर्मा घ पुंसैवमुश्पेक्ष्यत इतीष्यताम्॥। २२३॥ तदिति। तत् तस्मात् उपश्लेषणार्थः व्यापनवाचकः भरयं लिम्पतिः लिपूघात्वयों लेपनम् व्वान्तकर्तृकः तमसा सकर्तृक, तथा च अम्कर्मा अप्कर्मकथ, ध्यान्तकर्तृक- मनकमंरक च लेपनम् व्यापनत्वेन रूपेण पुंसा कविनिबद्धेन वश्त्रा एवम् व्यापनरूपेण उस्प्रेच्यत इति इष्यताम् मन्यताम्। इत्यम् व्यापनं विषयो लेपनम विषयीति उत्प्रेक्षेवात्र शक्यसंभवा, नोपमेति ॥२३३॥ हिन्दी-यहाँ पर लिम्पतिका अर्थ उपश्लेषण-व्यापन है, तम उसका कर्ता हे और अङ् उसका कर्म, उसी व्यापनार्थक लिम्पतिकी लेपन रूपमें उत्प्रेक्षा की जाती है। प्रस्तुत अर्थको विषय और संभाव्यमान अर्थको (अप्रस्तुतार्थको) विषयी माना जाता है, प्रकृत उदाहरणमें तम:कर्तृक अग्रव्यापन उत्प्रेक्षाका विषय है, उसी तरडका लेपन संमाव्यमान होनेके कारण विषयी है, वही उत्प्रेक्षा का बीज है, अतः यहाँ उत्प्रेक्षा अलद्धार है, काव्यप्रकाशकारने भी इसे उत्प्रेक्षा का ही १. लिम्पती।

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१६४ काव्यादर्श:

उदाहरण माना है, समन्वयके लिये जो विवरण दिया है उससे दण्डीका मत अच्छी तरह समयित हो जाता है। विवरण को है :- 'अत्र व्यापनादि लेपनादिरूपतया संभावितम्।' व्यापनको विषय और लेपनको विषयी मान कर ही उत्प्रेक्षा सिद्ध की जाती है॥। २३४ ।। मभ्ये शङ्के ध्रुवं प्रायो नूनमित्येवमादयः। उत्प्रेक्षा व्यज्यते शम्दैरिवशब्दोऽपि तायः ॥ २३४॥ (इत्युत्प्रेक्षाचक्रम् ) उस्प्रेक्षावाचकश्दान् संगृहभुपसंहरति-मन्ये शङ्के इति। एषां निर्दिष्टानां शब्दानां प्रयोगे सति वाच्योत्प्रेक्षा, तदभावे तु गम्येति बोध्यम् ॥२३४॥ हिन्द्री-मन्ये, शहे, ध्रुवम्, प्रायः आदि शब्दोंसे उत्प्रेक्षाकी प्रतीति होती है, और इव शब्दसे भी उसकी प्रतीति होती है। यद्यपि इव शब्द प्रधानतया उपमावाचक है, परन्तु वह संभावनावाचक भी है, इसीलिये उसकी गणना उत्प्रेक्षावाचकोंमें की जा रही है। यहाँ के आदि शब्दसे सर्कयामि, जाने, उत्प्रेक्षे, संभावयामि और एतदर्थक अन्यान्य क्रियाओंका ग्रहण समझना चाहिये। यहाँ कहे गये मन्ये शङ्के बगैरहके उदाहरण काव्योंमें अतिसुलभ है, अतः यहाँ नहीं दिये गये ।। २३४॥ रेतुध् सूक्ष्मलेशी च वाचामुत्तमभूषणम्। कारकश्ापकौ हेतू तौ' चानेकविधौ यथा ॥२३५॥ कमप्राप्तान् हेतुसूच्मलेशालक्वारॉल्लक्षयति-हेतुम्रभेति। श्रमी त्रयोऽप्यलङ्गाराः वाचामुत्तमभूषणम् प्रतिरमणीयतासंपादकम्, अत एव चावश्यमलङ्कारतया स्वीकरणीयाः । एतच भामहमतमपासितुमुक्त्तम्। तथाहि भामहेन :- 'हेतुथ सूक्ष्मो लेशोऽय नालक्कारतया मतः । समुदायाभिधानस्य वक्रोक्त्यनभिधानतः।।' इति ब्रुवता चमत्कृतिशून्यत्वेनालक्ारत्रयमपीद न स्वीकृतम्, आाचार्यदण्डी तु वाचामुत्त- मभूषणमिति कथयस्तत्र चमत्कृतिमनुमन्यमानस्तानलङ्कारानज्रीकरोति। तत्र प्रथमोक्तस्य हेतो: प्रभेदान् दिदशयिषुराह-कारकक्षापकाधिति। अत्र भेदमात्रमभिधीयते, लक्षणं तु नाम गतार्थम्। हेतुर्द्विविध :- कारको श्ञापकथ्। अग्निधूमस्य कारको हेतु: धूमश्चाग्नेर्जाप- को हेतुः। तौ चेमौ कारकज्ञापकी अनेकविधौ प्रवृत्तिनिवृत्यादिमेदेन भिन्नत्वात् ॥ २३५॥ हिन्दी-मामहने हेनु, सूक्ष्म, लेश-इन तीन अलक्कारोंके विषयमें कह दिया है कि इनमें चम- त्कार नहीं होता है अतः इन्हें अलक्ारके रूपमें नहीं स्वीकार करना चाहिये, उसीके विरोधमें- 'हेतुश्च सूक्ष्मलेशौ च वाचामुत्तमभूषणम्' कहा गया है। दण्डीके कथनका लक्ष्य यह है कि इनमें अलक्कार होने की योग्यता है, इनसे अर्थकी अलठ्कृति होती है, फलतः इनमें चमत्कार है, तब इनको अलक्कार मानना ही चाहिये। इस कारिकामें दण्डीने हेतु अलक्वारका लक्षण नहीं कहा है, केवल भेद बताना प्रारम्भ कर दिया है, जिसका अभिप्राय यह है कि हेतु अपने नामसे ही अपना लक्षण कह रहा है। अभि- पुराणमें हेतुका लक्षण यह है :- 'सिषाधयिषितार्थस्य हेतुर्भवति साधकः।' भोजराजने हेतुका लक्षण यह कहा है :- 'क्रियायाः कारणं हेतुः।' १. च नैक।

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द्वितीय: परिच्छेद: १६x

शास्त्रीय हेतु दो प्रकारके होते हैं-कारक और सापक, स्वतः कार्यको निष्पन्न करनेवाला कारक हेतु है और दूसरों द्वारा निष्पादित वस्तुको बोधित करानेवाला नापक हेतु है। कारक हेतुका उदाहरण-अभनि धूमका कारक हेतु है। ज्ञापक हेतु-धूम अभिका श्ञापक हेतु है। यह हेतु और प्रकारसे बहुविध हो जाता है। आचार्य दण्डी इसी हेतुमें काव्यलिङ्, अनुमान, कार्यकारणमूलक अर्थान्तरन्यास-इन नामोंसे व्यवहृत अलक्कारोंका अन्तर्भाव कर लेते हैं, अत एव दण्डीने इनके अलगसे लक्षणादि नहीं किये हैं। २३५ ।। अयमान्दोलित प्रोढ़ वन्दनद्गुमपलब: उत्पाद्यति सर्वस्यं प्रीति मजयमारुत: ॥ २३६॥ कारकहेतुमुदाहरति-अयमिति। आन्दोलिता: स्पृष्टाबालिताथ प्रोढानां चन्दन- दरुमाणां पल्लवा येन तादृशोऽयं मलयमारुतः सर्वस्य प्रीतिमुत्पादयति जनयति, अत्र वायु- विशेषणं तस्य सुगन्धत्वादिगुणद्योतनार्थ, तेन च प्रीतिजननसाम्थ्य द्योत्यम्। भतोऽत्र चमत्कार कहेतूपन्यासात् हेतुर्नामालद्वारः।। २३६।। हिन्दी-विज्वाल चन्दनद्रुमके पत्तोंको हिलानेवाली यह मलयवायु सबके हृदयमें प्रसन्नता उत्पन्न कर रही है। इस उदाहरणमें प्रीतिजनन का हेतु-चन्दनपल्लवान्दोलनजात सुगन्धत्वादि बड़े चम- स्कारकरूपमें निबद्ध किया गया है, अतः यहाँ हेतु अलक्कार है॥ २३६॥ प्रीत्युत्पादनयोग्यस्य रूपस्यात्रोपनृंहणम् । अलक्कारतयोदिष्टं नितृत्तावपि तत्समम् ॥२३७ ॥ उक्त उदाहरणेऽलङ्कारं प्रसज्जयति-प्रीत्युत्पादनेति। अत्र उक्तश्लोके प्रीत्युत्पादन- योग्यस्य परमानन्दजननसमर्थस्य चन्दनद्वुमपल्लवान्दोलनजन्यसारभसमृद्दत्वस्य रुपस्य वायुस्वरूपस्य उपबृंहणम् वैचित्र्यजनकोमन्यासोऽसि्ति, तेनात्र वैचित्र्यकृतमलङ्कारत्वमिष्टम्, एवमेव निवृत्तावपि। तदाह-निवृत्तावपि। अयमाशयः-उत्पादने हेतुरिव निवृतावपि संभवति हेतु:, तत्रापि वैचित्र्ये सत्यलक्कारत्वं मन्तव्यमेवेति भावः ॥ २३७ हिन्दी-उक्त उदाइरणमें प्रीत्युत्पादनयोग्यवायु का रूप चमत्कारक रूपमें कहा गया है, भतः हेतुका चमत्कारजनकरूपमें उपन्यास होनेसे यह हेत्वलक्कार है। इसमें क्रियाकी उत्पत्तिका हेतु वर्णित है, इसी तरह कियाकी निवृत्तिमें हेतुके वर्णनमें भी चमत्कार होने से यह हेतु मलद्दार होगा, जिसका वर्णन अगले उदाहरणमें किया जायगा॥ २३७ ॥ चन्दनारण्यमाधूय स्पृष्टा मलयनिशेरान। पथिकानामभावाय पवनोऽयमुपस्थितः ॥२३८॥ निवुत्तौ हेत्वलङ्कारमुदाहरति-चम्दनेति। चन्दनारण्यम् चन्दनवनम् आरधुय कम्पयित्वा मलयनिर्झरान् मलयाचलपातिपयःप्रवाहान् स्पृष्टा च अयं पवनः पथिका नामू विरहिपान्थानाम् अभावाय विनाशाय उपस्थितः भायातः। अत्र पथिकवधरूप- निवृत्तिं प्रति वायोः कारणत्वमुपन्यस्यत इति हेतुर्नामालहारः।। २३८।। हिन्दी-चन्दनवनका कम्पन करके और मलयपर्वतसे गिरनेवाले झरनोंको छूकर यह वायु बिरडी पान्योंके अमावके लिये उपस्थित हुआ है। इस उदाहरणमें पथिकवमरूप निवृत्तिके लिये वायुकी उपस्थितिरूप चमत्कारी हेतुका निर्देश किया गया है, अतः हेलकट्ार है।। २३८।। १. लोकस्य। २. दक्षिण।

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१६६ काव्यादर्श:

अमावसाधनायालमेवंभूतो हि मारव:। जने ॥। २३९ ॥ यथा कस्यापि पदार्थस्य भावसाधने हेतुर्युज्यते, तथैवाभावसाधनेऽपि, तत्रायमान्दो- लितप्रौडचन्दनद्वुमपञ्लवः इत्यत्र प्रीतिरुपस्य वस्तुनो भावसाधनहेतुरुक्तः, अत्ोदाहरणे भभावसाधनहेतुरुकः, तदेव सभ्मय्य बोधयति-अभावेति। एवंभूतः चन्दनवन- सम्पर्केण सुरभिनिर्शरस्पर्शेन च शीतलोऽयं मारुतः पवनः विरहज्वरेण वियोगकृततापेन सेम्भूतं जातं मनोहारोचकं शीतलसुरभिवातादिमनोहरवस्तुविषयद्वेषो यस्य तादृशे- वियोगखिल्तया तादशेऽपि पवने खिदमाने जने अभावसाधनाय तदपायं कर्तुम् अलं सम्थ: । एतेन वायुना पान्या व्यापादन्ते इत्यर्थः। अत्राभावसाधने चमतकारकहेतूपन्यासो विशदीकृतो बोष्यः ॥। २३९॥ हिन्दी-बन्दनारण्यको कँपाकर और मलयाचलपाती निर्झरको छूकर आनेवाली वायु विरहसन्तापसे खिन्न होकर रमणीय वस्तुपर द्वेष रखनेवाले वियोगीजनके अभावके लिये समर्थ है, यहाँ इतना जानना आवश्यक है जिस प्रकार भावकार्य प्रति ललितकारणोपन्यासमें हेतु अलद्वार होता है, उसी प्रकारसे अभावकार्य-निवृत्तिमें ललितकारणोपन्यासमें भी होता है। यह उदाहरण निवृत्तिविषयक हेतुका है।। २३९ ।। निवस्यें व विकायें च हेतुत्वं तद्पेक्षया। प्राप्ये तु कर्मणि प्रायः क्रियापेक्षैव हेतुता ॥ २४० ॥ प्रायो हेतवो द्विविधा: क्रियार्थसम्पादकाः, कर्मार्थसम्पादकाथ, तत्र क्रियार्थसम्पादकेषु कारषश्ञापयभेदेन हेतूनां प्रकारद्वयम्, तत्रापि कारवहेतूनां प्रकारद्वितर्यं भवति, उत्पत्ति- निवृत्िविषय मेदात्, तयोरदाह रणमुत्तम्, सम्प्रति कर्मार्थसम्पाद कहे तूनामुदाहरणनि दर्श- यितुमाह-निर्वस्यें इति। कर्म निविधं, निर्दस्य विकार्य प्राप्यक, तत्रादयोरद्योस्तद- वेक्षया हेतुत्व भवति, निर्वत्यविकार्यवर्मसम्पादनाय हेतुत्वं भर्वत, प्राप्ये तु कर्मणि प्रायो भूयसा क्रियाऽरेक्षा एव हेतुता वियामात्रमेव तत्र हेतुसाध्यमिति। निर्दश्यें विकार्ये न कर्मणि हेतवी निर्दत्यविकार्यरपे कर्मभूते वस्तुनी निष्पादयन्ति, प्राप्ये तु क्रियामात्रं जनयन्ति न वस्तुरूपं किमपि। लदुक्तम्-'क्रियाकृतविशेषाणं सिद्धियंत्र न दृश्यते। दर्शनादनुमानाद्वा तत् प्राप्यमिति कथ्यते ।I' इति। यदसख्ायते पूर्व जन्मना यत्प्रकाशते। तभनिवत्य विकार्य च द्वेधा कर्म व्यवस्थितम्॥ प्रकृत्युच्छेदसभूरत किष्चित् काष्टादिभस्मवत्। किश्चिद् गुणान्तरोत्पत्या सुवर्णादिविकारवत् ॥। इति च। निर्वस्ये कर्म यथा-कटं करोति, वरनं वयाते। अत्र पूर्वमसतः कटवल्मादेर्जन्म। विकार्य द्विभिशम, प्रकृत्युच्छेदकं प्रकृती गुणान्तराधायकं चं। उच्छेदकं यथा-काष्ठ मस्म करोति। गुणान्तराधायरकं यथा-सुव्ण कुण्डलं करोति। १. संवाप। २. मदनाग्न्यातुरे जने।.

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द्वितीय: परिच्छेद: १६७

एतत्प्रकारद्वयभिलं प्राप्यं कर्म, यथा प्रामं गच्छति, सूर्य पश्यति। तथा च निर्वत्य- विकार्ययो: पूर्वावस्थातो विशेषदर्शनादन्यहेत्वपेक्षा भवति, प्राप्यस्थले तु केवलक्रिया- मात्रापेक्षा॥ २४० ॥ हिन्दी-हेतु दो प्रकारके हैं, क्रियार्थसम्पादक और कर्मार्थसम्पादक। क्रियार्थसम्पादक हेतु कारक च्ापक भैदसे दो प्रकार का होता है, उनमें भी कारक हेतुके उत्पत्ति-निवृत्तिरूप विषय- भेदसे दो प्रकार होंगे, उनका उदाहरण दिया जा चुका है। अब कर्मार्थसम्पादक हेतुओंके उदाहरण दिये जायेंगे। कर्मके तीन प्रभेद हैं-निर्व्त्य, विकार्य और प्राप्य। निर्व्त्त्य कर्म वह है जो पहले नहीं था, अभी क्रियाओं द्वारा निष्पन्न होता हो, जैसे-'कटं करोति', 'वररं वयति' यहाँ पर कट और वख पहले नहीं होते, तत्काल क्रिया सें बनते हैं। विकार्य कर्भ दो प्रकार का होता है :- एक वह जो प्रकृतिके नाशसे बनता हो, जैसे-'कार्ष भस्म करोति', यहाँ पर काष्ठरूप प्रकृतिके नाशसे ही मरमरूप कर्म उत्पन्न होता है। दूसरा वह जो प्रकृतिमें गुणान्तरकी उत्पत्तिसे हो, जैसे 'सुवर्ण कुण्डलं करोति'। यहाँ पर प्रकृति सुवर्णमें गुणान्तर वर्त्तुलत्वादिके उत्पन्न होनेसे कुण्डल रूप कर्म बनता है। प्राप्य कर्म वह है जिसमें क्रियाकृत विशेषका ज्ञान देखने या अनुमान करनेसे न हो सके, जैसे 'ग्रामं गच्छति' 'सूर्य पश्यति', यहाँ पर ग्राम और सूर्य रूप कर्ममें गमन और दर्शन क्रियासे कुछ विशेष नहीं होता है। इस प्रकारसे निर्वरत्य और विकार्य करमोंमें पूर्वावस्थासे विशेष होता है अतः हेत्वन्तरकी अपेक्षा होती है, इसीलिये तदपेक्षहेतुत्व-अर्थात् वस्त्वपेक्षहेतुत्व हुआ करता है, प्राप्य कमेमें कुछ विशेष नहीं होता, अतः वजँ क्रियापेक्षहेतुत्व हुआ करता है॥ २४० ।। हेतुर्निर्वर्सनीयस्य दर्शित: शेषयोद्योः। दस्वोदाहरणद्वन्द्वं शापको वर्णयिष्यते॥ २४१॥ हेतुरिति। निर्वर्त्तनीयस्य कर्मणः निर्वर्त्यकर्मणः हेतुः दर्शितः 'अयमान्दोलितप्रौढ- चन्दनद्रुमपल्लवः' इत्युदाहरणे विशदीकृतः, शेषयोद्वयोः विकार्यप्राप्ययोः उदाहरणद्वर्य दत्त्वा प्रदर्श्य ज्ञापको हेतुर्वर्णयिष्यते ॥ २४१॥ हिन्दी-कर्म-तीन प्रकारके माने गये हैं निर्व्स्य, विकार्य और प्राप्य। तदनुसार कारकहेतु तीन प्रकार का होगा। उनमें कार कहेतुप्रभेदभूत निर्वत्यकर्मविषयक हेत्वलक्कारका उदाहरण-'अयमा- न्दोलित प्रौढचन्दनद्रुमपल्वः' यह दिया जा चुका है, बचे हुए विकार्थ और प्राप्य कर्मद्वयविषयक दो प्रकारके हेत्वलक्कारका उदाहरण बता दिया जायगा-इस प्रकार कारक हेतुका प्रकरण समाप्त कर दिया जायगा, अनन्तर ज्ञापक हेतुके उदाहरण दिये जायेंगे।। २४१॥ उस्प्रवालान्यरण्यानि वाप्यः संफुल्लपङ्कजाः। चन्द्र: पूर्णश्र कामेन पान्थडं ष्टेरविषं कृतम् ॥। २४२।। विकार्यहेतुमुदाहरति-उत्प्रवालानिति। उत्प्रवालानि उद्गतनूतनकिसलयानि भर- ज्यानि वनानि, संफुल्लपक्कजाः विकसितकमला: चाप्यः, पूर्णः सम्पूर्णमण्डलवन्द्रथ कामेन पान्थटृष्टेः पथिकजननयनस्य विषं कृतम् विषरूपेण परिणमितम्। भत्रारण्यादिषु विषरूप- विकारत्वमारोपितम् ॥।२४२॥।

१. कालेन। २. दृष्टिविषं।

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१६= काव्यादर्श-

नवकिसलययुक्त कानन, विकसित कमलवाले तालाब, एवं सम्पूणमण्डल चन्द्रमाको कामदेवने पथिकोंकी दृष्टिके लिये विषरूपमें परिणत कर दिया है। यहाँ नवकिसलययुत काननादिमें विषरूप विकारत्व आरोपित हुआ है, अतः यह विकार्यविषयक हेतुका उदाहरण हुआ ॥ २४२॥ मानयोग्यां करोमीति प्रियस्थानस्थितां सखीम्। पाना भ्रुभङजिझाक्षी पश्यति स्फुरिताधरा॥२४३॥ प्राप्यहेतुमुदाहरति-मानयोग्यामिति। मानयोग्याम् मानस्याभ्यासम् करोमि इति विचार्य प्रियस्थानस्थिताम् प्रियतमत्वेन कल्पिताम् सखीं वयस्याम्-बाला अप्रौठा अप्राप्तमा- नशिक्षा वनिता भ्रभन्ञजिद्याक्षी भ्ुकुटिकुटिलनेत्रा स्फुरिताधरा चलदोष्ठपुटा च सती पश्यति निरीक्षते। अत्र पश्यतिक्कियया सखी न निष्पाद्यते न वा विक्रियते इति सखी प्राप्यकर्म। तदिष्यकदर्शनकिमापेक्षयेव बालाया हेतुत्वमिति प्राप्यहेतुगतोऽयं हेत्वलक्कारः ।। २४३।। हिन्दी-किली बाल वनिलाने मान करनेका अभ्यास करती है ऐसा विचार करके अपनी सकीको प्रियतमके रूपमें मान लिया है, और उसकी ओर भुकुटि, वक्नेत्र तथा स्फुरिताधर होकर देख रही है। इस उदाहरणमें सखीरूप कर्म प्राप्य है क्योंकि उसमें क्रियाकृत विशेषका सर्वया अमाव है, यहँ वाला केवल सलीविषयक दर्शनक्रिया करनेके कारण हेतु है, इसे प्राप्यकर्भविषयक हेखकड्ार मानना नाडिये।। २४३।। गतोऽस्तम्को भातीन्दुर्यान्ति वासाय पक्षिणः। छतीद्मपि साध्त्रेष कालावस्थानिवेद्ने ॥ २४४ ॥ सम्प्रति ज्ञापकहेतुमुदाहरति-गतोऽस्तमिति। अरकः अस्तंगतः, इन्दुशन्द्रो भाति प्रकाशते, पक्षिणः वासाय निवासस्यानमुद्दिश्य यान्ति प्रतिष्ठन्ति। इति इदम् अपि काळावस्थाया: सायंकालिकस्थितेर्निवेदने ज्ञापने साधु एव चमत्कारजनकं भवत्येव। तथा नात्र सापकहेत्यळद्टार इत्युक्त भवति॥। २४४ ।। हिन्दी-सूर्य अस्त हो गये, चन्द्रमा प्रकाशित हो रहे हैं, पशीगण निवासस्थानकी ओर चल रहे है, यह वर्णन समयकी स्थिति-सायंकालका ज्ञापन कराता है, अतः यह शापक हेसुका उदाहरण हुआा। 'सम्प्रति सन्ध्यासमय है' ऐसा कहने से चमत्कार नहीं होता है, परन्तु 'गतोऽस्तमर्को भातीन्दुः' इत्यादिं वाक्य कहनेसे चमत्कारिक रूपमें समयकी सूचना होती है, अतः इसे शापक- हेलब्द्ारका उदाहरण माना गया हैं।। २४४।।

देशोष्ममिः सुषोघं ते सझि कामातुरं मनः ॥२४५॥ शप्यस्य शब्देनोपादाने शापकहेतुमाह-अवध्यैरिति। हे सखि, इन्दुपादानाम् पन्द्रकिरणानाम् भवष्येः अविनाशनीयेः (शमयितुमशक्यः) चन्दनाम्भसाम् मलयजर- सानाम् अखाष्येः अनपनेयेः (दूरीकर्तृमशक्येः) देहोष्मभिः शरीरसन्तापैः से तव भमानुरं मदनपीितं मनः सुबोधम् सुज्ञेयम्। हे सखि, चन्द्रकरैरप्यशम्यैबन्दनरसै- बाप्यनपनेये: शरीरसन्तापैस्तव मनसो मदनपीडितत्वं सुखावगम्यमित्यथः। अत्र श्ञाप्यं मनसः कामातुरत्वं तब देहोष्मभिर्शञायते ॥। २४५। १. रथाने स्थितां। 2. अवन्धयैः। १. म्मसा।

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द्वितीय: परिचछ्ठेद: १६६

हे सखित्रि, चन्द्रमाकी किरणों से भी नहीं मिटनेवाली और चन्दनद्रवसे भी नहीं शान्त होनेवाली यह तुम्हारे शरीरकी गर्मी तुम्हारे हृदयका कामातुरत्व सुखसे बता रही है, यहाँ शापक हेतु है देहकी गर्मी और उससे श्ञाप्य है हृदयका कामातुरत्व। यहाँ श्ञाप्य हृदयका कामातुरत्व शब्दोपात्त है। यह ज्ञापकहेत्वलङ्कारका स्पष्ट उदाहरण है॥ २४५॥ इति लक्ष्या: प्रयोगेषु रम्या झापकहेतवः। अभावहेतव: केचिद् व्याहियस्ते मनोहराः ॥२४६ ॥ भावहेतुमुपसंहरति-इतीति। इति एवम् प्रयोगेषु कविकृतनिबन्धेषु रम्याः हृदय- अमाः ज्ञापकहेतवः लच्याः ज्ञातव्याः। तदेवं भावहेतवो निरुक्ताः। सम्प्रति केचित् कतिपये मनोहराः अभावहेतवो व्याहियन्ते अभिधीयन्ते। अभावक् चतुर्बिध: प्रषिद्ध एवेति तन्मूलकस्यास्याभावहेत्वलङ्कारस्यापि वातुर्विध्यं स्वतःसिद्धं ज्ञातव्यम् ॥/२४६ ॥ हिन्दी-इस प्रकारसे मनको भले लगनेवाले श्ञापक हेतुको कवियोंके निबन्धोंमें समझ लेना चाहिये। (इस प्रकार यह भावहेतुका प्रकरण समाप्त हुआ) अब कुछ अभावहेतुके उदाहरण बताये जा रहे हैं॥ २४६ ।। अनभ्यासेन विद्यानामसंसगेण धीमताम्। अनिग्रहेण चाक्षाणां जायते व्यसनं नृणाम् ॥ २४७॥ अभावहेतुनुदाहरिष्यन्प्रथमं प्रागभावहेतुमाह-अनभ्यासेति। बिद्यानाम् ज्ञान- साधनान्वीक्षिक्यादिशास्त्राणाम् अनभ्यासेन अपरिशीलनेन, धीमताम् पण्डितानाम् असंस- र्गेण, अक्षाणाम् इन्द्रियाणाम् च अनिग्रहेण असंयमेन नृणाम् व्यसनं दुष्कर्मरतिर्जायते। अत्र विद्यादीनां यावभनागमस्तावद् व्यसनं भवतीति विद्यादिप्रागभावस्य व्यसनहेतुतोक्त्या हेत्वलङ्कारः।। २४७।। हिन्दी-आन्वीक्षिकी आदि शास्त्रोंके अनभ्याससे, पण्डितोंके असंसर्गते, एवम् इन्द्रियों के असंयमसे मनुष्योंमें व्यसन पैदा होते हैं। यहाँ पर व्यसनकी उत्पत्तिमें विद्याभ्यास, पण्डितसंसर्ग, एवम् इन्द्रियके संयमका प्रागभाव कारणरूपमें निर्दिष्ट दुआ है, अतः यह प्रागभावहेत्वलक्कार हुआ। मनुस्मृतिमें भठारह व्यसन लिखे गये हैं- मृगयाक्षो दिवास्वाप: परोवाद: स्ित्रियो मदः। तौर्यत्रिकं वृथाट्या च कामजो दशको गणः।। पैशुन्यं साइसं द्रीह र्ईर्ष्यास्यार्थदूषणम्। वाग्दण्डजं च पारुष्यं क्रोधजोडपि गणोऽटकः ॥२४७॥ गतः कामकथोम्मादो गलितो यौवनउवर:। संतो मोहश्व्युता तृष्णा कृतं पुण्याश्रमे मनः ॥ २४८॥ प्रण्वंसाभावहेतुमुदाहरति-गत इति। कामकथा रतिविलासचर्चा तत्र यः उन्माद: व्यासभ: सः गतः निवृतः, यौवनज्वरः युवावस्थाजन्योष्मा गलितः दूरीभृतः। मोहः धनगृहस्त्रोपुत्रादि ममताबुद्धि: क्षतो नष्टः, तृष्णा विषयस्पृहा च्युता लुप्ा, अतः पुण्याश्रमे संन्यासे मनः कृतम् निश्चयः कृतः । अत्रोन्मादादीनां प्रथ्वंसाभाव एव चतुर्थाश्रमस्वीकारे हेतुत्वेनोक इत्ययं प्रथ्वंसाभावहेत्वलङ्कारः।। २४८।। हिन्दी-हमारे हृदयसे कामकथाकी आसक्ति जाती रही, जवानीकी गर्मी भी उतर गई, मोह नष्ट हो गया, विषयस्पृषा निकल गई, मैंने अब संन्यासरूप पुण्याश्रममें प्रवेश करनेका १. सम्यक्। २. क्रियन्ते। ३. इतः ।

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१७० काव्यादर्श:

निश्चय कर लिया है। इस उदाहरणमें कामकथोन्मादादिके प्रध्वंसामावको पुण्याश्रमप्रवेशके प्रति कारण बताया गया है, अतः यह प्रध्वंसाभावहेत्वलङ्कार हुआ ॥। २४८॥ वनान्यमूनि न गृहाण्येता नदो न योषितः। मृगा इमे न दायादास्तन्मे न्दति मानसम् ॥ २४२॥ अन्योन्याभावहेतुमुदाहरति-घनान्यमूनीति.। अ्रमूनि चित्तशान्तिजनकानि वनानि आश्रमकाननानि, गृहाणि चित्तोद्वे गकराणि गृहाणि न, एताः स्वच्छसलिलतया मनःप्रसाद- करा: नदः योषितः मनश्वपलतासंपादिका: स्त्रियो न, इमे मृगाः मधुरवृत्तयो हरिणाः दायादा: मत्सरप्रस्ताः सम्बन्धिजना: न, तत् तस्मात् (अत्र वने) मे मम विरक्तस्य मानसं नन्दति सन्तोषमनुभवति। अत्र वनगृहादीनामन्योन्याभावेन मनस्तोषोपपादना-

हिन्दी-यह वन है ( जहाँ चित्तको शान्ति मिलती है) चित्तको उद्विन् कर देने वाला घर नहीं है, यह (स्वच्छप्रवाहा मनोहर) नदियाँ हैं (हृदयको चज्ल कर देने वाली) स्त्रियाँ नहीं हैं, और यह (सरल) मृग हैं ( मत्सरसे भरे) दायाद नहीं हैं, इससे मेरा हृदय यहाँ तुष्ट होता है। इस उदाहरणमें वन गृहका अन्योन्याभाव (भेद-अन्तर) मनस्तुष्टिके प्रति कारणतया कहा गया है अतः यह अन्योन्याभावहेत्वलक्कार हुआ ॥ २४९॥ अत्यन्तमसदार्याणामनालोचितचेष्टितम् । अतस्तेषां विवर्धन्ते सततं सर्वसम्पदः ॥ २५०॥ अत्यन्ताभावहेतूदाहरणमाह-अत्यन्तमसदिति। आर्याणां सत्पुरुषाणाम् अना- लोचितचेष्टितम् अविमृश्यकारित्वम् अत्यन्तम् असत् सर्वया न भवति, सन्तो हि कदाचिदपि विना विचारेण न प्रवर्त्तन्ते इत्यर्थः । अतः अविचार्यकारिताया नितान्त- विरहादेव तेषाम् सर्वसम्पदः सर्वविधा समृद्धयः सततं सर्वदा विवर्धन्ते अधिकीभवन्ति, अत्राविमृश्यकारिताया अत्यन्ताभावस्य संपद्वृद्धिं प्रति कारणत्वोक्त्या अत्यन्ताभावहे- त्वलङ्कारः॥ २५० ॥ हिन्दी-आर्यजनोंमें अविमृश्यकारिताका नितान्त अभाव होता है, अतः आर्यजनोंकी सक तरहकी समृद्धियाँ सर्वदा बढ़ती रहती हैं। इस उदाहरणमें आर्यजनोंकी समृद्धिमें अविमृश्यकारिताका अत्यन्ताभाव कारणतया कहा गया है, अतः यह अत्यन्ताभावहेतु नामक अलक्कार हुआ ॥ २५० ॥

देय: पथिकनारीणां सतिलः सलिलाअलि: ॥२५१॥ इतः पूर्व भावप्रतियोगिकानां चतुर्णामभावानां हेतुत्वे हेत्वलक्कारा उदाहता सम्प्र- स्यभावप्रतियोगिकाभावस्य हेतुत्वे हेत्वलक्कारमुदाहरति-उद्यानेति। उद्यान सहकाराणां गृहर्सलग्नवाटिकावस्थितताम्रवृक्षाणं मजरी अनुद्धिषा अविकसिता न विकासं गतेत्यर्थ: एवं सति पथिकनारीणां पान्यस्त्रीणाम् वियोगिनीनाम् सतिल: सलिलाजलि: मरणोत्तर- कालदेयस्तिलतोयाजलि: देयः। पयिकस्त्रीणां मरणमुपस्थिरतं यतः सहकारमजर्यो नावि- कसिता इत्यर्थः। अत्र मजरीणामनुद्भेदाभावस्य मरणं प्रति हेतुतयोपन्यासादभावाभाव- हेत्वलडार:।। २५१॥

१. विवर्तन्ते।

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द्वितीय: परिच्छेद: १७१

हिन्दी-इससे पहले चार उदाहरणों द्वारा भावप्रतियोगिक अभावके हेतुत्वमें हेत्वलक्गारका प्रसङ् स्पष्ट किया गया है, अब अभावप्रतियोगिक अभावस्थलमें हेत्वलक्वारका उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है। उद्यानस्थित आम्रवृक्षोंकी मञ्जरियाँ अविकसित नहीं रह गई हैं, पथिकजनोंकी (वियोगिनी) स्त्रियोंको मरणोस्तरकालिक तिलतोयाअ्जलि देना ही है। अर्थात इन विकसित आम्रमअ्जरियों की उद्दीपकतासे पथिकस्त्रियोंका मरण अवश्यंभावी है। इस उदाहरणमें अविकसितत्वाभाव (विकासाभावके अभाव) को पथिकस्त्रीमरणमें कारणतया प्रकाशित किया गया है अतः यह अभावप्रतियोगिक अभावस्थलीय हेतु है। यहाँ अनुद्भेद = उद्धेद- प्रागभाव, तदभाव=प्रागभावाभावस्वरूप पड़ता है। इसी तरह प्रध्वंसाभावाभाव, अन्योन्याभावा. भाव, अत्यन्ताभावाभाव में हेत्वलक्कारके उदाहरण संभव हैं, जैसे-प्रध्वंसाभावाभाव में- 'पीनश्रोणि गभीरनाभि निभृतं मध्ये भृशोच्चस्तनं पायाद्वः परिरब्धमब्धिदुहित: कान्तेन कान्तं वपुः ।

यस्मै सोऽच्युतनाभिपद्मवसतिर्वेधा: शिवं ध्यायति ॥' इसमें विष्णुनाभिपङ्कजस्वरूप स्वावासके उपधाताभावको ब्रह्माके मनकी निर्वृतिके प्रति कारण- तया कहा गया है, उपघाताभाव-प्रध्वंसाभावाभावस्वरूप होगा, अतः यह प्रध्वंसाभावाभाव- स्थलीय हेतुका उदाइरण है। अन्योन्याभावाभावरमें- 'अवनिरुदकं तेजो बायुर्नभः शशिभारकरौ पुरुष इति यत् केचिद् भिन्ना वदन्ति तनूस्तव। तदनघ वचोवैचित्रीभिनिरावरणस्य ते विदधति पयःपूरोन्मीलन्मृषामिहिरोपमाम्।' इसमें भिन्न पदसे अन्योन्याभावका उपन्यास करके 'निरावरणस्य' 'मृषा' इन पदों द्वारा उसका निषेध कराया गया है, अतः वही अन्योन्याभावाभाव 'मिहिरोपमा' का समर्थन करता है, यही अन्योन्याभावाभावरूप हेतु अलक्कार है। अत्यन्ताभावाभावरमें- 'न विद्यते यदयपि पूर्ववासना गुणानुबन्धिप्रतिभानमद्भुतम्। श्रुतेन यत्नेन च वागुपासिता ध्रुवं करोत्येव क्मप्यनुग्रहम्।।' इसमें 'न विद्यते' इसके द्वारा प्रतिभाका अत्यन्ताभाव बताया गया, उसीका 'कमप्यनुग्रह्दम्' कडकर प्रतिषेध कर दिया गया, यही अत्यन्ताभावाभाव है, वही सरस्वतीकी उपासनाके कर्त्तव्यत्व- रूप कार्यका हेतु बताया गया है, अतः अत्यन्ताभावाभावहेतुनामक अलक्कार हुआ ॥ २५१॥ प्रागभावादिरूपस्य हेतुत्वमिह वस्तुनः । भावाभावस्वरूपस्य कार्यस्योत्पादनं प्रति ॥२५२ ॥ अभावहेतुमुपसंहरति-प्रागभावादीति। इह अत्र प्रकरणे प्रागभावादिरूपस्य प्रागभावप्रथ्वंसाभावात्यन्ताभावान्योन्याभावस्वरूपस्य वस्तुनः भावाभावस्वरूपस्य कार्य- स्योत्पादनं प्रति हेतुत्वम्, अर्थात् एषामन्यतमोऽभावः क्वचिद् भावकार्य प्रति क्वचि- बाभावकार्य प्रति हेतुतया वणिंतो भवतीत्यर्थः। तत्र भावरूपकार्य प्रति हेतुत्वेनोपन्यासो यथा-'अनभ्यासेन विद्यानाम्' इति पूर्वोक्ते। अत्र विद्याध्ययनप्रागभावस्य व्यसनरूप- भावकार्य प्रति हेतुर्त्व वर्णितम्। अभावरूपकार्ये प्रति हेतुत्वेनोपन्यासो यथा-'उधान-

१. स्वभावस्य ।

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१७२ काव्यादर्श:

सहकाराणाम्' इत्यत्र। तत्र हि-आममअरीविकासाभावाभावस्य पथिकवधूनामभावे कारणत्वेनोपादानम् ॥२५२॥ हिन्दी-यहाँ पर प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अत्यन्ताभाव, अन्योन्याभावरूप अभावचतुष्टय कहीं पर भावकार्यके प्रति कारणत्वेन प्रदशित होते हैं, और कहीं पर अभावकार्यके प्रति कारणत्वेन प्रदशित होते हैं, जैसे-'अनभ्यासेन विद्यानाम्' इस पूर्वोक्त उदाहरणमें विद्याध्ययन- प्रागभावको व्यसनरूप भावकार्यका कारण कहा गया है। इसी तरह-'उदयानसहकाराणाम्' इस उदाहरणमें आम्रमअ्जरी विकासाभावाभावको पथिकवधुओंके मरण-अभावरूप कार्यका कारण कहा गया है।। २५२॥। दूरकार्यस्तरसहजः कार्यानम्तरजस्तथा। अंयुक्तयुक्तकार्यो चेत्यसकृ्याश्ित्रहेतवः ॥। २५३॥ तेऽमी प्रयोगमागेंषु गौणवृत्तिष्यपाभयोः। अत्यन्तसुन्दरा इषास्तदुदाहतयो यथा ॥ २५४ ॥ सम्प्रतियावत्कारकज्ञापकहेतू निरूपिता, अथेदानी चित्रहेतु प्रभेदान्दर्शयितुमाह- दूरकार्य इति। दूरे कारय यस्य स दूरकार्य:, तत्सहजः तेन कार्येण सहजातः, कार्या- दनन्तरं जातः कार्यानन्तरजः, अयुक्तं कार्य यस्य सः अयुक्तकार्यः, तथा युर्क्त कार्य यस्य सः युक्त्तकार्य:, इति एवम् असंख्याः अगणनीयाः बहुविधा इत्यर्थः, चित्रहेतवः चित्राख्य- हेतुप्रभेदा जायन्ते। चित्राख्योऽयं हेतुः परिगणितो हेतुप्रभेदपरिगणने भोजराजेन-'क्रियायाः कारणं हेतुःः कारको ज्ञापकस्तथा। अरभावश्चित्रहेतुश्च चतुर्विध इहेष्यते' इति। ननु कार्याद्विदूरस्य, सहजस्य, तदनन्तरजस्य वा हेतोर्हेतुत्वमेव न सिद्धयति, कार्या- पेक्षया हेतोः सन्निकृष्टत्वस्य पूववर्त्तित्वस्य चावश्यकत्वादिति शङ्कामपनुदति-तेSमी इति। तेऽ्मी पूर्वोक्ताः दूरकार्यादयो हेतवः गौणवृत्तिव्यपाश्रयाः सारोपगौणलक्षणाSS- लम्बना: प्रयोगमार्गेषु कविजननिबन्धेषु अत्यन्तसुन्दरा दृष्टा अतः तदुदाहरणानि वक््यन्ते। चित्रहेतवो महाकविनिबन्धे सारोपलक्षणां निमित्तीकृत्य चमत्कारकरा दृष्टा अतस्तेषामुदाहरणानि प्रक्रम्यन्त इत्यर्थ: ॥ २५२-२५४॥ हिन्दी-अभीतक कारकज्ञापक हेतुओंका निरूपण किया जाता रहा है, अब चित्रहेतुका निरूपण किया जायगा। चित्रहेतुके बद्ठुत प्रभेद हैं-दूरकार्य, तत्सहज, कार्यानन्तरज, अयुक्त कार्य एवं युक्त कार्य। भोजराजने-चित्रहेतुका नाम हेतुप्रभेदोंमें लिया है, यह उसीका प्रपश्न है। यहाँ शक्का की जा सकती है कि कार्य और कारणमें सन्निकृष्टत्व एवं कार्यापेक्षया कारणका पहले रहना व्यवस्थित है, फिर यह दूरकार्य, तत्सहज, कार्यानन्तरज आदि प्रमेद कैसे हो सकते हैं ? इसका उत्तर इस कारिकामें दिया जायगा। यह चित्रप्रभेद दूरकार्य आदि सारोपलक्षणा- का अवलम्बन करके बनते हैं और महाकवियोंके निबन्धोंमें बड़े चमत्कारक बनते हैं, अतः इनका उदाहरण दिया जायगा। इन्हें सारोपगौणलक्षणासे जीवन मिलता है, उसमें कहीं कार्यमें गौणलक्षणा हुई रहती है जैसे-'प्रागेव हरिणाक्षीणामुदीरणों रागसागरः' यहाँ सागरका आरोप राग में हुआ है। राग चन्द्रोदयका कार्य है। कहीं पर कार्य और कारण दोनोंमें आरोप होता है, जैसे-'राजां इस्तारविन्दानि'॥ २५३-२५४॥

१. अयुक्तो युक्तकारी। २. गौणमार्गव्यपाश्रयाद्।

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द्वितीय: परिच्छेद: १७३

स्वद्पाङ्ाडयं जैन्रमनन्ारत्रं यद्ङ्गने। मुक्तं तदम्यतस्तेन सोऽप्यंहं मनसि क्षतः ॥। २५५॥ दूरकार्य हेतुमुदाहरति-त्वदपाक्केति। हे अपने प्रशस्तगात्रि, त्वदपाप्गाह्वयम् त्वदपाञसंज्ञकम जैत्रम् विजयसाधनम् यत् अनभास्नम् कामदेवस्यास्रम, तत् त्वया अन्यतः मद्धिनं जनमुद्दिश्य मुक्तम्, तेन त्वदपाहरूपमदनास्त्रण सः लक्ष्यीकृती जनः अ्रहम् अलच््यीकृतो मह्क्षणश्च जनः मनसि क्षतः आरहतः। अत्र अपाहेडस्नत्वारोपः, तस्य चात्त्रस्य लक्ष्यवेधरूपं कार्य सन्निहितम्, अल््यवेधरूपन्च विदूरम्, इति दूरकार्यस्य भवतीदमुदाहरणम्। इदध देशदूरत्वे उदाहरणम् ॥ २५५॥ हिन्दी-हे सर्वावयवानवद्ये, तुम्हारा जो यह अपाङ्गरूप कामदेवका विजयकारी अस्त्र है, उसे तुमने किसी अन्यको लक्ष्य करके चलाया, परन्तु उस अरसे लक्ष्यभूत वह जन तथा मैं भी मनमें आहत हो गया। इस उदाहरणमें अस्का लक्ष्यवेधरूप कार्य समीपस्थ है, और अलक्ष्यवेधरूप कार्य दूर है, अतः यह दूरकार्यहेतुका उदाहरण हुआ। इसमें दैशिकदूरता है, इसी प्रकारसे कालिकदूरतामें उदाहरण दिया जा सकता है, यथा- 'अनश्नुवानेन अस्पृष्टखड्गत्सरुणापि चासीद्रक्षावती तस्य भृजेन भूमिः ।' उस राजकुमारके हाथने युगकी उपमा नहीं पाई, धनुष चलानेका अभ्यास नहीं किया, तलवारकी मूठ नहीं पकड़ी, फिर भी उससे पृथ्वी सुरक्षित रही। यहाँ पर यौवमकार्य पृथ्वीरक्षण बाल्यमें ही किया गया है, अतः कालिकदूरकार्यहेतुका यह उदाहरण है॥ २५५॥ आविर्भवति नारीणां वयः पर्यस्तशैशवम्। सहैव विविधैः पुंसामङजोन्मादविभ्रमैः ॥२५६॥ सहजहेतुमुदाहरति-आविर्भवतीति। नारीणां पर्यस्तशैशवम् दूरीकृतबाल्यम् वयः यौवनम् पुंसाम् कामिजनानाम् विविधैः नानाप्रकारकैः अभ्जोन्मादविभ्रमैः कामकृत- मनोविकारविलासैः सहैव आविभवति प्रकटति, नारीणां यौवनं पुसां कामकृतमनोविकारै: सहैवोदयते इत्यर्थः। अत्र मनोविकारो यौवनस्य कार्य, तत्स्वकारणेन यौवनेन सहैव जायमानत्वेन वणितमिति सहजहेतोरुदाहरणमिदम् ॥२५६ ॥ हिन्दी-नारियोंकी बाल्यावस्थाको दूर भगानेवाली युवावस्था कामिजनोंके कामजनित मनो- विकारोंके साथ ही प्रकट होती है। इस उदाहरणमें युबावस्था कारण है और कामजनित मनोविकार कार्य है; कारयसे कारणको पहले होन। चाहिये, परन्तु आशुभाविताकी अभिव्यक्तिके लिये दोनोंको एक साथ प्रकट कराया गया है, यह सहजहेनुका उदाहरण हुआ, क्योंकि कार्य और कारण एक साथ हुये है॥ २५६ ॥ पश्चात् पर्यस्य किरणानुदीर्ण चन्द्रमण्डलम्। प्रागेव हरिणाक्षीणामुदीणो रागसागरः ॥ २५७॥ कार्यानन्तरजं हेतुमुदाहरति-पश्चादिति। किरणान् मयूखान् पर्यस्य समन्ततःप्रसाय चन्द्रमण्डलं पश्चात् (रागसागरोदीरणानन्तरम्) उदीर्णम् उदितम्, हरिणाक्षीणाम्

१. मङ्गलाखं। २. सोसम्यहं।

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१७४ काव्यादर्श:

रागसागरः प्रागेवोदीर्णः वनितानां कामाभिलाषरूपस्समुद्र: पूर्वमेव उच्छलितः। अ्रत्र समुद्रोच्छलनस्य कारणत्वेन प्रसिद्धथ्चन्द्रोदय:, स हि पूर्वमपेदयते, परन्तु पश्ाद्धावितवेन वणित इति कार्यान्तरजहेतूदाहरणमिदम् ॥२५७॥ हिन्दी-किरणोंको फैलाकरके चन्द्रमण्डल पीछे उदित हुआ, उससे पहले ही कानिनियोंके हृदयमें कामाभिलापाका समुद्र लहराने लगा था। चन्द्रमाका उदय रागोद्दीपक है। उदयरूप कारणसे पूर्व ही रागसागर लहराने लगा, यह कार्यानन्तर जहेतु है॥ २५७ ॥ जां हस्तारविन्दानि कुड्मलीकुरुते कुतः। देव त्वच्चरणद्वन्द्वरागवालातप: स्पृशन् ॥ २५८॥ भयुक्तकार्य नाम हेतुमुदाहरति-राश्षामिति। देव, राजन्, त्वचरणद्वन्द्वस्य त्वदीय- चरणयुगलस्य रागः रक्तिमा एव बालातपः प्रभातकालिकसूर्यरश्मिः, स्पृशन् रपर्श कुर्बन सन् राशां हस्ता एव अरविन्दानि कमलानि कुतः कुडमलीकुरुते मुकुलयति। बालातप- स्पर्शों हि कमलानां विकासाय भर्वात, न सद्कोचाय, अ्रन्नारविन्दसङ्कोचकत्वं प्रतिपाथमानं बालातपस्यायुक्तमिति अयुक्तकार्यो हेतुः। हस्तकमलानां मुकुलीभावश्च प्रगामाय भवतीति बोध्यम् ॥ २५८ ॥ हिन्दी-देव, आपके चरणपुगलकी रक्ततारूप वालातप स्पर्श करके अन्य राजोंके हाथरूप कमलको मुकुलित क्यों कर देना है? बालातास्पर्शसे कमल विकसित होते हैं, मुकुलित नहीं, यहाँपर प्रणामके लिए मुकुलीभावका वर्णन किया गया है, यह अयुक्तकार्यहेतु है॥ २५८॥ पाणिपश्मानि भूपानां सङ्कोचयितुमीशते। त्वत्पादनखचन्द्राणामचिषः कुम्दनिमलाः ॥ २५९ ॥ युर्तुकार्यहेतुमुदाहरति-पाणिपम्मानीति। त्वत्पादनखचन्द्राणाम् त्वदीयचरण- नखविधूनाम् कुन्दनिर्मला: कुन्दकुसुमस्वच्छा अचिषः कान्तयः भूपानां प्रत्यर्थिराजानाम् पाणिपद्ञानि करकमलानि सक्कोचयितुं प्रणामाज्जलिविधापनद्वारा मुकुलीकसंम ईशते समर्था भवन्ति। अत्र चन्द्रार्चिर्षा कमलसंकोचकत्वं युक्त्तमिति युक्तकार्यहेतूदाहरणमिदम्।।२५९॥ हिन्दी-आपके चरणनखरूप विधुकी कुन्दपुष्पके सदृश स्वच्छ कान्तियाँ अन्यान्य राज- गणके पाणिकमलको संकुचित करनेमें समर्थ हैं। आपके चरणोंमें सभी प्रणाम करते हैं, प्रणाम करनेसे हाथ संकुचित होते हैं। यहाँ चन्द्रकिरणोंका कमलसंकोचकत्व युक्त है, अतः यह युक्त- कार्यहेतुका उदाहरण हुआ ॥ २५९ ॥ इति ह्ेतु-विकल्पानां दर्शिता गतिरीहशी। (इति हेतुचक्रम्) उपसंहरति-इतीति। इतिः समाप्तिसूचनाय। ईदृशी एवंप्रकारा हेतुविकल्पानां हेत्वलक्कारप्रभेदानां गतिः पद्धतिः दर्शिता उदाहरणादिना प्रकाशिता। हिन्दी-इस प्रकारसे हेत्वलङ्गारके प्रभेदोंका दर्शन करा दिया गया।

१. रविवाला। २. विकल्पस्य ।

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द्वितीय: परिच्छेद: १७४

इद्विताकारलक्ष्योऽर्थः सौक्ष्म्यात् सूक्ष्म इति स्मृतः ॥२६०॥ कदा नौ सङ्गमो भावीत्याकी्णे वक्तुमक्षमम्। अवेत्य कान्तमबला लोलापनमं न्यमीलयत्॥२६१॥ पभ्मसंमीलमादत्र सूचितो निशि सग्गमः। आश्वासयितुमिच्छन्त्या प्रियमङजपीडितम्॥२६२॥ सूक्ष्मालद्कारं लक्षयति-इद्गिताकारेति। इजितं स्वाभिप्रायसूचकः शरीरचेष्टा- विशेष: आकारो हृदयाभिलाषसूचक आकारविशेष:, ताभ्यां लक्ष्य: साधारणजनदुर्जेयोऽपि सूज्मबुद्धिजनवेद्योऽर्थः प्रतिपाद्यविषयः सौद्षम्यात् अतिनिगूढत्वात् सूक्ष्मो नामालक्कारः स्मृतः, तथा च यत्र इत्िताकाराम्यां सूक्षमबुद्धिमात्रज्ञेयमर्धवर्णनं क्रियते, स सूष्मालङ्कार इति पर्यवस्यति। सोडयं सूक्षमो द्विवा, इज्वितेन सूक्ष्मार्थाभिधाने एकः आक्ारेण सुक्ष्मार्थाभिधाने च द्वितीयः ॥ २६०॥ तत्रेत्वितेन सूक्मार्थाभिधानं नाम सूक्ष्ममुदाहरति-कदा नाविति। कस्मिन्स- मर्ये नौ आवयो: संगमो भावी भविता इति आकीर्णे जनाकुल्ते स्थाने वत्तम् अक्षमम् प्रष्टुमपारयन्तम् कान्तम् अवेक्ष्य अबला कामिनी लीलापमं करधृतं क्रीडाकमलं न्यमी- लयत् संकोचितवती, कान्तेन लोकाकुज्ते स्थाने वाचाऽपृष्टमपि संगमकालं तदीयमुंखच्छा- यया पृष्टमिवाकलय्य बाला तमवेक्ष्य करस्थं लीलाकमलं समकोचयत्, तेन च तस्या: इ्वितेन चतुरः कान्तः सन्ध्यां सज्मकालमवगतवान्, इति भवति सूक्ष्मालङ्कारः ॥२६१॥ उदाहरणमुपपादयति-पद्मसंमीलनादिति। अत्र पूर्वोक्तोदाहरणे अञ्जपीडितम् कामसन्तप्तम् प्रियम् आश्वासयितुम् इच्छन्त्या बालया पद्मसम्मीलनात् करधृतक्रीडा- कमलसक्कोचनात् निशि सन्मो (भावीति) सूचितः। अत्र कमलनिमील नरूपेणेतितेन निशि भावी सप्म: प्रियाय सूक्ष्मतया सचित इति सूक्ष्मालक्ठारसमन्वयः ॥२६२॥ हिन्दी-इङ्गित-इशारा, (शरोरचेष्टाविशेष) एवम् आकार से यदि सूक्ष्म-साधारणतया अश्ञेय अर्थका ज्ञान हो, तो इसे सूक्ष्म नामक अलक्गार कहते हैं। वह दो प्रकारका है-१-इङ्ितसे सूक्ष्मार्थाभिधानमें और २-आकारसे सूक्ष्मार्थाभिधानमें। काव्यप्रकाशकारने सूक्ष्मालक्वारका स्वरूप दूसरा ही कहा है- 'कुतोऽ्पि लक्षितः सूक्ष्मोऽप्यर्थोऽन्यस्मै प्रकाश्यते । धर्मेण केनचिय्यत्र तत्सूक्ष्मं परिचक्षते ॥' आकार अथवा इङ्गित द्वारा किसी प्रकारसे लक्षित किये गये सूक्ष्म अर्थको यदि किसी असाधारण धर्मके द्वारा दूसरोंपर प्रकट कर दिया जाय तब सूक्ष्म होता है। काग्यप्रकाशके कक्षणमें दण्डीके लक्षणसे इतनी विशेषता है कि उनके मत में पहले स्वयं सूक्ष्म अर्थको किसी तरह जानकर उसीको दूसरों पर किसी प्रकार प्रकाशित किया जाता है, दण्डीने सूक्ष्मतया अभिधानको ही सूक्ष्म कहा है॥ २६०।। लोगोंसे परिपूर्ण सदनमें कान्त अपनी प्रेयसीसे मिलनका समय पूछनेमें असमर्थ हो रहा है, परन्तु वह मिलनके समयको जाननेके लिये व्यग्र है, यह देखकर उस कामिनीने क्रीडाके लिये हाथमें रखे गये कमलको मुकुलित कर दिया॥ २६१॥ इस उदाहरणमें मदनवाणविहल पतिदेवको धीरज देनेके लिये उस कामिनीने कमलसङ्गोचन- १. अवेक्ष्य। २. पशस्य मीलनादू।

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१७६ काव्यादर्श:

रूप इङ्गितके द्वारा रात्रिमें इमारा मिलन होगा यह बात सूचित कर दी। यहाँ कमलनिमीलन- रूप इङ्गितसे मिलनसमय सूक्ष्मतया कहा गया है अतः यह सूक्ष्मका पहला भेद हुआ॥। २६२॥ मंदर्पितरशस्तस्या गीतगोष्ठयामवर्घत। उद्दामरागतरला छाया कापि मुखाम्बुजे ॥ २६३॥

अनुल्लङ्षपैष सूक्ष्मत्वमभूदत्र व्यवस्थितः ॥ २६४ ।। (इति सूक्ष्मचक्रम्) आकारलच्ष्यं सूक्ष्ममुदाहरति-मदर्पितेति। गीतगोष्ठयरां गीतपरिषदि मदर्पित- दशो मयि निहितनयनायास्तस्याः नायिकाया मुखाम्बुजे कमलसमे मुखे उद्दामरागतरला अतिप्रवृद्धरत्यभिलाषविकस्वरा कापि अनिर्वचनीया छाया अवर्द्धत कान्ति: प्रकटीभृता। अत्र मुखच्छायावेलक्षण्यरूपाकारविशेषेण नायिकायाः रत्युत्सवेच्छा सूक्ष्मतया सूचितेति सूक्ष्मालङ्कार: ।। २६३॥। उदाहरणं सप्मयति-इत्थनुन्धिन्नति। इति अ्त्रोदाहरणे (छाययेष प्रकटीकृतः) रत्युत्सवमनोरथः कामक्रीडाविषयकोऽभिलाषः अनुद्भिमरूपत्वात् स्फुटतयाSप्रतीयमानत्वात् सूक्ष्मत्वम् अ्रनुल्लङ्म्य अपरित्यज्य एव व्यवस्थितः वर्णितोऽभूत, अतः सूच्ष्मालक्कारोऽयम् यतोऽत्र सफुटमप्रतीयमानो रत्युत्सवाभिलाषः छायया सूक्ष्मतया वोधितोऽत्रात्तः सूक्ष्मा- लक्कार इति भाव: ॥ २६४॥ हिन्दी-सङ्गीतगोष्ठीमें हमारे मुखकी ओर आँखें डालनेवाली उस कामिनीके मुखपर प्रवृद्ध- रतिकामनासे प्रस्फुट कुछ अद्भुतसी कान्ति बढ़ आई। मुझे देखकर उसकी कान्ति कुछ अद्भुत रक्ताम हो गई।। २६३ ।। इस उदाहरणमें (छायामात्रसे) स्पष्ट नहीं प्रतीयमान होनेवाला रत्युत्सवाभिलाष सूक्ष्मत्वका परित्याग बिना किये ही वणित हुआ है, यदपि वह सूक्ष्म बना ही है, फिर भी उसकी प्रतीति मुखच्छाया-वलक्षण्यसे हो जाती है, अतः यह सूक्ष्मका उदाहरण है॥ २६४॥ लेशो लेशेन निर्मिन्नवस्तुरूपनिगूहनम्। उदाहरण पवास्य रूपमाविर्भविष्यति ॥२६५ ॥ आदावलङ्कारनिर्देशे क्रियमाणे यो लवनाम्नाऽभिहितस्तं लेशं लक्ष्यति-लेश इति। लेशेन स्वल्पभावेन निर्भिन्नस्य प्रकटतां गतस्य वस्तुनः कस्यापि रहस्यवस्तुविशेषस्य यद्रूपं स्वरूपं तस्य निगूहनम् प्रच्छादनम्-यद्गोप्यवस्तु कुतोऽपि हेतोः प्रकटीभृतकल्पम् तद्रूपस्यान्यथाप्रथनं-लेशो नामालद्कारः। केचितु लेशेन व्याजेन वस्तुरूपनिगूहनं लेश इति व्याख्यां कुर्वन्ति। तथा च कारणान्तरोत्पन्नस्यांशतः प्रकटीभूतस्य च वस्तुनः कारणान्तरोत्पन्नत्वकथनद्वाराSSच्छादनं लेश इति फलितम्। अस्य लेशस्य रूपं चमत्कार- कत्वम् उदाहरण एव आविभविष्यति, एतेन चमत्कारविरहितत्वाल्लेशस्य नालङ्कारत्वमिति कथनं खण्डितम् ॥ २६५॥

१. स्वदपित। २. काचित्। ३: इत्यसम्भिभ्न। ४. वाक्यस्य ।

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द्वितीय: परिच्छेद: १७७

हिन्दी-लेश नामक अलदार तब होता है यदि कुछ-कुछ प्रकट होते हुए वस्तुरूपको चतुरतासे छिपा लिया जाय। इसका चमत्कारक रूप उदाहरण में प्रकट होगा। किसी रहस्य वस्तुके सुळ्ते- सुते गोपनको ही लेश अलदार कहा जाता है, वह सुलना दो प्रकारसे होता है-रोमाश्ादि गात्रविकारसे और असावधानतासे। नवीन आचार्यीने इसकी जगहपर व्याजोक्ति नामक अलद्दार कहा है। उनकी व्यामोकिका कक्षण है-'म्याजोक्तिश्छसनोङ्ग्रिभनस्तुरूपनिगूहनम्'। अप्पय्य दीक्षितने जो छेकापंकुतिनामक अलक्कार कहा है, वह भी लेशालद्टारमें ही अन्तर्भूत माना जाना चाहिये॥ २६५।। राजकम्यानुरकं मां रोमोन्ट्ेदेन रसका:। अवगच्छेयुरा मातमहो शीतानिल वनम् ॥ २६६।। लेशालक्वारमुदाहरति-राजेति। रक्षकाः राजान्तःपुरयामिका रोमोद्भेदेन रोमान्- दर्शनेन मां राजकन्यानुरकम् नृपकन्याकामुकम् अवगच्छेयुः जानीयुः-म्रा: स्मृतो गोप- नो यः भहो भावर्ये, वनं शीतानिलम् अतिशीतलवातयुतम्। तथा चार्य दृश्यमानो रोमान्ः शीतवातसम्पर्ककृत एवेति जानन्तो रक्षका मां न दोषिणं मन्येरभिति निगूहनो- पायोऽस्तीति भावः । अत्र शीतानिलसंपर्केण रोमोद्रमस्य समर्थनादनुरागनिगूहनं कृतमिति लेशः। प्रकाशीभवद्वस्तुगोपनं द्विया क्रियते, अनिष्टसंभावनया लज्जया वा। तत्रानिष्ट- संभावनया कृतमत्र निगूहनं, लज्जया निगूहनस्योदाहरणमनुपदमेव वक्यति॥२६६ ॥ हिन्दी-मेरे शरीरमें रोमान देखकर कहीं अन्तःपुर के रक्षकगण मुझे राजपुत्रीपर मसक न समझ लें ? आह ! समझ गया, इस वनकी हवा आश्चर्यजनक रूपमें शीतल है।। इस उदाइरणमें राजकन्यानुरागसे होनेवाले रोमा्रको शीतवातसंसगकृत कह कर छिपा दिया गया है, यह लेश है। दो कारणोंसे किसी प्रकट होने वाले अर्थका निगूहन किया जाता है-अनिष्टकी आशङ्कासे या लज्जासे। यहाँ पर राजदण्डरूप अनिष्टकी आशङ्कासे निगूहनका उदाहरण दिया गया है, लज्जासे निगूहनका उदाहरण अगले श्लोकमें दिया जायगा ॥ २६६ ॥ मानम्दाभु प्रवुत्तं मे कथं दष्टरवैव कन्यकाम्। अकषि मे पुष्परजसा वातोद्धूतेन कम्पितम् ॥२६७ ।। लज्जया निगूहनमुदाहरति-आनम्देति। कन्यकां विवाहमण्डपे समायातां कन्यामू दष्ट्ा एव मे मम आनन्दाश्रु कय प्रवृत्तम्। कन्यादर्शनेनानन्दाभुप्रवुत्तिर्लज्जाहेतुरिति निगूहति-अक्षीति। वातोद्धूतेन पवनचालितेन पुप्परजसा कुसुमपरागेण मे मम भक्षि दूषितम्। अत्र कन्यादर्शनजातस्यानन्दाश्रुणः पुष्परजोदूषिताक्षिजातत्वप्रतिपाद- नेन निगूहनं कृतं वेदितव्यम्॥ २६७ । हिन्दी-विवाहमण्डपमें आती हुई कन्याको देखते ही मेरी आँखमें आनन्वाक्व क्यों उमद़ आए, आ:, मेरी आँखमें पवनसे चालित पुष्पपराग आ पड़ा है, उसीसे यह अक्ु निकल आये हैं। इस उदाहरणमे कन्यादर्शनजात आनन्दाशुका स्वीकार लज्जाजनक होता, अतः उसे पवन- चालित पुष्परजसे दूषितनेत्रजात बताकर छिपाया गया है॥ २६७ ।।

लेशमेके वितुर्निन्दां स्तुति या लेशतः कवाम्॥ २६८।।

12 १. प्राव। २. शीताभिलम्बनम्।' १. इत्येबमादौ। १२ का०

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१७८ काव्यादर्श:

प्रोक्तस्वरूरप लेशमुपसंहरति-इत्येवमादीति। इत्येवमादिस्थाने एतादृशोदाहरण- स्थेऽयं लेशालट्कारोऽतिशोभते चमत्कारातिशयं जनयति, एतेन चमत्कारविरहान्नाय- मलहार इत्यपास्तम् । लेशस्य प्रकारान्तरमाह-लेशमिति। एके विद्वांसः लेशतः कतां निन्दां स्तुर्ति वा लेशमाहुः। तथा च स्तुतिमिषेण निन्दास्थले निन्दामिषेण वा स्तिस्थले लेशालक्वार इति फलति। व्याजस्तुतिर्नाम नवीनस्वीकृतालक्कारोप्यत्रैव गतार्थों बोष्य:॥। २६८।। हिन्दी-इस तरइ के उदाहरणोंमें यह लेशालक्कार अति चमत्कारक रूपमें प्रतीत होता है, (अतः यह शक्टा समाहित हो जाती है कि चमत्कारशून्यतया इसे अलक्कार नहीं माना जाना चाहिये) इस प्रकार लेशका एक प्रकार उपसंहृत होता है। लेशका एक दूसरा भी प्रकार है, यह यह है कि स्तुतिके व्याजसे निन्दा और निन्दाके व्याजसे स्तुतिस्थलमें लेश होता है। दण्डीने व्याजस्तुतिनामक पृथक अलक्कार नहीं माना है, मालूम पड़ता है इसी लेशप्रकारमें उसके लक्ष्यको अन्तर्भूत होते देख कर ही ऐसा किया गया ॥ २६४॥ युवैष गुणवान् राजा योग्यस्ते पतिरर्जितः। रणोस्सवे मनः सक्तं यस्य कामोत्सवाद्यि।।२६९।। वीर्योत्कर्षस्तुतिनिन्दवास्मिन् भावनिवृत्तये। कम्याया: कल्पते भोगान्निर्विविकोर्निरन्तरम् ॥। २७०॥ स्ुतिव्याजेन निन्दान्मकं लेशालङ्कारमुदाहरति-युवेति। स्वयंवरागतां राज- सुतां प्रति तत्सख्या उक्तिरियम्, एषः राजा युवा, गुणवान्, ऊर्जितः ओजस्वी, ते योग्यः अनुरूपः पतिः, यस्यास्य राजः मनः कामोत्सवात् मुरतप्रसप्गाद् अपि रणोत्सवे युद्धे सकम्, यो रतिमहोत्सवापेक्षयापि युद्धे समधिकं रमते सोयं राजा तव योग्य: पतिरित्यर्थः। अत्रातिवीरोऽयं व्रियतामिति प्रशंसया सदायुद्धासक्ततया त्वत्सुरताभिलाष- पूरणाक्षमोडयं न ते योग्य इति निन्दाप्रतीत्या लेशालक्कारः ॥ २६९॥ उदाहरणं विवृणोति-वीर्योत्कषति। अस्मिन्नुदाह तश्लोके निरन्तरं भोगान् निवि- विक्षो: सततभोगाभिलाषिण्या: कन्यायाः भावनिवृत्तये तद्राजविषयकाभिलाषप्रशमाय कल्पते (इति) वीर्योत्कषस्तुतिः सख्या करियमाणा तस्य राशः सततयुद्धरतिप्रशंसा निन्दा एन, अतम स्तुतिष्याजेन निन्दात्माडयं लेशाळक्कार इति भावः ॥ २७० ॥ हिन्दी-यह राजा युवा है, गुणवान् एवं तेजस्वी है, इसका मन कामोत्सवसे भी अधिक रणोत्सव में लगता है। यह स्तुतिव्याजेन निन्दारूप लेशका उदाहरण है। यह श्लोक स्वयंवरमें आई हुई राजकन्यासे उसकी सखी कह रही है, इसमें यद्यपि राजाकी वीरतासे प्रशंसा की गई है, परन्तु सततयुखरत होनेसे वह सुरतसुखदाता नहीं हो सकेगा, अतः वह राजकन्याके अयोग्य है यह निन्दा अभिव्यक्त हो जाती है॥। २६९ ।। इस उदाहरण श्लोकमें वीर्योत्कर्षद्वारा की गई राजाकी प्रशंसा निन्दामें परिणत हो जाती है क्योंकि-सरतामिलाषिणी राजकन्याके भाव-अभिलाष की निवृत्ति हो जाती है, उसी गुणके कारण राजकुमारी उससे अपरक्त हो जाती है। २७०।। चपलो निर्दयश्रासी जनः किं तेन मे सचि। भग:प्रमार्जनायेव चाटवो येन शिक्षिताः।।२७१।। १. निवर्सने। २. निरन्तरान्

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द्वितीय: परिचछेद: १७६

दोषामासो गुणं: कोऽपि दर्शितश्ाटुकारिता। मानं सखिजनोहिष्टं कसुे रागादशकया ॥। २७२ ।। (इति लेशचक्रम् ) निन्दाव्याजेन स्तुत्यात्मकं लेशमुदाहरति-चपल इति। हे सखि, असौ जनः मम प्रियतमः चपलः स्वभावतव्ध्लः, निर्दयक्ष परपीडानभिजय येन मम प्रियतमेन आागःप्रमार्जनाय एव स्वापराधक्षालनाय एव चाटव: प्रियालापा: शिक्षिता अभ्यस्ता अतः तेन भवतीभिरवश्यावलम्बनीयतयोपदिष्टेन मानेन में कि नास्ति किमपि प्रयोननम्। यद्यपि मम प्रियश्चमलो निर्दयश्वाप्यस्ति, तथापि कृतापराधे तस्मिहं यावन्मानं कर्तु- मिच्छामि तावदेव स्वभ्यस्तचाटुतयाऽसी मां प्रसादयति, तद्भवत्या क्रियमाणोडयं मानो- पदेशो कृथेति भावः ॥।२७१॥ उदाहरणं योजयति-दोषाभास इति। रागात् प्रियहनेहात सखीजनोहिषं सख्यो- पदिष्टं मानं प्रणयकोपं कर्त्तुम् अशक्तया अक्षमया नायिकया चाटकारिता नाम गुण: स्त्रीजनप्रियो नायकधर्मः दोषाभास: दर्शितः दोषरूपतयोकः, एवाब्चात्र निन्दाव्याजेन स्तुति- रूपो लेश इति बोष्यम् ॥ २७२॥ हिन्दी-हे सखि, मेरा प्रियतम चज्जल है, निदय भी है, जिसने अपने अपराधोंके मार्जनके लिये हि चाटुकारिताका अभ्यास कर लिया है, मुझे तुम्हारे द्वारा किये गये इस मानोपदेशका क्या प्रचोजन है। अर्थाव यद्यपि मेरी प्रियतम चञ्जल निर्दय है, फिर भी उसके द्वारा अपराध किये जानेपर जब मैं मान करनेको सोचती हूँ तभी वह चाटकारिताके सहारे मरे हृदयको चुरा लेता है, अतः मुझे इस मानके उपदेशसे क्या प्रयोजन है॥ २७१॥ इस उदाहरणमें प्रेमवश मान करनेमें असमर्थ उस नायिकाने प्रियतमके चाटुकारित्व गुणको दोष के रूपमें दिखलाया है, अतः यह निन्दाव्याजसे स्तुतिरूप लेशालक्कार है॥ २७२॥ उदिशानां पदार्थानामनूदेशो यथाक्रमम्। यथासङ्गयमिति प्रोक्तं संख्यानं कम इत्यपि ॥ २७३॥ 'हेतुः सूक्ष्मो लवः क्रमः' इति प्रागलङ्कारोद्ेशे प्रोक्तम्, तदवसरप्राप्तं क्रमालक्कारं निरुपयति-उद्दिष्टानामिति। उद्िष्टानां पूर्व कथितानां पदार्थानाम् यथाक्रमम् तेनैन क्रमेण (येन पौर्वापर्यक्रमेण पूर्वमुक्ताः) अनूद्देशः पश्चादाख्यानम (पश्चादुक्ततः पदार्थे: सहान्ययः) कमो नाम अलककारः, एतस्यवालक्वारस्य यथासंख्यपदेन संख्यानपदेन न प्राचां भ्रन्थेष्वभिधानम् , तदुक्तं भामहेन- 'यथासंख्यमथोत्प्रेक्षामलङ्गारद्वयं विदुः। संख्यानमिति मेधावी नो प्रेक्षाऽभिहिता कनिंद ।।' काव्यप्रकाशकारोऽपि यथासंख्यनाम्ना क्रममेव लक्षयति-'यथासंख्यं क्रमेणैब कमि- काणा समन्वयः ।।'२७३॥ हिन्दी-उि्ट-पहले कहे गये पदार्थोंका क्रमशः यदि आगे कहे गये पदार्थोंमें समन्वय हो, जिस पौर्वापर्य क्रमसे पहले कहे गये हों उसी क्रमसे यदि आगे कहे गये पदार्थोमें अन्वय् किया जाय तो क्रम नामक अलक्कार होता है। क्रमको केवल इतनेसे ही अलक्कार माना गया है कि यहाँ पहले और पीछे वर्णन किये गये पदार्थोमें यथाक्रम संबन्ध होनेसे एक प्रकारका वैचितर्य- १. गुणायैव। २. निर्दिटानां। ३.अनुदेसो।

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१६० काव्यादर्श:

चमत्कार प्रतीत होता है, नहीं तो यहाँ पदार्थोंमें कुछ उपमानोपमेयभाव, कार्यकारणभाव, या समर्थ्यसमर्थकमाव आदि नहीं रहता है। प्राचीन आचार्यों ने इसे यथासंख्य और संख्यान नामसे व्यवहृत किया है, उद्ट ने यथासंख्यकी जो परिभाषा को है वह स्वरूप स्पष्ट कर देती है- 'भूयसामुपदिष्टानामर्यानामसवर्मणाम्। क्रमशो योऽनुनिर्देशो यथासंख्यं तदुच्यते'॥२७३॥ ध्रुवं ते चोरिता तन्वि स्मितेक्षणमुसधुतिः। स्नातुमम्मःप्रविष्ठाया: कुमुदोत्पलपङ्कजै:॥२७४॥। (इति क्रम: ) कमालकारमुदाहरति-पुवममिति। हे तन्वि, कृशात्ि,स्नातुम् अम्भःप्रविष्टायाः जल- गतायाः ते तव स्मितेक्षणमुखद्ुतिः हसितनयनवदनच्छविः कुमुदोत्पलपङ्कजै: त्रुवम् निश्च- येन चोरिता भपहता। भत्र स्मितेक्षणमुखानि येन पौर्वापर्येण प्रागुद्ष्टानि तेनैव क्रमेणाप्रे कुमुदोत्पलपड्कुजरनुयन्ति, तथा च स्मितस्य द्ुतिः कुमुदेन चोरिता, ईक्षणद्युतिः उत्पलेन चोरिता, मुखस्य च द्ुतिः पड्डजेन चोरितेत्यभीष्टान्वयः सिद्धयति। अत्र कुमुदानां श्वेता- मतया, नीलकमलानां नीलतया, पड्ुजानां च रक्ततयेत्थमुक्तम् ॥ २७४॥ हिन्दी-हे कृशानि, स्नान करनेके लिये जब तुमने पानीमें प्रचेश किया था, तब तुम्हारी मुस्कान, नयन, और वदनकी कान्तिको निश्चय इन उत्पल, नीलकमल, पङ्कुजोंने अपहृत कर लिया। इसमें स्मित, नयन, वदन जिस पौर्वापर्यक्रमसे पहले कहे गये, उसी क्रमसे उनका अन्वय कुमुद, नीलकमल, पडकुजके साथ होता है॥ २७४।। प्रेयः प्रियतराख्यानं रसवद्रसपेशलम्। ऊर्जस्वि रुढाहक्कारं युक्तोस्कर्षे च तत्त्रयम् ॥ २३५ ॥। क्रमप्राप्तम् प्रेयोरसवदूर्जस्विनामकमलङ्कारत्रयं लक्षयति-प्रेय इति। प्रियतरम् भावाभिव्यक्त्या श्रोतुः प्रीत्यतिशयजनकं वत्तुर्वा प्रीतिविशेषकरम् आ्रख्यानं प्रेयो नामा- लहार: अतिशयेन प्रियं प्रेयः, भावाथ् देवादिविषया रतिविंभावानुभावाभ्यां प्राधान्येन व्यजितो निर्वेदादि: तटुं काव्यप्रकाशे-'रतिर्देवादिविषया व्यभिचारी तथाजितः, भाव: प्रोक्तः' इति। अजित इत्यस्य प्राधान्येनाभिव्यक्त इत्यर्थः। एवशोक्तिवैशिष्टथ- महिम्ना व्यज्यमाना देवादिविषया रतिरन्ये वा प्राधान्येनाभिव्यज्यमाना निर्वेदादयो भावा वाच्योपस्कारकत्वमुपयान्ति तत्र प्रेयोऽलक्कार इति लक्षणं बोष्यम्। एवमेव रसेन रत्यादिस्यायिभावरूपेण पेशलं रमणीयमाख्यानं रसवदलक्कार:, तथा रूठः अभिव्यकोऽहङ्कारो गर्वो यत्र तादृशमाख्यानमूर्जस्वि चेति रसवदूर्जस्विनोर्लक्षणं विवक्षितं बोध्यम्। तत्नयम्-प्रेयोरस बदूर्जस्विरूपमलभ्ारत्रितयं व युक्तोत्कर्षम् वाच्यशोभाकरत्वरूपो- त्कर्षशालि, तेन तत्त्रयस्याल्टारत्वं स्वीकरणीयमेव, वाच्यशोभाकरत्वस्यवालक्ारतानिया- मकत्वात् ॥। २७५ ।। हिन्दी-प्रियतर-भावकी अभिव्यक्ति होनेसे श्रोता तथा वक्ताकी प्रीति करनेवाले आख्यान- उचिविशेषको प्रेयःनामक अलक्कार मानते हैं। देवादिविषयक रति तथा प्राधान्येन वणित व्यमिनारीमावको ही मान नामसे कहा जाता है। सारांश यह कि उक्तिवेशिष्टयके द्वारा व्यज्यमान देवादिविषयक रति या प्राधान्ये अभिव्यश्जित निर्देदादि भाव यदि वाच्यार्थकी शोमा बढ़ावें तो प्रेव: नामक अलद्ार होगा।

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द्वितीय: परिच्छेद: १८१

इसी प्रकार रस-रत्यादिस्थायिभाव -रूपसे रमणीय आख्यानको रसवद, और रूद़ाइक्वार- गर्वचोतक माख्यानको ऊर्जस्व्रि अलक्कार माना जाता है। यह तीनों प्रेयः, रसवद, ऊर्जस्वि युक्तोत्कर्ष अर्थात् वाच्यशोभाकरत्वरूप उत्कर्पसे युक्त हैं, अतः इन तीनों को अलक्गार माना जाता है-क्योंकि वाच्यशोभाकरत्वको दण्डीने अलद्गारत्वका बीज स्वीकार किया है- 'वाच्यशोभाकरान् धर्मानलक्गारान् प्रचक्षते।' 'रतिर्देवादिविषया व्यभिचारी तथाजितः भावः प्रोक्तः' इस प्रामाणिक उक्तिके अनुसार भाव बहुत बड़ी संख्यामें है, क्योंकि व्यभिचारीभाव बहुत है, रस पदसे रस्यमानमात्र-अर्थाद रस, भाव, रसाभास, भावाभास, भावशान्ति, भावोदय, भावसन्धि, भावशवलता इन समीका ग्रहण होता है। इन सभी भावोंमें देवादिविषयक रतिभावस्थलमें प्रेय: अलक्गार होगा, गर्वार्य मावस्थलमें ऊर्जस्वि अलक्कार होगा, और अवशिष्ट भाव तथा रसामासादि स्थलूमें रसवत् अलक्वार होगा। जहाँ अन्य आचार्यगण अप्रधान रसमें ही रसवत् अलक्कार मानते हैं, प्रधान रसको अलदायं कहते हैं-'प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे यत्राऊं तु रसादयः । काव्ये तस्मिश्लक्गारो रसादिरिति मे मतिः' (ध्वन्यालोक), वहाँ दण्डी प्रधान अप्रधान उभयरूपमें अभिव्यज्यमान रसादिको अलक्कार मानते हैं, क्योंकि उनके मतानुसार शब्दार्थरूप का्यकी शोमा दोनों प्रकारके रससे बढ़ती है। रसके स्वरूप और भेदोंको अन्यत्र देखें। वह एक अलग विषय है॥ २७५॥ अद्य या मम गोविन्द जाता त्वयि गृह्दागते। कोलनेषा भवेत् प्रीतिस्तवैवागमनात् पुनः ॥ २७६ ॥। प्रेयोनामालक्वारमुदाहरति-अद्येति। हे गोविन्द, अथ त्वयि गृहागते मदीयं गृहमागते सति मम विदुरस्य या प्रीति:, जाता, कालेन पुनः समयान्तरेण तवैब (नान्यस्य कस्यापि ) पुनरागमनात् एषा प्रीति: भवेत् ( संभाव्यते) भगवन्तमद्य गृहा- गतं दष्ट्वाऽहं यमानन्दमनुविन्दामि, तमानन्दं पुनभवति गृहागते सत्येव लब्धाहं, नान्यतः कुतोपि सज्जनान्तरागमनादिति वदतो विद्ुरस्य भगवद्विषयकरतिभावो वाच्यभा्या सहृदयांक्षमत्करोतीति प्रेयोनामालक्ुार उपपन्नः ।। २७६।। हिन्दी-हे गोविन्द, आज आप जब हमारे घर पर पधारे हैं तब जो आनन्द मुझे हो रहा है, वह आनन्द कालान्तरमें फिर आप ही आनेकी कृपा करें तो संभव है, दूसरे किसी महात्माके मानेसे उस आनन्दकी उपलब्धि मुझे संभव नहीं है। यहाँ भगवद्विषयक विदुरका रतिभाव वाच्यभज्गीसे अभिव्यक्त होता है, अतः यह प्रेयः का उदाहरण है। इस उदाहरणश्लोकको महाभारतका निम्नलिखित श्लोक अपनी छायासे अनुप्राणित कर रहा है। 'या प्रीतिः पुण्डरीकाक्ष तवागमनकारणात। सा किमाख्यायते तुभ्यमन्तरात्मासि देहिनाम्'॥२७६॥ इत्याह युकं विदुरो नाम्यतस्तादशी घृतिः। भक्तिमात्रसमाराध्यः सुप्रीतश्ञ ततो हरिः ॥ २७७॥ उदाहरणं योजयति-इत्याहेति। इति यथोकरूपम् वचबनं विंदुरो युकतम् सत्यम् भाह (यतस्तस्य ) अन्यतः कुतोऽपि महात्मान्तरात् तादशी भगवदागमनजतप्रीति- १. नैषा काळे। २. वाक्यं।

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१८२ काव्यादर्श:

सदृशी पृतिः सन्तोष: (प्रीतिः) न। ततब विदुरेण तथाकयनात् भक्तिमात्रसमाराष्य: हरिः सुप्रीतः प्रसभोऽभवदिति शेषः ॥२७७॥ हिन्दी-विदुरने भगवान्से पूर्वोक्त वचन ठीक ही कहा था, उनको किसी भी दूसरेके आनेसे वह प्रीति नहीं होती, जो मगवान्के आनेसे हुई। उनकी उक्तिसे भक्तिका परिचय प्राप्त कर के भगवान् प्रसन्न हुए, क्योंकि वह भक्तिते समाराध्य हैं, भक्तिशून्य उपचारोंसे उन्हें सन्तुष्टि नहीं हुआ करती।। २७७।। सोम: सूर्यों मन्दूभूमिर्ष्योम होतानलो जलम्। इति रूपाण्यतिक्रम्य स्वां द्रष्टुं देव के वयम् ॥२७८ ।। प्रेयोऽलक्कारस्योदाह रणान्तरमाह-सोम इति। सोम: चन्द्र:, सूर्य:, मरुत् वायु:, भूमि: पृथ्वी, व्योम आकाशम् , होता आत्मा यजमान:, अनलः तेजः, जलम्, इति भष्टी रूपाणि तब स्वरूपाणि भतिक्रम्य निस्तीर्य स्वां द्रष्टुं वयं के? पृथ्व्या जलेन शिखिना मरुताऽम्बरेण होत्रेन्दुना दिनकरेण च मूर्तिभाजस्तव दर्शनमासु मूर्तिष्वेव शक्यक्रियम्, ता मूर्तीरतिक्रम्य तव प्रत्यक्षदर्शनं मादृशामशक्यं, तदपि जातमिति तवानुभ्रहातिशय इति भावः ॥। २७८॥। हिन्दी-चन्द्रमा, सूर्य, वायु, पृथ्वी, आकाश, यजमान, अनल और जल इन आठ रूपों को टपकर आपको देखनेमें हम कौन होते हैं, इमें इन मूर्सियोंमें ही आपके दर्शनका अवसर मिक सकता है, इसके ऊपर जाकर आपके प्रत्यक्ष दर्शनका सौभाग्य हमारे लिये दुर्लम है, मापने जो सुझे प्रत्यक्ष दर्शन दिया, वह आपका अनुभह है।। २७८ ।। इति साक्षास्कृते देवे राज्ो यद्रातवर्मणः । प्रीतिप्रकाशनं तबा प्रेय 'इत्यवगम्यताम् ॥ २७९॥ उदाहरणमुपपाद्यति-इतीति। इति प्रोक्कोदाहरणे देवे महेश्वरे साक्षात्कृते प्रत्यक्ष- इष्टे सति रातवर्मेण: तदाख्यस्य राजः यत् प्रीतिप्रकाशनम् महेश्वरविषयकरतिसूचनं तभ प्रेय इति अबगम्यताम् जञायताम् ॥२७९॥ हिन्दी-इस उदाहरणमें रातवर्मा नामक नृपतिने महेश्वरका साक्षान्कार करके जो महेश्वर- विषयक रतिभाव व्यक्त किया है, वह भी प्रेय: अलक्कार है। यहाँ आचार्य दण्डीने प्रेय: अलद्ारके दो उदाहरण दिये हैं। एक विदुरकी उक्ति, दूसरी रातवर्माकी उक्ति। उनमें पहले उदाहरणमें श्रोताकी प्रीतिका और दूसरेमें वक्ताकी प्रीतिका आाख्यान प्रियतर है, इसीलिये प्रेय: अलक्कार होता है। सर्ववादिसिद्ध भावकी परिभाषा-'रतिर्देवादिविषया भावः' है परन्तु उदाहरणके अनुरोधसे ऐसा मानना पढ़ेगा कि 'देद नात्रविषया रति' ही दण्डीको भावतया स्वीकार्य थी। बठुसंमत- मतानुसार देवविषयक भाव, मुनिविषयक नृपविषयक भाव, सबका उदाहरण देना चहिये, देखिये- मुनिविषयक रतिभाव, यथा- 'हरत्यघं सम्प्रति हेतुरेष्यतः शुभस्य पूर्वाचरितैः कृतं शुभैः। शरीरभारजां भवदीयदर्शनं व्यनक्ति कालत्रितयेप्रप योग्यताम्।' १. राशोभूद्। २ राजवर्मणः। ३. इत्यनु ।

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द्वितीय: परिच्छेद: १८३

राजविषयक रतिभाव, यथा- 'अत्युनाः परितः स्फुरन्ति गिरयः स्फारास्तथाम्भोषय- स्तानेतानपि विभ्रती किमपि न क्वान्तासि तुम्यं नमः । आश्चर्येण मुडुमुद्ः स्तुतिमिमां प्रस्तौमि यावद्सुव- स्तावद्विभ्रदिमां स्मृतस्तव भुजो वाचस्ततो मुद्रिताः॥ २७९ ॥ मृतेति प्रेत्य सङ्न्तुं यथामे मरणं मतम्'। 'सैवावन्ती मया लब्घा कथमत्रैष जम्मनि ॥ २८० ।। रसबदलड्कारोदाहरणानि दिदर्शयिषू रसेषु प्राधान्यात् शभ्ञारमुदाहरति-मृतेतीति। वासवदत्ताया दाहप्रवादमाकण्य समतिशयं दुःखमनुभूय पुनस्तां प्राप्य नितान्तमानन्दतो वत्सराजोदयनस्येयमुक्तिः। मृता अभिदाहात्पश्वत्वं प्राप्ता इति हेतोः यथा वासवदत्तया सह-प्रेत्य स्वयमपि मृत्वा-सप्न्तुम् मिलितुम् मे मम मरणं मतम् अभीष्टम् (यां वास- बदसतां मृतां मत्वा तया सह सप्न्तुमहं स्वमरणं प्रार्थये), सैव आावन्ती अवन्तिराजपुत्री वासवदत्ता कथम् अन्रैव जन्मनि मया लब्धा। अत्र संभोगशज्नारो रसः॥२८० ॥ हिन्दी-रसवत् अलक्कारके उदाइरणप्रसङ्गमें रसराज शरङ्गारका उदाहरण दे रहे हैं। वासवदत्ताके जल जानेकी बात सुनकर अत्यन्त कष्टका अनुभव करनेके बाद पुनः वासवदचाको उसी रूपमें प्राप्त करके अत्यन्त आनन्दित होनेवाले वत्सराज उदयनकी यह उक्ति है, उदयनने कहा कि-जिस वासवदत्ताको मरी हुई सुनकर उससे मिलनेके लिए मैं अपने प्राण छोड़ना चाह रहा था, वही अवन्तिराजतनया वासवदत्ता इसी जन्ममें विना प्राणत्याग किये ही मुझे किस प्रकार मिल गई! यह संभोगश्रक्गार है॥ २८० ॥ प्राक्प्रीतिदशिता सेयं रतिः शृभ्गारतां गता। रूपबाहुल्ययोगेन तदिदं रसवदचः ॥।२८१॥ प्राक पूर्वोदाहते प्रेयोऽलक्ारोदाहरणद्वये प्रीतिः दशिंता, संप्रयोगशून्या रतिः प्रीतिः सा हि प्रेयोऽलक्कारस्य विषयः, संप्रयोगशून्या विभावादयपरिपुष्ा, रतिः प्रीतिशब्दवाच्या, तत्र प्रेयोऽलक्वार उदाहत इत्यथः। सेयं रतिः विभावादिपरिपुष्टा रतिरत्र रसवद्दाहरण- भूते पद्येऽ्रस्मिन् रूपबाहुल्ययोगेन शज्गारतां गता स्वरूपस्य विभावादिकृतपरिपोषेण *भ्ाररसत्वं प्राप्ता तत् तस्मात् इदं पूर्वोक्तं वच: रसवत् रसवदलङ्वारशालीत्यर्थः॥२८१॥ हिन्दी-इस रसवत् अलक्कार के उदाहरणसे पूर्व प्रेय: नामक अलद्वारके दो उदाहरण दिये गये हैं, उनमें प्रीतिका प्रतिपादन हुआ है, संप्रयोगशून्य अर्थात् विभावादिकृत परिपोषसे रहिव रतिको प्रीति कहते हैं, वही प्रीति उन दोनों उठाहरणोंमें दिखलाई गई है, इस उदाहरणमें रति विभावादिपरिपुष्ट होनेसे श्रक्गाररस बन गई है, अतः यह रसवद्का विषय है। इस उदाहरणमें उदयननिष्ठ रतिकी वासवदश्ारूप विभाव, तदुक्त मधुरवचनादि अनुभाव और हर्ष विस्मयादि व्यमिचारिभावोंसे पुष्टि हो गई है, अतः वह रति रसरूप-शङ्गाररसत्वको प्राप्त हो गई है, इसीलिये यह रसवत् है।। २८१।। निगृह केशेष्वाकृष्टा कृष्णा येनाभ्रतो मम। सोडयं दुःशासनः पापो जव्घंः किं जीवति सणम् ॥२८२॥ १. मृतेमिप्रेत्य सङ्न्तु। २. वृत्तम्। ३. सेपावन्ती। ४. पुष्रः।

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१८४ काव्यादर्श:

इत्यावडा परं कोरटिं क्रोधो 'रौद्रात्मतां गताः। भीमस्य पश्यतः शत्रुमित्येतद्रसवतचः ।। २८३॥ रौद्ररसबद्दाहरति-निगुद्रेति। येन दुःशासनेन मम भीमस्य भभ्तः पश्यन्तं मामगणयित्वा कृष्णा द्रोपदी केशेषु निगृद पृत्वा भ्रकृष्टा नीता, सोऽयं पापो दुराचारी दुःशासन: (मया) लब्ध: प्राप्तः कि क्षणम् भल्पकालमपि जीवति, तादशदुष्कर्मकारिणं दुश्शा- सनं दृष्टमात्रमेव हन्यामिति भाव:।। २८२।। उपपत्तिमाह-इत्यायद्रोति। इति दर्शितदिशा परां करोटिम् भवुह विभावादिभि: परिपुष्टतया प्रकषम् आसाद्य (भीमनिष्ठः स्थायिभावः कोपः) शत्रुं कृतापकारं दुःशासनं पशयतो भीमस्य कोष: रौद्रात्मतां गतः रदद्रसस्वरूपत्वं प्राप्त इतीदं वच्चो रसवत्, अत्र क्रोषो नाम-'प्रतिकूलेपु तैप्ण्यस्य प्रणोध: क्रोध उच्यते' इति लक्षितः। इह हि दुःशासन आालम्यनविभाद:, कृष्णाकेशकर्षणस्मरणमुद्दीपनविभाव: पाप इति निन्दावचनमनुभाव: गर्वादयो व्यमिचारिभाषा इति रससामश्री॥२८३॥ हिन्दी-जिस डु:शासनने मेरे सामने मेरी कुछ भी परवाह नहीं करके द्रौपदीको केश पकड़ कर घसीटा, उस पापी दुशासनको यदि पा लूँ तो क्षण भर भी जिन्दा न छोहूँ। क्या वह मेरे सामने भाने पर क्षण भर भी जिन्दा रह सकता है ?॥ २८२॥ इस उद्राहरण-छोकमें पराकाषाको पहुँचा हुआ भीमका कोप विभावादिसे पुष्ट होकर रौद्र रसका रूप प्राप्त कर केता है, अतः यह रसवत् अलक्कार है। यहाँ पर क्रोध स्थायीभाव, कृष्णा- केशाकषी दुःशासन आलम्बनविभाव, उसके द्वारा किये गये द्रौपदीके केशाकर्षण आदि दुर्व्यवहारका स्मरण उद्दीपनविभाव, 'पापः' यह निन्दावचन अनुभाव एवं गर्वादि व्यमिचारिभाव है॥ २८३।। अजित्वा साणवामुर्वीमनिष्टा विविधमंजैः। अदस्वा चार्यमर्यिम्यो भवेयं पार्थिव: कथम् ॥२८४।। इत्युस्साइ: प्रकुषारमा तिष्ठन् वोररसात्मना। रसवस्वं गिरामासां 'समर्थयितुमीश्वरः ॥२८५॥ बीररसवदुदाहरति-अजिस्वेति। सार्णवाम् सागरपर्यन्ताम् उर्वीम् पृथिबोम् भजित्वा भवशीकृत्य, विविधेः नानाप्रकारकेः राजसूयादिभिर्मखेः यजैः अनिष्टा यज्ञमकृत्वा, भर्षिभ्यो याचके्यथ भर्यम् धनम् तदर्चितम् भदरवा कर्थ पार्यियो राजा भवेयम्। राज्ञा भुर्वश- नीया, यज्ञा: करणोया: याचकाय पूर्णमनोरया: सम्पादनीया:, तदेतञ्रयमपि राजकृत्य- मकुत्वा कसमहं राजा स्यामिति भाव:॥। २८४।। उदाहरणं योजयति-इत्युस्साह इति। इति पूर्वोकप्रकारकः उत्साह: युद्धधर्मेदान- विषयक: स्येयान संरम्म: प्रकृष्टात्मा विभावादिपरिपुष्टस्वरूपः सन् वीररसात्मना भासां गिराम् मानाम् रसवर्वं समर्थयितुम् उपपादयितुम् ईशवर: शक्तः। अत्र युद्धे विजेतव्या: शत्रम: धमें यका: दाने याथका: आलम्बनविभावा: साहायान्वेषणादयः भाक्षिप्यमाणा अनुभावा: हर्षपृतिस्मृत्यादयो व्यभिचारिण:, एमिरमिम्यको वीररसस्याय्युत्साहो रस- रूपर्ता प्रपथास गिरां रसंवद्ळदारयुकतां समर्थगित क्षम इति भाव:।।२८५।।

  1. मिर्स वार्सा। १. समर्पं।

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द्वितीय: परिच्छेद: १८५

हिन्दी-जब तक इस समुद्ररशना पृथ्वीको अधिकार में न कर लिया, जाय, नानाप्रकारके यशोंसे देवोंकी आराधना न की जाय और याचकोंको भरपूर धन न दे दिया जाय, तब तक मैं राजा कैसे होऊँगा, मेरे राजत्वका यही लक्ष्य है कि सारी पृथ्वी पर अधिकार हो, नानाविच यज् किये जाँय और याचकोंको पूर्ण धन दिया जाय ।। २८४॥ इस उदाहरणमें पूर्ववणित उत्साह-पृथ्वीवशीकरण, यश्ञकरण, दानविषयक उत्साह प्रकृष्टात्मा- विभावादिपरिपोषित होकर वीररसरूपमें अवस्थित हो इस वाणीका रसवस्व समा्यत करता है। इसमें-विजेतव्य, यज्ञ, याचक यह तीन आलम्बनविभाव हैं, प्रतीयमान होनेवाले सहाया- न्वेषणादि अनुभाव हैं, हर्ष-धृति-स्मृतिप्रमृति व्यमिचारिभाव हैं, इनसे अभिव्यक्त होनेवाला उत्साइ- रूप स्थायिभाव वीररसके रूपमें इस वाक्यको रसवत् बनाता है॥ २८५॥ यस्या: कुसुमरय्यापि कोमलाकया रुजाकरी। साऽधिशेते कथं तम्वी' हुताशनवरती चिताम् ॥२८६॥ इति कारुण्यमुद्रिक्तमलक्कारतया स्मृतम्। तथापरेऽपि बीभत्सडास्याद्भुतमयानकाः॥।२८७।। करुणरसवदुदाहरति-यस्या इति। यस्या: कोमलानयाः कुसुमशय्या पुष्पनिर्मितं शयनीयम् अपि रुजाकरी पीढाप्रदायिनी (भवति स्म ) सा तन्वी सुकुमारशरीरा हुता- शनवतीम् दीप्तपावकाम् चिताम् कथम् अधिशेते आरोहति ? कुसुमशयनेऽरपि दूयमान- वपुषोऽतिसुकुमार्या नार्या ज्वलदभिचिता रोहणं नितान्तकष्टकरमिति भावः ॥। २८६॥। उदाहरणमुपपादयति-इतीति। इति एवंप्रकारकं कारुण्यम्-प्रिय तमामरणजन्मा शोक: स्थायी भाव: उद्रिकम् विभावादिपरिपोषितं सत् अलङ्कारतया रसवदलङ्कारतवेन स्मृतम्। अत्र मृता रमणी भालम्बनम् , स्मर्यमाणा: कुसुमशयनादयः उद्दीपनविभावा:, करुणवचनमनुभावः, चिन्तादय: प्रतीयमाना व्यभिचारिण इतीयता साधननिवहेन पुष्टः शोकारयः स्थायो करुणरसवतां प्राप्नोतीति भावः । अथ रसान्तरप्रस्तावमाह-तथाऽपरे- पीति॥ २८७ ।। हिन्दी-जिस सुकुमार शरीरवालो मेरी प्रियतमाके लिए फूलकी बनी शय्या भी कषदायक हुआ करती थी, वही कृशाङी मेरी प्रियतमा इस धवकती हुई चितापर किस प्रकार आरूढ़ होगी, फूलकी शय्यापर कष्ट पानेवाली सुकुमारी के लिए यह जलती हुई चिता किस प्रकार सभ्य होगी॥ २८६ ॥ इसमें वर्णित नायकनिष्ठ प्रियतमाविपत्तिजन्मा शोक उद्रिक्त-विभावादिपोषित होनेसे करुणरसवदलक्कार हो गया है। यहाँ मरी हुई सुकुमारी आलम्बन, स्मर्यमाण कुसुमशयनादि उद्दीपन, करुणवचन अनुभाव, एवं प्रतीयमान चिन्तादि व्यभिचारी मिलकर करुणरस हो जाते हैं, जिससे यह रसवत् होता है। इसी प्रकार बीभत्स, हास्य, अद्भुत एवं भयानक रसोंके भी उदाहरण दिये जायेंगे॥ २८७ ॥ पायं पायं तवारीणां शोणितं पाणिसम्पुटैः। कौणपा: सह नृत्यन्ति कबन्घैरम्त्रभूषणाः ॥।२८८।। बीभत्सरसबद्दाहरति-पायं पायमिति। अन्त्राणि पुरीततःभूषणानि अलकरणानि येषां ताटशा: कौणपा: राक्षसाः कबन्येः शिरोरहितकलेवरः सह तवारीणां हतानां तब

१. देवी। २. अथापरे।

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१८६ काव्यादर्श:

शत्रूणां शोणितं रकं पाणिसम्पुटैः हस्तपुटकैः पायं पायं पीत्वा पीत्वा मृत्यन्ति भानन्देन क्ीन्ति। अत्र जुगुप्सा स्थायिभाव: कौणपा आलम्बनानि, प्रतीयमानानि निष्ठीष- नच्छर्दनानि अनुभावा:, मोहापस्मारादयो व्यभिचारिभावास्तैव परिपुष्टा जुगुप्सा बीभत्स- रसत्वं प्राप्नोति॥२८८॥। हिन्दी-आँतोंकी मालायें धारण करने वाले राक्षसगण बिना सिरके कबन्धोंके साथ आपके शत्रुओंके शोणित पाणिपुटसे पी पी कर नाच रहे हैं। यहाँ जुगुप्सा स्थायी भाव है, राश्स आदि आलम्बनविभाव, प्रतीयमान निष्ठीवनच्छर्दनादि उद्दीपनविभाव, एव मोहापस्मारादि व्यमि- चारिभाव हैं, इन्हींसे परिपुष्ट जुगुप्सा नीमत्सरस हो जाती है। यही रसवत् अलक्कार होता है। वस्तुतः यहाँ ₹भत्सराज राजविषयक रतिभावका अङ्क है, अतः प्रेयः अलक्कार होना चाहिये। इस प्रकार यहाँ प्रेयः और रसवत् का सक्कर है॥ २८८॥ इदमम्लानमानाया' लमं स्तनतटे तव। छाद्यतामुत्तरीयेण नवं नखपदं सखि ॥ २८९॥ हास्यरसयद्दाहरति-इदमिति। हे सखि, अम्लानमानायाः भखण्डितमानायाः अस्माकं पुनःपुनरनुरोधेनापि अपरित्यक्तमानायाः तव स्तनतटे लम् सजातम् इदं (प्रत्यन्रं नतु प्राच्चीनम्) नवम् नखपदम् नखाघातचिहम् उत्तरीयेण छाद्यताम आध्रिय- ताम्। काचिशायिका सखीभिरनुरुष्यमानापि मानं न त्यजति, पर नायकसमीर्प गत्वा स्वयं स्वान्मपयति, तदीयनस्त्रचिहं दृष्ट्रा सखी परिहसतीह तदेव वर्णितम्। अत्र हास: स्थायिभाव:, तादृशी मिथ्यामानवती नायिका आलम्बनविभावः, नखक्षतवीक्षणमनुभावः, तादृशानि सोल्लुण्ठनानि वचनानि चोद्दीपनानि, अवहित्यादयो व्यभिचारिणः, एतैः पोषितोऽयं हासो हास्यरसता प्राप्नोतीति भवति रसवत्॥ २८९॥ हिन्दी-किसी नायिकाने सखियोंके अनुरोध करनेसे अपने मानका परित्याग नहीं किया, अपने मान पर अड़ी ही रही, परन्तु गुप्तरूपसे नायकके साथं संमोग कर आई, उसीके नख, क्षतादि रतिचिक्ोंको देख कर सखियाँ परिहास कर रही हैं। सखियाँ कहती हैं कि तुम्हारा मान तो नहीं मिटा है, फिर भी तुम्हारे स्तन पर यह नखक्षत-नया नया नखाघातचिह्-दीख रहा है, इसे चादरसे आवृत कर लो। यदि इस नखक्षतको जो सदःकृत रतिपरिचय दे रहा है, आवृत नहीं कर लेती हो तो हमलोगोंके सामने बगलाभगत कैसे बन सकोगी? इस उदाहरणमें हास स्थायिभाव, कपटमानवती वह नायिका आलम्बन, नखक्षत उद्दीपन, उलाइनाभरी उक्ति अनुभाव तथा प्रतीयमान अवहित्थादि व्यभिचारिभाव हैं, इनसे पोषित होकर हास हास्य रस होता है, अतः यह रसवत् है॥ २८९॥ अंशुकानि प्रवालानि पुष्पं हारादिभूषणम्। शासाब् मम्दिराण्येषां चित्रं नम्दनशाखित्रिनाम्॥। २९० ।। विस्मयरसवदुदाहरति-अंशुकानीति। एषाम् नन्दनशाखिणां कल्पवृक्षतरूणाम् प्रवालानि किसलयानि अंशुकानि वक्नाणि, पुष्पं हारादिभूषणम् नानालक्कारस्थानीयम्, शाखाः विटपा: मन्दिराणि गृहाणि, चित्रम् । अत्याक्र्यकरमिदं सर्वमिति भावः। अत्र विस्मय: स्थायी, नन्दनशाखि्रिन आालम्बनानि, प्रवालादीनामंशुकादिपर्यवसायित्वमुद्दीपनम्,

१. मालाया। २. द्रवं।

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द्वितीय: परिच्छेद:

प्रतीयमाना: स्तम्भस्वेदादयोऽनुभावाः, व्यभिचारिभावाक् वितर्कादय:, एतैः पुष्टो विस्म- योऽद्भुतरसत्वं प्रपद्यत इति ॥ २९० ॥ हिन्दी-क्या आश्चर्य! ये कल्पवृक्ष है, इनके नूतन किसलय वस्त्रका काम देते हैं, इनके फुल नानाप्रकारके अलक्कार हो जाते हैं और इनकी डालियाँ भवन हो जाती हैं। इस उदाहरणमें विस्मय स्थायी, कल्पवृक्ष आलम्बन, उनके पत्ते आदिका वखादि बन जाना उद्दीपन, प्रतीयमान स्तम्भस्वेदादि अनुभाव एवं वितर्कादि व्यभिचारी भाव है, इनसे पोषित हो विस्मय अद्भुतरसरूपमें परिणत होता है, अतः यह अद्भुतरसवत् है॥ २९० ॥ इदं मघोन: कुलिशं धारासच्निहितानलम्। स्मरणं यस्य दैत्यस्रीगर्भपाताय जायते ॥।२९१॥ भयानकरसवदुदाहरति-इदमिति। मधोनः महेन्द्रस्य इदम् धारासन्निहितानलम् अप्रभागावस्थितपावकम् (तेजसा ज्वलद्धारम्) इदं कुलिशं वज्रमस्ति, यस्य मघवत्कु- लिशस्य स्मरणं दैत्यस्त्रोगर्भपाताय जायते, स्मर्यमाणमेव यद्वज्रं दैत्यवनितानां हदये भयमुत्पाद्य गर्भान्पातयतीत्यर्थः । अ्त्र भयं स्थायिभावः, इन्द्र आलम्बनम्, कुलिशाधु- द्दीपनम्, गर्भपातादयोऽनुभावाः, प्रतीयमाना आवेगादयो व्यभिचारिभावाः, एभिः पुष्यमाणं भयं भयानकरसत्वं प्रपद्यते ॥। २९१ ।। हिन्दी-जिसकी धारमें आग वर्त्तमान है, ऐसा है यह इन्द्रका वज्र, उसकी याद दानव- स्त्रियोंके गर्भपातका कारण बन जाती है, उसकी याद भर हो जानेसे दैत्यस्त्रियोंके हृदयमें इस प्रकारका आवेग होता है कि उनके गर्भ गिर जाते हैं। यहाँ भय स्थायी, इन्द्र आलम्बन, वज्र उद्दीपन, गर्भपातादि अनुभाव और प्रतीयमान आवेगादि व्यभिचारी है, इनसे पुष्ट भय भयानक रसके रूपमें आस्वादित होता है, अतः यहां रसवत् अलक्कार है। यहाँ तक आठ रसोंके आठ उदाहरण दिये गये हैं, दण्डीने शान्तका उदाहरण नहीं दिया है, मालूम होता है वह भरतके अनुसार आठ ही रस स्वीकार करते थे। काव्यप्रकाशकारने शान्तरस भी माना हैं :- 'निर्वेदस्थायिभावोऽस्ति शान्तोऽपि नवमो रसः'। इस रसभेद प्रकरणमें अष्टरसवादी भरतने-'अष्टौ नाट्ये रसाः स्मृताः' कहा है, जिसका तात्पर्य यह मालूम पड़ता है कि नाव्यसूत्रकार भरतको केवल नाटकोपयोगी रसोंका ही परिचय कराना इष्ट था, अतः उन्होंने केवल आठ ही रस कहे हैं, शान्तरसको नाटकानुपयुक्त समझकर छोड़ दिया है, शान्तरसका अभिनय उनके मतानुसार शान्तिका उपहास करना होगा, परन्तु यह बात परवर्त्ती आचार्योंको स्वीकार्य नहीं हुई, उन लोगोंने शान्तरसप्रधान नाटक भी लिखे हैं, और रचना द्वारा यह दिखलाया है कि-शान्तरस भी नाट्योपयुक्त हो सकता है। प्रबोधचन्द्रोदय, अमृतोदय, जीवा- नन्द आदि नाटक इसी प्रेरणासे लिखे गये हैं। काव्यप्रकाशकारने नाट्यमें आठ रस और श्रव्य काव्यमें शान्तसमेत नव रस स्वीकार कर लिये है, यह समन्वयवादी दृष्टिकोण है। शान्तरस स्वीकार करनेवाले उसमस उदाहरण देते हैं :- "अही वा हारे कुसुमशयने वा दृषदि वा प्लावा लोष्टे वा वलवति रिपौ वा सुहृदि था। तृणे वा स्त्रेणे वा मम समदृशो यान्तु दिवसा: क्वचित पुण्यारण्ये शिव शिव शिवेति प्रजपतः ॥' यहाँ पर मिथ्यात्वेन माना गया संसार आलम्बनविभाव, तपोवनादि उद्दीपनविभाव, सवंत्र समदर्शन अनुभाव, मतिषृत्यादि व्यभिचारिभावोंसे पोषित निर्वेद शान्तरसरूपमें आस्वादित होता है, इसे ही शान्तरसवत्का उदाहरण समझें।

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काव्यादर्श:

शाण्डिश्यमतानुयायी लोग भक्तिरस नामक एक अलग रस मानते है- 'परत्रानासकं जनयति रतिर्यां नियमतः परस्मिन्नेवास्मिन् समरसतया पश्यत इमम्। परप्रेमाठथेयं भवति पर मानन्दमपुरा परा भक्ति: प्रोक्ता रस इति रसास्वादनचणैः॥' इस भक्तिरसमें-भगवान् आलम्बन, रोमान्चाश्रुपातादि अनुभाव, हर्षादि व्यभिचारिभाव एवं भगवदनुराग स्थायिभाव होता है। पण्डितराज जगनाथने इस रसका खण्डन करते हुए कहा है कि यह देवादिविषया रति होनेसे भाव है, रस नहीं। अपने मतकी पुष्टिमें उन्होंने भरतादिवचनको ही प्रमाणरूपमें दुहराया है। कुछ लोग वत्सल रस भी मानते हैं 'केचिच्चमत्कारितया वत्सलं च रसं विदुः।' 'उवाच धात्र्या प्रथमोदितं वचो ययौ तदीयामवलम्ब्य चाङु लिम्। अभूच्च नम्र: प्रणिपातशिक्षया पितुर्मुदं तेन ततान सोऽर्भंकः ॥।' इस रसमें पुत्रस्नेह स्थायी, पुत्रादि आलम्बन, पुत्राथालिङ्न-संभाषण अनुभाव और हर्षादि व्यभिचारी भाव होते हैं। इसी प्रकार रस भाव जहाँ अनौचित्य प्रवृत्त हो वहाँ रसामास और भावाभास होता है, वहाँ भी रसवत् अलक्वार होगा क्योंकि रसवत्में रसशब्दका अर्थ रस्यमानमात्र है।। २९१।। वाक्यस्याभ्राम्यतायोनिर्माचुर्ये' दर्शितो रसः। इह स्वष्टरसायचा रसवत्ता स्मृता गिराम्।। २९२।। (इति रसवच्चक्रम् ) ननु पूर्ष माधुर्यगुणस्वरूपकथनावसरे मधुरं रसवत् इत्यनेन रसवत्वस्य माधुर्य- गुणत्वमुक्तमत्र पुनस्तस्येव रसवश्वस्यालक्ठारत्वमुच्यते, तदिदं भ्रामकमित्यपेक्षायामाह- वाक्यस्येति। वाश्यस्य वाच: (वस्तुनमंत्युपलच्यते ) अभ्राम्यतायोनिः अभ्राम्यता- मूलको रसो माधुर्ये दर्शित:, दोषाभावे सति वाक्यं रसवद् भवति, तदन्यथात्वमपकृष्यते, तदिदं माधुर्यगुणप्रकमे उक्तम्, इह तु भष्टरसायत्ता रसावत्ता दुर्शिता। अत्र प्राम्यत्वाभाव- समानाधिकरणरसव्यजकालक्का रादिमत्त्वस्य माधुर्यगुणत्वं पूर्वमुक्तम्, इह तु केवलानां रसानामेवाल्ारत्वमुच्यते इति भावः ।। २९२। हिन्दी-प्रथम परिच्छेदमें साधुर्यगुणनिर्वचनप्रसङ्में-'मधुर रसवत्' कहा था, फिर यहां रसबत अलक्कार कहा। एक जगह माधुर्यगुणस्वरूप रसवत्त्व और दूसरी जगह अलक्कारस्वरूप, ऐसी बात क्यों हो रही है ? इसी प्रश्नका उत्तर इस कारिकामें दिया जा रहा है। पहले वाक्यमें अग्राम्यता होनेसे-ग्राम्यता दोषके नहीं होने से-प्रतीत होनेवाले रसकी बात कही गई थी, यहां पर केवल रसकी बात है। अर्थात् पहले ग्म्यत्वदोषाभावसे समन्वित रसव्यजक अलक्कारादिसद्भावको माधुर्यगुणरूपमें कहा गया था-रसमात्रको माधुर्य नहीं कहा था, यहाँ केवल आठ रसोंको ही रसवदलद्टार के रूपमें कहा गया है, अतः उनके भेद स्पष्ट हैं ।। २९२॥ अपकर्साऽहमस्मीति हदि ते मा स्म भूद्भयम्। विमुखेधु न. में लड्ग: प्रहर्तु जांतु वाञ्छति॥२९३॥ 'इति मुक्तः परो युद्धे निरदधो दर्पशालिना। पुंसा केनापि तजयमूर्जस्वीत्येवमादिकम् ॥२९४॥ (इत्यूर्जस्वि) १. वाज्यस्य। २. योनेः। ३. माधुर्यं। ४. एवमुकख्वा।

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द्वितीय: परिच्छेद:

क्रमप्राप्तमू्जस्विनमुदाहरति-अपकर्ति। अरहं ते तब अपकर्ता क्षतिकर: भप- कारपरायणोऽस्मीति कृत्वा ते तव भयं मदपादानकं भयं मा स्म भृत न जयताम्, तत्र कारणमाह-विमुखेष्विति। विमुखेषु सम्मुखयुद्धात्पलायितेषु मे सड्गः प्रहर्तु प्रहार्र कर्तु जातु कदाचिदपि न वाञ्छति नाभिलष्यति। पराठमुसस्य हननं शाक्विरुद्धं मत्या मम खडगः त्वयि प्रहारं नव करिष्यति, तदलमपकर्तुरपि तब मदपादानकेन भयेनेति भाव:।।२९३। उदाहरणमुपपादयति-इति मुकत इति। दर्पशालिना अहक्ारयुतेन केनापि पुंसा वीरेण युद्धे निरुद्धः अवरुद्ध: स्ववशीकृतः परः शत्ुरिति एवमुक्त्वा मुकः गन्तुमाजप्ः, तत् तस्मात् गर्वस्यात्र प्राधान्येनाभिव्यकेरित्येवमादिकं सर्वमप्युदाहरणमोजस्विनाम्रा- ड्लक्कारंण युतं मन्तव्यम् ॥ २९४॥ हिन्दी-तुमने मेरा अपकार किया है इसलिए तुम्हें मुझसे डरनेकी आवश्यकता नहीं है, जब तुम युद्धविमुख हो गये हो, तब हजार उपकार करने पर भी हमारा यह खड्ग कभी भी तुम पर प्रहार नहीं करना चाहेगा। यहाँ गर्वरूप व्यभिचारी भाव उत्साहरूप स्थायी भावको आवृत करके प्रकट हो रहा है, अतः इसे ऊर्जस्वी अलङ्कार मानते हैं ॥ २९३॥ इस उदाहरणमें महाभिमानी किसी वीर पुरुषने युद्धमें बन्दी बनाये गये शुको उपर्युक्त प्रकार से लज्जिन करनेवाली बातें कहकर मुक्त कर दिया, इसलिये इस तरहके सगर्व कथनोंमें ऊर्जस्वी अलक्कार होगा ॥ २९४ ॥ इष्टमर्थमनाख्याय साक्षात्तस्यैव सिद्धये। यत्प्रकारान्तराखयानं पर्यायोकं तदिष्यते ।। २९५। पर्यायोपं नामालद्कारं लक्षयति-इएमथमिति। इष्टम् प्रतिपादयितुमीहितम् भर्थम् साक्षात् अनाख्याय अभिघया अनुक्त्वा तस्येव अभिधित्सितार्थस्य सिद्धये सचमत्कार- प्रतीतये यत प्रकारान्तरेण चमत्कारजनकभत्ञिविशेषेण आर्यानं व्यजनया प्रतिपादनं तत्पर्यायोकं नामालक्कारः । विवक्षितमर्य साक्षात्तद्वाचकपदैरनुक्त्वा चमत्कारातिय - प्रतिपत्तये प्रकारान्तरेण तत्कथनं पर्यायोक्तमिति फलितम्। पर्यायो नामैकस्यार्थस्य प्रति- पादकान्तरम्, पर्यायता हि शब्दयोरेकार्थबोधकता, सा चैकयेव वृत्येति न नियमः, तथा च वाच्यस्यार्थस्य व्यज्ञनया प्रतिपादनमेव पर्यायोक्तमिति भावः। न चैवमस्य व्वनिरपता- SSपत्तिः, अत्र व्यजनया वाच्यारयस्येवाभिधान, ध्वनी तु न वाच्य एवार्यो विषय इति भेदात्॥ २९५ ॥ हिन्दी-विवक्षित अर्थको वाचक शब्दोंसे साक्षाद नहीं कह कर उसी अर्थकी चमत्कारिणी प्रतीतिके लिये चातुर्यव्यअक भङ्गीसे व्यञ्ञना द्वारा कथनको पर्यायोक्त कहते हैं। पर्यायका अर्थ है शब्दान्तर, जिस शब्दसे व्यअना द्वारा विवक्षित अर्थ कहा जायगा वह अभिषा द्वारा तदर्थ- वाचकका पर्याय हुआ ही, उसीके द्वारा कहा जाता है अतः पर्यायोक्त नामकरण सार्थक हुआ। इसे आप ध्वनि या गुणीभूतव्यक्गय नहीं कह सकते हैं क्योंकि यहाँ पर वाच्यार्थ ही व्यज्जनासे कहलाया जाता है, ध्वनिमें तो वाच्यार्थ ही ध्वनिका विषय नहीं होता है, इसके अतिरिक्त यहाँ का व्यक्कयार्थ अतिस्फुट हुआ करता है अत एव वह वाच्यातिशायी नहीं होता है, फिर उसे

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१६० काव्यादर्श:

ध्वनि कैसे माना जाय, यह तो उक्तिवैचित्र्यमात्र है, इन्हीं बातोंको हृदयमें रख कर काव्यप्रकाश- कारने लिखा है :- 'यदेव वाच्यं तदेव व्यङ्थं, यथा तु वाच्यं तथा न व्यङ्गयम्' इति ॥ २९५॥ दशत्यसी परभृतः सहकारस्य मखरीम्। तमहं वारयिष्यामि युवाभ्यामास्यतामिह॥ २९६।। सङ्गमय्य सखी यूना संकेते तद्रतोत्सवम्। निर्वरयितुमिच्छन्त्या कयाऽप्यपसृतं ततः ।।२९७।। (इति पर्यायोक्तम्) पर्यायोक्तमुदाहरति-दशत्यसाविति। असी परमृतः कोकिल: सहकारस्य भाम्रस्य मजरीं दशति आस्वाय्य विनाशयति, अहं तं परभृतं वारयिष्यामि, युवाभ्याम् इह स्वैरम् निश्रब्धम् आस्यताम्। अत्र अहं गच्छामि, युवाभ्यां यथेप्सितं सुरतं विधीयतामिति विवक्षितमर्थ प्रकारन्तरेण चमस्कारकारिणोकतं विभाव्य पर्यायोक्तलक्षणं संगतं वेदि- तव्यम् ॥ २९६ ॥ प्रकरणं र्पष्ट्यति-सङ्गमय्येति। यूना नायकेन सखीं तत्सप्जमाभिलाषिणी वनितां सक्टेते सम्मय्य मेलयित्वा तद्रतोत्सवं तयोर्यूयोर्निधुवनं निर्वर्त्तयितुं स्वापसरणेन संपाद- यितुम् इच्छन्त्या कयापि सख्या ततः स्थानात् अपसतम् ॥ २९७॥ हिन्दी-वह कोकिल आम्रमअरीको नष्ट कर रहा है-कुतर-कुतर कर गिरा रहा है, मैं उसे वैसा करनेसे रोकने जा रही हूं, आप दोनों आदमी यहाँ यथाकाम निश्चिन्त होकर रहें। इस उदाहरणमें आप दोनों अपना अभीष्ट सुरतोपभोग करें यह वाच्यार्थ-मैं जाती हूँ, और किसीका यहाँ आना संभव नहीं है, अतः आप विश्रब्ध होकर वहाँ रहें, इस व्यजक प्रकारसे कहा गया है, अतः यह पर्यायोक्तालक्कार हुआ॥ २९६ ॥। युवा नायकके साथ नायिकाको एकान्त संकेत-स्थानमें मिलाकर उनके सुरतकार्यको सम्पादित कर नेकी इच्छा रखनेवाली सखी वहाँसे टल गई। यह केवल इसलिये कह दिया गया है कि प्रकरण स्पष्ट हो जाय, जिससे उदाहरणल्लोकका तात्पर्य स्फुट हो सके ॥ २९७॥ किश्चिदार ममाणस्य कार्य दैववंशात् पुनः। तस्साधनसमापत्तिर्या तदाडु: समाहितम्।। २९८। मानमस्या निराकर्से पाद्योमें पतिष्यतः। उपकाराय दिषयेदमुदीर्णे घनगर्जितम्।।२९९।। (इति समाहितम्) समाहितं -नामालद्वारं लक्षयति-किश्चिदारममाणस्येति। किकित् कार्यम् किमपि वर्त्तव्यं कर्म आारभमाणस्य यथोचितसाधनावलम्बनेन कर्तु मुपक्ममाणस्य कर्तः देववशात् या तत्साधनसमापति: तत्कार्यसाधकसाधनान्तरोपलव्धि: तत् समाहितम् आाहुः। भर- बधस्म कार्यस्य दैववशात् साधनान्तरोपलब्थ्या सौकर्येण समाधानं समाहितं नाम। अर्वाच्चीनास्तु समाधिसंज्याऽमुं व्यवहरन्ति। अत्र भोजराजेन देवात् साधनान्तरोपलब्ौ बुद्धिपूर्वकं वा साधनान्तरोपलब्धी द्विषाऽपि समाहितं स्वीकृतं, तथोदाहतं च ॥२९८ ॥ १. प्रबत। २. देववलाद।

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द्वितीय: परिच्छेद: १६१

उदाहरति-मानमस्या इति। अस्या मानिन्या नायिकाया मानम् निराकर्तु दूरीकर्सुम् पादयो: तदीयचरणयोः पतिष्यतः प्रणिपत्य तो प्रसादयिष्यतो मे मम उप- काराय दिष्टया देववशेन इद धनगर्जितम् उदीर्णम् जातम्। अत्र मानिन्या मानापनोदन- रूपकार्याय प्रणामरूपं साधनमादाय तत्परस्य नायकस्य दैवादुदीर्णेन घनगर्जितेन मानिनी- कामोद्दीपनद्वारा तत्सम्पाद्ये मानापनोदने सौकर्य सम्पादत इति समाहितसंगतिः ॥ २९९। हिन्दी-कर्त्ता किसी कार्यमें अपेक्षित साधनको लेकर उस कार्यको प्रारम्भ करे, भाग्यवश यदि उसी समय उस कार्यके साधक अन्य साधन मिल जायें तब कार्य सुकर हो जाय, इसे समाहित अलक्कार मानते हैं। नवीन आचार्य इसे समाधि नामसे व्यवहत करते हैं, समाहित तो उनके अनुसार भावशान्तिमें होता है। यहाँ 'दैवात्' यह नियमतः अपेक्षित नहीं है, दैवद्वारा अथवा बुद्धिकृत साधनान्तरोपलन्धि द्वारा कार्यसौकर्यविवक्षामें समाहित होता है, यह बात भोजराजने कही है, तदनुसार उदाहरण भी दिये हैं। २९८ ।। इस मानिनी नायिकाके मानको दूर करनेके लिये मैं इसके पैरों पर पड़ने ही वाला था कि मेरें उपकारके लिए मेघका गर्जन भी होने लगा. चरणप्रणिपातरूप साधनसे मानापनोदनरूप कार्यके करनेके लिये नायक तत्पर था, उसके उपकारार्थ मेघकी आवाज सुनाई पड़ी, उसका कार्य मानापनोदन सुकर हो गया, क्योंकि मेघगर्जन अतिकामोद्दीपक होता है, उसके होने पर मानिनीका मान सहज ही दूर हो गया। मानिनीके मानापनोदनोपायों में प्रणाम भी मिना गया है- 'सामभेदोऽथ दानं च नत्युपेक्षे रसान्तरम्। तद्भङ्गाय पतिः कुर्याद षढुपायानिति क्रमात्'॥२९९॥ आशयस्य विभूतेर्षा यम्महस्वमनुत्तमंम्। उदासं नाम तं प्राहुरलक्कारं मनीषिणः।। ३०० ।। उदासं लक्षयति- आशयस्येति। आशयस्य अभिप्रायस्य मनोव्यापारस्वरूपस्य विभृतेः सम्पदो वा यत् अनुत्तमम् अत्यधिकं महत्वं तत् मनीषिण उदार्तं नामालक्कारं प्राहुः यत्र प्रस्तुतस्यालौकिक महाशयत्वं महाविभवस्वं वा वण्यंते स उदात्तो नामालङ्कार: इस्यर्थः ॥ ३०० ॥ हिन्दी-आशय-अभिप्राय अथवा सम्पप्तिका यदि अतिशय महत्त्व वणित हो तो उदात्त अलक्कार कहते हैं, अर्थात् यदि प्रस्तुत वस्तुकी महाशयता अथवा महाविभवशालिताका वर्णन हो तो उदात नामक अलक्कार है। इन दोनों विषयोंके दो उदाहरण अभी आगे कहेंगे। काव्यप्रकाश- कारने 'महतां चोपलक्षणम्' कहकर एक नया प्रभेद बनाया है-जहाँ पर प्रस्तुत वस्तुका अङ्ग होकर महान् जनका चरित वणित हो वह भी एक प्रकारका उदात्त है, इस प्रमेदका उदाहरण यह दिया है- 'तदिदमरण्यं यस्मिन् दशरथवचनानुपालनव्यसनी। निवसन् बाडुसहायश्रकार रक्षक्षयं रामः ॥' यहाँ वर्णनीयतया प्रस्तुत दण्डकारण्यके उत्कर्षके लिए तदअतया रामका महान् चरित वर्णित हुआ है।। ३०० ॥ गुरोः शासनमत्येतुं न शशाक स राघयः। यो रावणशिरश्छेदकार्यभारेऽप्यविक्लवः।। ३०१॥ १. अनुत्तरम्।

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काव्यादर्श:

महाशयत्मवर्णन उदात्तमुदाहरति-गुरोरिति। यो राघवो राम: रावणस्य भसाषा- रणशोर्यबिलयातस्य राक्षसाधिपस्य न शिरसां मस्तकानां छेदकार्यमारे वेदनरूपे गुरुणि कार्ये अविकलम: भव्यप्रः, सः गुरोः शासनम् वनवासाझ्ञाम् अत्येतुं लक्षयितुं न शशाक नाक्षमत। अत्र रावणववरूपस्यासाध्यकार्यस्य क्तरि रामे राज्यापहारकपित्रादेशानुक्षडक तया महाशयतमुक्तमिति भवत्युदात्तम् ॥ ३०१ ॥ हिन्दी-जिस राघव रामने रावणके सिर काट़नेके समान महान् कार्यमें भी क्षमता प्रदशित की थी, वही राम पिताकी आज्ञा-बनवासादेशको (जिसके माननेसे राज्य छूट गया) नहीं टाल सके। यहाँ राक्षसराज-वधरूप असाधारण कार्य करनेवाले राममें पित्राश्ञावत्तित्व बताकर उनकी महाशयताका निदर्शन कराया मया है, अतः इसे उदार्त अलङ्गारका प्रथम भेद जानना चाडिये।। ३०१ ।। रस्ममित्तियु' सककान्ते: प्रतिबिम्बशतैव्ृतः। शातो लट्टश्वर: कुच्छ्रादाअनेयेन तस्वतः ॥ ३०२ ॥। महाविभवत्वे उदात्तमुदाहरति-रत्नेति। भ्ाजनेयेन हनूमता रत्नभित्तिषु मणि- मयगृहकुड थेषु सवकान्तः प्रतिफलितेः प्रतिबिम्बशतैः बहुभिः स्वीयप्रतिमूर्तिभि: कृतः वेष्टितो लङ्ेश्वरः कृच्छात् कष्टतः तत्वतो झ्ञातः यथार्थरावणः परिचितः। प्रतिबिम्बशत- घततया रावणस्य वास्तविकपरिचयो हनुमता कष्टेन प्राप्यते स्मेत्यर्थः। अत्र प्रतिबिम्ब- शततृुतत्वोपपादकरत्नभित्तिकभवनशालितया रावणस्य महाविभवत्यं वर्ण्यत इति भब- त्युदातालक्कार:॥। ३०२॥। हिन्दी-रत्ननिमित दीवारों पर प्रतिबिम्बित मूर्तिंशतसे आवृत रावणको हनुमान्ने कह्से यथार्थ रूपमें पहचाना। समानाकारक बिम्बप्रतिबिम्ब-समवधान होने-कौन यथार्थ रावण है, और कौन-कौन प्रतिबिम्ब है, यह पहचाननेमें इनुमान् को बुद्धि खपानी पड़ी। यहाँ पर रत्न- भित्तिक भवनके वर्णनसे रावणका महाविभवत्व प्रदशित होता है, अतः इसे उदात् अलक्कार कहा गया है॥। ३०२ ।।

(इत्युदाचम्) उदात्तमुपसंहरति- पूर्वत्रेति। पूर्वत्र-'गुरोः शासनम्' इत्यादिप्रथमोदाहरणे भाशायमाहात्म्यम् रामस्य महाशयर्त्वं सुव्यज्ञितम् साधु प्रकाशितम्, भत्र 'रत्नभित्तिपु' इत्यादि द्वितीयोदाहणे अभ्युदयगौरवम्-महाविभवत्वं रावणस्य सुव्यजितमिति हेतोः भदः एतत् उदात्तद्वयम् अपि प्रोक्तम्, उदात्तस्य माहात्म्य-महाविभवत्वरूपविषयद्वयगत- स्वेन द्वैविष्यनुकमिति भावः ॥। ३०३ ॥ हिन्दी-प्रथम उदाहरण-'गुरोः शासनमत्येतुं न शशाक स राघवः' इसमें रामके महाशय- स्वको अच्छी तरह व्यज्ित किया गया है, और 'रत्मभित्तिषु सक्कान्तैः प्रतिबिम्बशतर्वृतः' इस द्वितीय उदाहरणमें रावणका अभ्युद्यगौरव-बैभवकी विसालता प्रकाशित की गई है, अतः विषयद्वैनिध्य होनेसे इमने उदासका दो प्रकार किया है। ३०३॥ १. स्तम्भेषु । २. संक्रान्त। १. व्यक्तम्। ४. द्वितयं पुनः।

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द्वितीय: परिच्छेद: १६३

अपहूतिरपहुत्य न पक्ेधुः स्मरस्तस्य सहसं पत्रिणामिति॥ ३०४। अपहुर्ति क्षयति-अपहुतिरिति। किमित् किमपि प्रकृतस्य गुणक्रियादिरूपं वस्तु अपहुत्य अपलप्य अन्यस्य अर्थस्य दर्शनम् धर्मान्तरस्यारोपणम् अपठुतिर्नामालदवारः। प्रकृत धर्ममणं निषिष्य धर्म्यन्तरारोपः तत्वापहवरूपकनाम्रा पूयमुक्त अत्र तु गुभक्रिया- दिरूपधर्मापलापपूर्वको धर्मान्तरारोपोऽवकतिनाम्रा निर्दिश्यते इति भेद:। अन्यार्थारोप- मात्रस्य लक्षणत्वे रूपकातिशयोक्त्योरतिव्याप्तिः स्यादतः 'किशिदपहुत्य' इति योजितं तथा च रुपकातिशयोक्त्योः कस्यापि निषेषाभावाण्ातिव्याप्तिः। 'किशिदपहुल्य' इत्येताबन्मा- त्रोकतो आत्ेपालक्करिप्तिष्याशिक भरोऽन्यार्थसाधनमुच्यते। संदेहालदारे संशयः भत्र तु निश्यः, उत्प्रेक्षायां संभावनामात्रम, अत्र त्वाहार्यारोप इति भेद:। उदाहरण उत्तरार्धमुपन्यस्यति-न पश्चेषुरिति। स्मरः कामदेवः पश्येपुः बाणपश्ञक- मात्रसहायो न, तावद्िर्वणिजगदुत्पीडनासम्भवात्, अतस्तस्य पत्रिणां सहसमस्तीति बोष्यम्। अत्र प्रस्तुतस्य कामबाणस्य धम पक्मसंख्यकत्वं निषिध्य तत्र धर्मान्तर्रं सहस्र- संख्यकत्वमारोप्यत इति भवति लक्षणसप्गतिः॥ ३०४॥ हिन्दी-वर्णनीय वस्तुके गुणक्रियादि धर्मको असत्य बताकर-अपरूपित कर के यदि दूसरे धर्म-गुणक्रियादिका आरोप किया जाय तो अपकुति अलद्टार होता है, धर्मीका निषेण करके धर्म्यन्तर के आरोपमें दण्डीने तत्त्वापहवरूपक नामका अलक्कार बताया है, अतः उससे भेद बतानेके लिये धर्मनिषेधपूर्वक धर्मान्तरारोप को अपकुति कह रहे हैं। अन्यान्य नवीन आचार्यगण उभयविष स्थलमें अपकुति ही मानते हैं। यहों के अपकुतिलक्षणमें दो अंश है-धर्मका अपहव और धर्मान्तरका आरोप, उसमें यदि वर्मान्तरारोपमात्रको लक्षण कहेंगे तो रूपक और भतिशयोक्तिमें अतिव्याप्ति होगी, अतः 'किश्रिद- पहुत्य' धर्मका अपह्वरूप प्रथम अंशको मी लक्षणमें स्थान दिया गया। वैसा कहने पर अति- व्याप्ति मही होती है क्योंकि वहाँ किसी वस्तुका अपहब-प्रतिषेध नहीं किया जाता है। 'किशिदपठुत्य' इस पूर्वाशमात्रको लक्षण मानते हैं तो आक्षेप नामक अकदारमें कक्षणकी अतिव्याप्ति होती है, अतः अन्यषर्मारोपस्वरूप उत्तरांसको लक्षणमें समाविष्ट करते हैं। संदेहलक्कारमें संशय होता है यहाँ निश्षय, उत्प्रेक्षामें संभावना होती है यहाँ आहार्थ- निश्चय होता है, यही भेद है। इस कारिका का उत्तरार्व अपछुति का उदाहरण है। कामदेव पञ्चेषु नहीं है, उसके वाणोंकी संख्या हजार है, यदि वह पञ्जेषु होता तो उतनेसे वाणोंसे संसारको उत्पीडित नहीं कर पाता, अतः निश्चय ही उसके पास हजारों बाण है। इस उदाहरणमें वर्णनीय वस्तु कामवाणके धर्म पश्चसंख्यकत्वको असत्य बताकर दूसरे धर्म सहस्रसंस्यकत्वका आरोप हुआ है, अतः यह अपकुतिका उदाहरण है॥ ३०४॥ चन्दनं चन्ट्रिका मन्दो गन्घवाहम दक्षिणः। सेयमग्निमयी सृषिमयि शीता पराम्मति॥।३०५।। शैशिर्यमम्युपेत्यैव परेष्वात्मनि कामिना। भौष्णयप्रकाशनात् तस्य 'सेयं विषयनिहुतिः ॥ ३०६।।

13 १. प्रदर्शनाव्। २. सैपा। १३ का०

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१६५ काव्यादर्श

विषयापहुतिमुदाहरति-चन्दनमिति। चन्दर्न मलयजरस:, चन्द्रिका ज्योत्स्ना, तथा मन्द: दक्षिणो दक्षिणदिकप्रवुनः गन्ववाहो वायुथ, सेयम् एतत्समुदायरूपा मयि वियोगपीडितेऽप्रिमयी सृष्टिः अमिवत्सन्तापजननी, अतो मयाऽभिवन्मन्यते, परान् संयो- गिनः प्रति शीतला शीता, भतस्ते कामं तत्र तत्र शेत्यं प्रतियन्तु इति भाव:, अत्नोष्णत्व- प्रतिपादनेन शोतत्वं निषिध्यमानं बोध्यम्।३०५॥ उदाहरणमुपपादयति-शैशियमिति। अनोदाहरणे कामिना वियुक्ेन पुंसा परेषु स्वभिन्नेषु संयोगिषु जनेषु ( चन्दनादीनाम्) शेशिर्यम शीतलताम् अभ्युपेत्य अरभ्ोकृत्य एव तस्य शशिर्यस्य आत्मनि शष्ण्यप्रकाशनात् सन्तापकतया वर्णनात्, सा इयं विषय- निकृतिः विषयापहृतिः नामालक्कारः। अत्र चम्दनादीनां शैत्यं निषेष्यं तापकत्वं वारोप्य- मिति निषेधारोपयोर्व्यवस्थितविषयत्वाद्विषयापहतिरिति संज्ञा ॥ ३०६ ॥ हिन्दी-चन्दन, चन्द्रमाकी ज्योरस्ना और दक्षिण दिशासे आनेवाली शीतल मन्द वायु, यह सब मेरे लिये अभिमयी सृष्टि हैं, मले ही संयोगी पुरुषोंके लिये यही वस्तुएँ शीतल हों। यहाँ चन्दनादिकी उष्णता प्रतिपादन करके उनके शैत्यका निषेध व्यजित किया गया है॥ ३०५ ॥। इस उदाइरणमें कामी-वियुक्त पुरुषने स्वभिन्न संयोगी पुरुषोंमें चन्दनादिकी शीतलताको स्वीकार करके अपने विषयमें उन्हीं पदार्थोंकी उष्णता प्रकाशित की है, इसीलिए इसे विषयापकुति कहते हैं। इसका नाम विषयापहुति इसीलिए रखा गया कि निषेध्य और आरोप्यके विषय नियत है, अर्थाद शैत्यका निषेध होता है और सन्तापकत्वका आरोप है॥ ३०६॥ अमृतस्यन्दिकिरणश्रम्द्रमा नामंती मतः। अन्य पवायमर्थात्मा विषनिष्यन्दिदीघितिः॥३०७॥। इति चन्द्रत्वमेवेन्दी निवर्त्यार्थान्तरात्मता। उक्ता' स्मरासैनेत्येषा" स्वरूपापहुतिमता।। ३०८।। स्वरूपापहुतिमुदाहरति-अमृनेति। चन्द्रमा: चन्द्र: नामतः केवलं संज्ञामात्रेण भमृतस्यन्दिकिरण: सुधास्नाविकरशाली, मतः। चन्द्रमाः केवलं संज्ञयैवामृतवर्षी, न त्व- र्थत इति पूर्वार्द्धार्थ:, अर्थात्मा यथार्थत्वे स्वयं चन्द्रमा अन्य एव अन्यथाभ्त एव विष- निष्यन्दिदीधिति: गरलवर्षिकिरण: । वियोगिनां सन्तापजनकोडयं चन्द्रो नाममात्रेणा- मृतकर:, यथार्थभावे त्वसी विर्षाकरण इति। अत्र चन्द्रमसः संज्ञामात्र सधाकरत्वं कियाकृतं तु विषकरत्वमिति सुधाकरत्वं प्रति- विष्य विषकरत्वारोपादपहुतिः, इन्दो चन्द्रत्वमाहादकस्वरूपत्यं तदेवापहुत्य विषादकन्व- स्वरूपं धर्मान्तरमारोप्यते इति स्वरूपापहुतिः ॥। ३०७ ।। उदाहरणं योजयति-इति चन्द्रत्वमिति। केनचित स्मरार्तेन कामसन्तापितेन पुंसा इति प्रोसेन प्रकारेण इन्दी चन्द्रमसि चन्द्रत्वं सर्वजनाहादकत्वरूप तदीयमसाधा- रणधम निवत्य प्रतिषिष्य अर्थान्तरात्मता अन्यस्वरूपता विषमयकिरणशालिता उक्ता भारोपिता, इति स्वरूपापकृति: एषा स्वरूपस्याह्वादकत्वस्य निषेधेन प्रबुत्तस्वातस्वरूपा- पतुतिरिति संज्ञा ॥३०८ ॥। १. नाम नामतः। २. निडुत्य। १. अर्थान्तरात्मना। ४. उक्तं। ५. नेत्यादि।

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द्वितीय: परिच्छेद: १६५

हिन्दी-चन्द्रमा केवल संज्ञामात्रके लिये सुधाकर है, यथार्थमें वह विषमयकिरण है। यह स्वरूपापह्ुति है, वियोगियोंको सताने वाले चन्द्रमाको सुधाकर कोई वियोगी कैसे स्वीकार कर सकता है, उसके लिये तो वह विषकर ही है॥ ३०७।। इस उदाइरणमें किसी कामसन्तप्त विरहीने उक्त रीतिसे चन्द्रमाके स्वरूप सुषास्यन्दिकिरणत्व- सुधाकरत्व-आह्लादकत्वका प्रतिषेध करके विषमयकिरणत्वका आरोप किया है अतः इसे स्वरूपा- पहुति नामक अलक्कार कहा है। स्वरूपका अपलाप करके धर्मान्तरका आरोप किया जाता है अतएव इसे स्वरूपापहुति कहते हैं॥ ३०८ ॥। उपमापहुतिः पूर्वमुपमास्वेव दर्शिता। इत्यपदुतिभेदानां लक्ष्यो लक्ष्येषु विस्तरः॥ ३०१।। (इस्यपह्ुतिः) अपहुतिप्रस प्रमुपसंहरति-उपमेति। उपमायाः। सादृश्यस्य अपकुतिः प्रतिभेयः उप- मापहुतिः पूर्षमू उपमासु उपमाप्रभेदेषु दर्शिता-प्रतिषेधोपमानाम्रा उक्क्ा-भतीऽन नोकवते। इति एवम् अपहुतिभेदानां विस्तगे लक्ष्येषु लक्षय: अन्वेष्टव्यः॥३०९॥ हिन्दी-उपमा-सादृश्यके प्रतिषेधसे अनुपमत्व-प्रतिपादनमें चमत्कार हो सकता है, अतः उपमापछुति नामक प्रभेद भी इस अपङ्गुतिका होना चाहिये, उसे न कहने से न्यूनताका संदेह उठ सकता है, उसीका यह उत्तर दिया जाता है कि उपमा-सादृश्यके प्रतिषेधसे होनेवाले प्रभेदका उपमाकरण में कथन हो गया है, उसका वहाँ प्रतिषेधोपमा नामसे निरूपण कर दिया गया है, देखिये- 'न जातु शक्तिरिन्दोस्ते मुखेन प्रतिगजिंतुम् । कलक्किनो जडस्येति प्रतिषेधोपमैव सा ।।' इस तरहके लक्ष्योंमें सादृश्यका प्रतिषेध करके गुणातिशय प्रतिष्ठापित किया जाता है। यथपि सादृश्यप्रतिषेध होता है परन्तु सादृश्यप्रतिषेध उपमाके मूल गुणातिशयको ही प्रतिष्ठापित करता है, अतः यहाँ अपछुति भी उपमाकी विकासिका ही होकर रह जाती है, प्रधान उपमा ही होती है, अतएव दण्डीने इसे उपमाके प्रभेदोंमें ही कहा है, इसी अभिप्रयको व्यक्त करनेके लिये आचार्यने 'प्रतिषेधोपमैव'में एवकार लगा दिया है, यह ध्यान देनेके योग्य है। इसी प्रकारसे अलक्धारान्तरोत्पादक अपछुतिप्रभेदोंका लक्ष्यग्रन्थमें अन्बेषण करें। 'प्रेमचन्द्र' ने उत्प्रेशापकुतिका यह उदाहरण दिया है- 'अमुच्छकेन सुद्सो हुतपातकधूमकलुषाक्ष्याः । अप्राष्य मानमझे विगलति लावण्यवारिपूर इव ॥'३०९। रिलिर्शमष्टमनेकार्थमे करूपान्वितं वयः। तदभिन्नपदं भिन्नपद्धायमिति द्विया॥ ३१०॥ प्रथावसर प्राप्तं श्लेषाल्टारं निरूपयति-स्लिष्टमिति। अनेकार्थम् एकरूपान्वितम् ननः रिलिष्टम् इष्टम्। अनेकार्थम् अभिषाद्वाराऽनेकार्थवाचक्म्, एकरूपान्वितम् भर्यमेदे- 5पि अभिन्नप्रयमोच्चार्यतया एकेन रूपेण युक्तम, वचः वाक्यं श्लिष्टम् श्लेषालयालक्टार- योगीष्टम्। श्लेष :- एकत्वावभासक: सम्बन्धविशेष:, म च शब्दयोरेक्प्रयल्ञोच्चार्यन्वरूपः, भर्थयोस्तु प्रकरणादिनियमाभावे एकप्रयननोश्वार्यशब्दद येनेकका लिकबोधविषयत्वरूपः। एतम अनेकार्यकत्वम् अभिधाद्वारा युगपदनेकार्थप्रतिपादकरवं, तथाभिधानिवामकानां संयोगविपयोगाशीनामभावे एव संभवतीति संयोगादिभिरभिधाया निवयस्बले युगपदर्य- द्वयप्रतीते रभावाज श्लेष:, किन्तु तत्राप्रकृतार्थस्य व्वनित्वमेव, यषा-

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१६४ काव्यादर्श:

विषयापहुतिमुदाहरति-चन्दनमिति। चन्दर्न मलयजरस:, बन्द्रिका ज्योत्स्ना, तथा मन्दः दक्षिणो दक्षिणदिकप्रवुनः गन्ववाहो वायुथ, सेयम् एतत्समुदायरूपा मयि वियोगपीडितेऽम्िमयी सृष्टिः अमिवत्सन्तापजननी, अतो मयाऽभिवन्मन्यते, परान् संयो- गिनः प्रति शीतला शीता, अतस्ते कामं तत्र तत्र शैत्यं प्रतियन्तु इति भाव:, अत्रोष्णत्व- प्रतिपादनेन शोतत्वं निषिध्यमानं बोध्यम्।३०५॥ उदाहरणमुपपादयति-शैशियमिति। अनोदाहरणे कामिना वियुक्तेन पुंसा परेषु स्वभिज्जेषु संयोगिषु जनेषु ( चन्दनादीनाम् ) शेशिर्यम शीतलताम् अभ्युपेत्य श्रज्ञीकृत्य एव तस्य शैशिर्यस्य आत्मनि औष्ण्यप्रकाशनात् सन्तापकतया वर्णनात्, सा इयं विषय- निकुतिः विषयापकतिः नामालक्कारः। अत्र चम्दनादीनां शैत्यं निषेध्यं तापकत्वं चारोप्य- मिति निषेधारोपयोर्व्यवस्थितविषयत्वाद्विषयापहतिरिति संज्ञा ॥३०६ ॥ हिन्दी-चन्दन, चन्द्रमाकी ज्योर्स्ना और दक्षिण दिशासे आनेवाली शीतल मन्द वायु, यह सम मेरे लिये अभ्िमयी सृष्टि हैं, मले ही संयोगी पुरुषोंके लिये यही वस्तुएँ शीतल हों। यहाँ चन्दनादिकी उष्णता प्रतिपादन करके उनके शैत्यका निषेध व्यजित किया गया है॥ ३०५ ॥। इस उदाहरणमें कामी-वियुक्त पुरुषने स्वभिन्न संयोगी पुरुषोंमें चन्दनादिकी शीतलताको स्वीकार करके अपने विषयमें उन्हीं पदार्थोंकी उष्णता प्रकाशित की है, इसीलिए इसे विषयापकुति कहते हैं। इसका नाम विषयापहुति इसीलिए रखा गया कि निषेध्य और आरोप्यके विषय नियत है, अर्थात शैत्यका निषेध होता है और सन्तापकत्वका आरोप है॥ ३०६॥ अमृतस्यन्दिकिरणश्रन्द्रमा नामंतो मतः। अन्य पवायमर्थात्मा विषनिष्यन्दिदीघितिः॥३०७॥। इति चन्द्रत्वमेवेन्दी निवर्त्यार्थान्तरात्मता। उक्ता' स्मरार्तेनेत्येषा" स्वरूपापहुतिमता॥। ३०८।। स्वरूपापहुतिमुदाहरति-अमृनेति। चन्द्रमाः चन्द्र: नामतः केवलं संज्ञामात्रेण भमृतस्यन्दिकिरण: सुधास्त्नाविकरशाली, मतः। चन्द्रमा: केवलं संज्ञयैवामृतवर्षी, न त्व- र्यंत इति पूर्वार्द्धार्थ:, अर्थात्मा यथार्थत्वे त्वयं चन्द्रमा अन्य एव अन्यथाभृत एव विष- निष्यन्दिदीधिति: गरलवर्षिकिरण: । वियोगिनां सन्तापजनकोऽयं चन्द्रो नाममात्रेण- मृतकर:, यथार्थभावे त्वसी विर्षाकरण इति। अत्र चन्द्रमसः संज्ञामात्र सधाकरत्वं क्रियाकृतं तु विषकरत्वमिति सुधाकरत्वं प्रति- विष्य विषकरत्वारोपादपहुतिः, इन्दो चन्द्रत्वमाहादकस्वरूपत्वं तदेवापहुत्य विषादकन्य- स्वरूपं धर्मान्तरमारोप्यते इति स्वरूपापहुतिः ॥ ३०७ ॥ उदाहरणं योजयति-इति चन्द्रत्वमिति। केनचित स्मरार्तेन कामसन्तापितेन पुंसा इति प्रोत्तेन प्रकारेण इन्दी चन्द्रमसि चन्द्रत्वं सर्वजनाहादकत्वरूप तदीयमसाधा- रणधम निवतत्य प्रतिषिष्य भर्धान्तरात्मता मन्यस्वरूपता विषमयकिरणशालिता उक्ता भारोपिता, इति स्वरूपापकृति: एषा स्वरूपस्याह्वादकत्वस्य निषेधेन प्रबुत्तत्वात्स्वरूपा- पहुतिरिति संज्ञा ॥। ३०८ ॥। १. नाम नामतः। २. निहुत्य। ३. अर्थान्तरात्मना। ४. उक्तं। ५. नेत्यादि।

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द्वितीय: परिच्छेद: १६५

हिन्दी-चन्द्रमा केवल संशामात्रके लिये सुधाकर है, यथार्थमें वह विषमयकिरण है। यह स्वरूपापह्युति है, वियोगियोंको सताने वाले चन्द्रमाको सुधाकर कोई वियोगी कैसे स्वीकार कर सकता है, उसके लिये तो वह विषकर ही है॥। ३०७।। इस उदाहरणमें किसी कामसन्तप्त विरहीने उक्त रीतिसे चन्द्रमाके स्वरूप सुधास्यन्दिकिरणत्व- सुधाकरत्व-आह्ादकत्वका प्रतिषेध करके विषमयकिरणत्वका आरोप किया है अतः इसे स्वरूपा- पहुति नामक अलक्कार कहा है। स्वरूपका अपलाप करके धर्मान्तरका आरोप किया जाता है अतएव इसे स्वरूपापहुति कहते हैं॥ ३०८ ॥ उपमापहुतिः पूर्वमुपमास्वेव दर्शिता। इत्यपह्ुतिभेदानां लक्ष्यो लक्ष्येधु विस्तरः॥ ३०९॥ (इत्यपहुतिः) अपहुतिप्रस प्रमुपसंहरति-उपमेति। उपमायाः। सादृश्यस्य भपकुतिः प्रतिषेय: उप- मापहुतिः पूरषमू उपमासु उपमाप्रभेदेषु दर्शिता-प्रतिषेधोपमानाम्रा उक्का-भतीऽनर नोरयते। इति एवम् अपहुतिभेदानां विस्तगे लक्ष्येषु लक्षयः अन्वेष्टव्यः।।३०९॥ हिन्दी-उपमा-सादृश्यके प्रतिषेधसे अनुपमत्व-प्रतिपादनमें चमत्कार हो सकता है, अतः उपमापहुति नामक प्रभेद भी इस अपह्ुतिका होना चाडिये, उसे न कहने से न्यूनताका संदेह उठ सकता है, उसीका यह उत्तर दिया जाता है कि उपमा-सादृश्यके प्रतिषेधसे होनेवाले प्रभेदका उपभाकरण में कथन हो गया है, उसका वहाँ प्रतिषेधोपमा नामसे निरूपण कर दिया गया है, देखिये- 'न जातु शक्तिरिन्दोस्ते मुखेन प्रतिगजितुम्। कलक्किनो जडस्येति प्रतिषेधोपमैब सा।।' इस तरहके लक्ष्योंमें सादृश्यका प्रतिषेध करके गुणातिशय प्रतिष्ठापित किया जाता है। यथपि सादृश्यप्रतिषेध होता है परन्तु सादृश्यप्रतिषेध उपमाके मूल गुणातिशयको ही प्रतिष्ठापित करता है, अतः यहाँ अपकुति भी उपमाकी विकासिका ही होकर रह जाती है, प्रधान उपमा ही होती है, अतरव दण्डीने इसे उपमाके प्रभेदोंमें ही कहा है, इसी अभिप्रायको व्यक्त करनेके लिये आचार्यने 'प्रतिषेधोपमैव'में एवकार लगा दिया है, यह ध्यान देनेके योग्य है। इसी प्रकारसे अलकारान्तरोत्पादक अपहुतिप्रभेदोंका लक्ष्यग्रन्थमें अन्बेषण करें। 'प्रेमचन्द्र' ने उत्प्रेशापपुतिका यह उदाहरण दिया है- 'अमुच्छकेन सुद्सो हुतपात्रकधूमकलुषाकष्याः। अप्राप्य मानमझे विगलति लावण्यवारिपूर इन॥'३०९।। रिलिर्शमष्टमनेकार्थमे करूपान्वितं वयः। तदभिन्नपदं भिन्नपद्धायमिति दविया॥ ३१०॥ अ्रथावसर प्राप्तं श्लेषालक्टारं निरूपयति-स्लिश्मिति। अनेकार्यम् एकरूपान्वितम् नन: श्लिष्टम् इष्टम्। अ्नेकार्यम् अभिषाद्वाराऽनेकार्थवाचक्रम्, एकरूपान्वितम् भर्यमेदे- पि अभिभनप्रयल्नोच्चार्यतया एकेन रूपेण युक्तम, वचः वाक्यं श्लिष्टम् श्लेषारयालद्ार- योगीष्टम् । श्लेष :- एकत्वावभासक: सम्बन्धविशेष:, म च शब्दयोरेकप्रयल्नोच्चार्यन्वरूपः, भर्थयोस्तु प्रकरणादिनियमाभा वे एकप्रयननोच्वार्यशब्दद्येनेकका लिकबो घविषयत्वरूपः। एतम अनेकार्थकत्वम् अभिषाद्वारा युगपदनेकार्यप्रतिपादकर्व, तथ्ाभिधानियामकार्ना संयोगविप्रयोगाहीनामभावे एव संभवतीति संयोगादिभिरमिषाया निवमस्वले युगपदर्य- दयप्रतीते रभावान श्लेष:, किन्तु तत्राप्रकृतार्थस्य व्वनित्वमेव, यथा-

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१६४ काव्यादर्श:

विषयापछुतिमुदाहरति-चन्दनमिति। चन्दर्न मळयजरस:, च्न्द्रिका ज्योत्स्ना, तथा मन्द: दक्षिणो दक्षिणदिकप्रवुनः गन्घवाहो वायुक, सेयम् एतत्समुदायरूपा मयि वियोगपीडितेऽमरिमयी सृष्टिः अतिवत्सन्तापजननी, अतो मयाऽभिवन्मन्यते, परान् संयो- गिनः प्रति शीतला शीता, अतस्ते कामं तत्र तत्र शैत्यं प्रतियन्तु इति भाव:, अत्रोष्णत्व- प्रतिपादनेन शोत्त्वं निषिष्यमानं बोध्यम्।। ३०५॥ उदाहरणमुपपादयति-शैशिरयमिति। अनोदाहरणे कामिना वियुक्तेन पुंसा परेषु स्वभिल्जेषु संयोगिषु जनेषु (चन्दनादीनाम् ) शेशिर्यम शीतलताम् अभ्युपेत्य अज्ञीकृत्य एव तस्य शैशियस्य आरत्मनि औष्ण्यप्रकाशनात् सन्तापकतया वर्णनात्, सा इयं विषय- निकतिः विषयापकतिः नामालक्कारः। अत्र चम्दनादीनां शैत्यं निषेध्यं तापकत्वं चारोप्य- मिति निषेधारोपयोर्व्यवस्थितविषयत्वाद्विषयापहुतिरिति संज्ञा॥३०६॥ हिन्दी-चन्दन, चन्द्रमाकी ज्योर्स्ना और दक्षिण दिशासे आनेवाली शीतल मन्द वायु, यह सब मेरे लिये अभ्निमयी सृष्टि है, मले ही संयोगी पुरुषोंके लिये यही वस्तुएँ शीतल हों। यहाँ चन्दनादिकी उष्णता प्रतिपादन करके उनके शैत्यका निषेध व्यजित किया गया है॥ ३०५॥। इस उदाहरणमें कामी-वियुक्त पुरुषने स्वभिन्न संयोगी पुरुषोंमें चन्दनादिकी शीतलताको "स्वीकार करके अपने विषयमे उन्हीं पदार्थोंकी उष्णता प्रकाशित की है, इसीलिए इसे विषयापहुति कहते हैं। इसका नाम विषयापहुति इसीलिए रखा गया कि निषेध्य और आरोप्यके विषय नियत है, अर्थात शैत्यका निषेध होता है और सन्तापकत्वका आरोप है॥ ३०६॥ अमृतस्यन्दिकिरणश्रन्द्धमा नामंतो मतः। अन्य पवायमर्थात्मा विषनिष्यन्दिदीघितिः॥३०७॥ इति चन्द्रत्वमेवेन्दी निवर्त्यार्थान्तरात्मता। उक्ता' स्मरार्तेनेत्येषा" स्वरूपापहुतिमता॥३०८॥। स्वरूपापहुतिमुदाहरति-अमृनेति। चन्द्रमाः चन्द्रः नामतः केवलं संज्ञामात्रेण अमृतस्यन्दिकिरण: सुधास्राविकरशाली, मतः। चन्द्रमाः केवलं संज्ञयेवामृतवर्षी, न त्व- र्थत इति पूर्वार्द्धार्थ:, अर्थात्मा ययार्थत्वे त्वयं चन्द्रमा अन्य एव अन्यथाभृत एव विष- निष्यन्दिदीधिति: गरलवर्षिकिरणः। वियोगिनां सन्तापजनकोऽयं चन्द्रो नाममात्रेणा- मृतकरः, यथार्थभावे त्वसौ विर्षाकरण इति। अत्र चन्द्रमसः संज्ञामात्रं सधाकरत्वं क्रियाकृतं तु विषकरत्वमिति सुधाकरत्वं प्रति- षिष्य विषकरत्वारोपादपहुतिः, इन्दौ चन्द्रत्वमाहादकस्वरूपत्वं तदेवापहुत्य विषादकन्व- स्वरूपं धर्मान्तरमारोप्यते इति स्वरूपापहुतिः॥ ३०७ ॥ उदाहरणं योजयति-इति चन्द्रत्वमिति। केनचित स्मरार्लेन कामसन्तापितेन पुंसा इति प्रोत्ेन प्रकारेण इन्दौ चन्द्रमसि चन्द्रत्वं सर्वजनाहादकत्वरूपं तदीयमसाधा- रणधम निवतत्य प्रतिषिष्य अर्थान्तरात्मता अन्यस्वरूपता विषमयकिरणशालिता उक्ता भारोपिता, इति स्वरूपापहुतिः एषा स्वरूपस्याह्वादकत्वस्य निषेधेन प्रवृत्तस्वात्स्वरूपा- पहुतिरिति संज्ञा ॥ ३०८ ॥ १. नाम नामतः । २. निहुत्य। ३. अर्थान्तरात्मना। ४. उक्तं। ५. नेन्यादि।

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द्वितीय: परिच्छेद: १६५

हिन्दी-चन्द्रमा केवल संज्ञामात्रके लिये सुधाकर है, यथार्थमें वह विषमयकिरण है। यह स्वरूपापह्युति है, वियोगियोंको सताने वाले चन्द्रभाको सुधाकर कोई वियोगी कैसे स्वीकार कर सकता है, उसके लिये तो वह विषकर ही है। ३०७।। इस उदाहरणमें किसी कामसन्तप्त विरहीने उक्त रीतिसे चन्द्रमाके स्वरूप सुधास्यन्दिकिरणत्व- सुधाकरत्व-आहादकत्वका प्रतिषेध करके विषमयकिरणत्वका आरोप किया है अतः इसे स्वरूपा- पहुति नामक अलक्कार कहा है। स्वरूपका अपलाप करके धर्मान्तरका आरोप किया जाता है अतएव इसे स्वरूपापहुति कहते हैं॥ ३०८ ॥। उपमापहुतिः पूर्वमुपमास्वेव दर्शिता। इत्यपदुतिभेदानां लक्ष्यो लक्ष्येषु विस्तरः॥ ३०९।। (इत्यपहुतिः) अपहुतिप्रस प्मुपसंहरति-उपमेति। उपमायाः । मादृश्यस्य अपछुतिः प्रतिषेयः उप- मापहुतिः पूषम् उपमासु उपमाप्रभेदेषु दर्शिता-प्रतिषेधोपमानाम्रा उक्ता-भतीऽन्र मोर्यते। इति एवम् अपहुतिभेदानां विस्तगे लत्ष्येषु लक्षयः अन्वेष्टव्यः ॥३०९॥ हिन्दी-उपमा-सादृश्यके प्रतिषेधसे अनुपमत्व-प्रतिपादनमें चमत्कार हो सकता है, अतः उपमापहुति नामक प्रभेद भी इस अपद्दुतिका होना चाहिये, उसे न कहने से न्यूनताका संदेह उठ सकता है, उसीका यह उत्तर दिया जाता है कि उपमा-सादृश्यके प्रतिषेधसे होनेवाले प्रभेदका उपभाकरण में कथन हो गया है, उसका वहाँ प्रतिषेधोपमा नामसे निरूपण कर दिया गया है, देखिये- 'न जातु शक्तिरिन्दोस्ते मुखेन प्रतिगर्जितुम्। कलक्किनो जडस्येति प्रतिषेधोपमैव सा ।।' इस तरहके लक्ष्योंमें सादृश्यका प्रतिषेध करके गुणातिशय प्रतिष्ठापित किया जाता है। यथपि सादृश्यप्रतिषेध होता है परन्तु सादृश्यप्रतिषेध उपमाके मूल गुणातिशयको ही प्रतिष्ठापित करता है, अतः यहाँ अपहुति भी उपमाकी विकासिका ही होकर रह जाती है, प्रधान उपमा ही होती है, अतएव दण्डीने इसे उपमाके प्रभेदोंमें ही कहा है, इसी अभिप्रायको व्यक्त करनेके लिये आचार्यने 'प्रतिषेधोपमैव'में एवकार लगा दिया है, यह ध्यान देनेके योग्य है। इसी प्रकारसे अलक्टारान्तरोत्पादक अपछुतिप्रभेदोंका लक्ष्यग्रन्थमें अन्बेषण करें। 'प्रे मचन्द्र' ने उत्प्रेकषापछुतिका यह उदाहरण दिया है- 'ममुच्छलेन सुद्शो दुतपात्रकधूमकलुषाक्ष्याः। अप्राप्य मानमझे विगलति लावण्यवारिपूर इव॥'३०९।। श्लिधमिष्टमनेकार्थमे करूपान्वितं वचः। तदभिन्नपदं भिन्नपद्पायमिति द्विया॥ ३१०॥ भरथावसर प्राप्तं श्लेषालक्ारं निरूपयति-शलिष्ठमिति। अनेकार्थम् एकरूपान्वितम् वच: श्लिष्टम् इष्टम्। अरनेकार्थम् अभिधाद्वाराऽनेकार्थवाचकम्, एकरूपान्वितम् भर्थमेदे- 5पि अभिभ्नप्रयलनोच्चार्यतया एकेन रूपेण युक्त्तम, वच: वाक्यं श्लिष्टम् श्लेषाख्यालक्वार- योगीष्टम्। श्लेष :- एकत्वावभासक: सम्बन्धविशेष:, म च शब्दयोरेकप्रयन्नोच्चार्यनवरूपः, भर्थयोस्तु प्रकरणादि नियमाभावे एकप्रयल्नोश्चार्यशब्दद्वयेनेकका लिक बोधविषयत्वरूपः। एतम अनेकार्यकत्वम् अभिधाद्वारा युगपदनेकार्थप्रतिपादकर्त्वं, तथ्थाभिधानियामकानां संयोगविप्रयोगादीनामभावे एव संभवतीति संयोगादिभिरभिधाया निव्यस्बले युगपदर्य- द्वयप्रतीतेरभावाभ श्लेष:, किन्तु तत्राप्रकृतार्थस्य व्वनित्वमेव, यथा-

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१६६ काव्यादर्श:

यह्यानुपप्लवगतेः परवारणस्य दानाम्बुसेकसुभगः सततं करोडभून् ।।' इत्यत्र प्रकरणनियमेन प्रथमं राजरूपोऽर्यः प्रतिपाद्यते, पश्चाच्च हस्ती व्यज्यते। श्लेषस्य मेदमाह-तद्भिन्नपद्मिति। तत् श्लिष्टम द्विघा-अभिन्नपदं भिन्नपदप्रायमिति च। शक्यतावच्छेद कभेदेऽपि एकप्रत्ययप्रकृत्यादिघटितानि अत एवाभिन्नानि पदानि यस्मिस्तद- मिन्नपदम्, एवम्- भिन्नानां प्रकृतिप्रत्ययादिभेदेन भिन्नानां पदानां प्रायः बाहुल्यं यत्र तादृशमभिन्नपदप्रायम्। एवसाभिन्नपदस्यलेऽभपश्लेषः भिन्नपदप्राये च सभन्श्लेष इति। स चायं श्लेष: शब्दपरिवृत्तिसहत्वतदसहत्वाभ्यां द्विघा, अर्थश्लेषशब्दश्लेषनात्रा नवीनैरभ्युपगतः, प्राचीनास्तु दण््यादयः शब्दस्यार्थद्वयोपस्थापकत्वरूपं समार्नं वैचित्रयं निमिनमादायोभयत्रापि अर्थश्लेषमेवाहुः॥३१०॥ हिन्दी-अनेकार्थक-अमिधावृत्तिद्वारा एकही साथ एकाधिक अर्थको कहनेवाले, एवं एक- रूपान्वित-अर्थमद होने पर भी अभिन्नप्रयलोच्चार्य होनेसे एकरूप्र वचनको श्रिष्ट-क्रंषालङ्कार- युक्त कहते हैं। श्लेषका अर्थ है-शब्द और अर्थका एकतावभासक संबन्धविशेष, वह शब्दोंमें एकप्रयलोच्चार्यत्वस्वरूप और अथोमें एकप्रयलनाच्चार्य शब्दद्वारा एककालिकबोधविषयत्वरूप पढ़ता है। कुछ लोग शब्दोंमें जतुकाष्ठन्यायसे और अथोमें एकवृन्तगतफलद्वयन्यायसे श्लेष स्वीकार करते हैं। नवीन आचार्योने शब्दश्लेष और अर्थश्लेष नामसे अलग-अलग दो अलक्कार माने हैं, उनके मतमें जहाँ पर शब्दपरिवर्तन होने पर भी-शब्दपरिवृत्तिसह स्थलमें श्लेष बना ही रहता है उसे अर्थश्लेष स्वीकार किया जाता है, जैसे-'स्तोकेनोन्नतिमायाति स्तोकेन।यात्यधोगतिम्। अहो सुसदृशी पृर्तिस्तुलाकोटे: खलस्य च' यहाँ 'स्तोकेन' को 'अल्पेन' कहकर बदल देने पर भी श्लेषमें बाधा नहीं पढ़ती है अतः यह अर्थश्लेष है, एवं जहाँ पर शब्दका परिवर्त्तन न हो सके, उस शब्दपरि- वृत्य सह स्थलमें शब्दश्लेष होत। है, जैसे-'प्रतिकूलतामुपगते हि विधौ' इसमें 'विधौ' के स्थानमें कोई दूसरा पद रखें तो श्लेष में बाथा पढ़ जाती है, अतः यह शब्दश्लेष है। परन्तु आचार्य दण्डीने अर्थद्यप्रतीतिजनक इस श्लेषको प्रधानतया अर्थसापेक्ष देख कर केवल अर्थालक्कार ही माना है। शब्दका अनेकार्थत्व-अभिधावृत्तिसे अनेकार्थप्रतिपादकत्व माना जाता है, वह अनेकार्थ- प्रतिपादकत्व अभिधानियामक संयोगांदिकोंके अभावमें ही संभव होता है, जहाँ अनेकार्थक शब्दप्रयोग होने पर भी संयोगप्रकरणादि द्वारा एकार्थमें अभिधा नियन्त्रित हो जाती है वहाँ श्केष नहीं होता, जैसे-'भद्रात्मनो दुरविरोहतनोविशालवंशोन्नतेः कृतशिलीमुखसग्रहस्य। यस्यानुपप्लवगतेः परवारणस्य दानाम्युसेकसुभगः सततं करोडभूत' इस उदाइरणमें राजारूप अर्थमें अभिधानियन्त्रण हो जाने पर हाथीरूप अर्थ श्लेष द्वारा नहीं, व्यजना द्वारा प्रतीत होता है-व्यक्नय होता है। यह श्लेप दो प्रकारका है-अभिन्नपद और अभिन्नपदप्राय। शक्यतावच्छेदक भिन्न होने पर भी एकप्रकृति-प्रत्ययादिघटित होनेसे अभिन्न पदों वाला अभिन्नपद कहलाता है, और प्रकृति- प्रत्ययादि भिन्न होनेसे भिन्नपदप्राय। अमिन्नपद स्थलमे अभज्ज इलेष, मिन्नपदप्राय स्थलमें समझ इलेव होता है। समझ् श्लेष-

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द्वितीय: परिच्छेद: १६७

मिन्नपद श्लेष अधिक चमत्कारकारी होता है, उसे कवियोंका आदरातिशय प्राप्त है, अतः उसकी बहुलता बतानेके लिये 'प्राय' शब्दका निवेश कर दिया गया है। काव्यप्रकाशादिमें शब्दश्लेषके आठ भेद किये गये हैं। इसके अतिरिक्त एक सम्रामन्न श्लेष की भी कल्पना की गई है, इनके उदाहरण वहीं देखें॥ ३१० ॥ असावुदयमारूढ: कान्तिमान रक्तमण्डलः । राजा हरति लोकस्य' हृदयं मृदुभिः करैः ॥ ३११॥ अभिन्नपदं श्लेषमुदाहरति-असाविति। उदयम् उन्नतिम् उदयाचलश् आारूत: प्राप्तः, कान्तिमान सुन्दरतनुः किरणशाली च, रकमण्डलः अनुरक्तप्रजावर्गः लोहिताभावि- म्बक्च असी राजा प्रभुशन्द्रमाथ्च मृदुभि: सुखप्रदेयेः शीतलैय करैः राजप्राह्यभागैः किरणैब लोकस्य हृदयं हरति वशीकरोति। अत्र प्रकरणादिकताभिधानियन्त्रणाभावात् राजचन्द्री द्वावपि वाच्यो, उदयादिश्लिष्टपदेष्वपि एकप्रकृतिप्रत्ययादिनिष्पाद्यत्वरूपमभिन्नत्वमिति भवति अभिन्नपदश्लेषत्वम ॥ ३११॥ उदय-प्रतापप्रकर्ष तथा उदयाचलको प्राप्त, कान्तिमान्-रमणीय रूप तथा प्रभाश्ाली, रक्त्- मण्डल-अनुरक्त प्रजावर्ग और लोहितिविम्ब यह राजा-चन्द्रमा अपने हलके करों अथवा शीतक किरणोंसे समस्त लोकके हृदयको आकृष्ट करता है। इस उदाहरणमें प्रकरणादिकृत नियन्त्रणाभाव होनेसे राजा और चन्द्रमा दोनों ही समान मावसे वाच्य हैं, उसमें भी उदयादि श्लिष्ट पद एकप्रकृति-प्रत्ययादिसाध्य हैं, अत एव श्केषा- लक्कारका अभिन्नपद श्लेष नामक भेद हुआ । ३११॥ दोषाकरेण रज्ा प्रदोषो मामित्थमप्रियं कि न बाघते ॥ ३१२ ॥ भिन्नपदं श्लेषमुदाहरति-दोषाकरेणेति। प्रदोष: सन्ध्यासमयो निशाप्रारम्भकालः नक्षत्रपथवर्सतिना आकाशस्थितेन दोषाकरेण रजनीकरेण राज्ञा चन्द्रमसा सम्ब्नन् संयुज्यमान: सन अप्रियं प्रियाविरहितं मां किल्न बाधत अपि तु बाघत एवेति प्रदोषपचे- डर्व कोऽपि प्रकृष्टदोषयुत्तः दोषाकरेण सकलदोषनिधिना नक्षत्रपथवर्तिना क्षत्रियोचित- मार्गतश्च्युतेन सम्बध्नन सम्बन्धं मैत्र्यादिकं स्थापयन् अप्रियं शत्रुभूतं मां किन्न बाधते नोपतापर्यति, अवश्यं तापयतीत्यर्थः । अत्र दोषाकरादिपदानां प्रकृतिप्रत्ययादिभेदेन

हिन्दी-'दोषाकरेण' यह सभङपद श्लेषका उदाहरण है। इसका एक पक्षमें यह अर्थ है कि नक्षत्रपथवती-आकाशचारी दोषाकर-रजनीकर राजा चन्द्रमासे सम्बन्ध स्थापित करनेवाला यह निशाका प्रारम्भकाल प्रियाविरड्ी मुझको क्या नहीं बाधित करता है? दूसरा अर्थ है कि यह प्रदोष-नाना तरहके बड़े बड़े अवगुणोंवाला आदमी दोषोंके आकर-खानस्वरूप तथा क्षत्रियोचित मार्गसे च्युत इस राजासे सम्बन्ध स्थापित करके शत्चुता करनेवाले मुझको नहीं सताता है क्या? अर्थाव अवश्य सताता है। इस उदाहरणमें दोषाकारादि क्विष्ट पद प्रकृतिप्रत्ययादिके मिन्न होने से मिन्न-भिन्न :: धौंको कहता है अतः यह सभङश्लेष हुआ। यधपि इस उदाहरणमें राजशब्दमें अमज्ञश्लेष ही है, इस तरह इसे किस प्रकारमें गिना जाय, १. सर्वस्य ।

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१६६ काव्यादर्श:

यह बात उठती है, परन्तु ऐसा मालूम पड़ता है कि अधिकपदोंमें समझश्लेष देखकर इसे सभझपद इलेष ही माना गया। अर्वाचीन आचार्यगण उमयात्मक श्लेष मानते हैं, उनके अनुसार तो यह निर्वाध रूपमें समङ्ामङ श्लेषका उदाहरण माना जायगा। समकपदश्लेष का शुद्ध उदाहरण- 'पृथुकार्सस्वरपात्रं भूषितनिःशेषपरिजनं देव । विलसत्करेणुगद्दनं सम्प्रति सममावयो: सदनम् ॥' यह है। इसमें श्लेष वाले सभी पद समझ् ही हैं।। ३१२।।

उपमारूप काक्षेपव्यतिरेकादिगोचरा: । प्रागेव दर्शिता: शेषा दर्श्यन्ते केचनापरे॥ ३१३।। प्रधानभूतं श्लेषं निरूप्य अलङ्कारान्तरस्याप्रभू तोऽपि श्लेषश्वमत्कारमावहतीति युबोध- यिषयाऽउद-उपमेति। उपमारूपकान्ेपव्यतिरेकादिगोचगाः एतदलङ्कारसहचरिताः श्लेषा: प्रागेव तसतदलक्कारोदाहरण9सने दर्शिता, केचन अपरे प्रोक्तालङ्कारभिन्नालङ्का- रापभूता श्लेषा: दर्श्यन्ते ॥६१३॥ हिन्दी-प्रधानभूत श्लेषका सब प्रकार निरूपण किया जा चुका, इसके आगे यह बताना है कि श्लेषालक्कार अन्यान्य अलक्गारोंका अक्र होकर भी चमत्कारक होता है, इस सम्बन्धमें उपमा, रूपक, आक्षेप, व्यतिरेक आदि अलक्कारोंका अङ्गभूत श्लेष तत्तदलक्कारोदाहरणप्रसङ्गमें बताया जा चुका है, कुछ अन्यालक्काराङ्भूत श्लेषके स्थल बताये जा रहे हैं। उपमाके साथ शब्दश्लेष और अर्थश्लेष दोनों तरहके श्लेष समानोपमा और इलेषोपमामें दिखलाये गये हैं, जैसे- 'बाले वोद्यानमालेयं सालकाननशोभिनी' (समानोपमा) 'शिशिरांशु प्रतिस्पर्षि श्रीमत्सुरमिगन्धि च। अम्भोजमिव ते वक्त्रमिति श्लेषोपमा स्मृत।' (इलेषोपमा) रूपकके साथ श्लेष, जैसे- 'राजहंसोपभोगाई भ्रमरप्रार्थ्यसौरभम्। सखि वक्त्राम्बुजमिदं तवेति श्लिष्टरूपकम् ।।' आक्षेप के साथ श्लेष, जैसे- 'अमृतात्मनि पश्नानां द्वेष्टरि लिग्धतारके । मुखेन्दौ तव सत्यस्मिन्नपरेण किमिन्दुना ।।' साधारण धर्म प्रयोगवाले व्यतिरेकमें भी श्लेष होता है, जसे- 'अभिन्नवेलौ गम्भीरावम्बुराशिर्भवानपि। असावञ्ञनसंकाशस्तवं तु चामीकरधुतिः ।।' 'व्यतिरेकादिगोचराः' में आदि पदसे अर्थान्तरन्यास और समासोक्ति जानना चाहिये। अर्थान्तरन्यासमें श्लेष, जैसे- 'उत्पादयति लोकस्य प्रीति मलयमारुतः । ननु दाक्षिण्यसम्पन्नः सर्दस्य भवति प्रियः ॥' समासोक्तिमें श्लेष, जैसे - 'रूढमूलः फलभरः मुष्णननिश मर्यिनः । सान्द्रच्छायी महावृक्षः सोऽयमासादितो मया ॥' ३१३ ॥ अस्त्यमिन्नक्रियः कश्विदविरुद्धक्रियोडपरः। विरुद्धकर्मा चास्त्यन्य: श्लेषो नियमवानपि॥ ३१४॥ नियमाक्षेपरूपोक्तिरविरोधी विरोध्यपि। तेषां निदर्शनेष्वेव रूपमाविर्भविष्यति॥३१५।। श्लेषप्रकारानलक्धाराप्भूतात्परिगणयति-अस्तीति। निगदव्याख्यातम । तेषाम् १. विरुदपमां। २. रूपम्यक्कि।

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द्वताय पारच्छद:

अतोक्नामघेयानां श्लेषाणां रूपं स्वरूपम् निदर्शनेषु तत्तदुदाहरणेष्वेव भाबिर्भविष्यति स्फुटोभविष्यति॥।३१४-३१५॥ हिन्दी-अमिन्रक्रियश्लेय, अविरडक्रियश्लेव, विरुडक्रियश्लेष, सनियमश्लेष, नियमाक्षेप- रूपोक्तिश्लेष, अविरोधीश्लेष; तिरोभीश्लेष इस प्रकारसे और भी श्लेष हैं, उनके उदाहरण दिये बायँगे, जिनमें उनके स्वरूप प्रकट होंगे॥ ३१४-३१५॥ वक्राः' स्वभावमचुराः शंसन्स्यो रागमुल्घणम्। हशो दूत्यक्च कर्षन्ति काव्याभि: प्रेषिता: प्रियान्॥३१६॥ अभिज्नक्रियश्लेषमुदाहरति-घका इति। कान्ताभि: प्रेषिताः प्रक्षिप्ताः प्रहिताथ, वक्राः कुटिला: वक्रोक्तिनिपुणाक, स्वमावमधुरा: भकृत्रिमसान्दर्याः मधुरप्रकृतयक उल्वणं प्ररूढं रागं लोहितभावं प्रेमा्ण च शंसन्त्यः सूचयन्त्यः कथयन्त्यथ दृशो नेत्राणि दूत्यक्ष प्रियान् कर्षन्ति आवर्जयन्ति। अत्र दशो दूत्याश्य कर्षणैकक्ियान्वयातुत्ययोगिता, वक्रादिपदेषु श्लेषथ तदप्भूत इति अभिन्नक्रियश्लेषोयम् ।।३१६॥ प्रियतमा द्वारा क्षिप्त तथा प्रेषित, वक्र-तिरछी तथा वक्रोफ्तिनिपुण, स्वमावतः सुन्दर तथा मधुर प्रकृति वाली, बढ़े हुए रक्तलव एवं अनुरागको प्रकट करने वाली दृष्टियाँ तथा दूतियाँ नायकोंको आकर्षित करती हैं। इस उदाहरणमें दृष्टि और दूतीका कर्षणस्वरूप एकक्रियामें अन्वयसे होने वाली तुस्ययो- गिता है, वक्रादिपदमें वर्त्तमान श्लेष उसका अद्ग है, इस तरहके श्लेषको अभिन्नक्रियश्लेष कहते हैं। अलक्वारान्तरसइचरश्लेषकी प्रतिज्ञामें यह तुल्ययोगितासइचरश्लेष कहा गया है॥ ३१६ ।। मधुरा रागवर्धिम्यः कांमलाः कोकिलागिरः। आकर्ण्यम्ते मदकला: श्लिष्यन्ते चासितेक्षणाः ॥ ३१७।। अरविरुद्धक्रियश्लेषमुदाहरति-मधुरा इति। मधुरा श्रुतिप्रियाः रागवधिन्यः उद्दीप- कतया रागजनिकाः कोमलाः अपरुषाः मदकलाः मदमत्ताः कोकिलागिर: भाकर्ण्यन्ते श्रयन्ते, मधुराः सर्वावस्थाविशेषेषु माधुर्य रमणीयतेति लक्षितमाघुर्यगुणशालिन्यः राग- वर्धिन्यः प्रणयसमेधिन्यः कोमलाः सुकुमार्यः मदकलाः सौभाग्यगर्वशालिन्यक्ष भसिते- क्षणा: नीलाभनयनकान्तयः कामिन्यः श्लिध्यन्ते आलितयन्ते, अत्र आश्लेषाकर्णन- क्रिययो वभिन्नेन्द्रिय जन्यत्वेनाविरोधादविरुद्धक्रियत्वं, श्लेषथात्र तुन्ययोगिताप्भूतो बोष्य:।। हिन्दी-कानोंको भली लगने वाली, उद्दीपक होनेसे आसक्तिको बढ़ाने वाली, अकठोर एवं मदमत्त कोकिलावाणी सुनी जाती हैं, और माधुर्यगुणसे पूर्ण अनुराग बढ़ाने वाली सकुमारी तथा सौभाग्यगर्विता असितेक्षणा सुन्दरियाँ लिपटायी जाती हैं, आलिक्गित होती है। इसमें आश्लेष और आकर्णन रूप क्रियायें अविरुद्ध है, अतः अविरुदक्रियश्लेष है, यहाँ भो श्लेष तुल्ययोगिताका अङ्ग है।। ३१७।। राय मादर्श यत्रेष वारुणीयोगवर्द्धितम्। 'तिरोभवति धर्माशुरक्जस्तु विजृम्भते ॥ ३१८॥ विरुद्धक्रियं श्लेषमुदाहरति- रागमिति। एषः दृश्यमान: धर्माशुः सूर्य: वारुणी- योगवधितम् पश्चिमदिभ्संबन्धन समेधितं रागं लौहित्यम् आदर्शयन् प्रकाशयन् तिरोभवति

१. यत्र। २. परापतति। ३. जश्च।

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२०० काव्यादर्श:

भस्तं गच्छति, भ्भजः कामस्तु वारुण्या मदिराया योगेन सेवनमेन वधितम् रागम आरस- किम् आादर्शयन् प्रकाशयन् उज्जम्भते उद्दीप्तो भवति। अत्र तिरोभवनविज़म्भणकिये विरुद्ध इति तुल्ययोगिताप्भृतोऽयं श्लेषो विरुद्धक्रियश्लेषः ॥। ३१८॥ हिन्दी-वारुणी-पश्चिमदिशाके सम्बन्धसे बढी हुई लालिमाको प्रकटित करता हुआ यह सूर्य छिप रहा है और मदिरापानसे बढ़ी हुई वनितासक्तकिको प्रकटित करता हुआ कामदेव उद्दीप हो रहा है। इस उदाइरणमें छिपना और उद्दीप्त होना परस्पर विरद्ध हैं, अतः यह विरुद्धक्रियश्लेष है, इसमें भी तुल्ययोगिताका ही अक्रभूत श्लेष है।। ३१८।। निखिशस्वमसावेव धनुष्येवास्य वक्रता। शरेष्वेव नरेन्द्रस्य मार्गणत्वं च वतते ॥ ३१९॥ सनियमश्लेषोदाहरणमाइ-निखिशस्वमिति। भस्य नरेन्द्रस्य राज्ञः निस्िंशत्वम् निर्गतर खिशतोऽक्ुलिभ्यो निरखिंशः खड्गस्तस्य भावो निर्ख्िंशत्वम् त्रिशदंक्कुलिपरिमाणाधिक- परिमाणतवं निर्दयत्वं च असौ खड्गे एव, वक्रता कुटिलता धनुषि एव (तस्यैवाकर्षणादौ वक्रीभावात्), मार्गण्त्व बाणत्वं शरेष्वेव, मार्गणत्वं याचकत्वं च। अ्त्र राजोऽसिरेव क्रूरो न स्वभाव:, धनुरेव वर्क न हृदयम्, बाणा एव मार्गणा न प्रजाजना: इत्येवकारेण व्यवच्छे- दनात्सनियमश्लेष:, स चैवात्र मुख्यभूतोऽपि। ३१९॥ हिन्दी-इस नरेन्द्रकी तलबारमें ही निर्खिशता-तीस अंगुलीसे अधिक परिमाणता अथवा निदयता है हृदय में निदयता नहीं, धनुषमें ही कुटिलता (आकर्षणादिकृत). है मनमें नहीं, वाणोंमें ही मार्गणता-याचकता है प्रयोजनमें नहीं। इस उदाहरणमें प्रत्येकवाक्यस्थित एवकारसे द्वितीय वस्तुका व्यवच्छेद होता है अतः इसे सनियमश्लेव कहा जाता है। यहाँ श्लेष ही प्रधान अलक्कार है। कुछ टीकाकारोंने यहाँ परिसंख्याको प्रधान अलक्कार माना है और श्लेषको उसीका अम्ग कहा है, परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि दण्डीने तो परिसंख्यानामक अलक्कार नहीं माना है, इस स्थितिमें उनका यह अभिप्राय कैसे हो सकता है। अतः यहाँ सनियमश्लेष ही प्रधान है, छसीमें परिसंख्या का अन्तर्भाव दण्डीका अभिप्रेत जानना चाहिये ॥ ३१९॥ पम्मानामेव दण्डेशु कण्टकस्त्वयि रक्षति। अथवा दश्यते रागिमिथुनालिङ्रनेष्वपिं॥ ३२० ॥ नियमाच्षेपरूपोक्तिश्लेष मुदाहरति-पद्मानामेवेति। त्वयि रक्षति पालयति सति पद्मानां कमलानाम् एव दण्डेषु कण्टकः (प्रजानां तव वा कण्टकोऽल्पशसुर्नास्ति), अ्रथवा रागिमिधुनस्य अनुरागिणोः कामिनो: आलिप्नेषु परस्पराश्लेषु कण्टको रोमाञ्च: दृश्यते, अत्र पद्मानामेवेति नियमं कृत्वा अथवेति पक्षमुत्याप्य तदाक्षेप उक्त इति नियमा सेपरुपोक्तिश्लेषोड दीपकस्याप्भूतः, भत्र एकत्रोक्तस्य कण्टकस्य वाक्यद्वयप्रकाशकतया दीपकपरिस्फूर्तिर्जायते ॥ ३२० ॥ हिन्दी-आपके रक्षक होने पर कमलके नालोंमें ही कण्टक-कांटे रह गये हैं (प्रजाओंके कण्टक सब उस्साड़ दिये गये), अथवा अनुरागी युवकयुवतियोंके परस्पर आलिङनमें रोमाघ्रूप इम्टक रह गये हैं। इस उदाहरणमें 'पश्चानामेव' यह नियम करके अथवापक्षोत्यापनद्वारा उसीका प्रतिषेध किया

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द्वितीय: परिच्छेद: २०१

गया है, अतः इसे नियमाक्षेपरूपोक्तिश्लेष माना गया। यहाँ एक वाक्यमें उक्त कण्टकपदसे वाक्य- दयका प्रकाशन होता है अतः दीपककी परिस्फूति होती है, श्लेष उसीका पोषक है॥ ३२० ।। महीभृद्भूरिकटकस्तेजस्वी नियतोद्यः। दक्ष: प्रजापतिश्चासीत् स्वामी शक्तिधरश्च सः॥३२१।- अविरोधिश्लेषमाह-महीभृदिति। सः राजा महीभृत् पृथ्वीपालकः पर्वतश् भूरि- कटकः विशालस्कन्धावारः विपुलनितम्बक्च, तेजस्वी समधिकप्रतापः सूर्यक्र नियतोदयः प्रतिदिवसजायमानसमृद्धि: सतनोदयक्ष, दक्ष: कमसु निपुणः ऋषिमुख्यक्ष प्रजापतिः सृषटि- प्रवर्तकः प्रजापालकश्र, स्वामी प्रभुः कार्मिकेयक्ष, शक्तिधरः प्रभावोत्साहमन्त्रजभेदेन शक्ति- त्रयमम्पन्नः शक्त्याख्यशत्त्रधारी च आसीत्। अत्र महीमृदादिश्लिष्पदार्थाना परपरा- विरुद्धतथाऽविरोधिश्लेषोऽयं, प्रधानभूनोऽप्यत्र स एव ॥। :२१ ॥ हिन्दी-वह राजा महीभृत् पृथ्वीपालक (पर्वत भी) भूरिकटक-विशालस्कन्धावारवाला एवं विपुलविस्तारवाला था, तेजस्वी प्रतापवान् (सूर्य भी) नियमपूर्वक प्रतिदिन उन्नतिशाली एवं प्रतिदिन उगनेवाला था, दक्ष सर्वकार्यसमर्थ (दक्षप्रजापति) प्रजाका प्रवर्तक-प्रजापालक भी था, एवं स्वामी प्रभु (कार्सिकेय) प्रभावोत्साहमन्त्रजभेदसे त्रिविधशक्तिसम्पन्न और शक्त्याख्यास्त्- भेदसे युक्त था। यहाँ श्लिष्ट पदोंके अर्थोंमें परस्पर कुछ विरोध नहीं है, अतः इसे अविरोधिश्लेष कहा गया है। यहाँ श्लेष ही प्रधान भी है।। ३२१॥। अव्युतोऽप्यवृषच्छेदी राजाप्यविदितक्षयः। देवोऽप्यविवुधो जक्षे शङ्कूरोडव्यभुजङ्गवान् ॥ ३२२ ॥। (इति श्लेषचक्र्म् ) विरोधिश्लेपमुदाहरति-अच्युतोऽपीति।अच्युतः सन्मार्गात् अपरिभ्रष्टोऽपि शवृ- षच्छेदी अधर्मध्वंसकरः (अच्युतो विष्णुरपि अत्रषच्छेदी-वृषाख्यासुरभेदस्याहन्ता ) राजा प्रभुरपि अविदितक्षयः अज्ञातसंपत्क्षयः (राजा चन्द्रोऽपि अविदितक्षयः क्षयार्यरोगेणा परिचितः) देवः राजापि अविवुधः पण्डितजनसम्पर्करहितो न, (देवः अपि अविबुधो देव- भिन्नः) शङ्करः लोककल्याणकर्त्ता अपि अभुन्नवान खलजनासवितः (शङ्करो हरः सन्नप अभुजङ्वान्सर्परहितक्) जज्ञे जातः : अत्राच्युतादिपदानां वि्ण्वादिरूपे द्विती- यार्थे सृषच्छेद्यादिद्वितीयपदार्थस्यासएवं विरुद्धमिति विरोिश्लंपोयं विरोधाभासस्या्रभूतः॥ हिन्दी-वह अच्युत सुमागसे च्युत नहीं होकर भी अधर्मविनाशक (विष्णु होकर भी वृषनामक असुरको नहीं मारनेवाला), राजा होकर भी धनक्षयसे रहित ( चन्द्रमा होकर भी क्षयरोग से मुक्त), देव-प्रभु होकर भी सुधसे कभी भी अरहित (देव होकर भी अविबुध-देवेतर), शककर लोककल्याणकर होकर भी खल जनोंसे अयुक्त (शिव होकर भी सर्पसे रहित) थे। इस उदाहरणमें अच्युतादि पदोंके श्लेषद्वारा जब विष्ण्वादि अर्थ किये जाते हैं तब अवृष- चछेदी आदि विशेषणार्थोंसे विरोध होता है। अतः यह विरोधिश्लेष प्राधान्येन प्रतीत होनेवाले विरोधाभासका अङ्गभूत है।। ३२२ ॥। गुणजातिक्रियादीनां यत्तु' वैकल्यदर्शनम्। विशेषदर्शनायैध सा विशेषोकिरिष्यते॥ ३२३॥

१. यत्र।

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२०२ काव्यादर्शः

कमायातां विशेषोकि लक्षयति-गुणजातीति । यन् विशेषस्य वर्णनीयनिष्ठ- वीर्या्यतिशयस्य (कारणसामप्रथभावेऽपि कार्यक्षमत्वरूपस्य ) दर्शनाय ज्ञापनाय गुण- जातिक्रियादीनाम् वैकल्यदर्शनम् अनपेक्षाप्रकाशनं सा विशेषोत्तिर्नाम इष्यते। यत्र वर्णनीयवस्तुनः समधिकप्रभावतास्यापनार्थ कार्यसिद्धौ अपेक्षितानां गुणक्रियादीनां वैकल्यं प्रदर्श्यते सा विशेषोकि: इत्यर्थः। विशेषाय प्रकर्षसृचनाय उक्तिः गुणक्रियादिवकल्या- भिधानं विशेषोक्तिरिति शब्दरहस्यम्। अतिशयोको वीर्याद्तिशयप्रकाशनेष्रपि वैकल्यं न प्रकाश्यते, विभावनायां च कारणा- न्तरं स्वाभाविकत्वं वा विभाव्यते, न तु प्रस्तुतस्य विशेष इतति ताभ्यामस्या भेद:। नव्यास्तु-'विशेषोफ्तिरखण्डेषु कारणेषु फलावच् इन्याहुः॥।॥ ३२३॥। हिन्दो-जहों पर वर्णनीय वस्तुके वीर्याद्यतिशयको प्रदर्शित करनेके लिये (कार्यसिद्धिमें अपेक्षित) गुणजातिक्रियादिका वैकल्य वणित हो उसे विशेषोक्ति नामक अलक्कार कहते हैं। विशेषके लिये-उत्कृष्टता बतानेके लिये उक्ति-गुणक्रियादिन्यूनताकथन विशेषोत्ति, यह अक्षर- लभ्यार्थ ही इसका स्पष्ट लक्षण है। सरस्वतीकण्ठामरणकारने भी यही लक्षण स्वीकार किया है। वामनाका लक्षण है :- 'एक गुण- हानकल्पनायां साम्यदाढर्य विशेषोक्ति: ।' विभावनामें प्रधानतया कारणान्तर विभावित होता है या स्वाभाविकत्व प्रकाशित किया जाता है, विशेष प्रदर्शनको प्रधानता नहीं दी जाती और अतिशयोक्तिमें प्रस्तुत वस्तुका विर्याधति- शयमात्र कहा जाता है, गुणादिवैकस्य नहीं, यही विभावना और अतिशयोक्तिसे इसका भेद है। अर्वाचीन आचार्योने कारणोंके रहनेपर भी कार्यके नहीं होनेमें विशेषोक्ति स्वीकार की है ॥३२४॥ न कठोरं न वा तीक्ष्णमायुघं पुष्पधम्घनः । तथापि जितमेवासीदमुना भुवनन्रयम् ॥ ३२४।। गुणवैकल्यविशेषोक्तिमुदाहरति-न कठोरमिति। पुष्पधन्वनः कामस्य आयुधम् अख्म् न कठोरं कठिनं न वा तीक्णम् शितधारम्, तथापि जयायापेक्षितस्य कठोरती- दणायुधत्वस्याभावेऽपि अ्मुना कामेन भुवनत्रयम् जितमेवासीत्। अत्र कामस्य पराक्रमातिशयरूयापनाय तदस्त्राणं काठिन्यतीकणत्वरूपगुणवैकल्य- मुच्यत इति विशेषोततिः ॥ ३२४ ।। हिन्दी-पुष्पधन्त्रा के अख न तो कठोर हैं, न ता तीक्ष्ण है, फिर भी उसने तीनों भुवनोंको वशमें कर लिया है। इस उदाहरणमें कामदेवके पराक्रमातिशयको प्रकाशित करनेके लिये उसके अस्ोंमें कठोरता एवं तीक्ष्णता रूप गुणों की विकलता-न्यूनता का वर्णन किया गया है अतः गुणवैकल्यविशेषोक्ति है। न देवकम्यका नापि गन्धर्वकुल सम्भवा। तथाप्येषा तपोभक्ं विधातुं वेघसोऽप्यलम्॥ ३२५॥ जातिवैकल्ये विशेषोत्तिमुदाहरति-देवकन्यकेति। एषा देवकन्यका न (अ्रस्ति ) न वा एषा गन्धवकुलसंभवा गन्घर्ववंशोत्पज्ञा (भ्रस्ति ) तथापि एषा वेधसः ब्रह्मण: अपि तपोभर्ज्ं तपस्याच्युति विधातुं कर्तुम अलं समर्था। देवन्वगन्धर्वत्वराहित्येऽपि ब्रह्मणस्तपस्याभजञनसामर्थ्योकत्या तस्याः रूपगुणातिशयः

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द्वितीय: परिच्छेद: २०३

प्रतीयते। अत्र प्रस्तुताया नायिकाया जातिबैकल्येन विशेषो दशित इति जातिवैकल्यवि- शेषोफितिरियम् ॥३२५॥ हिन्दी-न तो यह देवकन्या है और न गन्धर्ववंशोत्पत्ञा है, फिर भी यह म्रझ्ाके तप का भी भङ्ग करनेमें समर्थ है। यहाँ देवत्व तथा गन्धर्ववंशोद्भवत्वके न होने पर भी म्रह्मतपोभज्ञनसमर्थत्व बताकर उस नायिकाकी उत्कृष्ट रूपमंपत्ति अभिव्यजित की गई है। यहाँ वर्णनीय नायिकाके जातिवैकल्यसे विशेष बताया गया है, अतः इसे जातिवैकल्यविशेषोक्ति कहते हैं॥ ३२५॥ न बद्धा भ्रुकुटिर्नापि स्फुरितो दशनच्छद्:। न व रक्ताभवदृदृष्टिजिंत च द्विषतां कुलम्॥ ३२६॥ कियावैक्ल्ये विशेषोक्तिमुदाहरति-न बद्धेति। भ्रुकुटिः भ्रुवोः कुटिलता न बद्धा न कृता, दशनच्छदः अधरः न स्फुरितः न चलित: दृष्टिः रक्ता लोहिता न अभवत्, तथापि च द्विषतां कुलं जितम्। अत्र भ्रूभग्वाद्यभावेषपि शत्रुकुलाभिभवोकत्या राजो महावलत्वं व्यजितम्। अत्र च भ्रूभप्वादिक्रियावैकस्ये विशेषाभिधानात् क्रियावैकल्य विशेषोक्तिः ॥ ३२६ ॥। हिन्दी-न भ्रुकुटि वक्रा की गई, न ओठ फड़के, न आँखें लाल हुई, फिर भी शबुकुल पराजित कर लिया गया। इस उदाहरणमें भ्रूभक्गादिके अभावमें भी शत्रुकुलका अभिभव कहने से राजाका महावलत्व व्यक्त होता है, भ्रूमक् आदि क्रियाके वकल्यमें विशेष कथन होनेसे इसे क्रियावैकश्यविशेषोक्ति कहते हैं। इस उदाहरणमें बन्धन और स्फुरण तो क्रिया है, परन्तु रक्तत्व गुण है, अतः यह शुद्ध क्रिया- वैकल्यविशेषोक्तिका उदाहरण नहीं है, किन्तु क्रियावैकल्यविशेषोक्ति और गुणवैकल्यविशेषोक्तिका सक्कर है। शुद्ध क्रियावैकल्यविशेषोक्तिका उदाहरण यह दिया जा सकता है- 'नोपभोगो न वा दानं बन्धूनां भरणं न वा। तथापि गुरुता धत्ते नृणां संरक्षितं धनम् ॥' २२६ ॥। न रथा न च मातङ्गा न हया न च पसय:। स्त्रीणामपाभ्षष्टेव जीयते जगतां त्रयम्॥ ३२७।। द्रव्यवैकल्ये विशेषोक्तिमाह-न रथा इति। न रथाः यानानि, न च मातज्ा: हस्तिनः, न हया: अश्वाः न च पतयः पदातयः, स्त्रीणाम् सुन्दरोणाम् अपाप्ृष्टया कटाक्षेणैव जगतां त्रयम् लोकत्र्यं जीयते वशीक्रियते। अत्र रयादिजयसाधनद्रव्याणाम- भावेऽपि जगत्रयविजयः केवलया दशा विहित इति द्रव्यवैकल्यविशेषोक्तिरेषा ॥। ३२७ ।। हिन्दी-न रथ थे न हाथी, न घोड़े थे और न पैदल सैनिक ही थे, फिर भी स्त्रियोंके कटाक्षमात्रसे तीनों लोक विजित कर लिये गये। इस उदाहरणमें विजयसाधनतया सम्मत चतुरक सैन्यके न रहने पर भी खितरियोंके कटाक्ष- मात्रसे त्रिभुवनविजय व्णित है, इससे खितियोंके मनोमोइनसामर्थ्यकी प्रतीति होती है, अतः यह द्रव्यवैकल्यविशेषोक्तिका उदाहरण है॥ ३२७॥ पकचको रथो यन्ता विकलो विषमा हयाः। आकामत्येव तेजस्वी तथाप्यर्को नमस्तलम्॥ ३२८॥। १. ध्वस्तं। २. तद् । ३. बलम्।

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२०४ काव्यादर्श:

सेषा हेतुविशेषोक्तिस्तेजस्वीति विशेषणात्। अयमेव क्रमोऽन्येषां भेदानामपि कल्पने ॥। ३२९॥ (इति विशेषोक्तिचक्रम्) हेतुविशेषोकि प्रदर्शयति-एकचक्र इति। रथः एकचक्रः (यथाह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भव्रेत्) इत्युक्त्या गन्तुमसमर्थ एव तादृशो रथो, यन्ता च विकलः अप्विकलः अनूरुनाम्रा प्रसिद्ध:, हया आश्राक् विषमाः सप्तसंख्यकाः, एतेन तेषामप्यकार्यकरत्वं व्यजितम, तथापि एवंसामप्रीवैकलयेऽपि तेजस्वी अर्कः सूर्यः नभस्तलम् विस्तीण व्योम- मण्डलम् आकामति पारयति एव। अत्र विकलसाधनस्यापि रवेर।काशपारगमनकथनेन तस्य सामर्थ्यातिशयप्रतिपत्तिस्तत्र च हेतुस्तेजस्वीति विशेषणेनोक्त इति हेतुविशेषोक्ति- रेषा॥ ३२८ ॥ उदाहरणं विशदयति-सैषेति। तेजस्वीति विशेषणात् सैषा उत्तरूपा हेतुविशेषो- किर्नाम, हेयोस्तेजस्वित्वस्योपन्यसनाद्वतुविशेषोक्तिः, अन्येषामपि भेदानां विशेषोक्तिप्रका- राणां कल्पनेऽयं पूर्वोक्तरूप एव कमो मार्गो बोष्य: ।। ३२९॥ हिन्दी-सूर्यके रथमें एक ही चक्का है, वाइक भी अङ्गविकल है-अनूरु है, घोड़े विषम सप्त- संख्यक हैं, फिर भी तेजस्वी होनेके कारण सूर्य आकाशमण्डलको लांघ जाता ही है। इस उदाहरणमें रथादि साधनोंकी विकलतासे यह बताया गया कि सूर्य असाधारण सामर्थ्य रखते हैं, उसमें हेतु तेजस्वी होना तेजस्वी शब्दसे कहा गया है, अतः इसे हेतुविशेषोक्ति नामक प्रभेद कहा गया है। भोजराजने 'न रथा न च मातन्ाः' इसमें द्रव्यवैकल्यविशेषोक्ति तथा-'एकचक्रो रथो यन्ता? में वैकल्यवद् द्रव्यविशेषोक्ति स्वीकार की है। 'एकचक्रो रथो यन्ता' इसका भाव लेकर भोजप्रबन्धमें एक श्लोक बनाया गया है, जो इसके अर्थको स्पष्ट कर देता है, जैसे- 'रथस्यकं चक्रं भुजगयमिताः सप्ततुरगा निरालम्बो मार्गश्चरणविकलः सारथिरपि। रविर्यात्येवान्तं प्रतिदिनमपारस्य नभसः क्रियासिद्धि: सत्वे भवति महतां नोपकरणे ।' पूर्वोक्त-'एकचक्रो रथो यन्ता' इस श्लोकमें 'तेजस्वी' विशेषण हेतुप्रकाशकरूपमें दिया गया है अतः यह हेतुविशेषोक्ति नामक प्रभेद हुआ। इसी प्रकार विशेषोक्तिके अन्यान्य प्रभेदोंकी कल्पना की जा सकती है। इसका तात्पर्य यह है कि जैसे-'एकचक्रो रथः' इत्यादि उदाहरणमें हेत्वलक्कारसहित विशेषोक्ति होती है, उसी तरह अन्यान्य अलक्गारोंके साथ भी विशेषोक्ति समावेशित हो सकती है, जैसे रूपकके साथ विशेषोक्ति-'भवन्ति यत्रौषधयो रजन्यामतैलपूराः सुरतप्रदीपा:' या-'धूतं हि नाम पुरुषस्यासिंहासनं राज्यम्'। इन उदाहरणोंमें रूपकसहचर विशेषोक्ति स्फुट है॥ ३२८-३२९ ।।

कीरशनं सतुतिनिन्दार्थ सा मता तुल्ययोगिता ॥३३० ॥ तुल्ययोगितां निर्वक्ति-विवक्षितेति। विवक्षिताः वर्णनीयग तत्वेन वसुमिष्टाः ये गुणाः तैर्गुणैरुत्कृष्टः प्ररुयातैरन्येः समीकृत्य तुलामानीय स्तुतिनिन्दार्थ स्तुतये निन्दायै वा कस्ष्य- चिद्यत् कीर्तनं कथनं सा तुल्ययोगिता नाम। तथा च प्रस्तुते यान् गुणान्विवक्षति, १. गुणोस्कषैं। २. स्मृता।

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द्वितीय: परिच्छेद: २०५

तैर्गुगैः प्रसिद्धः प्रस्तुतैः पुरुषादिभिः समं तुलनामारोप्य स्तुतये निन्दायै वा प्रस्तुतस्य कीर्तनं तुम्यगुणयोगात्तुल्ययोगितान।मालक्वार: इति लक्षणं पर्यवस्यति। विवक्षितगुणोत्कष्टैरिति बहुवचनमतन्त्रम्, तेन द्वाभ्यामेकेन वा समीकृत्याभिधानेऽपि तुल्ययागिता भवत्येव्रेति बोध्यम्। वामनोऽपि-'विशिष्टेन साम्यार्थमेककालक्कियायोगस्तुल्ययोगिता' इति सूत्रयम्नवि- रुद्धमेव लक्षणमभिप्रैति। उपमायां शाब्दी साम्यप्रतीतिरत्र तु सर्वेषां प्रस्तुताप्रस्तुतानां समभावेन शाब्दबोध- विषयत्वे जाते पर्यवसाने पाषठिकी सादृश्यप्रतीतिरित्यनयोर्भेंदः ॥ ३३० ॥ हिन्दी-जहाँ प्रस्तुत वस्तुमें विवक्षित गुणसे विख्यात अप्रस्तुतत वस्त्वन्तरके साथ समता बताकर प्रस्तुतकी स्तुति या निन्दाके उद्देश्यसे उसका वर्णन हो उसे तुल्ययोगिता अलक्कार कहते हैं, तात्पर्य यह है कि प्रस्तुतमें जिन गुणोंको बताना चाहते हैं उन्हीं गुणोंसे विख्यात अप्रस्तुतोंके साथ समता बताकर यदि स्तुत्यर्थ या निन्दार्थ प्रस्तुतका वर्णन किया जाय तो तुल्यगुणयोग होनेसे तुल्ययोगिता नामक अलक्कार होता है। 'गुणोत्कृष्टैः' पदमें का बहुवचन अविवक्षित है, अतः एक या दो के साथ समतामें भी तुल्य- योगिता होने में कुछ बाधा नहीं है। वामनका तुल्ययोगितालक्षण भी इसी तरह का है। उपमा (तुल्ययोगोपमा-'दिवो जागति रक्षायै पुलोमारिर्भुवो भवान्' इसमें) में वाच्यार्थ और व्यङ्रथार्थकी साम्यप्रतीति वृत्त्युपस्थिततया शाब्दी होती है, परन्तु तुल्ययोगितामें प्रस्तुत और अप्रस्तुतका शाब्दबोध हो जाने पर पर्यवसानमें पाष्ठिक सादृश्यप्रतीति होती है, यही दोनोंमें भेद है। ३३०।। यम: कुबेरो वरुण: सहस्राक्षो भवानपि। विभ्रत्यनन्यविषयां लोकपाल इति श्रुतिम्॥ ३३१॥ स्तुतौ तुल्ययोगितामुदाहरति-यम इति। यमः, कुंवरः, वरुणः, सहस्राक्ष इन्द्र:, भवान् अपि, अनन्यविषयाम् अनन्यगामिनीम 'लोकपालः' इति श्रुति प्रसिद्धिं बिभ्रति धारयन्ति। अत्र प्रस्तुते राजनि लोकपालत्वरूपो गुणी वत्तुमिष्टस्तेन च गुणेनोत्कृष्टयमा- दिभि: समतामानीय राजः स्तुत्यर्थ कीर्त्तनं कृतमिति स्तुनी तुत्ययोगिता॥। ३३१ ॥। हिन्दी-यम, कुबेर, वरुण, इन्द्र तथा आप अनन्यगामिनी दिक्पाल इस प्रतिष्ठाको धारण करते हैं। जैसे यमादि अनन्यगामी दिक्पालत्वसे ख्यात हैं, उसी तरह आप् भी दिक्पालरूपमें प्रसिद्ध हैं। यहाँ वर्णनीय राजामें दिक्पालत्वरूप गुण विवक्षित है, उसी दिक्पालत्वरूप गुणसे प्रख्यात यमकुबेरादिके साथ समतया निर्दिष्ट करके स्तुत्यर्थ राजाका कीतन हुआ है, अतः इसे स्तुतितुल्य- योगिता कहते हैं॥ ३३१॥ सङ्गतानि मृगाक्षीणां तडिद्विलसितानि च। क्षणद्वयं न तिष्ठन्ति घनारब्धान्यपि स्वयम्॥३३२॥ निन्दायां तुल्ययोगितामाह-सक्गतानीति। मृगाक्षीणाम् सुन्दरीणां त्त्रीणाम् सम्र तानि समागमा:, तडिद्विलसितानि विद्युदुन्मेषाक्ष, स्वयम् स्वेनैवानुरागाधिक्येन चना- १. बिभति। २. तान्यपि।

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२०६ काव्यादर्श:

रब्धानि बलवता वेगेन प्रारब्धानि मेघेन प्रारब्धानि अपि क्षणद्वयं न तिष्ृन्ति, तथा ख्तरीर्णा समतानि वलवतानुरागेण स्वतःप्रबृनान्यवि क्षणमा्त्र तिष्टन्ति, यथा घनेन मेघेन स्वतः- प्रारब्धा अपि विदयुदुन्मेषा: क्षणमात्रेणेव ममाप्ता भवन्तीति भावः। अत्र चपलतया प्रसि- द्वाया: विद्युत उन्मेषेण सह स्त्रीणां सप्तभः कीर्त्यनान: स्पष्ट निन्दापात्रं भवतीति निन्द- तुल्ययोगिता ॥। ३३२।। हिन्दी-रमणियों का सक्षम अनुरागप्रकर्षसे स्वतः प्रारब्घ होने पर एवं प्रबल वेगसे होकर भी दो क्षण भी नहीं ठहर पाता है, और बिजलीका उन्मेष मेधद्वारा प्रारब्ध होने पर भी दो क्षण नहीं ठहर पाता है। यहाँ प्रसिद्ध चछ्रला विद्युतके उन्भेषते समकक्ष बनाकर स्त्रीसङ्गमका प्रतिपादन निन्दार्थ पर्यव- सित होता है, अतः इसे निन्दातुल्ययोगिता कहा जाता है। भोजराजने तुष्ययोगिता का एक नया रूप स्वीकार किया है, वे कहते हैं-सुखहेतु और दुःख- हेतुके समवधानमें तुल्यरूपत्वकृत भी एक प्रकारकी तुल्ययोगिता मानी जाय, उनका लक्षण-उदाइरण निम्नलिखित है :- लक्षण-'अन्ये सुखनिमिस्ते च दुःखहेतौ च वस्तुनि। स्तुतिनिन्दार्थनेवाहुस्तुल्यत्वे तुल्ययोगिताम्।।' स्तुतिमें उदाहरण- 'आहूतस्याभिषेकाय विसष्टस्य वनाय च। न मया लक्षितस्तस्य स्वल्पोऽप्याकारविभ्रमः॥' निन्दामें उदाहरण- यश्च निम्बं परशुना यश्षैनं मधुसपिंषा। यश्ैनं गन्धमाल्यायै: सर्वस्य कटुरेव सः' ॥३३२॥ विरुद्धानां पदार्थानां यत्र संसर्गदर्शनम्। विशेषदर्शनायैव स विरोध: स्मृतो यथा॥ ३३३।। कमागतं विरोधालद्कारं लक्षयति-विरुद्धानामिति। विशेषस्य प्रस्तुतगतोन्कषस्य दर्शनाय बोधनाय एव यत्र विरुद्धानां परस्परसहवासाक्षमाणां पदार्थानां ससर्गदर्शनं सहा- वस्थानप्रदर्शन स विरोध: विशेषनामालद्वारः। अरयमाशयः, विरोधो द्विविधः-प्ररूढः अ्रप्र- रूढय, यत्र वाधमुद्धधानभिभूतत्वं तत्र प्ररूढो विरोध:, यत्र च बाघवुद्धयभिभूतत्वं तत्राप्ररूढो विरोध:, तत्र प्रथमो दोषो द्वितीयधालक्वारस्वरूपः, तथा च विरुद्धानां नाम चिरुद्धत्वेन भास- मानानां वस्तुतो विरोधाभावेपप विरोधितया प्रतीयमानानां पदार्थानां यत्र सामानाधिकरण्यं प्रतिपादमानं सस्प्रस्तुतस्योत्क्ष गमयति तत्र विरोधो नामालक्ार इति। अयमेवाशय :- 'विरोधः सोडविरोधेऽपि विरुद्धत्वेन यद्वचः' इति वदतः प्रकाशकारस्यापि॥ ३३३॥ हिन्दी-विशेष-प्रस्तुतगत उत्कर्ष प्रदर्शित करनेके लिये जहाँ विरुद्ध पदार्थोंका संसर्ग-एकत्रा- वस्थान वर्णन किया जाय, उसे विरोधनामक अलक्कार कहा जाता है। आशय यह है कि आपाततः विरुद्ध प्रतीत होनेवाले पदार्थोंका यदि प्रस्तुतोत्कर्ष बतानेके लिये सामानाधिकरण्य प्रदर्शित करें तो विरोधालक्कार होता है ।. काव्यप्रकाशमें-'विरोषः सोडविरोधेषपि विरुद्धत्वेन यदचः' ऐसा लक्षण किया गया है, जो इसके साथ मिलता-जुलता है। वामनने-'बिरुदाभासतवं विरोषः' कहकर इसका अनुभोदन ही किया है। इसके भेद के सम्बन्धमें काव्यप्रकाशकारने कहा है कि-जातिका जातिगुणक्रियाद्रव्यसे विरोध होनेसे चार प्रकार, गुणका गुणक्रियाद्रव्यसे विरोध होनेसे तोन प्रकार, क्रियाका करिया और १. विरोषसाधना।

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द्वितीय: परिचछ्छेद: २०७

द्रव्यसे विरोष होनेसे दो प्रकार और द्रव्यका द्रव्यसे विरोष होने पर एक प्रकार-इस तरह कुल दस भेद होते हैं। दण्डीने यह क्रम नहीं कहा है, उनका भेदकरण थोड़ा स्थूल है। यह विरोध अपिशष्दा- प्रयोगमें व्यक्चय और अपिशब्दप्रयोगमें वाच्य रहता है॥ ३३३ ॥ कूजितं राजहंसानां वर्घते मदमञ्जुलम्। क्षीयते च मयूराणां रुतमुत्कान्तसौष्ठवम्॥।३३४।। विरोधमुदाहरति-कूजितमिति। राजहंसानां पक्षिभेदानाम् मदमञजुलम् मदकलम् कूजितं शब्दो वर्धते, मयूराणाम उत्कान्तसौष्ठवम् भपगतमनोहरत्वं रतं शब्द: क्षीयते अपचीयते। अत्र कूजितरुतपदाभिलप्यस्य शब्दस्यकस्य क्षयपुद्धिकिये विरुद्धे, तयोरे कत्र शब्दे सामानाधिकरण्यवर्णनाद् विरोधो नामालङ्कार:, तेन व सामानाधिकरण्यदशनेन प्रस्तुतस्य शरत्कालस्य तुम्ययोरपि बलाबलकारित्वकृतं वैशिष्टथम् प्रतिभासत इति बोष्यम्। भत्र क्रिययोविरोध:॥३३४।। हिन्दी-राजइंसोंकी आवाज मदमञ्जुल होकर बढ़ती जाती है और मयूरोंकी वही आवाज अपने मनोहरत्वको खोकर घटती जा रही है। यह शरत्का वर्णन है। यह श्लोक-'शरदि हंसरवा: परुषीकृतस्वरमयूरमयूरमणीयताम्' इस श्लोकार्थसे समता रखता है। इस उदाइरणमें कूजित और रुत शब्दसे कहे जानेवाले एक शब्दरूप अर्थमें वृद्धि और क्षयक्रियाका-जो विरुद्ध है- वर्णन किया गया है, जिससे शरत्का माहात्म्य प्रतीत होता है, अतः विरोषालद्कार है। इस उदाहरणमें क्रियाओंका विरोध है॥ ३३४।। प्रावृषेण्यैर्जलधरैरम्बरं दुर्दिनायते रागेण पुंनराक्रान्तं जायते जगतां मनः ॥ ३३५॥ वस्तुगतगुणविरोधं दर्शयति-प्रात्ृपेण्यैरिति। प्रातृषेण्यैः वर्षाकाले जायमानेः जल- धरैः अम्बरं दुर्दिनायते आकाशं मेघाछनतया श्यामलं जायते, जगता जगति स्थितानां प्रजानां मनः पुनः रागेण (विषयासकत्या) आक्रान्तं व्याप्ं जायते, लोहितं भवतीति प्रतीतिः। अत्र रागस्य लोहिततया श्यामत्वलोहितत्वगुणयोरेकत्र जलधरे विरुद्धत्वं, तेन च वर्षासमयस्य विशेषः प्रकाश्यते ॥ ३३५॥ हिन्दी-वर्षाकालिक जलदोंसे आकाश आच्छन्न (श्यामल) हो रहा है, और लोगोंका हृदय राग (लाली-प्रेम) से आक्रान्त हुआ जा रहा है। इस उदाहरणमें जलवररूप एक अर्थमें श्यामता और लालीरूप विरुद्ध धर्मोका संसर्ग वर्णित हुआ है, अतः इसे विरोधालक्कार कहा गया है। ३३५॥ तनुमध्यं प्रथुभोणि रक्तौष्ठमसितेक्षणम्। नतनाभि वपुः स्त्रीणां कन्न हन्त्युन्नतस्तनम् ॥ ३३६ ।। अवयवगतविरोधमुदाहरति-तनुमध्यमिति। स्त्रीणां सुन्दरीणां तनुमण्यं क्रश- कटिदेशम, पृथुश्रोणि वृहनितम्बम, रकोष्ठम रक्तवर्णाधरं तथा असितेक्षणम् श्याम- नयनम्, नतनाभि गभीरनाभिविवरम् , उन्नतस्तनम् तुन्नकुचं व वपुः शरीरं कं पुमासं न हन्ति न पीडयति, अ्र तनुत्वबृहत््त्रयोः रत्तत्वासितन्वयोः नतत्वोभतत्वयोक्च गुणयो-

१. पुनरुस्सिक्तं। २. रक्तोष्ठम् ।

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२०८ काव्यादर्श:

विरोध: प्रतिभासते, परं तेषामाश्रयभेदेन व्यवस्थिततया विरोध: परिहियते। भ्यं न विरोधो वर्णनीयाया वनिताया उत्कर्ष प्रकाशयति॥३३६ ॥ हिन्दी-मध्यमागमें-कटिदेक्षमें कश तथा नितम्बमें विशाल, ओठमें रक्त एवं नवनभागमें श्याम, नाभिमें गंभीर एवं स्तनमें उत्नत नारीका रूपसौन्दर्य किस पुरुषको नहीं सताता है। यहाँ तनुत्व और विशालत्व, रक्तत्व एवं श्यामत्व, नतत्व और उन्नततव परस्पर विरुद्ध हैं, फिर भी एक नायिकामें वर्णित हुए है, अतः विरोधालक्ार है, जिससे नायिकाका असाधारण सौन्दर्य व्यक्त होता है। इस श्लोककी छाया गोविन्द ठक्कुरके निम्नलिखित श्लोकपर पड़ती हुई-सी प्रतीत होती है- 'अकृशं कुचयो: कृशं वलने विपुलं चेतसि विस्तृतं नितम्बे। अधरेप्रणमाविरस्तु चित्ते करुणाशालि कपालि भागधेयम्ं॥ ३३६ ।। मृणालयाहुरम्भोर पभ्मोत्पलमुखेक्षणम्। अपि ते रूपमस्माकं तृम्धि तापाय कल्पते ।। ३३७।। विषमविरोधमुदाहरति-मृणालेति। हे तन्वि कृशात्ि मृणालबाहु कमलनालो- पमशीतलभुजम् , रम्भोरु कदलोसमानजङ्गम्, पद्तम् इव उत्पले इव न मुख़म्, र्दक्षणे नयने च यत्र तनथा, पत्रमुखमुत्पलनयनश्चेत्यर्थः, एतादृशमपि ते रूपम् मृणाल- रम्भापद्योत्पलादिशीतलपदार्थप्रकारोपमितमपि ते तब रूपम् अस्माकं त्वत्सन्नवश्चितानां वापाय सन्तापातिशयाय जायते। भत्रशीतलोपमेयैरहैःसन्तापजननोक्त्या विरोध: ॥३३७। हिन्दी-हे कशाजि, मृणालके समान बाहुवाला, कदलीके समान जड्ावाला, कमलके समान मुखवाला एवं नील कमलके समान नयनों वाला होकर भी तुम्हारा यह रूप हमलोगोंके (वियुक्त्ों या पानेमें अशक्तोंके) लिये सन्तापका कारण हो रहा है। जो रूप इतना शीतल-मृणाल-कदली-पत्म-उत्पलके समान है, वह सन्ताप प्रदायक हो यह विरुद्ध है।। ३३७।। उद्यान मायुतोद्धूताश्चू तचम्पकरणव: उद्शयन्ति पान्थानामरपृशन्तोऽपि लोचने॥३३८॥ भसन्गतिविरोधमुदाहरति-उद्यानेति। उद्यानमारुतेम पुष्पवाटिकापवनेन उद्धृताः चालिता: चूतानाम् आम्राणाम् चम्पकानाख रेणवः परागाः लोचने पान्यानां पश्यता वियोगिनां नयने अस्पृशन्तोऽपि उदश्रयन्ति सवाष्पे कुर्वन्ति। अत्र चूतचम्पकरेणूनाम् स्पर्शाभावेऽपि अश्रदयकारणत्वं विरोध:, स चोहीपकतया सपरिहारः। अ्रनेन वियोगिना- मुस्कण्ठातिशयध्वनिः ॥ ३३८॥ हिम्दी-पुष्पवाटिकाकी वायुसे सम्मालित होकर उड़नेवाली आम्रमअ्जरी तथा चम्पककी धूल (पराग) बिना स्पर्श किये ही वियोगियोंकी आँखोंको अश्रुपूर्ण बना देती है। आम्रमज्री एवं चम्पक के परागको देखकर उद्दीपितकन्दर्प पथिकजन आँखोंमें आँसू भरकर उद्विभ् हो जाते हैं। इस उदाहरणमें-पुष्पपराग आँखको स्पर्श नहीं करता है फिर भी आँखें आँसूसे भर जाती है-यही असङ्तिमूलक विरोध है, जिससे समयकी मादकता व्यक्त होती है॥ ३३८।। कृष्णाजुनानुरक्तापि रष्ष्टिः कर्णावलम्बिनी। याति विश्वसनीयत्वं कस्य ते कलभाषिणि। ३३९।।

१. लोचनम्।

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द्वितम्य: परिच्छेद: २०६

इस्यनेकप्रकारोSयमंलक्गार: प्रतीयते। (इति विरोधवक्रम्) श्लेषमूलं विरोधमुदाहरति-कृष्णेति। हे कलभाषिणि मघुरवचने, कृष्णे भगवत वासुदेवे शजुने तृतीयपाण्डवे बानुरक्ता धृतप्रणयापि कर्णावलम्बिनी कानीने राषेये आाश्रिता (इति विरोष:, कृष्णार्जुनानुरक्ताया दृष्टः कर्णाश्रितत्वानुपपसेः), कृष्णा वंशतः श्यामप्रभा अंशतोऽर्जुना धवला अनुरक्ता प्रान्तभागे लोहितवर्णा च (इति विरोष- परिहार: ) ते तव दृष्टिः कस्य विश्वसनीयत्वं विश्वासपात्रत्वं याति, विरुद्धपक्षद्वयाश्रितायां तब दष्टो को विव्वास कुर्यादिति। अत्र ष्णार्जुनानुरक्ताया: कर्णाश्रयणं विरुद्धमिति करिया- विरोध:, स च श्लेषमूळः ॥ ३३९॥ उपसंहरति-इत्यनेकेति। इति पर्यवृणितदिशा अर्यं विरोधो नाम अलड्वारः अनेक- प्रकारो बहुविधः, स च दर्शित एव।। हिन्दी-हे मधुरभाषिणि, तुम्हारे ये नयन कृष्णार्जुनानुरक्त-कृष्ण एवं अर्जुन पर अनुराग रखनवाले होकर भी कर्णका अवलम्बन करते हैं, इनपर कौन विश्वास करेगा? तुम्हारे नयन काले, उजले और प्रान्तभागमें रक्तवर्ग हैं, श्वेतश्याभरतनार है फिर भी कान तक आये हैं, इनका विश्वास कौन करेगा ? इस उदाहरणमें कृष्णार्जुनानुरक्तका कर्णाश्रित होना बिरुद्ध है, यह श्लेषकृत विरोध है, श्वेतश्यामरतनार नयन आकर्ण व्याप्त हैं, इस अर्थमें विरोधपरिहार हो जाता है॥३३९॥ इस प्रकारसे यह विरोधनामक अलक्कार अनेक प्रकारका प्रतीत होता है, जिन प्रकारोंका परिचय कराया गया, भोजराजने एकके दूसरेसे उलझानेमें-परस्परसापेक्षविरोधस्थलमें ग्रथित विरोध मानकर यह उदाहरण दिया है- 'दिग्वासा यदि तत् किमस्य धनुषा, शस्त्रस्य किं भस्मना, भस्मस्याथ किमङ़गना, यदि च सा कामं परिद्वेष्टि किम्। इत्यन्योन्यविरुद्धचेष्टितमिदं पश्यत्रिजस्वामिनो भृङ्गी सान्द्रशिरावनद्धपुरुषं धत्तेऽस्थिशेषं वपुः ॥' अप्रस्तुतप्रशंस स्यादप्रक्रान्तेषु या स्तुतिः॥ ३४० ॥ अप्रस्तुतप्रशंसां लक्षयति-अप्रस्तुतेति। अप्रकान्तेषु अप्रस्तुतेषु (अप्रस्तुताना- मित्यर्थः) प्रस्तुतस्य निन्दार्था या स्तुतिः प्रशंसा सा अप्रस्तुतप्रशंसा नाम। यत्र प्रस्तुतस्य निन्दामुद्दिश्य अप्रस्तुतं प्रशस्यते सा अप्रस्नृतप्रशंसेत्यर्थः । इयं हि संज्ञाउन्वर्था, तथा चाप्रस्तुतानां प्रशंसया प्रस्तुतानां निन्देवास्यालङ्कारस्य प्रधानमुपपादकम्। समा- सोको तु अप्रस्तुताद्वच्यात् प्रस्तुतस्य प्रतीतिरिति ततो भेदः ॥ ३४० ॥

अलक्कार कहते हैं। हिन्दी-प्रस्तुतकी निन्दाके लिये की गई अप्रस्तुतकी प्रशंसा- स्तुतिको अप्रस्तुतप्रशंसा नामक

दण्डीने अप्रस्तुत वाच्यसे प्रस्तुतकी प्रतीने होनेमें समासोक्ति एवं अप्रस्तुतकी प्रशंसा द्वारा प्रस्तुतकी निन्दामें अप्रस्तुतप्रशंसा मानकर दोनों अलङ्गारोंका विषयविभाग कर दिया है। इस मतमें संज्ञाकी अन्वर्थता पर ध्यान दिया गया है। अन्यान्य आचार्योंने अप्रस्तुत वाच्यसे प्रस्तुतकी प्रतीतिमें अप्रस्तुतप्रशंसा और प्रस्तुत वाध्यसे अप्रस्तुतकी प्रतीतिमें समासोक्ति, इस प्रकार विभाग किया है। इस मतमें प्रशंसा-शब्द स्तुत्यर्थक न होकर उक्तिमात्रार्थक है॥ ३४० ॥ १. अलक्कारोतिशोभते। २. अप्रक्रान्तेप्सितस्तुति: । १४ का०

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२१० काव्यादशेः

सुखं जीवन्ति हरिणा वनेष्वपरसेविनः। अंन्येरयत्न सुलभैस्तृणदर्भाङ्कुरादिभि:।।३४१।। सेयमप्रस्तुतैवात्र मृगवृत्ति: प्रशस्यते। राजानुवरसनक्केशनिविण्णेन मनस्विना ॥ ३४२ ॥

अप्रस्तुतप्रशंसामुदाहरति-सुखमिति। अपरसेविनः परकीयसेवाकार्यविमुख़ाः पर- सेवाजनितस्वात्मापमानदुःखापरिचिता: हरिणाः अयत्नसुलभैः अनायासप्राप्यैः तृणदर्भाक्कु रादिभि: अभः भोज्यवस्तुभि: सुखं कमप क्लेशं विना वनेषु सुखं जीवन्ति। कस्यचिद्राज- सेवानिविण्णमनस इयमुक्तिः। वनवासिनोऽपि परसेवारहितास्सुखिन: परं प्रासादवासि- नोडपि परसेवाधिकृता: मादशाः सततसुलभदुःखा इति मृगप्रशंसया स्वनिन्दा।। ३४१ । उदाहरणं योजयति-सेयमिति। अत्र उक्त्ोदाहररो राजानुवर्त्तनश्लेशनिविण्णेन राजसेवाखिल्नेन केनापि मनस्विना मानिना सेयम् अप्रस्तुता एव मृगवृत्तिः प्रशस्यते, तया च प्रशंसया राजसेविनो वक्तुरात्मनिन्दा व्यज्यते ॥। ३४२ ॥ हिन्दी-दूसरेकी सेवा नहीं करनेवाले यह हरिण अनायासलभ्य घास, कुशाहुर आदि भोज्य वस्तुओंसे वनोंमें सानन्द जीवनयापन करते है (परन्तु राजप्रासादमें रहकर नानाविध मिषान्न- भोजी परसेवी जन कष्टमें रहते हैं क्योंकि सेवा बड़ी बुरी वस्तु है)॥ ३४१ ॥ इस उदाहरणमें राजसेवामें अनुभूत होनेवाले कष्टोंसे ऊब उठनेवाले किसी मानवाले पुरुषने अप्रस्तुत मृगवृत्तिकी प्रशंसा की है, जिससे वक्ताकी आत्मनिन्दा प्रतीत होती है। यह अलक्कार प्रस्तुनाप्रस्तुतकी प्रशंसामें नहीं होता है, किन्नु अप्रस्तुतकी प्रशंसासे प्रस्तुनकी निन्दामें होता है, अतएघ- 'याते मय्यचिरान्निदाघमिहिरज्वालाशतैः शुष्कतां गन्ता कं प्रति पान्थसन्ततिरसौ सन्तापमालाकुला। इत्थं यस्य निरन्तराधिपटलैनित्यं वपुः क्षीयत धन्यं जीवनमस्य मार्गसरसो धिग् वारिधीनां जनुः ॥' यहाँ अप्रस्नुत मार्गस्थ सरोवर एवं प्रस्तुत दाताकी प्रशसा होने पर भी अप्रस्तुतप्रशंसा नहीं, समासोक्ति ही है।। ३४२ ॥। यदि निम्दश्निव स्तौति ्याजस्तुतिरसौ स्मृता। दोषाभासा गुणा एव लभन्तं हात्र' सव्निधिम्॥ ३४३॥ सम्प्रति व्याजस्नुतिश्निरूपयति-यदीति। निन्दन्निव यदि स्तौति अरसौ व्याजस्तुतिः स्मृता। अत्र व्याजस्तुतौ दोषाभासाः वस्तुतो दोषा अभवन्तोऽपि गुणाः सन्तो- पपि दोषवदवभाममाना एव सानिधिं लभन्ते, दोषत्वेनोच्यमाना गुणा एव व्याजस्तुतौ कारणीभवन्तीत्यर्थः । निन्दशिव स्तौतीति शब्दैः निन्दामुखेन स्तुतावेवालक्कारत्वमभिप्रेयते दण्डिना, अत एवांग्रे तथेवोदाहृतमपि, प्रकाशकारादयस्तु 'स्तुवाश्व निन्दति'स्थलेऽपि व्याजस्तुतिमभिप्रयान्ति, तत्र व्याजेन निन्दा व्याजेन स्तुतिरिति दण्डी, प्रकाशकारादयक्ष तेन व्यार्यानेन सहैव व्याजरूपा स्तुतिर्व्याजस्तुतिः निन्दापर्यवसायिनी स्तुतिरित्यपि

१. अथँ:। २. जलदर्मा। १. मतः। ४. तत्र।

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द्वितीय: परिचछ्छेद: २११ हिन्दी-यदि आपाततः निन्दा-सी प्रतीत हो, लेकिन उससे स्तुति प्रकट होती हो तो उसे व्याजस्तुति मानते हैं, इस अलक्कारमें दोषाभासके समान प्रतीत होनेवाले गुण ही प्रधान कारण होते हैं। अर्थात् गुणोंको ही ऐसे शब्दोंसे कहें कि वह दोष मालूम पड़े, तो उस स्थितिमें निन्दाके बहाने स्तुति होनेसे व्याजस्तुति नामक अलक्कार होता है। आचार्य दण्डीका अभिप्राय ऐसा मालूम पड़ता है कि निन्दामुखेन स्तुतिम्थलमें ही व्याजस्तुति अलक्कार होता है, परन्तु काव्यप्रकाशकार प्रभृतिने व्याजस्तुतिका दो प्रकार विभाग किया है, एक निन्दामुखेन स्तुतिंमें और दू सरा स्तुतिमुखेन निन्द्रामें। 'व्याजेन निन्दा व्याजेन स्तुतिः, व्याजरूपा व। स्तुतिः व्याजस्तुतिः' इन दोनों प्रकारोंमें नामनिर्वचन किया जाता है। निन्दाव्याजेन स्तुतिमें दण्डीने कुछ उदाहरण दिये हैं, वे आगे दिये गये हैं, ग्याजरूप स्तुतिका उदाहरण काव्यप्रकाशकारने यह दिया है- 'हे हेलाजिनबोधिसत्त्व, वचसां किं विस्तरस्तोयधे, नास्ति त्वत्सदृशः परः परहिताधाने गृहीतव्रतः । तृष्यत्पान्थजनोपकारघटनावैमुख्यलब्धायशोभारस्योदहने करोषि कृपया साहायकं यन्मरोः॥' इस शोकमें रुमुद्रकी स्तुतिके व्याजसे निन्दा प्रतिपादित हुई है, अतः यह व्याजरूपा स्तुति- स्वरूप व्याजस्तुति अलक्कार है। ३४३ ॥। तापसेनापि रामेण जितेयं भूतघारिणी। त्वया रांजञापि सैवेयं जिता माभून्मदस्तव।। ३४४ ।। व्याजस्तुतिमुदाहरति-तापसेनापीति। तापसेन तपस्यापरायणेन (सैन्यूसम्ब न्धरहितेन ) रामेण भार्गवेण परशुरामेण इयं भूतधारिणी पृथिवी जिता, त्वया बाज्ञापि (चतुरतसैन्यसम्पन्ननापि ) सैवेयं तावती एव पृथ्वी जिता, इति हेतोः तव मद् पृथ्वी- जयसंभवो गर्वः माभूत न भवतु। साधनहीनेन रामेण या पृथ्वी जीयते स्म. साधनसम्पदु- पेतेन राज्ञा तस्या एव जय क्रियमाणे नाहति गर्वस्यावसर इति प्रथममापाततो निन्दा प्रति- भाति. नद्व्याजेन समस्तपृथिवीजयजनितोत्कर्षवत्तया राज्ञः प्रशसा फलतीति व्याजस्तुति- रियम्। अत्र निन्दाव्याजेन स्तुतिः स्फुटा ॥ ३४४॥ हिन्दी-तपत्वी होकर भी परशुरामने जिस पृथ्वीकी विजय की थी, आपने राजा होकर भी उसी पृथ्वीकी विजय की है, अतः आपको पृथ्वी जीतने का गर्व नहीं होना चाहिये। उस उदाहरणमें आपाततः (ऊपर ऊपरसे ) निन्दा प्रतीत होती है किन्तु है यह स्तुति, क्योंकि महादेवके शिष्य परशुरामने जिसे अधीनस्थ किया, आपने भी उसी पृथ्वीको अधीनस्प बनाया है, यह मामूली बात नहीं है। अत एव इसे निन्दाव्याजेन स्तुति-व्याजस्तुति कहा गया है ३४४ । पुंसः पुराणादाच्छिद्य श्रीम्त्वया पारभुज्यते। राजन्निक्ष्वाकुवंद्यंस्य किमिदं तव युज्यते ॥३४५॥ अलद्गारामरोत्या सा वैचिव्मधिक वहेदिति मम्वायश्लेयमूला व्याजोततमुद्दा हरति-पुंस इति। हे राजन, न्वया पुगणात् आद्यात् पुंसः पुरुषात् ( 'पुराणपुरुषो यज- पुरुषो नरकान्तक' इति कोशात्) विणोः (यृद्र्यति ध्यनः) आ्रच्छिय बलादाहत्य शीर्लदमी: (मम्पत्तिक्ष ) परिभुज्यते उपभोगवविपयक्रयत, इक्वाकुवंश्यस्त इत्वाकुकुल संभवस्य तव किम् इदं पुरुपान्तराहतलद्तमीभोगरूपं कार्यम युज्यते शचित्यमाबहति ? १. वंशस्य+ -: 3:

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२१२ काव्यादर्श:

पुराजपुल्वाहृतसम्पदुपभोगस्तव न युज्यते इति निन्दया प्रभूतसम्पत्तिकृता स्तुतिः प्रती- बते इति व्याजस्तुतिः । भत्र पुराणशब्दे श्रीशन्दे चार्थश्लेषः ।। ३४५ ॥ हिन्दी-पुराणपुरुष विष्णुसे (किसी वृद्धसे ) उसकी श्री (स्री) धीन कर आप भोग कर रहे है, यह क्या इक्वाकुतुलोत्पन्न आपके योग्य कार्य है? इस उदाहरणमें पुराणपुरुषसे छीन कर लाई गई सम्पत्तिका उपभोग निन्दाव्याजसे प्रभूत- सम्पत्तिशालिता द्वारा स्तुति प्रकाशित करता है, अतः व्याजस्तुति है। इस श्रोकमें पुराण एवं श्ौशब्दमें अर्थश्रेष है। ३४५।। भुजन्भोगसंसका कलतं तव मेदिनी। अहक्कार: परां कोटिमारोहति कुतस्तव ॥। ३४६ ॥। शब्दश्लेभ्मूलां व्याजस्तुतिमुदाहरति-भुजक्गेति। तव कलत्रं भार्या (भोग्या पाल्या च) मेदिनी पृथ्वी भुजप्भोगसंसक्ता शेषनागफणमण्डलाश्रिता (जारजनानुरक्ता च)। (एवं सति) तब अहङ्कारः परां कोटि प्रकर्ष कथमारोहति ? अत्र निन्दया त्वं सार्वभौमोऽसीति स्तुतिः पर्यवस्यति, सा भुजन्शब्दस्य श्लिष्टतया शब्दश्लेषमूला ॥ ३४६ ॥ हिन्दी-आपकी स्त्री पृथ्वी भुजमभोगसंसक्ता-शंषनागके फणपर अवलम्बित या जारजनानु- रकत है, फिर भी आपका अहक्कार पराकाष्ठाको क्यों पहुँच रहा है? इस उदाहरणमें राजाकी स्त्री- स्थानीया पृथ्वीकी जारासक्तत्वकर्थनरूप निन्दासे उसको सार्वभौमता प्रतीति होती है, अतः व्याज- स्तुति है, यहाँ भुजङ्गपदमें शब्दश्रेष है, इसलिये यह शब्दश्लेषमूला व्र्याजस्तुति हुई॥ ३४६ ॥

व्याजस्तुतिप्रकाराणामपर्यन्तस्तु3 विस्तरः॥ ३४७॥ (इति ग्याजस्तुतिः) व्याजोक्तिमुपसंहरति-इतीति। इति एवंप्रकारेण श्लेषानुविद्धानाम् श्लेषमूलानां तथा अन्येषाम् अन्यालह्कारमूलानां च व्याजस्तुतिप्रकाराणाम् अपर्यन्तः असीमः विस्तरः तु उपलक्षयताम् स्वयमूद्यताम्, सर्वेषामेतदलक्कारप्रभेदानां वततमशभ्यतयेत्थमुर्ततम् ॥३४७ हिन्दी-इसी तरइसे श्लेषमूलक तथा अन्यालक्वारमूलक व्याजस्तुतिके प्रभेदोंका असीम प्रभेद स्वयं समझे। अनन्तप्रभेद होनेसे वह कहा नहीं जा सकता है, स्वयं उसका ऊह करें॥ ३४७॥ अर्थान्तरप्रवृर्तेन किश्चित् तस्सडशं फलम्। सदसद्वा निद्श्येत येदि तस्स्यान्िदर्शनम्॥३४८॥ निदर्शनं लक्षयति-अर्थान्तरति। अर्थान्तरप्रवृत्तेन कार्यान्तरव्यापृतेन केनचित् किमपि सत् असत् वा तत्सदशम् अर्थान्तरतुल्यम् (स्वप्रवृत्तिविषयकार्यान्तरसटशम्) यदि निदश्यते बोध्यते, तत् निदर्शनम् तभ्ामालक्कार इत्यर्थः ॥ ३४८॥ हिन्दी-किसी कार्यान्तरमें प्रवृत्त कोई कर्त्ता यदि स्वक्रियमाण कार्ययोग्य किसी सत् या असत् कार्यका बोधन करे तो वहाँ निदशन नामक अलक्कार होता है, उदाहरणके लिए 'उगते ही मर्य उदय का फल मित्रोंको उपकृत करना होता है' यह समझानेके लिये कमलकी श्रीसम्पन्न करते

१. मंक्रान्ता । २. नुवद्धानाम् । ३.न्तः प्रविस्तरः । ५. सा स्याभिवर्शना।

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द्वितीय: परिष्जेद: २११

2ै'इस वाक्यमें पद्मश्रीदायक उदयरूप कार्यमें प्रवृत्त सूर्यरूप कर्त्ता स्वकियमाण उदयकार्ययोग्य सत् सुहदुपकार रूप कार्यका बोधन करता है, अतः यह निदर्शन है, अर्वाचीन आचायोंने इसका लक्षण इस प्रकार कहा है- 'सम्भवन्वस्तुसम्बन्धोडसम्भवन्त्रापि कुत्रचित्। यत्र विम्नानुविम्बत्वं बोषयेत्सा निदर्शना॥ ३४८ ।। उदयभ्नेषं सविता पग्नेप्वर्पयति श्रियम्। बिर्भावयितुमृद्धीनां फलं सुदतनुभ्रहम् ॥३४९॥ मत्फलनिदर्शनमुदाहरनि-उदयन्नेवेति। एषः सविता सूर्यः उदयन् उदयं प्राप्तु- वन् ऋद्धीनां जायमानानां सम्पत्तीनामुदयानां च फलं सुहृदनुभ्रहं बन्धुभनोपकारं विभाव- यितुं ज्ञापयितुम् पद्मेषु त्रियमपयति, कमलानि विकासभाजनानि कृत्या सश्रीकाणि रचयतीत्यर्थः। अत्र पद्मेषु श्रीप्रदानोन्मुखेन उदयभाजा सूर्येण उदयफलं सुहृदनुभरहरूपं निदश्यत इात भवति निदर्शनालक्कारस्तत्र व मृहदनुग्रहस्य मत्फलत्वम् ॥ ३४९ ॥ हिन्दी-सूर्य उगते ही समयमें सम्पत्तिका फल सुहृदनुग्रह होता है इस पातको शापित करने के लिये कमलोंको विकासित कर के शोभाशाली बना देते हैं। इस उदाहरणनें कमलोंको श्रीप्रदानमें उन्मुख उगता हुआ सूर्य उदयका फर सहदनुग्रह है- यह बताता है, अतः यह सत्फल निदरशन रूप निदर्शन प्रमेद है-। ३४९ ॥ याति चन्द्रांशुभि: स्पृष्टा ध्वाम्तराजी परामवम्। सद्ो राजविरुद्धानां सूचयम्ती दुरमतताम्॥ ३५०॥ (इति निदर्शनम्) असत्कलनिदर्शनमुदाहरति-यातीति। चन्द्रांशुभि: चन्द्रकरै: स्पृष्टा भ्वान्तराजी तमःपङ्गि: राजविरुद्धानां नृपप्रतिकूलानां चन्द्रविरोधिनां च दुरन्तताम् दुःखकर,वसानताम् सूचयन्ती सदः तत्समये एव पराभवं विनाशं याति, अत्र चन्द्रकरपरिभूयमाना तमस्ततिः राजदोहिणि परिणामदुरन्तं फलं बोधयतीति अंसत्फलनिदर्शनमिदम्॥ ३५०॥ हिन्दी-चन्द्रमाकी किरणोंसे छुये जाते ही अन्धकारराशि राजविरोषी-नृपद्रोही (या चन्द्रविरोधी) का अन्त भला नहीं हुआ करता, इस वातको सूचित करती हुई नष्ट हो जाती है। यहाँ चन्द्रकरसे परिभूयमान तमोराशि राजद्रोहीका अन्त मला नहीं होता है-इस असत फलका बोधन कराती है, अतः यह असत्फलनिदर्शन है॥ ३५० ॥ सहोक्ति: सहभावेन कथनं गुणकर्मणाम्। अर्थानां यो विनिमयः परिवृत्तिस्तु सा स्मृता ॥३५१॥ सहोकि लक्षयति- सहोकतिरिति। गुणस्य कर्मण: कियायाथ सहभावेन साहित्येन कथन सहोकित:, अत्र क्रियापदं द्रव्यस्याप्युपलक्षर्कं, तथा च सम्बन्धिभेदेन भिभनानामपि गुणक्ियादीनां सहार्थकशब्दसामर्थ्येन यदेकदा प्रतिपादनं सा सहोफिर्नामलहारः। सह- भावेन कथने चमत्कारकत्वमपेद्यत एव, अलङ्ठारत्वम्य तन्मूलकत्थात् , अत एव सत्यपि सहकथने 'पुत्रेण सहागतः पिता' इत्यादी नायमलङ्गारः, चमत्कारथात्रातिशयोक्तिमूलकत्न एव संभवति, अत एव च दर्पणकृता लक्षणे 'मूलभूताऽतिशयोकियदा भवेत्' इति समावेशितम्।

१. एव। २. विभावयन् समृद्धीनां। ३. राशिः। ४. सहमावस्य। ५. वा।

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२१४ काव्यादर्श:

पूर्वार्धेम सहोकि लक्षयित्वोत्तरार्घेन परित्ृत्तिं नामालक्कारं लक्षयति-अर्थामामिति। यः अर्थानां विनिमयः प्रतिदानम् (किञ्िदृत््वा श्न्यस्य कस्यचिद्ग्रहणम्) सा परि- पति: स्मृता। चमत्कारकोऽर्यविनिमयः परिवृत्तिरिति स्मयंत, तेन 'अश्ववरगाः क्रीणाति' इत्यत्र नालड्वार:। सा च परितृतिस्त्रिधा-समेन समस्य, न्यूनेन अधिकस्य, अरधिकेन न्यूनस्य च ॥। ३५१ ॥ हिन्दी-गुण, क्रिया, द्रन्यके सइभावेन कथनको सहोक्ति अलक्गार कहते हैं, जहाँ सम्बन्धि- भेदेन भिन्न होनेवाले भी गुण-क्रियादि सहार्थक शब्दके बलसे एक साथ कहे जात हों उसको सहोक्ति माना जाता है, इस एक साथ कथनमें चमत्कार आवश्यक है, अतएव 'पुत्रके साथ पिता आये' इसमें अलक्कार नहीं है। यहाँ चमत्कार अतिशयोक्तिमूलक ही होता है, इसी बातको ध्यान में रखकर साहित्यदर्पणकारने लक्षणमें ही 'मूलभूतातिशयोक्तियदा भवेत्' कह दिया है। कारिकापूर्वार्द्में सहोक्तिका विवेचन करके उत्तराधसे परिवृत्तिका लक्षण कहते है। अर्थ- वस्तुओंके विनिमय-प्रतिदान बदलकर लेनेको परिवृत्ति अलक्कार कहते है, उस विनिमयमें चमत्कार अवश्य अपेक्षित है, अतएव 'घोड़े देकर गाय बदलते हैं' इस वाक्यमें परिवृत्ति नहीं होती है। वरिनिमय तीन प्रकारका हो सकता है-समसे समका, न्यूनसे अधिकका, अधिकसे न्यूनका। अतएव परिवृत्िके तीन भेद होंगे। बिनिमयका तात्पर्य है अपना कुछ देकर दूसरेका कुछ लना, इसीलिये जहाँ कुछ छोड़कर कुछ ग्रहण करना इसका विषय नहीं है, अतएव-'किमित्यपास्याभरणानि यौवने धृतं त्वया वार्धक- शोभि वल्कलम् इसमें परिवृत्ति नहीं है। भोजराजने परिवर्तन-एक स्थानस्थित वस्तुका स्थानान्तरित होना भी परिवृत्तिका विषय माना है, यथा- 'कुमुदवनमपश्रि श्रीमदम्भ जखण्डं त्यजति मुदमुलूकः प्रीतिमाँश्चकवाकः। उदयमहिमरर्मिर्याति शीतांशुरस्तं इतविधिलसितानां ही विचित्रो विपाकः' ॥ ३५१॥ सह दीर्घा मम श्वांसैरिमा: सम्प्रति रात्रयः। पार्ण्डुराश् ममैवाडैः सहताश्वन्द्रभूषणाः ॥ ३५२।। गुणसहोक्तिमुदाहरति-सह दोर्घा इति। विरहिण्या उक्तिरियम्, सम्प्रति विरहकाले मम श्वासेः सह दीर्घाः विशाला: इमा रात्रयः जाता इत्यर्थः, चन्द्रभूषणाः चन्द्रिकाशोभिताः ताः रात्रयथ ममेवाजैः सह पाण्डुराः श्वतवर्णाः जाता इत्यत्रापि। अ्त्र दीघत्वपाण्डु- रत्वगुणौ सम्बन्धिभेदभिन्नावपि सहोकी ।। ३५२ ॥ हिन्दी-इस वियोगकालमें रानें नेरी सांसोंके साथ बड़ी-बड़ी होती जा रही हैं और चन्द्र- कलामण्डित वही रातें मैरे अङ्गोंके साथ उजली हुई जा रही है। यहाँ दीर्घल और पाण्डुरत्व रूप गुणकी सहोक्ति है। हेतुप्रभेन में सहजदेतुका उदाहरण दिया है- 'आविर्भवति नारीणां वयः पर्यस्तशैशवम्। सहैव विविधैः पुंसामकजोन्मादविभ्रमेः ॥' इसमें क्रियओंका सहभाव वर्णित तुआ है, तथापि वह महोक्ति नहीं है, क्योंंकि वहों सहभाव होने पर भी कार्यकारणभावकृत वैनित्रयको चमत्कारक मानते है। इसकः मारांश यह है कि जहाँ कार्यकारणभावके बिना केवल नहोक्तिकृत चमत्कार होगा, वहाँ सहोकि अलं- १. प्राण: । २. पाण्डराश्र।

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द्वितीय: परिच्छेद: २१५

कार और जहाँ कार्यकारणसइभावकृत चमत्कार होगा, वहाँ सहज हेतु नामक हेत्वलक्गारप्रभेद होगा। 'सहृदीर्घा' इत्यादि प्रकृतोदाहरणमें रात्रिरदर्ध्य और श्वासदैध्यमें परस्पर कार्यकारणमान नहीं है, दोनों ही विरहकृत हैं।। ३५२ ।। वर्घते सह पान्थानां मूच्छयां चूतमअरी। पतन्ति च समं तेषामसुभिर्मलयानिलाः॥३५३॥ क्रियासहोक्तिमाह-वर्द्धत इति। पान्थानां प्रवासिनां वियोगिनां मूच्छय। सह चृतमअरी वर्धते, तेषां प्रवासिवियोगिनाम् असभि: प्राणः सम मलयानिला: दक्षिणवाताथ्ष पतन्ति। अत्र वृद्धिपतनक्रिये सहभावेन मूच्छाचूतमजर्योरसुमलयानिलयोक्ोपनिबद्धे। तत्कृतेव च सहोक्तिरियम् ॥३५३॥ हिन्दी-वियोगी पथिकोंकी मूच्छाके साथ आम्रमअरी बढ़ती जा रही है, और उनके प्राणों के साथ ही दक्षिण वायु निकलने लगी है। इस उदाहरणमें बढ़ना और पतनरूप क्रियामें महभावेन मूर्च्छा-आब्रमअजरी, एवं वियोगि- जनप्राण-मलयानिलगतत्वेन वर्णिन हुए हैं, अतः यह सहोक्तिका उदाहरण है। सहजहेतु अलक्कार यह नहीं है, क्योंकि यहाँ भी परस्पर कार्यकारणभाव नहीं है, सभी वसन्नकार्य हैं॥ ३५३ ॥ कोकिलालापसुभगाः सुगन्धिवनवायवः। यान्ति सार्ध जनानन्दैर्वृद्धिं सुरभिवासराः॥।३५४॥। उदाहरणान्तरमाह-कोकिलेति। कोकिलानाम् आलापैः मुभगाः मनोहराः सुगन्धिवनवायवः विकसितपुष्पतया सुगन्धयुतवाताः सुरभिवासराः वसन्तर्त्तुदिवसाः जना- नन्दैः सार्ध सह वृद्धिं यान्ति। सहशब्दप्रयोंग एवायमलद्कार इति भ्रमनिरासाय सार्धशब्देनेदमुदाहरणमित्येके। केचिस श्रृद्धिरूपस्य गुणस्य वृद्धिपदार्थभूतव्याप्तिरूपक्रियायाक्च तुल्यतयाभिधाने गुणक्रिया- सहोक्तिरियमति व्याजह:॥ ३५४॥ हिन्दी-कोकिलोंके आलापसे मुखरित एवं पुष्पोंके विकसित होनेके कारण सुगन्धित वनवात वाले यह वसन्तके दिवस लोगोंके आनन्दके साथ बढ रहे है। इसमें वृद्धि रूप गुणक्रियाकी सहोक्ति है॥ ३५४ ।। इत्युदाहतयो दत्ता: सहोक्तेरत्र काश्चन। (इति सहोक्ति:) क्रियते परिवृत्तेश् किश्चिद्ृपनिदर्शनम्॥ ३५५॥ महोक्तिमुप संहरत्नेव परिवृनि प्रस्तौति-इत्युदाहृतय इति। इति एवंप्रकारेण अत्र काश्षन कतिपयाः सहोक्त उदाहृतयः उदाहरणानि दत्ता: इदानीं परिवृत्ेः किश्िद्- रूपनिदर्शनम् उदाहरणप्रदर्शनं क्रियते ॥३५५ ॥ हिन्दी-इस प्रकारसे यहाँ सहांक्तिके कुछ उदाहरण दिये गये (इसके विषयमे अधिक प्रभेद सरस्वतीकण्ठाभरणादिमें देखें), अब आगे परिवृत्तिका उदाहरण दिया जाता है। ३५५॥ १. वहन्ति। २. अश्रुभि: । ३. निरूपणम्।

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२१६ काव्यादशे:

शस्त्रप्रहारं ददता भुजेन तव भूसुजाम्। चिराजितं हतं तेषां यश: फुमुदपाण्डुरम्॥ ३५६ ॥ (इति परिवृत्तिः) परिवृत्तिमुदाहरति-शस्त्रप्रहारमिति। भूभुजाम् राज्ञाम् (शेषे षष्ठी) शस्त्रप्रहारं ददता तब भुजेन तेषां राज्ञां चिराजिंत सुबहुकालोपार्जितं कुमुदपाण्डुरं कुमुदयद्तिधवलं यशो हतम् गृहीतम्। अत्र शखप्रहारं दतत्वा कीर्तिग्रहणमिति न्यूनेनाधिकस्य ग्रहणरूपा परिवुति: ॥ ३५६॥ हिन्दो-हे राजन्, नृपोंको शस्तप्रहार देकर आपके बाहुने उनका चिराजिंत तथा कुमुद- समान स्वच्छ यश ले लिया। इस उदाहरणमें शखप्रहार देकर कीसिंग्रहण किया गया है, यह न्यूनसे अधिकग्रहणरूप परि- पसिप्रभेद हुआ। समसे समग्रहणमें-'दश्वा कटाक्षमेणाक्षी जग्राह हृदयं मम।' अधिकसे न्यूनग्रहणमें-'मया तु हदयं दत्वा गृहीतो मदनज्वरः' यह उदाहरण दिये जाते हैं॥३५६।। आशीर्नामामिलषिते वस्तुम्याशंसनं यथा। पातु वः' परमं ज्योतिरवाङमनसगोचरम्॥ ३५७॥ आशीर्नामकमलङ्कारं निरूपयपि-आशीरिति। अभिलषिते स्वमम्बन्धितया स्वेष्ट- जनसंबन्धितया वा लिप्सितेऽयॅ आशंसनं स्वकीयाभिरुचिप्रकाशनम् भाशीर्नामाSलक्कारः। उदाहरति-पात्विति। भ्रवाक्नसगोचरम् वाचा मनसा च प्राप्तुमशक्यम् वाचा वर्ण- यितुम् मनसा च प्रहीतुमशक्यम् परमं ज्योतिः परमात्माभिधानं तेजो वो युष्मान पातु। अवाद्मनसगोचरतामाह ब्रद्मणःश्रुतिर्यया 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह' ॥३५७॥ हिन्दी-अपने तथा अपने इष्टजनोंकी अभिलषित वस्तुके सम्बन्धमें स्वेच्छाप्रकाशनको 'भाशीः' नामक अलक्गार माना जाता है। इसका उदाहरण यह है-वचन तथा मनसे पर-वचनसे भवर्णनीय एवं मनसे अग्राह्य परमात्मस्वरूप तेज आपका कल्याण करे। इस उदाइरणमें स्वेजनसम्बन्धितया अभिलषित म्रह्मकर्त्तक पालनमें अपनी इच्छा प्रकट की गई है। कुछ कोगोंने इसमें वैचित्र्य नहीं है, इसलिए इसे अलक्कार नहीं मानना चाहिये, ऐसा कहा हैं। 'आशीरपि च केषाश्चित् अलक्कारतया मता।' साहित्यदर्पणकार प्रभृतिने इसे नाव्यालक्कार माना है, क्योंकि उनके मतमें नाट्यमें ही इसकः चमत्कार प्रतीत होता है, उनका कहना है- आशीराकन्दकपटाक्ष नागर्वोद्यमा श्र या: ।. 'नाटयभूषणहेतवः॥' इसके बाद-'आशीरिट्टजनाशंसा' यह लक्षण लिखकर उन्होंने उदाहरण दिया है- "ययातेरिव अर्मिष्ठा भत्तुरबंदुमता भव । पुत्रं त्वमपि सम्राजं सेव पूरुमवाप्तुहि ।' अन्य आचार्य इसे प्रयः अलक्कार स्वरूप मानते है॥ ३५७ ॥ अनन्वय ससम्देहवुपमास्ेव दर्शितौ। उपमारूपकं चापि रूपकेष्वेव दर्शितम्ं॥३५८॥ उत्प्रेक्षामेद पवासावुत्प्रेक्षावयवोर्ऽपि च।

१. न:। २. कीर्तिंतम्।

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द्वितीय: परिच्छेद: २१७

एतावत्पर्यन्त यथोदिष्ान् सर्वानलक्कारान् प्रदर्श्य परोकाना केवामिदलक्ाराणां स्वो- केष्वेय:लक्कारेध्वन्तर्भार्द प्रदर्श्य स्वपरिगणनस्य न्यूनतां वारयति-अनन्धयेति। भाम- हेन अनन्वयः, ससन्देह: उपमारूपकम्, उत्प्रेक्षावयवः इति चत्वा रोऽधिका अलद्वारा लक्षिता उदाहताक्ष, तत्र अनन्वयः ससन्देह्य् उपमासु उपमाप्रभेदेषु एव दर्शिता उत्त, उपमाया: प्रभेदेऽसाधारणोपमायामनन्वयस्यान्तर्भावः, ससन्देहस्य च संशयोपमायामन्त- र्भाष:, इति भावः ।

उपमारूपकस्य तलामके रूपकप्रभेदेऽन्तर्भावः, उत्प्रेक्षावयवो न पृथगलङ्कारः किन्तू- त्प्रेक्षाभेद एव, तस्मादेषां पृथगलङ्कारतयानुक्तावपि नास्माकं न्यूनतेति दण्डिनस्तात्पर्येम्।। हिन्दी-यहाँ उद्देशकरमानुसार नाम्ना उद्दिष्ट अलक्कारोंका निरूपण किया गया, इसके आगे यह बताया जायगा कि परोक्त अलक्कारोंका अन्तर्भाव इन्हीं अलद्कारोंमें हो जाता है, अतः उनका अलगसे निरूपण नहीं होनेपर भी इस ग्रन्थमें न्यूनता नहीं आई है। भामडने अनन्वयके लक्षण तथा उदाहरण निम्नलिखित दिये हैं- लक्षण-'यत्र तेनैव तस्य स्यादुपमानोपमेयता। असादृश्यविवक्षातस्तमित्याहुरनन्वयम्।।' उदाहरण-'ताम्बूलर।गवलयं सफुरद्शनदीधिति। इन्दीवराभनयनं तवेब वदनं तव।।' इस अनन्वयको अलग अलक्कार मानना व्यर्थ है, इसका अन्तर्भाव असाधारणोपमा नामक उपमाप्रभेदमें हो जाता है, जिसका लक्षणोदाहरण दण्डीने यह दिया है- 'चन्द्रारविन्दयोः कान्तिमतिक्रम्य मुखं तव। आत्मनैवाभवत्तुल्यमित्यसाधारणोपमा ।।' भामहने ससन्देहालक्कार के लक्षणोदाहरण निम्न प्रकार दिये हैं- लक्षण-'उपमानेन तत्वं च भेदं च वदतः पुनः। ससंदेहं वचः स्तुत्यै ससंदेहं विदुर्यथा॥' उदाहरण-'किमयं शशी न स दिवा विराजते कुसमायुधी न धनुरस्य कौसुमम्। इति विस्मयाद्विमृशतोऽपि मे मतिस्त्वयि वीक्षिते न लभतेडर्थनिर्वृतिम्'॥ इस सन्देहालङ्कारका भी दण्डीने उपमाप्रभेद-संशयोपमामें ही अन्तर्भाव कर दिया है, जिसका स्वरूप यह है- 'कि पभ्ममन्तर्भ्रान्तालि किन्ते लोलेक्षणं मुखम्। मम दोलायते चित्तमितीयं संशयोपमा ।' उप मारूपक के लक्षणोदाहरण भामहने यह दिये हैं- लक्षण-'उपमानेन तद्दावमुपमेयस्य साधयन्। यां वदन्त्युपमामेतदुपमारूपकं यथा ।।' उदाहरण-'समग्रगगनायाममानदण्डो रथाद्िनः । पादो जयति सिद्धस्त्रीमुखेन्दुनवदर्पणः ।।' इसका अन्तर्भाव दण्डीने रूपकके प्रमेदमें किया है, जिसका स्वरूप निम्न प्रकार है- इदं साधर्म्यवैधर्म्यदर्शनाद् गौणमुख्ययोः। उपमाव्यतिरेकाख्यं रूपकद्वितयं यथा॥' उत्प्रेक्षावयव नामक अलक्वारके भामहने इस प्रकार लक्षणोदाहरण बताये थे- लक्षण-'शलिष्टस्यार्थेन संयुक्त: किशिदुत्प्रेक्षयान्वितः। रूपकार्थेन च पुनरुत्प्रेक्षावयवो यथा ।' उदाहरण- 'तुल्योदयावसानत्वाद् गतेस्तं प्रतिभास्वति। वासाय वासरः क्वान्तो विशतीव तमोगृष्म् ।।' इस उत्प्रेक्षावयव नामक अलक्कारका भी अन्तर्माव उत्प्रेक्षामें ही हो जाता है, इसे आचार्य दण्डीने श्लेषरूपकादिसंकीर्ण उत्प्रेक्षा कहा है। इसके अतिरिक्त-पराभिमत दृष्टान्तका उपमाप्रभेदमें उल्लेख और परिणामका रूपकप्रमेदमें, कारणमालाका हेतुप्रकारमें अन्तर्भाव किया गया है, जिससे न्यूनताका समाधान समझना चाडिये।। ३५८ ।

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२१८ काव्यादर्श:

नानालक्कारसंसृष्टिः संसृष्टिम्तु निगदयते॥। ३५९॥ मंसृष्टिं लक्षयति-नानेति। सजातीयविजातीयबहुविधाल्काराणां संसृष्टिः संसर्ग: एकत्रावस्थानं संसुषिनाम्रा व्यवहियते, यथा लौकिकालक्वारभेदानां परस्परसहभावे कोषपि नवः प्रकार: शोकातिरेकजनकः प्रादुभवति, तद्वदिहापि। अत एव चास्याः पृथगलक्कारतया व्यवहारः।। ३५९।। हिन्दी-सजातीय नथा विजातीय अनेक अलङ्कारोंका एक साथ रहना संसृष्टि नामक पृथक अलद्कार माना जाना है, सज्ञानीयमंसृष्टिस्थलमें शब्दालक्वारोंकी संसृष्टि और अर्थालक्वारोंकी संसृष्टि, इस तरह न्दो प्रकार होंगे, विजातीयस्थलमें शब्दालक्कार एवं अर्थालक्कार-दोनों नरहके अलक्वारोंकी संसृष्टि होगी। जिस प्रकार हारादि लोविक अलक्वारोंको एक साथ मिलाकर कोई नवीन अलक्कार बनाया जाता है तो उसका एक विलक्षण चमत्कार होता है, उसी तरह इन शाब्दिक संसार के अलङ्कारों के परस्पर संसर्गसे एक दिव्य चमत्कार उत्पन्न होता है, अतएव इसको पृथक् अलक्कार माना जाता है॥ ३५९.।। अक्गाभ्निभांवावस्थानं सर्वेषां समकक्षता। इत्यलङ्गारसंसृष्टेर्लक्षणीया छयी गतिः ॥ ३६०॥। मंसृष्टेरमैदानाह-अक्गाभ्निभावेति। अप्राद्गिभावः गुणप्रधानभावः तेन अवस्थानं स्थितिः (कस्यचित्प्राधान्यं तदितरालङ्काराणां च गौणत्वमेवंरूपेणवस्थानम्), तथा सर्वेषामलद्वाराण समकक्षता तुल्यबलता, गुणप्रधानभावं विना समप्राधान्येनावस्थानम्, इति अलक्कारसंसृष्ेअलक्काराणं परस्परसंनर्गस्य द्वयी गतिःभेदद्यी लक्षणीया ज्ञेया॥३६॥ हिन्दी-संसृष्टि नामक इस अलक्कारके दो प्रभेद होंगे, एक वह जिसमें समवेत विजानीय सजातीय सकल अलक्गार परस्पर अङ्गाङ्गिभावापन्न हो, अर्थात् कोई एक अलक्कार प्रधान हो, तदन्य अलक्कार उसके पोषक हो, गीण हो, दूसरा प्रभेद वह होगा जिसमें समवेत सकल अलक्कार समकक्ष-वरापर-तुल्यभावेन स्वतन्त्रतया अवस्थित हों। इस प्रकार दण्डीने संकर-संसृष्टि सभी नवीन प्रभेदों की जगहमें एकमात्र संसृष्टि ही मान ली है। अर्वाचान आचार्योंने इस प्रसङ्गमें कुछ स्पष्ट विचार अ्र्पस्तुत किया है, उनके मतानुसार समकक्षतया वर्त्तमान दो अलक्कारोंके संसर्गमें संसृष्टिनामक अलक्गार होता है :- 'मिथोऽनपेक्ष- मेतेपां स्थितिः संसृष्टिरच्यते' और अङ्गाद्गिभाव, एकाश्रयानुप्रवेश तथा सन्दिग्धत्व स्थलकी संसृष्टिको सक्कर नामसे अलग अलङ्कार माना जाता है- 'अक्गाद्गित्वेऽलडकतीनां तद्वदेकाश्रयस्थितौ। सन्दिग्धत्वे च भवति सक्करस्त्रिविधस्ततः॥' इसका विस्तृत विवेचन जाननेके लिये साहित्यदर्मणादि ग्रन्थ देखें॥ ३६० ॥ आक्षिपन्त्यरविन्दानि मुग्धे तव मुखभ्रियम्। कोशदण्डसमग्राणां किमेषामस्ति दुष्करम् ॥ ३६१॥ अपत्ञिभावसंसृष्टिनुदाहरति-आक्षिपन्तीति। हे मुग्धे वाले, अरविन्दानि कमला- नि तव मुखश्रियम् वदनकान्तिम् आक्षिपन्ति तुलयन्ति (आक्षिपतिर्निन्दार्थकतयौगम्य- वाची, 'आक्रोशत्यवजानानि कदर्थयति निन्दती'त्यादिनीपम्यवाचकसंग्रहात्), तत्रोपपति- माह-कषित्यादि। कोष: कुडमलं धनचयक्, दण्डो नालदण्डः सामादिषूपायेषु चरम

१. संकीण। २. भावसंस्थाi ! ३. क्ष्यता। ४. भ्रिय:।

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द्वितीय: परिच्छेद: २१६

उपायथ, ताभ्यां कोषदण्डाभ्यां समप्राणं पूर्णानाम् एषां कमलानां दुष्करमसाध्यं किमस्ति, कोषदण्डसद्धावे नास्ति किमप्यसाध्यम्, तत्सम्पन्नानि चामूनि कमलानि तव मुखन्रियमा- क्षिपन्तीति सयुक्तिकमेव। अत्र प्रधानमुपमा, कोषदण्डपदयोः स्थितेन श्लेषेणानुप्राणितोऽर्यान्तरन्यासब् तदम्र- मिति बोर्ष्यम्, तदयं भवत्यक्ञा्िभावसंसृष्टथलङ्कारः।। ३:१ ॥ हिन्दी-हे वाले, तुम्हारे मुखकी शोभासे कमल बराबरी कर रहे है, ठीक ही हैं. कोष (धनराशि-कमलपुष्पकुड्मल), तथा दण्ड (कमलनालदण्ड नथा सामाधुपायमें अन्तिम उपाय दण्ड) इन दोनोंसे युक्क इन कमलोंके लिये दुष्कर क्या है? कुछ भी असाध्य नहीं है। 'आक्षिपन्ति' पदसे उपमाप्रधाननया प्रतोन होती है, और 'कोपदण्ड' पदोंमें व्त्तमान श्लेषसे अनुप्राणित अर्थान्नरन्यास उसका अप्ञ है, अनः यह श्लोक अङ्गाङ्गिभाव-संसृष्टिका उदाहरण हुआ है॥ ३६१। लिम्पतीव तमोऽक्गानि वर्षतीवाअनं नभः। मसत्पुरुषसेवेव दष्टिर्निष्फलतां गता ॥ ३६२॥। समकक्षतासंसृष्टिमुदाहरति-लिग्पर्तावेति । तमः अज्ञानि लिम्पतीव, नभः अअ्ञनं वर्षतीव, असत्पुरुषसेवा नीचजनानुव्ृत्तिः इव दृष्टि: निष्कलतां वस्तुनिरोक्षणाशक्तर्ता नैरर्थक्यम् गता प्राप्ता। अत्र पूर्वार्द्धे उन्प्रक्षाद्वयम्, उत्तरार्धें चोषमा, तासां परस्परनिर- पेक्षभावेन समकक्षतगाऽवस्थानान्समकक्षसंसृप्टिरियन। ३६२।। हिन्दी-अन्धकार अङ्गोको लिप्त सा कर रहा है, आकाश अज्ञनकी वृष्टि-सा कर रहा है और दुर्जनकी सेनाकी तरह आँखें वस्तुग्रहणाक्षमनया निष्फल हो रही है। इस इलोकमें कृष्णपक्ष की त्रयोदशीका वर्णन है, पूर्वाद्धमे दो उत्प्रेक्षायं है और उत्तरार्धमें उपमा है, उनका परम्पर निरपेक्ष रूपमें समकक्षनया अवस्थान होनेसे समकक्षनासंसृष्टि नामक संसृष्टिप्रभेद यहां म्फुट है।। श्लेष: सर्वासु पुष्णाति प्रायो वक्रोक्तिपु श्रियम्। भिन्नं द्विधा स्वभावोक्तिर्वकोक्तिश्धेति वायम् ॥३६३॥ (इति संसृष्टिः) श्लेष इति। श्लेषः प्रायः भूयसा मर्वासु वकरोनिषु उत्तिवे चित्र्यमूलका लक्कारेषु श्रियं शोभां पुष्णाति वर्धयति, प्रायः भर्वेप्वेवोत्तिवेंचित्र्यकतालद्रनेषु श्लेषो मूलन्वेनावतिष्ठते इत्यर्थः। वक्रोक्तिसाजात्यान्तमृता स्वभावोतिमपि निदिशंस्तयोर्वाष्चयव्यापितामाह- भिन्नमिति। स्वभावोक्ति: वस्तुस्वरूपवणनम्, वक्रोत्तिक्ष सालङ्कारमुक्तिवचित्र्यमिति वाब्ययम् सकलं काव्यादि द्विधा भिन्नम् प्रकारद्वितयक्तसमावंशमिति ॥३:३॥ शलेष प्रायः सभी वक्रोक्तियों-उत्तिवचित्र्यकृत अलङ्गारोंमें शोभाधायक रहा ही करता है, इस तरह सारा वाकय दो विभागोंमें बाँटा जा सकता है -. स्यभावोक्ति, २. वक्रोक्ति। इस नरह विभाग करनेका तात्पर्य यह मालूम पड़ता है कि काव्य में दो तरहकी उक्तिशैली कों प्रश्रय दिया जाता है, एक वस्तुस्वरूपवर्णनको दूसरा चमत्कृतवर्णन-उक्तिवेचित्यकी। इन दोनों में ही सारी काव्यकी प्रवृत्तियाँ निहित हैं। इन दोनों शैलियोंमें यथार्थस्वरूपवर्णनवाली जैली स्वभावोक्तिसे युक्त रह सकती है, और दूसरी शैली चमत्कृतवर्णन-उत्तिवैचित्य-वक्रोकिसे चमत्कृत हो सकती है। इस प्रकार हम देखत हैं कि मारा वाङ्मय दो विभागों में बँट जाता हैं-स्वभा- बोक्ति और वक्रोक्ति ।। ३६३॥।

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२२० काव्यादश:

तन्द्राविकमिति प्राह्ठुः प्रबन्धविषयं गुणम्। भाव: कवेरभिप्रायः काव्येष्वासिद्धिसंस्थितः ॥ ३६४ ॥। अ्रथ सर्वालक्वारप्रधानं भाषिकं नामालङ्कारं लक्षयति-तन्द्राविकमिति। प्रबन्ध ते ते महाकाव्यनाटकाखयायिकादयः तद्विषयं तत्र वर्तमानं धर्मम् जमत्काराधायकं गुणविशेषम् तत् भाविकमिति प्राहुः कथयन्ति। संज्ञां व्युत्पादयति-भाव इति। भाव: कवेरभिप्रायस्ततः प्रघुतं भाविकम्, स च भाव: आसिद्धिसमाप्तिपर्यन्तं संस्थितः एकरूपेण वर्तमानोऽत इदं भाविकं प्रबन्धगतम्। काव्यप्रकाशकारादयस्तु भाविकलक्षणमन्यर्थवाहु :- 'प्रत्यक्षा इव यद्भावाः क्रियन्ते भूतभाविनः तद्भ।विकम्' ॥ ३६४॥ हिन्दी-भाविक नामक एक प्रबन्धगत अलक्गार भी दण्डीने स्वीकार किया है, उसीका निरूषण इस कारिकामें किया जा रहा है। प्रबन्ध-महाकाव्य, नाटक, आख्यायिका आदि ग्रन्थोंसे कविके भावको चमत्कार।चायक धर्मविशेषको भाविक अलक्गार कहते है। यह अलक्गार प्रबन्धगत है, क्योंकि कविभाव पूर्ण ग्रन्थमें रहता है, तन्मूलक यह अलक्कार भी प्रबन्धगत होगा। काव्यप्रकाश आदिमें इसका जो लक्षण है, वह अत्यन्त भिन्न है। इस तरहके भेदका कारण क्या है? कहा नहों जा सकता है॥ ३६४॥ परस्परोपकारित्वं सर्वेषां वस्तुपर्वणाम्। विशेषणानां व्यर्थानामक्रियास्थानवर्णना ॥ ३६५॥ व्यक्तिरुक्तिक्रमबलादू गम्भीरस्यापि वस्तुनः । भावायश्तमिदं सर्वमिति तन्भ्राविकं विदुः॥३६६।। (इति भाविकम्) पूर्वकारिकायां कवेरभिप्रायो भाव इत्युक्तं तन्मूलमेवेदं भाविकमित्यपि स्वीकृतम्, सम्प्रति कवेरभिप्रायंविषयान, कांश्विन प्रबन्धधर्मानुदिशति-परस्परोपकारित्वमिति। वस्तुनि आाधिकारिकेतिवृत्षानि, पर्वाणि प्राकरणिकेतिवृत्तानि, तेषां वस्तुपर्वणाम् सर्वेषाम् परस्परो- पकारित्वम अन्योन्यपोषकत्वम् (अरयमेकः कवेर्भावः), अ्रत्र धनजयेनोक्तम्-वस्तु द्विधा-'तत्राधिकारिकं मुख्यमअं प्रासश्ञिकं विदुः' इति। यथा रामायणे रामसीतावृत्तान्तः आाधिकारिकः, सुभ्रीवविभीषणादिवृत्तान्तक्ष प्रासज्ञिकः, प्राकरणिकः। व्यर्थानां मुख्यार्या- नुपकारिणां विशेषणानाम् अक्रिया अविधानम्, अ्रयं द्वितीयः कवेरभिप्रायः, सोऽयम- भिप्रायः परिकरालङ्काररूपतया पररमीकृतः। अ्रन्ये त्वस्यापुष्टार्थत्वरूपदोषाभावस्वरूपत्वमा- तिष्ठन्ते। स्थानवर्णना प्रकृतोपयुक्तूविषयवर्णना अयमपरः कवेरभिप्रायः ॥३६५॥ उचिकरमबलाद् वचनोपन्यासंक्रमसामर्थ्यात् गम्भीरस्य गूठस्यापि वस्तुनः भर्थस्य व्य्ति: अभिव्यजना, अयमपरः कवेरभिप्रायः, तदेषां सर्वेषामपि कवेरभिप्रायरूपाणां भावानाम् भाविकालक्काररूपतां निगमयति-भावायस्तमिति॥३६६॥ हिन्दी-पूर्वकारिकामें प्रबन्धगत भाविक अलद्वारको कविके अभिप्रायस्वरूप भावमूलक कहा गया था, उसी भावको विवृत करके समझानेके लिये यह दो कारिकायें है।

१. भाविक तमिति। २. काव्येष्वस्य व्यवस्थिति:।

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द्वितीय परिच्छेद. २२१

धनजयने लिखा है कि कथावस्तु दो प्रकारकी होती है, आधिकारिक और प्रासग्गिक, प्रासशिकको ही प्राकरणिक भी कहा जाता है, उनमें-आधिकारिकको वस्तु एवं प्राकरणिकको पर्व शब्दसे दण्डीने कहा है। जैसे रामायणमें रामसीतावृत्तान्त आधिकारिक होनेसे वस्तु है, और सुग्रीव-विभीषणादि वृत्तान्त प्राकरणिक होनेसे पर्द हैं। इन वस्तु और पर्वोंका परस्परोपकार- कत्व होना एक कविभाव है, व्यर्थ विशेपणे का प्रयोग नहीं करना दूसरा कविभाव है, इस कवि- मावको कुछ लोग परिकरालक्वारस्वरूप मानने हैं और कुछ लोग अपुष्टार्थत्वदोषाभावम्वरूप कहते हैं। स्थानवर्णना-उपनुक्त विषयोंका वर्णन, यह भी एक कविभाव है॥३६५॥ उक्तिक्रमके बलसे गूढ़ विषयकी अभित्यक्ति भी एक प्रकारका कविभाव है, भाविक अलक्गार इन्हीं भावोपर अवलम्बित होता है. इसके समान भावोके होनेपर भाविक अलक्कार माना जायगा ॥ ३६६ ॥

व्यावर्णितमिदं चेष्टमलक्गारतयैव नः॥ ३६७॥ स्वग्रन्थस्य न्यूनतां वारयति-यश्चेति। यथ सन्धयः पक्च-'मुख प्रतिमुखं गर्भो विमर्श उपसंहृतिः' इति, तदमानि-'उपक्षेपः परिकरः परिन्यासी विलोभनम्' इत्यादोनि चतुःषष्टिप्रकाराणि। एवं वृनयक्षतस््रस्ततद्रसनियता:, यथा-'प्ारे कैशिकी वीरे सात्व- त्यारभटी पुनः। रसे रौद्रं च बीभत्से वृत्तिः सर्चत्र सात्वती'॥ तदशानि षोडश-'नर्म- तत्स्फूर्जतत्स्फोटतद्रर्भेश्चनुरज्ञिका' इत्यादीनि लक्षणानि भूषणाक्षरसङ्गातादीनि षट्त्रिशत्। आदिना नाव्यालक्वारादय:, एतत्सर्वमागमान्तरे भरतमुनिप्रणीतनाव्यशास्त्र व्यावणित विस्तरेण निरूपितं तत् इदं नः अरस्माकम् अलद्कारतया एव इष्टम् अलद्काररूपमेव मतम्। तत्र केषाश्चित् स्वभावाख्यानादावन्तर्भावः, केपाञ्चिथ भाविके इति बोध्यम्॥ ३६७॥ हिन्दी-भरतमुनिने जिन सन्धि, तदङ्, वृप्ति, तदङ्, लक्षण, आदि (पदबोध्य नाव्यालक्कार) के लक्षण, भेद आदि विस्तारके साथ बतलाये हैं, उन सभीको दण्डीने अलक्गारस्वरूप ही मान लिया है॥ ३६७।। पन्थाः स एषं वित्ृतः परिमाणवृत्त्या संहृत्य विस्तरमनन्तमलङक्रियाणाम्। वाचामतीस्य विषयं परिवर्तमाना- नभ्यास एव विवरीतुमलं विशेषान् ॥ ३६८ ॥ इत्याचार्यदण्डिनः कृतौ काव्यादर्शेंडर्यालक्कारविभागो नाम द्वितीय: परिच्छ्रेदः।

प्रकरणमुपसंहरति-पन्था इति। अलडक्रियाणं तत्तदलङ्गाराणाम् अ्रनन्तम् बहु- लीभुतम् विस्तरं प्रपथ संहृत्य संक्षिप्य परिमाणवृत्या परिमितभावेन स एष पन्थाः अलद्कारमागों वित्ृतः व्याख्यातः, वाचां विषयम् अतीत्य वर्णनापथमतिकम्य परिवर्त-

१. एव। २. संक्षिप्य। ३. इत्यार्य।

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२२२ काव्यादर्श:

मानान स्थितान् विशेषान अलक्ारप्रभेदान् विवरीतुं प्रकाशयितुम अ्रभ्यास: सततकाव्य- परिशीलनम् एव अलम् प्रभवति। अयमाशय :- 'सहस्त्रशो हि महात्मभिरन्येरलक्कार- प्रकारा: प्रकाश्यन्ते प्रकाशिताथ्च' इति ध्वन्यालोकोतिदियाऽनन्तमलक्कारप्रपथ संक्षिप्य

देवोल्नंयस्वरपा भविष्यन्तीति तदर्थ स्पृहयद्भिस्तदभ्याम एवालम्बनीय इति ॥ ३६८॥ हिन्दी-इस प्रकारसे हमने इस अनन्त अलक्कारविस्तारको संक्षिप्त करके परिमित रूपमें यह अलक्गारमार्ग प्रदशित किया है, वचनविषयसे पर, वर्णनके अयोग्य अनन्त अलक्कार प्रकारोंको सतत काव्यपरिशीलन ही बता सकता है॥ ३६८॥ इति मैथिलपण्डितश्रीरामचन्द्रमिश्रशर्मप्रणीते काव्यादश- 'प्रकाश' द्वितीयपररिच्छेद'प्रकाशः'॥

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तृतीय: परिच्छेद: अव्यपेतव्यपेतात्मा व्यावृत्तिवर्णसंहतेः। यमकं तञ् पादानामादिमध्यान्तगोचरम्॥ १॥ छथ यमकालङ्कारनिरूपणमारभते-अव्यपेनेति। अव्यपेतः अव्गवहितः व्यपेतः व्यवहितक्ष आरत्मा स्वरूपं यस्या: सा अरव्यपेतव्यपेतात्मा वर्णसंहते: स्वरव्यजञनसमुदायस्य व्याशृनि: विशेषेण आवृत्ति: पुनःपुनरुच्चारणम् यममिति लक्षगम्। तथा च पर्वोचारि- तवर्गममुदायस्य क्रचिदव्यवधानेन क्वचिद्व्यवधानेन व पुनःपुनरुचचारणं यमकमिति फलति, तथ यमकं पादानाम् श्लोकचरणनाम् आदी मध्ये अन्ते च भवति, तदाह- पमदानामादिमध्यान्तगोचरमिति। इदमुपलक्षणं तेन पादखण्डपादपद्यार्धसम्पूर्णपद्यानामपि पुनःपुनरावृनौ सत्यामपि यमकं भवत्येचेति बोध्यम् ॥ १॥ हिन्दी-द्वितीय परिच्छेदके आरम्भमें शब्दार्थोभयसाधारण अलक्गारसामान्यका लक्षण किया गया 'काव्यशोभाकरान् धर्मानलङ्गारान् प्रचक्षने'। अर्थालक्गारकृत चमत्कारको प्रधान मान कर पहले अर्थालक्कारका वर्णन भी कर दिया गया, शब्दालक्वारके यमकादि प्रभेद सावारणचमत्कारकारी होते हैं यह बात माधुर्यगुणवर्णनप्रसङ्गमें प्रथम परिच्छेदमें कही गई थी- 'आवृत्तिमेव सङ्कातगोचरां यमकं विदुः। तत्त नेकान्नमधुरमतः पश्चाद्विधास्यते॥' तदनुसार अब यमकका निरूपण प्रक्रान्न किया जाता है, उसका लक्षण है-वर्णसङ्गातका अव्यवधानसे या व्यवधानसे पुनः पुनः उच्चारण यमक कहा जाता है।' अर्थात्-पूर्वोच्चारित वर्ण- समुदायका अव्यवधानेन व्यवधानेन वा की गईं पुनः पुनः आवृत्ति ही यमक नामसे प्रख्यान है, वह यमक पादोंके आदि, मध्य एवं अन्तमें रहा करता है। यह स्थाननियम उपलक्षणमात्र है, अतः पादमें, पादखण्डमें, पद्यार्थमें, सम्पूर्ण पद्यमें भी आवृत्तिका दमक नामसे अभिधान होता है॥॥ एकद्वित्रिचतुष्पादयमकानां विकल्पनाः। आदिमध्याम्तमध्यान्तमध्याद्याधन्नसर्वतः ॥२।। पूर्वश्लोके 'आदिमध्यान्तगोचरम' इन्युक्त्वा सामान्यनो दशितस््य यमकस्य पाद- स्थितस्वविविधत्वेन संभविनो मेदान्दर्शयितुमाह एकेति। एकटित्रिचतुष्पादयमकानाम् एकद्वित्रिचनुष्पादस्थितानां यमकानां विकल्पनाः विविधा: प्रभेदाः भवन्तीति शेषः, तथाहि-प्रथमपादे, द्वितीयपादे, तृतीयपादे, चतुर्थपादे चेनि एकपादयमकभेद।श्षस्वारः, प्रथमद्वितीययोः, प्रथमतृतीययोः, प्रथमचतुर्थयोः, द्वितीयतृनीययो द्वितीयचतुर्थयोः, तृतोयचतुर्थयोर्श्चात द्विपादयमकभेदाः षट, प्रमद्वितीयतृतीयेषु, प्रथमद्वितीयचनुर्थषु, प्रथमतृनीयचनुर्थेषु, द्वितीयतृतीयचतुर्येषु इि त्रिपादयमकभेदाश्षनवारः। चनुप्पादयम- कमेकविधमेव, एवं सक्कलनया पादयमकस्य पश्चदशभेदाः। अयं पादविकल्पनासम्भविनां यमकानां भेदमश्षयः, सम्प्रति पादेवि आदिमध्यान्त। दभिः सम्भावनो भेदान्दर्शयितुमाह- आदिमध्यान्तेति। पर्वोत्ता: पश्दश यमकमेदा: आदियमकम्, मध्ययमकम्, अन्त्रयम- कम्, आदिमध्ययमकम्, आद्यन्तयमकम्, मध्यान्तयमकम्, आदिमध्यान्तयमकम इति सप्तधा संभवन्ति, अतः सर्वसंहत्या पश्चाधिकशतं यमकानि जातानि, तेषां व पुनरव्यपे-

१. या वृप्तिः। २. वर्णतः

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२२४ काव्यादर्श:

तव्यपेतव्यपेताम्यपेतेति भेदत्रयेण पचदशाधिकत्रिशतिपरिमाणानि यमकानि भवन्तीति बोध्यम्॥ २॥ हिन्दी-एक, दो, तीन, चार पादोंमें रहनेवाले यमकोंके बहुत भेद हो जाते हैं, जैसे :- प्रथम पादमें, द्वितीय पादमें, तृतीय पादमें, चतुर्थ पादमें, यमक इस प्रकार एकपादयमक चार प्रकार के हुए। प्रथम द्वितीय पादोंमें, प्रथम तृतीय पादोंमें, प्रथम चतुर्थ पादोंमें, द्वितीय तृतीय पादोंमें, द्वितीय चतुर्थ पादों, तृतीय चतुर्थ पादोंमें यमक, इस प्रकारसे द्विपादय मकके छः प्रभेद हुए। त्रिपादयमकके-प्रथमद्वितीयतृतीयपादगत, प्रथमद्वितीयचतुर्थपादगत, प्रथमतृतीयचतुर्थपादगत, द्वितीय तृतीयचतुर्थपादगत, इस प्रकार चार भेद हैं; चतुष्पाशयमक एक ही प्रकारका है। इस तरह पादयमकके १५ भेद हुए। ऊपर बताये गये १५ भेदोंके-आदियम्क, मध्ययमक अन्तयमक, आदिमध्ययमक, आधन्तयमक, मध्यान्तयमकं, आदिमध्यान्नयमक, नामक सात प्रकार होते हैं, इनके योगसे १०५ प्रभेद हुए, इन सबके अव्यपेतयमक, व्यपेतयमक, व्यपेताव्यपेतयमक नामसे तीन प्रभेद हुए, इस प्रकार कुल मिलाकर ३१५ भेद होते हैं ॥ २॥ अस्यन्तबह्वस्तेषां भेदा: समेदयोनयः। सुकरा डुष्कराश्चैव दशर्यन्ते तत्र केचन ।। ३ ॥ अत्यम्तबहव इति। तेषां पूर्वोक्तभेदानाम् सभेदयोनयः परस्परमिश्रणकृताः सजातीयविजातीययमकानामन्योन्यसंमिश्रणेन जायमाना इत्यर्थः। भेदाः अत्यन्तबहवः परि- च्छेतुमशक्र्याः, तत्र बहुषु प्रभेदेषु केचन सुकराः सुखं साध्या:, केचन च दुष्कराः कठिन- तया साध्या:, सन्तीति योज्यम्। तेषु केचन प्रकारा वण्यन्तेऽस्माभिरिति वेदितव्यम् ॥३॥ हिन्दी-पूर्ववर्णित यमकों के सजातीय-विजानीय-संमिश्रणजन्य प्रमेद बहुत अधिक हो जाते हैं, उनकी गणना नहीं हो सकती, उनमें कुछ भेद ऐसे होते हैं जिनकी रचना सुखसाध्य है और कुछ भेद ऐसे भी है जिनकी रचना कठिनतासे साध्य है, इस तरहके यमकोंमें से कुछके उदाहरण यहाँ पर शिष्यवुद्धिवैशदयार्थ दिये जा रहे हैं॥ ३ ॥ मानेन मानेन सखि प्रणयोऽभूत् प्रिये जने। खण्डिता कण्ठमान्लिष्य तमेव कुरु सन्रपम् ॥४ ॥। मानेनेति। हे सखि, प्रिये जने स्वप्रियतमे अ्रनेन मानेन कोनेन सह तव प्रणयः भ्रान्तरिकः स्नेहः मा भूत् नास्तु, प्रिये जने सस्नेहया त्वया तह्मन्कोपो न कार्य इत्यर्थः। ननु तथा कृतापराधस्य तस्ष्य प्रतियातनं कथं स्यादित्यपेक्षायामाह-खण्डितेति। खण्डिता 'पार्श्वमेति प्रियो ग्रस्या अन्यसंभोगचिहितः। सा खण्डितेति कथिता धीर री'र्याकषायिता' इत्युक्तस्वरूपा सत्यपि त्वं कण्ठमाश्लिष्य आरलिक्रथ तमेव सत्रपं संजातलखं कुरु। अरप- कर्त्तर प्रियेऽविकतभावेन प्रीतिप्रदशनमेव तदीयापकारप्रतियातनस्य सर्वोत्तमं वर्त्मेति सख्यास्तथानुरोधः। तत्र प्रथमपादस्थम् अ्रव्यवहितम् अमिश्रमादियमकम् ॥ ४ ॥ हिन्दी-खण्डिता होनेसे कृपिता किसी नायिकाकी उसकी सखी समझाती है, अरी सखी, तुमको अपने प्रियतमके ऊपर प्रणयके साथ इस मानका धारण नहीं कर ना चाहिये, (अगर तुम, प्रियतम द्वारा किये गये अपकारके लिये उसे सजा देना चाहती शे, तो यही सबसे अच्छा है कि) खण्डिता होकर भी तुम उसके गले से लिपटकर उसे लज्जित कर दो, (क्योंकि अपकारीके प्रति प्रीतिप्रदर्शन उसकी बड़ी भारी सजा हो जाती है)॥। ४ ।। १. वर्ण्यन्ते। २. तेडत्र।

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तृतीय: परिष्छेद: २२४

मेघनादेन इंसानां मदनो मदनोदिना। नुन्नमानं मनः स्नीर्णां सह सत्या विगाहते ॥। ५।। द्वितीसपादगतं यमकमुदाहरति-मेघनाद्मैति। मदन: कामः रत्या नाम स्वश्तियां सह अनुरागेण क सह हंसानां मदनोदिना गर्वापहारकेण मेघनादेन धनगर्जितेन नुजमान दुरीकृतक्रोपम् (धनर्जितस्योद्दीपकतया त्यक्तमानम्) स्त्रीणां मनो विगाहते भालोडयति। घनगजिंताकर्णनेन सर्वासां स्रीणां हृदयं विगतमानमनुरक्तं भवतीति भावः ।। ५ ॥ हिन्दी-मदन अपनी स्ी रति या अनुरागके साथ-इंसोके गर्वको दूर करनेवाले मेघगर्थन से अपगतमान अबलाओंके हृदयको आलोडित कर देता है, अर्थात् मेघगर्जन श्रवण करके सभी खियोंके हृदयसे मान निकल जाता है, और अनुरागके साथ काम आ जाता है, इस उदाहरणमें 'मदनो मदनो' मह द्वितीयपादगत यमकका उदाहरण हुआ ॥ ५॥

चतुरं राजन्धत्यः प्रजा जाता भवन्तं प्राप्य सस्पतिम्'।

तृतीयपादयमकमुदाहरति-राजन्वत्य इति। (हे राजन) चत्वार. अ्रम्भोधय: समुद्रा एव रशना मेखला यस्याः सा चतुरम्भोधिरशना सागरचतुष्टयवेष्टिता या उर्बी पृथ्वी तस्याः करप्रहे राजआत्यभागादाने पाणिप्रहणे च चतुरं निपुणं सत्प्ति योग्यपालर्क प्राप्य प्रजाः प्रकृतयः राजन्वत्यः सराजोपपन्ना जाता, त्वयि राजनि प्रजानां राजन्वत्वं जातमित्यर्थः, सराजि देशे राजन्वान स्याततोऽन्यत्र राजवान्' इत्यमरः ॥६॥ हिन्दी-चारों सागर जिसकी मेखला है, ऐसी पृथ्वीके कर (टैक्स) या हाथ ग्रहण करनेमें दक्ष आपको उपयुक्त पालकके रूपमें प्राप्त करके प्रजायें राजन्वती-सराजयुक्त हो गई, इसमें 'चट्ठर चतुरम्भोधि'में तृतीयपादगत यमक हुआ ॥। ६ अरण्यं कैश्धिदाक्रान्तमन्यैः सभ्न दिवीकसाम्। पदातिरथनागाश्वरहितैरह्वितैस्तव चतुर्थपादगनं यमकं दर्शयति-अरण्यमिति। पदातयः पादचारिसैनिकाः, रथाः यानानि, नागा: हस्तिनः, अश्वा, तैः सवैः रहितेः शून्यैः (पदातिरयनागाश्बानामपाये तद्रहित:) तब कैश्चित् श्हितः शत्रुभिः आक्रान्तम् वने पलायितम्. भ्न्येः वनं गतेभ्यो- Sतिरिकैश तैः दिवोकसां देवानां सद् स्वर्गलोकरूपम् आाक्रान्तम् गतम्। अ्त्र रहितैरहितै- रिति चतुर्थपादगतमत्यपेतमादियमकं बोध्यम्॥७॥ हिन्दी-पैदल सैनिक, रथ, हाथी, घोढ़ोंसे रहित आपके कुछ रब प्राणमयसे बनमें माग गये, और उसी तरहके कुछ अन्य शब्ट संमुख रणमें कटकर देवलोक सिधार गये। इसमें 'रहितै- रहितः' में चतुर्थपादगत अव्यपेत आदियमक है।। ७॥। मधुरं मधुरम्भोजवदने घद नेत्रयो:। विभ्रमं समरभ्नान्या विडम्बयति किन्नु" ते ।।८ ।। एकपाद्यमकस्य प्रभेदयतुष्टयमुदाहृत्य सम्प्रति द्विपादयमकप्रमेदानुदाहर्तुंसुपकरम- माण: प्रथमं द्विपादगताव्यपेतादियमकमाह-मधुरमिति। बसन्तसमये कमलेतु विद्व सितेषु भ्रमरं भ्रमन्तमालोकमानस्य कस्यचित् प्रियाचाटकारस्य नायकल्य ता प्रत्युक्तिरियम १. सम्प्रति। २. रक्षनोवीं। ३. परिभडे। ४. कि न। १५ का०

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२२६ काम्याद्शे:

हे अम्भोजवदने, मवुः वसन्तः ते तब नैत्रयो: मधुरं हृदयहारिणं विभ्रमं शोभातिशयम् भ्रमरभ्रान्त्या इमी त्रमन्ती भ्रमरावेवेति लोकानं हृदि भ्रममाधाय विडम्बयति अनुकृत्य विशेषयति नु किम्, तत् वद, त्वमेव कथय ।। ८ ।। हिन्दी-हे कमलमुखि, तुम्हीं बताओ, यह वसन्तसमय तुम्हारे नयनोंके हृदयाकर्षक शोभा- तिशयको भ्रमरका भ्रम उत्पन्न करके-यह भ्रमर ही है इस प्रकारका ज्ञान कराके क्या बढ़ा नहीं रहा है ? वसन्तऋतु्में कमलोंपर भ्रमर धूम रहे हैं, ऐसा मालूम पढ़ता है कि वसन्तऋतु चश्र- नयन तुम्हारे मुखकी शोभाका अनुकरण करके उसकी प्रतिष्ठावृद्धि कर रहा हो, तुम्हीं कहो, क्या ऐसी बात नहीं है।

से यह फोक कहा है। वसन्तमें लिखे कमलोंपर धूमते हुए भ्रमरोंको देखकर किसी चाटकार नायकने अपनी प्रेयसी

इसमें प्रथम पादमें 'मधुरं मधुरं' एवं द्वितीय पादमें 'वदने वदने' यह अव्यपेत आदिगत यमक है।। ८ ।। वारणो वा रणोद्दामो हयो वा स्मरदुर्धरः। न यतो न यतोऽग्तं नस्तदहो विक्रमस्तष ॥ ९॥ प्रथमतृतीयपादयमक्मुदाहरतति-वारण इति। हे स्मर कन्दर्प, यतस्तव रणोददामः युद्धदुर्मद: वारण: करी (नास्ति ) दुर्धरः दुरासदः हयः वाजी वान अस्तीति शेष:, तथापि पराभिभवसाधनवैकल्येऽपि नः वियोगिजनान् अन्तं नाशं नयतः ते तब अरहो आथ्र्यजनको विक्रम: पराक्रमातिशयः अस्तीति योजनीयम् ॥९॥ हिन्दी-हे कामदेव, तुम्हारे पास न तो लड़ाईके उपयुक्त दुर्दान्त हाथी है, न दुर्धर्पं घोड़ा ही है फिर भी तुम हम लोगों-वियोगिजनोंको विनष्ट करनेमें समर्थ होते ही हो, अद्भुत है तुम्हारा पराक्रम ! इस क्रोकमें 'वारणो वा रणो' यह प्रथम पादगत, 'न यतो नयतो' यह तृतीय पादगत अव्यपेत आदियमक है।। ९ ।। राजित राजितैक्षण्येन* जीयते स्वादशनृैः। नीयते व पुनस्तृप्तिं वसुधा वसुधारया ॥१०॥ प्रथम यतुर्यपादगतयमकमुदाहरति-राजितैरिति। आजितैच्ण्येन संग्रामदुर्धर्षतया राजितैः शोभितैः त्वादशैनृपैः वसुधा समस्तपृथ्वी वासिजनसमूहः जीयत स्वायत्तीकियते, पुनथ सेब वसुधा बसुषारया दानस्वकपधनवृष्टथा तृप्तिं नीयते सन्तोष्यते॥ १० ॥ हिन्दी-संग्रामकी प्रखरतासे युक्त आपके समान नृपोंने समूची पृथ्वी जीत ली और दानमें भाराप्रवाह रूपसे धनदान देकर उसी वसुषाको सन्तुष्ट किया है। इस उदाहरणमें प्रथम पादमें 'राजितैराजितै' और चतुर्थ पादमें 'वसुषा वसुधा' यह अव्यपेत आदियमक है।। १० । करोति सहकारस्य कलिकोस्कलिकोतरम्। मन्मनो मन्मनोऽप्येब मसकोकिलमिस्वनः।।११।। द्वितीयतृतीयपादगतमव्यपेतमादियमकमुदाहरति-करोतिती। सहकारस्य शम्रस्य मखरी मन्मन: मदीयं चितम् उत्कलिकोत्तरम् उत्कण्ठापूर्ण करोति, तथा एषः मन्मन: १. नयतोस्तं। २. वैक्ष्णेन। १. संग।

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तृतीय: परिच्छेद: २२७

अव्यक्तमधुरः मत्तकोकिलनिस्वनः समद्येकिसकलरवः भपि (मन्मनः) उत्कलिकोत्तरम् सोत्कष्ठं। करोति। अत्र मधौ यथैवामकलिका ममोत्कष्ठयति चितं, तथव मदमत्तको किलकूजितमपि मदीयमुत्कण्ठयति चित्तमिति भाव:। 'मन्मनोऽव्यकमधुरो मन्मनो रति- भाषित'मिति विश्वकोषः ॥। ११ ॥। हिन्दी-इस वसन्तसमयमें आमकी मब्जरी हमारे हृदय को उत्कण्ठापूर्ण बनाती है, एवं यह मदमत्त कोयलकी कूक भी हमारे मनको उत्कण्ठित करती है। इस उदाहरणश्लोकंके द्वितीय पादमें 'कलिकोत कलिकोत' एवं तृतीय पादमें 'मन्मनो मन्मनो' यह आदिगत अव्यपेत यमक है।। ११ ।। कथं त्वदुपलम्भाशा विदताविह तादशी'। अवस्था द्वितीयचतुर्थपादगतयमकमुदाहरति-कथमिति। इह वमन्तसमये त्वदुपलम्भाशा- चिहती त्वदीयसपमाशाया विघाते जाते तादशी वर्णनातिगामिनी अज्नाशिनी गात्रक्षय- करी अवस्था कामयमानावस्या अनां तां तब प्रियां सुन्दरीम् आरोढुम् अभिभवितुं कथं न समर्था, अपि तु समर्था एव। तव विरहे मा मरणोन्मुखो जातेत्यर्थः। नायकं प्रति दूत्या उक्तिरियम्। अत्र द्वितीयपादे 'षिहता विहता' चतुर्थपादे च 'मजना मजना' इति यमकम् ॥ १२ ॥ हिन्दी-इस वसन्तसमयमें तुम्हारे मिलने की आशा छूट जानेपर वर्णनसे पढे तथा शरीरक्षय- करी कामावस्था तुम्हारी प्रेयसी उस अबलाको सतानेमें किस प्रकार समर्थ नहीं होगी ? अर्थात् अवश्य सताने में समर्थ होगी। नायकके प्रति दूतीकी उक्ति है। इस श्लोकके द्वितीय चरणमें 'विह्ता विह्ता' और चतुर्थ चरणमें 'मकना मझना' में यमक है।। १२ ।। निगृह नेत्रे कर्षन्ति बालपल्लवशोभिना। तरुणा तरुणान् कंष्टानलिनो नलिनोममुनाः।।१३॥ तृतीयचतुथपादयमकमुदहरति-निगृह्योति । नलिनोन्मुखाः कमलमधुपानमत्ता अलिनो भ्रमरा: बालपल्लवशोभिना नवकिसलयशोभासमृद्धेन तरुणा वृक्षेण कृष्टान् स्वशोभा- वलोकनार्थमाकृष्टान् तरुणान् युवकान् नेत्रे चक्षुषी निगृद् गृहीत्वा इव कर्षन्ति स्वसौन्दर्य- दर्शनाय बाध्यभूतानिव कुर्वन्ति, नवकिसलयमनोरमं तरुं विलोकमाना युवानो भ्रमराणां तद्शृक्षस्थितानां दशने कुष्टवक्षुष इव जायन्त इत्यर्थ:, वसन्तशोभावर्णनमिदम्। अत्र तृतीयपादे 'तरुणा तरुणा' 'नलिनो नलिनो' इति यमक्म् ॥१३॥ हिन्दी-कमललोलुष भ्रमरगण नवकिसलय शोभासनाथ वृक्षसे आकष्ट किये गये युवकोंको आँख पकड़ कर अपनी ओर खींच रहे हैं, वृक्षकी शोभा देखने के लिये आकष्ट होने वाके युवकोंको भ्रमर अपनी शोमा देखनेके लिये बाध्य कर रहे हैं। यह वसन्तवर्णन है। इस इकोकमें तुतीय पादमें 'तरुणा तरणा' और चतुर्थ पादमें 'नलिनो नलिनो' यह यमक है।। १३ ॥ विशदा विशदामत्तसारसे सारसे जले। कुरुते कुरुतेनेयं हंसी मामन्तकामिषम् ॥।१४।।

१. वा दृशीम्। २. किकटा ।

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काष्यादर्शो:

करमप्राप्तं त्रिपादगतमादिगतमाव्यपेतयमकमुदाहरति-विशदेति। विशदामत्तसा- रसे सारसे जले इयं विशदा हंसी कुरुते न माम् अन्तकामिषं कुरुते इति भरन्वयः, विशन्तः प्राविश्य गाहमाना आमता: सारसा: पक्षिभेदा यत्र तादृशे सारसे सरोवरस्थे जले विशदा स्वच्छवर्णा इयं हंसी कुरुते न कामोद्ीपकतया विरहिजनासहेन स्वीयेन दुःशब्देन माम् विरहिर्ण जनम् भन्तकाभिषम् यमस्य भोज्यं वस्तु कुरुते विवत, अत्र 'बिशदा विशदा' 'सारसे सारसे' 'कुरुते कुरते' इति प्रथमणदत्रये क्रमशो यमकानि, चतुर्थपादमात्रं यमकरहितम् ॥ १४॥ हिन्दी-प्रवेश कर रहे हैं मदमत्त सारसगण जिसमें ऐसे सरोवरजलमें वर्तमान यह भवलूवर्णा हंसी कामोद्दीपकतया निन्दनीय अपने शब्द से मुझ विरहीको यमका भोज्य बना रही है, इंसीके शब्दसे मैं मरा जा रहा हूँ। इस श्लोक में क्रमशः प्रथम तीन चरणों में आदिगत अव्यपेत 'विशठा विशदा' 'सारसे सारसे' कुरुते कुरुने' यह यमक है, केवल चौथा चरण यमकरहित है॥ १४॥ विषमं विषमन्वेति मदनं मदनम्दनः । सदेन्दुकलयापोढमलया मलयानिलः ॥ १५ ॥ प्रथमद्वितीयचतुर्थपादगतं तादृशमेव यमकमुदाहरति-विषममिति। मलयानिलः भपोढमलया इन्दुकलया सह मदनन्दन: विपमं विषम् मदनम् अन्वेति इत्यन्वयः । मलयानिल: दक्षिणदिक प्रवृत्तः पवनः अपोढमलया त्यक्तमालिन्यया इन्दुकलया चन्द्र- मसो लेखया सह मदनन्दन: मदप्रीतिकरः सन विषमम् भयङ्करं विषम विषभिव सन्तापकारं मदर्न का्म नाम अन्वेति अनुयाति। निर्मलचन्द्रिकासहक्तो दक्षिणवातो मदप्रीतिमुन्पाद्य सन्तापकस्य भयक्ररस्य च कामस्य साहाय्यमिव करोति। अत्र प्रथमे द्वितीये चनुर्थे च पादेऽव्यपेतमादिगतं च क्रमशः-'विषमं विषमम्' 'मदनं मदनं' 'मलया मलया' इति यमकानि॥ १५॥ हिन्दी-यह मलयानिल मालिन्यरहित चन्द्रिकाके साथ हमारी अप्रीतिको बढ़ाते हुए भयङ्कर तथा बिषकी तरह सन्तापक कामदेवकी सहायता कर रहा है। इस श्लोक के प्रथम, द्वितीय एवं चतुर्थपादोंमें अव्यपेत आदियमक हैं, उनके आकार हैं- 'विषमं विषमम्' 'मदनं मदनं' 'मलया मलया'॥१५॥ मानिनी मा निनीषुस्त निषकस्थमनङ मे। हारिणी हारिणी शर्म ततुतां तनुतां यतः ॥ १६ ॥ प्रथमतृतीयचतुर्थपादगतं यमकमुदाहरति-मानिनीति। मानिन्या: प्रसादनाय कोडपि कामी कामदेवं प्रार्थयते-मा ते ननिषात्वं निनीषुः हारिणी हारिणी इयं मानिनि तनुतां यतः मे शर्म तनुताम्, इत्यन्वयः । मा माम् ते तव कामस्य निषजत्वं तूणीरभावम् भविरलनिपतितशरसमाश्रयत्वम् निनीषुः प्रापयितुमिच्छुः (मानमाधाय कृतवैमुख्या सततपतितकामबाणपात्ररवेन निषज्तां प्रापयितुमिच्छुः) हारिणी मौक्तिकहारभूषण भत एव हारिणी मनोहरसौन्दर्या इयं मानिनी तनुतां कृशभावं यतः प्राप्नुवतः मम शर्म सुखं तनुताम्। यथेयं मयि प्रसीदेतया कुरुष्वेति प्रार्थना । अत्र प्रंथमे तृतीये तुयें च पादे कमशी 'मानिनी मानिनी' 'हारिणी हारिणी' 'तनुतां तनुतां' इति यमकानि ॥१६॥

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तृतीय: परिच्छेद: २२६

हिन्दी-हे काम, मुझसे विमुख होकर यह सी मुझे तुन्हारे वाणों का तरकस बनाना चाह रही है, अर्थाद तुम्हारे वाण मुझपर गिरकर एकत्र हुए जा रहे हैं जिससे में वाणोका तरकस-सा हुआ जा रहा हूं, ऐसी तथा मौक्तिकहार भारिणी अवएव मनोहारिणी यह रमणी अनवरत दुर्वक होनेवाले मेरे सुखको करे। मैं उसके बिना दु्बल हुआ जा रहा हूँ, वह मेरे अनुकूल हो जय जिससे मै सुखका उपभोग कर सकूँ। इसमें प्रथम, तृतीय एवं चतुर्य बरणोंमें यमक स्पष्ट है॥१६॥ जयता त्वम्मुखेनास्मानकर्थ न कथं जितम्। कमलं कमलं कुर्षदलिमहलि मस्प्रिये।। १७।। द्वितीयतृतीयचतुर्थपादगतयमकमुदाहरति-जयतेति। हे प्रिये भस्मान् जयता स्ववशीकुवता त्वन्मुखेन तवाननेन कम पानीयम् अलक्ुर्वत् भूषरयत्, तथा अलिमद्दलि भ्रमरयुक्तपत्रम् कमलम् अथम् विना संशयम् अविवादरूपेण कथं न जितमू? भवशयं जितम्, चेतनानामस्माकं जेतुर्मुखस्य भ्रमरजयो नितान्तासन्दिग्ध इत्यर्थः । अत्र द्वितीये तृतीये चतुर्थे च पादे क्रमशो 'नकयं नकयं' 'कमलं कमर्ल' 'दलिमद् दलिमित्' इति यम- कानि॥ १७॥ हिन्दी-हे प्रिये, हम लोगोंको अपने वशमें कर लेने वाला यह तुम्हारा मुख जलकी सोभा बढ़ाने वाले तथा भ्रमरसे युक्त दलों वाले इन कमलपुष्पोंको जीत लेगा, इसमें कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। जिस मुखने सचेतन मुखको अपने बशमे कर लिया है, वह अचेतन कमलोंको क्यों न जीतेगा ? इस उदाहरणके द्वितीय, तृताय एवं सतुर्थ 'पादमें क्रमशः 'नक्थ नकथं' 'कमलं कमलं' तथा 'दलिमद् दलिमत्' यह यमक स्पष है।। १७।। रमणी रमणीया मे पाटलापाटलांशुका। वारुणोवारुणीभूतसौरभा सौरमास्पदम् ।। १८।। पादचतुष्टयगतमव्यपेतमादिभागयमकमुदाहरति-रमणीति। पाटलापाटलांशुका पाटलपुष्पवच्छ्ेतरक्तवस्त्रा सौरभास्पदम् पध्मिनीनायिकात्वेन सुगन्धिशरीरा मे रमणी प्रेयसी अरुणीभूतसौरभा रक्तसूर्यकररजिता वारुणी पश्चिमदिगिव रमणीया मनोहरा। अत्र चतुष्वपि पादेषु अरव्यपेतमादिगतं यमक्रम् ॥१८॥ हिन्दी-गुलान के फूलकी तरह रक्तश्वेत वस्त्र धारण करने वाली, पश्चिनी नायिका होनेसे परम सुगन्धिशरीरा, मेरी प्रिया लाल सूर्यकान्तिसे मण्डित वारुणी-पश्िमदिशाकी तरह रमणीव लग रही है। इसमें 'रमणी रमणी' 'पाटला पाटला' 'वारुणी वारणी' 'सौरमा सौरमा' इस प्रकार चारों चरणोंमें आदिगत अव्यपेत यमक वर्तमान है। इस प्रकार यहाँ तक अव्यपेत आदिगत यमकके उदाहरण दिये गये ।। १८ ।। इति पादादि यमकमध्यपेतं पिकस्पितम्। व्यपेतस्यापि वर्ण्यन्ते विकल्पास्तस्य केवन ।। १९।। भव्यपेतमादियमकमुपसंहरति-इतीति। इति पूर्वदर्शितप्रकारेण पादादि पादादि- भागगतम् अव्यपेतम् अरव्यवहितं यमकम् विकल्पितम् संभवधिमेंदे भेंदितमुदाहतय नसष्य पूर्वोदिष्टस्य व्यपेतस्य व्यवहितस्य यमकश्य केचन विकल्प: प्रभेदा: कमप्राप्ततया वर्ण्यन्ते दर्शयितुमुपक्कम्यन्ते ॥१९॥ १. तभ।

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२३० काव्यादर्श:

हिन्दी-पूर्ववश्षित प्रकारसे पादादिगत अव्यपेत यमकके संभवी प्रमेदोंके भेद-प्रभेद तथा उदाहरण बताये गये, अब व्यपेत यमकके प्रमेत बताये जायेंगे।। १९ ॥ मधुरेणरशां मान मधुरेण सुगन्धिना। सहकारोद्गमेनैव शब्दशेषं करिष्यति॥२०॥ प्रथमद्वितीयपादगतं व्यपेतमादियमकमुदाहरति-मधुरेणेति। मधुरेण मधुबिन्दु- सुगन्धकृतमाधुययुतेन सुगन्धिना सौरमपूर्णेन सहकारोद्गमेन आम्रमजरीविकासेनैव मधुव- सन्तसमय: एणदशां हरिणाक्षीणं मानम् प्रणयकोपम् शब्दशेषम् नाममात्रावशिष्टम् करिष्यति समापयिष्यति। अत्र 'मधुरेण मधुरेण' इति वर्णसमुदायावृत्ते'दशां मान' मिति पर्णचतुष्टयव्यवहितमिति व्यपेत्तयमकोदाहरणमिदम् ॥ २० ॥ हिन्दी-यह वसन्तसमय मधुबिन्दुसे मधुर तथा अतिशयसुगन्धित आभ्रमज्ञरीविकाससे ही इन हरिणनयनाओंके मानको कथावशेष बना देगा, इन आग्रमज्जरियोंके विकसित होते ही मानि- निमोंके मानकी कथाभर रह जायगी। इस उदाहरणमें 'मधुरेण मधुरेण' की आवृत्ति है, उन आवर्र्यमान वर्णसमुदायोंके बीचमें हसां मानम्' यह व्यंवधान है, अतः इसे आदिगत व्यपेतयमक कहा है। यह प्रथमद्वितीयपाद- गत व्यपेतयमक हुआ, एकपादगत व्यपेतयमकका उदाहरण सरल समझकर नहीं दिया गया है॥२०।। करोतिताम्रो रामाणां तन्त्रीताडनविभ्रमम्। करोति सेष्य काम्ते चे भवणोस्पलताउनम् ॥२१॥ प्रथमतृतीयपाद्गठं व्यपेतमादियमकमुदाहरति-करोतीति। विलासिन्या विलासस्य वर्णनम्। रामाणाम् रमणीनाम् अतिताम्रः रक्तवर्णः करः हस्तः तन्त्रीताउनविभ्रमम् वीणावादनविलासम्, तथा कान्ते परस्तनोसप्नादिना कृतापराधे नायके सेष्य कृतेर्याप्रकाशनं भवणोत्पलताडनम् कर्णावतंसीभूतनीलकमलकरणकं प्रहारं च करोति। अत्रावर्तत्यमानयोः 'करोति' 'करोति' इति वर्णसङ्ातयोरमथ्ये बहुवर्णव्यवधानमिति व्यपेतयमकमिदम्, तम्न प्रथमतृतीयपादादिगतं स्पष्टम् ॥। २१॥ हिन्दी-इस विकासिनी रमणीका अति रक्तवर्ण कर वीणावादनविलास करता है और कृता- पराष नायकके प्रति ईष्यासे कर्णभूषण नीलकमलद्वारा प्रहार भी करता है। इस उदाहरणमें प्रथम तृतीय चरणोंमें 'करोति करोति' वर्णसमुदायकी आवृत्ि है, बीचमें अनेकवर्णव्यवधान है, पादादिमें आवृत्ति है, अतः अनेकपादगत व्यपेत आदियमकका यह उदा- हरण रै ।। २१ ।। सकलापोल्लसनया कलापिन्यानुँ नृत्यते। मेघाली नर्रिता पातेः सकलापो विमुश्ति ॥ २२॥ प्रथमनतुर्यपादगर्त यमकमुदाहरति-सकलेति। वातैः वर्षाकालिकपवनैनरतिता बालिता सकला समस्ता मेवाली बनमाला अपः जलानि विमुमति वर्णति, अनु पब्ात् कलापस्य बईमारस्य उद्यसनं विकासस्तेन सहितया सकलापोल्लसनया विकासिपिच्छभारया कलापिन्या मयूर्बा मृत्यते, हर्षनृत्य कियते। अत्र प्रथमचतुर्यपादयोः 'सकलापो' 'सकलापो' इति व्यवहितमादिगतं यमकम् ।। २२ ।। १. बारीभाम्। २. सेप्ें। १. या। ४. न्यानुमृत्यते।

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तृतीय: परिच्छेद: २३१

हिन्दी-बरसाती हवासे नचाई गई यह मेघमाका पानी बरसा रही है, और तदनन्तर न- सित पिच्छष।रिणी यह मयूरी हर्षनृत्य कर रही है। इस उदाहरणश्लोकके प्रथम तथा चतुर्थ चरणोंमें 'सकलापो' 'सकलापो' का यमक है, जो आदिगत तथा व्यवहित है।। २२ ।। स्वयमेव गलन्मानकलि कामिनि ते मनः। कलिकामिह नीपस्य रष्ट्रा कां न स्पृशेदशाम्॥२३॥ द्वितोय तृतीयपादगतं व्यपेतमादियमक्मुदाहरति-स्वयमेषेति। हे कामिनि नायक- सपमाभिलाषिणि, स्वयमेव विनेव नायकानुनयं घनोदयं वा गलन्मानकलि अपगच्छन्मान- कलह्म् इदं ते तव मनः इह वर्षासमयसमागमे नीपस्य कदम्बस्य कलिको कोरकं दृष्ट्रा को दशां न स्पृशेत्, सर्वा आपे कामकृता भवस्था अनुभवेद, कामावुराया स्वयमपगच्छ न्मानायाः स्वल्पावशिष्टमानायाक्ष ते कोपोऽत फुक्लत्कदम्बे काले न स्थातुं शक्त इत्यर्थः। अत्र द्वितीयतृतीयपादयो: कलिकाकलिकेति पादादिगतं व्यवहितं यमकम् ॥२३॥ हिन्दी-तुम्हारा मानकलड स्वयं ही शान्त होता जा रहा है, सुम्हारा हृदय स्वतः अपगत- कानकलह हो रहा है, इस वर्षासमयमें खिलती हुई कदम्बकलिकाको देखकर, न जाने, किस अव- स्थाको प्राप्त करेगा ? इस उदाहरणमें द्वितीयतृतीयपादगत 'कलिका ककिका' शब्दमें व्यवहित आदियमक है।।२३। भावधयाकीडशैलस्य च्न्द्रकान्तस्थलीमिमाम्। नृत्यस्येष लंसव्वारचन्द्रकान्त: शिजावलः ॥।२४॥ द्वितीय चतुर्थपादगर्त व्यपेतयम कमुदाहरति-आरुह्यति। भाकीडशैलस्य उद्यानगत- कीडापर्वतस्य चन्द्रकान्तस्थलीम् चन्द्रकान्तमणिनिर्मितां भूमिम् आरुहा एषः चारवः चन्द्र काः मेचकाः वर्हस्थाश्विह्ृविशेषास्तैरन्तो रमणीयोऽयं शिखावलो मयूरः नृत्यति। 'पुमानाक्रीड उद्यानम्' इति 'अ्रन्तः प्रान्तेन्तिके नाशे स्वरूपेऽ्तिमनोहरे' इति चामरविश्यी। अ्रत्र प्रथमचतुर्थपादगतं 'चन्द्रकान्त' 'चन्द्रकान्त' इति व्यपेतं यमकम् ॥२४॥ हिन्दी-उद्यानस्थित क्रीड़ापर्वतकी चन्द्रकान्तमणिनिमित भूमिपर आरोहण करके चार मेचक से रमणीय यह मयूर नृत्य कर रहा है। इस उदाहरणमें 'चन्द्रकान्त' 'चन्द्रकान्त' यह द्वितीयचतुर्थपादगत आदिवर्त्ती व्यपेतयमक है।२४॥ उद्धृत्य राजकादुर्वो ध्रियतेऽय्य भुजेन ते। वराहेणोद्धृता यासौ वराहेरुपरि स्थिता ॥ २५॥ तृतीयचतुर्थपादगतयमकमुदाहरति-उद्धृत्येति । (हे नृप) या असी पृथ्वी वराहेण वराहरूपेण भगवता विष्णुना उद्वृता सागरादूष्यमानीता, तथा या पराहे: श्रेष्ठ- नागस्य शेषस्य उपरि स्थिता (सा) भ्द् ते तव भुजेन बाहुना राजकात् भन्यराजसम्- हात् उद्भृत्य आच्छिय ध्रियते स्ववशीकृत्य पाल्यते। अत्न तृतीयचतुर्थपादगतमादी व्यपेतयमकम्-'वराहे वराहे' इति॥। २५॥ हिन्दी-हेराजन्, जो पृथ्वी वराइमूचि विष्णुद्वारा सागर से निकाळी गई, जो भेड सर्प शेषके ऊपर स्थित है, आजकल आपके भुज अन्य राजगणसे छीनकर उसका यथान्याय पाळन १. कामपि। २. चलचारु। ३. उद्धृता।

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२३२ काव्यादर्श:

करते हैं। इस उदाहरणमें 'बराडे' 'बराहे' यह तृतीयचतुर्थपादगत आदिमें व्यपेतयमक है॥ २५॥ करेण ते रणेष्वम्तकरेण द्विषतां हताः। करेणवः सरद्रक्का भान्ति सम्ध्याघना इव ॥ २६ ॥। प्रथमद्वितीयतृतीयपादेष्वादिगतं व्यपेतयमकमुदाहरति-करेणेति। पराक्रमशालि- नृपवर्णनमिदम्। रणेषु युद्धक्षेत्रेषु द्विषतां शत्रूणाम् अन्तकरेण नाशकरेण ते करेण हस्तेन हता: ताडिता: क्षरद्रकाः गलदुधिराः करेणवः हस्तिन्यः सन्ध्याचनाः सायंकालिकरक्ता- भमेषा इब भान्ति शोभन्ते। भत्र 'करेण करेण करेण' इति प्रथमद्वितीयतृतीयपादेष्वादिगतं व्यपेतयमकम् ॥ २६॥ हिन्दी-रे राजन्, युद्धमें शत्रुओंके संहारक तुम्हारे इस भुजदण्डसे आइत एवं रक्तस्रावयुक्त हंचिनियों ऐसी मालूम पढ़ती है, मानो सन्ध्याकालमें आरक्तवर्ण धनमाला हो। इस उदाहरणरलोकमें 'करेण करेण करेण' यह प्रथम द्वितीय तृतोय पादोंमें ग्येपत आदिगत बमक है।। २६।। परागतकराजीव वातैरध्वस्ता भटैश्वमूः। परागतमिव क्वापि परागततमम्बरम्॥२७॥ प्रथमतृतीयनतुर्थंपादगतथम*सुवाहरति-परागेति। (हे राजन) तव भटैः योद्ध- गणे: वातैः पायुभि: भमस्ता उत्पाटिता परागतरुराजीव परे महति अगे पर्वते स्थिता तरराजी वृक्षततिरिय न्मू: शत्रुसेना व्वस्ता दूरे क्षिप्ता, (तथा) परागततम् न्वत्प्रयाण- समये सैन्यसंमर्दजनितधूलपूर्णम् भम्बरम् व्योम क्वापि परागतम् इव, आकाशं धूलि- पटलेनाटश्यमिवाआयतेति भावः। अत्र प्रथमतृतीयचतुर्य पादेषु 'परागत परागत परागत' इवि भादिगत व्यपेतयमकम् ॥।२७। हिन्दी-हे राजन्, आपके वीर भटोंने शत्रुसेनाको उसी तरह उखाड़ फेंका है, जैसे ऊंचे पर्वत पर अबस्थित वृक्षमाका को इवा उखाड़ फेंकती है, आपके प्रयाणसमयमें सैन्य द्वारा उड़ाये गये भूलीपटकसे भरा हुआ आकाश कहीं चला-सा गया, छिप गया, अदृश्य हो गया।

वमक है।। २७ ।। इस उदाहरणश्लोकमें 'परागत परागत परागत' यह प्रथम-तृतीय-चतुर्थपादगत व्यपेत आदि-

पातु वो भगवान् विष्णु: सदा नवघनधुति:'। स दानवकुलध्वंसी सदानवरदन्तिहा ॥२८॥ द्वितीमतृ तीय नतुर्यपादगतयमकमुदाहरति-पास्िति। सदानः समदो यो बरदन्ती भेहगजः कुमलनापीडाख्यस्तस्य हा हन्ता, सः प्रसिद्धो दानवकुलष्वंसी राक्षसवंशविनाशक: नवनतुतिः नवीनमेवरछवि: भगवान् विष्णुः वः युष्मान् सदा पातु। अत्र-'सदानय सदानव सदानव' इति द्वितीयतृतीयचतुर्थपादेष्वादिगतं व्यपेत- यमकम्॥२८ ॥ हिन्दी-मदमर कुवलयापीड नामक श्रेष्ठ इस्तीके इन्ता, प्रसिद्ध दानवकुछसंहारी तथा प्रवीन अखवश्वामकतनु भगवान् विष्णु सदा आप लोगोंका कल्याण करें। १. खदि.।

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तृतीय: परिच्छेद. २३३

व्यपेतयमक है।। २८।। इस उदाहरणश्लोकमें 'सदानव सदानव सदानव' यह द्वित्तीयतृतीयचतुर्थपादमें आदिगत

कमले: समकेशं ते कमलेर्ष्याकरं मुखम्। कमलेख्यं करोषि त्वं कमलेवोममदिष्णुधु॥ २९॥ पादचतुष्टयगतं व्यपेतयमक्रमुदाहरति-कमलेरिति। (हे बाले) तब अलेः सम- केशं भ्रमरोपमकेशराशि कं शिर:, तथा कमलेर्ष्याकरं कमलशत्रुत्वकरं मुखम्, अतः त्वं कमला लक्ष्मी: इव कं अनम् उन्मदिष्णुषु उन्मत्तेषु अलेख्यम् भगणनीयं करोषि, सर्वानेयो- न्मत्तषु गणनीयं करोषि, उन्मादयसीति यावत्। अत्र सर्वेष्वेव पादेषु 'कमले' इति आदि- गतं व्यपेतयमकम् ॥ २९॥ हिन्दी-शिरपर भ्रमरके समान काले घुंघराले तुम्हारे केश हैं और तुम्हारा मुख कमलोंके हृदयों में ईर्ष्या पैदा करता है, ऐसी तुम कमलाकी तरह सुन्दरी किस जनको पागकोंमें नहीं गिनवा देती हो? अर्थाद सभी तुस्हारे सौन्दर्यपर उन्मत्त हो उठते हैं। 'कमले' यह इस उदाहरण- इलोकमें चारों पादोंके आदिमें व्यपेतयमक है॥ २९ ॥ मुदा रमणमन्वीतमुदारमणिभूषणा: । मद्भ्रमद्दृशः कतुमद्भ्रजघना: समाः ॥३० ॥ अथ व्यपेतस्यव यमकस्य सजातीयविजातीयघटितानि प्रभेदान्तराण्युदाजिहीषुः प्रथम- द्वितीयपादयोरेकप्रकारं तृतीयचतुर्थपादयोक्ष तदन्यप्रकारं यमकमुपस्यापयति-मुद्ेति। उदारमणिभूषणा: रमणीयरत्नाभरणा: मदभ्रमद्दृशः मद्योपयोगघूणमाननयना: अदभ्रज- घना: विशालनितम्बाः (स्तियः) रमणम् स्वनायकम् मुदा आनन्देन अन्वीर्तं युरं क्तुं क्षमा: समर्था भवन्तीति शेषः ॥ ३० ॥ हिन्दी-इसके आगे व्यपेत यमकके ही सजातीय-विजातीयघटित प्रभेदोंके उदाहरण देनेकी इच्छासे प्रथम-द्वितीय पादोंमें अन्य प्रकारके तथा तृतीय-चतुर्थपादोंमें अन्य प्रकारके यमकसे युक्त एक उदाहरण दे रहे हैं। उदाइरणश्लोकका अर्थ है- रमणीय मणि-भूषणोंसे युक्त, मदसे घूमते हुए नयनोंवाली तथा विशालनितम्बा रमणियाँ अपने प्रियतमोंको आनन्दमग्न बना देनेमें समर्थ होती हैं। इस उदाइरणके प्रथम-द्वितीय पादोंमें 'मुदार मुदार' और तृनीय-चतुर्थ पादोंमें 'मदभ्न मदभ्र' यह विजातीय व्यपेत यमक है। ३० ॥ उदितैरम्यपुष्टानामा कतेमें हंतं मनः। उदितैरपि ते दूति मायतैरपि दक्षिणैः ॥३१॥ प्रथमतृतीययोर्द्वितीयचतुर्थयोथ पादयोर्यमकमुदाहरति-उदितैरिति। आ्र: खेदे, अन्यपुष्टानाम् कोकिलानाम उदितैः प्रकटीभूतैः रुतेः कूजितैः, हे दूति, ते तब उदितैः वचनेः, तथा दक्षिणैः मारुतैः मलयानिले: च मे मम मनः हतम् व्यथितम्। भत्र प्रथमतृतीयपादयोः 'मारुतः मारुतैः' इति द्वितीयचतुर्थपादयोक् 'रतै रुतः' इति यमक्रम्॥ ३१॥ १. हसं।

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२३४ काव्यादर्श:

हिन्दी-कोकिलोंके उदित होनेवाळे कूजितोंसे, हे दूति, तुम्हारे वचनोंसे तथा दक्षिण पवनसे हमारा मन व्यथित हो रहा है। इस उदाइरणश्लोकके प्रथम-तृतीय चरणोंमें 'उदितैः उदितैः' और द्वितीय-चतुर्थ चरणोंमें 'मारुतः मारुतैः' यह यमक है।। ३१।। सुराजितहियो यूनां ततुमध्यासते ख्ि्िय:। तनुमध्या: क्षरत्स्वेदसुराजितमुखेन्दवः।। ३२।। प्रथम चतुर्थयोद्विंतीयतृतीययोश् पादयोर्यमकमुदाहरति-सुराजितेति। तनुमध्या: कृशोदर्य: क्षरता प्रस्न्रवता स्वेदेन धर्मबिन्दुना सुराजिता: सुंशोभिताः मुखेन्दवः मुखचन्द्रा: यासां तादृश्यः अय च सुराजितहिय: मद्यपानापगतलज्जाः स्रत्रियो रमण्यः यूनाम् युवक- पुरुषाणाम् तनुम् शरीरम् अध्यासते आरोहन्ति विपरीतरतये पुंसामुपर्याक्राकन्तीति भावः। अत्र प्रथमचतुर्यपादयोः 'सुराजितसुराजिते'ति द्वितीयतृतीयपादयोक 'तनुमध्या तनुमभ्या' इति चादिगर्त विजातीयं व्यपेतं च यमकम् ॥ ३२ ॥ हिन्दी-कशोदरी चूते हुए पसीनेकी बूँढोंसे अलड्कृत मुखचन्द्रशालिनी तथा मद्यसेवनसे अपगतलब्जा ललनायें युवकोंके शरीरपर आरूद होकर विपरीतरतिप्रवृत्त हो रही हैं। इस उदाहरण इ्लोकमें प्रथम-चतुर्थ चरणोंमें 'सुरानिह सुराजित' तथा द्वितीय-वृतीय चरणोंमें 'तनुमध्या तनुमध्या' यह आदिगत विजातीय तथा व्यपेत यमक है।। ३२।। इति व्यपेतयमकप्रभेदोऽप्येष दर्शितः। अव्यपेतव्यपेतात्मा विकल्पोऽप्यस्ति तदथा।। ३३ ॥। स्पष्टार्थेयं कारिका ॥ ३३ ॥। हिन्दी-एतावत्पर्यन्त शुद्ध-असक्कीर्ण अव्यपेत तथा व्यपेत यमकोंके स्वरूप दिखलाये गये, अब उनको छोड़कर मिश्रित-अव्यपेतव्यपेतात्मा यमकके स्वरूप दिखलये जायेंगे, उदाहरण आगे कहा जा रहा है। ३३ ।। सालं सालम्बकलिकासालं सालं नें वीक्षितुम्। नालीनालीनवकुलानाली नालीकिनीरपि।। ३४॥ प्रथमद्वितीययोस्तृतियचतु्ययोक् पादयोक्षाव्यपेत व्यपेतात्मकं यमकमुदाहरति-साल. मिति। 'सा अलम् सालम्बकलिकासालम् सालम् न वीक्षितुम् न अलीन् आलीन बकुलान् आाली नालीकिनी: अपि' इति पदपाठः वसन्ते नायिकावूती नायकं वक्ति- सा त्वद्विरहाकुला मम सखी आलम्बाः लम्बमाना कलिकाः कोरकाः एव साल: प्राकारस्तेन सहितम् सालम्बकलिकासालम् सालम् आम्रतरुम् बीक्षितुम् द्रष्टुं न अलमू, झालीनबकुलान् आश्रितबकुलवृक्षान अलीन् भ्रमरान्, तथा नालीकिनी: पध्मिनीः अपि वीक्षितुं नालमिति योजना। 'नालीकौ पद्मनाराची' इति त्रिकाण्डशेषे। अत्र प्रथमपादे 'सालं सालम्' इत्यव्यपेतयमकम्, तदेव द्वितीयपादे व्यपेतं च, एवमुत्तरार्घे 'नाली नाली' इत्यत्रापि। ३४॥ हिन्दी-मेरी सखी आपके वियोगमें लटकती हुई मअरीरूप प्राकारसे घिरे आम्रतरुओंकी और दृष्टि नहीं डाल सकती और बकुल वृक्षपर आश्रित इन भ्रमरोंको तथा पश्चिनीको भी नहीं देख सकती है। १. त्स्वेदाः । ३. निरीक्षितुम्।

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तृतीय: परिच्छेद: २३५

इस उदाहरण इ्लोकके प्रथम पादमें 'सालं सालं' यह अव्यपेत यमक है, द्वितीय पादमें होने- पर वही व्यपेत भी है। इसी प्रकार अगले चरणोंमें भी ॥ ३४॥ कालं कालम नालक्ष्य तारतार कमीक्षितुभ्। तारतारग्यरसितं कालं कालमहाघनम्॥ ३५॥ प्रथमचतुर्थपादयोर्द्वितीय चतुर्थयोश्वाव्यपेतव्यपेतयमकमुदाहरति-कालं कालमिति। 'का अलम् कालम् अनालच्यतारतारकम् ईक्षितुम् तारताऽरम्यरसितम् कालं कालमहाघनम्' इति पदपाठः । का विरहाकान्ता स्त्री अनालक््याः अदृश्या: तारा: निर्मलमौक्तिकानीव तारकाः नक्षत्राणि यत्र तादृशम, तारतया अत्युच्चतया अरम्यं कर्णकटु रसितं गजितं यस्य तादृशम्, कालमहाघनम् श्यामवणमहाघनयुक्तम् कालं यमोपमानम् कार्ल वर्षा- समयम् ईक्षितुं द्रष्टम् अलम् समर्था। प्रावृटसमयमागतं वीक्ष्य नायिकाप्रेषिता दूती तमाह। 'तारो निर्मलमौक्तिके' इति हेमचन्तरः ॥। ३५ ॥। हिन्दी-अदृश्य हो गये हैं उज्ज्वल मौक्तिकाकार नक्षत्र जिसमें ऐसे, अत्युब्तस्वरतया कर्णकटु शब्द करनेवाले, श्याम वर्णवाले धनोंसे युक्त, यमराजतुल्य इस वर्षाकालको कौन वियोगिनी देख सकनेमें समर्थ हो सकती है। इस उदाहरण श्लोकके प्रथम तथा चतुर्थ पादमें 'कालं काल' यह अव्यपेतव्यपेत यमक है, इसी तरह द्वितीय तृतीय चरणोंमें 'तार तार' यह यमक है। यद्यपि 'कालं काल' में एकमें अनुस्वार है और दूसरे में नहीं है, परन्तु इससे यमकमें कुछ बाधा नहीं होती है, आलकारिकोंने अनुस्वार विसर्गकी न्यूनतमें भी यमकादिको स्वीकार कर लिया है, लिखा है :- 'नानुस्वारो विसगक् चित्रभज्जाय कल्पते' ॥ ३५॥ याम यामत्रयाधीनायामया मरणं निशा। यामयाम घियाऽस्वर्त्याया मया मथितैव सा ॥ ३६ ॥ पादचतुष्टयगतमव्यपेतव्यपेतात्मकं यमकमुदाहरति-यामेति। 'याम यामत्रयाधी- नयामया मरणं निशा याम् अयाम घिया अस्वर्त्याया मया मथिता एव सा' इति पदपाठः। यामत्रयाधीनः प्रहरन्नितयवशगः आयामो विस्तारो यस्यास्तथाभूतया निशा निशया मरणं याम प्राप्ता भवम, याम् प्रियाम् घिया बुद्धथा अयाम प्राप्तवन्तः यां लब्धुं सङ्कल्पमकुर्म, सा अस्वर्त्याया प्राणबाधागामिनी (असबः प्राणास्तेषामति पोडा- मायातीलि क्विबन्तम्-'अस्वर्त्याया' इति पदम् ) मया मथिता एव व्यापादिता एव। ममाप्यस्यां निशि मरणमवश्यंभावि, किन्तु सा तपस्विनी मद्वियोगे म्रियेतेति चिन्तास्पद- मिति भावः । अत्र सर्वेष्वपि पादेषु यमक्रम् ॥३६॥ हिन्दी-इस तीन प्रहरोंके अधीन विस्तारवाली-त्रियामा-रात्रिमें मेरा तो मरण होगा ही, परन्तु जिसे पानेका मैंने सङ्कल्प किया था, चित्तवृत्ति जिसके पास पहुँच चुकी थी, उस प्राणसङ्टटा- पज्चा रमणीको मैंने समाप्त कर दिया, मेरे वियोगमें वह भी नहीं बच सकी। इस उदाहरणक्लोकके चारों चरणोंमें अ्रव्यवहित तथा व्यवहित आदिगत यमक है॥ ३६ ॥। इति पादादियमकविकल्पस्येध्शी गतिः। एवमेव विकल्प्यानि यमकानीतरार्ण्याप।। ३७।। १. घिया स्वत्या या मया।

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२३६ काव्यादर्श:

पादादियमकमुप संहरति-इतीति। पादादियमकविकल्पस्य पादादिगतानां यमका- नां प्रभेदस्य इति ईदृशी दशितरूपा गतिः प्रकारः, इतराणि पादमध्यपादान्तभागगतानि तानि तानि यमकानि एवमेव दर्शितप्रकारेण विकल्प्यानि कल्पितभेदानि विधातव्यानि ॥३७। हिन्दी-इस प्रकार हमने पादादिभागगत यमकके यथासंभव विकल्प-भेदप्रमेद बतला दिये हैं, इसी प्रकार पादमध्यगत एवं पादान्तगत यमकोंके भी उदाहरणभेद आदिकी कल्पना कर लें।३७।।

दुष्कराभिमतां ये तु वर्ण्यन्ते 'तेऽन केचन ॥ ३८ ॥ स्वयं भेदानां कथनं न कृतं तत्र कारणमुपन्यस्यति-नेति। प्रपश्चभयात् विस्तार- भीतेः भेदा: सर्वे विकल्पाः कात्स्न्येन साकल्यन आख्यातुं कथयितुम न ईहिताः नाभि- मताः, विस्तारभयादेव तेषामभिधाने न चेष्टितमिति भावः । य तु भेदा दुष्कराभिभताः कठिनसम्पादना: ते केचन कतिपये भेदाः अत्र वर्ण्यन्ते ॥ ३८॥ हिन्दी-विस्तार के भयसे मैंने सारे प्रभेद बतानेकी चेष्टा नहीं की है, उन्हीं कुछ प्रभेदोंको मैं आगे बता रहा हूं जो कठिन हैं-बनाने में कष्टसाध्य हैं॥ ३८।। स्थिरायते यतेन्द्रियो न हीयते यतेर्भवान्। अमायतेयतेऽप्यभूत् सुखाय तेयते क्षयम् ॥ ३९ ॥ सकलपादगतमव्यपेतव्यपेतं मध्यगतं यमकमुदाहरति-स्थिरेति। स्थिरा आयतिः उत्तरकालो यस्य तत्संबोधने हे स्थिरायते, निश्चलहृदय, भवान् यतेन्द्रियः निगृहीतकरणगण: अत एव गतेः संयमात् न हीयते न च्युतो भवति, ते तव अमायता मायाकपटराहित्यम् इयते एतावते क्षयम अयते अगच्छते अविनाशिने सुखाय अपि अभूत्, स्वीयमायारहि- त्यकृतैव तवेयमात्मज्ञानसंभवाऽक्षयसुखायाप्तिरिति भावः ॥३९॥ हिन्दी-हे स्थिरायते निश्चलहृदय जीवन्मुक्त योगिप्रवर, आप जितेन्द्रिय होनेके कारण संयमसे च्युत नहीं होते हैं, और आपकी अमायता-मायासंपर्कशून्यता ही आपके इस आत्मज्ञानसंभव अक्षयसुखका कारण होती है। इस उदाहरणश्रोकके चारों चरणोंमें 'यते यते यते यते' यह अव्यपेतव्यपेत मध्यगत यमक है।। ३९ ।। सभासु राजन्नसुराइतमुखतैरमडीसुराणां वसुराजितैः स्तुताः। न भासुरा यान्ति सुरान्न ते गुणा: प्रजासु रागाम्मसु राशितां गताः।।४०।। पादचतुष्टयगतं केवलव्यपेतं मध्ययमकमुदाहरति-सभास्विति। हे राजन्, असु- राहतैः मदपानकृतदोषास्टृष्टः वसुराजितः भवदीयदानधनशोभायुतः महीसुराणं ब्राह्मणानां मुखै: सभासु लोकसमाजेषु स्तुताः प्रशस्ताः रागात्मसु अनुरकहृदयासु प्रजासु तब प्रकृतिषु राशितां गताः सततोपचिताः भासुरा: प्रकाशरूपास्ते तव गुणाः शौरयौदार्यादयो धर्मा: सुरान् देवान् न यान्ति, देवा अपि त्वद्गुणसदृशभासुरगुणानां पात्राणि न भवन्तीति भाव:।। ४० ।। हिन्दी-सरापा नकृत दोषसे अस्पृष्ट तथा भवदीय दानवनकृत शोभासे युक्क् ब्राह्मणजनमुखोद्वारा १ ईप्सित:। २. मता एव। ३. वक्यन्ते। .. तन।

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तृतीय: परिच्छेद: २३७

समाओंमें प्रशंसित एवं स्नेहपूर्ण हृदयवाली प्रजाओंमें राशीभूत आपके स्वच्छ गुणगण देवोंको भी नहीं प्राप्त है। इम उदाहर णश्लोकमें 'सुरा सुरा सुरा मुरा' यह चारों चरणोंमें यमक है जो केवल व्यपेन एवं मध्यगत है।। ४० ॥ तब प्रिया सच्चरिताप्रमस या विभूषणं धार्यमिहांशुमत्तया। रतोत्सवामोदविशेषमतया प्रेयोजनं नास्ति हि कान्तिमत्तया ।। ४१ ।। अथ व्यपेतं पादचतुष्टयगतमन्तयमकमृदाहरति-तव्नेति। हे अप्रमत्त, कपटनानु- नयकर्मणि रततसावधान, तव या सच्चरिता साधुशीला (विपरोतलक्षणया भ्रष्टा) प्रिया प्रियतमा (विद्यते) तया डह अस्मिन्नानन्दावमरे अंशुमन् किरणावलीभ्राजमानम् उदं भूषणम् ग्तोत्मवामोटविशेषमनया त्वया सह कृतम्य रतोन्सवस्य आरमोदेन हर्षाति केण विशेषमनया मातिशयप्रमन्नया मस्या धार्यम् धारणीयम् (मैव तव प्रयसी धारयत्विदं भूषणम्) (मम त्वदुपेक्षिताया) कान्तिमनया भूरणधारण जन्यशोभासम्पत्या प्रयोजनं नास्ति। 'प्रियेषु सौभाग्यफला हि चारुता' इति न्यायन या न्वया सह समवाप्गरतसौ- भाग्या सेवेदमधिकरोति भूषणं न तु त्वयोपेक्षिताऽहमिति भावः ॥।४१॥ हिन्दी-हं कपटानुनयसाधधान, आपकी वह सच्चरिता (भ्रष्टा) प्रिया हो इस अवसरपर इस चमकदार आभूषणको धारण करे, क्योंकि वह आपके साथ सुरतविहार करके आनन्दमग्न है, मुझ उपेक्षिताको इस शोमासम्पत्ति की क्या आववयकता है। नायकने किसी अन्य नायिकासे सम्बन्ध जोड़ा, नायिका रठ गई, उमको भूषण देकर प्सन्न करनेकी उद्यत नायकके प्रनि उस उपेक्षिता नायिकाकी यह निरस्कारोकि है इम उदाइरणालोकके चारो चरणोंमें 'मत्तया' का अन्नगत व्यपनयमक है॥ ४४॥ भवादशा नाथ न जानते नते रसे विरुद्धे खलु सन्नतेनते। य एव दाना: शिरसा नतन ते चर्म्त्यलं दैन्यरसेन तेन ते ।।४२। पादान्तगतमव्यपेतयम सुदाहरांत-भवाहशा इति। हे नाथ, भवादशा: प्रभवः नतेः नमनस्य रसम आन्वादविशपम् न आनने न विदन्ति, सन्नतम् मम्यक नमनम् इनता प्रभुता च सव्तेनते सलु विरुदे नैकत् संभवतः। (अतब् प्रभुणा त्वया न नमनरसो वेद्यः) ये जनाः दीनाः न एव केवलं नतेन शिरसा चरन्ति स्वामिनं सेवन्ते, तेन नमनकृतन देन्यरसेन देन्यास्वादेन ते तव प्रभोः अलम्, नास्ति क्िमपि प्रयोजनमिति ॥४२॥ हिन्दी-हे नाथ, आपको 'नमन' का स्वाद नहीं मालूम है क्योंकि आप प्रभु है, आपको कभी किसीके सामने झुकना नहीं होता है, नमन और प्रभुत्व एकास्पद नहीं हुआ करता है, जो दीन है वे सिर हुकाये सेव। करते हैं, (भगवान् की कृपासे) आपको कभी देन्यरसका अनुमव न करना पड़े। इस उदाइरणश्लोकके सभी चरणोंमें 'नते नते' यह अन्तगत अध्यपेत यमक है। ४२॥ लीलास्मितेन शुचिना मृदुनोदितेन व्यालांकितेन लघुना गुरुणा गतेन। ध्याजुम्मितेन जघनेन व दशितेन सा हन्ति तेन गलितं मम जीवितेन ।४३।। चतुर्ष्वपि पादेषु मध्यान्तयोर्व्यपेतयमकमुदाहरति-लीलेति। सा नायिका शुचिना १. चरित प्र। २. वानन्द्र। ३. न मे फलं किंन क्ान्ति।

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२३८ काव्यादर्श:

निर्मलेन लीलास्मितेन सविलासहमितेन, मृदुना उदितेन मधुरेण वचनेन, लघुना व्यालो- कितेन अपाप्वीक्षितेन, गुरुणा गतेन स्तननितम्बभारवशान्मन्दगमनेन, व्याजुम्भितेन जम्भया (अनुरागसृचकजुम्भितेन ) दर्शितेन जघनेन जघनदर्शनेन च (माम् ) हन्ति मारयति व्यथयति, मम जीवितेन गलितम् च्युतम् गतमित्यर्थः, तदीयानुरागचेष्टाभिः कामातुरीभूतोऽहं न शक्नोमि प्राणान धारयितुमित्यर्थः ॥४३ ॥ हिन्दी-वह नायिका अपने निर्नल सविलास हाससे, मधुर बचनसे, असमग्र कटाक्ष- निक्षेपसे, मन्द गमनसे, जम्भाई लेनेसे तथा जघनदर्शनरूप कामचेष्टासे मुझको व्यथित कर रही है, मेरे प्राण गये। इस उदाहरणश्लोकमें चारों चरणोंमें मध्यान्तगत व्यपेत यमक है॥। ४३॥।

भूमानमानमत यः स्थितिमानमाननामानमानमतमप्रतिमानमानम्।।४४।। पादचतुष्टयगतं मध्यान्तवनि चाव्यपेतव्यपेतयमकमुदाहरति-श्रीमानिति। यः श्रीमान् स्थितिमान अमान तम् अमाननामानम् आनमतम् अप्रतिमानमानम् आनतज- गत्प्रथमानमानम भूमानम् अमरवत्मसमानमानम् आत्मानम् आनमत इत्यन्वयः । यस्तनिविक्रमो भगवान श्रीमान् लक्ष्मीसम्पन्नः, स्थितिमान मर्यादाशाली, अमान अपरिमितः (वर्तते) तम् अमाननामानम् अन्तहीननामगणम्, अनन्तीति आनाः प्राणिनस्तेषां मतम् पूजितम्, अप्रतिमानमानम्-प्रतिमीयते प्रमीयते यस्तानि प्रतिमानानि प्रमाणानि तैर्न मान ज्ञानं यक्ष्य तादशम्-लोकिक प्रमाणावेद्यम्, आनते प्रह्वीभूते भजमाने जगति लोके प्रथमानः बहुलो मानः पूजा यस्य तथाविधम्, भूमानम् पृथ्वीमापकचरणन्यासम्, अमरवत्मसमानमानम् आकाशवद् व्यापकम् आत्मानम् आत्मस्वरूप भगवन्तम् आ्ानमत नमस्कुरुत। भत्र 'मानमान' इति यमकम् ॥४४ ॥ हिन्दी-जो लक्ष्मीसम्पन्न, अपरिभित, मर्यादापालक हैं, उस अपरिमितनामवाले, योगियों- द्वारा पूजित, लौकिक प्रमाणोंसे अवेदय, भक्तलोकमें प्रथितपूजन, एक चरणसे पृथ्वीको नाप लेने वाले, आकाशकी तरह व्यापक तथा आत्म चैतन्यस्वरूप त्रिविक्रम भगवान्को प्रणाम् करें। इस उदाहरणश्लोकके सभी चरणोंमें 'मानमान' यह अन्त मध्य दोनों जगह अव्यपेतव्यपेत यमक है॥ ४४ ॥ सारयम्तमुरसा रमयन्ती सारभूतमुरुसारधरा तम्। सारंवानुकृतसारसकाश्ची सा रसायनमसारमवैति ॥४५॥ पादचतुष्टयंगतं व्यपेतमादियमकं दर्शयति-सारयन्तमिति। सारयन्तम् सक्केत- स्पाने भात्मानमुपस्थापयन्तम्, सारभूतम् संसारसारभूतसौन्दर्ययौवनयुतम्, तं नायकम् उरसा वक्षसा रमयन्ती आलिपनेन सुखयन्ती, सारवा सशन्दा अत एव अनुकृतसारसा तुलित सारसास््यपक्षिभेदा कामी मेखला यस्याः सा तथोक्ता-सारवानुकृतसार मकाश्ची सारसास्यपक्षिरवानुकारिरवश/लिनी मेखलां धारयन्तोत्यर्थ, उरुसारधरा विपुलसौन्दर्यसार- धारिणी च सा नायिका रसायनम् अमृतम् असारम् तुच्छम् अवैति जानाति, प्रियसमा- गमसुखं हमृतमप्यतिशेते इत्याशयः ॥४५ ॥

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तृतीय: परिच्छेद: २३६

हिन्दी-सङ्केतस्थानमें अपनेको उपस्थित करनेवाले तथा जगत्सारभूत सौन्दर्य-योवन भूषित उस प्रियतमको छातीसे लगाकर आनन्दित करनेवाली, सारस पक्षियोंके शब्दका अनुकरण करने- वाले शब्दावली काशोसे भूषित और विपुल सौन्दर्यसार धारण करनेवाळी वह सुन्दरी अमृसको अतितुच्छ समझती है। इस उदाहरण श्रोकके सभी चरणोंमें 'सार सार' यह व्यपेत आदिमध्य यमक है॥४५॥ नयानयालोचनयानयानयानयानयानधान विनयानयायते।

इदानी चतुर्ष्वपि पादेष्वाद्यन्तगतमव्यपेतव्यपेतयमकमुदाहरति-नयेति। अत्राय- मन्वय :- हे अनयायते अनया नयानयालोचनया अनयान् भयानयान्धान विनय, (तथा) अनयाश्रितान् तान् अयानयान् नयान् जनय, यान् जिनयानया: न अयासीत्। अयमर्थ :- एति गच्छतीति अया विनाशिनी न अया अनया भविनासिनी आयति: उत्तरकालो यस््य तत्संबोधने हे अनयायते, अनया मदुक्तरूपया नयानयालोवनया न्यायान्यायविवेबनया शूनयान न्यायविमुखान् श्रयः शुभावहो विधिः अनयः अशुभावहो विधिस्तयोरन्धान शुभा- शुभविवेकशून्यान् विनय शिक्षय। तथा अनयाश्रितान् अन्यायमार्गगामिन; तान शयान- यान् शुभप्रापकान नयान् नीतीः जनय उपदिश्य प्रापय, यान नयान् जिनयानयाः जैन- मार्गानुसारी न अयामीत्। कश्ित्सचिवः स्वनृपमुपदिशति-उन्मार्गगामिजनान उचिते वर्त्मन्यानयेति भावः ॥।४६ ॥ हिन्दी-कोई मन्त्री अपने राजाको समझा रहा है-हे अनयायते-अनपायिभविष्य, इस न्यायान्यायविवेचना-द्वारा नीतिविमुख, शुभाशुभविवेकशून्य लोगोंको विनीत कीजिये और अन्यायगामी लोगोंको शुभप्रापक मार्गपर लाइये, जिस मार्गपर जैनमार्गानुसारी नहीं चल सके हैं। इस कोकमें चारों चरणोंके आदि अन्तमें अव्यपेतव्यपेत यमक है, अथवा यह भी कहा जा सकता है कि प्रथम-तृतीय पादके आदि-अन्तमें और द्वितीय-चतुर्थ पादके आदि-मध्यमें अव्यपेत- व्यपेत यनक है।। ४६ ॥। रवेण भौमो ध्वजवर्ततिवीरवेरवेजि संयत्यतुलाख्रगौरवे। रवेरिवोग्रस्य पुरो हरेरवेरवेत तुल्यं रिपुमस्य भैरवे॥। ४७ ॥ पाद्चतुष्टयगतं व्यपेतमादयन्तयमक्रमुदाहरति-रवेणेति। झालाख्गौरवे भैरवे भयडुरे संयति संग्रामे ध्वजवर्तिवीरवेः थ्वजाभ्रस्थितस्य वीरस्य वे: पक्षिणो गरुडस्य रवेण सिंहनादेन भौमो नरकासुरः अ्रवेजि उद्विग्नः कृतः कम्पितः। रवेः सर्यस्य इव उप्रस्य दीप्स्य सूर्यसमधुतेः हरेः सिंहसमानस्य अस्य भगवतः कृष्णस्य पुरः अभ्रतः रिपुं नरका- सुरनामानम् अवेः मेषस्य तुल्यम् अवेत अवगच्छत। अत्र संयच्छन्दस्य क्रीवत्वं चिन्त्यम्, अथवा स्वतन्त्रा: कविबुद्धयः, सामान्ये नपुंसकत्वं तु दुरुपपादम् ॥४७॥ हिन्दी-अनुपम, अखगौरवपूर्ण एवं भयानक उस युद्धमें ध्वजाग्रवत्ति वीर गरुड पक्षीके शब्द-सिंहनादसे वह नरकासर घवड़ा गया-काँपने लगा, और सूर्यके समान प्रदीप् सिंहपराक्रम भगवान् कृष्णके सामने उसकी दशा भेढ़ की-सी हो गई, यही समझ कें। इसमें कृष्ण-नरकासुर- युडका विवरण दिया गया है। १. कृति। २. सीजिनः। ३. नरा।

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२४० काव्यादश:

इस उदाहरण इलोकके चारों पादोंमें आधन्तगृत व्यपेत यमक है।। ४७। मया मयाजम््यक लामया मयाम यामयातव्यविरामयामया। मयामयाति निशयामयामयामयामयामूं करुणामयामया।।४८।। पादचतुष्टयगतमव्यपेतव्यपेतं तथाद्यन्तवर्त्तियमकमुदाहरति-मयेति। तत्रान्वय :- हे अमय करुणामय अयातव्यविरामयामया अमया अमया निशया मयः मयार्तिम् प्रयाम, अ्रमया मया मयालम््यकलामयामयाम् अमूम श्रमय। कबिद् विरही स्वमित्र- मनुरुणद्धि-हे श्मय निष्कपट, करुणामय दयाशालिन्, अयातव्यविरामयामया अ्रस- माण्यप्रहरया दीघया, अमया मा शोभा तद्रहितया, श्रमया भमावस्यासदृशया (विरहान्धकारपूर्णतयाऽमासादृश्यम) निशया रात्या अहम् मयामयार्तिम् मयः क्षयः भामयो गेगः तस्य आर्निम् पीडाम् दौर्बल्यातिशयकतयन्त्रणाम् अ्याम् प्राप्तवान्, (अ:) अमया अमं क्षयं याति तेन अमया क्षीणेन मया सह मयालम्व्यकलामया- मयाम मयः क्षयः तेन आलम्ब्याः प्रमनीयाः कलाः तन्मयश्न्द्रः स एव आमयो रोगो रोगवदूध्ययको यस्या: सा ताम् चन्द्रदर्शनमंजातव्यथाम् अरमूम् नायिकाम् अ्रमय योजय। हिन्दी-हे निष्कपट करुणामय, जिसके प्रहरोंका विराम ही नहीं हो रहा है ऐसी तथा शोभाशून्य इस विरहान्धकारपूर्ण अमासमान रात्रिसे मैं विरहातिक्षीणताको प्राप्त हो गया हूँ, अतः क्षीण होनेवाली कलाओंसे पूर्ण चन्द्रमा को देखकर सन्तप्ता उस नायिकाको मुझसे मिला दो। इस उदाहरण इलोकके चारों चरणोंमें अव्यपेत-व्यपेनात्मक आधन्तवत्तों 'मयामया' यह यमक है॥४८॥ मंता धुनानारमतामकामतामतापलब्धाभ्रिम तानुलोमता। मतावय त्युत्तमतावि लोमतामताम्यतस्ते समता न बामता।। ४९।। आ्रयमध्यान्वयः-अताम्यतः ते मतो उनमता विलोमनाम् अगनी अतापलंब्धा- प्रिमतानुलोमता आरमताम् अकामतां घुनाना मता समता न वामता। अताम्यतः कथमापे ग्वानिमगच्छतः ते तव मती विचारे उतमता विलोमताम् अपकृष्टताम् अयती अग्नाप्तुपती अतापेन अक्लेशन लब्धे अभिमतानुलोमते (अप्रिमता श्रष्ठता अनुलोमता अनुकूलता च) श्रष्ठत्वानुकूलत्वे यया सा तथोक्ता, तथा आरमताम आत्मारामाणां योगिनाम् अक्रामताम् कामबैमुर्य भुनाना अपनयन्ती योगिनामपि चेतसि स्वृहां जनयन्ती मता इष्टा ममता सर्वभूतमैत्री, वामता वेषम्यम् न मतेति शेयः ॥४९॥ हिन्दी-कभी भी ग्लानिको नहीं प्राप्त करने वाले आपकी दुद्धिमें समता-सर्वभूतमैत्री ही अभिमत है-वामता-विषमता नहीं अभिमत है, समताके विशेषण बताते हैं-अतापेत्यादि। जिस समताको उत्तमताविलोमता-अपकृष्टता कभी नहीं मिली, जो अलेश, श्रेष्ठत्व तथा अनुकूलल को पा चुकी है, और जिसके लिये आत्मारामयोगी भी अकामताको छोड़ स्पहा करते हैं। इस उदाहरणश्लोकके चारों चरणोंमें आदिमध्यान्नगत व्यपेत-'मता मता' का यमक स्पह हे।। ४९ ।। काल काल गल काल कालमुखकाल काल- कालकाल पनकाल काल घनंकाल काळ-।

१. मयालय। २. मतान्धुनाना। १. कमता । ४. धन। ५. पन।

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तृतीय: परिच्छेद: २४१

कालकालसितकालका ललनिकालकाल- कालकालगंतु कालकाल फलिकालकाल ।। ५० ॥ बतुर्षु पादेषु आदिमध्यान्तयमकमव्यपेतव्यपेतं दर्शयति-कालकार्लोव। भ्रयम- प्रान्वय :- हे अलकालकालक, कालकाल, कलिकालकाल, कालकालगलकालकालमुक्का लकालकालकालपनकालका लघनकालकाल काल का लसितकालका ललनिका झालगठ़। कब्द कामी त्वत्प्रसादेन प्रिया मामिच्छतु मामालिऋ्तु चेति वर्षासमयं प्रार्थयते-हे भलकाल- कालक-अलका यक्षपुरी तस्या अलकः अलद्डर्ता कुमेर: तद्वत भलक पर्याप्तिकारक (यण्े- शवरो यथा पर्या्त धनं दृदाति तद्वत्वमपि पर्याप्तं जलं वितरसीति संबोधनार्थः) कालकाल, वसन्तादिकालेषु काल: श्रेष्ठः तत्सम्बोधने कालकालेति। कलिकालकाल-कलिका: तर- कोरकान् अलन्ति भूषयन्ति इति कलिकालकाः वसन्तादिसमयभेदास्तेभ्योऽपि भल समर्थ, एवंभूत वर्षाकाल, ललनिका प्रशंसनीया ललना आालगतु ममि अनुरज्यतु, सा ललना कीटशीति प्रसम्ने आह-कालो यमस्तस्यापि काल: संहर्त्ता शिवस्तस्य गल एव गलकः, अलीनां समूहः आालम्, कालं श्यामलं मुखं यस्य स कालमुखो वानरमेद:, काल: कलि, कालो यम:, कालं कृष्णं क शिरो येषां ते कालका मयूरा: तेषाम् भलपनस्य कार: फर्ता एव रलयोरभेदात् काल: कालघनकाल: श्यामलजलदसमयो वर्ष्तः एतैः इब कालकेः कृष्णवणः अलकैः केशपाशैः आालसितं कृतशोभं कं शिरो यस्यास्तयोक्ता, हरकण्ठत्रमर- समूहकलियुगवानरमुखयमवर्षासमयसमानश्यामकेशा सा ललना मयि रमतामिति प्रार्थ- नाथेः ॥। ५० ॥ हिन्दी-हे यक्षपुरीभूषण कुबेर के समान पर्याप्तिकारक, कालोंमें सर्वश्रेष्ट वृक्षोंकी कलिका उगानेवाले वसन्तादि कालोंसे भी अधिक समर्थ (वर्षासमय) महादेवके कण्ठ, यम, वानरमुख, कलियुग, मयूरनृत्यकर वर्षासमयके समान श्याम केशकलापोंसे भूषित वह ललना मुझे आलिङ्गित करे। इस उदाहरणश्लोकके प्रथम अढ़ाई चरणोंका एक ही पद है जो नायिकाका विशेषणमात्र है, अन्त्यचरणके उत्तरार्धमें वर्षाकालके दो संबोधन हैं। इसमें चारोंपाद आदिमध्यान्तगत अम्यपेत व्यपेत यमकशली है॥ ५० ॥ सम्दृष्टयमकस्थानमन्तादी" पादयोबयो:। उक्काम्तर्गतमप्येतत् स्वातन्येणात्र कीर्त्यते ।।५१॥ पराभिमतं सन्दष्टयमकं निरूपयति-संदष्टेति। द्वयोः पाइयोरन्तादी भवसान- मादिय सन्दध्ट्यमकस्थानम्, एतत् सन्दष्टयमकम् उक्तान्तगतमपि पादचतुष्टयगतम्यपेता दन्तनामकयमकप्रभेदे मदुकंऽन्तर्गतमपि अत्र स्वातन्त्र्येण पृथक कीरसर्यते वर्ण्यते।।५१ ॥ हिन्दी-प्रथम पादके अन्तमें तथा द्वितीय पादके अन्तमें रहनेवाले यमकका नाम प्राचीनोंने सन्दध्यमक रखा है, वह यद्यपि हमारे द्वारा कहे गये पादचतुष्टयगत व्यपेताचन्त यमक नामक यमकप्रभेदमें अन्तर्भूत हो जाता है, तथापि प्राचीनानुरोपसे यहाँ स्वतन्त्र रूपसे वर्णन किया जाता है। उपर्युंक्त यमकप्रमेदका उदाहरण है :- 'रवेण मौमो ध्वजवरसिंनीरये' इत्यादि ३४७।५१।:

6 १. गत। २. कढि। १. कनि। ४. म्तादिपदनो। १६ का०

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२४२ काव्यादर्श:

उपोढरागाप्यवला मदेन सा मदेनसा मन्युरसेनयोजिता। न योजितात्मानमनन्तापिताम्ृतापि तापाय ममास नेयते ॥। ५२॥ संदध्टयमकमुदाहरति-उपोढरागेवि। मदेन मययोपयोगेन यौवनमदेन च उपोढ- रागा संजातसुरताभिलाषापि साडबला स्री मदेनसा मदीयेन दोषेण हेतुना मन्युरसेन कोपेन योजिता (अतथ्च) अनभ्गतापिताम् कामसन्तप्तत्वं गतापि सा आत्मानं (भयि) न योजिता योजितवती मया सह न सप्ता, (इदम्) इदम् मम इयते एतत्परिमाणाय महते तापाय न आस न बभूव, अपि तु बभूवैवेति काक्का व्यज्यते। आसेति तिकन्तप्रति- रूपमव्ययमिति शाकटायनः ॥। ५२ ॥ हिन्दी-मधपान तथा यौवनमदसे रत्यमिलाषिणी होकर भी वह अबला मेरे ही दोषसे क्रोधावेशयुक्त हो गई, अतः कामसन्तप्त होकर भी उसने मेरे पास आना नहीं चाहा, क्या यही मेरे इस महान् सन्तापका कारण नहीं है? यह सन्दष्टयमकका उदाहरण है क्योंकि प्रथम पादके अन्तर्में एवं द्वितीय पादके आदिमें 'मदेनसा मदेनसा' और तृतीय पादके अन्तमें और चतुर्थ पादके आदिमें 'अतापिता इतापिता' स्वरूप यमक है।। ५२॥ अर्धाभ्यास: समुद्र: स्यादस्य भेदास्यो मताः। पादाभ्यासोऽप्यनेकात्मा व्यज्यते स निदर्शनैः ॥५३॥ अथ समस्तपादयमकमुपक्कमते-अर्धाभ्यास इति। अर्धाभ्यासः पादद्वयाघृत्तिः समुद्रः स्यात् समुद्रयमकनाम्ना व्यवहियेत, समुद्गः सम्पुटकः स यथा भागद्वयात्मको भवति तथव भागद्वयात्मकतयाऽस्य समुद्गसंझ्ञकता। तस्य समुद्गयमकस्य त्रयो भेदा मताः। पादाभ्यासः एकमात्रपादावृत्तिरपि अनेकात्मा बहुविधो भवति स निदर्शनैः व्यज्यते उदाहरणप्रदर्शनेन स्फुटीक्रियते।।५३ ॥ हिन्दी-अर्धाभ्यास-पाददयावृत्तिको समुद्रयमक नामसे व्यवहृत किया जाता है, उसके तीन भेद हैं-प्रथम-तृतीय-एवं द्वितीय-चतुर्थ चरणोंकी समानतामें एक, प्रथम-द्वितीय एवं तृतीय-चतुर्थ चरणोंकी समानतामें द्वितीय, प्रथम-चतुर्थ एवं द्वितीय-तृतीय चरणों की समानतामें तृतीय भेद होगा। यंह समुद्रयमक हुआ, समुद्र सम्पुटक पेटारीका नाम है, पेटारीके जैसे दो भाग होते हैं उसी तरह इसके भी दो भाग होते हैं, इसीसे इसका नाम समुद्र कहा गया है। एकपादावृत्तियमक बहुत प्रकारका है जो उदाहरणोंद्वारा व्यक्त होगा। इस एकपादावृत्तियमकके निम्न प्रभेद संभव है, प्रथमपाद द्वितीयपादमें, प्रथमपाद तृतीयपादमें, प्रथमपाद चतुर्थपादमें इस प्रकार तीन भेद। द्वितीयपाद तृतीयपादमें, द्वितीयपाद चतुर्थपादमें इस प्रकार दो भेद। तृतीयपाद चतुर्थपादमें यह एक भेद, प्रथमपाद द्वितीय और तृतीयमें, प्रथमपाद द्वितीय और चतुर्थमें, प्रथमपाद तृतीय और चतुर्थमें, द्वितीयपाद तृतीय और चतुर्थमें यह चार भेद। प्रथम पाद द्वितीय वुतीय चतुर्थमें यह एक भेद, कुल मिकाकर एकादश भेद हुए। समुद्य मकके उदाहरण दिखलाकर इनके भी उदाहरण दिये जायेंगे।। ५३॥ ना स्थेय:सस्वया वज्ये: परमायतमानया। नास्येय: स त्वयावर्ज्येः परमायतमानया॥।५४॥

१. ताबाच ममाच नेयते। २. अन्राम्यास: ।

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तृतीय: परिच्छेद: २४३

समुद्दगय मकभेदमुदाहरति-ना स्थेय इति। परमायतमानया अत्यन्तविस्मृतकोपया स्येय: सत्वया निश्चलस्वभावया त्वया सः ना नायकः नं वर्ज्यः न परित्यकण्यः, किन्तु परम् अत्यथम् आयतमानया चेष्टमनया आस्येयः आदरणीयः भावर्ज्यः अनुकूलाचर- णेन स्ववशीकरणीयक्ष। अत्र प्रथमद्वितीययोस्तृतीयचतुर्ययोक पादयोरभ्यासः॥५४॥ हिन्दी-अत्यन्त विस्तृत मान तथा निश्चल स्वमावशालिनी तुम उस नायकका परित्याग मत कर दो अपितु यथासम्भव चेष्टा करके उसका आदर करो और अनुकूल आचरण करके उसे अपने वशमें कर लो। इस उदाहरणश्लोकके प्रथम-तृतीय एवं द्वितीय-चतुर्थ चरणोंमें समानताकृत अर्धाभ्यास है॥५४॥ नरा जिता माननयासमेत्य न राजिता माननया समेस्य । विनाशिता वैभवतीपनेन विनाशिता वै भवतापनेन ।। ५५॥ समुद्रयमकस्य द्वितीयं प्रभेदमुदाहरति-नरा इति। राइः खुतिपरं पद्यमिदम्। अत्र पदच्छेदो यथा-नरा: जिताः माननयासम् एत्य न राजिताः माननया सम इत्य- विनाशिता वैभवतापनेन विना अशिता: वे भवता आपनेन। सम माननया इत्य, जिताः नरा माननयासम् एत्य न राजिताः आपनेन भवता वैभवतापनेन विनाशिता: वै विना अशिता: इति चान्वयः । हे मया लक्ष्म्या सहित सम सश्रीक, माननया आदरेण इत्य प्राप्य भादरणीय, जिता: भवता परासिताः नराः शत्रुभूता: पुरुषाः माननयासम् प्रतिष्ठानीत्योः प्रतिचेपम् एत्य प्राप्य न राजिताः न शोभिताः आपनेन व्यापकेन भवता वैभवतापनेन धनकृत- पराभवप्रदानेन विनाशिता: मारितास्ते शत्रवो वे निव्येन बिना गृधादिपक्षिणा भशिता: भक्षिताः इत्यर्थः । अत्र प्रथमद्वितीयौ तृतीयचतुर्थौ च पादौ समानी ॥। ५५॥ हिन्दी-हे लक्ष्मीसम्पन्न तथा सम्माननीय नृपवर, आपके द्वारा पराजित आपके शत्तु प्रतिष्ठा और नीतिके प्रतिक्षेप हो जानेसे शोभासम्पन्न नहीं रह जाते हैं, इतप्रम हो जाते हैं, और व्यापक प्रभाव आपके द्वारा धनकृत सन्तापनसे विनाशित होकर गृभादिपक्षिगणसे भक्षित हो जाते हैं। इस उदाहरणश्लोकमें प्रथमद्वितीय एवं तृतीयचतुर्थ पादोंको आवृत्ति होनेसे यह अर्धाभ्यासरूप समुद्रका द्वितीय प्रभेद हुआ॥ ५५॥ कलापिनां चारुतयोपयान्ति वृन्दानि लॉपोडघनागमानाम्। वृन्दानिलापोठघनागमानां कलापिनां वावतयोपया्ति॥५६॥। तृतीयं प्रभेदमुदाहरति-कलापिनामिति। लापेन शब्देन केक्राभ्वनिना ऊठः"प्राप्तः स्वागतीकृतः धनागमो वर्षाकालो यैस्तादृशानां कलापिनां मयूराणां बन्दानि समूहाः चारतया शोभया उपयान्ति सज्च्छन्ते, शोभायुता भवन्तीत्यर्थः। तथा इन्दानिसेन सङातवायुनाऽपोढः निरस्तः घनस्य नृत्यविशेषस्यागमः परिशीलनं येवां तादशानां वृन्दानिलापोढवनागमानाम् (वर्षाकाले इंसा मदशून्या मृत्यं स्यजन्तीति प्रसिद्धि:) कलापिनां मधुरशब्दानां के जले लापिनां कूजतां थ हंसानां थ भारतंय: कूणितानि भप-

१. तायनेन। २. तमोप। ३. खापोद।

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२४४ काव्यादर्श:

वान्ति मन्दीभूय शनेरपसरन्ति। अत्र प्रथमचतुषों तथा द्वितीयतृतीयपादौ तुल्याविति समुद्गभेदस्वृतीयः ॥५६॥ हिन्दी-केकाध्वनिसे वर्षासमयका स्वागत-सत्कार करनेवाले मयूरोंके समुदायकी शोभा बढ़ रही है, और वर्षाऋतुके सकवायुसे दूर कर दिया गया है नृत्याभ्यास जिनका ऐसे मधुरभाषी तथा जलमें कूजन करनेवाले इंसोंका कूजन उनसे छूट रहा है। 'धनं स्यात्कांस्यतालादिबाद्यमध्यम- नृत्ययो:' इति मेदिनी। इस उदाहरणलोकमें प्रथमचतुर्थमें एवं द्वितीयतृतीय चरणोंमें आवृत्तिकृत समत्व है, अतः यह समुद्गयमकका तृनीय प्रभेद हुआ।। ५६ ॥ नमन्दयावर्जितमानसात्मया न मन्दयावर्जितमानसात्मया। उरस्युपास्तीणपयोधरद्चयं मया समालिक्यंत जीर्वितेश्वरः।।५७। पादाभ्यासमुदाहर्तुमुपक्रममाण: प्रथमद्वितीयपादाभ्यासमुदाहरति-नमन्दयेति। मन्दया मन्दमत्या मूखया अवर्जिते अपरित्यके माने कोपे सात्मया सप्रयासया तथा दयया वर्जिती मानसम् आत्मा स्वभावक् यस्यास्तथाभूतया मया नमन् अपराधक्षमा- पणार्थ पादयो: पतन् जीवितेश्वरः प्राणनाथः उरसि वक्षोदेशे उपास्तीर्णपयोधरद्वयं स्था- पितनिजकुचयुगलं न समाश्लि्यत नालितितः। पादपतितं प्रियं निराकृत्य मानिन्या:

हिन्दी-मूढ़ मति अपरित्यक्त मानके प्रति सदा सयल तथा दयाशून्यहृदय एवं स्वभावशालिनी मैंने चरणोंपर पड़ते हुए प्रियतमकी छातीसे अपने स्तनोंको लगाकर आलिङ़न नहीं किया। पादपतित प्रियतमकी उपेक्षा करके पीछे पछतानेवाली नायिककी यह उक्ति है। इस उदाहरणश्लोकमें प्रथमद्वितीय पादकी आवृत्ति है॥ ५७॥ सभा सुराणामवला विभूषिता गुणैस्तवारोहि मृणालनिमलैः। स भासुराणामवला विभूषिता विहारयनरिविश संपद: पुराम् ।।५८।। प्रथमतृतीयपादाभ्यासमुदाहरति-सरभेति। अबला बलसंश्ञकदैत्यशून्याऽतथ्व निर्भया विभूषिता विभुना स्वामिना शक्रेण उषिता अध्यासिता सुराणां सभा सुधर्मा तव मृणाल- निर्मलै: स्वच्छर्गुणेः आारोहि भभ्याक्रान्ता, सुधर्माऽपि तव गुणान गायतीत्यर्थः । सः त्वम् विभूषिता: भलककृता: भवलाः श्रिय: विहारयन रमयन् भासुराणाम् उज्ज्वलानाम् पुराम् नगरोणां सम्पद: निर्विश उपभुक्दव ।। ५८॥। हिन्दी-हे राजन, आपके मृणा लघवलगुणोंने इन्द्रसे शोभित एवं बलके नहीं होनेसे निर्भय देवसभा सुधर्मा तक आरोहण कर लिया है-सुध्मामें आपका गुणगान होता है, आप अलंकृत रमणियों के साथ विहार करते हुए उज्जवल नगरियोंकी सम्पत्तिका उपभोग करें। किसी राजाकी प्रशंसामें यह श्लोक कहा गया है। इस इलोकमें प्रथम-तृतीय पादका अभ्यास है॥ ५८॥ कल कमुक्ं ततुमध्यनामिका स्तनदूयी थ स्वहते न हम्स्यत:। म याति भूतं गणने मवममुखे कलकूमु कं ततुमध्यनामिका।।५९।।

१. सार्पबा।

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तृतीय: परिच्छेद: २४४

प्रथमचतुर्यपादाभ्यासमुदाहरति-कक्ञमिति। कमपि महान्तं प्रतीयमुक्ि, (विलास- वतीनाम्) कलम् मधुरम् उसं वचनम्, तनुम्यनामिका कृशकटिनमयित्री स्तनदयी न त्वटते त्वद्िजं कं न हन्ति व्यथयति? देवलं त्वमेव निर्गिकारचितो नान्य: कोऽपीति भाव:। अतः भवन्मुखे भवत्प्रमुखे समाजे गणने त्वादशजनसरूयाने अनामिकानामाङ्कुलि: कलक्रमुक्तं सवथा जितेन्द्रियम् तनुमत् शरीरिभूतं जन्तुम् न याति, जितेन्द्रियाणां गणना- प्रसजञे प्रथमं भवान् कनिष्टिकामारोहति, त्वतुल्यस्य पुरुषान्तरस्याभावाच्चानामिको न कोप्यन्यः प्राप्नोतीति सा सार्थनामा जायते इस्याशयः ॥५९॥ हिन्दी-विलासिनियोंके मीठे वचन तथा कटिभागको भारावनत बना देनेवाले स्तनद्य आपके अतिरिक्त किसको नहीं व्यथित कर देते हैं, इसीलिये आपके समान जितेन्द्रिय निष्कल्द पुरुषोंकी गणनामें अनामिका किसी शरोरी प्राणीतक नहीं पहुँच सकती है, कनिष्ठिकापर आपका नाम ले लिया गया, आपके समान कोई दूसरा मिला नहीं, अतः अनामिकापर कोई नहीं गिना गया। इस उदाहरणश्लोकके प्रथमचतुर्य चरणोंमें आवृत्ति है।। ५९ ॥ यशश्च ते दिक्षु रजश्व सैनिका वितम्वतेजोपम दंशिता युधा। वितन्वते जोपमदं शितायुधा द्विषां थं कुर्वन्ति कुलं तरस्विनः ।। ६० ।। द्वितीयतृतीयपादाभ्यासमुदाहरति-यशक्रति। कस्यापि विक्राम्तस्य नृपतेर्वर्णन- मिदम्। हे अजोपम विष्णुतुल्य, ते तव दंशिता: कवचिनः शितायुषाः तीक्षणधारप्रहरण- शालिन: तरस्त्रिनो वैगवन्तः च सैनिकाः युधा युद्धेन दिक्षु रजः सेनासंमर्दमवां धूलिम, यश: कीर्तिम् च वितन्वते विस्तारयन्ति, तथा द्विषां कुल शत्रुसमूहम् वितनु विनष्टशरीरम् अतेजः प्रभावदरिद्रम्, अपमदं गलितगर्वश कुर्वन्ति ॥६० ॥ हिन्दी-हे अजोपम विष्णुसमान, आपके कवचधारी, तीक्ष्णायुषवाले एवं बेगवान् सैनिकगणयुक्त द्वारा सभी दिशाओंमें रज तथा कीसि फैला देते हैं, एवं शत्रुसमूडको अतनु (शरीररहित), अतेज (प्रभाहीन ) तथा अपमद (गर्वहीन) कर देते हैं। इस श्लोकके द्वितीय तृतीय चरेणोंमें अभ्यास हुआ है॥ ६० ॥ विभर्ति भूमेर्वलयं भुजेन ते भुजङ्गमीमा स्मरतो मदश्ितम्। शृणूक्तमेकं स्वमवेत्य भूधरं भुजं गमो मा स्म रतो मदं चितम्॥६१ ॥ द्वितीयचतुर्थपादाभ्यासमुदाहरति-बिभर्चतीति। (हेनृप,) ते तब भुजेन भमा सह भुजमः शेषनागः भूमेवलयं धरामण्डलं बिभर्ति धारयति, भतः स्मरतः एतत्स्व स्मृतिपथे रक्षतो मत्सकाशात् अश्ितम् सर्वजनपूजितम् एकम् उक्त्म् वचरन *णु, किन्तदूव चनं यच्छोतुमनुरुणत्सीत्यपेक्षायामाह-स्वं निजं भुजम् एकरम् सहायान्तरनिरपेक्ष- मेव भूधरं पृथ्वीभारसह समथम् भवेत्य शञात्वा रतः सन्तुष्टहृदयः चितम् उपचितम् मदं गर्व मा स्म गमः न याहीति।।६१॥ हिन्दी-ह राजन्, आपके भुजके साथ शेषनाग पृथ्वीका धारण करते है, इस बातको ध्यानमें रखकर मैं आपसे एक बात कहूँगा, उस सर्वपूजित बातको आप सुनें, वह बात यही है कि

१. दु।

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२४६ काव्यादर्श:

आपका भुज बिना किसीकी सहायतासे पृष्वीको धारण करता हैं यह जानकर सन्तुष्टचित्त हो भप उपचित मदका वहन मत करें। इस उदाहरणश्लोकके द्वितीय-चतुर्थ चरणोंमें अभ्यास हुआ है। ६१ ।। स्मरानलो मानविवर्धितो यः स निर्वृति ते किमपाकरोति। समन्ततस्तामरसेक्षणेन समं ततस्तामरसे क्षणेन॥ ६२ ॥ तृतीयचतुर्थपादयोरभ्यासमुदाहरति-स्मरानल इति। हे तामरसेक्षणे कमलनयने, है अरसे नीरसहृदये, यः मानविवर्धितः मानेन वृद्धिं गमितः, तथा क्षणेन उत्सवेन समं ततः परिपूर्णश्र, एतादृशः स स्मरानलः कामाि: समन्ततः सर्वतोभावेन तां पूर्वानु- भूताम ते निर्षृति परमानन्दम् न अपाकरोति किम् ! कि त्वं मानसमुपचितेन कामेन न सन्ताप्यसे ? अतो मानं विहाय पतिमनुचर्त्तस्वेति सख्या अनुरोधः ॥६२॥ हिन्दी-हे कमलनयने, हे नीरसहदये, मान करनेसे बढ़ा हुआ और उत्सवोंसे परिपूर्ण यह कामानल उस तुम्हारे पूर्वानुभूत परमानन्दको क्षति नहीं पहुँचाता है? क्या मान करनेसे तुम्हारी रतिको बाधा नहीं हो रही है ? अतः मान छोड़कर अपने प्रियतमका अनुवर्त्तन करो। इस उदाहर णमें तृतीय-चतुर्थ चरणोंका अभ्यास है॥ ६२॥ प्रभावतोनाम न वासवस्य प्रभावतो नामन वा सवस्य। प्रभावतो नाम नवासवस्य विच्छित्तिरासीध्वयि विष्टपस्य ॥ ६३ ॥ पादत्रयाभ्यासमुदाहर्तुमुपक्कममाण: प्रथमं प्रथमपादत्रयाभ्यासमुदाहरति-प्रभावत इति। हे प्रभावतः स्वप्रभावातिशयेन प्रभावतः प्रभासम्पन्नस्य वासवस्य इन्द्रस्यापि नामन विनम्ताकारक, हे अनाम, नास्ति आ्रमः रोगो यस्य तत्सम्बोधने अनामेति पदम्, त्वयि श्रीकृष्णेऽतः विष्टपस्य जगतः प्रभी पालके सति न वासवस्य नित्यनूतन- सुराया: सवस्य यज्ञस्य वा विच्छित्ति: विच्छेदो नासीत्। यादवानां सुरापानं धार्मिकाणं यक्ञकर्म च निर्वाधं प्रवर्सतेस्मेत्यर्थः । श्रीकृष्णस्तुतिरियम् ॥ ६३ ॥ हिन्दी-अपने प्रभावसे प्रभावशाली इन्द्रको भी नम्र करनेवाले, तथा सवथा नीरोग भगवान् भीकृष्ण, आपके नगतप्रभु होनेपर यादवोंके नवासव-नवीन मध्यका तथा धार्मिकोंके यज्ञका कभी विच्छेद नहीं हुआ। इस उदाहरणके प्रथम तीन चरणोंका अभ्यास हुआ है॥ ६३ ॥ परंपराया बालवारणानां परं पराया बलवारणानाम्। धूली: स्थली्ष्योम्नि' विधाय रुन्धन् परं पराया बलवा रणानाम् ।६४। प्रथमद्वितीयचतुर्थपादाभ्यासमुदाहरति-परंपराया इति। बलवारणानाम् प्रबल- गजानाम् परायाः भतिवृहत्याः श्रेष्ठायाः परम्परायाः पङ्क: रणानां स्थलीः युद्धभूमीः म्योम्ि आाकाशे धूली: धूलिरूपा: विधाय कृत्वा बलेन स्वसामर्थ्येन शत्रून वारयतीि बलवाः त्वम् परं श्रेष्ट परं शत्रुं रुन्धन् अवरुष्य निगृह्न परायाः निर्गतः। गजसेनया युद्धभूमो घृहद्रजः समुत्याप्य स्वपराक्रमेण शत्रूनवरुन्वँसत्वं रणस्थलान्निर्गत इत्यर्थः ।६४॥ हिम्दी-प्रबल गजसेनाकी बढ़ी पज्ञिके द्वारा युद्ध भूमिको आकाशमें धूलिके रूपमें परिणत १. ब्येमि।

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तृतोय: परिच्छेद: २४७

कर के और आत्मसामथ्यसे शत्रुको निवारित करनेवाले आप बड़े-बड़े शशुओोंको रोककर निगृहीत करके युद्धस्थलसे निकल गये। इस उदाहरणश्लोकके प्रथम, द्वितीय और चतुर्थ चरणका अभ्यास हुआा है॥ ६४ ॥। न श्रद्दधे वाचमलज्ज मिथ्याभवद्टिधानामसमाहितानाम्। भवद्विधानामसमाहितानां भवद्विधानामसमाहितानाम् ॥ ६५॥। इदानीं पुनर्द्विंतीयपादमारभ्य चतुर्थपादपर्यन्तगतमभ्यासमुदाहरति-न भद्दधे इति। हे अलज्ज, निलेज्ज, भवद्विधानाम् भवत्सदृशानाम् जनानाम्-मिध्याभवद्विधानाम् अस- त्यार्थप्रतिपादकतया मिथ्याभवत् विधानं प्रतिपादनं यस्यास्तादृशीम्, असमाहितानाम् कुटिलसपेसमविस्ताराम् अतिवक्राम्, भवद्विधानाम् भवत् प्रतिक्षणजायमानं नवं नवं विधानं विधि: प्रकारो यस्यास्ताम् प्रतिक्षणं नूतनेन प्रकारेण प्रकटन्तीम्, वाचं न श्रद्दधे न प्रत्येमि। किंभूतानां भवद्विधानाम् इत्यपेक्षायामाह-असमाहितानाम् अप्रतीकाराणाम्, असमाहितानाम् अनुपमशत्रुभूतानाम्॥ ६५॥ हिन्दी-हे निर्लज्ज, आपके समान अप्रतीकार अथवा सदा व्यग्र रहनेवाले असमाहित, एवं अनुपम शत्रुभूत असमाहितजनकी मिथ्याभवद्विधान-असत्यार्थपतिपादक, असमाहितान कुटिल सर्पवद्धिस्तार (अतिवक्र) एवं भवद्विधान प्रतिक्षण नूतनप्रकारके वचनोंपर में श्रद्धा नहीं रखता हूँ। इस श्रोकके द्वितीय-तृतीय चतुर्थ पादमें अभ्यास है। यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि इस श्रोकसे पूर्व प्रथमतृतीयचतुर्थपादाभ्यासका उदाहरण देना प्रकरण-प्राप्त था, जो नहीं है। मालूम पड़ता है वह क्रोक त्रुटित हो गया होगा। किसी भी टीकाकारने उसकी व्याख्या नहीं लिखी है, इससे यह भी पता लगता है कि वह श्रोक बहुत पहले ही त्रुटित हो गया था॥ ६५॥ सन्नादितोमानमराजसेन सन्नाहितोमानम राजसेन। सन्नों हितोमानमराजसेन सन्नाहितो मानम राजसे न ॥६६ ॥ पादचतुष्टयाभ्यासमुद/हरति-सन्नाद्दितोमानेति। हे अनम अनम्रीभूत, तथा आहितोमानमराजसेन, (न नमन्तीति अनमाः द्विजाः तेषां राजा चन्द्रः अनमराजः, उमा च अनमराजश्चोमानमराजौ, आहितौ अक्क शिरसि च धृतौ उमानमराजौ येन सः आहितोमानमराजः तेन शिवेन सेनः सस्वामिक: शव इत्यर्थः, तत्सम्बोधने शहितोमान- मराजमनेति) सन्नाहित, सभ्नाः विनष्टाः अरहिताः शत्रवो यस्य तथाभृत, उमानम पार्षती- नमस्कारकर्त्त:, राजसेन राजसानां क्षत्रियाणाम् इन श्रेष्ठ, अ्रमराजसेन देवक्षेपकसन्यसम- न्वित, एतादृशनृपते, त्वं सन् ना उत्तमः पुमान हितः सर्वभूतहतकारी, अमान अ्तिमह्दान् सन्नाहित: युद्धार्थ कृतकवचादिधारणः सनन मा राजसे न शोभसे इत मा नहि, 'दवौ नमौ प्राकृताथ गयमत' इत्युक्त्या राजसे एवेति प्रतीयते॥ ६६ ॥ हिन्दी-हे अनम (किसीके सामने नहीं झुकनेवाले ) आहितोमानमराजसेन-उमा. और द्विजराजको रखनेवाले शिवजीसे सनाथ अर्थात् शिवभक्त, सन्नाहितविनष्टशत्रो, उमानम- पार्वतीनमस्कर्त्ता, राजसेन-क्षत्रियश्रेष्ठ अमराजसेन-सैन्यद्वारा अमरोंको मी परास्त करनेवाले १. सनामितो।

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२४८ काव्यादर्श:

नृपवर, आप उचमपुरष तथा सर्वहितेषी हैं, आप अतिमहान् है, जाप जब युखार्थ सन्राहादि भारण करते हैं तब नहीं शोमते है ऐसी बात नहीं है, अर्थात बहुत शोभाश्ाळी लगते हैं ॥ ६६ ।। इस मदाइरणलोकके बारो चरणोंका अभ्यास है। ६६ ।। सकद्द्िखिम्र योऽभ्यास: पादस्यैवं प्रदर्शितः। छोकवयं तु युकार्थ ग्ोकाम्यास: स्मृतो यथा ॥ ६७ ।। ोकावृत्तियमकप्रमेदमाह-सकृदिति। एवम् प्रोक्तप्रकारेण पादस्य चरणस्य सकृत् एकषा, द्वि: दविवारम् त्रिः वारत्रयम् व यः अभ्यास: आवृत्ति: सः प्रदर्शितः। तत्र सककदभ्यासः पादद्वयगतः, द्विरभ्यासः पावत्रयगतः, त्रिरभ्यासय पादचतुष्टयगत इति बोध्यम्। युककार्थम् परस्परसम्बद्धार्थम् एकवाक्यतापन्नम् श्लोकद्वयं तु श्लोकाभ्यासः स्मृतः, यथेत्युदाहरणोपक्रमे, श्लोकाभ्यास उदाहरिष्यत इति भावः ॥।६७ ।। हिन्दी-पादका एक बार दो बार तथा तीन बार अभ्यास अबतक बताया गया, एक बारका अम्यास पाददयगत होता है, दो बारका अभ्यास पादत्रयगत होता है, और तीन बार का अम्यास पादचतुष्यगत होता है, इन सभी प्रभेदोंके उदाहरण दिये जा चुके हैं। परस्पर- सम्यदधार्षक-एकवाक्यतापत्र दो समानानुपूर्वीक कोकको ही करोकाभ्यास कहा गया है, उसका उदाहरण दिया जा रहा है। ६७ ।। विनायकेन मवता वृत्तोपचितवाडुना। स्वमित्रोद्धारिणा भीता पृथ्वी यमतुलाश्रिता ॥। ६८ ।। विनायकेन भवता पुत्तोपचितवाडुना। स्वमित्रोद्धारिणामीता पृथ्वीयमतुलाश्चिता॥६९ ।। श्लोकाभ्यासमुदहरति-विनायकेनेति। अत्र ममानानुपुर्वीके श्लोकद्वये प्रथमेन वर्णनीयस्य राज्ः शत्रूणां दशा वर्ष्यते, अपरेण व राज्ः स्तुतिः करिष्यते। तत्र प्रथम- स्यार्थों यथा-बिनायकेन नियामकशून्येन वृत्तोपचितबाहुना-वृत्ती संजातौ उपचितं चितासमीपे बाडू यस्य तथाभृतेन चितासमीपगतबाहुयुगलेन नष्टप्रायबाहुनेति भाषः । स्वमित्रोद्धा स्वं घन मित्राणि च उज्महातीति स्वमित्रोद्धास्तेन धनमित्रत्यागिना भीता भियम् एतीति भीत् तेन भयशालिना भरिणा शत्रुणा पृथ्वी विशाला यमतुला रणपराङ्- सुखानां क्षत्रियाणों दण्डनाय तप्तायोनिर्मिता तुला लोकप्रसिद्धा आाश्रिता भारूढा । नियामक- मुर्यशून्यो नष्टप्रायबाहुष्य धनमित्रत्यागी तव रिपुर्यमतुलामारूढ इति भावः ॥६८ ॥। द्वितीयस्थार्थो यथा-विनायकेन विशिष्टनेत्रा वृत्ती वसुलाकारी उपचितौ पुष्टस्थूलौ व याहू यस्य तेन यथोकेन, स्वमित्रोद्धारिणा निजमित्रोद्धारकरेण सु-अमित्रविनाशकेन च भवता थ आाश्रिता स्ववरो कृता इयं पृथ्वी भूमि: अतुला अनुपमा सभीता भयशून्या च जातेति शेष: ॥६१॥ हिन्दी-बिना नियामकके होनेसे अस्तव्यस्त, चिताके पास प्रहुँचे हुएके समान नष्टप्राय बाहुवाळे, धन तथा मित्रका त्याग करनेवाले, एवं भययुक्त आपके शङ्डु विशाल यमतुलापर आरुद़ हो गये। (युद्ध-पराकमुस लोगोंको दण्डित करनेके लिये गरम लौइशलाकाओंसे बनी सुकका वमतुका नाम दण्डनीति-प्रसिद्ध है) यह अर्थ शत्रुपरक हुआ।। ६८ ।। १. बमुकार्य ।

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तृतीय: परिच्छेद. २४६

समीचीन नेता, बर्तुलम्थूलबाडुशाली, अपने सु अमित्रोंको नष्ट करनेवाले आपसे अभिकृत यह पृथ्वी अनुपम तथा मयरहित हो गई है। यह राजपरक अर्थ है। इन दोनों अर्थोंका एकवाक्यत्व-परम्परसंबद्धत्व हो जाता है, अतः इन दोनों फोंकोंको मिला कर शोकाभ्यास थमकका उदाहरण हुआ ॥ ६९॥ एकाकारचतुष्पादं तम्महायमकाळयम्। तंत्रापि दश्यतेऽभ्यास: सा परा यमकक्रिया॥ ७० ॥ महायमकमुपवर्णयति-एकाकारेति। एकाकारचतुष्पार्द समानानुपूर्वीकपादचत्र- ष्टयम् तत् महायमकाह्यम् महायमकनामकं भवति, तत्रापि तत्र पादमध्येऽि भभ्यासः आवृत्ति: दृश्यते, अत एव सा यमकक्रिया महायमकनिर्माणं परा उत्कृष्टा, अत्यन्तकष्ट- सम्पाद्यति भावः।। ७०॥। हिन्दी-एक समान चारो चरण होनेपर महायमक नामक होता है, उसमें पाद-मध्यमें भी आवृत्ति हो सकती है, वही यमककी पराकाषा मानी जाती है। इससे पहले 'सन्नादितोमानमराजसेन' इत्यादि क्रोकमें (तृती० ६६) जो पादचतुष्टय यमक है उसके पादमध्यमें अभ्यास नहीं होता है, इस महायमकमें पादमध्यमें भी अभ्यास होता है, अतः यह उससे भिन्न नामान्तर प्रकाश्ययमकभेद माना जाता है॥। ७० ॥ समानयासमानया समानयासमानया। स मा न यासमानया समानयासमानया ।। ७१।। महायमकमुदाहरति-समानयेति। समानया, असमानया, समानयाससमानया, सः, मा, न, या, असमानया, समानय, भसम, अनया इति पदच्छेदः। हे असम निरुपम (सखे), सः त्वम् मा मामू समानं यासस्य आयासस्य खेदस्य मानं परिमार्ण यस्यास्तथाभूतया समदुःखया समानया मानमहितया असमानया निरुपमया अनया न यिक्रया समानया मेलय, (ननूपेच््यतां सातिकोपनेति चेतत्ाह-) या सा नायिका मा लक्षमी: शोभा नयः विवेकक्ष मानयौ ताभ्यां सहिता समानया न समानया असमा- नया न भवतीति शेष:, सा हि सुन्दरी विवेकशालिनी च अतो नोपेक्षामर्हति, अतो मां तया सह समानयेत्यनुरोधस्यौचित्यमिति। अस्य छोकस्येकाकारचतुष्पादत्वं पादमध्येऽपि चावृत्तिमत्वमिति महायमकमिदम् ॥७१॥ हिन्दी-हे मेरे निरुपम मित्र, समदुःखशील।, मानशालिनी, निरुपमसौन्दर्या, इस नायिकासे मुझे मिला दो, जो शोभा तथा विवेकसे शून्या नहीं है। इस उदाहरणके चारो चरण एकाकार है, और प्रत्येक चरणोंमें भी आवृत्ति होती गई है, अतः यह दुष्कर महायमकका उदाहरण है॥ ७१ ॥ धराधराकारघरा धराभुजां भुज्ञा मही पातुमहीनविक्रमाः। कमात् सहन्ते सहसा हतारयो रयोदुरा मानधुरावलम्बिनः । ७२॥ यमकनिरूपणप्रकमे 'अत्यन्तबह्वस्तेषां मेदाः संमेदयोनयः' इत्युकं, तेषु संभेदयो- निषु भेदेषु सजातीयमिश्रणजनिता यमकप्रभेदा उदाहता: सम्प्रति विजातीयमिश्रणजनितं

१. तस्यापि। २. विक्रमाव।

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२५० काव्यादश:

भेदमुदाहरति-घराधरेति। धराधराकारधरा: पृथ्वीधारकशेषनागाकारधारिण: अ्रह्ीन- चिक्रमाः अन्यूनपराक्रमाः सहसा हतारयः मारितशत्रवः रयोद्गुराः उत्कटवेगाः मान- धुरावलम्बिनः अभिमानपूर्णाः धराभुजां राजां भुजाः बाहवः क्रमात् पूर्वजक्रमेण महीं पृथ्वीं पातुं रक्षितुं सहन्ते समर्था भवन्ति। अत्र 'धराधराकारधराधग' इत्यव्यपेतव्यपेत. यमक्म्, 'भुजां भुजे'ति सन्दष्ट्यमकम्, 'महीं पातुमही' इति 'सहन्ते सहसा' इति च व्यपेतयमक्म्, 'रयोरयो' इति अव्यपेतयमक सन्दष्टयमकं च, 'धुरा मानधुरा' इति व्यपेत- यमकम्। एवमत्र बहुप्रकाराणां यमकानां संभेदो बोध्यः॥ ७२॥ हिन्दी-पृथ्वी धारण करनेवाले शेषनागके समान दीर्घ, पीन, अन्यूनपराक्रमशाली, हठाव शश्रुसंहारक तथा उत्कट वेगशाली राजाओंके भुजगण ही इस पूरी पृथ्वीका धारण कर सकते हैं, जिस प्रकारसे उनके पूर्वज करते आये है। इस उदाहरणक्लोकमें बहुत प्रकारके यमकोंकी संसृष्टि है, जैसे 'घराधराकारधरा धरा' यह अग्यपेतव्यपेतयमक है, 'भुजां भुजा' यह सन्दष्टयमक है, 'महीं पातुमही' यह और 'सहन्ते सहसा' यह व्यपेतयमक है, 'रयो रयो' यह अव्यपेतयमक और सन्दष्टयमक है, 'धुरा मानधुरा' यह व्य- पेतयमक है। यमकनिरूपणके प्रारम्भमें यह बात कही गई थी कि उक्त यभकोंके संमिश्रणसे बहुत अधिक भेद हो सकते हैं-'अत्यन्तबह्वस्तेषां भेदाः संभेदयोनयः' तदनुसार सजातीय यमकोंके सम्मिश्रणमें संभवी नेदोंके उदाहरण इससे पूर्व दिये गये थे, यह विजातीय यमकोंके मिश्रणका उदाहरण दिया गया है॥ ७२॥ आवृत्ति: प्रातिलोभ्येन पादार्घश्लोकगोचरा। यमकं प्रतिलोमत्वात् प्रतिलोमेमिति म्मृतम् ॥७३॥ प्रतिलोमयमकनिरूपणमुपक्रमते-आवृत्तिरिति। प्रातिलोम्येन विपरीतक्रमेण पाद: एकक्षरणः, अर्धम् श्लोकार्घम्, श्रोकः सम्पूर्णपद्यं च तद् गोचरा तद्विषया आवृत्ति: अभ्यास: प्रतिलोमत्वात् (विपरीतक्रमेण वर्णाभ्याससद्भावात्) प्रतिलोमम् इति स्मृतम् प्रतिलोमयमकनाम्रा उक्त्म्। एवं च पादप्रतिलोमयमकम्, अरधप्रतिलोमयमकम्, छोक- प्रतिलोमयमकं चेति त्रयः प्रतिलोमयमकप्रकाराः ॥ ७३॥ हिन्दी-इससे पहले जो यमकके प्रभेद कहे गये हैं उनमें अनुलोम आवृत्ति होती थी, अब प्रतिलोम आवृत्तिमूलक प्रतिलोम यमकका निरूपण करते हैं। प्रतिलोम-उल्टी वर्णावृत्ति होनेसे प्रतिलोमयमक नाम पड़ा है। यह तीन प्रकारका है, पादप्रतिलोमयमक, अर्धप्रतिलोमयमक एवं श्लोकप्रतिलोमयमक। पादप्रतिलोमयमकमें पूर्वपादको उल्टा लिखकर दूसरा पाद बनाया जाता है, अर्धप्रतिलोम- यमकमें पूर्वार्धको ही उलटा लिखकर उत्तरार्ध बनाया जाता है और इलोकप्रतिलोमयमकमें एक इलोकको उलटे क्रमते लिखकर दूसरा श्लोक बना लिया जाता है। इन तीनोंके उदाहरण क्रमशः दिये जाते हैं॥ ७३ ॥ यामताश कृतायासा सा याता कुशता मया। रमणारकता तेम्तु स्तुतेताकरणामर।।७४।। पादप्रतिलोमयमकमुदाहरति-यामतारेति। अ्मते अनिष्टे परनायिकाप्रसके १. यमकप्रति। २. लोम्यमिदं।

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तृतीय: परिच्छेद: २५१

आाशा यस्य सोऽमताशस्तत्संबोधने हे अ्रमताश, या कृतायासा दुःखप्रदा कृशता विरह- प्रतीक्षादिकृता दुर्बलता सा मया याता प्राप्ता, (त्वद्विरहकष्ट मयानुभृतमेव), हे स्तुतेत अस्तुत्य, निन्धाचरण, अकरणे अकार्यकरणे अमरवदप्रतिबन्ध=अकरणामर, हे रमण, ते तव आरकता इतो गन्तृत्वम् अस्तु। त्वमितो गच्छेति विवक्षा। अत्र प्रथमपादस्य विलोमावृत्त्या द्वितीयपादः, तृतीयपादस्य च विलोमाषृश्या चतुर्थपादः संपाद्यत इति प्रति- लोमयमकमिदम्। तदपि च पादगतम्॥ ७४॥ हिन्दी-अनिष्ट परनायिकाप्रसङ्गमें आशा रखनेवाले मेरे प्रिय, दुःखदायिनी विरहकृत दुर्बलंता में पा चुकी (आपके वियोगमें प्रतीक्षामें जो कष्ट भोगने थे, मैने भोग लिए), ह निन्ध- चरित, अकार्य करनेमें देवोंकी तरह अप्रतिबन्ध मेरे रमण, अब आप यहाँ से चले जाइये। अन्यनायिकासक्त नायकके प्रति नायिका फटकार बता रही है। इस उदाहरणश्लोकमें प्रथम चरणको उलटाकर दुहरा देनेसे द्वितीय चरण एवं तृतीय चरणको उलट।कर दुहरा देनेसे चरम चरण बन गया है, अतः यह पादगत प्रतिलोमयमकका उदाहरण हुआ॥ ७४॥ नादिनोमदना घी: स्वा न मे काचन कामिता। तामिका न च कामेन स्वाधीना दमनोदिनो। ७५॥ श्लोकार्धप्रतिलोमयमकमुदाहरति-नादिन इति। नादिन: नादब्रह्मध्यानपरस्य मे मम साधकस्य अमदना कामविकारवर्जिता स्वा स्वीया घीः स्वाधीना आत्मवशा, अतः काचन कामिता विषयाभिलाषुकता न, अस्तीति शेष:, तथा दमनोदिना इन्द्रियनिभ्रहा- पनयनक्षमेण कामेन विषयाभिलाषेण हेतुभूतेन तामिका ग्लानि: नास्ति। कस्यचिद्योगिनः स्वावस्थानिवेदन मिदम्।श्रत्र पूर्वार्द्धस्य विपरीतपाठेन द्वितोयार्धस्य निर्मितिरिति श्लोका्धे- यमकमिदम्। अत्रानुलोमपाठकाले मदनाधीः स्वा इत्यत्र धीपदोत्तरं विसर्गश्रुतिः, प्रतिलोमपाठ काले तु सा नास्तीति वैगुण्यं यमकेऽत्र दोषाय न जायते, 'नानुस्वारविसगौं च चित्रभन्ञाय सम्मतौ' इत्याचायैः स्वीकारात्॥७५॥ हिन्दी-अनादहतनादस्वरूप ब्रह्मके ध्यानमें रत मुझ साधककी कामविकारशून्या अपनी बुद्धि अपने अधीन है, अतः किमी प्रकारकी विषयवासना नहों होतो है, और इन्द्रिय-निग्रहको दूर करनेवाली विषयतृष्णाके कारण ग्लानि भी नहीं होने पाती है। किसी साधक योगीका यह स्वावस्थानिवेदन है। इसमें पूर्वार्द्धका प्रतिलोमाभ्याप करके उत्तरार्ध बना लिया गया है, अतः यह इलोकार्थ प्रति- लोमयमकका उदाहरण हुआ॥ ७५॥ यानमानयमाराविकशानानजनाशना। यामुदारशताधीनामायामायमनादिसा ॥७६॥ सा दिनामयमायामा नाघीता शरदामुया। नोशनाजनना शोकविरामाय न मानया ॥। ७७॥। (इति यमकचक्रम् )

१. दमना। २. मदनोदिना। ३. जनासना। ४. नासना।

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२४२ काव्यादर्श:

लोकगोचरं प्रतिलोमयमकमुदाहरति-यानमानेति। ह्वारभ्यां श्लोकाभ्याम्, अनयोः श्लोकयोर्थः सहैव भवतीति तदन्वयोऽपि सहैव, तत्रान्वयो यथा-उदारशता- धीनां याम् आायाम् भमुया शरदा भधीता सा यानमानयमाराविकशा ऊनानजनाशना आायमनादिसा दिनामयमा अयामा नाशनाजनना मानया शोकविरामाय न न । भयमर्थ :- उदारशताधीनाम् बहुधनदायकजनगणवशगतामपि याम् गणिकाम् (सौभाग्य- वशेन अ्हम्) भयाम् प्राप्तवान्, तथा या अमुया शरदा शरत्कालेन भधीता आक्रान्ता उत्पन्नमदना विद्यत इति शेष:, सा यानमानयमाराविकशा-याने कामिजनविजयप्रयाणे यो मान: अभिमान: तं यातीति यानमानयाः एतादृशो यो मारो मदनः स एव अविः मेष: तस्य कशा ताडनी-विजययात्रासाभिमानमदनवशीकारसमर्थेत्यर्थः, ऊनानजनाशना-ऊनः स्वल्पः अनः प्राणः सामथ्य येषान्ते ऊनाना: स्वल्पसामर्थ्यशालिंन: ये जनाः तान् अश्नाति सर्वस्वापहारद्वारा समापयति या सा तयोक्ता-स्वसपप्राणतया चपलानां जनानां वित्तापहरणक्षमेत्यर्थः, आयमनादिसा-आयमनम् इन्द्रियनिभ्रहः आदिर्येषां तेषाम् भायम- नादिसमाधिसाधनानाम सा कृशताकारिणी-यमनियमादिविघ्नकरी, दिनामयमा दिनं दिवसमामयं रोगमिव मिमीते जानाति दिनं कामभोगपन्थितया रोगमिव मन्यमाना, भयामा-अयस्य शुभावहस्य विधेः अमतीति अमा आपिका प्राप्त्री शुभान्वितेत्यर्थः, नाशनाजनना-नाशनं कामिजनानां विनाशमाजनयतीति नाशनाजनना, मानया सत्कार- गामिनी शोकविरामाय मदीयशोकसमापनाय न इति न, सा मम शोकमवश्यमपनुदेदिति भाव: । कश्ित् कामी स्वोपभुक्तपूर्वां गणिकां स्तौति॥। ७६-७७।। हिन्दी-बहुतसे उदार पुरुषोंके वशमें रहनेवाली जिस गणिकाको मैंने सौमाग्यसे पा लिया था, जो शरद्की कामुकतासे आक्रान्त है, ऐसी वह कामिजनविषयप्रयाणमें साभिमान काम रूप भेड़की चाुकसमान-अपने अधीन रखनेवाली, चज्रलचित्त जनोंके सर्वस्वका अपहरण करनेवाली, इन्द्रियनिग्रहादि समाधिसाधनोंको कृश बनानेवाली, दिनको कामोपभोगप्रति- पन्थितया रोग समझनेवाली, शुभान्विता, कामिजनोंके नाशको सम्पन्न करने वाली और सत्कार- भागिनी वेश्यानायिका मेरे शोकको समाप्त न करे यह नहीं हो सकता है। श्लोक-दयग्रथित इस उदाहरणश्लोकमें एक श्लोक प्रतिलेमाभ्याससे श्लोकान्तरमें परिणत हो गया है, अतः यह श्लोकावृत्तिरूप प्रतिलोमयमक-प्रभेद है॥ ७६-७७ ॥ वर्णानामेकरूपत्वं यंश्वेकान्तरमर्धयोः । गोमूत्रिकेति तत्' प्रादुर्ुष्करं तद्विदो यथा॥। ७८ ॥। इयता प्रकरणेन दुष्करान् यमकालक्कारप्रभेदान् निरूप्य अपतिदुष्करान् चित्रालङ्गारा- निरूपयिष्यन् प्रथमं गोमूत्रिकाबन्घं लक्षयति-वर्णानामिति। भर्धयोः पूर्वार्धोत्तरार्धयोः (ऊर्ध्वाधःक्रमेण लिखितयोः) वर्णानाम् एकान्तरम् एकवर्णव्यवहितम् एकरूपत्वम् समानाक्षरत्वकृतमभिन्नत्वम् तत् तादृशवर्णरचनम् तद्विदः चित्रालक्कारपण्डिता 'गोमूत्रिका' इति प्राहुः कथयन्ति। तद्धि गोमूत्रिकारूपं चित्रकार्व्यं दुष्करम् साधारणजनैनिर्मातुम- शक्यम्। इयं हि गोमूत्रिका त्रिषा-पादगोमूत्रिका, अर्धगोमूत्रिका, श्लोकगोमूत्रिका, च। तत्रेदमर्षेगोमूत्रिकाया लक्षणम्॥। ७८॥। 2. तम।

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तृतीय: परिच्छेद: २५२

हिन्दी-इससे पहले दुष्कर यमकप्रभेदों के उदाहरणादि बताये गये हैं, अब अतिदुष्कर चित्रा- लक्कारोंके उदाहरणादि बतानेके उपक्रममें गोमूत्रिकाका लक्षणादि बताया जाता है। जिसमें ऊर्ध्वाधः करमसे लिये गये वरणोंमें एकवर्णव्यवहित समानाकारता पाई जाय, उसे चित्रकाव्यके विशेषक्ञ विद्वान् अर्ध-गोमूत्रिका नामसे अभिहित करते हैं। यह गोमूत्रिकाचित्रप्रभेद अतिदुष्कर माना जाता है। यह गोमूत्रिका तीन प्रकारकी है-पादगोमूत्रिका, अर्धगोमृतिका और श्लोक- गोमूत्रिका ॥ ७८ ॥ मदनो मदिराक्षीणामपाश्गासी जयेदयम्। मदेनो यदि तत्क्षीणमनग्गायाअति ददे ॥७९॥ अर्घगोमूत्रिकामुदारति-मदन इति। भयं मदन: कामः मदिराक्षीणाम् मदघूरणिं- तलोचनानां मदिरेव मादके नयने यासां तासामिति वा भपार्जं कटाक्षावलोकनमेवार्खत्र प्रहरणं यस्य तथोक्तः कामिनीजननयनप्रहरण: यदि जयेत् मामात्मवशगं कुर्यात्, तत् तदा मदेन: मदीयं पातर्कं क्षीणम् नष्टम् (इति मंस्ये), भ्रहम् अन्ञाय कामदेवाय अज्ञलिं ददे साअलि: प्रणमामीत्यर्थः । विलासिन्यो यदि कटाक्षेण मां प्रहरेयुस्तदाऽहं कृती स्याम्, तथा भावश्च वन्दर्पकृपामात्रसाथ्योऽतस्तामर्जयितुमहं कन्दप प्रति प्रणतोऽस्मी- त्याशय:। ७९॥ हिन्दी-मदमत्त नेत्रशालिनी रमणियोंके कटाक्षरूप अस्त्रवाला कामदेव यदि मुझे जीत ले, रमणियों के अधीन बना दे, तो मैं समझूंगा कि मेरे पाप क्षीण हो गये, इसी मनोरथसे मै कन्दर्पको साअलि नमस्कार किया करता हूं। इस उदाइरणके पूर्वार्द्ध एवं उत्तरार्धके विषम वर्ण समान है, इस अर्धगोमूत्रिका को पढ़नेका क्रम यह है कि इस इलोकके उत्तरार्थका पहला अक्षर पहले पढ़े, फिर पूर्वा्द्धका दूसरा अक्षर पढ़ें. अनन्तर उत्तरार्ध का तीसरा फिर पूर्वार्द्धका चतुर्थ अक्षर पढ़ें, इसी करमसे पढ़ते जानेपर पूर्वार्धं निकल जायगा, इसी प्रकार पूर्वार्ध प्रथमाक्षर के बाद द्वितीयार्धका द्वितीयाक्षर पढ़ें, फिर प्रथमार्धका तृतीयाक्षर अनन्तर द्वितीयार्धका चतुर्थ अक्षर पढ़े, इसी प्रकार ऊर्ध्वाधःकोणस्थ अक्षगेंको पढ़ते जाने पर उत्तरार्व भी निकल जायगा। जिस उदाहरणमें समव्णोंकी एकरूपता हो, उसमें पूर्वार्द्धके प्रथमाक्षर से ही पढ़ना प्रारम्भ करें, बादमें उत्तरार्धका द्वितीयाक्षर कहें, फिर पूर्वार्थका तृतीयाक्षर इसी तरह बदल कर पढ़ते जानेसे पूर्वार्ध और उत्तरार्धके प्रथमाक्षरसे प्रारम्भ करके बदल-बदलकर पढ़ते जानेपर उत्तरार्ष निकल जायगा। उदाहरण लीजिये- 'अजरामशुमाचार बलिशीलविनोचिता। भुजङमनिभासार कलिकालजनोचिता।' इस श्लोकके द्वितीयादि समवणोंमें एकरूपता है। यहाँ तक अर्धगोमूत्रिका का वर्णन हुआ। पादगोमूत्रिकाका उदाहरण निम्नलिखित है- 'काकूक्षन् पुलोमतनयास्तनताडितानि वक्ष:स्थलोत्थितर याश्ननपीडितानि। मायादपायभयतो नमुचिम्रहारी मायामपास्य भवतोऽम्युसुचां प्रसारी।।' इस इ्लोकको चार पङ्कियोंमें लिखिए, प्रथम द्वितीय चरणोंमें अर्धगोमूत्रिका-प्रकरणमें बताये गये कमसे अक्षर पढ़िये, प्रथम द्वितीय चरण निकल आयेंगे, उत्तरार्धमें भी अर्धगोमूत्रिकाकी हो तरह पढ़िये। १. पाङाखं। २. च क्षीणम्। १. दये।

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२४४ काव्यादर्श:

श्लोकगोमूत्रिकामें बारह पक्कियोंवाला कोष्ठक बनता है, उनमें अक्षरन्यास करके अर्धगोमूत्रि- कोक्त-क्रमद्वारा ही पढ़कर दोनों शलोक निकाले जाते हैं। उदाहरणश्लोक यों है- प्रथम इलोक-पायादश्चन्द्रधारी सकलसुरशिरोलीढपादारविन्दो देव्या रुद्धाङ्गमाग: पुरदनुजदवस्त्यानसंविन्निधानम्। कन्दपेक्षोददक्ष: सरससुरवधूमण्डलीगीतगबों दै त्याधीशान्ध केनानतचरणनखः शक्करो भव्यभाव्यः ।। द्वितीय श्लोक- देयान्नश्चण्डधामा सलिलहरकरो रूढकन्दारविन्दो देहे रुग्भङ्गरागः सुरमनुजदमं त्यागसंपन्निधानम्। मन्दं दिकक्षोभदश्री: सदसंदर वधूखण्डनागीरगम्यो दैत्येधी बन्धहानावततरसनयः शंपरो दिव्यसे्य:॥ गोमूत्रिका का बहुतसा विस्तार सरस्वतीकण्ठाभरणमें दिया गया है, वहाँ ही देखें। ऊपर दिये गये उदाहरणश्लोकोंके चित्र सामने (पृ. २५५ पर ) देखें। गोमूत्रिका नाम इसलिये रखा गया कि चलते हुए बैलके मूत्रपातसे जिस तरह भूमिपर बहु- कोणयुक्त ऊपर नीचे रेखायें बनतीजाती है, उसी तरहकी रेखाकृति इसमें भी बनाई जाती है ॥७९॥ प्राहुरर्घभ्रमं नाम श्लोकार्धभ्रमणं यदि। तदिष्टं सर्वतोभद्रं भ्रमणं यदि सर्वतः ।। ८० ।। अर्धश्रमं सवतोभद्रं च लक्षयति-प्राहुरिति। यदि श्लोकार्धभ्रमणं श्लोकत्य तत्पादानां वा अरधमार्गेण भ्रमणं तदा अर्धश्रमं नाम चित्रं प्राहुः, अनुलोमभ्रमणेन पादोप- स्थितावर्धभ्रमो नाम चित्रभेद इति पूर्वार्द्धार्थः। यदि सर्वतः अनुलोमप्रतिलोमाभ्यां श्लोक- पादानां भ्रमणं तदा तत् सर्वतोभद्रं नाम चित्रमिष्टं कविभिरिति शेषः ॥ ८० ॥ हिन्दी-इस कारिकामें अर्धभ्रम और सर्वतोभद्रनामक चित्रभेदोंके परिचय दिये गये हैं, अर्धभ्रम उसे कहते हैं जिसमें श्लोकका-बन्धाकारलिखित शलोकपादका अर्धमार्गसे अर्थात् अनु- लोमपाठ और प्रतिलोमपाठमें केवल अनुलोमपाठसे भ्रमण-भ्रमणद्वारा पादोत्थान होता हो। सर्वतोभद्र उसे कहते हैं जिसमें सर्वंतोभ्रमण-अर्थात् अनुलोमप्रतिलोम उभयविध भ्रमणसे पादोत्थान हो जाता हो। चित्रमें उदाहरण स्पष्ट है। इन दोनों चित्रोंमें वर्णसन्निवेशप्रकार यह होता है। यह बन्ध चौसठ कोष्ठोंमें लिखे जाते हैं, इनके लिये अष्टाक्षरवृत्त ही उपयुक्त हैं। आठ- आ.5 कोषठवाली आठ पक्कियाँ बनाइये, उनके प्रथमपक्गिचतुष्टयमें श्लोकके चारो चरण सीधे लिख लीजिये, इसके बाद नीचेकी चार पङ्ियोंमें चतुर्थ तृतीय द्वितीय प्रथम इस क्रमसे उन्हीं श्लोक चरणोंको लिखिये, इसी तरह दोनों बन्ध लिखे जायेंगे। अर्धभ्रमके अधःस्थित पङ्ञिचतुष्टयमें लौटकर चतुर्थादिचरण लिखे जायेंगे, और सर्वंतोभद्रमें लौट-लौटकर या बिना लौटे भी चतुर्थादि- चरण लिखे जायँगे, यही अन्तर है। यह तो हुआ वर्णसन्निवेशप्रकार, इनका उद्धारप्रकार यह है कि अर्धभ्रममें ऊपरवाली पक्ञियोंमें वामभागसे दक्षिणभागकी ओर, और नीचेवाली पज्ञियोंमें दक्षिणभागसे वामभागकी ओर एवं बाममागके ऊपरवाले कोछ्ठसे नीचे क्रमसे दक्षिणभागस्थ नीचेके कोछसे कपर कमसे अनुलोमोच्चारण करते जानेसे प्रथमादि श्लोकचरण निकलते जाते हैं। सर्वतोमद्रमें वामभागसे दक्षिणभागकी ओर अथवा दक्षिणभागसे वामभागकी ओर ऊपरसे नीचे अथवा नीचेसे ऊपर उलटा या सीधा किसी तरह आवर्त्तन करनेपर श्लोकके चरण निकलते जाते हैं। (अर्धभ्रम और सर्वंतोभद्र चित्र पृ० २५६ पर देखें) ॥। ८० ॥

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तृतीय: परिच्छेद:

अ रा शु व गी वि ज म भा र लि ल नो

भु नि सा क क ज चि

श्लोक टीका ३।७९

कां म न स्त पी ता

लो त या न डि नि

व स्थ र

पा द य य चि हा

या पा म तो मु प्र री

गा म स्य व म्तु चा सा

श्लोक टीका ३१७९

पा री क सु ली पा नदो

या धा स ल र रो दा वि

दे ण्टू मा लि इ रु क -टो

न्या हदा ना पु द ज व न वि धा

हे ग र सटया स त्रि र नु नम्

गम रा सू म ज मं ग धा A

र्द द र सु व म ली न

स स र गी क्षो ग

श्री र इ्यो म म द ना

न्या

घी ना र न रो न्य शय

हा

श्लोक टीका २१७९

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२४६ काव्यादर्श:

म नो भ व न वा नी कं

नो द या य न मा नि नी

भ या द मे या मी मा वा

य मे नो म या न त

या नो व

वा भ

नी नि मा या नो

नी व म

॥ अधभ्मः ॥ इलो. टी. ३।८०।। वा

सा मा या मा मा या मा सा

मा रा ना या या ना रा मा ॥। गोमूत्रिका ।।

या ना वा रा रा वा ना या

म या श मा मा रा या मा

म या रा मा मा रा या मा

या ना ब्रा रा रा वा ना या

म रा ना या या ना रा मा

सा मा या मा मा या मा सा

॥ सर्वतो भद्रम्॥ रलो.टी. ३८०।

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तृतीय: परिच्छेद: २४७

मंनोभव तवानीकं नोदयाय न मानिमी। भयादमेयामा मा वा वयमेनोमया मत ।। ८१॥ अर्धभ्रममुदाहरति-हे नत कामिवन्दनीय, मनोभव मदन, तब भनीकम् सैन्मस्वरूपा मानिनी इयं ग्रहिला नायिका उदयाय न इति न, अवश्यमेव विजयसाधनमियमिति भाव:। वयम् एनोमयाः कृतापराधतया पापिनः मा वा नैव, न वयमपराद्ा:, परन्तु भयात् त्वदीयमानिनीरूपसेनाभयात् अमेयामाः अपररिमितपोडायुक्त: (अतः इमां मद्वशबर्तिनी कुरुष्वेति योज्यम्)॥। ८१ । हिन्दी-हे कामि जनवन्दितं कामदेव, तुम्हारी यह कामिनी स्वरूपसेना उदयके लिए नहीं होगी यह बात नहीं है, मैंने कुछ भी अपराध नहीं किया है, फिर भी भयसे अपरिमित पीढ़ाका

सकूँ) ॥। ८१ ॥ पात्र हो रहा हूँ, (अतः इस मानिनीको मेरे वशमे कर दो जिससे निर्भय तथा सुखी होकर रह

सामायामा माया मासा मारानायायाना रामा। यानावारारावानाया मायारामा मारायामा।८२॥ सर्वतोभद्रमुदाहरति-सामायामेति। शमस्य विरहज्वरस्य आयामो दैध्य यस्याः सातयोक्ता, मायाः लक्ष्म्या: अपेक्षया रामा रमणीया, मारानायायाना-मारं काम- मानयति जनयतीति मारानायं तादृशमायानम् समागमनं यस्याश्तादशी, यानावारारा- बानाया-यानं गमनसाधनं पादस्तमावृणोति वेष्टयतीति यानावारो नृपुरस्तस्यारावी ध्यननः स एव आनायः कामिजनबन्धकं जालकं यस्याः सा तथोका, मायारामा शाम्बरी- सष्टिरपा ललना अतिविस्मयकारिसौन्दर्यतया मायामयोव प्रतीयमाना रमणी मासा चन्द्रेण अमा सह माराय मम वधाय अ्स्तीति शेषः। कवित् सखायं प्रति कस्यापि कामिनः स्वावस्थाविनिवेदनमिदम्। मास्शब्दः चन्द्रपरः, 'मास्तु मसे निशाकरे' इति हेमचन्द्रकोषात् ॥।८२ ॥। हिन्दी-विरहज्वरके विस्तारसे पीड़िता, कामोत्पादक आगमनवाली, लक्ष्मीसे मी अधिक सुन्दरी, नृपुरध्वनिरूप जाकमें कामियोंको बॉधनेवाली, मायामयी वह सुन्दरी चन्द्रमाके साथ मेरे वधके लिये उद्यत है। सर्वतोभद्रका यह उदाहरण संलग्नचित्रमें उचित कमसे लिखा गया है, वहाँ देखकर उदारक्रमसे मिला लें। इस प्रकारके और बहुतसे पश्मबन्ध, मुरजबन्ध, हलबन्ध, मुसलबन्ध आदि चित्रकाय्य होते हैं, उनका निर्माण औैर उद्धार इतना कठिन नहीं है, अतः कठिनतम अर्धश्रम और सर्वतोभंद्रके ही उदाइरण यहाँ दिये गये हैं, शेष बन्धोंके उदाइरणादि सरस्वतीकण्ठाभरणमें देखें॥ ८२॥ यः स्वरस्थानवर्णानां नियमो दुष्करेष्वसौ। इष्टश्तुष्प्रभृत्येषरे दश्यते सुकरः परः॥८३॥ सम्प्रति प्राचीनाभिमतान स्वरस्यानवर्णनियमेन वैचित्र्यशालिनः शब्दालक्कारानवतार- यति-यः स्वरस्थानेति। स्वराः आकरादयः, स्थानानि कण्ठादीनि, तात्स्प्यातडृद् यानि अक्षराणि गृह्यन्ते, वर्णाय व्यजनाक्षराणि, तेषां स्वरस्थानवर्णानाम् यः नियम: नयन्त्रणम्-अ्रनेनेव एभिरेव वा स्वरेण स्वरैवा, एतत्स्थानाक्षरैर्वा, एतद्वयजनैर्वा समस्तं 7 १. मानोमव। २. प्रभृत्येषु। ₹. दृश्यते। १७ का०

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काव्यादर्श:

पर्द ग्रथनीयमित्येषंरूपो यो नियम इत्यर्थः, दुष्करेषु कविकर्मसु इष्टः अभिमतः, एषः चतु :- प्रभृति चतुरादि, चतुःस्वरः, त्रिस्वरः, द्विस्वर, एकस्वरः तथा चतुःस्थानः, त्रिस्थानः, द्विस्थान:, एकस्थान:, एवमेव चतुर्वर्णः, त्रिवर्णः, द्विवर्णः, एकवर्णः, एतादृशो स्वरस्थानवर्ण- नियमो दर्श्यते उदाहरणप्रदर्शनेन विशदते, परः पश्चषस्वरस्थानवर्णनियमस्तु सुकर: सुसम्पाद: अतो नात्र प्रदर्श्यते इति भावः ॥८३ ।। हिन्दी-प्राचीन आचार्योंने स्वरस्थानवर्णनियमकृत वैचित्र्यमूलक भी कुछ शब्दालक्कार स्वीकार किये हैं, उनको कष्टसम्पाध कहा है, उन म्वरस्थानवर्णनियममूलक कष्टसम्पाद शब्दा- रुह्ारोंमें यहाँ चार स्वर चार स्थान तथा चार वर्ण नियमवाले अलक्कारों के ही उदाहरणादि बता रहे हैं, पाँच छः स्वरस्थानवर्णनियमवाले शब्दालक्कार सुखसम्पाद्य हैं, अतः उनक। उदाहरण नहीं दिया जाता है। चतुःप्रभृति का अर्थ है चार स्वरनियम, नीन स्वरनियम, दो स्वरनियम, एक स्वरनियम, (स्वरनियमके चार भेद) चार स्थाननियम, तीन स्थाननियम, ढो स्थान- नियम, एक स्थाननियम, (स्थाननियमके, चार भेद) चार वर्णनियम, तीन वर्णनियम, दो वर्णनियम, एक वर्णनियम (वर्णनियमके चार भेद)॥। ८३ ॥ अम्नायानामाहान्त्या वाग्गीतीरीती: प्रीतीर्भीतीः । भोगो रोगो मोदो मोहो' ध्येये वेच्छेहेशे क्षेमे।। ८४ ॥ चतुःस्वरनियममुदाहरति-आम्नायानामिति। आम्नायानां वेदानाम् अन्त्या अवसानभवा वाग् उपनिषत्-गीतीः गानानि ईतीः अतिवृष्टयादितुल्याः मोक्षप्रति- बन्धिका, प्रीतीः पुत्राद्यासक्तो: भीतीः भयस्वरूपाः, आह कथयति। किश्व भोगो विषयो- पभोग: (पर्यन्ते ) रोग: रून्तापप्रदः, मोदः सांसारिकमुखास्वादश्व मोहः अविवेकरूपः, अतः ध्येये ध्यारतुं योग्ये भगवन्वरणे वा एव क्षेमे निरुपद्रवे देशे एकान्तस्थाने इच्छेत् भ्यातुमभिलष्येदित्यर्थः । अत्र आ-ई-ओ-ए इति चतुर्भिरेव स्वरः पद्यमुपनिबद्धमिति स्वरनियमे चतुःस्वरनियमोदाहरणमिदम्॥८४॥ हिन्दी-बेदोंके अन्तभाग उपनिषद्ने गीत को ईति-विघ्नवाधारूप, पुत्राधयासक्तिको भीति- स्वरूप कहा है और भोग अन्तर्में रोगरूप, सांसारिक सुखास्वाद अविवेकस्वरूप सिद्ध होते हैं अतः ध्यान करने योग्य हरिचरणोंको एकान्त स्थानमें ध्यान करें। इस उदाहरणमें आ-ई-ओ-ए यही केवल चार स्वर व्यवहृत हुए हैं, अतः यह स्वरनियम- प्रमेदमें चतुःस्वरनियमका उदाहरण हुआ।। ८४।।

उठ रुरमुर्गुरु बुधुयुंधि कुरवः स्वमरिकुलम् ॥ ८५॥ त्रिस्वरनियममुदाहरति-सिवीति। क्षितेः पृथिव्याः विजितिःस्वबशीकरणम्, स्थितेः मर्यादाया: विहिति: प्रतिष्ठापनम्, एतदेव वतं नियमस्तत्र रतिरनुरागो येषां ते तथोक्ताः परमतयः उत्कृष्टमुद्धय: कुरवः पाण्डवा: युधि समरे उरु विशालं स्वम् स्वीयम् भरिकुलम् शत्रुवर्गम् दुर्योधनादिकम् रुरधु: परिवत्रः तथा गुरु सातिशयं दुधुवुः कम्पयामासुः। क्त्र ६-ध-उ-स्वरूपाश्रय एव स्वरा उपाताः ॥। ८५ ।।

: १. बेबे। २. ध्वेच्छे देसे। १. गतबः।

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तृतीय: परिच्छेद: २४६

हिम्दी-पृथ्वी-विजय और मर्यादाकी रक्षास्वरूप जतमें अनुराग रखनेवाले औद छलूष्ट- युद्धि पाण्डवोंने विशाल दुर्योधनादि शञ्ुवर्गको घेर लिया और सम्मुख युद्धमें अतिशय कम्पित कर दिया। इस उदाहरणश्लोकमें इ-अ-ड नामक तीन ही स्वर लिये गये हैं, अतः यह त्रिस्वरनियमका उदाहरण है।। ८५ ॥ श्रीदीप्ी हवीकीर्ती धीनीति गी:प्रीती। पंधेति दे दे ते ये नेमे देवेशे।। ८६ ॥ द्विस्वरनियममुदाहरति-श्रीदीक्ी इति। कवित्सत्पुरुषः प्रशस्यते। ये द्वे दे इमे देवेशे इन्द्रे अपि न (.रनः), ते श्रीदीप्ती लक्ष्मीकन्ती, हीकीर्ती लव्ायशसी, धीनीती बुद्धिनयौ, गीःप्रीती वाग्मित्वसन्तोषो, त्वयि राजनि एधेते निरन्त रोपबीयमानतया वर्तेते इत्यर्थः । अत्र ई-ए-स्वरूपौ द्वावेव स्वरौ निबद्धी ॥। ८६ ॥ हिन्दी-जो श्री दीप्ति-धन और कान्ति, लज्जाशीलता और कीर्ति, युद्धिमत्ता और नीति- परायणता, एवं वाग्ग्मिता तथा सन्तोष आपमें वृद्धि पा रहे हैं, उस तरह की वह चीजें इन्द्रमें मी नहीं है। इसमें ई-ए रूप दो ही स्वर निबद् दुए है।। ८६ ।। समायामा माया मासा मारामायायाना रामा। यानावाराराानाया मायारामा मारायामा ।। ८७। एकस्वरमुदाहरति-सामायामेति। श्लोकोडयं सर्वतोभद्रोदाहरण प्रस्तावेऽनुपदमेव व्यरूयातः । अत्र 'श्र' रूप एक: स्वरो निषद्धः ।। ८७ ।। हिन्दी-इस शोकका अर्थ सर्वतोभद्रोदाहरणप्रकरणमें कर दिया गया है, वहीं देख लें। इसमें एकमात्र स्वर-आ-का उपादान हुआ है, यही एकस्वर नियम है। ८७ । नयनानन्द्जनने नक्षत्रगणशालिनि। अघने गगने डध्टिरजने दीयतां सकतू॥८८। स्थाननियम प्रस्ताव ्मतुःस्थानमियममुदाहरति-नयनानन्देति। हे भगने प्रशस्त- सर्वावयवे, नयनानन्दजनने नेत्रप्रीतिकरे, नक्षत्रगणशालिनि तारकावयभूविते भबने मेघशून्ये गगने वियति सकत एकवारं दृष्टिः दीयताम्। मेघवर्जित निर्मलं व्योम वीक्षमाणा मानं जहिहीति भावः। अत्र कण्ठदन्ततालुनासिकारूपसथाननतुष्टयभवा एव वर्णा निवडा

हिन्दी-हे सुन्दरि, आँखोंको तृप्त करनेवाले, नक्षत्रमण्डलस भूषित, निर्मेष इस आकासकी ओर तो एक बार देखो। इस निर्मल आकाशकी ओर देखो और अपना यह मान छोड़ो। इस उदाहरणमें कण्ठदन्ततालुनासिकारूप चार ही स्थानमें उच्चरित होने वाले वर्ण निवक किये गये हैं, अतः यह चतुःस्थाननियमस्वरूप चित्रप्रभेदका उदाहरण है॥ ८८॥ अलिनीलालकलंतं कंम हन्ति घनस्तनि। आननं नलिनष्छायनं शशिकान्ति ते ।।८९ ।।

१. एवैते। २. चन्द्रनमृत्रमायिनि। ३. युवं।

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२६० काव्यादर्श:

त्रिस्थाननियममुदाहरति-अलिनीलेति। हे धनस्तनि कठोरकुचमण्डले, अलिनीला म्रमरशयामा अलकलता केशपाशो यत्र तत् तथोक्तम्, नलिनच्छायं कमलतुल्यं नयनं यत्र तत्तादृशय शशिकान्ति चन्द्रोपमं ते तब आ्ननं मुखं कं न हन्ति मदनव्यथया कदर्थयति ? सर्वमपि पुर्मासं पीडयतीत्यर्थः । अत्र कण्ठयदन्त्यतालव्या एव वर्णा निबद्धा इति त्रिस्वरनियमोऽयम्॥८९॥ हिन्दी-हे कठोरस्तनि, भ्रमरके समान काले अलकोंसे वेष्टित, कमलोपम नयनों वाला और चन्द्रमाके समान मनोहर यह तुम्हारा मुख किस पुरुषको पीडित नहीं करता है। इस उदाहरणकोकमें कण्ठतालुदन्तरूप तीन ही स्थानोंमें उत्पन्न वर्ण विन्यस्त हुए हैं, अतः यह त्रिस्थाननियमका उदाहरण हुआ।। ८९ ॥।

सदानघ सदानन्द नतान्वासङसकत ॥ ९० ॥ द्विस्थाननियममुदाहरति-अनक्गेति। हे सदानघ, सर्वदा निष्पाप, सदानन्द सता- मानन्दो यस्मात्तादृश सज्जनप्रिय नतानन्तानि नम्राणि अज्ञानि यस्य तादृश, असम्ग- सपत विषयानासक्तजनप्रिय, (सा त्वदीया) सदजना सती स्त्री अनपलङ्नेन कामानुप- भोगेन लम्राः संजाताः नानातड्काः विविधाः व्यथाः तस्याः तादृशी कामानुपभोगजनित- विविधयातना (सज्ाताऽस्ति, अतस्तां स्वसप्गमेन प्रसादयेति भावः)। अत्र केवलं कण्ठय- दन्त्यावेष वर्णो निबद्धाविति द्विस्थाननियमोदाहरणमिदत् ॥९०॥ हिन्दी-हे सदा निष्पाप, सब्जनोंके प्रिय, नतशरीर, विषयानासक्तजनप्रिय, वह तुम्हारी सती सी कामानुपभोगसे नानाप्रकारकी यातनायें भुगत रही है (अतः कृपाकर उससे मिल लो)। इस फोकमें केवल कण्ठ्य तथा दन्त्य ही वर्ण निबद्ध हुए हैं, अतः यह द्विस्थाननियमका उदाहरण हुआ ॥। ९० ॥

अहाराड़् सगाक्कांगकक्गागखगकाकेक।। ९१ ॥ एक स्वाननियममुदाहरति-झगा इति। नयमन्वय :- (हे) गानकाकाकगाहक महाहाड्ड खगाङ्कागकड अखखगकाकक (त्वम् ) अघककाकहा गाम् अगाः । गन्या इदं गाप कें जलम् तस्य गाजकस्य-आाकायति शब्दायते इत्याक: अकति कुटिलं गच्छतीति अक :- आकथ्ासावकः आकाकः सशन्दतियक्प्रवाहः तं गाहते इति गाहकाकाकगाहक = गन्ञाप्रवाहमानपरायण, हाहाङ्ः संसारक्लेशेन हाहाशब्दपरस्ता- दशो न भवतीति अहाहाड = संसारकष्टवजिंत, खगाङ्कागकढ्ढ-खगः भाकाशचारी सूर्य: भट्टो यस्य तादशोऽग: परवतः सुमेरुस्तत्र कदुति गच्छतीति खगाङ्कागकक्ट =सुमेरुपर्यन्त- गामिन, अगखगकाकक-अगन्ति कुटिलं गच्छन्ति तानि अगानि कुटिलगतोनि यानि खानि इन्द्रियाणि तान्येव भगखकानि तेषु न कक अकक अलोल अवशीभूत-भगखकाकक कृटिलेन्द्रियावशीभूत, (त्वम् ) अधककाकहा-अधमेवाचकं तदेव काक: तं जहातीति

१. नन्दिन्तताङ। २. सकतः। ३. अहाहाङ। ४. काडा। ५. काककः।

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तृतोय: परिच्छेदः २६१

भधककाकहा = सर्वविधपापरूपकाकपरिहर्त्ता सन् गाम भुवम् भगा: भागतः। पत्र केवस- कण्ठ्यवर्णविन्यासादेकस्थाननियमोदाहरणमिदम्॥९१॥ हिन्दी-गङ्गाके जलके सशब्द तिर्यक प्रवाहमें लान करनेवाले, संसारतापकृत हाहास्न्दसे अपरिचित, सुमेरुपर्वतपर्यन्त गमनसमर्थ, कुटिल इन्द्रियोंके वशमे नहीं रहनेवाले, आप पापरूप काकोंके परिहर्तता बनकर इस घराधाममें आये। इस उदाहरणकोकमें केवल कण्ठ्यवर्ण ही निवर हुए हैं, अतः एकस्थाननियम हुआ ॥ ९१॥

किं केकाकाकुक: काको मां मामामाममामम ।। ९२।। चतुर्वर्णनियममुदाहरति-रे रे इति। काश्चित्सुन्दरीममिलषन्तं कबिद् व्याधपुर्त्र प्रति तस्याः सन्दर्याः प्रत्याख्यानोक्तिरियम्, रे रे मा मम मार्या लक्ष्म्या मम ममतर्य यस्य तत्संबोधने हे मामम लक्ष्मीलोभिन, स्वं माम् मा मा अ्रम न भागच्छ (निषेष- दृढतायां मापदद्विरुफ्तिः) यतः काकः कि केकाकाकुकः केका मयूरवाणी सा काकुर्मेद- जनिती ध्वनिः शब्दो यक््य तथोतः भवति? यथा काको मयूरवाणी नाधिकुहते तयेष तवापि मत्समीपागमनाधिकारो नास्तीति भाव:। रोहयने. इति रोह: सशन्दो यो रद- र्मृगः सः रोरूरुरुः तक्ष्य उरसः वक्षसो या रुकू शरपातजनिता व्यथा सा रोरूठरूरोरक सैव आगः पपराधो यस्य तथाभूत रोहररूरोरुगाग:, अगाप्गः पर्वतकभागस्थितः असभ्य इत्यर्थः, तथा अगगुः अगा अचला गौर्वाणी यस्य तादशः अयतुरवयनः असि, एमि- रविशेषणैस्तस्य सुन्दरीसमीपोपसरणायोग्यता ध्वनिता। अत्र रेफगकारककारमकाररूपवर्ण- चतुष्टयनियम:, उकारस्तु पद्यपुरकत्वाभावाद् वणेत्वेनात्र न गृह्यते पद्यपूर कवर्णानामेवात्र वर्णपदभ्राह्यत्वात् ॥९२॥। हिन्दी-अरे मामम-लक्ष्मी लोमवाले, तुम मेरे समीप नहीं आना, क्या काकको कभी मयूरकी वाणीका सौभाग्य प्राप्त हो सकता है ? तुम सशब्दरुरू मृगके वक्षोदेशमें बाणव्यवा पहुँचाने के अपराधी हो, पर्वतमें एकभागपर रहनेसे असम्य तथा वाणीचातुर्यशून्य हो, (अतः तुमको मेरे पास आनेका क्या अधिकार है?) इस उदाहरणश्लोकमें रेफ-ग-क-म रूप चार वर्णोंसे ही काम चलाया गया है, अतः यह चतुर्वर्णनियमका उदाहरण है। यद्यपि क भी सुना जाता है परन्तु वह यहाँ वर्ण नहीं माना जायगा, क्योंकि पद्यपूरक वर्ण ही वर्ण कहे जाते हैं, वह यहाँ पदपूरक नहीं है, सन्धिज है॥। ९२ ॥ देवानां नन्दनो देवो नोदनो वेदनिन्दिन:। दिवं दुदाव नादेन दाने दानवनन्दिनः ।।९३।। त्रिवर्णनियममुदाहरति-देव इति। देवानों नन्दनः आनन्दकरः, वेदनिन्दिनां वेद- मार्गदूषकाणां दैत्यांनां नोदन: निवारक: देवो नरसिंहवपुर्भगवान् दानवनन्दिनः राक्षसा- नन्दजननस्य हिरण्यकशपोः दाने खण्डने विदारणे नादेन सिंहनादेन दिवम् आकारं दुदाब तापयामास क्षोभयामास। अत्र दवन इति वर्णत्रयनियमः । 'दानवदन्तिन:' इति पाठे तु तकारश्वतुर्थः स्यात्ततक् त्रिवर्णनियमोदाहरणतव समाप्येत ॥।९३॥ १. गोगगुः । २. मा मा मामम मामम। ३. देवनिन्दिनाम्। ४. दानव। ५. दन्तिय:।

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२६२ काव्यादर्श:

हिन्दी-देवगणको प्रसन्न करनेवाले एवं वेदमार्गकी निन्दा करनेवाले राक्षसोंके निवारक देव नरसिंह ने राक्षसोंके आनन्ददाता हिरण्यकशिपुका खण्डन करते समय अपने सिंहनादसे आकाशको कँपा दिया। इस उदाहरणश्लोकमें 'द व न' इन तीन वर्णोंका ही प्रयोग है, अतः यह त्रवर्णनियम हुअ ॥९३ ॥ सूरि: सुरासुरासारिसार: सारंससारसाः। ससार सरसीः सारी ससूरूः स सुरारसी॥ ९४।। द्विवर्णनियममुदाहरति-सूरिरिति। सूरि: पण्डितः सुरेधु असुरेषु च आसारी प्रसरणशीलः सारो बलं यस्य तथो कः, ससूंरूः सु शोभनी ऊर यस्याः सा सूरूः रेवतीनाम बलप्रिया तया सहितः ससूरः रेवतीसहितः, सुरारसी मद्यरसिक:सः सीरी बलभद्रः सारस- सारसाः शब्दायमानसारसर्पाक्षयुताः सरसीः सरांसि ससार विहाराय जगाम। भत्र स-रेफाभ्यामेव निर्वाह इति द्विवर्णनियमः ॥९४॥ हिन्दी-सूरि-विद्वान्, सुरों तथा असुरों पर प्रसरणशीलपराकमशाली, सुन्दरी रेवतीके साथ मथपानरसिक वलमद्र सशम्दसारसपक्षिभूषित सरोवरोंमें जलक्रीड़ा करने चले। इस उदाइरणमें सकार और रेफ रूप दो वर्णोंसे ही निर्वाह किया गया है, अतः इसे द्विवर्णनियम कहते हैं॥ ९४॥ नूनं तुभानि नानेन नाननेनाननानि नः । नानेना नतु नानूनेनैनेमानानिनो निनीः।९५॥ (इति चित्रचक्रम्) एकवणनियममुदाहरति-नूनमिति। अन्ान्वयो यथा-अनेन अननेन नः अन- नानि न नुभानि न, अनूनेन एनेन अनाभिनी: इनः ना अ्नेनाः न। अनेन युद्धे प्रत्यक्षबलेन राज्ञा अननेन स्वसामर्थ्येन नः अस्माक्म् अननानि साम- ध्यानि न नुलानि समापितानि इति न, अवश्यं समापितानीत्यर्थः। अनूनेन एनेन अधिक- बलशालीना अ्नेन विजेत्रा अनान् बलवतः स्वजनानस्मान् निनीः युद्धे योजयितुमिच्छुः इनः अत्माकं प्रभुः ना पुरुषः अनेना: निरपराधः नास्तीति शेषः। अधिकबलेनानेन विजयिना साधारणबलानस्मान् युद्धे संगमयन्नस्मतस्वामी निरपराधो न भवतीति भाव। भत्र केवलेन नकारेण निबन्धादेकवर्णनियमो बोध्यः ।।९५॥। हिन्दी-इस बहादुर राजाने अपने पराक्रमसे हमारे पराक्रमको प्रतिक्षिप्त कर दिया है, यह बात अवश्य है, इस विषयमें अधिक बलशाली इस वीरके साथ अल्प बलवाले हम लोगोंको मिड़ा देनेवाले हमारे स्वामी निरपराम नहीं हैं। इस फ्ोकमें एकमात्र वर्ण नकार ही प्रयुक्त दुआ है, अतः इसे एकवर्णनियम कहते हैं॥ ९५॥ इति दुष्करमार्गेऽपि कश्धिदादर्शित: क्मः । प्रहेलिकाप्रकाराणां पुनरददिश्यते गतिः ॥९६॥। इदानी चित्रचक्रमुपसंहरन प्रहेलिकाचक्रमवतारयति-इतिति। इति अ्रनेन रूपेण दुष्करमार्ग स्वरस्थानवर्णनियमरूपे कटिने कविकर्मणि कमित् अल्पमात्र: क्रमः प्रकारो दर्शित:, पुनः प्रहेलिकाया: प्रक्माराणं गतिः लक्षणादि उदिश्यते प्रकम्यते। प्रहेलिका- १. सरास। २ सीरो। ३. नाननिनां। ४. मार्गस्य ।

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तृतीय: परिच्छेद.

सामान्यलक्षणम्-'प्रहेलिका तु सा शेया वचः संवृतकारि यत्'। विशेषप्रकाराणों लक्ष- णानि पुरो यथावसरं निर्देक्ष्यन्ते ॥ ९६ ॥ हिन्दी-इस प्रकार दुष्कर मार्ग-स्वर स्थान वर्ण नियमरूप कष्टसाध्य चित्रालद्गार के कुछ उदाहरणादि दिखलाये गये, अब आगे प्रहेलिकाके प्रकारोंका लक्षणादि दिखलाया जाता है। क्रमस्थ सर्वव्यञ्ञन, छन्दोऽक्षरव्यञ्ञन, मुरजाक्षरव्यजञन, दीर्घैकस्वर आदि और पभ्मबन्ध, मुसलबन्ध, हलबन्ध, खड्गबन्ध आदि का उल्लेख इस ग्रन्थमें केवल विस्तारमयसे नहीं किया गया है, इसी बातको व्यज्जित करनेके लिये 'कश्चिदादशितः क्रमः' कहा है। प्रहलिकाका सामान्य लक्षण है-'जिसमें कुछ छिपा कर कहा जाय' इसका प्रख्यात नाम पहेली है, जो अतिप्रसिद्धार्थ है॥ ९६ ॥। क्रीडागोष्ठीविनोदेषु परव्यामोहने चाचि सोपयोगा: प्रहेलिकाः ॥९७॥ प्रहेलिकाप्रयोजनान्युपदिशति-क्रोडेति। क्रीडार्य या गोष्ठी सभा तत्र ये विनोदा: विचित्रवाग्व्यवहारजनितप्रमोदाः तेषु, तथा तज्शैः प्रहेलिकाप्रकारजैः आकीर्णे नानाजन- व्याप्त समाजे परस्परं यन्मन्त्रणं गुप्तभाषणं तत्र, तथा परव्यामोहने भभिमतार्थबोधन- वैफल्यसंपादने च प्रहेलिकाः सोपयोगा: उपयुक्तः भबन्तीति शेषः। इयं प्रहेलिका प्रोक्तत्रिविध प्रयोजनशालितया नोपेक्षास्पदमिति भावः ॥।९७॥ हिन्दी-प्रहेलिका रसके आम्वादमें परिपन्थी होनेके कारण अलद्कार नहीं है, तथापि आमोदगोष्ठीमें विचित्र तरहके वागव्यवहारोंसे मनोविनोइमें, लोगोंसे भरी भीड़में, गुप्तभाषण करनेमें तथा दूसरोंको अर्थानभिज्ञ बनाकर उपहासपात्र बना देनेमें इसका उपयोग होता है, अतः इसका निरूपण निरर्थक नहीं है॥ ९७ ॥ आहुः समागतां नाम गूढार्थो पदसन्धिना। वञ्चितान्यत्र रूढेन यत्र झब्देन वञ्चंना ।। ९८ ।। अथ प्रहेलिकाप्रभेदानुद्दिशति-आहुरिति। पदसन्धिना पदानां परस्परसन्धिना गूढार्थां दुर्वोधार्था प्रहेलिकाम् समागतां नाम आहु: तथाऽन्यत्र विवक्षितार्थादन्यस्मिसयें रुढेन प्रसिद्धेन पदेन यत्र वख्चना परप्रतारणा क्रियते सा वश्चिता नाम प्रहेलिका कथ्यते इति शेषः ॥। ९८ ॥ हिन्दी-जिस प्रहेलिकामें पदोंमें सन्धि हो जानेसे विवक्षित अर्थ गूढ़ हो जाय, छिप जाय उसे समागता नामक प्रहलिका कहते हैं, और जहाँ पर योगसे विवक्षितार्थका बोध होता हो परन्तु रूढ़िके द्वारा परवञ्चना की जाय उसे वश्चिता नामक पहेली कहते हैं ॥ ९८॥ व्युत्कान्तातिव्यवहितप्रयोगान्मोहकारिणी। सा स्यात्प्रमुषिता यस्यां दुर्बोधार्था पदावली।।९९।। व्युत्कान्सेति। यदि व्यवहितप्रयोगात् असंबद्धपदैर्व्यवहितानां संबन्धिपदानां प्रयोगात् मोहकारिणी अर्थावबोधे क्लेशदायिनी तदा सा व्युत्कान्ता नाम, यस्यां पदावली सर्वाण्यपि पदानि प्रायः दुर्वोधार्थो कठिना सा प्रमुषिता स्यात् ॥९९॥

१. समाहिताम्। २. वञ्जनम् । ३. वलि:।

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२६४ काव्यादर्श:

हिन्दी-जो प्रहेकिका असंबद्ध पदोंसे व्यवहित संबद्ध पद होनेके कारण अर्थज्ञानमें कठिनाई उत्पन्न करती हो उसे उ्युत्कान्ता नामसे कहते हैं, और जिस प्रहेलिकाके पदसमुदाय दुर्बोषार्थ- कठिनाईसे जाननेयोग्य अर्थवाले-हों, उसे प्रमुषिता नामक प्रहेलिका कहा जाता है। वश्चिता नामकी प्रहेलिकामें एक पद दुर्बोधार्थ होता है, इसमें पदसमुदाय दुर्बोध होता है, वश्चितामें नानार्थक पदका अप्रसिद्ध अर्थमें प्रयोग होता है, यहाँ पर एकार्थक शब्द ही अप्रसिद्ध रहता है, यही वश्चिता और प्रमुषितामें अन्तर है॥ ९९ ॥ समानरूपा गौणार्थारोपितैर्प्रथिता पदैः। परुषा लक्षणास्तित्वमात्रव्युत्पादितश्रुतिः ।। १०० ॥ समानेति । गौणार्येन लाक्षणिकार्थेन आरोपितैः उपचरितैः पदैः प्रथिता समान- रुपा नाम प्रहेलिका भवति। लक्षणस्य शास्त्रीयनियमस्य अस्तित्वमात्रेण प्रबृश्या व्युत्पा- दिता श्रुति: शब्दो यत्र सा परुषा नाम। यत्र शास्त्रीयसूत्रप्रवृत्तिमात्रेणवार्थो बोधनीयो न प्रसिद्धथा; सा परुषा नाम प्रहेलिका भवतीति भावः ॥। २०० ॥ हिन्दी-जो प्रहेलिका गौणार्थमें उपचरित पदोंसे ग्रथित हो उसे सादृश्यमूलक होनेसे समानरूपा नामक प्रहेलिका माना जाता है, और जिस प्रहेलिकामें शाखत्रीय सूत्रोंसे सिद्ध होने पर भी उसका वह योगार्थ अप्रसिद्ध हो उसे परुषा नामक प्रहेलिका कहते हैं॥ १०० ।। संज्याता नाम संख्यानं यत्र ध्यामोहकारणम्। अम्यथा भासते यत्रवाक्यार्थः सा प्रकल्पिता ॥ १०१॥ संज्यातेति। यत्र यस्यां प्रहेलिकायां संरयान वर्णगणना व्यामोहकारणं संखयावाचक- शब्द प्रयोगो वा व्यामोहकारणं बोद्पृजनबुद्धिष्यामोइसाधनं सा संर्याता नाम प्रहेलिका । यत्र यस्यां वाक्यार्थः अन्यथा भासते प्रथममापाततः प्रतीयमानादर्यात् पर्थवसाने भिन्न- तया प्रतीयते सा प्रकल्पिता नाम प्रहेलिका भवतीति॥ १०१ ॥ हिन्दी-जिस प्रहेलिकामें वर्णगणना अथवा संख्यावाचकपदप्रयोग दुद्धिको भ्रममें डाल दे उसे संख्याता नामक प्रहेलिका कहते हैं, और जिसमें पहले प्रतीत होनेवाले अर्थसे भिन्न अर्थ पर्यवसानमें समझा जाय उसे प्रकल्पिता नामक प्रहेलिका कहते हैं ॥ १०१ ॥ सा नामान्तरिता यस्यां नाम्नि नानार्थकल्पना। निमृता निभृतान्यार्था तुल्यधर्मस्पृशा गिरा ॥ १०२ ॥ सा नामास्तरितेति। यस्यां नाम्नि नानार्थकल्पना बहुविधार्थविकल्पनं भवति सा नामान्तरिता नाम प्रहेलिका, तुल्यधर्मस्टृशा प्रकृताप्रकृतपदार्थसाधारणधर्मवाचकगिरा निमृतः निबुतः अन्यार्थ: प्रकृतोऽर्यों यस्यां सा निभृतार्था नाम॥१०२ ॥ हिन्दी-जिसमें अनेकार्थक शब्दसे नाममें अनेकप्रकारक अर्थोंकी कल्पना की जाय उसे नामान्तरिता नामक प्रहेलिका माना जाता है, और जहाँ प्रकृताप्रकृत साधारणधर्मप्रतिपादक शब्ददवारा प्रकृत अर्थका गोपन किया गया हो उसे निमृतार्था नामक प्रहेलिका कहते हैं॥ १०२ ॥ समानशब्दी पन्यस्तराष्ट्रपर्यायसाधिता। संमूडा नाम या साक्षाधनिर्दिष्यार्थाऽपि सूठये। १०३॥ समानेति। उपन्यस्तानां श्लोके प्रयुक्तानां शब्दानां पर्यायो योजनाविशेषः तेन सापिता निष्पणा समानशब्दा नाम प्रहेलिका। साक्षात् वाचकशब्देन निर्दिष्र्था उक्तार्था

१. समानरू । २. परबितैः। ३. मूठ्योः।

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तृतीय: परिच्छेद: २६४

भपि या मूठये आपाततः श्रोतणां मूढये मूडभावतयोत्पादनाय क्षमते मा संमूडा नाम प्रहेलिका बोष्या।। १०३ ।। हिन्दी-प्रयुक्त शब्दोंमें पर्यायकृत योजना विशेषद्वारा जो प्रहेलिका बन जाती है उसे समान- शब्दा और जिसमें वाचक शब्दोंद्वारा अर्थ-निर्देश होने पर भी श्रोताओंको मूढ हो जाना पड़े उसे संमूढा नामक प्रहेलिका कहा जाता है॥ १०३ ॥ योगमालात्मिका नाम यो स्यात् सा परिहारिका। एकच्छन्नश्रितं व्यक्तं यस्यामाश्यगोपनम्॥ १०४॥ योगेति। या प्रहेलिका योगमालात्मिका योगिकशब्दपरम्परास्वरूपा स्यात्- यस्यां यौगिकशब्दमाला एकेकरूढार्थबोधनाय प्रयुज्येत, सा परिहारिका नाम। तथा यस्याम् आश्रितम् आघेयम् व्यक्तं सुबोधम्, आश्रयस्य आधारस्य च गोपनं स्यात् सा एकच्छला नाम ॥ १०४ ॥ हिन्दी-जिस प्रहेलिकाभेदमें यौगिक शब्दोंकी परम्परा एक-एक रूढ अर्थको बतानेके अभि- प्रायसे प्रयुक्त हो उसे परिहारिका कहा जाना है, और जिसमें आधेय तो स्पषटरूपसे कहा गया हो, परन्तु आधार छन्न-गुप्त हो उसे एकच्छन्ना प्रहेलिका कहते हैं॥ १०४॥ सा भवेदुभयच्छन्ना यस्यामुभयगोपनम्। सक्कीर्णा नाम सा यस्यां नानालक्षणसङ्करः॥ १०५॥ सा भवेदिति। यस्यां प्रहेलिकायाम् उभयगोपनम् आश्रिताश्रययोरु्भयोर्निगूहनं कर्त स्यात सा उभयच्छन्ना नाम प्रहेलिका भवेन, यस्या च नानालक्षणानां समागतादीना- मनुपदमेवोक्तानां प्रहेलिकानां मध्ये एकाधिकप्रहेलिकालक्षणानां सहावस्थानं भवेत् सा सङ्कीर्णा नाम प्रहेलिका भवेदिति शेषः ॥। १०५॥। हिन्दी-जिसमें आश्रित और आश्चय दोनोंका गोपन किया जाता है उसे उमयच्छन्ना नाम की प्रहेलिका कहते हैं, और जिसमें समागता आदि अनेक प्रहेलिकाओंके लक्षण एक साथ समाविष्ट हो उसे सक्कीर्णा प्रहेलिका कहते हैं॥ १०५॥ एता: बोडशनिर्दिष्टाः पूर्वाचार्येः प्रहेलिकाः। ॥। १०६ ॥ पता इति। एताः पूर्वोत्ता: षोडश समागताद्याः सक्रीर्णान्ताः प्रहेलिकाः पुर्वाचाय: निर्दिष्टाः, एतत्षोडशप्रहेलिकाभिन्नाः अन्याः चतुर्दश दुष्टाः सदोषा: च्युताक्षरदत्ताक्षरा- दय: तैः पूर्वाचार्यैः अधीताः उक्ताः ॥ १०६ ॥ हिन्दी-इन सोलह प्रहेलिकाओंका वर्णन प्राचीन आचार्योंने किया है, समागतासे लेकर पन्द्रह रूप शुद्ध प्रहेलिकायें और एक सक्कीर्णां, कुल सोलह प्रहेलिकायें प्राचीनोंने कही हैं, इन सोलह शुद्ध प्रहेलिकाओंके अतिरिक्त चौदह और च्युताक्षरदत्ताक्षर आदि दुष्ट प्रहेलिकाओंक निर्देश प्राचीनोंने किया है॥ १०६ ॥ दोषानपरिसंख्येयान् मन्यमाना वयं पुनः। साध्वीरेवाभिधास्यामस्ता दुषा यास्त्वलक्षणा।। १०७।। १. मालास्मकं। २. यस्या: । ३. हारिणी।

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२६६ काव्यादर्श:

दुष्टप्रहेलिकानुक्ती हेतुमुपन्यस्ष्यति-दोषानिति। वयम् दोषान व्युताक्षरत्वादिशाब्द- बोधपरिपन्थिदोषचयान अपनिसंख्येयान संख्यातुमशक्यान बहून् मन्यमानाः (न तान् दर्शयाम:, किन्तु ) पुनः साध्वीः चमत्कारजननीः स्वल्पदोषाश्च समागतादाः षोषश प्रहेलिका: एव अभिवास्यामः उदाहरणप्रदर्शनेन स्पष्टीकरिष्यामः, दुष्टप्रहेलिकासामान्य- लक्षणं तु-'या अलक्षणाः समागतादिषोडशप्रहेलिकालक्षणशून्यास्ता दुष्टाः' इति ॥१०७॥ हिन्दी-प्रहेलिकाके दोष च्युताक्षरत्वादि असीम हैं, उनकी गणना नहीं की जा सकती है, इम बातको माननेवाले हमलोगोंने यहाँ साधु प्रहेलिकाओंके ही उदाहरण दिये हैं, दुष्ट प्रहेलिकाये वह है जो समागतादिकथित सोलइ प्रहेलिकाओंके लक्षणसे रहित हों॥ १०७॥ न मया गोरसाभिशं चेतः कस्मात्प्रकुप्यसि। । १०८ ॥ अथ प्राणुदिष्टाः षोडशापि प्रहेलिका: क्रमश उदाहरिष्यप्रुद्देशक्रमप्राप्तां समागतां नाम प्रहेलिकामुदाहरति-न मयेति। काश्विद् गोपी प्रति कृष्णस्योक्तिरियम्। हे आलोहितेक्षणे कोपरक्ताक्षि, मया गोरसाभिशं पयःपानोनमुखं चेतो हृदयं न कृतम्, कुतः प्रकुप्यसि ? महयं कुध्यति ? अस्थानरुदितैः व्यर्थरोदनैः एभिः अलम्, एषः प्रकाशोऽर्थः समाजवच्वकः, वास्तवार्थस्तु-मे मम चेतः आगःअपराधः परवनितासंसर्ग- रूपः तदभिशं चेतो न, शेषं समानम्। मया वनितान्तरोपसर्पणरूपमागो नाचरितमतो वृथा तवायं कोपो रुदितं च त्रृथेति। अत्र मे आगोरसाभिज्ञमित्यत्र सन्धिना प्रकृतार्थसंवरणं कृतामिति बोध्यम्॥ १०८॥ हिन्दी-मैने अपने हृदयको दूध पीनेमें कभी नहीं लगाया, नें ने तुम्हारा गोरस नहीं पिया, तुम मुझपर क्रोध क्यों करती हो? हे लाल आँखोंवाली, इस तरह तुम बिना कारणके क्यों रो रही हो ? (यह तो खुला अर्थ है, जो समाजको वश्चित करनेके लिये किया जाता है, वास्तविक अर्थ तो यह है कि) हे रक्तनेत्रोंवाली, मैने कोई अपराध-परस्त्रीसंपर्क आदि करनेमें अपना मन नहीं दिया, मैंने दूसरी औरतका साथ नहीं किया है, तुम क्यों कोप करती हो? तुम्हारा यह अकारण रोदन व्यर्थ है। श्रीकृष्ण किसी गोपीसे लोगोंके सामने कह रहे हैं। इस प्रहेलिकाको समागता कहते हैं क्योंकि इसमें 'मे आगोरसाभिज्ञम्' में सन्धि द्वारा गोप्य अर्थ छिपाया जाता है॥ १०८॥ कुष्जामासेवमानस्य यथा ते वर्घते रतिः। नैवं निर्विशती नारीरमरस्रीविडम्बिनीः ॥ १०९ ॥ वश्चितां नाम प्रहेलिकामुदाहरति-कुष्जामिति। कुब्जाम् विकृतोच्चपृष्ठदेशां नारीम् आसेवमानस्य रमयतः ते तव रतिः अनुरागो यथा वर्घते उपचीयते अमरत्न्नीविडम्बिनीः नारी: निर्विशतः देवाज्नातुल्याः निविशतः उपभुआनस्य रतिः एवं न वर्घते इति प्रकाशोऽर्यः। संवृतार्थस्तु कुब्जां कान्यकुब्जानगरीम् आसेवमानस्य ते तव रतिर्यथा वर्धते इत्यादि:, शेषं समानम्। अ्त्र कुब्जाशब्दो विकृतान्ननार्याँ रूढः, विवक्षितायां नगर्या न रूढः, तदर्थप्रत्यय

१. रुपितैर। २. क्षणैः ।

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तृतीय: परिच्छेद: २६७

उपकरम बिना न सभवीति प्रकृतार्यस्य निपुणमतिवेद्यतयाऽत्र संवरणभिति वश्चिता नाम प्रहेलिकेयम् ॥।१०९॥ हिन्दी-इस कुबड़ी खीके साथ रमण करनेसे आपको जो आनन्द होता है वह आनन्द देववालासमान अन्य नारियोंके साथ रमण करने भी नहीं होता है। यह प्रकाश अर्थ है। छिपा अर्थ यह है कि इस कान्यकुब्जा नगरीका उपभोग करने से जो आनन्द आपको मिलता है वह देवबालाओंके उपभोगसे भी नहीं मिलता। इसमें कुब्जा शब्द कुबडी स्त्रीमें रूढ़ है, कान्यकुब्जा नगरीमें रूढ़ नहीं है, अतः छिपा हुआ अर्थ निपुणमतिमात्रवेध है, अतः इसे वञ्ञिता नामक प्रहेलिका कहा जाता है॥ १०९॥ दण्डे चुम्बति पग्मिन्या हंस: कर्कशकण्टके। मुखं वल्गुरवं कुर्वस्तुण्डेनाक्गानि घट्टयन्॥ ११० ।। व्युत्क्ान्तामुदाहरति-दण्डे इति। कर्कशकण्टके तीक्णमुखमण्टकबृते दण्डे पध्मिन्याः नाले अज्ञानि स्वशरीरावयवान् घट्टयन् संघर्षयन् वल्गुरवं मधुररवं कुर्धन् संहः तुण्डेन मुखाभ्रेण पद्मिन्या: मुखं कमलरूपं चुम्बति। अत्रान्वयबोधस्य हेतोः पदासतः विशेषेण- तिक्रान्ततया व्युत्कान्ता नाम प्रहेलिकेयम् ॥११ ॥ हिन्दी-कठोर कण्टक वाले कमलनालमें अपने अक्गोंको रगड़ता हुआ और मधुर शब्द करता हुआ इंस मुखा्रसे कमलिनीके मुखरूप कमलको चूमता है। इसमें आसत्ति नामक अन्वयंबोधका कारण अतिशय व्यवहित है, अतः इसे व्युत्क्रान्ता नामक प्रहेलिका कहा गया है। इसमें आसत्ति होने पर अर्थ सुगम हो जायगा, तब यह प्रहेलिका नहीं रह जायगी। आसत्ित होगी इस प्रकार पदविन्यास करने पर-'कर्कशकण्टके दण्डेडङ्गानि सहृट्टयन् वल्गुरवं कुर्वन् हंस: पच्चिन्या मुखं तुण्डेन चुम्बति'॥ ११०॥ खातयः कनि काले ते स्फातय: स्फार्हवल्गवः। चन्द्रे साक्षाद् भवन्त्यत्र वायवो मम धारिणः ॥ १११॥। प्रमुषितां नाम प्रहेलिकामुदाहरति-खातय इति। हे कनि कुमारि, ते काल्यते क्षिप्यते इति काल: पादः तो्मिन् तव पाढे रफातयः रफीताः प्रभूता इत्यर्थः खे आक्राशे अतिः गमनं येषां ते खातयः शब्दा: स्कार्हवल्गवः प्रभूताः मनोहराक्ष (भवन्ति) तादृशमनोहरशब्दयुते तव पादे चन्द्रे चन्द्रवदाह्वादकरे मम वायवः प्राणवायवः धारिणः स्थिरा: सन्तीत्यर्थः । अत्र अप्रसिद्धपदैः प्रकृतार्थस्य संवरणात् प्रमुषिता नाम प्रहेलिकेयम्। 'कन्या कनी कुमारी च' इति हेमचन्द्रः ॥ १११ ॥ हिन्दी-हे कुमारी, तुम्हारे चरणोंमें ये प्रनुर स्फीत शब्द चलनेपर अधिक तथा मनोहर होते हैं, अतः चन्द्रमाके समान आहादक इन तुम्हारे चरणोंमें मेरी प्राणवायु स्थिर हैं। इसमें कनी (कुमारी), काल (चरण), स्फाति (प्रचुर स्फीत), खाति (शब्द), स्फाई वल्गु (चलनेपर मनोहर) इन अप्रसिद्धार्थक पदोंका न्यास करके विवक्षित अर्थ निगूढ़ कर दिया गया है, अतः यह प्रमुषिता नाम की प्रहेलिका कही जाती है। १११॥ अत्रोद्याने मया हष्टा वेल्लरी पञ्चपल्लवा। पल्लवे पल्लवे ताम्री यस्यां कुसुममअरी॥ ११२॥ १. तायवो। २. मजरी। ३. चार्द्रा। ४. यस्या।

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२६८ काव्यादश:

समानरूपां नाम प्रहेलिकामुदाहरति-अत्रोद्याने इति। अत्र उद्याने (नायिकायां) मया पच्पल्लवा वल्लरी (बाहुरेव वह्लरी यत्राकुलयः पल्लवस्वरूपाः) दष्टा, यस्या वह्र्यां (बाहौ ) पल्लवे पल्लवे प्रतिपल्लवं ताम्रा रक्तवर्णा कुसुममज्री पुष्पमजजरी (नखप्रभा ) विराजते इति योजनीयम्। अत्र नायिकोद्याजत्वेन, बाहुर्वह्लरीत्वेन, अकुलयः पल्लवत्वेन, नखप्रभा च रक्ताभकुसुममज्जरीत्वेन सादृश्यादुपचर्यत इति समानरूपा नामेयम्॥। ११२॥ हिन्दी-इस (नायिका रूप) उद्यानमें पाँच पल्लवों (अङ्गुलियों) से युक्त वहरी लता (बादु) देखी गई है, जिसके प्रत्येक पल्लव्मे रक्तवर्ण कुसुममअ्री (नखप्रभा) विधमान है। इसमें नायिका उद्यानसे उसका बाहु पल्लव रूप अङ्ुलि युक्त होनेके कारण पल्लविनी लतासे, पलव अङ्गुलियोंसे और नखप्रभा रक्तवर्ण पुष्पमञ्जरीसे सावृश्य द्वारा उपचरित होते हैं, अतः इसे समानरूपा प्रहेलिका मानते हैं ॥ ११२ ॥

मुराः सुरालये स्वैरं भ्रमन्ति दशनार्चिषा। मज्जन्त इव मत्तासे सौरे सरसि संप्रति॥११३।। परषां बाम प्रहेलिकामुदाहरति-सुरा इति। सुरा अस्ति येषां ते सुराः शौण्डिकाः दशनार्चिषा हासद्वारा प्रकटीभूपतदशनकान्त्या उपलक्षिताः सौरे सरसि मुरामये सोरवरे मजन्तः कृतावगाहना इव मत्ताः कृतसुरापानाः सुरालये गजायाम् स्वैरं यथेच्छं भ्रमन्ति, इति प्रकृतार्थ:, भ्रामकोऽर्थस्तु देवाः हसन्मुखाः सौरे सरसि मानससरोवरे मज्जन्तः कृतस्नाना: मत्ताः प्रसन्नाश्च सुरालये स्वर्गे यथेच्छं भ्रमन्ति। अत्र प्रकृतार्थः शौण्डिक- विषयो ह्या संप्रदायेन वाऽप्रतीतः केवलं योगबलादेवानुशासनसमर्थनाषुभ्नेय इति प्रयोक: पारुष्यप्रतात्या परुषा नामेयं प्रहेलिका ॥। ११३॥ हिन्दी-सुर-शौण्डिक (कलाल) इंसीसे निर्गत दन्तकान्सि होकर सुराके कुण्डमें स्नान करके खूब पीकर मत्त हुए सम्प्रति मधशालामें यथेच्छ भ्रमण कर रहे हैं। यही प्रकृत अर्थ है, इसे छिपानेके लिये यह अर्थ किया जायगा कि-प्रकटितदशनकान्ति सहासमुख देवतागण मानससरोवरमें स्नान करके अतिप्रसन्न हो स्वर्गमें यथेच्छ भ्रमण करते हैं। इसमें शौण्डिक पक्षवाला अर्थ रूढ़िसे नहीं निकलता है, उसे सूत्रों द्वारा यौगिक बना कर ही निकाला जा सकता है, अतः प्रयोक्ताकी परुषताके प्रतीत होनेसे यह परुषा नामक प्रहेलिका कही जाती है। ११३ ।। नासिक्यमध्या परितंश्रतुर्वर्णविभूषिता। अस्ति काचित् पुरी यस्यामष्टवर्णाड्कया नृपाः ॥११४॥ संख्यातामुदाहरति-नासिक्येति। नासिक्यः नासिकारूपस्थानोत्पन्नो वर्णो म्ये नामाक्षरमध्ये यस्या: सा तादृशी, परितः ममन्ततः चतुर्वर्णविभूषिता अक्षरचतुष्टयेन युक्क्ता काचित् प्रसिद्धा पुर नगरी अरित विद्यते. यस्यां पुर्याम् अष्टवर्णाहयाः भ्रष्टाक्षरनाम- शालिनो नृपाः सन्तीति। अत्र संर्याद्वारा काश्वोपुरी विवक्षिता, तस्या मध्ये नासिक्यो मकार: तत्परितथ् क-आ-च-ई-रूपाव्त्वारो वर्णाः, तत्र 'पल्लवाः' नाम राजानः- तद- भिधानमष्टाक्षरम्, यथा प, अ,ल, ल, भ्, व,आ:। केचितु विसर्गस्ययोगवाहत्वेन १. बातुर्वण्य ।

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तृतीय: परिच्छ्ेद: २६१

वर्णमभ्ये परिगणनमनुपयुक्तं मन्यमाना: 'पुण्डकाः' इति नाम दस्पयन्ति-प, ट, ण, ४, , भ, क, भा, इत्यष्टौ वर्णास्तत्र स्थिताः॥११४॥ हिन्दी-मध्यमें नासिकास्थानीय वर्ण है, और उसके चारों ओर चार अक्षर है, ऐसे नाम वाली एक प्रसिद्ध नगरी है जिसमें अष्टाक्षरनामशाली राजगण रहा करते हैं। इसमें वर्णसंख्या द्वारा काख्ीपुरी और पल्लवानरेश विवक्षित है। 'काख्नी' के मध्यमें 'अ' और 'क-आ-च-ई-' रूप चार वर्ण हैं, 'पल्लवा' में आठ अक्षर हैं-प, अ, ल, ल, अ, व, आ, विसर्ग। कुछ लोग विसर्गको वर्ण नहीं मानने के कारण 'पल्वाः' की जगह 'पुण्डूकाः' की कल्पना करते हैं, उसमें विसर्गके बिना ही आंठ अक्षर हैं। पलव और पुण्डूक इस पाठ पर ही दण्डीके समय- निर्धारणका भार मुख्य रूपसे अवस्थित है, इस विषयमें भूमिका देखें॥ ११४॥ गिरा म्ललन्त्या नम्रेण शिरसा दीनया हशा। तिष्ठन्नमपि सोत्कंम्पं वृद्धे मां नानुकम्पसे ॥ ११५॥ प्रकल्पितां नाम प्रहेलिकामुदाहरति-हे श्रृद्धे जरठे, रखलन्न्या वार्धक्याद् गद्गदया गिरा, नम्रेण अधोनतेन शिरसा मस्तकेन, तथा दीनया कातरया दृशा (उपलक्षिता) त्वं सोत्कम्पं ससातत्विकभावं सभयं वा कम्पमानं मां तिष्ठन्तं त्वत्प्रतीक्षास्थितं नानुकम्पसे न दयसे। शृद्धां कामयमानस्योक्तिरिंयम्। संतृतिकरोऽर्थस्तु-हे वृद्धे पुराणपुरुषपत्नि लचम, स्खलन्त्या गिरा नम्रेण शिरसा दीनया च दृशा सोत्कम्पं तिष्ठन्तमपि मां नानु- कम्पसे इति। अत्र प्रकल्पिता नाम प्रहेलिका ॥११५ ॥ हिन्दी-कोई वृद्धाकामुक वृद्धा खीसे कहता है कि, ओ वृद्धे, तुम्हारी वाणी बुढ़ापे के कारण लटपटा रही है, शिर झुक गया है, आँखें कातर हो रही हैं, मैं तुम्हारी प्रतीक्षामें सास्विक कम्पयुक्त होकर खड़ा हूँ, फिर भी तुम मुझपर कृपा नहीं कर रहो हो। दूसरा संवृतिकारी अर्थ यह भी हो सकता है कि हे लक्ष्मी तुम मेरे ऊपर क्यों नहीं दया करती हो, मैं गद्गदवाणीसे शिर झुकाये, कातर नयनोंसे काँपता हुआ तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ। इस श्रोकमें प्रतीयमान प्रथम अर्थ द्वारा द्वितीय अर्थकी कल्पना की गई है, अतः इसे प्रकल्पिता नायक प्रहेलिका कहते हैं ॥११५॥ आदौ राजेत्यघीराक्षि पार्थिव: कोऽपि गीयते। सनातनश् नैवासी राजा नापि सनातनः॥ ११६ । नामान्तरिता प्रहेलिकामुदाहरति-अदाविति। हे अधीराक्षि चश्चलनयने कोपि पार्थिवः पृथिव्यां विदितः प्रसिद्धः आादो राजा इति गीयते कथ्यते, ततबासनातनः गीयते कथ्यते, असौ प्रृथिठ्यां प्रसिद्धः नापि राजा नैव सनातनः भस्ति, (तहिं कोऽसाविति प्रश्नः) तदुत्तरमप्यत्रैव, यथा पार्यिवः कोऽपि पृथ्वीप्रभवो वृक्षः आदो प्रथमं राजा इति ततक् नातनः न तनः अतनः न नातनः (परमार्ये तनः) नातनेन सहितः सनातनः तनशब्दयुतः राजातन इति गीयते। राजातनः प्रियालवृक्षः, यद्यप्यमरकोशे प्रियाल- पर्यायो राजादनशब्द एव दृश्यते, परन्तु शब्दमालायां राजातनशब्दोऽपि तदर्थकोऽस्तीति नानुपपत्ति:। अत्र राजातन इति वृक्षनान्नि नानार्थकल्पनया नामान्तरिता नामेयं प्रहेलिका ॥११६॥

१. सोस्कण्ठं।

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२७० काव्यादर्श:

हिन्दी-हे चञ्नलनयने, पृथिवीमें प्रसिद्ध कोई पहले राजा कहा जाता है फिर सनातन (तन शब्दयुक्त नामवाला) कहा जाता है, परन्तु वास्तवरमें न तो वह राजा ही है और न सनातन ही है। (फिर प्रश्न होता है कि तब वह कौन है ? इस प्रश्नका उत्तर भी इसी श्रोकमें है) पृथिवीमें उत्पन्न कोरड वृक्ष पहले राजा कहा जाता है बादमें मनातन (तनशब्दयुक्त) कहा जाता है-राजा + तन = राजातन कहा जाता है, वह न राजा है न सनातन शाश्वत। वह तो प्रियालवृक्षमात्र है। इस शोकमें प्रियालवृक्षके नाम राजातन शब्द्रको लेकर नाना अर्थोंकी कल्पना की गई है, अतः यह नामान्तरिता नामक प्रहेलिका है। यद्यपि अमरकोशमें प्रियालका नामान्तर 'राजादन' कहा गया है, परन्तु शब्दमाला नामक कोषमें राजातन शब्द मी प्रियालपर्यायमें आया है, अतः इस तरहकी कल्पना अनुपपत्न नहीं कही जा सकती है। इस नामान्तरिता नामक प्रहेलिका के लक्षणमें 'नाम्नि नानार्थकल्पना' कहा गया है, वहाँका नामपद केवल संज्ञापरक नहीं है, वस्तुपरक है, अत एव- तरुण्यालिक्गितः कण्ठे नितम्बस्थलमाश्रितः । गुरूणां सन्निधानेऽपि कः कूजति मुड्मुंद्कः॥ इस श्रोकमें सजलघटरूप वस्तुको कहनेके लिये नाना अर्थकल्पनायें की गई है अतः नामान्तरिता प्रहेलिका होगी, इसी तरह - य एवादौ स एवान्ते मध्ये भवति मध्यमः। अस्यार्थ यो न जानाति तन्मुखे नं ददाम्यहम्॥ इस पद्में भी नामान्तरिता प्रहेलिका है, यहाँ 'यवस' प्रतिपादन करनेके लिये नाना कल्पनायें की गई हैं।। ११६ ।। हतद्रव्यं नरं त्यक्त्वा धनवन्तं वजन्ति काः । नानाभङ्िसमाकृपठलोका वेश्या न दुर्घराः॥११७॥ निभृतामुदाहरति-हतद्रव्यमिति। नानाभज्िभि: बहुविधाभिर्विलासचेष्टाभिः समा- कृष्टाः स्वाभिमुखीकताः लोकाः याभिस्ताः तथोक्ताः तथा दुर्धराः स्वायत्तीकतु कटिनाः कथच्िदप्यवश्याः काः हृतद्रव्यं गृहीतधनं नरं त्यक्त्वा धनवन्तं व्रजन्ति वेश्याः न (वेश्यातिरिक्ता एव प्रश्नविषयाः) इति प्रकटार्थः । निभृतार्थस्तु नानाभज्ञास्तरप्न यत्र तादृशं नानाभत्ि जलं तेन समाकृष्ट।: निमज्जिताः लोका: याभिस्तास्तयोकाः, तथा दुर्धराः दुःखेन पर्वतेभ्यो निगताः नद्यः हृतानि गृहीतानि द्रव्याणि गैरिकादीनि येषां तादृशं नरम् पुरुषमिवाश्रयभूतं (पर्वतं) त्यक्त्वा धनवन्तं रत्नाकरं सागरं व्रजन्ति। भत्र तुल्यविशेषणवशात्प्रतीयमानाया अपि नदा वाचकशन्दानुपस्थापिततया निभृ- तात्वमिति बोध्यम् ॥११७॥ हिन्दी-नानाविध विलासचेष्टाओंसे लोगोंको आकृष्ट करनेवाली, वशमे नहीं आनेवाली तथा हतद्रव्य पुरुपको छोड़कर धनवान्के पास चली जानेवाली कौन है, वेश्याके विषयमें यह प्रश्न नहीं है, यह तो हुआ प्रकट अर्थ, निभृत अर्थ है कि नानाविष तरक्गों द्वारा लोगोंको डुबानेवाली, कष्टसे पर्वतोंसे निकली हुई नदियों जिसका गैरिकादि धातु ले लिया है ऐसे स्वोद्गम पर्वतको छोड़- कर रत्नाकरकी ओर चली जाती हैं। इस उदाहरणमें यद्यपि विशेषणसाम्यद्वारा नदीरूप अर्थ प्रतीत होता है, परन्तु नदीकी वाचक शब्दसे उपस्थिति नहीं होती है, अतः इसे निभृता नामक प्रहेलिका कहा जाता है॥ ११७ ॥

१. हिला। २. शताकुट ।

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तृतीय: परिच्छेद: २७१

स मामद्य प्रभूंतोत्कं करोति कलभाषिणि ॥ ११८॥ समानशब्दामुदाहरति-जितप्रकृष्टकेशाख्य इति। हे कलभाषिणि, मधुरवचने, प्रकृष्टकेशारूया प्रवाल इति जिता प्रकृष्टकेशाख्या प्रवालो येन तादृशः जितप्रवालस्तथा अभूमि: पृथ्वीरहितः अधरस्तेन साह्यः समानाभिधानस्तेऽधरः, अद्य मां प्रभूतोत्कं जाय- मानोत्कं करोति। अत्र प्रकृष्टकेशाख्याभूमिसाहयशब्दौ लक्षितलक्षणया प्रवालाधरवाचकौ इति प्रकृतार्थ- स्यं समानशब्देनोपस्थापनात् समानशब्दा नामेयं प्रहेलिका ॥। ११८॥ हिन्दी-प्रकृष्ट केशकी आख्या (नाम) प्रवालको जीत लेने वाले तथा अभूमि-पृथ्वी रहदित अधरसे तुल्य नाम वाले तुम्हारे इस अधरने मुझे अतिउत्सुक-पानाभिलाषी बना दिया है। इस उदाहरणमें प्रकृष्टकेशाख्या और अभूमिसाहय शब्द लक्षितलक्षणा द्वारा प्रवाल तथा अधर रूप अर्थ को उपस्थापित करते है, अतः प्रकृत अर्थके समान शब्द द्वारा उपस्थापित होनेके कारण इसे समानशब्दा नामक प्रहेलिका कहा जाता है॥११८॥ रायनीये परावृत्य शयितौ कामिनौ क्रुघा। तथैव शयितौ रागात् स्वैरं मुखमचुम्बताम् ॥ ११९॥ संमूढामुदाहरति-शयनीय इति। कामिनौ क्रुधा प्रणयकोपेन परावृत्य विदिष्मुखौ भूत्वा शयनीये शय्यायां शयिता, रागात् प्रमातिरेकात् तथैव शयितौ स्वैरं यर्थच्छं मुखम अन्योन्यवदनम् अचुम्बताम्। अत्र विवृश्य शयानयोः परस्परमुखचुम्बनमशक्य- क्रियमिति प्रथमं संमोहः, पर्व परावृत्त्य शयितौ, परस्ताथ कोपशान्ती पुनः परावृत्य शयितो (परावृत्तयोः पराशृतौ संमुखीनतासिद्ौ) परस्परं मुखमचुम्बतामिति भवत्यु- पपत्तिः॥११९।। हिन्दी-कामियुगल क्रोधके कारण परावृत्त होकर मुँह घुमा कर शय्या पर सो रहे थे, प्रेमातिरेकसे उसी प्रकार सो कर अन्योन्यमुख चुम्बन करने लगे। इसमें पहले मालूम पड़ता है कि मुँह घुमा कर सोने रहने पर मुख चुम्बन कैसे किया, परन्तु वास्तविकता यह है कि पहले क्रोधके कारण मुँह घुमा कर सोते रहे, पीछे कोप शान्त होने पर धूम गये, सम्मुख हो कर सो गये और एक दूसरेका मुख चुग्बन कर लिया॥११९॥ जनः। हिमापहामित्रधरैर्ष्यातं व्योमामिनन्दृति ॥ १२०॥ परिहरिकामुदाहरति-विजितेति। विना गरुडेन जित इन्द्रस्तस्यात्मभवः पुत्रः अर्जुनस्तस्य द्वेषी शत्रुः कर्णस्तस्य गुरुः पिता सूर्यस्तस्य पादैः किरणैः हतः सन्तापितः जन: हिमापहो वहिः तस्यामित्राणि जलानि तेषां धरजलघरैः मेर्घ: व्याप्तं व्योम आकाशम् अभिनन्दति प्रशंसति। अत्र यौगिकशब्दपरम्परया प्रकृतायोंद्भावनात् योगमालात्म कतया परिहारिका नामेयं प्रहेलिका ॥। १२० ॥ हिन्दी-बिना गरुड़से जित इन्द्र, उनके पुत्र अर्जुनके द्वेषी कर्णके पिता सूर्यकी किरणोंसे सन्तापित जन हिम जाड़ेको दूर करनेवाला वह्ि-हिमापडके अमित्र जलको धारण करनेवाले १. गस्तेऽभूमिसमाहय: । २. सभूतोत्कं। ३. रुषा । ४. विजितान।

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२७२ काव्यादर्श:

मेथोंसे व्याप आकासकी इच्छा करता है, सूर्बंकरसन्तप्त मनुष्य बदळी चाहता है। इस उदाहरणमें यौगिक शब्दोंकी भरमार है, अतः इसे परिहारिका नामक प्रहेषिका कहते हैं॥ १२० । न स्पृशत्यायुषं जातु न स्रीणां स्तनमण्डलम्। अमनुष्यस्य कस्यापि हस्तोऽयं न किलाफलः ॥१२१॥ एकच्छन्नामुदाहरति-न स्पृशतीति। कस्यापि भमनुष्यस्य मनुष्यत्वायोग्यस्य हस्तः जातु कदाचिदपि आयुरधं प्रहरणं न स्पृशति, न च स्त्रीणं युवतीनां स्तनमण्डलं स्प्रृशति, तथापि अयं हस्तः अफलः फलशून्यो न भवति। भायुधस्पर्शराहित्येन पौरुषाभावः, स्त्री्णं स्तनमण्डलस्पर्शाभावेन व रसिकत्वाभावः, तदुभयाभावयुतरयापि हस्तस्य नाफल्यमिति विरोध: प्रतिभासते। तत्परिहाराय श्रमनुष्यशन्देन गन्घर्वो लक्ष्यते, तथा च अमनुष्यहरतो नाम गन्धर्वहस्तः एरण्डवृक्ष:, स च नायुधं स्पृशति-तस्य सुखच्छेद्यत्वेनायुधानपेक्षणात्, न वा स्त्रोण स्तनमण्डलं स्पृशति, अनुपगोगात्कन्डूकर :- त्वाश्, तथापि अफलो न भवति फलप्रसूत्वात्, इत्यर्थ कृत्वा विरोधो निरस्यते। 'अ्रमण्ड- पश्चांगुलवर्धमानागन्धवहस्तः' इति हारावली। अतराश्रितं फलं व्यक्कम्, आश्रयो वृक्षत्- च्छन इति एकच्छना नामेयं प्रहेलिका।। १२१॥ हिन्दी-न कभी आयुधका स्पर्श करता है-और न स्त्रियोंके कुचमण्डलको छूता है, फिर भी अमनुष्यका-अयोग्यपुरुषका यह हाथ निष्फल नहीं है। आपाततः यही अर्थ है, इस अर्थमें आयुषस्पर्श नहीं करनेसे पौरुषका अभाव और स्त्रीस्तनमण्डलस्पर्श नहीं करनेसे रसिकत्वका अभाव स्फुट है, फिर भी सफलताका होना विरुद्ध-सा प्रतीत होता है, उसके परिहारार्थ अमनुष्य- शब्द लक्षणाद्वारा गन्धर्वार्थक हो जाता है, तब अमनुष्यहस्त-गन्धर्वहस्त-एरण्डवृक्ष दुआ, वह कभी अख नहीं छूता, क्योंकि हाथसे ही टूट जाता है, स्तियोंके स्तनमण्डलपर भी उसका सम्बन्ध नहीं होता है, फिर भी फलशाली है। इस अर्थमें विरोष हट जाता है। गन्धवहस्त परण्ड का नाम है। इस उदाइरणमें फल-आश्रित व्यक्त है, वृक्ष-आश्रय छिपा हुआ है, अतः यह एकच्छन्ना का उदाहरण हुआ ॥ १२१॥ केन क: सह संभूय सर्वकार्येषु सन्निधिम्। सब्च्वां भोजनेकोले तु यदि डष्टो निरस्यते ॥ १२२ ॥ उभयच्छभामुदाहरति-केनेति। कः पदार्थ: केन पदार्थेन सह संभूय उत्प्त्ति प्राप्य सर्वकार्येषु सभिषिम उपस्थिति लच्ा प्राप्य भोजनकाले यदि दष्टस्तदा निरस्यते दूरीक्रियते इति प्रश्नः। अस्योत्तरमप्यत्रैव, कस्य मस्तकस्यायं क: केशः केन मस्तकेन सह संभूय उत्पद्य सवकार्येषु भूषणादिधारणात्मकेषु सभिधिं ल०वापि भोजनकाले (पात्रे) दष्टबेद् दूरीकियते इति। अंत्राश्रयाश्रयिणोरुमयोर्मस्तककेशयोश्छल्तया उभयच्छभ्ना नामे4ं प्रहेलिका ।। १२२ ॥ हिन्दी-कौन ऐसा पदार्थ है जो किस पदार्थके साथ जन्म लेकर और सभी कार्योंमें उपस्थित रह कर यदि भोजनकालमें देखा जाय तो दूर कर किया जाता है, यह प्रश्न है, इसका उत्तर भी इसीमें है-क-मस्तकका क-केश मस्तकके साथ उत्पन होकर और अलक्कार-माल्यादि धारणमें १. लब्धा । २. बेलायां।

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तृतीय: परिच्छेद: १७२

सान्िध्य पा करके भौ यदि मोजनकाकमें पात्रमें देखा जय तो:दूर कर ठिय्या जाता है। कस्म मस्तकस्यायं क: केशः, अर्शभाचच्। इस उदाहरणमें आम्य मस्तक और आश्रित केश दोनों ही छिपे हुए हैं, अतः इसे उभयच्छका नामक प्रहेलिका कहते हैं।। १२२ ॥ सहया सगजा सेना सभटेयं न चेजिता। अमावृकोऽयं मूः स्यादकरबन्ध नः सुतः ॥ १२३॥ सङ्कोर्णामुदाहरति-सह्येति। सहया साक्रा, सगजा गजयुक्ता, सभटा योद्षृभि: सहिता इयम् शात्रवी सेना चेतू न जिता न पराभृता, तदा भयं नः सुतः भक्षररः परमा र्थतस्वश्ञोऽपि अ्रमातृक्ः परापरसामर्थ्यप्रमाविकल: एतादशो मूढः स्यात् इति प्रकाशोऽर्यः । संतृतार्थस्तु सहया हकारेण यकारेण व सहिता, सगजा गकारेण जकारेण च सहिता, सभटा भकारटकाराभ्यां सहिता, सेना इकारेण नकारेण च सहिता। एवंभूता वर्णमाला न जिता नाभ्यस्ता न सम्यगलखिता न सम्यगुदिता चेत् भक्षरङः वेदङः अवि भमातृकः वर्णपरिचयरहितः मूढः स्यात्। कण्ठस्थीकतवेदस्यापि लिखितुमक्षमस्य पुत्रस्य कृते पितु- रियं चिन्ता॥ १२३ ॥ हिन्दी-घोड़ोंसे युक्त, हाथीवाली, यह शतुसना अगर नहीं परास्त की जा सकी, तो परमार्थ- ज्ञानी होने पर भी परसामर्थ्यज्ञानसे वश्चित यह हमारा पुत्र मूर्ख ही कहा जायगा। यह प्रकाश अर्थ हुआ, छिपा हुआ अर्थ यह है कि-हकारयकारसे युक्त, गकारजकारसे युक्त्त, भकारटकारसे युक्त सथा इकारनकार से युक्त यह वर्णमाला यदि लिखने पढ़ने योग्य नहीं हो सकी, तो पूरा बेद पढ़कर भी मात्रासे अपरिचित यह मेरा पुत्र मूर्ख ही रह जायगा। कण्ठीकृतवेद किन्तु अक्षरान- भिज्ष पुत्रके विषयमें पिता चिन्ता कर रहा है॥ १२३।। सा नामान्तरितामिश्रा वश्चितारूपयोगिनी। एवमेवेतरासामप्युन्नेय: सफकरक्रमः ॥ १२४॥ (इति प्रहेलिकाचक्रम्) अस्य सङ्कीर्णप्रहेलिकात्वमुपपादयति-सा नामेति। सा प्रदर्शिता प्रहेलिका नामा- न्तरिता मिश्रा हयादिशब्दानां विविधार्थकल्पाभामान्तरिताख्यानामिकया प्रहेलिकया मिश्रा युक्ता वश्चितारूपयोगिनी सेनाशब्दस्य प्रसिद्धंऽर्थेऽप्रयोगाद वश्चितानामकप्रहेलिकायुक्ता चेतति नामान्तरिता वश्चितानामकप्रहेलिकाद्वयसाड्डर्यमत्र बोष्यम् । एवमेव इतरासाम् अपि प्रहेलिकानां सङ्करक्रमः सक्ठरप्रकारः उन्नयः स्वयमूहनीयः ॥१२४॥ हिन्दी-'सहया सगजा' इत्यादि उदाहरणमें दो तरहकी प्रहेलिकाओंका-नामान्तरिता और वश्िता नामक दो प्रहेलिकाओंका साकर्य है, क्योंकि इयादि शब्दोंकी विविधार्थकल्पना होनेसे नामान्तरिता हुई और सेना शब्द का प्रसिद्ध अर्थ में प्रयोग नहीं होने से वश्चिता हुई, इस प्रकार नामान्तरिता और वश्चिता नामक दो प्रहेलिकायें इस उदाहरणमें संकीण है, इसी तरह अन्यान्य प्रहेलिकाओंके सङ्करका क्रम-प्रकार मी स्वयं समझ लें॥ १२४॥ अपार्थ व्यर्थमेकार्थ ससंशयमपक्रमम्। शब्दहीनं यतिम्रष्टं भिन्नवृत्तं विसन्धिकम् ।। १२५।।

18 १. अमात्रिक: ।

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२७४ काव्यादर्श:

देशकालकलालोकम्यायागमविरोधि घ। इति दोषा दशैवैते वर्ज्याः कावयेषु सूरिभिः॥१२६ ॥ एतावत्पर्यन्तेन प्रन्थेन काव्यशोभाकरा अर्थालद्काराः शब्दालङ्काराश्च निरूपिता:, सम्प्रति 'तदल्पमपि नोपेच्यं शास्त्रे दुष्ट कथश्चन' इति हेयत्वोक्तपूर्वान् दोषानाह- अपार्थमिति। देशकालेति। तत्र दोषसामान्यलक्षणं 'वर्ज्याः' इत्युक्तम्। काव्ये विद्व- द्विरभिमतप्रतीतिपरिपन्थितया विध्नभृता इमे दोषा हेया इति वर्ज्यत्वमात्रं दोषलक्षण- मुक्तम्। वामनस्तु गुणविपर्ययात्मानो दोषा इत्याह। प्रकाशकारस्तु 'मुख्यार्थहृतिर्दोष' इत्याह। तदित्यं लक्षितस्य दोषस्य प्रभेदानाह-अपार्थम् इति। १-अपार्थम्-अर्थ- शून्यम्, २-व्यर्थम्-विरुद्वार्थम्, ३-एकार्थम्-अ्भिन्नार्थम् (पुनरुक्तम), ४-ससंश- यम्-सन्दिग्धम्, ५-अपकमम्-कमरहितम्, ६-शब्दहीनम्-अपेक्षितशब्दन्यूनम्, ७- यतिभ्रष्टं-विश्रान्तिविच्छेदशून्यम्। ८-भिन्नवृतम्-वृत्तनियमरहितम्, ९-विसन्धि- कम्-सन्धिशून्यम्, १०-देशकालकलालोकन्यायागमविरोधि-देशविरुद्धकालविरुद्धकला- विरुद्धलोकविरुद्धन्यायविरुद्धागमविरुद्वं चेति दश दोषाः सृरिभिः वर्ज्यत्वेन उक्ताः । भरतेन हि-'गूढार्थमर्थान्तरमर्थहीनं भिन्नार्थमेकार्थमभिप्लुतार्थम्। न्यायादपेतं विषमं विसन्धि शब्दच्युतं वै दश काव्यदोषाः' इति दशैव दोषा उक्ता, तदनुसारेण दण्डिनाऽपि तावन्त इव दोषा: स्वीकृताः। अर्वाचीनाचारय रसार्थशब्दगतत्वेन बहवो दोषा अभ्युपेता:, परं दण्डिना इष्टार्थव्यवच्छिन्नपदावलीकाव्यत्ववादिना शब्दार्थगता एव दोषा: स्वीकृता:, न रसगताः, तस्य काव्यशरीरबहिर्भूतत्वात् ॥१२५-१२६ ॥ हिन्दी-अब तक काव्यगत अलक्कारोंका निरूपण किया गया, अब दोषोंका निरूपण करेंगे। आचार्य दण्डीने मरतके अनुसार दस ही दोष मानकर काम चलाया है, अन्यान्य दोषोंके विषयमें उन्होंने कुछका स्वाभिमत दोषोमें अन्तर्भाव किया है और कुछ को दोष नहीं माना है। अर्वाचीन आचार्योने 'पदे पदांशे वाक्येर्थें संभवन्ति रसेऽपि यत' कहकर दोषोंके पांच प्रभेद स्थापित किये हैं, परन्तु दण्डीने केवल एक ही प्रभेद माना है-शब्दगत। इसका प्रधान कारण यह है कि दण्डीके मतमें शब्द ही काव्य है, अतः रसादिगत दोषोंके विषयमें वह क्यों ध्यान देते ? दोषोंके नाम कारिकामें आये हैं, वह यह हैं, १-अपांर्थ, २-यर्थ, ३-एकार्थ, ४-ससंशय, ५-अपक्रम, ६-शब्द- हीन, ७-यतिभ्रष्ट, ८-मिन्नवृत्त, ९-विसन्धिक, १०-देशकालकलालोकन्यायागमविरोधि। इन दोषों की परिभाषा यथावसर की जायेगी ॥ १२५-९२६ ॥। न वेत्यंसौ। विधार: कर्कशः प्रायस्तेनालीढेन किं फलम् ॥ १२७ ॥ भामहेन 'प्रतिज्ञाहेतुदृष्टान्तहीनं दुष्टं च नेष्यते' इति कथयता कथितेभ्यो दशम्यो दोषेभ्योऽधिकाः प्रतिज्ञाहीनत्व-हेतुहीनत्व-दृष्टान्तहीनत्वरूपास्रयो दोषा: स्वीकृताः, तान् निराकर्तुमाह-प्रतिक्षेति। साध्यनिर्देशाः प्रतिज्ञा, साध्यसाधनं हेतुः, प्रसिद्धोदाहरणो- पन्यासों दष्टान्त: एषां हानिः अनुपादानं दोषः अस्ति न वा अयं विचार: प्रायः भूम्ना ककेश: रूक्ष:, अतः काव्यनिरूपणे तेन विचारेण आालीढेन चर्वितेन कृतेन किं फलम्? १. वेस्ययं। २. कर्कशप्रायस्।

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तृतीय: परिच्छेद

प्रतिज्ञाहीनत्वादयो हि दोषा: शात्त्रीयविवाररपे शात्तार्ये समधिकमुपयुज्यन्ते न पुनः सरसकाव्यचिन्तने इति तद्वियारो निष्फलान्मयात्रोपेक्षित इति भावः ॥।१२७॥ हिन्दी-भामइने प्रतिज्ञाद्दीनत्व, हेतुहीनत्व तथा दृषटान्तहीनत्व नामके तीन दोष माने हैं, दण्डीने उनके विषयमें कहा है कि उन्हें दोष मानें कि नहीं मानें यह विचार कर्कश है, रूव है, अतः उसके सम्बन्धमें विचार करनेसे क्या लाभ ? दण्डीका अभिप्राय यह है कि प्रतिहादीन- त्वादिदोष काव्यसे उतना सम्बन्ध नहीं रखते हैं, अप्रतिज्ञात वस्तुओंका भी वर्णन कविगण करते ही हैं, हेतुहीनत्व भी प्रसिद्ध हेतुस्थलमें दोष नहों होता है, दृष्टान्तहीन होनेसे भी उतना वैरस्य नहीं होता है, अतः इन दोषोंका विचार अनपेक्षित है, अतः उनके नहीं मानने से भी कोई न्यूनता नहीं होगी॥ १२७॥ समुदायार्थशूम्यं यत्तदपार्थमिंतीष्यते।

कमप्राप्तमपार्थ नाम दोषं लक्षयति-समुदायेति। यत् समुदायार्थशून्यम् परस्पर- संबद्धार्थप्रतिपादनाक्षमं तत् अपार्थम्, इति इष्यते मन्यते, तत्सम्बद्धार्थप्रतिपादनाक्षमतर्व द्विधा भवति-एकं पदेषु, अपर वाक्येषु। क्वचित् पदानि सार्थकान्यपि परस्परासम्बद्- तया आकाडक्षाराहित्यालार्थ मिलित्वोपस्थापयन्ति; यथा गौरश्वः पुरुषो हस्ती शकुनि- मृगो ब्राह्मण इति। तदत्र वाक्ये पदान्यपार्थानि। एवमेव वाक्यानि प्रत्येकमर्थवन्ति सन्त्यपि मिलित्वाऽप्गािभावभाजि सन्ति। यत्रार्थ नोपस्थापयन्ति तत्राप्यपार्थत्वं भवति, यथा-'रामा हसति, वृक्षस्य शाखा पतति, पत्रिण: विमले व्योम्नि गच्छन्ति, नधः पानीयपुरिताः' अत्र वाक्यनि परस्परासंबद्धानोत्यपार्थानि। तदिदमपार्थम् उन्मताः उन्मादरोगिणः, मत्ताः मद्यपानजनितयुद्धित्रमाः बालाः शिशवथ्, तेषामुक्त: भाषणादन्यत्र दुष्यति, तेषामुक्तौ तु न दुष्टमिति बोध्यम् ॥१२८ ॥ हिन्दी-जिसमें पद या वाक्यका अर्थ हो, परन्तु समुदायवाक्य या महावाक्यका अर्थ न हो, उसे अपार्थ कहते हैं, अपार्थवाक्यमें सभी पदोंके सार्थक रहने पर भी उनका परस्पर सम्मिलित अर्थ नहीं होता है, अपार्थमहावाक्यमें अवान्तर वाक्यों के अर्थ रहने पर भी परस्पर सम्बद्ध अर्थ नहीं होता है, अतः वह अपार्थ है। यह अपार्थ दोष पागल, मदमत्त और बालकों की उक्तिके अतिरिक्तस्थलमें ही दोष कहा जाता है, उन्मत्त-मत्त-बालोक्तिमें परस्परासम्बद्धत्व होना स्वाभाविक है, अतः वडाँ वह दोष नहीं माना जाता ॥ १२८ । समुद्रः पीयते देवेरंहमस्मि जरातुरः। अमी गर्जन्ति जीमूता हरेरैरावर्ण: प्रियः ॥१२९॥ अपार्थमुदाहरति-समुद्र इति। 'देवः समुद्रः पीयते' अत् देवानां समुद्रपाने योग्यताविरहात् पदेषु सार्थकेषु सत्स्वपि वाक्यार्थबोधविरहादपार्थम्, एवमेव-'अहं जरा- तुरः अस्मि, जीमूता अमी अर्जन्ति, हरेः ऐरावणः प्रियः' इत्यमीषां त्रयाणामपि वाक्यानां पृथक्-पृथक् साथेकतवेऽपि परस्परनिरपेक्षत्वात् एकवात््यत्वाभावकृतमपार्यत्वम्॥१२९॥ १. र्थकमिष्यते। २. तन्मत्तोन्मसवाला। १. उक्तैरन्यत्। ४. मेघेः।५. अय। ६. मेरावत।

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२७६ काव्यादर्श:

हिन्दी-वाक्यमें अपार्यत्वका उदाहरण है 'दे वैः समुद्रः पीयते'। इस वाक्यमें सभी पद अर्थ बाले हैं, परन्तु देवोंमें समुद्र-पानयोग्यताके नहीं होनेसे उनका भिलितार्थ नहीं होता है, अतः यह वाक्य अपार्थ है। 'अहं जरातुरोडस्मि, अमी जीमूताः गर्जन्ति, हरे; ऐरावणः प्रियः' इन वाक्योंका अलग-अलग अर्थ होने पर भी परस्पर अङ्गादिभाव नहीं होनेसे एकान्वित वाक्यार्थ- बोष नहीं होता है, अतः यह महावाक्यगत अपार्थत्व दोष है॥ १२९।।

इवरत्र कवि: को वा प्रयुधीतैवमादिकम् ॥१३० ॥ इदमिति। अस्वस्थचित्तानाम् उन्मादादिदोषभ्रस्तानाम् इदं पूर्वोक्तस्वरूपम् अभि- धानम् कथनम् अनिन्दितम् अदुष्टत्वेन संमतम्। इतरत्र उन्मस्नादीन् बिना को वा कविः एवमादिकं पूर्वोक्तसदशमपार्थ वार्क्य महावाक्यं वा प्रयुज्जीत, कोप्यनुन्मत्तादिरीदृशं न प्रयोकुं क्षमते, दुष्टत्वात्तादृशप्रयोगस्येति भावः ॥। १३० ॥ हिन्दी-इस तरहका अपार्थ प्रयोग अस्वस्थचित्त उन्मादादिग्रस्त जनके लिये निन्दित-दुष्ट नहीं है, और जो उन्मादादिदोषग्रस्त नहीं है, वैसा कौन कवि होगा जो ऐसे अपार्थवाक्यादिका प्रयोग करेगा : ॥ १३० ॥ एकवाक्ये प्रबन्धे वा पूर्वापरपराहतम्। विरुद्धार्थतया व्यर्थमिति दोषेषु पठयते ॥१३१ ॥ व्यर्थ नाम दोषं लक्षयति-एकवाक्ये इति। व्यर्थमित्यत्र विपदं विरुद्धार्थक्मू, तथा च एकवाक्ये प्रबन्धे नानावाक्यघटिते प्रबन्धे वा (यत्) पूर्वापरपराहतम् परस्पर- विरुद्धं प्रतीयते, तद् विरुद्धार्थतय। व्यर्थमति दोषाणां मध्ये गण्यते। अपायें आकाडक्षादिविरहाच्छाव्दबोध एव न भवति, अत् तु शाब्दबोधे जाते पर्यालोबनयाऽर्यविरोधः प्रतिभासते इति अपार्थव्यर्थयोः परस्परं भेद:। वाक्यप्रबन्धपर्यालोचनया विरोधप्रतिभासे व्यर्थत्वदोषः, प्रकरणपर्यालोचनया विरोध- प्रतिभासे तु वत्यमाणो देशकालादिविरोधनामा दोष इति पार्थक्यं बोध्यम्। विरुद्धमतिकारित्व-प्रकाशित विरुद्धत्वामतपरार्थत्वपरिपन्थिरस अविभावादिपरिभ्रहना- मानो दोषा अत्रैव व्यर्थत्वाख्ये दोषेऽन्तर्भवन्तीति दण्डिनो हृदयस्याशय ऊहनीयः ॥१३१॥ हिन्दी-जिस वाक्य अथवा प्रंबन्धमें परस्पर विरुद्ध बातें कही जॉय, उसे विरुद्धार्थक होनेके कारण व्यर्थत्व नामक दोष कहा जाता है। व्यर्थशब्दगत 'वि' का अर्थ विरुद्धत्व है, अभाव नहदीं। व्यर्थत्वदोषस्थलमें अर्थविरोध शाब्दबोधके बाद प्रतिभासित हो उठता है और अपार्थदोषस्थलमें आाकाक्क्षादिविरह होनेसे शाब्दबोध ही नहीं हो पाता है। व्यर्थस्वदोषका विषय वह है जहाँ वाक्य या प्रबन्धकी पर्यालोचनासे विरो प्रतिभासित हो और देशकालादिविरोध नामक वक्ष्यमाण दोष प्रकरण-पर्यालोचनके बाद ही प्रतिभासित होता है। यही भेद है। दण्डीने इसी व्यर्थत्वदोषमें पराभिमत, विरुद्धमतिकारिता, प्रकाशितविरुद्ता, अमतपरार्थता, परिपन्थिरसाङ्विभावादिपरिग्रह नामक दोषोंका अन्तर्भाव स्वीकार किया है॥ १३१॥ जहि शत्रुबंलं कृत्स्नं जय विश्वम्भरामिमाम्। तेव नैकोऽपि विद्वेष सर्वभूतानुकम्पिनः ॥ १३२॥ 1 १. इलम्। २. मर । १. अमूम्। ४. न हि ते कोपि।

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तृतीय: परिच्छेद २७७

प्रबन्धगतं व्यर्थत्वमुदाहरति-जहीति। कृतल्मं शत्रुवलं जहि बिनाशय, इर्मा विश्वम्भरां पृथ्वों जय स्वायत्तीकुरु, सर्वभृतानुकम्पिनः :प्राणिमात्रदयालोस्तष नैकोऽवि विद्वेष्ट अस्तीति शेषः। अत्र शत्रुशून्यस्य शत्रुवलहननं, सर्वभूतदयालेय पृथ्बीजयो विरुद्धतया नोपपद्यते इति व्यर्थत्वं नाम दोषोऽत्र ॥ १३२ ॥ हिन्दी-समस्त शश्रुवलको मार दीजिये, और इस पृष्वीको अधीन बनाइये, सकलभूतदयालु होनेके कारण आपका कोई भी शत्तु नहीं है। इस उदाहरणकोकमें शशुशून्य राजा द्वारा रतुजय और प्राणिमात्र पर दया करने वालेका पृथ्वीविजय रूप परस्पर विरुद्ध बातें कही गई है, अतः यह व्यर्थत्वका उदाहरण है।। १३२ ।। अस्ति काचिदवस्था सा साभिषद्स्य चेतसः। यस्यां भघेद्भिमता विरुद्धार्थाऽपि भारती।।१३३ ॥ विरुद्धार्थतारूपव्यर्थत्वस्य गुणत्वमुपपादयति-अस्ति काचिदिति। साभिषज्स्प दुःखाभिभूतस्य चेतसः सा काचिदवस्था स्थितिः अस्ति, यस्यामवस्थायां विरुद्वार्थाऽवि भारती वाणी अभिमता इष्टा निर्दोषा गुणरूपा च भवेत्। सदुःखजनोंक्ता वाणी विरुद्धार्था सत्यपि तद्विवेकशून्यस्थितिपरिचायकतया न दुष्यति, अपितु माऽधिकंस्वदते इत्यर्थः॥१३३॥ हिन्दी-दुःखयुक्त चित्तकी कुछ ऐसी अविवेकावस्था होती है, जिस अवस्थामें कही गई विरुद्धार्था वाणी भी सदोष नहीं मानी जाती है, गुणयुक्त ही मानी जाती, है। अर्थात यदि दुखामि- भूत जनकी उत्तिमें विरुद्धार्थत्व दोष पाया जाय तो उसे दोष नहीं, गुण माना जायगा; क्योंकि उस तरकी उक्तिसे उसकी आन्तरिक अस्तव्यस्तता प्रतीत होती है।। १३३ ।। परदाराभिलाषो मे कथमार्यस्य युज्यते। पिषामि तरलं तस्याः कदा नु दशनच्छदम्॥ १३४।। व्यर्थत्वदोषस्य गुणत्वमुपदर्शयति-परदारेति। आर्यस्याभिजनवतः मे मम पर- दाराभिलाष: कस्यचिदन्यस्य स्तिया सह सप्मः कथं युज्यते? न युज्यते इत्यर्थः, तस््याः परस्तियः तरलं भयलज्जाचपलं दशनच्छदम् ओष्टं कदा नु पिवामि ? अत्र पूर्वार्द्धे पर- स्निरिया समागमस्यानौचित्यमुत्तम्, उत्तरार्धे तस्येवाभिलाषास्पदत्वमुक्तमिति परस्परविर्- द्वार्थमपीदं कामाभिभूतस्यास्तव्यस्तहृदयस्य जनस्य वचनं गुणवदेव ॥ १३४॥ हिन्दी-सत्कुलोत्पन्न होनेसे हमारे लिये पर स्त्रीसक्गम कैसे युक्त होगा ? मयलज्जासे चश्रक उसके अधरके पानका अवसर कब मिलेगा ? इस पद्यके दोनों चरण विरुद्धार्थक हैं, क्योंकि पूर्वाद्धमें पर-स्त्रीसङ्गमका अनौचित्य बताया है और उत्तरार्धमें उसीके लिये अभिलाषा प्रकट की है, इसको सदोष नहीं, सगुण कहा जायगा; क्योंकि यह कामाभिभूत जनकी विरुद्धार्थक उक्ति उसके मनकी अस्तव्यस्तता व्यजित करती है॥१३४॥ अविशेषेण पूर्वोक्तं यदि भूयोऽपि कीर्स्यंते। अर्थतः शब्दतो वापि तदेकार्थ मर्त यथा।। १३५॥ कमप्राप्तमेकार्थ लक्षयति-अविशेषेणेति। यदि पूर्वोक्तम् बच्ः अर्थतः शब्दतो या अविशेषेण विशेषशून्येन शब्देनाथतो वा पुनः कीरत्यते; तदा तत् एकार्थम् मतम्। अत्राविशेषेणेत्युक्त्या यत्र विशेषाभिधानेच्छयोत्तार्थस्य पुनः कीर्तनं कियते, तत्र नैकर्य- १. सामिलावस्य।

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काव्यादर्श:

दोष इति सूचितम्। यत्र शब्द मेदेऽर्याभेदस्तत्र केवलमर्थपुनरुक्ति, यत्र तु शब्दाभेदस्तत्र शब्दार्योभयपौनरुकत्यम्। यत्र पुनर्भिन्नार्थयोः शब्दयोः सादृश्यं तत्र न पौनरुक्त्यं यथा-'सुरा विप्रः सुरा नीचैः सेव्यन्ते भक्तिभावतः' इति। अर्थतः शब्दतो वेति कथनान- वीनोक्तस्य पुनरुक्तत्वस्य कथितपदत्वस्य चात्र समावेशः कृतो बोध्यः ॥१३५॥ हिन्दी-पहले जो कहा गया, उसके शब्द या अर्थको विना किसी विशेषके दुहरानेको एकार्थ- दोष कहते हैं। बिना किसी विशेषके पूर्वोक्त वस्तुको शब्द या अर्थ में समता रखनेवाले शब्द या अर्थसे दुहराया जाय तो एकार्थत्वनामक दोष होता है। 'विना किसी विशेषके' इस कथनका अभिप्राय यह है कि यदि किसी विशिंष्ट-विशेष कथनके लिये दुहराया जाय तो एकार्थत्वदोष नहीं होता है। शब्दभेद रहनेपर भी यदि अर्थमें अभेद हो तो अर्थमें पुनरुक्ति, और एकही अर्थमें शब्द एकसा हो सो शब्दार्थोमयपुनरु्ति होती है। शब्द एकसा हो और अर्थ मिन्न हो तो कुछ दोष नहीं होता है, इसी दोषमें नवीनोक्त पुन- रकत्व और कथितपदत्व दोनों दोषोंका अन्तर्माव हो जाता है। १३५।

उत्कामुन्मनयम्स्येते बालां तद्लकत्विषः। अम्भोधरास्तडित्वन्तो गम्भीरा: स्तनयिलवः ॥ १३६ ।। भर्थगतमेकार्थमुदाहरति-उत्कामिति। तस्याः बालाया अलकानां केशानां त्विषः कान्तय इ त्विषः कान्तयो येषां ते तदलकत्विषः श्यामलाः एते ( मेघाः) तडित्वन्तो विद्युता युक्ता: गम्भीरा: स्तनयित्रवः सशब्दाक्ष अम्भोधराः उत्काम् उत्कष्ठाशालिनीम् इमां बालां युवतीम् उन्मनयन्ति उन्मनसं कुर्वन्ति। अत्र 'गम्भीराः स्तनयिल्नवः' इति, 'उत्काम् उन्मनयन्ति' इति च पुनरुष्तिद्वयम् ॥१३६॥ हिन्दी-इस उत्कण्ठिता युवतीको उसके बालोंके समान काले वर्णवाले, बिजलीसे युक्त, गम्भीर, गर्जन करनेवाले मेघ उन्मन बना देते हैं। इस छोकमें 'उत्काम् उन्मनयन्ति' और 'गम्भीराः स्तनयिलवः' यह दो पुनरुक्तियां हैं। 'तडि, स्वन्तः' पुनरुक्त नहीं है क्योंकि वह विशेषार्थ कहा गया है, उससे यह विशेष प्रतीत होता है कि बिजली युक्त होनेसे मेघ अधिक उत्कठाजनक है। यह अर्थपुनरुक्तिका उदाहरण हुआ, शब्द- पुनरक्तिका उदाइरण है-'रतिलीलाश्रमं भिन्ते सलीलमनिलो बहन्', प्रकारान्तरसे भी यदि दुवारा कहा जायगा तो पुनरुक्ति हो ही जायगी। जैसे- 'सइसा विदधीत न क्रियामविवेक: परमापदां पदम्। पृण ते हि विमृश्यकारिणं गुणलु्धा: स्वयमेव संपद: ॥ इस छोकमें पूर्वादोंक्त अर्थ ही प्रकारान्तरसे उत्तरर्धमें कहा है॥ १३६ ॥ अनुकम्पाद्यतिशयो यति कश्धिद्विवक्ष्यते। न दोष: पुनरुक्तोऽपि प्रत्युतेयमलकूक्रिया॥। १३७॥ एकार्थत्वदोवत्वस्थलं निर्दिशति-अनुकम्पादीति। यदि कश्चित् अनुकम्पाद्यतिशयः इयादिभावातिशयः विवच्यते-दयनीयताप्रकर्षः प्रमापयितुमिष्यते-तदा पुनरुक्तोऽपि न दोष:, प्रत्युत तादृशी पुनरुक्ति: अलब्किया गुण एव भवतीति। तथा चोक्तमत्र प्रसम्रे मामहे- १. कृति।

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तृतीय: परिच्छेद: २U६

कथमाक्षिप्चितः सन् युक्त्तमेवाभिधास्यते। भयशोकाभ्य सूयासु हषविस्मययोरपि। यथाह गच्छ गच्छेति पुनरुकतं न तद्विदुः ।। १३७ ।। हिन्दी-यदि किसी व्यक्तिविशेष के प्रति अतिदयनीयता आदिकी विवक्षा हो तो पुनरुक्तदोष नहीं होता है, प्रत्युत वह अलक्कार-गुणस्वरूप हो जाता है॥ १३७ । हन्यते सा घरारोहा स्परेणाकाण्डपैरिणा। हन्यते चारुसर्वाक्ी हन्यते मजुभाषिणी॥ १३८॥ अनुकम्पाविवक्षायां पुनरुक्तरुदाहरणमाह-हम्यते सेति। सा वरारोहा मुन्दरे अकाण्डवरिणा अकारणशत्रुणा स्मरेण हन्यते पोडथते, चारुसर्वाङ्ी अनवय्यसर्वशरीरा- वयवा हन्यते, तथा मञुभाषिणी हन्यते। अत्रं 'हन्यते' इति पदस्य पुनरुक्त्या नायिकायाः कोऽपि दयनीयतातिशयः प्रत्याय्यते इति नात्र दोषः पुनरुक्तत्वं प्रत्युत गुण एवेति। एवं विहितानुवाद्यत्वादावाप पुनरुत्तिर्गुण एव, यथा-'उदेति सविता ताम्रस्ताम्र एवास्तमेति च' इत्यादाविति बोध्यम्॥ १३८॥ हिन्दी-यह सुन्दरी अकारणशत्ु कामदेव द्वारा पीडित की जाती है, तथा यह सर्वावय- वानवध पीडित होती है, यह मधुरवचना पीडित होती है। इस उदाहरणश्रोकमें बार-बार 'इन्यते' कहनेसे उस सुन्दरीकी दयनीयता व्यज्जित होती है, अतः यह 'इन्यते' की पुनरुक्ति दोष नहीं, गुण ही है। इसी तरह विहितानुवादस्थलमें भी पुनरुक्ति गुण ही होती है, जैसे-'उदेति सविता ताम्रस्ताम्र एवास्तमेति च' इस उदाहरणमें ॥ १३८॥ निर्णयार्थ प्रयुक्तानि संशयं जनयन्ति चेतू। वचांसि दोष एवासौ ससंशय इति स्मृतः ॥१३९, ॥ ससंशर्यं नाम दोषं लक्षयति-निर्णयार्थमिति। यदि निर्णयार्थ प्रयुक्तानि निक्च- यात्मकज्ञानजननाय प्रयुज्यमानानि वचासि पदानि वाक्यानि वा संशयं जनयन्ति अनिश्यात्मकं ज्ञानमुत्ादयन्ति, तदा असी एव दोषः ससंशयः इति स्मृतः । संशयाथ प्रयुत्तस्य संशयजनकत्वे तु न दोष: तदर्थमेव प्रयोगात्। अयं च दोषो यत्र संशयेन निश्चितान्वयबोधानुदयवशात् निश्चितार्थानुपपत्तिस्तत्र शब्दगतः । यत्र त्वर्थबोधानन्तरं प्रकरणाज्ञाने वक्त्रादनिश्वयस्तत्रार्थगत इति बोध्यम्। तत्र शब्दगतस्यास्योदाहरणमनुपर्द वच्यते, अर्थगतस्योदाहरणं काव्यप्रकाशोक्तं यथा- 'मात्सर्यमुत्सार्य विचार्य कार्यमार्याः समर्यादमिदं वदन्तु। सेव्या नितम्बाः किमु भूधराणां क्रिमु स्मरस्मेरविलासिनीनाम्।' अत्र प्रकरणाज्ञानेन शान्तश्प्ञारिणोः को वक्तेति न निश्चयः ॥१३९॥ हिन्दी-जहाँ पर निश्चयात्मक ज्ञानके लिये उच्चारित पद अनिश्चयात्मक ज्ञान उत्पन्न करें, वही दोष ससंशयनामक दोष है। यह दोष वहाँ पर शब्दगत होता है जहाँ संशय हो जानेसे निश्चितान्वयबोध नहीं होनेके कारण निश्चितार्थ का ज्ञान नहीं हो पाता है। अर्थगत वहाँ होता है जहाँ प्रकरणज्ञान नहीं होनेके कारण वक्ता आदि का निश्चय नहीं हो पाता है।

१. यद।

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२८० काव्यादश:

शब्दगत ससंशयका उदाहरण अभी आगे कहा जा रहा है, अर्थगत ससंशयका उदाहरण काव्यपकाशकारने 'मात्सर्यमुत्सार्य' इत्यादि फोक कहा है।। १३९॥ मनोरथप्रियालोकर सलोलेकणे सखि। आराद्वृत्तिरसो माता न क्षमा द्रष्टुमीडशम् ॥ १४० ॥ शब्दगतं ससंशयदोषमुदाहरति-मनोस्थेति। मनोरथप्रियः मनोरथोपनीतः पुरुषः तदालोकनरसे तद्दर्शनावेशे लोले चपले र्क्षणे यस्यास्तादशे, मनोरथशतागतप्रियावलोक- नचपलाक्षि सखि, असौ आराद्वृत्ति: समीपस्था (तव) माता ईदृशं तव प्रणयव्यापारम् ईक्षितुं सोद्रूं न क्षमा न शक्त्ता, अतो निवर्तस्वास्माद्दुरभिसन्घेरित्येकोऽर्थः, अ्रथवा आराद्- वृति: अतिदुरस्था सा तब माता तवेदशं व्यापारं द्रष्टुं न क्षमाऽतो यावतृप्ति विलोकय प्रियमिति वार्थः, अत्र कतरोऽर्यो वक्तरभिमत इति निश्याभावात्संशयो नाम दोषः । स च 'आराद्दूरसमीपयोः' इति नानार्थशब्दोपनिबन्धनप्रभव इति शब्दगतः ॥ १४० ॥ हिन्दी-अरी मनोरथोपनीत प्रियतमके देखनेमें व्यस्तनयने, मेरी प्रिय सखि, तुम्हारी माता समीपस्थ है वह तुम्हारे इस गुप्त प्रणय-व्यापारको नहीं सह सकेगी। पहले अथसे यह आशय निकलता है कि छोडो इस दुर्व्यवहारको, ओर दूसरे अर्थसे यह आशय निकलता है कि यथेच्छ दरेख लो। इन दोनों अर्थोमें कौनसा अर्थ कहनेवाली सखीका अभिमत था यह सन्देह बना ही रह जाता है, अतः यह ससन्देह दोष है। 'आराद' शब्द दूर और समीप दोनों अर्थोंका वाचक होनेसे अनेकार्थक है वही इस सन्देहका बीज है, अतः यह ससन्देह दोष शब्दगत है॥ १४० ।। ईडशं संशयायैय यदि जार्तु प्रयुज्यने। स्यादलक्कार पवासी न दोषस्तत्र तदयथा।। १४१।। सरुशयस्य गुणत्वस्थलमाह-ईहशमिति। यदि जातु कदाचित् ईदर्शं ससंशयं संशयायैव संरायं जनयितुमेव प्रयुज्यते, तदाऽसी ससंशयदोषः अलङ्कार एव संशयालद्वार एव जायते, तत्र दोषो न भवति। तदुदाहरणमुच्यते॥ १४१॥ हिन्दी-यदि कदाचिव संशय उत्पन्न करनेके ही लिये संशययुक्त वाक्यका प्रयोग किया जाय, तब वहाँ यह ससंशयदोष नहीं होगा, प्रत्युत वह संशयालक्कार होगा। इस अदोषताका कारण तो लक्षणाप्रसक्ति ही है, क्योंकि लक्षणमें कहा है-'निश्चयार्थ प्रयुक्तानि संशथं जनयन्ति चेद' ॥। १४१ ॥

कालेनैव फठोरेण प्रस्तां किन्नस्तदाशया*॥।१४२। ससंशयदोषस्य गुणस्यमुदाहरति-पश्यामीति। अनन्नजातइ्लद्विताम् मदनजनित- म्याधिनाSSक्रान्ताम् कठोरेण निष्कृपेण कालेन एव मृत्युनेव प्रस्ताम् ताम् अनिन्दितां एन्दरी तब प्रेयसी पश्यामि, नः श्रस्माकं तदाशया तदीयजीवनसंभावनया किम्? न किमपि तज्जीविताशाया: फलम् , साऽचिरादेव मरिष्यतीति भावः । १. अणं। २. बादेब। ३. यातु। ४. कि नुत। ५. स्तववारया।

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तृतीय: परिच्छेद: २८१

अथवा अप्रजः मदन: तस्यातक्क सन्ताप:, स न भवतीत्यनप्जातक्कः, तेन मदन- संतापभिन्नभ्रीष्मसन्तापेन आक्रान्तां तां पश्यामि, अतो नस्तदाशया किम् ? अत्र नायका- कुलीकरणाय दूतीभूता सखी बुद्धिपूर्वकमेव ससंशयं वाक्यमाहेति नासौ दोषः ।। १४२॥ हिन्दी-मदनसन्तापरूप व्याधिसे पीडिता उस अनिन्धसुन्दरी तुम्हारी प्रियतमाको कठोर कालसे ही अ्स्त देख रही हूँ, अतः उसके विषयमें जीवनाशा करनेसे कया प्रयोजन है? अथवा मदनसन्तापसे भिन्न ग्रीष्मरूप कठोर कालसे ही वह ग्रस्त है, उसके विषयमें जीवनाशा से क्या प्रयोजन ? इसमें दूती बनी सखीने जान-बूझकर नायकको आकुल करनेके उद्देश्यसे ऐसा प्रयोग किया है, अतः यह ससंशय दोष नहीं, गुण है।। १४२।। कामार्ज्ता धर्मतप्ता वेत्यनिश्चयकरं वचः। युवानमाकुलीकशुमिति दूत्याह नर्मणा ॥ १४३ ॥ उदाहरणं सज्जमयति-कामार्स्तेति। युवानम् नायकम् आकुलीकत्तुम् संशयोत्पादन- द्वाग नायिकासमीपोपसर्पणाय व्याकुलयितुम् दूती सखी नर्मणा वचनचातुर्येण कामार्त्ता श्रीष्मसन्तप्ता वा वर्त्तत इति अनिक्षयकरं वचः आह, अतो विदुष्या सर्या बुद्धिपूर्वरक तथोकत्वान् दुष्टत्वमिति भावः ।। १४३ ॥ ऊपरवाले उदहरणमें दूतीने कामार्त्त है या ग्रीष्मपीडित है इस तरहका सन्दिग्ध वचन इसलिए कहा है कि सन्देहमें पड़कर नायक नायिकाके समीप जानेके व्याकुल हो उठे, अतः यहाँ पर ससंशय दोष नहीं है।। १४३।। उद्देशानुगुणोऽर्थानामनूद्देशो न चेस्कृतः। अपक्रमाभिधानं तं दोषमाचक्षते बुघोः ॥। १४४।। अपक्रमं नाम दोर्ष लक्षयति-उद्देशेति। अर्थानाम् उद्देशः प्रथमोपन्यासः तदनु- गुणस्तदनुसारी अनूद्देशः तत्सम्बन्धिनाम् पश्चादभिधानम् चेत् न कृतः, तं दोर्ष युधाः अपक्रमाभिधानम् आरहुः। येन क्रमेण प्रथमोपन्यासः कृतस्तेनैष क्रमेण यदि पश्चादपि तत्सम्बन्धिनोऽर्थाः न उदिष्टाः अक्रमेणाभिधानं कृ्तं तदाऽपक्रमो दोषः। क्रमेणाभिधाने कमालक्कार उत्तस्तत्परिपन्थी दोपोऽयम् ॥ १४४॥ हिन्दी-जिस क्रमसे अर्थोंको पहले कहा जाय, उसी कमसे तत्सम्बन्धिपदार्थोंके फिरसे कथन में क्रमनामक अलक्कार कहा गया है, उसीका विपरीत यह अपक्रम नामक दोष है, यदि प्रथमोक्त पदार्थ जिस क्रमसे कहे गये हों, तत्सम्बन्धि पदार्थ के कथनमें उसी क्रमका अवलम्बन न किया जाय तो यह अपक्रमदोष होता है॥। १४४ ।। स्थितिनिर्माणसंहार हेतवो जगताममी। शम्भुनारायणाम्भोजयोनयः पालयन्तु वः॥१४५॥ अपक्रममुदाहरति-स्थितिनिर्माणेति। अमी जगतां स्थितिः सत्ता, निर्माण- मुत्पादनं, संहारो विनाशस्तेषां हेतवः कारणभूताः शम्भुः नारायणः अम्भोजयोनिर्ब्रश्ा च ते त्रयो वः युष्मान पालयन्तु। श्रत्र स्थितिनिर्माणसंहाराणां येन पौर्वापर्यक्रमेणो- द्देशस्तत्सम्बन्धिनां कर्ततयाऽपेक्षितानां देवानाम् तेन क्रमेणोपन्यासो न कृतः, तेन १. तहोष। २. यया। १. तामया: ।

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२६२ काव्यादर्श:

क्रमेणोपन्यासे हि अम्भोजनारायणशम्भव इति कथितं स्यात् स्थित्यादीनां पूर्वोदिषिटिना कर्त्तारोडत्र क्ममनादृत्य निबद्धा इति भवत्यपक्रमदोषः ।। १४५॥ हिन्दी-जगत्के स्थिति, निर्माण और संहारके कारण यह शम्भु-नारायण-ब्रह्मा आपलोगों का पालन करें। इस उदाहरण में स्थिति-निर्माण-संहारका जिस पौर्वापर्य-क्रमसे कथन हुआ है, उनके कर्चा देवों का भी उसी क्रमसे अभिधान होना चाहिये, अर्थात् नारायण-बह्मा-शम्भु इस क्रमसे कहना चाहिये, तभी यथासंख्य अन्वय हो सकेगा, वैसा नहीं कहा गया है, अतः इसमें अपक्रमदोष हुआ ॥ १४५ ॥ यत्नः संबन्धविज्ञानहेतुकोऽपि कृतो यदि। क्रमलङ्ग्नमप्याङु: सूरयो नैव दूषणम् ॥१४६॥ अपक्रमदोषस्यादोषत्वस्थलं दर्शयति-यत्न इति। संबन्धविज्ञानहेतुकः अन्वय- बोधौपयिकः अन्वयस्य सुखावबोधे कारणीभूतो यत्नो यदि कृतः, तदा सूरयः क्रमलङ्गनम् अपक्रमम् अपि दूषणम् नैव आहुः। अन्वयानवगम एवापक्रमस्य दूषकताप्रयोजकः, तदर्थे याने कृते सत्यन्वयस्य सुखावसेयतयाऽदोषत्वमस्त्येवेति ॥ १४६ ॥ हिन्दी-यदि अन्वय-बोध लिये यत्न किया गया हो (यदि अपेक्षित अन्वयबोधके लिये कविने कुछ प्रयत्न कर दिया हो) तो अपक्रमको विद्वान् दूषण नहीं मानते। अन्वयमें बाधा होनेसे ही तो वह दोष होता है, यदि कविकृत यत्नविशेषसे अन्वयबोध सुकर हो जाय तो वह दोष क्यों माना जायगा ? ॥ १४६ ॥ बन्धुत्यागस्तनुत्यागो देशत्याग इति त्रिषु। आध्यन्तावायतफ्लेशौ मध्यमः क्षणिकज्वरः ॥ १४७॥ अपक्रमदोषस्यादोषत्वस्थलमुदाहरति-बन्धुत्याग इति। बन्धुत्यागादिषु त्रिषु त्यागेषु आद्यन्तौ बन्धुत्यागदेशत्यागौ आरयतक्लेशौ दोर्घक्लेशविधायिनौ, मध्यमः तनुन्यागस्नु क्षणिकज्वरः अल्पकालसन्तापकरः, तनुत्यागो बन्धुत्याग-देशत्यागापेक्षया सुमह्व्यथ इत्यर्थः । अपरत्र कविः 'आद्यन्तौ' 'मध्यम' इति चोक्त्वाऽन्वयबोधं सुगमं कृतवा- नतो न दोपः, अस्यैव स्थाने यदि 'द्वावेवात्यायतक्लेशौ तृतीयः क्षणिकज्वरः' इत्यपठिष्य- तदा को द्वौ, कक्च तृतीय इति बोधकष्टमभविष्यदेव, ततव्वापक्रमदोषो मन्तव्य एव स्यादिति भावः ॥ १४६ ॥ हिन्दी-बन्धुत्याग, देहत्याग और देशत्याग इन तीन त्यागोंमें आदि-अन्त (बन्धुत्याग और देशत्याग) दीर्घकाल तक कष् देनेवाले होते हैं, और तीसरा (देहत्याग) कुछ समयके लिये ही सन्तापदायी होता है। इस उदाहरणमें आदि, अन्त, मध्यम शब्दोंका प्रयोग करके कविने अन्वयबोधका उपाय कर दिया है अतः यहाँ अपक्रमदोष नहीं होता है। यदि इसीके बदले-'दावेवात्यायतक्लेशौ तृतीयः क्षणिकज्वरः' ऐसा पाठ कर दिया जाय तो अपक्रमदोष हो ही जायगा॥१४७॥ शष्दहीनमनालक्ष्य लक्ष्यलक्षणपद्धतिः। पदप्रयोगोशिष्टेष्ः शिष्टेष्टस्तु न दुष्यत ॥।१४८। १. यत्र। २. डाने। ३. अदोषं सूरयो यथा। ४. योग: शिष्टे। ५. य शिष्ेहं हि।

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तृतीय: परिच्छेद: २८३

शब्दहीनमुपदर्शयति-शब्दह्वीनमिति। लक्ष्यं प्रयोगः, लक्षणं सूत्रम्, तयोः पद्धतिः मार्गः, अनालच््या अप्रतीयमाना लक्ष्यलक्षणपद्रतिगन् तादृशः सूत्रकृतसाधुत्व- रहितः अनुशासनविरुद्धः पदप्रयोग: शब्दहीनम् शब्दहीनत्वरूपदोषस्वरूपम्। अशिष्टेष्टः शिष्टजनर्गहतः (अनुशासनसंमतोऽपि ) पदप्रयोग: शब्दहीनम्, तथा च द्विविर्ध शब्द- हीनम्-एकमस।वुत्यकृतम्, अपरं त्वप्रयुक्तत्वकतम्। शिष्टसंमतत्वे तु लक्षणहीनमपि दुष्यति-तदाह-शिष्टेष्टस्तु न दुष्यतीति॥। १४८॥ हिन्दी-लक्ष्यलक्षणमार्ग-सूत्रादिकृत साधुत्व जहाँ नहीं मालूम पड़े, उस तरह के प्रदप्रयोग को शब्दहीन कहते हैं और साधुत्व होने पर भी शिष्टजनगर्हित शब्दप्रयोगको भी शब्दहीन ही कहते हैं।

इस प्रकार शब्दहीन दो प्रकार का है, एक व्याकरण-लक्षणहीन, दूसरा अप्रयुक्त। व्याकरण- लक्षणहीनका उदाहरण-'अवते भवते' इत्यादि आगे कहेंगे, अप्रयुक्तत्वमूलक शब्दहीनका उदा- हरण है-'हन्ति हन्त कान्तारे कान्तः कुटिलकुन्तलः', 'पभनो भाति सरोवर', 'दैवतोऽस्य पिशाचो राक्षसोऽथवा'। दण्डीने अप्रयुक्तत्व असमर्थत्वको भी शब्दहीन ही माना है। यही शब्दहीनदोष यदि शिष्टपरिगृद्दीत हो तो दोष नहीं माना जाता है, जैसे-'हनूमानब्धिमतरद् दुष्करं किं महात्मनाम्' इसमें 'महात्मनाम्' में षष्ठी शास्त्रविरुद्ध होने पर भी महाकविगृहीत है, अतः दोप नहीं माना जाता है।। १४८।।

अवते भवते महाराजन्न जिज्वासा नास्तीत्यासां गिरां रसः । १४९॥ व्याकरणलक्षणहीनं नाम शब्दहीनमुदाहरति-अवते इति। हे महाराजन, भवते तव बाहुः अणवशक्वरीम् सागरमेलां महीम् अवते रक्षति, जिज्ञामा अन् विषये मम ज्ञातुमिच्छा नास्ति, प्रत्यक्षाकृतमिदं मयति भावः। आसाम् पूर्वोत्तरपाणं गिराम् रसः सन्तोषप्रदो धर्मविशेषः नास्ति, 'अवते, भवते बाहुः, 'महाराजन' इन्यादिनि पदानि व्या- करणलक्षणहीनतया रसं न पुष्णन्ति, प्रत्युत वैरस्यमेव जनयन्तीति शब्दहीनत्वदोपोऽत्र मतः। अवते इत्यात्मनेपदमनुचितम्, भवते इति चतुर्थी न युक्ता, महाराजन्' इत्यत्र च टच् अवश्यमपेच्यते इति बोध्यम् ॥१४९॥ हिन्दी-महाराजन्, आपके बाहु सागरमेखला पृथ्वीका पालन करते हैं, इस विषयमें मुझे जिश्वासा नहीं, निश्चयात्मक ज्ञान है; क्योंकि प्रत्यक्ष देखा है। इस तरहकी अशुद्धमाषामयी उक्ति में रसास्वाद नहीं होता है, इनमें व्याकरण-त्रुटि देखकर विरसता का ही उदय आता है। इस उदाहरणका-'अवते' आत्मनेपद अशुद्ध, 'वते' में चतुर्थी गलत है, और महाराजन् में टच् होकर महाराज होना चहिये।। १४९ ॥ दक्षिणाद्रेरुपसरन् मारुतश्चूतपादपान्। कुरुते ललिताधूतप्रवालाक्कुरशोभिनः ॥ १५०। शिष्टानुगहीतस्य शब्दहीनत्वदोषस्यादोषभावमुदाहरति-दक्षिणाद्रेरिति। दक्षिणा- द्रेर्मलयपर्वतात् उपसरन् आगच्छन्, मारुतो वायुः चूतपादपान् आम्रवृक्षान् ललितं

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काव्यादर्श:

मन्दम् आधूता: कम्पिता: ये प्रवालाक्कुराः नवकिसलयप्ररोहाः तैः शोभिनः शोभाशालिनः कुरुते विदधति॥ १५० ॥ हिन्दी-दक्षिणाचल-मलयसे चलनेवाली वायु आम्रवृक्षोंको मन्दमन्द कम्पमान प्रबालोंसे सुशोभित बनाती है॥ १५० । इत्यादिशास्त्रमाहात्म्यदर्शनालसचेतसाम्। अपभाषणवन्द्राति न चे सौभाग्यमुज्झति ॥ १५१ ॥ उदाहरणं विशदीकरोति-इत्यादिशास्त्रेति। इत्यादि दक्षिणाद्वेरुपसरन् इत्यादि- पदं शास्त्रमाहात्म्यम् साधुशन्दप्रयोगे फलबोधकशास्त्रगौरवम्, तद्दर्शने अलसचेतसाम् मन्दानाम् (वचः) अपभाषणवद्धाति अशुद्धमिव प्रतीयते, परम् शिष्टपरिप्रहेण सौभाग्यं सौष्ठवं न उज्झति न त्यजति। साधारणत उपसरन्नित्यत्रोपधावतीति युक्तं, एवमेव करोतोति युक्तं 'कुरुते' इत्यस्य स्थाने, परन्तु शिष्टाः त्वरितगमने एव सरतेर्धावादेशमाहु अत्र तु मन्दा गतिर्विवक्षितेति, कर्ततृ- गामिक्रियाफलस्थले चेतनकर्तुकादेवात्मनेपदमभ्युपगच्छन्त्यत्र तु वायुने तथेति मन्यमाना: प्रयोगमीदृशं शुद्धं सुन्दरं चाहुरिति तात्पर्यम्॥१५१॥ हिन्दी-'दक्षिणाद्रेरुपसरन्' इत्यादि पदको देखनेसे ऐसा लगता है मानो किसी व्याकरणशा- खीय नियमको नहीं देखनेवालेका अशुद्ध प्रयोग हो, परन्तु शिष्टपरिगृहीत होनेके कारण इनका सौष्ठव नहीं गया है, यह सौष्ठवयुक्त ही हैं। यहाँ साधारणतः देखनेसे उपसरन्के स्थानमें उपधावन् होना चाहिये और कुरुते के स्थानमें करोति होना चाहिये, ऐैसा लगता है, क्योंकि सूत्रके अनुसार वैसा ही होना चाहिये, परन्तु कविजन-सम्प्रदायमें ऐसा व्यवहार हो गया है कि सवेग गमनमें ही धावति का प्रयोग होता है, अतः मन्दगतिविवक्षामें यहाँ उपसरन्का ही प्रयोग उचित है। इसी तरह कर्तृगामिक्रियाफलमें आत्मनेपदका होना चेतनकर्त्तृक स्थलमें ही सीमित है, अतः वायुकर्सा होनेसे यहाँ आत्मनेपद ठीक ही है। यह नियम शिष्टजनकृत है, अतः इनको मानकर इस प्रकार के प्रयोग किये जाते हैं।। १५१ ॥।

श्रोकेषु नियतस्थानं पदच्छेदं य्ति विदुः। तदपेतं यतिभ्रषं श्रवणोद्वेजनं यथा ॥ १५२ ॥ यतिभ्रष्टं नाम दोषं लक्षयति-श्लोकेष्विति। श्रोकेषु नियतस्थानं शास्त्रकृद्भि: निश्चिताक्षरं पदच्छेदं पदावसाने विश्रामं यति विदुः आहुः तदपेतं च यतिभ्रष्टमाहु तब् श्रवणोद्वेजनं श्रुत्युद्वेगकरं भवति, यथेत्युदाहरणप्रस्तावाय ॥ १५२॥ हिन्दी-कोकमें विश्रामके स्थान निर्दिष्ट हुआ करते हैं, छन्दःशास्त्रके आचार्योंने किस छन्दमें कहाँ कहाँ विश्राम हुआ करता है इसका निश्चय कर दिया है, उसी निश्चित विश्राम- स्थानको यति कहते हैं, उसीका विचार अगर-नहीं हो, अस्थानमें ही विश्राम किया गया हो तो यतिभ्रष्ट नामक दोष होता है, वह श्रवणोद्वेगकर होता है। छन्दोमजरी में दतिका लक्षण है :- 'यतिजिंद्ेष्टविश्रामस्थानं कविभिरुच्यते'। वामनने यतिभ्रष्टका लक्षण किया है :- 'विरसविरामं यतिभ्रष्टम्'। अस्थानमें विराम होनेसे पदपदार्थका बोध कटकर हो जाता है, सुननेमें विचित्रसा प्रतीत होता है, इसी से दोष माना गया है।। १५२ ।। १. शाखयायाथ्य। २. स।

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तृतीय: परिच्छेद:

स्रोणां सङ्गी। तविधिमयमा। दित्यवंशो नरेन्द्रः । पश्यत्य्कि। एरसमिह शि। ष्टैरमेत्यादि दुष्टम्। कार्याकार्या। ण्ययमविकला। न्यागमेनैव पश्यन् वंश्यामुर्वी वहति नृप इत्यस्ति चैवं प्रयोग: ॥ १५३ ।। पद्यार्धेन यतिभ्रष्टोदाहरणं तदुत्तरार्घेन च तदपवादमाह-स्त्रीणामिति। अयम् आादित्यवंश्यः सूर्यवंशोत्पन्नः नरेन्द्रो राजा शिष्टैः सभ्यजनैः अरमा सह त्रीणाम् अक्रिष्ट- रसं बहुविधरसप्रदम् स्गीतविधिम् नृन्यवाद्यगीतविधानं पश्यति, इत्यादि एतादृशं पदं दुष्टम्, अस्थाने विरामाश्रयणात्, तथाहि मन्दाकान्तानामकेऽत्र वृन चतुर्ये, ततः षष्टे, ततश्च सप्तमे यतिरुचिता, परं तत्र पदावसानमपेक्षितमपि नात्र ोके कृतं; किन्तु पद- मध्य एव विरन्तव्यं भवतीति यतिभ्रष्टमेतत्। पदमये कृतया यत्या श्रवणोद्वेगकरणाद्यति- भ्रष्टरूपदोषोऽ बोध्यः। क्वचित् सन्धिविकारेण मिलितपदद्रयमध्ये यदि यतिर्भवति तदा न दोषस्तत्र श्रवणो- द्वेगाभावादिति यतिभ्रष्टापवादमुत्तरार्धेनाह-कार्येति। अरयं राजा अविक्लानि समस्तानि कार्याकार्याणि आगमेन शास्त्रेण एव पश्यन् आलोचयन वश्याम् स्वायत्तीकृताम् उवी वहति धारयति-एवं प्रयोग: अरस्ति शिष्टैः कृत इति शेषः। अनोदाहरणे कार्याकार्या-

त्वानत्र विश्रामस्योचितत्वेन न भवति यतिभ्रष्टन्वमिति भावः ॥१५३॥ हिन्दी-'खोणां सक्गीतविधिमयमादित्यवंश्यो नरेन्द्रः' यह मदाक्रान्ता वृत्त है, इसके चरणोंमें चतुर्थ, छठे, पुनः सप्तम अक्षरोंपर विराम लक्षणोक्त हैं, उन अक्षरोपर पद भी पूर्ण होत रहना चाहिये, परन्तु वैसा नहीं है, पदके बीचमें ही विश्राम करना पड़ता है, अतः ऐसा प्रयोग यतिभ्रष्ट है। इसी श्रोकके उत्तरार्धमें यतिभ्रष्टदोषका अपवाद बताया गया है 'कार्याकार्याण्ययम् अविकला- न्यागमेनैव पश्यन्' इस चरणमें 'कार्याकार्याणि +अयम्' 'अविकलानि +आगमेन' इस प्रकार सन्धि हुई है, जिससे पदान्तवाले वर्ण उत्तरपदके आदिमें चले गये हैं, 'कार्याकार्या' यही पद बच गया है, अतः वहाँ विश्राम होनेसे श्रवणोद्ग नहीं होता, अतः वैसा प्रयोग शिष्टों द्वारा किया जाता है॥१५३॥ लुप्ते पदान्ते शिष्टस्य पदत्वं निश्चितं यथा। तथा सन्घिविकारान्तपद्मेवेति वर्ण्यते॥ १५४॥ यतिभ्रंश दोषस्यादोषत्वस्थलीयमुदाहरणमुपपादर्यात-लुप्ते इति। यथा पदान्ते पदचरमावयवे वर्णे लुप्ते सति शिष्टस्य तद्वणहीनभागस्य पदत्वं निब्ितं तथा सन्धि- विकारान्तपदं पदमेव इति तथा वर्ण्यते निर्दुष्टतया कविभिः प्रयुज्यते। अयमाशयः-यथा 'राजा' इत्यादौ नकारलोने शिष्टमाकारान्तं पदं मन्यने, तथैव 'कार्याकार्याणि' इत्येतदन्त- गतस्य णि इत्यस्ष्य परस्वरवर्णेन सति सन्धी शिष्टमाकारान्तं पदमवशिष्यते, तस््य च विश्रान्तिस्थानत्वे यतिभ्रषत्वं नास्तीति ॥१५४॥ हिन्दी-जैसे पदान्तवर्णके लोप हो जाने पर शिष्ट भागको पद मानना निश्चित हैं, उसी तरह पदके अन्तमें सन्धिविकार हो जने पर बचे हुए भागको ही पद मान लिता जाता है, १. वंश्याम्। २. रान्तं पदम् ।

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२८६ काव्यादर्श:

अतः तादृश पदके अन्तमें यतिभ्रंशदोष नहीं माना जाता है, 'कार्याकार्याणि' वाले पदके अन्त में इकारका यण हो, वह अगले पदमें चला गया, णकार स्वरहीन होकर परवर्णका अनुगामी बन गया, शेष भाग पद माना गया 'कार्यकार्या' इतनेको ही पद कहा गया, वहाँ यदि यति हुई तो यह दोष नहीं है, अतः ऐसा प्रयोग अनुमोदित है॥ १५४ ॥ तथापि कटु केर्णानां कवयो न प्रयुअते। ध्वजिनी तस्य रजः के। तूदस्तजलदेत्यदुः ॥१५५॥ पूर्वदर्शितापवादस्य श्रुतिकढत्वव्य्तिरेकसामानाधिकरण्यमेवेति दर्शयति-तथापीति। तथापि पदान्ते सन्धिविकारेण शिष्टभागस्य पदत्वस्व्रीकारेऽपि कर्णानां कटु श्रुत्युद्वेजकं तादर्श कवयो न प्रयुञ्जते, यथा तस्य राजों ध्वजिनी सेना केतूदस्तजलदा ध्वजवंशक्षिप्त- मेघा अस्तीति शेषः। अत्र केनु + उदस्तपदयोः सन्धी सति श्रुतिकटुत्वं प्रसक्तं तद्यतिनियमा- नतिक्रमेऽपि परिहर्त्तव्यमेवरेति भावः ॥। १५५।। हिन्दी-यति नियमानुकूल होनेपर भी यदि श्रुतिकटत्व हो जाय तो कविगण उसका प्रयोग नहीं करते हैं, जैसे 'केतूदस्तजलदा'। यहाँ केतु +उदस्त पदोंमें सन्धि हो गयी, यतिमङ्गका नियम नहीं लगा, फिर भी श्रुतिकदुताके कारण वैसा प्रयोग नहीं किया जाना चहिये। इसका तात्पर्य यह है कि सन्धिविकारान्तपद श्रुतिकटुत्वसे अस्पृष्ट रहेगा, तब तो वह प्रयोगयोग्य है, अन्यथा नहीं, अत एव 'केतूदस्तजलदा' वाला यतिभ्रष्ट ही माना जायगा ॥१५५ ॥ वर्णानां न्यूनताधिक्ये गुरुलध्वयथास्थितिः। यंत्र तन्द्िष्नवृत्त स्यादेष दोष: सुनिन्दितः ॥१५६ ।। भिन्नवृत्तं लक्षयति-वर्णानामिति। यत्र वृत्ते वर्णानाम् वृत्ताक्षराणाम् न्यूनता संख्याह्ास:, आधिक्यम् संख्यावृद्धिश्च स्यात्, अथवा गुरोलघोर्वा अयथास्थितिः यत्र हस्वभावोऽपेद्यते तत्र गुरुभावः, एवं यत्र गुरुभावोऽपेच््यने तत्र ह्रस्वत्वं स्यात्तत्र भिन्न- वृत्तत्वं नाम दोष: भवति, स चातीव सर्वथा निन्दित इत्यर्थः ॥ १५६॥ हिन्दी-जिस वृत्तमें वर्ण कम अथवा अधिक हो, या गुरुकी जगहमें हस्व, हस्वकी जगइमें गुरु हो, वह भिन्नवृत्त है, इसे अतिवर्जनीय जानना चाहिये ॥ १५६ ॥। इन्दुपादा: शिशिराः स्पृशन्तीत्यूनवर्णता। सहकारस्य किस(ल)यान्यार्द्राणीत्यधिकाक्षरम् ॥ १५७।। भिन्नवृतप्रभेदं न्यूनवर्णमधिकवर्णोदाहरति-इन्दुपादा इति। शिशिरा: शीतला इन्दुपादा: स्पृशन्तीति न्यूनवर्णम्, एकाक्षगल्पत्वात्। एवं सहकारस्य किसलयानि आर्द्राणि इति चाधिकवर्णम्, अरक्षरदूयाधिक्यात् : १४७ ॥ हिन्दी-ऊपर वाले उदाहरणके पूर्वार्ध भागमें एक अक्षर कम है, अतः वह न्यूनवर्ण हुआ, एवं उत्तरार्धमें दो अक्षर अधिक होनेसे अधिक वर्ण हुआ॥१५७॥ कामेन बाणानिशाता विमुक्ता मृगेक्षणास्वित्ययथागुरुत्वम्। मदनवाणो निशिता: पतन्ति वामेक्षणास्वित्ययथालघुत्वम्।। १५८।। गुरुलध्वयथास्थितिरूपं भिन्नवृतमुदाहरति-कामेनेति। कामेन निशाताः तीच्णा: बाणा: मृगेक्षणासु विमुकताः । अत्र पद्यार्घे 'निशाता' इत्यत्र मध्यस्थ आकारोऽस्थानगुरुः। १. वर्णानाम्। २. तत्र। ३. निशिता। ४. स्मरस्य। ५. मृगेक्षणा।

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तृतीय: परिच्छेद: २८७

तत्र निशिता इति पाठे दोष उद्घृतो भवति। मदनवाणा निशिताः पतन्ति मृगेक्षणासु इति द्वितीयार्धे अयथालघुत्वम्, यत्र लघुत्वं नोचितं तत्र लघुत्वं कृतमिति, यथा आराघ- योर्वर्णयोद्वयोर्गुकुत्वमपेद्षयते, नथ्च न कतमिति दोष एव ।। १५८॥। हिन्दी-मिन्नवृत्तके प्रभेदोंमें गुरुलध्वयथास्थितिनामक प्रभेदका उदाहरण है-कामेन इत्यादि। इस श्रोकमें छन्दःशास्त्रीय नियम-विरुद्ध हस्व-दीर्घ वर्ण का न्याम किया गया है। इसमें उपजातिवृत्त है, तदनुसार 'निशाताः' का द्वितीय अक्षर लघु होना चाहिये, कर दिया गया है गुरु। एवं उत्तरार्धमें द्वितीय अक्षर गुरुके बदले लघु कर दिया गया है, यही अयधागुरुत्व और अयथालघुत्वरूप भिन्नवृत्तत्व यहाँ दोष है॥ १५८।। न संहितां विवकामीत्यसन्धानं पदेषु यत्। तद्विसन्धीति निर्दिषं न प्रगृह्यादिद्वेतुकम्॥१५९ ॥ विसन्धिकं नाम दोषभेदं लक्षयति-न संहितामिति। संहितां न विवक्षामि न कर्त्तुमिच्छामि इति कत्वा यत् पदेषु पदावयववर्णेषु असन्धानम् सन्धिविरहः तत् विसन्धीति निःदंष्टम्, अर्थात् यत्र सत्यामपि सन्धेः प्राप्ती केवलमविवक्षाकृतः सन्धिविरह- स्तद्विसन्धीति मतम्, अस्य दोषस्यापवादमाह-न प्रगृह्यति। यत्र प्रगृह्संज्ञादिद्वारकः सन्धिविरहस्तत्र विसन्धित्वदोषो न भवतीति ॥ १५६॥ हिन्दी-व्याकरणशास्त्रमें नियन है कि-'संहितकपदे नित्या नित्या धातूपसर्गयोः। नित्या समासे वाक्ये तु सा विवक्षामपेक्षते ।' इस नियमके अनुसार एक पद, एक चरणके मध्यमें संहिता होती है, वहाँ सन्धिका होना अनिवार्य है, तथापि यदि कोई प्रयोक्ता केवल इसीलिये सन्धि न करके प्रयोग करें कि मै संहिता की विवकनहीं करता हू, तो वैसे स्थलमें विसन्धित्व नामक दोष होता है। यदि प्रगृह्यादि संज्ञाके हो जानेसे सन्धिकार्य नहीं हो पाता हो तो वैसे स्थलमें विसन्धित्व दोष नहीं माना जाता है॥ १५९ ।। मन्दानिलेन चलता अङ्गनागण्डमण्डले। लुप्तमुद्भेदि धर्माम्भो नभस्यस्मंद् वपुष्यपि॥ १६०॥ विसन्धिनामकदोपमुदाहरति-मन्दानिलेति। नभमि आकाशे चलता मन्दा- निलेन अङ्गनागण्डमण्डले वनिताकपोलतले उद्धंदि समुत्पननं धर्माम्भः लुप्तम्, अम्मद्- चपुष्यपि उद्भेदि धर्माम्भः लुप्तम्। अत्रोदाहरणे प्रथमपादान्ताकारस्य द्वितीयपादाद्यकारेण सह सन्धिन कृत इति, तथा सति वर्णन्ूनतापत:, अती विमन्धित्वनामको दोषोऽयम् ॥१०॥ हिन्दी-आकाशमें चलने वाली मन्द वायुसे स्त्रियोंके गण्डस्थल पर उत्पन्न स्वेदकण दूर कर दिये गये, और हमारे शरीर पर वर्त्तमान स्वेदकण भी दूर कर दिये गये। इस उदाहरण- श्रोकमें प्रथमपादान्तवत्ती आकार और द्वितीयपादादिवर्ती अकारमें अवश्यंभावी सन्धि छड़ दी गई है, अतः यहाँ विसन्धि नामक दोष है॥ १६० ॥ मानेष्यें इह शीर्येते स्त्रीणां हिमऋतौ प्रिये। आसु रात्रिष्विति प्राश्षैराम्नातं व्यॅस्तमीदशम्।। १६१।। १. चरता। २. दवेदघ। ३. स्यस्मनस्यपि। ४. ईद्श्नी स्त्रीणां नास्ताम् हिम। १. अमू आदिष्विति। ६. आशातम्। ७. नाङ्गमी। ८. अस्माच्छ्लोकात्परतः कचिदधिकम्- आषिन्याभिपरीताय अब श्वो वा विनाशिने। को हि नाम शरीराय धर्मापेतं समाचरेत्।

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काव्यादर्श:

प्रगृह्यादिनाऽनुमतं सन्धिविश्वेषं दर्शयति-मानेष्यें इति। हे प्रिये, इह हिमऋतौ हेमन्तकाले आसु दीर्घशीतासु रजनीषु ख्त्रीणाम् मानेर्ष्ये मान: प्रणयकोप:, ईर्ष्या प्रिया- पराधदर्शनजन्मा कोपक्ष ते उमे अपि शीर्येते नार्श गच्छतः, मानमीर्ष्यां च विहाय ख्रियः प्रियानाश्छिष्यन्तीति भाव:। ईदर्श व्यस्तमसंहितम् प्राशराम्रातम् इष्टतयानुमतम् ईदृश- विसन्धित्वस्य व्याकरणानुमोदिततयाऽदुष्टत्वम् इति भावः ॥ १६१॥ हिन्दी-हे प्रिये, इस हेमन्तसमयकी इन दोर्घ शीतल रात्रियोंमें स्त्रियोंके मान तथा ईर्ष्याभाव स्वयं दूर हो जाते हैं। यहाँ 'मानेष्यें इह' इसमें 'पुतप्रगृष्या अचि नित्यम्' इस सूत्रसे प्रकृतिभाव हो गया है, और 'हिमऋतौ' यहाँ 'ऋत्यकः' इस पाणिनी्यसूत्रसे प्रकृतिभाव हो गया है, अतः इस तरह के विसन्धित्व दोषको विद्वानोंने शास्त्रानुमोदित होनेसे ग्राझ माना है॥ १६१ ॥ देशोऽद्रिविनराष्ट्रादि: कालो राजिदिवत्तवः। नृत्यगीतप्रभृतयः कला: कामाथसंभ्रयाः॥१६२॥ चराचराणं भूतानां प्रवृत्तिलोकसंज्िता। हेतुविद्यात्मको न्यायः सस्मृतिः श्रुतिरागमः ॥१६३॥ तेषु तेष्वयथारूढं यदि किश्चित् प्रवर्सते। कवे: प्रमादाद्देशादिविरोधीत्येतदुच्यते ॥ १६४॥ 'देशकालकलालो कन्यायागमविरोधि च' इत्यनेन पूर्व दोषोद्देशप्रस्तावे देशादिविरु- द्धानां दोषत्वमुक्ततं, सम्प्रति तन्निरूपयितुं देशादीन परिभाषते-देश इति। अद्रिवन- राष्ट्रादि: देशः, आदिना समुद्रत्रामादिपरिप्रहः। रात्रिंदिवर्तवः इत्यपि माससंवत्सरादी- नामुपलक्षकम्। कामार्थसंश्रयाः कामस्य अरथस्य चाश्रयभूताः नृत्यगीतप्रमृतयः चतु- ष्षष्टिः कलाः ॥ १६२ ॥ चराचराणां स्थावरजञ्मात्मकानां भूतानां पदार्थानां प्रशृत्ति: व्यवहारः लोकसंशिता लोकपदप्रतिपाद्यः। हेतुविद्यात्मकः तर्कशास्त्ररूपः न्याय, सस्मृतिः श्रुतिः धर्मशास्त्रोपपन्नो वेद:, आगमः शैवादिशास्रम् ॥१६३ ॥ तेषु तेषु देशादिषु आगमान्तेषु अयथारूढं प्रसिद्धिविरुद्धं किश्चित् यदि कवेः प्रमा- दात् अनवधानतावशात् प्रवत्तते वर्ण्यते, तदा एवंप्रकारकं वचनं देशादिविरुद्धमुच्यते। उक्तथ्ायमर्थो वामनेन-'देशकालस्वभावविरुद्धानि, लोकविरुद्धानि, कलाचतुवगशास्र- विरुद्धार्थानि विद्याविरुद्धानि' इति ॥१६४॥ हिन्दी-दोषोंको बताते समय-'देशकालकलालोकन्यायागमविरोधि च' ऐसा कहा था, उनमें देशादिकी परिभाषा बता रहे हैं। देश-अद्रि, वन, राष्ट्र आदि। काल-रात्रि, दिन, ऋतु। काम तथा अर्थका आश्रयभूत सम्पर्क-कला। कलायें ६४ हैं, उनमें नृत्यगीत प्रभृति प्रसिद्ध हैं ॥ १६२ ।। स्थावरजङ्गमात्मक संसारका व्यवहार लोकशब्दसे कहा जाता है, तर्कशास्त्ररूप न्याय, एवं धर्मशास्त्रयुक्त वेद, तथा शैवादि आगमशास्त्र विद्यायें हैं॥ १६३ ॥। इनमें-देश, काल, कल।, लोक, न्याय, सस्मृतिवेद, एवं शैवाद्यागमशासत्रमें अप्रसिद्धवस्तुका

१. देशो हि वन। २. नक्तंदिव। ३. नृस्त। ४. लोकानां। ५. यथा भूतम्।

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तृतीय: परिच्छेद:

वर्णेन गड्े कवि असावधाननावश कर बैठता है, तो उसे देशविरुद्ध, कालविरुद्ध, कलाविरुद्ध, लोक- विरुद्ध, न्यायविरुद्ध, वेदविरुद्ध, आगमविरुद्ध आदि नामोंसे व्यवहृत किया जाता है॥ १६४। कर्पूरपादपामर्शसुरभिर्मलयानिलः। कलिङ्गवनसंभूता मृगप्राया मतङ्गजाः ॥ १६५ ।। ेशनिरदमुदाहरति-कर्पूरेति। कर्पूरपादपानाम् आमर्शः संसर्गस्तेन सुरभिः मगन्ध :प: मलयानिल: मलयपर्वतोत्थितो वायुः, मलयो हि चन्दनजननप्रसिद्धो दक्षिण- भारतस्थः, कर्रपादपाश्च न तत्र प्रथन्ते, इति देशविरोधः ) एवम्-कलिप्वनसम्भूताः कलिङ्स्थवनजाता: मतङ्गजाः करिणः मृगप्रायाः अतिलघवः । अत्र कलिश्वनेषु करिणा- मुत्पनेन्मसिद्धया देशविरुद्धत्वम् ॥ १६५॥ हिन्दी-कर्पूरवृक्षके संसर्गसे सुरभित दक्षिणानिल चल रहा है [ इसमें द्क्षिणानिलके साथ कर्पूरवृक्षका संपर्क कविकी असावधानतासे वर्णित हुआ है, अतः यह देशविरुद्ध है] इसी प्रकार- कलिङ्गके बनमें उत्पन्न हाथी हरिणोंके समान ही छोटे होते हैं, [ इस उदाहरणमें कलिक् के वनमें हाथीकी उत्पत्तिका वर्णन देशविरुद्ध है, क्योंकि हाथीकी उत्पत्ति सिंहलके बनोमें प्रसिद्ध है, कलिन् के वननें नहीं॥ १६५॥ चोला: कालागुरुश्यामकावेरीतीरभूमयः। इति देशविरोधिन्या वाच: प्रस्थानमीदशम्॥ १६६॥ राष्ट्ररूपदेशविरोधमुदाहरति-चोला इति। चोला : द्र विड देशनिकटवर्ततिंन: प्रदेशा: कालगुरुणा श्यामा: कृष्णवर्णाः कावेरीतीरभूमयो येषु तादृशाः सन्तीति शेषः। अ्रत्र कविना प्रमादवशात् चोलेषु कृष्णागुरवः काव्रेरीप्रवाहाश्च वर्णिताः तदिदं देशविरुद्धम्। इति देशविरोधिन्या: वाच: ईदशं प्रस्थानम् एतादृशी स्थितिः स्वरूपम् ॥१६६ ॥ हिन्दी-चोलकी भूमि कालागुरुके संस्गसे श्यामवर्ण कावेरीतटवाली बन गई है, इस उदाहरणमें देशविरुद्धत्वदोष है क्योंकि चोलमें न तो कृष्णागुरुका होना ही प्रसिद्ध है, न कावेरी नदी ही चोलदेशमें प्रवाहित होती है। देशविरुद्ध प्रयोगोंके स्वरूप इसी प्रकारके हुआ करते हैं॥ १६६ ॥ पन्निनी नक्तमुन्निद्रा स्फुटत्यहि कुमुद्दती। मधुरुत्फुल्लनिचुलो निदाघो मेघदुर्दिनः ॥ १६७ ॥ कालविरोधमुदाहरति-पश्चिनीति। नक्तं रात्रौ पघ्मिनी कमलिनी उन्निद्रा प्रफुज्ला, श्रह्नि दिवा कुमुद्रती स्फुटति विकसति। मधुः वसन्तः उत्फु्लनिचुलः विकसितवेतस्रवृक्षः, निदाघ: प्रोष्मममयः मेधदुर्दिनः मेघाच्छनः। अत्र कमलिनी दिवा विकसति न रात्री, कुमुद्वता अह्धि न विकसति किन्तु रात्रो विकसति; निचुलस्तकहिं वर्षासु विकसति न वस- न्तेषु, प्रोग्मो न हि मेघच्छन्नव्योमदेशो भवतीति सर्वत्र रात्रिन्दिवर्तुरूपकालविरोध: स्पष: ॥ १६७॥ हिन्दी-रातमें कमलिनी खिलती है, दिनमें कुमुदिनी विकसित होती है, वसन्तमें निचुल तरु खिलते हैं, और ग्रीष्ममें आकाश मेघावृत रहता है। यह कार्लवरोध है॥ १६७ ।।

१. काला: । २. गुरु। ३. श्यामा: । ४. हिमजाड्यकृद।

६ का०

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२६० काव्यादर्श ::

श्रंव्य हंसगिरो वर्षाः शरंदो मत्तबर्हिणः। हेमन्तो निर्मलादित्यः शिशिर: इ्लाध्यचन्दनः ॥ १६८।। कालविरुद्धत्वमेवोदाहरति-श्रव्येति। वर्षाः प्रातट्समयः श्रव्यहंसगिरः श्रवण- सुखदहंसरुतयः, शरदः शरत्समयः मत्तबर्हिणः प्रसन्नमयूरकुलः, हेमन्तः निर्मलादित्यः भास्वरभास्करकिरणः, तथा शिशिरः श्लाध्यचन्दनः सुखदमलयजालेपः। अत्र मर्वत्र कालविरुद्धत्वं स्फुटम् ॥ १६८ ॥ हिन्दी-वर्षा ऋतुमें हंसध्वनिकी श्रव्यताका वर्णन, शरत्में मयूरकी प्रसन्नताका वर्णन, हेमन्तमें मास्करके प्रकाशका वर्णन और शिशिरमें मलयजके लेपकी सुखदताका वर्णन काल- विरोध है; क्योंकि उनका अयथार्थत्व प्रसिद्ध है॥ १६८॥ इति कालविरोधस्य दर्शिता गतिरीदृशी। मार्ग: कलाविरोधम्य मनागुद्दिश्यते यथा॥ १६९ ।। कालविरोधमुपसंहरन कलाविरोधं प्रस्तौति-इतीति। इति पूर्वदर्शितदिशा ईदशी उक्तरूपा कालविरोधस्य अयथासमयवर्णनकतस्य दोषस्य गतिः प्रकारो दशिता निरूपिता। अथ कलाविरोधस्य नाट्यगीतादिकलाविरुद्धस्य मार्ग: प्रकारः मनाक स्वल्पम् उद्दिश्यते, यथेति वत्त्यमाणोदाहरणप्रस्तावाय ॥ १६९॥ हिन्दी-इस प्रकार कालविरुद्धत्व नामक दोषका प्रकार-प्रभेद बताया गया, अब मंक्षेषमें कलाविरुद्धत्व दोषका स्वरूप दिखलाया जायगा, उदाहरण इस प्रकार है॥ १६९ ॥ वीरशृङ्गारयोर्भावौ स्थायिनी क्रोधविम्मयौ। पूर्णसप्तस्वरः सोऽयं भिन्नमार्गः प्रवर्त्तते ॥ १७०॥ कलाविरोधे नाव्यकलाविरोधं सज्गीनकलाविरोधं चोदाहरति-वीरशङ्गारयोरिति।

सान नाटथे संमतवान्, रतिहासशोकोत्साहभयजगुप्साविस्मयाख्याँथ् क्रमशस्तनद्रस- स्थायिभावानुक्तवान्, तदनुसारण वीरश्ङ्गारग्ोः स्थायिभावी उन्साहरत्याख्यी, तत्र कोधविस्मययो रौद्रानभुतस्थायिनोर्वीरशज्ताररसयोः स्थायिन्वेनोपादानं नाव्यकलाविरुद्धम्। निषादर्षभगान्धारषड्जमध्यमधैवताः पश्चमश्रेति सप्तस्वरा: सर्ङ्गतशास्त्रे प्रसिद्धा, तेषां तत्तत्कालनियतत्वम्, द्वित्रस्वरसंयोगे सङ्कीणत्वम्, सति चासङ्कीर्णत्वे भिन्नमार्गत्वम्, तदयं नियमोऽत्र नादतः पूर्णसप्तस्वरस्यापि भिन्नमाग-वोक्त, तदिदं सङ्गीतकलाविरुद्धम् ॥१०॥ हिन्दी-वीररस एवं शरृङ्गाररसके स्थायीभाव क्रोध एवं विस्मय कहे जाँय, तो यह नाट्य- कलाविरुद्धत्व नामक दोष है; क्योंकि नाटयशास्त्रके अनुसार वीर-शृङ्गारके स्थायीभाव उन्साह- रति हैं, कोध-विस्मय नहीं। निषाद, ऋषम आदि सात स्वर प्रसिद्ध हैं, एकाधिक स्वरका सक्कीर्णत्व होने पर भिन्न मार्ग नहीं रह जाता है, इस उदाहरणमें सप्तस्वरसाङर्यं होनेपर भी भिन्नमार्गत्व स्वीकृत किया गया है, यह कलाविरोध नामक दोष है॥ १७० ॥। इत्थं फलाचतुःषष्टिविरोध: साधु नीयताम्। तस्या: कलापरिच्छेदे रूपमाविर्भविष्यति।१७१॥। १. आव्य। २. शरदामत्तवहिणी। ३. नन्दन: 1. ४. काल। ५. पूर्णः । ६. पटटौ। ७. काले !

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तृतीय: परिच्छेद: २६१

कलाविरोधमुपसंहरति-इत्थमिति। इत्थं वणितप्रकारेण कलाचतुष्षष्टिविरोध: चतुष्षष्टिसंख्यककलाविरोध: साधु नीयताम् तर्क्यताम्ं। तस्याः कलायाः रूपम् कला- परिच्छेदे नाम ललितकलावर्णनात्मके स्वतन्त्रे प्रन्थे आ्विर्भविष्यति। तस्यु प्रन्थस्ष्य मुख्यतः कलापरिचयार्थमेव निर्मितनया तत्रैव कलास्वरूपवर्णनौचित्यमिति नात्र तदनुक्त्या न्यूनत्वमाशङ्कनीयम् ॥ १७१॥ हिन्दी-इसी तरह चौसठ कलाओंके विरुद्धत्वका अनुमान कर लिया जा सकता है, ककाके स्वरूपका परिचय कलापरिच्छेद नामक ग्रन्थमें दिया जायगा।। कलापरिच्छेदमें प्रधानतः कलाका निरूपण होगा ॥ १७१॥ आधूतकेसरो हस्ती तीक्ष्णशङ्गस्तुरङ्गमः । गुरुसारोऽयमेरण्डो निःसार: खदिरद्गुमः ॥ १७२ ॥ लोकविरुद्धत्वमुदाहरति-आधूतकेसर इति। हस्ती आधूतकेसरोन भवति, केसरा हि सिंहस्य प्रथन्ते न हस्तिनः, तुरअमश्श्ोऽप्यलोक एव, एरण्डस्यासारत्वं खू्यातं तदत्र गुरुसारत्वेनोच्यते, एवं प्रसिद्धसारवतः खदिरतरोः निःसारत्वमुच्यते, तदिदं सव लोक- विरुद्धत्वोदाहरणम् ॥ १७२ ॥ हिन्दी-हाथी केसरको हिलाता है, घोड़ेकी सींग बहुत तीक्षण है, इस परण्डवृक्षमें बड़ा सार है और यह खदिरवृक्ष असार है। इस उदाहरणमें लोकविरुद्ध बातें कही गई हैं, अतः इसे लोकविरुद्धत्व कहा जाता है। पूर्वार्द्धमें जङ्गमलोक और उत्तरार्धमें स्थावरलोक-विरुद्धत्वका उदाहरण दिया गया है॥ १७२ ॥ इति लौकिक एवायं विरोध: सर्वगर्हितः। विरोधो हेतुविद्यासु न्यायाख्यासु निदश्यते॥ १७३ ॥ लोकविरुद्धत्वमुपसंहरन हेतुविद्याविरुद्धत्वमवतारयति-इति लौकिक इति। इति प्रोक्तरूपः अयं लौकिक एव विरोध: सर्वगर्हितः सर्वलोकनिन्दितः अस्ति, तस्मात् तत्परि- हारे यतनीयम्। न्यायाख्यासु हेतुविद्यासु तर्कशास्त्रेषु विरोध: निदर्श्यते उपह्नियते॥ १७३ ।। हिन्दी-इस प्रकार लोकविरुद्धत्वका उदाहरण दिया गया, जो सर्वथा गहिंत है, इसके बाद न्यायविद्या नामसे प्रसिद्ध तत्तत् तर्कविद्याओंके विरुद्धत्वका उदाहरण दिया जाता है॥ १७३ ॥ सत्यमेवाह सुगतः संस्कारानविनश्वरान्। तर्थाहि सा चकोराक्षी स्थितैवाद्यापि मे हदि॥ १७४ ॥ बौद्धदर्शनरूपन्यायविरोधमुदाहरति-सत्यमिति। सुगतः गौतमः सत्यम् एव संस्कारान् अ्प्रनुभवजन्यभावनाविशेषान् अविनश्वरान स्थायिनः आह, तथाहि सा चको- राक्षी अदयापि मे हृदि स्थिता एव। संस्कारा अनश्वरा भवन्ति, अत एव च चिरदृष्टापि सा सुन्दरी मम हृदये स्थिता। अत्र सर्वक्षणिकतावादिनो बौद्धस्य साच्येण सर्वास्तित्वप्रतिपादनं बौद्धन्याय्व्विरू -् द्म् ॥ १७४ ॥ १. उरु। २. तथैब।

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२६२ काव्यादर्शः

हिन्दी-भगवान् सुगतने संस्कारोंको ठीक ही अविनाशी स्वीकार किया है; क्योंकि चिरदृष्ट होनेपर भी वह सुन्दरी मेरे हृदयमें आज भी वर्त्तमान है। इस उदाहरणमें सर्वक्षणिकताबादी भगवान् बुद्धको साक्षी देकर संस्कारका अविनश्वरत्व प्रतिपादन किया गया है, यह बौद्धन्यायविरुद्ध है॥ १७४ ॥ कपिलैरसदुद्भूतिः स्थान एवोपवर्ण्यते। असतामेव दश्यन्ते यस्मादस्माभिरुद्द्रवाः ॥१७५।। साङ्ख्यशास्रविरुद्धत्वनुदाहरति-कपिलैरिति। कापिलैः सांख्यशास्त्रानुसारिभिः स्थान एव युक्तरूपमेव असदुद्धतिः अमतः जगदुत्प्त्तिः (अमतामुत्पततिश्व) उपव्ण्यत, यस्माद् अस्माभि: (जगति) असतां दुर्जनानामेव उद्भवाः उत्पत्तयो दृश्यन्ते।

दाहरणमिदम् ॥१७५॥ हिन्दी-कपिलमतानुगामियोंने ठीक ही असतसे उत्पप्तिका प्रतिपादन किया है (असतोंकी उत्पत्तिका प्रतिपादन किया है) क्योंकि हम संसारमें असतों-दुर्जनोंकी ही उत्पत्ति देख रह है। इस उदाहरणमें सांख्यमतके विपरीत असतसे उत्पत्तिका प्रतिपादन किया है, अतः यह -सांख्यविरुद्ध है॥ १७५॥ गतिर्न्यायविरोधस्य सैषा सर्वत्र दृश्यते। अथागमविरोधस्य प्रस्थानमुपदिश्यंते ॥१७॥ न्यायविरोधमुपसंहरति- गतिरिति। न्यायविरोधस्य न्यायविरुद्वत्वदोषस्य सैषा गतिः सोडयं मार्ग: सर्वत्र अन्यान्यन्यायविरुद्धत्वस्थलेऽपि दृश्यते यथा बौद्धसा्यन्यायः उक्त:, एवमेवान्यान्यन्यायविरोधोऽपि लक्ष्येप्वन्वेष्य इति भावः। अथागमविरोधस्य प्रस्थानं प्रकार: उपदिश्यते प्रदर्श्यते ॥ १७६ ॥ हिन्दी-न्यायविरुद्धत्व दोषके उदाहरण दिये गये, अब आगे आगमंविरुद्धत्व दोषके प्रकार दिखलाये जाते हैं॥ १७६ ॥। अनाहिताग्नयोऽप्येतेऽजातपुत्रा वितन्वते। विप्रा वैश्वानरीमिष्टिमक्लिष्टाचारभूषणः ॥१७७।। श्रुतिविरोधमुद्ाहरति-अनाहितेति। एने अनाहिताग्नयः अकृताग्न्याधाना अरपि अजातपुत्राः अनुत्पन्नपुमपत्या अपि अक्लिष्टाचारभूषणाः अदूपिताचारभूषिताः विप्राः वैश्वानरीम् विराट्पुरुष संबन्धिनीम् इष्टिं वितन्वते यज्ञं कुदते। अत्र ऊुताग्न्याधाना जातपुत्रा एवं च विप्रा वैश्वानरोमिष्टि प्रत्यधिकारिणः, तद्विरुद्वं चात्रोक्तमिति भावः ॥ १७॥ हिन्दी-अग्न्याधान नहीं करनेवाले और बिना पुत्र वाले भी सदाचारी ब्राह्मणगण विश्वानर याग कर रहे हैं। यहाँ आगमविरुद्धत्व दोष है क्योंकि श्रुतिके अनुसार वही विश्वानरयागके अधिकारी हैं जो अग्न्याधान कर चुके हों और जिन्हें पुत्र प्राप्त हो, परन्तु यहाँ बिना, अग्न्याधानके और बिना पुत्र के ही विश्वानर यागका करना वर्णित किया गया है, अतः यह श्रुतिविरुद्धत्व दोष है॥। १७७।। १. वर्णिता। २. नीतिः। ३. सैषाप्यन्यत्र दृश्यताम्। ४. दर्शयिष्यते। ५. राजपुत्रा।

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तृतीय: परिच्छेद: २६३

असावनुपनीतोऽपि वेदानधिजगे गुरोः। स्वभावशुद्ध: स्फटिको न संस्कारमपेक्षते ।। १७८।। स्कृतिविरोधमुदाहरति-असाविति। असौ कुमारः अनुपनीतः अकृतव्रतबन्धोऽपि गुरोः वेदान् अधिजगे, तत्र दृष्टान्तमाह-स्वभावेति। स्वभावशुद्धः प्रकृतिनिर्मलः स्फटिकः संस्कारं न अपेक्षते। यथाऽसंस्कृतोपि स्फटिकमणिः प्रतिबिम्बभ्राही भवत्येव, तद्वदनुपनीतोऽप्यसौ बदुरवेदानधिजग इत्यर्थः । अत्र स्मृत्य। कृतोपनयनस्यैव वेदाध्ययनं विहितं, तद्विरुद्वं चोक्तमिति स्मृतिविरुद्धत्व- दोषोऽत्र स्फुटः ॥ १७८॥ हिन्दी-बिना यश्ञोपवीतसंस्कार के भी उस कुमारने गुरुसे सारे वेद पढ़ लिए, स्वभाव- निर्मल स्फटिकको संस्कारकी अपेक्षा नहीं होती है। इस उदाहरणमें स्मृतिविरुद्धत्व दोष है; क्योंकि उपनयनके बाद ही वेदाध्ययन का अधिकार स्मृतिसम्मत है, उसके बिरुद्ध इसमें लिखा है॥ १७८ ॥ विरोध: सकलोऽप्येष कदाचित् कविकौशलात्। उत्क्रम्य दोषगणनां गुणवीथीं विगाहते ॥ १७९ ॥ पूर्वोक्तस्य देशकालादिविरुद्धत्वदोषस्य गुणत्वमुपपादयति-विरोध इति। सकलः सर्वप्रकारोप्येष देशकालादिविरुद्धत्वदोषः कविकौशलात् कविप्रतिभावशात् कदाचित् दोषगणनाम् उत्क्रम्य विहाय गुणवीथीं गुणगणनां विगाहते प्राप्नोति। कदाचिदयमपि दोषो विचित्रकविप्रतिभया चमत्कारकरूपेण निबध्यमानः सन्गुणायते इत्यर्थः ॥१७९॥ हिन्दी-अब तक जो देशकालादिविरोधका स्वरूपादि दिखलाया गया है, वह यदि कवि- प्रतिभाद्वारा चमत्कारक रूपमें वर्णित हो तो वह देशकालादिविरोधदोषकी गिनती छोड़कर गुणकी गणना में आ जाता है॥ १७९॥ तस्य रश: प्रभावेण तदुद्यानानि जक्षिरे। आर्द्रोशुक प्रवालानामास्पदं सुरशाखिनाम्॥ १८० ॥ देशविरुद्धत्वदोषस्य गुणत्वमुदाहरति-तस्येति। तस्य कस्यापि वर्णनीयस्य राजः प्रभावेण सामर्थ्यातिशयन तदुदानानि तस्य राजः पुष्पोपवनानि आद्रांशुकप्रवालानाम् जलक्लिन्न वस्त्ररूपप्रवालयुक्तानाम् सुरशाखिनाम् दिवपादपानां कल्परुहाम् आस्पदं जज्ञिरे जातानि। तन राजः स्वप्रभाववशात्स्वर्गादानीय कल्पतरवः स्वोद्याने स्थापिता येषां शाखासु तत्तरुण्य: स्वीयान्यार्द्रोणि वस्त्राणि प्रसारयामासुः। अत्र कल्पपादपानां नृपो- दयाने वर्णनं देशविरुद्धमपि तदीयसामथ्यव्यञ्जकतया गुणतां गतानीति भावः ॥१८०॥ हिन्दी-उस राजाके प्रभावसे उसके उदयान भींगे हुए वस्त्रोंसे प्रवालपूर्ण कल्पद्रुमोंके आश्रय बन गये। उस राजाने स्वगसे लाकर कल्पवृक्षों को अपने उधानोंमें रोपित किया। इस उदाहरणमें यद्यपि देशविरोध है, तथापि राजाके प्रभावातिशयकी व्यञ्ञना होनेसे वह देशविरोध गुण बन गया है।। १८० ।। राश्षां विनाशपिशुनश्चचार खरमारुतः । घुन्वन् कदम्बरजसा सह सप्च्छदोद्रूमान् ॥ १८१॥ -

१. तस्य प्रभावेण तदा। २. आर्द्राकुर। ३. धून्वन्। ४. द्रमम् ।

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२६४ काव्यादर्श:

कालविरोधमाह-राज्ञामिति। राजां प्रतिपक्षनृपतीनाभ् विनाशपिशुनः भाविमरण- सूचकः खरमारुतः चण्डवातः कदम्बरजसा कदम्बकुसुमरेणुभि: सह सप्तच्छदोद्रमान् सप्त- पर्ण: पुष्पाणि धुन्वन कम्पयन् चचार ववौ। तदयं कदम्बरजसा सह सप्तच्छदोद्रमोपनिबन्धः कालविरुद्धोऽपि 'अकाले फलपुष्पाणि देशविद्रवकारणम्' इति प्रतिपन्थिराजविनाशसूच- नया गुणभावं भजते। राजो विजययात्रावर्णनमिदम् ॥१८१॥ हिन्दी-राजाके विजयप्रयाणसमयमें शञ्ुनृपतियोंके विनाशकी सूचना देनेवाली और कदम्यपुष्पर जके साथ सप्तपर्णपुष्पोंको कम्पित करनेवाली प्रचण्ड वायु बहने लगी। यहाँ कदम्यपुष्पके साथ सप्तपर्णपुष्पोद्गमका वर्णन कालविरुद्ध है, तथापि उसे दोष नहीं माना ज़ायगा, क्योंकि-'अकाले फलपुष्पाणामुदये देशविद्रवः' के अनुसार उससे शत्रुनृपदेशके नाशकी व्यजना होती है।। १८१।। दोलाभिप्रेरणत्रस्तवधूजनमुखोद्गतम्। कामिनां लयवैषम्यं गेयं रागमवर्धयत् ॥१८२॥ कलाविरोधस्य गुणत्वमुदाहरति-दोलेति। दोलायाः अभिप्रेरणम् इतस्ततः सभ्व- लनं तेन त्रस्तस्य भीतस्य वधूजनस्य मुखादुद्गतं लये वैषम्यं भिन्नप्रकारत्वं यत्र तादृशं गेयं दोलागीतं कामिनां रागम् आनन्दम् अवधयत्। लयशुद्धगीतस्यैव रागवर्द्धकत्वौचित्ये- ऽपि सविशेषानुरागसूचकतया गुणत्वमत्र लयवैषम्यस्येति॥ १८२॥ हिन्दी-झूलेके चलायमान होनेसे डरी हुई अबलाओंके मुखसे निकला हुआ विषमलयवाला गान काभिजनके रागको बढ़ाता रहा। इस उदाहरणमें विषमलयगानका रागवर्धकत्व कलाविरुद्ध है, क्योंकि लयशुद्धगान ही रागवर्धक हो सकता है, तथापि कामिजनोंके उत्कट रागकी सूचना देनेसे वह गुण ही माना जाता है॥१८२॥ पेन्दवादचिष: कामी शिशिरं हव्युवाहनम्। अबलाविरहक्लेशविह्वलो गणयत्ययम् ॥ १८३॥ लोकविरुद्धत्वस्य गुणत्वमुदाहरति-ऐन्दवादिति। अयम् अबला विरहक्लेश विह्वलः कामी प्रियाविरहकष्टकातरः कामुकः ऐन्दवात् अचिंषः चन्द्रसम्बन्धिनः प्रकाशात् हव्य- वाहनं वहिं शिशिरं शीतलं गणयति मन्यते, 'दहनजा न पृथुदवधुव्यथा विरहजव पृथुः' इति नैषधे। अत्र वियोगकष्टाधिक्यव्यअजकतया लोकविरोधस्य गुणत्वं बोध्यम्॥१८३ ॥ हिन्दी-यह प्रियाविरहकातर कामीजन चन्द्रकरसे वह्निको ही शीतल समझता है। इस उदाहरणमें चन्द्रकरापेक्षया वह्निका शीतलत्व लोकविरुद्ध वणित हुआ है, पंरन्तु वियोग- कषाधिक्य सूचनाद्वारा वह गुण मान लिया जाता है॥ १८३।। प्रमेयोप्यSप्रमेयोऽसि सफलोऽष्यसि निष्फलः। एकस्त्वमप्यनेकोSसि नमस्ते विश्वमूर्त्तये ॥ १८४॥ न्यायविरोधस्य गुणत्वमाह-प्रमेय इति। प्रमेयः वेदप्रमाणज्ञेयः अपि अ्प्रमेयः भनन्तगुणशालितयाऽपरिच्छेद्यरूपः, सफल: व्यष्टिरूपेण अंशवान् अपि समष्टिरूपेण निष्फल: निरंशः असि, एकः अद्वितीयः अपि अ्रनेकः 'इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते' इत्युक्त्यनुसारम् अ्नेक: असि, तादृशाय विश्वमूर्त्तये सर्वव्यापकस्वरूपाय ते तुभ्यं नमः । १. डोकातिप्रेरणात्रस्त २. वैषम्याद् गेयम्। ३. त्यलम्। ४. सकलोप्यसि निष्कलः ।

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तृतीय: परिच्छेदः २६५

अत्र परस्परविरुद्धानां तत्तद्वर्माणामेकत्र वर्णनं न्यायविरुद्धमपि परमेश्वरस्य लोकाती- तमाहात्म्यप्रकाशतया गुणत्वं भजते ॥ १८४ ॥ हिन्दी-वेदप्रमाणवेद्य होकर भी अन्तहीनगुणशील होनेसे आप अज्ञेय हैं, व्यष्टिरूपमें सफल होकर भी समष्टिरूपमें आप निष्फल हैं, एवम् अद्वितीय होकर भी आप विश्वरूप हैं, इस तरह के आप परमेश्वरको नमस्कार है। इस उदाहरणमें परस्परविरुद्ध धर्मोका एकत्र वर्णन न्यायविरुद्ध होने पर भी परमेश्वरके लोकातीत मह्दात्म्य सूचन करनेके कारण गुण हो जाता है॥ १८४॥ पश्चानां पाण्डुपुत्राणां पत्नी पाञ्चालपुत्रिकां। सतीनामग्रणीश्चासीद् दैवो हि विधिरीद्टशः॥१८५।। आगमविरोधस्य गुणत्वमुदाहरति-पञ्चानामिति। पश्चानां युधिष्ठिरादीनां पाण्ड- पुत्राणां पत्नी पाश्चालपुत्रिका द्रौपदी सतीनाम् अग्रणीः मूर्धन्या आसीत्, दैवः देवता- सम्बन्धी विधि: नियम: र्टद्ृशः भवति। स्त्रिय एकस्याः पञ्चपुरुषपत्नीत्वे सतीत्वमागम- विरुद्रम्, परन्तु आगमानां लोकबाधकत्वेऽपि देवबाधकत्वाभावेन द्रौपद्या देवतां व्यअय- त्तद्गुणभावं भजते ॥। १८५ ।। हिन्दी-पाँच पाण्डवोंकी पत्नी द्रौपदी सतियोंकी शिरोमुकुट रही, देवोंके नियम ही कुछ अद्भुत होते हैं। इस उदाहरणमें एक स्त्रीका अनेक पति होना आगमविरुद्ध है, परन्तु उससे द्रौपदीका देवताभाव सूचित होता है, अतः वह दोष नहीं होकर गुण हो जाता है॥ १८५॥ शब्दार्थालङिक् याश्चित्रमार्गा: सुकरदुष्कराः। गुणा दोषाश्च काव्यानामिह संक्षिप्य दर्शिताः ॥ १८६।। अ्रन्थमुपसंहरति-शब्दार्थेति। काव्यानां शब्दार्थालडिक्रयाः शब्दालङ्कारा अर्था- लड्काराश्च तथा सुकरदुष्कराः चित्रमार्गाः चित्रालङ्काराः गुणः श्लेषप्रसादादयः दोषा अपार्थत्वादयक्व दश संक्षिप्य दर्शिताः ॥ १८६ ॥ हिन्दी-अबतक इस ग्रन्थमें शब्दालक्कार-दीपक, आवृत्ति, क्रम, श्लेष (चार), अर्था- ल्कार-स्वभावाख्यानादि [चौंतीस ], सुकर तथा दुष्कर चित्रमार्ग, सुकर-पादादियमकादि और दुष्कर-महायमकस्वरस्थानवर्णादि नियम, गुण-श्लेषादि एवं दोष अपार्थत्वादि संक्षिप्त- रूपमें दिखाये गये हैं॥ १८६ ।। ग्युत्पन्नबुद्धिरमुना विधिदशितेन मार्गेण दोषगुणयोर्वशवत्तिनीभिः। वाग्भि: कृताभिसरणो मदिरेक्षणाभि- धन्यो युवेव रमते लभते च कीर्तिम् ॥१८७।। इत्याचार्यदण्डिन: कृतौ काव्यादर्शे शब्दालङ्कारदोषविभागो नाम तृतीय: परिच्छेदः॥

१. कन्यका। २. शब्दार्थानां क्रियामार्गा: सुकराश्चैव दुष्कराः। ३. काव्यानामिति। ४. कृतानु।

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२६६ काव्यादर्श:

प्रन्थफलं निर्दिशति-व्युत्पम्नेति। अमुना पूर्वोक्तरूपेण विधिदर्शितेन भरतादा- चार्यादेशानुकूलं निरूपितेन दोषगुणयोः हेयतोपादेयताप्रयोजकधमयोः मार्गेण विवेचन- प्रकारेण व्युत्पन्नबुद्धि: संस्कृतमतिः (विद्वान्) वशवर्त्तिनीभिः आयत्तीकृताभिः वाग्भिः कृताभिसरणः स्वयंकृताभिगमनः सन् धन्यो युवा मदिरेक्षणाभिरिव (ताभिः वाग्भिः) रमते कीर्ति च लभते। भरतोक्तमार्गानुसारिणाऽत्र निरूपितेन दोषगुणयोः स्वरूपेण काव्यतत्त्वं विदजनो वाचं वशगां विधाय तया सह रमते, यथा धन्यो युवा मदिरेक्षणां वशगां विधाय तया सह रमते, कीर्त्तिलाभः परमस्य वागवशयितुरतिरिच्यत इति ॥१८७।। हिन्दी-मरतादिआचार्यसम्मत तथा यहाँ बताये गये दोष-गुणके रूपको जानकर संस्कृत- युद्रि साहित्यमर्गज्ञ विद्वान् वाणींको अपने वज्चमें करके उसके साथ विलास किया करेगा, जैसे रमणीय धनसोन्दर्यादिशाली युवा रगणीको वशबततिनी वनाकर उसके साथ विलास किया करता है। याणीको वशमें करनेवाला केवल सुखसौभाग्य ही नहीं, कीति भी प्राप्त करेगा ।.१८७।। यो जातो धरणीसुरान्वयसरोहंसात्प्रसपंथशो

मिश्राव्यान्मधुसूदनाजयमणौ सीमन्तिनीनां मणौ तस्य श्रीयुतरामचन्द्रसुधियो व्याकया प्रसिद्धयादियम्॥ १॥ वेदइन्डूनमोषिसम्मितशर धाशातिथौ मार्गगे चन्द्रे पुष्यति वासरे दिनमणे: श्रीशारदानुग्रहात्। 'रांची' स्थापितराज्य संस्कृतमहाविद्यालये पूणता- मानीतेयमुमाम हेश्वर पदाम्भोजेषु विश्राग्यतु॥। २ ॥ 'विद्ांसो वसुधातले परवच :- शलाघासु वाचंयमाः' उपश्वैतद्टिसुखीभवामि न मनागालोचनावर्त्मनः।

निचिप्यात्मगुणोचितादरभुवं कुयुर्ममेर्मा कृतिम॥३॥ दिद्रान्वेषणमात्रसज्जधिषणानप्यत्र दोषान् बहून् ग्रभ्थे दशयतो न मतसरितया निन्दामि किन्सवर्थये। निर्दोषेण पथा प्रशस्तरचनां निर्माय काक्ित कृतिं लोकेम्यः समुपाहरन्तु भविता भूयो यशोऽनेन वः ॥। ४ ॥ माम्यान्यानहमाद्रिये नतशिरास्ते ते सखायश्च मे येषामाग्रहतो विदभ्पि निजा शक्ति प्रवृत्तोऽभवम्। व्यावयानेऽत्र न तैरियं मम कृति: कार्यान्यथा हक्पदं सर्वानिन्दितकीत्तिलाभसुभगं भाग्यं कुतोऽस्माडशाम् ॥५॥ इति 'सुजप्फरपुर'मण्डलान्त:पाति'पकड़ी'ग्रामवासिना 'रांची'स्थराजकीय- संस्कृतमहाविद्यालये साहित्याध्यापकेन व्याकरणसाहित्यवेदान्ताचार्या- घुपाधिप्रसाधिनां मैथिलपण्डितश्रीरामचन्द्रमिश्रशर्मणा विर- चितायां काव्यादर्शस्य प्रकाशाभिधायां व्याख्यायां तृतीयपरिच्छेद प्रकाशः ।।

समाप्तन्धायं ग्रम्थ:

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श्लोकानुकमणिका

परि० श्लोक परि० श्लोक अ-अकस्मादेव ते चण्डि अभिन्नवेलौ गम्भीरौ २ ९८३

अक्रियाचन्द्रकार्याणा अभ्रविलासमस्पृष्ट २

अगागां गाङ्डकाकाक ३ अम्भोरुह मिच्राताम्र २ ९५

२ ३६० अमृतस्यन्दिकिरण २ ३०७ अङ्गल्यादी दलादित्व २ ७५० अमृतात्मनि पद्मानां २ १६१ अच्यतोऽप्यवषच्छेदी २ ३२२ अयं मम दहर्यक्गम २ १७७ अजित्वा साणवामुर्वी २ २८४ अयमर्थान्तराक्षेप: २ १६६ अतः प्रजानां व्यूत्पत्तिम अयमान्दोलितप्रौढ २ २३६ अ्रत्यन्तवहतस्तेषाम 3 ३ अयमालोहित च्छायो २ ८९ अत्यन्नममदार्याणाम २ २५० अरण्यं कैश्रिदाक्रान्तम् ३ 9 अत्र धर्मेरभिन्नानाम् २ ११४ अग्वालोकसंहायम् २ १९० अन्रोद्याने मया हष्टा २ ११२ अर्थमिष्टमनाख्याय २ २९५ अद्य या मम गोविन्द २ २७६ १ अधिकेन समीकृत्य अर्थान्तर प्रवृत्नेन २ अनङ्ग: पञ्रभि: पौष्पैः १२१ अर्थावृत्ति: पदावृत्ति: 2 ११६ A m २

अनक्गलङ्नालस 3 ९० अर्थिनां कृपणा दृष्टिः 9'9 अनख्ितामिता दृष्टि २ २०१ अर्थो न संमृत: कश्रिन्न २ १५९ अनन्वयमसन्देहा २ ३५८ अर्धाभ्यास: समुद्रः 3 ५३ अनय रनवधाङ्ि ८७ अलिनीलालकलनं 3 ८९ अनग्पविटपा २ २९० अलडकृतमसडचतिप्तम् १८ अनाहिनाप्योष्येते ३ १७७ अल्पं निर्मितमाकाशम् ९१ अनिष्ठशक्षरप्रायम ६९ अवते भवते बाहुम् ३ अनुकम्पाद्रतिशयो १३७ अवलेपप देनात्र ११० m' 3 २ अनप्रामधिया गौडै: १ अवलेपमनङ्स्य १०९ अनेकशब्दोपादानात ११२ अविकृत्य मुखाङ्गानि ७४ U अनेनैव प्रकारेण २ ११५ अविशेषेण पूर्वोक्तम् ३ १३५ अन्यथैव स्थिता २ १२१ अव्यपेतव्यपेतात्मा ३

९३ असावनादरात्षेप: २ अपकर्त्ताहमस्मीति असावनुपनीतोऽपि 3 अपह्वतिरपह्नत्य ३०४ अमावनुशयाक्षेप: २ १६० अपाङ्गभागपातिन्या २ ३२५ असावुदयमारूढ: २ ३११ अपाद: पादसन्तानो २३ अस्तमस्तकपर्यस्त २ ८२ अपार्थ व्यर्थमेकार्थम ३ १२५ अस्तयनेको गिर्रां मार्ग: ४०

अपित्वनियमो 9 २५ अस्त्यभिन्नक्रिय: कश्चित् २ ३१४ अपीतन्ीबकादम्ब २ २०० अस्ति काचिदवस्था 3 १३३ अप्रस्तुतप्रशंसा स्यात् ३४० अहो विशालं भूपाल २ २१९ अबाध्यैरिन्दुपादानाम् २ २४५ अंशुकानि प्रवालानि २ २९० अभावसाधनायालम् २ २३९ आ-आक्रोशत्यवजानाति २ ६२

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२६८ काव्यादर्शः

परि० छोक। परि० शोक आत्िपन्त्यरविन्दानि ३६१ इस्यनुज्ञामुखेनेव १६६ आदिराजयशोबिम्ब आदो राजेत्यधीराचि इत्यनुद्धिक्ष रूपत्यात् २६४ 3 १९६ इस्यनुप्रासमिच्छन्ति ५८ आधूतकेसरो हस्ती ३ १७२ इत्यनूर्जित एवार्थ: १ ७१ आनन्दाश्रुप्रवृत्तं मे २६७ इस्यपूवसमासोकि: २१३ आभीरादिगिर: काव्ये ३६ इत्ययं संशयाक्षेप: १६४ आम्नायानामाहान्त्या 3 ८४ इत्यादि दीपकर्वेऽपि २ १८० 3 २४ आर्यादिवत् प्रवेश: कि इत्यादि दीपकान्युक्ता १ २७ इत्यादि बन्धपारष्यं ६० आविर्भवति नारीणां २५६ इश्यादि शास्त्रमाहा. Y M ३ १५१ आवृत्ति: प्रातिलोभ्येन ७३ इत्यारुस परां कोटि २८३ आवृत्तिमेव संघात २ १४२ आशयस्य विभूतेवां २ ३०० इश्याह युक्तं विदुरो २ २७७ आशीर्नामाभिलषिते ३५७ इत्युत्साह: प्रकृष्टात्मा २ २८५ आहुः समागतां नाम ७८ इश्युदाहतयो दत्ता: २ ३५" इ-इचुसीरगुणादीनां 9 १०२ इत्येक व्यतिरेकोऽयम् २ १८२ २ २६० इश्येतद समस्ताख्यम् २ ६८ इति कारुण्यमुद्रिक २८७ २ १७१ इति कालविरोधस्य इत्येवमादयो भेदा: ३ १६९ इति चन्द्रश्वमेवेन्दो इत्येवमादिराक्षेपो २ १६८ २ ३०८ इत्येवमादिसीभाग्यं 9 "४ इति त्यागस्य वाक्ये ७८ इस्येवमादिस्थाने २ २६८ इनि दुष्करमार्गेऽपि ३ ९६ इत्येष परुषासेप: २ १४४ इति पद्येऽपि पौरस्स्या 9 ८३ १ ९२ इति पादादियमकम् १९ इदमन्धंतमः कृत्स्नं ४ इनि पादादियमक 3 ३७ इदं मघोन: कुलिशं २ २१९ m इति प्रौढाङ्गनाबद्धू २ २०७ इदमम्लानमालाया: २ २८९ इति मा्गदयं भिन्नं १ १०१ इदमस्वस्थचिस्तानाम ३ १३० इति मुक्तपरो युद्धे २९४ २ ७८ इति मुर्येन्दुराचिप्तो इन्दुपादा: शिशिरा: ३ इति लक्याप्रयोगेषु २४६ २ ५७ इति लौकिक एवायम् 3 १७३ इषं साध्ग्यवधर्म्य २ ८6 इति वैदर्भमार्गस्य ५्२ इह शिष्टानुशिष्टानां ३ इति व्यपेतयमक ३३ ई-ईएशं वज्यंते सद्धिः २ ५६ इति श्लेषानुविद्धानाम ३४७ ईएशं संशयायैव ३ १४२ इति साच्ारकृते देवे २ २७९ उ-उत्कण्ठयति मेघानां २ ११८ इति संभाव्यमेवैत १ ८८ उस्कर्षवान् गुण: कश्चित् ७६ इतिहासकथोद्भूत १५ ३ १३६ इति हचमहयं तु 9 ९७ उत्पादयति लोकस्य २ १७४ इतीदं नाडतं गौडै: ९ ५४ उम्प्रवालान्यरण्यानि २ २४२ इत्यनङ्जयायोग २ १२२ उत्प्रेत्नाभेद पवासा २ ३५९ इत्यनालोच्य वैषम्य 9 ५० उत्सङ्शयनं सख्या: ९ १९

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श्रोकानुक्र्कमणिका २६ह

परि० शोक परि० शोक उद्यन्रेव सविता २ ३४९ कविभावकृतं चिह्नं 9 ३०

२ कान्तं सवजगर्कानतं २ ८५ उदित रन्य पुष्टानाम ३ ३१ कान्श्या चन्द्रमसं धाम्ना २ ५०

उद्िष्टानां पदार्थानाम् २ २७३ कापिलैरसदुद्भूतिः ३ १७५

३ १४४ कामार्त्ता धर्मंतप्ता 3 १४३ उद्धृत्य राजकादुर्वी ३ २५ कामेन बाणा निशिता ३ १५८

उद्यानमारुतोद्धूता २ ३३८ कामं कन्दर्प चाण्डालो १ ६४

उदयानसहकाराणम् कामं सर्वोप्यलङ्कारो २ २५१ ६२ उपमानोपमेयत्वम् २ २२८ कार्याक्षेप: सकायस्य २ १३४ उपमापह्वति: पूर्वम २ ३०९ कालकालगलकाल ५०

उपमारूपकाल्षेप ३१३ कालं कालमनालचय 3 ३५ २ उपमैव तिरोभूतभेच्वा ६६ काष्यशोभाकरान् धर्मान् २ काश्चिन्मार्गविभागार्थ २ ३ उपोढरागाप्यबलामदेन- 3 उभयत्र पुमान् कश्चित् २११ किश्विदारभमाणस्य २ २ २९८

उभयव्यतिरेकोऽयम २ १८४ किन्तु बीजं विकल्पानां २ २

ए-एकचक्रो रथो यन्ता ३२८ किं पद्ममन्तर्भ्रान्तालि २ २६ २ NM Y mn एकद्वित्रिचतुष्पाद किमयं शरदम्भोद: १६३ 3 २ एक,वाक्ये प्रबन्धे वा 3 १३१ कीडागोष्ठीविनोदेषु ३ ९७ एकाकारचतुष्पादं 3 ७० कुतः कुवलयं करणे २ 1२३ एकाङ्गरूपकं चैतदेवं २ ७६ कुब्जामासेवमानस्य i०९ एताः षोडश निर्दिश्टः ३ ०६ कुमुदानि निमीलन्ति ९४

एष राजा यदा लचमीं ५३ कुमुदान्यपि दाहाय २ १७९ १ ऐ-ऐन्दवादचिंष: कामी १८३ कूजितं राजहंसानां २ ३३४

ओ-ओज: समासभूयस्वम् ८० केन कः सह संभूय १२

क-कण्ठेकाल: करस्थेन १२ कोकिलालापवाचालो १ ४८ २ कथा हि सर्वभाषाभि: ३८. कोकिलालापसुभगा: २ ३५४

करथं त्वदुपलम्भाशा- १२ कृष्णार्जुनानुरक्तापि २ ३३९ m' N कंदा नौ संगमो भावी २६१ ख-खरं प्रहृत्य विश्रान्तः ६७

कन्याहरणसंग्राम २९ खातयः कति काले ते कन्ये कामयमानं मा ६३ ग-गच्छ गण्छसि चेत् २ ९४१ कमले समकेशं ते 3 २९ गच्छेति वक्तुमिच्छ्रामि २ १४७ करेण ते रणेष्वन्त 3 २६ गतः कामकथान्मादो २ २४८ करोति ताम्रो रामाणं ३ २१ गतिर्न्यायविरोधस्य 3 १७६ करोति सहकारस्य 3 गतोऽस्तमर्को भातीन्दु २४४ कर्त्ता यध्पमानं स्यात् २ २३० गन्ता चेद् गच्छ तूणं ते २ १४५ कर्णस्य भूषणमिदम २ २२४ गाम्भीर्यं प्रमुखैरत्र २ ८६ -- कपूर पादपामर्श ३ १६५ गाम्भीर्येण समुद्रोऽसि २ कलक्कणितगर्भेण- २ ५० गिरा स्खलन्त्या नम्रेण ३ ११५ कलङ्मुक्तं तद्नुमध्य ३ ५९ २ ३२३ कलापिनां चारुतयोप ३ ५६ गुणदोषानशासज: कक्पदेशीय देश्यादि २ ६० गुणतः प्रागुपन्यस्य २१

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३०० काव्यादर्श:

परि० शोक परि० श्रोक गुरुगर्भभरक्ान्ता: ९८ तदेतह्ाङ्मयं भूय: ३२ गुरो: शासनमस्येतुं ३०५ तनुमध्यं पृथुश्रोणि २ ३३६

गृहाणि नाम तान्येव ८६ तव तन्वक्ि मिथ्यैव २ १२७ गौगों: कामदुघा ६ तब प्रिया सचरिताप्रमत्तया ३ ४१

च-चसुषी तव रज्येते २ तवाननमिवाम्भोज़ं २ १८

चतुमुखमुखाम्भोज तस्य चानुकरोतीति २ ६५ YIY चन्दनोदकचन्द्रांशु २ ४० तस्य सुष्णाति सौभाग्यं ६३ YMY चन्दनं चन्द्रिका मन्दो ३.५ तस्य राज: प्रभावेण ३ १८०

चन्दनप्रणयोदन्धि ४९ तापसेनापि रामेण ३४४

चन्दनारण्यमाधूय २३८ ताम्राकुलिदलश्रेणि २ ६९

चन्द्रबिम्बादिव विषं २ ३९ तुन्दैराताम्रकुटिलै: चन्द्रमाः पीयते वेवैः २ ९० तेज्मी प्रयोगमार्गेषु २ २५४

चन्द्रातपस्य बाहुलयं २ २१६ तेषु तेष्वयथारूढं १६४

चन्द्वारविन्दयो: कचया २ ३७ तैः शरीरं च काव्यानाम् १०

चन्द्रेण तवन्मुखं तुश्यं ३२ स्वद्पाङ्गाह्हयं जंत्र २ २५५

चन्द्रे शरभ्रिशोत्तंसे ५६ स्वदाननमधीराष २ ४४

चन्द्रोडयमम्बरोत्ंसो १९४ सवदाननमिवोभिद्र २ १७

चपलो निर्दयश्चासी २ २७१ स्वनमुखं कमलेनव २ १९

चरन्ति चतुरम्भोधि २ ९९ रवन्मुखं कमलं चेति २ १९०

घराचराणां भूतानां ९५३ स्वन्मुखं पुण्डरीकं च १९३ चारुचन्द्रमसं भीरु '1 त्वया नीलोश्पलं कर्णे १०६ चित्रमाक्रान्तविश्वोऽपि २ १६५ स्वय्येव रवन्मुखं हष्टं २ २२

चोला: कालागुरु 3 ९६६ स्वं समुद्रश्च दुर्वारी २ १८५

छ्र-छन्दोविचित्यां सकलः १२ द-दक्षिणाद्रेरुपसरन् ३ १६६

ज-जगदाहादयत्येष २ १७५ दण्डे चुम्बति पभ्मिन्या ३ ९९०

जयता त्वन्मुखेनास्मान् १७ दशत्यसी परभृतः २ २९६

जलं जलधरोद्गीणम् दिवो जागर्ति रक्षाये २ १०५ २ ४९

जहि शत्रुबलं कृत्स्नम् १३२ दीक्षमित्य परैभूम्ना ७२

जातिक्रियागुणद्रव्य २ ९७ दुष्करं जीवनोपाय २ १५२

जातिक्रियागुणद्रव्य २ १३ दूरकार्यस्तत्सहज: २ २५३

जित प्रकृष्टकेशाकयो ३ दूरे प्रियतमः सोडय २ १३३

जिस्वा विश्वं भवानत्र २ १९९ देवधिष्ण्यमिवाराध्य 5 ९० ९३ MMM M जीविताशा बलवती २ १३९ देवानां नन्दनो देवो ३

त-तत्कथाख्यायिकेत्येका २८ देशकालकलालोक ३ १६० तर्पदुम्यां पदं धसे ६४ १६२ तथापि कटुकर्णानां ३ १५५ दोलाभिप्रेरणत्रस्त ३ १८२ तद्गुकुणां लघूनां च १ ८१ दोषाभासो गुणः कोऽपि २ २७२ तदश्पमपि नोपेचयं ७ दोषाकरेण संबध्नन् २ ३१२ तदस्ततम्द्रैरनिशं सरस्वती १०५ दोषानपरिसंखयेयान् ३ १०७

२ २३३ ध-धनं च बहुलभ्यं ते २ १३९ तदेतत् काव्यसर्वस्वं १०० धराधराकारघराधराभुजां ३

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श्रोकानुक्र्कमणिका ३०१

परि० श्लोक परि० श्लोक १२८ निवृत्तव्यालसंसर्गो २ २१२ १३० २'. निमर्गादिप दैरन्न २०४ घ्रवं ते चोरिना नन्वि ३१९ न-न कठोरं न वा तीच २ ३२: नृत्यन्ति निचुलोत्सड़े १०३ नगराणव शेलर्स्त नूनं नुन्नानि नानेन न चिरं मम तापाय २ नेशं बहु मन्यन्ते :५ न जातु शक्तिरिन्दो नैकोडपि ग्वादशोऽद्यापि n न देवकन्यका नापि ३२५ नैतन्मुखमिदं पद्यं ९.५ न पद्मं सुखमेवेदं ३६ नैसर्गिकी च प्रतिभा १०३ न पद्मस्येन्द.निग्राह्य : 9 न्यूनमप्यत्र ये: वशविदङ्गे: २० न पर्गन्तो विकल्पाना प-पञ्जानां पाण्डपुत्राणां 3 न प्रपञ्जचयाचवेदा ३% पद्मसंमील्नादत् २ २६२ न बद्ा भ्रक्टिर्नापि ३२६ पदसंधानवर्ता वा ६६ न मन्दयावजिंतमानसा पद्मानामेव दण्डेष ३२० U न मया गरसाभिज्ञं पद्मिनी नकमन्निद्वा २ १६५ न मीलयति पद्मानि पद्मान्य्काशुनिष्यता: ९.६ नयनानन्दजनने पद्मं नावतवान्वेनि २ २० नयानयालोचनयानयानया न रथा न च मातङ्गा ३२ पद्म बहुरजश्नन्द्रः ३६८ नरा जिता माननयासमेर्य पन्थाः स एप त्रिवृन: ५५ पयोघरनटोत्सङ्ग U

न लिङ्गवचने भिन्ने पयोमुच: परीतापं २ 82

नलिन्या इव तन्वङ्गया: २ ४५ न विद्यते यद्यपि परदागभिलाषो मे १०४ न श्रद्दधे वाचमलज परस्परोप कारित्वं ३६' २ ६५ mmrni न संहितां विवसामी परागतरुराजीव २७ १९९ ६४ न स्तूयते नरेन्द्रत्वं परम्पराया बलवारणानां २ १६७ पवनो दक्षिण: पर्ण ९८ न स्पृशत्यायुधं जातु ३ १२१. नाघातं न कृतं कर्णे पश्चात्पयस्य किरणा

नादिनोमदना घी: पश्याम्यनङ्गजातङ्क पाणिपद्मानि भूपानां २५९ नानालङ्कारमंसृ्टिः १५९ पातु वो भगवान् विष्णुः 3 २८ नानावस्थं पदार्थानां २ पायं पायं नवारीणां नायकेनेव वाच्यान्या ५ पिवन्मधु यथाकामं २ २०६ नासिक्यमध्या पारत पुंमः पुराणादाच्छिद २ ३४५ ना स्थेय:सश्वया वज्य: ५४ पूर्व त्रशब्दवत्साम्य २ १९६ निगृद् केशेप्वाकृष्टा २८२ पूर्वत्राशयमाहात्म्य २ ३०३ निगृद्य नेत्रे कर्षन्ति १३ पूर्व शास्त्राणि संहत्य २ नियमाच्ेपरूपोक्ति २ ३१५ पूर्वस्मिन् भेदमात्रोक्ति २ १९२ निर्णयार्थ प्रयुक्कानि १३९ पूष्ण्यातप इवाहीव २ ४२ निर्णेतुं शक्यमस्तीति २ २१४ प्रतिज्ञाहेतुरशन्त ३ १२७ निर्वस्यं च विकार्ये च २ २४० २ ५९

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३०२ काव्यादर्श:

परि० शलोक परि० श्लोक प्रतिषेधोक्तिरासषेप: २ ९२० मया मयालम्बकला ४८ २ ५८ मय्येवास्या मुखश्री २ २३ प्रतीयमानशौकल्यादि २ १९५ मछ्िक्ामालभारिण्य: २ २१५ प्रन्याससाणया हेतुन् २ महाराष्ट्रीश्रयां भाषां १ ३४ प्रभावनो नाम न वासवस्य 3 ६३ महीमृदभूरिकटक २ ३२१ प्रमेयोऽप्यप्रमेयोसि ३ १८४ मही महावराहेण ७४ प्रवृत्तेव प्रयामीति २ १५३ मानमस्या निराकन २ २९९

प्रम्ादवत् प्रसिद्धार्थ ४५ मानयोग्यां करोमीति २ ३४३

प्रसिद्ध हेतुव्यावृध्या १९९ मानिनी मा निनीषुस्ते 3 ९६

पाकप्रीतिर्दशिता सेयं २८१ मानेन मानेन सखि ३ ४ २ प्रागभावादिरूपस्य ९६१ २ २५२ मानेर्ष्ये इह शीर्येते प्रावृषेण्यजंलघरैः ३३५ मिश्राणि नाटकादीनि ९ ३१ २ प्राहुग्धत्रमं नाम मुखचन्द्रस्य चन्द्ररवं २ ९१ 3 प्रीत्युत्पादनयोग्यस्य २ २३७ मुखपङ्क्जर ङ्रडस्मिन् ९३

प्रेय: व्रियतराखयानं मुखादित्वं निवरथैवं २ २५ २ २९५ २ घ्र-ब्नन्नङ्गेषु रोमाञ्जं मुखेन्दुरपि ते चण्डि ९२ २ मुग्धा कान्तस्य यात्रोक्ति २ वन्यन्यागस्तनुत्यागो १५५ १४७ मुद्ा रमणमन्वीत 3 विभत्ति भूमेरवलयं ३० ३ मृगेक्षणाक्कं ते वक्त्रं २ ३५ २ ३१ २ भ-भगवन्ती जगभ्नेत्रे मृणालबाहुरम्भोरु ३३१ २ १७२ २ भगिनी भगवत्यादि मृनेति प्रेत्य संगन्तु २८०

भवाहशा नाथ न जानते मेघनादेन हंमानां ४२ ३ ५ 3 भवानिव महीपाल मण्डलीकृत्य बर्हाणि s0 २ ५३ २ भाविकन्वमिति प्राहुः ३६७ २ ३६४ य-यञ्च सन्ध्यङ्गवृत्यङ्ग

भुजङ्गभोगसंसक्ता ३४६ यत्रात्षेप: सयत्रस्य २ १४८

म-मज्जरीकृत्य धर्माम्भ: यत्न: संबन्धविज्ञान १४६ २ ७२ मताधुनानारमतामकामता ३ ४९ यथाकथनित् सादृश्यं

मदनो मदिराक्षीणा यथेन्दुरिव ते वक्त्रम् २ २६२ ३ ७९ मदपाटलगण्डेन यदपीतादिजन्यं स्यात् २ २०२

मदरफ्तकपोलेन यदि कि्विद भवेत् पदमं २ २४ २ ८० २ मधुपानकलात् कण्ठा १७६ यदि निन्दन्निव स्तौति ३४३ २ मधुरा रागवर्धिन्य: २२९ २ ३१७ यदि लेयनमेवेषं २

मधुरेण हशां मानं २० यदि सत्येव यात्रा ते २ १४३

मधुरं मधुरम्भोज यमः कुबेरो वरुण: २ ३३१ 3 1. मधुरं रसवद्धाचि ५९ यया कयाचिच्छ्रृत्या ५२

मध्यन्दिनाकसन्तप्ः २ २२२ यशश्च ते दिष्ठ रजश्व ३ ६०

मनोरथप्रियालोक 3 १४० यस्या: कुसुमशय्यापि २ २८६ मनोभव तवानीकं ३ ८१ याति चन्द्रांशुभि: स्पृष्टा २ ३५० मन्दानिलेन चलता ३ १६० यानमानयमारावि ३ ७६ मन्दो गन्धवह: चारो २ १०४ यामताश कृतायासा ३ मभ्ये शक्के ध्रुवं प्रायो २ २३४ यामतामन्रयाधीन ३ ३६

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श्रोकानुक्रमणिका ३०३

परि० श्लोक परि० श्रोक युवैष गुणवान् राजा २ २७९ विनायकेन मवता ३ ६८

योगमालात्मिका नाम ३ १०५ विप्रलम्भैविवा हैश्र यो लिम्पर्यमुना तुल्यं २३१ विरुद्धानां पदार्थानां य: स्वरस्थानवर्णानां ३ विरोध: सकलोप्येघ: र-रवभित्तिषु संक्रान्तै २ ३०२ विवसाया विशेषस्य २ १४ रमणी रमणीया मे १८ विववितगुणोर्कृष्टै २ ३३० रवेण भौमो ध्वजवर्त्तिवीरवं ३ ४७ विशदा विशदामत्त ३ १४ रागमादशयन्नेष २ ३१८ विशेषणसमग्रस्य २ ८२ राज्ञां हस्तारविन्दानि २ २५८ विशेष्यमात्रभिन्नापि २ राजकन्यानुरक्तं मां २ २६६ चिश्वव्यापी विशेषस्थः २ राजन्वर्य: प्रजा जाता ३ ६ विषमं विषमन्वेति ३ राजितै राजितप्ण्येन 3 विष्णुना विक्रमस्थेन २ १05 राजीवमिव ते वक्त्रम् १६ वीरशृङ्गारयोर्भावी LY रूढमूल: फलभरै: २ २०९ वीर्यवंशश्रुतादीनि . २२ ७९ वीर्योत्कर्षस्तुतिनिन्दै २ २ 9० रे रे रोरुरुरूरोरु ९२ व्यक्तिरुक्तिक्रम बलात् २ ३६६ २ १५४ व्युत्क्रान्तातिव्यवहित ३ ल-लास्यच्छलितशम्पादि ३९ ·्युत्पन्नवुद्धिरमुना ३ १८७ छिस्पतीव तमोङ्गानि २२६ व्युत्पन्नमिति गौडीयै: ४६ लिम्पतीव तमोङ्गानि २ ३६२ श-शतपत्रं शरचन्द्र २ :३ लीलास्मितेन शुचिना ४३ OY MY YY शब्दही नमनालच्य ३ १४८ लुप्ते पदान्ते शिष्टस्य ३ १५४ शब्दार्था लडिक्रया: ३ लेशो लेशेन निर्भिन्न २ २६५ शब्दोपात्ते प्रतीते वा २ लोकातीव इवात्यथ ८९ शब्दोपादानसादृश्यं २ व-वक्तं चापरवव्त्र च २६ शब्देऽपि ग्राम्यतास्त्येव १ ६५ वक्त्रं निसर्गसुरभि २ २०३ शयनीये परावृश्य ३ 3९६ शशीत्युत्पेच्य तन्वद्गि Y rm वक्रा: स्वभावमधुरा २ वनान्यमूनि न गृहा २४९ शसत्प्रहार दढ़ता २ ३-६ वर्णनामेकरूपत्वं २ वर्णानां न्यूनताधिक्ये १६६ शुक्क: श्वेताचिंषो वृद्धै २ वर्णावृत्तिरनुप्रासः ५५ शैशियंमभ्युपेत्यैव २ ३०६ वद्धते सह पान्थानां २ ३५३ शोरसेनी च गौडी च 5 वशगतभ्रगलद्ूर्म २ श्यामला: प्रावृषेण्य।: २

वस्तु किश्विदभिप्रेत्य श्रव्यहंसगिरे वर्षाः ३ २ २०५ 1.८

वस्तु किञ्चिदुपन्यस्य २ १८८ श्री दीपिह्वीकी र्ती 3 ८६

वहत्नपि महीं कुल्खां २ १८८ श्रीमानमानमरवरमसमान ३ ४४

वाक्यार्थेनेव वाक्यार्थ: ४३ श्लाष्यरविशेषणेयुक्क ९

२ e

२९२ ४३ वारणो वारणोद्दामो ३ २ ३१० विकसन्ति कदम्बानि २ १९७ शेष: प्रसाद: समता ४1 विजिताष्मभवदवेषि ३ १२० श्लेष: सर्वासु पुष्णाति २ ३६३

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३०२ काव्यादर्श:

परि० शोक परि० श्ोक २ ९२० मया मयालम्बकला ४८

२ ५८ मय्येवास्या मुखश्री २ २३ प्रतीयमानशौकल्यादि 2 १९५ २ २१५ प्रग्यासाणया हेतुन् २ १३८ महाराष्ट्रीश्रयां भाषां 9 ३४ प्रभावनो नाम न वासवस्य 3 महीमृदभूरिकटक २ ३२१ प्रमेयोऽप्यप्रमेयोसि ३ १८४ मही महावराहेण ७४ प्रवृत्तेव प्रयामीति २९९ २ १५३. मानमस्या निराक्त्त २

प्रसादवत् प्रसिद्धार्थ मानयोग्यां करोमीति ४५ २ ३४३

प्रसिद्ध हेतुव्यावृध्या १९९ मानिनी मा निनीषुस्ते ९६ n 80 माकप्रीतिर्दशिता सेयं २८१ मानेन मानेन सखि ३ २ प्रागभावादिरपस्य २५२ मानेष्ये इह शीर्येते ३ ९६१ २ प्रावृषेण्यैजंलधरैः ३३५ मिश्राणि नाटकादीनि ३१ २ मुखचन्द्रस्य चन्द्रर्वं २ प्राहुग्धंभ्रमं नाम ९१ ३ ९३ 2 २३७ मुखपङ्कजरङ्रडस्मिन् २

२ प्रेयः प्रियतराखयानं मुखादित्वं निवर्यैवं ९५ २ २९५ मुखेन्दुरपि ते चण्डि २ व-बध्नन्ङ्गेषु रोमाञ्ञं ९२ 2 १९ २ १५५ १४७ मुग्धा कान्तस्य यात्रोक्ति मुदा रमणमन्वीत 3 ३० विभत्ति भूमेरवलयं ३ मृगेक्षणाङ़ं ते वक्त्रं २ ३५ ३१ मृणालबाहुरम्भोरु २ ३३१ भ-भगवन्ती जगन्नेन्रे २ १७२ भगिनी भगवत्यादि मृनेति प्रेत्य संगन्तु २ २८० मेघनादेन हंमानां ३ ५ भनाहशा नाथ न जानते 3 ४२ भवानिव महीपाल मण्डलीकृत्य बर्हाणि २ ५३ भाविकन्वमिति प्राहु: य-यच्च सन्ध्यङ्गवृत्यङ्ग २ ३६७ २ ३६४ ३४६ यत्नाव्षेप: सयल्रस्य २ भुजङ्गभोगसंसक्ता १४८ यत्र: संबन्धविज्ञान ३ म-मज्जरीकृत्य वर्माम्भः १४६ २ ७२ Ymmnr यथाकथञ्चित् सादश्यं ४९ 5 मताधुनानारमतामकामता 3 २ मदनो मदिराक्षीणा २३२ 3 ७९ यथेन्दुरिव ते वक्त्रम् यदपीतादिजन्यं स्यात् २ मदपाटलगण्डेन २०२ २४ मदरक्तकपोलेन यदि किश्विद भवेत् पद्मं ८० २

मधुपानकलात् कण्ठा १७६ यदि निन्दन्निव स्तौति २ ३४३ २ मधुशा रागवर्धिन्य: २ ३१७ यदि लेशनमेवेषं २ २२९

मधुरेण हशां मानं २० यदि सत्येव यात्रा ते २ ९४३

मधुरं मधुरमभोज २ ३३१ 3 यमः कुबेरो वरुण: मधुरं रसवद्धाचि १ यया कयाचिच्छ्त्या ५२

मध्यन्दिनाकसन्तप्तः २ २२२ यशश्च ते दिष्ठ रजश्न ३ ६० मनोरथप्रियालोक ३ १४० यस्या: कुसुमशय्यापि २ २८६

मनोभव तवानीकं ३ ८१ याति चन्द्रांशुभि: स्पृष्टा २ ३५०

मन्दानिलेन चलता ३ १६० यानमानयमारावि ३ ७६ मन्दो गन्धवहः चारो २ १०४ यामताश कृतायासा ३ R6. मन्ये शक्े ध्रुवं प्रायो २ २३४ यामतामम्रयाधीन ३ ३६

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श्रोकानुक्रमणिका ३०३

परि० श्रोक परि० श्रोक युवेष गुणवान् राजा २७९ विनायकेन मवता ३ ६८

योगमालात्मिका नाम ३ १०५ विप्रलमभेविवा हैश्र यो लिम्पर्यमुना तुल्यं २ २३१ विरुद्धानां पदार्थानां य: स्वरस्थानवर्णानां 3 विरोध: सकलोप्येप: ३ र-रसभित्तिषु संक्रान्त २ ३०२ विवसाया विशेषस्य २ १४ रमणी रमणीया मे 3 १८ विववितगुणोत्कृष्टै २ ३३० रवेण भौमो ध्वजवर्ततिवीरव ३ ४७ विशदा विशदामत्त ३ १४ रागमादशयश्लेष २ ३१८ विशेषणसमग्रस्य २ ८२ राज्ञां हस्तारविन्दानि विशेष्य मात्रभिन्नापि २ २०८ राजकन्यानुरक्तं मां २ २६६ चिश्वव्यापी विशेषस्थः २ ९७० राजन्वर्य: प्रजा जाता 3 ६ विषमं विषमन्वेति ३ १५ राजितै राजितद्ण्येन ३ ९० विष्णुना विक्रमस्थेन २ 905 राजीवमिव ते वक्त्रम् २ १६ वीरशृङ्गारयोर्भावी 950 रूढमूल: फलभरैः २ २०९ वीर्यवंशश्रुतादीनि . २२ ७९ वीर्योत्कर्पस्तुतिर्निन्दै २ २ 9० रे रे रोरुरुरूरोरु 3 ९२ २ ३६६ गेषाक्षेपोडयम २ १५४ व्युस्क्रान्तातिव्यवहित ३ ल-लास्यच्छलितशम्पादि ३९ ३ 1८७ लिम्पतीव तमोङ्गानि २२६ व्युत्पन्नमिति गौडीये: १ ४६ लिग्पतीव तमोङ्गानि २ ३६२ श-शतपत्रं शरचन्द्र २ लीलास्मितेन शुचिना ४३ शब्दही नमनालदय ३ १४८ लुप्ते पदान्ते शिष्टस्य ३ ३ लेशो लेशेन निर्भिन्न शब्दार्था लडिक्रया: २ २६५ शब्दोपात्ते प्रतीते वा २ लोकातीव इवात्यथ ८९ शब्दोपादानसादृश्यं २ व-वक्त्रं चापरवक्त्र च १ २६ शब्देऽपि ग्राम्यतास्त्येव ६५ वक्त्रं निसर्गसुरभि २ २०३ शयनीये परावृत्त्य वक्रा: स्वभावमधुरा शशीर्युत्प्रेच्य तन्वङ्गि २ वनान्यमूनि न गृहा २ २४९ शासत्रप्रहारं दढ़ता २ ३-६ वर्णनामेकरूपत्वं ७८ २ वर्णानां न्यूनताधिक्ये १६६ शुक्क: श्वेताचिषो वृदधधै २ ५५ शैशियंमभ्युपेत्यैव २ ३०६ वद्धते सह पान्थानां २ ३५३ शोरसेनी च गौडी च 5 वशगतभ्रगलदूर्म २ ७३ श्यामला: प्रावृषेण्या: २

वस्तु किश्निदभिप्रेश्य श्रव्यहंसगिरो वर्षाः २ २०५ ३ 1.6

वस्तु किक्विदुपन्यस्य १८८ ३ ८६ वहसपि महीं कृस्खां २ १८८ श्रीमानमानमरवरमसमान ३ ४४ वाक्यार्थेनैव वाक्यार्थः ४३ शलाध्यविशेषणेयुक्क 2 वाच्यस्याग्राग्यतायोनि २ २९२ ४३ वारणो वारणोददामो ३ लिष्टमिश्ट्मनेकार्थ २ ३१० विकसन्ति कदम्बानि २ १७ लेष: प्रसाद: समता १ ४१ ३ १२० श्लेष: सर्वासु पुष्णाति २ ३६३

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३०४ काव्यादर्श

परि० श्रोक। परि० श्रोक श्रांकेषु नियतस्थानं ३ १५२ सुखं जीवन्ति हरिणा २ २४१

म-म एष कारणासेप: १३२ सुन्दरी सा ममेतेप ९५९

म पुप श्लेष रूपत्वात १८६ सुरजिनहियो यूनां ३२

मकलापोल्वसनयो २२ सुरा: सुरालये स्वेरं ६७ सूरि: सुरासुरामारसार: ९४ לו. सकदिदखिश्व योड्भ्यासः सतातिग्यति रेकोऽयभ् १९८ सेय मप्रस्तुतैवात्र मन्यं ब्रनीमि न त्वां मां १२. सैषा हेतुविशेषोकि LY मत्यमेवाह सुयगाः १७५ मोमः सूर्यो मरुद्भूमि २ .17 सोय भविप्रदाच्तेप: २ כד. मन्नाहिनो मानमराजसेन ६६ मभासु राजन्रसुराहने 2० संख्याता नाम संख्यातं

मनासुराणामबला संगनानि मृगक्षीणां

समानया समानया संगमय्य मखी यूना

समानरूपा गौणार्था संदध्यमकस्थानं 3 ५१

ममानशब्दोपन्यस्न १-३ संस्कृतं नाम देवी वाग 5.3

समासश्न बहुव्ीहि: ६१ संस्कृतं सर्गबन्धादि स्तनयोजंघनस्यापि स्त्रीणां संगी विधिमय २१ स्नीव गच्छति पण्ढोडयं ५२ समुद्दायार्थशून्यं यत् १२: ससुद: नायते देवे: स्थितिनिर्माणसंहार १२९ नमं बन्घेष्वविषमं स्थितिमानपि धीरोऽपि २ 9 ४७ स्थिरायते यतेन्द्रिया सरूपशब्दवाच्यत्वात् २ २९ स्नातुं पातुं बिसान्यत्तं २ २२३ सर्गबन्धो महाकाव्यं १४ सर्वत्र भिन्नवृत्तान्ते: स्मरानली मानववर्धितो य: ३ स्मरः खरः खलः कान्तः सर्वपद्यप्रभासारः २ ३८ स्मितपुष्पोज्ज्वलं लोल २ २ ५२४ स्वभावाख्यानसुपमा ४ सह दीर्घा मम श्वासं ३५२ स्वयमेव गलम्मान ३ २३ In महया सगजा सेना १२३ ह-हन्यने सा वरारेहा १३८ साहिप्ये विरह नाथ १५१ हरत्याभोगमाशानां महोक्ति: परिवृत्याशी: हरिपाद: शिरोलप ८5 महांकि: सहभावस्य २ हेतुनिवर्त्तनीयस्य २ ५४६ हेतुश्च सूष्मलेशी च २ २३५ सा दिनामयमायामा ७७ हंसीव धवलश्रन्द्र: सा, नामान्तरितामिश्रा हतद्रव्यं नरं व्यकन्व: 12 सा नामान्तरिता यस्यां हदगन्धवहास्तुङ्गा २ ९९३

सा भवेदुभयचछन्जा १०५ २ १४९

सामायामा माया मासा ३ ८७ व्िणोतु कामं शीतांशु: २ १७८ मारयन्तमुरसा रमयन्ती ४५ च्वितिविजितिस्थिति सालं सालम्बकलिका ३ ३४ ज-शेय: सोऽर्यान्तरन्यास: २ १६९