1. Kavya Prakasa Hindi Tika Vishveshavara Siddhanta Shiromani Ed. Nagendra
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य काव्य प्रकाश
आचार्य विश्वेश्वर
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ग्रन्थ-परिचय
'काव्यप्रकाश' की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सूत्रशैली और विषयबाहुल्य है। भरतमुनिसे लेकर भोजराजतक लगभग १२०० वर्षोंमें अलङ्कारशास्त्रके विषयमें जिस विशाल साहित्यका निर्माण हुआ उसका सम्पूर्ण सारतत्व 'काव्यप्रकाश' है। पूर्ववर्ती आचार्योंके ग्रन्थोंमें विषयप्रतिपादनकी दृष्टिसे जो न्यूनता या त्रुटियाँ रह गयी थीं, आचार्य मम्मटने उन सबको दूर करनेमें पूर्ण सफलता प्राप्त की है। फलतः इस ग्रन्थमें शक्ति, ध्वनि, रस, गुण, दोष, अलङ्कार आदि समग्र तत्वोंका यथार्थ मूल्याङ्कन हो सका है। यह साहित्यशास्त्रका अत्यन्न प्रोढ़ प्रसिद्ध एवं महान् ग्रन्थ है। इसमें प्राचीन मतोंकी आलोचना है और पद-पदपर दार्शनिक ग्रन्थियाँ उलझी हुई हैं। यही कारण है कि पचासों टोकाओंके बाद भी इसकी दुरूहता बनी हुई है। आचार्य विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि दार्शनिक ग्रन्थियोंको सुलझानेमें सिद्धहस्त हैं। अतः उनके द्वारा प्रस्तुत यह हिन्दी व्याख्या 'काव्यप्रकाश' का अध्ययन-अध्यापन करनेवालोंके लिए निश्चय ही वरदान-रूप सिद्ध होगी। ९६ पृष्ठोंकी दिस्तृत भूमिकामें आदिकालसे लेकर अबतकके साहित्यशास्त्रका सारा इतिहास सुन्दर रूपमें दिया गया है। मूल्य : १६०.००
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काव्यप्रकाश:
आचार्य विश्वेश्वर
ज्ञानमण्डल लिमिटेड विकरमभवन, बी० ३०/५ ए, लंका, वाराणसी-२२१००५
मूल्य : १६०) रुपया
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काव्यप्रकाश:
प्रचित
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ज्ञानमण्डल-ग्रन्थमालाका ९२वाँ ग्रन्थ
काव्यप्रकाशः
[श्रीमम्मटाचार्यविरचित काव्यप्रकाशकी हिन्दी व्याख्या]
व्याख्याकार स्व० आचार्य विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि
सम्पादक डॉ० नरेन्द्र, एम. ए., डी. लिट्.
वाराणसी ज्ञानमण्डल लिमिटेड
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मूल्य : एक सौ साठ रुपये
प्रथम संस्करण, भाद्रपद, संवत् २०१७ वि० द्वितीय संस्करण, आश्विन, संवत् २०१८ वि० तृतीय संस्करण, श्रावण, संवत् २०२४ वि० o चतुर्थ संस्करण, श्रावण, संवत् २०२७ बि०5गग] पंचम संस्करण, श्रावण, संवत् २०३१ वि० षष्टम संस्करण, संवत् २०४२ वि० संस्करण १९९८
महापाड
C ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी, १९६० प्रकाशक-ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी मुद्रक-ज्ञानमण्डल लिमिटेड, सन्त कबीर रोड, वाराणसी, २२१ ००१
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विषयसूची
प्रथम उल्लास
[काव्य-प्रयोजन-कारण-स्वरूपनिर्णय]
विषय पष्ठ विषय TEP पष्ठ भूमिका १-६६ समाधान काफ्री ग्रन्थकार 9 विश्वनाथकी भावनाक5IH.I n २० कारिका तथा वृत्तिकर्ताका अ्रभेद अदोषौ पदकी आलोचना २१ साहित्यमीमांसाका विवेचन ३ समाधान २२ ग्रन्थका लक्षण ४ सगणौ पदकी आलोचना २२ मङ्गलाचरण रसगङ्गाधरकारकृत आलोचना 5२३ कविसृष्टिकी विशेषताएँ ५ू नागेशभट्टकृत पण्डितराजकी प्रत्यालोचना २३ अनुबन्धचतुष्टय भामहका काव्य-लक्षण काव्यके प्रयोजन १० दण्डीका काव्य-लक्षण २५ उपदेशकी त्रिविध शैली ११ वामनका काव्य-लक्षण एक कि कलाहग २६
मयूरभट्टका उपाख्यान १३ आनन्दवधनका मत वामनाभिमत काव्यके प्रयोजनका १४ राजशखरका मत क २६ भामह-प्रतिपादित काव्यप्रयोजन १४ कुन्तकका काव्य-लक्षण २७ कुन्तक-प्रतिपादित काव्यप्रयोजन १५ क्षेमेन्द्रका मत २७ कवि तथा पाठककी दृष्टिसे प्रयोजन-विभाग १६ विश्वनाथका काव्य-लक्षण २७ भरतमुनिके काव्यप्रयोजन १६ काव्यभेद :१. ध्वनिकाव्य २८ काव्यके हेतु १७ ध्वनि नामका मूल आधार २६ वामन-प्रतिपादित काव्यके हेतु १८ स्फोटवाद २६ भामह-प्रतिपादित काव्य-हेतु १८ २. गुणीभूतव्यङ्गय-काव्य ip ३१
मम्मटका काव्य-लक्षण १८ ३. चित्र-काव्य ३२
उदाहरणकी विश्वनाथकृत आलोचना २० सारांश 2श ३३
द्वितीय उल्लास [शब्दार्थ-स्वरूप-निर्णय] उल्लासस ङ्गति ३४ अभिहितान्वयवाद ही ३५ शब्दके तीन भेद ३४ अन्विताभिधानवाद ३७ अर्थके तीन भेद ३५ प्रभाकरका परिचय ३७ अर्थका चतुर्थ भेद 'तात्पर्यार्थ' ३५ प्रभाकरको 'गुरु'की उपाधि ३८
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विषय पृष्ठ विषय पष्ठ तौतातिक-मत ३६ शुद्धा तथा गौणी लक्षणाविषयक मम्मटमत ५० तीन अर्थोंका व्यञ्जकत्व ३६ शुद्धा तथा गौणोविषयक मुकुलभट्टका मत ६० वाचक शब्दका स्वरूप ४२ मुकुलभट्टके 'ताटस्थ्य'-सिद्धान्तका निराकरण ६१ सङ्कतग्रहके उपाय" ४२ शुद्धा तथा गौणी लक्षणाके दो-दो भेद ६१ सङ्कतग्रहका विषय ४३ सारोपा साध्यवसानाके शुद्धा, गौणी दो भेद ६२ उपाधिभेद द्वारा शब्दोंका चतुर्विध विभाग ४४ गौणी सारोपा साध्यवसानाके उदाहरण ६२ परम-अणु-परिमाणकी गुणोंमें गणना ४४ गौणी साध्यवसानाविषयक तीन मत ६२ गुणशब्दादिमें दोषशङ्का व उसका निराकरण ४६ 'स्वीयाः' शब्दकी व्याख्याका विवेचन ६३ केवल 'जाति' में शक्ति माननेवाला मीमांसक- शुद्धा सारोपा-साध्यवसाना लक्षणाके उदाहरण ६५ मत ४७ षड्विधा लक्षणाका रहस्य ६६ यदृच्छा शब्दोंमें जातिका उपादान ४८ साहित्यदर्पणमें लक्षणाके सोलह भेद ६७ संकेतग्रहविषयक नैयायिक-मत ४६ लक्षणासे लक्षणामूला व्यञ्जनाकी ओर ६७ बौद्धमत ४६ प्रयोजन-प्रतीतिमें व्यञ्जनाकी अपरिहार्यता ६६ अम्मटका सिद्धान्तमत ५० प्रयोजनकी वाच्यताका निराकरण ७० अभिधालक्षण ५० प्रयोजनकी लक्ष्यताका निराकरण ७१ लक्षणानिरूपण ५१ लक्षणाके हेतुओंका अभाव ७१ । मुख्यार्थबाधके दो रूप ५२ प्रयोजनविशिष्टमें लक्षणाका निराकरण ७४ लक्षणाके दो उदाहरण न्यायका अनुव्यवसाय-सिद्धान्त ७४ 1/ लक्षणाके दो भेद ५३ मीमांसकोंका ज्ञातता-सिद्धान्त ७५ उपादान लक्षणाके दो उदाहरण ५४ अनुव्यवसाय और ज्ञातताका भेद ७५ मुकुलभट्टके उपादान-लक्षणाके दो उदाहरण ५४ अभिधामूला (व्यञ्जना) ७७ मुकुलभट्टके प्रथम उदाहरणका खण्डन ५५ एकार्थ-नियामक हेतु ७७ मुकुलभट्टके दूसरे उदाहरणका खण्डन ५६ संयोग और विप्रयोगकी नियामकता ७८ अर्थापत्ति लक्षणा नहीं ५७ साहचर्य-विरोधकी नियामकता ७८ लक्षणलक्षणाका उदाहरण ५७ अर्थ-प्रकरणकी नियामकता ७८ 'गङ्गायां घोषः' उदाहरणका विश्लेषण ५८ स्वरभेदका प्रभाव ७8 न्यायमें लक्षणलक्षणाका उदाहरण ५८ सङ्कतकी नियामकता लक्षणलक्षणाका अधिक स्पष्ट उदाहरण ५६ शाब्दी-व्यञ्जनामें अर्थका सहयोग ८१
तृतीय उल्लास [अर्थव्यअ्ञकता-निर्णय] उल्लाससङ्गति ८२ बोद्धाके वैशिष्टयमें व्यञ्जना ८३ अर्थके भेद ८२ काकुके वैशिष्टयमें व्यञ्जना ८४ आर्थी व्यञ्जनाके भेद ८२ काक्वाक्षिप्तकी ध्वनिरूपतामें शङ्का-समाधान ८४ वक्ताके वैशिष्टयमें व्यञ्जना ८२ वाच्यवैशिष्टयमें व्यञ्जनाका उदाहरण ८५
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विषय पष्ठ विषय पष्ठ
वाच्यवैशिष्टयमें व्यञ्जनाका उदाहरण ८६ देशके वैशिष्टयमें व्यञ्जना वाक्य और वाच्यवैशिष्टयका अन्तर ८६ कालके वैशिष्टयमें व्यञ्जना दोनोंका एक हिन्दी उदाहरण ८६ आदि पदसे ग्राह्य चेष्टाकी व्यञ्जकता अन्यसन्निधिके वैशिष्टयमें व्यञ्जना ८७ 'अधिक उदाहरण देनेका कारण प्रस्तावके वैशिष्टयमें व्यञ्जना ८७ आर्थी-व्यञ्जनामें शब्दका सहयोग सारांश चतुर्थ उल्लास [ध्वनि-निर्णय]
उल्लासस ङ्गति अलौकिकताकी दूसरी युक्ति ११०
विगतका स्मरण अलौकिकताकी तीसरी युक्ति १११ अविवक्षितवाच्य लक्षणामूलध्वनिके दो भेद सूत्रमें विभावादिका सम्मिलित निर्देश ११३
अर्थान्तरसंक्रमितवाच्यका उदाहरण विभावादिके अनुक्त होनेपर आरक्षेप अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यध्वनिका उदाहरण हर द्वारा बोध ११३ विवक्षितवाच्य या अ्भिधामूल-ध्वनिके भेद ६३ रसोंका विशेष क्रम ११५
अलक्ष्यक्मव्यङ्गय रसादि-ध्वनि शान्तरसकी स्थिति ११६
रस-निरूपण भक्तिरस ११८
मनोविज्ञान और स्थायिभाव ह६ वात्सल्यरस ११६
मनःसंवेगों और स्थायिभावोंका मूलरस ११६ तुलनात्मक चित्र ६७ एकरसवाद १२० चार मौलिक रसोंका सिद्धान्त ६७ रसोंकी सुख-दुःखरूपता १२०
विभाव शृङ्गाररस और उसके भेद १२१
अनुभाव हास्यरसका उदाहरण १२६
स्थायिभाव और उनके अनुभावोंका चित्र करुणरसका उदाहरण १२७
व्यभिचारिभाव करुण तथा विप्रलम्मशृङ्गारका भेद १२८
भरतमुनिका रससूत्र १०० रौद्ररसका उदाहरण १३०
भट्टलोल्लटका उत्पत्तिवाद १०१ वीररसका उदाहरण १३१
भट्टलोल्लटके मतकी न्यूनता १०२ भयानकरसका उदाहरण १३२
श्रीशङकुकका अनुमितिवाद १०३ बीभत्सरसका उदाहरण १३३
'एवकारस्त्रिधा मतः, १०४ हास्य तथा जुगुप्साका आश्रय १३३
श्रीशङकुकके मतकी न्यूनता १०५ अद्भुतरसका उदाहरण १३४
भट्टनायकका भुक्तिवाद १०५ रसगङ्गाधरकारका मतभेद १३४
भट्टनायकके मतकी न्यूनता १०७ स्थायिभाव १३५ अभिनवगुप्तका अभिव्यक्तिवाद १०७ व्यभिचारिभाव १३६ रसकी अलौकिकताकी सिद्धि १०६ व्यभिचारिभावोंके लक्षण १३६
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विषय पृष्ठ विषय ThNFE पष्ठ शान्तरसका उदाहरण १३८ अठारह ध्वनिभेदोंका विस्तार पदद्योत्य लक्षणामूल ध्वनिके १७ उदाहरण १६३ १६२ भावका लक्षण १३६ रसाभास, भावाभासोंका वर्णन १४१ पदद्योत्य अभिधामूल असंलक्ष्य कमध्वनिके भावशान्ति आदि चार १४३ दो उदाहरण १६४ भावशान्तिका उदाहरण १४३ पदद्योत्य संलक्ष्यक्रम शब्दशक्त्युत्थ भावोदयका उदाहरण १४३ ध्वनिके दो उदाहरण १६६ भावसन्धिका उदाहरण १४४ पदद्योत्य संलक्ष्यक्रम अर्थशक्त्युत्थ भावशबलताका उदाहरण १४४ स्वतःसम्भवी ध्वनिके चार उदाहरण १६७ ध्वन्यालोककारका दृष्टिकोण १४५ अर्थशक्त्युत्थ कविप्रौढोक्तिसिद्ध भावस्थिति १४६ पदद्योत्य ध्वनिका उदाहरण १६६ रसवदलड्कार १४६ कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध पदद्योत्य संलक्ष्यक्रमव्यङ्गयध्वनि १४६ ध्वनिके चार उदाहरण १७१ शब्दशक्त्युत्थ ध्वनिके दो भेद १४७ अर्थशकत्युत्थ ध्वनिके प्रबन्धगत उपमालङ्कारध्वनिका उदाहरण १४७ बारह भेद १७५ शब्दशक्युत्थ व्यतिरेकालङ्कारध्वनि १४६ आ्धारभेदसे रसादि-ध्वनिके चार भेद १७६ वस्तुध्वनिक दो उदाहरण १५० धातुरूप प्रकृति द्वारा रसकी व्यञ्जकता १७६ अर्थशक्त्युत्थ ध्वनिके बारह भेद १५१ प्रातिपदिक द्वारा रसकी व्यञ्जकता १७७ स्वतःसम्भवीके चार उदाहरण १५३ प्रत्ययांश द्वारा सम्भोगशृङ्गारकी वस्तुसे वस्तुव्यङ्गय १५३ व्यञ्जकता १७८ स्वतःसम्भवी : वस्तुसे अलङ्कारव्यङ्गय १५३ प्रत्ययांश द्वारा विप्रलम्भशृङ्गारकी स्वतःसम्भवी : अलङ्कारसे वस्तुव्यङ्गय १५४ व्यञ्जना १७६ स्वतःसम्भवी : अलङ्गारसे अलङ्कारव्यङ्गय १५४ प्रत्ययांश द्वारा रौद्ररसकी अभिव्यक्ति १८० प्रदीपकारकी व्याख्या १५५ कविप्रौढोक्तिसिद्ध : वस्तुसे वस्तुव्यङ्गय वचनकी व्यञ्जकताका उदाहरण १८० १५६ विभक्तिकी व्यञ्जकताका उदाहरण कविप्रौढ़ोक्तिसिद्ध : वस्तुसे अलङ्गारव्यङ्गय १५७ १८२ उपसर्गकी व्यञ्जकता कविप्रौढ़ोक्तिसिद्ध:अलङ्गारसे वस्तुव्यङ्गय १५८ १८३ निपातकी व्यञ्जकता कविप्रौढोक्तिसिद्ध : अलङ्गारसे १८३ त्रनेक प्रत्ययांशोंकी वीररसव्यञ्जकता अलड्कारव्यङ्गय १५८ १८४
कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध : अ्नेक प्रत्ययांशोंकी शृङ्गारव्यञ्जकता १८४
FEP वस्तुसे वस्तुव्यङ्गय ध्वनिभेदोंका उपसंहार १५६ १८६
वस्तुसे अलङ्कारव्यङ्गय ध्वनिभेदोंका सङ्कर तथा संसृष्टि १५६ १८६ अलङ्कारसे वस्तुव्यङ्गय १६० लोचनकारके अनुसार ध्वनिके ३५ अलङ्कारसे अलङ्कारव्यङ्गय १६० भेदोंकी गणना उभयशक्त्युत्थध्वनिका एक भेद ध्वनिके अठारह मुख्य भेद १६१ लोचन तथा काव्यप्रकाशकारक १६१ भेदोंकी तुलना रसादि असंलक्ष्यक्रम ध्वनिका एक ही भेद १६२ संसृष्टि तथा सङ्करभेदसे लोचनकारकी गणना १८६
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विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ
लोचनकी एक और चिन्त्य गणना गुणनप्रक्रिया १६१
काव्यप्रकाश तथा साहित्यदर्पणकी गणना- सङ्कलनप्रक्रियाहए ककि हशी शच।
का भेद १६१ सङ्कलनकी लघुप्रक्रिया ग १६२
संख्याभेदका कारण १६१ काव्यप्रकाशकी द्विविधशैली १६३
पञ्चम उल्लास [ध्चनिगुणीभूतव्यङ्गयसङ्कीण-भेदनिर्णय]
उल्लासस ङ्रात १६६ गुणीभूतव्यङ्गयकाव्यके भेदोंका विस्तार २११
गुणोभूतव्यङ्गयक शरपराठ भेद १६६ ध्वनिकाव्यके ५१ भेद २१२
व्यङ्ग्यका चमत्कार कहाँ १६६ गुणीभूतव्य ङ्गयके ४२ भेद २१३
अ्रगूढ़ व्यङ्गयका दूसरा उदाहरण १६८ संसृप्टि औौर सङ्कर २१३
अगूढ़ व्यङ्गयका तीसरा उदाहरण १६८ सङ्कर-संसृप्टि आररादि सहित गणना अपराङ्ग-रूप गुणोभूतव्य ङ्गयके श्ररठ FIGITNP संसृष्टि-संकरसे भेदोंका विस्तार Tस २१४
उदाहरण १६६ सुधासागरकारका मत ए२१५
प्रथम उदाहरण १६६ सुधासागरकारकी भूल TTHR २१५
द्वितोय उदाहरण ४२ भेदोंका गुणनप्रक्रियासे विस्तार २१५
तृतीय उदाहरण सङ्कलनप्रक्रियासे विस्तार २१६
चतुर्थ उदाहरण २०१ व्यञ्जनाकी अपरिहार्यता २१६
पञ्चम उदाहरण २०२ रसप्रतीतिके लिए व्यञ्जना अनिवार्य २१७
षष्ठ उदाहरण २०२ लक्षणामूल ध्वनिमें व्यञ्जना अनिवार्य २१७
सप्तम उदाहरण २०२ अभिधामल शब्दशक्त्युत्थध्वनिमें व्यञ्जना
अष्टम उदाहरण २०३ अनिवार्य २१८
रसवदादि अलङ्कार अभिधामूल अर्थशक्त्युत्थध्वनिमें
प्राधान्यन व्यपदेश २०५ व्यञ्जनाकी अनिवार्यता २१८
शब्दशक्तिमूल अलङ्गारध्वनिकी अन्विताभिधानवादमें व्यञ्जना २२०
वाच्याङ्गताका उदाहरण २०६ सङ्कतग्रहका आ्धार २२१
अर्थशक्तिमूल वस्तुध्वनिकी वाच्याङ्गता- अन्विताभिधानवादका उपपादन २२३
का उदाहरण २०६ अन्विताभिधानवादमें व्यञ्जनाकी
वाच्याङ्गऔर वाच्यासिद्धयङ्ग व्यङ्ग्यका भेद२०७ अपरिहार्यता २२४
वाच्यसिद्धयङ्ग-व्यङ्गयके दो उदाहरण २०८ विशेषान्वितमें शक्तिग्रहका उपपादन २२५
अस्फुट व्यङ्गयका उदाहरण २०६ अभिहितान्वयवाद तथा अन्विताभि-
सन्दिग्धप्राधान्यका उदाहरण २०६ धानवादकी समानता २२७
तुल्यप्राधान्य गुणीभूतव्यङ्गयका उदाहरण २१० मीमांसकके एकदेशीका व्यञ्जनाविरोधी
काक्वाक्षिप्त व्यङ्गयका उदाहरण पूर्वपक्ष २२८ २१० व्यञ्जनावादीकी ओरसे उसका खण्डन २२८ असुन्दर व्यङ्गयका उदाहरण २११ भट्टलोल्लटका पूर्वपक्ष २२६
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विषय पृष्ठ विषय पष्ठ भट्टलोल्लटके मतका खण्डन २३० वाच्य और व्यङ्गचके भेदसाधक सात 'मूर्ख' अर्थमें 'देवानां प्रिय का प्रयोग २३१ और कारण २४४ 'भूतं भव्याय' २३१ 'लोहितोष्णीषाः' अतात्पर्यविषयीभूत अर्थकी व्यङ्गयता २४५ २३२ व्यङ्गयार्थकी लक्षणागम्यताका निषेध २४८ द्रव्यकी गौण साध्यता २३३ लक्ष्यार्थसे व्यङ्गयार्थका प्रथम भेद २४६ उपात्त शब्दके अर्थमें हो तात्पर्य : व्यञ्जना- लक्ष्यार्थसे व्यङ्गयार्थका द्वितीय भेद २५० वादी पक्ष २३४- लक्ष्यार्थसे व्यङ्गयार्थका तीसरा भेद २५१ 'विषं भक्षय' में तात्पर्यनिर्णय २३६ चौथा भेद : लक्षणा अभिधाको पुच्छभूता २५१ बलाबलाधिकरण २३७ लक्ष्यार्थसे व्यङ्गर्यार्थके चार और भेद २५१ श्रुतिप्रमाण २३८ पूर्वोक्त नियत-अ्नियतसम्बन्धके तीन लिङ्गप्रमाणु २३६ उदाहरण २५२ वाक्यप्रमाण २३६ परम्परित सम्बन्धका उदाहरण २५३ प्रकरणप्रमाण २३६ लक्षणासे भिन्न व्यञ्जनासाधक युक्तियोंका स्थानप्रमाण २४० सारांश २५३ समाख्याप्रमाण २४० व्यञ्जनाका आग्रह क्यों नित्यानित्यदोषव्यवस्थासे भी व्यञ्जनाकी 'एका क्रिया द्वयर्थकरी प्रसिद्धा' २५४ सिद्धि २४० गुणव्यव्रस्थाके द्वारा व्यञ्जनाकी सिद्धि २४१ वेदान्तियोंका अखण्डार्थतावाद २५५
संख्याभेदसे वाच्य-व्यङ्गयका भेद वैयाकरणोंका अखण्डार्थतावाद २५६ स्वरूपभेदसे वाच्य-व्यङ्गयभेदके तीन नैयायिक महिमभट्टका मत २५७ उदाहरण २४३ महिमभट्टके अरनुमानका खण्डन २६०
षष्ठ उल्लास
[शब्दार्थचित्र-निरूपण]
उल्लाससङ्गति २६३
सप्तम उल्लास
[दोषदर्शन] उल्लाससङ्गति २६५ वाक्यगत अश्लीलत्व २८३ दोषसामान्य लक्षण २६६ वाक्यगत सन्दिग्धत्व श्रुतिकटु आदि पदगत १६ दोष २८४
और उनके उदाहरण वाक्यगत अप्रतीतत्व २६६-२८० २८५ वाक्यगत ग्राम्यत्व दोष वाक्यगत श्रुतिकटु २८५ २८१ वाक्यगत अप्रयुक्तत्व वाक्यगत नेयार्थता दोष २८१ २८६ वाक्यगत निहतार्थता २८१ वाक्यगत क्लिष्टता दोष २८६ वाक्यगत अनुचितार्थत्व २८२ वाक्यगत अविमृष्टविधेयांश २८६ वाक्यगत अवाचकत्व २८३ अविमृष्टविधेयांशका तीसरा रूप २८७
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विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ प्रकान्त अर्थमें तत् शब्दका प्रयोग २८६ प्रसिद्धार्थमें तत् शब्दका प्रयोग २३ अर्थदोष २८६ अनुभूतार्थमें तत् शब्दका प्रयोग अपुष्टार्थदोष ३२६
२८६ कष्टार्थदोष ३२७
तत् शब्दके प्रयोगका दूसरा अंपवाद २६० पदांशदोष-श्रुतिकटु व्याहतार्थदोष ३२७ ३२८ २६५ पदांशगत निहतार्थता पुनरुक्तत्व (अर्थदोष) २६६ पदांशगत निरर्थकत्व दुष्कमत्व (पञ्चम अर्थंदोष) २२६ ३२६ २६६ पदांशगत अरवाचकत्व दोष ग्राम्यत्व (अर्थदोष) सन्दिग्धत्व (अर्थदोष) ३३० २६८ पदांशगत अश्लोलत्व निर्हेतुत्व (अर्थदोष) ३३०
पदांशगत संदिग्धत्व २६६ प्रसिद्धिविरुद्धता (अर्थदोप) ३३०
वाक्यगत दोष ३३१ ३०० विद्याविरुद्धता (अर्थदोष) प्रतिकूलवर्णता ३३२ ३०१ अनवोकृतत्व (अर्थदोष) प्रतिकूलवर्णताका प्रत्युदाहरण ३०२ चार प्रकारके परिवृति-दोष ३३३
उपहतविसर्गता ३०३ सनियम-परिवृति (अर्थदोष) ३३४
विसन्धि ३०४ अ्नियम-परिवृति (अर्थदोष) ३३४
अश्लोलताजन्य विसन्धि-दोष विशेष-परिवृति (अर्थदोष) ३३५ ३०५ कष्टताजन्य विसन्धि-दोष अविशेष-परिवृति (अर्थदोष) ३३५ ३०६ साकांक्षता (अर्थदोष) ३३६ हतवृत्तता ३०६ अप्राप्त-गुरुभावान्त लघुरूप हतवृत्तता ३३६ ३०७ अपदयुक्तता ३३७ रसाननुगुण हतवृत्तता ३०८ सहचारभिन्नता ३३८ न्यूनपदता ३०६ प्रकाशितविरुद्धता अधिकपदता विध्ययुक्तता ३३८ ३०६ कथितपदता ३३८ ३१० अनुवादायुक्तता ३४० पतत्प्रकर्यता ३१० समाप्तपुनरात्तत्व ३११ ३५० समाप्तपुनरात्तता अर्थान्तरैकपदता ३११ अश्लीलता ३५१ वाच्यस्यानभिधानं-दोष ३१५ दोषोंकी अनित्यताके उदाहरण ३५१ अस्थानस्थसमासता-दोष ३१७ रसदोषोंके अपवाद ३६५ सङ्कीर्णंता-दोष ३१८ रसविरोधके परिहारार्थ तीन और मार्ग ३७३ गभितता-दोष ३१८ स्मर्यमाण विरोधी रसका विरोध ३७३ प्रसिद्धिविरुद्धता-दोष ३१६ साम्यविवक्षामें विरोधी रसोंका अविरोध ३७४ भग्नप्रक्रमता-दोष ३२० प्रधानभूत तृतीय रसके अङ्गभूत रसोंमें अक्रमता वाक्यदोष ३२५ अविरोध ३७५
अष्टम उल्लास [गुणालङ्कारभेद-निर्णय] उल्लासस ङ्गति ३७८ भट्टोद्दटके मतका खण्डन ३८४ गुण तथा अलङ्गारोंका भेद ३७८ गुणोंके भेद ३८७ वामनका मत ३७८ गुणोंके भेद ३८८ आ्नन्दवधनका मत ३७६ गुणोंका शब्दार्थधर्मत्व औपचारिक ३६० मम्मटाचार्यका मत ३८० वामनोक्त दस शब्दगुणोंका खण्डन ३६०
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विषय पष्ठ विषय पृष्ठ वामनोक्त दस अर्थगुणोंका खण्डन ३६१ गुणानुसारिणी रचनादिके अपवाद ३६५ तीन गुण और उनके व्यञ्जक ३६३
नवम उल्लास [शब्दालङ्कार-निर्णय]
उल्लाससङ्गति ३६६ पदश्लेष ४१७ अलङ्कारका लक्षण ३६६ लिङ्गश्लेष तथा वचनश्लेष ४१७ अलङ्कारोंके विभाजक तत्त्व ४०० भाषाश्लेष ४१८ अलङ्कारोंकी संख्या ४०० प्रकृतिश्लेष ४१६ नज अनुप्रास अल्कार ४०४ प्रत्ययश्लेष ४१६ छेकानुप्रास ४०४ विभक्तिश्लेष ४२० वृत्त्यनुप्रास ४०५ अभङ्गश्लेष ४२१ वृत्त्यनुप्रासमें गुण, वृत्ति, रीति आदिका शब्दश्लेष और अर्थश्लेषका भेद ४२२ समन्वय ४०५ अर्थश्लेषका उदाहरण ४२५ लाटानुप्रास ४०६ श्लेषके साथ अन्य अलङ्कारोंकी प्रधानता ४२५ P६ यमक ४०६ शब्दमात्रका साम्य भी उपमाका प्रयोजक ४२६ सन्दशयमक ४१२ साधारणधर्मशून्य उपमा नहीं ४२७ युग्मयमक ४१२ श्लेषकी स्वतन्त्र स्थितिका उदाहरण ४२८ महायमक ४१२ विरोधाभास भी श्लेषका बाधक ४२६ पादभागावृत्ति 'सन्दष्टक' यमक ४१३ अ र्थापेक्षितासे अर्थालङ्कारत्वाभाव ४३३ आद्यान्तिक यमक ४१३ चित्र अलङ्कार ४३४ केवल उत्तरार्द्धमें समुच्चय ४१४ खङ्गबन्ध ४३४ पूर्वार्द्ध-उत्तरार्द्ध, दोनोंमें समुच्चय ४१४ मुरजबन्ध ४३५ अनियतपादभागवृत्ति यमक ४१५ पद्मबन्ध ४३६ श्लेष ४१५ पुनरुक्तवदाभास ४३८ वर्णश्लेष ४१६
दशम उल्लास [अर्थालङ्कार-निर्णय]
उल्लाससङ्गति ४४० पूर्णा, लुप्ता-दो भेद ४४३ अलङ्कारसंख्यामें मतभेद ४४० पूर्णोपमाके छह भेद ४४३ काव्यप्रकाशके ६१ अर्थालङ्कार ४४१ श्रौती और आर्थी पूर्णोपमाके भेद ४४४ अलङ्कारोंका वर्गीकरण ४४१ वाक्यगा श्रौती तथा आर्थी ४४५ १. उपमा अलङ्कार v ४४२ समासगा श्रौती तथा आर्थी ४४६
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विषय पष्ठ विषय पष्ठ तद्धितगा श्रौती तथा आर्थी ४४७ २७. विनोक्ति अलङ्कार ५०७ अलङ्कारोंमें व्यङ्गयकी चारुता ४४७ २८. परिवृत्ति अल्कार ५०८ लुप्तोपमाके उन्नीस भेद ४४६ २६. भाविक अलङ्कार ५०६ उपमानलुप्ताके दो भेद ४५१ ३०. काव्यलिङ्गालङ्कार ५१० वाचकलुप्ताके छह भेद ४५२ ३१. पर्यायोक्त अलङ्कार ५११ द्विलुप्ताके पाँच भेद ४५४ ३२. उदात्त अलङ्कार ५१४ त्रिलुप्ताका एक भेद ४५६ ३३. समुच्चयालङ्कार ५१५ मालोपमा और रशनोपमाकी स्थिति ४५८ ३४. पर्यायालङ्कार ५१८ २. सादृश्यमूलक अ्र्प्रनन्वयालङ्वार : ४६० ३५. अनुमानालङ्वार ५२१ ३. सादृश्यमूलक उपमेयोपमालङ्वार ४६० ३६. परिकरालङ्कार ५२३ ४. सादृश्यमूलक उत्प्रक्षालङ्कार · ४६० ३७. व्याजोक्ति अलङ्कार ५२४ ५. सादृश्यमूलक ससन्देहालङ्कार ४६२ १G३८. परिसंख्या अलङ्कार ५२५ रूपकालङ्कार. ४६३ ५२८ p er ३६. कारणमालालङ्कार उपमा और रूपकके भेदक धर्म ४६४ ४०. अन्योन्यालङ्कार ५२६ रशनारूपक अनावश्यक ४७० ४१. उत्तर अलङ्कार ५३० ७. अपह्नुति अलङ्कार ४७० ४२. सूक्ष्म अलङ्कार ५३२ ८. (अर्थ) श्लेषालङ्कार ४७३ ४३. सार अलङ्कार ५३३ DuT E. समासोक्ति अलङ्कार ४७४ ४४. असङ्गति अलङ्कार ५३३ रूपक और समासोक्तिका भेद ४७४ ४५. समाधि अलङ्कार ५३४ ०. निदर्शनालङ्कार V ४७४ ४६. सम अलङ्कार ५३५ ४७६ ४७. विषम अलङ्कार ५३५ P७. १२. अतिशयोक्ति अलङ्कार ४८२ ४८. अधिक अलङ्कार ५३८ १३. प्रतिवस्तूपमालङ्कार ४८४ ४६. प्रत्यनीक अ्लङ्कार ५३६
४८६ ५०. मोलित अलङ्कार ५४० ५. दीपकालङ्कार ४८७ ५१. एकावली अलङ्कार ५४१ १६. तुल्ययोगितालङ्वार ४६० ५२. स्मरण अलङ्कार ५४२ ७. व्यतिरेकालड्वारह ४६१२७५३. भ्रान्तिमान् अलङ्कार ५४३ १८. आक्षेपालङ्कार ४६७ ५४. प्रतीप अलङ्कार ५४४ LE. विभावनालड्वार ४६८ ५५. सामान्य अलङ्कार ५४५
२०. विशेषोक्ति अलङ्कार ४६८ ५६. विशेष अलङ्कार ५४८
२१. यथासंख्य अलङ्कार ५७. तद्गुण अलङ्कार ५५०
२२. अर्थान्तरन्यास अलङ्कार ५०० ५८. अतद्गुण अलङ्कार ५५१ २५०२३. विरोधालङ्वार ५०१ ५६. व्याघात अलङ्कार ५५२ ९७२४. स्वभावोक्ति अलङ्कारV ५०५ ६०. संसृष्टि अलङ्कार ५५२ २५. व्याजस्तुति अलङ्कारv ५०५ ६१. सङ्कर अलङ्कार ५५४ २६. सहोक्ति अलक्कार- ५०६ (१) अङ्गा्गिभावसङ्कर ५५४
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विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ रूपकपक्षमें विनिगमक हेतु ५५६ (ग) लिङ्गभेद और वचनभेद ५७१ शब्दालङ्कारोंका अङ्गाङ्गिभाव ५५८ वचनभेदकी अदोषता ५७३ (२) सन्देहसङ्कर (घ) कालभेद और पुरुषभेद ५७४ (३) एकाश्रयानुप्रवेशसङ्कर ५६३ उपमाभेदोंके निराकरणका और एक सुझाव ५७६ शब्दालङ्कार अर्थालङ्कारोंकी व्यवस्था ५६५ इस सुझावपर आपत्ति ५७७ रुय्यकका खण्डन ५६६ इस सुझावका सारांश ५७७ वामनोक्त अलङ्कारदोषोंका खण्डन ५६७ यह प्रकार प्राचीन प्रयोगोंतक (१) अनुप्रासदोषोंका अन्तर्भाव ५७८ ५६७ (ङ) असादृश्य तथा असम्भव ५७८ (२) यमकदोषका अ्र्प्रन्तर्भाव ५६६ (४) उत्प्रेक्षादोषोंका विवेचन (३ ) उपमादोषोंका अ्र्प्रन्तर्भाव ५७६ ५६६ (२) समासोक्तिदोषोंका विवेचन ५८० (क) उपमानका न्यूनाधिक्य ५७० (ख) साधारणधर्मका न्यूनाधिक्य (६) अप्रस्तुतप्रशंसाके दोष ५८३ ५७१ परिशिष्ट ५८५-५६७
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भूमिका
नामकरण काव्यसौन्दर्यकी परख करनेवाले शास्त्रका नाम 'काव्यशास्त्र' है। काव्यशास्त्रके प्रारम्भिक युगमें इसके लिए मुख्यरूपसे 'काव्यालङ्गार' शब्दका प्रयोग होता था। इसीलिए काव्यशास्त्रके आदि युगके सभी आचार्योंने अपने ग्रन्थोंका नाम 'काव्यालङ्गार' रखा है। भामहका कारिकारूपमें लिखा हुआ काव्यशास्त्रका आदि ग्रन्थ 'काव्यालङ्गार' नामसे ही प्रसिद्ध है। उद्भटने भी अपने ग्रन्थका नाम 'काव्यालङ्कारसारसंग्रह' रखा है। रुद्रटके काव्यशास्त्रविषयक ग्रन्थका नाम भी 'काव्यालङ्कार' है। वामनने सूत्ररूप में लिखे हुए अपने ग्रन्थका नाम भी 'काव्यालङ्कारसूत्र' रखा। इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राचीनकालमें 'काव्यशास्त्र'के लिए 'काव्यालङ्कार' नाम ही अधिक प्रचलित पाया जाता है। इस नाममें आया हुआ 'अलङ्कार' शब्द सौन्दर्य अर्थको बोधन करनेवाला है। वामनने "सौन्दर्यम् अलङ्गारः" सूत्र लिखकर अलङ्गारशब्दको सौन्दर्यपरक प्रतिपादन किया है। अन्य सब आचार्योंने भी काव्यके सौन्दर्याधायक धर्मोंको ही 'अलङ्गार' नामसे व्यवहृत किया, "काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलङ्कारान प्रचक्षते"२ आदि वचन भी इसी मत की पुष्टि करते हैं। इस प्रकार 'काव्यालङ्गार' शब्दका अर्थ काव्य- सौन्दर्य होता है और उससे लक्षणा द्वारा काव्यसौन्दर्यपरक शास्त्रका ग्रहण होता है। इसीलिए काव्यतौन्दर्यकी परीक्षाके आधारभूत मौलिक सिद्धान्तोंका प्रतिपादन करनेवाले ये सब प्राचीन ग्रन्थ 'काव्यालङ्कार' नामसे कहे जाते हैं। इन ग्रन्थोंमें केवल अलङ्गारोंका ही वर्णन नहीं है अपितु सौन्दर्यकी परीक्षाके लिए गुण, दोष, रीति, अलङ्कार आदि जिन-जिन तत्वोंके ज्ञानकी आवश्यकता है उन सभीका प्रतिपादन किया गया है। इसलिए इन नामोंमें आये हुए 'अलङ्गार' शब्दको सौन्दर्यपरक मानकर काव्यसौन्दर्यके प्रतिपादक शास्त्रोंके लिए 'काव्यालङ्कार' नामका प्रयोग उचित प्रतीत होता है। बादको अनेक स्थलोंपर इस शास्त्रके लिए 'काव्यालङ्गार'के बजाय केवल 'अलङ्गारशास्त्र' नामका प्रयोग ही पाया जाता है। 'प्रतापरुद्रीय'की टीकामें 'अलङ्गारशास्त्र' नामके प्रतिपादनके लिए 'छत्रिन्याय'का अवलम्बन किया गया है। उन्होंने लिखा है-'यद्यपि रसालङ्काराद्यनेकविषयमिदं शास्त्रं तथापि छत्रिन्यायेन अलङ्गारशास्त्रमुच्यते"। इसका अर्थ यह हुआ कि यद्यपि इस शास्त्रमें रस, गुण, दोष, अलङ्गार आदि अनेक विषयोंका विवेचन किया गया है परन्तु 'छत्रिन्याय'से उसे केवल अलङ्कारशास्त्र कहा जाता है। 'छत्रिन्याय' का अभिप्राय यह है कि कहीं बहुतसे व्यक्ति जा रहे हैं, उनमें दो-चार या एक-दो व्यक्ति छाता लगाये हुए, छत्रधारी हैं, उन दो-चार छत्रधारी व्यक्तियोंकी प्रधानता मानकर उनके साथ चलनेवाले छत्ररहित अन्य अनेक व्यक्तियोंका भी 'छत्रिणो यान्ति' आदि पदोंसे ग्रहण हो जाता है और व्यवहार उन दो-चार छातेवालोंके कारण उस समुदायके अनेक छत्ररहित व्यक्तियोंको भी 'वे छातेवाले जा रहे हैं' इस प्रकार कहा जाता है। इसी तरह अलङ्कारशास्त्र में अलङ्कारके अतिरिक्त रसादि अनेक विषयोंका प्रतिपादन होते हुए भी अलङ्गारको प्रधान मानकर
१. काव्यालङ्कारसूत्र १-२। २. काव्यादर्श २-१। ३. प्रतापरुद्रीय-टीका, पृ० ३।
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२ काव्यप्रकाश:
'अलङ्गारशास्त्र' नामसे उनका ग्रहण हो जाता है। यह 'प्रतापरुद्रीय' के टीकाकारका अभिप्राय है। अलङ्गारशास्त्र नामकी व्याख्याके विषयमें अन्य विद्वानोंका भी प्रायः यही मत है। परन्तु हमें यह व्याख्या अधिक रुचिकर प्रतीत नहीं होती। इसका कारण यह है कि काव्यमें अलङ्गारकी प्रधानता नहीं है, वह काव्यका आत्मा नहीं है, काव्यका आत्मा तो रस है। अलङ्कारकी स्थिति तो केवल कटक-कुण्डल आदिके समान गौण है। कटक-कुण्डल आदि मनुष्य के उत्कर्षाधायक धर्म तो हो सकते हैं, जीवनाधायक नहीं। कटक-कुण्डल आदि अलङ्कारोंको धारण करनेवाला व्यक्ति बड़ा आदमी माना जा सकता है, पर उनके हटा देनेपर या उनसे रहित व्यक्ति मनुष्य न रहे यह नहीं हो सकता है। शरीरका जीवनाधायक तत्त्व आत्मा है, इसी प्रकार काव्यका जीवनाधायक तत्त्व रस है। इसीलिए रसादिके रहते उनको गौण करके और गौण अलङ्कारोंको प्रधान मानकर उनके आधारपर इस शास्त्रका 'अलङ्गारशास्त्र' यह नामकरण उचित प्रतीत नहीं होता। इसीलिए हम इस व्याख्याके पक्ष में नहीं हैं। हमारे विचारमें वामनके मतानुसार अलङ्कार शब्दको सौन्दर्यपरक मानकर अलङ्गार- शास्त्रको 'सौन्दर्यशास्त्र' या 'काव्यसौन्दर्यशास्त्र' मानना अधिक सङ्गत और उचित प्रतीत होता है। काव्यके साथ 'शास्त्र' शब्दका प्रयोग प्रारम्भमें, जैसा कि हम देख चुके हैं, इस शास्त्रका नाम केवल 'काव्यालङ्गार' था। शास्त्र शब्दका प्रयोग उसके साथ नहीं होता था। आगे उसका और अधिक विकास होनेपर उसका महत्त्व बढ़ानेके लिए उसके साथ 'शास्त्र' शब्दका प्रयोग होने लगा। सामान्य रूपसे 'शास्त्र' शब्द 'शासनात् शास्त्रं' शासन करनेवाला होनेसे 'शास्त्र' कहलाता है। शासनका अर्थ मनुष्यको किसी कार्यमें प्रवृत्त करना या किसी कार्यसे निवृत्त करना होता है। वेद, स्मृति, धर्मशास्त्र आदि ग्रन्थ मनुष्योंको सत्कर्ममें प्रवृत्त होने और असत्कार्योंसे निदृत्त होनेका आदेश देते हैं इसलिए वे 'शास्त्र' कहे जाते हैं। मुख्य रूपसे शासन करनेवाले अर्थात् प्रवृत्ति-निवृत्ति करनेवाले ग्रन्थ 'शास्त्र' कहलाते हैं। काव्यका मुख्य प्रयोजन प्रवृत्ति-निवृत्ति नहीं, रसास्वादन या 'सद्यः परनिर्वृति' है 'कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे' अर्थात् कर्तव्याकर्तव्यका उपदेश काव्यका गौण प्रयोजन है। इसलिए काव्य 'प्रभुशब्दसम्नित' वेद-शास्त्र आदिसे भिन्न है। इसलिए 'काव्यशास्त्र' में प्रयुक्त 'शास्त्र' शब्द 'शासनात् शास्त्रं' इस व्युत्पत्तिको लेकर प्रयुक्त नहीं हुआ है। वेदान्तदर्शनमें 'शास्त्र' शब्दकी एक और व्युत्पत्ति की गयी है। 'शासनात् शास्त्रं' अर्थात् केवल शासन करनेवाले विधि-प्रतिषेधपरक ग्रन्थ ही 'शास्त्र' नहीं कहलाते, अपितु किसी गूढ़ तत्त्वका 'शंसन' प्रतिपादन करनेवाले ग्रन्थ भी 'शास्त्र' कहलाते हैं। इस व्युत्पत्तिके करनेका कारण यह है कि वेदान्तका प्रतिपाद्य विषय-'ब्रह्म'-'प्रवृत्ति-निवृत्ति' या विधि-प्रतिषेधका विषय नहीं माना गया है। तब उसका प्रतिपादन शास्त्रमें कैसे सम्भव होगा यह शङ्का 'ब्रह्म'के विषयमें उठायी गयी है। उस शङ्गाके निराकरणके लिए 'शंसनात् शास्त्रं' यह दूसरे प्रकारकी व्युत्पत्ति भाष्यकारने की है। इसके अनुसार 'ब्रह्म' जैसे गूढ़ तत्त्वका प्रतिपादन करनेवाले वेदान्त आदिके लिए 'शास्त्र' शब्दके प्रयोगका और विधि-प्रतिषेधरहित 'ब्रह्म' के शास्त्रप्रतिपाद्यत्वका समर्थन किया गया है। इसलिए शासनात्मक न होनेपर भी अर्थात् विधि-प्रतिषेध रहित होनेपर भी किसी गूढ़ तत्त्वका प्रतिपादन करनेवाले ग्रन्थ 'शास्त्र' नामसे कहे गये हैं। इसी व्युत्पत्तिको लेकर अलङ्गारशास्त्र, काव्यशास्त्र आदि नामोंमें 'शास्त्र' शब्दका प्रयोग हुआ है। काव्यके साथ 'शास्त्र' शब्दका सम्बन्ध जुड़ जानेसे उसका महत्त्व बहुत अधिक बढ़ गया।
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भूमिका ३
प्राचीन नाम 'काव्यालङ्गार' में उतना महत्त्व प्रतीत नहीं होता है जितना 'काव्यशास्त्र' या 'अलङ्कारशास्त्र' नामोंमें प्रतीत होता है। 'काव्यशास्त्र' शब्दके प्रयोगका आधार ग्यारहवीं शताब्दीमें 'सरस्वतीकण्ठाभरण' के रचयिता भोजदेवने मुख्य रूपसे इस शास्त्रके लिए 'काव्यशास्त्र' पदका प्रयोग किया है। परन्तु उन्होंने 'शास्त्र' शब्दकी विधि-प्रतिषेधपरक 'शासनात् शास्त्रं' इस पहली व्युत्पत्तिको लेकर ही 'शास्त्र' शब्दका प्रयोग माना है। उन्होंने लिखा है- 'यद्विधौ च निषेधे च व्युत्पत्तेरेव कारणं। तदध्येयं विदुस्तेन लोकयात्रा प्रवर्तते ।" इसका अर्थ यह है कि विधि या निषेधका ज्ञान करानेवाला अर्थात शासन करनेवाला 'शास्त्र' है उसका अध्ययन करना चाहिये क्योंकि उसीसे लोकव्यवहारका सञ्चालन होता है। इस विधि और प्रतिषेधका ज्ञान करानेवाले मुख्य तीन साधन हैं-(१) काव्य, (२) शास्त्र तथा (३) इतिहास । इन तीनोंके मिश्रणसे तीन और बन जाते हैं-(१) काव्य और शास्त्रको मिलाकर काव्यशास्त्र, (२) काव्य और इतिहासको मिलाकर काव्येतिहास, (३) शास्त्र और इतिहासको मिलाकर शास्त्रेतिहास। इस प्रकार भोजदेवके मतमें विधि और प्रतिषेधकी व्युत्पत्ति अर्थात् ज्ञानके कारण छः हो जाते हैं-(१) काव्य, (२) शास्त्र, (३) इतिहास, (४) काव्यशास्त्र, (५) काव्येतिहास, (६) शास्त्रेतिहास । इनका प्रतिपादन करते हुए उन्होंने लिखा है- 'काव्यं शास्त्रेतिहासौ च काव्यशास्त्रं तथैव च। काव्येतिहासः शास्त्रेतिहासस्तदपि षड्विधन् ।।" इस प्रकार भोजदेवने काव्य, काव्यशास्त्र और काव्येतिहास तीनोंको विधि-प्रतिषेधका ज्ञान करानेवाला माना है। इस प्रकार उन्होंने काव्यके सब प्रयोजनोंमेंसे 'कान्तासम्मिततया उपदेशयुज' अर्थात् विधि-प्रतिषेधको ही काव्यका मुख्य प्रयोजन माना है। पर यह वस्तुतः बहुजनसमादृत पक्ष नहीं है। अधिकांश विद्वानोंकी दृष्टिमें उपदेश काव्यका मुख्य प्रयोजन नहीं, गौण प्रयोजन है। उसकी अपेक्षा 'सद्यः परनिर्वृति'-अलौकिकानन्दानुभूति या रसास्वादन ही काव्यका मुख्य प्रयोजन है। भोजदेवके ध्यानमें 'शास्त्र' शब्दकी कदाचित् 'शासनात् शास्त्रं'वाली एक ही व्युत्पत्ति थी इसीलिए उन्होंने काव्यशास्त्रमें भी शासनकी प्रधानता मान ली है। पर ऐसा करके उन्होंने कदाचित् काव्यके साथ न्याय नहीं किया है। काव्यका प्रधान उद्देश्य शासन नहीं है अन्यथा वेद, शास्त्रादिसे उसका भेद ही क्या रह जायगा। काव्यका प्रधान लक्ष्य 'सद्यः परिनिर्वृति' अर्थात् अपूर्व आनन्दानुभूति या रसास्वादन ही है। यही उसका वेद, शास्त्र आदिसे विभेदक मुख्य धर्म है। भोजदेव इस तत्वकी रक्षा नहीं कर सके हैं। 'काव्य' के साथ 'शास्त्र' शब्द जोड़कर उन्होंने उसकी गौरववृद्धि करनेका यत्न तो किया है, पर उस यत्नमें काव्यके आत्माको भूल गये हैं। 'शासनात् शास्त्रं' के स्थानपर यदि 'शंसनात् शास्त्रं' इस व्युत्पत्तिको लेकर शास्त्र शब्दका प्रयोग मानते तो उससे काव्यका आत्मा भी सुरक्षित रहता और उसकी गौरववृद्धि भी होती।
१. सरस्वतीकण्ठाभरण २-१३८। २. सरस्वतीकण्ठाभरण २-१३१।
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४ काव्यप्रकाश: 'साहित्य' शब्दका प्रयोग ऊपर हम देख चुके हैं कि 'काव्यशास्त्र' के लिए प्रारम्भमें 'काव्यालखगार' शब्दका प्रयोग होता था। उसमें 'अलङ्गार' शब्द सौन्दर्यपरक था अर्थात् काव्यसौन्दर्यकी विवेचना करनेवाले शास्त्रके लिए 'काव्यालड्वार' शब्दका प्रयोग होता था और प्राचीन सभी आचार्योने इसी आधारपर अपने ग्रन्थोंके नाम 'काव्यालङ्कार' रखे थे। परन्तु इसके साथ ही एक और शब्द भी है जो इस शास्त्रके लिए प्रयुक्त पाया जाता है, वह है 'साहित्य' शब्द। इधर नवीन युगमें तो यह शब्द 'काव्यशास्त्र'के अन्य सब नामोंकी अपेक्षा अधिक प्रचलित है और इसका श्रेय कदाचित् चौदहवीं शताब्दीके विश्वनाथको है। उन्होंने अपने ग्रन्थका नाम 'साहित्यदर्पण' रखा है। इधरके नवीन युगमें यह ग्रन्थ पठन-पाठनकी प्रणालीमें बहुत अधिक प्रचलित रहा इसलिए काव्यसौन्दर्यकी विवेचना करनेवाले शास्त्रके लिए 'साहित्य' शब्द अधिक प्रचलित हो गया और 'काव्यालङ्कार' या 'काव्यशास्त्र' जैसे शब्दोंका प्रयोग बहुत ही कम हो गया। विश्वनाथसे पूर्व ग्यारहवीं शताव्दीमें अलङ्गारसर्वस्वकार रुथ्यकने भी 'साहित्यमीमांसा' नामक अपने दूसरे ग्रन्थमें 'साहित्य' शब्दका प्रयोग किया था। परन्तु उनका यह ग्रन्थ अधिक प्रचलित नहीं हुआ इसीलिए काव्य- शास्त्रके लिए 'साहित्य' शब्दके प्रचारका श्रेय विश्वनाथको ही दिया जा सकता है। परन्तु विश्वनाथ इस शब्दके प्रयोगके आदिप्रवर्तक नहीं हैं। इसका आदि मूल तो काव्यशास्त्र के आदि आचार्य भामहके 'काव्यालङ्गार' में ही पाया जाता है। भामहने अपने ग्रन्थके प्रारम्भमें ही 'शब्दार्थों सहितौ काव्यं' इस प्रकार काव्यका लक्षण किया अर्थात् शब्द और अर्थके 'साहित्य' का नाम ही काव्य है। शब्दार्थके 'साहित्य' का अभिप्राय खोलते हुए दशम शताब्दीमें वकोकिजीवितकार आचार्य कुन्तक ने लिखा है -- साहित्यमनयोः शोभाशालितां प्रति काप्यसौ। अन्यनानतिरिक्तत्वमनोहारिण्यवस्थिति: इसके अनुसार काव्यमें सौन्दर्याधानके लिए शब्द और अर्थ दोनोंकी एक-सी मनोहारिणी स्थितिका नाम 'साहित्य' है। अर्थात् काव्यमें जितने सुन्दर अर्थका वर्णन किया जा रहा हो उतने ही सुन्दर शब्दोंका सन्निवेश होना चाहिये। अथवा जैसे सुन्दर शब्दोंका प्रयोग किया जा रहा हो उसीके अनुरूप सुन्दर अर्थका समन्वय होना चाहिये। शब्द, अर्थगौरवके अनुरूप हो, न कम न अधिक, और अर्थ, शब्दसौन्दर्यके अनुरूप हो. न कम न अधिक; यही शब्द और अर्थकी 'अन्यूनानतिरिक्तत्वमनोहारिण्यवस्थितिः' हुई। इसीका नाम शब्द और अर्थका 'साहित्य' है। इस प्रकारके 'साहित्य' से युक्त शब्द और अर्थका नाम ही काव्य है यह भामहके 'शध्धार्थौं सहितौ काव्यं' इस काव्यलक्षणका अभिप्राय है। वक्रोक्तिजीवितकार कुन्तकने भी शब्द और अर्थके इस 'साहित्य' को अपने काव्यलक्षणमें समाविष्ट किया है। उन्होंने काव्य- लक्षण करते हुए लिखा है -- शब्दाथौं सहितौ वक्रकविर्व्यापारशालिनि। बन्धे व्यवस्थितौ काव्यं तद्विदाह्ल्ादकारिणि ॥" अर्थात सहृदयोंको आह्लादित करनेवाले सुन्दर कविर्व्यापारसे युक्त रचनामें समुचित रीतिसे स्थित साहित्ययुक्त शब्दार्थका नाम ही काव्य है। इस प्रकार भामह तथा कुन्तक दोनोंने शब्द और अर्थके १. वकोक्तिजीवित १-१७। २. वकोक्तिजीवित १-७।
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भूमिका ५
'साहित्य' के आधारपर ही अपने काव्यलक्षण किये हैं और इस आधारपर ही 'काव्यशास्त्र'के लिए 'साहित्य' शब्दका प्रयोग होता है। यह प्रयोग यों तो आदिकालसे होता आया है और उसीके आधारपर नवम शताब्दीमें काव्यमीमांसाकार राजशेखरने "पश्चमीसाहित्यविद्या इति यायावर्यः" लिखकर इस शास्त्रके लिए 'साहित्यविद्या' या साहित्यशास्त्र नामका निर्देश किया है और उसी आधारपर ग्यारहवीं शताब्दीमें रु्यकने अपने ग्रन्थका नाम 'साहित्यमीमांसा' तथा चौदहवीं शताब्दीमें विश्वनाथने अपने ग्रन्थका नाम 'साहित्यदर्पण' रखा।
'क्रियाकल्प' शब्दका प्रयोग इस प्रकार हनने देखा है कि काव्यसौन्दर्यकी परख करनेवाले इस शास्त्रके लिए (१) 'काव्यालङ्गार', (२) 'काव्यशास्त्र', (३) 'अलङ्गारशास्त्र', (४) 'साहित्यशास्त्र', (५) 'साहित्य- विद्या' आदि अनेक नामोंका प्रयोग करते आये हैं। परन्तु इन सब नामोंसे भिन्न इस शास्त्रके लिए एक और भी नाम प्रयुक्त है और वह है 'क्रियाकल्प'। यह नाम कदाचित् इन सब नामोंसे अधिक प्राचीन हैं। इसका निर्देश वात्स्यायनके 'कामशास्त्र' में गिनायी गयी ६४ कलाओंमें आता है। 'क्रियाकल्प' 'काव्य- क्रियाकल्प'का संक्षिप्त रूप जान पड़ता है। इसका पूरा नाम 'काव्यक्रियाकल्प' अर्थात् 'काव्यशास्त्र' है। केवल 'कामशास्त्र'में ही नहीं अपितु 'ललितविस्तर' नामक बौद्ध ग्रन्थमें भी 'क्रियाकल्प' शब्दका प्रयोग किया गया है। टीकाकार जयमङ्गलार्कने उसका अर्थ 'क्रियाकल्प इति काव्यकरणविधि: काव्यालङ्कार इत्यर्थ:' इस प्रकार किया है। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि कलाओंके अन्तर्गत प्रयुक्त हुआ 'क्रियाकल्प' शब्द काव्यालङ्गार अथवा अलङ्गारशास्त्रके अर्थमें भी प्रयुक्त हुआ है। वाल्मीकि- रामायणके उत्तरकाण्ड (अध्याय ६४, श्लोक ४-१० तक) में लव-कुशके गानको सूननेके लिए रामकी सभामें वैयाकरण, नैगम, स्वरज्ञ, गान्धर्व आदि विद्याओंके विशेषज्ञोंकी उपस्थितिका वर्णन किया गया है, उसीके साथ 'क्रियाकल्प' तथा 'काव्यविद्'का वर्णन भी पाया जाता है। उसमें 'काव्यविद्'का अर्थ केवल काव्यरसको ग्रहण करनेमें समर्थ व्यक्ति है तथा 'क्रियाकल्पविद्' का अभिप्राय काव्यसौन्दर्यकी परीक्षामें समर्थ व्यक्ति है। रामायणके श्लोकका सम्बद्ध भाग निम्नलिखित प्रकार है- 'त्रियाकल्पविदश्चैव तथा काव्यविदो जनान।"
इस प्रकार 'काव्यशास्त्र'के लिए (१) काव्यालङ्गार, (२) काव्यशास्त्र, (३) अलङ्गारशास्त्र, (४) साहित्यशास्त्र, (५) क्रियाकल्प; इन पाँच नामोंका प्रयोग प्रायः होता रहा है। भामह, उन्ट, रुद्रट, वामन और कुन्तकने इनमेंसे 'काव्यालङ्गार' शब्दको अधिक पसन्द किया है इसलिए अपने ग्रन्थोंके नाम 'काव्यालड्गार' रखे हैं, कुन्तकका ग्रन्थ यद्यपि 'वक्रोक्तिजीवित' नामसे प्रसिद्ध है परन्तु इसके दो भाग हैं-एक मूल कारिकाभाग और दूसरा वृत्तिभाग। दोनों भागोंके रचयिता स्वयं कुन्तक ही हैं। उन्होंने अपने वृत्तिभागका नाम 'वक्रोकितिजीवित' रखा है और इसी नामसे यह ग्रन्थ प्रसिद्ध है, परन्तु उसके मूलकारिका भागका नाम 'काव्यालङ्गार' ही है। इसीलिए कुन्तकने प्रारम्भमें ही लिखा है कि- 'लोकोत्तरचमत्कारकारिवैचित्र्यसिद्धये। काव्यस्यायमलङ्कारः कोडप्यपूर्वो विधीयते।'
१. काव्यमीमांसा, पृ० ४। २. वाल्मीकिरामायण, उत्तरकाण्ड, २४-७। ३. वकरोक्तिजीवित १-२।
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६ काव्यप्रकाश: इससे प्रतीत होता है कि वकोक्तिजीवितकारने भी अपने मूल ग्रन्थका नाम 'काव्यालङ्गार' ही रखा था। इस प्रकार बहुत समयतक इस शास्त्रके लिए 'काव्यालङ्गार' शब्दका प्रयोग होता रहा, परन्तु पीछे ऐसा अनुभव हुआ कि भिन्न-भिन्न आचार्योंके सभी ग्रन्थोंके लिए एक ही 'काव्यालङ्गार' नाम उचित नहीं है इसलिए दण्डीने सातवीं शताब्दीमें अपने ग्रन्थका नाम 'काव्यादर्श' रखा और नवम शताब्दीमें राजशेखरने अपने ग्रन्थका नाम 'काव्यमीमांसा' तथा ग्यारहवीं शताब्दीमें मम्मटने अपने ग्रन्थका नाम 'काव्यप्रकाश' रखा और चौदहवीं शताब्दीमें विश्वनाथने 'साहित्यदर्पण' नामसे इस विषयपर अपने ग्रन्थकी रचना की। उद्गम 'साहित्यशास्त्र' के उद्गमके विषयमें राजशेखरने अपनी 'काव्यमीमांसा'के प्रारम्भमें एक आख्या- यिका दी है। आख्यायिका पौराणिक शैलीकी जान पड़ती है। इसमें प्रामाणिक तत्त्व कम हैं, फिर भी उससे 'साहित्यशास्त्र' के उद्गमके विषयमें एक विचारधाराका विषय मिलता है इसलिए उसे यहाँ दे देना उपयुक्त ही होगा। राजशेखरने लिखा है- "अथातः काव्यं मीमांसिष्यामहे यथोपदिदेश श्रीकण्ठः परमेष्ठिवकुण्ठादिभ्यश्चतुष्षष्टये शिष्ये- भ्यः । सोऽपि भगवान् स्वयम्भूरिच्छाजन्मभ्यः स्वान्तेवासिभ्यः । तेषु सारस्वतेयो: वृन्दीयसामपि वन्दः 'काव्यपुरुषः' आसीत्। तश्व् सर्वसमयमिदं दिव्येन-चक्षुषा भविष्यदर्थदशिनं भूर्भुवस्वस्त्रितयर्वातनीषु प्रजासु हितकाम्यया प्रजापतिः काव्यविद्याप्रवर्तनाय प्रायुंक्त। सोऽष्टादशाधिकरणीं दिव्येभ्यः काव्यविद्या- स्नातकेभ्यः सप्रपश्व प्रोवाच। "तत्न कविरहस्यं सहस्त्राक्षः समाम्नासीत्, औक्तिकमुक्तिगर्भः, रीतिनिर्णयं सुवर्णनाभ:, आनुप्रासिकं प्रचेता:, यमो यमकानि, चित्रं चित्राङ्गदः, शब्दश्लेषं शेष:, वास्तवं पुलस्त्यः, औपम्यमौप- कायनः, अतिशयं पाराशरः, अर्थश्लेषमुतथ्यः, उभयालङ्कारिकम् कुबेरः, वैनोदिकं कामदेवः, रूपक- निरूपणीयं भरतः, रसाधिकारिकं नन्दिकेश्वरः, दोषाधिकरण धिषण:, गुणौपादानिकसुपमन्युः, औप- निषदिकं कुचमार इति। ततस्ते पृथक्-पृथक् स्वशास्त्राणि विरचयाश्वकुः। "इत्थंकारञ् प्रकीर्णत्वात् सा किश्न्निदुच्चिच्छिदे। इतीयं प्रयोजकाङ्गवती संक्षिप्य सर्वमर्थ- मल्पग्रन्थेन अष्टादशाधिकरणी प्रगीता।"-काव्यमीमांसा, पृ० ३-४ इसका अर्थ निम्नलिखित प्रकार है- "अब काव्यकी विवेचना आरम्भ करते हैं। भगवान् श्रीकण्ठ शिवने इस काव्यविद्याका उपदेश परमेष्ठी, वैकुष्ठादि चौंसठ शिष्योंको किया था। उनमेंसे प्रथम शिष्य स्वयम्भ-ब्रह्मदेवने इस विद्याका द्वितीय बार उपदेश अपनी इच्छासे उत्पन्न (अयोनिज) शिष्यों-ऋषियों-को किया। इन शिष्योंमें सरस्वतीका पुत्र 'काव्यपुरुष' भी एक था, जगद्वन्द्य देवता भी जिसकी वन्दना करते थे। ब्रह्मदेवने त्रिकालज्ञ और दिव्यदृष्टि द्वारा भविष्यकी बातोंको जाननेवाले उस 'काव्यपुरुष'को भू, भुवः और स्वर्ग तीनों लोकोंमें रहनेवाली प्रजामें काव्यविद्याका प्रचार करनेकी आज्ञा दी। काव्यपुरुषने अठारह भागोंमें विभक्त काव्यविद्याका उपदेश सबसे प्रथम सहस्राक्षादि दिव्य काव्यविद्यास्नातकोंको किया। उनमेंसे एक-एक शिष्यने अठारह भागोंमें विभक्त उस काव्यविद्याके एक-एक भागमें विशेषता प्राप्त करके अपने- अपने विषयपर पृथक्-पृथक् ग्रन्थोंकी रचना की। "सहत्राक्ष इन्द्रने कविरहस्य नामक प्रथम अधिकरण (भाग) का निर्माण किया। इसी प्रकार उक्तिगर्भने उक्तिविषयक ग्रन्थका निर्माण किया। सुवर्णनाभने रीतिविषयक, प्रचेताने अनुप्रासविषयक,
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भूमिका
मने यमकसम्बन्धी, चित्राङ्गदने चित्रकाव्यविषयक, शेषने शब्दश्लेषपर, पुलस्त्यने वास्तव अर्थात् स्व- भावोक्तिपर, औपकायनने उपमा अलङ्गारके सम्बन्धमें, पाराशरने अतिशयोक्तिके सम्बन्धमें, उतथ्यने अर्थश्लेषपर, कुबेरने शब्द और अर्थ उभयालङ्गारोंके सम्बन्धमें, कामदेवने विनोदसम्बन्धी, भरतने नाटयविषयपर, नन्दिकेश्वरने रसविषयपर, धिषण-बृहस्पति-ने दोषपर, उपमन्युने गुणोंके सम्बन्धमें और कुचमारने औपनिषदिक विषयोंपर स्वतन्त्र रूपसे अपने-अपने ग्रन्थोंकी रचना की। "इस प्रकार भिन्न-भिन्न विषयोंकी ग्रन्थरचनाओंसे काव्यविद्या अनेक भागोंमें विभक्त होकर छिन्न-भिन्न-सी हो गयी। इसलिए अत्यावश्यक काव्यविद्याके सभी विषयोंको संक्षिप्त करके हमने अठारह अधिकरणोंमें 'काव्यमीमांसा' नामक इस ग्रन्थकी रचना की है।" इस प्रकार राजशेखरने काव्यशास्त्रके उद्गमके ऊपर प्रकाश डालनेका प्रयत्न किया है। परन्तु इस प्रकारका उल्लेख अन्य किसी ग्रन्थमें नहीं मिलता है।
वेदोंमें काव्यशास्त्रक बीज प्राचीन भारतीय दृष्टिकोणके अनुसार वेद सब सत्य विद्याओंके प्रतिपादक ग्रन्थ हैं। सब सत्य विद्याओंकी उत्पत्ति और विकास वेदोंसे ही हुआ है इसलिए सभी विद्याओंके मूल तत्त्वोंका अनुसन्धान वेदीमें किया जाता है। आधुनिक पाश्र्वात्य विद्वान् भी ऋग्वेदको विश्व-साहित्यका सबसे प्राचीन ग्रन्थ मानते हैं। इसीलिए अपनी अनुसन्धानप्रक्रियामें वे भी प्रत्येक विषयका बीज ऋग्वेदमें खोजनेका प्रयत्न करते हैं। इसी दृष्टिसे साहित्यशास्त्रके मूल सिद्धान्तोंका वेदोंमें अन्वेषण करनेका यत्न किया गया है। यों साक्षात् साहित्यशास्त्रका वेदोंसे कोई सम्बन्ध नहीं। वेदाङ्गोंमें भी शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष इन छः विद्याओंकी गणना की गयी है, पर उनमें साहित्यका नाम नहीं आता। इसलिए वेद और वेदाङ्गोंसे साहित्यशास्त्रका साक्षात् सम्बन्ध नहीं है फिर भी वेदको 'देवका अमर काव्य' कहा गया है-"देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति" के वैदिक वचनमें 'देवके काव्य'के रूपमें वेदका ही निर्देश किया गया है और वेदके निर्माता परमात्माके लिए वेदोंमें अनेक जगह 'कवि' शब्दका प्रयोग किया गया है। इसलिए वेद स्वयं काव्यरूप है और उसमें काव्यका सम्पूर्ण सौन्दर्य पाया जाता है। इसलिए काव्यसौन्दर्यके निरूपक साहित्यशास्त्रमें काव्यसौन्दर्यके आधायक जिन गुण, रीति, अलङ्गार, ध्वनि आदि तत्त्वोंका विवेचन किया गया है वे सभी तत्त्व मूल रूपमें वेदमें पाये जाते हैं। वेदोंमें रचनाके माधुर्य, ओज और प्रसादादि गुणोंके उदाहरण अनेक स्थानोंपर पराये जाते हैं। गुणोंके आधारपर ही रीतियोंका निर्धारण होता है। इसलिए रीतियोंके उदाहरण भी वेदमें खोजे जा सकते हैं। उपमा और रूपक आदि अलङ्कारोंकी तो वेदोंमें भरमार है। एक-एक मन्त्रमें अनेक जगह रूपक और उपमा आदिका प्रयोग देखा जा सकता है -- 'उत त्वः पश्यन् न ददर्श वाचं उत त्वः शृण्वन् न शृणोत्येनाम्। उतो त्व स्मै तन्वं विसस्रे जायेव पत्ये उषती सुवासाः ॥।" की उपमा कैसी सुन्दर उपमा है। अनेक लोग विद्या पढ़ते हैं पर उसका रहस्य खुलता नहीं, अनेक लोग महत्त्वकी बालें सुनते हैं पर उनका भाव समझमें नहीं आता। ऐसे ही लोगोंको लक्ष्यमें रखकर मन्त्रमें कहा गया है, 'उत त्वः पश्यन् न ददर्श वाचं।' 'त्व' अर्थात् 'एके' कुछ लोग ऐसे हैं जो देखते हुए भी वाणीके
१. अथर्ववेद १०-८-३२। २. ऋग्वैद १०-७१-४।
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काव्यप्रकाश: स्वरूपको नहीं देख पाते हैं और 'शृण्वन् अपि न शृणोत्येनां', सुनकर भी उसको सुन नहीं पाते हैं। ये दोनों विरोधाभासके कितने सुन्दर और प्रासादिक, प्रसादगुणयुक्त मनोहर उदाहरण हैं। तीसरे वे लोग हैं जिनके सामने वाणी अपना सारा सौन्दर्य इस प्रकार खोलकर रख देती है जैसे सुन्दरतम वेश-भूषामें अलङकृत होकर पत्नी अपने पतिके सामने अपने सौन्दर्यको पूर्ण रूपमें प्रदशित करती है। 'उतो त्व स्मै त्वन्नं विसस्रे जायेव पत्ये उषती सुवासा' इस उपमाका यही भाव है। यह कितनी सुन्दर उपमा है। दूसरी जगह-'उषा हस्नेव निर्णोते अप्सः' में उषा हँसती हुई-सी अपने 'अप्सः' रूपाणि अर्थात् सौन्दर्यको प्रकाशित करती है में 'हंसती हुई-सी सौन्दर्यको प्रकाशित करती है', कितनी सुन्दर उत्प्रेक्षा है। 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ।।" इस मन्त्रमें यों तो दर्शनशास्त्रके मौलिक तत्त्वोंका प्रतिपादन किया गया है, परन्तु काव्य या साहित्यशास्त्रकी दृष्टिसे भी वह एक बड़ा सुन्दर उदाहरण है। वेदके दार्शनिक सिद्धान्तके अनुसार सृष्टिमें ईश्वर, जीव और प्रकृति तीन अनादि, अनन्त मौलिक तत्त्व हैं। ईश्वर प्रकृतिके द्वारा सृष्टिकी रचना करता है और जीव उस सृष्टिमें अपने कर्मोंके अनुसार सुख-दुःखरूप फलोंका भोग करता है। इस एक मन्त्रमें सारे दर्शनोंका रहस्य समाविष्ट कर दिया गया है। पर इस जटिल दार्शनिक तत्त्वका निरूपण 'दिव्य काव्य' वेदमें हुआ है इसलिए वह काव्यके समान सुन्दर प्रतीत होता है। मन्त्रमें ईश्वर, जीव और प्रकृति इन तीनों तत्त्वोंको अपने नामोंसे न कहकर 'रूपकालङ्गार' में दो पक्षियों और एक वृक्षके रूपमें प्रदशित किया है। प्रकृति एक विशाल पिप्पलवृक्ष के रूपमें है। ईश्वर और जीव दोनों 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया' दो 'सुपर्णा' सुन्दर पंखोंवाले, 'सयुजा' साथ रहनेवाले और मित्ररूप पक्षी हैं। वे दोनों पक्षी 'समानं वृक्षं परिषस्वजाते' एक समान वृक्ष अर्थात् प्रकृतिपर स्थित हैं। 'तयोरन्यः पिप्पलं स्वादृत्ति' उन दोनोंमेंसे एक-जीव-उस वृक्षके फलोंको खाता है अर्थात् जीवात्मा अपने कर्मोंके अनुसार सृष्टिमें सुख-दःखरूप फलोंका भोग करता है और 'अनश्नन्नन्यः अभिचाकशीति', दूसरा पक्षी अर्थात् परमात्मा 'अनश्नन्' फलोंका भोग न करता हुआ 'अभिचाकशीति' संसारमें चारों ओर अपने सौन्दर्यको प्रकाशित करता है। यह इस मन्त्रका भाव है। काव्यकी मनोहर भाषामें दार्शनिक तत्त्वका ऐसा सुन्दर निरूपण सारे साहित्यमें कहीं और देखनेको नहीं मिलता है। रूपककी कल्पना कैसी सुन्दर बनी है और उसके साथ 'सुपर्णा, सयुजा, सखाया, समानं, परिषस्वजाते'के सुन्दर अनुप्रासने तो सोनेमें सुगन्धका काम किया है। 'अनश्नन्नन्यः अभिचाकशीति' में नकारका अनुप्रास माधुर्यकी अभिव्यञ्जना कर रहा है। 'अनश्नन् अन्यः अभिचाकशीति' फलका भोग न करते हुए भी अपने तेजको, सौन्दर्यको प्रकाशित कर रहा है यह विभावना अलङ्कारका सुन्दर उदाहरण है। 'विभावना तु विना हेतुं कार्योत्पत्तिर्यदुच्यते', बिना हेतुके जहाँ कार्यकी उत्पत्तिका वर्णन हो वहाँ 'विभावना' अलङ्कार होता है। फलका भोग या भक्षण ही दैहिक सौन्दर्यका जनक है पर यहाँ 'अनशनन्' न खानेपर भी 'अभिचाकशीति' सौन्दर्यके प्रकाश- का उल्लेख पाया जाता है। इसलिए यह विभावना अलङ्कारका उदाहरण है। 'काव्यप्रकाश'के 'यः कौमारहर:' इत्यादि अनलङकृतिवाले उदाहरणके खण्डनमें 'साहित्यदर्पण'की अपनायी गयी प्रक्रियावे अनुसार यदि इसको उलट दिया जाय तो यह 'विशेषोक्ति' का उदाहरण बन जायेगा। 'सति हेतौ फलाभावो विशेषोक्ति:' हेतुके होनेपर भी फलका न होना 'विशेषोक्ति' अलङ्गार कहलाता है। यहाँ 'अनश्नन्' १. ऋग्वेद १-१६४-२०।
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भूमिका रूप सौन्दर्याभावका कारण विद्यमान है परन्तु सौन्दर्याभावरूप कार्य विद्यमान नहीं है क्योंकि 'अनश्नन् अन्यः अभिचाकशीति', न खाते हुए भी वह अपने सौन्दर्यको प्रकाशित कर रहा है। इसलिए यहाँ विशेषोक्ति अलङ्गार है। इस मन्त्रमें न केवल रूपक, अनुप्रास, विभावना या विशेषोक्ति अलङ्कार ही पाये जाते हैं, अपितु 'सयुजा' और 'सखाया' विशेषणोंसे जीवात्मा और परमात्माकी नित्यता एवं सच्चिद्रूपताकी अभिव्यक्ति भी होती है, इसलिए वे पदद्योत्य ध्वनिके उदाहरण भी हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि इस एक ही मन्त्रमें रूपक, अनुप्रास, विभावना, विशेषोक्ति चार अलङ्गारों, माधुर्य गुण और पदद्योत्य ध्वनि आदि काव्यके अनेक महत्त्वपूर्ण अङ्गोंका समावेश पाया जाता है। इस प्रकारके अन्य सैकड़ों मन्त्र पाये जाते हैं जिनमें साहित्यशास्त्रके मौलिक तत्त्वोंका सुन्दर समावेश हुआ है। इन मन्त्रोंका जितना ही अधिक आलोडन किया जाय उतना ही उनका सौन्दर्य प्रस्फुटित होता जायगा। वेदाङ्ग निरुक्तमें उपमाका विवेचन ऊपरके प्रकरणमें हम देख चुके हैं कि वेदोंमें साहित्यशास्त्रके मौलिक तत्त्वोंका सुन्दर समावेश हुआ है। पर वह व्यावहारिक प्रयोगमात्र है, उनका शास्त्रीय विवेचन वहाँ नहीं किया गया है। निरुक्त- कारने इस दिशामें कुछ थोड़ा-सा प्रयास किया है। उपमा अलङ्गार सारे अलङ्गारोंका बीज है, इसीसे वैदिक साहित्यमें उसका प्रयोग पाया जाता है। निरुक्तकारने इस उपमालङ्कारका शास्त्रीय विवेचन करनेका यत्न किया है। उन्होंने तृतीय अध्यायके तृतीय पादमें अपने पूर्ववर्ती आचार्य गार्ग्यके मतका उल्लेख करते हुए 'उपमा'का लक्षण इस प्रकार किया है- 'यद् अतत् तत्सदृशं तदासां कर्म इति गार्ग्यः' अर्थात् जो ऊपरसे भिन्न होनेपर उसके सदृश हो वह इनका अर्थात् उपमाका कर्म अर्थात् विषय होता है। 'ज्यायसा वा गुणेन प्रख्याततमेन वा, कनीयांसं का अप्रख्यातं वा उपमिमीते।' अर्थात् अधिक गुणवाले अथवा अत्यन्त प्रख्यात उपमानके साथ 'कनीयांसं' कम गुणवाले अथवा 'अप्रख्यातं', कम प्रसिद्धिवाले उपमेयका सादृश्य उपमामें दिखलाया जाता है। यह उपमाका सामान्य लक्षण है और उत्तरवर्ती साहित्यशास्त्रमें भी इसी रूपमें इसको स्वीकार किया जाता है। परन्तु निरुक्तकारने 'अथापि कनीयसा ज्यायांसम्', छोटे-से बड़ेकी उपमा अर्थात् न्यून गुणवाले उपमानके साथ अधिक गुणवाले उपमेय- की उपमाका भी वर्णन किया है और उसके अनेक उदाहरण दिये हैं। नवीन साहित्यशास्त्रमें इस प्रकारकी उपमाको 'हीनोपमा' कहा जाता है और दोषकी कौटिमें गिना जाता है। परन्तु निरुक्तकारने उसे दोषाधा- यक नहीं माना है अपितु सुन्दर उपमाका रूप ही माना है। इसका उदाहरण उन्होंने ऋग्वेदसे इस प्रकार उद्धृत किया है- तनूत्यजेव तस्करा वनर्गू रशनाभिर्दशभिरभ्यधीतां। इयन्ते अग्ने नव्यसी मनोषा युक्ष्वा रथं न शुचयद्भिरङ्ग:।' इस मन्त्रमें आध्यात्मिक और आधिभौतिक दोनों प्रकारके उच्च तत्त्वोंका प्रतिपादन किया गया है। आध्यात्मिक दृष्टिसे इसमें मनुष्यके लिए इन्द्रियसंयमका उपदेश किया गया है। 'रशनाभिर्दशभि- १. ऋग्वेद १०-४-६।
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१० काव्यप्रकाश: रभ्यधी तां', दस रसनाओंसे अर्थात् दस इन्द्रियोंसे अपना संयम करे अर्थात् अपनी दशों इन्द्रियोंका कठोरताके साथ नियन्त्रण करे! इसके लिए मन्त्रके प्रथम चरणमें 'तनूत्यजेव तस्करा वनर्गू', जंगलमें रहनेवाले तस्कर अर्थात् लुटेरोंको उपमानरूपमें प्रस्तुत किया गया है। 'वनर्गू' वनगामिनौ अर्थात् वनमें रहनेवाले, 'तस्कराः' लुटेरे, 'तनूत्यजेव' अपने प्राणोंपर खेलकर भी जैसे परद्रव्यापहरणरूप कार्यका सम्पादन अत्यन्त निष्ठुर होकर भी करते हैं इसी प्रकार प्रेयोमार्गके पथिक मानवको निष्ठुरताके साथ या दृढ़ताके साथ अपनी दसों इन्द्रियोंका नियन्त्रण करना चाहिये और इस इन्द्रियसंयम द्वारा 'शुचयद्भिरङ्गः', पवित्र अङ्गोंसे 'रथम् युक्ष्वा', अपने जीवन-रथका सश्वालन करना चाहिये। इस प्रकार संयत जीवन व्यतीत करनेसे, 'यन्ते अग्ने नव्यसी मनीषा', हे अग्रगन्तः ! प्रतिदिन जीवनके उन्नत पथपर चलनेवाले तुमको 'नव्यसी मनीषा' प्रतिदिन आत्मसाक्षात्कारके मार्गसे नूतन ज्ञान, नूतन स्फूर्ति प्राप्त होगी, यह इस मन्त्रका अर्थ है। इसमें अपनी इन्द्रियोंके संयमके लिए तस्करोंकी दृढ़ताको उपमान बनाया गया है। यों तो तस्करोंका उपमान बनानेके कारण यह हीनोपमा है पर इन्द्रियदमनके लिए अपेक्षित दृढ़ता या निष्ठुरताका प्रदर्शक वह एक बहुत ही सुन्दर उपमान है इसलिए निरुक्त्तकारने इस हीनोपमाको दोष न मानकर अलङ्गार ही माना है। वदमें 'इव'के अतिरिक्त उपमावाचक अन्य अनेक शब्द भी आते हैं। उनके आधारपर अनेक उदाहरण निरुक्तकारने प्रस्तुत किये हैं। इनमें 'आ' और 'चित्' भी वेदके उपमावाचक शब्द हैं। सूर्य रात्रिके अन्धकारको नष्ट करता है। इसका वर्णन करते हुए-'जार आ भगम्' यह उपमा वेदमें दी गयी है। उसमें 'आ' उपमावाचक शब्द है। 'था'को भी वेदमें उपमावाचक शब्दके रूप में प्रयुक्त किया जाता है -- 'तं प्रत्नथा पूर्वथा विश्व थेमथा'में 'था' शब्द 'इव'के अर्थमें प्रयुक्त हुआ है। 'प्रत्नथा'का अर्थ 'प्रत्न इव', 'पूर्वथा'का पूर्व इव, 'विश्व था'का विश्व इव आदि है। 'यथा' और 'वत्' आदि भी लोकके समान वेदमें उपमावाचक शब्दके रूपमें प्रयुक्त होते हैं- 'यथा वातो यथा वनं यथा समुद्र एजति" में 'यथा' शब्द उपमावाचक शब्दके रूपमें प्रयुक्त हुआ है। इसी प्रकार- 'प्रियमेधवदत्रिवज्जातवेदो विरूपवत्।" में 'वत्' शब्द उपमावाचक शब्दके रूपमें प्रयुक्त हुआ है। निरुक्तकारने 'कर्मोपमा, भूतोपमा, रूपोपमा, सिद्धोपमा और लुप्तोपमा आदि उपमाके अनेक भेद भी किये हैं। 'लुप्तोपमा'का दूसरा नाम 'अर्थोपमा' भी है। 'सिंहः पुरुषः', 'काकः पुरुषः' आदि इस उपमाके उदाहरण हैं। इनमें सिंह आदि शब्द प्रशंसा- परक और काक पद निन्दाव्यञ्जक हैं। यही उत्तरवर्ती कालमें रूपकालङ्कारके रूपमें व्यवहृत हुआ है। वेदाङ्ग व्याकरणशास्त्रमें उपमाका निरूपण 'निरुक्त' के समान ही व्याकरण' की गणना भी छः वेदाङ्गोंमें की गयी है। वर्तमान व्याकरण- ग्रन्थोंके देखनेसे पता चलता है कि व्याकरणशास्त्रपर अनेक आचार्योंने ग्रन्थ लिखे थे। परन्तु इस समय उनकी उपलब्धि नहीं हो रही है। इस समय केवल पाणिनिव्याकरण ही उपलब्ध हो रहा है। १. ऋग्वेद ५-७८-८ । २. ऋग्वेद १-४५-३।
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भूमिका ११ उसमें भी 'निरुक्त'के समान या उससे भी अधिक स्पष्ट रूपमें 'उपमा' अलङ्कारका निरूपण पाया जाता है। उपमा अलङ्कारमें (१) उपमान, (२) उपमेय, (३) साधारणधर्म और (४) उपमावाचक शब्द-ये चार मुख्य भाग होते हैं। पाणिनिसूत्रोंमें उन सबका स्पष्ट निर्देश पाया जाता है- 'तुल्याथेरतुलोपमाभ्यां तृतीयान्यतरस्याम्' -- अष्टाध्यायी २-३-७२ उपमानानि सामान्यवचनैः' २-१-५५ 'उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोग' २-१-५६ इन सूत्रोंमें उपमान, उपमेय आदि शब्दोंका स्पष्ट रूपसे प्रयोग गया गया है। इतना ही नहीं, अपितु उत्तरवर्ती आलङ्कारिकोंने उपमाके 'श्रौती' और 'आर्थी' रूपसे जो भेद किये हैं उनका भी विस्तृत विवेचन व्याकरणशास्त्र में पाया जाता है। अथवा यों कहना चाहिये कि अलङ्गारशास्त्रमें वह विवेचन व्याकरणके आधारपर ही किया गया है। साहित्यदर्पणकारने श्रौती और आर्थी उपमाका लक्षण बताते हुए लिखा है- 'श्रौती यथेव वा शब्दा इवार्थो वा वतिर्यदि। आर्थी तुल्य-समानाद्या तुल्यार्थो यत्र वा वतिः ॥' सा० द० १०-१६ इसका अभिप्राय यह है कि जहाँ उपमानके साथ 'यथा', 'इव', 'वा' आदि शब्दोंका प्रयोग किया जाय अथवा 'तत्र तस्येव' (अष्टाध्यायी १-५-११६) सूत्रसे 'इव'के अर्थमें 'वति' प्रत्यय किया जाय वहाँ 'श्रौती' उपमा होती है और जहाँ तुल्य, समान आदि उपमावाचक शब्दोंका प्रयोग किया जाय अथवा 'तेन तुल्यं करिया चेद्वतिः' (अष्टा० ५-१-११५) सूत्रसे 'वति' प्रत्यय किया जाय वहाँ 'आर्थी' उपमा होती है। काव्यप्रकाशकारने भी पूर्णोपमाके भेदोंका प्रतिपादन करते हुए लिखा है- 'साग्रिमा श्रौत्यार्थी च भवेद् वाक्ये समासे तद्धिते तथा ॥' -का० प्र०, का० ८७, सू० १२७ 'अग्रिमा' अर्थात् पूर्णोपमा 'शरौती' और 'आर्थी' भेदसे दो प्रकारकी होती है और उनमेंसे प्रत्येक वाक्यगत, समासगत तथा तद्धितगत तीन प्रकारकी हो जाती है। इस प्रकार 'पूर्णोपमा'के छः भेद बन जाते हैं। यथा, इव, वा आदि शब्दोंके योगमें 'श्रौती' और तुल्य आदि शब्दोंके योगमें 'आर्थी' उपमा क्यों मानी जाती है इसका उपपादन करते हुए काव्यप्रकाशकारने लिखा है- "यथेववादिशब्दाः यत्परास्तस्यैवोपमानताप्रतीतिरिति यद्यप्युपमानविशेषणान्येते तथापि शब्दशक्तिमहिम्ना श्रुत्यैव षष्ठीवत् सम्बन्धं प्रतिपादयन्तीति तत्सद्ध्ावे श्रौती उपमा तथैव तत्र तस्येव इत्यनेनेवार्थे विहितस्य वतेरुपादानेऽपि। "'तेन तुल्यं मुखम्' इत्यादावुपमेये एव 'तत्तुल्यमस्य' इत्यादौ चोपमाने एव 'इदश्व तच्च तुल्यं' इत्युभयत्नापि तुल्यादिशब्दानां विश्रान्तिरिति साम्यपर्यालोचनया तुल्यताप्रतीतिरिति साधर्म्यस्यार्थ- त्वात् तुल्यादिशब्दोपादाने आर्थी। तद्वत् 'तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः' इत्यनेन विहितस्य वतेः स्थितौ।" इसका अभिप्राय यह हुआ कि 'यथा', 'इव' आदि शब्द जिसके बाद या साथमें प्रयुक्त होते हैं वही उपमान होता है और षष्ठी विभक्तिके समान श्रवणमात्रसे ही यहाँ इस सम्बन्धकी प्रतीति हो जाती है इसलिए उनके होनेपर 'श्रौती' उपमा मानी जाती है। इसी प्रकार 'तत्र तस्येव' सूत्रके द्वारा 'वति'
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१२ काव्यप्रकाश:
प्रत्यय होनेपर भी श्रवणमात्रसे ही उपमानसम्बन्धकी प्रतीति हो जाती है इसलिए उसके योगमें भी श्रौती उपमा होती है। तुल्य, समानादि उपमावाचक अन्य शब्दोंकी स्थिति इससे भिन्न है। यथा, इव आदि शब्द सदा उपमानके साथ ही प्रयुक्त होते हैं, परन्तु तुल्य, समानादि शब्दोंके विषयमें यह बात नहीं है। वे कभी उपमानके साथ प्रयुक्त होते हैं, कभी उपमेयके साथ और कभी दोनोंके साथ, जैसे -- 'तेन तुल्यं मुखम्।' इस उदाहरणमें 'तुल्य' शब्दका सम्बन्ध 'तेन' इस उपमेयके साथ है। उपमानके साथ नहीं। 'तत्तुल्यमस्य' इस उदाहरणमें 'तुल्य' शब्दका प्रयोग उपमानके साथ है उपमेयके साथ नहीं और 'इदश्व तच्च तुल्यं' इस उदाहरणमें 'तुल्य' शब्दका प्रयोग 'इदं' और 'तत्' अर्थात् उपमेय और उपमान दोनोंके साथ है इसलिए इन शब्दोंके प्रयोगमें उपमान और उपमेयकी प्रतीति तुरन्त नहीं होती। विचार करनेके बाद निश्र्य होता है कि यहाँ तुल्य शब्दका सम्बन्ध किसके साथ है। इसलिए इस प्रकारके स्थलोंमें 'आर्थी' उपमा मानी जाती है। इन दोनों भेदोंमें 'तत्र तस्येव' तथा 'तेन तुल्यं त्रिया चेद्वतिः, इन दो व्याकरणसूत्रोंका उपयोग होता है। इसलिए इन उपमाभेदोंके ऊपर व्याकरणशास्त्रका प्रभाव स्पष्ट दिखलायी देता है। यही नहीं, इन दोनों भेदोंके वाक्यगत, समासगत तथा तद्धितगत जो भेद किये गये हैं वे तो पूर्णतः व्याकरणके आधारपर ही किये भये हैं। 'सौरभमम्भोरुहवन्मुखस्य कुम्भाविव स्तनौ पीनौ। हृदयं मदयति वदनं तव शरदिन्दुर्यथा बाले।' इस उदाहरणमें 'अम्भोरुहवत्' में 'तत्न तस्येव' सूत्रसे 'वति' प्रत्यय होनेसे तद्धितगत श्रौती उपमा है। 'कुम्भाविव' में 'इवेन नित्यसमासः विभवत्यलोपश्र' इस नियसके अनुसार 'कुम्भ' शब्दके साथ 'इव' शब्दका नित्यसमास होनेसे समासगत श्रौती उपमा है और 'शरदिन्दुर्यथा'में वाक्यगत शरौती उपमा है। इस प्रकार एक ही श्लोकमें श्रौती उपमाके तद्धितगत, समासगत तथा वाक्यगत, तीनों भेदोंके उदाहरण आ जाते हैं। इसी प्रकार- मधुरः सुधावदधरः पल्लवतुल्योऽतिपेलवः पाणिः। चकितमृगलोचनाभ्यां सदृशी चपले च लोचने तस्याः ।' इस उदाहरणमें 'सुधावत्', पदमें 'सुधया तुल्यं सुधावत्' इस विग्रहमें 'तेन तुल्यं किया चेद्वतिः' सुत्रसे 'वति' प्रत्यय होनेके कारण तद्धितगत आर्थी उपमा है। 'पल्लवतुल्य'में समासगत आर्थो उपमा तथा 'मृगलोचनाभ्यां सदृशी चपले' में वाक्यगत आर्थी उपमा है। पूर्णोपमाके ये श्रौती और आर्थी भेद कुछ अंशमें व्याकरणके सूत्रोंसे नियन्त्रित होते हैं। परन्तु लुप्तोपमाके पाँच भेद तो पूर्ण रूपसे व्याकरणके सूत्रोंसे ही नियन्त्रित होते हैं- 'आधारकर्मविहिते द्विविधे च क्यचच क्याङ। कर्मकर्त्रोण्मुलि च स्यादेवं पञ्चधा पुनः ॥' सा० द० १०-१६ 'वादेलोंपे समासे सा कर्माधारक्यचि क्याडि। कर्मकर्त्रोण्मुलि -- का० प्र०, का० १०, सूत्र १३० के अनुसार आधार तथा कर्म अर्थोंमें क्रमशः 'अधिकरणाच्च' इस वार्तिक तथा उसके मूलभूत 'उपमाना- दाचारे' (अष्टा० ३-१-१०) सूत्रसे क्यच् प्रत्यय होनेपर दो प्रकारकी तथा 'कर्तः क्यड-सलोपश्र' (अष्टा०
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भूमिका १३
३-१-११) सूत्रसे क्यड प्रत्यय होनेपर तीसरी प्रकारकी एवं 'उपमाने कर्मणि' (अष्टा० ३-४-४५) सूत्रसे उपमानभूत कर्म तथा कर्ता उपपद रहते किसी धातुसे 'ण्मुल्' प्रत्यय करनेपर चौथी और पाँचवीं धर्मलुप्ता उपमा होती है। इस प्रकार धर्मलुप्ता उपमाके पाँचों भेद एकदम व्याकरणसूत्रोंसे ही नियन्त्रित होते हैं। इन पाँचों भेदोंके उदाहरण एक ही श्लोकमें निम्नलिखित प्रकार आ जाते हैं --
'अन्तःपुरीयसि रणेषु सुतीयसि त्वं, पौरं जनं तव सदा रमणीयते श्रीः। दृष्टः प्रियाभिरमृतद्युतिदर्शमिन्दु- सञ्चारमत्र भुवि सञ्चरसि क्षितीश।'
इस उदाहरणमें 'रणेषु अन्तःपुरीयसि' यह आधार अर्थमें 'अधिकरणाच्च' इस वार्तिकसे 'क्यच्' प्रत्यय होकर 'अन्तःपुरे इव आचरसि अन्तःपुरीयसि' रूप बनता है। 'पौरं जनं सुतीयसि' इसमें 'सुतमिव आचरसि सुतीयसि' यह रूप 'उपमानादाचारे' (अष्टा० ३-१-१०) सूत्रसे वयच् प्रत्यय करनेपर बनता है। 'रमणीयते श्रीः'में 'रमणी इव आचरति' इस अर्थमें 'कर्तुः क्यड सलोपश्र' (अष्टा० ३-१-११) सूत्रसे क्यङ प्रत्यय होकर 'रमणीयते' रूप बनता है। 'अमृतद्युतिदर्श दृष्टः' और 'इन्दुसश्व्वारं संचरति' इन दोनों उदाहरणोंमें 'उपमाने कर्मण च' (अष्टा० ३-४-४५) सूत्रसे कमशः कर्म तथा कर्ता उपपद रहते 'ण्मुल्' प्रत्यय होकर यह रूप बने हैं। इस प्रकार उपमाके भेदोंपर व्याकरणशास्त्रका पर्याप्त नियन्त्रण प्रतीत होता है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि वेद तथा वेदाङ्गोंमें काव्यशास्त्रके मौलिक तत्त्वोंका बीज पर्याप्त रूपमें पाया जाता है।
कालविभाग इस प्रकार हमने वैदिक साहित्यसे लेकर विक्रमसे लगभग ५०० वर्ष पूर्व पाणिनिके कालतक अलङ्कारशास्त्रकी स्थितिपर पिछली पंक्तियोंमें विचार किया। परन्तु इस कालमें अलङ्कारशास्त्रके मौलिक तत्त्वोंका पर्याप्त मात्रामें उल्लेख मिलते हुए भी उसका सुश्लिष्ट शास्त्रीय निरूपण प्राप्त नहीं होता है। उसका शास्त्रीय निरूपण मुख्यतः भरतमुनिसे प्रारम्भ होता है। भरतमुनिका काल प्रायः विक्रमसे २ शताब्दी पूर्वसे लेकर २ शताब्दी बादतकके बीचमें विभिन्न विद्वानों द्वारा नियत किया जाता है। इस प्रकार विकमले दो शताब्दी पूर्वसे लेकर १८वीं शताब्दीतकके पण्डितराज जगन्नाथ, आशाधर भट्ट और अलङ्कारकौस्तुभकार विश्वेश्वर पण्डिततक अलङ्गारशास्त्रके साहित्यका निर्माण होता रहा है। विक्रमसे पूर्व द्वितीय शताब्दीसे लेकर १८ वीं शताब्दीतक लगभग २ हजार वर्षके बीचमें अलङ्कारशास्त्रका इतिहास फैला हुआ है। इस कालका विभाजन कई प्रकारसे विद्वानोंने किया है। अधिकांश विद्वानोंने इस कालको चार भागोंमें विभक्त किया है- १. प्रारम्भिक काल (अज्ञातकालसे लेकर भामहतक) २. रचनात्मक काल (भामह ", " आनन्दवर्धनतक, अर्थार्त् ६०० विकरमीसे ८०० विकमीतक) ३. निर्णयात्मक काल (आनन्दवर्धनकालसे लेकर मम्मटतक, अर्थात् ८०० विक्मीसे १००० विक्मीतक)
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४. व्याख्याकाल (मम्मटकालसे लेकर जगन्नाथ तथा विश्वेश्वर पण्डिततक, अर्थात् १००० विक्रमीसे १७५० विक्रमीतक १. प्रारम्भिक काल
इन चार कालविभागोंमें पहला-प्रारम्भिक काल है। यह अज्ञातकालसे प्रारम्भ होकर ७वीं शताब्दीके प्रारम्भमें भामहतक आता है। इस कालमें मुख्य रूपसे भरत और भामह दो ही मुख्य आचार्य पाये जाते हैं। भरतका 'नाटयशास्त्र' ग्रन्थ साहित्यशास्त्रका मुख्य ग्रन्थ है उसमें रस और नाटकके सूक्ष्म तत्त्वोंका विवेचन बहुत सुन्दर रूपसे किया गया है। परन्तु वह सब मूलभूत है, बीजभूत है। आगे उसका विस्तार अन्य आचार्योंने किया है। 'नाट्यशास्त्र' के १६ वें अध्यायमें केवल ४ अलङ्गार, १० गुण और १० दोषोंका ही विवेचन किया गया है जो अलङ्गारशास्त्रकी दृष्टिसे एक रूपरेखामात्र ही कहा जा सकता है। भरतके बाद मेधावी रुद्र आदि उनके कुछ टीकाकार हुए हैं पर उनके ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होते हैं। उनके बाद वास्तवमें भामह ही अलङ्कारशास्त्रके प्रथम आचार्य पाये जाते हैं और उनका 'काव्यालङ्गार' ग्रन्थ अलङ्गारशास्त्रका मुख्य ग्रन्थ कहा जा सकता है। इसमें इन्होंने भरतके चार अलङ्गारोंके स्थानपर ३८ स्वतन्त्र अलङ्गारोंका विवेचन किया है। भट्टिकाव्यके निर्माता भट्टिने इसीके आधारपर अपने ग्रन्थमें अलङ्कारोंका निरूपण किया है। २. रचनात्मक काल माहित्यशास्त्रका दूसरा महत्त्वपूर्ण काल रचनात्मक काल है जो भामह (६०० विकमी) से लेकर आनन्दवर्धन (८०० विक्रमी) तक २०० वर्षोंमें फैला हुआ है। इस रचनात्मक कालमें साहित्य- शास्त्रके आगे कहे जानेवाले अलङ्कारसम्प्रदाय, रीतिसम्प्रदाय, रससम्प्रदाय तथा ध्वनिसम्प्रदाय चारों मुख्य सम्प्रदायोंके मौलिक ग्रन्थोंका निर्माण हुआ है। इन चारों सम्प्रदायोंके मौलिक साहित्यका निर्णय करनेवाले आचार्य इस कालमें ही हुए हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं- १. अलङ्कारसम्प्रदाय- भामह, उन्डट, रुद्रट २. रीतिसम्प्रदाय- दण्डी, वामन ३. रससम्प्रदाय- लोल्लट, शङकुक और भट्टनायक आदि ४. ध्वनिसम्प्रदाय- आनन्दवर्धन यह काल साहित्यशास्त्रकी दृष्टिसे बड़ा महत्त्वपूर्ण है। इसमें जहाँ एक ओर भामह, उद्ट तथा रुद्रटने काव्यके बाह्य अलङ्गारोंका निरूपण किया, वहाँ दूसरी ओर दण्डी और वामनने काव्य- की रीति और उसके गुणोंकी विवेचना की। भरतनाटयशास्त्रके प्रसिद्ध 'रससूत्र'की व्याख्या करनेवाले लोल्लट, शङकुक और भट्टनायक आदिने नाटयशास्त्रपर टीका लिखकर 'रससिद्धान्त'को स्पष्ट करनेका प्रयत्न किया और इसी कालमें आनन्दवर्धनाचार्यने अपना 'ध्वन्यालोक' ग्रन्थ लिखकर ध्वनिसिद्धान्तकी स्थापना की।
३. निर्णयात्मक काल आनन्दवर्धनसे लेकर मम्मटतक साहित्यशास्त्रका तीसरा महत्त्वपूर्ण काल है जो निर्णयात्मक कालके नामसे प्रसिद्ध है। यह काल ८०० विक्रमीसे लेकर १००० विक्रमीतक दो सौ वर्षोंके बीच
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भूमिका १५ फैला हुआ है। 'ध्वन्यालोक' की प्रसिद्ध टीका 'लोचन' एवं 'नाटयशास्त्र'की 'अभिनवभारती' टीकाके निर्माता अभिनदमुप्त, वकोक्तिजीवितकार कुन्तक, व्यक्तिविवेककार महिमभट्ट इस युगके ग्रधान आचार्य हैं। इनमेंसे कुन्तक पाँचवें वकोक्तितम्प्रदायके संस्थापक हैं और महिमभट्ट ध्वनिसिद्धान्तके कट्टर विरोधी हैं। कुन्तकका 'वकोक्तिजीवित' ग्रन्थ वकोक्तिसिद्धान्तका प्रतिपादन करनेवाला उत्कृष्ट ग्रन्थ है और महिमभट्टका 'व्यक्तिविवेक' ग्रन्थ धवनिसिद्धान्तका आमूल खण्डन करनेवाला उच्च कोटिका ग्रन्थ है। इनके अतिरिक्त रुद्रभट्ट, भोजराज तथा धनिक और धनञ्जय भी इसी कालके उज्जवल रत्न हैं। ४. व्याख्याकाल साहित्यशास्त्रका चौथा महत्त्वपूर्ण काल व्याख्याकालके नामसे प्रसिद्ध है जो मम्मटसे लेकर जगन्नाथ और विश्वेश्वर पण्डिततक अर्थात् १००० से लेकर १७५० तक लगभग ७२ सौ वर्षोंमें फैला हुआ है। यह सबसे लम्बा काल है। इसमें अनेक आचार्य हुए जिनमेंसे हेमचन्द्र, विश्वनाथ और जयदेव आदिने काव्यकी सर्वाङ्गपूर्ण विवेचना की है और साहित्यके सम्पूर्ण विषयोंको लेकर अपने ग्रन्थोंकी रचना की है। रुथ्यक तथा अप्पयदीक्षित आदिने केवल अलङ्गारोंके विवेचनमें ही अपनी शक्तिका व्यय किया है। शारदातनय, शिङ्गभूपाल तथा भानुदत्त आदिने इस सिद्धान्तके विवेचनमें श्लाघनीय प्रयत्न किया है। गौडीय, वैष्णव आचार्य रूपगोस्वामीका सहयोग भी इस कार्यमें श्लाघनीय रहा है। राजशेखर, क्षेमेन्द्र, अमरचन्द्र आदिने कविशिक्षाके विषयपर अपने ग्रन्थोंका निर्माण किया है। इस कालके आचार्योंका वर्गीकरण हम विविध सम्प्रदायोंके अन्तर्गत निम्नलिखित प्रकार कर सकते हैं- १. ध्वनिसम्प्रदाय-मम्मट, रुथ्यक, विश्वनाथ, हेमचन्द्र तथा विद्याधर, विद्यानाथ, जयदेव तथा अप्पयदीक्षित आदि। २. रससम्प्रदाय -- शारदातनय, शिङ्गभूपाल, भानुदत्त, रुपगोस्वामी आदि। ३. कवि-शिक्षा -- राजशेखर, क्षेनेन्द्र, अरिसिंह, अमरचन्द्र, देवेश्वर आदि। ४. अलङ्कारसम्प्रदाय-पण्डितराज जगन्नाथ, विश्वेश्वर पाण्डेय आदि। प्रकारान्तरसे कालविभाग यह एक शैलीसे कालविभाजन किया गया है, जिसमें साहित्यशास्त्रके दो हजार वर्षके लम्बे इतिहासको चार भागोंमें विभक्त किया है। दूसरे विट्वानोंने ध्वनिसिद्धान्तको साहित्यशास्त्रका मुख्य सिद्धान्त मानकर इस कालको तीन भागोंमें विभक्त किया है- १. पूर्वध्वनिकाल -- प्रारम्भसे आनन्दवर्धन (८०० विकमी) तक २. ध्वनिकाल -- आनन्दवर्धन (८०० विक्मी) से मम्मट (१००० विकमी) तक ३. पश्रात् ध्वनिकाल -- मम्मट (१००० विकमी) से जगन्नाथ (१७५० विक्रमी) तक साहित्यशास्त्रके सम्प्रदाय कालविभागके उपर्युक्त प्रकरणमें ध्वनिसम्प्रदाय, रससम्प्रदाय आदि कुछ सम्प्रदायोंकी चर्चा आयी है। इन सम्प्रदायोंकी स्थापना काव्यात्मभूत तत्त्वके विषयमें मतभेदके कारण हुई है। जो लोग रसको काव्यका आत्मा मानते हैं वे रससम्प्रदायके अन्तर्गत हैं। जो अलङ्गारोंको ही काव्यका आत्मा मानते हैं वे अलङ्कारसम्प्रदायके अनुयायी कहे जाते हैं। इसी प्रकार 'रीतिरात्मा काव्यस्य', रीतिको ही
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काव्यका आत्मा माननेवाले रीतिसम्प्रदायके अन्तर्गत आते हैं। 'काव्यस्यात्मा ध्वनिः', ध्वनिको काव्यका आत्मा माननेवाले ध्वनिसम्प्रदायके अनुयायी तथा 'वकोक्ति: काव्यजीवितम्', वक्रोतिको काव्यका आत्मा माननेवाले वकोक्तिसम्प्रदायके अनुयायी कहे जाते हैं। इस प्रकार साहित्यशास्त्रमें प्रायः (१) रस- सम्प्रदाय, (२) अलङ्कारसम्प्रदाय, (३) रीतिसम्प्रदाय, (४) वक्रोत्तिसम्प्रदाय तथा (५) ध्वनि- सम्प्रदाय ये पाँच सम्प्रदाय पाये जाते हैं। भरतसे लेकर पण्डितराज जगन्नाथतक लगभग दो हजार वर्षोंमें साहित्यशास्त्रमें जितने आचार्य हुए हैं वे प्रायः इन्हीं सम्प्रदायोंमेंसे किसी-न-किसी सम्प्रदायमें अन्तर्भुक्त हो जाते हैं। १. रससम्प्रदाय इन पाँचों सम्प्रदायोंमेंसे सबसे मुख्य तथा प्राचीन सम्प्रदाय कदाचित् रससम्प्रदाय है। रस- सम्प्रदायके संस्थापक भरतमुनि हैं। यद्यपि राजशेखरने अपनी 'काव्यमीमांसा' में भरतसे भी पहले नन्दिकेश्वरको रससिद्धान्तका प्रतिष्ठापक माना है, किन्तु नन्दिकेश्वरका कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है। इसलिए उपलब्ध साहित्यके आधारपर साहित्य शास्त्रके पितामह भरतको ही रससम्प्रदायका संस्थापक माना जाता है। रसके विषयमें सबसे पहिला विवेचन भरतके 'नाटयशास्त्र'में ही पाया जाता है। भरतमुनिका 'विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः' यह प्रसिद्ध रससूत्र ही रससिद्धान्तका प्राण- भूत है। उत्तरवर्ती आचार्योंने इसीके आधारपर रसका विवेचन किया है। इसलिए भरतमुनिको ही रस सम्प्रदायका आदिप्रवर्तक मानना होगा। भरतमुनिने 'नाट्यशास्त्र'के छठे अध्यायमें रसोंका और सातवें अध्यायमें भावोंका बहुत विस्तारके साथ सिवेचन किया है। वही रससिद्धान्तका आधार है। भरतमुनिके रससिद्धान्तके व्याख्याकारके रूपमें भट्टनायक, भट्टलोल्लट, शड,कुक, अभिनद- गुप्त आदि पाँच आचार्य बहुत प्रसिद्ध हैं। इनके मतोंकी चर्चा प्रकृत ग्रन्थ 'काव्यप्रकाशमें की गयी है। उनके मतोंका अन्तर क्या है इसे 'काव्यप्रकाश'की प्रकृत टीकामें दिखलाया गया है, उसे वहींसे (पृष्ठ १००-१०६ तक) देखना चाहिये। 'काव्यप्रकाश'का यह सारा विवरण भरतनाट्यशास्त्रकी 'अभिनव- भारती' टीकाके आधारपर दिया है। २. अलङ्कारसम्प्रदाय रससम्प्रदायके बाद दूसरा स्थान अलङ्कारसम्प्रदायका आता है। कालकमसे भरतके बाद होनेवाले दूसरे आचार्य भामह इस अलङ्कारसम्प्रदायके प्रवर्तक माने जाते हैं। उनके व्याख्याकार 'भामह- विवरण' के निर्माता उड्ट और उनके बाद हुए दण्डी, रद्रट आदि और पश्चाद्टर्ती प्रतिहारेन्दुराज तथा जयदेव आदि अनेक आचार्य इस अलङ्गारसम्प्रदायके अन्तर्गत आ जाते हैं। अलङ्कारसम्प्रदायके अनुयायी भी रसकी सत्ता मानते हैं किन्तु उसे प्रधानता नहीं देते हैं। उनके मतमें काव्यका प्राणभूत जीवनाधायक तत्त्व अलङ्गार ही है। अलङ्कारविहीन काव्यकी कल्पना वैसी ही है जैसे उष्णताचिहीन अग्निकी कल्पना। 'चन्द्रालोक' के निर्माता जयदेवने काव्यप्रकाशकारके काव्यलक्षणमें आये 'अनलडकृती पुनः क्वापि', अर्थात् 'कहीं-कहीं' अलङ्गारहीन शब्दार्थ भी काव्य हो सकते हैं' इस अंशपर कटाक्ष करते हुए लिखा है -- 'अङ्गोकरोति यः काव्यं शब्दार्थावनलङकृती। असौ न मन्यते कस्मादनुष्णमनलं कृती ।।' अर्थात् काव्यप्रकाशकार जो अलङ्गारविहीन शब्द और अर्थको भी काव्य मानते हैं वे उष्णताविहीन
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भूमिका अग्निकी सत्ता क्यों नहीं मानते ? अलङ्कारसम्प्रदायवादी, काव्यमें अलङ्गारोंको ही प्रधान मानते हैं और इसका अन्तर्भाव रसवदलङ्गारोंमें करते हैं। रसवत्, प्रेय, ऊर्जस्विन् और समाहित, चार प्रकारके रसवदलङ्गार माने जाते हैं। भामह और दण्डी दोनोंने इन रसवदलङ्गारोंके भीतर ही रसका अन्त- अन्तर्भाव किया है-
यथा।' -- भामह, काव्यालडकार ३-६ 'मधुरे रसवद्वाचि वस्तुन्यपि रसस्थितिः ।' -- दण्डी, काव्यादर्श ३-५१ . रीतिसम्प्रदाय कालकममें अलङ्कारसम्प्रदायके बाद रीतिसम्प्रदायका स्थान आता है। रीतिसम्प्रदायके संस्थापक भामहके बाद होनेवाले वामन हैं। वामनने काव्यमें अलङ्गारकी प्रधानताके स्थानपर रीतिकी प्रधानताका प्रतिपादन किया है। 'रीतिरात्मा काव्यस्य" यह उनका प्रमुख सिद्धान्त है। इसीलिए उन्हें रीतिसम्प्रदायका प्रवर्तक माना जाता है। रीति क्या है इसका विवेचन करते हुए उन्होंने 'विशिष्ट- पदरचना रीतिः" अर्थात् विशिष्ट पदरचनाका नाम 'रीति' है यह लक्षण किया है। आगे उस 'विशेष' की व्याख्या करते हुए 'विशेषो गुणात्मा" अर्थात् रचनामें माधुर्यादि गुणोंका समावेश ही उसकी विशेषता है और यह विशेषता ही 'रीति' है। इस प्रकार इस सिद्धान्तमें 'गुण' और 'रीति' का अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है इसलिए रीतिसम्प्रदायको 'गुणसम्प्रदाय'के नामसे भी कहा जाता है। वामनने 'काव्यशोभायाः कर्तारो धर्मा गुणाः" तथा 'तदतिशयहेतवस्त्वलङ्गाराः" इन दो सूत्रोंको लिखकर गुण तथा अलङ्गारोंका भेद प्रदर्शित करते हुए अलङ्गारोंकी अपेक्षा गुणोंके विशेष महत्त्वको प्रद्शित किया है। गुण काव्यशोभाके उत्पादक होते हैं। अलङ्गार केवल उस शोभाके अभिवर्द्धक होते हैं। इसलिए काव्यमें अलङ्कारोंकी अपेक्षा गुणोंका स्थान अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसीलिए वामनने अलङ्कारोंकी प्रधानताको समाप्त कर गुणोंकी प्रधानताका प्रतिपादन करनेवाले रीतिसम्प्रदायकी स्थापना की। मम्मट आदि उत्तरवर्ती आचार्योंने 'रीति'की उपयोगिता तो स्वीकार की है किन्तु उसे काव्यका आत्मा स्वीकार नहीं किया है। उनके मतमें 'रीतयोऽवयवसंस्थानविशेषवत्', काव्यमें रीतियोंकी स्थिति वैसी ही है जैसे शरीरमें आँख, नाक, कान आदि अवयवोंकी। इन अवयवोंकी रचना शरीरके लिए उपयोगी भी है और शरीरशोभाकी जनक भी है फिर भी उसे आत्माका स्थान नहीं दिया जा सकता है। इसी प्रकार काव्यमें 'रीति' का महत्त्व तथा शोभाजनकत्व होनेपर भी उसे काव्यका आत्मा नहीं कहा जा सकता है। ४. वकरोक्तिसम्प्रदाय कालकमसे वामनके रीतिसिद्धान्तके बाद उसको दबाकर वकोक्तिसम्प्रदायके संस्थापक वक्रोक्ति- जीवितकार कुन्तक माने जाते हैं। कुन्तकने काव्यमें रीतिकी प्रधानताको समाप्त कर 'वकोक्ति'की प्रधानताकी स्थापना की। वैसे काव्यमें 'वक्रोक्ति'का मूल्य भामहने भी स्वीकार किया है- १. काव्यालङ्कारसूत्र १-२-६। २. का० सू० १-२-७। ३. का० सू० १-२-८ । ४. का० सू० ३२-१। ५. का० सू० ३-१-२। २
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'सैषा सर्वत्र वक्रोवितिरनयार्थो विभाव्यते। यत्नोऽस्यां कविना कार्य: कोडलङ्कारोऽनया विना।' -- भामह, काव्यालङ्कार २-८५ इसी प्रकार दण्डीने 'भिन्नं द्विधा स्वभावोक्तिर्वक्रोक्तिश्चेति वाङ्मयम्' (काव्यादर्श, २-३६३) लिखकर वक्रोक्तिके महत्त्वका प्रतिपादन किया है। और वामनने भी 'सादृश्याल्लक्षणा वकोक्तिः' (काव्यालड्कारसूत्र, ४-३-८ की वृत्ति) लिखकर काव्यमें 'वकरोक्ति'का स्थान माना है। किन्तु उन सबके मतसे वकोक्ति सामान्य अलङ्गारादिरूप ही है। कुन्तकने वक्रोक्तिको जो गौरव प्रदान किया है वह उन आचार्योंने नहीं दिया है। इसलिए कुन्तक ही इस सम्प्रदायके संस्थापक माने जाते हैं। उन्होंने इस वकोक्तिसिद्धान्तके ऊपर भी 'वकोक्तिजीवित' नामक अपने विशाल एवं अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ग्रन्थकी रचना की है। वकोक्तिजीवितकारने अपने पूर्ववर्ती रीतिसिद्धान्तको भी परिमाजित करके अपने यहाँ स्थान दिया है। वामनकी पाश्चाली, वैदर्भी, गौडी आदि 'रीतियाँ' देशभेदके आधारपर मानी जाती थीं। कुन्तकने उनका आधार देशको न मानकर रचनाशैलीको माना है और उनके लिए 'रीति' के स्थानपर 'मार्ग' शब्दका प्रयोग किया है। वामनकी वैदर्भी रीतिको कुन्तक 'सुकुमारमार्ग' कहते हैं। इसी प्रकार गौडी रीतिको 'विचित्मार्ग तथा पाञ्चाली रीतिको 'मध्यममार्ग' नामसे कहते हैं। ५. ध्वनिसम्प्रदाय कालकमसे वक्रोक्तिसम्प्रदायके बाद ध्वनिसम्प्रदायका उदय हुआ। इस सम्प्रदायके संस्थापक आनन्दवर्धनाचार्य माने जाते हैं। इनके मतमें 'काव्यस्यात्मा ध्वनिः', काव्यका आत्मा ध्वनि है। इन सभी सम्प्रदायोंमें ध्वनिसम्प्रदाय सबसे अधिक प्रबल एवं महत्त्वपूर्ण सम्प्रदाय रहा है। यों इसके विरोधमें भी अनेक ग्रन्थ लिखे गये, किन्तु उस विरोधसे ध्वनिसिद्धान्त वैसा ही अधिकाधिक चमकता गया जैसे अग्निमें तपानेपर स्वर्णकी कान्ति तढ़ती जाती है। ध्वनिसिद्धान्तके विरोधमें वैयाकरण, साहित्यक, वेदान्ती, मीमांसक, नैयायिक सभीने आवाज उठायी, किन्तु अन्तमें काव्यप्रकाशकार मम्मटने बड़ी प्रबल युक्तियों द्वारा उन सबका खण्डन करके ध्वनिसिद्धान्तकी पुनः स्थापना की। इसीलिए उनको 'ध्वृनिप्रतिष्ठापक परमाचार्य' कहा जाता है। भरतसे लेकर पण्डितराज जगन्नाथतक लगभग दो हजार वर्षोंके दीर्घकालके भीतर इन सम्प्रदायों- का विकास और सङ्र्ष होता रहा है। इस बीचमें लगभग चालीस-पैंतालीस मुख्य आचार्योंने इस साहित्यिक विकासके कार्यमें अपना योगदान किया है। उनका परिचय इस सारे सङ्गर्ष एवं विकासको समझनेमें उपयोगी होगा; इसलिए निम्नलिखित पंक्तियोंमें हम साहित्यशास्त्रके उन प्रमुख आचार्योंका संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करनेका यत्न करते हैं।
साहित्यशास्त्रके आचार्योंका परिचय भरतमुनि भरतमुनि साहित्यशास्त्रके आचार्योंमें सबसे प्राचीन आचार्य माने जाते हैं। भरत नामसे पाँच विभिन्न व्यत्तियोंका उल्लेख संस्कृत साहित्यमें पाया जाता है-१. दशरथके पुत्र भरत, २. दुष्यन्तके पुत्र भरत, ३. मान्धाताके प्रपात् अरत, ४. जड़भरत और ५. 'नाट्यशास्त्र'के प्रवर्तक भरतमुनि।
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भूमिका १६
हमें यहाँ केवल अन्तिम अर्थात् नाटयशास्त्रकार भरतमुनिके विषयमें ही विवेचन करना है, क्योंकि साहित्यशास्त्रके आचार्योंमें उन्हींकी गणना की जाती है। अन्य भरतोंका साहित्यशास्त्रके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। भरतमुनिके कालका निर्णय करना बड़ा कठिन कार्य है। कुछ विद्वान् भरत नामको एक काल्पनिक नाम मानते हैं। डॉ० मनमोहन घोषका 'नाटचशास्त्र' का अंग्रेजी अनुवाद 'रायल एशियाटिक सोसाइटी' बंगालसे अभी सन् १६५० में प्रकाशित हुआ है। उसमें भी उन्होंने भरतमुनिको एक काल्पनिक व्यक्ति माना है। इस मतके मानननेवाले लोगोंका यह विचार है कि प्रारम्भमें जो नटगण स्वाँग भरते थे वे स्वाँग भरनेके कारण 'भरत' कहलाते थे। बादमें उनके आदिपुरुषके रूपमें भरतमुनिकी कल्पना कर ली गयी। परन्तु यह मत वास्तवमें ठीक नहीं है। भरतमुनि काल्पनिक व्यक्ति नहीं अपितु ऐतिहासिक व्यक्ति हैं। सारे साहित्यशास्त्रमें उनको 'नाटयशास्त्र'के प्रवर्तकरूपमें स्मरण किया गया है। 'मत्स्य- पुराण' के २४ वें अध्यायमें २७-३२वें श्लोकतक ६ श्लोकोंमें भरतमुनिका उल्लेख अनेक बार किया गया है। उनमें यह कथा कही गयी है कि भरतमुनिने देवलोकमें 'लक्ष्मीस्वयंवर' नामक नाटकका अभिनय करवाया था। उसमें अप्सरा उर्वशी लक्ष्मीका अभिनय कर रही थी। देवसभामें इन्द्रके साथ राजा पुरूरवा भी उपस्थित थे। पुरूरवाके रूपको देखकर उरवशी उस समय ऐसी मोहित हो गयी कि वह अपना अभिनय करना भूल गयी। इसपर भरतमुनिने अप्रसन्न होकर पुरूरवा और उर्वशी दोनोंको शाप दे दिया। महाकवि कालिदासने भी इस घटनाकी ओर सङ्केत किया है और भरतमुनिके नामका उल्लेख करते हुए लिखा है- 'मुनिना भरतेन यः प्रयोगो भवतीष्वष्टरसाश्रयः प्रयुक्तः । ललिताभिनयं तमद्य भर्ता मरुतां द्रष्टुमनाः सलोकपालः ।' -- विकमोर्वशीय २-१८ भरतके 'नाटयशास्त्रमें भी देवलोकमें भरतमुनिके द्वारा किये जानेवाले अभिनयका वर्णन किया गया है। इसमें भरतमुनिके सौ पुत्रोंकी लम्बी सूची भी दी गयी है और साथमें अप्सराओंके नामोंकी सूची दी गयी है, जिनके द्वारा भरतमुनिने अभिनयकी योजना की थी। संस्कृतके सभी नाटकोंकी समाप्ति प्रायः 'भरतवाक्य'के साथ होती है। और अभिनवगुप्त आदि सभी प्राचीन लेखकोंने भरतमुनिको' 'नाटयशास्त्र'का प्रवर्तक माना है, इसलिए उनको कल्पित व्यक्ति कहना उचित नहीं है। भरतमुनिके कालका निर्णय कर सकना यद्यपि बहुत कठिन है फिर भी जो लोग उनको ऐतिहासिक व्यक्ति मानते हैं वे उनका समय ५०० विक्रमपूर्वसे लेकर प्रथम शताब्दीतकके बीचमें मानते हैं। अश्वघोष नामक बौद्ध दार्शनिक तथा कवि, विक्रमकी प्रथम शताब्दीमें हुए हैं। उनका 'सारिपुत्रप्रकरण' नामक एक नाटयग्रन्थ भी खण्डित अवस्थामें अभी मिला है। आलोचकोंकी सम्मतिमें उसके ऊपर भी भरतमुनिके 'नाट्यशास्त्र'का प्रभाव दिखायी देता है। इसलिए भरतमुनिका काल उनसे पहिले अवश्य ही मानना होगा। अतएव कुछ विद्वान् लोग विक्रमपूर्व पश्चम शताब्दीसे लेकर विक्रमकालके बीचमें कहीं भरतमुनिका समय मानते हैं। भरतमुनिका एकमात्र ग्रन्थ 'नाटयशास्त्र' है। यों नामसे तो वह नाटयके विषयका ही ग्रन्थ प्रतीत होता है परन्तु वस्तुतः वह समस्त कलाओंका विश्वकोष है। स्वयं भरतमुनिने 'नाटयशास्त्र' का परिचय देते हुए लिखा है-
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काव्यप्रकाश:
'न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला। नासौ योगो न तत्कर्म नाट्येऽस्मिन् यन्न दृश्यते ।।" जो बात उन्होंने नाटयके विषयमें कही है वही बात उनके 'नाटयशास्त्र'पर भी चरितार्थ होती है। उनका 'नाटयशास्त्र' न केवल नाटयका ही अपितु समस्त ललित एवं उपयोगी कलाओंका आकरग्रन्थ है। वर्तमान 'नाटयशास्त्र' प्रायः ६,००० श्लोकोंका ग्रन्थ है। इसलिए उसको 'षट्साहस्त्री संहिता' भी कहा जाता है। पर इसके पूर्व उसका १२,००० श्लोकोंका भी कोई संस्करण रहा होगा क्योंकि उसकी 'द्वादशसाहत्री संहिता' का भी उल्लेख पाया जाता है। शारदातनयने अपने 'भावप्रकाशन' ग्रन्थमें इन दोनों संस्करणोंका उल्लेख किया है और उनमेंसे 'द्वादशसाहस्त्री संहिता'का रचियिता वृद्ध- भरतको और 'षट्साहस्री संहिता' का रचयिता भरतको बतलाया है। उन्होंने लिखा है- 'एवं द्वादशसाहस्त्रः श्लोकरेकं तदर्धतः । षड्भि: श्लोकसहस्त्र्यो नाटचवेदस्य संग्रहः ॥" नाटयशास्त्रका वर्तनान संस्करण 'षट्साहत्री' संस्करण है। इसमें कुल ३६ अध्याय हैं। निर्णयसागरसे प्रकाशित प्रथम संस्करणमें 'नाटयशास्त्र'के ३७ अध्याय दिखलाये गये थे। परन्तु 'नाटय- शास्त्र के प्राचीन टीकाकार अभिनवगुप्तने उसमें केवल ३६ अध्यायोंका वर्णन करते हुए लिखा है-
षटत्रिशकं भरतसूत्रमिदं विवृण्वन् बन्दे शिवं. ........... .li'
'नाटयशास्त्रका सम्पादन सन् १८२५ में विलसन महोदयने कुछ संस्कृत नाटकोंका अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया था। उस समय 'नाट्यशास्त्र' की कोई प्रति सर्वसाधारणके लिए सुलभ न थी। विलसन महोदयको भरत- मुनिके 'नाट्यशास्त्र' का उल्लेख तो विभिन्न ग्रन्थोंमें मिला, परन्तु उसकी कोई प्रति उपलब्ध न हो सकी, इसलिए उस समय उन्होंने बड़े दुःखके साथ यह लिखा कि भरतमुनिका 'नाटयशास्त्र' तो सर्वदाके लिए लुप्त हो गया प्रतीत होता है। इसके चालीस वर्ष बाद सन्१८६५ में फ्रेड्रिक हाल महोदयको 'नाटय- शास्त्र' की एक प्रति प्राप्त हुई। परन्तु वह अत्यन्त अशुद्ध थी इसलिए वे उसका सम्पूर्ण रूपसे सम्पादन तथा प्रकाशन न कर सके। फिर भी उन्होंने उसके कुछ अध्यायोंको अपने सम्पादित 'दशरूपक'के साथ प्रकाशित किया।
हाल महोदयके इस प्रकाशनसे 'नाटयशास्त्रके बिलकुल लुप्त हो जानेकी धारणाका निराकरण हो गया, इसलिए विद्वान् लोग हस्तलिखित ग्रन्थोंके भण्डारोंमें इस 'नाटयशास्त्र' की अन्य प्रतियोंकी खोज बड़ी तत्परतासे करने लगे। सन् १८७४ में हेमान नामक जर्मन विद्वान्ने 'नाट्यशास्त्र' की एक और नयी प्रतिका पता लगाकर गौटिंगेन नगरकी राजकीय विज्ञान-परिषद्की विवरणपुस्तकमें 'नाटयशास्त्र'- का एक विस्तृत परिचय प्रकाशित किया। उसके बाद सन् १८८० में रैग्नो नामक फ्रांसके एक विद्वान्ने १. ना. शा० १-११७। २. भावध्रकाशन, पृ० २८७।
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भूमिका २१
'नाटयशास्त्र' के १५वें तथा १६ वें अध्यायोंको प्रकाशित किया। उसके बाद सन् १८८४ में उन्हीं रैग्नो महोदयने ६ठें तथा ७वें अध्यायोंको प्रकाशित किया। रैग्नो महोदयके शिष्य ग्रौसे नामक दूसरे फ्रेंच विट्वान्ने अपने गुरुके कार्यको आगे बढ़ाते हुए सन् १८८८ में नाटयशास्त्रके संगीतविषयक २८ वें अध्यायको सम्पादित करके प्रकाशित किया और उसके बाद भी 'नाटयशास्त्र'के सम्पादनमें अनवरत तत्पर रहे। अनेक कठिनाइयोंके होते हुए भी सन् १८६८ में उन्होंने 'नाट्यशास्त्र'के प्रारम्भिक १४ अध्यायोंका एक सुसम्पादित संस्करण प्रकाशित किया। ग्रौसेके इस संस्करणके प्रकाशित होनेके पूर्व फ्रांसके प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान् प्रो० शिल्वाँ लेबी ने अपने भारतीय नाटकविषयक ग्रन्थमें भरतके 'नाटयशास्त्र'के कुछ अध्यायोंका विवेचन किया था, पर वह बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता था। इसी बीचमें ग्रौसेके संस्करणसे पहले हमारे भारतमें भरत- नाटयशास्त्रका प्रथम संस्करण निर्णयसागर प्रेस, बम्बईकी काव्यमाला सीरीजमें प्रकाशित हुआ। इसका सम्पादन स्वर्गोय श्री पण्डित शिवदत्तजी तथा श्री काशीनाथ पाण्डुरङ्ग परब महोदयने किया था।
इतना कार्य हो चुकनेपर भी 'नाटयशास्त्र'का समझना और उसकी समुचित व्याख्या कर सकना विद्वानोंके लिए एक समस्या ही बनी हुई थी। क्योंकि ये संस्करण पर्याप्त शुद्ध न थे और न उनकी कोई टीका आदि अबतक मिल सकी थी। सर्तमान २० वीं शताब्दीके आरम्भमें डॉ० सुशीलकुमार दे महोदयने 'नाटयशास्त्र'की 'अभिनवभारती' नामक प्राचीन टीकाकी एक प्रति खोजकर निकाली। इस टीकाके रचयिता कश्मीरके प्रसिद्ध विद्वान् श्री अभिनवगुप्तपादाचार्य हैं। बादको मद्रासके प्रसिद्ध विद्वान् श्री रामकृष्ण कवि महोदयने 'अभिनवभारती' टीका और मूल 'नाट्यशास्त्र'को सम्पादित करनेका भार उठाया और सन् १६२६ में उसके सात अध्यायोंका प्रथम भाग तथा सन् १६३४ में द्वितीय भाग १८ अध्यायतकका प्रकाशित किया। इसका तृतीय भाग भी अब प्रकाशित हुआ है और चतुर्थ भाग भी शीध्र प्रकाशित होनेकी आशा है। 'अभिनवभारती' के प्रकाशनसे यह आशा हुई थी कि 'नाटयशास्त्र'का रहस्य स्पष्ट हो जायगा। और बहुत-कुछ अंशोंमें ऐसा हुआ भी है। परन्तु दुःखकी बात यह है कि 'अभिनवभारती'की जो प्रतियाँ उपलब्ध हुई वे सब अत्यन्त दूषित थीं। उनका पाठ अत्यन्त अशुद्ध था। सम्पादक महोदयको जिस प्रकारका पाठ हस्तलिखित प्रतियोंमें मिला उसको उन्होंने उसी रूपमें छाप दिया था। परन्तु वह पाठ इतना अधिक अशुद्ध और असङ्गत है कि उससे ग्रन्थका अभिप्राय समझ सकना नितान्त असम्भव है। उसके सम्बन्धमें विद्वानोंका कहना तो यह है कि 'अभिनवभारती' का पाठ इतना अधिक अशुद्ध है कि यदि स्वयं अभिनवगुप्ताचार्य भी स्व्गसे उतरकर आ जायँ तो वर्तमान पाठको देखकर वे भी अपने अभिप्रायको नहीं समझ सकते। इस प्रकारकी अशुद्धियोंके दो कारण हुए हैं। एक तो यह कि सम्पादक महोदयको जो पाण्डुलिपि प्राप्त हुई थी उसे अनेक स्थानोंपर कीड़ों ने खा डाला था। इसलिए उन स्थानोंपर क्या पाठ था यह पढ़ा नहीं जा सकता। इसी कारणसे मुद्रित संस्करणमें अनेक जगह पाठ लुप्त-सा दिखायी देता है। दूसरा कारण यह है कि पाण्डुलिपिके पृष्ठोंपर संख्या पड़ी हुई नहीं थी। इसलिए कहीं-कहींपर जहाँ कि पृष्ठोंको किसीनी इधर-उधर करके रख दिया था, वे वहीं छाप दिये गये। इस प्रकार उनके मुद्रणमें भी भूल हो गयी है, अर्थात् पाठोंका पौर्दापर्य बिगड़ गया है। ऐसी अवस्थामें किसी पाठका अर्थ समझमें आ ही कैसे सकता है।
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२२ काव्यप्रकाश:
हमारा संस्करण हमने अभी 'अभिनवभारती' का पाठसंशोधनकर नवीन संस्करण प्रस्तुत किया है जो दिल्ली विश्वविद्यालयकी 'हिन्दी-अनुसन्धान-परिषद्'की ओरसे प्रकाशित हो गया है। इसमें हमने अपनी विवेकाश्रित सम्पादन-पद्धतिसे पाठोंका संशोधन करनेका यत्न किया है। जहाँपर कीड़ोंके खा जानेके कारण हस्तस्लिखित पाण्डुलिपियोंमें पाठ न पढ़े जा सकनेसे मुद्रित प्रतिमें पाठ लुप्त हो गये थे वहाँ हमने प्रसङ्गके अनुसार लुप्त पाठकी पूर्ति करनेका यत्न किया है। जहाँ दो-चार अक्षरोंका ही लोप हुआ था वहाँ तो हमारा संशोधित पाठ निश्चय ही ठीक बैठ गया है। पर जहाँ लम्बा पाठ लुप्त हो गया था वहाँ भी अक्षरशः नहीं तो भी ग्रन्थकारका भाव पूर्णतः संशोधित पाठमें आ गया है। इसी प्रकार जहाँ पृष्ठोंके व्युत्कमसे रख दिये जानेके कारण मुद्रित संस्करणमें पाठ उलट-पलटकर अस्थानमें छप गये थे वे भी प्रायः ठीक स्थानपर कर दिय गये हैं। पाठोंका यह संशोधन बड़ा असाध्य कार्य था। पर मैंने उसे करनेका यत्न किया है। यदि विद्वानोंको सन्तोषप्रद हुआ तो हम अपना श्रम सफल समझेंगे और यदि इस कार्यमें कोई भूल-चूक हुई हो तो विद्वानोंके परामर्शका आदर करते हुए अगले संस्करणमें और आवश्यक सुधार करनेका यत्न करेंगे। भरतमुनिके टीकाकार भरतमुनिके 'नाटयशास्त्र'की यद्यपि केवल एक ही टीका 'अभिनवभारती' अबतक उपलब्ध हुई है परन्तु उसे देखनेसे विदित होता है कि उनके पूर्व अन्य अनेक टीकाकारोंने 'नाटयशास्त्र'पर टीकाएँ लिखी थीं। किन्तु वे सब कालकमसे विलुप्त हो गयीं या कम-से-कम अबतक प्राप्त नहीं हो सकी हैं। इनमेंसे १. भट्टोन्ड्रट, ३. भट्टलोल्लट, ३. भट्टशङकुक और ४. भट्टनायक इन चार व्याख्याकारोंका उल्लेख तो काव्यप्रकाशकारने भी किया है। भरतके 'रससूत्र' की व्याख्यामें इन चारोंके मतोंका उल्लेख अभिनवभारतीकारने भी किया है। इनके साथ पाँचवें अभिनवगुप्त और छठे कीतिधरको मिलाकर 'सङ्गीतरत्नाकर' के लेखक श्री शार्ङ्गदेवने भरतके छः टीकाकारोंका उल्लेख निम्नलिखित प्रकारसे किया है- व्याख्यातारो भारतीये लोल्लटो ट्रुटशङकुका; । भट्टाभिनवगुप्तश्च श्रीमान् कीतिधरोऽपर: ।' इन छःटीकाकारोंके अतिरिक्त 'अभिनवभारती' में ७. राहुल, ८. भट्टयन्त्र और ६. हर्षवार्तिकका उल्लेख अपनी टीकामें किया है। राहुलके मतका उल्लेख करते हुए 'अभिनवभारती' के चतुर्थ अध्यायमें पृष्ठ १७२ पर लिखा है- 'यथाह राहुल :- परोक्षेऽपि हि वक्तव्यो नार्या प्रत्यक्षवत् प्रियः । सखी च नाटयधर्मोडयं भरतेनोदितं द्वयम् ।' अभिनवभारतीकारने पृष्ठ २०८ पर भट्टयन्त्रके मतका उल्लेख करते हुए लिखा है- 'शिक्षार्हस्वेच्छान्यनृत्तकतिपयनाटयाङ्गकृतं नृत्तमभ्यासफलमिति भट्टयन्त्रः ।
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भूमिका २३ इसी पृष्ठ २०८ पर अभिनवभारतीकारने 'नाट्यमेवेदमिति कीतिधराचार्यः' लिखकर कीतिधरके नामका भी उल्लेख किया है! वार्तिककारके मतका उल्लेख 'अभिनवभारती' के पृष्ठ १७२ पर भी किया गया है और फिर पृष्ठ २०७ पर भी उनका उल्लेख किया है। दोनोंमें अन्तर यह है कि पहिली जगह अर्थात् पृष्ठ १७२ पर केवल 'वार्तिककृताप्युक्तम्' इस रूपमें नामके बिना वार्तिककारका उल्लेख किया है। और दूसरी जगह अर्थात् पृष्ठ २०७ पर 'इति हर्षवार्तिकम्' इस रूपमें वार्तिकके साथ हर्ष नामको जोड़कर उसका उल्लेख किया गया है। इससे प्रतीत होता है कि 'नाट्यशास्त्र'पर वार्तिक लिखनेवाले कदाचित् हर्षदेव या श्रीहर्ष आदि नामका कोई व्यक्ति रहा होगा। इन नौ टीकाकारोंका उल्लेख 'अभिनवभारती' तथा 'सङ्गीतरत्नाकर' आदि ग्रन्थोंमें पाया जाता है। इनके अतिरिक्त मातृगुप्ताचार्य नामक एक दसवें व्यक्तिका नाम भी इस प्रसङ्गमें लिया जाता है। राघवभट्टने 'अभिज्ञानशाकुन्तल'की टीकामें दृष्ठ १५ पर भरतके आरम्भ तथा बीचके लक्षणवाले पद्योंको उद्धृत कर उनका भेद दिखलानेके लिए मातृगुप्ताचार्यका उल्लेख करते हुए लिखा है- 'अत्र विशेषो मातृगुप्ताचायै रुक्त :.......... । क्वचित् कारणमात्रन्तु क्वचिच्च फलदर्शनम् ।' इसी प्रकार 'नाटयप्रदीप' के निर्माता सुन्दरमित्र (१६१३ ई०) ने 'नाटय शास्त्र' ५-२५ तथा ५-२८ से नान्दी-लक्षणको उद्धृत करते हुए लिखा है- 'अस्य व्याख्याने मत्गुप्ताचायै: षोडशांघिपदापीयमुदाहृता।' इस लेखसे प्रतीत होता है कि उन्होंने भी भरतनाट्यशास्त्रपर कोई व्याख्या लिखी थी। इस प्रकार भरतमुनिके व्याख्याकारोंके रूपमें प्रायः दस विद्वानोंका उल्लेख पाया जाता है परन्तु उनमेंसे एक 'अभिनवभारती' को छोड़कर अन्य किसीका टीकाग्रन्थ अबतक उपलब्ध नहीं हुआ है। और यह भी विदित नहीं होता है कि उन्होंने सारे 'नाटयशास्त्र' के ऊपर अपनी टीकाएँ लिखी थीं अथवा उसके किसी विशेष भागपर ही अपनी व्याख्याएं की थीं। केवल एक 'अभिनवभारती' व्याख्या ऐसी है जो 'नाटय- शास्त्र'के अधिकांश भागपर की गयी है। किन्तु कुछ अध्यायोंमें और कुछ स्थलोंपर वह भी उपलब्ध नहीं होती। जो कुछ उपलब्ध होती है वह भी अशुद्ध पाठोंके कारण दुरूह है। अच्छे-अच्छे विद्वान् भी पाठदोषके कारण उसे समझ नहीं सकते। हमने केवल तीन अध्यायों (१,२ तथा ६) का पाठसंशोधन किया है। उतना भाग तो अब सुबोध हो गया है, परन्तु शेष भाग अभी संशोधनकी अपेक्षा रखता है। . मेधावी साहित्यशास्त्रके इतिहासमें भरतमुनिके बाद मुख्य रूपसे भामहका नाम आता है। परन्तु इन दोनोंके बीचमें छः-सात सौ वर्षका व्यवधान पड़ता है। भरतमुनिका समय, जैसा कि पहले कहा जा चुका है, विकमके पूर्व प्रथम शताब्दी या विक्रमके बाद प्रथम शताब्दीतक माना जाता है। भामहका काल, जैसा कि आगे कहेंगे, विक्रमके षष्ठ शतकका पूर्वार्द्ध माना जाता है। इतना लम्बा बीचना काल साहित्यक आचार्योंसे शून्य ही पड़ा रहा हो ऐसा सम्भव नहीं है। इस बीचमें भी अनेक आचार्य हुए होंगे। १. नाटयशास्त्र (बड़ोदा), पृ० १७२। २. ना० शा० (वड़ोदा), पृ० २०८।
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२४ काव्यप्रकाश: परन्तु दैवदुविपाकसे आज हमको उनका कोई पता नहीं चलता है। इन्हीं बीचके आचार्योंमें मेधावी या मेधाविरुद्र नामके अलङ्गारशास्त्रके एक प्रमुख आचार्य हो चुके हैं। उनका पता हमें भामह, रुद्रटके व्याख्याकार नमिसाधु और राजशेखर आदिके ग्रन्थोंसे मिलता है। मेधावी आचार्यके जिस मुख्य सिद्धान्तकी चर्चा उत्तरवर्ती साहित्यमें की गयी है वह उनका उपमादोषोंके विवेचनका सिद्धान्त है। उन्होंने १. हीनता, २. असम्भव, ३. लिङ्गभेद, ४. वचनभेद, ५. विपर्यय, ६. उपमानाधिवय तथा ७. उपमानासादृश्य-इन सात प्रकारके उपमादोषोंका विशेष रूपसे निरूपण किया था। इसकी चर्चा भामह, नमिसाधु तथा वामनने अपने ग्रन्थोंमें की है। भामहने इस विषयका विवेचन करते हुए लिखा है -- 'होनताऽसम्भवो लिङ्गवचोभेदौ विपर्ययः । उपमानाधिकत्वं च तेनासदृशतापि च॥ त एत उपमादोषाः सप्त मेधाविनोदिताः । सोदाहरणलक्ष्माणो वर्ण्यन्तेऽत्र ते च पृथक् ।' -- भामह, काव्यालङ्कार २-३६, ४० रुद्रटके, 'काव्यालङ्गार' (११-२४) की टीकामें इसी विषयकी चर्चा करते हुए उसके टीकाकार नमिसाधुने लिखा है- 'अत्र च स्वरूपोपादाने सत्यपि चत्वार इति ग्रहणान्मेधादि-प्रभृतिभिरुक्तं यथा लिङ्गवचनभेदौ हीनताधिक्यमसम्भवो विपर्ययोऽसादृश्यमिति सप्तोपमादोषाः ... तदेतन्निरस्तम्।' मेधावीने जिन सात उपमादोषोंका प्रतिपादन किया था उनमेंसे विपर्ययको हीनता या अधिकता दोषके अन्तर्गत करके वामनने सातके स्थानपर केवल छः उपमादोषोंका प्रतिपादन करते हुए लिखा है- 'अनयोर्दोषयोविपर्ययाख्यस्य दोषस्यान्तर्भावान्न पृथगपादानम् । अत एवास्मारक मते षड्दोषा इति।' -- वामन, काव्यालङ्गारसूत्र ४-२-११ की वृत्ति वामनने यद्यपि भामह और नमिसाधुकी तरह यहाँ मेधावीके नामका उल्लेख नहीं किया है, वरन्तु इस विवेचनको देखते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि मेधावीके सात दोषोंवाले सिद्धान्तके आलोचना- रूपमें ही इसे लिखा है। दोषोंके अतिरिक्त अलङ्कारोंके विवेचनमें भी भामह और दण्डीने मेधावीके सिद्धान्तकी चर्चा की है। भागह आदि उत्तरवर्ती आलङ्कारिकोंने 'यथासंख्य' तथा 'उत्प्रेक्षा' दो अलग-अलग अलङ्गार माने हैं, परन्तु मेधावी 'उत्प्रेक्षा' को अलग अलङ्कार न मानकर कहीं-कहीं 'संख्यान' नामसे ही उसका कथन करते हैं। इसी बातका प्रतिपादन करते हुए भामहने लिखा है -- विदुः। संख्यानमिति मेधाविनोत्प्रेक्षाऽभिहिता क्वचित् ।' -- भामह, काव्यालड्कार २-८८
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भूमिका २५
दण्डीने इस संख्यान नामको उत्प्रेक्षाका वाचक न कहकर यथासंख्यका ही दूसरा नाम माना है और उसीको 'क्रम' नामसे भी कोई आचार्य कहते हैं यह लिखा है- 'यथासंख्यमिति प्रोक्तं संख्यानं क्रम इत्यपि।' -- दण्डी, काव्यादर्श २-३८३ दण्डीके इस लेखमें यद्यपि मेधावीके नामका उल्लेख नहीं किया गया है और न उनके उत्प्रेक्षाको 'संख्यान' नामसे कहनेकी चर्चा की गयी है फिर भी उसमें मेधावीके द्वारा प्रयुक्त 'संख्यान' नामकी चर्चा हुई है इसलिए हमने उसको यहाँ दे दिया है। मेधाविरुद्रके तीसरे जिस सिद्धान्तकी चर्चा उत्तरवर्ती साहित्यमें पायी जाती है, वह है शब्दोंका चतुर्धा विभाग। व्याकरण आदि शास्त्रोंमें शब्दोंके १. नाम, २. आख्यात, ३. उपसर्ग, ४. निपात और ५. कर्मप्रवचनीय नामसे पाँच विभाग किये गये हैं, परन्तु मेधाविरुद्रने इनमेंसे कर्मप्रवचचीयको छोड़ केवल १. नाम, २. आख्यात, ३. उपसर्ग और ४. निपात, चार ही विभाग किये हैं। इसकी चर्चा करते हुए र्द्रट-काव्यालड्गारकी टीकामें नमिसाधुने लिखा है- 'एत एव चत्वारः शब्दविधा इति येषां सम्यङमतं तत्र तेषु नामादिषु मध्ये मेधाविरुद्रप्रभृतिभिः कर्मप्रवचनीया नोक्ता भवेयुः ।' -- हुद्रट, काव्यालङ्गारकी टीका २-२, पृ० ६ 'निरुक्त'के रचयिता यास्कमुनिने भी 'निरुत्त' के प्रारम्भमें शब्दोंका विभाजन करते हुए 'तद्यान्ये- तानि चत्वारि पदजातानि नामाख्याते चोपसर्गनिपाताश्र' लिखकर नाम, आख्यात, उपसर्ग तथा निपात चार प्रकारका पदविभाग ही स्वीकार किया है। 'कर्मप्रवचनीय'को अलग विभाग नहीं माना है। इसी प्रकार मेधाविरुद्रने भी 'कर्मप्रवचनीय' को छोड़कर केवल चार प्रकारका ही पदविभाग माना है। इस प्रकार हम देखते हैं कि मेधाविरुद्रके अनेक सिद्धान्तोंकी चर्चा भामह तथा उनके परवर्ती ग्रन्थोंमें हुई है। इसलिए उन्होंने अलङ्गारशास्त्रपर अवश्य ही कोई महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ लिखा होगा जो दुर्भाग्यवश आज उपलब्ध नहीं होता है। राजशेखरके लेखसे यह भी जान पड़ता है कि मेधावी जन्मान्ध थे। राजशेखरने लिखा है- प्रत्यक्षप्रतिभावतः पुनरपश्यतोऽति प्रत्यक्ष इव। यतो मेधाविरुद्र-कुमारदा- सादय: जात्यन्धा: कवयः श्रयन्ते।' काव्यमीमांसा, पृ० ११-१२ राजशेखरके इस लेखसे प्रतीत होता है कि मेधाविरुद्र प्रतिभावान्, उच्च कोटिके कवि भी थे। परन्तु दुःखकी बात है कि आज उनका न काव्यग्रन्थ मिलता है और न अलङ्कारग्रन्थ ही पाया जाता है। ३. भामह भरतमुनिके बाद अलङ्गारशास्त्रके दूसरे आचार्य, जिनका ग्रन्थ भी मिलता है, भामह हैं। भामहका समय विद्वानोंने षष्ठ शतकका पूर्वार्द्ध माना है। इसका आधार यह है कि उन्होंने अपने काव्यालङ्गार' के पश्चम परिच्छेदमें न्यायनिर्णयका वर्णन करते हुए बौद्ध आचार्य दिनागके 'प्रत्यक्ष कल्पनापोम्' इस प्रत्यक्षलक्षणको उद्धृत किया है। दिङनागका समय ५०० ई० के लगभग माना
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२६ काव्यप्रकाश:
जाता है। दिङनागके बाद उनके व्याख्याकार आचार्य धर्मकीर्तिका समय ६२० ई० के लगभग माना जाता है। धर्मकीतिने दिङनागके प्रत्यक्ष-लक्षणमें थोड़ा-सा संशोधनकर 'कल्पनापोढमभ्रान्तं प्रत्यक्षं निर्विकल्पकम्' यह प्रत्यक्षलक्षण किया है। इसमें 'अभ्रान्तम्' पद जोड़ दिया गया है। किन्तु भामहके ग्रन्थमें दिये हुए प्रत्यक्षलक्षणमें 'अभ्रान्तम्' पद नहीं है। इससे अनुमान होता है कि भासह दिङनागके बाद और धर्मकीतिके पहिले अर्थात् ५०० तथा ६२० ई० के बीच में हुए हैं। भामह और कालिदास वस्तुतः भामहके कालका निर्णय करना बड़ा कठिन काम है। उनके ग्रन्थमें अन्य लोगोंके लेखोंके कुछ सङ्गेत पाये जाते हैं जिनके कारण विद्वानोंमें उनके पौर्वापर्यके निर्णयमें विभिन्न मत पाये जाते हैं। उदाहरणके लिए भामहके 'काव्यालङ्गार'में- 'अयुक्तिमद् यथा दूता जलभून्मारुतेन्दवः । तथा भ्रमरहारीतचतवाकशुकादयः ॥ १-४२ अवाचोऽव्यवतवाचश्च दूरदेशविचारिणः । कथं दूत्यं प्रपद्येरन् इति युक्त्या न युज्यते ।। १-४३ यदि चोत्कण्ठया यत् तदुन्मत्त इव भाषते। तथा भवतु भूम्नेदं सुमेधोभिः प्रयुज्यते ॥' १-४४ इन कारिकाओंमें 'अयुक्तिमत्' दोषकी विवेचना करते हुए साधारण अवस्थामें मेघ आदिको दूत बनानेके वर्णनको 'अयुक्तिमत्' दोष कहा है। क्योंकि दूर देशमें विचरण करनेवाले और वाणीरहित अथवा अव्यक्त वाणीवाले होनेसे वे दौत्यकार्य कर ही नहीं सकते। इसलिए उनको दूत बनाना 'अयुक्तिमत्' दोष माना जाता है। इसके साथ उन्होंने यह भी लिखा है कि यह तो हो सकता है कि उन्मत्तावस्थामें उनको दूतरूपमें प्रयुक्त किया जा सके, क्योंकि बड़े-बड़े विद्वान् इस रूपमें उनका प्रयोग करते हैं। यह जो वर्णन भामहके ग्रन्थमें मिलता है इससे प्रतीत होता है कि इस आलोचनाके समय उनके सामने कालिदासका 'मेघदूत' ग्रन्थ विद्यमान था। और कालिदास जैसे महाकविके द्वारा उस मेघको दूत बनाये जानेका वर्णन देखकर ही उन्होंने 'सुमेधोभिः प्रयुज्यते' लिखा है। इसलिए भामह कालिदासके उत्तरर्ती हैं। इसके विपरीत डॉ० टी० गणपति शास्त्री आदि कुछ विद्वानोंका मत है कि भामह कालिदाससे बहुत पूर्ववर्ती रहे होंगे, क्योंकि भामहने मेधावी, रामशर्मा, अश्मकवंश, रत्नाहरण आदि अत्यन्त अप्रसिद्ध ग्रन्थकारोंके नामोंका तो स्पष्ट रूपसे उल्लेख किया है किन्तु कालिदास जैसे महाकविका नामतः कहीं कोई उल्लेख नहीं किया है। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि महाकवि कालिदासका नाम उनको विदित नहीं था। यह जो मेघको दूत बनाने आदिकी चर्चा की है वह सामान्य रूपसे ही की है, उसका कालिदासके 'मेघदूत' से कोई सम्बन्ध नहीं है। भामह और माघ माघकविविरचित 'शिशुपालवध' महाकाव्यमें द्वितीय सर्गमें निम्नलिखित श्लोक आता है- 'नालम्बते दैष्टिकतां न निषीदति पौरुषे। शब्दार्थौं सत्कविरिव द्वयं विद्वानपेक्षते ।।' -- माघ २-२८
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भूमिका २७
इसमें सत्कवि, शब्द और अर्थ दोनोंकी अपेक्षा रखता है, उसी प्रकार राजनीतिज्ञ भाग्य और पौरुष दोनोंकी अपेक्षा रखता है। इस युक्तिसे काव्यके साथ शब्द और अर्थ दोनोंका जो सम्बन्ध सूचित किया गया है इस आधारपर कुछ विद्वानोंका विचार है कि माघकी यह उपमा भामहके काव्य-लक्षणके आधारपर स्थित होती है। भामहने 'शब्दा्थों' सहितौ काव्यम्' यह काव्यका लक्षण किया है। इन विद्वानोंका विचार है कि माघकविकी यह उपमा भामहके काव्यलक्षणके आधारपर बनी है। इसलिए भामह माघके पूर्ववर्ती हैं। यह प्रो० पाठकका मत है। इसके विपरीत डॉ० जे० नोबुलका कहना है कि यह युक्ति बिलकुल निस्सार है। यदि इसी युक्तिसे काम लिया जाय तो फिर कालिदासके 'रघुवंश' में जो 'वागर्थाविव सम्पृक्तै' लिखा गया है वह भी कालिदासने भामहके काव्यलक्षणके आधारपर ही लिखा होगा। परन्तु यह सब बात ठीक नहीं। भामह और भास इसी प्रकारकी कल्पनाओंके आधारपर कुछ विद्वान् भामह और भासका भी सम्बन्ध जोड़नेका यत्न करते हैं। भामहने 'काव्यालङ्गार' के चतुर्थ परिच्छेदमें निम्नाङ्ित श्लोक लिखे हैं- 'विजिगीषुमुपन्यस्य वत्सेशं वृद्धदर्शनम्। तस्यैव कृतिनः पश्चादभ्यधाच्चारशून्यताम् ।३९॥ अन्तर्योधशताकीणं सालङ्कायननेतृकम्। तथाविधं गजच्छद्य नाज्ञासीत् स स्वभूगतम् ।।।।४०।। यदि वोपेक्षितं तस्य सचिवैः स्वार्थसिद्धये। अहो नु मन्दिमा तेषां भवितिर्वा नास्ति भर्तरि ।।४१।' इन श्लोकोंमें वत्सराज उदयनकी कथाकी चर्चा की गयी है। गणपति शास्त्रीका कथन है कि भामहने यह चर्चा भास कविके 'प्रतिज्ञायौगन्धरायण' नाटकके आधारपर की है। इसकी सम्पुष्टिमें उन्होंने एक युक्ति यह भी दी है कि इसी प्रसङ्गमें भामहने अगले ४३ वें श्लोकमें लिखा है- 'हतोडनेन मम भ्राता मम पुत्रः पिता मम। मातुलो भागिनेयश्च रुषा संरब्धचेतसा ।।' इसीसे मिलता-जुलता निम्नलिखित प्राकृत गद्यभाग 'प्रतिज्ञायौगन्धरायण' में आया है- 'मम भादा हदो अणेण मम पिदा अणेण मम सुदो।' भामहके उपर्युक्त श्लोकों और 'प्रतिज्ञायौगन्धरायण' नाटिकाकी कथा तथा उक्त 'हतो येन मम भ्राता' आदि वाक्यकी समानताके आधारपर टी. गणपति शास्त्रीने यह परिणाम निकाला है कि भामह भासके बाद हुए हैं, किन्तु दूसरे विद्वानोंकी सम्मतिमें यह ठीक नहीं है। वत्सराज उदयनकी कथा 'बृहत्कथा' में मूल रूपसे आती है। अन्यत्न जहाँ कहीं भी उसका उल्लेख किया गया है वह सब 'गुणाढय'की 'बृहत्कथा' से ही लिया गया है। 'बृहत्कथामञ्जरी' और 'कथासरित्सागर' 'बृहत्कथा' के संक्षिप्त रूप हैं। उनमें भी वत्सराज उदयनकी कथा आती है। भामहने जो वत्सराज उदयनकी कथाका यह उल्लेख-किया है वह भासके 'प्रतिज्ञायौगन्धरायण'के आधारपर नहीं, अपितु 'बृहत्कथामञ्जरी' या 'कथासरित्सागर' के आधारपर ही किया है। अतः इस युक्िके आधारपर भामहको भासका उत्तरवर्ती सिद्ध करनेका प्रयत्न ठीक नहीं है।
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२८ काव्यप्रकाश: भामह और भट्टि महाकवि भट्टि भी संस्कृत साहित्यके महान् कवि हुए हैं। उनकी कल्पना बड़ी विचित्र है। उन्होंने 'रावणवध' नामक एक महाकाव्य लिखा है। जिस प्रकार माघने 'शिशुपालवध' काव्य लिखा है, उसी प्रकार इनका 'रावणवध' महाकाव्य है। किन्तु माघके काव्यका नाम कविके नामसे 'माघ' के रूपमें ही प्रसिद्ध हो गया है। 'शिशुपालवध' नाम उसकी अपेक्षा कम प्रचलित है। उसी प्रकार भट्टि कविके 'रावणवध' महाकाव्यका मुख्य नाम गौण हो गया है। उसके स्थानपर उसे अब 'भट्टिकाव्य' ही कहा जाता है। इस 'भट्टिकाव्य' की रचना काठियावाड़के 'बलभी' राज्य, जिसे अब 'वल' कहते हैं, के राजा धरसेनके समयमें हुई है। 'भट्टिकाव्य'के अन्तमें कविने इसका उल्लेख करते हुए लिखा है- 'काव्यमिदं विहितं मया बलभ्यां श्रीधरसेननरेन्द्रपालितायाम्। कीतिरतो भवतान्नृपस्य तस्य प्रेयकर: क्षितिपो यतः प्रजानाम् ॥' -- २२-३५ 'भट्टिकाव्य' में रचनाकालका इतना परिचय होनेपर भी उसका समय कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता, क्योंकि काठियावाड़के इतिहासके अनुसार 'बलभी' में धरसेन नामके चार राजा राज्य कर चुके हैं। इनमेंसे किस 'धरसेन'के समयमें 'भट्टिकाव्य'की रचना हुई वह नहीं कहा जा सकता। प्रो० मजूमदारने सन् ४७३ ई० के मन्दसोर सूर्यमन्दिरके लेखमें कहे हुए वत्सभट्टिको ही 'भट्टिकाव्य'का रचयिता माना है। इसके समर्थनके लिए उनकी यह युक्ति है कि मन्दसोरके शिलालेखके श्लोक 'भट्टि- काव्य' के शरद्वर्णनके श्लोकोंसे बहुत मिलते-जुलते हैं। इसके विपरीत प्रो० कीथने इस मतका उग्रताके साथ खण्डन किया है। इसी प्रकार प्रौ० काणे, प्रो० पाठक आदि अन्य विद्वानोंका भी 'भट्टिकाव्य'के रचनाकालके विषयमें मतभेद पाया जाता है। इसलिए इसके कालका यथार्थ निर्णय बड़ा कठिन काम है। भामहने 'काव्यालङ्गार' के द्वितीय परिच्छेदमें निम्नलिखित श्लोक दिया है- काव्यान्यपि यदीमानि व्याख्यागम्यानि शास्त्रवत्। उत्सवः सुधियामेव हन्त दुर्मेधसो हताः ।' -२-२० इसी श्लोकका भावानुवाद 'भट्टिकाव्य' के श्लोकमें निम्नलिखित प्रकार किया गया है -- 'व्याख्यागम्यमिदं काव्यमुत्सवः सुधियामलम्। हता दुर्मेधसश्चास्मिन् विद्वत्पियतया मया।।" -२२-३४ भामह और भट्टिके इन दोनों श्लोकोंमें इतना अधिक साम्य है कि इन दोनोंमेंसे किसी एकने दूसरेके श्लोकका भावानुवाद किया है यह बात बिलकुल निश्रित ही है। किन्तु भामहने भट्टिका अनुवाद किया है अथवा भट्टिने भामहका यह बात तबतक नहीं कही जा सकती जबतक उनके कालका ठीक निर्णय नहीं हो जाता है। इसीलिए विद्वानोंमें इस विषयमें मतभेद पाया जाता है। भामह और न्यासकार पाणिनिकी 'अष्टाध्यायी'पर 'काशिका' वृत्ति और उसके ऊपर जिनेन्द्रबुद्धिकी 'काशिका-
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भूमिका २६
विवरणपञ्जिका' टीका मिलती है। इस 'काशिकाविवरण-पञ्जिका'की अधिक प्रसिद्धि 'न्यास' नामसे पायी जाती है। 'काशिका के ऊपर जिनेन्द्रबुद्धिके 'न्यास'के पहिले हरदत्तने 'पदमञ्जरी' नामकी एक और टीका की थी। 'भविष्यत्पुराण' के आधारपर डॉ० याकोबीने (जे० आर० ए० एस०, बम्बई, भाग २३, पृष्ठ ३१) लिखा है कि हरदत्तका देहावसान ८७८ ई० के लगभग हुआ। अर्थात् हरदत- का समय नवम शताब्दीमें पड़ता है। डॉ० कीलहार्न आदि विद्वानोंका मत है कि जिनेन्द्रबुद्धिने अनेक स्थानोंपर 'पदमञ्जरी'की बिलकुल नकल की है। इसका अर्थ यह होता है कि जिनेन्द्रबुद्धिका काल हरदत्तके बाद दशम शताब्दीमें पड़ता है। भामहके 'काव्यालङ्गार' में षष्ठ परिच्छेदमें एक स्थानपर न्यासकारके मतका उल्लेख इस प्रकार किया गया है- 'शिष्ट प्रयोगमात्रेण न्यासकारमतेन वा। तृचा समस्तषष्ठीकं न क्थञ्चिद्दाहरेत् ।। सूत्रज्ञापकमात्रेण वृत्रहन्ता यथोदितः । अकेन च न कुर्वीत वृत्ति तद्गमको यथा ॥ -- ६३६-३७ इन श्लोकोंमें न्यासकारके मतका उल्लेख देखकर प्रो० पाठकने यह सिद्धान्त निकाला कि भामह न्यासकार जिनेन्द्रबुद्धिके पश्चात हुए हैं और जिनेन्द्रबुद्धिका समय उन्होंने इत्सिगके वृत्तान्तके आधारपर सप्तम शताब्दीमें निश्चय किया है। इस प्रकार प्रो० पाठकने भामहका समय अष्टम शताब्दीमें स्थिर किया है। किन्तु डॉ० त्रिवेदी आदि अन्य विद्वान् इस मतको नहीं मानते हैं। उनके कथनानुसार यहाँ जिस न्यासग्रन्थका उल्लेख किया गया है वह जिनेन्द्रबुद्धिकी 'काशिकाविवरणपज्जिका' नहीं अपितु कोई अन्य ही ग्रन्थ है। 'न्यास' शब्द सामान्य रूपसे व्याकरणकी टीका या व्याख्याग्रन्थोंके लिए प्रयुक्त होता है। जिनेन्द्रबुद्धिके 'न्यास'के अतिरिक्त अन्य भी अनेक न्यासग्रन्थोंका उल्लेख पाया जाता है। माधवाचार्यने अपना 'मववीया धातुवृत्ति' में 'क्षेमेन्द्रन्यास', 'न्यासोद्योत', 'बोधिन्यास', 'शाकटायन-न्यास' आदि अनेक न्यासोंका उल्लेख किया है। बाणभट्टके 'हर्षचरित' में 'कृतगुरुपदन्यासाः' पद आया है। इसकी व्याख्या करते हुए उनके टीकाकार शङ्करने 'कृतोऽ़भ्यस्तो गुरुपदे दुर्बोधशब्दे न्यासो वृत्तिविवरणं यैः' यह लिखा है। यहाँ 'न्यास' पदसे टीकाकारने वृत्ति या विवरण अर्थ ही लिया है। उससे जिनेन्द्रबुद्धिके 'न्यास' का ग्रहण नहों किया गया है। अन्यथा न्यासकार जिनेन्द्रबुद्धिको बाणभट्टका भी पूर्दवर्ती मानना होगा। इसलिए जो लोग 'न्यासकार' पदका उल्लेख देखकर भामहको जिनेन्द्रबुद्धिके बादमें होनेवाला सिद्ध करना चाहते हैं उनका मत ठीक नहीं है। भामह और दण्डी भास और भट्टिके समान दण्डीके साथ भी भामहकी अनेक उक्तियोंका असाधारण सादृश्य पाया जाता है। अनेक उक्तियाँ तो ऐसी हैं जो भामहके 'काव्यालड्गार' तथा दण्डीके 'काव्यादर्श' में बिलकुल एक ही रूपमें पायी जाती हैं। उदाहरणके लिए हम कुछ उक्तियाँ नीचे उद्धुत करते हैं जो इन दोनों ग्रन्थोंमें शब्दशः समान रूपमें उपलब्ध होती हैं -- १. 'सर्गबन्धो महाकाव्यम् ।' भामह १-१६। काव्यादर्श १-१४। २. 'मन्त्रिदूतप्रयाणाजिनायकाभ्युदयैरपि।' भामह १-२०। काव्यादर्श १-१७। ३. 'कन्याहरणसंग्रामविप्रलम्भोदयादयः ।' भामह १-२७। काव्यादर्श १-२६।
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३० काव्यप्रकाश: ४. 'अद्य या मम गोविन्द जाता त्वयि गृहागते। कालनैषा भवेत्प्रीतिस्तवैवागमनात् पुनः ।' भामह ३-५। काव्यादर्श २-२७६। . 'तद् भाविकमिति प्राहुः प्रबन्धविषयं गुणम्।' भामह ३-५३। काव्यादर्श २-३६४ । ६. 'अपार्थ' व्यर्थमेकार्थ ... विरोधि च ।' भामह ४-१, २। काव्यादर्श ३-१२५, १२६। ७. 'समुदायार्थशून्यं यत् तदपार्थकमिष्यते।' भामह ४-८। काव्यादर्श ३-१२८। ८. 'गतोऽस्तमर्को भातीन्दुर्यान्ति वासाय पक्षिणः।' भामह २-८७। काव्यादर्श २-२४४। ९. आक्षेपोऽर्थान्तरन्यासो व्यतिरेको विभावना।' भामह २-६६। काव्यादर्श २-४। १०. 'प्रेयो रसवदूर्जस्वि पर्यायोवतं समाहितन्।' भामह ३-१। काव्यादर्श २-५। ये दस उदाहरण ऐसे हैं जो भामहके 'काव्यालङ्गार' और दण्डीके 'काव्यादर्श'में न केवल अर्थतः अपितु शब्दतः भी प्रायः एक रूपमें ही उपलब्ध होते हैं। कहीं बिलकुल नाममात्रका भेद पाया जाता है; जैसे, द्वितीय उदाहरणके अन्तमें 'अपि' शब्दके स्थानपर भामहने 'च यत्' शब्दका प्रयोग किया है। इसी प्रकार तीसरे उदाहरणके अन्तमें 'उदयादयः'के स्थानपर भामहमें 'उदयान्विताः' प्रयोग पाया जाता है। इन नाममात्रके भेदोंके अतिरिक्त ये दसों स्थल भामह और दण्डीमें बिलकुल एक-से पाये जाते हैं। कुछ स्थल मिलते हैं जिनमें एक-दूसरेके मतकी आलोचना की गयी प्राप्त होती है; जैसे, भामहने काव्यके -- 'सर्गबन्धोऽभिनेयार्थ' तथैवाख्यायिकाकथे। अनिबद्धं च काव्यादि तत्पुनः पञ्चधोच्यते ।।' -- १-१८ (१) सर्गबन्ध अर्थात् महाकाव्य, (२) अभिनेयार्थ अर्थात् नाटक, (३) आख्यायिका, (४) कथा तथा (५) अनिबद्ध अर्थात् मुक्तक ये काव्यके पाँच भेद किये हैं। इनमें आख्यायिका तथा कथाको काव्यका अलग-अलग भेद माना है। किन्तु दण्डीने अपने 'काव्यादर्श'में इसका खण्डन करते हुए लिखा है- 'तत् कथाख्यायिकेत्येका जाति: संज्ञा द्वयाङिता ।'-१-२८ भामहने अपने पूर्ववर्ती आचार्य मेधावीके आधारपर उपमाके सात दोष बतलाये हैं। किन्तु दण्डीने इस मतकी आलोचना करते हुए लिखा है- 'न लिंगवचने भिन्ने न हीनाधिकतापि वा। उपमादूषणायालं यत्रोद्वेगो न धीमताम् ।।' -- २-५१ भामह और दण्डीके ग्रन्थोंमें इस प्रकारके सारूप्य तथा वैरूप्यके उदाहरण बहुत अधिक मात्रामें पाये जाते हैं। इससे प्रतीत होता है कि इनमेंसे किसी एकने दूसरेके आधारपर ही अपने ग्रन्थमें उन प्रसङ्गोंका उल्लेख किया है। इसी आधारपर भामह और दण्डीके पौर्वापर्यके विषयमें विद्वानोंमें बड़ा तीव्र वाद-विवाद बहुत दिनोंतक चलता रहा। सबसे पहले एम० टी० नरािंह अयङ्गर'ने सन् १६०५ में 'जरनल आफ रायल एशियाटिक सोसाइटी' (पृ० ३५५) में इस प्रश्नको उठाया और दण्डीको भामहका पूर्ववर्ती सिद्ध करनेका यत्न किया। परन्तु इनके मतका बड़ा विरोध हुआ। डॉ० त्रिवेदीने 'प्रताप- रुद्रयशोभूषण'की भूर्ामें, प्रो० रङ्गाचार्यने 'काव्यादर्शकी' भूमिकामें, गणपति शास्त्रीने 'स्वप्नवासव-
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भूमिका ३१
दत्ता'की भूमिकामें और प्रो० पाठकने 'कविराजमार्ग' की भूमिका में दण्डीको भामहके पूर्व ठहरानेवाले नरसिंह आयङ्गरके सतका विस्तारके साथ खण्डन किया। अपने देशमें ही नहीं, डॉ० जैकोबोने भी (जेड० एस० एम० जी०, पृ० १३४-१३६पर) दण्डीको भामहका पूर्ववर्ती बतलानेवाले श्री नरंिंह आयङ्गरके मतका खण्डन किया। इन सब विवादोंका अध्ययन करनेसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि अधिकांश विद्वान् भामहको ही दण्डीका पूर्ववर्ती नाननेके पक्षमें हैं। भामहको दण्डीका पूर्ववर्ती माननेके विषयमें एक युक्ति और है। दण्डीके 'अवन्तिसुन्दरीकथा' नामक एक नवीन ग्रन्थका परिचय अभी हालमें प्राप्त हुआ है। इस ग्रन्थके आरम्भमें जो श्लोक दिये गये हैं उनमें- 'भिन्नरतीक्ष्णमुखेनापि चित्रं बाणेन निर्व्यथः । व्याहारेषु जहौ लीलां न मयूर :.......... ।।' आदि श्लोकमें महाकवि बाणभट्ट तथा मयूरभट्टका उल्लेख किया गया है। इसके अतिरिक्त दण्डीने अपनेको महाकवि भारविका प्रपौत्र घोषित किया है। इससे स्पष्ट है कि दण्डी महाकवि बाणके बाद हुए हैं। बाणभट्टके 'हर्षचरित'के आधारपर यह निश्चित बात है कि बाणभट्ट हर्षवर्धनकी राजसभामें थे। हर्षवर्धनका राज्यकाल ६०६-६४८ ई० तक माना जाता है। इसलिए बाणभट्टका काल भी सप्तम शताब्दीका मध्यभाग है। उस दशामें दण्डीका समय आठवीं शताब्दीमें होना चाहिये। दण्डी बाणभटके बाद हुए हैं और भामह बाणभट्टके पहिले हुए हैं इसलिए भामह दण्डीके निश्रय ही पूर्ववर्ती हैं। इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं है। भामह बाणभट्टसे पहिले हुए हैं इस बातकी सिद्धि आनन्दवर्धनाचार्यके 'ध्वन्यालोक' ग्रन्थके आधारपर होती है। 'ध्वन्यालोक' के चतुर्थ उद्योतमें- 'दृष्टपूर्वा अपि ह्यर्था काव्ये रसपरिग्रहात्। सर्वे नवा इवाभान्ति मधुमास इव दुमाः ।' यह कारिका आयी है। इसका अभिप्राय यह है कि काव्यमें पूर्वकवियों द्वारा र वणित पुराने अर्थोंमें भी कवि रसका समावेश करके उनमें नवीनता ला सकता है और वे पुराने अर्थ भी रसके सम्पर्कसे ऐसे ही नवीन प्रतीत होने लगते हैं जैसे वसन्तमें पुराने वृक्ष भी नवीन और आकर्षक हो जाते हैं। इसीका उदाए देते हुए आनन्दवर्धनने लिखा है- 'तथा हि विवक्षितान्यपरवाच्यस्यैव शब्दशक्त्युदद्वानुरणनरूपव्यङ्गयप्रकार- समाश्रयेण नवत्वं । यथा-धरणीधारणायाधुना त्वं शेषः इत्यादौ -- शेषो हिमगिरिस्त्वं च महान्तो गुरवः स्थिराः । ... ... इत्यादिषु सत्स्वपि।' इसका अभिप्राय यह है कि 'शेषो हिमगिरि:' इत्यादि पूर्ववर्ती श्लोकमें वणित पुराने अर्थको ही 'अधुना धरणीधारणाय त्वं शेषः' इस नवीन वाक्यमें कहा गया है, किन्तु उसमें शब्द-शक्त्युत्थ अलङ्गार ध्वनिके सन्निवेशसे विशेष चमत्कार आ जानेसे उसमें नवीनता प्रतीत होने लगी है। इसी प्रकार पूर्वकवियों द्वारा वणित पुराने अर्थोंमें नवीन चमत्कारका आधान करके उनमें नूतनता उत्पन्न की जा सकती है। इस आशयसे आनन्दवर्धनाचार्यने यहाँ यह उदाहरण दिया है। इस उदाहरणमें जो दो वाक्य उद्धृत किये गये हैं वे विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। आनन्दवर्धना-
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३२ काव्यप्रकाशः चार्यने 'शेषो हिमगिरिस्त्वं च' इत्यादि श्लोकको पुराना वर्णन माना है और उसी अर्थको नवीन रूपमें प्रस्तुत करनेवाला 'धरणीधारणायाधुना त्वं शेषः' इस वाक्यको नवीन वाक्य माना है। आनन्दवर्धना- चार्य जिस 'शेषो हिमगिरिस्त्वं च' आदिको पुराना वाक्य कहते हैं वह भामहके 'काव्यालङ्गार' में आया हुआ तीसरे परिच्छेदका २७ वाँ श्लोक है। और 'धरणीधारणायाधुना त्वं शेषः' रूप जिस वाक्यको वे नवीन वाक्य कहते हैं वह बाणभट्टके 'हर्षचरित'के चतुर्थ उच्छ्वासके १५ वें अनुच्छेदमें आया है। अर्थात् बाणभट्टका यह वाक्य भामहके वाक्यकी अपेक्षा नवीन है। इसका अर्थ हुआ कि भामह बाणभट्टसे बहुत पहिले हुए हैं और दण्डी बाणभट्टके बाद में हुए हैं। इसलिए भामह दण्डीके पूर्ववर्ती हैं इसमें कोई सन्देह रह ही नहीं जाता है। भामहका धर्म जिस प्रकार भामहके कालके विषयमें विद्वानोंमें बड़ा मतभेद पाया जाता है उसो प्रकार उनके धर्मके विषयमें भी पर्याप्त मतभेद पाया जाता है। भामहके 'काव्यालङ्कार' के प्रथम श्लोकमें -- 'प्रणम्य सार्वसर्वज्ञं मनोवाक्कायकर्मभिः । काव्यालङ्कार इत्येष यथाबुद्धि विधास्यते ।।'-का० १-१ "'सार्वसर्वज्ञ' को नमस्कार किया गया है।" 'सर्वज्ञः सुगतो बुद्धः' इत्यादि 'कमरकोश'के आधार- पर कुछ लोगोंने 'सर्वज्ञ' पदको बुद्धका नाम मानकर यह अर्थ लगा लिया है कि इसमें बुद्धको नमस्कार किया गया है इसलिए भामह बौद्ध आचार्य जान पड़ते हैं। परन्तु यह कोई युक्ति नहीं है। 'कृशानुरेताः सर्वज्ञो धूर्जटिर्नीलतोहितः' इत्यादि 'अमरकोश' के अनुसार 'सर्वज्ञ' पद शिवके नामोंमें भी पढ़ा गया है। तब उससे शिव अर्थ न लेकर बुद्ध अर्थ ही कैसे लिया जा सकता है ? उसके साथमें 'सार्व' पद और है। उसका अर्थ सबके लिए हितकारी है। वह जैसे बुद्धके साथ जुड़ सकता है वैसे ही शिवके साथ भी जुड़ सकता है। इसलिए इस पदके आधारपर भामहको बौद्ध नहीं माना जा सकता। इसके विपरीत उनके ग्रन्थके भीतर वैदिक प्रक्रियाओं, वैदिक कथाओंका विशेष रूपमें उल्लेख पाया जाता है, बौद्ध कथाओं या बौद्ध प्रत्रियाओं आदिका उल्लेख बिलकुल नहीं पाया जाता है। इसलिए उनको बौद्ध नहीं कहा जा सकता है। इस प्रकार कथाओं आदिके उदाहरणरूपमें 'काव्यालङ्गार' ग्रन्थके निम्नलिखित श्लोक उद्धृत किये जा सकते हैं जिनसे भामहके वैदिक धर्मके प्रति अनुरक्तिकी ही सूचना मिलती है- 'भूभृतां पीतसोमानां न्याय्ये वर्त्मनि तिष्ठताम्। अलङ्गरिष्णुना वंशं गुरौ सति जिगीषुणा।। ४-४८ युगादौ भगवान् ब्रह्मा विनिमित्सुरिव प्रजाः ॥ २-५५ समग्रगगनायाममानदण्डो रथाङ्गिणः । पादो जयति सिद्धस्त्रीमुखेन्दुनवदर्पणः ॥ ३-३६ कान्ते इन्दुशिरोरत्ने आदधाने उदंशुनी। पातां वः शम्भु-शर्वाण्याविति प्राहुविसन्ध्यदः ॥ ४-२७ विदधानौ किरोटेन्दू श्यामाभ्रहिमसच्छवी। रथाङ्गशूले विभ्राणौ पातां वः शम्भुशा्ङिणौ ॥ ४-२१ उदात्तशक्तिमान् रामो गुरुवाक्यानुरोधकः । विहायोपनतं राज्यं यथा वनमुपागमत् ॥ ३-११
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भूमिका ३३
'भरतस्त्वं दिलीपस्त्वं त्वमेवैल: पुरूरवाः । त्वमेव वीर प्रद्युम्नस्त्वमेव नरवाहनः ।।' ५-५६ इत्यादि श्लोकोंमें शिव, विष्णु, पार्वती, ब्रह्मा आदि देवताओंका वर्णन और सोमपान आदि याज्ञिक क्रियाओंका उल्लेख वैदिक धर्मके प्रति भामहका स्पष्टरूपसे अनुराग सूचित करता है। रामचन्द्र, भरत, दिलीप, प्रद्युम्न और पुरूरवाका उल्लेख भी वैदिक धर्मके प्रति उनके अगाध प्रेमको ही सूचित करता है। इसमें कहीं भी कोई ऐसा तत्त्व नहीं है जिससे भामहको बौद्ध माननेका सङ्गत मिल सकता हो। अतएव भामहको बौद्ध सिद्ध करनेका प्रयास असङ्गत है। अपने वंशपरिचयके रूपमें केवल एक पंक्ति भामहके ग्रन्थके अन्तिम भागमें पायी जाती है। उसमें उन्होंने अपने पिताका नाम 'रक्रिलगोमिन' बतलाया है- अवलोक्य मतानि सत्कवीनामवगम्य स्वधिया च काव्यलक्ष्यम् । सुजनावगमाय भामहेन ग्रथितं रत्रिलगोमिनसूनुनेदम् ।।' इस श्लोकमें ग्रन्थकारने अपना नाम 'भामह' और अपने पिताका नाम 'रक्रिलगोमिन' बतलाया है। इसके अतिरिक्त इनके जीवनका और कोई परिचय इनके ग्रन्थमें नहीं मिलता है। भामहक ग्रन्थ भामहका आज हमें केवल 'काव्यालङ्गार' ही एकमात्र ग्रन्थ उपलब्ध होता है। किन्तु साहित्य- शास्त्रके ग्रन्थोंके देखनेसे विदित होता है कि उन्होंने इस 'काव्यालङ्गार'के अतिरिक्त छन्दः-शास्त्र और अलङ्कारशास्त्रके विषयमें कुछ और ग्रन्थोंकी भी रचना की थी, किन्तु दुर्भाग्यवश वे ग्रन्थ अबतक उपलब्ध नहीं हो सके हैं। उन ग्रन्थोंके उद्धरण भामहके नामसे विविध ग्रन्थोंमें पाये जाते हैं। उदाहरणके लिए, 'अभिज्ञानशाकुन्तल' की टीकामें राघवभट्टने- 'क्षेमं सर्वगुरुर्दत्ते मगणो भूमिदैवतः ।' इति भामहोवतेः (अभि० शा०, टीका नि० सा०, पृ० ४) लिखकर भामहके किसी छन्दःशास्त्रविषयक ग्रन्थसे उसके उद्धृत किये जानेकी सूचना दी है। इसी टीकामें दूसरे स्थान (पृ० १०) पर राघवभट्टने उनके किसी अलङ्कारविषयक ग्रन्थसे निम्नलिखित वाक्य उद्धुत किया है- तल्लक्षणमुक्तं भामहेन -- पर्यायोक्तं प्रकारेण यदन्येनाभिधीयते। वाच्य-वाचकशक्तिभ्यां शून्येनावगमात्मना ।। इति। उदाहृतं च हयग्रीववधस्थं पद्यं- यं प्रेक्ष्य चिररूढापि निवासप्रीतिरुज्झिता। मदेनैरावणमुखे मानेन हृदये हरे: ॥' पर्यायोक्त अलङ्गारके जिस लक्षण और उदाहरणको राघवभट्टने यहाँ भामहके नामसे उद्धृत किया है, उन दोनोंमेंसे कोई भी भामहके वर्तमान 'काव्यालङ्गार' में नहीं पाया जाता है। वर्तमान 'काव्यालङ्गार' में भामहके अनुसार पर्यायोक्त अलङ्कारके लक्षण और उदाहरण निम्नलिखित प्रकार दिये गये हैं- 'पर्यायोक्तं यदन्येन प्रकारेणाभिधीयते। उवाच रत्नाहरणे चैद्यं शार्ङ्गधनुर्यथा।।'-का० ३-८ ३
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३४ काव्यप्रकाश:
लक्षणका पूर्वार्द्ध भाग तो थोड़े-से अन्तरसे भामहके लक्षणसे मिल जाता है किन्तु उत्तरार्द्ध भागका उल्लेख वर्तमान लक्षणमें नहीं पाया जाता है और हयग्रीववधस्थ उदाहरण तो यहाँ बिलकुल ही नहीं पाया जाता है। उद्धटके 'काव्यालङ्गार' में पर्यायोक्तका यह लक्षण कुछ अन्तरसे मिल जाता है और हयग्रीववधस्थ जिस श्लोकको उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किये जानेकी चर्चा राघवभट्टने की है वह उदाहरण 'काव्यप्रकाश' में पाया जाता है। ऐसा हो सकता है कि राघवभट्टके पास भामहके 'काव्यालङ्गार'की जो प्रति रही हो उसमें पर्यायोक्तका लक्षण इसी रूपमें दिया गया हो जिस रूपमें उन्होंने उद्धृत किया है और हयग्रीववधस्थ श्लोक भी उदाहरणरूपमें दिया गया हो, किन्तु दूसरी किसी प्रतिमें जिसके आधारपर वर्तमान काव्यालङ्गारका सम्पादन किया गया है, ये दोनों भाग लिखनेसे रह गये हों। लक्षणके विषयमें तो इतना ही भेद है कि राघवभट्टने जो लक्षण उद्धुत किया है वह पूरा एक श्लोक है, किन्तु वर्तमान 'काव्यालङ्गार' में दिया हुआ लक्षण आधे श्लोकमें ही आ गया है। वर्तमान 'काव्यालङ्गार'का लक्षण अपूर्ण-सा भी जान पड़ता है। राघवभट्टने जो लक्षण दिया है वह पूर्ण लक्षण है। इसलिए ऐसा अनुमान होता है कि वर्तमान 'काव्यालङ्गार' की पाण्डलिपिमें लक्षणकी एक पंक्ति लिखनेसे छूट गयी है। इसी प्रकार पर्यायोक्तके अनेक उदाहरण 'काव्यालङ्गार' में पाये जाते हैं। सम्भव है इनके साथ हयग्रीव- वधस्थ एक और भी उदाहरण रहा हो। परन्तु यह बात तभी सम्भव हो सकती है जब 'हयग्रीववध'के प्रणेताका काल भामहके पूर्व निश्रित किया जा सके अन्यथा नहीं। किन्तु यह बात निश्चित है कि केवल इस श्लोकके आधारपर भामहके अलङ्कारविषयक किसी अन्य ग्रन्थकी कल्पना नहीं की जा सकती है। उनका छन्दःशास्त्रविषयक तो दूसरा ग्रन्थ हो सकता है किन्तु अलङ्गारशास्त्रके विषयमें तो 'काव्यालङ्कार' के रहते अन्य दूसरा ग्रन्थ लिखे जानेकी कोई सङ्गति नहीं लगती है। छन्दःशास्त्रके विषयमें भामहने किसी ग्रन्थकी रचना की थी यह बात अन्य साहित्यग्रन्थोंमें भामहके नामसे उद्धृत किये गये उद्धरणोंसे प्रतीत होती है। उनमेंसे एक उदाहरण तो हम 'अभिज्ञानशाकुन्तल' की राघवभट्टकृत टीकामेंसे ऊपर उद्धुत कर चुके हैं। उसी प्रकारका दूसरा उद्धरण 'वृत्तरत्नाकर'की टीकामें नारायणभट्टने इस प्रकार दिया है- 'तदुक्तं भामहेन- अवर्णात् सम्पत्तिर्भवति मुदिवर्णात् धनशता- न्युवर्णाद् अख्यातिः सरभसमृवर्णाद्धरहितात् ॥ तथा ह्येच: सौख्यं ङ-ञ-णरहितादक्षरगणात् पदादौ विन्यस्ताद् भ-र-ब-ह-ल-हाहाविरहितात् ।।' 'तदुक्तं भामहेन -- -- वृत्तरत्नाकर, पृ० ६
देवतावाचका: शब्दा: ये च भद्रादिवाचकाः । ते सर्वे नैव निं्द्याः स्युलिपितो गणतोऽपि वा॥ कः खो गो घश्च लक्ष्मीं वितरति वियशो डस्तथा चः सुखं छः प्रोति जो मित्रलाभं भयमरणकरौ झ-जौ ट-ठौ खेददुःखे। डः शोभां ढो विशोभां भ्रमणमथ च णस्तः सुखं थश्च युद्धं दो धः सौख्यं मुदं नः सुखभयमरणक्लेशदुःखं पदर्गः ॥
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भूमिका ३५
यो लक्ष्मीं रश्च दाहं व्यसनमथ ल-वौ शः सुखं षश्च खेदं सः सौख्यं हश्च खेदं विलयमपि च लः क्षः समृद्धि करोति। संयुक्तं चेह न स्यात् सुख-मरण-पटुर्वर्णविन्यासयोगः पद्यादौ गद्यवक्त्रे वचसि च सकले प्राकृतादौ समोऽयम् ।।' -- वृत्तरत्नाकर, पृ० ७ यद्यपि ये सब उद्धरण बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं हैं फिर भी इनके आधारपर यह सम्भावना भानी जा सकती है कि भामहने सम्भव है छन्दःशास्त्रविषयक कोई अन्य ग्रन्थ लिखा हो। भामहभट्टके नामसे एक ग्रन्थ और मिलता है और वह है वररुचिके 'प्राकृत-प्रकाश' नामक प्राकृत-व्याकरणग्रन्थकी 'प्राकृतमनोरमा' नामक टीका। प्राकृत-व्याकरणमें इस टीकाका बड़ा महत्त्व माना जाता है। पिशल आदि प्राकृत-व्याकरणके व्रिद्वानोंने 'काव्यालङ्गार' और 'प्राकृतमनोरमा' दोनोंके निर्माता एक ही भामहको माना है। इस प्रकार भामहके १. 'काव्यालङ्गार' तथा २. 'प्राकृतमनोरमा' दो ग्रन्थ तो उपलब्ध होते हैं और तीसरे छन्दःशास्त्रविषयक ग्रन्थकी भी रचना उन्होंने की थी इस बातका अनुमान किया जाता है। 'प्राकृतमनोरमा' 'प्राकृतप्रकाश' की टीका है। 'काव्यालङ्गार' स्वतन्त्र ग्रन्थ है। इसमें ६ परिच्छेद हैं। प्रथम परिच्छेदमें ६० श्लोक हैं और उनमें काव्यके शरीरका वर्णन किया गया है; द्वितीय और तृतीय परिच्छेदमें मिलाकर १६० श्लोक हैं। द्वितीय तथा तृतीय दोनों परिच्छेदोंमें अलङ्कारोंका वर्णन किया गया है। चतुर्थ परिच्छेदमें दोषोंका निरूपण किया है और उसमें ५० श्लोक हैं। पञ्चम परिच्छेदके ७० श्लोकोंमें न्यायनिर्णयका प्रतिपादन किया है और षष्ठ परिच्छेदके ६० श्लोकोंमें शब्दशुद्धिका विवेचन किया गया है। इस प्रकार 'काव्यालङ्गार'में कुल मिलाकर ४०० श्लोक हैं जो ६ परिच्छेदोंमें विभक्त हैं। भामहने स्वयं इस सबका विवरण निम्नलिखित प्रकार दिया है- 'षष्ट्या शरीरं निर्णोतं शतषष्टया त्वलङकृतिः । पञ्चाशता दोषदृष्टिः सप्तत्या न्यायनिर्णयः॥ षष्टया शब्दस्य शुद्धि: स्यादित्येवं वस्तुपञ्चकम्। उक्तं षड्भि: परिच्छेदैः भामहेन क्रमेण वः ।'
भामहके टीकाकार भामहका 'काव्यालड्गार' अलङ्कारशास्त्रका प्रथम उपलब्ध ग्रन्थ है जिसमें अलङ्गारशास्त्र एक स्वतन्त्र शास्त्रके रूपमें दिखाई पड़ता है। इसके पूर्व भरतके 'नाटयशास्त्र' में नवें अध्यायमें गौणरूपसे काव्यके गुण, दोष, अलङ्गार आदिके लक्षण किये गये थे, किन्तु वे सब 'नाट्यशास्त्र'के अङ्गरूपमें ही थे। स्वतन्त्ररूपमें अलङ्गारशास्त्रको एक अलग शास्त्रका रूप प्रदान करनेवाला भामहका 'काव्यालङ्कार' ग्रन्थ ही है। इसके ऊपर नवम शताब्दीमें कश्मीरके राजा जयादित्यकी राजसभाके सभापति उद्टने 'भामहविवरण' नामसे एक टीका लिखी थी। किन्तु दुर्भाग्यसे वह 'भामहविवरण' आजतक उपलब्ध नहीं हुआ है। केवल साहित्यके विभिन्न ग्रन्थोंमें स्थान-स्थानपर उसका उल्लेख पाया जाता है। उ्टका स्वयं भी एक 'काव्यालङ्कारसारसंग्रह' ग्रन्थ है, जो अब प्रकाशित हो चुका है। उसपर प्रतीहारेन्दुराजने 'लघुविवृति' नामक टीका लिखी है। इस टीकामें प्रतीहारेन्दुराजने इस 'भामहविवरण'का उल्लेख इस प्रकार किया है-
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३६ काव्यप्रकाश: 'विशेषोकितिलक्षणे च भामहविवरणे भट्टोद्भटेन एकदेशशब्द एवं व्याख्यातो यथे हास्माभिनिरूपितः ।' (पृ० १३) अभिनवगुप्ताचार्यने भी 'ध्वन्यालोकलोचन'में कई जगह भामहके ऊपर 'उद्भट'के विवरणका उल्लेख किया है।
४. दण्डी भामहके बाद दूसरे आचार्य, जिन्होंने अलङ्कारशास्त्रपर स्वतन्त्ररूपसे ग्रन्थरचना की, दण्डी हैं। भामह और दण्डीके पौर्वापर्यके निरूपणके प्रसङ्गमें हम पीछे देख चुके हैं कि दण्डीका काल अष्टम शताब्दीमें पड़ता है। दण्डीने अपने 'अवन्तिसुन्दरीकथा' में अपनेको महाकवि भारविका प्रपौत्र बतलाया है और बाण तथा मयूर कविकी प्रशंसा की है। अतएव उनका समय सप्तम शताब्दीमें राजा हर्षवर्धन (राज्यकाल ६०६-६४८ तक) की राजसभामें रहनेवाले बाणभट्टके बाद अर्थात आठवीं शताब्दीमें है।
दण्डीके ग्रन्थ 'शार्ङ्गधरपद्धति' में श्लोकसंख्या १७४ पर राजशेखरके नामसे निम्नलिखित पद्य उद्धत किया गया है- 'त्रयोऽग्नयस्त्रयो वेदा त्रयो देवास्त्रयो गुणाः। त्रयो दण्डिप्रबन्धाश्च त्रिषु लोकेषु विश्रुताः ।।' अर्थात् तीन अग्नि, तीन वेद, तीन देव और तीन गुणोंके समान दण्डी कदिके तीन ग्रन्थ सारे संसारमें प्रसिद्ध हैं। इस श्लोक द्वारा राजशेखरने दण्डीके तीन ग्रन्थोंको विश्वविश्रुत बतलाया है। किन्तु अभी कुछ समय पूर्वतक विद्वानोंको दण्डीके तीन ग्रन्थोंके नामोंका भी पता नहीं था। दण्डीके १. 'काव्यादर्श' तथा २. 'दशकुमारचरित' दो ग्रन्थ तो लोकप्रसिद्ध हैं किन्तु इनका तीसरा ग्रन्थ कौन-सा है इसका पता इस २०वीं शताब्दीके आरम्भमें विद्वानोंको नहीं था। डॉ० पिशलने 'मृच्छकटिक' को दण्डीका तीसरा ग्रन्थ कहनेका साहस कर डाला। 'दशकुमारचरित'की भूमिकामें डॉ० पीटर्सनने तथा डॉ० जैकोबीने 'छन्दोविचिति' नामक ग्रन्थको दण्डीका तीसरा ग्रन्थ कहा है। किन्तु यह सिद्धान्त भी गलत निकला। उसके बाद कुछ लोगोंने 'कलापरिच्छेद' नामक किसी ग्रंथको दण्डीकी तृतीय रचना माना। परन्तु यह बात भी केवल कल्पनामात्र ही ठहरी। उसमें कोई तत्त्व नहीं निकला। इस प्रकार दण्डीका तीसरा ग्रन्थ कौन-सा है इसके विवयमें विद्वज्जन अभीतक अन्धकारमें थे। 'प्रोसीडिंग्स एण्ड ट्रान्जैक्शन्स ऑव दि सेकेण्ड ओरि- एण्टल कान्फ्रेंस', पृ० १६८२०१ तथा 'जनरल ऑफ दि मिथिक सोसाइटी' भाग १३, पृ० ६७१-६८५ के अनुसार अभी दक्षिणभारतमें स्थित, मद्रासके हस्तलिखित ग्रन्थोंके राजकीय पुस्तकालयमें अवन्ति- सुन्दरीकथा' नामक एक ग्रन्थकी पाण्डुलिपि मिली है। इसके प्रारम्भिक भागके देखनेसे स्पष्टरूपसे विदित होता है कि यह ग्रन्थ दण्डीने लिखा है। इसीमें दण्डीने अपनेको भारविका प्रपौत्र कहा है। इस प्रकार इस 'अवन्तिसुन्दरीकथा' को मिलाकर दण्डीके तीन ग्रन्थ बन जाते हैं। एक बातको जानकर और आश्र्वर्य होगा कि अभीतक कुछ लोग ऐसे भी हैं जो 'दशकुमारचरित'के दण्डीकृत होनेमें सन्देह करते हैं। श्री त्रिवेदीने अपने सभ्णदित 'प्रतापरूद्रयशोभूषण'की भूमिकामें
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भूमिका ३७ तथा श्री आगाशेने 'दशकुमारचरित' की भूमिकामें इस प्रकारका सन्देह प्रद्शित किया है। श्री आगाशेका कहना यह है कि 'काव्यादर्श'के प्रणेता दण्डी बड़े कठोर आलोचक हैं। 'तदल्पमपि नोपेक्ष्यं काव्ये दुष्टं कथञ्चन। स्याद्वपुः सुन्दरमपि श्वित्रेणैकेन दुर्भगम् ।' -- काव्यादर्श १-७ 'काव्यादर्श'के इस सिद्धान्तके अनुसार दण्डी काव्यमें एक तनिक-से भी दूषणको सहन नहीं करते हैं। सुन्दर चेहरेपर यदि एक भी कोढ़का दाग हो जाय तो जैसे मुखका सारा सौन्दर्य नष्ट हो जाता है उसी प्रकार सुन्दर काव्यमें एक भी दोष आ जानेपर काव्यका सारा सौन्दर्य जाता रहता है। इसलिए काव्यमें एक भी दोषकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। यह दण्डीका सिद्धान्त है। इस सिद्धान्तके आधार- पर आगाशे महोदयका कहना है कि "दशकुमारचरित', जिसमें कि सैकड़ों दोष पाये जाते हैं, किसी भी अवस्थामें दण्डीकी रचना नहीं हो सकता है। ग्राम्यत्व दोषके विवेचनमें दण्डीने -- 'कन्ये कामयमानं मां न त्वं कामयसे कथम्। इति ग्राम्योऽयमर्थात्मा वैरस्याय प्रकल्पते ।।' -- काव्यादर्श १-६३ 'है कन्ये, मैं तुमको चाहता हूँ फिर तुम मुझको क्यों नहीं चाहती हो' इस बातको भी दण्डीने ग्राम्य दोषका उदाहरण माना है और इस प्रकारकी उत्तिको भी वैरस्यापादक माना है। परन्तु 'दशकुमार- चरित में इससे भी कहीं अधिक ग्राम्यताके उदाहरण पाये जाते हैं। इससे भी आगाशे महोदयने अपने इस सिद्धान्तकी पुष्टि करनेका यत्न किया है कि 'दशकुमारचरित' दण्डीकी रचना नहीं है। परन्तु इस बातको लिखते समय आगाशे महोदयने सिद्धान्त और व्यवहारके सार्वत्रिक भेदकी ओर ध्यान नहीं दिया है। सिद्धान्त और व्यवहारका यह भेद तो सब जगह पाया जाता है। सिद्धान्त या लक्ष्यबिन्दु तो सदा ऊँचा होता है और रखना भी चाहिये। किन्तु व्यवहारमें उसका उतना शुद्धरूपमें पालन लगभग असम्भव है। इसलिए यदि दण्डीके सिद्धान्त और व्यवहारमें अन्तर पाया जाता है तो यह कोई आश्र्वर्यकी बात नहीं है। दण्डी ही क्यों, कोई भी महाकवि आजतक ऐसे निर्दोष काव्यकी रचना नहीं कर सका है जिसके ऊपर अँगुली न उठायी जा सके। कोई भी कवि या कोई व्यक्ति किसी भी कार्यको करे, सिद्धान्ततः यही चाहता है कि उसके कार्यमें कोई कमी न रहने पाये, कोई दोष न निकाल सके, परन्तु फिर भी मनुष्यके प्रत्येक काममें कोई-न कोई दोष रह ही जाता है। व्यक्तिविवेककारने लिखा है- 'स्वकृतिष्वयन्त्रितः कथमनुशिष्यादन्यमयमिति न वाच्यम् । वारयति भिषगपथ्यादितरान् स्वयमाचरन्नपि तत्।।' वैद्य स्वयं अपथ्यका सेवन करते हुए भी दूसरोंको अपथ्यका निषेध करता है। दण्डीने जो 'काव्यादर्श'में तनिक-से भी काव्यदोषकी उपेक्षा न करनेकी बात लिखी है वह सब वैद्यके अपथ्यसेवनके निषेधक आदेशके समान है और 'कन्ये कामयमानं मां' आदि श्लोकमें तो दण्डीने यही दिखलाया है कि बातको इस प्रकार
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काव्यप्रकाश:
नग्न रूपमें कहना सहृदयोंके लिए रुचिकर नहीं होता है। उसी बातको यदि थोड़ी-सी शैली बदलकर थों कह दिया जाय कि -- 'कामं कन्दर्पचाण्डालो मयि वामाक्षि निर्दयः । त्वयि निर्मत्सरो दिष्ट्येत्यग्राम्योऽर्थो रसावहः ।' -- काव्यादर्श १-६४ तो यह अर्थ ग्राम्यता दोषसे रहित और रसावह हो जाता है। इसलिए 'दशकुमारचरित' में दोषोंके विद्यमान होनेसे आगाशे महोदयने जो यह परिणाम निकाला है कि वह दण्डीकी रचना नहीं है वह अनुचित और असङ्गत है। दूसरी बात यह भी है कि 'दशकुमारचरित' दण्डीकी अप्रौढ़ावस्थाकी रचना है इसलिए उसमें दोषोंका होना स्वाभाविक है। आगाशे महोदयने 'दशकुमारचरित'को दण्डीकी रचना न माननेका दूसरा कारण यह बतलाया है कि 'दशकुमारचरित' की रचनाशैली बड़ी क्लिष्ट और समासबहुल है, जब कि 'काव्यादर्श' की रचनाशैली बड़ी सरल समासरहित प्रसादगुणयुक्त है। इसलिए भी इन दोनोंका रचयिता एक जहीं हो सकता है। किन्तु वह हास्यास्पद-सी बात है। 'दशकुमारचरित' गद्यग्रन्थ है। उसमे समासबाहुल्य गुण है, दोष नहीं। स्वयं 'काव्यादर्श'में दण्डीने इस बातका समर्थन करते हुए लिखा है -- 'ओज: समासभयस्त्वमेतदमद्यस्य जीवितम् । परायणम् ।।' -- काव्यादर्श १-८० अर्थात् समासबाहुल्यात्मक ओज गुण ही तो गद्यकी जान है और दाक्षिणात्य लोगोंको छोड़कर अन्य लोग तो पद्यमें भी समासबाहुल्यका प्रयोग पसन्द करते हैं। इसलिए गद्यात्मक 'दशकुमारचरित'में भी समास- बाहुल्य पाया जाता है और वह उसमें सौन्दर्यका आधान कर रहा है। 'काव्यादर्श' तो गद्य-प्रन्थ नहीं है; पद्यात्मक ग्रन्थ है। इसलिए उसमें समासका न होना या कम होना स्वाभाविक है। फिर 'काव्यादर्श'में समासभूयस्त्व नहीं है यह बात नहीं है। 'पयोधरतटोत्स ङ्गलग्नसन्ध्यातपांशुका कस्य कामातुरं चेतो वारुणी न करिष्यति ।' -- काव्यादर्श १-८४ इस पद्यमें पूर्वार्द्धभाग साराका सारा मिलकर एक समस्तपद है। इसलिए 'दशकुमारचरित'के समासबाहुल्यके आधारपर उसको दण्डीकी रचना न शाननेका आगाशे महोदयका विचार किसी रूपमें भी ग्राह्य नहीं हो सकता है। एक बात और है, संस्कृत साहित्यमें दण्डी एक महाकविके रूपमें प्रसिद्ध हैं। 'जाते जगति वाल्सीकौ कविरित्यभिधाऽभवत्। कवी इति ततो व्यास कवयस्त्वयि दण्डिनि ।' इस श्लोकमें तो वाल्मीकि तथा व्यासके बाद तीसरे नम्बरपर दण्डी कविको ही रखा गया है। सबसे पहिले जब वाल्मीकि इस जगत्में आये तो उनके लिए एकवचन 'कवि' शब्दका प्रयोग प्रारम्भ हुआ। उस समय कोई दूसरा कवि नहीं कहलाता था। उसके बाद व्यासके आनेपर 'कवी' यह द्विवचनमें
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भूमिका ३६
कवि शब्दका प्रयोग होने लगा, क्योंकि अब वाल्मीकि और व्यास दो कवि हो गये। किन्तु अभीतक 'कवयः' इस बहुवचनमें कवि शब्दके प्रयोगका अवसर नहीं आया। कवि शब्दका बहुवचनमें 'कवयः' प्रयोग दण्डीके बाद होना प्रारम्भ हुआ। यह तो कविकी प्रशंसापरक अतिशयोक्ति है। किन्तु इसका माव इतना ही है कि दण्डी एक महाकविके रूपमें प्रसिद्ध हैं। उनकी यह प्रसिद्धि मुख्यरूपसे 'दशकुमार- चरित के आधारपर ही है। 'काव्यादर्श'के आधारपर कवित्वकी प्रसिद्धि नहीं है। यदि उस 'दशकुमार- चरित'को उनकी रचनाओंमेंसे निकाल दिया जाय तो फिर उनकी इस प्रसिद्धिका आधार ही क्या रह जाता है। इसी प्रकार -- 'उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थगौरवम्। दण्डिनः पदलालित्यं माघे सन्ति त्रयो गुणाः ।।' इस प्रसिद्ध लोकोक्तिमें दण्डी अपने 'दशकुमारचरित' के पदलालित्यके आधारपर ही स्थान पा सके हैं। इसलिए 'दशकुमारचरित' दण्डीकी रचना नहीं है, आगाशे महोदयका यह कथन सर्वथा असङ्गत है। पता नहीं उन्होंने इस प्रकारकी असङ्गत बात लिखनेका साहस कैसे किया। 'काव्यादर्श' दण्डीके तीन ग्रन्थोंमेंसे अलङ्कारशास्त्रसे सम्बद्ध ग्रन्थ 'काव्यादश' ही है। भारतमें इसके अनेक संस्करण निकल चुके हैं। सबसे पहिला संस्करण सन् १८६३ में कलकत्तासे प्रकाशित हुआ था। उसमें प्रेमचन्द्र तर्कवागीशकी टीका भी साथमें मुद्रित थी। उसके बाद सन् १६१० में प्रो० रङ्गाचार्य द्वारा सम्पादित एक 'तरुण वाचस्पति'-कृत टीका तथा दूसरी 'हृदयङ्गमा' टीका जिसके निर्माताके नामका पता नहीं है, इन दो टीकाओं सहित एक संस्करण मद्राससे प्रकाशित हुआ। उसके बाद पूनासे डॉ० बेलवलकर और शास्त्री रङ्गाचार्य रेही द्वारा सम्पादित होकर प्रकाशित हुआ। 'काव्यादर्श'में सामान्यतः तीन परिच्छेद हैं। किन्तु मद्राससे प्रकाशित रङ्गाचार्यवाले संस्करणमें चार परिच्छेद रखे गये थे। अन्य संस्करणोंमें जिसको तृतीय परिच्छेदके रूपमें दिया गया है उसको रङ्गाचार्यवाले संस्करणमें दो भागोंमें विभक्त कर दिया गया था। उसमें दोषोंके निरूपणसे चतुर्थ परिच्छेदका आरम्भ किया गया था। कलकत्ता और मद्रासवाले संस्करणोंमें दूसरा अन्तर यह भी था कि कलकत्तावाले संस्करणमें कुल श्लोकोंकी संख्या ६६० थी और मद्रासवाले संस्करणमें वह संख्या ६६३ थी। यह तीन संख्याओंका अन्तर इस प्रकार है कि दो श्लोक तो तृतीय परिच्छेदके अन्तमें अधिक पाये जाते हैं और एक श्लोक चतुर्थ परिच्छेदके आरम्भमें अधिक पाया जाता है। इसके अतिरिक्त कलकत्तादाले संस्करणके तृतीय परिच्छेदके १० वें श्लोकके बाद- 'आधिव्याधिपरीताय अद्य श्वो वा विनाशिने। को हि नाम शरीराय धर्मापेतं समाचरेत् ।' यह एक चौथा श्लोक मद्रास संस्करणमें अधिक पाया जाता है। इस प्रकार मद्रास संस्करणमें चार श्लोक अधिक हो जाते हैं। किन्तु इसके साथ ही २ य परिच्छेदका 'लिम्पतीव तमोडङ्गानि'वाला प्रसिद्ध श्लोक मद्रासवाले संस्करणमें नहीं पाया जाता है। इसलिए इन दोनों संस्करणोंमें तीन श्लोकोंका ही अन्तर रह जाता है। कलकत्तावाले संस्करणमें कुल ६६० श्लोक थे और मद्रासवाले संस्करणमें ६६३ श्लोक थे। 'काव्यादर्श'के प्रथम परिच्छेदमें काव्यका लक्षण, उसके गद्य, पद्य और मिश्रकाव्यरूप तीन भेद,
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४० काव्यप्रकाश:
सर्गबन्ध महाकाव्यका लक्षण देनेके बाद गद्यकाव्यके कथा तथा आख्यायिकारूप भामहाभिमत दो भेदोंका उल्लेख कर फिर उसका खण्डन कर दिया है। उन्होंने कथा और आख्यायिकाको एक ही जाति माना है। उसके बाद साहित्यका भाषाके आधारपर १. संस्कृत, २. प्राकृत, ३. अपभ्रनंश तथा ४. मिश्ररूपसे चार भागोंमें विभाजन किया है। उसके बाद काव्यके दस गुणोंके लिए 'वैदर्भ' तथा 'गौड' दो मार्गोंका उल्लेख कर उसी प्रसङ्गमें अनुप्रासका लक्षण तथा उदाहरण दिये हैं। इसके बाद उत्तम कवि बननेके लिए आवश्यक १. प्रतिभा २. श्रुत तथा ३. अभियोग इन तीन गुणोंका वर्णन किया है। द्वितीय परिच्छेदमें अलङ्कारका सामान्य लक्षण करनेके बाद ३५ अलङ्गारोंके लक्षण तथा उदाहरण दिये हैं। वे ३५ अलङ्गार, जिनका वर्णन दण्डीने द्वितीय परिच्छेदमें किया है, क्रमशः निम्नलिखित प्रकार हैं- १. स्वभावोक्ति, २. उपमा, ३. रूपक, ४. दीपक, ५. आवृत्ति, ६. आक्षेप, ७. अर्थान्तरन्यास, 5. व्यतिरेक, . विभावना, १०. समासोक्ति, ११. अतिशयोक्ति, १२. उत्प्रेक्षा, १३. हेतु, १४. सूक्ष्म, १५. लेश (या लव), १६. यथासंख्य (या क्रम), १७. प्रेय, १८. रसवत्, १६. ऊर्जस्वि, २०, पर्यायोक्त, २१. समाहित, २२. उदात्त, २३. अपह्नुति, २४. श्लेष, २५. विशेषोक्ति, २६. तुल्ययोगिता, २७. विरोध, २८. अप्रस्तुतप्रशंसा, २६. व्याजोक्ति, ३०. निदर्शना, ३१. सहोक्ति, ३२. परिवृत्ति, ३३. आशी:, ३४. संसृष्ट और ३५. भाविक। 'काव्यादर्श' के तृतीय परिच्छेदमें ग्रन्थकारने 'यमक'का विस्तारके साथ वर्णन किया है और चित्रबन्धके गोमूत्रिका, अर्धभ्रम, सर्वतोभद्र, स्वरस्थानवर्णनियम आदि भेदोंका तथा प्रहेलिकाके दस भेदोंका वर्णन करनेके बाद दस प्रकारके काव्यदोषोंका वर्णन किया है। मद्रासवाले संस्करणमें इन दोषोंके विवेचनको चतुर्थ परिच्छेदमें दिखलाया गया है। दण्डीका प्रभाव और उनके टीकाकार यद्यपि अलङ्कारशास्त्रके आद्य आचार्य भामह हैं और दण्डी उनके बाद हुए हैं, किन्तु अपनी रचनाके द्वारा दण्डीने भामहकी अपेक्षा कहीं अधिक ख्याति प्राप्त की है। भामहका मूलग्रन्थ ही बड़ी कठिनाईसे मिल सका। उसपर 'भामहविवरण' नामक एक ही टीका लिखी गयी, वह भी मिलती नहीं। किन्तु दण्डीके 'काव्यादर्श'की स्थिति इससे बिलकुल भिन्न है। इसके ऊपर अनेक टीकाएँ लिखी गयीं। एक प्रेमचन्द्र तर्कवागीशवाली टीका जो कलकत्तासे प्रकाशित हुई थी और तरुण वाचस्पतिकृत टीका तथा 'हृदयङ्गमा' टीका, जिसके लेखकके नामका पता नहीं है, दो टीकाएँ मद्राससे प्रकाशित हुई थीं। इन तीनों टीकाओंकी चर्चा हम पहिले कर चुके हैं। इनके अतिरिक्त ४. महामहोपाध्याय हरिनाथकृत 'मार्जन' नामक टीका (विक्रम संवत् १७४६ में इसकी प्रतिलिपि की गयी थी), ५. कृष्णकिङ्कर तर्कवागीशविरचित 'काव्यतत्त्वविवेचनकौमुदी' नामक टीका, ६. वादिङ्गलविरचित 'श्रुतानुपालिनी' टीका, ७. जगन्नाथके पुत्र मल्लिनाथकृत 'वैमल्यविधायिनी' आदि अनेक टीकाओंका उल्लेख मिलता है। इतनी अधिक टीकाएँ 'काव्यादर्श'पर लिखी गयी हैं इससे 'काव्यादर्श'की लोक- प्रियता तथा विद्वानोंमें उसके विशेष आदरका परिचय मिलता है। न केवल टीकाग्रन्थोंके द्वारा ही, अपितु अन्य भाषाओंमें अनुवाद आदिके द्वारा भी 'काव्यादर्श'ने विशेष सम्मान प्राप्त किया है। सिंहली भाषामें 'सिय-बस-लकर' नामका अलङ्गारशास्त्रका सर्वमान्य प्रन्थ है। 'सिय-वस-लकर'का अर्थ होता है 'स्व-भाषा-अलङ्गार'। इस ग्रन्थकी रचना 'काव्यादर्श'के
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भूमिका ४१
आधारपर ही हुई है। इसी प्रकार कन्नड़ भाषाका अलङ्कारशास्त्रविषयक प्रसिद्ध ग्रन्थ 'कविराजमार्ग' भी दण्डीके 'काव्यादर्श'के आधारपर ही लिखा गया है। अधिकांशमें उसका अनुवाद ही कहा जा सकता है। सिंहल और कन्नड़ भाषाके अलङ्कारशास्त्रविषयक ग्रन्थोंपर इतना व्यापक प्रभाव देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि दण्डी स्वयं दक्षिणभारतके ही रहनेवाले थे। 'काव्यादर्श'के 'पद्येऽप्यदाक्षिणात्या- नामिदमेकं परायणम्' आदि (१-८०) श्लोकको हम ऊपर दे चुके हैं। उसमें एक ध्वनि यह निकलती है कि दाक्षिणात्य लोग तो पद्यमें समासभूयस्त्वका प्रयोग नहीं करते हैं किन्तु दाक्षिणात्योंको छोड़कर अन्य लोगोंके लिए पद्यमें भी सौन्दर्य लानेका केवल यही एक मार्ग रह जाता है। इससे दाक्षिणात्योंके प्रति कुछ गौरवभावना व्यक्त होती है। इससे भी यह अनुमान होता है कि वे दाक्षिणात्य रहे होंगे। इसके अतिरिक्त कर्णाटककी रहनेवाली कवयित्री विज्जिका या विजयाङ्काके द्वारा दण्डीका विशेषरूपसे उल्लेख भी उनके दाक्षिणात्य होनेका सङ्गृत करता है। जल्हणकी 'सूक्तिमुक्तावली' में तथा 'शार्ङ्गधरपद्धति'में १८४ श्लोकसंख्यापर राजशेखरके नामसे निम्नलिखित पद्य उद्धृत किया गया है -- 'सरस्वतीव कार्णाटी विजयाडा जयत्यसौ। या वैदर्भगिरां वास: कालिदासादनन्तरम् ।।'
-- शा० प० १८४ इसमें कर्णाटकनिवासिनी 'विजयाड्गा' कवययत्रीकी प्रशंसा की गयी है उत्हतीके समान कहा गया है और वैदर्भमार्गकी रचनामें कालिदासके समान ठहराया गया है। वजयाडा' या 'विज्जिका' के नामसे 'शार्ङ्गधरपद्धति' में श्लोकसंख्या १८० पर निम्निलिखित पद्य दिया गया है- 'नीलोत्पलदलश्यामां विज्जिकां मामजानता। वृथैव दण्डिना प्रोक्तं सर्वशुक्ला सरस्वती।।' -- शा० प० १८०।
'सर्वशुक्ला सरस्वती' 'काव्यादर्श' के प्रथम श्लोकका अन्तिम चरण है। इसमें सरस्वतीको 'सर्वशुक्ला' कहा है। कार्णाटी विजयाड्का या विज्जिकाको भी लोग साक्षात् सरस्वती कहते थे। और वह स्वयं भी अपनेको सरस्वतीसे कम नहीं समझती थी। किन्तु कार्णाटी होनेके कारण वह 'नीलोत्पल- दलश्यामा' थी। इसीलिए उसने अपनी प्रशंसाके रूपमें कहा है कि सरस्वती श्याम भी हो सकती हैं, क्योंकि मैं श्यामवर्ण हूँ। दण्डीने जो सरस्वतीको 'सर्वशुवला सरस्वती' कहा है वह ठीक नहीं है। दण्डीके 'काव्यादर्श'का भारतके दक्षिणी भागमें विशेष प्रभाव होने, कार्णाटी 'विजयाङ्गा'के द्वारा उनका उल्लेख करने और स्वयं दण्डीके द्वारा दाक्षिणात्योंकी प्रशंसा ध्वनित करनेसे यह अनुमान किया जा सकता है कि दण्डी कदाचित् दाक्षिणात्य ही रहे होंगे।
५. भट्टोट्रट दण्डीके बाद अगले आचार्य भट्टों्ड्रट हैं जिन्होंने अलङ्गारशास्त्रके ऊपर महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। भट्ट उ्ड्ट, जैसा कि उनके नामसे विदित होता है, कश्मीरी ब्राह्मण थे। वे कश्मीरके राजा
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४२ काव्यप्रकाशः
जयादित्यकी राजसभाके पण्डित नहीं, अपितु सभापति थे। उन्हें राज्यकी ओरसे प्रतिदिन एक लाख दीनार वेतनरूपमें मिलता था। कल्हणकी 'राजतर्राङ्गणी' में उनका वर्णन करते हुए लिखा है- 'विद्वान् दीनारलक्षेण प्रत्यहं कृतवेतनः। भट्टोडभूदुं्डूटस्तस्य भूमिभर्तुः सभापतिः ॥ ४-४९५ कश्मीरमें महाराज जयापीडका शासनकाल ७७६ ई० से लेकर ८१३ ई० तक माना जाता है। इसलिए उद्भटका समय भी आठवीं शताब्दीका अन्तिम तथा नवम शताब्दीका प्रारम्भिक भाग पड़ता है। दण्डीके समान उद्टने भी साहित्यशास्त्रके सम्बन्धमें तीन ग्रन्थ लिखे। उनके एक ग्रन्थ 'भामहविवरण' का उल्लेख पहले ही किया जा चुका है। यह ग्रन्थ भामहके 'काव्यालङ्गार' की व्याख्याके रूपमें लिखा गया था, किन्तु आजकल उपलब्ध नहीं होता है। अनेक साहित्यग्रन्थोंमें उसका उल्लेख आदरपूर्वक किया जाता है। उनके शेष दो ग्रन्थोंमें एक 'काव्यालङ्गारसारसंग्रह' और दूसरा 'कुमार- सम्भव' काव्य है। इनमेंसे केवल 'काव्यालङ्कारसारसंग्रह' प्राप्त होता है। 'कुमारसम्भव काव्य' भी नहीं मिलता है। किन्तु उसके अनेक श्लोक 'काव्यालङ्गारसारसंग्रह' में उदाहरणरूपमें उद्धृत पाये जाते हैं। 'काव्यालङ्गारसारसंग्रह' में उ्भटने जितने भी उदाहरण दिये हैं वे सब अपने बनाये हुए इस 'कुमारसम्भव' काव्यसे ही दिये हैं। महाकवि कालिदासका भी 'कुमारसम्भव' नामक एक काव्य है किन्तु उद्धटका 'कुमारसम्भव' काव्य उससे बिलकुल भिन्न है। यद्यपि दोनों काव्योंकी रचना एक ही कथानकको आधार मानकर की गयी है, किन्तु रामचरितको लेकर बनाये गये अनेक काव्यों और नाटकोंके समान ये दोनों काव्य बिलकुल अलग हैं। फिर भी उन दोनोंके कुछ श्लोकोंकी तुलना मनोरञ्जक होगी। 'कुमारसम्भव'के कथानकके अनुसार पार्वतीजी जब शिवकी प्राप्तिके लिए तपस्या कर रही थीं तब उनकी परीक्षा लेनेके लिए शिवजी ब्रह्मचारीका वेश बनाकर पार्वतीके पास जाते हैं। उस समय पार्वतीकी तपस्या तथा शिवके जानेका वर्णन दोनों महाकवियोंने बड़े सुन्दर रूपमें किया है। उस प्रसङ्गके दो-तीन श्लोक दोनों कवियोंके हम नीचे दे रहे हैं- उद्धटका श्लोक-'प्रच्छन्ना शस्यते वृत्तिः स्त्रीणां भावपरीक्षणे। प्रतस्थे धूर्जटिरतस्तनुं स्वीकृत्य बाटवीम् ।।' २-१० कालिदासका श्लोक-'विवेश कश्चिज्जटिलस्तपोवनं शरीरबद्धः प्रथमाश्रमो यथा ।' ५-३० उ्दटका श्लोक -- 'अपश्यच्चातिकष्टानि तप्यमानां तपांस्युमाम्। असम्भाव्यपतीच्छानां कन्यानां का परा गति: ।।' कालिदासका श्लोक-'इयेष सा कर्तुमबन्ध्यरपतां समाधिमास्थाय तपोभिरात्मनः । अवाप्यते वा कथमन्यथा द्वयं तथाविधं प्रेम पतिश्च तादृशः ।' ५-२ उद्टका श्लोक -- 'शीर्णपर्णाम्बुवाताशकष्टेडपि तपसि स्थिताम् । समुद्वहन्तीं नापूर्वं गर्वमन्यतपस्विवत् ॥' २-१
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भूमिका ४३ ४
कालिदासका श्लोक -- 'स्वयं विशीर्णद्रुमपर्णवृत्तिता परा हि काष्ठा तपसस्तया पुनः ॥' ५-२८ िी िडि हा 'काव्याल ङ्गारसारसंग्रह' भट्ट उद्धटका एकमात्र उपलब्ध ग्रन्थ 'काव्यालङ्कारसारसंग्रह' है। यह ग्रन्थ ६ वर्गोंमें विभक्त है। इसमें कुल मिलाकर ७६ कारिकाएँ हैं और उनमें ४१ अलङ्कारोंके लक्षण आदि दिये गये हैं। ६ वर्गोंमें उन ४१ अलङ्कारोंका विभाजन निम्नलिखित प्रकार किया गया है -- प्रथम वर्ग-१. पुनरुक्तवदाभास, २. छेकानुप्रास, ३. त्रिविध अनुप्रास (परुषा, उपनागरिका, ग्राम्या या कोमला वृत्ति), ४. लाटानुप्रास, ५. रूपक, ६ उपमा, ७. त्रिविध दीपक (आदिदीपक, मध्यदीपक, अन्तदीपक), ८. प्रतिवस्तूपमा। द्वितीय वर्ग-१. आक्षेप, २. अर्थान्तरन्यास, ३. व्यतिरेक, ४. विभावना, ५. समासोक्ति, ६. अतिशयोक्ति। तृतीय वर्ग-१. यथासंख्य, २. उत्प्रेक्षा, ३. स्वभावोक्ति। चतुर्थ वर्ग -- १. प्रेय, २. रसवत्, ३. ऊर्जस्विन्, ४. पर्यायोक्त, ५. समाहित । पञ्चम वर्ग-१. अपह्नुति, २. विशेषोक्ति, ३. विरोध, ४. तुल्ययोगिता, ५. अप्रस्तुतप्रशंसा, ६. व्याजस्तुति, ७. निदर्शना, ८. उपमेयोपमा, ६. सहोक्ति, १०. सङ्कर (चतुविध), ११. परिवृत्ति। षष्ठ वर्ग-१. अनन्वय, २. ससन्देह, ३. संसृष्टि, ४. भाविक, ५. काव्यलिङ्ग, ६. दृष्टान्त। इन सब अलङ्गारोंका वर्णन ७६ कारिकाओंमें किया गया है और उनके उदाहरणरूपमें लगभग १०० श्लोक ग्रन्थकारने अपने कुमारसम्भव काव्य'मेंसे उद्धृत किये हैं। इन ४१ अलङ्गारोंमेंसे १. पुनरुक्तवदाभास, २. काव्यलिङ्ग, ३. छेकानुप्रास, ४. दृष्टान्त और ५. सङ्गर ये पाँच अलङ्गार ऐसे हैं जो भामहके 'काव्यालङ्गार' में नहीं पाये जाते हैं। किन्तु उं्धटने एक रूपमें उनकी स्थापना की है। ये पाँचों अलङ्गार दण्डीके 'काव्यादर्श' में भी नहीं पाये जाते हैं। १. उत्प्रेक्षावयव, २. उपमारूपक और ३. यमक ये तीन अलङ्गार ऐसे हैं जो भामहने और दण्डीने उत्प्रेक्षाके अन्तर्गत माने हैं किन्तु उ्टने उनको नहीं माना है। १. लेश, २. सूक्ष्म तथा ३. हेतु ये तीन अलङ्गार दण्डीने माने हैं। भामहने उनका निषेध किया है। भामहके समान उद्धट भी इन तीनों अलङ्गारोंको नहीं मानते हैं, इसलिए उन्होंने अपने ग्रन्थमें इन तीनों अलङ्गारोंकी कोई चर्चा नहीं की है। १. रसवत्, २. प्रेय, ३. ऊर्जस्वि, ४. समाहित और ५. श्लिष्ट ये पाँच अलङ्गार ऐसे हैं जिनका वर्णन तो भामह और दण्डीने किया है, किन्तु उनके लक्षण दोनों जगह अस्पष्ट हैं। उद्टने उनके लक्षण बहुत स्पष्टरूपसे प्रस्तुत कर दिये हैं। इस प्रकार पुनरुक्तवदाभासादि पाँच अलङ्गारोंकी स्थापना तथा रसवत् आदि पाँच अलङ्कारोंके लक्षणोंका स्पष्टीकरण साहित्यशास्त्रको उद्धटकी अपनी विशेष देन है। उ्डटके टीकाकार उद्टके 'काव्यालङ्गारसारसंग्रह'पर दो टीकाएँ उपलब्ध होती हैं। एक टीकाके लेखक प्रतीहारेन्दुराज हैं और दूसरीके निर्माता राजानक तिलक हैं। प्रतीहारेन्दुराज कोंकण देशके निवासी तथा 'अभिधावृत्तिमातृका' के निर्माता मुकुलभट्टके शिष्य थे। इनका समय दशम शताब्दीके प्रारम्भमें माना जाता है। 'काव्यालङ्गारसारसंग्रह'पर इनकी 'लघुविवृति' नामकी टीका है। उस टीकामें
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४४ काव्यप्रकाश: इन्होंने अपने गुरु मुकुलभट्टकी बड़ी प्रशंसा की है। उन्हींसे पढ़कर इन्होंने 'काव्यालङ्गारसारसंग्रह' की यह टीका लिखी है- 'विद्वदग्र्यान्मुकुलकादधिगम्य विविच्यते। प्रतीहारेन्दुराजेन काव्यालङ्गारसंग्रह: ।।' I यह 'लघुविवृति' टीका निर्णयसागर प्रेस बम्बईसे काव्यमाला तथा बाम्बे संस्कृत सिरीजके अन्तर्गत प्रकाशित हो चुकी है। 'काव्यालड्कारसारसंग्रह'पर 'विवृति' नामकी एक और टीका 'गायकवाड ओरिएण्टल सिरीज' बड़ौदासे प्रकाशित हुई है। इसके रचयिताका नाम तो उसपर नहीं दिया गया है, किन्तु उसके सम्पादक महोदयका विचार है कि इस टीकाके निर्माता कश्मीर-निवासी राजानक तिलक प्रतीत होते हैं। राजानक तिलकने 'काव्यालङ्गारसारसंग्रह' पर 'उ्डटविवेक' नामसे कोई टीका लिखी थी इस बातका उल्लेख 'अलङ्कारसर्वस्व' की जयरथ-विरचित 'विर्माशनी' टीकामें पाया जाता है। किन्तु उसकी अन्यत्न कहीं उपलब्धि नहों हुई है। इसलिए यह अनुमान किया गया है कि यही ग्रन्थ राजानक तिलक द्वारा लिखा गया होगा। यह ग्रन्थ प्रतीहारेन्दुराजकी 'लघुविवृति' के बाद लिखा गया है, क्योंकि उसमें प्रती- हारेन्दुराजकी व्याख्याकी आलोचना भी पायी जाती है। उ्टके 'भामहविवरण', 'कुमारसम्भव' तथा 'काव्यालङ्गारसारसंग्रह' इन तीन ग्रन्थोंका उल्लेख तो ऊपर किया जा चुका है। इनके अतिरिक्त भरत-नाटयशास्त्रके टीकाकारके रूपमें भी इनका उल्लेख पाया जाता है। शार्ङ्गदेवने अपने 'सङ्गीतरत्नाकर' में 'नाटयशास्त्र' के व्याख्याताओंकी सूची निम्नलिखित प्रकार दी है- व्याख्यातारो भारतीये लोल्लटोद्भटशङ्ककाः । भट्टाभिनवगुप्तश्च श्रीमत्कीतिधरोऽपर: ।' 'भामहविवरण' के समान 'नाट्यशास्त्र'पर इनकी लिखी टीका भी उपलब्ध नहीं होती है। ६. वामन अलङ्कारशास्त्रके आचार्योंमें उं्धटके बाद वामनका स्थान आता है। साहित्यशास्त्रके इतिहास- में वामनका स्थान विशेष महत्त्वपूर्ण है। ये रीतिसम्प्रदाय नामसे प्रसिद्ध साहित्यशास्त्रके एक प्रमुख सम्प्रदायके प्रवर्तक हैं। 'रीतिरात्मा काव्यस्य' लिखकर इन्होंने रीतिको काव्यका आत्मा माना है। इस सिद्धान्तके कारण इनका साहित्यशास्त्रके इतिहासमें विशेष महत्त्व माना गया है। उड्धटके समान वामन भी कश्मीरके निवासी उद्भटके समकालीन और सहयोगी थे। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, उन्डट कश्मीरराज जयादित्यकी राजसभाके सभापति थे। आचार्य वामन उन्हीं जयादित्यके मन्त्री थे। राजत्राङ्गणी' में जहाँ उन्धटके सभापति होनेकी बात लिखी है वहीं वामनके जयादित्यके मन्त्री होनेकी बात भी इस प्रकार लिखी है- 'मनोरथः शङ्ङ्दत्तश्चटकः सन्धिमांस्तथा। बभवुःकवयस्तस्य वामनाद्याइच मन्त्रिणः ।।' -राजतर्राङ्गणी ४-४६७ जयादित्यका राज्यकाल ७७६से ८१३ ई० तक माना जाता है। अतएव इनका समय आठवीं शताब्दीके अन्तमें और नवम शताब्दीके आरम्भमें पड़ता है।
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भूमिका ४५
बामनका एकमात्र ग्रन्थ 'काव्यालडारसूत्र' है। अलङ्गारशास्त्रपर यह एक ऐसा ग्रन्थ है जो सूत्रशैलीमें लिखा गया है। यह ग्रन्थ पाँच अधिकरणोंमें विभक्त है। प्रत्येक अधिकरण दो या तीन अध्यायोंमें विभक्त किया गया है। इस सम्पूर्ण ग्रन्थमें बारह अध्याय हैं। इन बारहों अध्यायोंमें मिलाकर सूत्रोंकी संख्या ३१२ है। ग्रन्थके प्रथम अधिकरणमें काव्यके प्रयोजन, अधिकारीका वर्णन करके रीतिको काव्यका आत्मा सिद्ध किया है। रीतिको काव्यका आत्मा बतलानेवाले प्रसिद्ध सिद्धान्तका निरूपणकर, फिर रीतिके तीन भेद तथा काव्यके अनेक प्रकारका वर्णन किया गया है। इस अधिकरणका नाम 'शरीराधिकरण' है और उसमें तीन अध्याय हैं। द्वितीयाधिकरणका नाम 'दोषदर्शनाधिकरण' है। इसमें दो अध्याय हैं जिनमें काव्यके दोषोंका विवेचन किया गया है। तीसरे अधिकरणका नाम 'गुणविवेचनाधि- करण' है। इसमें दो अध्याय हैं, जिनमें काव्यके गुणोंका विवेचन किया गया है। इसमें ग्रन्थकारने गुण तथा अलङ्कारोंका भेद भी दिखलाया है। "काव्य-शोभायाः कर्तारो धर्मा गुणाः" (३-१-१), "तदतिशय- हेतवस्त्वलड्गाराः" (३-१-२), इन सूत्रोंमें गुण तथा अलङ्गारके भेदनिरूपणसे ही इस अधिकरणका आरम्भ हुआ है। किन्तु उत्तरवर्ती मम्मटादि आचार्योंने वामनके इस मतकी बड़ी कटु आलोचना की है। वामनको गुण तथा अलङ्गारका यह भेद दिखलानेकी आवश्यकता इसलिए पड़ी कि इनके पूर्ववर्ती उ्धटने काव्यमें गुण तथा अलङ्गारोंका भेद नहीं माना था। उद्भटका कहना था कि लोकमें तो शौर्यादि गुणों तथा हारादि अलङ्गारोंमें यह भेद किया जा सकता है कि शौर्यादि गुण आत्मामें समवायसम्बन्धसे रहते हैं और हारादि अलङ्गार संयोगसम्बन्धसे शरीरमें रहते हैं, इसलिए वे दोनों भिन्न हैं। किन्तु काव्यमें तो ओज आदि गुण तथा उपमादि अलङ्गार दोनों समवायसम्बन्धसे ही रहते हैं इसलिए उनमें कोई भेद नहीं है। उद्धटके इस मतका खण्डन करनेके लिए वामनको गुण-निरूपण करनेवाले तृतीय अधिकरणके आरम्भमें ही गुण तथा अलङ्गारोंका यह भेद करना पड़ा। चतुर्थ अधिकरणका नाम 'आलङ्गारिक अधिकरण' है। इसमें तीन अध्याय हैं। पाँचवें अधिकरणका नाम 'प्रायोगिकाधिकरण' है। इसमें दो अध्याय हैं और शब्दप्रयोगके विषयमें विवेचन किया गया है। इस ग्रन्थके तीन भाग हैं-१. सूत्र, २. वृत्ति तथा ३. उदाहरण। सूत्र और वृत्ि दोनों भागोंकी रचना वामनने स्वयं की है। 'प्रणम्य परमं ज्योतिर्वामनेन कविप्रिया। काव्यालङ्कारसूत्राणां स्वेषां वृत्तिविधीयते।' अर्थात् वामनने अपने काव्यालड्डारसूत्रोंके ऊपर 'कविप्रिया' नामकी वृत्ति स्वयं ही लिखी है। इस प्रकार सूत्र तथा वृत्ति दो भागोंकी रचना तो स्वयं वामनने की है। किन्तु उदाहरणरूप तीसरे भागमें उन्होंने कुछ उदाहरण अपने भी दिये हैं और अधिकांश उदाहरण दूसरोंके ग्रन्थोंसे लिये हैं। चतुर्थ अधिकरणके अन्तमें उन्होंने स्वयं लिखा है- 'एभिनिदर्शनैः स्वीयैः परकीयेश्च पुष्कलैः।' अन्य जिन ग्रन्थोंसे उदाहरण लेकर वामनने अपने ग्रन्थमें प्रस्तुत किये हैं उनमें 'अमरुकशतक', 'उत्तररामचरित', 'कादम्बरी', 'किरातार्जुनीय', 'कुमारमम्भव', 'मालतीमाधव', 'मृच्छकटिक', 'मेघदुत',
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४६ काव्यप्रकाश:
'रघुवंश', 'विकरमोर्वशीय', 'वेणीसंहार', 'अभिज्ञानशाकुन्तल', 'शिशुपालध', 'हर्षरित' आदिके नाम विशेषरूपसे उल्लेखनीय हैं। कान 'काव्यालङ्गारसूत्र' वामनका एकमात्र ग्रन्थ है किन्तु बीचमें वह भी लुप्त हो गया था। प्रतीहारे- न्दुराजके गुरु मुकुलभट्टको कहींसे उसकी एक आदर्श प्रति मिली, उसके आधारपर इसका फिर प्रसार और प्रचार हो सका है। इस बातका उल्लेख 'काव्यालङ्गार' के टीकाकार सहदेवने निम्नलिखि त प्रकार किया है- 'वेदिता सर्वशास्त्राणां भट्टोऽभून्मुकुलाभिधः । लब्ध्वा कुतश्चिदादर्श भ्रष्टाम्नायं समुद्धृतम् ।। काव्यालङ्गारशास्त्रं यत् तेनैतद्वामनोदितम्। असूया तन्न कर्तव्या विशेषालोकिभि: क्वचित् ।'
६. रुद्रट वामनके बाद अगले आचार्य रुद्रट हैं। ये साहित्यशास्त्रके इतिहासमें एक अत्यन्त प्रसिद्ध आचार्य हुए हैं। इनका दूसरा नाम शतानन्द था। किन्तु वह नाम अधिक प्रसिद्ध नहीं है। इनकी प्रसिद्धि रुद्रट नामसे ही है। इनके पिताका नाम वामुकभट्ट था। नामसे प्रतीत होता है कि ये भी कश्मीरी थे। अपने वंशके परिचयरूपमें इनके एक श्लोकको टीकाकारने विशेषरूपसे निम्नलिखित प्रकार उल्लिखित किया है- 'अत्र च चक्रे स्वनामाङ्कभूतोडयं श्लोक; कविनान्तर्भावितो यथा -- शतानन्दपराख्यन भट्टवामुकसूनुना। साधितं रुद्रटेनेदं सामाजा धीमतां हितम् ।' -- काव्यालड्कार ५। १२-१४ की टीका इनके मतका उल्लेख धनिक, मम्मट, प्रतीहारेन्दुराज, राजशेखर आदि अनेक आचार्योंने अपने ग्रन्थोंमें किया है। किन्तु इनमें सबसे पूर्ववर्ती उल्लेख राजशेखर द्वारा किया गया है। राजशेखरने 'काव्यमीमांसा' में 'काकुवक्रोक्तिर्नाम शब्दालङ्कारोऽयमिति रुद्रटः' 'काव्यमीमांसा, अध्याय ७, पृष्ठ ३१) लिखकर रुद्रटके मतका उल्लेख किया है। राजशेखरका काल ६२० ई० के लगभग माना जाता है। इसलिए रुद्रटका काल उनके पहले नवम शताब्दीमें ८५० ई० के लगभग पड़ता है। ऐसा जान पड़ता है कि साहित्यशास्त्रके सारे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थोंकी रचना कश्मीरमें हुई और उनमेंसे अधिकांश लोगोंने अपने ग्रन्थोंके नाम भी 'काव्यालङ्गार' ही रखे हैं। इस परम्पराके अनुसार कश्मीरवासी रुद्र के ग्रन्थका नाम भी 'काव्यालङ्गार' होना चाहिये और है भी। रुद्रटका 'काव्यालङ्कार' ग्रन्थ आर्या छन्दमें लिखा गया है। इसमें कुल ७१४ आर्याएँ हैं। ग्रन्थ १६ अध्यायोंमें विभक्त है, जिनमेंसे ११ अध्यायोंमें अलङ्गारोंका वर्णन है। अन्तिम अध्यायमें रसोंकी मीमांसा की गयी है। इसमें नौरसोंके साथ एक 'प्रेय' नामक रसकी और कल्पना करके रसोंकी संख्या दस कर दी गयी है। नायकनायिका- भेदका भी विस्तारके साथ वर्णन किया गया है। अलङ्कारोंके विवेचनमें इन्होंने नयी बात यह की है कि वैज्ञानिक आधारपर अलङ्कारोंका विभाजन करनेका यत्न किया है। वास्तवमें, औपम्य, अतिशय तथा श्लेष इन चारको इन्होंने अलङ्कारोंका विभाजक तत्त्व माना है और इसीके आधारपर अलङ्गारोंको चार भागोंमें विभक्त किया है। यह इनका विलकुल नया दृष्टिकोण है। रुद्रटने अलङ्गारक्षेत्र में १.
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भूमिका ४७ मत, २. साम्य, ३. पिहित और ४. भाव नामके चार बिलकुल नवीन अलङ्गारोंकी कल्पना की है, जिनका उल्लेख प्राचोन और नवीन किन्हीं ग्रन्थोंमें नहीं मिलता है। कुछ प्राचीन अलङ्कारोंका इन्होंने नवीन रूपमें नया नामकरण किया है। जैसे भामह आदिके 'व्याजस्तुति'के लिए इन्होंने 'व्याजश्लेष' (१०-११) शब्दका प्रयोग किया है। 'स्वभावोक्ति'के स्थानपर 'जाति' (ह-३) और 'उदात्त'के स्थानपर 'अवसर' (७-१०३) आदि नामोंका प्रयोग किया है। रुद्रटके टीकाकार रुद्रटके 'काव्यालङ्गार' पर तीन टीकाओंका उल्लेख मिलता है। उनमें सबसे पहली टीका कश्मीरके वल्लभदेव नामक विद्वानने लिखी थी। इसका नाम 'रुद्रटालङ्कार' था। परन्तु वह टीका उपलब्ध नहीं होती है। दूसरी टीका नमिसाधुकी है। यह टीका उपलब्ध होती है और छप चुकी है। नमिसाधु जैन विद्वान् थे। इन्होंने अपनी टीकाके रचनाकालका उल्लेख निम्नलिखित प्रकार किया है- 'पञ्चविशतिसंयुक्तैः एकादशसमाशतः । विक्रमात् समतिक्रान्तैः प्रावृषीदं समर्थतम् ।' अर्थात् विक्रमके ११२५ संवत् (१०६८ ई०) में नमिसाधुने इस टीकाकी रचना की। तीसरी टीकाके निर्माता भी जैन यति थे। इनका नाम आशाधर और समय १३वीं शताब्दीका मध्यभाग है। रुद्रट और रुद्रभट्ट रुद्रटसे मिलता-जुलता एक नाम और पाया जाता है रुद्रभट्ट। रुद्रभट्टकी रचनाका नाम 'शृङ्गारतिलक' है। इसमें तीन परिच्छेद हैं। प्रथम परिच्छेदमें नौ रसों, भाव तथा नायक-नायिकाके भेदोंका सामान्य वर्णन है। द्वितीय परिच्छेदमें विशेषरूपसे विप्रलम्भशृङ्गारका तथा तृतीय परिच्छेदमें इतर रसों तथा वृत्तियोंका वर्णन किया गया है। नवीन और प्राचीन अधिकांश विद्वान् इन दोनोंको अभिन्न एक ही व्यक्ति मानते हैं। किन्तु कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इनको भिन्न-भिन्न व्यक्ति मानते हैं। भिन्नतावादियोंकी मुख्य युक्तियाँ इस प्रकार हैं- १. रद्रटके 'काव्यालङ्गार'के अनुसार काव्यका तत्त्व अलङ्गार है, क्योंकि उन्होंने अपने ग्रन्थके सोलह अध्यायोंमेंसे ग्यारह अध्यायोंमें अलङ्कारोंका वर्णन किया है। रसका वर्णन केवल एक अन्तिम अध्यायमें किया है। इसके विपरीत 'शृङ्गारतिलक' में काव्यका प्रधान तत्त्व रस है। उसमें अलङ्कारोंकी चर्चा बिलकुल ही नहीं की गयी है। इसलिए इन दोनों ग्रन्थोंके कर्ता अलग-अलग मानने चाहिये। २. 'शृङ्गारतिलक' में रुद्रभट्टने केवल नौ रसोंका उल्लेख किया है, किन्तु 'काव्यालङ्गार' में रुद्रटने 'प्रेय' को भी दसवाँ रस मानकर रसोंकी संख्या दस कर दी है। ३. र्द्रभट्टने कौशिकी आदि चार वृत्तियोंका उल्लेख किया है, किन्तु रुद्रटने मधुरा, परुषा, प्रौढा, ललिता तथा भद्रा नामसे पाँच प्रकारकी वृत्तियोंका वर्णन किया है। ४. नायकनायिकाभेदमें रुद्रभट्टने तीसरे नायिकाभेद, वेश्याका बड़े विस्तारके साथ वर्णन किया है, किन्तु रुद्रटने केवल दो श्लोकोंमें उनका वर्णन कर उसको तिरस्कारपूर्वक छोड़ दिया है। इस प्रकार भेदवादियोंकी दृष्टिमें रुद्रट तथा रुद्रभट्ट दोनों अलग-अलग व्यक्ति हैं। किन्तु
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४८ काव्यप्रकाश: अधिकांश लोग इन दोनोंको एक ही व्यक्ति मानते हैं। प्राचीन सूक्तिसंग्रहोंमें दोनोंके पद्य एक-दूसरेके नामसे दिये गये हैं। ८. आनन्दवर्धनाचार्य साहित्यशास्त्रके आचार्योंमें रुद्रभट्टके बाद आनन्दवर्धनाचार्यका नाम आता है। आनन्दवर्धनाचार्य साहित्यशास्त्रके प्रमुख ध्वनिसम्प्रदायके प्रतिष्ठापक होनेके नाते साहित्यशास्त्रके अत्यन्त प्रसिद्ध एवं प्रमुखतम व्यक्ति हैं। पूर्ववर्ती अन्य आचार्योंके समान यह भी कश्मीरके निवासी हैं। राजतराङ्गणीकारने इन्हें कश्मीराधिपति अवन्तिवर्माका समकालीन बतलाते हुए लिखा है- 'मुक्ताकण: शिवस्वामी कविरानन्दवर्धनः । प्रथां रत्नाकरश्चागात् साम्राज्येऽवन्तिवर्मणः ।।' -राजतर्राङ्गणी ५-४ कश्मीरनरेश अवन्तिवर्माका समय ८५५-८८४ ई० तक है। इसलिए आनन्दवर्धनाचार्यका समय नवम शताब्दीमें ठहरता है। आनन्दवर्धनाचार्यने १. 'विषमबाणलीला', २. 'अर्जुनचरित', ३. 'देवीशतक', ४. 'तत्त्वालोक' तथा ५. 'ध्वन्यालोक' इन पाँच ग्रन्थोंकी रचना की थी। इनमें सबसे अधिक प्रसिद्ध एवं महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ 'ध्वन्यालोक' है। इस ग्रन्थमें काव्यके आत्मभूत ध्वनि-तत्त्वका प्रतिपादन किया गया है। ग्रन्थमें चार 'उद्योत' हैं। कुछ लोग ध्वनिको मानते ही नहीं हैं, कुछ उसको गौण मानते हैं और कुछ उसको अनिर्वचनीय तत्त्व कहते हैं। ये तीन ध्वनिविरोधी सिद्धान्त हैं। इन तीनों सिद्धान्तोंका खण्डन करके प्रथम उद्योतमें ध्वनिकी स्थापना की गयी है और उसका स्वरूप प्रतिपादन किया गया है- 'काव्यस्यात्मा ध्वनिरिति बुधैर्यः समाम्नातपूर्व- स्तस्याभावं जगदुरपरे भाक्तमाहुस्तमन्ये। केचिद्वाचां स्थितमविषये तत्त्वम्चुस्तदीय तेन ब्रूमः सहृदयमनःप्रीतये तत्स्वरूपम् ।।' -- ध्वन्यालोक १-१ द्वितीय उद्योतमें अविवक्षितवाच्य अर्थात् लक्षणामूला ध्वनि तथा विवक्षितवाच्य अर्थात् अभिधामूला ध्वनिके भेदोपभेदोंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है और उनके साथ गुणोंका भी कुछ विवेचन किया गया है। तृतीय उद्योतमें पदों, वाक्यों, पदांश और रचना आदिके द्वारा ध्वनिकी प्रकाश्यताका प्रतिपादन और रसोंके विरोध तथा अविरोधापादनके सिद्धान्तोंका वर्णन किया गया है। चतुर्थ उद्योतमें यह दिखलाया गया है कि ध्वनि तथा गुणीभूतव्यङ्गचके प्रयोगके प्रभावसे कविके काव्यमें अनन्त चमत्कारकी उत्पत्ति हो जाती है। जैसे मधुमासमें पुराने जीर्ण-शीर्ण वृक्षोंमें अनन्त सौन्दर्य छा जाता है उसी प्रकार ध्वनि तथा रसके सम्बन्धसे पूर्वकवियों द्वारा वणित पुराने अर्थोंमें भी नवीन चमत्कार उत्पन्न किया जा सकता है। इस प्रकार आनन्दवर्धनाचार्यने इस ग्रन्थमें ध्वनिविरोधी पक्षोंका निराकरण कर बड़ी सुन्दरता एवं प्रौढ़ताके साथ ध्वनि-सिद्धान्तकी स्थापना की है। 'ध्वन्यालोक' में तीन भाग हैं। एक मूलकारिका-भाग, दूसरा उनकी वृत्ति और तीसरा भाग उदाहरणरूप है। कारिका और वृत्ति दोनों भागोंके निर्माता स्वयं आनन्दवर्धनाचार्य ही हैं। उदाहरणोंमें कुछ उदाहरण उन्होंने स्वयं अपने बनाये 'विषमबाणलीला' और 'अर्जुनचरित' आदि ग्रन्थोंसे दिये हैं, किन्तु अधिकांश उदाहरण अन्य प्रसिद्ध कवियोंके ग्रन्थोंसे दिये हैं। प्राचीन सभी आचार्य कारिकाभाग
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भूमिका
तथा वृत्तिभाग दोनोंका निर्माता आनन्दवर्धनाचार्यको ही मानते हैं। किन्तु डॉ० वुल्हर, प्रो० जैकोबी, प्रो० कीथ आदि आधुनिक विद्वानोंने इन दोनों भागोंको भिन्न व्यक्तियोंकी रचना सिद्ध करनेका यत्न किया है। इन भिन्नतावादियोंके मतमें कारिकाभागके निर्माता कोई 'सहृदय' नामके व्यक्ति हैं और वृत्तिभागके निर्माता आनन्दवर्धनाचार्य हैं। अपने मतके समर्थनके लिए वे 'ध्वन्यालोक'के प्रथम तथा अन्तिम श्लोकमें 'सहृदय' पदके प्रयोगको प्रस्तुत करते हैं। प्रथम श्लोक जो ऊपर उद्धुत किया जा चुका है उसके अन्तिम चरणमें 'तेन ब्रूमः सहृदयमनःप्रीतये तत्स्वरूपम्'में जो 'सहृदय' पद आया है इसे भेदवादी लोग कारिकाकारका नाम मानते हैं। इसी प्रकार 'ध्वन्यालोक'के अन्तिम श्लोक-
'सत्काव्यतत्त्वनयवर्त्मचिरप्रसुप्तकल्पं मनस्सु परिपकवधियां यदासीत्। तद्व्याकरोत् सहृदयोदयलाभहेतोरानन्दवर्धन इति प्रथिताभिधानः ।' इसमें जो 'सहृदयोदयलाभहेतोः' पद आया है यह भी इन भेदवादियोंकी दृष्टिमें मूल कारिका- कारके नामका ग्राहक है। किन्तु वास्तवमें यह बात नहीं है। 'सहृदय' शब्द यहाँ किसी व्यक्तिविशेषका नाम नहीं, अपितु 'सहृदय' व्यक्तियोंका बोधक विशेषणपद है। 'धवन्यालोक'की टीका 'लोचन' में स्थान-स्थानपर 'वृत्तिकृत्' 'ग्रन्थकृत्' आदि शब्दोंका जो प्रयोग आता है। वह व्याख्याके कारिका तथा वृत्तिभागको सूचित करनेकी दृष्टिसे ही आता है, किन्तु उसका यह अभिप्राय नहीं है कि वृत्तिकार और कारिकाकार दोनों अलग-अलग हैं। वक्रोक्तिजीवितकार कुन्तक, व्यक्तिविवेककार महिमभट्ट, 'औचित्य- विचारचर्चा के निर्माता क्षेमेन्द्र आदि उत्तरवर्ती सभी आचार्य आन्दवर्धनको ही कारिका तथा वृत्तिभाग दोनोंका निर्माता मानते हैं। स्वयं आनन्दवर्धनाचार्यने भी -- 'इति काव्यार्थविवेको योडयं चेतश्चमत्कृतिविधायी। सूरिभिरनुसृतसारैरस्मदुपज्ञो न विस्मार्यः ।'
लिखकर ध्वनितत्त्वको 'अस्मदुपज्ञ' कहा है। अर्थात् स्वयं अपने आपको ही ध्वनिसिद्धान्तका प्रतिष्ठापक बतलाया है। अतः कारिकाभाग तथा वृत्तिभाग दोनोंका निर्माता आनन्दवर्धनाचार्यको ही मानना उचित है। नवीन विद्वानोंकी शङ्गाएँ उचित नहीं हैं। आनन्दवर्धनाचार्यके 'ध्वन्यालोक'पर दो टीकाओंका पता चलता है। इनमेंसे एक अभिनव- गुप्तपादाचार्य द्वारा विरचित 'लोचन' टीका उपलब्ध होती है। दूसरी टीका 'चन्द्रिका' नामकी थी। यह टीका 'लोचन' से पहले लिखी गयी थी और उसके निर्माता अभिनवगुप्तके कोई पूर्ववंशज ही थे। अभिनव- गुप्तने 'लोचन' में जगह-जगह उसका खण्डन किया है। एक जगह खण्डन करते हुए लिखा है -- 'चन्द्रिकाकारस्तु पठितमनुपठतीति न्यायेन गजनिमीलिकया व्याचचक्षे। ... इत्यलं पूर्ववंश्यैः सह विवादेन बहुना।' -लोचन, पृ० १४५ 'चन्द्रिका' टीकाके होनेपर भी अभिनवगुप्तने जो 'लोचन' टीका लिखी है इसका कारण दिखलाते हुए लोचनकारने लिखा है -- 'किं लोचनं विनालोको भाति चन्द्रिकयापि हि। अतोऽभिनवगुप्तोऽत्र लोचनोन्मीलनं व्यधात् ।।' इसमें प्रकारान्तरसे ग्रन्थकारने 'लोचन' की विशेषता सूचित की है।
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९. अभिनवगुप्त 'ध्वन्यालोक'की इस 'लोचन' टीकाके निर्माता अभिनवगुप्त कश्मीरके एक प्रमुख विद्वान् हैं। वे स्वयं यद्यपि कश्मीरी ब्राह्मण हैं किन्तु उनके पूर्वज सदा कश्मीरके ही रहनेवाले नहीं थे। अभिनवगुप्तके जन्मसे लगभग २०० वर्ष पूर्व उनके पूर्वज उत्तरप्रदेशके प्रसिद्ध नगर कन्नौजमें रहते थे, जो उन दिनों एक बड़ा समृद्ध एवं शक्तिशाली साम्राज्य था। उस समय कन्नौज-साम्राज्यके अधिपति यशोवर्मा थे। यह आठवीं शताब्दीकी बात है। कश्मीरमें उस समय राजा ललितादित्य राज्य कर रहे थे। किसी कारणवश कश्मीरराजने कन्नौजपर चढ़ाई कर दी और उस युद्धमें यशोवर्मा पराजित हो गये। उस समय यशोवर्मक यहाँ अत्निगुप्त नामके एक बहुत बड़े विद्वान् थे। कश्मीरके राजा तो सदासे ही बड़े-बड़े विद्वानोंका आदर एवं संग्रह करनेवाले रहे हैं। इसलिए राजा ललितादित्य अत्निगुप्तको बड़े आदरपूर्वक अपने यहाँ ले गये। उनके लिए मकान बनवा तथा एक बड़ी जागीर प्रदान कर अपने यहाँ रखा। इन्हीं अत्निगुप्तके वंशमें लगभग २०० वर्ष बाद अभिनवगुप्त उत्पन्न हुए। अभिनवगुप्तने इस घटनाका वर्णन अपने ग्रन्थ 'तन्त्रालोक' में निम्नलिखित प्रकार किया है- 'निःशेषशास्त्रसदनं किल मध्यदेश- स्तस्मिन्नजायत गुणाभ्यधिको द्विजन्मा। कोऽप्यत्रिगुप्त इति नाम निरुक्तगोत्र: शास्त्राब्धिचर्वणकलोद्यदगस्त्यगोत्र: ।। तमथ ललितादित्यो राजा निजं पुरमानयत्। प्रणयरभसात् कश्मीराख्यं हिमालयमूर्धगम्।। तस्मिन् कुबेरपुरचारिसितांशुमौलि- साम्मुख्यदर्शनविरूढ़पवित्रभावे वैतस्तरोधसि निवासममुष्व्य चक्रे राजा द्विजस्य परिकल्पितभूरिसम्पत् ।।' इस प्रकार मध्यदेश या अन्तर्वेदी गङ्गा-यमुनाके मध्यवर्ती प्रदेश कन्नौजसे अत्रिगुप्तको लाकर ललितादित्यने कश्मीरमें वितस्ता नदीके किनारे, जो कैलास (अलका) चारी भगवान् शिवजीके अति संमुख दर्शनसे पवित्र है, पर मकान बनवाकर तथा 'परिकल्पितभूरिसम्पत्' जागीर द प्रचुर सम्पत्ति प्रदान कर आदरपूर्वक रखा। इस बातका वर्णन करनेके बाद अभिनवगुप्तने 'तन्त्रालोक' में ही फिर इसी वंशमें अपने बाबा 'वराहगुप्त', अपने पिता 'चुलुखक' तथा अपनी उत्पत्तिका वर्णन निम्नलिखित प्रकार किया है- 'तस्यान्वये महति कोऽपि वराहगुप्तनामा बभूव भगवान् स्वयमन्तकाले। गीर्वाणसिन्धुलहरीकलिताग्रमूर्धा यस्याकरोत् परमनुग्रहमाग्रहेण।। तस्यात्मजः चुलुखकेति जने प्रसिद्धश्चन्द्रावदातधिषणो नरसिंहगुप्तः । यं सर्वशास्त्ररसमज्जनशुभ्रचित्तं माहेश्वरी परमलङ्कुरुते स्म भक्तिः ।।' इन दो श्लोकोंमें अभिनवगुप्तने अपने बाबा वराहगुप्त तथा अपने पिता नरसिंहगुप्त, जिनकी लोकमें 'चुलुखक' नामसे प्रसिद्धि थी, की उत्पत्तिका वर्णन किया है। इन्हीं नर्रांसहगुप्तके पुत्र अभिनव- गुप्त थे। अभिनवगुप्तने अपने १. 'विवृतिविमशनी', २. 'कमस्तोत्न' तथा ३. 'भैरवस्तोत्र' इन
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भूमिका ५१
तीन ग्रन्थोंका रचनाकाल कश्मीरके प्रसिद्ध सप्तर्षिसंवत्सर और उसके साथ कलिसंवत्सरका सम्बन्ध दिखलाते हुए दिया है। उसके अनुसार 'कमस्तोत्र' की रचना ६६० ई० में, 'भैरवस्तोत्र'की रचना ६६२ ई० में और 'विवृतिविर्माशनी' की रचना १०१४ ई० में की गयी है। 'विवृतिविर्माशनी' में उसके रचनाकालका निर्देश अभिनवगुप्तने इस प्रकार किया है -- 'इति नवतितमेडस्मिन् वत्सरान्त्ये युगांशे तिथिशशिजलधिस्थे मार्गशीर्षावसाने। जगति बिहितबोधामीश्वरप्रत्यभिज्ञां व्यव्णुत परिपूर्णा प्रेरितः शम्भुपादैः ॥' 'अन्त्ये युगांशे' अर्थात् कलियुगके तिथि अर्थात् १४ 'शशि' अर्थात् १ और 'जलधि' अर्थात् ४, 'अङ्कानां वामतो गतिः' इस सिद्धान्तके अनुसार ४११४ कलि-संवत्सरमें जब कि कश्मीरका प्रसिद्ध 'सप्तर्षसंवत्सर'का 'नवतितमेऽस्मिन्' ६० संवत् अर्थात् ४०६० 'सप्तर्षिसंवत्' में मार्गशीर्षके अन्तमें इस ग्रन्थकी रचना हुई। इस कलिसंवत्सर और सप्तर्षिसंवत्सरको जब हम ईसवी सन्में लाते हैं तब यह मालूम होता है कि १०१४ ईसवी सन्में 'विवृतिविमशिनी'की रचना हुई। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि अभिनवगुप्तका काल दशम शताब्दीका अन्तिम भाग तथा ग्यारहवीं शताब्दीके प्रारम्भमें था। अभिनवगुप्तका पूरा नाम 'अभिनवगुप्तपाद' है। 'काव्यप्रकाश' के टीकाकार वामनका कहना है कि यह नाम बादको उनके गुरुओंने उनकी अपने सहाध्यायी बालकोंको सताने और डरानेकी प्रवृत्तिके कारण दिया था। 'गुप्तपाद'का अर्थ है 'सर्प'। यह अपने साथियोंके लिए सर्पके समान त्रासदायक थे इसलिए गुरुओंने इनका 'अभिनव-गुप्तपाद' नाम रख दिया। इसके बाद इन्होंने अपने लिए गुरुप्रदत्त इसी नामका व्यवहार आरम्भ कर दिया। इन्होंने 'तन्त्रालोक' (१-५०) में स्वयं भी लिखा है- 'अभिनवगुप्तस्य कृतिः सेयं यस्योदिता गुरुभिराख्या।' अभिनवगुप्तको विद्याध्ययनका बड़ा व्यसन था। इनके समयमें कश्मीरमें और कश्मीरके आस-पास जितने प्रसिद्ध विद्वान् थे उन सबके पास जाकर इन्होंने विद्याका अध्ययन किया था। जिस शास्त्रके विशेषज्ञके रूपमें जिस विद्वान्की उस समय प्रसिद्धि थी उस शास्त्रका अध्ययन इन्होंने उसी विशिष्ट विद्वान्के पास जाकर किया था। इसलिए इनके भिन्न-भिन्न शास्त्रोंके भिन्न-भिन्न गुरु थे, जिनकी सूची निम्नलिखित प्रकार है- १. नर्रासहगुप्त (अभिनवगुप्तके पिता) व्याकरणशास्त्रके गुरु २. वामनाथ द्वैताद्वततन्द्रके गुरु ३. भूतिराजतनय द्वैतवादी शैवसम्प्रदायके गुरु ४. लक्ष्मणगुप्त प्रत्यभिज्ञा, कम तथा त्रिक दर्शनके गुरु ५. भट्ट इन्दुराज ध्वनिसिद्धान्तके गुरु ६. भूतिराज ब्रह्मविद्याके गुरु ७. भट्ट तोत नाटयशास्त्रके गुरु इन सात गुरुओंका तो अभिनवगुप्तने शास्त्रके सहित उल्लेख किया है। इनके अतिरिक्त अपने १३ अन्य गुरुओंका उल्लेख भी एक श्लोकमें इस प्रकार किया है-
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अन्येऽपि धर्मशिववामनकोद्भटश्रीभूतेशभास्करमुखप्रमुखा महान्तः ।।' अभिनवगुप्तके ग्रन्थ अभिनवगुप्तके गुरुओंके समान उनके ग्रन्थोंकी भी एक बड़ी लम्बी सूची है। उनमें 'तन्त्रालोक' जैसे विशालकाय ग्रन्थ भी हैं और 'कमस्तोत्न', 'भैरवस्तोत्र' जैसे १०-१२ श्लोकोंकी कृतियाँ भी। इन सबको मिलाकर उनकी रचनाओंकी संख्या ४१ तक पहुँच जाती है। रचनाकालके क्रमानुसार उनके नाम निम्नलिखित प्रकार हैं- १. बोधपश्चदशिका, २. परात्रिंशिकाविवृतिः, ३. मालिनीविजयवार्तिक, ४. तन्त्रालोक, ५. तन्त्रसार ६. तन्त्रवटधानिका ७. ध्वन्यालोक-लोचन ८. अभिनवभारती ६. भगवद्गीतार्थ- संग्रह १०. परमार्थसार ११. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविर्माशनी, १२. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविर्मशनी (बृहती), १३. कमस्तोत्र, १४. देहस्थदेवताचकरस्तोत्र, १५. भैरवस्तोत्न, १६. परमार्थद्वादशिका, १७, अनुभवनिवेदन, १८. परमार्थचर्चा, १६. महोपदेशविशतिका, २०. अनुत्तरशतिका, २१. तन्त्रोच्चय, २२. घटकर्परकुलकविवृति, २३. कमकेलि, २४. शिवदृष्टयालोचन, २५ पूर्वपन्तिका, २६. पदार्थप्रवेशनिर्णयटीका, २७. प्रकीर्णकविवरण, २८. प्रकरणविवरण, २६. काव्यकौतुक- विवरण, ३०. कथामुखटीका, ३१. लध्वी प्रक्रिया, ३२. भेदवादविदारण, ३३. देवीस्तोत्रविव रण, ३४. तत्त्वार्थप्रकाशिका, ३५. शिवशक्त्यविनाभावस्तोत्न, ३६. बिम्बप्रतिबिम्बवाद, ३७. परमार्थ- संग्रह, ३८. अनुत्तरशतक, ३६. प्रकरणस्तोत्र, ४०. नाटयालोचन, ४१. अनुत्तरतत्त्वविर्मशनी। अन्तिम ६ कृतियाँ ऐसी हैं जिनके केवल नामोंका उल्लेख सूचीपत्रोंमें मिलता है। ग्रन्थ नहीं मिलते हैं। इसी प्रकार ऊपर दिये ३५ ग्रन्थोंमेंसे कुछ ऐसे हैं जिनका उल्लेख अभिनवगुप्तने स्वयं अपने उपलब्ध ग्रन्थोंमें किया है, किन्तु वे प्राप्त नहीं हैं। इन ४१ कृतियोंमेंसे साहित्यशास्त्रसे सम्बन्ध रखनेवाले केवल तीन ग्रन्थ हैं। एक 'ध्व न्यालोक- लोचन' जो 'ध्वन्यालोक' की टीकाके रूपमें लिखा गया है, दूसरा 'अभिनवभारती' जो भरत-नाटयशास्त्रकी टींकाके रूपमें लिखा गया है और तीसरा 'घटकर्पर-विवरण' जो 'मेघदूत'के सदृश एक दूतकाव्यपर टीकारूपमें लिखा गया है। शेष सब ग्रन्थ शैवदर्शन आदिसे सम्बन्ध रखनेवाले हैं। जीवन-झाँकी अभिनवगुप्तके जीवनकी झाँकी कुछ बहुत सुखद नहीं है। उनका 'अभिनवगुप्तपाद' नाम, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, उनकी बाल्यकालकी शरारतोंका स्मारक है। 'माता व्ययूयुजदमुं किल बाल्य एवं', उनकी माता बाल्यावस्थामें ही उनको छोड़कर परलोक चली गयीं। इसकी कसक उनके हृदयमें बहुत कालतक बनी रही। 'माता परं बन्धुरिति प्रवादः, स्नेहोऽति गाढीकुरुते हि पाशान्।' किन्तु अभिनवगुप्तने माताके इस वियोगको भी अपने भावी जीवनके लिए कल्याणप्रदरूपमें ही स्वीकार किया है-'देवो हि भाविपरिकर्मणि संस्करोति।' भाताके वियोगके बाद शीघ्र ही इनको पिताके वियोगका भी सामना करना पड़ा,क्योंकि माताका देहान्त हो जानेके बाद इसके पिताको एकदम वैराग्य हो गया और वे 'तारुण्यसागरतरङ्गभरानपोह्य वैराग्यपोतमधिरह्य दृढं हठेन' विरक्त होकर संन्यासी हो गये। माता और पिताके वियोगकी इन दोनों घटनाओंने अभिनवगुप्तकी जीवनधारा ही बदल दी। अबतक
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भूमिका ५३
वे साहित्यके सरस विषयके अध्ययनमें प्रवृत्त थे, किन्तु अब उसको छोड़कर वे एकदम शिवभक्ति और दार्शनिक विषयोंके अध्ययनमें लग गये- 'साहित्यसान्द्ररसभोगपरो महेशभक्त्या स्वयंग्रहणदुर्मदया गृहीतः । स तन्मयीभूय न लोकवर्तनीमजीगणत् कामपि केवलं पुनः। तदीयसम्भोगविवृद्धये पुरा करोति दास्यं गुरुवेश्मसु स्वयम् ।' उन्होंने विवाह भी नहीं किया। जीवनभर ब्रह्मचर्यके कठोर व्रतका पालन किया। उनके जीवनका पटाक्षेप भी उनकी इस जीवनचर्याके अनुरूप ही सुन्दररूपमें हुआ है। कश्मीरमें श्रीनगर तथा गुलमर्गके बीचमें 'मगम' नामका एक स्थान है। इस स्थानसे पाँच मीलकी दूरीपर 'भैरवगुफा'के नामसे एक प्रसिद्ध गुफा है। उसके पास ही 'भैरव' नामकी एक छोटी-सी नदी भी बहती है। इसके पास एक छोटा-सा गाँव है, वह भी 'भैरव गाँव' के नामसे प्रसिद्ध है। अभिनवगुप्तने अपने जीवनका अन्तिम भाग इसी पवित्र वातावरणमें व्यतीत किया। अन्तिम समय समीप आनेपर वे स्वयं इस गुफाके भीतर प्रविष्ट हो गये और फिर कभी वापस नहीं लौटे। उनकी इस अन्तिम दीर्घ यात्राके समय कहते हैं कि उनके बारह सौ शिष्य उनको विदाई देनेके लिए उनके साथ थे। १०. राजशखर दशम शताब्दीके आरम्भमें प्रसिद्ध नाटककार तथा काव्यशास्त्रके सूक्ष्म विवेचक राजशेखरका नाम उल्लेख योग्य है। अबतक हमने साहित्यशास्त्रके जिन आचार्योंका परिचय दिया है उनमें एक दण्डीको छोड़कर शेष सभी आचार्य कश्मीरी थे। दण्डीके बाद यह दूसरे आचार्य हैं जो कश्मीरके बाहरके हैं। राजशेखर विदर्भवासी हैं। किन्तु इनका कार्यक्षेत्र विदर्भमें न होकर कन्नौजमें रहा। कत्नौजके प्रतीहारवंशीय राजा महेन्द्रपाल और महिपाल इनके शिष्य थे। 'बालरामायण' नाटकमें अपने इन शिष्योंकी प्रशंसा करते हुए राजशेखरने लिखा है- 'आपन्नातिहरः परात्रमधनः सौजन्यवारासिधि: त्यागी सत्यसुधाप्नवाहशशभृत् कान्तः कवीनां गरुः। वर्ष्य वा गुणरत्नरोहणगिरेः कि तस्य साक्षादसौ देवो यस्य महेन्द्रपालनृपति: शिष्यो रघुग्रामणीः ।' -- बा० रा० १-१८ राजशेखर अपनेको 'यायावरीयः' लिखते हैं। इसका अर्थ यह है कि वे 'यायादर' वंशमें उत्पन्न हुए थे। वे महाराष्ट्रके प्रसिद्ध कवि 'अकालजलद'के पौत्र थे। उनके पिताका नाम 'दुर्दुक' और माताका नाम 'शीलवती' था। 'यायावर' वंशमें इनके पितामह अकालजलद और उनके अतिरिक्त सुरानन्द, तरल आदि अनेक कविराज हो चुके हैं। इसलिए इनमें कवित्व तथा शास्त्रीय प्रतिभा वंश- परम्परागत थी। सौभाग्यसे पत्नी भी इनको बड़ी विदुशी और कवित्वप्रतिभाशालिनी प्राप्त हुई थी। उसका नाम 'अवन्तिसुन्दरी' था। राजशेखरने अपनी 'काव्यमीमांसा' में कई स्थानोंपर 'इति अवन्ति- सुन्दरी' लिखकर उसके साहित्यविषयक मतोंका उल्लेख किया है। इससे उसके पाण्डित्यका परिचय मिलता है। यह अवन्तिसुन्दरी चौहान-वंशमें उत्पन्न हुई थी। अपने 'कर्पूरमञ्जरी सट्टक' में राजशेखरने अपनी पत्नीका परिचय निम्नलिखित प्रकार दिया है-
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'चाहुमानकुलमौलिमालिका राजशेख रकवीन्द्रगेहिनी। भर्तुः कृतिमवन्तिसुन्दरी या प्रयोक्तुमेवमिच्छति॥ -- कर्पूरमञ्जरी (संस्कृत) १-११ राजशेखरके ग्रन्थ राजशेखर मुख्यरूपसे कवि और नाटककार हैं। उन्होंने चार नाटकोंकी रचना की है- १. 'बालरामायण', २. 'बालभारत', ३. 'विद्धशालभज्जिका' और ४. कर्पूरमञ्जरी। 'कर्पूर- मञ्जरी' संस्कृत भाषामें न लिखकर प्राकृतभाषामें लिखा गया 'सट्टक' है। इनका पाँचवाँ ग्रन्थ 'काव्य- मीमांसा' है। यह ग्रन्थ साहित्यसमीक्षासे सम्बन्ध रखता है। इसी ग्रन्थके कारण अलङ्गारशास्त्रके इतिहासमें उनको गौरवमय स्थान प्राप्त हुआ है। अबतक हम साहित्यशास्त्रके ग्रन्थोंकी जो रूप-रेखा देखते आये हैं, राजशेखरकी 'काव्यमीमांसा'की रूपरेखा उस सबसे एकदम विलक्षण है। इसमें अठारह अध्याय हैं। प्रथम अध्यायका नाम 'शास्त्रसंग्रह' है। इसमें बतलाया गया है कि 'काव्यमीमांसा' की शिक्षा शिवने ब्रह्मा आदिको किस प्रकार प्रदान की और फिर ब्रह्मासे शिष्यपरम्परा द्वारा इसके १८ विषयोंको १८ लेखकोंने १८ ग्रन्थोंमें अलग-अलग लिखा और उन सबको यायावरवंशोत्पन्न राजशेखरने एक ही ग्रन्थमें १८ अध्यायोंमें किस प्रकार संक्षेपमें दे दिया है। इसलिए इस अध्यायका नाम 'शास्त्र- संग्रह' अध्याय रखा है। दूसरे अध्यायका नाम 'शास्त्रनिर्देश' है। इसमें वाङमयको दो भागोंमें विभक्त किया है-एक 'शास्त्र' और दूसरा 'काव्य'। 'शास्त्रको फिर पौरुषेय तथा अपौरुषेयरूपसे दो भागोंमें विभक्त किया है। ४ वेद, ४ उपवेद और ६ वेदाङ्ग ये अपौरुषेय शास्त्रके वर्गमें आते हैं। राजशेखरने अपना मत दिया है कि ६ वेदाङ्गोंके साथ अलङ्कारको भी सातवाँ वेदाङ्ग मानना चाहिये। पौरुषेय शास्त्रमें पुराण, आन्वीक्षिकी, पूर्वमीमांसा, उत्तरमीमांसा, १८ स्मृति, १४ या १८ प्रकारकी जो विद्याएँ मानी जाती हैं उन सबका समावेश होता है। तीसरे अध्यायका नाम 'काव्यपुरुषोत्पत्ति' है। इसमें सरस्वतीसे 'काव्यपुरुष'की उत्पत्तिका वर्णन किया गया है। उस काव्यपुरुषके स्वरूपका वर्णन करते हुए लिखा है- 'शब्दार्थौं ते शरीरम्, संस्कृतं मुखम्, प्राकृतं बाहुः, जघनमपभ्रंशः, पैशाचं पादौ, उरो मिश्रम्, समः प्रसन्नो मधुर उदार ओजस्वी चासि। उक्तिलक्षणं च ते वचो, रस आत्मा, रोमाणि छन्दांसि प्रश्नोत्तरप्रवह्निकादिकं च वाक्केलिः, अनुप्रासोपमादयश्र त्वामलअंकुर्वन्ति। साहित्यविद्यावधूके साथ 'वत्सगुल्म' नगरमें इस काव्यपुरुषके विवाहका वर्णन भी किया है। चतुर्थ अध्यायका नाम 'पदवाक्यविवेक' है। इसमें कवि बननेके लिए किन-किन बातोंकी आवश्यकता है इस बातका वर्णन विशेषरूपसे किया गया है। इसमें राजशेखरने कहा है कि 'यायावरीय' के मतमें केवल एक शक्ति ही काव्यका हेतु है। उसीसे प्रतिभा तथा व्युत्पत्ति आती है। अन्योंके मतमें समाधि तथा अभ्यासकी भी आवश्यकता होती है। इसी प्रकार आगे अध्यायोंके नाम तथा विषय हैं -- ५. काव्यपादकल्प, ६. पदवाक्यविवेक, ७. पाठप्रतिष्ठा, ८. काव्यार्थयोनि, ६. अर्थव्याप्ति, १०. कविचर्या तथा राजचर्या। इसके बाद ११-१३ अध्यायोंमें यह दिखलाया है कि कवि अपने पूर्ववर्ती कवियोंके अभिप्रायको कैसे और कहाँतक समझ सकता है। १४-१६ अध्यायोंमें देश, काल, प्रकृति आदिके वर्णनमें प्रसिद्ध कविसमयका वर्णन किया गया है। १७ वें अध्यायमें देशविभाग तथा १८ वें अध्यायमें कालविभागका वर्णन है।
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इस विषयसूचीके देखनेसे विदित होता है कि 'काव्यमीमांसा' अपने पूर्ववर्ती अलङ्गारग्रन्थोंसे एकदम विलक्षण ग्रन्थ है। वह कविके लिए उपयोगी जानकारी देनेवाला एक विश्वकोश-सा प्रतीत होता है। इसलिए राजशेखर एक स्वतन्त्र 'कविशिक्षासम्प्रदाय'के प्रवर्तक माने जा सकते हैं। राज- शेखरके बाद क्षेमेन्द्र, अरिसिंह, अमरचन्द्र तथा देवेश्वर आदिने भी इसी प्रकार 'कविशिक्षा'के विषयमें ग्रन्थोंकी रचना की है। इसलिए साहित्यशास्त्र, रससम्प्रदाय, ध्वनिसम्प्रदाय, अलङ्गारसम्प्रदाय आदि प्रसिद्ध सम्प्रदायोंसे भिन्न यह 'कविशिक्षासम्प्रदाय' अलग ही माना जाना चाहिये। ११. मुकुलभट्ट उद्धटके टीकाकार प्रतीहारेन्दुराजके वर्णनके प्रसङ्गमें हम देख चुके हैं कि प्रतीहारेन्दुराजने मुकुलभट्टको अपना गुरु माना है। इसलिए मुकुलभट्टका समय नवम शताब्दीमें पड़ता है। यों मुकुलभट्टने ग्रन्थोंके अन्तमें 'भट्टकल्लटपुत्रेण मुकुलेन निरूपिता' लिखकर अपनेको भट्टकल्लटका पुत्र बतलाया है। 'राजतर्राङ्गणी' में भट्टकल्लटको अवन्तिवर्माका समकालीन कहा गया है- 'अनुग्रहाय लोकानां भट्टाः श्रीकल्लाटादयः ।' अवन्तिवर्मणः काले सिद्धा भुवमवातरन् ॥' ५-५६ ।
अवन्तिवर्माका समय, जैसा कि पहिले कहा जा चुका है, ८५५-८८४ ई० तक माना जाता है। इन्हीं अवन्तिवर्माके राज्यकालमें आनन्दवर्धन भी हुए। इसलिए मुकुलभट्टके पिता आनन्दवर्धनकें समकालीन रहे होंगे। मुकुलभट्टने अपने ग्रन्थमें आनन्दवर्धन, उन्ट, विज्जका आदिका उल्लेख किया है। इनके शिष्य प्रतीहारेन्दुराजने इनका जो परिचय दिया है उसके अनुसार मुकुलभट्ट मीमांसाशास्त्रके एक प्रकाण्ड विद्वान् थे। इसके साथ ही व्याकरण, तर्क और साहित्यशास्त्रपर भी उनका पूर्ण अधिकार था। इनका एकमात्र ग्रन्थ है 'अभिधावृत्तिमातृका'। यह बहुत छोटा-सा ग्रन्थ है। इसमें केवल १५ कारिकाएँ हैं। इन कारिकाओंकी वृत्ति भी स्वयं मुकुलभट्टने ही लिखी है। यह ग्रन्थ एक तरहसे ध्वनि- सिद्धान्त तथा व्यञ्जनावृत्तिका विरोधी है। व्यञ्जनावादी आचार्य, अभिधा, लक्षणा तथा व्यञ्जना, तीन प्रकारकी वृत्ति मानते हैं। ममीमांसक व्यञ्जनावृत्तिको नहीं मानते हैं। इसलिए मुकुलभट्टने इस ग्रन्थमें व्यज्जना तो दूर रही, लक्षणाको भी अलग वृत्ति न मानकर अभिधाका ही एक भेद माना है और 'इत्येतदभिधावृत्तं दशधात्र विवेचितम्' लिखकर अभिधाके दस प्रकारके व्यापारके अन्तर्गत ही लक्षणाका भी समावेश कर दिया है। इनका ग्रन्थ छोटा होनेपर भी तनिक क्लिष्ट है। मम्मटने 'काव्य- प्रकाशमें' जो अभिधा,लक्षणा आदि वृत्तियोंका निरूपण किया है वह इस 'अभिधावृत्तमातृका'के आधारपर ही किया है। मम्यटने इसके आधारपर 'शब्दव्यापार-विचार' नामक एक छोटा-सा अलग ग्रन्थ भी लिखा है। उसीके आधारपर 'काव्यप्रकाश' में अभिधादि वृत्तियोंका विवेचन किया गया है। अतएव इस विषयकी 'काव्य-प्रकाश'की पंक्तियोंके रहस्यको ठीक तरहसे हृदयङ्गम करनेके लिए मुकुलभट्टके ग्रन्थका परिशीलन उपयोगी तथा आवश्यक है।
१२. धनञ्जय धनञ्जय दशम शताब्दीके एक महान् साहत्यिक हैं। किन्तु इनका सम्बन्ध मुख्यतः अलङ्गार- शास्त्रसे न होकर नाटयशास्त्रसे है। इनका एकमात्र ग्रन्थ 'दशरूपक' है। भरतमुनिके 'नाटयशास्त्र'के बाद इस विषयपर यह सबसे अधिक प्रसिद्ध एवं महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। भरत का 'नाटयशास्त्र' एक विश्व-
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कोश है। उसमें जितना वर्णन नाटयके मुख्य विषयोंका है उससे कहीं अधिक विस्तृत वर्णन उससे सम्बद्ध अन्य विषयोंका है। नाटयके पारिभाषिक शब्दों और विशेष विषयोंका यदि कोई मूल 'नाटय- शास्त्र' से अध्ययन करना चाहे तो उसे बड़ी कठिनाई होगी। इसलिए धनञ्जयने 'नाटयशास्त्र'के आधारपर नाटकके भेदोपभेद सहित इस प्रकारके रूपकोंसे सम्बन्ध रखनेवाली सारी बातोंका संग्रह करके इस सरल ग्रन्थका निर्माण कर दिया है। इससे नाटक सम्बन्धी सारी बातें बड़ी सरलतासे समझमें आ जाती हैं। इसीलिए इस ग्रन्थका विद्वानोंमें बड़ा आदर हुआ और पठन-पाठनमें सर्वत्र प्रचार होनेसे इसकी बड़ी ख्याति हुई। 'दशरूपक' ग्रन्थ कारिकारूपमें लिखा गया है। इसमें लगभग ३०० कारिकाएँ हैं। ग्रन्थ चार प्रकाशोंमें विभक्त है। प्रथम प्रकाशमें ग्रन्थके प्रयोजन आदिको दिखलाते हुए ग्रन्थकारने नाटयानां किन्तु किञ्चित् प्रगुणरचनया लक्षण संक्षिपामि', नाटकोंके लक्षण आदिको संक्षिप्त रूपमें प्रस्तुत करना इस ग्रन्थका प्रयोजन बतलाया है। उसके बाद नाटकोंकी पञ्चसन्धियों, अर्थोपक्षेपकों आदिके लक्षण और आख्यानवस्तुके भेद आदिका वर्णन किया गया है। द्वितीय प्रकाशमें नायक-नायिकाभेद तथा कैशिकी आदि वृत्तियोंके भेदोंका वर्णन किया गया है। तृतीय प्रकाशमें नाटकके लक्षण, प्रस्तावना, अङ्गमंविधान, कथाभागके औचित्यानुसार परिवर्तन, नाटकके प्रधान-रस, पात्रोंकी संख्या, प्रवेश और निर्गभके नियम आदिका वर्णन किया गया है। चतुर्थ प्रकाश मुख्यतः रसोंसे सम्बन्ध रखता है। रसके स्थायिभाव, व्यभिचारिभाव आदि सामग्रीका विवेचन, रसनिष्पत्ति सामाजिकमें होती है, रसास्वादनके प्रकार, नाटयमें शान्तरसकी अनुपयोगिता, अन्य रसोंकी स्थिति आदि रससम्बन्धी समस्त विषयोंका विवेचन किया गया है। ग्रन्थके अन्तमें अपना परिचय देते हुए धनञ्जयने लिखा है- 'विष्णोः सुतेनापि धनञ्जयेन विद्वन्मनोरागनिबन्धहेतुः । आविष्कृतं मुञ्जमहीशगोष्ठीवैदग्ध्यभाजा दशरूपमेतत् ।।' इससे प्रतीत होता है कि धनञ्जयके पिताका नाम 'विष्णु' था। इन्होंने मालवाके परमारवंशके राजा 'मुञ्ज', जिनको 'वाक्पतिराज द्वितीय' भी कहा जाता है, की राजसभामें रहनेका सौभाग्य प्राप्त किया था और वहीं रहकर इस ग्रन्थकी रचना की थी। मुञ्जका राज्यकाल ६७४-६६४ ई० तक माना जाता है। अतः यही धनञ्जयका काल है। रसनिष्पत्तिके विषयमें धनञ्जय व्यञ्जनावादी नहीं हैं। चतुर्थ प्रकाशमें उन्होंने इसका खण्डन किया है। धनञ्जयके 'दशरूपक'पर उनके छोटे भाई धनिकने 'अवलोक' नामकी टीका लिखी है। यह टीका बड़ी विद्वत्तापूर्ण है। धनिकके अतिरिक्त नृसिंहभट्ट, देवपाणि, कुरविराम और बहुरूप मिश्रने भी दशरूपकके ऊपर टीकाएँ लिखी हैं। इनमेंसे बहुरूप मिश्रकी टीका विशेष महत्त्वपूर्ण है। ये चारों टीकाएँ हस्तलिखितरूपमें उपलब्ध हैं। अभी प्रकाशित नहीं हुई हैं। १३. भट्टनायक भट्टनायक दशम शताब्दीके एक अत्यन्त प्रसिद्ध साहित्यकार हैं। दुर्भाग्यसे इस समय उनका एकमात्र ग्रन्थ 'हृदयदर्पण' उपलब्ध नहीं हो रहा है, किन्तु साहित्यके क्षेत्रमें उनकी जो नयी देन थी उसके कारण उत्तरवर्ती साहित्यमें उनके मतकी चर्चा बहुत अधिक पायी जाती है। सामान्यतः वे ध्वनिविरोधी आचार्य हैं। उनके 'हृदयदर्पण' में 'ध्वन्यालोक' के सिद्धान्तोंका खण्डन किया गया है। इसलिए वे ध्वनिकार आनन्दवर्धनाचार्यके बाद हुए हैं। फिर उनके ध्वनिविरोधी सिद्धान्तोंका खण्डन 'ध्वन्यालोकके टीकाकार
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अभिनवगुप्तने किया है। इसलिए वे अभिनवगुप्तके पहिले हुए हैं। इस प्रकार उनका समय आनन्दवर्धन तथा अभिनवगुप्तके बीच दशम शताब्दीमें पड़ता है। उनका ग्रन्थ 'हृदयदर्पण' आज उपलब्ध नहीं हो रहा है। किन्तु इस ग्रन्थकी अनुपलब्धि आजकी नहीं, बहुत पुरानी जान पड़ती है। भट्टनायकके कुछ समय बाद ही ग्यारहवीं शताब्दीमें दूसरे ध्वनिविरोधी आचार्य महिमभट्ट हुए हैं। भट्टनायकके समान उन्होंने भी 'ध्वन्यालोक' के खण्डनमें अपना 'व्यक्तिविवेक' नामक ग्रन्थ लिखा है। इस ग्रन्थके लिखते समय उन्होंने भट्टनायकके 'हृदयदर्पण' को देखना चाहा जिससे कि वे अपने ग्रन्थको और अधिक उत्कृष्ट बना सकें, किन्तु उस समय भी उनको यह ग्रन्थ देखनेको नहीं मिल सका। इस बातका उल्लेख उन्होंने 'व्यक्तिविवेक' में बड़े सुन्दररूपमें करते हुए लिखा है-
सहसा यशोऽभिसतुं समुद्यताऽदृष्टदर्पणा मम धीः। स्वालङ्कारविकल्पप्रकल्पने वेति कथमिवावद्यम् ।' श्लोकमें श्लेषालड्गार है। कविने अपनी बुद्धिको नायिका बनाया है। वह अलङ्गार सजाने जा रही है ताकि उसे सौन्दर्यका यश प्राप्त हो सके। किन्तु जल्दीबाजीमें बिना दर्पण देखे ही अपनी अलङ्गारसज्जामें लग गयी है। तो वह विचारी बिना दर्पणके यह कैसे समझ सकेगी कि मेरे अलङ्गारमें कोई दोष तो नहीं रह गया है। इसके द्वारा ग्रन्थकार यह कहना चाहते हैं कि मैं अलङ्गारशास्त्रपर ध्वनिविरोधी ग्रन्थ तो लिखने जा रहा हूँ, किन्तु मैंने भट्टनायकके 'हृदयदर्पण' ग्रन्थका अबतक अवलोकन नहीं किया है, अब मुझे यह कैसे ज्ञात होगा कि मेरे ग्रन्थमें क्या कमी रह गयी है। इस प्रकार चाहे उसी समय लुप्त हो जानेके कारण या फिर चाहे किसी अन्य कारणसे ११ वीं शताब्दीमें ही महिमभट्ट को भट्टनायकका 'हृदयदर्पण' ग्रन्थ देखनेका अवसर नहीं मिल सका। इस ग्रन्थके उत्तरवर्ती साहित्यमें विशेष ख्याति प्राप्त करनेके दो कारण हैं, एक ध्वनिविरोध और दूसरा रसनिष्पत्तिविषयक सिद्धान्त। ये दोनों सिद्धान्त बड़े महत्त्वपूर्ण हैं और इन दोनोंके विषयमें भट्टनायकने एकदम नवीन दृष्टिकोण उपस्थित किया था। इसलिए उसे आलोचनाका सामना करना ही पड़ा। भट्टनायकके बाद ही अभिनवगुप्तका काल आ जाता है और अभिनवगुप्तको ध्वन्यालोकपर 'लोचन' लिखते समय तथा 'नाट्यशास्त्र'पर 'अभिनवभारती' लिखते समय भट्टनायकके ध्वनिविरोधी तथा रसनिष्पत्तिविषयक दोनों सिद्धान्तोंकी आलोचना करनी पड़ी है। इसलिए भट्टनायकके सबसे बड़े विरोधी अभिनवगुप्त हैं। उन्होंने भट्टनायकपर बड़े कड़े प्रहार किये हैं। भट्टनायकने ध्वनिसिद्धान्तका खण्डन किया है, किन्तु रसकी स्थिति तो वे मानते ही हैं। वह भी ध्वनिके अन्तर्गत आता है। इसलिए भट्टनायकके ध्वनिविरोधका उपहास करते हुए अभिनवगुप्तने 'लोचन'में (पृ० २० पर ) लिखा है- वस्तुध्वानन दूषयता रसध्वनिस्तदनुग्राहकः समर्थ्यत इति सुष्ठुतरां ध्वनिध्वंसोऽयम्।' भट्टनायक मीमांसक थे। मीमांसक वेदको ही परमप्रमाण मानते हैं। वेदको 'काव्यप्रकाश' आदिमें 'प्रभु-शब्द' कहा है, अर्थात् वेद राजाज्ञाके समान है। राजाज्ञामें व्यञ्जनाका अवसर नहीं होता है। उसमें अभिधासे जो सीधा अर्थ निकलता है उसीको ग्रहण किया जाता है। इसलिए मीमांसकके यहाँ व्यञ्जनाका कोई मूल्य नहीं है। 'ध्वन्यालोक' में अत्यन्ततिरस्कृत वाच्यध्वनिके उदाहरणरूपमें 'निःश्वासान्ध इवादर्शश्चन्द्रमा न प्रकाशते' यह प्रसिद्ध श्लोक दिया गया है। इसमें दर्पणके लिए 'अन्ध'
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विशेषणका प्रयोग किया गया है। किन्तु नेत्रहीनत्वरूप अन्धत्व तो दर्पणमें बन नहीं सकता है। इसलिए 'अन्ध' शब्द अप्रकाशातिशयत्वको सूचित करनेवाला होनेसे इसको अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ध्वनिका उदाहरण ध्वनिकारने माना है। भट्टनायकने इसका खण्डन करके इस श्लोककी व्याख्या कुछ अन्य प्रकारसे की है। भट्टनायककी उस व्याख्याका उपहास करते हुए अभिनवगुप्तने 'लोचन' (पृ० ६३ पर) लिखा है-'जैमिनिसूते हयोवं योज्यते न काव्येऽपि', इस प्रकारकी अर्थयोजना आपके मीमांसादर्शनमें ही होती होगी काव्यमें नहीं, अर्थात् तुम काव्यकी योजनाका प्रकार नहीं समझते हो। इसी प्रकार 'ध्व- न्यालोक'के प्रथम उद्योतकी १३ वीं कारिकामें आये हुए 'व्यंक्त: काव्यविशेषम्'में 'व्यंक्तः' पदमें द्विवचनका खण्डन भट्टनायकने किया था। इसकी आलोचना करते हुए अभिनवगुप्तने 'तेन भट्टनायकेन द्विवचनं दूषितं तद् गजनिमीलिकयैव' उसे गजनिमीलिका या प्रमाद कहकर उसका उपहास किया है। रसनिष्पत्तिके विषयमें भी भट्टनायकका अपना अलग सिद्धान्त है। उनके सिद्धान्तका उल्लेख 'काव्यप्रकाश' में किया गया है। उन्होंने शब्दमें अभिधाव्यापार, भावकत्वव्यापार तथा भोजकत्वव्यापार तीन प्रकारके व्यापार माने हैं। अभिधाव्यापारके द्वारा काव्यका सामान्य अर्थ उपस्थित होता है। भावकत्वव्यापार सीता-राम आदिके विशेष स्वरूपका अपहरण कर उनका साधरणीकरण करता है और भोजकत्वव्यापार सामाजिकको रसकी अनुभूति कराता है। जयरथने 'अलङ्गारसर्वस्व'की टीकामें (पृ० ६ पर) तथा हेमचन्द्रने 'काव्यानुशासनविवेक'में (पृ० ६१ पर) भट्टनायकके इस विषयके प्रतिपादक श्लोकोंको निम्नलिखितरूपमें उद्धृत किया है- 'अभिधा भावना चान्या तद्भोगीकृतिरेव च। अभिधाधामतां याते शब्दार्थालङकृती ततः । भावनाभाव्य एषोऽपि शृङ्गारादिगणो मतः । तद्भोगीकृतिरूपेण व्याप्यते सिद्धिमान्नरः ॥' इनका अभिप्राय 'अलङ्गारसर्वस्व'की टीकामें (पृ० पर) निम्नलिखित प्रकार दिया गया है- 'भट्टनायकेन तु व्यङ्गयव्यापारस्यैव प्रौढोक्त्याऽभ्युपगतस्य काव्यांशत्वं ब्रुवता न्यग्भावितशब्दार्थ स्वरूपस्य व्यापारस्यव प्राधान्यमुक्तम्। तत्नापि अभिधाभावकत्वलक्षणव्यापारद्वयोत्तीर्णो रसचर्वणात्मा भोगापरपर्यायो व्यापार: प्राधान्येन विश्रान्तिस्थानतयाऽङ्गीकृतः ।'
१४. कुन्तक कुन्तक साहित्यशास्त्रके एक प्रमुख आचार्य हैं। ये साहित्यके परम मान्य वक्रोक्तिसम्प्रदायके संस्था- पक माने जाते हैं। उनका समय आनन्दवर्धनके बाद राजशेखर तथा महिमभट्टके बीचमें पड़ता है। उन्होंने 'वकोक्तिजीवित' में (पृ० १६६ पर) 'यस्मादत् ध्वनिकारेण व्यङ्गयव्यञ्जकभावोऽत् सुतरां समर्थितस्तत् किं पौनरुक्त्येन' लिखकर ध्चनिकार तथा (पृ० १५६ पर) 'भवभूतिराजशेखरविरचितेषु बन्धसौन्दर्य- सुमनेषु मुक्तकेषु परिदृश्यते' लिखकर राजशेखरका उल्लेख किया है। इससे प्रतीत होता है कि वे आनन्द- वर्धन और राजशेखरके भी बाद हुए हैं। इधर व्यक्तिविवेककार महिमभट्टने- 'काव्यकाञ्चनकशाश्ममानिना कुन्तकेन निजकाव्यलक्ष्मणि। यस्य सर्वनिरवद्यतोदिता श्लोक एष स निदशितो मया।' -- व्यक्तिविवेक, पृ० ५द
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भूमिका इस श्लोकमें स्पष्टरूपसे कुन्तकके नामका उल्लेख किया है इसलिए यह निश्रय है कि कुन्तक महिमभट्टके पूर्ववर्ती हैं। राजशेखरका काल उनके शिष्य कन्नौजके राजा महेन्द्रपाल तथा उनके पुत्र महि- पालके कालके आधारपर दशम शताब्दीका प्रारम्भिक भाग निर्धारित किया जाता है और महिमभट्टका काल ग्यारहवीं शताब्दीके पहिले ही मानना होगा, क्योंकि ग्यारहवीं शताब्दीमें अलङ्गारसर्वस्वकार रुय्यकने महिमभट्टके मतका उल्लेख किया है। इसलिए महिमभट्टके पूर्ववर्ती होनेके कारण कुन्तकका काल दशम शताब्दीका अन्तिम भाग मानना होगा। राजशेखर, कुन्तक और महिमभट्ट ये सब थोड़े-थोड़े अन्तरसे ही पूर्व-पश्राद्वर्ती हैं, वैसे ये सब दशम शताब्दीके ही साहित्यक महापुरुष हैं। कुन्तकका एकमात्र ग्रन्थ 'वकोक्तिजीवित' है। किन्तु उस एक ही ग्रन्थने कुन्तकके नामको अमर कर दिया है। महिमभट्टके अतिरिक्त गोपालभट्टने 'साहित्यसौदामिनी' नामक ग्रन्थके आरम्भमें कुन्तककी प्रशंसा करते हुए लिखा है- 'वकानुरञ्जिनीमुकति शुक इव मुखे वहन्। कुन्तकः कीडति सुखं कीतिस्फटिकपञ्जरे॥ 'ध्वन्यालोक' आदि ग्रन्थोंके समान 'वकोक्तिजीवित' में भी कारिका, वृत्ति और उदाहरण, तीन भाग हैं। कारिका और वृत्ति दोनोंके लेखक कुन्तक ही हैं। उदाहरण प्रसिद्ध काव्यग्रन्थोंसे लिये गये हैं। ग्रन्थ चार उन्मेषोंमें विभक्त किया गया है। प्रथम उन्मेषमें काव्यके प्रयोजन, लक्षण तथा प्रतिपाद्य विषय षड्विधवऋताका सामान्य उल्लेख किया गया है। द्वितीय उन्मेषमें षड्विध-वक्रतामेंसे १. वर्णविन्यासवकता, ३. पदपूर्वार्द्धवकता तथा ३. प्रत्ययवकता इन तीन प्रकारकी वकरताओंका प्रतिपादन किया गया है। तृतीय उन्मेषमें वाक्यवकताका विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है। उसीके भीतर अलङ्गारोंका अन्तर्भाव हो जाता है। चतुर्थ उन्मेषमें वक्रोक्तिके अन्तिम दो भेदों अर्थात् प्रकरण- वकता तथा प्रबन्धवकताका निरूपण किया गया है। कुन्तक अभिधावादी आचार्य हैं। वैसे वे लक्ष्य-व्यङ्गय अर्थ भी मानते हैं, किन्तु उनका अन्तर्भाव वाच्यमें ही कर लेते हैं-'यस्मादर्थप्रतीतिकारित्वात् उपचारात् तावपि वाचकावेव। एवं द्योत्यव्यङ्गय- योरर्थयो: प्रत्येयत्वसामान्यदुपचारात् वाच्यत्वमेव' (का० १-८ का०) और उस वाचकत्वका अर्थ 'कविविवक्षितविशेषाभिधानक्षमत्वमेव वाचकत्वलक्षणम्' किया है। १५. महिमभट्ट कुन्तकके बाद महिमभट्टका स्थान आता है। इनका उल्लेख ग्यारहवीं शताब्दीमें होनेवाले अलङ्कारसर्वस्वकार रुथ्यकने किया है और इन्होंने वकोक्तिजीवितकार कुन्तकका उल्लेख किया है। इसलिए कुन्तक तथा रुथ्यकके बीचमें महिमभट्टका समय दशम शताब्दीका अन्तिम भाग पड़ता है। महिमभट्ट भी ध्वनिविरोधी आचार्य हैं। आनन्दवर्धनाचार्य और अभिनवगुप्तने ध्वनिको काव्यका आत्मा सिद्ध करनेका जैसा प्रबल प्रयत्न किया है उतना ही अधिक उस सिद्धान्तका उग्र विरोध भी साहित्य- शास्त्रमें हुआ है। अभिनवगुप्तके बाद मुकुलभट्ट, धनञ्जय, भट्टनायक, कुन्तक और महिमभट्ट आदि सभी आचार्य ध्वनिके विरोधी हैं। किसीने उग्र विरोध किया है, किसीने हलका। किन्तु इनमेंसे कोई भी ध्वनिको काव्यका आत्मा माननेको तैयार नहीं है। इन विरोधियोंको उनकी शास्त्रीय मान्यताके आधारपर तीन भागोंमें विभक्त किया जा सकता है। मुकुलभट्ट तथा भट्टनायक ये दोनों भीमांसक हैं। मीमांसा अभिधाप्रधान शास्त्र है, उसमें व्यञ्जना और ध्वनिका कोई स्थान नहीं हो सकता है इसलिए
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इन दोषोंने अपनी शास्त्रीय मान्यताके अनुसार व्यञ्जना और ध्वनिसिद्धान्तका खण्डन किया है। कुन्तक साहित्यिक आचार्य हैं। उन्होंने शुद्ध शाहित्यिक दृष्टिसे ध्वनिको काव्यका आत्मा माननेसे निषेध कर दिया और उसके स्थानपर वक्रोक्तिको काव्यका जीवनाधायक तत्त्व माना है। महिमभट्ट नैयायिक हैं इसलिए उन्होंने न्यायकी पद्धतिसे ध्वनिको सामान्यरूपसे और उसके उदाहरणोंको विशेषरूपसे अनुमानके अन्तर्गत करनेका यत्न किया है। महिमभट्टका एकमात्र ग्रन्थ 'व्यक्तिविवेक' है। इसके निर्माणका उद्देश्य ध्वनिको अनुमानके भीतर अन्तर्भुक्त करना ही है। इस बातका प्रतिपादन उन्होंने अपने ग्रन्थके आरम्भमें निम्नलिखित श्लोकमें किया है- 'अनुमानेऽन्तर्भावं सर्वस्युव ध्वनेः प्रकाशयितुम् । व्यक्तिविवेकं कुरुते प्रणम्य महिमा परां वाचम् ।' महिमभट्टका केवल एक ही ग्रन्थ पाया जाता है किन्तु इसके द्वारा उनको पर्याप्त ख्याति प्राप्त हुई है। वे अपने मुख्य नामकी अपेक्षा 'व्यक्तिविवेकार'के नामसे ही अधिक प्रसिद्ध हैं। ये भी कश्मीर- निवासी थे। इनके पिताका नाम 'श्रीधैर्य' और गुरुका नाम 'श्यामल' था। इन्होंने 'व्यक्तिविवेक'के अतिरिक्त 'तत्त्वोक्तिकोश' नामक किसी और ग्रन्थकी भी रचना की थी, किन्तु वह उपलब्ध नहीं है। उसका उल्लेख उन्होंने स्वयं 'इत्यादि प्रतिभातत्त्वमस्माभिरुपपादितं शास्त्रे तत्त्वोक्तिकोशशास्त्रे इति नेह प्रपञ्चितम्' (व्यक्तिविवेक, पृष्ठ १८. अनन्तशयन संस्करण) इस रूपमें 'व्यक्तिविवेक' में किया है। 'व्यक्तिविवेक' ग्रन्थमें तीन'विमर्श' हैं। प्रथम विमर्शमें ध्वनिका प्रबल रूपसे खण्डन करके ध्वनिके सारे उदाहरणोंका अनुमानके भीतर अन्तर्भाव दिखलाया है। द्वितीय विमर्शमें काव्यदोषोंका निरूपण किया है। उसमें अनौचित्यको काव्यका मुख्य दोष माना है। इसके शब्द तथा अर्थविषयक या अन्तरङ्ग एवं बहिरङ्ग दो भेद किये हैं। अन्तरङ्ग अनौचित्यके भीतर रसदोषका समावेश किया है और बहिरङ्ग अनौचित्यके १. विधेयाविमर्श, २. प्रकरमभेद, ३. करमभेद, ४. पौनरुक्त्य और ५. वाच्यावचन ये पाँच भेद किये हैं। तृतीय विमर्शमें ध्वनिके ४० उदाहरणोंका अनुमानमें अन्तर्भाव दिखलाया है।
१६. क्षेमेन्द्र जिस प्रकार आनन्दवर्धन ध्वनिसम्प्रदायके, वामन रीतिसम्प्रदायके और कुन्तक वक्रोक्ि- सम्प्रदायके संस्थापकके रूपमें साहित्यशास्त्रके इतिहासमें प्रसिद्ध हैं उसी प्रकार क्षेमेन्द्र अपने औचित्य- सम्प्रदायके संस्थापकके रूपमें प्रसिद्ध हैं। उन्होंने अपने 'कविकण्ठाभरण' ग्रन्थमें लिखा है- 'तस्य श्रीमदनन्तराजनृपतेः काले किलायं कृतः ।' इसी प्रकार 'औचित्यविचारचर्चा' में भी-'राज्ये श्रीमदनन्तराजनृपतेः काव्योदयोऽयं कृतः' लिखकर 'अनन्तराज' के नामका उल्लेख किया है। अनन्तराज नामके राजाने कश्मीरमें १०२८ से १०६३ तक राज्य किया। इसलिए यही काल क्षेमेन्द्रका सिद्ध होता है। क्षेमेन्द्रके पिताका नाम 'प्रका- शेन्द्र' और बाबाका नाम 'सिन्धु' था। अपने 'बृहत्कथामञ्जरी' ग्रन्थमें इन्होंने 'धरुत्वाभिनवगुप्ताख्यात् साहित्यं बोधवारिधे:' लिखकर अभिनवगुप्तको अपना साहित्यशास्त्रका गुरु माना है। कश्मीरके अनन्तराजके बाद उनके पुत्र 'कलश' राजसिंहासनपर आसीन हुए। अनन्तराजने अपने जीवनकालमें ही कलशको राज्यभार सौंप दिया था। अनन्तराजका शरीरान्त यद्यपि १०८१ ई० में हुआ था किन्तु उन्होंने १०६३ में ही राज्यभार कलशको सौंप दिया था। क्षेमेन्द्रने अपने 'समयमातृका' ग्रन्थकी रचना १०५०
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में अनन्तराजके कालमें की थी। किन्तु 'दशावतार' ग्रन्थकी रचना उसके १६ वर्ष बाद १०६६ में कलशके राज्यकालमें की थी। इनके ग्रन्थोंकी सूची बहुत लम्बी है। लगभग ४० ग्रन्थोंकी रचना इन्होंने की है। पर वे सब उपलब्ध नहीं हैं। १. भारतमञ्जरी, २. बृहत्कथामञ्जरी, ३. औचित्यविचारचर्चा, ४. कवि- कण्ठाभरण, ५. सुवृत्ततिलक, ६. समदमातृका आदि कुछ ही ग्रन्थ उपलब्ध हैं। इन ग्रन्थोंमें उन्होंने अपने अनेक ग्रन्थोंके नामोंका उल्लेख किया है। १. अवसरसार, २. अमृततरङ्गकाव्य, ३. कनकजान- की, ४. कविकणिका, ५. चतुर्वर्गसंग्रह, ६. चित्रभारतनाटक, ७. देशोपदेश, ८. नीतिलता, ६. पद्यका- काम्बरी, १०. बौद्धावदानकल्पलता, ११. मुक्तावलीकाव्य, १२. मुनिमतमीमांसा, १३. ललितरत्न- माला, १४. लावण्यवतीकाव्य, १५. वात्स्यायनसूत्रसार, १६. विनयवती, १७. शशिवंश इन सत्रह ग्रन्थोंके नाम मिलते हैं। क्षेमेन्द्रके उपलब्ध ग्रन्थोंमेंसे 'औचित्यविचारचर्चा' का ही अलङ्गारशास्त्रके साथ विशेषरूपसे सम्बन्ध माना जा सकता है। इसीके कारण उनकी गणना आलङ्गारिक आचार्योंमें की जाती है। इसमें उन्होंने औचित्यको रसका भी प्राण कहा है- औचित्यस्य चमत्कारकारिणश्चारुचर्वणे। रसजीवितभूतस्य विचारं कुरुतेऽधुना ।।' दूसरी जगह अनौचित्यको रसभङ्गका कारण और औचित्यको रसका परम रहस्य कहा है- अनौचित्यादृते नान्यद् रसभङ्गस्य कारणम्। प्रसिद्धौचित्यबन्धस्तु रसस्योपनिषत्परा ॥' औचित्य क्या है इसका वर्णन करते हुए लिखा है -- 'उचितं प्राहुराचार्याः सदृशं किल यस्य यत्। उचितस्य च यो भावस्तदौचित्यं प्रचक्षते ।।' 'सुवृत्ततिलक' ग्रन्थमें छन्दोंका वर्णन है। उसमें ग्रन्थकारने यह भी दिखलाया है कि किस कविका किस छन्दपर विशेष अधिकार है; जैसे, अभिनन्द अनुष्टुपमें, पाणिनि उपजातिमें, भारवि वंशस्थमें, कालिदास मन्दाक्रान्तामें, रत्नाकर वसन्ततिलकामें, भवभूति शिखरिणीमें और राजशेखर शार्दूलविकरींडितमें विशेष चमत्कार उत्पन्न करते दीखते हैं। 'कविकष्ठाभरण'में कवित्वकी प्राप्ति अथवा उसमें उत्कर्षप्राप्तिके उपायोंका वर्णन किया है। इसमें पाँच सन्धियाँ हैं और उनके प्रतिपाद्य विषयका संग्रह निम्नलिखित एक श्लोकमें दिया गया है- १ अत्राकवेः कवित्वाप्तिः, २ शिक्षाप्राप्तगिरः कवेः । ३ चमत्कृतिश्च शिक्षाप्तौ, ४ गुणदौषोद्गतिस्ततः ॥ ५ पश्चात् परिचयप्राप्तिरित्येते पञचसन्धयः ॥ क्षेमेन्द्रने अपनेको अभिनवगुप्तका शिष्य कहा है। इन्हीं अभिनवगुप्तके एक शिष्य और हैं क्षेमराज। कुछ विद्वान् इन दोनोंको भिन्न-भिन्न व्यक्ति मानते हैं। क्षेमराजने शैवदर्शनके ऊपर अनेक रचनाएँ की हैं। उन्होंने अभिनवगुप्तके 'परमार्थसार' पर व्याख्या भी लिखी है। भेदवादियोंका कहना है कि क्षेमराज शैव थे और क्षेमेन्द्र वैष्णव। क्षेमेन्द्रने विष्णुके दस अवतारोंके विषयमें अपना
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'दशावतारचरित' लिखा है। अभेदवादियोंका कहना है कि क्षेमेन्द्र पहिले शैव थे, बादको सोमाचार्य द्वारा वैष्णव सम्प्रदायमें दीक्षित किये गये। क्षेमेन्द्र अपने ग्रन्थोंमें अपनेको प्रायः व्यासदास नामसे लिखते हैं, जैसे 'दशावतारचरित' के निम्नाङित श्लोकमें पाया जाता है- 'इत्येष विष्णोरवतारमर्ते: काव्यामृतास्वादविशेषभक्या। श्रीव्यासदासान्यतमाभिधेन क्षेमेन्द्रनाम्ना विहितः प्रबन्धः ॥' १०-४१ १७. भोजराज धारानरेश राजा भोज भारतीय इतिहासमें विद्वानोंके आश्रयदाता एवं उदार दानशील राजाके रूपमें अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। इनका शासनकाल ग्यारहवीं शताब्दीमें माना जाता है। इनकी विद्वत्सेवा एवं दानशीलताकी सारे देशमें ख्याति थी। यहाँतक कि कश्मीर राज्यके इतिहास 'राज- तर्राङ्गणी'में भी इनके इन गुणोंकी प्रशंसा की गयी है। कश्मीरके राजा अनन्तराजकी चर्चा हम अभी कर चुके हैं, भोजराज उन्हीं अनन्तराजके समकालीन हैं। 'राजतर्राङ्गणी' की सप्तम तरङ्गमें कश्मीर- नरेश अनन्तराज तथा मालवाधीश भोजराज दोनोंकी समानरूपसे विद्वत्प्रियताका उल्लेख ग्रन्थकारने निम्नलिखित प्रकारसे किया है -- 'स च भोजनरेन्द्रश्च दानोत्कर्षेण विश्रुतौ। सूरी तस्मिन् क्षणे तुल्यं द्वावास्तां कविबान्धवौ ।।' ७-२५९ इसमें 'स च' इस सर्वनाम 'स' पदसे प्रकृत वर्ण्यमान कश्मीराधिपति अनन्तराजका ग्रहण होता है। अनन्तराजका समय ग्यारहवीं शताब्दीमें था, इसी प्रकार भोजराजका समय भी ग्यारहवीं शताब्दीमें निश्चित माना जाता है। भोजराजके समयके निर्णयके लिए इस प्रमाणके अतिरिक्त उनका स्वयं एक शिला-दानपत्र संवत्, १०७८ सन् १०२१ का पाया जाता है। इसमें भोजराजने गोविन्दभट्टके पुत्र धनपतिभट्ट नामक किसी ब्राह्मणको ग्रामदान करनेका उल्लेख किया है। उसके अन्तमें उस दानपत्रकी तिथि आदि इस प्रकार दी है- 'इति। संवत् १०७८ चैत्र सुदी १४ स्वयमाज्ञा मंगलं महाश्रीः । स्वहस्तोऽयं भुजदेवस्य।' इस दानपत्रमें अपने उत्तराधिकारी अन्य सब लोगोंसे प्रार्थना की है कि जो दान दे दिया गया है उसको कोई वापस लेनेका यत्न न करे। उनमेंसे दो श्लोक निम्नलिखित प्रकार हैं- 'सर्वाननतान् भाविनः पार्थिवेन्द्रान् भूयो भूयो याचते रामभद्रः । सामान्योडयं धर्मसेतुर्नराणाँ काले काले पालनीयो भवद्भिः ॥ इति कमलदलाम्बुबिन्दुलोलां श्रियमनुचिन्त्य मनुष्यजीदितं च। सकलमिदमुदाहृतं च बुद्ध्वा न हि पुरुषः परकीर्तयो विलोपनीयाः॥ राजा भोज केवल विद्वानोंका आदर करनेवाले ही नहीं थे अपितु स्वयं भी एक महान् विद्वान् और अच्छे साहित्यिक थे। अलङ्कारशास्त्रके विषयमें उनके लिखे हुए दो ग्रन्थ मिलते हैं-१. 'सरस्वती- कण्ठाभरण' और २ 'भृङ्गारप्रकाश'। 'सरस्वतीकण्ठाभरण' पाँच परिच्छेदोंमें विभक्त है। प्रथम परिच्छेदमें दोष और गुणका विवेचन है। इसमें इन्होंने पद, वाक्य तथा वाक्यार्थ तीनोंके १६-१६ दोष माने हैं और शब्द तथा अर्थ दोनों के २४-२४ गुण माने हैं। द्वितीय परिच्छेदमें २४ शब्दालङ्गारों तथा चतुर्थ परिच्छेदमें २४ उभयालङ्गारोंका वर्णन किया है। पञ्चम परिच्छेदमें रस, भाव, पञ्चसन्धि तथा चारों वृत्तियोंका वर्णन किया है। इसके ऊपर १४ वीं शताब्दीमें तिरहुतके राजा रामसिंहदेवके
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भूमिका ६३ आग्रहसे महामहोपाध्याय रत्नेश्वरने 'रत्नदर्पण' नामक टीका लिखी थी। इस टीकाके सहित यह ग्रन्थ काव्यमाला सीरीजमें निर्णयसागर प्रेस बम्बईसे प्रकाशित हो चुका है। भोजराजका दूसरा ग्रन्थ 'शृङ्गारप्रकाश' है। यह बड़ा विशालकाय ग्रन्थ है। इसमें ३६ 'प्रकाश' हैं। ग्रन्थ हस्तलिखित रूपमें पूरा उपलब्ध है। परन्तु अभी पूरा प्रकाशित नहीं हुआ है। इस ग्रन्थपर प्रथम आठ प्रकाशोंमें शब्द तथा अर्थविषयक अनेक वैयाकरणोंके मत दिये गये हैं। नवम- दशम प्रकाशोंमें गुण तथा दोषोंका विवेचन है। ग्यारहवें-बारहवें प्रकाशमें महाकाव्य तथा नाटकका वर्णन है। शेष २४ प्रकाशोंमें उदाहरण सहित रसोंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इसमें, जैसा कि ग्रन्थनामसे ही प्रतीत होता है, शृङ्गाररसको ही प्रधान रस अथवा एकमात्र रस माना है- 'शृङ्गारवीरकरुणाद्भुतरौद्रहास्य- वीभत्सवत्सलभयानकशान्तनाम्नः । आम्नासिषुर्दशरसान् सुधियो वयं तु शृङ्गारमेव रसनाद् रसमामनामः ।' किन्तु भोजराजका यह शृङ्गार सामान्य शृङ्गार नहीं है, उसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों- का समावेश हो जाता है। 'मन्दारमरन्दचम्पू' (बिन्दु ७, पृ० १०७) में लिखा है "अथ भोजनृपादीनां मतमत्र प्रकाश्यते। 'रसो वै सः' इति श्रुत्वा रस एकः प्रकीत्तितः । अतो रसः स्याच्छृङ्गार एक एवेतरे तु न ।। धर्मार्थकाममोक्षाख्यभेदेन स चतुविधः।।" 'शृङ्गारप्रकाश' अलङ्गारशास्त्रके ग्रन्थोंमें कदाचित् सबसे अधिक विशालकाय ग्रन्थ है। भोजराजकी इस उत्तम रचनाने साहित्यिक जगत्में उनका नाम चिरकालके लिए अमर कर दिया है।
१८. काव्यप्रकाशकार मम्मट
मम्मटका काल तथा वंश भोजराजके बाद मम्मटाचार्यका काल आता है। अलङ्कारसाहित्यके निर्माताओंकी अब- तककी धारामें दण्डी, राजशेखर और भोजराजके अतिरिक्त और सभी आचार्य कश्मीर-निवासी थे। इसी प्रकार ये मम्मटाचार्य भी कश्मीर-निवासी हैं यह बात उनके नामसे ही प्रतीत होती है। परन्तु इनके जीवनवृत्तादिका और कुछ अधिक परिचय नहीं मिलता है। कश्मीरी पण्डितोंकी परम्परागत प्रसिद्धिके अनुसार मम्मट 'नैषधीयचरित'के रचयिता महाकवि श्रीहर्षके मामा माने जाते हैं। किन्तु यह प्रवादमात्र जान पड़ता है, क्योंकि महाकवि श्रीहर्ष स्वयं कश्मीरी नहीं थे। 'काव्यप्रकाश'की 'सुधा- 'सुधासागर' टीकाके निर्माता भीमसेनने मम्मटके परिचयके रूपमें कुछ पद्य लिखे हैं, उनसे यह प्रतीत होता है कि मम्मट कश्मीरदेशीय जैयटके पुत्र थे। उन्होंने वाराणसीमें जाकर विद्याध्ययन किया था। पतञ्जलि-प्रणीत 'महाभाष्य' के टीकाकार कैयट तथा यजुर्वेदभाष्यकार उव्वट दोनों मम्मटके छोटे भाई थे। इस भावका वर्णन भीमसेनने अपने श्लोकोंमें निम्नलिखित प्रकार किया है- 'शब्दब्रह्म सनातनं न विदितं शास्त्रै: क्वचित् केनचित् तद्देवी हि सरस्वती स्वमभूत काश्मीर-देशे पुमान्।
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श्रीमज्जैयटगेहिनीसुजठराज्जन्माप्य युग्मानुजः श्रीमन्मम्मटसंज्ञया श्रिततनुं सारस्वतीं सूचयन्। मर्यादां किल पालयन् शिवपुरीं गत्वा प्रपठयादरात् शास्त्रं सर्वजनोपकाररसिकः साहित्यसूत्रं व्यधात्। तत्वृत्ति च विरच्य गूढमकरोत् काव्यप्रकाशं स्फुटं वैदग्ध्यैकनिदानमर्िषु चतुर्वर्गप्रदं सेवनात्।। कस्तस्य स्तुतिमाचरेत् कविरहो को वा गुणान् वेदितुं शक्तः स्यात् किल मम्मटस्य भुवने वाग्देवतारूपिणः । श्रीमान् कैयट औव्वटो ह्यवरजौ यच्छात्रतामागतौ भाष्यान्धि निगमं यथाक्रममनुव्याख्याय सिद्धिं गतौ ।।' इस विवरणके अनुसार मम्मटका जन्म 'जैयटगेहिनी' के सुजठरसे हुआ था। अर्थात् वे जैयटके पुत्र थे और 'श्रीमान् कैयट औव्वटौ ह्यवरजौ' कैयट और औव्वट उनके छोटे भाई थे, जिन्होंने 'भाष्यान्धि निगमं यथाक्रममनुव्याख्याय' महाभाष्य तथा वेदोंपर व्याख्या लिखी थी। इस प्रकार मम्मट रूपमें स्वयं सरस्वती देवीने कश्मीरदेशमें पुरुषके रूपमें अवतार लिया था और साहित्यशास्त्रपर सूत्रोंका निर्माण, उसपर स्वयं काव्यप्रकाश-वृत्तिकी रचना की थी। यह विवरण सुधासागरकार भीमसेनने मम्मटाचार्यके विषयमें अपने ग्रन्थमें प्रस्तुत किया है। किन्तु इसमें जो कैयट तथा औव्वट या उव्वटको मम्मटका अनुज कहा है वह ठीक प्रतीत नहीं होता है, क्योंकि उव्वटकृत वाजसनेयसंहिता-भाष्यमें उनका परिचय इस प्रकार मिलता है- सुनुना। मन्त्रभाष्यमिदं क्लृप्तं भोजे पृथ्वीं प्रशासति ।।' उव्वट द्वारा स्वयं प्रदत्त इस विवरणके अनुसार उब्बटके पिताका नाम 'वज्तट' है, 'जैयट' नहीं, और उनका वेदभाष्य भोजराजके शासनकालमें लिखा गया है। किन्तु मम्मटका समय भोजराजके समकाल नहीं अपितु उनके बाद पड़ता है क्योंकि मम्मटने स्वयं दशम उल्लासमें उदात्त अलङ्गारके उदाहरणरूपमें जो पद्य दिया है उसमें अन्तमें 'भोजनृपतेस्तत् त्यागलीलायितम्', वह सब भोजराजके दानका फल है, इस रूपमें भोजराजके नामका उल्लेख किया है। भोजराजका शासनकाल, जैसा कि पहले कहा जा चुका है, ६६६ ई० से १०५१ ई० पर्यन्त माना जाता है। मम्मट उनके उत्तरवर्ती जान पड़ते हैं। किन्तु यदि कर्थञ्चित् मम्मटको भोजराजका समकालीन भी मान लिया जाय तो भी उव्वटको उनका अनुज कहना कठिन है। हाँ, कैयटको उनका अनुज माना जा सकता है, क्योंकि कैयटने भी 'कैयटो जैयटात्मजः'के अनुसार अपनेको जैयटका पुत्र कहा है। किन्तु उव्वट तो वज्रटके पुत्र हैं। इसलिए उव्वटको मम्मटका अनुज बतलानेवाला भीमसेनका लेख सन्दिग्ध जान पड़ता हैं। इसके अतिरिक्त 'शिवपुरीं गत्वा प्रपठयादरात्' लिखकर मम्मटको विद्याध्ययनके लिए कश्मीर- से 'शिवपुरी' वाराणसी भेजा है। यह बात भी कुछ युक्तिसङ्गत प्रतीत नहीं होती। कश्मीर तो स्वयं विद्याका केन्द्र था। साहित्य शास्त्रके अबतक जितने आचार्य हुए थे उनमेंसे दण्डी, राजशेखर और भोजराजको छोड़कर सभी आचार्य कश्मीरमें ही उत्पन्न हुए थे। जो तीन आचार्य कश्मीरसे बाहरके थे, काशीके साथ उनका भी कोई सम्बन्ध नहीं था। साहित्यशास्त्रकी दृष्टिसे काशीका कोई विशेष महत्त्व
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उस समय नहीं था। इसलिए मम्मटके लिए कश्मीरको छोड़कर काशी आनेका कोई विशेष प्रयोजन या आकर्षण नहीं प्रतीत होता है। इन सब कारणोंसे भीमसेनका मम्मटविषयक उपर्युक्त परिचय अप्रामाणिक मालूम होता है। भीमसेनका यह लेख मम्मटके लगभग ६०० वर्ष बाद सन् १७२३ में लिखा गया है। इसलिए उसमें अधिकतर कल्पनासे काम लिया गया है। उव्वटने अपने ऋक्-प्रातिशाख्यमें अपनेको वज्रटका पुत्र लिखा है और वाजसनेय संहिताभाष्यमें 'भोजे राज्यं प्रशासति' लिखा है; इन दोनों बातोंसे उव्वटका सम्बन्ध मम्मटसे नहीं जुड़ता है।
युग्मकतृ त्व 'काव्यप्रकाश' के कर्ताके रूपमें साधारणतः मम्मट ही प्रसिद्ध हैं। किन्तु वस्तुतः वे अकेले ही इस ग्रन्थके निर्माता नहीं हैं। इसमें मम्मटके अतिरिक्त कश्मीरके दूसरे विद्वान् 'अल्लर्ट'का भी सहयोग है। वह सहयोग कितने अंशमें है इस विषयमें कुछ मतभेद पाया जाता है, किन्तु 'काव्यप्रकाश' केवल अकेले मम्मटकी रचना नहीं है, उसकी रचनामें अल्लटका भी हाथ है इस विषयमें मतभेद नहीं है। अधिकांश टीकाकार इस बातमें एकमत हैं। 'काव्यप्रकाश' के अन्तमें एक श्लोक निम्नलिखित प्रकार दिया गया है --
'इत्येष मार्गो विदुषां विभिन्नोऽप्यभिन्नरुपः प्रतिभासते यत् । न तद्विचित्रं यदमुत्र सम्यग्विनिमिता सङ्गटनैव हेतुः ।।' 'काव्यप्रकाश' के सबसे पूर्ववर्ती टीकाकार माणिक्यचन्द्रने इसकी व्याख्या करते हुए लिखा है- 'अथ चायं ग्रन्थोऽन्येनारब्धोऽपरेण च समापित इति द्विखण्डोऽपि सङ्गटना- वशादखण्डायते।'
इसी प्रकार 'काव्यप्रकाश'की 'सङ्गेत' टीकाके निर्माता रुचकने इसकी व्याख्यामें लिखा है- 'एतेन महामतीनां प्रसरणहेतुरेष ग्रन्थो ग्रन्थकृतानेन कथमप्यसमाप्तत्वादपरेण च पूरितावशेषत्वात् द्विखण्डोऽपि।' इन दोनों टीकाकारोंने इस बातकी ओर सङ्केत तो किया है कि ग्रन्थका आरम्भ अन्य विद्वान्के द्वारा अर्थात् मम्मटाचार्यके द्वारा किया गया, किन्तु किसी कारणसे वे इसको समाप्त नहीं कर सके, तब इसकी समाप्ति दूसरे विद्वान्के द्वारा की गयी। किन्तु दो निर्माताओंके द्वारा बनाये जानेपर भी यह ग्रन्थ अखण्ड-सा प्रतीत होता है। परन्तु इन टीकाकारोंने न तो स्पष्टरूपसे इस बातका उल्लेख किया कि पूर्व ग्रन्थकार अर्थात् मम्मटने ग्रन्थका कितना भाग लिखा और दूसरे ग्रन्थकारने कितना भाग लिखा और न इस बातका ही सङ्गेत किया कि वह दूसरा विद्वान्, जिसने अपूर्ण 'काव्यप्रकाश' को पूर्णता प्रदान की, कौन था। इन दोनों बातोंका उल्लेख स्पष्टरूपसे सबसे पहिले 'काव्यप्रकाशनिदर्शना' नामक टीकाके निर्माता राजानक आनन्दने (१६८५) निम्नलिखित प्रकार किया है --
'कृतः श्रीमम्मटाचार्यवयै: परिकरावधि:। ग्रन्थ: सम्पूरितः शेषं विधायाल्लटसूरिणा ।'
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इस श्लोकसे यह स्पष्ट हो जाता है कि मम्मटाचार्यने परिकर अलङ्गारपर्यन्त 'काव्यप्रकाश'की रचना की, उसके बाद कदाचित् उनका देहावसान हो गया या किसी अन्य कारणसे वे ग्रन्थको समाप्त नहीं कर सके तो शेष ग्रन्थकी रचना 'अल्लट' या 'अलट' नामके विद्वान्ने करके इस ग्रन्थको पूरा किया। इस प्रकारकी घटना कादम्बरी' ग्रन्थके विषयमें भी हुई है। 'कादम्बरी'के निर्माता बाणभट्ट कादम्बरीके केवल पूर्वार्द्धभागकी ही रचना कर सके थे। उसके बाद उसके उत्तरार्द्धभागकी रचना उनके पुत्रने की थी। इस प्रकार मम्मटाचार्यके इस अपूर्ण 'काव्यप्रकाश'की समाप्ति अल्लट या अलकसूरिने की। यह एक मत हुआ। इसके अनुसार दशम उल्लासके परिकर अलङ्गारतकके अधिकांश ग्रन्थकी रचना मम्मटने की है। उनके बाद जो थोड़ा-सा भाग रह गया था उसकी पूर्ति अलकसूरि या अल्लट- सूरिने की थी। पर इसके अतिरिक्त एक दूसरा मत भी पाया जाता है। उसके अनुसार 'काव्यप्रकाश'का एक भाग मम्मटोचार्यका और दूसरा भाग अल्लटसूरिका लिखा हुआ है यह बात नहीं है अपितु साराका सारा ग्रन्थ दोनों विद्वानोंकी सम्मिलित रचना है। जैसे 'नाट्यदर्पण' नामक ग्रन्थकी रचना रामचन्द्र और गुणचन्द्र दोनोंने मिलकर की है। सम्पूर्ण 'नाटयदर्पण' गुणचन्द्र और रामचन्द्रकी सम्मिलित कृति है। इसी प्रकार सम्पूर्ण 'काव्यप्रकाश' मम्मट और अल्लटकी सम्मिलित कृति है। इस दूसरे मतका उल्लेख भी उसी 'काव्यप्रकाशनिदर्शना' टीकामें राजानक आनन्दने अन्योंके मतको दिखलाते हुए निम्नलिखित प्रकार किया है- 'अन्येनाप्युक्तम्- काव्यप्रकाशदशर्केऽपि निबन्धकृद्भ्यां दवाभ्यां कृतेऽपि कृतिनां रसवत्त्वलाभः।' श्री भण्डारकरने संवत् १२१५ (सन् १११८) में लिखी गयी 'काव्यप्रकाश' की एक पाण्डुलिपि के अन्तमें पुष्पिकामें 'इति राजानकमम्मटालकयोः' इस प्रकारका लेख पाया है। इससे भी सम्पूर्ण 'काव्य प्रकाश' मम्मट तथा अल्लट दोनोंकी सम्मिलित रचना है इस मतकी पुष्टि होती है। 'अमरुक-शतक' की टीकामें उसके निर्माता अर्जुनवर्मदेवने भी इसी मतकी पुष्टि की है। उन्होंने 'भवतु विदितं' इत्यादि श्लोककी व्याख्यामें पृष्ठ २६ पर लिखा है-'यथोदाहृतं दोषनिर्णये मम्मटालकाभ्याम्-"प्रसादे वर्तस्व" इत्यादि'। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि वे न केवल परिकरालङ्गारके बादवाले भागको ही अलक-विरचित मानते हैं अपितु सप्तम उल्लासको भी अर्थात सारे ग्रन्थको ही दोनोंकी सम्मिलित कृति मानते हैं। 'अमरुकशतक' के टीकाकार अर्जुनवर्मदेवने एक जगह और इसी बातका उल्लेख किया है। 'लीलातामरसाहत' आदि ('काव्यप्रकाश' उदाहरणसंख्या २३८) 'अमरुकशतक' का बड़ा सुन्दर श्लोक है। इसमें 'वायु' पद आया है। 'काव्यप्रकाश'ने उस 'वायु' पदको जुगुप्साव्यञ्जक अश्लीलताका उदाहरण मानकर इस श्लोकको अश्लीलताके उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया है। इसपर टिप्पणी करते हुए अर्जुनवर्मदेवने लिखा है- 'अत्र केचिद् वायुपदेन जुगुप्साइलीलमिति दोषमाचक्षते । ... तदा वाग्देवतादेश इति व्यवसितव्य एवासौ। किन्तु ह्लादैकमयोवरलब्धप्रसादौ काव्यप्रकाशकारौ प्रायेण दोषदृष्टी ।' इसमें भी 'काव्यप्रकाशकारौ' यह द्विवचनका उल्लेख यह बतलाता है कि अर्जुनवर्मदेवकी वृष्टिमें 'काव्यप्रकाश'का सम्पूर्ण भाग मम्सट तथा अल्लट दोनों विद्वानोंकी सम्मिलित रचना है।
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'अमरुकशतक' के टीकाकार अर्जुनवर्मदेव मालवाधीश और धारानगरीके राजा भोजराज (जिनका उल्लेख पहिले किया जा चुका है) के वंशधर हैं। वे भोजके बाद धाराके राजसिंहासनको अलङकृत करनेवाले १३ वे राजा थे। १२११ से लेकर १२१६ ई० तकके उनके शिलालेख पाये जाते हैं, अर्थात् वे काव्यप्रकाशकारके लगभग १०० वर्ष बाद हुए हैं। 'काव्यप्रकाश'को 'सङ्केत' टीकाके प्रथम तथा दशम उल्लासके अन्तकी पुष्पिकाओंमें एक और सङ्गेत मिलता है। इसके प्रथम उल्लासके अन्तकी और दशम उल्लासके अन्तकी पुष्पिकाएँ निम्न- लिखित प्रकार हैं -- इति श्रीमद्राजानकमल्लमम्मटरुचकविरचिते निजग्रन्थकाव्यप्रकाशसङ्गेते प्रथम उल्लासः ।' इसमे 'काव्यप्रकाश' के निर्मातारूपमें राजानक मल्ल (अलकके स्थानपर), मम्मट और रुचक तीन नाम दिये हैं। इसी प्रकार दशम उल्लासकी पुष्पिकामें फिर 'राजानकमम्मट-अलक-रुचकानाम्' इन्ही तीन नामोंका उल्लेख किया है। इससे प्रतीत होता है कि 'सङ्गत' टीकाके निर्माता रुचक 'काव्य- प्रकाश'को दो की नहीं, तीनकी कृति मानते हैं। पर यह बात नहीं है। रुचकने इस स्थलपर 'काव्य- प्रकाश' मूल ग्रन्थके साथ अपनी 'संङ्गेत' टोकाको भी सम्मिलित करके पुष्पिकाएँ दी हैं। इसलिए 'काव्यप्रकाश के मम्मट तथा अलक निर्माताओंके साथ टीकाकारके रूपमें अपने नामका भी समावेश कर दिया है। यहाँ ग्रन्थकार जिस ग्रन्थकी पुष्पिका लिख रहे हैं वह ग्रन्थ 'काव्यप्रकाश' ग्रन्थ नहीं अपितु 'काव्यप्रकाशसङ्गूत' ग्रन्थ है। उसके तीन रचयिता हो जाते हैं, 'काव्यप्रकाश' के नहीं। इसलिए 'काव्यप्रकाश के विषयमें युग्मकर्तुत्ववाला सिद्धान्त प्रायः सर्वसम्मत सिद्धान्त माना जाता है। कारिकाकतृ त्व 'काव्यप्रकाश' के युग्मकर्तृत्व-सिद्धान्तके दो पक्ष हमने ऊपर दिखलाये। इनमेंसे एक पक्षके अनुसार 'काव्यप्रकाश'का प्रारम्भसे लेकर परिकरालङ्ारतकका भाग भम्मटका और शेष अन्तिम भाग अलकसूरिका लिखा हुआ है। दूसरे मतके अनुसार साराका सारा 'काव्यप्रकाश' मम्मट तथा अलकसूरिकी सम्मिलित रचना है। इस प्रकार 'काव्यप्रकाश'के युग्मकर्तृत्वविषयक ये दो सिद्धान्त बनते हैं। इसी प्रसङ्गमें एक और तीसरा सिद्धान्त भी है। वह भी 'काव्यप्रकाश' को दो व्यक्तियोंकी रचना मानता है। किन्तु उसकी विचारशली भिन्न प्रकारकी है। 'ध्वन्यालोक', 'व्यक्तिविवेक' आदि अन्य सभी ग्रन्थोंके समान 'काव्यप्रकाश' में भी तीन भाग हैं-१. कारिकाभाग, २. वतिभाग और ३. उदाहरणभाग। 'काव्यप्रकाश'के उदाहरण सब विभिन्न प्रसिद्ध काव्योंसे लिये गये हैं इसलिए उनके कर्तृत्वके विषयमें कोई विवाद नहीं है। किन्तु कारिकाभाग और वृत्तिभागकी रचनाके विषयमें दो प्रकारके मत पाये जाते हैं। कुछ लोग इन दोनों भागोंके कर्ता अलग-अलग मानते हैं। उनके मतानुसार कारिकाभागके निर्माता भरतमुनि हैं और वृत्तिभागके निर्माता मम्मटाचार्य हैं। दूसरे लोग कारिकाभाग तथा वृत्तिभाग दोनोंका निर्माता एक ही मम्मटाचार्यको मानते हैं। कारिका तथा वत्तिभागका भिन्नकर्त कत्ववादी पूर्वपक्ष कारिकाभाग तथा वृत्तिभाग दोनोंके निर्माता अलग-अलग हैं इस सिद्धान्तका उदय बङ्गदेशमें हुआ। साहित्यकौमुदीकार विद्याभूषण तथा 'काव्यप्रकाश'की 'आदर्श' टीकाके निर्माता महेश्वरने
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काव्यप्रकाश:
'काव्यप्काश'के कारिकाभागका निर्माता भरतमुनिको माना है। विद्याभूषणने 'साहित्यकौमुदी' में दो बार इस बातका उल्लेख किया है जो निम्नलिखित प्रकार है --
'मम्मटाद्युक्तिमाश्रित्य मितां साहित्यकौमुदीम्। वृतति भरतसूत्राणां श्रीविद्याभूषणो व्यधात्।।' इसमें विद्याभूषणने 'काव्यप्रकाश'के सूत्रोंको भरतसूत्र कहा है। दूसरी जगह उन्होंने फिर लिखा है -- 'सूत्राणां भरतमुनीशर्वणितानां वृत्तीनां मितवपुषां कृतौ ममास्याम्। इन लेखोंसे विदित होता है कि साहित्यकौमुदीका विद्याभूषणके मतमें 'काव्यप्रकाश'के सूत्र भरतमुनि-विरचित हैं। इसी प्रकार 'आदर्श' व्याख्याके निर्माता महेश्वरने (जीवानन्द संस्करण पृ० ३ पर) 'काव्यप्रकाश' के सूल्रोंको भरतनिर्मित तथा वृत्तिभागको मम्मटाचार्यकृत माना है। इसके विपरीत जयरामने अपनी 'तिलक' नामक 'काव्यप्रकाश'की टीकामें इस मतका खण्डन किया है। उन्होंने पहिले पूर्वपक्षके रूपमें सूत्रोंको भरतकृत माननेवालोंका पक्ष रखा है, फिर उसका खण्डन कर सूत्र तथा वृत्ति दोनों भागोंका निर्माता मम्मटको ही सिद्ध किया है। 'काव्यप्रकाश' के सूत्र- भागको भरतमुनिकृत माननेवाले लोग अपने पक्षके समर्थनमें प्रायः तीन युक्तियाँ देते हैं। उनकी पहिली युक्ति यह है कि 'काव्यप्रकाश' में रसनिरूपणके विषयमें जो सूत्र आये हैं वे स्पष्ट रूपसे भरतमुनिके सूत्र हैं। 'विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः' यह स्पष्ट ही भरतसूत्र है। इसके अतिरिक्त 'शृंङ्गार-हास्य-करुण-रौद्र-वीर-भयानकाः' इत्यादि सूत्रसंख्या ४४, जिसमें कि रसोंके नाम गिनाये गये हैं, 'रतिर्हासिश्च शोकश्र' इत्यादि सूत्रसंख्या ४५, जिसमें स्थायिभावोंके नाम दिये गये हैं और 'निर्वेदग्लानिशङ्गा' इत्यादि सूत्रसंख्या ४६, जिसमें व्यभिचारिभावोंके नामोंका निर्देश किया गया है ये सब भरतमुनिके सूत्र हैं। ये तीनों सूत्र भरतनाटय- शास्त्रके छठे अध्यायमें क्रमशः १४, १७ तथा २१ संख्यावाले हैं।
भेदवादियोंकी दूसरी युक्ति यह है कि 'काव्यप्रकाश'की प्रथम कारिकाकी वृत्ति आरम्भ करते समय ग्रन्थकारने -- 'ग्रन्थारम्भे विध्नविघाताय समुचितेष्टदेवतां ग्रन्थकृत् परामृशति' यह प्रथमपुरुषका प्रयोग किया है। इससे प्रतीत होता है कि ग्रन्थकार मम्मट जिस कारिकाकी व्याख्या करने जा रहे हैं उसका बनानेवाला उनसे भिन्न कोई दूसरा व्यक्ति है। तभी उसके लिए 'परामृशति' इस प्रथमपुरुषका प्रयोग बनता है। अन्यथा यदि वे अपनी बनायी कारिकाओंकी स्वयं ही व्याख्या लिख रहे होते तो इस प्रकार प्रथमपुरुषका प्रयोग न करके उत्तमपुरुषका प्रयोग करते। ऐसा नहीं किया है। इससे यही सिद्ध होता है कि कारिकाकार भरतमुनि ही हैं। तीसरी युक्ति यह है कि दशम उल्लासमें रूपकके निरूपणमें 'समस्तवस्तुविषयं भौता आरोपिता यदा' यह सूत्र [संख्या १३६ ] आया है। इस सूत्रकी व्याख्यामें मम्मटने लिखा है -- 'बहुवचनमविवक्षितम्' अर्थात् बहुवचनके स्थानपर द्विवचन भी हो सकता है। भेदवादियोंका कहना है कि यदि कारिकाभागके निर्माता मम्मट स्वयं ही होते तो पहिले सूत्रभागमें 'आरोपिताः' इस बहुचनका प्रयोग करके फिर स्वयं उसकी व्याख्यामें 'बहुवचनमविवक्षितम्' ऐसा लिखनेकी क्या आवश्यकता थी। वे कारिकामें स्वयं ही
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भूमिका छ६
'श्रौतावारोपितौ यदा' पाठ रख सकते थे। पर क्योंकि सूत्रभाग मम्मटका बनाया हुआ नहीं है, भरतका बनाया हुआ है, इसलिए उसकी व्याख्यामें 'बहुवचनमविवक्षितम्' लिखा जाना सङ्गत हो सकता है। भेदवादीकी युक्तियोंका खण्डन इस प्रकार इन तीन युक्तियोंके आधारपर भेदवादी 'काव्यप्रकाश' के सूत्रोंको भरतमुनिकी रचना बताते हैं और काव्यप्रकाशकारको केवल उन सूत्रोंपर वृत्ति लिखनेवाला मानते हैं। किन्तु यदि इन युक्तियोंपर विचार किया जाय तो ये तीनों युक्तियाँ एकदम थोथी और निस्सार प्रतीत होती हैं। पहिली युक्तिमें भरतमुनिके तीन ऐसे सूत्र प्रस्तुत किये गये हैं जो 'काव्यप्रकाश' में ज्योंके त्यों पाये जाते हैं। यह ठीक है। वे तीनों सूत्र भरतमुनिके बनाये हुए हैं। उनको काव्यप्रकाशकारने ज्योंका त्यों अपने ग्रन्थमें उद्धुत कर दिया है। पर उससे सारे सूत्रोंके भरतनिमित होनेकी पुष्टि कैसे हो सकती है ? जैसे यह स्पष्ट है कि ये तीन सूत्र भरतके 'नाटयशास्त्र' में पाये जाते हैं ऐसे ही यह भी स्पष्ट है कि 'काव्यप्रकाश' के शेष सूत्रोंमेंसे कोई भी सूत्र भरतनाटयशास्त्रमें नहीं पाया जाता है। तब उनका निर्माता भरतको कैसे माना जा सकता है ? भरतने नाटयशास्त्रको छोड़कर कोई और ग्रन्थ बनाया हो उसमें शेष सूत्र आये हों यह बात एकदम क्लिष्ट कल्पनामात्र है। भरतमुनिका कोई दूसरा ग्रन्थ न मिलता है और न उसका कहीं उल्लेख ही किसी ग्रन्थमें पाया जाता है। अतः यह निश्रयं है कि इन तीन सूत्रोंके अतिरिक्त और कोई सूत्र भरत निर्मित नहीं है। शेष सब सूत्र काव्यप्रकाश-कारके स्वनिरमित सूत्र हैं और उन स्वनिमित सूत्रोंपर मम्मटाचार्यने स्वयं ही वृत्ति भी लिखी है। प्रथम युक्तिके समान दूसरी युक्ति भी एकदम निस्सार है। उसमें 'काव्यप्रकाश' के आरम्भ- में आये हुए 'समुचितेष्टदेवतां ग्रन्थकृत् परामृशति' इस प्रथमपुरुषके प्रयोगके आधारपर सूत्रभागको व्याख्याकारसे भिन्नकी कृति ठहरानेका यत्न किया गया है, किन्तु यह तो युक्ति देनेवालेके अज्ञानका ही परिचायक है। ग्रन्थोंमें इस प्रकारके अवसरोंपर अपने लिए प्रथमपुरुषके प्रयोगकी शैली तो संस्कृत- साहित्यकी बहु-समादृत और बहु-प्रचलित सामान्य शैली है। अधिकांश लोग ऐसे अवसरोंपर प्रथम पुरुषका प्रयोग करते हैं। उदाहरणके लिए, विश्वनाथने भी 'साहित्यदर्पण'-के आरम्भमें इसी प्रकार 'वाग्देवतायाः साम्मुख्यमाधत्ते' लिखा है। 'नागेशः कुरुते सुधीः' में नागेशने भी अपने लिए 'कुरुते' इस प्रथमपुरुषका प्रयोग किया है। यह संस्कृत-साहित्यके ग्रन्थकारोंकी सामान्य प्रवृत्ति है। वे कदाचित् अपनी निरभिमानिताके सूचनार्थ उत्तमपुरुषका प्रयोग बचाना चाहते हैं इसलिए ऐसे स्थलोंपर प्रथम- पुरुषका प्रयोग करते हैं। इसी दृष्टिसे मम्मटाचार्यने भी स्वयं अपनी लिखी हुई कारिकाकी वृत्ति लिखते समय उसमें 'ग्रन्थकृत परामृशति' यह प्रथम-पुरुषका प्रयोग किया है। उसके आधारपर कारिका और वृत्तिको भिन्न निर्माताओंकी कृति माननेका प्रयत्न अनुचित एवं उपहासास्पद है। इसी प्रकार कारिकाकार तथा वृत्तिकारको भिन्न सिद्ध करनेके लिए जो तीसरी युक्ति प्रस्तुत की गयी है वह भी असङ्गत और उपहासास्पद है।' 'समस्तवस्तुविषयं श्रौता आरोपिता यदा' समस्तवस्तु- विषयरूपकके इस लक्षणकी वृत्तिमें 'बहुत्वमविवक्षितम्' यह जो वृत्तिकारने लिख दिया है इससे भेदवादी यह परिणाम निकालना चाहते हैं कि यह मूल कारिका तथा वृत्ति अलग-अलग व्यक्तियोंकी लिखी हुई है, क्योंकि यदि एक ही व्यक्तिकी लिखी हुई होती तो वृत्तिमें 'बहुत्वमविवक्षितम्' लिखनेके बजाय ग्रन्थकार स्वयं मूल कारिकामें ही बहुवचन या एकवचन जो विवक्षित हो उसका प्रयोग कर सकते थे। पहले मूल सूत्रमें बहुवचनका प्रयोग करके स्वयं ही फिर 'बहुत्वमविवक्षितम्' उसी वृत्तिकारके लिए शोभा
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नहीं देता है; 'प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम्'। इससे यह सिद्ध होता है कि मूल सूत्र भरतमुनिका बनाया हुआ है। उसमें बहुवचनका प्रयोग किया गया है। उसकी दृत्ति मम्मटाचार्यकी लिखी है इसलिए उन्होंने इसमें बहुत्वमविवक्षितम्' लिखा है। यह भेदवादीका युक्तिकम है। किन्तु जान पड़ता है कि वह प्रकृत प्रसङ्गको बिलकुल ही नहीं समझ सका है इसीलिए ऐसी बात कह रहा है। यहाँ ग्रन्थकारने रूपकके समस्तवस्तुविषयरूपक और एकदेशविवर्तिरूपक ये दो भेद किये हैं। रूपकमें किसी एक वस्तुके ऊपर दूसरेका आरोप किया जाता है। जैसे मुखके ऊपर चन्द्रका आरोप करके मुखचन्द्र रूपकका उदाहरण हो जाता है। यह आरोप कहीं एक ही होता है, कहीं दो-तीन-चार भी हो सकते हैं। जैसे यहाँ पृष्ठ ४६४ पर समस्तवस्तुविषयरूपकका जो उदाहरण दिया है उसमें 'रात्रिकापालिकी' में रात्रिके ऊपर कापालिकी होनेका आरोप किया है। रात्रिके इस कापालिकीत्वके उपपादनके लिए रात्रिकी ज्योत्स्नापर कापालिकीकी भस्मका, तारोंके ऊपर कापालिकीकी अस्थियोंका, चन्द्रमाके ऊपर कपालका और चन्द्रमाके कलडूके ऊपर सिद्धाञ्जनका आरोप किया है। इस प्रकार इसमें अनेक आरोप किये गये हैं। समस्तवस्तुविषयरूपकके लिए यह आवश्यक है कि उसमें दो या दोसे अधिक आरोप होने चाहिये और वे सब 'श्रौत' अर्थात् शब्दतः उपात्त होने चाहिये। दो आरोपोंके शब्दतः उप्रात्त होनेपर भी समस्तवस्तुविषयरूपक हो सकता है और तीन, चार आदि अनेक आरोपितोंके भी शब्दतः उपात्त होनेपर समस्तवस्तुविषयरूपक हो सकता है। यह बात ग्रन्थकार कहना चाहते हैं। अब यदि इस स्थलपर मूलमें प्रयुक्त बहुवचनको ज्योंका त्यों माना जाता है तो इसका अर्थ यह होगा कि जब कमसे कम तीन या उससे अधिक आरोपित शब्दोपात्त हों तभी समस्तवस्तुविषयरूपक होगा। यदि किसी स्थलपर केवल दोका ही आरोप किया गया है और वे दोनों शब्दोपात्त हैं तब वहाँ समस्तवस्तुविषयरूपक नहीं माना जा सकेगा। इस दोषको बचानेके लिए वृत्ति- कारको यहाँ 'बहुत्वमविवक्षितम्' लिखना पड़ा है। इसी प्रकार यदि मूल कारिकामें बहुवचनको हटाकर द्विवचनका प्रयोग किया जाता तो भी यही स्थिति उत्पन्न होती। उस दशामें यदि दोसे अधिकका आरोप कहीं किया जाता और वे सब शब्दतः उपात्त होते तो वहाँ समस्तवस्तुविषयरूपक नहीं बन सकता। क्योंकि मूल लक्षणमें द्विवचनके प्रयोगके कारण दो आरोपोंके स्थलपर ही वह लक्षण घट सकता था। दोसे अधिक आरोपितोंके विषयमें वह लक्षण नहीं घट सकता। तब इस दोषके परिहारके लिए उस अवस्थामें वृत्तिकारको 'द्वित्वमविवक्षितम्' लिखना पड़ता। मूल कारिकामें यदि बहुवचनका प्रयोग किया है तो वृत्तिमें 'बहुत्वमदिवक्षितम्'का लिखना अनिवार्य है और यदि मूलमें द्विवचनका प्रयोग किया जाता तो वृत्िमें 'द्वित्वमविवक्षितम्' लिखना अनिवार्य हो जाता। इसलिए मूलकारको स्वयं ही द्विवचन या बहुवचन लिखकर फिर उसको अविवक्षित मानना इस स्थलपर सर्वथा अनिवार्य है। भेदवादियोंने इस रहस्यको न समझ सकनेके कारण ही 'बहुत्वमविवक्षितम्'के आधारपर कारिकाकार तथा वृत्तिकारको भिन्न-भिन्न व्यक्ति सिद्ध करनेका यह जो प्रयास किया है वह उनके अधिवेकको ही सूचित करता है। अभेदसमर्थक युक्तियाँ यह तो भेदवादियों द्वारा प्रस्तुत की गयी युक्तियोंका खण्डन हुआ। इसके अतिरिक्त कुछ युक्तियाँ ऐसी भी प्रस्तुत की जा सकती हैं जिनके आधारपर यह सिद्ध होता है कि वृत्ति तथा मूलकारिकाओं- के निर्माता एक हैं। इनमें सबसे पहिले कारिका तथा वृत्ति दोनोंके निर्माता मम्मटाचार्य ही हैं इस बातके समर्थनके लिए निम्नाङ्गित तीन युक्तियाँ प्रस्तुत की जा सकती हैं --
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भूमिका ७१
१. 'काव्यप्रकाश' की मूल कारिकाओंके आरम्भमें तो मङ्गलाचरण किया गया है, किन्तु वृत्ति- भागके आरम्भमें कोई मङ्गलाचरण नहीं किया गया है। यदि मम्मट केवल वृत्तिभागके ही निर्माता होते तो वे अपने वृत्तिग्रन्थके आरम्भमें मङ्गलाचरण अवश्य करते। मूलके आरम्भमें जो मङ्गलाचरण है उसीको वृत्तिभागका मङ्गलाचरण माननेका अभिप्राय यह है कि ये दोनों भाग मम्मटाचार्यके ही बनाये हुए हैं। २. जहाँ कहीं मम्मटाचार्यने भरतमुनिकी कारिकाओं या सूत्रोंको उद्धृत किया है वहाँ 'तदुक भरतेन' लिखकर उस विशेष सूत्र या कारिकाके साथ भरतमुनिका नाम जोड़कर ही उद्धुत किया है। यदि सारी ही कारिकाएँ भरतमुनिकी बनायी हुई होतीं तो फिर दो-तीन विशेष स्थलोंपर ही 'तदुक्तं भरतेन'- का प्रयोग क्यों किया जाता। इस प्रयोगसे सिद्ध होता है कि केवल वे कारिकाएँ या सूत्र जिनके साथ 'तदुक्तं भरतेन' लिखा गया है, भरतमुनिके बनाये हुए हैं, शेष सब मम्मटाचार्यके स्वयं बनाये हुए सूत्र या कारिकाएँ हैं। ३. 'काव्यप्रकाश' के कारिका तथा वृत्तिभाग दोनों ही मम्मटाचार्यके ही बनाय हुए हैं इस बातको सिद्ध करनेके लिए तीसरी युक्ति यह है कि रूपकके प्रसङ्गमें-
'साङ्गमेतन्निरङ्गन्तु शुद्धं, माला तु पूर्ववत्।' लिखकर पूर्वकथित 'मालोपमा' के समान 'मालारूपक' भी हो सकता है यह बात ग्रन्थकारने 'माला तु पूर्ववत्' इस कारिकाभागसे कही है। यदि कारिकाभाग भरतमुनिका बनाया हुआ है तो यहाँ कारिका- भागमें 'माला तु पूर्ववत्' लिखकर जिस मालोपमाका सङ्गत किया गया है वह मालोपमा भी भरतमुनि- विरचित कारिकामें ही निर्दिष्ट होनी चाहिये किन्तु 'काव्यप्रकाशमें मालोपमाका जो उल्लेख किया गया है वह कारिकाभागमें नहीं किन्तु वृत्तिभागमें किया गया है (पृ० ४६६) । पहिले वृत्तिभागमें जिस मालोपमाका उल्लेख किया गया है उसीको यहाँ कारिकाभागमें 'माला तु पूर्ववत्' लिखकर निर्दिष्ट किया गया है। इससे यह बात स्पष्टरूपसे सिद्ध होती है कि 'काव्यप्रकाश' के कारिकाभाग और वृत्तिभाग दोनोंके निर्माता स्वयं ममम्टाचार्य ही हैं। इसलिए जो लोग कारिकाभागको भरतमुनिकृत मानते हैं और मम्मटाचार्यको केवल वृत्तिभागका ही निर्माता मानते हैं उनका मत युक्तिसङ्गत नहीं है।
मम्मटके टीकाकार मम्मटका 'काव्यप्रकाश' संस्कृत-साहित्यके विद्वानोंका अत्यन्त प्रेमभाजन रहा है। इसलिए इसके ऊपर टीका लिखनेवाले विद्वानोंकी संख्या बहुत बड़ी है। 'भगवद्गीता' एक अत्यन्त प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय धार्मिक ग्रन्थ है। इसलिए भारतीय साहित्यमें सबसे अधिक टीकाएँ 'भगवद्गीता'के ऊपर लिखी गयी हैं। 'भगवद्गीता' के बाद जिस ग्रन्थपर सबसे अधिक टीकाएँ लिखी गयीं वह ग्रन्थ मम्मटाचार्य- का 'काव्यप्रकाश' है। 'काव्यप्रकाश'पर अबतक लगभग ७५ टीकाएँ संस्कृतमें ही लिखी जा चुकी हैं। वर्तमान प्रस्तुत टीकाको मिलाकर हिन्दीमें भी तीन टीकाएँ लिखी जा चुकी हैं। अंग्रेजी भाषामें भी उसका अनुवाद हो चुका है। इतनी अधिक टीकाओंका होना जहाँ एक ओर ग्रन्थकी लोकप्रियताका परिचायक है वहाँ उसकी क्लिष्टता और दुरूहताका भी द्योतक है। किसी ग्रन्थकी लोकप्रियता तो उसके गौरवका कारण हो सकती है किन्तु उसकी दुरूहता और क्लिष्टता ग्रन्थकारके गौरवको बढ़ानेवाली नहीं हो सकती है। 'काव्यप्रकांश'के विषयमें प्रसिद्ध है कि उसकी टीकाएँ घर-घरमें विद्यमान हैं किन्तु ग्रन्थ आज भी वैसा ही दुरूह बना हुआ है-
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७२ काव्यप्रकाश:
कीड ीT 'काव्यप्रकाशस्य कृता गृहे गृहे, टीकास्तथाप्येष तथव दुर्गमः।' यह उक्ति काव्यप्रकाशके गौरवको बढ़ानेवाली नहीं है। ग्रन्थकारका कौशल तो इसमें है कि जो बात वह कहना चाहता है वह पढ़ने और सुननेवालोंको एकदम हस्तामलकवत् स्पष्ट हो जाय। 'काव्यप्रकाश'की टीकाओंमें सबसे प्राचीन टीका माणिक्यचन्द्रकृत 'सङ्गेत' टीका है। इसका रचनाकाल विकम संवत् १२१६ तदनुसार ११६० ई० है। माणिक्यचन्द्र गुजराती जैन विद्वान् थे। उन्होंने 'सङ्गत' टीकाके अन्तमें उसके लिखनेका समय निम्नलिखित प्रकार दिया है- 'रसववत्रग्रहाधीशवत्सरे (१२१६) मासि माधवे । काव्ये काव्यप्रकाशस्य सङ्गतोऽयं समथितः ।।' कर्णाटक जनपदके बीजापुर प्रान्तमें स्थित झलकी ग्रामके निवासी महाराष्ट्र ब्राह्मण वामनाचार्य शर्माने पुण्यपत्तनकी प्रधान पाठशालामें अध्यापन करते हुए सं० १८०४ तदनुसार सन् १७४७ ई० में 'बालबोधिनी' नामकी 'काव्यप्रकाशकी बड़ी सुन्दर टीका लिखी है। इसके आरम्भमें उन्होंने 'काव्यप्रकाश' की ४८ टीकाओं और उनके निर्माताओंके नाम गिनाये हैं। ये नाम उन्होने पद्यबद्ध रूपमें दिये हैं। हम उनके नामोंकी सूची निम्नलिखित प्रकार दे रहे हैं -- १. माणिक्यचन्द्रकृत 'सङ्गेत' टीका : रचनाकाल सं० १२१६, सन् ११६० ई० । २. सरस्वती- तीर्थकृत 'बालचित्तानुरज्जिनी' टीका : रचनाकाल सं० १२६८, सन् १२४२। ३. जयन्तभट्टकृत 'दीपिका' टीका : रचनाकाल सं० १३५०, सन् १२६३। ४. सोमेश्वरकृत 'काव्यादर्श' टीका, इसका दूसरा नाम 'सङ्गत' भी है। ५. विश्वनाथकृत 'दर्पण' टीका। ६. परमानन्द भट्टाचार्यकृत 'विस्ता- रिका' टीका। ७. आनन्दकविनिरमित 'निदर्शना' टीका। ८. श्रीवत्सलाञ्छनकृत 'सारबोधिनी' टीका। ६. महेश्वरकृत 'आदर्श' टीका। १०. कमलाकरभट्टनिर्मित 'विस्तृता' टीका। ११. नरसिंह- कृत 'नर्रासहमनीषा' टीका। १२. भीमसेनकृत 'सुधासागर' टीका। १३. महेशचन्द्रविरचित 'तात्पर्य विवृति' टीका। १४. गोविन्दनिमित 'प्रदीपच्छाया' व्याख्या। १५. नागेशभट्टकृत 'लघ्वी' टीका तथा नागेशभट्टकृत 'बृहती' टीका। १७. वैद्यनाथकृत प्रदीपकी 'उद्योत' नामक टीका, १८. वैद्यनाथ- निर्मित 'प्रभा' टीका तथा १६. वैद्यनाथ द्वारा निर्मित 'उदाहरणचन्द्रिका' टीका। २०. राघव-विनिमित 'अवचूरि' टीका। २१. श्रीधरकृत टीका। २२. चण्डीदासकृत टीका। २३. देवनाथकृत टीका। २४. भास्करकृत 'साहित्यदीपिका' टीका। २५. सुबुद्धिमिश्रकृत टीका। २६. पद्मनाभकृत टीका। २७. मिथिलेशके मन्त्री अच्युतकृत टीका। २८. अच्युत्तपुत्र रत्नपाणि द्वारा निर्मित टीका। २६. भट्टाचार्यकृत 'काव्यदर्पण' टीका। ३०. भट्टाचार्यके पुत्र रविकृत 'मधुमती' टीका। ३१. 'तत्त्वबोधिनी' टीकाके निर्माताके नामका पता नहीं चलता है। ३२. इसी प्रकार 'कौमुदी' टीकाके निर्माताका नाम विदित नहीं। ३३. 'आलोक' टीका। ३४.रुचककृत 'सङ्केत' टीका। ३५. जयराम- कृत 'प्रकाशतिलक' टोका। ३६. यशोधरकृत टीका। ३७. विद्यासागरनिर्मित टीका। ३८. मुरा- रिमिश्रकृत टीका। ३६. मणिसारकृत टीका। ४०. पक्षधरकृत टीका। ४१. सूरिकृत 'रहस्यप्रकाश' टीका। ४२. रामनाथकृत 'रहस्यप्रकाश' टीका। ४३. जगदीशकृत टीका। ४४. गदाधरकृत- टीका। ४५. भास्करविनिरमित 'रहस्यनिबन्ध' टीका। ४६. रामकृष्णनिमित 'काव्यप्रकाश- भावार्थ' टीका। ४७. वाचस्पतिमिश्र-विरचित टीका। ४८. झलकीकर वामनाचार्यकृत 'बालबोधिनी' टोका।
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भूमिका ७३
इन उपरिनिर्दिष्ट ४८ टीकाओंमें सबसे प्राचीन माणिक्यचन्द्रकृत टीका सन् ११६० ई० में लिखी गयी थी और सबसे नवीन टीका 'बालबोधिनी' सन् १७४७ ई० में लिखी गयी थी, अर्थात् लगभग ५०० वर्षोंमें 'काव्यप्रकाश' के ऊपर ५० के लगभग टीकाएँ लिखी जा चुकी थीं। इसका अर्थ यह हुआ कि औसतन प्रति दस वर्षमें 'काव्यप्रकाश' पर एक नयी टीका लिखी जाती रही है। बालबोधिनी- कार वामनाचार्य झलकीकरके बाद विगत २५० वर्षोंमें भी कुछ टीकाएँ लिखी गयी हैं। संस्कृत टीकाओंके अतिरिक्त इधर हिन्दीमें भी 'काव्यप्रकाश' के ऊपर टीकाओंकी रचनाका क्रम प्रारम्भ हो गया है। इस क्रममें प्रस्तुत यह 'काव्यप्रकाश-दीपिका' तीसरी टीका है। इसके पूर्व हरि- मङ्गलमिश्र तथा डॉ० सत्यव्रतसिंह द्वारा निर्मित दो हिन्दी टीकाएँ पहिले प्रकाशित हो चुकी हैं। यह 'काव्यप्रकाश-दीपिका' तीसरी हिन्दी टीकाके रूपमें प्रकाशित हो रही है। यह तो अभी हिन्दीवालोंका 'काव्यप्रकाश' के प्रति प्रेमका आरम्भ है; आगे देखिये, कितनी टीकाएँ लिखी जाती हैं। मम्मटका मूल्याङून वागदेवतावतार मम्मट और उनके ग्रन्थ 'काव्यप्रकाश'ने अलङ्ारशास्त्रके क्षेत्रमें बड़ा गौरव तथा आदर प्राप्त किया है। उस गौरवका कारण ग्रन्थकी अपनी विशेषताएँ हैं। 'काव्यप्रकाश'की सबसे बड़ी विशेषता, जिसके कारण उसको इतना अधिक गौरव प्राप्त हुआ और उसका इतना अधिक प्रचार हो सका, उसकी सूत्रशैली और विषय-बाहुल्य है। मम्मटने 'काव्यप्रकाश' में संक्षेपमें काव्यशास्त्रसे सम्बन्ध रखनेवाले सारे विषयोंका प्रतिपादन बड़े सुन्दररूपमें कर दिया है। भरतमुनिसे लेकर भोज- राजतक लगभग १२०० वर्षोंमें अलङ्कारशास्त्रके विषयमें जिस विशाल साहित्यका निर्माण हुआ उसका दिग्दर्शन हम ऊपर करा चुके हैं। मम्मटने इस सारे विशाल साहित्यका मन्थन कर उसका सारभूत जो 'नवनीत' प्राप्त किया वह 'काव्यप्रकाश' है। अलङ्गारशास्त्रकी दृष्टिसे भरतके नाटयशास्त्रका नवनीत है रससिद्धान्त। भरतमुनिका रससूत्र और उसपर गत १२०० वर्षोंमें जो कुछ ऊहापोह हुआ है उस सबका सार 'काव्यप्रकाश' में सुन्दररूपमें उपस्थित है। भामहका 'शब्दाथौ' सहितौ काव्यम्'वाला क्राव्यलक्षण और अधिक निर्दुष्ट, और अधिक सगुण, और अधिक अलङकृत, और परिमाजित होकर 'तददोषौ शब्दारथौं सगुणावनलङकृती पुनः क्वापि'के रूपमें 'काव्यप्रकाश' में मौजूद है। गत १२०० वर्षोंमें किये गये काव्यलक्षणोंका सार मम्मटने अपने इस काव्यलक्षणके भीतर समाविष्ट कर दिया है। भामह और दण्डीने न शब्दशक्तियोंका विवेचन किया है, न रस और ध्वनिका। इसलिए वे आजके अलङ्कारशास्त्र- की आवश्यकताओंकी पूर्ति नहीं करते और विषयप्रतिपादनकी दृष्टिसे अपूर्ण हैं। मम्मटने भामह और दण्डीकी इस कमीको समझा और 'काव्यप्रकाश' में इन विषयोंका समावेश करके उस कमीको दूर करनेका यत्न किया। उ्दट तो 'अलङ्कारसारसंग्रह' में ही रम गये हैं। गिने-चुने ४१ अलङ्गारोंके निरूपणके अतिरिक्त उनके पास काव्यशास्त्रका और कोई तत्त्व नहीं है। वामन रीतिपर रीझ रहे हैं। उन्होंने यद्यपि गुण, दोष और अलङ्गारोंका भी वर्णन किया है, किन्तु काव्यके आत्मभूत रसकी नितान्त उपेक्षा कर दी है और रीतिको असाधारण गौरव प्रदान कर दिया है। वे साहित्यिक तत्त्वोंका यथार्थ मूल्याङ्कन नहीं कर सके हैं। मम्मटने रीति, गुण, दोष और अलङ्कार सबका यथार्थ मूल्याङ्गन किया है और सबको अपनी योग्यताके अनुरूप स्थान दिया है। यह उनकी बड़ी विशेषता है। वामनके बाद रुद्रट आते हैं, पर वे भी काव्यलक्षण, शब्दालड्कार और अर्थालङ्गारके विवेचनमें लगे हुए हैं। दस प्रकारके रस और नायक-नायिकाभेदका वर्णन इन्होंने अवश्य किया है किन्तु उसके बाद भी साहित्यशास्त्रके अनेक अङ्ग छूट जाते हैं; शब्दशक्ति, ध्वनि आदिके विवेचनके बिना साहित्यिक ग्रन्थ पूर्ण नहीं कहा जा
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७४ काव्यप्रकाश: सकता। रुद्रटके बाद आनन्दवर्धन आते हैं। आनन्दवर्धन सचमुच ही आनन्दवर्धन हैं। उन्होंने ध्वनि- तत्त्वका ऐसा विशद और प्राञ्जल विवेचन उपस्थित किया है कि सहृदयोंका हृदय आनन्दोल्लाससे परिपूर्ण हो उठता है। पर अकेली मिठाईसे ही तो काम नहीं चलता। भगवान्ने तो मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कषाय और तिक्त षड्रस बनाये हैं। उन सबकी विविधता आस्वादविशेषको उत्पन्न करती है। आनन्दवर्धनमें वह विविधता कहाँ है ? उनका तो सब-कुछ ध्वनिपर केन्द्रित हो रहा है। इसलिए वे भी साहित्यशास्त्रका समग्र चित्र अपने 'ध्वन्यालोक'में प्रस्तुत नहीं कर सके हैं। काव्यप्रकाशकारने तो 'ध्वन्यालोक' का सारा तत्त्वांश बड़े सुन्दर रूपमें अपने ग्रन्थमें उपस्थित कर दिया है। या यों कहिये कि मम्मटने आनन्दवर्धनको पुनः प्राणदान किया है अन्यथा ध्वनिविरोधी भट्टनायक और महिमभट्टने मिलकर उनके ध्वनिसिद्धान्तको कुचल ही डाला था। यह तो मम्मटका ही सामर्थ्य था कि इस उग्र सङ्गर्षके बीचसे वे ध्वनिसिद्धान्तको बचा कर निकाल लाये हैं और अब वह सिद्धान्त 'ध्वन्यालोक' से भी अधिक सुन्दर रूपमें और अधिक पुष्ट आधारपर 'काव्यप्रकाश' में उपस्थित है। इसीलिए मम्मटाचार्यको 'ध्वनिप्रस्थापनपरमाचार्य' कहा जाता है। आनन्दवर्धनके बाद अभिनवगुप्त आते हैं। वे बड़े उ्ट विद्वान् और प्रौढ़ लेखक थे। 'धवन्या- लोकलोचन' और 'अभिनवभारती' दोनों साहित्यशास्त्रके लिए बड़ी देन हैं। परन्तु वे दोनों मिलकर भी साहित्यको पूर्ण नहीं कर रही हैं। काव्यके आवश्यक अङ्ग-दोष और अलङ्गारोंका विवेचन उनमें नहीं है। इसलिए वे अलङ्कारशास्त्रकी दृष्टिसे अपूर्ण और एकदेशी ही कहे जा सकते हैं। 'का अप्रकाश'ने उनकी इस अपूर्णताको पूर्ण किया है। 'लोचन'में अभिनवगुप्तने ध्वनिसिद्धान्तका उद्धार करनेका यत्न किया है और 'अभिनवभारती' में नाट्यशास्त्रका। अलङ्गारशास्त्रकी दृष्टिसे उनका जो सारभूत तत्त्व है वह सब 'काव्यप्रकाश' में उपस्थित है। इसलिए 'काव्यप्रकाश' इनकी अपेक्षा अधिक परिपूर्ण है और साहित्यिक आवश्यकताको अधिक सुन्दरताके साथ शान्त करनेवाला है। इनके बाद राजशेखर आते हैं। यह तो बस 'मुरारेस्तृतीयः पन्थाः' हैं। 'काव्यमीमांसा' साहित्यशास्त्रका विवेचन करनेवाली होनेपर भी अबतककी सारी विचारधारासे बिलकुल भिन्न है। इसलिए उपयोगी होनेपर भी वह अलङ्गारशास्त्रविषयक जिज्ञासाकी निवृत्तिमें प्रायः असमर्थ है। अगले मुकुलभट्ट हैं। इनका 'अभिधावृत्तिमातृका' ग्रन्थ केवल शब्दशक्तिसे सम्बन्ध रखता है। अलड्कारशास्त्रके अन्य अङ्गोंसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। काव्यप्रकाशकार मम्मटने उसकी उपेक्षा नहीं की है। साहित्यशास्त्रके एक आवश्यक भागकी पूर्ति उसके द्वारा होती है इसलिए उसका भी सारांश उन्होंने बड़े सुन्दर रूपमें अपने ग्रन्थमें उपस्थित किया है। कुन्तक, क्षेमेन्द्र और भोजराजके सिद्धान्तोंका भी यथार्थ मूल्याङ्गन कर उनका समुचित रूपमें 'काव्यप्रकाश' में समावेश किया गया है और धवनिविरोधी महिमभट्टको तो खूब मजा चखाया है। उनकी ध्वनिविरोधी युक्तियोंकी ऐसी छोछालेदर की है कि अब वह बिचारा सिकुड़- सिकुड़ाकर अपने 'व्यक्तिविवेक'के भीतर ही समा गया है, उसके बाहर उसका कहीं कोई आदर नहीं है। जिस ध्वनिसिद्धान्तको मिटा डालनेका व्यक्तिविवेककारने सङ्कल्प किया था, मम्मटकी कृपासे वह अब पहलेकी अपेक्षा भी अधिक सुन्दर तथा सुदृढ़ सिद्धान्तके रूपमें उपस्थित है। आचार्य मम्मटकी प्रतिभा, उनकी विशेषता और साहित्यशास्त्रके प्रति की गयी उनकी सेवाका मूल्याङ्गन एक सहस्र वर्षसे भी अधिक लम्बे कालमें फैले हुए साहित्यशास्त्रके सिंहावलोकनके बिना नहीं किया जा सकता है। इसलिए हमने बहुत संक्षेपमें विगत एक सहस्र वर्षोंकी साहित्यिक ऋवृत्तियोंका विश्लेषणकर यह दिखलानेका यत्न किया है कि काव्यप्रकाशने इन एक सहस्र वर्षोंमें साहित्योद्यानमें
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खिले हुए समस्त पुष्पोंका मधुसश्वय करके अपने इस 'काव्यप्रकाश' ग्रन्थका निर्माण किया है। यह उनकी सबसे बड़ी विशेषता है जिसके कारण उनको और उनके ग्रन्थको इतना अधिक आदर प्राप्त हुआ है। 'काव्यप्रकाश में अपने पूर्ववर्ती सारे अलङ्गारशास्त्रियोंके गुणों सारी उत्तम बातोंका एक साथ संग्रह कर दिया गया है और उनमें जो त्ुटियाँ या न्यूनताएँ थीं उनको दूरकर एक सर्वाङ्गपूर्ण साहित्यग्रन्थ उपस्थित करनेका प्रयत्न मम्मटने किया है। इसीलिए 'काव्यप्रकाश' इतना सारगभित, महत्त्वपूर्ण एवं उपादेय ग्रन्थ बन गया है कि उस एक ही ग्रन्थका अध्ययन कर लेनेसे साहित्यशास्त्रका पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए 'काव्यप्रकाश' वस्तुतः एक महती रचना है। किसी भी महती कृतिके लिए श्रम और कला दोनोंकी आवश्यकता होती है। मधुमक्षिका विविध पुष्पोंका मधु सश्चय करके लाती है यह उसका श्रमपक्ष है। पर उसको अपने छत्तेमें किस प्रकार सजाकर, संभालकर रखती है यह उसका कलापक्ष है। मधुमवखीके छत्तेकी रचना उसके मधुसे कम आनन्ददायक नहीं है। मधु रसनाको तृप्त करता है तो छत्ता दृष्टिको। दोनोंका अपना सौन्दर्य है, दोनोंकी अपनी उपयोगिता है और दोनोंकी अपनी कला है। मधुमक्षिकाका यह श्रम और वह कलात्मक प्रवृत्ति दोनों ही सराहना प्राप्त करती हैं। 'काव्यप्रकाश' की मधुमक्षिका-मम्मट-की भी यही स्थिति है। उन्होंने एक सहस्र वर्षके दीर्घकालमें फैले हुए विस्तीर्ण, साहित्योद्यानके सैकड़ों सुन्दर पुष्पोंसे मधुसश्वय करनेमें जो क्रम किया है वह तो प्रशंसनीय है ही, पर उसके साथ ही उसको जिस रूपमें सजाकर 'काव्यप्रकाश' में उपस्थित किया है वह उनकी कलात्मक प्रवृत्तिका परिचायक है। 'काव्यप्रकाश' में दस उल्लास हैं। उनमें प्रतिपाद्य विषय या सश्वित मधुको इस प्रकार सजाकर रखा गया है कि बस देखते ही बनता है। सारा 'काव्यप्रकाश' 'तददोषौ शब्दार्थौ' सगुणावनलङकृती पुनः क्वापि' इस एक सूत्रके ऊपर घूम रहा है। इस सूत्रमें आया हुआ 'तत्' पद काव्यका वाचक है। 'काव्यं यशसेऽर्थकृते' इत्यादि, काव्य- प्रयोजनोंका प्रतिपादन करनेवाली पहली कारिकाके प्रारम्भमें 'काव्यम्' यह संज्ञापद आया है। उसके परामर्शक रूपमें 'तददोषौ शब्दाथौ" में 'तत्' यह सर्वनाम प्रयुक्त हुआ है। इसलिए 'तत्' यह सर्वनाम 'काव्यम्'का ग्राहक है। इसलिए पहिले उल्लासमें काव्यका लक्षण करनेके बाद उसके ध्वनि, गुणीभूतव्यंग्य और चित्रकाव्यरूप तीन भेद भी दिखलाये हैं। इसके बाद 'शब्दाथौ" पदके स्पष्टीकरणके लिए द्वितीय उल्लासमें वाचक, लक्षक, व्यञ्जक तीन प्रकारके शब्द तथा वाच्य, लक्ष्य, व्यङ्गय तीन प्रकारके अर्थोंका वर्णन किया गया है। शब्दमें जो अर्थकी प्रतीति होती है वह शब्दकी शक्ति द्वारा ही होती है इसलिए तीन प्रकारके शब्दोंसे तीन प्रकारके अर्थोंको बोधित करनेवाली अभिधा, लक्षणा और व्यञ्जना तीनों प्रकारकी शब्दशक्तियोंका भी निरूपण इसी उल्लासमें कर दिया है। प्रथम उल्लासमें काव्यके भेदोंका केवल सामान्य वर्णन किया था, उनके स्पष्टीकरणके लिए कुछ विशेष वर्णनकी आवश्यकता थी। अतः चौथे, पाँचवें तथा छठे उल्लासोंमें क्रमशः ध्वनिकाव्य, गुणीभूतव्यङ्ग्यकाव्य और चित्रकाव्यका विशेष वर्णन किया गया है। ध्वनिकाव्यके भीतर रसध्वनिका समावेश या मुख्यता होनेके कारण चौथे उल्लासमें ध्वनिकाव्यके निरूपणके साथ ही इसका निरूपण भी कर दिया गया है। इसके पहिले तीसरे उल्लासमें आर्थो व्यञ्जनाका वर्णन किया है। काव्यप्रकाशकार 'ध्वनिप्रस्थापनपरमाचार्य' कहलाते हैं। उड्ट और महिमभट्टकी उक्तियोंका खण्डन करके ध्वनिसिद्धान्तकी स्थापना करनेमें उनको बड़ा परिश्रम करना पड़ा है। इसलिए ध्वनिका विषय काफी विस्तृत भी हो गया है। द्वितीय उल्लासमें अभिधा और लक्षणाके अतिरिक्त व्यञ्जनाके केवल शाब्दी व्यञ्जनाभेदका निरूपण किया था। इसलिए व्यञ्जनाके दूसरे भेद आर्थी व्यञ्जनाका निरूपण तृतीय उल्लासमें किया गया है और पञ्चम उल्लासमें गुणीभूतव्यङ्गय-
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काव्यके भेदों तथा उदाहरणोंको दिखलानेके बाद फिर व्यञ्जनाकी सिद्धिका यत्न किया गया है। द्वितीय तथा तृतीय उल्लासमें केवल व्यञ्जनाके भेद दिखलाये गये थे और उनके उदाहरण दिये गये थे, अन्य मतोंका खण्डन करके ध्वनिसिद्धान्तकी स्थापनाका प्रयत्न वहाँ नहीं किया गया था। ध्वनि तथा गुणीभूतव्यङ्गय दोनों प्रकारके व्यञ्जनाश्रित काव्यके भेदों तथा उदाहरणोंका निरूपण करनेके बाद उद्ड्ट आदि साहित्यिकों, महिमभट्ट आदि नैयायिकों, मुकुलभट्ट आदि मीमांसकों, वैयाकरणों और वेदान्तियों, सब व्यञ्जना-विरोधी मतोंका खण्डन करके बड़ी विद्वत्ताके साथ व्यञ्जनावृत्तिकी सत्ता पञ्चम उल्लासके अन्तमें विस्तारके साथ सिद्ध की गयी है। इसके बाद काव्यलक्षणमें 'अदोषौ', 'सगुणौ' और 'अनलङकृती पुनः क्वापि' पद व्याख्याके लिए शेष रह जाते हैं। इनकी व्याख्याके लिए ग्रन्थकारने सातसे लेकर दस तक चार उल्लास लिखे हैं। सप्तम उल्लासमें दोषोंका, अष्टम उल्लासमें गुणोंका, उनके साथ ही रीति तथा वृत्तियोंका, नवम तथा दशम दो उल्लासोंमें अलङ्गारोंका वर्णन किया है। नवम उल्लासमें केवल शब्दालङ्कार तथा उभयालङ्गारका और दशम उल्लासमें अर्थालङ्कारोंका वर्णन किया है। इस प्रकार दस उल्लासोंमें ग्रन्थकारने काव्यशास्त्रसे सम्बद्ध सारे विषयको बड़ी सुन्दरताके साथ सजा दिया है। यह 'काव्यप्रकाश' की एक बड़ी विशेषता है जो उसको अन्य सब साहित्यिक ग्रन्थोंकी अपेक्षा उपादेय बनाती है। इस प्रकार 'काव्यप्रकाश' के गौरव और उपादेयताकी वृद्धि करनेवाले और उसे अन्य सबकी अपेक्षा अधिक गौरव एवं आदर प्राप्त करानेवाले कारणोंका संग्रह हम निम्नलिखित पाँच भागोंमें कर सकते हैं- १. काव्यप्रकाशकारने साहित्यशास्त्रके एक सहस्त्र वर्षके समस्त आचार्योंकी कृतियोंका अवगाहन और मनन करके उनके सर्वोत्तम सारभागका संग्रहकर अपने इस ग्रन्थमें उपस्थित करनेका यत्न किया है और अपने उस प्रयत्नमें उन्होंने यथेष्ट सफलता प्राप्त की है। २. पूर्ववर्ती आचार्योंके ग्रन्थोंमें विषयप्रतिपादनकी दृष्टिसे जो न्यूनता या त्रुटियाँ रह गयी थीं उन सबको हृदयङ्गनम करके मम्मटने अपने ग्रन्थमें उन सबको दूर कर विषयकी दृष्टिसे ग्रन्थको सर्वाङ्ग- सुन्दर एवं परिपूर्ण बनानेका यत्न किया है और उस यत्नमें पूर्ण सफलता प्राप्त की है। ३. मम्मटने साहित्यशास्त्रके शक्ति, ध्वनि, रस, गुण, दोष, अलङ्कार आदि समग्र आवश्यक तत्त्वोंका यथार्थ मूल्याङ्न किया है और उसीके अनुसार उनको अपने ग्रन्थमें स्थान दिया है। ४. संक्षिप्त सूत्रशैलीका अवलम्बनकर परिमित शब्दोंमें अधिकसे अधिक विषय देनेका यत्न किया है।
मम्मटके उत्तरवर्ती आचार्य
१९. सागरनन्दी कालकममें मम्मटाचार्यके बाद सागरनन्दीका स्थान आता है। ये काव्यशास्त्रके नहीं अपितु नाटयशास्त्रके आचार्य हैं। मम्मटके पूर्ववर्ती आचार्योंमें १. भरत तथा २. धनञ्जय और उनके भाई ३. धनिक ये तीन नाटयशास्त्रके आचार्य हो चुके हैं। धनञ्जयने ६७४-६६४ ई० के बीच अपने नाटयशास्त्र विषयक प्रसिद्ध ग्रन्थ 'दशरूपक'की रचना की थी। इनके लगभग १०० वर्ष बाद सागरनन्दीने अपने 'नाटकलक्षणरत्नकोश' नामक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थकी रचना की। इनका असली नाम तो केवल
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भूमिका ७७
'सागर' था, किन्तु नन्दी-वंशमें उत्पन्न होनेके कारण ये 'सागरनन्दी' नामसे ही विख्यात हैं। इन्होंने अपने ग्रन्थके अन्तिम श्लोकमें अपने आधारभूत आचार्योंका उल्लेख इस प्रकार किया है- 'श्रीहर्षविकरमनराधिपमातृगुप्त- गर्गाश्मकुट्टनखकुट्टकबादरीणाम्। एषां मतेन भरतस्य मतं विगाह्य, घुष्टं मया समनुगच्छत रत्नकोशम्।। सन् १६२२ में स्व० सिलवाँ लेवीने नेपालमें 'नाटकलक्षणरत्नकोश' नामक ग्रन्थकी पाण्डुलिपि प्राप्तकर और उसके सम्बन्धमें परिचयात्मक विवरण 'जरनल एशियाटिक'में (१६२२, पृष्ठ २१० पर) प्रकाशित कराया। उससे विदित हुआ कि सागरनन्दीने भी नाटयसाहित्यपर एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थकी रचना की है। इसके पूर्व 'नाटकलक्षणरत्नकोश'के कुछ उद्धरण तो विभिन्न ग्रन्थोंमें मिलते थे, किन्तु इनके ग्रन्थका पता नहीं था। उसके बाद श्री एम० डिलनने इस ग्रन्थको सुसम्पादित करके लन्दनसे प्रकाशित करवाया है (१६३७ ई०)। 'नाटकलक्षण' में भरतमनिके अतिरिक्त १. हर्षविकम, २. मातृगुप्त, ३. गर्ग, ४. अश्मकुट्ट, ५. नखकुट्ट, ६. बादरिका भी उल्लेख पाया जाता है। इससे प्रतीत होता है कि सागरनन्दीने भरत सहित सात आचार्योंके आधारपर अपने ग्रन्थकी रचना की है। किन्तु इन सबमें अधिक 'नाट्यशास्त्र' का आश्रय लिया गया है। अनेक स्थानोंपर भरतके श्लोकोंको ज्योंका त्यों उतार दिया गया है। 'दशरूपक' के समान यह ग्रन्थ भी कारिकारूपमें लिखा गया है।
२०. राजानक रुय्यक ऊपरकी पंक्ियोंमें 'काव्यप्रकाश' की टीकाओंके प्रसङ्गमें 'काव्यप्रकाशसङ्गत' टीकाके रचयिताके रूपमें हमने रुय्यकका नाम दिया था। मम्मटके उत्तरवर्ती साहित्या चार्योंमें ये राजानक रुथ्यक प्रमुख आचार्य हैं। इनके नामके साथ जुड़ी हुई 'राजानक' उपाधि इनके कश्मीरी पण्डित होनेका प्रमाण है। कश्मीरके राजाओं द्वारा ही प्रमुख विद्वानोंको 'राजानक'की उपाधि दी जाती थी। राजानक रुथ्यकने 'काव्यप्रकाश'पर टीका लिखी है इसलिए वे ११ वीं शताब्दीके उत्तरार्द्धमें होनेवाले आचार्य मम्मटके पश्चाद्वर्ती हैं यह बात स्पष्ट ही है। दूसरी ओर उन्होंने मङ्ङककविविरचित 'श्रीकण्ठचरित' काव्यसे लिये हुए पाँच पद्योंको उदाहरणरूपमें अपने 'अलङ्गारसर्वस्व' ग्रन्थमें उद्धृत किया है। यह बात भी उनका कालनिर्णय करनेमें सहायक होती है। मङ्क कवि राजानक रुय्यकके शिष्य हैं। उनके 'श्रीकण्ठचरित' का रचनाकाल ११४५ है। इसलिए राजानक रुय्यकका काल ११ वीं शताब्दीका मध्यभाग मानना उचित प्रतीत होता है। रुय्यकविरचित ग्रन्थोंमेंसे १ 'सहृदयलीला', २. 'व्यक्तिविवेवेक' की टीका, तथा ३. 'अलङ्गार- सर्वस्व' केवल ये तीन ग्रन्थ इस समय उपलब्ध हो रहे हैं। इनमेंसे 'सहृदयलीला' स्त्रियोंके प्रसाधन अलङ्कारादिसे सम्बन्ध रखनेवाला एक छोटा-सा काव्यग्रन्थ है। दूसरा ग्रन्थ महिमभट्टके 'व्यक्तिविवेक' की टीकारूपमें लिखा गया है। किन्तु वह भी अधूरा ही मिला है और 'अनन्तशयन ग्रन्थमाला' में प्रकाशित हो चुका है। उनका सबसे प्रमुख ग्रन्थ है 'अलङ्कारसर्वस्व'। अलङ्गारशास्त्रके ऊपर यह बड़ा प्रौढ़ तथा महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। साहित्यशास्त्रके रस, ध्वनि, वक्रोक्ति, रीति आदि जिन सम्प्रदायोंकी चर्चा ऊपर की गयी है उनकी मूल उ्ावना 'अलङ्गारसर्वस्व' और उसकी समुद्रबन्धकृत टीकामें ही की गयी थी। समुद्रबन्धकी टीकामें इन सम्प्रदायोंके विभाजनका वैज्ञानिक विवेचन इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है-
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७८ काव्यप्रका ::
'इह विशिष्टौ शब्दार्थौं काव्यम्। तयोश्च वैशिष्टयं धर्ममुखेन, व्यापारमुखेन, व्यङ्गयमुखेन चेति त्रयः पक्षाः। आद्येडप्यलङ्गारतो गुणतो वेति द्वैविध्यम्। द्वितीये भणितिवैचित्र्येण भोगकृत्वेन चेति द्वैविध्यम्। इति पञ्चसु पक्षेषु आद्यः उद्दटादिभि- रङ्गीकृतः । द्वितीयो वामनेन, तृतीयो वकरोक्तिजीवितकारेण, चतुर्थो भट्टनायकेन, पञचम आनन्दवर्धनेन।' -- समुद्रबन्धकृत अलङकारसर्वस्व-टीका इस विवेचनमें टीकाकार समुद्रबन्धने 'विशिष्ट शब्दार्थ'को काव्य माना है। शब्द और अर्थका वह 'वैशिष्टच' धर्म द्वारा, व्यापार द्वारा तथा व्यङ्गच द्वारा तीन प्रकारसे हो सकता है। इन तीनोंमेंसे भी प्रथम तथा द्वितीय पक्षके फिर दो-दो भेद होकर चार भेद बन जाते हैं। (१) धर्म शब्दसे अलङ्गार तथा गुण इन दो धर्मोंका ग्रहण होता है। इसलिए धर्ममुखसे होनेवाले शब्दार्थके वैशिष्टचके दो पक्ष बन गये-एक अलङ्गार द्वारा शब्दार्थका वैशिष्टय माननेवाला पक्ष और दूसरा गुणों द्वारा शब्दार्थका वैशिष्टय माननेवाला पक्ष। इन्होंको क्रमशः अलङ्गारसम्प्रदाय तथा गुणसम्प्रदाय कहा जा सकता है। इनमेंसे अलङ्गारपक्षके पोषक भट्टोन्दूट आदि हैं और गुणपक्षके णोषक वामनादि है। यह टीकाकारका मत है। हम ऊपर दिखला चुके हैं कि गुणसम्प्रदायका दूसरा नाम 'रीतिसम्प्रदाय' भी है। इस रीति सम्प्रदायके प्रवर्तक वामन हैं। (२) व्यापारमुखेन शब्दार्थका वैशिष्टय माननेवाले मतके दो भेद बन जाते हैं-एक भणितिवचित्यकृत भेद और दूसरा भोगकृत्त्व भोजकत्वव्यापार द्वारा होनेवाला वैचित्य। इनमेंसे प्रथम अर्थात् 'भणितिवैचित्यकृत' भेदको ही वकरोक्तिसम्प्रदाय कहते हैं। उसके प्रवर्तक वकरोक्ति- जीवितकार कुन्तक हैं। दूसरा पक्ष भोजकत्वव्यापारके द्वारा शब्दार्थका वैशिष्टय मानता है। इस पक्षको माननेवाले भट्टनायक हैं। भट्टनायकके इस 'भोजकत्व' सिद्धान्तकी चर्चा काव्यप्रकाशकारने रसनिरूपणके प्रसङ्गमें (पृ० १०६ पर) की है। इस सिद्धान्तका सम्बन्ध रससम्प्रदायके साथ है। इन चार पक्षोंके बाद पाँचवाँ पक्ष वह रह जाता है जो (३) व्यङ्गयमुखेन शब्दार्थके वैशिष्टचको मानता है। यही ध्वनि- सम्प्रदाय है और इसके प्रतिष्ठापक आनन्दवर्धन हैं। यह समुद्रबन्धके इस विवेचनका अभिप्राय है। इसमें अलङ्कारसम्प्रदायका पोषक भामहके बजाय उनके टीकाकार उन्धटको बताया है और रससम्प्रदायके सम्बन्धमें भरतमुनिका नाम न लेकर उनके टीकाकार भट्टनायकका उल्लेख किया है। इन सम्प्रदायोंके विभाजनका यह सुन्दर एवं वैज्ञानिक विवेचन है। इनको प्रस्तुत करनेका श्रेय अलङ्गारसर्वस्वकार रुथ्यक और उनके टीकाकार समुद्रबन्धको है। रुय्यकके टीकाकारोंमें समुद्रबन्ध १३ वीं शताब्दीके टीकाकार हैं। ये दक्षिणभारतके निवासी हैं। केरलके राजा रविवर्माके राज्यकालमें हुए थे। रविवर्माका जन्मकाल १२६५ ई० माना जाता है। रुथ्यकके दूसरे टीकाकार जयरथ हैं। उन्होंने 'अलङ्गारसर्वस्व'के ऊपर 'विमशशनी' टीका लिखी है। इसके अतिरिक्त अभिनवगुप्तके 'तन्त्रालोक'पर भी जयरथने 'विवेक' नामकी बड़ी विद्वात्तापूर्ण टीका लिखी है। इससे प्रतीत होता है कि अन्य कश्मीरी विद्वानोंके समान जयरथ भी साहित्य एवं दर्शनके प्रौढ़ विद्वान् थे। इनका काल समुद्रबन्धसे कुछ पहले तेरहवीं शताब्दीका आरम्भिक भाग माना जाता है। 'अलङ्गारसर्वस्व' के टीकाकारोंमें एक 'अलक' और दूसरे विद्याधर चक्रवर्तो ये दो टीकाकार और हुए हैं। इनमेंसे 'अलक'के नामका केवल उल्लेखमात्र मिलता है। उनकी टीका उपलब्ध नहीं है।
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भूमिका ७६
विद्याधर चक्वर्तीकी टोकाका नाम 'अलङ्कारसञ्जीवनी' या 'सर्वस्वसञ्जीवनी' है। उन्होंने मम्मटके 'काव्यप्रकाश'पर भी 'सम्प्रदायप्रकाशिनी' टीका लिखी थी। इनका काल चौदहवीं शताब्दीमें माना जाता है। रुय्यकके तीन ग्रन्थोंका उल्लेख हमने ऊपर किया है। ये तीनों ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं। इनके अतिरिक्त (१) 'काव्यप्रकाशसङ्गत', (२) 'अलङ्गारमञ्जरी', (३) 'अलङ्गारानुसारिणी', (४) 'साहित्यमोमांसा', (५) 'नाटकमीमांसा' और (६) 'अलङ्गारवात्तिक' इन ६ ग्रन्थोंका उल्लेख जयरथ- की 'विनशिनी' टीकामें मिलता है।
२१. हेमचन्द्र राजानक रुथ्यकके बाद साहित्यशास्त्रके आचार्योंमें आचार्य हेमचन्द्रका नाम आता है। ये जैनधर्मके अत्यन्त प्रसिद्ध आचार्य हैं। इनका जन्म गुजरातमें अहमदाबाद जिलेके 'धुन्धुक' नामक गाँवमें ११४५ वि० (१०८८ ई०) में और देहावसान ११७२ ई० में हुआ था। इस प्रकार इन्होंने ८४ वर्षकी आयु पायी। इनके अनेक ग्रन्थ हैं। अनहिलपट्टनके चालुक्य राजा सिद्धराज (१०७३- ११४३ ई०) की प्रार्थनापर इन्होंने एक व्याकरणकी रचना की जिसका नाम अपने तथा सिद्धराज दोनोंके नामोंको मिलाकर 'सिद्धहेम' व्याकरण रखा। साहित्यशास्त्रपर इन्होंने 'काव्यानुशासन' नामक प्रसिद्ध ग्न्थकी रचना की। यह ग्रन्थ सूत्रपद्धतिपर लिखा गया है। उसके ऊपर 'विवेक' नामक 'वृत्ति' भी स्व्रयं ग्रन्थकारने लिखी है। ग्रन्थमें आठ अध्याय हैं। इनमें काव्यके लक्षण, प्रयोजनादि, रस, दोष, गुण, ६ प्रकारके शब्दालङ्कार, २६ प्रकारके अर्थालङ्कार आदिका वर्णन किया गया है। यह प्रायः संग्रहग्रन्थ- सा है जिसमें 'काव्यमीमांसा', 'काव्यप्रकाश', 'ध्वन्यालोक', 'अभिनवभारती' आदिसे लम्बे-लम्बे उद्धरण प्रस्तुत किये गये हैं।
२२. रामवन्द्र-गुणचन्द्र आचार्य हेमचन्द्रके बाद उनके प्रमुख शिष्य रामचन्द्र और गुणचन्द्रका स्थान आता है। आचार्य हेमचन्द्रके समान ये दोनों भी जैनधर्मके लब्धप्रतिष्ठ विद्वान् हैं। वैसे रामचन्द्र गुणचन्द्र एक नहीं, दो अलग-अलग व्यक्ति हैं, किन्तु दोनों हेमचन्द्राचार्यके शिष्य हैं। इन दोनोंने मिलकर 'नाटयदर्पण' नामक एक नाटयविषयक ग्रन्थकी रचना की है इसलिए इन दोनोंके नामका उल्लेख प्रायः साथ-साथ ही किया जाता है। गुणचन्द्रका अपना अलगसे कोई और ग्रन्थ नहीं पाया जाता है किन्तु रामचन्द्रके अलग भी बहुत-से ग्रन्थ पाये जाते हैं जो प्रायः नाटक हैं। उन्हें 'प्रबन्धकर्ता' कहा जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि उन्होंने लगभग १६० ग्रन्थोंकी रचना की थी। उनके ११ नाटकोंके उद्धरण 'नाटयदर्पण' ग्रन्थमें पाये जाते हैं। अनेक दुर्लभ नाटकोंके उद्धरण भी इसमें दिये गये हैं जिनमें विशाखदत्तविरचित 'देवीचन्द्र- गुप्त' नाटक भी है। अन्य साहित्यप्रन्थोंके समान 'नाटयदर्पण'की रचना भी कारिकाशैलीमें हुई है। उसपर वृत्ति भी ग्रन्थकारोंने स्वयं ही लिखी है। ग्रन्थमें चार 'विवेक' हैं, जिनमें क्रमशः नाटक, प्रकरणादि रूपक, रस, भावाभिनय तथा रूपक सम्बन्धी अन्य बातोंका विवेचन किया गया है। इन्होंने रसको केवल सुखात्मक न मानकर दुःखात्मक भी माना है। आचार्य हेमचन्द्रके शिष्य होनेके नाते ये गुजरातके सिद्धराज (१०६३-११४३), कुमारपाल (११४३-११७२) तथा अजयपाल (११७२-११७४) तीन राजाओंके समयमें विद्यमान थे। कहते
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८० काव्यप्रकाश: है कि अन्तिम राजा अजयपालने किसी कारणवश क्रुद्ध होकर इन्हें प्राणदण्ड दिलवा दिया था। इनका समय १२वीं शताब्दीमें निश्चित होता है। २२. वाग्भट आचार्य हेमचन्द्रके समयमें गुजरातका अनहिलपट्टन राज्य जैन विद्वानोंका केन्द्र बन गया था। काव्यशास्त्रके अनेक आचार्योंने वहाँ रहकर साहित्यका निर्माण किया था। उसी परम्परामें रामचन्द्र और गुणचन्द्रके बाद वाग्भटका नाम आता है। साहित्यिक क्षेत्रमें वाग्भटका नाम अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। १. 'वाग्भटालड्गार', २. 'काव्यानुशासन', ३. 'नेमिनिर्वाणमहाकाव्य', ४. 'ऋषभदेवचरित', ५. 'छन्दोनुशासन' और आयुर्वेदके प्रसिद्ध ग्रन्थ, ६. 'अष्टाङ्गहृदय' आदि ग्रन्थोंके रचयिता वाग्भट माने जाते हैं। इन सबके रचयिता एक ही व्यक्ति हैं या अलग-अलग व्यक्तियोंने इनकी रचना की है इस विषयमें मतभेद है। कुछ लोग वाग्भट प्रथम और वाग्भट द्वितीय दो वाग्भट हुए हैं ऐसा मानते हैं। उनके मतमें प्रथम वाग्भट केवल 'वाग्भटालङ्गार'के निर्माता हैं और 'काव्यानुशासन', 'ऋषभदेवचरित' तथा 'छन्दोनुशासन' इन तीन ग्रन्थोंको ये लोग दूसरे वाग्भटकी रचना बतलाते हैं। किन्तु 'नेमिनिर्वाण महाकाव्य' तथा आयुर्वेदकी 'अष्टाङ्गहृदयसंहिता' इन दोनोंमेंसे किस वाग्भटकी कृति है इस विषयपर ये लोग कोई प्रकाश नहीं डाल सके हैं। वास्तवमें तो इन सब ग्रन्थोंके रचयिता वाग्भट नामके एक ही व्यक्ति प्रतीत होते हैं। 'वाग्भटालङ्गार' की टीका (४-१४८) में- इदानीं ग्रन्थकार इदमलङ्गारकर्तृ त्वख्यापनाय वाग्भटाभिधस्य महाकवेर्महामा- त्यस्य तन्नाम गाथया एकया निदर्शयति -- ' यह पंक्ति लिखी है। इसमें वाग्भटको 'महाकवि' और अलङ्गारकर्ता' कहा गया है। इससे प्रतीत होता है कि अलङ्गारशास्त्रके 'वाग्भटालङ्गार' तथा 'काव्यानुशासन' ग्रन्थोंके साथ 'नेमिनिर्वाणमहाकाव्य' तथा 'ऋषभदेवचरित' जैसे काव्योंके रचयिता भी यही वाग्भट हैं। उस दशामें 'छन्दोनुशासन' तथा 'अष्टाङ्गहृदयसंहिता' का रचयिता भी इन्हींको मानना उचित प्रतीत होता है। ऊपर दिये हुए उद्धरणमें जहाँ इनको 'महाकवि' कहा गया है उसके साथ ही 'महामात्य' भी बतलाया है। 'वाग्भटालड्गार' के उदाहरणोंमें कर्णदेवके पुत्र अनहिलपट्टनके राजा चालुक्यवंशी राजा जयािंहकी स्तुति निम्नलिखत प्रकार पायी जाती है -- 'जगदात्मकीतिशुभ्रं जनयन्नुमधानदो परिघः। जयति प्रतापपूषा जयसिंह: क्षमाभृदधिनाथः ॥४-४५ अणहिल्लपाटकं पुरमवनिपतिः कर्णदेवनृपसूनुः । श्रीकलशनामधेयः करी च रत्नानि जगतीह ।।४-१३२ इन्द्रेण किं यदि स कर्णनरेन्द्रसूनु:, ऐरावणेन किमहो यदि तद्द्विपेन्द्रः । दम्भोलिनाप्यलमलं यदि तत्प्रताप:, स्वर्गोडप्ययं ननु मुधा यदि तत्पुरी सा।।' इस स्तुतिसे यह प्रतीत होता है कि वाग्भट अनहिलपट्टनके राजा ज्यासंहके महामात्य थे। एक बड़े राज्यके महामात्य, महाकवि और महान् विद्वान् होनेपर भी इनकी जीवनकथा बड़ी करुण है।
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भूमिका ८१
इन्हें अपने इस 'महामात्यत्व'का 'महामूल्य' चुकाना पड़ा है। इनकी एक पुत्री थी, परम सुन्दरी, परम विदुषी और अपने पिताके सदृश कविप्रतिभाशालिनी। जब वह विवाहयोग्य हुई तो उसे बलात् इनसे छीनकर राजप्रासादकी शोभा बढ़ानेके लिए भेज दिया गया। न वाग्भट इसके लिए तैयार थे और न कन्या। पर 'अप्रतिहता राजाज्ञा'के सामने दोनोंको सिर झुकाना पड़ा। बिदाईके समयकी कन्याकी इस उक्तिको जरा देखिये कैसा चमत्कार है, तबीयत फड़क उठती है। राजप्रासादके लिए प्रस्थान करते समय कन्या अपने रोते हुए पिताको सान्त्वना देते हुए कह रही है- 'तात वागभट ! मा रोदी: कर्मणां गतिरीदृशी।' दुष् धातोरिवास्माकं गुणो दोषाय केवलम् ।।' व्याकरणप्रक्रियाके अनुसार दुष् धातुको गुण होकर 'दोष' पद बनता है 'दुष' धातुके 'गुण' का परिणाम 'दोष' है। इसी प्रकार हमारे सौन्दर्य-'गुण' का परिणाम यह अनर्थ है और अत्याचाररूप 'दोष' है। इसलिए हे तात ! आप रोइये नहीं, यह तो हमारे कर्मोंका फल है कि दुष् धातुके समान हमारा गुण भी दोषजनक हो गया। २४. अरिसिंह और अमरचन्द्र जैन आचार्योंकी परम्परामें अगला नाम अरिसिंह-अमरचन्द्रका आता है। जिस प्रकार रामचन्द्र और गुणचन्द्र दोनों एक ही गुरुके शिष्य थे और दोनोंने मिलकर 'नाटयदर्पण' की रचना की थी उसी प्रकार अरिसिंह और अमरचन्द्र दोनों एक ही गुरु जिनदत्त सूरिके शिष्य हैं और उन दोनोंने मिलकर 'काव्यकल्पलता' नामक ग्रन्थकी रचना की है- 'किञ्चिच्च तद्रचितमात्मकृतं च किञ्चिद् व्याख्यास्यते त्वरितकाव्यकृतेऽत्र सूत्रम्।' -- काव्यकल्पलतावृत्ति, पृ० १ अमरससिंहके पिताका नाम लावण्यसिंह था। इन्होंने गुजरातके ढोलकर राज्यके राणा धीर- धवलके मन्त्री और अपने मित्र वस्तुपाल जैनकी स्तुतिमें 'सुहृत्सङ्कीर्तन' नामक काव्य लिखा है। अमरचन्द्रने 'काव्यकल्पलतावृत्ति' में अपने १. 'छन्दोरत्नावली', २. 'फाव्यकल्पलतापरिमल' तथा ३. 'अलङ्कारप्रबोध' इन तीन ग्रन्थोंका उल्लेख किया है : इनके अतिरिक्त इन्होंने 'जिनेन्द्रचरित', जिसका दूसरा नाम 'पद्यानन्द' भी है, की रचना की है। 'काव्यकल्पलतावृत्ति' में अपने पूर्ववर्ती आचार्योंके मार्गको छोड़कर नवीन मार्गका अवलम्वन किया गया है। उसका विषय 'कविशिक्षा' है। उसमें गुण, दोष, अलङ्गार आदिका विवेचन न करके काव्यरचनाके नियमोंका प्रतिपादन किया गया है। कवि बननेके इच्छुक व्यक्ति किस प्रकार अपने लक्ष्यको सरलतासे प्राप्त कर सकते हैं उन्हीं उपायोंका वर्णन इसमें किया गया है। इस ग्रन्थमें चार 'प्रतान' हैं। उनमें १. छन्दःसिद्धि, २. शब्दसिद्धि, ३. श्लेवसिद्धि और ४. अर्थसिद्धिके उपायोंका प्रतिपादन किया गया है।
२५. देवेश्वर अरिसिंह और अमरचन्द्रके बाद उसी १४ वीं शताब्दीमें देवेश्वर नामके एक और जैन विद्वान् हुए हैं। उन्होंने 'कविकल्पलता' नामक ग्रन्थकी रचना की है। पर यह ग्रन्थ पूर्वोक्त 'काव्यकल्पलता'- ६
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=२ काव्यप्रकाश:
की एकदम अनुकृति है। कुछ नामभाजका शैलीभेद करके सारा विषय 'काव्यकल्पलता'का ले लिया गया है। इसलिए इस ग्रन्थका अपना कोई मूल्य नहीं है। २६. जयदेव ग्यारहवीं शताब्दीमें आचार्य हेमचन्द्रसे लेकर चौदहवीं शताब्दीनें देवेश्वरपर्यन्त लगभग २५० वर्षतक जब उधर गुजरातका अनहिलवाड़ा राज्य जैन विद्वानों और साहित्यकारोंका केन्द्र बन रहा था, उसी समय बङ्गदेश ब्राह्मण विद्वानों, कवियों और साहित्यकारोंका केन्द्र बना हुआ था। इस कालमें गुजरातने जहाँ आचार्य हेमचन्द्र जैसे विद्वान और रामचन्द्र जैसे सुकवि उत्पन्न किये उसी प्रकार बङ्गदेशके विद्याकेन्द्रने जयदेव और गोवर्धनाचार्य जैसे सुकवियों और पण्डितोंको प्रस्तुत किया। बङ्गदेशमें वल्लाल- सेनके पुत्र लक्ष्मणसेन ११ वीं शताब्दीमें राज्य करते थे। इन लक्ष्मणसेनकी राजसभामें (१) आर्या- सप्तशतीकार गोवर्धनाचार्य, (२) जयदेव, (३) शरणकवि, (४) उसापति और (५) कविराज ये पाँच प्रमुख समापण्डित थे। राजा लक्ष्मणसेनके सभाभवनके द्वारपर इन 'मभारत्तों के नाम शिलापट्टपर एक श्लोकके रूपमें निम्नलिखित प्रकार अद्कित थे-
'गोवर्धनश्च शरणो जयदेव उमापति: । कविराजश्च रत्नानि समितौ लक्ष्मणस्य तु।' इनमेंसे गोवर्धनाचार्य 'आर्यासप्तशती'के रचयिताके रूपमें अत्वन्त प्रसिद्ध हैं। जयदेव 'चन्द्रालोफ' और 'प्रसन्नराघव' नाटकादि अनेक ग्रन्थोंके रचयिता हैं। 'केविराज' पद कदाचित् धोयी कविके लिए प्रयुक्त हुआ है। जय देवकविने 'गीतागोदिन्द' में अपने सभी साथी कवियोंका उल्लेख इस प्रकार किया है -- 'वाच: पल्लवयत्युमापतिधर: सन्दर्भशुद्धि गिरां जानीते जयदेव एव शरण: श्लाध्यो दुरुहद्रुतेः । शृङ्गारोत्तरसत्प्रमेयरचनैराचार्यगोवर्धन- स्पर्धी कोडपि न विश्रुतः श्रुतिधर: धोयी कविक्ष्मापतिः ॥' -- गीतगोविन्द -- ४
।2हा इसमें जयदेवने उमापति, जयदेव, शरण, गोवर्धनाचार्य और धोयी कविराज सभीका नाम ग्रहण करके उनकी विशेषताओंका वर्णन किया है। जयदेवविरचित ग्रन्थोंमें ६. 'चन्द्रालोक', २. 'प्रसन्नराधव' नाटक और 'गीतगोविन्द' तीन रान्य विशेव प्रसिद्ध हैं। इनमेंसे "गीतगोविन्द' में उन्होंने अपने आध्रयदाता लक्ष्मणसेन तथा अपने सहयोगी पःचरत्ोंका परिचय दिया है। 'चन्द्रालोक' एवं 'प्रसुन्नराघव' नाटकमें अपने माता-पिताका परिचय दिया है। उनके पिताका नाम महादेव और माताका नाम सुमित्रा था। 'चन्द्रालोक' के प्रत्येक 'मयूख'- के अन्तमें- 'महादेव: सत्रप्रमुखविध्येकवतुरः सुमित्रा तः्दुक्तिप्रणहितमतिर्वस्य पितरौ ।' लिखकर अपनी माता सुमिला तथा अपने पिता महादेवके नामका कीर्तन किया है। इसी प्रकार 'प्रसन्न- राघव' नाटककी प्रस्तावनामें भी जयदेवने इन दोनोंका परिचय निम्नलिखित प्रकार दिया है-
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भूमिका ८३
'विलासो यद्वाचामसमरसनिष्यन्दमधुरः कुरङ्गाक्षीबिम्बाधरमधुरभावं गभयति।
कोकम क्िक कवोन्द्र: कौण्डिन्यः स तव जयदेवः श्रवणयो- रयासीदातिथ्यं न किभिह महादेवतनयः ॥ लक्ष्मणस्येव यस्यास्य सुमित्राकुक्षिजन्मनः। रामचन्द्रपदाम्भोज भ्रमद् भुङ्गायते मनः ।' माता-पिताके इस परिचयसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि 'चन्द्रालोक' तथा 'प्रसन्नराघव' नाटकके रचयिता एक ही व्यक्ति हैं।
गीतगोविन्दकार जयदेव 'गोतागोविन्द'के बारहवें सर्गका ११ वाँ श्लोक निम्नलिखित प्रकार पाया जाता है- 'श्रीभोजदेवप्रभवस्य रामा- (धा!)-देवीसुतश्रीजयदेवकस्य । पराशरादिप्रियवर्गकण्ठे श्रीगीतगोविन्दकवित्वमस्तु।।' इस श्लोकमें जयदेवको भोजदेव और रामादेवीका पुत्र कहा है। इस कारण अधिकांश विद्वान् गीतगोविन्दकार जयदेवको 'चन्द्रालोक' तथा 'प्रसन्नराघव' के प्रणेता जयदेवसे भिन्न मानते हैं। इन गीतगोविन्दकार जयदेवके विषयमें श्रीचन्द्रदत्त नामक किसी कविने संस्कृतके 'भक्तमाल' नामक अपने ग्रन्थमें (३६-४१ तीन सर्गोंमें २४१ श्लोकोंमें) विस्तारके साथ परिचय दिया है। किन्तु उसमें इनके माता-पिताके नामका कोई उल्लेख नहीं किया है। उस परिचयमें चन्द्रदतने उत्कलमें जगन्नाथपुरीके पास 'बिन्दुबिल्व' ग्रामको जयदेवकी जन्मभूमि बतलाते हुए लिखा है -- 'जगन्नाथपुरीप्रन्त देशे चैवोत्कलाभिधे। बिन्दुबिल्व इति ख्यातो ग्रामो ब्राह्मणसङ्कुलः ।। तत्रोत्कले द्विजो जातो जयदेव इति श्रुतः' आगे तीन सर्गोंमें जो कुछ वर्णन है वह 'गीतगोविन्द'के माहात्म्यकी प्रदर्शक अनेक भक्तजनोचित कथाओंके रूपमें है। चन्द्रदत्तके इस वर्णन और 'गीतगोविन्द' में दिये हुए माता-पिताके नामोंके भेदसे यह प्रतीत होता है कि गीतगोविन्दकार जयदेव चन्द्रालोककार और प्रसन्नराघवकार जयदेवसे भिन्न हैं। इसी आधारपर अधिकांश विद्वान् दो जयदेव अलग-अलग मानते हैं। किन्तु हमारे विचारमें यह स्थिति यथार्थ नहीं है। चन्द्रालोककार जयदेवको गीतगोविन्दकार जयदेवसे भिन्न माननेका मुख्य आधार 'चन्द्रालोकमें आया हुआ उपरिलिखित 'श्रीभोजदेवप्रभवस्य रामादेवीसुतश्रीजयदेदकस्य' श्लोक ही है। परन्तु यह श्लोक प्रक्षिप्त जान पड़ता है। इस अनुमानका कारण यह है कुम्भनृपतिकृत 'रसिकप्रिया' नामक 'गीतगोविन्द'की टीकामें इस 'भभोजदेवप्रभवस्य' श्लोककी टीका नहीं पायी जाती है। निर्णयसागरसे जो 'रसिकप्रिया टीका' सहित 'गोतगोविन्द' प्रकाशित हुआ है उसें इस स्थलपर सम्पादक महोदयने कोष्ठकमें 'अत शीभोजदेवेति श्लोकस्य टीका नोपलब्धा टीकादर्शपुस्तके' पद लिख दिया है। इससे अनुमान होता है कि यह श्लोक बादका बढ़ाया हुआ श्लोक है और प्रामाणिक नहीं है।
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८४ काव्यप्रकाश: हमारे इस अनुनानके समर्थनमें दूसरी युक्ति यह भी है कि यदि हम इस श्लोकके आधारपर 'गीत- गोविन्दकार जयदेवको चन्द्रालोककार जयदेवसे भिन्न मानना चाहें तो फिर चन्द्रदत्तकृत 'भक्तमाल'के विवरणके अनुसार उन्हें उत्कल-निवासी जयदेवके रूपमें मानना होगा। उस दशामें 'गीतगोविन्द'के प्रथम सर्गमें बङ्गालके राजा लक्ष्मणसेनकी राजसभाके पश्चरत्नोंका उल्लेख करनेवाले श्लोककी सङ्गति कैसे लगेगी ? 'गीतगोविन्द'का प्रथम सर्गवाला यह श्लोक सर्वथा प्रामाणिक श्लोक है। उसमें किसीका मतभेद नहीं है। इस श्लोकसे यह स्पष्ट है कि गीतगोविन्दकार जयदेव बङ्गदेशीय राजा लक्ष्मणसेनकी सभाके पश्चरत्नोंमेंसे ही हैं। इसलिए वे चन्द्रालोककार तथा प्रसन्नराघवकार जयदेवसे अभिन्न ही हैं, भिन्न नहीं हैं। चन्द्रालोककार जयदेवसे गीतगोविन्दकार जयदेवको भिन्न माननेका मुख्य आधार 'भीभोजदेव' इत्यादिश्लोक था। वह अप्रामाणिक है यह बात हम अभी दिखला चुके हैं। इसका दूसरा आधार चन्द्रदत्तकृत 'भक्तमाल' में दिया हुआ उत्कलवासी जयदेवका वर्णन है। वह वर्णन स्पष्टतः गीतगोविन्द- कारसे ही सबन्ध रखता है। किन्तु उसमें जयदेवके माता-पिताके नामका कहीं उल्लेख नहीं आता है। केवल उत्कलदेशमें उनके जन्मकी और जगन्नाथपुरी तथा उत्कलसे सम्बद्ध 'गीतगोविन्द'के माहात्म्यकी प्रदर्शक कथाओंका वर्णन है। परन्तु उससे गीतगोविन्दकार जयदेवको चन्द्रालोककार जयदेवसे भिन्न माननेका समर्थन नहीं होता है। यह हो सकता है कि जयदेवका जन्म उत्कलके 'बिन्दुबिल्व' ग्राममें ही हुआ हो और उनका विवाह भी वहीं पद्मावतीके साथ हुआ हो, किन्तु बादको वे बङ्गदेशीय राजा लक्ष्मण- सेनकी राजसभाके 'रत्न' बन गये हों। यह भी माना जा सकता है कि उन्होंने 'गीतगोविन्द'की रचना उत्कलमें रहते हुए हो कर ली हो जिससे उत्कल और जगन्नाथपुरीके मन्दिरमें 'गीतगोविन्द'का विशेष प्रचार हो गया हो। पर इससे उन्हें 'चन्द्रालोक' और 'प्रसन्नराघव' का कर्ता न माननेका समर्थन नहीं होता है, और न इससे यह सिद्ध होता है कि वे राजा लक्ष्मणसेनकी सभाके रत्नोंमें नहीं आ सकते हैं। यदि 'भक्तमाल' वाली कथा इस बातमें बाधा उपस्थित करती है कि गीतगोविन्दकार जयदेव राजा लक्ष्मणसेनकी सभाके 'रत्न' थे तो उस कथाको भी अप्रामाणिक मानना होगा, क्योंकि गीतगोदिन्दकार जयदेवने स्वयं ही लक्ष्मणसेनके सभारत्नोंमें अपने नामका उल्लेख किया है। इस सब विवेचनका परिणाम यह निकलता है कि गीतगोविन्दकार जयदेव चन्द्रालोककार जयदेवसे भिन्न नहीं हैं, अभिन्न ही हैं।
पक्षधर मिश्र और जयदेव मिश्र चन्द्रदत्तके 'भक्तमाल'के अनुसार उत्कलप्रदेशमें जयदेव उत्कलवासीके रूपमें प्रसिद्ध हैं। इसी प्रकार मिथिलानें वे एक मौलिक विद्वानके रूपमें प्रसिद्ध हैं। मैथिल-प्रसिद्धिके अनुसार जयदेव पक्षधर मिश्रका दूसरा नाम है। पक्षधर मिश्र मैथिल और नव्यन्यायके प्रजुख आचार्य हैं। उनका जन्मकाल १२७५ है। इन्हीोंका दूसरा नाम जयदेव मिश्र है। अलङ्कारशास्त्रपर इन्होंने 'चन्द्रालोक' ग्रन्थ लिखा है, इसी प्रकार गङ्गशोपाध्याय-विरचित 'तत्त्वचिन्तामण' ग्रन्थके ऊपर पक्षधर मिश्रने 'तत्त्वचिन्तामण्या- लोक' ग्रन्थकी रचना की है। पक्षधर मिश्र (जयदेव) के नव्यन्यायपर 'न्यायलीलावतीविवेक' तथा 'द्रव्यपदार्थालोक' ध्रन्थ भी है। जयदेव भिश्र पक्षधर मिश्रका ही दूसरा नाम हो सकता है, इस बातकी पुष्टि इस आधारपर होती है कि 'प्रसनराघव' नाटकमें जयदेव मिश्रने अपने तार्किकत्वका भी बड़े गर्वके साथ उल्लेख करते हुए लिखा है-
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भूमिका ८५ येषां कोमलकाव्यकौशलकलालीलावती भारती तेषां कर्कशतर्कवक्वचनोद्गारेऽपि कि होयते। थैः कान्ताकुचमण्डले कररुहाः सानन्दमारोपिता- स्तैः कि मत्तकरीन्द्रकुम्भशिखरे नारोपणीया: श्वराः ।। जयदेवके नानसे १. 'चन्द्रालोक', २. 'प्रसल्नराघव' नाटक तथा ३. 'गीतगोविन्द' तीन ग्रन्थ विशेषरूपसे प्रसिद्ध हैं। 'चन्द्रालोक' में १० 'मयूख' हैं। उनमें क्रमशः १. वाग्विचार, २. दोषनिरूपण, ३. लक्षण- निरूपण, ४. गुणनिर्पण, ५. अलद्गारनिरूपण, ६. रसभावरीतिवृत्तिनिरूपण, ७. शब्दशक्तिनिरूपण, 5. गुणीभूतव्यङ्गचनिरूपण, ६. लक्षणानिरूपण और १०. अभिधानिरूपणका प्रतिपादन हुआ है। यह ग्रन्थ बड़ी सरल और सुन्दर शैलीमें लिखा गया है। अलङ्कारोंके निरूपणमें इनकी सवसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्होंने अनुष्टुप श्लोकके पूर्वार्द्धमें प्रत्येक अलङ्गारका लक्षण और आधे श्लोकमें उसका उदाहरण दे दिया है। इससे अलड्ारोंके समझने और याद करनेमें बड़ी सरलता होती है। इसलिए यह ग्रन्थ बहुत लोकप्रिय हुआ। इसके ऊंपर प्रद्योतन भट्टाचार्यने 'शरदागम' टीका सबसे पहिले लिखी थी। उसके बाद अप्पय्यदीक्षित ( १६२०-१६६०) ने 'चन्द्रालोक'के अलङ्गारप्रकरणको लेकर अपने 'कुवलयानन्द' ग्रन्थकी रचना की। चन्तालोको विजयतां शरदागमसम्भवः । हृदः कुवलयानन्दो यत्पसादादभूदयम् ।।' इनके अतिरिक्त वैद्यनाथ पायगुण्डेने 'रामा' नामक एक टीका और विश्वेश्वर पण्डितने, जो 'गागाभट्ट' नामसे भी कहे जाते हैं, 'चन्द्रालोक'पर 'सुधा' या 'राकागम' टीका लिखी। जोधपुरनरेश जसदन्तासंह प्रथम (सं० १६८३-१७३५) ने इसी 'चन्द्रालोक'के आधारपर भाषाभूषण' नामक अलङ्गार- ग्रन्थकी रचना की है। 'चन्द्रालोक' का पाँचदाँ सयूख इस 'भाषाभूषण' ग्रन्थका आधार है। 'भाषाभूषण' 'चन्द्रालोक' का अनुवादगात् नहीं है। जयदेवका दूसरा ग्रन्थ 'ग्रसन्नराघव' नाटक है। 'चन्द्रालोक' के समान उत्तरवर्ती साहित्यपर इसका भी पर्याप्त प्रभाव पड़ा है। गोस्वामी तुलसीदासने 'प्सन्नराघव' के अनेक पद्योंका अनुवाद अपने 'रामचरितमानस' में प्रस्तुत किया है। उदाहरणरूपमें निम्नलिखित दो पद्य प्रस्तुत किये जा सकते हैं- चन्द्रहास हर मे परितापं रामचन्द्रविरहानलजातम्। त्वं हि कान्तिजितमौकतिकचूर्ण धारया वहसि शीतलमम्तः ।।' यह 'प्रसन्नराघव' नाटकके छठे अङका श्लोक है। गोस्वामी तुलसीदालने इसका अनुवाद निम्नलिखित प्रकार किया है- "चन्द्रहारा हरु नम परितापं। रघुपति विरह अनल संजालम्। सीत निसा तब असिवर धारा। कह सीता हरु म दुख भारा।।" 'प्रसन्नराघव' नाटकके छठे अङकका पहिला श्लोक इस प्रकार है -- 'उदर्कभूतिमिर्च्छा्द्गिः सद्धिः खलु न दृश्यते। चतुर्थीचन्द्रलेखेव परस्त्रीभालपट्टिका ।'
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८६ काव्यप्रकाश:
गोस्वामी तुलसीदासजीने इसका भाषानुवाद निम्नलिखितप्रकार प्रस्तुत किया है- "सो परनारि-लिलार गोसाई। तजहु चौथ चन्दाकी नाई।।"
२७. विद्याधर एकावलीकार विद्याधरसे अलङ्कारशास्त्रकी प्रवृत्तियोंमें एक नया मोड़ आरम्भ होता है। अबतक हमने देखा है कि साहित्यशास्त्रके ऊपर सबसे बड़ा और सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण काम भारतके ठेठ उत्तरी भाग दाश्मीरमें हुआ। साहित्यशास्त्रके २,००० वर्षोंके इतिहासमें बारहवीं शताब्दीमें हुए रुय्यकतक लगभग १,४०० वर्ष साहित्यिक प्रवृत्तियोंका प्रधान केन्द्र कश्मीर रहा है। यह भारतका उत्तरी विद्याकेन्द्र था। इसके बाद गुजरातका अनहिलपट्टन राज्य और पूर्वका बङ्गराज्य साहित्यक प्रवृत्तियोंके केन्द्र बने। एकावलीकार विद्याधरसे साहित्यिक प्रवृत्तियोंका केन्द्र दक्षिगभारतमें पहुँच गया। विद्याधर, विद्यानाथ और विश्वनाथ ये सब दक्षिण भारतकी विभूतियाँ हैं, जिन्होंने अलङ्कारशास्त्रके साहित्यनिर्माणमें महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। विद्याधरका एकमात्र ग्रन्थ 'एकावली' है। इसमें आठ 'उन्मेष' या अध्याय हैं। इनमें क्रमशः १. काव्यस्वरूप, २. वृतिविचार, ३. ध्वनिभेद, ४. गुणीभूतव्यङ्गय, ५. गुण और रीति, ६. दोष, ७. शब्दालङ्कार तथा द. अर्थालङ्कारोंका विवेचन किया गया है। यह ग्रन्थ 'काव्यप्रकाश' और 'अलङ्कारसर्वस्व'के आधार पर लिखा गया है। इसके ऊपर १४ वीं शताब्दीमें सुप्रसिद्ध टीकाकार भल्लि- नाथ ने 'तरला' नामक विद्वत्तापूर्ण टीका लिखी है। इसीलिए मल्लिनाथने अपनी काव्य-टीकाओंमें 'एकावली' के काव्यलक्षण ही प्रायः उद्धृत किये हैं। 'एकावली' की एक मुख्य विशेवता यह है कि इसमें जितने उदाहरण दिये गये हैं वे स्वयं विद्याधरके बनाये हुए हैं और उन्होंने अपने आश्रयदाता उत्कलाधिपति नरसंहदेवके स्तुतिरूपमें उनकी रचना की है। उन्होंने लिखा है- 'एष विद्याधरस्तेषु कान्तासम्मितलक्षणम्। करोमि नरसिंहस्य चाटुश्लोकानुदाहरन्।' -- एकावली सन्थकारने स्वयं अपने इन श्लोकोंको 'चाटुश्लोक' (खुशामद और चापलूसीके श्लोक) कहा है। पूर्ववर्ती अलङ्धारसाहित्यमें यह प्रथृत्ति नहीं दिखायी देती है। विद्याधरने इस नवीन चाटुप्रवृत्तिकी उद्धावना की। उनके बाद विद्यानायने भी इसका अनुकरण किया। विद्याधरने जिस उत्कलाधिपतिके चाटुश्लोकोंको उदाहरणरूपमें प्रस्तुतकर 'एकावली'की रचना की है वे उड़ीसाके राजा नरसिंह द्वितीय माने जाते हैं। उनका समय १२८०-१३१४ ई० है। इसलिए विद्याधरका भी यही काल पड़ता है। २८. विद्यानाथ विद्याधरके बाद विद्यानाथका समय आता है। ये भी विद्याधर द्वारा उद्ावित 'चाटुप्रवृत्ति'के अनुगामी हैं। इन्होंने अलङ्कारशास्त्रपर 'प्रतापरुद्रयशोभूषण' नामक ग्रन्थ लिखा है। अन्य ग्रन्थोंके समान इसमें भी कारिका, वृत्ति तथा उदाहरण तीन भाग हैं। इसके सारे उदाहरण आन्ध्रप्रदेशके काकतीय- दंशीय राजा प्रतापरद्रकी स्तुतिमें स्वयं विद्यानाथके बनाये हुए हैं।
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भूमिका
'प्रतापरुद्रवेवस्य गुणानाश्रित्य निरमितः। अलङ्कारप्रदं्धोडयं सगतः वर्णोतवोऽरतु वः।' -- प्रतापसुद्रयशोभूषण १-६ इस 'प्रतापरुद्रयशोभूषण'के तृतीय अध्यायमें ग्रन्थकारने अपने आश्रयदाताफी स्तुतिमें लिखे हुए 'प्रतापकल्याण' नाटकका समावेश कर दिया है। प्रतापरुद्र आन्धराप्रदेशके राजा थे। इनकी राजधानी वारङ्गल, जिसको 'एकशिला' कहते हैं, थी। इनके शिलालेख १२६८-१३१७ ई० तकके मिलते हैं। इसलिए प्रतापरुद्र राजाका समय चौदहवीं शताब्दीका आरम्भिक भाग है। यही सगय विद्यानाथका भी है। विद्यानाथके 'प्रतापरुद्रयशोभूषण' के आदर्शपर ही कदाचित् हिन्दीके प्रसिद्ध कवि भूषणने 'शिवराजभूषण' नामक अलङ्कार ग्रन्थकी हिन्दीमें रचना की थी। २९. विश्वनाथ कविराज विद्यानाथके बाद विश्वनाथ कविराजका नाम आता है। इनका अलङ्कारशास्त्रविषयक 'साहित्यदर्पण' ग्रन्थ बड़ा लोकप्रिय है। उसके अन्तिम श्लोकमें उन्होंने अपनेको 'श्रीचन्द्रशेखरमहाकवि- चन्द्रसूनु:' कहा है, जिससे पता चलता है कि इनके पिताका नाम चन्द्रशेखर था। इनके पितामहका नाम नारायणदास था। इन्होंने 'काव्यप्रकाश' के ऊपर टीका भी लिखी है। उसका उल्लेख 'काव्यप्रकाश'की टोकाओंके प्रसङ्गमें किया जा चुका है। इसमें उन्होंने अपने पितामह श्रीनारायणदासका परिचय देते हुए लिखा है- 'यदाहु: श्रीकलिङ्गभूनण्डलाखण्डलमहाराजाधिराजश्रीनरतिंहदेवराभायां धर्मदत्तं
'साहित्यदर्पण' में इन्हीं नारायणदासका उल्लेख इस प्रकार किया गया है-m
रायणपादैरुक्तम्।' इन दोनोंमें विश्वनाथने नारायणदासके साथ अपना जो सम्बन्ध विखलाया है वह एक-सा नहीं है। पहिली जगह उनको अपना साक्षात् पितामह कहा है और दूसरी जगह 'वृद्धप्रपितामहसहृदयगोळी- गरिष्ठ' अर्थात् मित्रमण्डलीके प्रमुख कहा है। पता नहों इननेंसे कौन-सी बात ठीक है। पर इस विवरणसे यह निकलता है कि यह कलिङ्गके रहनेवाले थे। 'साहित्यवर्पण' के प्रथम परिच्छेदके अन्तकी पुष्पिकाफे अनुसार उन्होंने अपनेको 'सान्धिविग्रहिक' और 'अष्टादशभाषावारविलासिनीभुजन्न कहा है। इसका अभिप्राय यह है कि वे १८ भषाओंके ज्ञाता थे और किसी राज्यके 'सान्धिग्हिक' अर्थात् विदेशमन्त्री थे। किन्तु उस राज्यका कोई उल्लेख नहीं किया है। 'साहित्यदर्पण' के चतुर्थ परिच्छेदमें 'अल्लावदीननृपतौ न सन्धिर्न च विग्रहः' (४-१४) इन शब्दोंमें दिल्लीके सुलतान अलाउद्दीन खिलजीका उल्लेख पाया जाता है : अलाउद्दीन खिलजीका शासन- काल १२६६-१३१६ ई० तक रहा है। उसने दक्षिणभारतपर आक्रमण कर पिछले आचार्य विद्यानाथके आश्रयदाता प्रतापरुद्रकी राजधानी वारङ्गल (एकशिला) को जीत लिया था। उसका उल्लेख 'साहित्य- दर्पण में पाये जानेसे विश्वनाथका काल उसके बाद ही सम्भव है। इधर 'साहित्यदर्पण' की एक हस्त- लिपि प्राप्त हुई है, उसका लेखनकाल सन् १३८४ ई० (सं० १४४०) है। इसलिए विश्वनाथका काल चौदहवीं शताब्दीमें स्थिर होता है।
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काव्यप्रकाश:
विश्वनाथका सबसे मुख्य और प्रसिद्धतम ग्रन्थ 'साहित्यदर्पण' है। 'काव्यप्रकाश' के समान इसमें भी दस परिच्छेद हैं और इन परिच्छेदोंमें प्रायः उसी कमसे विषयका विवेचन किया गया है। किन्तु इसकी अपनी विशेषता यह है इसके छठे परिच्छेदमें, जो इसका सबसे बड़ा परिच्छेद है, नाटयशास्त्र-सम्बन्धी सम्पूर्ण दिषयका समावेश कर दिया गया है, जिससे काव्य तथा नाटय-सम्बन्धी सम्पूर्ण विषयोंका ज्ञान एक ही ग्रन्थ द्वारा प्राप्त हो जानेसे ग्रन्थकी उपयोगिता बढ़ गयी है। 'काव्यप्रकाश' में नाटकसम्बन्धी अंश नहीं है। प्रथम परिच्छेदमें काव्यके प्रयोजन-लक्षणादि प्रस्तुत करते हुए विश्वनाथने मम्मटके 'तददोषौ शब्दार्थौ' सगुणावनलडकृती पुनः क्वापि' इस काव्यलक्षणका बड़े संरम्भके साथ खण्डन किया है और उसके स्थानपर 'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्' को काव्यका लक्षण स्थापित किया है। द्वितीय परिच्छेदमें वाक्य और पदका लक्षण करनेके बाद अभिधा-लक्षणा-व्यञ्जनादि शब्दशक्तियोंका विस्तारके साथ विवेचन किया है। तृतीय उल्लासमें रसनिष्पत्तिका बड़ा सुन्दर विवेचन किया है। रसनिरूपणके साथ-साथ इसमें नायकनायिकाभेदका प्रतिपादन किया है। यह विषय भी 'काव्यप्रकाश' में नहीं आया है। चतुर्थ परिच्छेदमें काव्यके ध्वनिकाव्य, गुणीभूतव्यङग्यकाव्यके भेदोंका विवेचन किया है। पञ्चम परिच्छेदमें ध्वनिसिद्धान्तके विरोधी समस्त मतोंका खण्डन करके ध्वनिसिद्धान्तका समर्थन बड़ी प्रौढ़ताके साथ किया है। इसीलिए ग्रन्थकार परिच्छेदोंके अन्तकी पुष्पिकाओंमें अपनेको 'ध्वनिप्रस्थापनपरमाचार्य' लिखते हैं। छठे परिच्छेदमें नाटयशास्त्र-सम्बन्धी विषयोंका प्रतिपादन है। उसके बाद ७-१० चार परिच्छेदोंमें कमशः दोष, गुण, रीति तथा अलङ्कारोंका प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकार यह ग्रन्थ सर्वाङ्गपूर्ण बन गया है। ग्रन्थकी लेखनशैली बड़ी सरल और सुबोध है। 'काव्यप्रकाश'की-सी जटिलता इसमें कहीं नहीं है। 'साहित्यदर्पण' के लिखनेके बाद विश्वनाथने 'काव्यप्रकाश'के ऊपर 'काव्यप्रकाशदर्पण' नामक टीका लिखी। इनके अतिरिक्त अनेक काव्योंकी भी रचना की है, जिनमें १. 'राघवविलास' संस्कृतका महाकाव्य है; २. 'कुवलयाश्वचरित' प्राकृत भाषानें निबद्ध काव्य है; ३. 'प्रभावतीपरिणय' नाटिका; ४. 'चन्द्रकला' नाटिका; ५ .. 'नरसिंहविजय' काव्य तथा ६. 'प्रशस्तिरत्नावली' इन ६ काव्य तथा नाटकोंका उल्लेख इन्होंने स्वयं 'साहित्यदर्पण' तथा 'काव्यप्रकाश' की टीकामें किया है। इनमेंसे अन्तिम 'प्रशस्तिरत्नावली' सोलह भाषाओंमें लिखा हुआ 'करम्भक' है।
३०. शारदातनय [१३वीं शताब्दी] शारदातनय अलङ्कारशास्त्रके नहीं, अपितु नाटयशास्त्रके आचार्य हैं। इनके ग्रन्थका नाम 'भावप्रकाशन' है। ग्रन्थमें दस 'अधिकार' अथदा अध्याय हैं। इनमें क्रमशः १. भाव, २. रसस्वरूप, ३. रसभेद, ४. नायक-नायिका, ५. नायिकाभेद, ६. शब्दार्थसम्बन्ध, ७. नाटयेतिहास, ८. दशरूपक, ६. नृत्यभेद तथा १०. नाटय-प्रयोगका वर्णन किया गया है। शारदातनयका नाम उनका राशिनाम नहीं है अपितु वे अपनेको शारदादेवीका पुत्र मानकर अपनेको 'शारदातनय' कहने-लिखने लगे, इसलिए उनका यही नाम प्रसिद्ध हो गया। उन्होंने अपने 'भावप्रकाशन' ग्रन्थमें भोजके 'शृङ्गारप्रकाश' तथा मम्मटके 'काव्यप्रकाश'से अनेक श्लोकोंको उद्धृत किया है। आगे १३२० ई० के लगभग होनेवाले शिङ्गभूपालने अपने 'रसार्णवसुधाकर' ग्रन्थमें इन शारदातनयके मतका उल्लेख किया है, इसलिए शारदातनयका समय उनले पूर्व अर्थात् तेरहवों शताब्दी माना जा सकता है।
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भूमिका
३१. शिङ्गभूपाल [ १४वीं शताब्दी ] शारदातनयके समान शिङ्गभूपाल भी नाटयशास्त्रके आचार्य हैं। इनका 'रसार्णवसुधाकर' ग्रन्थ नाटयशास्त्रसे सम्बन्ध रखनेवाला ग्रन्थ है। उसमें १. रञ्जकोल्लास, २. रसिकोल्लास तथा ३. भावोल्लास नामक तीन उल्लास हैं। ग्रथम रञ्जकोल्लासमें नायक-नायिकाके स्वरूपका, दूसरे रसिकोल्लासमें रसके स्वरूपका, तीसरे भावोल्लासमें रूपकोंके वस्तुविन्यासका विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है। लेखनशैली सरल और सुन्दर है। 'रसार्णवसुधाकर' की पुष्पिकामें इन्होंने अपना परिचय निम्नलिखित प्रकार दिया है-
भीमश्रीशिङ्गभूपालविरचिते रसार्णवसुधाकरनाम्नि नाटयालड्कारे रञ्जकोल्लासो नाम प्रथमो विलासः ।' इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि ये आन्ध्रके राजा अन्नप्रोतके पुत्र और आन्ध्रमण्डलके अधीश्वर थे। साथ ही इन्होंने अपने को शूद्र लिखा है। 'रसार्णवसुधाकर'के अतिरिक्त इन्होंने शार्ङ्गदेवके 'सङ्गीतरत्नाकर' नामक सङ्गीतशास्त्रविषयक ग्रन्थके ऊपर 'सङ्गीतसुधाकर' टीका लिखी है। इसकी पुष्पिका भी 'रसार्णवसुधाकर'की पुष्पिकासे बिलकुल मिलती-जुलती है। 'रसार्णवसुधाकर' के आरम्भमें इन्होंने अपने वंशादिका जो परिचय दिया है उससे विदित होता है कि इनका जन्म 'रेचल्ल' वंशमें हुआ था। इन्हें ६ पुत्र थे। विन्ध्याचलसे लेकर शरीबोल नामक पर्वततकके बीचके भागपर इनका शासन था। इनकी राजधानीका नाम 'राजाचल' था और ये शूद्र थे। इनका समय चौदहवीं शताब्दीमें माना जाता है। ३२. भानुदत्त [ १४ वीं शताब्दी ] अबतक हमने काव्यशास्त्रविषयक साहित्यिक प्रवृत्तियोंका जो चित्र उपस्थित किया है उससे भारतके उत्तरमें कश्मीर, पश्चिममें अनहिलपट्टन, पूर्वमें बङ्ग और दक्षिणमें उत्कल, आन्ध्र आदिके राजाओं- के संरक्षणमें होनेवाली साहित्यिक प्रवृत्तियोंका परिचय मिल जाता है। किन्तु इस कार्यमें मध्यभारतका भाग अबतक शून्य जैसा है। अब भानुदत्तसे मध्यभारतकी साहित्यिक प्रवृत्तियोंका आरम्भ होता है। भानुदत्तके दो ग्रन्थ हैं-१. 'रसमञ्जरी' और २. 'रसतराङ्गणी'। इनमेंसे 'रसमञ्जरी' मुख्य गन्थ है। 'रसतर्राङ्गणी' इसीका संक्षिप्त रूप है। 'रसमञ्जरी' के अन्तिम श्लोकमें ग्रन्थकारने अपना परिचय निम्नलिखित प्रकार दिया है- 'तातो यस्य गणेश्वरः कविकुलालङ्कारचूडामणिः देशो यस्य विदेहभू: सुरसरित्कल्लोलकिमींरिता।' इससे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि ये विदेहभू अर्थात् मिथिलाके रहनेवाले थे और इनके पिताका नाम गणेश्वर था। 'विवादरत्नाकर' नामक धर्मशास्त्रविषयक ग्रन्थके लेखक चण्डेश्वरने भी अपनेको मन्त्री गणेश्वरका पुत्र बतलाया है। इससे प्रतीत होता है कि कदाचित् भानुदत्त और चण्डेश्वर सगे भाई होंगे। चण्डेश्वरने १३१५ ई० में अपना तुलादान करवाया था। इसलिए भानुदत्तका समय चौदहवीं शताब्दीमें ही निर्धारित होता है। पन्द्रहवीं शताब्दीमें गोपाल आचार्य (१४२८ ई०) ने
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काव्यप्रकाश:
भानुदत्तकी 'रसमञ्जरी' पर विकास' नामक टीका लिखी है। 'रसमञ्जरी'पर अबतक ११ टीकाएँ उपलब्ध हो चुकी हैं। 'रसगञ्जरी' एवं 'रसतरङ्गिणी' के अतिरिक्त भानुदत्तका 'गीतगौरीपति' नामक एक सुन्दर गीतिकाव्य भी मिलता है, जो जयदेवके 'गीतगोविन्द'के आदर्शपर लिखा गया है और उसीके समान सरल एवं सुन्दर है। ३३. रूपगोस्वामी [ १५-१६वीं शताब्दी ] रूपगोस्वामी वृन्दावनकी विभूति हैं। ये चैतन्य महाप्रभुके शिष्य प्रसिद्ध वैष्णव आचार्य हैं। इन्होंने वैष्णव दृष्टिकोणसे अत्यन्त सहत्त्वपूर्ण एवं विशाल साहित्यकी रचना की है। रूपगोस्वामी तथा सनातनगोस्वामी ये दो भाई थे। दोनों चैतन्य महाप्रभुके शिष्य थे और उन्हींकी प्रेरणासे अपनी जन्मभूमि बंगालको छोड़कर वन्दावनमें जाकर बसे थे। इनके साथ इनके एक भतीजे जीवगोस्वामी भी हैं। ये तीनों ही वैष्णवधर्मके पसिद्ध आचार्य हैं। इनके कारण वृन्दावनको साहित्यिक क्षेत्रमें अपूर्व गौरव प्राप्त हुआ है। जीवगोस्वामीने सनातनगोस्वामीकी भागवत-टीकाका संक्षिप्तरूप 'लघुतोषिणी'के नामसे प्रस्तुत किया है। इस ग्रन्थमें उन्होंने सनातनगोस्वामी तथा रूपगोस्वामीके सभी रन्थोंकी सूची दी है। इस सूचीके अनुसार रूपगोस्वामीके १७ ग्रन्थ हैं। इनमें १. 'हंसदूत' काव्य, २. 'उद्धवसन्देश' काव्य, ३. 'विदग्धमाधव' नाटक, ४. 'ललितमाधव' नाटक, ५. 'दानकेलिकौमुदी' भाणिका, ६. 'भक्तिरसामृतसिन्धु', ७. 'उज्ज्वलनीलमणि' (रसशास्त्र) तथा द. 'नाटकचन्द्रिका' ये आठ ग्रन्थ विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। इनमेंसे भी अन्तिम तीन गन्थ अलङ्कारशास्त्रसे सम्बन्ध रखनेवाले हैं। इन्हीं गन्थोंके कारण अलङ्गारशास्त्रके इतिहासमें इनको महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ है। इनमेंसे 'विदग्धमाधव' का रचनाकाल १५३३ ई० तथा 'उत्कलिकावल्लरी' (जिसका उल्लेख ऊपर नहीं आया) का रचनाकाल १५५० ई० दिया गया है। इससे इनके कालनिर्धारणमें सहायता मिलती है। चैतन्य महाप्रभुका समय १५ वीं शताब्दीका अन्तिम भाग है। रूपगोस्वासी उनके शिष्य हैं और १५५० में उन्होंने 'उत्कलिकावल्लरी' की रचना की है, इसलिए उनका समय हमने १५-१६वीं शताब्दी रखा है। रूपगोस्वामीके साहित्यशास्त्रसे सम्बन्ध रखनेवाले तीन ग्रन्थोंमें से 'भक्तिरसामृतसिन्धु' तथा 'उज्ज्वलनीलमणि' ये दोनों ग्रन्थ रसविषयपर हैं। 'भक्तिरसामृतसिन्धु' सें पूर्व, पश्चिम, उत्तर तथा दक्षिण विभाग नामसे चार 'विभाग' हैं। प्रत्येक विभाग अनेक लहरियोंमें विभक्तक हैं। इसमें भक्तिरस- को सर्वोत्तम रस सिद्ध करनेका यत्न किया गया है। पूर्वविभागमें भक्तिका सामान्य स्वरूप, लक्षणादि दिये हैं। दक्षिणविभागमें उसके विभाव, अनुभाव, सात्त्विकभाव, व्यभिचारिभाव तथा स्थायिभावोंका वर्णन किया गया है। पश्चिमविभागमें शान्त भक्तिरस, प्रीत भक्तिरस, प्रेयो भक्तिरस, वत्सल भलिरस तथा मधुर भक्तिरस आदि भक्तिरसके विशेव भेदोंका निरूपण किया है। उत्तरविभागमें हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, बीभत्स और भयानक रसोंका वर्णन और रसोंके विरोधाविरोध आदिका दिग्दर्शन कराया गया है। इस ग्रन्थकी रचना १५४१ ई० (१४३३ शाके) में हुई थी। 'उज्ज्वलनीलमणि' इसका पूरक ग्रन्थ है। उसमें मधुर शृङ्गारका विवेचन है। रूपगोस्वामीका साहित्यशास्त्रविषयक तीसरा ग्रन्थ 'नाटकचन्दिरिका' है। इसकी रचना उन्होंने भरत-नाटयशास्त्र तथा शिङ्गभूपालके 'रसार्णवसुधाकर के आधारपर की है। इसमें निश्वनाथके 'साहित्यदर्पण' में किये हुए नाटशनिरपणको भरतमुनिके विपरीत बतलाया गया है। रूपगोस्वामीके भतीजे जीवगोस्वामीने उनके 'भक्तिरसामृतसिन्धु'पर 'दुर्गमसङ्गमिनी' तथा
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भूमिका ६१
'उज्ज्वलनीलमणि'पर 'लोचनरोचनी' टीकाएँ लिखी हैं। रूपगोस्वामी तथा सनातनगोस्वामीके समान जीवगोस्वामी भी बड़े उच्च कोटिके विद्वान् थे। ये तीनों आचार्य वृन्दावनके गौरवभूत हैं। ३४. केशवमिश्र [ १६वीं शताब्दी ] भारतके मध्यभागमें होनेवाली साहित्यिक प्रवृत्तियोंका यह प्रसङ्ग चल रहा है। इसमें हम वृन्दावन आ गये हैं। अब थोड़ा-सा और आगे बढ़ें तो हम भारतकी राजधानी दिल्लीके पास पहुँच जाते हैं। यह केशवमिश्रका स्थान है। केंशवमिशने काव्यशास्त्रपर 'अलङ्कारशेखर' नामक एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थकी रचना की है : इस द्रन्थमें उन्होंने लिखा है कि इस ग्रन्थकी रचना धर्मचन्द्रके पुत्र राजा माणिक्य- चन्द्रके आग्रहपर की गयी है। कनिङ्गमने धर्मचन्द्रके पुत्र माणिक्यचन्द्र राजाका उल्लेख काँगड़ाके राजाके रूपमें किया है। उनके अनुसार माणिक्यचन्द्र १५६३ ई० में काँगड़ाकी गद्दीपर बैठे और उन्होंने दस वर्षतक राज्य किया। इससे केशवमिश्रका काल सोलहवीं शताब्दीका उत्तरार्धभाग निश्चित होता है। अन्य अलड्कारग्रन्थोंके समान केशवमिश्रने भी अपने 'अलङ्गारशेखर' ग्रन्थकी रचना कारिकारूपमें की है और उसपर स्वयं ही वृति लिखी है। इसमें आठ अध्याय या आठ 'रत्न' हैं। इसमें १. काव्यका लक्षण, २. रीति, ३. शन्दशक्ति, ४. आठ प्रकारके पददोष, ५. अठारह प्रकारके वाक्यदोष, ६. आठ प्रकारके अर्थदोष, ७. पाँच प्रकारके शब्दगण, चार प्रकारके अर्थगुण, दोषोंका गुणभाव, ८. अलड्गार तथा . रूपक आदि विषयोंका निरूपण किया गया है। इसमें इन्होंने यह भी लिखा है कि उन्होंने अपनी कारिकाओंकी रचना किन्हीं 'भगवान् शौद्धोदनि'के अलङ्कारग्रन्थके आधारपर की है। किन्तु आजतक 'भगवान् शौद्धोदनि' और उनके अलङ्कारग्रन्थका कोई पता नहीं चल सका है। ३५. कवि कर्णपुर [ १६वीं शताबदी ] कवि कर्णपूरके पिता शिवानन्द चैतन्य महाप्रभुके शिष्य थे। उनके पुत्रका नाम परमानन्ददास सेन था। यही परमानन्ददास सेन साहित्यिक जगत्में 'कवि कर्णपूर' नामसे विख्यात हैं। सन् १५२४ ई० में बङ्गालके नदिया जिलेमें इनका जन्म हुआ था। सन् १५७२ ई० में इन्होंने महाप्रभु चैतन्यके जीवनपर 'चैतन्यचन्द्रोदय' नासक नाटककी रचना की। इनका दूसरा ग्रन्थ 'अलङ्गारकौस्तुभ' है। इसीके कारण अलड्कारशास्त्रके आचार्योमें गिने जाते हैं। इस ग्रन्थमें दस 'किरण' या अध्याय हैं। इनमें काव्यलक्षण, शब्दशक्ति, ध्वनि, गुणीभूतव्यङ्गय, रस तथा भाव, गुण, शब्दालङ्कार, अर्थालङ्गार, रीति तथा दोष आदिका दर्णन किया गया है। ३६. कविचन्द्र [१६वीं शताब्दी ] कवि कर्णपूरके पुत्रका नाम कविचन्द्र था। इन्होंने भी अलङ्गारशास्त्रपर 'काव्यचन्द्रिका' नामक ग्रन्थकी रचना की थी। इसमें १६ 'प्रकाश' या अध्याय हैं। ग्रन्थकारने 'सारलहरी' तथा 'धातु- चन्द्रिका' नामक ग्रन्थोंकी रचना भी की है। इनका समय सत्हवीं शताब्दी है।
३७. अप्यय्यदीक्षित [१६-१७वीं शताब्दी] अप्पय्यदीक्षित दक्षिण भारतकी विभूति हैं। वे सुख्य रूपसे दार्शनिक, किन्तु सर्वतन्त्रस्वतन्त्र विद्वान् हैं। इन्हें १०४ ग्रन्थोंका कर्ता कहा जाता है। इनके पूर्व संख्या २३ पर निर्दिष्ट रामचन्द्रको
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काव्यप्रकाश:
'प्रबन्धशतकर्ता' कहा गया था, पर अप्पय्यदीक्षितके ग्रन्थोंकी संख्या उनसे भी आगे निकल गयी है। विषयकी दृष्टिसे उनकी मुख्य रचनाओंका विभाजन निम्नलिखित प्रकार किया जा सकता है -- (१) अद्वैतवेदान्तविषयक ६ ग्रन्थ : १. 'परिमल', २. 'सिद्धान्तलेशसंग्रह', ३. 'वेदान्त- नक्षत्रदादावली', ४. 'मध्यतन्त्रमुखमर्दन', ५. 'मध्वमतविध्वंसन', ६. 'न्यायरक्षामणि'। (२) भर्तिविषयक २६ रचनाएँ : १. 'शिखरिणीमाला', २. 'शिवतत्वविवेक', ३. 'ब्रहा- तर्कस्तव', ४. 'लघुविवरण', ५. आदित्यस्तवरत्न', ६. 'आदित्यस्तवव्याख्या', ७. 'शिवाद्वैत-विनिर्णय,' ८. शिवध्यानपद्धति', ६. 'पञ्चरत्न', १०. 'पञ्चरत्वव्याख्या', ११. 'आत्मार्पण', १२ 'मानसोल्लासः', १३. 'शिवकर्णामृत', १४. 'आनन्दलहरी', १५ 'चन्द्रिका', १६. 'शिवमहिभकलिकास्तुति', १७. 'शिवमहिमव्याख्या', १८. 'रत्नतयपरीक्षा', १६. रत्नत्रयपरीक्षाव्याख्या', २०. 'अरुणाचलेश्वरस्तुति', २१. 'अपीतकुदाम्बास्तुति', २२. 'चन्द्रकलास्तव', १२३. 'शिवार्कमणिदीपिका', २४. 'शिवपूजाविधि', २५. 'नयमणिमाला', २६. 'नयमणिमालाव्याख्या'। (३) रामानुजमतविषयक ५ द्रन्थ : १. 'नयमयुखमालिका', ३. 'नयमयूखमालिकाव्याख्या', ३. श्रीवेदान्तदेशिकविरचित 'यादवाभ्युदय' की व्याख्या, ४. वेदान्तदेशिक-विरचित 'पादुकारहस्य'की व्यास्या, ५. 'वरदराजस्तव'। (४) मध्वसिद्धान्तानुसारी २ न्थ : १. 'न्यायरत्नमाला', २. 'न्यायरत्नमालाव्याख्या'। (५) व्याकरणविष्यक १. 'नक्षल्रवादावली'। (६) पूर्वमीमांसाशास्त्रपर २ ग्रन्थ : १. 'नक्षत्रवादावली', २. 'विधिरसायन'। (७) अलड्कारशास्त्रपर ३ ग्रन्थ : १. 'वृत्तिवातिक', ३. 'चित्रमीमांसा', ३. 'कुवलयानन्द' । अप्पव्यदीक्षितके १०४ ग्रन्थोंमेंसे मुख्यतम ४०-५० ग्रन्थोंके नाम हमने ऊपर दिये हैं। इस सूची में दिये अन्तिम तीन ग्रन्थ अलङ्कारशास्त्रसे सम्बद्ध होनेके कारण प्रकृतमें उपयोगी हैं। इनमेंसे 'वृत्तिवातिक' ग्रन्थ, जैसा कि उसके नामसे प्रतीत होता है, वृत्ति अर्थात् शव्दशक्तिके विषयपर लिखा गया है। इसमें केवल दो ही परिच्छेद हैं जिनमें केवल अभिधा तथा लक्षणाका विवेचन किया गया है। इससे यह ग्रन्थ अपूर्ण-सा प्रतीत होता है। 'वित्रमीमांसा' दूसरा ग्रन्थ है परन्तु यह भी केवल अतिशयोक्ति अलङ्कारपर्यन्त होनेसे अधूरा है। इसके अधूरे होनेका उल्लेख स्वयं ग्रन्थकारने निम्नलिखित प्रकार किया किया है- 'अप्यर्धचित्रमीमांसा न मुदे कस्य मांसला। अनूररिव धर्मोशोरर्धेन्दुरिव धूर्जटेः ॥' तीसरा ग्रन्थ 'कुवलयानन्द' है। यह अप्पय्यदीक्षितका अलङ्कारशास्त्रविषयक मुख्य ग्रन्थ है। इसकी रचना जयदेवके 'चन्द्रालोक'के आधारपर हुई है। 'चन्द्रालोक' में अलङ्गारोंके लक्षण दिये हैं। उनको अप्पय्यदीक्षितने ज्योंका त्यों ले लिया है। किन्तु उदाहरण अन्य काव्योंसे भी प्रचुरमात्रामें उपस्थित किये हैं। अन्तमें केवल २४ अलङ्कार ऐसे दिये हैं जो जयदेवके 'चन्द्रालोक' में नहीं पाये जाते हैं। इन २४ अलङ्गारोंके लक्षण भी उन्होंने जयदेवकी शैलीसे ही बनाये हैं, अर्थात् आधे श्लोकमें लक्षण और आधे श्लोकमें उदाहरण दिया है। 'अमुं कुवलयानन्दमकरोदप्पदीक्षितः ।
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भूमिका इस श्लोकसे विदित होता है कि अप्यय्यदीक्षितने वैङ्कटपतिके अनुरोधसे 'कुवलयानन्द'की रचना की थी। वैङ्ट नामके दो राजा दक्षिण भारतमें मिलते हैं। एक विजयनगरराज्यमें १५३५ के लगभग और दूसरे पेन्नकोण्डराज्यमें,जिनके १५८६ से १६१३ तकके लेख मिलते हैं। कोई प्रथम वेङ्टपतिको और कोई द्वितीय वेङ्कटपतिको अप्पय्यदीक्षितका आश्रयदाता मानते हैं। दोनों अवस्थाओं में उनका समय १६-१७ शताब्दीमें पड़ता है।
३८ पण्डितराज जगन्नाथ अप्यय्यदीक्षितके बाद पण्डितराज जगन्नाथका नाम आता है। वैसे ये दोनों समकालीन और दक्षिण भारतके परस्पर प्रतिद्वन्द्वी विद्वान् हैं : पण्डितराज जगन्नाथके पिताका नाम पेरुभट्ट तथा माताका नाम लक्ष्मीदेवी था। ये तैलङ्ग ब्राह्मण थे। यों इनका जन्म दक्षिण भारतमें हुआ था किन्तु इनका यौवन दिल्लीके शाहजहाँ बादशाहके यहाँ बीता था ('दिल्लीवल्लभपाणिपल्लवतले नीतं नवीनं वयः')। 'दिल्लीश्वरो वा जगदीश्वरो वा मनोरथान पूरयितुं समर्थः । अन्येन केनापि नृपेण दत्त शाकाय वा स्याल्लवणाय वा स्यात् ।।' शाहजहाँके यहाँ रहकर ये दाराशिकोहको संस्कृत पढ़ाते थे। उसके संस्कृत और भारतीय अध्यात्मविद्या के प्रति अनुपम अनुरागादि गुणोंको देखकर पण्डितराजने दाराशिकोहके ऊपर 'जगदाभरण' नामका एक पूरा काव्य ही बना डाला था। शाही दरबारके सरदार आसफअली इनके मित्र थे। १६४१ ई० में उनकी मृत्यु हो जानेपर उनकी स्मृतिमें इन्होंने 'आसफविलास' नामक काव्यकी रचना की थी। पण्डितराज कवि होनेके नाते बड़े रसिक थे। दिल्लीमें आकर वे लवङ्गी नामकी यवन कन्याके चक्करमें फँस गये थे। यह यवनकन्या बहुत सामान्य परिवारकी थी। सिरपर पानीका घड़ा लेकर जाती हुई उस नवयुवतीको देखकर मुग्ध हो गये और बादशाहसे प्रार्थना की कि- न याचे गजालि न वा वाजिराजि वित्तेषु चित्तं मदीयं कदाचित् इयं सुस्तनी मस्तकन्यस्तकुम्भा की
लवङ्गो कुरङ्गीदृगङ्गीकरोतु ।। लवङ्गीके ऊपर यह इतने आसक्त थे कि उसके बिना इन्हें तनिक भी चैन नहीं था और स्वर्गका सुख भी तुच्छ प्रतीत होता था -- 'यवनी नवनीतकोमलाङ्गी शयनीये यदि नीयते कदाचित। अवनीतलमेव साधु मन्ये न वनी माघवनी विनोदहेतुः । यवनी रमणी विपदः शमनी कमनीयतया नवनीतसमा। उहि-ऊहि वचोऽमृतपूर्णमुखी स सुखी जगतीह यदङ्गगता ।।' इत्यादि अनेक श्लोक पण्डितराजने इस यवनकन्याके विषयमें कहे हैं। अपना यौवनकाल इन्होंने इस
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काव्यप्रकाश:
यवनकन्याके साथ दिल्लीमें बिताया। ढलती उमरमें यौवनका नशा उतरनेपर इस पापका प्रायश्वित्त करने- के लिए 'मधुपुरीमध्ये हरि: सेव्यते', मथुरा आकर कृष्णकी आराधना में लग गये और अन्त समयमें काशीमें पश्चगङ्गा घाटपर बैठकर गङ्गाकी स्तुतिमें 'गङ्गालहरी' की रचना की। कहते हैं कि गङ्गालहरी' का एक- एक श्लोक भक्तिभावसे गाते जाते थे और गङ्गाकी धारा इनके पास बढ़ती आती थी (अथवा ये स्वयं गङ्गाकी धाराकी ओर बढ़ते जाते थे)। 'गङ्गालहरी'के अन्तिम श्लोकके पाठके साथ गङ्गाने इनको अपनी गोदमें ले लिया और इनकी जीवनलीला समाप्त हो गयी। यह इनके यवनीप्रणयका अन्तिम प्रायश्रित्त था। यवनीप्रणयकी घटनाको लेकर इनके प्रतिद्वन्द्वी अप्पय्यदीक्षितने इनको जातिबहिष्कृत करा दिया था। इसलिए ये अप्पय्यदीक्षितसे और भी अधिक नाराज हो गये थे और अप्पय्यदीक्षितकी 'चित्रमीमांसा' के खण्डन में 'चित्रमीमांसाखण्डन' ग्रन्थ लिखा, जिसमें अप्पय्यदीक्षितके लिए अनेक दुर्वाक्योंका प्रयोग किया है।
पण्डितराज जगन्नाथने बहुत-से ग्रन्थोंकी रचना की, जिनमें १. 'भामिनीविलास', २. 'गङ्गा- लहरी', ३. 'करुणालहरी', ४. 'अमृतलहरी', ५. 'लक्ष्मीलहरी', ६. 'आसफविलास', ७. 'जगदाभरण', ८. 'प्राणाभरण', ६. 'सुधाहलहरी', १०. 'यमुनावर्णनचम्पू' ये सब काव्यग्रन्थ प्रसिद्ध हैं। भट्टोजि- दीक्षितकी 'मनोरमा' के खण्डनमें 'मनोरमाकुचमर्दन' नामक व्याकरणग्रन्थकी भी रचना की थी। अलङ्कारशास्त्रके सम्बन्धमें इन्होंने जो ग्रन्थ लिखा, उसका नाम 'रसागङ्गाधर' है। यह बड़ा प्रौढ़ और विद्वत्तापूर्ण ग्रन्थ है। इसमें सारे उदाहरण इन्होंने स्वयं अपने बनाकर दिये हैं। इस बातका उल्लेख करते हुए उन्होंने लिखा है- 'निर्माय नूतनमुदाहरणानुरूपं काव्यं मयात्र निहितं न परस्य किञ्चित्। किं सेव्यते सुमनसां मनसापि गन्धः कस्तूरिकाजननशक्तिभृता मृगेण ।I' किन्तु दुर्भाग्यकी बात है कि पण्डितराजका यह ग्रन्थ अधूरा है। इसमें केवल दो 'आनन' हैं। प्रथम आननमें अन्य सब काव्यलक्षणोंका खण्डन करके 'रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्' को काव्यका लक्षण स्थापित किया है। काव्यके हेतुओंमें 'प्रतिभा' को ही मुख्य हेतु ठहराया गया है और १. उत्तमोत्तम, २. उत्तम, ३. मध्यम तथा ४. अधम, ये चार काव्यके भेद बतलाये हैं। द्वितीय आननमें ध्वनिके भेदोंको दिखलाकर अभिधा तथा लक्षणाका विवेचन किया है। उसके बाद ७० अलङ्कारोंका वर्णन किया है। उत्तरालङ्कारके विवेचनके बाद यह ग्रन्थ बीचमें ही समाप्त हो गया है। 'रसगङ्गाधर' पर नागेशभट्टकृत 'गुरुमर्मप्रकाशिका' टीका प्रकाशित हो चुकी है। नागेशभट्टने गोविन्द ठक्कुरकी 'काव्यप्रकाश'पर लिखी 'काव्यप्रदीप' टीकापर बृहत् तथा लघु दो 'उद्योत' भी लिखे हैं। 'उदाहरणदीपिका' मम्मटके ग्रन्थका विवरण है। उन्होंने अप्यय्यदीक्षितके 'कुवलयानन्द'- पर भी 'अलड्कारसुधा' तथा 'विषमपदव्याख्यानषट्पदानन्द' टीका लिखी है। भानुदत्तकी 'रसमञ्जरी' की 'प्रकाश' टीका तथा 'रसतरङ्गिणी' व्याख्या भी नागेशभट्टने लिखी है। किम फनिश भीकट
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भूमिका ६५ ३९. आशाधरभट्ट [ १८वीं शताब्दी ] 'शिवयोस्तनयं नत्वा गुरुं च धरणीधरम्।ग ल आशाधरेण कविना रामजीभट्टसूनुना ॥' अपने 'अलङ्कारदीपिका' ग्रन्थके आरम्भमें आशाधरभट्टने इन शब्दोंमें अपना परिचय देते हुए अपने पिताका नाम रामजी तथा अपने गुरुका नाम धरणोधर सूचित किया है। आशाधरभट्टके अलङ्कार- शास्त्रविषयक तीन ग्रन्थ हैं-१. 'कोविदानन्द', २. 'त्रिवेणिका' और ३. 'अलङ्कारदीपिका'। ये ग्रन्थ अभीतक प्रकाशितरूपमें देखनेमें नहीं आये। किन्तु इनका जो विवरण हस्तलिखित ग्रन्थोंकी सूची आदि में दिया गया है उससे निदित होता है कि 'कोविदानन्द' तथा 'व्रिवेणिका' ग्रन्थ शब्द- शक्तिके विषयपर हैं। 'त्रिवेणिका' में अभिधा, लक्षणा, व्यञ्जना तीनों वृत्तियोंका निरूपण होनेसे इसका त्रिवेणिका नाम सार्थक है। इन तीनों शक्तियोंका उपयोग प्रधानतया कौन करते हैं इसका विवेचन करते हुए ग्रन्थकारने लिखा है -- 'शक्ति भजन्ति सरला लक्षणां चतुरा जनाः । व्यञ्जनां नर्ममर्मज्ञा: कवयः कमना जना: ।।' आशाधरभट्टका तीसरा ग्रन्थ 'अलङ्कारदीपिका' हैं। यह अप्पय्यदीक्षितके 'कुवलयानन्द'के आधारपर लिखा गया है। इसमें तीन 'प्रकरण' या अध्याय हैं। प्रथम अध्यायमें 'कुवलयानन्द'की कारिकाओंकी बालोपयोगी सरल व्याख्यामात् की गयी है। द्वितीय प्रकरणका नाम उद्दृष्टालद्गार- प्रकरण है। 'कुवलयानन्द'के अन्तमें रसवत्, प्रेय, ऊर्जस्वि और समाहित आदि रसवदलङ्कारोंको केवल 'उद्देश' अर्थात् नाममात्रेण कथन करके छोड़ दिया गया है। आशाधरने इस द्वितीय प्रकरणमें उन अलङ्कारोंके लक्षण अप्पय्यदीक्षितकी शैलीसे ही बना दिये हैं और उनकी व्याख्या कर दी है। 'अलङ्गार- दीपिका' का तीसरा 'परिशेषप्रकरण' है। इसमें संसृष्टि तथा सङ्कारालक्वारके पाँच भेदोंका निरुपण किया गया है। इसकी कारिकाएँ भी आशाधरने स्वयं बनायी हैं। जयदेवके 'चन्द्रालोक' में अलङ्कारोंकी संख्या १०० थी। उसके आधारपर लिखे गये 'कुवलयानन्द' में अप्यय्यदीक्षितने २४ अलङ्कार और बढ़ा दिये थे। आशाधरभट्ट की 'अलङ्गारदीपिका' में अलङ्गारोंकी संख्या १२५ हो गयी है। ये अप्पय्यदीक्षित- के बाद हुए इसलिए इनका समय १८वीं शताब्दी में निश्ित होता है। अलक्कारशास्त्रविषयक इन तीन ग्रन्थोंके अतिरिक्त १. 'अद्वैतविवेक' तथा २. 'प्रभापटल' ये दो और ग्रन्थ भी आशाधरभट्टने लिखे थे।
हैं। वे इनसे भिन्न हैं। इन आशाधरभटके ४०० वर्ष पूर्व 'आशाधर' नामके एक जैन विद्वान् १४वीं शताब्दीमें हो सुके
४०. नर्रालह कवि [ १वीं शताब्दी ] इनका अलड्ारशास्त्रविषयक एक ही ग्रन्थ मिलता है, उसका नाम 'नञ्जराजयशोभूषण' है। यह ग्रन्थ विद्यानाथके 'प्रतापरुद्रयशोभूदण' के आधारपर लिखा गया है। अन्तर यह है कि यह राजाकी स्तुतिमें नहीं, अपितु मैसूरराज्यके मन्त्रीकी स्तुतिमें लिखा गया है। नञ्जराज १८ वीं शताब्दीमें मैसूर- राज्यके मृख्यमन्त्री थे। राज्यका सारा अधिकार उन्हींके हाथमें था। इसलिए नञ्जराजने उन्हींको
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काव्यप्रकाश:
अपना आश्रयदाता मानकर 'नञ्जराजयशोभूषण, नामक इस अलङ्कारग्रन्थकी रचना की है। इसमें सात 'विलास' या अध्याय हैं -- १. नायक, २. काव्य, ३. ध्वनि, ४. रस, ५. दोष, ६. नाटक तथा ७. अलड्कार। इन विषयोंका इसमें विवेचन किया गया है। नाटकका निरूपण करनेवाले षष्ठ विलासमें ग्रन्थकारने अपने आश्रयदाता नञ्जराजकी स्तुतिमें एक नाटकका ही समावेश कर दिया है। दक्षिण नायकके उदाहरणरूपमें दिये हुए निम्नलिखित पद्यसे नरसिंह कविकी रचनाशैलीका परिचय मिल सकता है। 'धम्मिल्ले नवमल्लिकाः स्तनतटे पाटीरचर्चा गले, हारं मध्यतले दूकलममलं दत्वा यशःकैतवात्। यः प्राग्दक्षिणपश्चिमोत्तरदिशा: कान्ताः समं लालयन्, आस्ते निस्तुलचातुरीकृतपदःश्रीनञ्जराजाग्रणीः ।'
४१. विश्वेश्वर पण्डित
अलङ्कारशास्त्रके प्रमुख साहित्यनिर्माताओंमें विश्वेश्वर पण्डित कदाचित् अन्तिम विद्वान् हैं। ये उत्तरप्रदेशके अलमोड़ा जिलेके अन्तर्गत 'पाटिया' ग्रामके निवासी पाण्डेय ब्राह्मण हैं। इनके पिताका नाम लक्ष्मीधर था, जो अपने समयके एक अत्यन्त प्रतिष्ठित मूर्धन्य विद्वान् और सर्वतन्त्रस्वतन्त्र पण्डित थे। विश्वेश्वर पण्डितने व्याकरण, न्याय और साहित्यशास्त्रोंपर उत्कृष्ट ग्रन्थोंकी रचना की है। 'वैयाकरण-सिद्धान्तसुधानिधि' इनका व्याकरणविषयक उत्कृष्ट एवं विशाल ग्रन्थ है। न्यायपर 'तर्क- कुतूहल' तथा 'दीधितिप्रवेश' ये दो इनके उत्कृष्ट ग्रन्थ हैं। साहित्यशास्त्रपर इनका ग्रन्थ 'अलङ्गारकौस्तुभ' नामसे विख्यात है। यह ग्रन्थ अलङ्कारशास्त्रका बड़ा प्रौढ़ एवं प्रामाणिक ग्रन्थ है। इसमें अप्पय्यदीक्षित तथा पण्डितराज जगन्नाथके मतोंका अनेक स्थलोंपर बड़ी प्रौढ़ताके साथ खण्डन किया गया है। इसके अतिरिक्त १. 'अलङ्कारमुक्तावली', २. 'अलङ्कारप्रदीप', ३. 'रसचन्द्रिका' और ४. 'कवीन्द्रकण्ठाभरण' ये चार ग्रन्थ और भी हैं। इस प्रकार, अलङ्गारकौस्तुभ'को मिलाकर विश्वेश्वर पण्डितके अलड्कारविषयक ग्रन्थोंकी संख्या पाँच हो जाती है। इनमें 'अलङ्कारकौस्तुभ' सर्वोत्तम ग्रन्थ है।
उपसंहार भरतमुनि (२०० वि० पू०) से लेकर विश्वेश्वर पण्डित (१८वीं शताब्दीतक) लगभग २००० वर्षमें होनेवाले भारतीय काव्यशास्त्रके विकासकी यह संक्षिप्त रूपरेखा हमने प्रस्तुत की है। 'काव्यप्रकाश' के पढ़नेवालोंके लिए साहित्यशास्त्रके इतिहासका यह सर्वेक्षण मनोरञ्जक एवं लाभदायक होगा, इस आशाके साथ हम इसे समाप्त करते हैं।
गुरुपणिमा आषाढ़ शु० १५, सं० २०१७ विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि आचार्य ८ जुलाई, सन् १६६०। गुरुकुल विश्वविद्यालय, वृन्दावन
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श्रीमम्मटाचचार्यकृत:
काव्यप्रकाश:
प्रथम उल्लास:
ग्रन्थारम्भे विघ्नविघाताय समुचितेष्टदेवतां ग्रन्थकृत् परामृशति -- श्रीमदाचार्यविश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोमणिविरचिता काव्यप्रकाशदीपिका हिन्दीव्याख्या प्र सुमेधा गातुविद्विश्वदेवः सोमः पुनावः सद एति नित्यम् । भुवद्विश्वेषु काव्येषु रन्तानु जनान् चतते पञ्च धीरः॥ यस्य काव्यं विभोराद्यमजरञ्चामरं श्रुतम्। काव्यप्रकाशकर्तारं कविमाद्यं नुमस्तु तम्।। आनन्दवर्धनकृती विर्युत विरच्य व्याख्यां विधाय विशदामय वामनीये। वक्रोक्तिजीवितविधेऽपि विधाय बृत्ति काव्यप्रकाशमधुना विशदीकरोमि।। चन्थकार ['श्रीमम्मटाचार्य' बन्थके निर्माण-कादमें उपस्थित होनेवाले सम्भाटित ] विघ्नोंके नाशके लिए गन्थके आरम्भमें [ ग्र थारम्भमें स्मरण करने योग्य सरस्वती अथवा विशेषरूपसे कवि- · भारतीरूप ] उचित इष्टदेवताका स्मरण [ध्यान और शिष्योंकी शिक्षाके लिए केवल मानसव्यापांरसाध्य उस ,मरणको 'मङ्गलाचरण' के रूपमें अद्धित भी] करते हैं- ग्रन्थकार 'काव्यप्रकाश' श्रीमम्मटाचार्यकी सर्वोत्तम कृति है। साहित्यशास्त्रमें इस ग्रन्थने और इसके द्वारा इसके निर्माता श्रीमम्मटाचार्यने विपुल ख्याति एवं प्रतिष्ठा प्राप्त की है। परन्तु इस ग्रन्थकी रचनामें केवल मम्मटाचार्यका ही हाथ नहीं है अपित् उसके अन्तिम भागका निर्माण दूसरे कश्मीरी विद्वान् श्री 'अल्लटसूरि' के हाथों हुआ है। ऐसा जान पड़ता है कि मम्मटाचार्य अपने जीवनकालमें 'काव्यप्रकाश' को पूरा नहीं कर सके थे। वे दशम उल्लासका 'परिकर-अलङ्कार' तकका भाग ही लिख पाये थे कि बीचमें ही सब-कुछ छोड़कर स्वर्ग-धाम सिधार गये। उनके पीछे उनके मित्र श्री 'अल्लटसूरि' ने शेष भागकी रचना कर ग्रन्थको पूर्ण किया। इस प्रकार इस ग्रन्थकी रचना दो विद्वानोंके प्रयत्नसे हुई है यह बात ग्रन्थके अन्तिम उपसंहारात्मक श्लोकसे भी प्रतीत होती है, पर उससे भी अधिक स्पष्टरूपसे उसका वर्णन विम्नलिखित दो प्राचीन श्लोकोंमें पाया जाता है- कृत: श्रीमम्मटाचार्यवर्ये: परिकरावधिः । प्रबन्ध: पूरितः शेषं विधायाल्लटसूरिणा ॥ १. 'ऋग्वेद', ६।६२३।
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DSESI
२ काव्यप्रकाश: [ कारिका ५
इस श्लोकमें स्पष्टरूपसे यह प्रतिपादन किया गया है कि मम्मटाचार्यने केवल 'परिकर अलङ्कार' पर्यन्त 'काव्यप्रकाश'की रचना की थी। उनके बाद श्री अल्लटसूरिन शेष भागकी रचनाकर के ग्रन्थको पूर्ण किया। दूसरा श्लोक निम्नलिखित प्रकार है। काव्यप्रकाश इह कोऽपि निबन्धकृद्भ्यां द्वाभ्यां कृतेऽपि कृतिनां रसवत्त्वलाभः । लोकेऽस्ति विश्रुतमिदं नितरां रसालं 'रन्ध्रप्रकाररचितस्य तरोः फलं यत् ।। इसका अभिप्राय यह है कि जैसे रन्ध्र-प्रकार या बन्ध-प्रकार अर्थात् कलम लगानेकी शैलीसे लगाये गये कलमी आरमका फल संसार में अधिक स्वादिष्ट-रूपसे प्रसिद्ध है उसी प्रकार 'मम्मट' तथा 'अल्लट' दो विद्वानों द्वारा बनाये गये इस 'काव्यप्रकाश' ग्रन्थमें भी सहृदय विद्वानोंको विशेष आनन्द मिलता है। कारिका तथा वृत्ति-ग्रन्थोंके कर्ताका अभेद रचना-शैलीकी दृष्टिसे भी 'काव्यप्रकाश' में दो भाग पाये जाते हैं-एक कारिकाभाग औौर दूसरा वृत्तिभाग । यहाँ 'ग्रन्थकृत् परामृशति' ये जो शब्द आपराये हैं उनके आरधारपर कुछ विद्वानोंका विचार है कि इन दोनों भागोंकी रचना अलग-अलग व्यक्तियोंने की है। वे लोग कारिकाभागका रचयिता 'भरतमुनि'को मानते हैं और मम्मटाचार्यको केवल उन कारिकाओंपर वृत्ति लिखनेवाला मानते हैं। अपने मतके समर्थनमें वे निम्नलिखित युक्तियाँ देते हैं- १. 'ग्रन्थकृत् परामृशति' इस वाक्यमें प्रथम-पुरुषके प्रयोग द्वारा वृत्तिकार अपनेसे भिन्न किसी अन्य ग्रन्थकारका निर्देश कर रहे हैं। इससे प्रतीत होता है कि जिन कारिकाओंकी व्याख्या 'मम्मटाचार्य' करने जा रहे हैं उनका निर्माता उनसे भिन्न है। इसलिए ये कारिकाएँ 'भरतमुनि' की बनायी हुई हैं और मम्मटाचार्य केवल उनपर वृत्तिका ही निर्माण कर रहे हैं। २. इस सिद्धान्तके माननेवाले दूसरी युक्ति यह देते हैं कि रूपकके निरूपणके प्रसङ्गमें- समस्तवस्तुविषयं श्रौता आरोपिता यदा। 'आरोपिताः' इति बहुवचनमविवक्षितम्। यह पाठ मिलता है। इसमें ऊपरकी पंक्ति कारिकाभागकी है और नीचेकी पंक्ति वृत्तिभागकी है। कारिकाकारने 'श्रौता आरोपिताः' इन पदोंमें बहुवचनका प्रयोग किया है, परन्तु उसकी व्याख्यामें वृत्तिकार उस बहुवचनको अविवक्षित बतलाते हैं। यदि वृत्तिकार मम्मट ही कारिकाके भी निर्माता होते दो कारिकामें स्वयं ही बहुवचनके स्थानपर एकवचनका प्रयोग कर सकते थे। उस दशामें उसकी व्याख्या में 'बहुवचनमविवक्षितम्' लिखनेकी आवश्यकता ही न होती। परन्तु वास्तवमें कारिका उनकी लिखी नहीं है इसलिए मूल-भरतमुनिकी कारिका-में बहुवचन रखकर उसकी वृत्तिमें उनको 'बहुवचनम् अविवक्षितम्' लिखना पड़ा। मुख्य रूपसे इन दो युक्तियोंके आधारपर ही कुछ विद्वान् 'काव्यप्रकाश'के कारिकाभागको भरत- मुनिकृत मानकर मम्मटाचार्यको केवल वृत्तिभागका निर्माता सिद्ध करना चाहते हैं। परन्तु उनका यह १. बन्ध-प्रकार इति पाठान्तरम्। २. 'काव्यप्रकाश', दशम उल्लास, सूत्न १३६ कारिका ६२ !
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कारिका १] प्रथम उल्लास: ३
पक्ष ठीक नहीं है। यह ठीक है कि मम्मटाचार्यने दो-तीन स्थलोंपर भरतमुनिकी कारिकाएँ भी दी हैं। परन्तु उनकी संख्या बहुत थोड़ी है। 'काव्यप्रकाश' की १४२ कारिकाओंमें केवल दो-तीन कारिकाएँ भरतमुनिकी उद्धृत की गयी है, शेष सब कारिकाएँ मम्मटाचार्यकी स्वयं बनायी हुई ही हैं। ग्रन्थकार जब अपनी बनायी हुई कारिकाओंपर स्वयं वृत्ति लिखने बैठता है तो वह अपनेको कारिकाकारसे भिन्न-सा मानकर 'ग्रन्थकृत् परामृशति' आदि प्रथम-पुरुषका प्रयोग करता है और स्वरचित कारिकाकी व्याख्यामें स्वयं ही 'बहुवचनमविवक्षितम्' आदि भी लिख सकता है। इस प्रकारका व्यवहार न केवल 'काव्य- प्रकाश' में अपितु अ्र्प्रन्य त्र्प्रनेक ग्रन्थोंमें भी पाया जाता है। मम्मटाचार्यके अ्र्प्रतिरिक्त आ्र्प्रानन्दवर्धन, कुन्तक, मुकुलभट्ट, विश्वनाथ आदि आचार्योंने भी इस पद्धतिका अवलम्बन किया है। इन सभीने स्वयं कारिका- रूपमें अपने ग्रन्थोंकी रचनाकर उनपर स्वयं ही वृत्तिकी रचना की है। इसी प्रकार मम्मटाचार्यने भी अपनी लिखी कारिकाओंपर स्वयं ही वृत्ति लिखकर 'काव्यप्रकाश'की रचना की है यह मानना ही उचित है।
इसके अतिरिक्त चतुर्थ उल्लासमें जहाँ मम्मटाचार्यने रसका निरूपण किया है वहाँ "उक्तं हि भरतेन' लिखकर विशेषतः प्रमाणरूपसे भरतमुनिका उल्लेख किया है। इससे भी यह सिद्ध होता है कि केवल वह अंश भरतमुनिका है। अन्य सब कारिकाभाग स्वयं मम्मटाचार्यका ही है। इसी प्रकार दशम उल्लासमें रूपकालङ्कारके निरूपणमें 'माला तु पूर्ववत्' यह कारिकाका भाग आया है। परन्तु इसके पूर्व किसी कारिकामें 'माला' का वर्णन नहीं आया है। हाँ, उपमालद्वारके प्रसङ्गमें वृत्तिभागमें 'एकस्यैव बहूपमानोपादाने मालोपमा' यह पङक्ति अवश्य आयी है। 'मालारूपक'वाली कारिकामें वृत्तिभागके इसी अंशकी ओर सङ्केत किया गया है। यदि कारिकाएँ भरतमुनिकी होतीं तो इस वृत्तिभागका सद्केत उसमें कैसे हो सकता था ! इसलिए भी 'काव्यप्रकाश' के कारिकाभाग तथा वृत्तिभाग दोनों मम्मटाचार्यके बनाये हुए हैं यही बात मानना उचित एवं अधिक युक्तिसंगत है। साहित्य-मोमांसाका विवेचन
हमने अपनी बनायी 'साहित्य-मीमांसा' नामक कारिका-रूपमें लिखी हुई अन्य पुस्तकमें इस विषयका विवेचन इस प्रकार किया है- काव्यप्रकाशनामा च मम्मटाचार्यनिर्मितः । ग्रन्थो लेभे परां ख्याति शते तु द्वादशे कृतः ॥१॥ "कृतः श्रीमम्मटाचार्यवर्येः परिकरावधिः । ग्रन्थ: सम्पूरितः शेषं विधायाल्लटसूरिणा ।" कारिका भरतस्यात्र वृत्तिर्मम्मटनिर्मिता। य एवं मेनिरे केचिन्मतं तेषामशोभनम् ॥२। कारिकाणां शते त्वत् द्वाचत्वारिंशदुत्तरे। कथं हरेयुः स्वातन्त्र्यं द्वित्रा भरतकारिकाः ॥३॥
१. सूत्र ४३, कारिका २७ की व्याख्या। २. 'साहित्य-मीमांसा' ६।
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काव्यप्रकाश: [कारिका १
१ग्रन्थारम्भे प्रयोगो यः प्रथमे पुरुषे कृतः । 'परामृशती'ति नूनं सोऽनहङ्कारसूचकः ।४। रूपके कारिकायान्तु बहुवचनं प्रयुज्यते। वृत्तौ तस्य च सम्प्रोक्तं 'बहुत्वमविवक्षितम्' ।।५।। तेनापि भिन्नकर्तृत्वमनयोर्न प्रसिद्धयति। स्वाभिन्नकर्तृकत्वेऽपि तथा व्याख्यानसम्भवात् ।६।। मङ्गलं मूलमात्ने तु वृत्तेरादौ न दृश्यते। एतेनापि तयोरेककर्तृकत्वं सुनिश्चितम्।।७।। 'तदुक्तं भरतेनेति' वृत्तिस्तुये तु दृश्यते । सर्वाश्चेत् कारिकास्तस्य किमर्थमत्र कीर्तनम् ॥८॥। रूपके कारिकायां हि प्रोक्तं 'माला तु पूर्ववत्' । वृत्तेस्तेन परामर्शान्न कर्तृत्वं विभिद्यते ।।६।। तस्मात् काव्यप्रकाशस्य वृत्तिभागोऽथ कारिकाः । उभयं मम्मटेनैव निमितमिति निश्चितम् ॥१०॥ इस प्रकार श्रीमम्मटाचार्यने अपनी बनायी हुई कारिकाओंकी ही व्याख्या स्वयं लिखकर अपने इस ग्रन्थकी रचना की है यह बात बिलकुल निश्चित है। ग्रन्थका लक्षण पञ्चाङ्गकं वाक्यं ग्रन्थः अर्थात् पाँच अवयवोंसे युक्त वाक्यको ग्रन्थ कहते हैं। वस्तुतः उन पाँच अङ्गोंको ही दूसरी जगह 'पञ्चाधिकरण' नामसे कहा गया है- विषयो विशयश्चैव पूर्वपक्षस्तथोत्तरम्। निर्णयश्चेति पञ्चाङ्गं शास्त्रेऽधिकरणं विदुः ॥ (१) विषय, (२) उसके सम्बन्धमें विशय अपर्थात् संशय, (३) पूर्वपक्ष, (४) उत्तरपक्ष आदि दिखलाकर अन्तमें किसी (५) निर्णयको प्राप्त करना यह पाँच अङ्ग शास्त्रमें 'अधिकरण' माने गये हैं, वे ही पाँचों ग्रन्थोंके भी त्रङ्ग हैं। उन पाँचों अङ्गोंसे युक्त महावाक्य 'ग्रन्थ' कहलाता है। 'काव्यप्रकाश' में भी अनेक विषयोंमें पूर्वपक्ष आदिका निराकरण करके निर्णय या सिद्धान्त स्थिर किये गये हैं इसलिए यह भी ग्रन्थ कहा जाता है। अन्य विद्वानोंने 'सम्बन्धप्रयोजनज्ञानाहितशुश्रूषाजन्यश्रुतिविषयशब्दसन्दर्भो ग्रन्थ:' यह ग्रन्थका लक्षण किया है। मङ्गलाचरण प्रत्येक शुभकार्यके प्रारम्भमें भगवान्का स्मरण करना सभी आस्तिकोंमें समानरूपसे पाया जाता है। इसलिए ग्रन्थके आरम्भमें भी किसी-न-किसी रूपमें अपने इष्टदेवताका स्मरण किये जानेकी परम्परा सारे भारतीय साहित्यमें पायी जाती है। इसको 'मङ्गलाचरण' नामसे कहा जाता है। इस 'मङ्गलाचरण' अथवा भगवान्के नामका स्मरण करनेसे कार्य-सिद्धिके मार्गमें आ्रनेवाली विध्नबाधाओंके ऊपर विजय प्राप्त करनेकी क्षमता प्राप्त होती है। इसलिए विध्नविघातको भी 'मङ्गलाचरण' का एक मुख्य प्रयोजन माना जाता है। इसी परम्पराके अनुसार मम्मटाचार्यने भी अपने ग्रन्थके आरम्भमें १. 'साहित्य-मीमांसा' ६।
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कारिका १ ] प्रथम उल्लास: ५
नियतिकृतनियमरहितां ह्वादैकमयोमनन्यपरतन्त्राम् । नवरसरुचिरां निर्मितिमादधती भारती कवेर्जयति।।१।। पहिली कारिका मङ्गलाचरणके स्वरूपमें लिखी है। 'काव्यप्रकाश' नामसे यह साहित्यशास्त्रके एक मुख्य ग्रन्थका निर्माण करने जा रहे हैं। इसलिए उन्होंने वाङमयकी अधिष्ठातृ-देवता और उसमें भी विशेषरूपसे कवि-भारतीका इष्टदेवताके रूपमें स्मरण करना उचित समझा है। अतएव 'भारती कवेजयति' के रूपमें उस कवि-भारतीका जय-जयकार करते हुए वे लिखते हैं- [पद्मत्वादिरूप असाधारण धर्म अथवा अदृष्ट या धर्माधर्मादिरूप ] नियतिके द्वारा निर्धारित नियमोंसे रहित, केवल आनन्दमात्रस्वभावा, [कविकी प्रतिभाको छोड़कर ] अन्य किसीके अधीन न रहनेवाली तथा [छह रसोंके स्थान पर] नौ रसों [के योग ] से मनोहारिणी काव्य-सृष्टिकी रचना करनेवाली कविकी भारती [वाणी-सरस्वती ] सर्वोत्कर्षशालिनी है।।१।। कवि-सृष्टिकी विशेषताएँ ध्वन्यालोककार आनन्दवर्धनाचार्यने कविको स्वयं प्रजापति या ब्रह्मा और काव्यसंसारको उसकी सृष्टि कहा है- अपारे काव्यसंसारे कविरेकः प्रजापतिः । यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते।। इस अपार काव्यसंसारका निर्माता कवि है। उस कवि-प्रजापतिकी इच्छा और रुचिके अनुसार ही इस काव्यसंसारकी रचना होती है। यह कहकर आनन्दवर्धनाचार्यने कविके असाधारण महत्त्वका प्रतिपादन किया है, पर मम्मटाचार्य उससे भी एक पग आगे बढ़ गये हैं। उन्होंने कविकी सृष्टिको ब्रह्माकी सृष्टिसे भी उत्कृष्ट माना है और इस प्रकार कविकी सामर्थ्यको ब्रह्माके सामथ्योंसे अधिक महत्त्व प्रदान किया है। अपने इस मङ्गलाचरणमें ग्रन्थकारने अपने इष्ट-देवता 'कवि-भारती' को सर्वोत्कर्षशालिनी सिद्ध करनेके लिए 'व्यतिरेकालूङ्कार' का प्रयोग किया है। उपमानसे उपमेयका आधिक्य वर्णन करनेपर व्यतिरेकालङ्कार होता है। यहाँ ब्रह्माकी सृष्टिरूप उपमानकी अपेक्षा कवि- भारतीकी सृष्टि-निर्मिति-के उत्कर्षका प्रतिपादन कर ग्रन्थकारने उसके सर्वोत्कर्षशालित्वकी स्थापना की है। ब्रह्माकी सृष्टिकी अपेक्षा कविकी सृष्टिमें काव्यप्रकाशकारने चार प्रकारकी विशेषताओंका उल्लेख इस मङ्गल-श्लोकमें किया है। उनको इस प्रकार समझना चाहिये- १. पहली विशेषता यह है कि ब्रह्माकी सृष्टि 'नियतिकृतनियमसहिता' है, परन्तु कविकी सृष्टि 'नियतिकृतनियमरहिता' है। 'नियति' शब्दके दो अरथ हो सकते हैं। 'नियम्यन्ते सौरभादयो धर्मा अ्नया इति नियतिरसाधारणो धर्म: पद्मत्वादिरूपः' अर्थात् जिसके द्वारा सौरभ आदि धर्मोंका नियन्त्रण किया जाता है वे पद्मत्वादिरूप असाधारण धर्म 'नियति' पदसे कहे जाते हैं। उसके द्वारा किया गया नियम 'यत्र पद्मत्वं तत्र सौरभविशेषः जहाँ पद्मत्व होता है वहाँ विशेष प्रकारका सौरभ रहता है इस प्रकारकी व्याप्तिको 'नियति-कृत-नियम' कहा जा सकता है। ब्रह्माकी सृष्टि इस 'नियति-कृत-नियम'से युक्त है। उसमें इस प्रकारकी व्याप्ति पायी जाती है कि विशेष प्रकारके सौरभ आ्र्रादिका विशेष पदार्थोंके साथ ही सम्बन्ध होता है, परन्तु कविकी सृष्टिमें इस प्रकारका कोई नियम नहीं है। उसकी सृष्टिमें स्त्रीके १. 'ध्वन्यालोक', पृष्ठ ४२२।
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६ काव्यप्रकाश: [कारिका १
मुखमें कमलकी सुगन्ध, उसकी आँखोंमें कमलका सौन्दर्य और उसके शरीरमें कमलकी कोमलता रहती है। उसकी सृष्टिमें चन्द्रमाकी शीतल चाँदनी और मेघोंकी मन्दध्वनिसे भी विरहिणियोंके लिए आ्गकी लपटें निकलती हुई दिखलायी देती हैं। इसलिए कविकी सृष्टि 'नियतिकृत-नियम-रहिता' है। 'नियति' शब्दका दूसरा अर्थ 'अदृष्ट' या धर्माधर्म' है। ब्रह्माकी सारी सृष्टि 'अदृष्ट' के सिद्धान्तपर ही स्थिर है। प्राणियोंके पूर्वकृत कर्म या 'अदृष्ट'के फलभोगके लिए ही इस सृष्टिकी रचना हुई है और उसीके अनुसार प्रत्येक व्यक्तिको सुख-दुःख, स्वर्ग और नरककी प्राप्ति होती है। परन्तु कविकी सृष्टि इन सब बन्धनोंसे परे है। कवि केवल अपनी कल्पनाके सहारे जब चाहता है अपने नायकको या पात्रोंको विघ्न-बाधाओंके भयङ्कर संघर्षमें डाल देता है और जब चाहता है तब अतकितरूपसे मनोवाञ्छित सामग्रीसे भी अधिक सुख-सामग्री उनके सामने उपस्थित कर देता है। ""स्वर्गप्राप्तिरनेनैव देहेन वर्वणिनी।" के अनुसार वह इसी शरीरसे मनुष्यको सदेह स्वर्गमें पहुँचा सकता है। इसलिए कवि- सामर्थ्य ब्रह्माके सामर्थ्यसे कहीं अधिक है। मङ्गलाचरणके श्लोकमें 'नियतिकृतनियमरहिताम्' लिखकर मम्मटाचार्यने कवि-भारतीकी इसी विशेषताका उल्लेख किया है। २. कवि-सृष्टिकी दूसरी विशेषता 'ह्वादकमयत्व' है। ब्रह्माकी सृष्टिमें सुख-दुःख दोनोंका अस्तित्व है। कोई प्राणी संसारमें रहकर दुःखसे नहीं बच सकता। सांसारिक सुखोंके साथ दुःखका भोग अवश्यम्भावी है। परन्तु कविकी सृष्टिमें दुःखका अस्तित्व नहीं है। उसकी सृष्टिमें जब हम 'इन्दुमती' के वियोगमें 'अज'को विलाप करते हुए सुनते हैं और जब 'उत्तररामचरित'के कविको सीता- वियोगमें रोते हुए रामचन्द्रको देखकर "अपि ग्रावा रोदित्यपि दलति वज्रस्य हृदयम्" पत्थरोंको रुलाते हुए पाते हैं तब उस करुण रसमें भी आनन्दका अनुभव करते हैं। उस आनन्दातिरेकसे द्रवीभूत होकर नेत्रोंसे भी अश्रुधारा प्रवाहित होने लगती है। कविकी सृष्टिमें रुदन एवं कन्दनसे भरा हुआ करुणरस भी आनन्दानुभूतिस्वरूप ही है- करुणादावपि रसे जायते यत् परं सुखम् । सचेतसामनुभवः प्रमाणं तत्र केवलम् ॥ इसलिए कविकी सृष्टि 'ह्लादकमयी'-केवल सुखमयी-है। 'संख्याः संख्येये ह्याद्वादश त्रिषु' 'अमरकोश' के इस वचनके अनुसार द्वादशपर्यन्त संख्या-वाचक शब्द संख्याके अतिरिक्त संख्येय वस्तुके वाचक भी होते हैं। इसलिए यहाँ 'एक' शब्द संख्याका नहीं अपितु संख्येयका वाचक है। उससे "तत्प्रकृतवचने मयट' इस सूत्रसे मयट्-प्रत्यय होकर 'एक [ वस्तु ] प्राचुर्येण प्रस्तुतं यस्यां सा एकमयी' एक वस्तु जिसमें प्रचुरतासे प्रस्तुत है वह 'एकमयी' हुई है। 'ह्वादेन एकमयी ह्वादकमयी' इस प्रकारका समास होकर 'ह्लादकमयी' यह पद सिद्ध होता है और इसका अर्थ 'आनन्दमात्रपरिच्छिन्नस्वरूपा' होता है।ह्वाद' शब्दका 'एक' शब्दके साथ 'कर्मधारय-समग्प' करके 'ह्लादश्चासौ एक: ह्वादकः' पद बनाकर और उससे 'मयट्-प्रत्यय' करके इस पदको सिद्ध करनेका प्रयत्न नहीं करना चाहिये, क्योंकि उस दशामें "पूर्वकालैकसर्वंजरत्पुराणनवकेवलाः समानाधिकरणेन' इस सूत्रसे 'पूर्वनिपात अनिवार्य १. 'काव्यप्रकाश', अष्टम उल्लास, उदाहरण सं० ३४७। २. 'उत्तररामचरित' १, २८। ३. 'साहित्यदर्पण' ३, ४ । ४. 'अष्टाध्यायी' ५, ४, २१ । ५. 'अष्टाध्यायी' २, १, ४६।
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कारिका १ ] प्रथम उल्लास: ७ होनेके कारण 'एकश्चासौ ह्वाद: एकह्वादः' यह रूप बनेगा, 'ह्वादकः' रूप नहीं बनेगा। इसलिए इस प्रकारका समास न करके पूर्वोक्त रीतिसे पहिले संख्ये-वस्तु-वाचक 'एक' शब्दसे प्राचुर्यार्थमें अथवा प्रदीपका रके अनुसार स्वार्थमें मयट्-प्रत्यय करके 'एकमयी' शब्द बना लेनेके बाद उसका तृतीयान्त 'ह्वाद' शब्दके साथ 'ह्वादेन एकमयी ह्लादकमयी' इस प्रकारका समास करना ही उचित है, जिसका अर्थ 'आनन्दमात्रस्वभावा' होता है। इससे ब्रह्माकी सृष्टिमें सांख्याभिमत सुख-दुःख-मोहस्वभावत्वकी अपेक्षा कविकी सृष्टिमें आनन्दमात्रस्वभावत्व दिखलाकर ग्रन्थकारने कवि-सृष्टिके दूसरे उत्कर्षका प्रतिपादन किया है। ३. कविकी सृष्टिमें तीसरी विशेषता मम्मटाचार्यने 'अनन्य-परतन्त्राम्' इस पदसे प्रदर्शित की है। ब्रह्माकी सृष्टि प्रकृति अथवा सभवायि असमवायि-निमित्तकारण आदिके बिना सम्भव न होनेके कारण इनके अधीन है परन्तु कविकी सृष्टिके लिए कविकी अपनी प्रतिभाके अतिरिक्त अन्य किसी सामग्रीकी आवश्यकता नहीं होती। वह किसी दूसरेके अधीन न होनेसे 'अनन्यपरतन्त्ना' है। इसीलिए वह ब्रह्माकी सृष्टिकी अपेक्षा उत्कर्षशालिनी है। अनन्य-परतन्त्ना पदमें 'परतन्त्न' पदका प्रयोग किया गया है, इसमें परतन्त्र शब्दका अरथ अधीन है। परतन्त्रका पराधीन अरथ न करके केवल अधीन अर्थ ही करना चाहिये। क्योंकि 'अनन्यपराधीना' यह अरथ कुछ सङ्गत-सा नहीं होता है। इसलिए यहाँ 'परतन्त्न' शब्दका केवल 'अधीन' अर्थ ही लेना चाहिये। "परतन्त्र: पराधीन: परवान्नाथवानपि। अधीनो निघ्न आयत्तोऽस्वच्छन्दो गृह्यकोऽप्यसौ ।। 'अमरकोश'के इस वचनके अनुसार 'परतन्त्र' शब्द केवल 'अधीन' अर्थका वाचक भी माना गया है। ४. ब्रह्माकी सृष्टिकी अपेक्षा कविकी सृष्टिमें चौथी विशेषता यह दिखलायी है-ब्रह्माकी सृष्टिमें मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कषाय और तिक्त केवल ये छः प्रकारके रस पाये जाते हैं। उनमेंसे सब रस मनुष्योंको प्रिय ही नहीं हैं, कटु-रस अत्यन्त अप्रिय भी है। औषध आदिके रूपमें भी उसका सेवन करनेसे आदमी घबड़ाता है। परन्तु कवि-सृष्टिके रसोंमें एक विशेषता तो यह है कि उसमें छह रसोंके स्थानपर शङ्गार, वीर, करुण आदि नौ रस होते हैं और जैसा कि अभी कहा जा चुका है, दूसरी विशेषता यह है कि वे सब रस केवल आनन्दमय ही होते हैं। इसलिए कविकी सृष्टि 'नवरसा' और 'रुचिरा' होनेके कारण भी ब्रह्माकी सृष्टिकी अपेक्षा अधिक उत्कृष्ट है यह ग्रन्थकारका अभिप्राय है। 'नवरस' पदमें 'नवानां रसानां समाहारः' इस प्रकारका समास नहीं करना चाहिये, क्योंकि उस दशामें 'अकारान्तोत्तरपदो द्विगुः स्त्रियामिष्टः' इस महाभाष्यके वचनके अनुसार त्रिलोकी, पञ्चमूली आदिके समान 'नवरसी' इस प्रकारका प्रयोग प्राप्त होगा। इसलिए 'समाहार द्विगु-समास' न करके 'नवसंख्याका रसा यस्यां सा नवरसा' इस प्रकारका 'बहुव्रीहिसमास' करनेके बाद फिर 'नवरसा चासौ रुचिरा चेति नवरसरुचिरा' यह 'कर्मधारयसमास' करके इस पदको बनाना चाहिये। अथवा 'नवावय- वश्चासौ रसश्च' इस विग्रहमें 'शाकपार्थिवत्वात्' मध्यमपदलोपी कर्मधारयसमास करके 'नवरसा' पद बनानेके बाद उसका 'रुचिरा' पदके साथ फिर कर्मधारयसमास किया जा सकता है। इस प्रकार ब्रह्माकी सृष्टिकी अपेक्षा कवि-भारतीकी रचनामें चार महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ पायी १. 'अमरकोश' ३-१-१६ ।
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काव्यप्रकाश: [कारिका १
नियतिशक्त्या नियतरूपा सुखदुःखमोहस्वभावा परमाण्वाद्युपादानकर्मादिसह- कारिकारणपरतन्त्रा षड्सा, न च हृद्ैव तैः, तादृशी ब्रह्मणो निर्मितिर्निर्माणम् । एत- द्विलक्षणा तु कविवाङनिमितिः । अत एव जयति। जयत्यर्थेन च नमस्कार आक्षिप्यत इति तां प्रत्यस्मि प्रणत इति लभ्यते ।।१।। जाती हैं। ब्रह्माकी अपेक्षा कहीं अधिक उत्कृष्ट सृष्टिकी रचना करनेवाली कवि-भारती 'जयति' अर्थात् सर्वोत्कर्षशालिनी है, यह लिखकर मम्मटाचार्यने अपने ग्रन्थके आ्रम्भमें कवि-भारतीका जय-जय-कार किया है और उसके द्वारा कवि-भारतीके प्रति अपनी सम्मान-भावना द्वारा नमस्कार भी सूचित किया है। [ब्रह्माकी ] सृष्टि 'नियति' [पद्मत्वादिरूप असाधारण धर्म अथवा अदृष्ट ] के सामर्थ्यसे निश्चित स्वरूपवाली, [त्रिगुणात्मक होनेसे ] सुख-दुःखमोहस्वभावसे युक्त, परमाणु आदि रूप उपादान- कारण, तथा कर्म आदि रूप सहकारिकारणके अधीन, छह रसोंसे युक्त और उनसे केवल मनोहारिणी ही नहीं [अपितु अ्ररुचिकर भी ] इस प्रकारकी ब्रह्माकी रचना अर्थात् सृष्टि है। कवि-भारतोकी सृष्टि तो इसके विपरीत [नियतिकृतनियमरहिता, ह्वादकमयी, अनन्यपरतन्त्रा और नवरसरुचिरा ] है, इसलिए [कविकी भारती ] विजय-शालिनी [सर्वोत्कर्षसे युक्त ] है। 'जयति' [क्रिया ] के अर्थसे [जयकार करनेवालेका उसके प्रति] नमस्कार आक्षिप्त [बिना कहे अर्थतः बोधित ] होता है। इसलिए मैं उसेका अभिवादन करता हूँ यह [अर्थ भी ] सूचित होता है ।१॥ मङ्गलाचरणके इस श्लोकमें 'आर्या' छन्दके 'गीति' नामक भेदका लक्षण पाया जाता है। आर्या छन्दका लक्षण कालिदासने 'श्रुतबोध' में इस प्रकार किया है- यस्या: प्रथमे पादे द्वादश मात्रास्तथा तृतीयेऽपि। अ्ष्टादश द्वितीये चतुर्थके पञ्चदश सार्या।। संस्कृतके इस 'आर्या' छन्दको ही प्राकृतमें 'गाथा' नामसे कहा जाता है। इसी छन्दमें संस्कृतकी 'आर्या-सप्तशती' तथा प्राकृतकी 'गाथा-सप्तशती'की रचना हुई है। 'प्राकृत-पिङ्गल'के आचार्य पिङ्गलनागने गाथाका लक्षण इस प्रकार किया है- पढमं बारह मत्ता बीए अट्टारहेहिं संजुत्ता। जह पढमं तह तीतं दहपञ्चबिहूसिश् गाहा।। गाथाका यह लक्षण आर्या छन्दके पूर्वोक्त लक्षणसे बिलकुल मिलता-जुलता है। यहाँ मम्मटा- चार्यने अपने मङ्गलाचरणके श्लोकमें इसी 'आर्या' छन्दके विशेष भेद 'गीति' का प्रयोग किया है। 'गीति' का लक्षण इस प्रकार किया गया है- आआर्या प्रथमदलोक्तं कथमपि लक्षणं भवेदुभयोः। दलयो: कृतयतिशोभां तां गीति गीतवान् भुजङ्गेशः ॥ इस मङ्गलश्लोकमें उपमानभूत ब्रह्माकी सृष्टिकी अपेक्षा उपमेयभूत कवि-भारतीकी सृष्टिमें
१. 'श्रुतबोध'। २. प्राकृत-पिंङ्गल'। ३. वृत्तरत्नाकर २-८।
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कारिका १] प्रथम उल्लास:
चार प्रकारका आधिक्य दिखलाया गया है इसलिए यहाँ व्यतिरेकालङ्कार है। व्यतिरेकालङ्कारका लक्षण 'काव्यप्रकाश' में इस प्रकार किया गया है- "उपमानाद् यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः'। 'भारती कवेजयति' में कविपदमें जो षष्ठीका प्रयोग हुआ है वह सम्बन्ध-सामान्यका सूचक है। 'कवेर्भारती' इसके दो अर्थ हो सकते हैं-एक कविकी भारती अरथात् काव्य, और दूसरी कविकी भारती अरथात् उसकी आराध्य-देवता सरस्वती। इन दोनोंमेंसे पहिले अर्थमें कविका, काव्य-रूप अपनी भारतीके साथ जन्य-जनक-भाव-सम्बन्ध होगा और देवतारूप दूसरे पक्षमें कविका भारतीके साथ आराध्य-आराधक-भाव-सम्बन्ध होगा। 'जयत्यर्थेन नमस्कार आक्षिप्यते' यहाँ 'जयति'का अर्थ उत्कर्षशालिनी होता है। इसलिए 'जयत्यर्थेन'का अर्थ 'उत्कर्षेण' होता है। उससे अपने अपकर्षज्ञानपूर्वक प्रह्वीभावरूप नमस्कारकी अभिव्यक्ति होती है। 'वैयाकरण-मञ्जूषामें' 'सुबर्थ'के प्रकरणमें 'नमः' शब्दका अर्थ "अपकृष्टत्वज्ञान- बोधनानुकूलो व्यापार: स्वरादिपठितनम:शब्दार्थः" इस प्रकार किया है। नमस्कार करनेवाला पुरुष नमस्कार्यकी अपेक्षा अपनेको छोटा समझकर ही नमस्कार करता है। इसलिए नमस्कार्य कविभारतीके 'जयति' पदसे सूचित उत्कर्षके द्वारा ग्रन्थकर्ताके नमस्कार या प्रह्लीभावकी सूचना मिलती है। अतएव यहाँ 'जयति' कहनेसे 'मैं उस कवि-भारतीको नमस्कार करता हूँ' यह अर्थ ही प्रतीत होता है; यह ग्रन्थकारका अभिप्राय है।।१।।
अनुबन्धचतुष्टय इस प्रकार प्रथम कारिकामें मङ्गलाचरण करनेके बाद ग्रन्थके विषय, प्रयोजन आादि रूप अ्नु- बन्धचतुष्टयका निरूपण करनेका अवसर आता है। किसी भी कार्यमें मनुष्य तभी प्रवृत्त होता है जब उसमें उसको इष्ट-साधनता तथा कृतिसाध्यताका ज्ञान होता है। 'इदं मदिष्टसाधनम्' यह कार्य मेरे लिए हितकर या मेरे अभीष्टका साधन है और 'इदं मत्कृति-साध्यम्' मैं इस कार्यको भली प्रकार कर सकता हूँ इस प्रकारका ज्ञान होनेपर ही मनुष्य किसी कार्यमें प्रवृत्त हो सकता है अन्यथा नहीं। इस ज्ञानमें 'इदम्' अंशसे विषय, 'इष्ट' पदसे प्रयोजन, 'साधनम्' पदसे सम्बन्ध एवं 'मत्' पदसे अधिकारीका ज्ञान होता है। इस प्रकार इन चारोंका ज्ञान ही प्रवृत्तिका प्रयोजक होता है। इसलिए 'प्रवृत्तिप्रयोजक- ज्ञानविषयत्वम् अनुबन्धत्वम्' यह 'अनुबन्ध'का लक्षण किया गया है और अधिकारी, विषय, सम्दन्ध और प्रयोजन इन चारोंको 'अनुबन्ध' शब्दसे कहा जाता है। प्रत्येक ग्रन्थके आ्ररारम्भमें इन चारों अ्र्प्रनुबन्धों- का निरूपण आवश्यक माना गया है- सिद्धार्थं सिद्धसम्बन्धं श्रोतुं श्रोता प्रवर्तते। शास्त्रादौ तेन वक्तव्यः सम्बन्धः सप्रयोजनः । इन चार अनुबन्धोंमें विषय तथा प्रयोजन ये दो अनुबन्ध मुख्य हैं अतः इनका शब्दतः निरूपण आवश्यक होता है। शेष अधिकारी तथा सम्बन्ध इनकी अपेक्षा गौण हैं, इनकी सिद्धि शब्दतः कहे बिना अर्थतः भी हो जाती है। इसलिए अगली कारिकामें ग्रन्थकार अपने ग्रन्थके विषय और प्रयोजनका प्रतिपादन करेंगे।
९. 'काव्यप्रकाश', दशम उल्लास, सत्र १५८. कारिका १०५।
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१० काव्यप्रकाश: [कारिका २
इहाभिधेयं सप्रयोजनमित्याह- काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये । सद्यः परनिवृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे ॥।२। कालिदासादीनामिव यशः, श्रीहर्षदिर्धावकादीनामिव धनम्, राजादिगतोचिता- चारपरिज्ञानम्, आदित्यादेमयूरादीनामिवानर्थनिवारणम्, सकलप्रयोजनमौलिभूतं सम- नन्तरमेव रसास्वादन-समुद्भूतं विगलितवेद्यान्तरमानन्दम्, प्रभुसम्मितशब्द प्रधानवेदादि- शास्त्रेभ्यः सुहृत्सम्मितार्थतात्पर्यवत्पुराणादीतिहासेभ्यश्च शब्दार्थयोर्गुणभावेन रसाङ्ग- भूतव्यापारप्रवणतया विलक्षणं यत्काव्यं लोकोत्तरवर्णनानिपुणं कविकर्म तत् कान्तेव
ग्रन्थके नामसे ही प्रतीत हो जाता है कि इस ग्रन्थका प्रतिपाद्य विषय काव्यसे सम्बन्ध रखनेवाला है, अर्थात् इसमें काव्यसे सम्बन्ध रखनेवाले गुण, दोष, रीति, अलङ्कार आदिका विवेचन किया गया है। इसलिए वह काव्य-चर्चा ही इसका विषय है और काव्यका जो प्रयोजन है वही इस ग्रन्थका भी प्रयोजन है, क्योंकि यह ग्रन्थ भी उस काव्य-फलकी सिद्धिमें प्रधान कारण होता ही है। इसलिए अपने ग्रन्थका प्रयोजन लिखनेके स्थानपर ग्रन्थकार मुख्यरूपसे विषय-भूत काव्यका प्रयोजन दिखाते हुए आगे लिखते हैं-
काव्यके प्रयोजन और यहाँ [इस ग्रन्थमें ] कहा जानेवाला [काव्यका लक्षण, उसके भेद, गुण, दोष, अलड्गार आदि रूप ] विषय [रसास्वादन आदि रूप काव्यके फलोंकी सिद्धिका प्रधान साधन होनेसे ] सप्रयोजन है यह [काव्यके प्रयोजनोंको दिखाते हुए ] कहते हैं- काव्यका यशजनक, अर्थका उत्पादक, [लोक-] व्यवहारका बोधक, [शिव अर्थात् कल्याण, शिवेतर अर्थात् उससे भिन्न ] अनिष्टका नाशक, पढ़ने [ या सुनने, देखने आदि] के साथ ही [सद्यः ] परम आनन्दका देनेवाला और स्त्रीके समान [सरसरूपसे कर्तव्याकर्तव्यका ] उपदेश प्रदान करनेवाला होता है ।२॥ [काव्यका निर्माण कविको ] कालिदास आदिके समान (१) यश [की प्राप्ति, नषध महाकाव्यके प्रणेता महाकवि श्रीहर्षसे नहीं, अपितु 'रत्नावली नाटिका'के प्रणेता राजा ] श्रीहर्ष आदिसे धावक आदि [पण्डितों ] के समान (२) धन [की प्राप्ति कराता है और काव्योंके अध्ययन करनेसे पढ़नेवालोंको वणित राजा आदिके साथ अन्य लोगोंके व्यवहारको पढ़ने या नाटक आदिमें देखनेके द्वारा काव्य ही] (३) राजा आदिके साथ किये जाने योग्य आचारका परिज्ञान [कराता है। इसी प्रकार काव्यनिर्माण ] (४) सूय आदि [की स्तुति ]से 'मयूर' [ कवि ] आदि [के कुष्ठ-निवारण ] के समान अनर्थका निवारण [करता है] और इन समस्त प्रयोजनोंमें मुख्य [काव्यके पढ़ने या सुननेके बाद सद्य: ] तुरन्त ही रसके आस्वादनसे समुत्पन्न और अन्य सब विषयोंके परिज्ञानसे शून्य (५) परम आनन्द [की अनुभूति ], तथा राजा [की आज्ञा ] के समान शब्द-प्रधान वेद आदि शास्त्रोंसे [विलक्षण ], मित्र [-वचन ] के समान अर्थ-प्रधान पुराण और इतिहास आदिसे (विलक्षण), शब्द तथा अर्थ दोनोंके गुणीभावके कारण रसके साधक [व्यञ्जन ] व्यापारकी प्रधानताके द्वारा, [वेद-शास्त्र-पुराण-इतिहास आदिसे ] विलक्षण, जो लोकत्तर वर्णन-शैलीमें निपुण कविका कर्म [अर्थात् काव्य ] है वह (६) स्त्रीके समान सरसताके
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कारिका २ ] प्रथम उल्लास: ११
सरसतापादनेनाभिमुखी कृत्य रामादिवद्व्तितव्यं न रावणादिवदित्युपदेशं च यथायोगं कवे: सहृदयस्य च करोतीति सर्वथा तत्र यतनीयम् ॥२।। साथ [सरस बनाकर ] राम आदिके समान आचरण करना चाहिये, रावण आदिके समान नहीं, यह यथायोग्य उपदेश [आवश्यकतानुसार ] कवि तथा सहृदय [पाठक आदि] दोनोंको कराता है। इसलिए [काव्यकी रचना तथा उसके अध्ययन ] में अवश्य प्रयत्न करना चाहिये ॥२॥ इस वाक्यका अर्थ समझनेके लिए उसका विश्लेषण करना आवश्यक है। वाक्यका क्रियापद 'करोति' लगभग वाक्यके अन्तमें आया है। इस क्रियाके कर्म-पद यशः, धनम्, आचार-परिज्ञानम्, अनर्थनिवारणम्, आनन्दम्, उपदेशं च ये ६ हैं। इन सबके साथ उपमा और विशेषण जुड़े हुए हैं। विशेषरूपसे आ्र्ानन्दके साथ 'सकलप्रयोजनमौलिभूतम्', 'रसास्वादनसमुद्भूतम्' औ्र्प्रौर 'विगलितवेद्यान्तरम्' ये तीन विशेषण जुड़े हुए हैं। वाक्यमें 'काव्यम्' पद कर्तृपद है। पर उसके साथ 'वेदादिशास्त्रेभ्यः पुराणादीतिहासेभ्यश्च विलक्षणं' इन विशेषणोंको जोड़कर 'यत् काव्यं तत्', यह कर्तृपद बनता है। इन विशेषणोंके साथ भी दूसरे विशेषण जुड़े हुए हैं। 'प्रभुसम्मित-शब्दप्रधानवेदादिशास्त्रेभ्यः [विलक्षणं] सुहृत्सम्मितार्थतात्पर्यवत्पुराणादीतिहासेभ्यश्च [विलक्षणं ] यत् काव्यं तत्-यशः, धनम्, आचार- परिज्ञानम्, अनर्थनिवारणम्, उपदेशं च करोति' यह वाक्य बनता है। वेद-शास्त्र-इतिहास-पुराणादिसे काव्यकी विलक्षणता दिखलानेके लिए पूर्वोक्त विशेषणोंके अतिरिक्त 'शब्दार्थयोर्गुणभावेन रसाङ्गभूत- व्यापारप्रवणतया' पद तथा 'उपदेशं' इस कर्मपदके साथ 'कान्तेव सरसतापादनेनाभिमुखीकृत्य' पदमें इतिकर्तव्यता भी समाविष्ट हो गयी है। फलतः इस वाक्यकी रचना बड़ी दुरूह और क्लिष्ट हो गयी है। बिना टीकाके इसका अर्थ समझना जरा टेढ़ी खीर है। मम्मटाचार्यने सारे ग्रन्थमें इसी प्रकारकी रचना शैलीका अवलम्बन किया है। इसीलिए 'काव्यप्रकाश'की बीसों टीकाएँ होते हुए भी अनेक स्थलोंपर उसका रहस्य आज भी दुरूह बना हुआ है। उपदेशकी त्रिविध शैली इस प्रकार मम्मटाचार्यने इस कारिकामें काव्यके छह प्रयोजन दिखलाये हैं। इसमेंसे 'कान्ता- सम्मिततया उपदेशयुजे' इसकी व्याख्या करते हुए उन्होंने वेदादि शास्त्र तथा पुराण-इतिहासादिसे काव्यका भेद और उसकी उपादेयताका प्रतिपादन बड़े अच्छे ढंगसे किया है। काव्यके प्रयोजनोंमें यश, धन आदि अन्य प्रयोजनोंके साथ कर्तव्याकर्तव्यका उपदेश करना भी एक मुख्य प्रयोजन है। वेद-शास्त्र- इतिहास-पुराण आदिकी रचना भी मनुष्योंको शुभ-कर्मोंमें प्रवृत्त करने तथा अशुभ-कमोंसे निवृत्त करनेके लिए ही की गयी है। परन्तु काव्यकी उपदेश-शैली उन सबसे विलक्षण है। इस विलक्षणताका उपपादन करनेके लिए ग्रन्थकारने शब्दप्रधान, अर्थप्रधान तथा रसप्रधान तीन तरहकी उपदेशशैलियोंकी कल्पना की है, जिनको क्रमशः 'प्रभुसम्मित', 'सुहृत्सम्मित' तथा 'कान्तासम्मित' पदोंसे निर्दिष्ट किया है। वेद-शास्त्र आदिकी शैली 'प्रभुसम्मित' या शब्दप्रधान शैली है। राजाज्ञाएँ तथा राजकीय विधान सदा शब्दप्रधान होते हैं। उनमें जो कुछ आराज्ञा दी जाती है उसका अक्षरशः पालन अनिवार्य होता है। इसी प्रकार वेद-शास्त्र आदिमें जो उपदेश दिये गये हैं उनका अक्षरशः पालन करना ही अभीष्ट होता है। इसलिए वे शब्दप्रधान होनेसे राजाज्ञाके समान या प्रभुसम्मित उपदेश-शैलीमें अन्तर्भुक्त होते हैं। दूसरी उपदेश-शैली इतिहास-पुराण आदिकी है। इनमें वेद-शास्त्र आदिके समान शब्दोंकी प्रधानता नहीं होती है अपितु अर्थपर विशेष बल दिया जाता है। इसलिए उनका अक्षरशः पालन
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१२ काव्यप्रकाश: [कारिका २ आवश्यक नहीं होता है अपितु उनके अभिप्रायका अनुसरण किया जाता है। इसको ग्रन्थकारने 'सुहृत्- सम्मित' शैली कहा है। मित्र अपने मित्रको उचित कार्यका अनुष्ठान करने तथा अनुचित कामका परित्याग करनेका उपदेश करता है। परन्तु उसका उपदेश राजाज्ञाके समान शब्दप्रधान नहीं होता है। उसका तात्पर्य अर्थमें होता है। इसलिए अर्थमें तात्पर्य रखनेवाली इस दूसरे प्रकारकी उपदेश-शैलीको ग्रन्थकारने 'सुहृत्सम्मित' शैली कहा है। इतिहास-पुराण आदिका अन्तर्भाव इस शैलीके अन्तर्गत होता है। काव्यकी उपदेश-शैली इन दोनोंसे भिन्न प्रकारकी होती है। उसमें न शब्दकी प्रधानता होती है और न अर्थकी। वहाँ शब्द तथा अर्थ दोनोंका गुणीभाव होकर केवल रसकी प्रधानता होती है। इस शैलीको मम्मटने 'कान्तासम्मित' उपदेश-शैली नाम दिया है। स्त्री जब किसी काममें पुरुषको प्रवृत्त या किसी कार्यसे उसको निवृत्त करती है तब वह अपने सारे सामर्थ्यसे उसको सरस बनाकर ही उस प्रकारकी प्रेरणा करती है। इसलिए कान्तासम्मित-शैलीमें शब्द तथा अर्थ दोनोंका गुणीभाव होकर रसकी प्रधानता हो जाती है। इसलिए इसको रसप्रधान-शैली कहा जा सकता है। मम्मटाचार्यने काव्यकी उपदेश-शैलीको इस श्रेणीमें रखा है। काव्योंके पढ़नेसे भी रामादिके समान आचरण करना चाहिये, रावण आदिके समान आचरण नहीं करना चाहिये इस प्रकारकी शिक्षा प्राप्त होती है। परन्तु उसमें शब्द या अर्थकी नहीं अपितु रसकी प्रधानता होती है। काव्यके रसास्वादनके साथ-साथ कर्तव्य- अकर्तव्यका ज्ञान भी मनुष्यको होता जाता है। यह शैली वेद-शास्त्रकी शब्दप्रधान तथा इतिहास-पुराण आदिकी अर्थप्रधान दोनों शैलियोंसे भिन्न और सरसताके कारण अधिक उपादेय है। इसलिए काव्यके विषयमें प्रयत्न करना ही चाहिये, यह ग्रन्थकारका अभिप्राय है। काव्यसे यशकी प्राप्ति होती है इसको सिद्ध करनेके लिए ग्रन्थकारने कालिदासका उदाहरण दिया है, जो उचित ही है। अर्थप्राप्ति भी काव्यसे हो सकती है; इसके लिए ग्रन्थकारने धावकका नाम लिया है। श्रीहर्षके नामसे 'रत्नावली-नाटिका' आदि जो ग्रन्थ पाये जाते हैं वे वस्तुतः उनके बनाये हुए नहीं हैं अपितु धावक नामक किसी अन्य कविके बनाये हुए हैं। राजा श्रीहर्षने प्रचुर धन देकर उस कविको सम्मानित तथा पुरस्कृत किया, इसलिए कविने उसपरसे अपना नाम हटाकर लिखनेवालेके स्थानपर राजा श्रीहर्षका नाम डाल दिया है। इस प्रकार उन काव्योंसे धावकको केवल धनकी प्राप्ति हुई, यशकी प्राप्ति जितनी होनी चाहिये थी उतनी नहीं हुई। तीसरा प्रयोजन 'व्यवहारविदे' अर्थात् व्यवहारका ज्ञान है। काव्य-नाटक आदिमें जो चरित्र-चित्रण होता है उससे भिन्न-भिन्न स्थितियोंमें पात्रोंके परस्पर व्यवहारकी शैलीका परिज्ञान होता है; विशेषकर राजा आदिके साथ किस प्रकारका शिष्टाचार व्यवहारमें लाना चाहिये इस बातका परिज्ञान काव्यादिके द्वारा ही साधारण जनोंको प्राप्त होता है। 'सद्यः परनिर्वृतये' अरथात् काव्यके निर्माण अथवा पाठके साथ ही जो एक विशेष प्रकारके आन्तरिक आनन्दकी प्राप्ति होती है वह अलौकिक आनन्दानुभूति ही काव्यका सबसे मुख्य प्रयोजन है। इस आनन्दानुभूतिकी वेलामें पाठक संसारका और सब-कुछ भूलकर उसी काव्य जगत्में तल्लीन हो जाता है। इस तन्मयतामें ही उस अलौकिक आनन्दकी अभिव्यक्ति होती है। इसलिए ग्रन्थकारने उसके साथ 'विगलितवेद्यान्तरम्' तथा 'सकलप्रयोजनमौलिभूतम्' ये दो विशेषण जोड़े हैं। इन प्रयोजनोंमें 'शिवेतरक्षति' अरथात् अ्र्प्रनिष्ट-अमङ्गलका निवारण भी एक प्रयोजन बतलाया गया है। इसके लिए ग्रन्थकारने 'मयूर' कविका उदाहरण दिया है। 'मयूर' कविका एकमात्र काव्य 'सूर्यशतक' मिलता है। इसमें सूर्यके स्तुति-परक १०० श्लोक हैं। कहते हैं कि इन श्लोकों द्वारा सूर्यकी
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कारिका २] प्रथम उल्लास: १३
स्यति कर 'मयूर' कविने कुष्ठ-रोगसे छुटकारा पाया था। इसलिए ग्रन्थकारने उसे अनिष्ट-निवारणके उाहरणरूपमें प्रस्तुत किया है। 'मयूर' कविके कुष्ठी होनेके विषयमें एक कथा प्रसिद्ध है। उसका भी इस प्रसङ्गमें उल्लेख कर देना उचित होगा। 'मेरुतुङ्गाचार्य' कृत 'प्रबन्धचिन्तामणि' तथा 'यज्ञेश्वर- भट्ट' कृत 'सूर्य-शतक' की टीकामें मयूरभट्टके कुष्ठी होने और उस दुष्टरोगसे मुक्त होनेकी कथा इस प्रकार दी गयी है- मयूरभट्टका उपाख्यान संवत् १०७८ या सन् १०२१ में मयूर कवि राजा भोजके सभारत्न थे और धारानगरीमें रहते थे। 'कादम्बरी' नामक प्रसिद्ध गद्य-काव्यके निर्माता महाकवि 'बाणभट्ट' इनके भगिनी-पति अर्थात् बहनोई थे। वे भी उसी धारानगरीमें रहते थे। दोनों ही कवि थे इसलिए साले-बहनोईके इस सम्बन्धके अतिरिक्त भी उन दोनोंमें विशेष मैत्नी-भाव था। दोनों अपनी नूतन रचनाएँ एक-दूसरेको सुनाते रहते थे। एक दिनकी बात है कि बाणकी पत्नी किसी कारणसे बाणभट्टसे अत्यन्त अप्रसन्न हो गयी। बाणभट्टने उसको मनानेका बहुतेरा प्रयत्न किया पर उसमें उनको सफलता नहीं मिली। इस मान- मनौवलमें ही उनकी सारी रात बीत गयी और लगभग सबेरा हो आया, पर बाणभट्ट भी अपने प्रयत्नमें लगे हुए थे। वे अपनी पत्नीसे कह रहे थे- गतप्राया रात्रिः कृशतनुशशी शीर्यत इव प्रदीपोऽयं निद्रावशमुपगतो घूर्णित इव। प्रणामान्तो मानस्त्यजसि न तथापि क्रुधमहो "हे प्रिये, रात्रि समाप्त हो आयी है। चन्द्रमा अस्त होने जा रहा है और यह दीपक भी रातभर जागनेके कारण अब निद्राके वशीभूत होकर झोंके ले रहा है। यद्यपि प्रणामसे मानकी समाप्ति हो जाती है पर मेरे सिर नवानेपर भी तुम अपना कोध नहीं छोड़ रही हो-" श्लोकके तीन चरण बन पाये थे और बाणभट्ट उन्हीं तीनोंको बार-बार दुहरा रहे थे। इसी समय मयूरभट्ट प्रातःकालके भ्रमण और काव्यचर्चाके निमित्त बाणभट्टको साश ले जानेके लिए उनके घर आ पहुँचे। बाणभट्टको ऊपर लिखे श्लोकका पाठ करते हुए सुनकर वे बाहर ही रुक गये। थोड़ी देर सुननेके बाद उनसे चुप न रहा गया और उन्होंने श्लोकके चतुर्थ चरणकी इस प्रकार पूर्ति करके उसे जोरसे सुना ही दिया कि- 'कुचप्रत्यासत्त्या हृदयमपि ते चण्डि कठिनम्।' बाणकी पत्नीने जब यह सुना तो उसे बड़ा कोध आया और उस कोधके आवेशमें उसने पूर्ति करनेवालेको पहिचाने बिना ही कुष्ठी हो जानेका शाप दे दिया। उसके पातिव्रत्यके प्रभावसे मयूरभट्टपर शापका प्रभाव पड़ा और वे कुष्ठी हो गये। इसके बाद मालूम होने तथा कोध शान्त होनेपर उसीने उनको शापके प्रभावसे मुक्त होनेका यह उपाय बतलाया कि तुम गङ्गाके किनारे जाकर सूर्यकी उपासना करो, उसीसे तुम इस रोगसे मुक्त हो सकोगे। तदनुसार मयूरभट्टने गङ्गाके किनारे एक वृक्षपर एक रस्सीका छीका लटकाकर और उसपर बैठकर सूर्यदेवकी उपासना प्रारम्भ की। वह प्रतिदिन सूर्यकी स्तुतिमें एक नया श्लोक बनाते थे और प्रतिदिन अपने छीकेकी एक रस्सी काटते जाते थे। छीकेकी सौ डोरियाँ कट जानेपर उनके गङ्गामें गिरनेके पूर्व ही सूर्यदेवकी कृपासे उनको आरोग्य-लाभ हो गया। इस प्रकार
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१४ काव्यप्रकाश: [ कारिका २
सूर्यकी स्तुतिमें मयूरकविने जिन सौ श्लोकोंकी रचना की, उन्हींका संग्रह 'सूर्यशतक' नामसे प्रसिद्ध है। इसी प्रसिद्ध कथाके आधारपर मम्मटाचार्यने 'शिवेतरक्षतये' की व्याख्यामें मयूरभट्टके नामका उल्लेख किया है। वामनाभिमत काव्यके प्रयोजन मम्मटाचार्यने यहाँ काव्यके जिन छह प्रयोजनोंका निरूपण किया, लगभग उसी प्रकारके काव्य- प्रयोजनोंका प्रतिपादन उनके पूर्ववर्ती आचार्योंने भी किया है। इनमेंसे 'वामन'कृत प्रयोजनोंका निरूपण सबसे अधिक संक्षिप्त है। उन्होंने काव्यके केवल दो प्रयोजन माने हैं-एक कीति और दूसरा प्रीति या आनन्द। उन्होंने लिखा है- काव्यं सद् दृष्टादृष्टारथं प्रीतिकीतिहेतुत्वात्। इनमेंसे प्रीति अर्थात् आनन्दानुभूतिको काव्यका दृष्ट-प्रयोजन तथा कीर्तिको काव्यका अदृष्टार्थ- प्रयोजन माना है और इसपर विशेष बल दिया है। उन्होंने इस विषयमें तीन श्लोक भी दिये हैं- प्रतिष्ठां काव्यबन्धस्य यशसः सर्राण विदुः। अकीतिवर्तिनीं त्वेवं कुकवित्वविंडम्बनाम् ।।१।। कीति स्वर्गफलामाहुरासंसारं विपश्चितः । अकीरतिन्तु निरालोकनरकोद्देशदूतिकाम् ।।२।। तस्मात् कीर्तिमुपादातुमकीतिञ्च व्यपोहितुम्।
भामह-प्रतिपादित काव्य-प्रयोजन काव्यालङ्कारसूतार्थः प्रसाद्यः कविपुङ्गवैः॥३।
वामनके भी पूर्ववर्ती आचार्य भामहने इनकी अपेक्षा अधिक विस्तारके साथ काव्यके प्रयोजनोंका वर्णन निम्नलिखित प्रकार किया है- धर्मार्थकाममोक्षेषु वैचक्षण्यं कलासु च। करोति कीति प्रीति च साधुकाव्यनिबन्धनम् ।। अर्थात् उत्तम काव्यकी रचना धर्म, अर्थ काम और मोक्ष-रूप चारों पुरुषार्थों तथा समस्त कलाओंमें निपुणता और कीति एवं प्रीति अरथात् आनन्दको उत्पन्न करनेवाली होती है। भामहके इस श्लोकको उत्तरवर्ती सभी आचार्योंने आदरपूर्वक अपनाया है। इसके अनुसार कीर्ति तथा प्रीतिके अतिरिक्त पुरुषार्थ-चतुष्टय, कला तथा व्यवहार आदिमें निपुणताकी प्राप्ति भी काव्यका प्रयोजन है। कीर्तिको काव्यका मुख्य प्रयोजन बतलाते हुए जिस प्रकार वामनने तीन श्लोक लिखे थे, जो ऊपर दिये जा चुके हैं, उसी प्रकार मामहने भी कुछ श्लोक इसी अभिप्रायके लिखे हैं जो नीचे दिये जा रहे हैं- "उपेयुषामपि दिवं सन्निबन्धविधायिनाम् । पास्त एव निरातङ्कं कान्तं काव्यमयं वपुः ॥६॥
१, २. वामन-'काव्यालङ्कारसूत्र', १, १, ५। ३. भामह-'काव्यालङ्कार', १, २। ४. भामह-'काव्याल हार', पयम परिच्छेद।
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कारिका २ ] प्रथम उल्लास: १५
शणद्धि रोदसी चास्य यावत् कीतिरनश्वरी। तावत् किलायमध्यास्ते सुकृती वैबुधं पदम् ।।७।। अतोऽभिवाञ्छता कीति स्थेयसीमा भुवः स्थितेः। यत्नो विदितवेद्येन विधेय: काव्यलक्षणः ॥८॥ सर्वथा पदमप्येकं न निगाद्यमवद्यवत्। विलक्ष्मणा हि काव्येन दुःसुतेनेव निन्द्यते ॥११॥ नाकवित्वमधर्माय व्याधये दण्डनाय वा। कुकवित्वं पुनः साक्षान्मृतिमाहुर्मनीषिणः ॥१२॥ अर्थात् उत्तम काव्योंकी रचना करनेवाले महाकवियोंके दिवङ्गत हो जानेके बाद भी उनका सुन्दर काव्य-शरीर 'यावच्चन्द्रदिवाकरौ' अक्षुण्ण बना रहता है ।।६।। और जबतक उनकी अनश्वर कीर्ति इस भू-मण्डल तथा आकाशमें व्याप्त रहती है तबतक वे सौभाग्यशाली पुण्यात्मा देवपदका भोग करते हैं।।७।। इसलिए प्रलयपर्यन्त स्थिर रखनेवाली कीतिके चाहनेवाले कविको, उसके उपयोगी समस्त विषयोंका ज्ञान प्राप्त कर उत्तम काव्यकी रचनाके लिए प्रयत्न करना चाहिये।।८।। काव्यमें एक भी अनुपयुक्त पद न आने पावे इस बातका ध्यान रखना चाहिये, क्योंकि बुरे काव्यकी रचनासे कवि उसी प्रकार निन्दाका भाजन होता है जिस प्रकार कुपुत्रसे पिताकी निन्दा होती है।।११।। [कु-कवि बननेकी अपेक्षा तो त्र्प-कवि होना अच्छा है क्योंकि] त्र-कवित्वसे न तो अरधर्म होता है और न व्याधि या दण्डका भागी ही बनना पड़ता है परन्तु कु-कवित्वको विद्वान् लोग साक्षात् मृत्यु ही कहते हैं ॥१२॥ कुन्तक-प्रतिपादित काव्य-प्रयोजन
कुन्तकने अपने 'वक्रोक्तिजीवित' में इसको और भी अधिक स्पष्ट किया है। उन्होंने काव्यके प्रयोजनोंका निरूपण करते हुए लिखा है- धर्मादिसाधनोपायः सुकुमारक्रमोदितः । काव्यबन्धोऽभिजातानां हृदयाह्लादकारक: ॥३। व्यवहारपरिस्पन्दसौन्दयं व्यवहारिभिः। सत्काव्याधिगमादेव नूतनौचित्यमाप्यते ।।४।। चतुर्वर्गफलास्वादमप्यतिक्र्म्य तद्विदाम्। काव्यामृतरसेनान्तश्चमत्कारो वितन्यते ।।५।। अर्थात् काव्य की रचना अभिजात-श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न-राजकुमार आदिके लिए सुन्दर एवं सरस ढंगसे कहा गया धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धिका सरल मार्ग है। सत्काव्यके परिज्ञानसे ही व्यवहार करनेवाले सब प्रकारके लोगोंको अपने-अपने व्यवहारका पूर्ण एवं सुन्दर ज्ञान प्राप्त होता है। [और सबसे बड़ी बात यह है कि] उससे सहृदयोंके हृदय में चतुर्वर्ग-फलकी प्राप्तिसे भी बढ़कर आनन्दानुभूतिरूप चमत्कार उत्पन्न होता है। १. 'वक्रोक्तिजीवितम्', प्रथम उत्मेष, ३-५ कारिका।
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१६ काव्यप्रकाश: [कारिका ३
एवमस्य प्रयोजनमुक्त्वा कारणमाह- शक्तिर्निपुणता लोकशास्त्रकाव्याद्यवेक्षणात्। काव्यज्ञशिक्षयाभ्यास इति हेतुस्तदुन्द्वे ।।३।। शक्ति: कवित्वबीजरूप: संस्कारविशेषः यां बिना काव्यं न प्रसरेत्, प्रसृतं वा उपहसनीयं स्यात्। लोकस्य स्थावरजङ्गमात्मकस्य लोकवृत्तस्य, शास्त्राणाँ छन्दो- व्याकरणाभिधानकोशकलाचतुर्वर्गगजतुरगखङ्गादिलक्षणग्रन्थानाम्, काव्यानाँ च महाकवि- कवि तथा पाठककी दृष्टिसे प्रयोजन-विभाग इस प्रकार पूर्ववर्ती आचार्योंने जिन काव्य-प्रयोजनोंका प्रतिपादन किया था उनका और भी अधिक परिमार्जन करके काव्यप्रकाशकारने सबसे अधिक सुन्दर एवं विस्तृत रूपमें काव्यके प्रयोजनोंका निरूपण किया है। इनमेंसे तीनको मुख्यतः कवि-निष्ठ तथा तीनको मुख्यतः पाठक-निष्ठ प्रयोजन कहा जा सकता है। 'यशसे', 'अरथकृते' तथा 'शिवेतरक्षतये' ये तीन मुख्यतः कविके उद्देश्यसे औ्रौर 'व्यवहारविदे', 'सद्यः परनिर्वृतये' तथा 'कान्तासम्मिततया उपदेशयुजे' ये तीन मुख्यतः पाठककी दृष्टिसे विशेष महत्त्वपूर्ण प्रयोजन कहे जा सकते हैं। परन्तु प्राचीन आचार्योंने इस प्रकारका विभाजन नहीं किया है। भरतमुनिके काव्य-प्रयोजन काव्यशास्त्रके शद्य आचार्य श्रीभरतमुनिने अपने 'नाटयशास्त्र' [अ० १, श्लो० ११३-११५] में नाटय अथवा काव्यके प्रयोजनोंका वर्णन इस प्रकार किया है- उत्तमाधममध्यानां नराणां कर्मसंश्रयम् । हितोपदेशजननं धृति-करीड़ा-सुखादिकृत् ।।११३।। दुःखार्तानां श्रमार्तानां शोकार्तानां तपस्विनाम्। विश्रान्तिजननं काले नाटयमेतद् भविष्यति ।।११४।। धम्यं यशस्यमायुष्यं हितं बुद्धिविवर्द्धनम्। लोकोपदेशजननं नाट्यमेतद् भविष्यति ।११५।। उत्तरवर्ती आचार्योंने इसीके आधारपर काव्यके प्रयोजनोंका निरूपण किया है। इस प्रकार अधिकांश आचार्योंने कीति या यशको काव्यका मुख्य प्रयोजन माना है। कदाचित् इसीलिए मम्मटाचार्यने भी अपनी कारिकामें उसको सबसे पहिला स्थान दिया है। कविकी दृष्टिसे वह है भी सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण । परन्तु पाठककी दृष्टिसे सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण प्रयोजन 'सद्यः परनिर्वृति' अर्थात् अलौकिक आनन्दानुभूति है। इसलिए मम्मटाचार्यने उसको 'सकलप्रयोजन-मौलिभूतम्' कहा है ।।२।। काव्यके हेतु इस प्रकार काव्य तथा उसके उपयोगी विषयोंमें अभिरुचि उत्पन्न करनेके लिए काव्यके प्रयोजनों- का प्रतिपादन करनेके बाद ग्रन्थकार काव्यके प्रयोजक हेतुओंका वर्णन अगली कारिकामें करते हैं- [कविमें रहनेवाली उसकी स्वाभाविक प्रतिभारूप ] १. शक्ति, २. लोक [व्यवहार ], शास्त्र तथा काव्य आदिके पर्यालोचनसे उत्पन्न निपुणता और ३. काव्य [की रचना-शैली तथा आलोचनापद्धति]
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कारिका ३ ] प्रथम उल्लास: १७
सम्बन्धिनाम्, आदिग्रहणादितिहासादीनां च विमर्शनाद् व्युत्पत्तिः। काव्यं कर्तु विचारयितुं च ये जानन्ति तदुपदेशेन करणे योजने च पौनःपुन्येन प्रवृत्तिरिति त्रयः समुदिताः, न तु व्यस्ता:, तस्य काव्यस्योद्द्वे निर्माणे समुल्लासे च हेतुर्न तु हेतवः ।३।
को जाननेवाले [गुरु] की शिक्षाके अनुसार [काव्य-निर्माणका ] अभ्यास, ये [तीनों मिलकर समष्टि- रूपसे ] उस [काव्य ] के विकास [उद्द्व ] के कारण हैं ।।३।। १. कवित्वका बीजभूत संस्कार-विशेष [प्रतिभा या ] शक्ति [कहलाती ] है, जिसके बिना काव्य [निकलता ] बनता ही नहीं है। अथवा [निकलने, तुकबन्दीके रूपमें कुछ] बन जानेपर [भी] उपहासके योग्य होता है। २. लोक अर्थात् स्थावरजङ्गमरूप संसारके व्यवहारके, शास्त्र अर्थात् छन्द, व्याकरण, संज्ञा-शब्दों [अभिधान ] के कोश [अमरकोश आदि ], कला [अर्थात् भरत, कोहल आदि प्रणीत नृत्य-गीत आदि चौसठ प्रकारकी कलाओंके प्रतिपादक लक्षण-ग्रन्थों ], चतुर्वरग [अर्थात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके प्रतिपादक ग्रन्थ ], हाथी-घोड़े [आदिके लक्षणोंके प्रतिपादक शालिहोत्र आदि रचित ग्रन्थ ] एवं खङ्ग आदिके लक्षणग्रन्थों और महाकविसम्बन्धी [अर्थात् महाकवियों द्वारा रचे गये ] काव्योंके, आदि [ पदके ] ग्रहणसे [ सूचित ] इतिहास आदिके पर्यालोचनसे उत्पन्न व्युत्पत्ति [विशेष प्रकारका ज्ञान] तथा ३. जो काव्य [की रचना] करना और उसकी विवेचना करना जानते हैं उनके उपदेशके अनुसार [अपने आप नवीन श्लोकादिके ] निर्माण करने और [प्राचीन कवियोंके श्लोकोंमें ] जोड़-तोड़ करनेमें बार-बार प्रवृत्ति [अर्थात् अभ्यास ] ये तीनों मिलकर [समष्टिरूपसे ] अलग-अलग नहीं, उस काव्यके उद्व अर्थात् निर्माण और विकासमें कारण हैं। अलग-अलग तीन कारण नहीं होते हैं। यहाँ ग्रन्थकारने (१) शक्ति, (२) लोकव्यवहार, शास्त्र एवं काव्य आदिके पर्यालोचनसे उत्पन्न व्युत्पत्ति तथा (३) काव्यकी रचना-शैली और उसके गुण-दोषोंके जाननेवाले विद्वानोंकी शिक्षाके अनुसार अभ्यास इन तीनोंकी समष्टिको काव्य-निर्माणकी योग्यता प्राप्त करनेका कारण माना है।
वामन-प्रतिपादित काव्यके हेतु वामनने भी इसी प्रकार (१) लोक, (२) विद्या तथा (३) प्रकीर्ण इन तीनोंको काव्यका त्रङ्ग, काव्य-निर्माणकी क्षमता प्राप्त करनेका साधन बतलाया है- 'लोको विद्या प्रकीर्णञ्च काव्याङ्गानि १, ३, १। *लोकवृत्तं लोक: १, ३, २।
"लक्ष्यज्ञत्वमभियोगो वृद्धसेवावेक्षणं प्रतिभानमवधानञ्च प्रकीर्णम् १, ३, ११। इस प्रकार वामनने काव्यके कारणोंका अधिक विस्तारके साथ विवेचन किया है। प्रथम अधिकरणके तीसरे अध्यायके २० सूत्र वामनने इन काव्याङ्गोंके निरूपण करनेमें व्यय किये हैं जिनको यहाँ मम्मटाचार्यने केवल एक कारिकामें कह दिया है। मम्मटने वामनके लोक तथा विद्या दोनोंको 'लोकशास्त्रकाव्याद्यवेक्षणात् निपुणता'के अन्तर्गत कर लिया है। 'प्रकीर्ण' मेंसे 'शक्ति'को अपलग कर दिया है और 'वृद्ध-सेवा'का 'काव्यज्ञशिक्षयाभ्यासः' में अन्तर्भाव करके मम्मटने वामनके समान आाठ काव्याङ्गोंका मुख्यरूपसे तीन काव्य-साधनोंके रूपमें प्रतिपादन किया है। १-४. वामन -- 'काव्यालङ्कारसूत्र' १, ३, १-२-३ और ११।
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काव्यप्रकाश [ कारिका ३
भामह प्रतिपादित काव्य-हेतु hNswpins.PIB वामनके पूर्ववर्ती आचार्य भामहने भी काव्य-साधनोंका निरूपण लगभग उसी प्रकारसे किया है। उन्होंने लिखा है- 'शब्दश्छन्दोऽभिधानार्था इतिहासाश्रयाः कथाः । लोको युक्तिः कलाश्चेति मन्तव्या काव्यगैरमी।।। शब्दाभिधेये विज्ञाय कृत्वा तद्विदुपासनाम्। विलोक्यान्यनिबन्धांश्च कार्यः काव्यक्रियादरः॥१०॥ इन काव्य-साधनोंकी तुलना करनेसे प्रतीत होता है कि काव्य-साधन सभी आचार्योंकी दृष्टिमें लगभग एक-से ही हैं। परन्तु भिन्न-भिन्न आचार्योंने उनके पौर्वापर्य अथवा विभाग आदिमें थोड़ा-बहुत भेद करके उनका अलग-अलग ढंगसे निरूपण कर दिया है। तत्त्वतः उनके विवेचनमें अधिक भेद नहीं है ।।३। १. मम्मटका काव्य-लक्षण इस प्रकार द्वितीय कारिकामें काव्यके प्रयोजन तथा तृतीय कारिकामें काव्यके साधनोंका निरूपण कर चुकनेके बाद चतुर्थ कारिकामें ग्रन्थकार काव्यका लक्षण प्रस्तुत करने जा रहे हैं। किसी भी पदार्थका अव्याप्ति, अतिव्याप्ति तथा असम्भव-तीनों प्रकारके दोषोंसे रहित एकदम निर्दुष्ट लक्षण प्रस्तुत करना यों ही कठिन होता है, फिर काव्य जैसे दुर्बोध पदार्थका लक्षण करना और भी अधिक कठिन है। फिर भी काव्यप्रकाशकारने इस दिशामें जो प्रयत्न किया है वह प्रशंसनीय है। यद्यपि उत्तरवर्ती विश्वनाथ आदिने उनके लक्षणका बुरी तरहसे खण्डन किया है, परन्तु वास्तविक दृष्टिसे विचार किया जाय तो वह उतना दूषित लक्षण नहीं है जितना विरोधियोंने उसको चित्रित करनेका प्रयत्न किया है। उनके काव्य-लक्षणके गुण-दोषकी मीमांसा करनेसे पहिले उनके लक्षणोंको भली प्रकार समझ लेना चाहिये अन्यथा उसकी समालोचना और मीमांसा समझमें नहीं आ सकेगी। 'तददोषौ शब्दार्थौं सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि' मम्मटाचार्यके अनुसार यह काव्यका लक्षण है। इस लक्षणमें सबसे पहिली बात यह है कि मम्मट शब्द तथा अर्थ दोनोंकी समष्टिको काव्य मानते हैं। अकेला शब्द या अकेला अर्थ इनमेंसे कोई भी काव्य नहीं है। 'तत्' यह सर्वनामपद पिछली 'काव्यं यशसे' इत्यादि कारिकामें प्रयुक्त हुए काव्यपदका परामर्शक है। द्वितीय कारिकामें मुख्य संज्ञापद या 'काव्य'पदका प्रयोग करनेके बाद तीसरी तथा चौथी दोनों कारिकाओंमें ग्रन्थकारने 'तत्' इस सर्वनाम-पदके प्रयोग द्वारा ही उसका निर्देश किया है। इसलिए यहाँ भी 'तत्' पद 'काव्य का परामर्शक है। 'शब्दार्थौं तत्' का अरथ 'शब्दार्थौ काव्यम्' यह हुआ। इसके अनुसार शब्द तथा अर्थ, ये दोनों मिलकर काव्यपदवाच्य होते हैं, यह ग्रन्थकारका अभिप्राय है। इस 'शब्दाथौ"' पदके तीन विशेषण लक्षणमें प्रस्तुत किये गये हैं। वे शब्द और अर्थ दोनों किस प्रकारके होने चाहिये कि (१) 'अदोषौ', (२) 'सगुणौ' तथा (३) 'अनलंकृती पुनः क्वापि'। अरथात् वे शब्द तथा अर्थ दोनों दोष-रहित हों यहं पहली बात है। दूसरी बात यह है कि वे दोनों 'सगुण' माधुर्य आदि काव्य-गुणोंसे युक्त होने चाहिये और तीसरी बात यह है साधारणतः वे अलङ्कार सहित भी होने चाहिये परन्तु जहाँ कहीं रसादिकी प्रतीति हो रही हो वहाँ उनके अलङ्कारविहीन होनेपर भी काम चल १. भामह-'काव्यालङ्कार' 9, ६-१०।
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का० ४, सू० १] प्रथम उल्लास: १६
एवमस्य कारणमुक्त्वा स्वरूपमाह- [ सूत्रम् १] तददोषौ शब्दारथौ' सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि। दोषगुणालंकारा वक्ष्यन्ते। क्वापीत्यनेनैतदाह यत् सर्वत्र सालकारौ क्वचित्तु स्फुटालंकारविरहेऽपि न काव्यत्वहानिः। यथा- थ्यः कौमारहरः स एव हि वरस्ता एव चैत्रक्षपा- स्ते चोन्मीलितमालतीसुरभयः प्रौढा: कदम्बानिलाः । सा चैवास्मि तथापि तत्र सुरतव्यापारलीलाविधौ रेवारोधसि वेतसीतरुतले चेतः समुत्कण्ठते ।।१। अत्र स्फुटो न कश्चिदलंकारः। रसस्य च प्राधान्यान्नालकारता।
सकता है। इस प्रकार इन तीन विशेषणोंसे युक्त शब्द तथा अर्थकी समष्टिका नाम काव्य है, यह ग्रन्थकारका अभिप्राय है। यही बात आगे कहते हैं -- इस प्रकार इस [काव्य ] के साधन बतलाकर [उसके ] स्वरूपको कहते हैं -- [सू० १]-दोषोंसे रहित, गुण-युक्त और [साधारणतः अलङ्कार सहित परन्तु ] कहीं-कहीं अलङ्कार-रहित शब्द और अर्थ [दोनोंकी समष्टि ] काव्य [कहलाती] है। दोष, गुण और अलङ्गार [किसको कहते हैं यह बात ] आगे कहेंगे। [ 'अनलंकृती पुनः क्वापि' इस वाक्यांशमें प्रयुक्त ] 'क्वापि' इस पदसे [ ग्रन्थकार ] यह कहते हैं कि [साधारणतः ] सब जगह अलङ्गारसहित [ शब्द तथा अर्थ होने चाहिये ] परन्तु कहीं [ जहाँ व्यङ्गय या रसादिकी स्थिति विद्यमान हो वहाँ ] स्पष्टरूपसे अलङ्गारकी सत्ता न होनेपर भी काव्यत्वकी हानि नहीं होती है। जैसे- क गए [जिन प्रियतम पतिदेवने विवाहके बाद प्रथम सम्भोग द्वारा मेरे कुमारीभावके सूचक योनिच्छदका भङ्ग करके कौमार्यका हरण किया, चिर उपभुक्त, मेरे ] कौमार्यका हरण करनेवाले वे ही पतिदेव हैं, और [आज फिर ] वे ही चैत्र [मास ] की [उज्ज्वल चाँदनीसे भरी हुई ] रातें हैं, खिली हुई मालतीकी [मालतीका अर्थ जाति-पुष्प या चमेली होता है परन्तु 'न स्याज्जाती वसन्ते' इत्यादि कविसम्प्रदायके अनुसार वसन्त ऋतुमें जाति-पुष्पका वर्णन करना वर्जित है, इसलिए यहाँ मालती पदसे वसन्तमें खिलनेवाली किसी लता-विशेषका ग्रहण करना चाहिये] सुगन्धसे भरी हुई और [वसन्त ऋतुमें कदम्ब भी नहीं खिलता है, वह वर्षा ऋतुमें खिलता है। इसलिए यहाँ कदम्ब शब्दसे वसन्तमें खिलनेवाले धूलि-कदम्ब नामक पुष्प-विशेषका ग्रहण करना चाहिये ] धूलि-कदम्बकी उन्मादक [प्रौढ़ अत्यन्त कामोत्तेजक ] वायु बह रही है और मैं भी वही हूँ [ सभी सामग्री पुरानी, चिर उपभुक्त होनेसे उसमें उत्कण्ठा होनेका कोई अवसर नहीं ] फिर भी [ न जाने क्यों आज ] वहाँ नर्मदाके तटपर उस बेतके पेड़के नीचे [जहाँ अनेक बार अपने पतिदेवके साथ सम्भोग कर चुकी हूँ-सम्भोगकी] उन काम-केलियोंके [फिर-फिर करनेके ] लिए चित्त उत्कण्ठित हो रहा है ।।१।। यहाँ कोई स्पष्ट अलङ्गार नहीं है और रसके प्रधान होनेसे [ रसवदलङ्गारके रूपमें ] उसको भी अलङ्गार नहीं कहा जा सकता है। [क्योंकि वह रसवदलड्कार रसके गौण होनेपर ही होता है]। १. 'शार्ङ्गधर-पद्धति' में यह श्लोक 'शिलाभट्टारिका'के नामसे दिया गया है।
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२० काव्यप्रकाश: [का० ४, सू० १ इस उदाहरणकी विश्वनाथकृत आलोचना यहाँ कोई स्पष्ट अलङ्कार नहीं है इस कथनका अभिप्राय यह है कि वैसे चाहें तो खींच-तान करके यहाँ अलङ्कार निकाला जा सकता है; जैसे कि साहित्यदर्पणकार विश्वनाथने इसमें 'विभावना' तथा 'विशेषोक्ति' अलङ्कार निकालनेका प्रयत्न किया है। 'विभावना' तथा 'विशेषोक्ति' ये दोनों अलङ्कार परस्पर विरोधीरूप हैं। -I विभावना तु विना हेतुं कार्योत्पत्तिर्यदुच्यते। सति हेतौ फलाभावो विशेषोक्तिस्ततो द्विधा। जहाँ बिना कारणके कार्यका वर्णन किया जाय वहाँ 'विभावना' अलद्कार होता है। इसके विपरीत जहाँ कारण होनेपर भी कार्यकी उत्पत्ति न हो वहाँ 'विशेषोक्ति' नामक दूसरा अलङ्कार होता है। साहित्यदर्पणकारका कहना यह है कि यहाँ उत्कण्ठारूप कार्यका वर्णन किया गया है परन्तु उसका कारण विद्यमान नहीं है। उत्कण्ठा सदा किसी नयी चीजकी प्राप्तिके लिए होती है। यहाँ कोई भी नयी चीज नहीं, सभी वस्तुएँ पहिले सैकड़ों बारकी भोगी हुई हैं। इसलिए उत्कण्ठाका कारण न होनेपर भी उत्कण्ठारूप कार्यका वर्णन होनेसे यहाँ 'विभावना' अलङ्कार है। इसी प्रकार यदि इसको उलट दिया जाय तो यहाँ 'विशेषोक्ति' अलङ्कार निकल सकता है। यहाँ सब ही वस्तुएँ उपभुक्त-चर हैं इसलिए उत्कण्ठा नहीं होनी चाहिये। अर्थात् उत्कण्ठाके अभावकी सारी सामग्री विद्यमान है परन्तु उत्कण्ठाका अभावरूप कार्य नहीं है, उत्कण्ठा हो रही है। इस प्रकार उत्कण्ठाभावका कारण रहते हुए भी उत्कण्ठाभाव कार्यके न होनेसे यहाँ 'विशेषोक्ति' अलङ्कार भी पाया जाता है। समाधान FIHDR इस प्रकार साहित्यदर्पणकार विश्वनाथने इस श्लोकमें 'विभावना' तथा 'विशेषोक्ति' दो अर्प्रल- द्वारोंकी कल्पना करके और उनके सन्देह-सङ्कर अलङ्कारकी स्थिति सिद्ध करके मम्मट द्वारा 'अनलंकृती पुनः क्वापि' के उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किये गये इस श्लोकमें अलङ्कारके अभावका खण्डन किया है। परन्तु विश्वनाथन अत्यन्त संरम्भके साथ विभावना-विशेषोक्ति-मूलक सन्देह-संङ्कर अलङ्धारको यहाँ सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है वह मम्मटाचार्यकी दृष्टिसे शझल नहीं था। वे भी जानते थे कि यहाँ इस प्रकारसे 'विभावना' या 'विशेषोक्ति' या दोनोंका सन्देह-सङ्कर अलङ्कार निकाला जा सकता है। परन्तु ये अलङ्कार भाव-मुखेन नहीं, अभाव-मुखेन निकलते हैं इसलिए वे स्पष्ट नहीं अपितु खींचतानकर ही निकाले जा सकते हैं। इसीलिए तो मम्मटने उसे 'स्फुटालड्कार-विरह' के उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया है। अतएव विश्वनाथने जो इस उदाहरणका खण्डन किया है वह युक्तिसङ्गत नहीं है। विश्वनाथकी भावना विश्वनाथने अपने 'साहित्यदर्पण' में मम्मटके इस काव्य-लक्षणकी बुरी तरह छीछालेदर की है। उनकी दृष्टिमें तो 'काव्यप्रकाश'के इस काव्य-लक्षणमें 'पदसंख्यातोऽपि भूयसी दोषाणां संख्या' जितने पद प्रयुक्त हुए हैं उनसे भी अधिक दोष उसमें हैं। 'साहित्यदर्पण' को पढ़नेसे तो ऐसा प्रतीत होता है कि विश्वनाथकी दृष्टिमें मम्मट महामूर्ख आदमी हैं, वह साहित्यशास्त्रकी बारहखड़ी भी नहीं जानते हैं। उन्होंने अपने पाण्डित्यके प्रदर्शनका यही एकमात्र उपाय समझा है कि 'काव्यप्रकाश' का हर बातमें खण्डन किया जाय। कदाचित् इसलिए उन्होंने अपने ग्रन्थका नाम 'साहित्यदर्पण' रखा है। 'दर्पण' का कार्य 'प्रकाश'का प्रतिक्षेप करना ही है। दर्पणको यदि सूर्यके सामने दिखाया जाय तो उसपर जो सूर्यकी
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का० ४, सू० १ ] प्रथम उल्लास: २१ किरणें पड़ेंगी वे वहाँसे प्रतिक्षिप्त होकर सामने खड़े हुए व्यक्तिकी आंखोंमें भीषण चकाचौंध उत्पन्न कर देंगी। इस प्रकार साहित्यदर्पणकार विश्वनाथके अपने 'दर्पण' द्वारा काव्यप्रकाशकार मम्मटके 'प्रकाश' का प्रतिक्षेप कर साहित्यके विद्यार्थियोंकी दृष्टिमें चकाचौंध उत्पन्न कर दी है जिसके कारण विद्यार्थी उस समय अन्धा-सा हो जाता है और 'काव्यप्रकाश' में उसे कुछ भी तत्त्व नहीं दिखायी देता। 'अदोषौ' पदकी आलोचना काव्यप्रकाशकारने अपने लक्षणमें 'शब्दाथों के जो तीन विशेषण 'अदोषौ', 'सगुणौ' और 'अनलंकृती पुनः क्वापि' दिये हैं उन तीनोंका ही विश्वनाथने बुरी तरह खण्डन किया है। उनकी युक्तियोंका सार यह है कि यदि दोषरहित शब्दार्थको ही काव्य माना जाय तो इस प्रकारका नितान्त दोषरहित काव्य संसारमें मिल सकना ही कठिन है। इसलिए 'एवं काव्यं प्रविरलविषयं निर्विषयं वा स्यात्' अरथथात् ऐसी दशामें काव्य या तो संसारमें मिलेगा ही नहीं और यदि भूले-भटके कहीं मिल भी गया तो बहुत कम मिल सकेगा। इसके अतिरिक्त आगे चलकर 'न्यक्कारो ह्ययमेव मे यदरयः' इत्यादि जिस श्लोकको ध्वनि- प्रधान होनेसे उत्तम काव्य माना गया है उसमें भी 'विधेयाविमर्श' दोषके विद्यमान होनेसे उसको उत्तम- काव्य क्या, काव्य भी नहीं कहा जा सकेगा और यदि यह कहा जाय कि दोष तो उस श्लोकके थोड़े-से ही अंशमें है तो- 'यत्रांशे दोष: सोडकाव्यत्वप्रयोजकः, यत्र ध्वनिः स उत्तमकाव्यत्वप्रयोजक इत्यंशाभ्यामुभयत आकृष्यमाणमिदं काव्यमकाव्यं वा किमपि न स्यात्।1 जिस अंशमें दोष है वह अकाव्यत्वका प्रयोजक होगा और जिस अंशमें ध्वनि है वह उत्तम काव्यत्वका प्रयोजक होगा। इस प्रकार दोनों अंशोंकी इस छीना-झपटीमें वह काव्य या अकाव्य कुछ भी सिद्ध नहीं होगा। समाधान इस प्रकार साहित्यदर्पणकारने 'अदोषौ' पदके लक्षणमें रखे जानेका खण्डन किया है। परन्तु काव्यप्रकाशकारका 'अदोषौ' पदके रखनेका अभिप्राय यह है कि काव्यत्वके विघटक जो 'च्युतसंस्कार' आदि प्रबल दोष हैं उनसे रहित शब्द तथा अर्थ काव्य है। कोई भी दोष स्वरूपत: दोष नहीं होता, अपितु जब वह रसानुभूतिमें बाधक होता है तभी दोष कहा जाता है। जैसे 'दुःश्रवत्व' दोष करुण, शृंगार आदि कोमल रसोंकी अनुभूतिमें बाधक होता है इसलिए वहाँ उसे दोष कहा जाता है। परन्तु वीर, बीभत्स या भयानक रसमें वह 'दुःश्रवत्व' रसानुभूतिका बाधक नहीं, अपितु साधक हो जाता है इसलिए वहाँ दोष नहीं, अपितु गुण कहा जाता है। इसलिए जो दोष प्रबल होनेके कारण रसानुभूतिमें बाधक हों उन प्रबल दोषोंसे रहित शब्द तथा अर्थ काव्य हैं। यह काव्यप्रकाशकारका अभिप्राय है। अतः साधारण स्थितिके दुर्बल दोषके विद्यमान होनेपर भी काव्यत्वकी हानि नहीं होती है। स्वयं साहित्यदर्पणका रने भी साधारण दोषोंके रहते हुए भी काव्यमें काव्यत्व स्वीकार किया है। कीटानुविद्धरत्नादिसाधारण्येन काव्यता। दुष्टेष्वपि मता यत्र रसाद्यनुगम: स्फुटः ॥ जैसे कीड़ोंसे खाया हुआ प्रवाल आदि रत्न रत्न ही कहलाता है उसी प्रकार जिस काव्यमें रसादिकी अ्रनुभूति स्पष्टरूपसे होती रहती है वहाँ दोषके होते हुए भी काव्यत्वकी हानि नहीं होती। १. 'साहित्यदर्पण', प्रथम परिच्छेद।
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२२ काव्यप्रकाशः [ का० ४, सू० १ इस सिद्धान्तको साहित्यदर्पणकार भी स्वीकार करते हैं और काव्यप्रकाशकारने जो अपने काव्य-लक्षणमें 'अदोषौ' पदका समावेश किया है वह भी इसी अभिप्रायसे किया है कि रसानुभूतिके बाधक प्रबल दोषोंसे रहित शब्द तथा अर्थकी समष्टि काव्य कहलाती है अर्थात् जहाँ साधारण दोषके होते हुए भी रसानुभूतिमें बाधा नहीं होती है वह दोष-युक्त काव्य भी काव्य ही है। ऐसी दशामें काव्य 'प्रविरलविषय' या 'निर्विषय' कुछ भी नहीं होता है, और न 'न्यक्कारो ह्ययमेव मे यदरयः' इत्यादिमें साधारण 'विधेयाविमर्श' दोषके होनेसे अकाव्यत्व होता है। इसलिए विश्वनाथने इसके खण्डनमें जो कुछ लिखा है उसका 'पाण्डित्य-प्रदर्शन' के अतिरिक्त औौर कोई मूल्य नहीं है। 'सगुणौ' को आलोचना इसी प्रकार लक्षणमें दिये हुए. 'सगुणौ' पदका भी विश्वनाथने खण्डन किया है। उनका कहना है कि गुण तो रसके धर्म होते हैं, रसमें रहते हैं। वे शब्द या अर्थके धर्म नहीं होते हैं इसलिए शब्द या अरथमें नहीं रह सकते हैं। ऐसी दशामें रस ही 'सगुण' कहा जा सकता है, शब्द या अर्थको 'सगुण' नहीं कहा जा सकता। इसलिए काव्यप्रकाशकारने जो 'सगुणौ' पदको 'शब्दाथो के विशेषणरूपमें प्रयुक्त किया है वह भी उचित नहीं किया है। विश्वनाथ तो ऐसा समझ रहे हैं कि मम्मटाचार्य मानों कोई बिलकुल साधारण विद्यार्थी हों जिनको इस बातका भी बोध नहीं है कि गुण शब्द या अर्थके धर्म नहीं हैं। पर ऐसी बात नहीं है। काव्यप्रकाशकार भी जानते हैं कि गुण रसके धर्म होते हैं। फिर भी गौणरूपसे शब्द और अरथके साथ भी उनका सम्बन्ध हो सकता है। अष्टम उल्लासमें 'गुणवृत्त्या पुनस्तेषां वृत्ति; शब्दार्थयोर्मता।' लिखकर मम्मटाचार्यने गौणीवृत्तिसे शब्द तथा अर्थके साथ भी गुणोंके सम्बन्धका प्रतिपादन किया है और उसी दृष्टिसे यहाँ 'शब्दाथौ के विशेषणरूपमें 'सगुणौ' पदका प्रयोग किया गया है। इसलिए विश्वनाथने अपना पाण्डित्य-प्रदर्शन करनेके लिए काव्यप्रकाशकारपर जो यह पङ्मप्रक्षेप किया है वह सब केवल उनका अकाण्ड-ताण्डवमात्र है। रसगङ्गाधरकार-कृत आलोचना 'काव्यप्रकाश' के इस काव्यलक्षणपर न केवल विश्वनाथने, अपितु रसगङ्गाधरकार पण्डितराज जगन्नाथने भी कुछ आपत्ति उठायी है। परन्तु उनका दृष्टिकोण विश्वनाथसे बिलकुल भिन्न है। विश्वनाथने लक्षणके केवल विशेषणभागका खण्डन किया है, विशेष्य-भाग अर्थात् 'शब्दाथौ पदपर कोई आक्षेप नहीं किया है। इसके विपरीत पण्डितराज जगन्नाथने लक्षणके केवल विशेष्यांश 'शब्दाथौ" पदपर आपत्ति उठायी है, विशेषण-भूत 'अदोषौ', 'सगुणौ' आदि पदोंपर कोई आक्षेप नहीं किया है। 'शब्दारथौ' पदपर पण्डितराजको यह आपत्ति है कि काव्यत्व शब्द और अर्थ दोनोंकी समष्टिमें नहीं रहता है और न दोनोंकी व्यष्टिमें अलग-अलग काव्यत्व रहता है। अपितु केवल शब्दमें ही काव्यत्व रहता है। उन्होंने लिखा है- "यत्तु प्राञ्चः (काव्यप्रकाशकारादयः)० ०० शब्दार्थौ काव्यमित्याहुः, तत्र विचार्यते-० ० ० अपि च काव्यपदप्रवृत्तिनिमित्तं शब्दार्थयोर्व्यासक्तं (व्यासज्यवृत्ति) प्रत्येकपर्याप्तं वा ? नाद्ः, एको न द्वो इति व्यवहारस्येव श्लोकवाक्यं न काव्यमिति व्यवहारस्यापत्तेः । न द्वितीयः, एकस्मिन् पद्ये काव्य- द्वय व्यवहारापत्ते:। तरुमाद्वेदशास्त्रपुराणलक्षणस्येव काव्यलक्षणस्यापि शब्दनिष्ठतवोचिता।' १. 'रसगङ्गाधर', पृष्ठ ५।
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अर्थात् जो काव्यप्रकाशकार आदि प्राचीन आचार्य शब्द और अर्थ दोनोंको काव्य कहते हैं उसके विषयमें यह विचार करना है कि वह काव्यत्व शब्द तथा अर्थ दोनोंमें 'व्यासज्य-वृत्ति' अरथात् दोनोंमें मिलकर रहनेवाला धर्म है अथवा 'प्रत्येक-पर्याप्त' अर्थात् एक-एकमें अलग भी रह सकता है। इनमेंसे पहिला अरथात् 'व्यासज्य-वृत्ति' वाला पक्ष नहीं बन सकता है; क्योंकि उस दशा में 'एको न दौ' इस व्यवहारके समान यह श्लोक-वाक्य तो है परन्तु काव्य नहीं है इस प्रकारका व्यवहार होने लगेगा। जैसे दो पदार्थोंमें रहनेवाली द्वित्व-संख्या दोनोंमें मिलकर ही रहती है, अलग-अलग नहीं। इसलिए द्वित्व-संख्या उन दोनों पटाणोंका व्यासज्य-वृत्ति धर्म है। जब दोनों पदार्थ उपस्थित होते हैं तभी 'द्वौ'-'ये दो हैं' इस प्रकारका व्यवहार होता है और जब उनमेंसे एक ही पदार्थ उपस्थित होता है उस समय 'यह दो नहीं, एक है' इस प्रकारका व्यवहार होता है। इसी प्रकार 'यह श्लोक-वाक्य है, काव्य नहीं' यह व्यवहार होने लगेगा। इसलिए काव्यत्वको 'व्यासज्य-वृत्ति' धर्म नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार काव्यत्वको 'प्रत्येक-पर्याप्त' अरथात् शब्द तथा अरर्थ दोनोंमें अलग-अलग रहनेवाला धर्म भी नहीं कहा जा सकता है; क्योंकि उस दशामें एक ही श्लोक-वाक्यमें शब्द और अर्थ दोनोंकी दृष्टिसे दुहरा काव्यत्व आ जायगा। इसलिए एक पद्यमें दो काव्योंका व्यवहार होने लगेगा। इसलिए शब्द तथा अर्थमें न 'व्यासज्य-वृत्ति' काव्यत्व बनता है, न 'प्रत्येक-पर्याप्त'। फलतः काव्यत्व शब्दार्थ उभयनिष्ठ धर्म नहीं है अपित् केवलै शब्दनिष्ठ धर्म है। यह पण्डितराज जगन्नाथका सिद्धान्त है। इसीलिए उन्होंने- "'रमणीयार्थ-प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्' इस प्रकार काव्यका लक्षण किया है। नागेशभट्टकृत पण्डितराजकी प्रत्यालोचना परन्तु उनका यह खण्डन उनके ही टीकाकार नागेशभट्टको उचित प्रतीत नहीं हुआ। इसलिए 'रसगङ्गाधर' की इसी स्थलकी टीकामें 'नोचिता' इस प्रतीकको लेकर उन्होंने लिखा है- "आस्वादव्यञ्जकत्वस्योभयत्नाप्यविशेषात् चमत्कारिबोधजनकज्ञानविषयतावच्छेदकधर्मत्वरूप- स्यानुपहसनीयकाव्यलक्षणस्य प्रकाशाद्युक्तलक्ष्यतावच्छेदकस्योभयवृत्तित्वाच्च काव्यं पठितम्, काव्यं श्रुतम्, काव्यं बुद्धमित्युभर विधव्यहारदर्शनाच्च काव्यपदप्रवृत्तिनिमित्त व्यासज्यवृत्ति। अत एव वेदत्वादेरुभयवृत्तित्वप्रतिपादकः 'तदधीते तद्वेद' ५,२,५६ इति सूत्रस्थो भगवान् पतञ्जलि: सङ्गच्छते। लक्षणयान्यतरस्मिन्नपि तत्त्वात् 'एको न दौ' इतिवत् न तदापत्तिः। तेनानुपहसनीयकाव्यलक्षणं प्रकाशोक्तं निर्बाधम्।" इसका अभिप्राय यह है कि काव्यत्वका प्रयोजक जो 'रसास्वादव्यञ्जकत्व' है वह शब्द तथा अर्थ द्रोनोंमें समानरूपसे रहता है। काव्यको पढ़ा, काव्यको सुना और काव्यको समझा इस प्रकारका व्यवहार भी दिखलायी देता है, इससे शब्द तथा अर्थ दोनोंकी काव्यता प्रतीत होती है, केवल शब्द या केवल अर्थकी नहीं और काव्यप्रकाशोक्त अनुपहसनीय काव्यका नियामक 'चमत्कारिबोधजनकज्ञान- विषयत्वावच्छेदकधर्मत्व' रूप काव्य-लक्षण शब्द तथा अर्थ दोनोंमें रहता है, कमें नहीं। इसलिए काव्यत्वको 'व्यासज्य-वृत्ति' धर्म माननेमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती। इसी दशामें, अर्थात् काव्यत्वको व्यासज्य-वृत्ति धर्म माननेपर ही, 'तदधीते तद्वेद' इस पाणिनि-सूत्रके 'महाभाष्य'में भाष्यकार पतञ्जलि सुनिने वेदत्व आदिको जो व्यासज्य-वृत्ति धर्म माना है उसकी सङ्गति लगती है। इस प्रकार काव्यत्व 'ग्मगङ्गाधर', पृष्ठ ४। I TB
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२४ काव्यप्रकाशः [ का० ४, सू० १ मुख्यरूपसे 'व्यासज्य-वृत्ति' धर्म है परन्तु लक्षणासे केवल शब्द अभवा केवल अर्थमें भी काव्यत्व माना जा सकता है। इसलिए 'एको न दो'के समान 'श्लोकवाक्यं न काव्यम्' इस प्रकारके व्यवहारका कोई अवसर नहीं आता है। फलतः 'काव्यप्रकाश'के अनुसार शब्द तथा अरथ दोनोंको काव्य माननेमें कोई बाधा नहीं है यह 'रसगङ्गाधर' के टीकाकार नागेशभट्टका अभिप्राय है। लमेणन केवल नागेश, अपितु पण्डितराज जगन्नाथको छोड़कर प्रायः सभी आचार्योंने शब्द और अर्थ दोनोंको ही काव्य माना है। इस विषयमें विभिन्न आचार्योंके निम्नलिखित वचन उद्धृत किये जा सकते हैं- १ शब्दाथौं सहितो काव्यं गद्यं पद्यं च तद् द्विधा [ भामह १, १६ ] २ काव्यशब्दोऽयं गुणालङ्कारसंस्कृतयोः शब्दार्थयोर्वर्तते [ वामन १, १] ३ शब्दार्थौ काव्यम् [ रुद्रट-काव्यालद्कार २, १] ४ अदोषौ सगुणौ सालङ्कारौ च शब्दार्थौ काव्यम् [ हेमचन्द्र पृ० १६ ] ५ शब्दार्थौ निर्दोषी सगुणौ प्रायः सालङ्कारी च काव्यम् [ वाग्भट पृ० १४] ६ गुणालङ्कारसहिती शब्दार्थौ दोषवजितौ [ विद्यानाथ-प्रतापरुद्र पृ० ४२] ७ शब्दार्थों वपुरस्य तत्न विवुधैरात्माभ्यधायि ध्वनिः [विद्याधर-एकावली पृ० १, १३] इस प्रकार शब्द तथा अर्थ दोनोंमें काव्यत्व माननेवाला मत ही बहुजन-समादृत मत है। अतएव पण्डितराज जगन्नाथने जो उसका खण्डन किया है वह उपादेय नहीं है। 'अनलंकृती पुनः क्वापि' अर्थात् कहीं स्फुटालङ्कार-रहति शब्दार्थ भी काव्य हो सकते हैं, इसे दिखलानेके लिए काव्यप्रकाशकारने जो 'यः कौमारहरः' इत्यादि श्लोक उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया है उसका समन्वय करते हुए उन्होंने लिखा है कि यहाँ कोई अलङ्कार स्पष्ट नहीं है। इसका अभिप्राय यह है कि उसमें खींचातान करके 'विभावना' या 'विशेषोक्ति' जैसे अलङ्कार निकालनेका प्रयत्न उचित नहीं है। अतएव विश्वनाथने यहाँ 'विभावना' 'विशेषोक्ति' मूलक सन्देह-सङ्कर अलङ्कार सिद्ध करनेका जो प्रयत्न किया, वह ठीक नहीं है। 'हरो वर:' इस प्रकारका अनुप्रासरूप शब्दालङ्कार भी प्रकृत शृङ्गार रसके विरोधी वर्ण रेफसे घटित होनेके कारण अलङ्कार कहलाने योग्य नहीं है। 'रसस्य च प्राधान्यान्नालङ्कारता' 'काव्यप्रकाश'की इस पंक्तिका अभिप्राय यह है कि-जहाँ रस स्वयं प्रधान न होकर अन्य किसीका अङ्ग बन जाता है वहाँ 'रसवत्' अलङ्कार माना जाता है। इस प्रकारके रसवत्, प्रेय, ऊर्जस्वि और समाहित ये चार अलङ्कार अलग माने गये हैं। इनमेंसे भी कोई अलद्कार यहाँ नहीं है। क्योंकि यदि रस यहाँ प्रधान न होकर किसी अन्यका अ्रङ्ग होता तब तो इसमें 'रसवत्'-अलद्कार हो सकता था। परन्तु यहाँ तो रस किसी अन्यका अङ्ग नहीं, अपितु स्वयं प्रधानरूपसे अनुभूत हो रहा है इसलिए 'रसवदलड्कार' भी नहीं है। अतएव 'अनलंकृती पुनः क्वापि' का यह उदाहरण ठीक बन जाता है यह काव्यप्रकाशकारका अभिप्राय है। २. भामहका काव्य-लक्षण मम्मटके पूर्ववर्ती आचार्योमेंसे साहित्यशास्त्रके भीष्मपितामह 'भामह'का काव्य-लक्षण सबसे अधिक प्राचीन है। उन्होंने- 'शब्दार्थौं सहिती काव्यं गद्यं पद्यं च तद् द्विधा।' १, १६।
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का ० ४, सू० १ ] प्रथम उल्लास: २५ । यह काव्यका लक्षण किया है। यह लक्षण जितना ही प्राचीन है उतना ही संक्षिप्त है। उन्होंने शब्द और अर्थ दोनोंके सहभावको काव्य माना है। वे सहभाव या 'सहितौ' शब्दका क्या अर्थ लेते हैं इसकी व्याख्या भी उन्होंने नहीं की है। पर उनका अभिप्राय यह है कि जिस रचनामें व्णित अर्थके अनुरूप शब्दोंका प्रयोग हो या शब्दोंके अनुरूप अर्थका वर्णन हो वे शब्द और अर्थ ही 'सहितौ' पदसे विवक्षित हैं। वही शब्द और अरथका 'साहित्य' है। ३. दण्डीका काव्य-लक्षण भामहके बाद 'काव्यादर्श' के निर्माता "दण्डी' का स्थान माना जाता है। दण्डीने पूर्वके आचार्योंका उल्लेख करते हुए लिखा है- १अतः प्रजानां व्युत्पत्तिमभिसन्धाय सूरयः । वाचां विचित्रमार्गाणां निबबन्धुः क्रियाविधिम्।। तैः शरीरं काव्यानामलङ्काराश्चः द्शिताः ।' अर्थात् प्रजाजनोंकी व्युत्पत्तिको ध्यानमें रखकर भामह आदि प्राचीन विद्वानोंने विचित्र मागोंसे युक्त काव्यवाणीके रचनाके प्रकारोंका वर्णन किया है, जिसमें उन्होंने काव्यके शरीर तथा उसके अलङ्कारोंका वर्णन किया है। यहाँतक डेढ़ कारिकामें दण्डीने पूर्व आचार्योंके मतकी चर्चा की है। उनका सङ्केत यहाँ मुख्य रूपसे 'भामह' की ओर ही है। 'भामह' के 'शब्दारथौ' सहितौ काव्यम्' इस लक्षणमें काव्यके शब्द और अर्थमय 'शरीर' का निर्देश है और आगे ग्रन्थमें उसके अलङ्कारोंका वर्णन किया गया है। इस प्रकार 'तैः शरीरं काव्यानामलङ्काराश्च दर्शिताः ।' यह पंक्ति स्पष्टरूपसे 'भामह की ओोर संकेत कर रही है। भामहके इस लक्षणमें आये हुए 'सहितौ' पदकी कोई व्याख्या नहीं की गयी थी। इस कमीको पूरा करनेका प्रयत्न 'दण्डी'ने किया है- "शरीरं तावदिष्टार्थ-व्यवच्छिन्ना पदावली ।' यही दण्डीका काव्य-लक्षण है। इष्ट अर्थात् मनोरम हृदयाह्वादक अर्थसे युवत पदावली-शब्द- समूह-अर्थात् शब्द और अर्थ दोनों मिलकर ही काव्यका शरीर है। इस प्रकार 'भामह' और 'दण्डी' दोनोंने काव्यके शरीर तथा अलङ्कारोंकी चिन्ता की है, पर उसकी आत्माका विचार नहीं किया है। ३. वामनका काव्य-लक्षण दण्डीके बाद 'वामन' का लक्षण सामने आता है। वामनने भामह और दण्डीके उक्त काव्य- शरीरमें प्राणप्रतिष्ठा करनेका प्रयत्न किया है। उन्होंने काव्यके शरीरकी चिन्ता न करके उसके आत्माका अनुसन्धान करनेका प्रयत्न किया है। 'रीतिरात्मा काव्यस्य' [ काव्यालङ्कारसूत्र १, २, ६ ] यह उनका प्रसिद्ध सूत्र है। अर्थात् वे 'रीति' को काव्यकी 'आत्मा' मानते हैं और 'काव्यं ग्राह्यमलङ्कारात्', 'सौन्दर्यम- लङ्गार:' आदि सूत्रोंमें काव्यके सौन्दर्याधायक अलङ्कारोंको काव्यकी ग्राह्यता एवं उपादेयताका प्रयोजक मानते हैं। ४. आनन्दवर्धनका मत भामह और दण्डीने काव्यके शरीरकी चर्चा की थी इसलिए आत्माका कोई प्रश्न उनके सामने १-२. 'काव्यादर्श', १, ६-१०। कोरी
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२६: काव्यप्रकाश: [ का० ४, सू० १
न था। वामनने 'रीतिरात्मा काव्यस्य' लिखकर काव्यकी 'आत्मा' वया है, एक नया प्रश्न उठा दिया है। इसलिए अगले विचारक आनन्दवर्धनाचार्यके सामने काव्यकी आत्माके निर्धारण करनेका प्रश्न, काव्य- प्रश्न बन गया। रीतियोंको वे केवल 'सङ्कटना' या अवयव-संस्थानके समान ही मानते हैं, उनको काव्यकी 'आत्मा' वे नहीं मानते हैं। इसलिए उन्होंने 'ध्वनि'को काव्यकी आत्मा माना है और वह भी अपने मतसे ही नहीं, अपितु प्राचीन अलिखित परम्पराके आधारपर वे 'ध्वनि'को ही काव्यकी आत्मा माननके पक्षमें हैं। इस विषयमें कुछ लोगोंने विप्रतिपत्ति उत्पन्न कर दी थी, उन्हींके निराकरणके लिए उन्हें 'ध्वन्यालोक' ग्रन्थ लिखनेकी आवश्यकता पड़ी। 'काव्यस्यात्मा ध्वनिरिति बुधः यः समाम्नातपूर्व- स्तस्याभावं जगदुरपरे भाक्तमाहुस्तमन्ये। केचिद्वाचां स्थितमविषये तत्त्वमूचुस्तदीयं तेन ब्रूमः सहृदयमनःप्रीतये तत्स्वरूपम् ।। इस प्रकार आनन्दवर्धनाचार्यके मतसे 'ध्वनि' ही काव्यका जीवनाधायक तत्त्व है। उसके बिना सुन्दर शब्द और अरथ भी निर्जीव देहके समान त्याज्य हैं। ध्वनि-रूप आत्माकी प्रतिष्ठा होनेपर ही शब्दार्थ काव्य होते हैं। ५. राजशखरका मत। पिछले आचार्योंने काव्यके शरीर, आत्मा, अलङ्कार आदिका जो यह रूपक बाँधा था इसकी पृष्ठ-भूमिमें उन्होंने एक 'काव्यपुरुष' की कल्पना की थी जो बहुत स्पष्ट नहीं थी। आगे चलकर राजशेखरने इस 'काव्यपुरुष' की कल्पनाको एकदम स्पष्ट और मूर्त, रूप प्रदान कर दिया। उन्होंने 'काव्यपुरुष' का वर्णन करते हुए लिखा है- 'शब्दारथौं ते शरीरम्, संस्कृत मुखम्, प्राकृत बाहुः, जघनमपभ्रंशः, पैशाचं पादौ, उरो मिश्रम् । ममः प्रसन्नो मधुर उदार ओजस्वी चासि। उक्तिचणं च ते वचः, रस आत्मा, रोमाणि छन्दांसि, प्रश्नोत्तर-प्रवह्निकादिकं च वाक्केलिः, अनुप्रासोपमादयश्च त्वामलंकुर्वन्ति।" ध्वनिकारने ध्वनिको काव्यकी 'आत्मा' माना था। राजशेखरने उस आत्मतत्त्वको और अधिक निश्चितरूप देनेके लिए वस्तु-ध्वनि तथा अलङ्कार-ध्वनिको छोड़कर केवल रसको काव्यका आत्मा माना है।
६. कुन्तकका काव्य-लक्षण वक्रोक्तिजीवितकार कुन्तकने इन सबकी अपेक्षा अधिक विस्तारपूर्वक और अधिक स्पष्टरूपसे काव्यका लक्षण करनेका प्रयत्न किया है। शब्दाथौ सहितौ वक्र-कविव्यापारशालिनि। बन्धे व्यवस्थितौ काव्यं तद्विदाह्लादकारिणि। कुन्तकके इस लक्षणमें पूर्वोक्त सभी लक्षणोंका सारांश प्रायः आ जाता है। 'शब्दार्थौं सहितौ काव्यम्' यह भामहका लक्षण कुन्तकके इस लक्षणमें स्पष्टरूपसे ही समाविष्ट हो गया है। 'तद्विदाह्लाद-
१. 'ध्वन्यालोक', १, १। २. 'काव्यमीमांसा', पृष्ठ १३-१४। शोछ क. किशीमर किफनार चिषिक जी हाना :. 'बकोक्तिजीविन', १-७।
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का० ४, सू० १] प्रथम उल्लास: २७
कारिणि बन्धे व्यवस्थितौ'से दण्डीकी 'इष्टार्थव्यवच्छिन्ना पदावली' तथा वामनकी 'रीति' दोनोंका समावेश हो जाता है। 'वत्र-कविव्यापारशालिनि'से ध्वन्यालोककारके व्यञ्जना-व्यापार-प्रधान 'ध्वनि' तथा राजशेखरके 'रस' दोनोंका अन्तर्भाव हो जाता है। इस प्रकार कुन्तकने मानों पूर्ववर्ती सभी आचार्योंके काव्य-लक्षणोंका निचोड़ अपने इस लक्षणमें समाविष्ट कर दिया है। फिर भी अभी उनकी तृप्ति नहीं हुई है। क्योंकि 'सहितौ' पदका स्पष्टीकरण न भामहके लक्षणमें हुआ था और न यहाँ हुआ है। अतएव शब्द और अर्थके इस 'साहित्य' का स्पष्टीकरण करते हुए वे लिखते हैं- "शब्दाथौ सहितावेव प्रतीती स्फुरतः सदा। सहिताविति तावेव किमपूर्वं विधीयते।। साहित्यमनयोः, शोभाशालितां प्रति काप्यसौ। अन्यूनानतिरिक्तत्वमनोहारिण्यवस्थितिः यहाँ पहिले यह शंका उठायी है कि शब्द और अर्थ तो प्रतीतिमें सदा साथ-साथ ही भासते हैं फिर 'सहितौ' पदसे आप उनमें कौन-सी विशेषता दिखलाना चाहते हैं ? इस शंकाका उत्तर देते हुए कुन्तक यह कहते हैं कि शब्द और अर्थके 'साहित्य'का अभिप्राय काव्य-सौन्दर्यके लिए उनकी 'न्यूनता या अधिकतासे रहित' मनोहर स्थिति होना चाहिये। उसीको शब्द और अर्थका 'साहित्य' कहते हैं। इस प्रकार कुन्तकने काव्यलक्षणको अधिक विस्तारके साथ स्पष्ट करनेका प्रयत्न किया है। ७. क्षमेन्द्रका मत साहित्यशास्त्रके इतिहासमें जिस प्रकार वामन अपने 'रीति-सिद्धान्त'के लिए, आनन्दवर्धन अपने 'ध्वनि-सिद्धान्त' के लिए और कुन्तक अपने 'वकरोक्ति-सिद्धान्त' के लिए प्रसिद्ध हैं उसी प्रकार क्षेमेन्द्र अपने 'औचित्य-सिद्धान्त' के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्होंने 'औचित्य'को ही काव्यका 'जीवित' माना है। अपने 'औचित्यविचारचर्चा' ग्रन्थमें वे लिखते हैं- काव्यस्यालमलङ्कारैः कि मिथ्यागणितैर्गुणैः । यस्य जीवितमौचित्यं विचिन्त्यापि न दृश्यते ॥ अलड्कारास्त्वलङ्कारा गुणा एव गुणाः सदा। औचित्यं रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम्।। ८. विश्वनाथका काव्य-लक्षण साहित्यदर्पणकार विश्वनाथ 'रसात्मक वाक्य' को काव्य मानते हैं। 'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्' यह उनका काव्य-लक्षण है।
मम्मटके काव्य-लक्षणकी विशेषता काव्यप्रकाशकार मम्मटका 'तददोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि' यह काव्य-लक्षण अन्य लक्षणोंकी अपेक्षा अधिक परिमार्जित है। कुन्तकने जिस बातको कई कारिकाओंमें कहा है मम्मटने इस आधी कारिकामें ही उसको समाविष्ट कर दिया है। उसके साथ ही 'अदोषौ' तथा 'सगुणौ' पद १. 'वकोक्तिजीवित', १-१६, १७। २. 'औचित्यविचारचर्चा', ४,५' वgm pu ] fime Ansbys wwwpss mnp f.
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२८ काव्यप्रकाशः२ [का० ४, सू० २
त्द्गेदान् क्रमेणाह-ासफीहायगडय [ सू० २ ] इदमुत्तममतिशयिनि व्यङ्गचे वाच्याद् ध्वनिर्बुधै: कथितः ।४।। इदमिति काव्यम्। बुधैर्वैयाकरणै: प्रधानभूतस्फोटरूपव्यङ्गयव्यञ्जकस्य शब्दस्य जोड़कर उन्होंने काव्य-लक्षणका नया दृष्टिकोण भी उपस्थित किया है, जिसका प्राचीन लक्षणोंमें इतना स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था। पूर्वलक्षणकारोंने काव्यके शरीर 'शब्द तथा अरथ, उसकी आत्मा रीति, रस या ध्वनि उसके अलङ्कारोंकी चर्चा तो अपने लक्षणोंमें की थी, परन्तु गुणदोषकी चर्चा नहीं की थी। मम्मट इस दोष तथा गुणके प्रश्नको सामने लाये हैं और वह बड़ा आवश्यक प्रश्न है। कितना ही सुन्दर काव्य हो पर उसमें यदि एक भी उत्कट दोष आ जाता है तो वह उसके गौरवको कम कर देता है। यों तो महाकवि कालिदासने- 'एको हि दोषो गुणसन्निपाते निमज्जतीन्दोः किरणेष्विवाङ्क:।' कहकर चन्द्रमाके सौन्दर्यके भीतर उसके कलङडके दब जानेकी बात कही है। उनके अनुसार चन्द्रमाका कलड् कितना ही दब गया हो परन्तु देखनेवालेको दह सबसे पहिले खटकता है। इसी प्रकार काव्यका दोष उसके गौरवको कम करनेवाला हो जाता है। इसलिए मम्मटने गुण और अलङ्कारोंकी चर्चा करनेसे पहिले दोषकी चर्चा की है- 'दुर्जनं प्रथमं वन्दे सज्जनं तदनन्तरम्। मुखप्रक्षालनात् पूर्व गुदप्रक्षालनं यथा।।' शरीरके संस्कारमें भी पहिले दोषापनयनरूप संस्कार करनेके बाद ही गुणाधानरूप संस्कार किया जाता है, तब उसके बाद अलङ्कार आदिका नम्बर आता है। वह अगर न भी हो तो भी दोषापनयन तथा गुणाधानरूप संस्कार तो अपरिहार्य हैं। उनके बिना काम नहीं चलता है। इसीलिए मम्मटने काव्यके शरीरभूत शब्दार्थके 'अदोषौ' तथा 'सगुणौ' विशेषणों द्वारा इस द्विविध संस्कारकी अपरिहार्यताका प्रतिपादन किया है और 'अनलंकृती पुनः क्वापि' लिखकर अलङ्कारकी गौणताको सूचित किया है। इस प्रकार थोड़े शब्दोंमें भाव-गाम्भीर्यके द्वारा मम्मटने अपने काव्यलक्षणको अत्यन्त सुन्दर एवं उपादेय बना दिया है। काव्य-भेद : १. ध्वनि-काव्य की इस प्रकार काव्यका लक्षण करनेके बाद काव्यप्रकाशकार उसके मुख्य तीन भेदोंका संक्षेपसे उल्लेख करते हैं। [काव्यके प्रयोजन, उसके साधन तथा उसके लक्षणके निरूपणके बाद अब] कमसे [अवसरप्राप्त] उसके भेदोंको कहते हैं- [सू० २ ]-वाच्य [अर्थ] की अपेक्षा व्यङ्गय [अर्थ ] के अधिक चमत्कारयुक्त होनेपर [इवं] काव्य उत्तम होता है, और विट्वानोंने उसको 'ध्वनि' [-काव्य नामसे ] कहा है।।४।। 'इदं' यह पद [यहाँ ] काव्यका बोधक है। 'बुध' अर्थात् वैयाकरणोंने प्रधानभूत 'स्फोट' रूप व्यङ्गयकी अभिव्यक्ति करानेमें समर्थ शब्दके लिए 'ध्वनि' इस पदका प्रयोग किया था। उसके बाद उनके मतका अनुसरण करनेवाले अन्यों [अर्थात् साहित्यशास्त्रके आचार्यों] ने भी वाच्यार्थको गौण बना
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का० ४, सू० २ ] प्रथम उल्लास: २६ ध्वनिरिति व्यवहार: कृतः । ततस्तन्मतानुसारिभिरन्यैरपि न्यग्भावितवाच्यव्यङ्गय व्यञ्जनक्षमस्य शब्दार्थयुगलस्य । देनेवाले व्यङ्गचार्थकी अभिव्यक्ति करानेमें समर्थ शब्द तथा अर्थ दोनोंके लिए [ध्वनि' पदका प्रयोग करना आरम्भ कर दिया]। 'ध्वनि' नामका मूल आधार यहाँ ग्रन्थकारने जो पंक्तियाँ लिखी है उनसे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि 'ध्वनि' शब्दका प्रयोग मुख्यरूपसे वैयाकरणोंने किया था और साहित्यशास्त्रमें आनन्दवर्धन आदि ध्वनिवादी आचार्योंने व्याकरणशास्त्रके इस 'ध्वनि' शब्दको अपना लिया है। इस शब्द-प्रयोगको अपना लेनेका कारण यह था कि व्याकरणशास्त्रमें प्रधानभूत 'स्फोट' की अभिव्यक्ति शब्दसे होती है इसलिए 'ध्वनति स्फोटं व्यनक्ति इति ध्वनिः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार 'स्फोट' के अभिव्यञ्जक शब्दोंके लिए 'ध्वनि' पदका प्रयोग किया गया था। इसीके आधारपर ध्वनिवादी आचार्योंने भी वाच्यार्थको दबा सकनेमें समर्थ जो व्यङ्गय अर्थ उसको अभिव्यक्त करनेवाले शब्द तथा अर्थके लिए 'ध्वनि' इस पदका प्रयोग प्रारम्भ कर दिया। यहाँ वैयाकरणोंके जिस 'ध्वनि' पदके प्रयोगकी ओर ग्रन्थकार संकेत कर रहे हैं वह महाभाष्यमें आया है। उसका प्रसङ्ग इस प्रकार है- "अथ शब्दानुशासनम्। ... अथ गौरित्यत् कः शब्दः। कि यत्तत् सास्ना-लाङगूल-ककुद-खुर- विषाण्यर्थरूपं स शब्द: ? नेत्याह, द्रव्यं नाम तत् । ... कस्तहि शब्दः । येनोच्चारितेन सास्ना-लाङगूल- ककुद-खुर-विषाणिनां सम्प्रत्ययो भवति स शब्दः । अथवा प्रतीतपदार्थको लोके 'ध्वनिः' शब्द इत्युच्यते। तद्यथा शब्दं मा कुरु, मा शब्दं कार्षीः, शब्दकार्ययं माणवकः इति। ध्वनि कुर्वन्नेवमुच्यते। तस्माद् 'ध्वनिः' शब्दः । Fi इसमें 'ध्वनि' को शब्द कहा गया है। परन्तु स्फोटरूप व्यङ्गचके अभिव्यक्त करनेवाले शब्दके लिए ध्वनि पदका प्रयोग हुआ है यह बात इस पंक्तिसे नहीं निकलती है। फिर भी व्याकरणशास्त्रमें अन्य स्थानोंपर स्फोट-सिद्धान्तकी कल्पना की गयी है और उस 'स्फोट' की अभिव्यक्ति श्रोत्-ग्राह्य वर्ण या ध्वनिसे ही होती है। इसलिए ग्रन्थकारने उक्त आशयकी पंक्ति लिखी है। इस विषयको और अधिक स्पष्टरूपसे समझनेके लिए स्फोट-सिद्धान्तको समझना आवश्यक है। इसलिए संक्षेपमें उसका विवरण नीचे दे रहे हैं। स्फोटवाद 'स्फोटवाद' वैयाकरणोंका प्रमुख सिद्धान्त है। 'स्फोट' शब्दकी व्युत्पत्ति 'स्फुटति अर्थः यस्मात् स स्फोट:' इस प्रकार की जाती है। अर्थात् जिससे अर्थकी प्रतीति हो उसको 'स्फोट' कहते हैं। यह 'स्फोट' पद-स्फोट, वर्ण-वाक्य-स्फोट आदि भेदसे आठ प्रकारका होता है। 'पदस्फोट' से पदार्थकी तथा वाक्य-स्फोटसे वाक्यार्थकी प्रतीति होती है। गकार, औकार, विसर्जनीयके योगसे मिलकर बना हुआ जो 'गौः' पद गायका बोध कराता है, वह श्रोत्से सुनायी देनेवाली ध्वनि नहीं, उससे व्यक्त मानस 'स्फोट' है। क्योंकि श्रोत्से सुनायी देनेवाली ध्वनि तो क्षणिक और अस्थिर है। एक ध्वनिके उच्चारणके वाद जबतक दूसरी ध्वनिका उच्चारण किया जाता है तबतक पहिला ध्वनि-रूप वर्ण नष्ट हो जाता है इसलिए अ्नेक वर्णोंके समुदायरूप पदकी उपस्थिति एक साथ नहीं हो सकती। इसी प्रकार अनेक १. 'महाभाष्य', प्रथमाह्निक, पृष्ठ 3।
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३० काव्यप्रकाशः [ का० ४, सू० २
निःशेषच्युतचन्दनं स्तनतटं निर्मृष्टरागोऽधरो नेत्रे दूरमनञ्जने पुलकिता तन्वी तवेयं तनुः । मिथ्यावादिनि दूति बान्धवजनस्याज्ञातपीडागमे वापीं स्नातुमितो गतासि न पुनस्तस्याध मस्यान्तिकम् ॥ २॥ अत्र तदन्तिकमेव रन्तुं गतासीति प्राधान्येनाधमपदेन व्यज्यते ।।४।। पदोंके समुदायरूप वाक्यकी भी एक साथ उपस्थिति नहीं हो सकती है। तब पदार्थ या वाक्यार्थकी प्रतीति कैसे होती है इस प्रश्नका समाधान करनेके लिए वैयाकरणोंने स्फोट-सिद्धान्त'की कल्पना की है। उनका अभिप्राय यह है कि पूर्वपूर्व वर्णके अनुभवसे एक प्रकारका संस्कार उत्पन्न होता है। उस संस्कारसे सहकृत अन्त्य वर्णके श्रवणसे तिरोभूत वर्णोंको भी ग्रहण करनेवाली एक मानसिक पदकी प्रतीति उत्पन्न होती है। इसीका नाम 'पदस्फोट' है। अर्थकी प्रतीति इस 'पदस्फोट' के द्वारा ही होती है, श्रोत्रसे गृहीत शब्द या ध्वनिसे नहीं; क्योंकि उस रूपमें तो अ्रनेक व्णोंके समुदायरूप पदकी स्थिति ही नहीं बन सकती है। इसी प्रकार 'पूर्व-पूर्व-पदानुभवजनितसंस्कारसहकृत-अन्त्य-पद-श्रवण' से सदसद् अनेक पदाव- गाहिनी मानसी वाक्य-प्रतीति होती है, वैयाकरण उसको 'वाक्य-स्फोट' कहते हैं। इस 'वाक्य-स्फोट' से वाक्यार्थकी प्रतीति होती है। वर्ण-ध्वनिसे वर्ण-स्फोटकी अभिव्यक्ति होती है। नैयायिक 'स्फोट' को नहीं मानते हैं। इसका कारण यह है कि वैयाकरणोंका यह 'स्फोट' नित्य है। इसी 'स्फोट' को लेकर वे शब्दको नित्य बतलाते हैं। नैयायिकके मतसे शब्द अनित्य है और स्फोटकी सत्तामें कोई प्रमाण नहीं है। वे केवल 'सदसदनेकवर्णावगाहिनी पदप्रतीति' तथा 'सदसदनेकपदाव- गाहिनी वाक्य-प्रतीति' मानते हैं। पर उसे 'स्फोट' नहीं कहते हैं और न नित्य मानते हैं। इस 'स्फोट की अभिव्यक्ति श्रोत्ग्राह्य ध्वनि-रूप शब्दसे होती है। इसलिए जैसे वैयाकरणोंने अपने यहाँ प्रधानभूत 'स्फोट' के अभिव्यञ्जक शब्दके लिए 'ध्वनि' पदका प्रयोग किया है उसी प्रकार प्रधानभूत व्यङ्गय अर्थको अभिव्यक्त करनेवाले शब्द तथा अर्थके लिए आ्नन्दवर्धनाचार्य आदिने 'ध्वनि' शब्दका प्रयोग साहित्यशास्त्रमें किया है यह ग्रन्थकारका अभिप्राय है। [ध्वनि-काव्यका उदाहरण ] जैसे- तुम्हारे स्तनके अग्रभागका चन्दन बिलकुल छूट गया है। [यदि स्नानसे यह चन्दन छूटता तो केवल अग्रभागका ही नहीं, सारे स्तनका छूटता। यह जो ऊपर उठे हुए अग्रभागका ही चन्दन छूटा है, वह निश्चय परपुरुषके आलिङ्गनसे ही छूटा है। ] अधरका राग बिलकुल छूट गया है, आँखोंका अंजन अत्यन्त पुँछ गया है और तुम्हारा यह कृश शरीर रोमाञ्चयुक्त हो रहा है। अपनी सखीकी [बान्धवरूप मेरी ] पीड़ाको न समझनेवाली और झूठ बोलनेवाली अरी दूती तू यहाँसे बावली नहाने गयी थी और उस अधम [नायक ] के पास नहीं गयी ।।२।। यहाँ [कहनेवाली भी जानती है कि यह नायकके साथ भोग करके आयी है और जिससे कहा जा रहा है वह तो जानती ही है। इसलिए वक्ता तथा बोद्धाके वैशिष्टघसे तू ] उसीके पास गयी थी, और रमण करनेके लिए ही गयी थी, यह बात विशेषकर 'अधम' पदसे अभिव्यक्त होती है। [इसमें वाच्यार्थकी अपेक्षा व्यङ्गचार्थ अधिक चमत्कारयुक्त है इसलिए ग्रन्थकारने इसको उत्तम-काव्य या ध्वनि-काव्यके उदाहरणके रूपमें प्रस्तुत किया है] ।४।
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का० ५, सू० ४] प्रथम उल्लास: ३१
[सू० ३ ] अतादृशि गुणीभूतव्यङ्गयं व्यङ्गचे तु मध्यमम्। अतादृशि वाच्यादनतिशायिनि। यथा- ग्रामतरुणं तरुण्या नववञ्जुलमञ्जरीसनाथकरम् पश्यन्त्या भवति मुहुनितरां मलिना मुखच्छाया ।३।। अत्र वञ्जुललतागृहे दत्तसङ्केता नागतेति व्यङ्गयं गुणीभूतम्, तदपेक्षया वाच्यस्यैव चमत्कारित्वात्। [ सू० ४ ] शब्दचित्रं वाच्यचित्रमव्यङ्गचं त्ववरं स्मृतम् ।।५।।
काव्य-भेद : २. गुणीभूतव्यङ्गय-काव्य इस प्रकार ध्वनि-काव्यका लक्षण तथा उदाहरण दे चुकनेके बाद काव्यके 'गुणीभूतव्य ङ्गच' नामक दूसरे भेदका लक्षण करके उसका उदाहरण आगे देते हैं- [सू० ३ ] उस प्रकारके [अर्थात् वाच्यसे अधिक चमत्कारी ] व्यङ्गय [अर्थ ] न होनेपर [गुणी भूतव्यङ्गघ [नामक दूसरे प्रकारका काव्य ] होता है जो मध्यम [काव्य कहा जाता ] है। [अतादृशि ] वैसा न होनेपर अर्थात् [व्यङ्गचार्थके ] वाच्यसे अधिक उत्तम न होनेपर [गुणीभूत- व्यङ्गय-काव्य होता है ] जैसे- वेतस-वृक्षकी ताजी तोड़ी हुई मञ्जरीको हाथमें लिये ग्रामके नवयुवकको देख-देखकर तरुणीके मुखकी कान्ति मलिन होती जा रही है ।।३॥ यहाँ अशोक या वेतसके [वञ्जुलः पुंसि तिनिशे वेतसाशोकयोरपि ] लता-गृहमें [ग्राम-तरुणके साथ मिलनेका ] संकेत देकर[घरके काममें लग जाने अथवा अन्य लोगोंकी उपस्थितिके कारण निकलनेका समय न मिलनेसे तरुणी नियत समयपर वहाँ ] नहीं आयी [और प्रामतरुण समयपर पहुँच गया; उसको देखकर तरुणीकी मुख-कान्ति मलिन हो रही है] यह व्यङ्गच, वाच्यके ही उस [व्यङ्ग्य ] की अपेक्षा अधिक चमत्कारी होनेसे, गुणीभूत हो गया है। [ इसलिए यह गुणीभूतव्य ङ्गचका उदाहरण है]।।३।। i 'ग्रामतरुण' इस पदसे यह भी व्यक्त होता है कि ग्राममें एक ही तरुण है, अ्नेक युवतियों द्वारा प्रार्थ्यमान होनेसे उसका दुबारा जल्दी मिलना कठिन है। इसलिए पश्चात्तापका अतिशय सूचित होता है। यहाँ व्यङ्गय अर्थकी अपेक्षा वाच्य अर्थके ही अधिक चमत्कारी होनेसे गुणीभूतव्यङ्गयका यह उदाहरण दिया है। वाच्य और व्यङ्गय दोनों जहाँ समान स्थितिमें हों, वहाँ भी व्यङ्गचके वाच्यातिशायी न होनेके कारण गुणीभूतव्यङ्गय ही होता है। उसका उदाहरण यहाँ नहीं दिया है। पञ्चम उल्लासमें जहाँ 'गुणीभूतव्यङ्गय का विस्तारके साथ विवेचन किया जायगा, वहाँ वाच्य तथा व्यङ्गय दोनोंके 'तुल्य- प्राधान्य' का उदाहरण भी दिया जायगा।श काव्य-भेद : ३. चित्र-काव्य इस प्रकार काव्यके ध्वनि तथा गुणीभूतव्यङ्गयरूप उत्तम तथा मध्यम भेदोंके लक्षण एवं उदाहरण यहाँ तक दिखलाये। आगे काव्यके तीसरे भेद 'चित्र-काव्य'का लक्षण तथा उदाहरण दिखलाते हैं- [ सू० ४ ]-व्यङ्गय [अर्थ ] से रहित 'शब्द-चित्र' तथा 'अर्थ-चित्र' [दो प्रकारका ] अधम [काव्य ] कहा गया है ।।५।।
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३२ काव्यप्रकाश: [ का० ५, सू० ४
चित्रमिति गुणालङकारयुक्तम् । अव्यङ्गयमिति स्फुटप्रतीयमानार्थरहितम् । अवरम् अधमम्। यथा- स्वच्छन्दोच्छलदच्छकच्छकुहरच्छाततराम्बुच्छटा- मूर्च्छन्मोहमहर्षिहर्षविहितस्नानाह्निका ह्वाय वः । भिद्यादुद्यदुदारदर्दुरदरी दीर्घादरिद्रदुम- द्रोहोद्रेकमहोर्मिमेदुरमदा मन्दाकिनी मन्दताम् ।।४।। १विनिर्गतं मानदमात्ममन्दिराद् भवत्युपश्रुत्य यदृच्छयापि यम् । ससम्भ्रमेन्द्रद्रुतपातितार्गला निमीलिताक्षीव भियामरावती ।।५।। चित्र [नाम ] गुण तथा अलङ्गारसे युक्त [होनेसे ] है। अव्यङ्ग्च [का अभिप्राय ] स्पष्टरूपसे [प्रतीयमान ] व्यङ्गच अर्थसे रहित [काव्य] है। अवर [का अर्थ ] अधम है। [शब्द-चित्र, अर्थ- चित्र-दोनोंके उदाहरण देते हैं ] जैसे- जमा ['मन्दाकिनी वः मन्दताम् अह्लाय भिद्यात्' यह इस श्लोकका मुख्य वाक्य है, शेष सब मन्दाकिनीके विशेषण हैं। इसलिए श्लोकका भावार्थ यह हुआ कि ] गङ्गा तुम्हारी मन्दता अर्थात् अज्ञान या पापको अह्लाय अर्थात् झटिति तुरन्त ही दूर करे। [किस प्रकारकी मन्दाकिनी कि -- ] स्वच्छन्दरूपसे उछलती हुई, अच्छ अर्थात् निर्मल और [कच्छ-कुहर ] किनारेके गड्ढोंमें [छात दुर्बल, छातेतर ] अत्यन्त वेगसे प्रवाहित होनेवाली जो जलकी धारा [अम्बुच्छटा ] उससे जिनके मोह अज्ञानका [मूर्च्छा ] नाश हो गया है ऐसे महर्षियोंके द्वारा जिसमें आनन्दपूर्वक स्नान तथा आह्निक [सन्ध्या-वन्दन आदि ] कार्य किये जा रहे हैं [ इस प्रकारकी मन्दाकिनी तुम्हारी मन्दता, अज्ञान अथवा पापादिको दूर करे। इस विशेषणसे * मन्दाकिनीके महर्षिजनसेव्यत्वका प्रतिपादन कर अन्य तीर्थोंकी अपेक्षा उसका महत्त्व प्रदर्शित किया है। आगे अन्य नदियोंसे उसकी श्रेष्ठता दिखलाते हैं। उद्यन्तः प्रकाशमाना उदारा महान्तो दुर्दुरा भेका यासु एवंविधा दर्य: कन्दरा यस्यां सा] जिनमें बड़े-बड़े मेढक दिखलायी पड़ रहे हैं इस प्रकारकी कन्दराओंसे युक्त, और दीर्घकाय एवं अदरिद्र अर्थात् [बड़े ऊँचे तथा शाखा, पत्र-पुष्प आदिसे लवे हुए ] जो वृक्ष उनके गिराने [द्रोह ] के कारण ऊपर उठनेवाली बड़ी-बड़ी लहरोंसे [मेदुरमदा ] अत्यन्त गर्वशालिनी गङ्गा तुम्हारे पाप या अज्ञान आदिको तुरन्त नष्ट करे। उसमें कोई व्यङ्गयार्थ नहीं है केवल शब्दोंका अनुप्रास- जन्य चमत्कार है। अतः चित्र काव्य है।। यह 'शब्दचित्र' का उदाहरण है। अर्थचित्रका उदाहरण आगे देते हैं- [शतूणां मानम् अभिमानम् द्यति खण्डयति, मित्रेभ्यो मानमादरं ददाति वा इति मानदः ] शत्रुओंके अभिमानको चूर करनेवाले जिस [हयग्रीव ] को यों ही घूमनेके लिए [ युद्ध या अमरावतीपर विजय करनेके लिए नहीं ] अपने महलसे निकला हुआ सुनकर भी घबड़ाये हुए इन्द्रके द्वारा जिसकी अर्गला डाल दी गयी है इस प्रकारकी [इन्द्रकी राजधानी ] अमरावती [नगरीरूप नायिका ] ने भयसे [द्वाररूप अपनी] आँखें बन्द-सी कर लीं। यहाँ 'भिया निमीलिताक्षीव अमरावती जाता' अर्थात् अमरावतीने मानों डरके मारे आँखें बन्द कर ली हों यह उत्प्रेक्षा अलङ्कार है। इस उत्प्रेक्षामें ही कविका प्रधानरूपसे तात्पर्य है। इसलिए
१. मेण्ठ-कवि-कृत 'ह्यग्रीववध-नाटक'।
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कारिका ५, सू० ४ ] प्रथम उल्लास: ३३ इति काव्यप्रकाशे काव्यस्य प्रयोजन-कारण-स्वरूपविशेष-निर्णयो नाम प्रथम उल्लास: यद्यपि वीररसकी प्रतीति हो सकती है परन्तु उसमें कविका तात्पर्य न होनेसे इसको चित्र-काव्यमें स्थान दिया गया है। परन्तु अर्थचित्रका यह उदाहरण कुछ ठीक नहीं जँचता है। यहाँ वीररसकी प्रतीति होती है, जिसमें हयग्रीव स्वयं 'आलम्बन-विभाव', प्रतिपक्षी इन्द्रगत भय 'उद्दीपन-विभाव', मानका खण्डन 'अनुभाव' और यदृच्छा-सञ्चरणसे गम्य धृति 'व्यभिचारिभाव' है। इसलिए यह व्यङ्गय- रहित अधम 'चित्र-काव्य'का उदाहरण नहीं हो सकता है। यदि उत्प्रेक्षासे वीररस अभिभूत हो जाता है यह कहा जाय, तो इसको गुणीभूत-व्यङ्गयके उदाहरणमें अन्तर्भूत किया जा सकता है। अधमकाव्यकी श्रेणीमें रखकर कदाचित् इस श्लोकके साथ न्याय नहीं किया गया है। सारांश इस प्रकार इस प्रथम उल्लासमें ग्रन्थकारने (१) मङ्गलाचरण, उसके बाद (२) काव्यके प्रयोजन, (३) काव्यके साधन, (४) काव्यका लक्षण तथा (५) काव्यके भेदोंका वर्णन किया है। काव्यके भेदोंका वर्णन करते हुए उन्होंने मुख्यरूपसे काव्यके तीन भेद किये हैं-१. ध्वनि-काव्य, २. गुणीभूत-व्यङ्गय-काव्य और ३. चित्र-काव्य। इनमेंसे 'ध्वनि-काव्य' उसको कहते हैं जिसमें वाच्यार्थकी अपेक्षा व्यङ्गयार्थ अधिक चमत्कारयुक्त हो। इसके विपरीत जहाँ व्यङ्गयार्थकी अपेक्षा वाच्यार्थ अधिक वा उसके तुल्य चमत्कारजनक होता है उसको 'गुणीभूत-व्यङ्गय-काव्य' कहते हैं, और जहाँ व्यङ्गयका सर्वथा अभाव होता है उसको 'चित्र-काव्य' कहते हैं। इनमेंसे ध्वनि-काव्य उत्तम, गुणीभूत-व्यङ्गय- काव्य मध्यम तथा चित्र-काव्य अधम श्रेणीमें गिना जाता है। काव्यप्रकाशमें काव्यके प्रयोजन, कारण तथा स्वरूप-विशेष- का निर्णय नामक प्रथम उल्लास समाप्त हुआ। श्रीमदाचार्य-विश्वेश्वर-सिद्धान्तशिरोमणिविरचितायां काव्यप्रकाशदीपिकायां हिन्दीव्याख्यायां प्रथम उल्लासः समाप्तः ।
प्रशि
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द्वितीय उल्लास:
क्रमेण शब्दार्थयोः स्वरूपमाह- [सू० ५] स्याद्वाचको लाक्षणिक: शब्दोऽत्र व्यञ्जकस्त्रिधा। अत्रेति काव्ये। एषां स्वरूपं वक्ष्यते। अथ काव्यप्रकाश-दीपिकायां द्वितीय उल्लास: उल्लास-सङ्गति प्रथम उल्लासमें काव्यका लक्षण करते हुए ग्रन्थकारने शब्द तथा अरथ दोनोंकी समष्टिको काव्य बतलाया था। इसलिए काव्यके इस लक्षणको समझनेके लिए शब्द तथा अर्थके स्वरूपका ज्ञान आवश्यक है। इसलिए ग्रन्थकार इस द्वितीय उल्लासमें शब्द तथा अर्थके स्वरूपका परिचय करानेका प्रयत्न कर रहे हैं। इस दृष्टिसे उन्होंने अपने इस द्वितीय उल्लासका नाम 'शब्दार्थस्वरूपनिर्णय' रखा है। उन्होंने वाच्य, लक्ष्य और व्यङ्गय तीन प्रकारके अरथ माने हैं। उसीके अनुसार वाचक, लक्षक तथा व्यञ्जक तीन प्रकारके शब्द माने हैं। इन तीन प्रकारके शब्दोंसे तीनों प्रकारके अरथोंकी प्रतीतिके लिए उन शब्दोंमें अभिधा, लक्षणा तथा व्यञ्जना नामक तीन प्रका रकी शब्द-शक्तियाँ मानी हैं। इस उल्लासमें ग्रन्थकार तीन प्रकारके अर्थ, तीन प्रकारके शब्द और तीन प्रकारकी शब्द-शक्तियोंका वर्णन करेंगे। सबसे पहले तीन प्रकारके शब्दोंका निरूपण करते हैं। शब्दके तीन भेद [काव्यका लक्षण हो जानेके बाद लक्षणमें आये हुए 'शब्दाथौ"का विवेचन करनेके लिए ] कमसे [अवसरप्राप्त ] शब्द तथा अर्थके स्वरूपको कहते हैं- [सू० ५]-यहाँ [काव्यमें ] वाचक, लाक्षणिक और व्यञ्जक [भेदसे ] तीन प्रकारका शब्द होता है। 'यहाँ' इससे 'काव्यमें' [ यह अर्थ लेना चाहिये ]। इन (वाचक, लाक्षणिक और व्यञ्जक तीनों प्रकारके शब्दों ] का स्वरूप [आगे] बतलाया जायगा। अन्य शास्त्रोंमें वाचक तथा लक्षक दो प्रकारके शब्द तो प्रायः माने गये हैं परन्तु तीसरे व्यञ्जक शब्दका निरूपण साहित्यशास्त्रको छोड़कर अन्य शास्त्रोंमें नहीं किया गया है। इसलिए कारिकामें 'अत्न' शब्दका विशेषरूपसे प्रयोग किया गया है, जिसका अभिप्राय यह है कि यद्यपि अन्य शास्त्रोंमें व्यञ्जक- शब्द नहीं माना गया है परन्तु काव्यमें तो व्यञ्जक शब्दके बिना कोई चमत्कार ही न रह जायगा इसलिए यहाँ काव्यमें तीनों प्रकारके शब्द माने जाते हैं। इनमें वाचक शब्द मुख्यार्थका बोधक होता है इसलिए सबसे पहिले उसको रखा गया है। लाक्षणिक शब्द वाचक शब्दके ऊपर आश्रित रहता है इसलिए वाचकके बाद लाक्षणिक शब्दका स्थान आता है और व्यञ्जक शब्द इन दोनोंकीं अपेक्षा रखता है इसलिए उसको तीसरे स्थानपर रखा गया है। उसमें भी विशेषरूपसे यह बात ध्यान देने योग्य है कि यह तीन प्रका रका विभाग केवल शब्दकी उपाधियोंका है, शब्दोंका नहीं; क्योंकि अमुक शब्द केवल वाचक है, अमुक शब्द केवल लक्षक है या अमुक शब्द केवल व्यञ्जक है इस प्रकार कोई निश्चित विभाग शब्दोंमें नहीं पाया जाता है। एक ही शब्द वाचक भी हो सकता है और लक्षक तथा व्यञ्जक भी। इसलिए यह तीन प्रकारका विभाग शब्दोंका नहीं, अपितु शब्दकी उपाधियोंका ही समझना चाहिये ? जिस प्रकार एक ही व्यक्ति
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का० ६, सू० ७] द्वितीय उल्लास: ३५
[सू० ६ ] वाच्यादयस्तदर्थाः स्युः BTOTB-DRNIB-THFTF TE वाच्य-लक्ष्य-व्यङ्गयाः । [सू० ७] तात्पर्यार्थोऽपि केषुचित् ।।६।। उपाधिके भेदसे कभी वाचक और कभी पाठक कहा जा सकता है, उसी प्रकार उपाधियोंके भेदसे एक ही शब्द कभी वाचक, कभी लक्षक और कभी व्यञ्जक कहा जा सकता है। अर्थके तीन भेद जिस प्रकार उपाधिभेदसे शब्द तीन प्रकारके होते हैं उसी प्रकार अर्थ भी तीन प्रकारके होते हैं। उनको कहते हैं- [सू० ६]-वाच्य [लक्ष्य तथा व्यङ्गय ] आदि उन [वाचक, लक्षक तथा व्यञ्जक शब्दों] के अर्थ [ भी तीन प्रकारके ] होते हैं। [वाच्यादिका अर्थ है] वाच्य, लक्ष्य तथा व्यङ्गय। अर्थका चतुर्थ भेद-'तात्पर्यार्थ' [सू० ७]-किन्हीं कुमारिलभट्टके अनुयायी पार्थसारथिमिश्र आदि [ 'अभिहितान्वयवादी' मीमांसकों ] के मतमें [तीन प्रकारके वाच्यादि अर्थोंके अतिरिक्त चौथे प्रकारका ] तात्पर्यार्थ भी होता है।।६।। भारतीय साहित्यमें शाब्दबोधका विवेचन व्याकरण, न्याय तथा मीमांसा इन तीन शास्त्रोंमें विशेषरूपसे किया गया है। इनमेंसे व्याकरणशास्त्रमें पद-पदार्थोंका विवेचन है, इसलिए व्याकरणको 'पद-शास्त्र' कहते हैं। न्यायमें विशेषरूपसे प्रमाणोंका विवेचन किया गया है इसलिए न्यायको 'प्रमाण- शास्त्र' दहा जाता है। इसी प्रकार वाक्यार्थ-शैलीका विवेचन मीमांसामें विशेषरूपसे किया है, इसलिए मीमांसाको 'वाक्य-शास्त्र' कहा जाता है। शाब्दबोधमें इन तीनों शास्त्रोंकी आवश्यकता पड़ती है इसलिए शाब्दबोधमें निष्णात इन तीनों शास्त्रोंके पण्डितको 'पद-वाक्य-प्रमाणज्ञः' इस गौरवपूर्ण उपाधिसे विभूषित किया जाता है। यहाँ ग्रन्थकारने अर्थविवेचनके प्रसङ्गमें मीमांसकोंके सिद्धान्तको प्रदर्शित करनेके लिए 'तात्यार्थोऽपि केषुचित्' यह पंक्ति विशेषरूपसे लिखी है। मीमांसकोंमें भी वाक्यार्थके विषयमें कई मत पाये जाते हैं, जिनमें 'अभिहितान्वयवाद' तथा 'अन्विताभिधानवाद' दो मुख्य हैं। प्रसिद्ध मीमांसक विद्वान् कुमारिलभट्ट तथा उनके अनुयायी पार्थ- सारथिमिश्र आदि 'अभिहितान्वयवाद' के माननेवाले हैं। इसके विपरीत प्रभाकर-गुरु और उनके अनुयायी शालिकनाथमिश्र आदि 'अन्विताभिधानवाद' के माननेवाले हैं। अभिहितान्वयवाद अभिहितान्वयवादका अभिप्राय यह है कि पहिले पदोंसे पदार्थोंकी प्रतीति होती है। उसके बाद उन पदार्थोंका परस्परसम्बन्ध, जो पदोंसे उपस्थित नहीं हुआ था, वाक्यार्थ-मर्यादासे उपस्थित होता है। इसलिए पहिले पदोंके द्वारा पदार्थ अभिहित अर्थात् अभिधा शक्ति द्वारा बोधित होते हैं, बादमें वक्ताके तात्पर्यके अनुसार उनका परस्पर अन्वय या सम्बन्ध होता है जिससे वाक्यार्थकी प्रतीति होती है। इस प्रकार वाक्यार्थ-बोधके लिए अभिहित पदार्थोंका अन्वय माननेके कारण कुमारिलभट्ट आादिका यह सिद्धान्त 'अभिहितान्वयवाद' कहा जाता है। इस मतमें पदार्थोंका परस्पर सम्बन्ध पदोंसे नहीं, अपितु वक्ताके तात्पर्यके अनुसार होता है, इसलिए उसको 'तात्पर्यार्थ' कहते हैं, वही वाक्यार्थ
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३६ काव्यप्रकाश: [का० ६, सू० ७ आकाङक्षा-योग्यता-सन्निधिवशाद् वक्ष्यमाणस्वरूपाणां पदार्थानां समन्वये तात्पर्यार्थो विशेष त्रपुरपदार्थोऽपि वाक्यार्थः समुल्लसतीति 'अभिहितान्वयवादिनां' मतम् । कहलाता है और उसकी बोधक शक्तिको 'तात्पर्याख्या शक्ति' भी कहा जाता है, जो पहिले बतलायी हुई तीनों शक्तियोंसे भिन्न चौथी शक्ति मानी जा सकती है। परन्तु मीमांसक व्यञ्जना-शक्ति नहीं मानते हैं इसलिए उनकी दृष्टिसे तो यह चौथी नहीं, तीसरी ही शक्ति है। ग्रन्थकारने 'अभिहितान्वयवाद के इसी सिद्धान्तका परिचय इस प्रकार दिया है- जिन [पदार्थो) का स्वरूप आगे कहा जायगा ऐसे [ पदों द्वारा अभिहित केवल ] पदार्थोंका आकांक्षा, योग्यता तथा सन्निधिके बलसे [समन्वय ] परस्पर सम्बन्ध होनेमें पदोंसे प्रतीत होनेवाला अर्थ न होनेपर भी [तात्पर्यविषयीभूत अर्थ होनेके कारण ] विशेष प्रकारका तात्पर्यरूप वाक्यार्थ प्रतीत होता है यह 'अभिहितान्वयवादियों' [ अर्थात् कुमारिलभट्टके अनुयायियों] का मत है। एक तो 'अभिहितान्वयवाद' का सिद्धान्त दार्शनिक विषय होनेके कारण वैसे ही क्लिष्ट है उसपर आचार्य मम्मटकी क्लिष्ट रचना-शैलीके कारण ये पंक्तियाँ और भी कठिन एवं दुरूह बन गयी हैं। 'आकाङक्षा-योग्यता-सन्निधिवशात्' इस वाक्य-खण्डको ग्रन्थकारने पहिले रखा है और 'वक्ष्यमाणस्व- रूपाणां पदार्थानाम्' इस वाक्यांशको बादमें रखा है। यह वाक्य-रचना अर्थको समझनेमें कुछ कठिनाई उपस्थित करती है। यदि इसके स्थानपर 'वक्ष्यमाणस्वरूपाणां पदार्थानाम् आकाङक्षा-योग्यता-सन्नि- धिवशात् समन्वये' इस प्रकार का पाठ रखते तो अर्थका समझना अपेक्षाकृत सरल हो जाता। पंक्तियोंका आशय यह है कि पदार्थोंका परस्पर सम्बन्ध पदों द्वारा उपस्थित न होनेपर भी आकांक्षादिके बलसे भासता है। यही 'तात्पर्यार्थ' है और यही 'वाक्यार्थ' कहलाता है। इसीको पंक्तिमें 'तात्पर्यार्थों विशेषवपुः अपदार्थोऽपि वाक्यार्थः समुल्लसति' इन शब्दोंसे कहा है। इस अनुच्छेदमें आकांक्षा, योग्यता तथा सन्निधि शब्दोंका प्रयोग हुआ है। ये नये शब्द हैं इसलिए इनका अर्थ समझ लेना आवश्यक है। इनमेंसे 'आकांक्षा' वस्तुतः 'श्रोताकी जिज्ञासारूप' है। एक पदको सुननेके बाद वाक्यके अन्य पदोंके सुने बिना पूरे अर्थका ज्ञान नहीं होता है, इसलिए वाक्यके अगले पदके सुननेकी इच्छा श्रोताके मनमें उत्पन्न होती है। इसीका नाम आकांक्षा है। जिन पदोंके सुननेपर इस प्रकारकी आकांक्षा होती है उनके समुदायको ही वाक्य कहते हैं। आकांक्षासे रहित 'गौरश्वः पुरुषो हस्ती' आदि यों ही अनेक पद बोल देनेसे वाक्य नहीं बनता है। दूसरे 'योग्यता' पदका अभिप्राय 'पदार्थोंके परस्पर सम्बन्धमें बाधाका अभाव' है। जहाँ पदार्थोंके परस्पर सम्बन्धमें बाधा होती है उस पद-समुदायको वाक्य नहीं कहा जाता और न उससे वाक्यार्थबोध होता है। जैसे 'वह्निना सिञ्चति' इस पद-समुदायमें 'योग्यता' नहीं है अर्थात् अग्निसे सिंचाई नहीं की जा सकती है। इसलिए वह्नि तथा सिंचनके सम्बन्धमें बाधा होनेसे यहाँ योग्यताका अभाव है। इस कारण इसको वाक्य नहीं कहा जा सकता है। तीसरा 'सन्निधि' पद है, उसका अर्थ 'एक ही पुरुष द्वारा अविलम्बसे पदोंका उच्चारण करना' है। यदि एक ही व्यक्ति द्वारा घंटे-घंटेभर बादमें पदोंका अलग-अलग उच्चारण किया जाय तो वे सब मिलकर वाक्य नहीं कहला सकते हैं; क्योंकि उनमें 'आसत्ति' या सन्निधि' नहीं है। इसलिए आकांक्षा, योग्यता और सन्निधिसे युक्त जो पदसमुदाय होता है वही वाक्य कहलाता है और उसीसे वाक्यार्थका बोध होता है। इसलिए यहाँ ग्रन्थकारने इन तीनोंका उल्लेख किया है। 'अभिहितान्वयवाद' में पहिले पदोंसे केवल- अनन्वित-पदार्थ उपस्थित होते है उसके बाद पदोंकी आकांक्षा, योग्यता तथा सन्निधिके बलसे 'तात्पर्य-
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का० ६, सू० ७] द्वितीय उल्लास: ३७
वाच्य एव वाक्यार्थ इति 'अन्विताभिधानवादिनः' ।
शक्ति' द्वारा उन पदार्थोंके परस्परसम्बन्धरूप वाक्यार्थोंके बोध होता है। यह 'अभिहितान्वयवादी' कुमारिलभट्टके मतका सारांश ग्रन्थकारने यहाँ प्रस्तुत किया है। अन्विताभिधानवाद दूसरा सिद्धान्त 'अन्विताभिधानवाद' है। इस सिद्धान्तके प्रतिपादक प्रभाकर और उनके अनुयायी शालिकनाथमिश्र आदि हैं। इनका कहना यह है कि पहिले 'केवल' पदार्थ अभिहित होते हों और बादको उनका 'अन्वय' होता हो यह बात नहीं है, बल्कि पहिलेसे 'अन्वित' पदार्थोंका ही अभिधासे बोधन होता है। इसलिए इस सिद्धान्तका नाम 'अन्विताभिधानवाद' रखा गया है। इस मतमें पदार्थोंका 'अन्वय' पूर्वसे ही सिद्ध होनेके कारण, उसके करानेके लिए, 'तात्पर्याख्या शक्ति' की आ्र्प्रावश्यकता नहीं होती है। प्रभाकर अपने इस मतके समर्थनके लिए यह युक्ति देते हैं कि पदोंसे जो पदार्थोंकी प्रतीति होती है वह 'सङ्केतग्रह' के बाद ही होती है और उस सङ्केतका ग्रहण व्यवहारसे होता है। जैसे, छोटा बालक है, उसको यह ज्ञान नहीं होता है कि किस शब्दका क्या अर्थ है, कौन-सा शब्द किस अर्थके बोधनके लिए प्रयुक्त किया जाता है। वह अपने पिता आदिके पास बैठा है। पिता उसके बड़े भाई या नौकर आदि किसीको आज्ञा देता है कि 'जरा कलम उठा दो।' बालक न कलमको जानता है और न 'उठा दो'का परर्थ समझता है। परन्तु वह पिताके इस वाक्यको सुनता है और भाईके व्यापारको देखता है। इससे उसके मनपर उस समष्टि वाक्यके समष्टिभूत अर्थका एक संस्कार बनता है। उसके बाद पिता फिर कहता है 'कलम रख दो और दावात उठा दो।' बालक फिर इस वाक्यको सुनता और भाईको तदनुसार क्रिया करते देखता है। इस प्रकार अनेक बारके व्यवहारको देखकर बालक धीरे-धीरे कलम, दावात, उठाना, रखना आदि शब्दोंके अलग-अलग अर्थ समझने लगता है। इस प्रकार व्यवहारसे सङ्गेत-ग्रह होता है। यह सङ्केत-ग्रह केवल पदार्थमें नहीं, अपितु किसीके साथ अन्वित-पदार्थमें ही होता है। इसलिए जब 'केवल' 'अनन्वित' पदार्थमें सङ्केत-ग्रह नहीं होता है तो 'केवल' या अनन्वित' पदार्थकी उपस्थिति भी नहीं होती है। अतएव 'अत्वित'का ही 'अभिधान' अर्थात् 'अभिधा' से बोधन होनेसे 'अन्विताभिधान' ही मानना उचित है, 'अभिहितात्वय' का मानना उचित नहीं है यह प्रभाकरके सिद्धान्त- का सार है। अगली पंक्तिमें अन्विताभिधानवादके सिद्धान्तको इस प्रकार दिखलाते हैं- [पदोंके द्वारा अन्वित पदार्थोंकी ही उपस्थिति होती है इसलिए पदार्थोंका परस्पर सम्बन्धरूप] वाक्यार्थ वाच्य ही होता है। [तात्पर्याख्या शक्तिसे बादको प्रतीत नहीं होता है] यह 'अन्विताभिधान- बादियों [प्रभाकर आदि] का मत है। प्रभाकरका परिचय इस 'अन्विताभिधानवाद'के सिद्धान्तका प्रतिपादन करनेवाले प्रभाकर, वस्तुतः 'अभिहिता- न्वयवादी' कुमारिलभट्टके शिष्य हैं। पर उनका अ्नेक विषयोंमें अपने गुरुसे मतभेद रहा है। प्रभाकर अपने विद्यार्थी-जीवनमें ही बड़े प्रभावशाली विद्यार्थी थे और अपने स्वतन्त्र विचारोंके लिए प्रसिद्ध थे। प्रत्येक विषयपर वे अपनी स्वतन्त्र प्रतिभा और स्वतन्त्र विचार-शैलीसे विचार करते थे जिसके कारण कभी-कभी उनके गुरु कुमारिलभट्टको भी कठिनाईका सामना करना पड़ता था। एक बारकी बात है कि कुछ विद्वानोंमें 'आतिवाहिक-पिण्ड'के सिद्धान्तपर विवाद छिड़ गया।
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३८ काव्यप्रकाश: [का० ६, सू० ७ आतिवाहिक-पिण्डका अभिप्राय मृत्युके बाद दिये जानेवाले पिण्डसे है। एक पक्ष उसके दिये जानेका समर्थन करता था और उसकी एक विशेष विधिका प्रतिपादन करता था। दूसरा पक्ष उसका विरोधी था। अन्तमें यह विवाद निर्णयके लिए कुमारिलभट्टके पास पहुँचा। कुमारिलभट्टने अपनी सम्मतिके अनुसार एक पक्षमें व्यवस्था दे दी। परन्तु यह व्यवस्था प्रभाकरको रुचिकर प्रतीत नहीं हुई और उन्होंने उसका प्रतिवाद किया। बाहरके विद्वान् तो कुमारिलभट्टकी व्यवस्था लेकर चले गये परन्तु जो विवाद अबतक बाहर था वह अब घरमें प्रारम्भ हो गया। कुमारिलभट्टने अनेक प्रकारसे प्रभाकरको अपना सिद्धान्त समझानेका प्रयत्न किया परन्तु उसको सन्तोष न हुआ, या यों कहना चाहिये कि कुमारिल- भट्ट अपनी युक्तियोंसे उसको चुप न कर सके। जैसे गान्धीजी अपने जीवन-कालमें जवाहरलालजीको अपने अहिंसा-सिद्धान्तको पूरी तरहसे समझा नहीं सके पर उनको यह विश्वास था कि मेरे सिद्धान्तका पालन करनेवाले 'जवाहर' ही होंगे, उसी प्रकार कुमारिलभट्टको यह विश्वास था कि इस 'आतिवाहिक- पिण्ड'के सिद्धान्तको प्रभाकर इस समय भले ही अपने इस तर्कके सामने न टिकने दे पर किसी दिन इस सिद्धान्तको मानेगा ही। इसलिए उस समय उन्होंने इस विषयपर आगे चर्चा बन्द कर दी और प्रभाकरसे कह दिया कि फिर कभी इस सिद्धान्तका स्पष्टीकरण करेंगे। बहुत दिन बीत गये। एक दिन सहसा कुमारिलभट्टकी मृत्युका समाचार सुनायी दिया। यद्यपि सहसा किसीको उनकी मृत्युका विश्वास न होता था पर जब सभीने उनके शरीरकी परीक्षा क उसमें जीवनका कोई चिह्न न पाया तो फिर उसपर विश्वास करनेके अतिरिक्त और मार्ग ही क्या था। फलतः सब लोगोंने उनका अन्तिम संस्कार करनेकी तैयारी प्रारम्भ कर दी। इस अन्तिम संस्कारके प्रसङ्गमें जब 'आतिवाहिक-पिण्ड'का अवसर आया तो लोगोंने प्रभाकरकी ओर देखा। परन्तु उस समय प्रभाकरने बिना किसी सङ्कोचके कुमारिलभट्टकी व्यवस्थाके अनुसार ही सारी प्रक्रिया करवायी। सारी काररवाई पूर्ण हो जानेके बाद मृतक-यानके उठाये जानेके पूर्व कुमारिलभट्टके शरीरमें कुछ चेतनाका संस्कार-सा प्रतीत हुआ और धीरे-धीरे थोड़ी देर बाद वे उठकर बैठ गये, जैसे सोकर उठे हों। उठनेके बाद सब लोगोंमें प्रसन्नताकी लहर दौड़ गयी और इस बीचमें क्या-क्या हुआ इस सबका समाचार उनको सुनाया गया। उस प्रसङ्गमें जब उनको यह मालूम हुआ कि आज प्रभाकरने मेरे 'आतिवाहिक-पिण्ड' सम्बन्धी सिद्धान्तको ही मान्य ठहराया था तब उनको भी प्रसन्नता हुई और उन्होंने प्रभाकरको सम्बोधन करके कहा, 'प्रभाकर जितमस्माभिः'-कहो प्रभाकर, हम जीते न। प्रभाकरने उत्तर दिया, 'भगवन् मृत्वा जितम्' -- भगवन्, मरकर जीते। मुझे जीतनेके लिए आपको मरनेका छल करना पड़ा या दूसरा जन्म लेना पड़ा। प्रभाकरको 'गुरु'की उपाधि यह उन गुरु-शिष्यके शास्त्र-समरकी एक झाँकी है। पर एक और घटना इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। एक दिन कुमारिलभट्टके यहाँ विद्यार्थियोंके पाठ हो रहे थे। प्राचीन पाठशालाओंकी प्रणाली यह थी कि पाठके समय छोटे-बड़े सभी विद्यार्थी, गुरुजीके पास ही बैठकर सबके पाठ सुनते थे। इससे जो विद्यार्थी उस ग्रन्थको पहिले पढ़ चुके होते थे उनको उसका पाठ दुबारा-तिबारा सुननेसे वह और अधिक परिमाजित हो जाता था और जिन्हें आगे चलकर वह ग्रन्थ पढ़ना होता था उनका कुछ प्रारम्भिक संस्कार बन जाता था जो आगे उनको सहायता देता था। ऐसे ही पाठके प्रसङ्गमें सब विद्यार्थियोंके साथ बैठे हुए प्रभाकर, अपनेसे किसी उच्च कक्षाके विद्यार्थियोंका पाठ सुन रहे थे। पढ़ाते-पढ़ाते गुरुजी अकस्मात् रुक गये। कोई क्लिष्ट पंक्ति आ गयी
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का० ६, सू० ७ ] द्वितीय उल्लास: ३६
थी जो लग नहीं रही थी। इसलिए गुरुजीने उस पाठको वहीं रोक दिया और देखकर कल पढ़ानेको कह दिया। पाठोंके समाप्त हो जानेके बाद जब सब लोग उठकर चले गये और गुरुजी अपने भोजन आदि अन्य कार्योंमें लग गये तो प्रभाकरने आकर गुरुजीकी पुस्तक उठा ली और जहाँ गाड़ी अटक गयी थी उस पाठको विचारने लगे। तनिक देर सोचनेके बाद उन्हें मालूम हो गया कि यह, 'ईश्वरकी रचना' को '७ सेरके चना' बना देनेवाले आजके प्रेसके भूतोंके समान, लेखकके प्रमादका खेल है। उसमें कोई शास्त्रीय गुत्थी नहीं है। पुस्तकमें लेखकने प्रमादसे पाठ अ्शुद्ध लिख दिया था। इसलिए वह पंक्ति नहीं लग रही थी। पुस्तकमें लिखा हुआ था 'अत्नापि नोक्तं तत्नापि नोक्तम् इति पौनरुक्त्यम्'। इसका अर्थ यह होता था कि 'यहाँ भी नहीं कहा है और वहाँ भी नहीं कहा है इसलिए पुनरुक्ति है'। यही समस्या बन गयी थी। पुनरुक्ति तो तब होती है जब एक ही बात दो बार कही जाय। जो बात न यहाँ कही गयी, न वहाँ कही गयी वह पुनरुक्त कैसे हो सकती है यह बात समझमें नहीं आ रही थी। प्रभाकरने कलम लेकर उस पाठको संशोधन करके इस प्रकार लिख दिया- 'अत्न तुना उक्तं तत्र अपिना उक्तम् इति पौनरुक्त्यम्।' अर्थात् यहाँ जो बात 'तुना' अर्थात् 'तु' शब्दसे कही है वही बात वहाँ अर्थात् दूसरे स्थानपर 'अपिना' अर्थात् 'अपि' शब्दसे कही गयी है इसलिए पुनरुक्ति है। अत्र तुनोक्तं तत्नापिनोक्तम् इति पौनरुक्त्यम्।' इस पाठमें जो पुनरुक्ति समझमें नहीं आ रही थी पाठका संशोधन कर देनेसे वह बिलकुल स्पष्ट हो गयी। प्रभाकर चुप-चाप पुस्तक रखकर चले आये। कुछ समय बाद जब कुमारिलभट्टने उस पाठको विचारनेके लिए पुस्तक उठायी तो सब-कुछ हस्तामलकवत् स्पष्ट हो गया और यह समझनेमें भी उनको देर न लगी कि यह कार्य प्रभाकरका है। उनको अपने शिष्यकी प्रतिभापर पहिले ही बड़ा विश्वास था पर आज उसकी अपूर्व प्रतिभा देखकर उनको बड़ा आ्नन्द हुआ और वे गद्गद हो गये। विश्वविद्यालयीय बाह्याडम्बरमय वातावरणके समान नहीं, अपितु विशुद्ध भावनासे अपने समस्त शिष्य- मण्डलके बीच आज उन्होंने अपने उस शिष्यको 'गुरु'की गौरवमयी उपाधि प्रदान की। तबसे आजतक प्रभाकर 'गुरु' नामसे प्रसिद्ध हैं और दार्शनिक ग्रन्थोंमें 'इति गुरुमतम्' कहकर अत्यन्त सम्मानपूर्वक उनके मतका उल्लेख किया जाता है। तौतातिक मत इसके विपरीत कुमारिलभट्टके मतका प्रायः 'इति तौतातिकं मतम्' 'तौतातिक मत' नामसे उल्लेख किया जाता है। 'तौतातिक' शब्दका अर्थ 'तु शब्द: तातः शिक्षको यस्य स तुतातः, तस्येदं तौताति- कम्' यह होता है। 'तु' शब्द जिसका 'तात' अर्थात् शिक्षक है वह तु-तात हुआ और उसका मत 'तौतातिक- मत' हुआ। ऊपरकी घटनाके अनुसार 'तु' शब्दसे ही कुमारिलभट्टको यह शिक्षा मिली थी इसलिए वे ही 'तु-तात' हुए, और उनका मत 'तौतातिक-मत' कहलाया जाने लगा। इन तीनों अर्थोंका व्यञ्जकत्व इस प्रकार ग्रन्थकारने वाचक, लक्षक तथा व्यञ्जक तीन प्रकारके शब्दों और उनके अनुसार वाच्य, लक्ष्य तथा व्यङ्गय तीन प्रकारके अरथोंका विवेचन किया और उसके साथ 'अभिहितान्वय- वादियों के मतमें 'तात्पर्यार्थ' भी होता है यह बात यहाँतक दिखलायी है। इसके बाद वे यह कह रहे हैं कि इन तीनों प्रकारके अथोंमें व्यञ्जकत्व भी रहता है अर्थात् वाच्यार्थ भी व्यञ्जक हो सकता है और
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४० काव्यप्रकाश: [ का० ७, सू० ८
[सू० ८] सर्वेषां प्रायशोऽर्थानां व्यञ्जकत्वमपीष्यते। तत्र वाच्यस्य यथा- माए घरोवअरणं अज्ज हु णत्थित्ति साहिअं तुमए। ता भण कि करणिज्जं एमेअ ण वासरो ठाइ ।।६।। [मातर्गृहोपकरणमद्य खलु नास्तीति साधितं त्वया। तद्दण कि करणीयमेवमेव न वासर: स्थायी।। इति संस्कृतम् ] अत्र स्वैरविहाराथिनीति व्यज्यते। लक्ष्यस्य यथा- साहेन्ती सहि सुहअं खणे खणे दूम्मिआसि मज्झकए । सब्भावणेहकरणिज्जसरिसअं दाव विरइअं तुमए।।७।। [साधयन्ती सखि सुभगं क्षणे क्षणे दूनासि मत्कृते। स्द्ावस्नेहकरणीयसदृशकं तावद् विरचितं त्वया।। इति संस्कृतम् ] अत्र मत्प्रियं रमयन्त्या त्वया शत्रुत्वमाचरितम् इति लक्ष्यम्। तेन च कामुकविषयं सापराधत्वप्रकाशनं व्यङ्गयम् । लक्ष्यार्थ तथा व्यङ्गयार्थ भी, अर्थात् तीनों ही अर्थ व्यञ्जक हो सकते हैं। उन तीनों अथोंके व्यञ्जकत्वके उदाहरण क्रमशः देते हुए इसी बातको आगे कहते हैं- [सूत्र ८]-प्रायः [इन] सभी अर्थोंका व्यञ्जकत्व भी [साहित्यशास्त्रमें ] माना जाता है। उनमेंसे वाच्य [अर्थके व्यञ्जकत्व] का [उदाहरण] जैसे- हे मातः ! आज घरकी [आटा-दाल ] सामग्री नहीं रही है यह बात सुमने बतला ही दी है। तो अब यह बताओ कि क्या करना चाहिये, क्योंकि दिन ऐसा ही तो नहीं बना रहेगा। थोड़ी देरमें दिन छिप जायगा फिर क्या होगा] ।६।। यहाँ [कहनेवाली वधू ] स्वच्छन्द विचरणके लिए [अर्थात् उपपतिके पास] जाना चाहती है यह बात व्यङ्गच है। लक्ष्य [अर्थके व्यञ्जकत्व ] का [उदाहरण] जैसे -- हे सखि, उस सुन्दरके पास बार-बार जाकर मेरे लिए तुमने बड़ा कष्ट उठाया अब उसकी आवश्यकता नहीं है। [मेरे प्रति] अपनी सद्भावना और स्नेहके सदृश जो तुमको करना चाहिये था सो तुमने कर लिया।।७। यहाँ, मेरे प्रियके साथ रमण करके तूने [मेरे साथ ] शत्रुता निबाही है यह लक्ष्य अर्थ होता है और उससे कामुकविषयक सापराधत्वका प्रकाशन व्यङ्गच है। यह श्लोक भी वञ्चिता नायिकाकी उक्ति है और यह ठीक उसी ढंगका है जिस ढंगका 'निःशेषच्युतचन्दनम्' इत्यादि उदाहरण सं० २ का श्लोक पहिले दिया जा चुका है। उसमें भी नायिकाकी भेजी हुई दूतीने उसका संवाद नायकके पास पहुँचानेके बजाय स्वयं उसके साथ 'स्वैरविहार' करके उस
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का० ७, सू० ८] द्वितीय उल्लास: ४१ व्यङ्गयस्य यथा- उअ णिच्चलणिप्पंदा भिसिणीपत्तम्मि रेहइ बलाआ। णिम्मलमरगअभाअणपरिट्ठिआ संखसुत्ति व्व।।८।। [पश्य निश्चलनिष्पन्दा बिसिनीपत्रे राजते बलाका। निर्मलमरकतभाजनपरिस्थिता शङ्दशुक्तिरिव ।।' इति संस्कृतम् ]। अत्र निष्पन्दत्वेन आश्वस्तत्वम्। तेन च जनरहितत्वम्। अतः संकेतस्थानमेतदिति कयाचित् कंचित् प्रति उच्यते। अथवा मिथ्या वदसि न त्वमत्रागतोऽभूरिति व्यज्यते।। उस नायिकाको धोखा दिया था। इसी प्रकार यहाँ भी नायिकाकी सखीने बीचमें स्वयं ही उसके प्रियके साथ रमण कर उसको धोखा दिया है। यह बात वक्ता तथा बोद्धाके वैशिष्टयसे व्यङ्गय है। इस प्रकार वाच्यार्थ तथा लक्ष्यार्थके व्यञ्जकत्वके उदाहरण दिये गये हैं। आगे व्यङ्गयार्थके व्यञ्जकत्वका तीसरा उदाहरण देते हैं- व्यङ्गय [अर्थके व्यञ्जकत्व ] का [उदाहरण ] जैसे- देखो, कमलके पत्तेपर निश्चल और बिना हिले-डुले बैठी हुई बलाका [ बगुलिया] निर्मल [हरे रंगकी ] मरकत-मणिकी तश्तरी [भाजन ] में रखी हुई शङ्ङ-शुक्तिकी तरह विदित होती है ॥।८।। यहाँ [बलाकाके ] निश्चल होनेसे उसकी निडरता [आश्वस्तता लक्षणासे सूचित होती है। [और उस [आश्वस्तत्वरूप लक्ष्यार्थ ] से [ स्थानका ] जनहरित होना [व्यञ्जनासे सूचित होता है ]। इसलिए यह संकेतस्थान है यह [बात पहिले व्यङ्गयार्थसे फिर व्यञ्जना द्वारा] कोई नायिका किसीसे [अर्थात् अपने कामुक प्रियसे ] कह रही है। अथवा झूठ बोलते हो तुम यहाँ नहीं आये [ अन्यथा यह बलाका ऐसी निश्चल-निष्पन्द नहीं रह सकती थी] यह [पहिले व्यङ्गयार्थसे ] व्यञ्जना द्वारा सूचित होता है। यह पद्य 'हाल-कवि'-विरचित 'गाथासप्तशती' के प्रथम शतकका चतुर्थ पद्य है। ग्रन्थकारने उसे व्यङ्गचार्थके व्यञ्जकत्वको दिखलानेवाले उदाहरणके रूपमें प्रस्तुत किया है। इसमें बलाका निष्पन्द अर्थात् बिना हिले-डुले बैठी है यह वाच्य अरथ है। इससे वह सर्वथा आश्वस्त है, उसको किसी प्रकारका भय नहीं है यह बात लक्षित होती है। इस आश्वस्तत्वसे यह स्थान विजन एकान्त-स्थान है यह व्यङ्गय निकलता है। इस व्यङ्गय अर्थसे यह 'सङ्केत' के लिए उचित स्थान है। यह दूसरा व्य ङ्गयार्थ निकलता है, इसलिए यह व्यङ्गयार्थकी व्यञ्जकताका उदाहरण है। / यहाँ श्लोकमें निश्चल तथा निष्पन्द दो विशेषणोंका प्रयोग किया गया है। वैसे अ्रनेक स्थानोंपर ये दोनों शब्द समानार्थक रूपमें प्रयुक्त होते हैं। परन्तु यहाँ यदि उनको समानार्थक माना जाय तो पुनरुक्ति होती है, इसलिए उनके अर्थमें जो सूक्ष्म भेद है, उसकी ओर ध्यान देना चाहिये। चलन शरीरकी स्थानान्तर-प्रापिका करिया है। अर्थात् चलनक्रिया शरीरमें होती है और उसके होनेपर चलनेवाला व्यक्ति एक स्थानसे दूसरे स्थानपर पहुँच जाता है। परन्तु स्पन्दन शरीरके अवयवोंकी करिया है जो स्थानान्तर-प्रापक नहीं होती है। अर्थात् अपने स्थानपर बैठे या खड़े हुए जो शरीरके अवयवोंका हिलाना- डुलाना है वह 'स्पन्दन' कहा जाता है। 'स्पदि किञ्चिच्चलने' धातुका यही भावार्थ है। इसलिए इन दोनों शब्दोंके सह-प्रयोगमें भी पुनरुक्ति नहीं होती है।
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४२ काव्यप्रकाश: [का० ७, सू० ६
वाचकादीनां क्रमेण स्वरूपमाह- [सू० ९ ] साक्षात्संकेतितं योऽ्र्थमभिधत्ते स वाचक: ।७। इहागृहीतसंकेतस्य शब्दस्यार्थप्रतीतेरभावात् संकेतसहाय एव शब्दोऽर्थविशेषं प्रतिपादयतीति यस्य यत्राव्यवधानेन संकेतो गृह्यते स तस्य वाचकः।
वाचक शब्दका स्वरूप इस प्रकार तीन प्रकारके शब्द तथा अरथोंका निरूपण कर चुकनेके बाद उन वाचक आदि तीनों प्रकारके शब्दोंके स्वरूपको कहते हैं- क्रमशः वाचक आदि [तीनों प्रकारके शब्दों ]के स्वरूपका निरूपण करते हैं -- ८ [सू० ६]-जो [शब्द ] साक्षात् संकेतित अर्थको [अभिधा शक्तिके द्वारा ] कहता है वह 'वाचक' [शब्द कहलाता है]।।७।। लोकव्यवहारमें [इह ] बिना संकेत-ग्रहके शब्दके अर्थकी प्रतीतिके न होनेसे संकेतकी सहायतासे ही शब्द अर्थविशेषका प्रतिपादन करता है [ यह सिद्धान्त निश्चित होता है ] इसलिए जिस [शब्द]का जहाँ [जिस अर्थमें] अव्यवधानसे संकेतका ग्रहण होता है वह [शब्द ] उस [अर्थ] का 'वाचक' होता है। संकेतग्रहके उपाय लोकव्यवहारसे छोटे बालकोंको संकेतग्रह किस प्रकार होता है यह हम अभी दिखला चुके हैं। उस प्रक्रियाको 'आवापोद्वाप' की प्रक्रिया कहते हैं क्योंकि उसमें पहिले उत्तमवृद्ध अर्थात् बालकके पिता आदिने मध्यमवृद्ध अर्थात् बालकके बड़े भाई या नौकर आदिको कलम उठानेकी आज्ञा दी थी। फिर कलम रखकर दावात उठानेकी आज्ञा दी थी और मध्यमवृद्धने उसीके अनुसार क्रिया की थी। उस व्यवहारमें एक शब्दको हटाकर जो दूसरे शब्दका इसी प्रकार एक अर्थके स्थानपर दूसरे अर्थका निवेश किया गया इसीको आवाप-उद्वाप कहते हैं, इसलिए व्यवहारमें 'आवापोद्वाप' द्वारा संकेतका ग्रहण होता है यह बात स्पष्ट हो जाती है। यह लोकव्यवहार संकेतग्रहका प्रधान साधन है परन्तु उसके अतिरिवत अन्य उपाय भी माने गये हैं जिनका संग्रह निम्नलिखित कारिकामें किया गया है- 'शक्तिग्रहं व्याकरणोपमानकोशाप्तवाक्याद् व्यवहारतश्च। वाक्यस्य शेषाद् विवृतेर्वदन्ति सान्निध्यतः सिद्धपदस्य वृद्धाः ।' अर्थात् व्याकरण, उपमान, कोश, आप्तवाक्य, व्यवहार, वाक्यशेष, विवृति अर्थात् व्याख्या और सिद्ध-ज्ञात-पदके सान्निध्यसे भी शक्ति या संकेतका ग्रहण माना जाता है। इन सबमें मुख्य उपाय व्यवहार है, क्योंकि अधिकांश शब्दोंका और सबसे पहिले शक्तिग्रह व्यवहारसे ही होता है। इनमें 'भू सत्तायाम्' आदि धातुपाठसे अथवा 'साधकतमं करणम्' आदि सूत्रोंसे भू-धातु तथा करण आदि पदोंका संकेतग्रह व्याकरणके द्वारा होता है। 'यथा गौस्तथा गवयः' यह उपमान प्रमाणका उदाहरण है। जो व्यक्ति गौको जानता है पर गवय (नील गाय) को नहीं जानता है, उसको गौके सदृप्र गवय होता है इस वाक्यकी सहायतासे गवय पदका संकेतग्रह हो जाता है। कोश तथा तप्तवाक्य अर्थात् पिता आदिके बतलानेसे भी नये पदार्थोंके नामोंका ज्ञान बालकोंको होता ही है। व्यवहारका उदाहरण ऊपर दे चुके हैं। विवृति अर्थात् व्याख्या भी संकेतग्रहका साधन है और 'वाक्यशेष' तथा सिद्ध पद अरथात् ज्ञात अर्थवाले पदकी सन्निधिसे अज्ञात अर्थवाले पदका अर्थ भी ज्ञात हो जाता है। इस प्रकार ये सब संकेतग्रहके उपाय माने गये हैं।
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का० ८, सू० १०] द्वितीय उल्लास: ४३
[ सू० १०] संकेतितश्चतुर्भेदो जात्यादिर्जातिरेव वा।
संकेतग्रहका विषय यह शक्तिग्रह किसमें होता है, यह संकेतग्रहसे सम्बन्ध रखनेवाला महत्त्वपूर्ण प्रश्न है, जिसका अ्रनेक विवचकोंने अ्नेक प्रकारसे समाधान किया है। कोई जातिमें संकेतग्रह मानते हैं, कोई व्यक्तिमें और कोई जातिविशिष्ट व्यक्तिमें। यद्यपि साधारणरूपसे व्यवहार किसी व्यक्तिमें ही होता है इसलिए संकेतग्रह व्यक्तिमें ही होना चाहिये परन्तु व्यक्तिमें संकेतग्रह माननेसे 'आनन्त्य' तथा 'व्यभिचार' दो प्रकारके दोषोंकी सम्भावना रहती है। जिस शब्दका जिस अर्थमें संकेतग्रह होता है उस शब्दसे उसी अर्थकी प्रतीति होती है। बिना संकेतग्रहके अर्थकी प्रतीति नहीं होती। इसलिए यदि व्यक्तिमें संकेतग्रह मांना-जाय तो जिस व्यक्ति-विशेषमें संकेतग्रह हुआ है उस शब्दसे उस व्यक्ति-विशेषकी ही उपस्थिति होगी। अन्य व्यक्तियोंकी प्रतीतिके लिए प्रत्येक व्यक्तिमें अलग-अलग संकेतग्रह मानना आवश्यक होगा। इस दशामें एक गो शब्दसे प्रतीत होनेवाली सभी गो-व्यक्तियोंमें अलग-अलग संकेतग्रह मानने- में अनन्त शक्तियोंकी कल्पना करनी होगी। यही 'आनन्त्य' दोषका अभिप्राय है। फिर व्यवहार से तो वर्तमान देश और वर्तमान कालकी गो-व्यक्तियोंमें ही संकेतग्रह हो सकता है, भूत-भविष्य और देशान्तर या कालान्तरकी सब गो-व्यक्तियोंमें संकेतग्रह सम्भव भी नहीं है इसलिए व्यक्तिमें संकेतग्रह नहीं माना जा सकता है। इस 'आनन्त्य-दोष' अर्थात् अनन्त शक्तियोंकी कल्पनाके दोषको बचानेके लिए यदि यह कहा जाय कि अन्य सब व्यक्तियोंमें अलग-अलग शक्तिग्रहकी आवश्यकता नहीं होती है, दो-चार व्यक्तियोंमें व्यवहारसे संकेतग्रह हो जाता है, शेष व्यक्तियोंका बोध बिना संकेतग्रहके ही होता रहता है; तब 'व्यभिचार-दोष' होगा। 'व्यभिचार' शब्दका अरथ है 'नियमका उल्लङ्घन'। संकेतकी सहायतासे ही शब्द अर्थकी प्रतीति कराता है यह नियम है। अब यदि यह मान लिया जाता है कि गो-शब्दसे बहुत-सी गो-व्यक्तियोंका बोध बिना संकेतग्रहके होता है तो इस नियमका उल्लङ्डन होता है। इसलिए 'व्यभिचार- दोष' आरा जाता है। इस प्रकार व्यक्तिमें संकेतग्रह माननेमें 'आ्नन्त्य-दोष' हो जाता है और उससे बचनेका प्रयत्न करनेपर 'व्यभिचार-दोष' आ जाता है। इसलिए व्यक्तिमें संकेतग्रह मानना सम्भव नहीं है। दूसरी बात यह है कि 'महाभाष्यकार' ने 'चतुष्टयी शब्दानां प्रवृत्तिः जातिशब्दाः, गुणशब्दाः, क्रियाशब्दा: यदृच्छाशब्दाश्चतुर्थाः' लिखकर जातिशब्द, गणशब्द, क्रियाशब्द और यदृच्छा-शब्दरूपसे शब्दोंका चार प्रकारका विभाग किया है। व्यक्तिमें शक्ति माननेपर यह चारों प्रकारका शब्द-विभाग भी नहीं बन सकता है। क्योंकि जब व्यक्तिमें संकेतग्रह माना जायगा तो गौः, शुक्ल:, चलः, डित्थः, आदि चारों शब्दोंसे व्यक्तिका ही बोध होगा। इसलिए गौ-शब्द जातिवाचक है, शुक्ल पद गुणवाचक है, चल पद क्रियावाचक है और डिन्थ पद उस व्यक्तिका नाम होनेसे यदृच्छाशब्द है इस प्रकारका विभाग नहीं बन सकता है। अतएव व्यक्तिमें शक्ति न मानकर व्यक्तिके उपाधिभूत जाति, गुण, क्रिया और य दच्छारूप धर्मोंमें ही संकेतग्रह मानना उचित है यह सिद्धान्त स्थिर होता है। इसी बातको ग्रन्थकारने इस प्रकार लिखा है- [सू० १०]-संकेतित अर्थ जाति आदि [अर्थात् जाति, गुण, क्रिया तथा यदृच्छा ] भेदोंसे
अर्थ] होता है। चार प्रकारका होता है। अथवा [मीमांसकोंके मतमें ] केवल जाति [रूप एक प्रकारका] ही [संकेतित
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४४ काव्यप्रकाश: [ का० ८, सू० १०
यद्यप्यर्थक्रियाकारितया प्रवृत्तिनिवृत्तियोग्या व्यक्तिरेव तथाप्यानन्त्याद् व्यभि- चाराच्च तत्र संकेतः कतु न युज्यत इति, 'गौःशुक्ल: चलो डित्थः' इत्यादीनां विषयविभागो न प्राप्नोतीति च, तदुपाधावेव संकेतः । उपाधिश्च द्विविध: वस्तुधर्मो वक्तृयदृच्छासन्निवेशितश्च। वरतुधर्मोऽपि द्विविधः; सिद्धः साध्यश्च। सिद्धोऽपि द्विविधः, पदार्थस्य प्राणप्रदो विशेषाधानहेतुश्च। तत्राद्यो जातिः। उक्तं हि वाक्यपदीये-"न हि गौःस्वरूपेण गौर्नाप्यगौः, गोत्वाभिसम्बन्धात्तु गौः।" इति। द्वितीयो गुणः । शुक्लादिना हि लब्धसत्ताकं वस्तु विशिष्यते। साध्यः पूर्वापरीभूतावयवः क्रियारूपः ।
यद्यपि [आनयन, अपनयन आदिरूप] अर्थक्रियाका निर्वाहक होनेसे प्रवृत्ति-निवृत्ति [रूप व्यवहार] के योग्य व्यव्ति ही होता है [इसलिए व्यवहार द्वारा होनेवाला संकेतग्रह उस व्यदितमें ही होना चाहिये] फिर भी आनन्त्य तथा व्यभिचार [दोष] आ जानेके कारण उस [व्यवित]में संकेतग्रह मानना उचित नहीं है इसलिए, और सफेद रंगकी [शुक्ल: ], [चल: ] चलती हुई, डित्थ नामक, गौ इत्यादि [गुणवाचक 'शुक्ल' पद, क्रियावाचक 'चल' पद, जातिवाचक 'गौ' पद तथा यद्च्छात्मक संज्ञारूप 'डित्थ' पद-इन सब शब्दोंसे केवल व्यक्तिकी ही उपस्थिति होनेपर ] का विषय-विभाग नहीं हो सकता है इसलिए भी [व्यक्तिमें नहीं अपितु] उसके उपाधि-[भूत धर्म जाति, गुण, क्रिया और यदृच्छा] में ही संकेतका ग्रहण होता है। उपाधिभेद द्वारा शब्दोंका चतुविध विभाग यह उपाधि [मुख्यरूपसे ] दो प्रकारकी होती है। १. वस्तुका [यथार्थ ] धर्म और २. बक्ताके द्वारा अपनी इच्छासे [उस अर्थमें ] सन्निवेशित। [इनमेंसे वक्ताकी यदृच्छासे सन्निवेशित उपाधि यद्च्छात्मक रूढ़ि शब्दोंमें रहती है] । वस्तु-धर्म भी दो प्रकारका होता है, एक सिद्धरूप और दूसरा साध्यरूप। [इनमें साध्यरूप वस्तुधर्म 'क्रिया' कहलाता है]। सिद्ध [रूप, वस्तु-धर्म ] भी दो प्रकारका होता है। एक पदार्थका प्राणप्रद या जीवनाधायक और दूसरा विशेषताका आधान करानेका कारण। इनमेंसे पहिला [अर्थात् वस्तुका प्राणप्रद सिद्ध धर्म] 'जाति' होता है। जैसा कि [ भर्तृहरिने अपने] वाक्यपदीय [नामक ग्रन्थ] में कहा है कि-'गौ स्वरूपतः न गौ होती है न अगौ। गोत्व [जाति] के सम्बन्धसे ही गौ कहलाती है'। [इसलिए वस्तुका प्राणप्रद जीवनाधायक वस्तु-धर्म 'जाति' कहलाता है]। दूसरा [अर्थात् वस्तुका विशेषाधान-हेतु सिद्ध वस्तु-धर्म ] 'गुण' होता है। क्योंकि शुक्ल आदि [गुणों] के कारणसे [ही] सत्ताप्राप्त वस्तु ] अपने सजातीय अन्य पदार्थोंसे विशेष ] भिन्नताको प्राप्त होती है। [गौ के साथ गुण-वाचक शुक्ल विशेषण अन्य गौओंकी अपेक्षा उसकी विशेषता या भेदको सूचित करता है]। साध्य [रूप वस्तुधर्म दाल आदिके पकानेमें चूल्हा जलाकर बटलोई रखनेसे लेकर उसके उतारने पर्यन्त आगे-पीछे किया जानेवाला ] पूर्वापरीभूत [सारा व्यापार-कलाप ] क्रियारूप [क्रिया शब्दसे वाच्य] होता है।
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का० ८, सू० १०] द्वितीय उल्लास: ४५
डित्थादिशब्दानामन्त्यबुद्धिनिर्ग्राह्यं संहृतक्रमं स्वरूपं वक्त्रा यदृच्छया डित्थादिष्व- र्थेषूपाधित्वेन सन्निवेश्यत इति सोडयं संज्ञारूपो यदृच्छात्मक इति। 'गौःशुक्लश्चलो डित्थः' इत्यादौ 'चतुष्टयी शब्दानां प्रवृत्तिः' इति महाभाष्यकारः।
डित्थ आदि [किसी व्यक्तिविशेषके वाचक रूढ़ि ] शब्दोंका [स्फोटकी पूर्वप्रदशित प्रत्रियाके अनुसार पूर्व-पूर्ववर्णानुभवजनितसंस्कारसहकृत चरम वर्णके श्रवणसे] अन्त्य-बुद्धि [चरमवर्णके श्रवण] से गृहीत होनेवाला [गकार, औकार, विसर्जनीय आदिके नामके ] कमभेदसे रहित [बिना कमके बुद्धिमें एक साथ उपस्थित होनेवाला पदस्फोटरूप स्वरूपको वत्ताकी अपनी स्वेच्छा द्वारा डित्थ आदि पदार्थोंमें [उसके वाचक] उपाधिरूपसे सन्निविष्ट किया जाता है। [अर्थात् किसी पदार्थ या व्यक्ति-विशेषका नाम रखनेवाला व्यक्ति रूढ़ संज्ञारूप शब्दका उस अर्थके साथ सम्बन्ध स्थापित कर देता है कि व्यक्ति इस नामसे बोधित होगा]। इस प्रकार यह [रूढ़ ] संज्ञारूप यदृच्छात्मक [शब्द होता ] है। इस प्रकार ग्रन्थकारने यहाँतक प्रतिपादन किया कि संकेतग्रह व्यक्तिमें नहीं होता है अपितु व्यक्तिके उपाधिभूत जाति, गुण, क्रिया और यदृच्छा आदि धर्मोंमें होता है। उसीके अनुसार शब्दोंका चार प्रकारका विभाग किया जाता है। अपने इस चतुर्विध विभागकी सम्पुष्टिमें महाभाष्यकार पतञ्जलि मुनिकी सम्मति प्रमाणरूपसे उपस्थित करते हैं कि- 'सफेद रंगकी 'चलती हुई', 'डित्थ' नामकी, 'गाय' इत्यादि [वाक्य] में [जाति-शब्दके रूपमें गौ पदका, गुण-शब्दके रूपमें शुक्ल पदका, करिया शब्दके रूपमें चल पदका और यदृच्छा-श.दके रूपमें डित्थ पदका प्रयोग होनेसे ] शब्दोंकी प्रवृत्ति [या प्रवृत्ति-निमित्त ] चार प्रकारकी होती है यह महाभाष्य- कारने कहा है। परम-अणु-परिमाणकी गुणोंमें गणना कैसे इस विभाजनके अनुसार वस्तुके प्राणप्रद धर्मका नाम 'जाति' और उसके विशेषाधानहेतु धर्मको 'गुण' कहा जाना चाहिये। परन्तु 'वैशेषिक-दर्शन' में शुक्ल आदि 'रूप' के समान 'परिमाण' को भी गुण माना है। उसमें रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिमाण आदि २४ गुणोंमें 'परिमाण' की भी गणना की गयी है। यह परिमाण मुख्यरूपसे 'अणु' तथा 'महत्' दो प्रकारका होता है। परन्तु उन दोनोंके साथ परमशब्दको जोड़कर उनका एक-एक भेद और हो जाता है। अर्थात् अणु-परिमाणके दो भेद हो गये- एक 'अणुपरिमाण' और दूसरा 'परम-अणुपरिमाण'। इसी प्रकार महत्-परिमाणके भी एक 'महत्-परि- माण' तथा दूसरा 'परममहत्-परिमाण' दो भेद हो जाते हैं। इनमेंसे 'परम-अणु-परिमाण' केवल परमाणु- संज्ञक पदार्थ अर्थात् पृथिव्यादि द्रव्योंके सबसे सूक्ष्म और अविभाज्य अवयवमें रहता है। इस 'परम- अणु-परिमाण' के लिए 'पारिमाण्डल्य-परिमाण' शब्दका भी प्रयोग होता है। यह परम-अणु-परिमाण 'परमाणु'-रूप सूक्ष्मतम पदार्थका प्राणप्रद धर्म है, विशेषाधान हेतु नहीं। इसलिए आपकी परिभाषाके अनुसार परम-अणु-परिमाणके वाचक 'परमाणु-परिमाण' शब्दको जाति-शब्द मानना चाहिये। परन्तु 'वैशेषिक-दर्शन' में उसका पाठ गुणोंमें किया गया है। इसका क्या कारण है ? यह प्रश्न उपस्थित होता है। इस प्रश्नका उत्तर ग्रन्थकारने यह दिया है कि 'परम-अणु-परिमाण' वस्तुतः जाति-वाचक शब्द ही है। परन्तु जैसे लोकमें अन्य अरथोंमें प्रसिद्ध 'गुण', 'वृद्धि' आदि शब्दोंका व्याकरण शास्त्रमें विशेष अर्थमें प्रयोग होता है, उसी प्रकार वैशेषिक दर्शनमें परम-अ्णु-परिमाणकी गणना गुणोंमें की गयी है।
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४६ काव्यप्रकाश: [का० ८, सू० १०
परमाण्वादीनान्तु गुणमध्यपाठात् पारिभाषिक गुणत्वम्।्र गुण-क्रिया-यदृच्छानां वस्तुत एकरूपाणामप्याश्रयभेदाद् भेद इव लक्ष्यते। य्थकस्य मुखस्य खङ्ग-मुकुर-तैलाद्यालम्बनभेदात्। इसी बातको ग्रन्थकारने निम्नलिखित पंक्तिमें लिखा है- परम-अणु [परिमाण तथा आदि शब्दसे परम-महत्-परिमाण ] आदिका [उनके प्राणप्रद-धर्म होनेके कारण जाति-शब्द मानना उचित होनेपर भी 'वैशेषिकदर्शन' में उनका] गुणोंके बीच पाठ होनेसे [उस शास्त्रमें 'नदी', गुण', वृद्धि' आदि व्याकरणके विशेष संज्ञाशब्दोंकी भाँति] परिभाषासे निर्धारित गुणत्व है। गुण शब्द आदिमें दोषोंकी शङ्का और उसका निवारण ऊपर ग्रन्थकारने यह कहा था कि व्यक्तिमें संकेतग्रह माननेसे 'आ्नन्त्य' तथा 'व्यभिचार' दोष आ जाते हैं इसलिए व्यक्तिमें संकेतग्रह न मानकर व्यक्तिके उपाधिभूत जाति, गुण आदि धर्मोंमें ही संकेतग्रह मानना चाहिये। गोत्व ज़ाति सब गो-व्यक्तियोंमें एक ही है इसलिए उसमें संकेतग्रह माननेपर एक जगह संकेतग्रह हो जानेसे सब गो-व्यक्तियोंकी उपस्थिति हो सकती है। इसी प्रकार शुक्ल आदि गुण सर्वत्र एक ही है इसलिए एक बार संकेतग्रह हो जानेपर सब शुक्ल पदार्थोंका उससे बोध हो सकता है, अलग-अलग शक्तिग्रहकी आवश्यकता नहीं है। इसपर यह शङ्का उपस्थित होती है कि शंख, दूध, कपड़ा आदि अनेक शुक्ल पदार्थोंमें रहनेवाला शुक्ल रूप भिन्न-भिन्न प्रकारका प्रतीत होता है। इसी प्रकार भातका पकाना, ईटोंका पकाना आदि क्रियाओंमें पाक आदि किया भी भिन्न-भिन्न ही होती है। इसलिए एक जगह शुक्ल पदका संकेतग्रह होनेसे काम नहीं चलेगा। जैसे भिन्न गो-व्यक्तियोंमेंसे एक व्यक्तिमें संकेतग्रह माननेमें 'आ्नन्त्य' तथा 'व्यभिचार' दोष आ जाते हैं उसी प्रकार शंख, दूध आदिमें आश्रित शुक्ल आदि गुणों तथा पाक आदि क्रियाओंमें भेद होनेसे भी 'आनन्त्य' और 'व्यभिचार' दोष आ सकते हैं। अतः एक जगह संकेतग्रह माननेसे काम नहीं चल सकता है। इस शङ्काका उत्तर ग्रन्थकारने यह दिया है कि शुक्ल आदि गुण और पाक आदि क्रियाओंका भिन्न-भिन्न पदार्थोंमें जो अलग-अलग रूप दिखलायी देता है उसका कारण उनका वास्तविक भेद नहीं, अपितु उपाधिका भेद है। जैसे एक ही मुखको समतल, नतोदर, उन्नतोदर आदि भिन्न-भिन्न प्रकारके दर्पणोंमें, अथवा तेल, पानी, तलवार आदिमें देखा जाय तो सब जगह उसका प्रतिबिम्ब अलग-अलग दिखलायी देता है; परन्तु मुखमें वस्तुतः भेद नहीं है, वह सब केवल उपाधिकृत भेद है। इसी प्रकार शुक्लादि गुण और पाकादि करियाएँ भिन्न-भिन्न पदार्थोंमें भिन्न प्रकारकी दिखलायी भले ही देती हों परन्तु उनका यह भेद पारमार्थिक नहीं, औपाधिक है। इसलिए गुण, क्रिया आदिमें संकेतग्रह माननेमें कोई दोष नहीं आता है। इसी बातको अगली पंक्तिमें इस प्रकार लिखा है- [भिन्न-भिन्न पदार्थोंमें भिन्न रूपसे प्रतीत होनेवाले ] गुण, करिया और यदृच्छाके एकरूप होनेपर भी आश्रयके भेदसे उनमें भेद-सा दिखलायी देता है [ वह वास्तविक भेद नहीं है]। जैसे एक ही मुखका तलवार, दर्पण तथा तेल आदि आश्रयोंके भेदसे [प्रतिबिम्बोंमें भेद-सा प्रतीत होता है। वह वास्तविक नहीं, औपाधिक भेद है। इसी प्रकार गुण आदिमें प्रतीत होनेवाला भेद भी केवल औपाधिक भेद है। अतः गुण आदिमें संकेतग्रह माननेमें 'आनन्त्य', 'व्यभिचार' दोषोंके आनेकी सम्भावना नहीं है।]
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का० ८, सू० १० ] द्वितीय उल्लास: ४७
केवल 'जाति' में शक्ति माननेवाला मीमांसक-मत 'संकेतितश्चतुर्भेदो जात्यादिर्जातिरेव वा' इस कारिकांशमें संकेतित अर्थके विषयमें १. 'जात्यादिः' और २. 'जातिरेव वा' ये दो पक्ष दिखलाये थे। इनमेंसे 'जात्यादिः' यह पक्ष वैयाकरणों तथा उनके अनुगामी अलङ्कारशास्त्रियोंका है और 'जातिरेव वा' यह दूसरा पक्ष मीमांसकोंका है। 'जात्यादि' रूप प्रथम-पक्षके अनुसार जात्यादि अर्थात् १. जाति २. गुण ३. करिया और ४. यदृच्छारूप वस्तुके उपाधिभूत इन चार धर्मोंमें संकेतग्रह होता है। इस पक्षका आधार 'चतुष्टयी शब्दानां प्रवृत्तिः' यह महाभाष्यका वचन है। इसलिए ग्रन्थकारने इस प्रमाणको उद्धृत कर यहाँतक इन चारोंको शब्दका प्रवृत्ति-निमित्त माननेका उपपादन किया। अब 'जातिरेव वा' यह मीमांसकोंका दूसरा पक्ष रह जाता है, उसका उपपादन अगले अनुच्छेदमें करते हैं। मीमांसकोंका सिद्धान्त यह है कि जाति आदि चारोंके स्थानपर केवल जातिमें ही शब्दकी शक्ति या संकेतग्रह होता है। अर्थात् केवल जातिको ही शब्दका प्रवृत्ति-निमित्त मानना उचित है। जाति- शब्दोंके समान गुण, क्रिया तथा यदृच्छा-शब्दोंमें भी जातिमें ही संकेतग्रह मानना चाहिये। अनुगत अर्थात् एकाकार प्रतीतिके कारणको 'सामान्य' या जाति कहते हैं। गुण, करिया और यदृच्छाशब्दोंमें भी जातिका अनुसन्धान किया जा सकता है-जैसे शंख, दूध, बर्फ आदि अनेक शुक्ल पदार्थोंमें शुक्ल: शुक्ल: यह अनुगत प्रतीति या एकाकार प्रतीति होती है इसका कारण 'शुक्लत्व-साव्नान्य' ही है। 'जाति' का ही दूसरा नाम 'सामान्य' है। उसका लक्षण 'अनुवृत्तिप्रत्ययहेतुः सामान्यम्' अनुगत-एकाकार प्रतीतिका हेतु 'सामान्य' कहलाता है, यह किया गया है। जैसे दस घट व्यक्तियोंमें घटः घटः इस अनुवृत्ति- प्रत्यय अर्थात् एकाकार प्रतीतिका कारण 'घटत्व-सामान्य' माना जाता है, उसी प्रकार दस जगह रहनेवाले शुक्ल गुणमें जिसके कारण शुक्ल: शुक्ल: यह अनुगत या एकाकार प्रतीति होती है वह 'शुक्लत्व-सामान्य' है। इसी प्रकार गुड़, तण्डुल आदि अनेक पदार्थोंके पाकमें रहनेवाली पाक-क्रियामें पाक: पाक: इस अनुगतप्रतीतिका कारण 'पाकत्व-सामान्य' है। इसी प्रकार विभिन्न व्यक्तियों द्वारा उच्चरित यदृच्छा- शब्द और प्रतिक्षण परिणामके कारण भिद्यमान उनके अरथोंमें भी सामान्यका अनुसन्धान किया जा सकता है। इसलिए जाति शब्दोंके समान शेष तीनोंमें भी जातिमें ही संकेतग्रह मानना चाहिये और जातिको ही उन शब्दोंका प्रवृत्ति-निमित्त मानना चाहिये। जाति या सामान्यके लक्षणमें दो बातें आवश्यक होती हैं। एक तो यह सामान्य ही अनुवृत्ति- प्रत्यय अर्थात् एकाकार-प्रतीतिका कारण होता है। दूसरी बात यह है कि वह नित्य और अ्नेकमें समवेत धर्म होता है। 'नित्यत्वे सत्यनेकसमवेतत्वं सामान्यम्' यह भी सामान्यका दूसरी तरह लक्षण किया गया है। इसके अनुसार शुक्लत्वादिको 'सामान्य' माननेमें तो कोई कठिनाई नहीं होती है, क्योंकि भिन्न-भिन्न पदार्थोंमें रहनेवाले शुक्ल रूप भिन्न-भिन्न हैं। अभी 'जात्यादि' पक्षकी व्याख्याके अन्तिम भागमें अनेक पदार्थोंमें रहनेवाले शुक्लादि गुणोंके एकरूप होनेका जो प्रतिपादन किया था, मीमांसक उस सिद्धान्तको नहीं मानते हैं। उनके मतानुसार भिन्न-भिन्न पदार्थोंमें रहनेवाले शुक्ल आदिको अभिन्न मानना अनुभवके विपरीत है क्योंकि उनकी शुक्लताकी प्रतीतिमें अन्तर है। अतः वे भिन्न ही है और उनमें अनुगत- प्रतीतिका कारण शुक्लत्व-सामान्यको मानना ठीक है। इसी प्रकार पाक आदि करियाओंमें भी पारमार्थिक भेद होनेके कारण उनमें पाकत्व आदि जातिको प्रवृत्ति-निमित्त मानना ही उचित है। इसलिए, जाति- शब्दोंके समान गुण-शब्द तथा करिया-शब्दोंमें भी जातिको ही प्रवृत्ति-निमित्त मानकर उसीमें संकेतग्रह मानना उचित है, यह बात सिद्ध हो जाती है।
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४८ काव्यप्रकाश: [का० ८, सू० १० हिम-पयः-शङ्काद्याश्रयेषु परमार्थतो भिन्नेषु शुक्लादिषु यद्वशेन शुक्ल: शुक्ल इत्यभिन्नाभिधानप्रत्ययोत्पत्तिस्तत् शुक्लत्वादि सामान्यम् । गुडतण्डुलादिपाकादिष्वेवमेव पाकत्वादि। वालवृद्धशुकाद्युदीरितेषु डित्थादिशब्देषु च, प्रतिक्षणं भिद्यमानेषु डित्थाद्यर्थेषु वा डित्थत्वाद्यस्तीति सर्वेषां शब्दानां जातिरेव प्रवृत्तिनिमित्तमित्यन्ये। यदृच्छा-शब्दोंमें जातिका उपपादन परन्तु सामान्य जातिके उक्त लक्षणमें 'अनेकसमवेतत्व'का समावेश होनेके कारण यदृच्छा- शब्दोंमें जातिको प्रवृत्ति-निमित्त माननेमें थोड़ी कठिनाई प्रतीत हो सकती है। इसलिए उसके समाधानका विशेष मार्ग निकालना पड़ा है। कठिनाई यह उपस्थित होती है कि यदृच्छा शब्द तो अनेक व्यक्तियोंके वाचक नहीं, अपितु केवल एक व्यक्ति-वाचक रूढ शब्द होते हैं। उनमें 'अनेकसमवेतत्व' के न रहनेसे जातिकी कल्पना कैसे की जाय। जाति तो अनेक व्यक्तियोंमें रहनेवाला-अनेकसमवेत-धर्म है और यदृच्छा-शब्दोंमें स्फोट-रूप शब्द भी एक है और उसका वाच्यार्थ व्यक्ति-विशेष भी एक है तब उसमें जातिकी कल्पना कैसे की जाय। यह एक शंका हो सकती है। इसका समाधान करनेके लिए मीमांसकोंने उच्चारण करनेवाले व्यक्तियोंके भेदसे शब्दोंमें और प्रतिक्षण होनेवाले वृद्धि वा ह्रासरूप परिवर्तनके आधारपर व्यक्तियोंमें भेदकी कल्पना की है। अर्थात् बाल-वृद्ध-शुक आदि द्वारा उच्चारण किये जानेवाले 'डित्थ' या देवदत्त आदि एक व्यक्ति-वाचक शब्द-व्यक्तियोंमें अनेकत्व मानकर उनमें अ््नुगत-प्रतीति करानेवाली 'डित्थत्व' आदि जातिकी कल्पना की जा सकती है। इसी प्रकार "प्रतिक्षणपरिणामिनो हि सर्वें भावा ऋते चितिशक्तेः" एकमात्र चेतन आत्माको छोड़कर सारे पदार्थोंमें प्रतिक्षण परिणाम, प्रतिक्षण परिवर्तन हो रहा है इस सिद्धान्तके अनुसार प्रतिक्षण परिवर्तनके कारण यदृच्छा-शब्दोंके वाच्यार्थ व्यक्तियोंमें भी भेदकी कल्पना करके उनमें अनुगत-प्रतीतिके कारणरूपमें जातिको माना जा सकता है। अतः यदृच्छा- शब्दोंका संकेतग्रह भी जातिमें ही मानना चाहिये। इस प्रकार मीमांसक जाति आदि चारके स्थानपर केवल एक जातिमें ही संकेतग्रह मानते हैं। मम्मटाचार्यने अपनी कारिकामें 'जातिरेव वा' लिखकर उसी मीमांसक-मतका प्रदर्शन किया है। अगले अनुच्छेदमें उसी मीमांसक-सिद्धान्तका उपपादन करते हुए वे लिखते हैं कि- बर्फ, दूध और शंख आदिमें रहनेवाले वास्तवमें भिन्न [अर्थात् प्रथम सिद्धान्तमें कहे अनुसार एकरूप नहीं ] शुक्ल आदि गुणोंमें जिनमें जिनके कारण शुक्ल: शुक्ल: इस प्रकारका एकाकार कथन और प्रतीतिकी उत्पत्ति होती है वह शुक्लत्व आदि सामान्य [जाति ] है। गुड़ और तण्डुल आदिके पाकादिमें भी इसी प्रकार पाकत्व आदि 'सामान्य' [रहता] है। इसी प्रकार बालक, वृद्ध और तोता आदिके द्वारा उच्चारण किये जानेवाले 'डित्थ' आदि शब्दोंमें अथवा प्रतिक्षण भिद्यमान-परिवर्तन-शील 'डित्थ' आदि पदार्थोंमें डित्थत्व आदि [सामान्य ] रहता है। इसलिए सब शब्दोंका प्रवृत्तिनिमित्त केवल एक जाति ही है। [अर्थात् वैयाकरणोंके पूर्वोक्त मतके अनुसार ] जात्यादि चारको प्रवृत्ति-निमित्त न मानकर केवल जातिको ही प्रवृत्ति-निमित्त मानना चाहिये और उसीमें संकेतग्रह मानना चाहिये यह अन्यों [अर्थात मीमांसकों ] का सिद्धान्त है। इस प्रकार 'जातिरेव वा' लिखकर ग्रन्थकारने शक्ति-विषयक जो यह दूसरा मत दिखलाया है वह ग्रन्थकारको मान्य नहीं है। मीमांसकोंके मतको दिखलानेके लिए ही उसे लिखा है।
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का० ८, सू० १०] द्वितीय उल्लास: ४६
तद्वानपोहो वा शब्दार्थ: कैश्चिदुक्त इति ग्रन्थगौरवभयात् प्रकृतानुपयोगाच्च न दशितम् ।
संकेतग्रहविषयक नैयायिक-मत इस प्रकार संकेतग्रहके विषयमें वैयाकरण, आलङ्कारिक और मीमांसकोंके मतका वर्णन किया जा चुका है। इनके अतिरिक्त नैयायिकों तथा बौद्ध आदि अन्य दार्शनिकोंने भी इस प्रश्नपर विचार किया है और उनके मत इन पूर्वप्रदर्शित मतोंसे भिन्न हैं। नैयायिकोंके मतमें न केवल जातिमें शक्तिग्रह माना जा सकता है और न केवल व्यक्तिमें। केवल व्यक्तिमें संकेतग्रह माननेसे आनन्त्य और व्यभिचार दोष आते हैं तो केवल जातिमें शक्तिग्रह माननेपर शब्दसे केवल जातिकी उपस्थिति होनेके कारण व्यक्तिका भान शब्दसे नहीं हो सकता है। जातिमें शक्ति मानकर यदि व्यक्तिका भान आक्षेपसे माना जाय तो उसका शाब्द-बोधमें अन्वय नहीं हो सकेगा। क्योंकि 'शाब्दी हि आकाडक्षा शब्देनैव पूर्यते' इस सिद्धान्तके अनुसार शब्द-शक्तिसे लभ्य अर्थका ही शाब्दबोधमें अन्वय हो सकता है। आक्षेप-लभ्य अर्थ शाब्द-बोधमें अन्वित नहीं हो सकता है। इसीलिए नैयायिकोंके मतानुसार केवल व्यक्ति या केवल जाति किसी एकमें शक्तिग्रह नहीं माना जा सकता। इसलिए 'व्यक्त्याकृतिजातयस्तु पदार्थः' [ न्यायसूत्र २,२,६८ ] जाति तथा आकृतिसे विशिष्ट व्यक्ति पदका अर्थ होता है यह नैयायिक-सिद्धान्त है। इसे ग्रन्थकारने अगली पंक्तिमें 'तद्वान् पदार्थः' कहकर दिखलाया है। 'तद्वान्का अरथ जातिमान् है। अर्थात् जातिविशिष्ट व्यक्तिमें संकेतग्रह मानना चाहिये, यह नैयायिक-मत है। बौद्ध-मत इसके अतिरिक्त बौद्ध-दार्शनिकोंका भी इस विषयमें अपना अलग मत है। उनके मतमें शब्दका अर्थ 'अपोह' होता है। 'अपोह' का अरथ 'अतद्-व्यावृत्ति' या 'तद्भिन्नभिन्नत्व' है। दस घट-व्यक्तियोंमें 'घटः-घटः' इस प्रकारकी एकाकार प्रतीतिका कारण नैयायिक आदि 'घटत्व सामान्य'को मानते हैं। उनका 'सामान्य' एक नित्य पदार्थ है क्योंकि 'नित्यत्वे सति अ्नेकसमवेतत्वं सामान्यम्' यह सामान्यका लक्षण है। इसके अनुसार 'सामान्य' नित्य है। परन्तु बौद्धोंका पहिला सिद्धान्त 'क्षणभङ्गवाद' है। उनके मतसे सारे पदार्थ 'क्षणिक' हैं इसलिए वे 'सामान्य' जैसे किसी नित्य-पदार्थको नहीं मानते। उसके स्थानपर अनुगत प्रतीतिका कारण वे 'अपोह'को मानते हैं। 'अपोह' शब्द बौद्ध-दर्शनका पारिभाषिक शब्द है। उसका अर्थ 'अतद्-व्यावृत्ति' या 'तद्धिन्नभिन्नत्व' होता है। अर्थात् दस घट-व्यक्तियोंमें जो 'घटः घटः' इस प्रकारकी अनुगत प्रतीति होती है उसका कारण 'अघट-व्यावृत्ति' या 'घटभिन्नभिन्नत्व' है प्रत्येक घट अघट अर्थात् घटभिन्न सारे जगत्से भिन्न है। इसलिए उसमें 'घटः घटः' यह एक-सी प्रतीति होती है। इसलिए बौद्धोंके मतमें 'अपोह' ही शब्दका अर्थ होता है। उसीमें संकेतग्रह मानना चाहिये। इस बौद्धमतका संकेत ग्रन्थकारने 'अपोहो वा शब्दार्थः' लिखकर किया है। इन सब पक्षोंका विस्तार- पूर्वक विवेचन ग्रन्थगौरवके भयसे तथा प्रकृतमें विशेष उपयोग न होनेसे ग्रन्थकारने नहीं किया है। यही बात वे अगली पंक्तिमें दिखलाते हैं- किन्हीं लोगोंने 'तद्वान्' [अर्थात् जातिविशिष्ट व्यक्ति] और 'अपोह' [अर्थात् अतद्-व्यावृत्ति या तद्भिन्नभिन्नत्व ] शब्दका अर्थ है यह कहा है [ ये दोनों मत क्रमशः नैयायिक तथा बौद्धोंके हैं ]। ग्रन्थके बढ़ जानेके भयसे और प्रकृतमें उपयोग न होनेसे उनको [विस्तारपूर्वक ] नहीं दिखलाया है। ४
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५० काव्यप्रकाश: [का० ८, सू० ११ [सू० ११ ] स मुख्योऽर्थस्तत्र मुख्यो व्यापारोऽस्याभिधोच्यते ।।८।। स इति साक्षात् संकेतितः । अस्येति शब्दस्य। मम्मटका सिद्धान्त मत यहाँ संकेतग्रहके विषयमें जो तीन-चार मत दिखलाये हैं उनमेंसे पहिलेके साथ 'इति महाभाष्य- कारः', दूसरेके साथ 'इत्यन्ये' और तीसरे तथा चौथेके साथ 'कैश्चित्' शब्दका प्रयोग किया गया है। नरसिंह ठक्कुर आदि 'काव्यप्रकाश'के कुछ टीकाकारोंने इसका अर्थ यह लगाया है कि इनमेंसे कोई भी मत ग्रन्थकारको अरभिमत नहीं है। इसलिए इन शब्दोंके द्वारा सब मतोंमें अपना अस्वरस प्रदर्शित किया है। नरहिं ठक्कुरने तो यहाँतक लिख दिया है कि 'तस्माद् व्यक्तिपक्ष एव क्षोदक्षमः', अर्थात् 'इसलिए व्यक्तिपक्ष ही अधिक उचित होता है।' परन्तु यह कथन ठीक नहीं है, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, साहित्यशास्त्रमें प्रायः व्याकरणशास्त्रके दार्शनिक सिद्धान्तोंको अपनाया गया है। स्वयं काव्यप्रकाश- कारने 'बुधैवैयाकरणैः' आदि लिखकर इस सिद्धान्तकी पुष्टि की है। इसलिए इस विषयमें भी साहित्य- शास्त्रमें व्याकरण-सिद्धान्तके अनुसार 'जात्यादि' चारमें संकेतग्रह मानना ही अभीष्ट है। मम्मटाचार्य भी इसी सिद्धान्तको मानते हैं। उन्होंने यहाँ महाभाष्यकारके नामका उल्लेख अपने मतके समर्थनमें प्रमाण प्रस्तुत करनेके लिए ही किया है। श्रीमम्मटाचार्यने इसी विषयपर 'शब्द-व्यापार-विचारः' नामक एक और छोटा-सा प्रकरण- ग्रन्थ लिखा है। उसमें भी मीमांसक आदि अन्य मतोंका खण्डन करके उन्होंने वैयाकरण-सम्मत और महाभाष्यकार द्वारा अनुमोदित जात्यादि चारोंमें संकेतग्रह माननेके सिद्धान्तका ही प्रतिपादन किया है। उन्होंने उस ग्रन्थमें स्पष्टरूपसे लिखा है कि- 'तत्र मुख्यश्चतुभेंदो ज्ञयो जात्यादिभेदतः।' अर्थात् अभिधा-शक्तिसे प्रतिपादित होनेवाला 'मुख्य अर्थ जाति आदिके भेदसे चार प्रकारका समझना चाहिये।' अतः नरसिंह ठक्कुरका लेख भ्रममूलक है। अभिधालक्षण ऊपर अर्थके 'वाच्य', 'लक्ष्य' और 'व्यङ्गय' रूपसे तीन भेद बतलाये थे। इनमेंसे वाच्यार्थको मुख्यार्थ नामसे भी कहा जाता है। 'मुखमिव मुख्यः' इस विग्रहमें 'शाखादिभ्यो यः' [५-३-१०३] सूत्रसे य-प्रत्यय होकर मुख्य-शब्द सिद्ध होता है। जैसे शरीरके सारे अवयवोंमें मुख सबसे प्रधान है और सबसे पहिले दिखलायी देता है उसी प्रकार वाच्य, लक्ष्य तथा व्यङ्गय सब अथोंमें वाच्यार्थ सबसे प्रधान और सबसे पहिले उपस्थित होनेवाला अर्थ है इसलिए मुखके समान होनेसे उसको 'मुख्यार्थ' कहा जाता है। उस वाच्यार्थ या 'मुख्यार्थ'का बोधन करानेवाला जो शब्दका व्यापार है उसको 'अभिधा' व्यापार कहते हैं। आगे 'मुख्यार्थबाधे तद्योगे' तथा 'मुख्यशब्दाभिधानाल्लक्षणायाः को भेदः' इत्यादि अ्नेक स्थलोंपर ग्रन्थकार वाच्य अर्थ तथा वाचक शब्दके लिए मुख्यार्थ तथा मुख्य-शब्द पदका प्रयोग करेंगे। अरतः यहाँ वाच्यार्थको ही मुख्यार्थ कहा जाता है। इस बातको ग्रन्थकार आगे कहते हैं- [सू० ११]-वह [साक्षात् संकेतिक अर्थ] मुख्य अर्थ [कहलाता ] है, और उस [का बोधन कराने ] में इस [शब्द] का जो व्यापार होता है वह अभिधा [व्यापार या अभिधा-शक्ति] कहलाता है ।।८। [कारिकामें प्रयुक्त] 'सः' इस [ पद] से साक्षात्-संकेतित [अर्थ लिया जाता है ]। 'अस्य' इस [पद ] से 'शब्दका' [ यह अर्थ लिया जाता है] ।८॥
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का० , सू० १२] द्वितीय उल्लास: ५१
[सू० १२ ] मुख्यार्थबाधे तद्योगे रूढितोऽथ प्रयोजनात्। अन्योडर्थो लक्ष्यते यत् सा लक्षणारोपिता क्रिया ।।९।।V
लक्षणा-निरूपण मुख्यार्थ अथवा वाच्यार्थकी बोधिका अमिधा-शक्ति होती है और अन्य सबकी अपेक्षा सबसे पहिले अभिधा-शक्ति ही अपने अर्थ अर्थात् वाच्यार्थका बोध कराती है परन्तु जहाँ कहीं मुख्यार्थका वाक्यके अन्य पदोंके अथोंके साथ अन्वय होनेमें बाधा होती है अथवा उससे तात्पर्यकी उपपत्ति नहीं होती वहाँ रूढ़ि अर्थात् प्रसिद्धिके कारण अथवा किसी विशेष प्रयोजनके प्रतिपादनके लिए मुख्यार्थसे सम्बद्ध किसी अन्य अर्थकी प्रतीति हो सकती है। उस अन्य अर्थको 'लक्ष्यार्थ' और उसकी बोधिका शक्तिको 'लक्षणा-शक्ति' कहा जाता है। लक्षणा-शक्तिके व्यापारके लिए १. मुख्यार्थ-बाध, २. लक्ष्यार्थका मुख्यार्थके साथ सम्बन्ध तथा ३. रूढ़ि या प्रयाजनमेंसे अन्यतर, इन तीन कारणोंकी आवश्यकता होती है। इसी अभिप्रायसे लक्षणाका लक्षण करनेके लिए ग्रन्थकार अगली कारिका लिखते हैं- [सू० १२]-१. मुख्यार्थका बाध [अर्थात् अन्वयकी अनुपपत्ति या तात्पर्यकी अनुपपत्ति ] होनेपर, २. उस [मुख्यार्थ ] के साथ [लक्ष्यार्थ या अन्य अर्थका ] सम्बन्ध होनेपर, ३. रूढ़िसे अथवा प्रयोजन-विशेषसे जिस [शब्द-शक्ति ] के द्वारा अन्य अर्थ लक्षित होता है वह [ मुख्यरूपसे अर्थमें रहनेके कारण शब्दका ] आरोपित व्यापार लक्षणा [कहलाता ] है ।।६।। इस कारिकामें 'लक्ष्यते यत् सा' इस स्थलपर जो 'यत्' शब्दका प्रयोग हुआ है उसकी दो प्रकारकी व्याख्या की जाती है। प्रथम व्याख्याके अनुसार 'यदिति यया इत्यर्थे लुप्तकरगं तृतीयान्तमव्ययम्' 'यत्' पद 'यया' इस अर्थमें करण-विभक्तिके लोप द्वारा बना हुआ तृतीयान्त अव्ययपद है। उसके अनुसार 'यया शब्दशक्त्या अन्योऽर्थों लक्ष्यते सा लक्षणा' जिस शब्दशक्तिसे अन्य अर्थ लक्षित होदा है वह 'लक्षणा' कहलाती है, यह अर्थ होता है। दूसरी व्यांख्याके अनुसार 'यत्' यह क्रियाविशेषण है 'यत् लक्ष्यते' अर्थात् 'यत् प्रतिपाद्यते' जो प्रतिपादित होता है वह 'लक्षणा' है। इन दोनों ही व्याख्याओंमें और विशेषकर दूसरी व्याख्यामें 'लक्ष्यते' यह पद णिजन्तसे बना हुआ आख्यातका रूप है। णिच्-प्रत्ययका अरथ प्रयोजक हेतुका व्यापार होता है, 'अन्योऽर्थों यत् लक्ष्यते' का अरथ 'अन्यार्थ-प्रतिपत्तिहेतुः शब्दव्यापारो लक्षणा' यह होता है। परन्तु यह व्याख्या अधिक क्लिष्ट हो जाती है। इसलिए 'यत्' पदको 'यया'के अर्थमें लुप्तकरण तृतीयान्त अ्व्यय मानना ही अधिक अच्छा है। कुछ लोगोंने 'यत् प्रतिपाद्यते सा प्रतिपत्तिरेव लक्षणा' इस प्रकारकी व्याख्या भी की है, परन्तु यह व्याख्या नितान्त असङ्गत है क्योंकि 'प्रतिपत्ति' अर्थात् ज्ञान 'लक्षणा' नहीं है अपितु शब्दकी शक्ति 'लक्षणा' है। प्रसिद्ध मीमांसक कुमारिलभट्टने अपने श्लोकवार्तिक' में 'अभिधेयाविनाभूतप्रतीतिर्लक्षणो- च्यते' यह लिखा है। उसीके आधारपर इन व्याख्याकारोंने यहाँ भी 'यत् लक्ष्यते सा प्रतिपत्तिरेव लक्षणा' इस प्रकारकी व्याख्या कर दी है। परन्तु एक तो वह काव्यप्रकाशकारका सिद्धान्तमत नहीं, अपितु मीमांसकोंका मत है, इसलिए उसके आधारपर व्याख्या उचित नहीं है। काव्यप्रकाशकारको शब्द- व्यापारको ही लक्षणा मानना अभिमत है अतः 'यया' अर्थमें ही 'यत्' अव्ययका प्रयोग समझना चाहिये। दूसरे, वहाँ भी 'प्रतीति' पदका अर्थ ज्ञान नहीं अपितु 'प्रतीतिका करणभूत व्यापार' किया जाता है। करणमें क्तिन्-प्रत्यय करके 'प्रतीयतेऽर्थोऽनया इति प्रतीतिः' यह विग्रह होता है।
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५२ काव्यप्रकाश: [का० e, सू० १२ कर्मणि कुशलः' इत्यादौ दर्भग्रहणाद्ययोगात्, 'गङ्गायां घोषः' इत्यादौ च गङ्गा- दीनां घोषाद्याधारत्वासम्भवात्, मुख्यार्थस्य बाधे, वित्रेचकत्वादौ सामीप्ये च सम्बन्धे, रूढित: प्रसिद्धेः तथा गङ्गातटे घोष इत्यादेः प्रयोगात् येषां न तथा प्रतिपत्तिः तेषां पावन- त्वादीनां धर्माणां तथाप्रतिपादनात्मनः प्रयोजनाच्च मुख्येन अमुख्योऽर्थो लक्ष्यते यत् स आरोपितः शब्दव्यापार: सान्तरार्थनिष्ठो लक्षणा।
मुख्यार्थबाधके दो रूप इस कारिकामें 'लक्षणा' का मुख्य कारण 'मुख्यार्थबाध' बतलाया गया है। इस 'मुख्यार्थबाधकी भी दो प्रकारकी व्याख्या की जाती है। अधिकांश व्याख्याकार मुख्यार्थबाधका अर्थ 'अन्वयानुपपत्ति' करते हैं। जैसे 'गङ्गायां घोषः' इस उदाहरणमें गङ्गाका अरथ जलकी धारा और 'घोषका अर्थ आभीरपल्ली- घोषियोंकी बस्ती-है। गङ्गाकी धाराके ऊपर घोषियोंकी बस्ती नहीं रह सकती है इसलिए यहाँ अन्वयके ग्रनुपपन्न होनेके कारण गङ्गा पद लक्षणासे तटरूप अर्थका बोधक होता है। परन्तु नागेशभट्टने 'परमलघुमञ्जूषा' में 'अन्वयानुपपत्ति'के स्थानपर 'तात्पर्यानुपपत्ति' को लक्षणाका बीज माना है और उसका हेतु यह दिया है कि यदि अन्वयानुपपत्तिको लक्षणाका बीज माना जायगा तो 'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्' इस प्रयोगमें लक्षणा नहीं हो सकेगी। कोई व्यक्ति अपना दही बाहर रखा हुआ छोड़कर किसी कामसे तनिक देरके लिए कहीं जा रहा है। वह चलते समय अपने साथीसे कहता है कि 'जरा कौओसे दहीको बचाना'। इसका अभिप्राय केवल कौओंसे बचाना ही नहीं है अपितु कौए, कुत्ते आदि जो कोई दहीको बिगाड़ने या खानेका प्रयत्न करें, उन सबसे दहीकी रक्षा करना यह वक्ताका अभिप्राय है। यह अभिप्राय 'काक' पदकी 'दध्युपघातक' अर्थमें लक्षणा करनेसे ही पूरा हो सकता है। अन्यथा नहीं। परन्तु 'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्' इस प्रयोगमें 'अन्वयानुपपत्ति' नहीं है। " सब पदोंका अन्वय बन जाता है इसलिए यदि अन्वयानुपपत्तिको ही लक्षणाका बीज मानें तो यहाँ लक्षणाका अवसर ही नहीं आता। इसलिए नागेशभट्टने 'अन्वयानुपपत्ति' के स्थानपर 'तात्पर्यानुपपत्ति' को लक्षणाका बीज माना है। अन्वयमें बाधा न होनेपर भी 'काक' पदका मुख्यार्थमात् लेनेसे वक्ताके तात्पर्यकी उपपत्ति नहीं होती है इसलिए लक्षणा करना आवश्यक हो जाता है। अतः तात्पर्यानुपपत्तिको ही लक्षणाका बीज मानना चाहिये, यह नागेशभट्टका अभिप्राय है। लक्षणाके दो उदाहरण 'कर्मणि कुशलः' [अर्थात् चित्रकर्म आदि किसी विशेष ] 'काममें कुशल है' इत्यादिमें 'कुशान् लाति आदत्ते इति कुशलः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार] कुशोंके लानेका कोई सम्बन्ध न होनेसे [ मुख्यार्थका बाध होता है] और 'गङ्गायां घोषः' इत्यादिमें गङ्गा [ पदके जलप्रवाहरूप मुख्यार्थ ] आदिमें घोष [आभीर-पल्ली] आदिका आधारत्व सम्भव न होनेसे मुख्यार्थका बाध होनेपर [प्रथम उदाहरणमें] विवेचकत्वादि और [दूसरे उदाहरणमें ] सामीप्य-सम्बन्ध होनेपर, [पहिले उदाहरणमें कुशल पदके दक्षरूप अर्थमें रूढ़ होनेके कारण ] रूढ़िसे अर्थात् प्रसिद्धिसे, और [दूसरे उदाहरणमें ] 'गङ्गातटे घोषः' इत्यादि [मुख्य शब्द ] के प्रयोगसे जिन [शैत्य, पावनत्वादि धर्मों ] की उस रूपमें प्रतीति नहीं है उन शैत्य, ] पावनत्व आदि धर्मोंके उस प्रकारके प्रतिपादनस्वरूप प्रयोजनसे मुख्य अर्थसे जो अमुख्य अर्थ लक्षित होता है वह शब्दका व्यवहितार्थविषयक आरोपित शब्द-व्यापार 'लक्षणा' (कहलाता) है।
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का० १०, सू० १३] द्वितीय उल्लास: ५३
[सू० १३ ] स्वसिद्धये पराक्षेपः परार्थं स्वसमर्पणम् । उपादानं लक्षणं चेत्युक्ता शुद्धैव सा द्विधा।।१०।। ग्रन्थकारने कारिकामें 'लक्ष्यते यत् सा' इस अंशमें 'यत्' पदका प्रयोग किया है। यह पद कुछ अस्पष्ट-सा है इसलिए इसकी व्याख्यामें ऊपर लिखे अनेक मतभेद पाये जाते हैं। वृत्ति लिखते समय यदि वे अपने इस पदकी स्पष्ट व्याख्या कर देते तो अच्छा होता। परन्तु उन्होंने वृत्ति लिखते समय भी उसकी व्याख्या न करके फिर उसी 'यत्' शब्दका प्रयोग कर दिया है। इससे उसका अर्थ स्पष्ट नहीं हुआ और व्याख्याकारोंको अ्नेक प्रकारकी व्याख्या करनेका अवसर मिल गया है। प्रयोजनवती-लक्षणाके उदाहरणरूपमें 'गङ्गायां घोषः' यह वाक्य यहाँ प्रस्तुत किया गया है। लक्षणाका यह उदाहरण साहित्यशास्त्रके सभी ग्रन्थोंमें दिया गया है, परन्तु वह उनका अपना बनाया हुआ उदाहरण नहीं है अपितु जिस प्रकार 'ध्वनि' शब्द तथा 'चतुष्टयी शब्दानां प्रवृत्तिः' के सिद्धान्तको उन्होंने व्याकरणशास्त्रसे उधार लिया है उसी प्रकार यह उदाहरण भी उन्होंने व्याकरणशास्त्रसे ही लिया है। महाभाष्यकारने 'पुंयोगादाख्यायाम्' [४-१-४८ ] सूत्रके महाभाष्यमें 'गङ्गायां घोषः' तथा 'कूपे गर्गकुलम्' ये दो लक्षणाके उदाहरण दिये हैं। वहाँसे ही साहित्यशास्त्रमें यह उदाहरण ले लिया गया है। यह भी साहित्यशास्त्रके व्याकरणानुगामी होनेका प्रमाण है। लक्षणाके दो भेद आगे ग्रन्थकार लक्षणाके 'उपादान-लक्षणा' तथा 'लक्षण-लक्षणा' नामसे दो भेद करते हैं। 'जहाँ शब्द अपने अन्वयकी सिद्धिके लिए अन्य अर्थका आक्षेप कर लेता है और स्वयं भी बना रहता है उसको 'उपादान-लक्षणा' कहते हैं। उसमें मुख्यार्थका भी उपादान या ग्रहण रहता है इसलिए उसकी 'उपादान- लक्षणा' यह अन्वर्थ-संज्ञा है। जैसे 'कुन्ता: प्रविशन्ति' या 'यष्टयः प्रविशन्ति' आदि उदाहरणोंमें 'कुन्त' और 'यष्टि' शब्द भाला और लाठी रूप अचेतन अ्थोंके वाचक हैं, उनमें प्रवेश-क्रियाका अन्वय नहीं हो सकता है इसलिए यहाँ मुख्यार्थका बाध होनेपर 'कुन्त' आदि शब्द अपने अन्वयकी सिद्धिके लिए 'पुरुष' पद या पदार्थका आक्षेप कर लेते हैं। इस प्रकार 'कुन्त' शब्द 'कुन्तधारी पुरुष'का बोधक हो जाता है और उसका अन्वय होनेमें जो बाधा थी वह दूर हो जाती है। 'कुन्ताः प्रविशन्ति' का अरथथ 'कुन्तधारी पुरुष घुसे आ रहे हैं' यह हो जाता है। कुन्तधारी पुरुषोंका दाहुल्य-सूचन ही लक्षणाका प्रयोजन है। इस प्रकार यह प्रयोजनवती उपादानलक्षणाका उदाहरण है। इसके विपरीत जहाँ वाक्यमेंका कोई शब्द वाक्यमें प्रयुक्त दूसरे शब्दके अन्वयकी सिद्धिके लिए अपने अर्थका परित्याग कर अन्य अर्थका बोधक हो जाता है वहाँ 'लक्षण-लक्षणा' होती है। जैसे 'गङ्गायां घोष:' इस उदाहरणमें वाक्यमें प्रयुक्त 'घोष' पदके आधेयत्वरूपसे अन्वयका उपपादन करनेके लिए 'गङ्गा' शब्द अपने 'जल-प्रवाह' रूप मुख्यार्थका परित्याग कर सामीप्यसम्बन्धसे 'तट' रूप अन्य अर्थको बोधित करता है अतएव यह प्रयोजनवती 'लक्षण-लक्षणा' का उदाहरण है। लक्षणाके इन्हीं दोनों भेदोंको ग्रन्थकार निम्नलिखित प्रकारसे दिखलाते हैं- [सू० १३]-[ वाक्यमें प्रयुक्त किसी पदका ] अपने अन्वयकी सिद्धिके लिए अन्य अर्थका आक्षेप करना 'उपादान' और दूसरेके [अन्वयकी सिद्धिके ] लिए अपने [मुख्य अर्थ] का परित्याग [समर्पण] 'लक्षण' [कहलाता ] है, इस प्रकार वह शुद्धालक्षणा ही दो प्रकारकी कही गयी है [गौणीके ये भेद नहीं होते हैं] ।१०।
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५४ काव्यप्रकाश [ का० १०, सू० १३
कुन्ता: प्रविशन्ति', 'यष्टयः प्रविशन्ति' इत्यादौ कुन्तादिभिरात्मनः प्रवेशसिद्धयर्थ स्वसंयोगिन: पुरुषा आक्षिप्यन्ते। तत उपादानेनेयं लक्षणा। उपादान-लक्षणाके दो उदाहरण 'कुन्ता: प्रविशन्ति' 'भाले घुस रहे हैं' और 'यष्टयः प्रविशन्ति' 'लाठियाँ घुस रही हैं, इत्यादि [वाक्यों] में 'कुन्त' आदि [पदों] के द्वारा अपने [अचेतनरूपमें ] प्रवेश [करिया] की सिद्धिके लिए अपनेसे संयुक्त [अर्था्त् कुन्तधारी] पुरुषोंका आक्षेप [द्वारा बोध ] कराया जाता है। इसलिए [स्वार्थका परित्याग किये बिना अन्य अर्थके ग्रहणरूप अथवा स्वार्थके भी ग्रहणरूप ] उपादानसे यह लक्षणा है। [अतः यह 'उपादान-लक्षणा' कहलाती है ]। मुकुलभट्टके उपादान-लक्षणाके दो उदाहरण उपादान-लक्षणाके इन उदाहरणोंके बाद लक्षण-लक्षणाका उदाहरण देना चाहिये। परन्तु उसको प्रस्तुत करनेके पूर्व ग्रन्थकार 'मुकुलभट्ट' तथा मण्डनमिश्र आदि मीमांसकों द्वारा दिये गये 'उपादान- लक्षणा'के दो उदाहरणोंका खण्डन करते हैं। मुकुलभट्ट काव्यप्रकाशकारसे कुछ पहिले हुए हैं। उनका एकमात्र ग्रन्थ 'अभिधावृत्तिमातृका' इस समय उपलब्ध होता है। इस ग्रन्थमें उन्होंने अभिधा, लक्षणा तथा व्यञ्जना इन तीनों शक्तियोंके स्थानपर केवल 'अभिधा' शक्तिको ही माननेका सिद्धान्तरूपसे प्रतिपादन किया है। अभिधाके उन्होंने दस भेद माने हैं। इनमें जात्यादि चार प्रकारके अरथोंकी बोधक चार प्रकारकी अभिधाशक्ति तथा लक्षणाके छह भेदोंका भी अभिधामें अन्तर्भाव करके दस प्रकारकी अभिधाशक्ति उन्होंने सिद्ध की है। व्यञ्जनाके सब भेदोंका अन्तर्भाव लक्षणाके छह भेदोंमें कर लिया है। इस प्रकार दस तरहकी अभिधाके अतिरिक्त अन्य किसी शक्तिके माननेकी आवश्यकता नहीं है यह बात उन्होंने सिद्ध की है। ग्रन्थका उपसंहार करते हुए उन्होंने लिखा है- 'इत्येतदभिधावृत्तं दशधात्र विवेचितम्' ॥।१३।। इस ग्रन्थमें उन्होंने 'उपादान-लक्षणा'के गौरनुबन्ध्यः' तथा 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुङक्ते' ये दो उदाहरण दिये हैं। जिस प्रकार काव्यप्रकाशकार आदि साहित्यशास्त्रके अधिकांश आचार्य वैयाकरणोंके अनुयायी हैं और उन्होंने अन्य विषयोंके साथ लक्षणाके उदाहरण भी व्याकरणशास्त्रसे लिये हैं-'गङ्गायां घोष:', 'कुन्ताः प्रविशन्ति', 'यष्टयः प्रविशन्ति' इत्यादि लक्षणाके सब उदाहरण काव्यप्रकाशकारने महाभाष्यसे ही लिये हैं-उसी प्रकार 'मुकुलभट्ट' मीमांसक-मतके अनुयायी हैं इसलिए उन्होंने अपने उदाहरणोंका संग्रह प्रायः मीमांसाके ग्रन्थोंसे किया है। 'गौरनुबन्ध्यः' और 'पीनों देवदत्तो दिवा न भुङक्ते' ये उदाहरण मुकुलभट्टने मीमांसा-ग्रन्थोंसे ही लिये हैं। 'गौरनुबन्ध्यः' यह वैदिक प्रयोगमें और पदमें 'उपादान-लक्षणा'का उदाहरण है। उसका अर्थ 'गायको बाँधना चाहिये' यह होता है। यज्ञमें गौके उपाकरण आदि द्वारा पूजनके लिए यहाँ उसके बाँधनेका विधान किया गया है। दूसरे लोग 'अनुबन्ध्यः' का अरथ 'आलम्भः' 'हन्तव्यः' मारना चाहिये यह करते हैं। जैसा कि कहा जा चुका है, मीमांसक लोग केवल जातिमें शब्दकी शक्ति मानते हैं इसलिए गौ शब्दका वाच्यार्थ 'गोत्व' जाति होता है। उस जातिमें बन्धन अथवा आलम्भनरूप क्रिया सम्भव नहीं है इसलिए मुख्यार्थका बाध होता है। तब गो-शब्द बन्धनके साथ अपने 'गोत्व' जातिरूप अर्थके अन्वय- की सिद्धिके लिए व्यक्तिका आक्षेपसे बोध कराता है। इसलिए यह पदमें उपादानलक्षणा है। यह मुकुलभट्टका या मीमांसकोंका अभिप्राय है।
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का० १०, सू० १३ ] द्वितीय उल्लास: ५५
'गौरनुबन्ध्यः' इत्यादौ श्रुतिचोदितमनुवन्धनं कथं मे स्यादिति जात्या व्यक्ति- राक्षिप्यते,न तु शब्देनोच्यते 'विशेष्य नाभिधा गच्छेत् क्षीणशक्तिर्विशेषणे' इति न्यायात्। इत्युपादानलक्षणा तु नोदाहर्तव्या। न ह्यत्र प्रयोजनमस्ति न वा रूढिरियम्। व्यक्त्यविनाभावित्वात्तु जात्या व्यक्तिराक्षिप्यते।
मीमांसक लोग अर्थवाद-वाक्योंको 'प्राशस्त्य' का लक्षक मानकर वाक्यमें भी लक्षणा स्वीकार करते हैं। इसलिए 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुङक्ते' 'देवदत्त मोटा हो रहा है परन्तु दिनमें नहीं खाता है' यह लौकिक प्रयोगमें वाक्य-लक्षणाका उदाहरण मुकुलभट्ट आदि मीमांसकोंने दिया है। इस उदाहरणमें दिनमें न खानेवाला देवदत्त मोटा हो यह बात साधारणतः सम्भव नहीं है। इसलिए मुख्यार्थका बाध होनेपर यह वाक्य अपने अन्वयकी सिद्धिके लिए रात्रि-भोजनका आक्षेप द्वारा बोध कराता है। इस दृष्टिसे यह भी उपादान-लक्षणाका उदाहरण बन जाता है। मुकुलभट्टने उपादान-लक्षणाका लक्षण तथा इन दोनों उदाहरणोंमें उस लक्षणका समन्वय करते हुए लिखा है कि- 'स्वसिद्धयर्थतयाक्षेपो यत्र वस्त्वन्तरस्य तत् । उपादानं लक्षणन्तु तद्विपर्यासतो मतम् ॥ का० ६३। यत्र स्वसिद्धचर्थतया वस्त्वन्तरस्याक्षेपो भवति तत्नोपादानम् । यथा 'गौरनुबन्ध्यः' इति। अत् हि गोत्वस्य याग प्रति साधनत्वं शाब्दं व्यक्त्याक्षेपमन्तरेण नोपपद्यत इति तत्सिद्धयर्थतया व्यक्तेराक्षेपः । यथा च 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुङक्ते' इति। अत्र हि पीनत्वं दिनाधिकरणभोजनाभावविशिष्टतया- वगम्यमानमेव कार्यत्वात् स्वसिद्धयर्थत्वेन कारणभूतं रात्रिभोजनमाक्षेपादभ्यन्तरीकरोति। अत् च 'रात्रौ भुङक्ते' इत्येतच्छब्दाक्षेपपूर्वकतया प्रमाणस्यापरिपूर्णस्य परिपूरणात् श्रुतार्थाप- पत्तित्वं भवत्वथवा कारणस्यैव रात्रिभोजनस्याक्षेप इति। स्वथा स्वसिद्धयर्थत्वेनार्थान्तरस्याक्षेपपूर्वक- तयान्तर्भावनादुपादानत्वमुपपद्यते ।' इस प्रकार मुकुलभट्टने उपादान-लक्षणाके जो दो उदाहरण दिये हैं उनका क्रमशः खण्डन करनेके लिए काव्यप्रकाशकार पहिले उनका अनुवाद करते हुए फिर उनका खण्डन करते हैं। 'गौरनुबन्ध्यः' के विषयमें मुकुलभट्टके मतका अनुवाद करते हुए ग्रन्थकार लिखते हैं- मुकुलभट्टक प्रथम उदाहरणका खण्डन 'गौरनुबन्ध्यः' इत्यादि [वाक्य] में, श्रुतिमें प्रतिपादित किया हुआ मेरा [अर्थात् गौ शब्दके मुख्यार्थ 'गोत्व' जातिका ] 'अनुबन्धन' कैसे बन सके इसके [उपादनके ] लिए [मुख्यार्थ ] जातिसे [अमुख्यार्थभूत ] व्यक्तिका आक्षेप किया जाता है। [क्योंकि गोत्वरूपी] 'विशेषणका बोध करानेमें क्षीण हुई अभिधाशक्ति [किसी भी प्रकारसे गो-व्यक्तिरूप ] विशेष्यका बोध नहीं करा सकती है' इस युक्तिसे। [अतः उस विशेष्यभूत गो-व्यक्तिका बोध उपादान-लक्षणा द्वारा होता है ]। आगे उसका खण्डन करते हुए लिखते हैं- यह उपादान-लक्षणाका उदाहरण [मुकुलभट्टको ] नहीं देना चाहिये। क्योंकि यहाँ [लक्षणाके प्रयोजक रूढ़ि तथा प्रयोजनरूप दो मुख्य हेतुओंमेंसे । न तो कोई [विशेष ] प्रयोजन ही है और न यह रूढ़ि है। किन्तु [व्यक्तिके बिना जाति रह नहीं सकती है इसलिए ] अविनाभावके कारण जातिसे व्यक्तिका [अनुमान ] आक्षेप किया जाता है [ अतः यह लक्षणाका उदाहरण नहीं है ]।
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५६ काव्यप्रकाश: [ का० १०, सू० १३ यथा 'क्रियताम्' इत्यत्र कर्ता। 'कुरु' इत्यत्र कर्म। 'प्रविश', 'पिण्डीम्' इत्यादौ 'गृहम्', 'भक्षय' इत्यादि च।
जैसे [कोई यह कहे कि] 'क्रियताम्' [तुम] 'करो' [इसमें कोई क्रिया बिना कर्ताके नहीं हो सकती है इसलिए ] इत्यादिमें [ 'कृतिः अर्थात् यत्नः साशया गुणत्वात्' इस अनुमानसे ] कर्ता ['त्वया'का लाभ होता है]। 'करो' यहाँ [ 'कृतिः सविषया कृतित्वात्' इस अनुमानसे 'पाकम्' आदि] कर्म [ का आक्षेपसे लाभ होता है]। 'प्रवेश करो' और 'पिण्डीको' [ इन दोनोंके कहनेपर अविनाभावसे क्रमशः ] घरमें [प्रवेश करो ] और [पिण्डीको] 'खाओ' इत्यादि [की अविनाभावसे प्रतीति होती है, इनमेंसे किसी भी स्थलमें लक्षगा नहीं मानी जाती है। इसी प्रकार 'गौरनुबन्ध्यः' में भी किसी प्रकारकी लक्षणा नहीं है। अतः उसको उपादान-लक्षणाके उदाहरणके रूपमें प्रस्तुत नहीं करना चाहिये]। यहाँ 'क्रियताम्', 'कुरु', 'प्रविश', 'पिण्डीम्' इत्यादि सब असम्पूर्ण वाक्य प्रयुक्त किये गये हैं। उनमें पूरकरूपसे जिन अन्य अंशोंकी अपेक्षा रहती है उनकी पूर्ति 'अध्याहार' या 'आक्षेप'के द्वारा की जाती है। अध्याहारके विषयमें मीमांसकोंमें दो प्रकारके सिद्धान्त पाये जाते हैं। कुमारिलभट्ट 'शब्दाध्याहार- वाद'के माननेवाले हैं और उनके शिष्य प्रभाकर 'अर्थाध्याहारवाद' के समर्थक हैं। ऊपर जो अध्याहारके चार उदाहरण दिये गये हैं उनमेंसे पहिले दो अर्थाध्याहारवादी प्रभाकरके अभिप्रायसे और अन्तिम दो शब्दाध्याहारवादी भट्ट-मतके अभिप्रायसे दिये गये हैं। 'क्रियाताम्' तथा 'कुरु' ये दोनों क्रियापद हैं। उनमें पहिली जगह कर्ता 'त्वया' की और दूसरी जगह कर्म 'पाकम्' आदिकी अपेक्षा है। इन दोनोंकी पूर्ति अध्याहार अथवा आक्षेपसे की जाती है। किन्तु वहाँ कर्ता तथा कर्म पदोंका अध्याहार न होकर. उनके अर्थोंका अध्याहार किया जाता है इसलिए वे 'अर्थाध्याहारवाद'के पोषक उदाहरण हैं। इसके विपरीत 'प्रविश' तथा 'पिण्डीम्' इन दोनों उदाहरणींमें अपेक्षित 'गृहम्' तथा 'भक्षय' इन पूरक अंशोंका शब्दरूपमें 'अध्याहार' किया जाता है। इसलिए ये दोनों 'शब्दाध्याहार' के उदाहरण हैं। ग्रन्थकारने इन उदाहरणोंको इसलिए प्रस्तुत किया है कि जिस तरह यहाँ कर्ता या कर्मके बिना करिया-पदोंका अन्वय सम्भव न होनेसे अविनाभाव द्वारा उन पदों या उनके अ्थोंका अध्याहार या आक्षेप किया जाता है उसी प्रकार 'गौरनुबन्ध्यः' आदि उदाहरणोंमें व्यक्तिके बिना जाति नहीं रह सकती है इसलिए अविनाभाव द्वारा जातिसे व्यक्तिका अध्याहार या आक्षेप किया जाता है। व्यक्तिका बोध लक्षणासे नहीं होता है। अतः इसको उपादान-लक्षणाके उदाहरणरूपमें प्रस्तुत करना उचित नहीं है।
मुकुलभट्टका दूसरा उदाहरण, उसका खण्डन मुकुलभट्टने इसी प्रकार 'उपादानलक्षणा' का दूसरा उदाहरण 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुङक्ते' यह दिया है। इस उदाहरणमें विशेषता यह है कि यह 'पद-लक्षणा' के बजाय 'वाक्यलक्षणा' का उदाहरण है। मीमांसक लोग 'अर्थवाद' वाक्योंकी 'प्राशस्त्य' में लक्षणा मानकर वाक्यमें भी लक्षणा स्वीकार करते हैं। 'गौरनुबन्ध्यः' इस उदाहरणमें गौपदमें लक्षणा थी तो यहाँ पूरे वाक्यमें लक्षणा है, इस दृष्टिसे यह उदाहरण दिया गया है। इस उदाहरणमें लक्षणाका खण्डन करते हुए ग्रन्थकारने रात्रिभोजनको 'श्रुतार्थापत्ति अथवा अर्थार्थापत्ति' का विषय बतलाया है। अर्थात् यहाँ रात्रि-भोजनका ज्ञान लक्षणासे नहीं, अपितु अरथापत्तिप्रमाणसे होता है इसलिए यह भी उपादान-लक्षणाका उदाहरण नहीं हो सकता है। वह ग्रन्थकारका अभिप्राय है।
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का० १०, सू० १३] द्वितीय उल्लास: ५७ 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुङक्ते' इत्यत्र च रात्रिभोजनं न लक्ष्यते, श्रुतार्थापत्तेरर्था- र्थापत्तेर्वा तस्य विषयत्वात् । 'गङ्गायां घोषः' इत्यत्र तटस्य घोषाधिकरणत्वसिद्धये गङ्गाशब्दः स्वार्थम्पयति इत्येवमादौ लक्षणेनैषा लक्षणा। उभयरूपा चेयं शुद्धा, उपचारेणामिश्रितत्वात्। अर्थापत्ति लक्षणा नहों मीमांसक लोग प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाणोंके समान अर्थापत्तिको भी अलग प्रमाण मानते हैं और उसका लक्षण "अनुपपद्यमानार्थदर्शनात् तदुपपादकीभूतार्थान्तरकल्पनम् अर्थापत्तिः" इस प्रकार करते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि किसी अनुपपद्यमान अर्थको देखकर उसके उपपादक अर्थकी कल्पना जिस प्रमाणके द्वारा की जाती है उसको 'अर्थापत्ति' कहते हैं। जैसे 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुङक्ते' यहाँ 'देवदत्त मोटा है' यह अनुपपद्यमान अर्थ है और 'रात्रिभोजन' उसका उपपादकीभूत अर्थ है। यदि देवदत्त दिनमें न खाय और रात्रिमें भी न खाय तो वह मोटा नहीं हो सकता है। दिनमें न खानेवाला व्यक्ति रात्रिभोजनके बिना पीन नहीं हो सकता। इसलिए यहाँ अनुपपद्यमान अर्थ दिवा अभुञ्जानके पीनत्वको देखकर उसके उपपादक रात्रिभोजनकी कल्पना अर्थापत्तिके द्वारा होती है। यह अर्थापत्ति दो प्रकारकी होती है-एक दृष्टार्थापत्ति और दूसरी श्रुतार्थापत्ति। जहाँ अनुपपद्यमान अर्थको स्वयं आँखोंसे देखकर उसके उपपादक अर्थकी कल्पना की जाती है वह दृष्टार्थापत्ति कहलाती है और जहाँ किसी अन्यके मुखके अनुपपद्यमान अर्थको सुनकर उसके उपपादक अर्थकी कल्पना की जाती है वह श्रुतार्थापत्ति कहलाती है। 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुङक्ते' यही दोनों प्रकारकी अर्थापत्तियोंका उदाहरण बन सकता है। यहाँ ग्रन्थकारने दृष्टार्थापत्तिके स्थानपर अर्थार्थापत्ति शब्दका प्रयोग किया है। यह प्रयोग पूर्वोक्त अर्थाध्याहारवादकी दृष्टिसे किया गया है। श्रुतार्थापत्ति-पक्षमें यहाँ रात्रिभोजनका ज्ञान "रात्रौ भुङक्ते" इस शब्दके अध्याहारसे होता है और अर्थार्थापत्ति-पक्षमें शब्दका अध्याहार न करके साक्षात् रात्रिभोजनरूप अरथका आक्षेपसे ज्ञान होता है। इस प्रकार इन दोनों मीमांसक-सिद्धान्तोंकी दृष्टिसे ही यहाँ ग्रन्थकारने श्रुतार्थापत्ति तथा अर्थार्थापत्ति शब्दोंका प्रयोग किया है। और 'देवदत्त मोटा हो रहा है परन्तु दिनमें नहीं खाता है, यहाँ रात्रि-भोजन लक्षणासे उपस्थित नहीं होता है। क्योंकि वह श्रुतार्थापत्ति अथवा अर्थार्थापत्तिसे सिद्ध होता है। लक्षण-लक्षणाका उदाहरण इस प्रकार मुकुलभट्ट द्वारा प्रस्तुत किये गये उपादान-लक्षणाके दोनों उदाहरणोंका खण्डन ग्रन्थकारने यहाँतक कर दिया है। अपने मतके अनुसार उपादान-लक्षणाके 'कुन्ताः प्रविशन्ति' आदि उदाहरण वे पहले ही दे चुके हैं। इसलिए अब क्रमप्राप्त 'लक्षण-लक्षणा'का 'गङ्गायां घोषः' यह उदाहरण देते हैं। 'लक्षण-लक्षणा'का यही उदाहरण मुकुलभट्टने भी दिया है। 'गङ्गायां घोषः' इसमें [वाक्यके भीतर प्रयुक्त हुए ] घोषके अधिकरणत्वकी सिद्धिके लिए 'गङ्गा' शब्द अपने [ जलप्रवाहरूप मुख्य ] अर्थका परित्याग कर देता है, इसलिए इस प्रकारके उदाहरणोंमें यह 'लक्षण-लक्षणा' होती है। यह दोनों प्रकारकी [लक्षणा ] उपचारसे मिश्रित न होनेके कारण शुद्धा है।
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५८ काव्यप्रकाश: [का० १०, सू० १३
'गङ्गायां घोष:' उदाहरणका विश्लेषण लक्षण-लक्षणाका दूसरा नाम, जो वेदान्त-शास्त्रमें मुख्यतः प्रयुक्त होता है, 'जहत्स्वार्था-लक्षणा' भी है। 'जहत्स्वार्था' तथा 'लक्षण-लक्षणा' दोनों ही नामोंका अभिप्नाय यह है कि यहाँ लक्षक पद दूसरे पदोंके अन्वयकी सिद्धिके लिए अपने मुख्यार्थका परित्याग कर देता है। यह 'जहत्स्वार्था' या लक्षण- लक्षणाके अनेक उदाहरणोंमें 'गङ्गायां घोषः' यह उदाहरण बहुत प्रसिद्ध है। मुकुलभट्टने भी यह उदाहरण दिया है और 'काव्यप्रकाश' की अपेक्षा अधिक पिस्तारसे कई बार उन्होंने इस उदाहरणके अर्थका विवेचन किया है। इस उदाहरणमें 'लक्षण-लक्षणा'के लक्षणका समन्वय करते हुए उन्होंने लिखा है- "यत्र तु पूर्वोदितोपादानरूपविपर्याससंश्रयात् न स्वार्थसिद्धयर्थतया अर्थान्तरस्याक्षेपः अपितु अर्थान्तरसिद्धयर्थत्वेन स्वसमर्पणम्, तत्र लक्षणम्, यथा पूर्वमुदाहृतं 'गङ्गायां घोषः' इति। अत्न हि तटस्य घोषाधारतया धारणत्रियान्वितस्य गङ्गाशब्देन स्वसमर्पणं करियते। अतो अर्थान्तरभूतं तटमवगमयितुँ गङ्गाशब्देन स्ववाच्यभूतः स्रोतोविशेषोऽत्र समर्प्यते, इति अर्थान्तरसिद्धचर्थत्वेन स्वस- मर्पणम् । एवं चात्र पूर्वोदितोपादनरूपविपर्यासाल्लक्षणत्वम्।" (पृ० ७) क इसका यह अभिप्राय हुआ कि तटके घोषका आधार होनेके कारण उस अर्थान्तर तटके अन्वयकी सिद्धिके लिए गङ्गाशब्द अपने अर्थको छोड़ देता है और तटका लक्षणसे बोध कराता है। अतः यहाँ लक्षण-लक्षणा है। इंसीका अनुवाद काव्यप्रकाशकारने 'तटस्य घोषाधिकरणत्वसिद्धये गङ्गाशब्दः स्वार्थमर्पयति' इन शब्दोंमें कर दिया है।
परन्तु इस उदाहरणमें यह बात स्पष्ट नहीं हो पाती है कि लक्षणा करनेके बाद यहाँ केवल 'तटे घोषः' इतना ही अर्थ प्रतीत होता है अथवा गङ्गा अर्थका सम्बन्ध भी तटके साथ जुड़ा रहता है और 'गङ्गातटे घोष:' यह अरपर्थथ प्रतीत होता है। मुकुलभट्टने आगे चलकर 'तटस्थे लक्षणा शुद्धा' इत्यादि पञ्चम कारिकाकी व्याख्यामें इस प्रश्नपर कुछ प्रकाश डाला है। उन्होंने लिखा है- "गङ्गायां घोषः' इत्यत्र घोषाधिकरणभूततटोपलक्षणाभिसन्धानेन गङ्गायां घोषो न वितस्ता- यामिति गङ्गाशब्दे प्रयुज्यमाने तटस्य स्रोतोविशेषणोपलक्षकत्वमात्रोपयुक्तत्वेन उपरागो न प्रतीयते। तटस्थत्वेनैव तस्य तटस्य प्रत्ययात्।" (पृ० ६) इसका अभिप्राय यह हुआ कि गङ्गा शब्दसे जो तटरूप अर्थ उपस्थित होता है वह केवल तटरूपसे उपस्थित होता है। गङ्गासे उपरक्त या सम्बद्ध तटके रूपमें उपस्थित नहीं होता है। गङ्गा शब्दके प्रयोगसे केवल इतनी विशेषता हो जाती है कि वितस्ता नदीका तट नहीं उपस्थित होता है। मुकुलभट्टका यह सिद्धान्त 'ताटस्थ्य-सिद्धान्त' है। मम्मटाचार्य अभी इसका खण्डन करेंगे। प्रकृतमें इस व्याख्यासे जो शंका उपस्थित हुई थी उसका कुछ परोक्ष-सा समाधान तो होता है कि गङ्गा शब्द अपने मुख्यार्थको बिलकुल छोड़ देता है। परन्तु यह समाधान कुछ शाब्दिक-सा समाधान ही प्रतीत होता है; क्योंकि वह तट वितस्ता (झेलम) नदीका नहीं, गङ्गा नदीका ही है। इस रूपमें भी गङ्गारूप लक्षक पदका तटरूप लक्ष्यार्थके साथ सम्बन्ध प्रतीत होता ही है। तब यह पद जहत्स्वार्था या 'लक्षण- लक्षणा'का उदाहरण कैसे हो सकता है यह एक समस्या बनी ही रहती है। न्यायमें लक्षण-लक्षणाका उदाहरण न्यायके ग्रन्थोंमें परम्परा-सम्बन्धसे होनेवाली लक्षणाको लक्षण-लक्षणा कहा गया है और उसका उदाहरण 'द्विरेफः' यह दिया गया है। 'द्विरेफ' पदका वाच्यार्थ दो रेफसे युक्त 'भ्रमर' पद होता है। 'भौंरा' अर्थ उससे 'लक्षण-लक्षणा' द्वारा बोधित होता है।
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का० १०, सू० १३] द्वितीय उल्लास:
लक्षण-लक्षणाका अधिक स्पष्ट उदाहरण AV मुकुलभट्टके मतमें तो फिर भी कुछ समाधान-सा हो सकता है परन्तु काव्यप्रकाशकारके मतमें उतना भी आधार नहीं मिलता, क्योंकि उन्होंने आगे मुकुलभट्टके इस सिद्धान्तका खण्डन करके 'गङ्गात्वेन' या गङ्गाके साथ अभेदसम्बन्धसे ही तटकी उपस्थिति मानी है। उस अवस्थामें गङ्गा शब्द अपने अर्थको छोड़कर केवल तटका बोध कराता है, यह बात और भी दुरूह-सी हो जाती है और साधारण विद्यार्थीकी बुद्धिमें नहीं बैठती है। इसलिए इस प्रकारका कोई दूसरा उदाहरण ऐसा होना चाहिये जिसमें यह स्पष्ट- रूपसे प्रतीत हो सके कि यहाँ शब्द अपने मुख्यार्थको छोड़कर केवल लक्ष्यार्थका ही बोध करा रहा है। काव्यप्रकाशकारने आगे चतुर्थ उल्लासके आरम्भमें सू० २६ में लक्षणामूल ध्वनिके 'अत्यन्ततिरस्कृत- वाच्य' नामक भेदका जो उदाहरण दिया है वह इस दृष्टिसे 'लक्षण-लक्षणा' या 'जहत्स्वार्था लक्षणा'का बहुत सुन्दर उदाहरण हो सकता है। वह उदाहरण निम्नलिखित प्रकार है- "उपकृतं बहु तत्र किमुच्यते सुजनता प्रथिता भवता परम्। विदधदीदृशमेव सदा सखे सुखितमास्स्व ततः शरदां शतम् ।' किसी अत्यन्त अपकार करनेवाले व्यक्तिके प्रति उसके अपकारसे पीड़ित व्यक्तिकी यह उक्ति है। इसमें 'आपने बड़ा उपकार किया' यह 'उपकृतम्' शब्दका मुख्यार्थ बाधित होता है। इसलिए उपकृत शब्द अपने अर्थको छोड़कर 'अपकृतम्' अर्थको 'लक्षण-लक्षणा' या 'जहत्स्वार्था लक्षणा' से बोधित करता है। इसी प्रकार 'सुजनता', 'सखे', 'सुखितमास्स्व' आदि शब्द भी अपने अथोंको छोड़कर अपनेसे विपरीत 'दुर्जनता', 'शत्रो', 'सद्यः त्रियस्व' आदि अथोंको लक्षणासे बोधित करते हैं और अपकारातिशय व्यङ्गय होता है। इस प्रकार 'लक्षण-लक्षणा' या 'जहत्स्वार्था-लक्षणा' का यह उदाहरण बिलकुल स्पष्ट है। 'गङ्गायां घोषः' यह उदाहरण उतना स्पष्ट नहीं है। शुद्धा तथा गौणी लक्षणाविषयक मम्मटमत इस प्रकार उपादान-लक्षणा तथा लक्षण-लक्षणाके नामरो जो दो प्रकारकी लक्षणा दिखलायी गयी है इसे मम्मट तथा मुकुलभट्ट दोनोंने शुद्धा लक्षणा माना है। शुद्धासे भिन्न लक्षणाका दूसरा भेद गौणी- लक्षणा नामसे कहा जाता है। इन शुद्धा तथा गौणी-लक्षणाओंका परस्पर-भेदक धर्म क्या है इसके विषयमें भी मुकुलभट्ट तथा मम्मटका मतभेद है। जैसा कि ऊपरकी मूल-ग्रन्थकी पंक्तिसे प्रतीत होता है, मम्मटाचार्य 'उपचार' को शुद्धा' तथा 'गौणी' का भेदक धर्म मानते हैं। 'उभयरूपा चेयं शुद्धा, उपचारेण अमिश्रितत्वात्' इस पंक्तिसे विदित होता है कि मम्मटके मतमें उपचारसे रहित लक्षणा 'शुद्धा' तथा उपचारसे युक्त लृक्षणा 'गौणी' कही जाती है। उपचारका लक्षण 'उपचारो हि नाम अत्यन्तं विशकलितयोः पदार्थयोः सादृश्यातिशयमहिम्ना भेदप्रतीतिस्थगनमात्रम्' यह किया गया है। इसका अभिप्राय यह है कि अत्यन्त भिन्न दो पदार्थोंमें अतिशय सादृश्यके कारण उनके भेदकी प्रतीतिका न होना उपचार' कहलाता है। जैसे किसी पुरुष या बालकमें शौर्य, कौर्य आदिके सादृश्यातिशयके कारण 'सिंहो माणवकेः' 'यह बच्चा शेर है' आदि प्रयोग उपचार-मूलक होते हैं; इसलिए गौण प्रयोग कहे जाते हैं। इन सबमें गौणी लक्षणा होती है और जहाँ सादृश्यसम्बन्धके अतिरिक्त सामीप्य आदिरूप कोई अन्य सम्बन्ध लक्षणाका प्रयोजक होता है वहाँ शुद्धालक्षणा होती है। इस प्रकार मम्मटाचार्यने उपचारके अमिश्रण तथा मिश्रणको शुद्धा तथा गौणी लक्षणाका भेदक धर्म माना है। १. 'सुभाषितावली' में यह पद्य रविगुप्तके नामसे दिया गया है।
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६० काव्यप्रकाश: [का० १०, सू० १३ शुद्धा तथा गौणीविषयक मुकुलभट्टका मत परन्तु मुकुलभट्टका मत इससे भिन्न है। वे 'उपचार'को 'शुद्धा' तथा 'गौणी' का भेदक धम नहीं मानते हैं। उनके मतमें उपचारका मिश्रण शुद्धामें भी होता है और गौणीमें भी। इसलिए उन्होंने 'शुद्धोपचार' तथा 'गौणोपचार' भेदसे उपचारमिश्रा लक्षणाके दो भेद करके फिर उनके 'सारोपा' तथा 'साध्यवसाना' दो भेद किये हैं। इस प्रकार उपचारमिश्रा-लक्षणाके चार भेद तथा शुद्धा-लक्षणाके उपादान-लक्षणा एवं लक्षण-लक्षणा दो भेद कुल मिलाकर लक्षणाके छह भेद किये हैं। *द्विविध उपचारः शुद्धो गौणश्च। तत्र शुद्धो यत्र मूलभूतस्योपमानोपमेयभावस्याभावेनोपमान- गतगुणसदृशगुणयोगलक्षणासम्भवात् कार्यकारणभावादिसम्बन्धाल्लक्षणया वस्त्वन्तरे वस्त्वन्तरमुप- चर्यते। यथा 'आयुर्घृतम्' इति। अ्रत्र ह्यायुषः कारणे घृते तद्गतकार्यकारणभावलक्षणापूर्वकत्वेना- युष्ट्वकार्यं तच्छव्दश्चेत्युभयमुपचरितम्। तस्माच्छुद्धोऽयमुपचारः। गौण: पुनरुपचारो यत्र मूलभूतोपमानोपमेयभावसमाश्रयेणोपमानगत-गुणसदृशगुणयोगलक्षणां पुरःसरीकृत्योपमेये उपमानशब्दस्तदर्थश्चाध्यारोप्यते। स हि गुणेभ्य आगतत्वाद् गौणशब्देनाभिधीयते। यथा 'गौर्वाहीकः' इति। अत् हि गोगतजाडय-मान्द्यादिगुणसदृशजाडयमान्द्यादियोगाद् वाहीके गोशब्दगोत्वयोरुपचारः । केचित्तु उपचारे शब्दोपचारमेव मन्यन्ते नार्थोपचारम्। तदयुक्तम्, शब्दोपचारस्यार्थोपचारा- विनाभावित्वात् । एवमयमुपचार: शुद्ध-गौणभेदेन द्विविधोऽभिहितः ।' इस प्रकार मुकुलभट्टने उपचारके शुद्धोपचार तथा गौणोपचार रूपसे दो भेद किये हैं। उनके यहाँ उपचारका अर्थ अन्यके लिए अन्य शब्दका प्रयोग है। जहाँ अन्यके लिए अन्यके वाचक शब्दका प्रयोग सादृश्यके कारण होता है वहाँ 'गौण उपचार, होता है और जहाँ सादृश्यसे भिन्न कार्यकारणभाव आदिके कारण अन्यके लिए अ्न्य शब्दका प्रयोग होता है वहाँ 'शुद्धोपचार' होता है। जैसे 'आयुर्घृतम्' इस उदाहरणमें आयुके कारणभूत घृतके लिए आयु शब्दका प्रयोग किया गया है यह शुद्धोपचारका उदाहरण है। 'और 'गौर्वाहीकः में वाहीकदेशवासी पुरुषमें गौके सदृश जाडय, मान्द्य आदि गुणोंका योग होनेसे गौशब्दका प्रयोग किया गया है। यह वाहीकके लिए गौशब्दका प्रयोग गुणोंके सादृश्यके कारण होनेसे 'गौण' उपचार कहलाता है। इस प्रकार उपचारके भी शुद्ध और गौण रूप होनेसे उपचारको शुद्धा तथा गौणीका भेदक नहीं माना जा सकता है। इसलिए मुकुलभट्टने उपचारके स्थानपर 'ताटस्थ्य' अर्थात् लक्ष्यार्थ तथा लक्षकार्थके भेदको शुद्धा तथा गौणीका भेदक धर्म माना है। अर्थात् मुकुलभट्टके मतानुसार गौणी-लक्षणामें सादृश्यातिशयके कारण लक्ष्य तथा लक्षकका अभेद प्रतीत होता है, जैसे 'गौर्वाहीकः' में गौ तथा वाहीक अरथोंका अभेद प्रतीत होता है। तभी उन दोनों पदोंका समानाधिकरण-प्रयोग किया जाता है। परन्तु शुद्धालक्षणामें अर्थात् उपादान-लक्षणा तथा लक्षण-लक्षणामें लक्ष्य तथा लक्षकका अभेद नहीं, अपितु भेद या 'ताटस्थ्य' होता है। उपादान-लक्षणाके 'कुन्ताः प्रविशन्ति' और लक्षण-लक्षणाके 'गङ्गायां घोषः' इन दोनों उदाह रणोंमें लक्ष्य तथा लक्षक अरथोंका अ्भेद नहीं, अपितु भेदरूप 'ताटस्थ्य' प्रतीत होता, है। इसलिए मुकुलभट्टके सिद्धान्तमें-'तटस्थे लक्षणा शुद्धा'-शुद्धा लक्षणा तटस्थमें होती है। शुद्धा-लक्षणामें लक्ष्य और लक्षक अरथोंका 'ताटस्थ्य' अर्थात् भेद प्रतीत होता है और गौणी लक्षणामें लक्ष्य-लक्षक अरथोंका अभेद प्रतीत होता है। यह इन दोनोंका भेद है। १. 'अभिधावृत्तिमातृका', पृष्ठ ७-८।
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का० ११, सू० १४-१५] द्वितीय उल्लास: ६१ अनयोर्लक्ष्यस्य लक्षकस्य च न भेदरूपं ताटस्थ्यम् । तटादीनां हि गङ्गादिशब्दः प्रतिपादने तत्त्वप्रतिपत्तौ हि प्रतिपिपादयिषितप्रयोजनसम्प्रत्ययः । गङ्गासम्बन्धमात्र- प्रतीतौ तु 'गङ्गातटे घोषः' इति मुख्यशब्दाभिधानाल्लक्षणायाः को भेदः । [सू० १४ ] सारोपान्या तु यत्रोक्तौ विषयी विषयस्तथा । आरोप्यमाण: आरोपविषयश्च यत्रानप ह्वतभेदौ सामानाधिकरण्येज निर्दिश्येते सा लक्षणा सारोपा। निहर विश्ातीक। [सू० १५ ] विषय्यन्तःकृतेऽन्यस्मिन् सा स्यात् साध्यवसानिका ।११।। विषयिणारोप्यमाणेनान्तःकृर्त्ने निगीर्णे अन्यस्मिन्नारोपविषये सति साध्यवसाना स्यात् ।
मुकुलभट्टके 'ताटस्थ्य'-सिद्धान्तका निराकरण परन्तु मम्मटाचार्य इससे सहमत नहीं हैं। इसलिए अगले अनुच्छेदमें उन्होंने मुकुलभट्टके इस सिद्धान्तका खण्डन करते हुए लिखा है कि- [शुद्धा-लक्षणाके उपादान-लक्षणा तथा लक्षण-लक्षणा ] इन दोनों भेदोंमें लक्ष्य [अर्थ ] और लक्षक [अर्थ] का [अर्थात् गङ्गाके जल-प्रवाहरूप लक्षक अर्थ तथा तीररूप लक्ष्यार्थका ] भेद-प्रतीतिरूप 'ताटस्थ्य' नहीं [माना जा सकता] है। [क्योंकि लक्ष्यरूप ] तट आदि [अर्थो] के गङ्गा आदि शब्दोंसे प्रतिपादन करनेमें [तत्त्व अर्थात् गङ्गात्वकी अथवा लक्ष्य तथा लक्षक, तीर तथा जलप्रवाहके ] अभेदकी प्रतीति होनेपर ही [शंत्य-पावनत्वादि धर्मोंके अतिशयरूप ] अभीष्ट प्रयोजनोंकी प्रतीति हो सकती है। [यदि तटमें तत्त्व अर्थात् गङ्गात्व अथवा गङ्गाशब्दके मुख्यार्थ जलप्रवाहके साथ अभेदकी प्रतीति न होकर] केवल गङ्गाका सम्बन्धमात्र प्रतीत होनेपर[ 'गङ्गायां घोषः' इस लाक्षणिक शब्दके स्थानपर 'गङ्गातटे घोष:'] 'गङ्गाके किनारे घोष है, इस मुख्य शबदसे कथन करनेसे लक्षणाका क्या भेद होगा। शुद्धा तथा गौणी लक्षणाके दो-दो भेद इस प्रकार शुद्धाके उपादान-लक्षणा तथा लक्षण-लक्षणा इन दो भेदोंके करनेके बाद अब ग्रन्थकार शुद्धा और गौणी दोनों लक्षणाके सारोपा तथा साध्यवसाना ये दो-दो भेद करके चार भेद दिखलायेंगे और उन चारोंके साथ आदिके उपादान-लक्षणा तथा लक्षण-लक्षणा इन दोनों भेदोंको जोड़कर लक्षणाके कुल छह भेद सिद्ध करेंगे । पहिले सारोपा तथा साध्यवसाना ये दो भेद करते हैं- [सू० १४]-जहाँ आरोप्यमाण [उपमान ] तथा आरोपविषय [उपमेय ] दोनों शब्दतः कथित होते हैं वह दूसरी [गौणी ] सारोपा लक्षणा होती है। आरोप्यमाण [उपमान ] तथा आरोप-विषय [उपमेय] जहाँ दोनों, स्वरूपका अपह्लव किये बिना, [शब्दतः ] सामानाधिकरण्यसे निर्दिष्ट किये जाते हैं वह सारोपा लक्षणा होती है। [सू० १५]-और विषयी [अर्थात् आरोप्यमाण, उपमान ] के द्वारा दूसरे [ अर्थात् आरोप- विषयरूप उपमेय] का [अपने भीतर] अन्तर्भाव कर लिये जानेपर वह साध्यवसानिका लक्षणा हो जाती है।। ११। विषयी अर्थात् आरोप्यमाण [उपमान ] के द्वारा अन्य अर्थात् आरोपके विषय [उपमेय ] के निगीर्ण कर लिये जानेपर साध्यवसाना लक्षणा होती है।
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६२ काव्यप्रकाश: Lका० १२, सू० १६
[सू० १६ ] भेदाविमौ च सादृश्यात् सम्बन्धान्तरतस्तथा । गौणौ शुद्धौ च विज्ञेयौ। इमौ आरोपाध्यवसानरूपौ सादृश्यहेतू भेदौ 'गौर्वाहीकः' इत्यत्र 'गौरयम्' इत्यत्र च। अत्र हि स्वार्थसहचारिणो गुणा जाडयमान्द्यादयो लक्ष्यमाणा अपि गो-शब्दस्य परार्थाभिधाने प्रवृत्तिनिमित्तत्वमुपयान्ति इति केचित् । सारोपा तथा साध्यवसानाके शुद्धा और गौणी दो भेद [सू० १६]-ये [सारोपा तथा साध्यवसानारूप ] दोनों भेद सादश्यसे तथा [सादृश्यको छोड़कर ] अन्य सम्बन्धसे [सम्पन्न ] होनेपर [कमशः ] गौण तथा शुद्ध [लक्षणाके ] भेद समझने चाहिये। गौणी सारोपा तथा साध्यवसानाके उदाहरण ये सारोपा तथा साध्यवसानारूप भेदसादश्य-हेतुक होनेपर 'गौर्वाहीकः' 'वाहीक देशका वासी पुरुष गौ है' और 'यह गौ है' इनमें हैं। [और सादृश्यमूलक होनेसे वे गौणी लक्षणाके भेद कहलाते हैं]। यहाँ ग्रन्थकारने 'गौर्वाहीकः' सारोपा लक्षणाके और 'गौरयम्' साध्यवसाना लक्षणाके उदाहरण- रूपमें प्रस्तुत किया है। लक्षणाके अन्य उदाहरणोंके समान ये दोनों भी ग्रन्थकारने 'पुंयोगादाख्यायाम्' सूत्रके महाभाष्यमेंसे उद्धृत किये हैं। वाहीक किसी देशका नाम था। ऐसा जान पड़ता है, भारतकी उत्तरी सीमाके परे 'अपगान-स्थान' अफगानिस्तान आदि देश उन दिनों वाहीक नामसे व्यवहृत होते थे। अन्य लोग 'बहिर्भवो वाहीकः' व्युत्पत्तिके आधारपर शास्त्रीय आचारका पालन न करनेवालेको 'वाहीक' कहते हैं। 'वहिषष्टिलोपो यच्च' 'ईकक् च' इन दो वार्तिकोंके द्वारा बहिः शब्दके टि-भागका लोप और ईकक्-प्रत्यय करके 'बवयोरभेदःके सिद्धान्तके अनुसार ब-वका अभेद मानकर 'वाहीक' शब्द सिद्ध होता है। इसलिए उसकी दोनों प्रकारकी व्याख्या की जा सकती है। यहाँ गौ आरोप्यमाण [उपमान] और वाहीक आरोपविषय [उपमेय] है। दोनोंका सामानाधिकरण्यसे शब्दतः प्रतिपादन इस वाक्यमें है। इसलिए दोनोंके स्वरूपके अनपहनुत होनेके कारण यह सारोपा लक्षणाका उदाहरण है। इसके विपरीत 'गौरयम्' में आरोपविषय वाहीकका शब्दतः उपादान नहीं है, वह आरोप्यमाण गौके द्वारा निगीर्ण हो गया है। इसलिए वह साध्यवसाना लक्षणाका उदाहरण है। सादृश्यमूलक होनेके कारण दोनों गौणी लक्षणाके उदाहरण हैं। 'गौरयम्'में 'अयम्' पदसे आरोपविषयका संकेत मिल जानेसे वह साध्यवसानाका ठीक उदाहरण नहीं बनता है। उसके स्थानपर 'गौर्जल्पति' उदाहरण अधिक अच्छा है। गौणी साध्यवसानाविषयक तीन मत 'गौर्जल्पति' आदि गौणी साध्यवसानाके उदाहरणोंमें लक्षणा-वृत्तिसे बोध्य-लक्ष्य-अर्थ क्या है इस विषयमें मम्मटने तीन पक्षोंको निम्नलिखितरूपमें प्रस्तुत किया है- १-यहाँ [ 'गौरयम्' आदि उदाहरणोंमें गो-शब्दके ] अपने अर्थके सहचारी जाडच, मान्द्यं [मूर्खता, आलस्य ] आदि गुण, लक्षणा द्वारा बोधित होकर भी, गो-शब्दके [द्वारा वाहीकरूप ] दूसरे अर्थको अभिधासे बोधित करनेमें प्रवृत्ति-निमित्त बन जाते हैं यह कोई [विवेचक] मानते हैं। १. 'अष्टाध्यायी' ४, १, ४८। २. 'अष्टाध्यायी' ४, १, ८५ पर वार्तिक ।
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का० १२, सू० १६] द्वितीय उल्लास: ६३
स्वार्थसहचारिगुणाभेदेन परार्थगता गुणा एव लक्ष्यन्ते न परार्थोडभिधीयत इत्यन्ये। साधारणगुणाश्रयत्वेन परार्थ एव लक्ष्यत इत्यपरे। २-[गो-शब्दके ] अपने अर्थके सहचारी [जाडय, मान्द आदि] गुणोंसे अभिन्न रूपमें वाहीक- गत गुण ही लक्षितहोते हैं [परन्तु वे वाहीक अर्थके अभिधया बोधन में प्रवृत्ति-निमित्त नहीं होते हैं] यह अन्य मानते हैं। ३ -- [गौ तथा वाहीक दोनोंके ] समान गुणोंके आश्रयरूपसे वाहीक अर्थ ही लक्षणासे उपस्थित होता है यह अन्य लोग [मुकुलभट्ट और मीमांसक] मानते हैं। 'स्वीयाः' व्याख्याका विवेचन यहाँ ग्रन्थकारने तीन मतोंका उल्लेख किया है। परन्तु वें किन-किन आचार्यों या सम्प्रदायोंके मत है इसका कोई निर्देश नहीं किया है और इन मतोंकी खण्डन-मण्डनात्मक अपनी कोई टिप्पणी भी नहीं दी है। परन्तु उनके टीकाकारोंने अन्तिम मतको उनका अपना मत कहा है। अन्तिम मतके साथ ग्रन्थकारने 'इत्यपरे' इस पदका प्रयोग किया है। टीकाकारोंने इस 'अपरे' पदका 'न परे इति अपरे' इस प्रकारका समास करके उसका अर्थ 'स्वीयाः' किया है। इस प्रकार इस मतको 'स्वीय' अर्थात् अपने लोगोंका मत टीकाकारोंने बतलाया है। परन्तु यह व्याख्या उचित प्रतीत नहीं होती है। जैसा पहिले कहा जा चुका है, मम्मट तथा अन्य साहित्यशास्त्रियोंने अधिकांश दार्शनिक सिद्धान्त व्याकरणशास्त्रसे ही लिये हैं। इसलिए उनके 'स्वीय' वैयाकरण ही हो सकते हैं। पर काव्यप्रकाशकारने इस अन्तिम मतके समर्थनके लिए आगे 'अभिधेयाविनाभूतप्रतीतिर्लक्षणोच्यते' आदि जो कारिका उद्धृत की है वह कुमारिलभट्टकी अर्थात् मीमांसकोंकी कारिका है। उसके यहाँ उद्धृत करनेसे यह स्पष्ट है कि यह मत मीमांसकोंका है। 'अपरे' पदकी 'स्वीयाः' व्याख्या करनेवालोंने 'स्वोक्तेऽर्थे पूर्वमीमांसकसम्मतिमाह' लिखकर इस मतका समर्थन मीमांसक-मतके द्वारा कराया है। परन्तु जब मम्मट अन्य जगह वैयाकरणोंके सिद्धान्तका अनुसरण करते रहे हैं तो यहाँ उसको छोड़कर मीमांसक-मतका अनुसरण क्यों कर रहे हैं इस बातकी सङ्गति नहीं लगती है। इसलिए 'अपरे'की 'स्वीयाः' व्याख्या करना ठीक नहीं जँचता है। अतः अन्तिम मतको मीमांसकोंका मत मानना चाहिये। मम्मटने अपने शक्तिविवेचनके प्रकरणमें मुकुलभट्टकी 'अभिधावृत्तिमातृका' का बहुत अधिक उपयोग किया है। उन्होंने पहिले मुकुलभट्टकी 'अभिधावृत्तिमातृका'का खण्डन करनेके लिए 'शब्द- व्यापारविचार' नामक अपने एक छोटेसे प्रकरण-ग्रन्थकी रचना की थी जिसमें मुकुलभट्टके मतसे जिन अंशोंमें वे सहमत नहीं थे उनका खण्डन किया था। शेष जिन अंशोंमें उनका मतभेद नहीं था उनका मुकुलभट्टके आधारपर अपने ग्रन्थमें विवेचन कर दिया था। 'काव्यप्रकाश' में यह जो शक्तियोंके विवेचन- का प्रकरण चल रहा है वह सब मम्मटके उसी 'शब्दव्यापारविचार' के आधारपर लिया गया है। अधिकांश पंक्तियाँ ज्यों की त्यों 'शब्दव्यापारविचार' से उद्धृत कर दी गयी हैं। इसलिए लक्षणाके इस विवेचनमें भी 'काव्यप्रकाश'पर मुकुलभट्टकी छाया पड़ी है। ऊपर उपादानलक्षणाक मुकुलभट्ट द्वारा दिये गये दो उदाहरणोंका ग्रन्थकारने जो खण्डन किया है उससे भी यह प्रमाणित होता है कि इस प्रकरणके लिखते समय मुकुलभट्टका ग्रन्थ उनकी दृष्टिमें था और उसकी छाया उनके इस विवेचनपर भी पड़ रही है। इसलिए यद्यपि उन्होंने यहाँ मुकुलभट्टका न नाम लिया है और न ठीक उनके शब्दोंमें उनके मतको उपस्थित किया है फिर भी यह उनके मतका ही उल्लेख प्रतीत होता है। परन्तु यहाँ मम्मटने उनके मतको अपना लिया है। अतः वह उनका भी मत बन गया है।
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६४ काव्यप्रकाश: [का० १२, सू० १६
मुकुलभट्टने इस विषयकी विवेचना करते हुए लिखा है। अत् हि गोगतजाडयमान्द्यादिसदृशजाडयमान्द्यादियोगाद्वाहीके गोशब्द-गोत्वयोरुपचारः । केचित्तु शब्दोपचारमेव मन्यन्ते नार्थोपचारम् । तदयुक्तम्। शब्दोपचारस्यार्थोपचाराविनाभावित्वात्'। इसका अर्थ यह हुआ कि गो-गत जाडय, मान्द्य आदि गुणोंके सदृश जाडय, मान्द् आदि गुण वाहीकमें भी पाये जाते हैं इसलिए वाहीकमें 'गोशब्द' तथा गो-शब्दके अर्थ 'गोत्व' दोनोंका उपचारसे प्रयोग होता है। कुछ लोग केवल गोशब्दका उपचार या आरोप वाहीकमें मानते हैं, उनका सिद्धान्त मुकुलभट्टकी दृष्टिमें उचित नहीं है; क्योंकि अर्थका आरोप किये बिना शब्दका आरोप नहीं किया जा सकता। इसलिए गोगत जाडय, मान्द्य आदि गुणोंके सदृश गुणोंका वाहीकमें योग होनेसे उसमें गो- शब्द तथा गो-अर्थ 'गोत्व' दोनोंका आरोप होता है। मुकुलभट्टकी इस पंक्ति तथा तीसरे मतका प्रतिपादन करनेवाली 'काव्यप्रकाश' की पंक्तिमें अ्त्यन्त समानता है। मुकुलभट्टके 'गोगतजाड्यमान्द्यादिसदृश-जाडयमान्द्यादियोगात' के स्थानपर मम्मटने 'साधारणगुणाश्रयत्वेन' पदका प्रयोग किया है और 'वाहीके गोशब्द-गोत्वयोरुपचारः'के स्थानपर 'परार्थ एव लक्ष्यते' इस वाक्यकी रचना की है। इन दोनों वाक्योंकी तुलना करनेपर यह स्पष्ट हो जाता है कि इस पंक्तिमें मम्मट अपनी संक्षेप लेखनशैलीमें मुकुलभट्टके मतका ही अनुवाद कर रहे हैं। जैसा कि 'गौरनुबन्ध्यः' तथा 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुङक्ते' इन उदाहरणोंके विवेचनके प्रसङ्गमें दिखलाया जा चुका है, मुकुलभट्टने अपने विषयके प्रतिपादनमें प्रायः मीमांसासे सहायता ली है। मम्मट आदिने जहाँ अपने विवेचनमें उदाहरण आदि वैयाकरणोंसे लिये हैं और उन्हींके मतको अपनाया है वहाँ मुकुलभट्टने अपने विवेचनमें प्रायः मीमांसकोंके सिद्धान्तों तथा उदाहरण आदिको अपनाया है। इस दृष्टिसे विचार किया जाय तो भी 'काव्यप्रकाश' में जो मीमांसकाभिमत मत दिया गया है वह मुकुलभट्टका ही मत होना चाहिये। उसकी सङ्गति भी मुकुलभट्टके विवेचनके साथ मिल जाती है। क्योंकि यही नहीं, अपित् गौण उपचारका निरूपण करते हुए मुकुलभट्टने जो लिखा है उसकी छाया भी 'काव्यप्रकाश'की इस पंक्तिपर स्पष्ट दिखलायी देती है। "गौणः पुनरुपचारो यत्र मूलभूतोपमानोपमेयभावसमाश्रयेणोपमानगतगुणसदृशगुणयोगलक्षणां पुरःसरीकृत्योपमेये उपमानशब्दस्तदर्थश्चाध्यारोप्यते। स हि गुणेभ्य आगतत्वाद् गौणशब्देनाभिधीयते। यथा 'गौर्वाहीकः' इति । इसमें दो बातें ध्यान देने योग्य हैं-एक तो 'सदृशगुणयोगलक्षणां पुरःसरीकृत्य' शब्दका प्रयोग और दूसरा 'गुणेभ्य आगतत्वाद् गौणी' इस व्युत्पत्तिका प्रदर्शन। मम्मटने तीसरे मतके प्रदर्शनमें 'साधारणगुणाश्रयत्वेन परार्थ एव लक्ष्यते' यह जो लिखा है उसका 'सदृशगुणयोगलक्षणां पुरःसरीकृत्य'के साथ अर्थसादृश्य पर्याप्त मात्रामें पाया जाता है। दूसरे इस मतके समर्थनमें जो कुमारिलभट्टकी कारिका मम्मटने उद्धृत की है उसके उत्तरार्द्ध 'लक्ष्यमाणगुणैर्योगाद् वृत्तेरिष्टा तु गौणता'के साथ मुकुलभट्टकी 'स हि गुणेभ्य आगतत्वाद् गौणशब्देनाभिधीयते' इस पंक्तिकी पूर्णतः सङ्गति लगती है इन सब कारणोंसे हमारे मतसे 'काव्यप्रकाश' में दिखलाया हुआ तीसरा मत मुकुलभट्टका मत है। और 'अपरे' की 'स्वीयाः' यह व्याख्या उचित नहीं है। इस विषयमें मुकुलभट्टका मत मम्मटको अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। इसलिए वे उसके समर्थनमें 'श्लोकवार्तिक' से अगली कारिका उद्धृत करते हैं- १-२. 'अभिधावृत्तिमातृका', पृष्ठ ७-८।
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का० १२, सू० १६ ] द्वितीय उल्लास: ६५ उक्तं चान्यत्र -- "अभिघेयाविनाभूत प्रतीतिर्लक्षणोच्यते। लक्ष्यमाणगुणैर्योगाद् वृत्तेरिष्टा तु गौणता ।।" इति। अविनाभावोऽत्र सम्बन्धमात्रं न तु नान्तरीयकत्वम्। तत्त्वे हि 'मञ्चाः करोशन्ति' इत्यादौ न लक्षणा स्यात्। अविनाभावे चाक्षेपेणैव सिद्धेर्लक्षणाया नोपयोग इत्युक्तम्। 'आयुर्घृतम्' 'आयुरेवेदम्' इत्यादौ च सादृश्यादन्यत् कार्यकारणभावादि सम्बन्धा- न्तरम्। एवमादौ च कार्यकारणभावादिलक्षणपूर्वे आरोपाध्यवसाने। दूसरी जगह (अर्थात् कुमारिलभट्टके 'श्लोकवार्तिक' नामक ग्रन्थमें) कहा भी है- 'मानान्तरविरुद्धे हि मुख्यार्थस्य परिग्रहे' यह इससे पहिला कारिका-भाग है। इसका अर्थ है कि 'मुख्यार्थके अन्य प्रमाणोंसे बाधित होनेपर'। इस अंशको मिलाकर ही कारिकाकों उद्धुत करना उचित था। क्योंकि उसके बिना अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाता है। उसको मिलाकर अरथ इस प्रकार होगा कि- [ मुख्यार्थका अन्य प्रमाणोंसे बाध होनेपर ] अभिधेय [मुख्यार्थ ] से सम्बद्ध [अविनाभूत ] अर्थकी प्रतीति [करानेवाली शक्ति ] 'लक्षणा' कहलाती है और लक्ष्यमाण [जाडय-मान्द् आदि ] गुणोंके [ वाहीकमें रहने रूप ] योगसे [इस लक्षणा ] वृत्तिकी गौणता हो जाती है [ अर्थात् 'गुणेभ्य आगतत्वाद् गौणी' लक्षणा कहलाती है ]। [कारिकामें प्रयुक्त ] 'अविनाभाव' शब्दसे यहाँ सम्बन्धमात्र समझना चाहिये, नान्तरीयकत्व अर्थात् व्याप्ति नहीं। क्योंकि व्याप्ति या नान्तरीयकत्व अर्थ लेनेपर [तत्त्वे] 'मचान पुकारते हैं' इत्यादिमें [मञ्च पदकी मञ्चस्थ पुरुषके अर्थमें ] लक्षणा नहीं होगी और अविनाभाव [व्याप्ति ] होनेपर तो आक्षेप [अनुमान ] से ही [लक्ष्यमाण अर्थके ] सिद्ध हो जानेसे लक्षणाकी आवश्यकता ही नहीं रहेगी। इस अन्तिम मतके उपपादनमें जो अन्य मतोंकी अपेक्षा अधिक रुचि मम्मटने दिखलायी है, इससे यह प्रतीत होता है कि इस मतमें उनको विशेष सार दिखलायी देता है। इसलिए इस विषयमें उन्होंने मुकुलभट्टके मतको अपना लिया है। अर्थात् मुकुलभट्टका मत उनका अपना मत कहा जा सकता है; यदि वे उससे सहमत न होते तो उसका खण्डन अवश्य करते। शुद्धा सारोपा-साध्यवसाना लक्षणाके उदाहरण इस प्रकार गौणी-सारोपा तथा साध्यवसाना लक्षणाके उदाहरण देनेके बाद शुद्धा-सारोपा तथा शुद्धा-साध्यवसाना लक्षणाके उदाहरण देते हैं। 'घी आयु है' अथवा 'यह [घी] आयु ही है' इत्यादिमें सादृश्यसे भिन्न कार्य-कारण-भाव आदि अन्य सम्बन्ध [लक्षणाके प्रयोजक ] हैं। इस प्रकारके उदाहरणोंमें कार्य-कारणभाव सम्बन्धपूर्वक आरोप तथा अध्यवसान होते हैं। [अर्थात् 'आयुर्घृतम्'में आरोप्यमाण आयु तथा आरोप-विषय घृत दोनोंके अनपह्नुत-स्वरूप अर्थात् शब्दतः उपात्त होनेसे शुद्धा-सारोपा तथा 'आयुरेवेदम्' में आरोप-विषय घृतके शब्दतः उपात्त न होने अर्थात् अपह्नुत-स्वरूप होनेसे साध्यवसाना-लक्षणा होती है ]। 'आयुरेवदम्'में 'इदं' सर्वनामसे आरोपविषयका संकेत हो ही जाता है। अतः वह 'साध्यव- साना' का ठीक उदाहरण नहीं बनता है। 'आयुः पिबामि' यह अधिक अच्छा उदाहरण है। ५
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६६ काव्यप्रकाश: [का० १२, सू० १७ अत्र गौणभेदयोर्भेदेऽपि ताद्रूप्यप्रतीतिः सर्वथैवाभेदावगमश्च प्रयोजनम्। शुद्धभेदयोस्त्वन्यवैलक्षण्येनाव्यभिचारेण च कार्यकारित्वादि। क्वचित् तादर्थ्यादुपचारः, यथा इन्द्रार्था स्थूणा 'इन्द्रः'। क्वचित् स्वस्वामि- भावात्; यथा राजकीयः पुरुषो 'राजा'। क्वचिदवयवावयविभावात्, यथा अग्रहस्त इत्यत्राग्रमात्रेऽवयवे 'हस्तः' । क्वचित् तात्कर्म्यात्, यथा अतक्षा 'तक्षा'। v[सू० १७ ] लक्षणा तेन षड्विधा ।।१२।। आद्यभेदाभ्यां सह। यहाँ [इन चारों उदाहरणोंमेंसे गौर्वाहीकः' तथा 'गौरयम् ] गौणीके दोनों भेदोंमें [ आरोप्यमाण गौ तथा आरोपविषय वाहीकका ] भेद होनेपर भी [ उन दोनोंके ] तादात्म्यकी प्रतीति [लक्षणासे होती है ] और [उन दोनोंके ] सर्वथा अभेदका बोधन करना [उस गौणी लक्षणाका ] प्रयोजन है। शुद्धा-लक्षणाके ['आयुर्घुतम्' तथा 'आयुरेवेदम्' आदि सारोपा तथा साध्यवसाना ] दोनों भेदोंमें अन्योंसे भिन्न प्रकार [अर्थात् अति प्रबलता ] से तथा नियमसे [अवश्य ही आयु आदि रूप ] कार्य-कारित्वादि (लक्षणाका प्रयोजन) है। सादृश्यसे भिन्न सम्बन्ध होनेपर शुद्धा-लक्षणा होती है यह बात अभी कही थी और उस शुद्धा- लक्षणाके दो उदाहरण भी दिये थे। उसी प्रकारके कुछ और भी उदाहरण आगे दिखलाते हैं, जिनमें सादृश्य-सम्बन्धसे भिन्न सम्बन्ध लक्षणाके प्रयोजक हैं। अतएव वे सब शुद्धा-लक्षणाके उदाहरण हैं। कहीं तादर्थ्य [उसके लिए होने ] से उपचार [अन्यके लिए अन्यके वाचक शब्दका प्रयोग ] होता है, जैसे [यज्ञमें ] इन्द्रके [पूजनके ] लिए बनायी हुई स्थूणा [भी तादर्थ्य-सम्बन्धसे ] 'इन्द्र' [कहलाती] है। कहीं स्व-स्वाभिभाव सम्बन्धसे [अन्य शब्दका अन्यत्र प्रयोग होता है] जैसे राजाका [विशेष कृपा-पात्र ] पुरुष [भी] 'राजा' [कहलाता ] है। कहीं अवयवावयविभावसे [औपचारिक प्रयोग होता है ] जैसे-'अग्रहस्त' यहाँ [ हाथके] केवल आगेके भागके लिए 'हाथ' [शब्दका प्रयोग होता ] है। कहीं 'उस कर्मके करनेके कारण' [तात्कर्म्य सम्बन्ध ] से [ औपचारिक शब्दका प्रयोग होता है ], जैसे [ बढ़ईका काम करनेवाले ] अतक्षा [बढ़ईसे भिन्न ब्राह्मण आदिके लिए ] बढ़ई [ तक्षा शब्दका प्रयोग तात्कम्य सम्बन्धसे होता है ]। [सू० १७ ]-इसलिए लक्षणा छह प्रकारकी हुई ॥१२॥ आदिके [उपादान-लक्षणा तथा लक्षण-लक्षणारूप] दोनों भेदोंके साथ [शुद्धा तथा गौणी दोनोंमेंसे
जाते है ]। प्रत्येकके सारोपा तथा साध्यवसाना दो-दो भेद कुल चारों भेदोंको मिलाकर लक्षणाके छह भेद हो
षड्विधा लक्षणाका रहस्य यहाँतक ग्रन्थकारने लक्षणाके छह भेदोंका निरूपण किया। हम पहले यह कह चुके हैं कि मम्मटने इस प्रसङ्गमें मुकुलभट्टके 'अभिधावृत्तिमातृका' ग्रन्थका बहुत उपयोग किया है; इसकी पुष्टि मम्मटकी 'लक्षणा तेन षडनिधा' इस पंक्तिसे भी होती है। लक्षणाका यह छह प्रकारका विभाग मूलतः भुकुलमट्टने किया है। मम्मटने भी उत्तीका अनुवाद करके यहाँ' लक्षणा तेन षड्विधा' यह लिख दिया है।
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का० १३, सू० १८-१8] द्वितीय उल्लास: ६७
सा च -- [सू० १८] व्यङ्गयेन रहिता रूढौ सहिता तु प्रयोजने। 1995 प्रयोजनं हि व्यञ्जन-व्यापारगम्यमेव। [सू० १९ ] तच्च गूढमगूढं वा। तच्चेति व्यङ्गयम् । 'साहित्यदर्पण' में लक्षणाके सोलह भेद साहित्यदर्पणकारने 'तेन षोडशभेदिता' लिखकर यहाँतक ही लक्षणाके छह भेदोंके स्थानपर सोलह भेद करके दिखला दिये हैं। वे सोलह भेद इस प्रकार होते हैं-पहिले रूढ़ि-लक्षणा तथा प्रयोजन- वती-लक्षणा ये दो भेद हुए। फिर उन दोनोंके उपादान-लक्षणा तथा लक्षण-लक्षणाके भेदसे, दो-दो भेद होकर चार भेद हुए। फिर उन चारों भेदोंके सारोपा तथा साध्यवसाना रूपसे दो-दो भेद होकर कुल आठ भेद हुए। फिर उन आठों भेदोंके शुद्धा तथा गौणी भेदसे दो-दो भेद होकर कुल सोलह भेद हुए। इस प्रकार साहित्यदर्पणकारने यहाँतक लक्षणाके सोलह भेद कर दिये हैं। मम्मट और मुकुलभट्टने यहाँतक केवल छह भेद ही किये हैं। इस अन्तरका कारण यह है कि मम्मट और मुकुलभट्ट दोनोंने 'उपादान- लक्षणा और 'लक्षण-लक्षणा' ये दोनों भेद केवल 'शुद्धा'के माने हैं, 'गौणी'के नहीं। विश्वनाथने 'गौणी' के भी ये दोनों भेद माने हैं। उनको मम्मटके ६ भेदोंमें मिला देनेसे ८ भेद बन जाते हैं। विश्वनाथने इनके रूढ़ि तथा प्रयोजनसे दो भेद करके १६ भेद बनाये हैं। मम्मट और मुकुलभट्टने ये भेद नहीं किये हैं। इसलिए उनके यहाँ भेदोंकी संख्या केवल ६ रह गयी है। लक्षणासे लक्षणामूला व्यञ्जनाकी ओर 'गौर्वाहीकः' आदिके विवेचनमें जो तृतीय मत मम्मटने दिखलाया था वह मूलतः मुकुलभट्टका मत था, परन्तु मम्मट भी उससे सहमत थे इसलिए उन्होंने उसका अपने मतके समान विस्तारपूर्वक औौर सप्रमाण उपपादन करनेका प्रयत्न किया है। यह बात हम पहिले लिख चुके हैं। वहाँसे यहाँतक मुकुलभट्टके साथ उनका विशेष मतभेद नहीं है इसलिए उसी पद्धतिपर उन्होंने विषयका विवेचन किया है परन्तु आगे उनका मुकुलभट्टके साथ मतभेद है और वह मतभेद व्यञ्जनाके विषयमें है। मुकुलभट्ट व्यञ्जनाको अलग बृत्ति नहीं मानते हैं परन्तु काव्यप्रकाशकार इस विषयमें ध्वनिवादी आचार्योंके अनुयायी हैं। ध्वन्यालोककारने प्रयोजनवती लक्षणा में प्रयोजनको व्यञ्जनागम्य ही माना है। इसलिए मम्मट भी लक्षणाके विवेचनके साथ ही लक्षणा-मूला व्यञ्जनाका भी विवेचन करना चाहते हैं। अतएव यहाँसे आगे उनकी शैली मुकुलभट्टसे भिन्न हो जाती है। लक्षणा-मूला व्यञ्जनाके विवेचनकी भूमिका बाँधते हुए वे लिखते हैं- [सू० १८]- रूढ़ि [गत भेदों] में व्यङ्गचसे रहित तथा प्रयोजन [मूलक भेदों ] में [ व्यङ्गचके ] सहित होती है। क्योंकि प्रयोजन व्यञ्जना-व्यापारसे ही जाना जा सकता है [प्रयोजनवती लक्षणामें व्यङ्गय प्रयोजन अवश्य रहता है। अतएव वह व्यङ्गय-सहित ही होती है]। [सू० १६]-और वह [व्यङ्गय प्रयोजन कहीं] गूढ [दुर्ज्ञेय, सहृदयकगम्य और कहीं] अगूढ़ [स्पष्ट, सर्वजनसंवेद्य ] होता है। वह अर्थात् व्यङ्गय [ 'तत्' सर्वनाम इस पूर्व-प्रयुक्त व्यङ्गचका परामर्शक है ]।
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६८ काव्यप्रकाश: [का० १३, सू० १८-१६ गूढं यथा- मुखं विकसितस्मितं वशितवक्रिम प्रेक्षितं समुच्छलितविभ्रमा गतिरपास्तसंस्था मतिः । उरो मुकुलितस्तनं जघनमंसबन्धोद्ध रं वतेन्दुवदनातनौ तरुणिमोद्गमो मोदते ।।९।। अगूढं यथा- श्रीपरिचयाज्जडा अपि भवन्त्यभिज्ञा विदग्धचरितानाम्। उपदिशति कामिनीनां यौवनमद एव ललितानि ॥१०। अत्रोपदिशतीति।
गूढ़ [व्यङ्गचका उदाहरण है] जैसे -- मुखपर मुस्कराहट खिल रही है, बाँकपन दृष्टिका दास हो रहा है, चलनेमें हाव-भाव छलक रहे हैं, बुद्धि मर्यादाका अतिकरमण कर [अत्यन्त तीव्र हो ] रही है। छातीपर स्तनोंकी कलियाँ निकल रही हैं। जाँघे अवयवोंके बन्धसे उभर रही है। बड़ी प्रसन्नताकी बात है कि उस चन्द्रवदनीके शरीरमें यौवनका उभार किलोल कर रहा है ।।६।। यहाँ मुखमें स्मित-मुस्कराहट-के खिलनेका वर्णन किया गया है। परन्तु विकास या खिलना तो फूलोंका धर्म है, मुखमें उसका सम्बन्ध लक्षणासे ही किया जा सकता है। उस लक्षणासे असंकुचितत्व- रूप सम्बन्ध द्वारा स्मितका अतिशय लक्षित होता है और मुखके सौरभ आदि व्यङ्गय हैं। चेतनके धर्म 'वशीकरण' के प्रेक्षितमें सम्बन्धसे वक्रभावकी स्वाधीनता लक्षित होती है और उसकी किसी अभिमत- विशेषकी त्रपरोर प्रवृत्ति व्यङ्गय होती है। किसी मूर्त द्रव पदार्थके धर्म 'छलकने'का गतिमें सम्बन्ध जोड़नेसे विभ्रमोंका बाहुल्य लक्षित होता है और सकल मनोहारित्व व्यङ्गय है। 'मर्यादाके त्याग' रूप चेतन- धर्मका मतिके साथ जो सम्बन्ध दिखलाया गया है उससे अधीरता लक्षित होती है और अनुरागातिशय व्यङ्गय है। 'मुकुलितत्व' रूप पुष्पके धर्मका स्तनके साथ सम्बन्ध दिखलानेसे स्तनोंका काठिन्य या उभार लक्षित होता है और आलिङ्गनयोग्यत्व व्यङ्गय है। उत्कृष्टधुरात्वरूप 'उद्धुरत्व'के जंघाओंके साथ सम्बन्धसे रमणीयत्व लक्षित होता है और विलक्षण रतियोग्यत्व व्यङ्गय है। 'मोद'से उत्कर्ष लक्षित होता है और स्पृहणीयत्व व्यङ्गय है। इस प्रकार इस श्लोकमें जो व्यङ्गय अर्थ है वह सर्वजनसंवेद्य नहीं है अपितु केवल सहृदयोंके ही समझने योग्य है अतएव उसको गूढ-व्यङ्गयके उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया गया है। अगूढ [व्यङ्गचका उदाहरण ] जैसे -- लक्ष्मीकी प्राप्ति हो जानेपर मूर्ख [मनुष्य ] भी चतुरोंके व्यवहारको समझनेवाले हो जाते हैं। [अर्थान्तरन्याससे इसका समर्थन करते है कि जैसे ] यौवनका मद ही कामिनियोंको ललितोंका उपदेश कर देता है। ['अनाचार्योपदिष्टं स्याल्ललितं रतिचेष्टितम्' बिना सिखलाय रतिचेष्टाओंका ज्ञान 'ललित' कहलाता है]।।१०। यहां 'उपदिशदि' यह [पद अगूढ-व्यङ्गय है। व्योंकि शब्द द्वारा अज्ञातार्थका ज्ञापनरूप 'उपदेश' चेतनका धर्म है वह यौवन-मदमें सम्भव नहीं है। इसलिए उससे 'आष्किरोति' अर्थ लक्षित होता है]।
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का० १४, सू० २०-२२ ] द्वितीय उल्लास: ६६ [सू० २० ] तदेषा कथिता त्रिधा ॥१३।। अव्यङ्गया, गूढव्यङ्गया अगूढव्यङ्गया च। [ सू० २१ ] तद्भूर्लाक्षणिकः । 'शब्दः' इति सम्बध्यते। तद्भूस्तदाश्रयः । [सू० २२ ] तत्र व्यापारो व्यञ्जनात्मकः । [सू० २०]-इस प्रकार यह [लक्षणा व्यङ्गयकी दृष्टिसे] तीन प्रकारकी कही गयी है।१३।। १. [रूढिगत ] व्यङ्गय-रहित [लक्षणा] २. गूढव्यङ्गया तथा ३. अगूढव्यङ्गया । इस प्रकार यहाँतक लक्षणाके भेदोंका निरूपण करके पिछले प्रसङ्गके साथ इसकी सङ्गति दिख- लानेके लिए इस उल्लासकी सबसे पहिली 'स्याद् वाचको लाक्षणिकः शब्दोऽत्र व्यञ्जकस्त्रिधा' आदि सूत्रसंख्या ५ का स्मरण दिलाते हैं। उस सूत्रमें वाचक, लाक्षणिक तथा व्यञ्जक तीन प्रकारके शब्दोंका निर्देश किया था। उनमेंसे वाचक शब्दका प्रतिपादन पहिले किया जा चुका है। लक्षणाका विवेचन हो जानेके बाद उस लक्षणाका आश्रयभूत शब्द जो 'लाक्षणिक-शब्द' कहलाता है, उसका लक्षण आगे करते हैं- [सू० २१ ] उस [लक्षणा ] का आश्रयभूत [शब्द ] लाक्षणिक [शब्द कहलाता ] है। 'शब्द यह [पद इस उल्लासकी प्रथम कारिका सू० ५ से 'मण्डूक-प्लुति-न्याय' से यहाँ ] सम्बद्ध होता है। तद्भू [ का अर्थ] उस [लक्षणा ] का आश्रय है। [सू० २२ ] उस [व्यङ्गघरूप प्रयोजनके विषय ] में [लाक्षणिक शब्दका लक्षणासे भिन्न ] व्यञ्जनात्मक व्यापार होता है। प्रयोजन-प्रतीतिमें व्यञ्जनाकी अपरिहार्यता मुकुलभट्टने अपनी दशम कारिकामें रूढि तथा प्रयोजनको लक्षणाका प्रयोजक हेतु माना है। 'रूढेः प्रयोजनाद्वापि व्यवहारे विलोक्यते' इस कारिका-भागकी व्याख्या करते हुए- अत्न च लक्षणायाः प्रयोजनं तटस्य गङ्गात्वैकार्थसमवेतासंविज्ञातपदपुण्यत्वमनोहरत्वादिप्रति- पादनम्। न हि तत् पुण्यत्वमनोहरत्वादि स्वशब्दैः स्प्रष्टुं शक्यते।' यह लिखकर पुण्यत्व-मनोहरत्वादिके प्रतिपादनको लक्षणाका प्रयोजन माना है और यह भी लिखा है कि उनकी प्रतीत स्व-शब्दसे अभिधा द्वारा नहीं हो सकती है। ध्वनिवादी आचार्य उस प्रयोजनकी प्रतीति व्यञ्जना द्वारा मानते हैं। परन्तु मुकुलभट्ट उस व्यञ्जनको स्वीकार नहीं करते। इसका अर्थ यह हुआ कि वे उस प्रयोजनकी प्रतीति भी लक्षणा वृत्तिसे ही मानते हैं। यदि लक्षणा-शक्तिसे ही प्रयोजनकी प्रतीति मानी जाय तो उसके दो रूप हो सकते हैं-एक तो यह कि उस प्रयोजनको लक्ष्यार्थ माना जाय और दूसरा पक्ष यह हो सकता है कि यदि प्रयोजन लक्ष्यार्थसे भिन्न है तो प्रयोजन-विशिष्ट तट आदिकी उपस्थिति लक्षणासे मानी जाय। मुकुलभट्टको इनमेंसे कौन-सा पक्ष अभीष्ट है इसका कोई विवेचन उन्होंने अपने ग्रन्थमें नहीं किया है। फिर भी- २ अत्र हि गङ्गाशब्दाभिधेयस्य स्रोतोविशेषस्य घोषाधिकरणत्वानुपपत्त्या मुख्यशब्दार्थबाधे सति योऽसौ समीपसमीपिभावात्मकः सम्बन्धस्तदाश्रयेण तटं लक्षयति'। १. 'अभिधावृत्तिमातृका', पृष्ठ १७। २. 'अभिधावृत्तिमातृका', पृष्ठ १७।
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७० काव्यप्रकाश: [का० १५, सू० २३-२४ कुत इत्याह- [सू० २३ ] यस्य प्रतीतिमाधातुं लक्षणा समुपास्यते ।।१४।। फले शब्दकगम्येऽत्र व्यञ्जनान्नापरा क्रिया। प्रयोजन प्रतिपिपादयिषया यत्र लक्षणया शब्दप्रयोगस्तत्र नान्यतस्तत्प्रतीतिरपि तु तस्मादेव शब्दात्। न चात्र व्यञ्जनादृतेज्न्यो व्यापारः। तथाहि- [सू० २४] नाभिधा समयाभावात्। 'गङ्गायां घोषः' इत्यादौ ये पावनत्वादयो धर्मास्तटादौ प्रतीयन्ते न तत्र गङ्गादि- शब्दा: संकेतिताः । इस लेखसे यह स्पष्ट हो जाता है कि वह तटको लक्ष्यार्थ मानते हैं। इसलिए प्रयोजनको लक्ष्यार्थ माननेकी सम्भावना नहीं रहती है। उस दशामें व्यञ्जनाका आश्रय लिये बिना पुण्यत्व, मनो- हरत्व आदि प्रयोजनोंकी गङ्गा-शब्दसे प्रतीति होनेका केवल एक ही मार्ग शेष रह जाता है कि प्रयोजन- विशिष्ट तटकी उपस्थिति लक्षणासे मानी जाय। यही सम्भवतः मुकुलभट्टका भी अभिप्राय है। परन्तु उन्होंने इसका स्पष्ट निर्देश नहीं किया है। इसलिए काव्यप्रकाशकारके लिए इस विषयमें सम्भावित दोनों मतोंकी आलोचना करना अनिवार्य हो गया है। इसीलिए उन्होंने अगली १६-१८ तक तीन कारिकाओंमें इन दोनों सम्भावित पक्षोंकी आलोचना की है। १६वीं कारिका तथा १७ वीं कारिकाके पूर्वार्द्धमें उन्होंने प्रयोजनको लक्ष्यार्थ माननेकी सम्भावनाका निराकरण किया है और १७ वीं कारिकाके उत्तरार्द्ध तथा १८ वीं कारिकामें प्रयोजन-विशिष्ट तीरमें लक्षणा माननेका खण्डन किया है। इस खण्डनका अभिप्राय यह है कि जब मुकुलभट्ट प्रयोजनको लक्षणाका प्रयोजक मानते हैं तो उस प्रयोजनकी प्रतीति अभिधा या लक्षणासे होनेका कोई मार्ग न होनेके कारण उसकी प्रतीतिके लिए उन्हें व्यञ्जना भी अवश्य माननी चाहिये। इसी अभिप्रायसे ग्रन्थकार आगे लिखते हैं कि- प्रयोजनकी वाच्यताका निराकरण [व्यञ्जनाव्यापार ही] क्यों [होता है] यह कहते हैं- [सू० २३ ]-जिस [प्रयोजनविशेषकी ] प्रतीति करानेके लिए [लक्षणा अर्थात् ] लाक्षणिक शब्द [वृत्तिमें 'लक्षणया शब्दप्रयोग:' इस प्रकारकी व्याख्या होनेसे यहाँ 'लक्षणा' शब्दका अर्थ 'लाक्षणिक शब्द' ही करना उचित है] का आश्य लिया जाता है [ अनुमान आदिसे नहीं अपितु] केवल शब्दसे गम्य उस फल [प्रयोजन ] के विषयमें व्यञ्जनाके अतिरिक्त [शब्दका] और कोई व्यापार नहीं हो सकता है ।।१४ । प्रयोजनविशेषका प्रतिपादन करनेकी इच्छासे जहाँ लक्षणासे [लाक्षणिक ] शब्दका प्रयोग किया जाता है वहाँ [अनुमान आदि ] अन्य किसी [साधन या उपाय ] से उस प्रयोजनरूप अर्थकी प्रतीति नहीं होती है अपितु उसी शब्दसे होती है। और उस [के बोधन ] में [शब्दका ] व्यञ्जनाके अतिरिक्त और कोई व्यापार नहीं [ होता ] है। [इसी बातको स्पष्ट करनेके लिए कहते हैं] क्योंकि -- [सू० २४]-संकेतग्रह न होनेसे अभिधावृत्ति [प्रयोजनकी बोधिका ] नहीं है। 'गङ्गायां घोष:' इत्यादिमें जो पावनत्व आदि धर्म तटमें प्रतीत होते हैं उनमें गङ्गा आदि शब्दोंका संकेतग्रह नहीं है [ अतः अभिधासे उनका ज्ञान नहीं हो सकता है ]।
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का० १५, सू० २५ ] द्वितीय उल्लास: ७१ [सू० २५ ] हेत्वभावान्न लक्षणा ।।१५।। मुख्यार्थबाधादित्रयं हेतुः। प्रयोजनकी लक्ष्यताका निराकरण [सू० २५]-[लक्षणाके प्रयोजक मुख्यार्थबाध आदि ] हेतुओंके न होनेसे लक्षणा [भी प्रयोजन- की बोधिका] नहीं हो सकती है। [१.] मुख्यार्थका बाध [और उसके साथ-साथ २. मुख्यार्थसे सम्बन्ध तथा ३. रूढ़ि एवं प्रयोजनमेंसे कोई एक ] आदि ( लक्षणाके ] तीन कारण हैं। [वे तीनों यहाँ नहीं पाये जाते हैं। अतः प्रयोजक-सामग्रीके न होनेसे प्रयोजनका बोध लक्षणासे भी नहीं हो सकता है ]। लक्षणाके हेतुओंका अभाव २५वें सूत्रमें अभी कहा हैं कि प्रयोजनके बोधनमें मुख्यार्थबाध आदि लक्षणाके प्रयोजक हेतुओंमेंसे कोई भी हेतु नहीं है। इसलिए लक्षणासे उसका बोध नहीं हो सकता है। अगली कारिकामें इन्हीं हेतुओंके अभावका उपपादन करेंगे। उसका आशय यह है कि गङ्गा पदसे तटरूप अर्थकी प्रतीति होनेके बाद जो शैत्य-पावनत्व आदि धर्मोंकी प्रतीति होती है, उसको यदि लक्ष्यार्थ माना जाय तो उससे पूर्व उपस्थित होनेवाला तटरूप अर्थ मुख्यार्थ होना चाहिये। परन्तु वह लक्ष्यार्थ है, मुख्यार्थ नहीं हो सकता है। फिर यदि उसको कथञ्चित् मुख्यार्थ ही मान लिया जाय तो लक्षणा होनेके पूर्व उसका बाध होना चाहिये। यह बाध भी नहीं होता है क्योंकि तटपर घोष रहता ही है। इसलिए भी लक्षणा नहीं हो सकती है। इस प्रकार अगली कारिकाके 'लक्ष्यं न मुख्यम्' 'नाप्यत्र बाधः' इस प्रथम चरणसे मुख्यार्थबाधरूप लक्षणाके प्रथम कारणका अभाव प्रदर्शित किया। लक्षणाका दूसरा कारण लक्ष्यार्थका मुख्यार्थके साथ सम्बन्ध है। यदि शैत्य-पावनत्व आदि धर्मोंको लक्ष्यार्थ माना जाय तो तटको मुख्यार्थ मानना होगा। उस दशामें मुख्यार्थरूप तटके साथ लक्ष्यार्थ- रूप शैत्य-पावनत्व आदिका सम्बन्ध होना चाहिये। परन्तु शैत्य-पावनत्वका सम्बन्ध तो जलप्रवाहके साथ है, तटके साथ नहीं, इसलिए मुख्यार्थके साथ साक्षात् सम्बन्धरूप दूसरा हेतु भी नहीं है। यह बात अगली कारिकाके 'योग: फलेन नो' इस द्वितीय चरणके भागसे प्रतिपादित की है। उसका अभिप्राय यह है कि आपके मतानुसार लक्ष्यार्थरूपमें कल्पित किये जानेवाले शैत्य-पावनत्व आदि फलके साथ मुख्यार्थ- स्थानीय तटका सम्बन्ध भी नहीं है। इसलिए लक्षणाके दूसरे हेतुका भी अभाव होनेसे लक्षणा नहीं हो सकती है। लक्षणाका प्रयोजक तीसरा कारण रूढि और प्रयोजनमेंमे किसी एककी स्थिति है। इन दोनोंमेंसे कोई भी यहाँ नहीं बन सकता है। शैत्य-पावनत्वादि प्रयोजनको यदि लक्ष्यार्थ मानें तो फिर उसमें किसी अन्यको प्रयोजन मानना होगा, परन्तु इस फलमें और कोई प्रयोजन नहीं माना जा सकता है और यदि माननेका आग्रह ही करेंगे तो फिर उस प्रयोजनका भी प्रयोजन और फिर उसका भी प्रयोजन खोजना होगा, इस प्रकार 'अनवस्था' होगी। अतः प्रयोजनका प्रयोजन मानना उचित नहीं है और रूढिसे शैत्य- पावनत्व आदिका बोध तो हो ही नहीं सकता है। इसलिए रूढि और प्रयोजनमेंसे किसी एककी उपस्थिति- रूप तृतीय कारणका भी अभाव होनेसे लक्षणा नहीं हो सकती है। यह बात कारिकाके उत्तरार्द्धके 'न प्रयोजनमेतस्मिन्' इस भागसे कही है। यह १६ वीं कारिकाके आदिके तीन चरणोंका अभिप्राय है।
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७२ काव्यप्रकाश: [का० १६, सू० २६
तथा च- [सू० २६] लक्ष्यं न मुख्यं नाप्यत्र बाधो योग: फलेन नो। न प्रयोजनमेतस्मिन् न च शब्द: स्खलद्गतिः ॥१६।। यहाँतक तो कारिका क्लिष्ट होनेपर भी स्पष्ट है। परन्तु कारिकाका अन्तिम चरण और उसका वृत्तिभाग दोनों अत्यन्त अस्पष्ट हैं। जहाँ कारिका-भागमें क्लिष्टता आ गयी थी उसकी वृत्ति लिखते समय वृत्तिकारको उस विषयका विस्तारके साथ स्पष्टीकरण करना चाहिये था, परन्तु दुर्भाग्यसे मम्मटने यह नहीं किया है। इस स्थलपर उनकी व्याख्या मूलसे भी अधिक क्लिष्ट हो गयी है। यहाँ उनकी स्थिति उन टीकाकारोंके समान हो गयी है जो स्पष्ट स्थलोंका तो खूब विस्तार करते हैं, परन्तु अस्पष्ट स्थलोंको शब्द-जालमें ही उड़ा देते हैं। 'न च शब्दः स्खलद्गतिः' इसकी व्याख्यामें 'नापि गङ्गाशब्दस्तट- मिव प्रयोजनं प्रतिपादयितुमसमर्थः' यह जो पंक्ति मम्मटने लिखी है वह 'मघवा मूल विडौजा टीका' का उदाहरण बन रही है। उसका पाठ 'प्रयोजनं प्रतिपादयितुमसमर्थः' होना चाहिये या 'समर्थः' इसका निर्णय करनेमें भी टीकाकार चक्करमें पड़े हुए हैं। पता नहीं, इतना भ्रामक पाठ और इतनी अस्पष्ट वृत्ति मम्मटने इस स्थलपर क्यों लिखी है। क्या वे स्वयं अपनी लिखी पंक्तिकी भी स्पष्ट व्याख्या नहीं कर सकते थे। अस्तु, 'स्थितस्य गतिश्चिन्तनीया'के सिद्धान्तके अनुसार हमको इसकी गति सोचनी चाहिये। इसका भाव यह है कि यदि प्रयोजनको लक्ष्यार्थ माना जाय तो उसके विषयमें शब्दका 'स्खलद्गति' होना आवश्यक है। अर्थात् मुख्यार्थबाध आदिके बाद ही उस अर्थका बोधन होना चाहिये। मुख्यार्थबाध आदि लक्षणाके प्रयोजन हेतुओंके बिना उस शब्दसे अर्थकी प्रतीति सम्भव न हो, तब उस अर्थको लक्ष्यार्थ कहा जा सकता है। जैसे गङ्गा शब्दका लक्ष्यार्थ तट है। मुख्यार्थबाध आदिके बिना गङ्गा शब्द तटका प्रतिपादन करनेमें असमर्थ है। इसलिए वह उस तटरूप अर्थके बोधनमें स्खलद्गति है। इसलिए उसको लक्षणासे बोधित करता है। परन्तु शैत्य-पावनत्वादि प्रयोजनके विषयमें गङ्गा आदि लाक्षणिक शब्द 'स्खलद्गति' नहीं होते हैं। अर्थात् मुख्यार्थबाध आदिके बाद ही वे शैत्यादिका बोध नहीं कराते हैं। अपितु, मुख्यार्थबाधके बाद तो वे तटका बोध कराते हैं और शैत्यपावनत्वादि धर्म तो बिना मुख्यार्थबाधके भी अविनाभूत होनेसे गङ्गा शब्दके अर्थके साथ स्वयं ही उपस्थित हो जाते हैं। इसलिए गङ्गा शब्द मुख्यार्थबाध आदिके बिना भी उस शैत्यादि अर्थके प्रतिपादनमें असमर्थ नहीं, समर्थ है। अतः वह उस अर्थके विषयमें 'स्खलद्गति' नहीं है। अतः शैत्य-पावनत्व आदि प्रयोजनोंका बोध लक्षणासे नहीं हो सकता है। उसके लिए व्यञ्जना-व्यापारके माननेके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है यह ग्रन्थकारका अभिप्राय है। इसी बातको अगली कारिकामें कहते हैं- [सू० २६ ] [तटरूप ] लक्ष्यार्थ मुख्य अर्थ नहीं है, न उसका यहाँ बाध होता है, और न उसका [शैत्यपावनत्वादि ] फलके साथ सम्बन्ध है, और न इस [प्रयोजनको लक्ष्यार्थ मानने ] में कोई प्रयोजन है और न [प्रयोजनके विषयमें लाक्षणिक ] शब्द स्खलद्गति [अर्थात् मुख्यार्थबाधादिके बिना प्रयोजनके प्रतिपादनमें असमर्थ या मुख्यार्थ बाध आदिके बाद ही प्रयोजनके प्रतिपादनमें समर्थ ] है ॥१६।। 'शब्द स्खलद्गति नहीं है'। इसका अभिप्राय यह है कि गङ्गा शब्द शैत्य-पावनत्वरूप प्रयोजनको बोधित करनेमें 'बाधितार्थ' नहीं है। बिना मुख्यार्थबाधके भी वह शैत्य-पावनत्वको व्यक्त कर सकता है। मुख्यार्थका बाध होनेपर वह शैत्य-पावनत्वको नहीं, अपितु तटको ही बोधित करता है।
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का० १७, सू० २७ ] द्वितीय उल्लास: ७३ यथा गङ्गाशब्दः स्रोतसि सबाध इति तटं लक्षयति, तद्वत् यदि तटेऽपि सबाध: स्यात् तत् प्रयोजनं लक्षयेत्। न च तटं मुख्योऽर्थः। नाप्यत्र बाधः, न च गङ्गाशब्दार्थस्य तटस्य पावनत्वादयैर्लक्षणीयैः सम्बन्धः । नापि प्रयोजने लक्ष्ये किञ्चित् प्रयोजनम्। नापि गङ्गाशब्दस्तटमिव प्रयोजनं प्रतिपादयितुमसमर्थः । [सू० २७ ] एवमप्यनवस्था स्याद् या मूलक्षयकारिणी। एवं प्रयोजनं चेल्लक्ष्यते तत् प्रयोजनान्तरेण, तदपि प्रयोजनान्तरेणेति प्रकृता- प्रतीतिकृत् अनवस्था भवेत् ।।
जैसे गङ्गा शब्द ['गङ्गायां घोषः' इस उदाहरणमें घोषका आधार बननेके लिए ] जलप्रवाह अर्थमें बाधित होता है इसलिए [ लक्षणासे ] तट [रूप लक्ष्यार्थ ] का बोध कराता है उसी प्रकार यदि तट [गङ्गा शब्दका मुख्यार्थ हो और उसमें घोषका आधार बननेकी योग्यताके न होनेसे उस ] में भी बाधित हो, तब वह प्रयोजनको लक्षणासे बोधित कर सकता है, परन्तु न तो तट [गङ्गा शब्दका ] मुख्य अर्थ है और न उसका बाध होता है। [इसलिए मुख्यार्थ बाधरूप प्रथम लक्षणा-हेतुका अभाव सिद्ध होता है और यदि गङ्गा शब्दका मुख्यार्थ तट ही मान लिया जाय तो भी ] गङ्गा शब्दके [उस कल्पित मुख्य ] अर्थ तटका [जिनका आप लक्षणासे बोध करना चाहते हैं उन ] लक्षणीय पावनत्वादिके साथ सम्बन्ध भी नहीं है [पावनत्व आदि धर्मोंका सम्बन्ध तो जलकी धारासे है, तटसे नहीं। इसलिए मुख्यार्थके साथ लक्ष्यार्थका सम्बन्धरूप लक्षणाका जो दूसरा हेतु बतलाया गया है उसका भी यहाँ अभाव है और तीसरा लक्षणाका हेतु, रूढ़ि तथा प्रयोजनमेंसे किसी एककी स्थितिका होना है उसका भी खण्डन करते हैं कि ] और न प्रयोजनको लक्ष्यार्थ माननेमें कोई अन्य प्रयोजन ही है[ और उस प्रयोजनको इसलिए भी लक्ष्यार्थ नहीं माना जा सकता है कि] गङ्गा शब्द तटके समान प्रयोजनका प्रतिपादन करनेमें असमर्थ [स्खलद्गति ] भी नहीं है। [इसलिए भी प्रयोजनका बोध लक्षणासे नहीं हो सकता है] ॥१६॥ इस प्रकार प्रयोजनको लक्ष्यार्थ मानना सम्भव नहीं है यह बात इस सोलहवीं कारिकामें भली प्रकार सिद्ध कर दी गयी है। फिर भी यदि व्यञ्जनाविरोधी प्रयोजनको लक्ष्यार्थ ही मानना चाहें और उसके लिए प्रयोजनमें भी कोई अन्य प्रयोजन सिद्ध करनेका प्रयत्न करें तो भी यह उचित नहीं होगा, क्योंकि उस दशामें वह दूसरा प्रयोजन भी लक्ष्य होगा, इसलिए उसके लिए तीसरे प्रयोजनकी आवश्यकता होगी। फिर उस तीसरे प्रयोजनके लिए चौथे आदि प्रयोजनोंकी आवश्यकता होनेसे 'अनवस्था-दोष' होगा। यह अनवस्था दोष मूलका ही नाश कर देनेवाला होता है। इसलिए अनवस्थाभयसे भी प्रयोजनको लक्ष्यार्थ नहीं माना जा सकता है। इसी बातको आगे कहते हैं- [ सू० २७ ]-इस प्रकार भी अनवस्था दोष आ जायगा जो मूलका ही नाश करनेवाला होता है। इस प्रकार यदि प्रयोजन लक्षित होता है [ यह माना जाय ] तो उसे अन्य प्रयोजनसे और उसे भी अन्य प्रयोजनसे [लक्षित मानना होगा ] इस प्रकार [प्रयोजनकी अविश्रान्त परम्पराकी कल्पनाके कारण मूलभूत प्रथम प्रयोजनरूप ] प्रस्तुत अर्थप्रतीतिमें भी बाधा डालनेवाली [मूलक्षयकारिणी ] अनवस्था होगी।
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७४ काव्यप्रकाश: [का० १७, सू० २७
प्रयोजन-विशिष्टमें लक्षणाका निराकरण इस प्रकार यहाँतक ग्रन्थकारने यह सिद्ध किया है कि प्रयोजनका बोध लक्षणासे नहीं हो सकता है इसलिए उस प्रयोजनके बोधनके लिए व्यञ्जना-वृत्ति मानना आवश्यक है। परन्तु अभी विशिष्टमें लक्षणा माननेवाला दूसरा पक्ष शेष रह जाता है। विशिष्ट-लक्षणाका अर्थ यह है कि तट आदि लक्ष्यार्थके बोधके साथ-ही-साथ शैत्य-पावनत्वादि प्रयोजनोंका भी बोध हो जाता है। अर्थात् लक्षणा केवल तटका नहीं, अपितु शैत्य-पावनत्वादि प्रयोजन-विशिष्ट तटका बोध कराती है इसलिए उनके बोधके लिए लक्षणा-मूला व्यञ्जना माननेकी आवश्यकता नहीं है। इस विशिष्ट-लक्षणावादका खण्डन ग्रन्थकारने १७ वीं कारिकाके उत्तरार्द्ध तथा १८ वीं कारिकामें दिया है। इस प्रसंगमें उन्होंने विशिष्ट-लक्षणावादके खण्डनके लिए जो युक्ति दी है उसका अभिप्राय यह है कि ज्ञानका विषय तथा ज्ञानका फल, ये दोनों अलग-अलग होते हैं। उनको एक साथ मिलाया नहीं जा सकता है। लक्षणाजन्य ज्ञानका विषय तट आदि है और उसका फल शैत्यपावनत्व आदिका बोध है। इसलिए इन दोनोंको एक साथ न मिलाकर अलग-अलग ही उनकी प्रतीति माननी होगी। क्योंकि विषय तथा फलमें कार्य-कारण-भाव होता है। ज्ञानका विषय ज्ञानका कारण होता है और ज्ञानका फल ज्ञानका कार्य होता है। इसलिए उनकी समकालीन उत्पत्ति नहीं हो सकती है। ज्ञानका विषय और ज्ञानका फल दोनों अलग-अलग होते हैं। इस बातको सिद्ध करनेकें लिए ग्रन्थकारने न्याय तथा मीमांसाकी दार्शनिक प्रत्रियाकी चर्चा की है। उस दार्शनिक सिद्धान्तको समझे बिना इस कारिकाका मौलिक रहस्य समझमें नहीं श सकता है। इसलिए नैयायिक तथा मीमांसकोंके उस सिद्धान्तको, जिसकी यहाँ चर्चा की गयी है, भली प्रकार समझ लेना आवश्यक है। घट, पट आदि विषयोंका जो ज्ञान होता है उसके विषय घट, पट आदि होते हैं और वे ज्ञानके प्रति कारण होते हैं इसलिए उनकी सत्ता ज्ञानसे पहिले रहती है। सभी दार्शनिक इस सिद्धान्तको मानते हैं। परन्तु ज्ञानका फल क्या होता है इस विषयमें न्याय तथा मीमांसा दर्शनके सिद्धान्तोंमें मतभेद है। न्यायका अनुव्यवसाय-सिद्धान्त न्याय-सिद्धान्तके अनुसार पहिले विषयसे उसका ज्ञान उत्पन्न होता है। घट या नील आदि विषयोंका ग्रहण तो प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे हो जाता है। परन्तु ज्ञानका ज्ञान कैसे होता है इस प्रश्नके समाधानके लिए नैयायिक 'अनुव्यवसाय' की कल्पना करते हैं। अनुव्यवसायका अर्थ 'ज्ञानका ज्ञान' है। पहिले 'अयं घटः' इस प्रकारका ज्ञान होता है, उसके बाद 'घटज्ञानवानहम्' या 'घटमहं जानामि' इस प्रकारका ज्ञान होता है। इनमेंसे 'यह घट' है इस प्रकारका पहिला ज्ञान 'व्यवसायात्मक' ज्ञान कहलाता है और उसके बादका 'मैं घटको जानता हूँ' या 'मुझे घटका ज्ञान होता है,' यह दूसरा ज्ञान 'अनुव्यव साय' कहलाता है। 'अयं घटः' इस प्रथम ज्ञानका विषय घट होता है और 'घटमहं जानामि' या 'घटज्ञानवानहम्' इस दूसरे ज्ञानका विषय 'घटज्ञान' है। जैसे पहिला 'व्यवसायात्मक ज्ञान' अपने विषय घटसे उत्पन्न होता है इसी प्रकार दूसरा ज्ञान अपने विषय 'व्यवसायात्मक' घटज्ञान'से उत्पन्न होता है, इसीलिए वह 'अनुव्यवसाय' कहलाता है। यह अनुव्यवसाय घटज्ञानका फल हुआ। अर्थात् घटज्ञानके विषय 'घट'से उस घटज्ञानका फल 'अनुव्यवसाय' भिन्न है। इसलिए विषय तथा ज्ञानके फलको अलग-अलग मानना होगा और उन दोनोंकी समकालीन उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती है। यह न्यायके सिद्धान्तके अनुसार सिद्ध होता है।
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का० १७, सू० २८ ] द्वितीय उल्लास: ७५ ननु पावनत्वादिधर्मयुक्तमेव तटं लक्ष्यते। 'गङ्गायास्तटे घोषः' इत्यतोऽधिक- स्यार्थस्य प्रतीतिश्च प्रयोजनमिति विशिष्टे लक्षणा। तत्कि व्यञ्जनयेत्याह- [सू० २८ ] प्रयोजनेन सहितं लक्षणीयं न युज्यते ।।१७।। मीमांसकोंका ज्ञातता-सिद्धान्त मीमांसकोंका सिद्धान्त इससे थोड़ा भिन्न है। नैयायिकोंने 'अयं घटः' इस ज्ञानके होनेके बाद उससे 'घटज्ञानवानहम्' या 'घटमहं जानामि' इत्यादि रूप 'अनुव्यवसाय' की उत्पत्ति मानी है। परन्तु मीमांसक 'अनुव्यवसाय' के स्थानपर 'ज्ञातता' धर्मकी उत्पत्ति मानते हैं। उनका कहना यह है कि 'अयं घटः' इस प्रकारका ज्ञान होनेके बाद 'ज्ञातो मया घटः' इस प्रकारकी प्रतीति होती है। इस प्रतीतिमें घटमें रहनेवाला 'ज्ञातता' नामक धर्म भासता है। यह धर्म ज्ञानसे पहिले घटमें नहीं था। ज्ञान होनेके बाद आया है। इसलिए वह ज्ञानसे उत्पन्न हुआ है। ज्ञान उसका कारण है। कारणके बिना कार्य उत्पन्न नहीं होता इसलिए ज्ञानके बिना 'ज्ञातता' धर्म भी घटमें उत्पन्न नहीं हो सकता था। परन्तु 'ज्ञातता' धर्म घटमें उत्पन्न हुआ है और 'ज्ञातो मया घटः' इस प्रतीतिमें भास रहा है इसलिए उसका कारण ज्ञान अवश्य होना चाहिये। इस प्रकार 'ज्ञातता'की 'अन्यथा अनुपपत्ति' होनेके कारण 'ज्ञातता'से ज्ञानका ग्रहण होता है, यह मीमांसकोंका सिद्धान्त है। अनुव्यवसाय और ज्ञातताका भेद नैयायिकोंके मतमें ज्ञानका ग्रहण 'अनुव्यवसाय' से होता है और मीमांसकोंके मतमें ज्ञानका ग्रहण 'ज्ञातता'से होता है। नैयायिकका 'अनुव्यवसाय' भी 'ग्र्प्रयं घटः' इस ज्ञानसे उत्पन्न होता है और मीमांसकों- की 'ज्ञातता' भी 'अयं घटः' इस ज्ञानसे ही उत्पन्न होती है। फिर उन दोनोंमें मौलिक अन्तर क्या है जिसके कारण इन दोनोंका अलग सिद्धान्त माना जाय। इस प्रश्नका उत्तर यह है कि नैयायिकका 'अनुव्यवसाय' आत्मामें रहनेवाला धर्म है और मीमांसककी 'ज्ञातता' घट आदि विषयमें रहनेवाला धर्म है। इस भेदके कारण इन दोनोंको अलग सिद्धान्त माना जाता है। प्रकृतमें इस सारी चर्चाका प्रयोजन यह है कि जब वह सिद्धान्त मान लिया जाता है कि ज्ञानका विषय और उसका फल अलग-अलग होते हैं तब लक्षणाजन्य ज्ञानका विषय तट और उसका फल पुण्यत्व- मनोहरत्व या शैत्य-पावनत्वादि भी अलग-अलग मानने होंगे और उनकी उत्पत्ति समकालमें मानना सम्भव नहीं होगा। अतएव 'विशिष्ट-लक्षणा' का सिद्धान्त भी नहीं माना जा सकता है। इसी बातको अगली कारिकामें कहते हैं- [पूर्वपक्ष ]-अच्छा पावनत्व आदि धर्मसे युक्त ही तट लक्षणासे उपस्थित होता है [ यह माना जाय तो क्या हानि है ? ] और 'गङ्गाके तटपर घोष है' इससे अधिक [पावनत्वादि विशिष्ट तीर ] अर्थकी प्रतीति (उस लक्षणाका ] प्रयोजन है। इस प्रकार [पावनत्वादि ] विशिष्टमें लक्षणा हो सकती है। तब व्यञ्जना [मानने ] से क्या लाभ ? [अर्थात् विशिष्टमें लक्षणा मान लेनेसे ही काम चल जाता है तब अलग व्यञ्जनावृत्तिका मानना व्यर्थ है। [यह पूर्वपक्ष हुआ] इसका उत्तर [अगले सूत्रमें ] कहते हैं- [सू० २८ ]-प्रयोजनके सहित [अर्थात् शैत्य-पावनत्वादि विशिष्ट तीरको ] लक्ष्यार्थ [लक्षणीय ] मानना सङ्गत नहीं है।।१७।।
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७६ काव्यप्रकाश: [का० १८, सू० २६-३१ कुत इत्याह- [सू० २९ ] ज्ञानस्य विषयो ह्यान्य: फलमन्यदुदाहृतम्। प्रत्यक्षादेर्नीलादिर्विषयः फलन्तु प्रकटता संवित्तिर्वा। [सू० ३० ] विशिष्टे लक्षणा नैवं व्याख्यातम्। [सू० ३१ ] विशेषा: स्युस्तु लक्षिते ।।१८। तटादौ ये विशेषा: पावनत्वादयस्ते चाभिधा-तात्पर्य-लक्षणाभ्यो व्यापारान्तरेण गम्याः । तच्च व्यञ्जन-ध्वनन-द्योतनादिशब्दवाच्यमवश्यमेषितव्यम्। एवं लक्षणामूलं व्यञ्जकत्वमुक्तम् ।।१८।। क्यों [असङ्गत है ] यह बतलाते ह- [सू० २६]-क्योंकि ज्ञानका विषय [घर आदि ] अलग और [ज्ञानका ] फल [नैयायिकके मतमें 'अनुव्यवसाय' तथा मीमांसकके मतमें 'ज्ञातता'] अलग, कहे गये हैं। [नैयायिक तथा मीमांसक-दोनों ही इस बातको स्वीकार करते है कि ज्ञानका विषय और उसका फल दोनों अलग-अलग होते हैं। दोनोंके मतमें ज्ञानका विषय तो समान है परन्तु फलके विषयमें भेद है] प्रत्यक्ष आदि [जन्य ज्ञान ] का विषय नील आदि है और फल [भीमांसकके मतमें प्रकटता अर्थात् ] 'ज्ञातता' अथवा [नैयायिकके मतमें संवित्ति अर्थात् ] 'अनुव्यवसाय' [होता ] है। दोनों ही मतोंमें ज्ञानका विषय ज्ञानके फलसे भिन्न होता है। विषय ज्ञानका कारण होता है। इ सलिए उसकी स्थिति ज्ञानके पहिले रहती है तथा फल ज्ञानका कार्य होता है इसलिए उसकी उत्पत्ति ज्ञानके बाद होती है। इसलिए लक्षणा-जन्य ज्ञानके विषय 'तटादि' और उसके फल पुण्यत्व, मनोहरत्व आदि शैत्य-पावनत्वादिकी स्थिति भी अलग-अलग है। उन दोनोंकी समकालीन उत्पत्ति नहीं हो सकती है। इस कारण प्रयोजनके सहित तट आदिको लक्ष्यार्थ मानना युक्ति सङ्गत नहीं है। [सू० ३०]-इस प्रकार विशिष्टमें लक्षणा नहीं हो सकती है। इसकी व्याख्या [पहले ही ] कर चुके हैं। [अर्थात् अब पंक्तिके अत्यन्त स्पष्ट होनेसे उसकी व्याख्या करनेकी आवश्यकता नहीं है ]। [सू० ३१ ]-लक्षित अर्थमें विशेष हो सकते हैं। [अर्थात् पहिले लक्षणासे केवल तटकी उपस्थिति होनेके बाद लक्षणामूलक व्यञ्जनासे उस तटादिरूप लक्ष्य अर्थमें शैत्य-पावनत्व आदि प्रयोजनों- की प्रतीति हो सकती है]।१८॥ तट आदि [रूप लक्ष्यार्थ] में जो पावनत्व आदि विशेष [प्रयोजनभूत धर्म प्रतीत होते ] हैं वे अभिधा, [अभिहितान्वयवादी कुमारिलभट्ट द्वारा स्वीकृत ] तात्पर्या तथा लक्षणासे भिन्न व्यापारसे गम्य हैं और व्यञ्जना, ध्वनन, द्योतन आदि शब्दोंसे वाच्य वह [व्यञ्जना-व्यापार ] अवश्य मानना चाहिये [ उसके बिना प्रयोजन आदिका बोध नहों हो सकता है]। इस प्रकार लक्षणामूला व्यञ्जनाका वर्णन [समाप्त ] हुआ ॥१८॥
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का० १६, सू० ३२] द्वितीय उल्लास: ७७ अभिधामूलं त्वाह- [ सू० ३२] अनेकार्थस्य शब्दस्य वाचकत्वे नियन्त्रिते। संयोगाद्यैरवाच्यार्थधीकृद् व्यापृतिरञ्जनम् ।१९।। "संयोगो विप्रयोगश्च साहचर्य विरोधिता । अर्थः प्रकरणं लिङ्गं शब्दस्यान्यस्य सन्निधि: ॥ सामर्थ्यमौचिती देश: कालो व्यक्तिः स्वरादयः । शब्दार्थस्यानवच्छेदे विशेषस्मृतिहेतवः ।।" इत्युक्तदिशा अभिधामूला [व्यञ्जना ] इस प्रकार मीमांसकोंके व्यञ्जना-विरोधी मतका खण्डन करके ग्रन्थकारने व्यञ्जनाको अलग वृत्ति माननेके सिद्धान्तका उपपादन किया। यह व्यञ्जना-वृत्ति 'शाब्दी-व्यञ्जना' तथा 'आर्थी-व्यञ्जना' भेदसे दो प्रकारकी मानी गयी है। इनमेंसे शाब्दी-व्यञ्जनाके भी 'अभिधामूला' तथा 'लक्षणामूला' व्यञ्जना ये दो भेद किये गये हैं। लक्षणाके प्रसङ्गमें प्रयोजनके लिए व्यञ्जनाकी आवश्यकता अनुभव में आयी इसलिए लक्षणामूला-व्यञ्जनाका निरूपण भी ग्रन्थकारने उसीके साथ कर दिया है। शाब्दी- व्यञ्जनाके दूसरे भेद अभिधामूला-व्यञ्जनाका निरूपण अगली कारिकामें करते हैं। अभिधामूला [व्यञ्जना ] को तो कहते हैं- [सू० ३२]-संयोग आदिके द्वारा अनेकार्थक शब्दोंके वाचकत्वके [किसी एक अर्थमें ] नियन्त्रित हो जानेपर [उससे भिन्न ] अवाच्य अर्थकी प्रतीति करानेवाला [शब्दका ] व्यापार व्यञ्जना [अर्थात् अभिधामूला-व्यञ्जना कहलाता है]।१६॥ एकार्थदिगामक हेतु अनेकार्थक शब्दका एक अर्थमें संयोगादिके द्वारा नियन्त्रण हो जानेपर भी उससे जो अन्य अर्थकी प्रतीति होती रहती है उस प्रतीतिका करानेवाला शब्द-व्यापार 'अभिधामूला-व्यञ्जना' नामसे कहा जाता है। यह अभिधामूला-व्यञ्जनाका लक्षण हुआ। अब यहाँ यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि अनेकार्थक शब्दका एकार्थमें नियन्त्रण करनेवाले संयोगादिका क्या अभिप्राय है। इस जिज्ञासाकी निवृत्तिके लिए ग्रन्थकारने अपने व्याकरणानुगत सिद्धान्तके अनुसार भर्तृहरि-प्रणीत व्याकरणशास्त्रके प्रसिद्ध ग्रन्थ 'वाक्यपदीय' से दो कारिकाएँ उद्धृत की हैं। जिनका अरथ निम्नलिखित प्रकार है- १ संयोग, २ विप्रयोग, ३ साहचर्य, ४ विरोधिता, ५ अर्थ, ६ प्रकरण, ७ लिङ्ग, ८ अन्य शब्दकी सन्निधि, ६ सामर्थ्य, १० औचित्य, ११ देश, १२ काल, १३ [पुल्लिङ्ग-स्त्रीलिङ्ग आदि रूप ] व्यक्ति और १४ स्वर आदि [अनेकार्थक ] शब्दके अर्थका निर्णय न होनेपर विशेष अर्थमें निर्णय करानेके कारण होते हैं। [भर्तृहरि द्वारा प्रतिपादित ] इस मार्गसे [निम्नलिखित उदाहरणोंमें अनेकार्थ शब्दोंका एक अर्थमें नियन्त्रण किया जा सकता है]। भर्तृहरिकी इन कारिकाओंके आधारपर अनेकार्थक शब्दोंका एकार्थसे नियन्त्रण करनेके जो १४ कारण दिखलाये हैं इन सबके उदाहरण दिखलाते हुए आगे उनकी व्याख्या करेंगे। सबसे पहिले 'संयोग' और 'वियोग' के उदाहरण देते हैं-
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७८ काव्यप्रकाश: [का० १६, सू० ३२
'सशंखचक्रो हरिः, 'अशंखचक्रो हरिः' इति अच्युते। 'राम-लक्ष्मणौ' इति दाशरथौ । 'रामार्जुनगतिस्तयोः' इति भार्गव-कार्तवीर्ययोः । 'स्थाणुं भज भवच्छिदे' इति हरे। 'सर्व' जानाति देव:' इति युष्मदर्थे। संयोग और विप्रयोगकी नियामकता यमानिलेन्द्रचन्द्रार्कविष्णुसिंहांशुवाजिषु । शुकाहिकपिभेकेषु हरिरना कपिले त्रिषु ॥ अर्थात् पुल्लिङ्गमें प्रयुक्त हरि शब्द यम, अनिल, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, विष्णु, सिंह, रश्मि, घोड़ा, तोता, सर्प, बन्दर और मेढ़कका वाचक होता है और कपिल अर्थात् पीले अर्थके 'हरि' शब्दका तीनों लिङ्गोंमें प्रयोग हो सकता है। इस कोशके अनुसार हरि शब्दके अनेक अर्थ हो सकते हैं परन्तु उसके साथ जब शंख-चक्र्कके संयोग या विप्रयोगका वर्णन हो तो उन दोनों ही दशाओंमें 'हरि' शब्द विष्णुका ही वाचक होगा। क्योंकि शंख-चक्रका योग तथा वियोग उन्हींके साथ हो सकता है। इसलिए- 'शंख-चक्र सहित हरि' [ यहाँ संयोगसे ] और 'शंख-चक्रसे रहित हरि' [ यहाँ विप्रयोगसे ] यह (हरि शब्द) अच्युत में नियन्त्रित होता है]। साहचर्य-विरोधकी नियामकता राम: पशुविशेषे स्याज्जामदग्न्ये हलायुधे। राघवे चासिते श्वेते मनोज्ञेऽपि च वाच्यवत् ।। इस प्रकार राम शब्दके अनेक अर्थ होते हुए भी जब लक्ष्मणके नामके साथ 'रामलक्ष्मणौ' इस रूपमें राम पदका प्रयोग किया जाता है तब साहचर्यके कारण उससे दशरथ-पुत्र रामका ही ग्रहण होता है और जब 'रामार्जुनौ' इस प्रकारका प्रयोग होता है तब परशुराम तथा कार्तवीर्य अरजुनका विरोध होनेसे विरोधिताके द्वारा उसका परशुराम अर्थमें नियन्त्रण हो जाता है। 'राम-लक्ष्मण' इस [प्रयोग ] में [साहचर्यके कारण राम और लक्ष्मण दोनों शब्दोंका ] दशरथके पुत्रमें [नियन्त्रण होता है] और 'रामार्जुनगतिस्तयोः' [प्रयोग]में [ 'राम' और 'अर्जुन' इन दोनों शब्दोंका विरोधिताके कारण क्रमशः ] परशुराम तथा कार्तवीर्य अर्जुन अर्थमें [नियन्त्रण होता है ]। अर्थ और प्रकरणकी नियामकता इसी प्रकार 'स्थाणु' शब्दके कोशमें निम्नलिखित प्रकार अ्नेक अ्र्पर्थ दिखलाये हैं- स्थाणुर्वा ना ध्रुवः शंकुः। स्थाणू रुद्र उमापतिः । अर्थात् 'स्थाणु' शब्दके वृक्षका ठूठ या स्थिर खड़ा हुआ खूंटा तथा शिव आदि अनेक अर्थ होते हैं परन्तु जब उसका प्रयोग संसारसे पार उतारनेकी प्रार्थनामें किया जाय तो वह 'अर्थ' या कार्य केवल शिवसे ही सिद्ध हो सकता है इसलिए उस दशामें 'अर्थ' अर्थात् प्रयोजनके कारण 'स्थाणु' पद शिवका वाचक होगा। 'संसारके पार उतरनेके लिए स्थाणुका भजन कर'। यहाँ [स्थाणु शब्द प्रयोजनरूप अर्थके कारण ] शिवमें [नियन्त्रित हो जाता है ]। [इसी प्रकार ] 'देव सब जानते है' यहाँ [प्रकरणसे अनेकार्थक 'देव' शब्द ] 'आप' ['अर्थ' ] में [नियन्त्रित हो जाता है ]।
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का० १६, सू० ३२] द्वितीय उल्लास: ७६ 'कुपितो मकरध्वजः' इति कामे। 'देवस्य पुरारातेः' इति शम्भौ। 'मधुना मत्तः कोकिल:' इति वसन्ते। 'पातु वो दयितामुखम्' इति साम्मुख्ये। 'भात्यत्र परमेश्वरः' इति राजधानीरूपाद् देशाद्राजनि। 'चित्रभानुविभाति' इति दिने रवौ रात्रौ वह्नौ। मित्रं भाति' इति सुहृदि। 'मित्रो भाति' इति रवौ। इन्द्रशत्रुरित्यादौ वेद एव न काव्ये स्वरो विशेषप्रतीतिकृत् । [इसी प्रकार मकरध्वज पद समुद्र, औषधि विशेष और कामदेव आदि अनेक अर्थोंका वाचक है। परन्तु] 'मकरध्वज कुपित हो रहा है' यहां [लिङ्ग अर्थात् कोपरूप चिह्नसे मकरध्वज पद ] कामदेवमें [नियन्त्रित हो जाता है ]। 'पुराति देवका' यहाँ [अनेकार्थक 'देव' शब्द' पुराराति रूप अन्य शब्दके सन्निधानके कारण] 'शम्भु' अर्थमें [नियन्त्रित हो जाता है ]। 'कोकिल मधुसे मत्त हो रहा है' यह [कोकिलको मत्त करनेका सामर्थ्य केवल वसन्तमें होनेसे 'मधु' शब्द सामर्थ्य-वश ] 'वसन्त' अर्थमें [नियन्त्रित हो जाता है ]। 'पत्नीका मुख तुम्हारी रक्षा करे' इसमें [अनेकार्थक 'मुख' शब्द औचित्यके कारण 'साम्मुख्य' अर्थात् ] 'आनुकूल्य' अर्थमें [नियन्त्रित हो जाता है ]। 'यहाँ परमेश्वर शोभित होते हैं' इसमें राजधानीरूप देशके कारण [अनेकार्थक 'परमेश्वर' शब्द] 'राजा' अर्थमें [नियन्त्रित हो जाता है ]। 'चित्रभानु चमक रहा है' यहां [अनेकार्थक चित्रभानु शब्द ] दिनमें 'सूर्य' अर्थमें, और रात्रिमें 'अग्नि' अर्थमें [कालके कारण नियन्त्रित हो जाता है ]। 'मित्रं भाति' 'मित्र शोभित होता है' यह [नपुंसकलिङ्गमें प्रयुक्त हुआ अनेकार्थक 'मित्र' शब्द 'व्यक्ति' अर्थात् लिङ्गके कारण] 'सुहृत्' अर्थमें [नियन्त्रित हो जाता है ]। 'मित्रो भाति'[ पुल्लिङ्गमें प्रयुक्त हुआ अनेकार्थक 'मित्र' शब्द लिङ्गके ही सामर्थ्यसे ] सूर्य अर्थमें [नियन्त्रित हो जाता है। सुहृत्का वाचक मित्र शब्द नपुंसकलिङ्गमें और सूर्यका वाचक मित्रशब्द पुल्लिङ्गमें प्रयुक्त होता है]। ऊपर भर्तृहरिकी जो करिकाएँ उद्धृत की थीं उनमें अनेकार्थ शब्दका एकार्थमें नियन्त्रण करने- वाले संयोगादि १४ हेतु बतलाये थे। उनमें १३ के उदाहरण दिखला दिये गये हैं। चौदहवां हेतु 'सार' कहा गया है। यह उदात्त आदि स्वरोंका भेद वेदमें ही अर्थभेदका नियामक होता है, काव्यमें नहीं। इसलिए यहाँ उसका उदाहरण नहीं दिया गया है। इस बातको कहते हैं- 'इन्द्रशत्र' आदिमें वेदमें ही स्वर अर्थविशेषका बोधक होता है, काव्यमें नहीं [ इसलिए उसके लौकिक उदाहरण नहीं दिये हैं ]। स्वरभेदका प्रभाव 'इन्द्रशत्रु' यह स्वरका वैदिक-प्रयोग ग्रन्थकारने अर्थभेद दर्शानेके लिए प्रस्तुत किया है, वह भी उन्होंने अपनी परम्पराके अनुसार व्याकरणके प्रसिद्ध ग्रन्थ महाभाष्यसे उद्धृत किया है। महाभाष्यमें व्याकरणके अध्ययनके मुख्य १४ प्रयोजन बतलाये हैं। उनमें दुष्ट शब्दोंके प्रयोगसे बचना भी व्याकरणका एक प्रयोजन बतलाया गया है। इसके विषयमें महाभाष्यकारने लिखा है- "दुष्ट: शब्द: स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह। स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्नु: स्वरतोऽपराधात्॥"
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८० काव्यप्रकाश: [का० १६, सू० ३२
आदिग्रहणात्- एद्दहमेत्तत्त्थणिआ एद्दहमेत्तेहिं अच्छिवत्तेहिं। एद्दहमेत्तावत्था एद्दहमेत्तेहिं दिअएहिं ॥११॥ [एतावन्मात्रस्तनिका एतावन्मात्राभ्यामक्षिपत्राभ्याम् । एतावन्मात्रावस्था एतावन्मात्रैदिवसैः ॥ इति संस्कृतम् ] इत्यादावभिनयादयः । इत्थं संयोगादिभिरर्थान्तराभिधायकत्वे निवारितेऽप्यनेकार्थस्य शब्दस्य यत् क्वचिदर्थान्तरप्रतिपादनम्, तत्र नाभिधा नियमनात् तस्याः । न च लक्षणा मुख्यार्थ- बाधाद्यभावात्। अपितु अञ्जनं व्यञ्जनमेव व्यापारः। यथा- इस श्लोकमें 'इन्द्रशत्ुः' सम्बन्धी जिस घटनाका संकेत किया गया है उस कथाका उल्लेख तैत्तिरीयसंहिताके द्वितीय काण्डके पञ्चम प्रपाठकमें पाया जाता है, जिसका सारांश यह है कि- त्वष्टाका पुत्र विश्वरूप, जो असुरोंका भानजा भी होता था, देवताओंका पुरोहित था। वह प्रत्यक्षरूपसे देवताओ्ंका कार्य करता था परन्तु परोक्षरूपसे असुरोंका भी कार्य करता रहता था। इसलिए इन्द्रने कुद्ध होकर वज्रसे उसका सिर काट दिया। उसके मारे जानेपर त्वष्टाने इन्द्रको मारनेवाले दूसरे पुत्रको उत्पन्न करनेके लिए यज्ञका आरम्भ किया। उस यज्ञमें उसने 'इन्द्रशत्ुर्वधस्व' आदि मन्त्रका 'ऊह' करके पाठ किया। उसका अभिप्राय यह था कि 'इन्द्रके मारनेवाले पुत्रकी वृद्धि हो'। 'शत्रु' शब्द यहाँ 'शातयिता' मारनेवालेके अर्थमें प्रयुक्त हुआ है। 'इन्द्रशत्रु' पदमें दो प्रकारके समास हो सकते हैं। एक 'इन्द्रस्य शत्रु: शातयिता इन्द्रशत्रु' अर्थात् इन्द्रका मारनेवाला इस अर्थमें षष्ठीतत्पुरुष समास हो सकता है और दूसरा 'इन्द्रः शत्रुः शातयिता यस्य स इन्द्रशत्ुः' 'इन्द्र जिसको मारनेवाला है' इस विग्रहमें बहुव्रीहि समास हो सकता है। इन दोनों समासोंसे शब्दका अर्थ बिलकुल उलटा हो जाता है। एक जगह षष्ठीतत्पुरुष समासमें 'इन्द्रको मारने वालेपुत्रकी वृद्धि हो' यह अरथ होता है और दूसरी ओर बहुव्रीहि समासमें 'इन्द्र जिसको मारे' अर्थात् जिसकी मृत्यु इन्द्रके हाथसे हो उस पुत्रकी उत्पत्ति हो, यह अर्थ हो जाता है। इनमेंसे षष्ठीतत्पुरुष समासवाला अर्थ यजमानको अभीष्ट था। उस षष्ठीतत्पुरुष समासमें 'अन्तोदात्त' स्वरका प्रयोग होना चाहिये था, परन्तु मन्त्र पढ़ते समय उसने 'इन्द्रशत्ु' शब्दका 'आद्युदात्त' उच्चारण किया, जिससे प्रार्थनाका अर्थ ही उल्टा हो गया। इस प्रकार अन्तोदात्त और आद्युदात्त स्वरके भेदसे अनेकार्थक वेदमें ही 'इन्द्रशत्रु' शब्दका भिन्न-भिन्न अथोंमें नियन्त्रण होता है। अतः यहाँ स्वरके उदाहरण नहीं दिये हैं। संकेतकी नियामकता कारिकामें आदि [पदके ] ग्रहण किये जानेसे-
गयी।।११।। इतने बड़े स्तनोंवाली, इतनी बड़ी आखोंसे [ उपलक्षित वह तरुणी ] इतने दिनोंमें ऐसी हो इत्यादिमें अभिनय आदि [ कृत संकेत एकार्थमें नियन्त्रण करनेवाले होते हैं ]। इस प्रकार संयोग आदिके द्वारा अन्य अर्थके बोधकत्वका निवारण हो जानेपर भी अनेकार्थ जो कहीं दूसरे अर्थका प्रतिपादन करता है वहाँ अभिधा नहीं हो सकती है, क्योंकि उसका नियन्त्रण हो चुका है और मुख्यार्थबाध आदिके न होनेसे लक्षणा भी नहीं हो सकती है। अपितु अञ्जन अर्थात व्यञ्जनाव्यापार ही होता है। जैसे-
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का० २०, सू० ३३-३४ ] द्वितीय उल्लास: ८१ भद्रात्मनो दुरधिरोहतनोविशालवंशोन्नतेः कृतशिलीमुखसंग्रहस्यस यस्यानुपप्लुतगतेः परवारणस्य दानाम्बुसेकसुभगः सततं करोऽभूत् ॥१२। [सू० ३३ ] तद्युक्तो. व्यञ्जकः शब्दः । / तद्युक्तो व्यञ्जनयुक्त: [सू० ३४ ] यत् सोऽर्थान्तरयुक् तथा। अर्थोऽपि व्यञ्जकस्तत्र सहकारितया मतः ॥२०॥ तथेति व्यञ्जकः । इति काव्यप्रकाशे शब्दार्थस्वरूपनिर्णयो नाम द्वितीय उल्लासः । निम्नलिखित श्लोकमें किसी राजाकी स्तुति की जा रही है। इसलिए उसमें जितने अनेकार्थक शब्द आये हैं उन सबका प्रकरणसे एक अर्थमें नियन्त्रण हो जाता है। फिर भी उसमें हाथी-परक दूसरे अर्थ और उसके साथ उपमानोपमेयभावकी भी प्रतीति होती है। राजाके सारे विशेषण हाथीके पक्षमें भी लगते हैं। वह दूसरी प्रतीति अभिधामूला व्यञ्जनासे ही होती है इस बातके प्रतिपादनके लिए यह उदाहरण है। सुन्दर रूपवाले, दूसरोंसे अनभिभवनीय शरीरसे युक्त, उच्च कुलमें उत्पन्न, जिसने बाणोंका संग्रह [दृढ़ अभ्यास ] कर रखा है, जिसकी गति [अथवा ज्ञान अनुपप्लुत अर्थात् ] अबाधित है और जो [पर अर्थात् ] शत्रुओंका निवारण करनेवाला है उस राजाका हाथ [हाथीके सू ड़के समान ] सदा दानके [संकल्प पढ़कर छोड़े जानेवाले ] जलसे सुन्दर रहता था। इस प्रकार राजा-परक अर्थ हो जानेपर हाथी-परक दूसरा अर्थ इस प्रकार प्रतीत होता है- भद्र जातिवाले, जिसके ऊपर चढ़नेमें कठिनाई होती है [ अर्थात् बहुत ऊँचे ], जिसकी पीठकी हड्डी [वंश ] बहुत विशाल और उन्नत है, जिसकी गति [अनुपप्लुत अर्थात् ] धीर है और जिसने [अपने मद-जलके कारण बहुत-से ] भ्रमरोंका संग्रह कर रखा है इस प्रकारके [ परवारण अर्थात् ] उत्तम हाथीकी [कर अर्थात् ] सूंड़ [के समान राजाका हाथ ] मद-जलके बहनेसे सदा सुन्दर मालूम होती है ॥१२॥ शाब्दी व्यञ्जनामें अर्थका सहयोग इस प्रकार शब्द-व्यञ्जनाके लक्षणामूला तथा अभिधामूला दोनों भेदोंका निरूपण हो जानेके बाद उसमें अर्थकी सहकारिताका प्रतिपादन करते हैं- [सू० ३३ ]-उस [व्यञ्जना-व्यापार ] से युक्त शब्द व्यञ्जक [शब्द कहलाता] है। उससे युक्त अर्थात् व्यञ्जना-व्यापारसे युक्त।- [सू० ३४]-और क्योंकि वह [व्यञ्जक शब्द] दूसरे अर्थके योगसे[ अर्थात् अपने मुख्यार्थको बोधन करनेके बाद ] उस प्रकारका [अर्थात् दूसरे अर्थका व्यञ्जक ] होता है, इसलिए उसके साथ सहकारी रूपसे अर्थ भी व्यञ्जक होता है। काव्यप्रकाशमें शब्द और अर्थके स्वरूपका निरूपण नामक द्वितीय उल्लास समाप्त हुआ श्रीमदाचार्य-विश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोमणि-विरचितायां काव्यप्रकाशदीपिकायां कतक आप्ाडजवतीया हिन्दी-व्याख्यायां द्वितीय उल्लास: समाप्तः । -0-
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तृतीय उल्लास: [सू० ३५] अर्था: प्रोक्ता: पुरा तेषाम्।3ी३ सिकाहर [सू० ३६ ] अर्थव्यञ्जकतोच्यते। कीदृशीत्याह- [सू० ३७ ] वक्तृबोद्धव्यकाकूनां वाक्यवाच्यान्यसन्निधेः ॥२१॥। प्रतिभाजुषाम् योऽर्थस्यान्यार्थधीहेतुर्व्यापारो व्यक्तिरेव सा ॥२२।। बोद्धव्यः प्रतिपाद्यः। काकुर्ध्वनेविकारः । प्रस्तावः प्रकरणम् । अर्थस्य वाच्य- लक्ष्य-व्यङ्गयात्मनः काव्यप्रकाशदीपिकार्यां तृतीय उल्लास: उल्लाससङति द्वितीय उल्लासमें शब्द तथा अर्थके स्वरूपका निर्णय करते हुए ग्रन्थकारने वाचक, लक्षक और व्यञ्जक तीन प्रकारक शब्द तथा वाच्य, लक्ष्य और व्यङ्गय तीन प्रकारके अरथोंका प्रतिपादन किया था। उसके साथ लाक्षणिक शब्दोंके प्रसङ्गमें 'प्रयोजन'के बोधके लिए व्यञ्जना-वृत्तिकी अनिवार्य आ्र्रवश्यकताका प्रतिपादन किया था। वह व्यञ्जना-शक्ति भी दो प्रकारकी होती है, एक 'शाब्दी व्यञ्जना' और दूसरी 'आर्थी व्यञ्जना'। इनमेंसे 'शाब्दी व्यञ्जना'के भी दो भेद होते हैं, एक 'अभिधामूला व्यञ्जना' और दूसरी 'लक्षणामूला व्यञ्जना'। शाब्दी व्यञ्जनाके इन दोनों भेदोंका निरूपण द्वितीय उल्लासमें किया जा चुका है। इस तृतीय उल्लासमें आर्थी व्यञ्जनाके समस्त भेदोंके उदाहरण आदि देकर उसका निरूपण करना है। इसीलिए इस उल्लासका नाम 'अर्थव्यञ्जकतानिर्णय' रखा गया है। इस उल्लासके प्रारम्भमें पूर्वकथित अरथोंका स्मरणकर ग्रन्थकार 'आर्थी व्यञ्जना'का निरूपण प्रारम्भ करते हैं। अर्थके भेद [सू० ३५]-उनके अर्थोंका वर्णन पहले किया जा चुका है। उनके अर्थात् वाचक, लाक्षणिक और व्यञ्जक शब्दोंके अर्थ वाच्य, लक्ष्य और व्यङ्गय [तीन प्रकारके बतलाये े]। [सू० ३६ ]-उनकी अर्थव्यञ्जकता [अर्थात् उनके ऊपर आश्रित आर्थी व्यञ्जना] का अब वर्णन करते हैं। आर्थी व्यञ्जनाके भेद वह [आर्थी व्यञ्जना ] किस प्रकारकी [होती है] यह कहते हैं -- [सू० ३७] -- १. वक्ता, २. बोद्धव्य, ३. काकु, ४. वाक्य, ५. वाच्य, ६. अन्यसन्निधि, ७. प्रस्ताव, ८. देश, ६. काल, १०. [आदि शब्दसे ग्राह्य ] चेष्टादिके वैशिष्टयसे [प्रतिभावानों] सहृदयोंको अन्यार्थकी प्रतीति करानेवाला अर्थका जो व्यापार होता है वह 'आर्थी व्यञ्जना' ही [कहलाता] है। बोद्धव्यका अर्थ प्रतिपाद्य [अर्थात् जिससे बात कही जाय वह] है। 'काकु' ध्वनिके विकारको कहते हैं [ उसका 'भिन्नकण्ठध्वनिर्धोर: काकुरित्यभिधीयते' इस प्रकार किया गया है]। प्रस्तावका अर्थ प्रकरण है। अर्थका अर्थात् वाच्य, लक्ष्य, व्यङ्गय-रूप [अर्थ] का [व्यापार 'आर्थो व्यञ्जना' कदलाता है]।
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का० २२, सू० २७] तृतीय उल्लास: ८३
कमेणोदाहरणानि- गकायएक अइपिहुलं जलकुंभं घेत्तूण समागदहि सहि तुरिअम्0 किक समसेअसलिलणीसासणीसहा वीसमामि खणम् ॥१ [अतिपृथुलं जलकुम्भं गृहीत्वा समागतास्मि सखि त्वरितम्। श्रमस्वेदसलिलनिःश्वासनिःसहा विश्राम्यामि क्षणम्। इति संस्कृतम् ] अत्र चौर्यरतगोपनं व्यज्यते। ओण्णिदं दोव्वल्लं चिंता अलसत्तणं सणीससिअम्। मह मंदभाइणीए केरं सहि तुह वि अहह परिहवइ ॥१४।।ा्डा गिड [औन्निद्य दौर्बल्यं चिन्तालसत्वं सनिःश्वसितम्। मम मन्दभागिन्याः कृते सखि त्वामपि अहह परिभवति ॥ इति संस्कृतम् ] अत्र दूत्यास्तत्कामुकोपभोगो व्यज्यते।
कोडा [आर्थो व्यञ्जनाके उन दसों प्रकारोंके ] कमशः उदाहरण [देते हैं] -- १. वक्ताके वैशिष्टयमें व्यञ्जनाका उदाहरण हे सखि, मैं बड़ा भारी पानीका घड़ा लेकर भागी चली आ रही हूँ। परिश्रमके कारण पसीना और निःश्वाससे परेशान हो गयी हूँ, इसलिए थोड़ी देर [यहाँ बैठकर ] सुस्ताऊँगी ।।१३।। इसमें (वक्ताके वैशिष्टयसे) चौर्यरत छिपानेकी प्रतीति होती है। इसका अभिप्राय यह है कि कोई स्त्री पानी भरनेके बहाने उपनायकके पास गयी और उसके साथ सम्भोग करके आ रही है। छिपकर किये गये इस सुरतके चिह्नरूप पसीना आदि उसके मुखपर स्पष्टरूपसे व्यक्त हो रहे हैं। उनको देखकर शायद सखी चौर्यरतकी शङ्का कर बैठे, इसलिए कहनेवाली स्त्री उस शङ्काके निवारणके लिए पहिले ही कह देती है कि पानीका घड़ा लेकर और जल्दी-जल्दी चलकर आनेके कारण यह सब हो रहा है। अर्थात् इस प्रकार वह अपने चौर्यरतको छिपानेका प्रयत्न कर रही है, यह बात वक्ताके वैशिष्टयसे व्यङ्ग्य है। २. बोद्धव्यके वैशिष्टयमें व्यञ्जनाका उदाहरण आगे बोद्धव्यके वैशिष्टयमें व्यञ्जनाका उदाहरण देते हैं- हे सखि, मुझ मन्दभागिनीके कारण नींदका न आना, दुर्बलता, चिन्ता, आलस्य, निःश्वास आदि तुमको भी भोगने पड़ रहे है यह बड़े खेदकी बात है ॥१४॥ इसमें दूतीका उस [नायिका] के कामुकके साथ भोग व्यङ्गय है। हिन्दीके निम्नलिखित पद्यको वक्ता तथा बोद्धव्य दोनोंके वैशिष्टयमें विशेष अर्थकी व्यञ्जनाके उदाहरणके रूपमें प्रस्तुत किया जा सकता है- यदि अवसर किन कामना निज पूरन करि लेहु। ये दिन फिर ऐहैं नहीं यह क्षण भंगुर देहु।। FAFदोहेका अर्थ स्पष्ट है। यदि इसका वक्ता या बोद्धव्य कोई कामुक व्यक्ति है तो उससे विषय- वासनाकी पूर्ति व्यङ्गय होगी और यदि उसका वक्ता या बोद्धव्य कोई विरक्त पुरुष है तो उससे धर्म- साधना या मोक्ष-प्राप्ति व्यङ्गय होगी। इस प्रकार यह एक ही दोहा वक्ता और बोद्धव्य दोनोंके वैशिष्टयमें होनेवाली आर्थी व्यज्जनाका उदाहरण है।
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Tका न्यत्रकाश: [का० २२, सू० ३७ तथाभूतां दृष्टवा नृपसदसि पाञ्चालतनयां वने व्याध: साध सुचिरमुषितं वल्कलधरःर लवीग विराटस्यावासे स्थितमनुचरितारम्भनिभृतंग गुरु: खेदं खिन्ने मयि भजति नाद्यापि कुरुषु ।।१५।। 5] अत्र मयि न योग्यः खेदः कुरुषु तु योग्य इति काक्वा प्रकाश्यते।ग ३. काकुके वैशिष्टचमें व्यञ्जनाका उदाहरण इस प्रकार वक्ता तथा बोद्धव्यके वैशिष्टयमें 'आर्थी व्यञ्जना'के दो उदाहरण देनेके बाद 'काकु' द्वारा व्यञ्जनाका तीसरा उदाहरण देते हैं। 'काकु' शब्दका अर्थ विशेष प्रकारकी कण्ठध्वनि, अर्थात् बोलनेका विशेष प्रकारका लहजा होता है। उस बोलनेके विशेष ढंगसे भी अरथकी व्यञ्जना होती है। इसके प्रतिपादनके लिए 'वेणीसंहार' नाटकके प्रथम अङ्गमेंसे भीमकी उक्तिको उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया गया है। इस प्रसङ्गमें भीम और सहदेवका संवाद हो रहा है। भीमके कोधको देखकर सहदेव भीमसे कहते हैं कि आपके इस प्रकारके व्यापारको सुनकर 'कदाचित् खिद्यते गुरुः' शायद गुरु अर्थात् युधिष्ठिर नाराज हों। उसके उत्तरमें भीमसेन कह रहे हैं कि 'गुरुः खेदमपि जानाति' अच्छा, गुरु अर्थात् युधिष्ठिर नाराज होना भी जानते हैं तो फिर- उस राजसभामें पाञ्चाली [द्रौपदी ] की उस प्रकारकी [बाल तथा वस्त्र खींचे जानेकी ] अवस्था- को देखकर [गुरु नाराज नहीं हुए, उनको क्रोध नहीं आया] फिर वनमें वल्कल धारण कर चिरकाल [ बारह वर्ष ] तक व्याधोंके साथ रहते रहे [ तब भी उनको क्रोध नहीं आया ] फिर विराटके घरमें [रसोइया आदिके ] अनुचित कायोंको करके छिपकर जो हम रहे [ उस समय भी गुरुको क्रोध नहीं आया] और आज भी उनको कौरवोंपर तो क्रोध नहीं आ रहा है। पर मैं कौरवोंपर क्रोध करता हूँ तो मेरे ऊपर नाराज होते हैं ॥१५॥ असाष यहाँ मेरे ऊपर नाराज होना उचित नहीं है। कौरवोंपर नाराज होना उचित है यह 'काकु' से प्रकाशित होता है। काक्वाक्षिप्तकी ध्वनिरूपतामें शङ्का-समाधान यहाँपर एक शङ्का यह हो सकती है कि आगे चलकर पञ्चम उल्लासमें गुणीभूतव्यङ्गय-काव्यके आठ भेदोंकी गणना करायी है, उनमें 'वाच्यसिद्धयङ्गव्यङ्गय' और 'काक्वाक्षिप्तव्यङ्गय' नामसे गुणी- भूतव्यङ्गय काव्यके दो भेद गिनाये गये हैं और वहाँ भी 'वेणीसंहार' से ली गयी भीमकी इसी प्रकारकी निम्नलिखित उक्तिको काक्वाक्षिप्तव्य ङ्गयके उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया गया है- मथ्नामि कौरवशतं समरे न कोपाद् दुःशासनस्य रुधिरं न पिबाम्युरस्तः । संचूर्णयामि गदया न सुयोधनोरू सन्धिं करोतु भवतां नृपतिः पणेन । अर्थात् यदि तुम्हारे राजासाहब अर्थात् युधिष्ठिरजी किसी शर्तपर कौरवोंके साथ सन्धि कर लें तो क्या मैं युद्धमें सौ कौरवोंका नाश करना छोड़ दूँगा ? अथवा दुःशासनकी छातीका खून नहीं पीऊँगा ? अथवा गदासे दुर्योधनकी जाँघ नहीं तोडूंगा ? यह इसका वाच्य अर्थ है। परन्तु भीमके बोलनेके ढंगसे काकु द्वारा यह व्यक्त होता है, भले ही युधिष्ठिर सन्धि कर लें पर मैं तो यह सब काम करके ही रहूँगा।
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का० २२, सू० ३७] तृतीय उल्लास: ८५ न च वाच्यसिद्धयङ्गमत्र काकुरिति गुणीभूतव्यङ्गयत्वं शङ्कयम्। प्रश्नमात्रे- णापि काकोर्विश्रान्ते: ।िशक क तइआ मह गंडत्थलणिमिअं दिठ्ठिं ण णेसि अण्णत्तो। एण्हि सच्चेअ अहं ते अ कवाला ण सा दिठिठ ॥१६ [तदा मम गण्डस्थलनिमग्नां दृष्टि नानषीरन्यत्र। फतम् ] इदानीं सैवाहं तौ च कपोलौ न सा दृष्टिः ॥ इति संस्कृतम् ] अत्र मत्सखीं कपोलप्रतिबिम्बितां पश्यतस्ते दृष्टिरन्यैवाभूत्। चलितायाँ तु तस्यां अन्यैव जातेत्यहो प्रच्छन्नकामुकत्वं ते, इति व्यज्यते। यहाँ 'काकु' से आक्षिप्त अर्थ होनेसे इसे गुणीभूतव्यङ्गय काव्य माना गया है। 'तथाभूताम्' इत्यादि प्रकृत उदाहरण भी उसी प्रकारका है, इसलिए इसे भी काक्वाक्षिप्त होनेसे अथवा वाच्यसिद्धिका अ्रङ्ग होनेसे गुणीभूतव्य ङ्गय ही मानना उचित है। फिर उसे ध्वनि-काव्यके उदाहरणरूपमें कैसे प्रस्तुत किया गया है ? यह शङ्का हो सकती है ? उसके निवारणके लिए ग्रन्थकार कहते है कि-घ ऋग8 यहाँ काकु [से लभ्य अर्थ ] वाच्यकी सिद्धिका अङ्ग है, इसलिए गुणोभूतव्यङ्गय् [काव्य ] है [ध्वनिकाव्य नहीं है] यह शङ्का नहीं करनी चाहिये। क्योंकि प्रश्नमात्रसे भी काकुकी विशान्ति हो सकती है। [अर्थात् यहाँ काकु केवल प्रश्नमात्रमें ही विश्रान्त हो जाती है। उससे व्यङ्गचार्थ आक्षिप्त नहीं होता है। ] इसका अभिप्राय यह है कि काकुसे एक तो यह प्रश्न निकलता है कि गुरु मेरे ऊपर नाराज हो रहे हैं, कौरवोंपर नहीं ? और दूसरी बात प्रतीत होती है कि युधिष्ठिरका मुझपर क्रोध करना उचित नहीं है, इनको मेरे स्थानपर कौरवोंपर क्ोध करना चाहिये था। यह दूसरी बात व्यङ्गय अर्थ है। परन्तु वह काकुसे जो प्रश्न सूचित होता है उसकी सिद्धिका अङ्ग प्रतीत होता है, इसलिए वाच्यसिद्धिका अ्रङ्ग होनेसे यह गुणीभूतव्य ङ्गय होना चाहिये यह पूर्वपक्षका भाव है। ग्रन्थकार उसके उत्तरमें कहते हैं कि इस व्यङ्गय अर्थको काकुका अ्रङ्ग माननेकी आवश्यकता नहीं है। क्योंकि यह का कुकी विश्रान्ति तो प्रश्नमात्रमें ही हो सकती है, उससे व्यङ्गयार्थ आक्षिप्त नहीं होता है। इसलिए यहाँ व्यङ्गय अर्थ न काक्वाक्षिप्त ही है और न वाच्यकी सिद्धिका अ्रङ्ग ही है। अतः यह ध्वनिकाव्यका उदाहरण हो सकता है। गुणीभूत- व्यङ्गय नहीं है। वैसे तो यह ध्वनिकाव्यके उदाहरणरूपमें नहीं, केवल काकुकी व्यञ्जकताका उदाहरण दिया गया है। काकुसे व्यङ्गय वह अर्थ, चाहे गुणीभूत हो या प्रधान, इस प्रकृत उदाहरणमें कोई अन्तर नहीं पड़ता है। हिन्दीमें 'सोह कि कोकिल विपिन करीरा' यह पद्यांश 'काकु'की व्यञ्जनाका सुन्दर उदाहरण है। उसे पढ़ते ही स्पष्ट हो जाता है कि करीरके वनमें कोकिल शोभित नहीं हो सकता है। ४. वाक्यवैशिष्टयमें व्यञ्जनाका उदाहरण उस समय मेरे गालपर गड़ायी हुई [अपनी ] वृष्टिको कहों और नहीं ले जा रहे थे। अब मैं वही हूं, मेरे गाल भी वे ही हैं, किन्तु तुम्हारी वह [ मेरे गालपर ही गड़ी रहनेवाली ] दृष्टि नहीं है ॥१६॥ ।9B यहाँ मेरे गालपर प्रतिबिम्बित मेरी सखीको देखते हुए तुम्हारी दृष्टि कुछ और ही प्रकारकी थी, उसके चले जानेपर कुछ और ही हो गयी है इसलिए तुम्हारे प्रच्छन्न कामुकत्वपर आश्रर्य होता है। यह [अर्थ नायिकाके वाक्यसे ] व्यक्त होता है।क मह स1 किह
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काव्यप्रकाश: [का० २२, सू० ३७
विाभन्दार उद्देशोडयं सरसकदलीश्रेणिशोभातिशायीीe. FF कुञ्जोत्कर्षाङकुरितरमणीविभ्रमो नर्मदायाः। तगालरेकियक शी किञ्चैतस्मिन् सुरतसुहृदस्तन्वि ते वान्ति वाता येषामग्रे सरति कलिताकाण्डकोपो मनोभू:॥१७। अत्र रतार्थ प्रविशेति व्यङ्गयम्
५. वाच्यवैशिष्टयमें व्यञ्जनाका उदाहरण हे तन्वि [इस विशेषणसे मदनवेदना-प्रस्तत्व सूचित होता है ], सरस हरी-हरी केलोंकी पंक्तिसे अत्यन्त सुन्दर लगनेवाला और कुञजोंके उत्कर्षके कारण रमणियोंके हाव-भावोंको अङकुरितकर देनेवाला नर्मदा [केवल सामान्य नवीमात्र नहीं अपितु 'नर्म रतिसुखं ददानि इति नर्मदा' जो असाधारण रतिसुखका प्रदान करनेवाली है उसी ] का ऊँचा प्रदेश है और वहाँ सुरतके मित्र [पुनः-पुनः सुरतके लिए उत्तेजना देनेवाले ] वे वायु बहते हैं जिनके आगे [वसन्त आदि रूप ] अवसरके न होनेपर भी चाप धारण किये हुए [अत्यन्त उग्र रूपमें उत्तेजना देनेवाला ] कामदेव चलता है ।।१७।। [ यहाँ सुरतके लिए [ कुञ्जके ] भीतर चलो यह [वाच्यवशिष्टयसे ] व्यङ्गय है। कि यहाँ न्मदाके उन्नत प्रदेशरूप स्थानविशेष तथा उसके विशेषणीभूत वायु, कुञ्ज आदि रूप वाच्यके वैशिष्टयसे उक्त व्यङ्गयकी प्रतीति होती है, इसलिए यह वाच्यवैशिष्टयका उदाहरण दिया गया है। वाक्य और वाच्य वैशिष्टचका अन्तर वक्ता और बोद्धव्यके वैशिष्टयमें जैसे आर्थी-व्यञ्जनाके दो भेद अलग-अलग कहे गये हैं, उसी प्रकार वाक्य' और 'वाच्य के वैशिष्टयकृत भेदसे भी आर्थी-व्यञ्जनाके दो अलग-अलग भेद माने गये हैं। इन भेदोंमें भी एक ही उदाहरण दोनों भेदोंका बन सकता है। उनमें केवल प्राधान्य-अप्राधान्यकी विवक्षासे ही अन्तर हो जाता है। जब 'वक्ता का प्राधान्य विवक्षित हो तब वही पद्य वक्तृ-वैशिष्टयका उदाहरण बन जाता है और जब 'बोद्धव्य' का प्राधान्य विवक्षित हो तब वही पद्य बोद्धव्य-वैशिष्टयका उदाहरण बन सकता है। इसी प्रकार जहाँ 'वाक्य' का प्राधान्य विवक्षित हो वहाँ वही पद्य 'वाक्य-वैशिष्टय'का उदाहरण हो सकता है और जहाँ उसके 'वाच्य' अर्थका प्राधान्य विवक्षित हो वहाँ वही वाच्य-वैशिष्टयका उदाहरण बन सकता है। यह केवल विवक्षाके ऊपर आश्रित भेद है। दोनोंका एक हिन्दी उदाहरण हिन्दीमें बिहारीका निम्नलिखित दोहा वाक्य-वैशिष्टय तथा वाच्य-वैशिष्टय दोनोंमें होनेवाली आर्थी-व्यञ्जनाका सुन्दर उदाहरण है- घाम घरीक निवारिये कलित-ललित अलिपु जमुना तीर तमाल-तरु मिलति मालती-कुञ्ज हिछ यह स्वयं रमणोत्सुका नायिकाकी उक्ति है। इसका अर्थ यह है कि यमुनाके किनारे तमाल- वृक्षके पास घनी मालतीके कुञ्जमें भ्रमरगण मनोहर गुञ्जार कर रहे हैं, वहाँ तनिक देर बैठकर धूपसे बचकर आराम कर लो। इससे रमणके लिए इस मालती-कुञ्जमें प्रवेश करो, यह अर्थ वाक्य तथा वाच्य दोनोंसे व्यङ्गय है। अतः वाक्य-वैशिष्टय और वाच्य-वैशिष्टय दोनोंमें होनेवाली व्यञ्जनाका यह एक ही उदाहरण है। प्रस्ताव, देश और अन्यसन्निधिमें भी यह पद्य उदाहरण बन सकता है।
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का० २२, सू० ३७ ]] तृतीय उल्लास: णोल्लेइ अणोल्लमणा अत्ता मं घरभरम्मि सअलम्मि। खणमेत्तं जइ संझाइ होइ ण व होइ वीसामो ।१८॥ [नुदत्यनार्द्रमना: श्वश्रूर्मा गृहभरे सकले। सी क्षणमात्रं यदि सन्ध्यायां भवति न वा भवति विश्रामः ॥ इति संस्कृतम् ] अत्र सन्ध्या सङ्केतकाल इति तटस्थं प्रति कयाचिद् द्योत्यते। सुव्वइ समागमिस्सदि तुज्झ पिओ अज्ज पहरमेत्तेण। एमे अ कित्ति चिठ्ठसि ता सहि सज्जेसु करणिज्जम् ॥१९॥ [श्रूयते समागमिष्यति तव प्रियोऽद्य प्रहरमात्रेण। एवमेव किमिति तिष्ठसि तत् सखि सज्जय करणीयम् । इति संस्कृतम् ] अत्रोपपति प्रत्यभिसतु प्रस्तुता न युक्तमिति कयाचित्निवार्यते।50 अन्यत्र यूयं कुसुमावचायं कुरुध्वमत्रास्मि करोमि सख्य: कलास र्डगीह क नाहं हि दूरं भ्रमितु समर्था प्रसीदतायं रचितोऽञ्जलिर्वः ॥२०॥ अत्र विविक्तोऽयं देश इति प्रच्छन्नकामुकस्त्वयाभिसार्यतामिति आश्वस्तां प्रति कयाचित्निवेद्यते। स श की ६. अन्यसन्निधिके वैशिष्टयमें व्यञ्जनाका उदाहरण निर्दय [अनार्द्रमना: ] सास घरके सारे काम मुझसे ही कराती है इसलिए कभी मिलता है तो शामके समय थोड़ा-सा विशाम मिल जाता है नहीं तो कभी वह भी नहीं मिलता है ॥१॥ुए यहाँ सन्ध्याका समय सङ्कतकाल है यह बात [गुरुजन आदिकी सन्निधिके वैशिष्टचसे दूत आदि रूप किसी ] तटस्थके प्रति [नायिका ] के द्वारा सूचित की जा रही है। यहाँ अन्य लोगोंके पासमें उपस्थित होनेके कारण स्पष्टरूपसे संङ्कतकाल आदिके विषयमें बान करना सम्भव न होनेसे इस प्रकारसे तटस्थ दूत आदिको सन्ध्याके समय मिलनेका अवसर निकल सकता है यह बात व्यञ्जनासे सूचित की गयी है। ७. प्रस्तावके वैशिष्टयमें व्यञ्जनाका उदाहरण हे सखि, सुनते हैं कि तुम्हारे प्रिय आज पहरभरके भीतर आ जायेंगे। तो ऐसे ही क्यों बैठी हो [उनके लिए भोजन या अपने शृङ्गार आदि ] करने योग्य कार्योंकी तैयारी करो ॥१॥क क यहाँ उपपतिके पास जानेके लिए उद्यत किसी [अभिसारिका]को उसकी सखी मना कर रही है कि [अब] यह [अभिसार करना ] उचित नहीं है। ८. देशके वैशिष्टयमें व्यञ्जनाका उदाहरण हे सखियो, तुम कहीं और जाकर फूल तोड़ो, यहाँ मैं तोड़ रही हूँ। मैं दूर चलनेमें समर्थ नहीं हूँ। इसलिए तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ मुझपर कृपा करो [ और आप और कहीं जाकर अपना काम करो। यहाँ मुझे अपना काम करने दो ] ।।२०॥ यहाँ यह एकान्त-स्थान है इसलिए प्रच्छन्न-कामुकको तुम यहाँ भेज दो यह अपनी किसी विश्वस्त सहेलीके प्रति कोई कह रही है। लागलीहना [सी गिशक] पासणर भाक्ण Iए
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का व्यप्रकाशः [का० २२, सू० ३७
गुरुअणपरवस पिअ कि भणामि तुह मंदभाइणी अहकम्11 अज्ज पवासं वच्चसि वच्च सअं जेव्व सुणसि करणिज्जम् ।।२१।। [गुरुजनपरवश प्रिय किं भणामि तव मन्दभागिनी अहकम् । अद्य प्रवासं व्रजसि व्रज स्वयमेव श्रोष्यसि करणीयम् ।। इति संस्कृतम् ] [ F अत्राद्य मधुसमये यदि व्रजसि तदाहं तावत् न भवामि, तव तु न जानामि गतिमिति व्यज्यते। आदिग्रहणाच्चेष्टादेः। तत्र चेष्टाया यथा द्वारोपान्तनिरन्तरे मयि तया सौन्दर्यसारश्चिया प्रोल्लास्योरुयुगं परस्परसमासक्तं समासादितम् । आनीतं पुरतः शिरोंऽशुकमधः क्षिप्ते चले लोचने वाचस्तत्र निवारितं प्रसरणं सङ्कोचिते दोलते ।।२२।। अत्र चेष्टया प्रच्छन्नकान्तविषय आकूतविशेषो ध्वन्यते। ९. कालके वैशिष्टयमें व्यञ्जनाका उदाहरण इस प्रकार देशके वैशिष्टयमें व्यञ्जकत्वका उदाहरण देनेके बाद अब कालके वैशिष्टयमें व्यञ्जकत्वका उदाहरण आगे देते हैं -- गुरुजनोंके परवश हे प्रिय ! मैं मन्दभागिनी तुमसे क्या कहूँ [ वस्तुतः तो न तुम जाना चाहते हो और न मैं भेजना चाहती हूँ। परन्तु माता-पिता आदि गुरुजनोंकी आज्ञाके कारण ] आज [इस वसन्तकालमें ] यदि जा रहे हो तो जाओ, [आगे ] क्या करना चाहिये यह बात [मेरी मृत्युके बाद] तुमको स्वयं सुननेको मिल जायगी ॥२१।। यहाँ आज वसन्तके समय यदि तुम जाते हो तो मैं तो जीवित न रहूँगी, तुम्हारी क्या गति होगी यह मैं नहीं जानती। यह व्यक्त होता है। हिन्दीमें निम्नलिखित सवैया कालकी व्यञ्जकताका सुन्दर उदाहरण हो सकता है- भूमि हरी पै प्रवाह बह्यो जल मोर नचै गिरि पै मतवारै। चञ्चला त्यों चमके 'लखिराम' चढ़े चहुँ ओरन ते घन कारे॥ जान दे वीर विदेस उन्हें कछु बोल न बोलिये पावस प्यारे। आइहैं ऊबि घरीमें घरै घनघोर सों जीवन मूरि हमारे। f४ oयह सवैया वस्तुतः पूर्वश्लोकके भावको लेकर ही लिखा गया है। इसमें पावसका वर्णन है। इस ऋतुमें नायक अपनी प्रियतमाको छोड़कर विदेश नहीं जा सकता है इस बातको मानती हुई नायिकाकी यह उक्ति है। उसमें कामोद्दीपक-भाव व्यक्त हो रहा है। १०. आदि पदसे ग्राह्य चेष्टाका व्यञ्जकत्व [कारिकामें आये हुए ] आदि पदके ग्रहणसे चेष्टा आदिका [ग्रहण करना चाहिये]। उनमेंसे चेष्टा [के वैशिष्टचमें व्यञ्जकत्व ] का [उदाहरण] जैसे- मेरे दरवाजेके समीप पहुँचनेपर उस अनिन्द्य सुन्दरीने अपनी दोनों जाँघोंको फैलाकर एक-दूसरेसे चिपटा लिया। सिरपर घुंघट डाल लिया, आँखें नीची कर लीं, बोलना बन्द कर दिया और अपनी भुजाएँ सिकोड़ लीं ॥२२। यहाँ चेष्टासे प्रच्छन्न [रूपमें स्थित ] कान्तविषयक अभिप्रायविशेष व्यङ्गय है। कह्ठा
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का० २३, सू० ३८ ] तृतीय उल्लास: निराकांक्षत्वप्रतिपत्तये प्राप्तावसरतया च पुनः पुनरुदाह्नियते। वक्त्रादीनाँ मिथ:संयोगे द्विकादिभेदेन। अनेन क्रमेण लक्ष्यव्यङ्गययोश्च व्यञ्जकत्वमुदाहार्यम्।यग एफोड [सू० ३८ ] शब्दप्रमाणवेद्योऽर्थो व्यनक्त््यर्थान्तरं यतः । अर्थस्य व्यञ्जकत्वे तच्छब्दस्य सहकारिता ।२३।ल शब्देति। नहि प्रमाणान्तरवेद्योऽर्थो व्यञ्जकः । इति काव्यप्रकाशे अर्थव्यञ्जकतानिर्णयो नाम तृतीय उल्लास: । इतने उदाहरण देनेके कारण किड्ी। इस प्रकार यहाँ ग्रन्थकारने आर्थी-व्यञ्जनाके दसों भेदोंके उदाहरण अलग-अलग दिये हैं। वैसे दो-तीन या अधिक भेदोंको एक जगह मिलाकर एक या दो उदाहरणोंमें इन सबकी व्यञ्जकता दिखलायी जा सकती थी, परन्तु अलग-अलग भेदोंके विषयमें- क निराकांक्षता [अर्थात् जिज्ञासाकी निवृत्ति ]क लिए और अवसर होनेसे बार-बार [सब भेदोंके अलग-अलग ] उदाहरण दिये हैं। वक्ता आदिके परस्पर संयोगसे दो-दो तीन-तीन आदिके भेदसे [मिलकर भी इनके उदाहरण समझ लेने चाहिये]। लक्ष्यार्थ और व्यङग्यार्थ भी व्यञ्जक होते हैं का काऊ आर्थी व्यञ्जनामें इन सब उदाहरणोंमें वाच्य अर्थकी ही व्यञ्जकता दिखलायी गयी है परन्तु वाच्यके समान लक्ष्य तथा व्यङ्गय अर्थ भी व्यञ्जक हो सकते हैं। यह बात आगे कहते हैं- इसी कमसे लक्ष्य तथा व्यङ्गच अर्थोंके व्यञ्जकत्वके उदाहरण भी समझ लेने चाहिये। आर्थो व्यञ्जनामें शब्दका सहयोग शाब्दी-व्यञ्जनाके अन्तमें यह कहा था कि शाब्दी-व्यञ्जनामें शब्द मुख्यरूपसे व्यञ्जक होता है उसके साथ अथ उसका सहकारी होता है। इसी प्रकार आर्थी व्यञ्जनामें अर्थके मुख्यरूपसे व्यञ्जक होनेपर शब्दकी सहकारिता आगे दिखलाते हैं- ल क[सू० ३८] -- क्योंकि शब्दप्रमाणसे गम्य अर्थ ही अर्थान्तरको व्यक्त करता है इसलिए अर्थके व्यञ्जकत्वमें शब्द भी सहकारी होता है ।२३। शब्द [प्रमाणसे गम्य अर्थ, अर्थान्तरको व्यक्त करता है] इससे [ यह सूचित किया गया है कि अनुमान आदि ] अन्य प्रमाणोंसे वेद्य अर्थ व्यञ्जक नहीं होता है। सारांश इस प्रकार इस तृतीय उल्लासमें वक्ता, बोद्धव्य आदिके वैशिष्टयसे आर्थी-व्यञ्जनाके दस भेद करके उनका उदाहरण सहित विवेचन किया है। शाब्दी-व्यञ्जनाका निरूपण द्वितीय उल्लासमें कर चुके हैं। अतः व्यञ्जनाके दोनों भेदोंके निरूपणके साथ, ध्वनिकाव्यका सामान्य निरूपण समाप्त हुआ। आगे गुणीभूतव्यङ्गय-काव्यका विवेचन करेंगे। काव्यप्रकाशमें अर्थ-व्यञ्जकता-निर्णय नामक तृतीय उल्लास समाप्त हुआ। श्रीमदाचार्य-विश्वेश्वर-सिद्धान्तशिरोमणिविरचितायां काव्यप्रकाशदीपिकायां हिन्दीव्याख्यायां तृतीय उल्लासः समाप्तः ।
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3P चतुर्थ उल्लास: यद्यपि शबदार्थयोनि्णये कृते दोषगुणालङ्काराणां स्वरूपमभिधानीयम्, तथापि रशशंक
धर्मिणि प्रद्शिते धर्माणां हेयोपादेयता ज्ञायत इति प्रथमं काव्यभेदानाह अथ्र काव्यप्रकाश-दीपिकायां चतुर्थ उल्लास:द 0] उल्लास-सङ्गति प्रथम उल्लासमें ग्रन्थकारने "तददोषौ शब्दार्थौ सगुणौ अनलंकृती पुनः क्वापि" इस प्रकार काव्यका लक्षण दिया है। इस लक्षणमें 'शब्दाथौ" यह विशेष्य पद है और 'अदोषौ', 'सगुणौ' तथा अनलंकृती पुनः क्वापि' ये तीन उसके विशेषणरूपमें प्रयुक्त हुए हैं। लक्षणके स्पष्टीकरणार्थ लक्षण- घटक इन चारों पदोंकी व्याख्याके लिए ही ग्रन्थके शेष भागकी रचना हुई है। इसलिए सबसे पहिले द्वितीय उल्लासमें ग्रन्थकारने शब्द तथा अर्थका स्वरूपनिर्णय करनेका प्रयत्न किया है। उसी प्रसङ्गमें वाचक, लक्षक, व्यञ्जक शब्द तथा अर्थके वाच्य, लक्ष्य, व्यङ्गय आदि भेदोंका निरूपण करनेके बाद द्वितीय उल्लासके अन्तमें 'शाब्दी व्यञ्जना'के भेदोंका और फिर तृतीय उल्लासमें 'आर्थी व्यञ्जना'का प्रतिपादन किया है। इस प्रकार तीसरे उल्लासतक लक्षणके विशेष्य भाग 'शब्दाथौ" की व्याख्या पूरी हो जाती है। अब इसके बाद क्रमशः 'अदोषो' आदि विशेषणोंकी व्याख्या प्रांरम्भ करनी चाहिये थी, परन्तु 'अदोषौ' 'सगुणौ' आदि विशेषणोंके घटक उन दोष, गुण आदिका निरूपण न करके इस चतुर्थ उल्लासमें ग्रन्थकार ध्वनिकाव्यके भेदोंका निरूपण प्रारम्भ कर रहे हैं। वह जो क्रमभेद उन्होंने किया है उसका स्पष्टीकरण देना आवश्यक हो जाता है; उसे आगे देते हैं। इस क्रमभेदका कारण यह है कि गुण, दोष, अलङ्कार आदि सब काव्यके 'धर्म' हैं। काव्य 'धर्मी' है। जबतक 'धर्मी' रूप काव्यका पूर्ण ज्ञान न हो जाय तबतक उसके धर्मोंका स्वरूप या हेयता, उपादेयता आदिका ज्ञान भी ठीक तरहसे नहीं हो सकता है। इसलिए गुण, दोष आदिके निरूपणके पूर्व भेदोपभेद-सहित काव्यका सम्पूर्ण चित्र उपस्थित कर देना आवश्यक है। काव्यका लक्षण और उसके ध्वनि, गुणीभूत-व्यङ्गय तथा चित्रकाव्य नामक तीन मुख्य भेद तो प्रथम उल्लासमें बतलाये जा चुके हैं, परन्तु उनके अवान्तर भेदका निरूपण करना शेष है। इस कार्यको ग्रन्थकार अगले ४ से ६ तक तीन. उल्लासोंमें करेंगे। इनमेंसे इस चतुर्थ उल्लासमें ध्वनिकाव्यके अवान्तर भेदोंका सविस्तार वर्णन किया जा रहा है। पञ्चम उल्लासमें गुणीभूतव्यङ्गयके भेदोंका और छठे उल्लासमें चित्रकाव्यके भेदोंका निरूपण किया जायगा। इस प्रकार इन तीन उल्लासोंमें काव्यके भेदोपभेदोंका निरूपण कर चुकनेके बाद सातवें उल्लाससे दोष, गुण, अलङ्कार आदिका विवेचन आरम्भ करेंगे और दशम उल्लासतक काव्यलक्षणकी व्याख्या पूर्ण हो जायेगी। स्वाभाविक क्रममें इस प्रकारके परिवर्तन करनेके इसी कारणको दिखलाते हुए ग्रन्थकार इस उल्लासका आरम्भ इस प्रकार करते हैं- यद्यपि [काव्यलक्षणके विशेष्यभाग ] शब्द तथा अर्थका निर्णय करनेके बाद [स्वाभाविकरूपसे] दोष, गुण तथा अलङ्कारोंके स्वरूपका कथन करना चाहिये था, परन्तु धर्मो [मुख्यभूत काव्य]का निरुण करनेपर ही [दोष, गुण आदि ] धर्मोंकी हेयता या उपादेयताका ज्ञान हो सकता है इसलिए [दोष आदिका निरूपण छोड़कर ] [पहले धर्मी रूप ] काव्यके भेदोंको कहते हैं -- कणगमी
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का० २४, सू० ३६] चतुर्थ उल्लास: [सू०. ३९ ] अविवक्षितवाच्यो यस्तत्र वाच्यं भवेद् ध्वनौ।ह् अर्थान्तरे संक्रमितमत्यन्तं वा तिरस्कृतम् ॥२४। लक्षणामूलगूढव्यङ्गयप्राधान्ये सत्येव अविवक्षितं वाच्यं यत्र सः 'ध्वनौ' इत्यनु- वादाद् ध्वनिरिति ज्ञेयः । तत्र च वाच्यं क्वचिदनुपयुज्यमानत्वादर्थान्तरे परिणमितम् । विगतका स्मरण
यहाँ ग्रन्थकारने एकदम ध्वनिकाव्यके विभेद करने प्रारम्भ कर दिये हैं, इससे पाठक जरा कठिनाईमें पड़ जाता है। बिना अवतरणिकाके विषय एकदम सामने श जानेसे उसे प्रसङ्ग समझनेके लिए विशेष प्रयत्न करना पड़ता है। वह इस विचारमें पड़ जाता है कि यह क्या प्रारम्भ हो गया है। इस जिज्ञासाकी निवृत्तिके लिए प्रथम उल्लासमें पहले किये हुए काव्यके भेदोंका स्मरण कर लेना आवश्यक है। उससे विषयके हृदयङ्गम करनेमें सुविधा होगी। ग्रन्थकार काव्यके ध्वनि, गुणीभूत-व्यङ्गय तथा चित्रकाव्य नामसे तीन प्रकारके भेद कर चुके हैं। इन तीनों मुख्य भेदोंके भी फिर और अवान्तर भेद होते हैं। इन सब भेदोपभेदोंका आगे यथाक्रम निरूपण किया जायगा। इसी प्रसङ्गसे सबसे पहिले ध्वनिकाव्यके शवान्तर भेदोंका विभाजन इस चतुर्थ उल्लासमें किया जा रहा है। अविवक्षितवाच्य लक्षणामूलध्वनिके दो भेद जैसा कि इसी उल्लासमें आगे स्पष्ट होगा-ध्वनिकाव्यके भेदोपभेदोंका भी बहुत अधिक विस्तार इस शास्त्रमें किया गया है। परन्तु उसके मुख्य दो भेद हैं-एक 'अविवक्षितवाच्य ध्वनि' और दूसरा 'विवक्षितवाच्य ध्वनि'। 'अविवक्षितवाच्य ध्वनि'का दूसरा नाम 'लक्षणामूल ध्वनि' तथा 'विवक्षितवाच्य ध्वनि'का दूसरा नाम 'अभिधामूल ध्वनि' भी है। लक्षणामूल ध्वनिमें वाच्य विवक्षित नहीं होता है इसलिए उसका नाम 'अविवक्षितवाच्य ध्वनि' रखा गया है। इसके भी फिर दो अवान्तर भेद होते हैं। एक 'अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य' और दूसरा 'अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य'। 'अविवक्षितवाच्य' या 'लक्षणामूल ध्वनि'के इन दोनों भेदोंके लक्षण तथा उदाहरण दिखलानेके लिए ग्रन्थकार लिखते हैं- [सू० ३६]-अविवक्षितवाच्य [अर्थात् लक्षणामूल ] जो [ध्वनिभेद ] है उस ध्वनि [भेद] में वाच्य या तो अर्थान्तरमें संक्रमित [हो जाता है ] या अत्यन्त तिरस्कृत हो जाता है। [इस प्रकार अविवक्षितवाच्यध्वनिके 'अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य' और 'अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य' दो भेद होते हैं] ॥।२४।। [अविवक्षितवाच्य ध्वनिका दूसरा नाम लक्षणामूल ध्वनि भी है। इसलिए ] लक्षणामूल गूढव्यङ्गयकी प्रधानता होनेपर ही जहाँ वाच्य अविवक्षित होता है वह [अविवक्षितवाच्य ध्वनि भेद कहलाता है। यद्यपि कारिकामें 'अविक्षितवाच्यो ध्वनिः' इस प्रकार विशेष्य-भूत प्रथमान्त ध्वनि पदका प्रयोग नहीं किया गया है अपितु उसीका 'ध्वनौ' यह सप्तम्यन्त रूप प्रयुक्त हुआ है। उसीसे पहले ध्वनि इस प्रथमान्त पदका भी आक्षेप कर लेना चाहिये, इस बातको वृत्तिकार कहते हैं। ] 'ध्वनौ' इस [ पद] के द्वारा [पूर्वकथित 'ध्वनि' के ] अनुवादसे [पूर्ववाक्यमें ] 'ध्वनिः' इस [प्रथमान्त विशेष्य पदके अध्याहार] को भी समझ लेना चाहिये। उस अविवक्षितवाच्य [ध्वनि-भेद ] में कहीं वाच्य [यथाश्रुत रूपमें अन्वित होनेमें ] अनुपयुक्त होनेसे [अपने किसी विशेष भेवरूप] अर्थान्तरमें परिणत हो जाता है। उसे 'अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य ध्वनि' कहते हैं।)
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ह२ ा का व्यप्रकाशः [का० २४, सू० ३६
यथा- cीत्वामस्मि वच्मि विदुषां समवायोऽत्र तिष्ठति। आत्मीयाँ मतिमास्थाय स्थितिमत्र विधेहि तत् ।।२३।। अत्र वचनादि उपदेशादिरूपतया परिणमति क्वचिदनुपपद्यमानतया अत्यन्तं तिरस्कृतम्। यथा- उपकृतं बहु तत्र किमुच्यते सुजनता प्रथिता भवता परम् विदधदीदृशमेव सदा सखे सुखितमास्स्व ततः शरदाँ शतम् ॥२४॥ एतदपकारिणं प्रति विपरीतलक्षणया कश्चिद् वक्ति ।। अर्थान्तरसंक्रमितवाच्यका उदाहरण जहाँ वाच्यार्थका सीधा वाच्यतावच्छेदकरूपसे अन्वय नहीं बनता है वहाँ शब्द अपने सामान्य अर्थको छोड़कर स्वसम्बद्ध किसी विशिष्ट अर्थको बोधित करता है। वहाँ अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य ध्वनि होता है। जैसे- मैं तुमसे कहता हूँ कि यहाँ विद्वानोंका समुदाय रहता है इसलिए अपनी बुद्धिक्ो ठीक करके [जरा सँभलकर ] रहना ।।२३।। यहाँ वचन आदि [ का साधारण अर्थ कथन आदि प्रकृतमें अनुपयुक्त होनेसे ] उपदेश आदि रूपमें परिणत हो जाता है। [अतः यह अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य ध्वनिका उदाहरण है]। यह अपने शिष्यके प्रति किसी विद्वान्की उक्ति है। 'देख मैं तुझसे कहता हूँ' यहाँ वक्ता और वौद्धव्य, दोनों एक दूसरेके सामने ही उपस्थित हैं इसलिए 'त्वां वच्मि' पदोंका प्रयोग किये बिना भी बात कही जा सकती थी। अतः 'त्वाम्' पदका प्रयोग अन्योंसे व्यावृत्त कर उस शिष्यकी विशेषताको सूचित करता है, फिर वह विशेषता चाहे विशेषकृपापात्रता रूप हो अथवा शिष्यकी अनुभवहीनता आदि रूप हो। इसी प्रकार 'वच्मि' इस क्रियापदसे उसके कर्ता 'अ्हम्' का ज्ञान हो सकता था इसलिए विशेष रूपसे 'अस्मि' अरथात् 'अहम्' पदके प्रयोगकी आवश्यकता नहीं थी। परन्तु 'अस्मि' या 'अ्हम्' पद कहनेवालेकी विशेष हितभावना और अनुभवशीलता आदिको व्यक्त करता है। इसी प्रकार 'वच्मि' पद साधारण अर्थको छोड़कर 'उपदेश करता हूँ' इस विशेष अर्थका बोधन करता है। इस प्रकार इस श्लोकके पद अपने वाच्यार्थ के अनुपयुक्त होनेसे अर्थान्तरमें संक्रमित हो जाते हैं। इसलिए यह लक्षणामूल- ध्वनिके 'अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य ध्वनि' नामक उपभेदका उदाहरण है अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ध्वनिका उदाहरण तका अविवक्षितवाच्य या लक्षणामूल ध्वनिका दूसरा भेद 'अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ध्वनि' होता है। उसका लक्षण तथा उदाहरण आगे देते हैं। · कहीं [ वाच्यार्थ ] अनुपपद्यमान होनेसे अत्यन्त तिरस्कृत हो जाता है। [उसे अत्यन्ततिरस्कृत- वाच्य ध्वनि कहते हैं) जैसे -- आपने बड़ा उपकार किया है, कहाँ तक प्रशंसा की जाय ! हे मित्र, सदा ऐसा ही करते हुए तुम सैकड़ों वर्षतक सुखी होकर [इस संसारमें ] रहो ॥२४। कोई [ अपकृत व्यक्ति] अपकार करनेवालेके प्रति विपरीतलक्षणासे यह कह रहा है।
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का० २५, सू० ४०-४१] चतुर्थ उल्लास: [सू० ४०] विवक्षितं चान्यपरं वाच्यं यत्रापरस्तु सः 11 अन्यपर व्यङ्गयनिष्ठम्। एष च- [सू० ४१ ] कोऽप्यलक्ष्यक्रमव्यङ्गयो लक्ष्यव्यङ्ग्यक्मः परः ॥२५॥ जिस व्यक्तिके साथ उसके किसी मित्रने अत्यन्त अपकार किया है उस अपकारी मित्रके प्रति उस सताये गये अर्थात् अपकृत व्यक्तिकी यह उक्ति है। उसमें 'उपकृतम्' आदि शब्दोंके मुख्य अर्थकी कोई भी सङ्गति नहीं लग सकती है। इसलिए विपरीत लक्षणा अर्थात् वैपरीत्य-सम्बन्ध-मूलक लक्षणासे उन शब्दोंका एकदम उलटा अर्थ हो जाता है। इस प्रकार वाच्य अर्थका अत्यन्त तिरस्कार करके 'उपकृत' आदि शब्द 'अपकृत' आदि अर्थके बोधक बन जाते हैं। तब उस विपरीत-लक्षणासे इस श्लोकका अर्थ बदलकर निम्नलिखित प्रकारका हो जाता है- तुमने बड़ा धोखा दिया, बड़ा अपकार किया है, उसकी जहाँतक निन्दा की जाय थोड़ी है। तुमने वास्तवमें अत्यन्त दुष्टताका परिचय दिया है। अरे मित्रद्रोही, अपकार करनेवाले, तेरे जैसा व्यक्ति जितनी जल्दी इस संसारको छोड़ दे उतना ही अच्छा है। विवक्षितवाच्य या अभिधाम्लध्वनिके भेद B इस प्रकार 'अविवक्षितवाच्यध्वनि' या 'लक्षणामूलध्वनि' के दो भेद और उन दोनोंके उदाहरण दिखला दिये। अब ध्वनिकाव्यका जो दूसरा मुख्य भेद 'विवक्षितवाच्यध्वनि' या 'अभिधामूलध्वनि' बतलाया था उसके भेद आगे दिखलायेंगे। इस 'अभिधामूल' या 'विवक्षितवाच्य ध्वनि'के भी पहले 'असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गय' औरर 'संलक्ष्यत्रमव्यङ्गय' दो भेद होते हैं, जिनमें 'असंलक्ष्यत्रमव्यङ्गय' रसादि- ध्वनिको कहते हैं। इसके यदि अवान्तर भेद किये जायँ तो उनकी गणना करना ही कठिन हो जायगा। इसलिए 'असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गय'के भेदोंका अधिक विस्तार न करके गणनाके लिए उसका एक ही भेद मान लिया गया है। दूसरे 'संलक्ष्यक्रमव्यङ्गय' नामक भेदके फिर १. शब्दशक्त्युत्थ, २. अर्थशक्त्युत्थ और ३. उभयशक्त्युत्थ इस प्रकार तीन अवान्तर उपभेद किये गये हैं। इनमेंसे शब्दशक्त्युत्थ ध्वनिके फिर वस्तुध्वनि तथा अलङ्कारध्वनिरूप दो अवान्तर उपभेद, अर्थशक्त्युत्थ ध्वनिके १२ अवान्तर उपभेद तथा उभयशक्युत्थका एक भेद, कुल १५ संलक्ष्यक्रमके और एक असंलक्ष्यक्रमका १६ भेद मिलाकर अभिधामूलाके किये गये हैं। इस प्रकार 'अविवक्षितवाच्य' अथा्त् 'लक्षणामूल' ध्वनिके दो भेद और 'विवक्षितवाच्य' या 'अभिधामूल' ध्वनिके १६, कुल मिलाकर ध्वनिकाव्यके २+ १६ = १८ भेद होते हैं। इनमेंसे लक्षणामूल ध्वनिके दो भेद पहले दिखलाये जा चुके हैं। अब 'अभिधामूल' या 'विवक्षित- वाच्य' ध्वनिके १६ भेदोंका वर्णन करेंगे। [सृ० ४०]-जहाँ वाच्य अर्थ विवक्षित [अर्थात् वाच्यतावच्छेदकरूपसे अन्वययोग्य ] होनेपर भी अन्यपर [अर्थात् व्यङ्गचनिष्ठ ] होता है वह [ध्वनिकाव्यका अभिधामूलध्वनि या ] विवक्षितान्य- परवाच्य नामक दूसरा भेद होता है। अन्यपर [शब्दका अर्थ] व्यङ्गचनिष्ठ है। और यह- [सू० ४१]-[इस विवक्षिरतान्यपरवाच्य या अभिधामूलध्वनिके भी दो भेद होते हैं। एक तो ] कोई [अनिर्वचनीय अनुभवैकगोचर रसध्वनिरूप ] अलक्ष्यकरमव्यङ्गच [जिसमें वाच्य और व्यङ्गय अर्थोंके कमकी प्रतीति नहीं होती है इस प्रकारका ] और दूसरा संलक्ष्यकरमव्यङ्गच [जिसमें वाच्य तथा व्यङ्गय अर्थोंका कम लक्षित होता है इस प्रकारका ध्वनिकाव्य ] होता है ।।२५।।
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६४ काव्यप्रकाश: [का० २६, सू० ४२
अलक्ष्येति। न खलु विभावानुभावव्यभिचारिण एव रसः, अपितु रसस्तैरित्यस्ति कमः स तु लाघवान्न लक्ष्यते। तत्र- [सू० ४२] रसभावतदाभासभावशान्त्यादिरक्रमः । भिन्नो रसाद्यलड्कारादलङ्कार्यतया स्थितः ॥२६॥ आदिग्रहणाद् भावोदयभावसन्धिभावशबलत्वानि। प्रधानतया यत्र स्थितो रसादिस्तत्रालङ्कार्यः, यथोदाहरिष्यते । अन्यत्र तु प्रधाने वाक्यार्थे यत्राङ्गभूतो रसादि- स्तन्न गुणीभूतव्यङ्गये रसवत्प्रेयऊर्जस्विसमाहितादयोऽलङ्काराः । ते च गुणीभूतव्यङ्गया- भिधाने उदाहरिष्यन्ते।
अलक्ष्यत्रमव्यङ्गय रसादिध्वनि यहाँ अभिधामूलध्वनिके असंलक्ष्यत्रमव्यङ्गय तथा संलक्ष्यत्रमव्यङ्गग्य दो भेद किये हैं। इनमें असंलक्ष्यक्रमव्य ङ्गयध्वनि रसादिध्वनिको कहते हैं। यहाँ विशेषरूपसे यह बात ध्यान देने योग्य है कि ग्रन्थकारने उसको 'अक्रमव्यङ्ग्य' न कहकर 'अलक्ष्यक्रमव्यङ्गय' ध्वनि कहा है। इसका अभिप्राय यह होता है कि उसमें वाच्य और व्यङ्गयकी प्रतीतिका क्म होता तो अवश्य है, परन्तु शीघ्रताके कारण वह कम दिखलायी नहीं देता। विभाव, अनुभाव शदिकी प्रतीति ही रस नहीं है अपितु उनकी प्रतीति रसप्रतीतिका कारण है। विभावादिकी प्रतीति होनेके बाद रसादिकी प्रतीति होती है। इसलिए रसादिकी प्रतीतिमें क्रम अवश्य रहता है, परन्तु जैसे कमलके सौ पत्तोंको एक साथ रखकर उनमें सुई चुभायी जाय तो वह उन पत्रोंका भेदन तो कमसे ही करती है परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि वह एक साथ सौ पत्तोंके पार पहुँच गयी है। इसी प्रकार रसकी अनुभूतिमें विभावादिकी प्रतीतिका क्रम होनेपर भी उसकी प्रतीति न होनेसे उसको 'अलक्ष्यक्रमव्य ङ्गय' ध्वनि कहा गया है। अलक्ष्य [कमव्यङ्गय ] इससे [ यह सूचित किया है कि ] विभाव आदि [की प्रतीति ही रस नहीं है अपितु उन [विभावादिकी प्रतीति ] से रस [उत्पन्न या अभिव्यक्त ] होता है। इसलिए [रसकी प्रतीतिमें भी ] कम तो है परन्तु शीघ्रताके [अतिशयके ] कारण उसका अनुभव नहीं होता है। उन [अलक्ष्यकरमव्यङ्गय-ध्वनिके अनेकों भेदों ] मेंसे -- [सू० ४२ ]-रस, भाव, तदाभास [अर्थात् रसाभास तथा भावाभास ] और भावशान्ति आदि [अर्थार्त् १. भावोदय, २. भावशान्ति, ३. भावसन्धि एवं ४. भावशबलता ] अलक्ष्यक्रम [ध्वनि प्रधान होनेके कारण ] अलङ्कार्य होनेसे 'रसवत्' आदि [अर्थात् रसवत्, प्रेय, ऊर्जस्विन्, समाहित इन चारों] अलङ्कारोंसे भिन्न हैं ॥२६।। आदि [पदके ] ग्रहणसे १. भावोदय, २. भावसन्धि और ३. भावशबलत्व [का भी ग्रहण होता है]। जहाँ रस आदि प्रधानरूपसे स्थित होते हैं वहाँ ये अलङ्कार्य कहलाते हैं, जैसे कि [ उनके ] उदाहरण आगे देंगे और जहाँ अन्य [वस्तु या अलङ्कार आदिरूप ] वाक्यार्थके प्रधान होनेपर रसादि [ उन वस्तु या अलङ्कार आदिके ] अङ्ग होते हैं उनमें [रसाबिके ] गुणीभूतव्यङ्गय होनेपर १. रसवत्, २. प्रेय, ३. ऊर्जस्विन् और ४. समाहित आदि [चार प्रकारके ] अलङ्कार होते हैं। गुणीभूतव्यङ्गयके निरूपणके प्रसङ्गमें उनके उदाहरण देंगे।गाप्आलसे ेशर T
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का० २७-२८, सू० ८३] चतुर्थ उल्लाम: ६५ तत्र रसस्वरूपमाह- ममार [सू० ४३ ] कारणान्यथ कार्याणि सहकारीणि यानि च। वत्र किगा रत्यादेः स्थायिनो लोके तानि चेन्नाटयकाव्ययोः ॥२७॥ विभावा अनुभावास्तत् कथ्यन्ते व्यभिचारिणः । व्यक्तः स तैविभावाद्यैः स्थायी भावो रसः स्मृतः ॥२८।98 औीर इस प्रकार 'अभिधामूल' या 'विवक्षितान्यपरवाच्य' ध्वनिके 'असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गय' तथा 'संलक्ष्यक्रमव्यङ्गय' नामके दो भेद यहाँतक किये गये हैं। उनमेंसे १. रस, २. भाव, ३. रसाभास, ४. भावाभास, ५. भावोदय, ६. भावसन्धि, ७. भावशबलत्व और ८ भावशान्ति ये आठों जब काव्यमें प्रधानरूपसे स्थित होते हैं तब रसादिरूप असंलक्ष्यत्रमव्यङ्गयध्वनि काव्य कहलाता है। और जब ये वस्तु या अलङ्कारादि किसी अन्यके अङ्ग बन जाते हैं तब गुणीभूतव्यङ्गय नामक काव्यका दूसरा भेद हो जाता है। यह असंलक्ष्यकमव्यङ्गयके स्वरूपका सामान्यरूपसे निरूपण किया है। इनमेंसे सबसे प्रधान रस है इसलिए आगे रसका निरूपण करेंगे। रस-निरूपण का [सू० ४३ ]-लोकमें रति आदिरूप स्थायी भावके जो कारण, कार्य और सहकारी होते हैं, वे यदि नाटक या काव्यमें [प्रयुक्त ] होते हैं तो करमशः विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव कहलाते हैं और उन विभाव [आलम्बन या उद्दीपन ] आदि [रूप कारण, कार्य तथा सहकारियोंके योग ] से व्यक्त वह [रति आदिरूप ] स्थायी भाव 'रस' कहलाता है ॥२७,२८। इन कारिकाओंमें विभाव, अनुभाव, व्यभिचारिभाव तथा स्थायिभावसे रसकी निष्पत्तिका वणन किया गया है और यह बतलाया है कि रति आदिकी उत्पत्तिके जो कारण हैं वे विभाव शब्दसे, कार्य अनुभाव शब्दसे औौर सहकारी व्यभिचारिभाव नामसे कहे जाते हैं। इनमेंसे रति आदिके कारणका नाम 'विभाव है। रति आदिके कारण दो प्रकारके होते हैं, एक आलम्बनरूप और दूसरे उद्दीपनरूप । मीता, राम आदि एक दूसरेकी प्रीतिक आलम्बनरूप कारण होते हैं। क्योंकि सीताको देखकर रामके मनमें और रामको देखकर सीताके मनमें प्रेम या रतिकी उत्पत्ति होती है। इसलिए वे दोनों आलम्बन विभाव कहलाते हैं और परस्पर रति या प्रेमकी उत्पत्तिके प्रति कारण होते हैं। इस प्रीति या रतिका उद्बुद्ध करनेवाली चाँदनी, उद्यान, नदीतीर आदि नामग्रीको उद्दीपन विभाव कहा जाता है, क्योंकि वे पूर्वोत्पन्न रति आदिको उद्दीप्त करनेवाले है। इम पकार आलम्बन और उद्दीपन दोनों मिलकर स्थायी भावको व्यक्त करते है।5 १. स्थायिभाव कह्र। रसकी प्रक्रियामें आलस्बन तथा उद्दीपन विभावको रसका बाह्य कारण समझना चाहिये। रसानुभूतिका आन्तरिक और मुख्य कारण स्थायिभाव है। स्थायिभाव मनके भीतर स्थिररूपसे रहनेवाला प्रसुप्त संस्कार है जो अनुकूल आलम्बन तथा उद्दीपन रूप उद्वोधक सामग्रीको प्राप्त कर अभिव्यक्त हो उठता है और हृदयमें एक अपूर्व आनन्दका संचार कर देता है। इस स्थायिभावकी अभिव्यक्ति ही रसास्वादजनक या रस्यनान होनेसे रस-शब्दसे बोध्य होती है। इसलिए 'व्यक्तः म तैविभावाद्यः स्थायी भावो रस स्मृत म्राित जताहै। कितtहR-pp INB fNFMRN Bp
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६६ काव्यप्रकाश: [का० २७-२८, सू० ४३ अर्थात् उन पूर्वोक्त विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारिभावोंके संयोगसे व्यक्त होनेवाले स्थायि- भावको रस कहते हैं।ा व्यवहारदशामें मनुष्यको जिस-जिस प्रकारकी अनुभूति होती है उसको ध्यानमें रखकर प्रायः आठ प्रकारके स्थायिभाव साहित्यशास्त्रमें माने गये हैं। काव्यप्रकाशकारने उनकी गणना इस प्रकार की है- [सू० ४५] रतिर्हासश्च शोकश्च क्रोधोत्साहौ भयं तथा। जुगुप्सा विस्मयश्चेति स्थायिभावाः प्रकीर्तिताः ॥ अर्थात् १. रति, २. हास, ३. शोक, ४. क्रोध, ५. उत्साह, ६. भय, ७. जुगुप्सा या घृणा और ८. विस्मय ये आठ स्थायिभाव कहलाते हैं। इनके अतिरिक्त ह. निर्वेदको भी नौवाँ स्थायिभाव माना गया है। काव्यप्रकाशकारने लिखा है- [सू० ४७]-निर्वेदस्थायिभावोऽस्ति शान्तोऽपि नवमो रसः। कह काथी के। इस प्रकार नौ स्थायिभाव और उनके अनुसार ही १. शृंगार, २. हास्य, ३. करुण, ४. रौद्र, ५. वीर, ६. भयानक, ७. बीभत्स, ८. अद्भुत और ६. शान्त ये नौ रस माने गये हैं। ये नौ स्थायिभाव मनुष्यके हृदयमें स्थायी रूपसे सदा विद्यमान रहते हैं इसलिए 'स्थायिभाव' कहलाते हैं। सामान्यरूपसे वे अ्व्यक्तावस्थामें रहते हैं, किन्तु जब जिस स्थायिभावके अनुकूल विभानादि सामग्री प्राप्त हो जाती है तब वह व्यक्त हो जाता है और रस्यमान या आस्वाद्यमान होकर रसरूपताको प्राप्त हो जाता है। मनोविज्ञान और स्थायिभाव स्थायिभावोंका जो यह निरूपण साहित्यशास्त्रमें किया गया है वह विशुद्ध मनोवैज्ञानिक आधारपर किया गया है। मनोविज्ञानके मूल सिद्धान्त आ्जके समान पूर्वकालमें भी ज्ञात थे। केवल उनकी अभिव्यक्तिकी शैलीमें भेद है। आधुनिक मनोविज्ञान जिनको मूल-प्रवृत्तियोंसे सम्बद्ध 'मनःसंवेग' कहता है उन्हींको साहित्यशास्त्रमें 'स्थायिभाव' नामसे कहा गया है। नवीन मनोविज्ञानके 'मनःसंवेग' और प्राचीन साहित्यशास्त्रके 'स्थायिकरण' एक ही तत्त्वके विभिन्न नाम हैं। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक मैगडूगलने १४ प्रकारकी मूल-प्रवृत्तियाँ और उनसे सम्बद्ध १४ मन :- संवेग माने हैं। भूल-प्रवृत्तिकी परिभाषा करते हुए उन्होंने लिखा है- 'मूल-प्रवृत्ति वह प्रकृति-प्रदत्त शक्ति है जिसके कारण प्राणी किसी विशेष प्रकारके पदार्थकी ओरपर ध्यान देता है और उसकी उपस्थितिमें विशेष प्रकारके संवेग या मनःक्षोभका अनुभव करता है।' मैगडूगलने जो चौदह प्रकारकी मूल-प्रवृत्तियाँ मानी हैं, उनकी तथा उनके साथ सम्बद्ध मन :- संवेगोंकी तालिका भी उन्होंने प्रस्तुत की है। मैगडूगलकी बनायी हुई तालिकामें पहला स्थान मूल- प्रवृत्तियोंको दिया गया है और दूसरा स्थान सम्बद्ध मनःसंवेगोंको। परन्तु जब वह मनोविज्ञानके विषयका विवेचन कर रहे हैं तब उन्हें मनोधर्म या मनःसंवेगोंको ही प्रधानता देनी चाहिये थी। इसका अभिप्राय यह है कि उन्हें अपनी तालिकामें मूल-प्रवृत्तियोंके बजाय मनःसंवेगोंको प्रथम स्थान देना चाहिये था और उसके बाद मनःसंवेगोंसे सम्बद्ध मूल-प्रवृत्तियोंका निर्देश करना चाहिये था, क्योंकि मूल-प्रवृत्तियों- के कारण, मूल-प्रवृत्तियोंको प्रेरणा देनेवाली शक्ति, मनःसंवेग ही है। इसी दृष्टिसे हमने उस तालिकाके कममें परिवर्तनकर मनःसंवेगको पहिले तथा मूल-प्रवृत्तिको पीछे कर दिया है। तदनुसार मैगडूगलके चौदह मनःसंवेगों तथा मूल-प्रवृत्तियोंकी सूची और उनके साथ स्थायिभावों तथा रसोंका समन्वय करके
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का० २७-२८, सू० ४३] चतुर्थ उल्लास:
दोनोंकी तुलनात्मक सूची नीचे प्रस्तुत कर रहे हैं। इस सूचीको देखनेसे मनोव्यापारोंके मनःसंवेगात्मक नव्य विभाजन और स्थायिभावात्मक प्राचीन विभाजनमें विस्मयजनक समता प्रतीत होगी। मनःसंवेगों और स्थायिभावोंका तुलनात्मक चित्र
नव्य मनोविज्ञानके अनुसार प्राचीन साहित्यशास्त्रके अनुसार
मनःसंवेग मूल-प्रवृत्तियाँ स्थायिभाव रस
१. भय पलायन तथा आ्त्मरक्षा भय भयानक-रस २. क्रोध युयुत्सा करोध रौद्र-रस ३. घणा निवृत्ति, वैराग्य जुगप्सा बीभत्स-रस ४. करुणा, दुःख शरणागति शोक करुण-रस ५. काम कामप्रवत्ति रति शृङ्गार-रस ६. आश्चर्ये कौतूहल, जिज्ञासा विस्मय अद्भुत-रस ७. हास आमोद हास हास्य-रस ८. दैन्य आत्मदीनता निर्वेद शान्त-रस ६. आत्मगौरव, उत्साह आत्माभिमान उत्साह वीर-रस १०. वात्सल्य, स्नेह पुत्रैषणा वात्सल्य, स्नेह वात्सल्य-रस इनके अतिरिक्त १. भोजनान्वेषणकी प्रवृत्ति, २. संग्रहकी प्रवृत्ति, ३. सामूहिकताकी प्रवृत्ति, ४. विधायकता या रचनाकी प्रवृत्ति इन चार प्रकारकी मूल-प्रवृत्तियोंका भी उल्लेख मैगडूगलने किया है। परन्तु उनका सम्बन्ध रससे नहीं है और उनको मौलिक मनःसंवेग कहना भी उचित नहीं प्रतीत होता है। प्राचीन भारतीय आचार्योंने मौलिकरूपसे नौ प्रकारके मनःसंवेग मानकर साहित्यशास्त्रमें नौ रसों या नौ प्रकारके स्थायिभावोंकी ही स्थापना की है। इस प्रकार स्थायिभावोंका सिद्धान्त प्राचीन मनोविज्ञानके सिद्धान्तपर आधारित है। चार मौलिक रसोंका सिद्धान्त अधिक सूक्ष्म विवेचन करनेवाले धनिक तथा धनञ्जय आदि आचार्योंने नौ मौलिक मनःसंवेगों अथवा स्थायिभावोंके स्थानपर केवल चार स्थायिभाव या चार रस माननेका भी निर्णय किया है और शेष रसोंकी उत्पत्ति उन चारसे ही मानी है। उनका कहना है कि रसानुभूतिके कालमें चित्तकी विकास, विस्तार, विक्षोभ तथा विक्षेपरूप चार प्रकारकी ही अवस्थाएँ होती हैं इसलिए चार ही रस मानने चाहिये। दशरूपककारने इस विषयका विवेचन करते हुए लिखा है -- विकासविस्तरक्षोभविक्षेपै: स शृङ्गारवीरबीभत्सरौद्रेषु चतुविध: ।। मनस: क्रमात् हास्याद्भुतभयोत्कर्षकरुणानां त एव हि॥ अर्थात् काव्यके परिशीलनसे आत्मामें आनन्दकी अनुभूतिका नाम स्वाद या रसास्वाद है। वह आ्त्मानन्द चित्तके विकास, विस्तार, विक्षोभ तथा विक्षेपरूपसे चार प्रकारका होता है। चित्तकी यह चार प्रकारकी अवस्था क्रमशः श्रृङ्गार, वीर, बीभत्स तथा रौद्र रसमें होती है। शेष हास्य, अद्भुत, भयानक तथा करुण रसमें भी चित्तकी वे ही अवस्थाएँ होती हैं -- 10
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काव्यप्रकाश [का० २७-२5, मू० 6३
अतस्तज्जन्यता तेषामत एवावधारणम्।। श्ृङ्गाराद्धि भवेद्धास्यो रौद्राच्च करुणो रसः । वीराच्चवाद्भुतोत्पत्तिर्बीभत्साच्च भयानकः । अर्थात् शंङ्गाररससे हास्यकी उत्पत्ति होती है और रौद्ररससे करुणरस उत्पन्न होता है। इसी प्रकार वीररससे अद्भुत तथा बीभत्सरससे भयानकरसकी उत्पत्ति होती है। अर्थात् हास्य आदि अन्तिम चार रसोंकी उत्पत्ति शृङ्गार आदि पहिलेके चार रसोंसे होती है। इसलिए चार ही मुख्य रस हैं, इस प्रकारका अवधारण किया जा सकता है। इस प्रकार प्राचीन साहित्यशास्त्रियोंने जो रस और उनसे सम्बद्ध स्थायिभावोंकी कल्पना की थी वह पूर्णतः मनोवैज्ञानिक आधारपर ही की थी। आजके मनोविज्ञानके सिद्धान्तोंके आधारपर भी उनकी मनोवैज्ञानिकताका समर्थन किया जा सकता है। २. विभाव जैसा कि हम पहले कह चुके हैं, रसानुभूतिके कारणोंको 'विभाव' कहते हैं। वे दो प्रकारके होते हैं-एक 'आलम्बन-विभाव' और दूसरा 'उद्दीपन-विभाव'। जिसको आलम्बन करके रसकी उत्पत्ति होती है उसको 'आलम्बन-विभाव' कहते हैं। जैसे सीताको देखकर रामके मनमें और रामको देखकर सीताके मनमें रतिकी उत्पत्ति होती है और उन दोनोंको देखकर सामाजिकके भीतर रसकी अभिव्यक्ति होती है। इसलिए सीता, राम आदि शृङ्गार रसके 'आलम्बन-विभाव' कहलाते हैं। चाँदनी, उद्यान, एकान्त स्थान आदिके द्वारा उस रतिका उद्दीपन होता है। इसलिए उनको शृङ्गाररसके 'उद्दीपन- विभाव' कहा जाता है। प्रत्येक रसके आलम्बन तथा उद्दीपन-विभाव अलग-अलग होते हैं। ३. अनुभाव 'स्थायिभाव' रसानुभूतिका प्रयोजक अन्तरङ्ग या आभ्यन्तर कारण है। आलम्बन तथा उद्दीपन विभाव उसके बाह्य या बहिरङ्ग कारण हैं। इसी प्रकार अनुभाव तथा व्यभिचारिभाव उस आन्तर रसानुभूतिसे उत्पन्न, उसकी बाह्याभिव्यक्तिके प्रयोजक शारीरिक तथा मानसिक व्यापार हैं। इनको रसका कारण, कार्य तथा सहकारी कहा जाता है। साहित्यदर्पणकारने अनुभावका लक्षण इस प्रकार किया है- उद्बुद्ध कारणैः स्वैः स्वैर्बहिर्भाव प्रकाशयन्। लोके यः कार्यरूप: सोऽनुभावः काव्यनाटययोः ॥ ३,१३२। अर्थात् अपने-अपने आलम्बन या उद्दीपन कारणोंसे, सीता-राम आदिके भीतर उद्बुद्ध रति आदिरूप स्थायिभावको बाह्यरूपमें जो प्रकाशित करता है वह रत्यादिका कार्यरूप, काव्य और नाटयमें 'अनुभाव' के नामसे कहा जाता है। भरतमुनिने अनुभावका लक्षण निम्नलिखित प्रकार किया है- वागङ्गाभिनयेनेह यतस्त्वर्थोऽनुभाव्यते। शाखाङ्गोपाङ्गसंयुक्तस्त्वनुभावस्ततः स्मृत: ॥। ३, ५। अर्थात् जो वाचिक या आङ्गिक अभिनयके द्वारा रत्यादि स्थायिभावकी आन्तर अभिव्यक्तिरूप अर्थका बाह्यरूपमें अनुभव कराता है उसको 'अनुभाव' कहते हैं। भरत-नाट्यशास्त्रके अनुसार अनुभावोंका विशेष उपयोग अभिनयकी दृष्टिसे ही होता है। किसी रसकी बाह्य अभिव्यक्तिके लिए अलग-अलग अभिनय-शैलीका अवलम्बन किया जाता है। पलग-अलग रसको प्रकाशित करनेवाले स्मित आदि बाह्य व्यापार 'अनुभाव' कहलाते हैं और वे प्रत्येक उसमें अलग-अलग होते हैं। वैसे अनुकार्यकी दृष्टिसे भी वे उसकी रसानुभूतिके बाह्य प्रदर्शक होते हैं।
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का० २७-२८, सू० ४३] चतुर्थ उल्लास:
भरतमुनिने नाटयशास्त्रके सप्तमाध्यायमें अलग-अलग स्थायिभावों और रसोंके अनुभावोंका वर्णन इस प्रकार किया है- स्थायिभाव और उनके अनुभावोंका चित्र स्थायिभाव उनके अनुभाव रतिः तामभिनयेत् स्मितवदन-मधुरकथन-भ्रक्षेप-कटाक्षादिभिरनभावैः । २ हास: तमभिनयेत् पूर्वोक्तर्हसितादिभिरनुभावैः । ३ शोक:
भिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । ४ कोध: अस्य विकृष्टनासापुट-उद्वृत्तनयन-सन्दष्टोष्ठपुट-गण्डस्फुरणादि- भिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । ५ उत्साह तस्य धैर्य-शौर्य-त्याग-वैशारद्यादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । ६ भयम् तस्य प्रकम्पितकरचरण-हृदयकम्पन-स्तम्भ-मुखशोष-जिह्वापरिलेहन-
क्तव्यः ।
७ जुगुप्सा तस्या: सर्वाङ्गसङ्कोच-निष्ठीवन-मुखविकूणन-हल्लेखादिभिरनुभावै- रभिनयः प्रयोक्तव्यः ।
विस्मय तस्य A5 साधुवादादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः । भरतमुनिके द्वारा अनुभावोंका यह जो विशेषरूपसे अभिनयमें प्रयोग दिखलाया गया है उससे प्रतीत होता है कि अनुभाव वस्तुतः आन्तर रसानुभूतिकी बाह्य अभिव्यञ्जनाके साधन हैं और उनमें शारीरिक व्यापारकी प्रधानता रहती है। नट कृत्रिमरूपसे इन अनुभावोंका अभिनय करता है परन्तु अनुकार्य राम आदिकी अन्तःस्थ रसानुभूतिकी बाह्य अभिव्यक्ति इन साधनोंके द्वारा होती है। वे रसानुभूतिके 'अनु पश्चात् भवन्ति इत्यनुभावाः' बादमें होते हैं, रसानुभूतिके कार्य होते हैं, इसलिए 'अनुभाव' कहलाते हैं। अथवा अनुकार्य राम आदिकी रसानुभूतिका अनुभव, अनुमान सामाजिकोंको कराते हैं, इसलिए अनुभाव कहलाते हैं। ४. व्यभिचारिभाव उद्बुद्ध हुए स्थायिभावोंकी पुष्टि तथा उपचयमें जो उनके सहकारी होते हैं उनको व्यभिचारि- भाव कहते हैं। भरतमुनिने 'नाटय-शास्त्र'के सप्तम अध्यायमें व्यभिचारिभाव शन्दकी निरुक्ति करते हुए लिखा है- 'व्यभिचारिण इदानी व्याख्यास्यामः । अव्राह-व्यभिचारिण इति कस्मात्। उच्यते-वि- अभि इत्येतावुपसगौं, चर इति गत्यर्थो धातुः। विविधम् आभिमुख्येन रसेषु चरन्तीति व्यभिचारिणः । वागङ्गसत्त्वोपेताः प्रयोगे रसान्नयन्तीति व्यभिचारिणः । अत्राह-कथं नयन्तीति। उच्यते-लोक- सिद्धान्त एषः यथा सूर्य इदं दिनं नक्षत्रं वा नयतीति। न च तेन बाहुभ्यां स्कन्धेन वा नीयते। किन्तु लोकप्रसिद्धमेतत्, यथेदं सूर्यो नक्षत्रं दिनं वा नयतीति। एवमेते व्यभिचारिणः इत्यवगन्तव्याः । तानिह संग्रहाभिहितांस्त्रयस्त्रिशद्व्यभिचारिणो भावान् वर्णयष्यामः ।'
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उक्तं हि भरतेन- "विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः" इति।F एतद्विवृण्वते- अर्थात् जो रसोंमें नानारूपसे विचरण करते हैं और रसोंको पुष्ट कर आ्स्वादके योग्य बनाते हैं उनको 'व्यभिचारिभाव' कहते हैं। इन व्यभिचारिभावोंकी संख्या ३३ मानी गयी है। ये ३३ व्यभिचारिभाव सब रसोंमें मिलकर होते हैं। अलग-अलग रसोंके हिसाबसे उनका वर्गीकरण नहीं किया गया है। भरतमुनिने व्यभिचारिभावोंकी गणना इस प्रकार की है- निर्वेदग्लानिशङ्काख्यास्तथासूया मदः श्रमः । आलस्यं चैव दैन्यं च चिन्ता मोहः स्मृतिर्धुतिः ॥१८॥ व्रीडा चपलता हर्ष आवेगो जडता तथा। गर्वो विषाद शत्सुक्यं निद्रापस्मार एव च॥१६॥ सुप्तं विबोधोऽमर्षश्चाप्यवहित्थमथोग्रता । मतिर्व्याधिस्तथोन्मादस्तथा मरणमेव च॥२०॥ त्ासश्चैव वितर्कश्च विज्ञेया व्यभिचारिणः। त्रयस्त्रिशदमी भावाः समाख्यातास्तु नामतः ॥ २१॥ भरतमुनिका रससूत्र रसकी निष्पत्तिका सर्वप्रथम उल्लेख भरतमुनिने अपने नाटयशास्त्रमें किया है। वही सारे रस- सिद्धान्तकी आधार-भित्ति है। भरतमुनिके 'रससूत्र' की व्याख्यामें ही उत्तरवर्ती आचार्योंने अपनी शक्ति लगायी है और उसके परिणामस्वरूप १. उत्पत्तिवाद, २. अनुमितिवाद, ३. भुक्तिवाद और ४. अभिव्यक्तिवाद इन चार सिद्धान्तोंका विकास हुआ है। विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारिभावोंके संयोगसे रसकी निष्पत्ति होती है इस भरत-सूत्रमें जो 'निष्पत्ति' शब्द आया है उसके भी चार अर्थ होते हैं। भट्टलोल्लटके मतमें 'निष्पत्ति' का अरथ 'उत्पत्ति', शंकुकके मतमें 'अनुमिति', भट्टनायकके मतमें 'भुक्ति' और अभिनवगुप्तके मतमें 'निष्पत्ति' शब्दसे अभिव्यक्तिका ग्रहण होता है। 'विभाव-अनुभाव-व्यभिचारि-संयोगाद् रसनिष्पत्तिः' विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारिभावके संयोगसे रसकी निष्पत्ति होती है। यह भरतमुनिका सूत्र है। इस सूत्रकी अनेक प्रकारकी व्याख्या उनके टीकाकारोंने की है जिनमेंसे १. भट्टलोल्लट, २. शंकुक, ३. भट्टनायक तथा ४. अभिनवगुप्त मुख्य व्याख्याकार हैं। इन चार आचार्यों द्वारा की गयी व्याख्या यहाँ काव्यप्रकाशकार मम्मटने भी उद्धृत की है। इन चारों आचार्यों द्वारा की जानेवाली यह व्याख्या अभिनवगुप्त-रचित भरतनाटयशास्त्रकी 'अभिनवभारती' नामक टीकामेंसे ली गयी है। 'अभिनवभारती' में यह सव प्रकरण बहुत लम्बा तथा कठिन है। मम्मटने उसका सारांश संक्षिप्तरूपमें उपस्थित कर दिया है, इतना ही अन्तर है। 'अभिनवभारती' के आधारपर ही आगे ग्रन्थकार भरतके रससूद और उसकी चार प्रकारकी व्याख्याको प्रस्तुत करेंगे। वे पहले रससूत्र देते हैं। [जैसा कि ] भरतमुनिने कहा भी है -- 'विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारिभावोंके संयोगसे रसकी निष्पत्ति होती है'। [पूर्ववर्तो १. भट्टलोल्लट, २. शंकुक, ३. भट्टनायक और ४. अभिनवगुप्त ] ;इसकी [ इस प्रकार ] व्याख्या करते हैं-/ १5 99 97
- 'नाटयशास्त्र' ६, १८-२१ 2000
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का० २७-२८, सू० ४३ ] चतुर्थ उल्लास: १०१
विभावैर्ललनोद्यानादिभिरालम्बनोद्दीपनकारणैः रत्यादिको भावी जनितः, अनुभावैः कटाक्षभुजाक्षेपप्रभृतिभिः कार्येः प्रतीतियोग्यः कृतः, व्यभिचारिभिनिर्वेदादिभिः सहकारिभिरुपचितो मुख्यया वृत्त्या रामादावनुकार्ये तद्रूपता नुसन्धानान्नर्त्तकेडपि प्रतीयमानो रस इति भट्टलोल्लटप्रभृतय; । भट्टलोल्लटका उत्पत्तिवाद भरत-सूत्रके व्याख्याकारोंमें भट्टलोल्लट उत्पत्तिवादके माननेवाले हैं। उनके मतमें विभाव, अनुभाव आदिके संयोगसे अनुकार्य राम आदिमें रसकी उत्पत्ति होती है। उनमें भी विभाव सीता आदि मुख्यरूपसे रसके उत्पादक होते हैं। अनुभाव उस उत्पन्न हुए रसको बोधित करनेवाले होते हैं और व्यभिचारिभाव उस उत्पन्न रसके परिपोषक होते हैं। अतः स्थायिभावके साथ विभावोंका उत्पाद्य- उत्पादकभाव, अनुभावोंका गम्य-गमकभाव और व्यभिचारिभावोंका पोष्य-पोषकभाव सम्बन्ध होता है। इसलिए भरत-सूत्रमें जो 'संयोग' शब्द आया है भट्टलोल्लटके मतमें उसके भी तीन अर्थ हैं। विभावोंके साथ संयोग अर्थात् उत्पाद्य-उत्पादक-भाव सम्बन्ध अनुभावोंके साथ गम्य-गमकभाव सम्बन्ध तथा व्यभिचा- रिभावोंके साथ पोष्य-पोषकभावरूप सम्बन्ध 'संयोग' शब्दका अर्थ होता है। इसी बातको आगे कहते हैं- [विभावों अर्थात् रसके आलम्वन तथा उद्दीपनके कारणभूत] ललना [आलम्बनविभाव ] और उद्यान आदि [उद्दीपन-विभावों ] से रति आदि [स्थायी ] भाव उत्पन्न हुआ, [रति आदिकी उत्पत्तिके ] कार्यभूत कटाक्ष, भुजाक्षेप आदि अनुभावोंसे प्रतीतिके योग्य किया गया और सहकारीरूप निर्वेद आदि व्यभिचारिभावोंसे पुष्ट किया गया मुख्यरूपसे अनुकार्यरूप राम आदिमें और उनके स्वरूपका अनुकरण करनेसे नटमें प्रतीयमान [अर्थात् आरोप्यमाण रत्यादि स्थायिभाव ही] रस [कहलाता ] है। यह भट्टलोल्लट आदिका मत है। यह जो भट्टलोल्लट आदिका मत दिखलाया है इरुमें स्थायिभावके साथ विभावोंका 'संयोग' अर्थात् उत्पाद्य-उत्पादकभाव सम्बन्ध, अनुभावोंके साथ गम्य-गमकभाव सम्बन्ध तथा व्यभिचारिभावोंके साथ पोष्य-पोषकभाव सम्बन्ध 'संयोग'से अभिप्रेत है ऐसा मान कर ही व्याख्यामें क्रमशः 'जनितः', 'प्रतीतियोग्यः कृतः' तथा 'उपचितः इन पदोंका प्रयोग किया गया है। दूसरी बात यह है कि इस मतमें रस मुख्यरूपसे अनुकार्य राम आदिमें रहता है और उनका अनुकर्ता होनेके कारण गौणरूपसे नटमें भी रसकी स्थिति मानी जाती है। परन्तु सामाजिकमें रसकी उत्पत्ति नहीं होती है। तीसरी बात यह है कि जैसे भरत-सूत्रमें आये हुए 'संयोग' शब्दके तीन अरथ यहाँ माने गये हैं उसी प्रकार भरत-सूत्रमें आये हुए 'निष्पत्ति' शब्दके भी तीन अर्थ समझने चाहिये। विभावके साथ स्थायिभावका 'संयोग' अर्थात् उत्पाद्य- उत्पादकभाव सम्बन्ध होनेपर रसकी 'निष्पत्ति' अर्थात् 'उत्पत्ति' होती है। यहाँ 'निष्पत्ति' शब्दका अर्थ 'उत्पत्ति' होता है। अनुभावोंके साथ 'संयोग' अर्थात् गम्य-गमकभाव सम्बन्ध होनेपर रसकी 'निष्पत्ति' अर्थात् 'प्रतीति' होती है। यहाँ 'निष्पत्ति' शब्दका अर्पर्थ 'प्रतीति' होता है और व्यभिचारिभावों- के साथ पोष्य-पोषकभाव सम्बन्ध होनेसे रसकी 'निष्पत्ति' तथा 'पुष्टि' होती है। यहाँ 'निष्पत्ति' शब्दका अर्थ पुष्टि होता है। यह इस व्याख्याका अभिप्राय है। इस व्याख्याको टीकाकारोंने मीमांसा-सिद्धान्तके अनुसार की गयी व्याख्या बतलाया है। 'मीमांसा' से यहाँ 'उत्तर-मीमांसा' अर्थात् 'वेदान्त'का ग्रहण करना चाहिये। वेदान्तमें जगत्की आध्यासिक प्रतीति मानी गयी है। जैसे रज्जुमें मर्पकी आ्र्पाध्यासिक या आरोपित प्रतीतिके समय सर्पके विद्यमान
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काव्यप्रकाश: [का० २७-२८, सू०४२ काीए राम एवायम् अयमेव राम इति, न रामोऽ्यमित्यौत्तरकालिके बाधे रामोऽयमिति, राम: स्याद्वा न वाऽयमिति, रामसदृशोऽयमिति, च सम्यङमिथ्यासंशयसादृश्यप्रतीतिभ्यो विलक्षणया चित्रतुरगादिन्यायेन रामोऽ्यमिति प्रतिपत्त्या ग्राह्ये नटे- 'सेयं ममाङ्गेषु सुधारसच्छटा सुपूरकर्पूरशलाकिका दृशोः । मनोरथश्रीर्मनस: शरीरिणी प्राणेश्वरी लोचनगोचरं गता ।।२५।। न होनेपर भी सर्पकी प्रतीति और उससे भयादि कार्योंकी उत्पत्ति होती है; उसी प्रकार अभिनयादिके समय रामादिगत सीताविषयिणी अनुरागादिरूपा रतिके विद्यमान न होनेपर भी नटमें विद्यमानरूपसे उसकी प्रतीति और उसके द्वारा सहृदयोंमें चमत्कारानुभूति आदि कार्योंकी उत्पत्ति होती है। इसी सादृश्यके कारण इस सिद्धान्तको 'मीमांसा' अर्थात् 'उत्तर-मीमांसा' या 'वेदान्त'का अनुगामी सिद्धान्त कहा जा सकता है। इस व्याख्याके करनेवाले भट्टलोल्लट मीमांसक पण्डित थे। भट्टलोल्लटके मतकी न्यूनता भट्टलोल्लटकी इस व्याख्यामें सबसे बड़ी कमी यह प्रतीत होती है कि इसमें मुख्यरूपसे अनुकार्य तथा गौणरूपसे नटमें तो रसकी उत्पत्ति, अभिव्यक्ति और पुष्टि आदि मानी गयी है, परन्तु सामाजिकको रसानुभूति क्यों होती है इस समस्यापर कोई ध्यान नहीं दिया गया है। दूसरी बात यह है कि अनुकार्य सीता-राम आदि तो अब इस जगत्में नहीं हैं। अतः इस समय किये जानेवाले अभिनयसे उनमें रसकी उत्पत्ति नहीं बन सकती है। इसलिए उनके अनुकर्ता नटमें भी रसकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है। ये दो इस व्याख्याके मुख्य दोष हैं। इसलिए यह व्याख्या अन्य आचार्योंको रुचिकर प्रतीत नहीं हुई। शंकुकका अनुमितिवाद इसलिए न्याय-सिद्धान्तके अनुयायी भरत-सूत्रके दूसरे टीकाकार शंकुकने इस सूत्रकी दूसरे प्रकारकी व्याख्या उपस्थित की है। उसमें उन्होंने सामाजिकके साथ रसका सम्बन्ध दिखलानेका प्रयत्न किया है। इस व्याख्याके अनुसार नट कृत्रिमरूपसे अनुभाव आदिका प्रकाशन करता है। परन्तु उनके सौन्दर्यके बलसे उनमें वास्तविकता-सी प्रतीत होती है। उन कृत्रिम अनुभाव आदिको देखकर सामाजिक, नटमें वस्तुतः विद्यमान न होनेपर भी, उसमें रसका अनुमान कर लेता है और अपनी वासनाके वशीभूत होकर उस अनुमीयमान रसका आस्वादन करता है। शंकुककी इस व्याख्याको काव्यप्रकाशकारने निम्नलिखित प्रकारसे उपस्थित किया है- १. 'यह राम ही है' अथवा 'यह ही राम है' [ इस प्रकारकी सम्यक् प्रतीति ], २. 'यह राम नहीं है' इस प्रकार उत्तरकालमें बाधित होनेवाली 'यह राम' है [ इस प्रकारकी मिथ्याप्रतीति ], ३. 'यह राम है या नहीं' [ इस प्रकारकी संशयरूप प्रतीति ] और ४. 'यह रामके समान है' [इस प्रकारकी सादृश्य- प्रतीति, ] इन १. सम्यकप्रतीति, २. मिथ्याप्रतीति, ३. संशयप्रतीति तथा ४. सादृश्यप्रतीतियोंसे भिन्न प्रकारकी 'चित्र-तुरग-न्याय' से होनेवाली [पाँचवें प्रकारकी ] प्रतीतिसे ग्राह्य नटमें- मेरे अङ्गोंमें सुधारसके समान [आनन्ददायिनी ], आँखोंके लिए कर्पूरकी शलाकाके समान [शीतलतादायक ] और मनके लिए शरीर-धारिणी मनोरथश्रीके समान यह प्राणेश्वरी मुझे अब दिखलायी दे रही है ।।२५।
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का० २७-२८, सू० ४३] चतुर्थ उल्लास: १०३
दैवादमहैद्य तया चपलायतनेत्रया वियुक्तश्च। अविरलविलोलजलदः काल: समुपागतश्चायम् ॥'२६।।
प्रकाशितैः कारणकार्यसहकारिभिः कृत्रिमैरपि तथाऽनभिमन्यमानैविभावादिशब्दव्यपदेश्यैः संयोगात्' गम्यगमकभावरूपात्, अनुमीयमानोऽपि वस्तुसौन्दर्यबलाद्रसनीयत्वेनान्यानु- मीयमानविलक्षणः स्थायित्वेन सम्भाव्यमानो रत्यादिर्भावस्तत्रासन्नपि सामाजिकानां वासनया चर्व्यमाणो रस इति श्रीशङकुकः । व वात मैं चञ्चल, बड़ी-बड़ी आँखोंवाली उस [प्रियतमा ] से आज ही अलग हुआ और [आज ही] निरन्तर उमड़ते हुए मेघोंसे युक्त यह [सन्तापकारी वर्षाका ] काल आ गया ॥२६।। इत्यादि काव्योंके अनुशीलसे तथा शिक्षाके अभ्याससे सिद्ध किये हुए अपने [अनुभाव इत्यादि ] कार्यसे नटके ही द्वारा प्रकाशित किये जानेवाले, कृत्रिम होनेपर भी कृत्रिम न समझे जानेवाले, विभाव आदि शब्दोंसे व्यवहृत होनेवाले, कारण, कार्य और सहकारियोंके साथ 'संयोग' अर्थात् गम्य-गमकभावरूप सम्बन्धसे, अनुमीयमान होनेपर भी, वस्तुके सौन्दर्यके कारण तथा आस्वादका विषय होनेसे अन्य अनुमीय- मान अर्थोंसे विलक्षण स्थायीरूपसे सम्भाव्यमान रति आदि भाव वहाँ [अर्थात् नटमें वास्तव रूपमें ] न रहते हुए भी सामाजिकके संस्कारोंसे [स्वात्मगतत्वेन ] आस्वाद किया जाता हुआ 'रस' कहलाता है। यह शरीशंकुकका मत है। [इस मतमें भरत-सूत्रके 'निष्पत्ति' शब्दका अर्थ 'अनुमिति' और 'संयोग' शब्दका अर्थ गम्य-गमकभाव सम्बन्ध है। ] श्रीशंकुकके मतका विश्लेषण किया जाय तो उसमें निम्नलिखित बातें विशेष ध्यान देने योग्य पायी जाती हैं-
१-शंकुकने नटमें रसको अनुमेय माना है। अनुमानकी सामग्रीमें, नटमें 'चित्रतुरग-न्याय'से गम-बुद्धिका प्रतिपादन किया है। जैसे घोड़ेके चित्रको देखकर 'यह घोड़ा है' इस प्रकारका व्यवहार होता है, परन्तु इस प्रतीतिको १. न सत्य कहा जा सकता है, २. न मिथ्या, ३.न संशयरूप कहा जा सकता है और ४. न सादृश्यरूप प्रतीति ही माना जा सकता है। चित्रस्थ तुरगमें होनेवाली बुद्धि इन चारों प्रकारकी बुद्धियोंसे भिन्न होती है। इसी प्रकार नटमें जो राम-बुद्धि होती है वह १. सम्यक्, २. मिथ्या, : संशय तथा ४. सादृश्य इन चारों प्रकारकी प्रतीतियोंसे विलक्षण होती है। २-रसकी अनुमितिमें राम-सीता आदि विभावोंकी प्रतीति तो चित्रतुरग-न्यायसे होती ही है, उसके अतिरिक्त जिन अनुभाव तथा व्यभिचारिभावरूप लिङ्गोंसे उनमें 'इय सीता रामविषयक- रतिमती, तस्मिन् विलक्षणस्मितकटाक्षादिमत्त्वात्' इस प्रकारका अनुमान होता है, वे लिङ्ग भी यथार्थ नहीं हैं। यथार्थ स्मित-कटाक्षादि अनुभाव तो यथार्थ सीता-राम आदिमें ही रहे होंगे। पर यहाँ चित्र- तुरग-न्यायसे उपस्थित सीता-रामरूप नटमें यथार्थ स्मित-कटाक्षादि नहीं हैं। नट अपने शिक्षा और अभ्याससे कृत्रिम स्मित-कटाक्षादिका प्रदर्शन करता है। इस प्रकार कृत्निम आलम्बनरूप सीता-राम आदिमें नटों द्वारा कृत्रिमरूपसे प्रकाशित स्मित-कटाक्षादिसे 'इयं सीता रामविषयक-रतिमती' या 'अयं गमः सीताविषयकरतिमान् तत्न विलक्षणस्मित-कटाक्षादिमत्त्वात्' इस प्रकार आ्नुमानिक रसकी प्रनीति होती है।
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३-इसलिए भरतके रससूत्रमें प्रयुक्त 'संयोगात्' शब्दका अर्थ 'गम्यगनकभावसम्बन्धात्' होता है। ४ -- इसलिए आनुमानिक रसकी प्रतीतिका आधार भी सामाजिक नहीं होता है। कृत्रिम राम और सीतामें रहनेवाली रति या रसका सामाजिकको केवल अनुमान होता है। उ्रP५-सामान्यतः अनुमान आदि प्रमाणोंसे होनेवाले ज्ञान 'परोक्ष' रूप माने जाते हैं। केवल प्रत्यक्षप्रमाणसे ही 'अपरोक्ष' प्रतीति होती है। परन्तु इस रसानुमितिमें विशेषता यह है कि वह अनुमिति होनेपर भी अन्य अनुमितियोंसे भिन्न और 'अपरोक्ष' रूप होती है। इसलिए उस अनुमित रसका भी मामाजिकको आस्वाद होता है। :-- सामाजिकके रसास्वादका कारण उसकी वासना और रसप्रतीतिमें विलक्षण अपरोक्षताकी कल्पना [5 है। वस्तुतः अनुमित रस न सामाजिकमें रहता है और न कृत्रिम रामादिमें रहता है, परन्तु वासनाके तलसे सामाजिकमें न रहनेवाले और नटमें भी वस्तुतः अविद्यमान किन्तु अनुमीयमान रसका सामाजिकको काग्रास्वाद होता है। शंकुकके 'अनुमितिवाद'को न्यायमतानुसारी सिद्धान्त माना गया है। इसका कारण उसका क अनुमिति-प्रधान होना ही है। न्यायशास्त्र अनुमिति-प्रधान शास्त्र है। विशेषरूपसे नव्य-न्यायके आचार्योने तो अपनी सारी शक्ति अनुमानके परिष्कारमें ही लगा दी थी। न्यायकी इस 'अनुमितिप्रधान' प्रत्रियाके आधारपर ही शंकुकने अपने 'अनुमितिवाद' की स्थापना की है। इसीलिए उसको न्याय- मतानुसारी सिद्धान्त कहा जाता है। i 'शंकुक' के मतमें चतुर्विध प्रतीतियोंमेंसे सम्यक् प्रतीतिका प्रदर्शन करते हुए ग्रन्थकारने 'राम एवायम्', 'अयमेव रामः' इन दो वाक्योंका प्रयोग किया है। इनमें वस्तुतः 'एव' पदका दो प्रकारसे, प्रयोग किया गया है। 'राम एवायम्' और 'अयमेव रामः' इन दोनों वाक्योंमें 'रामः' विशेषण पद है, 'अयम्' विशेष्य पद है। इनमेंसे प्रथम वाक्यमें विशेषणभूत 'रामः' पदके साथ 'एवकार का प्रयोग किया गया है और 'अयमेव रामः' इस दूसरे वाक्यमें 'अयम्' इस विशेष्य पदके साथ 'एवकार' का प्रयोग किया है। पहले वाक्यमें 'रामः' इस विशेषण पदके साथ एवकारको मिलाकर 'राम एवायम्' यह प्रयोग किया गया है। 'विशेषणसङ्गतः एवकारः अयोगव्यवच्छेदकः' इस नियमके अनुसार वह विशेष्यभूत 'अ्र्यम्' पदके अर्थमें 'रामत्व' के अयोगका व्यवच्छेद कर उसमें 'रामत्व' का नियमन करता है-अर्थात् 'यह रामसे भिन्न नहीं है'। दूसरे वाक्यमें विशेष्यभूत 'अयम्' के साथ प्रयुक्त 'एवकार' अन्ययोगका व्यवच्छेदक होता है। अर्थात् विशेष्यसे भिन्न किसी अन्य पदार्थमें विशेषणीभूत धर्मके सम्बन्धका निवारक होता है। इसलिए यहाँ विशेष्यभूत 'अयम्'के साथ प्रयुक्त 'एवकार' इससे भिन्न अर्थमें 'रामत्व' के सम्बन्धका निवारण करता हुआ 'यही राम है, अन्य कोई राम नहीं' इस प्रकार 'अयम्' में रामत्वका नियमन करता है। 'राम एवायम्' और 'अयमेव रामः' ये दोनों अंश मिलकर सम्यक प्रतीतिका प्रदर्शन करते हैं। 'एवकारस्त्रिधा मतः' अयोगमन्ययोगं च अत्यन्तायोगमेव च। व्यवच्छिनत्ति धर्मस्य एवकारस्त्रिधा मतः॥' इस 'एव का प्रयोग तीन प्रकारसे होता है और उन तीनोंमें उसके अर्थमें भेद हो जाता है। वह कभी विशेषणके साथ प्रयुक्त होता है, कभी विशेष्यके साथ और कभी क्रियाके साथ। विशेष्यके साथ प्रयोग होनेपर वह अन्य-योगका व्यवच्छेदक होता है [ विशेष्यसङ्गतस्त्वेवकारो अन्ययोगव्यवच्छेदक: ] जैमे 'पार्थ एव धनुर्धरः' । यहाँ पार्थ विशेष्य है उसके साथ प्रयुक्त एवकार अन्ययोगका व्यवच्छेदक
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होता है। अर्थात् वह विशेष्य पार्थसे अन्यमें विशेषण 'धनुर्धर'के सम्बन्धका निषेध करता है। 'पार्थ एव धनुर्धरो नान्य:' [पार्थ ही धनुर्धर है अन्य नहीं] यह उसका भावार्थ होता है। विशेषणके साथ प्रयुक्त 'एव' अयोगव्यवच्छेदक होता है [ विशेषणसङ्गतस्त्ववकारो अयोगव्यवच्छेदकः ] जैसे 'पार्थो धनुर्धर एव' यहाँ विशेषण धनुर्धरके साथ प्रयुक्त 'एव' विशेष्यमें विशेषणके अयोग अपर्थात् सम्बन्धाभावका निषेध करता है और 'पार्थ धनुर्धर ही है' इस रूपमें उसमें धनुर्धरत्वका नियमन करता है। इसी प्रकार जब 'एव' क्रियाके साथ अन्वित होता है तब अत्यन्तायोगका व्यवच्छेदक होता है। जैसे 'नीलं कमलं भवत्येव' इस वाक्यमें 'भवति' क्रियाके साथ अन्वित एवकार कमलमें नीलत्वके अत्यन्त असम्बन्धका निवेधक है। यहाँ वह न तो सब कमलोंमें नीलत्वके सम्बन्धको नियमित करता है और न कमलभिन्नमें अनील-वके सम्बन्धको, किन्तु किसी विशेष कमलमें नीलत्वके सम्बन्धको नियमित करता है। इस प्रकार एवके तीन प्रकारके प्रयोग होते हैं। श्रीशंकुकके मतकी न्यूनता श्रीशंकुकने सामाजिकमें रसप्रतीतिका उपपादन करनेका प्रयत्न अवश्य किया है, परन्तु वह पर्याप्तरूपसे सन्तोषजनक नहीं बन पड़ा है। उनकी प्रक्रियाके अनुसार सामाजिकको कृत्रिम विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारिभावोंके साथ कृत्रिम स्थायिभावके सम्बन्धसे नटमें कृत्रिम राम-सीतादिविषयक रतिका अनुमान होता है। परन्तु उससे सामाजिककी रसानुभूतिकी समस्या हल नहीं होती है। सामाजिकको रसका साक्षात्कार होता है इसका उपपादन करना चाहिये। रसानुभवमें इस प्रकारकी साक्षात्का रात्मक प्रतीतिका उपपादन अनुमानके द्वारा नहीं किया जा सकता है। अनुमानसे होनेवाला ज्ञान परोक्ष होता है, साक्षात्कारात्मक नहीं। फिर वह अनुमिति भी कैसी, जिसमें सब-कुछ कृत्रिम है। इसलिए अनुमितिवादके आधारपर रसास्वादनका ठीक तरहसे उपपादन नहीं किया जा सकता है। यही अनुमितिवादका सबसे बड़ा दोष है। भट्टनायकका भुक्तिवाद भरतमुनिके सूत्रके तीसरे व्याख्याकार भट्टनायकने सामाजिकको होनेवाली साक्षात्कारात्मक रसानुभूतिके उपपादनके लिए एक नये ही मार्गका अवलम्बन किया है। उसे साहित्यशास्त्रमें 'भुक्तिवाद' नामसे कहा जाता है। उसका आशय यह है कि रसकी 'निष्पत्ति' न अनुकार्य राम आदिमें होती है और न अनुकर्ता नट आदिमें। अनुकार्य और अनुकर्ता दोनों तटस्थ हैं, उदासीन हैं। उनको रसानुभूति नहीं होती है। वास्तविक रसानुभूति सामाजिकको होती है। उसका उपपादन अन्य किसी व्याख्याकारने नहीं किया है। भट्टलोल्लटने मुख्यरूपसे 'तटस्थ' राम आदिमें और गौणरूपसे 'तटस्थ' नटमें रसकी 'उत्पत्ति' मानी है। पर इसमें सामाजिकका स्थान कहीं नहीं आया है। अतएव 'ताटस्थ्येन रसोत्पत्ति' माननेवाले भट्टलोल्लटका सिद्धान्त ठीक नहीं है। श्रीशंकुकने 'तटस्थ' नटमें रसकी 'अनुमिति' [प्रतीति] मानी है और उसके द्वारा संस्कारवश सामाजिककी रस-चर्वणाका उपपादन करनेका यत्न किया है। परन्तु 'अनुमिति' तो केवल परोक्ष-ज्ञानरूप होती है। साक्षात्कारात्मक रसानुभूतिकी ममस्या उसके द्वारा हल नहीं हो सकती है। इसलिए यह सिद्धान्त भी ठीक नहीं है। 'न ताटस्थ्येन रस उत्पद्यते, न प्रतीयते' ताटस्थ्यसे अर्थात् अनुकार्यगत या अनुकर्तगतरूपसे न रसकी उत्पत्ति होती है और न प्रतीति या अनुमिति होती है। यहाँ 'न उत्पद्यते' से भट्टलोल्लटके 'उत्पत्तिवाद'का औरर 'न प्रतीयते' से शंकुकके अ्नुमितिवाद'का निराकरण किया गया है। इनके अतिरिक्त रसके विषयमें एक और सिद्धान्त है-'अभिव्यक्तिवाद' । इस सिद्धान्तके मुख्य आचार्य अभिनवगुप्त हैं। उनके मतानुसार सामाजिकमें रसकी 'अभिव्यक्ति' होती है। इन्होंने
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p: IV 'न ताटस्थ्येन नात्मगतत्वेन रसः प्रतीयते, नोत्पद्यते, नाभिव्यज्यते अपितु काव्ये
रसकी स्थिति 'तटस्थ' राम या नट आदिमें न मानकर 'आत्मगत' अर्थात् सामाजिकगत मानी है। मामाजिकमें भी रसकी 'उत्पत्ति' या 'अनुमिति' न मानकर उसकी अभिव्यक्ति मानी है। परन्तु भट्ट- नायकके मतमें यह 'अभिव्यक्तिवाद' भी ठीक नहीं है. क्योंकि अभिव्यक्ति सदा पूर्वसे विद्यमान वस्तुकी ही होती है। रस अनुभूतिस्वरूप है। अनुभतिकालसे पहिले या पीछे उनकी सत्ता नहीं है। 'अभिव्यक्त' होनेवाली वस्तुका अस्तित्व अभिव्यक्तिके पहले भी रहता है और बादको भी। परन्तु रसकी यह स्थिति नहीं है। रस अनुभूतिकालमें ही रहता है, उसके आगे या पीछे नहीं। इसलिए रसकी अभिव्यक्ति माननेवाला सिद्धान्त भी ठीक नहीं है। 'आत्मगतत्वेन नाभिव्यज्यते' आरत्मगत अर्थात् सामाजिकगत रूपसे रस अभिव्यक्त भी नहीं होता है। इस प्रकार भट्टनायकने 'उत्पत्तिवाद', 'अनुमितिवाद' और 'अभिव्यक्तिवाद' तीनोंका खण्डन करके अपने 'भुक्तिवाद' की स्थापना की है और उसीको रसानुभूतिकी समस्याका सबसे सुन्दर समाधान माना है। भट्टनायकने अपने 'भुक्तिवाद' की स्थापना करनेके लिए शब्दमें स्वीकृत अभिधा और लक्षणा शक्तिके अतिरिक्त 'भावकत्व' तथा 'भोजकत्व' रूप दो नये व्यापारोंकी कल्पना की है। उनके मतानुसार अ्भिधा या लक्षणासे काव्यका जो अर्थ उपस्थित होता है उसको शब्दका 'भावकत्व' व्यापार परिष्कृत कर सामाजिकके उपभोगके योग्य बना देता है। काव्यसे जो अर्थ अभिधा द्वारा उपस्थित होता है वह एक विशेष नायक और विशेष नायिकाकी प्रेमकथा आदिके रूपमें व्यक्तिविशेषसे सम्बद्ध होता है। इस रूपमें सामाजिकके लिए उसका कोई उपयोग नहीं होता है। शब्दका 'भावकत्व' व्यापार इस कथामें परिष्कार कर उसमेंसे व्यक्तिविशेषके सम्बन्धको हटाकर उसका 'साधारणीकरण' कर देता है। उस साधारणीकरण के बाद सामाजिकका उस कथाके साथ सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। अपनी रुचि या संस्कारके अनुरूप सामाजिक उस कथाका एक पात्र स्वयं बन जाता है। इस प्रकार असली नायक- नायिका आदिकी जो स्थिति उस कथामें थी, 'साधारणीकरण' व्यापारके द्वारा सामाजिकको लगभग वही स्थान मिल जाता है। यह शब्दके 'भावकत्व' नामक दूसरे व्यापारका प्रभाव हुआ। भट्टनायकके अनुसार इस 'भावकत्व' व्यापारसे काव्यार्थका 'साधारणीकरण' हो जाता है तब शब्दका 'भोजकत्व' नामक तीसरा व्यापार सामाजिकको रसका साक्षात्कारात्मक 'भोग' करवाता है। यही भट्टनायकका 'भोजकत्व' सिद्धान्त है, जो 'भुक्तिवाद' कहलाता है। इस प्रकार भट्टनायकने शब्दमें अभिधा, लक्षणा आदिके अतिरिक्त 'भावकत्व' तथा 'भोजकत्व' रूप दो नवीन व्यापारोंकी कल्पना कर सामाजिककी रसानुभूतिका उपपादन करनेका प्रयत्न किया है। मम्मटने उनके सिद्धान्तका उल्लेख प्रकृत प्रकरणमें इस प्रकार किया है- न तटस्थरूपसे [ अर्थात् नटगत या अनुकार्यगतरूपसे ] रसकी प्रतीति [अर्थात् अनुमिति ] होती है और न उत्पत्ति होती है [ क्योंकि तटस्थगत रसकी उत्पत्ति या अनुमिति माननेसे सामाजिकको रसका आस्वादन नहीं हो सकता है] और न सामाजिकगतरूपसे [ आत्मगतत्वेन रसकी ] अभिव्यक्ति होती है [क्योंकि 'अभिव्यक्ति' सदा पूर्वसे विद्यमान अर्थकी होती है। रस केवल अनुभूतिस्वरूप ही है। अनभतिसे भिन्न कालमें उसकी स्थिति नहीं है। इस प्रकार 'नोत्पद्यते' से भट्टलोल्लटके मतका, 'न प्रतीयते'से श्रीशंकुकके मतका तथा 'नाभिव्यज्यते' पदसे आगे दिखाये जाने वाले अभिनवगुप्तके मतका, सबका ही निराकरण कर दिया गया है। तब भट्टनायकके मतमें सामाजिकको रसास्वादन कैसे होता है यह आगे बतलाते हैं ]। अपितु काव्य अथवा नाटकमें [ शब्दके ] अभिधा [तथा लक्षणा ] से भिन्न विभावादिके
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नाटये चाभिधातो द्वितीयेन विभावादिसाधारणीकरणात्मना भावकत्वव्यापारेण भाव्यमान: स्थायी, सत्त्वोद्रेकप्रकाशानन्दमयसंविद्विश्रान्तिसतत्त्वेन भोगेन भुज्यते' इति भट्टनायकः । साधारणीकरणस्वरूप 'भावकत्व' नामक व्यापारसे [विशेष सीता-राम आदिके सम्बन्धके बिना 'भाव्य- मान:' अर्थात् ] साधारणीकृत [रत्यादि] स्थायिभाव [योगाभ्यास आदि कालमें ] सत्त्व [गुण ] के उद्रेकसे [ब्रह्मानन्दसदृश ] प्रकाश और आनन्दमय अनुभतिकी [वैद्यान्तर-सम्पर्क-शून्यरूपसे ] स्थितिके सदृश [अर्थात् ब्रह्मसाक्षात्कारजन्य आनन्दानुभूतिके सदृश ] भोगसे [अर्थात् शब्दके 'भोजकत्व' नामक व्यापारसे 'भुज्यते' अर्थात् ] आस्वादित किया जाता है यह भट्टनायकका मत है। [इस मतमें सूत्रके 'निष्पत्ति' शब्दका अर्थ 'भुक्ति' है और 'संयोग' का अर्थ 'भोज्य-भोजकभाव सम्बन्ध' है ]। भट्टनायकके इस 'भुक्तिवाद'को व्याख्याकारोंने सांख्यमतानुयायी सिद्धान्त माना है। इस सिद्धान्तको सांख्य-सिद्धान्तका अनुगामी इस रूपमें कहा जा सकता है कि जैसे सांख्यमें सुख-दुःख आदि वस्तुतः अन्तःकरणके धर्म हैं, आत्माके धर्म नहीं, परन्तु पुरुषका अन्तःकरणके साथ सम्बन्ध होनेसे पुरुषमें उनकी औपाधिक प्रतीति होती है, उसी प्रकार सामाजिकमें न रहनेवाले रसका भोग उसको होता है इस सादृश्यके आधारपर ही इस सिद्धान्तको सांख्य-सिद्धान्तका अनुगामी कहा जा सकता है। भट्टनायकके मतकी न्यूनता भट्टनायकने अपनी इस प्रक्रिया द्वारा सामाजिकगत रसानुभूतिके उपपादनका अच्छा प्रयत्न किया है। पर उसमें उन्होंने शब्दमें 'भावकत्व' तथा 'भोजकत्व' नामक जिन दो नवीन-व्यापारोंकी कल्पना की है वे अनुभवसिद्ध नहीं हैं और जिस स्थायिभावका 'भोग' बतलाया है वह राम-सीतादिगत स्थायिभाव है या नटगत या सामाजिकगत, इसका भी स्पष्टीकरण नहीं हुआ है। इसलिए मुख्यरूपसे अप्रामाणिक 'भोजकत्व' व्यापारपर आश्रित होनेसे भट्टनायकका 'भुक्तिवाद' विद्वानोंमें आदर प्राप्त न कर सका।
अभिनवगुप्तका अभिव्यक्तिवाद इसलिए भरत-नाटयशास्त्रके चतुर्थ किन्तु सर्वप्रमुख व्याख्याकार अभिनवगुप्तने 'अभिव्यक्ति- वाद' की स्थापना की है। जिस प्रकार भट्टलोल्लटने उत्तरमीमांसाके, श्रीशंकुकने न्यायके और भट्टनायकने सांख्यके आधारपर अपने-अपने मतोंकी स्थापना की है, उसी प्रकार अभिनवगुप्तने अपने पूर्ववर्ती अलद्कार- शास्त्रके प्रमुख ध्वनिवादी आचार्य आनन्दवर्धनके आधारपर अपने 'अभिव्यक्तिवाद'का प्रतिपादन किया है इसलिए उनका मत आलङ्कारिक मत कहा गया है। उन्होंने स्पष्टरूपसे सामाजिकगत रसानु- भूतिके उपपादनके लिए दूसरे मार्गका अवलम्बन किया है। उसमें पहली बात तो उन्होंने यह स्पष्टकर दी है कि सामाजिकगत स्थायिभाव ही रसानुभूतिका निमित्त होता है। मूल मनःसंवेग अर्थात् वासना या संस्काररूपमें रति आदि स्थायिभाव सामाजिककी आत्मामें स्थित रहता है। वह साधारणीकृतरूपसे उपस्थित विभावादि-सामग्रीसे अभिव्यक्त या उद्बुद्ध हो जाता है और तन्मयीभावके कारण वेद्यान्तरके सम्पर्कसे शून्य ब्रह्मास्वादके सदृश परमानन्दरूपमें अनुभूत होता है। इस मतमें भट्टनायकके समान शब्दमें 'भावकत्व' तथा 'भोजकत्व' रूप दो व्यापारोंकी कल्पना नहीं की गयी है, परन्तु 'भावकत्व' व्यापारके स्थानपर 'साधारणीकरण' व्यापार, अभिधा तथा लक्षणाके साथ शब्दकी 'व्यञ्जना' नामक तृतीय
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लोके प्रमदादिभिः स्थाय्यनुमानेऽभ्यासपाटववतां काव्ये नाटये च तैरेव कारण- त्वादिपरिहारेण विभावनादिव्यापारवत्त्वाद लौकिकविभावादिशब्दव्यावहा य्यैर्म मैवैते, शत्रोरेवैते, तटस्थस्यैवैते, न ममैवैते, न शत्रोरेवैते, न तटस्थस्यैवैते, इति सम्बन्धविशेष- स्वीका रपरिहा रनियमा नध्यवसायात् साधारण्येन प्रतीतैरभिव्यक्तः सामाजिकानां वासना- त्मकतया स्थितः स्थायी रत्यादिको नियतप्रमातृगतत्वेन स्थितोऽपि साधारणोपायबलात् तत्का लविगलितपरिमितप्रमा तृभाववशोन्मिषितवेद्यान्तरसम्पर्कशून्यापरिमितभावेन प्रमात्रा सकलसहृदयसंवादभाजा साधारण्येन स्वाकार इवाभिन्नोऽपि गोचरीकृतश्चर्व्यमाणतैक- प्राण:, विभावादिजीवितावधिः, पानकरसन्यायेन चर्व्यमाण: पुर इव परिस्फुरन्, हृदयमिव
वृत्ति अवश्य मानी गयी है। अभिनवगुप्तके इस सिद्धान्तको ग्रन्थकारने यहाँ निम्नलिखितरूपमें प्रस्तुत किया है- लोकमें प्रमदा आदि [अर्थात् प्रमदा, उद्यान, कटाक्ष आदि विभाव, अनुभावादिके देखने ] से [ उन प्रमदादिमें रहनेवाले रति आदिरूप ] स्थायी [भावों ]के अनुमान करनेमें निपुण सहृदयोंका, काव्य तथा नाटकमें कारणत्व [कार्यत्व तथा सहकारित्व ] आदिको छोड़कर विभावन आदि व्यापार [रत्यादीनाम् आस्वादयोग्यतानयनरूपाविभविनं विभावनम् अर्थात् रत्यादिको आस्वादयोग्य रूप प्रदान करना 'विभावन व्यापार' कहलाता है आदि पदसे 'अनुभावन' तथा 'व्यभिचारण' व्यापारका भी संग्रह होता है। इस प्रकारके आस्वादयोग्य रत्यादिको 'अनुभवविषयीकरणमनुभावनम्' अनुभवका विषय बनाना 'अनुभावन' तथा 'काये विशेषेण अभितः रत्यादीनां सञ्चारणं व्यभिचारणम्' शरीरमें रति आदिके प्रभावका सञ्चारण 'व्यभिचारण' व्यापार] से युक्त होनेसे विभावादि शब्दोंसे व्यवहार्य उन्हीं [प्रमदादि रूप कारण, कार्य, सहकारियों] से [जो] 'ये मेरे ही हैं' या 'शत्रुके ही है' या 'तटस्थके ही है' अथवा 'ये न मेरे ही हैं, 'न शत्रुके ही है' और 'न तटस्थके ही है' इस प्रकारके सम्बन्धविशेषका स्वीकार अथवा परिहार करनेके नियमका निश्चय न होनेसे साधारण [अर्थात् विशेष व्यक्तिके सम्बन्धसे रहित ] रूपसे प्रतीत होनेवाले [उन विभावादि ] से ही अभिव्यक्त होनेवाला और सामाजिकोंमें वासनारूपसे विद्यमान रति आदि स्थायी [भाव ] नियत प्रमाता [अर्थात् विशिष्ट एक सामाजिक ] में स्थित होनेपर भी साधारणो- पाय [अर्थात् व्यक्तिविशेषके सम्बन्धके बिना प्रतीत होनेवाले विभावादि ] के बलसे उसी [ रसानुभवके] कालमें [मैं ही इसका आस्वादनकर्ता हूँ, या ये विभावादि मेरे ही हैं, इस प्रकारके व्यक्तिगत भावनाओं रूप ] परिमित प्रमातृभावके नष्ट हो जानेसे वद्यान्तरके सम्पर्कसे शून्य और अपरिमित प्रमातृभाव जिसमें उदित हो गया है इस प्रकारके [प्रमाता ] सामाजिकके द्वारा समस्त [सामाजिकोंके ] हृदयोंके साथ समानरूपसे [व्यक्तिविशेषके सम्बन्धसे रहित साधारण्यसे ] अपनी आत्माके समान [आस्वादसे ] अभिन्न होनेपर भी, [आस्वादका ] विषय होकर, [अर्थात् जैसे आत्म-साक्षात्कारमें चिद्रूपसे अभिन्न आत्माको भी साक्षात्कारका 'विषय' माना जाता है, इसी प्रकार रसानुभूतिमें अनुभूतिसे अभिन्न होनेपर भी रसको [ 'विषय' कहा जा सकता है ], आस्वादमात्रस्वरूप [चर्व्यमाणतैकप्राणः ], विभावादिकी स्थितिपर्यन्त ही रहनेवाला, [इलायची, कालीमिर्च, शक्कर, इमली, आम आदिको मिलाकर तैयार किये गये प्रपाणक अर्थात् ] पनेके रसके समान [अर्थात् प्रपाणककी घटक-सामग्रीके रससे विलक्षण रसके समान ] आस्वाद्यमान, साक्षात् प्रतीत होता हुआ-सा, हृदयमें प्रविष्ट होता हुआ-सा, समस्त
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प्रविशन्, सर्वाङ्गीणमिवालिङ्गन्, अन्यत्सर्वमिव तिरोदधद्, ब्रह्मास्वादमिवानुभावयन्, अलौकिकचमत्कारकारी शृङ्गारादिको रसः ।
अङ्गोंका आलिङ्गन करता हुआ-सा, अन्य सबको तिरोभूत करता हुआ-सा, ब्रह्मसाक्षात्कारका अनुभव कराता हुआ-सा, अलौकिक आनन्दको प्रदान करनेवाला [चमत्कारी ] शृङ्गार आदि 'रस' होता है। [यह अभिनवगुप्तका मत है और यह आलङकारिकोंका सिद्धान्त माना जाता है।] अभिनवगुप्तने भरतनाटयशास्त्रकी 'अभिनवभारती' नामक अपनी व्याख्यामें रसोत्पत्तिके विषयमें बहुत अधिक विस्तारके साथ विचार किया है। उसमें उन्होंने भट्टलोल्लट, श्रीशंकुक तथा भट्टनायकके मतोंको दिखलाने तथा उनकी आलोचना करनेके बाद अपने सिद्धान्तका प्रतिपादन किया है। उनके सारे विवेचनका केन्द्रबिन्दु सामाजिककी रसानुभूति रही है। इसी कसौटीपर उन्होंने दूसरे मतोंकी परीक्षा की है और इन मतोंके विन्यासके पौर्वापर्यका निर्धारण भी उसी कसौटीपर किया है। सबसे पहिले दिये हुए भट्टलोल्लटके मतमें सामाजिककी रसानुभूतिकी कोई चर्चा नहीं है इसलिए खण्डन करने योग्य अथवा अनुपादेयताकी दृष्टिसे उसको सबसे पहिले रखा है। अनुमेयतावादी शंकुकके मतमें यद्यपि सामाजिकके साथ रसका सम्बन्ध तो स्थापित किया गया है, परन्तु अनुमितिरूप होनेसे वह साक्षात्कारात्मक नहीं है इसलिए वह भी अधिक उपादेय नहीं है, अतः उसको दूसरा स्थान दिया गया है। भट्टनायकके तीसरे मतमें रसानुभूतिको सामाजिकके साक्षात्कारात्मक अनुभवके रूपमें प्रस्तुत करनेका यत्न किया गया हैं, इसलिए वह शेष दोनों मतोंसे अधिक उपादेय है इसलिए तीसरे स्थानपर उसको रखा गया है। परन्तु इस सिद्धान्तमें 'भावकत्व' तथा 'भोजकत्व' रूप दो व्यापारोंकी कल्पना की गयी है वह प्रामाणिक नहीं है, इसलिए उसका भी निराकरण कर अभिनवगुप्तने अपने 'अ्भिव्यक्तिवाद' की स्थापना की हैं। इस प्रकार इन मतोंकी रसप्रक्रियामें उपादेयताके तारतम्यसे ही अभिनवगुप्तने उनके कमका निर्धारण किया है। काव्यप्रकाशकारने इन मतोंके विवेचन को 'अभिनव- भारती' से ही लेकर अपने ग्रन्थमें समाविष्ट किया है। रसकी अलौकिकताकी सिद्धि अभिनवगुप्तने यहाँ रसको 'अलौकिक' कहा है, अर्थात् वह लौकिक अन्य वस्तुओंसे भिन्न प्रकारका है। उसकी इस अलौकिकताका उपपादन ग्रन्थकारने अगले अनुच्छेदमें किया है। लोकमें पायी जानेवाली अनित्य वस्तुएँ दो प्रकारकी होती हैं-एक 'कार्य' रूप और दूसरी 'ज्ञाप्य' रूप। घट, पट आदि 'कार्य' पदार्थ हैं। ये किसी कारणसे उत्पन्न होते हैं इसलिए 'कार्य' कहलाते हैं और इनका जनक 'कारण' या 'कारक' कहलाता है। दूसरे प्रकारसे ये पदार्थ ज्ञानके 'विषय' या 'ज्ञाप्य' होते हैं; जैसे दीपकके प्रकाशसे घटका ज्ञान होता है इसलिए दीपकके द्वारा घट 'ज्ञाप्य' है। पूर्वसिद्ध पदार्थका जब किसी साधनके द्वारा ज्ञान होता है तो वह पदार्थ 'ज्ञाप्य' कहलाता है और जो पदार्थ पूर्वसिद्ध नहीं है, कारणके व्यापारके बाद उसकी उत्पत्ति होती है वह 'कार्य' कहलाता है। संसारके सारे अनित्य पदार्थ 'कार्य' और 'ज्ञाप्य' दो वर्गोंमें ही अवश्य अन्तर्भूत हो जाते हैं। परन्तु रसको न 'कार्य' कहा जा सकता है और न 'ज्ञाप्य'। 'कार्य' तो इसलिए नहीं हो सकता है कि 'कार्य' पदार्थ अपने निमित्तका नाश हो जानेपर भी बने रहते हैं; जैसे, कुम्हारका वनाया हुआ घड़ा कुम्हारके मर जानेके बाद भी बना रह सकता है। यदि रमको 'कार्य' माना जाय तो उसके निमित्तकारण विभावादि ही होंगे। इसलिए विभावादिका नाश
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स च न कार्यः, विभावादिविनाशेऽपि तस्य सम्भवप्रसङ्गात् । नापि ज्ञाप्यः, सिद्धस्य तस्यासम्भवात् । अपि तु विभावादिभिर्व्यन्जितश्चर्वणीयः । कारकज्ञापकाभ्यामन्यत् क्व दृष्टमिति चेत् ? न क्वचिद् दृष्टमित्यलौकिकत्व- सिद्धर्भूषणमेतन्न दूषणम् ।
हो जानेके बाद भी उसकी प्रतीति होनी चाहिये। परन्तु विभावादिके नाशके बाद रसकी प्रतीति नहीं होती है। इसी अभिप्रायसे ग्रन्थकारने 'विभावादिजीवितावधिः' इस विशेषणका प्रयोग ऊपर किया है। इसलिए रसको 'कार्य' नहीं माना जा सकता है। इसी प्रकार रस 'ज्ञाप्य' भी नहीं है, क्योंकि 'ज्ञाप्य' पदार्थ ज्ञान होनेके पूर्व भी विद्यमान होता है और बादको भी विद्यमान रहता है। परन्तु रसकी सत्ता न अनुभवसे पूर्वकालमें रहती है और न अनुभवके बाद। जबतक रसकी अनुभूति होती है तबतक ही उसकी सत्ता रहती है। इसलिए वह 'कार्य' तथा 'ज्ञाप्य' दोनों प्रकारके लौकिक पदार्थोंसे भिन्न है। इसी कारण रस 'अलौकिक' कहा जाता है। इसी बातको ग्रन्थकारने अगले अनुच्छेदमें इस प्रकार प्रस्तुत किया है- और वह [रस ] कार्य नहीं है। [क्योंकि 'कार्य' माननेपर ] विभावादिका नाश हो जानेपर भी [कुम्भकारकी मत्यु हो जानेपर भी जैसे घड़ा बना रहता है इस प्रकार ] उसकी स्थिति सम्भव हो जायगी [जो कि होती नहीं है। इसलिए रस 'कार्य' नहीं है ] और उसके पूर्वसिंद्ध [अनुभवके पहले विद्यमान ] न होनेसे वह 'ज्ञाप्य' भी नहीं है। अपितु विभावादिसे व्यञ्जित और आस्वादयोग्य [अर्थात् आस्वादकालमें ही विद्यमान रहता ] है।
अलौकिकताकी दूसरी युक्ति यहाँ यह प्रश्न उपस्थित होता है कि आप रसको न 'कार्य' मानते हैं और न 'ज्ञाप्य'। फिर भी यह कह रहे हैं कि वह विभावादिसे व्यञ्जित होकर चर्वणीय होता है। ये दोनों बातें कैसे सङ्गत हो सकती हैं। क्योंकि संसारमें दो ही प्रकारके कारण होते हैं, एक 'कारक' दूसरे 'ज्ञापक'। जब रस 'कार्य' नहीं है तो उसका कोई 'कारक' हेतु नहीं हो सकता है और इसके 'ज्ञाप्य' न होनेसे उसका कोई 'ज्ञापक' हेतु भी नहीं हो सकता है। इन 'कारक' तथा 'ज्ञापक' हेतुंके अतिरिक्त और कोई तीसरा हेतु होता ही नहीं है तो विभावादि रसके 'व्यञ्जक' कैसे हो सकत हैं ? इस प्रश्नका उत्तर ग्रन्थकार यह देते हैं कि इसीलिए तो हम रसको 'अलौकिक' कहते हैं। लोकमें जो 'कारक' तथा 'ज्ञापक' दो प्रकारके हेतु पाये जाते हैं, रसके 'व्यञ्जक' हेतु विभावादि उन दोनोंसे विलक्षण अतएव 'अलौकिक' हैं। इसलिए यह अलौकिकत्वसिद्धिका भूषण है, दूषण नहीं। पहिले अनुच्छेदमें यह कहा था कि रस न 'कार्य' है न । 'ज्ञाप्य', इससे रसकी अलौकिकता सिद्ध होती है। इस अनुच्छेदमें यह कहा है कि रसका हेतु न 'कारक' हेतु है, न 'ज्ञापक' हेतु । यह हेतुकी अलौकिकताको सिद्ध करता है। इस प्रकार हेतुकी अलौकिकतासे भी रसकी अलौकिकता सिद्ध होती है।
इसी बातको ग्रन्थकार अगले अनुच्छेदमें कहते हैं -- कारक तथा ज्ञापक। हेतुओं ससे अतिरिक्त [ व्यञ्जक आदि हेतु ] कहाँ पाये जाते हैं यह प्रश्न
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का० २७-२८, सू० ४३] चतुर्थ उल्लास १११
चर्वणानिष्पत्त्या तस्य निष्पत्तिरुपचरितेति कार्योऽप्युच्यताम्। लौकिक प्रत्यक्षादि-
मितेतरयोगिसंवेदनविलक्षणलोकोत्तरस्वसंवेदनगोचर इति प्रत्येयोऽप्यभिधीयताम्।
करो तो [ हमारा उत्तर यह है कि ] कहीं नहीं पाये जाते हैं यह बात तो अलौकिकत्वकी सिद्धिका भूषण है, दूषण नहीं [ इसलिए रस वस्तुतः न 'कार्य' है और न 'ज्ञाप्य'। वह 'अलौकिक' है]। आस्वादकी उत्पत्ति होनेसे उपचारसे उसकी भी उत्पत्ति कही जा सकती है इसलिए [ रसको उपचारसे ] 'कार्य' भी कहा जा सकता है और १. लौकिक प्रत्यक्षादि [से भिन्न ], तथा २. बिना प्रमाणों- की सहायताके [प्रमाणताटस्थ्य ] से होनेवाले 'मित-योगि-ज्ञान' [अर्थात् बिना प्रमाणोंकी सहायताके योगजसाम्थ्यसे सिद्ध युञ्जान योगियोंके ज्ञानसे भिन्न ] तथा ३. वेद्यान्तरके संस्पर्शसे रहित, स्वात्म- [साक्षात्कार ] मात्रमें पर्यवसित, परिमितसे भिन्न योगियों [अर्थात् युक्त योगियों] के ज्ञानसे भिन्न, [लौकिक प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे जन्य लौकिक प्रत्यक्ष तथा युञ्जान एवं युक्त दोनों प्रकारके योगियोंके ज्ञानसे विलक्षण ] लोकोत्तर अनुभूतिका विषय होता है इसलिए [ रसको उपचारसे ] 'ज्ञेय' भी कहा जाता है [ परन्तु वस्तुतः वह न 'कार्य' है और न 'ज्ञाप्य', अपितु अलौकिक है]। ऊपर ग्रन्थकारने यह कहा था कि लौकिक पदार्थ 'कार्य' या 'ज्ञाप्य' दोनोंमेंसे किसी एक वर्गमें अवश्य आते हैं, किन्तु रस इन दोनोंमेंसे किसी भी वर्गमें नहीं आता है। इसलिए वह लौकिक पदार्थोंसे भिन्न है। इस विषयमें एक और भी युक्ति इसी अनुच्छेदके भीतर आ गयी है। वह यह है कि हम लौकिक प्रत्यक्षज्ञानको तीन भागोंमें विभक्त कर सकते हैं-एक अस्मदादिका प्रत्यक्ष, दूसरा मित-योगी अर्थात् अपरिपक्व सविकल्पक समाधिमें स्थित युञ्जान योगियोंका ज्ञान और तीसरा परिमितेतर योगी अर्थात् परिपक्व या युक्त योगियोंका ज्ञान। अस्मदादिका साक्षात्कारात्मक ज्ञान प्रत्यक्षादि प्रमाणोंकी सहायतासे ही होता है। मित-योगियोंका ज्ञान प्रत्यक्षादि प्रमाणोंकी सहायताके बिना [प्रमाणताटस्थ्य ] योगज- सामथ्यसे ही हो जाता है। और तीसरा परिमितेतर योगी अर्थात् परिपक्व निर्विकल्पक समाधिमें स्थित योगीका ज्ञान वेद्यान्तरके स्पर्शसे रहित केवल आत्मानुभूतिमात्र होता है। रसकी अनुभूति इन तीन प्रकारके ज्ञानोंसे विलक्षण है। वह न तो अस्मदादिके प्रत्यक्षके समान प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे उत्पन्न होती है, न 'प्रमाणताटस्थ्य'वाले मित-योगि-ज्ञानका विषय है और न निर्विकल्पक समाधिमें स्थित योगियोंकी वैद्यान्तर-स्पर्शरहित आत्मानुभूतिरूप ही है। इस प्रकार इन तीनों प्रकारकी अनुभूतियोंसे विलक्षण होनेके कारण वह अलौकिक ही है-। इस अनुच्छेदकी इस बातको कहनेवाली पंक्तिको बहुत ध्यानसे समझनेकी आवश्यकता है। उसमें १. 'प्रत्यक्षादि', २. 'प्रमाणताटस्थ्यावबोधशालिमित-योगि-ज्ञान' और ३. 'वैद्यान्तरसंस्पर्शरहित- स्वात्ममात्नपर्यवसित-परिमितेतर-योगि-संवेदन' ये तीनों वाक्यांश विशेषरूपसे ध्यान देने योग्य हैं। रसकी प्रतीति इन तीनों प्रकारके साक्षात्कारात्मक ज्ञानसे विलक्षण है। यह भी उसकी अलौकिकताका एक प्रमाण है। यह ग्रन्थकारका आरशय है। रसकी अलौकिकताकी तीसरी युक्ति विगत प्रकरणमें रसको 'कार्य' तथा 'ज्ञाप्य' और उसके हेतुको कारक तथा ज्ञापक दोनोंसे भिन्न सिद्ध करके उसकी अलौकिकताका उपपादन किया था। अगले अनुच्छेदमें इसीकी सिद्धिके लिए
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११२ काव्यप्रकाश: [का० २७-२८, सू० ४३ तद्ग्राहकं च' न निर्विकल्पकं विभावादिपरामर्शप्रधानत्वात्। नापि सविकल्पकं चर्व्यमाणस्यालौकिकानन्दमयस्य स्वसंवेदनसिद्धत्वात्। उभयाभावस्वरूपस्य चोभयात्म- कत्वमपि पूर्ववल्लोकोत्तरतामेव गमयति न तु विरोधमिति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तपादाः। अभिनवगुप्तने तीसरी युक्ति यह दिखलायी है कि उसका ग्रहण न 'सविकल्पक-ज्ञान'से हो सकता है और न 'निर्विकल्पक-ज्ञान'से, इसलिए भी वह 'अलौकिक' है। 'सविकल्पक-ज्ञान' उसको कहते हैं, जिसमें पदार्थके स्वरूपके अतिरिक्त उसके नाम, उसकी जाति आदिका भी भान होता है। 'नामजात्यादियोजन- सहित ज्ञानं सविकल्पकम् ।' जैसे घट, पट आदि पदार्थोंके ज्ञानमें उनके स्वरूपके साथ वस्तुके नाम, जाति आदिका भी भान होता रहता है। इसलिए 'घटः, पटः' आदि ज्ञानको 'सविकल्पक-ज्ञान' कहते हैं। वह शब्द-व्यवहारका विषय होता है। परन्तु रसानुभूति तो स्वसंवेदनमात्ररूप होती है, शब्द- व्यहारका विषय नहीं होती है, इसलिए उसमें नामजात्यादिके भानका कोई अवसर नहीं है। अतएव रसको 'सविकल्पक-ज्ञान' से ग्राह्य नहीं कह सकते हैं। 'सविकल्पक-ज्ञान' से भिन्न दूसरा 'निर्विकल्पक-ज्ञान' होता है। नामजात्यादियोजनासहित ज्ञानको 'सविकल्पक-ज्ञान' कहते हैं तो नाम, जाति, विशेषण-विशेष्यभाव आदिसे रहित केवल वस्तुमात्रका अवगाहन करनेवाला ज्ञान 'निर्विकल्पक-ज्ञान' कहलाता है। इस 'निर्विकल्पक-ज्ञान'को समझनेके लिए बालक तथा मूक पुरुषके ज्ञानको उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया जाता है। 'बालमूकादिविज्ञानसदृशं निर्विकल्पकम्'। उदाहरणके लिए एक घड़ी बालकके सामने रखी है। बालकको इस घड़ीका ज्ञान उसी प्रकारका होता है जिस प्रकारका किसी बड़े आदमीको। उसका गोल डायल, उसपर बने हुए अङ्क और लगी हुई सुइयाँ आदि हमारी ही तरह बालकको भी प्रतीत होती हैं। अन्तर केवल इतना है कि बालक उसके नाम, उपयोग आदिको नहीं जानता है और बड़ा व्यक्ति इन सबको जानता है इसलिए बालकका ज्ञान नाम, जाति आदिकी योजनासे रहित होने से 'निर्विकल्पक-ज्ञान' कहलाता है और बड़े व्यक्तियोंका ज्ञान 'सविकल्पक-ज्ञान' कहलाता है। बड़े व्यक्तियोंका जो 'सविकल्पक-ज्ञान' होता है वह भी प्रथम क्षणमें 'निर्विकल्पक-ज्ञान' ही होता है। शब्दव्यवहारमें शा जानेसे वह अ्रत्यन्त शीघ्रतासे सविकल्पक-ज्ञानके रूपमें परिणत हो जाता है। इसलिए उसका निर्विकल्पक स्वरूप अनुभवमें नहीं आता है। रसकी प्रतीतिमें विभावादिकी प्रतीति भी होती रहती है इसलिए समूहालम्बनात्मक- ज्ञान होनेसे निर्विकल्पक-ज्ञान भी उसका ग्राहक नहीं हो सकता है और न वह सविकल्पकका विषय होता है। यह भी रसकी अलौकिकत्वसिद्धिका प्रमाण है। इस बातको ग्रन्थकारने अगले अनुच्छेदमें इस प्रकार प्रस्तुत किया है- [रसकी प्रतीतिमें ] विभावादिके परामर्शकी प्रधानता होनेसे निर्विकल्पक-ज्ञान उसका ग्राहक नहीं हो सकता है और आस्वाद्यमान अलौकिक आनन्दमय [रस] के स्ववेदनसिद्ध होनेसे सविकल्पक-ज्ञान भी उसका ग्राहक नहीं हो सकता है। तथा उभयाभावस्वरूपका [अर्थात् निर्विकल्पक तथा सविकल्पक दोनोंसे भिन्न उस रसका ] उभयात्मकत्व [अर्थात् सविकल्पकत्व और निर्विकल्पकत्व ] भी पहिलेके समान लोकोत्तरताको ही बोधित करता है, विरोधको नहीं। यही श्रीमान् अभिनव-गुप्त- पादाचार्यका मत है। १. च प्रमाणम् ।
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का० २७-२८, सू० ४३] चतुर्थ उल्लास: ११३ व्याघादयो विभावा भयानकस्येव वीराद्भुतरौद्राणाम्, अश्रुपातादयोऽनुभावाः शृङ्गारस्येव करुणभयानकयोः, चिन्तादयो व्यभिचारिणः शृङ्गारस्येव वीरकरुण- भयानकानामिति पृथगनैकान्तिकत्वात् सूत्रे मिलिता निर्दिष्टाः । वियदलिमलिनाम्बुगर्भमेघं मधुकरकोकिलकूजितैर्दिशां श्रीः। धरणिरभिनवाङकुराङ्कटड्का प्रणतिपरे दयिते प्रसीद मुग्धे ॥२७॥ इत्यादौ
'काव्यप्रकाश' का यह प्रकरण साहित्यशास्त्रके इतिहासमें सामाजिकगत रसनिष्पत्तिके सिद्धान्तका द्योतक है। भरतसूत्रकी व्याख्यामें जो अनेक मत पाये जाते हैं उनका संग्रह काव्यप्रकाशकारने बड़ी सुन्दरताके साथ किया है। यह प्रकरण यद्यपि काव्यप्रकाशकारने 'अभिनवभारती' से लिया है, परन्तु उन्होंने 'अभिनवभारती' के अत्यन्त विस्तृत एवं जटिल विवेचनको संक्षिप्त एवं अपेक्षाकृत सरल रूपमें प्रस्तुत करनेका यत्न किया है। इन मतोंमेंसे अभिनवगुप्तपादाचार्य द्वारा प्रतिपादित मत ही काव्य- प्रकाशकारका अभिमत सिद्धान्तपक्ष है। सूत्रमें विभावादिका सम्मिलित निर्देश क्यों ? सूत्रकी व्याख्यामें एक बात और रह जाती है कि सूत्रकारको प्रत्येक रसके विभाव, अनुभाव, व्यभिचारिभाव आदिको अलग-अलग दिखलाना चाहिये था। उन्होंने ऐसा न कर सबका इकट्टा निर्देश क्यों कर दिया है ? इस प्रश्नका उत्तर ग्रन्थकार अगले अ्परनुच्छेदमें यह देते हैं कि- व्याघ्र आदि विभाव भयानकरसके समान वीर, अद्भुत तथा रौद्र [रस]के [ भी हो सकते हैं], अश्रुपात आदि अनुभाव शृङ्गारके समान करुण तथा भयानकरसके [भी हो सकते हैं ]; चिन्ता आदि व्यभिचारिभाव शृङ्गारके समान वीर, करुण तथा भयानकके [भी हो सकते हैं]; इसलिए उनके अलग-अलग अनैकान्तिक होनेसे [ अर्थात् किसी एक ही रसके साथ निश्चित न होनेसे ] सूत्रमें [ उनको ] सम्मिलित रूपसे ही निर्दिष्ट किया गया है। विभावादिके अनुक्त होनेपर आक्षेप द्वारा बोध इसके बाद एक और शङ्काका समाधान करनेके लिए ग्रन्थकारने अगले प्रकरणकी अवतारणा की है। प्रश्न यह है कि रसकी उत्पत्तिमें जब विभाव, अनुभाव और व्यभिचारिभावोंकी सम्मिलितरूप- से कारणताका प्रतिपादन सूत्रकारने किया है तब जहाँ इन तीनोंका इकट्ठा वर्णन न होकर किसी एकका या किन्हीं दोका ही वर्णन हो, वहाँ रसकी निष्पत्ति किस प्रकार होगी ? इस शङ्काको प्रस्तुत करनेके लिए ग्रन्थकारने आमे तीन श्लोक उद्धृत किये हैं। इनमेंसे पहिले श्लोकमें केवल वर्षाकालरूप उद्दीपन- विभावका, दूसरे श्लोकमें वियोगिनी नायिकाके केवल अनुभावोंका और तीसरे श्लोकमें केवल शत्सुक्य आदि व्यभिचारिभावोंका वर्णन किया गया है। इन तीनों श्लोकोंको उद्धृत करनेके बाद शङ्काका स्पष्टीकरण करके उसका निराकरण किया गया है। श्लोकोंका अर्थ इस प्रकार है- हे मुग्धे! आकाश भौंरोंके समान काले-काले, जलसे भरे हुए मेघोंसे आच्छादित हो रहा है, भौंरों एवं कोयलोंके कूजनसे दिशाएँ शोभायमान हो रही है और पृथ्वी [ सन्तापदायक होनेसे पत्थर काटनेवाली लोहेकी ] टाँकियोंके समान अंकुरोंवाली हो रही है। [ऐसी दशामें तुम्हारा मान अधिक देरतक टिकनेवाला नहीं है] इसलिए प्रियतमके प्रणाम करनेपर मान जाओ [ अपने हठको छोड़ दो) ॥२७॥ 5
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११४ काव्यप्रकाश: [का० २७-२८, सू० ४ परिमृदितमृणालीम्लानमङ्गं प्रवृत्ति: कथमपि परिवारप्रार्थनाभि: क्रियासु। कलयति च हिमांशोर्निष्कलङ्कस्य लक्ष्मी- मभिनवकरिदन्तच्छेदकान्तः कपोलः ।२८।। इत्यादौ दूरादुत्सुकमागते विवलितं सम्भाषिणि स्फारितं संश्लिष्यत्यरुणं गृहीतवसने किंचान्चितभ्रूलतम्। मानिन्याश्चरणानतिव्यतिकरे वाष्पाम्बुपूर्णेक्षणं चक्षुर्जातमहो प्रपञचचतुरं जातागसि प्रेयसि ।।२९। इत्यादौ च
इत्यादिमें [केवल मुग्धा दयितारूप आलम्बन-विभाव और वर्षा ऋतुके मेघरूप उद्दीपन-विभावका ही वर्णन है। शेष अनुभाव, व्यभिचारिभाव आदिका आक्षेपसे बोध होता है ]। यहाँ वर्षा ऋतुका वर्णन है, उसके भीतर भ्रमरों और कोकिलोंके कूजनकी भी चर्चा की गयी है। साधारणतः वर्षामें कोकिलोंका वर्णन उचित नहीं समझा जाता है। इसलिए कुछ व्याख्याकारोंने इसकी यह व्याख्या की है कि सखीने मुग्धा नायिकाको भयतीत करनेके लिए ही यहाँ कोकिलोंका उल्लेख कर दिया है। दूसरे व्याख्याकारोंने मधुकरोंपर कोकिलका आरोप कर 'मधुकरा एव कोकिला: मधुकर- कोकिला:' इस प्रकारकी व्याख्या की है। तीसरे व्याख्याकारोंका मत यह है कि वर्षा ऋतुमें भी कोकिलोंका वर्णन अस्वाभाविक नहीं है। 'परिमृदितमृणाली' इत्यादि अगला श्लोक 'मालतीमाधव' नामक नाटकसे लिया गया है। प्रथमाङ्गमें मालतीकी दशाके वर्णनमें यह उक्ति आयी है। उसमें अङ्गम्लानि, पाण्डुता आदि केवल अनुभावोंका वर्णन है, शेष दोका आक्षेप द्वारा बोध होता है। उस [मालती ]का शरीर मसली हुई मणालीके समान मलिन हो रहा है, [भोजन आदि जीवनोप- योगी क्रियाओंमें भी ] सखियोंकी प्रार्थनापर जैसे-तैसे प्रवृत्ति होती है और तुरन्त काटे गये हाथीदाँतके टुकड़ेके समान सुन्दर [और पीला पड़ा हुआ] गाल निष्कलंक चन्द्रमाकी-सी कान्तिको धारण कर रहा है।।२८ ।। इत्यादिमें [केवल अङ्गम्लानि आदि अनुभावोंका वर्णन किया गया है]। अगला श्लोक 'अमरुकशतक'से लिया गया है। उसमें मुख्यरूपसे केवल औत्सुक्य आदि व्यभि- चारिभावोंका वर्णन किया गया है। शेषका आक्षेप द्वारा बोध होता है। दूरसे [नायकको आता हुआ देखकर] उत्सुकतापूर्ण, [परन्तु समीप ] आनेपर [कहीं इन्होंने मेरी उत्सुकताको भाँप तो नहीं लिया है, इस लज्जासे ] नीचे की हुई, बात करनेपर प्रसन्नतासे खिली हुई, आलिङ्गन [करनेका यत्न ] करनेपर [कोधके कारण ] लाल हुई, वस्त्र पकड़नेपर तनिक भृकुटी चढ़ाये हुए और चरणोंमें नमस्कार करनेपर आँसुओंसे भरी हुई मानिनीकी आँखें प्रियतमके [ परस्त्री-सम्पर्करूप ] अपराध करनेपर [नानाकारधारण-रूप ] प्रपञ्च-रचनामें चतुर हो गयी हैं ॥२६॥ इत्यादिमें [केवल औरसुक्य आदि व्यत्रिचारिभावोंका वर्णन किया गया है]।
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का० २६, सू० ४४] चतुर्थ उल्लास: ११५
यद्यपि विभावानाम्, अनुभावानाम्, औत्सुक्यव्रीडाहर्षकोपासूयाप्रसादानां च व्यभिचारिणां केवलानामत्र स्थितिः, तथाप्येतेषामसाधारणत्वमित्यन्यतमद्वयाक्षेपकत्वे सति नानैकान्तिकत्वमिति।। तद्विशेषानाह-सद [सू० ४४] शृङ्गारहास्यकरुणरौद्रवीरभयानकाः । बीभत्साद्भुतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाटये रसाः स्मृताः ।२९॥'
यद्यपि यहाँ [इन तीनों श्लोकोंमेंसे पहिले श्लोकमें मुग्धा दयितारूप आलम्बन और वर्षारूप उद्दीपन ] विभावोंकी, [दूसरे श्लोकमें अङ्गम्लानि आदि ] अनुभावोंकी और [तीसरे श्लोकमें ] औत्सुक्य, लज्जा, प्रसन्नता, कोप, असूया तथा प्रसादरूप केवल व्यभिचारिभावोंकी ही स्थिति है। फिर भी इनके [प्रकृत रतिके बोधमें ] असाधारण [लिङ्ग ] होनेसे [उनके द्वारा ] शेष दोका आक्षेप हो जानेपर [विभाव आदि तीनोंके संयोगसे रसनिष्पत्तिके सिद्धान्तका ] व्यभिचार नहीं होता है। उस [रस] के [आठ ] भेदोंका वर्णन करते हैं- [सूत्र ४४]-१. शृङ्गार, २. हास्य, ३. करुण, ४. रौद्र, ५ वीर, ६.भयानक, ७. बीभत्स और ८. अद्भुत-नाटचमें ये आठ रस माने जाते हैं ॥।२६।
रसोंका यह विशेष क्रम क्यों ? यह कारिका मूलरूपसे भरतमुनिके नाटयशास्त्रकी कारिका है। मम्मटने उसे भरत-नाटयशास्त्र अ्र. ६-१६ से ज्योंका त्यों उतार लिया है। इसमें विशेषतः नाटयगत आाठ रसोंका क्रमशः उद्देश अर्थात् नाममात्रसे कथन किया है। भरतमुनिने इन आठों रसोंका जो इस विशेष कमसे कथन किया है उसका विशेष प्रयोजन है। इस प्रकारका उपपादन करते हुए 'अभिनवभारती' में अभिनवगुप्तने लिखा है- तत्र कामस्य सकलजातिसुलभतयात्यन्तपरिचितत्वेन सर्वान् प्रति हृद्यतेति पूर्व शृङ्गारः। तदनुगामी च हास्यः । निरपेक्षभावत्वात् तद्विपरीतस्ततः करुणः । ततस्तन्निमित्तं रौद्रः । स चार्थ- प्रधान: । ततः कामार्थयोर्धर्ममूलत्वाद्वीरः। स हि धर्मप्रधानः। तस्यच भीताभयप्रदानसारत्वात्। तदनन्तरं भयानकः । तद्विभावसाधारण्यसम्भावनात्ततो बीभत्सः । वीरस्य पर्यन्तेऽद्भुतः । यद्वीरेण आक्षिप्तं फलमित्यनन्तरं तदुपादानम्। तथा च वक्ष्यते-'पर्यन्ते कर्त्तव्यो नित्यं रसोऽद्भुतः' इति। ततस्त्रिवर्गात्मकप्रवृत्तिधर्मविपरीतनिवृत्तिधर्मात्मको मोक्षफलः शान्तः । तत्न स्वात्मावेशेन रसचर्वणा। अर्थात् रति या काम न केवल मनुष्य-जातिमें अपितु सभी जातियोंमें मुख्य प्रवृत्तिके रूपमें पाया जाता है और सबको उसके प्रति आकर्षण होता है, इसलिए सबसे पहिले शृङ्गारको स्थान दिया गया है। हास्य शृङ्गारका अनुगामी है, इसलिए शृङ्गारके बाद हास्यरसको स्थान दिया गया है। सम्भोगभृङ्गारमें नायक-नायिकाका मिलन होता है इसलिए एक-दूर रेकी अपेक्षा रहती है। विप्रलम्भशृङ्गारमें भी दोनोंको मिलनकी आशा रहती है, अतः वे दोनों सापेक्ष-आशामय-रस हैं। हास्यसे विपरीत स्थिति करुणरसकी है। इसलिए हास्यके बाद करुणरसको स्थान दिया गया है। अपने प्रियतम बन्धुके वास्तविक विनाश या भ्रमवश ही उसके विनाशका निश्चय हो जानेके बाद करुणरसकी सीमा प्रारम्भ होती है, उसमें पुनममिलनकी आशा नहीं रहती है। अतएव करुणरस नैराश्यमय होनेसे निरपेक्ष-रस माना जाता है। भवभूतिने 'तटस्थं नैराश्यात्' कहकर करुणरसके
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काव्यप्रकाश [का० २६ सू० ४४
निराशात्मक स्वरूपको सूचित किया है। अतः आशामय सापेक्ष भावसे विपरीत नैराश्यमय-निरपेक्ष- रस होनेसे शृंगार और उसके अनुगामी हास्यके बाद करुणरसको रखा गया है। करुणरसकी सीमा मरणके बाद प्रारम्भ होती है। मरणका सम्बन्ध प्रायः रौद्ररससे होता है। इसलिए करुणरसका निमित्तरूप होनेसे करुणके बाद उससे सम्बद्ध रौद्ररसको स्थान दिया गया है। यह रौद्ररस अर्थप्रधान होता है। काम और अर्थके धर्ममूलक होनेसे रौद्ररसके बाद वीररस रखा गया है। वह धर्मप्रधान होता है। वीररसका मुख्य कार्य भयभीतोंको अभय प्रदान करना है। इसलिए वीरके साथ उसके विरोधी भयानकरसको स्थान दिया गया है। उस भयानकरसके समान ही बीभत्सरसके विभाव होते हैं। क्योंकि वीररसके प्रभावसे ही बीभत्स दृश्य उपस्थित होते हैं, इसलिए भयानकके बाद बीभत्सरसको रखा गया है। वीरके बादमें अद्भुत होता है। इसीलिए आगे कहा जायगा कि अन्तमें सदा अद्भुतरसको स्थान देना चाहिये। इसलिए वीरके बाद अद्भुतरसको रखा गया है। उसके बाद धर्म-अर्थ-काम-रूप त्रिवर्गके साधनभूत प्रवृत्तिधमोंसे विपरीत निवृत्तिधर्मप्रधान और मोक्षफलवाला शान्तरस आता है। यद्यपि शान्तरसकी गणना यहाँ नहीं की गयी है, परन्तु काव्यमें शान्तरस भी माना जाता है। इसलिए सबसे अन्तमें उसको स्थान दिया जा सकता है।
शान्तरसकी स्थिति शान्तरसकी स्थितिके विषयमें न केवल आधुनिक विद्वानोंमें, किन्तु प्राचीन विद्वानोंमें भी, मतभेद पाया जाता है। इस मतभेदका मुख्य आधार भरतमुनिका यह 'अष्टौ नाटये रसाः स्मृताः' [६-१६] श्लोक ही है। उसीको यहाँ काव्यप्रकाशकारने भी रसोंकी संख्य। का निरूपण करते हुए उद्धृत किया है। भरतके इसी वचनके आधारपर प्राचीन आचार्योंमें महाकवि कालिदास, अमरसिंह, भामह और दण्डी आदिने भी नाटकके आठ ही रसोंका उल्लेख किया है तथा शान्तरसका प्रतिपादन नहीं किया है। इसके विपरीत उङ्धट, आनन्दवर्धन तथा अभिनवगुप्तने स्पष्टरूपसे शान्तरसका प्रतिपादन किया है। बड़ौदासे प्रकाशित 'अभिनवभारती' व्याख्यासे युक्त भरत-नाटय शास्त्रके द्वितीय संस्करणके सम्पादक श्री रामस्वामी शास्त्री शिरोमणिने लिखा है कि शान्तरसकी स्थापना सबसे पहिले भरत-नाटयशास्त्र के टीकाकार उ्टने अपने 'काव्यालड्डारसंग्रह' नामक ग्रन्थमें की है। उसके बाद आनन्दवर्धन तथा अभिनवगुप्त आदिने उनका समर्थन किया है। उद्टके पहिले शान्तरसकी कोई सत्ता नहीं मानी जाती थी। भरत-नाटयशास्त्रके छठे अध्यायमें भी शान्तरसका वर्णन पाया जाता है, परन्तु उसके विरोधमें उक्त सम्पादक महोदयका मत है कि वह प्रक्षिप्त या बादका बढ़ाया हुआ है। इस अंशको प्रक्षिप्त माननेके लिए उन्होंने दो हेतु दिये हैं। पहिला हेतु तो यह है कि भरतमुनिने पहिले आठ ही रसोंका उल्लेख किया है तब बादमें नवम रसका वर्णन उनके ग्रन्थमें नहीं होना चाहिये था। अतः यह अंश प्रक्षिप्त है। उनकी युक्ति यह है कि शान्तरसवाला यह प्रकरण 'नाटयशास्त्र' की कुछ पाण्डुलिपियोंमें नहीं पाया जाता है। इसलिए वे इसको प्रक्षिप्त मानते हैं और शान्तरसकी सत्ता न माननेवाले पक्षके समर्थक हैं। प्राचीन आचार्योंमें शान्तरसके सबसे प्रबल विरोधी धनञ्जय और धनिक हैं। 'दशरूपक' तथा उसकी टीका, दोनोंमें बड़ी प्रौढ़ताके साथ शान्तरसका खण्डन किया गया है। उनके मतमें नाटयमें आठ ही रस होते हैं। इसका अर्थ यह है कि नाटयमें शान्तरस होता ही नहीं है। शान्तरसको नाटयमें स्थान न दिये जानेका कारण उसका अनभिनेयत्व है। जैसा कि अ्रभी कहा है, शान्तरस निवृत्तिप्रधान है। अभिनयमें प्रयृत्तिका प्राधान्य होता है। नियतिणा अ्रभिनय नहीं किया जा सकता है। इसलिए
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का० २६, सू० ४४] चतुर्थ उल्लास: ११७ अभिनयके उपयोगी न होनेसे अभिनयप्रधान नाटयमें शान्तरसको स्थान नहीं दिया जाता है। इसकी चर्चा करते हुए 'दशरूपक' के टीकाकारने कुछ विस्तारके साथ इस प्रकार विवेचन किया है- 'शममपि केचित् प्राहुः पुष्टिर्नाटयेषु नैतस्य। निर्वेदादिरताद्रूप्यादस्थायी स्वदते कथम्। वैरस्यायैव तत्पोषस्तेनाष्टी स्थायिनो मताः ।।' 'इह शान्तरसं प्रति वादिनामनेकविधा विप्रतिपत्तयः । केचिदाहुः-नास्त्येव शान्तो रसः, तस्याचार्येण विभावाद्यप्रतिपादनाल्लक्षणाकरणात्। अन्ये तु वस्तुतस्तस्याभावं वर्णयन्ति, अनादिकाल- प्रवाहायातरागद्वेषयोरुच्छेत्तुमशक्यत्वात्। अन्ये तु वीरबीभत्सादावन्तर्भावं वर्णयन्ति। यथा तथा अ्रस्तु। सर्वथा नाटकादावभिनयात्मनि स्थायित्वमस्माभिः शमस्य निषिध्यने । तस्य समस्तव्यापार- प्रविलयरूपस्याभिनयायोगात् यत्तु कैश्चिन्नागानन्दादौ शमस्य स्थायित्वमुपव्णितम्, तत्तु मलयवत्यनुरागेण आप्रबन्धप्रवृत्तेन विद्याधरचक्र्वर्तित्वप्राप्त्या च विरुद्धम्। नह्येकांनुकार्यविभावालम्बनौ विषयानुरागापरागावुपलब्धौ । अ्रनो दयावीरोत्साहस्यैव तत्र स्थायित्वम् । विरुद्धाविरुद्धाविच्छेदित्वस्य निर्वेदादीनामभावादस्थायित्वम् । अत एव ते चिन्तादिस्वस्व- व्यभिचार्यन्तरिता अपि परिपोषं नीयंमाना वैरस्यमावहन्ति।' [दशरूपक ४।३५, ३६ ] इसका अभिप्राय यह है कि शान्तरसको रस अथवा उसके स्थायिभाव शमको स्थायिभाव माननेमें कई प्रकारके मतभेद पाये जाते हैं। उनमें एक मत यह है कि भरतमुनिने उसके अनुभाव आदिका वर्णन नहीं किया है तथा उसका लक्षण नहीं किया है अतः शान्तरस नहीं है। दूसरा मत यह है कि वास्तवमें शान्तरस बन ही नहीं सकता है। क्योंकि अनादि कालसे चले आये रागद्वेष के संस्कारोंका सर्वथा नाश नहीं किया जा सकता है। इसलिए निर्वेदरूप स्थायिभाव तथा शान्तरसका उपपादन नहीं किया जा सकता है। तीसरे विचारकोंका मत है कि वीर, बीभत्स आदि रसोंमें उसका अन्तर्भाव किया जा सकता है। इन तीन मतोंका उल्लेख करनेके बाद ग्रन्थकार कहते हैं कि इनमें कोई मत भी ठीक हो, हमें उसका विचार नहीं करना है। हमारा कहना तो यह है कि नाटयमें शमको स्थायिभाव नहीं माना जा सकता, क्योंकि समस्त व्यापारोंके निवृत्तिरूप शमका अभिनय नहीं किया जा सकता है, इसलिए अभिनयप्रधान नाटयमें शान्तरसको स्थान नहीं दिया जा सकता है। कुछ लोग यह कहते हैं कि यदि नाटकमें शान्तरसका अभिनय नहीं हो सकता है, तो शान्तरस- प्रधान 'नागानन्द' आदि नाटकोंकी रचना कैसे हुई ? उसका उत्तर दशरूपककारने यह दिया है कि 'नागानन्द' में शान्तरस मानना उचित नहीं है, क्योंकि उसमें नायकका मलयवतीके प्रति अनुरागका वर्णन सारे नाटकमें पाया जाता है और अन्तमें उसको विद्याधरोंके चक्रवर्ती राजा होनेका अवसर प्राप्त होता है। इसलिए 'नागानन्द' का मुख्य रस शान्तरस नहीं है। अपितु दयावीरका उत्साह उसका स्थायिभाव है और वीररसकी उसमें प्रधानता है। वीररस केवल युद्धप्रधान ही नहीं है, उसका स्थायिभाव उत्साह है। वह उत्साह जैसे युद्धके लिए हो सकता है उसी प्रकार दया और धर्मके प्रति भी हो सकता है। इसलिए 'नागानन्द' में दया-वीर प्रधान रस है; शान्तरस नहीं। किन्तु 'दशरूपक' के इस सारे विवेचनसे केवल इतना ही सिद्ध है कि नाटथमें शान्तरसकी उपयोगिता नहीं है। उससे शान्तरसका सर्वथा अभाव नहीं माना जा सकता है। विशेषकर इस अवस्थामें जब कि आ्नन्दवर्धन और अभिनवगुप्त, दोनोंने बड़े विस्तारके साथ शान्तरसकी स्थापना की है।
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'अभिनवभारती' में अभिनवगुप्तने लगभग सौ पृष्ठोंमें अत्यन्त विस्तारके साथ शान्तरसका विवेचन किया है। आनन्दवर्धनने भी 'ध्वन्यालोक' पृष्ठ ४६५ [ दिल्ली-संस्करण ]में 'भहाभारत' का मुख्य रस शान्तरस माना है। इस प्रकार इन दोनों आचार्योंने शान्तरसका प्रबल समर्थन किया है। इसके अतिरिक्त भरतसूत्रके टीकाकार भट्टनायकने भी शान्तरसकी सत्ता स्वीकार की है। इसका परिचय 'अभिनव- भारती के प्रथम श्लोककी व्याख्याके प्रसङ्गमें भट्टनायककृत व्याख्याके उद्धृत भागसे प्राप्त होता है। पृष्ठ ३५ [दिल्ली-संस्करण ] पर 'शान्तरसोपक्षेपोऽयं भविष्यति' यह भट्टनायकका वचन अभिनवगुप्तने उद्धृत किया है। इन लेखोंसे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि भरत-नाटयशास्त्रके भट्टो्ट, भट्टनायक तथा अभि नवगुप्त आदि सभी टीकाकार शान्तरसकी स्थिति मानते हैं। ऐसी दशामें रामस्वामी शास्त्रीका यह कहना कि भरत-नाटयशास्त्रमें जो शान्तरसका प्रकरण आया है वह प्रक्षिप्त है, सर्वथा अनुचित प्रतीत होता है। प्राचीन टीकाकारोंके अनुसार भरतमुनि शान्तरसको मानते हैं। 'अष्टौ नाटये रसाः स्मृता:' इस वचनका आशय केवल नाटयमें आठ रसोंका प्रतिपादन करना है। काव्यमें शान्तरस भी हो सकता है। इसीलिए भरतमुनिने आगे चलकर शान्तरसका भी प्रतिपादन किया है। उसको प्रक्षिप्त कहना या न मानना उचित नहीं है। अतः काव्यप्रकाशकारने आगे चलकर 'निर्वेदस्थायिभावोऽस्ति शान्तोऽपि नवमो रसः।' लिखकर शान्तरसका भी प्रतिपादन किया है। भक्तिरस इन नौ रसोंके अतिरिक्त कुछ लोग भक्तिरसको भी अलग रस मानते हैं। इसकी स्थापना साहित्यिक क्षेत्रमें न होकर धार्मिक क्षेत्रमें हुई है। साहित्यशास्त्रमें इसकी गणना देवादिविषयक रतिके रूपमें भावोंमें की गयी है। उसे रस नहीं माना है। किन्तु गौडीय वैष्णव उसको अलग रस ही नहीं, अपितु सर्वश्रेष्ठ रस मानते हैं। रूपगोस्वामीने अपने 'भक्तिरसामृतसिन्धु' तथा 'उज्ज्वलनीलमणि' नामक ग्रन्थोंमें भक्तिरसका प्रतिपादन बड़े विस्तारके साथ किया है। वे देवताविषयक रतिको तो साहित्यशास्त्रियोंके समान 'भाव' ही कहते हैं, किन्तु भक्तिरसका स्थायिभाव केवल श्रीकृष्णविषयक रतिको मानते हैं। श्रीकृष्ण देवता नहीं अपितु साक्षात् भगवान् हैं। इसलिए तद्विषयक रति देवविषयक रतिसे सर्वथा भिन्न है। इसीलिए 'भक्तिरस' 'भाव' के अन्तर्गत नहीं अपितु स्वतन्त्र रस है, ऐसा उनका मत है। उसके आलम्बन केवल [रामया] कृष्ण; उद्दीपन भक्तोंका समागम, तीर्थसेवन, नदी या एकान्त पवित्र स्थल आदि; भगवान्के नाम तथा लीलाका कीर्तन, गद्गद हो जाना, अश्रु-प्रवाह, कभी नाचना, कभी हँसना या कभी रोना आदि अनुभाव तथा मति, ईर्ष्या, वितर्क आदि व्यभिचारिभाव हैं। भक्तिरसके उदाहरणरूपमें 'पद्माकर'के निम्नलिखित पद्यको प्रस्तुत किया जा सकता है- ब्याधहुँ ते बेहद असाधु हौं अजामिल लौं, ग्राह ते गुनाही, कैसे तिनको गिनाओगे, स्योरी हों न शूद्र, नहीं केवट कहीं को त्यौं, न गौतमी-तिया जापै पग धरि आओोगे, रामसौं कहत पद्माकर पुकारि पुनि, मेरे महा पापन को पार न पाओगे। झूठो ही कलंक सुनि सीता जैसी सती तजी नाथ, हौं तो साँचो ही कलङ्की ताहि कैसे अपनाओगे।
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इसमें कवि भगवान्के सामने अपने अपराधोंको स्वीकार करता है और क्षमाकी याचनाके अभिप्रायसे विनती कर रहा है। भगवान् राम आलम्बन-विभाव हैं तथा भगद्विषयक रति स्थायिभाव है। वात्सल्यरस इनके अतिरिक्त कुछ लोग 'वात्सल्यरस' को भी अलग रस मानते हैं। साहित्यशास्त्रके आचार्योंमें साहित्यदर्पणकार विश्वनाथने विशेषतया स्वतन्त्र रसके रूपमें वात्सल्यरसको प्रतिष्ठित किया है। हिन्दी कवियोंमें तुलसी तथा सूरकी रचनाओंमें इस रसका विशेष प्रभाव दिखलायी देता है। इसके उदाहरणके रूपमें निम्नलिखित पद्य प्रस्तुत किया जा सकता है- कबहूँ ससि माँगत आरि करैं, कबहूँ प्रतिबिम्ब निहारि डरैं, कबहूँ करताल बजाइके नाचत, मातु सबै मन मोद भरैं। कबहूँ रिसितय कहैं हठिक, पुनि लेत वही जेहि लागि अरैं, अवधेसके बालक चारि सदा, तुलसी मन मन्दिरमें बिहरैं।। छोटोंके प्रति स्नेह इसका स्थायिभाव है। छोटे बालक आलम्बन-विभाव, बालकोंकी तोतली बोली, सौन्दर्य, कीड़ा आदि उद्दीपन और स्नेहसे गोदमें ले लेना, आलिङ्गन, चुम्बन आदि व्यभिचारि- भाव हैं। किन्तु अधिकांश साहित्यशास्त्रके आचार्य भक्ति और वात्सल्य इन दोनोंको अलग रस नहीं मानते, क्योंकि उनके आधारभूत स्थायिभाव कोई मौलिक स्थायिभाव नहीं हैं। वे सब स्नेहके ही रूपान्तरमात्र हैं। विभिन्नलिङ्गक और समवयस्क व्यक्तियोंका परस्पर स्नेह 'रति' कहलाता है। उत्तम या बड़ेका छोटेके प्रति स्नेह 'वात्सल्य' और छोटेका बड़ेके प्रति स्नेह 'भक्ति' या 'श्रद्धा' कहलाता है। इसी प्रकार समलिङ्ग या समवयस्क व्यक्तियोंका स्नेह 'मत्री' और चेतनका अचेतनके प्रति स्नेह 'लोभ' कहलाता है। यह सब रतिके ही नामानान्तर हैं। अलग तात्त्विक मूल स्थायिभाव नहीं हैं। इसलिए साहित्यशास्त्रियोंने 'भक्ति' तथा 'वात्सल्य'को अलग रस नहीं माना है, अपितु उनकी गणना भावोंमें की है। देवादिविषयक रतिको 'भाव' कहते हैं। इसलिए साहित्यशास्त्रके अनुसार 'भक्ति' एवं 'वात्सल्य' दोनों 'भाव' हैं, रस नहीं। उनको भक्ति-भाव तथा वात्सल्य-भाव कहना चाहिये, रस, नहीं कहना चाहिये। मूलरस यद्यपि इस प्रकार विभिन्न आचार्योंने आठसे लेकर ग्यारहतक रसोंकी संख्या मानी है, किन्तु इनमें भी अनेक आचार्योंने प्रधानता और अप्रधानताकी दृष्टिसे अलग-अलग मूल रसोंकी कल्पना की है। स्वयं भरतमुनि आठ रसोंमेंसे शृङ्गार, रौद्र, वीर तथा बीभत्स इन चार रसोंको प्रधान मानकर शेष चार रसोंकी उत्पत्ति इन चार रसोंसे ही होती है इस बातका प्रतिपादन करते हुए लिखते हैं- शृङ्गाराद्धि भेवेद्धास्यो रौद्राच्च करुणो रसः । वीराच्चवाद्भुतोत्पत्तिः बीभत्साच्च भयानकः ॥ शृङ्गारानुकृतिर्या तु स हास्यस्तु प्रकीर्तितः । रौद्रस्यैव च यत्कर्म स ज्ञेयः करुणो रसः । वीरस्यापि च यत्कर्म सोऽद्भुतः परिकीतितः । बीभत्सदर्शनं यत्र ज्ञेयः स तु भयानकः ।
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१२० काव्यप्रकाशः [का० २६, सू० ४४
एकरसवाद इनके अतिरिक्त अपनी-अपनी दृष्टिसे किसी एक ही विशेष रसको मूलरस माननेकी प्रवृत्ति भी साहित्यशास्त्रमें पायी जाती है। इस विषयमें निम्नलिखित मतोंको उद्धृत किया जा सकता है। (१) महाकवि भवभूतिने करुणरसको एकमात्र रस बतलाते हुए अपने करुणरसप्रधान नाटक उत्तररामचरितमें लिखा है- एको रस: करुण एव निमित्तभेदाद् भिन्नः पृथक् पृथगिवाश्रयते विवर्तान्। आवर्तबुद्बुदतरङ्गमयान् विकारान् अम्भो यथा सलिलमेव हि तत्समस्तम्।। (२) भोजराजने [ १२ वीं शता० ] अपने 'शृङ्गारप्रकाश' नामक ग्रन्थमें शृङ्गाररसको ही एकमात्र मूलरस बतलाते हुए लिखा है- शृङ्गारवीरकरुणाद्भुतरौद्रहास्य- बीभत्सवत्सलभयानकशान्तनाम्नः । आम्नासिषुर्दश रसान् सुधियो वयं तु शृङ्गारमेव रसनाद् रसमामनाम: ।। (३) साहित्यदर्पणकार विश्वनाथने अपने पूर्वज नारायणपण्डितके केवल अद्भुतरसको ही मूल रस माननेका उल्लेख करते हुए लिखा है- रसे सारश्चमत्कार: सर्वत्राप्यनुभूयते। तच्चमत्कारसारत्वात् सर्वत्राप्यद्भुतो रसः ।। तस्मादद्भुतमेवाह कृती नारायणो रसम्। (४) अभिनवगुप्तने शान्तरसको ही एकमात्र मूलरस प्रतिपादन करते हुए 'अभिनवभारती'में लिखा है- स्वं स्वं निमित्तमासाद्य शान्ताद् भावः प्रवर्तते। पुनर्निमित्तापाये च शान्त एवोपलीयते।। आगे ग्रन्थकार इन सारे रसोंके उदाहरण देंगे। इन उदाहरणोंके साथ उस रसका परिचय देनेके लिए उसके लक्षण आदिका वर्णन कर दिया जाता तो अच्छा होता, परन्तु काव्यप्रकाशकारने उसको बिलकुल छोड़कर उदाहरणमात्र दे दिये हैं। 'साहित्यदर्पण' में नाटयशास्त्र के आधारपर रसोंका अच्छा परिचय दे दिया है। रसोंकी सुख-दुःखरूपता रसोंकी अलौकिकताके साथ उनकी सुख-दुःखरूपताका प्रश्न भी प्राचीन साहित्यशास्त्रियोंके लिए एक विवेचनीय प्रश्न रहा है। इस विषयमें प्रायः तीन प्रकारके मत पाये जाते हैं। धनिक,धनञ्जय और विश्वनाथ आदि, सभी रसोंको नितान्त सुखरूप मानते हैं। इन लोगोंने करुणरसको भी सर्वथा सुखात्मक रस माना है। विश्वनाथने इसका प्रतिपादन करते हुए लिखा है- करुणादावपि रसे जायते यत्परं सुखम्। सचेतसामनुभवः प्रमाणं तत्र केवलम् ॥ किञ्च तेषु यदा दुःखं न कोऽपि स्यास् तदुन्मुखः। तथा रामायणादीनां भविता दुःखहेतुता । सा० द० ३-४,५॥
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का० २६, सू० ४४ ] चतुर्थ उल्लास: १२१
तत्र शृङ्गारस्य द्वौ भेदौ, सम्भोगो विप्रलम्भश्च। तत्राद्यः परस्परावलोकना- लिङ्गनाधरपानपरिचुम्बनाद्यनन्तभेदत्वादपरिच्छेद्य इत्येक१ एव गण्यते।
विश्वनाथ आदिके सुखात्मतावादके विपरीत अभिनवगुप्तने प्रत्येक रसको उभयात्मक रस माना है, अर्थात् प्रत्येक रसमें सुख और दुःख दोनोंका समावेश रहता है, किन्तु इनमेंसे शृङ्गार, हास्य, वीर तथा अद्भुत इन चार रसोंमें सुखकी प्रधानताके साथ दुःखका अनुवेध रहता है। इसके विपरीत रौद्र, भयानक, करुण तथा बीभत्स इन चार रसोंमें दुःखकी प्रधानताके साथ सुखका आंशिक अनुवेध रहता है। केवल शान्तरसको उन्होंने सर्वथा सुखात्मक रस माना है। इस विषयका प्रतिपादन अभिनव- गुप्तने 'अभिनवभारती' ग्रन्थके प्रथम अध्यायमें विस्तारपूर्वक किया है। रसोंके विषयमें नाटयदर्पणकार रामचन्द्र-गुणचन्द्रका मत इन दोनोंसे भिन्न प्रकारका है। उसे हम 'विभज्यवादी' मत कह सकते हैं। विश्वनाथने सभी रसोंको सुखात्मक रस माना है। अभिनव- गुप्तने सभी रसोंको उभयात्मक रस माना है। किन्तु रामचन्द्र-गुणचन्द्रने न सब रसोंको सुखात्मक ही माना है और न सब रसोंमें सुख-दुःख दोनोंका समावेश ही माना है। उन्होंने रसोंको अलग-अलग दो विभागोंमें विभक्त कर दिया है, जिनमेंसे शृङ्गार, हास्य, वीर, अद्भुत और शान्त इन पाँच रसोंको सर्वथा सुखात्मक और करुण, रौद्र, बीभत्स तथा भयानक इन चार रसोंको सर्वथा दुःखात्मक बतलाते हुए उन्होंने लिखा है- 'तत्रेष्टविभावादिप्रथितस्वरूपसम्पत्तयः शृङ्गारहास्यवीराद्भुतशान्ताः पञ्च सुखात्मानः । अपरे पुनरनिष्टविभावाद्युपनीतात्मानः करुणरौद्रबीभत्सभयानकाश्चत्वारो दुःखात्मानः।' यही नहीं बल्कि उन्होंने अभिनवगुप्तकें उभयात्मकतावाद और अन्योंके सुख-दुःखात्मतावादी सिद्धान्तका खण्डन भी स्पष्टरूपसे किया है। एकान्त सुखात्मतावादका खण्डन करते हुए उन्होंने लिखा है- 'यत् पुनः सर्वरसानां सुखात्मकत्वमुच्यते तत् प्रतीतिबाधितम् । आस्तां नाम मुख्यविभावो- पचितः, काव्याभिनयोपनीतविभावोपचितोऽपि भयानको बीभत्सः करुणो रौद्रो वा रसास्वादवताम् अनाख्येयां कामपि क्लेशदशामुपनयति। अत एव भयानकादिभिरुद्विजते समाजः । न नाम सुखास्वा- दादुद्वेगो घटते।'-'नाटयदर्पण' पृ० १५६। अर्थात् जो लोग सब रसोंको नितान्त सुखात्मक मानते हैं उनका वह मत प्रतीतिसे बाधित हो जाता है। मुख्य सिंह-व्याघ्रादि विभावोंसे उत्पन्न भयानक आदिकी बात तो जाने दीजिये [ वे तो निश्चतरूपसे क्लेशदायक, दुःखात्मक होते ही हैं] किन्तु काव्यके अभिनयमें प्राप्त विभावोंसे उत्पन्न भयानक बीभत्स, करुण या रौद्र रस भी उसके आस्वादन करनेवालोंमें किसी अनिर्वचनीय क्लेशदशाको उत्पन्न कर देते हैं। इसीलिए भयानक आदि रसोंसे [देखनेवाला ] समाज घबड़ाता है। यदि वे भयानक आदि रस सुखात्मक होते तो उनसे उद्वेग नहीं होता। इसलिए भयानक आदि रस दुःखात्मक ही हैं, सुखात्मक नहीं। शृङ्गाररस और उसके भेद उन रसोंमेंसे शृङ्गारके दो भेद होते हैं-[१]सम्भोग [शृङ्गार ] और [ २] विप्रलम्भ। उनमेंसे पहिला [अर्थात् सम्भोगशृङ्गार ] परस्पर अवलोकन, आलिङ्गन, अधरपान, चुम्बन आदि अनन्त प्रकारका [असंख्येय हो जाता है, इसलिए उसके ] भेदोंकी गणना सम्भव न होनेसे एक ही गिना जाता है। १. अनन्तत्वादपरिच्छेद्य एक एव।
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१२२ काव्यप्रकाश: [का० २६, सू० ४४
यथा- शून्यं वासगृहं विलोक्य शयनादुत्थाय किञ्चिच्छन- निद्राव्याजमुपागतस्य सुचिरं निर्वण्य पत्युर्मुखम्। विस्रब्धं परिचुम्ब्य जातपुलकामालोक्य गण्डस्थलीं लज्जानम्रमुखी प्रियेण हसता बाला चिरं चुम्बिता ॥३०। तथा- त्वं मुग्धाक्षि विनैव कञ्चुलिकया धत्से मनोहारिणीं लक्ष्मीमित्याभिधायिनि प्रियतमे तद्वीटिकासंस्पृशि। शय्योपान्तनिविष्टसस्मितसखीनेत्रोत्सवानन्दितो निर्यात: शनकैरलीकवचनोपन्यासमालीजनः ।३१। [पतिके बराबर अलग पलंगपर लेटी हुई नवोढ़ा नायिकाने ] वासगृह [अर्थात् अपने लेटनेके कमरे] को शून्य [अर्थात् सखियोंसे खाली ] देखकर अपनी खाटपरसे तनिक-सा उठकर और नींदका बहाना करके लेटे हुए पतिके मुखको बहुत देरतक देखकर [ये सो रहे हैं ऐसा समझकर ] निश्शंक भावसे चुम्बन कर लेनेसे [उसके ] पतिके कपोलपर [प्रसन्नताजन्य ] रोमाञ्च देखकर [नायिका यह समझ गयी कि वे जग रहे थे। इसलिए उसका मुख लज्जासे झुक गया। उस ] लज्जासे नम्र मुखवाली बालाको [पकड़कर ] हँसते हुए प्रियतम [नायक ] ने बहुत देरतक चुम्बन किया॥३०: यह सम्भोगशृङ्गाररसका उदाहरण है। नायक इसका आ्रलम्बन है, शून्य वासगृह उद्दीपन- विभाव है। मुख-निर्वर्णन, चुम्बनादि अनुभाव तथा लज्जा, हास तथा उससे व्यङ्गय हर्षादि व्यभिचारि- भाव हैं। रति स्थायिभाव है। उससे सामाजिकको रसकी चर्वणा होती है। साहित्यशास्त्रमें पहिले नारीके अनुरागका वर्णन उचित माना गया है। [पूर्व रक्ता भवेन्नारी पुमान् पश्चात्तदिङ्गितः] इसी सिद्धान्तके अनुसार यहाँ सम्भोगशृङ्गारका यह उदाहरण दिया गया है,पमें यिकाकी प्रथम अनुरक्ति दिखलायी गयी है। मम्मटने यह पद्य 'अमरुकशतक' से उद्धुत किया है। हिन्दीके महाकवि बिहारीलालने अमरुकके इस पद्यका छायानुवाद एक दोहेमें इस प्रकार किया है- हौं मिसहा सोयो समुझि मुख चूम्यो ढिग जाय। हस्यों, खिसानी, गर गह्यो, रही गले लपटाय ।। अमरुकके इस लम्बे पद्यके भावको दोहेके छोटेसे कलेवरमें भरकर बिहारीने अपने अद्भुत कौशल- का परिचय दिया है। इसीलिए बिहारीके दोहेके विषयमें कहा गया है- सतसैयाके दोहरे ज्यों नावकके तीर। देखतमें छोटे लगें घाव करें गम्भीर॥ नायककी अनुरक्तिका प्रदर्शन करनेवाला दूसरा उदाहरण आगे देते हैं- हे सुन्दर नेत्रोंवाली प्रियतमे ! तुम तो बिना कञ्चुकी धारण किये हुए ही बड़ी सुन्दर मालूम होती हो, ऐसा कहकर नायकको उसके बटनको खोलनेके लिए छूते देख शध्याके पास बैठी हुई, मुस्कराती हुई सखीके नेत्रोंकी प्रसन्नतासे आनन्दित हुई अन्य सखियाँ [किसी आवश्यक कामका] झूठा बहाना करके धीरे-धीरे कमरेसे निकल गयों॥३१॥
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का० २६, सू० ४४] चतुर्थ उल्लास: १२३
अपरस्तु अभिलाषविरहेर्ष्याप्रवासशापहेतुक इति पञ्चविधः । यह श्लोक भी 'अमरुकशतक' से लिया गया है। सम्पूर्णरूपसे आलिङ्गन करनेका लोभी अतएव व्यवधान करनेवाली कञ्चुकीको हटानेमें तत्पर नायकका वर्णन है। यहाँ मुग्धाक्षी आलम्बन- विभाव है। नयन-सौन्दर्य, श्रङ्ग-शोभा आदि उद्दीपन-विभाव हैं। आभाषण और बीटिका-संस्पर्श अनुभाव तथा उनकी तुल्यकालतासे अवगत उत्कण्ठा आदि व्यभिचारिभाव हैं। इस सब सामग्रीके द्वारा सामाजिकको रसकी अनुभूति होती है। हिन्दीके महाकवि बिहारीने पूर्व पद्यके समान अमरुकके इस पद्यका भी अनुवाद अपने इस दोहेमें किया है- पति रतिकी बतियाँ करीं सखी लखी मुसकाय। कै के सबै टला-टली अली चलीं सुख पाय।। अमरुकके लम्बे शार्दूलविकरीडित छन्दके सम्पूर्ण भावको दोहेके छोटेसे कलेवरमें भर देनेका बिहारीका कौशल यहाँ भी द्रष्टव्य है। संस्कृतमें मङ्गक-कविने भी अमरुकके इस पद्यका भावानुवाद अपने 'श्रीकण्ठचरित' १५-१५ में इस प्रकार किया है- सख्योऽथ पक्ष्मलदृशां तदवेक्ष्य तन्त्रं स्मेराननापितकरं शनकरनिरीयुः । तत्कर्पटाञ्चलसमीरविधयमानो दीपोऽपि निर्जगमिषुत्वमिवाललम्बे ।। अमरुकके मूल पद्यमें सखियोंकी उपस्थितिमें नायक बीटिका-संस्पर्श, बटन खोलनेतक पहुँच गया है। यह कुछ अच्छा नहीं लगता है। सभ्यताकी मर्यादाका अतिकमण-सा और अस्वाभाविक-सा प्रतीत होता है। इसलिए मङ्कक-कविने उस सबके स्थानपर 'तदवेक््य तन्त्रं' लिखकर तन्त्र शब्दसे ही सब-कुछ कह दिया है और बिहारीने भी 'पति रतिकी बतियाँ कहीं में उस सबका समावेश करके अपनी 'सुरुचि"का प्रदर्शन किया है। सम्भोगशृङ्गारके इन दोनों उदाहरणोंमेंसे पहिलेमें नायिका और दूसरेमें नायकका अनुराग दिखलाया गया है। नीचेके हिन्दी पद्यमें सीता और राम दोनोंके युगपत् अनुरागका सुन्दर वर्णन पाया जाता है- दोऊ जने दोऊको अनूप रूप निरखत, पावत कहूँ न छवि-सागरको छोर हैं। चिन्तामणि केलिकी कलानिके विलासनि सों, दोऊ जने दोऊनके चित्तनके चोर हैं। दोऊ जने मन्द मुसकानि-सुधा बरसत, दोऊ जन छके मोद, मद दोऊ ओर हैं। सीता जू के नैन रामचन्द्रके चकोर भये, राम-नैन सीतामुख-चन्द्रके चकोर हैं। इस प्रकार सम्भोगशृङ्गारके दो उदाहरण देकर आगे विप्रलम्भशंङ्गारका वर्णन करते हैं। दूसरा [अर्थात् विप्रलम्भशृङ्गार] अभिलाष, ईर्ष्या, विरह, प्रवास तथा शाप [रूप पाँच प्रकारके हेतुओं ] से होनेके कारण पाँच प्रकारका होता है।
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१२४ काव्यप्रकाश: [ का० २६, सू० ४४
कमेणोदाहरणम्- प्रेमार्द्रा: प्रणयस्पृशः परिचयादुद्गाढरागोदया- स्तास्ता मग्धदृशो निसर्गमधुराश्चेष्टा भवेयमयि। यास्वन्त:करणस्य बाह्यकरणव्यापाररोधी (क्षणा- दाशंसापरिकल्पितास्वपि भवत्यानन्दसान्द्रो लयः ॥३२।।
कमशः [उन पाँचोंके] उदाहरण [आगे देते हैं]- साहित्यदर्पणकार आदि अन्य कुछ आचार्योंने इस विप्रलम्भके चार ही भेद माने हैं- पूर्वानुरागमानाख्यप्रवासकरुणात्मना। विप्रलम्भाभिधानोऽयं शृङ्गारः स्याच्चतुविधः । मम्मटका अभिलाष इसके पूर्वरागका तथा ईर्ष्या मानका नामान्तर है। प्रवास दोनों जगह समान है। शापके स्थानपर यहाँ करुण है। किन्तु विरहका यहाँ कोई उल्लेख नहीं है। इन पाँचों भेदोंमेंसे सबसे पहिले अभिलाष या पूर्वरागका उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। पूर्वराग या अभिलाषका अभिप्राय उन व्यक्तियोंके राग या अभिलाषसे है जिनको एयागमका अवसर प्राप्त नहीं हुआ है। समागम हो जानेके बाद जो कादाचित्क समागमका अभाव हो जाता है उसको 'विरह' कहते हैं। यह 'विरह' उन दोनोंमेंसे एकके अनुरागशून्य होनेपर भी हो सकता है और गुरुजनोंसे लज्जा आदिके कारण समागम न होनेपर भी हो सकता है। इन सबका अन्तर्भाव 'विरह'के भीतर ही होता है। प्रवासहेतुक और शापहेतुक दीर्घतर विरह उस-उस नामसे विप्रलम्भशृङ्गारमें आाते हैं। समीप रहनेपर भी मान- निमित्तक समागमका अभाव, 'ईर्ष्या' भेदके अन्तर्गत होता है। इस प्रकार पाँच प्रकारके विप्रलम्भशृङ्गार- का प्रतिपादन किया गया है। आगे चलकर ग्रन्थकार इन पाँचों प्रकारके भेदोंके उदाहरण क्रमशः देते हैं। इनमें सबसे पहिले अभिलाष या पूर्वरागका उदाहरण 'मालतीमाधव' नामक नाटकसे उद्धृत करते हैं। 'मालतीमाधव' के प्रथम अङ्गमें मालतीकी प्राप्तिके लिए श्मशान-साधना करनेवाले माधवके अभिलाप या पूर्वरागको महाकवि भवभूतिने अगले श्लोकमें प्रस्तुत किया है। इस उदाहरणमें प्रेम, प्रणय तथा परिचय शब्दोंका प्रयोग किया गया है। वे सब लगभग एक अर्थके वाचक हैं। किन्तु उनमें थोड़ा-थोड़ा भेद समझना चाहिये, अन्यथा पुनरुक्ति हो जायगी। 'यह मेरा है मैं इसका हूँ' इस प्रकारका पक्षपातविशेष 'प्रेम' कहलाता है। परस्पर अवलोकनादिसे जो प्रेम प्रकर्षको प्राप्त हो जाता है, जिसमें किसी एकके अनेक अपराध करनेपर भी कमी नहीं आती है, उस प्रकारके अविरल प्रेमको 'प्रणय' शब्दसे सूचित किया गया है और अधिक कालतक साथ रहनेसे जो प्रणयकी दृढ़ता होती है उसे 'परिचय' शब्दसे सूचित किया गया है। उस सुन्दर नेत्रोंवाली मालतीकी प्रेमसे सनी हुई, प्रणयका स्पर्श करनेवाली तथा परिचयके कारण उद्गाढ़ [अर्थात् गुरुजन आदिके प्रतिबन्धकी भी चिन्ता न करनेवाले ] अनुरागसे भरी हुई इस प्रकारकी वे भावपूर्ण चेष्टाएँ मेरे प्रति हों, जिनकी [इस समय अपने मनमें ] कल्पना करनेपर भी तत्क्षण बाह्य इन्द्रियोंको व्यापारशून्य बना देनेवाला अन्तःकरणका आनन्दमय लय-सा हो जाता है [ अर्थात् जिन चेष्टाओंकी कल्पनामात्रसे इस समय सब-कुछ सुध-बुध भूलकर मन आनन्दसागरमें लीन हो जाता है] ।। ३२ ।
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का० २६, सू० ४४ ] चतुर्थ उल्लास: १२५
अन्यत्र व्रजतीति का खलु कथा नाप्यस्य तादृक् सुहृद् यो मां नेच्छति नागतरच हह हा कोऽयं विधेः प्रक्रमः । इत्यल्पेतरकल्पनाकवलितस्वान्ता निशान्तान्तरे वाला वृत्तविवर्तनव्यतिकरा नाप्नोति निद्रां निशि ॥३३॥ एषा विरहोत्कण्ठिता। सा पत्युः प्रथमापराधसमये सख्योपदेश विना नो जानाति सविभ्रमाङ्गवलनावकरोक्तिसंसूचनम् । स्वच्छैरच्छकपोलमूलगलितैः पर्यस्तनेत्रोत्पला बाला केवलमेव रोदिति लुठल्लोलालकैरश्रुभिः ॥३४॥
यह विप्रलम्भशृङ्गारके अभिलाष या पूर्वरागभेदका उदाहरण है। इसके बाद विरह या समागमके बाद गुरुजनोंकी लज्जा आदिके कारण समागममें विलम्ब होनेपर विकलताका प्रदर्शन कराने- वाला उदाहरण देते हैं। इसमें रातको नायकके आगमनकी प्रतीक्षामें खाटपर लेटी हुई नायिकाकी विकलावस्था या विरहका वर्णन किया गया है। नायिका कह रही है- वे कहीं और [किसी अन्य स्त्रीके पास ] चले गये हैं, यह तो [ कुत्सित कथा ] कुविचार है। [ऐसा तो कभी संम्भव हो ही नहीं सकता है। शायद किसी मित्रके कहनेसे कहीं चले गये हों यह शङ्गा भी नहीं बनती है क्योंकि ] उनका ऐसा कोई मित्र भी नहीं है जो मुझको न चाहता हो [ अर्थात् मेरा अहितचिन्तन करता हो और उनको बहकाकर कहीं ले जाय ], फिर भी वे [अबतक ] आये नहीं, यह भाग्यका कँसा खेल है ! इस प्रकारकी अनेक कल्पनाओंके हृदयमें व्याप्त हो जानेसे वह बिचारी [बाला ] करवटें बदलती हुई [वृत्तः सञ्जातः विवर्तानां पार्श्वपरिवर्तनानां व्यतिकरः सम्बन्धः समूहो वा यस्याः सा वृत्त- विवर्तनव्यतिकरा ] रातको सो नहीं पा रही है।।३३।। [अधिक राततक गुरुजन आदिके पास बैठे रहनेके कारण, सङ्कोचवश उसका पति उसके पास नहीं आ रहा है। इसलिए] यह विरहोत्कष्ठिता है। आगे ईर्ष्याेतुक विप्रलम्भशृङ्गारका तीसरा उदाहरण 'अमरुकशतक' मेंसे देते हैं। इसमें किसी नवोढ़ाकी सखी उसकी अवस्थाको किसी अन्य सखीको सुनाकर कह रही है- वह पतिके [अन्यस्त्रीप्रसङ्गरूप ] प्रथम अपराधके समय सखियोंके बतलाये बिना हाव-भावसे अङ्गको चलाकर वक्रोक्तियोंसे उलहना देना नहीं जानती है। इसलिए खुले हुए और चञ्चल अलकोंसे उपलक्षित और [पर्यस्तनेत्रोत्पला परितः अस्ते क्षिप्ते नेत्रोत्पले यया सा पर्यस्तनेत्रोत्पला अर्थात् ] आँखोंको इधर-उधर करती हुई वह विचारी [बाला ] स्वच्छ गालोंके किनारेसे आँसू टपकाती हुई केवल रोती ही रहती है।।३४।। नायकके परस्त्रीके सम्बन्धको देखकर उत्पन्न ईष्याके कारण यह विप्रलम्भशृङ्गारका उदाहरण दिया गया है। आगे प्रवासहेतुक विप्रलम्भशृङ्गारका उदाहरण देते हैं। यह श्लोक भी 'अमरुकशतक' से लिया गया है। किसी स्त्रीका पति गुरुजनोंके आदेश आदिके कारण दीर्घ-प्रवासपर विदेश जा रहा है। यह समाचार सुनकर वह अपने जीवनको सम्बोधन करके कह रही है-
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१२६ काव्यप्रकाश: [का० २६, सू० ४४
प्रस्थानं वलयैः कृतं प्रियसखैरस्त्रैरजस्रं गतं धृत्या न क्षणमासितं व्यवसितं चित्तेन गन्तुं पुरः। यातुं निश्चितचेतसि प्रियतमे सर्वे समं प्रस्थिता गन्तव्ये सति जीवित ! प्रियसुहृत्सार्थः किमु त्यज्यते ।३५॥ त्वामालिख्य प्रणयकुपितां धातुरागैः शिलाया- मात्मानं ते चरणपतितं यावदिच्छामि कर्तुम्। अस्रैस्तावन्मुहुरुपचितैर्द् ष्टिरालुप्यते मे कूरस्तस्मिन्नपि न सहते सङ्गमं नौ कृतान्तः ॥३६॥ हास्यादीनां क्रमेणोदाहरणम्। आकुञ्चय पाणिमशुचि मम मूध्नि वेश्या मन्त्राम्भसां प्रतिपदं पृषतैः पवित्रे तारस्वनं प्रथितथूत्कमदात् प्रहारं हा हा हतोऽहमिति रोदिति विष्णुशर्मा ।३७। हे जीवन [हे प्राणो ], प्रियतमके [प्रवासपर ] जानेका निश्चय कर लेनेपर कड्कण पहिले ही चल दिये [अर्थात् मेरे शरीरमें दुर्बलता आ जानेसे कङ्कणोंने अपना स्थान छोड़ दिया और ढीले पड़कर नीचे गिर गये हैं] और प्रियको प्यार करनेवाले आँसू तबसे ही निरन्तर बहे जा रहे हैं। धृति तनिक देर भी नहीं रुकी और चित्तने उनके आगे-आगे जानेका निश्चय कर लिया है। हे प्राणो ! तुम्हे भी जाना ही है, तब प्रिय मित्रका साथ क्यों छोड़ रहे हो [तुम भी शरीरसे निकल चलो ] ॥३५॥ यह प्रवासहेतुक विप्रलम्भशङ्गारका उदाहरण दिया। आगे शापहेतुक विप्रलम्भशृङ्गारका उदाहरण कालिदासके 'मेघदूत' से उद्धृत करते हैं। पत्थरकी शिलापर गेरू आदि धातुके रङ्गोंसे तुम्हारा चित्र बनाकर मैं जबतक [चित्रमें ] अपनेको तुम्हारे चरणोंमें गिरा हुआ करना चाहता हूँ, तबतक आँसू फिर बढ़कर मेरी दष्टिको आच्छादित कर लेते हैं। [और मैं उस चित्रको पूर्ण नहीं कर पाता हूँ]। निष्ठुर 'दैव' उस [चित्र ]में भी हमारे सङ्गमको सहन नहीं करता है।।३६।। इस प्रकार सम्भोगशङ्गारके दो भेद औरर विप्रलम्भशङ्गारके पाँचों भेदोंके पाँच, कुल मिलाकर शृङ्गारके सात उदाहरण ग्रन्थकारने यहाँतक दिखलाये हैं। अब शेष हास्य आदि रसोंका एक-एक उदाहरण आगे दिखलाते हैं। हास्य आदिके करमसे उदाहरण आगे देते हैं। हास्यरसका उदाहरण वेश्याने अपने अपवित्र हाथको सिकोड़कर [मुट्ठी बाँधकर ] जोरसे थूत्कार करते हुए मन्त्रोंके [द्वारा अभिमन्त्रित ] जल-बिन्दुओंसे प्रतिपद पवित्र किये हुए मेरे शिरपर प्रहार किया है, हाय-हाय मार डाला यह कहकर विष्णुशर्मा रो रहा है।३७।।
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का० २६, सू० ४४ ] चतुर्थ उल्लास: १२७
हा मातस्त्वरिताऽसि कुत्र किमिदं हा देवताः क्वाऽडशिष: धिक प्राणान् पतितोऽशनिर्हुतवहस्तेऽङ्गेषु दग्धे दृशौ। इत्थं घर्घरमध्यरुद्धकरुणाः पौराङ्गनानां गिर- श्चित्रस्थानपि रोदयन्ति शतधा कुर्वन्ति भित्तीरपि ॥३८॥
यह हास्यरसका उदाहरण दिया गया है। विष्णुशर्माकी दशाको देखकर सबको हँसी आती है। बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचेसे हम निकले। यहाँ विष्णुशर्मा आ्लम्बन-विभाव है। रोदन उद्दीपन-विभाव है। स्मित, हसित, अतिहसित आदि अनुभाव हैं। हास स्थायिभाव है। हिन्दी साहित्यमें पद्माकरका निम्नलिखित पद हास्यरसका सुन्दर उदाहरण है- हँसि हँसि भाजै देखि दूलह दिगम्बरको, पाहुनो जे आव हिमाचलके उछाह मैं कहै 'पद्माकर' सू काहूको कहै को कहा, जोई जहाँ देख सो हँसोई तहाँ राह मैं। मगन भएई हँसै नगन महेस ठाढ़े, और हँसे वेऊ हँसि हँसिके उमाह मैं। सीसपर गगा हँसै, भुजनि भृजंगा हँसै, हास ही को दंगा भयो नगाके विवाह मैं।। यहाँ महादेवके विवाहका प्रसङ्ग है। हास स्थायिभाव है। महादेव आलम्बन-विभाव है। नंगा रूप उद्दीपन-विभाव है। गंगा और साँपोंका हँसना अनुभाव है। इस दृश्यको देखनेके लिए लोगोंकी उत्सुकता आदि व्यभिचारिभाव है। इन सबसे मिलकर हास्यरसकी अभिव्यक्ति हो रही है। करुणरसका उदाहरण आग करुणरसका उदाहरण देते हैं। यह श्लोक कहाँका है इसका ठीक पता नहीं है। जयन्त- भट्टके अनुसार कश्मीरकी राजमाताके मरनेपर भट्टना रायणके विलापका यह वर्णन है। महेश्वरका यह कथन है कि मदालसाके जलकर मर जानेपर यह पुरवासिनी स्त्रियोंका विलाप है। हे मातः ! इतनी जल्दी हमको छोड़कर कहाँ चली गयी। [अकस्मात् वज्रपातसदृश ] यह क्या हुआ। [देवताओंकी इतनी पूजा करनेवाली भी इस प्रकार चली गयी और देवता उसको बचा नहीं सके इसलिए ] हा देवताओ, [आपकी भक्तिका क्या मूल्य रहा ]। हे ब्राह्मणो, [आप प्रतिदिन उनको चिरञ्जीवी होनेका आशीर्वाद देते थे। पर आपके] आशीर्वाद कहाँ चले गये। [और उनके चले जानेके बाद भी अबतक बने रहनेवाले हमारे इन ] प्राणोंको धिक्कार है। [तुम्हारे अन्त्येष्टि संस्कारके समय ] अग्नि वज्त्र बनकर तुम्हारे शरीरपर गिरा और तुम्हारे [शरीरके साथ सुन्दर तथा स्नेह एवं दयासे पूर्ण ] नेत्र भी भस्म हो गये। इस प्रकार उच्च स्वरसे रोनेके कारण भर्राती हुई बीच-बीचमें रुक जाती हुई पुरवासिनी स्त्रियोंकी करुण-ध्वनि, चित्रमें अङ्गित [नर, नारी आदि] को भी रुला रही है और भित्तियोंके भी टुकड़े करे डालती है॥३८॥
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१२८ काव्यप्रकाश: [का० २६, सू० ४४
यहाँ मृत राजमाता शलम्बन-विभाव, उसका दाहादि उद्दीपन-विभाव, रोदन अनुभाव, दैन्य, ग्लानि, मूरच्छा आदि व्यभिचारिभाव हैं। उस सब सामग्रीके द्वारा अभिव्यक्त होकर करुणरस सामाजिकके आस्वादका विषय होता है। हिन्दीमें श्रीपति-कविका निम्नलिखित पद्य करुणरसके उदाहरणके रूपमें प्रस्तुत किया जा सकता है- मातुको मोह, न द्रोह विमातुको, सोच न तातके गात दहेको। प्रानको छोभ न, बन्धु विछोह न, राजको लोभ न, मोद रहेको। एते तै नेक न मानत 'श्रीपति', एते मैं सीय वियोग सहेको। ता रनभूमि मैं राम कह्यो, मोहि सोच विभीषण भूप कहेको।। यह लक्ष्मणजीके शक्ति लगनेपर रामचन्द्रजीके विलापका प्रसङ्ग है। लक्ष्मणके लिए विलाप करनेसे शोक स्थायिभाव है। लक्ष्मणका निश्चेष्ट शरीर तथा उनका विपुल पराक्रम आदि उद्दीपन- विभाव है। लक्ष्मण आलम्बन-विभाव है। रामचन्द्रका विलाप करना अनुभाव है। ऐसी दशामें भी विभीषणको राजा बनानेका ध्यान होनेसे मति, स्मृति, वितर्क, विषादादि सञ्चारिभाव हैं। करुण तथा विप्रलम्भशृङ्गारका भेद करुण तथा विप्रलम्भशृङ्गारकी स्थितिके विषयमें कभी-कभी भ्रम हो जाता है। उनकी सीमा अलग-अलग है। भ्रमकी सम्भावना मुख्यतः प्रेमियोंके वियोगकी अवस्थाओंमें रहती है। प्रेमियोंका वियोग दो प्रकारका हो सकता है-१. स्थायी वियोग, २. अस्थायी वियोग। दोनों प्रेमियोंके जीवन- कालमें जो वियोग किसी भी कारण होता है वह अस्थायी वियोग होता है और वह विप्रलम्भ-शृङ्गारकी सीमामें आता है। किन्तु दोनों प्रेमियोंमेंसे किसी एककी मृत्यु हो जानेपर जो वियोग होता है, उसमें मिलनेकी कोई आशा या सम्भावना नहीं रहती है। इसीलिए वह स्थायी वियोग होता है। वह करुणरस- की सीमामें आता है। इस प्रकार जहाँतक प्रेमियोंके वियोगका सम्बन्ध है, उसमें विप्रलम्भशृङ्गार तथा करुणरसकी सीमारेखा 'मृत्यु' है। मृत्युसे पूर्वतक विप्रलम्भशृङ्गार और मृत्युके बाद करुणरसका क्षेत्र होता है। संस्कृत काव्यों तथा नाटकोंमें ऐसे कथाप्रसङ्ग भी पाये जाते हैं जहाँ दो प्रेमियोंमेंसे किसी एककी मृत्यु हो जानेपर भी उसका मिलन हो जाता है। कुछ इस प्रकारके उदाहरण भी पाये जाते हैं जिनमें वस्तुतः किसीकी मृत्यु होती तो नहीं है, परन्तु समझ ली जाती है। ये दोनों प्रकारके स्थल भी करुणरसके क्षेत्रमें माने जाते हैं। कुछ लोगोंने मृत्युके बाद फिर समागम होनेकी स्थितिमें करुणविप्रलम्भ नामसे विप्रलम्भके एक अलग भेदकी कल्पना की है, जैसा कि साहित्यदर्पणकारने लिखा है- यूनोरेकतरस्मिन् गतवति लोकान्तरं पुनर्लभ्ये। विमनायते यदैकस्तदा भवेत् करुणविप्रलम्भः ॥ इस प्रकारका उदाहरण 'कादम्बरी' में पुण्डरीक तथा महाश्वेताके वृत्तान्तमें मिलता है। पुण्डारीकके मर जानेके बाद महाश्वेता और कपिञ्जल आदि विलाप कर रहे हैं। इसी बीचमें कोई दिव्य ज्योति आरकर पुण्डरीकके मृत शरीरको उठा ले जाती है और महाश्वेताको आश्वासन दे जाती है कि तुम्हरा इससे फिर मिलन होगा। इसमें आकाशवाणीके पूर्वका महाश्वेता आदिका जो विलाप है वह स्पष्ट ही करुणरस है। उसके बाद मिलनकी आशा हो जानेसे विप्रलम्भ कहा जा सकता है। इसीलिए
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का० २६, सू० ४४ ] चतुर्थ उल्लास: १२६ इसके लिए 'करुण-विप्रलम्भ' नामका प्रयोग इन लोगोंने किया है। 'किञ्चात्नाकाशसरस्वतीभाषानन्तरमेव शृङ्गारः, सङ्ग्मप्रत्याशया रतेरुद्द्रवात्। प्रथमन्तु करुण एव इत्यभियुक्ता मन्यन्ते।' परन्तु मम्मट आदि अन्य आचार्योंने 'करुणविप्रलम्भ' नामक शृङ्गारका कोई भेद नहीं माना है। उनके मतमें यह करुणरसकी सीमाके ही अन्तर्गत है। हाँ, आकाशवाणीके पश्चात् उसे कथञ्चित् विप्रलम्भ माना जा सकता है। परन्तु यह उदाहरण केवल कविकी कल्पनामात्र है। यथार्थमें तो अन्ततक करुण ही रह सकता है। क्योंकि व्यवहारमें ऐसा तभी हो सकता है जब वास्तवमें मृत्यु न हुई हो, पर समझ ली गयी हो। ऐसे स्थलपर पुनर्ममलन एकदम अप्रत्याशितरूपसे ही होता है इसलिए करुणरसकी मर्यादा रहती है और आकस्मिक पुनर्ममिलनपर अद्भुतरसका उदय हो जाता है। इस प्रकारके उदाहरण, जिनमें मृत्यु नहीं हुई है परन्तु मृत्यु समझ ली गयी है, संस्कृत-साहित्य में अ्रनेक पाये जाते हैं। महाकवि भवभूतिका 'उत्तर-रामचरित' नाटक इसका सबसे सुन्दर उदाहरण है। रामचन्द्रके आदेशसे लक्ष्मण गर्भवती सीताको वाल्मीकिके आश्रमके पास जङ्गलमें छोड़ आये हैं। उसके बाद रामचन्द्रने, उनको जङ्गली जानवरोंने खा डाला होगा, ऐसा समझ लिया है। 'उत्तर- रामचरित' के करुणरसको सर्वोत्तम स्वरूप प्रदान करनेवाला रामचन्द्रका वह करुण विलाप है, जिसने पत्थरोंको भी रुलाया है-'अपि ग्रावा रोदित्यपि दलति वज्रस्य हृदयम्'। ये सब उसी धारणापर अवलम्बित हैं और इसीलिए 'उत्तररामचरित' करुणरसप्रधान नाटक माना गया है। पहिले सीताहरणके बाद भी सीता और रामका वियोग हुआ था, पर वह करुण नहीं अपितु विप्रलम्भका ही उदाहरण है, क्योंकि उससे रामचन्द्रको सीतासे मिलनेकी आशा थी। 'उत्तररामचरित' में रामचन्द्रने स्वयं इन दोनों वियोगोंका अन्तर इस प्रकारसे बतलाया है- 'उपायानां भावादविरलविनोदव्यतिकरै: विमदैर्वीराणां जनितजगदत्यद्भुतरस: 1 वियोगो मुग्धाक्ष्याः स खलु रिपुघातावधिरभूत् कटुस्तूष्णीं सह्यो निरवधिरयं तु प्रविलयः ॥ पहिला वियोग रिपुघातपर्यन्त रहनेवाला था इसलिए वह विप्रलम्भशृङ्गारका उदाहरण था पर यह दूसरी बारका वियोग 'निरवधिरयं तु प्रविलयः' है इसलिए वह करुणरसका उदाहरण है। करुण तथा विप्रलम्भशृङ्गारका भेद दिखलाते हुए साहित्यदर्पणकारने लिखा है- शोकस्थायितया भिन्नो विप्रलम्भादयं रसः । विप्रलम्भे रतिः स्थायी पुनः सम्भोगहेतुकः ।। अर्थात् करुणरसका स्थायिभाव 'शोक' होता है और विप्रलम्भशृङ्गारका स्थायिभाव 'रति' होता है, क्योंकि उसमें पुनमिलनकी आशा बनी रहती है। भरतमुनिने विप्रलम्भको 'सापेक्ष' अर्थात् आशामय और करुणको 'निरपेक्ष' अर्थात् निराशामय रस कहकर उनका भेद दिखलाया है- करुणस्तु शापक्लेशविनिपतितेष्टजनविभवनाश-वध-बन्धसमुत्थो 'निरपेक्षभावः'। श्त्सुक्य- चिन्तासमुत्थः 'सापेक्षभावो' विप्रलम्भकृतः । एवमन्यः करुणोऽन्यश्च विप्रलम्भ इति। १. उत्तररामचरित, ३-४४। २. साहित्यदर्पण, ३, २२६ । ३. भरतनाटयशास्त्र, ६-४५ पृष्ठ ३०६।
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१३० काव्यप्रकाश: [ का० २६, सू० ४४
कृतमनुमतं दृष्टं वा यैरिदं गुरुपातक
नरकरिपुणा साधं सभीमकिरीटिना- मयमहमसृङनेदोमांसैः करोमि दिशां बलिम् ।।३१।।
यहाँ 'सापेक्ष' और 'निरपेक्ष' शब्दोंका अर्थ क्रमशः 'आशामय' तथा 'नैराश्यमय' करना चाहिये। विप्रलम्भमें पुनर्ममिलनकी आशा बनी रहनेसे दुःखमय होनेपर भी उसमें जीवनका आशामय दृष्टिबिन्दु बना रहता है। परन्तु करुणरसमें पुनमिलनकी कोई सम्भावना न रहनेसे निराशामय दृष्टिकोण हो जाता है। करुणके इसी नैराश्यमय रूपको भवभूतिने 'तटस्थ नैराश्यात्' कहकर व्यक्त किया है। यहाँ 'तटस्थ' शब्द 'निराशामय' निरपेक्षभावको सूचित करता है। इसलिए करुण और विप्रलम्भकी सीमा अलग-अलग है। करुण तथा विप्रलम्भके इस भेदकी विवेचना तो केवल दो प्रेमियोंके वियोगकी दो भिन्न प्रकारकी दशाओंको लेकर करनेकी आवश्यकता पड़ी है। परन्तु इससे अतिरिक्त करुणरसका एक और भी क्षेत्र है, जो विप्रलम्भसे बिलकुल स्वतन्त्न है। वहाँ दोनोंके सङ्करकी कोई सम्भावना ही नहीं है। 'साहित्य- दर्पण' आदिमें 'इष्टनाश' और 'अनिष्टाप्ति', दोनोंको करुणरसका कारण माना है। इष्टनाशमें तो नायक नायिकामेंसे किसीका नाश आता है और अनिष्टाप्तिमें अन्य पिता-पुत्रादि सम्बन्धियोंकी मृत्यु, वध, बन्धन, विभवनाश आदिका अन्तर्भाव होता है। यह सब करुणका विप्रलम्भसे बिलकुल भिन्न क्षेत्र है। रौद्ररसका उदाहरण इसके आगे काव्यप्रकाशकार क्मप्राप्त रौद्ररसका उदाहरण 'वेणीसंहार' नाटकके तृतीय अङ्कसे देते हैं। द्रोणाचार्यका निर्दयतापूर्वक अनुचित ढंगसे वध किये जानेका समाचार जब अश्वत्थामाको मिला तो अपने पिता और कौरव-पाण्डव सबके आचार्यके इस प्रकार अपमानपूर्वक सिर काटे जानेसे कुद्ध होकर वह कह रहा है- हाथमें शस्त्र लिये हुए [उदायुधः ] 'मर्यादाका पालन न करनेवाले' नरपशुओंके सदृश जिन आप- लोगोंने [आचार्य द्रोणका शिरश्छेदन रूप ] यह महान् पातक किया है, अथवा [कृष्ण आदि जिन्होंने उसका ] अनुमोदन किया है, अथवा [भीम, अर्जुन आदि जिन्होंने धृष्टद्युम्नको रोकनेका ] यत्न न करके खड़े-खड़े प्रसन्नतापूर्वक [इस पापको ] देखा है, [नरकासुरके शत्रु ] कृष्ण, भीम तथा अर्जुनके सहित उन [धृष्टद्युम्न आदि] के रक्त, चर्बो और मांससे मैं अभी दिशाओंकी बलि [ पूजन ] करता हूँ॥३६॥ वहाँ 'पशुभिः' इस पदसे बलिदान-योग्यता सूचित होती है, 'उदायुधैः' इस पदसे उनके प्रतीकार करनेमें समर्थ होनेपर भी प्रतीकार न करनेसे अत्यन्त दण्डनीयत्व सूचित होता है। कर्त्ता, अनुमन्ता और द्रष्टाके अपराधमें क्रमशः न्यूनता होती है इसलिए दण्डनीयताके कमसे इनका उपादान किया गया है। इस दृष्टिसे पहले कर्त्ता धृष्टद्युम्नका नाम लेना चाहिये था, परन्तु कोधातिशयमें क्रम भूलकर पहले नरकरिपु कृष्णका नाम लिया गया है। इस श्लोकका अर्थ तो रौद्ररसके अनुरूप है, परन्तु उसकी शब्दरचना रौद्ररसके अनुरूप नहीं बन पड़ी है। इससे कविकी अशक्ति द्योतित होती है। हिन्दीमें पद्माकरका निम्नलिखित पद्य रौद्ररसके उदाहरणके रूपमें प्रस्तुत किया जा सकता है-
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का० २६, सू० ४४] चतुर्थ उल्लास: १३१
क्षुद्राः संत्रासमेते विजहत हरयः क्षुण्णशक्रेभकुम्भा युष्मद्देहेषु लज्जां दधति परममी सायका निष्पतन्तः । सौमित्रे ! तिष्ठ पात्रं त्वमसि नहि रुषां नन्वहं मेघनादः किञ्चिद्भ्रूभङ्गलीलानियमितजलधि राममन्वेषयामिं ॥।४०।।
'बारि टारि डारौं कुम्भकर्नहिं बिदारि डारों, मारौं मेघनाद आज यों बल-अनन्त हौं। कहै पद्माकर त्रिकूट ही को ढाहि डारौं, डारत करेई यातुधानन को अन्त हौं। अच्छहिं निरच्छ कपि रुच्छ है उचारौं इमि, तोसे तिच्छ तुच्छन को कछुवै न गंत हौं। जारि डारौं लंकहि उजारि डारौं उपवन, फारि डारौं रावण को तो मैं हनुमंत हौं।।
वीररसका उदाहरण रौद्ररसके बाद आगे 'हनुमन्नाटक' के एकादश अङ्कसे वीररसका उदाहरण देते हैं। लड्का-युद्धके समय इन्द्रजित्की यह उक्ति है। अरे क्षुद्र बन्दरो, तुम मत डरो, [क्योंकि इन्द्रके हाथी ] ऐरावतके गण्डस्थलका भेदन करनेवाले [मेरे ] ये बाण तुम्हारे शरीरपर गिरनेमें लज्जाका अनुभव करते हैं [ इसलिए तुम मत डरो, तुम्हारे ऊपर इनका प्रहार नहीं होगा ], हे लक्ष्मण, तुम भी हट जाओ, तुम [मेरे ] कोधके [योग्य ] पात्र नहीं हो, [जानते हो] मैं मेघनाद हूँ, [मैं तुम लोगोंसे क्या लडूँ गा] मैं तो तनिक-सी भौंहें टेढ़ी करनेमात्से समुद्रको वशमें कर लेनेवाले रामको खोज रहा हूँ॥४०।। क यहाँ राम आलम्बन विभाव हैं, उनके द्वारा समुद्रबन्धन उद्दीपन-विभाव, क्षुद्र वानर आदिकी उपेक्षा और परम प्रतापशाली रामका अन्वेषण अनुभाव, ऐरावतके गण्डस्थलके भेदनकी स्मृति और 'बाण लज्जित होते हैं' इससे गम्य गर्व व्यभिचारिभाव है। रामसे लड़नेका 'उत्साह' स्थायिभाव है। हिन्दीके निम्नलिखित पद्को वीररसके उदाहरण रूपमें प्रस्तुत किया जा सकता है- कुद्ध दशानन बीस भुजानि सो लै कपि रीछ अनी सर वट्टत । लच्छन तच्छन रत्त किये दृग लच्छ विपच्छनके सिर कटटत । कि मारु पछारु पुकारु दुहूँ दल, रुण्डि झपट्टि दपट्टि लपट्टत। रुण्ड लरैं भट मत्थनि लुट्टत जोगिनि खप्पर ठट्टनि ठददृत । यहाँ लड्काके युद्धमें रीछ-वानरोंकी सेना देखकर रावणके लड़नेका वर्णन है। रावणके हृदयका उत्साह स्थायिभाव है। रीछ तथा वानर आलम्बन हैं। वानरोंकी नाना कीड़ाएँ तथा लीलाएँ उद्दीपन- विभाव हैं। नेत्रोंका लाल होना, शत्रुओंके सिरोंका काटना अनुभाव है। उग्रता, अमर्ष आदि सञ्चारि- भाव हैं। कुछ आचार्योंने युद्धवीर, दानवीर और दयावीर भेदसे वीर रसके तीन भेद किये हैं।
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१३२ काव्यप्रकाश: [का० २६, सू० ४४
ग्रीवाभङ्गाभिराम मुहुरनुपतति स्यन्दने बद्धदृष्टिः पश्चार्द्धेन प्रविष्टः शरपतनभयाद् भूयसा पूर्वकायम्। श्रमविवृतमुखभ्रंशिभिः कीर्णवर्त्मा पश्योदग्रप्लुतत्वाद्वियति बहुतरं स्तोकमुर्व्यां प्रयाति।४१।।
स च वीरो दानवीरो धर्मवीरो युद्धवीरो दयावीरश्चेति चतुर्विधः' लिखकर साहित्य-दर्पणकारने तीनके स्थानपर चार प्रकारका वीररस माना है। उनमेंसे दानवीर बलि आदि, दयावीर जीमूतवाहन आदि और धर्मवीर युधिष्ठिर आदि प्रसिद्ध हैं। दूसरे लोगोंका मत है कि वीर पदका प्रयोग केवल युद्धवीरके लिए ही होता है इसलिए वीररसके अन्य भेद नहीं करने चाहिये। भयानकरसका उदाहरण आगे शकुन्तला नाटकके प्रथम अङ्कसे भयानक रसका उदाहरण देते हैं। राजा दुष्यन्त शिकारके लिए निकले हैं। एक मृगके पीछे उनका रथ दौड़ रहा है और भयके कारण वह मृग अपनी सारी शक्तिसे आगे-आगे भाग रहा है। उस समय राजा दुष्यन्त अपने सारथिसे मृगके भागनेका वर्णन कर रहे हैं- सुन्दरताके साथ गर्दन घुमाकर पीछे आते हुए [ हमारे ] रथपर बार-बार दृष्टि डालता हुआ, और बाण लगनेके भयसे अपने पीछेके आधे शरीरको अगले शरीरमें घुसेड़ते हुए थक जानेसे [हाफते हुए ] खुले हुए मुखसे आधे खाये हुए तृणोंको पृथिवीपर गिराता हुआ, देखो, यह हरिण [लम्बी-लम्बी छलांगें मारनेके कारण मानों ] आकाशमें अधिक और पथिवीपर कम चलता है॥४१॥ यहाँ पीछा करनेवाला राजा या उसका रथ आलम्बन, बाण लगनेका भय और अनुसरण उद्दीपन, गर्दन मोड़ना और भागना आदि अनुभाव और तास, श्रम आदि व्यभिचारिभाव हैं। 'शरपतनभयात्' में भय पदका उपादान करनेसे स्थायिभावकी स्वशब्दवाच्यताका दोष नहीं आता है, क्योंकि शरपतन-भय वहाँ थायिभाव नहीं, केवल उद्दीपन है। रथसे या राजासे उत्पन्न भय स्थायिभाव है। हिन्दीके निम्नलिखित पद्यको भयानकरसके उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया जा सकता है- रानी अकुलानी सब डाढ़त परानी जाहिं. सकैं न विलोकि वेष केसरी किसोरको। मीजि-मीजि हाथ धुनि माथ दसमाथ-तिय 'तुलसी' तिलौ न भयो बाहिर अगारको। सब असबाब डरौं मैं न काढ़ो तै न काढ़ो जियकी परी सँभार, सहन भंडारको। खीजति मँदोवै सविषाद देखि मेघनाद बयो लुनियत सब याही दाढ़ीजारको।। हनुमान्जी लड्ढाको जला रहे हैं। लड्काको जलती देखकर मन्दोदरीका भय स्थायिभाव है। हनुमान् आलम्बन-विभाव हैं। हनुमान्का भयानक वेष, घर, असबाबका जलना उद्दीपन-विभाव हैं। घबड़ाकर भागना, हाथका मींजना, माथा पीटना, असबाबको घरसे काढ़नेके लिए तू-तू-मैं-मैं करना आदि अनुभाव हैं। विषाद, चिन्ता आदि सञ्चारिभाव हैं।
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का० २६, सू० ४४ ] ०म चतुर्थ उल्लासः १३३ उत्कृत्योकृत्य कृत्ि प्रथममथ पृथूत्सेधभूयांसि मांसा रजा की न्यंसस्फिकपृष्ठपिण्डयाद्यवयवसुलभान्युग्रपूतीनि जग्हवा । आर्त्तः पर्यस्तनेत्रः प्रकटितदशनः प्रेतरङ्कः करड्गा- 1 प दङ्कस्थादस्थिसंस्थं स्थपुटगतमपि ऋ्व्यमव्यग्रमत्ति ॥४२।। बीभत्सरसका उदाहरण आगे 'मालतीमाधव' के पञ्चम अङ्कसे बीभत्सरसका उदाहरण देते हैं। श्मशानमें किसी प्रेतको मांसभक्षणमें लगा हुआ देखकर साधव उसकी बीभत्स चेष्टाओंका वर्णन कर रहा है- पहिले खालको उखाड़-उखाड़कर कन्धे, नितन्ब, पीठ, पिडली आदि अवयवोंमें ऊँचे उभरे हुए अधिक मात्रामें उपलब्ध, भयंकर-दुर्गन्धयुक्त सड़े हुए मांसको खा चुकनेके बाद, [दूसरा छोन न ले इस वष्टिसे ] चारों ओर देखता हुआ, और दाँत निकाले हुए, भूखा, दरिद्र प्रेत गोदमें रखे हुए मुर्देके हट्टीके भीतर लगे हुए और गढ़ोंमें स्थित [कव्य ] कच्चे मांसको भी धीरे-धीरे खा रहा है।।४२।। यहाँ दरिद्र प्रेत आलम्बन, खालको उखाड़ना और मांसका खाना उद्दीपन, उसको देखनेवालेका नाक बन्द करना, मुँह फेर लेना, थूकना आदि अनुभाव और उद्वेग आदि व्यभिचारिभाव हैं। 'जुगुप्सा' स्थायिभाव है। उनसे सामाजिकमें जुगुप्साप्रकृतिक 'बीभत्स' रस अभिव्यक्त होता है। हिन्दीमें निम्नलिखित पद्यको बीभत्सरसके उदाहरणके रूपमें प्रस्तुत किया जा सकता है- सिर पै बैठो काग आँखि दोउ खात निकारत। खींचत जीभहिं स्यार अतिहि आनँद उर धारत।। गिद्ध जाँघ कहँ खोदि खोदि के माँस उचारत। स्वान आँगुरिन काटि काटि के खान विचारत।। बहु चील नोचि ले जात तुच, मोद मढ़यो सबको हियो। जनु ब्रह्मभोज जिजमान कोउ, आजु भिखारिन कहँ दियो।। श्मशानका दृश्य है। राजा हरिश्चन्द्र वहीं पशु-पक्षियोंकी नाना केलियाँ देख रहे हैं। उन्हें देखकर उनके मनमें जो घृणाका भाव उत्पन्न होता है वही-स्थायिभाव है। मुर्दोंकी हड्डी, त्वचा आदि आलम्बन-विभाव हैं। कौवोंका आँख निकालना, स्यारका जीभको खींचना, गिद्धका जाँघको खोद- खोदकर मांसका नोचना, कुत्तोंका अँगुलियोंका काटना ये सब उद्दीपन हैं। राजाका इस सबका वर्णन करना अनुभाव है। मोह, स्मृति आदि सञ्चारिभाव हैं। फलतः यहाँ पूर्णरूपेण बीभत्सरस है। हास्य तथा जुगुप्साका आश्रय यहाँ रसगङ्गाधरकारने यह शङ्का उठायी है कि- ननु रतिक्रोधोत्साहभयशोकविस्मयनिर्वेदेषु प्रागुदाहृतेषु यथालम्बनाश्रययोः सम्प्रत्ययः, न तथा हासे जुगुप्सायां च। तत्नालम्बनस्यैव प्रतीतेः । पद्यश्रोतुश्च रसास्वादाधिकरणत्वेन लौकिकहास- जुगुप्साश्रयत्वानुपपत्तेः । इति चेत् सत्यम् । तदाश्रयस्य द्रष्टपुरुषविशेषस्य तत्राक्षेप्यत्वात्। तदनाक्षेपे तु श्रोतुः स्वीयकान्तावर्णनपद्यादिव रसोद्वोधे बाधकाभावात्। इसका अभिप्राय यह हुआ कि काव्यप्रकाशकारने ऊपर रति आदि या शृङ्गार आदि रसोंके जो उदाहरण दिये हैं उनमें स्थायिभावके आश्रय तथा आलम्बन, दोनोंका वर्णन पाया जाता है। जैसे अभी भयानकरसके उदाहरणमें भयका आलम्बन अर्थात् जिसको देखकर भयकी उत्पत्ति हो रही है वह राजा
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१३४ काव्यप्रकाश: [का० २६, सू० ४४
चित्रं महानेष बतावतार: क्व कान्तिरेषाऽभिनवैव भङ्गि:। लोकोत्तरं धैर्यमहो प्रभाव: काऽप्याकृतिर्नूतन एष सर्गः ॥४३॥ या रथ है और उस भयका आश्रय मृग है। इस प्रकार 'आलम्बन' तथा 'आश्रय' का अलग-अलग बोध होता है। परन्तु हास्य तथा बीभत्सरसके उदाहरणोंमें यह बात नहीं है। उनमें हास तथा जुगुप्साके आलम्बनमात्र, अर्थात् जिसको देखकर हास या जुगुप्साकी उत्पत्ति होती है उसका वर्णन है, परन्तु उनके 'आश्रय' अर्थात् जिसमें हास तथा जुगुप्साका उदय हो रहा है, उसे देखनेवाले पुरुषका वर्णन नहीं है। यहाँ पद्यके श्रोताको लौकिक हास या जुगुप्साका आश्रय नहीं माना जा सकता है। वह तो सामाजिकके नाते अलौकिक रसास्वादका आश्रय होता है। लौकिक हास तथा जुगुप्साका आश्रय कोई अन्य होना चाहिये था। इस शङ्काका उत्तर रसगङ्गाधरकारने यह दिया है कि, हाँ ठीक है; यहाँ उसके आश्रयरूपमें द्रष्टा पुरुषकी आरक्षेपसे उपस्थिति माननी चाहिये। परन्तु यदि उसका आक्षेप न किया जाय तो भी पद्यका श्रोता ही उस लौकिक हास या जुगुप्साका आश्रय भी हो सकता है और वही अलौकिक रसास्वादका आश्रय भी हो सकता है। जैसे किसी स्त्रीका उसके पतिद्वारा काव्यरूपमें वर्णन किया जाय तो उससे लौकिक रति आदिका भी उसमें उदय होगा और साथ ही अलौकिक रसास्वादन भी। इसी प्रकार यहाँ आश्रयका अलग कथन नहीं हुआ है, इससे रसानुभूतिमें कोई बाधा नहीं हो सकती है। अद्भुतरसका उदाहरण आगे अद्भुतरसका उदाहरण देते हैं। यह वामनावतारको देखकर बलिकी उक्ति है। इसमें चित्र आदि पद विस्मयके वाचक नहीं हैं अपितु सम्बद्ध पदार्थ अथवा उसके अवच्छेदक धर्मके लोकोत्तर महत्त्वके प्रतिपादक हैं। उनको विस्मयार्थक माननेपर तो स्थायिभावकी स्वशब्दवाच्यता दोष-कोटिमें समाविष्ट हो जायेगी। इसलिए महान् माहात्म्यशाली यह पुरुष चित्र अर्थात् लोकोत्तर वस्तु है। इस प्रकारका वाक्यका अर्थ होता है। बलि वामनको देखकर कह रहा है- यह बड़ा लोकोत्तर अवतार है। यह [अलौकिक] कान्ति और कहाँ [मिल सकती है। इसके उठने-बैठने आदिकी ] शैली बिलकुल नयी-सी [अलौकिक ] है। इसका धैर्य भी लोकोत्तर है और प्रभाव भी अलौकिक है। इसकी आकृति अनिर्वचनीय है और [ब्रह्माकी सृष्टिसे भिन्न ] यह अलौकिक रचना है।।४ ३ । यहाँ वामन आलम्बन; कान्ति तथा गुणातिशयादि उद्दीपन; स्तुति आदि अनुभाव; मति, धृति, हर्षादि व्यभिचारिभाव और 'विस्मय' स्थायिभाव है। रसगङ्गाधरकारका मतभेद रसगङ्गाधरकार इस पद्यमें अद्भुतरस नहीं मानते हैं। उनके मतसे यहाँ विस्मय स्तुतिका अङ्गभूत होनेसे अप्रधान है, इसलिए इसे रसवदलङ्वार ही कहा जा सकता है। उन्होंने लिखा है- यच्च सहृदयशिरोमणिभिः प्राचीनैरुदाहृतम् 'चित्रं महानेष बतावतारः' इति। तत्रेदं वक्तव्यम्- प्रतीयतां नामात्र विस्मयः । परन्त्वसौ कथंकारं [अद्भुतरस ] ध्वनिव्यपदेशहेतुः । प्रतिपाद्यमहापुरुष- विशेषविषयायाः प्रधानीभूतायाः स्तोतृगतभक्तेः प्रकर्षादस्य गुणीभूतत्वात् । यथा महाभारते गीतासु विश्वरूपं दृष्टवतः पार्थस्य 'पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्गान्' इत्यादौ वाक्य- सन्दर्भे। इत्थं चास्य रसालङ्कारत्वमुचितम् ।
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का० ३०, सू० ४५] चतुर्थ उल्लास: १३५ एषां स्थायिभावानाह- [सू० ४५ ] रतिर्हासश्च शोकश्च क्रोधोत्साहौ भयं तथा। जुगुप्सा विस्मयश्चति स्थायिभावाः प्रकीतिताः ॥३०। स्पष्टम्। हिन्दीमें पद्माकरका निम्नलिखित पद्य अद्भुतरसका सुन्दर उदाहरण है- गोपी ग्वालबाल जुरे आपसमें कहें आली कोऊ जसुदाको अवतरयौ इन्द्रजाली है। कहै 'पद्माकर' करै को यों उताली, जापै OF रहन न पाव कहूँ एको फन खाली है। देखै देवताली भई विधिके खुशाली, कूदि किलकति काली हेरि हँसत कपाली है। जनमको चाली एरी अद्भुत दे ख्याली, आजु, कालीकी फनाली पै नचत बनमाली है।। श्रीकृष्ण भयानक कालियनागके सिरपर नाच रहे हैं। ऐ से भयानक दृश्यको देखकर ग्वालबाल चकित रह जाते हैं। यही विस्मय स्थायिभाव है। कालियनागको नाथकर यमुनासे बाहर खदेड़ना आलम्बन है, कृष्णका उसके सिरपर नाचना उद्दीपन है। ग्वालबालोंकी विचित्र लोलाएँ अनुभाव हैं। अतः पूर्ण अद्भुतरस है। इस प्रकार ग्रन्थकारने सम्भोग शृङ्गारके दो, विप्रलम्भशृङ्गारके पाँच और शेष रसोंमेंसे प्रत्येकका एक-एक, कुल मिलाकर सब रसोंके चौदह उदाहरण यहाँ दिये हैं। स्थायिभाव [अब आगे] इन [रसों ] के स्थायिभावोंको कहते हैं- [सू० ४५ ]-१. रति, २. हास, ३. शोक, ४. क्रोध, ५. उत्साह, ६. भय, ७. जुगुप्सा तथा ८. विस्मय [ये आठ, आठों रसोंके क्रमशः ] स्थायिभाव कहलाते हैं ॥३०॥ [कारिकाका अर्थ ] स्पष्ट है। काव्यप्रकाशकारने यहाँ स्थायिभावोंके केवल नामोंका उल्लेख कर दिया है, उनके लक्षण आदि नहीं किये हैं। साहित्यदर्पणकारने इन सब स्थायिभावोंके लक्षण निम्नलिखित प्रकार किये हैं- रतिर्मनोनुकूलेऽथे मनसः प्रवणायितम् । वागादिवैकृतैश्चेतोविकासो हास इष्यते ॥१७६॥ इष्टनाशादिभिश्चेतोवैक्लव्यं शोकशब्दभाक। प्रतिकलेषु तैक्ष्ण्यस्यावबोधः क्रोध इष्यते ॥१७७॥ कार्यारम्भेषु संरम्भ: स्थेयानुत्साह उच्यते। रौद्रशक्त्या तु जनितं चित्तवैक्लव्यदं भयम् ॥१७८॥ दोषेक्षणादिभिर्गर्हा जुगुप्सा विषयोद्गवा। विविधेषु पदार्थेषु लोकसीमातिवर्तिषु॥१७६॥ विस्फारश्चेतसो यस्तु स विस्मय उदाहृतः । शमो निरीहावस्थायां स्वात्मविश्रामजं सुखम् ॥१८०॥
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१३६ काव्यप्रकाश: [का० ३१-३४, सू० ४६
व्यभिचारिणो ब्रूते-
आलस्यं चैव दैन्यं च चिन्ता मोहः स्मृतिधृ तिः ॥३१॥ व्रीडा चपलता हर्ष आवेगो जडता तथा। कियवाा गिहन। गर्वो विषाद औत्सुक्यं निद्राऽपस्मार एव च ॥३२॥ सुप्तं प्रबोधोऽमर्षश्चाप्यवहित्थमथोग्रता। मतिर्व्याधिस्तथोन्मादस्तथा मरणमेव च ।।३३।। त्रासश्चैव वितर्कश्च विज्ञेया व्यभिचारिणः । त्रर्या्त्रिशदमी भावाः समाख्यातास्तु नामतः ।३४॥
व्यभिचारिभाव [स्थायिभावोंके निरूपणके बाद ] व्यभिचारिभावोंको कहते हैं- [सूत्र ४६ ] -- १. निर्वेद, २. ग्लानि, ३. शङ्ा, ४. असूया, ५. मद, ६. श्रम, ७. आलस्य, ८. देन्य, . चिन्ता, १०. मोह, ११. स्मृति, १२. धृति- १३. वरीडा, १४. चपलता, १५. हर्ष, १६. आवेग, १७. जडता, १८. गर्व, १६. विषाद, २०. औत्सुक्य, २१. निद्रा और २२. अपस्मार- २३. सोना, २४. जागना, २५. क्रोध, २६. अवहित्या [अर्थात् लज्जा आदिके कारण आकार- गोपन ], २७. उग्रता, २८. मति, २६. व्याधि, ३० उन्माद, ३१. मरण, ३२. वास और ३३. वितर्क, ये नामसे गिनाये हुए ३३ व्यभिचारिभाव [कहलाते ] हैं ॥३१-३४॥ व्यभिचारिभावोंके लक्षण ग्रन्थकारने यहाँ इन ३३ व्यभिचारिभावोंके केवल नाम गिना दिये हैं, उनके लक्षण नहीं किये हैं। साहित्यदर्पणकारने तृतीय परिच्छेदमें इनके लक्षण भी दिये हैं, जो निम्नलिखित प्रकार हैं। ये लक्षण भरत-नाटयशास्त्रके आधारपर दिये गये हैं- तत्त्वज्ञानापदीर्ष्यादेनिर्वेद: स्वावमाननम् । ।।१४२॥ आवेगः सम्भ्रमस्तत्र वर्षजे पिण्डताङ्गता। उत्पातजे स्रस्तताङ्ग धूमाद्याकुलताऽग्निजे ।१४३।। राजविद्रवजादेस्तु शस्त्रनागादियोजनम् । गजादेः स्तम्भकम्पादि पांस्वाद्याकुलताऽनिलात् ।।१४४।। इष्टाद्धर्षाः शुचोऽनिष्टाज्ज्ञेयाश्चान्ये यथायथम् । दौर्गत्याद्यैरनौजस्यं दैन्यं मलिनतादिकृत् ।।१४५।। खेदो रत्यध्वगत्यादेः श्वासनिद्रादिकृच्छमः । सम्मोहानन्दसम्भेदो मदो मद्योपयोगज: ॥१४६।।
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का० ३१-३४, सू० ४६ ]] चतुर्थ उल्लासः १३७
Ts अमुना चोत्तम: शेते मध्यो हसति गायति।R अधमप्रकृतिश्चापि परुषं वक्ति रोदिति ।।१४७।। अप्रतिपत्तिर्जडता स्यादिष्टानिष्टदर्शनश्रुतिभिः । अनिमिषनयननिरीक्षणतूष्णींभावादयस्तत्र 11१४८ ।। शौर्यापराधादिभवं भवेच्चण्डत्वमुग्रता। तत्र स्वेदशिर:कम्पतर्जनाताडनादयः ।।१४६।। मोहो विचित्तता भीतिदुःखावेगानुचिन्तनैः । मूच्छनाज्ञानपतन भ्रमणादर्शनादिकृत् ॥।१५०॥ निद्रापगमहेतुभ्यो विबोधश्चेतनागमः । जम्भाङ्गभङ्गनयनमीलना ङ्गावलोककृत् 119५911 स्वप्नो निद्रामुपेतस्य विषयानुभवस्तु यः । 150 कोपावेगभयग्लानिसुखदुःखादिकारक: ।१५२॥। मनःक्षेपस्त्वपस्मारो ग्रहाद्यावेशनादिजः । भूपातकम्पप्रस्वदफनलालादिकारक: ।।१५३।। गर्वो मदः प्रभावश्रीविद्यासत्कुलतादिज: 1 अवज्ञासविलासाङ्गदर्शनाविनयादिकृत् 11१५४11 शराद्यैर्मरणं जीवत्यागोऽङ्गपतनादिकृत। आलस्यं श्रमगर्भा्ैर्जाडयं जम्भास्मितादिकृत् 11१५५॥1
नेत्ररागशिर:कम्पभ्रूभङ्गोत्त्जनादिकृत् ।१५६11 चेतःसम्मीलनं निद्रा श्रमक्लममदादिजा। जृम्भाक्षिमीलनोच्छ्वासगात्रभ ड्गादिकारणम् 1 व्यापारान्तरसक्त्यन्यथावभाषणविलोकनादिकरी ।।१५८॥। इष्टानवाप्तेरौत्सुक्यं कालक्षपासहिष्णुता 1 चित्ततापत्वरास्वेददीर्घनिःश्वसितादिकृत् 119५६1ा चित्तसन्मोह उन्मादः कामशोकभयादिभि: अस्थानहासरुदितगीतप्रलपनादिकृत ।१६०॥1 परक्रौर्यात्मदोषाद्यैः शङ्राऽनर्थस्य तर्कणम् । ।।१६१॥। सदृशज्ञानचिन्ताद्यै: भ्रूसमुन्नयनादिकृत् । स्मृति: पूर्वानुभूतार्थविषयज्ञानमुच्यते ।१६२॥। नीतिमार्गानुसत्यादेरर्थनिर्धारणं मतिः। स्मेरता धृतिसन्तोषौ बहमानश्च तद्भवाः ।।१६३।। व्याधिज्वरादिर्वाताद्यैर्भूमीच्छोत्कम्पनादिकृत् क निर्घात-विद्युदुल्काद्यस्वारः कम्पादिकारक: ॥१६४।।
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१३८ ०९९ काव्यप्रकाश: [का० ३५, सू० ४७ ००
निवदस्यामङ्गलप्रायस्य प्रथममनुपादेयत्वेऽप्युपादनं व्यभिचारित्वेऽपि स्थायिता- डभिधानार्थम्। तेन- [सू० ४७ ] निर्वेदस्थायिभावोऽस्ति शान्तोऽपि नवमो रसः । अहौ वा हारे वा कुसुमशयने वा दृषदि वा मणौ वा लोष्ठे वा बलवति रिपौ वा सुहृदि वा तृणे वा स्त्रैणे वा मम समदुशो यान्ति दिवसाः क्वचित् पुण्यारण्ये शिव शिव शिवेति प्रलपतः ।४४।।
घाष्टर्याभावो वरीडा वदनानमनादिकृद् दुराचारात्। हर्षस्त्विष्टाप्तेर्मन:प्रसादोऽश्रुगद्गदादिकर: ।।१६५11 असूयाऽन्यगुणर्द्धीनामौद्धत्यादसहिष्णुता ।।१६६।।
उपायाभावजन्मा तु विषाद: सत्वसंक्षयः । निश्वासोछ्वासहृत्तापसहायान्वेषणादिकृत् ।।१६७॥। ज्ञानाभीष्टागमाद्यैस्तु सम्पूर्णस्पृहता धृतिः। सौहित्यवचनोल्लाससहासप्रतिमादिकृत् ॥१६८॥। मात्सर्यद्वेष रागादेश्चापल्यं त्वनवस्थितिः । तत्न भर्त्सनपारुष्यस्वच्छन्दाचरणादयः ।१६६11 रत्यायासमनस्तापक्षुत्पिपासादिसम्भवा 1 ग्लानिर्निष्प्राणताकम्पकार्यानुत्साहतादिकृत् ।।१७०॥। ध्यानं चिन्ता हितानाप्तेः शून्यताश्वासतापकृत् तर्को विचार: सन्देहाद् भ्रूशिरोङ्गलिनर्त्तक: ।१७१॥ इस प्रकार ३३ व्यभिचारिभावोंके लक्षण 'साहित्यदर्पण' में दिये गये हैं। काव्यप्रकाशकारने उनके नाम गिनाये हैं। निर्वेद स्थायिभाव तथा व्यभिचारिभाव, दोनों है। व्यभिचारिभावोंमेंसे 'निर्वेद' स्थायिभाव भी होता है यह बात आगे कहते हैं- [इन तैतींस व्यभिचारिभावोंमें सबसे पहिले कहा हुआ ] निर्वेद प्रायः अमङ्गलरूप है, इसलिए उसका सबसे पहिले कथन उचित न होनेपर भी उसका प्रथम उपादान उसके व्यभिचारिभाव होनेपर भी [स्थायित्व अर्थात् ] स्थायिभावत्वके प्रतिपादनके लिए किया गया है। [अर्थात् यद्यपि यहाँ निर्वेदकी गणना व्यभिचारिभावोंमें की जा रही है, परन्तु यह आगे कहे जानेवाले शान्तरसका स्थायिभाव भी है। अन्य किसी व्यभिचारिभावमें यह बात नहीं पायी जाती है। इसलिए निर्वेदको सबसे पहिले रखा गया है। शान्तरसका उदाहरण इसलिए -- [सू० ४७ ] निर्वेद जिसका स्थायिभाव है, इस प्रकार शान्तरस भी नवम रस होता है। जैसे [शान्तरसका उदाहरण ]- साँप और मुक्ताहारमें [ समबुद्धि रखनेवाले, इसी प्रकार ] फलोंकी सेज और पत्थरकी शिलामें
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का० ३५, सू० ४७ ] चतुर्थ उल्लास: १३६ [समबुद्धि ], मणि तथा ढेलेमें, बलवान् शत्रु तथा मित्रमें, तिनकेमें अथवा स्त्रियोंके समूहमें समबुद्धि रखने- वाले मेरे दिन किसी [ अर्थात् श्मशान आदि अपवित्र स्थानमें अथवा नैमिषारण्य आदि] पवित्र तपोवनमें, 'शिव' 'शिव' 'शिव' ऐसा प्रलाप करते हुए व्यतीत होते हैं ।।४४।। यहाँ मिश्या प्रतीत होनेवाला जगत् शलम्बन, तपोवनादि उद्दीपन, सर्प और हारादिमें समबुद्धि अनुभाव, धृति, मति और हर्षादि व्यभिचारिभाव तथा निर्वेद स्थायिभावसे सामाजिकमें शान्तरसकी अभिव्यक्ति होती है। हिन्दीका निम्नलिखित पद्य शान्तरसका सुन्दर उदाहरण है- भूखे अघाने रिसाने हितू अहितून्ह ते स्वच्छ मने हैं। दूषन भूषन कञ्चन काँच जू मृत्तिका मानिक एक गने हैं। सूल सों फूल सों माल प्रबाल सों 'दास' हिए सम सुक्ख सने हैं। राम के नाम सों केवल काम तेई जग जीवन-मुक्ख बने हैं। इस पद्यमें जीवन्मुक्त होनेवाले पुरुषका वर्णन है। संसारकी अ्रसारता आ्रपालम्बन है, शम स्थायि- भाव है। सन्तोंका संग होनेसे; तीर्थयात्रा करनेसे यह भाव उद्दीप्त बनता है। भूखसे अघाना, शूलको फूल समझना, मोतीको काँच समझना, मिट्टी तथा हीराको एक समझना ये सब अनुभाव हैं। चित्तमें हर्ष, प्रबोध, वितर्क आदि सञ्चारिभाव हैं। अतः पूर्ण शान्तरस है। यहाँ 'काव्यप्रकाश'की 'प्रदीप' नामक व्याख्यामें यह प्रश्न उठाया गया है कि शान्तरसकी भावना तो अनिवार्य है परन्तु 'निर्वेद'को उसका स्थायिभाव नहीं माना जा सकता है; उसके स्थानपर शमको उसका स्थायिभाव मानना चाहिये। उनका कहना है कि 'निर्वेद' सब चित्तवृत्तियोंका अभावरूप होता है अतएव अभावरूप होनेसे उसको स्थायिभाव नहीं माना जा सकता है। इसके विपरीत निरीहावस्थामें आत्मलीन होनेसे जो आनन्द होता है उसको 'शम' कहते हैं। 'शम' भावरूप है इसलिए शान्तरसका स्थायिभाव शम ही हो सकता है। निर्वेदको व्यभिचारिभाव माना जा सकता है। उन्होंने लिखा है- अत्र वदन्ति-शान्तो नाम रसस्तावदनुभवसिद्धतया दुरपह्नवः । न चैतस्य स्थायी निर्वेदो युज्यते। तस्य विषयेष्वलंप्रत्ययरूपत्वात्, आत्मावमानरूपत्वाद्वा। शान्तेश्च निखिलविषयपरिहार- जनितात्ममात्रविश्रामानन्दप्रादुर्भावमयत्वानुभवात् । तदुक्तं [कृष्णद्वैपायनेन ] यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशी कलाम्॥' इति। अत एव 'सर्वचित्तवृत्ति- विरामोऽस्य स्थायी' इति निरस्तम्। अभावस्य स्थायित्वायोगात्। तस्मात् शमोऽस्य स्थायी। निर्वेदादयस्तु व्यभिचारिणः । स च शमो निरीहावस्थायामानन्दः स्वात्मविश्रामात् इति। इस मतका खण्डन अन्य व्याख्याकारोंने किया है। उनका कहना है कि शान्तरसका स्थायिभाव तत्त्वज्ञानजन्य निर्वेद ही है। जैसे निरपेक्षभावरूप शोकको स्थायिभाव माना जा सकता है उसी प्रकार निर्वेदको भी स्थायिभाव कहा जा सकता है; भरतमुनिने जो 'क्वचिच्छमः' कहा है वहाँ भी 'शम्यते यस्मादिति शम:' इस व्युत्पत्तिसे निर्वेद ही शम-पद-वाच्य होता है। भावका लक्षण इस प्रकार नौ रसोंका निरूपण कर चुकनेके बाद ग्रन्थकार भावोंका निरूपण प्रारम्भ करते हैं। वसे तो स्थायिभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारिभावोंके साथ भी भाव शब्दका प्रयोग होता है, परन्तु ये 'भाव' जिनका निरूपण आगे करने जा रहे हैं, उन भावोंसे भिन्न प्रकारके हैं। भरतमुनिने 'भाव' शब्दकी
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१४० काव्यप्रकाश: [ का० ३५, सू० ४८ [ सू० ४८ ] रतिर्देवादिविषया व्यभिचारी तथाऽञ्जितः ।।३५।। भावः प्रोक्तः । आदिशब्दान्मुनिगुरुनृपपुत्रादिविषया, कान्ताविषया तु व्यक्ता शृङ्गारः। उदाहरणम्- कण्ठकोणविनिविष्टमीश ते कालकूटमपि मे महामृतम्। अप्युपात्तममृतं भवद्वपुर्भेदवृत्ति यदि मे न रोचते ।।४५।। हरत्यघं सम्प्रति हेतुरेष्यतः शुभस्य पूर्वाचरितः कृतं शुभैः । शरीरभाजां भवदीयदर्शनं व्यनक्ति कालत्रितयेऽपि योग्यताम् ।।४६।। व्युत्पत्ति 'भवन्तीति भावाः' तथा 'भावयन्तीति भावाः' दो प्रकारसे की है। उसका लक्षण इस प्रकार किया है- विभावैराहृतो योऽर्थो ह्यनुभावैस्तु गम्यते। वागङ्गसत्त्वाभिनयैः स भाव इति संज्ञितः । वागङ्गमुखरागेण सत्त्वेनाभिनयेन च। कवेश्चान्तर्गतं भावं भावयन् भाव उच्यते।। नानाभिनयसम्बद्धान् भावयन्ति रसानिमान्। यस्मात्तस्मादमी भावा विज्ञेया नाटययोक्तृभिः ॥ ७, २-३॥ प्रकृत 'भाव' पदार्थ उससे भिन्न है। काव्यप्रकाशकार उसका लक्षण निम्नलिखित प्रकार करते हैं- [सू० ४८ ] -- देव आदि विषयक रति [आदि सभी स्थायिभाव ], और व्यङ्गय व्यभिचारिभाव 'भाव' कहलाते हैं। आदि शब्दसे मुनि, गुरु, राजा और पुत्रादिविषयक [रतिका संग्रह होता है। पुरुष तथा स्त्री- विषयक रतिको छोड़कर अन्योंके प्रति जो रति है वह सब 'भाव' पदवाच्य है ]। स्त्रीविषयक रति व्यक्त होनेपर शृङ्गार [कहलाती ] है। [भावविषयक ] उदाहरण [निम्नलिखित श्लोक है]- हे भगवान [महादेव ], आपके कण्ठमें सन्निविष्ट कालकूट [विष] भी मेरे लिए महान् अमृतके समान है और आपके शरीरसे भिन्न [अलग रहनेवाला] प्राप्त अमृत भी मुझे अच्छा नहीं लगता।।४५।। श्री उत्पलपादाचार्य-विरचित 'परमेश्वरस्तोत्नावलि' में तेरहवें स्तोत्नमें यह पद्य आया है। इसमें महादेव आलम्बन हैं। ईश पदसे वाच्य अव्याहत ऐश्वर्य उद्दीपन, स्तव अनुभाव, धृति एवं माहात्म्य- का स्मरण आदि व्यभिचारिभाव हैं। इनसे स्तावककी रतिका अनुमानकर सकनेवाले सामाजिकोंको 'भाव' रूप रतिका अनुभव होता है। यह पूर्ण रूपसे परिपुष्ट न होनेसे रसरूपताको प्राप्त नहीं होती है इसलिए 'भाव' पद वाच्य होती है। यह उदाहरण देवविषयक रतिका दिया था। अगला उदाहरण मुनिविषयक रतिका 'शिशुपाल- वध' नामक काव्यके प्रथम सर्गसे देते हैं। नारदजीके आनेपर कृष्णजी उनका स्वागत करते समय उनकी प्रशंसा करते हुए कह रहे हैं- आपका दर्शन प्राणियोंकी [वर्तमान, भविष्यत् तथा भूत ] तीनों कालोंमें योग्यताको प्रकट
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का० ३६, सू० ४६] चतुर्थ उल्लास: १४१
एवमन्यदप्युदाहार्यम् । अञ्जितव्यभिचारी यथा- जाने कोपराङमुखी प्रियतमा स्वप्नेऽद्य दृष्टा मया मा मां संस्पृश पाणिनेति रुदती गन्तुं प्रवृत्ता पुरः। नो यावत् परिरभ्य चाटुशतकैराश्वासयामि प्रियां भ्रातस्तावदहं शठेन विधिना निद्रादरिद्रीकृतः॥४७॥ अत्र विधि प्रत्यसूया। [सू० ४९] तदाभासा अनौचित्यप्रवर्त्तिताः । तदाभासा रसाभासा भावाभासाश्च।
करता है। [क्योंकि ] वह वर्तमानकालमें पापका नाश करता है, भविष्यमें प्राप्त होनेवाले कल्याणका कारण होता है और पूर्वके पुण्यसे प्राप्त हुआ है।४६।। इस प्रकार [गुरु, राजा, पुत्र आदि विषयक रति आदिके ] अन्य उदाहरण भी समझ लेने चाहिये। [भावके दूसरे भेद ] व्यङ्गचव्यभिचारी [का उदाहरण ] जैसे- ओ भाई, आज मैंने कोधके कारण स्वप्नमें पराङमुखी प्रियतमाको देखा था। 'नहीं-नहीं, मुझे हाथसे मत छूओ', यह कहकर वह रोती हुई चल दी। जबतक मैं आलिङ्गन करके नाना प्रकारकी खुशामदके द्वारा उसको मनानेका यत्न करता हूँ तबतक धूर्त विधाताने मेरी निद्रा भङ्ग कर दी॥४७॥ यहाँ विधाताके प्रति 'असूया' [रूप व्यभिचारी-व्यङ्गय है। अतः यह भावके दूसरे भेदका उदाहरण है]। रसाभास, भावाभासोंका वर्णन इस प्रकार रस तथा भावोंका निरूपण कर चुकनेके बाद ग्रन्थकार रसाभास तथा भावाभासों- का निरूपण करते हैं। [सू० ४६ ]-उन रस तथा भावोंका ] अनुचित रूपसे वर्णन 'रसाभास' तथा 'भावाभास' [कहलाता है ]। तदाभास [का अर्थ ] रसाभास तथा भावाभास [है]। शङ्गार आदि रसों अथवा भावोंका अनुचित रूपसे वर्णन क्मशः 'रसाभास' तथा 'भावाभास' कहलाता है। वह अनौचित्य अनेक प्रकारका हो सकता है। उनका निर्णय सहृदय पुरुषोंकी व्यवस्थाके अनुसार ही हो सकता है; जैसे, रतिके विषयमें ही अनौचित्यके अनेक रूप हो सकते हैं। एक स्त्रीका एक पुरुषके प्रति प्रेम उचित है, परन्तु यदि एक स्त्रीका अनेक पुरुषोंके प्रति प्रेमका वर्णन किया जाय तो वह अनुचित होनेसे 'रसाभास' की कोटिमें आयेगा, जैसा कि कहा भी है- उपनायकसंस्थायां मुनिगुरुपत्नीगतायाञ्च। बहुनायकविषयायां रतौ तथानुभयनिष्ठायाम् ।। आभासत्वं कथितं तथव तिर्यगादिविषयायाम्।
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१४२ काव्यप्रकाश: [ [ का० ३६, सू० ४६
तत्र रसाभासो यथा- स्तुम: कं वामाक्षि ! क्षणमपि विना यं न रमसे विलेभे क: प्राणान् रणसखमुखे यं मृगयसे। सुलग्ने को जातः शशिमुखि ! यमालिङ्गसि बलात् तपःश्रीः कस्यषा मदननगरि ! ध्यायसि तु यम् ॥४८।। अत्रानेककामुकविषयमभिलाषं तस्याः 'स्तुमः' इत्याद्यनुगतं बहुव्यापारोपादानं व्यनक्ति।
भावाभासो यथा-
राकासुधाकरमुखी तरलायताक्षी सा स्मेरयौवनतरङ्गतविभ्रमाङ्गी। तत्कि करोमि विदधे कथमत्र मैत्रीं तत्स्वीकृतिव्यतिकरे क इवाभ्युपायः ॥४९॥ अत्र चिन्ता अनौचित्यप्रवर्तिता। एवमन्येऽप्युदाहार्याः।
का इसी प्रकार गृरु आदिको आलम्बन बनाकर हास्यरसका प्रयोग, अथवा वीतरागको आलम्बन बनाकर करुण आदिका प्रयोग, माता-पिता-विषयक रौद्र तथा वीररसका प्रयोग, वीरपुरुषगत भयानकका वर्णन, यज्ञीय पशु आदिको आलम्बन मानकर बीभत्सका, ऐन्द्रजालिक आदि विषयक अद्भुत और चाण्डाल आदि विषयक शान्तरसका प्रयोग भी अनुचित माना गया है, इसलिए वे सब रसाभासके अन्तर्गत होते हैं। उनमेंसे रसाभास [बहुनायकविषयक रतिका उदाहरण ], जैसे -- हे सुन्दर नेत्रवाली, जिसके बिना तुमको क्षणभर चैन नहीं पड़ता है ऐसा कौन [भाग्यशाली ] है, जिसकी हम [उसके सौभाग्यके लिए ] प्रशंसा करें, किसने युद्धरूप यज्ञमें अपने प्राणों [ की आहुति ] दी है जिसको तुम खोज रही हो, ऐसा कौन [भाग्यशाली] शुभ मुहर्तमें उत्पन्न हुआ है जिसका तुम गाढ़ालिङ्गन करती हो, हे मदननगरि, तुम जिसका ध्यान करती रहती हो ऐसी किसकी तपःसम्पत्ति है॥४८॥ यहाँ 'स्तुमः' इत्यादिसे अनुगत अनेक व्यापारोंका वर्णन उस [ परकीया या वेश्या नायिका ] के अनेक-कामुक-विषय अभिलाष्को व्यक्त करता है [ इसलिए यह रसाभासका उदाहरण है]। भावाभास [चिन्ताके अनौचित्य प्रव्तित होनेका उदाहरण ], जैसे -- वह पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान [सुन्दर] मुखवाली, चञ्चल और बड़ी-बड़ी आँखोंसे युक्त और उभरते नव-यौवनसे उद्भूत हावभावोंसे इठला रही है, सो अब मैं क्या करूँ। उसके साथ किस प्रकार मंैत्री-सम्बन्ध स्थापित करूँ और उसकी स्वीकृति प्राप्त करनेका क्या उपाय है [यह सीताको लक्ष्य करके रावणकी उक्ति है]॥४।।। यहाँ [रावणकी सीताके प्रति ] चिन्ता अनौचित्य प्रवर्तित है] अतः भावाभास है]। इसी प्रकार अन्य उदाहरण भी समझ लेने चाहिये।
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का० ३६, सू० ५० ] चतुर्थ उल्लास: १४३ [सू० ५०] भावस्य शान्तिरुदय: सन्धिः शबलता तथा॥३६॥ कमेणोदाहरणम्। तस्याः सान्द्रविलेपनस्तनतटप्रश्लेषभुद्राङ्कितं कि वक्षरचरणानतिव्यतिकरव्याजेन गोपाय्यते। I9P। इत्युक्ते क्व तदित्युदीर्य सहसा तत्सम्प्रमाष्टु मया साऽडश्लिष्टा रभसेन तत्सुखवशात्तन्व्या च तद्विस्मृतम् ।।५०।। अत्र कोपस्य । एकस्मिन् शयने विपक्षरमणीनामग्रहे मुग्धया सद्यो मानपरिग्रहग्लपितया चाटूनि कुर्वन्नपि। आवेगादवधीरितः प्रियतमस्तष्णीं स्थितस्तत्क्षणं मा भूत्सुप्त इवेत्यमन्दवलितग्रीवं पुनर्वीक्षितः ॥५१।। भावाभासके इस उदाहरणमें चिन्तारूपी व्यभिचारिभावको अनौचित्य-प्रवर्तित माना है। इसका आशय यह है कि पहिले स्त्रीके अनुरागका वर्णन होना चाहिये। यह कामशास्त्र तथा कवि- सम्प्रदायका नियम है। परन्तु यहाँ पहिले पुरुषानुरागका वर्णन किया गया है। इसलिए अननुरक्ता सीताके प्रति यह चिन्ताका प्रदर्शन अनौचित्यमय है। अतः यह 'भावाभास'का उदाहरण है। भावशान्ति आदि चार यहाँतक ग्रन्थकारने रस, रसाभास, भाव तथा भावाभासोंका वर्णन किया है। भावाभासके साथ ही भावशान्ति, भावोदय, भावसन्धि और भावशबलता इन चारका आगे निरूपण करते हैं- [सू ५०]-भावकी शान्ति, भावका उदय, भावसन्धि तथा भावशबलता [ये चार भी भावोंके साथ गिने जाने चाहिये।।३६।। भावशान्तिका उदाहरण कमशः [उनके ] उदाहरण [आगे देते हैं ] -- यह श्लोक 'अमरुकशतक' से लिया गया है। इसमें कोई शठनायक अपनी पत्नीकी कोपशान्तिका वर्णन अपने मित्रसे कह रहा है। उस [अन्यस्त्री]के गाढ़-विलेपनवाले स्तनोंके अग्रभागकी मुद्रासे अङ्कित अपनी छातीको चरणोंमें झुकनेके बहानेसे क्यों छिपा रहे हो [कुपित स्वपत्नीके द्वारा] ऐसा कहे जानेपर, 'वह [स्तनाग्रकी मुद्रा मेरे वक्ष:स्थलपर ] कहाँ है ?' यह कहकर उस [ अन्य स्त्रीके आलिङ्गनके चिह्न ] को मिटानेके लिए मैंने एकदम जोरसे उस [स्वपत्नी] का आलिङ्गन कर लिया और उसके सुखके कारण वह [तन्वी ] भी उसको भूल गयी ।।५०।। क यहाँ कोप [रूप भाव ]की [शान्ति प्रदर्शित की गयी है ]। भावोदयका उदाहरण अगला उदाहरण भावोदयका है। यह पद्य भी अमरुकशतकसे लिया गया है। एक ही पलङ्गपर [नायकके साथ ] लेटी हुई और [नायिकाके सम्बोधन करनेपर उसके अपने नामके स्थानपर उसकी विरोधिनी ] सपत्नीका नाम लेनेपर तुरन्त रूठी हुई [नायिका ] ने, खुशामद
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१४४ काव्यप्रकाश: [ Rx [का० ३६, सू० ५ू०
अत्रोत्सुक्यस्य। NW oN CT उत्सिक्तस्य तप:परात्रमनिधेरभ्यागमादेकत: सत्सङ्गप्रियता च वीररभसोत्फालश्च मां कर्षतः । वैदेहीपरिरम्भ एष च मुहुश्चैतन्यमामीलय- न्नानन्दी हरिचन्दनेन्दुशिशिरः स्निग्धो रुणध्द्यन्यतः ॥५२। अत्रावेगहर्षयोः । 150F
करते हुए प्रियतमको भी क्रोधावेशमें फटकार दिया। और [जब ] वह चुपचाप हो गया [ तो ] उसी समय कहीं सो न जाय, इसलिए खूब गर्दन भोड़कर फिर उसको देखने लगी ।५१॥ यहाँ [सुरतविषयक ] औत्सुक्य [के उदय ] का [वर्णन है]। यद्यपि इसमें कोपशान्ति भी लक्षित होती है, परन्तु सुरतौत्सुक्यकी प्रधानरूपसे अभिव्यक्ति हो रही है, इसलिए यह भावशान्तिका नहीं, अपितु भावोदयका ही उदाहरण माना गया है। भावसन्धिका उदाहरण आगे भावसन्धिका उदाहरण देंगे। भावसन्धिका यह उदाहरण 'महावीरचरित' नाटकके द्वितीय अङ्गमें सीताका आ्रलिङ्गन करनेके लिए प्रस्तुत रामकी, परशुरामके आ्रकस्मिक आ्रपरागमन- पर, उक्तिरूपमें है। इसमें आवेग और हर्षकी सन्धिका वर्णन किया गया है- [प्रसिद्ध ] अभिमानशाली, तप तथा पराक्रमके निधिस्वरूप [परशुरामजी]के आगमनसे उनके सत्सङ्गका प्रेम और वीररसका आवेग मुझे [उनकी ओर ] खींच रहे हैं। दूसरी ओर हरिचन्दनके समान शीतल और स्निग्ध आनन्ददायक वैदेहीका यह आलिङ्गन चैतन्यको विलुप्त-सा करता हुआ [वहाँ जानेसे ] रोक रहा है।।५२। यहाँ आवेग और हर्षकी [सन्धि ] है। ऊपर भावसन्धि तथा भावशबलता, ये दो भेद दिखलाये हैं। इनमेंसे जहाँ केवल दो भावोंका योग होता है वहाँ 'भावसन्धि' मानी जाती है और जहाँ दोसे अधिक भावोंका योग होता है वहाँ 'भाव- शबलता' मानी जाती है। ऊपरके उदाहरणमें 'आवेग' तथा 'हर्ष' दो भावोंका योग होनेसे उसे 'भाव- सन्धि'के उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया गया है। अगले श्लोकमें अ्रनेक व्यभिचारिभावोंका योग है इसलिए वह 'भावशबलता' के उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया जा रहा है। 'क्वाकार्य शशलक्ष्मण: क्व च कुलम्' इत्यादि श्लोक कहाँका है इस विषयमें 'काव्यप्रकाश' के टीकाकारोंमें दो प्रकारके मत पाये जाते हैं। श्रीवत्सलाञ्छन, कमलाकर, वैद्यनाथ, भीमसेन और अ्नेक टीकाकारोंने इसे शुकाचार्यकी कन्याको देखनेपर राजा ययातिकी उक्ति माना है। अन्य व्याख्या- कारोंने इसे 'विक्रमोर्वशीय' नाटकके चतुर्थ अङ्गमें उर्वशीको देखकर राजा पुरूरवाकी उक्ति बतलाया है। आज 'विकमोर्वर्शीय' नाटकके जो मुद्रित संस्करण उपलब्ध होते हैं उनमें यह श्लोक नहीं पाया जाता है, परन्तु, सन् १८५७ के मुद्रित संस्करणके पृष्ठ १२२ पर अधिक पाठके रूपसे यह श्लोक पाया जाता है। इसमें आठ व्यभिचारिभावोंका इकट्टा सम्मिश्रण पाया जाता है इसलिए यह 'भावशबलता'का उदाहरण है। उन आठों व्यभिचारिभावोंको अलग-अलग दिखलाते हुए इसका अर्थ निम्नलिखित प्रकार किया जा सकता है-
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का० ३६, सू० ५०] चतुर्थ उल्लास: १४५
क्वाकार्य शशलक्ष्मण: क्व च कुलं भूयोऽपि दृश्येत सा/ ०४] दोषाणां प्रशमाय नः श्रुतमहो कोपेऽपि कान्तं मुखम्। व्ाशाक सतकसे किं वक्ष्यन्त्यपकल्मषाः कृतधियः स्वप्नेऽपि सा दुर्लभा चेतः स्वास्थ्यमुपैहि कः खलु युवा धन्योऽधरं धास्यति ॥५३॥ प्रत फिश्
अत्र वितकौत्सुक्यमतिस्मरणशङ्कादैन्यधृतिचिन्तानां शबलता। भावस्थितिस्तूक्ता उदाहृता च।
T ST १. कहाँ यह अनुचित कार्य और कहाँ चन्द्रमाका वंश [तर्क], 1 २. क्या वह फिर कभी देखनेको भिलेगी [औत्सुक्य ], ३. मैंने दोषोंपर विजय प्राप्तिके लिए ही शास्त्रोंका अध्ययन किया है [मति], ४. क्रोधमें भी [उसका ] मुख कैसा सुन्दर लगता था [स्मरण ], ५. [इस व्यवहारसे ] विद्वान् एवं धर्मात्मा लोग मुझे क्या कहेंगे ? [शंका],श ६. वह तो अब स्वप्नमें भी दुर्लभ हो गयी [ दैन्य ], ७. अरे मनुआ [ हे मन ], धीरज रखो [धृति], ८. न जाने कौन सौभाग्यशाली युवक उसके अधरामृतका पान करेगा [चिन्ता]।।५३।। यहाँ १. वितर्क, २. औत्सुक्य, ३. मति, ४. स्मरण, ५. शङ्का, ६. दैन्य, ७. धृति, द. चिन्ता [इन आठ व्यभिचारिभावोंका योग होनेसे उन भावों ] की शबलता होती है। ध्वन्यालोककारका दृष्टिकोण यह श्लोक 'ध्वन्यालोक' तृतीय उद्योत [पृ० ३०१] में उद्धृत हुआ है। परन्तु वहाँ इसे विरोधी रसाङ्गोंके बाध्यत्वेन कथन के उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया गया है। इसमें सम संख्यावाले अर्थात् २. औत्सुक्य, ४. स्मरण, ६. दैन्य और ८. चिन्ता ये चार शृङ्गाररसके व्यभिचारिभाव हैं और विषम संख्यावाले अर्थात् १. वितर्क, ३. मति, ५. शङ्का, ७. धृति ये चार शान्तरसके व्यभिचारिभाव हैं। इस प्रकार इस एक ही श्लोकमें शान्त तथा शृङ्गार इन दोनों विरोधी रसोंका वर्णन पाया जाता है। परन्तु शान्त तथा शृङ्गाररसका त्रपरालम्बन ऐक्यमें तथा नैरन्तर्यमें दोनों प्रकारसे विरोध माना गया है। यहाँ उन दोनोंका आलम्बन ऐक्य भी है और नैरन्तर्य भी; इसलिए इन दोनोंका एक साथ सन्निवेश दोषाधायक है, यह शङ्का उठ सकती है। इसके समाधानके लिए ध्वन्यालोककारने यह सिद्धान्त स्थिर किया है कि विरोधी रसोंके अ्ङ्गोंके बाध्यत्वेन वणित होनेमें दोष नहीं होता है। उसी सिद्धान्तका समन्वय दिखानेके लिए यह उदाहरण दिया गया है। इसमें शान्तरसके व्यभिचारिभावोंका शृङ्गाररसके व्यभि- चारिभावोंसे बाध हो जाता है, अर्थात् १. वितर्कका २. औत्सुक्यसे बाध हो जाता है। फिर जब शान्तरसका व्यभिचारिभाव ३. मति आता है तब उसका ४. स्मरणसे बाध हो जाता है, फिर शान्तरसके ५. शङ्कारूप व्यभिचारिभावके आरनेपर ६. दैन्यसे उसका बाध हो जाता है। इसी प्रकार शान्तरसके सातवें व्यभिचारिभाव धृतिका शृङ्गाररसके व्यभिचारिभाव ८. चिन्तासे बाध हो जाता है। विरोधी रसाङ्गोंका बाध्यत्वेन सन्निवेश होनेसे यहाँ कोई दोष नहीं है। यह ध्वन्यालोककारका अभिप्राय है। यहाँ एक शङ्का यह हो सकती है कि आपने भावोदय, भावशान्ति, भावसन्धि, भावशबलता
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१४६ काव्यप्रकाश: [ का० ३७, सू० ५१
[सू० ५१ ] मुख्ये रसेऽपि तेऽ्ङ्गित्वं प्राप्नुवन्ति कदाचन। 1995 ते भावशान्त्यादयः । अङ्गित्वं राजानुगतविवाहप्रवृत्तभृत्यवत्। आदि सबके उदाहरण दिये, इसी प्रकार भावस्थितिका भी उदाहरण देना चाहिये था। इसका समाधान करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि- भावस्थिति भावस्थिति तो [ 'व्यभिचारी तथाज्जितः' इस ४८ वें सूत्रमें ] कह चुके हैं और [ 'जाने कोप- पराक्मुखी' आदि ४५ वें श्लोक द्वारा उसका ] उदाहरण भी दे चुके हैं। रसवदलङ्कार इस प्रकार रस, रसाभास, भाव, भावाभास तथा भावसन्धि आदिका निरूपण करनेके बाद अब यह दिखलाना चाहते हैं कि कहीं मुख्य रसके रहते हुए भी इन भावशान्ति आदिकी प्रधानता हो जाती है। उस दशामें ये सब 'रसवदलङ्कार' कहलाते हैं। [सूत्र ५१ ]-मुख्य रसके विद्यमान होनेपर भी कहीं-कहीं वे [भावशान्ति आदि अद्गित्व अर्थात् ] प्रधानताको प्राप्त हो जाते हैं। वे अर्थात् भावशान्ति आदि राजासे अनुगत विवाहके लिए जाते हुए भृत्यके समान [अद्गित्व अर्थात्] प्रधानताको [प्राप्त हो जाते हैं ]। इसका यह अभिप्राय हुआ कि जैसे यदि कभी राजाके किसी कृपापात् भृत्यका विवाह हो और उसकी बारातमें राजा भी सम्मिलित हो तो उस समय राजाकी नहीं अपितु वररूपमें स्थित भृत्यकी ही प्रधानता होती है। इसी प्रकार जहाँ विभाव आदिसे व्यक्त स्थायिभावके उद्रेकसे आस्वादन होता है वहाँ रस या रसध्वनि होती है और रसका प्राधान्य होता है और जहाँ अपने अनुभावों द्वारा व्यक्त व्यभिचारि- भावोंके उद्रेकसे आ्स्वाद होता है वहाँ भावध्वनि होती है। इसी प्रकार जहाँ वस्तु या अलङ्कारकी प्रधानता हो जाती है वहाँ वस्तुध्वनि या अ्लङ्कारध्वनि मानी जाती है। राजानुगत भृत्यका जो उदाहरण दिया है उसका आशय यह है कि कुछ समयके लिए 'आपाततः' भृत्यकी प्रधानता प्रतीत होते हुए भी जैसे पारमार्थिक प्रधानता राजाकी रहती है, उसी प्रकार रसके सम्पर्कसे 'आपाततः' भावशान्ति आ्ररादिकी प्रधानता होते हुए भी अन्तिम प्रधानता तो रसकी ही रहती है। संलक्ष्यक्रमव्यङ्गय्य-ध्वनि यहाँतक असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गयका निरूपण किया। अब आगे संलक्ष्यक्रमव्यङ्गय-ध्वनिके १५ भेदोंका वर्णन करेंगे। इस चतुर्थोल्लासमें ध्वनिका निरूपण प्रारम्भ किया था। उसमें पहिले ध्वनिके दो भेद किये थे-एक 'अविवक्षितवाच्य-ध्वनि' अरथात् लक्षणामूलध्वनि और दूसरा 'विवक्षितान्यपर- वाच्य-ध्वनि' अर्थात् अभिधामूलध्वनि। इनमें 'अविवक्षितवाच्य-ध्वनि' अरथात् लक्षणामूलध्वनि'के 'अर्थान्तरसंक्रमितावाच्य' तथा 'अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य' ये दो भेद किये थे और 'विवक्षितान्यपरवाच्य' 'अभिधामूलध्वनि'के 'असंलक्ष्यत्रमव्यङ्ग' तथा 'संलक्ष्यक्मव्यङ्गय' ये दो भेद किये थे। इनमेंसे रसादिध्वनि असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गय कहलाता है। रसादि अर्थात् रस और उनके समान विशेषरूपसे आस्वाद योग्य- २. रसाभास, ३. भाव, ४. भावाभास, ५. भावशान्ति, ६. भावोदय, ७. भावसन्धि और ८. भावशबलता भी इस असंलक्ष्यक्रमध्वनिके अन्तर्गत हैं। इसलिए उन सबका निरूपण यहाँतक किया। अब अभिधामूलध्वनिके दूसरे भेद 'संलक्ष्यक्रमध्वनि'के और भेद करेंगे।
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का० ३७-३६, सू० ५२-५३ ] चतुर्थ उल्लास: १४७ [सू० ५२ ]अनुस्वानाभसंलक्ष्यक्रमव्यङ्गचस्थितिस्तु यः ।।३७।। शब्दार्थोभयशक्त्युत्थस्त्रिधा स कथितो ध्वनिः । शब्दशक्तिमूलानुरणनरूपव्यङ्गयः, अर्थशक्तिमूलानुरणनरूपव्यङ्गयः, उभ- शक्तिमूलानुरणनरूपव्यङ्गयश्चेति त्रिविधः । तत्र- [सू० ५३ ] अलङ्कारोथ वस्त्वेव शब्दाद्यत्रावभासते ।।३८।। प्रधानत्वन स ज्ञेय: शब्दशक्त्युन्दवो द्विधा। वस्त्वेवेति अनलङ्कारं वस्तुमात्रम्। आद्यो यथा-
संलक्ष्यक्रमव्यङ्गयको 'अनुस्वानाभध्वनि' भी कहते हैं। इस अनुस्वानाभ या संलक्ष्यक्रम ध्वनिके तीन मुख्य भेद होते हैं-१. 'शब्दशक्त्युत्थ', २. 'अर्थशक्त्युत्थ', और ३. 'उभयशक्त्युत्थ'। इनमेंसे 'शब्दशक्त्युत्थ'के दो भेद, 'अर्थशक्त्युत्थ' के बारह भेद और 'उभयशक्त्युत्थ' का एक भेद, कुल मिलाकर संलक्ष्यक्रमव्यङ्गयके पन्द्रह भेद हो जाते हैं। इन भेदोंको आगे दिखलाते हैं। [सू० ५२ ]-और [ अभिधामूल विवक्षितान्यपरवाच्य-ध्वनिका] जो अनुस्वानाभ संलक्ष्यक्म- व्यङ्गघ-ध्वनि भेद है वह १. शब्दशक्त्युत्थ, २. अर्थशक्त्युत्थ और ३. उभयशक्त्युत्थ होनेसे तीन प्रकारका कहा गया है।।३७।। >p १. शब्दशक्तिमूल अनुरणन-रूप [संलक्ष्यकम ] व्यङ्गच, २. अर्थशक्तिमूल अनुरणनरूप [संलक्ष्य- करम ] व्यङ्गयध्वनि और ३. उभयशक्तिमूल अनुरणमरूप व्यङ्गय इस प्रकार [संलक्ष्यक्रमव्यङ्गचध्वनि] तीन तरहका होता है। शब्दशक्यत्युत्थध्वनिके दो भेद उनमेंसे -- [सू० ५३ ]-जहाँ शब्दसे वस्तु अथवा अलङ्कार प्रधानरूपसे प्रतीत होते हैं वह दो प्रकारका शब्दशक्त्युत्थध्वनि [कमशः वस्तुध्वनि तथा अलङ्गारध्वनि नामसे] कहलाता है। वस्तु [ध्वनि] इससे अलङ्गाररहित केवल वस्तु [का ग्रहण होता है]। उफ्मालड्कारध्वनिका उदाहरण [उनमेंसे ] पहिला [अर्थात् अलङ्कारध्वनिका उदाहरण ] जैसे -- यह श्लोक किसी राजाकी स्तुतिमें लिखा गया है। इसमें कविने राजाकी इन्द्रके साथ तुलना की है। इन्द्र जैसे मेघोंका उदय कर उनके द्वारा जलधाराओंसे दावानलके रूपमें वनोंमें प्रज्वलित अग्निको बुझा देता है उसी प्रकार उस राजाने अपने 'काल' अर्थात् काली रश्मियोंवाली अथवा कालायसलौह अर्थात् फौलादसे बनी हुई अथवा काल रूप करवाल अर्थात् तलवाररूप अम्बुवाह अर्थात् मेघको [अम्बुवाह शब्दका यौगिक अर्थ पानीको वहन करनेवाला होता है। तलवारमें भी एक प्रकारका 'पानी' माना जाता है। इसलिए पानीदार तलवारकी मेघके साथ उपमा भी अच्छी बन पड़ी है। इस प्रकार अपने करवालरूप महान् अम्बुवाहको ] उठाकर कठोर एवं वेगवान् गर्जन करनेवाले राजाने संसारमें शत्रुओंके प्रदीप्त प्रतापको बुझा दिया है। इस रूपमें कविने राजाका वर्णन किया है। श्लोकका अर्थ इस प्रकार है --
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१४८ काव्यप्रकाश: [का० ३६, सू० ५३
उल्लास्य कालकरवालमहाम्बुवाहं9 देवेन येन जरठोजितगजितेन । निर्वापित: सकल एव रणे रिपूणां धाराजलैस्त्रिजगति ज्वलितः प्रतापः ॥५४॥ अत्र वाक्यस्यासम्बद्धार्थाभिधायकत्वं मा प्रसाङक्षीदिति प्राकरणिकाप्राकरणिक- योरुपमानोपमेयभावः कल्पनीय इत्यत्रोपमालङ्कारो व्यङ्गयः । तिग्मरुचिरप्रतापो विधुरनिशाकृद्विभो ! मधुरलीलः । मतिमानतत्त्ववृत्तिः प्रतिपदपक्षाग्रणीविभाति भवान् ।५५॥।
कठोर एवं उच्चतर गर्जन करनेवाले जिस [इन्द्रदेवसदृश ] आपने कालरूप महान् [पानीदार ] तलवारको उठाकर शत्रुओंके तोनों लोकोंमें प्रदीप्त प्रतापको [ अपने खङ्गके ] धारा-जलसे रण-भूमिमें बिलकुल बुझा दिया॥५४॥ यहाँ [इन्द्र-पक्ष तथा राज-पक्षमें ] वाक्यकी असम्बद्धार्थकता न हो जाय, इसलिए प्राकरणिक [राज-पक्ष ] और अप्राकरणिक [इन्द्र-पक्ष] के उपमान-उपमेय-भावकी कल्पना की जाती है, इसलिए यहाँ उपमालङ्कार व्यङ्गय है। शब्दशक्त्युत्थ विरोधाभास अलङ्कारध्वनिके दो उदाहरण अगले श्लोकमें 'तिग्मरुचिः' अर्थात् सूर्य और 'अप्रतापः' अर्थात् प्रतापरहित ये दोनों विरोधी विशेषण हैं। परन्तु जब इनका अर्थ यह किया जाता है कि शत्रुओंके प्रति तिम्म अर्थात् तीक्ष्ण प्रतापवाले और मित्रोंके प्रति रुचिर अर्थात् मनोहर प्रतापवाले राजा, तब उस विरोधका परिहार हो जाता है। इसी प्रकार 'विधुः, और 'अनिशाकृत' में आपाततः विरोध प्रतीत होता है। 'विधुः' का अरथ चन्द्रमा है, उसे निशाकर या निशाकृत् भी कहा जाता है। परन्तु यहाँ कवि उस 'विधु' को 'अनिशाकृत्' कह रहा है। इसलिए इनमें विरोध उपस्थित होता है। परन्तु जब उसका 'विधुरों अर्थात् शत्रुओंका निशाके समान नाश करनेवाला राजा' यह अर्थ किया जाता है तब उस विरोधका परिहार हो जाता है। इसी प्रकार 'मधुरलीलः' में, 'अलीलः' लीलारहित 'मधुः' अर्थात् वसन्त यह अर्थ करनेपर विरोध होता है। परन्तु 'मधुर अर्थात् आनन्ददायक लीला अरथात् चेष्टाओंसे युक्त राजा' यह अरथ करनेपर विरोधका परिहार हो जाता है। इसी प्रकार 'मतिमान् अतत्त्ववृत्तिः' जो बुद्धिमान् होनेपर भी 'अतत्त्ववृत्ति' तत्त्वको न ग्रहण करनेवाला है यह अर्थ परस्पर विरुद्ध प्रतीत होता है। परन्तु जब 'मति अरथात् प्रतिभा तथा मान अर्थात् प्रमाणोंसे तत्त्वका निर्णय करनेवाला राजा' यह अर्थ किया जाता है तब उस विरोधका परिहार हो जाता है। इसी प्रकार 'प्रतिपद्' अरथात् प्रतिपदा तिथि और वह 'अपक्षाग्रणी' शुक्लपक्ष या कृष्णपक्षकी अग्रणी नहीं है यह अर्थ परस्पर विरोधी प्रतीत होता है। परन्तु 'प्रतिपद अर्थात् प्रत्येक स्थानपर पक्ष अर्थात् अपने पक्षके लोगोंका अग्रणी अर्थात् नेता' यह अरथ करनेपर उस विरोधका परिहार हो जाता है। इसलिए यहाँ विरोधाभास अलङ्कार व्यङ्गय है। अर्थ इस प्रकार है -- [शत्रुओंके प्रति ] तीव्र तथा [मित्रोंके प्रति ] मनोहर प्रतापवाले, [विधुर अर्थात् ] शत्रुओंके संहारकर्त्ता, मधुर चेष्टाओंवाले, प्रतिभा तथा प्रमाणोंसे तत्त्वका निश्चय करनेवाले और प्रत्येक स्थानपर अपने लोगोंका नेतृत्व करनेवाले हे प्रभो [राजन् ], आप [अत्यन्त ] शोभित होते हैं ॥५५॥
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का० ३६, सू० ५३] चतुर्थ उल्लास: १४६
अत्रकैकस्य पदस्य द्विपदत्वे विरोधाभासः।गम अमितः समितः प्राप्तैरुत्कर्षैहर्षद ! प्रभो ! अहितः सहितः साधुयशोभिरसतामसि ॥५६॥ अत्रापि विरोधाभासः । निरुपादानसम्भारमभित्तावेव तन्वते। जगच्चित्रं नमस्तस्मै कलाश्लाध्याय शूलिने ।।५७।। अत्र व्यतिरेकः ।
यहाँ [तिग्मरुचिरप्रतापः इत्यादि ] एक-एक पदके [विच्छेद द्वारा तिग्मरुचिः अप्रतापः इस प्रकार ] दो-दो पद बना देनेपर [विरोध-सा प्रतीत होनेसे ] विरोधाभास [अलङ्गार व्यङ्गच ] होता है। इसी प्रकार विरोधाभास अलङ्कारका एक और उदाहरण देते हैं- हे आनन्ददायक राजन्, [समितः ] युद्धसे प्राप्त उत्कर्षोंसे अपरिमित [ऐश्वर्यशाली ] आप सुन्दर कीतिसमूहसे युक्त [साधुयशोभि: सहितः होनेपर भी ] दुष्टोंके [असतां ] शत्रु [अहितः ] हैं ॥५६॥ यहाँ भी [ 'अमितः' तथा 'समितः' पदोंमें एवं 'अहितः' तथा 'सहितः' ] पदोंमें विरोधाभास व्यङ्गय है। यहाँ केवल 'अमितः'-'समितः' तथा 'अहितः'-'सहितः' पदोंमें विरोधाभास पाया जाता है। आपाततः, जो 'अमितः' है वह 'समितः' कैसे हो सकता है अथवा जो 'अ्हितः' है वह 'सहितः' कैसे हो सकता है। इस प्रकारका विरोध यहाँ प्रतीत होता है। परन्तु विचार करनेपर 'समित्' पदका अर्थ यहाँ 'युद्ध' विदित होता है। उसका पञ्चमी विभक्तिका रूप 'समितः' है। अतः उसका 'समितः' अर्थात् युद्धसे प्राप्त उत्कर्षसे 'अरमितः' अर्थात् अत्यन्त उत्कर्षशाली यह अर्थ लेनेपर विरोधका परिहार हो जाता है। इसी प्रकार 'अहितः-सहितः' के विरोधका भी परिहार 'साधुयशोभिः सहितः' 'असताम् अ्रहित: असि' इस प्रकारका अन्वय करनेपर हो जाता है। अतः यहाँ भी विरोधाभास अलङ्कारके व्यङ्गय होनेसे और उसीका प्राधान्य विवक्षित होनेसे अलङ्कारध्वनिका तीसरा उदाहरण है। शब्दशक्त्युत्थ व्यतिरेकालङ्कारध्वनिका उदाहरण अलङ्कारध्वनिके तीन उदाहरणोंके बाद उसीका एक और उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। [तूलिका आदि चित्र-निर्माणकी ] सामग्रीके बिना और [किसी ] आधार-भित्तिके बिना ही नानाकार जगतरूप चित्रका निर्माण करनेवाले [अन्य चित्रकारोंसे विलक्षण, वस्तुतः शिरःस्थित चन्द्रमाकी कलासे श्लाध्य परन्तु प्रकृतमें चित्रकारीरूप ] कलामें प्रशंसनीय [सिद्धहस्त कलाकार ] उन [प्रसिद्ध ] शिवको नमस्कार है।।५७।। यहाँ व्यतिरेकालङ्कार [व्यङ्ग्य है ]। दशम उल्लासमें 'उपमानाद् यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः' यह व्यतिरेकालङ्कारका लक्षण किया गया है। इसका अभिप्राय यह है कि उपमानकी अपेक्षा उपमेयमें गुणोंका आधिक्य वणित होनेपर व्यतिरेकालद्कार होता है। सामान्य चित्रकार तूलिका आदि उपादानोंकी सहायतासे आधारभित्तिपर
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१५० काव्यप्रकाश: [का० ३६, सू० ५३
अलङ्कार्यस्यापि ब्राह्मणश्रमणन्यायेनालङ्कारता।का वस्तुमात्रं यथा -- पंथिअ ण एत्थ सत्थरमत्थि मणं पत्थरत्थल गामे।
1 उण्णअपओहरं पेख्खिऊण जइ वससि ता वससु ॥५८॥ [पथिक नात्र स्रस्तरमस्ति मनाक् प्रस्तरस्थले ग्रामे। उन्नतपयोधरं प्रेक्ष्य यदि वससि तद्वस ।। इति संस्कृतम् ]
चित्रका निर्माण करता है। यहाँ तूलिका आदि सामग्रीकी सहायतासे और किसी आधारभित्तिपर ही चित्र बनानेमें समर्थ उपमानभूत अन्य कलाकारोंकी अपेक्षा बिना सामग्री और बिना आधारके जगत्- रूप चित्रका निर्माण करनेवाले उपमेयभूत शिवका आधिक्य व्णित होनेसे व्यतिरेकालद्वार व्यङ्गय है। इस प्रकार ग्रन्थकारने अलङ्कारध्वनिके चार उदाहरण दिये हैं। यहाँपर यह शङ्का उत्पन्न होती है कि काव्यमें ध्वनि या व्यङ्गय अर्थकी सदा प्रधानता होती है और जो प्रधान होता है वही 'अलङ्कार्य' होता है। इसलिए जिन उदाहरणोंमें अलङ्कार व्यङ्गय है वहाँ उनकी प्रधानता होनेसे वे 'अलङ्कार' नहीं अपितु 'अलङ्कार्य' होने चाहिये। फिर आप उनको 'अलङ्गार' कसे कह सकते हैं। इसलिए अलङ्कारध्वनि इन पदोंका समन्वय नहीं हो सकता है। ध्वनि 'अलङ्गार' नहीं अपितु 'अलङ्गार्य' ही हो सकता है। इस शङ्काका समाधान करनेके लिए ग्रन्थकारने अगली पंक्ति लिखी है। उसका अभिप्राय यह है कि यद्यपि यह ठीक है कि व्यङ्गय अर्थ 'अलङ्गार'-रूप नहीं अपितु सदा 'अलङ्कार्य' ही होता है फिर भी उसको 'ब्राह्मण-श्रमण-न्याय'से अथवा 'भूतपूर्व-न्याय'से अलङ्ार कहा जा सकता है। जैसे कोई ब्राह्मण, बौद्ध या जैन सम्प्रदायकी दीक्षा लेकर 'श्रमण' अर्थात् बौद्ध या जैन भिक्षु बन जाता है, तब भिक्षु बन जानेके बाद उसका ब्राह्मणत्व आदि नहीं रहता है, फिर भी वह पहले कभी ब्राह्मण था इसलिए उस भिक्षु-वेशमें भी उसके लिए यह 'ब्राह्मण भिक्षु है', इस प्रकारका व्यवहार होता है। यह व्यवहार गौण होता है इसलिए औपचारिक व्यवहार कहा जाता है। इसी प्रकार जब 'अलङ्कार' व्यङ्गय हो जानेके कारण प्रधान या 'अलङ्कार्य' हो जाता है तब भी 'ब्राह्मण-श्रमण-न्याय'से या भूतपूर्व गतिसे उसको 'अलङ्कार' कहा जा सकता है। इसी बातको ग्रन्थकारने इस प्रकार कहा है। [अलङ्गार ध्वनिके इन उदाहरणोंमें अलङ्गारोंके ] व्यङ्गय होनेके कारण प्रधान होनेसे अलङ्कार्य होनेपर भी 'ब्राह्मण-श्रमण-न्याय' से अलङ्गारत्व होता है। वस्तुध्वनिके दो उदाहरण इस प्रकार अलङ्कारध्वनिके चार उदाहरण देकर ग्रन्थकार वस्तुध्वनिके दो उदाहरण देते हैं- वस्तुमात्र [व्यङ्गयका उदाहरण ] जैसे- हे पथिक, यहाँ इस पथरीले [ पथरीली भूमिवाले ] ग्राममें [रातको सोते समय नीचे बिछानेके लिए ] तनिक भी बिस्तर नहीं [ मिल सकता] है। क्योंकि पथरीली भूमिमें तृण आदि कुछ पैदा ही नहीं होता है, जिसे बिछानेके काममें लाया जाय। इसलिए यह ग्राम तुम्हारे ठहरने योग्य तो है नहीं ] किन्तु यदि उमड़ते हुए बादलोंको देखकर ठहरना चाहो तो ठहर सकते हो ॥५८॥
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का० ३६, सू० ५३ ] चतुर्थ उल्लास: १५१
अत्र यद्यपभोगक्षमोऽसि तदा आस्स्वेति व्यज्यते।४/OF] शनिरशनिश्च तमुच्चैनिहन्ति कुप्यसि नरेन्द्र यस्मै त्वम्। यत्र प्रसीदसि पुनः स भात्युदारोऽनुदारश्च ।५९।। अत्र विरुद्धावपि त्वदनुवर्त्तनार्थमेकं कार्य कुरुत इति ध्वन्यते।
यह तो इस श्लोकका वाक्यार्थमात्र है। पर उसका व्यङ्गय अर्थ यह है कि हे पथिक, पत्थरके समान मूढ़ पुरुषोंके इस ग्राममें अन्य स्त्रीके सम्भोगको निषेध आदि करनेवाला कोई शास्त्र नहीं है, इसलिए यदि तुम मेरे या मेरी सखीके उन्नत उरोजोंको देखकर रहना चाहो तो रह सकते हो। यहाँ यदि तुममें [इस उठते यौवनके ] उपभोगकी क्षमता हो तो ठहर जाओ [ यह वस्तु व्यक्त होती है। इसलिए यह वस्तुध्वनिका उदाहरण है]। वस्तुध्वनिका दूसरा उदाहरण आगे देते हैं- हे राजन, आप जिसपर नाराज हो जाते हैं उसको शनि [ग्रह] और [अशनि ] वञ्त्र दोनों नष्ट कर देते हैं और जिसपर आपकी कृपादृष्टि हो जाती है वह महान् दाता [उदार ] और स्त्रियोंसे युक्त [अनुदार दाराओंसे अनुगत ] शोभित होता है ।।५E।। यहाँ विरुद्ध [स्वभाववाले शनि तथा अ-शनि] तुम्हारी प्रसन्नताके लिए [ तुम्हारे कोपभाजन व्यक्तिके हननरूप ] एक कार्यको करते हैं यह [वस्तुमात्र ] ध्वनित होता है। इस श्लोकके केवल पूर्वार्द्धमें वस्तुध्वनि मानी जाती है। श्लोकके उत्तरार्द्धमें विरोधालङ्कार- ध्वनि ही मानी जाती है। हिन्दीमें बिहारीका निम्नाङ्ित दोहा भी शब्दशक्त्युत्थ वस्तुध्वनिका सुन्दर उदाहरण है- चिर जीवौ जोरी जुरे क्यों न सनेह गँभीर। को घटि ये वृषभानुजा वे हलधरके वीर॥ इस दोहेमें कवि राधा और कृष्णकी 'जुगल-जोड़ी' के 'मिलन' और गम्भीर 'स्नेह' के शचित्य का प्रतिपादन शब्दक्त्युत्थ-ध्वनिके द्वारा कर रहा है। राधा राजा वृषभानुकी पुत्री हैं और कृष्ण हलधर बलरामके भाई हैं। इसलिए दोनोंके उच्चकुलीन होनेके कारण उनकी जोड़ी ठीक ही है। इसलिए उनका गम्भीर 'स्नेह' और परस्पर 'मिलन' सब-कुछ सुन्दर है। यह इस दोहेका भाव है। उसके समर्थनके लिए कविने 'वृषभानुजा' और 'हलधरके बीर' शब्दोंका प्रयोग विशेष अभिप्रायसे किया है। बृषभानुजाका अर्थ वृषभकी अनुजा अर्थात् बैलकी बहिन अर्थात् गाय है और 'हलघरके वीर' अर्थात् हलको धारण करनेवाले बैलका भाई अर्थात् साँड़ है। गाय और बैलकी जोड़ीका जुड़ना 'मिलन' और उससे गम्भीर स्नेहका होना उचित ही है। इस प्रकार यहाँ 'बृषभानुजा' और 'हलधरके बीर' शब्दोंका विशेष महत्त्व है। इसलिए यह शब्दशक्त्युत्थ वस्तुध्वनिका सुन्दर उदाहरण कहा जा सकता है। 8 इस प्रकार संलक्ष्यक्रमव्यङ्गय-ध्वनिके शब्दशक्त्युत्थ उपभेदके वस्तुध्वनि तथा अलङ्कारध्वनि- रूप दोनों भेदोंको मिलाकर छह उदाहरण ग्रन्थकारने उनके स्वरूपके स्पष्टीकरणके लिए दिये हैं। श्रब इसी संलक्ष्यत्रमव्यङ्गय-ध्वनिके अर्थशक्त्युत्थ नामक दूसरे भेदका निरूपण आगे करेंगे। अर्थशक्यत्युत्थ-ध्वनिके बारह भेद अर्थशक्त्युद्धव-ध्वनिके बारह भेद किये गये हैं। इनमेंसे पहिले उसके १. स्वतःसम्भवी, २. कविप्रौढोक्तिसिद्ध और ३. कविनिबद्धवक्तृप्रोढोक्तिसिद्ध ये तीन भेद किये जाते हैं। इन तीनों
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१५२ काव्यप्रकाश: [का० ३६-४१, सू० ५४ [सू० ५४ ] अर्थक्त्युन्धवोऽप्यर्थो व्यञ्जकः सम्भवी स्वतः ॥३१॥ प्रौढोक्तिमात्रात्सिद्धो वा कवेः तेनोम्भितस्य वा। 1/ वस्तु वाऽलङकृतिर्वेति षड्भेदोऽसौ व्यनक्ति यत् ।।४०।। वस्त्वलङ्कारमथवा तेनायं द्वादशात्मकः । का स्वतःसम्भवी न केवलं भणितिमात्रनिष्पन्नो यावद्वहिरप्यौचित्येन सम्भाव्यमानः। कविना प्रतिभामात्रेण बहिरसन्नपि निर्मितः, कविनिबद्धेन वक्त्रेति वा द्विविधोऽपर इति त्रिविधः । वस्तु वाऽलङ्कारो वाडसाविति षोढा व्यञ्जकः । तस्य वस्तु वाऽलङ्कारो वा व्यङ्गय इति द्वादशभेदोऽर्थशक्त्युद्वो ध्वनिः ।
भेदोंमें वस्तुध्वनि तथा अलङ्कारध्वनि दो भेद होकर ३ x २=६ भेद हो जाते हैं। ये छह भेद व्यङ्गय और व्यञ्जक, दोनों होनेसे द्विगुण होकर ६x२ = १२ भेद बन जाते हैं। जैसे कि- १. स्वतःसम्भवीमें १. वस्तुसे वस्तु व्यङ्गय २. वस्तुसे अलङ्कार व्यङ्गय ३. अलङ्कारसे वस्तु व्यङ्गय ४. अलङ्कारसे अलङ्कार व्यङ्गय २. कविप्रौढोक्तिसिद्ध में १. वस्तुसे वस्तु व्यङ्गय २. वस्तुसे अलङ्कार व्यङ्गय ३. अलङ्कारसे वस्तु व्यङ्गय ४. अलङ्कारसे अलङ्कार व्यङ्गय ३. कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध में १. वस्तुसे वस्तु व्यङ्गय २. वस्तुसे अलङ्कार व्यङ्गय ३. अलङ्कारसे वस्तु व्यङ्गय ४. अलङ्कारसे अलङ्कार व्यङ्गय अगली कारिका में ग्रन्थकार इन बारह भेदोंका निरूपण कर यथाक्रम उनके उदाहरण प्रस्तुत करेंगे। [सू० ५४ ] अर्थशक्त्यु्धव व्यञ्जक अर्थ भी १. स्वतःसम्भवी [अर्थात् लोकमें पाया जानेवाला ], २. [केवल ] कविकी प्रौढोक्तिमात्रसे सिद्ध अथवा ३. उस [कवि ] के द्वारा निबद्ध [वक्ता ] की [प्रौढोक्ति- मात्र ] से [सिद्ध अर्थात् लोकमें न पाया जानेपर भी केवल कविकी कल्पनामात्रसे काव्यमें वणित ] होता है। वही तीन प्रकारका भी वस्तु तथा अलङ्गाररूप [दो प्रकारका होने ३ X२ =६ ] से छह प्रकारका होता है और क्योंकि वह वस्तु अथवा अलङ्गार [दोनोंको ] व्यक्त करता है इसलिए वह अर्थशक्त्यु्व [ध्वनि ६X२=१२] बारह प्रकारका होता है॥३६-४१।। स्वतःसम्भवी [का अर्थ यह है कि वह ] केवल [कविके ] कथनमात्रसे ही सिद्ध नहीं होता है अपितु उचितरूपसे बाहर संसारमें भी पाया जाता है और बाहर संसारमें न होनेपर भी कविके द्वारा [अपनी ] प्रतिभामात्से निर्मित अथवा कविनिबद्ध वक्ताके द्वारा [प्रतिभामात्से निमित] दो प्रकारका और इस प्रकार [कुल मिलाकर ] तीन प्रकारका [अर्थशक्त्युन्दव-ध्वनि होता है।] वह [तीनों प्रकारका ] व्यञ्जक अर्थ वस्तु अथवा अलङ्गाररूप होता है इसलिए [३ x२ =६ ] छह प्रकारका हुआ। उससे वस्तु अथवा अलङ्गार [ये दो ] व्यङ्गय होते हैं। इस प्रकार अर्थशक्त्युद्धव-ध्वनि [ ६X२=१२] बारह प्रकारका होता है।
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का ३६-४१, सू० ५४] अा चतुर्थ उल्लासः १५३
ऋमेणोदाहरणम्। अलसशिरोमणि धुत्ताणं अग्गिमो पुत्ति धणसमिद्धिमओ। इअ भणिएण णअङ्गी पप्फुल्लविलोअणा जाआ ।।६०।। ['अलसशिरोमणिर्धूर्तानामग्रिमः पुत्रि धनसमृद्धिमयः । इति भणितेन नताङ्गी प्रफुल्लविलोचना जाता ।। इति संस्कृतम्] अत्र ममैवोपभोग्य इति वस्तुना वस्तु व्यज्यते। धन्याऽसि या कथयसि प्रियसङ्गमेऽपि विस्रब्धचाटुकशतानि रतान्तरेषु नीवीं प्रति प्रणिहिते तु करे प्रियेण सख्यः ! शपामि यदि किञ्चिदपि स्मरामि ॥६१॥ अत्र त्वमधन्या अहं तु धन्येति व्यतिरेकालड्कारः ।
स्वतःसम्भवीके चार उदाहरण : १ वस्तुसे वस्तु व्यङ्गय क्रमशः उनके उदाहरण देते हैं- हे पुत्नि, [वह तुम्हारा प्रस्तावित वर] बड़ा आलसी, धूर्तोंमें अग्रणी और धन-समृद्धिसे युक्त है। ऐसा कहनेसे उस नताङ्गीकी आँखें खिल उठीं ॥६०॥ यहाँ 'वह मेरे ही उपभोगके योग्य है' यह वस्तु [प्रफुल्लविलोचनत्वरूप कथित ] वस्तुसे व्यङ्गच होती है। यहाँ नायिकाके प्रसन्न होनेका यह कारण है कि आलसी होनेके कारण ये घरसे निकलकर कहीं नहीं जायँगे इसलिए हर समय उनके साथ रहनेका अवसर मिलेगा। 'धूर्तानाम् अग्रिमः'का अभिप्राय यह है कि वे मूर्ख या साधु नहीं हैं अपितु सब कलाओंको जानते हैं इसलिए उनका सहवास बड़ा आ्नन्द- दायक होगा। 'धनसमृद्धिमयः' इस विशेषणने उसकी जीवनयात्राकी चिन्ताओंसे मुक्तिकी सूचना द्वारा उसकी प्रसन्नताकी और भी बृद्धि कर दी है। इसीलिए इन तीनों विशेषणों द्वारा अपने भावी प्रियतमका परिचय प्राप्तकर उसकी आँखें प्रसन्नतासे खिल उठीं। यहाँ नायकके विशेषणश्रवणसे जनित प्रफुल्ल- विलोचनत्वरूप वस्तुसे, 'यह केवल मेरे ही उपभोग्य है' यह वस्तु अभिव्यक्त होती है। २. स्वतःसम्भवी वस्तुसे अलङ्गार व्यङ्गच वस्तुसे अलङ्कार व्यङ्गयका उदाहरण आागे देते हैं। यह पद्य 'विज्जिका' नामक कवियित्रीका है, यह बात शार्ङ्गधरपद्धति'में लिखी है। इसमें अपने-अपने रति-सम्भोगकी आलोचना करनेवाली सखियोंमेंसे कोई एक सखी अपनी दूसरी सखीका उपहास करते हुए कह रही है कि- तुम धन्य [व्यङ्गचसे अधन्य] हो जो प्रियके साथ सङ्गम होनेपर भी और सुरतके समय भी नाना प्रकारकी विश्वासयुक्त चापलूसीकी बातें कह लेती हो। हे सखि, सौगन्ध खाकर कहती हूँ कि प्रियके द्वारा [मेरे] नारेकी ओर हाथ बढ़ाते ही मुझे तो कुछ भी स्मरण नहीं रहता है ।६१। यहाँ तुम तो धन्य नहीं अपितु मैं धन्य हूँ यह [दूसरी सखीकी अपेक्षा आधिक्य दिखलानेसे] व्यतिरेकालङ्कार व्यङ्गय है।
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१५४ काव्यप्रकाश: [का० ३६-४१, सू० ५४
दर्पान्धगन्धगजकुम्भकपाटकूट- संक्रान्तिनिघ्नघनशोणितशोणशोचिः । वीरैर्व्यलोकि युधि कोपकषायकान्ति: कालीकटाक्ष इव यस्य करे कृपाण: ।६२।। अत्रोपमालङ्कारेण सकलरिपुवलक्षयः क्षणात्करिष्यते इति वस्तु। गाढ़कान्तदशनक्षतव्यथासङ्कटादरिवधूजनस्य यः । ओष्ठविद्रुमदलान्यमोचयन्निर्दशन् युधि रुषा निजाधरम् ।६३।। अत्र विरोधालङ्कारेणाऽधरनिर्दशनसमकालमेव शत्रवो व्यापादिता इति तुल्य- योगिता। मम क्षत्याऽप्यन्यस्य क्षतिरनिवर्ततामिति तद्बुद्धिरुत्प्रेक्ष्यते इत्युत्प्रेक्षा च। एषूदाहरणेषु स्वतःसम्भवी व्यञ्जकः ।
हिन्दीमें 'दास' कविका निम्नलिखित दोहा भी इसका सुन्दर उदाहरण हो सकता है- सखि तेरो प्यारो भलो दिन न्यारो है जात । मोते नहिं बलबीरको पल बिलगाव सुहात । इस दोहेमें राधा अपनी किसी सखीसे कह रही है कि तुम्हारे प्रिय बड़े अच्छे हैं जो कमसे कम दिनमें तुमको छोड़ देते हैं। पर मैं क्या करूँ, मेरे कृष्ण तो मुझे पलभरके लिए भी अलग नहीं रहने देते। यह स्वतःसम्भवी वस्तु व्णित है। इससे तेरी अपेक्षा मैं कहीं अधिक सौभाग्यशालिनी हूँ यह व्यतिरेकालङ्कार व्यङ्गय है। अतः स्वतःसम्भवी वस्तुसे अलङ्कारध्वनिका सुन्दर उदाहरण है। ३. स्वतःसम्भवी अलङ्गारसे वस्तु व्यङ्ग्य युद्धभूमिमें जिसके हाथकी, मद-मत्त गन्धगजके कपाटसदृश विस्तीर्ण कुम्भस्थलमें घुसनेके कारण लगे हुए प्रचुर रक्तसे लाल वर्णकी, तलवारको वीरोंने दुर्गाके क्रोधसे रक्त वर्णवाले कटाक्षके समान देखा ।।६२। यहाँ [दुर्गाके कटाक्षके समान इस ] उपमा अलड्गारसे क्षणभरमें समस्त शत्रुओंका नाश कर देगा यह वस्तु व्यक्त होती है। ४. स्वतःसम्भवी अलङ्गारस अलङ्गार व्यङ्गय युद्ध [भूमि ]में क्रोध [के आवेग]से अपने ओष्ठको चबाते हुए जिस [राजा ]ने शत्रुओंकी स्त्रियोंके विद्रुम-दलके सदृश [रक्तवर्ण ] ओष्ठोंको पतियोंके द्वारा जोरसे काटे जानेके सङूटसे बचा लिया ॥६३। लह। यहाँ [अपने ओष्ठके काटनेसे दूसरोंके ओष्ठोंको काटनेके सङ्कटसे बचा दिया इस ] विरोध अलङ्कारसे, ओष्ठके चबानेके साथ ही शत्रुओंको मार दिया यह 'तुल्य-योगिता' अलडकार, और मेरी [अर्थात् राजाकी ओष्ठदशनरूप ] क्षतिसे भी [वैरिवधूजनरूप ] अन्योंकी [अधर-दशनरूप ] क्षति बच सके इस प्रकारकी उस राजाकी बुद्धिके [तद्बुद्धि: ] उत्प्रेक्षित होनेसे 'उत्प्रेक्षा' अलङ्कार भी व्यक्त होता है। इन उदाहरणोंमें व्यञ्जक [अर्थ] स्वतःसम्भवी है।
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का० ३६-४१, सू० ५४] चतुर्थ उल्लास: १५५
दशम उल्लासमें विरोधालङ्कारका लक्षण निम्नलिखित प्रकार किया गया है- [सू० १६६ ] विरोधः सोऽविरोधेऽपि विरुद्धत्वेन यद्वचः । [सू० १६७ ] जातिश्चतुभिर्जात्याद्यैविरुद्धा स्याद् गुणस्त्रिभिः । क्रिया द्वाभ्यामपि द्रव्यं द्रव्येणैवेति ते दश। जातिवाचक, गुणवाचक, क्रियावाचक और द्रव्यवाचक [यदृच्छा-शब्द ] चार प्रकारके शब्द और जात्यादि उनके चार अर्थ माने गये हैं। इन अरथोंका परस्पर विरोध न होनेपर भी जहाँ उनका विरोध-सा वर्णन किया जाय वहाँ विरोधालङ्कार या विरोधाभास अलङ्कार होता है। जातिका जात्यादि चारोंके साथ, गुणोंका गुण आदि तीनके साथ, क्रियाका क्रिया और द्रव्य दोके साथ तथा द्रव्यका द्रव्यके साथ, इस प्रकार [४+३+२+१=१०] दस प्रकारका विरोध सम्भव होनेसे विरोधाभास अलङ्कारके दस भेद हो जाते हैं। तुल्ययोगिता अलङ्कारका लक्षण दशम उल्लासमें निम्नलिखित प्रकार दिया है- [सू० १५८ ] नियतानां सकृद्धर्मः स पुनस्तुल्ययोगिता । नियत अर्थात् केवल प्राकरणिक अथवा केवल अप्राकरणिक अनेक अथोंमें एक धर्मका अभिसम्बन्ध होनेपर तुल्ययोगिता अलङ्कार होता है। यहाँ ग्रन्थकारने विरोधालङ्कारसे तुल्ययोगिता अलङ्कार व्यङ्गय माना है। इसमें श्ष्ठदशन और व्यथामोचनरूप क्रियाओंमें परस्पर विरोध होनेसे विरोधालङ्कार व्यञ्जक अलङ्कार है और उससे स्वाधरदशन तथा शत्रुव्यापादनरूप दो प्राकरणिक अथोंमें एककालिकत्वरूप एक धर्मका सम्बन्ध होनेसे तुल्ययोगिता अलङ्कार व्यङ्गय है। यह ग्रन्थकारकी ऊपरकी पंक्तियोंका अभिप्राय है। 'प्रदीपकार' की व्याख्या यहाँ वृत्तिग्रन्थमें ग्रन्थकारने विरोधालङ्कारसे तुल्ययोगिता अलङ्कारको व्यङ्गय माना है परन्तु 'काव्यप्रकाश'के अ्र्प्रनेक टीकाकारोंने 'विरोध' और 'तुल्ययोगिता' अल द्वारोंकी यहाँ किसी प्रकार सङ्गति नहीं मानी है। उदाहरणके लिए प्रदीपकारादि कहते हैं कि- विरोधालङ्कारेण इत्यस्य विरोधाभासालङ्कारेण इत्यर्थस्तु न। विरोधस्यासम्भवात्। किन्तु विरोधगभितोऽलङ्कारस्तेनेत्यर्थः। कार्यकारणयोः पौर्वापर्यविपर्ययरूपातिशयोक्त्यलङ्कारेणेति यावत्। स्वाधरदशनस्य कारणस्य वैरिवधूजनोष्ठदशनव्यथामोचनस्य कार्यस्य च समकालतया निर्दिष्टत्वात्। तुल्ययोगितेति पदस्यापि तुल्योगितालद्कार इत्यर्थस्तु न, 'नियतानां सकृद्धर्मः सा पुनस्तुल्ययोगिता' इति १५८ सूत्रेण लक्षिताया: प्रकृतानामप्रकृतानां वा एकधर्मसम्बन्धरूपतुल्ययोगितायाः प्रकृतेऽसम्भवात्। तुल्ययोगितायां धर्मस्य गुणत्रियान्यतररूपस्यैव ग्रहणात्। किन्तु तुल्ययोगितापदस्य अधरो निर्दष्टश्च शत्रवो व्यापादिताश्चेति तुल्यकालं योग: ययोस्तौ तुल्यगिनौ तयोर्भावस्तुल्ययोगितेति व्युत्पत्त्या समुच्चयालङ्कार इत्यर्थः । अधरनिर्दशनवैरिव्यापादनत्रिययोयौं गपद्यप्रतीतेरिति। इसका अरभिप्राय यह है कि प्रदीपकार आदिने यहाँ वृत्तिग्रन्थके 'विरोध' तथा 'तुल्ययोगिता' दोनों पदोंको मुख्यरूपसे उस नामके अलङ्कारोंका वाचक न मानकर उनका यौगिक अर्थ करनेका प्रयत्न किया है और विरोधालङ्कार शब्दसे विरोधगभित कार्य-कारणके पौर्वापर्यविपर्ययरूप अतिशयोक्ति अलङ्कारका तथा तुल्ययोगिता शब्दसे शष्ठदशन तथा शत्रुव्यापादनके तुल्यकालमें होनेसे समुच्चयालङ्कारका ग्रहण किया है।
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१५६ काव्यप्रकाश: [का० ३६-४१, सू० ५४ कैलासस्य प्रथमशिखरे वेणुसम्मूर्च्छनाभि: श्रुत्वा कीति विबुधरमणीगीयमानां यदीयाम्। स्रस्तापाङ्गा: सरसबिसिनीकाण्डसञ्जातशङ्का दिङमातङ्गा: श्रवणपुलिने हस्तमावर्त्तयन्ति ।।४६।। अत्र वस्तुना येषामप्यर्थाधिगमो नास्ति तेषामप्येवमादिबुद्धिजननेन चमत्कारं करोति त्वत्कीतिरिति वस्तु ध्वन्यते। केसेसु बलामोडिअ तेण अ समरम्मि जअसिरी गहिआ। जह कन्दराहिं विहुरा तस्स दढं कंठअम्मि संठविआ ।।६५।।
परन्तु यह व्याख्या उचित प्रतीत नहीं होती है, क्योंकि यदि ग्रन्थकारको यही अर्थ अभीष्ट होता तो वे स्वयं ही इस प्रकारकी स्पष्ट वृत्ति लिख सकते थे। ग्रन्थकारको यदि कार्यकारणके पौर्वापर्यविपर्यय- रूप अतिशयोक्ति अलङ्कारसे समुच्चयालङ्कारकी व्यङ्गयता ही अभिप्रेत थी तो वे उसका स्पष्टरूपसे उल्लेख कर सकते थे। परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया है। इसलिए ग्रन्थकारके विरोधालङ्कार और तुल्ययोगिता अलङ्कार शब्दोंकी अतिशयोक्ति तथा समुच्चयालङ्कारपरक व्याख्या करना ग्रन्थकारके अभिप्राय एवं गौरव, दोनोंके प्रतिकूल है। इसलिए यहाँ शष्ठविषयक दशन तथा दशनमोचनरूप क्रियाओंमें विरोध होनेसे विरोधालङ्कार व्यञ्जक और स्वाधर-दशन तथा शत्रुव्यापादनरूप वीरसके प्रकृत दोनों अनुभावोंमें समकालत्वरूप एक धर्मका अभिसम्बन्ध होनेसे तुल्ययोगिता अलङ्कार व्यङ्गय है, यह मानकर ग्रन्थकारके अभिप्रायके अनुसार ही व्याख्या करनी चाहिये। ५. कविप्रौढ़ोक्तिसिद्ध वस्तुसे वस्तु व्यङ्गय यहाँतक स्वतःसम्भवी अर्थशक्त्युत्थ-ध्वनिके चार उदाहरण दिये। अब कविप्रोढोक्तिसिद्ध अरथशक्त्युत्थ-ध्वनिके चार उदाहरण आगे देते हैं- कैलास-पर्वतके प्रथम [अर्थात् सबसे ऊँचे अथवा सबसे निचले ] शिखरपर बाँसुरीकी मूर्च्छनाओं [सङ्गीतविषयक उतार-चढ़ावों ] के साथ दिव्य अप्सराओंके द्वारा गायी जानेवाली जिस [राजा] की कीतिको सुनकर [कीरतिके धवलतातिशयके कारण ] सरस मृणालखण्डकी शङ्गा हो जानेसे [दिशाओंके अन्तमें स्थित ] दिग्गज अपनी आँखें तिरछी करके [ कानोंकी ओर देखनेका प्रयत्न करते हुए-से ] श्रोत्र- प्रान्तमें [ उस मृणालखण्डको पकड़नेके लिए अपनी सूंड़रूप ] हाथको घुमा रहे हैं ।।६४।। यहाँ [कविप्रौढोक्तिसिद्ध, श्लोकमें कल्पित ] वस्तुसे जिन [हाथियों] को, [गीतके ] अर्थका ज्ञान [सम्भव ] नहीं है उनकी भी इस प्रकारकी [कीतिके धवलतातिशयके कारण मृणालभ्रान्तिरूप ] बुद्धिको उत्पन्न करके तुम्हारी कीति चमत्कारजनक होती है यह वस्तु ध्वनित होती है। यहाँ व्यङ्गय वस्तु और व्यञ्जक वस्तु दोनों ही केवल कविकी प्रतिभामात्से सिद्ध हैं। संसारमें इस प्रकारकी वस्तु नहीं मिलती है। इसलिए यह 'कविप्रौढोक्तिसिद्ध' वस्तुसे-वस्तु व्यङ्गयका उदाहरण है। यहाँ 'त्वत्कीरति' के स्थानपर कुछ लोग 'तत्कीरति' पाठ मानते हैं।
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का० ३६-४१, सू० ५४] चतुर्थ उल्लासः १५७ [केशेषु बलात्कारेण तेन च समरे जयश्रीर्गृहीता।। यथा कन्दराभिविधुरास्तस्य दृढं कण्ठे संस्थापिताः ॥ इति संस्कृतम् ] अत्र केशग्रहणावलोकनोद्दीपितमदना इत्र कन्दरास्तद्विधुरान् कण्ठे गृह्हन्ति इत्युत्प्रेक्षा। एकत्र संग्रामे विजयदर्शनात्तस्यारयः पलाय्य गुहासु तिष्ठन्तीति काव्य- हेतुरलङ्कारः। न पलाय्य गतास्तद्वैरिणोऽपितु ततः पराभवं सम्भाव्य तान् कन्दरा न त्यजन्तीत्यप ह्नतिश्च।।
६. कविप्रौढोक्तिसिद्ध वस्तुसे अलङ्गार व्यङ्गय उस [स्तूयमान राजा ] ने युद्धक्षेत्र [सुरतभूमि]में बलात् केशोंको पकड़कर जयश्रीका इस प्रकार आलिङ्गन किया, जिससे [उसकी रति-कीड़ाको देखकर मदनोन्मत्त ] कन्दराओंने उसके शत्रुओंको गलेमें जोरसे लिपटकर रोक लिया॥६५॥ यहाँ [राजाके द्वारा विजयश्रीके ] केशग्रहणके अवलोकन [रूप वस्तु ] से मदनोन्मत्त-सी होकर कन्दराएँ [मानो ] उसके शत्रुओंके गलेमें लिपट-सी रही हैं यह १. उत्प्रेक्षा [अलङ्गार व्यङ्ग्य है]। अथवा [एकत्र अर्थात् ] एक स्थानपर संग्राममें उस [राजा ] की विजय [रूप वस्तु] को देखकर, उसके शत्रु भागकर गुफाओंमें रहने लगे इस प्रकार [वस्तुसे ] २. काव्यलिङ्ग अलङ्गार [व्यङ्गय ] है। अथवा शत्रु भागकर [कन्दराओंमें] नहीं गये अपितु उससे हार जानेके डरसे कन्दराएँ [पूर्वसे विद्यमान] उनको नहीं जाने देती हैं यह ३. अपह्नति [अलङ्कार वस्तुसे] व्यङ्गय है। यहाँ कविप्रौढोक्तिसिद्ध केशग्रहणरूप वस्तुसे १. उत्प्रेक्षा, २. काव्यलिंग तथा ३. अपह्नति तीन अलङ्कार व्यङ्गय माने हैं। इनके लक्षण तथा उनका समन्वय निम्नलिखित प्रकार होता है- [सू० १३७]'सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत्।' प्रकृत उपमेयकी 'सम' अपर्रात् उपमानके साथ सम्भावना अर्थात् 'उत्कटैककोटिक-संशयको' 'उत्प्रेक्षा' कहते हैं। यहाँ भयके कारण शत्रुओोंसे निरन्तर कन्दराओंमें घुसे रहने रूप प्रकृत अर्थकी, कन्दराओंने मानो उन शत्तुओंको गलेमें लिपटकर रोक लिया है, इस प्रकारकी सम्भावनाके कारण उत्प्रेक्षालद्वार व्यङ्गय है। [सू० १७४] 'काव्यलिङ्ग हेतोर्वा्यपदार्थता'। जहाँ वाक्यार्थ अथवा पदार्थको अन्यके हेतुरूपमें व्णित किया जाय वहाँ 'काव्यलिङ्ग' अलङ्गार होता है। इस दूसरे पक्षमें राजाने विजयलक्ष्मीको अपने वशमें कर लिया है, इसी कारण शत्रु भागकर कन्दराओंमें घुस गये हैं, इस प्रकार प्रथम वाक्यार्थ द्वितीय वाक्यार्थके कारणरूपमें प्रस्तुत किया गया है। इसलिए यहाँ केशग्रहणरूप वस्तुसे काव्यलिङ्ग अलङ्कार व्यङ्गय माना गया है। [सू० १४१]'प्रकृतं यन्निषिध्यान्यत् साध्यते सा त्वपह्नतिः।' जहाँ प्रकृत अरथात् उपमेयको असत्य बतलाकर अन्य अर्थात् उपमानको सत्यतया स्थापित किया जाता है वहाँ 'अपह्नति' अलद्कार होता है। इस तीसरी स्थितिमें शत्रु भयके मारे भागकर कन्दराओंमें चले गये हैं इस प्रकृत अरथको असत्य ठहराकर कन्दराएँ पहिलेसे ही अपने भीतर बैठे हुए शत्रुंको उसके भयके कारण बाहर नहीं आने देती हैं यह अन्य अर्थकी स्थापना की जा रही है अतः अपह्नति अलङ्कार व्यङ्गय है। यही बात ग्रन्थकारने ऊपरकी पंक्तियोंमें लिखी है।
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१५८ :3 काव्यप्रकाशः [का० ३६-४१, सू० ५४
गाढालिंगणरहसुज्जुअम्मि दइए लहुं समोसरइ। माणंसिणीण माणो पीलणभीअ व्व हिअआहि ॥६६। [गाढालिङ्गनरभसोद्यते दयिते लघु समपसर्रात। मनस्विन्या मान: पीडनभीत इव हृदयात् ।।इति संस्कृतम्] अत्रोत्प्रेक्षया प्रत्यालिङ्गनादि तत्र विजुम्भते इति वस्तु । जा ठेरं व हसन्ती कइवअणंबुरुहबद्धविणिवेसा दावेइ भुअणमंडलमण्णं विअ जअइ सा वाणी ।६७।। [या स्थविरमिव हसन्ती कविवदनाम्बुरुहबद्धविनिवेशा। दर्शयति भुवनमण्डलमन्यदिव जयति सा वाणी ।। इति संस्कृतम्] अत्रोत्प्रेक्षया चमत्कारैककारणं नवं नवं जगद् अजडासनस्था निर्मिमीते इति व्यतिरकः । एषु कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नो व्यञ्जकः ।
७. कविप्रौढोक्तिसिद्ध अलङ्कगारसे वस्तु व्यङ्गय प्रियतमके इस [नायिकाके ] गाढ़ आलिङ्गनके लिए उद्यत होते ही [ कहीं इन दोनोंके गाढालिङ्गन करते समय मैं बीचमें ही पिस न जाऊँ इस ] दब जानेके डरसे मानो मानिनीका मान उसके हृदयसे झट निकल भागा॥६६।। यहाँ उत्प्रेक्षा अलङ्कारसे प्रत्यालिङ्गन आदि वस्तु व्यङ्गय हो रही है। ८. कविप्रौढोक्तिसिद्ध अलङ्कारसे अलङ्कार व्यङ्ग्य कविके मुखकमलमें बैठी हुई जो वाणी [नवीन वस्तुके निर्माणमें असमर्थ और जड कमलके ऊपर बैठे हुए ] बूढ़े [ब्रह्मा ] का उपहास करती हुई-सी समस्त भुवनमण्डलको अन्य प्रकारका-सा [अलौकिक चमत्कारजनक ] दिखलाती है वह [कविवाणी ब्रह्माकी अपेक्षा] सर्वोत्कर्षयुक्त है ॥६७।। यहाँ [स्थविरमिव हसन्ती इस ] उत्प्रेक्षा [अलङ्गार] से, अत्यन्त चमत्कारजनक [प्रतिक्षण] नये-नये जगत्को चेतन [कविमुखरूप] आसनपर बैठी हुई [कविवाणी ] बनाती है। इस प्रकार [जड कमलपर बैठे हुए और नीरस जगत्को उत्पन्न करनेवाले बूढ़े ब्रह्माकी अपेक्षा कविवाणी उत्कृष्ट है यह ] व्यतिरेकालङ्कार व्यङ्ग्य है। इन [चारों उदाहरणों ] में व्यञ्जक [अर्थ] कविप्रौढोक्तिमात्रसे सिद्ध है। इस प्रकार अर्थशक्त्युत्थ-ध्वनिके स्वतःसम्भवी तथा कविप्रौढोक्तिसिद्ध, दो भेदोंके चार-चार अवान्तर भेद दिखला देनेके बाद अब कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध नामक तृतीय भेदके भी उसी प्रकारके चार अवान्तर भेद आगे दिखलाये जायँगे। यद्यपि कविनिबद्ध वक्ताकी प्रौढोक्ति भी कविप्रौढोक्ति के ही अन्तर्गत हो सकती है, परन्तु उसमें सहृदयोंको कविप्रौढोक्तिसिद्धकी अपेक्षा अधिक चमत्कार अनुभूत होता है। कविनिबद्ध वक्तामें रागादिका आवेश होनेसे ही उसकी उक्तिमें अधिक चमत्कार आ जाता है। इसलिए उसको कविप्रौढोक्तिसे अलग ही मानना उचित है।
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का० ३६-४१, सू० ५४ ] शक चतुर्थ उल्लास: १५६
जे लंकागिरिमेहलासु खलिआ संभोगखिण्णोरई-15 फारुप्फुल्लफगावलीकवलणे पत्ता दरिह्दतणम् ।ं ते एहि मलआणिला विरहणीणीसाससंपक्किणो जादा झत्ति सिसुत्तणे वि वहला तारुण्णपुण्णा विअ।।६८।। [ये लङ्कागिरिमेखलासु स्खलिताः सम्भोगखिन्नोरगी- स्फारोत्फुल्लफणावलीकवलने प्राप्ता दरिद्रत्वम् सhPi त इदानीं मलयानिला विरहिणीनि:श्वाससम्पर्किणो जाता झटिति शिशुत्वेऽपि बहलास्तारुण्यपूर्णा इव ।। इति संस्कृतम् ] अत्र निःश्वासैः प्राप्तैश्वर्या वायः कि कि न कुर्वन्तीति वस्तुना वस्तु व्यज्यते। सहि विरइऊण माणस्य मञ्झ धीरत्तणेण आसासम् । पिअदंसणाविहलंख लखणम्मि सहसत्ति तेण ओसरिअम्।।६९।। [सखि विरचय्य मानस्य मम धीरत्वेनाश्वासम्। प्रियदर्शनविशृङ्खलक्षणे सहसेति तेनापसृतम् ।।इति संस्कृतम्] केशक
अत्र वस्तुनाऽकृतेपि प्रार्थने प्रसन्नेति विभावना, प्रियदर्शनाय सौभाग्यबल धर्येण सोढुँ न शक्यते इत्युत्प्रेक्षा वा।
९. कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध वस्तुसे वस्तु व्यङ्गय [लड्कागिरि ] हेमकूट पर्वतकी तलहटियोंमें [सर्पोंके डरसे ] मन्दगतिसे चलनेवाले [स्खलिता: ] जो वायु, सम्भोगसे थकी हुई [अतएव प्यासी ] सर्पिणियोंकी फैली हुई और ऊपर उठी हुई फणावलीके द्वारा भक्षण कर लिये जानेके कारण, स्वल्पताको प्राप्त हो गये थे, वे मलयानिल आज [इस वसन्तके समय ] शैशवावस्था [वसन्तके आरम्भ ] में ही विरहिणियोंके निःश्वासोंका सम्पर्क प्राप्तकर तारुण्यमय [प्रबल ] तथा प्रचुरताको प्राप्त हो गये हैं। [यह 'कर्पूरमञ्जरी' में वसन्तवर्णनका श्लोक है]॥६८॥ कभी यहाँ निःश्वासों [के सम्पर्क] से शक्ति [ऐश्वर्य ] प्राप्तकर मलयानिल क्या-क्या न कर डालेंगे यह वस्तु [श्लोकोक्त वस्तुसे व्यक्त होती ] है। १०. कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध वस्तुसे अलङ्कार व्यङ्गय हे सखि, [तेरे द्वारा दिलाया हुआ] धैर्य, मेरे मानको [हे मान, तुम डटे रहना, भागना नहीं, मैं तुम्हारी सहायता करूँगा, इस प्रकार ] आश्वासन देकर प्रियतमके दर्शन होनेपर [मानके पैरोंके] डगमगाते ही [उसकी सहायताका दम भरनेवाला धैर्य न जाने कहाँ] सहसा भाग गया ।।६६।। यहाँ [श्लोकमें प्रतिपादित ] वस्तुसे, प्रार्थना या मनाने ]के बिना ही [नायिका या मैं ] प्रसन्न हो गयी इस प्रकार [बिना कारणके कार्यके वर्णनरूप ] विभावना अलङ्गार, अथवा प्रियतमके दर्शनसे प्राप्त सौभाग्यके बलको धैर्य सहन नहीं कर सकता है यह उत्प्रेक्षा अलङ्कार [व्यङ्गच] है।।
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१६० काव्यप्रकाश [का० ३६-४१, सू० ५४ ओल्लोल्लकरअरअणख्खएहिं तुह लोअणेसु मह दिण्णम् । रत्तंसुअं पसाओ कोवेण पुणो इमेण अक्कमिआ ॥।७०।। [आद्रर्द्रिकरजरदनक्षतैस्तव लोचनयोर्मम दत्तम् । रक्तांशुकं प्रसाद: कोपेन पुनरिमे नाकान्ते ।। इति संस्कृतम् ] अत्र किमिति लोचने कुपिते वहसि इत्युत्तरालङ्गारेण न केवलमार्द्रनखक्षतानि गोपायसि यावत्तेषामहं प्रसादपात्रं जातेति वस्तु।। महिलासहस्सभरिए तुह हिअए सुहअ सा अमाअन्ती। अणुदिणमणण्णकम्मा अंग तणुअं वि तणुए।।७१।। [ महिलासहस्रभरिते तव हृदये सुभग सा अमान्ती। अनुदिनमनन्यकर्मा अङ्गं तन्वपि तनयति ॥ इति संस्कृतम्] अत्र हेत्वलङ्गारेण तनोस्तनूकरणेऽपि तव हृदये न वर्तते इति विशेषोक्तिः ।
११. कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध अलङ्गारसे वस्तु व्यङ्गय तुम्हारे इस [शरीरपर प्रतिनायिकाके सम्भोगकालमें प्रदत्त ] बिलकुल ताजे नखक्षत तथा वन्तक्षतोंने [प्रसन्नतासे ] लाल रंगका आवरण-पट पुरस्कारमें मेरे नेत्रोंको प्रदान किया है [ इसलिए उसको धारण करनेसे ये लाल प्रतीत होते हैं।] परन्तु ये कोधसे आक्रान्त नहीं हैं ॥७०।। यहाँ तुम आँखें लाल क्यों कर रही हो, इस [प्रश्नके उत्तररूपमें इस श्लोकके उक्त होनेसे] उत्तरालङ्गारसे, तुम केवल अपने ताजे नखक्षतोंको ही नहीं छिपा रहे हो बल्कि मेरे ऊपर भी उनकी कृपा हो गयी है [ क्योंकि उनके छिपानेके लिए ही तुम मेरा आलिङ्गन आदि कर रहे हो] यह वस्तु ध्वनित होती है]। [ सू० १८८ ] उत्तरश्रुतिमात्रतः । प्रश्नस्योन्नयनं यत्र क्रियते तत्र वा सति। असकृद् यद् असम्भाव्यमुत्तरं स्यात् तदुत्तरम् ।। अर्थात् जहाँ प्रतिवचनके श्रवणमात्रसे पूर्व प्रश्नवाक्यकी कल्पना कर ली जाय वह 'उत्तरा- लङ्कार' होता है और जहाँ प्रश्नके होनेपर किसी अर्थकी लोकोत्तरता या दुर्लभता दिखलानेके लिए अ्नेक बार अ्सम्भाव्य उत्तर दिया जाय वह भी 'उत्तरालङ्कार' का दूसरा भेद होता है। यह 'उत्तरा- लङ्कार' का लक्षण है। १२. कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध अलङ्कारसे अलङ्गार व्यङ्गय हे सुभग, अगणित महिलाओंसे भरे हुए तुम्हारे हृदयमें न समा सकनेके कारण वह तन्वी प्रतिदिन सब कामोंको छोड़कर अपने दुबले शरीरको और भी पतला कर रही है ।७१।। यहाँ हेत्वलङ्कार [अर्थात् काव्यलिङ्ग अलङ्गार]से शरीरको कृश करनेपर भी तुम्हारे हृदयमें नहीं रह पाती है [ इस प्रकार कारणके होनेपर भी कार्यके न होनेसे ] यह विशेषोक्ति [अलङ्कार व्यङ्गच] है। किस क किलड आपतण पग
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का० ४१, सू० ५५-५६] चतुर्थ उल्लास: १६१
एषु कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरो व्यञ्जकः । एवं द्वादश भेदा: म प पाकवाीहर [सू० ५५ ] शब्दार्थोभयभूरेकः । यथा- अतन्द्रचन्द्राभरणा समुद्दीपितमन्मथा। तारकातरला श्यामा सानन्दं न करोति कम् ॥७२।। अत्रोपमा व्यङ्गया। [सू० ५६ ] भेदा अष्टादशास्य तत् ॥।४१।। अस्येति धवनेः ।
इन [चारों ] में व्यञ्जक [अर्थ ] कविनिबद्ध वक्ताकी प्रौढोक्तिमात्रसे सिद्ध है। इस प्रकार [अर्थशक्त्युत्थध्वनिमें ] बारह भेद होते हैं। उभयशक्त्युत्थध्वनिका भेद इस प्रकार यहाँ संलक्ष्यक्मव्यङ्गयके अर्थशक्त्युत्थध्वनिके बारह भेदोंका तथा शब्दशक्त्युत्थके दो भेदोंका पहिले, कुल १२+२= १४ भेदोंका, निरूपण कर चुकनेके बाद अब उभयशक्त्युत्थध्वनिके एक (संलक्ष्यक्रमके पन्द्रहवें) भेदका निरूपण आगे करते हैं- [सू० ५५]-[संलक्ष्यकमव्यङ्गय-ध्वनिका ] शब्द और अर्थ [उभय ] की शक्तिसे सिद्ध [उभयशक्त्युत्थ ] एक भेद होता है। जैसे- [मेघ आदिके आवरणसे रहित ] चमकते हुए चन्द्रमासे विभूषित [श्यामा शब्द श्लिष्ट है। उसके दो अर्थ हैं, एक रात्रि और दूसरा षोडशवर्षोया नायिका, इस दूसरे पक्षमें उज्ज्वल चन्द्रके आकारवाले सिरके आभूषणको धारण करनेवाली श्यामा अर्थात् षोडशवर्षीया नायिका] कामदेवको उद्दीप्त करने- वाली [श्यामा रात्रि तथा षोडशवर्षीया नायिका] किसको आनन्दित नहीं करती है ।७२।। यहाँ [उक्त विशेषणोंसे विशिष्ट श्यामा रात्रिके समान उक्त विशेषणोंसे विशिष्ट षोडशवर्षीया नायिका यह] उपमा अलङ्गार व्यङ्गय है। ध्वनिक अठारह मुख्य भेद [सू० ५६]-इस प्रकार उस [ध्वनि]के १८ भेद होते हैं। इसके [अर्थात् ] ध्वनिके [१८ भेद होते हैं]। यहाँ ध्वनिके अठारह भेद बतलाये गये हैं। इनमेंसे संलक्ष्यक्रमव्यङ्गचके २ शब्दशक्त्युत्थ + १२ अर्थशक्त्युत्थ + १ उभयशक्त्युत्थ= १५ भेद अभी गिनाये हैं। संलक्ष्यक्रमके इन १५ भेदोंके साथ असंलक्ष्यक्रम एक भेदको मिला देनेसे १५+१=१६ भेद तो अभिधामूल या विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनिके होते हैं। इन सोलहके साथ अविवक्षितवाच्य या लक्षणामूलध्वनिके अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य तथा अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य इन दोनों भेदोंको मिलाकर ध्वनिके १६+२= १८ भेद हो जाते हैं। इन्हीं अठारह भेदोंकी गणना ग्रन्थका रने यहाँ दिखलायी है। ११
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१६२ काव्यप्रकाश: [का० ४२, सू० ५७
ननु रसादीनां बहुभेदत्वेन कथमष्टादशेत्यत आह- [सू० ५७] रसादीनामनन्तत्वाद् भेद एको हि गण्यते। अनन्तत्वादिति । तथा हि नवरसाः। तत्र शृङ्गारस्य द्वौ भेदौ, सम्भोगो विप्रलम्भश्च। सम्भोगस्यापि परस्परावलोकनालिङ्गनपरिचुम्बनादिकुसुमोच्चयजलकेलि- सूर्यास्तमयचन्द्रोदयषड्ऋतुवर्णनादयो बहवो भेदाः। विप्रलम्भस्य अभिलाषादय उक्ताः। तयोरपि विभावानुभावव्यभिचारिवैचित्र्यम् । तत्रापि नायकयोरुत्तममध्यमाधमप्रकृति- त्वम्। तत्रापि देशकालावस्थादिभेदाः। इत्येकस्यैव रसस्यानन्त्यम्। का गणना त्वन्येषाम्। असंलक्ष्यक्रमत्वन्तु सामान्यमाश्रित्य रसादिध्वनिभेद एक एव गण्यते।
रसादि असंलक्ष्यक्रमध्वनिका एक ही भेद माना है [प्रश्न ]-अच्छा, रस आदिके बहुत भेद होनेसे [ ध्वनिके ] अठारह भेद कैसे होते हैं ? इस [शङ्ाके समाधान ]के लिए कहते हैं- [सू० ५७ ]-रस आदिके अनन्त होनेसे केवल एक ही भेद गिना जाता है। [अर्थात् उनका और अधिक विस्तार नहीं किया जाता है ]। [रसादिके] अनन्त होनेसे [ इसकी व्याख्या करते हैं-] जैसे कि [मुख्यरूपसे] नौ रस हैं। उनमेंसे शृङ्गारके दो भेद हैं, एक सम्भोग और दूसरा विप्रलम्भ। सम्भोगके भी परस्पर अवलोकन, आलिङ्गन, चुम्बन आदि, जलकेलि, सूर्यास्तमय, चन्द्रोदय, तथा षड्ऋतु-वर्णन आदि बहुत-से भेद [हो सकते ] हैं। विप्रलम्भके अभिलाष [ईर्ष्या, विरह, प्रवास, शाप ] आदि [ हेतुक पाँच भेद ] बतला चुके हैं। [अनेक उपभेदों सहित] उन दोनोंमें भी विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारिभावोंका वैचित्य [होनेसे अनेक भेद] हैं। उनमें भी फिर [सम्भोग तथा विप्रलम्भ दोनों प्रकारके शृङ्गारोंमें नायिका-नायकोंमें उत्तम, मध्यम, अधम प्रकृति [होनेसे भेद हो सकते) हैं। उनमें भी फिर देश, काल, अवस्था आदि [के भेदसे ] भेद होते हैं। इस प्रकार एक ही [शृङ्गार ] रसके अनन्त भेद हो जाते हैं। अन्य सबकी गिनती करनेकी तो बात ही क्या है। [इन सबमें] असंलक्ष्यकरमत्वकी समानताको लेकर रसादिध्वनिको एक ही भेद माना जाता है। [इस प्रकार ध्वनिके अठारह भेद होते हैं]। अठारह ध्वनिभेदोंका विस्तार अब ध्वनिके इन मुख्य अठारह भेदोंका आगे और भी विस्तार होता है। इन मुख्य अठारह भेदोंमें एक उभयशक्त्युत्थ भेद तो केवल वाक्यमें ही रहता है, परन्तु शेष १७ के पदगत तथा वाक्यगत भेद होनेसे १७x २ =३४ भेद हो जाते हैं। और उनमेंसे अर्थशक्त्युत्थके जो १२ भेद गिनाये थे उनके प्रबन्धमें भी होनेसे १२ भेद और हो सकते हैं। उनको और उभयशक्त्युत्थके एक भेदको भी मिला देनेसे १+३४=३५+१२=४७ भेद होते हैं। इनके अतिरिक्त असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गचके १. पदांश, २. वर्ण, ३. रचना तथा ४. प्रबन्धगत होनेसे चार भेद और जोड़कर ध्वनिके ४७+४=५१ भेद हो जाते हैं। ध्वनिके पूर्वोक्त १८ भेद करनेके बाद अब अगले ५१ भेदोंकी संख्याकी दृष्टिसे इन भेदोंका आगे विभाजन दिखलाते हैं-
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का० ४२, सू० ५८-५६] चतुर्थ उल्लास: १६३ [सू० ५८] वाक्ये द्वधुत्यः। द्वयुत्थ इति शब्दार्थोभयशक्तिमूलः । [सू० ५९ ] पवेऽप्यन्ये। अपिशब्दाद्वाक्येऽपि। एकावयवस्थितेन भूषणेन कामिनीव पदद्योत्येन व्यङ्गचेन वाक्यव्यङ्गचाऽपि भारती भासते। तत्र पदप्रकाश्यत्वे क्रमेणोदाहरणानि- यस्य मित्राणि मित्राणि शत्रवः शत्रवस्तथा। अनुकम्प्योऽनुकम्प्यश्च स जातः स च जीवति ।७३।[१] अत्र द्वितीयमित्रादिशब्दा आश्वस्तत्वनियन्त्रणीयत्वस्नेहपात्रत्वादिसंक्रमितवाच्याः१।।
[सू० ५८]-उभयशक्त्युत्थ [ध्वनि केवल ] वाक्यमें [होता है]। द्वघुत्थ [अर्थात् ] शब्दार्थोभयशक्तिमूल [ध्वनि, इसका केवल वाक्यगत एक ही भेद होता है ]। [सू० ५६]-अन्य [सत्रह भेद वाक्यके अतिरिक्त] पदमें भी [होते हैं ]। 'अपि' शब्दसे [अन्य १७ भेद ] वाक्यमें भी होते हैं। [इस प्रकार उन सत्रह भेदोंके पदगत तथा वाक्यगत दो भेद होकर १७x२= ३४ भेद हो जाते हैं ]। [पदद्योत्य ध्वनिसे काव्यका क्या उपकार हो सकता है इसको उदाहरण द्वारा स्पष्ट करते हैं ]- जैसे एक ही अवयवमें धारण किये हुए आभूषणसे कामिनी शोभित होती है इसी प्रकार पदसे द्योत्य व्यङ्गचसे [श्रोत्ग्राह्य ] वाक्य द्वारा व्यङ्गय [कविकी स्फोटरूप ] वाणी भी शोभित होती है। पदद्योत्य लक्षणामूलध्वनिक १७ उदाहरण उनमेंसे पदप्रकाश्य [सत्रह भेदों ]के [ सत्रह ] उदाहरण करमसे देते हैं -- सबसे पहिले अविवक्षितवाच्य या लक्षणामूलध्वनिके अर्थान्तरसंक्र्कमितवाच्य तथा अत्यन्त- तिरस्कृतवाच्य-ध्वनि दोनोंके पदद्योत्य उदाहरण क्रमशः देते हैं- जिसके मित्र [आश्वस्तत्व आदि धर्मयुक्त ] मित्र और शत्रु [दण्डभाजनत्वादि धर्मयुक्त वास्तविक ] शत्रु हैं और जिसके कृपापात्र [स्नेहपात्रत्वादि धर्मयुक्त वस्तुतः ] कृपापात्र हैं वही [सौभाग्यशाली पुरुष] उत्पन्न हुआ है और वही जीता है ॥७३।। [१ लक्षणामूल पदद्योत्य अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य ]। यहाँ [पुनरुक्ति-भयसे ] द्वितीय मित्र आदि शब्द[क्रमशः ] १ आश्वस्तत्व, २ नियन्त्रणीयत्व तथा स्नेहपात्रत्व आदि [रूप अर्थान्तरमें ] संक्रमितवाच्य हैं। हिन्दीमें निम्नलिखित पद्य पदद्योत्य अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य-ध्वनिका उदाहरण हो सकता है- राधा अति गुन आगरी स्वर्न बरन तनु रंग। मोहन तू मोहन भयो परसत जाके अङ्ग।।
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१६४ काव्यप्रकाश: [ का० ४२, सू० ५६ खलववहारा दीसन्ति दारुणा जहवि तहवि धीराणम्। हिअअवअस्सबहुमआ ण हु ववसाआ विमुज्झन्ति ।।७४।। [२] [खलव्यवहारा दृश्यन्ते दारुणा यद्यपि तथापि धीराणाम् । हृदयवयस्यबहुमता न खलु व्यवसाया विमुह्यन्ति ।। इति संस्कृतम्] अत्र विमुह्यन्तीति। लावण्यं तदसौ कान्तिस्तद्रूपं स वच:क्र्मः । तदा सुधास्पदमभूदधुना तु ज्वरो महान् ॥७५॥[३ क ] अत्र तदादिपदैरनुभवैकगोचरा अर्थाः प्रकाश्यन्ते। यथा वा- मुग्धे ! मुग्धतयैव नेतुमखिल: काल: किमारभ्यते। मानं धत्स्व धृरति बधान ऋजुतां दूरे कुरु प्रेयसि। सख्यैवं प्रतिबोधिता प्रतिवचस्तामाह भीतानना नीचैः शंस हृदि स्थितो हि ननु मे प्राणेश्वरः श्रोष्यति ॥७६॥[३ ख] यहाँ पहला 'मोहन' शब्द सामान्यरूपसे कृष्णका वाचक है। परन्तु दूसरा 'मोहन' शब्द सबको मोहित करनेकी सामर्थ्य आदिसे युक्त 'मोहन' का बोधक होनेसे अर्थान्तरमें संक्रमित हो गया है। इसलिए यह पदद्योत्य अर्थान्तरसंत्रमितवाच्य-ध्वनिका उदाहरण है। यद्यपि धूरतोंके व्यवहार [दूसरोंके इष्टविघातक होनेसे ] भयङ्कर [या कठोर ] दिखलायी देते हैं तथापि हृदयरूप [सदर्थग्राही ] वयस्य [मित्र] द्वारा अनुमोदित धीर पुरुषोंके निश्रय भङ्ग नहीं होते हैं [दुष्टों द्वारा कार्यमें विघ्न उपस्थित किये जानेपर भी धीर पुरुष अपने निश्च्यपर अटल ही रहते हैं] ।।७४॥ [२ ल० मू० अत्यन्ततिरस्कृत० ] यहाँ 'विमुह्यन्ति' यह [ पद अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य है]। पदद्योत्य अभिधामूल असंलक्ष्यत्रमध्वनिके दो उदाहरण इस प्रकार अविवक्षितवाच्य या लक्षणामूलध्वनिके अर्थान्तरसंक्मितवाच्य तथा अत्यन्ततिर- स्कृतवाच्य दोनों भेदोंके पद-प्रकाश्य व्यङ्गयस्थलोंके दो उदाहरण देकर अब विवक्षितवाच्य या अभिधामूल- ध्वनिके असंलक्ष्यक्रमव्य ङ्गयरूप एक भेदके पद-प्रकाश्य दो उदाहरण देते हैं- [उस नायिकाके ] वह [अपूर्व ] सौन्दर्य, वह कान्ति, वह रूप और वह [अनुभवकनीचर] बोलनेका ढंग ये सब उस [नायिकाके संयोगके ] समय तो सुधाके समान थे परन्तु [उसके वियोगमें] अब तो महान् सन्तापदायक [ज्वर] हो रहे हैं। ॥७५।। [३ क ] यहाँ 'तत्' आदि शब्दीरस [ उस समयके ] अनुभवंकगोचर अर्थ [व्यङ्गचरूपसे ] प्रकाशित होते हैं। [यह पदद्योत्य असंलक्ष्यकमव्यङ्गय विप्रलम्भभृङ्गारका उदाहरण है]। अथवा जैसे -- हे मुग्धे ! तुम इस भोलेपनमें ही सारा समय [यौवन ] क्यों बिताने जा रही हो। [तुम्हारा यह भोलापन ठीक नहीं है। इससे तुम्हारे प्रियतम तुन्हारे वशमें नहीं आयेंगे। उनके वशीकरणके लिए
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का० ४२, सू० ५६] चतुर्थ उल्लास: १६५
अत्र भीताननेति। एतेन हि नीचैःशंसनविधानस्य युक्तता गम्यते।
तो] मान करो, धैर्य रखो [अर्थात् जल्दी मान भङ्ग न करना] और प्रयतमके प्रति इस सरलताको छोड़ दो। सखीके द्वारा इस प्रकार समझाये जानेपर भयभीत मुखमुद्रासे [उत्तर देती हुई] उससे बोली कि हे सखि, धीरे बोलो, नहीं तो मेरे हृदयमें बैठे प्राणेश्वर सुन लेंगे ।७६।[ ३ ख ] यहाँ 'भीतानना' [ यह व्यञ्जक-पद है]। इससे धीरे बोलनेका विधान करनेकी युक्तता प्रतीत होती है। [यह असंलक्ष्यकमव्यङ्गय पदद्योत्य सभ्भोगभृङ्गारका उदाहरण है]। यह श्लोक 'अमरुकशतक' से लिया गया है। असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गयके ये दो उदाहरण पदद्योत्य ध्वनिके प्रदर्शनके लिए दिये गये हैं। इनमेंसे पहिला उदाहरण विप्रलम्भशृङ्गारका और दूसरा उदाहरण सम्भोगशृङ्गारका है। इसी दृष्टिसे इस भेदके दो उदाहरण दिये हैं। हिन्दीके महाकवि बिहारीलालने 'अमरुकशतक' के इस पद्यका भी अनुवाद अपने दोहेमें बड़ी सफलताके साथ इस प्रकार किया है- सखी सिखावत मान विधि, सैननि बरजति बाल। हरुए कहु मो हिय बसत, सदा बिहारीलाल। बिहारीका काव्यकौशल यहाँ भी बड़े सुन्दर रूपमें प्रकट हो रहा है। अमरुकके लम्बे-लम्बे ढाई चरणोंके भावको बिहारीने केवल 'सखी सिखावत मान विधि' इन चार शब्दोंमें रखकर अपने अद्भुत चातुर्यका परिचय दिया है। सखीकी सिखायी हुई मानविधिको सुनकर अमरुककी नायिका 'प्रतिवच- स्तामाह भीतानना' भयभीत होकर कहती है। पर बिहारीकी नायिका मुँहसे नहीं बोलती है। मुँहसे कही बात तो हृदयमें स्थित प्राणेश्वर सुन ही लेंगे। इसलिए बिहारीकी नायिका 'सैननि बरजति बाल' आँखके इशारेसे ही मना कर रही है। 'सैननि बरजति बाल' ने दोहेमें एक अपूर्व चमत्कार उत्प कर दिया है जिसके का रण यहाँ सहृदयतामें बिहारी अमरुकसे कहीं आगे निकल गये हैं। पर इससे भी अधिक चमत्कार 'मो हिय बसत सदा बिहारीलाल' में है। अमरुककी नायिकाके 'प्राणेश्वर' उसके हृदयमें बैठे हैं। ठीक है, यह नायिकाका गौरव है। परर बिहारीकी नायिकाने उन 'बिहारी'जीको बाँधा है, जिनका काम ही सदा 'बिहार' करना है। जो एक जगह बँधकर रहते नहीं उन्हीं 'बिहारीाल'को सदाके लिए बाँध लेनेमें और भी गौरव है। सब मिलाकर बिहारीका यह छोटा सा दोहा अमरुकके विशालकाय श्लोकसे कहीं आगे निकल गया है।
दीरघ दोहा अरथके आखर थोरे आहिं। ज्यों रहीम नट कुण्डली समिटि कूदि चढ़ि जाहिं।। रहीमने दोहेकी प्रशंसामें जो यह बात कही है वह बिहारीके दोहोंपर बिलकुल ठीक बैठती है। 'बिहारी सतसई'के अनुकरणमें लिखी गयी 'रामसतसई' या 'शृङ्गारसतसई' में रचयिताने भी इस श्लोकके भावको अपने दोहेमें भरनेका यत्न किया है। 'शृङ्गारसतसई' का दोहा निम्नलिखित प्रकार है- हिय लोचनमें भरि रहे सुन्दर नन्दकिशोर। चलत सयान न बावरी मान धरौं किहि ठौर। पर बिहारीके दोहेके सामने यह जम नहीं रहा है।
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१६६ काव्यप्रकाश: [का० ४२, सू० ५६ भावादीनां पदप्रकाश्यत्वेऽधिकं न वैचित्र्यमिति न तदुदाह्नियते।
इल किरता रुधिरविसरप्रसाधितकरवालरुधिरभुजपरिघः झटिति भ्रुकुटिविटङ्ितललाटपट्टो विभासि नृप ! भीम ।।७७।।[४] अत्र भीषणीयस्य भीमसेन उपमानम् । भुक्तिमुक्तिकृदेकान्तसमादेशनतत्परः । कस्य नानन्दनिस्यन्दं विदधाति सदागमः ॥७८। [५] काचित् सङ्केतदायिनमेवं मुख्यया वृत्त्या शंसति ।
भाव आदिके पदप्रकाश्यत्वमें अधिक वैचित्य नहीं होता है, इसलिए उनके उदाहरण नहीं दिये हैं। पदद्योत्य संलक्ष्यक्रम शब्दशक्त्युत्थ ध्वनिके दो उदाहरण इस प्रकार असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गय पदद्योत्य ध्वनिक उदाहरण देनेके बाद अब संलक्ष्यक्रमव्यङ्गयके शब्दशक्तिमूल भेदमें पदप्रकाश्य वस्तुसे अलङ्कारध्वनिका उदाहरण देते हैं- रक्तप्रवाहसे रॅँगी हुई तलवारके द्वारा [शत्रु तथा मित्रोंके लिए कमशः] भयङ्गर और मनोहर [शत्रुओंकी विजयके निरोधक ] भुजागलसे युक्त और तुरन्त ही भुकुटिसे अङ्गित ललाटपट्टवाले हे भयङ्कर [भीम ] राजन् ! आप [भीमसेनके समान ] शोभित हो रहे हैं ॥७७।। [४] F यहाँ [भीषणीय पदमें 'कृत्यल्युटो बहुलम्' इस बाहुलकसे कर्तामें अनीयर प्रत्यय होकर भीम पद बना है इसलिए उसका अर्थ ] भयङ्गर [ राजा]का भीमसेन उपमान है [ यह बात भीम पदसे ध्वनित होती है। इसलिए यह पदद्योत्य वस्तुसे अलङ्गार व्यङ्गयका उदाहरण हुआ]। आगे पद-प्रकाशश्य वस्तुव्यङ्गयका उदाहरण है- अन्य लोगोंकी उपस्थितिमें उपनायकके श जानेपर उसके शगमनजन्य हर्षको अप्रस्तुतप्रशंसाके व्याजसे व्यक्त करती हुई नायिका कह रही है- भुक्ति [अर्थात् क्मकाण्डसाध्य स्वर्गादि भोग ] और [ज्ञानकाण्डसाध्य ] मुक्तिको प्रदान करने- वाला, नियम [एकान्त अव्यभिचार ]से [ हितसाधनताका ] सम्यक् उपदेश देनेमें तत्पर, सत् [समीचीन ], आगम [वेद ] किसके लिए आनन्ददायक नहीं होता है। [यह इस श्लोकका वाच्य अर्थ है। व्यङ्गयपक्षमें इसका अर्थ इस प्रकार होगा कि-भुक्ति अर्थात् सुरतभोग और मुक्ति अर्थात् विरहदुःखसे मुक्ति दिलानेवाले तथा एकान्तसमादेशनतत्पर अर्थात् एकान्तसङ्गेतस्थानके सेवनकी प्रेरणा देनेमें तत्पर, सत् अर्थात् सुन्दर प्रियका आगमन किस स्त्नीके लिए आनन्ददायक नहीं होता है]॥।७८। [x] यहाँ कोई [नायिका ] सङ्ग्ेत देनेवाले [ उपनायक]को मुख्य [अर्थात् प्रधान ] व्यञ्जनावृत्तिसे कह रही है। यहाँ व्यङ्गय अर्थकी प्रतीति मुख्यरूपसे 'सदागमः' इस पदसे होती है इसलिए यह पदद्योत्य ध्वनिका उदाहरण माना गया है। इसमें वस्तुसे वस्तु व्यङ्गय है ।
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का० ४२, सू० ५६] चतुर्थ उल्लास: १६७
सायं स्नानमुपासितं मलयजेनाङ्गं समालेपितं यातोऽस्ताचलमौलिमम्बरमणिविस्त्रब्धमत्रागतिः । का
आश्चर्यं तव सौकुमार्यमभितः क्लान्ताऽसि येनाधुना नेत्रद्वन्द्वममीलनव्यतिकरं शवनोति ते नासितुम् ।।७९।। [६] अत्र वस्तुना कृतपरपुरुषपरिचया क्लान्ताऽसीति वस्तु अधुनापदद्योत्यं व्यज्यते। तदप्राप्तिमहादुःखविलीनाशेषपातका। तच्चिन्ताविपुलाह्लादक्षीणपुण्यचया तथा ।।८०।।
यहाँ 'मुख्यया वृत्त्या' इन शब्दोंके अर्थके विषयमें टीकाकारोंमें मतभेद है। वैसे तो मुख्य वृत्ति अभिधा कहलाती है। पर मुख्यका अर्थ प्रधान भी होता है और व्यञ्जना सब वृत्तियोंमें प्रधान है इसलिए मुख्य-वृत्ति शब्दसे कुछ टीकाकार व्यञ्जनावृत्तिका ग्रहण करते हैं। दूसरे लोग यह कहते हैं कि यह उदाहरण-अभिधामूला व्यञ्जनाके दिये जा रहे हैं इसलिए अभिधामूला व्यञ्जना भी मुख्यवृत्ति कही जा सकती है।
पदद्योत्य संलक्ष्यक्रम अर्थशक्त्युत्थ स्वतःसम्भवी ध्वनिके चार उदाहरण संलक्ष्यत्रमव्यङ्गयके शब्दशक्तिमूल भेदके पद-प्रकाश्य भेदोंके दो उदाहरण देनेके बाद अब अर्थशक्तिमूल बारह भेदोंके पद-प्रकाश्य बारह उदाहरण प्रारम्भ करते हैं। सबसे पहिले स्वतःसम्भवी पद-प्रकाश्य वस्तुसे वस्तुका उदाहरण देते हैं- उपपतिके साथ सम्भोग करनेके बाद उसकी श्रान्तिको मिटानेके लिए स्नान करने आयी हुई किसी नायिकाके प्रति उसके चौर्य-रतके रहस्यको ताड़ लेनेवाली सखी व्यङ्गयपूर्वक कह रही है- [ हे सखि ] तुमने सायङ्कालके समय भली प्रकार स्नान [उपासित ] किया है [इसलिए श्रमका कोई अवसर नहीं जान पड़ता है। उसपर भी] शरीरमें चन्दनका लेप करवाया है [ स्वयं लेप नहीं किया बल्कि किसी अन्यसे करवाया है इसलिए लेपनके श्रमका भी प्रश्न नहीं है], अम्बरमणि [अर्थात् सूर्य] अस्ताचलके शिखरपर पहुँच चुके हैं [ अथवा 'अस्ताचलमौलिम् अतिकरम्य यातः' अर्थात् अस्ताचलके शिखरका अतिकमणकर अस्त भी हो चुके हैं] और तुम धीरे-धीरे टहलती हुई यहाँतक आयी हो [इसलिए शान्तिका कोई कारण प्रतीत नहीं होता है फिर भी] तुम बुरी तरह थक रही हो और [ थकावटके कारण] तुम्हारी आँखें मुंदी जा रही है; तुम्हारी इस सुकुमारताको देखकर आश्रवर्य होता है ॥७६।। [६] यहाँ [श्लोकोक्त अर्थरूप ] वस्तुसे परपुरुषके साथ सम्भोग करनेके कारण ही इतनी थक रही हो यह बात 'अधुना' पदसे द्योत्य वस्तुरूपमें व्यक्त हो रही है। अर्थशक्त्युत्थ-ध्वनिके स्वतःसम्भवी भेदमें पदद्योत्य वस्तुसे अलङ्कार-व्यङ्गय ध्वनिके उदाहरण- रूपमें पद्योंका युग्म आगे देते हैं। ये पद्य 'विष्णुपुराण' से लिये गये हैं- उन [कृष्ण ]के प्राप्त न होनेके महादुःखसे जिसके सारे पापोंका नाश हो गया है और उन [कृष्ण ]- के चिन्तनसे उत्पन्न परमानन्दसे जिसके सारे पुण्यसमूहका नाश हो गया है।
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१६5 काव्यप्रकाश: [का० ४२, सू० ५६ चिन्तयन्ती जगत्सूर्ति परब्रह्मस्वरूपिणम् ।ास निरुच्छ्वासतया मुक्ति गताऽन्या गोपकन्यका ।८१।।[७] अत्र जन्मसहस्त्रैरुपभोक्तव्यानि दुष्कृतसुकृतफलानि वियोगदुःखचिन्तनाह्लादा- भ्यामनुभूतानीत्युक्तम् । एवं च अशेष-चयपदद्योत्ये अतिशयोक्ती। क्षणदाऽसावक्षणदा वनमवनं व्यसनमव्यसनम्। बत वीर ! तव द्विषतां पराङमुखे त्वयि पराङमुखं सर्वम् ।।८२।।[८] अत्र शन्दशक्तिमूलविरोधाङ्गनार्थान्तरन्यासेन विधिरपि त्वामनुवर्तते इति सर्व- पदद्योत्यं वस्तु ।
[इस प्रकार पुनर्जन्मके हेतुभूत समस्त पाप तथा पुण्यरूप कर्मोंका नाश हो जानेपर पुनर्जन्मका कारण न रहनेसे और] परब्रह्मस्वरूप जगत्के उत्पादक [विष्णु भगवान्]का ध्यान करती हुई मूच्छित हो जानेसे [ 'नास्य प्राणा उत्कामन्ति अत्रैंव समवलीयन्ते' इस उपनिषद्वाक्यके अनुसार] कोई गोपकन्या मुक्तिको प्राप्त हो गयी।८०-८१। [७] यहाँ सहस्रों जन्मोंमें भोगने योग्य पुण्य तथा पापके फलोंका [कृष्णके ] वियोगके दुःख तथा [चिन्ता] ध्यानके आनन्दसे ही अनुभव कर लिया, यह कहा गया है। इस प्रकार 'अशेष' तथा 'चय' पदसे द्योत्य दो अतिशयोक्ति [अलङ्गार व्यङ्ग्य] हैं। आगे स्वतःसम्भवी अलङ्कारसे पदद्योत्य वस्तुध्वनिका उदाहरण देते हैं- हे वीर [राजन् ], तुम्हारे विमुख हो जानेपर सभी कुछ तुम्हारे शत्रुओंके विपरीत हो गया है [क्षणदा अर्थात् सुखादिकी देनेवाली] आनन्ददायिनी रात्रि उनके लिए निरानन्दमयी [अक्षणदा ], वन उनका 'अवन' [अर्थात् ] रक्षास्थान [दूसरे पक्षमें वनके विपरीत अ-वन] और '[अवीनां असनं अव्य- सनम्' दूसरे पक्षमें व्यसनविरोधी] भेड़-बकरी चराना [अव्यसन] उनका जीवन बितानेका साधन [व्यसन ] पेशा बन गया है ।८२।। [८] यहाँ [क्षणदा-अक्षणदा इत्यादि शब्दोंकी शक्तिसे प्रतीत होनेवाले शब्दशक्तिमूलक ] विरोधके [अङ्ग ] उपपादक [तुम्हारे पराङमुख हो जानेसे सब ही पराड मुख हो गया इस ] अर्थान्तरन्यास [अलङ्गार]से, विधि भी तुम्हारा [तुम्हारी इच्छाका ] अनुसरण करता है यह 'सर्व' पदद्योत्य वस्तु [व्यङ्गय है]। (सू० १६५) सामान्यं वा विशेषो वा तदन्येन समर्थ्यंते। यत्तु सोऽर्थान्तरन्यासः साधर्म्येणेतरेण वा।। सामान्यका विशेषसे अथवा विशेषका सामान्यसे समर्थन होनेपर 'अर्थान्तरन्यास' होता है। यह 'अर्थान्तरन्यास' अलङ्कारका लक्षण किया है। यहाँ 'त्वयि' तुम्हारे विपरीत हो जानेपर, इस विशेष अर्थसे सबका पराङमुख हो जाना इस सामान्य अर्थका समर्थन मानकर अर्थान्तरन्यास अलङ्कार कहा है। प्रधान पुरुषके विरुद्ध हो जानेपर अन्य सबका भी विपरीत हो जाना लोकसिद्ध अर्थ है। इसलिए स्वतःसम्भवी अर्थान्तरन्यास अलङ्कार वस्तुव्यङ्गयका यह उदाहरण दिया गया है। इससे मुख्यरूपसे सर्व पदकी द्योतकता है। इसलिए इसको पदद्योत्य ध्वनि माना जाता है।
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का० ४२, सू० ५६] चतुर्थ उल्लास: १६६ Iतुह वल्लहस्स मोसम्मि आसि अहरो मिलाणकमलदलो। इअ णववहुआ सोऊण कुणइ वअणं महिसंमुहम् ।८३॥[] [तव वल्लभस्य प्रभाते आसीदधरो म्लानकमलदलम्। इति नववधू: श्रुत्वा करोति वदनं महीसम्मुखम् ।। इति संस्कृतम् ] अत्र रूपकेण त्वयाऽस्य मुहुर्मुहुः परिचुम्बनं तथा कृतं येन म्लानत्वमिति मिला- णादिपदद्योत्यं काव्यलिङ्गम्। एषु स्वतःसम्भवी व्यञ्जकः । राईसु चंदधवलासु ललिअमप्फालिऊण जो चावम्। एकच्छत्तं विअ कुणइ भुअणरज्जं विजंभंतो ।।८४।। [१] [रात्रीषु चन्द्रधवलासु ललितमास्फाल्य यश्चापम् । एकच्छत्रमिव करोति भुवनराज्यं विजूम्भमाणः ॥ इति संस्कृतम्] अत्र वस्तुना येषां कामिनामसौ राजा स्मरस्तेभ्योन कश्चिदपि तदादेशपराङमुख इति जाग्रन्भिरुपभोगपरैरेव तैनिशाऽतिवाह्यते इति भुअणरज्जपदद्योत्यं वस्तु प्रकाश्यते। निशितशरधियाऽर्पयत्यनङ्गो दृशि सुदृशः स्वबलं वयस्यराले। दिशि निपतति यत्र सा च तत्र व्यतिकरमेत्य समुन्मिषन्त्यवस्थाः ॥८५॥[११] सबेरे तुम्हारे पतिका अधरोष्ठ मुरझाये हुए कमलदलके समान हो रहा था। [सखीके मुखसे] यह सुनकर नववधूने मुख नीचा कर लिया ॥८३॥[] JH यहाँ [ओष्ठ कमलदल था इस ] रूपकसे तुमसे बार-बार इतना अधिक उसका चुम्बन किया जिससे वह म्लान हो गया, यह म्लानादि-पदद्योत्य काव्यलिङ्ग [व्यङ्गय] है। इन [चारों उदाहरणों] में स्वतःसम्भवी व्यञ्जक है। अर्थशक्त्युत्थ कविप्रौढोक्तिसिद्ध पदद्योत्य ध्वनिका उदाहरण चन्द्रमासे उज्ज्वल धवलवर्ण रात्रियोंमें प्रकट होता हुआ [विजुम्भमाण: ] जो [कामदेव बाण आदिका प्रयोग किये बिना केवल] धनुषकी टङ्कारमात्नसे सारे संसारपर एकच्छत्र राज्य-सा करता है ।८ ४।। [१0 ] यहाँ जिन कामी [स्त्री-पुरुषोंका ] यह कामदेव राजा है उनमेंसे कोई भी उसकी आज्ञाका उल्लङ्डन नहीं कर सकता है। और वे सब [सारी रात ] जागते हुए और उपभोग करते हुए ही सारी रात बिताते हैं यह बात [भुअणरज्ज ] 'भुवनराज्य' पदसे द्योत्य है। फ कामदेव नवयौवनकी अवस्थामें कामिनियोंके कटाक्षको [अपना ] तीक्ष्ण बाण मानकर [उनके प्रहारको सफल बनानेके लिए ] अपनी [सारी ] शक्ति दे देता है, इसलिए वह [कामिनियोंका कटाक्ष] जिस ओर पड़ता है वहाँ इकट्ठी ही [ एक साथ ही कामकी ] सब अवस्थाएँ प्रकट हो जाती हैं ।।८५॥ (११)
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१७० काव्यप्रकाश: [का० ४२, सू० ५६ अत्र वस्तुना युगपदवस्थाः परस्परविरुद्धा अपि प्रभवन्तीति व्यतिकरपदद्योत्यो विरोधः । वारिज्जंतो वि पुणो सन्दावकदत्थिएण हिअएण थणहरवअस्सएण विसुद्धजाई ण चलइ से हारो ।। ८६।। [१२] [ वार्यमाणोऽपि पुनः सन्तापकदर्थितेन हृदयेन। स्तनभरवयस्येन विशुद्धजातिन चलत्यस्या हारः ॥ इति संस्कृतम्] अत्र विशुद्धजातित्वलक्षणहेत्वलङ्गारेण हारोऽनवरतं कम्पमान एवास्ते इति ण चलइपदद्योत्यं वस्तु ।
यहाँ [श्लोकवणित ] वस्तुसे परस्पर विपरीत [हँसना, रोना आदि कामकी उपर्युक्त ] अवस्थाएँ एक साथ प्रकट हो जाती हैं यह 'व्यतिकर' पदसे द्योत्य विरोध [अलङ्गार व्यङ्गघ] है। कामकी दस अवस्थाएँ निम्नलिखित मानी गयी हैं- दृङमन:सङ्गसङ्कल्पा जागर: कृशताऽरतिः । इत्यनङ्गदशा दश ।। कविप्रोढोक्तिमात्रसिद्ध पदद्योत्य अलङ्कारसे वस्तुव्यङ्गयका उदाहरण देते हैं- विपरीत सुरतके कालमें नायिकाके वक्ष:स्थलपर स्तनस्पर्शप्रतिबन्धक हारके कारण जब स्तनोंका पूर्ण स्पर्श नहीं हो पाता है, सन्तापसे खिन्न होकर नायक उसको बार-बार बीचमेंसे हटानेका प्रयत्न करता है, परन्तु वह हार फिर उसके स्तनोंके ही ऊपर आ जाता है, मानों मित्र स्तनोंकी अतिपीड़नसे रक्षा करनेके लिए ही उच्च शुद्ध जातिके मोतियोंसे बना हुआ हार अपने मित्रोंको छोड़कर नहीं जाता है और स्तनोंके ऊपर निरन्तर हिल रहा है; यह इस श्लोकका भाव है। शब्दार्थ इस प्रकार है- [स्तनके स्पर्शमें निरन्तर बाधा पड़नेके कारण ] सन्तापसे व्याकुलहृदय [नायक के द्वारा हटाया जानेपर भी विशुद्ध जाति [के मोतियों] का [बना हुआ इस विपरीत सुरतमें प्रवृत्त नायिकाका ] हार अपने मित्र स्तनोंसे [स्तनोंको छोड़कर] नहीं हटता है। [बराबर स्तनोंपर ही झूलता रहा] ॥८६।। [१२] यहाँ विशुद्धजातित्वरूप हेतु [होनेके कारण काव्यलिङ्ग ] अलङ्कारसे हार [हटानेपर भी निरन्तर स्तनोंके ऊपर ] झूल रहा है। यह 'ण चलइ'-पदद्योत्य वस्तु व्यक्त होती है। 1ह यहाँ 'स्तनभरवयस्येन न चलति' इस वाक्यांशमें 'वयस्येन' में साधारणतः तृतीयाके स्थानपर पञ्चमी विभक्तिका प्रयोग होना चाहिये था। परन्तु कविने 'अव्यथन' में पञ्चम्यर्थमें ही यहाँ तृतीयाका प्रयोग किया है। इसलिए. 'वयस्येन न चलति'का अरथ 'वयस्यतो न चलति' होता है। इस प्रकारके प्रयोगका समाधान पाणिनिके 'अतिग्रहाव्यथनक्षेपेष्वकर्तरि तृतीयायाः' ५-४-४६ इस सूत्रके आधारपर किया जा सकता है। इस सूत्रमें 'अव्यथन' का अरथ 'अचलन' है। उस 'अचलन' आदि अर्थमें तृतीयासे तसि-प्रत्ययका विधान किया गया है, इसलिए यहाँ भी 'अव्यथन' अर्थमें 'वयस्येन न चलति' इस तृतीया विभक्तिके प्रयोगका उपपादन किया जा सकता है।
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का० ४२, सू० ५६] चतुर्थ उल्लास: १७१
सो मुद्धसामलंगो धम्मिल्लो कलिअललिअणिअदेहो। तीए खंधाहि बलं गहिअ सरो सुरअसंगरे जअइ ।।८७।। [१३] [स मुग्धश्यामलाङ्गो धम्मिल्ल: कलितललितनिजदेहः । तस्या: स्कन्धाद्वलं गृहीत्वा स्मरः सुरतसङ्गरे जयति ।। [इति संस्कृतम्] अत्र रूपकेण मुहुर्मुहुराकर्षणेन तथा केशपाशः स्कन्धयोः प्राप्तः यथा रतिविरता- वप्यनिवृत्ताभिलाषः कामुकोऽभूदिति खंधपदद्योत्या विभावना। एषु कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरः । यह कविप्रौढोक्तिमात्रसिद्ध अलङ्कारसे अलङ्कारव्यङ्गयका उदाहरण दिया गया है। यहाँ रूपकालङ्वारसे विभावना अलङ्कार व्यङ्गय बतलाया है। इसमें सुरतसङ्गर पदसे सुरतके ऊपर 'सङ्गर' अर्थात् युद्धका आरोप किया गया है। इसलिए नायिकाके स्कन्ध अर्थात् कन्धेपर सेनाके 'स्कन्ध' अर्थात् छावनीका आरोप किया गया है। यह 'स्कन्ध' शब्द छावनी तथा कन्धा दोनों अथोंका वाचक होनेसे और 'बल' पद शक्ति तथा सेना दोनोंका वाचक होनेसे श्लिष्ट हैं। जैसे युद्धमें पराजित होनेके कारण लौटते हुए सेनापतिको यदि किसी अन्य स्कन्धावार या छावनीसे सेनाकी कुमक मिल जाती है तो वह फिर युद्धके लिए उद्यत हो जाता है, उसी प्रकार नायिकाका सुन्दर और श्यामल रूपवाला जो धम्मिल अर्थात् केशपाश है वही 'स्मर' कामदेव है। सुरतकी पूर्वावस्थामें बार-बार आकर्षणके कारण खुलकर वह केशपाश नायिकाके कन्धोंके ऊपर गिर गया है। उससे नायकको वह नायिका और भी सुन्दर लगने लगती है और थोड़ी देरमें उसका सुरताभिलाष पुनः उद्दीप्त हो उठता है। मानों स्मर उस स्कन्धावारसे नवीन बल या सैन्य प्राप्त कर फिर युद्धके लिए उद्यत हो जाता है। इस प्रकार उस नायिकाके स्कन्धोंसे बलको प्राप्त करके नायिकाका केशपाशरूप स्मर सुरतसंग्राममें विजयी या सर्वोत्कर्षशाली प्रतीत होता है। यह इस श्लोकका भाव है। शब्दार्थ निम्नलिखित है -- [एक बारके सुरत-सम्भोगके बाद दुबारा फिर] अपने सुन्दर स्वरूपको प्राप्त सुन्दर और श्यामल [नायिकाका ] वह केशपाश [रूप कामदेव ] उस [नायिका ] के स्कन्धसे बल प्राप्तकर सुरतसमरमें सर्वोत्कषको ? प्राप्त होता है।।८७।। [१३ ] यहाँ [धम्मिल-रूप कामदेव इस ] रूपक [अलङ्गार]से, बार-बार खोंचे जानेसे, केशपाश इस सुन्दर रूपसे कन्धोंपर गिरा है कि जिससे [एक बार] सुरतके समाप्त हो जानेपर भी कामुकका [सम्भोग- का ] अभिलाष पूर्ण नहीं हुआ [वह पुनः सम्भोगके लिए तैयार है] यह 'स्कन्ध' पदसे विभावना अलड्कार द्योतित होता है। इन [चारों श्लोकों]में [व्यञ्जक अर्थ] कविकी प्रौढोक्तिमात्रसे निष्पन्न है। कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध पदद्योत्य ध्वनिके चार उदाहरण आगे कविनिबद्ध वक्तुप्रोढोक्तिसिद्ध पदद्योत्य वस्तुसें वस्तुव्यङ्गयका उदाहरण देते हैं- वृद्धा परवधूपर अनुरक्त अपने पतिके प्रति खण्डिता नायिकाकी यह उक्ति है। जैसे पूर्णिमाका चन्द्रमा जब निकलता है उस समय रात्रिके प्रारम्भमें थोड़ी देरके लिए रक्तवर्ण होता है फिर बादको उस प्रकारका रक्तवर्ण नहीं रहता है। इसी प्रकार यह नायक भी क्षणिक अनुराग रखनेवाला है। इसलिए नायिका उसको उलाहना देती हुई कह रही है।
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१७२ काव्यप्रकाश: [का० ४२, सू० ५६ णवपुण्णिमामिअंकस्स सुहअ कोत्तं सि भणसु मह सच्चम् । का सोहग्गसमग्गा पओसरअणि व्व तुह अज्ज ।।८८।। [१४ ]] [नवपूर्णिमामृगाङ्कस्य सुभग कस्त्वमसि भण मम सत्यम् । का सौभाग्यसमग्रा प्रदोषरजनीव तवाद्य ।। इति संस्कृतम्] अत्र वस्तुना मयीवान्यस्यामपि प्रथममनुरक्तस्त्वं न तत इति णवेत्यादि-पओसे- त्यादिपदद्योत्यं वस्तु व्यज्यते। सहि णवणिहुवणसमरम्मि अंकवालीसहीए णिविडाए। हारो णिवारियो विअ उच्छेरन्तो तदो कहं रमिअम् ।।८९।। [१५] [सखि नवनिध्वनसमरेऽङ्कपालीसख्या निविडया। हारो निवारित एवोच्छियमाणस्ततः कथं रमितम् ।। इति संस्कृतम् ।] अत्र वस्तुना हारच्छेदानन्तरमन्यदेव रतमवश्यमभूत् तत्कथय कीदगिति व्यतिरक: कहंपदगम्यः ।
हे सुभग, सच बतलाओ कि नवीन [सद्यः उदित हुए ] पूर्णिमाके चन्द्रमाके तुम कौन लगते हो [जो उसीके समान क्षणिक अनुरक्त होते हो और बादको तुम्हारा वह अनुराग न जाने कहाँ चला जाता है] और प्रदोष रजनीके समान आज सम्पूर्ण सौभाज्ययुक्त तुम्हारी [क्षणिक अनुरागशालिनी नायिका ] कौन है ॥८5॥I [१४] यहाँ [श्लोकोक्त ] वस्तुसे मेरे समान अन्यमें भी पहिले तुम अनुरक्त हुए थे, बादको [अनुरक्त] नहीं [ रहे] यह णव [नव ] इत्यादि और 'पओस' [प्रदोष ] इत्यादि पदोंसे द्योत्य वस्तु व्यङ्गय है। 'प्रदोषो रजनीमुखम्' इस कोषके अनुसार रात्रिका प्रारम्भिक भाग 'प्रदोष' कहलाता है। प्रदोष पदसे यहाँ नायिकाका स्वरूप तथा चरित्रादि विषयक मालिन्य और नवपूर्णिमामृगाड्ढ पदसे नायकका क्षणिकानुरागित्व तथा कलङ्कित्व आदि व्यक्त होता है। आगे कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध वस्तुसे अलङ्कारव्यङ्गयका उदाहरण देते हैं। किसी नवोढ़ा नायिकाकी अत्यन्त विश्वस्त प्रिय सखि उससे सुरतकी चर्चा करते हुए कह रही है- हे सखि, प्रथम बारके [नवीन ] सुरतसमरमें गाढ़ आलिङ्गन [अङ्कपालीसख्या ] रूप सखीने स्तनोंके ऊपर झूलता हुआ [और आलिङ्गनमें बाधक ] हार तो [तोड़कर ] हटा ही दिया फिर तुमने कैसे रमण किया [यह तो तनिक बतलाओ] ॥८६॥ [५] यहाँ हारके टूट जानेके बाद [प्रौढ़ा स्त्रियोंके सुरतसे भी अधिक आनन्ददायक ] कुछ अन्य ही प्रकारका सम्भोग अवश्य हुआ होगा। सो बतलाओ, वह कैसा था ? इस [प्रश्न ]से [ उस सम्भोगका अन्य प्रौढा स्त्रियोंके सम्भोगसे अधिक आह्लाद-दायकरूप ] व्यतिरेक [अलङ्गार] 'कहं' [कथम् ] पदसे व्यक्त होता है। [इसलिए यह कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध वस्तुसे अलङ्गारव्यङ्गयका उदाहरण है]।
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का० ४२, सू० ५६] चतुर्थ उल्लास: १७३
पविसन्ती घरवारं विवलिअवअणा विलोइऊण पहम्। खंधे घेत्तूण घडं हा हा णट्ठोत्ति रुअसि सहि किं ति ।।९०।। [१६ क] [प्रविशन्ती गृहद्वारं विवलितवदना विलोक्य पन्थानम्। स्कन्धे गृहीत्वा घटं हा हा नष्ट इति रोदिषि सखि किमिति ॥ इति संस्कृतम् ] अत्र हेत्वलङ्गारेण सङ्केतनिकेतनं गच्छन्तं दृष्टवा यदि तत्र गन्तुमिच्छसि तदा अपरं घटं गृहीत्वा गच्छेति वस्तु किं तिपदद्योत्यम् । यथा वा- विहलंखलं तुमं सहि दट्ठूण कुडेण तरलतरदिट्ठिम् । वारप्फंसमिसेण अ अप्पा गुरुओत्ति पाडिअ वहिण्णो ।।९१।। [१६ ख] [विशृङ्गलां त्वां सखि दृष्टवा कुटेन तरलतरदृष्टिम् । द्वारस्पर्शमिषेण चात्मा गुरुक इति पातयित्वा विभिन्नः ॥ इति संस्कृतम् ]
आगे कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध अलङ्कारसे वस्तुकी व्यञ्जनाका उदाहरण देते हैं। जल भरनेके बहाने सङ्केतस्थानको जाकर भी वहाँ प्रच्छन्न कामुकको न पाकर वापिस आयी नायिका जब अपने घरके दरवाजेके भीतर घुसने लगी तब उसने प्रच्छन्न कामुकको सङ्केतस्थानकी ओर जाते हुए देखा तो जान-बूझकर घड़ेको गिराकर फोड़ दिया ताकि उसे दुबारा पानी लानेके लिए जानेका अवसर मिल जाय और दिखलानेके लिए रोने लगी कि हाय मेरा घड़ा फूट गया। उसकी सखी इस बातको ताड़ गयी। वह उससे कहती है कि तुम रोती क्यों हो। जाओ, दूसरा घड़ा लेकर दुबारा पानी भर लाओ। मैं तुम्हारे घरवालोंसे दुबारा जानेका समाधान कर दूँगी। यह इस श्लोकका गूढ़ अभिप्राय है। शब्दार्थ इस प्रकार है- कन्धेपर घड़ा लिये हुए घरके दरवाजेमें घुसते हुए और मुख फेरकर मार्गको देखते हुए [घड़ेको गिराकर ] 'हाय-हाय, घड़ा फूट गया' ऐसा कहकर क्यों रो रही है ॥६०।। [१६ क ] यहाँ [घड़ा फूट गया इसलिए रो रही है इस प्रकारके कार्यकारणभावमूलक ] काव्यलिङ्ग [हेतु ] अलङ्कारसे, यदि [दुबारा फिर] वहाँ जाना चाहती हो तो दूसरा घड़ा लेकर चली जाओ यह 'किं ति' [किमिति] इस पदसे द्योत्य है। ग्रन्थकारने इसको 'पदद्योत्य' कविनिबद्धवक्त प्रौढोक्तिसिद्ध अलङ्कारसे वस्तुव्यङ्गयके उदाहरण- रूपमें प्रस्तुत किया है। परन्तु यह सब अर्थ केवल कविकल्पनामात्रसे ही सिद्ध नहीं है अपितु लोकमें भी उस प्रकारका व्यवहार पाया जाता है। इसलिए इसको पदद्योत्य स्वतःसम्भवी अलङ्कारसे वस्तु- व्यङ्गयका उदाहरण भी माना जा सकता है। अतः यह उदाहरण ठीक नहीं है। इस प्रकारकी शङ्का इस उदाहरणके सम्बन्धमें उठायी जा सकती है। इसलिए ग्रन्थकारने इसी कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध अलङ्कारसे वस्तुव्यङ्गयका दूसरा उदाहरण भी आगे दिया है। अथवा जसे -- हे सखि, तुमको व्याकुल और अत्यन्त चञ्चलदृष्टि देखकर और अपनेको भारी [अतएव तुम्हारे लिए कष्टदायक] मानकर द्वारके स्पर्शके बहानेसे घड़ेने अपने आपको गिराकर फोड़ डाला [ तुमने नहीं फोड़ा है] ।६१।। [१६ ख]
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१७४ काव्यप्रकाश: [का० ४२, सू० ५६ अत्र नदीकूले लतागहने कृतसङ्केतमप्राप्तं गृहप्रवेशावसरे पश्चादागतं दृष्ट्वा पुनर्नदीगमनाय द्वारोपघातव्याजेन बुद्धिपूर्व व्याकुलतया' त्वया घटः स्फोटित इति मया चिन्तितम्, तत्किमिति नाश्वसिषि, तत्समीहितसिद्धये व्रज, अहं ते श्वश्रूनिकटे सर्व समर्थयिष्ये इति द्वारस्पर्शनव्याजेन इत्यपह्नत्या वस्तु । जोह्लाइ महुरसेण अ विइण्णतारुण्णउत्सुअमणा सा। बुढ्ढा वि णवोढव्विअ परवहुआ अहह हरइ तुह हिअअम् ।।९२।। [१७] ज्योत्स्नया भधुरसेन च वितीर्णतारुण्योत्सुकमना: सा। वृद्धापि नवोढेव परवधूरहह हरति तव हृदयम् ।। इति संस्कृतम्] अत्र काव्यललिङ्गेन वृद्धां परवधू त्वमस्मानुज्झित्वाऽभिलषसीति त्वदीयमाचरितं वक्तुं न शक्यमित्याक्षेपः परवधूपदप्रकाश्यः । एषु कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरः। वाक्यप्रकाश्ये तु पूर्वमुदाहृतम्। शब्दार्थोभयशक्त्युद्दवस्तु पदप्रकाश्यो न भवतीति पञ्चत्रिशद्देदाः ।
यहाँ नदीके किनारे लताकुञ्जमें सङ्गतस्थान नियत करके [समयपर वहाँ ] न पहुँचनेवाले [बादमें नायिकाके वहाँ प्रतीक्षा करनेके बाद वापिस आ जानेपर ] घरमें घुसते समय पीछे-पीछे आते हुए [उपपति ] को देखकर फिर नदीपर जानेके लिए व्याकुल होनेके कारण तुमने जान-बूझकर घड़ा फोड़ दिया यह मैं समझ गयी [ मया चिन्तितम् ], किन्तु तुम घबड़ाती क्यों हो, अपने कार्यकी सिद्धिके लिए निश्चिन्त होकर जाओ। तुम्हारी सासके सामने मैं सब समाधान कर दूगी यह [वस्तु ] द्वारके स्पर्शके बहानेसे, इस अपह्नति [अलङ्गार] से व्यक्त होती है। यहाँ अचेतन घटमें 'अपने आपको गिराकर फोड़ दिया' इस प्रकार चेतनधर्मका अध्यारोप किया गया है। अतः तन्मूलक अपह्नतिकी प्रोढोक्तिसिद्धता होनेसे यह कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध अलङ्कारसे वस्तुव्यङ्गयका उदाहरण है। अलङ्कारसे अलङ्गारकी व्यक्तिका उदाहरण आगे देते हैं- चाँदनी और मधु [अर्थात् वसन्त तथा मद्य ] के रससे जिसमें तारुण्यकी उमङ्ग आ गयी है वह वृद्धा परवधू भी नवोढाके समान तुम्हारे [मन] को हरण कर रही है यह बड़े आश्चर्यकी बात है ।६२।। [१७ ] यहाँ [परवधू होने मात्रसे ही वह तुम्हारे हृदयको हरण कर रही है इस ] काव्यलिङ्ग अलङ्गारसे तुम हमको [अर्थात् हमारी सरीखी नवयौवनाको ] छोड़कर बूढ़ी परवधूको चाह रहे हो, तुम्हारे इस आचरणको क्या कहा जाय यह समझमें नहीं आता है, यह आक्षेप [अलङ्गार] 'परवधू' पदसे प्रकाशित होता है। इन [चारों उदाहरणोंमें व्यञ्जक अर्थ ] कविनिबद्धवक्तप्रौढोक्तिमात्रसे सिद्ध है। [इस प्रकार ध्वनिकाव्यके सत्रह भेदोंके पदद्योत्य सत्ह उदाहरण यहाँ दिये गये हैं] वाक्यसे प्रकाश्य [इन सत्रह भेदों] के उदाहरण पहिले दिये जा चुके हैं। [इस प्रकार यहाँ तक ३४ प्रकारके ध्वनिकाव्यके
१. व्याकुलया।
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का० ४२, सू० ६० ] चतुर्थ उल्लास: १७५
[सू० ६० ] प्रबन्धेऽप्यर्थशक्तिभू: ॥४२॥ यथा गृधगोमायुसंवादादौ- अलं स्थित्वा रमशानेऽस्मिन्गृधगोमायुसङकुले। कङ्कालबहले घोरे सर्वप्राणिभयङ्करे ।।९३।। न चेह जीवितः कश्चित्कालधर्ममुपागतः । प्रियो वा यदि वा द्वेष्यः प्राणिनां गतिरीदृशी ।।९४।। इति दिवा प्रभवतो गृधस्य पुरुषविसर्जनपरमिदं वचनम्। उदाहरण दिये जा चुके हैं] शब्द तथा अर्थ उभयकी शक्तिसे उत्थित [ध्वनि तो केवल वाक्यसे द्योतित होनेके कारण ] पदप्रकाश्य नहीं होता है इसलिए [उक्त ३४ भेदोंके साथ इसके एक भेदको और बढ़ा देनेसे ध्वनिके] ३५ भेद होते हैं। अर्थशक्त्युत्थ-ध्वनिके प्रबन्धगत बारह भेद ध्वनिकाव्यके ५१ मुख्य भेद दिखलाने हैं। उनमेंसे यहाँतक पैंतीस भेदोंका विस्तार दिख- लाया गया है। आगे उसका और विस्तार दिखलायेंगे। ये जो पैंतीस भेद दिखलाये हैं इनमेंसे अर्थके शक्त्युत्थ-ध्वनिके १२ वाक्यद्योत्य तथा १२ पदद्योत्य भेद दिखलाये जा चुके, इनके अतिरिक्त उसके १२ प्रबन्धद्योत्य भेद भी होते हैं। इनको मिलाकर ३५+ १२=४७ भेद हो जाते हैं। प्रबन्धगत १२ भेदोंको आगे कहते हैं -- [सू० ६०]-अर्थशक्त्युत्थ [ध्वनि ]के प्रबन्धमें भी [बारह भेद और ] होते हैं। जैसे [महाभारतके शान्तिपर्व अ० १५३ में बिये हुए ] गिद्ध और शृगालके संवाद आदिमें [प्रबन्धगत अर्थशक्त्युत्थ-ध्वनि इस प्रकार पाया जाता है]- 'महाभारत' के शान्तिपर्वके १५३ वें अध्यायमें मरे बालकको देखकर, दिनमें ही मृतमांसके भक्षणमें समर्थ गिद्ध, उस बालकके सम्बन्धियोंको बालकको छोड़कर घर लौट जानेकी प्रेरणा करता हुआ कह रहा है -- गिद्धों तथा सियारोंसे भरे हुए, ठठरियोंसे परिपूर्ण, बीभत्स और सब प्राणियोंके लिए भयङ्गर श्मशानमें ठहरना व्यर्थ है ।६३।। [कालधर्म अर्थात् ] मृत्युको प्राप्त हुआ कोई व्यक्ति वह चाहे [ किसीका प्रिय ] मित्र हो या शत्रु हो, फिर जीवित नहीं हो सकता है [ या नहीं हुआ है], सब प्राणियोंकी [एक दिन] यही गति [होनी] है ।। ६४।I [केवल ] दिनमें [देखने और उस मांसभक्षणमें] समर्थ गिद्धका [मृत बालकके सम्बन्धी] पुरुषोंको बिदा करने-परक यह वचन है। इसके विपरीत रात्रिमें देख सकने और गिद्ध आदिके विघ्नोंसे रहित निश्चिन्त होकर भक्षण/ करनेमें समर्थ शृगाल यह चाहता है कि ये लोग अभी सूर्यास्त होनेतक यहाँ बैठे रहें ताकि उनके रहनेसे गिद्ध आदि इस बालकके मृत शरीरको न खा सकें और सूर्यास्तके बाद गिद्ध आदिके असमर्थ हो जानेसे साराका सारा मुझे निश्चिन्त होकर खानेको मिल जाये। इसलिए वह उस मृत बालकके सम्बन्धियोंको समझाता हुआ कह रहा है-
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१७६ काव्यप्रकाश: [का० ४३, सू० ६१
आदित्योऽयं स्थितो मूढा: स्नेहं कुरुत साम्प्रतम्। बहुविघ्नो मुहर्तोऽयं जीवेदपि कदाचन ।।९५।। अमुं कनकवर्णाभं बालमप्राप्तयौवनम् गृधवाक्यात् कथं मूढास्त्यजध्वमविशङ्ङिताः ॥९६।। इति निशि विजृम्भमाणस्य गोमायोर्जनव्यावर्त्तननिष्ठं च वचनमिति प्रबन्ध एव प्रथते। अन्ये त्वेकादश भेदा ग्रन्थविस्तरभयान्नोदाहृताः । स्वयन्तु लक्षणतोऽनुसर्त्तव्याः। अपिशब्दात् पदवाक्ययोः । [६१]पदैकदेशरचनावर्णेष्वपि रसादयः ।
अरे मूर्खो [अभीसे क्यों भागे जा रहे हो ] देखो, अभी सूर्य स्थित है। अभी इसको प्रेम करो। यह मुहर्त बहुत-से विघ्नोंसे पूर्ण है। [इस विध्नमय मुहर्तके टल जानेपर ] कदाचित् यह फिर जी उठे ॥६५॥ सोनेके समान वर्णवाले और यौवनको [भी] न पहुँचे हुए इस बालकको गिद्धके कहनेसे हे मूर्खो, तुम निःशङ्ग होकर कैसे छोड़े जाते हो ॥।६६।। [विशेष रूपसे ] रात्रिमें समर्थ होनेवाले शृगालका [मृत बालकके सम्बन्धी ] लोगोंको रोकने- परक यह वचन है। यह [इस प्रकारका अर्थशक्त्युन्दव-ध्वनि ] प्रबन्धमें ही प्रतीत होता है। [प्रबन्धगत अर्थशक्त्युद्द्व-ध्वनिके बारह भेदोंमेंसे यहाँ केवल एक भेदका उदाहरण दिया है] ग्रन्थके विस्तारके भयसे शेष ग्यारह भेदोंके उदाहरण नहीं दिये गये हैं। लक्षणके अनुसार स्वयं समझ लेने चाहिये। ['प्रबन्धेऽप्य- थंशक्तिभू:' इस सूत्र ६० में आये हुए] 'अपि' शब्दसे [यह सूचित होता है कि अर्थशक्त्युद्धवध्वनि ] पद तथा वाक्यमें भी [होता है]।
आधारभेदसे रसादि ध्वनिके चार भेद इस प्रकार यहाँतक ध्वनिकाव्यके ३५+ १२=४७ भेद गिनाये जा चुके हैं। ध्वनिके मुख्य ५१ भेदोंमें चार भेदोंकी अभी कमी रह गयी है। उनकी गणना अगले सूत्रमें करते हैं। रसादिमें ध्वनिका पहिले केवल एक ही भेद गिना गया था। उसके पदगत तथा वाक्यगत भेदोंकी गणना उसीके अन्तर्गत आ गयी है। परन्तु उनके अतिरिक्त १. पदके एकदेशमें अर्थात् प्रकृति, प्रत्यय, उपसर्ग आदिमें, २. दीर्घमासादि-रूप रचना अथवा वैदर्भी आदि रीति-रूप रचनामें, ३. वर्णोंमें और अपि शब्दसे ४. प्रबन्धमें भी हो सकता है। इस प्रकार १. पदैकदेश, २. रचना, ३. वर्ण और ४. प्रबन्धगत रसादिके चार और भेदोंको मिलाकर ध्वनिके कुल ४७+४ = ५१ भेद हो जाते हैं। उन्हींको आगे दिखलाते हैं- [सू० ६१]-१. पदके एकदेश [प्रकृति-प्रत्यय आदि], २. रचना और ३. वर्णोंमें [और अपि शब्दसे ४. प्रबन्धमें ] भी रस आदि [असंलक्ष्यकरमव्यङ्गय-ध्वनि ] होता है। धातुरूप प्रकृति द्वारा रसकी व्यञ्जकता उनमेंसे [तिङन्त पदकी ] प्रकृतिसे [रसकी व्यञ्जकता] जैसे --
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का० ४३, सू० ६ ] चतुर्थ उल्लास: १७७ रइकेलिहिअणिअसणकरकिसलअरुद्धणअणजुअलस्स । g F Fniiस रुट्टस्स तइअणअणं पव्वईपरिचुँबिअं जअइ ।९७।। [रतिकेलिहृतनिवसनकरकिसलयरुद्धनयनयुगलस्य । रुद्रस्य तृतीयनयनं पार्वतीपरिचुम्बितं जयति ॥ इति संस्कृतम्] अत्र जयतीति न तु शोभते इत्यादि । समानेऽपि हि स्थगनव्यापारे लोकोत्तरेणैव व्यापारेणास्य पिधानमिति तदेवोत्कृष्टम् ।
यथा वा- प्रेयान् सोऽयमपाकृतः सशपथं पादानतः कान्तया द्वित्राण्येव पदानि वासभवनाद्यावन्न यात्युन्मनाः । तावत्प्रत्युत पाणिसंपुटगलन्नीवीनिबन्धं धृतो धावित्वैव कृतप्रणामकमहो प्रेम्णो विचित्रा गतिः ।।९८।।
रतिकीडाके समय [पार्वतीके ] वस्त्रका अपहरण [कर उनको नंगी ] करनेवाले और [पार्वतीके द्वारा] करकिसलयोंसे मू दी हुई आँखोंवाले शिवका पार्वतीके द्वारा परिचुम्बित [करके ढका गया] तीसरा नेत्र सर्वोत्कर्षयुक्त है।६७।। यहाँ जयति यह [जि धातुका प्रयोग रसका विशेषरूपसे व्यञ्जक है। इसलिए कविने उसीका प्रयोग किया है, न कि उसके समानार्थक ] शोभते आदि [का प्रयोग, क्योंकि वह रसका व्यञ्जक ] नहीं है। [यहाँ शिवजीके तीनों नेत्रोंके ] बन्द करनेका व्यापार समान होनेपर भी [चुम्बनरूप ] लोकोत्तर व्यापारसे इस [तृतीय-नेत्र ]को बन्द किया गया है यही उसका [अन्योंकी अपेक्षा ] उत्कृष्टत्व है। इसीके कारण यहाँ 'जयति' पदका प्रयोग किया गया है। यह धातुरूप प्रकृतिके व्यञ्जकत्वका उदाहरण है। प्रातिपदिक द्वारा रसकी व्यञ्जकता पदैकदेशके रूपमें तिङन्त पदके एकदेश अर्थात् जि धातुके द्वारा रसव्यञ्जकत्वका उदाहरण 'रतिकेलि' आदि अभी दिया था। अब सुबन्त पदके एकदेश अर्थात् प्रातिपदिकके व्यञ्जकत्वका उदाहरण आगे देते हैं। इसमें 'पदानि' इस पदके एकदेश 'पद' इस प्रातिपदिकरूप अंशसे सम्भोग-शृङ्गारकी विशेषरूपसे अभिव्यक्ति होती है। अथवा जैसे [प्रातिपदिकरूप प्रकृतिके व्यञ्जकत्वका दूसरा उदाहरण ]- नायिकाने [मैं सत्य कहता हूँ कि मैं अब कभी किसी अन्य स्त्रीके पास नहीं जाऊँगा इस प्रकारकी ] शपथपूर्वक [पूर्वापराधकी क्षमाप्राप्तिके लिए नायिकाके ] पैरोंपर झुके हुए उस अत्यन्त प्रेमास्पद प्रियतमको फटकार दिया, जिससे खिन्न होकर [बिचारा चल दिया परन्तु ] जबतक दो-तीन पग भी न जा पाया था कि तबतक [सम्भोगके उत्कट अभिलाषके कारण ] खुली जा रही नीवी [ लँहगेकी गाँठ ] को [प्रणाम करनेके लिए जोड़े हुए ] हाथोंसे थामे हुए और प्रणाम करते हुए दौड़कर उसको रोक लिया। अहो प्रेमकी बड़ी विचित्र गति है।।६८।। १२
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१७८ काव्यप्रकाश: [का० ४३, सू० ६५
अत्र पदानीति न तु द्वाराणि। तिङसुपोर्यथा- पथि पथि शुकचञ्चूचारुराभाङकुराणां दिशि दिशि पवमानो वीरुधां लासकश्च। नरि नरि किरति द्राक् सायकान पुष्पधन्वा पुरि पुरि विनिवृत्ता मानिनीमानचर्चा ।।१९।। अत्र किरतीति किरणस्य साध्यमानत्वम्, निवृत्तेति निवर्त्तनस्य सिद्धत्वं तिङतिडा सुपा च। तत्रापि क्तप्रत्ययेनाऽतीतत्वं द्योत्यते।
यहाँ [दो-तीन ] 'पग' न कि [दो-तीन ] द्वार, इस [कथन ]से [नायिकाके उत्कट सम्भोगाभिलाष और उसके द्वारा सम्भोगशृङ्गार रसकी अभिव्यक्ति होती है, इसलिए यह प्रातिपदिकरूप पदैकदेश या प्रकृतिकी रसव्यञ्जकताका उदाहरण है]। प्रत्ययांश द्वारा सम्भोगशृङ्गारको व्यञ्जकता यहाँ पदैकदेशकी रसव्यञ्जकताके उदाहरण दे रहे हैं। पदका लक्षण पाणिनि मुनिने 'सुप्ति- ङन्तं पदम्' अर्थात् सुबन्त और तिडन्तको पद कहते हैं इस प्रकारका किया है। इन दोनों प्रकारके सुबन्त और तिङन्त पदोंके प्रकृतिभाग अर्थात् धातु तथा प्रातिपदिककी रसव्यञ्जकताके दो उदाहरण दिखला दिये। अब उन दोनोंके प्रत्ययांशकी रसव्यञ्जकताका उदाहरण आगे देते हैं। तिङ् और सुप् [रूप प्रत्ययोंके व्यञ्जकत्व] का [ उदाहरण] जैसे -- [वसन्त ऋतुके कारण] प्रत्येक मार्गमें तोतोंकी चोंचके समान [लाल-लाल नवीन ] उगे हुए अङकुरोंकी सुन्दर कान्ति [दिखलायी दे रही] है, चारों ओर लताओंको नचानेवाला वायु [बह रहा] है, कामदेव हर एक पुरुषके ऊपर बाणोंका प्रहार कर रहा है और प्रत्येक नगरमें मानिनियोंके मानकी चर्चा समाप्त हो गयी है ।६६।। यहाँ 'किरति इससे [तिङन्त क्रियापदमें क्रियाके सदा साध्यरूप होनेसे तिङ्रूप प्रत्यायांश द्वारा कामदेवके बाणोंके किरण अर्थात्] विक्षेपकी साध्यमानता और 'निवृत्ता' इस [सुबन्तपद ] से [मानिनियोंकी मानचर्चा हीके ] समाप्त हो चुकनेका सिद्धत्व [कमशः ] तिङ और सुप् प्रत्ययोंसे [व्यक्त होता है] और उसमें भी 'विनिवृत्ता' इस [पदमें भूतार्थक] क्त-प्रत्ययसे [मानचर्चाका ] अतीतत्व द्योतित होता है। इसका अभिप्राय यह है कि अभी कामदेवने पुरुषोंके ऊपर अपने बाण चलाये भी नहीं हैं, शीघ्र चलायेगा अर्थात् पुरुषोंमें तो अभी कामवासनाका उदय भी नहीं हो पाया है, परन्तु स्त्रियाँ उसके बहुत पहले ही अपनी मानचर्चा भूलकर सम्भोगके लिए आतुर हो उठी हैं। यह बात 'किरति' के तिङ, 'विनि- वृत्ता' के सुप्-प्रत्यय और विशेषकर क्त-प्रत्ययसे द्योतित होती है। क्योंकि क्त-प्रत्यय 'भूते' इस सूत्रसे भूत- कालके अरथमें ही होता है। इसलिए 'विनिवृत्ता' पदके क्त-प्रत्ययसे मानचर्चा अब कहीं नहीं रही, वह अनीतका विषय बन चुकी, यह बात द्योतित होती है। उधर पुरुषोंके साथ 'किरति' पदके प्रयोगसे और क्रियाके साध्यरूप होनेसे पुरुषोंपर कामदेवके बाणोंका प्रहार अभी 'साध्य' है, अर्थात् 'आगे होगा' यह बात प्रतीत होती है।
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का० ४३, सू० ६१] चतुर्थ उल्लाश: १७६
बथा वा- श्री लिखन्नास्ते भूमि बहिरवनतः प्राणदयितो निराहारा: सख्यः सततरुदितोच्छूननयनाः । परित्यक्तं सर्व हसितपठितं पञ्जरशुक- स्तवावस्था चेयं विसृज कठिने मानमधुना ॥१००॥ अत्र लिखन्निति न तु लिखतीति तथा आस्ते इति, न त्वासित इति अपि तु प्रसादपर्यन्तमास्ते इति भूमिमिति न तु भूमाविति न हि बुद्धिपूर्वकमपरं किञ्चिल्लिख- तीति तिङसुब्विभक्तीनां व्यङ्गयम्। सम्बन्धस्य यथा- गामारुहम्मि गामे वसामि णअरठ्ठइं ण जाणामि। णाअरिआणं पइणो हरेमि जा होमि सा होमि ॥१० १।।
प्रत्ययांश द्वारा विप्रलम्भशृङ्गारकी व्यञ्जना सुप् तथा तिङ रूप प्रत्ययांशों द्वारा सम्भोगशृङ्गारकी व्यञ्जनाका उदाहरण दिया था। अब विप्रलम्भशृङ्गारकी अभिव्यक्तिका उदाहरण देते हैं। यह श्लोक 'अमरुकशतक' का है। उसमें बहुत दिनोंसे नायकसे रूठी हुई नायिकाको मनानेके लिए उसकी सखी उसको समझाते हुए कह रही है कि- अथवा [प्रत्यय द्वारा विप्रलम्भभृङ्गारकी व्यञ्जकता] जैसे -- तुम्हारे प्राणप्रिय बाहर सिर झुकाये [निरुद्देश्यभावसे ] भूमिको कुरेद रहे हैं [ उनके दुःखसे दुःखी तुम्हारी सारी] सखियाँ भोजन भी त्याग बँठी हैं और हर समय रोते रहनेसे उनकी आँखें सूज गयी हैं [ न केवल हम लोगोंकी यह अवस्था है अपितु ] पिंजड़ेके तोतोंने हँसना और पढ़ना सब-कुछ छोड़ दिया है [ तुम्हारे सारे प्रिय सम्बन्धियोंकी तो तुम्हारे मानके कारण यह दुर्दशा हो रही है] और तुम्हारी यह अवस्था है [ कि तुम मान छोड़नेका नाम ही नहीं ले रही हो]। हे कठोरहृदये, अब तो मानको छोड़ दो॥१०० ।। यहाँ 'लिखन्' यह [कहा है] न कि 'लिखति' यह [लिखन् इस शत्प्रत्ययसे लिखन क्रियाकी अप्रधानतासे उसके अतात्पर्यविषयत्व तथा अबुद्धिपूर्वकत्वकी सूचना मिलती है। अर्थात् कुछ लिख नहीं रहा है अपितु किंकर्त्तव्यविमूढ़ अवस्थामें यों ही बैठा हुआ जमीन कुरेद रहा है] उसी प्रकार 'आस्ते' बैठा हुआ है यह [कहा है ] न कि 'आसितः' बैठ गया यह [कहा है, इससे प्रारब्ध कामकी असमाप्तताके बोधक वर्तमानकालिक तिङ् प्रत्ययसे ] तुम्हारे प्रसन्न होनेतक इसी प्रकार बैठा रहेगा यह बात ध्वनित होती है। और 'भूमिम्' भूमिको यह [कहा है] न कि 'भूमौ' अर्थात् भूमिपर यह [इससे यों ही जमीनको कुरेद रहा है] बुद्धिपूर्वक और कुछ [विशेष बात] नहीं लिख रहा है। यह तिड-सुप् विभक्तियोंसे व्यङ्गय है। सम्बन्ध [अर्थात् षष्ठी विभक्तिके रसव्यञ्जकत्व]का [उदाहरण ] जैसे --
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१८० काव्यप्रकाश: [का० ४३, सू० ६५ [ग्रामरुहास्मि ग्रामे वसामि नगरस्थिति न जानामि। नागरिकाणां पतीन् हरामि या भवामि सा भवामि ॥ इति संस्कृतम् ] अत्र नागरिकाणामिति षष्ठयाः । 'रमणीय: क्षत्रियकुमार आसीत्' इति कालस्य। एषा हि भग्नमहेश्वरकार्मुकं दाशरथि प्रति कुपितस्य भार्गवस्योक्तिः । वचनस्य यथा- P1S ताणं गुणग्गहणाणं ताणुक्कंठाणं तस्स पेम्मस्स। ताणं भणिआणं सुन्दर ! एरिसिअं जाअमवसाणम् ॥१०२। [तेषां गुणग्रहणानां तासामुत्कण्ठानां तस्य प्रेम्णः । तासां भणितीनां सुन्दरेदृशं जातमवसानम् ।। इति संस्कृतम् ] अत्र गुणग्रहणादीनां बहुत्वं प्रेम्णश्चैकत्वं द्योत्यते।
मैं ग्राममें पैदा हुई हूँ, गाँवमें रहती हूँ, इसलिए नगरकी चातुर्यभरी बातें नहीं जानती हूँ, परन्तु नागरिकाओंके पतियोंको वशमें कर लेती हूँ; मैं तो जो हूँ सो हूँ ही॥१०१॥ यहाँ 'नागरिकाणां पतीन्' इस सम्बन्धसे नागरिकाओंसे उनके पतियोंके चातुर्यका और उनको भी अपने वशमें कर लेनेसे अपने चातुर्यातिशयका बोधन व्यङ्गय है। 'षष्ठी चानादरे' २-३-६८ सूत्रसे अनादरार्थमें षष्ठी होनेसे तुम्हारी सरीखी नागरिकताका दम भरनेवालियोंके सामने उनके देखते-देखते उनके पतियोंको अपने वशमें कर लेती हूँ इस प्रकार अपना उत्कर्ष व्यङ्गय है। यहाँ 'नागरिकाणां' इस षष्ठी विभक्तिकी [रसव्यञ्जकता है]। प्रत्ययांश द्वारा रौद्ररसकी अभिव्यक्ति ये दो उदाहरण प्रत्ययांशकी शृङ्गाररसव्यञ्जकताके दिये हैं। आगे प्रत्ययांश द्वारा रौद्ररसकी व्यञ्जकताका उदाहरण देते हैं- नू 'क्षत्रिकुमार [रामचन्द्र ] सुन्दर था'। यहाँ ['आसीत्' पदसे सूचित भूत] कालकी [रौद्ररसव्यञ्ज- कता है]। यह 'महावीरचरित' नामक नाटकमें ] शिव-धनुषको तोड़ चुके रामचन्द्रके प्रति कुपित हुए परशुरामका वचन है। यहाँ कुपति हुए परशुरामके इस वचनसे धनुष तोड़नेके पहिले रामचन्द्र रमणीय था, अब नहीं है, यह प्रतीत होता है। उससे क्षणभरमें ही इसको मार डालँगा इस प्रकारका परशुरामका करोधातिशय सूचित होता है। इसलिए तिडन्त 'आसीत्' पदके प्रत्ययांश लङ्-लकारसे रौद्ररस व्यङ्गय है। वचनकी व्यञ्जकताका उदाहरण वचन [बोधक प्रत्ययरूप अंशकी रसव्यञ्जकता ] का [उदाहरण ] जैसे -- हे सुन्दर, उन [ पूर्वकालिक ] गुणग्रहणोंकी, उन उत्कण्ठाओंकी, उस प्रेमकी और [उस समयके] उन वचनोंकी आज इस प्रकारकी परिसमाप्ति हुई है॥१०२। यहाँ गुणग्रहण आदिका बहुत्व [नानाविधत्व ] और प्रेमका [सदा समानरूपमें रहनेसे ] एकविधत्व [कमशः बहुवचन तथा एकवचनसे ] द्योत्य है।
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का० ४३, सू० ६१] चतुर्थ उल्लास: १८१
पुरुषव्यत्ययस्य यथा- रे रे चञ्चललोचनाञ्चितरुचे ! चेतः ! प्रमुच्य स्थिर- प्रेमाणं महिमानमेणनयनामालोक्य किं नृत्यसि। किं मन्ये विहरिष्यसे बत हतां मुञ्चान्तराशामिमा- मेषा कण्ठतटे कृता खलु शिला संसारवारान्निधौ॥१०३॥ अत्र प्रहासः । पूर्वनिपातस्य यथा- येषां दोर्बलमेव दुर्बलतया ते सम्मतास्तैरपि प्रायः केवलनीतिरीतिशरणैः कार्य किमुर्वीश्वरैः । ये क्ष्माशकर ! पुनः पराक्रमनयस्वीकारकान्तक्रमा- स्ते स्युर्नैव भवादृशास्त्रिजगति द्वित्राः पवित्राः परम् ॥१०४॥ अत्र पराक्रमस्य प्राधान्यमवगम्यते।
[प्रत्यांशरूप ] पुरुषके परिवर्तनका [रसव्यञ्जकत्वका उदाहरण ] जैसे- [किसी सुन्दरीको देखकर कुछ कालके लिए क्षुब्ध हुए किसी विरक्त पुरुषकी अपने मनके प्रति यह उपहासपरक उक्ति है। वह अपने मनका सम्बोधन करके कह रहा है कि-] चपलनयना सुन्दरीकी इच्छा करनेवाले अरे दुष्ट मन ! [ परमात्माके ] स्थिर प्रेमको छोड़कर इस अत्यन्त चञ्चल मृगनयनीको देखकर क्यों नाच रहा है ? क्या तू सोचता है कि मैं इसके साथ विहार करूँगा ? अरे अभागे, इस आन्तरिक अभिलाषको छोड़ दे। यह [स्त्री अथवा सम्भोगकी इच्छा ] संसारसागरमें [डुबानेके लिए ] गलेमें बाँधी गयी पत्थरकी शिला है।१३। यहाँ [ पुरुषव्यत्ययसे ] प्रहास [व्यङ्गच है]। श्लोकके तृतीय चरणमें 'किं मन्ये विहरिष्यसे' यह प्रयोग है। इसका अभिप्राय 'त्वं मन्यसे अहं विहरिष्ये' होता है। यहाँ 'त्वम्' मध्यम पुरुषके साथ 'मन्ये' इस उत्तम पुरुषका और 'अ्रहम्' इस उत्तम पुरुषके साथ 'विहरिष्यसे' इस मध्यम पुरुषकी क्रियाका प्रयोग किया गया है। साधारण नियमके अपनुसार 'त्वं मन्यसे' 'अहं विहरिष्ये' इस प्रकारका प्रयोग होना चाहिये था। परन्तु पाणिनि मुनिने 'प्रहासे च मन्योपपदे मन्यतेरुत्तमकवच्च' १-४-१०६ सूत्रसे प्रहासके द्योत्य होनेपर 'मन्यति' अर्थात् मन धातुके उपपद रहते पुरुषव्यत्ययका विधान कर मध्यम पुरुषके स्थानपर उत्तम पुरुषका और उत्तम पुरुषके स्थानपर मध्यम पुरुषका प्रतिपादन भी किया है। इसीके अनुसार यहाँ पुरुषका व्यत्यय किया गया है और उस पुरुषव्यत्ययसे प्रहास व्यङ्गय है। पूर्वनिपातकी [रसव्यञ्जकताका उदाहरण ] जैसे- हे राजन् ! जिन [राजाओं]के पास केवल बाहुबल ही है [ नीतिबल नहीं है] वे भी दुर्बल माने जाते हैं, और केवल नीतिमार्गका अवलम्बन करनेवाले [ बाहुबलसे रहित ] उन [दूसरे प्रकारके ] राजाओंसे भी क्या लाभ [केवल नीतिबलपर आश्रित रहनेवाले राजा भी श्रेष्ठ नहीं कहे जा सकते
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१८२ काव्यप्रकाश: [का० ४३, सू० ६१ विभक्तिविशेषस्य यथा- प्रधनाध्वनि धीर धनुर्ध्वनिभृति विधुरैरयोधि तव दिवसम्। दिवसेन तु नरप भवानयुद्ध विधिसिद्धसाधुवादपदम् ॥१०५।। अत्र 'दिवसेन' इति अपवर्गतृतीया फलप्राप्ति द्योतयति।
हैं] किन्तु हे पृथ्वीन्द्र, पराक्रम और नीति [दोनों ] को स्वीकार कर सुन्दररूपसे आचरण करनेवाले [जो राजा होते हैं वे ही राजा प्रशंसाके योग्य होते हैं परन्तु ] संसारमें आपके समान पवित्र वे राजा दो-तीनसे अधिक नहीं निकलेंगे ॥१०४। यहाँ [पूर्वनिपात ] से पराक्रमका प्राधान्य सूचित होता है। यहाँ 'पराक्रमनयस्वीकारकान्तक्र्माः' इस समस्त पदमें 'पराक्रम' तथा 'नय' पदोंमेंसे 'नय' पदके अल्पाच्तर अर्थात् कम स्वर-वर्णवाला होनेके कारण 'अल्पाच्तरम्' २-२-३४ इस सूत्रसे पूर्वनिपात होकर 'नय-पराक्रम' पद बनना चाहिये था। परन्तु 'अभ्यहितञ्च' इस वार्तिकसे परात्रमको अभ्यहित अर्थात् श्रेष्ठ मानकर उसका पूर्वनिपात किया गया है। इसलिए यहाँ पराक्रम शब्दके पूर्वनिपातसे उसका अभ्यहितत्व अर्थात् प्राधान्य व्यङ्गय है। विभक्तिकी व्यञ्जकताका उदाहरण विभक्तिविशेष [की रसव्यञ्जकता]का [उदाहरण ] जैसे- हे धीर राजन्, धनुषोंकी टड्गारसे युक्त समरमार्गमें तुम्हारे [विधुरैः ] शत्रुओंने सारे दिन युद्ध किया [पर विजय नहीं मिली ], किन्तु ब्रह्मा और सिद्धगणोंके साधुवादके साथ आपने एक ही दिनमें [विजय कर] युद्ध समाप्त कर दिया॥१०५।। यहाँ 'दिवसेन' यह अपवर्ग-तृतीया फलप्राप्तिको सूचित करती है। यहाँ पूर्वार्द्धमें तव 'विधुरै: दिवसम् अरयोधि' और उत्तरार्द्धमें 'भवान् दिवसेन अर्प्रयुद्ध' ये प्रयोग किये गये हैं। इनमेंसे 'दिवसम् अयोधि' में 'कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे' २-३-५ इस सूत्रसे अत्यन्त-संयोगमें द्वितीया विभक्ति हुई है। इसलिए उससे शत्रुओंका युद्धमें दिवसभरका अत्यन्त संयोग अरथात् सारे दिन युद्धमें लगे रहनेपर भी विजय प्राप्त न कर सकना सूचित होता है। दूसरी ओर 'दिवसेन अयुद्ध'में 'अपवर्गे तृतीया' २-३-६ इस सूत्रसे अपवर्ग अरथात् फलप्राप्ति अर्थमें तृतीया विभक्ति हुई है। इसलिए यहाँ तृतीया विभक्तिसे विजयरूप फलकी प्राप्ति सूचित होती है। इसलिए यह श्लोक विभक्तिरूप पदैकदेशकी रसव्यञ्जकताका उदाहरण है। आगे क-रूप तद्धित-प्रत्ययकी रसव्यञ्जकताका उदाहरण देते हैं। यह श्लोक 'मालतीमाधव' नाटकके प्रथम अङ्डसे लिया गया है। 'कथितमेव नो मालतीधात्या लवङ्गिकया' इस गद्यांशके बाद निम्नलिखित श्लोक दिया गया है। इसके अन्तमें 'अङ्गकैस्ताम्यतीति' यह वाक्यांश आया है। उसमें 'अङ्गकैः' पदमें जो क-प्रत्ययरूप तद्धितका प्रयोग हुआ है वह अनुकम्पा अर्थमें हुआ है। इसलिए यहाँ अनुकम्पाके द्योतक कप्रत्ययरूप तद्धितसे विप्रलम्भशृङ्गाररस व्यक्त होता है। इस अभिप्रायसे ग्रन्थ- कारने यह उदाहरण दिया है। श्लोकका अर्थ निम्नलिखित प्रकार है-
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का० ४३, सू० ६१] चतुर्थ उल्लास: १८३
भूयो भूय: सविधनगरीरथ्यया पर्यटन्त दृष्ट्वा दृष्टवा भवनवलभीतुङ्गवातायनस्था। साक्षात् कामं नवमिव रतिर्मालती माधवं यद् गाढोत्कण्ठाललितलुलितैर ङ्गकस्ताम्यतीति ॥१०६।। अत्र अनुकम्पावृत्तेः क-रूपतद्धितस्य। परिच्छेदातीतः सकलवचनानामविषय पुनर्जन्मन्यस्मिन्ननुभवपथं यो न गतवान्। विवेक प्रध्वंसादुपचितमहामोहगहनो विकार: कोऽप्यन्तर्जडयति च तापं च कुरुते॥१०७॥ अत्र प्र-शब्दस्योपसर्गस्य । कृतं च गर्वाभिमुखं मनस्त्वया किमन्यदेवं निहताश्च नो द्विषः । तमांसि तिष्ठन्ति हि तावदंशुमान् न यावदायात्युदयाद्रिमौलिताम् ।१०८।
[वलभी ] छज्जेपरके ऊँचे झरोखोंमें खड़ी होकर पासकी, नगरीकी सड़कपर बार-बार घूमते हुए साक्षात् कामदेवके समान माधवको देख-देखकर गाढ़ उत्कण्ठाके कारण अत्यन्त खिन्न [मालती] अनुकम्पनीय अङ्गोंसे मुरझायी जा रही है ॥१०६।। यहाँ अनुकम्पासूचक क-रूप तद्धित [विप्रलम्भभृङ्गारका व्यञ्जक ] है। उपसर्गकी व्यञ्जकता प्रकृतिके एकदेश उपसर्गकी विप्रलम्भशृङ्गारव्यञ्जकताका उदाहरण आगे देते हैं, यह श्लोक भी 'मालतीमाधव' नाटकके प्रथम अङ्गसे लिया गया है। इसमें माधव अपने मित्र मकरन्दसे अपनी काम अवस्थाका वर्णन करते हुए कहता है कि- कोई अद्भुत [प्रकारका कामज ] विकार, जिसकी व्यापकता [अथवा समाप्ति]का कोई ठिकाना नहीं है, जो किसी प्रकार शब्दों द्वारा नहीं कहा जा सकता है, जो इस जन्ममें और कभी अनुभवमें नहीं आया, और विवेकका समूल नाश करके महान् अज्ञानको बढ़ाकर दुर्लध्य हो गया है इस प्रकारका कोई अनिवंचनीय [कामज ] विकार अन्तःकरणको विवेकशून्य [जड़ ] बना रहा है और सन्ताप दे रहा है॥१०७॥ यहाँ [प्रध्वंस पदमें ] प्र-शब्दरूप उपसर्ग [विप्रलम्भ-व्यञ्जक है ]। निपातकी व्यञ्जकता आगे निपातकी रसव्यञ्जकताका उदाहरण देते हैं- [हे राजन् ] आपने अहङ्गारकी ओर मुख किया नहीं कि अधिक क्या कहें उसके साथ ही हमारे शत्रु मारे गये। अन्धकार [संसारमें ] तभीतक रहता है जबतक सूर्य उदयाचलके शिखरपर नहीं आता है ॥१६८॥
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१८४ काव्यप्रकाश: [ का० ४३, सू० ६१
अत्र तुल्योगिताद्योतकस्य 'च' इति निपातस्य । रामोडसौ भुवनेषु विक्रमगुणैः प्राप्तः प्रसिद्धि परा- मस्म्द्ाग्यविर्ययाद्यदि परं देवो न जानाति तम्। बन्दीवैष यशांसि गायति मरुद् यस्यैकबाणाहति- श्रेणीभूतविशालतालविवरोद्गीणै : स्वरैः सप्तभिः ॥१०९॥ अत्र 'असौ' इति, 'भुवनेषु' इति, 'गुणैः' इति सर्वनाम-प्रातिपदिक-वचनानाम्, न त्वदिति, न मदिति अपितु 'अस्मद्' इत्यस्य सर्वाक्षेपिणो 'भाग्यविपर्ययात्' इत्यन्यथा- सम्पत्तिमुखेन न त्वभावमुखेनाभिधानस्य। तरुणिमनि कलयति कलामनुमदनधनुभ्रुवोः पठत्यग्रे। अधिवसति सकलललनामौलिमियं चकितहरिणचलनयना ।।११०।
यहाँ [गर्वाभिमुख होने अर्थात् युद्धमें प्रवृत्त होने और शत्रुओंके वधकी समकालताके द्योतक] तुल्ययोगिता [अलङ्कार] के सूचक 'च' इस निपातकी [वीररसव्यञ्जकता है ]। अनेक प्रत्ययांशोंकी वीररसव्यञ्जकता आगे अनेक पदकदेशोंके वीररसव्यञ्जकत्वका उदाहरण देते हैं। यह श्लोक 'राघवानन्द' नामक नाटकसे लिया गया है। उसमें विभीषण रावणसे कह रहा है कि- वह रामचन्द्र अपने पराक्रम तथा गुणोंसे [तीनों] लोकोंमें अत्यन्त प्रसिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं। परन्तु यदि आप [जैसा कि अहङ्कारवश आप कह रहे हैं] एक बाणके प्रहारसे पंक्तिबद्ध [सात] विशाल ताल-वृक्षोंमें उत्पन्न [सात ] छिद्रोंसे निकलते हुए सात स्वरोंसे वायु बन्दीके तुल्य जिसके यशका गान कर रहा है उसको नहीं जानते हैं तो यह हमारे दुर्भाग्यसे ही है॥१०६॥ यहाँ 'असौ' इस [सर्वनाम], 'भुवनेषु' इस [प्रातिपदिक ] और 'गुणैः' इस [बहुवचनरूप ] सर्वनाम, प्रातिपदिक और वचनका [करमशः व्यञ्जकत्व है। इसी प्रकार 'अस्मद्भ्ाग्यविपर्ययात्' में 'त्वत्' या 'मत्' न कहकर 'अस्मत्' पदके प्रयोगसे ] केवल तुम्हारे या मेरे नहीं अपितु सबका अन्तर्भाव कर लेनेवाले 'अस्मत्' इस पदका और 'भाग्यविपर्ययात्' इस पदसे [अन्यथासम्पत्ति अर्थात् ] भाग्यके उलट जानेसे न कि अभाग्यसे [अभावमुखेन ] इस प्रकारसे [व्यङ्गचार्थबोधन द्वारा ] कथनका [व्यञ्जकत्व है ] । अनेक प्रत्ययांशोंकी शृङ्गारव्यञ्जकता इसमें अनेक पदांशोंसे वीररसकी अभिव्यञ्जना होती है। इसी प्रकार आगे अनेक पदांशों द्वारा शृङ्गाररसकी अभिव्यञ्जनाका उदाहरण देते हैं- नवयौवनका उदय होनेपर [नायिकाकी ] भौंहोंके, कामदेवके धनुषके समीप बैठ कर [गुरु- स्वरूप कामदेवके धनुषसे कलाओंको ] पढ़नेपर भयभीत [चकित ] हरिणके समान चञ्चल नेत्रवाली यह [नायिका ] समस्त सुन्दरियोंकी शिरोभूषणताको प्राप्त हो रही है॥११०॥
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का० ४३, सू० ६१] चतुर्थ उल्लास: १८५
अत्र इमनिज्-अव्ययीभाव-कर्मभूताधाराणां स्वरूपस्य । तरुणत्वे इति, धनुषः समीपे इति, मौलौ वसतीति त्वादिभिस्तुल्ये एषां वाचकत्वे अस्ति कश्चित्स्वरूपस्य विशेषो यश्चमत्कारकारी स एव व्यञ्जकत्वं प्राप्नोति। एवमन्येषामपि बोद्धव्यम् । वर्णरचनानां व्यञ्जकत्वं गुणस्वरूपनिरूणे उदाहरिष्यते अपिशब्दात् प्रबन्धेषु नाटकादिषु ।
यहाँ [तरुणिमनिमें ] इमनिच् [प्रत्यय, 'अनुमदनधनुः' इस पदमें 'मदनधनुषः समीपे इति अनुमदनधनुः' इस प्रकारका ] अव्ययीभाव [समास और 'मौलि' इस पदमें ] कर्मभूत आधार [इन तीनों] के स्वरूपका शृङ्गारव्यञ्जकत्व ] है। [तरुणिमनि इस इमनिच्-प्रत्ययान्तके स्थानपर] 'तरुणत्वे' इस [प्रयोगमें ], [ 'अनुमदनधनुः' इस अव्ययीभाव समासके स्थानपर ] धनुषः समीपे [ धनुषके पास ], इस [प्रयोगमें ] और [ 'मौलिमधि- वसति' इसमें 'उपान्वध्याङवसः' सूत्रसे आधारकी कर्मसंज्ञा करके उसमें द्वितीया विभक्तिका प्रयोग करनेके स्थानपर] 'मौलौ वसति' इस [प्रयोग ] में [किये गये] 'त्व' आदि [प्रत्ययोंके ] साथ [इमनिच्-प्रत्यय, अव्ययीभाव पदसे जो अर्थ प्रतीत होता है वही अर्थ 'तरुणत्वे' आदि पदोंसे भी प्रतीत हो सकता है फिर भी इन प्रयोगोंमें ] स्वरूपकी कुछ विशेषता है, जिससे उनमें [अधिक ] चमत्कार प्रतीत होता है। वही व्यञ्जकत्वको प्राप्त होता है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि 'तरुणिमनि' पदके स्थानपर उसके समानार्थक होनेसे 'तरुणत्बे' पदका भी प्रयोग किया जा सकता था, परन्तु कविने उसका प्रयोग न करके उसके स्थानपर 'तरुणमनि' पदका प्रयोग किया है। इसका कारण यह है कि 'इमनिच्'-प्रत्ययसे पदमें सुकुमारता प्रतीत होती है, इसलिए उस पदसे नायिकाके तारुण्यमें भी सौकुमार्यकी अभिव्यक्ति होती है। इसके विपरीत 'तरुणत्वे' पदके अक्षरोंमें सुकुमारताके स्थानपर प्रौढ़ता पायी जाती है इसलिए उसके प्रयोगसे नायिकाके यौवनमें कुछ कठोरताकी अभिव्यक्ति होने लगती है। इस कारण कविने तारुण्यमें भी सौकुमार्यातिशयके बोधनके लिए 'तरुणमनि' इस 'इमनिच्' प्रत्ययान्त पदका प्रयोग किया है। इसी प्रकार 'अनुमदनधनुः' इस पूर्वपदार्थप्रधान अव्ययीभाव समासमें उत्तरपदरूप मदनधनुकी अप्रधानताके प्रकाशन द्वारा भरूलताग्रके वशीकरणसामर्थ्यके अतिशयकी अभिव्यक्ति होती है। इसी प्रकार 'मौलिमधिवसति' इस कर्मविभक्तिके प्रयोगसे कर्मीभूत समस्त ललनाओंकी अभिव्याप्तिके सूचन द्वारा नायिकाके सौन्दर्यातिशयकी अभिव्यक्ति होती है। 'मौलौ' इस प्रकारका सप्तम्यन्त प्रयोग करने- पर एक देशमें आधारताका सम्भव होनेसे भी सकल ललनाओंकी व्याप्ति सूचित नहीं हो सकती है। इस प्रकार यहाँ इमनिच्-प्रत्यय, कर्मविभक्ति तथा अव्ययीभावसमास आदिके द्वारा काव्यमें विशेष चमत्कार आ गया है। इसलिए यहाँ उनकी ही व्यञ्जकता मानी गयी है। इसी प्रकार [प्रकृति-प्रत्यय आदि ] अन्योंकी भी [व्यञ्जकता ] समझ लेगी चाहिये। वर्णों तथा रचनाके व्यञ्जकत्वके उदाहरण गुणोंके स्वरूपके निरूपणके अवसरपर [अष्टम उल्लासमें ] देंगे। [सूत्र ६१ में ] 'अपि' शब्दके प्रयोगसे नाटकादि प्रबन्धोंमें [ भी रसादि-व्यञ्जकता समझनी चाहिये ।।
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१८६ काव्यप्रकाश: [का० ४३, सू० ६२
एवं रसादीनां पूर्वगणितभेदाभ्यां सह षड्भेदाः ।E [ सू० ६२ ] भेदास्तदेकपञ्चाशत्। व्याख्याताः । कडी
इस प्रकार रस आदि [ध्वनि] के पहले गिनाये हुए [ पदप्रकाश्य तथा वाक्यप्रकाश्यरूप ] दो भेदोंके साथ, [ १. पदांश, २. वर्ण, ३. रचना तथा ४. प्रबन्धगत चार 'पदैकदेशरचनावर्णेष्वपि' भेदोंको मिलाकर कुल ] छ: भेद होते हैं। ध्वनिभेदोंका उपसंहार [सू० ६२]-इस प्रकार [ध्वनिकाव्यके ] इक्यावन भेद होते हैं। [इन इक्यावन भेदोंकी ] व्याख्या की जा चुकी है। ध्वनिकाव्यके इन मुख्य ५१ भेदोंकी गणना इस प्रकार की गयी है। सबसे पहले ध्वनिके 'अवि- वक्षितवाच्य' तथा 'विवक्षितान्यपरवाच्य' अर्थात् लक्षणामूल तथा अभिधामूल ये दो भेद होते हैं। इनमेंसे 'अविवक्षितवाच्य' अर्थात् 'लक्षणामूल' ध्वनिके भी 'अर्थान्तसंक्र्कमितवाच्य' 'अ्र्रत्यन्ततिर- स्कृतवाच्य' ये दो भेद हो जाते हैं। 'विवक्षितान्यपरवाच्य' या 'अभिधामूल' ध्वनिसे भी पहले असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गय तथा संलक्ष्य- कमव्यङ्गय दो भेद होते हैं। इनमेंसे असंलक्ष्यक्रमव्य ङ्गयके अ्र्परनेक भेद हो सकनेके कारण आागे उनका विस्तार न करके एक ही भेद माना गया है। इस प्रकार यहाँतक लक्षणामूल ध्वनिके १. अर्थान्तर- संक्रमितवाच्य और २. अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य तथा अभिधामूलका ३. असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गय ये तीन भेद होते हैं। अभिधामूलके संलक्ष्यत्रमव्यङ्गय भेदके पहिले शब्दशक्त्युत्थ, अर्थशक्त्युत्थ तथा उभयशक्त्युत्थ ये तीन भेद दिये गये हैं। उनमेंसे शब्दशक्त्युत्थके वस्तुध्वनि तथा अलङ्गारध्वनि ये दो भेद किये गये अर्थशक्त्युत्थके स्वतःसम्भवी चार भेद, कविप्रौढ़ोक्तिसिद्ध चार भेद तथा कविनिबद्धवक्तृप्रौढ़ोक्तिसिद्ध चार भेद, कुल मिलाकर बारह भेद किये गये हैं। और उभयशक्त्युत्थध्वनिका एक भेद, कुल मिलाकर संलक्ष्यकरमव्यङ्गयके २+१२+१= १५ भेद किये गये हैं। इनके साथ पिछले तीन भेदोंको मिला देनेसे ध्वनिके यहाँतक १५+३ = १८ भेद हो जाते हैं। इन १८ भेदोंमेंसे एक उभयशक्त्युत्थ भेद है। वह तो केवल वाक्यमें रहता है, शेष १७ भेद पदगत तथा वाक्यगत दो प्रकारके होनेसे १७x२=३४ बन जाते हैं। उनके भीतर जो अर्थशक्त्युत्थ- के बारह भेद हैं वे पद तथा वाक्यके अतिरिक्त प्रबन्धगत भी हो सकते हैं इसलिए उनको और जोड़ देने ३४+ १२=४६ तथा एक उभयशक्त्युत्थको मिलाकर ३४+ १२+१=४७ भेद हो जाते हैं। इन सैंतालीस भेदोंमें असंलक्ष्य क्रमव्यङ्गयभेद एक ही माना गया है। वह पदगत तथा वाक्य- गतरूपसे तो इस गणनामें आ चुका है। परन्तु उसके अतिरिक्त वह १. पदांश, २. वर्ण, ३. रचना, तथा ४. प्रबन्धमें भी हो सकता है। इसलिए पूर्वोक्त ४७ भेदोंके साथ इन चार भेदोंको और जोड़ देनेसे कुल ४७+४=५१ भेद हो जाते हैं। ६२ वें सूत्रमें इन्हींका निर्देश ग्रन्थकारने 'भेदास्तदेकपञ्चाशत्' लिखकर किया है। ध्वनिभेदोंका सङ्कर तथा संसृष्टि ये ५१ तो ध्वनिके मुख्य भेद हुए। परन्तु इन भेदोंके परस्पर मिलनेसे उनके संसृष्टि तथा
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का० ४३-४४, सू० ६३-६५] चतुर्थ उल्लास: १८७
[सू० ६३ ] तेषां चान्योन्ययोजने ।।४३।। सङरेण त्रिरूपेण संसृष्ट्या चैकरूपया। न केवलं शुद्धा एवैकपञ्चाशद्गेदा भवन्ति, यावत्तेषां स्वप्रभेदैरेकपञ्चाशता संशयास्पदत्वेन, अनुग्राह्यानुग्राहकतया, एकव्यञ्जकानुप्रवेशेन चेति त्रिविधेन सङ्करेण, परस्परनिरपेक्षरूपया एकप्रकारया संसृष्ट्या चेति चतुभिर्गुणने- [सू० ६४ ] वेदखाब्धिवियच्चन्द्राः [ १-०-४-०-४] शुद्धभेदै: सह- [सू० ६५ ] शरेषुयुगखेन्दवः [ १-०-४-५-५] ।।४४।।
सङ्करकृत और भेद भी हो सकते हैं। 'मिथोऽनपेक्षतयैषां स्थितिः संसृष्टिरुच्यते' अति् इनमेंसे किन्हीं दो या अधिक भेदोंकी एक ही उदाहरणमें परस्पर निरपेक्षरूपसे तिल-तण्डुल-न्यायते स्थितिको 'संसृष्टि' कहते हैं और अनेक भेदोंकी परस्पर सापेक्षरूपसे स्थितिको 'सङ्कर' कहते हैं। यह सङ्कर तीन प्रकारसे होता है-एक अङ्गाङ्गिभाव-सङ्कर, दूसरा एकाश्रयानुप्रवेश-सङ्कर और तीसरा सन्देहसङ्कर। इस प्रकार इन शुद्ध ५१ भेदोंको परस्पर मिलानेपर तीन प्रकारके सङ्कर तथा एक प्रकारकी संसृष्टि उनकी संख्याका और भी अधिक विस्तार हो सकता है। उस विस्तारको ग्रन्थकार आगे दिखलाते हैं- [सू० ५३]-उन [शुद्ध इक्यावन भेदों ] को एक-दूसरेके साथ मिलानेपर तीन प्रकारके सङ्कर तथा एक प्रकारकी संसृष्टिसे [और भी भेद हो सकते हैं ]। [ध्वनिकाव्यके ] न केवल शुद्ध इक्यावन भेद ही होते हैं अपितु अपने इक्यावन भेदोंके साथ [मिलनेपर ] [ १ ] सन्देहास्पद होनेसे [सन्देह-सङ्कर ], [२] अनुग्राह्य-अनुग्राहकरूपसे [ अङ्गाङ्गिभाव- सङ्कर ] और [ ३ ] एक व्यञ्जकमें अनुप्रवेश होनेसे [ एकाश्रयानुप्रवेश-सङ्कर ] इस प्रकार तीन तरहके सङ़कर और परस्पर निरपेक्षरूप [स्थितिसे ] एक प्रकारकी संसृष्टि इस तरह [५१ x५१ =२६०१ को ] चारसे गुणा करने पर- [सू० ६४][५१x५१=२६०१+४=]१०४०४ [भेद होते हैं] शुद्ध [५१ ] भेदोंके साथ [सङ्कर तथा संसृष्टिकृत ] इन १०४०४ भेदोंको जोड़नेसे- [सू० ६५]-१०४०४x५१= १०४५५ भेद हो जाते हैं.। यहाँ 'वेदखाब्धिवियच्चन्द्राः', इस ६४वें सूत्रमें वेद आदि पद संख्याविशेषके बोधक हैं। वेद चार हैं इसलिए वेद पद ४ संख्याका, ख अर्थात् आकाश शून्य संख्याका, अब्धि अर्थात् सागर चार होनेसे अब्धि पद चार संख्याका, वियत् अर्थात् आकाश शून्य संख्याका और चन्द्र पद एक संख्या बोधक माना जाता है। इस प्रकार वेद [४]ख [०] अब्धि [४] वियत् [०] चन्द्र [ १] पदोसे ४०४०१ यह संख्या उपस्थित होती है। परन्तु 'अङ्कानां वामतो गतिः' इस सिद्धान्तके अनुसार संख्याके अ्ङ्गोंकी गणना बायीं ओरसे की जाती है। अर्थात् हिन्दी वर्णमालाकी लिखावट दाहिनी ओरसे बायीं ओरको चलती है। परन्तु संस्कृतमें इस प्रकार सङ्केतों द्वारा निर्दिष्ट अङ्कोंको बायीं ओरसे दाहिनी ओरको लिखा जाता है। इसलिए वेद [४] ख [०] अब्धि [४] वियत् [०] चन्द्र [१] पदोंसे बोधित [४०४०१] संख्याको
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काव्यप्रकाश: [का० ४४, सू० ६५ जब अङ्कोंमें लिखा जायगा तब उसकी लिखावट बायीं ओरसे होकर दाहिनी ओरको चलेगी। इसलिए 'वेदखाब्धिवियच्चन्द्राः'वाली संख्याको इस प्रकारसे अङ्गोंमें लिखनेपर यह संख्या १०४०४ बनती है। इसी प्रकार ६५वें सूत्रमें शर अर्थात् कामदेवके पाँच बाण होनेसे शर पद ५ अङ्कका, इसी प्रकार शर अर्थात् बाणका ही वाचक इषु पद ५ अङ्कका, सतयुग आदि चार युग होनेसे युग पद ४ अङ्कका, ख पद ० अङ्कका और इन्दु पद १ अङ्कका बोधक होता है। इसलिए शर [५] इषु [५] युग [४] ख [0] और इन्दु [१] से १०४५५ संख्या उपस्थित होती है। इस प्रकार 'काव्यप्रकाश' के अनुसार ध्वनिके सङ्कर, संसृष्टि तथा शुद्ध सब भेदोंको मिलाकर कुल १०४५५ भेद बनते हैं।
लोचनकारके अनुसार ध्वनिके ३५ भेदोंकी गणना
'ध्वन्यालोक'की 'लोचन' टीकामें द्वितीय उद्योतकी ३१वीं कारिका तथा तृतीय उद्योतकी तैंतीस वीं कारिकाकी व्याख्या करते हुए अभिनवगुप्तने दो जगह ध्वनिके प्रभेदोंकी गणना की है। पहली जगह 'एवं ध्वनिप्रभेदान् प्रतिपाद्य' इस मूल ग्रन्थकी व्याख्या करते हुए ध्वनिके पैतीस भेदोंकी गणना इस प्रकार की है- अविवक्षितवाच्यो विवक्षितान्यपरवाच्यश्चेति द्वौ मूलभेदौ। आद्यस्य द्वौ भेदौ, अत्यन्त- तिरस्कृतवाच्योऽर्थान्तरसंक्रमितवाच्यश्च। द्वितीयस्य द्वौ भेदौ, अलक्ष्यक्मोऽनुरणनरूपश्च। प्रथमो- जनन्तभेदः । द्वितीयो द्विविधः, शब्दशक्तिमूलोऽर्थशक्तिमूलश्च। पश्चिमस्त्रिविधः कविप्रौढोक्ति- कृतशरीर:, कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिकृतशरीरः, स्वतःसम्भवी च। ते च प्रत्येकं व्यङ्गयव्यञ्जकयोरुक्त- भेदनयेन चतुर्धेति द्वादशविधोऽर्थशक्तिमूलः। आद्याश्चत्वारो भेदा इति षोडश मुख्यभेदाः । ते च पदवाक्यप्रकाशत्वेन प्रत्येकं द्विविधा वक्ष्यन्ते। अलक्ष्यक्रमस्य तु वर्ण-पद-वाक्य-सङ्घटना-प्रबन्धप्रकाश्य- त्वेन पञ्चत्रिंशद् भेदाः ।' अर्थात् ध्वनिके अविवक्षितवाच्य [लक्षणामूल ] और विवक्षितान्यपरवाच्य [अभिधामूल] ये दो मूल भेद हैं। उनमेंसे प्रथम अर्थात् अविवक्षितवाच्यके अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य और अत्यन्ततिस्कृत- वाच्य ये दो भेद होते हैं। द्वितीय अर्थात् विवक्षितान्यपरवाच्य [अभिधामूल] ध्वनिके असंलक्ष्यक्रम- व्यङ्गय और संलक्ष्यक्रमव्यङ्गय ये दो भेद होते हैं। इनमेंसे प्रथम असंलक्ष्यक्रमव्य ङ्गय [रसादि-ध्वनि ] के अनन्त भेद हो सकते हैं, इसलिए वह सब एक ही माना जाता है। दूसरे अरथात् संलक्ष्यक्रमव्य ङ्गयके शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्तिमूल इस प्रकार दो भेद होते हैं। इनमेंसे अन्तिम अर्थात् अर्थशक्त्युद्व- ध्वनिके स्वतःसम्भवी, कविप्रौढोक्तिसिद्ध तथा कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध ये तीन भेद होते हैं। इन तीनों भेदोंमेंसे प्रत्येक, व्यङ्गय और व्यञ्जक दोनोंमें उक्त भेद [वस्तु और अलङ्कार] नीतिसे चार भेद होकर कुल बाहर प्रकारके अर्थशक्युद्धव-ध्वनि भेद होते हैं। इन बारह भेदोंमेंसे पहिले चार भेद अर्थात् अविवक्षितवाच्यके दो भेद, तीसरा असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गय और चौथा शब्दशक्त्युत्थ-भेद मिला देनेसे बारह और चार मिलकर सोलह भेद हुए। ये सब पदगत और वाक्यगत होनेसे दो प्रकारके होकर ३२ भेद हुए। असंलक्ष्यत्रमव्यङ्गय पद और वाक्यके त्तिरिक्त वर्ण, सङ्टटना तथा प्रबन्धमें भी प्रकाश्य होनेसे तीन भेद और जुड़कर ध्वनिके कुल ३५ भेद हो जाते हैं। इनमें जहाँ 'व्यङ्गयव्यञ्जकयोरुक्तभेदनयेन चतुर्धेति' लिखा है वहाँ कुछ पाठ भ्रष्ट हो गया जान पड़ता है।
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का० ४४, सू० ६५ ] चतुर्थ उल्लास: १८६
'लोचन' तथा 'काव्यप्रकाश'के भेदोंकी तुलना ऊपर दिये हुए विवरणके अनुसार 'लोचन' में ध्वनिके ३५ शुद्ध उपभेद दिखलाये हैं और 'काव्य- प्रकाश' तथा 'साहित्यदर्पण' आदिमें उनके स्थानपर ५१ भेद दिखलाये हैं। इस प्रकार 'लोचन' तथा 'काव्यप्रकाश' आदिके भेदोंमें १६ भेदोंका अन्तर है अर्थात् 'काव्यप्रकाश' आदिमें 'लोचन' से सोलह भेद अधिक दिखलाये गये हैं। यह सोलहों भेदोंका अन्तर विवक्षितान्यपरवाच्य अर्थात् अभिधामूल ध्वनिके भेदोंमें ही हुआ है, जिनमेंसे मुख्य भेद तो अर्थशक्त्युद्धव-ध्वनिके भेदोंमें है। लोचनकारने अर्थशक्त्यु- द्रव-ध्वनिके बारह भेद दिखलाकर उनके पद और वाक्यगत भेद दिखलाये हैं। इस प्रकार अर्थशक्त्युद्धव- ध्वनिके २४ भेद हो जाते हैं। काव्यप्रकाशकारने पद और वाक्यके अतिरिक्त प्रबन्धमें भी अरथशक्त्युद्धव ध्वनिके बारह भेद माने हैं, जो लोचनकारने नहीं दिखलाये हैं। इस प्रकार 'लोचन' के मतमें अर्थशक्त्युद्धव ध्वनिके २४ भेद और 'काव्यप्रकाश'के अनुसार ३६ भेद होते हैं अरथात् बारह भेदोंका अन्तर तो इसमें है। इसके अतिरिक्त शब्दशक्त्युत्थ-ध्वनिके लोचनकारने केवल पदगत और वाक्यगत ये दो ही भेद किये हैं, वस्तु और अलङ्कार व्यङ्गयके भेदसे भेद नहीं किये हैं। 'काव्यप्रकाश' में शब्दशक्त्युत्थके वस्तु औ्रौर अलङ्कार व्यङ्गय भेदसे दो भेद करके फिर उनके पदगत तथा वाक्य गत भेद किये हैं। अतः 'काव्य- प्रकाश' में शब्दशक्त्युत्थके चार भेद होते हैं और 'लोचन' में केवल दो भेद। अतः दो भेदोंका अन्तर यहाँ आता है। इसके अतिरिक्त 'लोचन' में उभयशक्त्युत्थ नामका कोई भेद परिगणित नहीं किया है। 'काव्यप्रकाश' में उभयशक्त्युत्थको भी एक भेद माना गया है। इसलिए 'काव्यप्रकाश' में एक भेद यह बढ़ जाता है। इस प्रकार शब्दशक्त्युत्थके वस्तु तथा अलङ्कारके दो भेद, अर्थशक्त्युत्थके प्रबन्धगत बारह भेद और उभयशक्त्युत्थका एक भेद यह सब मिलाकर २+ १२+१= १५ भेद तो संलक्ष्यक्रम- व्यङ्गयके अन्तर्गत 'काव्यप्रकाश'में अधिक दिखलाये हैं और सोलहवाँ भेद असंलक्ष्यक्रमकी गणनामें अधिक है। असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गय रस आदि ध्वनिका वैसे तो 'लोचन' तथा 'काव्यप्रकाश' दोनों जगह एक ही भेद माना है। परन्तु 'लोचन' में उस असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गयके १. पद, २. वाक्य, ३. वर्ण, ४. सङ्गटना तथा ५. प्रबन्धमें व्यङ्गय होनेसे पाँच भेद माने जाते हैं। 'काव्यप्रकाश' में इन पाँचोंके अतिरिक्त पदैकदेश अर्थात् प्रकृति-प्रत्ययादिगत एक भेद और माना है। अतः 'काव्यप्रकाश' में असंलक्ष्य- क्रमव्यंग्यके भेदोंमें भी एक भेद अधिक होनेसे 'लोचन'की अपेक्षा कुल सोलह भेद अधिक हो जाते हैं। इसलिए जहाँ 'लोचन' में ध्वनिके शुद्ध ३५ भेद दिखाये हैं, वहाँ 'काव्यप्रकाश' में ध्वनिके शुद्ध ५१ भेद दिखलाये गये हैं। 'काव्यप्रकाश' तथा लोचनकारकी ध्वनिभेदोंकी गणना में यह मुख्य भेद है। संसृष्टि तथा सङ्करभेदसे लोचनकारकी गणना न केवल इन शुद्ध भेदोंकी गणनामें ही यह अन्तर पाया जाता है अपितु उन शुद्ध भेदोंका संसृष्टि तथा सङ्करभेदसे जब विस्तार किया जाता है तो उस विस्तारमें भी 'लोचन' तथा साहित्यशास्त्रके विविध ग्रन्थोंसे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भेद पाया जाता है। लोचनकारने गुणीभूतव्यङ्गय, अलद्कार तथा ध्वनिके अपने भेदोंके साथ ध्वनिभेदोंकी संसृष्टि तथा सङ्करसे ध्वनिके ७४२० भेद दिखलाये हैं। काव्यप्रकाशकार- ने केवल ध्वनिके इक्यावन शुद्ध भेदोंकी संसृष्टि तथा सङ्करसे १०४०४ भेद किये हैं। और साहित्य साहित्यदर्पणकारने सङ्कर तथा संसृष्टिकृत ५३०४ तथा ५१ शुद्ध भेदोंको जोड़कर ५३५५ भेद दिखलाये हैं। लोचनकारने अपने मतानुसार ७४२० ध्वनिभेदोंकी गणना इस प्रकार करायी है-
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120 काव्यप्रकाश: [का० ८८, सू० ६५ पूर्व ये पञ्चत्रिंशद्भेदा उक्तास्ते गुणीभूतव्यङ्गयस्यापि मन्तव्याः। स्वप्रभेदास्तावन्तः । अलङ्कार इत्येकसप्ततिः । तत्न सङ्करत्नयेण संसृष्टया च गुणने द्वे शते चतुरशीत्यधिके[२८४]। पञ्चत्रिंशतो मुख्यभेदानां गुणने सप्त सहस्राणि चत्वारि शतानि विशत्यधिकानि [७४२०] भवन्ति। लोचन० उद्योत ३, का. ४३ काव्यप्रकाशकारने १०४५५ ध्वनिभेदोंका प्रतिपादन इस प्रकार किया है- भदास्तदेकपञ्चाशत् तेषां चान्योन्ययोजने। सङ्करेण त्रिरूपेण संसृप्टया चैकरूपया ।। वेदखाब्धिवियच्चन्द्रा: [१०४०४] शरेषुयुगखेन्दवः [१०४५५] काव्यप्रकाश, चतुर्थोल्लास, सू० ६२-६५ साहित्यदर्पणकारने ध्वनिभेदोंका वर्णन इस प्रकार किया है- तदेवमेकपञ्चाशद्द्दास्तस्य ध्वनर्मता: । सङ्करेण त्रिरूपेण संसृष्टया चैकरूपया ।। वेदखाग्निशराः [५३०४] शुद्धरिषुबाणाग्निसायका: [५३५५] साहित्यदर्पण, चतुर्थ परिच्छेद, १२ इन तीनोंमें यद्यपि लोचनकार सबसे अधिक प्राचीन और सबसे अधिक प्रामाणिक हैं, परन्तु इस विषयमें उनकी गणना सबसे अधिक चिन्त्य है। उन्होंने ध्वनिके शुद्ध ३५ भेद; उतने ही [ ३५ ही] गुणीभूतव्यङ्गयके और अलङ्कारोंको मिलाकर एक भेद, इस प्रकार कुल ७१ भेदोंकी संसृष्टि तथा सङ्कर दिखलानेके लिए ७१ को चारसे गुणाकर ७१x४= २८४ भेद किये हैं और फिर उनको शुद्ध पंतीस भेदोंसे गुणा करके २८४X ३५= ७४२० भेद दिखलाये हैं। इसमें सबसे बड़ी तुटि तो यही दिखलायी देती है कि २८४ और ३५ का गुणा करनेसे गुणनफल ६६४० होता है, परन्तु लोचनकार उस के स्थानपर केवल ७४२० लिख रहे हैं। यह गणनाकी प्रत्यक्ष दिखलायी देनेवाली त्ुटि है। इसके अतिरिक्त और भी विशेष बात इस प्रसङ्गमें चिन्तनीय है। 'लोचन' की एक और चिन्त्य गणना लोचनकारने 'पूर्व ये पञ्चतिशद्भेदा उक्तास्ते गुणीभूतव्य ङ्गय्रस्यापि मन्तव्याः' लिखकर जितन ध्वनिके भेद होते हैं उतने ही भेद गुणीभूतव्यङ्गयके भी माने हैं। परन्तु 'काव्यप्रकाश'ने इस विषयका प्रतिपादन कुछ भिन्न प्रकारसे किया है। वे लिखते हैं- 'एषां भेदा यथायोगं वेदितव्याश्च पूर्ववत् । यथायोगमिति- व्यज्यन्ते वस्तुमात्रेण यदालङकृतयस्तदा। घ्रुवं ध्वन्य ङ्गता तासां काव्यवृत्तेस्तदाश्रयात् । [ध्व० -- २, २६] इति ध्वनिकारोक्तदिशा वस्तुमात्रेण यत्रालङ्कारो व्यज्यते न तत्र गुणीभूतव्यङ्गयत्वम्' सू० ६७
पदवाक्यप्रबन्धगतत्वेन त्रिरूपतया वस्तुव्यङग्यालङ्कारस्य नवविधत्वमिति ध्वनिप्रभेदसंख्यैक पञ्चाशतो नवन्यूनेन [५१-६=४२] अष्टानां भेदानां प्रत्येकं द्विचत्वारिशद् [४२] विधत्वमिति मिलित्वा ४२X८ =३३६ । गुणीभूतव्य ङ्गयस्य षट्त्रिशदधिकत्रिशतभेदा: [३३६ ] काव्यप्रकाश-टीका [सू० ६० ]
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का० ४४, सू० ६५ ] चतुर्थ उल्लास: १६१ इसके अनुसार का व्यप्रकाशकारने ध्वनिके अर्थशक्त्युद्भव भेदके अन्तर्गत वस्तु अलद्कार व्यङ्गयके स्वतःसम्भवी, कविप्रौढोक्तिसिद्ध तथा कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध ये तीन भेद, और उनमेंसे प्रत्येकके पद, वाक्य तथा प्रबन्धगत होनेसे [३X ३ = ६ ] वस्तुसे अलङ्का व्यङ्गयके कुल नौ भेद दिखलाये थे। इन नौ प्रकारोंमें केवल ध्वनि ही होता है, गुणीभूतव्य ङ्गय नहीं, जैसा कि 'ध्वन्यालोक'-की ऊपर उद्धृत कारिकासे सिद्ध होता है। अतः ध्वनिके ५१ भेदोंमेंसे इन नौको कम करके [५१-६= ] ४२ भेद होते हैं। इसलिए कुल मिलाकर ४२X८=३३६ गुणीभूतव्यङ्गयके शुद्ध भेद होते हैं। यह काव्यप्रकाशकारका आशय है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि काव्यप्रकाशकारने 'ध्वन्यालोक' की ऊपर उद्धृत की हुई [२,२६] कारिकाके आधारपर वस्तुसे अलङ्कार व्यङ्गयके नौ भेदोंको कम करके गुणीभूतव्यङ्गयके भेद माने हैं। क्योंकि जहाँ वस्तुसे अलङ्कारव्यङ्गय होता है, वहाँ 'ध्वन्यालोक'की उक्त कारिकाके अनुसार 'ध्रुवं ध्वन्यङ्गता' ध्वनि ही होती है, गुणीभूतव्यङ्गय नहीं। लोचनकारने इस ओर ध्यान नहीं दिया है। न केवल इस गणनामें अपितु वस्तु तथा अलङ्कारव्यङ्गयके भेदसे गणना करनेका ध्यान भी उनको नहीं रहा है। इसलिए अर्थशक्त्युद्भवके जो बारह भेद उन्होंने दिखलाये हैं, उनमें भी त्ुटि रह गयी है। उभयशक्त्युद्भवको भी जो लोचनकार छोड़ गये हैं वह सब चिन्त्य है। 'काव्यप्रकाश' तथा 'साहित्यदर्पण' की गणनाका भेद काव्यप्रकाशकारने ध्वनिके ५१ शुद्ध भेदोंकी संसृष्टि तथा सङ्करके द्वारा १०४०४ भेद बनाये हैं। परन्तु साहित्यदर्पणकारने उन्हीं ५१ भेदोंके संसृष्टि तथा संकरके द्वारा केवल ५३०४ भेद तथा शुद्ध भेदोंको मिलाकर ५३५५ भेद बनाये हैं। साहित्यदर्पणकारने लिखा है- तदेवमेकपञ्चाशद्भेदास्तस्य ध्वनेर्मताः । सङ्करेण त्रिरूपेण संसृष्टया चैकरूपया।। वेदखाग्निशराः [५३०४] शुद्धरिषुबाणाग्निसायका: [५३५५] अर्थात् ध्वनिके ५१ भेदोंके तीन प्रकारके सङ्कर तथा एक प्रकारकी संसृष्टिके द्वारा ५३०४ भेद होते हैं। उनके साथ शुद्ध ५१ भेदोंको मिला देनेसे ५३५५ भेद होते हैं अर्थात् 'काव्यप्रकाश' में जहाँ ध्वनिके १०४५५ भेद किये हैं वहीं साहित्यदर्पणकारने केवल ५३५५ भेद माने हैं। इस संख्याभेदका कारण 'साहित्यदर्पण' तथा 'काव्यप्रकाश' की गणनामें जो इतना भेद पाया जाता है उसका कारण उनकी गणनाप्रक्रिया का भेद है। साहित्यदर्पणकारने सङ्कलनप्रक्रियाका अवलम्बन किया है और काव्य- प्रकाशकारने गुणनप्रक्रियाका अवलम्बन किया है। इस प्रक्रियाभेदके कारण ही उनकी गणनामें इतना भेद आ गया है। गुणनप्रक्रिया काव्यप्रकाशकारने यहाँ जो ध्वनिभेदोंकी गणना की है वह गुणनप्रक्रियाके अनुसार की है। गुणनप्रक्रियाका अभिप्राय यह है कि ध्वनिके शुद्ध ५१ भेद जब एक दूसरेके साथ मिलते हैं तो उस मिलने- से उनमेंसे प्रत्येकके इक्यावन-इक्यावन भेद हो जाते हैं। इस प्रकार इक्यावन भेदोंमेंसे प्रत्येकके ५१ भेद होनेसे उनकी एक प्रकारकी संसृष्टिके ५१x५१= २६०१ भेद हो जाते हैं। तीन प्रकारके सड़र
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१६२ काव्यप्रकाश: [का० ४४, सू० ६५ तथा एक प्रकारकी संसृष्टिको मिलाकर चारसे इस २६०१ को गुणा कर देनेपर २६०१x४= १०४०४ संख्या आती है। इस प्रकार गुणनप्रक्रियाका अवलम्बन कर काव्यप्रकाशकारने यहाँ ध्वनिके १०४०४ भेद तथा उनके साथ शुद्ध ५१ भेदोंको जोड़कर कुल १०४०४+५१=१०४५५ धवनिभेद माने हैं। सड़कलनप्रक्रिया परन्तु साहित्य दर्पणकारने इस गुणनप्रक्रियाका अवलम्बन न करके सङ्कलनपक्रियाका अवलम्बन किया है। उनका आशय यह है कि ५१ शुद्ध भेदोंको परस्पर मिलानेसे प्रत्येक भेदके इक्यावन-इक्यावन भेद हो जाते हैं। परन्तु उनकी कुल संख्या निकालते समय ५१-५१ का गुणा करना उचित नहीं है। क्योंकि पहले भेदका अन्य भेदोंके साथ मिश्रण करनेपर जो इक्यावन भेद बनते हैं उनमें और दूसरे भेदका अन्य भेदोंके साथ मिश्रण करनेपर जो ५१ भेद बनते हैं इनमेंसे एक भेद दोनों जगह समान रहता है। जैसे-अर्थान्तरसंक्रमितवाच्यके संसृष्टिकृत जो ५१ भेद बनेंगे उनमें अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य तथा अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यके सम्मिश्रणसे एक भेद बनेगा। इसी प्रकार फिर जब अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यका अन्य भेदोंके साथ सम्मिश्रण होगा तब उन भेदोंमें अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य तथा अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य के सम्मिश्रणसे एक भेद बनेगा। यह भेद अभी पहली गणनामें आ चुका है। इसलिए सम्पूर्ण ध्वनिभेदोंकी गणना करते समय इस भेदकी दुबारा गणना न हो जाय इसलिए इस भेदको निकालकर द्वितीय प्रकारके भेदकी संसृष्टिमें ५१के स्थानपर केवल ५० ही भेद मानने चाहिय। इस पद्धतिसे आरगे चलनेपर तृतीय भेदकी संसृष्टिके ४६, चौथ भेदकी संसृष्टिसे ४५ भेद होंगे। इस कमसे एक-एक भेदका ह्रास होत हुए अन्तिम ५१ वें भेदकी संसृष्टिके ५१ भेदोंमेंसे केवल एक भेद गणनामें सम्मिलित करने योग्य रह जायगा। अन्य सब भेदोंका अन्तर्भाव पहिले भेदोंकी संसृष्टिके भेदोंमें हो चुका है। इस प्रकार संसृष्टिके कुल भेदोंकी गणनाके लिए ५१-५१ का गुणा न करके एकसे लेकर इक्यावनतककी संख्याओंका जोड़ या सङ्कलन करना चाहिये। एकसे इक्यावनतककी संख्याओंका जोड़ १३२६ होता है। इसलिए साहित्य- दर्पणकारने सङ्कलन प्रत्रियाका अवलम्बन कर, ध्वनिके एकसे इक्यावनतकके जोड़ १३२६ को संसृष्टिकृत तथा उससे तिगुने अर्थात् ३९७८ सङ्करकृत भेद, कुल मिलाकर [१३२६+३६७८=)५३०४ ध्वनि- भेद माने हैं।
सङ्कलनकी लघु प्रक्रिया एको राशिद्विंधा स्थाप्य एकमेकाधिकं कुरु। समार्धेनासमो गुण्य एतत् सङ्कलितं लघु ॥। अर्थात् एकसे लेकर जहाँतकका जोड़ लगाना हो उस अन्तिम राशिको दो जगह लिखो। उसमेंसे एकमें एक संख्या और जोड़ दो। ऐसा करनेसे उनमेंसे एक सम और दूसरी विषम संख्या बन जायगी। इनमें सम संख्याको आधा करके उससे विषम संख्याको गुणा कर देनेसे एकसे लेकर उस संख्यातकका योगफल निकल आवेगा। जैसे, यहाँ १ से लेकर ५१ तकका जोड़ करना है तो इक्यावन- को ५१-५१ दो जगह रखकर और उनमें एकमें १ संख्याको जोड़कर ५१-५२ संख्याएँ हुईं। इनमें सम संख्या ५२ को आधा करके ५२ -- २=२६ अरथात् २६ से विषम संख्या अर्थात् ५१ को गुणा कर देनेसे एकसे इक्यावनतकका जोड़ ५१x २६ = १३२६ आाता है। यह सङ्कलनकी लघु प्रक्रिया कहलाती है। इससे किसी भी संख्यातकका जोड़ सरलतासे निकल आता है।
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का० ४४, सू० ६५] चतुर्थ उल्लास: १६३
इसी सङ्कलनप्रक्रियाका अवलम्बन कर साहित्यदर्पणकारने १३२६ संसृष्टिके तथा उससे तिगुने ३६७८ सङ्करके, कुल मिलाकर ५३०४ ध्व्निके सङ्करसंसृष्टिकृत भेद माने हैं। 'काव्यप्रकाश' की द्विविधशैली काव्यप्रकाशकारने यहाँ ध्वनिभेदोंकी गणना करते समय गुणनप्रक्रियाका अवलम्बन किया है। उसका उपपादन करते हुए टीकाकारोंने यह प्रतिपादन किया है कि ध्वनिके मुख्य इक्यावन भेदोंकी संसृष्टिके समय प्रत्येक भेदके ५१-५१ भेद ही गिने जाने चाहिये। उनमें एक-एक भेदको क्र्मशः कम नहीं करना चाहिये। क्योंकि अर्थान्तरसंक्र्कमितवाच्यकी अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यके साथ संसृष्टि और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यकी अर्थान्तरसंक्रमितवाच्यके साथ संसृष्टि ये दोनों बिलकुल भिन्न हैं। उनमें भिन्न-भिन्न प्रकारके चमत्कारकी अनुभूति सहृदयोंको होती है। इसलिए इन दोनोंको परस्पर विलक्षण ही मानना चाहिये। इसलिए प्रत्येक भेदकी संसृष्टिके ५१-५१ भेद ही होते हैं। इसलिए संसृष्टिके कुल भेदोंकी गणनामें ५१-५१ का गुणा ही करना चाहिये। तदनुसार काव्यप्रकाशकारने गुणनप्रक्रियाका अवलम्बन कर ५१ x५१x४ = १०४०४ भेद निकाले हैं। और वे उचित हैं। परन्तु दशम उल्लासमें विरोधालङ्कारका निरूपण करते हुए काव्यप्रकाशकारने इसी प्रकारके भेदोंकी गणनाके अवसरपर गुणनप्रक्रियाके स्थानपर सङ्कलनप्रक्रियाका अवलम्बन किया है। जाति, गुण, क्रिया और द्रव्य इन चारोंका वास्तविक विरोध न होनेपर भी विरोधका वर्णन होनेसे विरोधाभास अलङ्गार होता है। इन चारोंका चारोंके साथ विरोध हो सकता है इस दृष्टिसे विरोधके ४x४=१६ भेद होने चाहिये थे। परन्तु वहाँ ग्रन्थकारने जातिका तो जाति आदि चारोंके साथ विरोध माना है, पर आगे गुणका तीनके साथ, क्रियाका दोके साथ और द्रव्यका केवल द्रव्यके साथ ही विरोध गणना करने योग्य मानकर उसके १६ के स्थानपर केवल १० भेद माने हैं- जातिश्चतुर्भिर्जात्याद्यैविरुद्धा स्याद् गुणस्त्रिभिः । क्रिया द्वाभ्यामपि द्रव्यं द्रव्येणैवेति ते दश ।।सू० १६७।। इस प्रकार विरोधालङ्वारके प्रसङ्गमें जातिका चारके साथ, गुणका तीनके साथ, क्रियाका दोके साथ और द्रव्यका केवल एकके साथ विरोध मानकर और एकसे चारतककी संख्याको जोड़कर सङ्कलन- प्रक्रियाके अनुसार ही, भेदोंकी कुल दस संख्या मानी है। परन्तु ध्वनिके भेदोंकी गणनाके प्रसङ्गमें इससे भिन्न प्रकारकी नीतिका अवलम्बनकर ध्वनिके मुख्य इक्यावन भेदोंकी संसृष्टि होनेपर प्रत्येक भेदके ५१-५१ प्रकारके ही संसृष्टिकृत भेद मानकर और ५१ X ५१ का गुणा करके गुणनप्रक्रियाके अनुसार ही भेदोंकी कुल संख्या निर्धारित की है। इस प्रकार 'काव्यप्रकाश' में स्थलभेदसे गुणन तथा सङ्कलनकी द्विविध प्रत्रियाका अवलम्बन किया गया है। दो भिन्न स्थलोंपर ग्रन्थकारने जो दो भिन्न प्रक्रियाओंका अवलम्बन किया है उसका उपपादन इसी प्रकार किया जा तकता है कि ध्वनिके भेदोंमें दो समान भेदोंकी दोनों प्रकारकी संसृष्टियोंमें विलक्षण चमत्कारका अनुभव होता है, परन्तु विरोधस्थलमें इस प्रकारके चमत्कारका अनुभव नहीं होता है। इस ध्वनिस्थलमें अर्थान्तरसंक्र्मितवाच्यकी अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यके साथ संसृष्टिसे जो चमत्कार-प्रतीत होता है, अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यकी अर्थान्तरसंक्रमितवाच्यके साथ संसृष्टि होनेपर उससे विलक्षण चमत्कार- का अनुभव होनेसे इन दोनोंको अलग अलग भेद माना है। परन्तु जातिका गुणके साथ और गृणका जातिके साथ जो विरोध है उसमें कोई विलक्षणता न होनेसे उनको अलग भेद नहीं माना है।
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काव्यप्रकाश का० ४6, सू० ६५
तत्र दिङमात्रमुदाह्नियते- खणपाहुणिआ देअर जाआए सुहअ किपि दे भणिआ। रुअड पडोहरवलहीघरम्मि अणुणिज्जउ बराई ।१११ [क्षणप्राघुणिका देवर जायया सुभग किमपि ते भणिता। रोदिति गृहपश्चाद्द्ागवलभीगृहेऽनुनीयतां वराकी ॥ इति संस्कृतम्] अत्रानुनय: किमुपभोगलक्षणेऽर्थान्तर संक्रमितः किमनुरणनन्यायेनोपभोगे एव व्यङ्गये व्यञ्जक इति सन्देहः। स्निग्धश्यामलकान्तिलिप्तवियतो वेल्लद्वलाका घनाः वाताः शीकरिणः पयोदसुहृदामानन्दकेकाः कलाः । काम सन्तु दृढं कठोरहृदयो रामोऽस्मि सर्व सहे वैदेही तु कथं भविष्यति ह हा हा देवि धीरा भव ।११२॥ अत्र लिप्तेति पयोदसुहृदामिति च अत्यन्ततिरस्कृतवाच्ययोः संसृष्टिः। ताभ्यां सह रामोऽस्मीत्यर्थान्तर सङकमितवाच्यस्यानुग्राह्यानुग्राहकभावेन, रामपदलक्षणैकव्यञ्ज- कानुप्रवेशेन चार्थान्तरसंक्रमितवाच्यरसध्वन्योः सङ्करः ।
[ इस प्रकार ध्वनिकाव्यके भेदोंका विस्तारपूर्वक निरूपण करनेके बाद उनमेंसे ] दिग्दर्शन करानेके लिए कुछ उदाहरण देते हैं- हे देवर, तुम्हारी पत्नीने [क्षण ] उत्सवकी पाहुनी [अर्थात् घरके किसी उत्सवके अवसरपर अतिथिरूपमें आयी हुई] से कुछ कह दिया है [ जिससे दुःखी होकर ] वह एकान्त [शून्य ] पिछवाड़ेके बलभीगृहमें रो रही है। उस विचारीको मना लो ।।१११।। यहाँ 'अनुनय' [यह शब्द ] क्या उपभोगरूप अर्थान्तरमें संक्रमित [होनेसे यह लक्षणामूल अविवक्षितवाच्यध्वनिका भेद ] है, अथवा संलक्ष्यक्रम [अनुरणन-न्याय]की रीतिसे [रोदननिवर्तक अनुनय ही वाच्यार्थ है और उससे ] उपभोगरूप व्यङ्गयमें ही व्यञ्जक [होनेसे अभिधामूलध्वनि ] है यह सन्देह [होनेसे सन्देहसङ्कर ] है। स्निग्ध एवं श्यामल कान्तिसे आकाशको व्याप्त करनेवाले और बलाका [बकपक्ति ] जिनके पास विहार कर रही है ऐसे सघन मेघ [भले ही उमड़ें], छोटे-छोटे जलकणोंसे युक्त [शीतल मन्द ] समीर [भले ही बहे] और मेघोंके मित्र मयूरोंकी आनन्दभरी ककें भी चाहे कितनी ही [श्रवणगोचर ] हों, मैं तो कठोरहृदय राम हूँ, सब-कुछ सह लूँगा। परन्तु [अतिसुकुमारी वियोगिनी ] सीताकी क्या दशा होगी। हा देवि, धैर्य रखना ।११२।। यहाँ 'लिप्त' और 'पयोदसुहृदां' इन दोनोंमें अत्यन्ततिरस्कृतवाच्योंकी संसृष्टि है। उन दोनोंके साथ 'रामोऽस्मि' इस अर्थान्तरसंकमितवाच्यका अङ्गाङ्गिभावसे [सङ्गर], तथा 'राम' पदरूप एक व्यञ्जक [पद] में अनुप्रवेशके कारण अर्थान्तरसंकमितवाच्यध्वनि तथा रसध्वनिका [एकाश्रयानु- प्रवेशरूप ] सङ़कूर है।
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का० ४४, सू० ६५] चतुर्थ उल्लास: १६५
एवमन्यदप्युदाहार्यम्। इति काव्यप्रकाशे ध्वनिनिर्णयो नाम चतुर्थोल्लासः ।
यहाँ 'लिप्त' लिपा हुआ अर्थका वाचक शब्द है। परन्तु कान्तिसे लीपना नहीं होता, इसलिए लिप्तपद अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य होकर 'व्याप्त' अर्थको बोधन करता है। इसी प्रकार चेतन-धर्म 'सौहार्द' अर्थात् 'मित्नत्व'का अचेतन मेघोंमैं सम्भव न होनेसे वह भी अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यरूपसे 'सुखदायक' अर्थ व्यक्त करता है। अतः अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यध्वनिके दो स्थानोंपर निरपेक्षरूपसे स्थित होनेसे उन दोनोंकी संसृष्टि होती है। 'रामोऽस्मि'में राम पद अत्यन्तदुःखसहिष्णुत्वरूप अर्थान्तरमें संक्रमित है। उसका अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यध्वनि-भेदोंके साथ अङ्गाङ्गिभावसङ्कर है। और उसी अर्थान्तरसंक्र्कमित- वाच्यध्वनिका रसध्वनिके साथ एकाश्रयानुप्रवेशरूप सङ्कर पाया जाता है। इसी प्रकार [संसृष्टि, सङ्कर आदिके ] अन्य उदाहरण भी समझने चाहिये। ६२ वें सूत्रमें त्रिविध सङ्कर और एक प्रकारकी संसृष्टि द्वारा ध्वनिभेदोंके विस्तारका वर्णन किया था। उसीकी दृष्टिसे ध्वनिभेदोंकी संसृष्टि और त्रिविध सङ्करके उदाहरण दिखलानेके लिए १. 'क्षणप्राघुणिका' तथा २. 'स्निग्धश्यामल' आदि १११ वाँ तथा ११२ वाँ दो श्लोक यहाँ उद्धृत किये हैं। इनमेंसे प्रथम श्लोकमें दो ध्वनिभेदोंका सन्देहसङ्कर दिखलाया गया है और दूसरे श्लोकमें १. 'अङ्गाङ्गिभावसङ्कर' २. एकाश्रयानुप्रवेशसङ्कर तथा ३. संसृष्टि इन तीनके उदाहरण दिखलाये। गये हैं। इस प्रकार इन दो श्लोकोंमें ही त्रिविध सङ्कर और एक प्रकारकी संसृष्टि, चारोंके उदाहरण दिखला दिये गये हैं। इनमेंसे प्रथम श्लोकमें लक्षणामूल अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य तथा अभिधामूल संलक्ष्यक्रम वस्तुसे व्यङ्गय ध्वनि, इन दोनों ध्वनिभेदोंमेंसे कौन-सा भेद माना जाय इसका कोई विनिगमक न होनेसे दो ध्वनिभेदोंका 'सन्देहसङ्कर' है। 'स्निग्धश्यामल' आदि दूसरे श्लोकमें 'लिप्त' तथा 'पयोदसुहृदां' इन दोनों पदोंमें अत्यन्ततिरस्कृत- वाच्यध्वनि परस्पर निरपेक्षभावसे स्थित है। अतः उन दोनों भेदोंकी संसृष्टि है। 'रामोऽस्मि' इस पदमें 'राम' पद अत्यन्तदुःखसहिष्णुत्व आदि रूप अर्थान्तरमें संक्रमित है। 'लिप्त' तथा 'पयोदसुहृदां' पदोंकी अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यध्वनि इस 'रामोऽस्मि'के अर्ान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनिकी उपकारक है। इसलिए यहाँ पूर्वोक्त दो अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यध्वनियोंका इस तीसरे अर्थान्तरसंत्रमितवाच्यध्वनिके साथ अनुग्राह्य-अ्नुग्राहकभाव अथवा अङ्गाङ्गिभाव सङ्कर है। इसी अर्थान्तरसंक्रमित 'राम' पदमें दुःखपात्रताकी लक्षणा द्वारा व्यज्यमान राज्यत्याग, जटा-वल्कलधारण, पितृशोकादिसे व्यञ्जना द्वारा प्रतीत होनेवाले शोक, आवेश, धैर्य, निर्वेदादि व्यभिचारिभावोंसे परिपुष्ट विप्रलम्भ प्रकाशित होता है। इसलिए 'राम' पदमें अर्थान्तरसंक्र्मितवाच्यध्वनि तथा रसध्वनिका 'एकाश्रयानुप्रवेश' सङ्कर है। इस प्रकार इन दो श्लोकों द्वारा ग्रन्थकारने ४ भेदोंके उदाहरण संक्षेपमें प्रस्तुत किये हैं। काव्यप्रकाशमें 'ध्वनिनिर्णय' नामक चौथा उल्लास समाप्त हुआ। श्रीमदाचार्य-विश्वेश्वर-सिद्धान्तशिरोमणिविरचितायां काव्यप्रकाशदीपिकायां हिन्दीव्याख्यायां चतुर्थ उल्लास: समाप्तः ।
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पञ्चम उल्लास:
एवं ध्वनौ निर्णीत गुणीभूतव्य ङ्गयप्रभेदानाह- [सू० ६६ ] अगूढ मपरस्याङ्गं वाच्यसिद्धयङ्गमस्फुटम् । सन्दिग्धतुल्यप्राधान्ये काक्वाक्षिप्तमसुन्दरम् ।।४५।। an व्यङ्गयमेवं गुणीभूतव्यङ्ग्यस्या्टौ भिदा: स्मृताः अथ काव्यप्रकाशदीपिकायां पञ्चम उल्लास:
उल्लाससङ्गति प्रथम उल्लासमें काव्यके तीन भेद बतलाये थे-१. ध्वनिकाव्य, २. गुणीभूतव्यङ्गय और ३. नित्रकाव्य। इनमेंसे जहाँ वाच्यार्थकी अपेक्षा व्यङ्गयार्थ अधिक चमत्कारी होता है उसको ध्वनिकाव्य कहा जाता है और वह सबसे उत्तम काव्य माना जाता है। इस ध्वनिकाव्यका भेदोपभेद-सहित विस्तार- पूर्वक निरूपण गत चतुर्थ उल्लासमें किया जा चुका है। अब इस पञ्चम उल्लासमें काव्यके दूसरे भेद अर्थात् गुणीभृतव्यङ्गरूप मध्यम काव्यके भेदोंका निरूपण प्रारम्भ करते हैं। गुणीभूतव्यङ्गयके आठ भेद इस प्रकार [चतुर्थ उल्लासमें ] ध्वनि [ काव्यरूप उत्तम काव्य ] का निरूपण हो जानेपर [अब उसके बाद काव्यके दूसरे भेद] गुणीभूतव्यङ्गचके भेदोंको कहते हैं -- गुणीभूतव्यङ्गयके आपराठ भेद माने गये हैं। अगले सूत्रमें इन आटों भेदोंके नाम गिनाते हैं- [सूत्र ६६ ] -- १. अगूढ़ [व्यङ्गच ], २. इतरका अङ्ग [भूत व्यङ्गय], ३. वाच्यसिद्धिका अङ्ग [भूत व्यङ्गच ], ४. अस्फुट [अर्थात गूढ़ व्यङ्गय ], ५. सन्दिग्धप्राधान्य, ६. तुल्यप्राधान्य [व्यङ्गच], ७. काकुसे आक्षिप्त [व्यङ्गय ] और ८. असुन्दर [व्यङ्गय] इस प्रकार गुणीभूतव्यङ्गय [रूप मध्यम काव्य] के आठ भेद बतलाये गये हैं। व्यङ्गचका चमत्कार कहाँ ? ये जो गुणीभूतव्यङ्गकाव्यके आठ भेद गिनाये हैं इनमें अगूढव्य ङ्गय अरथात् स्फुटव्यङ्गय और अस्फुटव्यङ्गय अरथात् गूढव्यङ्गय दोनों ही प्रकारके काव्योंकी गणना गुणीभूतव्यङ्गयमें की गयी है। इसका कारण यह है कि ध्वनि तथा गुणीभूतव्यङ्गकाव्योंका भेद सहृदयोंके अनुभवोंके आरधारपर किया जाता है। सहृदयमात्रसंवेद्य व्यङ्गय होनेपर ही ध्वनिकाव्य होता है। सहृदयसे भिन्न सामान्य व्यक्ति भी जिम व्यङ्गयको अनायास ग्रहण कर लें वह अत्यन्त स्पष्ट होनेसे वाच्यार्थके समान ही हो जाता है इसलिए उस अगुढ व्यङ्गयकी प्रधानता न होनेसे उसको गृणीभूतव्य ङ्गय माना जाता है। इसी प्रकार जिस व्यङ्गयकी प्रतीति सहृदयोंको भी सरलतासे न हो सके वहाँ भी व्यङ्गयका चमत्कार नहीं रहता है इसलिए उस अस्कुटव्यङ्गय या गूढव्य ङ्गयको भी गुणीभूतव्यङ्गय माना जाता है। जहाँ सहृदयोंको व्यङ्गयकी प्रतीति होती है उसको ध्वनिकाव्य कहते हैं। गुणीभूतव्यङ्गयके चमत्कारका निरूपण कामिनीकुचकलशन्यायसे किया गया है -- नान्ध्रीपयोधर इवातितरां प्रकाशो नो गुर्जरीस्तन इवातितरां निगूढः । अर्थों गिरामपिहित: पिहितश्च कश्चित् सौभाग्यमेति मरहृट्टवधूकुचाभ: ।
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का• ४५, सू० ६६ ] पञ्चम उल्लास: १६७
कामिनीकुचकलशवद् गूढं चमत्करोति, अगूढं तु स्फुटतया वाच्यायमानमिति गुणीभूतमेव। अगूढं यथा यस्यासुहृत्कृततिरस्कृतिरेत्य तप्त- सूचीव्यधव्यतिकरेण युनक्ति कणौं। काञ्चीगुणग्रथनभाजनमेष सोडस्मि जीवन्न सम्प्रति भवामि किमावहामि ॥११३॥ [१ क] अत्र 'जीवन्" इत्यर्थान्तरसंक्रमितवाच्यस्य ।
अर्थात् न तो आन्ध्र देशकी स्त्रियोंके कुचकलशके समान अत्यन्त स्पष्टरूपसे प्रकाशमान अगूढ व्यङ्गय शोभा देता है, और न गुजराती स्त्रीके स्तनोंके समान अत्यन्त अप्रकाशित बिलकुल दिखायी न देनेवाला गूढ व्यङ्गय चमत्कारजनक होता है। किन्तु महाराष्ट्र देशकी स्त्रीके कुचकलशके समान न बहुत अस्पष्ट और न बहुत स्पष्ट, केवल सहृदयमात्रसंवेद्य व्यङ्गयार्थ ही शोभित होता है। इस उपमाको ध्यानमें रखकर ही ग्रन्थकार कहते हैं कि- [महाराष्ट्रकी ] कामिनीके कुचकलशके समान [अंशतः ] गूढ़ [व्यङ्गच ] चमत्कारजनक होता है इसलिए [आन्ध्री स्त्रीके कुचके समान ] अगूढ़ [व्यङ्गय ] तो अत्यन्त स्पष्ट होनेसे वाच्य-सा प्रतीत होनेके कारण गुणोभूतव्यङ्गय ही होता है। १. अगूढव्यङ्गय [का प्रथम उदाहरण ] जैसे- शत्रुओं द्वारा की जानेवाली [ पाण्डु-पुत्रोंकी तिरस्कृति ] निन्दा [कानोंमें ] आकर गरम की हुई सुइयोंके समान जिसके कानोंमें चुभती है, वह मैं [ अर्जुन ] आज [बृहन्नलारूपमें ] करधनी गूंथनेका काम कर रहा हूँ। मैं तो इस समय [जीवित रहते हुए भी ] मृतकल्प हूँ, क्या करूँ, [कुछ कर नहीं सकता हूँ। शत्रुओंके मुखसे पाण्डवोंकी निन्दा सुनता हूँ, पर एक वर्ष तो अज्ञातवासमें काटना ही है इसलिए यह सब सुनकर भी कुछ कर नहीं पाता हूँ ॥११३॥[१ क ] प्राचीन टीकाकारोंने इस श्लोकका अर्थ भिन्न प्रकारसे किया है। 'सुधासागर' नामक टीकाके लेखकने लिखा है कि कीचकके द्वारा किये गये पराभवका निवेदन करनेवाली द्रौपदीके प्रति बृहन्नलाके रूपमें अर्जुनकी यह उक्ति है। उद्योतकारका कहना है कि बूहन्नलाकी दशामें किसीने अर्जुनसे यह कहा है कि तुम अपने अभ्युदयके लिए यत्न क्यों नहीं करते हो, उसके उत्तरमें अर्जुनकी यह उक्ति है। उन लोगोंके अनुसार श्लोकका अर्थ इस प्रकार है- जिस [अर्जुन] का शत्रु [उसके डरके कारण ] स्वयं अपनेको धिक्कारता हुआ [कृततिरस्कृतिः और शरणमें] आकर [अपने अपराधके प्रायश्चित्तरूपमें ] गरम सुईसे अपने कानोंको छेद लेता था वही मैं आज करधनी गूँथनेका काम कर रहा हूँ। इसलिए मैं आज बड़ा निन्दित जीवन व्यतीत कर रहा हूँ। पर कर क्या सकता हूँ। इस अर्थके अनुसार श्लोकके पूर्वार्धमें अर्जुनने अपनी पूर्वावस्थाका वर्णन किया है कि पूर्वावस्थामें जिसके शत्रु भी उसकी शरणमें आकर गरम शलाकाओंसे अपने कान छेदकर प्रायश्चित्त करते थे। शरणागतका तप्त शलाकाओंसे स्वयं कर्णबेधन करना उस समयका आचार था यह उन टीकाकारोंका
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१६८ काव्यप्रकाश [ का० ४५, सू० ६६
उन्निद्रकोकनदरेणुपिर्शा्ङ्गिताङ्गा गायन्ति मञ्जु मधुपा गृहदीर्घिकासु। एतच्चकास्ति च रवेनवबन्धुजीव- पुष्पच्छदाभमुदयाचलचुम्बि बिम्बम् ॥११४॥ [१ ख] अत्र चुम्बनस्यात्यन्ततिरस्कृतवाच्यस्य। अत्रासीत् फणिपाशबन्धनविधिः शक्त्या भवद्देवरे गाढं वक्षसि ताडिते हनुमता द्रोणाद्रिरत्राहृतः । दिव्यैरिन्द्रजिदत्र लक्ष्मणशरैर्लोकान्तरं प्रापितः केनाप्यत्र मृगाक्षि ! राक्षसपतेः कृत्ता च कण्ठाटवी ।११५। [१ ग]
अभिप्राय है। परन्तु दूसरे व्याख्याकारोंने इसकी व्याख्यामें शत्रुओंके कर्णवेधनकी बात नहीं लिखी है और न उसमें अर्जुनकी पूर्वावस्थाका वर्णन माना है। द्रौपदीने जब कीचकके द्वारा किये जानेवाले अपने अपमानकी चर्चा अर्जुनसे की तो उसको सुनकर बृहन्नलारूपधारी अर्जुनको ऐसा दुःख हुआ मानों किसीने गरम शलाका उनके कानोंमें घुसेड़ दी हो। परन्तु प्रतिज्ञाबद्ध होनेके कारण वह कुछ कर नहीं सकता था। अपनी इसी विवशताका प्रदर्शन अर्जनने इस श्लोकमें किया है। यहाँ 'जीवन्' यह [ पद निन्दित जीवनरूप ] अर्थान्तरमें संक्रमितवाच्य [ध्वनिके अत्यन्त अगूढ़ होनेसे गुणीभूतव्यङ्गच् ] का [उदाहरण है ]। अगूढव्यङ्गयका दूसरा उदाहरण लक्षणामूलध्वनिके अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य भेदके गुणीभूत होनेका उदाहरण दिया है। अ्ब इसी लक्षणामूलध्वनिके अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य नामक भेदके गुणीभूत होनेका उदाहरण देते हैं- खिले हुए लाल कमलोंके परागसे पीले अङ्गवाले भौंरे घरकी बावड़ियोंमें मधुर स्वरमें गा रहे हैं और गुड़हल [ या दुपहरिया] के फूलके समान [अत्यन्त रक्तवर्ण] उदयाचलका स्पर्श करनेवाला सूर्यका यह बिम्ब शोभित हो रहा है ॥११४।[१ ख] यहाँ 'उदयाचलचुम्बि बिम्बम्' में सूर्यमें वक्त्रसंयोगव्यापाररूप चुम्बनके बाधित होनेसे 'चुम्बि' पद सामान्यसंयोगरूप अर्थका बोधक हो जाता है, अतः अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य चुस्बनका [स्पष्ट होनेसे अगूढव्यङ्गचत्व है ]। अगूढव्यङ्गयका तीसरा उदाहरण इस प्रकार लक्षणामूलध्वनिके दोनों भेदोंके अगूढव्य ङगयके दो उदाहरण देकर आगे अभिधामूल- ध्वनिके अर्थशक्तिमूल भेदमें अगूदव्यङ्गयका ही तीसरा उदाहरण देते हैं। 'बालरामायण' में अयोध्याको लौटते समय रामचन्द्रजी सीताके प्रति कह रहे हैं- [हे सीते ! ] यहाँ नागपाशसे हम [ दोनों भाइयोंको ] बाँधा गया था। और [उसी युद्धभूमिके दूसरे स्थलपर ] यहाँ तुम्हारे देवर [लक्ष्मण] के वक्षःस्थलपर शक्तिके लगनेपर हनुमान् द्रोणाचलको लाये थे। यहाँ लक्ष्मणके दिव्य बाणोंने मेघनादको दूसरे लोक [यमपुर] पहुँचाया था। और हे मृगाक्षि ! यहाँ [ युद्धभूमिके चौथे स्थलमें ] किसीने राक्षसपति [रावण ]के कण्ठवनको काटा था ।११५ [१ग] कक विकाफइ
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का० ४५, सू० ६६ ] पञचम उल्लास: १६६
अत्र 'केनाप्यत्र' इत्यर्थशक्तिमूलानुरणनरूपस्य । 'तस्याप्यत्र' इति युक्तः पाठः । अपरस्य रसादेर्वाच्यस्य वा वाक्यार्थीभूतस्य अङ्ग रसादि अनुरणनरूपं वा।
यथा- अयं स रशनोत्कर्षी पीनस्तनविमर्दनः । नाभ्यूरुजघनस्पर्शी नीवीविस्रंसन: करः ॥११६॥ [२ क ] अत्र शृङ्गारः करुणस्य।
यहाँ 'केनापि' किसीने इस अर्थशक्तिमूल [अनुरणनरूप ] संलक्ष्यकमव्यङ्गधका [अगूढ 'होनेसे गुणीभाव है। इसलिए] यहाँ ['केनाप्यत्र'के स्थानपर] 'तस्याप्यत्र' यह पाठ होना उचित था। २. अपराङ्ग-रूप गुणीभूतव्यङ्गयके आठ उदाहरण इस प्रकार यहाँतक गुणीभूतव्यङ्गयके प्रथम भेद अगूढव्यङ्गयके तीन उदाहरण दिये। इस प्रथम भेदका निरूपण समाप्त करनेके बाद इसी गुणीभूतव्यङ्गयके दूसरे भेद 'अपराङ्ग्व्यङ्गय'के आपराठ उदाहरण देते हैं। अपराङ्गव्यङ्गयका अभिप्राय यह है कि जहाँ वाक्यका तात्पर्यविषयीभूत प्रधान अर्थ अन्य रसादि या वाच्यादि अर्थ हो और दूसरा व्यङ्गय रसादि अथवा संलक्ष्यक्रमव्यङ्गय वस्तु या अलङ्कारादि व्यङ्गय उसका अ्रङ्ग हो उसको अपराङ्गव्यङ्गयरूप गुणीभूतव्यङ्गय कहा जाता है। इस प्रकारके आठ उदाहरण आगे देते हैं। इनमेंसे पहिले उदाहरणमें वाक्यार्थीभूत प्रधान रस करुण है और उसका अ्रङ्ग शृङ्गाररस है। अतः उसमें शृङ्गाररस गुणीभूत है। अतः वह 'अपराङ्गव्यङ्गय' का उदाहरण है। [अपरस्य अर्थात् ] रसादिका अथवा वाक्यके तात्पर्यविषयीभूत अन्य वाच्यका अङ्ग रसादि अथवा संलक्ष्यकरम [अनुरणनरूप वस्तु अलङ्कार आदि ] होनेपर [अपराङ्ग नामक गुणीभूतव्यङ्गयका द्वितीय भेद होता है] जैसे- प्रथम उदाहरण यह [मेरी रशना ] करधनीको खींचनेवाला, पीन स्तनोंका मर्वन करनेवाला, नाभि, ऊरु तथा जघनस्थलका स्पर्श करनेवाला तथा नीवी [नारे]को खोलनेवाला [मेरे पतिका अत्यन्त प्रिय ] हाथ है ।११६॥ [ २ क ] यहाँ शृङ्गार [रस ] करुण [रस] का [अङ्ग है]। यह श्लोक 'महाभारत' के स्त्रीपर्वके २४वें अध्यायमेंसे लिया गया है। उसमें रणभूमिमें कटकर गिरे हुए भूरिश्रवाके हाथको देखकर विलाप करती हुई उसकी पत्नी कह रही है। इसलिए इस श्लोकका मुख्य रस तो करुणरस है। परन्तु उसमें वह स्त्री रतिकालमें होनेवाले उस हाथके विविध कार्योंका स्मरण कर रही है इसलिए उससे शृङ्गाररस भी अभिव्यक्त होता है। परन्तु वह स्मर्यमाण शृङ्गारप्रसङ्ग प्रकृत करुणरसका ्रङ्ग ही है। अतः यह अपराङ्गरूप गुणीभूतव्यङ्गयका उदाहरण है। द्वितीय उदाहरण इस प्रकार जहाँ एक रस दूसरे रसका शङ्भ है इस प्रकारका उदाहरण दिया गया है। अब आगे इस प्रकारका उदाहरण देते हैं जिसमें-रस भावका अ्रङ्ग होनेसे गुणीभूत हो गया है। अगले श्लोकका
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कैलासालयभाललोचनरुचा निर्व्त्तितालक्तक- व्यक्तिः पादनखद्युतिगिरिभुवः सा वः सदा त्रायताम् । स्पर्धाबन्धसमृद्धयेव सुदृढं रूढा यया नेत्रयोः कान्तिः कोकनदानुकारसरसा सद्यः समुत्सार्यंते ॥११७॥[२ ख] अत्र भावस्य रसः ।
भाव यह है कि रूठी हुई पार्वतीको मनानेके लिए शिवजी उनके चरणोंपर झुक रहे हैं। उस समय उनके मस्तकपर स्थित तृतीय नेत्रकी कान्ति पार्वतीके चरणोंपर पड़कर महावरका काम कर रही है। और करोधके कारण अत्यन्त लाल होनेसे उसके साथ स्पर्धा करनेवाली पार्वतीके नेत्रोंकी लाल कान्ति उससे पराजित होकर मानो तुरत ही भाग जाती है। अर्थात् शिवजीको पादावनत देखकर पार्वतीका क्रोध एकदम दूर भाग जाता है। इसमें कविकी पार्वतीविषयक भक्ति प्रधान अर्थ है। देवविषयक रति होनेके कारण 'रतिर्देवादिविषया भावः' इस लक्षणके अनुसार वह भक्ति या रति 'भाव' रूप है। श्लोकमें शृङ्गाररसका भी वर्णन है परन्तु वह प्रधान नहीं अपित भक्ति 'भाव'का अ्रङ्ग है। इसलिए यह अपराङ्ग- व्यङ्गयका दूसरा उदाहरण है। श्लोकका शब्दार्थ इस प्रकार है। कैलासवासी [शिवजी] के ललाटस्थ [तृतीय ] नेत्रकी कान्तिसे महावरकी [व्यक्तता या ] शोभा जिसमें सम्पादित की गयी है इस प्रकारकी पार्वतीके चरणोंके नाखूनोंकी वह द्युति, तुम्हारी सदा रक्षा करे [पार्वतीके क्रोधसे आरक्त नेत्रोंकी आरक्तताको जीतनेके लिए स्पर्धाबन्ध ] शर्त बदनेके कारण और भी अधिक बढ़ी हुई जिस [पादनखद्युति ]के द्वारा [पार्वतीके कोधसे ] आरक्त नेत्रोंकी लाल कमल [कोकनद ] का अनुकरण करनेवाली सरस कान्ति [पराजित कर दी जानेसे ] तुरन्त भगा दी जाती है। [अर्थात् पार्वतीके मानापनोदनके लिए चरणोंपर झुके हुए शिवजीके तृतीय नेत्रकी द्युतिसे और भी आरक्त हुई पार्वतीकी नखद्युतिसे मानो पराजित होकर क्रोधसे आरक्त नेत्रोंकी लाल कान्ति भाग जाती है। अर्थात् पार्वतीका क्रोध शान्त हो जाता है ] ॥११७॥[२ ख]। यहाँ [पार्वतीविषयक भक्तिरूप] 'भाव'का [महादेवनिष्ठ पार्वतीविषयक सम्भोग-शृङ्गाररुप] रस [अङ्ग है]। इसका अभिप्राय यह है कि इस श्लोकका मुख्य वाक्य 'गिरिभुवः सा पादनखद्युतिर्वः सदा दायताम्' यह है। इससे कविके पार्वतीविषयक भक्तिरूप 'भाव'की अरभिव्यक्ति होती है। वह प्रधान 'भाव' है। उसके साथ पार्वतीके मानापनोदनके लिए शिवजीके जिस व्यापारका वर्णन है वह सम्भोग- श्ृङ्गारका अभिव्यञ्जक है। उससे अभिव्यक्त शृङ्गाररस यहाँ प्रधानभूत भक्ति-भाव'का त्रङ्गमात्र है, प्रधान नहीं। अतः रसके 'भाव का अङ्ग होनेके कारण यह श्लोक अपराङ्गरूप गुणीभूतव्य ङ्गयका उदाहरण हो जाता है। तृतीय उदाहरण इस द्वितीय उदाहरणमें यह दिखलाया गया था कि 'रस' 'भाव'का अङ्ग हो गया। अगला ततीय उदाहरण इम प्रकारका दिखलाते हैं, जिसमें एक 'भाव' दूसरे 'भाव'का अङ्ग होता है। जयन्त- भट्टारककृत 'दीपिका' टीकामें यह श्लोक 'पञ्चाक्षरी' नामक कविके द्वारा भोजराजकी स्तुतिमें लिखा हुआ बतलाया गया है। श्लोकका अर् निम्नलिखित प्रकार है-
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का० ४५, सू० ६६ ] पञ्चम उल्लास: २०१
अत्युच्चा; परितः स्फुरन्ति गिरयः स्फारास्तथाम्भोधयः तानेतानपि बिभ्रती किमपि न क्लान्ताऽसि तुभ्यं नमः ~ आश्चर्येण मुहुर्मुहुः स्तुतिमिति प्रस्तौमि यावद् भुवः तावद्विभ्रदिमां स्मृतस्तव भुजो वाचस्ततो मुद्रिताः ॥११८।[ २ ग] अत्र भूविषयो रत्याख्यो भावो राजविषयस्य रतिभावस्य । बन्दीकृत्य नृपद्विषां मृगदृशस्ताः पश्यतां प्रेयसां श्लिष्यन्ति प्रणमन्ति लान्ति परितश्चुम्बन्ति ते सैनिकाः ।
अस्माक विध्वस्ता विपदोऽखिलास्तदिति तैः प्रत्यथिभिः स्तूयसे ॥११९॥[२ घ] अत्र भावस्य रसाभासभावाभासौ प्रथमार्धद्वितीयार्धद्योत्यौ।
चारों ओर बड़े ऊँचे-ऊँचे पहाड़ और विस्तीर्ण सागर दिखलायी पड़ते हैं। उन [जैसे भयङ्गर] इन [भारी वस्तुओं] को [अपने आप ] धारण करती हुई भी [हे पृथ्वि ! ] तुम घबड़ाती नहीं हो, ऐसी [अद्भुत साहसमयी ] तुमको [श्रद्धाभावसे मेरा ] नमस्कार है। इस प्रकार आश्चर्यसे [अभिभूत हुआ] मैं जबतक बार-बार पृथिवीकी यह स्तुति कर रहा था तबतक इस [पृथिवी ] को भी धारण करनेवाले तुम्हारे [ राजा भोजके ] भुजकी याद आ गयी [ जो उसके भी भारको धारण किये हुए है] तब [पृथिवीकी स्तुतिपरक मेरी ] वाणी बन्द हो गयी ॥११८॥[२ग] यहाँ पृथिवीविषयक [कविनिष्ठ ] रतिरूप 'भाव' [कविनिष्ठ ] राजविषयक रतिरूप [दूसरे] 'भाव' का [अङ्ग है। इसलिए यह अपराङ्गव्यङ्गयका उदाहरण है]। चतुर्थ उदाहरण इस प्रकार इस तृतीय उदाहरणमें एक 'भाव' दूसरे 'भाव' का अङ्ग है यह दिखलाया था; अगला उदाहरण इस प्रकारका देते हैं जिसमें राजविषयक रतिरूप 'भाव' प्रधान है और श्लोकके पूर्वार्द्धसे द्योत्य 'शृङ्गाराभास' तथा उत्तरार्द्धसे द्योत्य 'भावाभास' उसके अ्रङ्ग हैं। हे राजन् ! आपके सैनिक शत्रुओंकी स्त्रियोंको बन्दी बनाकर [उनके ] पतियोंके सामने [उनकी परवाह न करके] उनका [बलात्] आलिङ्गन करते हैं, [सैनिकोंकी इस धृष्टतापर स्त्रियोंके नाराज होनेपर उनको प्रसन्न करनेके लिए ] प्रणाम करते हैं, [उनसे बचनेके लिए स्त्रियोंके इधर-उधर हटनेपर ] उनको चारों ओरसे पकड़ लेते हैं, और [धृष्टतापूर्वक बलात् उनका ] चुम्बन करते हैं। और तुम्हारे शत्रु इस प्रकार [कहकर] तुम्हारी स्तुति करते हैं कि हे औचित्यके वारिधि! [उचित कार्यके करनेवाले हे राजन् !] हमारे [पूर्वजन्मके ] पुण्योंसे हमें आपके दर्शन हुए हैं इसलिए [ अब आपके दर्शनसे ] हमारी सारी विपत्तियाँ मिट गयी हैं ॥११६॥[ २ घ] यहाँ पूर्वार्द्ध [में सैनिकोंका अननुरक्त परस्त्रीविषयक शृङ्गाराभास ] और उत्तरार्द्ध [में शत्रु- निष्ठ राजविषयक रतिरूप भावाभास ] से द्योत्य रसाभास तथा भावाभास [कविनिष्ठ राजविषयक रतिरूप ] भावके [अङ्ग हैं ]।
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काव्यप्रकाश [का० ४५, सू० ६६
अविरलकरवालकम्पनैभ्रुकुटीतर्जनगर्जनैमुहुः । दद्शे तव वैरिणां मदः स गतः क्वापि तवेक्षणे क्षणात् ॥१२०।।[२ ङ] अत्र भावस्य भावप्रशमः । साक कुरङ्गकैदृशा मधुपानलीलां कर्त सुहृद्द्िरपि वैरिणि ते प्रवृत्ते । अन्याभिधायि तव नाम विभो! गहीतं केनापि तत्र विषमामकरोदवस्थाम् ।१२१॥[२च] अत्र त्रासोदयः ।
इसका अभिप्राय यह है कि श्लोकके पूर्वार्द्धमें राजाके सैनिकोंका शत्रुकी स्त्रियोंके साथ जो शृङ्गार- का वर्णन है वह अनौचित्यसे प्रवर्तित होनेके कारण रसाभास है, क्योंकि अनुरक्त स्त्रीके प्रति रतिसे तो रसनिष्पत्ति हो सकती है, किन्तु अननुरक्त शत्रुकी स्त्रियोंके प्रति प्रदर्शित रतिसे यहाँ 'रसाभास' ही व्यक्त होता है, रस नहीं। इसी प्रकार श्लोकके उत्तराधमे शत्रु लोग प्रकृत राजाकी स्तुति करते हुए बतलाये गये है। किसी शत्रुकी अपने प्रति रति या उसके द्वारा की जानेवाली स्तुतिको भी अनौचित्यसे प्रवर्तित होनेके कारण 'भावाभास' ही कहा जा सकता है। परन्तु इम श्लोकमें 'रसाभास' तथा 'भावाभास दोनों ही अप्रधान या अङ्गभूत है। ग्रङ्गी या प्रधानभूत कविनिष्ठ राजविषयक रति है। कवि राजाकी स्तुति कर रहा है। इसलिए कविकी गजाविषयक रति ही यहाँ मुख्य है। शेष उपरिनिरदिष्ट रसाभास तथा भावाभाम, दोनों उसके अ्ङ्ग है। इसलिए यह अपराङ्गव्यङ्गयरूप गुणीभूतव्यङ्गयका उदाहरण है। पञ्चम उदाहरण आगे भावशान्तिक भावका अ्रङ्ग होनेका उदाहरण देते हैं- [हे राजन् ! तुम्हारी अनुपस्थितिमें ] निरन्तर तलवार चलाने, भौहें चढ़ाकर डराने और बार-बार गरजनेके द्वारा तुम्हारे बैरियोंका बड़ा अभिमान दिखलायी देता था, परन्तु तुम्हें देखते ही वह [मद] पलभरमें न जाने कहाँ उड़ गया ॥१२०॥[२ ङ] यहाँ [वैरियोंके मदरूप ] भावका प्रशम [भावशान्ति कविनिष्ठ राजविषयक रतिरूप] 'भाव' का [अङ्ग है। इसलिए यह भी अपराङ्गव्यङ्गयका पाँचवाँ उदाहरण है ]। षष्ट उदाहरण आ्रगे भावोदयकी अङ्गताका उदाहरण देते हैं- 1 हे राजन् ! तुम्हारा शत्रु मित्रों सहित मृगनयनीके साथ जसे ही मद्यपानकी लीलामें प्रवृत्त हुआ कि [श्लेषसे ] अन्य अर्थका वाचक तुम्हारा नाम किसीने ले लिया जिससे वहाँ [उस मधुपानगोष्ठीमें] बड़ी विषम अवस्था हो गयी। [तुम्हारे नामको सुनकर सब लोग घबड़ा गये, इधर-उधर भागने लगे] ।।१२१॥ [२ च ] यहाँ तास [रूप भाव ] का उदय [कविनिष्ठ राजविषयक रतिरूप 'भाव' का अङ्ग है। इसलिए यह भी अपराङ्गव्यङ्गयरूप गुणोभूतव्यङ्गचका छठा उदाहरण हुआ। सप्तम उदाहरण आगे भावसन्धिकी अपराङगताका उदाहरण देते हैं। शिवजीकी प्राप्तिके लिए तपस्या करती हुई पार्वनीके सामने कपटभेष धारणकर उपस्थित हए शिवजीका इम पद्यमें वर्णन है। यह पार्वती
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का० ४५, सू० ६६ पञ्चम उल्लास: २०३ असोढा तत्कालोल्लसदसहभावस्य तपसः कथानां विश्रभ्भेष्वथ च रसिक: शैलदुहितुः । प्रमोदं वो दिश्यात्कपटबटुवेषापनयने त्वराशैथिल्याभ्यां युगपदभियुक्तः स्मरहरः ॥११२।[२ छ] अत्रावेगधैर्ययो: सन्धिः । पश्येत्कश्चिच्चल चपल रे का त्वराऽहं कुमारी हस्तालम्वं वितर हह हा व्युत्कम: क्वासि यासि। इत्थं पृथ्वीपरिवृढ ! भवद्विद्विषोऽरण्यवृत्तेः कन्या कञ्चित्फलकिसलयान्याददानाऽभिधत्ते ।१२३। [२ ज] मेरे ही लिए ऐसी कठोर तपस्या कर रही है यह देखकर उनके मनमें एक बार यह भाव उत्पन्न होता है कि क्यों न मैं इसके सामने अपने कपटवेषको हटाकर अपने-आपको प्रकट कर दूँ कि मैं ही तो वह शिव हूँ जिसके लिए तुम तपस्या कर रही हो। दूसरी ओर फिर अज्ञातरूपमें अपने प्रति पार्वतीकी अनुरागभरी बातें सुननेकी इच्छासे वह अपने सङ्कल्पको रोक लेते हैं। इस प्रकार शिवजीके त्वरा और शैथिल्यरूप भावोंकी सन्धि है। और यह भावसन्धि कविनिष्ठ शिवभक्तिरूप 'भाव'का अ्ङ्ग हो रही है इसलिए यह अपराङ्ग्व्यङ्गयका सातवाँ उदाहरण है। श्लोकका अर्थ इस प्रकार है- [पार्वतीकी कोमल अवस्थाके ] उस कालमें [पार्वती द्वारा की जानेवाली ] तपकी कठोरता [असहभाव असहनीयता ] को [देखकर द्रवीभूत हुए अतएव ] न सह सकनेवाले [अर्थात् तुरन्त इच्छा पूर्तिके लिए उद्यत ] साथ ही पार्वतीकी [शिवानुरागपरक ] विश्वस्तरूपसे की जानेवाली बातों [कथानां] का रस लेनेवाले [ अतएव पार्वतीके तपकी दुःसहताको देखकर अपने ] कपटपूर्ण ब्रह्मचारीके वेषके छोड़ने- के त्वरा और [उस अनुरागचर्चाके रसास्वादके कारण उस वेषके परित्याग करनेके लिए ] शैथिल्यसे एक साथ ही अभियुक्त हुए [स्मरहर ] शिवजी तुम्हें आनन्द प्रदान करें ॥१२२॥[२छ] यहाँ आवेग [त्वरा] और धैर्य [शैथिल्य] की सन्धि [कविनिष्ठ शिवविषयक रतिरूप 'भाव'का अङ्ग है। अतः यह अपराङ्गव्यङ्गयका सातवाँ उदाहरण है। अष्टम उदाहरण आगे 'भावशबलता' के भावाङ्ग होनेपर अपराङ्गव्यङ्गयरूप गुणीभूतव्यङ्गयका आाठवाँ उदाहरण देते हैं। इस उदाहरणमें किसी राजाकी स्तुति करता हु कवि जङ्गलमें रहनेवाले उसके शत्रुकी कन्याकी अवस्थाका वर्णन कर रहा है। यह कन्या वनमें फल-फूल बीनने गयी थी। वहाँ किसी कामुकसे उसका सम्बन्ध हो गया। उस समयकी कन्याकी बातोंका वर्णन करते हुए कवि कहता है कि- १. [कामुक पुरुष एकान्तमें उसको पकड़ना चाहता है तो कन्या उससे मना करती हुई करती है] अरे कोई देख लेगा। [शङ्का] २. [फिर भी कामुक पास आ जाता है तो कन्या कहती है ] अरे चपल, हट जा [इससे रागानुबिद्ध असूया सूचित होती है ]। [असूया] क्यों हो रहे हो ]। ३. [कहीं निराश होकर चला ही न जाय इसलिए कन्या कहती है] जल्दी क्या है [इतने अधीर [धुति]
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अत्र शङ्कासूयाधृतिस्मृतिश्रमदैन्यविबोधौत्सुक्यानां शवलता। एते रसवदाद्यलङ्काराः ।
४. [फिर उसको स्मरण आता है कि ] मैं कुमारी हूँ [ मेरा यह प्रेमव्यापार उचित नहीं है]। [स्मृति ] ५. [पर शीघ्र ही वह कामावेशमें परवश होकर कहती है] मुझे हाथका सहारा दो [ पकड़ लो] [श्रम] ६. [आत्मसमर्पण कर देनेपर दन्य प्रकट करती है] ह-ह-हा ! [दैन्य] ७. [फिर उसको बोध हाता है और कहती है, कुमारी कन्याका यह आचरण कुलमर्यादा आदिका ] अतिकमण है। [विबोध] ८. [जब कामुक निराश होकर चल देता है तब औत्सुक्यवश कहती है] अरे तुम कहाँ जाते हो ['क्वासि' में 'असि' पद 'त्वं' पदके अर्थमें है। क्वासि यासि अर्थात् 'त्वं क्व यासि' यह अभिप्रेत है]। [औत्सुक्य] हे राजन् ! [आपके डरसे भागकर ] जङ्गलमें रहनेवाले आपके शत्रुकी [भोजनके लिए ] फल और पत्तोंको तोड़ती हुई कन्या [अपने किसी कामुकसे ] इस प्रकार कहती है ॥१२३॥[२ ज] यहाँ [पश्येत कश्चित्से ] १. शङ्गा, ['चल चपल रे' इससे ] २. असूया, [ 'का त्वरा' इससे ] ३. धृति, ['अहं कुमारी' इससे ] ४. स्मृति, [ 'हस्तालम्बं वितर' इससे ] ५. श्रम, [ 'हह हा' इससे ] ६. दैन्य, ['व्युत्कमः' इससे ]७. विबोध और [ 'क्वासि यासि' इससे ] ८. औत्सुक्य [इन आठ भावोंकी ] शबलता है [और वह कविनिष्ठ स्तूयमान राजविषयक रतिका अङ्ग है]। रसवदादि अलङ्कार चतुर्थ उल्लासके आरम्भमें असंलक्ष्यक्रमव्य ङ्गयध्वनिके निरूपणमें रसके साथ रसाभास, भाव, भावाभास और भावशान्ति आदिकी चर्चा करते हुए ग्रन्थकारने लिखा था कि जहाँ अन्य वाक्यार्थकी प्रधानता होनेपर रसादि उसके अङ्ग होते हैं: वहाँ गुणीभूतव्यङ्गयमें रसके अन्यका श्रङ्ग होनेपर १ लप 'रसवत्', भावके अन्यका अङ्ग होनेपर २. प्रेय, रसाभास तथा भावाभासके अन्यका अङ्ग होनेपर ३. ऊर्जस्वि और भावशान्ति आदिके अन्यके अ्रङ्ग होनेपर ८. समाहित आदि अलङ्कार होते हैं। उनके उदाहरण गुणीभूतव्यङ्गयके निरूपणके समय देंगे। अपनी इस प्रतिज्ञाके अनुसार ही ग्रन्थकारने अप- गङ्ग्व्यङ्गय नामक गृणीभूतव्यङ्गयके निरूपणके प्रसङ्गमें उस प्रकारके आपठ उदाहरण दिये हैं। अपनी उस पूर्व उक्तिका स्मरण दिलाते हुए ग्रन्थकार अगली पंक्तिमें कहते हैं कि- ये ही [पूर्वकथित ] रसवदादि अलङ्गार हैं। यहाँ यह प्रश्न उपस्थित होता है कि प्राचीन आचार्योंके मतमें- गुणीभतो रसो रसवत्, भावस्तु प्रेयः, रसाभासभावाभासौ उर्जस्वि, भावशान्तिः समाहितः । इन चारको ही रसवत् अलङ्कारोंमें गिना गया है। भावोदय, भावसन्धि तथा भावशबलत्वको अलङ्कार नहीं माना गया है। तब आपको भी पाँच उदाहरण रसवदादिके देने चाहिये थे। आपने भावोदयादिके तीन अधिक उदाहरण किसलिए दिये हैं। इस शङ्काका समाधान ग्रन्थकार यह करते हैं कि यद्यपि स्पष्टरूपसे चारको ही रसवदादि अलङ्कारोंमें गिना गया है, परन्तु जहाँ भावशान्तिको ममाहित अलङ्कार बतलाया गया है वहाँ उस समाहित पदको भावोदय आदि शेष तीनका भी उपलक्षण
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का० ४५, सू० ६६ ] पञ्चम उल्लास: २०५ यद्यपि भावोदयभावसन्धिभावशबलत्वानि नालङ्कारतया उक्तानि, तथाऽपि कश्चिद् ब्रूयादित्येवमुक्तम्। यद्यपि स नास्ति कश्चिद्विषयः, यत्र ध्वनिगुणीभूतव्यङ्गचयोः स्वप्रभेदादिभिः सह सङ्करः संसृष्टिर्वा नास्ति तथाऽपि 'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति' इति क्वचित्केनचिद् व्यवहारः। माना जा सकता है, क्योंकि उनमें भी परोत्कर्षकत्वरूप अलङ्कारका लक्षण पाया जाता है। इसलिए कोई व्याख्याकार यह भी कह सकते हैं कि इन तीनोंकी भी रसवदादि अलङ्कारोंमें गणना की जानी चाहिये। उनका यह कथन नितान्त निराधार नहीं कहा जा सकता है इसलिए हमने उनके भी उदाहरण यहाँ दे दिये हैं। अपने इसी भावको ग्रन्थकार अगली पंक्तिमें इस प्रकार व्यक्त करते हैं- यद्यपि [महिमभट्ट या भामह आदि प्राचीन आचार्योंने ] भावोदय, भावसन्धि और भावशबलत्व- को [रसवदादि ] अलङ्कार नहीं कहा है फिर भी [अन्य रसवदादि अलङ्कारोंके समान इनसे भी अन्यका उत्कर्ष होता है, इसलिए लक्षणकी समानता से ] कोई [व्याख्याकार उनको भी समाहित अलङ्गारके अन्तर्गत रसवदाद्यलङ्कार] कह सकता है [लक्षणकी समानताके कारण यह कथन निराधार नहीं होगा] इसलिए हमने यहाँ रसवदादि अलङ्कारोंके प्रसङ्गमें उन तीनोंको भी] कहा है। प्राधान्येन व्यपदेश ऊपर ध्वनि तथा गुणीभूतव्यङ्गयके जो भेद दिखलाये हैं उनमें अन्य भेदोंका सङ्कर [नीर- क्षीरन्यायसे मिश्रण] या संसृष्टि [तिलतण्डुलन्यायसे मिश्रण] भी प्रायः रहती है, परन्तु उन सङ्कीण या संसृष्ट भेदोंमेंसे जिसकी प्रधानता होती है उसी नामसे उस भेदका निर्देश किया जाता है। जो कम चमत्कार- जनक या गौण होता है उसके नामसे नहीं। इसी बातको ग्रन्थकार अगली पंक्तिमें कहते हैं- यद्यपि ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलेगा जिसमें ध्वनि या गुणीभूतव्यङ्गचका अपने प्रभेदादिके साथ [नीरक्षीरन्यायसे मिश्रणरूप अङ्गाङ्गिभाव, एकाश्रयानुप्रवेश या सन्देहरूप त्रिविध ] सङ्कर अथवा [तिलतण्डुलन्यायसे मिश्रणरूप ] संसृष्टि न हो, फिर भी प्रधानताके अनुसार नामकरण किया जाता है इस [नियम] के अनुसार कहीं किसी विशेष [नाम]से व्यवहार होता है[ अर्थात् दो या अधिक भेदोंके एक उदाहरणमें होनेपर भी जो प्रधान या अधिक चमत्कारजनक होता है उसके अनुसार उसका नामकरण या व्यवहार होता है]। शब्दशक्तिमूल अलङ्कारध्वनिकी वाच्याङ्गताका उदाहरण यहाँतकके उदाहरणोंमें एक असंलक्ष्यक्रम रसादि ध्वनि दूसरे व्यङ्गय भावादि ध्वनिका अ्रङ्ग हो रहा है। अतः ये रसवदलङ्कारोंके उदाहरण थे। रसवदलङ्कारोंके विशेष महत्त्वके कारण ही उनके उदाहरण इतने विस्तारके साथ दिये गये थे। अब आगे इसी अपराङ्गव्यङ्गयके दो उदाहरण ग्रन्थकार और दे रहे हैं। इनमें क्रमशः संलक्ष्यक्रमव्यङ्गय अलङ्कारध्वनि तथा वस्तुध्वनि, वाच्यके अ्ङ्ग हो रहे हैं। वस्तुध्वनि यों तो व्यङ्गय है, परन्तु वह वाच्यका अ्रङ्ग बन गया है इसलिए ये दोनों अपराङ्गव्यङ्गय- रूप गुणीभूतव्यङ्गयके उदाहरण हैं। इनमें पहिले उदाहरणमें कवि किसी भिक्षुकके मुखसे रामचन्द्रजीक साथ उसके साम्यका वर्णन करा रहा है। इसमें उपमालङ्कार व्यङ्गय है, साथमें श्लेषालङ्ार भी है। श्लेषमुखसे भिक्षुक कहता है कि-
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२०६ काव्यप्रकाश: [का० ४५, सू० ६६
जनस्थाने भ्रान्तं कनकमृगतृष्णान्धितधिया वचो वैदेहीति प्रतिपदमुदश्रु प्रलपितम् । कृतालङ्काभर्तुर्वदनपरिपाटीषु घटना। मयाऽडप्तं रामत्वं कुशलवसुता न त्वधिगता ॥१२४।।[२ झ] अत्र शब्दशक्तिमूलानुरणनरूपो रामेण सहोपमानोपमेयभावो वाच्याङ्गतां नीतः ।
[रामचन्द्रजी कनकमृगकी तृष्णामें उसके पीछे घूमते फिरे थे तो उनके समान मैं भी कनक] सोनेकी मृगतृष्णामें [ धनकी प्राप्तिके लिए ] विवेकशून्य होकर जनस्थान [अर्थात् नगरोंमें और रामचन्द्रके पक्षमें दण्डकारण्यके स्थान-विशेष में मारा-मारा फिरा और [धनाढयोंके सामने धनकी याचना करते हुए ] आँखोंमें आँसू भरे हुए पग-पगपर बार-बार [कुछ धन] 'दीजिये' यह [वै] निश्चयपूर्वक बकता फिरा। [रामचन्द्रजी भी सीताहरणके बाद रोते हुए और बार-बार पग-पगपर वैदेहीका नाम लेकर पुकारते फिरते थे] और [काभर्तुः ] धूर्त धनिकोंके मुखकी भावभङ्गियों [वदनपरिपाटीषु, इशारों] पर [उनके इच्छानुसार घटना अलं अत्यर्थ ] सारा व्यवहार किया। [रामचन्द्रजीने भी लङ्गाभर्तु: रावणकी वदनपरिपाटी दशमुखोंकी पंक्तिपर इषुघटना बाणोंका प्रयोग किया था। इस प्रकार रामके समान सारे कार्य करके] मैंने रामत्व [रामसदृशत्व ] को तो प्राप्त कर लिया, परन्तु कुशल-वसुता [कुशलं प्रचुर वसु धनं यस्य तस्य भाव: कुशल-वसुता] बड़ा धनिकत्व [रामचन्द्रके पक्षमें कुशलवौ सुतौ यस्याः सा कुशलव-सुता जानकी] को प्राप्त नहीं कर सका ॥१२४॥[२ ञ] यहाँ रामके साथ [भिक्षुकका] उपमानोपमेयभाव शब्दशक्तिमूल संलक्ष्यकरमव्यङ्गय है [ उसको 'मयाप्तं रामत्वं' कहकर ] वाच्यार्थका अङ्ग बना दिया गया है[ इसलिए यह वाच्यसिद्धचङ्गव्यङ्गयरूप गुणोभूतव्यङ्गयका उदाहरण बन गया है ]। इस श्लोकमें भिक्षुकका रामचन्द्रके साथ उपमानोपमेयभाव शब्दशक्तिके द्वारा व्यङ्गयरूपसे स्वयं ही प्रतीत हो रहा है। परन्तु कविने अन्तिम चरणमें 'मयाप्तं रामत्वं' कहकर उस व्यङ्गय उपमानो- पमेयभावको वाच्य 'मयाप्त रामत्व का अ्रङ्ग बना दिया है। इसलिए यह श्लोक गुणीभूतव्यङ्गचका उदाहरण बन गया है अन्यथा यह उत्तम ध्वनिकाव्य होता। क्षेमेन्द्रकृत 'कविकण्ठाभरण' में यह पद्य भट्ट बाचस्पतिके पद्यके रूपमें उद्धृत हुआ है। यद्यपि यह पद्य हनुमत्कविके बनाये 'हनुमन्नाटक' के दशम अङ्गमें भी पाया जाता है, परन्तु इससे इस पद्यको भट्ट वाचस्पतिका पद्य माननेमें कोई बाधा नहीं होती है, क्योंकि 'हनुमन्नाटक' के लेखकने अपने नाटकमें अन्य कवियोंके पद्य भी अनेक स्थानोंपर दे दिये हैं। उदाहरणके लिए, कालिदासके 'अभिज्ञानशाकुन्तल'के प्रथमाङ्कका 'ग्रीवाभङ्गाभिरामं', राजशेखरकृत 'बालरामायण'के षष्ठ अङ्डका 'सदः पुरीपरिसरेऽपि' तथा मुरारिकविके 'अनर्धराधव' के तृतीयाङ्कका 'समन्तादुत्तालैः सुरसहचरी' इत्यादि पद्य भी 'हनुमन्नाटक' में हैं। अर्थशक्तिमूल वस्तुध्वनिकी वाच्याङ्गताका उदाहरण ऊपर शब्दशक्तिमूल संलक्ष्यक्रमव्यङ्गय अलङ्कारध्वनिकी वाच्याङ्गताका उदाहरण दिया था, अब अर्थशक्तिमूल संलक्ष्यक्रमव्य ङ्गय वस्तुध्वनिकी वाच्याङ्गताका उदाहरण आगे देते है-
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का० ४५, सू० ६६ ] पञ्चम उल्लास: २०७ आगत्य वियोगविसंष्ठलाङ्गी- मम्भोजिनीं क्वचिदपि क्षपितत्रियामः । एनां प्रसादयति पश्य शनैः प्रभाते तन्वद्गि ! पादपतनेन सहस्ररश्मिः ॥१२५॥[२ ज] अत्र नायकवृत्तान्तोऽर्थशक्तिमूलो वस्तुरूपो निरपेक्षरविकमलिनीवृत्तान्ताध्यारो- पेणैव स्थितः ।
हे तन्वङ्गि! कहीं और [सूर्यपक्षमें द्वीपान्तरमें और नायकपक्षमें दूसरी प्रेयसीके घर] रात बिताकर आनेवाला यह सहस्ररश्मि [सूर्य ] अब सबेरेके समय आकर वियोगसे संकुचित देहवाली इस कमलिनीको पादपतन [सूर्यपक्षमें किरणोंके संस्पर्श और नायकपक्षमें प्रणाम] के द्वारा प्रसन्न [सूर्यपक्षमें विकसित और नायकपक्षमें चाटुकारिता द्वारा प्रसन्न ] कर रहा है ॥१२५॥[२ ञ] यहाँ अर्थशक्तिमूल वस्तुध्वनिरूप नायकव्यवहार (वाच्यभूत) निरपेक्ष रवि तथा कमलिनीके व्यवहारपर अध्यारोप द्वारा ही स्थित होता है। इसका अभिप्राय यह है कि यहाँ रवि-कमलिनीका व्यवहार तो वाच्यभूत है और नायक-नायिका- का व्यवहार व्यङ्गय है। वह वाच्यभूत रवि-कमलिनी व्यवहारपर आरोपित होकर ही स्थित होता है, उसके बिना नहीं बन सकता है। अतः वह वस्तुभूतव्यङ्गय अर्थ वाच्यका अ्रङ्ग होता है। इसलिए वह भी गुणीभूतव्य ङ्गयका उदाहरण है। वाच्याङ्ग और वाच्यसिद्धचङ्गव्यङ्गयका भेद यहाँतक ग्रन्थकारने गुणीभूतव्यङ्गयके 'अपराङ्गव्यङ्गय' नामक द्वितीय भेदके दस उदाहरण दिये हैं। इनमेंसे अन्तिम दो उदाहरणोंमें क्मशः अलङ्कारध्वनि तथा वस्तुध्वनि वाच्यके अङ्ग हो रहे हैं, यह बात दिखलायी है। इसलिए इन दोनोंको वाच्याङ्गव्यङ्गयका उदाहरण माना है। अभी 'वाच्यसिद्धयङ्गव्यङ्गय' नामसे गुणीभूतव्यङ्गयकाव्यका जो तीसरा भेद माना गया है उसके दो उदाहरण आगे देंगे। यहाँ शङ्का होती है कि 'वाच्याङ्गव्यङ्गय' और 'वाच्यसिद्धयङ्गव्यङ्गय' में क्या अ्परन्तर है ? ग्रन्थकारने इसे स्पष्ट नहीं किया है और न उनके टीकाकारोंने इस ओर ध्यान दिया है। परन्तु इस अन्तरको दिखलाना आवश्यक है, उसके बिना पाठककी जिज्ञासा शान्त नहीं होती है। यह अन्तर वस्तुतः वाच्यार्थकी निरपेक्षता और सापेक्षताके ऊपर निर्भर है। यदि वाच्यार्थका अन्य किसीकी अपेक्षा न होनेपर भी व्यङ्गयार्थ उसका त्रङ्ग बन जाता है तो वह निरपेक्ष वाच्यका अङ्ग होनेसे केवल 'वाच्याङ्गव्यङ्गय' कहलायेगा। यदि वाच्य सापेक्ष है, उसे अपनी सिद्धिके लिए दूसरे अर्थकी अपेक्षा है तो जो व्यङ्गय अर्थ सापेक्ष वाच्यार्थकी आवश्यकताकी पूर्तिके लिए उसका त्रङ्ग बनता है: वह वाच्यसिद्धिका अ्रङ्ग होनेसे 'वाच्यसिद्धयङ्गव्यङ्गय' कहलाता है। यह बात काव्यप्रकाशकारने इस १२५ वें श्लोककी वृत्तिमें प्रयुक्त 'निरपेक्ष' पदसे सूचित की है। इस श्लोकमें सूर्य तथा कमलिनीके वृत्तान्तका वर्णन है। वह वाच्यार्थ है। उसके साथ नायक-नायिकाव्यवहारकी प्रतीति भी व्यङ्गय- रूपसे हो रही है। परन्तु उसके आधारपर नायक-नायिका वहाँ नहीं हैं इसलिए वह प्रतीति व्यङ्गय होनेपर भी मुख्य नहीं है। इधर रवि-कमलिनीव्यवहार वाच्यरूप और पूर्ण है, उसे किसी अन्यकी आवश्यकता नहीं है। फिर भी व्यङ्गय नायक-नायिकाव्यवहारमे उस वाच्यार्थमें चमत्कारकी वृद्धि हो जाती है. इसलिए वह वाच्याङ्गताका उदाहरण है।
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२०८ काव्यप्रकाश: [ का० ४५, सू० ६६ वाच्यसिद्धयङ्गं यथा- भ्रमिमरतिमलसहृदयतां प्रलयं मूर्छा तमः शरीरसादम् । मरणञ्च जलदभुजगजं प्रसह्य कुरुते विषं वियोगिनीनाम् ।१२६॥[३ क] अत्र हालाहलं व्यङ्गयं भुजगरूपस्य वाच्यस्य सिद्धिकृत् । यथा वा- गच्छाम्यच्युत ! दर्शनेन भवतः किं तृप्तिरुत्पद्यते किन्त्वेवं विजनस्थयोर्हतजनः सम्भावयत्यन्यथा। इत्यामन्त्रणर्भाङ्गसूचितवृथावस्थानखेदालसा- माश्लिष्यन्पुलकोत्करान्चिततनुर्गोपीं हरिः पातु वः ॥१२७॥ [३ ख ] अत्राच्युतादिपदव्यङ्गयमामन्त्रणेत्यादिवाच्यस्य। आगे जो उदाहरण वाच्यसिद्धयङ्गव्यङ्गयके देंगे उनमें वाच्यार्थ सापेक्ष है। व्यङ्गयार्थकी सहायताके बिना उसकी सिद्धि नहीं होती है। उनमें व्यङ्गयार्थ सापेक्ष वाच्यकी सिद्धिका अङ्ग है। अतः वे 'वाच्यसिद्धयङ्गव्यङ्गय' के उदाहरण हैं। यही उनका भेद है। ३. वाच्यसिद्धचङ्गव्यङ्गयके दो उदाहरण गुणीभूतव्यङ्गयरूप मध्यम काव्यका तीसरा भेद वाच्यसिद्धयङ्गव्यङ्गव्य है। उसके दो उदाहरण आगे देते हैं -- वाच्यसिद्धचङ्ग [व्यङ्गयका उदाहरण ] जैसे -- मेघरूप सपसे उत्पन्न विष [विष शब्दका अर्थ जल भी होता है और हालाहल विष भी ] वियोगि- नियोंको बलपूर्वक [जबर्दस्तीसे ] चक्कर, बेचैनी, उदासीनता [अलसहृदयता ], ज्ञान और चेष्टाका अभाव [प्रलयः सुखदुःखाभ्यां चेष्टाज्ञाननिराकृतिः] मूर्च्छा, अन्धापन [तमः] शारीरिक दुर्बलता और मरणको उत्पन्न कर देता है ॥१२६॥ [३ क ] यहाँ [विष पदसे ] हालाहल व्यङ्गय है, वह [मेघपर आरोपित] सर्परूप वाच्यार्थकी सिद्धिका उपकारक है [इसलिए वह वाच्यसिद्धयङ्गव्यङ्गयका उदाहरण है]। अथवा जैसे -- हे अच्युत [सम्भोग द्वारा स्खलित होकर तृप्त न करनेवाले कृष्ण ], क्या आपके दर्शनमात्रसे [सम्भोगेच्छाकी ] तृप्ति हो सकती है ? उलटे एकान्त स्थानमें स्थित हम दोनोंको देखकर दुष्ट पुरुष कुछ और ही प्रकारकी [हमारे सम्भोगादिकी ] कल्पना करने लगते हैं। [पर यहाँ मिला कुछ भी नहीं। इसलिए मैं जाती हूँ। इस प्रकार ['अच्युत' अर्थात् स्खलित न होनेवाले ] इस सम्बोधनकी शैलीसे [अपनी इच्छापूर्तिकी ओरसे निराश और कृष्णके पास ] व्यर्थ बैठनेके खेदसे अलसायी हुई गोपीका आलिङ्गन कर रोमाञ्चित शरीरवाले कृष्ण तुम्हारी रक्षा करें ॥१२७॥[३ ख] यहाँ 'अच्युत' आदि पदसे व्यङ्गय अर्थ [ इस प्रकारके ] सम्बोधन इत्यादि वाच्य [की सिद्धि ] का [अङ्ग हो गया है। इसलिए यह वाच्यसिद्धचङ्गव्यङ्गयका उदाहरण है]। यहाँ वाच्यसिद्धयङ्गव्यङ्गयके दो उदाहरण दिये हैं। इन दोनोंका भेद यह है कि पहिले उदाहरण- में वाच्य और व्यङ्गय अ्र्थ जिन पदोंका है उन दोनोंका वक्ता एक ही अर्थात् कवि ही है। परन्तु दूसरे उदाहरणमें व्यञ्जक 'अच्युत' पदकी वक्त्री गोपी है और वह व्यङ्गयार्थ जिस वाच्यकी सिद्धिका अ्रङ्ग
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का० ४५, सू० ६६ ] पञ्चम उल्लास: २०६ एतच्चैकत्र एकवक्तृगतत्वेन, अपरत्र भिन्नवक्तृगतत्वेन इत्यनयोर्भेदः । अस्फुटं यथा- अदृष्टे दर्शनोत्कण्ठा दृष्टे विच्छेदभीरुता। नादृष्टेन न दृष्टेन भवता लभ्यते सुखम् ॥१२८॥ [४] अत्रादृष्टो यथा न भवसि वियोगभयं च यथा नोत्पद्यते तथा कुर्या इति क्लिष्टम् । सन्दिग्धप्राधान्यं यथा- हरस्तु किञ्चित्परिवृत्तधैर्यश्चन्द्रोदयारम्भ इवाम्बुराशिः । उमामुखे बिम्बफलाधरोष्ठे व्यापारयामास विलोचनानि ॥१२९॥ [५] होता है। उस सम्बोधनरूप अर्थके वाचक 'आमन्त्रण' पदका वक्ता कवि है इस प्रकार इस द्वितीय उदाहरणमें वाच्य और व्यङ्गय दोनों भिन्नवक्तृगत हैं। पहिले उदाहरणमें वाच्य और व्यङ्गय दोनोंका वक्ता कवि है। अर्थात् प्रथम उदाहरणमें दोनों एकवक्तृगत हैं और दूसरे उदाहरणमें दोनोंके अलग- अलग वक्ता है। यह इन दोनों उदाहरणोंका भेद है। इसी बातको ग्रन्थकार अगली पंक्तिमें कहते हैं- यह [वाच्यसिद्धयङ्गता ] एक जगह [अर्थात् 'भ्रमिमरति' इत्यादि पहिले उदाहरणमें वाच्य और व्यङ्गय दोनों अर्थ ] एकवक्तृगत और दूसरी जगह [अर्थार्त् 'गच्छाम्यच्युत' इत्यादि दूसरे उदाहरणमें वाच्य और व्यङ्गय अर्थ ] भिन्न वक्तृगत हैं, यह इन दोनों उदाहरणोंका अन्तर है। ४. अस्फुटव्यङ्गयका उदाहरण आगे गुणीभूतव्य ङ्गयके चौथे भेद 'अ्स्फुटव्य ङ्गय' का उदाहरण देते हैं- अस्पष्ट [व्यङ्गयका उदाहरण ] जैसे -- [आपका ] दर्शन न होनेपर दर्शनकी उत्कण्ठा रहती है और दर्शन होनेपर वियोगका भय रहता है। इसलिए आपका दर्शन न होने और होने, दोनों ही अवस्थाओंमें आपसे सुख नहीं मिलता है ॥१२[४] यहाँ [कहनेवाली नायिकाका अभिप्राय यह है कि ] आप ऐसा [उपाय ] करिये जिससे आप न तो अदृष्ट हों और न आपके वियोगका भय हो [अर्थात् सदा मेरे पास रहें] यह [व्यङ्गय अर्थ है। परन्तु उसका समझना सहृदयोंके लिए भी अत्यन्त ] क्लिष्ट है। ५. सन्दिग्धप्राधान्यका उदाहरण आगे गुणीभूतव्यङ्गयके पञ्चम भेद सन्दिग्धप्राधान्यका उदाहरण देते हैं- सन्दिग्धप्राधान्य [का उदाहरण ] जैसे -- यह श्लोक 'कुमारसम्भव'से लिया गया है। पार्वतीको देखकर शिवजीकी जो अवस्था हुई उसका वर्णन करते हुए कवि कहता है -- चन्द्रमाके उदयके आरम्भमें समुद्रके [उद्वेलित हो उठनेके ] समान अधीर होकर शिवजीने बिम्बफलके समान [रक्तवर्ण ] अधरोष्ठसे युक्त पार्वतीके मुखपर अपनी तीनों आँखें गड़ा दीं ।१२६॥ [x ] १४
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२१० काव्यप्रकाश: [का० ४५, सू० ६६
अत्र परिचुम्बितुमैच्छदिति किं प्रतीयमानं कि वा विलोचनव्यापारणं वाच्यं प्रधानमिति सन्देहः । तुल्यप्राधान्यं यथा -- ब्राह्मणातिकरमत्यागो भवतामेव भूतये जामदग्न्यस्तथा मित्रमन्यथा दुर्मनायते ॥१३०॥ [६] अत्र जामदग्न्यः सर्वेषां क्षत्रियाणामिव रक्षसां क्षणात्क्षयं करिष्यतीति व्यङ्गचस्य वाच्यस्य च समं प्राधान्यम् । काक्वाक्षिप्तं यथा- मथ्नामि कौरवशतं समरे न कोपाद् दुःशासनस्य रुधिरं न पिवाम्युरस्तः । सञ्चूर्णयामि गदया न सुयोधनोरू सन्धि करोतु भवतां नृपतिः पणेन ॥१३१॥[७] अत्र मथ्नाम्येवेत्यादि व्यङ्गयं वाच्यनिषेधसहभावेन स्थितम् ।
यहाँ [शिवजी पार्वतीके मुखका ] चुम्बन करना चाहते थे यह व्यङ्गय [प्रधान है ] अथवा वाच्यरूप नेत्रोंका व्यापार [अर्थात् देखना प्रधान है] यह सन्देहास्पद है। [इसलिए यह सन्दिग्धप्राधान्य- व्यङ्गचका उदाहरण है] ६. तुल्यप्राधान्य गुणोभूतव्यङ्गयका उदाहरण तुल्यप्राधान्य [रूप गुणीभूतव्यङ्गयका उदाहरण ] जैसे -- ब्राह्मणके अपमान [करनेके स्वभाव अथवा क्रिया] का परित्याग करना आपके ही लिए कल्याण- कारक है। क्योंकि ऐसा करनेसे [जामदग्न्य ] परशुराम तुम्हारे मित्र बने रहेंगे अन्यथा [ वह परशुराम तुमसे ] नाराज हो जायँगे ।।१३०। [ ६ ] 'महावीरचरित' नाटकके द्वितीयाङ्गमें रावणको लक्ष्यमें रखकर रावणके मन्त्री माल्यवान् के पास परशुरामने जो सन्देश भेजा है उसमें यह श्लोक दिया गया है। यहाँ [नाराज हो जानेपर ] परशुराम [ने जैसे सारे क्षत्रियोंका नाश कर दिया था। उसी प्रकार ] सारे क्षत्रियोंके समान राक्षसोंका भी वह क्षणभरमें नाश कर देगा, इस व्यङ्गयका और वाच्य [नाराज हो जायँगे ] का समान ही प्राधान्य है। [इसलिए यह तुल्यप्राधान्य गुणीभूतव्यङ्गयका उदाहरण है। .9. काक्वाक्षिप्त व्यङ्गयका उदाहरण काकुसे आक्षिप्त [गुणीभूतव्यङ्गयका उदाहरण ] जैसे- यदि आपका [अर्थात् मेरा नहीं ] राजा किसी शर्तपर [कौरवोंके साथ ] सन्धि कर ले तो क्या मैं क्रोधसे युद्धभूमिमें समस्त कौरवोंका नाश नहीं करूँगा ? [अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार ] दुःशासनकी छातीसे [उसका ] रक्त पान न करूँगा ? और [अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार ] गदासे दुर्योधनकी जाघें नहीं तोडँ गा ? [अर्थात् युधिष्ठिर भले ही सन्धि कर लें, पर मैं तो कौरवोंका नाश अवश्य करूँगा ] ।१३१॥ [७] यहाँ 'अवश्य नाश करूँगा' यह व्यङ्गय काकुसे आक्षिप्त होनेके कारण वाच्यनिषेध [न मथ्नामि] के साथ-साथ ही प्रतीत [स्थित ] होता है।
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का० ४६, सू० ६७] पञ्चम उल्लास: २११
असुन्दरं यथा- वाणीरकुडंगुड्डीणसउणिकोलाहलं सुणन्तीए। घरकम्मवावडाए बहुए सीअन्ति अंगाइं ॥१३२॥ [वानीरकुञ्जोड्डीन-शकुनिकोलाहलं शृण्वन्त्याः । गृहकर्मव्यापृताया वध्वाः सीदन्त्यङ्गानि ॥ इति संस्कृतम् ] [] अत्र दत्तसङ्केतः कश्चिल्लतागहनं प्रविष्ट इति व्यङ्गयात् सीदन्त्यङ्गानीति वाच्यं सचमत्कारम्। [सू० ६७ ] एषां भेदा यथायोगं वेदितव्याश्च पूर्ववत् ।४६।।
८. असुन्दर व्यङ्गचका उदाहरण [गुणीभूतव्यङ्गचके आठवें भेद ] असुन्दर व्यङ्ग [का उदाहरण ] जैसे -- बेत [वानीरकी लताओं] के कुञ्जमें उड़ते हुए पक्षियोंके कोलाहलको सुनकर घरके काममें लगी हुई वधूके अङ्ग शिथिल हो रहे हैं ॥१३२॥ [८] यहाँ [जिसके साथ कुञ्जमें मिलनेका समय निश्चित किया था इस प्रकारका] 'दत्तसङ्गेत कोई [अर्थात् प्रेमी पुरुष नियत समयपर ] लतागृहमें प्रविष्ट हो गया' इस व्यङ्गचसे 'बहूके अङ्ग शिथिल हो रहे हैं' यह वाच्य अधिक चमत्कारजनक है। [अतः यह गुणीभूतव्यङ्गयके असुन्दरव्यङ्गय नामक आठवें भेदका उदाहरण है]। गुणीभूतव्यङ्गयकाव्यके भेदोंका विस्तार इस प्रकार गुणीभूतीव्य ङ्गयके आठ भेद बतलाये गये हैं। ऊपर ध्वनिकाव्यके ५१ भेद दिखलाये गये थे। ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गयका भेद वस्तुतः व्यङ्गयकी प्रधानता और अप्रधानताके कारण ही होता है अर्थात् जहाँ व्यङ्गय अर्थका प्राधान्य होता है वहाँ 'ध्वनिकाव्य' अर्थात् उत्तमकाव्य, और जहाँ उसका अप्राधान्य होता है वहाँ 'गुणोभूतव्यङ्गयकाव्य' या मध्यमकाव्य कहा जाता है। इसलिए जैसे व्यङ्गचके प्रधान होनेपर ध्वनिकाव्यरूप उत्तमकाव्यके ५१ भेद दिखलाये गये थे उसी प्रकार गुणी- भूतव्यङ्गयरूप मध्यमकाव्यके भी वे ५१ भेद होने चाहिये। परन्तु जहाँ वस्तुसे अलङ्कार व्यङ्गय होता है, वहाँ वस्तुकी अपेक्षा अलङ्गकारका सदा प्राधान्य होनेके कारण उसको गुणीभूतव्यङ्गय नहीं माना जाता है। उसको सदा ध्वनिकाव्य ही माना जाता है। इस बातका समर्थन करनेके लिए ग्रन्थकारने 'ध्वन्यालोक'की कारिका आगे उद्धृत की है। वस्तुसे अलङ्कार व्यङ्गयके पहिले १. स्वतःसम्भवी, २. कविप्रौढोक्तिसिद्ध तथा ३. कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध तीन भेद किये थे। फिर उनके पदगत, वाक्यगत तथा प्रबन्धगत तीन भेद होकर वस्तुसे अलङ्गार व्यङ्गयके ३x३ =६ भेद, ध्वनिकाव्यके ५१ शुद्ध भेदोंमेंसे कम कर देनेसे गुणीभूतव्य ङ्गयकाव्यके ५१-६=४२ भेद रह जाते हैं। इसी बातको ग्रन्थकारने इस प्रकार कहा है- [सू० ६७ ] इनके [अर्थात् गुणीभूतव्यङ्गयके मुख्य भेदोंके ] अवान्तर भेद यथासम्भव पहिले [कहे हुए ध्वनिभेदों ] के समान समझ लेने चाहिये ।।४६।। 'यथायोग' का आशय यह है कि गुणीभूतव्यङ्गमें जिन भेदोंके बननेमें कोई कठिनाई नहीं है उनको तो ध्वनि भेदोंके समान बना लेना चाहिये और जिन भेदोंके बननेमें बाधा उपस्थित होती है उनको छोड़ देना चाहिये। ध्वनिके प्रकरणमें ध्वनिके मख्य ५१ भेद किये थे। उसी शैलीसे यदि
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२१२ काव्यप्रकाश: [का० ४६, सू० ६७ यथायोगमिति -- 'व्यज्यन्ते वस्तुमात्रेण यदाऽलङकृतयस्तदा। ध्रुवं ध्वन्यङ्गता तासां काव्यवृत्तेस्तदाश्रयात् ।।' इति ध्वनिकारोक्तदिशा वस्तुमात्रेण यत्रालङ्कारो व्यज्यते न तत्र गुणीभूत- व्यङ्गयत्वम् ।
गुणीभूतव्यङ्गयके भी भेद किये जायँ, तो उसके आठ भेदोंमेंसे प्रत्येक भेदके उसी प्रकार ५१ भेद बनने चाहिये। परन्तु आगे 'ध्वन्यालोक' का श्लोक उद्धुत कर ग्रन्थकारने यह दिखलाया है कि उनमें e भेद गुणीभूतव्यङ्गयमें सम्भव नहीं है। इसलिए गुणीभूतव्यङ्गयके प्रत्येक भेदके ५१-६= ४२ त्वान्तर भेद होते हैं और आठों भेदोंके सब अवान्तर भेदोंको मिलाकर ४२x८=३३६ भेद हो जाते हैं। इसी बातको आगे लिखते हैं- 'यथायोग' [इसका अभिप्राय यह है कि ]- जब वस्तुमात्रसे अलङ्गारोंकी अभिव्यक्ति होती है, तब उन [अलङ्गारों ] की निश्चितरूपसे [ध्वन्यङ्गता ] ध्वनिव्यवहारप्रयोजकता ही होती है, क्योंकि [काव्यलक्षणमें अलङ्गारका समावेश होनेके कारण वस्तुसे अलङ्कारव्यङ्गयवाले उदाहरणोंमें ] काव्य [पद ] का व्यवहार उस [अलङ्गार] के आश्रित होता है। अर्थात् वस्तुसे अलङ्गार व्यङ्गय होनेपर गुणीभूतव्यङ्गय नहीं, ध्वनिकाव्य ही माना जाता है।] [तदनुसार ] ध्वनिकार [श्री आनन्दवर्धनाचार्य] द्वारा प्रतिपादित इस शैलीसे जहाँ वस्तुमात्रसे अलङ्कार व्यङ्ग्य होता है वहाँ गुणीभूतव्यङ्गयत्व नहीं होता है। ध्वनिकाव्यके ५१ भेद चतुर्थ उल्लासमें ध्वनिकाव्यके ५१ भेद इस प्रकार किये गये थे-लक्षणामूलध्वनिके दो भेद [अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य तथा अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ], अभिधामूलध्वनिके १६ भेद [१. असंलक्ष्यक्रम- व्यङ्गय ], संलक्ष्यकमव्यङ्गचके (क) शब्दशक्त्युत्थ, (ख) अर्थशक्त्युत्थ, (ग) उभयशक्त्युत्थ तीन मुख्य भेदोंमेंसे शब्दशक्त्युत्थ ध्वनिके वस्तुध्वनि अलङ्कारध्वनिरूप दो भेद + अर्थशक्त्युत्थ ध्वनिके १२ भेद + उभयशक्त्युत्थका एक भेद । अर्थात् अलसंक्ष्यक्रमका १ + संलक्ष्यक्रमव्यङ्गयके १५=१६+ अभिधामूल + लक्षणामूल= १८ ध्वनिके भेद हुए। ये सब भेद पदगत तथा वाक्यगत भेदसे दो-दो प्रकारके हो जाते हैं। इस प्रकार १८X२=३६ भेद बने। इनमें अरथशक्त्युत्थ ध्वनिके जो बारह भेद हैं वे प्रबन्धगत भी होते हैं; उनको जोड़ देनेसे ३६ + १२=४८ भेद हुए। इनमें असंलक्ष्यक्रमका जो एक भेद दिखलाया है वह पदगत, पदांशगत, वाक्यगत और अर्थगत चार प्रकारका हो सकता है। उनमेंसे एककी गणना ऊपरके ४८ भेदोंमें आ चुकी है। इसलिए तीन भेद इसमें और जोड़नेपर ४८+ ३=५१ ध्वनिभेद हो जाते हैं। इनमें अर्थशक्त्युत्थके जो १२ भेद दिखलाये थे वे निम्नलिखित प्रकार दिये गये थे- स्वतःसम्भवी कविप्रौढोक्तिसिद्ध कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध १ वस्तुसे वस्तु व्यङ्गय ५ वस्तुसे वस्तु ६ वस्तुसे वस्तु २ वस्तुसे अलक्कार व्यङ्गय ६ वस्तुसे अलङ्कार १० वस्तु से अलङ्कार ३ अलङ्कारसे वस्तु व्यङ्गय ७ अलङ्कारसे वस्तु ११ अलङ्कारसे वस्तु ४ अलङ्कारसे अलङ्कार व्यङ्ग्य ८ अलङ्गारसे अलङ्गार १२ अलङ्कारसे अलङ्कार
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का० ४६, सू० ६७ ] पञ्चम उल्लास: २१३ गुणोभूतव्यङ्गचके ४२ भेद सामान्यतः ये ५१ भद गुणीभूतव्यङ्गयकाव्यके भी होने चाहिये। किन्तु, जैसा कि 'ध्वन्यालोक' के आधारपर अभी ग्रन्थकारने लिखा है, वस्तुसे अलङ्कार व्यङ्गय होनेपर गुणीभूतव्य ङ्गय नहीं होता। इसीलिए स्वतःसम्भवी, कविप्रौढोक्तिसिद्ध और कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध वस्तुसे अलङ्कार व्यङ्गयके इन तीन भेदोंके पदगत, वाक्यगत तथा प्रबन्धगत रूपसे प्रत्येकके तीन भेद होकर कुल ३x३ = १ भेद हो जाते हैं। ध्वनिकाव्यके ५१ भेदोंमेंसे यदि इन नौ भेदोंको कम कर दिया जाय तो बचे हुए ५१-६= ४२ भेद गुणीभूतव्यङ्गयके आप्राठ अ्र्प्रवान्तर भेदोंमेंसे प्रत्येक भेदके और्प्रौर आ्र्प्राठोंको मिलाकर ४२x८= ३३६ गुणीभूतव्य ङ्गयकाव्यके शुद्ध भेद हो सकते हैं। इनकी संसृष्टि, सङ्कर आदिसे उनका और भी विस्तार हो जाता है, जिसे हम संक्षेपमें आागे दिखलायेंगे। संसृष्टि और सङ्कर आगे उद्धृत की जानेवाली 'ध्वन्यालोक'की कारिकाके आधारपर ध्वनि तथा गुणीभूतव्यङ्गय तथा वाच्य अलङ्कारोंकी संसृष्टि तथा सङ्करकृत भेदोंके प्राचुर्यके दिखलानेके लिए ग्रन्थकारने अगली कारिक लिखी है। परन्तु यह कारिका कुछ अस्पष्ट और कठिन-सी हो गयी है। इसलिए इसको समझने तथा समझाने दोनोंके लिए विशेष प्रयत्नकी आवश्यकता है। सबसे अधिक क्लिष्टता कारिकाके 'सालङ्कारैः' पदके कारण है। टीकाकारोंके अनुसार 'सालङ्कारः' यह पद यहाँ वाच्यालङ्गारों तथा गुणीभूतव्य ङ्गय दोनोंका ग्राहक है। गुणीभूतव्यङ्गय उस वाक्यमें जो प्रधानभूत अर्थ होता है उसका उत्कर्षाधायक होता ही है, इसलिए काव्यकी शोभाका जनक होनेसे उसको भी 'अलङ्कार' कहा जा सकता है और उपमा आदि वाच्य अलङ्कारोंके लिए तो अलङ्कार पदका प्रयोग होता ही है। इसलिए कारिकामें आये हुए 'सालङ्कारैः' पदसे उपमादि वाच्यालङ्कार तथा गुणीभूतव्यङ्गय इन दोनों अरथोंका ग्रहण यहाँ अभिप्रेत है। इस प्रकार 'सालङ्कारैः' पदके ये दो भिन्न अर्थ हैं। 'प्रत्यर्थ शब्दा भिद्यन्ते' इस नियमके अनुसार दोनों अरथोंके लिए यहाँ दो बार 'सालङ्कारैः' पदका प्रयोग होना चाहिये और हुआ भी है। परन्तु 'सरूपाणामेकशेष एकविभतौ' इस सूत्रके अनुसार उनमेंसे एकका लोप होकर एक ही 'सालड्वार' पद शेष रह गया है। उसीसे दोनों अर्थ निकलते हैं। गुणीभूतव्यङ्गयके लिए 'सालङ्कारैः' शब्दका प्रयोग माननेपर अलङ्कार शब्दमें भावप्रधान निर्देश मानकर अलद्कार' का अरथ 'अलङ्कारत्व' या 'अलङकृति' या 'शोभा' होगा। गुणीभूतव्यङ्गयकाव्यमें व्यङ्गय अर्थ स्वयं गुणीभूत होनेपर भी प्रधान अर्थका शोभाजनक होता है। इसलिए गुणीभूतव्यङ्गयके भेदोंको स्वयं 'अलङकृतियुक्त' या 'सालङ्वार' कहा जा सकता है। इस पक्षमें कारिकाके 'सालङ्वारैः तैः'का अर्थ 'तैरेव अलङ्कारैः' अर्थात् 'शोभाजनकैः गुणीभूतव्यङ्गयभेदैः' होगा। दूजरे पक्षमें 'सालङ्कारैः' पदका अरथ 'अलङ्कारसहितैस्तैः' अर्थात् 'उपमादिवाच्यालङ्कारसहितैश्च गुणीभूतव्यङ्गयभेदै:' यह हो जाता है। इसी बातको सूत्रकी वृत्तिमें 'तैरेव अलङ्कारैः, अलङ्कारयुक्तैश्च तैः' इन पदोंसे ग्रन्थकारने निर्दिष्ट किया है। उनके साथ 'ध्वनिः' हर्थात् ध्वनिके भेदोंकी संसृष्टि अर्थात् तिलतण्डुलन्यायसे मिश्रण तथा सङ्कर नीरक्षीरन्यायसे मिश्रण द्वारा योग हो सकता है। इस प्रकार यहाँ तीन तत्त्व उपस्थित हैं-१. ध्वनिके भेद, २. गुणीभूतव्यङ्गयके भेद जो स्वयं अलङ्कार रूप हैं और ३. वाच्य अलङ्गार। इन तीनोंकी 'संसृष्टि' तथा त्रिविध 'सङ्कर' से भेदोकी बहुत अधिक संख्या हो जाती है। इसी बातको ग्रन्थकार अगले सूत्र और उसकी वृत्तिमें इस प्रकार कहते हैं-
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२१४ काव्यप्रकाश: [का० ४७, सू० ६८-६६ [सू० ६८] सालङ्कारैर्ध्वनेस्तैश्च योग: संसृष्टिसड्ूरै: । सालङ्कारैरिति तैरेवालङ्कारैः अलङ्कारयुक्तैश्च तैः। तदुक्तं ध्वनिकृता- स गुणीभूतव्यङ्गचैः सालङ्कारैः सह प्रभेदैः स्वैः। सङ्करसंसृष्टिभ्यां पुनरप्युद्योतते बहुधा ॥ इति ।। [सू० ६९ ] अन्योन्ययोगादेवं स्यान्द्रेदसंख्यातिभूयसी ।।४७।। एवमनेन प्रकारेण अवान्तरभेदगणनेऽतिप्रभूततरा गणना। तथा हि-शृङ्गारस्यैव भेदप्रभेदगणनायामानन्त्यम्, का गणना तु सर्वेषाम्।
[सू० ६८ ]-[ काव्यशोभाजनक ] १. अलडकृतिरूप उन्हीं [गुणीभूतव्यङ्गचके भेदों ] और २. [उपमादि वाच्य अलङ्गारोंके साथ ३. ध्वनिके भेदोंकी संसृष्टि [अर्थात् तिलतण्डुन्यायसे निरपेक्ष मिश्रण ] और सङ्कर [अर्थात् क्षीरनीरन्यायसे सापेक्ष मिश्रण ] रूपसे योग होता है। 'सालङ्कारः' इस [ पद ] से [ एकशेष द्वारा दो अर्थ बोधित होते हैं-] १. अलडकृति [शोभा- युक्त रूप उन [गुणीभूतव्यङ्गय भेदों ], उन्हींके साथ २. [उपमादि रूप वाच्य ] अलङ्गारोंके सहित [३. ध्वनिके भेदोंकी संसृष्टि तथा सङ्कर रूपसे योग होता है ] जैसा कि ध्वनिकार [आनन्दवर्धनाचार्य ] ने कहा है- वह [ध्वनि उपमादि वाच्य ] १. अलङ्गारों सहित, [अलङकृत अर्थात् शोभायुक्त ] २. गुणीभूत- व्यङ्गचके [भेदोंके ] साथ और ३. अपने [ध्वनिके ] अवान्तर भेदोंके साथ [अर्थात् १. ध्वनिभेद, २. गुणीभूतव्यङ्गचके भेद और ३. वाच्यालङ्गार इन तीनोंके साथ ] सङ्कर तथा संसृष्टि द्वारा भी अनेक प्रकार [के भेदों ] से [ विशिष्ट होकर ] अत्यन्त प्रकाशित होता है। यह [ध्वनिकारने कहा है ]। [सू० ६६]-इस प्रकार एक दूसरेके मिश्रणसे भेदोंकी संख्या बहुत अधिक हो जायगी। सङ्कर-संपृष्टि आदि सहित गणना इस प्रकारसे अवान्तर भेदोंकी गणना करनेसे [ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गचके भेदोंकी ] गणना बहुत अधिक बढ़ जाती है। जैसे अकेले शुङ्गारके भेद-प्रभेदोंकी गणना ही अनन्त हो जाती है, फिर सबकी गणनाकी तो बात ही क्या। संसृष्टि-सङ्करसे भेदोंका विस्तार ५१ ध्वनिभेदोंके त्रिविध सङ्कर तथा एक प्रकारकी संसृष्टि द्वारा भेदोंका विस्तार करते समय काव्यप्रकाशकारने गुणनप्रक्रियाका अवलम्बन कर ५१x५१=२६०१४४=१०४०४ सङ्कर तथा संसृष्टिकृतभेद किये थे। उनके साथ ५१ शुद्ध भेदोंको मिलाकर १०४०४+५१=१०४५५ भेद ध्वनिकाव्यके सङ्कर और संसृष्टिजन्य माने थे। यदि इसी प्रक्रियाका यहाँ अवलम्बन करें तो गुणीभूतव्यङ्गयकाव्यके प्रत्येक भेदके ४२X ४२X४ = ७०५६ सङ्कर तथा संसृष्टिजन्य भेद बनेंगे। उनके साथ शुद्ध भेदोंको मिला देनेपर ७०५६ +४२ = ७०६८ मेद, गुणीभूतव्यङ्गयके प्रत्येक अवान्तर भेदके बनेंगे। इसलिए आठों अवान्तर भेदोंको मिलाकर गणोभूतव्यङ्गयके ७०६८x८= ५६७८४ भेद बन जायँगे।
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का० ४७, सू० ६६] पञ्चम उल्लास: २१५
सुधासागरकारका मत
गुणीभूतव्यङ्गयके प्रत्येक अवान्तर भेदके शुद्ध भेद हमने ५१ - ६ = ४२ बतलाये हैं। परन्तु सुधासागरकारने ४२ के स्थानपर ४५ शुद्ध भेद माने हैं। फिर ४५ x४५= २०२५X४=८१०० प्रकारके संसृष्टि-सङ्कर भेदोंके साथ ४५ भेदोंको मिलाकर ८१००+४५=८१४५ भेद माने हैं। फिर इनको ध्वनिके पूर्वोक्त १०४५५ भेदोंके साथ गुणा करके १०४५५x८१४५=८५१५५६७५ और इस संख्याको तीन प्रकार के संकर तथा एक प्रकारकी संसृष्टि को चारसे गुणा करके ३४०६२३६०० ध्वनि तथा गुणीभूतव्यङ्गयके भेदोंके सङ्कर तथा संसृष्टिजन्य भेद माने हैं।
सुधासागरकारने गुणीभूतव्यङ्गयके जो ८१४५ भेद दिखलाये हैं वे गुणीभूतव्यङ्गयके आाठ भेदोंमेंसे प्रत्येक भेदके बनते हैं। आाठों अ्रवान्तर भेदोंके कुल मिलाकर कितने भेद बनेंगे इसकी ओर ध्यान नहीं दिया है। यदि आठों भेदोंको मिलाकर फिर ध्वनिकाव्यके भेदोंके साथ सङ्कर और संसृष्टि की जाय तो यह संख्या अठगुनी हो जायगी।
सुधासागरकारकी भूल सुधासागरकारके इस मतमें एक आपत्ति रह है कि उन्होंने गुणीभूतव्यङ्गयके मूल ४५ भेद मानकर यह सब गणना की है। परन्तु वह संख्या ४५ नहीं, ४२ होनी चाहिये। 'वस्तुसे अलङ्कार व्यङ्गय होनेपर ध्वनिकाव्य ही होता है, गुणीभूतव्यङ्गय नहीं होता है। ध्वन्यालोककारके इस कथनके अनुसार ध्वनिकाव्यके ५१ भेदोंमेंसे वस्तुसे अलङ्कारव्यङ्गयवाले e भेदोंको निकाल देनेपर गुणीभूत- व्यङ्गयकाव्यके ४२ ही मूल भेद निकलेंगे, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है। वस्तुसे अलङ्कार व्यङ्गयके नौ भेद बनते हैं। पहिले स्वतःसम्भवी, कविप्रौढोक्तिसिद्ध और कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध ये तीन प्रकारके भेद वस्तुसे अलङ्कारव्यङ्गय ध्वनिके होते हैं। फिर उन तीनोंके पदगत, वाक्यगत और प्रबन्धगत तीन-तीन भेद होकर वस्तुसे अलङ्कारव्यङ्गय ध्वनिके नौ भेद बन जाते हैं। गुणीभूतव्यङ्गचमें जब वस्तुसे अलङ्कारव्यङ्गयकी गणना नहीं होती है तो ध्वनिके ५१ भेदोंमेंसे इन नौको कम कर देनेपर [५१-8]४२ गुणीभूतव्यङ्गय भेद रहते हैं। सुधारसागरकारने जो ४५ भेद माने हैं वे ठीक नहीं हैं। उन्होंने ५१ मेंसे के बजाय केवल ६ भेद कम किये हैं। वह युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता है। ४२ भेदोंका गुणनप्रत्रियासे विस्तार सुधासागरकारने जैसे ४५ भेदोंका आगे विस्तार किया है उसी प्रकार यदि ४२ मूल भेद मानकर विस्तार किया जाय तो ४२x४२= १७६४X४= ७०५६ गुणीभूतव्यङ्गयके सङ्करसंसृष्टिजन्य और उनके साथ शुद्ध ४२ भेदोंको मिला देनेपर ७०६८ भेद, गुणीभूतव्यङ्गचके प्रत्येक अ्रवान्तर भेदके बनेंगे। इनको ध्वनिभेदोंके साथ गुणन करनेपर १०४५५४७०६८= ७४२०६५६० प्रकारकी ध्वनि तथा गुणीभूतव्यङ्गयके भेदोंकी केवल संसृष्टि बनेगी। सङ्करसंसृष्टि दोनों भेद बनानेके लिए इस संख्याको ४ से गुणा करना होगा। यह संख्या तब ७४२०६५६०X४= २६६८३८३६० हो जायगी। यह संख्या गुणीभूतव्यङ्गयके प्रत्येक भेदकी ध्वनिभेदोंके ताथ सङ्कर तथा संसृष्टिसे बनेगी। यदि आाठों भेदोंकी सङ्कर-संसृष्टिकी गणना की जाय तो यह संख्या फिर अठगुनी होकर [ २६६८३८३६०X८ = ] २३७४७०६८८० हो जायगी। सुधासागरकारने अन्तिम दो गुणन नहीं किये हैं।
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२१६ काव्यप्रकाश: [का० ४७, सू० ६६ सङ्कलनेन पुनरस्य ध्वनेस्त्रयो भेदाः, व्यङ्गयस्य त्रिरूपत्वात् । तथाहि किन्चिद्वा- च्यतां सहते किञ्चित्त्वन्यथा। तत्र वाच्यतासहमविचित्रं विचित्रं चेति। अविचित्रं वस्तुमात्रम्, विचित्रं त्वलङ्काररूपम्। यद्यपि प्राधान्येन तदलङ्कार्यम्, तथापि ब्राह्मण- श्रमणन्यायेन तथोच्यते।
सङ्कलनप्रक्रियासे विस्तार यह ऊपर दिखलाया हुआ भेदोंका विस्तार गुणनप्रक्रियाके अनुसार है। हम ध्वनिभेदोंके विस्तारके प्रकरणमें यह लिख आये हैं। साहित्यदर्पणकारने ध्वनिभेदोंके विस्तारमें सङ्कलनप्रक्रियाका अवलम्बन किया है। यदि उसी सङ्कलनप्रत्रियाका यहाँ गुणीभृतव्यङ्गयके भेदोंके विस्तारमें भी अव- लम्बन किया जाय तो परिणाम भिन्न निकलेगा। उस दशामें गुणीभूतव्यङ्गयके ४२ भेदोंका सङ्कर निकालनेके लिए १ से ४२ तक संख्याओंको जोड़ना होगा। सङ्कलनकी संक्षिप्त प्रक्रियाके अनुसार ४२ + १ = ४३x ४२ अर्थात् ४३x २१= ६०३x४ =३६१२ सङ्कर तथा संसृष्टिकृत + ४२= ३६५४ भेद ही गुणीभूतव्य ङगयके प्रत्येक भेदके बनेंगे। इनको ध्वनिके १०४५५ भेदोके साथ गुणा करनेपर [१०४५५x३६५४=]३८२०२५७० ध्वनि गुणीभूतव्य ङ्गयके प्रत्येक भेदके साथ संसृष्टिकृत भेद होंगे। इस संग्याको ४ से गुणा करनेपर [ ३८२०२५७० X४=१५२८१०२८०]भेद सङ्कर तथा संसष्टिकृत होंगे। गणीभूतव्यङ्गयके आठ भेदोंकी दृष्टिसे इस संख्याको ८ से गुणा करनेपर [१५२८१०२८०x८=]१२२२४८२४० भेद हो जायँगे। यह सब विस्तार बड़ा लम्बा और श्रमसाध्य है। बहुत उपयोगी भी नहीं है। इसलिए ग्रन्थ- कारने उसको नहीं दिखलाया है, 'अन्योन्ययोगादेवं स्याद् भेदसंख्यातिभूयसी' लिखकर इस अनुपयुक्त प्रसङ्गको समाप्त कर दिया है। व्यञ्जनाकी अपरिहार्यता इस प्रकार यहाँतक ग्रन्थकारने ध्वनिकाव्य तथा गुणीभूतव्यङ्गयकाव्यके भंदोपभेदोंका वर्णन किया। अब आगे इस पञ्चम उल्लासके शेष भागमें वे व्यञ्जनावृत्तिकी अपरिहार्यताका प्रतिपादन करेंगे और यह दिखलायेंगे कि ध्वनिके जितने भी भेद हैं उनकी प्रतीति केवल व्यञ्जनाके द्वारा ही हो सकती है। व्यञ्जनाके अतिरिक्त उनकी प्रतीतिका और कोई मार्ग नहीं है। इसी दृष्टिसे वे पहिले ध्वनिके वाच्यतासह और वाच्यता-असह दो भेद करते हैं। वाच्यता-सहके भी विचित्र तथा अविचित्र दो भेद करके विचित्रको 'अलङ्कारध्वनि' तथा अविचित्रको 'वस्तुध्वनि' के अन्तर्भूत करते हैं। तीसरा रसादि-ध्वनि वाच्यता-असह है; वह कभी वाच्य नहीं हो सकता है, सदा व्यङ्गय ही होता है। इसलिए व्यञ्जनावृत्तिका मानना अनिवार्य है। इस प्रकार व्वञ्जनावृत्तिकी सिद्धिके लिए पहली युक्ति देते हुए वे लिखते हैं कि- संक्षेपतः [सङ्कलनेन ] व्यङ्गचके तीन प्रकारके होनेसे इस ध्वनिके भी तीन भेद होते हैं। जैसे कि [उन तीन प्रकारके व्यङ्ग्योंमेंसे ] कोई [ वस्तु तथा अलङ्गाररूप दो प्रकारका ध्वनि ] वाच्यताको सहन कर सकता है[ अर्थात् वस्तुध्वनि और अलङ्गारध्वनिके रूपमें जो अर्थ व्यङ्गयरूपसे प्रतीत होता है वह अर्थ अन्य दशामें वाच्य भी हो सकता है ] और कोई [रसध्वनि ] अन्य प्रकारका [अर्थात् वाच्यताका सहन न करनेवाला, कभी वाच्य न हो सकनेवाला ] होता है। उनमेंसे वाच्यताको सहन करनेवाला [व्यङ्गचार्थ भी ] विचित्र तथा अविचित्र [दो प्रकारका ] होता है। अविचित्र वस्तुमात्र और विचित्र
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का० ४७, सू० ६६ ] पञ्चम उल्लास: २१७
रसादिलक्षणस्त्वर्थः स्वप्नेऽपि न वाच्यः । स हि रसादिशब्देन शृङ्गारादिशब्देन वाजभिधीयेत। न चाभिधीयते। तत्प्रयोगेऽपि विभावाद्यप्रयोगे तस्याऽप्रतिपत्तेस्तदप्रयोगे- डपि विभावादिप्रयोगे तस्य प्रतिपत्तेश्चेत्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां विभावाद्यभिधानद्वारेणैव प्रती- यते, इति निश्चीयते। तेनाऽसौ व्यङ्गय एव। मुख्यार्थबाधाद्यभावान्न पुनर्लक्षणीयः । अर्थान्तरसङतमितात्यन्ततिरस्कृतवाच्ययोर्वस्तुमात्ररूपं व्यङ्गयं (विना) लक्षणैव न भवतीति प्राक् प्रतिपादितम् ।
अलङ्काररूप [कहलाता है ]। यद्यपि [व्यङ्गय होनेके कारण ] प्रधान होनेसे वह [व्यङ्गचार्थ ] अलड्कार्य होता है [ अलङ्रार नहीं ] फिर भी [ अन्यत्न उपमादि वाच्य अलङ्काररूपमें भी देखा जा चुका है। इस- लिए भूतपूर्व गति अथवा ] ब्राह्मण-श्रमणन्यायसे उस प्रकार [अलङ्गार नामसे] कहा जाता है। रसप्रतीतिके लिए व्यञ्जना अनिवार्य [तीसरा ] रसादिरूप अर्थ तो स्वप्नमें भी वाच्य नहीं हो सकता है। [क्योंकि उसको यदि वाच्य कहा जाय तो ] वह या तो रसादि शब्दसे अथवा शृङ्गारादि शब्दसे [ ही ]अभिधाशक्तिसे [वाच्य- रूपमें ] कहा जा सकता है। परन्तु [इन दोनों शब्दोंसे अभिधाशक्तिके द्वारा] कहा नहीं जाता है। [क्योंकि ] उन [रसादि अथवा शृङ्गारादि शब्दों]का प्रयोग होनेपर भी विभावादिका प्रयोग न होनेपर उसकी अनुभूति न होने और उन [वाचक रसादि या शृङ्गारादि शब्दों]का प्रयोग न होनेपर भी विभा- वादिका प्रयोग होनेपर उस [रसादि] की अनुभूति होनेसे, विभावादिके कथनके द्वारा ही उस [ रसादि ]- की प्रतीति होती है यह बात अन्वय-व्यतिरेकसे सिद्ध होती है [ निश्चीयते ]। इसलिए वह [रसादिध्वनि या अर्थ सदा ] व्यङ्गच ही होता है [ वाच्य कभी भी नहीं होता है]। और [ जैसा कि दूसरे उल्लासमें २५वें एवं २६वें सूत्र द्वारा कहा जा चुका है] मुख्यार्थबाध आदि [ लक्षणाके प्रयोजक हेतुओं ]के न होनेसे वह लक्षणीय [लक्षणागम्य ] भी नहीं [ हो सकता] है [ इसलिए रसादि-प्रतीति व्यङ्ग्य ही है ]। लक्षणामूलध्वनिमें व्यञ्जना अनिवार्य इस प्रकार अभिधामूलध्वनिमें असंलक्ष्यक्रमव्य ङ्गय रसादिरूप अर्थकी प्रतीतिके लिए व्यञ्जना- वृत्तिका मानना अपरिहार्य है इस बातके कहनेके बाद ध्वनिके अन्य जो भेद माने गये हैं उनमें भी व्यञ्जनाके द्वारा ही व्यङ्गय अर्थकी प्रतीति हो सकती है। अन्य किसी वृत्तिसे काम नहीं चल सकता है इस बातका प्रतिपादन करनेके लिए पहिले लक्षणामूलध्वनिके अर्थान्त रसंक्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यरूप दोनों भेदोंमें व्यञ्जनाकी अनिवार्यता दिखलाते हुए ग्रन्थकार लिखते हैं- [अविवक्षितवाच्य या लक्षणामूलध्वनिके ] अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य [दोनों भेदों ] में वस्तुमात्ररूप व्यङ्गचके बिना लक्षणा ही नहीं हो सकती है यह पहिले [सू० २४, २५ में ] प्रतिपादन कर चुके हैं। इसका अभिप्राय यह है कि अर्थान्तरसङक्रमितवाच्य लक्षणामूलध्वनिका 'त्वामस्मि वच्मि' इत्यादि और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य लक्षणामूलध्वनिका 'उपकृतं बहु तत्र' इत्यादि दोनों उदाहरण सं० २३, २४ पर पहिले दिये जा चुके हैं। उनमेंसे पहिले उदाहरणमें 'वच्मि' आदि पद उपदेश आदिरूप
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२१८ काव्यप्रकाश: [का० ४७, सू० ६६
शब्दशक्तिमूले तु अभिधाया नियन्त्रणेनानभिधेयस्यार्थान्तरस्य तेन सहोपमादेर- लङ्कारस्य च निर्विवादं व्यङ्गयत्वम् ।
अर्थान्तरमें संकान्त हो जाते हैं और दूसरे उदाहरणमें 'उपकृत' आदि पद अपने अरथको बिलकुल छोड़कर 'अपकृत' आदि अथोंका द्योतन करते हैं। इनमें व्यङ्गय प्रयोजनकी प्रतीति ही लक्षणाका आधार है। यदि वह व्यङ्गय प्रयोजन न हो तो उसमें लक्षणा ही न हो सकेगी। और उस व्यङ्गय प्रयोजनका बोध अभिधा या लक्षणा द्वारा नहीं होता है। यह बात 'नाभिधा समयाभावात् हेत्वभावान्न लक्षणा' इत्यादि सू० २४-२५ में कह चके हैं। अतः लक्षणामूलध्वनिके अर्थान्तरसंक्र्मितवाच्य औ्र अत्यन्ततिरस्कृत- वाच्य दोनों भेदोंमें प्रयोजनकी प्रतीतिके लिए व्यञ्जनावृत्तिका मानना अनिवार्य है। अभिधामूल शब्दशक्त्युत्थ ध्वनिमें व्यञ्जना अनिवार्य इस प्रकार लक्षणामूलध्वनिके दोनों भेदोंमें व्यञ्जनावृत्तिकी अपरिहार्यताको दिखलानेके बाद अभिधामूलध्वनिके भेदोंमें व्यञ्जनावृत्तिकी अनिवार्यता दिखलानेका उपकम करते हैं। अभिधामूल- ध्वनिके पहले दो भेद होते हैं-१. असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गय और २. संलक्ष्यक्रमव्यङ्गय। इनमेंसे असंलक्ष्यत्रमव्यङ्गय रसादिध्वनिमें व्यञ्जनावृत्तिकी अनिवार्यता अभी दिखला चुके हैं। इसलिए संलक्ष्यक्रमव्यङ्गयमें व्यञ्जनाकी अनिवार्यता दिखलानेका कार्य शेष रह जाता है। उसीका विवेचन आगे करेंगे। संलक्ष्यक्रमव्यङ्गयके १. शब्दशक्त्युत्थ, २. अर्थशक्त्युत्थ ३. उभयशक्त्युत्थ ये तीन भेद किये थे। उनमेंसे पहिले शब्दशक्त्युत्थ भेदको लेते हैं। जहाँ अनेकार्थक शब्दका'प्रकरणादिवशात् एकार्थमें नियन्त्रण हो जानेपर भी अन्य अर्थकी प्रतीति होती है उसे शाब्दी व्यञ्जना या शब्दशक्त्युत्थध्वनि कहते हैं। यह वस्तु और अलङ्काररूपसे दो प्रकारका होता है। यहाँ अभिधाका एकार्थमें नियन्त्रण हो जानेसे अन्य अर्थकी प्रतीति अभिधासे नहीं हो सकती है। उसके लिए व्यञ्जनाव्यापार मानना ही होगा। इसी प्रकार इस स्थलपर प्रतीत होनेवाले प्राकरणिक तथा अप्राकरणिक अरथोंका उपमानो- पमेयभाव आदि अलङ्कार भी व्यञ्जनावृत्तिसे ही बोधित होता है। इसलिए शब्दशक्तिमूलध्वनिमें भी [उदाहरण सं० ५४-५७ दोनोंमें ] व्यञ्जनाका मानना अनिवार्य है। इसी बातको ग्रन्थकार अगली पंक्तिमें कहते हैं- [अभिधामूलध्वनिके शब्दशक्त्युत्थ, अर्थशक्त्युत्थ और उभयशक्त्युत्थरूप तीनों भेदोंमेंसे ] शब्दशक्तिमूल [भेद ] में अभिधाका [संयोगादि द्वारा एकार्थमें ] नियन्त्रण हो जानेसे अनभिधेय जो दूसरा अर्थ प्रतीत होता है उसका और उसके साथ [वाच्य प्राकरणिक अर्थका जो उपमानोपमेयभावादि प्रतीत होता है उस ] उपमादि अलङ्गारका व्यङ्गचत्व निरविवाद है। अभिधामूल अर्थशक्त्युत्थ ध्वनिमें व्यञ्जनाकी अनिवार्यता अभिहितान्वयवादमें व्यञ्जना-इस प्रकार लक्षणामूलध्वनिके दोनों भेद, अभिधामूलके असंलक्ष्यक्रम रसादि-ध्वनि और संलक्ष्यक्रम-ध्वनिके शब्दशक्त्युत्थ वस्तु तथा अलङ्काररूप भेदोंमें व्यञ्जनावृत्तिकी अनिवार्यताका उपपादन करके अब अभिधामूल ध्वनिके अर्थशक्त्युत्थ १८ भेदोंमें भी व्यञ्जनावृत्तिकी अपरिहार्यताका उपपादन करते हैं।
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का० ४७, सू० ६६] पञ्चम उल्लास: २१६ अर्थशक्तिमूलेऽपि विशेषे सङ्केतः कर्तु न युज्यत इति सामान्यरूपाणां पदार्था- नामाकांक्षासन्निधियोग्यतावशात्परस्परसंसर्गो यत्रापदार्थोऽपि विशेषरूपो वाक्यार्थस्त- त्राभिहितान्वयवादे का वार्ता व्यङ्गयस्याभिधेयतायाम् ।
अर्थशक्त्युत्थ ध्वनिमें व्यङ्गयार्थकी प्रतीतिके पहिले बाच्यार्थकी उपस्थिति आवश्यक है। पहिले वाच्यार्थकी प्रतीति हो जानेके बाद उससे फिर व्यङ्गयार्थकी प्रतीति होती है इसीलिए उसे 'अर्थशक्त्युत्थ' ध्वनि कहा जाता है। वाक्यसे अर्थकी प्रतीति कैसे होती है इसका विवेचन यद्यपि व्याकरण, न्याय और मीमांसा आदि अनेक शास्त्रोंमें किया गया है, किन्तु वाक्यविचारमें मीमांसकोंको ही प्रधान माना जाता है। वैयाकरणोंको केवल 'पदज्ञ' और नैयायिकोंको 'प्रमाणज्ञ' कहा जाता है। वाक्योंका विचार मुख्यरूप से मीमांसकोंका क्षेत्र है, इसलिए उनको 'वाक्यज्ञ' कहा जाता है। अर्थशक्त्युत्थ ध्वनिके विवेचनमें पहिले वाक्यार्थज्ञानकी आवश्यकता होती है और वह मीमांसकोंका क्षेत्र है। इसलिए ग्रन्थकारने अर्थ- शक्त्युत्थ ध्वनिके भेदोंमें व्यञ्जनाकी अपरिहार्यता सिद्ध करनेके इस प्रकरणको मीमांसक-मतकी आ्रप्रालो- चनासे ही प्रारम्भ किया है। जैसा कि पहिले कहा जा चुका है, मीमांसकोंके दो मुख्य सम्प्रदाय हैं-एक 'अभिहितान्वयवाद' और दूसरा 'अन्विताभिधानवाद'। 'अभिहितान्वयवाद' के संस्थापक आचार्य कुमारिलभट्ट हैं और 'अन्विताभिधानवाद'के प्रतिपादक उनके शिष्य प्रभाकर हैं। ग्रन्थकार मम्मट यहाँ यह दिखलानेका यत्न करेंगे कि इन दोनों मतोंमें 'वाक्यार्थ' ही अभिधासे उपस्थित नहीं होता है तब उससे जो व्यङ्गयार्थ प्रतीत होता है वह अभिधासे प्रतीत हो सकता है इसकी तो चर्चा ही व्यर्थ है। उनमेंसे भी पहिले कुमारिलभट्टके 'अभिहितान्वयवाद'को लेते हैं। 'अभिहितान्वयवाद' में तो अभिधाशक्तिसे केवल पदार्थोंकी उपस्थिति होती है। पदार्थोंके परस्परसंसर्गरूप वाक्यार्थकी प्रतीति भी अभिधासे नहीं होती है, उसके लिए 'तात्पर्याख्या' शक्ति अलग मानी जाती है। तब व्यङ्गय अर्थ, जिसकी प्रतीति वाक्यार्थकी भी प्रतीतिके बाद होती है, उसको अभिधावृत्तिसे बोध्य या वाच्य कैसे कहा जा सकता है ? इसलिए 'अभिहितान्वयवाद' में व्यङ्गचार्थके बोधके लिए व्यञ्जनावृत्तिका मानना अनिवार्य है। इसी बातको ग्रन्थकार अगली पंक्तियोंमें इस प्रकार लिखते हैं- [अभिधामूलध्वनिके दूसरे भेद ] अर्थशक्तिमूल [ध्वनि]में भी जहाँ [ व्यक्तिमें सङ्गतग्रह मानने- पर आनन्त्य तथा व्यभिचार दोष आ जानेके कारण व्यक्तिरूप ] विशेष अर्थमें सङ्कगेत करना सम्भव [उचित ] न होनेसे सामान्य [अर्थात् जाति ] रूप पदार्थोंका परस्परसंसर्गरूप विशेष, पदोंसे न उपस्थित होनेपर भी, आकांक्षा, सन्निधि और योग्यताके कारण वाक्यार्थ [रूपमें तात्पर्याख्या नामक अन्य शक्तिसे उपस्थित ] होता है उस अभिहितान्वयवादमें [ वाक्यार्थबोधके भी बादमें उपस्थित होनेवाले ] व्यङ्गय अर्थके अभिधेय माननेकी तो बात ही कहाँ उठती है ? अर्थात् कुमारिलभट्टके अभिहितान्वयवादमें व्यङ्गयार्थके बोधनके लिए व्यञ्जनावृत्तिको माननेके अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं हो सकता है। इसलिए उन अभिहितान्वयवादियोंके लिए व्यञ्जनावृत्तिका मानना अनिवार्य है। इस अनुच्छेदकी वाक्यरचना कुछ क्लिष्ट-सी हो गयी है। सरलतया अर्थ समझनेके लिए उसके पदविन्यासमें थोड़ा-सा अन्तर कर लेना उचित होगा। 'सामान्यरूपाणां पदार्थनां विशेषरूपः परस्पर- संसर्गों यत्रापदार्थोऽपि आकांक्षासन्निधियोग्वतावशात् वाक्यार्थः' इस कमसे पदोंका अन्वय कर लेनेपर
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२२० काव्यप्रकाश: [का० ४७, सू० ६६ उनका अर्थ सरलतासे समझमें आ जाता है। यथास्थित कमसे अर्थ करनेपर अर्थका समझना कठिन हो जाता है। इसलिए हमने 'अर्थक्रमानुरोधेन पाठक्रममनादृत्यैव' अर्थक्रमको ध्यानमें रखकर ही इसका अनुवाद किया है। अन्विताभिधानवादमें व्यञ्जना प्रभाकरके 'अन्विताभिधानवाद' में यद्यपि अन्वित पदार्थोंकी ही अभिधा द्वारा उपस्थिति होती है, इसलिए वाक्यार्थबोधके लिए 'तात्पर्याख्या' शक्तिकी आ्ररवश्यकता नहीं होती है। परन्तु उनके यहाँ भी अभिधा द्वारा सामान्यरूपसे अन्वित पदार्थोंकी ही उपस्थिति हो सकती है। किसी विशेष अर्थके साथ अन्वित अर्थकी उपस्थिति नहीं होती है, क्योंकि एक ही शब्दका अनेकों शब्दोंके साथ भिन्न- भिन्नरूपमें प्रयोग होता है। किसी एक ही विशेष अर्थके साथ सम्बद्धरूपसे शब्दका सङ्केतग्रह मान लेनेपर अन्य विशेष अरथोंके साथ उसका सम्बन्ध नहीं हो सकेगा। विशेष व्यक्तिके साथ सङ्केतग्रह माननेपर आ्ानन्त्य और व्यभिचार दोष हो जानेके कारण अभिहितान्वयवादमें ही जब व्यक्तिमें सङ्कतग्रह न मानकर जातिमें सङ्केतग्रह मानना अनिवार्य हो गया था, तब 'अन्विताभिधानवाद'में भी विशेष अर्थके साथ अन्वित- रूपमें सङ्केतग्रह मानना सम्भव नहीं है। इसलिए यदि अन्विताभिधानपक्ष माना भी जाय तो भी केवल सामान्यरूपसे अन्वितमात्रमें सङ्केतग्रह हो सकता है, विशेषके साथ अन्वितरूपमें सङ्केतग्रह नहीं हो सकता है। परन्तु वाक्यार्थ तो विशेष अर्थोंका परस्परसम्बन्धरूप होता है। इसलिए विशेष अरथोंका सम्बन्धविशेषरूप वाक्यार्थ उनके यहाँ भी अभिधा शक्तिसे उपस्थित नहीं हो सकता है। तब उस 'विशेषरूप' वाक्यार्थसे भी आागे बढ़े हुए उसके भी बाद प्रतीत होनेवाले-'अतिविशेषभूत' व्यङ्गय अर्थकी प्रतीति अभिधासे हो सकती है यह तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इसलिए 'अन्विता- भिधानवाद' में भी 'निश्शेषच्युतचन्दनं स्तनतटं' इत्यादि उदाहरणोंमें निषेधरूप वाच्यार्थसे प्रतीत होनेवाले विधिरूप व्यङ्गय अर्थकी प्रतीति करानेके लिए व्यञ्जनावृत्तिका मानना अनिवार्य है। इस प्रकार प्रभाकरके 'अन्विताभिधानवाद' में भी व्यञ्जनावृत्तिकी अपरिहार्यताका उपपादन करते हुए ग्रन्थकार अगले प्रकरणका प्रारम्भ करते हैं। किन्तु इस प्रकरणका प्रारम्भ उन्होंने बहुत दूरसे किया है। इसलिए यह प्रकरण लम्बा हो गया है और प्रकृत प्रसङ्गमें उसकी सङ्गति जोड़नेके लिए हमें विशेष ध्यान देना होगा। प्रकरणके आरम्भमें सङ्गेतग्रहका प्रकार दिखलाया है। यहाँ पृष्ठ २२२ के 'येऽप्याहुः' से लेकर पृष्ठ २२५ पर दिये 'इत्यन्विताभिधानवादिनः' तक सङ्केतग्रहका प्रकार ही दिखलाया गया है। इसके दो भाग हैं। पहिला भाग पृष्ठ २२४ पर 'इति विशिष्टा एव पदार्थाः वाक्यार्थः, न तु पदार्थानां वैशिष्टयम्' तक समाप्त होता है। और दूसरा भाग उसके बाद प्रारम्भ होता है। प्रथम भागमें सामान्यरूपसे अन्वित अर्थ ही पदों द्वारा उपस्थित होता है। 'विशिष्टा एव पदार्थाः वाक्यार्थः' यह बात सिद्ध की है। 'विशिष्टाः'का अर्थ 'अ्रन्विताः' है। अन्वित पदार्थ ही वाक्यार्थ होता है यही 'अन्विताभिधानवाद'का मोटा रूप है। प्रथम भागमें इसी मोटे-रूपमें 'अन्विताभिधानवाद'का प्रतिपादन किया है। उसीके साथ 'न तु पदार्थानां वैशिष्टयम्' अरथात् 'पहिले अनन्वितरूपसे उपस्थित होनेवाले' पदार्थोंका 'वैशिष्टय अर्थात् बादमें होनेवाला 'अन्वय' वाक्यार्थ नहीं है, यह लिखकर अभिहितान्वयवादका खण्डन करते
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हुए इस प्रथम भागका उपसंहार किया है। उसके बाद अगले अनुच्छेदमें अन्विताभिधानवादके सूक्ष्म रूपकी विवेचना की है। यह विवेचना 'इत्यन्विताभिधानवादिनः' पर समाप्त होती है। यह सब वस्तुतः इस प्रकारकी अवतरणिकामात् है। यहाँका मुख्य विषय यह है कि 'अन्विता- भिधानवाद' में भी निषेधसे विधि या विधिसे निषेधरूप व्यङ्गचार्थकी प्रतीतिके लिए व्यञ्जना माननी ही होगी। इस मुख्य विषयका प्रतिपादन पृष्ठ २२६ के 'तेषामपि मते' से आरम्भ होता है। इस प्रकार लम्बे प्रकरणका विश्लेषण कर लेनेके बाद इसको पढ़ा जायगा तो उसको हृदय ङ्गम करनेमें सरलता होगी इसी दृष्टिसे हमने यह विश्लेषण यहाँ प्रस्तुत कर दिया है। इस प्रकरणका आरम्भ सङ्केतग्रहके प्रकारके निरूपणसे हुआ है इसलिए ग्रन्थके अनुवादके पहिले सामान्यरूपसे उसका निरूपण भी हम आगे दे रहे हैं। इससे पंक्तियोंके समझानेमें सफलता होगी। सङ्गतग्रहका आधार इस प्रकार 'अभिहितान्वयवाद' में व्यञ्जनाशक्तिकी अपरिहार्यताका उपपादन करनेके बाद प्रभाकराभिमत 'अन्विताभिधानवाद' में भी व्यञ्जनाशक्तिकी अपरिहार्यताका उपपादन करनेके लिए पहिले ग्रन्थकार अगली दो कारिकाओं द्वारा शक्तिग्रहका प्रकार दिखलाते हुए अन्वित अर्थमें ही शक्तिग्रह होता है यह सिद्ध करनेका यत्न करेंगे। 'अमुक शब्दसे अमुक अर्थ समझना चाहिये' इस प्रकारके शक्तिग्रह- के सामान्यतः निम्नलिखित उपाय बतलाये गये हैं- शक्तिग्रहं व्याकरणोपमान- कोशाप्तवाक्याद् व्यवहारतश्च। वाक्यस्य शेषाद् विवतेर्वदन्ति सान्निध्यतः सिद्धपदस्य वृद्धाः । अर्थात् व्याकरण, उपमान, कोश, आप्तवाक्य, वाक्यशेष, विवृति अर्थात् व्याख्या और सिद्ध अर्थात् ज्ञात पदके सान्निध्यसे शक्तिग्रह होता है। इन सबमें मुख्य साधन व्यवहार है। क्योंकि अन्य सभी साधनोंमें पदोंके प्रयोग और उनके अर्थज्ञानकी आवश्यकता होती है इसलिए वे बड़े व्यक्तियोंके लिए सङ्केतग्रहके साधन हो सकते हैं। छोटे बालकोंके लिए सङ्केतग्रहका एकमात्र साधन व्यवहार है। बिलकुल प्रारम्भमें बालकको अपनेसे बड़े 'उत्तमवृद्ध' माता-पिता आदि 'मध्यमवृद्ध' भाई आदि अ्थवा भृत्य आदिके व्यवहारसे ही सङ्केतका ग्रहण होता है। 'उत्तमवृद्ध' पिता आदि 'मध्यमवृद्ध' भाई या भृत्य आदिसे कहते हैं कि 'गामानय' गौको ले आओ। 'मध्यमवृद्ध' सास्नादिमान् गो-व्यक्तिको ले आाता है। पासमें बैठा हुआ बालक 'गाम्' और 'आनय' इनमेंसे किसी भी शब्दका अर्थ नहीं जानता है। परन्तु पिताके मुखसे निकले हुए इन शब्दोंको वह सुनता है और उसके बाद होनेवाली 'मध्यमवृद्ध' की क्रियाको देखता है। इससे पहली बात तो वह यह अनुमान करता है कि 'मध्यमवृद्ध'ने जी किया की है वह उत्तमवृद्धके वाक्यके अर्थको समझकर की है। इसलिए 'सास्नादिमान् पिण्डका आानयन ही उ अखण्ड वाक्यका अखण्ड अर्थ है। अर्थात् सम्पूर्ण वाक्यके अर्थका अनुमान तो बालकको हो जाता , परन्तु अलग-अलग शब्दोंके अर्थका ज्ञान इस दशामें उसको नहीं होता है। उसके बाद फिर 'गा नय 'अश्वमानय' -- 'गायको ले जाओ', 'अश्वको ले आओो' आदि वाक्योंके प्रयोग और उनके अनस होनेवाली क्रियाओंको देखकर शनैः-शनैः बालकको अलग-अलग शब्दोंके अर्थका ज्ञान हो जाता : यही व्यवहारतः शक्तिग्रहकी प्रक्रिया है। इसी प्रक्रियाका वर्णन आ्गे उद्धृत की हुई दो कारिकाओं श्रौ:
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येऽप्याहु :- शब्दवृद्धाभिधेयांश्च प्रत्यक्षेणात्र पश्यति श्रोतुश्च प्रतिपन्नत्वमनुमानेन चेष्टया ।।१।। अन्यथाऽनुपपत्त्या तु बोधेच्छकि्ति द्वयात्मिकाम् ४ अर्थापत्त्याऽवबोधेत सम्बन्धं त्रिप्रमाणकम् ।।२।। इति प्रतिपादितदिशा-
उनकी व्याख्यामें किया गया है। इन कारिकाओंका अर्थ समझनेके लिए निम्नलिखित बातोंको विशेष- रूपसे हृदयङ्गभ कर लेना चाहिये। १. प्रत्येक वाक्यके कर्तारूपमें 'बालः' पदका अध्याहार करना है। २. 'शब्द-वृद्धाभिधेयांश्च प्रत्यक्षेणात्र पश्यति' इस प्रथम श्लोकके पूर्वार्द्धमें 'प्रत्यक्ष' शब्दसे चाक्षुष एवं श्रावण प्रत्यक्षके करणभूत चक्ष तथा श्रोत्रका ग्रहण करना चाहिये। और 'पश्यति' शब्दसे 'शृणोति' का भी ग्रहण समझना चाहिये। क्योंकि 'वृद्ध' और 'अभिधेय' का तो चक्षुसे दर्शन हो सकता है, परन्तु 'शब्द'का ग्रहण चक्षुसे न होकर श्रोत्से ही होता है, इसलिए शब्दके पक्षमें 'प्रत्यक्षेण पश्यति' की सङ्गति लगानेके लिए उसका अर्थ 'शृणोति' अर्ात् 'श्रोत्रेण गृहणाति' करना चाहिये। ३. 'वृद्ध' शब्दसे 'उत्तमवृद्ध' पिता आर्प्रादि तथा 'मध्यमवृद्ध'से भाई या भृत्य आ्र्प्रादि दोनोंका ग्रहण करना चाहिये। 'येऽप्याहुः' यहाँसे लेकर आगे २२४ पृष्ठपर आये हुए 'इति विशिष्टा एव पदार्था वाक्यार्थः', न तु पदार्थानां वैशिष्टयम्' तक एक वाक्य है। अर्थात् 'येऽप्याहुः' से लेकर 'वैशिष्टयम्'तक एक साथ मिलाकर 'अन्विताभिधानवादियों के सिद्धान्तको मोटेरूपसे उपस्थित किया गया है। उसके बाद फिर 'इत्यन्विताभिधानवादिनः'तक उसके सूक्ष्मरूपका विवेचन किया गया है। उसके बाद फिर अन्विताभिधानवादका खण्डन है। अब 'अन्विताभिधानवाद' के पूर्वपक्षकी स्थापना करनेवाले ग्रन्थभागकी व्याख्या इस प्रकार होगी- और जो [अन्विताभिधानवादी] यह कहते हैं कि- यहाँ ['अत्र' अर्थात् व्यवहारतः शक्तिग्रहकी प्रक्रियामें बालक, उत्तमवृद्धके द्वारा उच्चारण किये हुए ] शब्द [को 'प्रत्यक्षेण पश्यति' अर्थात् श्रोत्रसे सुनता है, मध्यम] 'वृद्ध' तथा 'अभिधेय' [अर्थात् गवानयनादिरूप क्रिया] को प्रत्यक्ष [अर्थात् चाक्षुष प्रत्यक्षके हेतुभूत चक्षु ] से [ पश्यति-देखता ] ग्रहण करता है। [और उसके बाद मध्यमवृद्धरूप ] श्रोताके ज्ञानको क्रियाके द्वारा [अर्थात् मध्यमवृद्धने उत्तमवृद्धके कहे हुए वाक्यका अर्थ समझकर ही इस प्रकारका व्यापार किया है यह बात] अनुमानसे वह जानता है।।१। [उत्तमवृद्धके द्वारा कहे गये वाक्य और उसके अर्थमें वाच्यवाचकभावसम्बन्धके बिना मध्यम- वृद्धको उसके अर्थका ज्ञान नहीं हो सकता था, इसलिए इन दोनोंका वाच्यवाचकभावसम्बन्ध अवश्य है इस प्रकारकी ] अन्यथानुपपत्तिरूप अर्थापत्ति [प्रमाण ]से वाच्यवाचकभावरूप ] दोनों प्रकारकी शक्तिको जानता है। इस प्रकार [प्रत्यक्ष, अनुमान तथा अर्थापत्तिरूप ] तीन प्रमाणोंसे [ शब्द तथा अर्थके वाच्य- वाचकभावरूप ] सम्बन्धको [बालक ] जानता है ॥।२।।
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का० ४७, सू० ६६] पञ्चम उल्लास: २२३ अन्विताभिधानवादका उपपादन यह इन दोनों कारिकाओंका अर्थ हुआ। इन कारिकाओंमें यह दिखलाया गया है कि सङ्केत- ग्रहमें प्रत्यक्ष, अ्नुमान और अर्थापत्ति इन तीन प्रमाणोंका उपयोग होता है यही 'सम्बधं त्रिप्रमाणकम्' का अरथ है। सङ्केतग्रहमें इन तीनों प्रमाणोंका उपयोग निम्नलिखित प्रकार होता है- १. प्रत्यक्ष-व्यवहारमें उत्तमवृद्ध और मध्यमवद्धको बालक चक्षु द्वारा प्रत्यक्ष देखता है। यह चाक्षुष प्रत्यक्ष हुआ। उसके बाद उत्तमवृद्धके द्वारा कहे हुए वाक्यको अपने कानोंसे सुनता है। यह 'श्रावण प्रत्यक्ष' हुआ। फिर जब मध्यमवृद्ध गायको लाता है तो गायको भी बालक चक्षुसे देखता है। यह 'अरभिधेय' अर्थका चाक्षुष प्रत्यक्ष हुआ। इस प्रकार 'शब्दका' श्रावण प्रत्यक्षसे और 'वृद्ध' तथा 'अभिधेय' का चाक्षुष प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है। यही बात प्रथम कारिकाके 'शब्द-वृद्धाभिधेयांश्च प्रत्यक्षेणात्र पश्यति' इस पूर्वार्द्ध भागसे कही गयी है। २. अनुमान-इस प्रकार शब्द, वृद्ध और अभिधेयका प्रत्यक्ष करनेके बाद बालकको अनुमान प्रमाणका उपयोग करना होता है। उत्तमवृद्धके वाक्यको सुननेके बाद जब मध्यमवृद्ध गवानयनमें प्रवृत्त होता है तो उसकी चेष्टाको देखकर बालक यह अनुमान करता है कि मध्यमवृद्धकी यह चेष्टा उत्तमवृद्धके वाक्यको सुननेके बाद हुई है, इसलिए उत्तमवृद्धके वाक्यके अर्थको समझकर ही की गयी है। इसलिए चेष्टारूप 'लिङ्ग' से बालक श्रोता अर्थात् मध्यमवृद्धके 'प्रतिपन्नत्व' अर्थात् ज्ञानका 'अनुमान' करता है। इस प्रकार सङ्केतग्रहमें 'अनुमान'रूप दूसरे प्रमाणका उपयोग भी सिद्ध होता है। इसी बातको प्रथम कारिकाके 'श्रोतुश्च प्रतिपन्नत्वमनुमानेन चेष्टया' इस वाक्यके द्वारा कहा गया है। ३. अर्थापत्ति-सङ्केतग्रहमें सहायता देनेवाला तीसरा प्रमाण 'अर्थापत्ति' है। 'अनुपपद्यमानार्थ- दर्शनात् तदुपपादकीभूतार्थान्तरकल्पनमर्थापत्तिः' यह 'अर्थापत्ति' प्रमाणका लक्षण है। 'अनुपपद्यमान' अर्थको देखकर उसके 'उपपादक' अरथकी कल्पना करनेको 'अर्थापत्ति' कहते हैं। जैसे 'पीनो देवदत्तः दिवा न भुंक्ते' देवदत्त मोटा हो रहा है परन्तु दिनमें नहीं खाता है। ऐसा देखकर या सुनकर यह स्वयं ही समझ लिया जाता है कि वह रात्रिमें खाता होगा। यहाँ दिनमें न खानेवाले देवदत्तका 'पीनत्व' अर्थात् मोटापन 'अनुपपद्यमान' अर्थ है और रात्रिभोजन उसका 'उपपादकीभूत' अर्थ है। रात्रिभोजनके बिना दिवा अभुञ्जानका पीनत्व बन ही नहीं सकता है। इसलिए पीनत्वकी अन्यथा अर्थात् रात्रिभोजनके बिना-अनुपपत्ति होनेसे वही अन्यथानुपपत्तिप्रसूता अर्थापत्ति रात्रिभोजनमें प्रमाण होती है। यहाँ सङ्कतग्रहणमें 'गामानय' आरदि प्रयोगों औप्रौर उनके अरर्थोंके वाच्यवाचकभावसम्बन्धका ग्रहण इसी 'अर्थापत्ति' प्रमाणसे होता है। उत्तमवृद्धके वाक्यको सुननेके बाद जब मध्यमवृद्ध गवानयनमें प्रवृत्त होता है तब बालक यह अनुमान करता है कि मध्यमवृद्धने उत्तमवृद्धके वाक्यके अर्थको जानकर ही गवानयनरूप क्रिया की है। यह ज्ञान अनुमान द्वारा होता है यह बात ऊपर कही जा चुकी है। इसके बीचमें 'गामानय' आदि वाक्य और उसके अर्थका जो वाच्यवाचकभावसम्बन्ध है उसका ग्रहण 'अर्थापत्ति' के द्वारा होता है। यदि वाक्यमें वाता और अर्थमें वाच्यता अर्थात् शक्ति न होती तो वाक्यसे अर्थका बोध नहीं हो सकता था। यहाँ 'अर्थावबोध' 'अनुपपद्यमान' अर्थ है। और वाच्य- वाचक-भाव-सम्बन्ध उसका 'उपपादकीभूत' अर्थ है। अनुपपद्यमान अर्थावबोधको देखकर उसके 'उप- पादकीभूत' वाच्यवाचकभावकी कल्पना अर्थापत्तिके द्वारा होती है। इस प्रकार अर्ापत्ति भी सङ्केतग्रहमें सहायक होती है। इसी बातको द्वितीय कारिकामें 'अन्यथानुपपत्त्या तु बोधेच्छक्ति द्वयात्मिकाम् ।
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देवदत्त गामानयेत्याद्युत्तमवृद्धवाक्यप्रयोगा द्देशा द्देशान्तरं सास्नादिमन्तमर्थ मध्यम- वृद्धे नयति सति 'अनेनास्माद्वाक्यादेवंविधोऽर्थः प्रतिपन्नः' इति तच्चेष्टयाऽनुमाय, तयोरखण्डवाक्यवाक्यार्थयोरर्थापत्त्या वाच्यवाचकभावलक्षणं सम्वन्धमवधार्य वालस्तत्र व्युत्पद्यते। परतः 'चैत्र गामानय, 'देवदत्त अश्वमानय' 'देवदत्त गां नय' इत्यादिवाक्यप्रयोगे तस्य तस्य शब्दस्य तं तमर्थमवधारयतीति, अन्वयव्यतिरेकाभ्यां प्रवृत्तिनिवृत्तिकारि- वाक्यमेव प्रयोगयोग्यमिति वाक्यस्थितानामेव पदानामन्वितैः पदार्थैरन्वितानामेव सङ्केतो ृह्यते इति विशिष्टा एवपदार्था वाक्यार्थोन त पदार्थानां वैशिष्टयम्।
अर्थापत्त्या' इस भाषामें कहा गया है। और 'अवबोधेत् सम्बन्धं त्रिप्रमाणकम्' द्वारा यह कहा गया है कि इस प्रकार तीनों प्रमाणोंकी सहायतासे सङ्केतका ग्रहण होता है। यहाँ बालक तीनों प्रमाणों द्वारा सङ्केतका ग्रहण करता है यह बात कही गयी है। यद्यपि बालक न अनुमानकी प्रक्रिया जानता है न अर्थापत्तिकी, किन्तु उसके द्वारा ज्ञात न होनेपर भी ये प्रमाण उसके ज्ञानमें सहायक होते ही हैं, इसलिए यह बात असङ्गत नहीं है। अन्विताभिधानवादका उपपादन [इन दोनों कारिकाओंमें प्रतिपादित ] इस शैलीसे -- 'देवदत्त गायको लाओ' इस प्रकार 'उत्तमवृद्ध' [पिता आदि]के द्वारा वाक्यके प्रयोगके बाद मध्यमवृद्धको सास्नादिमान् अर्थ [गाय] को एक स्थानसे दूसरे स्थानको ले जाते हुए देखकर 'इसने [अर्थात् मध्यमवृद्धने ] उत्तमवृद्ध द्वारा कहे गये [ 'गामानय'] इस वाक्यसे यह [गवानयनरूप ] अर्थ समझा' इस बातका उस [मध्यमवृद्ध ] की [गवानयनरूप ] चेष्टासे अनुमान करके अखण्ड वाक्य और अखण्ड वाक्यार्थ दोनोंके वाच्यवाचकभाव रूप सम्बन्धका 'अर्थापत्ति' द्वारा निश्चय करके बालक उस अखण्ड वाक्य और अखण्ड वाक्यार्थ [के वाच्यवाचकभावसम्बन्ध ] का ज्ञान प्राप्त करता है। उसके बाद, 'चंत्र गायको लाओ', 'देवदत्त घोड़ेको लाओ', 'देवदत्त गायको ले जाओ' इस प्रकारके वाक्योंका प्रयोग होनेपर उस-उस शब्दके उस-उस अर्थका निश्चय करता है। इस प्रकार अन्वय-व्यतिरेकसे प्रवृत्ति तथा निवृत्तिका करनेवाला वाक्य ही प्रयोगके योग्य होता है इसलिए वाक्यमें स्थित अन्वित पदोंका ही अन्वित पदार्थोंके साथ सङ्गेत गृहीत होता है। [केवल अर्थात् अनन्वित पदार्थोंका सङ्गतग्रह नहीं होता है] इसलिए 'अन्वयविशिष्ट' [परस्परान्वित ] पदार्थ ही वाक्यार्थ हैं। [केवल अनन्वित] पदार्थोंका [बादमें प्रतीत होनेवाला ] वैशिष्टय [अर्थात् सम्बन्ध वाक्यार्थ] [नहीं होता है।] 'विशिष्टा एव पदार्थाः वाक्यार्थः' और 'न तु पदार्थानां वैशिष्टयम्' ये दोनों वाक्य क्रमशः 'अन्विताभिधानवाद' तथा 'अभिहितान्वयवाद'के सिद्धान्तके प्रदर्शक हैं। अन्विताभिधानवाद' में वाक्यसे परस्पर अन्वित पथार्थ ही वाक्यार्थके रूपमें उपस्थित होते हैं। अभिहितान्वयवाद'में पहिले पदोंके द्वारा केवल पदार्थ उपस्थित होते हैं, बादको उनका परस्पर अन्वय या सम्बन्ध होता है। यहाँ ग्रन्थकार 'अन्विताभिधानवाद'के सिद्धान्तको प्रस्तुत कर रहे हैं, इसलिए 'विशिष्टा एव पदार्थाः वाक्यार्थः' इस वाक्य द्वारा उनका मत दिखलाया गया है। और 'न तु पदार्थानां वैशिष्टयम्' इस वाक्य द्वारा 'अभि- हितान्वयवाद'का खण्डन किया है। 'विशिष्टाः पदार्थाः' का अरथ 'अन्वित पदार्थ' और 'पदार्थानां
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यद्यपि वाक्यान्तरप्रयुज्यमानान्यपि प्रत्यभिज्ञाप्रत्ययेन तान्येवैतानि पदानि निश्ची- यन्ते इति पदार्थान्तरमात्रेणान्वितः सङ्केतगोचरः तथापि सामान्यावच्छादितो विशेषरूप एवासौ प्रतिपद्यते व्यतिषक्तानां पदार्थानां तथाभूतत्वादित्यन्विताभिधानवादिनः ।
वैशिष्टयम्'का अ्रर्थ केवल अनन्वित पदार्थोंका बादको होनेवाला अन्वय है। इसका सारांश यह हुआ कि अन्वित पदार्थ ही वाक्यार्थके रूपमें उपस्थित होते हैं। केवल पदार्थोंकी उपस्थितिके बाद उनका अन्वय नहीं होता है। अतः 'अन्विताभिधानवाद' ही ठीक है, 'अभिहितान्वयवाद' नहीं। विशेषान्वितमें शक्तिग्रहका उपपादन 'काव्यप्रकाश का यह प्रकरण बड़ा कठिन प्रकरण है। पर इतनी व्याख्यासे यहाँतकका भाग सम्भवतः स्पष्ट हो गया होगा। अगली पंक्तियाँ इससे भी अधिक कठिन हैं। इसलिए इन पंक्तियोंका अर्थ लगानेसे पहिले हम उनका अभिप्राय स्पष्ट कर रहे हैं। ग्रन्थकारने अभी दिखलाया था कि व्यवहारतः शक्तिग्रहकी जो प्रक्रिया मानी जानी है उसके अनुसार 'गामानय' आदिको सुनकर होनेवाले 'गवानयन' आदि व्यवहारके द्वारा अन्वित पदार्थमें ही सङ्कतग्रह या शक्तिग्रह हो सकता है, केवल पदार्थमें नहीं। इसलिए 'अन्विताभिधानवाद' ही ठीक है। यहाँ यह प्रश्न उपस्थित होता है कि यह अन्वय या सम्बन्ध किसके साथ गृहीत होता है। किसी विशेष अर्थके साथ या सामान्य अर्थके साथ ? विशेष अर्थके साथ अन्वित अर्थमें शक्तिग्रह नहीं हो सकता है, क्योंकि 'गामानय'के व्यवहारसे जो शक्तिग्रह होता है वह यदि 'गो-विविष्ट आनयन' में माना जाय तो 'अश्वमानय' में उससे अर्थज्ञान नहीं हो सकेगा। इसी प्रकार प्रत्येक शब्द भिन्न-भिन्न वाक्योंमें भिन्न-भिन्न शब्दोंके साथ प्रयुक्त होता है। किसी एक अर्थके साथ अन्वित रूपमें शक्तिग्रह माननेपर अन्य वाक्योंमें प्रयुक्त इसी शब्दसे अर्थबोध नहीं हो सकेगा। इसलिए किसी विशेष अर्थके साथ अन्वित अर्थमें सङ्केतग्रह नहीं हो सकता है। केवल सामान्य रूपसे अन्वित अर्थमें सङ्केतग्रह माना जा सकता है। पर उससे तो 'अन्विताभिधानवाद' सिद्ध नहीं होता है। 'अन्विताभिधानवाद' के लिए विशेषके साथ अन्वित अर्थमें सङ्केतग्रह होना चाहिये। सामान्य अन्वयसे काम नहीं चलेगा। इस प्रश्नका समाधान करनेके लिए ग्रन्थकारने अगला अनुच्छेद लिखा है। उसका अभिप्राय यह है कि यद्यपि एक ही पदके भित्न-भिन्न शब्दोंके साथ प्रयुक्त होनेसे किसी विशेष अर्थके साथ अन्वितरूप- से सङ्केतग्रह मानना सम्भव नहीं है, सामान्यरूपसे अन्वित अर्थमें ही सङ्केतग्रह मानना होगा ; फिर भी 'निर्विशेषं न सामान्यम्' इस सिद्धान्तके अ्र्प्रनुसार प्रत्येक सामान्यका पर्यवसान विशेषमें अवश्य होता है। बिना विशेषके कोई सामान्य नहीं रहता है। इसलिए सामान्यरूपसे अन्वित अर्थका पर्यवमान भी विशेषमें होता है। वाक्यमें अन्वित पदार्थ सामान्य नहीं, विशेष होते हैं। अतः विशेषके साथ अरन्वित अर्थमें सङ्केतग्रह माननेमें कोई हानि नहीं है। यह अन्विताभिधानवादियोंका मत है। इसी बातको ग्रन्थकार अगले अनुच्छेदमें इस प्रकार लिखते हैं- यद्यपि ['गामानय' इत्यादि वाक्यसे भिन्न 'देवदत्त अश्वमानय' इत्यादि ] दूसरे वाक्योंमें प्रयुक्त हुए 'आनय' आदि पद भी प्रत्यभिज्ञा [तत्तेदन्तावगाहिनी प्रतीतिः प्रत्यभिज्ञा ]के बलसे 'ये वे ही पद हैं' [जो पहिले वाक्यमें प्रयुक्त हुए थे ] यह निश्चित हो जाता है। इसलिए सामान्यतः अन्य पदार्थके साथ अन्वित पदार्थमें ही सङ्गेतग्रह होता है [ विशेषमें अन्वितरूपसे नहीं ] फिर भी परस्पर सम्बद्ध [व्यतिषक्त ] १५
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२२६ काव्यप्रकाश: [का० ४७, सू० ६६ तेषामन मते सामान्यविशेषरूपः पदार्थ: संकेतविषय इत्यतिविशेषभूतो वाक्या- र्थान्तरगतोऽस ङ्केतितत्वादवाच्य एव यत्र पदार्थः प्रतिपद्यते तत्र दूरेऽर्थान्तरभूतस्य निःशेष- च्युतेत्यादौ विध्यादेश्चर्चा। पदार्थोंके ['तथाभूत' अर्थात् ] विशेषरूप ही होनेसे [ 'निविशेषं न सामान्यम्' इस नियमके अनुसार] सामान्यसे अवच्छादित होनेपर [भी] वह [सङ्गेतग्रह ] विशेषरूप [में] ही [परिणत] हो जाता है। यह अन्विताभिधानवादियोंका मत है। अन्विताभिधानवादमें व्यञ्जना अनिवार्य उनके मतमें भी सामान्यविशेषरूप पदार्थ सङ्गेतका विषय होता है इसलिए [ कर्मत्वादिरूप सामान्यविशेष अर्थसे भिन्न, उसके भी बादमें प्रतीत होनेवाला ] वाक्यार्थके अन्तर्गत 'अतिविशेष' रूप अर्थ [अर्थात् गो-अश्व आदि व्यक्तिविशेषके साथ सम्बद्ध आनयन ] असङ्गेतित होनेसे वाच्यार्थ न होनेपर भी यहाँ [अर्थात् अन्विताभिधानवादमें] पदार्थरूपमें प्रतीत होता है वहाँ [ उस वाक्यार्थबोधके भी बाद प्रतीत होनेवाले ] 'निःशेषच्युत' इत्यादिमें [वाच्यनिषेधसे व्यङ्गच ] विध्यादि [के वाच्य होने ] की चर्चा तो दूर ही है। इस प्रसङ्गमें ग्रन्थकारने १. सामान्य २. सामान्यविशेष ३. अतिविशेष इन तीन शब्दोंका प्रयोग किया है। इनमें 'सामान्य' शब्दका अर्थ साधारणरूपसे अन्वितत्वमात्र है। 'सामान्य- विशेष' का अर्थ 'कर्मत्वादिरूपसे अन्वितत्व' और 'अतिविशेष' का अरथ गो-अश्वादि व्यक्तिविशेषके साथ अन्वितत्व है। व्यञ्जनावादी पक्षमें यह कहा गया था कि यदि अन्विताभिधान माना भी जाय तो अधिकसे अधिक 'सामान्य' रूपसे अन्वित अर्थमें सङ्गेतग्रह माना जा सकता है, परन्तु उससे तो काम नहीं चल सकता। जैसे किसीको घड़ा मँगाना अभीष्ट है। वह 'घड़ा ले आओ' कहने के स्थानपर किसीको 'वस्तु ले आओ' कहे तो उससे लानेव, ला व्यक्ति 'घड़ा ले आओ' यह अर्थ नहीं समझ सकेगा। यद्यपि 'वस्तु' शब्दसे सभी वस्तुओरोंका ग्रहण हो सकता है। इस दृष्टिसे 'वस्तु' शब्द घड़ेका भी ग्राहक होना चाहिये। किन्तु 'वस्तु ले आओ' इस वाक्यमें सामान्यरूपसे घटके ग्राहक 'वस्तु' शब्दसे काम नहीं चलता है। उसके लिए विशेषरूपसे घट शब्दका ही प्रयोग करना होगा। इसी प्रकार सामान्यरूपसे अन्वित अर्थमें सङ्केतग्रह माननेसे काम नहीं चल सकता है यह व्यञ्जनावादी पक्षका अभिप्राय था। इस दोषका समाधान करनेके लिए अन्विताभिधानवादीने सामान्यरूपसे अन्वितमें सङ्गेतग्रह न मानकर 'निर्विशेषं न सामान्यम्' इस नियमके अनुसार 'सामान्यविशेष' में सङ्केतग्रह माना था। इस 'सामान्यविशेष' का अभिप्राय यह है कि यद्यपि 'गामानय' आदि वाक्योंमें 'आनय' आदि पदार्थोंका केवल सामान्यतः अन्वित पदार्थमें नहीं अपितु कर्मत्व आदि रूप 'सामान्यविशेष' रूपसे अन्वित अरथमें ही सङ्केतग्रह होता है। इसलिए जब उसके साथ 'गां' या 'अश्वं' ये विशेष शब्द प्रयुक्त होते हैं तब उससे सामान्यरूपसे अरपत्वित अर्थकी प्रतीति न होकर 'सामान्यविशेष' अर्ात् कर्मत्वादिरूपसे अन्वित अर्थकी प्रतीति होती है। 'गाम् आ्नय' इस वाक्यमें कर्मभत 'गां' पदसामान्यविशेष है। इसलिए 'नय' पद उस 'सामान्यविशेष' से श्रन्वित अरथका बोधक होता है। जब उसके स्थानपर 'अश्वम् आ्रानय' वाक्य बोला जाता है तब 'आनय' पद कर्मभूत 'अश्ब' से अन्वित 'गनय'का बोधक हो जाता है, क्योंकि उस
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का० ४७, सू० ६६ ] पञ्चम उल्लास: २२७ अनन्वितोऽर्थोऽभिहितान्वये पदार्थान्तरमात्रेणान्वितस्त्वन्विताभिधाने अन्वित- वाक्यमें कर्मत्वेन अन्वित अश्व ही 'सामान्यविशेष' होता है। इस प्रकार 'सामान्यमात्र' में सङ्केतग्रह माननेमें जो दोष आता था, वह 'सामान्यविशेष' में सङ्केतग्रह माननेसे दूर हो जाता है। इसको 'सामान्यविशेष' इसलिए कहा गया है कि 'गां' आनय', 'अश्वम् आनय' आदिमें यद्यपि 'आनय'का सम्बन्ध 'गा', 'अश्वं' आदि विशेष पदार्थोंके साथ होता है किन्तु वे 'गां' और 'अश्वं' पद 'आनय' क्रियाके साथ उन दोनोंमें समानरूपसे रहनेवाले 'कर्मत्व' रूपसे ही अन्वित होते हैं। सकर्मक 'आनय' क्रियाको 'कर्म' की आवश्यकता है इसलिए कभी 'गां' और कभी 'अश्वं' उसके कर्मके रूपमें उसके साथ अन्वित होते हैं। यहाँ 'गां' 'अश्वं' पद विशेष होते हुए भी अपने व्यक्तिरूपसे नहीं अपितु केवल 'कर्मत्व' रूप सामान्यसम्बन्धसे ही अन्वित होते हैं। इसलिए ग्रन्थकारने इनके लिए 'सामान्यविशेष' शब्दका प्रयोग किया है और सामान्यमात्रमें सङ्केतग्रह न मानकर 'सामान्यविशेष' में सङ्केतग्रह माना है। इस प्रकार 'सामान्य' और 'सामान्यविशेष शब्दोंकी व्याख्या हो गयी। तीसरा शब्द 'अतिविशेष' है। ऊपरके वाक्योंमें 'गां' 'अश्वं' पद विशेष होते हुए भी दोनोंमें रहनेवाले सामान्य 'कर्मत्व' रूपसे ही 'आनय'के साथ अन्वित होते हैं। यह उनका 'सामान्यविशेष' रूप है, 'गोत्व' और 'अश्वत्व' या गो और अश्व आदि विशेष व्यक्तिको यहाँ 'अतिविशेष' शब्दसे कहा गया है। यह 'अतिविशेष' रूप वाक्यार्थमें प्रतीत होता है। परन्तु उसमें सङ्केतग्रह नहीं होता है, क्योंकि व्यक्तिमें सङ्केतग्रह माननेपर आ्ानन्त्य तथा व्यभिचार दोष आ जायँगे यह बात पहिले कही चा चुकी है। अतः वाक्यार्थमें भासनेपर भी व्यक्तिरूप 'अतिविशेष' अर्थ असङ्केतित अर्थ होनेसे वाच्यार्थ नहीं हो सकता है। उसका बोध अभिधाके अतिरिक्त किसी अन्य शक्तिसे मानना पड़ेगा। अतः 'अन्विताभिधानवाद' माननेपर भी उस 'अतिविशेष' अर्थके बोधनके लिए 'तात्पर्याख्या' या इसी प्रकारकी कोई अन्य शक्ति माननी होगी। जब वाक्यार्थके बोधके लिए ही अभिधाशक्तिसे भिन्न शक्तिकी आवश्यकता होती है तब वाक्यार्थबोधके भी बादमें उपस्थित होनेवाले व्यङ्गयार्थका बोध अभिधासे हो सकता है यह कहना सर्वथा असङ्गत है। यह इस अनुच्छेदका अभिप्राय हुआ।
अभिहितान्वयवाद तथा अन्विताभिधानवादकी समानता यों तो 'अन्विताभिधानवाद' के संस्थापक प्रभाकरने 'अभिहितान्वयवाद'के विरोधमें अपने सिद्धान्त- की स्थापना की है, किन्तु जब विगत अनुच्छेदमें दिखलायी हुई पद्धतिसे उसका विश्लेषण किया जाता है तब यह स्पष्ट हो जाता है 'अभिहितान्वयवाद'के समान ही 'अन्विताभिधानवाद'में भी वाक्यार्थरूप 'अतिविशेष' अर्थका बोध अभिधाशक्तिसे नहीं बनता है, उसके लिए कोई दूसरी शक्ति माननी ही होगी। अतः दोनों पक्षोंमें ही जब वाक्यार्थ अभिधा द्वारा बोधित नहीं होता है तब व्यङ्गचार्थके अभिहित होनेकी तो चर्चा ही कहाँ हो सकती है। इसी बातको अगले अनुच्छेदमें कहते हैं। अभिहितान्वयवादमें अनन्वित अर्थ [वाच्य होता है] और अन्विताभिधानवादमें [सामान्यरूपसे ] पदार्थान्तरमात्रसे अन्वित अर्थ [वाच्यार्थ होता है]। अन्वितविशेष तो [अभिहितान्वयवाद या अन्विता- भिधानवाद दोनों ही मतोंमें ] वाच्य नहीं होता है। इसलिए [ अभिहितान्वयवाद और अन्विताभिधान- वाद] दोनों ही सिद्धान्तोंमें वाच्यार्थसे भिन्न [अपदार्थ-पदार्थ या वाच्यार्थसे भिन्न ] ही वाक्यका अर्थ
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विशेषस्त्ववाच्य एव इत्युभयनयेऽप्यपदार्थ एव वाक्यार्थः ।
होता है [ तब उसके भी बाद प्रतीत होनेवाला व्यङ्गचार्थ तो वाच्य हो ही नहीं सकता है। अतः उस व्यङ्गचार्थकी प्रतीतिके लिए इन दोनों सिद्धान्तोंमें व्यञ्जनाका मानना अपरिहार्य ही है।] मीमांसकके एकदेशीका व्यञ्जनाविरोधी पूर्वपक्ष 'काव्यप्रकाश'के प्रारम्भमें शब्दप्रधान प्रभुशब्द, अरथप्रधान सुहृत्शब्द तथा रसप्रधान कान्ताशब्द इन तीन प्रकारके शब्दोंकी चर्चा आयी थी। उसके अनुसार वेदको शब्दप्रधान प्रभुशब्द या राजाज्ञाके समान माना गया था। राजाज्ञामें शब्दोंका सीधा और एकमात्र वाच्यार्थ ही ग्रहण किया जाता है। उसमें लक्षणाका अवसर कम और व्यञ्जनाका अवसर तो कोई होता ही नहीं है। इसी प्रकार वेदोंमें भी मुख्यरूपसे सीधा वाच्यार्थ ही ग्रहण किया जा सकता है। उनमें भी लक्षणाका अवसर कम और व्यञ्जनाके प्रयोगका अवसर बिलकुल नहीं हो सकता है। इसलिए मीमांसक जो वेदपर ही अपना सब-कुछ निछावर किये हुए है, अभिधा-लक्षणाके अतिरिक्त व्यञ्जनावृत्तिके माननेका विरोधी है। इसलिए मीमांसक होनेके नाते मुकुलभट्टने 'अभिधावृत्तिमातका' नामक अपने ग्रन्थमें अभिधा तथा लक्षणाका ही प्रतिपादन किय। है और अन्तमें लक्षणाका भी अभिधामें ही अन्तर्भाव करके एक ही अभिधा- वृत्तिका प्रतिपादन किया है और उसके दस भेद माने हैं। इस प्रकार मीमांसक मुख्यरूपसे व्यञ्जनाके विरोधी हैं। इसलिए ग्रन्थकार यहाँ विशेषरूपसे उन्हींके मतमें व्यञ्जनाको अलग वृत्ति माननेकी अपरिहार्यताक। प्रदर्शन करनेका प्रयत्न कर रहे हैं। ऊपरके प्रकरणमें उन्होंने मीमांसकोंके सबसे प्रमुख आचार्य कुमारिलभट्टके 'अभिहितान्वयवाद' तथा प्रभाकरके अभिमत 'अन्विताभिधानवाद' सिद्धान्तोंमें व्यञ्जनावृत्तिकी अपरिहार्यताका प्रतिपादन किया था; आगे फिर वे किसी मीमांसकैकदेशीके 'नैमित्ति- कानुसारेण निमित्तानि कल्प्यन्ते' इस तीसरे मतकी चर्चा प्रारम्भ करते हैं। 'नैमित्तिकानुसारेण निमित्तानि कल्प्यन्ते' इस मतका अभिप्राय यह है कि व्यञ्जनावादी जिस अर्थको 'व्यङ्गयार्थ' कहते हैं वह भी शब्दसे ही प्रतीत होता है। शब्दके अतिरिक्त उसका और कोई निमित्त तो उपलब्ध होता ही नहीं है। इसलिए शब्दको ही उसका निमित्त मानना होगा। निमित्त, जैसाकि ऊपर रसकी अलौकिकत्वासिद्धिके प्रसङ्गमें पृष्ठ ११० पर कहा जा चुका है, कारक औौर ज्ञापक- रूप दो ही प्रकारका होता है। शब्द कारकरूप निमित्त नहीं हो सकता है। इसलिए व्यङ्गयार्थके प्रति शब्दका निमित्तत्व भी कारकरूप नहीं अपितु ज्ञापकत्व या बोधकत्वरूप ही होगा। शब्द तथा व्यङ्गयार्थ- का यह बोध्यबोधकभावरूप निमित्त-नैमित्तिकभाव, बिना शक्तिके नहीं हो सकता है। और शब्दमें अर्थका बोधन करानेवाली अभिधाशक्ति ही है इसलिए शब्दसे व्यङ्गयार्थकी जो प्रतीति होती है वह भी शब्दके अभिधाव्यापार द्वारा ही होती है। इसलिए व्यञ्जना आदिकी कल्पनाका प्रयास बिलकुल व्यर्थ है। यह 'नैमित्तिकानुसारेण निमित्तानि कल्प्यन्ते' इस पूर्वपक्षकी पंक्तिका अप्रिप्राय है। व्यञ्जनावादीकी ओरसे इसका खण्डन इसका उत्तर व्यञ्जनावादी यह देते हैं कि गत अनुच्छेदमें कहे युक्तिकमके अनुसार शब्दसे जो व्यङ्गयार्थ प्रतीत होता है उससे शब्दमें उसका केवल ज्ञापकत्वरूप निमित्त ही बनता है। वह ज्ञापकत्व- रूप निमित्त भी तब बन सकता है जब शब्दका उस अर्थके साथ सङ्केतग्रह हो। आपके मतानुसार
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यदप्युच्यते 'नैमित्तिकानुसारेण निमित्तानि कल्प्यन्ते' इति, तत्र निमित्तत्वं कारणत्वं ज्ञापकत्वं वा ? शब्दस्य प्रकाशकत्वान्न कारकत्वम्, ज्ञापकत्वन्तु अज्ञातस्य कथम् । ज्ञातत्वं च सङ्कतेनैव, स चान्वितमात्रे। एवं च निमित्तस्य नियतनिमित्तत्वं यावन्न निश्चितं तावन्नैमित्तिकस्य प्रतीतिरेव कथमिति 'नैमित्तिकानुसारेण निमित्तानि कल्प्यन्ते' इत्यविचारिताभिधानम् । सङ्कत केवल सामान्यरूपसे अन्वितमात्रमें गृहीत होता है, विशेषमें सङ्गतग्रह नहीं होता है। इसलिए निमित्तरूप शब्दका जबतक प्रतीत होनेवाले व्यङ्गयरूप विशेष अर्थके साथ निश्चयरूपसे सम्बन्ध या सङ्कतका ग्रहण न हो तबतक उससे अभिधा द्वारा नैमित्तिक व्यङ्गयार्थकी प्रतीति ही कैसे हो सकती है। ऊपर लिखे युक्तिक्रमके अनुसार विशेषरूप व्यक्तिके साथ अन्वितरूपमें जब शक्तिग्रह ही नहीं बनता है तब व्यङ्गयार्थके साथ सङ्गेतग्रह माननेका अवसर ही कहाँ ? इसलिए शब्दसे अभिधाव्यापार द्वारा व्यङ्गयार्थकी प्रतीति अ्सम्भव है। इसी पूर्वपक्ष और उत्तरपक्षको ग्रन्थकारने अगली पंक्तियोंमें इस प्रकार प्रस्तुत किया है- [पूर्वपक्ष ]-और [ मीमांसकैकदेशी द्वारा] जो यह कहा जाता है कि 'नैमित्तिक [कार्य]के अनुसार निमित्त [कारण ] की कल्पना की जाती है।' [उत्तरपक्ष ]-उस [सिद्धान्त ]में [शब्दका ] निमित्तत्व कारकत्वरूप है या ज्ञापकत्वरूप ? शब्द [अर्थका ] प्रकाशक होता है [ उत्पादक नहीं होता] इसलिए कारकत्व नहीं [ बनता है केवल ज्ञापकत्व बन जाता है]। और वह [ज्ञापकत्व ] भी [ शब्दसे अर्थका ज्ञान हुए बिना कैसे बनेगा [ज्ञापकत्वन्तु अज्ञातस्य कथम्]। और ज्ञान सङ्गतग्रहसे ही होता है। वह [सङ्केत ] केवल [सामान्यरूपसे ] अन्वित- मात्रमें ही होता है [ विशेषमें नहीं होता है। इसलिए शब्द [रूप निमित्त] का [नियतनिमित्तत्वं] विशेषके साथ सङ्गेत जबतक न माना जाय तबतक [उससे नमित्तिक ] विशेष अर्थकी प्रतीति ही कैसे हो सकती है [ अर्थात् नहीं हो सकती है]। इसलिए नैमित्तिक [कार्य] के अनुसार निमित्त [कारण ] की कल्पना की जाती है यह कहना अविवेकपूर्ण है। भट्टलोल्लटका पूर्वपक्ष भरतनाटयसूत्रोंके व्याख्याकार भट्टलोल्लट भी कुमारिलभट्टके अनुयायी मीमांसक थे इसलिए वे भी व्यञ्जनावृत्तिको नहीं मानते थे। उनका कहना यह है जैसे एक ही बार छोड़ा हुआ बाण पहिले शत्रुके कवचका भेदन करता है, फिर उसके वक्षःस्थलका विदारण करता है और फिर उसके प्राणोंका विमोचन करता है, उसी प्रकार एक ही बार उच्चारण किया हुआ शब्द एक ही व्यापारसे पहिले वाच्य, फिर लक्ष्य और व्यङ्गय कहे जानेवाले तीनों अरथोंका बोधक हो सकता है। इसके लिए शब्दमें अलग- अलग अनेक शक्तियोंको माननेकी आवश्यकता नहीं है। व्यङ्गय कहे जानेवाले अर्थकी प्रतीति अभिधा द्वारा हो सकती है। इसी मतके समर्थनमें भट्टलोल्लटने दूसरी युक्ति यह दी है कि 'यत्परः शन्दः स शब्दार्थः' अर्थात् जिस अरथके बोधन करानेके लिए शब्दका प्रयोग किया जाता है वही उस शब्दका अर्थ होता है। इसलिए जहाँ केवल वाच्यार्थके बोधनके लिए शब्दका प्रयोग किया गया है वहाँ उतना ही उसका अर्थ होगा और जहाँ उसके अतिरिक्त लक्ष्य या व्यङ्गय कहे जानेवाले अन्य अर्थके बोधनके लिए शब्दका प्रयोग किया गया है यहाँ वह अन्यार्थ ही उस शब्दका वाच्यार्थ होगा'रस प्रकार सभी अर्थ अभिधा द्वारा उपस्थित हो सकते हैं। इसलिए
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ये त्वभिदधति 'सोऽ्यमिषोरिव दीर्घदीर्घतरो व्यापारः' इति 'यत्पर: शब्दः स शब्दार्थ:' इति विधिरेवात्र वाच्य इति, तेऽप्यतात्पर्यज्ञास्तात्पर्यवाचोयुक्तेर्देवानांप्रियाः । किसी भी अर्थके बोधनके लिए व्यञ्जना आदिके माननेकी आवश्यकता नहीं है। भट्टलोल्लटके इसी मतको ग्रन्थकार अगली पंक्तिमें लिखते हैं कि- और जो [भट्टलोल्लट आदि] यह कहते हैं कि [ व्यङ्गचार्थके बोधनमें ] यह बाणके [ १. कवच- छेदन, २. उरोविदारण और ३. प्राणविमोचनरूप व्यापारके] समान [आवश्यकतानुसार लम्बा खिंचकर वाच्य, लक्ष्य, व्यङ्गच कहे जाने वाले सभी अर्थोंका बोध करानेवाला ] दीर्घ-दीर्घतर [अभिधा] व्यापार ही है [ इसलिए व्यञ्जनाका मानना व्यर्थ है ] और जिस अभिप्रायसे शब्द [बोला गया] है वही उसका अर्थ है इसलिए यहाँ [निःशेषच्युतचन्दनं स्तनतटम् इत्यादिमें निषेधसे ] विधिरूप अर्थ ही वाच्य है [ अतएव उसके बोधनके लिए भी व्यञ्जनाके माननेकी आवश्यकता नहीं ]।
भट्टलोल्लटके मतका खण्डन यह भट्टलोल्लटका पूर्वपक्ष हुआ। इसका खण्डन करते हुए ग्रन्थकार लिखते हैं कि- [जो लोग यह बात कहते हैं ] वे मूर्ख भी तात्पर्यबोधक युक्ति [अर्थात् 'यत्पर: शब्दः स शब्दार्थः' इस युक्ति] के तात्पर्यको नहीं समझते हैं [ इसलिए ऐसा कहते हैं ]। इस पंक्तिमें ग्रन्थकारने भट्टलोल्लटके मतका खण्डन करते हुए केवल इतना लिख दिया है कि वे भट्टलोल्लटादि 'तात्पर्यवाचो युक्तिके' अभिप्रायको नहीं समझते हैं। क्यों नहीं समझते हैं इसका उपपादन आागे करेंगे। पंक्तियाँ कठिन हैं इसलिए पहिले उनका भाव समझ लेना ठीक होगा। व्यञ्जना- विरोधी भट्टलोल्लटादिने 'यत्पर: शब्दः स शब्दार्थः' इस तात्पर्यवाचो-युक्तिका यह अभिप्राय निकाला है कि लक्ष्य-व्यङ्गय सब अरथोंको वाच्यार्थ ही मान लेना चाहिये, पर इसका यह अभिप्राय नहीं है। इसका अभिप्राय यह है कि 'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः' जैसे वैदिक वाक्योंमें कहीं केवल होमक्रियाका विधान अभिप्रेत होता है, कहीं 'दघ्ना जहोति' जैसे वाक्योंमें होमके पूर्व वाक्यसे प्राप्त होनेके कारण केवल दधि- रूप साधनद्रव्यका विधान अभिप्रेत होता है, कहीं 'सोमेन यजेत' जैसे वाक्योंमें सोम और याग, दोनोंके अप्राप्त होनेसे दोनोंका विधान अभिप्रेत होता है, कहीं 'लोहितोष्णीषा ऋत्विजः प्रचरन्ति' जैसे वाक्योंमें केवल लोहितत्वका विधान अभिप्रेत होता है। इस प्रकार वैदिक विधिवाक्योंमें जहँ जितना अंश प्रमाणान्तरसे अप्राप्त होता है, उतने ही अंशका विधान अभिप्रेत होता है। जैसे अग्नि दग्धका दहन नहीं करता है, अदग्धका ही दहन करता है, उसी प्रकार वैदिक विधिवाक्य प्राप्तका प्रापण, ज्ञातका ज्ञापन नहीं करते हैं, अप्राप्तका ही विधान करते हैं। इस स्थितिमें जिस अप्राप्त अंशके बोधनमें विधिवाक्यका तात्पर्य होता है वही उस विधि-वाक्य- का विधेय या प्रतिपाद्य अर्थ होता है, यह 'यत्पर: शब्दः स शब्दार्थः' इस वाक्यका अर्थ है। लक्ष्यार्थ और व्य ङ्गयार्थ सब, शब्दका वाच्यार्थ ही होता है यह इस वाक्यका तात्पर्य नहीं है। यदि यही तात्पर्य होता तो कुमारिलभट्ट लक्षणावृत्तिको क्यों मानते ? इसलिए भट्टलोल्लट आदि जो लोग 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थ इस तात्पर्यवाचोयुक्तिके आधारपर व्यङ्गयार्थको वाच्यार्थ सिद्ध करना चाहते हैं व्रे उसके अभिप्रायको नहीं समझते हैं. स्वयं अपने शास्त्रके ही वचनोंका ठीक भाव न समझनेके कारण उनको 'मूर्ख' ही कहना चाहिये, इस अभिप्रायसे उनको 'देवानांप्रिय' अर्थात् मूर्ख कहा गया है।
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मूर्ख अर्थमें 'देवानांप्रिय' का प्रयोग इस वाक्यमें ग्रन्थकारने भट्टलोल्लट आदिके लिए 'देवानांप्रियः' इस विशेषणका प्रयोग किया है 'देवानांप्रिय इति च मूखे' इस वार्तिकके अनुसार यद्यपि संस्कृत-साहित्यमें यह शब्द मूर्ख अर्थमें रूढ़ हो गया है, परन्तु वह सदासे इस गहित अर्थका बोधक नहीं रहा है, उसके पीछे एक इतिहास है। 'देवा- नांप्रियः'का सीधा अर्थ 'देवताओंका प्रिय' है, इसी सुन्दर अर्थके कारण बौद्धमतानुयायी सम्राट् अशोकने अपने नामके आगे उपाधिरूपसे इसका प्रयोग प्रारम्भ किया था। पर बादमें धार्मिक विद्वेषवश इस शब्दका प्रयोग मूर्ख अर्थमें किया जाने लगा। 'देवानांप्रिय इति च मूर्खे' लिखकर वार्तिककारने उस शब्दको मूर्ख अर्थमें रूढ कर दिया है। अशोकका समय विक्रमपूर्व चतुर्थ शताब्दीमें है और वार्तिककार कात्यायनका समय विकरमपूर्व तृतीय शताब्दीमें पड़ता है। इसी प्रकारकी दशा 'असुर' शब्दकी भी हुई है। 'असुर' शब्द ऋग्वेदमें परमात्माके नाम या विशेषणके रूपमें अ्र्प्रनेक स्थानोंपर प्रयुक्त हुआ है। वैदिक धर्मसे निकली हुई आयोंकी दूसरी शाखा पारसी धर्मके नामसे कही जाती है, उसके धर्मग्रन्थोंमें परमात्माको 'महान् असुर' 'अहुरमज्द' नामसे कहा गया है। परन्तु बादमें इस शब्दका प्रयोग कुत्सित अर्थमें पाया जाता है। संस्कृत साहित्य के बहुत बड़े भागमें 'असुर' शब्द राक्षस अर्थका वाचक हो गया है। कुछ विद्वानोंका विचार है कि 'असुर' शब्दके इस अर्थ- भेदका कारण धार्मिक विद्वेष ही है। 'भूतं भव्याय' पिछली पंक्तियोंमें यह कहा गया था कि भट्टलोल्लट आदिने 'तात्पर्यवाचोयुक्ति'का अभिप्राय ठीक नहीं समझा है। तब उसका क्या ठीक अर्थ है इसको बतलानेका भार ग्रन्थकारपर आ जाता है। इसी दृष्टिसे ग्रन्थकार अगली पंवितयोंमें उसके ठीक अभिप्रायका प्रदर्शन करेंगे। इस प्रकरणमें ही 'यत्पर: शब्दः स शब्दार्थः' तथा 'भूतं भव्यायोपदिश्यते' इत्यादि दो विशेष वाक्य ग्रन्थकारने उद्धृत किये हैं। ये दोनों कठिन वाक्य हैं। इनका ठीक अर्थ समझे बिना अगली पंक्तियोंका भाव ठीक समझमें नहीं आयेगा इसलिए पहिले उनका अर्थ समझ लेना आवश्यक है। 'भूतभव्यसमुच्चारणे भूतं भव्यायो- पदिश्यते' यह वाक्य उनमेंसे दूसरा वाक्य है। 'आ्म्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम्।' [मीमांसा १-१-२१] तथा 'दृष्टो हि तस्यार्थ: कर्मावबोधनम्' [ मीमांसा १-१-२२] आदि मीमांसासूत्रोंके अनुसार सारा वेदभाग क्रियार्थक ही है। जो क्रियार्थक नहीं है वह अनर्थक हो जाता है। इसलिए वेदमें वणित 'यूप', 'आहवनीय' आदि अक्रियारूप सिद्ध पदार्थोंकी आनर्थक्यसे रक्षाके लिए किसी विधि- वाक्य या निषेधवाक्यके साथ एकवाक्यता द्वारा उनको क्रियाका अङ्ग बनाया जाता है। इसी बातको व्यक्त करनेवाला 'भूतं भव्यायोपदिश्यते' यह मीमांसाका दूसरा प्रसिद्ध वाक्य है जिसे यहाँ ग्रन्थकारने उद्धृत किया है। इसका अभिप्राय यह है कि 'भूत' अर्थात् सिद्धरूप या अत्रियारूप तथा 'भव्य' अर्थात साध्य या क्रियारूप दोनों प्रकारके अरथोंके ['समुच्चारणे' अर्थात् वाक्यमें एक साथ बोले जानेपर या साथ- साथ प्रतिपादन किये जानेपर उन दोनोंमेंसे 'भूत' अरथात् सिद्ध पदार्थ, 'भव्याय' अरथथात् साध्य क्रियाके लिए अर्थात् क्रियाके अङ्गरूपमें उपदिष्ट होता है। इसलिए क्रियाभाग या विधिनिषेधके प्रधान होनेसे विधिवाक्यमें सिद्धपदार्थका कथन होनेपर भी क्रियारूप विधि अंशकी ही प्रधानता होती है। यह 'यत्पर: शब्द: स शब्दार्थ:' और 'भूतं भव्याय उपदिश्यते' आदि मीमांसवाक्योंका अरथ है। इसको और अधिक स्पष्टरूपसे समझनेके लिए वाक्यरचनाके नियमपर दृष्टि डाल लेना
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सुविधाजनक होगा। लौकिक वाक्योंकी रचना 'उद्देश्य' और 'विधेय' दो भागोंको मिलाकर होती है। प्रत्येक वाक्यमें एक कर्ता और एक किया अवश्य होती है। 'राम श्याम आदि कोई सुबन्त पद वाक्यमें कर्ताके रूपमें प्रयुक्त होता है और 'गच्छति', 'पठति' आदि कोई तिड़न्त पद क्रियारूपमें प्रयुक्त होता है। वाक्यमें आये हुए कर्तृपदको 'उद्देश्य' और क्रियापदको 'विधेय' कहा जाता है और वाक्यमें विधेयांशका ही सदा प्राधान्य रहता है। यह लौकिक वाक्योंकी स्थिति है। वैदिक वाक्योंमें भी सदा त्रियाभागका ही प्राधान्य रहता है। यह बात 'आम्नायस्य क्रिया- र्थत्वात्' आदि मीमांसासूत्रमें कही गयी है। इसीका प्रतिपादन यहाँ 'भूतं भव्याय उपदिश्यते' इत्यादि वाक्यमें किया गया है। निरुक्तकार यास्कने भी 'भावप्रधानमाख्यातम्। सत्त्वप्रधानानि नामानि। तद्यत्न उभे भावप्रधाने भवतः' लिखकर इसी नियमकी पुष्टि की है। 'आख्यात' अर्थात् तिडन्तपद में 'भाव' अर्थात् क्रियाका प्राधान्य होता है। उसी धातुसे बने 'नाम' पदमें द्रव्यका प्राधान्य होता है। और वाक्यमें जहाँ नाम और आख्यात दोनों होते हैं वहाँ 'भाव' अर्थात् कियाका प्राधान्य होता है। यह 'निरुक्त'के इस उद्धरणका अभिप्राय है। यही मीमांसाके 'भृतं भव्याय उपदिश्यते' आदि वाक्यका अभिप्राय है। 'लोहितोष्णोषाः' इसी अनुच्छेदमें 'लोहितोष्णीषा ऋत्विजः प्रचरन्ति' यह दूसरा विधिवाक्य ध्यान देने योग्य है। यह वाक्य कर्मकाण्डके ग्रन्थोंमें 'श्येनयाग'के प्रकरणमें आया है। 'श्येनयाग' एक 'विकृतियाग' है। 'ज्योतिष्टोमयाग' उसका 'प्रकृतियाग' है। 'यत्र समग्राङ्गोपदेशः सा प्रकृतिः' जिस यागमें समस्त अ्ङ्गोंका वर्णन किया गया हो वह 'प्रकृतियाग' होता है, उसे प्रधानयाग भी कह सकते हैं। प्रकृतियागके साथ अ्नेक 'विकृतियाग' भी वणित होते हैं। उनमें सारे विधिविधानोंका वर्णन नहीं किया जाता, केवल विशेष-विशेष नवीन अङ्गोंका वर्णन किया जाता है। शेष सारी प्रक्रिया 'प्रकृतिवद् विकृतिः कर्तव्या' इस नियमके अनुसार 'प्रकृतियाग' के समान ही की जाती है। 'लोहितोष्णीषा ऋत्विज: प्रचरन्ति' यह वाक्य 'ज्योतिष्टोमयाग'के विकृतिभूत'में आया है। उसमें साधारणतः ऋत्विक-प्रचरणका विधान प्रतीत होता है। परन्त 'ज्योतिष्टोम' रूप प्रकृतियाग'में भी इसी आशयका 'सोष्णीषा विनीतवसना ऋत्विज: प्रचरन्ति' इस वाक्यके द्वारा ऋत्विक्-प्रचरणका विधान किया हुआ है। 'श्येनयाग'में 'प्रकृतिवद् विकृतिः कर्तव्या' इस नियमके अनुसार ऋत्विक-प्रचरण स्वयं प्राप्त हो जाता है। वहाँ उसका दुबारा विधान करनेकी आवश्यकता नहीं है। इसी प्रकार 'उष्णीष' अर्थात् 'पगड़ी'का विधान भी ज्योतिष्टोमयागवाले वाक्यमें आये हुए 'सोष्णीषाः' पदसे किया जा चुका है। विकृतियागमें उसके भी विधानकी आवश्यकता नहीं है। अतः विकृतिभूत 'श्येनयाग' में जो यह 'लोहितोष्णीषा ऋत्विजः प्रचरन्ति' वाक्य आया है उसमें न तो ऋत्विक-प्रचरणका विधान अभिप्रेत है और न 'उष्णीष'का। केवल उष्णीषके 'लौहित्य' [लाल रङ्ग ] का विधान अभिप्रेत है। अर्थात् 'श्येनयाग' में ऋत्विजोंके उष्णीष लाल रङ्गके होने चाहिये। उतना ही उस वाक्यका अभिप्राय है। 'यत्पर: शब्दः स शब्दार्थः' यह वाक्य इसी अर्थको सूचित करता है। इसीलिए ग्रन्थकारने 'यत्पर: शब्दः स शब्दार्थ' इस 'तात्पर्यवाचोयुक्ति'का अरथ स्पष्ट करते हुए इस वाक्यको यहाँ उद्धत किया है। इसी बातको ग्रन्थकार आगे इस प्रकार कहते हैं-
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तथा हि-भूतभव्यसमुच्चारणे भूतं भव्यायोपदिश्यते इति कारकपदार्थाः क्रिया- पदार्थेनान्वीयमाना: प्रधानक्रियानिर्वर्त्तकस्वत्रियाभिसम्बन्धात् साध्यायमानतां प्राप्नुवन्ति। ततश्चादग्धदहनन्यायेन यावदप्राप्तं तावद्विधीयते। यथा ऋत्विकप्रचरणे प्रमाणान्तरा- तिसिद्धे 'लोहितोष्णीषा ऋत्विजः प्रचरन्ति' इत्यत्र लोहितोष्णीषत्वमात्रं विधेयम्। हवनस्यान्यतः सिद्धेः 'दध्ना जुहोति' इत्यादौ दध्यादेः करणत्वमात्रं विधेयम् ।
जैसे कि -- [भूत ] सिद्ध और [भव्य करियारूप ] साध्यके साथ-साथ पठित होनेपर सिद्धपदार्थ क्रियाके लिए [क्रियाके अङ्गरूपमें ] कहा जाता है। इस नियमके अनुसार क्रियापदार्थके साथ अन्वित होनेवाले कारकपदार्थ [कर्ता, कर्म, करण आदिरूप सिद्ध द्रव्य प्रधान क्रियाके अङ्ग होनेके कारण] प्रधान क्रियाकी सम्पादक अपनी [अङ्गभूत ] क्रियाके सम्बन्धसे साध्य-जैसे हो जाते हैं। इसलिए अदग्धदहन- न्यायसे [अर्थात् जैसे काष्ठ आदिमें जितना भाग बिना जला होता है अग्नि उतने ही भागको जलाता है, जले हुएको नहीं जलाता है, इस युक्तिसे विधिवाक्योंमें ] जितना [भाग प्रमाणान्तरसे ] अप्राप्त होता है उतनेका ही विधान किया जाता है। जैसे [लोहितोष्णीषा ऋत्विजः प्रचरन्ति ] 'लाल पगड़ीवाले ऋत्विक घूमते हैं' इसमें ऋत्विक् प्रचरणके प्रमाणान्तरसे सिद्ध होनेके कारण 'लोहितोष्णीषत्वमात्र' [अर्थात् उष्णीषके भी केवल लौहित्य ] का विधान किया जाता है और 'दध्ना जुहोति' इत्यादि [विधि]में होमके अन्य प्रमाणसे सिद्ध होनेसे दध्यादिके करणत्वमात्रका विधान किया जाता है। 'लोहितोष्णीषाः' वाले वाक्यके समान दूसरा 'दघ्ना जुहोति' वाक्य भी यहाँ ग्रन्थकारने उद्धृत किया है। यह वाक्य अग्निहोत्रके प्रकरणमें आया है। 'अग्निहोत्रं जुहोति' यह इस प्रकरणका उत्पत्ति- वाक्य है। उसमें 'होम' का विधान किया हुआ है। अतः 'दघ्ना जुहोति' वाक्यमें केवल दधिरूप करण या साधनका विधान है, होमका नहीं। यह इस वाक्यका अभिप्राय है। यह बात 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थ:' इस नियमके अनुसार निकलती है। इसलिए 'तात्पर्यवाचोयुक्ति'की व्याख्या ग्रन्थकारने इस वाक्यमें भी प्रस्तुत की है।
द्रव्यकी गौणसाध्यता इसी अनुच्छेदमें 'कारकपदार्थाः कियापदार्थेनान्वीयमानाः'के साथ दिया हुआ 'प्रधानक्रियानिर्वर्त- कस्वक्रियाभिसम्बन्धात् साध्यायमानतां प्राप्नुवन्ति' यह अंश भं। कुछ व्याख्याकी अपेक्षा रखता है। द्रव्य सिद्ध पदार्थ होता है, साध्य नहीं। किन्तु कभी-कभी वह भी साध्य-जैसा प्रतीत होता है। द्रव्यकी यह साध्यता केवल गौणसाध्यता ही होती है। 'घटमानय'में आनयन अर्थात् 'समीपदेशसंयोग' प्रधान किया है। उसकी निर्वर्तक अर्थात् हेतुभूत, घटकी 'स्पन्द' किया है। उसकी दृष्टिसे घट साध्य होता है। जब घटका आनयन होता है तब सबसे पहिले 'नोदनादभिघाताद्वा कर्मोत्पद्यते' घटमें कर्म होता है। उस कर्मसे विभाग और विभागसे पूर्वदेशसंयोगका नाश होकर उत्तरदेशसंयोग होता है। इसमें घटमें विभागको उत्पन्न करनेवाला जो कर्म है वह अप्रधान करिया है। उसीको 'स्पन्द' कहा जाता है। घट स्वरूपत: सिद्ध है किन्तु स्पन्दाश्रयत्वेन पूर्णसिद्ध नहीं है। घटमें 'नोदन' अरथात् ज्ञानपूर्वक की हुई क्रिया अथवा 'अभिघात' अर्थात् टक्कर आदिसे उत्पन्न क्रियाके होनेपर वह 'स्पन्द'का आश्रय बनता है। इस प्रकार घट स्वरूपतः सिद्ध रहनेपर भी उस 'नोदन' या 'अभिघात' रूप क्रिया द्वारा 'स्पन्दाश्रयत्वेन' साध्य होता है। इसी बातको यहाँ प्रधान क्रिया [आनयन]की निर्वर्तक [हेतुभूत] स्वक्रिया [नोदन
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२३४ काव्यप्रकाशः [का० ४७, सू० ६६ क्वचिदुभयविधिः, क्वचित् त्रिविधिरपि यथा रक्तं पटं वय' इत्यादौ एकविधिद्वि- विधिस्त्रिविधिर्वा। ततशच यदेव विधेयं तत्रैव तात्पर्यमित्युपात्तस्यैव शब्दस्यार्थे तात्पर्य न तु प्रतीतमात्रे। एवं हि 'पूर्वो धावति' इत्यादावपराद्यर्थेऽपि क्वचित्तात्पर्य स्यात्।
या अभिघातजन्य स्पन्द ] के सम्बन्धसे घट आदि सिद्ध पदार्थ साध्य-जैसे प्रतीत होते हैं, इस वाक्यसे कहा है। इस वाक्यको यहाँ देनेका अभिप्राय यह है कि भूत पदार्थ कभी मुख्य-साध्य नहीं होते हैं। उनमें जो साध्यता प्रतीत होती है वह गौण है। मुख्यरूपसे करिया ही साध्य होती है। इसलिए लौकिक- वैदिक दोनों प्रकारके वाक्योंमें क्रियाभागकी ही प्रधानता होती है। कहीं दोका विधान भी होता है[ जैसे, 'सोमेन यजेत्' यहाँ सोम और याग दोनोंके अप्राप्त होनेसे दोनोंका विधान होता है]। कहीं तीनका भी विधान होता है। जैसे, 'रवतं पटं वय' 'लाल कपड़ा बुनो'; यहाँ आवश्यकताके अनुसार कभी केवल [बुनने ] एकका विधान अथवा [कभी पट और वयन ] दोका, अथवा [कभी रक्त, पट और वयन ] तीनका भी विधान हो सकता है। इसलिए [ जहाँ] जो विधेय होता है [ वहाँ ] उसमें ही तात्पर्य होता है [ यह 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थ:' का अभिप्राय है]। इसलिए जो शब्द [वाक्यमें] उपात्त [पठित या श्रुत] है उसके ही अर्थमें [ वाक्यका] तात्पर्य हो सकता है, न कि शब्दके उपात्त न होनेपर भी किसी प्रकारसे प्रतीत होनेवाले अर्थमाल में। [यदि वाचक शब्दका ग्रहण किये बिना किसी प्रकारसे प्रतीत होनेवाले अर्थमात्रमें तात्पर्य माना जाय तो ] इस प्रकार 'पूर्वो धावति' पहिला [घोड़ा या आदमी ] दौड़ता है इत्यादिमें [ पहिले शब्दके सापेक्ष होनेसे उसके साथ ही 'दूसरा' यह अर्थ भी प्रतीत हो सकता है और यदि प्रतीतमात्रमें तात्पर्य माना जाय तो यहाँ 'पूर्व' पदका] कहीं 'अपर' आदि अर्थमें भी तात्पर्य होने लगेगा [अर्थात् 'पूर्वो धावति' का 'अपरो धावति' यह तात्पर्य भी हो जायगा ]। उपात्त शब्दके अर्थमें ही तात्पर्य : व्यञ्जनावादी पक्ष इस प्रकार मीमांसकोंने 'यत्पर: शब्दः स शब्दार्थः' इस वाक्यका यह अर्थ निर्णय किया है कि सिद्ध पदार्थोंका विधान अनर्थक होनेसे मुख्यरूपसे साध्यभूत क्रियांशका ही विधान किया जाता है। जहाँ कहीं यागादि करिया अन्य प्रमाणोंसे सिद्ध होती है वहाँ उनके उद्देश्यसे दधि आदि द्रव्योंका भी विधान किया जाता है। किन्तु प्रत्येक दशामें जो विधेय होता है उसीमें वाक्यके अन्य पदोंका तात्पर्य होता है। परन्तु जिस अर्थमें तात्पर्य होता है उसका वाचक शब्द वाक्यमें अवश्य उपात्त होता है। इसका फलितार्थ यह निकला कि वाक्यमें उपात्त किसी एक शब्दके अर्थमें ही वाक्यके अन्य पदोंका तात्पर्य होता है। शब्दतः अनुपात्त अरथमें तात्पर्य नहीं होता है। व्य ङ्गयार्थका वाचक कोई शब्द वाक्यमें उपात्त नहीं होता। इसलिए 'यत्पर: शब्दः स शब्दार्थः' यह नियम उसपर लागू नहीं होता है। अतः व्यङ्गयार्थकी प्रतीति अभिधासे सम्भव न होनेसे उसकी प्रतीतिके लिए व्यञ्जनावृत्ति माननी ही होगी। भट्टलोल्लट आदिने 'यत्पर: शब्दः स शब्दार्थः' का नियम लगाकर उसे अभिधाका विषय माननेका जो यत्न किया है वह युक्तिसङ्गत नहीं है और न यह मीमांसकोंके सिद्धान्तोंके अनुकूल ही है। उन्होंने इस विषयमें जिस नीतिका अवलम्बन किया है उ ससे यह प्रतीत होता है कि वे अपने शास्त्रके रहस्यको भी नहीं समझते हैं। इसीलिए उन्हें 'देवानांप्रियः की उपाधि प्राप्त हुई है; इसी बातको व्यञ्जनावादीकी ओरसे ऊपर लिखा गया है। इसलिए जो शब्द वाक्यमें आये हैं उनमेंसे ही किसीके अर्थमें वाक्यका तात्पर्य हो सकता है।
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यत्तु 'विषं भक्षय मा चास्य गृहे भुङक्थाः' इत्यत्र 'एतद्गृहे न भोक्तव्यम्' इत्यत्र तात्पर्यमिति स एव वाक्यार्थ इत्युच्यते। तत्र चकार एकवाक्यतासूचनार्थः । जो शब्द वाक्यमें आया ही नहीं है उसके अर्थमें तात्पर्य नहीं हो सकता। व्यञ्जनावादी जिस अर्थको व्यङ्गय कहना चाहते हैं उसका वाचक कोई शब्द वाक्यमें उपात्त न होनेसे उसमें तात्पर्य नहीं हो सकता है। इसलिए 'यत्पर: शब्दः स शब्दार्थ:' इस युक्तिके आधारपर भट्टलोल्लट जो व्यङ्गयार्थको तात्पर्य- विषय मानकर वाच्यार्थ कहना चाहते हैं वह युक्तिसङ्गत नहीं है। 'यत्पर: शब्दः स शब्दार्थः' इस वाक्यका ठीक अरथ न समझनेके कारण ही भट्टलोल्लट उसको वाच्यार्थ कह रहे हैं।
'विषं भक्षय'में तात्पर्यनिर्णय व्यञ्जनाविरोधी पूर्वपक्ष-इस प्रकार ग्रन्थकारने यहाँतक यह सिद्ध किया है कि 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थ:' इस नियमके अनुसार उसी अर्थमें तात्पर्य माना जा सकता है जिसका वाचक कोई शब्द वाक्यमें उपात्त हो। जिसका वाचक कोई शब्द वाक्यमें उपात्त नहीं है और अन्य किसी प्रकारसे जिस अर्थकी प्रतीतिमात्र हो जाती है उसमें यह तात्पर्यनिर्णायक नियम नहीं लगता है। अन्यथा 'पूर्वो धावति'का कभी 'अपर' अर्थमें भी तात्पर्य होने लगेगा। इसपर पूर्वपक्षी अर्थात् मीमांसक भट्टलोल्लटकी ओरसे यह शङ्का हो सकती है कि यदि वाक्या- न्तर्गत उपात्त शब्दोंके अर्थमें ही वाक्यका तात्पर्य हो सकत। है तो 'विष भले ही खा ले पर इसके घरमें भोजन मत कर' यहाँ शत्रुके घरमें भोजन करना विषभक्षणसे भी बुरा है इसलिए 'इसके घर भोजन नहीं करना चाहिये' इसमें तात्पर्य है, और वही वाक्यका अर्थ है। परन्तु उस अथका वाचक कोई शब्द वाक्यमें उपात्त नहीं है। तब व्यञ्जनावादीकी यह बात कैसे मानी जा सकती है कि उपात्त शब्दके अर्थमें ही तात्पर्य होता है। इस शङ्काको उठाकर ग्रन्थकानने आगे उसका समाधान किया है। अगली पंक्तिमें इसी पूर्वपक्षको इस प्रकार दिया है- और जो 'विष [भले ही ] खा लेना पर इसके घरमें भोजन मत करना' यहाँ ['विषं भक्षय' आदि वाक्यका] 'इसके घर भोजन नहीं करना चाहिये' इस [अर्थ ] में तात्पर्य होता है। और यही यहाँ वाक्यार्थ कहलाता है [ परन्तु इसका कोई बाचक शब्द 'विषं भक्षय' आदि वाक्य में उपात्त नहीं है। तब यह अर्थ कैसे हो गया ? व्यञ्जनावादी सिद्धान्तपक्ष-व्यञ्जनाविरोधी भट्टलोल्लटकी इस आपत्तिका उत्तर ग्रन्थकारने 'विषं भक्षय, मा चास्य गृहे भुङक्थाः' इन दो वाक्योंकी एकवाक्यता मानकर कह दिया है कि यहाँ 'विषं भक्षय' इस वाक्यका जो तात्पर्य है वह 'मा चास्य गृहे भुङक्थाः' इस उपात्त शब्दके अर्थमें ही है। अनुपात्त शब्दके अरथमें नहीं है। इसी बातको अगली पंक्तिमें इस प्रकार लिखा है- उस ['विषं भक्षय, मा चास्य गृहे भुङक्थाः' आदि उदाहरण ] में [ 'मा चास्य' के साथ प्रयुक्त ] 'चकार' [दोनों वाक्योंकी ] एकवाक्यताके सूचनार्थ है। इसका अभिप्राय यह हु है कि चकारसे सूचित एकवाक्यताके आधारपर जब इन दोनों वाक्योंको एकवाक्य मान लिया जाता है तब उसके प्रथम भाग 'विषं भक्षय'का जो यह तात्पर्य निकलता है कि शत्रुके गृहमें भोजन करना विषभक्षणसे भी बुरा होता है इसलिए 'इसके घरमें मत खाओ', यह, उपात्त शब्दके अर्थमें ही होता है, अनुपात्त शब्दके अर्थमें नहीं।
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विषभक्षणवाक्यस्य सुहृद्वाक्यत्वेनाङ्गता कल्पनीयेति 'विषभक्षणादपि दुष्टमेतद्गृहे भोजनमिति सर्वथा मास्य गृहे भुङवथाः' इत्युपात्तशब्दार्थे एव तात्पर्यम् । व्यञ्जनाविरोधी पूर्वपक्ष-व्यञ्जनावादी पक्षने जो यह समाधान किया है वह उक्त दोनों वाक्योंकी एकवाक्यता मानकर किया है। परन्तु व्यञ्जनाविरोधी पक्षका यह कहना है कि 'एकतिङ वाक्यम्' इस नियमके अनुसार एक-एक तिङन्त पदसे युक्त होनेसे ये दोनों स्वतन्त्र वाक्य हैं, उनकी एकवाक्यता ही नहीं बनती है। जैसे 'गृणानां च परार्थत्व।दसम्बन्धः' अर्थात् दो या अधिक गौण पदार्थ परस्पर सम्बद्ध न होकर किसी प्रधानके साथ ही सम्बद्ध होते हैं। इसी प्रकार दो प्रधान अरथोंका भी परस्पर अङ्गाङ्गिभावसम्बन्ध नहीं हो सकता है। इसलिए इन दोनों वाक्योंकी एकवाक्यता सम्भव न होनेसे उस एकवाक्यताके आधारपर जो विषभक्षणवाक्यका उपात्त शब्दके अर्थमें तात्पर्य दिखलानेका यत्न किया था वह भी असङ्गत है। इसी बातको ग्रन्थकी अगली एक पंक्तिमें इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है- दो तिङन्त [क्रियापदोंसे घटित] वाक्योंमें [दोनोंके प्रधान स्वतन्त्र वाक्य होनेसे] अङ्ग- अङ्गिभाव नहीं हो सकता है [ इसलिए यहाँ दोनों वाक्योंकी जो एकवाक्यता न्यञ्जनावादी सिद्ध करना चाहता है वह नहीं बन सकती है ]। जिसमें एक तिङन्त या क्रियापद हो उसको एक वाक्य कहते हैं। इस दृष्टिसे इस वाक्यमें 'भक्षय' औपरौर 'भङक्थाः' दो त्रियापद होनेसे इनको एक वाक्य नहीं अपितु दो वाक्य कहना होगा, इसलिए यहाँ इन दोनों वाक्योंका अङ्गाङ्गिभावसम्बन्ध असम्भव होनेसे दोनों मिलकर एक वाक्य नहीं बन सकता है, फलतः 'मा चास्य' में आया हुआ्र्रा 'चकार' इन दोनोंकी एकवाक्यताका सूचक नहीं है। इस प्रकार इनमें तात्पर्य नहीं है। यह पूर्वपक्षीका कथन है। इस वाक्यमें उपात्त शब्दोंके अर्थमें तात्पर्य नहीं है। व्यञ्जनावादी सिद्धान्तपक्ष-व्यञ्जनाविरोधी भट्टलोल्लटादि द्वारा उठायी गयी इस शङ्काका समाधान ग्रन्थकारने यह किया है कि यहाँ 'विषं भक्षय' इसको यदि अलग वाक्य माना जाय तो इस वाक्यका अर्थ सर्वथा अनुपपन्न हो जाता है। यह वाक्य 'सुहृद्वाक्य' है। कोई मित्र अपने मित्रको विष खानेकी सलाह नहीं दे सकता है। इसलिए विषभक्षणका आदेश देनेवाला यह वाक्य यदि स्वयंमें पूर्ण वाक्य माना जाय तो उसका अर्थ सङ्गत नहीं होता है। इसलिए उसका 'मा चास्य गृहे भुङक्थाः' इस दूसरे वाक्यके साथ सम्बन्ध मानना आवश्यक हो जाता है। इसलिए विपभक्षणवाक्य स्वयं अनुपपन्नार्थ होनेके कारण दूसरे वाक्यका अङ्ग बन जाता है। अङ्गाङ्गिभावसम्बन्ध होनेसे दोनोंकी एकवाक्यता बन जाती है और एकवाक्यता हो जानेपर 'उपात्तस्यैव शव्दस्यार्थे तात्पर्यम्' इस नियमकी सङ्गति बन जाती है। व्यञ्जनावादीकी इसी युक्तिको ग्रन्थकारने अगली पंक्तिमें इस प्रकार प्रस्तृत किया है- विषभक्षणवाक्य [अर्थात् 'विषं भक्षय' इस वाक्य] के 'सुहृद्वाक्य' होनेके कारण [उसको स्वतन्त्र पूर्ण वाक्य माननेपर उसके मुख्यार्थके अनुपपन्न होनेसे लक्षणा द्वारा अगले वाक्यमें ] उसकी अङ्गताकी कल्पना करनी चाहिये। इस प्रकार 'इसके घरमें भोजन करना विषभक्षणसे भी अधिक बुरा है' इसलिए इसके घर बिलकुल भोजन नहीं करना चाहिये। यह [ 'विषं भक्षय' इस वाक्यका तात्पर्य होता है और वह 'मा चास्य गूहे भुददथाः' इस ] उपात्त शब्दके अर्थमें ही तात्पर्य है।
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का० ४७, सू० ६६] पञ्चम उल्लास: २३७ यदि च शब्दश्रुतेरनन्तरं यावानर्थो लभ्यते तावति शब्दस्याभिधैव व्यापारः, ततः कथं 'ब्राह्मण पुत्रस्ते जातः' 'ब्राह्मण कन्या ते गभिणी' इत्यादौ हर्षशोकादीनामपि न वाच्यत्वम् ? कस्माच्च लक्षणा ? लक्षणीयेऽप्यर्थे दीर्घदीर्घतराभिधाव्यापारेणैव प्रतीति- सिद्धेः । किमिति च श्रति-लिङ्ग-वाक्य-प्रकरण-स्थान-समाख्यानां पूर्वपूर्वबलीयस्त्वम् ? इत्यन्विताभिधानवादेऽपि विधेरपि सिद्धं व्यङ्गयत्वम्। इस प्रकार ग्रन्थकारने अपने व्यञ्जनावादी सिद्धान्तपक्षकी ओरसे यह सिद्ध किया कि 'यत्पर: शब्द: स शब्दार्थःके अनुसार जो तात्पर्यका निर्णय किया जाता है वह वाक्यमें उपात्त शब्दके अरथमें ही हो सकता है। वाक्यमें अनुपात्त शब्दके अर्थमें तात्पर्यका निश्चय नहीं हो सकता है। व्यङ्गचार्थके प्रतीतिस्थलमें जो व्यङ्गाचार्थ होता है उसका वाचक कोई पद वाक्यमें उपात्त नहीं होता है अतएव उस व्यङ्गयार्थको 'यत्पर: शब्दः स शब्दार्थः' इस सिद्धान्तके अनुसार तात्पर्यार्थ नहीं माना जा सकता है। इसलिए वह अभिधा द्वारा उपस्थित नहीं होता है। उसके लिए अलग व्यञ्जनावृत्तिका मानना अपरिहार्य है। व्यङ्गचार्थके बोधके लिए अभिधासे भिन्न और वत्ति माननी ही होगी इसका उपपादन करनेके लिए ग्रन्थकार औौर भी युक्ति आगे देते हैं। और यदि [ यह कहा जाय कि] शब्दके श्रवणके बाद जितना भी अर्थ प्रतीत होता है उस सबमें शब्दका केवल अभिधाव्यापार ही [कार्य करता ] है तो 'हे ब्राह्मण, तुम्हारे पुत्र उत्पन्न हुआ है', 'हे ब्राह्मण, तुम्हारी [अविवाहिता ] कन्या गर्भिणी हो गयी है' इत्यादि [वाक्यों]में [ उनके सुननेसे उत्पन्न होनेवाले कमशः ] हर्ष तथा शोकादिको भी वाच्य क्यों नहीं मानते हो ? और लक्षणाको भी क्यों मानते हो ? [ उसके माननेकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ] लक्षणीय अर्थमें भी [इच्छानुसार दूरतक खिंचनेवाले] दीर्घ-दीर्घतर अभिधाव्यापारसे ही [लक्ष्यार्थकी भी] प्रतीति सिद्ध हो जानेसे [ व्यञ्जनाके समान लक्षणाका मानना भी अनावश्यक है। भट्टलोल्लट आदि मीमांसक व्यञ्जना तो नहीं मानते है, परन्तु लक्षणा मानते हैं इसलिए उनपर यह आक्षेप किया गया है] और [आपके मीमांसादर्शनमें माने हुए] श्रुति-लिङ्ग-वाक्य-प्रकरण-स्थान-समाख्या [इन छः प्रमाणोंके समवाय ] में पूर्वपूर्वकी बलवत्ता क्यों मानी जाती है ? [अर्थात् यदि शब्द-श्रवणके बाद प्रतीत होनेवाले सभी अर्थोंकी प्रतीति अभिधासे ही हो जाती है तो न लक्षणाकी आवश्यकता रहती है और न श्रुति आदि प्रमाणोंकी प्रबलता-दुर्बलताका निश्चय हो सकता है] इसलिए अन्विताभिधानवादमें भी [ 'निःशेषच्युतचन्दनं' इत्यादि उदाहरणोंमें निषेधरूप वाच्यार्थसे प्रतीत होनेवाले ] विधिकी व्यङ्गचता सिद्ध होती है। बलाबलाधिकरण श्रुति, लिङ्ग आदि षट प्रमाणोंकी प्रबलता-दुर्बलताके जिस प्रसङ्गकी चर्चा यहाँ ग्रन्थकारने की है वह मीमांसादर्शनका एक प्रमुख सिद्धान्त है। उसका उपयोग बहुत जगह किया जाता है इसलिए उसको तनिक विस्तारसे समझ लेना उचित होगा। मीमांसाके इस प्रकरणको "बलावलाधिकरण' कहते हैं। उसका थोड़ा-सा विवेचन हम आगे दे रहे हैं। मीमांसादर्शनमें वेदको १. विधि, २. मन्त्र, ३. नामधेय, ४. निषेध और ५. अर्थवाद इन पाँच भागोंमें विभक्त किया गया है। इनमेंसे विधिके भी १. उत्पत्तिविधि, २. विनियोगविधि, ३. अधिकार-
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विधि, ४. प्रयोगविधि ये चार भेद किये गये हैं। इनमेंसे अ्ङ्ग और प्रधानके सम्बन्ध अर्थात् अङ्गादङगि- भावकी बोधक विधि 'विनियोगविधि' कहलाती है। इस विनियोगविधिके सहकारी १. श्रुति, २. लिङ्ग, ३. वाक्य, ४. प्रकरण, ५. स्थान और ६. समाख्या ये छः प्रमाण माने गये हैं। इनकी सहायतासे विनियोगविधि द्वारा प्रधान और अप्रधानके अङ्गाङ्गिभावका निर्णय होता है। परन्तु कहीं ऐसा भी हो सकता है कि इनमेंसे दो या अधिक प्रमाणोंके एक ही वाक्यमें प्रयोगका अवसर आ जाय और उनमेंसे एक प्रमाण किसीको प्रधान बतलाता हो और दूसरे प्रमाणके अनुसार किसी अन्यकी प्रधानता सिद्ध होती हो। तब अन्तमें निर्णय किस आधारपर किया जाय इसके लिए मीमांसादर्शनके तृतीयाध्यायके तृतीय पादमें चौदहवाँ सूत्र निम्नलिखित प्रकार लिखा गया है- श्रुति-लिङ्ग-वाक्य-प्रकरण-स्थान-समाख्यानां समवाये पारदौर्बल्यम्- अर्थविप्रकर्षात्। मीमांसादर्शन, ३-३-१४
इसका अभिप्राय यह है कि श्रुति, लिङ्ग आदि छः प्रमाणोंमेंसे यदि अ्नेक प्रमाणोंके एक स्थानपर इकट्ठ प्रवृत्त होने और उनमें विरोध होनेका अवसर आ जाय तो उनमेंसे उत्तर-उत्तरको दुर्बल और पूर्व-पूर्वको प्रबल समझना चाहिये। इसी आधारपर गुणप्रधानभावका निर्णय करना चाहिये। इसीका नाम 'बलाबलाधिकरण' है। १. श्रुतिप्रमाण इनमेंसे सबसे पहिला और सबसे अधिक प्रबल प्रमाण 'श्रति' है। 'श्रुति'का लक्षण 'निरपेक्षो रव: श्रुतिः' इस प्रकार किया गया है। अरथात् अपने अर्थके बोधन और प्रामाण्यके लिए किसी अन्यकी अपेक्षा न करनेवाला शब्दप्रमाण 'श्रुति' कहलाता है। इस श्रुतिप्रमाणके भी १. विधात्री, २. अभिधात्री और ३. विनियोक्त्री ये तीन भेद किये गये हैं। इनमेंसे लिडाद्यात्मिका श्रुतिको 'विधात्री श्रुति', 'ब्रीहि- भिर्यंजेत्' आदिको 'अभिधात्री श्रुति' और जिसके श्रवणमात्रसे सम्बन्धकी प्रतीति हो जाती है उसको 'विनियोक्त्री श्रुति' कहा जाता है। विनियोक्त्री श्रुतिके फिर, १. विभक्तिरूपा, २. एकाभिधानरूपा और ३. एकपदरूपा ये तीन भेद किये हैं। इनमेंसे 'ब्रीहीन् प्रोक्षति' में द्वितीया विभक्तिसे, 'व्रीहिभिर्यजे त्'में तृतीया विभक्तिसे, 'आहवनीये जुहोति' में सप्तमी विभक्तिसे, ब्रीहि तथा आहवनीय अग्निकी यागके प्रति अङ्गता बोधित होती है। ये विभक्तिश्रुतिके उदाहरण हैं। 'पशुना यजेत्' में 'आङो नाऽस्त्रियाम्' अष्टाध्यायीके इस सूत्रसे तृतीया विभक्तिके एकवचनमें 'टा' के स्थानपर अस्त्रीलिङ्ग अर्थात् पुल्लिङ्गमें 'ना' होकर 'पशुना' यह रूप बना है। इसलिए इस 'ना'से एकवचन तथा 'पुंस्त्व' दोनों सूचित होते हैं और उसीसे करणकारकका बोध होता है, अर्थात् तीनोंकी उपस्थिति एक ही प्रत्ययरूप अंशसे होती है। इसलिए पुंस्त्व तथा एकत्वकी कारकाङ्गताका निर्णय समानाभिधानश्रुतिसे होता है। इसी प्रकार 'यजेत्' में दो अ्रश हैं- एक प्रकृति- रूप 'यज' धातु और दूसरा प्रत्ययांश। प्रत्ययांशमें भी दो भाग हैं-एक साधारण आाख्यातत्वमात्र और दूसरा लिङत्वरूप विशेष भाग। इनमेंसे लिङगसे 'शाब्दी भावना' या प्रवर्तना बोधित होती है और आख्यातांशसे संख्या आदिका बोध होता है। उस संख्याका प्रकृतिभाग यज धातुसे बोधित यागके साथ अङ्गरूपसे अन्वय होता है। इसमें यागरूप एक अंश प्रकृतिसे और संख्यारूप दूसरा अंश प्रत्यय द्वारा बोधित होता है। प्रकृति तथा प्रत्यय मिलकर पद बन जाते हैं। इसलिए यह अन्वय एकपदरूपा श्रुतिसे होता है।
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यह 'श्रुति', लिङ्ग आदि उत्तरवर्ती प्रमाणोंकी अपेक्षा बलवती होती है, क्योंकि इसको अपने अर्थ या अङ्गप्रधानभावके बोधनमें किसी अन्यकी अपेक्षा नहीं होती है। यह तुरन्त अङ्गप्रधानभावका निर्णय कर देती है। 'लिङ्ग' आदि अन्य प्रमाण सीधे, निरपेक्षरूपसे अङ्गप्रधान-भावका निर्णय नहीं कर सकते हैं। उन्हें अपने समर्थनमें श्रुतिकी कल्पना करनी होती है। उससे निर्णय होनेमें बिलम्ब होता है। इसलिए अन्य सब प्रमाणोंकी अपेक्षा 'श्रुति' सबसे प्रबल प्रमाण है। श्रुतिकी प्रबलताके कारण ही 'ऐन्द्रया गार्हपत्यमुपतिष्ठते' इस वाक्यमें इन्द्रदेवतावाली 'एन्द्री' ऋचाका गार्हपत्याग्निकी स्तुतिमें विनियोग होता है। अन्यथा इन्द्रदेवताके लिङ्ग अर्थात् चिह्नसे युक्त होनेके कारण 'ऐन्द्री' ऋचासे इन्द्रकी ही स्तुति होनी चाहिये थी। २. लिङ्गप्रमाण दूसरा प्रमाण 'लिङ्ग' है। 'लिङ्ग'का अर्थ 'सामर्थ्यं सर्वशब्दानां लिङ्गमित्यभिधीयते' इस लक्षणके अनुसार 'सामर्थ्य' ही किया जाता है। सामर्थ्यका अरथ 'रूढ़ि' है। आगे 'समाख्या' नामक छठा प्रमाण आयेगा, उसका अर्थ यौगिक-शब्द होगा। इसलिए 'रूढ़ि' रूप 'लिङ्ग' प्रमाण यौगिक शब्दरूप 'समाख्या' प्रमाणसे भिन्न है। इस रूढ़िरूप लिङ्गप्रमाणकी वाक्यप्रमाणकी अपेक्षा प्रबलताके कारण 'बहिर्देवसदनं दामि', देवताओंके या विद्वानोंके बैठने योग्य 'बहि' अरथात् कुशको काटता हूँ। इस वाक्यमें 'बहि' शब्दसे रूढ़ 'कुश' अर्थ ही लिया जाता है। कुशके सदृश 'उलप' आदि अन्य घासका ग्रहण 'बहि' पदसे नहीं किया जाता है। यह लिङ्गप्रमाण अपने उत्तरवर्ती वाक्यादि अन्य प्रमाणोंसे अधिक बलवान् है। इसलिए 'स्योनं ते सदनं कृणोमि' इस मन्त्रकी पुरोडाशके सदन करणमें जो अङ्गता होती है वह वाक्यसे नहीं अपितु लिङ्गसे मानी जाती है।
३. याक्गप्रमाण तीसरा प्रमाण 'वाक्य' है। 'वाक्य' का अर्थ 'समभिव्याहार' या सहोच्चारण है 'यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति न स पापं श्लोकं शृणोति' इस वाक्यमें 'पर्ण' और 'जुहू'का सहोच्चारण या समभिव्याहार होनेके कारण 'वाक्य' से 'पर्णता' की 'जुहू' के प्रति अङ्गता प्रतीत होती है। यज्ञमें अवत्त हवि अर्थात् काटकर डाली जानेवाली हलुआ आदि जैसी हविकी आहुति देनेवाली चम्मचको 'जुहू' कहते हैं। वह 'जुहू' सदा पर्ण अर्थात् पत्तेकी ही बनायी जानी चाहिये। यह इसका अभिप्राय है। यह 'वाक्य' रूप तृतीय प्रमाण अपने उत्तरवर्ती 'प्रकरण' आदि अन्य प्रमाणोंकी अपेक्षा बलवान् होता है। इसलिए 'इन्द्राग्नी इद हवि' यह दर्शयाग [अमावास्याके दिन किये जानेवाले विशेष याग] के साथ पठित होनेसे समभिव्याहाररूप 'वाक्य' प्रमाणके द्वारा केवल दर्शयागका अङ्ग होता है। प्रकरणसे पूर्णमास अर्थात् पूर्णिमाके दिन किये जानेवाले यागका भी अ्ङ्ग हो सकता था। परन्तु वाक्यके बलवान् होनेसे यह केवल दर्शयागका अङ्ग होता है। ४. प्रकरणप्रमाण चौथा प्रमाण 'प्रकरण' है। 'उभयाकांक्षा प्रकरणम् यह 'प्रकरण' प्रमाणका लक्षण है। यह प्रकरणप्रमाण अपने उत्तरवर्ती स्थान आदि प्रमाणोंकी अपेक्षा बलवान् होता है। इसलिए 'अ्क्षैदीव्यति, राजन्यं जिनाति' इत्यादि अभिषेचनीयके साथ पठित होनेपर भी 'स्थान' प्रमाणसे अभिषेचनके अ्रङ्ग न होकर 'प्रकरण'के प्रबल होनेसे राजसूयके अङ्ग माने जाते हैं।
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२४० काव्यप्रकाश: [का० ४७, सू० ६६ ५. स्थानप्रमाण पाँचवाँ प्रमाण 'स्थान' है। देशकी समानताका नाम 'स्थान' है। यह दो प्रकारका होता है-एक पाठसादेश्य और दूसरा अनुष्ठानसादेश्य। यह 'स्थान' प्रमाण अपने उत्तरवर्ती 'समाख्या' प्रमाणसे अधिक बलवान् होता है। इसलिए 'शुन्धध्वं दैव्याय कर्मणे' यह मन्त्र पाठ-सादेश्यके कारण सन्नाय्यपात्रों अर्थात् दूध-दहीके पात्रोंके शोधनका अ्रङ्ग होता है। 'पौरोडाशिक' इस समाख्यासे पुरोडाश- पात्रोंके शोधनका अङ्ग नहीं होता है। ६. समाख्याप्रमाण छठा प्रमाण 'समाख्या' है। समाख्या 'यौगिक' शब्दको कहते हैं। यह 'समाख्या' वैदिकी तथा लौकिकी भेदसे दो प्रकारकी होती है। 'होतृचमस' इस वैदिकी समाख्यासे 'होता' चमसभक्षणका अ्रङ्ग होता है। इन छः प्रमाणोंमें जो पूर्व-पूर्वके बलीयस्त्वका निश्चय किया गया है, इसका कारण यह है कि श्रुति निरपेक्ष होनेसे सबसे पहले उससे अर्थकी प्रतीति हो जाती है इसलिए वह सबसे बलवान् है। अन्य प्रमाणोंमें अरथकी प्रतीतिमें जितना-जितना विलम्ब होता है उसी अनुपातसे उनको दुर्बल कहा गया है। मीमांसकोंके पूर्वकथनके अनुसार यदि शब्दप्रमाणके बाद जितना अर्थ प्रतीत होता है वह सब एक ही अभिधाव्यापारसे बोधित होता है, यह माना जाय, तो उस अर्थकी प्रतीतिमें पौर्वापर्य आदिका कोई प्रश्न ही नहीं उठता है। उस दशामें इन सब प्रमाणोंमें जो बलाबलका निर्धारण किया गया है यह सब नहीं बनता है। इसलिए यह सिद्धान्त ठीक नहीं है। नित्यानित्य दोषव्यवस्थासे भी व्यञ्जनाकी सिद्धि यहाँतक ग्रन्थकारने मीमांसकमतका खण्डन कर व्यञ्जनावृत्तिको सिद्ध करनेका प्रयत्न किया था। अब आगे साहित्यशास्त्रकी प्रत्रियासे व्यञ्जनावृत्तिको सिद्ध करनेके लिए कुछ युक्तियाँ देते हैं। इनमेंसे पहिली युक्ति यह है कि 'कुरु रुचिम्' इन शब्दोंको यदि उलटकर 'रुचि कुरु' यह पाठ कर दिया जाय तो इसमें 'चिंकु' शब्दके योनिस्थित 'भगनासा'का वाचक हो जानेसे अश्लीलता दोष आ जाता है। परन्तु यहाँ असभ्य भगनासा अरथ 'रुचि' और 'कुरु' दोनोंमेंसे किसी पदका वाच्यार्थ नहीं है। जब अश्लील अरथ वाच्य नहीं है और अभिधाको छोड़कर और कोई अर्थबोधक वृत्ति नहीं है तो असभ्यार्थकी प्रतीति हो ही नहीं सकती है। उस दशामें इस प्रकारके प्रयोग काव्यमें वर्जित नहीं ठहराये जा सकते हैं। परन्तु सभी सहृदय व्यक्ति इस प्रकारके प्रयोगोंको असभ्यार्थका व्यञ्जक मानकर वर्जनीय ठहराते हैं। अतः अभिधाके अतिरिक्त व्यञ्जनाको भी अलग अर्थबोधक वृत्ति अवश्य मानना चाहिये। दूसरी युक्ति यह है कि साहित्यशास्त्रमें दोषप्रकरणमें नित्यदोष और अनित्यदोष, दो प्रकारके दोष माने गये हैं। 'असाधुपदत्व' आदि दोष प्रत्येक रसके अपकर्षक होते हैं, इसलिए वे 'नित्यदोष' माने गये हैं। परन्तु 'श्रुतिकटुत्व' आदि दोष करुण-शृङ्गार आादि कोमल रसोंमें ही दोष माने जाते हैं। वीर, रौद्र, भयानक आदि रसोंमें उनको दोष नहीं माना जाता है इसलिए वे 'अनित्यदोष' कहलाते हैं। यदि वाच्यवाचकभावसे अतिरिक्त व्यङ्गयव्यञ्जकभाव न माना जाय तो यह नित्य तथा अनित्यदोष की व्यवस्था भी नहीं बन सकती है। व्यङ्गयव्यञ्जकभावको अलग माननेपर व्यञ्जनावृत्तिसे द्योत्य भिन्न-भिन्न रसोंके अनुकूल या प्रतिकूल होनेके आधारपर नित्य-अनित्यदोषोंकी व्यवस्था बन सकती है। इसलिए व्यञ्जनावृत्तिको मानना आवश्यक है। इसी बातको ग्रन्थकार अगले दो अनुच्छेदोंमें इस प्रकार लिखते हैं-
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का० ४७, सू० ६६ ] पञ्चम उल्लास: २४१ किञ्च 'कुरु रुचिम्' इति पदयोवैपरीत्ये काव्यान्तर्वतिनि कथं दुष्टत्वम्? न ह्यत्रासभ्योरऽर्थः पदार्थान्तरैरन्वित इत्यनभिधेय एवेति एवमादि अपरित्याज्यं स्यात्। यदि च वाच्यवाचकत्वव्यतिरेकेण व्यङ्गयव्यञ्जकभावो नाभ्युपेयते तदाऽसाधुत्वा- दीनां नित्यदोषत्वं कष्टत्वादीनामनित्यदोषत्वमिति विभागकरणमनुपपन्नं स्यात्। न चानुपपन्न सर्वस्यैव विभक्ततया प्रतिभासात्। वाच्यवाचकभावव्यतिरेकेण व्यङ्गय- व्यञ्जकताश्रयणे तु व्यङ्गचस्य वहुविधत्वात् क्वचिदेव कस्यचिदेवौचित्येनोपपद्यत एव विभागव्यवस्था। द्वयं गतं सम्प्रति शोचनीयतां समागमप्रार्थनया कपालिनः । इत्यादौ पिनाक्यादिपदवैलक्षण्येन किमिति कपाल्यादिपदानां काव्यानुगुणत्वम् ?
'कुरु रुचिम्' इन पदोंको उलट देनेसे काव्यमें [रुचि कुरु इस पाठमें अश्लीलता दोष आ जानेसे] दुष्टता क्यों हो जाती है ? यहाँ असभ्य [योन्यंकुर या भगनासारूप ] अर्थ अन्य पदार्थोंके साथ अन्वित नहीं है इसलिए वाच्यार्थ भी नहीं है। इस कारण [यदि उसको व्यङ्गय न माना जाय तो ] इस प्रकारके प्रयोग [काव्यमें ] परित्याज्य नहीं होंगे। और यदि वाच्यवाचकभावसे भिन्न व्यङ्गयव्यञ्जकभाव नहीं माना जाता है तो असाधुपदत्व [च्युतसंस्कारत्व ] आदि नित्य दोष हैं और कष्टत्व [श्रुतिकटुत्व ] आदि अनित्य दोष हैं। इस प्रकारका [दोषोंका ] विभाग भी नहीं बन सकता है। परन्तु [वह विभाग ] अनुपपन्न नहीं है [ होता ही है ]। समस्त सहृदयोंको [नित्यदोष तथा अनित्यदोषोंके ] विभक्तरूपसे [अलग-अलग ] प्रतीत होनेसे [उस विभागको मानना ही होगा]। वाच्यवाचकभावसे भिन्न व्यङ्गयव्यञ्जकभावको स्वीकार करनेपर तो व्यङ्गचके अनेक प्रकारके होनेसे कहीं ही किसीके औचित्यके कारण विभागव्यवस्था बन ही जाती है [इसलिए व्यङ्गयव्यञ्जकभावको मानना ही चाहिये]। गुणव्यवस्थाके द्वारा व्यञ्जनाकी सिद्धि [और यदि व्यङ्गयव्यञ्जकभावको न माना जाय तो कालिदासके 'कुमारसम्भव'में आये हुए] अब कपाल धारण करनेवाले [दरिद्व और बीभत्सरूप शिव ] के समागमकी इच्छाके कारण [चन्द्रमाकी सुन्दर कला और उससे भी अधिक सुन्दर तुम पार्वती] दो जने शोचनीय हो गये। इत्यादि [श्लोक ]में [शिवके वाचक] 'पिनाकी' आदिकी अपेक्षा 'कपाली' आदि पदोंमें अधिक काव्यानुगुणत्व क्यों साना जाता है ? यह श्लोकका केवल आधा भाग है जो 'कुमारसम्भव' से लिया गया है। पूरा श्लोक इस प्रकार है- द्वयं गतं सम्प्रति शोचनीयतां समागमप्रार्थनया कपालिनः । कला च सा कान्तिमती कलावतस्त्वमस्य लोकस्य च नेत्रकौमुदी ॥। इस श्लोकमें शिवकी प्राप्तिके लिए तपस्या करनेवाली पार्वतीकी परीक्षा करनेके लिए ब्रह्मचारी- का वेष धारण करके आये हुए शिवजी पार्वतीकी शिव-समागमकी इच्छाका उपहास करते हुए कह रहे हैं १६
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२४२ काव्यप्रकाश: [का० ४७, सू० ६६
अपि च वाच्योरर्थः सर्वान् प्रतिपत्तन् प्रति एकरूप एवेति नियतोऽसौ। न हि 'गतोऽस्तमर्कः' इत्यादौ वाच्योऽर्थः क्वचिदन्यथा भवति। प्रतीयमानस्तु तत्तत्प्रकरण- वक्तृ-प्रतिपत्त्त्रादिविशेषसहायतया नानात्वं भजते। तथा च 'गतोऽस्तमर्कः' इत्यतः सपत्नं प्रत्यवस्कन्दनावसर इति, अभिसरणमुपक्रम्यतामिति, प्राप्तप्रायस्ते प्रेयानिति, कर्म- करणान्निवर्तामहे इति, सान्ध्यो विधिरुपक्रम्यतामिति, दूरं मा गा इति, सुरभयो गृहं प्रवेश्यन्तामिति, सन्तापोऽधुना न भवतीति, विक्रेयवस्तूनि संहियन्तामिति, नागतोऽद्यापि प्रेयानित्यादिरनवधिर्व्यङ्गयोर्ऽर्थस्तत्र तत्र प्रतिभाति।
कि पहिले तो यह सुना था कि अकेली चन्द्रमाकी सुन्दर कला ही उस 'कपाली' के समागमकी इच्छा करती थी, अब उरुके साथ तुम भी जुड़ गयी हो। पहिले अकेली चन्द्रकला ही शोचनीय थी, अब तुम दोनोंकी दशा शोचनीय हो गयी है। इसमें शिवके वाचक 'पिनाकी' आदि अ्न्य सब शब्दोंको छोड़कर कविने 'कपाली' शब्दका ही विशेषरूपसे प्रयोग किया है। उसका विशेष कारण है। उससे जिन दरिद्रता, बीभत्सता आदि अ्रनेक गुणोंका वैशिष्टय प्रतीत होता है वह शिवजीके वाचक 'पिनाकी' आदि अन्य शब्दोंसे व्यक्त नहीं होता है। उसीके आधारपर शोचनीयताका औचित्य व्यक्त होता है। इस व्यङ्गयव्यञ्जक- भावको न माना जाय तो वाचकरूपसे सभी शब्दोंका समान ही स्थान होनेसे इस विशेष पदके प्रयोगमें कोई विलक्षण चमत्कार नहीं होना चाहिये था। परन्तु वह चमत्कार सब सहृदयोंको अनुभूत होता है। इसलिए वाच्यवाचकभावसे भिन्न व्यङ्गयव्यञ्जकभाव अवश्य मानना चाहिये। संख्याभेदसे वाच्य-व्यङ्गचका भेद [व्यङ्गयव्यञ्जकभावकी सिद्धिमें ] और भी [हेतु यह है कि -- ]वाच्यार्थ सब ज्ञाताओंके प्रति एकरूप ही होता है इसलिए उसका स्वरूप निश्चित है। क्योंकि 'सूर्य छिप गया' [गतोऽस्तमर्कः ] इत्यादिमें वाच्यार्थ कहीं भी बदलता नहीं है [ अपितु सब जगह एक-सा ही रहता है]। परन्तु उस-उस प्रकरणके वक्ता, बोद्धा आदिकी सहायतासे प्रतीयमान अर्थ अलग-अलग हो जाता है। जैसे कि 'सूर्य छिप गया' [ इस वाक्यका यदि लुटेरे या लड़ाकू व्यक्ति प्रयोग करते हैं तो] इससे १. शत्रुको लूटनेका समय आ गया यह, [अर्थ उसके साथियोंको प्रतीत होता है। यदि दूती नायिकासे कहती है तो नायकके पास ] २. अभिसरणकी तैयारी करो यह, [यदि सखी नायिकासे कहती है तो ] ३. तुम्हारे पति आते ही होंगे यह, [इसी प्रकार कहीं] ४. हम काम समाप्त करते हैं यह, [कहीं ] ५. सन्ध्याकालीन विधि करनी चाहिये यह, [कहीं] ६. दूर मत जाना यह, [कहीं] ७. गायोंको घर ले जाओ यह, [कहीं] ८. अब गर्मो नहीं रही यह, [कहीं] ६. दूकान बढ़ाओ [विक्रय वस्तुओंको समेटना चाहिये] यह [और कहीं ] १०. अबतक भी प्राणनाथ नहीं आये यह, इस प्रकार भिन्न-भिन्न स्थलोंपर [तत्न-तत्र] अनन्त प्रकारका व्यङ्गय अर्थ प्रतीत होता है [ इसलिए वाच्यार्थ और व्यङ्गचार्थकी संख्यामें भेद होनेसे भी व्यङ्गयार्थको वाच्यसे भिन्न मानना होगा]। साहित्यशास्त्रकी दृष्टिसे यहाँतक व्यञ्जनासाधक चार हेतु दिये जा चके हैं। आगे वाच्य और व्यङ्गयके १. स्वरूपभेद, २. प्रतीतिभेद, ३. कालके भेद, ४. आश्रयभेद ५. निमित्तभेद, ६. कार्यभेद, ७. संख्याभेद और ८. विषयभेदसे भी वाच्य अरथसे व्यङ्गय अर्थका भेद सिद्ध करते हैं।
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वाच्यव्यङ्गचयोः निःशेषेत्यादौ निषेधविध्यात्मना, मात्सर्यमुत्सार्थ विचार्य कार्यमार्याः समर्यादमुदाहरन्तु। सेव्या नितम्बाः किमु भूधराणामुत स्मरस्मेरविलासिनीनाम् ।।१३३।। इत्यादौ संशय-शान्त-शृङ्गार्यन्यतरगतनिश्चयरूपेण, कथमवनिप ! दर्पो यन्निशातासिधारा- दलनगलितमू्ध्नां विद्विषां स्वीकृता श्रीः। ननु तव निहतारेरप्यसौ किं न नीता त्रिदिवमपगताङ्गर्वल्लभा कीतिरेभिः ॥१३४। इत्यादौ निन्दास्तुतिवपुषा स्वरूपस्य,
स्वरूपभेदसे वाच्य-व्यङ्गचके भेदके तीन उदाहरण १. निःशेषच्युतचन्दनं स्तनतट' इत्यादि [पूर्वोद्धृत उदाहरण सं० २ ]में वाच्य और व्यङ्गचके [क्मशः ] निषेध और विधिरूप होनेसे [स्वरूपभेद १]- २. [कार्य-अकार्यके विचारमें निपुण ] हे आर्यो, आप पक्षपात छोड़कर और विचार करके यह बात प्रमाण सहित [समर्याद ] बतलाइये कि क्या पहाड़ोंके मध्यभागोंका [नितम्बोंका ] सेवन करना चाहिये अथवा कामवासनासे मुस्कराती हुई सुन्दरियोंके नितम्बोंका सेवन करना चाहिये [ इस प्रकारका संशय होनेपर जो कर्त्तव्य हो सो आप लोग बतलाइये] ॥१३३॥ इत्यादिमें [वाच्यार्थके ] संशय [रूप होने ] और [व्यङ्गचार्थ ] के शान्त [रसप्रधान व्यक्तिके लिए पर्वत-नितम्बोंके ] और शृङ्गारी [व्यक्तिके लिए विलासिनियोंके नितम्बोंके सेवन ] मेंसे किसी एकके निश्चयरूपसे [स्वरूपभेद २] -- ३. हे राजन् यह अभिमान आप क्यों कर रहे हैं कि तीक्ष्ण तलवारकी धारसे जिनके सिर गिरा दिये उन शत्रुओंकी लक्ष्मी आपने लेखी है। क्या सिर कटे हुए ये [ शत्रु] जिसके सारे शत्रु मारे जा चुके हैं ऐसे आपकी प्रियतमा कीतिको [अपहरण करके अपने ससथ ] स्वर्ग नहीं,ले गये हैं ॥१३४॥ इत्यादिमें [ वाच्य और व्यङ्गचके क्रमशः] निन्दा तथा स्तुतिरूप होनेसे स्वरूपका [भेद होनेसे वाच्य और व्यङ्गच अलग-अलग हैं [स्वरूपभेद ३ ]। यहाँ वाच्यार्थ तो यह है कि आपने शत्रुओंके सिर काट डाले और उनकी लक्ष्मी छीनकर अपने अधीन कर ली। यह ठीक है परन्तु इसपर आपके घमण्ड करनेका कोई कारण नहीं है। आपने ज़ब उनकी लक्ष्मीका हरण किया उस समय शत्रु मर चुके थे और आप पूर्णरूपसे सदेह और सशक्त थे। ऐसी दशामें मरे हुए व्यक्तियोंकी सम्पत्तिको छीन लेनेमें कौन बड़ी बात है। पर आपके शत्रु आपसे कहीं आगे है। क्योंकि वे मर जाने और सिर कट जानेके बाद भी और आपके सदेह एवं सशक्तरूपमें सामने खड़े रहनेपर भी, आपके देखते-देखते आपकी 'वल्लभा' कीर्तिको अपने साथ लेकर स्वर्ग चले गये। यह श्लोकका वाच्यार्थ है जो स्पष्टतः निन्दारूप है। पर उससे 'आपने अपने समस्त शत्रुओ्ंका नाश कर दिया है और आपकी कीर्ति स्वर्गतक व्याप्त हो रही है' यह प्रशंसा व्यङ्गय है। इस प्रकार वाच्य और व्यङ्गचके स्वरूपमें भेदके तीन उदाहरण देकर वाच्यार्थसे व्यङ्गचार्थको अलग सिद्ध कर त्र्यञ्जनाकी अनिवार्यता- का प्रतिपादन किया है।
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२४४ काव्यप्रकाश: [का० ४७, सू० ६६
पूर्वपश्चा्द्ावेन प्रतीते: कालस्य, शब्दाश्रयत्वेन शब्दतदेकदेशतदर्थवर्णसंघटना- श्रयत्वेन च आश्रयस्य, शब्दानुशासनज्ञानेन प्रकरणादिसहायप्रतिभानैर्मल्यसहितेन तेन चावगम इति निमित्तस्य, बोद्धुमात्रविदग्धव्यपदेशयोः, प्रतीतिमात्रचमत्कृत्योश्च करणात् कार्यस्य, गतोऽस्तमर्क इत्यादौ प्रद्शितनयेन संख्यायाः, कस्य वा ण होइ रोसो दट्ठूण पिआइ सव्वणं अहर। सभमरपडमग्घाइणि वरिअवामे सहसु एण्हिं।।१३५।। [कस्य वा न भवति रोषो दृष्ट्वा प्रियायाः सव्रणमधरम्। सभ्रमरपद्माघायिणि वारितवामे सहस्वेदानीम् ।।इति संस्कृतम् ।] इत्यादौ सखीतत्कान्तादिगतत्वेन विषयस्य च भेदेऽपि यद्येकत्वं तत्क्वचिदपि नीलपीतादौ भेदो न स्यात्।
वाच्य और व्यङ्गचके भेदसाधक सात और कारण [वाच्य तथा व्यङ्गच अर्थकी] प्रतीतिके आगे-पीछे होनेसे १. कालका [भेद भी दोनोंका भेदसाधक है]। [वाच्यके केवल ] शब्दमें आश्रित होने [तथा व्यङ्गच अर्थके ] शब्द, उसके एकदेश, उसके अर्थ, वर्ण, और सङ्गटना आदिके आश्रित होनेसे २. आश्रयका [भेद भी दोनोंका भेदसाधक है ]। [वाच्यार्थके ] केवल शब्दानुशासन [व्याकरण तथा कोश आदि] के ज्ञानसे और [व्यङ्गयार्थके ] प्रकरण आदिकी सहायता, प्रतिभाकी निर्मलताके सहित व्याकरण-कोशादि [तेन च ] के ज्ञानसे प्रतीति होती है इसलिए ३. निमित्तका [भेद भी वाच्य-व्यङ्गचके भेदका साधक है]। केवल वाच्यार्थ-मात्रके ज्ञानसे उसके ज्ाताको केवल सामान्य प्रकारका] 'बोद्ा' [कहा जाता है और व्यङ्गचार्थका अनुभव करनेवालेको सहृदय] 'विदग्ध' [कहा जाता है, इस प्रकार इन ] दोनों ४. संज्ञाओंका [भेद भी वाच्य-व्यङ्गचके भेदका साधक है]। [वाच्यार्थज्ञान ] केवल प्रतीतिमात्रका अनुभव करानेवाला [और व्यङ्गयार्थका ज्ञान ] चमत्कारका जनक होता है, इसलिए ५. कार्यका [भेद भी वाच्यव्यङ्गयका भेदसाधक है] और 'सूर्य छिप गया' इत्यादिमें पूर्वप्रद्शित रीतिसे [वाच्य और व्यङ्गयकी ] ६. संख्याका [भेद भी वाच्य और व्यङ्गचका भेदसाधक है। तथा ]- [परपुरुषके द्वारा उत्पादित दन्तक्षतके कारण] प्रियाके व्रणयुक्त अधरको देखकर किसको क्रोध नहीं होता है। इसलिए भौंरे सहित कमलको सूंघनेवाली और मना करनेपर भी न भाननेवाली, अब उसका फल भोग ।१३५। इत्यादि [उदाहरण ] में [वाच्यार्थके ] सखी [विषयक तथा [व्यङ्गयार्थके] उसके पतिसे सम्बद्धरूपसे [प्रतीत होनेसे वाच्य-व्यङ्गय अर्थके] ७. विषयका भेद होनेपर [अर्थात् इतने भेदोंके होनेपर ] भी यदि [वाच्य तथा व्यङ्ग्य अर्थका ] भेद न माना जाय तो फिर नीले, पीले आदि [पदार्थो]में कहीं भी भेद नहीं रहेगा। 'कस्य वा न भवति रोषो' इत्यादि श्लोकवाक्य किसी दुष्टा स्त्रीकी सखी उससे कह रही है। स्त्रीके अधरपर पर-पुरुषकृत दन्तक्षतका चिह्न बना हुआ है। इसको देखकर पतिका नाराज होना स्वाभाविक है। उससे बचानेके लिए उसकी सखी इस वाक्य द्वारा प्रबन्ध कर रही है। स्त्रीका पति कहीं समीप ही है और वह इस वाक्यको भली प्रकार सुन सकता है, पर सखी ऐसा प्रकट करती हुई कि
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का० ४७, सू० ६६] पञ्चम उल्लास: २४५
उक्तं हि "अयमेव हि भेदो भेदहेतुर्वा यद्विरुद्धधर्माध्यासःकारणभेदश्च" इति। वाचकानामर्थापेक्षा व्यञ्जकानान्तु न तदपेक्षत्वमिति न वाचकत्वमेव व्यञ्जकत्वम्। किं च वाणीरकुडंग्वित्यादौ प्रतीयमानमर्थमभिव्यज्य वाच्यं स्वरूपे एव यत्र विश्राम्यति
मानो उसे पतिकी उपस्थितिका कोई ज्ञान ही नहीं है, स्त्रीसे यह श्लोक कह रही है। इसके वाच्यार्थका विषय यद्यपि वह स्त्री है, परन्तु सखीका मुख्य लक्ष्य स्त्रीको उपदेश देना नहीं है अपितु उसके पतिको यह सुनाना है इसने ऐसा कमलका फूल सूँघ लिया था जिसमें भौंरा बैठा हुआ था। सूंघते समय इसकी असावधानीसे भौंरेने इसके अधरमें काट लिया है उसीका वह चिह्न बन गया है। यह परपुरुषके दन्तक्षत- का चिह्न नहीं है। इस प्रकार वाच्य तथा व्यङ्गय त्ररथ में विषयका भेद होनेसे भी व्यङ्गचार्थको वाच्यार्थसे भिन्न मानना होगा। इसी बातको कहते हैं। कहा भी है कि- [घट-पट आदिमें घटत्व आदि ] विरुद्ध धर्मोंकी [दो भिन्न धर्मियोंमें ] प्रतीति और [उन दोनोंके] कारणोंका भेद ही [ पदार्थोंके ] भेदका कारण होता है। वाचक और व्यञ्जक शब्दोंका भेद इस प्रकार यहाँतक वाच्यार्थ तथा व्यङ्गयार्थका १० प्रकारका भेद दिखलाकर व्यङ्गयार्थकी प्रतीति- के लिए व्यञ्जनावृत्तिकी अनिवार्यताका उपपादन किया है। अब आगे यह दिखलाते हैं कि न केवल वाच्यार्थ और व्यङ्गयार्थमें ही भेद होता है अपितु वाचक और व्यञ्जक शब्दोंमें भी भेद होता है। वाचक शब्दोंको अर्थकी अपेक्षा होती है [ अर्थात् वाचक शब्द केवल सङ्गेतित अर्थका ही बोध करा सकते हैं।। पर व्यञ्जक शब्दोंको उसकी आवश्यकता नहीं होती है [अर्थात् वे बिना सङ्गेतग्रहके किसी भी अर्थका बोध करा सकते हैं। इसलिए वाचकत्व ही व्यञ्जकत्व नहीं है [अर्थात् वाचकत्व और व्यञ्जकत्व दोनों अलग-अलग हैं]। अतात्पर्यविषयीभूत अर्थकी व्यङ्गयता 'यत्पर: शब्दः स शब्दार्थः' इस नियमका आश्रय लेकर भट्टलोल्लट आदिने व्यङ्गयार्थको तात्पर्य- विषयीभूत होनेसे वाच्यार्थ सिद्ध करनेका यत्न किया था। उसका अत्यन्त विस्तारके साथ खण्डन पहिले कर चुके हैं। परन्तु अरब यह दिखलाते हैं कि कहीं-कहीं ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जिनमें व्यङ्गचार्थ- की प्रतीति तो होती है परन्तु वह तात्पर्यविषयीभूत अ्ररथ नहीं होता है। जैसे गुणीभूतव्यङ्गयके 'अ्र्प्रसुन्दर- व्यङ्गय' नामक भेदमें व्यङ्गयार्थकी प्रतीति तो होती है परन्तु वह वाच्यार्थकी अपेक्षा असुन्दर है, इसलिए आस्वादवादकी चरम विश्रान्ति व्यङ्गयमें नहीं अपितु वाच्यमें ही होती है। अतः इन उदाहरणोंमें व्यङ्गयार्थको तात्पर्यविषयीभूत अर्थ नहीं कहा जा सकता है। यदि व्यञ्जनाको अलग वृत्ति न माना जायगा तो इस अतात्पर्यविषयीभूत अर्थकी प्रतीति कैसे होगी ? इसलिए भी व्यञ्जनाका मानना आवश्यक है। इसी बातको ग्रन्थकार अगले अनुच्छेदमें जिखते हैं- और 'वानीरकुञ्जोड्डीन' इत्यादि [असुन्दर व्यङ्गयके उदाहरण सं० १३२, पृ० २११] में 'दत्तसङ्गेत: कश्चिल्लतागृहं प्रविष्टः' इस ] प्रतीयमान अर्थको प्राप्त कराके [व्यङ्गयकी अपेक्षा वाच्यके ही अधिक चमत्कारयुक्त होनेसे ] वाच्य अपने स्वरूपमें ही जहाँ विश्रान्त होता है [ अर्थात् चरम आस्वादका विषय वाच्य ही होता है, व्यङ्गय नहीं ] वहाँ [ उस ] गुणीभूतव्यङ्गय [रूप मध्यमकाव्य] में [वाच्यापेक्षया अधिक चमत्कारयक्त न होनेसे। अतात्पर्यविषयीभूत अर्थ भी जो अपने [ वाचक ] शब्दसे अभिहित न
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२४६ काव्यप्रकाश: [का० ४७, सू० ६६
तत्र गुणीभूतव्यङ्गयेतात्पर्यभूतोऽप्यर्थंः स्वशब्दानभिधेयः प्रतीतिपथमवतरन् कस्य व्यापारस्य विषयतामवलम्बतामिति ।
होकर ही प्रतीतिगोचर हो रहा है वह [व्यञ्जनाव्यापारको छोड़कर और ] किस व्यापारका विषय हो सकता है [ अर्थात् उसकी प्रतीति केवल व्यञ्जनासे ही हो सकती है। अन्य किसीसे सम्भव नहीं, इसलिए भी व्यञ्जनावृत्तिका अलग मानना आवश्यक है ]। यहाँतक ग्रन्थकारने व्यञ्जनावृत्तिकी पृथक् सत्ता सिद्ध करनेके लिए जो युक्तियाँ दी हैं उनका सारांश निम्नलिखितप्रकार है- (१) लक्षणामूलध्वनिके १. अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य तथा २. अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य दोनों भेदोंमें व्यङ्गयार्थके बिना लक्षणा ही नहीं हो सकती है इसलिए उनमें व्यञ्जनाका मानना अनिवार्य है। (२) अ्र्प्रभिधामूलध्वनिके अर्प्रसंलक्ष्यक्रमव्यङ्गय भेदमें रसादि ध्वनि कभी भी स्वशब्दवाच्य नहीं होता है अतः उसे व्यङ्गय ही मानना होगा। (३) अर्प्रभिधामूल संलक्ष्यत्रमव्य ङ्गयके शब्दशक्त्युत्थ भेदमें अभिधाका प्रकरणादिवश एकार्थमें नियन्त्रण हो जानेसे अप्राकरणिक अर्थ और उसके साथ उपमानोपमेयभाव आदिकी प्रतीति व्यञ्जनासे ही सम्भव है, अभिधासे नहीं। अतः व्यञ्जनाका मानना आवश्यक है। (४) अभिभामूल संलक्ष्यक्रमव्यङ्गचके अरथशक्त्युत्थ भेदमें 'अभिहितान्वयवाद'में जहाँ वाक्यार्थ ही अभिधाका विषय न होकर 'तात्पर्याख्यावृत्ति' से प्रतीत होता है, वहाँ व्यङ्गचार्थकी प्रतीति तो अभिधासे हो ही नहीं सकती है। उसकी प्रतीतिके लिए व्यञ्जनाका मानना अनिवार्य है। (५) 'अन्विताभिधानवाद' में भी सामान्यरूपसे अ्र्परन्वित पदार्थमें ही सङ्केतग्रह होता है। विशेषमें अन्वितका सङ्केतग्रह नहीं होता है। इसलिए वहाँ भी अतिविशेषरूप वाक्यार्थकी प्रतीति अ्भिधासे नहीं हो सकती है। तब उसके भी बादमें प्रतीत होनेवाले व्यङ्गयार्थकी प्रतीति अभिधासे माननेका प्रश्न ही नहीं उठता है। अतः 'अन्विताभिधानवाद' में भी व्यञ्जनाका मानना अनिवार्य है। (६) 'नैमित्तिकानुसारेण निमित्तानि कल्प्यन्ते' इस नियमके अपनुसार भी व्यङ्गयार्थकी प्रतीति शब्दसे अभिधा द्वारा तबतक नहीं मानी जा सकती है जबतक कि शब्दका उसके साथ सङ्केतग्रह न हो। सङ्कतग्रह केवल सामान्यरूपसे अन्वितके साथ है, विशेषके साथ नहीं, अतः अतिविशेषरूप वाक्यार्थकी ही प्रतीति जब अभिधासे नहीं हो सकती है तब उसके भी बाद होनेवाली व्यङ्गयार्थकी प्रतीति अभिधासे सम्भव ही नहीं है। अतः व्यञ्जनाका अपलाप असम्भव है। (७) भट्टलोल्लट आररादि 'यत्पर: शब्दः स शब्दार्थः' इस नियमके आधारपर व्यङ्गयार्थको अ्रभि- धागम्य बतलाते हैं। परन्तु वे 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थः' इस नियमका अरथ ही नहीं समझे हैं। इस नियमका अभिप्राय इतना ही है कि विधिवाक्योंमें मुख्यरूपसे क्रियाका विधान होता है। 'भूतभव्यसमुच्चारणे भूतं भव्यायोपदिश्यते' इसका भी यही अभिप्राय है कि जहाँ करिया अन्य प्रमाणसे प्राप्त होती है वहाँ गुणका, या कहीं गुण या किया दोनोंका और कहीं तीनोंका भी विधान होता है। अदग्धदहनन्यायसे जहाँ जितना अंश अप्राप्त होता है, उतनेका विधान होता है। यही 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थः'का तात्पर्य होता है। भट्टलोल्लट आदि जो इस 'तात्पर्यवाचोयुक्ति' का यह अर्थ लेना चाहते हैं कि जहाँ व्यङ्गचार्थके बोधनमें वक्ताका तात्पर्य होता है वहाँ वही अर्थ शब्दका वाच्यार्थ होता है, अतः व्यञ्जनाको अलग वृत्ति माननेकी आवश्यकता नहीं है, यह कल्पना असङ्गत है। इस असत्कल्पनाका कारण 'तात्पर्यवाचोयुक्ति'के अररभिप्राय-
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का० ४७, सू० ६६] पञ्चम उल्लास: २४७
को न समझना ही है। इस नियमके आधासपर सभी अरथोंको वाच्यार्थ मान लिया जाय तो लक्षणा आदिकी आवश्यकता नहीं रहेगी। दूसरी बात यह है कि इसके अनुसार वाक्यमें उपात्त किसी विशेष शब्दके अर्थमें ही वाक्यके शेष शब्दोंका तात्पर्य माना जा सकता है। वाक्यमें अनुपात्त शब्दके अर्थमें वाक्यका तात्पर्य नहीं हो सकता है। किन्तु व्यञ्जना द्वारा जिस अर्थकी प्रतीति होती है उसका वाचक कोई भी शब्द वाक्यमें नहीं होता है। अतः उसके विषयमें 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थः' वाला नियम लागू नहीं होता है। अतः व्यङ्गयार्थकी प्रतीतिके लिए व्यञ्जनाका मानना अनिवार्य है। (८) 'सोयभिषोरिव दीर्घदीर्घतरोऽभिधाव्यापारः' के अनुसार दीर्घदीर्घतर अभिधाव्यापार मानकर भट्टलोल्लटने जो व्यङ्गचार्थको अभिधाका ही विषय सिद्ध करनेका यत्न किया है, वह भी ठीक नहीं है; क्योंकि उस दशामें- क-लक्षणाशक्तिकी भी आवश्यकता नहीं रहेगी। ख-'ब्राह्मण पुत्रस्ते जातः', 'कन्या ते गर्भिणी जाता' इत्यादिमें हर्ष, शोक आदि भी वाच्य कहलाने लगेंगे। ग-श्रुति, लिङ्ग आदि छह प्रमाणोंके बलाबलका जो सिद्धान्त मीमांसामें स्थापित किया गया है, वह व्यर्थ हो जायगा। मीमांसक होनेके नाते भट्टलोल्लट इन तीनों बातोंको मान नहीं सकते हैं। अतः दीर्घ-दीर्घतर अभिधाव्यापार माननेसे काम नहीं चलेगा। व्यङ्गयार्थकी प्रतीतिके लिए व्यञ्जनाका मानना अनिवार्य है। (६) यदि वाच्यार्थसे भिन्न व्यङ्गयार्थको अलग न माना जाय तो- क-[रुचि कुरु] आदि वा क्योंमें असभ्यार्थकी प्रतीतिसे जो अश्लीलता दोष माना जाता है, वह नहीं बनेगा। ख-नित्यदोष तथा अनित्यदोषकी व्यवस्था नहीं बनेगी। ग-कपाली और पिनाकी शब्दोंके वाच्यार्थकी समानता होते हुए भी विशेष स्थलपर विशेष शब्दके प्रयोगसे जो चमत्कार आ जाता है उसका उपपादन नहीं हो सकेगा।
(१०) वाच्यार्थ और व्यङ्गयार्थ की प्रतीतिमें १. सख्या, २. स्वरूप, ३. काल, ४. आश्रय, ५. निमित्त, ६. व्यपदेश, ७. कार्य, ८. विषय आदिका भेद होनेसे भी व्यङ्गचार्थको वाच्यार्थसे भिन्न मानना आवश्यक है। साहित्यदर्पणकारने इन भेदकोंका संग्रह इस प्रकार कर दिया है- स्वरूप-संख्या-निमित्त-कार्य प्रतीति-कालानाम् । आश्रय-विषयादीनां भेदाद् भिन्नोऽभिधेयतो व्यङ्गयः ॥ (११) न केवल वाच्य और व्यङ्गय अर्थ ही अलग हैं अपितु इनके कारणभूत वाचक तथा व्यञ्जक शब्द भी ऊलग हैं। वाचक शब्दोंको अर्थकी अपेक्षा होती है किन्तु व्यञ्जक शब्दोंको अर्थकी अपेक्षा नहीं रहती है। निरर्थक अवाचक शब्द भी व्यञ्जक हो सकते हैं। अतः व्यञ्जनावृत्ति अलग ही माननी होगी। (१२) असुन्दरव्यङ्गय नामक गुणीभूतव्यङ्गयके भेदमें व्यङ्गय अर्थके प्रतीत होते हुए भी वाच्यार्थके ही चमत्कारयुक्त होनेसे उसीमें चरम विश्रान्ति होती है। ऐसे स्थलोंपर उस व्यङ्गचार्थको तात्पर्यविषयीभूत अर्थ भी नहीं कहा जा सकता है। अतः उसकी प्रतीति व्यञ्जनासे ही माननी होगी। अभिधासे काम नहीं चलेगा।
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२४८ काव्यप्रकाश: [का० ४७, सू० ६६ व्यङ्गचार्थकी लक्षणागम्यताका निषेध इस प्रकार यहाँतक ग्रन्थकारने एक दर्जनसे भी अधिक युक्तियोंके द्वारा यह सिद्ध करनेका यत्न किया है कि अभिधासे व्यङ्गयार्थकी प्रतीति नहीं हो सकती है। अतः व्यञ्जना अभिधासे भिन्न ही है। अब आगे ग्रन्थकार उनके मतका खण्डन करने जा रहे हैं जो लक्षणासे ही व्यञ्जनाका भी काम निकालना चाहते हैं। इस मतके अनुसार पहिले पूर्वपक्ष उपस्थित करते हुए ग्रन्थकारने यह लिखा है कि-व्यञ्जनावादीने अपनी व्यञ्जनाकी सिद्धिके लिए संख्या, प्रतीति, काल और व्यपदेश आदिका भेद दिखलाकर व्यङ्गयार्थकी वाच्यार्थसे विशेषताएँ बतलायी हैं, वे सब लक्षणामें भी पायी जाती हैं। इसलिए व्यञ्जनाको अलग माननेकी आवश्यकता नहीं है। लक्षणासे व्यञ्जनाका कार्य निकालनेवाले इस मतकी युक्तियोंको निम्नलिखित प्रकार सङ्कलित किया जा सकता है- (१) व्यञ्जनाको अलग वृत्ति सिद्ध करनेके लिए इस विषयमें व्यञ्जनावादीने सबसे मुख्य बात यह कही है कि वाच्यार्थ नियतरूपसे एक ही होता है और व्यङ्गचार्थ नाना हो सकते हैं। अतः व्यञ्जनाको अलग वृत्ति मानना चाहिये। इसके उत्तरमें लक्षणावादीका कहना है कि यह बात लक्ष्यार्थके विषयमें भी लागू होती है। राम शब्दका वाच्यार्थ निम्नलिखित तीनों उदाहरणोंमें एक ही है। पर उसका लक्ष्यार्थ तीनों जगह भिन्न-भिन्न है। इनमें पहिला श्लोक अभी पीछे उद्धृत किये गये उदाहरण संख्या ११२, पृष्ठ १६४ पर दिया जा चुका है। इसमें 'राम' पदका वाच्यार्थ दाशरथि राम ही है। परन्तु लक्षणा द्वारा वह पद अर्थान्तरमें संक्रान्त होकर 'अत्यन्तदुःखसहिष्णुत्वधर्मविशिष्ट राम' अर्थका बोधक हो गया है। इस प्रकारके उदाहरणमें 'राम' पदका लक्ष्यार्थ, वाच्यार्थसे भिन्न, 'अत्यन्तदुःखसहिष्णु राम' है।
दूसरा उदाहरण कुन्तकके 'वकोक्तिजीवित' से दिया गया है। यहाँ ग्रन्थकारने उसका एक ही चरण उद्धृत किया है पूरा श्लोक निम्नलिखित प्रकार है- प्रत्याख्यानरुषा कृतं समुचितं क्रूरेण ते रक्षसा सोढं तच्च तथा त्वया कुलजनो धत्ते यथोच्चैः शिरः। व्यर्थ सम्प्रति बिभ्रता धनुरिदं त्वद्व्यापदां साक्षिणा रामेण प्रियजीवितेन तु कृतं प्रेम्ण: प्रिये नोचितम् ।। इसमें 'राम' शब्द 'निष्करुणत्व' आ्रप्रादि धर्म-विशिष्ट राम अर्थको लक्षणासे बोधित करता है। रामोऽसौ भुवनेषु वितमगुणैः प्राप्तः प्रसिद्धि पराम्। यह तीसरा उदाहरण जिस श्लोकसे लिया गया है वह पूरा श्लोक भी पीछे उदाहरण सं० १०६, पृष्ठ १८४ पर उद्धृत किया जा चुका है। यहाँ भी 'राम' शब्द अर्थान्तरमें संक्रमित होकर 'खरदूषणादि- निहन्ता राम का बोध लक्षणासे कराता है। इस प्रकार इन तीनों ही उदाहरणोंमें राम शब्दका वाच्यार्थ तो एक ही दाशरथि राम है परन्तु लक्ष्यार्थ भिन्न-भिन्न हैं। इससे स्पष्ट है कि व्यङ्गयार्थके समान लक्ष्यार्थमे भी नानात्व रहता है। अतः इस आधारपर व्यञ्जनाको अलग मानना उचित नहीं है। (२) व्यङ्गयार्थको सहृदयत्वादि, विदग्धत्वादि विशेष व्यपदेशका हेतु बतलाकर व्यञ्जनाको पृथक् वृत्ति सिद्ध करनेका यत्न किया था। परन्तु लक्षणावादीके मतमें वह भी उचित नहीं है, क्योंकि व्यङ्गयार्थके समान लक्ष्यार्थ भी अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य आदि रूप विशेष व्यपदेशका हेतु हो सकता है। अतः लक्षणासे भिन्न व्यञ्जना नहीं है।
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का० ४७, सू० ६६ ] पञ्चम उल्लास: २४६ ननु- 'रामोऽस्मि सर्वं सहे' इति, 'रामेण प्रियजीवितेन तु कृतं प्रेम्ण: प्रिये नोचितम्' इति, 'रामोऽसौ भुवनेषु विक्रमगुणैः प्राप्तः प्रसिद्धिं पराम्', इत्यादौ लक्षणीयोऽप्यर्थो नानात्वं भजते विशेषव्यपदेशहेतुश्च भवति तदवगमश्च शब्दार्थायत्तः प्रकरणादिसव्यपेक्षश्चेति कोऽयं नूतनः प्रतीयमानो नाम ? (३) तीसरी बात यह कही थी कि वाच्यार्थकी प्रतीति केवल शब्दसे होती है और व्यङ्गचार्थकी प्रतीति शाब्दी व्यञ्जना और आर्थी व्यञ्जनाके रूपमें, शब्द तथा अर्थ दोनोंसे हो सकती है। अतः व्यञ्जनाको अलग वृत्ति मानना चाहिये। लक्षणावादीका कहना है कि यह बात लक्ष्यार्थके विषयमें भी लागू है। वह भी शब्द तथा अर्थ दोनोंसे हो सकता है। अतः व्यञ्जनाको अलग मानने की आवश्यकता नहीं। (४) व्यङ्गय अर्थकी प्रतीतिमें प्रकरणादिसे सहायता मिलती है इसलिए वह वाच्यार्थसे भिन्न है। यह जो चौथी विशेषता व्यङ्गचार्थमें बतलायी गयी थी वह भी लक्ष्यार्थमें घट सकती है। ऐसी दशामें व्यञ्जनाका काम लक्षणासे निकल सकता है फिर व्यञ्जनतावृत्तिको माननेकी क्या आवश्यकता है ? लक्षणावादीकी इन सब युक्तियोंका खण्डन ग्रन्थकार आगे क्रमशः करेंगे। इस पूर्वपक्षकी सबसे प्रथम युक्तिका ग्रन्थकारने यह उत्तर दिया है कि यद्यपि लक्ष्यार्थमें नानात्व हो सकता है परन्तु अनेकार्थक शब्दके वाच्यार्थके समान वह प्रायः नियतस्वरूप ही होता है। मुख्यार्थसे असम्बद्ध अरथ लक्षणा द्वारा बोधित नहीं हो सकता है। इसलिए वह नियत सम्बन्धवाला ही होता है। परन्तु व्यङ्गचार्थ कहीं नियतसम्बन्ध, कहीं अनियतसम्बन्ध और कहीं सम्बद्ध-सम्बन्धवाला अर्थात् परम्परितसम्बन्धवाला भी होता है। इसलिए वह लक्ष्यार्थसे भिन्न होता है। दूसरी बात यह है कि लक्ष्यार्थकी प्रतीतिके लिए मुख्यार्थबाधका होना अनिवार्य है पर व्यङ्गयार्थकी प्रतीति उसके बिना भी हो सकती है। लक्ष्यार्थसे व्यङ्गचार्थका प्रथम भेद [प्रश्न ] क-'रामोऽस्मि सर्व सहे'-'मैं तो कठोरहृदय राम हूँ इसलिए सब कुछ सह लूँगा', इसमें [कठोरहृदय राम ]। ख-'रामेण प्रियजीवितेन तु कृतं प्रेरण: प्रिये नोचितम्' -- 'अपने जीवनका मोह करनेवाले इस रामने प्रेमके अनुरूप कार्य नहीं किया', इसमें [ मिथ्या प्रेमका दम्भ करनेवाला राम ]। ग-और 'रामोऽसौ भुवनेषु विक्रमगुणैः प्राप्तः प्रसिद्धिं पराम्' [ वह दया आदि गुणोंसे युक्त राम अपने पराक्रम आदि गुणोंसे संसारमें अत्यन्त प्रसिद्ध है ]। इत्यादिमें १. लक्षणीय अर्थ भी यद्यपि नाना प्रकारसे हो सकता है। २. [व्यञ्जनाके समान वह भी अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य आदि विविध प्रकार ] विशेष व्यवहारका हेतु है। ३. उसकी प्रतीति भी [व्यङ्गचार्थकी प्रतीतिके समान ] शब्द और अर्थ दोनोंके अधीन होती है। और [वह भी ] ४. प्रकरण आदिकी अपेक्षा रखता है। इसलिए [उस लक्षणीय अर्थसे भिन्न ] यह प्रतीयमान [व्यङ्गचार्थ] कौन-सी नयी वस्तु है ? [अर्थात् लक्ष्यार्थसे भिन्न व्यङ्गचार्थ कुछ नहीं है। अतः लक्षणासे भिन्न व्यञ्जनावृत्तिके माननेकी आवश्यकता नहीं है। यह पूर्वपक्ष हुआ]।
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२५० काव्यप्रकाश: [का० ४७, सू० ६६
उच्यते। लक्षणीयस्यार्थस्य नानात्वेपि अनेकार्थशब्दाभिधेयवन्नियतत्वमेव। न खलु मुख्येनार्थेनाऽनियतसम्बन्धो लक्षयितुँ शक्यते। प्रतीयमानस्तु प्रकरणादिविशेष- वशेन नियतसम्बन्धः अनियतसम्बन्धः सम्बद्धसम्बन्धश्च द्योत्यते। न च- अत्ता एत्थ णिमज्जइ एत्थ अहं दिअहए पलोएहि। मा पहिअ ! रत्तिअन्धअ ! सेज्जाए मह णिमज्जहिसि ॥१३६॥ [श्वश्रूरत्र निमज्जति अत्राहं दिवसके प्रलोकय। [ मा पथिक रात्र्यन्ध शय्यायां मम निमंक्ष्यसि ।। इति संस्कृतम् ] इत्यादौ विवक्षितान्यपरवाच्ये ध्वनौ मुख्यार्थवाधः। तत्कथमत्र लक्षणा ?
[उत्तरमें] कहते हैं कि -- [आपके कथनानुसार] लक्षणीय अर्थ नानाविध होनेपर भी वह अनेकार्थक शब्दके वाच्यार्थके समान नियतरूप ही होता है, क्योंकि मुख्यार्थके साथ सम्बन्ध न रखनेवाला अर्थ लक्षणा द्वारा बोधित नहीं किया जा सकता है। [इसके विपरीत प्रतीयमान ] व्यङ्गचार्थ तो प्रकरण आदि विशेषके कारण १. कहीं नियतसम्बन्ध, २. कहीं अनियतसम्बन्ध और ३. कहीं परम्परित सम्बन्ध- वाला [इस रूपसे तीन प्रकारका] द्योतित होता है[ यह लक्ष्यार्थसे व्यङ्गयार्थका पहिला भेद है, जिसके कारण व्यङ्गयार्थको लक्ष्यार्थ नहीं कहा जा सकता है]। लक्ष्यार्थसे व्यङ्गचार्थका द्वितीय भेद लक्ष्यार्थ और व्यङ्गयार्थका दूसरा भेद यह है कि लक्ष्यार्थकी प्रतीति मुख्यार्थबाधके बिना नहीं हो सकती है, परन्तु व्यङ्गयार्थके लिए वैसी बात नहीं है। यहाँ उदाहरणरूपमें जो श्लोक आगे दिया जा रहा है उसको कहनेवाली कोई दुश्चरित्रा स्त्री है। अपने यहाँ ठहरनेवाले किसी पथिकको रात्रिमें अपने तथा अपनी सासके सोनेका स्थान दिखलाती हुई कहती है कि 'तुम दिनमें अच्छी तरह देख लो कि यहाँ मैं सोती हूँ और यहाँ मेरी सास सोती है। तुमको रतौंधी आती है। कहीं ऐसा न हो कि रातमें तुम मेरी खाटपर गिर पड़ो।' यह इस श्लोकका सीधा वाच्यार्थ है और उसका बाध भी नहीं होता है। परन्तु कहनेवालीका तात्पर्य इतना ही नहीं है। वह तो पथिकको रात्रिमें अपनी खाटपर आनेका निमन्त्रण दे रही है। यहाँ वाच्यार्थ निषेधरूप होनेपर भी व्यङ्गचार्थ विधिरूप है। इसलिए वह वाच्यार्थसे भी भिन्न है। उसको न वाच्यार्थ कहा जा सकता है और न लक्ष्यार्थ अतः उसकी प्रतीतिके लिए व्यञ्जनावृत्तिका मानना आवश्यक है। और न- हे रतौंधी आनेवाले पथिक ! दिनमें अच्छी तरह देख लो कि यहाँ सासजी लेटती हैं और यहाँ मैं लेटती हूँ। [रतौंधीके कारण देख न सकनेसे रातको ] कहीं मेरी खाटपर न गिर पड़ना ॥१३६। इत्यादि अभिधामूलध्वनि [के उदाहरण] में [न ] मुख्यार्थ बाध ही है [ इलोकसे पहिले दिये 'न' का अन्वय यहाँ होता है]। तब यहाँ लक्षणा कसे हो सकती है ? [अर्थात् यहाँ मुख्यार्थका बाध न होनेसे लक्षणा नहीं है बिना लक्षणाके ही व्यङ्गचार्थकी प्रतीति हो रही है। अतः वह लक्ष्यार्थसे भिन्न ही होता है]।
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का० ४७, सू० ६६] पञ्चम उल्लास: २५१ लक्षणायामपि व्यञ्जनमवश्यमाश्रयितव्यमिति प्रतिपादितम् । यथा च समयसव्यपेक्षाऽमिधा। तथा मुख्यार्थबाधादित्रयसमयविशेषसव्यपेक्षा लक्षणा, अत एवाभिधापुच्छभूता सेत्याडुः। न च लक्षणात्मकमेव ध्वननम्, तदनुगमेन तस्य दर्शनात्। न च तदनुगतमेव, अभिधावलम्वनेनापि तस्य भावात्। न चोभयानुसार्येव, अवाचकवर्णानुसारेणापि तस्य दृष्टेः। न च शब्दानुसार्येव अशब्दात्मकनेत्रविभागावलोकनादिगतत्वेनापि तस्य प्रसिद्धेः। लक्ष्यार्थसे व्यङ्गयार्थका तीसरा भेत इसपर यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि लक्षणाका बीज अन्वयानुपपत्ति ही नहीं अपितु नागेशभट्ट आदिके मतानुसार 'तात्पर्यानुपपत्ति' भी लक्षणाका बीज है। प्रकृत उदाहरणमें यद्यपि अन्वयानुपपत्ति नहीं है तथापि तात्पर्यकी अनुपपत्तिके कारण मुख्यार्थका बाध माना जा सकता है। और उस रूपमें यहाँ दूसरे अर्थकी प्रतीति लक्षणा द्वारा ही मानी जा सकती है। इस आपत्तिको ध्यानमें रखकर ग्रन्थकारने इसीके साथ दूसरा हेतु भी जोड़ दिया है कि- लक्षणामें भी [फल या प्रयोजनका बोध करानेके लिए ] व्यञ्जनाका आश्रय अवश्य लेना होगा। यह बात [द्वितीय उल्लासमें "फले शब्दकगम्येऽत् व्यञ्जनान्नापरा करिया" इस २३ वें सूत्रमें ] प्रतिपादित कर चुके हैं। चौथा भेद : लक्षणा अभिधाकी पुच्छभूता और जैसे अभिधा सङ्गेतग्रहकी अपेक्षा करती है, इसी प्रकार लक्षणा भी मुख्यार्थबाध आदि तीन [१. मुख्यार्थबाध २. तद्योग अर्थात् लक्ष्यार्थका मुख्यार्थके साथ सम्बन्ध और ३. रूढि तथा प्रयोजन इन दोनोंमेंसे कोई एक] के सम्बन्ध विशेषकी अपेक्षा करती है। [उनके बिना अपने अर्थका बोध नहीं करा सकती है] इसलिए [विद्वान् ] उसे अभिधाकी पुच्छभूत कहते हैं। इसका अभिप्राय यह हुआ कि जैसे मुख्यार्थबाध आदिके आश्रित होनेके कारण लक्षणा अभिधासे भिन्न मानी जाती है, उसी प्रकार मुख्यार्थबाध आदिकी अपेक्षा न रखनेके कारण व्यञ्जनाको भी लक्षणासे भिन्न मानना चाहिये। इस प्रकार यहाँतक व्यञ्जनाको भिन्न सिद्ध करनेके लिए तीन हेतु दिये जा चुके हैं। आगे उसी बातको सिद्ध करनेके लिए और भी हेतु देते हैं। लक्ष्यार्थसे व्यङ्गचार्थके चार और भेद और [निम्नांकित चार कारणोंसे भी ] व्यञ्जना लक्षणारूप नहीं है, क्योंकि १. उस [लक्षणा] के बाद [व्यङ्गचार्थकी प्रतीति ] देखी जाती है। २. उस [लक्षणा ] के बिना अभिधाके अवलम्बनसे भी उस [अभिधामूला व्यञ्जना]का सम्भव होनेसे। ३. और न [अभिधा तथा लक्षणा] दोनोंकी अनु- गामिनी ही [ व्यञ्जना ] है। क्योंकि अवाचक [निरर्थक ] वर्णोंके द्वारा भी वह [व्यञ्जना ] देखी जाती है [अर्थात् वाचक तो पद होते हैं, केवल वर्ण किसी अर्थके वाचक नहीं होते हैं परन्तु वे भी किसी अर्थविशेष- के व्यञ्जक हो सकते हैं] ४. और [अभिधा तथा लक्षणाका सम्बन्ध तो केवल शब्दतक ही सीमित है। परन्तु ] व्यञ्जना केवल शब्दानुसारिणी ही नहीं है। अशब्दस्वरूप [नेत्रप्रान्तसे अवलोकन ] कटाक्ष आदिसे भी उस [अभिप्राय-विशेषकी अभिव्यञ्जनाके ] प्रसिद्ध होनेसे।
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२५२ काव्यप्रकाश: [का० ४७, सू० ६६ इति अभिधातात्पर्यलक्षणात्मकव्यापारत्रयातिवर्त्ती ध्वननादिपर्यायो व्यापारोऽनपह्रव- नीय एव। तत्र 'अत्ता एत्थ' इत्यादौ नियतसम्बन्धः, 'कस्स वा ण होइ रोसो' इत्यादाव- नियतसम्बन्धः । विपरीअरए लच्छी बह्मं दठ्ठूण णाहिकमलठ्ठं। हरिणो दाहिणणअणं रसाउला झत्ति ढक्केइ।१३७।।
इस प्रकार अभिधा, तात्पर्य और लक्षणात्मक तीनों व्यापारोंके बाद होनेवाला [अतः इन तीनों व्यापारोंसे भिन्न ] ध्वनन [व्यञ्जन, गमन ] आदि नामक व्यापारको अस्वीकार नहीं किया जाता है [उसका मानना सब प्रकारसे अनिवार्य ही है ]। पूर्वोक्त नियत-अनियत-सम्बन्धके तीन उदाहरण पृष्ठ २५० पर लक्ष्यार्थ तथा व्यङ्गयार्थका भेद बतलाते हुए लिखा था कि लक्ष्यार्थ नाना-विध होनेपर भी अनेकार्थक शब्दके अर्थके समान ही नियतरूप होता है। परन्तु प्रतीयमान अर्थ नियतसम्बन्ध, अनियतसम्बन्ध और सम्बद्धसम्बन्ध तीन प्रकारका होता है। यह बात वहाँ कह तो दी थी, पर उदाहरण द्वारा उसका स्पष्टीकरण नहीं किया जा सका था। इसलिए अब ग्रन्थकार सिंहावलोकनन्यायसे उसको उदाहरणों द्वारा स्पष्ट करते हैं। नियतसम्बन्ध और अनियतसम्बन्ध पदोंकी दो प्रकारकी व्याख्या टीकाकारोंने की है। कुछके अनुसार नियतसम्बन्धका अर्थ प्रसिद्ध सम्बन्ध और अनियतसम्बन्धका अर्थ अप्रसिद्ध सम्बन्ध होता है। दूसरोंके अनुसार नियतसम्बन्धका अर्थ वाच्यव्यङ्गयकी समानविषयता और अनियतसम्बन्धका श्ररथ दोनोंकी भिन्नविषयता है। उदाहरण दोनों दशाओंमें एक ही है। 'अत्ता एत्थ णिमज्जइ' में वाच्यार्थमें खाटपर गिर पड़नेका निषेध किया जा रहा है। पर व्यङ्गय अर्थमें उसे खाटपर आनेका निमन्त्रण दिया जा रहा है। इस प्रकार वाच्यार्थ तथा व्यङ्पार्थ, तोनों एक-दूसरेके विपरीत हैं। इसलिए उन दोनोंका विरोध सम्बन्ध है। यह विरोध सम्बन्ध प्रसिद्ध सम्बन्ध है। इसलिए प्रथम व्याख्याके अनुसार यह नियतसम्बन्ध या प्रसिद्धसम्बन्धवाले व्यङ्गयका उदाहरण हुआ। इसके विपरीत 'कस्य वा न भवति रोषो' [उदाहरण सं० १३५] अनियतसम्बन्धके उदाहरणमें प्रस्तुत किया गया है। यहाँ वाच्यार्थका नायिकासे सम्बन्ध है और व्यङ्गयार्थका सम्बन्ध नायक, पड़ोसिन, उपपति, सपत्नी, सास, उपपतिकी स्त्री आदि अनेकसे हो सकता है। इस वाच्यार्थका व्यङ्गयार्थके साथ कोई नियत या प्रसिद्ध सम्बन्ध नहीं दिखलाया जा सकता है। इसलिए प्रथम व्याख्याके अनुसार यह अ्रनियतसम्बन्धका उदाहरण है। दूसरे व्याख्याकारोंने नियतसम्बन्धसे वाच्य तथा व्यङ्गयकी समानविषयता तथा अनियतसम्बन्धसे दोनोंकी भिन्नविषयताका ग्रहण किया है।' 'अत्ता एत्थ' इत्यादि पहिले उदाहरणमें वाच्य तथा व्यङ्गय दोनों अर्थोंका विषय या बोद्धव्य एक ही व्यक्ति पथिक है इसलिए वह नियतसम्बन्धका उदाहरण है। और 'कस्य वा न भवति रोषो' इत्यादिमें वाच्यार्थका विषय सखी तथा व्यङ्गयार्थका विषय नायक, पड़ोसिन, उपपति, सपत्नी, सास, उपपतिकी स्त्री आदि अनेक हैं। इस प्रकार वाच्यार्थ तथा व्यङ्गयार्थोंका विषयभेद होनेसे यह अ्रनियतसम्बन्ध व्यङ्गयका उदाहरण है। इसीको आगे कहते हैं- उन [तीन प्रकारके व्यङ्गचार्थों ]मेंसे 'अत्ता एत्थ' इत्यादि [उदाहरण सं० १३६]में [व्यङ्गचार्थ] नियतसम्बन्ध वाला और 'कस्य वा न भवति रोषो' इत्यादि [उदाहरण सं० १३५] में अनियतसम्बन्ध- वाला है [ सम्बद्ध-सम्बन्ध अर्थात् परम्परितसम्बन्धवाले व्यङ्गयका उदाहरण अगला इ्लोक है।।
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का० ४७, सू० ६६] पञ्चम उल्लास: २५३ [विपरीतरते लक्ष्मीर्ब्रह्माणं दृष्ट्वा नाभिकमलस्थम् । हरेर्दक्षिणनयनं रसाकुला झटिति स्थगयति । इति संस्कृतम् ] इत्यादौ सम्बद्धसम्बन्धः । अत्र हि हरिपदेन दक्षिणनयनस्य सूर्यात्मकता व्यज्यते तन्निमीलनेन सूर्यास्तमयः, तेन पद्मस्य सङ्कोचः, ततो ब्रह्मणः स्थगनम्; तत्र सति गोप्या- ङगस्यादर्शनेन अनिर्यन्त्रणं निधुवनविलसितमिति। परम्परितसम्बन्धका उदाहरण [विष्णुजीके साथ ] विपरीत रतिके समय [उनकी ] नाभिके कमलमें बैठे हुए ब्रह्माको देखकर [कामके आवेगसे व्याकुल ] लक्ष्मी [स्वयं अपने व्यापारसे हट तो न सकीं, पर मेरे इस व्यापारको ब्रह्माजी न देख सकें इसलिए कमलको बन्द कर देनेके लिए ] विष्णुजीके दाहिने नेत्र [सूर्य] को ढँक देती हैं ॥१३७॥ इत्यादि [उदाहरण ]में [वाच्यार्थ तथा व्यङ्गचार्थका सम्बद्धसम्बन्ध अर्थात् ] परम्पराकृत सम्बन्ध है। यहाँ 'हरि'पदसे [ विष्णुके ] दाहिने नेत्रकी सूर्यरूपता व्यक्त होती है, उसको बन्द कर देनेसे सूर्यका अस्त होना और उससे कमलका बन्द होना, उससे ब्रह्माजीका [कमलके भीतर ] बन्द हो जाना और उनके बन्द हो जानेपर गोप्य अङ्गों [और उसके साथ ही गोप्य व्यापार ] के न देखे जानेसे निर्विघ्न सुरतविलास यह [ सब परम्परितसम्बन्धसे व्यङ्गय ] है। लक्षणासे भिन्न व्यञ्जनासाधक युक्तियोंका सारांश 'ननु रामोऽस्मि सर्वं सहे' पृष्ठ २४६ से लेकर 'विपरीत रते लक्ष्मीः' इत्यादि उदाहरण सं० १३3 तक ग्रन्थकारने यह सिद्ध किया है कि व्यञ्जनाका काम लक्षणासे भी नहीं निकल सकता है। इसलिए उसे लक्षणासे भिन्न पृथक् वृत्ति मानना ही होगा। इसमें उन्होंने निम्नलिखित छह युक्तियाँ प्रस्तुत की हैं, जिनका सारांश इस प्रकार है- (१) लक्ष्यार्थकी प्रतीतिके लिए मुख्यार्थका बाध होना आवश्यक है परन्तु 'अत्ता एत्थ णिमज्जइ' आदि उदाहरण संख्या १३६ में मुख्यार्थका बाध नहीं होता है। फिर भी निषेधपरक वाच्यार्थसे विधिपरक 'निमन्त्रण' रूप व्यङ्गय अ्र्पर्थ प्रतीत होता है। यह लक्षणाका विषय नहीं हो सकता है। इसलिए व्यञ्जना- को लक्षणासे भिन्न ही मानना होगा। (२) अररभिधा जिस प्रकार सङ्केतग्रहकी त्र्प्रपेक्षा रखती है उसी प्रकार लक्षणा मुख्यार्थबाध आ्र्प्रादि हेतुओंके बिना नहीं हो सकती है। इसलिए उसको अभिधाकी 'पुच्छभूत' कहा गया है। व्यञ्जना इन सब बन्धनोंसे मुक्त है। इसलिए वह लक्षणाके अन्तर्गत नहीं हो सकती है। उसे लक्षणासे भिन्न स्वतन्त्र वृत्ति ही मानना होगा। (३) अरपरभिधा और्प्रौर लक्षणा दोनोंमें यद्यपि एक ही शब्दसे त्र्प्रनेक अ्र्प्रथोंकी प्रतीति हो सकती है, परन्तु वह सब नियतसम्बन्धवाला अर्थ ही होता है। पर व्यञ्जनासे जिन विभिन्न अरथोंकी प्रतीति होती है वे नियतसम्बन्धवाले भी होते हैं और अनियतसम्बन्धवाले भी होते हैं तथा परम्परितसम्बन्धवाले भी होते हैं। 'अत्ता एत्थ णिमज्जइ' [ १३६ ] में व्यङ्गचार्थ नियतसम्बन्ध अर्थात् एकव्यक्तिविषयक अथवा प्रसिद्धसम्बन्धवाला है। 'कस्य वा न भवति रोषो' [१३५ ] में व्यङ्गचार्थ अ्र्प्रनियतसम्बन्धवाला अ्र्थात् वाच्य अर्थसे भिन्नविषयक अथवा अप्रसिद्धसम्बन्धवाला है। और 'विपरीतरते' [१३७ ] आदिमें परम्परित
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सम्बन्धसे व्यङ्गर्यार्थकी प्रतीति होती है। इसलिए व्यञ्जनाको अभिधा और लक्षणा दोनोंसे भिन्न मानना होगा। (४) व्यङ्गयार्थकी प्रतीति लक्ष्यार्थके साथ नहीं अपितु उसके बाद होती है। अतः व्यञ्जनाको लक्षणासे भिन्न ही मानना होगा। (५) केवल लक्षणामूलक ही नहीं अपितु अभिधामूलक व्यङ्गयार्थकी भी प्रतीति होती है, इसलिए भी व्यञ्जना लक्षणासे भिन्न है। (६) अर्प्रभिधामूलक और्प्रौर लक्षणामूलक व्यञ्जनाओंको छोड़कर कहीं निरर्थक वर्ण आदिसे और कहीं शब्दसे भिन्न कटाक्षादि व्यापारोंसे भी व्यङ्गयार्थकी प्रतीति होती है। इसलिए व्यञ्जनाको लक्षणासे भिन्न स्वतन्त्र वृत्ति मानना अनिवार्य है। इस प्रकार यहाँ व्यञ्जनाको लक्षणासे भिन्न सिद्ध करनेके लिए छह युक्तियाँ दी हैं। इसके पूर्व व्यञ्जनाको अभिधासे भिन्न सिद्ध करनेके लिए ग्रन्थकार एक दर्जनसे भी अधिक युक्तियाँ दे चुके हैं। इस प्रकार यहाँतक डेढ़ दर्जन युक्तियों द्वारा ग्रन्थकारने व्यञ्जनाको अभिधा और लक्षणा दोनोंसे भिन्न तीसरी वृत्ति सिद्ध करनेका यत्न किया है। उनके इस सारे प्रयत्नका केन्द्रबिन्दु मीमांसकोंका विरोध है। अभिहितान्वयवादी कुमारिलभट्ट, अन्विताभिधानवादी प्रभाकरभट्ट, दीर्घ-दीर्घतर अभिधाव्यापारवादी भट्टलोल्लट और 'अभिधावृत्ति- मातृका' वाले मुकुलभट्ट सभी मीमांसक हैं और वे सभी व्यञ्जनाके विरोधी हैं। इसलिए यहाँतक ग्रन्थ- कारने बड़े विस्तारके साथ उन सबके मतोंका खण्डन करके व्यञ्जनाकी सिद्धि की है तथा उसमें अपूर्व सफलता प्राप्त की है। व्यञ्जनाका आग्रह क्यों ? परन्तु इतनेसे ग्रन्थकारका कार्य समाप्त नहीं हुआ है। वे व्यञ्जनाकी प्रतिष्ठा करनेका यत्न कर रहे हैं। इसके लिए उन्हें बड़ा कड़ा सङ्गर्ष करना है। केवल साहित्यशास्त्रमें, और उसके भी अनेक सम्प्रदायोंमेंसे केवल ध्वनिसम्प्रदायमें व्यञ्जनावृत्तिकी सत्ता मानी गयी है। शेष बड़े-बड़े दार्शनिक शरर साहित्यिक सम्प्रदाय व्यञ्जनावृत्तिको नहीं मानते हैं। मीमांसक, वेदान्ती, नैयायिक और वैयाकरण सभी व्यञ्जनाविरोधी हैं, पर ध्वनिवादी आचार्योंके अनुसार साहित्यशास्त्रकी गाड़ी व्यञ्जनाके बिना एक पग भी नहीं चल सकती है। यहाँ सीधी तरहसे अभिधा द्वारा बातको कहना केवल फूहड़पन है। उसमें कोई चमत्कार नहीं, कोई रस नहीं। ऐसी नीरस शुष्क उक्ति सहृदयोंके कामकी चीज नहीं है। नैयायिक और वैयाकरण, मीमांसक और वेदान्ती इस नग्न यथार्थवादसे भले ही सन्तुष्ट हो जायँ, पर साहित्यशास्त्र तो रसप्रधान शास्त्र है। रसास्वादनके बिना सहृदयकी तृप्ति नहीं होती है और उस रसाभिव्यक्तिके लिए व्यञ्जना आवश्यक है। इसलिए कविगण सीधी तरहसे बात न कहकर, व्यञ्जना द्वारा ही बातको कहना अधिक पसन्द करते हैं। कवियोंकी वर्णनशैलीके विषयमें किसीने लिखा है- व्यङ्गयप्रधानाभिनवैव भङ्गी मुख्यार्थबाधः परमप्रकर्षः । वकोक्तयो यत्र विभूषणानि सा काचिदन्या सरणिः कवीनाम् ।। अपनी इस वक्रोक्ति और मुख्यार्थबाधवाली शैलीपर उन कवियोंको गर्व है। उनका कहना है जब वेदोंने भगवान्की स्तुति की है तो उसमें भगवान्को वैयाकरण या नैयायिक, मीमांसक या वेदान्ती नहीं कहा है। अपितु बार-बार 'कवि' कहकर ही उनकी स्तुति की है- स्तोतुं प्रवृत्ता श्रुतिरीश्वरं हि न शाब्दिकं प्राह न तार्किकं वा। ब्रूते तु तावत् कविरित्यभीक्ष्णं काष्ठा ततः सा कविता परा नः।
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का० ४७, सू० ६६ ] पञन्चम उल्लास: २५५ इस कवित्वकी कसौटी और काव्यका 'प्राण' 'व्यञ्जना' है। इसलिए यहाँ आचार्य मम्मटने इस व्यञ्जनाकी सिद्धिके लिए इतना आग्रह और इतना प्रबल प्रयत्न किया है। पर अभी तो वे केवल मीमांसकोंसे निबट पाये हैं, वेदान्ती, वैयाकरण और नैयायिक आदिसे निबटना अभी शेष है। इसलिए इस उल्लासके शेष भागमें वे इन तीनों मतोंका खण्डनकर व्यञ्जनाकी स्थापना करनेका यत्न करेंगे। 'एका क्रिया द्वचर्थकरी प्रसिद्धा' अगले अनुच्छेदमें ग्रन्थकार 'अखण्डार्थतावाद'की चर्चा उठाकर उसमें भी व्यञ्जनावृत्तिकी मान्यताका प्रतिपादन करेंगे। यह अखण्डार्थताका सिद्धान्त वेदान्ती और वैयाकरण दोनों मानते हैं। इसलिए इस एक ही सिद्धान्तकी आरपलोचना द्वारा उन्होंने वेदान्ती तथा वैयाकरण दोनोंके व्यञ्जना-विरोधी मतकी एक साथ ही आलोचना कर दी है। इस प्रक्रियासे लेखमें कुछ लाघव तो हो गया है, परन्तु ग्रन्थकी पंक्तियाँ अस्पष्ट और क्लिष्ट हो गयी हैं। टीकाकार भी यहाँ चक्करमें पड़ जाते हैं कि यह किसके मतकी आलोचना की जा रही है। 'सारबोधिनी' और 'बालबोधिनी' टीकाकारोंने इसे वेदान्तियोंकी आालोचना- परक माना है और प्रभाकरने इसे वैयाकरणोंकी आलोचनापरक माना है। पर वास्तवमें ग्रन्थकारने यहाँ एक ही तीरसे दो निशाने मारे हैं। इस अखण्डार्थतावादकी आलोचना द्वारा उन्होंने वेदान्तियों और वैयाकरणों दोनोंके मतोंकी आलोचना कर दी है। उनकी यह एक ही करिया 'द्वयर्थकरी' हो गयी है। वेदान्तियोंका अखण्डार्थतावाद (१) शब्दबोधकी प्रक्रियामें साधारणतः 'पदार्थसंसर्गबोध'को 'वाक्यार्थ' कहा जाता है। वाक्यमें प्रयुक्त हुए पदोंसे पहिले 'पदार्थों की उपस्थिति होती है। उसके बाद उन पदार्थोंका परस्पर सम्बन्ध होता है। इसी 'पदार्थसंसर्गको' वाक्यार्थ कहा जाता है। इसलिए सभी वाक्य साधारणतः 'पदार्थ- संसर्गगोचरप्रतीति'को उत्पन्न करते हैं। परन्तु वेदान्तियोंने एक प्रकारके ऐसे वाक्योंकी भी कल्पना की है, जो संसर्गविषयक प्रतीतिको नहीं कराते हैं। ऐसे वाक्योंको वे 'अखण्डार्थवाक्य' कहते हैं। वेदान्तग्रन्थोंमें 'संसर्गगोचरप्रमिति- जनकत्वम् अखण्डार्थत्वम्' यह अखण्डार्थका लक्षण किया गया है। इस श्रेणीमें मुख्यरूपसे लक्षणवाक्य आते हैं। लक्षणवाक्योंको अखण्डार्थवाक्य माननेका मुख्य आधार, प्रश्न और प्रतिवचनके सारूप्यका सिद्धान्त है। जिस विषयमें प्रश्न किया जाय उसी विषयमें उत्तर दिया जाय यह एक सामान्य सिद्धान्त है। प्रश्न कुछ किया जाय, उत्तर कुछ और ही दिया जाय तो यह उचित नहीं है। किसी पदार्थके स्वरूपकी जिज्ञासा होनेपर लक्षणवाक्य द्वारा उसका उत्तर दिया जाता है। जैसे कोई पूछे कि आकाशमें 'कतमश्चन्द्रः' चन्द्रमा कौन-सा है ? तो उत्तर देनेवाला कहता है कि 'प्रकृष्ट प्रकाशश्चन्द्रः' जो सबसे अधिक प्रकाश- मान है वह चन्द्रमा है। यहाँ चन्द्रमाके स्वरूगके विषयमें प्रश्न है तो उत्तर भी स्वरूपमात्रविषयक ही होना चाहिये। इसलिए 'प्रकृष्टप्रकाशश्चन्द्रः' इस उत्तर-वाक्यको केवल स्वरूपपरक मानना चाहिये, संसर्गपरक नहीं। अर्थात् इससे पदार्थसंसर्गका बोध नहीं होता है। सामान्य वाक्योंके समान इसको भी यदि 'संसर्गगोचरप्रमिति' का जनक मान लिया जाय तब तो 'आम्रान् पृष्टः कोविदारान् शचष्टे'वाली बात हो जायगी। प्रश्न स्वरूंपविषयक है। उत्तर संसर्गविषयक हो, यह उचित नहीं है। अतः यह वाक्य, संसर्गका नहीं स्वरूपमात्रका बोधक होनेसे, अखण्डार्थवाक्य कहलाता है। इसी प्रकार सारे लक्षण- परक वाक्य, 'संसर्गगोचरप्रमिति'के जनक होनेसे 'अखण्डार्थ' वाक्य कहलाते हैं। 'तत्त्वमसि', 'सोऽयं देवदत्तः' आररादि वाक्योंको भी वेदान्ती अ्र्रखण्डार्थ वाक्य ही मानते हैं। यह शखण्डवाक्यकी एक व्याख्या है।
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(२) परन्तु दूसरे व्याख्याकारोंने 'अर््खण्डार्थवाक्य'की व्याख्या प्रकारान्तरसे की है। साधा- रणतः क्रियाकारकभावको स्वीकार कर उत्पन्न होनेवाले शब्दबोधको 'सखण्डबोध' कहा जाता है, क्योंकि उसमें वाक्यका क्रिया, कारक आदि रूपमें अनेक खण्डोंमें विश्लेषण किया जा सकता है। उससे भिन्न अर्थात् जिसमें करिया-कारकभाव आदि रूप खण्डोंमें वाक्य या वाक्यार्थका विभाग न किया जा सके उसको 'अखण्डवाक्य' या 'अखण्डवाक्यार्थ' कहा जाता है। 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या' इस वेदान्त-सिद्धान्तमें यह सारा जगत् और उसमें दिखलायी देनेवाला नानात्व ही मिथ्या है। इसलिए उनके सिद्धान्तमें धर्म-धर्मिभाव तथा क्रिया-कारकभाव आदि भी मिथ्या है। अतएव उनके यहाँ पारमार्थिक रूपमें अभिधा और लक्षणा, व्यञ्जना आदिकी सत्ता नहीं मानी जाती है। पर व्यावहारिकरूपमें अभिधा और लक्षणाकी सत्ता मानते हैं। लक्षणाके साहित्य आदि अन्य शास्त्रोंमें केवल 'उपादानलक्षणा' तथा 'लक्षणलक्षणा' ये दो ही भेद माने गये हैं। इनके ही दूसरे नाम कमशः 'अजहल्लक्षणा' तथा 'जहल्लक्षणा' रखे गये हैं। पर वेदान्तियोंने 'तत् त्वमसि' इत्यादि महावाक्योंके अर्थके लिए 'अभिधा' और 'अजहल्लक्षणा' तथा 'जहल्ल- क्षणा' इन तीनोंसे अतिरिक्त 'जहदजहल्लक्षणा' नामक एक चौथा व्यापार भी माना है। उसको वे 'भागत्यागलक्षणा' भी कहते हैं। इस प्रकार वेदान्तियोंके मतमें परमार्थमें तो ब्रह्मको छोड़कर और सब कुछ ही मिथ्या है। न अभिधा है, न लक्षणा और न व्यञ्जना। न अखण्डवाक्य है, न सखण्डवाक्य। पर व्यवहारकालमें 'व्यवहारे भट्टनयः'के अ्र्पनुसार यहाँ उनको अ्र्पखण्डवाक्य तथा अखण्डवाक्यार्थतावादी कहा गया है। वैदान्तानुसारिणी शखण्डवाक्यकी इन दोनों व्याख्याओंमें 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म', 'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म', 'नेह नानास्ति किञ्चन', 'तत् त्वमसि', 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्यादि वाक्योंसे अखण्डबुद्धि ही उत्पन्न होती है। उस अखण्डबुद्धिसे निर्ग्राह्य परब्रह्म ही वाक्योंका अर्थ होता है। अतएव वही उन वाक्योंका वाच्यार्थ कहलाता है और वे वाक्य ही अखण्ड ब्रह्मके वाचक होते हैं। यह 'काव्यप्रकाश'की अ्खण्डब्रुद्धिनिर्ग्राह्यो वाक्यार्थ एव वाच्यः, वाक्यमेव च वाचकम् इत्याहुः इस पूर्वकी पंक्तिका अर्थ है। इसके खण्डनमें ग्रन्थकारने 'तैरप्यविद्यापदपतितैः पदपदार्थकल्पना कर्तव्यैव' यह जो पंक्ति लिखी है उसका आशय यह है कि 'व्यवहारे भट्टनयः' इस सिद्धान्तके अ्र्प्रनुसार वेदान्ती भी व्यवहारदशामें जगत्की दृश्यमान स्थितिको स्वीकार करते ही हैं। इसलिए उनको भी पद-पदार्थ आदिकी कल्पना करनी होगी। और उस दशामें 'निश्शेषच्युतचन्दनम्' इत्यादि उदाहरणोंमें निषेधवाक्यसे जो विधिरूप अर्थ प्रतीत होता है उसको व्यञ्जनाका विषय मानना ही होगा। इस प्रकार इस पंक्ति द्वारा ग्रन्थकारने वेदान्तसिद्धान्तमें भी व्यञ्जनाकी अपरिहार्यताका प्रतिपादन किया है। कुछ व्याख्याकारोंके अनुसार इस पंक्तिमें केवल वैयाकरणोंके अखण्डवाक्यार्थता- सिद्धान्तकी आ्रालोचना की गयी है : परन्तु यह ठीक नहीं है। पंक्तिमें आरया हुआ 'अविद्यापदपतितैः' शब्द विशेषरूपसे वेदान्तमतकी ओर सङ्केत कर रहा है। वैयाकरणोंका अखण्डार्थवाद वेदान्तियोंके समान वैयाकरण भी अखण्डार्थतावादी हैं। अन्तर इतना है कि वेदान्तियोंके अरद्वितीय ब्रह्मतत्त्वके स्थानपर वैयाकरण एकमात्र 'स्फोट'रूप 'शब्दब्रह्म' को मानते हैं। इन अखण्डार्थ- वादी वैयाकरणोंके सिद्धान्तकी त्रपलोचना आरागे देते हैं।
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का० ४७, सू० ६६ ] पञ्चम उल्लास: २५७ अखण्डबुद्धिनिर्ग्राह्यो वाक्यार्थ एव वाच्यः, वाक्यमेव च वाचकम्' इति येऽप्याहुः, तैरप्यविद्यापदपतितैः पदपदार्थकल्पना कर्त्तव्यैवेति तत्पक्षेऽ्प्यवश्यमुक्तोदाहरणादौ विध्यादिर्व्यङ्गय एव।
पदमें वर्ण और वाक्यमें पदोंको अलग-अलग नहीं माना जा सकता है। 'वैयाकरणभूषण'में लिखा है -- पदे न वर्णा विद्यन्ते वर्णेष्ववयवा न च। वाक्यात् पदानामत्यन्तं प्रविवेको न कश्चन ।।३८८।। भर्तृहरिने भी अपने 'वाक्यपदीय' नामक ग्रन्थमें इसी विषयका प्रतिपादन करते हुए लिखा है- ब्राह्मणार्थो यथा नास्ति कश्चिद् 'ब्राह्मणकम्बले'। देवदत्तादयो वाक्ये तथैव स्युरनर्थकाः ॥ उपायाः शिक्ष्यमाणानां बालानामुपलालनाः । असत्ये वर्त्मनि स्थित्वा ततः सत्यं समीहते। अर्थात् जैसे ब्राह्मणका कम्बल 'ब्राह्मणकम्बल' इस पदमें समस्त पदका तो अर्थ है, परन्तु ब्राह्मण शब्दका कोई अलग अर्थ नहीं है उसी प्रकार किसी भी वाक्यमें उसके अलग-अलग पदोंका कोई अर्थ नहीं होता है। समष्टिरूपसे ही वाक्यका अर्थ होता है। इसीको 'अखण्डवाक्यार्थताका सिद्धान्त' कहते हैं। वैयाकरण लोग इधर तो इस अखण्डवाक्यार्थताके सिद्धान्तका प्रतिपादन करते हैं और उधर प्रत्येक पदके प्रकृति-प्रत्यय आदिका भी विभाग करते हैं। इस विरोधाभासका उपपादन करनेके लिए ही भर्तृहरिने दूसरा श्लोक लिखा है। उसका अभिप्राय यह है कि यह प्रकृति, प्रत्यय आदिका विभाग तो केवल बालकोंकी शिक्षाके लिए किया जाता है। 'शाखा अरुन्धतीन्याय' से बालकोंको समझानेके लिए पहिले असत्य मार्गका अवलम्बन कर बादको सत्यतक पहुँचाया जाता है। वैयाकरण-सिद्धान्तके पक्षमें मूल ग्रन्थका 'अविद्यापदपतितैः' शब्द इसी 'असत्ये वत्मनि स्थित्वा'की ओर सङ्केत कर रहा है। इस प्रकार अखण्डवाक्यार्थका सिद्धान्त वेदान्त और व्याकरण, दोनों मतोंमें समान रूपसे माना गया है। इसलिए ग्रन्थकारने दोनों मतोंकी आलोचना एक साथ ही कर दी है। पंक्तियोंका अरथ निम्नलिखित प्रकार है- जो [वेदान्ती या वैयाकरण ] यह कहते हैं कि 'अखण्डबुद्धिसे ग्राह्य वाक्यार्थ ही वाच्य होता है और [अखण्ड ] वाक्य ही [ उसका ] वाचक होता है' उनको भी अविद्याकी स्थितिमें [ व्यवहारकालमें] आकर पद-पदार्थकी कल्पना करनी ही होगी। इसलिए उनके पक्षमें भी उक्त [ 'निःशेषच्युतचन्दनं' इत्यादि ] उदाहरण [सं० २] में विधि आदिको व्यङ्गय मानना होगा। नैयायिक महिमभट्टका मत इस प्रकार यहाँतक मीमांसक, वेदान्ती तथा वैयाकरणोंके मतमें व्यञ्जनाके विपरीत जो कुछ युक्तियाँ दी जा सकती थीं, उनका खण्डन कर व्यञ्जनावृत्ति सिद्ध करनेका प्रयत्न किया गया है। अब व्यञ्जनाविरोधी एक महिमभट्टका मत और रह जाता है जिसकी आलोचना आवश्यक है। महिमभट्ट न्यायाचार्य थे, उन्होंने मुख्यतः न्यायकी प्रक्रियाका अवलम्बनकर व्यञ्जनाको अनुमानप्रमाणके अन्तर्गत करनेका प्रयत्न किया है। उनके ग्रन्थका नाम 'व्यक्तिविवेक' है। इसमें उन्होंने ध्वनिको सामान्यरूपसे भी अनुमानके अन्तर्गत सिद्ध किया है और उनके उदाहरणोंको भी अलग-अलग लेकर उसमें प्रतीत होने- १७
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ननु वाच्यादसम्बद्धं तावन्न प्रतीयते, यतः कुतश्चिद् यस्य कस्यचिदर्थस्य प्रतीते: प्रसङ्गात्। एवं च सम्बन्धाद् व्यङ्गयव्यञ्जकभावोऽप्रतिबन्धेऽवश्यं न भवतीति व्याप्तत्वेन नियतधामनिष्ठत्वेन च त्रिरूपाल्लिङ्गाल्लिङ्गिज्ञानमनुमानं यत् तद्रूपः पर्यवस्यति।
वाले व्यङ्गयार्थको अनुमानका विषय सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है। यह मत मुख्यरूपसे न्यायकी अनुमानप्रक्रियापर आधारित है इसलिए इस मतको हम न्यायमत कह सकते हैं। इस मतकी आलोचनाके लिए पहिले इस सिद्धान्तका उपपादन करते हैं। [पूर्वपक्ष ] वाच्यसे असम्बद्ध अर्थ तो प्रतीत नहीं होता है। क्योंकि [यदि वाच्यसे असम्बद्ध अर्थकी प्रतीति हो तो ] जिस किसी भी शब्दसे जो कोई भी अर्थ प्रतीत होने लगेगा। इस प्रकार [व्यङ्गय और व्यञ्जकका ] सम्बन्ध अनिवार्य होनेसे व्यङ्गयव्यञ्जकभाव [प्रतिबन्ध अर्थात् ] व्याप्तिके बिना निश्चय ही नहीं हो सकता है। इसलिए व्याप्तियुक्त और नियतधर्मो [अर्थात् पक्ष ] में रहनेसे [अर्थात् व्याप्ति तथा पक्षधर्मतायुक्त होनेसे पक्षसत्त्व, सपक्षसत्त्व और विपक्षव्यावृत्तत्वरूप ] तीन रूपोंवाले [ धूमा- दिरूप हेतुके समान] लिङ्गसे, लिङ्गी [अर्थात् वह्नि आदिके समान साध्य ] का जो अनुमान उसी रूपमें [व्यङ्गचव्यञ्जकभावका भी] पर्यवसान होता है। यहाँ महिमभट्ट व्यङ्गयव्यञ्जकभावको न्यायकी प्रत्रियाके अनुसार अ्र्प्नुमानके अ्र्प्रन्तर्गत करनेका यत्न करते हैं। इसलिए अनुमानकी प्रक्रियाको समझ लेना आवश्यक है। अनुमानकी प्रक्रियामें 'व्याप्ति' और 'पक्षधर्मता' दो अंश मुख्य हैं। 'हेतु' और 'साध्य'के साहचर्यनियमको 'व्याप्ति करते हैं। जैसे 'जहाँ-जहाँ धुआँ होता है वहाँ-वहाँ अग्नि होती है' यह धूम और अग्निका साहचर्यनियम 'व्याप्ति' कहलाता है। व्याप्तिका ग्रहण हुए बिना अनुमान नहीं हो सकता है। इसलिए व्याप्ति 'अनुमान' का सबसे मुख्य भाग है। अनुमानका दूसरा मुख्य भाग 'पक्षधर्मता' है। 'सन्दिग्धसाध्यवान् पक्षः' यह 'पक्ष' का लक्षण किया गया है। जिसमें साध्य सन्दिग्ध अवस्थामें रहता है उसको 'पक्ष' कहते हैं। जैसे जबतक पर्वतमें वह्निकी सिद्धि नहीं हो जाती है तबतक 'सन्दिग्धसाध्यवान्' होनेसे इस अनुमानमें पर्वत 'पक्ष' कहलाता है। धूमरूप 'हेतु'का इस पक्षमें रहना आवश्यक है। अन्यथा 'व्याप्ति'का ज्ञान रहनेपर भी पर्वतपर वह्निकी सिद्धि नहीं हो सकती है। धूमादिरूप 'लिङ्ग' की पर्वतरूप पक्षमें स्थितिको ही 'पक्षधर्मता' कहा जाता है। इस प्रकार अनुमानके लिए 'व्याप्ति' तथा 'पक्षधर्मता' की अनिवार्यरूपसे आरवश्यकता है। इन्हीं दोनों बातोंको मूल ग्रन्थमें क्रमशः 'व्याप्तत्वेन' तथा 'नियतधर्मिनिष्ठत्वेन' इन दो पदोंसे सूचित किया है। इसके साथ अनुमानमें जो 'लिङ्ग' या 'हेतु' होता है उसमें १. पक्षसत्त्व, २. सपक्षसत्त्व, ३. विपक्षव्यावृत्तत्व, ये तीन धर्म भी अनिवार्य माने गये हैं। इनमेंसे 'सन्दिग्धसाध्यवान् पक्षः', 'निश्चित- साध्यवान् सपक्षः', 'निश्चितसाध्याभाववान् विपक्षः' ये पक्ष, सपक्ष और विपक्षके लक्षण किये गये हैं। जहाँ साध्य वह्नि आदि सन्दिग्ध अवस्थामें रहते हैं उसको 'पक्ष' कहते हैं। जैसे कि वह्निविषयक अनुमान- में पर्वत 'पक्ष' है। जिसमें साध्य निश्चितरूपसे रहता है उसको 'सपक्ष' कहते हैं, जैसे उसी अनुमान में महानस या रसोईघर 'सपक्ष' है, क्योंकि महानसमें साध्य वह्नि निश्चितरूपसे विद्यमान रहती है। और जहाँ साध्यका अभाव निश्चितरूपसे रहता है उसको 'विपक्ष' कहते हैं। जैसे तालाब या महाह्रद 'विपक्ष' है, क्योंकि उसमें साध्य वह्निका अभाव निश्चितरूपसे रहता है। जो शुद्ध हेतु होता है उसको पक्ष तथा
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तथा हि -- भम धम्मिअ वीसद्वो सो सुणओ अज्ज मारिओ तेण। गोलाणईकच्छकुडंगवासिणा दरिअसीहेण ।१३८। [भ्रम धार्मिक विश्वस्तः स शुनकोज्द्य मारितस्तेन। गोदानदीकच्छकुञ्जवासिना दृप्तसिंहेन ।। इति संस्कृतम् ।]
सपक्षमें अवश्य रहना चाहिये तथा विपक्षमें उसका सदैव अभाव रहना चाहिये। ये ही 'पक्षसत्त्व', 'सपक्षसत्त्व' तथा 'विपक्षव्यावृत्तत्व' लिङ्गके तीन रूप कहलाते हैं। इन तीन रूपोंसे युक्त हेतु ही शुद्ध हेतु कहलाता है। इनमेंसे किसी भी एक धर्मकी न्यूनता हो जानेपर हेतु हेतु नहीं रहता अपितु 'हेत्वाभास' कहलाने लगता है। इन्हीं तीनों रूपोंका निर्देश यहाँ ग्रन्थकारने 'त्रिरूपाल्लिङ्गाल्लिङ्गिज्ञानम् अनुमानम्' कहकर किया है। इस प्रकार 'व्याप्ति' तथा 'पक्षधर्मता' युक्त एवं 'त्रिरूपविशिष्ट' लिङ्गसे लिङ्गीका जो ज्ञान होता है वह अनुमान कहलाता है और व्यङ्गय अर्थकी प्रतीति भी 'व्याप्ति' [सम्बन्धात् ] और पक्षधर्मता [नियतधमिनिष्ठत्वेन] के बिना नहीं होती है। इसलिए व्यङ्गय-व्यञ्जकभावकी प्रतीति भी अनुमानरूप ही ठहरती है। यह महिमभट्टके पूर्वपक्षका युक्तिक्रम हुआ्रा। उसीको उदाहरण द्वारा स्पष्ट करते हैं। जैसे कि -- हे पण्डितजी [धार्मिक]! अब आप निश्शङ्क होकर भ्रमण करें। गोदावरीके कछारके कुञ्जमें रहनेवाले उस दूप्त [अभिमानी ] सिंहने आज उस कुत्तेको [ जो आपको तंग किया करता था] मार डाला ॥१३८॥ यह श्लोक 'गाथासप्तशती' के द्वितीय शतकमें आया हुआ ७५ वाँ श्लोक है। गोदावरी नदीके किनारे किसी उद्यानमें किसी स्त्रीने अपना निवासस्थान बना रखा था जहाँ उसका उपपति उससे मिलने आता था। कोई दूसरे पण्डितजी उसी उद्यानमें अपने पूजा-पाठके लिए फूल आदि लेने और भ्रमण करनेके लिए आते थे। इनके आनेसे उस स्त्रीके कार्यमें विघ्न पड़ता था। इसलिए उसने इस प्रकारका उपाय निकाला कि जिससे पण्डितजी उधरका आना-जाना बन्द कर दें। इसी दृष्टिसे उसने इस श्लोक द्वारा पण्डितजीको सिंह द्वारा कुत्तेके मारे जानेकी सूचना दी है। वह जानती है कि पण्डितजी बड़े डरपोक आदमी हैं। बागमें जो कुत्ता रहता था उससे ही वे इतना डरते थे तो सिंहका नाम सुनकर वह उधरका आना- जाना अवश्य ही भूल जायँगे। इसलिए उसने पण्डितजीको यह सूचना दी कि गोदावरीके किनारेके कुञ्जमें रहनेवाले सिंहने उस कुत्तेको आज मार डाला है। यहाँ वाच्यार्थ 'भ्रम धार्मिक' विधिरूप है, पर व्यङ्गचार्थ निषेधमें पर्यवसित होता है। स्त्री कह तो यह रही है कि पण्डितजी, अब आप निश्चिन्त होकर भ्रमण करें। पर उसका अभिप्राय यह है कि अब इधर भूलकर भी आनेका विचार न करना, नहीं तो जो दशा आज सिंहने कुत्तेकी की है वही दशा किसी दिन आपकी भी हो सकती है। व्यञ्जनावादी इस निषेध- रूप अर्थको व्यङ्गचार्थ मानते हैं। परन्तु महिमभट्ट उसको अनुमिति तपर्थात् अनुमानजन्य प्रतीतिका विषय मानते हैं। हम ऊपर दिखला चुके हैं कि अनुमानके मुख्यरूपसे दो अङ्ग होते हैं-एक 'व्याप्ति' तथा दूसरा 'पक्षधर्मता'। इनमेंसे व्याप्तिके भी दो रूप होते हैं-एक अन्वयव्याप्ति, दूसरी व्यतिरेकव्याप्ति। अन्वयव्याप्ति धूम और वह्नि जैसे भावपदार्थोंकी होती है और व्यतिरेकव्याप्ति वह्नयभाव तथा धूमाभाव
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अत्र गृहे श्वनिवृत्त्या भ्रमणं विहितं गोदावरीतीरे सिंहोपलब्धेरभ्रमणमनुमापयति। यद् यद् भीरुभ्रमणं तत्तद्गयकारणनिवृत्त्युपलब्धिपूर्वकम्, गोदावरीतीरे च सिंहोपलब्धि- रिति व्यापकविरुद्धोपलब्धिः ।
जैसे अभावपदार्थोंकी होती है। 'यत्र यत्र धूमस्तत्न तव वह्निः' यह अन्वयव्याप्ति है। इसके विपरीत 'यत्र यत्र बह्नयभावः तत्र तत्र घूमाभावः' यह व्यतिरेकव्याप्ति है। महिमभट्ट यहाँ गोदावरी- तीरपर पण्डितजीके न जाने अर्थात् भ्रमणाभावके बोधके लिए व्यतिरेकव्याप्तिका आश्रय लेते हैं। गोदावरीका किनारा आप जैसे भीरुतंके लिए भ्रमण योग्य नहीं है यह बात सिद्ध करनी है। श्लोकमें विधिरूपसे 'भ्रम' 'भ्रमण करो' यह कहा है। साथमें ही गोदावरी-तीरपर सिंहके रहनेकी सूचना भी दी गयी है। पण्डितजी जैसे भीरु व्यक्तिका भ्रमण तो तब बन सकता था जब भयका कारण वहाँ न होता। परन्तु वहाँ सिंहरूप भयका कारण विद्यमान है। इसलिए यहाँ 'भयकारणोपलब्धि' रहनेसे साध्याभाव अर्थात् 'भयकारणानुपलब्धि'का अभाव अर्थात् 'भयकारणोपलब्धि' पाया जाता है। उससे साध्य, विधिरूप भ्रमणका तभाव, अर्थात् भ्रमणका निषेध, भ्रमणाभाव ही सिद्ध हो सकता है। इसको त्र्परनुमान- वाक्यके रूपमें इस प्रकार कहा जा सकता है- १. गोदावरी-तीरं भीरुभ्रमणायोग्यं-[प्रतिज्ञा या साध्य] २. भयकारणसिंहोपलब्धे :- [हेतु या साधन ] ३. यद्यत् भीरुभ्रमणयोग्यं तत्तद्भयकारणाभाववत् यथा गृहम्-[ व्यतिरेकव्याप्ति सहित उदाहरण] ४. न चेदं तीरं तथा भयकारणाभाववत् सिंहोपलब्धे :- [उपनय] ५. तस्मात् भीरुभ्रमणायोग्यम् [निगमन] इस प्रकारके पञ्चावयव-वाक्यसे अनुमान द्वारा महिमभट्ट भ्रमणनिषेधको सिद्ध करते हैं और उसके लिए व्यञ्जनावृत्ति माननेवाले व्यञ्जनावादीके सिद्धान्तका खण्डन करते हैं। इसी बातको ग्रन्थ- कारने इस प्रकार दिखलाया है- यहाँ [भ्रम धार्मिक इत्यादि श्लोकमें गोदावरीतीरवर्ती ] घरमें [रहनेवाले ] कुत्तेके न रहनेसे विहित भ्रमण, [हेतु या लिङ्ग ] गोदावरीतीरपर सिंहके रहनेके ज्ञानके द्वारा भ्रमणके अभाव [साध्य] का अनुमान कराता है। जो-जो भीरुओंका भ्रमण होता है वह-वह भयकारणके अभावके ज्ञानपूर्वक होता है [ यह व्याप्ति है]। और गोदावरीके किनारे [भयके कारण ] सिंहकी उपलब्धि [अर्थात् साधनाभाव ] है। इसलिए [साध्य भीरुभ्रमणकी व्यापिका जो भयकारणके अभावकी उपलब्धि उसके विरुद्ध जो भय-कारण उसकी उपलब्धि अर्थात् अभाव साधक सिंहोपलब्धिरूप ] व्यापक विरुद्ध [अर्थात् व्यतिरेकव्याप्ति] की प्रतीति होती है। इसलिए [ व्यतिरेकी अनुमानके द्वारा भ्रमणनिषेधकी प्रतीति हो जाती है। उसके लिए व्यञ्जनाकी आवश्यकता नहीं है। यह पूर्वपक्ष हुआ ]। महिमभट्टके अनुमानका खण्डन इस प्रकार यहाँतक महिमभट्टके मतानुसार अ््प्रनुमान द्वारा भ्रमणनिषेधको सिद्ध करनेकी प्रक्रिया दिखलायी है। आगे ग्रन्थकार यह दिखलाते है कि महिमभट्ट द्वारा प्रस्तुत किया गया यह हेतु, हेतु नहीं अपितु 'हेत्वाभास' है। पाँच प्रकारके हेत्वाभासोंमेंसे १. अनैकान्तिक, २. विरुद्ध, और ३. स्वरूपा- सिद्ध तीन प्रकारके हेत्वाभासोंके लक्षण महिमभट्टके इस हेतुमें पाये जाते हैं।
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अत्रोच्यते-भीरुरपि गुरोः प्रभोरवा निदेशेन, प्रियानुरागेण, अन्येन चैवंभूतेन हेतुना सत्यपि भयकारणे भ्रमतीत्यनैकान्तिको हेतुः। शुनो विभ्यदपि वीरत्वेन सिंहान्न विभेतीति विरुद्धोऽपि। गोदावरीतीरे सिंहसद्द्ावः प्रत्यक्षादनुमानाद्वा न निश्चितः अपि तु वचनात्। न च वचनस्य प्रामाण्यमस्ति अर्थेनाप्रतिवन्धादित्यसिद्धश्च। तत्कथमेवं- विधाद्धेतोः साध्यसिद्धिः ।
प्रत्येक शुद्ध हेतुमें १. पक्षसत्त्व, २. सपक्षसत्त्व तथा ३. विपक्षव्यावृत्तत्व इन तीनों रूपोंका होना आवश्यक है। यदि उनमेंसे किसी एक भी धर्मकी न्यूनता हो जाती है तो वह हेतु, हेतु नहीं रह जाता है अपितु 'हेत्वाभास' बन जाता है। जो हेतु पक्षमें न पाया जाय अर्थात् पक्षसत् न हो वह 'स्वरूपा- सिद्ध' नामक 'हेत्वाभास' कहलाता है और जो हेतु विपक्षव्यावृत्तत्व धर्मसे रहित है वह 'अनकान्तिक हेत्वाभास' कहलाता है। यहाँ महिमभट्टने 'सिंहोपलब्धि'को 'भीरुभ्रमणायोग्यत्व' सिद्ध करनेके लिए हेतुरूपमें प्रस्तुत किया है। किन्तु यह अनैकान्तिक हेतु है। जहाँ-जहाँ भीरुभ्रमण होता हो, वहाँ भयके कारणका आभाव हो, इस प्रकारकी कोई व्याप्ति भी नहीं है। क्योंकि युद्धादिमें भयके कारणोंको जानते हुए भी राजाकी आज्ञासे भीरु सनिक आदिको जाना ही पड़ता है। इसी प्रकार कहीं प्रभुकी आज्ञासे, कहीं गुरुकी आाज्ञासे और कहीं प्रियाके अनुरागसे भयके कारणके होते हुए भी भीरकी भी प्रवृत्ति पायी जाती है। इसलिए यह हेतु 'अनैकान्तिक' है। इसके अतिरिक्त दूसरा दोष यह है कि गोदावरीतीर यहाँ 'पक्ष' है। उसमें 'सिंहोपलब्धि'- रूप हेतुका निश्चतरूपसे होना आवश्यक है। यदि अनुमान करनेवाले पण्डितजीने गोदावरी-तीर- रूप पक्षमें सिंहको देखा होता तब तो उसको 'पक्षसत्' हेतु कहा जा सकता था। परन्तु पण्तिडजीने उसे देखा तो नहीं है। केवल उस स्त्रीके कथनसे ही उनको उसका ज्ञान हो रहा है। परन्तु जो वचन कहा जाय वह प्रमाण ही हो, इस प्रकारकी कोई व्याप्ति न होनेसे वचनमात्रको प्रमाण नहीं माना जा सकता है। इसलिए गोदावरी-तीरपर सिंहकी सत्ता निश्चित नहीं है। फलतः 'यो हेतुराश्रये नावगम्यते स स्वरूपासिद्धः इस लक्षणके अनुसार 'सिंहोपलब्धि' रूप हेतुके गोदाव रीतीररूप 'पक्ष'में निश्चितरूपसे गृहीत न होनेसे यह हेतु 'स्वरूपासिद्ध' हेत्वाभास हो जाता है। इस प्रकारके हेतुके 'अनैकान्तिक' तथा 'स्वरूपासिद्ध' होनेसे अ्पनुमान द्वारा भ्रमणनिषेधका ज्ञान नहीं हो सकता है। अतः उसके ज्ञानके लिए व्यञ्जनावृत्ति अवश्य माननी चाहिये। यह सिद्धान्तपक्ष हुआ्ररा। इस [पूर्वपक्षके होने ] पर [उसके खण्डनके लिए ] कहते हैं कि-भीरु भी प्रभुकी अथवा गुरुकी आज्ञासे अथवा प्रियाके अनुरागसे अथवा इसी प्रकारके किसी अन्य कारणसे भयका कारण होनेपर भी घूमता है। इसलिए यह हेतु . 'अनकान्तिक' [हेत्वाभास ] है। और कुत्तेसे डरनेपर भी वीर होनेसे सिंहसे नहीं डरता है। इसलिए २. 'विरुद्ध' [हेत्वाभास ] भी है। [तीसरा दोष यह है कि ] गोदावरीके किनारे सिंहका होना प्रत्यक्षसे तथा अनुमानसे निश्चित नहीं हुआ है किन्तु वचनसे। अर्थके साथ [वचनका ] प्रतिबन्ध [अर्थात् वचनसे जिस अर्थकी प्रतीति हो वह अर्थ अवश्य होना ही चाहिये इस प्रकारका नियम या व्याप्ति] न होनेसे वचनका प्रामाण्य नहीं है। इसलिए [ पक्षमें हेतुके न होनेसे] ३. 'स्वरूपासिद्ध' [हेत्वाभास ] भी है। तो इस प्रकार के [त्रिदोषग्रस्त ] हेतुसे साध्यकी सिद्धि किस तरह [अनुमान द्वारा] हो सकती है ? [अर्थात् अनुमान द्वारा सिद्धि नहीं हो सकती है।]
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तथा निःशेषच्युतेत्यादौ गमकतया यानि चन्दनच्यवनादीन्युपात्तानि, तानि कार- णान्तरतोऽपि भवन्ति, अतश्चात्रैव स्नानकार्यत्वेनोक्तानीति नोपभोगे एव प्रतिवद्धानीत्य- नैकान्तिकानि। व्यक्तिवादिना चाधमपदसहायानामेषां व्यञ्जकत्वमुक्तम्। न चात्राधमत्वं प्रमाणप्रतिपन्नमिति कथमनुमानम्। एवंविधादर्थादेवंविधोऽर्थ उपपत्त्यनपेक्षत्वेऽपि प्रकाशते इति व्यक्तिवादिन: पुनस्तद् अदूषणम् । इति श्रीकाव्यप्रकाशे ध्वनिगुणीभूतव्यङ्गयसङ्गीर्ण- भेदनिर्णयो नाम पञ्चम उल्लास:
इसी प्रकार 'निःशेषच्युत' इत्यादि [उदाहरण सं० २] में जिन चन्दनके छूट जाने आदिको [महिमभट्टने अनुमानके गभक ] अनुमापकरूपमें [हेतुके रूपमें ] दिया है वे अन्य कारणोंसे भी हो सकते हैं। इसलिए यहाँ [उक्त श्लोकमें ] स्नानके कार्यरूपसे कहे गये हैं। इसलिए उपभोगमें ही [उनकी] व्याप्ति नहीं है। अतः 'अनकान्तिक' [हेत्वाभास] हैं [ इसलिए भी वे अनुमापक नहीं हो सकते हैं यह चौथा दोष है ]। और [निःशेषच्युत आदि श्लोकमें ] व्यञ्जनावादीने 'अधम' पदकी सहायतासे ही इन [चन्दन- च्युति आदि ] का व्यञ्जकत्व बतलाया है। परन्तु वह अधमत्व [वचनमात्रसे उक्त होनेके कारण प्रत्यक्ष या अनुमान ] प्रमाणसे सिद्ध नहीं है। तो [पूर्ववत स्वरूपासिद्ध होनेके कारण ] उससे अनुमान कैसे हो सकता है ? [अर्थात् अनुमान द्वारा साध्यकी सिद्धि नहीं हो सकती है। परन्तु व्यञ्जनावादीके मतमें यह बात नहीं है। उसके यहाँ तो] 'व्याप्तिके बिना भी इस प्रकारके अर्थसे इस प्रकारका [व्यङ्गय ] अर्थ प्रकाशित होता है' [सामान्यरूपसे ] यह कहनेवाले व्यञ्जनावादीके मतमें वह दोष नहीं होता है। इस प्रकार ग्रन्थकारने इस उल्लासमें बड़े विस्तारके साथ व्यञ्जनावृत्तिकी स्थापनाका प्रयत्न किया है। इस प्रयत्नमें उन्होंने शब्दवोधकी प्रत्रियापर विचार करनेवाले सभी दार्शनिक मतोंकी आालो- चना की है, क्योंकि व्यञ्जनावृत्तिकी आवश्यकता कोई भी दार्शनिक नहीं मानता है केवल साहित्यशास्त्री, और उनमेंसे भी ध्वनिवादी आनन्दवर्धनके अनुयायी ही व्यञ्जनावृत्तिकी सत्तापर विशेष बल देते हैं। इसलिए ग्रन्थकारको अन्य साहित्यशास्त्रियोंके मतकी भी आलोचना करनी पड़ी है। इस प्रकार इस उल्लासमें 'अभिहितान्वयवाद' और 'अन्विताभिधानवाद' आदि माननेवाले मीमांसकों, उसके बाद व्यञ्जनाको न माननेवाले साहित्यशास्त्रियों, 'अखण्डवाक्यार्थतावादी' वेदान्तियों और वैयाकरणों और अन्तमें नैयायिक महिमभट्टकी अनुमानप्रक्रियाका खण्डन कर ग्रन्थकारने आनन्दवर्धनकी अभिमत व्यञ्जनावृत्तिकी यहाँ स्थापना की है। काव्यप्रकाशमें 'ध्वनिगुणीभूतव्यङ्गयसड्गोर्णभेदनिर्णय' नामक पञ्चम उल्लास समाप्त हुआ। श्रीमदाचार्यविश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोमणिविरचितायां काव्यप्रकाशदीपिकायां हिन्दीव्याख्यायां पञ्चम उल्लासः समाप्तः ।
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अथ षष्ठ उल्लास:
सू० ७० ] शब्दार्थचित्रं यत्पूर्व काव्यद्वयमुदाहृतम् । गुणप्राधान्यतस्तत्र स्थितिश्चित्रार्थशब्दयोः ॥४८॥ न तु शब्दचित्रेऽअर्थस्याचित्रत्वम्, अर्थचित्रे वा शब्दस्य।
अथ काव्यप्रकाशदीपिकायां हिन्दीव्याख्यायां षष्ठ उल्लास: उल्लाससङ्गति प्रथम उल्लासमें १. ध्वनिकाव्य, २. गुणीभूतव्यङ्गयकाव्य तथा ३. चित्रकाव्य नामसे काव्यके तीन भेद दिखलाये गये थे। इनमेंसे व्यङ्गयप्रधान ध्वनिकाव्यरूप उत्तमकाव्यका चतुर्थ उल्लासमें तथा गुणीभूतव्यङ्गयरूप मध्यमकाव्यका पञ्चम उल्लासमें भेदोपभेदसहित विस्तारपूर्वक वर्णन किया जा चुका है। अब व्यङ्गयार्थरहित चित्रकाव्य नामक अधमकाव्यके भेदोंका निरूपण इस षष्ठ उल्लासमें कर रहे हैं। चित्रकाव्यके शब्दचित्र तथा अर्थचित्र, दो प्रकारके भेद होते हैं, इन दोनों भेदोंका एक-एक उदाहरण आगे दिखलायेंगे। यद्यपि चित्रकाव्यके इन दोनों भेदोंके उदाहरण भी प्रथम उल्लासमें ही दिये जा चुके थे, इसलिए दुबारा इसके विवेचनकी आवश्यकता नहीं थी, किन्तु जब ध्वनिकाव्य और गुणीभूतव्यङ्गयकाव्यका विवेचन अलग-अलग उल्लासोंमें किया गया है तो चित्रकाव्यका विवेचन भी एक अलग उल्लासमें किया जाना चाहिये। ऐसा मानकर ग्रन्थकारने चित्रकाव्यके विवेचनके लिए यह षष्ठ उल्लास प्रारम्भ किया है। चित्रकाव्यके जो शब्दचित्र तथा अर्थचित्र ये दो भेद किये गये थे उसका आशय यह नहीं है कि शब्दचित्रमें अपर्थका औरप्रौर अर्थचित्रमें शब्दका कोई उपयोग नहीं। वास्तवमें तो दोनोंमें दोनोंका ही उपयोग होता है, जैसे कि शब्दचित्रका उदाहरण 'स्वच्छन्दोच्छलदच्छ०' इत्यादि प्रथम उल्लासमें दिया गया था। उसमें गङ्गाका अन्य नदियोंसे अधिक उत्कर्ष वणित होनेके कारण व्यतिरेकरूप अरथालङ्कार भी होनेसे अर्थचित्रता भी है। और 'विनिर्गतं मानदमात्ममन्दिरात्' इत्यादि अर्थचित्रके उदाहरणमें 'मानदमात्म- मन्दिरात्' में मकारकी आवृत्ति होनेसे वृत्त्यनुप्रासरूप शब्दालङ्कारके भी होनेसे शब्दचित्रत्व भी है। परन्तु 'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति' इस नियमके अ्रपनुसार उनमेंसे जहाँ जिसकी प्रधानता होती है उसके आ्राधार पर उसका नामकरण किया जाता है। सबसे पहिले इसी बातको ग्रन्थकार निम्नलिखितप्रकार कहते हैं- [सू० ७० ]-शब्दचित्र तथा अर्थचित्र [नामसे ] जो दो प्रकारके [चित्र ] काव्य पहिले [प्रथम उल्लासमें] कहे गये हैं उनमें शब्दचित्र तथा अर्थचित्र शब्दोंका प्रयोग [स्थिति ] गुणप्रधानभावसे होता है [अर्थात् दोनोंमें दोनों प्रकारकी चित्रताकी स्थिति सम्भव होनेपर भी शब्द और अर्थकी चित्रतामेंसे जहाँ जिसकी प्रधानता होती है उसके आधारपर उसको शब्दचित्र या अर्थचित्र कहा जाता है। दूसरेकी भी गौण स्थिति रहती है ]। न कि शब्दचित्रमें अर्थचित्रताका अभाव, अथवा अर्थचित्रमें शब्द [के चित्रत्व ] का [अभाव होता है ]। आगे ग्रन्थकारने 'भामह' के 'काव्यालङ्कार' से तीन श्लोक उद्धृत किये हैं। इन श्लोकोंमें 'भामह' ने यह प्रतिपादन किया है कि कुछ लोग रूपक आदि अर्थालङ्कारोंको ही प्रधान अल द्वार मानते हैं, शब्दालङ्कारोंको अलङ्गार नहीं मानते हैं। दूसरे लोग रूपकादि अर्थालङ्कारोंकी प्रतीति अर्थ-
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तथा चोक्तम् -- न कान्तमपि निर्भूषं विभाति वनिताननम् ।। रूपकादिमलङ्कारं वाह्यमाचक्षते परे। सुपां तिङां च व्युत्पत्ति वाचां वाच्छन्त्यलङकृतिम् ।। तदेतदाहु: सौशब्द्यं नार्थव्युत्पत्तिरीदृशी। शब्दाभिधेयालङ्कारभेदादिष्टं द्वयन्तु नः ।।" इति ॥ शब्दचित्रं यथा- प्रथममरुणच्छायस्तावत्ततः कनकप्रभ: तदनु विरहोत्ताम्यत्तन्वीकपोलतलद्युतिः । उदयति ततो ध्वान्तध्वंसक्षमः क्षणदामुखे सरसविसिनीकन्दच्छेदच्छविर्मृ गलाञ्छनः ॥१३९॥ प्रतीतिके बाद होती है इसलिए उनको वाह्य या गौण तलङ्कार कहते हैं और शब्दालड्कार-जिसे 'सौशब्द्य' भी कहा जाता है-की प्रतीति काव्यके सुनते ही होती है इसलिए उसीको प्रधान अलङ्कार मानते हैं। किन्तु 'भामह' अपने सिद्धान्तमतका उल्लेख करते हुए कहते हैं कि हमको तो शब्दालङ्कार और अर्थालङ्कार भेदसे दोनों ही इष्ट हैं। इसी शैलीसे ग्रन्थकारने यहाँ चित्रकाव्यमें शब्दचित्र तथा अर्थचित्र दोनोंका समन्वय किया है। इसलिए प्रमाणरूपमें 'भामह'के वचन उद्धुत करते हुए ग्रन्थकार लिखते हैं कि -- [जैसा कि] प्राचीन आचार्य [भामहने ] कहा भी है- अन्योंने नाना प्रकारके रूपकादि [अर्थालङ्गाररूप ] अलङ्गारोंका प्रतिपादन किया है। [अर्थात् इनके मतमें अर्थालङ्गार ही मुख्य अलङ्गार हैं। क्योंकि] सुन्दर होनेपर भी [जैसे] बिना अलङ्गारके सुन्दरियोंका मुख शोभित नहीं होता है [ उसी प्रकार बिना अर्थालङ्गारोंके सुन्दर शब्दोंवाला काव्य भी अच्छा नहीं लगता है ]। दूसरे लोग रूपकादि अर्थालङ्गारोंको [क्योंकि उनकी प्रतीति अर्थज्ञानके बाद होती है इसलिए ] बाह्य अलङ्गार कहते हैं और सुबन्त और तिङन्त पदोंकी व्युत्पत्ति [विशेषेणानुप्रासादिरूपेण उत्पांत्ति सन्निवेशं] को ही वाणीका [वास्तविक अन्तरङ्ग] अलङ्गार मानते हैं[ क्योंकि काव्यके सुनते ही शब्दाल- द्वारोंकी प्रतीति हो जाती है अतः शब्दालङ्गार ही अन्तरङ्ग कहलाते हैं ]। इस [सुबन्त तिङन्त पदोंकी व्युत्पत्ति या सुन्दर सन्निवेश ] को ही वे 'सौशब्द्' नामसे कहते हैं [वह सुनते ही चमत्कारको उत्पन्न करता है इसीलिए उसीको मुख्य अलङ्गार नामसे कहते हैं]। अर्थ- सौन्दर्य [अर्थव्युत्पत्ति ] तो इस प्रकारका [सद्यः चमत्कारजनक] नहीं होता है [ उसकी प्रतीति तो अर्थज्ञानके बाद होती है इसलिए अर्थालड्गार गौण या बाह्य अलङ्गार कहलाते हैं]। हम [भामह] को तो शब्दालङ्गार और अर्थालङ्गार भेदसे दोनों ही इष्ट हैं। शब्दचित्र [का उदाहरण ] जैसे -- [उदय होते समय चन्द्रमा ] पहिले लाल रङ्गका, उसके बाद सोनेके समान (पीत) कान्तिवाला,
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का० ४८, सू० ७० ] षष्ठ उल्लास: २६५
अर्थचित्रं यथा -- ते दृष्टिमात्रपतिता अपि कस्य नात्र क्षोभाय पक्ष्मलदृशामलकाः खलाश्च। नीचा: सदैव सविलासमलीकलग्ना ये कालतां कुटिलतामिव न त्यजन्ति॥१४०।। यद्यपि सर्वत्र काव्येउन्ततो विभावादिरूपतया पर्यवसानम्, तथापि स्फुटस्य रसस्या- नुपलम्भादव्यङ्गयमेतत्काव्यद्वयमुक्तम् । अत्र च शब्दार्थालङ्कारभेदाद् वहवो भेदाः । ते चालङ्कारनिर्णये निर्णेष्यन्ते। इति काव्यप्रकाशे शब्दार्थचित्रनिरूपणं नाम षष्ठ उल्लासः । उसके बाद विरहसे पीड़ित सुन्दरीके कपोलकी [श्वेत ] कान्तिवाला उदय होता है। उसके बाद रात्रिके प्रारम्भमें ताजे मृणालखण्डके समान [अत्यन्त श्वेत] कान्तिवाला होकर अन्धकारका नाश करनेमें समर्थ होता है।।१३६।। अर्थचित्र [का उदाहरण ] जैसे- सघन पलकोंवाली सुन्दरियोंके केश और दुष्ट पुरुष, जो विलासपूर्वक सदैव अलीक [केशपक्षमें ललाट तथा खलपक्षमें मिथ्याभाषण] में लगे हुए, कुटिलता [केशपक्षमें टेढ़ेपन और खलपक्षमें दुष्टता] के समान कालेपनको नहीं छोड़ते हैं, दिखलायी देते ही किसके चित्तमें क्षोभ उत्पन्न नहीं करते हैं [ अर्थात् कामिनियोंके काले और घुंघराले केश और उन्हींके समान काले और कुटिल वृत्तिके दुष्ट पुरुष देखनेवालोंके हृदयको क्षुब्ध कर देते हैं॥१४०॥ इनमेंसे पहिले उदाहरणमें अनुप्रासरूप शब्दालङ्गारकी प्रधानताके कारण उसको शब्दचित्र और दूसरे उदाहरणमें समुच्चय, उपमा तथा श्लेष आदि अर्थालङ्कारोंके प्रधान होनेसे उसको अरथचित्र कहा है। यद्यपि सभी काव्योंमें [ वणित सभी पदार्थोंका रसके ] विभावादिरूपमें पर्यवसान होता है [ इस- लिए सभीमें व्यङ्गचका सम्बन्ध रहता है इसलिए ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गय दो ही काव्य मानने चाहिये] फिर भी [चित्रकाव्यके इन दोनों उदाहरणोंमें ] स्पष्टरूपसे रसकी प्रतीति न होनेसे इन दोनों काव्योंको व्यङ्गचरहित [अधम ] काव्य कहा गया है। इनमें भी शब्दालड्कार और अर्थालङ्गारोंके भेदसे बहुत-से भेद हो सकते हैं। अलङ्गारोंके निर्णयके अवसरपर [दशम उल्लासमें ] उनका निर्णय करेंगे। काव्यप्रकाशमें शब्दचित्र तथा अर्थचित्रका निरूपण करनेवाला षष्ठ उल्लास समाप्त हुआ। श्रीमदाचार्यविश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोमणिविरचितायां काव्यप्रकाशदीपिकायां हिन्दीव्याख्यायां षष्ठ उल्लास: समाप्तः ।
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सप्तम उल्लास: काव्यस्वरूपं निरूप्य दोषाणाँ सामान्यलक्षणमाह- [सू० ७१ ] मुख्यार्थहतिर्दोषो रसश्च मुख्यस्तदाश्रयाद् वाच्यः । , उभयोपयोगिनः स्युः शब्दाद्यास्तेन तेष्वपि सः॥४९॥ हतिरपकर्षः । शब्दाद्या इत्याद्यग्रहणाद् वर्णरचने । विशेषलक्षणमाह- [सू० ७२] दुष्टं पदं श्रुतिकटु च्युतसंस्कृत्यप्रयुक्तमसमर्थम् । निहतार्थमनुचितार्थ निरर्थकमवाचकं त्रिधाऽलीलम् ।।५०।। सन्दिग्धमप्रतीतं ग्राम्यं नेयार्थमथ भवेत् क्लिष्टम्। अविमृष्टविधेयांशं विरुद्धमतिकृत् समासगतमेव ।।५१।। अथ काव्यप्रकाशदीपिकायां सप्तम उल्लासः उल्लाससङ्गति प्रथम उल्लासमें काव्यका लक्षण किया गया था। उसके बाद छठे उल्लासतक काव्यके भेदोपभेद आदिका वर्णनकर काव्यलक्षणकी ही व्याख्या करनेका प्रयत्न किया गया था। काव्यलक्षणमें 'अदोषौ" 'सगुणौ' और 'अनलङकृती पुनः क्वापि' ये पद भी हैं। इनमेंसे 'अदोषौ' पदकी व्याख्याके लिए पहिले दोषोंके स्वरूपका स्पष्टीकरण होना चाहिये। इसलिए ग्रन्थकार दोषोंका निरूपण करनेके लिए इस सप्तम उल्लासको प्रारम्भ कर रहे हैं। इसमें भी सामान्य लक्षणके बाद ही विशेष लक्षण करना उचित होगा, इसलिए दोषका सामान्य लक्षण करते हैं- [सू० ७१]-मुख्यार्थका अपकर्ष जिससे होता है उसको दोष कहते हैं। [मुख्यार्थ पदका अभिप्राय यहाँ वाच्यार्थ नहीं है, रस है] और रस मुख्य [अर्थ] है। [इसलिए मुख्यतः रसके अपकर्षजनक कारणको दोष कहते हैं। परन्तु ] उसका [रसका ] आश्रय होनेसे वाच्य [अर्थ ] भी [मुख्य अर्थ कह लाता ] है। [इसलिए रसके साथ चमत्कारी वाच्यका अपकर्षकारक भी दोष कहलाता है। उसको अर्थदोष कहते हैं]। शब्दादि [रस तथा वाच्यार्थ ] इन दोनोंके [बोधनमें ] उपकारक [सहायक ] होते हैं इसलिए उनमें भी वह [दोष] रहता है [ और वह पददोष कहलाता है] ॥४६॥ [कारिकामें आये हुए ] 'हति' [शब्दका अर्थ विनाश नहीं अपितु ] अपकर्ष है। 'शब्दाद्याः' यहाँ आद्य पदके ग्रहणसे वर्ण और रचना [का ग्रहण होता है ]। [इस प्रकार दोषका सामान्य लक्षण कर चुकनेके बाद ] विशेष लक्षण कहते हैं- [सू० ७२]-१. श्रुतिकटु, २. च्युतसंस्कार, ३. अप्रयुक्त, ४. असमर्थ, ५. निहतार्थ, ६. अनुचितार्थ, ७. निरर्थक ८. अवाचक, ६. तीन प्रकारका अश्लील, १०, सन्दिग्ध, ११. अप्रतीत, १२. ग्राम्य, १३ नेयार्थ [ये दोष पदगत एवं समासगत दोनों प्रकारके होते हैं और ], १४. क्लिष्ट, १५. अविमृष्टविधेयांश, १६. विरुद्धमतिकृत् [ये तीन दोष ] केवल समासमें ही होते हैं ॥५०-५१।।
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का० ५०-५१, सू० ७२ ] सप्तम उल्लास: २६७
(१) श्रुतिकटु परुषवर्णरूपं दुष्टं यथा- अनङ्गमङ्गलगृहापाङ्गभङ्गतर्राङ्गतैः । आलिङ्गितः स तन्वङ्गया कार्तार्थ्यं लभते कदा ॥ १४१॥ अत्र कार्तार्थ्यमिति : (२) च्युतसंकृति व्याकरणलक्षणहीनं यथा -- एतन्मन्दविपक्वतिन्दुकफलश्यामोदरापाण्डर- प्रान्तं हन्त पुलिन्दसुन्दरकरस्पर्शक्षमं लक्ष्यते। तत् पल्लीपतिपुत्रि ! कुञ्जरकुलं कुम्भाभयाभ्यर्थना- दीनं त्वामनुनाथते कुचयुगं पत्रावृतं मा कृथाः ॥१४२॥ अत्रानुनाथते इति । 'सर्पिषो नाथते' इत्यादाविवाशिष्येव नाथतेरात्मनेपद विहितम् -- 'आशिषि नाथः' इति। अत्र तु याचनमर्थः। तस्मात् 'अनुनाथति स्तनयुगम्' इति पठनीयम् । १. कठोर वर्णरूप दुष्ट [रसापकर्षक पद] श्रुतिकटु [कहलाता] है। जैसे -- कामदेवके मङ्गलगृहरूप कटाक्षोंकी परम्परासे उमङ्गयुक्त [उपलक्षणे तृतीया] कृशाङ्गीसे आलिङ्गित वह [ युवा] कब कृतार्थताको प्राप्त होगा।।१४१। यहाँ कार्तार्थ्य यह [पद श्रुतिकटु है ]। २. व्याकरणके संस्कारसे हीन [अर्थात् जो पद व्याकरणके नियमके अनुकूल न हो वह] च्युत- संस्कार [दोषयुक्त कहलाता ] है। जैसे -- हे [भीलोंके ] छोटेसे ग्रामके स्वामीकी पुत्री ! यह [ तुम्हारा स्तन ] थोड़े पके हुए तेंदू [तिन्दुक ] के फलके समान बीचमें काला और चारों और गौरवर्ण, शबरयुवकके मर्दन [स्पर्श] करने योग्य दिखायी दे रहा है यह बड़े आनन्दकी बात है। इसलिए अपने गण्डस्थलके अभयदानकी प्रार्थनासे अत्यन्त नम्र होकर हाथियोंका समूह तुमसे यह भीख माँगता है कि तुम इस स्तनयुगलको पत्तोंसे मत आवृत करो ।।१४२1। कि इसका अभिप्राय यह है कि यदि शबरयुवक तुम्हारे इस खुले हुए स्तनयुगलकी ओर देखेंगे तो वे हमारे गण्डस्थलके भेदनको भूलकर उसीके स्पर्शमें तत्पर हो जायेंगे और कुछ समयके लिए हमारे गण्डस्थलोंको अभयप्रदान मिल जायमा। इसलिए हाथियोंका समूह यह प्रार्थना कर रहा है कि अपने स्तनोंको पत्तोंसे न ढको। इसमें याचनाके अर्थमें 'अनुनाथते' पदका प्रयोग किया गय। है। परन्तु नाथ धातु परस्मैपदी धातु है, उसका 'अनुनाथति' प्रयोग होना चाहिये था। 'आशिषि नाथः' २।३।५५ सूत्रसे आशी: अर्थमें नाथ धातुसे आत्मनेपदका विधान है याचनार्थमें नहीं। यहाँ 'अनुनाथते' यह [पद च्युतसंस्कार दोषका उदाहरण है]। 'सर्पिषो नाथते' मेरे पास घी हो इत्यादि आशी: अर्थमें ही नाथ धातुसे आत्मनेपदका विधान 'आशिषि नाथः' सूत्रसे किया गया है। परन्तु यहाँ [प्रकृत उदाहरणमें ] तो याचना-अर्थ [में आत्मनेपदका प्रयोग किया गया] है। इसलिए [यहाँ च्युतसंस्कारत्व दोष हो जाता है। उसको बचाना है तो ] 'अनुनाथति स्तनयुगं' यह पाठ रखना चाहिये।
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२६८ काव्यप्रकाश: [का० ५०-५१, सू० ७२ (३) अप्रयुक्तं तथाऽडम्नातमपि कविभिर्नादृतम्। यथा -- यथाऽयं दारुणाचार: सर्वदैव विभाव्यते। तथा मन्ये दैवतोऽस्य पिशाचो राक्षसोऽथवा ।१४३।। अत्र दैवतशब्दो 'दैवतानि पुंसि वा' इति पुंस्याम्नातोऽपि न केनचित् प्रयुज्यते। (४) असमर्थ यत्तदर्थं पठचते न च तत्रास्य शक्तिः। यथा- तीर्थान्तरेषु स्नानेन समुपाजितसत्कृतिः । सुरस्रोतस्विनीमेष हन्ति सम्प्रति सादरम् ।।१४४।। अत्र हन्तीति गमनार्थम् ।
३. [कोश आदिमें ] उस अर्थमें [तथा] पढ़ा हुआ होनेपर भी कवियों द्वारा न अपनाया हुआ [शब्दप्रयोग ] अप्रयुक्त [दोष] है। जैसे- यह [आदमी] तो हर समय भयङ्गर आचरण करता हुआ दिखलायी देता है। इससे प्रतीत होता है कि इसका उपास्य-देवता कोई राक्षस या पिशाच है।।१४३।। यहाँ 'दैवतानि पुंसि वा' दैवत शब्द विकल्पसे पुल्लिङ्ग होता है, इस प्रकार [अमरकोशमें ]पठित होनेपर भी किसी [महाकवि ] के द्वारा [पुल्लिङ्गमें ] प्रयुक्त नहीं किया गया है [इसलिए इसमें अप्रयुक्तत्व दोष है ]। ४. जो उस रूपमें [ उपसन्दानोपजीवी रूपमें ] पढ़ा गया है, परन्तु [उस उपसन्दान अर्थात् अन्य किसीकी सहायता न होनेसे किसी विशेष स्थलपर ] उस अर्थमें उसकी शक्ति नहीं है, उसको असमर्थ कहते हैं। जैसे- अन्य तीर्थोंमें स्नानके द्वारा पुण्यका सञ्चय करके यह अब श्रद्धापूर्वक गङ्गा [स्नान करने ] को जा रहा है।।१४४।। यहाँ हन्ति यह गमनार्थमें [असमर्थ] है। अप्रयुक्तत्व और अ्र्प्रसमर्थत्व इन दोनोंमें उस अर्थमें उस शब्दका कोश आदिमें पाठ होनेपर भी उनके प्रयोगको दोष कहा गया है। इसका कारण पहली जगह तो कवियों द्वारा किसी विशेष अर्थमें प्रयोगका न अपनाया जाना है, दूसरी जगह उस अर्थमें शक्तिका न होना है। यहाँ शङ्का यह उपस्थित होती है कि जब उस अर्थमें कोशादिमें शब्द पढ़ा गया है, तब उसमें उस अर्थको बोधन करानेकी शक्ति नहीं है, यह कैसे कहा जा सकता है। व्याकरणकोशादि तो शक्तिग्राहक प्रमाण हैं। जब उन्होंने उस अर्थमें शब्दका पाठ किया है तो उसमें शक्ति न होनेका प्रश्न कहाँसे आ जाता है। इसका समाधान यह है कि कोशादिने किसी विशेष स्थितिमें किसी विशेष उपपदके साथ होनेपर ही उस अर्थमें पाठ किया है। उस स्थितिमें उसमें सामर्थ्य माना जाता है। उससे भिन्न स्थलमें अर्थात् विशेष उपपद शदिके अभावमें वह असमर्थ हो सकता है। जैसे धातुपाठमें 'हन् हिंसागत्योः' इस रूपमें हन् धातुका गति अरथ भी बतलाया गया है। परन्तु यह गति अर्थ उपसन्दानोपजीवी है अर्थात् अन्य उपपदोंके योगमें ही होता है। उप- सन्दान अर्थात् उपपदोंके सहकारसे पद्धति, जङ्डा आदि शब्दोंमें हन् धातु गति अर्थका बोधक होता है। परन्तु यहाँ अन्य उपपदके बिना केवल हन् धातुका प्रयोग किया गया है। अतः वह गमनार्थमें असमर्थ है।
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का० ५०-५१, सू० ७२ ] सप्तम उल्लास: २६६
(५) निहतार्थ यदुभयार्थमप्रसिद्धेऽर्थे प्रयुक्तम्। यथा- यावकरसार्द्रपादप्रहारशोणितकचेन दयितेन। मुग्धा साध्वसतरला विलोक्य परिचुम्बिता सहसा ।।१८५।। अत्र शोणितशब्दस्य रुधिरलक्षणेनार्थेनोज्ज्वलीकृतत्वरूपोऽर्थो व्यवधीयने। (६) अनुचितार्थं यथा- तपस्विभिर्या सुचिरेण लभ्यते प्रयत्नतः सत्रिभिरिष्यते च या । प्रयान्ति तामाशुगति यशस्विनो रणाश्वमेधे पशुतामुपागताः ।१४६।। अत्र पशुपदं कातरतामभिव्यनक्तीत्यनुचितार्थम् । (७) निरर्थकं पादपूरणमात्रप्रयोजनं चादिपदम् । यथा- उत्फुल्लकमलकेसरपरागगौरद्युते ! मम हि गौरि ! अभिवाञ्छितं प्रसिद्धयतु भगवति ! युष्मत्प्रसादेन । १४७॥
अत्र हि शब्द:
५. जो [शब्द ] दोनों अर्थोंका वाचक होनेपर भी [अपेक्षाकृत ] अप्रसिद्ध अर्थमें प्रयुक्त हो वह 'निहतार्थ' होता है। जैसे- महावरसे गीले चरणके प्रहारसे जिसके बाल कुछ लाल-लाल-से लगने लगे हैं, उस प्रियतमने [पादप्रहारसे इनके रक्त निकल आया है, ऐसा समझकर ] उस भोली नायिकाको भयसे विह्वल देखकर सहसा उसका चुम्बन कर लिया।१४५॥ यहाँ शोणित शःदके रुधिररूप [अधिक प्रसिद्ध ] अर्थसे [ कम प्रसिद्ध ] उज्ज्वलत्व [चमकना ] रूप अर्थ दब जाता है। [इसलिए यह निहतार्थ दोष है]। ६. अनुचितार्थ [दोषका उदाहरण ] जैसे- [ज्ञानकाण्डके अनुयायी ] तपस्वी लोग जिस [मुक्तिरूप ] गतिको [अनेक जन्मपरम्पराके प्रयत्नके बाद ] बहुत देरमें प्राप्त कर पाते हैं और [कर्मकाण्डके अनुयायी ] याज्ञिक लोग प्रयत्नपूर्वक [कर्म द्वारा ] जिसको प्राप्त करना चाहते हैं, युद्धरूप अश्वमेध यज्ञमें पशुके समान मारे गये [लोकमें] यशकी प्राप्ति करनेवाले वीर उस गतिको तुरत ही प्राप्त कर लेते हैं ॥१४६॥ यहाँ पशु-पद [मारे जानेवालेकी ] कातरता [भयत्रस्तता ] का व्यञ्जक है। इसलिए [वीरताके वर्णनमें ] अनुचितार्थ है। ७. केवल पादपूर्तिमात्रके लिए प्रयुक्त च आदि पद निरर्थक होते हैं। जैसे- खिले हुए कमलके केसरके चूर्ण [पराग] के समान गौर कान्तिवाली हे भगवती पार्वति ! आपकी कृपासे मेरा मनोरथ पूर्ण हो ।।१४७।। यहाँ हि शब्द [केवल पादपूर्तिके लिए प्रयुक्त हुआ है ]।
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२७० काव्यप्रकाश: [का० ५०-५१, सू० ७२
(८) अवाचकं यथा- अवन्ध्यकोपस्य विहन्तुरापदां भवन्ति वश्याः स्वयमेव देहिनः । अमर्षशून्येन जनस्य जन्तुना न जातहार्देन न विद्विषादरः ॥१४८॥ अत्र जन्तुपदमदातर्यर्थे विवक्षित तत्र च नाभिधायकम् ।
यथा वा- हा धिक् सा किल तामसी शशिमुखी दृष्टा मया यत्र सा तद्विच्छेदरुजाऽन्धकारितमिदं दग्धं दिनं कल्पितम् । कि कुर्म: कुशले सदैव विधुरो धाता न चेत्तत्कथं
तादृग्यामवतीमयो भवतत मे नो जीवलोकोऽधुना ॥१४९॥
८. अवाचक [दोषका उदाहरण ] जैसे- ['किरातार्जुनीय' के प्रथम सर्गमें युधिष्ठिरको युद्धके लिए प्रेरित करती हुई द्रौपदी उनसे कह रही है कि ] जिसका क्रोध कभी व्यर्थ नहीं जाता है और जो दूसरोंकी आपत्तियोंका नाश कर सकता है, उसके अधीन मनुष्य स्वयं ही हो जाते हैं। और [आपके समान ] जिसको कभी कोध ही नहीं आता है, ऐसे तुच्छ व्यक्तिके मित्र होनेसे कोई उसका आदर नहीं करता है और न शत्रु होनेसे उसका कोई भय करता है।१४८।। यहाँ 'जन्तु' पद अदाता अर्थमें विवक्षित है, पर उसका वाचक नहीं है। मनुष्य दो ही प्रकारसे वशवर्ती हो सकते हैं, या तो भयसे या लोभसे। श्लोकके पूर्वार्द्धमें 'अ्वन्ध्य- कोप' शब्दसे भय और 'आपदां विहन्तु;' से धनादिके द्वारा दूसरोंके दुखोंका नाश करनेके सामर्थ्यका निर्देश किया है। इसलिए उत्तरार्द्धमें 'जन्तु' पदका अदाता अर्थमें प्रयोग किया गया है यह ग्रन्थकारका अभिप्राय है। परन्तु यह अर्थ यों ही कर लिया गया है। वस्तुतः यह अरथ वक्ताको अभिप्रेत नहीं है। युद्धके लिए प्रेरित करते समय दानकी चर्चा व्यर्थ ही है। इसलिए पूर्वार्द्धमें 'विहन्तुरापदां'का अ्पर्थ धनादिसे आपत्तियोंका नाश करना नहीं अपितु अपनी शक्तिसे दूसरोंकी विपत्तियोंका निराकरण ही विवक्षित अर्थ है। अतः उत्तरार्द्धमें 'जन्तु'पद अदाता अर्थका नहीं अपितु अमर्षशून्य व्यक्तिकी तुच्छताका सूचक है। इस कारण यह अवाचकत्व दोषका ठीक उदाहरण नहीं बनता है। ग्रन्थकार भी प्रथम व्याख्याको बहुत उचित नहीं समझते हैं। इसलिए उन्होंने इसी अवाचकत्व दोषका दूसरा उदाहरण भी दिया है। अथवा [अवाचकत्व दोषका उदाहरण ] जैसे -- [हा धिक् ] बड़े दुःखकी बात है कि जब [जहाँ] मैंने उस चन्द्रमुखी [उर्वशी] को देखा था वह अँधेरी रात [तामसी ] थी। [उस अँधेरी रातमें चन्द्रमुखीका दर्शन स्वयं एक आश्चर्य है। उससे भी बड़ा आश्चर्य यह है कि] उसके वियोग दुःखने इस अभागे दिनको अन्धकारमय बना दिया है। [हम तो चाहते हैं कि इस वियोगमय दिनके स्थानपर हमारे लिए वही अँधेरी रात सदा बनी रहे। किन्तु ] क्या करें, इष्ट कार्यमें विधाता सदैव प्रतिकूल रहता है, नहीं तो मेरे लिए यह जीवन, वही अँधेरीरातमय क्यों नहीं हो जाता है [ जिससे मैं सदैव उस चन्द्रमुखीको देखता रह सकूं] ।१४६।
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का० ५०-५१, सू० ७२ ] सप्तम उल्लास: २७१
अत्र दिनमिति प्रकाशमयमित्यर्थेऽवाचकम् । यच्चापसर्गसंसर्गादर्थान्तरगतम् । यथा- जङ्घाकाण्डोरुनालो नखकिरणलसत्केसरालीकराल: प्रत्यग्रालक्तकाभाप्रसरकिसलयो मञ्जुमञ्जीरभृङ्गः । भर्तुर्नृ त्तानुकारे जयति निजतनुस्वच्छलावण्यवापी- सम्भूताम्भोजशोभां विदधदभिनवो दण्डपादो भवान्याः ।।१५०।। अथ दधदित्यर्थे त्रिदधदिति।
(९) त्रिधेति ब्रीडाजुगुप्सामङ्गलव्यञ्जकत्वाद्। यथा --
['विकरमोर्वशीय' नाटकमें यह पुरूरवाकी उक्ति है] इसमें 'दिन' यह पद [तामसीके विपरीत] प्रकाशमय इस अर्थका अवाचक है। [क्योंकि दिन-पद रविसंयुक्त कालका दिनत्वेन रूपेण वाचक है, प्रकाशमयत्वका नहीं। वास्तवमें यह उदाहरण भी बहुत सुन्दर नहीं बन पड़ा है। तामसीके साथ उधर रात्रि-पदका प्रयोग नहीं किया है। इसी प्रकार इधर प्रकाशमय शब्द या अर्थकी आवश्यकता नहीं है। दिन स्वयं प्रकाशमय है। अतः प्रकाशमय शब्दसे उसका कथन करनेकी आवश्यकता नहीं है]। और जो उपसर्गके सम्बन्धसे अन्य अर्थका बोधक हो जाता है [ वह भी अवाचक पद होता है] जैसे --
अपने स्वामी [शिवजी ]के नृत्त [पदार्थाभिनयो नृत्यं नृत्तं ताललयाश्रयम् ]का अनुकरण करते समय अपने शरीरके निर्मल सौन्दर्यकी बावड़ीमें उत्पन्न हुए कमलकी शोभाको धारण करनेवाला वह चरण जिसमें जङ्गाकाण्ड ही लम्बे नाल । मृणालदण्ड]के समान है, जो नखकिरणों रूप केसरकी पंक्तिसे नतोन्नत [कराल: ] है, जो ताजा लगाये हुए महावरकी प्रभाके विस्ताररूप नवीन पत्तोंसे युक्त तथा सुन्दर नूपुरों रूप भ्रमरसे युक्त है, इस प्रकारका पार्वती देवीका प्रथम बार उठा हुआ [नाटचारम्भे ऊर्ध्योक्षिप्तः पादो दण्डपाद: ] चरण सबसे अधिक उत्कर्षशाली है॥१५०॥ यहाँ 'दधत्' धारण करते हुए इस अर्थमें 'विदधत्' यह [अवाचक ] है। अवाचकत्वके तीनों उदाहरणोंमेंसे यह उदाहरण तो ठीक है। परन्तु पहिले दोनों उदाहरण ठीक नहीं बने। इनमें ग्रन्थकारने जवरदस्ती खींचातानी करके दोष निकालनेका यत्न किया है। मम्मट अपने इस दोषदर्शनके लिए बदनाम हैं, यहाँतक कि किसी आलोचकने उन्हें 'काव्याली' काव्यश्रेणीरूप कुलाङ्गना- पर बलात्कार करनेवाला 'यवन' तक कह डाला है- काव्यप्रकाशो यवन: काव्याली च कुलाङ्गना। प्रनेन प्रसभाकृष्टा कष्टामेषाश्नुते दशाम् । [५०वें सूत्रमें आये हुए व्रिधाश्लील पदमें ] व्रिधा १. ब्रीडा, २. जुगुप्सा और ३. अमङ्गलके व्यञ्जक होनेसे [कहा गया] है। जैसे --
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२७२ काव्यप्रकाश: [ का० ५०-५१, सू० ७२
साधनं सुमहद्यस्य यन्नान्यस्य विलोक्यते। तस्य धीशालिनः कोऽन्यः सहेतारालितां भ्रुवम् ॥१५१॥[१] लीलातामरसाहतोऽन्य त्रनितानि:शङ्कदष्टाधर: कश्चित्केसरदूषितेक्षण इव व्यामील्य नेत्रे स्थितः । मुग्धा कुड्मलिताननेन ददती वायुं स्थिता यत्र सा भ्रान्त्या धूर्त्ततयाऽथवा नतिमृते तेनानिशं चुम्विता ।११२।[२] मृदुपवनविभिन्नो मत्प्रियाया विनाशाद् घनरुचिरकलापो निःसपत्नोऽ्द्य जातः । रतिविगलितवन्धे केशपाशे सुकेश्या: सति कुसुमसनाथे कं हरेदेष वही ॥१५३॥[३] जिस [राजा]का 'साधन' [सेना व लिङ्ग ] इतना बड़ा है जैसा किसी अन्यका नहीं दिखलायी देता है, उस [शत्रुपराभवविषयक तथा सुरतविषयक ] बुद्धिशाली [राजा या नायक]की [कामावेशसे या क्रोधावेशसे ] टेढ़ी हुई भौंहोंको [नायिकाविशेषके अतिरिक्त ] और कौन सह सकता है ।१५१।[१] यहाँ 'साधनं' आदि श्लोकमें 'साधन' शब्द पुरुषके लिङ्गका वाचक भी हो सकता है। इसलिए यह ब्रीडा या लज्जाका व्यञ्जक होनेके कारण अश्लील पद है। दूसरी स्त्री [सपत्नी ]ने निःशङ्ग भावसे [अधरपान करते समय ] जिसके अधरोष्ठमें काट लिया है, ऐसा कोई [नायक, अपनी पत्नीके पास पहुँचकर अलङ्गाररूपमें ] शोभाके [लिए हाथमें पकड़े गये ] लाल कमलसे पिटनेपर मानों उसकी आँखें परागसे भर गयी हों, इस प्रकार दोनों आँखें बन्द करके खड़ा हो गया। [नायिकाने यह समझकर कि इनकी आँख में धूल पड़ गयी है इसलिए ] वह भोली-भाली बिचारी मुखको गोल [कलीके समान ] बनाकर खड़ी होकर [उसकी आँख ] फूंकने लगी। तब भ्रान्तिसे अथवा धूर्तताके कारण [क्षमाप्रार्थनाके रूपमें ] नमस्कार किये बिना ही [ धूर्त नायकने ] चिरकालतक उसका चुम्बन कर लिया ॥१५२॥ [२] [यहाँ वायु शब्दका प्रयोग जुगुप्साका व्यञ्जक है क्योंकि उसका अर्थ अपानवायु भी हो सकता है। इसलिए यह जुगुप्साव्यञ्जक अश्लीलताका उदाहरण है।] यह अगला श्लोक 'विकमोर्वशीय' नाटकसे लिया गया है। उर्वशीके वियोगमें राजा पुरूरवा कह रहे हैं कि- मन्द-मन्द वायुसे बिखरा हुआ सघन और सुन्दर मयूर-पिच्छ मेरी प्रिया [ उर्वशी ]के अदृश्य हो जानेसे [विनाशात् -- णश अदर्शने ] प्रतिद्वन्द्वी-विहीन हो गया है। [नहीं तो ] फूलोंसे अलडकृत और रतिकालमें खुले हुए बन्धनवाले सुन्दर केशोंसे युक्त [उर्वशीके ] केशपाशके रहते यह मयूर किसको मुग्ध कर सकता था। [अथवा अपने बहोंका अभिमान करनेवाला यह बही, उसके सामने, 'कम् उदकं हरेत्', ] पानी भरता ।।१५३। [३]
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का० ५०-५१, सू० ७२ ] सप्तम उल्लास: २७३
एषु साधनवायुविनाशशब्दा व्रीडादिव्यञ्जकाः । (१०) सन्दिग्धं यथा -- आलिङ्गितस्तत्रभवान् सम्पराये जयश्रिया। आशी:परम्परां वन्दां कर्णे कृत्वा कृपां कुरु।।१५४।। अत्र वन्द्यां कि हठहृतमहिलायां कि वा नमस्यामिति सन्देहः । (११) अप्रतीतं यत्केवले शास्त्रे प्रसिद्धम् । यथा -- सम्यग्ज्ञानमहाज्योतिर्दलिताशयताजुषः । विधीयमानमप्येतन्न भवेत्कर्म बन्धनम् ।१५५।।
इन [तीनों अश्लीलताव्यञ्जक उदाहरणों]में साधन [लिङ्गका वाचक होनेसे व्रीडाका ] वायु [शब्द अपानवायुका बोधक होनेके कारण जुगुप्साका ] और विनाश शब्द [मृत्युका बोधक होनेसे अमङ्गल- का, इस प्रकार] व्रीडा आदिके व्यञ्जक हैं। १०. सन्दिग्ध [दोषका उदाहरण ] जैसे -- युद्धभूमिमें [ सम्पराये ] जयश्रीसे आलिङ्गित [अर्थात् अनायास ही विजय प्राप्त करनेवाले ] आप [हमारे द्वारा प्रस्तुत की गयी ] प्रशंसा या नमस्कारके योग्य आशीर्वादकी परम्पराको सुनकर [हम लोगोंपर ] कृपा करें ॥१५४॥ यहाँ 'वन्दां'से क्या जबर्दस्ती कँद की गयी स्त्रीपर [यह अर्थ सप्तमीका रूप मानकर करना चाहिये] अथवा [द्वितीयाका रूप मानकर ] नमस्कार करने योग्य [उत्तम आशी:परम्परा ] को [सुनकर यह अर्थ करना चाहिये] यह सन्देह होता है। यहाँ युद्धमें विजयप्राप्तिके बाद हठात् पकड़ी हुई-बन्दी बनायी हुई किसी स्त्रीके द्वारा प्रस्तुत की जानेवाली आशी: अर्थात् मुझे छोड़ दो, भगवान् तुमको इसी प्रकार सदा शत्रुओंपर विजय देंगे, इस प्रकारके वचनोंको सुनकर उस वन्दी बनायी हुई स्त्रीपर उसको मुक्त करनेरूप कृपा करें, यह अर्थ भी हो सकता है। उस दशामें स्त्रीलिङ्ग 'बन्दी' शब्दका सप्तमीके एकवचनमें 'बन्द्यां' यह रूप होगा। और दूसरा अर्थ माननेपर स्त्रीलिङ्ग 'वन्द्या' शब्दका द्वितीयाके एकवचनमें 'वन्द्यां' यह रूप होता है इसलिए यहाँ 'वन्द्ां' को वन्दी शब्दका सप्तमीके एकवचनका रूप माना जाय अथवा 'वन्द्ा' शब्दका द्वितीयाके एकवचनका रूप माना जाय यह सन्देह हो जाता है, अतः यह सन्दिग्ध दोषका उदाहरण है। ११. अप्रतीत -- जो केवल [किसी विशेष ] शास्त्रमें प्रसिद्ध है [ अर्थात् किसी विशेष शास्त्रका पारिभाषिक शब्द है, उसका प्रयोग साधारणरूपमें करना अप्रतीत दोष कहलाता है ] जैसे -- तत्त्वज्ञान [आत्मज्ञान ] की महाज्योतिसे जिसके कर्मसंस्कारों [आशेरते फलपर्यन्तमिति आशयाः कर्मसंस्कारा: ]का नाश हो गया है, [जीवन्मुक्त पुरुष]के द्वारा किया जानेवाला यह [शुभाशुभ ] कर्म उसके बन्धनका कारण नहीं होता है।१५५। १८
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२७४ काव्यप्रकाश: [ का० ५०-५१, सू० ७२ अत्राशयशब्दो वासनापर्यायो योगशास्त्रादावेव प्रयुक्तः । (१२) ग्राम्यं यत्केवले लोके स्थितम्। यथा- राकाविभावरीकान्तसंक्रान्तद्युति ते मुखम् । तपनीयशिलाशोभा कटिश्च हरते मनः ॥१५६॥ अत्र कटिरिति। (१३) नेयार्थम् -- निरूढा लक्षणा: काश्चित् सामर्थ्यादभिधानवत्। क्रियन्ते साम्प्रतं काश्चित् काश्चिन्नैव त्वशक्तितः । इति यन्निषिद्धं लाक्षणिकम्। यथा- शरत्कालसमुल्लासिपूर्णिमाशर्वरीप्रियम्। करोति ते मुखं तन्वि चपेटापातनातिथिम् ।।१५७।।
यहाँ 'आशय' शब्द वासना [कर्मसंस्कार ]के वाचकरूपमें योगशास्त्र आदिमें ही प्रयुक्त होता है। [लोकमें नहीं, अतः यहाँ 'आशय' शब्दका प्रयोग अप्रतीत दोष है ]। १२ ग्राम्य-जो शब्द केवल लोकमें प्रयुक्त होता है। जैसे -- पूर्णिमाके चन्द्रमामें [ अथवा चन्द्रमासे ] जिसकी कान्ति संकरान्त हो रही है [ अर्थात् पूर्णिमाके चन्द्रमाने जिसकी कान्ति प्राप्त की है अथवा जिसने पूर्णिमाके चन्द्रमासे कान्ति प्राप्त की है] इस प्रकार तुम्हारा मुख और सोनेकी शिलाके समान सौन्दर्यवाली तुम्हारी कमर [मेरे] मनको मुग्ध कर रही है। ।१५६॥। यहाँ कटि [कमर ] यह [शब्द ग्राम्य है] १३. नेयार्थ -- 'नेय: रूढि-प्रयोजनाभावे कविना कल्पितोऽर्थः यत्र' जहाँ रूढि और प्रयोजनरूप लक्षणाके हेतुओंके न होनेपर भी कवि अपनी इच्छासे यों ही लक्षणासे शब्दका प्रयोग कर दें, वहाँ नेयार्थत्व दोष होता है। कुमारिलभट्टने 'तन्त्रवार्तिक' में लिखा है- कुछ रूढ लक्षणाएँ होती हैं, जो वाचक शब्द [अभिधान ]के समान सामर्थ्यसे [अर्थका बोध कराती हैं] और कुछ इस समय [प्रयोजनवश] की जाती हैं। [ये दोनों रूढि तथा प्रयोजनवती लक्षणाएँ तो उचित हैं। परन्तु रूढि तथा प्रयोजन इन दोनोंके अभावमें [स्वेच्छापूर्वक ] कोई लक्षणा अशक्तिके कारण नहीं करनी चाहिये [अर्थात् इस प्रकारकी लक्षणा करनेपर 'नेयार्थत्व' दोष हो जाता है ]। इसके अनुसार जो निषिद् लक्षणावाला पद है [वह नेयार्थ है]। जैसे- हैं इशाद़्ि ! तुम्हारा सुख शरत्कालके चमकते हुए चन्द्रमाको भी चपत लगा रहा है [ चन्द्रमा- को भी तिरस्कृत कर रहा है] ।१ !!
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का० ५०-५१, सू० ७२ ] सप्तम उल्लास: २७५ अत्र चपेटापातनेन निर्जितत्वं लक्ष्यते। अथ समासगतमेव दुष्टमिति सम्बन्धः । अन्यत्केवलं समासगतं च। (१४) क्लिष्टं यतोरऽर्थप्रतिपत्तिर्व्यवहिता। यथा- अत्रिलोचनसम्भूतज्योतिरुद्गमभासिभिः । सदृशं शोभतेऽत्यर्थ भूपाल ! तव चेष्टितम् ।।१५८।। अत्राऽत्रिलोचनसम्भूतस्य चन्द्रस्य ज्योतिरुद्गमेन भासिभिः कुमुदैरित्यर्थः । यहाँ थप्पड़ लगानेसे 'तिरस्कृत कर दिया है',यह अर्थ लक्षणासे[ कविको अभीष्ट ] है [ परन्तु यहाँ लक्षणाके प्रयोजक हेतुओंके अभावमें की गयी लक्षणा दूषित है ]। कारिका ५१ में नेयार्थके बाद 'अथ' शब्दका प्रयोग करके-'अथ भवेत्क्लिष्टम्। अविमृष्ट विधेयांशं विरुद्धमतिकृत् समासगतमेव ।।' लिखा है। इसका अर््रभिप्राय यह है कि 'अर्थ' शब्दके पहले नेयार्थतक जो पददोष दिखलाये गये है वे 'केवल' अर्थात् असमस्तपदगत और समस्तपदगत दोनों रूपोंमें पददोष होते हैं। किन्तु अब आगे गिनाये गये क्लिष्ट, अविमृष्टविधेयांश और विरुद्धमतिकृत् ये तीन दोष समासरहित एक पदमें नहीं होते। समासगत ही होते हैं या फिर वाक्यगत होते हैं अर्थात् ये तीनों दोष अकेले एक पदमें न रहकर पदसमुदायमें ही रहते हैं। वह पदसमुदाय १. समस्तपदरूप भी हो सकता है और २. वाक्यरूप भी हो सकता है। इसीलिए साहित्यदर्पणकार तथा वामन आदि भी इनको केवल समासगत दोष न मानकर पदगत तथा वाक्यगत दोष भी मानते हैं। [कारिका ५१ में कहे हुए ] 'अथ'का 'समासगतमेव' के साथ सम्बन्ध है, अर्थात् ] पहिले कहे हुए ] अन्य [श्रुतिकट आदि दोष ] केवल [असमस्त ] पदगत और समासगत [दोनों प्रकारके पददोष ] होते हैं। जैसे -- १४ क्लिष्ट [दोष वह है ] जिससे अर्थकी प्रतीति [साक्षात् न होकर ] व्यवधानसे होती है, हे राजन् ! आपका चरित्र अत्िमुनिके नेत्रसे उत्पन्न ज्योति [अर्थात् चन्द्रमा ] का उदय होनेसे खिलनेवाले [कुमुदों ] के समान शोभित हो रहा है ॥१५८॥ यहाँ 'अत्निमुनिके नेत्नसे उत्पन्न चन्द्रमाकी ज्योतिके उदयसे खिलनेवाले कुमुदोंसे' यह अर्थ है [जो व्यवधानसे प्रतीत होता है। अतः यहाँ क्लिष्टत्व दोष है ]। अगला दोष 'अविमृष्टविधेयांश' है। प्रत्येक वाक्यमें दो भाग होते हैं, एक उद्देश्यभाग और दूसरा विधेयभाग। 'राम जाता है' इस वाक्यमें 'राम' उद्देश्यभाग है और 'जाता है' यह विधेयभाग है। इन दोनों भागोंमेंसे विधेयांश प्रधान माना जाता है। इसलिए प्रत्येक वाक्यकी रचना करते समय इस बातका ध्यान रखना चाहिये कि वाक्यमें विधेयांशका प्राधान्य अक्षुण्ण बना रहे। जहाँ इस बातका ध्यान नहीं रखा जाता और असावधानीसे इस प्रकारकी वाक्यरचना कर दी जाती है, जिसमें विधेयांशका यह प्राधान्य नष्ट हो जाता है, उसी स्थानपर अविमृष्टविधेयांश दोष हो जाता है। इस प्रकारकी वाक्य- रचना प्रायः विधेयांशको समासमें डाल देनेसे हो जाती है, क्योंकि समासमें कहीं पूर्व पदार्थका प्राधान्य होता है, कहीं उत्तर पदार्थका और कहीं अन्य पदार्थका। विधेयपदके उससे भिन्न स्थलपर श जानेसे उसका प्राधान्य नष्ट हो जाता है। इसलिए अविमृष्टविधेयांशको समासगत दोष कहा जाता है। इसीके उदाहरण आगे देते है-
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२७६ काव्यप्रकाश: [का० ५०-५१, सू० ७२
(१५) अविमृष्टः प्राधान्येनानिर्दिप्टो विधेयांशो यत्र तत्। यथा- मूर्ध्नामुद्वृत्तकृत्ताविरलगलद्रक्तसंसक्तधारा- धौतेशा ङघिप्रसादोपनतजय जगज्जातमिथ्यामहिम्नाम् । कैलासोल्ला सनेच्छाव्यतिकरपिशुनोत्सर्पिदर्पोद्धुराणां दोष्णां चैषां किमेतत्फलमिह नगरीरक्षणे यत्प्रयासः ।१५९।। अत्र मिथ्यामहिमत्वं नानुवाद्यम्, अपि तु विधेयम् । यथा वा- स्त्रस्तां नितम्बादवरोपयन्ती पुनः पुनःकेसरदामकाञ्चीम्। न्यासीकृतां स्थानविदा स्मरेण द्वितीयमौर्वीमिव कार्मुकस्य ।।१६०।। अत्र द्वितीयत्वमात्रमुत्प्रेक््यम् । मौर्वीं द्वितीयामिति युक्तः पाठः ।
१५. अविमृष्टविधेयांश जहाँ विधेयांशका विचार नहीं किया गया अर्थात् प्राधान्यनिर्देश नहीं किया गया वहाँ अविमृष्टविधेयांश [दोष ] होता है। जैसे -- हनुमन्नाटक के अष्टमाङ्कमें रामचन्द्रजीकी सेनाके द्वारा लङ्गाके घेर लिये जाने और मन्त्रियों आदि द्वारा उसकी रक्षाका प्रयत्न करनेका परामर्श देनेपर रावण कहता है कि- औद्धत्यपूर्वक निरन्तर काटे गये [ एकके बाद दूसरे गलेसे अर्थात् ] कण्ठसे बहती हुई अविच्छिन्न रक्तधारासे धोये हुए शिवजीके चरणोंकी कृपासे प्राप्त विजय [के वरदान ] से संसारमें मिथ्या महत्त्वको प्राप्त हुए मेरे इन [ दस ] शिरोंका और कैलासको उठानेकी इच्छाके आवेशके सूचक उत्कट अभिमानसे ग्वित मेरी इन भुजाओंका क्या यही फल है कि इस नगरीकी रक्षामें [ मुझे ] प्रयास करना पड़े ॥१५६॥ यहाँ मिथ्यामहिमशालित्व उद्देश्य [अनुवाद्य] नहीं अपितु विधेय है[ इसलिए उसकी प्रधानताकी रक्षाके लिए उसे समासमें नहीं डालना चाहिये था। समासमें आ जानेसे उसकी प्रधानता नष्ट हो जानेके कारण अविमृष्टविधेयांश दोष हो गया है ]। [पहिले श्लोकमें विधेय पदके बहुव्रीहि समासमें अन्तर्भूत होनेसे अविमृष्टविधेयांश होनेका उदाहरण दिया था। अगले श्लोकमें कर्मधारय समासमें उसके अन्तर्भावका उदाहरण देते हैं। यह श्लोक 'कुमारसम्भव'के तीसरे सर्गसे लिया गया है। इसमें पार्वतीका वर्णन करते हुए कवि कहता है]- अथवा जैसे -- [धरोहरको रखनेके ] उचित स्थानको पहिचाननेवाले कामदेवके द्वारा [पार्वतीके नितम्बस्थलके पास ] धरोहररूपमें रखी हुई; [अपने ] धनुषकी दूसरी प्रत्यञ्चाके समान मौलश्रीके फूलोंकी मालारूप, और नितम्बोंपरसे [ बार-बार] खिसक पड़नेवाली करधनीको बार-बार चढ़ाती हुई [ पार्वती दिखलायी दीं] ॥१६०॥ यहाँ [भौवीके] द्वितीयत्वमात्रकी उत्प्रेक्षा है [ इसलिए वह विधेय है। उसको समासमें रख दिया गया है जो उचित वहीं है। अतः दोष है] 'मौवों द्वितीया' यह पाठ होना चाहिये [ तब दोष नहीं रहेगा ]।
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का० ५०-५१, सू० ७२] सप्तम उल्लास: २७७ यथा वा- वपुर्विरूपाक्षमलक्ष्यजन्मता दिगम्बरत्वेन निवेदितं वसु। वरेषु यद् वालमृगाक्षि ! मृग्यते तदस्ति कि व्यस्तमपि त्रिलोचने ॥१६१॥ अत्रालक्षिता जनिरिति वाच्यम् । यथा वा- आनन्दसिन्धुरतिचापलशालिचित्तसन्दाननैकसदनं क्षणमप्यमुक्ता। या सर्वदैव भवता तदुदन्तचिन्तातान्ति तनोति तव सम्प्रति धिग् धिगस्मान् ॥१६२।। अत्र न मुक्तेति निषेधो विधेयः ।
अथवा जैसे [सम सगत अविमृष्टविधेयांशका दूसरा उदाहरण] हे मृगशावकके समान नेत्रवाली, [जिस शिवकी प्राप्तिके लिए इतना कठोर तपश्चरण कर रही हो उनका ] शरीर तीन नेत्रवाला [विरूपाक्ष ] है, उनके जन्मका कोई पता नहीं और [दरिद्रताके कारण ] नग्नतासे ही उसके धनकी सूचना मिल जाती है। [तो फिर] वरोंमें जो [रूप, कुल तथा धन ] देखा जाता है उनमेंसे कोई एक भी गुण तीन आँखवाले [शिव]में है ? [जो तुम उसके लिए व्याकुल हो रही हो।] ।।१६१॥ यहाँ [समस्तपदके स्थानपर ] 'अलक्षिता जनिः' यह [व्यस्त ] कहना चाहिये। यहाँ जिसके जन्मका कुछ पता नहीं इस रूपमें जन्मकी अलक्ष्यता विधेय है। इसलिए अलक्ष्यता पदको समासमें नहीं रखना चाहिये। उसे समासमें रखनेसे अविमृष्टविधेयांश दोष हो गया है। यह भी बहुव्रीहि समासका उदाहरण है, आगे नञ्न समासमें अविमृष्टविधेयांशका उदाहरण देते हैं। निषेधार्थक नञ् दो प्रकारका है, एक 'प्रसज्यप्रतिषेध' नञ, दूसरा 'पर्युदास' नञ्। 'प्रसज्यप्रतिषेध' निषेध करनेके लिए प्रयुक्त होता है, अर्थात् जहाँ निषेधकी प्रधानता होती है वहाँ 'प्रसज्यप्रतिषेध'का और प्रतिषेधकी अप्रधानतामें सदृश पदार्थके बोधके लिए 'पर्युदास'का प्रयोग होता है- द्वो नञ्र्थौं समाख्याती पर्युदासप्रसज्यकौ। पर्युदास: सदृग्ग्राही प्रसज्यस्तु निषेधकृत् ॥ नञ किसी अन्य पदके साथ समस्त हो जानेपर सदा 'पर्युदास' बन जाता है, उसमें प्रतिषेधकी प्रधानता नहीं रहती है। अतः प्रतिषेधकी प्रधानता होनेपर यदि पर्युदास अर्थात् समासगत नञ् का प्रयोग किया जाता है, तो वहाँ अविमृष्टविधेयांश दोष हो जाता है, जैसे अगले श्लोकमें 'अमुक्ता' पदके प्रयोगसे दोष आरा गया है। यहाँ १६२, १६३, १६४ तीन उदाहरणोंमें नञ् समासका प्रयोग दिखलाया है। जो आपके लिए [ कभी] आनन्दकी सागर थी, और आपके अत्यन्त चञ्चल चित्तको बाँध रखने- का मात्र स्थान थी, जिसको आप एक क्षणके लिए भी नहीं छोड़ते थे, आज उसके समाचार जाननेकी चिन्ता आपको हर समय क्लेश देती रहती है। इससे हम लोगोंको बार-बार धितकार है ॥१६३॥ यहाँ 'न मुक्ता' यह निषेध विधेय है [अतः समासरहित प्रसज्यप्रतिषेध नञ का ही प्रयोग होना चाहिये था, परन्तु यहाँ 'अमुक्ता' इस रूपसे समास करके पर्युदास नञ बना दिया है इसलिए अविमृष्ट- विधेयांश दोष हो गया है ]।
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२७८ काव्यप्रकाश: I[ का० ५०-५१, सू० ७२
यथा- नवजलधर: सन्नद्धोऽयं न दृप्तनिशाचर: सुरधनुरिदं दूराकृष्टं न तस्य शरासनम्। अयमपि पटुर्धारासारो न वाणपरम्परा कनकनिकषस्निग्धा विद्युत् प्रिया न ममोर्वशी ।१६३।। इत्यत्र। न त्वमुक्ततानुवादेनान्यदत्र किञ्चिद्विहितम् ।
यथा- जुगोपात्मानमत्रस्तो भेजे धर्ममनातुरः । अगृध्नुराददे सोऽर्थानसक्तः सुखमन्वभूत् ॥१६४॥ इत्यत्र अत्रस्तत्वाद्यनुवादेनात्मनो गोपनादि।
[प्रसज्यप्रतिषेधरूपमें नञ् का उचित प्रयोग ] जैसे -- यह तो उमड़ता हुआ नवीन मेघ है, उद्धत निशाचर नहीं है। यह इन्द्रधनुष है, उस [राक्षस ] का दूर [कानतक ] खींचा हुआ धनुष नहीं है। यह मूसलाधार वर्षा हो रही है [उस राक्षसकी ] बाणोंकी पंक्ति नहीं है और सोनेकी कसौटी [ पर खींची गयी रेखा ] के समान सुन्दर यह बिजलीकी रेखा है, मेरी प्रियतमा उर्वशी नहीं है ॥१६३। इसमें [समासरहित प्रसज्यप्रतिषेध ] नञ' का प्रयोग किया गया है। इसी प्रकार पहिले श्लोकमें भी प्रसज्यप्रतिषेधका ही प्रयोग करना चाहिये था, क्योंकि 'अमुक्ता' इस रूपमें पर्युदासका प्रयोग तो तभी हो सकता था जब 'अमुक्ता' का अनुवाद करके अन्य किसीका विधान किया जाता। परन्तु [ 'अमुक्ता'का अनुवाद करके अन्य किसीका विधान यहाँ नहीं किया गया है] अपितु अमुक्तत्व ही विधेय है। अतः प्रसज्य- प्रतिषेध ही होना चाहिये था। समस्त 'अमुक्ता' पदका प्रयोग दूषित है। [पर्युदास नञ् के प्रयोगका उचित उदाहरण ] जैसे -- उस [राजा दिलीप]ने निडर होकर अपनी रक्षा की, नीरोग [अनातुर ] रहकर धर्मका आचरण किया, लोभरहित होकर धनको ग्रहण किया और आसक्तिरहित होकर सुखका भोग किया॥१६४॥ यहाँ अत्स्तत्वादिको [ अनुवाद ] उद्देश्य बनाकर अपनी रक्षा आदि [क्रियाओं]का विधान किया है [अतः अव्स्त आदि पदोंमें पर्युदास नञ् का प्रयोग ठीक है ]। यहाँ समासगत अविमृष्टविधेयांश दोषके उदाहरणरूपमें नञ्म समासकी चर्चा चल रही है। नञ्म का जब कभी समास होगा तब नञ् का 'प्रसज्यप्रतिषेध'वाला रूप समाप्त होकर पर्युदासात्मक रूप ही रह जायगा। प्रसज्यप्रतिषेध तथा पर्युदास नञ् के लक्षण निम्नलिखित प्रकार किये गये हैं- अप्राधान्यं विधेरयंत्न प्रतिषेधे प्रधानता। प्रसज्यप्रतिषेधोऽसौ क्रियया सह यत्र नञ् ।। प्रसज्यप्रतिषेधमें प्रतिषेधकी प्रधानता होती है और क्रियाके साथ नञ्न का सम्बन्ध होता है।
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का० ५०-५१, सू० ७२ ] सप्तम उल्लास: २७६
(१६) विरुद्धमतिकृत् यथा -- सुधाकरकराकारविशारदविचेष्टितः । अकार्यमित्रमेकोऽसौ तस्य किं वर्णयामहे॥१६५॥ अत्र कार्य विना मित्रमिति विवक्षितम्, अकार्ये मित्रमिति तु प्रतीतिः । यथा वा- चिरकालपरिप्राप्तलोचनानन्ददायिनः । कान्ता कान्तस्य सहसा विदधाति गलग्रहम् ॥१६६।। अत्र कण्ठग्रहमिति वाच्यम् । यथा वा- न त्रस्तं यदि नाम भूतकरुणासन्तानशान्तात्मनः तेन व्यारुजता धनुर्भगवतो देवाद् भवानीपतेः।
इसके विपरीत- प्रधानत्वं विधेयत्र प्रतिषेधेऽप्रधानता। पर्युदासः स विज्ञेयो यत्रोत्तरपदेन नञ् ।। पर्युदासमें प्रतिषेधकी प्रधानता नहीं रहती है और नञ का सम्बन्ध क्रियाके साथ न होकर उत्तरपद- के साथ होता है। ऊपरके तीन उदाहरणोंमेंसे १६३ वें श्लोकमें प्रसज्यप्रतिषेधरूपमें और १६४वें श्लोकमें 'पर्युदास' रूपमें नञ्म का उचित प्रयोग हुआ है। १६२ वें श्लोकमें 'अमुक्ता' यह 'पर्युदास' नञ्य का प्रयोग अनुचितरूपसे किया गया है। १६. विरुद्धमतिकृत् [दोषका उदाहरण ] जैसे -- चन्द्रभाकी किरणोंके समान निर्मल [निर्दोष ] व्यवहार करनेवाला और निःस्वार्थ मित्र वह एक ही है [अद्वितीय है]। उसका क्या दर्णन किया जाय ॥१६५॥ यहाँ बिना कार्यके मित्र [अर्थात् अपने निजी स्वार्थके बिना निःस्वार्थ मित्र ] यह अर्थ विवक्षित है। परन्तु [अकार्यमित्रं पदसे अकार्य] बुरे काममें सहायक [अकार्यमित्र ] यह प्रतीति होती है [ अतः यह प्रयोग विरुद्धमतिकारी होनेसे दूषित है ]। अथवा [विरुद्धमतिकृत्का दूसरा उदाहरण ] जैसे -- बहुत दिनोंके बाद मिले हुए, नेत्रोंको आनन्द देनेवाले पतिके गलेमें पत्नी तुरन्त ही लिपट जाती है ॥१६६।। यहाँ [गलग्रह पदकी जगह ] कण्ठग्रह ऐसा कहना चाहिये था '[ गला दबोच लेना', 'गर्दनिया- अर्धचन्द्र देकर निकाल देना'से अनिष्ट अर्थोंकी प्रतीति होती है ]। अथवा [इसी विरुद्धमतिकारिताका तीसरा उदाहरण ] जैसे -- उस [रामचन्द्र ] ने धनुष तोड़ते समय जीवोंपर अपार दयाके कारण शान्तस्वरूप भगवान् शिव [भवानीपति] से डर नहीं माना तो न सही, परन्तु मदान्ध तारकासुरके वधसे संसारको आह्लादित
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२८० काव्यप्रकाश: [ का० ५०-५१, सू० ७२
तत्पुत्रस्तु मदान्धतारकवधाद्विश्वस्य दत्तोत्सवः स्कन्दः स्कन्द इव प्रियोऽहमथ वा शिष्यः कथं विस्मृतः ॥१६७॥ अत्र भवानीपतिशब्दो भवान्याः पत्यन्तरे प्रतीति करोति।
यथा वा- गोरपि यद्वाहनतां प्राप्तवतः सोऽपि गिरिसुतासिंहः । सविधे निरहङ्कारः पायाद्वः सोऽम्विकारमणः ॥१६८॥ अत्राम्बिकारमण इति विरुद्धां धियमुत्पादयति।
श्रुतिकटु समासगतं यथा -- सा दूरे च सुधासान्द्रतरङ्गतविलोचना। वहिनिह्रादिनार्होडयं कालश्च समुपागतः ।१६९॥ एवमन्यदपि ज्ञेयम्।
करनेवाले उनके पुत्र स्कन्दको, अथवा स्कन्द के समान ही प्रिय शिष्य मुझ [परशुराम ] को कैसे भुला दिया ॥१६७॥ यहाँ [ 'भवस्य शिवस्य पत्नी भवानी' इस व्युत्पत्तिके अनुसार शिव-पार्वतीका पति-पत्नीसबन्ध भवानीशब्दसे ही प्रतीत होता है, फिर भवानीके साथ पतिशब्द जोड़नेसे ] भवानीपति शब्द भवानी [पार्वती ] के दूसरे पतिकी प्रतीति कराता है। [इसलिए विरुद्धमतिकारी होनेसे यह दोष है ]। अथवा [इसी विरुद्धमतिकारिताका चौथा उदाहरण ] जैसे -- जिनकी सवारी बने हुए [नन्दी ] बैलके पास वह [अत्यन्त कूर ] पार्वतीका सिंह भी अहङ्गार त्याग देता है वे अम्बिकारमण [शिवजी ] तुम्हारी रक्षा करें ॥१६८॥ यहाँ अम्बिकारमण पद [अम्बिका अर्थात् माताके साथ रमण करनेवाला जार आदि रूप ] विरुद्धमतिको उत्पन्न करता है। सूत्र ७२ में क्लिष्टत्व, अविमृष्टविधेयांश और विरुद्धमतिकृत् इन तीन दोषोंको समासगतमेव- समासगत ही कहा था। इसलिए इन तीनोंके समासगत ही उदाहरण यहाँ दिये गये। इन तीनों ही दोषोंको समासगत कहनेका अभिप्राय यह है कि श्रुतिकटु आदि अन्य दोष समासगत और पदगत दोनों प्रकारके होते हैं। उनके पदगत उदाहरण दे चुके हैं। उनके प्रतिनिधिरूपमें एक श्रुतिकटु दोषका समासगत उदाहरण दिखलाते हैं- समासगत श्रुतिकटु [उदाहरण ] जैसे -- अमृतकी भरी [तरङङ्गित ] उज्ज्वल नेत्रवाली वह [सीता दूर है और मयूरोंके केकारवका करानेवाला यह [वर्षाका ] समय आ गया है ॥१६६। [यहाँ बहिनिरहरादनाह यह समस्त पद श्रुतिकट है]। इसी प्रकार अन्य [दोषोंके समासगत उदाहरण ] भी समझ लेने चाहिये।
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का० ५२, सू० ७३ ] सप्तम उल्लास: २८१
[सू० ७३ ] अपास्य च्युतसंस्कारमसमर्थ निरर्थकम्। वाक्येऽपि दोषाः सन्त्येते पदस्यांशेऽपि केचन ।५२।। केचन न पुनः सर्वे। करमेणोदाहरणम्- सोऽध्यैष्ट वदांस्त्रिदशानयष्ट पितृनतार्प्सीत् सममंस्त बन्धून् व्यजेष्ट षड्वर्गमरंस्त नीतौ समूलघातं न्यवधीदरींश्च ।।१७०।। स रातु वो दुश्च्यवनो भावुकानां परम्पराम् । अनेडमूकताद्यैश्च द्यतु दोषैरसम्मतान् ॥१७१॥ अत्र दुश्च्यवन इन्द्रः, अनैडमूको मूकबधिरः । सायकसहायबा होर्मकरध्वजनियमितक्षमाधिपतेः । अब्जरुचिभास्वरस्ते भातितरामवनिप श्लोकः ॥१७२॥ अत्र सायकादयः शब्दाः खड्गाब्धिभूचन्द्रयशःपर्यायाः शराद्यर्थतया प्रसिद्धाः ।
१. वाक्यगत श्रुतिकटु [सूत्र ७३]-च्युतसंस्कार, असमर्थ और निरर्थक [इन तीन पददोषों ] को छोड़कर ये सब दोष वाक्यमें भी होते हैं और कुछ पदांशमें भी होते हैं। [पदके अंशमें केचन ] कुछ ही [दोष होते हैं] सब नहीं। [वाक्यगत उक्त दोषोंके ] क्मशः उदाहरण ] आगे देते हैं, जैसे -- उस [ राजा दशरथ ] ने वेदोंका अध्ययन किया, [यज्ञों द्वारा] देवताओंका पूजन किया, पितरोंको ·[ श्राद्ध-तर्पण आदिसे] तृप्त किया, बन्धु-बान्धवोंका [दान आदि द्वारा ] सम्मान किया, [कामक्रोधादि- रूप ] शत्रुओंके षड्वर्गपर विजय प्राप्त की, नीतिशास्त्रका आनन्द लिया और शत्रुओंका समूल नाश कर दिया ॥१७०॥ यह सारा श्लोक श्रुतिकटु पदोंसे भरा हुआ्र है, इसलिए यह वाक्यगत श्रुतिकटु दोषोंका उदाहरण है। श्रुतिकटुके बाद दूसरे च्युतसंस्कार दोषको छोड़कर तीसरे वाक्यगत अप्रयुक्त दोषका उदाहरण देते हैं। २. वाक्यगत अप्रयुक्तत्व वह इन्द्र [दुश्च्यवन ] तुमको कल्याणपरम्परा प्रदान करे और [तुम्हार ] शत्रुओंका गूंगा-बहिरापन आदि दोषोंसे नाश करे ॥१७१॥ यहाँ दुश्च्यवन पद इन्द्र [अर्थमें अप्रयुक्त है] और अनेडमूक [पद ] गूंगा-बहिरापन [अर्थमें अप्रयुक्त ] है [ अनेक पदोंमें होनेसे यह वाक्यगत अप्रयुक्तत्व दोष है ]। ३. वाक्यगत निहतार्थता आगे वाक्यगत निहतार्थ दोषका उदाहरण देते हैं- [सायक खडग ] खड्गसे युक्त बाहुवाले और समुद्रसे परिवेष्टित पृथिवीके स्वामी हे राजन् ! आपका यश चन्द्र [अब्जश्चन्द्रः ] के समान अत्यन्त प्रकाशमान हो रहा है ।।१७२।।
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२८२ काव्यप्रकाश: [का० ५२, सू० ७३ कुविन्दस्त्वं तावत्पटयसि गुणग्राममभितो यशो गायन्त्येते दिशि दिशि च नग्नास्तव विभो ! शरज्ज्योत्स्नागौरस्फुटविकट सर्वाङ्गसुभगा तथापि त्वत्कीतिर्भ्रमति विगताच्छादनमिह ।।१७३।। अत्र कुविन्दादिशब्दोऽ्र्थान्तरं प्रतिपादयन् उपश्लोक्यमानस्य तिरस्कारं व्यनवतीत्य- नुचितार्थः ।
यहाँ सायक आदि [सायक, मकरध्वज, क्षमा, अब्ज और श्लोक ] शब्द [क्रमशः ] खड़ग, समुद्र, पृथिवी, चन्द्रमा और यशके पर्यायरूप [में प्रयुक्त हुए ] हैं [ किन्तु लोकमें ] बाण आदि [कमशः दाण, क मदेव, सहन करना, कमल और पद्य ] अर्थमें प्रसिद्ध हैं [ अतः सायक आदि शब्दोंका खङ्ग आदि अर्थोंमें प्रयोग निहतार्थत्व दोषसे ग्रस्त है]। ४. वाक्यगत अनुचितार्थत्व आगे वाक्यगत अनुचितार्थ दोषका उदाहरण देते हैं। इस श्लोकमें राजाकी स्तुति है, परन्तु उसके साथ जुलाहेके वाचक कुविन्द शब्द तथा 'पटं करोषि' इस अर्थकी बोधक 'पटायसि' क्रियाके द्वारा जुलाहा-परक दूसरे अर्थकी भी अभिधामूलक व्यञ्जना द्वारा प्रतीति होती है। और उन दोनों अरथोंका उपमानोपमेयभाव होनेसे राजाकी जुलाहेके साथ उपमा सारे वाक्यसे प्रतीत होती है जो हीनोपमा होनेके कारण अनुचित है। इसलिए यह वाक्यगत अनुचितार्थ दोषका उदाहरण है। अर्थ निम्नलिखित प्रकार है- [कु अर्थात् पृथिवीको विन्दति प्राप्नोति इति कुविन्दः ] पृथिवीको [विजय द्वारा] प्राप्त करनेवाले हे राजन् [दूसरे पक्षमें कुविन्द जुलाहा ] आप अपने [शौर्य, दानादि ] गुणसमुदाय [ जुलाहेके पक्षमें गुणपदका अर्थ सूत होगा ] को चारों ओर [ पटुं करोषि पटयसि, ऐसा दानी, ऐसा विद्वान्, ऐसा पराक्रमी राजा है, इत्यादि रूपमें ] प्रकाशित कर रहे हैं [ जुलाहेके पक्षमें-जुलाहेके रूपमें आप सूतसे चारों ओर कपड़े तैयार कर रहे हैं ] और ये चारण [नग्न पदका राजा-पक्षमें चारण और जुलाहे-पक्षमें वस्त्रहीन अर्थ होता है। 'नग्नो वन्दिक्षपणयोः पुंसि त्रिषु विवाससि']। सारी दिशाओंमें आपका यश गाते फिरते हैं। फिर भी शरत्कालकी चाँदनीके समान गौर उज्ज्वल और विशाल सर्वाङ्गोंसे सुन्दर तुम्हारी कीति [विगताच्छादन, निरावरण, उन्मुक्त] नग्न-सी घूमती फिर रही है।१०३।। यहाँ कुविन्द आदि शब्द [कुविन्द अर्थात् जुलाहा, गुण सूत्र, पटयसि पटं करोषि, विगताच्छादन वस्त्रहित नंगी आदि रूप ] अन्यार्थका प्रतिपादन करते हुए स्तूयमान राजाके तिरस्कारको सूचित करते हैं। इसलिए [ यह सारा श्लोकवाक्य ] अनुचितार्थ है। ऊपर यह दिखलाया है कि इस श्लोकका अर्थ राजा व जुलाहा, दोनों पक्षोंमें लगता है। राजा-पक्षमें 'कुविन्द' आदि शब्दोंका जो अर्थ किया है वह उनकी प्रशंसाका सूचक है। किन्तु उससे जो जुलाहा-
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का० ५२, सू० ७३ ] सप्तम उल्लास: २८३
प्राभ्रभ्राड्विष्णुधामाप्य विषमाश्वः करोत्ययम् । निद्रां सहस्रपर्णानां पलायनपरायणाम् ।।१७४।। अत्र प्राभ्रभ्राड्विष्णुधामविषमाश्वनिद्रापर्णशब्दाः प्रकृष्टजलदगगनसप्ताश्वसङ्कोच- दलानामवाचकाः । भूपतेरुपसर्पन्ती कम्पना वामलोचना तत्तत्प्रहरणोत्साहवती मोहनमादधौ ।।१७५।। अत्रोपसर्पणप्रहरणमोहनशब्दा व्रीडादायित्वादश्लीलाः।
पक्षवाला अर्थ निकलता है वह राजाके लिए अपमानजनक है। अतः यह सारा श्लोकवाक्य अनुचित हो गया है। इस कारण इसे वाक्यगत अनुचितार्थ दोषके उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया गया है। ५. वाक्यगत अवाचकत्व आगे वाक्यगत अवाचकत्व दोषका उदाहरण देते हैं। यह [विषम संख्याके घोड़ोंवाला सप्ताश्व ] सूर्य [विष्णुधाम ] आकाशमें पहुँच [उदित हो ]कर, प्रकृष्ट मेघोंसे शोभायमान [प्राभ्रभ्राड्] सहस्रदल कमलोंकी निद्राको भागनेके लिए उद्यत कर देता है [कमलोंको खिला देता है]।।१७४॥ यहाँ प्राभ्रभ्राड्, विष्णुधाम, विषमाश्व, निद्रा, पर्ण शब्द [कमशः] प्रकृष्टमेघ, आकाश, सप्ताश्व, सङ्कोच और दल अर्थोंके अवाचक हैं [ अतः यह वाक्यगत अवाचकत्व दोषका उदाहरण है]। इसमें विष्णुधाम आदि शब्द आकाशादिके लिए प्रयुक्त किये गये हैं किन्तु वे शब्द साक्षात रूपसे उन अरथोंके वाचक नहीं हैं, लक्षणा द्वारा परम्परितरूपसे ही उन अथोंके वाचक होते हैं। यह साक्षाद् अवाचकत्व दोष अनेक पदोंमें है इसलिए यह वाक्यगत अवाचकत्व दोषका उदाहरण है। ६. वाक्यगत अश्लीलत्व दोष आगे वाक्यगत त्रिविध अश्लीलताके तीन उदाहरण देते हैं। इनमें सबसे पहले व्रीडाजनक अश्लीलताका उदाहरण देते हैं। इसमें राजाकी सेनाका वर्णन है कि नाना प्रकारके शस्त्रोंके प्रयोगमें उत्साहवती और आगे बढ़ती हुई, शत्रुओंके प्रति वकदृष्टिवाली राजाकी सेनाने शत्रुओंको वशमें कर लिया, उनपर मोहनमन्त्रका प्रयोग कर दिया। इसमें सेनाके लिए 'कम्पना'का प्रयोग किया है, इसका अर्थ शत्रुओंको कँपा देनेवाली सेना भी होता है, और सुरतमें कम्पनशीला नायिका भी होती है। इसी प्रकार प्रहरण और मोहन शब्द भी सुरतलीलासे सम्बन्ध रखनेवालेसे शब्द हैं। इसलिए उनसे व्रीडाकी अभिव्यक्ति होनेसे यह वाक्यगत अश्लीलताका उदाहरण है। [शत्रुओंके प्रति ] वक्रदष्टि और [दूसरे पक्षमें सुन्दर नेत्रोंवाली ] और उन [विशेष-विशेष प्रहरण ] अस्त्र-शस्त्रोंके प्रयोगके लिए उत्साहवती राजाकी बढ़ती हुई सेनाने [शत्रुको वशमें कर लिया [या चकित कर दिया]॥१७६। यहाँ उपसर्पण, प्रहरण और मोहन शब्द ब्रीडाजनक होनेसे अश्लील हैं।
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२८४ काव्यप्रकाशः [ का० ५२, सू० ७३
तेऽन्यैर्वान्तं समश्नन्ति परोत्सर्गञ्च भुञ्जते । इतरार्थग्रहे येषां कवीनां स्यात्प्रवर्त्तनम् ॥१७६।। अत्र वान्तोत्सर्ग-प्रवर्त्तनशब्दा जुगुप्सादायिनः । पितृवसतिमहं व्रजामि तां सह परिवारजनेन यत्र मे। भवति सपदि पावकान्वये हृदयमशेषितशोकशल्यकम् ।।१७७।। अत्र पितुर्ग्ृहमित्यादौ विवक्षिते श्मशानादिप्रतीतावमङ्गलार्थत्वम्। सुरालयोल्लासपर: प्राप्तपर्याप्तकम्पनः । मार्गणप्रवणो भास्वद्भूतिरेष विलोक्यताम् ।।१७८।।
वाक्यगत व्रीडाजनक अश्लीलताका उदाहरण देनेके बाद अब वाक्यगत जुगुप्साजनक अश्लीलता का उदाहरण देते हैं। अन्य कवियोंके अर्थका अपहरण करनेमें जिन कवियोंकी प्रवृत्ति होती है [ जो कवि प्रवृत्त होते हैं ] वे अन्योंके वमनको और अन्योंके पुरीष [विष्ठा] को खाते हैं ॥१७६॥ यहाँ वान्त, उत्सर्ग तथा प्रवर्तन शब्द [प्रवर्तनं प्रवृत्तिः पुरीषोत्सर्गश्च ] जुगुप्सादायक [होनेसे अश्लील ] हैं। मैं अपने परिवारके [पुत्र आदि ] लोगोंके साथ उस पितृगृह [पीहर] को जाती हूँ, जिस पवित्र कुलमें पहुँचते ही हृदय शोकके सारे कील-काँटोंसे रहित हो जायेगा ॥१७७॥ यहाँ [पितृवसति शब्दसे ] पितृगृह [पीहर] अर्थ विवक्षित होनेपर भी [पितृवसतिका अर्थ श्मशान भी होता है, पावकान्वय शब्दसे पवित्र करनेवाले कुलमें, यह अर्थ विवक्षित है परन्तु श्मशानपक्षमें चिताग्निके साथ अन्वय सम्बन्ध होनेपर, यह अर्थ भी प्रतीत होता है कि चितामें जल जानेसे सारे कष्ट मिट जायेंगे इत्यादि ] श्मशानकी प्रतीति होनेपर [वाक्यगत ] अमंगलार्थत्व [ होनेसे वाक्यगत अमंगलजनक अश्लीलता दोष है]। ७. वाक्यगत सन्दिग्धत्व आगे वाक्यगत सन्दिग्धत्वका उदाहरण देते हैं। इस श्लोकके दो अर्थ हो सकते हैं।, एक राजापरक, दूसरा भिक्षुकपरक। राजापरक अर्थमें सुरालयका अर्थ देवताओंका घर, कम्पनाका अर्थ सेना, मार्गणप्रवणका अर्थ बाणप्रहारमें चतुर और भास्वद्भूतिका अर्थ ऐश्वर्यशाली होगा। पर दूसरे पक्षमें सुरालयका अर्थ मद्यशाला [मयखाना ], कम्पनाका अर्थ शराबके नशेमें काँपता हुआ, मार्गणप्रवणका अर्थ भीख माँगता हुआ और भास्वद्भूतिका अर्थ राख लगाये हुए होगा। इन दोनों अरथोंमेंसे यहाँ कौन-सा अरथ विवक्षित है, यह निश्चय न होनेसे यह वाक्यगत सन्दिग्ध दोषका उदाहरण है। अर्थ निम्नलिखित प्रकार है- देवताओंके घर [या मद्यालय ] में प्रसन्न रहनेवाले, प्रचुर सेनासे युक्त, [और ज्यादा चढ़ा जानेके कारण नशेमें कांपते हुए, ] ऐश्वर्यशाली [दूसरे पक्षमें राख लपेटे ] और बाणप्रहारमें निपुण [दूसरे पक्षमें भीख माँगनेवाले ] इस राजाको [अथवा भिखमङ्ग] को देखो ॥१७८॥
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का० ५२, सू० ७३ ] सप्तम उल्लास: २८५
अत्र किं सुरादिशब्दा देवसेनाशरविभूत्यर्थाः किं मदिरादयर्था इति सन्देहः । तस्याधिमात्रोपायस्य तीव्रसंवेगताजुषः । दृढभूमि: प्रियप्राप्तौ यत्नः स फलितः सखे ॥१७९॥ अत्राधिमात्रोपायादयः शब्दाः योगशास्त्रमात्रप्रयुक्तत्वादप्रतीताः । ताम्बूलभृतगल्लोडयं भल्लं जल्पति मानुषः । करोति खादनं पानं सदैव तु यथा तथा ॥१८०॥ अत्र गल्लादय: शब्दा ग्राम्याः ।
यहाँ सुरारि [सुर-सुरा, कम्पना-कम्पन, मार्गण और भूति ] आदि शब्द क्या [कमशः] देव, सेना, बाण और विभूतिके वाचक हैं, अथवा शराब आदि परक हैं यह सन्देह होनेसे [ यह वाक्यगत सन्दि- गधत्व दोषका ] उदाहरण है।
८. वाक्यगत अप्रतीतत्व आगे वाक्यगत अप्रतीतत्व दोषका उदाहरण देते हैं। इसमें आये हुए अधिमात्रोपाय, तीव्रसंवेग और दृढभूमि शब्द योगदर्शनके विशेष शब्द हैं। योगसाधकोंके नौ भेद किये है। इनमें तीन भेद उपायोंके उत्कर्षापकर्षके आ्र्प्राधारपर, मृदूपाय, मध्योपाय और अधिमात्रोपाय हैं। फिर इन तीनों प्रकारके साधकोंकी वैयक्तिक क्षमताके आधारपर मृदुसंवेग, मध्यसंवेग और तीव्रसंतेग ये तीन भेद किये गये हैं। इस प्रकार साधक योगी नौ प्रकारके होते हैं। इस रूपमें अधिमात्रोयपाय और तीव्रसवेग शब्दोंका प्रयोग योगमें हुआ है। इस प्रकार योगका अभ्यास दीर्घकालपर्यन्त, निरन्तर और श्रद्धापूर्वक सेवित होनेसे दृढभूमि होता है, इस रूपमें दृढ़भूमि शब्दका प्रयोग किया गया है। योगदर्शनको जिसने पढ़ा है उसीको उन शब्दोंके अर्थका परिज्ञान हो सकता है, अन्यको नहीं। इसलिए निम्नलिखित श्लोकमें इन शब्दोंका प्रयोग वाक्यगत अप्रतीतत्व दोषका कारण बन गया है। हे सखे ! [इन नौ प्रकारके साधकोंमें ] अधिमात्रोपाय और तीव्रसंवेगवाले उस साधक योगीका [तत्न स्थितौ यत्नोऽभ्यासः ] अभ्यास [स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमि: ] दृढभूमि होकर प्रिय [आत्मसाक्षात्कार अथवा समाधि आदि] को प्राप्त कर, सफल हो गया है॥१७१॥ इसमें अधिमात्रोपाय आदि 'अनेक ] शब्द केवल योगशास्त्रमें प्रसिद्ध होनेसे अप्रतीत [दोषग्रस्त ] हैं। [अतः यह वाक्यग्रत अप्रतीतत्व दोषका उदाहरण है]। ९. वाक्यगत ग्राम्यत्व दोष आगे वाक्यगत ग्राम्यत्व दोषका उदाहरण देते हैं- यह मनुष्य खान-पान तो सदा ऐसा-वैसा ही करता है [ अर्थात् बहुत अच्छा खाता-पीता नहीं, किन्तु गालोंमें पान भरकर बोलता अच्छा है ॥१८०॥ यहाँ गल्ल [भल्ल खादन ] आदि [अनेक ] शब्द ग्राम्य हैं [ अतः यह वाक्यगत ग्राम्यत्व दोषका उदाहरण है]।
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२८६ काव्यप्रकाश: [का० ५२, सू० ७३
वस्त्रवैदूर्यचरणैः क्षतसत्त्वरजःपरा। निष्कम्पा रचिता नेत्रयुद्धं वेदय साम्प्रतम् ।।१८१।।
अत्राम्वररत्नपादैः क्षततमा अचला भू: कृता नेत्रद्वन्द्वं बोधयेति नेयार्थता।
धम्मिलस्य न कस्य प्रेक्ष्य निकामं कुरङ्गशावाक्ष्याः । रज्यत्यपूर्व बन्धव्युत्पत्तेर्मानसं शोभाम् ।।१८२।। अत्र धम्मिल्लस्य शोभां प्रेक्ष्य कस्य मानसं न रज्यतीति सम्वन्धे क्लिष्टत्वम्।
१०. वाक्यगत नेयार्थता दोष आगे वाक्यगत नेयार्थ दोषका उदाहरण देते हैं -- [सोती हुई स्त्रीको जागती हुई उसकी सखी कह रही है कि सूर्यकी किरणोंसे पृथिवीके अन्धकारका नाश हो गया है, इसलिए तुम अपनी आँखें खोलो ]। [वस्त्रवैदूर्य अम्बरमणि अर्थात् ] सूर्यकी किरणों [चरणैः ] से [निष्कम्पा अचला ] पृथिवी- का [रजोगुण और सत्त्वगुणसे भिन्न अर्थात् तम अर्थात् ] अन्धकार नष्ट हो गया है। इसलिए [ नेत्रयुद्ध अर्थात् नेव्द्वन्द्व अर्थात् ] दोनों आँखें [वेदय] खोलो ॥१८१॥ यहाँ अम्बरमणि [सूर्य]की किरणोंसे पृथ्वीका अन्धकार दूर हो गया है, इसलिए नेत्र खोलो, यह [अर्थ क्लिष्ट कल्पनासे रूढि या प्रयोजन रूप उचित कारणोंके बिना की गयी लक्षणासे निकलता है, इस- लिए ] नेयार्थता [दोष ] है।
११. वाक्यगत क्लिष्टता दोष आगे वाक्यगत क्लिष्टत्वका उदाहरण देते हैं- इस मृगशावकनयनीके अपूर्व बन्धनचातुर्यसे बँधे [जुड़े ] केशपाशकी शोभाको देखकर किसका मन प्रसन्न [या अनुरक्त, मोहित ] नहीं होता है ।१८२। यहाँ केशपाशकी शोभाको देखकर किसका मन प्रसन्न नहीं होता है [ इन पदोंका दूरान्वय होनेके कारण ] यह सम्बन्ध क्लिष्ट है [ अतः यह वाक्यगत क्लिष्टत्वका उदाहरण है)। १२. वाक्यगत अविमृष्टविधेयांश दोष समासगत अविमृष्टविधेयांशके अनेक उदाहरण दिये थे। उनमें विधेय भागको समासके अन्तर्गत कर देनेसे उसकी प्रधानता नष्ट हो जानेके कारण अविमृष्टविधेयांश दोष हो गया था। परन्तु विधेयकी प्रधानताका नाश इसके अतिरिक्त अन्य स्थितिमें भी हो सकता है। 'अनुवाद्यमनुक्त्वैव न विधेयमुदीरयेत्' इस नियमके अनुसार वाक्यरचनामें पहिले उद्देश्यका बादमें विधेयका प्रयोग करना चाहिये। इस नियमके विपरीत पहिले विधेयका और बादमें उद्देश्यका कथन करनेपर भी विधेयका प्राधान्य नहीं रहता है। इसलिए वहाँ भी अविमृष्टविधेयांश दोष हो सकता है। उस दशामें वह वाक्यगत दोष ही होता है। जैसे 'न्यक्कारो ह्ययमेव मे यदरयः' इसमें 'न्यक्कार' विधेय है और 'अयम्' उद्देश्य है। परन्तु 'न्यक्कार' पदका प्रयोग पहिले कर दिया गया है, इसलिए इसमें अविमृष्टविधेयांश दोष हो गया है।
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का० ५२, सू० ७३ ] सप्तम उल्लास: २८७
न्यक्कारो ह्ययमेव मे यदरयस्तत्राप्यसौ तापसः सोऽप्यत्रैव निहन्ति राक्षसकुलं जीवत्यहो रावणः । धिक् धिक शकरजितं प्रबोधितवता कि कुम्भकर्णेन वा स्वर्गग्रामटिकाविलुण्ठनवृथोच्छूनैः किमेभिर्भुजैः ॥१८३॥
अत्रायमेव न्यक्कार इति वाच्यम्। च्छूनत्वमात्रं चानुवाद्यं न वृथात्वविशेषितम्। अत्र च शब्दरचना विपरीता कृतेति वाक्यस्यैव दोषो न वाक्यार्थस्य।
इसी दृष्टिसे आगे वाक्यगत अविमृष्टविधेयांश दोषके उदाहरणरूपमें इस श्लोकको उद्धृत किया है। यह 'हनुमन्नाटक' के चतुर्दश अङ्गमें रावणकी उक्ति है- [संसारमें ] मेरे शत्रु हों यही [ बड़ा भारी] अपमान है, उसमें भी यह साधु। वह भी यहाँ [लङ्गामें ] ही [और मेरी नाकके नीचे ही ] राक्षसकुलकानाश कर रहा है, [यह सब देखकर भी ] रावण जी रहा है यह आश्चर्यकी बात है। इन्द्रको जीतनेवाले मेघनादको धिक्कार है। कुम्भकर्णको जगानेसे क्या [लाभ ] हुआ। और [दूसरोंकी बात क्या कही जाय ] स्वर्गकी उस छोटी-सी गउँटियाको लूटकर व्यर्थ ही गर्वसे फूली हुई मेरी इन भुजाओंका ही क्या फल है ॥१८३॥ यहाँ 'अयम्' उद्देश्य और 'न्यक्कार' विधेय है, इसलिए 'अनुवाद्यमनुक्त्वैव न विधेयमुदीरयेत्' इस सिद्धान्तके अनुसार उद्देश्यको पहिले और विधेयको पीछे करके] 'अयमेव न्यक्कारः' यह ही मेरा अपमान है; इस प्रकार कहना चाहिये था। [उस नियमका उल्लंघन करनेसे श्लोकके प्रथम चरणमें वाक्यगत अविमृष्टविधेयांश दोष है। और चतुर्थ चरणमें 'उच्छूनत्वमात्र' उद्देश्य है तथा वृथात्व विधेय है, इसलिए वृथात्वको समासमें न रखकर अलग रखना चाहिये था। उस नियमका उल्लंघन होनेसे यहाँ भी अवि- मृष्टविधेयांश दोष है। इसीको कहते हैं कि चतुर्थ चरणमें ] केवल उच्छूनत्वमात्र ही उद्देश्य [अनुवाद्य] है, न कि वृथात्वविशिष्ट [उच्छूनत्व। अपितु वृथात्व विधेय है] परन्तु [दोनों स्थलोंमें ] शब्दरचना उलटी कर दी है, इसलिए यह वाक्यका ही दोष है। वाक्यार्थगत दोष नहीं है। अविमृष्टविधेयांश दोषका तीसरा रूप 'न्यक्कारो ह्ययमेव' इत्यादि श्लोकके प्रथम चरणमें उद्देश्य तथा विधेयके व्युत्क्मके कारण तथा चतुर्थ चरणमें विधेयके समासान्तर्गत गुणोभावके कारण हुआ अविमृष्टविधेयांश दोष दिखलाया था। इनसे भिन्न एक अन्य हेतुसे भी यह दोष हो सकता है, यह बात आगे दिखायेंगे। इसमें 'यत्' और 'तत्' शब्दका-अपप्रयोग इस दोषका प्रमुख कारण होता है। इसलिए इस प्रसङ्गमें 'यत्' और 'तत्' शब्दोंके प्रयोगके विषयमें विस्तारपूर्वक विवेचन किया है। इस विवेचनमें इन दोनों शब्दोंके प्रयोगके विषयमें निम्नलिखित नियमोंकी स्थापना की गयी है। १. 'यत्तदोनित्यसम्बन्धः' इस नियमके अनुसार 'यत्' शब्दके प्रयोगके साथ 'तत्' शब्दका प्रयोग अवश्य होना चाहिये। यह सामान्य नियम है, परन्तु इसके दो अपवाद भी हैं जो निम्नलिखित प्रकार हैं-
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२८८ काव्यप्रकाश: [ का० ५२, सू० ७३
यथा वा- अपाङ्गसंसरगितरङङगितं दृशोभ्रुवोररालान्तविलासि वेल्लितम्। विसारिरोमाञ्चनकञ्चुकं तनोस्तनोति योऽसौ सुभगे तवागतः ॥१८४। अत्र योऽसाविति पदद्वयमनुवाद्यमात्रप्रतीतिकृत् । तथा हि प्रकान्तप्रसिद्धानुभूतार्थविषयस्तच्छब्दो यच्छब्दोपादानं नापेक्षते ।
[क] जहाँ १. प्रकान्त अर्थात् प्रकरणप्राप्त, २. प्रसिद्ध तथा ३. अनुभूत अर्थके द्योतनके लिए तत् शब्दका प्रयोग होता है, वहाँ यत् शब्दके प्रयोगकी आवश्यकता नहीं होती है। [ख]जहाँ उत्तरवाक्य अर्थात् बादके वाक्यमें यत् शब्दका प्रयोग होता है, वहाँ पूर्ववाक्यमें तत् शब्दकी प्रतीति स्वयं सामर्थ्यसे हो जाती है, इसलिए वहाँ तत् शब्दके प्रयोगकी आवश्यकता नहीं होती है। २. पहिले वाक्यमें प्रयुक्त यत् शब्द तत् शब्दकी आ्रकांक्षा अवश्य रखता है, अर्थात् जहाँ पहिले वाक्यमें यत् शब्दका प्रयोग हो वहाँ उत्तरवाक्यमें तत् शब्दका प्रयोग अवश्य होना चाहिये। ३. तत् शब्दके समानार्थक रूपमें इदम्, एतद् और अदस् शब्दोंका प्रयोग भी हो सकता है। परन्तु यत् शब्दके साथ अव्यवहित रूपसे उनका प्रयोग नहीं होना चाहिये। यत् शब्दके साथ अव्यवधानसे प्रयुक्त तत् या इदम्, अदस् आदि शब्द केवल प्रसिद्धिमात्रके सूचक होते है, और विधेयके स्थानपर उद्देश्यकी प्रतीति कराते हैं। साधारणतः यत् पद उद्देश्यका और तत् शब्द या उसके समानार्थक इदम्, एतत् और अदस् शब्द विधेयांशके बोधक होते हैं। परन्तु यत् शब्दसे अव्यवहित रूपमें 'योऽसौ' इत्यादि रूपमें प्रयुक्त अदस् आदि शब्द उद्देश्यकी प्रसिद्धिमात्रके बोधक होते हैं, विधेयांशके बोधक नहीं होते। इसलिए ऐसे प्रयोगोंके स्थलमें वस्तुतः विधेयांशका अभाव ही हो जाता है। और उसके कारण वहाँ अविमृष्टविधेयांश दोष हो जाता है। यह इस दोषके होनेका तीसरा कारण है। इसीका उदाहरण आगे देते हैं। और इसीके विवेचनके प्रसङ्गमें ग्रन्थकारने यत् तत् शब्दोंके विषयमें विस्तारपूर्वक विचार किया है। अथवा [तीसरे प्रकारके अविमृष्टविधेयांश दोषका उदाहरण ] जैसे- हे सुन्दरि, जो [तुम्हारे प्रियतम ] आँखोंकी चञ्चल चितवनको नेत्रोंके किनारे पहुँचा [कर कटाक्ष बना देते हैं, और भौंहोंके कुटिल होनेपर भावपूर्ण [विलासी ] नर्तन [उत्पन्न कर देते ] तथा सारे शरीरमें फैला हुआ रोमाञ्चका कुर्ता पहिना देते हैं तुम्हारे वही [ प्रियतम ] आ गये हैं ॥१८४॥ यहाँ 'यः', 'असौ' ये दोनों पद [अव्यवधानसे प्रयुक्त होनेके कारण अनुवाद्य] उद्देश्यमात्रकी प्रतीति करानेवाले [हो गये ] हैं [ अतः विधेयकी प्रतीति करानेवाला पद न होनेसे यहाँ अविमृष्टविधेयांश हो गया है ]। [इसी प्रसङ्गमें यत् और तत् शब्दके प्रयोगसम्बन्धी नियमोंका प्रतिपादन करते हैं], जैसे कि -- १. प्रकान्त [प्रकरणसे प्राप्त ], २. प्रसिद्ध तथा ३. अनुभूत अर्थविषयक तत् शब्द, यत् शब्दके प्रयोगकी अपेक्षा नहीं रखता है।
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का० ५२, सू० ७३ ] सप्तम उल्लास: २८६ करमेणोदाहरणम्- कातर्य केवला नीतिः शौर्य श्वापदचेष्टितम् । अतः सिद्धिं समेताभ्यामुभाभ्यामन्वियेष सः ॥१८५॥ द्वयं गतं सम्प्रति शोचनीयतां समागमप्रार्थनया कपालिनः । कला च सा कान्तिमती कलावतस्त्वमस्य लोकस्य च नेत्रकौमुदी ॥१८६। उत्कम्पिनी भयपरिस्खलितांशुकान्ता ते लोचने प्रतिदिशं विधुरे क्षिपन्ती। क्रूरेण दारुणतया सहसैव दग्धा धूमान्धितेन दहनेन न वीक्षिताऽसि ॥१८७।।
१. प्रक्ान्त अर्थमें तत् शब्दका प्रयोग केवल नीति [का अवलम्बन करना ] कायरता है और [केवल ] परात्रम [का अवलम्बन करना ] हिंस् जन्तुओं [श्वापदों] का व्यापार है। इसलिए राजा [अतिथि] ने उन दोनोंको मिलाकर [ही विजयरूप ] सिद्धिका अनुसन्धान किया ॥१८५॥ यह श्लोक 'रघुवंश' के सत्नहवें सर्गका ४२ वाँ श्लोक है। उसमें अतिथि नामक राजाका वर्णन है। यहाँ प्रयुक्त हुआ तत् शब्दका प्रथमा विभक्तिका 'सः' यह पद, प्रकरणप्राप्त प्रकान्त अर्थका बोधक है, अतः उसके साथ यत् शब्दका प्रयोग नहीं किया है। २. प्रसिद्धार्थमें तत् शब्दका प्रयोग कपाल धारण करनेवाले [भयङ्कर और दरिद्र शिव] के समागमकी प्रार्थनाके कारण [पहिले तो अकेली चन्द्रमाकी कला ही शोचनीय-तरस खाने योग्य थी, परन्तु उसीके साथ पार्वतीके भी जुड़ जानेसे] अब चन्द्रमाकी वह सुन्दर कला और संसारके नेत्रोंको [आह्लाददायिनी] कौमुदीरूप तुम दोनों तरस खाने योग्य [शोचनीय ] हो गयी हो ॥१८६।। यह श्लोक 'कुमारसम्भव'से लिया गया है। इसमें 'कला च सा कान्तिमती' यहाँ 'सा' शब्दका प्रयोग प्रसिद्धार्थमें हुआ है, इसलिए उसके साथ 'यत्' शब्दका प्रयोग नहीं किया गया है। आगे अनुभूतार्थमें प्रयुक्त हुए तत् शब्दका प्रयोग दिखलानेके लिए 'रत्नावली' नाटिकासे एक पद्य उद्धृत करते हैं। वासव- दत्ताके आगमें जलकर मर जानेका समाचार सुनकर राजा उदयन कह रहे हैं- ३. अनुभूतार्थमें तत् शब्दका प्रयोग [अपने वासस्थानमें लगी हुई भयङ्कर अग्निको देखकर ] भयके कारण अस्त-व्यस्त वस्त्रवाली, काँपती हुई और [रक्षाके स्थान अथवा सहायता देनेवालेकी खोजमें] उन [पूर्वानुभूत सुन्दर ] व्याकुल नेत्रोंको चारों ओर दौड़ाती हुई तुमको धूमसे अन्धे हुए अग्निने [ तुम्हारी दयनीय अवस्थाको ] देखा [भी] नहीं और सहसा जला ही डाला ॥१८७॥ यहाँ 'ते लोचने में जो 'ते' शब्दका प्रयोग किया गया है वह उन नेत्रोंके व्यापार और सौन्दर्यकी उदयन द्वारा की गयी पूर्वानुभूतिका सूचक है। इसलिए यहाँ भी 'तत्' शब्दके साथ 'यत्' शब्दका प्रयोग नहीं किया गया है। 'यत्'और 'तत्' शब्दके प्रयोगके विषयमें 'यत्तदोनित्यसम्बन्धः' इस सामान्य नियमके १६
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यच्छब्दस्तूत्तरवाक्यानुगतत्वेनोपात्तः सामर्थ्यात्पूर्ववाक्यानुगतस्य तच्छब्दस्योपादानं नापेक्षते। यथा- साधु चन्द्रमसि पुष्करैः कृतं मीलितं यदभिरामताधिके। उद्ता जयिनि कामिनीमुखे तेन साहसमनुष्ठितं पुनः ।१८८॥ प्रागुपात्तस्तु यच्छब्दस्तच्छब्दोपादानं विना साकांक्षः। यथा तत्रैव' श्लोके आद्य- पादयोर्व्यत्यासे। द्वयोरुपादाने तु निराकांक्षत्वं प्रसिद्धम्। अनुपादानेऽपि सामार्थ्यात्कुत्रचिद्® द्वयमपि गम्यते। यथा- ये नाम केचिदिह नः प्रथयन्त्यवज्ञां जानन्ति ते किमपि तान् प्रति नैष यत्नः । उत्पत्स्यते तु मम कोऽपि समानधर्मा कालो ह्ययं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी ।।१८९।। बाद उसके अपवादरूपमें पहिला नियम यह हुआ कि प्रकान्त, प्रसिद्धऔ्ौर अनुभूतार्थक 'तत्' शब्दके साथ 'यत्' शब्दके प्रयोगकी आवश्यकता नहीं होती है। तत् शब्दके प्रयोगका दूसरा अपवाद २. उत्तरवाक्यमें अन्वित [अनुगत ] रूपमें पठित 'यत्' शब्द [तत् शब्दकी आक्षेप द्वारा बोध करानेकी ] सामर्थ्य होनेसे पूर्ववाक्यमें अनुगतरूपसे 'तत्' शब्दके उपादानकी अपेक्षा नहीं करता है। जैसे -- इन कमलोंने यह अच्छा ही किया कि अपनेसे अधिक सौन्दर्यवाले चन्द्रमाके [ उदयपर उसके ] सामने बन्द हो गये। परन्तु उसको भी जीत लेनेवाले सुन्दरीके मुखके रहते, उदय होकर उस [चन्द्रमा] ने साहसका [अनुचित ] कार्य किया है[ यहाँ द्वितीय चरणमें 'यत्' है, प्रथम चरणमें तत् नहीं है] ।१८८॥ [परन्तु] पहले प्रयुक्त किया हुआ 'यत्' शब्द तो 'तत्' शब्दके प्रयोगके बिना साकांक्ष रहता है। [उसके लिए 'तत्' शब्दका प्रयोग अवश्य होना चाहिये]। जैसे इसी श्लोकमें प्रथम और द्वितीय चरणका क्रम बदल देनेपर [प्रथम चरणमें 'यत्' शब्दका प्रयोग हो जानेपर द्वितीय चरणमें 'तत्' शब्दका प्रयोग अनिवार्य हो जायगा ]। ['यत्' तथा 'तत्' शब्द ] दोनोंका ग्रहण होनेपर ['यत्' शब्दकी ] निराकांक्षता तो ['यत्तदो- नित्यसम्बन्धः' इस नियमके अनुसार] प्रसिद्ध [ही] है। कहीं-कहीं [ यत् और तत् दोनोंका] ग्रहण न होनेपर भी सामर्थ्यवश दोनोंका ज्ञान हो जाता है। जैसे -- ['मालतीमाधव' नाटकके प्रारम्भमें अपनी निन्दा करनेवाले आलोचकोंको लक्ष्यमें रखकर महाकवि भवभूति कह रहे हैं कि] यहाँ [ इस संसारमें अथवा नाटय रचनाके विषयमें ] जो कोई भी हमारी निन्दा या तिरस्कार करते हैं [ कि भवभूतिकी रचनाशली क्लिष्ट है। उसका बनाया हुआ 'महावीर- १. अन्नैव । २. क्वचिद्।
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का० ५२, सू० ७३ ] सप्तम उल्लास: अत्र य उत्पत्स्यते तं प्रति, इति। एवं च तच्छन्दानुपादानेऽत्र साकांक्षत्वम्। न चासाविति तच्छब्दार्थमाह। असौ मरुच्चुम्वितचारुकेसर: प्रसन्नताराधिपमण्डलाग्रणीः । वियुक्तरामातुरदृष्टिवीक्षितो वसन्तकालो हनुमानिवागतः ॥१९०। अत्र हि न तच्छब्दार्थप्रतीतिः । चरित' किसी कासका नहीं ] वे कुछ [अनिर्वचनीय विद्या] जानते होंगे [ जिससे वे अपनेको बड़ा भारी विद्वान् समझकर हमारी निन्दा करते हैं, परन्तु वे वस्तुतः मूर्ख हैं, यह व्यञ्जनासे प्रतीत होता है। अथवा वे कुछ ही जानते हैं इस कारण वे अधिक नहीं समझते यह अर्थ प्रतीत होता है] उनके लिए यह (मालती- माधवरूप ] रचनाका प्रयत्न नहीं किया जा रहा है। [तब आप किसके लिए इसकी रचना कर रहे हैं, इस प्रश्नका उत्तर देते हुए कहते हैं कि ] इस कालकी कोई सीमा नहीं है, और पृथिवी भी अत्यन्त विस्तृत है इसलिए ] इस विस्तीर्ण पृथिवीके किसी देशमें और इस अनन्तकालमें ] कोई मेरे समान धर्मका [मेरे प्रयासको समझनेवाला ] उत्पन्न होगा ही ॥१८६॥ यहाँ [पूर्वार्द्धमें 'ये' 'ते' इस रूपमें 'यत्' 'तत्' दोनोंका उपादान होनेसे निराकांक्षता हो जाती है। उत्तरार्द्धमें दोनोंमेंसे किसीका भी उपादान न होनेसे दोनोंका सामर्थ्यवश ] जो उत्पन्न होगा, उसके प्रति [यह प्रयत्न है] यह प्रतीति होती है। इस प्रकार यत्, तत् शब्दके प्रयोग-सम्बन्धी नियम यहाँतक दिखलाये गये। ये नियम उदाहरण सं० १८४ की विवेचनाके प्रकरणमें प्रसङ्गतः दिखला दिये हैं। इसलिए अपनी इस विवेचनाको मुख्य विषयसे जोड़ते हुए ग्रन्थकार लिखते हैं कि- इस प्रकार यहाँ [अपाङ्गसंसगि इत्यादि उदाहरण सं० १८४ में विधेयांशका बोध करानेके लिए] 'तत्' शब्दका उपादान न होनेसे 'यत्' शब्द स।कांक्ष है [अतः अविमृष्टविधेयांश दोष हो जाता है। यदि यह कहा जाय कि यहाँ 'तत्' शब्दके अर्थमें अदस्के 'असौ' पदका प्रयोग तो है, उसीत यत् शब्दकी आकांक्षा- की निवृत्ति हो जानी चाहिये तो इसका निराकरण करते हैं कि] यहाँ 'असौ' यह शब्द भी तत् शब्दके अर्थका बोधक नहीं है। क्योंकि- वायु जिसके सुन्दर केसरों [वसन्तपक्षमें मौलश्रीके वृक्षों तथा हनुमान् पक्षमें उनके बालों]का चुम्बन [स्पर्श ] कर रहा है, उज्ज्वल चन्द्रमण्डल जिस [वसन्त]का नायक है [ हनुमान् पक्षमें प्रसन्न जो ताराके पति सुग्रीव उनके मण्डल-दलके नेता] और वियुक्त [रामा ] अर्थात् वियोगिनी स्त्रियों[हनुमान् पक्षमें वियोगी रामके द्वारा कातर दृष्टिसे देखे जानेवाले हनुमान्के समान वह वसन्त आ गया है॥१६०॥ यहाँ [प्रयुक्त हुए प्रत्यक्षबोधक 'असौ' शब्दसे परोक्षबोधक ] 'तत्' शब्दके अर्थकी प्रतीति नहीं होती है। यह श्लोक 'हनुमन्नाटक' के षष्ठ अङ्कमें पाया जाता है, परन्तु यह उन्हींका बनाया हुआ है, यह नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि 'हनुमन्नाटक' में बहुतसे पद्य अन्य कवियोंके भी नाटककारने अपने नाटकमें समाविष्ट कर लिये हैं। जैसे 'शकुन्तला' नाटक के प्रथम अङ्कमें आर्प्रया हुआ््र 'ग्रीवाभङ्गाभिराम' आदि
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प्रतीतौ वा- करवालकरालदोःसहायो युधि योऽसौ विजयार्जुनैकमल्लः । यदि भूपतिना स तत्र कार्ये विनियुज्येत ततः कृतं स्यात् ॥१९१॥ अत्र स इत्यस्यानर्थक्यं स्यात्। अथ -- योऽविकल्पमिदमर्थमण्डलं पश्यतीश ! निखिलं भवद्वपुः । आत्मपक्षपरिपूरिते जगत्यस्य नित्यसुखिनः कुतो भयम् ।१९२। इति इदंशब्दवद् अदःशब्दस्तच्छन्दार्थममिधत्ते इति उच्यते, तर्ह्यत्रेव वाक्यान्तरे उपादानमर्हति न तत्रैव। यच्छब्दस्य हि निकटे स्थितस्तच्छब्दः प्रसिद्धिं परामृशति। यथा-
पद्य 'हनुमन्नाटक'के चतर्थ अङ्कमें पाया जाता है। 'बालरामायण'के षष्ठ अङ्कका 'सद्यः पुरी- परिसरे' इत्यादि तथा 'अनर्घराघव'के तृतीय अङ्कका 'समन्तादुत्तालैः सुरसहचरी' इत्यादि पद्य 'हनुमन्नाटक' में पाये जाते हैं। 'तत्' शब्दके पर्यायरूपमें 'असौ' पदका प्रयोग नहीं हो सकता है। इसे दिखलानेके लिए पहिला उदाहरण 'असौ मरुच्चुम्बितचारुकेसरः' आदि (१६०) अभी दिया था। उसमें प्रयुक्त 'असौ' पद ग्रन्थकारके मतसे 'तत्' शब्दके अर्थका वाचक नहीं हो सकता है। यदि कोई यह कहे कि वहाँ भी 'असौ' पद 'तत्' शब्दके अर्थका वाचक हो सकता है, तो उसके निराकरणके लिए आगे और युक्ति देते हैं कि- अभवा ['असौ' शब्दसे 'तत्' शब्दके अर्थकी] प्रतीति माननेपर- जो यह [कर्ण ] तलवारसे युक्त भयङ्कर भुजाओंकी सहायतासे युद्धमें विजय प्राप्त करनेमें अर्जुनका अद्वितीय प्रतिद्वन्द्वी है, उसको यदि राजा [दुर्योधन सेनापतिके ] कार्यपर नियुक्त कर दें, तो सब काम हो जाय ॥१६१। यहाँ [योऽसौ रूपसे अव्यवधानसे 'असौ'का प्रयोग होनेपर ] 'सः' इसका प्रयोग अनर्थक हो जायगा [इसलिए यत्के साथ अव्यवधानसे प्रयुक्त 'असौ' पद 'तत् शब्दके अर्थका वाचक नहीं होता है ]। और यदि [यह कहा जाय कि ]- हे परमात्मन् [जो पुरुष ] इस समस्त पदार्थसमूह [प्रमेयमात्र ]को निःसन्देह [अविकल्प] रूपसे आपका शरीर [आपसे अभिन्न ] समक्ता है, नित्य आनन्दरूप [अद्वंतका साक्षात्कार करनेवाले ] उसके लिए आत्मरूपसे परिपूर्ण संसारमें किसका भय हो सकता है ? [अर्थात् उसे किसीसे भय नहीं होता है] ।१६२ । इसमें प्रयुक्त 'इदं' शब्दके समान 'अदस्'. शब्द भी 'तत्' शब्दके अर्थका वाचक हो सकता है [यह कहा जाय ] तो, यहाँके समान भिन्न वाक्यमें उसका प्रयोग होना चाहिये [ यत् शब्दसे अव्यवहित- रूपमें ] वहीं [ उसी वाक्यमें ] नहीं। [ क्योंकि] यत् शब्दके समीपमें [ अव्यवहितरूपसे ] स्थित ['इदम्', 'अदस्', 'एतद' आदि शब्द 1 प्रसिद्धिके बोधक होते हैं[ विधेयभागके बोधक नहीं होते हैं] जैसे-
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का० ५२, सू० ७३ ] सप्तम उल्लास: २६३ यत्तदूजितमत्युग्रं क्षात्रं तेजोऽस्य भूपतेः । दीव्यताऽक्षैस्तदाऽनेन नूनं तदपि हारितम् ॥१९३॥ इत्यत्र तच्छब्दः । ननु कथम्- कल्याणानां त्वमसि महसां भाजनं विश्वमूर्त्ते ! धुर्या लक्ष्मीमथ मयि भृशं धेहि देव ! प्रसीद। यद्यत्पापं प्रतिजहि जगन्नाथ ! नम्रस्य तन्मे भद्रं भद्रं वितर भगवन् ! भूयसे मङ्गलाय ।१९४। अत्र यद्यदित्युक्त्वा तन्मे इत्युक्तम् ? उच्यते। यद्यदिति येन केनचिद्रूपेण स्थितं सर्वात्मकं वस्त्वाक्षिप्तम्। तथाभूतमेव तच्छब्देन परामृश्यते।
['वेणीसंहार' में युधिष्ठिरकी निन्दा करते हुए भीमसेन सहदेवसे कह रहे हैं कि -- ] इस राजा [युधिष्ठिर ] का जो अत्यन्त उग्र और व्यापक [ऊजित ] क्षात्र तेज था, उस समय जुआ खेलते हुए यह उसको भी हार गया ॥१६३॥ यहाँ ['यत् तदूजितं' इस रूपमें यत्के साथ अव्यवहितरूपमें पठित ] तत् शब्द [केवल प्रसिद्धि- मात्रका परामर्शक है ]। कमलाकरभट्टने लिखा है कि यह श्लोक 'किरातार्जुनीय' में इन्द्रके प्रति अ्परजुनका वाक्य है, परन्तु यह ठीक नहीं है। यह 'किरात' का नहीं, 'वेणीसंहार' का ही श्लोक है। अगला श्लोक 'महावीरचरित' नाटकके प्रथम अङ्गसे उद्धृत किया गया है। उसमें सूत्रधार सूर्यकी स्तुति कर रहा है। श्लोकके तृतीय चरणके आरम्भमें 'यद्यत् पापं' इस रूपमें एक साथ दो बार यत् शब्दका प्रयोग हुआ है, परन्तु उसी चरणके अन्तमें 'तन्मे' यहाँ तत् शब्दका एक ही बार प्रयोग हुआ है। इसपर यह शङ्का हो सकती है कि दो बार प्रयुक्त यत् शब्दोंकी आकांक्षानिवृत्तिके लिए 'तत्' शब्दका प्रयोग भी दो बार करना चाहिये था। इसका समाधान ग्रन्थकार यह करते हैं कि वहाँ 'यद्यत्' शब्दोंसे समाष्टिरूपसे समस्त पापोंका एक साथ ग्रहण किया गया है, इसलिए एक ही तत् शब्दसे उसकी निवृत्ति हो सकती है। यही बात प्रश्नोत्तरके रूपमें हैं- प्रश्न-तो फिर, हे विश्वमूर्ते, आप अनन्त कल्याणोंके निधान हैं। हे देव, कृपा करके [इस अभिनयके प्रारम्भमें इसको सफल बनानेकी ] सर्वश्रेष्ठ सामर्थ्य या सम्पत्ति मुझे प्रदान करें। हे जगन्नाथ, मेरे जो-जो पाप [अभिनयकी सफलताकी विरोधी बाधाएँ ] हैं, उन सबको दूर करें, मुझ विनीतको [नाटककी सम्पूर्ण सफलतारूप] प्रचुर मङ्गलके लिए शुभ-शुभ प्रदान करें ॥१६४॥ इसमें 'यद्यत्' [दो बार यत् ] कहकर 'तन्मे' [एक ही बार तत् जैसे ] कहा है ? उत्तर-कहते हैं, कि 'यद्यत्' इससे जिस किसी रूपमें स्थित सम्पूर्ण वस्तु प्रतीत होती है। और उसी प्रकारकी [समष्टि ] तत् शब्दसे गृहीत होती है।
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यथा वा- कि लोभेन विलङ्गितः स भरतो येनैतदेवं कृतं मात्रा स्त्रीलघुतां गता किमथवा मातैव मे मध्यमा । मिथ्यैतन्मम चिन्तितं द्वितयमप्यार्यानजोऽसौ गुरु- र्माता तातकलत्रमित्यनुचितं मन्ये विधात्रा कृतम् ।१९५।। अत्रार्यस्येति तातस्येति च वाच्यम्, न त्वनयो समासे गुणीभावः कार्यः । एवं समासान्तरेष्वप्यु दाहार्यम् विरुद्धमतिकृद्यथा- श्रितक्षमा रक्तभुवः शिवालिङ्गितमूर्त्तयः । विग्रहृक्षपणेनाद्य शेरते ते गतासुखाः ॥१९६। अत्र क्षमादिगुणयुक्ता: सुखमासते इति विवक्षिते हता इति विरुद्धा प्रतीतिः । इस प्रकार यहाँतक समासगत अविमृष्टविधेयांशका विचार करनेके बाद अब समासमें ही वाक्यगत अर्थात् अ्रनेक समस्त पदोंमें स्थित अविमृष्टविधेयांश दोषका उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। अथवा [विधेयांशको समासमें डाल देनेसे अविमृष्टविधेयांश] जैसे -- [रामके वनवासकी आज्ञा दिये जानेके विषयमें सोचते हुए लक्ष्मण अपने मनमें यह तर्क-वितर्क कर रहे हैं कि] क्या [विनयी और रामके प्रति भक्ति रखनेवाला] वह भरत [राज्यके ] लोभमें पड़ गया है, जिससे [रामके वनवासरूप ] यह कार्य माता [कैकेयीके ] द्वारा किया [करवाया] गया। अथवा क्या मेरी मँझली माता [कंकेयी] ही स्त्रीकी [स्वाभाविक ] क्षुद्रतापर पहुँच गयी [और उसने स्वयं यह कार्य किया]। [इन दो शङ्गाओंके बाद लक्ष्मणके मनमें स्वयं दूसरा विकल्प आता है कि] नहीं, मेरी सोची हुई दोनों बातें मिथ्या हैं, क्योंकि मेरे बड़े भाई [गुरु भरत ], आर्य [रामचन्द्र ] के अनुज ठहरे [वे ऐसा कार्य नहीं कर सकते ] और माताजी [दशरथ सरीखे मेरे ] पिताकी पत्नी हैं [ वे भी ऐसा अनुचित कार्य नहीं कर सकतीं। इसलिए मैं समझता हूँ कि यह [अनुचित कार्य इन लोगोंने नहीं अपितु] विधाताने ही किया है।१६५।। यहाँ ['आर्यानुजः' के स्थानपर ] आर्यस्य [अनुजः ] यह और [ 'तातकलत्नं' के स्थानपर ] तातस्य कलत्नं ] यह कहना चाहिये था। इनको समासमें रखकर गुणीभाव नहीं करना चाहिये था। इसी प्रकार और समासोंमें भी उदाहरण देख लेने चाहिये। [वाक्यगत ] विरुद्धमतिकृत [का उदाहरण ] जैसे -- [शान्तिपूर्ण सामनीतिका आश्रय लेनेवाले राजाओंका वर्णन करते हुए कवि कह रहा है कि] क्षमाका आश्रय लेनेवाले जिनपर सारी प्रजा [भू ] अनुरक्त है [ प्रेम करती है], कल्याणसे परिवेष्टित वे राजा युद्धका परित्याग कर देनेसे [सब दुःखोंसे मुक्त होकर] सोते हैं ॥१६६। यहाँ क्षमा आदि गुणोंसे युक्त राजा सुखसे रहते हैं [ यह बात कवि] कहना चाहता है परन्तु उससे [शरितक्षमा: पृथिवीपर पड़े हुए, जिन्होंने शरीरसे निकलते हुए रक्तसे भूमि रँग दी है, शिवा अर्थात् शृगाली
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पदैकदेशे यथासम्भवं क्रमेणोदाहरणम्- अलमतिचपलत्वात् स्वप्नमायोपमत्वात् परिणतिविरसत्वात् सङ्गमेनाङ्गनायाः । इति यदि शतकृत्वस्तत्त्वमालोचयाम- स्तदपि न हरिणाक्षीं विस्मरत्यन्तरात्मा ।।१९७।। अत्र त्वादिति।
यथा वा- तद् गच्छ सिद्ध्यै कुरु देवकार्यमर्थोऽयमर्थान्तरलभ्य एव। अपेक्षते प्रत्ययमङ्गलब्धयै बीजाङकुरः प्रागुदयादिवाम्भः ॥१९८॥ अत्र द्वर्य ब्धये इति कटु।
जिनके शरीरको खा रही है, इस प्रकारके वे राजा विग्रह अर्थात् युद्धमें मारे जानेके कारण सब दुःखोंसे मुक्त होकर सो रहे हैं इस अर्थकी प्रतीतिके कारण ] मारे गये यह विरुद्ध प्रतीति होती है। इस प्रकार पदगत तथा वाक्यगत रूपमें पूर्वोक्त दोषोंके उदाहरण देनेके बाद जैसा कि सूत्र ७३ में 'पदस्यांशेऽपि केचन' कहा था, उनमेंसे जो कोई दोष पदके 'अंश'में हो सकते हैं, उनके उदाहरण देनेके लिए अगले प्रकरणका आरम्भ करते हैं। पदांशदोष : १. श्रुतिकटु पदके एक देशमें [होनेवाले दोषोंके ] यथासम्भव उदाहरण कमसे [देते हैं]- अत्यन्त अस्थिर, स्वप्न और मायाके समान [क्षणिक भ्रान्तिरूप ] होनेके कारण और अन्तमें नीरस [दुःखदायक ] होनेके कारण स्त्रीका सङ्ग नहीं करना चाहिये। इस प्रकार यदि सौ बार तत्त्वका विचार करें, तो भी अन्तरात्मा उस हरिणाक्षीको भूल नहीं पाता है ॥१६७॥ यहाँ [अनेक बार प्रयुक्त हुआ पञ्चमीका] 'त्वात्' यह [ पदांश श्रुतिकटु है ]। अथवा [पदांशगत श्रुतिकटका दूसरा उदाहरण देते हैं] जैसे -- ['कुमारसम्भव'के तृतीय सर्गमें कामदेवके प्रति इन्द्रका कथन है कि ] इसलिए तुम जाओ, तुमको अपने कार्यमें सफलता प्राप्त हो और देवताओंका [तारकासुरको मारनेके लिए शिवके पुत्रकी प्राप्तिरूप] कार्य करो। यह शिवके पुत्रकी प्राप्तिरूप कार्य [शिव और पार्वतीके विवाहरूप ] दूसरे कार्यके होनेपर ही हो सकता है। इसलिए हे कामदेव ! जैसे बीजसे उत्पन्न होनेवाला अड.उर निकलनेसे पहिले [कारणभूत ] जलकी अपेक्षा रखता है, उसी प्रकार [शिवके पुत्रके प्राप्तिरूप ] यह कार्य भी अपनी सिद्धि [लब्धि ]के कारण [शिवपार्वतीके विवाहकी ] अपेक्षा करता है [ उसके बिना नहीं हो सकता है] इसलिए तुम शिवका पार्वतीसे विवाह करानेका प्रयत्न करो ॥१६८॥ यहाँ [सिद्धर्चैंका ] 'द्धच' और [लब्ध्यका] 'बध्य'] यह [दोनों पदांश ] श्रुतिकट हैं।
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यश्चाप्सरोविभ्रममण्डनानां सम्पादयित्रीं शिखरैविभत्ति। वलाहकच्छेदविभक्तरागामकालसन्ध्यामिव धातुमत्ताम् ।।१९९।। अत्र मत्ताशब्दः क्षीवार्थे निहतार्थः । आदावञ्जनपुञ्जलिप्तवपुपां श्वासानिलोल्लासित- प्रोत्सर्पद्विरहानलेन च ततः सन्तापितानां दृशाम् । सम्प्रत्येव निपेकमश्ुपयसा देवस्य चेतोभुवो भल्लीनामिव पानकर्म कुरुते कामं कुरङगेक्षणा ।।२००।। अत्र दृशामिति बहुवचनं निरर्थकम्। कुरङ्गेक्षणाया एकस्या एवोपादानात्।
२. पदांशगत निहतार्थ पदांशगत श्रुतिकटु दोषका उदाहरण देकर आागे पदांशगत निहतार्थका उदाहरण देते हैं। 'कुमासरम्भव'के प्रथम सर्गमें हिमालयका वर्णन करते हुए कवि कह रहा है कि हिमालय पर्वतके किन्हीं भागोंमें धासु अर्थात् गैरिकका आ्धिक्य है। वहाँ गेरकी लाल कान्ति जब आ्र्परकाशमें मेघोंपर पड़ती है, तो वे मेघ सन्ध्याकालीन मेघोंके समान लाल हो जाते हैं। इन लाल मेघोंको देखकर अप्सराओंको सन्ध्याकाल हो जानेका भ्रम हो जाता है, और वे सन्ध्याकाल तुआ समझकर सन्ध्याकालके समय धारण किये जानेवाले आरभूषण आरादिको धारण करने लगती है। इस प्रकार हिमालयकी धातुमत्ता तकाल- सन्ध्याके समान अप्सराओंकी प्रसाधनविधिकी सम्पादिका है। जो [हिमालय ] मेघों [बलाहक]के खण्डोंमें अप्सराओंकी प्रसाधनविधिको सम्पादन करानेवाली लालिमाका आधान करके अप्सराओंकी प्रसाधनविधिका सम्पादन करानेवाली अकालसन्ध्याके समान [गैरिक आदि] धातुमत्ताको अपने शिखरोंपर धारण करता है ॥१६६॥ यहाँ मत्ता [रूप पदका एक देश] उन्मत्त [क्षीञ] अर्थमें [प्रसिद्ध है। यहाँ मतुप् प्रत्ययके अर्थमें पठित है। यह पदैकदेश] निहतार्थ है। ३. पदांशगत निरर्थकत्व इस प्रकार पदके एक देशमें निह्तार्थका उदाहरण देकर पदैकदेशमें निरर्थकत्वका उदाहरण देते हैं। इसमें सुन्दरियोंकी आंखोंको कामदेवका भाला मानकर उनके पनकर्मका वर्णन किया गया है। भाले आदिको तेज करनेके लिए पहिले उसमें मिट्टी लपेटकर अग्निमें तपाया जाता है और उसको पानीमें वुझाया जाता है। यही प्रत्रिया कामदेवकी भल्ली (भाला) रूप सुन्दरियोंके नेत्रोंमें की जा रही है। सुन्दरियाँ आँखोंमें जो अ्ञ्जन लगाती हैं, वही भल्लियोंमें पङ्कलेपन हुआ, फिर विरहानलमें उनको सन्तप्त करके अश्रजलमें बुझाया जाता है। इसीको कति कहता है कि- सबसे पहिले अञ्जनपुञ्जसे भली प्रकार लेप करके, निःश्वासवायुसे प्रज्वलित किये हुए विरहानल- से तपाये नेत्रोंको कामदेवकी भल्लियोंके पानकर्मके [जलमें बुझानेके] समान मृगनयनी तुरन्त ही आँसुओं- के जलमें बुझाती है॥२००॥ यहाँ 'दृशां' यह बहुवचन निरर्थक है। क्योंकि एक ही कुरङ्गेक्षणाका ग्रहण [वाक्यमें] होनेसे [दशां यह बहुवचन निरर्थक है]।
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न च --
अलसवलितः प्रेमाद्रद्रि मकुलीकृतैः क्षणमभिमखैर्लज्जालोलैनिमेषपराङमुखैः। हृदयनिहितं भावाकूतं वर्मान्द्रिवेक्षणैः कथय सुकृती कोयं मुग्धे त्वयाद्य विलोक्यते ॥२०१॥ इत्यादिवद् व्यापारभेदाद् बहुत्वम्, व्यापाराणामनुपात्तत्वात्। न च व्यापारज्न दृक्शब्दो वर्त्तते। अत्रैव 'कुरुते' इत्यात्मनेपदमप्यनर्थकम् । प्रधानक्रियाफलस्य कर्त्रसम्बन्धे कर्त्रभिप्रायक्रियाफलाभावात्।
और न -- हे मुग्धे ! यह तो बतलाओ कि अलसाये हुए, प्रेमसे परिपूर्ण, कुछ मिचे हुए, तनिक देरको सामने आये और फिर लज्जाके कारण चञ्चल हुए, हृदयके भीतरके छिपे हुए भावको व्यक्त करते हुए एवं अपलक नेत्रोंसे तुम आज किस सौभाग्यशालीको देख रही हो ॥२०१॥ इसका अभिप्राय यह है कि जैसे 'अलसवलितः' इत्यादि श्लोकमें एक ही नायिकाका वर्णन होनेपर भी 'इक्षणैः' यह बहुवचनका प्रयोग उसके नेत्रोंके लिए किया गया है और उसमें कोई दोष नहीं होता है, इसी प्रकार 'आदावञ्जनपुञ्जलिप्तवपुपां' आदि श्लोक सं० २०० में भी एक ही कुरङ्गेक्षणाका वर्णन होनेपर भी 'दृशाम्' यह बहुवचनका प्रयोग अनुचित या निरर्थक नहीं है। यह पूर्वपक्षीका भाव है। इसका उत्तर ग्रन्थकारने यह किया है 'अलसवलितैः' इत्यादि उदाहरण सं० २०१ में जो एक ही नायिकाके नेत्रोंके लिए बहुवचनका प्रयोग किया है वह उन नेत्रोंके विविध व्यापारोंके आधारपर किया गया है। परन्तु उदाहरण सं० २०० में इस प्रकार त्र्प्रनेक व्यापारोंको प्रदर्शित नहीं किया गया है अ्र्प्रतः वहाँ वहुवचन- का प्रयोग निरर्थक ही है। इत्यादिके समान व्यापारभेदके कारण बहुवचन हुआ है। यह भी, व्यापारोंका ग्रहण न होनेसे, नहीं कहा जा सकता है। और न दूक शब्द यहाँ व्यापार अर्थमें प्रयुक्त हुआ है। और इसी [ उदाहरण सं० २००]में 'कुरुते' यह आत्मनेपद भी निरर्थक है [ उभयपदी कृ धातुका आत्मनेपदमें वहीं प्रयोग करना चाहिये, जहाँ प्राधान क्रियाका फल कर्त्तामें रहता हो। यह बात 'स्वरित- जितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले' इस सूत्रमें कही ही गयी है। यहाँ कामदेवके जगद्विजयरूप कार्यके] कर्त्तासे असम्बद्ध होनेपर, क्रियाफलके क्तृ गामी न होनेसे [आत्मनेपदका प्रयोग भी निरर्थक ही है ]। इसका अभिप्राय यह हुआ कि 'स्वरितजिितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले' इस पाणिनिसूत्रके अनुसार उभयपदी धातुओोंमें क्रियाफलके कर्तृगामी होनेपर आत्मनेपदका प्रयोग करना चाहिये और उससे भिन्न अवस्थामें अर्ात् क्रियाफल जहाँ कर्तृगामी न हो वहाँ परस्मैपदका प्रयोग करना चाहिये। जैसे 'यजमानो यजते' यहाँ यजनक्रियाका फल स्वर्गप्राप्तिरूप है, वह कर्तृगतत्वेन इष्ट होनेसे यहाँ आ्त्मनेपद होता है। परन्तु 'ऋत्विजो यजन्ति' यहाँ स्वर्गरूप मुख्य फल कर्ता अर्थात् ऋत्विकमें नहीं अपितु यजमानमें त्भीष्ट
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२६८ काव्यप्रकाश: [ का०५२, सू० ७३
चापाचार्यस्त्रिपुरविजयी कात्तिकेयो विजेय: शस्त्रव्यस्तः सदनमुदधिर्भूरियं हन्तकारः । अस्त्येवैतत् किमु कृतवता रेणुकाकण्ठवाधां वद्धस्पर्धस्तव परशुना लज्जते चन्द्रहासः ॥२०२॥ अत्र विजेय इति कृत्यप्रत्ययः क्तप्रत्ययार्थेऽवाचकः । अतिपेलवमतिपरिमितवणं लघुतरमुदाहरति शठः। परमार्थतः स हृदयं वहति पुनः कालकूटघटितमिव ॥२०३॥ अत्र पेलवशब्दः ।
होता है, इसलिए यहाँ 'यजन्ति' इस परस्मैपदका ही प्रयोग किया जाता है। यद्यपि यज्ञ करानेसे ऋत्विजों- को भी दक्षिणारूप फलकी प्राप्ति होती है, परन्तु वह मुख्य फल नहीं है। अतएव उसके होनेपर भी स्वर्गप्राप्तिरूप मुख्य फलके यजमानगत होनेसे यहाँ परस्मैपद ही होता है। इसी प्रकार प्रकृत उदाहरणमें नेत्रोंके व्णित पानकर्नसे होनेवाला कामदेवका जगद्विजयरूप फल कर्तृनिष्ठ न होनेसे उसमें आत्मनेपदका प्रयोग निरर्थक है। ४. पदांशगत अवाचकत्व दोष [आगे पदके एकदेशमें अवाचकत्व दोषका उदाहरण देते हैं-राजशेखरकृत 'बालरामायण' नाटकके द्वितीय अङ्गमें परशुरामके प्रति रावणकी यह उक्ति है]- त्रिपुरविजयी [शिवजी ] तुम्हारे धनुविद्याके आचार्य हैं, तुमने [इस विद्यामें शिवके पुत्र] कात्तिकेयको [भी] जीत लिया है। अपने शस्त्रसे खाली किया गया [ हटाया गया] हुआ समुद्र तुम्हारा घर है। और यह भूमि [क्षत्रियोंका नाश कर काश्यप ब्राह्मणको तुम्हारे द्वारा दी हुई ] भिक्षारूप है। यह सब-कुछ ठीक है [ उससे तुम्हारा गौरव प्रतीत होता है] फिर भी [अपनी माता ] रेणुकाका गला काटनेवाले तुम्हारे फरसेकी बराबरी करनेमें मेरी तलवार लज्जित होती है ॥२०२॥ यहाँ [विजेय इस पदमें 'यत्' रूप ] 'कृत्य' प्रत्यय 'क्त' प्रत्यय [विजितः प्रयोग ] के अर्थमें अवाचक है। ग्रासप्रमाणा भिक्षा स्यात् अग्रं ग्रासचतुष्टयम्। अग्रं चतुर्गुणं प्राहुर्हन्तकारं द्विजोत्तमाः ॥ 'भिक्षा'का परिमाण एक ग्रासका होता है। चार ग्रासवाली भिक्षाको 'अग्र' कहते हैं। और चार 'अग्र' अर्थात् १६ ग्रासकी भिक्षाका नाम 'हन्तकार' है। यह 'हन्तकार' की व्याख्या मार्कण्डेय पुराणमें की गयी है। ५. पदांशगत अश्लीलता दुष्ट पुरुष अत्यन्त कोमल 'संक्षिप्त' और बहुत धीरे-धीरे बोलता है, परन्तु वस्तुतः उसका हृदय कालकूट विषसे भरा हुआ-सा होता है ॥२०३। यहाँ [पेलव शब्दका एकदेश ] पेल शब्द [लाट देशकी भाषामें वृषण, अण्डकोषरूप गुह्याङ्गका वाचक होनेसे व्रीडाव्यञ्जक अश्लीलताका उदाहरण है]।
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का० ५२, सू० ७३ ] सप्तम उल्लास: २६६ यः पूयते सुरसरिन्मुखतीर्थसार्थ- स्नानेन शास्त्रपरिशीलनकीलनेन। सौजन्यमान्यजनिरूजितमूजितानां सोऽयं दृशो: पतति कस्यचिदेव पुंसः ॥२०४॥ अत्र पूयशब्दः । विनयप्रणयैककेतनं सततं योऽभवदङ्ग ! तादृशः । कथमद्य स तद्वदीक्ष्यतां तदभिप्रेतपदं समागतः ।।२०५।। अत्र प्रेतशब्दः । कस्मिन्कर्मणि सामर्थ्यमस्य नोत्तपतेतराम्। अयं साधुचरस्तस्मादञ्जलिर्बध्यतामिह ॥२०६॥ अत्र किं पूर्व साधुः, उत साधुषु चरतीति सन्देहः।
जो गङ्गोत्री [सुरसरिन्मुख ] तीर्थमें स्नानसे, शास्त्रके अध्ययन और दृढ़ीकरणसे पवित्र होता है। सौजन्यके कारण पूज्य धन्य जीवनवाला और बलवानोंसे भी अधिक बलवान् वह [पुरुष ] किसी [सौभाग्यशाली] पुरुषके ही दृष्टिगोचर होता है ॥२०४। यहाँ 'पूयते' का एकदेश-पूय शब्द [मवादका वाचक होनेसे जुगुप्साव्यञ्जक अश्लील है, अतः यह भीं पदकदेशगत अश्लीलताका उदाहरण है]। हे मित्र [अङ्ग, पहिले] जो सदा विनय तथा प्रेमका घर बना रहता था, वह अपने अभिप्रेतपदको पाकर अब उस रूपमें कैसे दिखायी दे सकता है[ अर्थात् अवस्थाके अनुसार उसमें परिवर्तन हो जाना अनिवार्य है]।।२० ५।। यहाँ [अभिप्रेत शब्दका एकदेश ] प्रेत शब्द [भूत-प्रेत या मृत व्यक्तिका वाचक होनेसे अमङ्गल- व्यञ्जक अश्लीलताका उदाहरण है ]। पदांशगत सन्दिग्धत्व इस प्रकार पदांशगत त्रिविध अश्लीलताके तीन उदाहरण देकर अब पदांशगत सन्दिग्धत्वका उदाहरण देते हैं- ऐसा कौन-सा कार्य है, जिसमें इस पुरुषका सामर्थ्य खूब न चलता हो। यह सज्जनों या साधुओं- के साथ रहनेवाला [ महापुरुष ] है, इसलिए इसको नमस्कार करना चाहिये [ इसके आगे हाथ जोड़ना चाहिये] ॥२०६। यहाँ [साधु शब्दसे 'भूतपूर्वे चरट' इस सूत्रसे चरट् प्रत्यय करके पूर्वभूतः साधुः साधुचर: इस व्युत्पत्तिसे ] पहिले साधु था, यह अर्थ है, अथवा [साधुषु चरतीति साधुचरः इस व्युत्पत्तिसे ] साधुओंमें रहता है, यह अर्थ है, यह सन्देह होता है [ अतः पदांशगत सन्दिग्धत्व दोषका उदाहरण है]। आगे पदांशगत नेयार्थताका उदाहरण देते हैं। इस उदाहरणमें गीर्वाण अर्थात् देवताके अर्थमें 'वचोबाण' शब्दका प्रयोग किया है। 'वचः' शब्दसे 'गीः' शब्दकी लक्षणा बिना उचित हेतुओंके की गयी है, इसलिए पदांशगत नेयार्थताका उदाहरण होता है।
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३०० काव्यप्रकाश: [ का० ५३,.सू० ७४
किमुच्यतेऽस्य भूपालमौलिमालामहामणेः । सुदुर्लभं वचोबाणैस्तेजो यस्य विभाव्यते ॥२०७।
अत्र वच:शब्देन गीःशब्दो लक्ष्यते। अत्र खलु न केवलं पूर्वपदम्, यावदुत्तरपदमपि पर्यायपरिवर्तनं न क्षमते। जलध्यादावुत्तरपदमेव बडवानलादौ पूर्वपदमेव।
यद्यप्यसमर्थस्यैवाप्रयुक्तादयः केचन भेदाः तथाप्यन्यैरालङ्कारिकैर्विभागेन प्रदर्शिता इति भेदप्रदर्शनेनोदाहर्त्तव्या इति च विभज्योक्ताः । [सू० ७४ ] प्रतिकूलवर्णमुपहतलुप्तविसर्ग विसन्धि हतवृत्तम्। न्यूनाधिककथितपदं पतत्प्रकर्ष' समाप्तपुनरात्तम् ।५३।।
[वचोबाण-गीर्वाण ] देवता भी जिसके तेज [प्रताप ] को [अपने लिए ] दुष्प्राप्य समझते हैं। राजाओंके मुकुटमालाओंके महामणिरूप इस [प्रस्तुत ] राजाका क्या वर्णन किया जाय ॥२०७॥ यहाँ [वचोबाण प्रयोगमें ] 'वचः' शब्दसे 'गीः' शब्द लक्षित होता है [ परन्तु उक्त लक्षणा करनेमें रूढि या प्रयोजनमेंसे कोई हेतु नहीं है, अतः यहाँ पदांशगत नेयार्थता दोष है]। यहाँ न केवल पूर्वपद अपितु उत्तरपद भी शब्दपरिवर्तनके सहन करने योग्य नहीं है [अर्थात् गीर्वाणमें 'गीः' और 'बाण' दोनों ही शब्द परिवर्तनको सहन नहीं करते हैं। अर्थात् चाहे उत्तरपद 'बाण'को हटाकर उसके स्थानपर 'शर' रख दिया जाय तो 'गीःशर' पद देवताका वाचक नहीं होगा। इसी प्रकार पूर्वपद 'गीः' को हटाकर उसका वाचक 'वचः' शब्द रख देनेपर 'वचोबाण' शब्द भी देवताका वाचक नहीं हो सकता। इसलिए यहाँ नेयार्थता दोष है]। जलधि आदिमें तो उत्तरपद ही और बडवानल आदिमें पूर्वपद ही परिवर्तनका असह है [ अर्थात् जलधि आदिमें पूर्वपद बदला जा सकता है, जलधिके स्थानपर उदधि, वारिधि आदि प्रयोग हो सकते हैं। उत्तरपद नहीं बदला जा सकता है। और बडवानलमें उत्तरपद बदलकर बडवाग्नि किया जा सकता है, परन्तु पूर्वपद बदलकर अश्वानल नहीं किया जा सकता है ]। यद्यपि अप्रयुक्तत्वादि [आदि पदसे अवाचकत्व, निहतार्थता और नेयार्थकत्वका ग्रहण करना चाहिये] कुछ दोष असमर्थके ही भेद हैं, परन्तु अन्य आलड्गारिकोंने उनको अलग दिखलाया है, इसलिए उनका परस्पर भेद दिखलाना चाहिये इसलिए [ हमने ] भी अलग-अलग करके उनका निरूपण किया है।
वाक्यगत दोष इस प्रकार यहाँतक पद, वाक्य तथा पदैकदेशमें रहनेवाले १६ सामान्य दोषोंका निरूपण कर चुकनेके बाद आगे केवल वाक्यमें रहनेवाले २० दोषोंका निरूपण प्रारम्भ करते हैं। सबसे पहले उनका उद्देश अर्थात् नाममात्रसे कथन करते हैं- [सूत्र ७४] १. प्रतिकूलवर्णता, २. उपहतविसर्गता, ३. विसंधि, ४. हतवृत्तता, ५. न्यून- पदता, ६. अधिकपदता, ७. कथितपदता, ८ पतत्प्रकर्षता, ६. समाप्तपुनरात्तता ।।५३।।
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का० ५४-५५, सू० ७४ ] सप्तम उल्लास: ३०१ अर्थान्तरैकवाचकमभवन्मतयोगमनभिहितवाच्यम्। अपदस्थपदसमासं सड्कीणं गरभितं प्रसिद्धिहतम् ।।५४।। भग्नप्रक्रममक्रमममतपरार्थं च वाक्यमेव तथा। रसानुगुणत्वं वर्णानां वक्ष्यते तद्विपरीतं प्रतिकूलवर्णम्। यथा शृङ्गारे- अकुण्ठोत्कण्ठया पूर्णमाकण्ठं कलकण्ठि माम् । कम्बुकण्ठयाः क्षणं कण्ठे कुरु कण्ठात्तिमुद्धर ।।२०८।। रौद्रे यथा-
१०. अर्थान्तरकवाचकता, ११. अभवन्मतसम्बन्ध, १२. अमतयोग, १३. अनभिहितवाच्यता १४. अस्थानपदता, १५. अस्थानसमासता, १६. सङ्कीणंता, १७. गभितता, १८. प्रसिद्धिविरोध, १६. भग्नप्रकमता, २०. अकरमता, २१. अमतरार्थता [ ये २१ प्रकारके ] वाक्यदोष [अथवा २१ प्रकारके वाक्य ही दूषित ] होते हैं। १. प्रतिकू लवर्णता १. वर्णोंका रचनानुगुणत्व [अष्टम उल्लास ] में कहा जायगा। उसके विपरीत [अर्थात् जिस रसमें जिन वणोंका प्रयोग विहित है, उसके विपरीत वर्णोंका प्रयोग ] प्रतिकूलवर्ण [वाक्यदोष] होता है। जैसे शृङ्गाररसमें -- हे कलकण्ठि ! [दूती अथवा नायिकाकी सखी ] प्रबल उत्कण्ठासे कण्ठतक भरे हुए मुझको थोड़ी देरके लिए शङ्के समान [उतार-चढ़ाव युक्त ) गर्दनवाली [कम्बुकण्ठी प्रियतमा ] के कण्ठालिङ्गन करनेका अवसर दो ] और [ इस प्रकार मेरे गलेमें ] अटके हुए प्राणों [ कण्ठके क्लेश ] को बचाओ ॥२०८॥ शृङ्गाररसमें श्रुतिकटु होनेसे टवर्गका प्रयोग वजित माना गया है, जैसा ८ वें उल्लासमें सूत्र ६दवेंमें अटवर्गा इत्यादि दिखलायेंगे। कविने इस श्लोकमें अनेक बार इसका प्रयोग कर दिया है, इसलिए प्रतिकूल व्णोंके प्रयोगके कारण यह दूषित हो गया है। रौद्ररसमें [प्रतिकूलवर्णताका उदाहरण ] जैसे -- यह श्लोक 'वेणीसंहार' नाटकके तृतीय अङ्कमें आया है। द्रोणाचार्यके शस्त्र डाल देनेके बाद धृष्टद्युम्नने उनके बाल पकड़कर उनका सिर काट डाला। इस समाचारको सुनकर उनका पुत्र अश्वत्थामा करोधावेशमें समस्त क्षत्रियोंका नाश करनेकी घोषणा करता है। इसके साथ ही वह इसी प्रकारकी पूर्व- घटनाका सम्बन्ध जोड़ देता है। कुरुक्षेत्रके मैदानमें ही कुछ समय पूर्व कार्तवीर्य सहस्रार्जुनने परशुरामके पिताके बालोंको पकड़कर उनका अपमान किया था, परशुरामके पिता जामदग्न्य ब्राह्मण थे, और उनका अपमान करनेवाला कार्तवीर्य अर्जुन क्षत्रिय था, इसलिए परशुरामने अपने पिताके इस अपमानका बदला लेनेके लिए समस्त क्षत्रियोंके नाशकी प्रतिज्ञा कर ली और उसको पूर्ण करके ही दम लिया। इस प्रकारकी स्थिति उस समय भी थी। क्षत्रिय धृष्टद्युम्नने ब्राह्मण द्रोणाचार्यका अपमान किया था इसलिए उनका पुत्र अश्वत्थामा पूर्व इतिहासके साथ सादृश्य दिखलाकर जो कार्य परशुरामने किया था, उसीकी पुनरावृत्ति करनेकी प्रतिज्ञा करते हुए कहता है-
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३०२ काव्यप्रकाश: [का० ५४-५५, सू० ७४ देश: सोऽयमरातिशोणितजलैर्यस्मिन् ह्रदाः पूरिताः क्षत्रादेव तथाविधः परिभवस्तातस्य केशग्रहः । तान्येवाहितहेतिघस्मरगुरूण्यस्त्राणि भास्वन्ति मे। यद्रामेण कृतं तदेव कुरुते द्रोणात्मजः कोधनः ॥२०१॥ अत्र हि विकटवर्णत्वं चोचितम् । यथा- प्रागप्राप्तनिशुम्भशाम्भवधनुर्द्वेधाविधाविर्भव- त्क्रोध प्रेरितभीमभार्गवभुजस्तम्भापविद्धः क्षणात्। उज्ज्वाल: परशुर्भवत्वशिथिलस्त्वत्कण्ठपीठातिथि- र्येनानेन जगत्सु खण्डपरशुर्देवो हर: ख्याप्यते ॥२१०॥ यह [कुरुक्षेत्रका मैदान ] वही देश है, जिसमें [ परशुराम ] ने शत्रुओंके रक्तरूप-जलसे तालाबोंको भर दिया था, और क्षत्रिय द्वारा पिताजीके केशोंका पकड़ा जाना उसी प्रकारका अपमान है [जैसा कि कार्तवीर्य अर्जुनने परशुरामके पिता जामदग्न्यके केश पकड़कर किया था ] और [अपने विरोधमें ] शस्त्र उठानेवाले शत्रुको खा जानेवाले [घस्मर ] वे ही उत्तम [गुरूणि ] शस्त्र मेरे पास हैं। इसलिए [ समस्त क्षत्रियोंका विनाशरूप ] जो [कार्य उस समय ] परशुरामने किया था, उसीको आज करुद्ध हुआ द्रोणका पुत्र [मैं या यह अश्वत्थामा ] कर [ने जा] रहा है ॥२०६॥" यहाँ [रौद्ररस होनेके कारण उसके अनुरूप ] विकट वर्णों तथा दीर्घ समासोंका होना उचित था [परन्तु कविने न तो लम्बे समासोंका ही प्रयोग किया है, और न कठोर वर्णोंका, अतः यहाँ प्रति- कूलवर्णता दोष है ]। प्रतिकूलवर्णताका प्रत्युदाहरण इस श्लोकके प्रतिकूलवर्णता दोषके स्पष्टीकरणके लिए ग्रन्थकार प्रत्युदाहरणरूपमें अ्रगला श्लोक उद्धृत करते हैं, जिसमें रौद्ररसके वर्णनमें उसके अनुरूप दीर्घसमास तथा कठोर वर्णोंका प्रयोग किया गया है। यह श्लोक दोषका उदाहरण नहीं है, अपितु रसानुगुण रचनाके कारण रौद्ररसकी रचनाके आदर्शरूपमें प्रत्युदाहरणरूपसे प्रस्तुत किया गया है। श्लोक 'महावीरचरित' नाटकके द्वितीय अङ्कमें शिवधनुषके तोड़ दिये जाने के बाद कुद्ध हुए परशुरामकी रामचन्द्रके प्रति उक्ति है। परशुराम रामचन्द्रसे कह रहे हैं कि- [अरे क्षत्रियकुमार, ] जिस [शिवधनुष ] को पहले कभी झुकाया [निशुम्भ ] भी न जा सका था उसके दो टुकड़े [तेरे द्वारा ] कर दिये जानेसे उत्पन्न क्रोधसे भयङ्कर [मुझ ] परशुरामके बलिष्ठ-बाहु [भुजस्तम्भ] द्वारा चलाया गया, ऐसा जिस [का आधा भाग प्रसन्न होकर शिवजी अपने प्रिय शिष्य इस परशुराम अर्थात् मुझको दे देने ] के कारण भगवान् महादेव खण्डपरशु नामसे कहे जाते हैं, आग उगलता हुआ [ उज्ज्वाल: ] वह तीव्र [अशिथिलः ] परशु तेरे कण्ठरूप आसनका अतिथि होता है [अर्थात् शीघ्र ही अभी तेरी गर्दनपर बैठता है ]।२१०॥
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का० ५४-५५, सू० ७४ ] सप्तम उल्लास: ३०३ यत्र तुन कोधस्तत्र चतुर्थपादाभिधाने तथव शब्दप्रयोग:। श उपहत उत्वं प्राप्तो वा विसर्गो यत्र तत्। यथा -- धीरो विनीतो निपुणो वराकारो नृपोऽत्र सः । यस्य भृत्या वलोत्सिक्ता भक्ता बुद्धिप्रभाविताः ।२११॥ इस श्लोकको ग्रन्थकारने रौद्ररसकी रचनाके आदर्शरूपमें प्रस्तुत किया है। श्लोकके तीन चरणोंकी रचनामें दीर्घ समास तथा विकट वर्णोंका प्रयोग होनेसे उनकी रचना रौद्ररसके अनुरूप कही जा सकती है। परन्तु चतुर्थ चरणकी रचनामें तो वह बात नहीं है, तब इसको रौद्ररसकी रचनाका आदर्श कैसे माना गया है। इस प्रकारकी सम्भावित शङ्काको मनमें रखकर उसके समाधानके लिए ग्रन्थकारने अगली पंक्ति लिखी है। उसका अभिप्राय यह है कि श्लोकके तीन चरणोंमें रामचन्द्रके प्रति परशुरामका क्रोधरूप और रौद्ररसका स्थायिभाव विद्यमान रहता है इसलिए उनकी रचना इस प्रकारकी है। परन्तु चतुर्थ चरणमें परशुरामको अपने गुरु शिवजीका स्मरण हो आया और उससे उनके क्रोधका शमन हो जाता है। इसलिए वहाँ रचनामें उग्रताका न होना दोष नहीं, अपितु उचित ही है। इसी बातको कहते हैं- और जहाँ [ चतुर्थ चरणमें गुरु महादेवका स्मरण हो जानेके कारण ] कोध [रौद्ररसका स्थायिभाव नहीं रहा, वहाँ चतुर्थ पादमें उसी प्रकारके [शिथिल ] शब्दोंका प्रयोग [किया गया] है [ और वह उचित ही है ]। २. उपहतविसर्गता इस प्रकार प्रतिकूलवर्णता दोषका निरूपण करनेके बाद उपहतविसर्गताके [क] विसर्गके श्त्व तथा [ख] विसर्गलोप, दोनों भेदोंके उदाहरण एक ही श्लोकमें दिखलाते हैं- उपहत अर्थात् [क ] उत्व [अथवा ओ-रूपता ] को प्राप्त [विसर्ग ] तथा [ख] लोपको प्राप्त विसर्ग [अर्थात् ] जहाँ [ विसर्गको ओ हो जाता है या जहाँ विसर्गोंका लोप हो जाता है, उपहतविसर्गताके ये दो भेद होते हैं। उन दोनोंके उदाहरण ] जैसे -- इस संसारमें [अत्] वही राजा [धीर: ] पण्डित, [विनीतः ] सुशिक्षित, चतुर और सुन्दर है, जिसके सेवक बलका अभिमान करनेवाले [अर्थात् बलवान् ] उसकी भक्ति और बुद्धिसे प्रभावित हों ।।२ ११।। यहाँ श्लोकके पूर्वार्द्धमें धीरो, विनीतो, निपुणो और नृपो इन चारों पदोंमें विसर्गोंका श रूप हो गया है। पहिले तीन स्थलोंमें 'हसि च' इस सूत्रसे और अन्तिममें 'अतो रोरप्लुतादप्लुते' इस सूत्रसे विसर्गस्थानीय रु को उ और गुण होकर ओ हो गया है। उत्तरार्द्धमें 'भृत्याः', 'बलोत्सिक्ताः' और 'भक्ताः' इन प्रथमाके बहुवचनके प्रयोगोंके अन्तमें विसर्ग थे, परन्तु उनको 'ससजुषो रुः' (८-२-६६) सूत्रसे रु होकर 'भोभगोत्धोत्पूर्वस्य योऽशि (८-३-१७) सूत्रसे य होकर 'हलि सर्वेषाम्' (८-३-२२) इस सूत्रसे य का लोप हो जाता है। इस प्रकार यहाँ विसर्गोंका लोप और पूर्वार्द्धमें विसर्गोंको शरत्व करके अनेक बार एक साथ ही प्रयुक्त किया गया है। इसलिए उपहतविसर्ग के क्रमशः शत्वविसर्गता और लुप्तविसर्गतारूप दोनों भेदोंमें वाक्यदोष होते हैं।
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३०४ काव्यप्रकाशः [ का० ५४-५५, सू० ७४
विसन्धि सन्धेवैरूप्यम्, विश्लेषोऽश्लीलत्वं कष्टत्वं च। तत्राद्यं यथा -- राजन् ! विभान्ति भवतश्चरितानि तानि इन्दो्दुति दधति यानि रसातलेऽन्तः । धीदोबले अतितते उचितानुवृत्ती आतन्वती विजयसम्पदमेत्य भातः ॥२१२॥
३. विसन्धि आगे विसन्धिरूप चतुर्थ वाक्यदोषका निरूपण करते हैं। जहाँ सन्धि होनी चाहिये वहाँ सन्धि न होना विसन्धि दोष कहलाता है। सन्धिस्थलमें सन्धि न करनेके तीन कारण हो सकते हैं। उनमें पहिला कारण तो वाक्यमें सन्धिको नित्य न मानकर वक्ताकी इच्छा विवक्षाके अधीन माना जाना है। संहितैकपदे नित्या नित्या धातूपसर्गयोः । नित्या समासे वाक्ये तु सा विवक्षामपेक्षते ।। इस नियमके अनुसार वाक्यमें सन्धि करना या न करना वक्ताकी इच्छाके अधीन होनेसे सन्धि न की जाय यह सन्धि न करनेका कारण हो सकता है। दूसरे दो भेद शास्त्रीय नियमसे प्राप्त होते हैं। एक तो वह जहाँ प्रगृह्यसंज्ञा हो जानेके कारण सन्धि नहीं होती है। दूसरे वे स्थल जहाँ विसर्गोंका लोप आदि होनेके बाद गुण आदि रूप सन्धि प्राप्त होती है, परन्तु इसके प्राप्त होनेपर लोप आदि असिद्ध हो जाता है। इनमेंसे विवक्षाधीन विसन्धि तथा प्रगृह्यसंज्ञानिमितक विसन्धि, इन दो भेदोंका एक सम्मिलित उदाहरण और असिद्धिहेतुक विसन्धिका एक अलग उदाहरण ग्रन्थकारने प्रस्तुत किया है। इसके अतिरिक्त वाक्यमें अश्लीलताका आ जाना और सन्धि होकर क्लिष्ट रूप बन जाना यह दोनों भी विसन्धि दोषके ही भेद हैं। इस प्रकार विसन्धि अर्थात् सन्धिवैरूप्य के भेदोंका निरूपण आगे करते हैं- विसन्धि [अर्थात् सन्धिवरूप्य तीन प्रकारका होता है, एक सन्धिका ] विश्लेष, अश्लीलता और कष्टता। उनमेंसे पहिला [अर्थात् सन्धिविश्लेष भी तीन प्रकारका होता है। उनमेंसे विवक्षाधीन तथा प्रगृह्यसंज्ञानिमित्तक दो प्रकारके सन्धिविश्लेषका एक ही उदाहरण आगे दिखलाते हैं ] जैसे- हे राजन् ! आपके वे [लोकोत्तर ] चरित्र जो रसातल [के गहन अन्धकार ] में भी चन्द्रमाके समान [प्रकाशमान ] कान्तिको धारण करते हैं, अत्यन्त शोभित होते हैं। और आपके अत्यन्त प्रसिद्ध एवं उचित कार्यमें लगे बुद्धिबल तथा बाहुबल, दोनों विजयसम्पत्तिका विस्तार करते हुए अत्यन्त शोभित हो रहे हैं।२१२।। इस श्लोकमें प्रथम और द्वितीय चरणके बीचमें 'तानि इन्दोः' में 'अकः सवर्णे दीर्घः' इस सूत्रसे प्राप्त होनेवाला दीर्घ, कविने विवक्षाधीन मानकर नहीं किया है। परन्तु इस सन्धिके न करनेके कारण कविकी अशक्ति सूचित होती है। कविको यहाँ इस प्रकारके पदोंका प्रयोग करना चाहिये था, जिनमें प्राप्त सन्धिको करनेमें उसको कोई कठिनाई न होती। परन्तु उसको इस प्रकारके पद न मिल सके। जो पद मिले हैं, उनमें प्राप्त सन्धि यदि कर दी जाय तो छन्दोभङ्ग हो जाता है, इसलिए उसने उनमें प्राप्त सन्धि नहीं की है। इस स्थितिमें सन्धि न करनेका कारण कविकी अशक्ति ही है। अतएव इस प्रकारकी सन्धिको विवक्षाधीन मानकर काव्यमें यदि एक बार भी सन्धिविश्लेष किया जाय, तो यह कविकी अशक्ति- का सूचक होनेसे दोष हो जाता है।
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का० ५४-५५, सू० ७४] सप्तम उल्लास: ३०५
यथा वा --
तत उदित उदारहारहारिद्युतिरुच्चैरुदया चलादिवेन्दुः । निजवंश उदात्तकान्तकान्तिर्बत मुक्तामणिवच्चकास्त्यनर्घः ॥२१३॥ संहितां न करोमीति स्वेच्छया सकृदपि दोषः। प्रगृह्यादिहेतुकत्वे त्वसकृत् । वेगादुड्डीय गगने चलण्डामरचेष्टितः । अयमुत्तपते पत्री ततोऽत्रैव रुचिङकुरु ॥२१४॥
अत्र सन्धावश्लीलता।
श्लोकके उत्तरार्धमें 'धीदोर्बले' + 'अतितते' के बीच तथा 'अतितते' + 'उचितानुवृत्ती'के बीच 'एचोऽ्यवायावः' सूत्रसे प्राप्त अयादेश एवं 'उचितानुवृत्ती' + 'आतन्वती' के बीच 'इको यणचि' सूत्रसे प्राप्त यणादेशरूप सन्धि, तीनों स्थलोंपर 'इदूदेद्द्विवचनं प्रगृह्यम्' इस सूत्रमें प्रगृह्यसंज्ञा औौर इसके परि- णामरूप प्रकृतिवद्ाव हो जानेके कारण, नहीं होती है। यह प्रगृह्यसंज्ञानिमित्तक सन्धिविश्लेष यहाँ इकट्ठा तीन बार आ पड़ा है। इसलिए कविकी अशक्तिका सूचक होनेसे दोष है। तीसरे प्रकारके असिद्धिमूलक सन्धिविश्लेषका उदाहरण अगला श्लोक दिया है। उस श्लोकमें 'ततः' + 'उदितः'के बीच, 'उदितः' + 'उदार०'के बीच तथा उत्तरार्द्धमें 'निजवंशे + उदात्त०'के बीच- के विसर्ग तथा 'ए' का लोप हो जानेके बाद जो रूप प्रयुक्त हुए हैं, उनमें तीनों जगह 'आद्गुणः' इस सूत्रसे गुण प्राप्त है, परन्तु इस गुणके प्रति 'पूर्वत्रासिद्धम्' से लोपके अ्रपरसिद्ध हो जानेसे गुण नहीं होता है। इस असिद्धि-मूलक सन्धिविश्लेषके एक ही श्लोकमें तीन बार आ जानेसे दोष है। [पतिवरा कन्याके प्रति सखि कह रही है कि ] अत्युन्नत उदयाचलसे उदय हुए विशुद्ध मुक्ताहार- सदृशी मनोहारिणी कान्तिसे युक्त चन्द्रमाके समान, उसी राजवंशसे उत्पन्न हुआ अत्यन्त चमकते हुए मुक्ताहार [धारण करनेके कारण ] से मनोहर कान्तिवाला अत्युत्तम एवं आकर्षक सौन्दर्यसे युक्त यह राजा उत्तम बाँससे उत्पन्न बहुमूल्य मणिके समान शोभित हो रहा है ॥२१३। अपनी इच्छासे 'सन्धि न करूँ' इस दृष्टिसे एक बार [का किया हुआ सन्धिविश्लेष ] भी दोष है। प्रगृह्यादि [अर्थात् प्रगृह्यसंज्ञानिमित्तक अथवा असिद्धिमूलक सन्धिविश्लेषण] तो अनेक बार होनेपर दोष होता है। अश्लीलताजन्य विसन्धिदोष इस प्रकार तीन तरहके सन्धिविश्लेषके उदाहरण देकर अब विसन्धिदोषके दूसरे भेद सन्धिकी अश्लीलताका उदाहरण देते हैं- वेगसे आकाशमें उड़कर भयडूर चेष्टासे चलता हुआ यह बाज [ 'श्येनाख्यो विहगः पतत्नी' इति शाश्वतः ] उत्तप्त हो रहा है। [इससे इस कुञ्जमें नायककी उपस्थिति सूचित होती है। इसलिए तुम ] यहाँ ही इच्छा [मनोकामना पूर्ण ] करो ॥।२१४।। यहाँ ['चलण्डामर' इस पदका एकदेश 'लण्डा' यह अंश पुरुषके लिङ्गका तथा 'रुचिङकुरु'का एकदेश 'चिङकु' पद स्त्रीकी योनिका सूचक है, इसलिए यहाँ ] सन्धिमें अश्लीलता है। २०
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उर्व्यसावत्र तर्वाली मर्वन्ते चार्ववस्थितिः । नात्रार्जु युज्यते गन्तुं शिरो नमय तन्मनाक् ।२१५। (५) हतं लक्षणानुसरणेऽप्यश्रव्यम, अप्राप्तगुरुभावान्तलघु, रसाननुगुणं च वृत्तं यत्र तत् हतवृत्तम्। कमेणोदाहरणम्- अमृतममृतं कः सन्देहो मधून्यपि नान्यथा मधुरमधिकं चूतस्यापि प्रसन्नरसं फलम्। सकृदपि पुनर्मध्यस्थः सन् रसान्तरविज्जानो वदतु यदिहान्यत् स्वादु स्यात् प्रियादशनच्छदात् ॥२१६॥ अत्र 'यदिहान्यत्स्वादु स्यात्' इत्यश्रव्यम् ।
कष्टताजन्य विसन्धिदोष [सन्धिके कारण उत्पन्न कष्टताका उदाहरण देते हैं ]-यहाँ मरुदेशके मध्यमें [अन्ते ] यह विस्तीर्णा [उर्वी] एवं सुन्दर स्थितिवाले वृक्षोंकी पंक्ति है। यहाँ सीधे [खड़े होकर ] चला नहीं जा सकता है इसलिए तनिक सिर झुका लो ।।२१५। इसमें उर्वी+असौ, तरु +आली, मरु +अन्ते, चारु+अवस्थितिः, अत् +ऋजु इन पदोंमें सन्धि होकर श्लोकका जो प्रकृत पाठ बन गया है, वह सुनने और अर्थज्ञान दोनोंमें ही कष्टदायक है। अतः यहाँ सन्धिके कारण कष्टसन्धिका यह उदाहरण है। ५. हतवृत्तता त्रिविध अश्लीलताका निरूपण करनेके बाद पञ्चम वाक्यदोष 'हतवृत्त का निरूपण करते हैं। यह 'हतवृत्त' दोष भी तीन प्रकारका होता है। एक लक्षणानुसार होनेपर भी अश्रव्य, दूसरा अप्राप्त- गुरुभावान्तलघु और तीसरा रसके अननुरूप छन्दका प्रयोग। हत अर्थात् (क) लक्षणका अनुसरण करनेपर भी सुननेमें बुरा लगनेवाला, (ख) अन्त लघु जिसमें गुरुभावको प्राप्त नहीं होता है तथा (ग) रसके अनुरूप जिसका छन्द नहीं है वह [तीन प्रकारका ] 'हतवृत्त' है। क्रमशः उदाहरण -- (क) अमृत [लोकोत्तर स्वादयुक्त ] अमृत ही है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। शहद भी [मधुर ही है] अन्य प्रकारका [अस्वादु या फीका ] नहीं है। मधुर रसवाला आमका फल भी अत्यन्त मीठा होता है। परन्तु अन्य सब [स्वादिष्ट वस्तुओंके ] रसोंको जाननेवाला एक भी व्यक्ति निष्पक्ष होकर यह बतलाये कि इस संसारमें प्रियाके अधरोष्ठसे अधिक स्वादु और क्या कोई वस्तु है ॥२१६॥ इसमें 'यदिहान्यत् स्वादु स्यात्' यह अश्रव्य है। इस श्लोकमें हरिणी छन्द है। 'रसयुगहयैन्सों म्रौ म्लौ गो यदा हरिणी तदा' यह हरिणी छन्दका लक्षण किया गया है। इसके अनुसार 'वदतु यदिहा' के बाद यति होनी चाहिये, परन्तु वह यति सुननेमें अश्रव्य हो जाती है। इसलिए लक्षणका अनुसरण होनेपर भी उसमें अश्रव्यता आ गयी है। इसको बदलकर 'वदतु मधुरं यत्त्यादन्यत् प्रियादशनच्छवात्' ऐसा पाठ कर देने पर दोष नहीं रहता है।
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का० ५४-५५, सू० ७४ ] सप्तम उल्लास: ३०७ यथा वा- TE PE जं परिहरिउं तीरइ मणअं पि ण सुन्दरत्तणगुणेण। अह णवरं जस्स दोसो पडिपक्खेहिं पि पडिवण्णो ॥२१७॥ [यत् परिहर्तु तीर्यते मनागपि न सुन्दरत्वगुणेन। अथ केवलं यस्य दोष: प्रतिपक्षैरपि प्रतिपन्नः । इति संस्कृतम्] अत्र द्वितीयतृतीयगणौ सकारभकारौ। विकसितसहका रतारहारिपरिमलगुन्जितपुन्जितद्विरेफः । नवकिसलयचारुचामरश्रीर्हरति मुनेरपि मानसं वसन्तः ।२१८।। अत्र हारिशब्दः । 'हारिप्रमुदितसौरभ' इति पाठो युक्तः ।
अथवा [लक्षणानुसरणमें भी अश्रव्यताका दूसरा उदाहरण ] जैसे -- सुन्दरता गुणके कारण जिसका तनिक भी परित्याग किसी भी दशामें नहीं किया जा सकता है, यह उसका [नायक या कामुकका ] एक दोष है, जिसे उसके विरोधी भी स्वीकार करते हैं ॥२१७॥ इसमें [गाथा छन्दमें लक्षणके अनुसार ] द्वितीय तथा तृतीय सगण [अन्त्यगुरु ] और भगण [आदिगुरु गणका प्रयोग लक्षणानुसार होनेपर भी अश्रव्य है]। (ख) अप्राप्तगुरुभावान्तलघुरूप हतवृत्त खिले हुए आमोंके दूर फैले हुए [तार ] और मनोहर सुगन्धसे [उन्मत्त होकर ] गुञ्जार करते हुए भ्रमरोंके समूह जिसमें [चारणोंके समान ] एकत्र हो रहे हैं और नवीन पत्र ही जिसका सुन्दर चमर है, इस प्रकारका [ऋतुराज ] वसन्त मुनियोंके मनको भी मोह लेता है ॥२१८॥ [यह अप्राप्तगुरुभावान्तलघुका उदाहरण है, इसमें प्रथम चरणके अन्तका ] यहाँ 'हारि' शब्द [अप्राप्तगुरुभावान्तलघु है]। 'हारिप्रमुदितसौरभ' यह पाठ उचित है। इसका अभिप्राय यह है कि छन्दःशास्त्रमें जहाँ लघु और गुरुके लक्षण किये गये हैं, वहाँ 'वा पादान्ते' अथवा 'पादान्तस्थं विकल्पेन' इस नियमसे पादान्तमें होनेवाले लघुवर्णको भी विकल्पसे गुरु माना जा सकता है, यह कहा गया है। प्रकृत श्लोक 'पुष्पिताग्रा' छन्दका है। 'अयुजि नयुगरेफतो यकारो युजि च नजौ जरगाश्च पुष्पिताग्रा' इस लक्षणके अनुसार प्रथम चरणके अन्तमें आदिलघु यगणका प्रयोग होनेसे अन्तिम वर्ण 'रि गुरु होना चाहिये था। वैसे 'रि' स्वरूपतः लघुवर्ण है, परन्तु 'वा पादान्ते' के नियमके अनुसार वह गुरु माना जा सकता है। परन्तु छन्दःशास्त्रके व्याख्याकारोंने इस नियमको इन्द्रवज्रा आदि कुछ परिमित छन्दोंमें ही माना है। पुष्पिताग्रा छन्दमें उस नियमको लागू नहीं माना है। इसलिए यह अन्तिम लघु गुरुवर्ण नहीं गिना जाता है। अतएव यह 'अप्राप्तगुरुभावान्तलघु' का उदाहरण है। यदि इसके बाद आये हुए 'परिमल' शब्दको बदलकर उसके स्थानपर 'प्रमुदित' पाठ कर दिया जाय, तो संयुक्ताक्षरके परे होनेपर 'रि' गुरु हो जायगा। यहाँ 'हारि' शब्द [अप्राप्तगुरुभावान्तलघु होनेसे यह हतवृत्ततादोषका उदाहरण बन जाता है। उसके परिहारके लिए ] 'हारिप्रमुदितसौरभ' यह पाठ उचित है।
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यथा वा- अन्यास्ता गुणरत्नरोहणभुवो धन्या मृदन्यैव सा सम्भारा: खलु तेजन्य एव विधिना यैरेष सृष्टो युवा। श्रीमत्कान्तिजुषां द्विषां करतलात्स्त्रीणां नितम्वस्थलात्. दृष्टे यत्र पतन्ति मूढमनसामस्त्राणि वस्त्राणि च ।।२१९।। अत्र 'वस्त्राण्यपि' इति पाठे लघुरपि गुरुतां भजते। हा नृप ! हा बुध ! हा कविवन्धो ! विप्रसहस्त्रसमाश्रय ! देव ! मुग्ध ! विदग्ध ! सभान्तररत्न ! क्वासि गतः क्व वयंच तवैते ॥२२०॥ हास्यरसव्यञ्जकमेतद् वृत्तम् ।
[सौन्दर्य आदि गुणोंसे युक्त ] गुणरत्नोंको उत्पन्न करनेवाली रोहण [रत्नोत्पादक पर्वतकी विशेष] भूमि कुछ और ही है, वह सौभाग्यशालिनी मिट्टी कुछ और ही है तथा वे उपादान सामग्रियाँ भी कुछ और ही हैं, जिनसे विधाताने इस युवककी रचना की है; जिसको देखकर सुन्दर शोभाशाली शत्रुओंके हाथसे अस्त्र और रूपवती सुन्दरियोंके नितम्बस्थलपरसे वस्त्र खिसक पड़ते हैं ॥२१६॥ यहाँ 'वस्त्राण्यपि' ऐसा पाठ होनेपर लघु भी गुरुताको प्राप्त हो जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि इस श्लोकमें' शार्दूलविकरीडित' छन्द है, इस छन्दका लक्षण 'सूर्याश्वै- मसजस्तता: सगुरवः शार्दलविक्रीडितम्' यह किया गया है। इस लक्षणके अनुसार प्रत्येक पादका अ्न्तिम अ्क्षर गुरु होना चाहिये। यहाँ चतुर्थ चरणका अन्तिम वर्ण 'च' है, जो स्वरूपतः लघु है, परन्तु 'वा पादान्ते' इस नियमके अनुसार वह गुरु हो सकता है। परन्तु इस नियमका आधार तो अनुभव है। यहाँ 'च' शब्दमें स्वाभाविक शैथिल्य है, वह गुरुरूपमें अनुभवमें नहीं आता है, उसको बदलकर 'वस्त्राण्यपि' यह पाठ कर देनेपर भी यद्यपि अ्न्तिम त्रक्षर 'पि' स्वरूपतः लधु ही है, परन्तु संयुक्ताक्षरसे परे होनेसे उसके उच्चारणमें दाढर्य आ जाता है, इसलिए वह गुरुभावको प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार 'हतवृत्त' के 'लक्षणानुसरणेऽप्यश्रव्यता' तथा 'अप्राप्तगुरुभावान्तलघु' इन दो भेदोंके उदाहरण देनेके बाद 'रसाननुगुणता' रूप तीसरे भेदका उदाहरण आगे देते हैं। रसाननुगुण हृतवृत्तता हे राजन् ! हे विद्वान् ! हे कवियोंके बन्धु ! और हे सहस्रों ब्राह्मणोंके आश्रय देव ! हे सुन्दर [मुग्ध ]! हे विद्वानोंकी सभाके मध्य रत्न [रूप राजन्] ! आप कहाँ चले गये और आपके [प्रिय या आश्रित ] ये हम कहाँ [रह गये] हैं ॥२२०॥ [यह श्लोक राजाके लिए शोकसे विलाप करते हुए लोगोंका है। इसमें करुण-रसका प्राधान्य है। अतः करुणरसके अनुरूप 'मन्दाकान्ता' आदि छन्दका प्रयोग करना चाहिये था। यहाँ जो 'दोधक' छन्द कविने अयुक्त किया है, वह करणरसका व्यञ्जक नहीं है, अपितु] यह छन्द हास्यरसका व्यञ्जक है [अतः रसाननुगुण होनेसे यह 'हल्बृत्तता' दोषका उदाहरण है ]।
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का० ५४-५५, सू० ७४ ] सप्तम उल्लास: ३०६
(६) न्यूनपदं यथा- तथाभूतां दृष्टवा नृपसदसि पाञ्चालतनयां वने व्याधैः साधं सुचिरमुषितं वल्कलधरैः । विराटस्यावासे स्थितमनुचितारम्भनिभृतं गुरुः खेदं खिन्ने मयि भजति नाद्यापि कुरुषु ॥।२२१॥ अत्रास्माभिरिति, 'खिन्ने' इत्यस्मात्पूर्वमित्थमिति च।
(७) अधिकं यथा- स्फटिकाकृतिनिर्मल: प्रकामं प्रतिसङक्ान्तनिशातशास्त्रतत्त्वः । अविरुद्धसमन्वितोक्तियुक्तः प्रतिमल्लास्तमयोदयः स कोऽपि ॥२२२। अत्राकृतिशब्दः ।
यथा वा- इदमनुचितमक्रमश्च पुंसां यदिह जरास्वपि मान्मथा विकाराः । यदपि च न कृतं नितम्बिनीनां स्तनपतनावधि जीवितं रतं वा ।।२२३।।
६. न्यूनपद [दोषका उदाहरण ] जैसे -- [यह श्लोक 'वेणीसंहार' नाटकका है। 'काव्यप्रकाश' के तृतीय उल्लासमें उदाहरण संख्या १५ पर भी उद्धृत किया जा चुका है। इसका अर्थ वहाँसे ही देख लेना चाहिये ॥।२२१।। यहाँ [तीनों चरणोंमें कर्त्तारूपमें ] 'अस्माभिः' यह [ पद होना चाहिये था, उसके न होनेसे न्यूनपदता दोष हो जाता है। इसी प्रकार चतुर्थ चरणमें] 'खिन्ने' इसके पूर्व 'इत्थं' यह पद भी [ कम है। उसके न होनेसे यहाँ न्यूनपदता दोष है]। ७. अधिक [पदता दोषका उदाहरण ] जैसे -- किसी विद्वान्का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि-] स्फटिकके समान अत्यन्त निर्मल [स्वरूप ], दुरूह [निशात ] शास्त्रोंका तत्त्व जिसके हृदयमें, जिसकी बुद्धिमें आरूढ़ है, जिसकी उक्तियाँ और तर्क [वेदशास्त्रादिसे ] अविरुद्ध तथा [ परस्पर ] समन्वित होते हैं। और अपने विरोधियोंके पराजय [अस्तमयोदय: ] की उत्पत्ति जिससे होती है, इस प्रकारका वह कोई [अपूर्व पुरुष] है ॥२२२।। यहाँ आकृति शब्द [अधिक ] है [ 'स्फटिकनिर्मलः' पद ही पर्याप्त है ]। अथवा [अधिकपदताका दूसरा उदाहरण ] जैसे -- यह जो बुढ़ापेमें भी [लोगोंमें ] कामसम्बन्धी विकार पाये जाते हैं, यह [अत्यन्त ] अनुचित और शास्त्रादिके विपरीत [अकरम] है। और वह भी [अत्यन्त अनुचित है ] कि जो स्त्रियोंमें जीवन और सुरतव्यापार स्तनोंके शिथिलतापर्यन्त [पतनावधितक ] नहीं किया [अर्थात् स्तनशैथिल्यके बाद भी उनमें जो कामेच्छा होती है वह भी अनुचित है ]।।२२३।।
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३१० काव्यप्रकाश: [का० ५४-५५, सू० ७४
अत्र कृतमिति। 'कृतं' प्रत्युत प्रक्रमभङ्गमा वहति। यथा च 'यदपि च न कुरङ्ग- लोचनानाम्' इति पाठे निराकाङक्षैव प्रतीतिः । (८) कथितपदं यथा- अधिकरतलतल्पं कल्पितस्वापलीलापरिमिलननिमीलत्पाण्डिमा गण्डपाली। सुतनु ! कथय कस्य व्यञ्जयत्यञ्जसैव स्मरनरपतिलीला यौवराज्याभिषेकम् ।२२४ अत्र लीलेति। (९) पतत्प्रकर्ष यथा -- क: कः कुत्र न घुर्घुरायितघुरीघोरो घुरेत्सूकर: क: कः कं कमलाकरं विकमलं कर्तु करी नोद्यतः । के के काति वनान्यरण्यमहिषा नोन्मूलयेयुर्यतः सिंहीस्नेहविलासबद्धवसतिः पञ्चाननो वर्त्तते ॥२२५॥
यहाँ [तृतीय चरणमें ] 'कृतम्' यह [पद अनावश्यक होनेसे अधिक है। यह पद न केवल अनावश्यक ही है] बल्कि 'कृतम्' भग्नप्रक्रम [दोष] को भी उत्पन्न कर रहा है। [श्लोकके पूर्वाधरं 'कृता' पदका प्रयोग 'मान्मथा विकाराः' के साथ नहीं किया गया है इसलिए यहाँ 'जीवितं रतं च'के साथ भी 'कृतम्' पदका प्रयोग नहीं होना चाहिये था। उसका प्रयोग कर देनेसे यहाँ प्रकमभङ्ग दोष भी हो गया है। उन दोनों दोषोंके परिहारके लिए यहाँ ] 'यदपि च न कुरङ्गलोचनानां' यह पाठ रखनेपर [कृतं पदकी ] आकांक्षाके बिना ही प्रतीति पूर्ण हो जाती है। ८. कथित पदरूप [वाक्यदोषका उदाहरण ] जैसे -- करतलरूपी शय्यापर शयन करनेके कारण [हाथकी ] रगड़से जिसकी पाण्डुता दूर हो गयी है [जिसमें लालिमाका उदय हो गया है] ऐसी तुम्हारी कपोलस्थली, हे सुतनु ! यह बताओ किस [सौभाग्यशाली ]के कामरूप राजाकी लीलाओंके युवराजपदपर शीघ्र ही होनेवाले अभिषेकको सूचित करती है॥२२४॥ यहाँ 'लीला' यह [प्रथम चरण तथा चतुर्थ चरणमें दो जगह प्रयुक्त हुआ, अतः कथितपद या पुनरुक्त है। 'स्मरनरपतिलक्ष्मी' पाठ ठीक है ]। ६. पतत्प्रकर्षरूप [वाक्यदोषका उदाहरण ] जैसे -- क्योंकि आज सिंहनीके स्नेहके प्रेमानन्दमें सिंह एक स्थानमें बँध गया है, इसलिए [ उसके अभावमें निश्शङ्क होकर ] कौन-कौन-सा घुर्घुर शब्द करनेवाली नाकके कारण भयड्गर सुअर कहाँ नहीं घुर्राता है, कौन कौन हाथी किस कमलोंके तालाबको कमलोंसे रहित करनेको तैयार नहीं हो गया है और कौन-कौनसे जङ्गली भैंसे किन वनोंका उन्मूलन न कर देंगे ।२२५॥ यहाँ पहिले तीन चरणोंमें वर्णोंकी रचनामें जैसे कठोरता पायी जाती है, उस प्रकारकी रचना चतुर्थ चरणमें नहीं पायी जाती, इसलिए यहाँ पतत्प्रकर्ष दोष हो गया है।
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का० ५४-५५, सू० ७४ ] सप्तम उल्लास: ३११
(१०) समाप्तपुनरात्तं यथा -- क्रेङ्कारः स्मरकार्मुकस्य सुरतक्रीडापिकीनां रवो झङ्कारो रतिमञ्जरीमधुलिहां लीलाचकोरीध्वनिः । तन्व्या: कञ्चुलिकापसारणभुजाक्षेपस्खलत्कङ्कण- क्वाण: प्रेम तनोतु वो नववयोलास्याय वेणुस्वनः ॥२२६॥ (११) द्वितीयार्धगतैकवाचकशेषप्रथमार्द्ध यथा -- मसृणचरणपातं गम्यतां भू: सदर्भा विरचय सिचयान्तं मू्ध्नि घर्म: कठोरः। तदिति जनकपुत्री लोचनैरश्रुपूणैः पथि पथिकवधूभिर्वीक्षिता शिक्षिता च ।।२२७।।
१०. समाप्तपुनरात्तत्व [दोषका उदाहरण ] जैसे -- अपने घरोंको जाते हुए पर्थिकोंके प्रति किसी कविका वचन है कि घर पहुँच कर नायिकासे मिलनेके समय ] कृशाङ्गीकी चोली खोलनेके लिए [आपके प्रयत्न करनेपर लज्जावश उसे रोकने के लिए नायिकाका जो भुजाक्षेप ] हाथ चलानेसे हिलते हुए कङ्कणोंका शब्द जो कामदेवके धनुषका टङ्गार, या सुरतक्रीडारूप कोकिलोंकी कूक या रतिरूप मञ्जरीके भौरोंकी झड्गार, अथवा लीलारूप चकोरीकी ध्वनि, अथवा नवयुवकोंको नचानेके लिए बाँसुरीकी ध्वनि है, वह [तुम दोनोंके ] नवयौवनके ] [उद्दाम ] नृत्यके लिए तुम लोगोंके प्रेमको [खूब] बढ़ावे ॥२२६।। यहाँ श्लोकके प्रथम तथा द्वितीय चरणमें 'क्वाणः' पदके विशेषण दिये गये हैं। चतुर्थ चरणमें 'क्वाण: प्रेम तनोतु वो' इस मुख्य वाक्यके बाद समाप्त हुई विशेषणपरम्परामें 'नववयोलास्याय वेणुस्वनः' कहकर एक और विशेषणका प्रतिपादन कर दिया गया है। इसलिए यह समाप्तपुनरात्तत्व दोषका उदाहरण है। ११. जहाँ प्रथमार्द्धका [केवल ] एक पद उत्तरार्द्धमें [ कथनके लिए ] शेष रह जाता है, [उसको 'अर्धान्तरैकपदता' कहा जाता है। उसका उदाहरण ] जैसे -- राजशेखरकृत 'बालरामायण' नाटकमें रामचन्द्रके साथ सीताको भी वनवासके लिए छोड़ आनेपर उसका समाचार सुमन्त्र दशरथसे कह रहे हैं कि -- [वन जाते समय ] रास्तेमें राहगीरोंकी [साथ चलनेवाली ] स्त्रियोंने आँखोंमें आँसू भरकर जनकराजपुत्री [सीता]को देखा और समझाया कि दर्भोंसे भरी भूमिपर हलके-हलके पैर रखकर चलो, धूप तेज हो रही है [ इसलिए ] साड़ीका पल्ला सिरपर डाल लो ॥२२७। यहाँ तृतीय चरणके आदिमें आया हुआ 'तत्' शब्द पूर्वार्द्धका भाग है। धूप तेज है, इसलिए सिरपर पल्ला डाल लो, इस प्रकार हेतुरूप इस 'तत्' पदका पूर्वार्द्धमें प्रयोग होना चाहिये था। परन्तु केवल इस एक पदका उत्तरार्द्धमें प्रयोग किया गया है, इसलिए यह 'अर्द्धा्तिरंकपदता' रूप वाक्य-दोषका उदाहरण है।
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३१२ काव्यप्रकाश: [ का० ५४-५५, सू० ७४
अभवन्मतः [इष्टः ] योगः [सम्बन्धः ]यत्र तत्। यथा- येषां तास्त्रिदशेभदानसरितः पीताः प्रतापोष्मभि- र्लीलापानभुवश्च नन्दनवनच्छायासु यैः कल्पिताः । येषां हुंकृतयः कृतामरपतिक्षोभाः क्षपाचारिणां किन्तैस्त्वत्परितोषकारि विहितं किञ्चित्प्रवादोचितम् ॥।२२८।। अत्र 'गुणानां च परार्थत्वादसम्वन्धः समत्वात्स्यात्' इत्युक्तनयेन यच्छब्दनिर्देश्या- नामर्थानां परस्परमसमन्वयेन यैरित्यत्र विशेष्यस्याप्रतीतिरिति। 'क्षपाचारिभिः' इति पाठे युज्यते समन्वयः । यथा वा- त्वमेवंसौन्दर्या स च रुचिरतायाः परिचितः । कलानां सीमानं परमिह युवामेव भजथः अपि द्वन्द्वं दिष्टया तदिति सुभगे संवदति वां अतः शेषं यत्स्याज्जितमिह तदानीं गुणितया ।।२२९।।
१२. [वाक्य ]में अभिमत अर्थात् इष्ट सम्बन्ध विद्यमान न हो [ उसको अभवन्मत दोष कहा जाता है। उसका उदाहरण ] जैसे -- जिन [राक्षसों]के प्रतापानलोंने देवताओंके हाथी [ऐरावत]की वे प्रसिद्ध मदकी धाराएँ सुखा डालीं, जिन्होंने नन्दनवनकी छायामें [ जगह-जगह अपने ] मद्यपानकी भूमियोंकी रचना कर डाली और जिन राक्षसोंकी हुङ्कारें देवराजको भी कम्पित कर देती थीं, क्या उन [राक्षसों]ने अपनी प्रसिद्धि [प्रवाद] के अनुरूप तुम्हारे लिए सन्तोषदायक कुछ [कार्य ] किया।२२८॥ यहाँ [अप्रधान विशेषणरूप ] 'गौण [पदों ]के परार्थ [प्रधान या विशेष्य] के लिए होनेके कारण और [परस्पर ] समानरूप होनेसे [दो गौण पदोंका परस्पर ] सम्बन्ध नहीं होता है' इस पूर्वमीमांसाके तृतीयाध्यायके प्रथमपादके २२वें सूत्रमें प्रतिपादित ] सिद्धान्तके अनुसार [ लोकमें ] 'यत्' शब्द ['येषा' और 'यैः' पदों]से निर्दिष्ट अर्थोंका परस्पर समन्वय न होनेसे 'यैः' इस पदमें विशेष्यकी प्रतीति नहीं होती है। [इसलिए अभिमत विशेषण-विशेष्य-भाव सम्बन्धके न बननेसे यहाँ 'अभवन्सतसम्बन्ध' नामक वाक्यदोष माना जाता है। 'क्षपाचारिणां के स्थानपर ] 'क्षपाचारिभिः' ऐसा पाठ कर देनेपर [विशेष्य भागके आ जानेसे ] समन्वय बन जाता है। अथवा [अभवन्मतसम्बन्ध दोषका दूसरा उदाहरण ] जैसे -- तुम इतनी सौन्दर्यशालिनी हो और वह सुन्दरताके लिए प्रसिद्ध है, तुम दोनों ही कलाओंकी चरम सीमाको पहुँचे हुए हो। तुम दोनोंकी जोड़ी भी सौभाग्यसे मिल रही है, इसलिए आगे [ समागम आदि ] जो [कुछ कार्य ] शेष रह गया है, यदि वह भी [पूरा ] हो जाय तो यह गुणवत्ताकी [बड़ी] विजय हो ॥२२६॥
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का० ५४-५५, सू० ७४] सप्तम उल्लास: ३१३
अत्र यदित्यत्र तदिति, तदानीमित्यत्र यदेति वचनं नास्ति। चेत्स्यादिति युक्तः पाठः ।
यथा वा- संग्रामाङ्गणमागतेन भवता चापे समारोपिते देवाकर्णय येन येन सहसा यद्यत्समासादितम् । कोदण्डेन शरा: शरैररिशिरस्तेनापि भूमण्डलं तेन त्वं भवता च कीतिरतुला कीर्त्या च लोकत्रयम् ।।२३०।। अत्राकर्णनत्रियाकर्मत्वे कोदण्डं शरानित्यादि वाक्यार्थस्य कर्मत्वे कोदण्डः शरा इति प्राप्तम्। न च यच्छब्दार्थस्तद्विशेषणं वा कोदण्डादि। न च केन केनेत्यादिप्रश्नः ।
यहाँ [चतुर्थ चरणमें 'यत्' तथा 'तदानीं' पदोंका प्रयोग किया गया है, परन्तु उनमेंसे] 'यत्' इसके साथ 'तत्' इसका और 'तदानीं' इसके साथ 'यदा'का कथन नहीं किया गया है। [इसलिए उनका उद्देश्य-विधेयभावरूप सम्बन्ध नहीं बना है, अतः अभवन्मतसम्बन्धरूप दोष है। इसलिए 'यत्'के स्थानपर ] 'चेत्स्यात्' यह पाठ उचित है। अथवा [अभवन्मतसम्बन्धका तीसरा उदाहरण ] जैसे -- हे राजन् ! युद्धभूमिमें आनेपर और आपके धनुष चढ़ानेपर जिस-जिसने सहसा जो-जो प्राप्त किया, सो सुनिये। धनुषने बाणोंको, बाणोंने शत्रुओंके सिरको, उस [शत्रु ]के सिरने भूमण्डलको, उस [भूमण्डल ] ने [राजारूपमें ] आपको, आपने [शत्रुओंके विजय द्वारा ] अतुल कीत्तिको और कीर्तिने [सारे लोकोंमें व्याप्त होकर ] तीनों लोकोंको [प्राप्त किया]॥२३०। यहाँ 'आकर्णय' क्रिया [के साथ कर्मरूपसे अभिमतसम्बन्ध किसी प्रकार नहीं बनता है। क्योंकि कोदण्ड, शर आदि पदोंको उस]का कर्म माननेपर [उनमें द्वितीया विभक्तिका प्रयोग होकर ]'कोदण्डं', 'शरान्' इत्यादि [प्रयोग होना चाहिये ] और वाक्यार्थको कर्म माननेपर [ यो यो वीरः समायातस्तं तं शृण, भीष्मो, द्रोणो, कृपः, कर्णः, सोमदत्तिः, धनञ्जयः इत्यादिके अनुसार परस्पर अनन्वित शुद्ध प्राति- पादिकार्थमात्रमें प्रथमा होनेसे ] 'कोदण्डः', 'शराः' यह प्राप्त होता है। [यदि यह कहा जाय कि 'यत्' शब्द बुद्धिस्थका परामर्शक होता है और बुद्धिस्थ कोदण्ड आदि पदार्थ ही हैं इसलिए 'यत्समासादितं तदाक- कर्णय' इस रूपमें यत्-पदार्थका क्रियाके साथ अन्वय होनेसे और यत् शब्दसे बुद्धिस्थ कोदण्डादि पदार्थोंका ग्रहण किये जानेसे उत्तरार्धवाक्यका पूर्वार्द्धके साथ अभिमतसम्बन्ध बन सकता है, तो इसके निराकरणके लिए कहते हैं कि ] और कोदण्ड आदि न 'यत्' शब्दके अर्थ हैं, न विशेषण इसलिए [ इस रूपमें भी पूर्वार्द्ध तथा उत्तरार्धका सम्बन्ध नहीं बन सकता है। इन दोनों भागोंके अभिमतसम्बन्धके बननेका एक मार्ग यह हो सकता था कि पूर्वार्धमें 'केन केन कि कि' ऐसा प्रश्न होता तो 'कोदण्डेन शराः' आदि उत्तरवाक्यका सम्बन्ध हो सकता था] परन्तु 'केन-केन' किस-किसने [क्या-क्या प्राप्त किया ] इत्यादि प्रश्न नहीं है [इसलिए पूर्वार्ध और उत्तरार्धका सम्बन्ध होनेका कोई मार्ग नहीं निकलता है। अतः यहाँ अभवन्मत- सम्बन्ध नामक वाक्यदोष है]।
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यथा वा-चापाचार्यस्त्रिपुरविजयी ।।२३१।। इत्यादौ भार्गवस्य निन्दायां तात्पर्यम् । 'कृतवता' इति परशौ सा प्रतीयते। 'कृतवतः' इति तु पाठे मतयोगो भवति। यथा वा- चत्वारो वयमृत्विजः स भगवान् कर्मोपदेष्टा हरि: संग्रामाध्वरदीक्षितो नरपतिः पत्नी गृहीतव्रता । कौरव्या: पशवः प्रियापरिभक्लेशोपशान्तिः फलं Iराजन्योपनिमन्त्रणाय रसति स्फीतं हतो दुन्दुभिः ॥२३२॥ अत्राध्वरशब्दः समासे गुणीभूत इति न तदर्थ: सर्वैः संयुज्यते। यथा वा- जङ्डाकाण्डोरुनालो नखकिरणलसत्केसरालीकराल: प्रत्यग्रालक्तकाभाप्रसरकिसलयो मञ्जुमञ्जीरभृङ्गः । भतुर्नृत्तानुकारे जयति निजतनस्वच्छलावण्यवापी- सम्भूताम्भोजशोभां विदधदभिनवो दण्डपादो भवान्याः ।।२३३।
अथवा [इसी अभवन्मतदोषका चौथा उदाहरण ] जैसे -- 'चापाचार्यस्त्रिपुरविजयी' इत्यादि। 'श्लोकका अर्थ उदाहरण सं० २०२ में दिया जा चुका है) ।।२३१।। इत्यादिमें परशुरामकी निन्दामें तात्पर्य है। [परन्तु 'परशुना' इस पदके विशेषणरूप ] 'कृतवता' इस [तृतीयान्त ] पदसे वह [निन्दा ] परशुमें प्रतीत होती है [ इसलिए अभिमतसम्बन्ध नहीं बन रहा है। हाँ, यदि 'कृतवता' इस तृतीयान्त पदके स्थानपर 'तव'के साथ अन्वित होनेवाले षष्ठचन्त] 'कृतवतः' इस प्रकारका पाठ होनेपर [निन्दाका परशुरामके साथ ] अभिमतसम्बन्ध बन जाता है। अथवा [इसी अभवन्मतका पाँचवाँ उदाहरण] जैसे -- ['वेणीसंहार' नाटकके प्रथम अङगमें रणदुन्दुभिकी आवाज सुनकर 'प्रिये रणयज्ञः प्रवर्तते' यह कहकर उस यज्ञका उपपादन करनेके लिए भीम कह रहे हैं कि इस रणयज्ञमें ] हम चारों [भाई] ऋत्विक् हैं, कर्तव्यका उपदेश करनेवाले वे श्रीकृष्ण भगवान् [ब्रह्मा ] हैं। संग्रामयज्ञकी दीक्षा लिये हुए राजा [युधिष्ठिर] यजमान हैं। और [उनकी ] पत्नी [द्रौपदी ] व्रतचारिणी [यजमानपत्नी ] है। कुरुवंशके [दुर्योधन आदि उस यज्ञमें मारे जानेवाले ] पशु हैं। प्रिया [द्रौपदी ]के अपमानजन्य क्लेशकी शान्ति [उस यज्ञका ] फल है, [और उस यज्ञमें ] राजसमुदायको निमन्त्रित करनेके लिए बजाया गया यह दुन्दुभि जोरका शब्द कर रहा है ।२३२। यहाँ 'अध्वर' शब्द [संग्रामाध्वरदीक्षितः इस ] समासमें गुणीभूत [हो गया ] है, इसलिए उसका अर्थ [ऋत्विक् आदि] सबके साथ अन्वित नहीं हो सकता। इसलिए यहाँ अभवन्मतसम्बन्ध दोष है। अथवा इसी [अभवन्मतसम्बन्धका छठा उदाहरण] जैसे-'जङ्गाकाण्डोरुनालो' इत्यादि श्लोक उदाहरण-संख्या १५० पर भी उद्धृत हो चुका है, वहाँसे इसका अर्थ देखें।
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का० ५४-५५, सू० ७४] सप्तम उल्लास: ३१५
अत्र दण्डपादगता निजतनुः प्रतीयते भवान्याः सम्बन्धिनी तु विवक्षिता । (१३) अवश्यवक्तव्यमनुक्तं यत्र यथा- अप्रा कृतस्य चरितातिशयैश्च दृष्टैरत्यद्भुतैरपहृतस्य तथापि नास्था। कोऽप्येष वीरशिशुकाकृतिरप्रमेयसौन्दर्यसारसमुदायमयः पदार्थः ॥२३४॥ अत्र 'अपहृतोऽस्मि' इत्यपहृतत्वस्य विधिर्वाच्यः । 'तथापि' इत्यस्य द्वितीय- वाक्यगतत्वेनैवोपपत्तेः ।
इस [श्लोक ]में 'निजतनुः' [पद ] दण्डपादसे अन्वित प्रतीत होता है। परन्तु भवानीके साथ उसका सम्बन्ध विवक्षित है [ इसलिए यहाँ भी अभवन्मतसम्बन्धरूप दोष विद्यमान है]।
१३. वाच्यस्यानभिधानं दोष अवश्य कहने योग्य शब्दको जहाँ न कहा जाय [वह वाच्यका अनभिधान नामक वाक्यदोष होता है] जैसे -- अनन्यसामान्य [रामचन्द्र अथवा मुझ विदग्ध] के देखे हुए [और चकारसे सुने हुएका भी ग्रहण करना चाहिये ] अद्भुत चरित्रके उत्कर्षसे वशीभूत होनेपर भी [ यह शिवका धनुष इस रामचन्द्रने ही तोड़ा है, इस बातपर [विश्वास ही नहीं होता है। वस्तुतः यह [सामने दिखलायी देनेवाला रामचन्द्र ] कोई [अनिर्वचनीय ] वीर बालककी आकृतिका और अपरिमेय सौन्दर्यसारसे बना हुआ पदार्थ है ।।२३४।। यहाँ 'तथापि' इस पदके द्वितीय वाक्यगतरूपसे ही उपपन्न होनेसे [ प्रथम वाक्यको अलग करनेके लिए] 'अपहृतोऽस्मि' इस रूपमें अपहृतत्वकी विधिका कथन करना चाहिये। इसका अभिप्राय यह है कि यहाँ वाक्यकी रचना इस प्रकार होनी चाहिये थी कि 'यद्यपि चरितातिशयैरपहृतोऽस्मि तथाऽपि नास्था' लोकोत्तर चरित्रको देखकर मैं मोहित हो गया हूँ, तथापि यह विश्वास नहीं होता है कि यह धनुष रामचन्द्रने ही तोड़ा है। उत्तरवाक्यमें 'तथापि' शब्दका प्रयोग होनेसे पूर्ववाक्यमें 'यद्यपि' पदका प्रयोग तो अनिवार्य नहीं है, परन्तु तथापि शब्दका प्रयोग द्वितीय वाक्यमें ही किया जा सकता है, इसलिए प्रथम वाक्यकी स्थिति तो अलग होनी ही चाहिये। उसको अलग करनेके लिए 'अपहृतस्य' इस षष्ठ्यन्त पदके स्थानपर 'अपहृतोऽस्मि' इस प्रकारका वाच्य स्यानभिधानं' नामक वाक्यदोष हो गया है। इसके पूर्व 'न्यूनपदता' दोष कह आये हैं उसमें और 'अवश्य वक्तव्यके अनभिधान' रूप इस दोषमें यह अन्तर है कि वाचक पदका प्रयोग न होनेपर 'न्यूनपदता' दोष हो जाता है और वाचक पदसे भिन्न 'द्योतक' 'अपि' आदि अथवा विभक्ति आदिका प्रयोग न होनेपर यह दोष होता है। यह भी दो प्रकारका होता है, एक द्योतक विभक्ति अगदिका अन्यथा अभिधानके कारण और दूसरा द्योतक श्रपि आदिके कथित न होनेके कारण। उनमेंसे यह प्रथमा विभक्तिके स्थानपर षष्ठी विभक्ति कर दी जानेसे अन्यथाभिधानका उदाहरण है। 'महावीरचरित' नाटकके द्वितीय अङ्गमें रामके द्वारा किये गये धनुर्भङ्ग- को देखकर परशुरामकी यह स्वगत उक्ति है।
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३१६ काव्यप्रकाश: का० ५४-५५, सू० ७४
यथा वा- एषोऽहमद्रितनयामुखपद्मजन्मा प्राप्तः सुरामुग्मनोर्थदूरबर्ती।
अत्र 'मनोरथानामपि दूरवर्त्ती' इत्यप्यर्थो वाच्यः । यथा वा- त्वयि निवद्धरतेः प्रियवादिनः प्रणयभङ्गपराङमुखचेतसः । कमपराधलव मम पश्यसि त्यजसि मानिनि ! दासजनं यतः ॥२३६।। अत्र 'अपराधस्य लवमपि' इति वाच्यम् । (१४) अस्थानस्थपद यथा - प्रियेण संग्रथ्य विपक्षसन्निधावुपाहितां वक्षसि पीवरस्तने। स्रजं न काचिद्विजहौ जलाविलां वसन्ति हि प्रेम्णि गुणा न वस्तुपु ।२३७।
अथवा [इसी अवश्यवक्तव्यके अनभिधानका दूसरा उदाहरण ] जैसे- अवश्यवाच्य विभक्तिके अन्यथाप्रयोगका उदाहरण ऊपरके श्लोकके रूपमें दिया था। आगे इसी दोषके दो उदाहरण और देते हैं। इनमेंसे एक समासगत, दूसरा असभासगत है। इनमेंसे पहला उदाहरण 'उषाहरण' नाटकसे लिया गया है। 'महाभारत'के अन्तर्गत हरिवंशमें आयी हुई कथाके आधारपर 'उषाहरण' नाटककी रचना हुई है। एक बार समस्त-कलाओंमें निपुण सुर, असुर, राक्षस, गन्धर्व आदिकी कन्याएँ शिव-पार्वतीके समीप नृत्य आदि कर रही थीं। उस समय वाणासुरकी उपा नाम्नी कन्याकी प्रवीणतासे सन्तुष्ट होकर पार्वतीने उसको वरदान दिया कि इतने समयके बाद रातमें तुम्हारे योग्य पति तुम्हारे पास आवेगा। इस वरदानके प्रभावसे उचित समय त्ानेपर उपाका श्रीकृष्णके पुत्र अनिरुद्धके साथ रात्रिमें समागम हुआ्र। समागमके बाद वरदान शरीर धारण कर उषाकी सखी चित्नलेखासे कह रहा है कि- देवताओं और राक्षसोंके मनोरथोंसे दूर रहनेवाला और पार्वतीके मुखकमलसे उत्पन्न हुआ यह मैं असुरराज [बाणासुर]की कन्या [उषा] को स्वप्नमें [ श्रीकृष्णके पुत्र ] अनिरुद्धके साथ समागम द्वारा उसके अपूर्व सौन्दर्यका फल प्राप्त कराकर [उसके व्यभिचार आदि शङ्गा निवारणके लिए तुम्हारे पास] आया हूँ।।२३५॥ यहाँ मनोरथोंके भी दूरवर्ती यह 'अपि' अर्थ अवश्य कहना चाहिये था। अथवा [इसी 'वाच्यस्यानभिधानं' का तीसरा उदाहरण ] जैसे- हे मानिनि ! तुम्हारे प्रति अनुराग स्थिर रखनेवाले, प्रियवादी और प्रेमका भङ्ग होनेसे डरनेवाले मेरे किस तुच्छसे [भी] अपराधको तुम देख रही हो, जिससे [नाराज होकर अपने दयनीय] इस सेवकको छोड़ रही हो ? ॥।२३६।। यहाँ [ 'कमपराधलवं'के स्थानपर ] 'अपराधस्य लवमपि', अपराधका लवलेश भी यह कहना चाहिये था [उसके अभावमें दोष हो गया है]। १४. अस्थानस्थपदता दोष अस्थानस्थ [पद] का उदाहरण जैसे-
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का० ५४-५५, सू० ७४] सप्तम उल्लास: ३१७
अत्र 'काचिन्न विजहौ' इति वाच्यस् यथा वा- लग्न: केलिकचग्रहश्लथजटालम्बेन निद्रान्तरे मुद्राङ्क: शितिकन्धरेन्दुशकलेनान्तःकपोलस्थलम् । पार्वत्या नखलक्ष्मशङ्ङितसखीमर्मस्मित ह्रीतया प्रोन्मृष्ट: करपल्लवेन कुटिलाताम्रच्छविः पातु वः ॥२३८।। अत्र 'नखलक्ष्म' इत्यतः पूर्व 'कुटिलाता म्र०' इति वाच्यम्। (१५) अस्थानस्थसमासम् । यथा -- अद्यापि स्तनशैलदुर्गविषमे सीमन्तिनीनां हृदि स्थातुं वाञ्छति मान एष धिगिति कोधादिवालोहितः । प्रोद्यद्दूरतरप्रसारितकर: कर्षत्यसौ तत्क्षणात् फुल्लत्केरवकोशनिःसरदलिश्रेणीकृपाणं शशी ।।२३९।
[विपक्ष अर्थात् ] सपत्नीके सामने प्रियतमके द्वारा [स्वयं ] गूंथकर स्थूलस्तनवाले वक्षःस्थलपर पहनायी गयी मालाको जलसे [भींग जानेके कारण ] खराब हो जानेपर भी किसी स्त्रीने नहीं उतारा। क्योंकि गुण तो प्रेममें रहते हैं, वस्तुमें नहीं ॥२३७॥ पहाँ 'काचिन्न विजहौ' इस प्रकार [काचित्के बाद न का प्रयोग करके ] कहना चाहिये। [काचित्के पूर्व न का प्रयोग कर देनेसे अस्थानस्थपदता दोष हो गया है। अथवा [इसी अस्थानस्थपदताका दूसरा उदाहरण] जैसे -- सुरत-कीड़ाके समय कचग्रहणके कारण खुल जानेवाली जटाओंके सहारे लटके हुए नीलकण्ठ [शिवजी ]के चन्द्रमाके टुकड़ेसे [ पार्वतीजीके, उसके ऊपर मुख रखकर सो जानेके कारण ] उत्पन्न सोते समय गालके बीचमें टेढ़ा और लाल रङ्ग [कुटिलाताम्रच्छविः ] का बना हुआ [चिह्न जिसको देखकर] नखक्षत समझनेवाली सखीके मुसकराने [नर्म-स्मित]से लजायी हुई पार्वतीके द्वारा अपने करपल्लवसे मिटाया हुआ चिह्न तुम्हारी रक्षा करे ॥२३८॥ यहाँ 'कुटिलाताम्रच्छविः' को 'नखलक्ष्म' इस [विशेष्य पद ]के पहिले कहना चाहिये [इसके भिन्न स्थानपर रखनेसे अस्थानस्थपदता दोष हो गया है]। १५. अस्थानस्थसमासता दोष अस्थानस्थसमास [दोष ] का उदाहरण। जैसे- [मेरा उदय हो जानेके बाद भी ] स्तनरूप पर्वतोंके कारण दुर्गम, स्त्रियोंके हृदय [रूप सुरक्षित स्थानमें छिपकर ] यह मान बैठना चाहता है, यह बड़ी बुरी बात है। इससे मानो क्रोधके कारण लाल- लाल चन्द्रमा दूरतक हाथ [किरणों]को फैलाकर तुरन्त ही खिले हुए कैरवोंके भीतरसे निकलती हुई भ्रमरपंक्तिरूप कृपाणको [कोश] म्यानसे खींच रहा है।२३६।।
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३१८ काव्यप्रकाश: [का० ५४-५५, सू० ७४
अत्र कुद्धस्योक्तौ समासो न कृतः । कवेरुक्तौ तु कृतः ॥॥ सङ्कीर्णम्। यत्र वाक्यान्तरस्य पदानि वाक्यान्तरमनुप्रविशन्ति। यथा- किमिति न पश्यसि कोपं पादगतं वहुगुणं गृहाणेमम् । ननु मुञ्च हृदयनाथं कण्ठे मनसस्तमोरूपम् ॥२४०॥ अत्र 'पादगतं बहुगुणं हृदयनाथं किमिति न पश्यसि इमं कण्ठे गृहाण मनसस्त- मोरूपं कोपं मुञ्च' इति। एकवाक्यतायां तु क्लिष्टमिति भेदः । (१६) गभितं यत्र वाक्यस्य मध्ये वाक्यान्तरमनुप्रविशति। यथा परापकारनिरतैर्दुर्जनैः सह सङ्गतिः । वदामि भवतस्तत्त्वं न विधेया कदाचन ।।२४१।। अत्र तृतीयपादो वाक्यान्तरमध्ये प्रविष्टः ।
यहाँ कुद्ध [चन्द्रमा]को उक्तिमें [ प्रथम दो चरणोंमें ] समास नहीं किया है। और [अन्तिम चरण ] कविकी उक्तिमें किया है। [अतः अस्थानस्थसमासका उदाहरण है]। १६. सङ्गीर्णता दोष जहाँ एक वाक्यके पद दूसरे वाक्यमें घुस जाते हैं। जैसे -- [किसी मानिनी स्त्रीसे उसकी सखी कह रही है कि ] पैरोंपर पड़े हुए, अत्यन्त गुणवान्, अपने इस प्राणनाथको तुम क्यों नहीं देखती हो। मनके तमोरूप मानको छोड़ो और इनको उठाओ ॥२४०॥ यहाँ १. पैरोंपर पड़े हुए अत्यन्त गुणवान् प्राणनाथको क्यों नहीं देखती हो [ यह प्रथम वाक्य है]; २. इनको गले लगाओ [ यह दूसरा वाक्य है] और ३. मनके अन्धकाररूप मानको छोड़ो [यह तीसरा वाक्य है] परन्तु उन तीनोंके पदोंको एक-दूसरे वाक्यके भीतर घुसेड़ [देनेसे सड्गीर्णत्व दोष है]। एक वाक्य होनेपर क्लिष्टत्व [दोष] होता है। यह सङ्गीर्णत्व तथा क्लिष्टत्व दोषोंका ] भेद है। इसमें 'पादगतं बहुगुणं हृदयनाथं किमिति न पश्यसि' यह पहिला वाक्य है, किन्तु उसका 'हृदयनाथं' पद तीसरे वाक्यमें चला गया है और तीसरे वाक्यका 'कोपं' पद प्रथमवाक्यमें आ गया है। इसी प्रकार 'इमं कण्ठे गृहाण' यह दूसरा वाक्य है। इसका 'कण्ठे' पद तीसरे वाक्यमें चला गया है। 'मनसस्तमोरूप कोपं मुञ्च' यह तीसरा वाक्य है। प्रथम वाक्यका हृदयनाथं' पद तथा द्वितीय वाक्यका 'कण्ठे' पद इसमें आ गये हैं। १७. गभितता दोष गभितता [दोष उसको कहते हैं] जहाँ एक वाक्यके भीतर दूसरा वाक्य प्रविष्ट हो जाता है। जैसे -- मैं तुमसे तत्त्वकी यथार्थ बात कहता हूँ कि दूसरेके अपकार [करने]में लगे हुए दुष्ट पुरुषोंके साथ कभी सङ्गति नहीं करनी चाहिये ।।२४१।। यहाँ तीसरा चरण [जो कि अलग वाक्य है] दूसरे वाक्यमें प्रविष्ट हो गया है [ इसलिए यह गभितत्व दोष है।।
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यथा वा- लग्नं रागावृताङ्गया सुदृढमिह ययैवासियष्टचारिकण्ठे मातङ्गानामपीहोपरि परपुरुषैर्या च दृष्टा पतन्ती। तत्सक्तोऽयं न किंचिद् गणयति विदितं तेऽस्तु तेनास्मि दत्ता भृत्येभ्यः श्रीनियोगाद् गदितुमिव गतेत्यम्बुधि यस्य कीर्तिः ।।२४२।। अत्र 'विदितं तेऽस्तु' इत्येतत्कृतम्। प्रत्युत लक्ष्मीस्ततोऽपसरतीति विरुद्धमतिकृत्।
अथवा [इसी गभितत्वका दूसरा उदाहरण ] जैसे -- किसी राजाकी स्तुति करते हुए उसकी कीति समुद्रतक फैल गयी है, इस बातमें उत्प्रेक्षा अल- द्वारका प्रयोग कर कवि उसे इस रूपसे कह रहा है कि उस राजाकी युद्धप्रियता और उदारता आदिको देखकर राजाकी पत्नी लक्ष्मीने अपने पिता समुद्रके पास शिकायत करनेके लिए कीर्त्िको दूती बनाकर भेजा है और उससे यह सन्देश अपने पिताके पास भिजवाया है कि यह तो मेरी सौत [असियष्टि] तलवार- पर रीझ रहा है, मुझको तो पूछता ही नहीं बल्कि मुझे [अरथात् लक्ष्मीको] तो भोग करनेके लिए अपने भृत्योंको दे दिया है। इस शिकायतके साथ उसने अपनी सौत तलवारकी दुश्चरिद्रताका भी सुन्दर चित्र इस प्रकार खींचा है कि-
जो [मेरी सौत ] असियष्टि [तलवार ] अनुरागसे परिपूर्ण [दूसरे पक्षमें शत्रुओंके रक्तसे रँगी हुई ] शत्रुओंके गलेमें चिपट [लग] जाती है, जिसको अन्य लोगोंने [किसी भले आदमीके साथ नहीं, अपितु मातङ्ग अर्थात् ] चाण्डालों [दूसरे पक्षमें मातङ्गका अर्थ हाथियों]के ऊपर गिरतै हुए [विपरीत रतिके लिए उद्यत ] देखा है उस [दुराचारिणी सौत ] तलवारपर रीझा हुआ यह [आपका जामाता और मेरा पति] कुछ नहीं सोचता-समझता है और उसने [ उदारतावश] मुझ [लक्ष्मी]को अपने सेवकोंको [उसका यथेष्ट भोग करनेके लिए ] सौंप दिया है। यह भी आप [मेरे पिता]को विदित हो। [राजाकी पत्नी ] लक्ष्मीकी आज्ञासे मानो यह कहनेके लिए जिसकी कीति [उसकी पत्नी लक्ष्मीके पिता] समुद्रके पास गयी है।४२२।। यहाँ यह 'विदितं तेऽस्तु' [ वाक्य दूसरे वाक्यके अन्तर्गत] कर दिया है। [अतः गभितत्व दोष होता है। इसके अतिरिक्त ] लक्ष्मी उसको छोड़ [तलाक दे ] रही है इस विरुद्ध बुद्धिकी भी प्रतीति [होने ]से विरुद्धमतिकृत् [नामक दूसरा दोष ] भी [इसमें पाया जाता ] है।
१८. प्रसिद्धिविरुद्धता दोष
इस प्रकार गर्भितत्व दोषका निरूपण करनेके बाद 'प्रसिद्धिविरुद्धता' दोषका निरूपण करते हैं। कवियोंके यहाँ कुछ विशेष शब्दों तथा अरथोंका विशेषरूपमें ही वर्णन करनेका नियम या परम्परा चली आ रही है। उसको 'कविसमय' या 'कविप्रसिद्धि' कहा जाता है। इस कविसमय या कवि- प्रसिद्धिका उल्लङ्घन होनेपर 'प्रसिद्धिविरुद्धता' दोष होता है। उसको दिखलानेके लिए कविसमयगत कुछ शब्दोंके विशेष प्रयोग का विधान पहिले दिखलाकर फिर उनके अन्यथाप्रयोगके कारण प्रसिद्धि-विरुद्धता दोषका उदाहरण देंगे।
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(१८) मञ्जीरादिषु रणितप्रायं पक्षिषु च कूजितप्रभृति। स्तनितमणितादि सुरते मेघादिषु गर्जितप्रमुखम् ।। इति प्रसिद्धिमतिकान्तम् । यथा -- महाप्रलयमा रुतक्षुभितपुष्करावर्त्तक- प्रचण्डघनगर्जितप्रतिरुतानुकारी मुहुः । रव: श्रवणभैरवः स्थगितरोदसीकन्दरः कुतोऽद्य समरोदधेरयमभूतपूर्वः पुरः ॥२४३॥ अत्र रवो मण्डूकादिषु प्रसिद्धो न तूक्तविशेषे सिहनादे। (१९) भग्नः प्रकम: प्रस्तावो यत्र। यथा -- नाथे निशाया नियतेनियोगादस्तङ्गते हन्त निशाऽपि याता। कुलाङ्गनानां हि दशानुरूपं नातः परं भद्रतरं समस्ति ॥२४४॥ अत्र 'गता' इति प्रकान्ते 'याता' इति प्रकृतेः । 'गता निशाऽपि' इति तु युक्तम् ।
मञ्जीर आदि [के शब्दका कथन करने]में रणित आदि जैसे [शब्दोंका ], पक्षियों [के शब्द]में कूजित आदि, सुरतमें स्तनित, मणित आदि तथा मेघ आदि [के शब्द]में गरजित आदि [का प्रयोग करना चाहिये ]। इस प्रकारकी प्रसिद्धिका अतिकमण करनेवाला [प्रसिद्धिविरुद्धता दोष होता है]। जैसे -- महाप्रलयकी वायुसे क्षुभित [चतुर्दश प्रकारके ] पुष्करावर्तक आदि नामोंसे प्रसिद्ध ] भयङ्गर मेघोंके गर्जनकी प्रतिध्वनिके सदृश सुननेमें भयङ्गर लगनेवाला [अथवा कानोंको भयप्रद ] आकाश और पृथिवीको भर देनेवाला यह समरसागरसे अत्पन्न अपूर्व शब्द सामनेसे क्यों [या कहाँसे] आ रहा है॥२४३। यहाँ 'रव' शब्द मेढक आदि [के शब्द]में प्रसिद्ध है, न कि उक्त प्रकारके विशिष्ट सिंहनाद [के अर्थ]में। [इसलिए यहाँ प्रसिद्धिविरुद्धता दोष है]।
१९. भग्नप्रकमता दोष
जहाँ प्रकरण [प्रस्ताव]का भङ्ग हो जाता है [ उसको भग्नप्रकमता दोष कहा जाता है [ जैसे- दैववश रात्रिके पति [चन्द्रमा ]के अस्त हो जानेपर रात्रि भी चले [विनष्ट हो ] गयी, यह दुःखकी बात है। [किन्तु कुलाङ्गनाओंके लिए [पतिकी मृत्युरूप इस ] दशाके योग्य इससे अधिक अच्छी और कोई बात सम्भव नहीं है॥२४४।।
यहाँ 'गता' इस [गम धातुके प्रयोगके ] प्रकरणमें [ या धातुसे बने] 'याता' [का प्रयोग ] प्रकृति [मूलधातु ]की [भग्नप्रकमतारूप दोष है]। [उसके स्थानपर] 'गता निशाऽपि' [यह ] कहना उचित है।
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का० ५४-५५, सू० ७४ ] सप्तम उल्लास: ३२१
ननु 'नैकं पदं द्विः प्रयोज्यं प्रायेग' इत्यन्यत्र, 'कथितपदं दुष्टम्' इति चेहैवोक्तम्, तत्कथ- मेकस्य पदस् द्विः प्रयोगः ? उच्यते। उद्देश्यप्रतिनिर्देश्यव्यतिरिक्तो विषय एकपदप्रयोग- निषेधस्प।तद्वति विजये प्रत्युव तस्यैत्र पदस्य सर्वनाम्नो वा प्रयोगं विना दोषः। तथा हि-
उदेति सविता ताम्रस्ताम्र एवास्तमेति च।जाए हारी सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता ।२४५।।F
अ अत्र 'रक्त एवास्तमेति' इति यदि क्रियेत तदा पदान्तरप्रतिपादितः सएवार्थोऽर्था- न्तरतयेव प्रतिभासमान: प्रतीति स्थगयति। SE FU BIFTE यथा वा- मार्र
इस प्रकार भग्नप्रक्रमता दोषको बचानेके लिए ग्रन्थकारने दोनों जगह 'गता' इस एक ही पदका प्रयोग किये जानेका सुझाव दिया है। इस विपयमें यह शङ्का उत्पन्न होती है कि यदि दोनों जगह एक ही पदका प्रयोग किया जायगा, तो फिर पुनरुक्ति दोप हो जायगा, जिसे यहाँ ग्रन्थकारने भी वर्जित किया है अन्योंने भी उसको निषिद्ध माना है। तब यहाँ उसी पदके दो बारके प्रयोगका सुझाव कैसे दे रहे हैं ? इस प्रश्नका उत्तर ग्रन्थकारने यह दिया है कि एक पदके दो बार प्रयोगका निषेध उद्देश्य-प्रतिनिर्देश्यभावसे भिन्न स्थलमें ही लागू होता है। जहाँ उद्देश्य-प्रतिनिर्देश्यभाव होता है, वहाँ तो नियमतः उसी शब्दका प्रयोग होना चाहिये। अन्यथा प्रतिनिर्देश्य अर्थको अन्य पर्यायवाचक शब्दसे कहनेपर अर्थकी प्रतीति उतने सुन्दररूपसे नहीं होती है। इस बातको ग्रन्थकार उदाहरणों द्वारा आगे स्पष्ट करेंगे। प्रश्न-'एक पदका प्रायः दो बार प्रयोग नहीं करना चाहिये'। यह अन्यत्न [वामनने अपने 'काव्यालङ्गारसूत्रवृत्ति' ग्रन्थके प्रथमाध्यायके पञ्चमाधिकरणमें ] और 'कथितपद [पुनरुक्त ] दोष होता है' यह यहाँ '[ काव्यप्रकाश' में आपने स्वयं ही ] कहा है। तब [ 'गता' इस ] एक ही पदका दो बार प्रयोग कैसे हो सकता है ? उत्तर -- कहते हैं-एक पदके दो बार प्रयोगके निषेधका विषय उद्देश्य-प्रतिनिर्देश्यभावसे भिन्न स्थल ही होता है। [तद्वति] उस [ उद्देश्य-प्रतिनिर्देश्य भाव ] से युक्त स्थलमें तो बल्कि उसी पद या सर्वनामका प्रयोग न करनेपर दोष हो जाता है। जैसे कि -- सूर्य लाल ही उदित होता है और अस्त होते समय भी लाल ही अस्त होता है। महापुरुषोंका सम्पत्ति तथा विपत्ति दोनोंमें एक-सा रूप रहता है॥२४५॥ यहाँ [उद्देश्यस्थलमें और प्रतिनिर्देश्यस्थलमें दोनों जगह एक ही 'ताम्र' इस विशेषणका प्रयोग किया है। यदि इस एक पदके प्रयोगके स्थानपर प्रतिनिर्देश्यस्थलमें 'ताम्र' पदके पर्यायवाचक 'रक्त' शब्दका प्रयोग करके ] 'रक्त एवास्तमेति च' ऐसा कर दिया जाय तो [ 'रक्त' रूप ] अन्य पदसे प्रतिपादित वही [ताम्रत्वरूप ] अर्थ भिन्न अर्थके समान प्रतीत होता है और [सम्पत्ति-विपत्ति दोनोंमें एकरूपताकी] प्रतीतिमें बाधा उत्पन्न करता है [ इसलिए दोष हो जाता है]। अथवा [भग्नप्रक्रमताका प्रत्ययगत दूसरा उदाहरण ] जैसे-[ 'किरातार्जुनीय के तृतीय सर्गमें अर्जुनके प्रति द्रौपदीकी उक्ति है कि]- २१
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३२२ काव्यप्रकाश: [का० ५४-५५, सू० ७४
यशोऽधिगन्तुं सुखलिप्सया वा मनुष्यसङ्यामतिवत्तितुं वा। निरुत्सुकानामभियोगभाजां समुत्सुकेवाङ्कमुपैति सिद्धिः ।२४६।। अत्र प्रत्ययस्य । 'सुखमीहितु वा' इति युक्तः पाठः । ते हिमालयमामन्त्र्य पुनः प्रेक्ष्य च शूलिनम् । सिद्धं चास्मै निवेद्यार्थं तद्विसृष्टाः खमुद्ययुः ॥२४७॥ अत्र सर्वनाम्नः । 'अनेन विसृष्टाः' इति वाच्यम्। ceT महीभृतः पुत्रवतोऽपि दृष्टिस्तस्मिन्नपत्ये न जगाम तृप्तिम्। अनन्तपुष्पस्य मधोहि चूते द्विरेफमाला सविशेषसङ्गा ॥२४८॥ अत्र पर्यायस्य। 'महीभृतोऽपत्यवतोऽपि' इति युक्तम्। अत्र सत्यपि पुत्रे कन्यारूपेS- प्यपत्ये स्नेहोऽभूदिति केचित्समर्थयन्ते। विपदोऽभिभवन्त्यविक्रमं रहयत्यापदुपेतमायतिः । नियता लघुता निरायतेरगरीयान्न पदं नृपश्रियः ॥२४९॥
यश प्राप्त करनेके लिए, अथवा सुखको पानेके लिए, अथवा साधारण जनोंकी गणनाका उल्लङ्डन करनेके लिए प्रयत्नशील पुरुषोंकी [लक्ष्मी प्राप्त करनेकी ] इच्छा न होनेपर भी [स्वयं] ही उत्सुक हुई-सी लक्ष्मी उनकी गोदमें आ जाती है ॥२४६॥ यहाँ प्रत्यय [की भग्नप्रकमता है। 'सुखलिप्सया'के स्थानपर ] 'सुखमीहितुं वा' यह [ 'अधि- गन्तुं']के समान [तुमुन् प्रत्ययान्त ] पाठ उचित है। इस प्रकार प्रकृतिगत और प्रत्ययगत भग्नप्रक्मताको दिखलाकर आगे ३. सर्वनाम, ४. पर्याय, ५. उपसर्ग, ६. वचन, ७. कारक तथा 5. क्रमकी भग्नप्रक्मताके भी उदाहरण क्रमशः देते हैं- वे [मरीचि आदि सप्तर्षिगण ] हिमालयसे बिदा माँग और शिवसे फिर मिलकर तथा उनको कार्यसिद्धि [पार्वतीके विवाहकी स्वीकृतिकी सूचना देकर उन [शिवजी] की आज्ञा प्राप्त कर आकाशको चले गये ।२४७।। यहाँ ['तद्विसृष्टाः' में तत् इस ] सर्वनामकी [भग्नप्रकमता है, उसके स्थानपर ] 'अनेन विसृष्टाः' यह कहना चाहिये। [मैनाक नामक पुत्रके पूर्व विद्यमान होनेके कारण ] पुत्रवान् होनेपर भी पर्वतराज हिमालयकी [दृष्टि स्नेहातिशयके कारण ] उस [पार्वती ] सन्तानको देखकर तृप्तिको प्राप्त नहीं करती थी [स्नेहाति- शयके कारण अतृप्त ही बनी रही]। जैसे वसन्तके अनेक पुष्पोंके होनेपर भी भ्रमरश्रेणी आम्र-मञ्जरीमें ही विशेषरूपसे आसक्त रहती है॥२४८॥ यहाँ पर्यायकी [भग्नप्रकरमता है]। [ 'महीभृतः पुत्रवतः'के स्थानपर] 'महीभृतोऽपत्यवतोऽपि' यह पाठ युक्त है [ अर्थात् दोनों जगह अपत्य पाठ होनेसे भग्नप्रक्रमता नहीं रहती है]। कुछ लोग पुत्रके होनेपर भी कन्यारूप सन्तानमें हिमालयका विशेष स्नेह था, ऐसा विवक्षित अर्थ मानकर [पुत्रवतः इसी प्रयोगका ] समर्थन करते हैं। हा पराक्रमहीन पुरुषको विपत्तियाँ घेर लेती हैं। विपत्तिग्रस्त पुरुषका भविष्य उसका साथ छोड़ देता है [ अन्धकारमय हो जाता है]। जिसका भविष्य अन्धकारमय है, उसकी [वर्तमान कालमें भी]
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का० ५४-५५, सू० ७४] सप्तम उल्लास: ३२३
अत्रोपसर्गस्य पर्यायस्य च। 'तदभिभवः कुरुते निरायतिम्। लघुतां भजते निराय- तिर्लघुतावान्न पदं नृपश्रियः ॥' इति युक्तम् । का 151 काचित्कीर्णा रजोभिदिवमनुविदधौ मन्दवक्त्रेन्दुलक्ष्मी- रश्रीका: काश्चिदन्तर्दिश इव दधिरे दाहमुद्भ्रान्तसत्त्वाः। भ्रेमुर्वात्या इवान्याः प्रतिपदमपरा भूमिवत्कम्पमानाः प्रस्थाने पार्थिवानामशिवमिति पुरो भावि नार्यः शशंसुः ॥२५०॥ अत्र वचनस्य। 'काश्चित् कीर्णा रजोभिरदिवमनुविदधुर्मन्दवक्त्रेन्दुशोभा निःश्रीकाः' इति 'कम्पमानाः' इत्यत्र 'कम्पमापुः' इति च पठनीयम् ।
लघुता [हीनत्वभावना ] निश्चित है और गौरवसे हीन व्यक्ति [कभी ] राजश्रीका अधिकारी नहीं हो सकता है॥२४६॥ F यहाँ [विपद् तथा आपद् शब्दोंमें जुड़े हुए ] उपसर्गकी और [अगरीयान, इस ] पर्यायकी [भग्न- प्रकरमता है]। यहाँ 'तदभिभवः कुरुते निरायतिम्।'[ ऐसा पाठ कर देनेसे 'आपदुपेतं' शब्दके कारण होनेवाला भग्नप्रकम दोष नहीं रहता है। इसी प्रकार उत्तरार्धमें लघुता तथा 'अगरीयान्'के प्रयोगसे जो भग्नप्रक्रमता दोष होता है, वह] 'लघुतां भजते निरायतिः लघुतावान्न पदं नृपश्रियः' [ऐसा कर देनेपर नहीं रहता है]। अतः यह युक्त पाठ है। अगला श्लोक 'माघकाव्य' के पञ्चदश सर्गसे लिया गया है। शिशुपालपक्षीय राजाओंके युद्धके लिए तैयार होकर घरसे निकलते समय उनकी स्त्रियोंकी भावी अमङ्गलसूचक चेष्टाओंका इसमें वर्णन है। श्लोकके प्रारम्भमें 'काचित्' इस एक वचनका बादमें 'काश्चित् दधिरे', 'काश्चित् भ्रेमुः' आदि बहुवचनोंका प्रयोग हुआ है। इसीलिए यह वचनकृत भग्नप्रकमता दोषका उदाहरण है। अर्थ निम्नलिखितप्रकार है- कोई [स्त्री रजोभिः अर्थात् आर्तव या ] मासिक धर्मसे व्याप्त अर्थात् रजस्वला होनेके कारण मन्दकान्तिवाले मुखचन्द्रके द्वारा [धूलिसे आच्छादित अतः मन्दकान्तिवाले चन्द्रमासे युक्त ] आकाशका अनुकरण कर रही थी। [कुछ टीकाकारोंने 'कीर्णा रजोभिः'की नायिकापक्षमें यह व्याख्या की है कि भूमिपर लोटनेके कारण धूलिसे व्याप्त। परन्तु भूमिपर लोटनेका अभी कोई अवसर न होनेसे यह व्याख्या सङ्गत नहीं है]। शोभाविहीन और घबड़ाये हुए चित्तवाली कोई [नायिकाएँ दिग्दाहके समय घबड़ाये हुए सत्त्वों अर्थात् प्राणियोंसे युक्त ] दिशाओंके समान अन्तः अर्थात् हृदयमें सन्तापको धारण कर रही थीं, अन्य नायिकाएँ वायुचकरके समान चक्कर काट रही थीं और दूसरी [ अन्य कुछ नायिकाएँ] पग- पगपर [भूकम्पके समय ] भूमिके समान काँप रही थीं। इस प्रकार [शिशुपालपक्षीय ] राजाओंके [युद्धके निमित्त सजकर] चलते समय आगे होनेवाले अनिष्टको स्त्रियोंने पहले ही सूचित कर दिया ॥२५०। यह वचनकी [भग्नप्रकरमता ] है। [जिसको दूर करनेके लिए प्रथम चरणमें भी बहुवचनका प्रयोग करके] 'काश्चित्कीर्णा रजोभिदिवमनुविदधुर्मन्दवक्त्रेन्दुशोभाः', 'निःश्रीकाः' इस प्रकार और 'कम्पमानाः' के स्थानपर 'कम्पमापुः' यह पाठ होना चाहिये। कारककृत भग्नप्रक्मताके उदाहरणरूपमें अगला श्लोक कालिदासके 'शकुन्तला' नाट कके द्वितीय
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३२४ काव्यप्रकाश: [का० ५४-५५, सू० ७४
आग होन गाहन्तां महिषा निपानसलिलं शृंगैर्महुस्ताडितं छायाबद्धकदम्बकं मृगकुलं रोमन्थमभ्यस्यताम् ।B स। विश्रब्धैः क्रियतां वराहपतिभिर्मुस्ताक्षतिः पल्वले विश्रान्ति लभतामिदं च शिथिलज्यावन्धमस्मद्वनुः ।२५१।।
अत्र कारकस्य। 'विश्रब्धा रचयत्तु शूकरवरा मुस्ताक्षतिम्' इत्यदुष्टम् ।
पकाह अकलिततपस्तेजोवीर्यप्रथिम्नि यशोनिधा- ववितथमदाध्माते रोषान्मुनावभिगच्छति।िलह गण की अभिनवधनुविद्यादर्पक्षमाय च कर्मणे स्फुरति रभसात्पाणिः पादोपसङग्रहणाय च ।।२५२।। अत्र कमस्य। 'पादोपसङ्ग्रहणाय' इति पूर्व वाच्यम्। एवमन्यदप्यनुसर्त्तव्यम्।
अङ्डसे उद्धृत किया गया है। शकुन्तलाको देखकर मृगया आदि अन्य किसी कार्यमें मन न लगनेसे राजा दुष्यन्त आज मृगयाका कार्यक्रम शिथिल करनेकी सूचना देते हुए सेनापतिसे यह श्लोक कह रहे हैं। इसके प्रथम और द्वितीय चरणमें 'महिषाः' और 'मृगकुलं' ये कर्तृवाचक पद प्रथमा विभक्तिमें प्रयुक्त हुए हैं, परन्तु तीसरे चरणमें 'वराहपतिभिः' यह कर्त्तामें तृतीया विभक्तिका प्रयोग किया गया है, इसलिए यह कारकंकृत भग्नप्रकमताका उदाहरण है। [आज शिकारका भय न होनेसे निश्चिन्त होकर ] मैंसे [मक्खियाँ उड़ानेके लिए] सींगोंसे बार- बार ताड़ित किये जाते हुए तालाबोंके जलमें अवगाहन करें, [वनवृक्षोंकी ] छायामें झुण्ड बनाकर [बैठा हुआ] मृगोंका समूह जुगाली [ रोमन्थ ] करे, वराहपति निश्चिन्त होकर पोखरेके किनारे होनेवाले] नागरमोथाको खोदकर खायें एवं शिथिल प्रत्यञचावाला हमारा यह धनुष भी आज विश्राम करे ॥२५१॥ यहाँ कारककी [भग्नप्रकमता है। उसे दूर करनेके लिए] 'बिश्रब्धा रचयन्तु शूकरवरा मुस्ता- क्षति' यह निर्दोष [पाठ] है। ग्रन्थकारने 'विश्रब्धा रचयन्तु शूकरवराः' इस निर्दुष्ट पाठका सुझाव दिया है। इस पाठसे कर्त्ता- कारकमें प्रथमा विभक्ति आ जानेसे पूर्वदोषका तो निवारण हो जाता है, परन्तु 'गाहन्ताम् अभ्यस्यताम्' आदि पूर्वक्रियाओंको देखते हुए 'रचयन्तु' क्रियाके भेदके कारण दूसरी भग्नकमता आा जाती है। 'महावीरचरित' नाटकके द्वितीय अङ्गमें धनुष तोड़नेके बाद कुद्ध हुए परशुरामको आाता हुआ देखकर रामचन्द्रजी कह रहे हैं कि- अपरिमित तप और तेजके प्रभावसे महिमान्वित यशोनिधि और यथार्थ [वस्तुतः शोभा देनेवाले] दर्पसे भरे मुनि [परशुराम ]के क्रोधपूर्वक आनेपर अभिनव [अभी सीखी हुई या अलौकिक ] धनुविद्याके योग्य [युद्ध अथवा बाणके आकर्षण रूप ] कर्मके लिए और साथ ही [श्रद्धावश ] पैरोंको पकड़ने [पैर छूने] के लिए हाथ जल्दीसे फड़क रहा है ।२५२। यहाँ करमकी [भग्नप्रकरमता ] है। पैरोंके छूनेकी बात पहिले कहनी चाहिये। इसी प्रकार [भग्नप्रकरमता ] के अन्य उदाहरण भी समझ लेने चाहिये।
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का० ५४-५५, सू० ७४] सप्तम उल्लास: ३२५
(२०) अविद्यमानः कमो यत्र। यथा- (1१) द्वयं गतं सम्प्रति शोचनीयतां समागम प्रार्थनया कपालिनः । कला च सा कान्तिमती कलावतस्त्वमस्य लोकस्य च नेत्रकौमुदी ॥२५३॥ अत्र त्वंशन्दानन्तरं चकारो युक्तः। यथा वा- शक्तिनिस्त्रिंशजेयं तव भुजयुगले नाथ! दोषाकरश्री-] र्वक्त्रे पार्श्वे तथैषा प्रतिवसति महाकुट्टनी खङ्गयष्टिः । आज्ञेयं सर्वगा ते विलसति च पुरः कि मया वृद्धया ते प्रोच्येवेत्थं प्रकोपाच्छशिकरसितया यस्य कीर्त्या प्रयातम् ॥२५४। अत्र 'इत्थं प्रोच्येव' इति वाच्यम्। तथा -- 'लग्नं रागावृताङ्गया' [२४२] इत्यादौ 'इति श्रीनियोगात्' इति वाच्यम् ।
यहाँतक भग्नप्रक्मता दोषके उदाहरण दिये गये हैं; अब इसके बाद 'अक्रमता' नामक बीसवें वाक्यदोषका निरूपण करते हैं। प्रारम्भमें जिस कमसे या जिस शैलीसे रचना प्रारम्भ की गयी है उस क्रमको छोड़कर बीचमें शैलीको बदल देनेपर 'भग्नप्रक्मता' दोष होता है; जिसके बाद जिम पदको रखना चाहिये उस पदको न रखनेपर 'अक्रमता' दोष होता है। २०. जहाँ क्रम विद्यमान न हो [उसको अकरमता दोष कहा जाता है] जैसे -- 'द्वयं गतं' आदि [श्लोकका अर्थ उदाहरण सं० २२६ पर दिया जा चुका है। वहाँसे ही देखना चाहिये] ।।२५३। इसमें 'त्वं' शब्दके बाद चकार [का प्रयोग ] उचित है। अथवा जैसे- हे नाथ ! आपकी बाहुओंमें तलवारसे उत्पन्न हुई शक्ति [पक्षान्तरमें निस्त्रिंश -- तीससे भी अधिक आदमियोंसे सम्बन्ध रहखनेवाली व्यभिचारिणी स्त्रीसे उत्पन्न यह शक्ति नामक वेश्यापुत्री तुम्हारी बाहुओंमें जकड़ी हुई तुम्हारा आलिङ्गन कर रही] है, दोषोंकी खान यह लक्ष्मी आपके मुखमें [चुम्बन प्राप्त कर रही है। पक्षान्तरमें दोषाकर चन्द्रमाका सौन्दर्य आपके मुखमण्डलपर विराज रहा है] और यह महाकुट्टिनी [अत्यन्त दुश्चरित्रा, पक्षान्व्ररमें बड़ा आघात पहुँचानेवाली ] खङ्गयष्टि आपके पासमें रहती है। आपकी यह आज्ञा [नामक प्रेमिका ] सबके पास पहुँचनेवाली [व्यभिचारिणी होने पर भी ] तुम्हारे सामने विलास करती है। ऐसी दशामें इस बूढ़ी [ पक्षान्तरमें वृद्धिको प्राप्त, दूर-दूरतक फैली हुई ] मुझ [कीति ] से आपको क्या प्रयोजन है। मानों यह कहकर चन्द्रकिरणोंके समान उज्ज्वल जिस राजाकी कीति क्रोधसे चल दी [पक्षान्तरमें सब जगह फैल गयी] ।।२५४।। इसमें ['प्रोच्येवेत्थं'के स्थानपर ] 'इत्थं प्रोच्येव' यह [पाठ ] होना उचित है। और [उदाहरण सं० २४२ 'लग्नं रागावृताङ्गया' इत्यादिमें 'इति श्रीनियोगात्' यह कहना चाहिये था [ इतिका प्रयोग कविने नहीं किया है]। कहुा को [एकीर) सितावा रिल्मी सकफा।
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३२६ काव्यप्रकाश: [का० ५५-५७, सू० ७५
(२१) अमतः प्रकृतविरुद्धः परार्थो यत्र। यथा- (oद) राममन्मथशरण ताडिता दुःसहेन हृदये निशाचरी। lgpci गन्धवद्रुधिरचन्दनोक्षिता जीवितेशवसत जगाम सा।।॥ अत्र प्रकृते रसे विरुद्धस्य शृङ्गारस्य व्यञ्जकोऽपरोऽर्थः।कF अर्थदोषानाह- [सू० ७५ ] अर्थोडपुष्ट: कष्टो व्याहतपुनरुक्तदुष्कमग्राम्या:।।५५। सन्दिग्धो निर्हेतुः प्रसिद्धिविद्याविरुद्धश्च। अनवीकृतः सनियमानियमविशेषाविशेषपरिवृत्ताः ॥५६।। साकाङक्षोऽपदयुक्तः सहचरभिन्नः प्रकाशितविरुद्धः। विध्यनुवादायुक्तस्त्यक्तपुनःस्वीकृतोऽश्लील: ।।५७।। दुष्ट इति सम्वध्यते। क्रमेणोदाहरणम् -- ( १ ) अतिविततगगनसरणिपरिमुक्तविश्रमानन्दः । मरुदुल्लासितसौरभकमलाकरहासकृद्रविर्जयति ।२५६।। २१. जहाँ दूसरा अर्थ अमत अर्थात् प्रकृत अर्थके विपरीत हो [ उसको अमतपरार्थता दोष कहते हैं] जैसे- वह [ताड़का नामक ] राक्षसी कामदेवके सदृश सुन्दर रामचन्द्र [दूसरे पक्षमें रामरूप कामदेव ]के बाणसे हृदयस्थलमें आहत होकर दुर्गन्धयुक्त [दूसरे पक्षमें सुगन्धयुक्त लालचन्दन ] रक्तरूप चन्दनसे लिप्त होकर यमपुरी [जीवितेश यम। दूसरे पक्षमें अभिसारिकाके रूपमें प्राणनाथकी पुरी ] को चली गयी ॥२५५। यहाँ प्रकृत [बीभत्स ] रसमें विपरीत शृङ्गाररसका व्यञ्जक दूसरा [अभिसारिकापरक ] अर्थ है [अतः अमतपरार्थता दोष है]। शिह ह इस प्रकार सबसे पहिले पद, पदांश तथा वाक्य तीनोंमें रहनेवाले १६ दोषों और वाक्यमें रहनेवाले २१ दोषोंके निरूपणके बाद २३ अर्थदोषोंका निरूपण आरम्भ करते हैं। अर्थदोषोंको कहते हैं -- १. अपुष्ट [अर्थ ], २. कष्ट, ३. व्याहत, ४. पुनरुक्त, ५. दुष्कम, ६. ग्राम्य, ७. सन्दिग्ध, ८. निर्हेतु, ६. प्रसिद्धिविरुद्ध, १०. विद्याविरुद्ध, ११. अनवीकत, १२. नियममें अनियम, १३. अनियममें नियम, १४. विशेषमें अविशेष और १५. अविशेषमें विशेषरूप परिवृत्त, १६. साकाङक्षता, १७. अपदयुक्तता, १८. सहचरभिन्नता, १६. प्रकाशितविरुद्धता, २०.विध्ययुक्तत्व, २१. अनुवादायु- क्तत्व, २२. त्यक्त पुनः स्वीकृत और २३. अश्लील [अर्थ दुष्ट होता है] ।५२-५७।। 10980 [यह २३ प्रकारका अर्थ ] दुष्ट होता है यह [ पीछेसे अनुवृत्ति द्वारा या आक्षेप द्वारा ] सम्बद्ध होता है। कमशः [उन सबके उदाहरण ] आगे देते हैं, जैसे -- १. अत्यन्त विस्तीर्ण गगन-मार्गमें [प्रतिक्षण ] चलते रहनेके कारण विश्रामसुखका परित्याग
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का० ५५-५७, सू० ७५] सप्तम उल्लास: ३२७ अत्रातिविततत्वादयोऽनुपादानेऽपि प्रतिपाद्यमानमर्थ न वाधन्त इत्यपुष्टाः, न त्वसङ्गताः पुनरुक्ता वा।
(२) सदा मध्ये यासामियममृतनिस्यन्दसुरसा सरस्वत्युद्दामा वहति वहुमार्गा परिमलम्। प्रसादं ता एता घनपरिचिता: केन महतां महाकाव्यव्योम्नि स्फुरितमधुरा यान्तु रुचयः ॥२५७॥
कर देनेवाले और वायुके द्वारा जिसका सौरभ प्रसारित किया जा रहा है, इस प्रकारके कमलसमुदायको विकसित करनेवाले सूर्य सर्वोत्कर्षशाली हैं ॥२५६॥ यहाँ अतिवितत आदि [आकाशके विशेषणों ] का ग्रहण यदि न किया जाय तो भी प्रतीत होनेवाले अर्थमें कोई बाधा नहीं होती है। इसलिए [ अतिविततत्वादि विशेषणोंका उपयोग न होनेसे वे ] अपुष्टार्थ हैं। असङ्गत अथवा पुनरुक्त नहीं हैं।
२. [कष्टार्थदोषका उदाहरण देते हैं। आकाशके समान [विस्तीर्ण ] महाकाव्यमें अत्यन्त परिचित [सदैव महाकाव्योंका अनुशीलन करनेवाले ] महानुभावोंको काव्यरसका आस्वादन करानेवाली [स्फुरितमधुराः ] जिन रुचियोंमें अमृत [सदृश काव्यरस ]के प्रवाहसे सुरस और [ 'वकोक्तिजीवितके अनुसार विचित्र, मध्यम तथा सुकुमाररूप तीन ] अनेक मागोंसे प्रवाहित होनेवाली यह उद्दाम सरस्वती [नदीके समान कवि-भारती] काव्यसौरभका अनुभव कराती रहती है [ काव्यमर्मज्ञ सहृदय महानुभावोंकी ] वे रुचियाँ [काव्यके अतिरिक्त अन्य] किस (साधन) से आनन्दलाभ कर सकती हैं ? [अर्थात् काव्यम्मंज्ञ और निरन्तर काव्योंका अनुशीलन करनेवाले सहृदयोंको काव्यानुशीलनसे अधिक आनन्द कहीं प्राप्त नहीं हो सकता है]। [श्लोकका दूसरा अर्थ इस प्रकार है] महाकाव्यके सदृश [अनन्त वैचित्यपूर्ण तथा आह्लाददायक ] आकाशमें [बहुत ऊँचे उड़नेवाले ] मेघोंके समीप रहनेवाली [ घनपरिचिता: ] मधुर कोमल प्रकाश देनेवाली नक्षत्रमण्डलकी [महतां ] वे [ प्रसिद्ध मनोरम ] कान्तियाँ जिनके बीच अमृतके प्रवाहसे आह्लाददायिनी और अप्रतिहत गतिवाली [उद्दामा ] बहुमार्गा, अनेक मागोंसे प्रवाहित होनेवाली यह [त्रिपथगा सरस्वती] आकाशगङ्गा सुन्दर प्रकाशधारा [परिमल] को प्रवाहित करती है वे [रात्रिकालीन नक्षत्रमण्डलकी कान्तियाँ ] अन्य किस साधनसे अधिक सौन्दर्य [प्रसाद ] को प्राप्त कर सकती हैं [ अर्थात् रात्रिके समय आकाशमें खिले हुए तारोंके बीच निकलती हुई आकाशगङ्गाकी धारासे उस नक्षत्रमण्डलकी जो अपूर्व शोभा हो जाती है, वह सौन्दर्य उसको अन्य किसी प्रकारसे प्राप्त नहीं हो सकता है। इसी प्रकार काव्यानुशीलनपरायण सहृदय महानुभावोंको काव्यामृतरसको प्रवाहित करनेवाली महाकवियोंकी बहु- मार्गा सरस्वतीसे जो आनन्द प्राप्त होता है, वैसा आनन्द किसी साधनसे प्राप्त नहीं हो सकता है] ।।२ ५७।
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३२८ काव्यप्रकाशः [का० ५५-५७, भू० ७५ 5 अत्र यासां कविरुचीनां मध्ये सुकुमा रविचित्रमध्यमात्मकत्रिमार्गा भारती चमत्कारं वहतिता: गम्भीरकाव्यपरिचिता: कथमितरकाव्यवत्प्रसन्ना भवन्तु।यासामादित्यप्रभाणां मध्ये त्रिपथगा वहति ताः मेघपरिचिताः कथ प्रसन्ना भवन्तीति संक्षेपार्थः । (३ ) जगति जयिनस्ते ते भावा नवेन्दुकलादयः प्रकृतिमधुराः सन्त्येवान्ये मनो मदयन्ति ये। मम तु यदियं याता लोके विलोचनचन्द्रिका नयनविषयं जन्मन्येकः स एव महोत्सवः ।।२५८।। TR
ग्रन्थकारने कष्टार्थदोषके रूपमें इस श्लोकको उद्धृत किया है, सो सचमुच ही यह श्लोक बड़ा ही क्लिष्ट है। इसका अर्थ बड़ी कठिनतासे समझमें आता है। प्राचीन टीकाकारोंने 'घनपरिचिताः' मेघोंसे आच्छादित 'महतां' द्वादश आदित्योंकी 'रुचयः' प्रभा किस प्रकार स्वच्छ हो सकती है, इस प्रकारकी दूसरी व्याख्या की है। परन्तु यह व्याख्या नितान्त असङ्गत है। प्रतीयमान अरथका प्रस्तुत अर्थके साथ सामान्यतः उपमानोपमेयभाव सम्बन्ध होता है। मेघाच्छन्न सूर्यको कान्त्रिवाले अर्थका प्रकृत अर्थके साथ उपमानोपमेयभाव सम्बन्ध नहीं हो सकता है। अतः यह अरथ सङ्गत नहीं हो सकता है। उसकी अपेक्षा रात्रिमें खिली हुई नक्षत्रमालावाला अर्थ अधिक सुन्दर है। उसके बीच त्रिपथगा आकाशगङ्गा प्रवाहित हो रही है। वही उस नक्षत्रमालाको सौन्दर्य प्रदान करती है। 'घनपरिचिताः'का अर्थ मेघोंसे आच्छादित नहीं, अपितु यत्र तत्न ऊँचे शरत्कालीन श्वेत बादलोंसे युक्त अथवा अत्यन्त परि- चित प्रतिदिन दिखलायी देनेवाली, बहुशः अनुभूत आदि अर्थ हो सकते हैं। इस अर्थका प्रस्तुत अर्थके साथ उपमानोपमेयभाव सम्बन्ध भी वन सकता है। अतः यही इसका दूसरे पक्षमें सुसङ्गत अर्थ है। जिन कविरुचियोंके मध्यमें [ 'वकरोक्ति जीवित'के निर्माता कुन्तक द्वारा प्रतिपादित ] सुकुमार, विचित्र तथा मध्यमरूप तीनों मागोंमें चलनेवाली भारती चमत्कारको उत्पन्न करती है। गम्भीर काव्योंसे परिचित वे साधारण काव्यके समान सुबोध [प्रसन्न ] कैसे हो सकती हैं। [यह प्रकृत पक्ष में अर्थ है। दूसरे पक्षमें ] जिन आदित्य-प्रभाओंके मध्यमें त्रिपथगा आकाशगङ्गा बहती है वे मेघोंसे आच्छादित होनेपर कैसे स्वच्छ हो सकती हैं। यह संक्षेपसे [इस श्लोकका ] अर्थ है। इन दोनों ही पक्षोंमें की गयी यह व्याख्या कम रुचिकर प्रतीत होती है। श्लोक कष्टत्वदोषका उदाहरण है, इसलिए वृत्तिकारने उसका पूरा अर्थ न देकर संक्षेपार्थसे ही काम चलाया है। टीका- कारोंने जो इस वृत्तिभागकी व्याख्या की है, वह और भी अधिक क्लिष्ट हो गयी है। कष्टत्वदोषका उदाहरण देनेके बाद तीसरे अर्थदोष व्याहतत्वका उदाहरण आगे देते हैं -- ३. [यह श्लोक 'मालतीमाधव' के प्रथम अङ्डसे लिया गया है। माधव कह रहा है कि- ] नवीन चन्द्रमाकी कला आदि वे [ प्रसिद्ध] पदार्थ संसारमें [ अन्य लोगोंके लिए बहुत सुन्दर ] सर्वोत्कर्षयुक्त [भले ही हों। और जो अन्य पदार्थ भी [ साधारण लोगोंके ] मनको आह्लादित करते हैं वे भी स्वभावतः सुन्दर हैं ही [ नहीं तो वे लोगोंको मोहित कैसे कर लेते हैं। परन्तु मेरे लिए उनमें कोई आकर्षण नहीं है ] मेरे लिए तो संसारमें जो यह [मालतीरूप ] नेत्रोंकी चाँदनी (चाँदनीके समान नेत्रोंको आनन्ददायक ] दिखलायी पड़ी है वही इस जीवनमें एकमात्र सबसे बड़ा आनन्द है॥२५८॥
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का० ५५-५७, सू० ७५] सप्तम उल्लास: ३२६
अत्रेन्दुकलादयो यं प्रति पस्पशप्रायाः स एवं चन्द्रिकात्वमुत्कर्षार्थमारोपयतीति व्याहतत्वम्। (४क) कृतमनुमतमित्यादि ॥२५९॥ अत्र अर्जुन अर्जुनेति, भर्वन्दिरिति चोक्ते सभीमकिरीटिनामिति किरीटिपदार्थः पुनरुक्तः । यथा वा- (४ख) अस्त्रज्वालावलीढ प्रतिवलजलधेरन्तरौर्वायमाणे। सेनानाथे स्थितेऽस्मिन्मम पितररि गुरौ सर्बधन्वीश्वराणाम्। कर्णाऽलं सम्भ्रमेण व्रज कृप ! समरं मुञ्च हार्दिक्य शङ्कां ताते चापद्वितीये वहति रणधुर को भयस्यावकाशः ॥२६०॥ अत्र चतुर्थपादवाक्यार्थः पुनरुक्तः । (५) भूपालरत्न ! निर्देन्यप्रदानप्रथितोत्सव । विश्राणय तुरङ्ग में मातङ्ग वा मदालसम् ।।२६१॥ अत्र मातङ्गस्य प्राङनिर्देशो युक्तः।
यहाँ जिस [माधव ]ने [ पूर्वार्द्धमें ] चन्द्रकला आदिकी व्यर्थता [रवणित की ] है वह ही [अपनी प्रियतमा मालतीमें ] उत्कर्ष [दिखलाने ] के लिए चन्द्रिकात्वका आरोप कर रहा है, यह बात परस्पर विरुद्ध है, [अतः इसमें व्याहतार्थत्व दोष है]। ४. पुनरुक्तत्व [अर्थदोष ] (४क) 'कृतमनुसतं' इत्यादि [उदाहरण सं० ३६ पर पहिले आ चुका है] ॥।२५६। यहाँ [श्लोककी अवतरणिकामें उसके पहिले ] अर्जुन ! अर्जुन ! और 'भर्वा्द्गि:' यह कह चुकनेके बाद 'सभीमकिरीटिनां' में [अर्जुनके वाचक] 'किरीटि' पदका अर्थ पुनरुक्त [हो गया] है। [अतः यह पुनरुक्तरूप अर्थदोषका उदाहरण है]। अथवा जैसे- (४ख) अस्त्रोंकी ज्वालाओंसे व्याप्त शत्रुसेनाके लिए बडवानलके समान [विशोषक या विनाशक ] सारे धनुर्धारियोंके गुरु, मेरे पिता [द्रोणाचार्य ]के सेनापति रहते हुए हे कर्ण ! डरनेकी आवश्यकता नहीं है, हे कृपाचार्य, [आप निर्भय होकर ] युद्धमें जाओ और हे कृतवर्मन् [हादिक्य अर्थात् कृतवर्मा ], शङ्गा [भय] का त्याग कर दो, पिताजी [अर्थात् द्रोणाचार्य ] के धनुष हाथमें लेकर युद्धका सञ्चालन करनेपर भयका कौन-सा अवसर है ? ॥२६०। इसमें चतुर्थ पादका अर्थ पुनरुक्त है। ५. दुष्कमत्व [अर्थदोष ] (५) दैन्याभावको प्रदान करनेके लिए प्रसिद्ध [प्रथितोत्सव ] हे नृपशिरोमणे ! मुझे घोड़ा अथवा मदमाता हाथी प्रदान कीजिये ॥२६१।। यहाँ हाथीका निर्देश पहिले करना चाहिये था।
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३३० काव्यप्रकाश: [ का० ५५-५७, सू० ७५
लोल (६) स्वपिति यावदयं निकटे जनः स्वपिमि तावदहं किमपैति ते। तदयि ! साम्प्रतमाहर कूर्पर त्वरितमूरुमुदञ्चय कुन्चितम् ।२६२। एषोऽविदग्धः । (७) 'मात्सर्यमुत्सार्य' इत्यादि ॥२६३॥ अत्र प्रकरणाद्यभावे सन्देहः शान्तशृङ्गार्यन्यतराभिधाने निश्चयः । (८) गृहीतं येनासी: परिभवभयान्नोचितमपि प्रभावाद् यस्याभून्न खलु तव कश्चिन्न विषयः ॥ 118,91 परित्यक्तं तेन त्वमसि सुतशोकान्न तु भयात् विमोक्ष्ये शस्त्र ! त्वामहमपि यतः स्वस्ति भवते ॥२६४॥
६. ग्राम्यत्व [अर्थदोष]] इस प्रकार दुष्कमत्व दोषका निरूपण करनेके बाद छठे अर्थदोष ग्राम्यत्वका उदाहरण देते हैं- जबतक समीपमें लेटा हुआ यह आदमी सो जाये तबतक [इसको दिखलानेके लिए सोनेका झूठा प्रदर्शन करनेके लिए ] सो जाती हूँ, क्या हानि है, [तबतक तुम भी सो जानेका बहाना करनेके लिए सिरके नीचे] कोहनी लगा लो और जल्दी ही इन सिकुड़ी हुई टाँगोंको फैला दो [इस प्रकार जबतक यह पासका आदमी जग रहा है, तब तक हम दोनोंको सो जाना चाहिये] ॥२६२॥ यह ग्राम्य [अविदग्ध अर्थका उदाहरण ] है। ७. सन्दिग्धत्व [अर्थदोष ] इस प्रकार ग्राम्यत्वका उदाहरण देनेके बाद सप्तम अर्थदोष सन्दिग्धत्वका उदाहरण देते हैं- 'मात्सर्यमुत्सार्य' इत्यादि [अर्थ उदाहरण सं० १३३ पर देखो] ॥२६३॥ यहाँ प्रकरणादिके अभावमें[ क्या पर्वतकी उपत्यकाओंका सेवनीयत्व विवक्षित है, अथवा स्त्रियोंके नितम्बोंका ] यह सन्देह है। शान्त अथवा शृङ्गारीमेंसे किसी एकके [वक्तारूपमें ] कथन कर देनेपर तो [एक पक्षमें ] निश्रय हो सकता है। ८. निर्हेतुत्व [अर्थदोष ] आ इस प्रकार सन्दिग्धत्व दोषका निरूपण करनेके बाद निर्हेतु नामक अष्टम अर्थदोषका उदाहरण देते हैं। 'वेणीसंहार' नाटकमें द्रोणाचार्यके मारे जानेके बाद अश्वत्थामा कह रहा है कि- हे शस्त्र ! [ब्राह्मणके लिए तुम्हारा धारण करना ] उचित न होनेपर भी [दूसरोंसे ] तिरस्कृत होनेके भयसे [अपनेको बचानेके लिए ] जिन[पिताजी ]ने तुमको ग्रहण किया था, और जिन [द्रोणाचार्य] के प्रभावसे [संसारमें ] कोई भी तुम्हारा अविषय नहीं था [कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं था, जिसपर तुम्हारा प्रहार न हो सकता हो ] उन्होंने भयसे नहीं अपितु [अश्वत्थामाकी मृत्युका झूठा समाचार सत्यवादी युधिष्ठिरके मुखसे सुनकर पुत्रके शोकके कारण तुम्हारा परित्याग कर दिया। इसलिए [ हे शस्त्र ] मैं भी तुमको छोड़ रहा हूँ, [जाओ ] तुम्हारा कल्याण हो ॥२६४॥ी किशड जिम
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का० ५५-५७, सू० ७५] सप्तम उल्लास: ३३१
अत्र शस्त्रविमोचने हेतुर्नोपात्तः। (९क) इदं ते केनोक्तं कथय कमलातङ्कवदने! ग्देतस्मिन् हेम्नः कटकमिति धत्से खलु धियम् ।
हीक गही इदं तद्दुःसाधाकमणपरमास्त्रं स्मृतिभुवा तव प्रीत्या चक्रं करकमलमूले विनिहितम् ।।२६५।।
अत्र कामस्य चक्र लोकेऽप्रसिद्धम् । ाा TगT (कo९
यथा वा --
(९ख) उपपरिसर गोदावर्याः परित्यजताध्वगाः । PISR FE
सरणिमपरो मार्गस्तावद्दवन्ध्िरवेक्ष्यताम् । 1195 इह हि विहितो रक्ताशोक: कयापि हताशया चरणनलिनन्यासोदञ्चन्नवाङकुरकञ्चुक: ।२६६।। अत्र पादाघातेनाशोकस्य पुष्पोद्गमः कविषु प्रसिद्धो न पुनरङकुरोद्गमः ।
यहाँ द्वितीयके [अर्थात् अपने ] शस्त्रत्यागका हेतु नहीं कहा [ अतः निहेतुत्व दोष है।]
९. प्रसिद्धिविरुद्धता [अर्थदोष ] (हक) [कमलोंको जिससे आतङ्क अर्थात् भय हो वह चन्द्रमा कमलातङ्क हुआ उसके समान वदनवाली ] हे चन्द्रवदने, तुमसे यह किसने कहा कि [हाथमें पहिने हए इस कङ्गनको ] तुम सोनेका कङ्गनमात्र समझो [मेरी दृष्टिमें तो यह कङ्गन नहीं अपित् कामदेवको जिनपर विजय प्राप्त करना या आक्रमण करना कठिन है, उन ] दुःसाध्याक्रमण [तरुण जितेन्द्रिय पुरुषोंको जीतने ] के लिए महास्त्र [के रूपमें ] कामदेवने बड़े प्रेमसे तुम्हारे करकमलके मूलमें यह चक्र स्थापित किया है[ तुम्हारे हाथमें दिया है। अर्थात् यह कडगन नहीं, अपितु जितेन्द्रिय तरुणोंके वशीकरणके लिए दिया हुआ कामदेवका चक्र- रूप महास्त्र है] ।।२६५।। यहाँ [चकररूप अस्त्रका वर्णन है, परन्तु ] कामका चक्र [रूप अस्त्र ] लोकमें प्रसिद्ध नहीं है [ पुष्प- बाण प्रसिद्ध हैं, अतः यह प्रसिद्धिविरुद्धता दोष है ]। हर (हख) अथवा [इसी प्रसिद्धिविरुद्धताका दूसरा उदाहरण ]। हे परथिको ! गोदावरीके किनारेके रास्तेको छोड़ दो और [अपने चलनेके लिए ] आप लोग कोई दूसरा रास्ता निकाल लो। क्योंकि पहिले मार्गमें किसी अभागिनीने अपने चरणकमलोंके आघात या आधानसे रक्ताशोकके वृक्षको निकलते हुए नवीन अंकुरोंसे आच्छादित कर दिया है ॥२६६॥ यहाँ [सुन्दरियोंके ] पैरोंके प्रहारसे अशोकमें फूलोंका निकलना कवियोंमें [कविसमयगत ] प्रसिद्ध है, अंकुरोंका निकलना [कविसमयगत ] नहीं है[ अतः अंकुरोद्गमका यह वर्णन प्रसिद्धिविरुद्ध है ]।
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३३२ काव्यप्रकाश: [का० ५५-५७, सू०. ७५
(९ग) सुसितवसनालङ्कारायां कदाचन कौमुदी- महसि सुदृशि स्वैरं यान्त्यां गतोऽस्तमभूद्विधुः । तदनु भवतः कीर्तिः केनाप्यगीयत येन सा प्रियगृहमगान्मुक्ताशङ्का क्व नासि शुभप्रदः ॥२६७॥ अत्रामूर्तापि कीर्तिः ज्योत्स्नावत्प्रकाशरूपा कथितेति लोकविरुद्धमपि कवि- प्रसिद्धेर्न दुष्टम् । (१०क) सदा स्नात्वा निशीथिन्यां सकलं वासरं बुधः। 1 नानाविधानि शास्त्राणि व्याचष्टे च शृणोति च ।।२६८।। अत्र ग्रहोपरागादिक विना रात्रौ स्नानं धर्मशास्त्रेण विरुद्धम् । (१०ख) अनन्यसदृगं यस्य बलं वाह्वोः समीक्ष्यते। षाङगुण्यानुसृतिस्तस्य सत्यं सा निष्प्रयोजना ।।२६९।। एतद् अर्थशास्त्रेण।
[इसी प्रसिद्धिविरुद्धताका प्रत्युदाहरण देते हैं -- ] (हग) कभी चाँदनीके प्रकाशमें अत्यन्त शुभ्र वस्त्र तथा अलङ्गारोंसे सुसज्जित सुन्दरीके अभिसार करते समय [प्रियतमके घर जाते समय ] चन्द्रमा छिप गया। [तब अन्धकार हो जानेसे उसमें सफेद वस्त्रोंके चमकनेसे वह भयभीत हुई ] उसके बाद किसीने आपकी कीतिका गान किया और [उसका शुभ्र प्रकाश चारों ओर फंल जानेसे ] वह निःशङ्क होकर प्रियतमके घरको चली गयी। आप कहाँ कल्याणकारी नहीं हैं ।।२६७।। यहाँ अमूर्त कीर्तिको ज्योत्स्नाके प्रकाशके समान [शुभ्र ] कहा है, यह लोकविरुद्ध होनेपर भी [कविसमयगत ] कवियोंमें प्रसिद्ध होनेसे दोष नहीं है। इस प्रकार प्रसिद्धिविरुद्धताके दो उदाहरण और एक प्रत्युदाहरण देनेके बाद भिन्न-भिन्न शास्त्रोंके विरोधको दिखलानेके लिए पहिले धर्मशास्त्रके विपरीत, फिर अर्थशास्त्र, फिर कामशास्त्र और उसके बाद मोक्षशास्त्रके विपरीत, इस शैलीसे विद्याविरुद्धके चार उदाहरण देते हैं- १०. विद्याविरुद्धता [अर्थदोष ] (१०क) वह विद्वान् सदा [मध्य] रात्रिमें स्नान करके सारे दिन नाना प्रकारके शास्त्रोंकी व्याख्या करता है, और [दूसरोंकी नयी की गयी व्याख्याको अथवा मूल शास्त्रको ] सुनता है ॥२६८॥ यहाँ ग्रहण [ग्रहोपरागादि ] विशेष कारणोंके बिना रात्रिमें स्नान करना धर्मशास्त्रके विरुद्ध है -- [ रात्रौ स्नानं न कुर्वीत राहोरन्यत्र दर्शनात् ]। (१०ख) जिस [राजा अथवा पुरुष ] के बाहुओंमें अतुल बल प्रतीत होता है [ या पाया जाता है] उसके लिए [नीतिशास्त्रमें प्रसिद्ध सन्धि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय और द्वैधीभावरूप] षाड्गुण्यका प्रयोग सचमुच ही व्यर्थ है ॥२६६।। यह अर्थशास्त्रसे [राजनीतिशास्त्रसे विपरीत होनेसे विद्याविरुद्धता दोष] है।मोप
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का ५५-५७, सू० ७५] सप्तम उल्लाम: ३३३
(१०ग) विधाय दूरे केयूरमनङ्गाङ्गणमङ्गना। 55 वभार कान्तेन कृतां करजोल्लेखमालिकाम् ॥२३०।। अत्र केयूरपदे नखक्षतं न विहितमिति, एतत्कामशास्त्रेण। (१०घ) अप्टाङ्गयोगपरिशीलनकीलनेन दुःसाधसिद्धिसविधं विदधद्विदूरे । असादयन्नभितामधुना विवेकख्याति समाधिधनमौलिमणिविमुक्तः ।२७१।। अत्र विवेकख्यातिस्ततः सम्प्रज्ञातसमाधिः, पश्चादसम्प्रज्ञातस्ततो मुक्तिरन तु विवेकख्यातौ, एदद् योगशास्त्रेण। एवं विद्यान्तरैरपि विरुद्धमुदाहार्यम् । (११) प्राप्ताः श्रियः सकलकामदुघास्ततः कि दत्तं पदं शिरसि विद्विषतां ततः किम् । सन्तर्पिता: प्रणयिनो विभवैस्ततः कि कल्पं स्थितं तनुभृतां तनुभिस्ततः किम् ॥२७२॥ इकह अत्र ततः किमिति न नवीकृतम् ।
(१० ग) कामदेवकी क्रीड़ाभूमि [रूप ] स्त्रीने बाजूबन्दोंको दूर करके [उनके स्थानपर] पतिके द्वारा उत्पादित नखक्षतोंकी मालाको धारण किया ॥२७०।। [ 'नखक्षतस्य स्थानानि कक्षो वक्षस्तथा गलः। पार्श्वों जघनमूर च स्तनगण्डललाटिकाः ।।' इस कामशास्त्रके वचनके अनुसार ] बाजूबन्दके स्थानपर नखक्षतका विधान नहीं किया गया है, इसलिए यह कामशास्त्रसे विरुद्ध [होनेसे विद्याविरुद्ध ] है। (१०घ) समाधि ही जिनका धन है, ऐसे योगियोंका शिरोमणि यह योगी अष्टाङ्ग योगके परि- शीलन तथा अभ्यास [कीलन ] से दुष्प्राप्य सिद्धि [अर्थात् मुक्ति ] के समीपवर्तो [असम्प्रज्ञात समाधि ] को दूर करके [अर्थात् उसके बिना ही] अभिमत विवेकख्याति [प्रकृति-पुरुषके भेदज्ञान ] को प्राप्त करते हुए अब मुक्त हो गया ॥२७१॥ यहाँ पहले [प्रकृति-पुरुषके भेदके ज्ञानरूप ] विवेकख्याति [होती ] है, उसके बाद सम्प्रज्ञात समाधि, उसके बाद असम्प्रज्ञात समाधि, उसके बाद मुक्ति होती है [ यह योगशास्त्रका करम है], न कि विवेकख्याति होनेपर ही [मोक्ष हो जाता है। अतः ] यह योगशास्त्रसे [विपरीत होमेसे विद्याविरुद्ध है ]। इसी प्रकार अन्य शास्त्रोंके विपरीत उदाहरण भी दिये जा सकते हैं। ११. अनवीकृतत्व [अर्थदोष ] विद्याविरुद्ध दोषके बाद अनवीकृतरूप ग्यारहवें अर्थदोषका निरूपण करते हैं। समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली सम्पत्ति प्राप्त कर ली तो क्या हुआ, शत्रुओंके सिरपर पैर रख लिया तो उससे क्या हुआ, सम्पत्तिसे अपने मित्रोंको तृप्त कर दिया तो उससे क्या हुआ और शरीर- धारियोंके शरीरसे कल्पपर्यन्त स्थिर बने रहे तो उससे भी क्या लाभ [आत्मज्ञानके बिना यह सब व्यर्थ है] । २७२।। इसमें [चारों चरणोंमें ] 'ततः कि' [ यह आया है] उसमें कोई नवीनता नहीं है।
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३३४ काव्यप्रकाश: [का० ५५-५७, भू० ३५
तत्तु यथा- Tio यदि दहत्यनिलोऽत्र किमद्भुतं यदि च गौरवमद्रिपु कि ततः । लवणमम्बु सदैव महोदधेः प्रकृतिरेव सतामविषादिता।२3३।। । (१२) यत्रानुल्लिखितार्थमेव निखिलं निर्माणमेतद्विधे- 11.3 रुत्कर्षप्रतियोगिकल्पनमपि न्यक्कारकोटि: परा।शस याताः प्राणभृतां मनोरथगतीरुल्लंध्य यत्सम्पद- स्तस्याभासमणीकृताशममु मणेरव्मत्वमेवोचितम्।२७४।।
वह [नवीकृतत्व ] तो [इस प्रकार होता है ] जैसे- यदि अग्नि जलाता है तो इसमें आश्र्वर्यकी क्या बात है ? यदि पहाड़ोंमें गुरुता [भारीपन] है तो क्या हुआ? समुद्रका पानी सदा खारा होता है और कभी दुःखी न होना यह सज्जनोंका स्वभाव ही है ।। २ ७३।। पतप्रर इसमें सब जगह नये-नये पदोंका प्रयोग किया है। अतः इसमें अनवीकृतत्व नहीं अपपितु नवीकृतत्व ही है। अतः यह 'अ्नवीकतत्व'का प्रत्युदाहरण है। चार प्रकारके परिवृत्त दोष इस अनवीकृतत्व दोषके बाद अर्थ दोषोंका परिगणन करनेवाली कारिकामें 'सनियमानियम- सविशेषाविशेषपरिवृत्ताः' यह एक लम्बा समस्तपद दिया है। इसमें चार अरथंदोषोंकी गणना एक साथ की गयी है। सनियम, अनियम, विशेष और अविशेष इन चारोंके साथमें पठित-'परिवृत्ताः' पद 'द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणं पदं प्रत्येकमभिसम्बद्धयते' इस नियमके अ्रपनुसार इन चारोंके साथ जुड़ता है। इसलिए सनियम- परिवृत्त, अनियमपरिवृत्त,विशेषपरिवृत्त और अविशेषपरिवत्त ये चार प्रकारके अर्थदोष इस पदके द्वारा प्रतिपादित किये गये हैं। इनमें सबसे पहिला दोष 'सनियमपरिवृत्त' है। इसका अभिप्राय यह है कि जहाँ नियम या अवधारण सहित बात कहनी चाहिये वहाँ बिना नियम या बिना अवधारणके वर्णन किया जाय तो वहाँ 'सनियमपरिवृत्त' दोप होता है। और जहाँ अनियमसे अर्थात् बिना अवधारणके बात कहनी उचित है; वहाँ नियम या अवधारण करते हुए वर्णन किया जाय तो वह 'अनियमपरिवृत्त' दोष होगा। 'परिवृत्त' शब्दका अरथ वैपरीत्य है। मनियमवैपरीत्य औ्र 'अनियमवैपरीत्य' ये दोष एक- दूसरेके विरुद्ध हैं। १२. सनियमपरिवृत्त [अर्थदोष ] सनियमपरिवृत्तका जो उदाहरण ग्रन्थकारने दिया है, वह एक कठिन, दुर्जेय, अन्योक्तिरूप है। इसमें कवि यह कहना चाहता है कि किसी अलौकिक योग्यताशाली महापुरुषकी साधारण पुरुषोंके साथ गणना करना, या उन क्षुद्र पुरुषोंसे उसकी तुलना करके उसकी किसी विशेषताका प्रदर्शन करना उसका अपमान करना ही है। अपने इस अभिप्रायको प्रकट करनेके लिए कौस्तुभमणिको प्रस्तुत विषय बनाकर उसकी प्रशंसा करते हुए कवि लिख रहा है कि- जिस [अद्वितीय कौस्तुभमणि ] के सामने विधाताकी यह सारी रचना [अनुल्लिखित अर्थ] निष्प्रयोजन-सी प्रतीत होती है, जिसमें उत्कर्षके प्रतियोगी [अर्थात् यह कौस्तुभमणि इस पदार्थसे अच्छा है, इस प्रकारकी तुलना करके जिसकी अपेक्षा अच्छा है, उस प्रतियोगी] की कल्पना करना भी जिसक
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का० ५५-५७, सू० ७५ ] सप्तम उल्लास: ३३५
अत्र 'छायामात्रमणी कृताश्मसु मणेस्तस्याश्मतैवोचिता' इति सनियमत्वं वाच्यम्। (१३) वक्त्राम्भोजं सरस्वत्यधिवसति सदा शोण एवाधरस्ते वाहु: काकुत्स्थवीर्यस्मृतिकरणपटुर्दक्षिणस्ते समुद्रः । वाहिन्यः पार्श्वमेताः क्षणमपि भवतो नैव मुञ्चन्त्यभीक्ष्णं स्वच्छेऽन्तर्मानसेऽस्मिन् कथमवनिपते ! तेऽम्बुपानाभिलाषः ॥२७५॥ अत्र शोण एव इति नियमो न वाच्यः ।
परम अपमान है, जिसकी सामर्थ्य [सम्पत्ति ] प्राणियोंके मनोरथोंकी गतिको भी पार कर गयी है[ अर्थात् न केवल मनुष्य अपितु देवता आदि तक कोई भी जिस वस्तुकी मनमें सर्वोत्कृष्टरूपसे या प्राप्तव्यरूपसे कल्पना कर सकते हैं, कौस्तुभमणिकी सामर्थ्य उससे भी अधिक दे सकनेकी है], जिसकी छायामात्रसे मणि बन जानेवाले पत्थरोंके [साथ तुलना आदि करनेकी अपेक्षा उनके ] बीच उस [कौस्तुभ ] मणिका पत्थर [रूपमें परिगणित ] होना ही उचित है ।२७४।। यहाँ [जिसकी] छायामात्रसे मणि बने हुए पत्थरोंमें उस मणिकी पत्थर-रूपता [से गणना ] ही उचित है। इस प्रकार [नियमसूचक 'मात्र' पदको जोड़कर 'छायाभास' के स्थानपर 'छायामात्र' इस प्रकारसे ] नियमत्व कहना चाहिये। [उस मात्र शब्दका प्रयोग न करनेसे यह 'सनियमपरिवृत्त' रूप अर्थदोपका उदाहरण बन गया है]।
१३. अनियमपरिवृत्त [ अर्थदोष ] Tका आगे 'अनियमपरिवृत्त' अर्थात् जहाँ नियम नहीं कहना चाहिये वहाँ नियम या अवधारणके प्रयोगका उदाहरण देते हैं। यह श्लोक बल्लाल-विरचित 'भोजप्रबन्ध'से लिया गया है। शिकारके समय प्यास लगनेपर राजा विक्रमादित्यके इलायची, खस, चन्दन, कपूर आदिसे सुगन्धित जल माँगनेपर राजाके प्रति मागधकी उक्ति है। इसका त्रशय यह है कि हे राजन् ! आपके मुखमें और समीप ही सब नदियोंको स्थिति है, तब आपको जलपानकी इच्छा क्यों हो रही है ? इसी बातका उपपादन करते हुए मागध कह रहा है कि- हे राजन् ! आपके मुखकमलमें सदा सरस्वती [नदी तथा देवी ] बसती है, आपका अधरोष्ठ सदा शोण [सोन नदी तथा लाल रंगका] ही रहता है, रामचन्द्रजी [काकुत्स्थ ] के पराक्रमका स्मरण दिलानेमें समर्थ आपका दक्षिण बाहु, दक्षिण समुद्र [राजचिह्वरूप मुद्रासे आङ्गित ] ही है, ये वाहिनियाँ [एक पक्षमें नदियाँ और दूसरे पक्षमें सेनाएँ ] तनिक देरके लिए भी कभी आपका साथ नहीं छोड़ती हैं, और आपके भीतर स्वच्छ मानस [मानससरोवर और दूसरे पक्षमें मन ] के रहते हुए आपको जल पीनेकी इच्छा कैसे होती है॥२७५॥ यहाँ 'शोण एवाधरस्ते' आपका अधर शोण ही है, यह नियम नहीं कहना चाहिये [ उसके कह देनेसे ] यह 'अनियमपरिवृत्त' दोषका उदाहरण बन गया है। १४. विशेषपरिवृत्त [अर्थदोष ] आग 'विशेषपरिवृत्त' अर्थात् जहाँ असमान्य अर्थात् विशेषवाचक पदका प्रयोग करना चाहिये
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३३६ काव्यप्रकाश: [का० ५५-५७, मू० ७५
(१४) श्यामां श्यामलिमानमानयत भोः ! सान्द्रै्मषीकर्चकैः स मन्त्रं तन्त्रमथ प्रयुज्य हरतश्वेतोत्पलानां श्रियम् चन्द्रं चूर्णयत क्षणाच्च कणशः कृत्वा शिलापट्टके येन द्रष्टुमहं क्षमे दश दिशस्तद्ववत्रमुद्राङ्किताः ॥२७२॥ upe अत्र 'ज्यौत्स्नीम्' इति श्यामाविशेषो वाच्यः। इन (१५) कल्लोलवेल्लितदृषत्परुषप्रहारै रत्नान्यमूनि मकरालय ! मावमंस्था । किं कौस्तुभेन विहितो भवतो न नाम याञ्चा प्रसारितकर: पुरुषोत्तमोऽपि ॥२७३॥ अत्र 'एकेन कि न विहितो भवतः स नाम' इति सामान्य वाच्यम्।
वहाँ विशेषको न कहकर सामान्यवाचक शब्दका प्रयोग कर दिया जाय। उस विशेषपरिवृत्तका उदाहरण देते हैं। राजशेखरकृत 'विद्धशालभन्जिका'के तृतीय अङ्गमें नायिका मृगाङ्कावलीके वियोगमें आ्र्परतुर राजा विद्याधर मल्लदेव आकाशभाषितके रूपमें सेवकोंको भो: शब्दसे सम्बोधन करके कह रहे हैं कि -- हे सेवको ! गहरी काली स्याहीकी कूँचियोंसे [ चाँदनी ] रात्रिको काली कर दो, मन्त्र या तन्त्रका प्रयोग करके सफेद कमलोंकी शोभाको नष्ट कर दो और चन्द्रमाको पत्थरकी शिलापर रख [ या पटक] करके कण-कणमें पीस डालो, जिससे कि मैं दसों दिशाओंको उसकी मुखमुद्रासे आङ्गित देख सकू ॥२७६॥ यहाँ 'ज्यौत्स्नी' चाँदनी रात इस प्रकार रात्रि-विशेषका कथन करना चाहिये। [उसका कथन न करके रात्रिवाचक साधारण 'श्यामा' शब्दका प्रयोग किया गया है, अतः यह 'विशेषपरिवृत्त' दोषका उदाहरण है ]। १५. अविशेषपरिवृत्त [ अर्थदोष ] जहाँ अविशेष अर्थात् सामान्यवाचक पदका प्रयोग करना चाहिये वहाँ उसका प्रयोग न करके विशेषवाचक पदका प्रयोग किया जाय तो वह 'अविशेषपरिवृत्त' का उदाहरण हो जाता है, जैसे- हे मकरालय [समुद्र ] ! लहरों द्वारा फेंके गये या चलाये गये इन कठोर पत्थरोंके प्रहारसे इन रत्नोंको अपमानित मत करो। क्या [इन्हीं रत्नोंमेंसे केवल ] अकेले कौस्तुभने पुरुषोत्तम [विष्णु भगवान् ] को भी आपके सामने याचनाके लिए हाथ फैलानेवाला नहीं बना दिया ? ।।२७७।। यहाँ [विशेष रूपसे कौस्तुभमणिका नाम न लेकर सामान्यरूपसे ] 'एकेन किं न विहतो भवतः स नाम' क्या एकने उस पुरुषोत्तमको आपका याचक नहीं बना दिया, यह कहना चाहिये [ सामान्यवाचकके स्थानपर विशेष कौस्तुभका नाम ले देनेसे यह 'अविशेषपरिवृत्त' दोषका उदाहरण बन गया है]। १६. साकांक्षता [ अर्थदोष ] इस प्रकार चार प्रकारके परिवृत्तके उदाहरण देनेके बाद सांकाक्षतारूप सोलहवें अरथदोषका निरूपण करते हैं। 'महावीरचरित' नाटकमें सीताकी प्राप्तिसे निराश रावणके अ्रमात्य माल्यवान् रावणसे कह रहे हैं कि-
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(१६) अथित्वे प्रकटीकृतेऽपि न फलप्राप्तिः प्रभो ! प्रत्युन द्रुह्यन् दाशरथिविरुद्धचरितो युक्तस्तया कन्यया। उत्कर्षञ्च परस्य मानयशसोविस्त्रंसन चात्मन स्त्रीरत्नञ्च जगत्पतिर्दशमुखो देवः कथ मृष्यते ।।२३८।। अत्र स्त्रीरत्नम् 'उपेक्षितुम्' इत्याकांक्षति। नहि परस्येत्यनेन सम्बन्धो योग्य। (१७) आज्ञा शकरशिखामणिप्रणयिनी शास्त्राणि चक्षुर्नवं भक्तिरभू तपतौ पिनाकिनि पदं लङ्केति दिव्या पुरी। उत्पत्तिर्द्रहिणान्वये च तदहो नेदृग्वरो लभ्यते स्याच्चेदेष न रावणः क्व नु पुनः सर्वत्र सर्वे गुणाः ।२७९।। अत्र 'स्याच्चेदेष न रावणः' इत्यन्तमेव समाप्यम् ।
हे प्रभो ! [सीताकी प्राप्तिके लिए जनकके सामने ] याचकता प्रकट करनेपर भी [सीतारूप] फलकी प्राप्ति नहीं हुई [यह ही बड़ा अपमान हुआ। पर उतसे बढ़कर अपमान यह हुआ कि सीता आपको न देकर] उलटे आपका विरोध करनेवाले शत्रु रामचन्द्रको दे दी। [इस व्यापारसे उत्पन्न होनेवाले ] १. शत्रु [रामचन्द्र ] के उत्कर्षको, २. अपने मान तथा यशके विनाशको और ३. स्त्रीरत्न [की उपेक्षा करने ] को संसारके स्वामी दशमुख देव [रावण ] कैसे सहन कर सकते हैं ॥२७८॥ यहाँ 'स्त्रीरत्नं' के बाद 'उपेक्षितुं' इसकी आकांक्षा [वाक्यको] रहती है। और 'परस्य' दूसरेकी इसके साथ [स्त्रीरत्न पदका ] सम्बन्ध करना भी उचित नहीं है [ क्योंकि उस 'परस्य' पदका उत्कर्षके साथ पहले ही सम्बन्ध किया जा चुका है]।
१७. अपदयुक्तता इसके बाद अपदयुक्तता नामक १७वे अर्थदोपका उदाहरण देते हैं। अपदयुक्तताका अभिप्राय यह है कि जहाँ अपद अरथात् त्रस्थान या तनुचित स्थानमें अ्र्पनावश्यक पदोंको जोड़ दिया जाय वह अपद- युक्तता दोष होता है। राजशेखरकृत 'बालरामायण' नाटकके प्रथम अङ्कमें सीताके वरके रूपमें रावणके प्रस्नावकी विवेचना करते हुए जनकके पुरोहित शतानन्द कह रहे हें कि- [रावणके दूतसे शतानन्द कहते हैं कि रावणकी ] आज्ञा इन्द्रके लिए शिरोधार्य [शिखामणि- प्रणयिनी ] है। शास्त्र जिसकी नवीन [प्रसिद्ध आँखोंसे भिन्न ] आँखें हैं। भूतपति महादेवमें [ जिसकी] अपार भक्ति है, और लड्डा इस नामसे विख्यात दिव्य नगरी उसका वासस्थान है। ब्रह्मा [द्रुहिण ]के वंशमें जन्म हुआ है। इसलिए इस प्रकारका [इतने गुणोंसे युक्त ] दूसरा वर नहीं मिल सकता है, यदि यह [दुराचारी ] रावण न होता तो निःसन्देह ऐसा [उत्तम] वर और नहीं मिल सकता है। [अथवा] सबमें सब गुण कहाँ मिल सकते हैं ॥२७६। यहाँ 'स्याच्चेदेष न रावणः' यहाँतक ही समाप्त कर देना चाहिये [कयोंकि 'कव नु पुनः सर्वत्र २२
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(१८) श्रुतेन बुद्धिर्व्यसनेन मूर्खता मदेन नारी सलिलेन निम्नगा। निशा शशाङ्केन धृतिः समाधिना नयेन चालंक्रियते नरेन्द्रता ।।२८०।। अत्र श्रुतादिभिरुत्कृष्टैः सहचरितैर्व्यसनमर्खतयोनिकृष्टयोभिन्नत्वम् । (१९) लग्नं रागावृताङ्गया ।।२८१।। इत्यत्र 'विदितं तेजस्तु'इत्यनेन श्रीस्तस्मादपसरतीति विरुद्ध प्रकाश्यत । (२०) प्रयत्नपरिबोधितः स्तुतिभिरद्य शेषे निगा- मकेशवमपाण्डवं भुवनमद्य निःसोमकम् । इयं परिसमाप्यते रणकथाज्द्य दो:शालिना- मपैतु रिपुकाननातिगुरुरद्य भारो भुवः ।।२८२।।
सर्वे गुणाः' कह देनेपर तो रावणको सीता देनेमें बाधा है, वह बात हलकी पड़ जाती है और उसीको सीता देनेके औचित्यकी प्रतीति होती है ]।
१८. सहचरभिन्नता अपदयुक्तताके बाद सहचरभिन्नता नामक १5 वे अर्थदोषका निरूपण करते हैं- शास्त्रश्रवणसे बुद्धि, दुव्यंसनसे मूखता, [यौवनके ] मदसे स्त्री, पानीसे नदी, चन्द्रमासे रात्रि, समाधिसे धैर्य और नीतिसे नरेन्द्रता [राजपद ] शोभित होती है ॥२८०॥। यहाँ श्रुति आदि उत्कृष्ट [पदार्थों]के साथ व्यसन और मूर्खता इन दो निकृष्ट अर्थोंके सहचारसे सहचरभिन्नता [अर्थ दोष हो जाता ] है। १९. प्रकाशितविरुद्धता सहचरभिन्नताके बाद प्रकाशितविरुद्धता नामक १९ वे अरथदोषका उदाहरण देते है। 'लग्नं रागावृताङ्गया' [इत्यादिका अर्थ उदाहरण सं० २४१ पर दिया जा चुका है। वहींसे देखना चाहिये] ॥२८१॥ इसमें 'आपको मालूम होना चाहिये' इससे 'लक्ष्मी उसको छोड़ रही है।' यह विरुद्ध अर्थ प्रकाशित हो रहा है [ अतः यहाँ प्रकाशितविरुद्धता नामक अर्थदोष है]। २०. विध्ययुक्तता प्रकाशितविरुद्धताके बाद 'विधिकी अयुक्तता' रूप २० वे अर्थदोपका उदाहरण देते हैं। यह श्लोक भी 'वेणीसंहार' के तृतीय अङ्कसे लिया गया है। जान पड़ता है कि मम्मटने 'वेणोसहार'को विशेषरूपसे दोषदर्शनके लिए चुन लिया है। इसलिए इतनी अधिक संख्यामें बार-वार 'वेणीसंहार' से ही दोषोंके उदाहरण देते हैं। निम्नलिखित उदाहरणमे द्रोणवधसे कुपित और शत्रओंसे इसका बदला लेनेके लिए उत्सुक अश्वत्थामा दुर्योधनको आ्श्वासन देता हुआ कह रहा है कि- [शत्रुओंका विनाश करके बिलकुल निश्र्िन्त हो] आज सारी रात ऐसे सोओगे कि सबेरे [चारणों द्वारा उच्च स्वरसे निरन्तर की जानेवाली] स्तुतियोंसे प्रयत्नपूर्वक जगाये जा सकोगे। आज संसार श्रीकृष्ण, पाण्डवों और [द्रोणका बध करनेवाले धृष्टद्युम्नके ] सोमवंशसे रहित हो जायगा।
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का० ५५-५७, सू० ७५] सप्तम उल्लास: ३३६ अत्र 'शयितः प्रयत्नेन बोध्यसे' इति विधेयम्। यथा वा- वाताहारतया जगद्विषधरैराश्वास्य निःशेषितं ते ग्रस्ताः पुनरभ्रतोयकणिकातीव्रव्रतैर्बहिभिः । तेऽपि क्रूरचमूरुचर्मवसनैर्नीता: क्षयं लुब्धके- र्दम्भस्य स्फुरितं विदन्नपि जनो जाल्मो गुणानीहते ।।२८३।। अत्र वाताहारादित्रयं व्युत्क्मेण वाच्यम्।
[और इन तीनका ही नाम क्यों लिया जाय, सत्य बात तो यह है कि-] आजसे बाहुबलका दर्प करनेवाले इन क्षत्रियोंकी यह युद्धकथा ही समाप्त हो जायगी '[क्योंकि परशुरामकी तरह आज मैं समस्त क्षत्रियोंका नाश किये देता हूँ, फिर जब कोई क्षत्रिय ही नहीं रहेगा, तो युद्धकी कथा स्वयं समाप्त हो जायगी ] आज रिपुसमुदायरूप पृथिवीका महान् भार दूर हो जायगा ।२८२। यहाँ 'शयितः प्रयत्नेन बोध्यसे' ऐसा [प्रयत्नसे जगाये जा सकोगे ] विधेय है [ जिसे समास में नहीं रखना चाहिये था ]। अथवा विधि-अयुक्तताका दूसरा उदाहरण जैसे- [यह उदाहरण भल्लटकवि-विरचित 'भल्लटशतक' से लिया गया है। इसमें धार्मिक तपस्वी बननेका ढोंग रचनेवालोंकी पोल खोलकर कवि यह कह रहा है कि इनके ढोंगको जानते हुए भी लोग इस बातपर कसे विश्वास करते हैं] विषधर सर्पोंने वायुभक्षणके व्रतके द्वारा [कि हम तो केवल वायुका भक्षण करते हैं। हम किसीको हानि नहीं पहुँचा सकते हैं, इस प्रकारका ] जगत्को विश्वास दिलाकर उसे समाप्त कर दिया [अर्थात् संसारको ठगनेके लिए उन्होंने वाताहारका ढोंग रचा था। परन्तु मोर उनके भी गुरु निकले ] वर्षाजलकी बूंदोंके ही [ पानका ] कठिन व्रत धारण करनेवाले मयूरोंने उन [धूर्त ढोंगी सरपों]को खा डाला [अर्थात् उन्होंने सर्पोंको ठगनेके लिए ही केवल वर्षाकी बूंदोंको पीनेका व्रत लिया था। पर उनके भी गुरु संसारमें निकल ही आये और ऋषियोंके समान] कठोर मृगचर्मके वस्त्रोंको धारण करनेवाले व्याधोंने [मृगचर्मके वस्त्रोंका ढोंग रचकर ] उन [ढोंगी] मयूरोंका नाश कर दिया। इस प्रकार [धर्मका ढोंग रचनेवाले इन धूर्तोंके] ढोंगके व्यवहारको जानते हुए भी यह मूर्ख संसार इन गुणोंको चाहता है।२८३॥ यहाँ वाताहार आदि तीनोंको उलटे कमसे कहना चाहिये [ उस प्रकारसे न कहनेके कारण विधि- अयुक्तता दोष हो गया है]। वृत्तिकारने जो दोष यहाँ दिखलाया है, उसका अभिप्राय यह है कि वाताहारका व्रत सबसे कठिन है, उससे अभ्रतोयकणिका-पानका व्रत सरल है और मृगचर्मके धारणमात्रका व्रत बहुत सरल है। अतः सरलताके कमसे सबसे पहले मृगचर्म धारण करनेके व्रतका, उसके बाद अभ्रतोयकणिका- पानके व्रतका और सबसे अन्तमें वाताहारव्रतका वर्णन करना चाहिये था। यहाँ उसका क्रम उलटकर वर्णन किया है। अतः यहाँ दोष हो गया है। परन्तु वृत्तिकारकी इस व्याख्याने तो कविके सारे अ्रभिप्रायको ही समाप्त कर दिया है। कवि तो यह कहना चाहता है कि साँपोंने ढोंग रचकर संसारको धोखा दिया. तो उनको ठगनेवाले उनके भी गुरु मयूर उन्हें मिल गये। मयूरोंने जो सर्पोंको धोखा दिया तो उनके भी
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(२१) अरे रामाहस्ताभरण ! भसलश्रेणिशरण ! स्मरक्रीडाव्रीडाशमन! विरहिप्राणदमन ! । मरोहंसोत्तंस ! प्रचलदल नीलोत्पल सखे सखेदोऽहं मोहं श्लथय कथय क्वेन्दुवदना ।।२८४।।
अत्र 'विरहिप्राणदमन' इति नानुवाद्यम् । लग्नं रागावृताङ्गयेत्यादि ।।२८५।। अत्र 'विदितं तेऽस्तु' इत्युपसंहृतोऽपि तेनेत्यादिना पुनरुपात्तः ।
गुरु व्याधोंने उनको भी इस ढोंगका मजा चखा दिया। इस प्रकार इन धार्मिकताका दम्भ करनेवाले लोगोंमें एकसे एक बढ़कर ढोंगी होते हैं। इस प्रकार कवि व्रतकी कठिनाईके तारतम्यको नहीं अपितु ढोंगियोंके पारस्परिक तारतम्यको दिखला रहा है। वृत्तिकारने उसको न समझकर अपनी नयी व्याख्या करके उसमें दोषकी कल्पना कर डाली है। यह युक्तिसंगत नहीं हुआ है। इसी प्रकार अन्य अनेक स्थलोंपर भी उनके सुझाव इसी प्रकारके हो गये हैं।
२१. अनुवादायुक्तता इस विधिकी अयुक्तताके उदाहरण देनेके बाद ग्रन्थकार २१ वें अर्थदोष अनुवादायुक्तताके उदाहरण आगे देते हैं। कुछ टीकाकारोंने इसे नीलोत्पलके प्रति विरही पुरूरवाकी उक्ति बतलाया है, परन्तु 'विकमोर्वशीय' नाटकमें यह श्लोक नहीं आता है। श्लोकमें कोई विरही नीलकमलसे अपनी प्रियतमाका पता पूछ रहा है कि वह कहाँ गयी है। उसमें नीलकमलके जो विशेषण दिये हैं उनसे यह सूचित होता है कि वह तुम्हारे पास अवश्य आयी होगी। इसलिए तुम उसका पता कुछ अवश्य दे सकते हो। हे [सुन्दरी ] स्त्रियोंके हाथके आभूषण ! [इससे यह निकलता है कि अपने हस्ताभरण बनानेके लिए वह यहाँ आयी होगी] हे भ्रमरसमुदायके शरणदाता, ['भसलश्ष मिलिन्दश्र शिपुटश्र शिलीमुखः' ] कामकेलिमें होनेवाली लज्जाका [उद्दीपन द्वारा ] शमन करनेवाले, विरहियोंके प्राणोंका दमन [नाश] करनेवाले, [सरोहंसोत्तंस ] उत्तम तालाबोंके शोभाजनक ! चञ्चल पत्रोंवाले हे मित्र नीलकमल ! मैं [प्रियतमाके वियोगमें ] अत्यन्त दुःखी हूँ। मेरे मोहको दूर करो और बतलाओ कि वह चन्द्रवदनी कहाँ है ॥२८४॥ इसमें 'विरहिप्राणदमन' यह अनुवादरूपसे नहीं कहना चाहिये।
२२. समाप्तपुनरात्तत्व इस प्रकार विध्ययुक्तता तथा अनुवादायुक्तताका निरूपण कर चुकनेके बाद ग्रन्थकार २२ वें अर्थदोष त्यक्तपुनःस्वीकृतत्व या समाप्तपुनरात्तत्वका उदाहरण देते हैं- 'लग्नं रागावृताङ्गया' [उदाहरण सं० २४१ पर देखिये]।२८५॥ इसमें 'विदितं तेऽस्तु' इस प्रकार उपसंहार हो जानेपर भी 'तेनास्मि दत्ता' इत्यादिसे फिर उठा लिया गया है [ इसलिए समाप्तपुनरात्तत्व या 'त्यक्तपुनःस्वीकृतत्व' दोष हो गया है ]।।
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का० ५८, सू० ७६ ] सप्तम उल्लास: ३४१ हन्तुमेव प्रवृत्तस्य स्तब्धस्य विवरेषिणः । यथास्य जायते पातो न तथा पुनरुन्नतिः ।२८६।। अत्र पुंव्यञ्जनस्यापि प्रतीतिः । यत्रैको दोष: प्रदर्शितस्तत्र दोषान्तराण्यपि सन्ति तथापि तेषां तत्राप्रकृतत्वात्प्र- काशन न कृतम् । [सू० ७६ ] कर्णावतंसादिपदे कर्णादिध्वनिनिरमितिः । सन्निधानादिबोधार्थम्
२३. अश्लीलता २३ वें अर्थदोष अश्लीलताका उदाहरण देते हैं- [दूसरेका ] नाश करने [मारने ] के लिए तैयार, उद्धत अभिमानी [खड़े हुए ] और दोषों [दूसरे पक्षमें योनिरूप छिद्र ] को खोजनेवाले इस [दुष्ट व्यक्ति या लिङ्ग ] का जितनी जल्दी पतन होता है उतनी जल्दी पुनः उत्थान नहीं होता ॥२८६॥ यहाँ पुरुषके लिङ्गकी भी प्रतीति होती है। इसलिए यह वीड़ाजनक अश्लीलताका उदाहरण हो जाता है]। अब इस दोषनिरूपणप्रसङ्गका उपसहार करते हुए लिखते हैं कि- [उक्त समस्त उदाहरणोंमें ] जहाँ एक दोष दिखलाया है, वहाँ और दोष भी [हो सकते] हैं, किन्तु वहाँ प्रसङ्ग न होनेसे उनको दिखलाया नहीं है। दोषोंकी अनित्यताके उदाहरण इस प्रकार दोषोंका निरूपण कर चुकनेके बाद अब उनके अपवादस्थलोंका निरूपण प्रारम्भ करते हैं। अपवादस्थलका अभिप्राय यह है कि जो दोष ऊपर बतलाये गये हैं, उनमें कुछ दोष ऐसे भी हैं, जो सब जगह दोष ही नहीं रहते हैं अपितु कहीं गुण भी बन जाते हैं। ऐसे दोषोंको अनित्य दोष कहा जाता है। 'च्युतसंस्कार' आरदि कुछ दोष ऐसे हैं, जो सदा दोष ही रहते हैं, उनको नित्य दोष कहा जाता है। यह नित्य और अनित्य दोषकी व्यवस्था रसापकर्षत्वके आधारपर होती है। च्युतसंस्करादि नित्य दोष सदा रसके अपकर्षक होते हैं, अतः वे सदा दोष ही माने जाते हैं। श्रुतिकटुत्व आदि केवल शृङ्गार आ्रदि कोमल रसोंके अपकर्षक होनेसे वहाँ दोष माने जाते हैं। रौद्र, वीर आदि कठोर रसोंमें उनसे रसका अपकर्ष नहीं होता, इसलिए उनको दोष नहीं माना जाता है और वे अनित्य दोष कहलाते हैं। इन अनित्य दोषोंका निरूपण आगे करते हैं। [सूत्र-७६ ] कर्णावतंस आदि पदोंमें [केवल अवतंस पदसे ही कानके आभूषण-रूप अर्थका ग्रहण हो जानेसे ] कर्ण आदि पदोंका प्रयोग ['ध्वनिनिरमितिः' ध्वनि अर्थात् पदकी निर्मिति अर्थात् प्रयोग उनके कर्ण आदिमें ] सन्निधान आदिके बोधनके लिए होता है [ अतः उसको दोष नहीं समझना चाहिये ]। यह ७६ वाँ तथा अगला ७७वाँ, दोनों सूत्र मिलकर एक श्लोक बन जाते हैं। वामनके 'काव्या- लड्कारसूत्र'के 'तदिदं प्रयुक्तेष' २-२-१६ की वृत्तिमें यह श्लोक दिया है। काव्यप्रकाशकारने इसको वहींसे ले लिया है।
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३४२ काव्यप्रकाश: [ का० ५८, सू० ७६
अवतंसादीनि कर्णाद्याभरणान्येवोच्यन्ते, तत्र कर्णादिशब्दा: कर्णादिस्थितिप्रपिपत्तये। यथा- अस्या: कर्णावतंसेन जितं सर्वं विभूषणम् । तथव शोभतेऽत्यर्थमस्याः श्रवणकुण्डलम् ।।२८७।। अपूर्वमधुरामोदप्रमोदितदिशस्ततः । आययुर्भृङ्गमुखराः शिरःशेखरशालिनः ।२८८।। अत्र कर्णश्रवणशिर:शब्दाः सन्निधानप्रतीत्यर्थाः । विदीर्णाभिमुखारातिकराले सङ्गरान्तरे। धनुर्ज्याकिणचिह्नेन दोष्णा विस्फुरितं तव ।।२८९।। अत्र धनुःशब्द आरूढत्वावगतये।
अवतंस आदि [नामसे ] कानके आभूषण आदि ही कहे जाते हैं [ परन्तु ] वहाँ [ उन आभूषण आदिकी] कान आदिमें स्थितिका बोध करानेके लिए कर्ण आदि शब्द [प्रयुक्त किये जाते ] हैं। [उनका प्रयोग दोष नहीं है] जैसे -- इस [नायिका ] के [कानमें पहने हुए ] कर्णावतंसने सब आभूषणोंको जीत लिया और उसी प्रकार श्रवणकुण्डल अत्यन्त शोभित हो रहा है ॥२८७। इसके बाद अपूर्व मीठी-मीठी सुगन्धसे दिशाओंको सुगन्धित करते हुए भौरोंके गुञ्जारसे युक्त शिरःशेखरधारी पुरुष आ पहुँचे ॥२८८॥ यहां [ पहिले श्लोकमें ] 'कर्ण' तथा 'श्रवण' शब्द और [दूसरे श्लोकमें] 'शिरः' शब्द [उन-उन आभूषणोंके उन-उन स्थानोंपर ] सन्निधानका बोध करानेके लिए [प्रयुक्त किये गये] हैं। [अतः यहाँ पुनरुक्ति या अपुष्टार्थत्व दोष नहीं समझना चाहिये ]। सामना करनेवाले शत्रुओंके विनाशसे भयङ्कर, संग्रामके बीचमें [ या दूसरे युद्धमें ] धनुषकी प्रत्यञ्चाके [बार-बार लगनेके कारण उत्पन्न हुए ] घावके [अच्छे हो जानेके बाद भी हाथपर बने हुए] चिह्नसे अद्गित तुम्हारा बाहु फड़क उठा ॥२८६।। यहाँ 'धनु' शब्द [प्रत्यञ्चाके धनुषपर ] चढ़े हुए होनेका बोध करानेके लिए ] प्रयुक्त किया गया है। अगला श्लोक 'रघुवंश' के षष्ठ सर्गसे लिया गया है। इस सर्गमें इन्दुमतीके स्वयंवरका वर्णन है। स्वयंवरके समय आये हुए राजाओंका परिचय करानेके प्रसङ्गमें सुनन्दा कार्तवीर्यके वंशधरका परिचय करा रही है। उसमें कार्तवीर्यके प्रभावका वर्णन रामायणके उत्तरकाण्डके ३१-३२ सर्गमें दी हुई कथाके आधारपर कर रही है। उस कथाका सारांश यह है कि एक बार माहिष्मतीके राजा कार्तवीर्य अपनी रानियोंके साथ जलकीड़ा कर रहे थे। उस समय उन्होंने अपनी बाहुओंसे रेवा नदीके जलको रोक लिया। जिसके कारण बाँधलग जानेसे नदीका पानी ऊपर बहुत स्थानमें फैल गया। रेवाके किनारे ही ऊपर कहीं रावण शिवजीकी पूजा कर रहा था। शिवलिङ्गकी अरचनाके लिए उसने जो फूल लाकर रखे थे, इस बढ़े हुए पानीके प्रवाहमें सब बह गये। रावण इसको कैसे सह सकता था। वह कार्तवीर्यसे लड़नेके लिए तैयार हो गया। निदान युद्ध छिड़ जानेपर कार्तवीर्यने उसको पकड़कर अपने धनुषकी
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का० ५८, सू० ७६] सप्तम उल्लास: ३४३ अन्यत्र तु -- ज्याबन्धनिष्पन्दभुजेन यस्य विनिश्वसद्वक्त्रपरम्परेण । कारागृहे निरजितवासवेन लङ्केश्वरेणोषितमाप्रसादात् ॥।२९०॥ इत्यत्र केवलो ज्याशब्दः । प्राणेश्वरपरिष्वङ्गविभ्रमप्रतिपत्तिभिः । मुक्ताहारेण लसता हसतीव स्तनद्वयम् ।।२९१।। अत्र मुक्तानामन्यरत्नामिश्रितत्वबोधनाय मुक्ताशब्दः । सौन्दर्यसम्पत् तारुण्यं यस्यास्ते ते च विभ्रमाः । षट्पदान् पुष्पमालेव कान् नाकर्षति सा सखे ! ॥।२९२।। अत्रोत्कृष्टपुष्पविषये पुष्पशब्दः । निरुपपदो हि मालाशब्दः पुष्पस्रजमेवाभिधत्ते । प्रत्यञ्चासे बाँधकर माहिष्मती नगरीके कारावासमें ले जाकर बन्द कर दिया। उसके सामने रावणकी एक न चली। और जबतक कार्तवीर्यने स्वयं ही उसके अपराधको क्षमा करके न छोड़ दिया, तबतक उसको कारावासमें ही रहना पड़ा। इसी घटनाका वर्णन इस श्लोकमें निम्न प्रकारसे किया है- जिस [कार्तवीर्य] की धनुषसे उतरी हुई ] प्रत्यञ्चाके द्वारा बाँध देनेसे निश्चेष्ट भुजावाला तथा हाँफते हुए मुखोंकी परम्परासे युक्त, इन्द्रको भी जीत लेनेवाला लक्कूश्वर [रावण ] जिसकी कृपादृष्टि होनेपर्यन्त [माहिष्मती नगरीके ] कारावासमें पड़ा रहा [ऐसा शक्तिशाली था कार्तवीर्य, उसका यह वंशधर है] ॥२६१। यहाँ [उतारी हुई प्रत्यञ्चाके बोधनमें ] केवल 'ज्या' शब्द [का प्रयोग ] है। इसी प्रकार दूसरा उदाहरण और देते हैं। इसमें मुक्ताहार, शब्द प्रयुक्त हुआ है। 'हारो मुक्तावली' इस विश्वकोष तथा 'मुक्ताग्रैवेयकं हारः' इत्यादि अन्य कोशोंके अनुसार मुक्तासे बना हुआ हार ही 'हार' पदका मुख्यार्थ है। अतः 'हार' शब्दके साथ 'मुक्ता' पदके प्रयोगकी आवश्यकता नहीं है। फिर भी इस श्लोकमें जो 'हार' शब्दके साथ 'मुक्ता' शब्दका प्रयोग किया गया है वह अन्य किसी रत्नके साथ मिश्रणसे रहित केवल मुक्ताओंसे बने हारके बोधनके लिए किया गया है। प्राणेश्वरके आलिङ्गनके [विविध ] हाव-भाव [या प्रकारों] से सम्मानित [प्रतिपत्तिका अर्थ सम्मान भी होता है] होनेके कारण शोभायमान [प्रसन्न ] मुक्ताहार [के सम्पर्क]से दोनों स्तन हँस-से रहे हैं [ हार मानों स्तनोंका हास्य हो] ।।२६२।। यहाँ अन्य रत्नोंसे अमिश्रित मुक्ताओंके बोधनके लिए 'मुक्ता' शब्दका [प्रयोग ] है। हे मित्र ! जिस [नायिका]के पास [अपूर्व ] सौन्दर्यकी सम्पत्ति, यौवन और वे [अपूर्व अनुभवक- गोचर ] हाव-भाव हैं, जिस प्रकार पुष्पमाला भौरोंको आकर्षित करती है, इस प्रकार वह किनको आकर्षित नहीं करती है ।।२६३।। यहाँ [ उत्कृष्ट पुष्पोंके बोधनके लिए 'पुष्प' शब्द [का प्रयोग किया गया] है। [क्योंकि अन्य] विशेषणोंसे रहित केवल माला शब्द फूलोंकी मालाका ही वाचक होता है। ऊपर जिन कर्णावतंस, श्रवणकुण्डल, धनुर्ज्या, मुक्ताहार, पुष्पमाला आदि शब्दोंके उदाहरण
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३४४ काव्यप्रकाश: [का० ५ू८, सू० ७७
[सू० ७७ ] स्थितेष्वेतत्समर्थनम् ॥५८।। न खलु कर्णावतंसादिवज्जघनकाञ्चीत्यादि क्रियते। जगाद मधुरां वाचं विशदाक्षरशालिनीम् ।।२९३।। इत्यादौ क्रियाविशेषणत्वेऽपि विवक्षितार्थप्रतीतिसिद्धौ 'गतार्थस्यापि विशेष्यस्य विशेषणदानार्थ क्वचित्प्रयोग: कार्यः'-इति न युक्तम् । युक्तत्वे वा, चरणत्रपरित्राणरहिताभ्यामपि द्रुतम् । पादाभ्याँ दूरमध्वानं व्रजन्नेष न खिद्यते ।२९४। इत्युदाहार्यम् ।
दिये गये हैं उनके प्रयोग उस रूपमें प्राचीन महाकवियोंके ग्रन्थोंमें पाये जाते हैं। अतः उनका समर्थन करनेका यह मार्ग निकाला गया है। परन्तु इस शैलीपर अन्य इस प्रकारके नवीन प्रयोगोंका समर्थन नहीं किया जा सकता है। इस बातको आगे कहते हैं- [सूत्र ७७] [केवल प्राचीन काव्योंमें ] स्थित [इन प्रयोगों] में ही यह समर्थन [लागू होता ] है।।५ ८।। कर्णावतंस आदि [प्राचीन प्रयोगों]के समान जघनकाञ्ची आदि [नवीन प्रयोग ] नहीं करने चाहिये। यह सब विषय ग्रन्थकारने वामनके 'काव्याल ङ्वारसूत्रवृत्ति' के आधारपर लिखा है। परन्तु वामनने २, २२ 'विशेषणस्य च' इस सूत्रमें गतार्थ विशेष्यका भी उसके विशेषण देनेके लिए प्रयोगका समर्थन किया है, और उसका उदाहरण 'जगाद मधुरां वाच विशदाक्षरशालिनीम्' यह पद्यांश दिया है। इसमें 'जगाद' यह पद 'गद व्यक्तायां वाचि' इस धातुसे सिद्ध होता है। इसलिए 'जगाद'के भीतर ही 'वाच' अर्थका समावेश हो जाता है। 'बोला' कहनेसे ही वाणी अर्थ आ जाता है, इसलिए 'वाणी बोला', वाच जगाद' यह कहनेकी आवश्यकता नहीं है। परन्तु उस वाणीके साथ 'मधुरां' विशेषण जोड़नेके लिए गतार्थ 'वाचं' पदका भी कभी-कभी प्रयोग किया जा सकता है। यह वामनका अप्रिप्राय है। परन्तु मम्मट इस बातका खण्डन करते हुए यह कहते हैं कि यहाँ 'मधुरां' को 'वाचं का विशेषण न बनाकर 'मधुर जगाद' इस रूपमें 'मधुर' पदका क्रियाविशेषणके रूपमें प्रयोग करनेसे भी उस प्रयोजनकी सिद्धि हो सकती है। इसलिए 'जगाद मधुरां वाचं जैसे प्रयोग नहीं करने चाहिये। इसी बातको अगली पंक्तिमें लिखते हैं- स्पष्ट अक्षरोंसे युक्त मधुरवाणी बोला ॥२६३। इत्यादिमें [ मधुर पदके 'मधुरं जगाद' इस रूपमें ] क्रियाविशेषण होनेपर भी अभीष्ट [विवक्षित] अर्थकी प्रतीति सिद्ध हो सकती है। इसलिए [ वामनका यह कहना कि] 'विशेषण जोड़नेके लिए कहीं. कहीं गतार्थ विशेष्यका भी प्रयोग किया जा सकता है' उचित नहीं है। अथवा यदि [ इस सिद्धान्तको] ठीक ही माना जाय तो -- जूतोंके द्वारा होनेवाली रक्षासे रहित [ अर्थात् बिना जूते पहिने नंगे ] पैरोंसे भी तेजीसे और दूरतक चलनेमें भी वह नहीं थकता है ॥२१४॥ इत्यादि उदाहरण देना चाहिये। ['जगाद मधुरां वाचं' यह ठीक नहीं है]।
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का० ५६, सू० ७८-७६] सप्तम उल्लास: ३४५
[सू० ७८ ] ख्यातेऽर्थे निर्हेतोरदुष्टता यथा- चन्द्रं गता पद्मगुणान्न भुङक्ते पद्माश्रिता चान्द्रमसीमभिख्याम् । उमामुखं तु प्रतिपद्य लोला द्विसंश्रयां प्रीतिमवाप लक्ष्मीः ॥२९५॥ अत्र रात्रौ पद्मस्य सङ्कोचः, दिवा चन्द्रमसच्च निष्प्रभत्वं लोकप्रसिद्धमिति 'न भुङक्ते' इति हेतुं नापेक्षते। [सू० ७९] अनुकरणे तु सर्वेषाम् सर्वेषां श्रुतिकटप्रभृतीनां दोषाणाम्। यथा- मृगचक्षुषमद्राक्षमित्यादि कथयत्ययम्। परयैष च गवित्याह सुत्रामाणं यजेति च ॥।२९६।
यहाँ ग्रन्थकारका अभिप्राय यह है, कि 'जगाद मधुरां वाच में 'मधुरां' इस विशेषणके बजाय 'मधर' पदको क्रियाविशेषण बना दिया जाय, तो गतार्थ हुए 'वाचं' इस विशेष्य पदको अलग ग्रहण करनेकी आवश्यकता नहीं रहती है। परन्तु यहाँ 'पादाभ्यां व्रजन्' इसमें चलनेकी किया पैरोंसे ही होती है, अतः 'पादाभ्यां' इस पदके प्रयोगके बिना भी उस अर्थकी प्रतीति हो सकती है। परन्तु यहाँ 'वजन्'के साथ जो 'पादाभ्यां' पद दिया गया है, उसका क्रियाविशेषणके रूपमें प्रयोग नहीं किया जा सकता है। अतः • यहाँ गतार्थ होनेपर भी 'पादाभ्यां' पदका प्रयोग उचित है। [सूत्र ७८] प्रसिद्ध अर्थमें निर्हेतुता [हेतु न होना ] दोष नहीं है। जैसे -- चञ्चल लक्ष्मी, चन्द्रके पास पहुँचकर कमलोंके [सुगन्ध आदि ] गुणोंका भोग नहीं कर पाती है और कमलमें स्थित होनेपर चन्द्रमाके सौन्दर्यका भोग करनेमें असभर्थ रहती है। परन्तु पार्वतीका मुख प्राप्त करके उसने [चन्द्रमें रहनेवाले सौन्दर्य तथा कमलमें रहनेवाले सौरभ आदि रूप ] दोनोंमें रहनेवाले आनन्दको प्राप्त किया ॥२६५॥ यहाँ रात्रिमें कमल बन्द हो जाते हैं और दिनमें चन्द्रमा कान्तिहीन हो जाता है [ इसलिए क्रमशः कमलोंका सौरभ और चन्द्रमाकी कान्ति उसको प्राप्त नहीं होती है। पार्वतीका मुख सदा ही चन्द्रमाके समान सुन्दर तथा कमलके समान सौरभयुक्त रहता है। इसलिए इसके पास पहुँचकर दोनोंके गुणोंको प्राप्त कर लक्ष्मी आनन्दका अनुभव करती है]। यह बात लोकप्रसिद्ध है, इसलिए 'न भुङक्ते' इसके लिए हेतुकी आवश्यकता नहीं रहती है [ अतः यहाँ अर्थके प्रसिद्ध होनेके कारण 'निहेंतुता' दोष नहीं है ]। [सू० ७६] अनुकरणमें सब दोषोंकी अदोषता है [ अर्थात् दूसरोंके दूषित पदोंके प्रयोगका अनुकरण करके बतलाते समय वत्ता जो उन दोषयुक्त पदोंका उच्चारण करता है, उनसे वक्ता दोषभाक् नहीं होता है ]। अनुकरणमें ['सर्वेषां' अर्थात् ] श्रुतिकटु आदि सब ही दोषोंकी [अदोषता है] जैसे- ससद वह [व्यक्ति] 'मैंने मृगनयनीको देखा' इत्यादि कहता है' और यह 'गौ देख' यह कहता है, और 'सुनामा [इन्ब] की पूजा कर' [यह कहता है] ।।२६६।।
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३४६ काव्यप्रकाश: [का० ५६, सू० ८० [सू० ८० ] वक्त्राद्यौचित्यवशाद्दोषोडपि गुण: क्वचित् क्वचिन्न । ॥ वक्तृप्रतिपाद्यव्यङ्गयवाच्यप्रकरणादीनां महिम्ना दोषोऽपि क्वचित् गुण:, क्वचिन्न दोषो न गुणः । तत्र वैयाकरणादौ वक्तररि प्रतिपाद्ये च, रौद्रादौ च रसे व्यङ्गचे कष्टत्वं गुण: क्रमेणोदाहरणम् ।
दीधीङवेवीङसमः कश्चिद् गुणवद्ध्यारभाजनम् । क्विप्प्रत्ययनिभ: कश्चिद्यत्र सन्निहिते न ते ।।२९३।।
यहाँ पूर्वार्द्धमें शृङ्गाररसमें 'अद्राक्षम्' यह श्रुतिकट् वर्णोंका प्रयोग किया गया है। अतः दोप होना चाहिये। तीसरे चरणमें 'गवित्याह' इसमें बिना विभक्तिके केवल प्रातिपादिकरूप 'गो' शब्दका प्रयोग किया है, जो 'न केवला प्रकृतिः प्रयोक्तव्या नापि केवलः प्रत्ययः' इस वैयीकरणसिद्धान्तके विपरीत होनेसे च्युतसंस्कारदोषग्रस्त है। चतुर्थ चरणमें 'सुत्रामा गोत्रभिद्वज्री' इत्यादि कोशके अनुसार 'सुत्रामा' शब्द इन्द्रके अरथमें पठित होनेपर भी कवियों द्वारा उस अरथमें प्रयुक्त न किये जानेसे 'अप्रयुक्तत्व' दोषग्रस्त है। परन्तु यहाँ वक्ता इनको अपनी ओरसे मूलरूपमें प्रयुक्त नहीं कर रहा है अपितु दूसरेके द्वारा प्रयुक्त किये हुए इन शब्दोंका अनुकरण करके यह निर्देश कर रहा है कि अमक व्यक्ति इस प्रकार कहता है। इसलिए अनुकरणमें इनमेंसे कोई भी दोप नहीं माना जाता है। [सूत्र ८०] वक्ता आदिके औचित्यके कारण कहीं दोष भी गुण हो जाता है और कहीं [ गुण या दोष ] दोनों ही नहीं होते हैं ।।५६।। वक्ता, बोद्धा [प्रतिपाद्य] व्यङ्गय, वाच्य और प्रकरण आदिके वैशिष्टय [महिम्ना] से कहीं दोष भी गुण हो जाता है और कहीं न दोष, न गुण होता है। उनमेंसे वैयाकरण आदिके वक्ता और बोद्धा होनेपर और रौद्र आदि रसके व्यङ्गच होनेपर कष्टार्थत्व [दोष ] गुण [हो जाता] है। कमशः उनके उदाहरण [आगे देते हैं]- सबसे पहिले वैयाकरणके वक्ता होनेपर कप्टत्व दोपके गुण हो जानेका उदाहरण देते है- कोई [पुरुष ] तो दीधीङ तथा वेवीड [धातु ]के समान हैं, जो गुण [पाण्डित्य, दान, शौर्यादि ] और वृद्धि [धन-धान्यकी समृद्धि ]के पात्र नहीं हैं [ यहींतक नहीं अपितु ] कोई क्विप प्रत्ययके समान है, जिसके पास आ जानेपर वे [ गुण-वृद्धि जिसको प्राप्त हैं, उससे भी दूर भाग जाती हैं। उसके ] पास [आ लानेपर गुणवान् तथा समृद्ध पुरुषोंकी गुण-वृद्धि भी ] नहीं रहने पाती है ॥।२६७।। गुण और वृद्धि शब्द व्याकरणशास्त्रके पारिभाषिक शब्द हैं। पाणिनिमुनिन 'अ्देङ गुण: १-१-२ इस सूत्रमें त्ररकार, एकार औरप्रौर त्रप्रोकारकी गुण संज्ञा की है, तथा 'वृद्धिरादैच्' १-१-१ इस सूत्र में आ,ऐ, तकी वृद्धि संज्ञा की है। इन शब्दोंसे इस पारिभाषिक अरथका ज्ञान वैयाकरणके अतिरिक्त अन्य लोगोंको सरलतासे नहीं हो सकता है। दीधीङ और वेवीङ ये दो धातुएँ धातुपाठमें पड़ी हुई हैं। इन दोनों धातुंमें 'दीधीवेवीटाम्' १-१-६ इस सूत्रसे गुण तथा वृद्धिका निषेध किया गया है। इसलिए आदीध्यनम्, आदीध्यकः आवेव्यनम्, आवेव्यकः आदि प्रयोगोंमें इन धातुत्रोंके इकारके स्थानपर
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का० ५६, सू० ८०] सप्तम उल्लास: ३४७
यदा त्वामहमद्राक्षं पदविद्याविशारदम् । उपाध्यायं तदाऽस्मार्ष समस्प्राक्षं च सम्मदम् ।२९८।। अन्त्रप्रोतबृहत्कपालनलकक्ूरक्वणत्कंकण-
पीतच्छर्दितरक्तकर्दमघनप्राग्भारघोरोल्लस- द्वयालोलस्तनभारभैरववपुर्दर्पोद्धतं धावति ॥२९९।।
एकार रूप गुण तथा वृद्धि 'नहीं होती है।' क्विप् प्रत्ययका 'वेरपृक्तस्य' ६-१-५७ इस सूत्रसे सर्वापहारी लोप हो जाता है। उसका कोई भाग शेष नहीं रहता है। परन्तु उसके परे होनेपर, क्डिति च' १-१-५ सूत्रसे गुण और वृद्धिका निषेध हो जाता है। जैसे 'लिट् भित्' आदि प्रयोगोंमें 'पुगन्तलघूपधस्य च' ७-३-८६ सूत्रसे प्राप्त होनेवाला गुण तथा 'मृट' आदि प्रयोगोंमें 'मृजेर्वृद्धिः' ७-२-११४ इस सूत्रसे प्राप्त होनेवाली वृद्धिका निषेध हो जाता है। ग्रन्थकारने इसको वैयाकरण वक्ता होनेपर कष्टत्वदोषके गुण हो जानेके उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया है। परन्तु इसको कष्टत्वके बजाय अप्रतीतत्वदोषके गुण हो जानेके रूपमें प्रयुक्त करना अधिक उपयुक्त है, क्योंकि किसी शास्त्रविशेषमें प्रसिद्ध शब्दोंके काव्यमें प्रयुक्त किये जानेपर अप्रतीतत्व दोष माना गया है। यहाँ व्याकरणशास्त्रके पारिभाषिक शब्दोंका प्रयोग होनेसे अप्रतीतत्व दोष हो सकता था, परन्तु वैयाकरणके वक्ता होनेके कारण वह दोष नहीं अपितु गुण हो गया है। * वैयाकरणके प्रतिपाद्य अर्थात् बोद्धा होनेपर कष्टत्वदोषके गुण हो जानेका उदाहरण देते हैं- जब मैंने व्याकरण [पदविद्या] के [अपूर्व ] विद्वान् आपको देखा तो [आपकी विद्वत्ताको देखकर ] मुझे अपने गुरुजी [ उपाध्याय] का स्मरण हो आया और मेरा अभिमान [सम्मद ] दूर हो गया [समस्प्राक्षम् ] ॥२६८।। यहाँ अद्राक्षम्, अस्मार्षम् तथा समस्प्राक्षं ये पद वस्तुतः श्रुतिकटु हैं। परन्तु वैयाकरणके बोद्धा होनेपर वह दोष नहीं अपितु गुण हो गया है। ग्रन्थकारने इसको कष्टत्वदोषके गुण हो जानेके उदाहरण- रूपमें प्रस्तुत किया है। आगे बीभत्सरसके व्यङ्गय होनेपर रसके अनुरोधसे श्रुतिकटदोषके गुण हो जानेका उदाहरण देते हैं। यह श्लोक 'महावीरचरित' के प्रथम अङ्गसे लिया गया है। बीभत्सरूपसे सामने भागती हुई ताड़काको देखकर लक्ष्मण विश्वामित्रके सामने उसके बीभत्स रूपका वर्णन करते हुए उनसे पूछते हैं कि यह कौन दौड़ रही है। प्रश्नभाग इस श्लोकमें नहीं है। अपितु इसके पूर्व गद्यभागमें 'का पुनरियम्' करके दिया गया है। श्लोकमें तो केवल लक्ष्मण उसके बीभत्स रूपका वर्णन करते हैं कि- अँतड़ियोंमें पिरोये हुए बड़े-बड़े कपाल और [नलक अर्थात् ] जङ्गाकी हड्डियोंके ही भयानक रूपसे [ परस्पर टकराते] बजते हुए कङ्कण जिसमें प्रधान हैं इस प्रकारके [अस्थियों आदिसे ही बने हुए] नाना प्रकारके आभूषणोंके शब्दोंसे आकाशको आघोषित [कोलाहलमय ] करती हुई और पहिले [ बहुत अधिक मात्रामें ] पी जानेके बाद वमन किये हुए रक्तके कीचड़से सने हुए [प्राग्भार अर्थात् छाती आदि] ऊपरी भागके बीचमें भयङ्गूररूपसे उठे हुए [भारी-भारी ] हिलते हुए स्तनोंके भारसे भयङ्कर शरीरवाली अभि- मानसे उद्धत होकर [यह कौन ] दौड़ रही है ।२६६।।
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२४८ काव्यप्रकाश: [ का० ५६, सू० ८०
वाच्यवशाद् यथा -- मातङ्गा: किमु वल्गितैः किमफलैराडम्वरैर्जम्बुकाः । सारङ्गा महिषा मदं व्रजथ किं शून्येषु शूरा न के। कोपाटोपसमुद्भटोत्कटसटाकोटेरिभारे: पुरः सिन्धुध्वानिनि हुङकृते स्फुरति यत् तद्गजितं गजितम् ॥३००॥ अत्र सिंहे वाच्ये परुषा: शब्दाः । प्रकरणवशाद् यथा- रक्ताशोक कृशोदरी क्व नु गता त्यक्त्वानुरक्त जन नो दृष्टेति मुधैव चालयसि कि वातावधूतं शिरः।
स्तत्पादाहतिमन्तरेण भवतः पुष्पोद्गमोऽयं कुतः ॥२०१। अत्र शिरोधूननेन कुपितस्य वचसि।
यहाँ बीभत्सरसके व्यङ्गय होनेके कारण, श्रुतिकट वर्ण तथा दीर्घसमाससे युक्त कठोर रचना गुण हो गयी है। वाच्यके कारण [कष्टत्वदोषके गुण हो जानेका उदाहरण ।] जैसे- अरे हाथियो ! [सिंहकी अनुपस्थितिमें] चिंघाड़ने [या झूमने]से क्या होता है ? अरे शृगालो ! व्यर्थ [अपनी चञ्चलताके और वीरताके मिथ्या ] ढोंग करनेसे क्या लाभ है? अरे मृगो ! और भैंसो ! तुम क्यों मतवाले हो रहे हो [ क्यों अभिमान कर रहे हो] [किसी वीरके न होनेपर ] खाली मैदानमें कौन शूर नहीं हो जाता है। परन्तु क्रोधके आदेशमें खड़े हुए भयडगूर सटाओंके अग्रभागोंसे युक्त और समुद्रके समान दहाड़ते हुए शेरका हुड्गार होनेपर भी जो गर्जन हो वही गर्जन [कहलाने योग्य] है।।३०० ।। यहाँ सिंहके वाच्य होनेपर कठोर शब्दोंका प्रयोग हो गया है। प्रकरण [के अनुरोध ] से [कष्टत्व दोष गुण हो जानेका उदाहरण ] जैसे-हे रक्ताशोक ! इस अनुरक्त सेवकको छोड़कर कृशोदरी [उर्वशी] कहाँ चली गयी है [ यह पुरूरवाका रक्ताशोकके वृक्षसे प्रश्न है। वृक्षको सिर हिलाता हुआ देखकर स्वयं उसके उत्तरकी कल्पना करके कहता है कि -- ] मैंने नहीं देखी है [ इस बातको सूचित करनेके लिए ] वायुसे कम्पित सिरको क्यों हिला रहा है। [तेरे ऐसे सिर हिला देनेसे यह थोड़े ही मान लिया जायगा कि तूने उसको देखा नहीं है क्योंकि] उसके पादप्रहारके बिना [तेरे फूलोंके पास] उत्कण्ठावश इकट्ठे हुए भौरोंके समूहसे जिनकी पंखुड़ियाँ टूटी जा रही हैं, इस प्रकारका तेरा यह फूलोंका उद्गम कहाँसे आया ? ॥३०१। यहाँ [अशोकके ] सिर हिलानेसे कुपित हुए [ पुरूरवा]की उक्तिमें [ समासबहुल परुष वर्णोंका प्रयोग गुण हो गया है]। इन सब श्लोकोंके प्रारम्भमें ग्रन्थकारने केवल कष्टत्वदोषके गुण हो जानेका उल्लेख किया है और उसी दृष्टिसे ये मब उदाहग्ण दिये हैं। परन्तु इन उदाहरणोंमें कष्टत्वदोग नहीं अपितु शनिकट
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का० ५६, सू० ८०] सप्तम उल्लास: ३४६ क्वचिन्नीरसे न गुणो न दोषः। यथा -- शीर्णघ्राणांघ्रिपाणीन् व्रणिभिरपघनैरघर्घराव्यक्तघोषान् दीर्घाघ्ातानघौघै: पुनरपि घटयत्येक उल्लाघयन् यः । धर्मांशोस्तस्य वोऽन्तर्द्विगुणघनघृणानिघ्ननिर्विघ्नवृत्ते- दत्तार्घाः सिद्धसङ्गविंदधतु घृणयः शीघ्रमंहोविघातम् ॥३०२। अप्रयुक्तनिहितार्थौं श्लेषादावदुष्टौ। यथा -- येन ध्वस्तमनोभवेन बलिजित्कायः पुरा स्त्रीकृतो यश्चोद्वृत्तभुजङ्गहारवलयो गङ्गां च योऽधारयत्। यस्याहुः शशिमच्छिरोहर इति स्तुत्यं च नामामरा: पायात्स स्वयमन्धकक्षयकरस्त्वां सर्वदो माधवः ॥३०३॥
दोष, अप्रतीतत्वदोष आदि पाये जाते हैं उन्हींको कष्टप्रद होनेके कारण लक्षणासे कष्टपदसे कह दिया है। इस प्रकारकी व्याख्या करनेसे ही इस प्रकरणकी ठीक सङ्गति लग सकती है। अतः कष्टत्वपदको श्रुति- कटु आदि अन्य दोषोंका भी ग्राहक समझना चाहिये। कहीं नीरस [काव्य ] में [क्लिष्ट रचना ] न दोष होती है, न गुण। जैसे -- यह श्लोक मयूरकविके रचित 'सूर्यशतक' से लिया गया है। मयूरकविने अपने कुष्ठरोगके निवारणके लिए सूर्यकी स्तुतिमें 'सूर्यशतक' की रचना की थी। इसलिए इस श्लोकमें सूर्यकी रश्मियोंकी .कुष्ठनिवारणी शक्तिकी स्तुति करते हुए मयूरकवि लिखते हैं कि -- [अपने पापसमूहोंके कारण ] जिनके नाक, पैर और हाथ [कुष्ठरोगसे ] गल गये हैं [ इसलिए] चौड़ी हुई नाकवाले और घर्घर अस्पष्ट रूपसे बोलनेवाले, घावोंसे भरे हुए अङ्गोंसे उपलक्षित [अपघनो- डङ्गम् ] कुष्ठियोंको जो नीरोग [ उल्लाघो निर्गतो गदात्'] करते हुए फिर [उन गलित अङ्गोंसे] पूर्ण बनाता है [ स्तुतिके द्वारा प्रसन्न होनेके कारण ] द्विगुणित घनीभूत दयाके अधीन [होनेसे ] निर्विध्न [रूपसे पाप रोगका विनाश करनेवाले ] व्यापारसे युक्त उस अद्वितीय सूर्यदेवकी, सिद्धदेवगणोंके द्वारा जिनको अर्घ प्रदान किया गया है, वे रश्मियाँ शीघ्र ही तुम्हारे पाप [ जन्य रोगों तथा कुष्ठों] का विनाश करें ॥३०२॥ श्लेष आदिमें 'अप्रयुक्तत्व' तथा 'निहतार्थत्व' दोष नहीं होते हैं : जैसे -- इसमें शिव तथा विष्णु दोनोंकी एक साथ श्लेष द्वारा स्तुति की गयी है। सारे विशेषण दोनों पक्षोंमें लगते हैं, विष्णुपक्षमें श्लोकका अर्थ निम्नलिखित है] -- [येन अभवेन ] जिस अजन्मा विष्णुने [अनो ध्वस्तं] बालकपनमें [अनः शकटम् ] बच्चोंकी गाड़ी अथवा शकटासुरका नाश किया। पुरा पहिले [अर्थात् अमृतहरणके समय] 'बलिजित्' राजा बलिको [अथवा बलवान् दैत्योंको ] जीतनेवाले अपने शरीरको [मोहिनी रूप ] स्त्री बना दिया। जो 'उद्वृत्त' मर्यादाका अतिकरमण करनेवाले भुजङ्ग अर्थात् कालिय नागको मारनेवाले हैं, और जिनमें रव अर्थात् श्रुतिरूप वेदका लय होता है, अथवा 'अकारो विष्णुः' अकाररूप शब्दमें जिनका लय होता है,
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३५० काव्यप्रकाश: [ का० ५६, सू० ८०
अत्र माधवपक्षे शशिमदन्धकक्षयशब्दौ अप्रयुक्तनिहताथौं। अश्लीलं क्वचिद् गुणः । यथा सुरता रम्भगोष्टयोम्, 'द्वयर्थ : पदैः पिशुनयेच्च रहस्यवस्तु' इति कामशास्त्रस्थितौ -- करिहस्तेन सम्वाधे प्रविश्यान्तर्विलोडिते। उपसर्पन् ध्वज: पुंसः साधनान्तर्विजराजते ।३०४।।
जिन्होंने 'अगं' अर्थात् गोवर्धन पर्वतको और 'गां' अर्थात् वराहावतारके समय पृथिवीको धारण किया। ['शशिनं मथ्नाति इति शशिमत् राहुः' राहुका सिर काटनेवाले होनेसे ] देवता लोग जिनका 'शशिमच्छि- रोहर' यह प्रशंसनीय नाम कहते हैं। अन्धक अर्थात् यादवोंका भी [महाभारतके मौसल पर्वकी कथाके अनुसार ] विनाश करनेवाले अथवा द्वारिकापुरीमें उनके 'क्षय' अर्थात् वासगृ के बनानेवाले सब मनो- कामनाओंको देनेवाले हैं वे विष्णु तुम्हारी रक्षा करें। [शिवपक्षमें इस श्लोकका अर्थ इस प्रकार होगा-'धवस्तो मनोभवः कामो येन सः 'ध्वस्त- मनोभवः' ] कामदेवका नाश करनेवाले जिन शङ्गरने 'पुरा' त्रिपुरदाहके समय 'बलिजित्कायः' विष्णुके शरीरको 'अस्त्रीकृतः' बाण बनाया, जो महा भयानक [उद्वृत्त ] सर्पोंको हार और वलयके रूपमें धारण करते हैं, गङ्गाको जिन्होंने धारण किया, जिनका शिर चन्द्रमासे युक्त है, और देवता लोग जिनका 'हर' यह प्रशंसनीय नाम बतलाते हैं, अन्धकासुरका नाश करनेवाले वे उमाधव गौरीपति [शङकर] सदैव तुम्हारी रक्षा करें॥३०३॥ वहाँ विष्णुपक्षमें, 'शशिमद्' तथा 'अन्धकक्षय' शब्द अप्रयुक्त तथा निहतार्थक है। अश्लीलता [भी] कहीं गुण होती है-जैसे सुरतके आरम्भकालकी बातों [गोष्ठी ] में। 'गुप्त वस्तुको द्वयर्थक पदोंसे सूचित करे, इस प्रकारके कामशास्त्रके सिद्धान्तके अनुसार [निम्नलिखित श्लोककी अश्लीलता गुण है]- प्रागेव पुंसः सुरते न यावन्नारी द्रवेद् भोगफलं न तावत्। अतो बुधैः कामकलाप्रवीणैः कार्यः प्रयत्नो वनिताद्रवत्वे॥ कामशास्त्रके इस प्रमुख सिद्धान्तके अनुसार वनिताद्रवत्वके सम्पादनके लिए इस उदाहरणमें 'करिहस्त'का प्रयोग करना बतलाया है। 'करिहस्त'का लक्षण निम्नलिखित प्रकार किया गया है- तर्जन्यनामिके युक्ते मध्यमा स्याद् बहिष्कता। करिहस्तः समुद्दिष्टः, कामशास्त्रविशारदैः ॥ 'सम्बाधे' संकुचित योनिमें 'करिहस्त'को [अर्थात् तर्जनी, मध्यमा तथा अनामिका-तीनों अँगुलियोंको मिलाकर ] प्रविष्ट कर, अन्दर विडोलन [द्रवीभाव सम्पादन ] करके पुरुषका [ध्वज: ] लिङ्ग, उपसर्पन् गच्छन् गतागतं कुर्वन् वा साधनस्य योने: अन्तविराजते ॥३०४॥ इस प्रकार कामशास्त्रकी रहस्यवस्तुको सुरतारम्भगोष्ठीके समय व्यक्त किया गया है। श्लोकका दूसरा अर्थ इस प्रकार है-
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३५१ का० ५६, सू० ८०] सप्तम उल्लाम:
शमकथासु- उत्तानोच्छनमण्डकपाटितोदरसन्निभे। क्लेदिनि स्त्रीव्रणे सक्तिरकृमे: कस्य जायते ॥३०५॥ निर्वाणवैरदहना: प्रशमादरीणां नन्दन्तु पाण्डुतनयाः सह माधवेन। रक्तप्रसाधितभुवःक्षतविग्रहाश्च स्वस्था भवन्तु कुरुराजसुताः सभृत्याः ॥३०६॥
अत्र भाव्यमङ्गलसूचकम्। सन्दिग्धमपि वाच्यमहिम्ना क्वचित्नियतार्थप्रतीतिकृत्त्वेन व्याजस्तुतिपर्यवसायित्वे
गुण: । यथा-
हाथीकी सूंड़ोंके द्वारा सेनाके भीतर प्रविष्ट होकर और भीतरसे विलोडित कर देनेपर योद्धा पुरुषकी ध्वजा उसके पीछे-पीछे चलकर शत्रुसेनाके बीचमें जाकर विराजित हो जाती है॥३०४॥ इस उदाहरणमें सुरतारम्भगोष्ठीके समय व्रीडाव्यञ्जक अश्लीलता गुण हो गयी है। इस प्रकार वैराग्यविषयक चर्चाके समय जुगुप्साव्यञ्जक अश्लीलता गुण हो जाती है, इसका उदाहरण आगे देते हैं- [उत्तान अर्थात् ] ऊपरको पेट करके पड़े हुए और फूले हुए [ या किसी रोगके कारण सूजे हुए] मेढकके फाड़े हुए पेटके समान, मवाद बहाते हुए [ मदनजलसे युक्त ] स्त्रीकी योनिमें कीड़ोंके अतिरिक्त और किसकी आसक्ति हो सकती है॥३०५॥
आगे अमङ्गलव्यञ्जक अश्लीलताके गुणत्वका उदाहरण देते हैं। यह श्लोक 'वेणीसंहार' नाटकके प्रथम अङ्कमें सूत्रधारकी उक्तिके रूपमें आया है। उसमें पाण्डवोंकी विजय तथा कौरवोंके भावी अमङ्गलकी सूचना मिलती है। श्लोकके उत्तरार्द्धमें कौरवोंकी मङ्गलकामनापरका अर्थ भी निकलता है, परन्तु उन्हीं पदोंसे श्लेष द्वारा अ्मङ्गलकी सूचना भी मिलती है। अर्थ इस प्रकार है- शत्रुओंके नष्ट हो जानेसे जिनका वैराग्नि शान्त हो गया है, इस प्रकारके पाण्डव कृष्णके सहित आनन्द मनावें। अपने अनुरक्त मित्रों आदिको भूमिदान करनेवाले [रक्तेभ्यः प्रसाधिता भूः यैस्ते रक्त- प्रसाधितभुवः ] और युद्धका नाश कर देनेवाले कौरव लोग भृत्योंके सहित स्वस्थ हों। [यह दोनों पक्षोंकी शुभकामनापरक अर्थ है। परन्तु उत्तरार्द्धका दूसरा अर्थ, 'रक्तेन प्रसाधिता भू: यैस्ते' अपने रक्तसे जमीनको रँग देने वाले और जिनके शरीर घायल हो गये हैं [ क्षतविग्रहाः ] वे कौरवगण अपने भृत्योंके साथ 'स्वः स्वर्गे स्थिता भवन्तु' स्वर्गको चले जावें अर्थात् मर जावें। इस अमङ्गलको सूचित करनेवाला है। परन्तु यह अमङ्गलव्यञ्जक अश्लीलता यहाँ दोष नहीं अपितु गुण है] ॥३०६।। यहाँ भावी अमङ्गलकी सूचक [अश्लीलता गुण हो गयी है ]। सन्दिग्धत्व भी कहीं वाच्यके प्रभावसे नियत अर्थका प्रतीतिजनक होनेसे व्याजस्तुतिपर्यवसायी होकर गुण हो जाता है। जैसे --
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३५२ काव्यप्रकाश: [ का० ५६, सू० ८०
पृथुकार्तस्वरपात्रं भूषितनिःशेषपरिजनं देव। विलसत्करेणुगहनं सम्प्रति सममावयोः सदनम् ॥३०७॥ प्रतिपाद्यप्रतिपादकयोर्ज्ञत्वे सत्यप्रतीतत्वं गुणः । यथा -- आत्मारामा विहितरतयां निर्विकल्पे समाधी ज्ञानोद्रेकाद्विघटिततमोग्रन्थय: सन्चनिष्ठाः । यं वीक्षन्ते कमपि तमसा ज्योतिषां वा परर्नात तं मोहान्धः कथमयमम्ं वेि देव 7राणम् ।।३०८।।
[निधन कवि राजासे कह रहा है फि ] हे राजन् ! इस समय हम दोनोंका [मेरा और आपका] घर एक ही समान है। [वह समानता श्लिष्ट पदों द्वारा बतलाता है। 'पृथुकार्तस्वरपात्रं पृथूनि महान्ति कार्तस्वरस्य सुर्वणस्य पात्राणि यस्मिस्तथा, पृथुकानां बालानां आर्तस्वरस्य बुभुक्षादिवशाद् रोदनस्य पात्रं] बड़े-बड़े सोनेके पात्रोंसे युक्त [आपका घर है, और मेरा घर भूखे ] बालकोंके रोनेका स्थान है। [दूसरी समानता है, 'भूषितनिःशेषपरिजनं' भूषिता अलङकृताः सर्वे परिजनाः सेवका यस्मिस्तथा, भुवि पृथिव्याम् उषिताः पतिता: सर्वे परिवारजना: यस्मिन् ] जिसमें सारे सेवक आभूषणोंसे अलङकृत हैं [ऐसा आपका घर है, और मेरा घर] जिसमें परिवारके सारे सदस्य पृथिवीपर पड़े हैं। [तीसरी समानता है कि हम दोनोंके घर 'विलसत्करेणुगहनं' हैं। विलसन्तीभिः करेणुभिः गहनं व्याप्तं तथा विले सीदन्तीति विलसत्का: मूषकाः तेषां रेणुः विलान्निर्गता धूलि: तया पूर्णम्] झूमती हुई हथिनियोंसे भरा [आपका घर है और मेरा घर ] चूहोंके बिलोंसे [निकली हुई] धूलसे भरा हुआ है॥३०७। यहाँ 'पृथुकार्त्तस्वरपात्र' इत्यादि विशेषणोंका कौन-सा अर्थ लिया जाय यह सन्दिग्ध है, परन्तु दोनों अर्थ दो भिन्न स्थितियोंके बोधक होकर व्याजस्तुति द्वारा राजाकी निन्दाको सूचित करते हैं, इसलिए यह सन्दिग्धत्व भी गुण हो गया है। बोद्धा तथा वक्ताके [ उस शास्त्रके ] ज्ञाता होनेपर अप्रतीतत्वदोष भी गुण हो जाता है। जैसे -- 'वेणीसंहार' नाटकके प्रथम अङ्गमें दूतरूपमें अपपनी सभामें आ्रराये हुए कृष्णको पकड़नेका दुर्योधनने प्रयत्न किया था। इस समाचारको सुनकर भीम सहदेवसे कह रहे हैं कि जिस कृष्णके स्वरूपको, उनके भगवान् होनेके कारण, ज्ञानी लोग भी समाधिस्थ होकर कठिनाईसे समझ पाते हैं उनको यह मोहान् दुर्योधन क्या समझ सकता है। निर्विकल्पक समाधिमें स्थित होकर आत्मस्वरूपमें रमण करनेवाले ज्ञानके उद्रेकसे जिनको तमोगुणकी ग्रन्थियाँ नष्ट हो गयी हैं, इस प्रकारके सत्त्वप्रधान योगी, तम और ज्योति दोनोंसे परे किसी अनिर्वचनीय स्वरूप जिस [परमात्मारूप कृष्ण ] को बड़ी कठिनाईसे देख पाते हैं, यह मोहान्ध [अज्ञानी दुर्योधन] उन पुरातन [सनातन ]देव [विष्णुस्वरूप कृष्ण ] को कैसे पहचान सकता है।३० =। यहाँ निर्विकल्प समाधि, आत्मरमण आदि शब्द योगशास्त्रके प्रसिद्ध शब्द है। गोमणास्तगात ये प्रसिद्ध उन शब्दोंके प्रयोगसे यहाँ अप्रतीतत्वदोष हो सकता है। परन्तु वक्ता भाग और वाढा सददेव, दोनों उस विपयके ज्ञाता हैं, अतः अप्रतीतत्वनोष यहाँ गुण हो गया है।
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का० ५६, सू० ८० ] सप्तम उल्लास: ३५३ स्वयं वा परामर्शे यथा- षडधिकदशनाडीचक्रमध्यस्थितात्मा हृदि विनिहितरूपः सिद्धिदस्तद्विदां यः । अविचलितमनोभिः साधकैमृग्यमाणः स जयति परिणद्धः शक्तिभिः शक्तिनाथः ॥३०१॥ अधमप्रकृत्युक्तिषु ग्राम्यत्वं गुणः। यथा- फुल्लुक्करं कलमकूरणिहं वहंति जे सिन्धुवारविडवा मह वल्लहा दे। जे गालिदस्स महिसीदहिणो सरिच्छा दे किं च मुद्धविअइल्लपसूणपुंजा ।।३१०॥ [पुष्पोत्करं कलमभक्तनिभं वहन्ति ये सिन्धुवारविटपा मम वल्लभास्ते। ये गालितस्य महिषीदध्नः सदृक्षास्ते कि च मुग्धविचकिलप्रसूनपुञ्जाः ।इति संस्कृतम् ] अत्र कलमभक्तमहिषीदधिशब्दा ग्राम्या अपि विदूषकोक्तौ। [इसी प्रकार ] स्वयं चिन्तन [करने ] में अप्रतीतत्व दोष गुण हो जाता है] जैसे- [ 'भालतीमाधव' नाटकके पञ्चम अङ्कमें स्वयं विचार करती हुई कपालकुण्डला कह रही है-] सोलह नाड़ियोंके [ हृदयस्थित मणिपूर ] चक्रके मध्यमें जिसका स्वरूप [आकार ] स्थित है, जो उसको जाननेवालोंको [अणिमा आदिरूप ] सिद्धियोंका प्रदान करनेवाला है और स्थिरचित्त साधकोंके द्वारा जिसका अनुसन्धान किया जाता है वह शक्तियोंसे युक्त शिव सर्वोत्कषशाली है ॥३०॥ यहाँ नाड़ी, चक्र, शक्ति, शक्तिनाथ आदि शब्द हठयोगशास्त्रके शब्द हैं, अतः उनका काव्यमें प्रयोग अप्रतीतत्व दोषका जनक होना चाहिये। परन्तु कपालकुण्डला स्वयं चिन्तनके अवसरपर उनका प्रयोग कर रही है अतः यह दोष नहीं अपितु गुण हो गया है। इसमें दिखलायी हुई सोलह नाड़ियाँ निम्नलिखित प्रकार हैं- इड़ा च पिङ्गला चैव सुषुम्ना चापराजिता। गान्धारी हस्तिजिह्वा च पूषा चैव तथापरा।। अलम्बुसा कुहूश्चैव शंखिनी दशमी स्मृता। तालुजिह्वेभजिह्वा च विजया कामदापरा।। अमृता बहुला नाम नाडयो वायुसमीरिताः॥ नीच प्रकृति [के पात्रों]की उक्तियोंमें ग्राम्यत्व [दोष ] गुण हो जाता है। जैसे- राजशेखरविरचित 'कर्पूरमञ्जरी' नामक नाटिकामें प्रथम जवनिकाके बाद विदूषककी यह उक्ति है- चावलोंके भातके समान पुष्पोंके समूहको जो धारण करते हैं, वे सिन्धुवार [निर्गुण्डी]के वृक्ष मुझे प्यारे लगते हैं। [इसी प्रकार ] निचोड़े हुए [निर्जल किये हुए ] भैंसके [ दूधसे जमाये हुए] वहीके समान सुन्दर मल्लिकापुष्पोंके पुञज भी मेरे प्रिय हैं॥३१०॥ यहाँ अधमपात्र विदूषककी उक्तिमें भातके समान या दहीके समान फूलोंका कथन ग्राम्यता- पूर्ण वर्णन भी गुण हो गया है। उसके द्वारा विद्ग्धोंको भी रसास्वाब होता है। २3
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३५८ काव्यप्रकाश: [ का० ५६, सू० ८०
न्यूनपदं क्वचिद् गुण: । यथा- गाढालिङ्गनवामनीकृतकुचप्रोद्भूतरोमोद्गमा सान्द्रस्नेहरसातिरेकविगलच्च्छ्ीमन्नितम्बाम्बरा। मा मा मानद माऽति मामलमिति क्षामाक्षरोल्लापिनी सुप्ता कि नु मृता नु कि मनसि मे लीना विलीना नु किम् ।।३११।। क्वचिन्न गुणो न दोषः । यथा- तिष्ठेत्कोपवशात्प्रभावपिहिता दीर्घं न सा कुप्यति स्वर्गायोत्पतिता भवेन्मयि पुनर्भावार्द्रमस्या मनः । तां हत्तु® विबुधद्विषोऽपि न च मे शक्ताः पुरोवर्तिनी सा चात्यन्तमगोचरं नयनयोर्यातेति कोऽयं विधिः ॥३१२॥ अत्र 'पिहिता' इत्यतोऽनन्तर 'नैतद्यतः' इत्येतैन्यूनैः पदैर्विशेषबुद्धेरकरणान्न गुणः । उत्तरा प्रतिपत्तिः पूर्वा प्रतिपत्ति वाधते इति न दोषः ।
यहाँ कलम, भक्त, महिषी-दधि आदि शब्द ग्राम्य होनेपर भी विदूषककी उक्तिमें [ गुण हो गये हैं]। न्यूनपदत्व [भी] कहीं गुण हो जाता है। जैसे-[ यह श्लोक 'अमरुकशतक'से लिया गया है] गाढ़ आलिङ्गन [अधिक दबने ]से जिसके स्तन नीचे हो गये हैं। जिसके [ शरीरमें आनन्दातिरेकसे] रोमाञ्च हो आया है और अत्यन्त स्नेहके आनन्दातिरेकके कारण जिसके सुन्दर नितम्बोंपरसे वस्त्र खिसक पड़ रहा है। मानको खण्डन करनेवाले या सम्मानको देनेवाले [प्रियतम, ] बस करो, बस करो, अब मुझे और न पीड़ित करो, इस प्रकार धीरे-धीरे कहती हुई [ आनन्दकी चरमभूमिमें पहुँचकर एकदम चुप हो गयी, तो उस समय वह] क्या सो गयी ? अथवा मर गयी, अथवा मेरे मनमें समा गयी, अथवा [नीरक्षीरन्यायसे ] विलीन हो गयी [अथवा जलमें लवणके समान विलीन हो गयी]।।३११।। इसमें 'मा मा' इसके बाद 'आयासय' और 'माति' इसके बाद 'पीडय' ये पद न्यून हैं। परन्तु उनकी अध्याहार द्वारा झटिति प्रतीति हो जानेसे यह दोष नहीं है, अपितु हर्ष एवं सम्मोहके अतिशयका सूचक होनेसे गुण हो गया है। कहीं [न्यूनपदता ] न गुण होता है, न दोष। जैसे -- वह [उर्वशी ] कोधके कारण अपने [देवाङ्गनात्वके दिव्य] प्रभावसे छिपकर बैठ सकती है[ यह शङ्गा होती है, परन्तु उसी समय उसका समाधान हो जाता है कि ] किन्तु वह बहुत देरतक नाराज नहीं रहती है। फिर दूसरी शङ्का होती है कि ] शायद [मुझको छोड़कर ] स्वर्गको चली गयी हो [ पर साथ ही उसका निवारण भी हो जाता है कि ] लेकिन उसका मन मुझपर स्नेहसे आर्द्र है। [इसलिए वह मुझे छोड़कर स्वर्गको नहीं जा सकती है। तब फिर क्या कोई हरण कर ले गया यह शङ्का होती है, उसके साथ ही उसका समाधान हो जाता है कि] मेरे सामनेसे असुर भी उसका अपहरण नहीं कर सकते [औरोंकी बात ही क्या है। इसलिए कोई अपहरण कर ले गया हो यह भी सम्भव नहीं ], फिर भी वह आँखोंके सामनेसे बिलकुल ओझल हो गयी है, यह क्या वात है [ कुछ समझमें नहीं आता है] ।३१२।
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का० ५६, सू० ८० ] सप्तम उल्लास: ३५५
अधिकपदं क्वचिद् गुणः । यथा -- यद्वञ्चनाहितमतिर्बहु चाटुगर्भू कार्योन्मुखः खलजनः कृतकं ब्रवीति। तत्साधवो न न विदन्ति, विदन्ति किन्तु कतुवृथा प्रणयमस्य न पारयन्ति॥३१३॥ अत्र 'विदन्ति' इति द्वितीयमन्ययोगव्यवच्छेदपरम् ।
यथा वा- वद वद जितः शत्रुर्न हतो जल्पंश्च तव तवास्मीति। चित्रं चित्रमरोदीद्धा हेति परं मृते पुत्रे ।।३१४।। इत्येवमादौ हर्षभयादियुक्ते वक्तरि। कथितपदं क्वचिद् गुण: लाटानुप्रासे, अर्थान्तरसंक्रमितवाच्ये, विहितस्यानुवाद्यत्वे च । क्रमेणोदाहरणानि --
यहाँ 'पिहिता' इसके बाद 'नैतद्यतः' इन [ न, एतत् और यतः तीन ] न्यून पदोंसे [ जो आवश्यक होनेपर भी पढ़े नहीं गये हैं] कोई विशिष्ट बुद्धि [अर्थात् उक्त वितर्कमें कोई चमत्कार] न करनेसे गुण नहीं है। और उसके बाद होनेवाली प्रतीति पूर्वप्रतीतिको बाधित कर देती है [ जो कि कविको यहाँ अभिप्रेत है' इसलिए [उन पदोंकी न्यूनता कोई ] दोष [भी] नहीं है। अधिकपदत्व कहीं गुण हो जाता है। जैसे -- [दूसरे सज्जन व्यक्तिको] धोखा देनेके लिए तत्पर दुष्ट पुरुष अपना कार्य सिद्ध करनेके लिए [सज्जन पुरुषके सामने ] जो बनावटी खुशामदभरी बातें बनाता है, उसको सज्जन पुरुष न समझ पाते हों सो बात [नहीं सब समझ जाते हैं] परन्तु फिर भी [अपनी सज्जनतावश] उसकी प्रार्थना अस्वीक,र करनेमें असमर्थ हो जाते हैं॥३१३।। यहाँ दूसरी बार आया हुआ 'विदन्ति' खूब समझते हैं, यह अन्य [व्यक्तियों] के साथ [उस ज्ञानके] सम्बन्धके निषेधका सूचक है [ अर्थात् वे सज्जन पुरुष सब समझ तो जाते हैं, परन्तु किसी दूसरेपर इस बातको प्रकट नहीं होने देते हैं ]। अथवा [अधिकपदत्वके गुण हो जानेका दूसरा उदाहरण ] जैसे- [युद्धसे लौटे हुए सैनिकसे स्वामी राजा पूछता है कि-]बताओ बताओ, वह शत्रु जीता गया [या नहीं। इसके उत्तरमें सेवक कहता है कि जीतनेकी क्या बात है, वह तो आपकी शरणमें आकर] मैं आपका दास हूँ यह कहने लगा इसलिए मारा नहीं गया, परन्तु [उसका पुत्र तो युद्धमें मारा ही गया] पुत्रके मरनेपर वह हाय-हाय करके फूट-फूट करके [ नाना प्रकारसे ] रो रहा था ॥३१४॥ इत्यादि उदाहरणोंमें हर्ष-भय आदिसे युक्त [वक्ताके होनेसे अधिकपदत्व दोष ] गुण हो जाता है]। कथितपदत्व [अर्थात् पुनरुक्तत्व ] कहीं [अर्थात् ] १. लाटानुप्रास, २. अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य [ध्वनि ] तथा ३. विहितके अनुवाद करनेमें [ तीन स्थानोंपर ] गुण हो जाता है। क्रमशः [उन तोनोंके ] उवाहरण [देते हैं]-
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३५६ काव्यप्रकाश [ का० ५६, सू० ८० सितकरकररुचिरविभा विभाकराकार! धरणिधर ! कीतिः । पौरुषकमला कमला सापि तवैवास्ति नान्यस्य ।।३१५।। ताला जाअंति गुणा जाला दे सहिअएहिं घेप्पन्ति। रइकिरणाणुग्गहिआइं होन्ति कमलाइं कमलाइं ।३१६। [ तदा जायन्ते गुणाः यदा ते सहृदयैर्गृह्यन्ते। रविकिरणानुगृहीतानि भवन्ति कमलानि कमलानि ।।इति संस्कृतम् ] जितेन्द्रियत्वं विनयस्य कारणं गुणप्रकर्षो विनयादवाप्यते। गुणप्रकर्षेण जनोऽनुरज्यते जनानुरागप्रभवा हि सम्पदः ॥३१७॥ पतत्प्रकर्षमपि क्वचिद् गुणः । यथा उदाहृते- प्रागप्राप्तेत्यादौ' ।।३१८।।
हे सूर्यके समान प्रतापशाली [विभाकराकार ] राजन् ! [(सितकर ] चन्द्रमाकी किरणोंके समान [शुभ्र ] १. कीति और २. परात्रमलक्ष्मी [पौरुष-कमला ] तथा ३. वह [प्रसिद्ध] लक्ष्मी [ये तीनों लक्ष्मियां ] भी आपकी ही हैं, अन्य किसीकी नहीं ॥३१५॥ यहाँ कर-कर, विभा-विभा तथा कमला-कमला इन तीनों स्थलोंपर तात्पर्यका भेद होनेपर शब्द तथा अर्थ दोनोंकी आवृत्ति होनेसे लाटानुप्रास है। लाटानुप्रासका लक्षण इस प्रकार किया है-'शाब्दस्तु लाटानुप्रासो भेदे तात्पर्यमात्नतः')। लाटानुप्रास होनेसे यहाँ इन पदोंकी पुनरुक्ति दोष नहीं है। आगे अथान्तरसंक्र्कमितवाच्यध्वनिमें कथितपदत्वके दोष न होनेका उदाहरण देते हैं- जब सहृदय लोग उनको ग्रहण करते [कुछ मानते ] हैं, तभी वे गुण होते हैं। सूर्यकी किरणोंसे अनुगृहीत कमल ही कमल होते हैं ॥३१६।। [यहाँ 'भवन्ति कमलानि कमलानि' में दूसरा 'कमल' पद सौरभसौन्दर्यादिविशिष्ट कमल इस विशिष्ट अर्थका वाचक होनेसे अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य है, इसलिए उसकी पुनरुक्ति दोष नहीं है। यह श्लोक आनन्दवर्धनाचार्यकी 'विषमबाणलीला' में आया है यह बात स्वयं आनन्दवर्धनाचार्यने अपने 'ध्वन्या- लोक' में द्वितीय उद्योतमें इसको उद्धुत करते हुए कही है ]। आगे विहितके अनुवाद्य होनेपर कथितपदत्वके गुण हो जानेका उदाहरण देते हैं। यहाँ पहिले वाक्यमें जितेन्द्रियत्वसे विनयका विधान किया गया है। दूसरे वाक्यमें विनय अनुवाद्य या उद्देश्य बन जाता है, और गुणप्रकर्ष विधेय हो जाता है। इससे पहिले वाक्यमें विहित अर्थात् विधेयरूपसे प्रयुक्त 'विनय' पद जब दूसरे वाक्यमें अनुवाद्य या उद्देश्यरूपमें प्रयुक्त होता है, तब वह दोष नहीं रहता है अपितु गुण हो जाता है। इसी प्रकार गुणप्रकर्ष तथा जनानुराग पदोंकी आवृत्ति भी गुण हो गयी है। जितेन्द्रियता विनयका कारण है [ उससे विनय उत्पन्न होता है] और विनयसे गुणप्रकर्षकी प्राप्ति होती है। गुणोंके प्रकर्षसे [ उस गुणी व्यक्तिके प्रति ] लोग अनुरक्त होते हैं और लोगोंके अनुरागसे ही सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है।३१७। पतत्प्रकर्ष भी कहीं गुण हो जाता है, जैसे- पूर्व उदाहृत [उदाहरण सं० २०६ पृष्ठ २५६ ] 'प्रागप्राप्त' इत्यादि श्लोकमें ॥३१८॥
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का० ६०-६१. सू० ८१] सप्तम उल्लास: ३५७
समाप्तपुनरात्तं क्वचिन्न गुणो न दोषो यत्र न विशेषणमात्रदानार्थू पुनर्ग्रहणम्, अपि तु वाक्यान्तरमेव क्रियते यथा अत्रैव 'प्रागप्राप्तेत्यादी' ॥३१९॥ अपदस्थसमासं क्वचिद् गण: यथा उदाहृते 'रक्लाशोक' इत्यादौ ॥३२०॥ गभित तथव यथा -- हुमि अवहत्थिअरेहो णिरंकुसो अह विवेअरहिओ वि । सिविणे वि तुमम्मि पुणो पत्तिहि भत्ति ण पसुमरामि ॥३२१॥ [भवाम्यपहस्तितरेखो निरङकुशोजथ विवेकरहितोऽपि। स्वप्नेऽपि त्वयि पुनः प्रतीहि भक्ति न प्रस्मरामि ।।इति संस्कृतम् ] अत्र प्रतीहीति मध्ये दृढ़प्रत्ययोत्पादनाय । एवमन्यदपि लक्ष्याल्लक्ष्यम् । [ सू० ८१ ] व्यभिचारिरसस्थायिभावानां शब्दवाच्यता। 98 कष्टकल्पनया व्यक्तिरनुभावविभावयोः॥६०॥ प्रतिकूलविभावादिग्रहो दीप्तिः पुनः पुनः । अकाण्डे प्रथनच्छेदौ अङ्गस्याप्यतिविस्तृतिः ।।६१।।
समाप्तपुनरात्तत्व कहीं न दोष होता है, न गुण। जहाँ केवल विशेषणमात्र देनेके लिए [ही समाप्तका ] दुबारा ग्रहण नहीं अपितु नया वाक्य ही बनाया जाता है[ वहाँ समाप्तपुनरात्तत्व न दोष होता है, और न गुण] जैसे इसी 'प्रागप्राप्त' इत्यादि [श्लोक सं० २०६ पृठ २५६] में [ येनानेन आदि चतुर्थ ] चरणमें समाप्त अर्थका पुनरुपादान होनेपर भी वह विशेषणमात्र देनेके लिए नहीं अपितु वाक्यके रूपमें पुनरुपात्त होनेसे दोष नहीं है॥३१६। अपदस्थ समास [अर्थात् अस्थानमें समास कर देना भी] कहीं-कहीं गुण हो जाता है, जैसे पूर्वों- दाहृत 'रक्ताशोक' [उदाहरण सं० ३००]में [ यहाँ शरृङ्गाररसमें दीर्घसमासमयी रचना रक्ताशोकके प्रति कोपकी अभिव्यञ्जना कर रही है। इसलिए विप्रलम्भकी पोषिका होकर गुण हो गयी है] ।।३१०। गभितत्व [दोष भी कहीं गुण हो जाता है] जैसे-[ हे स्वामिन् ] मैं चाहे मर्यादाका अतिक्रमण करनेवाला [अपहस्तितरेखः ] निरङकुश अथवा विवेकरहित भले ही हो जाऊँ, परन्तु आप विश्वास रखें कि स्वप्नमें भी आपकी भक्तिको नहीं भूलूंगा ॥।३२१।। [यहाँ वाक्यके बीचमें आया हुआ] 'प्रतीहि' पद [दूसरे वाक्यके ] बीचमें दृढ़ विश्वासके उत्पादनके लिए [ प्रयुक्त हुआ है, अतः दोष न होकर गुण हो गया] है। इस प्रकार उदाहरणोंसे और भी [दोषोंकी अदोषता ] समझनी चाहिये। रसदोषनिरूपण [सू० ८१]-१. व्यभिचारिभावों, २. रसों अथवा ३. स्थायिभावोंका अपने वाचक शब्द द्वारा कहना [स्वशब्दवाच्यता ], ४. अनुभाव और ५. विभावकी कष्टकल्पनासे अभिव्यक्ति, ६. [रसके] प्रतिकल विभाव आदिका ग्रहण करना ७. [रसकी ] बार-बार दीप्ति, ८. [रसका ] अनवसरमें विस्तार
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- ३५८ काव्यप्रकाश: [ का० ६०-६२, सू० ८१
अङ्गिनोऽननुसन्धानं प्रकृतीनां विपर्ययः । अनङ्गस्याभिधानं च रसे दोषा: स्युरीदृशाः ॥६२। स्वशब्दोपादानं व्यभिचारिणो यथा- सव्रीडा दयितानने सकरुणा मातङ्गचर्माम्बरे सत्रासा भुजगे सविस्मयरसा चन्द्रेऽमृतस्यन्दिनि। सेर्ष्या जह्नसुतावलोकनविधौ द्रीना कपालोदरे पार्वत्या नवसङ्गमप्रणयिनी दृष्टिः शिवायाऽस्तु वः ॥३२२। अत्र व्रीडादीनाम् । 'व्यानम्रा दयितानने मुकुलिता मातङ्गचर्माम्बरे सोत्कम्पा भुजगे निमेषरहिता चन्द्रेऽमृतस्यन्दिनि। मीलद्भ्रू: सुरसिन्धुदर्शनविधौ म्लाना कपालोदरे।' इत्यादि तु युक्तम् ।
कर देना, 8. अनवसरमें विच्छेद कर देना १०. अप्रधान [अङ्ग रस] का भी अत्यधिक विस्तार कर देना, ११. [अङ्गी] प्रधान रसको त्याग देना [भूल जाना ], १२. प्रकृतियों [ पात्रों ] का विपरयय कर देना और १३. अनङ्ग [अर्थात् जो प्रकृत रसका उपकारक नहीं है, उस ] का कथन; इस प्रकारके रसमें रहनेवाले [१३ ] दोष होते हैं ॥६०-६२।। [१ ]व्यभिचारिभावोंका वाचक शब्दसे कथन [का उदाहरण ] देते हैं। जैसे- [दयित ] प्रियतम [शिवजी ]के मुखके सामने होनेपर सलज्ज, [उनके ओढ़े हुए ] हाथीके चर्मके [बने हुए वस्त्रको ] देखनेपर सकरुण, शिवजीके द्वारा आभूषण रूपमें धारण किये हुए [साँपोंको देखनेपर त्ासयुक्त, अमृतको प्रवाहित करनेवाले चन्द्रमाको देखने पर विस्मयरससे युक्त, [शिवजीके मस्तक- पर स्थित ज हनु-कन्या ] गङ्गाको देखनेपर ईर्ष्याभावसे युक्त, [शिवजी द्वारा धारण किये हुए ] कपालके भीतर देखनेपर दीनतायुक्त इस प्रकार नवसङ्गमके लिए उत्सुक पार्वतीकी दृष्टि तुम्हारे लिए कल्याण- कारिणी हो॥३२२॥ यहाँ ब्रीडा आदि [व्यभिचारिभावों ] का [अपने वाचक शब्दों द्वारा कथन होनेसे व्यभिचारि- भावोंकी स्वशब्दवाच्यता दोष है ]। 'व्यानम्ना दयितानने' इत्यादि पाठ युक्त [हो सकता] है [ क्योंकि उसमें व्यभिचारिभावोंके वाचक शब्दोंको हटाकर उनको अन्य प्रकारसे प्रकट किया गया है। 'सव्रीडा'के स्थानपर 'व्यानत्रा', 'सकरुणा' के स्थानपर 'मुकुलिता', 'सव्रासा' के स्थानपर 'सोत्कम्पा', 'सविस्मयरसा'के स्थानपर 'निमेष- रहिता', सेष्या' के स्थानपर 'मीलद्भ्ः' और 'दीना' के स्थानपर 'म्लाना' पाठ कर देनेसे उन व्यभिचारि ". भावोंकी स्वशब्दवाच्यता नहीं रहती है। अतः दोषका निवारण हो जाता है]।
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का० ६०-६२, सू० ८१ ] सप्तम उल्लास: ३५६
(२ ) रसस्य स्वशब्देन शृङ्गारादिशब्देन वा वाच्यत्वम्। क्रमेणोदाहरणम्- तामनङ्गजयमङ्गलश्रियं किञ्चिदुच्चभुजमूललोकिताम्। नेत्रयो: कृतवतोऽस्य गोचरे कोऽप्यजायत रसो निरन्तरः ॥३२३। आलोक्य कोमलकपोलतलाभिषिक्तव्यक्तानुरागसुभगामभिराममूर्तिम्। पश्यैष बाल्यमतिवृत्त्य विवर्तमान; शृङ्गारसीमनि त्राङ्गतमातनोति ॥३२४। (३) स्थायिनो यथा- सम्प्रहारे प्रहरणैः प्रहाराणां परस्परम् । ठणत्कारैः श्रुतिगतैरुत्साहस्तस्य कोऽप्यभूत ।।३२५। अत्रोत्साहस्य । (४) कर्पू रधूलिधवलद्युतिपूरधौतदिङ्मण्डले शिशिररोचिषि तस्य यूनः ।
अत्रोद्दीपनालम्वनरूपा: शृङ्गारयोग्या विभावा अनुभावपर्यवसायिनः स्थिता इति कष्टकल्पना।
(२) रसकी स्वशब्द १. रस शब्दसे अथवा २. शृङ्गारादि शब्दसे वाच्यता [दोनों रस दोष ] हैं। क्रमशः उनके उदाहरण [देते हैं]- कामदेवके विजयकी मङ्गललक्ष्मी और तनिक ऊपर उठी हुई भुजाकी स्थितिमें देखी गयी उस [नायिकाको देखकर इसके [नायकके भीतर ] किसी अनिर्वचनीय और अविच्छिन्न [निरन्तर ] रस [का उदय ] हुआ ।।३२३।। [यहाँ रसका सामान्यवाचक रस शब्दसे ही निर्देश होनेके कारण दोष है।] [नायिकाके ] कोमल कपोलतलपर स्थित व्यक्त अनुराग [अर्थात् रिरंता ]के कारण [और भी अधिक] सुन्दर उस मनोहर रूपवाली [नायिका ] को देखकर बाल्यावस्थाका अतिकरमण करके नवयौवनमें प्रविष्ट होता हुआ यह [नायक ] शङ्गार [रस] की सीमामें तरङ्गित हो रहा है। इसको देखो ]॥३२४।। (३ ) स्थायिभावकी [स्वशब्दवाच्यता होनेपर दोषका उदाहरण ] जैसे -- युद्ध [भूमि ] में शस्त्रोंके परस्पर टकरानेसे उत्पन्न शब्दोंको सुनकर उस [वीर] में कोई अपूर्व [अनिर्वचनीय] उत्साह [उत्पन्न ] हुआ ।३२५।। यहाँ [वीररसके स्थायिभाव ] उत्साहकी [स्वशब्दवाच्यता दोष है]। इसके बाद विभाव तथा अनुभावोंकी कष्टकल्पनाका उदाहरण देते हैं- (४) कर्पूरपरागके समान शुभ्, ज्योत्स्नासे दिङमण्डलको परिपूर्ण करनेवाले चन्द्रमाका [उदय] होनेपर सिरपर पल्ला डालनेके विशेष प्रकारसे अपने स्तनोंकी उन्नतिको व्यक्त करनेवाली यह उस नवयुवकके नयनगोचर हुई ॥३२६॥ यहाँ उद्दीपन [रूप विभाव अर्थात् चन्द्रमा ] और आलम्तनरूप [नायिका ] शुद्गार योग्य विभाव, अनुभावमें पर्यवसित रूपमें स्थित हैं। [नायकके भीतर उत्पन्न होनेवाले अनुभावोंका वर्णन नहीं है।
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३६० काष्यप्रकाश [का० ६०-६२, सू० ८१
(५.) परिहरति रति मति लुनीते स्खलति भृशं परिवर्तते च भूयः । इति बत विषमा दशास्य देहं परिभवति प्रसभ किमत्र कुर्मः ॥३२७॥ अत्र रतिपरिहारादीनामनुभावानां करुणादावपि सम्भवात्कामिनीरूपो विभावो यत्नतः प्रतिपाद्यः । (६) प्रसादे वर्तस्व प्रकटय मुद संत्यज रु प्रिये ! शुष्यन्त्यङ्गान्यमृतमिव ते सिञ्चतु वच: । निधानं सौख्यानां क्षणमभिमुख स्थापय मुख न मुग्धे ! प्रत्येतुं प्रभवति गतः कालहरिण: ॥३२८॥ अत्र शृङ्गारे प्रतिकूलस्य शान्तस्यानित्यताप्रकाशनरूपो विभावस्तत्प्रकाशितो निर्वेदश्च व्यभ्तिचारी उपात्तः ।
किन्तु ऐसी उद्दीपक स्थितिमें नायिकाको देखकर नायकमें स्वेद, रोमाञ्च इत्यादि शृङ्गारके अनुभावोंकी उत्पत्ति अपेक्षित है। वह प्रकरण आदिके अनुसन्धान वश विलम्बसे [क्लिष्टकल्पना ] द्वारा प्रतीत होती है [अतः यह अनुभावकी कष्टकल्पना दोष है ]। ५. [यह नायक कामिनीके वियोगमें ] बेचैन हो रहा है, [इसका ] विवेक नष्ट हो गया है [कर्तव्याकर्तव्यका इस समय इसको कोई ध्यान नहीं है], यह [चलते हुए या उठ-उठकर ] गिर पड़ता है, और [जमीनपर ] बार-बार लोटता-पोटता है। इस प्रकार इसके शरीरकी बड़ी भयड्गर दशा हो रही है। यह बड़े खेदकी बात है। [परन्तु ] हम इस [दशा] में क्या [सहायता ] करें [यह समझमें नहीं आता ] ॥।३२ ७।। यहाँ [रवणित किये हुए] बेचैनी आदि अनुभाव [न केवल शृङ्गाररसमें ही अपितु ] करुण [आदि पदसे भयानक तथा वीभत्स रस] आदिमें भी हो सकते हैं। इसलिए कामिनीरूप [आलम्बन ] विभाव [यहाँ अभिप्रेत है वह ] कठिनाईसे प्रतीत होता है [ अतः यहाँ विभावकी कष्टकल्पनारूप दोष है]। इस प्रकार यहाँतक पाँच रसदोषोंका निरूपण करनेके बाद ग्रब प्रतिकूल विभावादिके वर्णनरूप छठे रसदोषका निरूपण करते हैं- ६. [कोई नायक रूठी हुई नायिकाको प्रसन्न करता हुआ कह रहा है कि] मान जाओ, तनिक मुस्करा दो [ प्रकटय मुदं ], यह गुस्सा छोड़ दो, हे प्रिये [तुम्हारी इस नाराजगीके कारण मेरे] अङ्ग सूखे जा रहे हैं, उनपर अपनी [प्रसन्नताभरी प्रिय ] वाणीरूप अमृतका सिञ्चन करो। [मेरे] सारे सुखोंके [एकमात्र ] आधार अपने इस सुन्दर मुखको जरा मेरे सामने करो। हे मुग्धे ! गया हुआ यह समयरूप मृग फिर लौटकर नहीं आ सकता है॥३२८॥ यहाँ [गया हुआ यह समय फिर लौटकर नहीं आ सकता है, इससे ] शृङ्गाररसके प्रतिकूल [यौवनकी] अनित्यताप्रकाशन-रूप शान्तरसके विभाव और उससे प्रकाशित [शान्तरसके ] निर्वेद- रूप व्यभिचारिभावका प्रतिपावन किया गया है [ अतः प्रकृत शुङ्गाररसके प्रतिकूल विभाव तथा व्यभि- चारिभावका ग्रहण दोष है ]।
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- का. ६०-६२, सू० ८१ ] सप्तम उल्लास: ३६१
णिहुअरमणम्मि लोअणपहम्मि पडिए गुरुअणमज्झम्मि। सअलपरिहारहिअआ वणगमणं एव्व महइ वहू ।।३२९।। [निभृतरमणे लोचनपथे पतिते गुरुजनमध्ये। सकलपरिहारहृदया वनगमनमेवेच्छति वधू: ।इति संस्कृतम् ] अत्र सकलपरिहारवनगमने शान्तानुभावौ। इन्धनाद्यानयनव्याजेनोपभोगार्थं वनगमनं चेत् न दोषः । (७) दीप्तिः पुनः पुनयथा कुमारसम्भवे रतिविलापे। (८) अकाण्डे प्रथनं यथा-वेणीसंहारे द्वितीयेऽङ्केनेकवीरक्षये प्रवृत्ते भानुमत्या सह दुर्योधनस्य शृङ्गारवर्णनम्।
इसी प्रकार प्रतिकूल अनुभावोंका ग्रहण होनेपर भी यह दोष हो सकता है, इसका उदाहरण आागे देते हैं- [सास-ससुर आदि ] गुरुजनोंके बीचमें [ उनकी उपस्थितिमें ] गुप्तपति [जारपुरुष ]के दिखलायी देनेपर बहू सब-कुछ [कार्य] छोड़कर [उस जारसे मिलनेके लिए इन्धन आदि बीनकर लानेके व्याजसे] वनको ही जाना चाहती है॥।३२६।। यहाँ सबकुछ छोड़ देना तथा वनको जाना, ये दोनों [भृङ्गाररसके विरोधी ] शान्तरसके अनु- भाव हैं। इसलिए यहाँ वे जिस रूपमें पठित हैं, उस कूपमें प्रकृत विप्रलम्भभृङ्गारकी प्रतीतिमें बाधक होनेसे दोष हैं ] परन्तु यदि इन्धन आदि लानेके बहानेसे उपभोग करनेके लिए वनको जाना चाहती है तो दोष नहीं होगा। ७. [सप्तम रसदोष रसकी ] बार-बार दीप्ति है, जैसे 'कुमारसम्भव' में रतिके विलापके प्रसङ्गमें- 'कुमारसम्भव'के चतुर्थ सर्गमें कामदेवके भस्म कर दिये जानेके बाद रतिके विलापका वर्णन किया गया है। उसमें 'अथ मोहपरायणा सती' [४.१] से करुणरसको प्रारम्भ किया गया है। उसके प्रारम्भमें 'अथ' शब्द दिया है, जो रसकी प्रारम्भिक दीप्तिको सूचित करता है, उसके बाद 'अथ सा पुनरेव विह्वला' [४.४] इत्यादिमें 'अथ' तथा 'पुनः' शब्दसे फिर उस रसकी दीप्ति करके 'तमवेक्ष्य रुरोद सा भृशम्' [४.२६ ] इत्यादिसे करुणरसको फिर उद्दीप्त किया गया है। इस प्रकार एक ही उपभक्त रसका बार-बार वर्णन उपभुक्त कुसुमपरिमलके समान सहृदयोंके लिए वैरस्योत्पादक हो जाता है, अतः दोष है। इसलिए ध्वन्यालोककारने भी लिखा है कि- परिपोषं गतस्यापि पौनःपुन्येन दीपनम्। रसस्य स्याद्विरोधाय, वृत्त्यनौचित्यमेव च ।। ध्वन्यालोक, ३,१६ आगे अकाण्डमें प्रथन अर्थात् अवसर न होनेपर भी अवसरके प्रतिकूल रसका प्रसार कर देने रूप अष्टम रसदोषका निरूपण करते हैं- ८. अनवसरमें प्रतिपादन [का उदाहरण ], जैसे 'वेणीसंहार' में द्वितीय अङकूमें [भीष्म आदि अनेक वीरोंका धरण प्रारम्भ होनेपर भानुमतीके साथ दुर्योधनके [सम्भोगरूप ] शृङ्गाररसका वर्णन [अनुचित होनेसे वोष है ]।
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(९) अकाण्डे छेदो यथा वीरचरिते द्वितीयेऽड्क राघवभार्गवयोर्धाराधिरूढे वीररसे कङ्कणमोचनाय गच्छामि इति राघवस्योक्तौ। (१०) अङ्गस्या प्रधानस्यातिविस्तरेण वर्णनं यथा हयग्रीववधे हयग्रीवस्य । (११) अङ्गिनोऽननुसन्धानं यथा रत्नावल्यां चतुर्थेऽङ्के वाभ्रव्यागमने सागररि- काया विस्मृतिः । (१२) प्रकृतयो दिव्या अदिव्या दिव्यादिव्याश्च, वीररौद्रशृङ्गारशान्तरस- प्रधाना धोरोदात्तधीरोद्धतधीरललितधीरप्रशान्ताः, उत्तमाधममध्यमाश्च।
६. अनुचित स्थानपर रसको भङ्ग कर देना [अकाण्डच्छेद भी दोष है, उसका उदाहरण ] जैसे 'महावीरचरित' के द्वितीय अङूमें राम तथा परशुरामके [संवादमें ] वीररसके चरमोत्कर्षपर पहुँचनेपर 'कङ्गण खोलनेके लिए जा रहा हूँ', यह रामचन्द्रका कथन [सहृदयोंकी रसानुभूतिमें बाधक होनेसे दोष हो जाता है]। १०. अङ्ग अर्थात् अप्रधान [पात्र या रस] का अत्यन्त विस्तारके साथ वर्णन [भी रसदोष होता है] जैसे, [कश्मीरके भर्तृमेण्ठकवि-विरचित नाटक ] 'हयग्रीववध'में [विष्णु प्रधान नायक हैं। उनको छोड़कर प्रतिनायक दैत्य ] हयग्रीवका [जलकेलि, वन-विहार, रतोत्सव आदिका नायककी अपेक्षा अधिक विस्तारसे वर्णन हयग्रीवके महत्त्वको बढ़ाता है, अतः दोष है ]। कविने पहिले हयग्रीवका महत्त्व तथा प्रभाव विस्तारके साथ दिखलाकर फिर विष्णु द्वारा उसके वध किये जानेका वर्णन करके विष्णुके प्रतापातिशयको द्योतन करनेके अभिप्रायसे हयग्रीवका इतना विस्तार के साथ वर्णन किया है। इसीलिए 'वंशवीर्यश्रुतादीनि वर्णयित्वा रिपोरपि' -- शत्रुके, वंश, वीर्य औ्र श्रुत आदिका वर्णन करके भी नायकका उत्कर्ष दिखलानेकी व्यवस्था आचार्योंने की है। परन्तु उनका वर्णन उतना ही होना चाहिये, जिससे नायकके प्रतापातिशयके द्योतनमें सहायता मिले। शत्रुकी जलकेलि, वनविहार, रतोत्सव आदिके वर्णन और वह भी इतने विस्तारसे किये हुए वर्णनसे नायकके प्रतापातिशयकी वृद्धि नहीं होती है। अतः ग्रन्थकारने इसे दोष ही माना है। ११. अङ्गी [अर्थात् प्रधान नायक या नायिका ] का विस्मरण [भी रसदोष है] जैसे, 'रत्नावली' नाटिकामें चतुर्थ अङ्गमें [सिंहलेश्वरके कञ्चुकी ] वाभ्रव्यके आ जानेपर [विजयवर्माके वृत्तान्तके सुननेमें लगकर नायक उदयनको, रत्नावली नामक मुख्य नायिका, जिसको सागरमें डूबनेसे बचकर आनेके कारण 'सागरिका' भी कहा जाता था, उस ] सागरिकाकी विस्मृतिसे [शृङ्गाररसकी प्रतीतिमें विच्छेद-सा आ जाता है। अतः दोष हो जाता है ]। 'प्रकृतीनां विपर्ययः' यह १२ वाँ रसदोष कहा गया है। उसके उपपादनके लिए पहिले प्रकृतियांको ममझाना आवश्यक है। इसलिए पहिले प्रकृतियों अर्थात् पात्रोंका भेद दिखलाते हैं। १२. [सबसे पहिले ] दिव्य, अदिव्य और दिव्यादिव्य [तीन प्रकार]की प्रकृति [नायक] होते हैं। [दिव्य नायक इन्द्र आदि, अदिव्य नायक वत्सराज, उदयन आदि मनुष्य; और दिव्यादिव्य नायक अवतारधारी राम, कृष्ण आदि होते हैं। फिर ये नायक धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरललित तथा धीरप्रशान्त भेदसे चार प्रकारके होते हैं]। और वे [कमशः ] वीर, रौद्र, शरृङ्गार तथा शान्तरसप्रधान,
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का० ६०-६२, सू० ८१] सप्तम उल्लास: ३६३ रतिहासशोकाद्भुतानि अदिव्योत्तमप्रकृतिवत् दिव्येष्वपि। किन्तु रतिः सम्भोग- शृङ्गाररूपा उत्तमदेवता विषया न वर्णनीया। तद्वर्णनं हि पित्रोः सम्भोगवर्णनमिवा- त्यन्तमनुचितम् । कोधं प्रभो ! संहर संहरेति यावदि्गरः खे मरुतां चरन्ति। तावत् स वह्निर्भवनेत्रजन्मा भस्मावशेषं मदनं चकार ॥।३३०॥ इत्युक्तवद् भ्रुकुटयादिविकारवर्जितः क्रोधः सद्य:फलदः स्वर्गपातालगगनसमुद्रो- ल्लङ्नाद्युत्साहश्च दिव्येष्वेव। [कमशः १. वीररसप्रधान ] धीरोदात्त, [२. रौद्ररसप्रधान ] धीरोद्धत, [३. शृङ्गाररसप्रधान ] धीरललित और [४. शान्तरसप्रधान ] धीरप्रशान्त [चार प्रकारके ] होते हैं। [इस प्रकार नायकोंके पहिले तीन, फिर उनमेंसे प्रत्येकके चार भेद करनेसे १२ भेद हो जाते हैं। अब इन बारहके फिर] उत्तम, मध्यम, तथा अधम [तीन भेद ] होते हैं [ इस प्रकार नायक अथवा प्रकृतियोंके ३६ भेद होते हैं ]। इस प्रकार प्रकृति अरथात् नायकके भेदोंको दिखलानेके बाद 'प्रकृतिविपर्यय'के उपपादनके लिए पहिले प्रकृतिके औचित्यका प्रतिपादन करते हैं। इस प्रदर्शित औचित्यका परित्याग कर विपरीत वर्णन करनेसे 'प्रकृतिविपर्यय' दोष हो जाता है। पहिले प्रकृतिके औचित्यका प्रतिपादन इस प्रकार करते हैं- उनमेंसे रति, हास, शोक, अद्भुत [रूप स्थायिभावों अर्थात् शृङ्गार, हास्य, करुण तथा अद्भुत- रसों ] का अदिव्य उत्तम नायकोंके समान दिव्य [उत्तम नायकों]में भी [ वर्णन करना चाहिये]। किन्तु [इस बातका ध्यान रखना चाहिये कि] सम्भोगशृङ्गाररूप रतिका [परस्परावलोकनको छोड़कर] उत्तम देवताविषयक वर्णन नहीं करना चाहिये। क्योंकि उसका वर्णन माता-पिताके सम्भोगवर्णनके समान अत्यन्त अनुचित है [ अतएव, 'कुमारसम्भव'में जो शिव-पार्वतीके सम्भोगका वर्णन है, वह अनुचित है]। इस प्रकार शृङ्गार, हास्य, करुण तथा अद्भुत इन चार रसोंके दिव्य तथा अदिव्यप्रकृति नायकोंका वर्णन करनेके विषयमें जो शचित्य है उसका प्रतिपादन कर दिया। इसके बाद भूकुटिरहित क्रोध तथा स्वर्ग, पातालगमन या समुद्रलङ्कन आदिके उत्साहका वर्णन केवल दिव्यप्रवृतियोंमें ही करना चाहिये। अदिव्यप्रकृतिमें अधिक नहीं करना चाहिये। इस बातका प्रतिपादन आगे करते हैं- हे भगवन् [महादेव ] ! क्रोधको शान्त कीजिये, शान्त कीजिये, जबतक आकाशमें देवताओंकी इस प्रकारकी आवाज सुनायी पड़े, तबतक महादेवके [ तृतीय ] नेत्रसे उत्पन्न [क्रोधकी ] अग्निने कामदेवको भस्मावशेष कर दिया ॥३३०॥ इस प्रकार कहे हुए [क्रोध]के समान भृकुटी आदि [शारीरिक विकारों ]से रहित, तथा तुरन्त फल देनेवाले क्रोध तथा स्वर्ग, पाताल आदि जाने एवं समुद्रके उल्लङ्गनके उत्साह आदिका वर्णन दिव्य [प्रकृतियों ]में ही करना चाहिये।
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३६४ काव्यप्रकाश: का० ६०-६२, सू० 5१
अदिव्येषु तु यावदवदानं प्रसिद्धमुचितं वा तावदेवोपनिवद्धव्यम्। अधिक तु निबध्यमानमसत्यप्रतिभासेन 'नायकवद्वर्तितव्यं न प्रतिनायकवद्' इत्युपदेशे न पर्यवस्येत्। दिव्यादिव्येषु उभयथाऽपि।
एवमुक्तस्यौचित्यस्य दिव्यादीनामिव धीरोदात्तादीनामप्यन्यथावर्णन विपर्ययः । १. तत्रभवन् भगवन्नित्युत्तमेन न अधमेन मुनिप्रभृती न राजादौ, २. भट्टारकेति नोत्तमेन राजादौ प्रकृतिविपर्ययापत्तेरवाच्यम्। एवं देशकालवयोजात्यादीनां वेषव्यव- हारादिकमुचितमेवोपनिबद्धव्यम् ।
अदिव्य [अर्थात् मनुष्य आदि ] में तो जितना [ 'अवदानं कर्म वृत्तम्' इतिहासप्रसिद्ध ] पूर्वचरित्र आदिमें प्रसिद्ध है, अथवा [मनुष्यके लिए] उचित [हो सकता] है उतना ही वर्णन करना चाहिये। क्योंकि अधिक [उत्साहादिका ] वर्गन कर देनेसे [ उसके ] असत्य प्रतीत होने [ लगने ] से [ काव्यके प्रमुख प्रयोजन ] 'नायक [राम आदि] के समान व्यवहार करना चाहिये, प्रतिनायक [रावण आदि] के समान नहीं', इस प्रकारके उपदेशमें परिणत नहीं हो सकता है। इसलिए मनुष्यके लिए साध्य उत्साह आदिसे अधिक उत्साहादिका वर्णन अदिव्य प्रकृतिमें नहीं करना चाहिये]। दिव्यादिव्य [प्रकृति या नायकों ] में [दिव्य तथा अदिव्य] दोनों [के योग्य कार्योंका वर्णन किया जा सकता है]।। इस प्रकार कहे हुए औचित्यके विपरीत दिव्य [अदिव्य या दिव्यादिव्य नायकों]के समान धीरोदात्त आदिका वर्णन भी [प्रकृति ] विपर्यय [दोष] कहलाता है [अर्थात् जिस प्रकार दिव्य आदि नायकोंके औचित्यके विपरीत वर्णन करना दोष है, उसी प्रकार धीरोदात्त आदि जो नायकोंके भेद किये गये हैं, उनके औचित्यके विपरीत वर्णन करना भी इस प्रकृति-विपर्यय दोषके अन्तर्गत आता है ]। इस प्रकृतिविपर्ययके अन्तर्गत सम्बोधन पदोंके त्रचित्यका विपर्यय भी सम्मिलित होता है। किन-किन स्थितिके लोगोंके लिए किन-किन सम्बोधन-पदोंका प्रयोग करना चाहिये, इसके लिए आ्वश्यक नियम बने हुए हैं, उन नियमोंका उल्लंघन करके अन्यके लिए प्रयुक्त होनेवाले सम्बोधनपदोंका अन्यथा प्रयोग करना भी प्रकृतिविपर्यय दोष है। अनः उसका निर्देश आररागे करते हैं- १. तत्रभवन्, भगवन्, यह उत्तम [पात्र ]के द्वारा, अधम [पात्र ]के द्वारा नहीं, मुनि प्रभृतिके लिए [प्रयुक्त किया जाना चाहिये] राजा आदिके लिए नहीं। [अर्थात् तत्रभवन् तथा भगवन् ये सम्बोधन-पद केवल मुनियोंके लिए और वह भी उत्तम पात्र द्वारा प्रयुक्त किये जाने चाहिये। अधम पात्रके द्वारा उनका प्रयोग नहीं होना चाहिये और न राजा आदिके लिए उनका प्रयोग होना चाहिये] और २. राजा आदिके लिए अधम [पात्र ] द्वारा भट्टारक [इस सम्बोधनका प्रयोग होना चाहिये ] उत्तम [पात]के द्वारा [राजा आदिके लिए भी भट्टारक आदि सम्बोधन-पदोंका प्रयोग ] नहीं होना चाहिये। क्योंकि उससे प्रकृतिविपर्यय दोष हो जाता है। इसी प्रकार देश, काल, अवस्था, जाति आदिके वेष, व्यवहार आदिका उचितरूपसे ही वर्णन करना चाहिये [ इनमेंसे किसीका भी अन्यथा वर्णन करनेसे प्रकृतिविपर्यय दोष हो जाता है ]।
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का० ६३, सू० ८२ । सप्तम उल्लास: ३६५
(१३) अनङ्गस्य रसानुपकारकस्य वर्णनं यथा -- कपू रमञ्जर्या नायिकया, स्वात्मना च कृतं वसन्तवर्णनमनादृत्य वन्दिर्वणितस्य राज्ञा प्रशंसनम्। ईदृशा इति। नायिकापादप्रहारादिना नायककोपादिवर्णनम् । उक्तं हि ध्वनिकृता -- अनौचित्यादृते नान्यद् रसभङ्गस्य कारणम्। औचित्योपनिवन्धस्तु रसस्योपनिषत्परा ।। इति।। इदानीं क्वचिददोषा अप्येते -- इत्युच्यन्ते। [सू० ८२ ] न दोषः स्वपदेनोक्तावपि सञचारिण:क्वचित् । यथा-
औत्सुक्यन कृतत्वरा सहभुवा व्यावर्तमाना हिया नैस्तैर्बन्धुवधूजनस्य वचनैर्नीताभिमुख्यं पुनः । दृष्ट्वाग्रे वरमात्तसाध्वसरसा गौरी नवे सङ्गमे संरोहत्पुलका हरेण हसता श्लिप्टा शिवायास्तु वः ॥३३१।।
१३. अनङ्गका अर्थात [प्रकृत ] रसके अनुपकारकका वर्णन [भी १३ वाँ रसदोष होता है] जसे -- 'कर्पूरमञ्जरी' [नाटिका ]में [प्रथम यवनिकाके बाद] नायिका [अर्थात् देवी विभ्रमलेखा ] के किये हुए और स्वयं अपने किये हुए वसन्तवर्णनकी उपेक्षा करके बन्दियों द्वारा किये गये वसन्तवर्णनकी राजा द्वारा प्रशंसा की गयी है। [रसदोषोंका परिगणन करानेवाली अन्तिम ६२ वीं कारिकाके अन्तमें 'रसे दोषा: स्युरीदृशाः' यह चतुर्थ चरण है। इसके अन्तमें 'ईदृशाः' पद आया है उस] 'ईदृशाः' पदसे नायिक।के पादप्रहार आदिसे नायकके कोपादिका वर्णन [भी रसदोषमें परिगणित होता है, यह समझना चाहिये]। इस प्रकार यहाँतक रसदोषका निरूपण समाप्त हो गया। अन्तमें रसदोषका कारण अनौचित्य- का वर्णन करना ही है। इस विषयमें वचन प्रमाणरूपमें उद्धृत करते हैं -- जैसा कि ध्वनिकार [आनन्दवर्धनाचार्य] ने कहा है -- अनौचित्य [के वर्णन] के अतिरिक्त रसभङ्ग [रसविच्छेद रसदोष] का और कोई कारण नहीं है। और औचित्यका वर्णन ही रस [परिपोषण]का परम रहस्य है। रसदोषोंके अपवाद रसदोषोंके निरूपणके बाद आगे उनके अपवाद दिखलाते हैं। अर्थात् किन्हीं विशेष परिस्थितियों- में उक्त दोष, दोष नहीं माने जाते हैं। वे परिस्थितियाँ निम्नलिखित प्रकार हो सकती हैं- अब यह कहते हैं कि कहीं ये [ व्यभिचारिभावकी स्वशब्दवाच्यता आदि रसदोष ] दोष नहीं रहते हैं। [सू० ८३]कहीं सञ्चारिभावका स्वशब्दसे कथन होनेपर भी दोष नहीं होता है। जैसे -- प्रथम बारके समागमके अवसरपर [अपने पति शिवजीसे ] मिलनेकी उत्सुकताके कारण जल्दी करी हुई किन्तु [नवोढ़ा वधूकी] स्वाभाविक लज्जाके कारण लौटती हुई [पीछे हटती हुई-सी] फिर
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३६६ काव्यप्रकाश: [ का० ६३, सू० ८२ अत्रौत्सुक्यशब्द इव तदनुभावो न तथा प्रतीतिकृत् । अत एव 'दूरादुत्सुकम्' इत्यादौ व्रीडाप्रेमाद्यनुभावानाँ विवलितत्वादीनामिवोत्सुकत्वानुभावस्य सहसा प्रसरणादि- रूपस्य तथाप्रतिपत्तिकारित्वाभावादुत्सुकमिति कृतम्। बन्धुजनोंकी स्त्रियोंके तत्कालोचित [तैस्तः ] वचनोंसे दुबारा [ शिवजीके सम्मुख ] पहुँचायी गयी [ एकान्त स्थलमें पहुँचनेपर ] सामने वर [श्रेष्ठ या पति शिव] को देखकर भीतिग्रस्त, [अतएव ] रोमाज्चित और [इस दशाको देखकर] हँसते हुए शिवके द्वारा चिपटा ली गयी [आलिङ्गित ] पार्वती आप सबके लिए कल्याणदायिनी हों ॥३३१॥ यहाँ औत्सुक्य तथा लज्जा वभिचारिभावोंको स्वशब्दसे कहा गया है। परन्तु यह दोष नहीं है, इस बातको दिखलानेके लिए उदाहरण दिया गया है। यह श्लोक 'रत्नावली' नाटिकाके मङ्गला- चरणका श्लोक है। इसमें औत्सुक्य तथा लज्जा इन दो व्यभिचारिभावोंको स्वशब्द अर्थात् उनके वाचक शब्द द्वारा ही कहा गया है, परन्तु वह दोष नहीं है। इसका कारण यह है कि यदि यहाँ उनको स्वशब्दसे न कहा जाय तो उनके 'त्वरा' तथा 'व्यावर्त्तन' रूप अनुभावों द्वारा निश्चित रूपसे औत्सुक्य तथा लज्जाका ज्ञान नहीं हो सकता है, क्योंकि 'त्वरा' और 'व्यावर्त्तन' रूप अनुभाव रोष तथा भय आदिके कारण भी हो सकते हैं। परन्तु यहाँ भय या रोषादिके कारण त्वरा एवं व्यावर्त्तन विवक्षित नहीं है अपितु औत्सुक्य तथा लज्जाके कारण त्वरा तथा लज्जानिमित्तक व्यावर्त्तन विवक्षित हैं। यह बात व्यभिचारिभावका स्वशब्दसे कथन किये बिना केवल अनुभाव द्वारा बोधित नहीं हो सकती है। इसलिए कविने यहाँ उनका स्वशब्दसे कथन किया है। केवल रत्नावलीने इस प्रकारका प्रयोग किया हो, यह बात नहीं है। ऐसी परिस्थितियोंमें अ्रन्य कवियोंको भी इसी मार्गका अवलम्बन करना पड़ा है। उदाहरणके लिए 'अमरुकशतक' का 'दूरादुत्सुक- मागते विवलितं' इत्यादि श्लोकसंख्या ३०, पृष्ठ ११४ पर दिया गया है, उसमें भी 'उत्सुक' शब्दसे ही औत्सुक्यरूप व्यभिचारिभावका कथन किया गया है। अन्य व्रीडा, प्रेम आदि व्यभिचारिभावोंको स्वशब्दसे न कहकर 'विवलितत्वादि' अनुभावोंके द्वारा ही कथन किया है। परन्तु औत्सुक्यकथन अनुभावों द्वारा निश्चित रूपसे नहीं किया जा सकता है। क्योंकि जो त्वरा आदि औत्सुक्यके ग्नुभाव हैं, वे ही भय आादिके भी अनुभाव हैं, इसलिए केवल अनुभावोंके द्वारा औत्सुक्यका निश्चित रूपसे बोध सम्भव न होनेके कारण अमरुक कविको भी औत्सुक्यरूप व्यभिचारिभावको स्वशब्दसे ही कहना पड़ा है। यही बात ग्रन्थकार अगली पक्तिमें लिखते हैं। यहाँ 'औत्सुक्य' शब्द [जैसे असन्दिग्धरूपसे औत्सुक्यरूप व्यभिचारिभावका बोध कराता है, उस] के समान उसका [त्वरारूप] अनुभाव [औत्सुक्यके अतिरिक्त भयादिका भी समान अनुभाव होनेके कारण ] उस प्रकार [असन्दिग्धरूपसे ] प्रतीति नहीं करा सकता है [ इसलिए यहाँ औत्सुक्य तथा ही रूप व्यभिचारिभावोंको स्वशब्दसे कहना आवश्यक हो गया है] इसीलिए [अमरक कविने भी १४४ पृष्ठपर पूर्व उद्धूत किये हुए] 'दूरादुत्सुकम्' इत्यादि [श्लोक ]में द्रीड़ा आदि [व्यभिचारिभावोंके ] अनुभाव विवलित वादिके समान औत्सुक्यके सहला गमन [त्वरा] रूप अनुभावके उस प्रकार [असन्दि- ग्धरूप ] से प्रतीति करानेवाला न होनेसे 'उत्सुकम्' यह [शब्दसे ही औसुक्यरूप व्यभिचारिभावका कथन ] किया है।
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का० ६३, सू० =३] सप्तम उल्लास: ३६ 3 [सू० ८३ ] सञचार्यादेविरुद्धस्य बाध्यस्योवितिर्गुणावहा ।।६३।। 996 D वाध्यत्वेनोकतिर्न पर्मदोषः, यावत्प्रकृतरसपरिपोषकृत् । यथा- क्वाकार्य शशलक्ष्मण: क्व च कुलम् -- इत्यादौ ॥३३२॥ अत्र वितर्कादिषु उद्गतेष्वपि चिन्तायामेव विश्रान्तिरिति प्रकृतरसपरिपोषः । इस प्रकार व्यभिचारिभावका जहाँ अनुभावों द्वारा निश्चितरूपसे प्रतिपादन करना सम्भव न हो, वहाँ उसका स्वशब्दसे कथन करना दोष नहीं है, यह सिद्धान्त स्थिर हुआ। परन्तु स्थायिभाव तथा रसकी स्वशब्दवाच्यता सदा दोष ही मानी जाती है। उसका कोई अपवाद ग्रन्थकारने नहीं दिखलाया है। इसके बाद प्रतिकूल विभावादिके परिग्रहरूप छठे रसदोषका अपवाद दिखलाते हैं- [सू० ८३ ]-[प्रकृत रसके ] विपरीत सञ्चारिभाव [अनुभाव तथा विभाव ] आदिका बाध्य- त्वेन कथन करना [दोष नहीं अपितु ] गुणाधायक होता है ।।६३।। [प्रकृत रसके प्रतिकूल विभाव, अनुभाव तथा सञ्चारिभावका ] बाध्यत्वेन कथन करना न केवल अदोष है, अपितु प्रकृत रसका परिपोषक [होनेसे गुण ] हो जाता है, जैसे -- 'क्वाकार्य शशलक्ष्मण: क्व च कुलम् ।' इत्यादिमें। [ यह श्लोक उदाहरण-सं० ५३, पृष्ठ १४५ पर उद्धृत किया जा चुका है। इसका अर्थ वहीं देखना चाहिये] ॥३३२॥ इस श्लोकमें शान्तरसके १. वितर्क, २. मति, ३. शङ्का तथा ४. धृति इन चार व्यभिचारिभावोंका और शृङ्गाररसके १. स्मरण, २. दैन्य, ३. औत्सुक्य एवं ४. चिन्ता इन चार व्यभिचारिभावोंका इकट्ठा वर्णन किया गया है। शान्त तथा शृङ्गाररसका त्रालम्बन-ऐक्य तथा नैरन्तर्य, दोनों प्रकारसे परस्पर विरोध है। यह श्लोक मुख्यरूपसे शृङ्गाररसका है। क्योंकि उर्वशीके वियोगमें पुरूरवाकी उक्ति है इसलिए उसके अन्दर शान्तरसके वितर्क आदि चार व्यभिचारिभावोंका कथन करना साधारणतः उचित नहीं था। परन्तु यहाँ यह दोष नहीं अपितु गुण हो गया है, क्योंकि 'क्वाकार्य शशलक्ष्मणः क्व च कुल' इस वितक [ यहाँ शान्तरसके व्यभिचारिभाव ] से श्लोकका प्रारम्भ होता है। परन्तु उसके बाद 'भूयोऽपि दृश्येत मा' यह शृङ्गाररसका व्यभिचारिभाव 'औत्सुक्य' आकर उस 'वित्क का बाधक होता है। इसके बाद 'दोषाणां प्रशमाय नः श्रुतमहो' यह शान्तरसका 'मति' रूप व्यभिचारिभाव उदित होता है। परन्तु उसके सांथ ही 'कोपेऽपि कान्तं मुखं' यह शृङ्गाररसका व्यभिचारिभाव स्मरण उसे बाधा देता है। इसके बाद तीसरी बार 'कि वक्ष्यन्त्यपकल्मषाः कृतधियः' यह 'शङ्का' रूप शान्तरसका व्यभिचारिभाव सामने आता है, परन्तु 'स्वप्नेऽपि सा दुर्लभा' यह शृङ्गाररसका 'दैन्य' रूप व्यभिचारिभाव उसका बाधक होता है। अन्तमें 'चेतः स्वास्थ्यमुपैहि' यह शान्तरसकी 'धृति' सिर उठाती है। परन्तु 'कः खलु युवा धन्योऽधर धास्यति' यह शृङ्गाररसका 'चिन्ता'रूप व्यभिचारिभाव उसको कुचल देता है। इस प्रकार अन्तमें शङ्गाररसके व्यभिचारिभाव चिन्तामें श्लोककी विश्रान्ति होती है। अतएव इस विरोधी रसके साथ संघर्षमें विरोधी रसके व्यभिचारिभावोंका बाध होकर प्रकृत रसकी विजय होती है। अतः बाध्यरूपसे विरोधी रसके व्यभिचारिभावोंका यह वर्णन दोष नहीं, अपितु प्रकृत शृङ्गाररसका परिपोषक होनेसे गुण ही है। यही बात ग्रन्थकार अगली पंक्तिमें कह रहे हैं- इस [क्वाकार्य' इत्यादि श्लोक ] में [प्रारम्भमें विरोधी शान्तरसके व्यभिचारिभाव ] वितर्क
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काव्यप्रकाश: [ का० ६३, सू० ८:
पाण्डुक्षामं वदनं हृदयं सरसं तवालसं च वपुः । आवेदयति नितान्तं क्षेत्रियरोगं सखि ! हृदन्तः ॥३३३॥ इत्यादौ साधारणत्वं पाण्डुतादीनामिति न विरुद्धम् ।
आदिका उदय होनेपर भी [उनकी शृङ्गाररसके व्यभिचारिभाव ] चिन्तामें ही विश्रान्ति होनेसे [विरोधी रसके व्यभिचारिभावोंका यह वर्णन ] प्रकृत [शृङ्गार ] रसका परिपोषक होता है [अतः यह दोष नहीं अपितु गुण है ]। विरोधी रसके विभावादि अङ्गोंके बाध्यरूपसे कथन होनेपर दोष नहीं होता है। इस सिद्धान्तका निरूपण ध्वन्यालोककारने भी विस्तारपूर्वक किया है। उसी प्रसङ्गमें ध्वन्यालोककारने एक पंक्ति यह भी लिखी है-समारोपितायामप्यविरोधो यथा 'पाण्डुक्षामम् इत्यादौ।' इसका अभिप्राय यह है कि इस श्लोकमें करुणरसोचित व्याधिका मुख्यतः वर्णन है। परन्तु श्लेष आदि द्वारा विप्रलम्भशृङ्गारमें भी नायिकामें करुणरसोचित 'व्याधि' धर्म पाण्डुत्वादिका आरोप कर लिया गया है। इस प्रकार विरोधी करुणरसके पाण्डुक्षामवदनत्वादि अङ्गोंकी विप्रलम्भशङ्गारमें समारोपित अङ्गता होनेसे उस प्रका रका वर्णन दोष नहीं है। यह ध्वन्यालोककारने 'पाण्डुक्षामं वदनं' इत्यादि श्लोककी विवेचना करते हुए लिखा है। परन्तु काव्यप्रकाशकार मम्मट उससे सहमत नहीं हैं। वे उसे समारोपित अङ्गता मानकर विरोधका परिहार करनेकी आवश्यकता नहीं मानते। उनका कहना यह है कि यह पाण्डुत्व आदि धर्म करुणरसो- चित राजयक्ष्मारूप व्याधिके धर्म तो होते ही हैं, परन्तु उसके साथ शृङ्गाररसके अनुभावोंमें भी हो सकते हैं। अतएव इनके दोनों रसोंमें सम्भव होनेके कारण शृङ्गाररसप्रधान इस श्लोकमें उनका वर्णन करना दोष नहीं है। उनमें वस्तुतः विरोध न होनेसे ध्वन्यालोककारने उनके विरोधपरिहारका जो प्रयत्न किया है वह व्यर्थ है। इसी बातको ग्रन्थकार अगली पंक्तिमें कहते हैं- हे सखि ! तेरा पीला और मुरझाया हुआ चेहरा, सरस [अनुरागसहित तथा अन्नरसयुक्त ] हृदय और अलसाई देह, तेरे हृदयमें स्थित [राजयक्ष्मारूप और दुर्लभके साथ प्रणयरूप ] असाध्य रोगकी सूचना देते हैं॥३३३॥ यहाँ पाण्डुता आदि [राजयक्ष्मारूप करुणरसोचित व्याधिमें तथा शृङ्गाररस ] दोनोंमें समान [रूपसे सम्भव हो सकते ] हैं। अतः [शृङ्गाररसके योग्य राजयक्ष्माव्याधिके अङ्गरूपमें प्रतीत होनेवाले पाण्डुता आदिका वर्णन] शृङ्गाररसके विपरीत नहीं है [ अतः उसके परिहारके लिए ध्वन्यालोककारका प्रयत्न अनावश्यक है ]। इसी रसदोषोंकी अदोषताके निरूपणके प्रसङ्गमें ध्वन्यालोककारने एक कारिका इस प्रकार लिखी है- विनेयानुन्मुखीकत्तुं काव्यशोभार्थमेव वा। तद्विरुद्धरसस्पर्शस्तदङ्गानां न दुष्यति ॥ ध्वन्यालोक-३३०। इस कारिकाकी व्याख्या करते हुए उन्होंने इसकी वृत्ति लिखी है- शृङ्गारविरुद्ध-रस-स्पर्श: शृङ्गाराङ्गाणां यः, सन केवलमविरोधलक्षणयोगे सति न दुष्यति, यावद् विनेयानुन्मुखीकतुं काव्यशोभार्थमेव वा क्रियमाणो न दुष्यति। शृङ्गाररसाङ्गरुन्मुखीकृताः सन्तो हि विनेया: सुखं विनयोपदेशान् गृह्न्ति। सदाचारोपदेशरूपा हि नाटकादिगोष्ठी, विनेयजनहितार्थमेव मुनिभिरवतारिता।
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का० ६३, सू० ८३ ] सप्तम उल्लास: ३६८
सत्य मनोरमा रामाः सत्य रम्या विभूतयः किन्तु मत्ताङ्गनापाङ्गभङ्गलोलं हि जीवितम् ।।३३४।।
किंच शृङ्गारस्य सकलजनमनोहराभिरामत्वात् तदङ्गसमावेशः काव्ये शोभातिशयं पुष्यतीत्य- नेनाऽपि प्रकारेण विरोधिनि रसे शृङ्गाराङ्गसमावेशो न विरोधी। ततश्च- सत्यं मनोरमा रामा: सत्यं रम्या विभूतयः । किन्तु मत्ताङ्गनापाङ्गभङ्गलोलं हि जीवितम् ।। इत्यादिषु नास्ति रसविरोधदोपः ।। इसका अभिप्राय यह है कि शृङ्गाररसका अनुभव संसारमें प्रत्येक व्यक्तिको अत्यन्त त्र्पराकर्पक- रूपमें होता है। इसलिए वह सब रसोंमें मुख्य या रसराज कहलाता है, इसलिए उसके विरोधी शान्त आदि रसोंमें भी उसके विभावादि अङ्गोंका प्रयोग किया जा सकता है। इस प्रयोगके दो प्रयोजन हैं, एक तो शिष्योंको उस शान्त आदि विरोधी रसोंके प्रति उन्मुख करना और दूसरा काव्यकी शोभा। शान्त आदि रसोंके वर्णनमें शृङ्गाररसका हलका-सा पुट दे देनेसे शक्कर-चढ़ी कुनैनकी कड़वी गोलियोंके समान शान्तरसके उपदेशको भी शिष्य लोग सरलतासे ग्रहण कर लेते हैं। इसलिए और उसके सम्पर्कसे काव्यमें कुछ अपूर्व चमत्कार या सौदर्य आ जाता है इसलिए-१. विनेयानुन्मुखीकर्तुम्' और २. 'काव्यशोभार्थमेव वा' उस शृङ्गारके विभावादिरूप अ्रङ्गोंका 'तद्विरुद्धरसस्पर्शः' उसके विरोधी शान्त आदि रसोंका सम्पर्क दोषाधायक नहीं होता है। इसीके उदाहरण रूपमे ध्वनिकारने 'सत्यं मनोरमा रामाः' आदि श्लोक उद्धृत किया है-अर्थ यह है- यह ठीक है कि स्त्रियाँ बड़ी मनोरम है ती हैं और यह भी ठीक है कि सम्पत्ति बड़ी रमणीय होती है, परन्तु [उन सबके भोग करनेका साधनभूत ] यह जीवन तो मतवाली स्त्रीके कटाक्षके समान क्षणभंगुर नै॥३३४॥ इसमें शान्तरस मुख्य है, परन्तु मनोरमाओंकी चर्चा करके कविने शृङ्गाररसके आ्रलम्बन- विभावरूप अङ्गका उसमें समावेश कर दिया है। फिर भी इन मनोरमाओंकी चर्चासे पाठकके हृदयमें शृङ्गाररसकी अ्र्परनुभूति नहीं होती है। 'मत्ताङ्गनापाङ्ग' रूप शृङ्गाररसका अ्र्पनुभाव भी शृङ्गाररसकी अभिव्यक्तिमें समर्थ नहीं है। हाँ, उससे जीवनकी क्षणभङ्गुरताका प्रतिपादन बड़े सुन्दर ढंगसे हो रहा है। इसलिए विषयोंसे विमुख होनेकी शिक्षा इस श्लोकसे सरलतासे पाठकके हृदयमें प्रविष्ट हो जाती है। साथ ही कोरी शान्तरसकी चर्चाकी अपेक्षा शृङ्गाररसका तनिक-सा पुट लग जानेसे काव्यमें सौन्दर्य भी आ गया है। इसलिए यहाँ दोष नहीं है। यह ध्वनिकारका सिद्धान्त है। परन्तु काव्यप्रकाशकार इससे सहमत नहीं हैं। ध्वनिकारने यहाँ विनेयोंके उन्मुखीकरण तथा काव्यशोभारूप जिन दो हेतुओं द्वारा शान्तरसमें शृङ्गाररसके पुटका समर्थन किया है, उन दोनोंको काव्य- प्रकाशकारने अस्वीकार कर दिया है और स्वयं उसके तीन प्रकारके समाधान प्रदर्शित किये हैं। काव्यप्रकाशकारका पहिला समाधान तो यह है कि विरोधी रसाङ्गके बाध्यत्वेन कथनमें दोष नहीं होता है। यह जो सिद्धान्त पहले स्थिर किया जा चुका है, उसीसे यहाँ भी काम चल सकता है। इसलिए यहाँ दूसरे सिद्धान्त या नियमका प्रयोग करनेकी आवश्यकता नहीं है। दूसरे समाधानका आरशय यह है कि 'मत्ताङ्गनापाङ्ग'को उपमान और जीवनकी अस्थिरताको वहाँ उपमेयरूपमें प्रस्तुत किया २४
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३७० काव्यप्रकाश: [का० ६३, सू० ८३ इत्यत्राद्यमर्ध वाध्यत्वेनैवोक्तम्। जीवितादपि अधिकमपाङ्गभङ्गस्यास्थिरत्वमिति प्रसिद्धभङगुरोपमानतयोपात्तं शान्तमेव पुप्णाति। न पुनः शृङ्गारस्यात्र प्रतीतिस्तद ङ्गा- प्रतिपत्तेः ।
है। इससे उपमानभूत 'मत्ताङ्गनापाङ्ग'की अ्रस्थिरता उपमेयभूत जीवनकी अ्स्थिरतासे अधिक होनी चाहिये, इसलिए शृङ्गाररसका 'मत्ताङ्गनापाङ्ग' रूप अ्नुभाव जीवनकी अ्र्पपेक्षा भी त्रप्रधिक क्षणभङ्गुर है, इस रूपमें वह शान्तरसका ही पोषक है, शङ्गाररसका नहीं। इसके ततिरिक्त तीसरा समाधान यह है कि यहाँ शृङ्गाररसके त्रालम्बन तथा विभावादिरूप त्रङ्गोंका वर्णन न होनेसे भी शृङ्गाररस है ही नहीं। इसलिए उसके विरोधपरिहारके लिए किसी नवीन नियमके प्रयोगकी आवश्यकता नहीं। इस प्रकार काव्यप्रकाशकारके समाधानके कथनका सारांश यह है कि पहिले तो यहाँ शृङ्गार- रसकी प्रतीति ही नहीं होती है कि उसके समाधानके लिए अलग नया नियम बनानेकी आवश्यकता पड़े और यदि शृङ्गाररसकी प्रतीति मानी जाय तो उसका पूर्वार्द्धमें वाध्यत्वेन ही कथन किया गया है। इसलिए इस विरोधका परिहार पूर्वनियमसे ही हो जाता है। इसलिए नवीन नियमके प्रयोगकी आवश्यकता नहीं है। अपने इस मतका प्रतिपादन ग्रन्थकारने निम्नलिखितप्रकार किया है- इसमें [शृङ्गाररसके द्योतक ] पूर्वार्द्धको [शान्तरसके प्रतिपादक उत्तरार्द्धके द्वारा ] बाध्यरूपसे ही कहा गया है। [इसलिए पूर्व नियमसे ही शान्त तथा शृङ्गारके विरोधका परिहार यहाँ हो जाता है। उसके लिए नवीन नियमके प्रयोगकी आवश्यकता नहीं है। दूसरी बात यह है कि यहाँ शृङ्गाररसका अनुभाव जो 'मत्ताङ्गनापाङ्ग' है वह उपमानके रूपमें प्रयुक्त किया गया है, इसलिए भी] प्रसिद्ध उपमानरूपमें गृहीत अपाङ्गभङ्गकी अस्थिरता [ उमेयभूत ] जीवन [की अस्थिरता] से भी अधिक है यह [कथन ] शान्त- रसको ही पुष्ट करता है। [तीसरी बात यह है कि] उस [शङ्गार]के अङ्गोंकी प्रतीति न होनेके कारण यहाँ शृङ्गाररसकी प्रतीति भी नहीं होती है [इसलिए भी इन दोनों रसोंके विरोधपरिहारके लिए नवीन नियमप्रयोगकी आवश्यकता नहीं है। अतः ध्वनिकारका नवीन नियमके प्रयोगका प्रयास व्यर्थ है ]। इस प्रकार अपनी दृष्टिसे किसी नवीन नियमके प्रयोगके बिना भी यहाँ रसोंके विरोधका कोई अवसर नहीं है। इस बातका उपपादन करके ग्रन्थकार आागे ध्वनिकारके द्वारा प्रदर्शित दोनों समाधानोंकी व्यर्थताको प्रदर्शित करते हुए ध्वनिकारके प्रतिपादित सिद्धान्तका खण्डन करते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि रसोंका परस्परविरोध तीन प्रकारका होता है, १. किन्हींका आलम्बन-ऐक्य होनेसे, जैसे वीर और शृङ्गारका आलम्बनके ऐक्यमें विरोध होता है, २. किन्हींका आश्रयका ऐक्य होनेसे विरोध होता है, जैसे वीर और भयानक रसोंका एक आश्रयमें रहना सम्भव न होनेसे उनका आश्रय-ऐक्यमें विरोध होता है और ३. किन्हींका नैरन्तर्यसे वर्णन होनेपर विरोध होता है, जैसे शान्त और शृङ्गारका नैरन्तर्येण वर्णन होनेसे विरोध होता है। यहाँ शान्त और शृङ्गाररसके विरोधका प्रसङ्ग है। इन दोनोंका विरोध तभी हो सकता है, जब इन दोनोंका नैरन्तर्यसे वर्णन किया जाय। परन्तु यहाँ इन दोनोंका नैरन्तर्यसे वर्णन नहीं है। इसलिए यहाँ विरोध ही नहीं है, जिसके परिहारके लिए विनेयोन्मुखीकरणरूप युक्तिका अवलम्बन किया जाय। दूसरी बात जो ध्वनिकारने कही है, वह यह कि 'काव्यशोभार्थ' भी विरोधी रसका ग्रहण किया जा सकता है, सो ह बात भी यहाँ लागू नहीं होती है।
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का० ६३, सू० ८३] सप्तम उल्लास: ३७१
न तु विनेयोन्मुखीकरणमत्र परिहारः, शान्तशृङ्गारयनैरन्तर्यस्याभावात्। नापि काव्यशोभाकरणम्, रसान्तरादनुप्रासमात्राद्वा तथाभावात्।
दूसरे रसके सम्पर्कमात्नसे काव्यकी शोभा हो भी नहीं सकती है। इसलिए ध्वनिकारने इस श्लोकके शान्त तथा शृङ्गाररसके विरोधके परिहारके लिए जो यत्न किया है, वह सब बिलकुल व्यर्थ है, यह काव्यप्रकाशकारका अभिप्राय है। अपने इस अभिप्रायको ग्रन्थकारने इस प्रकार व्यक्त किया है- शान्त और शृङ्गारके [विरोधापादक हेतु ] नैरन्तर्यका अभाव होनेसे [ यहाँ उनका परस्पर विरोध ही नहीं है। अतः] 'विनेयोन्मुखीकरण' यहाँ परिहार [का हेतु है, इसको माननेकी आवश्यकता ] नहीं है। और न काव्यशोभाका उत्पादन [ रूप ध्वनि-कारका दूसरामार्ग उपयुक्त हो सकता है। क्योंकि ] दूसरे रस, अथवा [मत्ताङ्गनापाङ्ग-भंग पदके ] अनुप्राससे इस प्रकारकी शोभा हो सकती है। इस प्रकार पिछली कारिकामें विरोधी रस, विभाव, अनुभाव तथा सञ्चारिभावरूप अङ्गोंका किसी रसके साथ वर्णन किये जा सकनेके विषयमें यह नियम स्थिर किया था कि विरोधी रसके अङ्गोंका बाध्यतया वर्णन दोषबाधक ही नहीं, अपितु गुणावह हो जाता है। अब रसोंके विरोधपरिहारका दूसरा प्रकार अगली कारिकामें दिखलाते हैं। ऊपर रसोंके तीन प्रकारका विरोध दिखलाया था, परन्तु उन तीन भेदोंके करनेसे पूर्व रसविरोधके दो भेद किये जाते हैं-एक दैशिक रसविरोध, दूसरा कालिक रसविरोध। दैशिक रसविरोधके फिर दो भेद हो जाते हैं, एक आ्लम्बन-ऐक्यमें विरोध, दूसरा आश्रय- ऐक्यमें विरोध। आलम्बनका अभिप्राय आलम्बनविभाव है। जिसको देखकर रसकी उत्पत्ति होती है, वह आलम्बन और जिसमें रसकी उत्पत्ति होती है, वह रसका आश्रय है। जैसे वीर और शृङ्गारका आलम्बन-ऐक्यमें विरोध होता है। वीर और भयानकका परस्पर आश्रय-ऐक्यमें विरोध है, अर्थात् जिस व्यक्तिसे भयानकरसकी उत्पत्ति हो रही है, उससे उसी समय वीररसकी अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। इसी प्रकार जिस आश्रयमें वीररसकी उत्पत्ति हो रही है उसी आश्रयमें भयकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। इस प्रकार आलम्बन-ऐक्य तथा आश्रय-ऐक्यसे रसोंमें दो प्रकारका विरोध होता है, वह दैशिक विरोध होता है और नैरन्तर्येण जो विरोध होता है वह कालिक विरोध होता है। जैसे शान्त और शृङ्गारका नैरन्तर्येण तथा आलम्बन-ऐक्य दोनों प्रकारका विरोध होता है, शान्त और शृङ्गारका अव्यवधानसे एक साथ वर्णन नहीं करना चाहिये। इस प्रकार रसोंके विरोधके पहिले दैशिक तथा कालिक रूप दो भेद होते हैं, और फिर उनमेंसे दैशिक विरोधके दो भेद होकर १. आलम्बन-ऐक्यमें विरोध, २. आश्रय-ऐक्यमें विरोध तथा ३. नैरन्तर्यमें विरोध। इस प्रकार विरोधके तीन भेद हो जाते हैं। इन तीनों प्रकारके विरोधोंके परिहारका मार्ग ग्रन्थकार अगली कारिकामें बतलाते हैं। उसका सारांश यह है कि जहाँ आलम्बन या आश्रयरूप देशको एकताके कारण विरोध होता है, वहाँ उन विरोधी रसोंका देशभेदसे अर्थात् आलम्बनभेद एवं आश्रयभेदसे वर्णन करना चाहिये। और जिन रसोंमें कालिक विरोध अर्थात् नैरन्तर्यसे वर्णन करनेमें विरोध आता है, उसका व्यवधानसे वर्णन करना चाहिये। इस प्रकार उनके विरोधका परिहार किया जा सकता है। कारिकामें आये आश्रयैक्य शब्दसे दैशिक विरोधके आश्रयैक्य तथा आलम्बनैक्यरूप दोनों भेदोंका ग्रहण करना चाहिये। उसमें आये रस शब्दका अभिप्राय स्थायिभाव है, यह बात ग्रन्थकार इस उल्लासके अन्तमें स्वयं कहे थे। कारिकाका अर्थ निम्नलिखित प्रकार है-
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३७२ काव्यप्रकाश: [का० ६४, सू० ८४ [सू० ८४ ] आश्रयैक्ये विरुद्धो यः स कार्यो भिन्नसंश्रयः । रसान्तरेणान्तरितो नैरन्तर्येण यो रसः ।६४।। वीरभयानकयोरेकाश्रयत्वेन विरोध इति प्रतिपक्षगतत्वेन भयानको निवेशयि- तव्यः । शान्तशृङ्गारयोस्तु नैरन्तर्येण विरोध इति रसान्तरमन्तरे कार्यम्। यथा- नागानन्दे शान्तस्य जीमूतवाहनस्य 'अहो गीतम् अहो वादित्रम्'-इत्यद्भुतमन्तन- वेश्य मलयवतीं प्रति शृङ्गारो निवद्धः । न परं प्रबन्धे यावदेकस्मिन्नपि वाक्ये रसान्तर-व्यवधिना विरोधो निवर्तते। यथा-
[सू० द४] जो रस आश्रय के ऐक्यमें विरोधी है उसको भिन्न आश्रयमें [रवणित] करना चाहिये और जो नैरन्तर्यसे विरोधी [रस] है उसको दूसरे [अविरोधी] रससे व्यवहित कर देना चाहिये ।।६४।। वीर तथा भयानक रसका एकाश्रयमें विरोध है इसलिए भयानक रसका प्रतिपक्ष [प्रतिनायक ] रूपसे वर्णन करना चाहिये। [इस प्रकार उनके विरोधका परिहार हो जायगा। इसी प्रकार ] शान्त तथा शृङ्गारका नैरन्तर्येण विरोध है, इसलिए उन दोनोंके बीचमें कोई दूसरा रस [वर्णन] कर देना चाहिये। जैसे नागानन्द [नाटक ]में शान्तरसप्रधान जीमृतवाहनका मलयवतीके प्रति अनुरागका वर्णन 'अहो गीतम् अहो वादित्रम्' इत्यादि [ से व्यङ्गय] अद्भुत्रसको बीचमें [शान्त तथा शृङ्गारके व्यवधा- यकरूपमें ] डालकर किया है। केवल प्रबन्ध [अर्थात् लम्बे काव्य या नाटक ] में ही नहीं अपितु एक ही वाक्य में [एक ही प्रकरणरूप छोटे भागमें ] भी रसान्तरका व्यवधान कर देनेसे विरोध समाप्त हो जाता है। यही बात ध्वनिकारकी निम्नलिखित कारिकामें कही गयी है- रसान्तरान्तरितयोरेकवाक्यस्थयोरपि। निवर्तते हि रसयोः समावेशे विरोधिता । ध्वन्यालोक ३।२७ रसान्तरव्यवहितयोरेकप्रबन्धस्थयोर्विरोधिता निवर्तते इत्यत्न न काचिद् भ्रान्तिः। यस्मा- देकवाक्यस्थयोरपि रसयोरुक्तया नीत्या विरुद्धता निवर्तते। यथा 'भूरेणुदिग्धान्' इत्यादौ। 'ध्वन्यालोक'की इसी कारिकाके आधारपर यहाँ ग्रन्थकारने प्रकृत विषयका प्रतिपादन किया है, और उसके उदाहरणरूपमें भी वे ही श्लोक उद्ध त किये हैं। तीन श्लोकोंमें वाक्यार्थके समाप्त होनेसे यह 'विशेषक' कहलाता है। इन तीन श्लोकोंसे बने हुए 'विशेषक'का मुख्य वाक्य अन्तिम श्लोक है। शेष दोनों श्लोकोंमें 'वीराः' तथा 'स्वदेहान् के विशेषणमात्र दिये हैं। इनमेंसे मुख्य वाक्यमें शृङ्गाररस है। उन्होंने युद्धभूमिमें पड़े हुए अपने मृत शरीरोंको देखा। इस रूपमें मृत शरोरके जो विशेषण दिये गये हैं वे बीभत्सरसके अभिव्यञ्जक हैं। इस प्रकार एक वाक्यमें नैरन्तर्यसे विरोधी शृङ्गार तथा वीभत्सरसका एक साथ समावेश किया है। परन्तु उसके साथ 'बीराः' के जो विशेषण हैं, वे वीररसके अभिव्यञ्जक हैं। इसलिए नैरन्तर्यसे विरोधी शृङ्गार तथा बीभत्सरसके श्लोकोंके बीचमें वीररसका यह व्यवधान हो जानेसे, एक वाक्यमें भी उनका समावेश हो जानेपर, विरोध नहीं रहता है। यह ग्रन्थ- कारका अभिप्राय है। श्लोकोंका अर्थ निम्नलिखित हे-
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का० ६५, सू० ८५ ] सप्तम उल्लास: [३७३ यथा- भूरेणुदिग्धान् नवपारिजातमालारजोवासितबाहुमध्याः। गाढं शिवाभिः परिरभ्यमाणान् सुराङ्गनाश्लिष्टभुजान्तरालाः ॥।३३४।। सशोणितैः क्रव्यभुजां स्फुरद्द्रिः पक्षैः खगानामुपवीज्यमानान् । संवीजिताश्चन्दनवारिसेक: सुगन्धिभिः कल्पलतादुकूलैः ॥३३६॥ विमानपर्यङ्कतले निषण्णाः कुतूहलाविष्टतया तदानीम्। निर्दिश्यमानान् ललनाङगुलीभिर्वीराः स्वदेहान् पतितानपश्यन् ।३३७।। अत्र बीभत्सशृङ्गारयोरन्तर्वीररसो निवेशितः । [ सू० ८५] स्मर्यमाणो विरुद्धोऽपि साम्येनाथ विवक्षितः। अङ्गिन्यङ्गत्वमाप्तौ यौ तौ न दुष्टौ परस्परम् ।६५।।
जैसे-नवपरिजातकी नवीन मालाके परागसे सुगन्धित वक्षःस्थलवाले [वीरोंने ] पृथिवीकी धूलसे सने हुए; अप्सराओंको अपनी भुजाके बीच आलिङ्गन किये हुए वीरोंने शृगालियोंके द्वारा [खानेके लिए ] जोरसे दबाये हुए [अपने शरीरोंको देखा] ।।३३५।। चन्दनजलसे सिक्त अतएव सुगन्धित कल्पलताके दुपट्टोंसे [सुराङ्गनाओं द्वारा ] पंखा किये जाते हुए वीरोंने मांसभक्षी पक्षियोंके रक्तसे सने हुए पंखोंके द्वारा जिनपर हवा की जा रही है, इस प्रकारके युद्धभूमिमें पड़े हुए शरीरोंको देखा ॥३३६।। [युद्धमें मारे जानेके बाद स्वर्गमें पहुँचकर तत्काल ही ] विमानोंके पलँगोंपर बैठे हुए वीरोंने [अपने साथ बैठी हुई] अप्सराओंके द्वारा अँगुलियों [के सङ्गेत ]से दिखलाये जानेवाले [ युद्धभूमिमें] पड़े अपने शरीरोंको आश्र्र्यसे देखा ।३३७॥ यहाँ [नैरन्तर्यसे विरोधी ] बीभत्स तथा शृङ्गारके बीचमें वीररसका सन्निवेश किया गया है [अतः एक वाक्यमें भी विरोधी रसोंके विरोधका परिहार हो जाता है ]। रसविरोधके परिहारार्थ तीन और मार्ग विरोधी रसोंके विरोधपरिहारके तीन और मार्ग अगली कारिकामें बतलाये गये हैं। इनमेंसे पहिला मार्ग यह है कि यदि विरोधी रसका स्मर्यमाणरूपमें वर्णन किया जाय तो उसमें दोष नहीं होता है। दूसरा मार्ग दोनोंकी साम्यसे विवक्षा हो। साम्यसे दो विरोधी रसोंके वर्णनमें दोष नहीं होता है। और तीसरा मार्ग यह है कि यदि दोनों विरोधी रस किसी प्रधान रसके अङ्गरूपमें एकत्र र्व्णित हों, तो उनमें भी परस्पर विरोध नहीं रहता है। इन तीनोंको उदाहरण द्वारा स्पष्ट करेंगे। [ सू० ८५ ] विरोधी रस भी यदि १. स्मर्यमाणरूपमें अथवा २. साम्यसे विवक्षित हो [ तो दोष नहीं होता है। इसी प्रकार ] जो दो विरोधी रस ३. किसी तीसरे प्रधान रसमें अङ्गताको प्राप्त हों, वे परस्पर विरोधी [ दुष्ट ] नहीं रहते हैं ।।६५। [जैसे-युद्धभूमिमें अपने पति भूरिश्रवाके कटे पड़े हाथको देखकर उसकी पत्नी विलाप करती हुई कह रही है कि-]
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३७४ काव्यप्रकाश: [का० ६५, सू० ८५
अयं स रशनोत्कर्षी पीनस्तनविमर्दनः । नाभ्यूरुजघनस्पर्शी नीवीविस्रंसनः करः ॥३३८॥ एतद् भूरिश्रवसः समरभुवि पतितं हस्तमालोक्य तद्वधूरभिदधौ। अत्र पूर्वावस्था- स्मरणं शृङ्गाराङगमपि करुणं परिपोषयति। दन्तक्षतानि करजैश्च विपाटितानि प्रोद्धिन्नसान्द्रपुलके भवतः शरीरे। दत्तानि रक्तमनसा मृगराजवध्वा जातस्पृहैमुनिभिरप्यवलोकितानि ॥३३९॥ अत्र कामुकस्य दन्तक्षतादीनि यथा चमत्कारकारीणि तथा जिनस्य। यथा वा परः शृङगारी तदवलोकनात्सस्पृहस्तद्वद् एतद्दृशो मुनय इति साम्यविवक्षा।
[अपने जीवनकालमें सम्भोगके समय ] तगड़ीको हटानेवाला, मेरे बड़े-बड़े [पीन ] स्तनोंका मर्दन करनेवाला, नाभि, ऊरु तथा जघनस्थलका स्पर्श करनेवाला तथा नाड़े [नीवी ]को खोलनेवाला यह वही [ पूर्वानुभूत मेरे पतिका प्रिय ] हाथ है ॥३३८॥ युद्धभूमिमें भूरिश्रवाके पड़े हुए हाथको देखकर उसकी स्त्री यह कह रही है, इसमें पूर्वावस्थाके स्मर्यमाण शृङ्गारके अङ्ग भी [प्रकृत ] करुणरसके पोषक [ही] होते हैं [ अतः उनका करुणरसके साथ समावेश दोष नहीं है]। २. साम्यविवक्षामें विरोधी रसोंका अविरोध आपके सघन रोमाञ्चयुक्त [एक पक्षमें करुणावश और अन्य पक्षमें शृङ्गारवश ] शरीरपर रक्तपानकी इच्छा करनेवाली [दूसरे शृङ्गारपक्षमें अनुरागयुक्त ] मृगराजवधू [सिंहिनी, अन्य पक्षमें किसी राजाकी पत्नी ] ने जो दन्तक्षत तथा नखक्षत [अङ्गित ] किये उनको [ बड़ी तपस्या करनेवाले ] मुनियोंने भी [दूसरेके प्राणोंकी रक्षामें अपनेको समर्पित कर देनेका यह सौभाग्य हमको प्राप्त न हुआ और दूसरे शृङ्गारपक्षमें अनुरक्त राजवधूके द्वारा सम्भोगकालमें किये हुए दन्तक्षत तथा नखक्षत हमको प्राप्त न हुए इस प्रकार ] सस्पृह [सतृष्ण ] होकर देखा ॥३३६।। यहाँ [कामुकीसे उपभुक्त ] कामुकके दन्तक्षत जैसे [ उसके लिए ] आनन्ददायक, चमत्कारयुक्त प्रतीत होते हैं उसी प्रकार 'जिन' [भगवान् ]के [शरीरपर सिंहिनी द्वारा किये दन्तक्षत तथा नखक्षत उनके लिए आनन्ददायक और चमत्कारयुक्त हैं इसलिए शान्त तथा शृङ्गारकी साम्यसे विवक्षा है। अथवा जैसे दूसरा शृङ्गारी [कामुक दूसरेके] दन्तक्षतादिको देखकर [स्वयं भी उनके प्राप्त करनेके लिए] सस्पृह हो उठता है, इसी प्रकार 'जिन' [भगवान् ]के इन [दन्तक्षतादि]को देखनेवाले मुनि उनको
विरोध नहीं है ]। प्राप्त करनेके लिए सस्पूह हो उठे हैं इस प्रकारकी साम्यकी विवक्षा है[ अतः यहाँ शान्त तथा शृङ्गाररसका
यह श्लोक कहाँका है, यह पता नहीं चलता है। इसमें अपने ही बच्चेको खानेके लिए प्रवृत्त सिंहिनीके बच्चोंको बचानेके लिए अपना शरीर सिंहिनीके भेंट कर देनेवाले बुद्ध अथवा जिनकी स्तुति है, ऐसा भिन्न-भिन्न व्याख्याकारोंने लिखा है। परन्तु अपने बच्चेको खानेवाली सिंहिनीके स्थानपर किसी अन्यको खानेके लिए उद्यत सिंहिनीकी कल्पना अधिक उचित प्रतीत होती है और उस दशामें बुद्ध या जिनका ही इस श्लोकके साथ सम्बन्ध जोड़नेके स्थानपर किसी भी वीर पुरुषका सम्बन्ध जोड़ा जा सकता है।
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का० ६५, सू० ८५ ] सप्तम उल्लास: ३७५
कामन्त्यः क्षतकोमलाङगुलिगलद्रक्तैः सदर्भाः स्थली: पादेः पातितयावकैरिव गलद्वाष्पाम्बुधौताननाः ।
दावाग्निं परितो भ्रमन्ति पुनरप्युद्यद्विवाहा इव ॥।३४०। अत्र चाटुके राजविषया रतिः प्रतीयते। तत्र करुण इव शृङ्गारोऽप्यङ्गमिति तयोन विरोधः ।
ध्वन्यालोककारने यहाँ दयावीर तथा शृङ्गाररसके अ्र्रविरोधका प्रतिपादन किया है। माणिक्य- चन्द्र आदि टीकाकारोंने इसमें शान्त तथा शृङ्गारके अविरोधका तथा सारबोधिनी तथा सुधासागरकार- ने बीभत्स तथा शृङ्गारके अ्विरोधका प्रतिपादन किया है। जिन भगवान्के शरीरपर सिंहिनीके द्वारा किये हुए दन्तक्षतादि बीभत्सरसके व्यञ्जक होनेपर भी कान्त-दत्त दन्तक्षतादिके समानरूपसे व्णित होनेसे उसीके उत्कर्षाधायक होते हैं, अतः साम्यविवक्षाके कारण शान्त या बीभत्सके साथ शृङ्गारके अनुभावोंका यह वर्णन दोषाधायक नहीं है। ३. प्रधानभूत तृतीय रसके अङ्गभूत रसोंमें अविरोध इस प्रकार विरोधी रसके १. स्मर्यमाणरूपमें वर्णनका तथा २. साम्यसे विवक्षितरूपमें वर्णनका उदाहरणों द्वारा स्पष्टीकरण कर दिया गया। अब रसोंके विरोधपरिहारका इस कारिकामें प्रदर्शित तीसरा मार्ग शेष रह जाता है। इस तृतीय प्रकारमें विरोधी रसोंमेंसे कोई प्रधान रस नहीं होता है। वे दोनों प्रधानभूत किसी तीसरे रसके अङ्गरूपमें स्थित होते हैं। इसका उदाहरण आगे देते हैं। 'ध्वन्यालोक' में भी तृतीय उद्योतमें पृष्ठ ३३१ पर यह पद्य दिया गया है। किसी राजाकी स्तुति करते हुए कवि उससे कह रहा है कि आपके शत्रुओंकी स्त्रियाँ दुबारा विवाहके लिए उद्यत-सी दावाग्निके चारों ओर घूम रही हैं। जो अवस्था विवाहके समय होती है उसी प्रकारकी अवस्था इस समय आपके शत्रुओोंकी स्त्रियोंकी हो रही है। उसीको कवि कहता है कि- तुम्हारे शत्रुकी स्त्रियाँ क्षतविक्षत कोमल अँगुलियोंसे रक्त टपकाती हुईं, अतएव मानों महावर लगाये हुए पैरोंसे कुशाङकुरयुक्त भूमिपर चलती हुई, गिरते हुए आँसुओंसे मुखको धोये हुए, भयभीत होनेके कारण पतियोंके हाथमें हाथ पकड़ाये हुए दावाग्निके चारों ओर परिक्रमा कर रही हैं ॥३४०॥ यहाँ खुशामदी [कवि]में राजविषयक रति [प्रधानतया ] प्रतीत हो रही है। उसमें करुणके समान शृङ्गार भी अङ्ग है। इसीलिए उनका [परस्पर ] विरोध नहीं है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि श्लोकमें शत्रुपत्नियोंकी दुर्दशाका वर्णन होनेसे करुणरस है। उसके साथ विवाह आदिका वर्णन होनेसे शृङ्गाररस आ जाता है। इन दोनोंका आलम्बन शत्रुपत्नियाँ हैं। करुण तथा विप्रलम्भशृङ्गारका आलम्बन-ऐक्यमें विरोध होता है। परन्तु यहाँपर इन दोनोंमेंसे कोई भी काव्यका प्रधान रस नहीं है। कविनिष्ठ राजविषयक रति ही प्रधान है और ये दोनों उसके अङ्ग हैं। अतः उन दोनोंमें परस्पर विरोध नहीं है। एक प्रधान रसके अन्तर्गत दो विरोधी रसोंका अङ्गरूपसे समावेश दो प्रकारसे होता है। एक वह, जिसमें अङ्गभूत दोनों रस समकक्ष हों। दूसरा वह, जिसमें उन अङ्गभूत दोनों रसोंमें भी गुण-
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३७६ काव्यप्रकाश: [ का० ६५, सू० ८५ यथा- एहि गच्छ पतोत्तिष्ठ वद मौनं समाचर। एवमाशाग्रहग्रस्तैः क्रीडन्ति धनिनोऽर्थिभिः ॥३४१॥ इत्यत्र एहीति क्रीडन्ति, गच्छेति क्रीडन्तीति करीडनापेक्षयोरागमनगमनयोर्न विरोधः । क्षिप्तो हस्तावलग्नः प्रसभमभिहतोऽप्याददानोंऽशुकान्तं गृह्न् केशेष्वपास्तश्चरणनिपतितो नेक्षितः सम्भ्रमेण। आलिङ्गन् योऽवधूतस्त्रिपुरयुवतिभिः साश्रुनेत्रोत्पलाभिः कामीवार्द्रापराधः स दहतु दुरितं शाम्भवो वः शराग्निः ॥३४२॥ इत्यत्र त्रिपुररिपुप्रभावातिशयस्य करुणोऽङ्गम्, तस्य तु शृङ्गारः, तथापि न करुणे विश्रान्तिरिति तस्याङ्गतैव।
प्रधानभाव या अङ्गाङ्गिभाव हो। दो समकक्ष रसोंकी अङ्गताको सेनापति-द्वयवत् अंगता और अ्रपरसम- कक्ष रसोंकी अङ्गताको सेनापति-तद्भृत्यवत् अंगता कहा जाता है। जैसे दो समकक्ष सेनापति राजाके अङ्ग होते हैं उसी प्रकार करुण तथा शृङ्गाररूप दो समकक्ष रसोंकी राजविषयक रतिमें अङ्गता पिछले उदाहरणमें दिखलायी गयी थी। इसके दूसरे भेद अरथात् सेनापति तथा उसके भृत्यके समान परस्पर अङ्गाङ्गिभावको प्राप्त दो रसोंकी प्रधानभूत तृतीय रसके प्रति अ्ङ्गताका उदाहरण आागे 'क्षिप्तो हस्ता- वलग्नः' आदि ३४२ वाँ श्लोक है। बीचमें 'एहि गच्छ' आदि उदाहरण इस प्रकारका दिया है, जिसमें प्रधानके साक्षात् अङ्गभूत व्यापारोंमें [ रसोंमें नहीं] विरोध प्रतीत होनेपर भी अरविरोध होता है। आशारूप ग्रहके चक्करमें पड़े हुए याचकोंके साथ धनी लोग 'आओ-जाओ', 'पड़ जाओ', 'खड़े हो जाओ', 'बोलो', 'चुप रहो', इस प्रकार [कहकर ] खेल करते हैं। [अर्थात् वे जो चाहते हैं, याचकोंको करना पड़ता है।३४१। यहाँ आओ यह कहकर कीड़ा करते हैं, और जाओ यह कहकर कीड़ा करते हैं, इस प्रकार कीड़ाके अङ्गभूत आगमन और गमनमें विरोध नहीं होता है। त्रिपुरदाहके समय [महादेवके बाणसे उत्पन्न ], आर्द्रापराध [तत्काल कृतपराङ्गनोपभोग ] कामीके समान हाथ छूनेपर झटका दिया गया, जोरसे ताड़ित होनेपर भी वस्त्रके छोरको पकड़ता हुआ, केशोंके पकड़ते समय हटाया गया, पैरोंमें पड़ा होनेपर भी सम्भ्रम [भय अथवा घबराहट ]के कारण न देखा गया, और आलिङ्गन करनेका प्रयत्न करनेपर आँसूभरे हुए नेत्रोंवाली [रोती हुई ] त्रिपुरयुवतियों द्वारा तिरस्कृत महादेवके बाणसे उत्पन्न अग्नि तुम्हारे दुःखोंका नाश करे ॥३४२॥ इसमें त्रिपुरारि [शिव ]के प्रतापातिशयका अङ्ग [त्रिपुरयुवतियोंकी दुर्दशासे अभिव्यक्त होने- वाला ] करुण.रस है। और ['कामीवार्द्रापराधः' से अभिव्यक्त ] शृङ्गाररस उस [करुणरस]का अङ्ग है। फिर भी [अर्थात् शृङ्गारकी अपेक्षाकरुणके प्रधान या अङ्गो होनेपर भी ] करुणमें विश्रान्ति नहीं होती है। इसलिए वह भी [त्रिपुरारि शिवके प्रतापातिशयके प्रति] अङ्ग ही रहता है।
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का० ६५, सू० ८५ ] सप्तम उल्लास: ३७७
अथवा प्राक् यथा कामुक आचरति स्म तथा शराग्निरिति शृङ्गारपोषितेन करुणेन मुख्य एवार्थ उपोद्वल्यते। उक्तं हि- गुण: कृतात्मसंस्कारः प्रधानं प्रतिपद्यते। प्रधानस्योपकारे हि यथा भूयसि वर्तते ।।इति॥। प्राक् प्रतिपादितस्य रसस्य रसान्तरेण न विरोधो नाप्यङ्गाङ्गिभावो भवति इति रसशब्देनात्र स्थायिभाव उपलक्ष्यते। इति काव्यप्रकाशे दोषदर्शनो नाम सप्तम उल्लासः समाप्तः ।
अथवा पहिले जैसे कामुक आचरण करता था, इसी प्रकार शराग्नि [भी कर रहा है] इस प्रकार शृङ्गारसे पोषित करुण रसके द्वारा [त्रिपुरारिका प्रभावातिशयरूप ] मुख्य अर्थ ही परिपुष्ट होता है। जैसा कि कहा भी -- गुण अर्थात् अप्रधान या अङ्ग, अपना [परिपोषणरूप ] संस्कार हो जानेपर [परिपुष्ट होकर प्रधान [त्रिपुरारिप्रतापातिशयरूप मुख्य ] को [अङ्गरूपसे ] प्राप्त होता है। और इस प्रकार प्रधान [रस] के संस्कारमें अत्यन्त उपयोगी होता है। ग्रन्थकारने यहाँतक रसोंसे अविरोध और अङ्गाङ्गिभाव आदिके सम्पादनके विषयमें कुछ नियमोंका प्रतिपादन किया है। परन्तु इस विषयमें एक विचारणीय प्रश्न यह उपस्थित हो जाता है कि चतुर्थ उल्लासमें रसको वेद्यान्तरस्पर्शशून्य माना गया है अर्थात् किसी भी रसके अनुभवकालमें उसके अतिरिक्त अन्य किसीका भान नहीं होता है। इस सिद्धान्तके अनुसार एक साथ दो रसोंकी अनुभूति ही नहीं हो सकती है। तब दो रसोंके विरोध या अविरोध अथवा अङ्गाङ्गिभाव आदिका कोई प्रश्न ही उपस्थित नहीं हो सकता है। तब क्या यह सारा विवेचन व्यर्थ ही किया गया है ? इस प्रश्नका उत्तर ग्रन्थकारने यह दिया है कि यद्यपि यह ठीक है कि रसोंमें विरोध आदिका उपपादन नहीं किया जा सकता है, परन्तु यहाँ रस शब्दसे मुख्य रसोंका ग्रहण न करके केवल स्थायिभावोंका ग्रहण करना चाहिये। 'रस्यते इति रसः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार इस प्रसङ्गमें रसशब्दको स्थायिभावका वाचक समझना चाहिये। इसी बातको अगली पंक्तिमें कहकर ग्रन्थकार इस प्रसङ्गकी और साथ ही दोषदर्शन नामक इस सप्तम उल्लासकी समाप्ति करते हैं- पहिले [चतुर्थ उल्लासमें ] प्रतिपादित [मुख्य ] रसका दूसरे रसके साथ न विरोध [ही] हो सकता है और न अङ्गाङ्गिभाव [ही] होता है, इसलिए रस शब्दसे यहाँ स्थायिभावका ग्रहण किया जाता है। काव्यप्रकाशमें दोषदर्शन नामक सप्तम उल्लास समाप्त हुआ। श्रीमदाचार्यविश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोमणिविरचितायां काव्यप्रकाशदीपिकायां हिन्दीव्याख्याया दोषदर्शनो नाम सप्तम उल्लास: समाप्तः ।
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अथाष्टम उल्लास:
अथ काव्यप्रकाशदीपिकायाम् अष्टम उल्लास: उल्लाससङ्गति प्रथम उल्लासमें ग्रन्थकारने 'तददोषौ शब्दार्थौ सगुणौ अनलङकृती पुनः क्वापि' यह जो काव्यका लक्षण किया था, उसमें 'सगुणौ' यह भी 'शब्दाथो' का एक विशेषण दिया था। पिछले सप्तम उल्लासमें 'अदोषौ' विशेषणके स्पष्टीकरणके लिए दोषोंका विवेचन किया गया था। अब इस अष्टम उल्लासमें 'सगुणौ' इस विशेषणके स्पष्टीकरणके लिए गुणोंका विवेचन करते हैं। इसमें भी गुणोंके लक्षण आदि करनेके पूर्व ग्रन्थकार गुण तथा अलङ्गारोंके परस्पर भेदका उपपादन करते हैं। इसका कारण यह है कि गुण तथा अलङ्कारोंका परस्पर क्या भेद है, इस विषयमें पूर्ववर्त्ती आचार्योंमें मतभेद पाया जाता है, इसलिए मम्मटने गुणोंके लक्षण आदि करनेके साथ उनका अलङ्कारोंसे भेदका प्रदर्शन आवश्यक समझकर उसी दृष्टिसे इस अष्टम उल्लासका प्रारम्भ किया है। गुण तथा अलङ्गारोंका भेद गुण तथा अलङ्कारोंके भेदके विषयमें पूर्ववर्त्ती आर्परचार्योंके दो प्रकारके मत पाये जाते हैं। भामहके 'काव्यालङ्कार' पर लिखे हुए अपने 'भामहविवरण' में उसके लेखक भट्टोढ़टने भेदको मिथ्याकल्पना माना है। उनके मतमें गुण तथा अलङ्कारोंमें कोई भेद नहीं है। लौकिक गुण तथा अलङ्कारोंमें तो यह भेद किया जा सकता है कि हारादि अलङ्कारोंका शरीरादिके साथ संयोगसम्बन्ध होता है, और शौर्यादि गुणोंका आत्माके साथ संयोगसम्बन्ध नहीं अपितु समवायसम्बन्ध होता है, इसलिए लौकिक गुण तथा अलङ्कारमें भेद माना जा सकता है। परन्तु काव्यमें तो तज आदि गुण तथा अनुप्रास, उपमा आदि अलङ्कार दोनोंकी ही समवायसम्बन्धसे स्थिति होती है, इसलिए काव्यमें उनके भेदका उपपादन नहीं किया जा सकता है। अपने इस मतको भट्टोद्दटने इस प्रकार लिखा है- "समवायवृत्त्या शौर्यादयः संयोगवृत्त्या तु हारादयः गुणालङ्गाराणां भेदः, शज:प्रभृतीनाम् अनुप्रासोपमादीनां चोभयेषामपि समवायवृत्या स्थितिरिति गड्डलिकाप्रवाहेणैवैषां भेदः ।" गड्डलिकाका अर्थ भेड़ होता है, इसलिए गड्डलिका-प्रवाहका अर्थ भेड़चाल है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि भट्टोद्टके मतानुसार गुण तथा अलङ्कारमें वस्तुतः कोई भेद नहीं है, उनमें जो लोग भेद मानते हैं, वह केवल भेड़- चालमात्र है। इस प्रकार भट्टोद्भटका मत अभेदवादी है। १. वामनका मत ादूसरा मत 'काव्यालङ्कारसूत्र'के निर्माता वामनका है। वह भेदवादी मत है। वामन गुण तथा अलङ्कार दोनोंमें भेद मानते हैं। उन्होंने अपने 'काव्यालङ्कारसूत्र'के तृतीय अधिकरणके प्रथमा- ध्यायमें इन दोनोंके भेदका निरूपण करते हुए लिखा है कि- "काव्यशोभायाः कर्त्तारो धर्मा गुणाः।३।१।१। ये खलु शब्दार्थयो: धर्माः काव्यशोभां कुर्वन्ति ते गुणाः । ते च श्रज प्रसादादयः । न यमकोपमादयः । कैवल्येन तेषामकाव्यशोभाकरत्वात्। शज:प्रसादादीनान्तु केवलानामस्ति काव्यशोभाकरत्वमिति। तदतिशयहेतवस्त्वलङ्काराः।३।१।२। तस्या: काव्यशोभ याः अतिशयस्तदतिशयः, अस्य हेतवः। तु शब्दो व्यतिरेके। अलङ्काराश्च यमको- पमादयः । अ्रत्र श्लोकौ-
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का० ६६, सू० ८६ ] अरष्टम उल्लास: ३७६
युवतेरिव रूपमङ्ग काव्यं स्वदते शुद्धगुणं तदप्यतीव। विहितप्रणयं निरन्तराभिः सदलङ्कारविकल्पकल्पनाभिः ॥ यदि भवति वचश्च्युतं गुणेभ्यो वपुरिव यौवनवन्ध्यमङ्गनायाः । अपि जनदयितानि दुर्भगत्वं नियतमलङ्करणानि संश्रयन्ते।। पूर्वे नित्याः।३।१।३। पूर्वे गुणा: नित्याः । तैविना काव्यशोभानुपपत्तेः ।" इसका अभिप्राय यह हुआ कि- काव्यशोभाके करनेवाले उत्पादक-धर्म गुण कहलाते हैं। शब्द अथवा अर्थके जो धर्म काव्यकी शोभाको उत्पन्न करने हैं, वे गुण कहलाते हैं और वे गुण शज, प्रसादादि ही होते हैं। यमक आदि शब्दा- लङ्कार और उपमा आदि अर्थालद्वार उस काव्यशोभाके उत्पादक न होनेसे गुण नहीं कहे जा सकते हैं। क्योंकि शज, प्रसादादि गुणोंके अभावमें केवल यमक अथवा उपमा आदि अलङ्कार काव्यके शोभाधायक नहीं हो सकते हैं, और ओज, प्रसादादि गुण तो यमक, उपमा आदिके बिना भी काव्यके शोभाधायक हो सकते हैं, इसलिए वे ही गुण कहे जा सकते हैं। उस काव्यशोभाके बढ़ानेवाले धर्म अलङ्कार होते हैं। जैसे युवतीके भीतर सौन्दर्यादि गुणोंके होनेपर ही अलङ्कार उसकी शोभाकी वृद्धि कर सकते हैं, वास्तविक शरीरसौन्दर्यके न होनेपर धारण किये हुए सुन्दर अलङ्कार भी व्यर्थ हो जाते हैं, वे उसके सौन्दर्यकी वृद्धि नहीं कर सकते हैं, उसी प्रकार काव्यमें शज, प्रसादादि गुणोंके न होनेपर यमक और उपमा आदि अलङ्कार उसके शोभावर्धक नहीं हो सकते हैं। गुण तथा अलङ्गारका दूसरा भेद यह भी है कि गुण नित्य या अपरिहार्य हैं, पर अलङ्कार अपरि- हार्य नहीं हैं। अर्थात् काव्यमें अलङ्कारके बिना तो काम चल सकता है, परन्तु गुणोंके अभावमें उसमें काव्यव्यवहार ही नहीं हो सकता है। यह वामनका मत है। वामनके इसी मतके आधारपर काव्य- प्रकाशकारने भी अपने काव्यलक्षणमें 'सगुणौ' कहकर काव्यमें गुणोंकी अपरिहार्यताका तथा 'अनलङकृती पुनः क्वापि' लिखकर अलङ्कारोंकी अपरिहार्यताके अभावका बोधन किया है। इस प्रकार वामनके मतमें गुण तथा अलङ्कारके बीच दो प्रकारका अन्तर होता है- १. काव्यशोभाके उत्पादक धर्म गुण कहलाते हैं, और गुणों द्वारा उत्पादित उस काव्यशोभाकी वृद्धि करनेवाले धर्म अलद्कार कहलाते हैं। अर्थात् गुण काव्यके स्वरूपाधायक धर्म हैं और अलङ्कार उसके उत्कर्षाधायक अथवा उसकी उपादेयताके तारतम्यके प्रयोजक धर्म हैं। २. काव्यमें गुणोंकी स्थिति अपरिहार्य है, परन्तु अलङ्कारोंकी स्थिति अपरिहार्य नहीं है। २. आनन्दवर्धनका मत गुण तथा अलङ्कारके भेदके विषयमें उ्धट तथा वामनके पूर्वोक्त दो मतोंके अतिरिक्त ध्वन्या- लोककार आानन्दवर्धनाचार्यका भी एक मत है। उन्होंने इन दोनोंके भेदका प्रदर्शन करते हुए लिखा है, कि- तमर्थमवलम्बन्ते येऽ्ङ्गिनं ते गुणाः स्मृताः । अङ्गाश्रितास्त्वलङ्कारा मन्तब्या: कटकादिवत्।। इसका अभिप्राय यह हुआ कि काव्यके आत्मभूत रसादिरूपध्वनिके आश्रित रहनेवाले धर्म गुण होते हैं, और अलङ्कार काव्यके अङ्गभूत शब्द तथा अर्थके धर्म होते हैं। इस प्रकार आनन्द-
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३८० काव्यप्रकाश [ का० ६६, सू० ८६ एवं दोषानुक्त्वा गुणालंकारविवेकमाह- [सू० ८६ ] ये रसस्याङ्गिनो धर्मा: शौर्यादय इवात्मनः । V उत्कषहतवस्ते स्युरचलस्थितयो गुणाः ॥६६॥ आत्मन एव हि यथा शौर्यादयो नाकारस्य, तथा रसस्यैव माधुर्यादयो गुणा न वर्णानाम् 1 क्वचित्तु शौर्यादिसमुचितस्याकारमहत्त्वादेर्दर्शनात्, 'आकार एवास्य शूर:' इत्यादेव्यत्रहारात्, अन्यत्राशूरेऽपि वितताकृतित्वमात्रेण 'शूरः' इति, क्वापि शूरेऽपि मूर्तिलाघवमात्रेण 'अशूरः'इति अविश्रान्तप्रतीतयो यथा व्यवहरन्ति तद्वन्मधुरादिव्यञ्जक- सुकुमारादिवर्णानां मधुरादिव्यवहारप्रवृत्तेः अमधुरादिरसाङ्गानां वर्णानां सौकुमार्यादि- मात्रेण माधुर्यादि, मधुरादिरसोपकरणानां तेषामसौकुमार्यादेरमाधुर्यादि रसपर्यन्तप्रतीति- वन्ध्या व्यवहरन्ति। अत एव माधुर्यादियो रसधर्माः समुचितैर्वर्णैव्यंज्यन्ते न तु वर्णमात्रा- श्रयाः। अथैषां व्यञ्जकत्वं तथोदाहरिष्यते।
वर्धनाचार्यने गुणोंको रसाश्रित तथा अलङ्कारोंको शब्द तथा अर्थके आश्रित धर्म मानकर उनके भेदका उपपादन किया है। ३. मम्मटाचार्यका मत उपर्युक्त तीन मतोंमेंसे अन्तिम दो मतोंको मिलाकर मम्मटने अपने मतकी स्थापना की है। भट्टोद्दटके अभेदवादी पक्षका तो मम्मटने बिलकुल खण्डन कर दिया है। वामनके मतमेंसे गुणोंके शोभाजनकत्व और अलङ्ारोंके शोभातिशयजनकत्व मतको बिलकुल छोड़ दिया है। उन्होंने गुणोंको शोभाजनक नहीं अपितु उत्कर्षहेतु ही माना है। हाँ, वामनके मतसे गुणोंकी अपरिहार्यताका ग्रहण और आनन्दवर्धनके मतसे गुणोंकी रसधर्मता तथा अलङ्कारोंकी शब्दार्थधर्मताका ग्रहण कर इन दोनोंके सम्मिश्रणके द्वारा गुण तथा अलङ्गारके भेदका प्रतिपादन किया है। गुण तथा अलङ्कारके भेदका प्रतिपादन करते हुए ग्रन्थकार इस अ्रष्टम उल्लासका प्रारम्भ इस प्रकार करते हैं- इस प्रकार [सप्तम उल्लासमें ] दोषोंका वर्णन करनेके बाद [अब इस अष्टम उल्लासमें सबसे पहिले ] गुण तथा अलङ्गारका भेद बतलाते हैं- (सू० ८६) -- आत्माके शौर्यादि धर्मोंके समान [काव्यके आत्मभूत] प्रधान रसके जो अपरिहार्य और उत्कर्षाधायक धर्म हैं वे गुण [कहलाते ] हैं ॥६६।। जैसे शौर्य आदि [धर्म ] आत्माके ही होते हैं, शरीर [आकार] के नहीं, इसी प्रकार माधुर्य आदि गुण रसके ही [धर्म ] होते हैं, वर्णोंके नहीं। कहीं-कहीं शौर्य आदि [आत्मगुणों ]के योग्य शरीरकी लम्बाई-चौड़ाईको देखकर 'इसका आकार ही शूरवीर है' इस प्रकारका व्यवहार होनेसे, और दूसरी जगह अशूर [काया ] में भी केवल लम्बी-चौड़ी आकृतिको देखकर 'शूर' है यह, तथा कहीं शूरमें भी केवल शरीरके छोटे होनेके कारण [विश्रान्तप्रतीतयः तत्त्वज्ञानिनः तन्िन्नाः भ्रान्ताः अविश्रान्तप्रतीतयः] भ्रान्त लोग जैसे व्यवहार करने लगते हैं, इसी प्रकार १. मधुर आदि [गुणों]के व्यञ्जक सुकुमार आदि वर्णोंमें मधुर आदि व्यवहारके होनेसे, २. अमधुर आदि रसके अङ्गभूत वर्णोंकी सुकुमारता आदि मात्रसे माधुर्य आदिका तथा ३. मधुर आदि रसोंके अङ्गभूत उन [वर्णों]के असुकुमार [कठोर] होनेसे रसकी मर्यादाको न
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का० ६७, सू० ८७ ] अष्टम उल्लास: ३८१ [सू० ८७ ] उपकुर्वन्ति तं सन्तं येऽङगद्वारेण जातुचित्। 1995 हारादिवदलङ्गारास्तेऽनुप्रासोपमादयः ॥६७। ये वाचकवाच्यलक्षणाङ्गातिशयमुखेन मुख्यं रसं सम्भविनमुपकुवन्ति ते कण्ठा- द्यङगानामुत्कर्षधिानद्वारेण शरीरिणोऽपि उपकारका हारादय इवालङ्काराः । यत्र तु नास्ति रसस्तत्रोक्तिवैचित्र्यमात्रपर्यवसायिनः । क्वचित्तु सन्तमपि नोपकुर्वन्ति। यथाकममुदाहरणानि --
समझनेवाले [भ्रान्त व्यक्ति ] उनके अमाधुर्य आदिका व्यवहार करते हैं। इसलिए [ यह समझना चाहिये कि ] गुण माधुर्य आदि [ गुण वस्तुतः ] रसके धर्म हैं वे [ माधुर्य आदि] योग्य वर्णोंसे अभिव्यक्त होते हैं, केवल व्णोंके आश्रित रहनेवाले नहीं हैं। ये [ वर्ण] जिस प्रकार [उन माधुर्यादि गुणोंके ] व्यञ्जक होते हैं, उसके उदाहरण आगे देंगे। इस प्रकार ग्रन्थकारने गुणोंका लक्षण किया है, इसके अनुसार गुणके लक्षणमें रसोत्कर्षकत्व तथा रसनिष्ठत्व ये दो धर्म समाविष्ट हो जाते हैं। इसलिए १. 'रसोत्कर्षकत्वे सति रसाव्यभिचारित्वम्' और २. 'अव्यभिचारेण रसोपकारकत्वं गुणत्वम्' ये दोनों गुणके लक्षण बनते हैं। अलङ्गारोंमें ये दोनों बातें नहीं पायी जाती हैं। रसके अभावमें भी शब्दालड्कारोंकी स्थिति होनेसे इनमें रसाव्यभिचारित्व नहीं हैं, और न वे अव्यभिचारेण रसोपकारक ही होते हैं। इसलिए अलङ्कारमें गुणके उक्त लक्षणोंकी अतिव्याप्ति नहीं होती है। इसी बातको दिखानेके लिए आगे ग्रन्थकार अलङ्कारोंमें उक्त धर्मोंके पभावका प्रतिपादन करते हुए अलङ्कारका स्वरूप प्रदर्शित करते हैं- [सू० ८७ ]-और जो [काव्यमें ] विद्यमान उस [अङ्गी रस ] को शब्द तथा अर्थरूप ] अङ्गोंके द्वारा [नियमेन अथवा सर्वथा नहीं। अपितु ] कभी-कभी उपकृत [उत्कर्षयुक्त ] करते हैं, वे अनुप्रास और उपमा आदि [शब्दालङ्गार तथा अर्थालङ्गार शरीरके शोभाधान द्वारा परम्परया शरीरी आत्माके उत्कर्षजनक ] हार आदि [दैहिक अलङ्गारों] के समान [काव्यके ] अलङ्गार होते हैं ।।६७।। १. शब्द तथा अर्थरूप अङ्गोंके उत्कर्ष द्वारा जो [काव्यमें यदि सम्भव हो तो उस ] विद्यमान मुख्य रसको उपकृत करते हैं [ उसके उत्कर्षाधायक होते हैं]। वे कण्ठ आदि अङ्गोंके उत्कर्षाधान द्वारा शरीरी [आत्मा ]के भी [ परम्परया ] उत्कर्षाधायक हारादिके समान [अलङ्गार] कहलाते हैं। २. जहाँ रस नहीं होता है वहाँ [ कुरूप स्त्री द्वारा धारण किये गये अलङ्गारोंके समान उत्कर्षा- धायक या सौन्दर्यवर्धक न होकर केवल दृष्टिवैचित्यमात्रके प्रयोजक होनेके समान ] उक्तिवचित्यमात्र प्रतीत होते हैं। ३ -- और कहीं तो [काव्यमें रसके ] होनेपर भी [लोकोत्तर सौन्दर्यशालिनी किसी नायिकाके शरीरमें धारण कराये गये ग्रामीण अलङ्गार जैसे उसके सौन्दर्यके वर्धक नहीं होते हैं, इस प्रकार ] उसके उत्कर्षाधायक नहीं होते हैं। [अलङ्कारोंकी इन तीन प्रकारकी स्थितियोंके ] यथाक्रम उदाहरण-
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३८२ काव्यप्रकाश: [का० ६७, सू० ८७
अपसारय घनसारं कुरु हार दूर एव किं कमलैः। अलमलमालिमृणालैरिति वदति दिवानिशं बाला ॥३४३।
इत्यादौ वाचकमुखेन, मनोरागस्तीव्रं विषमिव विसर्पत्यविरतं प्रमाथी निर्धूमं ज्वलति विधुतः पावक इव। हिनस्ति प्रत्यङगं ज्वर इव गरीयानित इतो न मां त्रातुं तातः प्रभवति न चाम्बा न भवती॥३४४।। इत्यादौ वाच्यमुखेनालङ्कारौ रसमुपकुरुतः।
[दामोदरगुप्त-कृत 'कुट्टनीमतम्' नामक काव्यमें किसी विरहिणीके वर्णनमें यह पद्य आया है। विरहिणीके सन्तापहरणके लिए विविध उपचार करनेवाली सखीके प्रति नायिका कह रही है कि -- ] हे सखि ! इस कपूरको हटा दो [ इससे मेरा सन्ताप दूर नहीं हो सकता है]। हारको भी दूर रखो। कमलोंसे क्या लाभ ? मृणालोंको भी रहने दो [ इनमेंसे किसीमें भी मेरे सन्तापको हरण करनेकी सामर्थ्य नहीं]। वह [वियोगिनी ] बाला हर समय यही कहती रहती है॥३४३। यहाँ [वाचक ] शब्दके द्वारा [रेफकी आवृत्तिके कारण अनुप्रासरूप शब्दालङ्गार काव्यमें विद्यमान विप्रलम्भ शृङ्गाररूप अङ्गी रसका उत्कर्षाधायक होता है। इसलिए यह 'सम्भविनम् उपकुर्वन्ति' का उदाहरण हुआ ]। आगे अर्थ द्वारा अर्थात् अर्थालङ्कार द्वारा रसके उत्कर्षाधानका उदाहरण देते हैं। यह उदा- हरण महाकवि भवभूतिकृत 'मालतीमाधव' नाटकके द्वितीय अङ्गसे लिया गया है। माधवके प्रति त्रपरनुरक्त मालती अपनी सखी ल्वङ्गकासे कह रही है कि- हे सखि ! [आज माधवके प्रति ] मेरा अनुराग तीव्र विषके समान निरन्तर बढ़ता जा रहा है। अत्यन्त सन्तापकारक वह [अनुराग ] हवा किये हुए अग्निके समान बिना धुएँके [बहुत जोरसे ] जल रहा है और तेज ज्वरके समान सारे अङ्गोंको पीड़ित कर रहा है, इसलिए न पिताजी मुझे इससे बचा सकते हैं, न माताजी और न आप ही [ इससे मेरी रक्षा कर सकती हो] ॥३४४॥ इत्यादिमें [अर्थात् ३४३ तथा ३४४ दोनों उदाहरणोंमेंसे प्रथममें वाचक अर्थात् शब्द द्वारा अनुप्रासरूप शब्दालङ्कार तथा दूसरेमें ) वाच्य [अर्थ]के द्वारा [मालोपमारूप अर्थालङ्गार ] दोनों अलङ्गार [काव्यमें विद्यमान विप्रलम्भशृङ्गार ] रसके उपकारक [उत्कर्षाधायक ] होते हैं। रसके अभावमें भी अलङ्कार हो सकते हैं, इसके दो उदाहरण चित्र काव्यके निरूपणके अवसर- पर दिये जा चुके हैं। 'स्वच्छन्दोच्छलदच्छ०' आदि उदाहरणोंमें रसके न होनेपर भी अलङ्कार पाये जाते हैं। इसलिए वे कुरूप स्त्री द्वारा धारण किये हुए अलङ्कारोंके समान उत्कर्षाधायक न होकर केवल उक्तिवैचित्यमात्रके प्रयोजक होते हैं। इसी प्रकार 'शोर्णघ्राणाङघ्रिपाणीन्' आदि उदाहरण सं० ३०१ भी रसविहीन अलङ्कारका उदाहरण पहिले आ चुका है। इसलिए यहाँ ग्रन्थकारने इस प्रकारके उदाहरण फिर नहीं दिये हैं।
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का० ६७, सू० ८७ ] अ्रष्टम उल्लास: ३८३
चित्ते विहद्टदि ण टुद्टदि सा गुणेसुं सज्जासु लोटटदि विसटटृदि दिन्मुहेसुं। बोलम्भि बद्टदि पवद्टृदि कव्वबन्धे झाणे ण टुद्टदिचरं तरुणी तरट्टी ।।३४५॥ [चित्ते विघटते न त्रुट्यति सा गुणेषु शय्यासु लुठति विसर्पति दिङमुखेषु। वचने वर्तते प्रवर्तते काव्यबन्धे ध्याने न त्रुटयति चिरं तरुणी प्रगल्भा ।।इति संस्कृतम् ] इत्यादौ वाचकमेव, मित्रे क्वापि गते सरोरुहवने वद्धानने ताम्यति कन्दत्सु भ्रमरेषु वीक्ष्य दयितासन्नं पुरः सारसम्। चक्राह्वेन वियोगिना बिसलता नास्वादिता नोज्झिता । कण्ठे केवलमर्गलेव निहिता जीवस्य निर्गच्छतः ।३४६॥
जहाँ रस होनेपर भी शब्दालड्कार उसका उपकारक या उत्कर्षाधायक नहीं होता है, इस प्रकारका उदाहरण आगे देते हैं। यह श्लोक राजशेखरकृत 'कर्पूरमञ्जरी' सट्टककी द्वितीय जवनिकाके बाद 'दंसणक्खणादो पहुदि कुरंगच्छी' (दर्शनक्षणात् प्रभृति कुरङ्गाक्षी) से लेकर देवी कर्पूरमञ्जरीके विषयमें राजा चण्डपालकी यह उक्ति है। सुधासागरकारने इसे प्रवासी नायकके प्रति विरहिणी नायिकाका वर्णन तदलाया है और उद्योतकारने इसे दूतीकी उक्ति कहा है। ये दोनों बातें ठीक नहीं हैं। वह प्रगल्भा [प्रतिभासमन्वित ] तरुणी [देवी कर्पूरमञ्जरी ] चित्तमें बैठी हुई है, वह गुणोंमें कम नहीं है [ कभी वह मुझे अपनी ] शय्यापर लोटती [ हुई दिखलायी देती ] है और [कभी ] सब दिशाओंमें [वही] दिखलायी देती है [ कभी] बात करती है [ कभी मेरे साथ ] काव्यरचनामें प्रवृत्त होती है और कभी भी बहुत देरतक ध्यानसे बाहर नहीं रहती है [ अर्थात् बहुत देरके लिए उसको भूल जाऊँ ऐसा कने नहीं होता है]।।३४५।। [यहाँ वर्णोंकी आवृत्ति होनेसे अनुप्रासरूप शब्दालङ्गार है। परन्तु विप्रलम्भ-शृङ्गारमें टवर्गका प्रयोग रसका उत्कर्षाधायक न होकर अपकर्षक होता है, इसलिए यहाँ रस तथा अलङ्गार दोनों होनेपर भी अलड्कार उस रसका उत्कर्षाधायक नहीं है। इसलिए ] यहाँ [अलङ्गार वाचक ] शब्दका ही [उपकारक होता है रसका नहीं, इसका आगेकी पंक्तिकें साथ अन्वय होगा]। [मित्र अर्थात् कमलोंके आह्लादकारक ] सूर्यके कहीं चले जाने [अस्त हो जाने ] पर, कमलोंके वनके मुख बन्द कर लेनेपर, सन्तप्त होनेवाले भ्रमरोंके रोने [शब्द करने ] और सामने [अपनी ] प्रिय- तमाके पास खड़े हुए सारसको देखकर, वियोगी चक्रवाकने [ खानेके लिए मुखमें पकड़ी हुई ] बिलसता [मृणालदण्ड] न तो खायी और न छोड़ ही दी, किन्तु [वियोगदुःखके कारण शरीरको छोड़कर ] निकलते हुए जीवके [ रोकनेके ] लिए कण्ठ [रूप द्वारा]में अर्गलाके समान लगा दी [ जिससे जीवात्मा शरीर छोड़कर बाहर न निकल सके]॥३४६॥
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३८४ काव्यप्रकाश: [का० ६७, सू० ८७ इत्यादौ वाच्यमेव, न तु रसम् । अत्र बिसलता न जीवं रोद्धु क्षमेति प्रकृतान- नुगुणोपमा । एष एव च गुणालङ्कारप्रविभागः । एवं च 'समवायवृत्त्या शौर्यादयः संयोग- वृत्त्या तु हारादय इत्यस्तु गुणालङ्काराणां भेदः, ओजःप्रभृतीनामनुप्रासोपमादीनां चोभयेषामपि समवायवृत्त्या स्थितिरिति गड्डलिका प्रवाहेणैवैषां भेदः' इत्यभिधानमसत्। यहाँ 'अर्गलेव' यह उपमारूप अर्थालङ्कार है और विप्रलम्भशृङ्गार रस है। परन्तु वह उपमा विप्रलम्भशृङ्गाररूप रसकी उत्कर्षाधायिका नहीं, अपितु अपकर्षकारिणी है। क्योंकि विप्रलम्भ अवस्थामें प्राण रोकनेकी नहीं अपितु प्राणपरित्यागकी हो इच्छा स्वाभाविकरूपसे होती है। इसलिए यह उपमा- अलङ्कार रसका उपकारक नहीं है, इसी बातको आगे कहते हैं- इत्यादिमें [उपमालङ्गार ] केवल अर्थको ही [ पुष्ट करता ] रसको नहीं। [क्योंकि ] यहाँ बिसलता जीवनको [प्राणोंको निकलनेसे ] रोकनेके लिए [ प्रयुक्त करने ] योग्य नहीं है। [अर्थात् बिसलताको अर्गला बनाकर उसके द्वारा जो प्राणोंको निकलनेसे रोका गया है, वह उचित नहीं है] इसलिए यह प्रकृतके अननुरूप [अयोग्य ] उपमा है [ अतः विद्यमान शृंगाररसकी उपकारक नहीं होती है]। यहाँ वाक्यकी रचना कुछ अटपटी-सी हो गयी है। 'बिलसता न जीव रोद्धुं क्षमा' इस पंक्तिसे यह अर्थ प्रतीत होता है कि बिलसता जीवको रोक नहीं सकती है। परन्तु ग्रन्थकारका यह अभिप्राय नहीं है। ग्रन्थकारका आ्ाशय यह है कि बिलसताकी जो अरगलासे उपमा दो गयी है, उससे निकलते हुए प्राणोंके मार्गमें रुकावट डाली गयो है, विप्रलम्भशङ्गारमें वह उचित नहीं है। इसलिए प्रकृत रसके अनुनुरूप होनेसे यह उपमा रसकी परिपोषिका नहीं है। ४. भट्टोन्डटके मतका खण्डन इस प्रकार यहाँतक ग्रन्थकारने अपने मतके अनुसार गुण तथा अलङ्कारका भेदप्रतिपादन किया। उनके मतानुसार गुण रसके उत्कर्षाधायक, रसके अव्यभिचारी और रसमात्रनिष्ठ धर्म हैं। अलङ्कार उनसे भिन्न हैं। वे रसके बिना भी रह सकते हैं। रस होनेपर कभी उसके पोषक भी हो सकते हैं और कभी उसके पोषक न हों यह भी हो सकता है। इसलिए गुण तथा अलङ्कार दोनों भिन्न हैं। अब भट्टोद्भटने भामहके 'काव्यालङ्वार' के विवरणमें जो गुण तथा अलङ्कारोंके अभेदका प्रतिपादन किया है, उसका खण्डन करनेके लिए ग्रन्थकार अरगले अनुच्छेदका प्रारम्भ करते हैं- और यही गुण तथा अलङ्गारका भेद [भेदक ] है। इस प्रकार [भट्टो्दटने जो गुण तथा अलङ्गार- के अभेदके सिद्धान्तका प्रतिपादन करते हुए लिखा है, कि लोकमें ] 'शौर्य आदि [ गुण आत्मारूप गुणी में ] समवायसम्बन्धसे और हारादि [रूप अलङ्गार शरीरमें ] संयोगसम्बन्धसे सम्बद्ध रहते हैं, [सम्बन्धभेदके आधारपर लौकिक गुण तथा अलङ्गारोंका भेद भले ही मान लिया जाय, परन्तु [काव्यमें तो ] ओज इत्यादि [गुणों ] तथा अनुप्रास, उपमा आदि [शब्दालङ्गार तथा अर्थालङ्गार]दोनोंकी समवायसम्बन्धसे स्थिति होती है इसलिए इनका भेद मानना भेड़चाल [अन्धपरम्परा]के कारण ही है, [वास्तवमें गुण तथा अलङ्गारमें कोई भेद नहीं है]'। [भट्टों्द्टका ] यह कहना असङ्गत है।
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का० ६७, सू० ८७ ] अ्रष्टम उल्लास: ३८k
यदप्युक्तम् 'काव्यशोभायाः कर्त्तारो धर्मा गुणाः, तदतिशयहेतवस्त्वलङ्काराः' इति तदपि न युक्तम् । यतः कि समस्तैर्गुणैः काव्यव्यवहारः, उत कतिपयैः ? यदि समस्तैः तत्कथमसमस्तगुणा गौडी पाञ्चाली च रीतिः काव्यस्यात्मा ? अथ कतिपयैः, ततः- अद्रावत्र प्रज्वलत्यग्निरुच्चैः प्राज्यः प्रोद्यन्नुल्लसत्येष धूमः ॥३४७॥ इत्यादावोज:प्रभृतिषु गुणेषु सत्सु काव्यव्यवहारप्राप्तिः ।
और जो [गुण तथा अलङ्गारका भेद माननेवाले वामनने अपने 'काव्यालङ्गार-सूत्र'के तृतीयाधि- करणके प्रथमाध्यायमें ] यह कहा है कि-'काव्यसौन्दर्यके उत्पादक धर्म गुण और इस [काव्यसौन्दर्य]के अभिवर्धक धर्म अलङ्गार [कहलाते] हैं। यह [गुण तथा अलङ्गारका भेद है ]' वह [वामनका कथन ] भी असङ्गत है। क्योंकि [उसमें दो विकल्प हो सकते हैं] १. क्या समस्त [अर्थात् वामनाभिमत दस ] गुणों [के होने ] से काव्यव्यवहार [हो सकता है] अथवा २. कुछ [गुणों] से ? यदि [प्रथम पक्षके अनुसार ] समस्त [गुणोंके होने]से [ही काव्यव्यवहार होता है] तो समस्त गुणोंसे रहित गौडी अथवा पाञ्चाली रीति काव्यका आत्मा कैसे [मानी जा सकती ] है ? और यदि [द्वितीय विकल्पके अनुसार ] कतिपय [गुणोंके होने ]से [ भी काव्यका व्यवहार हो सकता है] तो- इस पर्वतपर बड़े जोरसे आग जल रही है और यह प्रचुर धुआँ उठता हुआ दिखायी देता है ।।३४७। इत्यादि [रसविहीन काव्यलक्षणरहित वाक्य ] में ओज आदि [कतिपय ] गुणोंके होनेसे काव्य- व्यवहार प्राप्त होने लगेगा [जो कि अभीष्ट नहीं है ]। इसका अभिप्राय यह है कि वामनने रीतिको काव्यका आत्मा माना है। 'रीतिरात्मा काव्यस्य' १।२।६। यह वामनका सिद्धान्त है। वामनके मतानुसार वे रीतियाँ तीन प्रकार की हैं- सा त्ैधा वैदर्भी गौडीया पाञ्चाली चेति।१।२।६। इन तीनों रीतियोंमेंसे वैदर्भी रीति तो समस्त गुणोंसे युक्त होती है, परन्तु गौडीया रीतिमें केवल शज और कान्ति ये दो ही गुण रहते हैं और पाञ्चालोमें केवल माधुर्य तथा सौकुमार्य ये दो ही गुण रहते हैं। वामनने इन तीनों रोतियोंके लक्षण निम्नलिखितप्रकार किये हैं- समग्रगुणा वैदर्भी ।१।२।११। समग्रै :-- शज:प्रसादप्रमुखैर्गुणैरुपेता वैदर्भी नाम रीतिः । अत् श्लोकौ- अस्पृष्टा दोषमात्राभिः समग्रगुणगुम्फिता। विपञ्चीस्वरसौभाग्या वैदर्भी रीतिरिष्यते।। तामेतां कवय: स्तुवन्ति- सति वक्तरि सत्यर्थे सति शब्दानुशासने। अस्ति तन्न विना येन परिस्रवति वाङमधु।। अर्थात् ओज-प्रसादादि समस्त गुणोंसे युक्त और दोषको मात्रासे रहित वीणाके शब्दके समान मनो- हारिणी वैदर्भी रीति होती है। २५
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३८६ काव्यप्रकाश: [का० ६७, सू० ८७
सिद्धहस्त कवि, सुन्दर चमत्कारपूर्ण अर्थ और कविका शब्दशास्त्रपर पूर्ण अधिकार होनेपर भी यदि कवि इस वैदर्भी रीतिका अवलम्बन नहीं करता है तो उसकी वाणी सुधास्यन्दिनी नहीं हो सकती है। इस प्रकार वामनने वैदर्भी रीतिकी प्रशंसा करते हुए उसका लक्षण किया है। वैदर्भी रीतिका निम्नलिखित उदाहरण दिया है- गाहन्तां महिषा निपानसलिल शृङ्गर्मुहुस्ताडितं छायाबद्धकदम्बकं मृगकुलं रोमन्थमभ्यस्यतु। विस्रब्धं क्रियतां वराहपतिभिर्मुस्ताक्षतिः पल्वले विश्राति लभतामिदं च शिथिलज्याबन्धमस्मद्धनुः ॥ दूसरी गौडीया रीतिका लक्षण करते हुए वामनने लिखा है- शज:कान्तिमती गौडीया ।१।२।१२। समस्तात्युद्द्टपदां श्ोज:कान्तिगुणान्विताम् । गौडीयामिति गायन्ति रीति रीतिविचक्षणाः ।। उदाहरणम्- दोर्दण्डाञ्चितचन्द्रशेख रधनुर्दण्डावभङ्गोद्यत- प्टङ्कारध्वनिरार्यबालचरितप्रस्तावनाडिण्डिमः । द्राक्पर्यस्तकपालसम्पुटमिलद्ब्राह्माण्डभाण्डोदर- भ्राम्यत्पिण्डितचण्डिमा कथमहो नाद्यापि विश्राम्यति।। तीसरी पञ्चाली रीतिके लक्षण और उदाहरण वामनने निम्नलिखितप्रकार दिये हैं -- माधुर्यसौकुमार्योपपन्ना पाञचाली 18/21१३1 आश्लिष्टश्लथभावां तु पुराणच्छाययान्विताम्। मधुरां सुकुमाराञ्च पाञ्चालीं कवयो विदुः॥ यथा- ग्रामेऽस्मिन् पथिकाय पान्थ वसतिर्नेवाधुना दीयते रात्रावत्र विहारमण्डपतले पान्थः प्रसुप्तो युवा। तेनोत्थाय खलेन गर्जति घने स्मृत्वा प्रियां तत्कृतं येनाद्यापि करङ्कदण्डपतनाशङ्की • जनस्तिष्ठति ।। इस प्रकार वामनके लेखसे यह स्पष्ट हो जाता है कि इन तीनों रीतियोंमेंसे वैदर्भी रीति तो समस्त गुणोंसे युक्त होती है, परन्तु शेष दोनों रीतियोंमें दस गुणोंमेंसे केवल दो-दो गुण ही रहते हैं। यदि समस्त गुणोंकी समष्टिको काव्यव्यवहारका प्रयोजक माना जाय तो केवल वैदर्भी रीतिको काव्यका आत्मा माना जा सकता है, क्योंकि उसमें दसों गुण रहते हैं। परन्तु समस्त गुणोंसे रहित केवल दो-दो गुणोंवाली गौडीया तथा पाञ्चाली रीतियोंको काव्यका आत्मा नहीं माना जा सकता है। यह काव्य- प्रकाशकारका अररभिप्राय है। और यदि दूसरा पक्ष लिया जाय अर्थात् कतिपय गुणोंकी स्थितिमें भी काव्यव्यवहार माना जाय तो 'अद्रावत्' उदाहरण-संख्या ३४७ में भी काव्यव्यवहार होने लगेगा, जो कि इष्ट नहीं है। इसलिए वामनने जो काव्यशोभाके उत्पादक धर्मोंको गुण और काव्यशोभाके अ्भिवर्धक धर्मोंको अलङ्कार कहा है, यह उनका कथन उचित नहीं है।
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का० ६७, सू० ८७ ] ग्रष्टम उल्लास: ३८७ स्वर्गप्राप्तिरनेनैव देहेन वर्वणिनी। अस्या रदच्छदरसो न्यक्करोतितरां सुधाम् ॥३४८॥ इत्यादौ विशेषोक्तिव्यतिरेकौ गुणनिरपेक्षी काव्यव्यवहारस्य प्रवर्त्तका। पिछले (श्लोक सं० ३४७) उदाहरणमें गुणोंके होनेपर भी काव्यव्यवहारका अभाव पाया जाता है, इसके विपरीत अगले उदाहरणमें गुणोंके अभावमें भी काव्यव्यवहार होता है। इसलिए अन्वय-व्यतिरेक दोनोंका व्यभिचार होनेसे गुणोंको काव्यव्यवहारका प्रयोजक नहीं माना जा सकता है। इस आशयसे ग्रन्थकार अगला उदाहरण देते हैं। इस उदाहरणमें वरवणिनी नारीकी प्राप्तिकों सदेह स्वर्गप्राप्तिरूप बतलाया गया है। वरवणिनी नारीका लक्षण इस प्रकार किया गया है- शीते सुखोष्णसर्वाङ्गी ग्रीप्मे च सुखशीतला। भर्तृभक्ता च या नारी विज्ञेया वरवणिनी। [इस प्रकारकी ] वरर्वाणनी [नारीकी प्राप्ति ] इसी [मानुष ] देहसे स्वर्गकी प्राप्ति [के सदृश] है। इस [वरर्वणिनी-नारी ] के अधरपानका रस, अमृत [के आस्वादनके आनन्द] को [भी] तिरस्कृत करता है॥३४८॥ इत्यादि [उदाहरण ] में गुणोंके बिना ही विशेषोक्ति तथा व्यतिरेक [अलङ्कार ] काव्यव्यवहारके प्रवर्त्तक हैं। वामनने विशेषोक्ति तथा व्यतिरेक अलङ्कारोंके लक्षण इस प्रकार किये हैं- "एकगुणहानिकल्पनायां साम्यदाढर्यं विशेषोक्तिः ।।३।२३। एकस्य गुणस्य हाने: कल्पनायां शेषैर्गुणः साम्यं यत्, तस्य दाढर्यं विशेषोक्तिः । उपमेयस्य गुणातिरेकित्वं व्यतिरेकः ।४।३।२२। उपमेयस्य गुणातिरेकित्वं गुणाधिक्यं यद्, अर्थादुपमानात्, स व्यतिरेकः ।" प्रकृत उदाहरणमें दिव्यदेहरूप एक गुणकी हानिकी कल्पनासे सुखदायकत्व आदिरूप शेष गुणोंके दाढर्यकी कल्पनाके होनेसे विशेषोक्ति अलङ्कार है। और उपमेयरूप अधरके द्वारा उपमान- भूत सुधारसका तिरस्कार वणित होनेसे उपमेयके आधिक्यके कारण व्यतिरेकालङ्कार है। इस प्रकार इस श्लोकमें दो अलद्कार पाये जाते हैं, परन्तु वामनके मतानुसार अलद्धार केवल गुणों द्वारा उत्पन्न किये हुए काव्यसौन्दर्यके बढ़ानेवाले होते हैं, स्वयं काव्यसौन्दर्यके उत्पादक नहीं होते हैं। यहाँ प्रकृत श्लोकमें माधुर्यव्यञ्जक वर्णोंका अभाव होनेसे माधुर्यगुणका अभाव है। ओजके प्रकृत रसके विरोधी होनेसे वह भी काव्यशोभाका आधान नहीं कर सकता है और प्रसाद गुण भी नहीं है। गुणोंके अभाव में वामनके मतानुसार काव्यशोभाकी उत्पत्ति ही नहीं हो सकती है। तब विशेषोक्ति तथा व्यक्तिरेका- लङ्कार किस शोभाके अतिशयके हेतु होते हैं ? इसलिए वामन काव्यशोभाके अतिशयजनक धर्मोंको अलङ्कार मानकर जो गुण तथा अलद्धारका भेद करना चाहते हैं, वह उचित नहीं, यह काव्यप्रकाशकारका अभिप्राय है। इस प्रकार यहाँतक ग्रन्थकारने गुण तथा अलङ्कारका अभेद माननेवाले भट्टोद्दट और उनका भेद माननेवाले वामनके मतोंका खण्डन कर मुख्यतः ध्वन्यालोककार आनन्दवर्धनाचार्यके अनुयायी अपने मतके अनुसार गुण तथा अलङ्कारका भेदनिम्पण किया है। इम प्रकार इस उल्लासके प्रतिपाद्य विषयका एक भाग समाप्त हुआा। गुणोंके भेद अब आगे ग्रन्थकार गुणोंके भेदका निरूपण प्रारम्भ करते हैं। गुणोंके भेदोंके विषयमें भी ग्रन्थकारका प्राचीन आचार्य वामनसे मतभेद है। वामनने दस प्रकारके शब्दगुण तथा दस प्रकारके
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३८८ काव्यप्रकाश: [ का० ६८, सू० ८८-८8
y इदानीं गुणानां भेदमाह- सू० ८८ ] माधुयौ ज:प्रसादाख्यास्त्रयस्ते न पुनर्दश / एषां क्रमेण लक्षणमाह- [सू० ८९] आह्लादकत्वं माधुर्यं शृङ्गारे द्रुतिकारणम् ।६८। अर्थगुण माने हैं। इन शब्दगुण तथा अर्थगुणोंके नाम तो दोनों जगह एक ही हैं, परन्तु उनके लक्षणोंमें भेद है। इसलिए वामनके मतानुसार गुणोंकी संख्या दस है। परन्तु मम्मट उन दस गुणोंको न मानकर उनके स्थानपर केवल तीन ही गुण मानते हैं। अपने इसी मतभेदका प्रदर्शन अगले सूत्रमें 'तयस्ते न पुनर्दश' लिखकर ग्रन्थकार स्पष्टरूपसे दस गुण माननेवाले वामनके मतका खण्डन कर रहे हैं। अब गुणोंके भेदोंको कहते हैं [सू० ८८ ]-और वे [गुण ] १. माधुर्य, २. ओज तथा ३. प्रसाद [नामक ] तीन [ही गुण ] होते हैं, [वामनके अभिप्रेत ] दस [गुण] नहीं [ होते] हैं। वामनने गुणोंका प्रतिपादन करते हुए लिखा है-
शज, प्रसाद आदि दस बन्धके अर्थात् पदरचना या शब्दके गुण हैं। त एवार्थगुणाः।३।२।१। और वे ही ओज, प्रसाद आदि दस अर्थगुण भी होते हैं। अर्थात् शब्दगुण तथा अर्थगुण दोनोंके नाम तो एक ही हैं, परन्तु उनके लक्षण भिन्न-भिन्न है। वे लक्षण निम्नोक्त हैं- (शब्दगुणोंके लक्षण) (अर्थगुणोंके लक्षण) १. गाढबन्धत्वमोजः ।३।१।५। १. अर्थस्य प्रौढिरोजः ।३।२।२। २. शैथिल्यं प्रसादः । 1, 1६। २. अर्थवैमल्यं प्रसादः । ,।३। ३. मसृणत्वं श्लेष: । ,, 1901 ३. घटना श्लेषः । 2, 18/ ४. मार्गाभेद: समता। ,, 199। ४. अवैषम्यं समता । ,, ।५। ५. आरोहावरोहक्मः समाधिः ।,,।१२। ५. अर्थदृष्टिः समाधिः । ,, ।६। ६. पृथक्पदत्वं माधुर्यम्।,, ।२०। ६. उक्तिवैचित्यं माधुर्यम्।,, 1901 ७. अजरठत्वं सौकुमार्यम् ।,,।२१।। ७. अपारुष्यं सौकुमार्यम्।,, ।११। ८. विकटत्वमुदारता,, ।२२। ८. अग्राम्यत्वमुदारता। ,, 1१२1 ६. वस्तुस्वभावस्फुटत्वमर्थव्यक्ति: ।,, ।१३। १०. औज्ज्वल्यं कान्तिः,,।२४। १०. दीप्तरसत्वं कान्ति: वामनने शब्दगुण तथा अर्थगुणोंका जो विभाग किया है, वह मम्मटको मान्य नहीं है। वे गुणोंको शब्द या अरथका धर्म न मानकर रसका धर्म मानते हैं। इसलिए उनके मतमें शब्दगुण अथवा अर्थगुणका विभाग बन ही नहीं सकता है। इसके अतिरिक्त वामनने ये जो दस प्रकारके गुण माने हैं उनके स्थानपर मम्मटने केवल तीन ही गुण माने हैं। अब आगे ग्रन्थकार पहिले अपने अभिमत तीन गुणोंके लक्षण करके उसके बाद वामनके अभिमत शेष गुणोंका खण्डन करेंगे। [अब आगे] कमरे इन [तीन गुणों ] के लक्षण कहते हैं- [स० ८६]-[चित्तके] द्वीभावका कारण और शृङ्गारमें रहनेवाला जो आह्लादस्वरूपत्व है वह माधुर्य [नामक गुण कहलाता ] है ।६८।।
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का० ६६-७० सू० ६०-६२] अ्रष्टम उल्लास: ३८६
शृङ्गारे अर्थात् सम्भोगे। द्रुतिर्गलितत्वमिव । श्रव्यत्वं पुनरोज:प्रसादयोरपि। सू० ९० ] करुणे विप्रलम्भे तच्छान्ते चातिशयान्वितम् । अत्यन्तद्रुतिहेतुत्वात्। ज् सू० ९१ ] दीप्त्यात्मविस्तृतेर्हेतुरोजो वीररसस्थिति ॥६९।। चित्तस्य विस्ताररूपदीप्तत्वजनकमोजः । ज् सू० ९२] बीभत्सरौद्ररसयोस्तस्याधिक्यं क्रमेण च।
यहाँ आह्लादकत्वका अर्थ शह्लादजनकत्व नहीं अपितु शह्लादस्वरूपत्व है, क्योंकि शृङ्गार आदि रस शह्लादजनक नहीं अपितु शह्लादस्वरूप होते हैं। यहाँ शृङ्गारमें जो श्रह्लादकत्व है वह माधुर्यगुण कहलाता है, यह कहा है। शृङ्गारके श्रराह्नादस्वरूप होनेसे श्रह्लादकत्वका अर्थ श्राह्लाद- जनकत्व न करके शह्लादस्वरूप ही करना चाहिये। इसके लिए भावमें घञ्प्रत्यय करके 'श्राह्नादनं आह्लादः' शब्द बनाकर उससे स्वार्थमें 'क' प्रत्यय करके आ्रह्लादक बनाना चाहिये। 'शह्लादयतीति श्ह्लादक:' इस प्रकार उसकी व्युत्पत्ति नहीं करनी चाहिये। शृङ्गारमें अर्थात् सम्भोग [शृङ्गार] में। द्रुति अर्थात् [चित्तका ] विगलितत्व-सा [द्रवीभाव ]। [भामहका अभिमत माधुर्यका लक्षण ] 'श्रव्यत्व' तो ओज और प्रसाद [गुणों ] में भी होता है [इसलिए अतिव्याप्ति दोषसे ग्रस्त होनेके कारण भामहका उक्त लक्षण उचित नहीं है। यह ग्रन्थकारके इस वाक्यका अभिप्राय है]। वामनके दस्त गुणोंके विपरीत भामहने भी तीन ही गुण माने हैं-माधुर्य, श्रोज और प्रसाद। इनमेंसे माधुर्यका लक्षण भामहने इस प्रकार किया है- 'श्रव्यं नातिसमस्तार्थ काव्यं मधुरमिष्यते।' भामह-काव्यालङ्कार २।३। इसका अभिप्राय यह हुआ कि जिसमें अधिक समस्तपद न हों इस प्रकारका कानोंको प्रिय लगनेवाला श्रव्यकाव्य माधुर्ययुक्त कहलाता है। इसके अनुसार भामहके मतसे श्रव्यत्व माधुर्यगुणका लक्षण हुआ। परन्तु मम्मट इस लक्षणको उचित नहीं समझते हैं। इसलिए इसका खण्डन करनेके लिए उन्होंने 'श्रव्यत्वं पुनरोज:प्रसादयोरपि' यह वाक्य लिखा है। [सूत्र ६०]-[ यह माधुर्य गुण सामान्यतः सम्भोगशृङ्गारमें रहता है परन्तु ] करुण, विप्रलम्भ [श्रङ्गार ] तथा शान्त [रस ] में वह [उत्तरोत्तर ] अधिक चमत्कारजनक [अतिशयान्वित ] होता है। [उत्तरोत्तर चमत्कारातिशययुक्त होनेका हेतु अगले वाक्यमें बतलाते हैं] अत्यन्त द्रवीभावका कारण होनेसे। [सूत्र ६१]-चित्तके द्रवीभावका कारणभूत आह्लादकत्व जिस प्रकार माधुर्यगुण कहलाता है, उसी प्रकार] वीररसमें रहनेवाली [ आत्मा अर्थात् ] चित्तके विस्तारकी हेतुभूत दीप्ति ओज [कहलाती] है। चित्तके विस्ताररूप दीप्तत्वका जनक ओज [गुण कहलाता ] है। [सूत्र ६२]-[यह ओज सामान्यतः वीररसमें रहता है। परन्तु ] बीभत्स और रौद्र रसोंमें क्रमशः इसका आधिक्य [विशेष चमत्कारजनकत्व ] रहता है।
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३६० काव्यप्रकाश: [ का० ७०-७२, सू० १३-६५
वीराद्वीभत्से ततो रौद्रे सातिशयमोजः । जसू० ९३] शुष्केन्धनाग्निवत् स्वच्छजलवत्सहसंव यः ॥७०॥ व्याप्नोत्यन्यत् प्रसादोऽसौ सर्वत्र विहितस्थितिः । अन्यदिति व्याप्यमिह चित्तम्। सर्वत्रेति सर्वेषु, रसेषु, सर्वासु रचनासु च। सू० ९४] गुणवृत्त्या पुनस्तेषां वृत्तिः शब्दार्थयोर्मता ।।७१।। गुणावृत्त्या उपचारेण। तेषां गुणानाम्। आकारे शौर्यस्येव । कुतस्त्रय एव न दश इत्याह- [सू० ९५ ] केचिदन्तभवन्त्येषु दोषत्यागात्परे श्रिता:। 0 शनसूण) अन्ये भजन्ति दोषत्वं कुत्रचिन्न ततो दश ॥७२।। [अर्थात् ] वीरकी अपेक्षा बीभत्समें और उससे भी अधिक रौद्ररसमें ओजका चमत्कारातिशय होता है। [सूत्र ]-सूखे इन्धनमें अग्निके समान अथवा स्वच्छ [धुले हुए वस्त्रमें ] जलके समान जो चित्तमें सहसा व्याप्त हो जाता है, वह सर्वत्र [सब रसोंमें ] रहनेवाला प्रसाद [गुण कहलाता ] है ॥।७०।। 'अन्यत्' इस पदसे यहाँ व्याप्य चित्तका ग्रहण करना चाहिये। 'सर्वत्र' पदका अर्थ सब रसों और सब रचनाओंमें यह करना चाहिये। यहाँ ग्रन्थकारने यह कहा है कि जैसे सूखे इन्धनमें अग्नि सहसा व्याप्त हो जाती है, अथवा स्वच्छ धुले हुए वस्त्रमें जल सहसा व्याप्त हो जाता है, उसी प्रकार जो चित्तमें सहसा अनायास व्याप्त हो जाता है, वह प्रसाद नामक गुण कहलाता है, और वह सारे रसोंमें और सारी रचनाओंमें रहता है। यहाँ अग्नि और जलके दो उदाहरण देनेका अभिप्राय यह है कि जब वीर, रौद्र आदि उग्र रसोंमें प्रसाद गुण होता है, तब वह शुष्क इन्धनमें अग्निके समान चित्तमें व्याप्त होता है और जब शृङ्गार, करुण आदि कोमल रसोंमें होता है, तब स्वच्छ वस्त्रमें जलके समान चित्तमें व्याप्त होता है। गुणोंका शब्दार्थधर्मत्व औपचारिक [सूत्र ६४ ]-[ यद्यपि मुख्यरूपसे गुण रसके धर्म हैं, परन्तु ] गौणी वृत्तिसे शब्द और अर्थमें भी उनकी स्थिति मानी जाती है।।७१।। गुणवृत्तिसे अर्थात् उपचारसे। उनकी अर्थात् गुणोंकी। जैसे शरीर [आकार ]में [आत्माके धर्म ] शौर्य आदि [गुणों ] की स्थिति उपचारसे मानी जाती है उसी प्रकार उपचारसे रसके धर्म माधुर्य आदि गुणोंकी शब्द और अर्थमें भी स्थिति मानी जाती है ]। वामनोक्त शब्दगुणोंका खण्डन तीन ही [ गुण ] क्यों होते हैं, दस क्यों नहीं, यह कहते हैं- [सूत्र ६५]-इन [वामनके वस गुणों]मेंसे १. कुछ तो इन [माधुर्य, ओज, और प्रसादरूप तीन गुणों ] में अन्तर्भूत हो जाते हैं और २. कुछ दोषाभावरूप होते हैं, तथा ३. कुछ कहींपर गुण न होकर टोखरूप हो जाते हैं, इसलिए दस [गुण ] नहीं [ माने जा सकते ] हैं ॥७२।
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का० ७२, सू० E४ /51 अ्रष्टम उल्लास: ३६१ बहूनामपि पदानामेकपदवद्भासमानात्मा यः श्लेषः, यश्चारोहावरोहक्रमरूपः समाधिः, या च विकटत्वलक्षणा उदारता, यश्चौजोमिश्रितशैथिल्यात्मा प्रसादः, तेषा- मोजस्यन्तर्भावः। पृथक्पदत्वरूपं माधुर्य भङ्गया साक्षादुपात्तम्। प्रसादेनार्थव्यक्तिर्गृहीता। मार्गाभेदरूपा समता क्वचिद्दोषः । तथा हि 'मातङ्गा: किमु वल्गितैः' इत्यादौ सिंहाभिधाने मसृणमार्गत्यागो गुणः । कष्टत्वग्राम्यत्वयोर्दुष्टताभिधानात् तन्निराकरणेन अपारुष्यरूपं सौकुमार्यम्, औज्ज्वल्यरूपा कान्तिश्च स्वीकृता। एवं न दश शब्दगुणाः । पदार्थे वाक्यरचनं वाक्यार्थे च पदाभिधा। प्रौढिर्व्याससमासौ च साभिप्रायत्वमस्य च।।
वामनके दस शब्दगुणोंमेंसे १. श्लेष, २. समाधि, ३. उदारता और ३. प्रसाद ये चार गुण मम्मटने ५. शजगुणके अन्तर्गत कर लिये हैं। ६. माधुर्यगुण मम्मटने भी उसी नामसे माना है। ७. अर्थव्यक्ति- रूप गुण मम्मटने अपने प्रसादगुणके अन्तर्गत मान लिया है। ८. समतागुण कहीं दोषरूप हो जाता है, इसलिए गुण नहीं है। ६. सौकुमार्य तथा १०. कान्ति गुण कष्टत्व तथा ग्राम्यत्वदोषका परिहाररूप होनेसे गुण नहीं माने जा सकते हैं। यही बात ग्रन्थकार आागे लिखते हैं- ['मसुणत्वं श्लेषः' श्लेषके इस लक्षणमें मसृणत्वका अर्थ 'मसृणत्वं नाम तत्, यस्मिन् सति बहून्यपि पदान्येकवद् भासन्ते' किया है, तदनुसार ] अनेक पदोंकी एक पदके समान प्रतीतिरूप जो १. श्लेष और उतार-चढ़ाव [आरोह-अवरोह ] का क्रमरूप जो २. समाधि और विकटत्वरूप ३. उदारता तथा ओजोमिश्रित शैथिल्यरूप जो ४. प्रसाद [रूप चार शब्दगुण हैं] उनका ५. ओज [नामक वामन तथा मम्मट दोनोंके सम्मत गुण ] में अन्तर्भाव होता है। पृथकपदत्वरूप ६. माधुर्य [गुण ] हमने भी [ 'अवृत्ति- र्मध्यवृत्तिर्वा माधुर्ये घटना तथा' इत्यादि ६८वें सूत्रमें 'अवृत्ति' अर्थात् समासरहित रचनाकी माधुर्यव्यञ्ज- कताके प्रतिपादन द्वारा ] प्रकारान्तरसे साक्षात् स्वीकार कर लिया है। ७. अर्थव्यक्ति प्रसाद [गुण ] के द्वारा आ ही गयी है। ८. मार्गाभेदस्वरूपिणी समता कहीं दोष हो जाती है। जैसे 'मातङ्गा किमु वल्गितैः' [उदाहरण सं० २६६ ] इत्यादिमें सिंहका वर्णन करनेमें [तृतीय चरणमें ] कोमल मार्गका परित्याग गुण हो गया है[ यदि उसका त्याग न करके 'मार्गाभेद' रखा जाता तो वह यहाँ दोष हो जाता। इसलिए समताको गुण नहीं माना जा सकता है]। कष्टत्व तथा ग्राम्यत्वके दोष कहे जानेसे उनके परित्याग द्वारा [कमशः ] अपारुष्यरूप ६. सौकुमार्य तथा औज्ज्वल्यरूप १०. कान्ति [गुण भी दोषाभावरूपसे ] स्वीकृत कर लिये गये हैं। इसलिए दस शब्द गुण [मानना उचित ] नहीं है। वामनोक्त दस अर्थगुणोंका खण्डन इस प्रकार दस शब्दगुणोंकी अनुपपत्ति दिखलानेके बाद आगे अर्थगुणोंकी अनुपपत्तिका प्रदर्शन करते हैं- १. पदके प्रतिपाद्य अर्थ [के बोधन]में वाक्यकी रचना, २. वाक्यके प्रतिपाद्य अर्थमें पदका कथन करना, ३. विस्तार या ४ संक्षेप करना और ५ अर्थका [विशेषरूपसे ] साभिप्रायत्व [यह पाँच प्रकारकी ] प्रौढि होती है।
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३६२ काव्यप्रकाश: [का० ७३, सू० ६६ इति या प्रौढिः ओज इत्युक्तं तद्वैचित्र्यमात्रं न गुणः। तदभावेऽनि काव्यव्यव्- हारप्रवृत्तेः। करणेन च साभिप्रायत्वरूपमोजः, अर्थवैमल्यात्मा प्रसादः, उक्तिवैचित्र्यरूपं माधुर्यम्, अपारुष्यरूपं सौकुमार्यम्, अग्राम्यत्वरूपा उदारता च स्वीकृतानि। अभिधास्यमानस्व- भावोक्त्यलङ्कारेण रसध्वनिगुणीभूतव्यङ्गयाभ्यां च वस्तुस्वभावस्फुटत्वरूपा अर्थव्यक्तिः, दीप्तरसत्वरूपा कान्तिश्च स्वीकृते। क्रमकौटित्यानुल्बणत्वोपपत्तियोगरूपघटनात्मा श्लेषोऽपि विचित्रत्वमात्रम् । अवैषम्यस्वरूपा समता दोषाभावमात्रं न पुनर्गुणः। कः खल्वनुन्मत्तोऽन्यस्य प्रस्तावेऽन्यदभिदध्यात् । अर्थस्यायोनेरन्यच्छायायोनेर्वा यदि न भवति दर्शनं तत् कथं काव्यम् इत्यर्थदृष्टिरूपः समाधिरपि न गुणः । [सू० ९६ ] तेन नार्थगुणा वाच्या: प्रोक्ताः शब्दगुणाश्च ये । वाच्या वक्तव्याः । १. इस प्रकार जो प्रौढि ओज कही गयी है, वह केवल विचित्रतामात्र है, गुण नहीं, क्योंकि उसके बिना भी काव्यव्यवहार हो सकता है। अपुष्टार्थत्व, अधिकपदत्व, अनवीकृतत्व, अमङ्गलरूप अश्लील और ग्राम्यत्वके निराकरण द्वारा साभिप्रायत्वरूप १. ओज (अर्थात् ओजोगुण का दूसरा स्वरूप), अर्थ- वैमल्यरूप २. प्रसाद, उक्तिवैचित्यरूप ३. माधुर्य, अपारुष्यरूप ४. सौकुमार्य और अग्राम्यत्वरूप ५. उदारता (गुण, दोषाभावके अन्तर्गत) स्वीकृत हुए हैं। आगे कहे जानेवाले स्वभावोक्ति अलङ्कारसे और रसध्वनि तथा गुणीभूतव्यङ्गचके द्वारा वस्तुके स्वभावकी स्पष्टतारूप ६. अर्थव्यक्ति तथा दीप्तरसत्वरूप ७. कान्ति स्वीकृत हो गयी। कम-कौटिल्य-अनुल्बणत्व-उपपत्तियोगरूप रचनास्वरूप द. श्लेष भी विचित्रता मात्र है। अवैषम्यरूप ६. समताका अभाव दोष होगा, इसलिए समता दोषाभावमात्र है, गुण नहीं। क्योंकि ऐसा कौन बुद्धिमान् (अनुन्मत्त) होगा, जो अन्य प्रकरणमें अन्यको कहे। और यदि अयोनि अथवा अन्यच्छायायोनि अर्थका दर्शन न हो, तो काव्य ही कसे बने, इसलिए १०. अर्थदृष्टिरूप समाधि भी गुण नहीं है। वामनने 'अर्थदृष्टिः समाधिः' ३।२।७। यह समाधिगुणका लक्षण किया है, और उसके दो भेद करते हुए लिखा है, 'अथो द्विविधोऽ्योनिरन्यच्छायायोनिश्च' ।३।२।८। अर्थात् अरथके दर्शनका नाम 'समाधि' है। यह अर्थ दो प्रकारका होता है। एक अयोनि अर्थात् त्कारण अर्थात् कविकी कल्पना- मात्रसे उद्भूत होनेवाला अर्थ और दूसरा अन्यच्छायाको लेकर वणित हुआ अर्थ। इस द्विविध अर्थके दर्शनको वामनने समाधि नामक गुण माना है। उसके विषयमें ग्रन्थकारका यह कहना है कि इस दो प्रकारके अर्थके बिना तो कवि काव्यकी रचना ही नहीं कर सकता है, इसलिए यह तो काव्यके कारणोंमें आ सकता है, काव्यका गुण नहीं कहा जा सकता है। [सूत्र ६६ ]-इसलिए [वामनोक्त ] जो [दस ] अर्थगुण और शब्दगुण कहे गये हैं उनको [अलग ] नहीं मानना चाहिये। 'वाच्याः' का अर्थ [यहाँ'] 'वक्तव्याः' करना चाहिये।
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का० ७३-७४, सू० ६७-६८ ] अ्रष्टम उल्लास: ३६३
[सू० ९७ ] वर्णा: समासो रचना तेषां व्यञ्जकतामिताः ।७३।। के कस्य इत्याह- [सू० ९८] मूध्नि वर्गान्त्यगाः स्पर्शा अटवर्गा रणौ लघू। अवृत्तिर्मध्यवृत्तिर्वा माधुर्यें घटना तथा ॥७४।। टठडढवर्जिता: कादयो मान्ता: शिरसि निजवर्गान्त्ययुक्ता: तथा रेफणकारौ ह्रस्वान्तरिताविति वर्णाः, समासाभावो मध्यमः समासो वेति समासः तथा माधुर्यवती पदान्तरयोगेन रचना माधुर्यस्य व्यन्जिका। उदाहरणम्- अनङ्गरङ्गप्रतिमं तदङ्गं भङ्गीभिरङ्गीकृतमानताङग्याः । कुर्वन्ति यूनां सहसा यथैताः स्वान्तानि शान्तापरचिन्तनानि ॥३४९॥
तीन गुण और उनके व्यञ्जक यहाँतक मम्मटने वामनोक्त दस शब्दगुणों तथा दस अर्थगुणोंका खण्डन करके अपने 'त्रिगुणवाद'की स्थापना कर दी है। अब आगे वे उन माधुर्यादि तीनों गुणोंके ब्यञ्जकोंका वर्णन प्रारम्भ करते हैं- [सूत्र ६७ ] वर्ण, समास तथा रचना उन [तीनों गुणों]के व्यञ्जक होते हैं ।७३।। कौन [वर्ण आदि] किस [गुण ] के [ व्यञ्जक होते हैं] यह कहते हैं- [सूत्र ६८] अपने शिरपर स्थित अपने-अपने वर्गके अन्तिम वर्णसे युक्त, टवर्गको छोड़कर शेष स्पर्शवर्ण ['कादयो मावसानाः स्पर्शाः' क से लेकर म पर्यन्त सारे वर्ण 'स्पर्श' कहलाते हैं] ह्स्व रकार तथा णकार, और [अवृत्ति ] समासरहित अथवा स्वल्प समासवाली [मध्यवृत्ति ] रचना माधुर्यमें [व्यञ्जक होती है]॥।७४।। ['अटवर्गा:' अर्थात् ] ट,ठ, ड, ढ को छोड़कर [स्पर्शा: अर्थात्] क से लेकर म पर्यन्त [कवर्ग, चवर्ग, तवर्ग तथा पवर्ग इन चारों वर्गोंके समस्त अक्षर ] शिरपर अपने वर्गके अन्तिम वर्णसे युक्त, और [हरस्व ] से व्यवहित रेफ तथा णकार ये १. वर्ण, समासका अभाव [समासरहित अथवा मध्यम-समास [स्वल्प समास ] यह २. समास तथा अन्य पदोंके साथ योग [अर्थात् सन्धिसे ] माधुर्ययुक्त ३. रचना [ये तीनों] माधुर्य [नामक गुण] के व्यञ्जक होते हैं। जैसे -- [स्तनोंके भारसे ] ईषत् नताङ्गी उस [नायिका] के, कामदेवकी रङ्गशालाके समान उस [अलौकिक ] शरीरको हावभावमयी चेष्टाओंने इस प्रकार अपने अधीन कर लिया है, जिससे ये [ भङ्गियाँ] युवकोंके चित्तोंको सहसा ही अन्य विषयोंकी चिन्तासे रहित [केवल उसीके चिन्तनमें तत्पर ] कर देनी हैं।३४६।। यहाँ गकार तथा तकार अपने वर्गके अन्तिम वर्णसे युक्त हैं। अनङ्ग, तदङ्ग, भङ्गीभिः, अ्रङ्गीकृतम् आदिमें गकार तथा स्वान्त, शान्त, चिन्तन आदि पदोंमें तकार अपने-अपने वर्गोंके अन्तिम अक्षरसे युक्त है, और रङ्ग आदि पदोंमें हस्वसे व्यवहित रेफ है। ये सब वर्ण माधुर्यके व्यञ्जक हैं। अनङ्गरङ्ग- प्रतिम' यह मध्यमवृत्ति त्र्रात् स्वल्प-समासवाली रचना भी माधुर्यकी व्यञ्जक है। इस प्रकार ये तीनों विप्रतम्भशृङ्गारमें माधुर्यके व्यञ्जक हैं।
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३६४ काव्यप्रकाश: [का० ७५-७६, सू० ६६-१००
[सू० ९९]योग आद्यतृतीयाभ्यामन्त्ययो रेण तुल्ययोः । टादि: शषौ वृत्तिदैर्ध्य गुम्फ उद्धत ओजसि ।।७५।। वर्गप्रथमतृतीयाभ्यामन्त्ययोः द्वितीयचतुर्थयो: रेफेण अध उपरि उभयत्र वा यस्य कस्यचित्, तुल्ययोस्तेन तस्यैव सम्बन्धः, टवर्गोरऽर्थात् णकारवर्जः, शकारषकारौ, दीर्घ- समास: विकटा सङ्गटना ओजसः । उदाहरणम् -- मूर्ध्नामुद्दत्तकृत्तेत्यादि ।।३५०।। [सू ० १०० ] श्रुतिमात्रेण शब्दात्तु येनार्थप्रत्ययो भवेत् । साधारण: समग्राणां स प्रसादो गुणो मतः ।७६।। समग्राणां रसानां सङ्गटनानां च। उदाहरणम् --
माधुर्यगुणके अभि व्यञ्जक वर्ण, समास तथा रचनाका निरूपण करनेके बाद शजके व्यञ्जक वर्णादिका प्रतिपादन अगली कारिकामें करते हैं- [सूत्र ee]-[उक्त कवर्ग, चवर्ग, तवर्ग तथा पवर्ग चारों वर्गोंके आद्य अर्थात् ] १. प्रथम [क- च-त-प-रूप ] और तृतीय [ग-ज-द-ब-रूप ] वर्णोंके साथ उनके बादके [अन्त्ययो: अर्थात् ख-छ-थ-फ आदि द्वितीय तथा तृतीयके बादके चतुर्थ घ-झ-ध-भ ] वर्णोंका [अर्थात् नैरन्तर्य या अव्यवधानसे प्रयोग] तथा २. रेफके साथ योग [अर्थात् ऊपर या नीचे किसी भी रूपमें रकारका किसी भी वर्णके साथ योग जैसे, वक्त्र, वज्त्र, निर्ह्राद आदिमें ] और ३. तुल्यवर्णोंका योग [जैसे, वित्त, उच्च, उद्दाम आदिमें] ४. टादि [अर्थात् ट-ठ-ड-ढ वर्ण ] तथा ५. श-ष [ये सब वर्ण तथा ] ६. दीर्घ समास एवं ७. उद्धत रचना [गुम्फ ] ओज [गुण ] में [ व्यञ्जक होते हैं। इसका ७३ वीं कारिकाके 'व्यञ्जकतामिताः' के साथ अन्वय होता है]। १. वर्गके प्रथम तथा तृतीय वर्णके साथ उनके बादके अर्थात् द्वितीय और चतुर्थ वर्णोंका, २. ऊपर, नीचे, अथवा दोनों जगह विद्यमान रेफके साथ जिस किसी वर्णका, ३. दो तुल्य वर्णोंका अर्थात् [वित्त, उद्दाम आदिके समान ] उसका उसी वर्णके साथ योग, ४. टवर्ग अर्थात् णकारको छोड़कर [ट- ठ-ड-ढ का प्रयोग ], ५. शकार तथा षकारका प्रयोग, ६. दीर्घसमास और ७. विकट रचना ओज [गुण] के व्यञ्जक होते हैं। जैसे- 'मूर्ध्नामुद्वृत्त' इत्यादि [अर्थ उदाहरण संख्या १५६ देखिये]॥३५०॥ इस प्रकार माधुर्य तथा तजगुणके व्यञ्जक वर्णादिका प्रतिपादन करनेके बाद आगे प्रसाद- गुणके व्यञ्जक वर्ादिका निरूपण अगली ७६वीं कारिकामें करते हैं- [सूत्र १००]-जिस [शब्द, समास या रचना ] के द्वारा श्रवणमात्रसे शब्दसे अर्थकी प्रतीति हो जाय, वह सब [वर्णों, समासों तथा रचनाओं] में रहनेवाला प्रसादगुण माना जाता है ॥७६।। [समग्राणां अर्थात् ] समस्त रसों और रचनाओंका [साधारण धर्म प्रसावगुण होता है]। उदाहरण [जैसे ] --
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का० ७६, सू० १०० ] भष्टम उल्लास: ३९५
परिम्लानं पीनस्तनजघनसङ्गादुभयतः तनोर्मध्यस्यान्तः परिमिलनमप्राप्य हरितम् । इदं व्यस्तन्यासं श्लथभुजलताक्षेपवलनैः कृशाङ्गयाः सन्तापं वदति बिसिनीपत्रशयमम् ॥३५१॥
यह उदाहरण हर्षदेवकृत 'रत्नावली' नाटिकाके द्वितीय अङ्डसे लिया गया है। वत्सराज उदयन सागरिकाको उद्देश्य करके अर्थात् सागरिकाके विषयमें कह रहे हैं कि कमलपत्रोंकी शय्या उस कृशाङ्गी सागरिकाके सन्तापको स्पष्टरूपसे अभिव्यक्त कर रही है। ऊँचे स्तनों और नितम्बोंके सम्पर्कसे दोनों ओर [दोनों स्थानोंपर ] मुरझाये हुए और शरीरके मध्यभाग [अर्थात् कमरके कृश होनेसे उस] के मिलनको प्राप्त न होनेके कारण बीचमें हरी और शिथिल भुजाओंके [इधर-उधर ] पटकने तथा करवटे बदलने [वलनैः ] से जिसकी बनावट बिगड़ गयी है इस प्रकारकी कमलिनीके पत्तोंकी यह शय्या कृशाङ्गी [सागरिका ] के [विरहजन्य] सन्तापको बतला रही है॥३५१। गुणानुसारिणी रचनादिके अपवाद वामनने गुणके साथ वैदर्भी, गौडीया तथा पाञ्चाली तीन प्रकारकी रीतियोंका भी प्रतिपादन किया है और रीतिको ही काव्यका आत्मा माना है। वामनने जिसे रीति शब्दसे कहा है, दण्डी तथा कुन्तकने उसीके लिए 'मार्ग' शब्दका तथा आनन्दवर्धनाचार्यने 'सङ्टटना' शब्दका प्रयोग किया है। वामनकी त्रिविध रीतियोंके समान आनन्दवर्धनने तीन प्रकारकी 'सङ्गटना 'का निरूपण करते हुए · लिखा है- असमासा समासेन मध्यमेन च भूषिता। तथा दीर्घसमासेति त्रिधा सङ्गटनोदिता ।। ध्वन्यालोक ३।५। गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती माधुर्यादीन् व्यनक्ति सा। रसान् तन्नियमने हेतुरौचित्यं वक्तृवाच्ययोः ॥३।६। इसका अभिप्राय यह है कि वामन आदिने १. असमासा वैदर्भी रीति, २. मध्यमसमाससे भूषित पाञ्चाली रीति तथा ३. दीर्घसमासयुक्त गौडीया रीति इस प्रकार तीन तरहकी सङ्गटना या रीतियोंका प्रतिपादन किया है। सङ्घटना या रीति गुणोंसे भिन्न है या अभिन्न इस बातको लेकर तीन विकल्प 'ध्वन्यालोक' में दिखलाये गये हैं। एक पक्ष गुण तथा सङ्घटना अथवा रीतियोंका अभेद मानता है। दूसरा पक्ष उन दोनोंका भेद मानता है। उस भेदवादी सिद्धान्तमें भी दो विकल्प हो जाते हैं, जिनमेंसे एक पक्ष सङ्घटनाको गुणोंके आश्रित मानता है और दूसरा पक्ष गुणोंको सङ्घटनाके आश्रित मानता है। ध्वन्यालोककार गुणोंको सङ्घटनाके आश्रित नहीं अपितु रसके आश्रित मानते हैं। इसलिए वे सङ्घटना या रीतिको गुणोंके आश्रित मानते हैं। यही बात उन्होंने 'गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती माधुर्यादीन् व्यनक्ति सा । रसान्' इस कारिकाभागमें स्पष्टरूपसे प्रतिपादित की है। गुणोंके अतिरिक्त वक्ता, वाच्य आदिका औचित्य भी सङ्कटना या रीतिका नियामक होता है। यह ध्वन्यालोककारने 'तन्नियमने हेतुरौचित्यं वक्तृवाच्ययोः' इस कारिकाभागमें प्रतिपादित किया है। 'ध्वन्य।लोक'की इन्हीं कारिकाओंके आ्धारपर ग्रन्थकार अगली कारिकामें इसी विषयका प्रतिपादन करते हुए लिखते हैं कि-
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३६६ काव्यप्रकाश: [का० ७७, सू० १०१
यद्यपि गुणपरतन्त्राः सङ्गटनादयस्तथापि [सू० १०१] वक्तृवाच्यप्रबन्धानामौचित्येन क्वचित्क्वचित्। रचनावृत्तिवर्णानामन्यथात्वमपोष्यते ।।७७।। क्वचिद्वाच्यप्रबन्धानपेक्षया वक्त्रौचित्यादेव रचनादयः । यथा- मन्थायस्तार्णवाम्भ:प्लुतकुहरचलन्मन्दरध्वानधीर: कोणाघातेषु गर्जत्प्रलयघनघटान्योन्यसङघट्टृचण्डः । कृष्णाक्रोधाग्रदूतः कुरुकुलनिधनोत्पातनिर्घातवातः केनास्मत्सिहनाद प्रतिरसितसखो दुन्दुभिस्ताडितोऽसौ ॥३५२॥ अत्र हि न वाच्यं क्रोधादिव्यञ्जकम्। अभिनेयार्थ च काव्यमिति तत्प्रतिकूला उद्धता रचनादयः । वक्ता चात्र भीमसेनः ।
यद्यपि सङ्गटना आदि गुणोंके आश्रित होती हैं, फिर भी -- [सूत्र १०१]-कहीं-कहीं १. वक्ता, २. वाच्य [विषय ] तथा ३. प्रबन्धके औचित्यसे रचना, समास तथा वर्णोंका अन्य प्रकारका प्रयोग भी उचित माना जाता है।।७७।। कहीं वाच्य तथा प्रबन्धकी [भी] उपेक्षा करके केवल वक्ताके औचित्यसे ही रचना आदि होती है। जैसे -- मन्थनदण्ड [रईरूप मन्दराचल ] से क्षुब्ध समुद्रके जलसे व्याप्त गुफाओंवाले मन्दराचलके शब्दके समान गम्भीर ['भेरीशतसहत्त्राणि ढक्काशतशतानि च । एकदा यत्र हन्यन्ते कोणाघातः स उच्यते ॥' इत्यादिरूप परिभाषाके अनुसार ] कोणाघातके अवसरपर [उसके साथ ] गर्जन करते हुए प्रलयकालीन मेघोंके समूहके परस्पर सङ्गर्षण [जन्य शब्द ] के समान भयङ्गर, द्रौपदी [कृष्णा ]के क्रोधका [सूचक ] अग्रदूत, कौरववंशके नाशके लिए निर्घात वायु ['मेघवातयोः सङ्गट्टजो ध्वनिरशुभसूचको निर्घात उच्यते'] रूप और हमारे [भीमसेनके ] सिंहनादकी प्रतिध्वनिके सदृश यह दुन्दुभि किसने बजाया है ॥।३५२। यहाँ वाच्य [अर्थ प्रश्नरूप होनेसे ] कोधादिका व्यञ्जक नहीं है। और काव्य [जिससे यह श्लोक लिया गया है, वह 'वेणीसंहार' नाटकरूप प्रबन्ध ] अभिनेयार्थ है [ अभिनेय काव्यमें दीर्घ समास आदिकी रचनाका प्रयोग नहीं करना चाहिये, क्योंकि उससे शीघ्र अर्थकी प्रतीति नहीं होती है। इसलिए यहाँ वाच्य तथा प्रबन्ध दोनोंकी दृष्टिसे दीर्घसमासवाली उद्धत रचना नहीं होनी चाहिये थी, परन्तु उन दोनोंकी उपेक्षा करके केवल भीमसेन जैसे उद्धत वक्ताके मुखसे शोभा देनेके कारण वक्ताके औचित्यसे दीर्घसमासमयी यह उद्धत रचना की गयी है] इसलिए उद्धत रचना [दीर्घसमास ] आदि उन [वाच्य तथा प्रबन्ध ] दोनोंके प्रतिकूल है। परन्तु यहाँ [ उद्धत स्वभावका भीमसेन वक्ता है] उसके मुखसे उद्धत दीर्घसमासमयी रचना ही शोभा देती है, इसलिए वाच्य तथा प्रबन्धकी उपेक्षा करके इस प्रकारकी रचना भी गयी है।
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का० ७७, सू० १०१ ] अ्ष्टम उल्लास: ३६७ क्वचिद्वक्तृप्रवन्धानपेक्षया वाच्यौचित्यादेव रचनादयः । यथा -- प्रौढच्छेदा नुरूपोच्छलनरयभवत्सैहिकेयोपघात- त्रासाकृष्टाश्वतिर्यग्वलितरविरथेनारुणेनेक्ष्यमाणम् । कुर्वत्काकुत्स्थवीर्यस्तुतिमिव मरुतां कन्धरारन्धभाजां भाङ्कारैर्भीममेतन्निपतति वियतः कुम्भकर्णोत्तमाङ्गम् ।।३५३।। क्वचिद्वक्तृवाच्यानपेक्षा: प्रबन्धोचिता एव ते। तथा हि आख्यायिकायां शृङ्गारे- डपि न मसृणवर्णादयः, कथायां रौद्रेऽपि नात्यन्तमुद्धताः, नाटकादौ रौद्रेऽपि न दीर्घ- समासादयः । एवमन्यदप्यौचित्यमनुसर्तव्यम् ।
और कहीं वक्ता तथा प्रबन्ध [दोनों] की उपेक्षा करके [केवल ] वाच्यके औचित्यसे ही रचना आदि [प्रयुक्त ] होती है। जैसे -- 'चन्द्रिका' आदिमें इसको 'महावीरचरित' का श्लोक बतलाया है। परन्तु 'महावीरचरित' में यह श्लोक नहीं पाया जाता है। कुछ लोग इसे 'छलितराम' नाटकका पद्य बतलाते हैं। कुम्भकर्णके कटे हुए सिरके ऊपरसे गिरनेका वर्णन करते हुए कवि कहता है कि- प्रौढ अर्थात् बलवान्के द्वारा प्रयुक्त हुआ जो खङ्ग [छेद्यते अनेनेति छेदः इस प्रकारकी करण- व्युत्पत्तिसे छेद शब्द खङ्गका वाचक होता है] का प्रहार उसके अनुरूप जो [कटे हुए सिरका ] ऊर्ध्वगमनका वेग उस [वेग] से उत्पन्न जो राहु [सैंहिकेय ] के पतनके भयसे घोड़ों [ की रासों] को खींचकर सूर्यके रथको तिरछा मोड़ देनेवाले [ सूर्यके सारथि ] अरुणके द्वारा [भय तथा आश्रर्यपूर्वक ] देखा जाता हुआ और गर्दनके [कटे हुए ] छिद्रोंके भीतर भरी हुई वायुके भाँय-भाँय [इस प्रकारके शब्दों ] से [काकुत्स्थ अर्थात् ककुत्स्थवंशमें उत्पन्न हुए ] रामचन्द्रके पराक्रमकी स्तुति-सा करता हुआ कुम्भकर्णका यह भयानक सिर आकाशसे गिर रहा है।२५३॥ [यहाँ वक्ता वैतालिक है। उसके वचनमें दीर्घसमासमयी उद्धत रचना उचित नहीं हो सकती है और काव्य अभिनयात्मक नाटकरूप है इसलिए उसमें भी दीर्घसमासमयी रचना उचित नहीं है। तथापि कुम्भकर्णके सिरके पतनका विषय ऐसा है कि उसमें दीर्घसमासमयी उद्धत रचना ही शोभा देती है। इसलिए वक्ता तथा प्रबन्ध दोनोंकी उपेक्षा करके केवल वाच्यके औचित्यके कारण ही यहाँ दीर्घसमासमयी और उद्धत रचनाका प्रयोग किया गया है]। कहीं-कहीं वक्ता और वाच्यकी उपेक्षा करके प्रबन्धके औचित्यके अनुसार [रचना आदि ] की जाती है। जैसे कि आख्यायिकामें शृङ्गाररस [के वर्णन ] में भी कोमल वर्णादि [प्रयुक्त ] नहीं होते हैं, कथामें रौद्ररसमें भी अत्यन्त उद्धत [वर्णरचनादि प्रयुक्त ] नहीं होते हैं और नाटकादिमें रौद्ररसमें भी दीर्घसमास आदि नहीं [ प्रयुक्त ] होते हैं। इसी प्रकार अन्य औचित्योंका भी अनुसरण करना चाहिये।
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३६८ काव्यप्रकाश: [ का० ७७, सू० १०१
इति श्रीकाव्यप्रकाशे गुणालङ्कारभेदनियतगुणनिर्णयो नाम अष्टमोल्लास: यहाँ ग्रन्थकारने 'आख्यायिका' तथा 'कथा का उल्लेख किया है। वैसे ये दोनों शब्द समानार्थकसे लगते हैं, किन्तु साहित्यमें वे दोनों भिन्न रचनाशैलीके द्योतक हैं। ये दोनों गद्यकाव्यके भेद हैं। आख्यायिकाकी रचना उछ्वास आदि भागोंमें विभक्त होती है। कथामें इस प्रकारका विभाग नहीं होता है। 'आख्यायिक 'का उदाहरण 'हर्षचरित' है, और 'कथा'का उदाहरण 'कादम्बरी' है। विश्वनाथने 'कथा' तथा 'आख्यायिका' के भेदका प्रतिपादन करते हुए लिखा है- कथायां सरसं वस्तु गद्यैरेव विनिर्मितम्। क्वचिदत्र भवेदार्या क्वचिद् वक्त्रापवक्त्रके।। आदौ पद्यैर्नमस्कारः खलादेर्वत्तकीर्तनम्। यथा कादम्बर्यादिः । आाख्यायिका कथावत् स्यात् कवेवशानुकीर्तनम् । अस्यामन्यकवीनां च वृत्त पद्यं क्वचित् क्वचित्। कथांशानां व्यवच्छेद आश्वास इति कथ्यते। आर्यावक्त्रापवक्त्राणां छन्दसा थेन केनचित्।। अन्यापदेशेनाश्वासमुखे भाव्यर्थसूचनम् । यथा हर्षचरितादिः । मम्मटने यह सारा प्रकरण 'ध्वन्यालोक' के निम्नलिखित लेखके आधारपर लिखा है- विषयाश्रयमप्यन्यदौचित्यं तां नियच्छति। काव्यप्रभेदाश्रयतः स्थिता भेदवती हि सा॥ ३-७ वक्तृवाच्यगतौचित्ये सत्यपि, विषयाश्रयमन्यदौचित्यं सङ्गटनां नियच्छति। यतः काव्यस्य प्रभेदा: (१) मुक्तकं संस्कृत-प्राकृतापभ्रंशनिबद्धम्, (२) सन्दानितकविशेषककलापककुलकानि, (३) पर्यायबन्धः, (४) परिकथा, (५) खण्डकथासकलकथे, (६) सर्गबन्धः, (७) अभिनेयार्थम्, (८) आख्यायिकाकथे इत्येवमादयः तदाश्रयेणापि सङ्घटना विशेषवती भवति। तत्न मुक्तकेषु रसबन्धाभिनिवेशिन: कवेस्तदाश्रयमौचित्यम् । तच्च द्शितमेव । अ्न्यत्र काम- चारः । मुक्तकेषु प्रबन्धेष्वपि रसबन्धाभिनिवेशिनः कवयो दृश्यन्ते। यथा ह्यमरुककवेः मुक्तकाः शृङ्गाररसस्यन्दिनः प्रबन्धायमाना: प्रसिद्धा एव। सन्दानितकादिषु तु विकटनिबन्धनौचित्यान्मध्य- मसमासदीर्घसमासे एव सङ्घटने। प्रबन्धाश्रयेषु यथोक्तं प्रबन्धौचित्यमेवानुसर्त्तव्यस्। पर्यायबन्धे पुनरसमासमध्यमसमासे एव सङ्टने। कदाचिदर्थाचित्याश्रयेण दीर्घसमासायामपि सङ्कटनायां परुषा ग्राम्या च वृत्ति: परिहर्त्तव्या। परिकथायां कामचारः । तत्र इतिवृत्तमात्रोपन्यासेन नात्यन्तं रससम्बन्धाभिनिवेशात्। खण्डकथासकलकथयोस्तु प्राकृतप्रसिद्धयोः कुलकादिनिबन्धनभूय- स्त्वाद् दीर्घसमासायामपि न विरोधः । वृत्त्यौचित्यन्तु यथारसमनुसर्त्तव्यम् । सर्गबन्धे तु रसतात्पये यथारसमौचित्यम् । अन्यथा तु कामचारः । द्वयोरपि मार्गयो: सर्गबन्धविधायिनां दर्शनात् रसतात्पर्यं साधीयः । अभिनेयार्थे तु सर्वथा रसबन्धेऽभिनिवेशः कार्यः । आरख्यायिकाकथयोस्तु गद्यनिबन्धनबाहु- ल्याद् गद्ये च छन्दोबन्धभिन्नप्रस्थानत्वादिह नियमहेतुरकृतपूर्वोऽपि मनाक् क्रियते। काव्यप्रकाशमें गुण और अलङ्गारोंके निश्चित भेदका निर्णय करनेवाला अष्टम उल्लास समाप्त हुआ। इति श्रीमदाचार्यविश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोमणिविरचितायां काव्यप्रकाशदीपिकायां हिन्दीव्याख्यायां गुणालङ्कारनियतगुणनिर्णयो नाम अष्टम उल्लास: समाप्तः ।
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अथ नवम उल्लास: अथ काव्यप्रकाशदीपिकायां नवम उल्लास: उल्लाससङ्गति 'तददोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलङकृती पुनः क्वापि' इस काव्यलक्षणमें 'शब्दार्थौ' का अन्तिम विशेषण 'अनलङकृती' दिया है। उसका अभिप्राय यह है, साधारणतः सालङ्कार शब्दार्थ काव्यमें प्रयुक्त होने चाहिये, परन्तु जहाँ रसादिकी स्पष्ट प्रतीति हो, वहाँ कभी-कभी अलङ्काररहित शब्द और अर्थके होनेपर भी काव्यत्वकी हानि नहीं होती है। इसलिए इस लक्षणकी व्याख्याके लिए अलङ्कारोंका निरूपण करना आवश्यक है। उस लक्षणमें अलङ्कारका सम्बन्ध शब्द तथा अर्थ दोनोंके साथ दिखलाया गया है। अतएव शब्दालङ्कार तथा अर्थालङ्काररूपमें अलङ्कारोंके दो विभाग करके उनका निरूपण करनेके लिए यहाँ ग्रन्थकारने नवम तथा दशम दो उल्लासोंकी रचना की है। नवम उल्लासमें केवल शब्दालद्कार तथा दशम उल्लासमें अर्थालङ्कारोंका वर्णन किया है। अलङ्कारोंका सामान्य लक्षण 'उपकुर्वन्ति तं सन्तं येऽङ्गद्वारेण जातुचित्' इत्यादि अ्रष्टम उल्लासकी ६७वीं कारिकामें कर चुके हैं। इसलिए यहाँ फिर सामान्य लक्षण किये बिना ही अलङ्कारोंका निरूपण कर दिया है। अलङ्कारका लक्षण अलङ्करोति इति अलङ्कार:' यह अलङ्कार शब्दकी व्यत्पत्ति है। इसके अनुसार शरीरको विभू- षित करनेवाले अर्थ या तत्त्वका नाम 'अलङ्कार' है। जिस प्रकार कटक, कुण्डल आदि आभूषण शरीरको विभूषित करते हैं, इसलिए अलङ्कार कहलाते हैं उसी प्रकार काव्यमें अनुप्रास, उपमा आदि काव्यके शरीरभूत शब्द और अर्थको अलडकृत करते हैं इसलिए अलङ्कार कहलाते हैं। अलङ्कार अलङ्कार्यका केवल उत्कर्षाधायक तत्त्व होता है, स्वरूपाधायक या जीवनाधायक तत्त्व नहीं। जो स्त्री या पुरुष अलङ्कारविहीन हैं, वह भी मनुष्य हैं। पर जो अलङ्कारयुक्त हैं, वह अधिक उत्कृष्ट समझे जाते हैं। इसी प्रकार काव्यमें अलङ्कारोंकी स्थिति अपरिहार्य नहीं है। वे यदि हैं, तो काव्यके उत्कर्षाधायक होंगे, यदि नहीं हैं, तो भी काव्यकी कोई हानि नहीं है। इसलिए अलङ्कारोंको काव्यका अस्थिर धर्म माना गया है। यही गुण तथा अलङ्कारोंका भेदक तत्त्व है। गुण काव्यके स्थिर धर्म हैं, काव्यमें गुणोंकी स्थिति अपरिहार्य है। परन्तु अलङ्कार स्थिर या अपरिहार्य धर्म नहीं हैं, केवल उत्कर्षाधायक हैं। उनके बिना भी काव्यमें काम चल सकता है। इसलिए काव्यके लक्षणमें मम्मटने 'अनलङकृती पुनः क्व।-' लिखकर अलङ्काररहितको भी काव्य माना है। इसी दृष्टिसे उन्होंने अष्टम उल्लासमें अलङ्कारोंका लक्षण करते हुए लिखा है- (सूत्र ८७) उपकुर्वन्ति तं सन्तं येऽङ्गद्वारेण जातुचित्। हारादिवदल ङ्कारास्तेऽनुप्रासोपमादयः ।। अर्थात् अलद्कार 'जातुचित्' कभी-कभी ही उस रसको अलङकृत करते हैं, सदा नहीं। इसलिए ये काव्यके अस्थिर धर्म हैं। 'साहित्यदर्पण' में भी अलङ्गारका लक्षण इसी आशयसे निम्नलिखित प्रकार किया गया है- शब्दार्थयोरस्थिराः ये धर्माश्शोभातिशायिनः । रसादीनुपकुर्वन्तोऽलङ्कारास्तेऽङ्गदादिवत् ॥ सा० द० १०।१ किन्तु अलङ्कारोंको काव्यके अस्थिर धर्म माननेका सिद्धान्त सर्वमान्य नहीं है। यह केवल धवनिवादी सम्प्रदायका दृष्टिकोण है। अलङ्गारसम्प्रदाय अलङ्कारोंको काव्यका अपरिहार्य स्थिर तत्त्व
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४०० काव्यप्रकाश: [का० ७८, सू० १०२ मानता है। उसके मतमें अलङ्काररहित काव्यकी कल्पना, उष्णतारहित अग्निकी कल्पनाके समान ही उपहासयोग्य है। इसी भावको व्यक्त करते हुए जयदेवने अपने चन्द्रालोकमें लिखा है- अ्रङ्गीकरोति यः काव्यं शब्दार्थावनलडकृती। असौ न मन्यते कस्मात् अनुष्णमनलं कृती।। जो आदमी (मम्मट) अलङ्कारविहीन शब्द और अर्थको काव्य मानता है, वह उष्णताविहीन अ्रग्निको क्यों नहीं मानता है ? अलङ्कारोंके विभाजक तत्त्व प्रायः सभी आचार्योंने शब्द और अर्थको काव्यका शरीर माना है। अलङ्कार शरीरके शोभा- धायक होते हैं। इसलिए काव्यमें शब्द और अर्थके उत्कर्षाधायक तत्त्वका ही नाम अलङ्कार है। अर्थात् अलङ्कारका आधार शब्द और अरथ है। इसी आधारपर शब्दालङ्वार, अर्थालङ्कार और उन दोनोंके मिश्रणसे बने हुए उभयालङ्वार इन तीन प्रकारके अलङ्कारों की कल्पना की गयी है। शब्दालद्कार तथा अर्थालङ्कारका भेद शब्दके परिवर्तनसहत्व या परिवर्तनासहत्वके ऊपर निर्भर है। जहाँ शब्दका परिवर्तन करके उसका पर्यायवाचक दूसरा शब्द रख देनेपर अलद्कार नहीं रहता है, वहाँ यह समझना चाहिये कि उस अलङ्कारकी स्थिति विशेषरूपसे उस शब्दके कारण ही थी। इसलिए उसे 'शब्दालङ्वार' कहा जाता है। जहाँ शब्दका परिवर्तन करके दूसरा पर्यायवाचक शब्द रख देनेपर भी उस अलङ्कारकी सत्ता बनी रहती है, वहाँ अलङ्कार शब्दके आश्रित नहीं, अपितु अर्थके आश्रित होता है, इसलिए उसको 'अर्थालङ्कार' कहा जाता है। इस प्रकार जो अलङ्कार शब्दपरिवृत्तिको सहन नहीं करता वह शब्दालङ्कार और जो शब्दपरिवृत्तिको सहन करता है, वह अर्थालङ्कार होता है। यह शब्दालङ्कार तथा अर्थालङ्कारका भेद है। अलङ्कारोंकी संख्या अलङ्कारोंकी संख्याके विषयमें बड़ा मतभेद है; शब्दालङ्कारोंकी संख्यामें तथा अर्थालङ्कारोंकी संख्यामें भी। अर्थालङ्कारोंकी संख्याके विषयमें हम आगे दशम उल्लासमें लिखेंगे। मम्मटने ६१ अर्था लङ्गार माने हैं। शब्दाङ्कारोंमें वामन आदिने केवल 'अनुप्रास' और यमक' दोकी ही गणना की है। परन्तु मम्मटने उनके साथ, वकोक्ति, श्लेष, चित्र और पुनरुक्तवदाभासको भी लब्दालङ्वार माना है। इस प्रकार मम्मटके मतमें शब्दालङ्कारोंकी संख्या ६ हो जाती है। इनमेंसे श्लेष तथा पुनरुक्तवदाभासकी स्थितिमें भी मतभेद पाया जाता है। अलङ्कारसर्वस्वकार रुय्यक पुनरुक्तवदाभासको अर्थालङ्कार मानते हैं। मम्मट, विश्वनाथ, शोभाकर मिश्र इसको शब्दालङ्कार मानते हैं। श्लेष अलङ्कारके विषयमें भी इसी प्रकारका मतभेद पाया जाता है। श्लेषके दो भेद होते हैं। एक सभङ्गश्लेष दूसरा अभङ्गश्लेष, इनके विषयमें तीन प्रकारके मत पाये जाते हैं। क-अलङ्कारसर्वस्वकार रुय्यक आदि कुछ आलङ्गारिक सभङ्गश्लेषको शब्दालङ्कार तथा प्रभङ्गश्लेषको अर्थालङ्कार मानते हैं। ख-कुवलयानन्दकार अप्पय्य दीक्षित आदि कुछ आलङ्कारिक दोनों प्रकारके श्लेषोंको अर्थालङ्कार मानते हैं। ग-इसके विपरीत मम्मट आदि कुछ आलङ्कारिक सभङ्ग और अभङ्ग दोनों प्रकारके श्लेषोंको शब्दालद्कार ही मानते हैं। परन्तु मम्मटने अर्थालङ्कारोंमें भी श्लेषकी गणना की है। पर वह इन
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का० ७८, सू० १०२] नवम उल्लास: ४०१ गुणविवेचने कृतेऽलङ्काराः प्राप्तावसरा इति सम्प्रति शब्दालङ्गारानाह- [सू० १०२] यदुक्तमन्यथावाक्यमन्यथाऽन्येन योज्यते। श्लेषेण काक्वा वा ज्ञेया सा वक्रोक्तिस्तथा द्विधा॥७८। तथेति श्लेषवक्रोक्तिः काकुवक्रोक्तिश्च। तत्र पदभङ्गश्लेषेण यथा-
दोनों भेदोंसे भिन्न है, जहाँ शब्दोंका परिवर्तन कर देनेपर भी द्वितीय अर्थकी प्रतीति होती है, वह अरथ- श्लेष इन दोनों प्रकारके शब्द-श्लेषोंसे भिन्न है। शब्दालङ्काररूप श्लेषमें जतुकाष्ठ-न्यायसे दो शब्दोंका श्लेष होता है। परन्तु अर्थ-श्लेषमें एकवृन्तगतफलद्वय-न्यायसे एक शब्दमें दो अरथोंका श्लेष होता है। यही शब्दश्लेष और अर्थश्लेषका भेद है। इस प्रकार सम्मटके मतमें छह शब्दालङ्कार, इकसठ अर्थालङ्कार और एक उभयालङ्वार है। शब्दालङ्कारोंमें मम्मटने १. वकोक्ति, २. अनुप्रास, ३. यमक, ४. श्लेष, ५. चित्र और ६. पुनरुक्त- वदाभास ये छह अलङ्कार माने हैं। इन्हींका निरूपण इस नवम उल्लासमें किया गया है। 'काव्य- प्रकाश' के टीकाकार सोमेश्वरने इन्हीं छह शब्दालङ्कारोंको एक श्लोकमें इस प्रकार गिनाया है- वकोक्तिरप्यनुप्रासो यमकं श्लेषचित्रके। पुनरुक्तवदाभासः शब्दालङकृतयस्तु षट्।। 'सरस्वतीकण्ठाभरण' में ऐसे २४ अलङ्कारोंकी नामावली दी है जिनको अन्य लोग शब्दालङ्कार मानते हैं। परन्तु उनमें वस्तुतः शब्दपरिवृत्यसहिष्णुत्वरूप शब्दालङ्कारका लक्षण न पाये जानेसे उन्हें शब्दालड्कार नहीं कहा जा सकता है। यही बात निम्नलिखित श्लोकमें कही गयी है- पठन्ति शब्दालङ्कारान् बहूनन्यान् मनीषिणः । परिवृत्तिसहिष्णुत्वात् न ते शब्दैकभागिनः ।। बुद्धिमान् अन्य बहुतसे अलङ्कारोंको शब्दालद्कार कहते हैं, पर वे शब्दपरिवर्तनसहिष्णु होनेके कारण शब्दालद्कार नहीं हैं। आगे इन शब्दालङ्कारोंका विवेचन करते हैं- गुणोंका विवेचन [अष्टम उल्लासमें ] कर चुकनेपर अलङ्गारों [के निरूपण ] का अवसर आता है। इसलिए अब [पहिले] शब्दालङ्गारोंको कहते हैं- १. वकोक्ति अलङ्गार- [सूत्र १०२] जो [वक्ता द्वारा ] अन्य प्रकारसे [ अन्य अर्थमें] कहा हुआ वाक्य दूसरे [अर्थात् बोद्धा या शरोता ] के द्वारा श्लेष [अर्थात् शब्दके दो अर्थवाला होनेसे] अथवा [भिन्नकण्ठध्वनिर्धीरैः काकुरित्यभिधीयते ] काकु अर्थात् बोलनेके लहजेसे, अन्य प्रकारसे [अर्थात् वक्ताके अभिप्रायसे भिन्न अर्थमें ] लगा लिया जाता है, वह वकोक्ति नामक [शब्दालङ्गार] होता है और वह उस प्रकारसे [श्लेष- वक्ोक्ति और काकुवकोक्ति] दो तरहका होता है। जैसे- यह श्लेषवकोक्ति दो व्यक्तियोंके संवादरूपमें है। वक्ता शृङ्गारपरक भावसे बात कर रहा है, और दूसरा व्यक्ति उसका वीरपरक अर्थ लगा लेता है। इस प्रकार अन्यार्थपरक वाक्यका अन्य अर्थ लगाकर यह संवाद हो रहा है। इसलिए यह वकोक्तिका उदाहरण बनता है। श्लोकका अर्थ निम्न- लिखित प्रकार है- २६
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४०२ काव्यप्रकाश: [ का० ७८, सू० १०२
नारीणामनुकूलमाचरसि चेज्जानासि कश्चेतनो वामानां प्रियमादधाति हितकृन्नैवाबलानां भवान्। युक्तं किं हितकर्तनं ननु वलाभावप्रसिद्धात्मनः सामर्थ्यं भवतः पुरन्दरमतच्छेदं विधातुँ कुतः ॥३५४॥
१. यदि तुम [नारीणां ] स्त्रियोंके अनुकूल आचरण करते हो, तो [जानासि अर्थात् ] समझदार [बुद्धिमान् ] हो। २. [यहाँ वक्ताने 'नारीणां' पद 'स्त्री' अर्थमें प्रयुक्त किया था। पर दूसरा व्यक्ति इस एक पदको 'न अरीणां' इस प्रकार दो पदोंमें विभक्त करके, यदि तुम शत्रुओंके अनुकूल आचरण नहीं करते हो तो बुद्धिमान् हो, यह अर्थ लगा लेता है, और वक्ताके वचनका यह अर्थ मानकर उत्तर देता है कि-] कौन बुद्धिमान् [चेतनः समझदार व्यक्ति, वामानां ] शत्रुओंका प्रिय [अनुकूल कार्य] करता है। अर्थात् कोई भी बुद्धिमान् व्यक्ति शत्रुओंके अनुकूल आचरण नहीं कर सकता है, तब मैं ही क्यों करने लगा ]। १. [यहाँ द्वितीय वक्ताने 'वामनां' पदका प्रयोग विरोधी या शत्रुके अर्थमें किया था, परन्तु प्रथम वक्ता उसका अर्थ 'स्त्री' लगा लेता है। और उसके कथनका यह अर्थ मान लेता है कि कोई बुद्धिमान् स्त्रियोंका प्रिय कार्य अर्थात् स्त्रियोंके शासनमें रहना नहीं चाहता है ऐसा अभिप्राय मानकर उससे फिर पूछता है कि तो क्या ] आप अबलाओंके प्रिय करनेवाले [हितकृत् ] नहीं हैं ? २. [यहाँ 'अबलानां हितकृत्' का प्रयोग वक्ताने हित करनेवाले इस अर्थमें किया था। परन्तु दूसरा व्यक्ति उसका अर्थ यह लगाता है कि अबलानाम् अर्थात् दुर्बलोंके 'हितं कृन्तति विनाशयति इति हितकृत्' अर्थात् आप दुर्बलोंके हितोंका नाश करनेवाले नहीं हो। इस प्रश्नका उत्तर देते हुए वह कहता है कि -- ] बलके अभावके लिए प्रसिद्ध स्वरूपवाले [ अर्थात् दुर्बल व्यक्ति ] के हितका विनाश करना क्या उचित है [अर्थात् उचित नहीं है]। १. [पूर्ववक्ताने 'बलाभावप्रसिद्धात्मनः' पदका प्रयोग 'दुर्बल' इस अर्थमें किया था। परन्तु दूसरा व्यक्ति उसका अर्थ बल नामक असुरविशेषके अभाव अर्थात् मारनेके कारण प्रसिद्ध अर्थात् इन्द्र ले लेता है। और उस दशामें पूर्ववक्ताके वाक्यका अर्थ क्या इन्द्रके हितका नाश करना उचित है, यह हो जाता है। अर्थात् इन्द्रके हितका नाश करना उचित नहीं है, इसलिए मैं उसे नहीं करता हूँ। यह वक्ताका अभिप्राय मानकर पहिला वक्ता फिर पूछता है कि] आपमें इन्द्रके अभिमत अर्थका विनाश करने [पुर- न्दरमतच्छेदं विधातृं] की सामर्थ्यं [ही] कहाँ है [जो आप उसके हितका कर्त्तन कर सकते] ।।३५४। यहाँ अन्य वक्ताके अन्यार्थक शब्दोंका अन्य अर्थ लगाकर दूसरा व्यक्ति प्रश्नोत्तर आदि कर रहा है। इसलिए यह वक्रोक्तिका उदाहरण है। इसमें नारीणां, वामानां, हितकृत्, बलाभावप्रसिद्धा- त्मन: ये पद शलिष्ट है, अतः यह श्लेषवकोक्तिका उदाहरण है। उसमें भी नारीणां, अबलाना, इन पदोंमें एक पक्षमें 'नारोणा' तथा 'सबलाना' पद स्त्रो अर्थमें रूढ लिये जाते है, दूसरे पक्षमें 'न अरोणां' 'न बलं येषां ते अबलाः' इस प्रकारका समास करके बने हुए 'अबलाः' पदका 'अबलानां' रूप बनाया जाता है,
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का० ७८, सू० १०२] नवम उल्लास: ४०३ अभङ्गश्लेषेण यथा- अहो केनेदृशी बुद्धिर्दारुणा तव निर्मिता। त्रिगुणा श्रूयते बुद्धिर्न तु दारुमयी क्वचित् ।३५५।। काक्वा यथा- गुरुजनपरतन्त्रतया दूरतरं देशमुद्यतो, गन्तुमु। अलिकुलकोकिलललिते नैष्यति सखि ! सुरभिसमयेऽसौ ॥३५६॥
इसलिए इन दोनों पदोंमें सभङ्गश्लेष है। यद्यपि वामानां आदि पदोंमें सभङ्गश्लेष नहीं है, परन्तु इस संवादका प्रारम्भ 'नारोणां' इस सभङ्गश्लेषसे ही हुआ है, इसलिए आगेके सारे संवादके सभङ्गश्लेषपर आश्रित होनेके कारण इसे सभङ्गश्लेषका उदाहरण माना गया है। हिन्दीमें सभङ्गश्लेषमूलक वक्रोक्तिके उदाहरणके रूपमें निम्नलिखित पद्य उद्धृत किया जा सकता है- गौरवशालिनी प्यारी हमारी, सदा तुम इष्ट अहो। हौं न गऊ, नहिं हौं अबशा, अलिनी हूँ नहीं अस काहे कही ।। इस पद्यमें शिव-पार्वतीका संवाद है। पद्यका पूर्वार्द्ध शिवका वचन है। उसमें जो 'गौरव- शालिनी' पद आया है उसको पार्वतीने गौ: अवशा अलिनी इन तीन टुकड़ोंमें विभक्त कर दिया है, शिवजीने पार्वतीको अपनी 'गौरवशालिनी' प्रिया कहा है, पर पार्वती उसका दूसरा अर्थ लेकर कह रही हैं कि न तो मैं गऊ हूँ, न अवशा हूँ और न अलिनी-भ्रमरी हूँ, फिर आप ऐसा क्यों कह रहे हैं। अभङ्गश्लेषसे [वकोक्ि]का उदाहरण। जैसे- आश्चय है कि किस [दारुण-निर्दय ब्रह्मा ]ने तुम्हारी इस प्रकारकी [निर्दय कठोर ] बुद्धि बनायी है। यहाँ वक्ताने 'दारुणा' पदका प्रयोग कठोर अर्थमें किया है, परन्तु दूसरा व्यक्ति दारु अर्थात् काष्ठसे यह अर्थ लेकर कहता है कि सांख्यदर्शन आदिमें तो सत्त्व, रज, तमरूप ] तीन गुणोंसे बनी हुई बुद्धि बतलायी गयो है, काष्ठसे बनी हुई दो कहीं नहीं कही गयी है॥३५५॥ यहाँ वक्ता द्वारा कठोर अर्थमें प्रयुक्त 'दारुणा' पदका वक्ताके अभिप्रायसे भिन्न 'काष्ठेन' वह अर्थ लगा लिया है और इस पदका भङ्ग भो नहीं हुआ है। इसलिए यह अभङ्गश्लेषमूलक वक्ोक्तिका उदाहरण है। [आगे काकुवक्रोक्तिका उदाहरण देते हैं] काकुसे [वक्रोक्ति ] जैसे- गुरुजनों [माता-पिता]के अधीन होनेसे [उनकी आज्ञासे ] वे विदेशको जानेको उद्यत हुए थे, [अपनी इच्छासे नहीं ] इसलिए हे सखि, भ्रमरसमूह एवं कोकिलों [ की मधुर ध्वनि ]से मधुर वसन्त- समयमें नहीं लौटेंगे ॥३५६॥ यह नायिका और उसकी सखीके बीचकी बातचीत है। नायिकाने निराशापूर्ण भावसे कहा है कि वे गुरुजनोंके आज्ञाकारी हैं, उन्हें मेरी चिन्ता नहीं है, इसलिए वे वसन्तमें लौटकर आयेंगे, यह आशा नहीं है। उसकी सखी इसी वाक्यको फिर भिन्न-कण्ठध्वनि या लहजेसे बोलती है। तब क्या नहीं आयेंगेका अरथ अवश्य आवेंगे, यह हो जाता है। इसलिए यह काकुवक्ोक्तिका उदाहरण दिया है।
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४०४ काव्यप्रकाश: [ का० ७६, सू० १०३-१०५
[सू० १०३] वर्णसाम्यमनुप्रासः स्वरवैसादृश्येऽपि व्यञ्जनसदृशत्वं वर्णसाम्यम्। रसाद्यनुगतः प्रकृष्टो न्यासोऽ-
नुप्रास: । [सू० १०४ ] छेकवृत्तिगतो द्विधा । छेका विदग्धाः। वृत्तिर्नियतवर्णगतो रसविषयो व्यापार :। गत इति छेकानुप्रासो वृत्त्यनुप्रासश्च । किं तयो: स्वरूपमित्याह-
[सू० १०५ ] सोडनेकस्य सकृत्पूर्व: अनेकस्य अर्थात् व्यञ्जनस्य सकृदेकवारं सादृश्यं छेकानुप्रासः। उदाहरणम् --
२. अनुप्रास अलङ्गार इस प्रकार वकोक्तिरूप प्रथम शब्दालङ्कारके तीनों भेदोंका निरूपण करनेके बाद ग्रन्थकार अनुप्रास नामक दूसरे शब्दालङ्कारका निरूपण प्रारम्भ करते हैं। वह अनुप्रास पहले वर्णानुप्रास और पदानुप्रासरूपसे दो प्रकारका होता है। उसमें वर्णानुप्रासके छेकानुप्रास और वृत्त्यनुप्रास ये दो भेद होते हैं। पदानुप्रासका दूसरा नाम 'लाटानुप्रास' भी है। यह १. अनेक पदोंकी आवृत्तिरूप, २. एक पदकी आवृत्तिरूप, ३. एक समासमें आरवृत्तिरूप, ४. भिन्न समासोंमें आवृत्तिरूप और ५. समास तथा असमास दोनोंमें आवृत्तिरूप इस तरहसे पाँच प्रकारका होता है। इसीका निरूपण आगे करते हैं- [सूत्र १०३]-वर्णोंकी समानता [आवृत्तिका नाम] अनुप्रास है। स्वरोंका भेद होनेपर भी [केवल ] व्यञ्जनोंकी समानता [ही यहाँ] वर्णोंकी समानता [से अभिप्रेत ] है। रसादिके अनुकूल [वर्णोंका ] प्रकृष्ट सन्निवेश [ही 'अनुगतः प्रकृष्टश्च न्यास:' इस व्युत्पत्तिके अनुसार ] अनुप्रास [कहलाता] है। [सूत्र १०४ ]-छेकगत और वृत्तिगत [इस प्रकार यह अनुप्रास ] दो प्रकारका है। 'छेक' शब्दका अर्थ 'चतुर व्यक्ति' है और 'वृत्ति' [ का अर्थ नियत ] व्णोंमें रहनेवाला रसविषयक [व्यञ्जना ] व्यापार है। 'गत' [ यह पद 'द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणं पदं प्रत्येकमभिसम्बध्यते' इस नियमके अनुसार छेक तथा वृत्ति दोनों पदोंके साथ जुड़ता है। इसलिए ] इससे छेकानुप्रास तथा वृत्त्यनुप्रास [ यह दो प्रकारका वर्णसाम्यरूप वर्णानुप्रास होता है]। उन दोनोंका क्या लक्षण [स्वरूप ] है यह कहते हैं- (क) छेकानुप्रास [सूत्र १०५]-अनेक [वणों] का एक बार [आवृत्तिरूप साम्य ] प्रथम [छेकानुप्रास ] है। अनेक व्यञ्जनोंका सकृत् [अर्थात् ] एक बार सादृश्य छेकानुप्रास [कहलाता] है। उसका उदाहरण [जसे ]-
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का० ७६, सू० १०६] नवम उल्लास: ४०५
ततोऽरुणपरिस्पन्दमन्दीकृतवपुः शशी। दध्रे कामपरिक्षामकामिनीगण्डपाण्डुताम् ।।३५७। [सू० १०६] एकस्याप्यसकृत्परः ॥७१॥ एकस्य अपिशब्दादनेकस्य व्यञ्जनस्य द्विर्बहुकृत्वो वा सादृश्यं वृत्त्यनुप्रासः ।
तब [प्रातःकालके समय सूर्यके सारथि] अरुणके गतिशील होनेसे मलिन स्वरूपवाला चन्द्रमा काम [के उपभोग ]से दुर्बल कामिनीके कपोलस्थलके समान सफेद हो गया ॥३५७॥ कमलाकरभट्ट तथा चक्वर्ती आदिने इसे महाभारतके द्रोणपर्वमें रात्रियुद्धके बाद प्रभातवर्णनके प्रसङ्गका पद्य बतलाया है, परन्तु महाभारतमें उस प्रसङ्गमें यह नहीं पाया जाता है। (ख) वृत्त्यनुप्रास [सूत्र १०६ ] -- एक [वर्ण ] का भी [और अनेक बर्णोंका भी] अनेक बार [का आवृत्तिसाम्य होनेपर ] दूसरा [अर्थात् वृत्त्यनुप्रास] होता है। एक वर्णका और 'अपि' शब्द [के प्रयोग ] से अनेक व्यञ्जनोंका एक बार या बहुत बारका सादृश्य [अर्थात् आवृत्ति ] 'वृत्त्यनुप्रास' [ होता ] है। वृत्त्यनुप्रासमें गुण, वृत्ति, रीति आदिका समन्वय वृत्त्यनुप्रासका उदाहरण देनेके पूर्व 'वृत्ति' शब्दकी व्याख्या करना आवश्यक है, ऐसा समझकर ग्रन्थकार वृत्तियोंका वर्णन आागे दे रहे हैं। वृत्ति, रीति, मार्ग, सङ्गटना, तथा शैली शब्द प्रायः समानार्थक हैं। एक ही पदार्थको भिन्न-भिन्न आचार्योंने इन भिन्न नामोंसे व्यवहृत किया है। 'वृत्ति' शब्दका प्रयोग उन्टने किया है। उन्होंने अपने 'काव्यालङ्कारसारसंग्रह' नामक ग्रन्थमें उपनागरिका, परुषा तथा कोमला नामसे तीन प्रकारकी वृत्तियोंका वर्णन करते हुए उनके लक्षण आदि निम्नलिखितप्रकार दिये हैं- शषाभ्यां रेफसंयोगैष्टवर्गेण च योजिता। परुषा नाम वृत्तिः स्याद् बह्नन्याद्ैश्च संयुता ।।६।। स्वरूपसंयोगयुतां मूध्नि वर्गान्त्ययोगिभिः । स्पशैर्युतां च मन्यन्ते उपनागरिकां बुधाः ।।८। शेषैरवणैर्यथायोगं ग्रथितां कोमलाख्यया। ग्राम्यां वृत्ति प्रशंसन्ति काव्येष्वादृतबुद्धयः ॥१०।। इन्हीं तीन प्रकारकी 'वृत्तियों को वामनने तीन प्रकारकी 'रीतियों' के रूपमें, कुन्तक तथा दण्डीने तीन प्रकारके 'मार्गों के रूपमें और आ्रनन्दवर्धनाचार्यने तीन प्रकारकी 'सङ्गटना' के रूपमें माना है। सब जगह उनके लक्षण भी लगभग इसी प्रकारके दिये गये हैं। इसलिए उ्द्टकी 'वृत्तियाँ', वामनकी 'रीतियाँ', दण्डीके और कुन्तकके 'मार्ग' तथा आनन्दवर्धनकी 'सङ्गटना' एक ही भावको व्यक्त करती हैं। उद्भटने इन तीनों वृत्तियोंमें वर्णके साम्यको वृत्त्यनुप्रास कहा है- सरूपव्यञ्जनन्यासं तिसृष्वेतासु वृत्तिषु। पृथक् पृथगनुप्रासमुशन्ति कवयः सदा ॥१२॥ [उ्ट] इसी रूपमें उद्टकी अभिमत वृत्तियोंका निरूपण करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं-
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४०६ काव्यप्रकाश: [का० ८०-८१ सू० १०७-११०
तत्र --
[सू० १०८] ओज:प्रकाशकस्तस्तु परुषा उभयत्रापि प्रागुदाहृतम् । 'अनङ्गरङ्ग' इत्यादि, 'मूर्ध्नामुद्वृत्त' इत्यादि च । [सू० १०९] -कोमला परैः ॥८०॥ परै: शेषैः । तामेव केचित् ग्राम्येति वदन्ति। उदाहरणम्- अपसारय घनसारं कुरु हारं दूर एव कि कमलैः। अलमलमालि ! मृणालैरिति वदति दिवानिशं वाला ॥३५८। सू० ११०] केषाज्चिदेता वैदर्भीप्रमुखा रीतयो मताः । एतास्तिस्रो वृत्तय: वामनादीनां मते वैदर्भीगौडीपाञ्चाल्याख्या रीतयो मताः ।
उनमेंसे -- [सूत्र १०७ ]-माधुर्यव्यञ्जक वर्णोंसे युक्त [ वृत्ति उद्धटके मतमें ] उपनागरिका [और वामनके मतमें वैदर्भी रीति ] कहलाती है। [सूत्र १०८]-ओजके प्रकाशक व्णोंसे युक्त [वृत्ति उद्धटके मतमें] परुषा वृत्ति [और वामनके मतमें गौडी रीति ] कहलाती है। इन दोनोंके उदाहरण [अष्टम उल्लासमें माधुर्य तथा ओज गुणोंके प्रसङ्गमें 'अनङ्गरङ्गप्रतिमं' आदि उदाहरण सं० ३४६ तथा 'मूर्ध्नामुद्वृत्त' इत्यादि उदाहरण संख्या ३५० ] पहिले दिये जा चुके हैं। [सूत्र १०६]-शेष [वर्णों ] से [युक्त तीसरी वृत्ति उद्टके मतमें ] कोमला [वृत्ति और वामनके मतमें पाञ्चाली रीति ] होती है। [कारिकामें आये हुए] 'परः' [ पदका अर्थ उपनागरिका और परुषा वृत्ति अथवा माधुर्य और ओजके व्यञ्जक वर्णोंको छोड़कर ] शेषसे [ युक्त समझना चाहिये।] उसी [कोमला वृत्ति ] को कोई ग्राम्या [वृत्ति] भी कहते हैं। उदाहरण, जैसे- कपूरको हटा दो, हारको दूर ही रखो, कमलोंसे क्या लाभ और हे सखि! मृणालोंको रहने दो [वियोगिनी ] बाला रात-दिन यह कहती है ।।३५८।। [सूत्र ११०]- [ उद्धटकी अभिमत] ये तीनों वृत्तियाँ ही [वामन आदि ] किन्हीं [आचार्यों ] के मतमें वैदर्भी [गौडी और पाञ्चाली ] आदि रीतियाँ मानी गयी हैं। ये तीनों वृत्तियाँ वामन आदिके मतमें [कमशः ] वैदर्भी, गौडी और पाञ्चाली नामक रीतियाँ मानी जाती हैं [ उन वृत्तियोंमें होनेसे यह 'वृत्त्यनुप्रास' कहलाता है ]। (ग) लाटानुप्रास ऊपर वर्णसाम्यरूप 'वर्णानुप्रास का और छेकानुप्रास तथा वृत्त्यनुप्रास नामक उसके दो भेदोंका वर्णन किया गया था। अनुप्रासका दूसरा भेद 'पदानुप्रास' होता है, उसको ही 'लाटानुप्रास' कहा जाता है। लाटानुप्रासमें वर्णोंकी नहीं अपितु पदोंकी आवृत्ति होनेपर पुनरुक्ति दोष तथा पुनरुक्तवदाभास अलङ्कार भी हो सकते हैं। इसलिए लाटानप्रासको उनसे भिन्न करनेके लिए लाटानुप्रास-स्थलमें आवृत्त-
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का० ८१-८२, सू० १११-११३] नवम उल्लास: ४०७
[सू० १११ ] शाब्दस्तु लाटानुप्रासो भेदे तात्पर्यमात्रतः ।८१।। शब्दगतोऽनुप्रासः शब्दार्थयोरभेदेऽप्यन्वयमात्रभेदात्। लाटजनवल्लभत्वाच्च लाटानुप्रासः। एष पदानुप्रास इत्यन्ये। [सू० ११२ ] पदानां सः स इति लाटानुप्रासः । उदाहरणम्- यस्य न सविधे दयिता दवदहनस्तुहिनदीधितिस्तस्य । यस्य च सविधे दयिता दवदहनस्तुहिनदीधितिस्तस्य ।।३५९।। [सू० ११३] -- पदस्यापि अपिशब्देन स इति समुच्चीयते। उदाहरणम्-
पदमें तात्पर्यमात्रका भेद होना आवश्यक माना गया है। पदोंके उद्देश्यविधेयभावमें अन्तर श जानेपर भी तात्पर्यमात्रका भेद माना जाता है। इस लाटानुप्रासके पाँच भेद होते हैं। पहिले भेदमें अनेक पदोंकी आवृत्ति होती है, दूसरे भेदमें केवल एक ही पदकी आवृत्ति होती है, एक ही समासमें पदकी आवृत्ति होनेपर तीसरा भेद होता है, दो अलग-अलग समासोंमें एक ही पदकी आवृत्ति होनेपर लाटानुप्रासका चौथा भेद होता है और आवृत्त होनेवाला पद यदि एक ओर समासमें और दूसरी ओर असमासमें हो तो वह लाटानुप्रासका पाँचवाँ भेद होगा। ग्रन्थकार लाटानुप्रासके इन पाँचों भेदोंको उदाहरण सहित आगे दिखलाते हैं। [सूत्र १११]-[आवृत्त पदमें ] तात्पर्यमात्रसे भेद होनेपर शब्दानुप्रास [अर्थात् पदानुप्रास वर्णानुप्रास या वर्णसाम्य नहीं] लाटानुप्रास [कहलाता ] है ।।८१।। शब्दगत अनुप्रास [लाटानुप्रास कहलाता है] शब्द और अर्थ [दोनों] का अभेद होनेपर भी अन्वय [उद्देश्य-विधेयभाव या तात्पर्य ] मात्रके भेदसे और लाटदेशके [विदग्ध ] लोगोंका प्रिय होनेसे [यह ] लाटानुप्रारा कहलाता है। दूसरे लोग इसको पदानुप्रास कहते हैं। [क्योंकि-] [सूत्र ११२]-वह [लाटानुप्रास वर्णोंका नहीं] पदोंका [साम्य] होता है। वह [अर्थात् लाटानुप्रास ] पदोंका होता है, उदाहरण [जैसे]- जिसके समीपमें [ उसकी] प्रियतमा नहीं है, उसके लिए [तुहिनदोधिनि अर्थात्] चन्द्रमा दावानल [के समान सन्तापदायक ] है और जिसके समीपमें [ उसकी ] प्रियतमा विद्यमान है, उसके लिए दावानल भी चन्द्रमा [के समान शीतल और आनन्ददायक हो जाता] है॥३५६॥ यहाँ अनेक पदोंकी आ्रवृत्ति है। पूर्वार्द्धमें 'तुहिनदीधिति' में 'दवदहनत्व' विधेय है और उत्त- रार्द्धमें 'दवदहन' में 'तुहिनदीधितित्व' विधेय है। इसलिए उद्देश्य-विधेयभावमें भेद होनेसे तात्पर्यमात्रका भेद हो जाता है। अतः यह लाटानुप्रासका उदाहरण है। [सूत्र ११३]-वह [ लाटानुप्रास बहुत पदोंकी आवृत्ति होनेपर ही हो ऐसा नहीं है। अपितु ] एक पदका भी होता है। 'अपि' शब्दसे [ पूर्वसूत्रमें आये हुए] 'सः' का संग्रह होता है। उदाहरण- जैसे --
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४०८ काव्यप्रकाश: का० ८२, सू० ११४
वदनं वरवणिन्यास्तस्याः सत्यं सुधाकर: सुधाकर: क्व नु पुनः कलङ्कविकलो भवेत् ।३६०।। [सू० ११४ ] -- वृत्तावन्यत्र तत्र वा। नाम्न: स वृत्त्यवृत्त्योश्च एकस्मिन् समासे, भिन्ने वा समासे, समासासमासयोर्वा नाम्नः प्रातिपदिकस्य न तु पदस्य सारूप्यम् । उदाहरणम् -- सितकरकररुचिरविभा विभाकराकार! धरणिधर ! की्तिः । पौरुषकमला कमला साऽपि तवैवास्ति नान्यस्य ।।३६१।।
उस वरर्वानीका [वरर्वाणनीका लक्षण पृ० ३८७ पर किया जा चुका है] मुख सचमुच चन्द्रमा है। अथवा [वह चन्द्रमा नहीं, अपितु चन्द्रमासे भी अधिक सुन्दर है क्योंकि सुधारकर ] चन्द्रमा कलङ्डसे रहित कहाँ हो सकता है ? ॥३६०।। यहाँ केवल एक 'सुधाकर' पदकी आवृत्ति होनेपर भी लाटानुप्रास है। प्रथम सुधाकर पद विधेय है और द्वितीय सुधाकर पद उद्देश्य है, इसलिए तात्पर्य-भेद है। [सूत्र ११४ ] -- अन्य समासमें [अन्यत्न वृत्तौ] अथवा उसी समासमें, अथवा [एकके ] समासमें और [दूसरेके ] असमासमें 'नाम' अर्थात् प्रातिपदिकके [आवृत्त ] होनेपर भी वह [ लाटानुप्रास ] होता है। इसके पूर्व दो सूत्रोंमें अनेक पदोंकी आवृत्ति होनेपर और एक पदकी आवृत्ति होनेपर दो प्रकारका लाटानुप्रास दिखलाया था। सुबन्त या तिङन्तकी पदसंज्ञा होनेसे सुबादि विभक्तियोंसे युक्त प्रातिपदिक पद कहलाता है। केवल पदोंकी आवृत्ति होनेपर ही नहीं अपितु प्रातिपदिककी आवृत्ति होनेपर भी लाटानुप्रास हो सकता है। यह दिखलानेके लिए यह सूत्र लिखा है। साधारणतः केवल प्रातिपदिकका प्रयोग नहीं होता है। इसलिए प्रातिपदिककी आवृत्तिमें लाटानुप्रास कैसे हो सकता है ? इस शङ्काके समाधानके लिए कहा है कि इस प्रकारकी स्थिति समासमें हो सकती है। समासमें विभक्तिका लोप हो जानेसे प्रातिपदिकमात्रकी आवृत्ति हो सकती है। यह भी तीन रूपमें हो सकती है। एक तो उसी समस्तपदमें आवृत्ति हो ; दूसरी स्थितिमें एक पद एक समासमें आया हो और आवृत्त प्रातिपदिक दूसरे समासमें आया हो और तीसरी दशामें एक प्रातिपदिक समासगत हो और दूसरा प्रातिपदिक समास- गत न हो। इन्हीं तीनों प्रकारोंको वृत्तिग्रन्थमें स्पष्ट करते हैं- १. एक समासमें, अथवा २. भिन्न समासोंमें, अथवा ३. समास और असमासमें 'नाम' अर्थात् प्रातिपदिककी, [सुबन्त ] पदकी ही नहीं, आवृत्ति [होनेपर भी 'लाटानुप्रास' होता है ] जैसे -- इस उदाहरणका अर्थ सप्तम उल्लासमें उदाहरण संख्या ३१५ पर दिया जा चुका है। वहीं देखें ॥३६१। यहाँ 'कर' इस प्रातिपदिककी १. एक ही समासमें, 'कर-कर' रूपमें, २. 'विभा' इस प्रातिपदिक- की 'विभा-विभा' रूपमें दो भिन्न समासोंमें और ३. 'कमला' इस प्रातिपदिककी पहिली बार समास तथा दूसरी बार असमास अर्थात् स्वतन्त्रपदके रूपमें आवृत्ति हुई है। अतः यही श्लोक तीनों भेदोंका उदाहरण है।
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का० ८२-८३, सू० ११५-११७] नवम उल्लास: ४०६ [सू० ११५] तदेवं पञ्चधा मतः ॥८२।। [सू० ११६] अर्थे सत्यर्थभिन्नानां वर्णानां सा पुनः श्रुतिः । यमकम् समरसमरसोऽयम्' इत्यादावेकेषामर्थवत्त्वेऽन्येषामनर्थकत्वे भिन्नार्थानामिति न युज्यते वक्तुम्, इति 'अर्थे सति' इत्युक्तम्। सेति 'सरो रस' इत्यादिवैलक्षण्ये न, तेनैव कमेण स्थिता। [सू० ११७ ] पादतद्गागवृत्ति तद्यात्यनेकताम् ।।८३।। [सूत्र ११५]-इस प्रकार [लाटानुप्रास ] पाँच प्रकारका माना जाता है।।८२।। यहाँतक वकोक्ति तथा अनुप्रास इन दो शब्दालङ्कारोंका निरूपण किया गया। अब आगे तीसरे शब्दालड्कार यमकका निरूपण करते हैं। ३. यमक लाटानुप्रासमें पदोंकी आवृत्ति होती है और उन आवृत्त पदोंमें पद या प्रातिपदिकका अर्थभेद नहीं, केवल तात्पर्यमात्रमें भेद होता है। यमकमें वर्णोंकी आवृत्ति होती है। वे आवृत्त वर्ण यदि सार्थक हों तो उनके अर्थका भेद होना आवश्यक है। अन्यथा कहीं एक सार्थक दूसरा अनर्थक भी हो सकता है। परन्तु जहाँ दोनों भाग सार्थक हों वहाँ उनका भिन्नार्थकत्व अनिवार्य है। यही लाटानुप्राससे यमकका भेद है। इसी बातको यमकके लक्षणमें दिखलाते हैं- [सूत्र ११६ ]-अर्थ होनेपर [नियमेन ] भिन्नार्थक वर्णोंकी उसी कमसे [सा] पुनः श्रवण [पुनरावृत्ति ] यमक [नामक शब्दालङ्गार कहलाता ] है। यहाँ-लक्षणमें 'अरथे सति अर्थभिन्नानां' यह कहा गया है। केवल 'भिन्नार्थानां' यह नहीं कहा गया है। इसका कारण यह है कि यदि 'भिन्नार्थानां' यह कहा जाता, तो आवृत्त पदका दोनों स्थलोंपर सार्थक होना आवश्यक हो जाता, क्योंकि दोनोंके सार्थक होनेपर ही एकार्थता या भिन्नार्थकता हो सकती है। यमकस्थलमें यह आवश्यक नहीं कि आवृत्त वर्ण दोनों स्थलोंपर सार्थक ही हों। इसलिए लक्षणमें केवल 'भिन्नार्थानां' न लिखकर 'अरथे सति अरथभिन्नानां' यह रखा गया है। यही बात वृत्तिभागमें स्पष्ट करते हैं- यह [राजा ] समरसमरस [युद्धमें एकरस ] है, इत्यादिमें पहिले बारके [ समर इन वर्णोंके ] सार्थक और दूसरे बारके [सम-रसको मिलाकर बने समरके ] अनर्थक होनेसे 'भिन्नार्थानां' यह नहीं कहा जा सकता है, इसलिए [थमकके लक्षणमें] 'अर्थे सति' यह कहा गया है। [सा अर्थात् ] उसी रूपमें [ उसी कमसे आवृत्ति ] इससे 'सरो रसः' इस [भिन्न कमसे की गयी आवृत्तिमें यमक नहीं होता है। इसलिए इस ]से भिन्नरूपसे नहीं, अर्थात् उसी कमसे स्थित [वर्णोंकी आवृत्ति यमकमें होनी चाहिये]। [सूत्र ११७ ]-पद और उसके एकदेश [भाग] आदिमें रहनेसे वह [ यमक ] अनेक प्रकारका हो जाता है [ अर्थात् यमकके अनेक भेद बन जाते हैं] ॥८ ३। पादका अर्थ श्लोकका चतुर्थ भाग या चरण होता है। उनकी आवृत्तिके नौ भेद तथा श्लोकार्धकी आवृत्ति एवं सम्पूर्ण श्लोककी आर्वृत्ति ये दो भेद मिलाकर पादावृत्तिरूप यमकके ११ भेद हो जाते हैं। 'यमक' के इन ग्यारह भेदोंको निम्नलिखितप्रकार प्रदर्शित करते हैं।
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४१० काव्यप्रकाश: [का० ८३ सू० ११७
प्रथमो द्वितीयादौ, द्वितीयस्तृतीयादौ, तृतीयश्चतुर्थे, प्रथमस्त्रिष्वपीति सप्त । प्रथमो द्वितीये तृतीयश्चतुर्थे प्रथमश्चतुर्थे द्वितीयस्तृतीये इति द्वे। तदेवं पादजं नवभेदम्। अर्धावृत्ति: श्लोकावृत्तिश्चेति द्वे।
प्रथम पाद द्वितीय आदि अर्थात् द्वितीय, तृतीय या चतुर्थ चरणमें आवृत्त हो सकता है। इस प्रकार तीन भेद हो जाते हैं। प्रथम पाद द्वितीयपादके स्थानपर आवृत्त होनेपर (१) 'मुख' नामक यमक होता है। इसीके तृतीय पादके स्थानपर आवृत्त होनेपर (२) 'सन्दंश' नामक यमक होता है और उसी प्रथम पादके चतुर्थ पादके स्थानपर आवृत्त होनेपर (३) 'आवृत्ति' नामक यमक भेद होता है। द्वितीय पाद तृतीय आर्परादि, अरथात् तृतीय तथा चतुर्थ पादके स्थानमें आवृत्त हो सकता है। उससे दो भेद बनते हैं। द्वितीय पाद यदि तृतीयके स्थानमें आ्ररवृत्त होता है, तो (४) 'गर्भ' नामक यमक होता है और वही द्वितीय पाद जब चतुर्थ पादके स्थानपर आवृत्त होता है तब (५) 'सन्दष्ट' नामक यमक होता है। तृतीय पाद चतुर्थ पादके स्थानमें आररवृत्त होनेपर (६) 'पुच्छ' नामक यमकका छठा भेद बनता है। प्रथम पाद द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ तीनों स्थानोंमें आवृत्त होता है, तो (७) 'पंक्ति' नामक सप्तम यमक-भेद बनता है। प्रथम पाद द्वितीयके स्थानमें और तृतीय पाद चतुर्थके स्थानमें आवृत्त होनेपर (८) 'युग्मक' नामक अष्टम यमक-भेद बनता है। प्रथम पाद चतुर्थ स्थानमें और द्वितीय पाद तृतीय स्थानमें आर्वृत्त होनेपर (६) 'परिवृत्ति' नामक नवम यमक-भेद बनता है। इन दो-दो पादोंको आवृत्ति मिलाकर एक-एक भेद बनता है। इस प्रकार पादको आवृत्तिसे होनेवाले नौ भेद होते हैं। और श्लोककार्धकी आवृत्ति तथा सम्पूर्ण श्लोककी आवृत्ति ये दो भेद और मिलाकर पादगत या पादावृत्तिरूप यमकके ११ भेद हो जाते हैं। इन्हींको ग्रन्थकार आगे दिखलाते हैं- प्रथम पाद द्वितीयादि [अर्थात् द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ पादों]के स्थानपर, द्वितीय [पाद] तृती- यादि [अर्थात् तृतीय तथा चतुर्थ पादों ]के स्थानपर, तृतीय [पाद ] चतुर्थ स्थानपर और प्रथम पाद तीनों पादोंके स्थानपर [आवृत्त हो सकता है ] इस प्रकार सात भेद बनते हैं। प्रथम [पाद ] द्वितीयके स्थानपर तथा तृतीय [पाद ] चतुर्थके स्थानपर या प्रथम [पाद ] चतुर्थके स्थानपर और द्वितीय [पाद] तृतीयके स्थानपर [आवृत्त ] होनेपर इस प्रकार दो [भेद बनते हैं]। इस प्रकार पाद [की आवृत्ति ]से उत्पन्न नौ भेद होते हैं। अर्धावृत्ति तथा [सम्पूर्ण ] श्लोककी आवृत्ति ये दो भेद [कुल मिलाकर ११ भेद ] हो जाते हैं। पादकी आवृत्तिके समान पादके भागोंकी आवृत्ति होनेपर भी यमक होता है। पादावृत्तिगत यमकके ११ भेद बतलाये हैं। इनमेंसे श्लोकावृत्तिरूप ग्यारहवें भेदको पादभागावृत्तिमें नहीं माना जाता है। इसलिए उसमें ११ के स्थानपर १० भेद ही रह जाते हैं। अब यदि पादको दो भागोंमें बाँटा जाय, तो 'पादभागावृत्ति'के २० भेद बन जायेँगे। यदि पादको तीन भागोंमें बाँटा जाय तो पादभागावृत्तिके ३० भेद बन जायँगे और उसको चार भागोंमें विभक्त किया जाय तो पादभागावृत्तिरूप यमकके ४० भेद हो जायँगे। इसी बातको आगे कहते हैं।
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का० ८३, सू० ११७] नवम उल्लास: ४११
द्विधा विभक्ते पादे प्रथमादिपादादिभाग: पूर्ववद् द्वितीयादिपादादिभागेषु, अन्त- भागोऽन्तभागेष्विति विशतिर्भेदाः। श्लोकान्तरे हि नासौ भागावृत्तिः। त्रिखण्डे त्रिशत्। चतुःखण्डे चत्वारिशत्।
प्रथमपादादिगतान्त्यार्धादिभागो द्वितीयपादादिगते आद्यार्धादिभागे यम्यते इत्या- द्यन्वर्थतानुसरणेनानेकभेदम् । अन्तादिकम्, आद्यन्तिकम्, तत्समुच्चयः, मध्यादिकम्, आदिमध्यम्, अन्तमध्यम्, मध्यान्तिकम्, तेषां समुच्चयः । तथा तस्मिन्नेव पादे आद्यादि- भागानाँ मध्यादिभागेषु, अनियते च स्थाने आवृत्तिरिति प्रभूततमभेदम् । तदेतत्काव्या- न्तर्गड्भूतम् इति नास्य भेदलक्षणं कृतम्। दिङमात्रमुदाह्ियते --
पादके दो भाग करनेपर प्रथम आदि पादभाग पहिलेके समान द्वितीय पादादि भागों [ के स्थान ]में और [प्रथम आदि पादोंके उन-दो-दो विभागोंमेंसे ] अन्तिम भाग, अन्तिम भागों [ के स्थान ] में [आवृत्त हो सकते हैं]। इस प्रकार [पदके दो भागोंमें विभक्त करनेपर पादभागात्मक यमकके ] बीस भेद होते हैं। [क्योंकि श्लोकावृत्तिरूप ] दूसरे श्लोकमें भागावृत्ति [रूप भेद ] नहीं होता है। [इसलिए पादावृत्तिके ११ भेदोंके स्थानपर पादभागावृत्तिमें १० ही भेद रह जाते हैं। अतः पादके दो भागोंमें विभक्त होनेपर पादभागावृत्तिरूप यमकके बीस ही भेद होते हैं। इसी प्रकार पादके ] तीन खण्ड करनेपर तीस और चार खण्ड करनेपर चालीस भेद [पादभागावृत्तिरूप यमकके होते हैं ]। इस प्रकार पादावृत्ति या पादभागावत्तिके जो भेद यहाँतक दिखलाये गये हैं, उनमें प्रथम पादके आदि भागकी द्वितीय पादके आदि भागके स्थानपर और अन्तिम भागको अन्तिम भागके स्थानपर आरवृत्ति दिखलायी है। इसलिए ये सजातीय भागावृत्तिके उदाहरण हुए। आगे विजातीय भागावृत्तिको दिखलाते हैं।
प्रथम पादादिगत अन्तिम अर्धादि भाग द्वितीय पादादिगत आद्यार्धभाग [के स्थान]में आवृत्त [नियमित ] हो सकता है, इसलिए [ उस दशामें ] सार्थकताके अनुसार अन्तादि [नामक यमक या प्रथम पादका आदि अर्ध भाग यदि द्वितीयपादके अन्तिम अर्ध-भागके स्थानपर आवृत्त होता है तो] आद्यान्तिक और [प्रथम पादके आदि और अन्तार्ध भाग यदि द्वितीय पादके अन्त और आदि अर्ध भागके स्थानपर आवृत्त होते हैं तो ] उन दोनोंका समुच्चय आदि[ पादभागावृत्तिरूप यमककें ] अनेक भेद हो सकते हैं। और उसी पादमें [भी] प्रारम्भिकादि भाग मध्यादि भागोंके स्थानोंमें अथवा अनियत स्थानोंमें आवृत्त हो सकते हैं, इसलिए [ पादभागावृत्तिरूप यमकके ] प्रचुर भेद हो सकते हैं। किन्तु वे सब काव्यके रसा- स्वादमें बाधक हैं। [गडु ग्रन्थि। जैसे गन्नेकी गाँठ आ जानेपर उसके रसास्वादमें बाधा पड़ती है, इसी प्रकार यमकके पादभागावृत्तिरूप ये सब काव्यके अन्तर्गत गडु या ग्रन्थिके समान रसप्रतीतिके व्यव- धायक हैं] इसलिए उन भेदोंके लक्षण नहीं किये हैं। दिङमात्र [कुछ थोड़े-से ] उदाहरण देते हैं-
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४१२ काव्यप्रकाश: [ का० ८३, सू० ११७
(१) सन्नारीभरणोमायमाराध्य विधुशेखरम् । सन्नारीभरणोऽमायस्ततस्त्वं पृथिवीं जय ।।३६२।। (२) विनायमेनो नयताऽसुखादिना विना यमेनोनयता सुखादिना। महाजनोऽदीयत मानसादरं महाजनोदी यतमानसादरम् ॥२६२क॥।
(१) सन्दंशयमक सबसे पहिले पादावृत्तिमें प्रथमपादके स्थानपर आरवृत्ति होनेपर 'सन्दंश' नामक यमकका उदाहरण देते हैं। यह श्लोक रुद्रटके काव्यालङ्कारमें आया है। इसमें 'सन्नारीभरणोमाय' यह प्रथम चरण तृतीयपादके स्थानपर आवृत्त हुआ है। श्लोकका अरथ इस प्रकार है- सती नारियोंका भरण करनेवाली [अथवा आभरणरूपिणी ] जो उमा अर्थात् पार्वती उसको प्राप्त करनेवाले [ उमां याति अयते वा इति उमायः ] विधुशेखर शिवकी आराधना करके [सन्नाः विना- शिता: अरीणां इभा गजा: यत्र तादृशः रणो युद्धं यस्य सः सन्नारीभरण: ] शत्रुओंके हाथियोंका विनाश करनेवाले युद्धके प्रवर्त्तक होकर उस [शिवकी आराधना ] से [अनमायः] छल-कपटरहित आप पृथिवीका विजय करें ।।६६२।।
(२) युग्मयमक दो पादोंकी आवृत्तिमें प्रथमपादके द्वितीय पादके स्थानपर तथा तृतीयपादके चतुर्थ पादके स्थानमें आवृत्तिरूप 'युग्म' नामक यमकका दूसरा उदाहरण देते हैं। श्लोकका अर्थ निम्नलिखितप्रकार है- [अयं] यह [विश्रवासौ ना इति बिना अर्थात् पक्षीरूप पुरुष अर्थात् ] हंस नामक जीवात्मा [किस प्रकारका आत्मा उसके विशेषण देते हैं] 'महाजनः' अर्थात् महात्मा और '[ 'महाजनोदी' (१) महान् उत्सवान् अजन्ति गच्छन्तीति महाजाः सज्जना: तान् नोदयति प्रेरयतीति महाजनोदी, अथवा (२) महान् उत्सवान् अजन्ति क्षिपन्ति विनाशयन्तीति महाजाः 'दुर्जनाः'। तान् नोदितुं दूरीकर्तुं शीलमस्य इति महाजनोदी ] (१) उत्तम अवसरोंपर शुभ कर्मोंमें सम्मिलित होनेवाले धर्मात्मा लोगोंको प्रेरणा देनेवाले, अथवा (२) शुभ कर्मोंमें विध्न डालनेवाले दुष्टोंका विनाश करनेवाले [ हंस नामक जीवात्मा ] को [एनो बिना ] बिना अपराधके [ नयता ] अपने स्थान यमलोकको ले जानेवाले [असुखादिना] प्राणोंका भक्षण [नाश ] करनेवाले और [सुखादिना ऊनयता ] सुखादिसे रहित करनेवाले यभराजने मानस [अर्थात् चित्तरूप या हृदयरूप मानसरोवर ] से प्राणरक्षणके लिए [ यतमान ] यत्न करनेवालोंको [साद अर्थात् अवसाद दुःखको राति ददाति तत् यथा स्यात्तथा ] दुःख देकर [अरम् अर्थात् शीघ्रम् अदीयत अखण्डचत ] अलग कर दिया [ यमराजने जीवात्माको शरीर या हृदयसे पृथक् कर दिया। 'अङगुष्ठमात्रं पुरुषं निश्रकर्ष यमो बलात्' ] ॥।३६२।। (३ ) महायमक श्लोकाभ्यासरूप 'महायमक' का उदाहरण देते हैं। ३६४ वाँ श्लोक, ३६३ वें श्लोक के रूपमें ज्योंका- त्यों आवृत्त हुआ है। इसलिए यह श्लोकावृत्तिरूप 'महायमक'का उदाहरण है। ये दोनों श्लोक इसी रूपमें रुद्रटके काव्यालङ्कारमें दिये हैं। इन दोनों श्लोकोंका अर्थ निम्नलिखित प्रकार है-
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का० ८३, सू० ११७ ] नवम उल्लास: ४१३
(३) स त्वारम्भरतोऽवश्यमबलं विततारवम् । सर्वदा रणमानैषीदवानलसमस्थितः ।३६३।। सत्त्वारम्भरतोऽवश्यमवलम्बिततारवम्। सर्वदारणमानैषी दवानलसमस्थितः ।३६४।। (४) अनन्तमहिमव्याप्तविश्वां वेधा न वेद याम् । या च मातेव भजते प्रणते मानवे दयाम् ॥३६५॥
[ए विष्णौ स्थितः अस्थितः ] विष्णुभक्त [सः ] वह [प्रकरणगत ] राजा [अबलं ] शक्तिहीन और [विततारवं ] हा-हाकार करनेवाले [अरीणां समूहम् आरं] शत्रुसमूहको [अलसम् अवान् ] आलस्यपूर्वक धीरे-धीरे न चलता हुआ अर्थात् वेगसे गति करता हुआ सर्वदा [भरतः बलात् रणम् अवश्यम् आनैषीत् ] युद्धक्षेत्रोंमें हठात् अवश्य खींच ले जाता था-शत्रुओंको युद्धके लिए बाधित कर देता था॥३६३॥ [दूसरे श्लोकमें उसी बातका वर्णन है] सात्त्विक व्यापारोंमें रत [१. सत्त्वारम्भरतः ] सब [शत्रुओं] के कारण [विदारण-विनाश ]में जो मान-सम्मान उसको चाहनेवाला [२. सर्वदारण + मान +ऐषी ] और [शत्रुओंके लिए ] ३. दावानलके समान स्थित [सः ] वह राजा [४ अवलम्बित- तारवरम् अर्थात् ] तरुओंका सहारा लेनेवाले वनोंमें भटकनेवाले अथवा तारवं -- तरुत्वचा अर्थात् वल्कल वस्त्रोंको धारण करनेवाले-अथवा तरुओंके समान नम्रभावको धारण करनेवाले [आरं] अरिसमूहको युद्धमें जाने, [युद्ध करने अथवा अपने सामने सिर झुकाने ] के लिए [ अ-वश्यं ] विवश कर देता था ।। ॥३६४।। इन दोनों श्लोकोंमें राजाका वर्णन है, उन दोनोंका स्वरूप अर्थात् शब्दविन्यास एक-सा ही है, परन्तु अर्थका भेद है। अतः श्लोकावृत्तिरूप 'महायमक' का उदाहरण है। (४) पादभागावृत्ति 'सन्दष्टक' यमक यहाँतक पादावृत्ति और श्लोकावृत्तिके उदाहरण दिये थे। अब आगे पादभागकी आवृनिके उदाहरण देते हैं। उनमें पहिले पादके दो खण्ड करके द्वितीय पादके अन्तिम अरधभागकी चतुर्थ पादके अन्तिम अर्धभागके स्थानपर आवृत्ति 'सन्दष्टक' नामक यमकका उदाहरण देते हैं। यह श्लोक आनन्द- वर्धनाचार्यप्रणीत 'देवीशतक' का प्रथम पद्य है। श्लोकका अर्थ निम्नलिखितप्रकार है- अपनी अनन्त महिमासे समस्त विश्वको व्याप्त करनेवाली जिस [देवी-दुर्मा ] को ब्रह्मा भी [पूर्णतः ] नहीं जानते हैं और जो [ प्रणते मानवे ] भक्तजनोंपर माताके समान दया करती है[ उस माताकी चरण-रज हमारी इष्टसिद्धि करानेवाली हो, यह वहींके पञ्चम श्लोकके 'तस्याः सिद्धचै धियां मातुः कल्पन्तां पादरेणवः' इस अंशके साथ अन्वय होता है॥३६५॥ (५) आद्यान्तिक यमक अगला उदाहरण एक ही पादकी भागावृत्तिमें आदिभागके अन्तभागके स्थानपर आवृत्तिरूप 'आद्यान्तिक' नामक यमकका उदाहरण है। यह श्लोक भी आनन्दवर्धनप्रणीत उक्त 'देवीशतक'से ही लिया गया है। यह 'देवीशतक' का ४६वाँ श्लोक है। इसका अर्थ निम्नलिखित प्रकार है-
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४१४ काव्यप्रकाश: [ का० ८३, सू० ११७
(५) यदानतोऽयदानतो नयात्ययं न यात्ययम् । शिवेहितां शिवे हितां स्मरामितां स्मरामि ताम् ।३६६।। (६) सरस्वति ! प्रसादं मे स्थिति चित्तसरस्वति ! सर स्वति ! कुरु क्षेत्रकुरुक्षेत्रसरस्वति ! ॥३६७॥ (७) ससार साकं दर्पेण कन्दर्पेण ससारसा। शरन्नवाना बिभ्राणा नाविभ्राणा शरन्नवा ।३६८।
['यदानतः' ] जिस [पार्वती]का [आनतः अयं जनः ] यह भक्तजन, सदाचारमार्गका उल्लङ्गन [नयस्य नीतिमार्गस्य अत्ययम् उल्लङ्गनं न याति ] नहीं करता है, [शिवके प्रति] अमित स्नेहसे पूर्ण [स्मरेण कामेन स्नेहेन अमितां ], कल्याण-कारिणी [शिवे कल्याणे हितां अनुकूलांस्य ] और [अयलाम् शुभावहविधेर्दानतः 'अयदानतः' अर्थात् ] विवाहविधिके द्वारा [शिवेन ईहितां ] शिवकी प्रियतमा बनायी गयी हुई उस [पार्वती] का मैं स्मरण करता हूँ [ पार्वतीका ध्यान करता हूँ] ॥३६६॥ (६) केवल उत्तरार्धमें समुच्चय अगला उदाहरण भी आनन्दवर्धनाचार्यके 'देवीशतक'से लिया गया है। यह 'देवीशतक'का ५०वाँ श्लोक है। इसके पूर्वार्द्धमें प्रथम पादका आदि-भाग 'सरस्वति' शब्द द्वितीय पादके अन्तमें आ्रवृत्त हुआ है। इसलिए यह 'आद्यान्तिक' यमकका उदाहरण है। श्लोकके उत्तरार्द्धमें तृतीय चरणका आदिभाग 'सरस्वति' चतुर्थचरणके अन्तमें आवृत्त हुआ है और तृतीय चरणका अन्तिम भाग 'कुरुक्षेत्र' चतुर्थ चरणके आरम्भमें आवृत्त हुआ है। इसलिए इसमें आद्यान्तिक-यमक तथा अन्तादिकयमक दोनोंका सन्निवेश है। अतः यह केवल उत्तरार्ध भागमें आद्यान्तिक अन्तादिक दोनोंके समुच्चयका उदाहरण है। श्लोकका अर्थ निम्नलिखित प्रकार है- [हे क्षेत्र-कुरुक्षेत्र-सरस्वति ] हे शरीररूप [कुरुक्षेत्र ] पुण्यभूमिकी सरस्वति ! क्षेत्रं शरीरं कुरुक्षेत्रं पुण्यक्षेत्रविशेषस्तत्र सरस्वति सरस्वत्याख्यनदीरूपे हे सरस्वति] कृपा करो-प्रसन्न होओ [प्रसादं सर ] और मेरे चित्तरूप [सरस्वान्] सागरमें [ 'चित्तसरस्वति' यह सरस्वान् शब्दका सप्तमीके एकवचनका रूप है] अत्यन्त भले प्रकारसे [सुष्ठु अतिशयेन स्वति स्थिति कुरु] स्थित होओ ॥३६७॥ (७) पूर्वार्ध-उत्तरार्द्ध, दोनोंमें समुच्चय अगला उदाहरण रुद्रटके 'काव्यालड्कार' से लिया गया है। यह भी पादभागावृत्तिका उदाहरण है। इसमें पूर्वार्द्ध तथा उत्तरार्द्ध, दोनोंमें आद्यन्तिक और अन्तादिक यमकका समुच्चय है। पूर्वार्धमें प्रथम पादके आद्यार्ध भाग 'ससारसा' की द्वितीय पादके अन्तमें आवृत्ति होनेसे 'आद्यान्तिक' यमक' है। और प्रथम पादके अन्तिम अर्धभाग 'कन्दर्पेण' को द्वितीय पादके आदिमें आवृत्ति होनेसे 'अन्तादिक' यमक है। इसी प्रकार उत्तरार्द्धमें तृतीय चरणके आद्यार्ध भाग 'शरत्नवा' की चतुर्थ पादके अन्तमें आरवृत्ति होनेसे 'अन्तादिक' यमक है। इस प्रकार श्लोकके पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध, दोनोंमें आद्यान्तिक यमक तथा अन्ता- दिक यमकका समुच्चय है। श्लोकका अर्थ निम्नलिखित प्रकार है- [वीनां पक्षिणां भ्राणं शब्दः यस्यां सा 'विभ्राणा' पक्षिशब्दयुक्ता, न विभ्राणा अविभ्राणा पक्षि- शब्दरहिता, न अविभ्राणा नाविभ्राणा पक्षिकोलाहलयुक्ता ] पक्षियोंके कोलाहलसे युक्त [नवम् अनं
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का० ८४, सू० ११८] नवम उल्लास: ४१५ मधुपराजिपराजितमानिनीजनमनःसुमनःसुरभि श्रियम् । अभृत वारितवारिजविप्लवं स्फुटितता म्रतता म्रवणं जगत् ।३६९॥ एवं वैचित्र्यसहस्त्रैः स्थितमन्यदुन्नेयम् [सू० ११८] दाच्यभेदेन भिन्ना यद् युगपद्भाषणस्पृशः । श्लिष्यन्ति शब्दा: श्लेषोऽसावक्षरादिभिरष्टधा ।।८४।।
शकटं शकटमार्गों वा यस्यां सा नवाना ] शकटादिके [यातायातके लिए ] नवीन [ वर्षाके बाद पुनः व्यवहारयोग्य हुए ] मार्गोंसे युक्त, काशपुष्पोंको धारण करती हुई [ शरं काशं बिभ्राणा ], सारसों अथवा कमलोंसे युक्त, ['सारस: पक्षिभेदेन्द्वो: क्लीवन्तु सरसीरुहे ] नवीन शरदृतु [कं ब्रह्माणमपि दर्पयति तत्रापि कामवेगमुत्पादयति इति कन्दर्प: कामः 'कन्दर्पेण साकं ससार'] कामदेवके साथ सगर्व अवतीर्ण हुई ॥३६८॥ (८) अनियतपादभागावृत्तियमक अगला श्लोक रत्नाकर-कवि-विरचित 'हरविजय' नामक काव्यके तृतीय सर्गमें किये वसन्त- वर्णनके प्रसङ्गसे लिया गया है। यहाँ अ्र्प्रनियत स्थानमें होनेवाली पादभागावृत्तिसे जन्य यमक पाया जाता है। प्रदीपकारने इसे चार खण्डवाले पादके द्वितीय भागके स्थानपर आरवृत्तिका उदाहरण माना है। अ्नियत-स्थानावृत्ति यमकका नहीं, परन्तु उनका यह कथन उचित नहीं है। क्योंकि यह श्लोक बारह अक्षरोंके पादवाले द्रुतविलम्बित छन्दमें बना है। इसके पादमें यदि चार भाग किये जायँ तो प्रत्येक भाग तीन-तीन वर्णोंका होता है। श्लोकमें यद्यपि पराजि-पराजि, मनःसु-मनःसु, आदि तीन-तीन वर्णोंकी आवृत्ति है, परन्तु वह प्रथम और चतुर्थ भागकी द्वितीय और चतुर्थ भागके स्थानपर आवृत्ति नहीं है। क्योंकि प्रथम चतुर्थ भाग 'मधुप' होता है 'पराजि' नहीं। इसलिए प्रदीपकारका कथन ठीक नहीं है। इसे अनियतस्थानावृत्ति यमकका उदाहरण ही मानना चाहिये। श्लोकका अर्थ निम्नलिखित प्रकार है- भ्रमरपंक्ियों द्वारा मानिनी स्त्रियोंके धैर्यको च्युत करनेवाले पुष्पोंकी सुगन्धसे युक्त, [हिमपातके समाप्त हो जानेके कारण ] कमलोंके विनाशसे रहित और खिले हुए लाललाल [पत्तोंवाले ] विस्तीर्ण आमके वनोंसे युक्त जगत्ने [ वसन्तकालमें अभिनव मनोहारिणी ] सुन्दरताको धारण किया ॥३६६॥ इस प्रकारसे सहस्रों प्रकारके वैचित्यसे युक्त [यमकके ] अन्य उदाहरण स्वयं समझ लेने चाहिये। ४. श्लेष इस प्रकार यमकका निरूपण करनेके बाद श्लेषरूप अलङ्गारका निरूपण प्रारम्भ करते हैं। [सूत्र ११८ ]-अर्थका भेद होनेसे ['प्रत्यर्थ शब्दाः भिद्यन्ते' इस सिद्धान्तके अनुसार अथवा 'सकृत्प्रयुक्तः शब्दः सकृदेव अर्थ गमयति' इस सिद्धान्तके अनुसार भिन्न-भिन्न अर्थोंके बोधक समानाकार] भिन्न-भिन्न शब्द [समानानुपूर्वीक-समानाकार होनेसे ] एक साथ उच्चारण [रूप दोष घटित सामग्री] के कारण [जतुकाष्ठन्यायसे ] जब [परस्पर ] मिल [कर एक हो] जाते हैं, तब वह श्लेष [रूप शब्दाल- द्वार] होता है। और वह अक्षर आदि [के श्लेष ] के भेदसे आठ प्रकारका होता है॥८४।।
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४१६ काव्यप्रकाश: [की० द४, सू० ११८
'अर्थभेदेन शब्दभेदः' इति दर्शने 'काव्यमार्गे स्वरो न गण्यते' इति च नये वाच्य- भेदेन भिन्ना अपि शब्दा यद् युगपदुच्चारणेन श्लिष्यन्ति भिन्नं स्वरूपमपह्रवते स श्लेषः । स च वर्ण-पद-लिङ्ग-भाषा-प्रकृति-प्रत्यय-विभक्ति-वचनानां भेदादष्टधा। करमेणोदाहरणम्- (१) अलङ्कारः शङ्काकरनकपालं परिजनो विशीर्णाङ्गो भृङ्गी वसु च वृष एको बहुवयाः । अवस्थेयं स्थाणोरपि भवति सर्वामरगुरो- विधौ वक्रे मूध्नि स्थितवति वयं के पुनरमी ॥३७०॥
इसका अभिप्राय यह है कि साधारणतः 'सकृत्प्रयुक्तः शब्दः सकृदेव अरथ गमयति' अर्थात् एक बार प्रयुक्त किया हुआ शब्द एक ही अर्थका बोधन कराता है, इसलिए किसी भी एक शब्दसे दो अरथोंका बोध नहीं हो सकता है। जहाँ दो अरथोंका बोध कराना अभीष्ट हो, वहाँ 'प्रत्यर्थ शब्दा भिद्यन्ते' इस सिद्धान्तके अर्प्रनुसार अ्प्रलग-अ्प्रलग शब्दोंका प्रयोग अरप्रनिवार्य होता है। परन्तु कहीं-कहीं दो भिन्न अरथोंका बोध करानेवाले शब्द समानाकार एक-से वर्णविन्यासवाले या समानानुपूर्वीक पड़ जाते हैं। ऐसी दशामें उन समानाकार दो पदोंको वक्ता दो बार उच्चारण नहीं करता है। इसलिए वहाँ एक ही शब्दका प्रयोग प्रतीत होता है, परन्तु अरथविचारकी दृष्टिसे वहाँ दो भिन्न ग्रथोंके बोधक दोनों शब्द जतुकाष्ठ- न्यायसे मिलकर या चिपककर एक हो गये हैं। जैसे लाख और लकड़ी दो अलग-अलग वस्तुएँ हैं, परन्तु कभी-कभी लाख लकड़ीके साथ चिपककर एक हो जाती है। इसी प्रकार दो समानाकार शब्द एक बार उच्चारण किये जानेके कारण जहाँ एक शब्दके रूपमें प्रतीत होते हैं, वहाँ शब्दोंका श्लेष होनेसे उसको श्लेष नामक शब्दालङ्कार कहा जाता है। इसी बातको कहते हैं- 'अर्थके भेदके कारण शब्दोंका भेद होता है' [अर्थात् 'प्रत्यर्थ शब्दा भिद्यन्ते', प्रत्येक अर्थके बोधके लिए अलग-अलग शब्दका प्रयोग किया जाता है] इस सिद्धान्तके अनुसार और 'काव्यमार्गमें स्वरका विचार नहीं किया जाता है' [अर्थात् उदात्त, अनुदात्त आदि स्वरोंके भेदके आधारपर शब्दोंका भेद मानने- का विचार केवल वैदिक प्रयोगोंमें ही किया जाता है, काव्यमें नहीं] इस नियमके अनुसार अर्थभेदके कारण भिन्न होनेपर भी [समानानुपूर्वीक, समानाकार ] शब्द जब एक साथ उच्चारणके कारण [परस्पर] जुड़ जाते हैं, अर्थात् अपने भिन्न-भिन्न स्वरूपको छोड़ देते हैं, तब वह श्लेष [नामक शब्दालद्वार ] कह- लाता है। और वह १. वर्णश्लेष, २. पदश्लेष, ३. लिङ्गश्लेष, ४. भाषाश्लेष, ५. प्रकृतिश्लेष, ६. प्रत्ययश्लेष, ८. विभक्तिश्लेष और ८. वचनश्लेषके भेदसे आठ प्रकारका होता है। क्रमशः उदाहरण [निम्नलिखितप्रकार हैं ]- (१) वर्णश्लेष [देखनेवालेके हृदयमें ] भयका सञ्चार करनेवाली मनुष्योंकी खोपड़ी [ की हड्डी ] उनका अलङ्गार है। गलित अङ्गोंवाला भृङ्गी [नामक शिवजीका एक विशेष गण ] उनका सेवक है और एक अत्यन्त बूढ़ा बेल उनकी सम्पत्ति है। समस्त देवताओंके मान्य गुरु शिवजीकी भी टेढ़े चन्द्रमा [या भाग्य]के मस्तकपर स्थित होनेपर जब यह दुरवस्था है, तब [क्षुद्र कीटसदृश अत्यन्त तुच्छ ] हमारी तो गिनती ही क्या है॥३७०॥
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का० ८४, सू० ११८ ] नवम उल्लास: ४१७
(२) पृथुकात्तसवरपत्रं भूषितनिशेषपरिजनं देव!। विलसत्करेणुगहनं सम्प्रति सममावयोः सदनम् ॥३७१॥
यह श्लोक वर्णश्लेषका उदाहरण है। इसमें 'विधौ' पदमें वर्णश्लेष है। 'विधि' और 'विधु' दो अलग-अलग शब्द हैं, विधिका अर्थ भाग्य और विधुका अर्थ चन्द्रमा है। इन दोनों शब्दोंका सप्तमीके एक वचनमें 'विधौ' यह समानाकार एक ही रूप बनता है। केवल इकार और उकार वर्णोंके भेदसे अर्थभेद होता है, इसलिए यह वर्णश्लेषका उदाहरण है। भाग्यके विपरीत होनेपर बड़ेसे बड़े व्यक्तिकी दुरवस्था हो जाती है, साधारण पुरुषोंकी बात ही क्या, इस वातका कवि शिवजीके उदाहरण द्वारा प्रति- पादन कर रहा है। शिवजीके मस्तकपर चन्द्रमाकी टेढ़ी कला स्थित है, इसलिए वक्-विधु अर्थात् वक्र- विधिके मस्तकपर स्थिर होनेके कारण उनकी यह दुरवस्था है। (२) पदश्लेष कोई याचक किसी राजाके सामने कह रहा है कि इस समय मेरा और आपका घर एकसमान अवस्थामें है। दोनोंके घरकी समता वह तीन श्लिष्ट पदों द्वारा दिखला रहा है। इसमें 'पृथुकार्त्तस्वर- पात्रं', 'भूषितनिःशेषपरिजनं' तथा 'विलसत्करेणुगहन' इन तीन पदोमें श्लेष है। इनमेंसे पहिला पद 'पृथुकार्त्तस्वरपात्रं' है। इसके दोनों पक्षोंमें भिन्न-भिन्न अर्थ इस प्रकार होते हैं। 'पृथुकानां बालानाम् आर्त्तस्वरस्य पात्रं' अर्थात् मेरा-याचकका-घर बालकोंके रोनेका स्थान है, मेरे घरमें भूखे बालक रो रहे हैं, और आपका-राजाका-घर 'पृथूनि महान्ति कार्त्तस्वरस्य सुवर्णस्य पात्राणि यस्मिस्तत् पृथुकार्त्तस्वरपात्रं' सोनेके बड़े-बड़े वरतनोंसे युक्त है। दूसरा पद 'भूषितनि:शेषपरिजन' है। इसका राजाके पक्षमें 'भूपित' अर्ात् अ्र्प्रलङकृत हैं सारे परिजन, सेवक आदि जिसमें यह अर्थ होता है, और याचकके पक्षमें 'भुवि पृथिव्याम् उपिताः सर्दे परिजना यस्मिन्' जिसमें परिवारके सारे लोग जमीनपर पड़े हुए हैं यह अ्र्थ होता है। इस में 'भूषित' इस एक पदको अथवा 'भूषितनिश्शेपपरिजन' इस समस्त पदको श्लिष्ट मम्बकर पदश्लेष कहा गया है। इसी प्रकार 'विलसत्करेणुगहनं' यह तीसरा श्लिप्ट पद है। सजाके पक्षमें 'विलसन्नीभिः करेणुभिर्गहनं व्याप्तं' अर्थात् झूमती हुई हथिनियोंसे युक्त यह त्र्पर्थ होता है और याचकके पक्षमें 'विले सीदन्ति इति विलसत्काः मूपका: तेषां रेणुः धूलि: तया गहनं अर्थात् चूहोंके खोदे हुए विलोंकी धूलसे भरा हुआ मेरा घर है यह अर्थ होता है। अतः यह पदश्लेषका उदाहरण है। श्लोकका अर्थ निम्नलिखित प्रकार है- हे राजन् ! इस समय हम दोनोंका घर १. 'पृथुकार्तस्वरपात्र' [अ-बच्चोंके रोनेका स्थान तथा, आ-बड़े-बड़े सोनेके पात्रोंसे युक्त ], २. 'भूषितनिःशेषपरिजन' [अ -- पृथिवीपर लोटते हुए परिजनोंवाला तथा आ -- अलङकृत परिजनोंवाला] और ३. 'विलसत्करेणुगहन' [अ-चूहोंकी मिट्टीसे भरा हुआ तथा आ-झूमती हुई हथिनियोंसे भरा हुआ] होनेसे एकसमान हो रहा है ॥३७१। (३) लिङ्गश्लेष तथा (८) वचनश्लेष अगला उदाहरण 'लिङ्गश्लेष का दिया गया है। इस श्लोकका मुख्य 'हरेः नेत्रे तनुर्वा युष्माक भवार्तिशमनं कुरुतां' विष्णुजीके नेत्र अथवा शरीर तुम्हारे संसारके दुःखोंका नाश करें यह चतुर्थ चरण है। शेष तीन चरणोंमें इन 'नेत्े' तथा 'तनुः'के विशेषण हैं। इनमेंसे 'नेते' यह नपुंसकलिङ्ग 'नेत्र' शब्दके प्रथमा विभक्तिके द्विवचनका रूप है और 'तनुः' यह स्त्रीलिङ्ग 'तनु' शब्दका प्रथमाविभक्तिका एक वचन है। ये दोनों ही वाक्यके 'कर्ता' पद है। शेष तीनों चरणोंमें जो विशेषण दिये गये हैं वे २७
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(३) भक्तिप्रह्वविलोकनप्रणयिनी नीलोत्पलस्पधिनी ध्यानालम्वनतां समाधिनिरतैर्नीतेहितप्राप्तये। लावण्यस्य महानिधी रसिकतां लक्ष्मीदृशोस्तन्वती युष्माकं कुरुतां भवार्तिशमनं नेत्रे तनुर्वा हरे: ॥३७२॥ एष वचनश्लेषोऽपि।
एक बार नपुंसकलिङ्गके प्रथमाके द्विवचनके रूपमें और दूसरी बार स्त्रीलिङ्गके प्रथमाके एकवचनके रूपमें अन्वित होते हैं। इसलिए यह 'लिङ्गश्लेष' का उदाहरण तो है ही, परन्तु साथ ही इसको वचन- श्लेषका उदाहरण भी कहा जा सकता है। 'कुरुतां' इस पदमें आत्मनेपद तथा परस्मैपदका भी श्लेष है। 'नेत्ने' इस द्विवचनान्त कर्ताके साथ अन्वित होनेपर 'कुरुता' यह परस्मैपदमें प्रथम पुरुषके द्विवचनका रूप होता है और 'तनुः' इस एकवचनान्त कर्ताके साथ अन्वित होनेपर यह आत्मनेपदके प्रथम पुरुषके एकवचन- का रूप होता है। इस प्रकार इस एक उदाहरणमें अनेक प्रकारके श्लेष पाये जाते हैं। ग्रन्थकारने उसे यहाँ लिङ्गश्लेष तथा वचनश्लेष, दोनोंके उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया है। श्लोकक। अर्थ निम्नलिखित प्रकार है- [शाण्डिल्य मुनिने भक्तिसूत्र नामक ग्रन्थमें 'अथातो भक्तिजिज्ञासा सा परानुरक्तिरीश्वरे' ।१/१।१। इस प्रकार ईश्वरके विषयमें परानुरक्तिको भक्ति नामसे कहा है उस ] भक्तिसे नम्र हुए [भक्त- जनों]को [कृपापूर्वक ] देखनेके लिए अनुरागयुक्त, नील कमलोंके सदृश [सुन्दर ], हित [रूप मोक्ष ] की प्राप्तिके लिए समाधिस्थ योगियों द्वारा [अपने ] ध्यानके विषय बनाये हुए, अपरिमित सौन्दर्यके आधार और [अपनी पत्नी ] लक्ष्मीके नेत्रोंमें रसिकताको उत्पन्न करनेवाले, हरि [विष्णु ] के दोनों नेत्र तुम्हारी भवबाधाको दूर करें। अथवा [तनुपक्षमें भक्तिप्रह्वानां विलोकनप्रणयो दर्शनानुरागो यस्यां सा भक्तिप्रह्वविलोकन- प्रणयिनी ] भक्तजन जिसको अनुरागपूर्वक देखते हैं, [रंग तथा सौन्दर्य दोनोंमें] नीलकमलोंके साथ स्पर्धा करनेवाली [नीलकमलोंके सदृश ], [ईहितप्राप्तये ] अभीष्टसिद्धिके लिए समाधिस्थ योगियों द्वारा चिन्तन की जानेवाली [ध्यानका विषय बनायी हुई], सौन्दर्यकी महानिधि [तनुपक्षमें 'महानिधि: रसिकतां' इन दो बदोंके बीचके विसर्गोंका 'रो रि' ६।३।११० सूत्रसे लोप होकर 'ढलोपे पूर्वस्य दीर्घोडणः' ६।३।१११ सूत्रसे दीर्घ होकर 'महानिधी' पद बनता है। नेत्रपक्षमें निधिशब्दको जहल्लिङ्ग मानकर 'महानिधी' यह प्रथमाके द्विवचनका प्रयोग है] लक्ष्मीके नेत्रोंमें रसिकताको उत्पन्न करनेवाली विष्णुकी देह तुम्हारी भवपीड़ाका नाश करे॥३७२॥ यह [ 'तनु' पक्षमें एकवचन तथा 'नेते' पक्षमें द्विवचन होनेसे ] वचनश्लेष [का उदाहरण ] भी है। [इसलिए श्लेषके आठवें भेद वचनश्लेषका उदाहरण आगे नहीं देंगे]। (४) भाषाश्लेष आगे भाषाश्लेषका उदाहरण देते हैं। आनन्दवर्धरनप्रणीत 'देवीशतक' में यह ७६वाँ पद्य है। संस्कृत तथा प्राकृत दोनों भाषाओ्रोंमें उसका अर्थ होता है, अतः यह 'भाषाश्लेष'का उदाहरण है। संस्कृत भाषामें उसको निग्नलिखित प्रकार पढ़ा जायगा-
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का० ८४, सू० ११८ ] नवम उल्लास: ४१६ (४) महदेसुरसन्धम्मे तमवसमासङ्गमागमाहरणे। हरवहुसरणं तं चित्तमोहमवसरउमे सहसा ।।३७३।। (५) अयं सर्वाणि शास्त्राणि हृदि ज्ञेषु च वक्ष्यति। सामर्थ्यकृदमित्राणां मित्राणां च नृपात्मजः ॥३७४।।ोह (६) रजनिरमणमौले: पादपद्मावलोक- क्षणसमयपराप्तापूर्वसम्पत्सहस्त्रम्। प्रमथनिवहमध्ये जातुचित् त्वत्प्रसादा- प्र दहमुचितरुचिः स्यान्नन्दिता सा तथा मे ॥३७५॥ महदे सुरसन्धं मे, तम् अव समासङ्गम् आगमाहरणे। हर बहुसरणम् तम् चित्तमोहम् अवसरे उमे सहसा ।। और उसका अर्थ निम्नलिखित प्रकार होगा- ज हे आनन्ददायिनि [महदे ] गौरी ! [आगमाहरणे ] वेद-विद्याके उपार्जनमें मेरे उस अनुराग [समासङ्गम् ] को बनाये रखो और अवसरपर [कभी उत्पन्न होनेवाले ] उस प्रसिद्ध चित्तके अज्ञान या मोहको तुरन्त मिटा दो। प्राकृत भाषाके पक्षमें इस श्लोककी संस्कृत-छाया और अर्थ निम्नलिखित प्रकार होगा- मम देहि रसं धर्मे तमोवशाम् आशां गमागमात् हर नः। हरवधु शरणं त्वं चित्तमोहोऽपसरतु मे सहसा।। हे [हरवधु ] पार्वती ! आप मेरी [ एकमात्र ] शरण हो, आप [सदा ] धर्ममें मेरा प्रेम बनाये रहो और [गमो गमनं मरणम्, आगमः आगमनं पुनर्जन्म यस्मिन् तस्मात् गमागमात् संसारात्] संसार [की ओर]से हमारी अज्ञानमयी [ तमोवशां सुखप्राप्तिकी ] आशाको मिटा दो, [जिससे ] मेरा चित्तका अज्ञान तुरन्त दूर हो जाय॥३७३॥ (५) प्रकृतिश्लेष आगे प्रकृतिश्लेषका उदाहरण देते हैं। इसमें 'वक्ष्यति' यह रूप 'वह' धातु तथा 'वच' धातु दोनोंका लूट् लकारमें एक-सा ही बनता है। इसलिए 'धारण करेगा' और 'कहेगा', ये दोनों अर्थ इसके होते हैं। इसी प्रकार 'सामर्थ्यकृत' इस पदमें सामर्थ्यके उपपद रहते 'डुकृञ करणे' और 'कृतीछेदने' दोनों धातुओंसे 'सामर्थ्यं कोति इति सामर्थ्यकृत्' तथा 'सामर्थ्य कृन्तति छिनति विनाशयति इति सामर्थ्य- कृत्' यह एक-सा ही रूप बनता है। दोनों जगह वह और वच धातुके लृट्लकारके प्रथमपुरुषके एक- वचनके तिप्-प्रत्ययके तथा डुकृञ् और कृती धातुके कविप् प्रत्ययके समान होनेपर भी केवल धातुओंका भेद होनेसे यह प्रकृतिश्लेषका उदाहरण है। श्लोकका अर्थ निम्नलिखित प्रकार है- यह राजाका पुत्र समस्त शास्त्रोंको [अपने ] हृदयमें [ वक्ष्यति ] धारण करेगा, और [ज्ञेषु] विद्वानोंमें [वक्ष्यति] कहेगा तथा शत्रुओं [अमित्राणां ] की शक्तिका नाश करनेवाला एवं मित्रोंकी शक्तिकी वृद्धि करनेवाला होगा ॥३७४॥ (६ ) प्रत्ययश्लेष अगला श्लोक प्रत्ययश्लेषके उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया गया है। कोई शिवका उपासक शिवजी- की उपासना करते हुए अपने भविष्यमें यह कामना कर रहा है कि-
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(७) सर्वस्वं हर सर्वस्य त्वं भवच्छेदतत्परः । नयोपकारसाम्मुख्यमायासि तनुवर्तनम् ।३७६।।
आपकी कृपासे कभी मैं [रजनीरमणमौलि, चन्द्रमौली ] शिवजीके चरणकमलोंके [अवलोकन] दर्शनके साथ ही अपरिमित अपूर्व आनन्दको प्राप्तकर [उनके ] गणों [सेवकसमुदाय ] के मध्यमें उचित अनुरागयुक्त और [नन्दिता नन्दकः स्याम् ] आनन्द प्राप्त करानेवाला होऊँ तथा वही [ अर्थात् शिवजीके गणोंके भीतर गणना ही] मेरे लिए [ नन्दिनो भावः 'नन्दिता' अर्थात् उनके प्रमुख अनुचर 'नन्दि' नामक गण ] के नन्दीपदकी प्राप्तिके समान [स्यात् ] हो ।३७५।। यहाँ 'स्यान्नन्दिता' पदोंमें प्रत्ययश्लेष है यह सन्धि किया हुआ रूप है। सन्धिका विच्छेद करने- पर दो प्रकारके पदच्छेद निकलते है, एक 'स्यात्-नन्दिता'और दूसरा 'स्याम् नन्दिता'। 'अहं नन्दिता स्याम्' और 'सा-मे नन्दिता स्यात्' ये दो प्रकारके उसके अन्वय होते हैं। अर्थात् 'स्याम्' और 'स्यात्' पदोंमें उत्तमपुरुष तथा प्रथमपुरुषके प्रत्ययभागमात्रका भेद होनेसे प्रत्ययश्लेष है। इसी प्रकार 'नन्दिता' पदमें 'नन्दिनो भाव: नन्दिता' इस विग्रहमें तद्धितका तल् प्रत्यय होता है और 'नन्दकः स्याम्' इस अरथवाले पक्षमें कृत्-संज्ञक तृच्-प्रत्यय होता है इसलिए इन दोनों पदोंमें प्रत्यय-मात्रका भेद होनेसे यह प्रत्ययश्लेषका उदाहरण है। (७) विभक्तिश्लेष सुप् तथा तिङ् विभक्तियोंके श्लेषका अगला उदाहरण देते हैं। शिवका भक्त कोई डाकू अन्य लोगोंके सामने प्रार्थना करते हुए, समीपमें ही उपस्थित अपने पुत्रको दस्युकर्मका उपदेश इस शिवोपासना- परक श्लोकसे ही देते हुए कह रहा है कि- हे हर [शिवजी महाराज] ! आप सबके सर्वस्व है और भव [बन्धन] का नाश करनेवाले हैं। नीति [सदाचार या धर्मसंस्थापन ] और [साधुओंके परित्राणरूप ] उपकारके अनुकूल [परित्राणाय साधूनां धर्मसंस्थापनार्थाय च ] शरीरव्यवहार [अवतार-धारणरूप व्यापार] को प्राप्त होते हैं। [यह इस श्लोकका शिवस्तुतिपरक अर्थ है। दूसरे पक्षमें ] हे पुत्र ! [त्वं सर्वस्य सर्वस्वं हर] तू [किसीको छोड़ मत ] सबका सब-कुछ छोन ले और [केवल माल छीनकर ही सन्तोष न कर, अपितु उन सबको जानसे मारकर साफ कर देनेके लिए उनके गलोंको] काटनेमें तत्पर हो जा। [उपकार- सांमुख्यं नय ] किसीके साथ उपकार [अथवा अनुकूलता या कृपा ] मत कर [बल्कि सदा ही सबके प्रति आयासि वर्तनं तनु ] पीड़ा देनेवाला व्यवहार कर ॥३७६॥ यहाँ 'हर' तथा 'भव' पदोंमें विभक्तिश्लेष है। ये दोनों पद शिवके पर्यायवाचक हैं। इसलिए शिवपक्षमें ये दोनों सम्बोधन विभक्तिमें सुबन्तपद हैं। दूसरे दस्युव्यापारकी शिक्षा देनेवाले पक्षमें ये दोनों तिडन्त क्रियापद हैं। इसलिए इन दोनोंमें विभक्तिश्लेष है। यद्यपि विभक्तिश्लेष भी प्रत्ययश्लेषके अन्तर्गत हो सकता है, फिर भी उसके विशेष च मत्कारजनक होनेसे उसको अलग कहा गया है। इस प्रकार यहाँतक श्लेषके सात उदाहरण दिये हैं। आठवाँ' वचनश्लेष' है। ऊपर जो लिङ्ग- श्लेषका उदाहरण दिया है वही वचनश्लेषका भी उदाहरण हो सकता है यह बात पहले कह चुके हैं। इसलिए इसका अलग उदाहरण नहीं दिया है।
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का० ८५, सू० ११६] नवस उल्लास: ४२१ [सू० ११९ ] भेदाभावात्प्रकृत्यादेर्भेदोऽपि नवमो भवेत् । नवमोऽपीति अपिभिन्नक्रमः । उदाहरणम्- योऽसकृत्परगोत्राणां पक्षच्छेदक्षणक्षमः । शतकोटिदतां विभ्रद्विबुधेन्द्रः स राजते ॥३७७॥ अत्र प्रकरणादिनियमाभावाद् द्वावप्यर्थौ वाच्यौ। (९) अभङ्गश्लेष श्लेषके ये जो आठ भेद ऊपर दिखलाये गये हैं इनका प्रतिपादन मुख्यरूपसे रुद्रटने अपने 'काव्याल- द्वार'में किया है। अन्य आचार्योंने उसीके आधारपर शब्दश्लेषके आठ भेदोंका वर्णन किया है। इन सबमें प्रकृति-प्रत्यय आर्प्रादिका भेद होनेसे इस प्रकारके श्लेषको सभङ्गश्लेष कहते हैं। इन सबके उदाहरणमें दोनों पक्षोंमें अर्थ करते समय पदोंका भिन्न-भिन्न विश्लेषण करना होता है इसलिए भी इसको सभङ्गश्लेष कहा जाता है। परन्तु इनके अतिरिक्त इस प्रकारका भी श्लेष हो सकता है, जिसमें प्रकृति-प्रत्ययादिके भेदके बिना ही स्वरभेदके कारण भिन्नप्रयत्नोच्चार्य अथवा उस स्वरभेदादिका भी अभाव होनेपर अभिन्न- प्रयत्नोच्चार्य अनेक पदोंका श्लेष हो। उस श्लेषको अभङ्गश्लेष कहते हैं। यह श्लेषके पूर्वोक्त आाठ भेदोंसे भिन्न नवम भेद है। इसीका प्रतिपादन करते हुए ग्रन्थकार आगे कहते हैं कि- [सूत्र ११६]-प्रकृति [प्रत्यय ] आदिका भेद न होनेसे [ पूर्वोक्त आठ प्रकारके सभङ्गश्लेषोंसे भिन्न अभङ्गश्लेषरूप ] नवम भेद भी हो सकता है। [कारिकामें] 'अपि' शब्द भिन्नकरम है [अर्थात् जहाँ वह पढ़ा हुआ है, वहाँ उसका अन्वय न होकर 'नवमः' शब्दके बाद उसका अन्वय होता है, 'नवमोऽपि भेदो भवेत्' अर्थात् आठ भेदोंके अतिरिक्त ] नवम भेद भी है। उदाहरण [ जैसे ]- इस श्लोकमें अभङ्गश्लेष द्वारा देवराज इन्द्रके साथ साम्य दिखलाकर राजापर इन्द्रत्वका आरोप करते हुए कवि राजाका वर्णन कर रहा है- जो [राजा ] अनेक बार [परगोत्राणां ] शत्रुवंशोंके [ 'पक्षच्छेदक्षणक्षमः' अर्थात् ] सहायकोंके तनिक-सी देरमें नाश कर देनेमें समर्थ है [ शतकोटी: कोटिशतं ददातीति शतकोटिदः तस्य भावः शत- कोटिदता तां बिभ्रनत् ] शतकोटि अपरिमित धनको देनेवाला [विबुधेन्द्र ] वह विद्वच्छिरोमणि देवराजके समान शोभित होता है।।३७७।। [दूसरे इन्द्रपक्षमें शतकोटि: वज्तं तेन द्यति खण्डयति इति शतकोटिदः। तस्य भावः शतकोटिदता] वज्रसे नाश करनेकी सामर्थ्यवाला, असकृत् अनेकों बार [परगोत्नाणां ] उत्तम पर्वतोंके [पक्षच्छेद अर्थात्] पंखोंके काटनेमें क्षणमें समर्थ है, वह देवराज इन्द्र शोभित होता है।३७७।। यहाँ प्रकरणादिके द्वारा [अनेकार्थक परगोत्नादि शब्दोंके एकार्थमें ] नियमनके न होनेसे [राजा- परक और इन्द्रपरक ] दोनों ही अर्थ वाच्य हैं। [इसलिए यहाँ श्लेष अलङ्गार है और यह अभङ्गश्लेषका उदाहरण है]।
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४२२ काव्यप्रकाश: [का० ८५, सू० ११६ ननु स्वरितादिगुणभेदात् भिन्नप्रयत्नोच्चार्य्याणां तदभावादभिन्नप्रयत्नोच्चार्याणां च शब्दानां बन्धेऽलङ्कारान्तरप्रतिभोत्पत्तिहेतुः शब्दश्लेषोऽर्थश्लेषश्चेति द्विविधोऽप्यर्था- लङ्कारमध्ये परिगणितोऽन्यैरिति कथमयं शब्दाऽलङ्कारः ? इसका अभिप्राय यह है कि जहाँ प्रकरणादिवश अनेकार्थक शब्दका एकार्थमें नियन्त्रण हो जानेपर भी अन्य अर्थकी प्रतीति होती है, वहाँ द्वितीय अर्थ वाच्य नहीं अपितु व्यङ्गय होता है, जैसा कि द्वितीय उल्लासमें 'भद्रात्मनो दुरधिरोहतनो०' इत्यादि उदाहरण संख्या १२ में दिखलाया गया है और जहाँ प्रकर- णादि नियामक न हों, वहाँ दोनों अर्थ वाच्यरूपसे उपस्थित होते हैं। उसी स्थलमें श्लेषालङ्कार होता है। इस 'योऽसकत्परगोत्नाणां' इत्यादि श्लोकमें यदि 'भद्रात्मनः' इत्यादि उदाहरण संख्या १२ के समान प्रकरणादिको नियामक मान लिया जाय तो यहाँ श्लेष न होकर दूसरे अर्थकी प्रतीति व्यञ्जनासे होगी और उस दशामें यह ध्वनिका उदाहरण होगा। इसलिए ग्रन्थकारने यहाँ स्पष्टरूपसे यह लिखा है कि इसमें प्रकरणादिके द्वारा एकार्थमें नियन्त्रण न होनेसे दोनों अरथ वाच्य ही हैं। अतः यह ध्वनिका नहीं अपितु श्लेषका ही उदाहरण है। शब्दश्लेष और अर्थश्लेषका भेद शब्दालङ्काररूपमें ऊपर रुद्रटप्रतिपादित शब्दश्लेषके आठ प्रकार दिखलाये हैं। इन सबमें प्रकृति-प्रत्ययादिका भेद रहता है इसलिए ये सब सभङ्गश्लेषके उदाहरण हैं। इसके बाद ग्रन्थकारने अभ ङ्गश्लेष को भी श्लेषरूप शब्दालड्वारका नवम भेद मानकर उसका यह उदाहरण दिया है। अलङ्कार- सर्वस्वकारने अभङ्गश्लेषको अर्थालङ्कार माना है, शब्दालङ्कार नहीं। शब्दालङ्कारमें उन्होंने केवल सभङ्गश्लेषकी गणना की है। इसलिए इस प्रसङ्गमें उनके मतकी समीक्षा करना आवश्यक समझकर उनकी शरसे अभङ्गश्लेष शब्दालङ्वार कैसे हो सकता है इसी पूर्वपक्षको उठाते हुए ग्रन्थकार लिखते हैं- [प्रश्न ]-[ १] स्वरित आदि स्वररूप गुणके भेदके कारण [स्वरितादि स्वरके लिए गुण शब्दका प्रयोग अपने सजातीय समानाकार दूसरे शब्दोंसे भेदक होनेसे विशेषाधानहेतु होनेके कारण किया गया है ] भिन्न प्रयत्नसे उच्चारण किये जानेवाले [२] और [जहाँ स्वरका भेद नहीं है वहाँ ] उस [स्वरभेद] का अभाव होनेसे अभिन्न [एक ही] प्रयत्नसे उच्चारण करने योग्य [दोनों प्रकारके ] शब्दोंकी रचनामें [रूपक, उपमा आदि ] अन्य अलङ्कारोंके प्रतिभासमात्रका हेतु [भिन्नप्रयत्नोच्चार्य शब्दोंका जतुकाष्ठन्यायसे होनेवाला ] 'शब्दश्लेष' तथा [स्वरभेदके अभावमें अभिन्न प्रयत्नोच्चार्य समानाकार शब्दोंमें दो अर्थोंका एक वृन्तगत-फलद्वय-न्यायसे होनेवाला ] 'अर्थश्लेष' ये दोनों [प्रकारके सभङ्गश्लेष और अभङ्गश्लेष अलङ्कांरसर्वस्वकार आदि ] अन्योंने अर्थालङ्गारमें गिनाये हैं, तब [ये दोनों सभङ्गश्लेष और अभङ्गश्लेष ] शब्दालङ्गार कैसे हो सकते हैं ? इस प्रश्नका उत्तर ग्रन्थकार यह देते हैं कि गुण, दोष, अलङ्कार आदिकी शब्दनिष्ठता या अरथ- निष्ठताकी कसौटी केवल अन्वय-व्यतिरेक ही है। अन्वय व्यतिरेकका अर्थ है, 'तत्सत्त्वे सत्सत्ता अन्वयः' और 'तदभावे तदभावो व्यतिरेकः।' अर्थात् यदि किसी शब्दविशेषके रहनेपर ही किसी गुण, दोष तथा अलङ्कारको सत्ता रहतो हो और शब्दको बदलकर उसके स्थानमें उसीके समानार्थक दूसरे शब्दको रख देनेसे उस गुण, दोष, अलङ्कारकी सत्ता न रहे, तो यह मानना होगा कि वह गुण, दोष या अलङ्कार केवल उस शब्दके आश्रित है। इसलिए उसको शब्दनिष्ठ गुण, दोष या अलङ्कार माना जायगा और जहाँ किसी शब्दविशेषको हटाकर उसके समानार्थक अन्य शब्दका प्रयोग करनेपर भी उस गुण,
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उच्यते। इह दोपगुणालङ्काराणां शब्दार्थगतत्वेन यो विभाग: सः अन्वयव्यति- रकाभ्यामेव व्यवतिष्ठते। तथाहि कप्टत्वादिगाढत्वाद्यनुप्रासादयः, व्यर्थत्वादिप्रौद्याद्यु- पमादयः, तद्भ्ावतदभावानुविधायित्वादेव शब्दार्थगतत्वेन व्यवस्थाप्यन्ते।
दोष या अलद्कारकी स्थितिमें त्रन्तर नहीं आराता है, अपर्थात् अ्प्रलद्कार आ्प्रादि पूर्ववन् बना रहना है वहाँ यह समझना चाहिये कि वह अलद्कार आदि शब्दपर नहीं अपितु अथपर आश्रित है, इसलिए उस अद्वार आदिको अरथनिष्ठ या अर्थालद्कार आदि कहते हैं। इस अन्वय-व्यतिरेककी कसौटीपर कसनेसे यह प्रतीत होता है कि अभ ङ्गश्लेपके 'जनुकाष्ठन्याय' से अथवा 'एकवृन्तगतफलद्वयन्याय' से संश्लिष्ट दोनों भेदोंम शब्दोंका परिवर्तन कर देनेपर श्लेषकी स्थिति नहीं रहती है। इसलिए 'शव्दपरिवृन्यमह' होनेसे अभ ङ्गश्लेपके वे दोनों ही स्वरूप शव्दालङ्कारके अन्तर्गत ही आते हैं। अलङ्कारमवंस्वकारने अभङ्गश्लेपको अर्थापेक्षी मानकर जो अर्थालङ्कारोंमें परिगणित किया है, वह उचित नहीं है। अलङ्कारसर्वस्वकार 'पृथुकार्तस्वरपात्र' इत्यादि सभ ङ्गश्लेपके उदाहरणोंमें 'पृथुक-आ्र्प्रार्तस्वरपात्रं' तथा 'पथु-कार्तस्वरपात्रं' आदि विजातीय भिन्न-भिन्न शब्दोंका श्लेप होनेसे सभङ्गश्लेपको शब्दश्लेप कहते हैं और 'असकृत्परगोत्ाणां' इत्यादि अभङ्गश्लेषके उदाहरणोंमें विजातीय भिन्नाकार शब्दोंका नहीं अपितु 'एकवृन्तगतफलद्वयन्याय' से दो अरथोंका श्लेष होनेसे अभङ्गश्लेपको अर्थश्लेप मानते हैं। अल- द्वारस्वस्वकारका यह 'एकवृन्तगतफलद्वयन्याय' यहाँ श्लेपस्थलमें तो कथञ्चित् लागू हो जाता है, इसलिए उसके आधारपर अभङ्गश्लेषको एक बार यदि अरथालङ्कार मान भी लिया जाय तो भी गुण- दोष तथा अन्य अलङ्कारोंमें तो इस न्यायके लागू होनेका कोई अवसर ही नहीं है. परन्तु गुण-दोष तथा अन्य अलङ्कारोंमें भी उनकी शब्दनिष्ठता अथवा अरथनिष्ठताकी विवेचना करनी ही होती है। वहाँ इस युक्तिसे निर्णय नहीं हो सकता है। वहाँ तो अन्वय-व्यतिरेकके आधारपर ही किसी गुण, दोष या अलङ्कारके शब्दनिष्ठ होनेका निर्णय किया जाता है। यह अन्वय-व्यति रेक ही सर्वत्र प्रयोज्य-प्रयोजकभाव आदिका निर्णायक होता है। इसलिए श्लेषकी शब्दनिष्ठता तथा अर्थनिष्ठताका निर्णय भी उसीके द्वारा करना उचित है। इस दृष्टिसे यदि अन्वय-व्यतिरेकके आधारपर अभङ्गश्लेषकी परीक्षा की जाय तो वह शब्दालद्वार ही ठहरता है। हाँ, उन स्थलोंमें जहाँ शब्दका परिवर्तन कर देनेपर भी श्लेष बना रहता है, अर्थात् दो अरथोंकी प्रतीति होती रहती है, वहाँ अर्थालङ्कार कहा जा सकता है। इस प्रकारके अर्थश्लेषका उदाहरण भी आगे देंगे। परन्तु 'योसकृत्परगोत्राणां इत्यादि अभङ्गश्लषके उदाहरणोंमें शब्दपरिवृत्तिकी क्षमता न होनेसे उनमें रहनेवाला अभ ङ्गश्लेष अर्ालङ्कार नहीं अपितु शब्दालङ्कार ही है यह ग्रन्थकारका अभिप्राय है। इसी बातको आगे वृत्तिग्रन्थमें कहते हैं- [उत्तर ]-कहते हैं। यहाँ [काव्यमें ] गुण, दोष, अलङ्गारोंका शब्दगत और अर्थगत रूपसे जो विभाग किया जाता है वह अन्वय-व्यतिरेकसे ही ठीक बैठता है। [अर्थात् जहाँ शब्दपरिवृत्तिसहत्व नहीं है वहाँ शब्दगतत्व और शब्दपरिवृत्तिसहत्व होनेपर अर्थगतत्व माना जाता है] क्योंकि (१) श्रुतिक- दुत्व [कष्टत्व ] आदि [शब्ददोष ], गाढ़बन्धत्व आदि [रूप वामनोक्त दस शब्दगुण ] तथा अनुप्रासादि (शब्दालङ्गार शब्द-परिवर्तनको सहन नहीं करते हैं, इसलिए वे शब्दनिष्ठ गुण, दोष तथा अलङ्गार माने जाते हैं और व्यर्थत्व [अपुष्टार्थत्व आदि अर्थदोष ], प्रौढि आदि [ अर्थस्य प्रौढि आदि [अर्थस्य प्रौढिरोज:
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४२४ काव्यप्रकाश. [का० ८५, सू० ११६
स्वयं च पल्लवाता म्रभास्वत्करविराजिता ।
इत्यभङ्ग:, प्रभातसन्ध्येवास्वापफललुव्धेहितप्रदा ।।३७८।। इति सभङ्ग:,
इत्यादि वामनाभिमत दस अर्थगुण ] तथा उपमा आदि [अर्थाल्गार ], शब्द और अर्थकी सत्ता [तदभाव ] तथा शब्द और अर्थके अभाव [तदभाव] का अनुगमन करनेवाले होनेसे ही [ अर्थात् अन्वय-व्यतिरेकके आधारपर ही ] शब्दगत तथा अर्थगत माने जाते हैं। अरथात श्रुतिकटुत्व आदि शब्द दोप, वामनाभिमत दस शब्दगुण तथा अनुप्रासादि शब्दालडकार उन-उन शब्दोंके होनेपर ही रहते हैं, उन शब्दोंका परिवर्तन करके उनके पर्यायवाचक अ्न्य शब्दोंके रख देनेपर नहीं रहते हैं, इसलिए वे शब्ददोष, शब्दगुण तथा शव्दालद्दार कहे जाते हैं। इसके विपरीत अपुष्टार्थत्वादि अरथदोष, अर्थप्रौढ़ि त्ादिरूप वामनाभिमत दस अर्थगुण तथा उपमादि अर्थालद्कारोंमें शब्दोंका परिवर्तन करके उनके पर्यायवाचक दूसरे शब्द रख देनेपर भी वे दोप, गुण तथा अलङ्कार माने जाते हैं। इसलिए वे अर्थनिष्ठ दोप, गुण तथा अलद्कार माने जाते हैं। इसका अभिप्राय यह हुआ कि दोप, गुण तथा अलङ्गारोंकी शब्दनिष्ठता या अरथनिष्ठताका निर्णय अ्न्वयव्यतिरेकके आधारपर ही करना आवश्यक है और उस आधारपर केवल सभङ्गश्लेष ही नहीं अपितु 'योऽसकृत्' इत्यादि उदाहरणोंमें अ्र्प्रभङ्ग- श्लेषके दोनों भेद भी शब्दपरिवृत्तिको सहन नहीं कर सकते हैं, इसलिए शब्दालङ्कार ही माने जा सकते हैं, अर्थालङ्कार नहीं। सभङ्ग तथा अभङ्ग दोनों प्रकारके श्लेषोंमें शब्दपरिवृत्तिकी त्र्परसहनीय ताको दिखलाने- के लिए अगला उदाहरण देते हैं- प्रतीहारेन्दुराज-विरचित 'उद्धटालङ्कारसारसंग्रह-लघुवृत्ति' के चतुर्थ-वर्गमें पार्वती-वर्णनपरक यह पद्य उद्धृत हुआ है। उसके पूर्वार्द्धमें 'भास्वत्करविराजिता' इस अंशमें अ्ररभङ्गश्लेष है और उत्त- रार्द्धके 'अस्वापफललुब्धेहितप्रदा' इस अंशमें सभङ्गश्लेष है। पार्वतीका माहात्म्य केवल उनके स्वामी शिवजीके प्रभावके कारण ही नहीं है, अपितु वे स्वयं भी प्रभातसन्ध्याके समान महत्त्वशालिनी हैं, यह इस श्लोकका भाव है। प्रभातसन्ध्याके साथ पार्वतीकी समानता दिखलाते हुए कवि कह रहा है कि- [पार्वती देवी ] स्वयं भी पल्लवोंके सदृश रक्तवर्ण, भास्वत् = भास्वान् अर्थात् सूर्यकी किरणोंसे शोभायमान, प्रातःकालीन सन्ध्याके समान, किसलय जैसे [ आताम्र ] रक्तवर्णके और [भास्वत्] चमकते हुए हाथोंसे शोभायमान हैं। इस [पूर्वार्धभाग] में अभङ्गश्लेष [तथा ]- [और वे पार्वती, प्रभातसन्ध्यापक्षमें ] अस्वाप अर्थात् निद्राका अभाव, उसका फल अर्थात् प्रातःकालीन स्नान-सन्ध्या-वन्दनादि, उसके इच्छुकोंके लिए, हित प्रदान करनेवाली प्रभातसन्ध्याके समान [पार्वतीपक्षमें 'सुखेन आप्यते इति स्वापं न स्वापम् अस्वापं दुर्लभम् इति यावत्' मोक्ष आदि रूप] दुलभ फलके इच्छुकों के [ईहित ] अभीष्टको प्रदान करनेवाली हैं ॥३७८॥ इस [उत्तरार्धमें ] सभङ्गश्लेष है।
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इति द्वावपि शब्दकसमाश्रयाविति द्वयोरपि शब्दश्लेषत्वमुपपन्नम्। न त्वाद्यस्यार्थश्लेषत्वम् । अर्थश्लेषस्य तु स विषयः यत्र शब्दपरिवर्त्तनेऽपि न श्लेषत्वखण्डना यथा- स्तोकेनोन्नतिमायाति स्तोकेनायात्यधोगतिम् । अहो सुसदृशी वृत्तिस्तुलाकोटे: खलस्य च ॥३७९॥ ये दोनों ही [ शब्दपरिवर्तनको सहन न करनेके कारण ] केवल शब्दके आश्रित हैं। अतः दोनों ही शब्दश्लेष हैं। प्रथम [अर्थात् पूर्वार्धका अभङ्गश्लेष ] अर्थश्लेष नहीं है। अर्थश्लेषका उदाहरण अर्थश्लेषका तो वही उदाहरण हो सकता है, जिसमें शब्दका परिवर्तन कर देनेपर भी श्लेषका खण्डन नहीं होता है। जैसे -- आश्रवर्य है कि तराजूकी डण्डी और दुष्ट पुरुषकी वृत्ति बिलकुल एक-सी है, जो तनिकमें ऊपर चढ़ जाती है और तनिकमें ही अघोगतिको प्राप्त हो जाती है ॥३७६॥ इसमें 'स्तोकेन उन्नतिम् आयाति' आदि पदोंका परिवर्त्तन करके यदि उसके समानार्थक अन्य शब्द रख दिये जायँ तो भी श्लेषमें बाधा नहीं पड़ती है। इसलिए यह श्लेष, शब्दपर नहीं, अर्थपर आश्रित होनेसे अर्थालङ्कार है। श्लेषके साथ अन्य अलङ्कारोंकी प्रधानता ऊपर अलङ्कारसर्वस्वकारका जो पूर्वपक्ष दिया गया है उसका यदि सूक्ष्म विश्लेषण किया जाय तो उसमें तीन विचारणीय अंश निकलते हैं-१. अभङ्गश्लेष अर्थालङ्कार है; २. श्लेष उपमादि अर्थालङ्कारोंका बाधक है और ३. भिन्नप्रयत्नोच्चार्य या अभिन्नप्रयत्नोच्चार्य, दोनों प्रकारका श्लेष अर्थालङ्कार है। इनमेंसे पहिले अंशकी विवेचना यहाँतक की गयी। तीसरे मतकी आलोचना आगे पृष्ठ ४३२ पर करेंगे। मम्मटके अनुसार श्लेषको केवल वहीं अर्थालङ्वार कहा जा सकता है, जहाँ शब्दोंका परिवर्तन कर देनेपर भी श्लेषकी हानि नहीं होती है। शेष स्थलोंमें अभङ्गश्लेष भी शब्दालङ्कार ही होता है। अलङ्कारसर्वस्वकारके मतका दूसरा विचारणीय अंश यह है कि श्लेषके साथ जहाँ उपमा आदि अन्य अलङ्कारोंकी प्रतीति होती है, वहाँ वे श्लेषको अन्य अलङ्कारोंका प्रतिबन्धक मानते हैं। उनके अनुसार ऐसे स्थलोंपर अन्य अलङ्कारोंका अस्फुट आभासमात्र होता है, पूर्णता या विश्रान्ति नहीं होती है। मुख्य अलङ्कार श्लेष होता है और वह अलङ्कारान्तरके प्रतिभासमात्रका हेतु होता है। उदाहरणार्थ अभी दिये हुए 'स्वयं च पल्लवाताम्रभास्वत्करविराजिता' इत्यादि उदाहरणमें अलङ्कारसर्वस्वकार श्लेषको मुख्य अलङ्कार मानते हैं और उपमाको केवल आभासमात्र मानते हैं। उनकी युवित यह है कि श्लेषके साथ कोई दूसरा अलङ्कार रहता ही है, यदि सब जगह उस अन्य अलङ्कारकी ही प्रधानता मान ली जाय, तो श्लेषके लिए कहीं अवसर ही नहीं मिलेगा। इसके विपरीत अन्य उपमा आदि अलङ्कार तो श्लेषके बिना भी रह सकते हैं। इसलिए जहाँ श्लेषके साथ अन्य अलङ्कार होते हैं, वहाँ श्लेषको ही प्रधान मानना चाहिये। इसके विनरोत मम्मटका मत यह है कि 'पल्लवाताम्रभास्वत्करविराजिता' आदि उदाहरणोंमें श्लेष नहीं, अपितु उपमा हो प्रधान अलद्कार है। श्लेषका तो केवल आभासमात्र होता है। वह प्रधान
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४२६ काव्यप्रकाश: [का० ८५, सू० ११६ न चायमुपमाप्रतिभोत्पत्तिहेतुः श्लेषः अपि तु शलेपप्रतिभोत्पत्तिहेतुरुपमा । नहीं है। अलङ्कारसर्वस्वकारने श्लेषके साथ अन्य अलङ्कारोंके होनेपर श्लेपको उनका वाधक माननेका यह हेतु दिया है कि अन्य अलङ्कारोंसे रहित श्लेषकी स्वतन्त्र स्थिति कहीं भी सम्भव नहीं है तथा अ्रन्य अलङ्कार श्लेषसे रहित स्वतन्त्ररूपसे भी रह सकते हैं, अ्रतः जहाँ श्लेपके साथ त्रन्य त्र्प्रलङ्गारोंकी स्थिति हो, वहाँ अन्य अलङ्कार न मानकर श्लेषकी ही प्रधानता माननी चाहिये, अन्यथा श्लेपालङ्कारके लिए कहीं अवसर ही नहीं रहेगा। मम्मटाचार्य अलङ्कारसर्वस्वकारकी इस युक्तिसे सहमत नहीं हैं। उनके मतमें श्लेष भी अन्य अलङ्गारोंसे रहित स्वतन्त्ररूपसे रह सकता है। उन्होंने 'देव त्वमेव पातालं' आदि अगला श्लोक [संख्या ३८० ] इसी प्रकारके उदाहरणके रूपमें प्रस्तुत किया है, जिसमें अ्रन्य त्ररलङ्गारोंसे रहित श्लेषकी स्वतन्त्र स्थिति मानी जा सकती है। इसलिए अन्य अलङ्कारोंके साथ होनेपर श्लेपको अन्य अलङ्कारोंका बाधक नहीं माना जा सकता है। अतएव 'पल्लवाताम्रभास्वत्करविराजिता' आदि विवादास्पद स्थलमें भी श्लेषको उपमाका बाधक नहीं माना जा सकता है। फलतः इस उदाहरणमें उपमा हो प्रधान अलङ्कार है, श्लेषका केवल आभासमात्र होता है। यह मम्मटाचार्यका मत है। इसी बातको ग्रन्थकार अगली पंक्तिमें कहते हैं- और यह ['पल्लवाताम्रभास्वत्करविराजिता' आदि उदाहरणमें अलङ्कारसर्वस्वकार जो यह मानते हैं कि] श्लेष प्रधान अलङ्गार है और [वह] उपमा [ रूप गौण अलङ्गार] के प्रतिभासमात्रका हेतु है, यह बात ठीक नहीं है, अपितु [वस्तुतः ] उपमा ही [प्रधान अलङ्गार है और वह ] श्लेष [रूप गौण अलङ्गार ] के प्रतिभासमात्रका हेतु होती है। 'पल्लवाताम्रभास्वत्करविराजिता' आदि उदाहरणमें ग्रन्थकारने जो उपमाको ही प्रधान अलङ्कार माना है। इसके सम्बन्धमें एक यह शङ्का उपस्थित होती है कि इसमें पार्वतीका प्रभातसन्ध्याके साथ 'भास्वत्करविराजितत्व' यह साधर्म्य दिखलाया है। परन्तु यह तो वास्तविक साम्य नहीं है। श्लिप्ट 'भास्वत्-कर'के प्रयोगके कारण शब्दमात्रका साम्य प्रतीत होता है। वस्तुतः उन दोनोंमें कोई यथार्थ साम्य नहीं है। ऐसी अवस्थामें केवल शब्द-साम्यके आधारपर उपमा अलङ्कार नहीं माना जा सकता है। इस शङ्काका समाधान ग्रन्थकारने यह किया है कि जैसे 'कमलमिव मुखं मनोज्ञमेतत् कचति- तराम्' इत्यादि उदाहरणमें कमल तथा मुखके मनोज्ञत्वरूप गुणसाम्य 'कचति' अर्थात् 'दीप्यते' रूप क्रिया के साम्यमें उपमा होती है, इसी प्रकार 'सकलकलं पुरमेतज्जातं सम्प्रति सुधांशुबिम्बमिव' इत्यादि उदाहरणोंमें चन्द्रमा तथा पुरका 'सकलकलत्व' रूप शब्दमात्रका साम्य होनेपर भी उपमा हो सकती है। 'सकलकलत्व' का चन्द्रमापक्षमें सम्पूर्णकलासे युक्त अर्थ होता है और पुर या नगरके पक्षमें 'कलकल शब्द सहित' अर्थ होता है। इस प्रकार चन्द्रमा तथा नगरमें किसी प्रकारका वास्तविक साम्य न होने- पर भी केवल 'सकलकलत्व' रूप शाब्द साम्यके आधारपर भी उपमा हो सकती है। क्योंकि उपमाके लक्षणमें साधारणरूपसे साम्यका ही निर्देश किया गया है। शाब्दसाम्य या वास्तवसाम्यकी चर्चा नहीं की गयो है। इसलिए शब्दमात्रके साम्यमें जैसे 'सकलकलं' इत्यादि उदाहरणमें उपमा अलङ्कार होता है उसी प्रकार प्रकृत उदाहरणमें 'भास्वत्करविराजितत्व' रूप शाब्दसाम्यके होनेपर भी उपमालङ्वार हो सकता है। फलतः ग्रन्थकारके मतमें 'पल्लवाताम्रभास्वत्करविराजिता' आदि उदाहरणमें उपमा ही प्रधान अलङ्कार है, श्लेष नहीं। अलङ्कारसर्वस्वकारके मतका खण्डन करनेके लिए ग्रन्थकार अगले प्रसङ्गकी अ्रवतारणा करते हुए इस सब विषयको निम्नलिखित प्रकार लिखते हैं-
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का० ८५, सू० ११६] नवम उल्लास: ४२७ तथा हि-यथा 'कमलमिव मुखं मनोज्ञमेतत् कचतितराम्' इत्यादौ गुणसाम्ये क्रिया- साम्ये उभयसाम्ये वा उपमा। तथा- 'सकलकलं पुरमेतज्जातं सम्प्रति सुधांशुविम्बमिव' इत्यादौ शब्दमात्रसाम्येऽपि सा युवतैव। तथा ह्य वतं रुद्रटेन- 'स्फुटमर्थालङ्कारावेतावुपमासमुच्चयौ किन्तु । आश्रित्य शब्दमात्रं सामान्यमिहापि सम्भवतः" ॥ इति।
क्योंकि-जैसे यह मुख कमलके समान सुन्दर और अत्यन्त शोभित हो रहा है' इत्यादि [उदाहरण ] में (१) गुणसाम्य तथा (२) क्रियासाम्य, अथवा (३) उभयसाम्य होनेपर उपमा होती है। उसी प्रकार 'सकलकल [शब्द ] सहित यह नगर [सम्पूर्ण कलाओंसे युक्त सकलकल ] चन्द्रमाके समान हो रहा हैं', इत्यादि उदाहरणोंमें [ सकलकल ] शब्दमात्रके साम्यमें भी वह [ उपमा] युक्त हो ही सकती है [क्योंकि उपमाके लक्षणमें साधारणरूपसे साम्यमात्रका निर्देश किया गया है। ऐसा कोई उल्लेख नहीं है, जिससे शब्दसाम्यमें उपमा न हो सके। अतः 'सकलकलं' इत्यादि उदाहरणके समान 'पल्लवाताम्रभास्व- त्करविराजिता' आदि उदाहरणमें भी उपमा ही मुख्य अलङ्गार है, यह ग्रन्थकारका अभिप्राय है। शब्दमात्रके साम्यमें भी उपमा हो सकती है, अपने इस मतके समर्थनके लिए ग्रन्थकार मम्मट, अपने पूर्ववर्ती आचार्य श्रीरुद्रटका मत प्रमाणरूपमें उद्धृत करते हैं]। जैसा रुद्रटने [अपने काव्यालङ्गारमें] कहा है- '[यद्यपि ] उपमा तथा समुच्चय ये दोनों निश्चित [स्पष्ट ] रूपसे अर्थालङ्गार हैं। किन्तु केवल शब्दमाद [साधारणधर्म ] साम्यके द्वारा यहाँ शब्दालङ्गारोंमें भी हो सकते हैं।' इहापि अर्थात् 'सकलकल' इत्यादि उदाहरणोंमें अथवा शब्दालङ्कारोंमें जहाँ मनोजत्वादि साधारणधर्मोंका उपपादन रहता है, वहाँ उपमान कमल तथा उपमेय मुखमें रहनेवाला 'मनोज्ञत्व' रूप साधारणधर्म भी वस्तुतः पृथक्-पृथक् होता है, परन्तु समान शब्दसे अभिहित होनेके कारण अर्थात् शब्दमात्रके साम्यके द्वारा ही उपमाका प्रयोजक होता है। इसलिए 'सकलकलं पुरमेतज्जातं' अथवा 'पल्लवाताम्रभास्वत्करविराजिता' आदि उदाहरणोंमें भी शब्दमात्रके साम्यमें उपमा माननेमें कोई बाधा नहीं हो सकती है। साधारणधर्मशून्य उपमा नहीं इस प्रकार शब्दमात्रके साम्यमें भी रुद्रट तथा मम्मट आदि आचार्य उपमा अलङ्कार मानते ही हैं। परन्तु अलङ्कारसर्वस्वकार शब्दमात्रके साम्यमें उपमा नहीं मानते हैं, इसलिए वे साधारण धर्मसे रहित अर्थात् धर्मलुप्ताके उदाहरणोंको ही उपमाका विषय मानते हैं। परन्तु उनका यह मत भी उचित नहीं हैं, क्योंकि यदि साधारण धर्मसे रहित धर्मलुप्ताके स्थलोंको ही उपमाका उदाहरण माना जाय तो पूर्णोपमा तो सर्वथा निरविषय हो जायगी : पूर्णोपमाका कोई दूसरा उदाहरण ही नहीं मिल सकेगा। इसी बातको ग्रन्थकार अगली पंक्तियोंमें कहते हैं-
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। ४२८ काव्यप्रकाश: [का० ८५, सू० ११६ द न च 'कमलमिव मुखम्' इत्यादिः साधारणधर्मप्रयोगशून्य उपमाविषय इति वक्तुं युक्तम् पूर्णोपमाया निर्विषयत्वापत्तेः । देव ! त्वमेव पातालमाशानां त्वं निवन्धनम् । त्वं चामरमरुद्भूमिरेको लोकत्रयात्मकः ॥३८०।। इत्यादि: श्लेषस्य चोपमाद्यलङ्कारविविक्तोऽस्ति विषय इति। द्वयोर्योंगे सङ्कर एव।
और 'मुख कमलके समान है, इत्यादि साधारण धर्मके प्रयोगसे रहित ही उपमाका विषय होता है, यह भी नहीं कहा जा सकता है [ क्योंकि उस दशामें ] पूर्णोपमा निरविषय हो जायेगी। इसलिए 'पल्लवाताम्रभास्वत्करविराजिता' आदिमें शब्दमात्रका साम्य होनेपर भी उपमा अलद्कार हो सकता है। अतः वहाँ श्लेषको मुख्य अलद्कार न मानकर उपमाको ही मुख्य अलङ्कार मानना चाहिये। उपमाके कारण श्लेषका क्षणिक प्रतिभासमात्र होता है, अन्तिम विश्रान्ति उपमाकी होती है, श्लेषकी नहीं। अतः उपमा ही वहाँ मुख्य अलङ्कार है। यह मम्मटका सिद्धान्त हुआ। श्लेषकी स्वतन्त्र स्थितिका उदाहरण अलङ्कारसर्वस्वकार ऐसे स्थलोंपर श्लेषको अन्य अलङ्कारोंका बाधक प्रधान अलङ्गार मानते हैं। उसका हेतु वे यह देते हैं कि श्लेष अन्य अलङ्कारोंके बिना नहीं रह सकता है और अन्य अलङ्कार श्लेषके बिना भी रह सकते हैं। इसलिए जहाँ श्लेषके साथ अन्य अलङ्कारोंकी उपस्थिति हो, वहाँ अन्य अलङ्कारों- की उपेक्षा कर श्लेषको ही प्रधान अलङ्कार मानना चाहिये। अन्यथा यदि उन स्थलोंपर भी अन्य अलङ्कार ही माने जायँ तो श्लेषके लिए कोई अवसर ही नहीं रहेगा। इसलिए इस प्रकारके स्थलोंमें श्लेष अन्य अलङ्कारोंका बाधक बन जाता है। अलङ्कारसर्वस्वकारके इस मतके खण्डनके लिए मम्मट आगे ऐसा उदाहरण देते हैं, जिसमें किसी अन्य अलङ्कारके साहचर्यके बिना केवल श्लेष अलङ्कार स्वतन्त्ररूपसे रहता है। श्लोकका अरथ निम्नलिखित प्रकार है- हे [विष्णु ] देव ! आप ही पाताल [लोक और दूसरे पक्षमें 'पाता अलं' संसारके सदा रक्षक] हैं। आप ही संसारकी आशाओंके केन्द्र [दूसरे पक्षमें आशा अर्थात् दिशाओंके व्यवहारके केन्द्र अर्थात् भूलोक' हैं और आप ही [ ऊपर ] देवताओं तथा मरुदगणों [देवयोनिविशेष ] के निवासस्थान [स्वर्ग- लोक, दूसरे पक्षमें चामर अर्थात् राजचिह्न चामरके डुलानेसे उत्पन्न मरुत् अर्थात् वायुका भोग करनेवाले] हो। [इस प्रकार आप] अकेले ही तीनों लोकस्वरूप हैं ॥३८०॥ इत्यादि उपमा आदि [अन्य अलङ्कारों ] से रहित [शुद्ध ] श्लेषका [स्वतन्त्र ] उदाहरण है। इसलिए 'पल्लवाताम्रभास्वत्करविराजिता' इत्यादि विवादास्पद उदाहरणमें श्लेषको उपमाका बाधक माननेका कोई आधार नहीं है। अतः वहाँ श्लेष प्रधान अलङ्गार तो हो ही नहीं सकता है। प्रधान अलङ्गार तो उपमा ही है। अधिकसे अधिक यह कहा जा सकता है कि वहाँ अप्रधानरूपसे ही सही, श्लेषका भी प्रतिभासमात्न होता है, इसलिए] दोनोंका योग होनेपर सङ्कर [अलङ्गार ] ही [हो सकता है।]
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का० ८५, सू० ११६] नवम उल्लास: ४२६
उपपत्तिपर्यालोचने तु उपमाया एवायं युक्तो विषयः । अन्यथा विषयापहार
एव पूर्णोपमाया: स्यात्।
न च
अविन्दुसुन्दरी नित्यं गलल्लावण्यविन्दुका' इत्यादौ विरोधप्रतिभोत्पत्तिहेतुः श्लेषः। अपि तु श्लेषप्रतिभोत्पत्तिहेतुविरोधः ।
न ह्यत्रार्थद्वयप्रतिपादकः शब्दश्लेषः द्वितीयार्थस्य प्रतिभातमात्रस्य प्ररोहाभावात्।
तर्क [युक्ति, उपपत्ति] की दृष्टिसे विचार करें, तब तो इसे उपमाका ही उदाहरण मानना उचित है। अन्यथा पूर्णोपमाका विषय ही समाप्त हो जायगा [ क्योंकि श्लेष तो केवल 'भास्वत्करविराजितत्व' रूप साधारणधर्मकी प्रतीतिको उद्धावित करता है। उसका अन्य कोई उपयोग नहीं है। उस साधारण- धर्मकी प्रतीतिको करानेके कारण यदि श्लेषकी मुख्य स्थिति मानी जाय, तब तो पूर्णोपमाके सभी उदाहरणों- में उपमानगत तथा उपमेयगत साधारणधर्मके स्वरूपतः भिन्न होनेपर भी एक शब्दसे अभिहित होनेके कारण श्लेषसे ही सर्वत्र साधारणधर्मका बोध होता है, इसलिए सर्वत्र श्लेषकी मुख्य स्थिति हो जायगी। फलतः पूर्णोपमाका विषय ही कहीं नहीं रहेगा। इसलिए यहाँ श्लेष नहीं, अपितु उपमा अलङ्गार ही मानना चाहिये, यह ग्रन्थकारका अभिप्राय है]।
विरोधाभास भी श्लेषका बाधक 'पल्लवाताम्रभास्वत्करविराजिता' इत्यादि उदाहरणोंमें श्लेषको उपमा अलङ्कारका बाधक न मानकर उपमाको ही श्लेषालङ्कारका बाधक मानना चाहिये, यह बात ग्रन्थकारने यहाँतक प्रतिपादित की है। इसी नीतिका प्रयोग अन्य अलङ्कारोंके साथ श्लेषकी स्थिति होनेपर भी करना चाहिये। इस बातको दिखलानेके लिए ग्रन्थकार आगे ऐसा उदाहरण देते हैं, जिसमें विरोधाभास अलङ्कारके साथ श्लेषकी स्थिति पायी जाती है। अलङ्कारसर्वस्वकारके अनुसार उसमें श्लेषालङ्कार विरोधाभासका बाधक होना चाहिये, ग्रन्थकार मम्मट उसमें भी विरोधाभासको ही प्रधान अलङ्कार मानते हैं और श्लेषको केवल आभासमात्र मानते हैं। इसी बातको ग्रन्थकार आगे निम्नलिखित प्रकार लिखते हैं- '[अप्सु प्रतिबिम्बितः इन्दुः अबिन्दुः तद्वत् सुन्दरी ] जलमें प्रतिबिम्बित चन्द्रमाके समान सुन्दरी इस [तरुणी ] के मुखसे निरन्तर लावव्यकी बूंदे गिरती रहती हैं।' इत्यादि. उदाहरणमें [ 'अबिन्दुसुन्दरी' अर्थात् बिन्दुरहित और 'गलल्लावण्यबिन्दुका' अर्थात् लावण्यबिन्दुसहित इत्यादि रूप ] विरोधके प्रतिभोत्पत्ति [गौण-प्रतिभासमात्र] का हेतु [भुख्य] श्लेष [अलङ्गार ] नहीं है, अपितु [गौणरूपसे प्रतिभातमात्र होनेवाले ] श्लेषके प्रतिभासमात्रकी उत्पत्तिका हेतु बिरोध [अलङ्गार] है। क्योंकि यहाँ बिन्दुरहित और बिन्दुसहित रूप [द्वितीय अर्थका प्रतिपादक शब्दका श्लेष नहीं है अवितु द्वितीयार्थका प्रतिभासमात् होता है, उसका प्ररोह नहीं होता है[ अर्थात् अन्तिम चरमरूपसे अन्वयमें सम्बद्ध न होनेसे श्लेष यहाँ वास्तविक नहीं, केवल कुछ देरके लिए क्षणिकरूपसे प्रतिभातमात्र होता है ]।
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४३० काव्यप्रकाश: [का० ८५, सू० ११६
न च विरोधाभास इव विरोधः, श्लेषाभास: श्लेषः । तदेवमादिषु वावयेषु श्लेषप्रतिभोत्पत्तिहेतुरलङ्कारान्तरमेव। तथा च (१) सद्वंशमुक्तामणिः ॥३८१।
इसका अभिप्राय यह हुआ कि यदि श्लेषका पर्यवसान अन्तिम अन्वयमें होता, तब तो यहाँ श्लेषालङ्कार माना जा सकता था। परन्तु इस वाक्यका अन्तिम अ्रपर्थ तो यह होता है कि 'जलमें प्रतिबिम्बित चन्द्रमाके समान उस सुन्दरीसे निरन्तर लावण्य-बिन्दु प्रवाहित होते रहते हैं'। 'अबिन्दु' अर्थात् बिन्दु- रहितसे बिन्दुओंका प्रवाह कैसे हो सकता है, यह विरोधसूचक अर्थ अबिन्दुपदके श्लेषसे एक बार प्रतीत होता है, परन्तु अबिन्दुका अर्थ, 'जलमें प्रतिविम्बित चन्द्रमा' है यह बात प्रतीत हो जानेपर वह श्लेष समाप्त हो जाता है, अन्तिम अन्वयके समयतक श्लेषकी स्थिति नहीं रहती है। बीचमें उसका प्रतिभासमात्र होता है, इसलिए श्लेषका प्ररोह न होनेसे यहाँ श्लेषालङ्कार नहीं कहा जा सकता है। यद्यपि श्लेषके समान ही विरोध भी बीचमें तनिक देरके लिए प्रतीत हो जाता है और जब 'अबिन्दुसुन्दरो' पदका 'जलमें प्रतिबिम्बित चन्द्रमा' रूप दूसरा अर्थ प्रतीत हो जाता है, तब विरोध भी समाप्त हो जाता है। तब वहाँ विरोधालद्कार भी कैसे माना जा सकता है, यह शङ्का हो सकती है। इसका समाधान ग्रन्थकारने यह किया है कि विरोधकी अवास्तविकता ही तो विरोधालङ्कार है। यदि विरोध अ्ररवास्तविक न होकर वास्तविक हो जाय तो वह अ्लङ्कार नहीं रहेगा, अपितु दोष हो जायगा। इसलिए यहाँ 'अबिन्दुसुन्दरी' पदका द्वितीय अर्थ प्रतीत होनेपर विरोधका परिहार हो जानेके कारण ही विरोधालङ्कार है। श्लेषके विषयमें यह बात नहीं है। श्लेषमें तो उसकी वास्तविकता ही अलङ्कार है, अवास्तविकता अलङ्कार नहीं है। विरोधमें उसकी वास्तविकता दोष है और अवास्तविकता या प्रतिभासमात्र ही अलङ्कार है। इसलिए इस उदाहरणमें विरोधाभास ही मुख्य अलङ्कार है। इसी बातको ग्रन्थकार अगलो पंक्तिमें कहते हैं- और जैसे विरोधका आभास [मात्र ] विरोध [अलङ्गार ] है [ वास्तविक विरोध अलङ्गार नहीं अपितु दोष है] उसी प्रकार श्लेषका आभासमात्र श्लेष अलङ्गार नहीं है [ अपितु वास्तविक श्लेष ही अलङ्कार है। 'अबिन्दुसुन्दरी' इत्यादि उदाहरणमें श्लेषका आभासमात्र है, वास्तविक श्लेष नहीं है, इसलिए इसमें भी श्लेष मुख्य अलङ्कार नहीं है अपितु विरोधाभास ही मुख्य अलङ्गार है]। इसी नियमका सामान्यरूपसे उपसंहार करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं- इसलिए इस प्रकारके वाक्योंमें [ जहाँ अन्य अलङ्कारोंके साथ श्लेषकी स्थिति होती है, वहाँ ] अन्य अलङ्कार ही [मुख्य होते हैं, और वे ] श्लेषके गौणरूपसे प्रतीतिमात्रके हेतु होते हैं [ इसी नियमको अन्य चार अलङ्कारोंपर घटाते हैं]। इसलिए जैसे कि -- [१][यह राजा सद्वंश ] अर्थात् सत्कुल [रूप जो सुन्दर वंश अर्थात् बाँस उस ] का [मध्यस्थ ] मुक्तामणि है॥।३८१। इसमें वंश शब्द श्लिष्ट है। इसके दो अर्थ हैं, एक तो कुल और दूसरा बाँस। यहाँ 'वंश' शब्दके श्लेषके कारण कुलपर बाँसका आरोप होनेके बाद राजापर मुक्तामणिका आरोप होता है, इसलिए श्लेषके साथ परम्परित रूपक अलङ्कार है। परन्तु इसमें श्लेष केवल प्रतिभातमात्र ही होता है, वास्तविक प्रधान अलङ्कार 'परम्परित रूपक' ही है।
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का० ८५, सू० ११६ ] नवम उल्लास: ४३१ ;
(२) नाल्प: कविरिव स्वल्पश्लोको देव ! महान् भवान् ।३८२। (३ ) अनुरागवती सन्ध्या दिवसस्तत्पुरःसरः । अहो दैवगतिश्चित्रा तथापि न समागमः ॥३८३॥ (४) आदाय चापमचलं कृत्वाऽहीनं गुणं विषमदृष्टिः । यश्चित्रमच्युतशरो लक्ष्यमभाङक्षीन्नमस्तस्मै ।।३८४।।
(२) हे राजन् ! आप छोटे कविके समान थोड़े [श्लोक पद्यरचना तथा ] यशवाले नहीं हैं, किन्तु महान् हैं॥३८२॥ यहाँ 'श्लोक'पद श्लिष्ट है, उसके दो अर्थ हैं, एक कीति, दूसरा पद्यरचनारूप श्लोक। इसके द्वारा आप छोटे कविके समान स्वल्पश्लोक नहीं अपितु महान् कीरतिवाले हैं', यह व्यतिरेकालङ्कार पर्यवसितरूपमें प्रधानतया प्रतीत होता है। श्लेष केवल प्रतिभातमात्र होता है, पर्यवसित मुख्य अलङ्कार नहीं है। (३) सन्ध्या [काल और सन्ध्यारूप नायिका ] अनुराग [अर्थात् लालिमा एवं स्नेह ] से युक्त है और [नायकरूप ] दिन उसके सामने [ या आगे-आगे] चल रहा [बढ़ रहा] है। परन्तु फिर भी उसका समागम [मिलन या स्त्री-पुरुषका संयोग ] नहीं होता है, यह दैवगति कितनी विचित्र है ॥३८३॥ इसमें 'अनुराग' तथा 'समागम' पद श्लिष्ट हैं। इनके दो-दो अर्थ होते हैं, एक सन्ध्यापरक अर्थ दूसरा नायक-नायिकापरक अरथ। इसके आधारपर श्लोकमें समासोक्ति अलङ्कार है। परन्तु यहाँ भी श्लेष प्रतिभातमात्र होता है, परम विश्रान्ति श्लेषमें नहीं, अपितु समासोक्ति अलङ्गारमें है। इंसलिए श्लोकका प्रधान अल्कार श्लेष नहीं, अपितु समासोक्ति ही है। (४) जिन विषमदृष्टि अर्थात् वकदृष्टि त्रिलोचन शिवने [दूसरे पक्षमें दूषित दृष्टि-वाले धानुष्कने ] अचल अर्थात् मन्दराचल [दूसरे पक्षमें गति-रहित ] चापको लेकर और [अहीनां सर्पाणाम् इनं प्रभुं वासुकिं] नागराज वासुकिको प्रत्यञ्चा बनाकर [दूसरे पक्षमें हीनं निकृष्टं अथवा अहीनं धनु- दण्डादन्यूनं अर्थात् धनुर्दण्डसे भी बड़ी अथवा निकृष्ट प्रत्यञ्चा बनाकर] अच्युत विष्णुरूप बाण द्वारा [दूसरे पक्षमें बाणको छोड़े बिना ही लक्ष्य अर्थात् त्रिपुरासुररूप ] निशानेको [ दूसरे पक्षमें सौसह स्त्ररूप लाख निशानोंको ] भेद दिया उन [अपूर्व धनुर्धर शिव] को नमस्कार है ॥३८४॥ इस श्लोकमें 'अचलं', 'अहीन', 'विषमदृष्टिः, 'अच्युतशरः' तथा 'लक्ष्य' पद श्लिष्ट हैं। 'अचल' पदका मन्दराचल तथा निष्किरिय दो अर्थ होते हैं। 'अहीन का अर्थ सर्पराज वासुकि होता है। दूसरे पक्षमें सन्धिविच्छेदसे 'अहीन' के बजाय 'हीन' पद निकलता है, उसका अर्थ निक्ष्ट होता है। 'अहीन' पदच्छेद मानकर धनुषके दण्डसे जो कम न हो यह अर्थ होता है। साधारणतः प्रत्यञ्चाकी लम्बाई धनुषके दण्डको लम्बाईसे कम ही होनी चाहिये। अन्यथा 'अहीन' 'प्रत्यञ्चावाले धनुषसे लक्ष्यवेध सम्भव नहीं हो सकता है। 'अच्युतशरः' का एक अर्थ बाणको छोड़े बिना होता है और दूसरे पक्षमें 'अच्युत' अर्थात् विष्णु जिसके बाण हैं, ऐसा होता है। इनमें एक अर्थ विरोधका सूचक और दूसरा उसके परिहार- का सूचक होता है। इस प्रकार श्लेषके रहते हुए भी श्लोककी चरम विश्रान्ति विरोधाभासकी प्रतीतिमें ही होती है। श्लेष केवल प्रतिभातमात्र होकर समाप्त हो जाता है। इसलिए चरम विश्रान्तिधाम
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४३२ काव्यप्रकाश: [का० ८५, सू० ११६ इत्यादौ एकदेशविवर्तिरूपकश्लेषव्यतिरेकसमासोक्तिविरोधत्वमुचितम्, न तु श्लेषत्वम् । शब्दश्लेष इति चोच्यते अर्थालङ्कारमध्ये च लक्ष्यते इति कोऽयं नयः ? किञ्च 'वैचित्र्यमलङ्कारः' इति य एव कविप्रतिभासंरम्भगोचरस्तत्रैव विचित्रता इति सैवाऽलङ्कारभूमिः । होनेसे विरोधाभास ही मुख्य अलद्कार ठहरता है। यद्यपि यह विरोध भी वास्तविक विरोध नहीं है, अपितु केवल आभासमात्न है, परन्तु वास्तविक विरोध न होनेपर भी विरोधका आभास ही तो विरोधाभास अलङ्कार है। वास्तविक विरोध तो अलद्कार नहीं, अपितु दोष हो जाता है, इसलिए यहाँ विरोधाभासको ही विरोध नामसे कहा जाता है। यही मुख्य अलद्दार है, श्लेष नहीं। [इस प्रकार 'सद्वंशमुक्तामणिः' ] इत्यादि [ पूर्वोक्त चारों उदाहरणों ] में [त्रमशः ] १. एक- देशविर्वततिरूपक, २. श्लेषमूलक व्यतिरेक, ३. समासोक्ति तथा ४. विरोध [अलङ्गार मानना ] ही उचित है, न कि श्लेष। इस प्रकरणमें, पृष्ठ सं० ४२५ पर जो अलङ्कारसर्वस्वकारका मत पूर्वपक्षके रूपमें दिया था उसके तीन अंश किये जा सकते हैं, यह बात पहिले लिखी जा चुकी है। उसमेंसे एक अभङ्गश्लेषके अरथालङ्कार माननेवाले अंशका तथा दूसरे अंश अर्थात् श्लेष अलङ्कारको उपमा आदि अलद्दारोंका बाधक मानने परक अंशका निराकरण ग्रन्थकारने यहाँतक कर दिया। अब उस पूर्वपक्षका तीसरा अंश शेष रह जाता है। उस पूर्वपक्षका अभिप्राय यह है कि स्वरभेदादिके कारण भिन्नप्रयत्नोच्चार्य शब्दोंका जतु- काष्ठन्यायसे होनेवाला शब्दश्लेष तथा स्वरभेदादिके अभावमें अ्रभिन्नप्रयत्नोच्चार्य शब्दोंमें एकवृन्तगत- फलद्वयन्यायसे दो अरथोंका होनेवाला अर्थश्लेष, दोनों ही 'शब्दश्लेपोऽर्थश्लपश्च द्विविधोपि अर्थालङ्कार- मध्ये परिगणितोऽन्यः' दोनोंको ही अलङ्कारसर्वस्वकारने अरथश्लेषमें गिना है। इन दोनोंके अर्थालङ्कार में गिने जानेका खण्डन करनेके लिए ग्रन्थकार अगली पंक्ति लिखते हैं कि- (१) [शब्दश्लेषको आप नामसे तो ] शब्दश्लेष कहते हैं और अर्थालङ्गारोंमें गिनते हैं, यह कौन-सा सिद्धान्त हुआ ? [अर्थात् जब स्पष्टरूपसे आप श्लेषके एक भेदको शब्दश्लेष नामसे कहते हैं, तब उसकी गणना शब्दालङ्गारोंमें करनी चाहिये। अर्थालङ्गारोंमें उसको सम्मिलित करना उचित नहीं है ]। (२) [और दूसरी बात यह भी है कि वैचित्य अर्थात् ] चमत्कार ही अलङ्गार है। इसलिए [शब्द तथा अर्थमेंसे ] जो कोई कविकी प्रतिभा और प्रयत्न [संरम्भ शक्ति तथा व्युत्पत्ति ] का विषय होता है, उसीमें चमत्कार होता है और वही अलङ्गार होता है [ इसलिए जहाँ शब्दपर कविका विशेष बल रहता है, वहाँ शब्दका ही चमत्कार होता है, उस शब्दको बदल देनेपर वह चमत्कार नहीं रहता है। इसलिए उस स्थलपर शब्दालड्गार मानना उचित है और जहाँ शब्दका परिवर्तन कर देनेपर भी अलङ्कारकी हानि नहीं होती है, वहाँ यह समझना चाहिये कि कविका मुख्य बल शब्दपर नहीं अपितु अर्थपर है। इसलिए वहाँ अर्थालङ्गार मानना चाहिये ]।
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का० 5५, सू० ११६] नवम उल्लास: ४३३ अर्थमुखप्रेक्षित्वमेतेषां शब्दानामिति चेत्, अनुप्रासादीनामपि तथैवेति तेऽप्यर्था- लङ्काराः किं नोच्यन्ते ? रसादिव्यञ्जकस्वरूपवाच्यविशेषसव्यपेक्षत्वेऽपि ह्यनुप्रासा- दीनामलङ्कारता। शब्दगुणदोषाणामप्यर्थापेक्षयैव गुणदोषता। अर्थगुणदोषालङ्काराणां शब्दापेक्षयैव व्यवस्थितिरिति तेऽपि शब्दगतत्वेनोच्यन्ताम्। 'विधौ वक्रे मूर्ध्नि' इत्यादौ च वर्णादिश्लेषे एकप्रयत्नोच्चार्यत्वेऽर्थश्लेषत्वं शब्दभेदेऽपि प्रसज्यतामित्येवमादि स्वयं विचार्यम्।
अर्थापेक्षितासे अर्थालङ्गारत्व नहीं श्लेषके दोनों भेदोंको अर्थालङ्कार माननेके पक्षमें अलङ्कारसर्वस्वकारकी ओरसे यह युक्ति दी जा सकती है कि श्लेष सदा अर्थमुखापेक्षी होता है। क्योंकि दो अथोंकी प्रतीतिके बिना न श्लेष हो ही सकता है और न उसमें चमत्कार ही आ सकता है, इसलिए अर्थमुखापेक्षी होनेसे श्लेषके दोनों भेदोंकी अर्थालङ्कारोंमें ही गणना करनी उचित है। इसका खण्डन करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि- (३) इन [श्लेषपरक ] शब्दोंका अर्थमुखापेक्षित्व है। [अर्थात् बिना दो अर्थोंकी प्रतीतिके श्लेष हो ही नहीं सकता है। इसलिए श्लेषके दोनों भेदोंको अर्थालङ्गार माना जाता है] यह कहा जाय तो अनुप्रास आदि [प्रसिद्ध शब्दालङ्गारों] का भी उसी प्रकार [अर्थमुखापेक्षित्व ] है, इसलिए उनको भी अर्थालङ्गार क्यों नहीं मानते हो ? (४) रसादिके व्यञ्जकरूप वाच्य अर्थकी अपेक्षासे ही अनुप्रास आदिकी अलङ्कारता होती है[ अर्थात् जहाँ रसानुसारी वर्णसाम्य होता है, वहीं अनुप्रास अलङ्गार होता है। रसविरोधी वर्णोंका साम्य होनेपर अनुप्रासालद्वार नहीं होता है। इसलिए अनुप्रास आदि शब्दालङ्गारों- में भी इस प्रकार अर्थमुखापेक्षिता आ जाती है, तब उनको भी अर्थालङ्गार मानना चाहिये। परन्तु अनुप्रा- सादिको अलङ्गारसर्वस्वकार भी शब्दालङ्गार ही मानते हैं, अर्थालङ्गार नहीं। इसी प्रकार शब्दश्लेषमें भी अर्थापेक्षिता होनेपर भी उसको अर्थालङ्गार न मानकर शब्दालङ्गार मानना ही उचित है, यह ग्रन्थकार- का अभिप्राय है]। और शब्दगुण तथा शब्ददोषोंकी गुण-दोषता अर्थमुखापेक्षिणी ही होती है। इसी प्रकार अर्थगत गुण, दोष तथा अलङ्गारोंकी स्थितिमें भी शब्दकी अपेक्षा रहती है [ आपके मतसे ] उनको भी शब्दगत मानना चाहिये [ इसलिए आप जो अर्थापेक्षी कहकर शब्दश्लेषकी गणना अर्थालङ्गारोंमें करना चाहते हैं, वह उचित नहीं है]। एक बात अलङ्कारसर्वस्वकारने यह कही थी कि अभिन्नप्रयत्नोच्चार्य पदोंमें एकवृन्तगत-फलद्वय- न्यायसे होनेवाला श्लेष, अर्थश्लेष हो कहलाता है। उसका भी खण्डन करते हुए ग्रन्थकार अगलो पंक्तिमें लिखते हैं कि- (५) [उदाहरण सं० ३७० में ] 'विधौ वक्रे मूधि्नि' इत्यादिमें [विधि तथा विधुरूप पदोंमें इकार-उकाररूप ] वर्णादिका श्लेष होनेपर [भी अभिन्नप्रयत्नोच्चार्य होनेसे [ 'विधि' तथा 'विधु' रूप] शब्दोंका भेद होनेपर भी अर्थश्लेष होने लगेगा। इत्यादि [अनेक दोष अलङ्गारसर्वस्वकारके मतमें आ जाते हैं, अतः उनका श्लेषविषयक सारा सिद्धान्त ही दूषित है] यह उनको स्वयं विचार करना चाहिये। २८
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४३४ काव्यप्रकाश: [ का० ८५, सू० १२०
[सू० १२० ] तच्चित्रं यत्र वर्णानां खङ्गाद्याकृतिहेतुता ।८५।। सन्निवेशविशेषेण यत्र न्यस्ता वर्णाः खङ्गमुरजपद्माद्याकारमुल्लासयन्ति तच्चित्र काव्यम् । कष्टं काव्यमेतदिति दिङ्मात्रं प्रदर्श्यते। उदाहरणम्- (१) मारारिशकरामेभमुखेरासाररंहसा । सारारब्धस्तवा नित्यं तदातिहरणक्षमा ।३८५॥ माता नतानां सङ्डट्ट: श्रियां वाधितसमभ्रमा।कर हही मान्याजथ सीमा रामाणां शं मे दिश्यादुमादिमा ॥३८६॥ [खङ्गवन्धः ]
५. चित्र अलङ्गार [सूत्र १२०]-जहाँ [जिस बन्धमें ] वर्णोंकी [ रचना] खङ्ग आदिकी आकृतिका हेतु हो जाती है, वह 'चित्र' [नामक शब्दालङ्गार कहलाता है] ॥।८५।। जहाँ विशेष प्रकारके विन्याससे लिपिबद्ध किये गये वर्ण खङ्ग, मुरज, कमल आदिके आकारको प्रकट करते हैं, वह 'चित्र' [अर्थात् चित्र अलङ्गारयुक्त ] काव्य कहलाता है। यह क्लिष्ट काव्य होता है इसलिए उसका दिग्दर्शनमात्र कराते हैं। (क) खङ्गबन्ध उदाहरण, जसे -- [मार कामदेवके अरि ] शिव, इन्द्र, राम तथा [ इभमुखः गजानन ] गणेशके द्वारा [आसाररंहसा ] धाराप्रवाहसे जिसकी उत्कृष्ट स्तुति प्रारम्भ की गयी है, इस प्रकारकी और उन [शिव आदिकी पीड़ाका सदा निवारण करनेवाली -- विनयावनत भक्तोंकी माता [सब प्रकारकी ] लक्ष्मियोंकी सम्मेलनभूमि, भक्तोंके भयका निवारण करनेवाली [ बाधितसम्भ्रमा ], स्त्रियोंकी मर्यादारूप, परम माननीया और अनादि [ आदिमा] उमा पार्वती [मे शं दिश्यात् ] मेरा कल्याण करे ॥३८५-३८६॥ यह खङ्गवन्ध है। [इन दो श्लोकोंसे] खङ्गका आरकार बन जाता है।
स रारिशकर रामेभमुखै-ासाररंह रारब्धस्तवा नित्यं तदाति हरण न न्याथ सी मा: दिमा रामाणा शं धित स्:म ता नतानां सङ्गट मे दिश्या द
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का० ८५, सू० १२०] नवम उल्लास: ४३५
सरला बहुलारम्भतरलालिवलारवा। वारलाबहुलामन्दकरलाबहुलामला।२८७।। [ मुरजवन्धः]
पहिले मूठके ऊपर और नीचे दो शाखावाला उपरिलिखितप्रकारका खङ्गका चित्र बनाओ। उसकी मूठके निचले हिस्सेके बीचमें श्लोकका प्रथम अक्षर 'मा' लिख दो। तलवारकी सबसे निचली नोकके बोचमें प्रथम श्लोकके पूर्वार्द्धका अन्तिम अ्र्प्रक्षर 'सा' लिख दो। अब प्रथम श्लोकके शेष अ्क्ष रोंको मा'के बादसे आरम्भ करके खङ्गके एक ओर लिखते हुए चले जाओ तो तलवारकी निचली नोकपर पूर्वार्द्ध 'सा' अक्षरपर समाप्त हो जायगा। वहाँसे ही उत्तरार्द्धको तलवारके दूसरे भागपर लिखना आरम्भ कर दो और तलवारके एक ओर लिखते चले जाओ तो मूठके निचले भागके बीचमें पूर्वलिखित 'मा' अक्षरपर आकर वह समाप्त हो जायगा। इस 'मा'को केन्द्र मानकर मूठके निचले दोनों फलकोंमें दूसरे श्लोकका प्रथम चरण एक ओर तथा दूसरा चरण दूसरी ओर आ जायगा। इसी प्रकार द्वितीय श्लोक के तृतीय तथा चतुर्थ दोनों चरण मूठके ऊपरवाले भागके दोनों ओर लिखे जा सकते हैं। इस प्रकार ये दोनों श्लोक तलवार के आकारमें आ जाते हैं। (ख) मुरजबन्ध खङ्गबन्धके ये दोनों श्लोक रुद्रटके 'काव्यालद्वार' से लिये गये हैं। रुद्रटके आ्रधारपर ही आागे मुरजबन्धका उदाहरण देते हैं। इस श्लोकमें कवि शरद्का वर्णन कर रहा है। अर्थ इस प्रकार है -- सरला अर्थात् मेघादिके कौटिल्यसे रहित, अनेक प्रकारके व्यापारोंके कारण चञ्चल भ्रमर- समूहोंके कोलाहलसे युक्त, [वरटा वरला हंसिनी वरला एव वारला] प्रचुर हंसिनियोंसे सुशोभित, [अमन्दाः करलाः करग्राहिणो राजपुरुषा यस्यां] जिसमें अनेक राजपुरुष कर उगाहनेमें लगे हुए हैं, इस प्रकारकी और [बहुले कृष्णपक्षेऽ्रपि अमला ] कृष्णपक्षमें भी उज्ज्वल [शरदृतु सर्वोत्कर्षशालिनी] है॥३८७॥ श्लोकके चारों चरणोंके सारे वर्णोंको अलग-अलग करके चार पंक्तियोंमें लिखकर उनको निम्नलिखित प्रकारकी रेखाओंसे जोड़ देनेसे उसकी रचना मुरज नामक वाद्यके समान हो जाती है। इसलिए यह मुरजबन्धका उदाहरण होता है-
ला
ला दिव ल
बा ला व हे ला मे न्द
ला के ह लो म ला
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४३६ काव्यप्रकाश: [का० ८५, सू० १२०
भासते प्रतिभासार ! रसाभाताहताविभा। भावितात्मा शुभा वादे देवाभा बत ते सभा ॥३८८॥ [ पद्मबन्धः ]
(ग) पद्मबन्ध मुरजबन्धके बाद पद्मबन्धका उदाहरण देते हैं। अष्टदलका चित्र बनाकर उसके केन्द्रमें श्लोकका प्रथम अक्षर 'भा' रखकर श्लोकके दो-दो अक्षर आठों दलोंमें रख देनेसे इन सब अक्षरोंका विन्यास इस प्रकारका हो जाता है कि उससे श्लोकके ३२ अक्षरके चारों चरण पढ़े जा सकते हैं। उनके पढ़नेका प्रकार यह है कि कमलके आठों दलोंमेंसे चार दल दिशाओंमें और चार उपदिशाओंमें पड़ते हैं। इनमेंसे चार दिग्दलोंके अक्षरोंको दो बार पढ़ा जाता है। एक बार उनको बाहरकी ओरसे पढ़ते हुए काणिका या केन्द्रमें प्रवेश करते हैं, दूसरी बार केन्द्र या कणिकासे निकलते हुए भी उनका पाठ होता है। इस प्रकार इन चार दलोंमें लिखे हुए आठ अक्षरोंको पढ़ते समय १६ संख्या हो जाती है। शेष उपदिशाओ्ोंके चार दलोंमें आठ अक्षर मिलकर २४ अक्षर हो गये। केन्द्र या कणिकामें रखा हुआ अक्षर आठों दलोंके साथ आठ बार पढ़ा जाता है। इस प्रकार लिखे हुए १७ अक्षर पढ़ते समय ३२ तक्षर हो जाते हैं। पद्मबन्धका जो उदाहरण दिया है, उसका अर्थ निम्नलिखितप्रकार है- हे प्रतिभासार [अत्यन्त प्रतिभावान् राजन् ! 'शृङ्गारादि अथवा प्रीतिरूप ] रसोंसे शोभित [आभाता और अहता एवं आविभा ] अप्रतिहत एवं अत्यन्त दीप्तिमती' ['भावितात्मा'] जिसमें आत्मा- का चिन्तन किया जाता है तथा वादमें निपुणा आपकी सभा देवताओं [ की सभा] के समान है, यह बड़े आनन्द [या आश्र्वर्य] की बात है॥३८८।। पद्मबन्धमें इस श्लोकको निम्नलिखितप्रकार लिखा जाता है- उत्तर
त्माशु- -बता -वाद
हा स्वम ताविनमा-सते सु्ल ताह *सार प्रति-
दक्षिण
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का० ८५, सू० १२० ] नवम उल्लास: ४३७
रसासार ! रसा सारसायताक्ष ? क्षतायसा।
सातावात ! तवातासा रक्षतस्त्वस्त्वतक्षर ! ॥३८९॥
[सर्वतोभद्रम्]
(घ) सर्वतोभद्र
अगला उदाहरण 'सर्वतोभद्र' का है। यह भी रुद्रटके 'काव्यालङ्कार' से लिया गया है। अर्थ निम्नलिखितप्रकार है- हे पृथिवीके सार [पृथिवीमें सर्वश्रेष्ठ राजन् ]! रक्षण करनेवाले [रक्षतः तव ] आपकी [ रसा ] पृथिवी [क्षतायसा, क्षतः नाशितः अयः शुभावहविधिर्येषां ते क्षतायाः दुर्जनाः तान् स्यति अन्तं प्रापयति [षोऽन्तकर्मणि ] तादृशी क्षतायसा ] दुष्टोंका अन्त करनेवाली और [तु शब्द च के अर्थ में है। अतासा, तसु उपक्षये इस धातुसे अतासा पद बना है, न विद्यते तास: उपक्षयो यस्याः सा अतासा ] उपद्रव तथा उपक्षयसे रहित हो। [यह मुख्य वाक्यका अर्थ है। शेष 'सारसायताक्ष,' 'सातावात' तथा 'अतक्षर' ये तीन सम्बोधनात्मक विशेषण हैं। इनका अर्थ 'सारसं कमलं तद्वत् आयते विशाले अक्षिणी यस्य तादृश, सातावात सातं नाशितं अवातं अज्ञानं येन तादृश, अवात शब्द, वा गतिगन्धनयोः, धातुसे बना है। 'गते- स्त्रयोऽर्था: ज्ञानं गमनं प्राप्तिश्चेति' इस सिद्धान्तके अनुसार यहाँ 'वा' धातुका ज्ञानरूप अर्थ किया गया है। अथवा 'साते सुखे अवात अचञ्चल', अनासक्त यह 'सातावात'की दूसरी व्युत्पत्ति भी हो सकती है और 'अतक्षम् अनल्पं राति ददाति इति अतक्षर' ये तीन सम्बोधन विशेषण राजाके हैं] ॥३८६॥ सर्वतोभद्रके उदाहरणमें उस श्लोकके चारों चरणोंके अक्षरोंको साधारणरूपसे अलग-अलग करके चार पंक्तियोंमें लिख देना ही पर्याप्त होता है। उसकी रचनामें यह विशेषता होती है कि १. प्रत्येक चरणोंको सीधी ओरसे अथवा उल्टी शरसे चाहे किसी ओरसे पढ़ा जाये, एक ही प्रकारका पाठ उपलब्ध होता है, जैसे इसी उदाहरणमें। २. इसी प्रकार प्रत्येक पादके प्रारम्भिक चार तथा अन्तिम चार अक्षरोंको भी अनुलोम-विलोम सीधे-उल्टे किसी रूपसे पढ़नेपर एक पाठ रहता है। इसी प्रकार ३. चारों पादोंके प्रथम और अष्टम अक्षरकी पंक्तियोंको ऊपरसे नीचे या नीचेसे ऊपरकी ओर पढ़नेसे श्लोकका पाठ अक्षरोंका प्रथम चरण बन जायगा। ४. इसी प्रकार प्रत्येक पादके द्वितीय तथा सप्तम अक्षरोंको ऊपरसे नीचे या नीचेसे ऊपर किसी भी रूपमें पढ़नेपर श्लोकका दूसरा चरण बन जायगा। ५. इसी प्रकार चरणोंके तीसरे, छठे अक्षर, और चौथे तथा पाँचवें शक्षरोंको ऊपर-नीचे किसी भी ओरसे पढ़नेपर श्लोकका तीसरा तथा चौथा चरण बन जाता है। इस प्रकार सर्वतोभद्रमें अ्नेक प्रकारसे घुमा-फिराकर एक श्लोकको पढ़ा जा सकता है, इसलिए इसका नाम 'सर्वतोभद्र' रखा गया है। इसका लक्षण 'तदिष्टं सर्वतोभद्रं भ्रमणं यदि सर्वतः' इसी भावनाको व्यक्त करता है। सर्वतोभदके इस उदाहरण- को निम्नलिखित प्रकारसे लिखा जायगा।
र सा सा र र सा सा र सा य ता क्ष क्ष ता य सा। सा ता वा त त वा ता सा र क्ष त स्त्व स्त्व त क्ष र।।
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४३८ काव्यप्रकाश: [का० ८६, सू० १२१-२२
सम्भविनोऽप्यन्ये प्रभेदाः शक्तिमात्रप्रकाशका न तु काव्यरूपतां दधतीति न प्रदर्श्यन्ते। [सू० १२१ ] पुनरुक्तवदाभासो विभिन्नाकारशब्दगा । एकार्थतेव भिन्नरूपसार्थकानर्थकशब्दनिष्ठमेकार्थत्वेन मुखे भासनं पुनरुक्तवदाभासः । स च-
[सू० १२२] शब्दस्य सभज्जाभङ्गरूपकेवलशब्दनिष्ठः । उदाहरणम्- अरिवधदेहशरीर: सहसा रथिसूततुरगपादातः । भाति सदानत्यागः स्थिरतायामवनितलतिलकः ॥३९०॥
[इसी प्रकार इस चित्र अलङ्कारके] और भेद भी हो सकते हैं, परन्तु वे कविकी शक्तिमात्रके प्रदर्शक होते हैं [ लोकोत्तर चमत्कारके जनक न होनेसे] काव्यरूपताको धारण नहीं करते हैं, इसलिए यहाँ दिखलाये नहीं गये हैं। ६. पुनरुतवदाभास इस प्रकार १. वकोक्ति, २. अनुप्रास, ३. यमक, ४. श्लेष तथा ५. चित्र रूप पाँच शब्दालङ्कारोंके बाद छठे पुनरुक्तवदाभास अलङ्कारका निरूपण करते हैं। यह पुनरुक्तवदाभास शब्दालङ्कार और अर्थालङ्वार, दोनोंमें गिना जाता है, इसलिए शब्दालङ्वारोंके निरूपणके बाद तथा अगले दशम उल्लासमें अर्थालङ्कारोंका निरूपण प्रारम्भ करनेके पहिले दोनोंके बीचमें रखा गया है। [सूत्र १२१]-विभिन्न स्वरूपके शब्दोंमें रहनेवाली [समानार्थक न होनेपर भी ] समानार्थता- सी जो [प्रतीत होती ] है वह पुनरुक्तवदाभास [अलङ्गार कहलाता ] है। भिन्नरूपसे [कहीं-कहीं दोनों ] सार्थक और [कहीं दोनों या एकके ] अनर्थक शब्दोंमें आपाततः [प्रारम्भमें ] समानार्थकताकी प्रतीति [जहाँ होती है, वह ] पुनरुक्तवदाभास [अलङ्गार ] होता है। और वह [शब्द तथा अर्थ, दोनोंमें रहनेवाला होता है। उनमेंसे ]- SST [सूत्र १२२ ]-शब्दका [पुनरुक्तवदाभास ]- सभङ्ग तथा अभङ्गरूप केवल शब्दमें रहता है। उदाहरण --
प्रेरयति इति अरिवधदेहशरीर: ] शत्रुविनाशिनी चेष्टावाले योद्धाओंको प्रेरित करनेवाला [सहसा शीघ्रं -105 [अरिवधदा शत्रुविनाशिनी ईहा चेष्टा येषां तादृशाः ये शरिणः शरयुक्ता योद्धारः तान् ईरयति
हठेन वा रथिभि: सुष्ठु उताः सम्बद्धाः तुरगा अश्वाः पादाताः पदातिकाश्र यस्य सः] और जिसके अश्व [आरोही ] तथा पदाति सहसा [हठात् या ] शीघ्र रथियोंके साथ भली प्रकार मिल गये हैं, इस प्रकारका तथा स्थिरतामें [अग] पर्वतके समान और [अवनितलतिलकः ] भूतलका भूषणरूप [राजा] सदा विनम्रतासे [सदा नत्या, अथवा सतां विषये आनत्या, अथवा दुष्टोंके सामने अनत्या अनम्रत्वेन, भाति] शोभित होता है॥३६०।।
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का० ८६, सू० १२३ ] नवम उल्लास: ४३६
(२) चकासत्यङ्गनारामाः कौतुकानन्दहेतवः । तस्य राज्ञः सुमनसो विबुधाः पार्श्ववर्तिनः ।३९१।। [सू० १२३ ] तथा शब्दार्थयोरयम् ।।८६।। उदाहरणम्- तनुवपुरजघन्योऽसौ करिकुञ्जररुधिररक्तखरनखर: । तजोधाममहः पृथुमनसामिन्द्रो हरिजिष्णुः ।।३९२।। अत्रैकस्मिन् पदे परिवर्तिते नालङ्कार इति शब्दाश्रयः, अपरस्मिस्तु परिवर्तितेऽपि स न हीयते इत्यर्थनिष्ठः, इत्युभयालङ्कारोऽयम्। इति काव्यप्रकाशे शब्दालङ्कारनिर्णयो नाम नवम उल्लासः समाप्तः ।
इसमें देह-शरीर, सारथि-सूत और दान-त्याग शब्दोंकी आपाततः पुनरुवित-सी प्रतीत होती है, परन्तु अन्तमें पुनरुक्ति नहीं रहती है। ये शब्द सभी सभङ्ग हैं। इसलिए यह शब्दनिष्ठ सभङ्ग पुनरुक्त- वदाभासका उदाहरण है। देह-शरीरमें दोनों शब्द सार्थक और सभङ्ग हैं। सारथि-सूतमें पहिला शब्द अनर्थक और दूसरा सार्थक है और दोनों सभङ्ग हैं। दान-त्याग दोनों अनर्थक और सभङ्ग हैं। इनमेंसे किसीका परिवर्तन कर देनेपर यह अलङ्कार नहीं रह सकता है। इसलिए शब्दपरिवृत्त्यसह होनेके कारण शब्दालङ्कार माना जाता है। आगे अभङ्ग शब्दनिष्ठ पुनरुक्तवदाभासका उदाहरण देते हैं- उस राजाके [पार्श्ववर्त्ती ] सुन्दरी स्त्रियोंके साथ रमण करनेवाले, काव्यचर्चा आदिके द्वारा आनन्द प्रदान करनेवाले, सुन्दर मनवाले [सहृदय ] और विद्वान् पार्श्ववर्त्ती [मित्र] शोभित होते हैं।३६१ ।। इसमें अङ्गना :- रामा:, कौतुक-आ्रानन्द और सुमनसो-विबुधाः शब्द आ्पाततः पुनरुक्त-से प्रतीत होते हैं, परन्तु अरथका विचार करनेपर पुनरुक्ति नहीं रहती है। ये शब्द अभङ्ग हैं। इनमें शब्दपरि- वृत्तिसहत्व नहीं है। इसलिए यह श्लोक शब्दनिष्ठ अरभङ्ग पुनरुक्तवदाभासका उदाहरण है। [सूत्र १२३]-इसी प्रकार यह शब्द तथा अर्थ, दोनोंमें हो सकता है ॥८६।। [उभयनिष्ठ अलङ्काररूपमें ] उदाहरण [जैसे ]- यह सिंह कृशशरीर [तनुवपुः ] होनेपर भी [ अजघन्य ] श्रेष्ठ [अत्यन्त बलवान् ], बड़े श्रेष्ठ हाथियोंके रक्तसे रॅँगे हुए तीक्ष्ण नखोंवाला, तेजका धाम, [महसा तेजसा ] तेजके कारण उदार मनवालों- का राजा और विजयशील हैं॥३६२।। इसमें [तनु, कुञ्जर, रक्त इत्यादि ] कुछ पदोंका परिवर्तन कर देनेपर यह अलङ्गार नहीं रहता है इसलिए [ उस अंशमें ] शब्दाश्रित है। और [वपुः, करि, रुधिर आदि] दूसरोंका परिवर्त्तन कर देने- पर भी [अलङ्गारकी ] हानि नहीं होती है, इसलिए [ उस अंशमें ] अर्थनिष्ठ है। अतः यह उभयालङ्गार होता है। काव्यप्रकाशमें शब्दालङ्कारनिर्णय नामक नवम उल्लास समाप्त हुआ। श्रीमदाचार्यविश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोमणिविरचितायां काव्यप्रकाशदीपिकायां हिन्दीव्याख्यायां नवम उल्लास: समाप्तः ।
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अथ दशम उल्लास:
अथ काव्यप्रकाशदीपिकायां दशम उल्लासः। उल्लाससङ्ति कान्यपलारन प्रथम उन्लासमें काव्यका लक्षण करने समय 'अनलङकृती पुनः व्वापि' यह भी 'शब्दार्थी' का एक विशेषण दिया गया था। उसको स्पष्टरूपसे समझानेके लिए अलद्गारोंका निर्पण करना आवश्यक है, इसलिए इस ग्रन्थमें अलङ्कारोंका समावेश आवश्यक हुआ। इन अलद्दारोंके शब्दालद्कार, त्र्ा- लङ्गार तथा उभयालद्कार नामसे तीन भेद किये गये हैं। जो अलद्वार शब्दप्वृत्यसह होते हैं अ्रथात किन्हीं विशेष शब्दोंके रहनेपर ही जो अलद्कार रहते हैं और उन विशेष शब्दोंको बदलकर यदि उनके स्थानपर उनके पर्यायवाचक दूमरे शव्द रख दिये जायँ तो उन अलद्कारोंकी स्थिति नहीं रहती है, वे अलङ्कार उन विशेष शब्दोंके ही आश्रित होनेसे शब्दालद्वार कहलाते है। और जो अलद्कार शब्दपरि- वृत्तिसह होते हैं अर्थात् यदि उन शब्दोंका परिवर्तन करके उनके ममानार्थक दूसरे शब्द प्रयुक्त कर दिये जायँ तो भी त्लङ्गारोंकी कोई हानि नहीं होती है वे अलङ्कार शब्दाश्रित न होकर अपरथके आ्रश्रित होते हैं। इसलिए अर्थालद्कार कहलाते हैं। विगत नवम उल्लासमें ग्रन्थकारने १. वकोकति, २. अनुप्रास, ३. यमक, ४. श्लेप और ५. चित्र नामक पाँच अलद्कार तथा ६. पुनरुक्तवदाभास नामक उभयालङ्कार इन छह अलद्कारोंका निरूपण किया था। अब इस दशम उल्लासमें ६१ प्रकारके अर्थालङ्कारोंका निरूपण करते है। अलङ्गारसंख्याके विषयमें मतभेद इस प्रकार 'काव्यप्रकाश' में पाँच शब्दालङ्कार, ६१ अर्थालद्वारऔर १ उभयालङ्कार कुल मिलाकर ६७ प्रकारके अलङ्कारोंका निरूपण किया गया है। परन्तु अलङ्गारोंकी संख्या भिन्न-भिन्न आचार्योंके मतमें अलग-अलग पायी जाती है। भरत-नाटयशास्त्रमें उपमा, रूपक, दीपक तथा यमक केवल इन चार ही अलङ्कारोंका वर्णन पाया जाता है। वामनने उनके ३३ भेद दिखलाये हैं। दण्डीने ३५ प्रकारके, भामहने ३९ प्रकारके और उन्भटन ४० प्रकारके अलद्कारोंका वर्णन किया है। रुद्रटने अपने 'काव्या- लङ्गार' में ५२ तथा काव्यप्रकाशकारने ६७ प्रकारके अरलङ्कारोंके भेद दिखलाये हैं। जयदेवके 'चन्द्रालोक'- में अलङ्कारोंकी संख्या १०० हो गयी है और उनके व्याख्याकार अप्पय्यदीक्षितने 'कुवलयानन्द'में उसको बढ़ाकर १२४ तक पहुँचा दिया है। इसका संग्रह हमने निम्नलिखितप्रकार दिया है- उपमा रूपक चैव दीपको यमकस्तथा। चत्वार एवालड्वारा भरतेन निरूपिता: ॥१॥ वामनेन तर्यास्त्रिशद् भेदास्तस्य निरूपिताः । पञ्चत्रिंशद्विधश्चायं दण्डिना प्रतिपादितः ॥२।। नवत्रिशद्विधश्चायं भामहेन प्रकीतितः । चत्वारिशद्विधश्चैव उ्टेन प्रदर्शितः ॥।३।। द्विपञ्चाशद्विध: प्रोक्तो रुद्रटेन ततः परम्। सप्तषष्टिविधः प्रोक्तः प्रकाशे मम्मटेन च ।४।। शतधा जयदेवेन विभक्तो दीक्षितेन च। चतुर्विशतिभेदास्तु कृता एकशतोत्तराः ।।५।।
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का० ८७, सू० १२४ ] दशम उल्लास: ४४१ कराम उल्लाय 'काव्यप्रकाश' के ६१ अर्थालङ्कार 'काव्यप्रकाश' के इस दशम उल्लासमें व्णित ६१ अर्थालङ्कारोंके नाम निम्नलिखित प्रकार हैं- १ उपमा, २ अनन्वय, ३ उपमेयोपमा, ४ उत्प्रेक्षा, ५ ससन्देह, ६ रूपक, ७ अपह्नति, ८ श्लेष, ६ समासोक्ति, १० निदर्शना, ११ अप्रस्तुतप्रशंसा, १२ अतिशयोक्ति, १३ प्रतिवस्तूपमा, १४ दृष्टान्त, १५ दीपक, १६ तुल्ययोगिता, १७ व्यतिरेक, १८ आक्षेप, १६ विभावना, २० विशेषोक्ति, २१ यथासंख्य, २२ अर्थान्तरन्यास, २३ विरोधाभास, २४ स्वभावोकिति, २५ व्याजस्तुति, २६ सहोक्ति, २७ विनोक्ति, २८ परिवृत्ति, २६ भाविक, ३० काव्यलिङ्ग, ३१ पर्यायोक्ति, ३२ उदात्त, ३३ समुच्चय, ३४ पर्याय, ३५ अनुमान, ३६ परिकर, ३७ व्याजोक्ति, ३८ परिसंख्या, ३६ कारणमाला, ४० अन्योन्य, ४१ उत्तर, ४२ सूक्ष्म, ४३ सार, ४४ असङ्गति, ४५ समाधि, ४६ सम, ४७ विषम, ४८ अधिक, ४६ प्रत्यनीक, ५० मीलित, ५१ एकावली, ५२ स्मृति, ५३ भ्रान्तिमान्, ५४ प्रतीप, ५५ सामान्य, ५६ विशेष, ५७ तद्गुण, प८ अतद्गुण, ५६ व्याघात, ६० संसृष्टि, ६१ सङ्कर। अलङ्कारोंका वर्गोकरण 'अलङ्कारसर्वस्व'के निर्माता रुय्येक [बारहवीं शताब्दीका मध्यभाग] ने ६७ अलङ्कारोंका प्रतिपादन किया है और रचनाशैलीके आधारपर सात मुख्य भागोंमें उन समस्त अलङ्कारोंका वर्गीकरण किया है। इनमें प्रथम वर्गके फिर चार अवान्तर विभाग किये हैं। इस प्रकार अलङ्गारोंके ४+६=१० वर्ग बन जाते हैं। उनके नाम और उनके अन्तर्गत अलङ्कारोंकी संख्या निम्नलिखित प्रकार है- १ सादृश्यमूलक अलङ्कार २ विरोधमूलक अलङ्कार ११
[४ + ६ + २ + १७ = २ ] ३ शृङ्धलाबन्धमूलक अलङ्कार ३
अ-भेदाभेदप्रधान ४ ४ तकन्यायमूलक अलङ्कार २
आर-आरोपमूलक अभेदप्रधान ६ ५ वाक्यन्यायमूलक अलङ्कार इ-अध्यवसायमूलक अभेदप्रधान २ ६ लोकन्यायमूलक अलङ्कार ७
७ गूढ़ार्थप्रतीतिमूलक अलङ्कार ७
ई-गम्य औपम्यमूलक अलङ्कार १७ सादृश्यातिरिक्तमूलक अलङ्कार कुल ३८
सादृश्यमूलक अलङ्कार कुल २६ २६+३८ =६७ कुल अलङ्कार इस प्रकार रुय्यकने ६७ अलङ्कारोंका वर्गीकरण किया है। इन वर्गोंमें अन्तर्भूत अलङ्गारोंके नाम निम्नलिखितप्रकार हैं- १. सादृश्यमूलक चार अलङ्कार-अ-भेदाभेदप्रधान-१ उपमा [काव्यप्रकाश संख्या १], २ उपमेयोपमा [का० ३ ], ३ अनन्वय [का० २],४ स्मरण [का० ५२]। आर-आरोपमूलक अभेदप्रधान छह अलङ्कार-५ रूपक [का० ६], ६ परिणाम [का० अनुक्त ], ७ ससन्देह [का० ५], भ्रान्तिमान् [का० ५३], ६ उल्लेख [का० अनुक्त ], १० अपह्न ति [का० ७1 इ-अध्यवसायमूलक अभेदप्रधान दो अलङ्कार-११ उत्प्रेक्षा [का० ४ ], १२ अतिशयोक्ति [का० १२]। ई-गम्य औपम्याश्रित सादृश्यमूलक सत्नह अलङ्कार-१३ तुल्ययोगिता [का० १६], १४ [पदार्थगत ]दीपक [का० १५], १५ प्रतिवस्तूपमा [का० १३], १६ दृष्टान्त [का० १४],
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४४२ काव्यप्रकाश: [ का० ८७, सू० १२४
१७ [वाक्यार्थगत] निदर्शना [का० १०], १८ व्यतिरेक [का० १७ ],१६ [श्लेषप्रधान ] सहोक्ति [ का० २६],२० विनोक्ति [का० २७],२१ समासोक्ति [का० ६], २२ [विशेषण-विच्छित्त्याश्रय] परिकर [का० ३६ ], २३ [विशेष्य-विच्छित्त्याश्रय ] परिकराङकुर [का० अनुक्त ], २४ [विशेषण- विशेष्य-विच्छित्त्याश्रय ] श्लेष [का० ८], २५ अप्रस्तुतप्रशंसा [का० १६], २६ अर्थान्तरन्यास [का० २२],२७ पर्यायोक्ति [का० ३१], २८ व्याजस्तुति [का० २५], २६आपेक्ष [का० १८]। २. विरोधमूलक ग्यारह अलङ्कार-३० विरोध [या विरोधाभास का० २३],३१ विभावना [का० १६],३२ विशेषोक्ति [का० २०],३३ असङ्गति [का० ४४],३४ विषम [का० ४७],३५ सम [का० ४६],३६ विचित्र [का० अ्नुक्त], ३७ अधिक [का० ४८], ३८ अन्योन्य (का० ४०], ३६ विशेष [का० ५६], ४० व्याघात [का० ५६]। ३. शृङ्ङलाबन्धमूलक तीन अलङ्गार-४१ कारणमाला [का० ३६], ४२ एकावली [ का० ५१।, मालादीपक [का० १५, पदार्थगत दीपक ऊपर सं० १४ पर श चुका है], ४३ सार[का० ४३]। ४. तकन्यायमूलक दो अलद्धार-४४ काव्यलिङ्ग [का० ३०],४५ अनुमान [का० ३५]। ५. वाक्यन्यायमूलक आठ अलङ्गार-४६ यथासंख्य [का. २०], ४७ पर्याय [का० ३४], ४८ परिवृत्ति [का० २८],४६ परिसंख्या [का० ३८],५० अरथापत्ति [का० अनुक्त], ५१ विकल्प [का० अनुक्त ], ५२ समुच्चय [का० ३३], ५३ समाधि[का० ४५]। ६. लोकन्यायमूलक सात अलङ्गार-५४ प्रत्यनीक [का० ४६], ५५ प्रतीप [का० ५४], ५६ मीलित [का० ५०],५७ सामान्य [का० ५५], ५८ तद्गुण [का० ५७], ५६ अतद्गुण [का० ५८],६० उत्तर [का० ४१ ]। ७. गूढ़ार्थप्रतीतिमूलक सात अलङ्कार-६१ सूक्ष्म [का० ४२],६२ व्याजोक्ति, [का० ३७ ], ६३ वकोक्ति [का० अरनुक्त], ६४ स्वभावोक्ति [का० २४],६४ भाविक [का० २६],६३ संसृष्टि [का० ६०],६७ सङ्कर [का० ६१]। इस प्रकार अलङ्कारसर्वस्वकार रुय्यकने ६७ अलङ्कारोंका वर्गीकरण किया है। 'काव्यप्रकाश'में केवल ६१ अर्थालङ्कार दिये गये हैं। अतः सुय्यकने 'काव्यप्रकाश'की अपेक्षा छह अधिक अर्थालङ्कारोंका वर्णन किया है। रुय्यक के वर्गीकरणमें सम्मिलित किन्तु 'काव्यप्रकाशमें' अनुक्त उन छह अलङ्गारोंके नाम निम्नलिखितप्रकार हैं- १ परिणाम [ऊपर वर्गीकरणमें सं० ६ पर उक्त ], २ उल्लेख [सं० ६ पर कथित], ३ परि- कराडकुर [सं० २३ ],४ विचित्र [सं० ३६ ], ५ अर्थापत्ति [सं० ५०]तथा ६ विकल्प [सं० ५१]। इस प्रकार 'काव्यप्रकाश के अलङ्गारोंका रुय्यकके वर्गीकरणके साथ समन्वय हो जाता है। 10 9 १. उपमा अलङ्कार 'काव्यप्रकाश' में प्रतिपादित ६१ अर्थालङ्कारोंमें १ उपमा, २ उपमेयोपमा, ३ अनन्वय, ४ स्मरण, ५ रूपक, ६ ससन्देह, ७ भ्रान्तिमान्, ८ अपन्नति, २ उत्प्रेक्षा, १० अतिशयोक्ति, ११ तुल्ययोगिता, १२ दीपक, १३ प्रतिवस्तूपमा, १४ दृष्टान्त, १५ निदर्शना, १६ व्यतिरेक, १७ सहोक्ति, १८ समासोक्ति आदि उनतीस अलङ्कार सादृश्यमूलक अलङ्गार हैं। अतः इन सब वर्गोंमें सबसे अधिक संख्या सादृश्य मूलक अलङ्कारोंकी है। उक्त सादृश्यमूलक अलङ्कारोंका आधारभूत उपमा अलङ्कार है, इसलिए ग्रन्थकारने सब अलङ्कारोंसे पहिले उपमाका निरूपण किया है ।
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का० ८७, सू० १२४-१२६ ] दशम उल्लास: ४४३
अर्थालङ्कारानाह -- [सू० १२४] साधर्म्यमुपमा भेदे उपमानोपमेययोरेव न तु कार्यकारणादिकयोः साधर्म्य भवतीति तयोरेव समानेन धर्मेण सम्वन्ध उपमा। भेदग्रहणमनन्वयव्यवच्छेदाय। [सू० १२५ ] पूर्णा लुप्ता च उपमानोपमेयसाधारणधर्मोपमाप्रतिपादकानामुपादाने पूर्णा। एकस्य द्वयास्त्र- याणां वा लोपे लप्ता। [सू ० १२६ ] साड्ग्रिमा श्रौत्यार्थो च भवेद्वाक्ये समासे तद्धिते तथा ।८७।
उपमा अलङ्कारमें १. उपमान, २. उपमेय, ३. साधारणधर्म या सादृश्य तथा ४. उपमावाचक शब्द इन चारका उपयोग होता है। दो सदृश पदार्थोंमें प्रायः अधिक गुणवाला पदार्थ 'उपमान' और न्यूनगुणवाला पदार्थ 'उपमेय' होता है। 'मुख चन्द्रमाके समान सुन्दर है' यहाँ अधिकगुणवत्तया सम्भावित चन्द्रमा उपमान और न्यूनगुणवत्तया सम्भावित मुख उपमेय है। सौन्दर्य या मनोज्ञत्व उन दोनोंका समानधर्म है और यथा, इव आदि शब्द उपमाके वाचक शब्द होते हैं। इन उपमान तथा उपमेयके समानधर्मके सम्बन्धका वर्णन ही उपमा अलङ्कार कहलाता है। परन्तु उपमामें उन उपमान तथा उपमेयका भेद होना आवश्यक है। रामरावणयोर्युद्धं रामरावणयोरिव' इत्यादि स्थलोंमें भी सादृश्यका वर्णन किया गया है परन्तु इसमें उपमान तथा उपमेय दोनों एक ही हैं, अलग-अलग नहीं, इसलिए यहाँ उपमा नहीं अपितु 'अनन्वय अलङ्कार' होता है।/ [इस दशम उल्लासमें ] अर्थालङ्गारोंको कहते हैं- [सूत्र १२४]-[ उपमान तथा उपमेयका ] भेद होनेपर [उनके ] साधर्म्य [का वर्णन] उपमा [कहलाता ] है। उपमान और उपमेयका ही साधर्म्य होता है, कार्य-कारण आदिका नहीं, इसलिए उनका ही समानधर्मसे सम्बन्ध उपमा [ कहलाता ] है। [लक्षणमें ] भेदका ग्रहण अनन्वयसे पूथक करनेके लिए है। उपमाके पूर्णा और लुप्ता दो भेद [सूत्र १२५]-[वह उपमा ] १. पूर्णोपमा और २. लुप्तोपमा [दो प्रकारकी होती] है। १. उपमान, २. उपमेय, ३. साधारणधर्म और ४. उपमावाचक [इव आदि पद इन चारों] का ग्रहण होनेपर पूर्णा [ उपमा ] तथा [उन चारोंमेंसे ] एक या दो या तीनका लोप होनेपर लुप्ता [उपमा होती] है। पूर्णोपमाके छह भेद [सूत्र १२६ ] -- वह [उनमेंसे ] पहिली [ अर्थात् पूर्णोपमा ] श्रौती और आर्थी [दो प्रकारकी, फिर उन दोनोंमेंसे प्रत्येक ] वाक्यगत, समासगत तथा तद्धितगत [तीन प्रकारकी, ३x२ =६ कुल छह प्रकारकी ] होती है।
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४४४ काव्यप्रकाश: [का० ८७, सू० १२६ अग्रिमा पूर्णा । यथेवादिशब्दा यत्परास्तस्यैवोपमानताप्रतीतिरिति यद्यप्युपमानविशेषणान्येते तथापि शब्दशक्तिहिम्ना श्रुत्यैव षष्ठीवत् सम्बन्धं प्रतिपादयन्तीति तत्सद्भ्ावे श्रौती उपमा। तथैव 'तत्र तस्येव' इत्यनेन इवार्थे विहितस्य वतेरुपादाने। 'तेन तुल्यं मुखम्' इत्यादावुपमेये एव 'तत्तुल्यमस्य' इत्यादौ चोपमाने [कारिकामें आये हुए ] अग्रिमा [शब्दका अर्थ ] पूर्णा [है]। श्रौती तथा आर्थो पूर्णोपमाका भेद उपमावाचक शब्दोंमें यथा, इव, वा आदि शब्दों तथा तुल्य, सदृश आदि शब्दोंके अर्थबोधनमें कुछ भेद पाया जाता है। यथा, इव, वा आदि शब्द उपमानके विशेषण होते हैं और सुननेके साथ ही साधारणधर्मके सम्बन्धरूप सादृश्यका बोध करा देते हैं, इसलिए उनके प्रयोगमें 'श्रौती' उपमा कहलाती है। इसके विपरीत तुल्य, सदृश आदि दूसरे प्रकारके उपमावाचक शब्द कभी उपमानके साथ, कभी उपमेयके साथ, कभी दोनोंके साथ अन्वित होते हैं। इसलिए उनमें विचार करनेके बाद साधारणधर्मके सम्बन्धकी प्रतीति होती है, इसलिए उनके प्रयोगमें 'आर्थी' उपमा मानी जाती है। वाक्यगत और समासगत श्रौती तथा आर्थी उपमाका भेद इन यथा, इव, वाआदि तथा तुल्य, सदृश आदि शब्दोंके प्रयोगके आधारपर ही होता है। 'तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः' [अष्टा० ५, १, ११५] तथा 'तत्र तस्येव' [५,१,१६ ] इन दो सूत्रोंसे वति-प्रत्यय होनेपर तद्धितगत उपमा बनती हैं। इनमें 'तत्र तस्येव' से इवार्थमें वति-प्रत्यय होनेसे 'श्रौती' तथा 'तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः' से तुल्यार्थमें वति-प्रत्यय होनेसे 'आर्थी' उपमा होती है। 'तेन तुल्यं करिया चेद्वतिः'से जो वति-प्रत्यय होता है वह उपमान तथा उपमेयके क्रियासाम्यमें ही होता है और तृतीयान्त शब्दसे होता है। गुण औरर द्रव्यादिका साम्य होनेपर 'तत्न'और 'तस्य' अर्थात् सप्तम्यन्त तथा षष्ठयन्त शब्दसे वति-प्रत्यय 'तत्र तस्येव' इस सूत्रसे होता है, और उस दशामें श्रौती उपमा होती है। 'मथुरावत् पाटलिपुत्रे प्राकारः' यहाँ 'मथुरायाम् इव' इस सप्तम्यन्तसे वति-प्रत्यय होकर प्रकाररूप द्रव्य के सादृश्यमें 'मथुरावत्' प्रयोग बना है। 'मथुरावत् पाटलिपुत्रस्य विस्तारः' यहाँ विस्ताररूप गुणके सादृश्यमें 'मथुराया इव' इस षष्ठयन्तसे वति-प्रत्यय होकर 'मथुरावत्' शब्द बना है। इस प्रकार श्रौती उपमामें द्रव्य या गुणका सादृश्य विवक्षित होता है और षष्ठी या सप्तमी विभक्तिवाले पदसे वति-प्रत्यय होता है। इसके विपरीत आर्थी उपमामें क्रियामात्रका साम्य विवक्षित होता है और तृतीयान्त पदसे वति-प्रत्यय होता है। इसी आधारपर श्रौती तथा आर्थी उपमाका भेद अगले दो अनुच्छेदोंमें दिखलाते हैं- यथा, इव, वा इत्यादि शब्द जिसके बाद आते हैं वह ही उपमानरूपसे प्रतीत होता है, इसलिए यद्यपि ये उपमानके विशेषण होते हैं फिर भी शब्दशक्तिके प्रभावसे वे पष्ठी [विभक्ति ] के समान श्रवण- मात्रसे [तत्काल ] ही [सादृश्य ] सम्बन्धका प्रतिपादन कर देते हैं इसलिए उनका प्रयोग होनेपर 'शरौती' [उपमा ] होती है।. इसी प्रकार 'तत्र तस्येव' [अष्टा० ५, १, ११६ ] इस [सूत्र ] से इवार्थमें [ षष्ठचन्त अथवा सप्तम्यन्त पदसे ] विहित वति-प्रत्ययका ग्रहण होनेपर भी [ तद्धितगत श्रौती उपमा होती है]। [इसके विपरीत ] 'तेन तुल्यं मुखम्' 'उस [ कमल ] के समान मुख है' यहाँ [उपमावाचक
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का० =७, सू० १२६ ] दशम उल्लास: ४४५ एव 'इदं च तच्च तुल्यम्' इत्युभयत्रापि तुल्यादिशब्दानां विशान्तिरिति साम्यपर्या- लोचनया तुल्यताप्रतीतिरिति साधर्म्यस्यार्थत्वात् तुल्यादिशब्दोपादाने आर्थी। तद्वत् 'तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः' इत्यनेन विहितस्य वतेः स्थितौ। इवेन नित्यसमासो विभक्त्यलोपः पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वं च' इति नित्यसमासे इवशब्दयोंगे समासगा। कमेणोदाहरणम्- (१) ्वप्नेऽपि समरेषु त्वां विजयश्रीन मुञ्चति। प्रभावप्रभवं कान्तं स्वाधीनपतिका यथा ॥३९३॥
तुल्यपदका सम्बन्ध मुखरूप ] उपमेयमें ही [प्रतीत होता है]। 'वह [कमल ] इस [ मुख ] के तुल्य है' इत्यादि [ उदाहरणों] में [ उपमावाचक तुल्य पदका सम्बन्ध कमलरूप [उपमानमें ही [प्रतीत होता है]। ओर 'यह [कमल ] तथा वह [मुख] समान हैं' यहाँ [ मुख तथा कमल] दोनों [ के साथ सम्बन्ध ] में तुल्य आदि पदोंकी विश्रान्ति [पर्यवसान ] होती है, इसलिए साधारणधर्मके सम्बन्धका विचार करनेपर ही [ तुल्ययोर्भावः ] तुल्यताकी प्रतीति होती है। इसलिए [ तुल्यादि पदोंके प्रयोगमें ] साधर्म्यके इवादिके [समान वाच्य न होकर] 'आर्थ' होनेसे तुल्यादि शब्दोंका प्रयोग होनेपर 'आर्थी' [ उपमा ] होती है। इसी प्रकार 'तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः' [अष्टा० ५, १, ११५] इस [सूत्र ] से [ क्रियामात्रके साम्यमें तृतीयान्तसे विहित ] वति-प्रत्ययके प्रयोगमें भी [आर्थी उपमा होती] है। वाक्यगा श्रौती तथा आर्थी पूर्णोपमा [सह सुपा २, ४, ७१ इस पाणिनिसूत्रके महाभाष्यमें दिये हुए कात्यायनकृत वार्तिकके अनुसार] 'इवके साथ [उपमान-पदका ] नित्यसमास [और समास होनेपर भी ] विभक्तिका अलोप तथा पूर्वपदका प्रकृतिस्वरत्व होत। हैं', इस [नियम ] से नित्यसमासमें इव शब्दका प्रयोग होनेपर 'समासगा' [श्रौती और तुल्य आदि पदोंके साथ समास होनेपर आर्थी समासगा उपमा होती है। शेष स्थलोंपर इव आदिके प्रयोगमें वाक्यगा श्रौती तथा तुल्य आदिका प्रयोग होनेपर वाक्यगा आर्थी उपमा होती है ]। [श्रौती तथा आर्थी उपमाके इन छह भेदोंके ] कमशः उदाहरण [आगे देते हैं]- (१) स्वाधीनपतिका [नायिका] के समान विजयश्री प्रभाव [प्रभुशक्ति ] के कारणभूत [प्रभव ] आपको स्वप्नमें भी युद्धोंमें नहीं छोड़ती है॥३६३।। इसमें 'स्वाधीनपतिका यथा' यह वाक्यगा धौती उपमा मानी है। 'स्वाधीनपतिका' उपमान है, 'विजयश्रीः' उपमेय, 'न मुञ्चति' यह अपरित्यागरूप साधारणधर्म और 'यथा' यह उपमावाचक शब्द है। अतः यह पूर्णोपमा है। 'यथा' शब्दका प्रयोग होनेपर साधारणतः 'अव्ययं विभक्ति,' इत्यादि [१, १,६ ] सूत्रसे नित्य अव्ययीभाव समास होता है। तदनुसार अ्रव्ययीभाव समास होनेपर यह वाक्यगा श्रौती उपमाका उदाहरण न होकर समासगाका उदाहरण होना चाहिये। इस प्रकारकी शङ्का यहाँ हो सकती है। परन्तु वह उचित नहीं है। 'अव्ययं विभक्ति' इत्यादि सूत्रमें जो 'यथा' के साथ समासका विधान किया गया है वह सादृश्यसे भिन्न अर्थ होनेपर ही होता है। सादृश्यपरक 'यथा' शब्दक प्रयोगमें यह समास नहीं होता है यह बात 'यथाऽसादृश्ये' २, १, ७ इस अगले सूत्र में स्पष्ट कर दी गयी है। इसलिए
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४४६ काव्यप्रकाश: [ का० ८७, सू० १२६
-1up (२) चकितहरिणलोललोचनायाः कुधि तरुणारुणतारहारिकान्ति। De5 1Tne सरसिजमिदमाननं च तस्याः सममिति चेतसि सम्मदं विधत्ते ॥।३९४।। (३) अत्यायतैनियमकारिभिरुद्धतानां दिव्यैः प्रभाभिरनपायमयरुपायैः । शौरिर्भुजैरिव चतुभिरदः सदा यो लक्ष्मीविलासभवनैर्भुवनं वभार।३९५॥
शक्तिमनतिकरम्य इति यथाशक्ति' इत्यादि प्रयोगोंमें ही यथा शब्दके साथ अव्ययीभाव समास होता है। सादृश्यार्थमें 'यथा' शब्दका प्रयोग होनेपर समास नहीं होता है। इसलिए यह वाक्यगा श्रौती उपमाका ही उदाहरण है, समासगाका नहीं। वाक्यगा श्रौतीके उदाहरणके बाद वाक्यगा आर्थी उपमाका उदाहरण देते हैं- (२) चकित [भयभीत ] हरिणीके समान चश्वल नेत्रवाली उस [ नायिका] का करोधमें प्रातः कालीन [तरुण ] अरुण [सूर्यसारथि ] के समान [तार ] अत्यन्त सुन्दर कान्तिवाला [कोधसे आरक्त] मुख और यह [हाथमें लिया हुआ ] कमल दोनों एक-से [ सम ] हो रहे हैं। इसलिए [ कोधसे आरक्त नायिकाका मुख नायकके] मनमें आनन्द उत्पन्न करता है ॥३६४॥ 5 इसमें सरसिज उपमान है, आनन उपमेय है, अरुणके समान कान्तिमत्त्व साधारणधर्म और 'समम्' यह उपमावाचक शब्द है। 'सम'के साथ समास न होनेसे वाक्यगा श्रौती उपमा है। समासगा श्रौती तथा आर्थो पूर्णोपमा पूर्णोपमामें उपमान, उपमेय, साधारणधर्म तथा उपमावाचक शब्द इन चारोंका शब्दतः उपादान होता है। ये चारों जब अलग-अलग कहे जाते हैं तब वाक्यगा पूर्णा उपमा होती है और जब इनमेंसे किन्हीं दोका समास हो जाता है तब समासगा श्रौती पूर्णोपमा बन जाती है। वाक्यगा श्रौती तथा आर्थी उपमाके उदाहरण देनेके बाद समासगा श्रौती उपमाका उदाहरण देते हैं- (३) [शूरस्य तन्नामकस्य यादवविशेषस्य गोत्रापत्यं पुमान् शौरि: ] श्रीकृष्ण जिस प्रकार [विष्णुरूपमें अपनी ] चार भुजाओंसे संसारको धारण करते हैं इस प्रकार राजा [साम, दान, दण्ड तथा भेदरूप ] चार उपायोंसे सदा संसारका पालन करता था।[यह मुख्य वाक्यार्थ है। शेष पाँच विशेषण हैं जो विष्णुकी भुजाओं तथा सामादि उपायों, दोनोंके पक्षमें लगते हैं। जैसे १. अत्यायतः अर्थात् बाहुपक्षमें अत्यन्त लम्बे [आजानुलम्बी ] बाहुओं तथा [ उपायपक्षमें ] अत्यन्त शुभ परिणामवाले [ आयतिः उत्तर- काल:] उपायोंसे, २. उद्धतोंका नियन्त्रण करनेवाले [बाहुओं तथा उपायोंसे यह विशेषण दोनों पक्षोंमें समान ही रहता है], ३. दिव्य अर्थात् अलौकिक [बाहुओं तथा उपायपक्षमें उत्कृष्ट उपायोंसे ], ४. प्रभाभि: कान्तियों [से उपलक्षित बाहुओं] तथा प्रभावसे युक्त उपायोंसे [अथवा 'प्रकर्षेण भान्तीति प्रभा: तैः' इस व्युत्पत्तिसे दोनों पक्षोंमें उत्तम शोभायुक्त बाहुओं तथा उपायोंसे ] तथा ५. [अनपायमयः अपायाभावप्रचुर: अर्थात् ] सनातन तथा सदा सफल होनेवाले एवं ६. लक्ष्मी [विष्णु-पत्नी तथा सम्पत्ति ] के आधारभूत [चार ] बाहुओंके समान [सामादि चार ] उपायोंसे [ जो राजा सदा संसारका पालन करता था]॥३६५॥ इसमें 'भुजैः' उपमान है, 'उपायः' उपमेय है। 'अत्यायतत्वादि' साधारणधर्म तथा 'इव'
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का० ८७, सू० १२६ ] दशम उल्लास: ४४७
(४) अवितथमनोरथपथनेषु प्रगुणगरिमगीतश्रीः । सुरतरुसदृशः स भवानभिलषणीयः क्षितीश्वर न कस्य ।३९६। (५-६) गाम्भीर्यगरिमा तस्य सत्यं गङ्गाभुजङ्गवत्। दुरालोक: स समरे निदाघाम्बररत्नवत् ।३९७॥
उपमाप्रतिपादक शब्द है. 'इवेन नित्यसमासो विभक्त्यलोपः पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वं च' इस वार्तिकके अनुसार यहाँ 'भुजै.' इस उपमानपदके साथ 'इव' इस उपमावाचक पदका नित्यसमास होनेसे यह समासगा श्रौती उपमाका उदाहरण होता है। समासगा श्रौती उपमाका उदाहरण देनेके बाद समासगा आर्थी उपमाका उदाहरण देते हैं- (४) अव्यर्थ मनोरथ-मा्गोंके विस्तारमें प्रकृष्ट गुण-गरिमाके कारण जिसकी समृद्धि प्रसिद्ध है [ अर्थात् आपके पास आनेवाले याचकोंके मनोरथ कभी व्यर्थ नहीं होते। उन्हें अपने मनोरथके अनुसार धन-धान्यादि अवश्य प्राप्त होता है ऐसी आपकी लक्ष्मीकी प्रसिद्धि है]। इसलिए कल्पवृक्षके समान हे राजन् ! आप किसकी अभिलाषा या कामना के विषय नहीं हैं [ हर एक व्यक्ति आपको चाहता है] ।३६६॥ इसमें 'सुरतरु' उपमान, 'क्षितीश्वर' उपमेय, 'प्रगुणगरिमगीतक्षीत्व' तथा 'अभिलषणीयत्व' साधारणधर्म एवं 'सदृश' उपमावाचक शब्द है। 'सुरतरुसदृश' में उपमान तथा उपमावाचक पदोंका समास होनेसे यह समासगा आर्थी उपमाका उदाहरण हुआ। तद्धितगा श्रौती तथा आर्थी पूर्णोपमा १. वाक्यगा श्रौती, २. वाक्यगा अर्थी, ३. समासगा श्रीती, ४. समासगा आर्थी इन चारों प्रकारकी पूर्णोपमाओंके उदाहरण देनेके बाद अब तद्धितगा श्रौती तथा आर्थी दोनों प्रकारकी तद्धितगा पूर्णोपमाका एक ही उदाहरणमें प्रयोग दिखलाते हैं- [५-६ ] उस राजाके गाम्भीर्यकी गरिमा सचमुच [गङ्गाके उपपति अर्थात् ] समुद्र [गङ्गाके पास्तविक पति शान्तनु थे इसलिए समुद्र गङ्गाका भुजङ्ग उपपति हुआ] के समान है और युद्धभूमिमें यह ग्रीष्मकालके सूर्यके समान बड़ी कठिनाईसे देखा जा सकता है ॥३६७॥ यह. श्लोकके पूर्वार्द्धमें 'गङ्गाभुजङ्ग' अर्थात् 'समुद्र' उपमान, 'तस्य' उपमेय 'गाम्भीरयंगरिमा' साधारणधर्म तथा 'गङ्गाभुजङ्गस्य इव इति गङ्गाभुजङ्गवत्' इस विग्रहमें 'तत्र तस्येव' सूत्र द्वारा षष्ठयन्त 'गङ्गाभुजङ्गस्य' पदसे इवार्थमें वति-प्रत्यय होनेसे यह तद्धितगा श्रौती पूर्णोपमाका उदाहरण होता है। श्लोकके उत्तरार्द्धमें 'निदाधाम्बररत्न' उपमान, 'सः' उपमेय, 'दुरालोकत्व' साधारणधर्म तथा 'निदाघाम्बररत्नवत्' में निदाघाम्बररत्नेन तुल्यम् इति 'निदाघाम्बररत्नवत्' इस विग्रहमें तृतीयान्त 'निदाघाम्बररत्नेन' पदसे 'तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः' इस सूत्र द्वारा वति-प्रत्यय होनेसे यह तद्धितगा आर्थी पूर्णोपमाका उदाहरण होता है। अलङ्कारस्थलमें व्यङ्गचकी चारुताप्रयोजकता प्रथम उल्लासमें ग्रन्थकारने यह लिखा था कि 'गुणालङ्कारयुक्तमव्यङ्गय चित्रम्' अर्थात् गुण और अलङ्कारसे युक्त काव्य व्यङ्गयरहित होनेसे चित्रकाव्य कहलाता है। इसी प्रकार षष्ठ उल्लासके
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४४= काव्यप्रकाशः [का० ८७, सू० १२६ स्वाधीनपतिका कान्त भजमाना यथा लोकोत्तरचमत्कारभ:, तथा जयश्रीस्त्वदासे- वनेनेत्यादिना प्रतीयमानेन विना यद्यपि नोक्तेवैचित्र्यम्, वैचित्य चालद्वार: तथापि न ध्वनिगुणीभूतव्य ङ्गचव्यवहारः । न खलु व्यङ्गयसस्पपरामर्गादत्र चारुताप्रतीतिः अपि तु वाच्चवैचित्र्यप्रतिभासादेव। रसादिस्तु व्यज्ञचोर्थोल्ङ्वारान्तरं च सर्वत्ाव्यभिचारीति अगणयित्वैव तदलङ्कारा उदाहताः । तद्रहितत्वेन त् उदाह्ियमाणा विरसतामावहन्तीति पूर्वापर विरुद्धाभिधानमिति न चोदनीयम् ।
अ्रन्तमें लिखा था कि 'तत्र च (चित्रकाव्ये) शब्दार्थालङ्कारभेदाद् बहवो भेदाः, ते चालङ्वारनिर्णये निर्णेप्यन्ते।' अर्थात् शब्दालङ्कार, अर्थालङ्कार आदि रूपसे चित्रकाव्यके बहुत-से भेद हो सकते हैं। उनका निर्पण अलद्कारोंके निर्णयके अवसरपर करेंगे। इन दोनों स्थलोके उल्लेखसे यह प्रतीत होता है कि १. सभी अलङ्कार चित्रकाव्यके उदाहरण होते हैं और २. वे सब व्यङ्गयसे रहित होते हैं। इन दोनों बातोंका यहाँ प्रकृत उदाहरणोंमें विरोध पाया जाता है। क्योंकि 'स्वाधीनपतिका यथा' इत्यादि उपमाल द्वारके उदाहरणमें स्वाधीनपतिका नायिका पतिके साथ रमण करती हुई जिस प्रकार लोकोत्तर आरनन्दका अनुभव करती है उसी प्रकार विजयश्री तुम्हारा सेवन करनेसे अलौकिक आनन्दको प्राप्त करती है इत्यादि व्यङ्गय अर्थकी प्रतीति इस उदाहरणमें भी होती है। उस व्यङ्गय अ्र्थको यदि प्रधान माना जाय तो वह श्लोक ध्वनिकाव्यका उदाहरण बन जायगा और उसके अप्रधान होनेपर वह गुणीभूत- व्यङ्गयका उदाहरण बन जायगा। इसलिए अलङ्कारयुक्त होनेपर भी वह चित्रकाव्यका उदाहरण नहीं हो सकता है। अपितु इसको ध्वनिकाव्य अथवा गुणीभूतव्यङ्गयकाव्यका ही उदाहरण मानना चाहिये। अलङ्कारोंको व्यङ्गयरहित और चित्रकाव्य जो कहा है वह उचित नहीं है इस प्रकारके पूर्वापर- विरोधका यहाँ अनुभव होता है। इस शङ्काका परिहार करनेके लिए ग्रन्थकारने अगला अनुच्छेद लिखा है। समाधानका आशय यह है कि यद्यपि इस उदाहरणमें व्य ङ्गय अर्थका संस्पर्श अवश्य है परन्तु श्लोकका चमत्कार उस व्यङ्गयार्थके संस्पर्शके कारण नहीं अपितु उपमावाचक 'यथा' आदि पदसे वाच्यवैचित्यके कारण ही है। इसलिए उसे ध्वनि या गुणीभूतव्यङ्गय नहीं कहा जा सकता है। उसे अलङ्कारप्रधान होनेसे उपमाचित्र ही कहना चाहिये। इसलिए यहाँ पूर्वापरविरोधकी शङ्का करना उचित नहीं है। इसी बातको ग्रन्थकी पंक्तियोंमें इस प्रकार कहा गया है- स्वाधीनपतिका [नायिका ] पतिके साथ [रमण करती हुई ] जिस प्रकार लोकोत्तर आनन्दका अनुभव करती है उसी प्रकार जयश्री आपका सेवन करनेसे [ अलौकिक आनन्दको प्राप्त करती है] इत्यादि व्यङ्गय [प्रतीयमान अर्थ ] के बिना यद्यपि उक्तिमें चमत्कार नहीं आता है, और [उक्तिका ] वैचित्य ही अलङ्गार है। [इसलिए यदि व्यङ्गचयका संस्पर्श यहाँ न हो तो अलङ्गार भी नहीं हो सकता है। और यदि व्यङ्गचका संस्पर्श है तब या तो यह ध्वनिकाव्य होगा या गुणीभूतव्यङ्गच ] तो भी यहाँ ध्वनि या गुणीभूतव्यङ्गचका व्यवहार नहीं किया जाता है। [अर्थात् इसको ध्वनिकाव्य या गुणीभूत- व्यङ्गयकाव्य नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि] यहाँ व्यङ्गचार्थके संस्पर्शमात्रसे चारुताकी प्रतीत नहीं होती है अपितु [यथा आदि उपमाव(चक पदोंसे ] वाच्य [उपमा अलङ्गार] के वैचित्यसे ही [चारुता- प्रतीति होती है। इसलिए व्यङ्गचका संस्पर्श होनेपर भी उपमालङ्गार ही है]।
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का० ८७, सू० १२६ ] दशम उल्लास: ४४६
रसादिस्तु व्यङ्गयोऽ्थोऽलङ्कारान्तरं सर्वत्राव्यभिचारी, इत्यगणयित्वैव तदलङ्गारा उदाहृताः । तद्रहितत्वेन तु उदाह्नियमाणा विरसतामावहन्तीति पूर्वापरविरुद्धाभिधान- मिति न चोदनीयम् ।
इस प्रथम शङ्काका समाधान हो जानेके बाद यहाँ दूसरी यह शङ्का भी हो सकती है कि शृङ्गाररस- की प्रतीति होनेसे और रसके सदा प्रधान होनेके कारण यहाँ ध्वनिकाव्यका व्यवहार करना चाहिये। तीसरी शङ्का यह हो सकती है कि आप इसको उपमालङ्कारका उदाहरण बतलाते हैं, परन्तु इसमें उपमाके साथ 'स्वप्नेपि समरेषु' तथा 'प्रभावप्रभवं' इत्यादि अंशोंमें अनुप्रासालङ्कार भी है। इसलिए इसको उपमालङ्वारका उदाहरण न कहकर सङ्कर या संसृष्टि अलङ्कारका उदाहरण कहना चाहिये। इन दोनों शङ्काओ्रोंका समाधान ग्रन्थकार अगली पंक्तियोंमें करते हैं- रस आदि व्यङ्गच अर्थ और अन्य अलङ्गार सभी जगह [ सभी अलङ्कारोंके उदाहरणोंमें] निश्चितरूपसे रहते हैं इसलिए उनकी उपेक्षा करके ही अलङ्गारोंके उदाहरण दिये गये हैं। उस [रसादि] से रहितरूपसे [अलङ्गारोंके ] उदाहरण देनेपर तो वे [ सब अलङ्गार और उदाहरण एकदम ] नीरस हो जायँगे [ वैसे नीरस उदाहरण देना उचित नहीं होता ]। अतः [यहाँ दिये हुए उदाहरणोंमें रस तथा अनुप्रासादि अन्य अलङ्गारोंकी सत्ता रहनेपर भी जो उनको उपमादि विशेष अलङ्गारोंके उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया गया है उसमें ] पूर्वापरविरोधकी उद्ावना नहीं करनी चाहिये। लुप्तोवमाके उन्नीस भेद यहाँतक पूर्णोपमाके छह भेद दिखलानेके बाद अब आगे ग्रन्थकार 'लुप्तोपमा'के उन्नीस भेद दिखलाते हैं। पूर्णोपमामें उपमान, उपमेय, साधारणधर्म तथा उपमावाचक पद, चारों शब्दतः उपात्त होते हैं। इस प्रकार उपमाकी सारी सामग्रीके शब्दतः उपस्थित होनेके कारण ही इसको पूर्णोपमा कहते हैं। लुप्तोपमामें यह सारी सामग्री शब्दतः उपात्त नहीं होती है। उपमान आदि चारोमेंसे किसी-न किसीका लोप अवश्य रहता है। इसीलिए उसको 'लुप्तोपमा' कहा जाता है। यह लोप उपमान आदि चारोंमेंसे कभी किसी एकका, कभी किन्हीं दोका और कभी किन्हीं तीनका भी हो सकता है। इसलिए 'लुप्तोपमा के १६ भेद हो जाते हैं. जिसका विवरण निम्नलिखित है- पाँच प्रकारको धर्मलुप्ता- १. वाक्यगत श्रौती धर्मलुप्ता २. वाक्यगत आर्थी धर्मलुप्ता ३. समासगा श्रौतो धर्मलुप्ता ४. समासगा आर्थी धर्मलुप्ता ५. तद्धितगा आर्थी धर्मलुप्ता छह प्रकारकी वाचकलुप्ता- १. समासगा वाचकलुप्ता [कामिनीगण्डपाण्डुना] २. कर्ममें क्यच्-प्रत्यय होनेपर वाचकलुप्ता [सुतमिवाचरति सुतीयति] ३. आधारमें क्यच्-प्रत्यय होनेपर [अन्तःपुरे इवाचरति अन्तःपुरीयति] २६
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४५.० काव्यप्रकाश: [ का० ८८, सू० १२७ [सू० १२७ ] तद्वद्धर्मस्य लोपे स्यान्न श्रौती तद्धिते पुनः । धर्म: साधारणः। तद्धिने कल्पवादौ त्वाथ्येव। तेन पञ्च। उदाहरणम्- (१) धन्यस्थानन्यसामान्यसौजन्योत्कर्पशालिनः । करणीयं वचश्चेतः ! सत्यं तस्यामृत यथा ।३९८।
४. क्यङ-प्रत्यय होनेपर वाचकलुप्ता [नारी इव आरचरति नारीयते] ५. कर्ममें णमुल्प्रत्यय होनेपर वाचकलुप्ता [निदाघघर्माशुदर्श पश्यति] ६. कर्तामें णमुल्प्रत्यय होनेपर वाचकलुप्ता। पार्थसञ्चार सञ्चरति] दो प्रकारकी उपमानलुप्ता- १. वाक्यगा उपमानलुप्ता २. समासगा उपमानलुप्ता धर्म और वाचक दोके लोपमें दो प्रकार- १. क्विप्गता धर्मवाचकलुप्ता २. समासगा धर्मवाचकलुप्ता धर्म तथा उपमानके लोपमें दो प्रकार- १. वाक्यगा धर्मोपमानलुप्ता २. समासगा धर्मोपमानलुप्ता वाचक तथा उपमेय दोके लोपमें एक भेंद- १. क्यच्-प्रत्यय होनेपर वाचकोपमेयलुप्ता उपमान, उपमावाचक तथा साधारणधर्म तीनोंका लोप- १. तीनोंका लोप होनेपर समासगा। इस प्रकार लुप्तोपमाके १६ भेद होते हैं। उन्हींका वर्णन ग्रन्थकार आगे निम्नलिखित प्रकार करते हैं- [सूत्र १२७ ] -- उसी प्रकार [अर्थात् पूर्णोपमाके छह भेदोंके समान ही] धर्मका लोप होनेपर तद्धितगत श्रौतीको छोड़कर [धर्मलुप्ता छहके स्थानपर पाँच प्रकारकी ] हो सकती है। धर्म अर्थात् साधारणधर्म [का लोप होनेपर ]। कल्पप् आदि तद्धित-प्रत्ययोंके होनेपर तो आर्थो [धर्मलुप्ता] ही होती है [श्रौती धर्मलुप्ता नहीं है]। इसलिए [श्रौती धर्मलुप्ता उपमाका तद्धितगत भेद न होनेसे धर्मलुप्ता उपमा छह प्रकारकी नहीं अपितु केवल ] पाँच प्रकारकी होती है। [ धर्मलुप्ताके पाँचों प्रकारोंके ] उदाहरण [ जसे ]- पहिला वाक्यगा श्रौतो धर्मलुप्ताका उदाहरण देते हैं- (१) असाधारण सौजन्यके उत्कर्षसे शोभायमान उस [साधु महात्मा ]का अमृतके समान् परि- णामसुरस और आनन्ददायक ] वचन, हे चित्त ! सचमुच [पालन ] करना ही चाहिये ।३६७।। इसमें 'अमृत' उपमान और 'वचन' उपमेय है। 'परिणामसुरसत्व' आदि उनका साधारणधर्म है, परन्तु अत्यन्त प्रसिद्ध होनेके कारण यहाँ उसका ग्रहण नहीं किया गया है। इसलिए यह धर्मलुप्ताका उदाहरण है। 'यथा' शब्द उपमावाचक है। उसके साथ समास न होनेसे यह वाक्यगाका उदाहरण
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का० ८८, सू० १२८ ] दशम उल्लास: ४५१
(२) आकृष्टकरवालोऽसौ सम्पराये परिभ्रमन् । प्रत्यर्थिसेनया दृष्टः कृतान्तेन समः प्रभुः ॥३१९॥ (३-५ ) करवालइवाचारस्तस्य वागमृतोपमा। विषकल्पं मनो वेत्सि यदि जीवसि तत्सखे ! ॥४०।। [ सू० १२८ ] उपमानानुपादाने वाक्यगाथ समासगा ।।८८।।
हुआ।और 'यथा' शब्दके प्रयोगके कारण श्रौती उपमा हुई। इस प्रकार यह 'वाक्यगा शौती धर्मलुप्ता' उपमाका उदाहरण है। आगे वाक्यगा आर्थी धर्मलुप्ताका उदाहरण देते हैं- (२) हाथमें नङ्गी तलवार लिये हुए और संग्राममें घूमते हुए इस राजाको शत्रुकी सेनाने यमराज़- के समान देखा [समझा]।३६६॥। इसमें यमराज उपमान और राजा उपमेय है। उन दोनोंका साधारणधर्म अत्यन्त क्रूरत्व, प्रसिद्ध होनेके कारण, शब्दतः उपात्त नहीं हुआ है। 'आकृष्टकरवालत्व को, उन दोनोंका साधारणधर्म नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि यमराजका आयुध करवाल नहीं अपितु दण्ड माना जाता है। और 'दृष्टः' को भी, यमराजके त्दृष्ट होनेसे, साधारणधर्म नहीं कहा जा सकता है। 'सम' शब्द उपमावाचक है। परन्तु उसके साथ समास न होनेसे यह वाक्यगा आर्थी धर्मलुप्ताका उदाहरण है। धर्मलुप्ताके पाँच भेदोंमेंसे दो भेदोंके अलग-अलग उदाहरण देकर शेष तीनों भेदोंके एक ही श्लोकमें प्रयोगका उदाहरण देते हैं। श्लोकके पूर्वार्द्धमें समासगा श्रौती तथा समासगा आर्थी धर्मलुप्ताका तथा उत्तरार्द्धमें तद्धितगा धर्मलुप्ताका प्रयोग पाया जाता है। इस प्रकार यह एक ही श्लोक तीनों भेदोंका उदाहरण बन जाता है। (३-५) हे मित्र ! [ उस दुष्टके चक्करमें पड़कर भी] यदि जीवित रहते हो तो तुम देखोगे कि उसका आचरण तलवारके समान, वाणी अमृतके समान और मन विषके समान है॥४००॥ १. 'करवालइवाचारः' इसमें करवाल उपमान और आचार उपमेय है। 'धातुकत्व' उनका साधारणधर्म है, परन्तु प्रसिद्ध होनेके कारण शब्दतः उपात्त नहीं किया गया है। 'इव के साथ समास है। इमलिए यह समासगा श्रौती धर्मलुप्ताका उदाहरण है। २. 'वागमृतोपमा' इसमें वाक् उपमेय, अमृत उपमान और माधुर्य उनका साधारणधर्म है। परन्तु वह शब्दतः नहीं कहा गया है। 'उपमा' शब्द सदृशार्थक और उपमावाचक है। उसके साथ समास होनेसे यह समासगा आर्थी धर्मलुप्ताका उदाहरण है। ३. 'विषकल्पं मनः' इसमें विष उपमान, मन उपमेय और तद्धितका कल्पप्प्रत्यय उपमा- वाचक है। नाशकत्व साधारणधर्म शब्दतः नहीं कहा गया है। इसलिए यह तद्धितगा आर्थी धर्मलुप्ताका उदाहरण हुआा। यहाँतक छह प्रकारकी पूर्णा तथा पाँच प्रकारकी धर्मलुप्ता, कुल ११ प्रकारकी उपमाका निरूपण हुआ। आगे उपमानलुप्ताके दो भेद दिखलाते हैं- उपमानलुप्ताके दो भेद [सूत्र १२८ ]-उपमानका ग्रहण न करनेपर १. वाक्यगा तथा २. समासगा [दो प्रकारकी उपमानलुप्ता उपमा ] होती है।।८८।।
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४५२ काव्यप्रकाश: [ का० ८६, सू० १२६ सअलकरणपरवीसामसिरिविअरणं ण सरसकव्वस्स। दीसइ अह व णिसम्मइ सरिसं अंसंसमेत्तेण ।।४०१।। [सकलकरणपरविश्रामश्रीवितरणं न सरसकाव्यस्य। दृश्यतेऽ्थवा निशम्यते सदृशमंशांशमात्रेण ।। इति संस्कृतम्] 'कव्वस्स' इत्यत्र 'कव्वसमम्' इति, 'सरिसम् इत्यत्र च 'नूनम्' इति पाठे एषैव समासगा। [सू० १२९ ] वादेलोंपे समासे सा कर्माधारक्यच क्याडि। कर्मकर्त्रोर्णमुलि वाशब्दः उपमाद्योतक इति वादेरुपमाप्रतिपादकस्य लोपे षट्। समासेन, कर्मणोड़- धिकरणाच्चोत्पन्नेन क्यचा, कर्तुः क्यडा, कर्मकर्त्रोरुपपदयोर्णमुला चे भवेत्।
धर्मलुप्ताके पाँच भेद दिखलाये गये थे, परन्तु उपमानलुप्ताके केवल दो ही भेद रह गये। इसका कारण यह है कि उपमाप्रतिपादक 'वति' आदि 'तद्धित-प्रत्यय' उपमानवाचक पदसे ही होते हैं। इसलिए उपमानका लोप होनेपर उपमानलुप्ताके तद्धितगत दोनों भेद नहीं बन सकते हैं। इसी प्रकार श्रौती उपमामें भी 'इव' आदि उपमानवाचक पदोंका उपमानवाचक पदके साथ ही अन्वय होता है। इसलिए उपमानवाचक पदोंके न रहनेपर श्रौतीके वाक्यगत तथा समासगत दोनों भेद नहीं बन सकते हैं। इसलिए उपमानलुप्ताके केवल वाक्यगत तथा समासगत आर्थी उपमारूप दो ही भेद हो सकते हैं। उन्हीं दोनों भेदोंके उदाहरण आागे देते हैं -- (१) सरस काव्यके समान समस्त इन्द्रियोंकी परम-विश्रान्तिश्रीका वितरण [अन्यत्न कहीं] लेशमात्र भी न देखा और न सुना जाता है।४०१।। इसमें वर्णनीय होनेसे काव्य उपमेय है, उपमानका उपादान नहीं किया गया है, 'सकलकरण- परविश्रामश्रीवितरण' साधारणधर्म तथा 'सदृश' उपमावाचक पद है। उसका किसीके साथ समान न होनेसे यह वाक्यगा आर्थी उपमानलुप्ताका उदाहरण हुआ। ['काव्यस्य'] 'कव्वस्स'के स्थान पर 'कव्वसमम्' [ 'काव्यसमम्' ] तथा 'सरिसम्' के स्थानपर 'नूनं' पाठ कर देनेसे यही समासगाका उदाहरण हो सकता है। वाचकलुप्ताके छह भेद 'वा' आदि उपमावाचक पदोंके लोपमें न वाक्यगा वाचकलुप्ता उपमा सम्भव है और न तद्धितगा, केवल समासगा बनती है। आगे वाचकलुप्ताके प्रकारान्तरसे भेद करते हैं। [सूत्र १२६]-'वा' इत्यादि [उपमावाचक ] का लोप होनेपर वह [ वाचकलुप्ता उपमा] (१) समासमें, (२) कर्ममें क्यच्-प्रत्यय, (३) आधारमें क्यच्-प्रत्यय, (४) क्यङ-प्रत्यय, (५) कर्म उपपद रहते णमुल्-प्रत्यय तथा (६) कर्ता उपपद रहते णमुल्-प्रत्ययमें [ होनेसे पाँच प्रकारकी ] होती है। 'वा' शब्द उपमाका द्योतक [शब्द] है इसलिए 'वा' इत्यादि उपमाप्रतिपादक [पदों] का लोप होनेपर (१) समासमें, (२) कर्ममें विहित क्यच् तथा (३) अधिकरणमें उत्पन्न क्यच्, (४) कर्तामें क्यड, (५) कर्म उपपद रहते णमुल् तथा (६) कर्ता उपपद रहते णमुंलप्रत्ययके होनेसे छह प्रकारकी [वाचकलुप्ता उपमा ] होती है।
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का० ८६, सू० १२६] दशम उल्लास: ४५३
उदाहरणम् -- (१ क) ततः कुमुदनाथेन कामिनीगण्डपाण्डना नेत्रानन्देन चन्द्रेण माहेन्द्री दिगलङकृता।।४०२।।
तथा- (१ ख) असितभुजगभीषणासिपत्रो रुहरुहिकाहितचित्त तूर्णचार : । पुलकिततनुरुत्कपोलकान्तिः प्रतिभटविकमदर्शनेऽयमासीत् ।।४०३।।
उदाहरण [जैसे ] -- 'महाभारत' के द्रोणपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसङ्गमें चन्द्रोदयवर्णनपरक यह पद्य आया है। इसमें 'कामिनीगण्ड' रूप उपमानवाचक पद तथा 'पाण्डु' रूप साधारणधर्मप्रतिपादक दो पदोंके समासमें उपमावाचक पदका लोप होनेसे यह समासगा वाचकलुप्ताका उदाहरण है। श्लोकका अर्थ है- (१ क) तब [रात्रिके या सायंकालके समय ] कामिनीके कपोलस्थलके सदृश पीतवर्ण, कुमुदोंके स्वामी, नेत्रोंको आनन्द प्रदान करनेवाले चन्द्रमाने पूर्व दिशाको अलङकृत किया ॥४०१॥ यहाँ 'कामिनीगण्ड इव पाण्डुः' अथवा 'कामिनीगण्डवत् पाण्डुः' इस विग्रहमें 'उपमानानि सामान्य- वचनै: [अष्टा० २, १, ५५] इस सूत्रसे उपमान तथा साधारणधर्मवाचक दोनों पदोंका समास होनेपर यह 'समासगा वाचकलुप्ता' का उदाहरण होता है। इसमें समासविधायक सूत्रमें 'उपमानानि' इत्यादि कथनसे साध्म्यकी प्रतीति हो जानेके कारण उपमावाचक इवादिके प्रयोगकी आवश्यकता नहीं रहती है। इसलिए यह वाचकलुप्ता उपमा कहलाती है। इम उदाहरणमें उपमान तथा साधारणधर्मवाचक दो पदोंका समास हुआ है। इसलिए यह हिपद-समासगाका उदाहरण है। अगले उदाहरणमें उपमान, उपमेय तथा साधारणधर्म, तीनोंके वाचक पदोंका समास होनेपर वहुपदसमासगा वाचकलुप्ताका प्रयोग दिखलाते हैं -- (१ ख) काले नागके समान भीषण तलवारवाला यह [वीर योद्धा ] शत्रुको [सम्मुख ] देखकर उत्साह [रुहरहिका ] से चित्तके व्याप्त हो जानेसे त्वरितगति, पुलकितशरीर और गालोंपर विकसित कान्तिवाला हो गया [ अर्थात् शत्रुको देखकर उत्साहातिरेकसे पुलकित हो उठा] ।४०३।। इसमें 'असितमुजग' पद उपमानवाचक, 'भीषण' पद साधारणधर्मवाचक और 'असिपत्र' पद उमेयवाचक है। इन तोनों पदोंका समास हो गया है इसलिए यह 'बहुपदसमासगा वाचकलुप्ता' का उदाहरण है। अगले एक श्लोकमें (१) 'पौर जन सुतीयति' में कर्ममें क्यच्-प्रत्यय, (२) 'समरान्तरे अ्र्पन्त :- पुरीयति में आधारमें क्यच्-प्रत्यय तथा (३) 'नारीयते' में क्यङ-प्रत्ययके प्रयोगसे तीन प्रकारकी वाचक- लप्ताके उदाहरण इकट्ठे दिखलाये है। 'सुतीयति' पदमें 'सुतमिवाचरति' इस विग्रहमें उपमानवाचक 'मुत' पदसे 'उपमानादाचारे' [अष्टा० ३, १, १० ] इस सूत्रसे क्यच्-प्रत्यय होकर 'सुतीयति' पद वनता है। इसी प्रकार 'अन्तःपुरे इव आचरति' इस विग्रहमें अधिकरणवाचक 'अन्तःपुर' पदसे 'अधि- करगाच्च' इस वार्तिकसे क्यच्-प्रत्यय होकर 'अन्तःपुरोयति' पद बनता है। 'नारी इव आरचरति' इम विग्रहमें उपमानवाचक 'नारो' पदसे 'कर्तुः क्यङसलोपश्च' [अष्टा० ३, १, ११] इस सूत्रसे क्यङ-
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४५४ काव्यप्रकाश: [ का० ८६, सू० १३० (२-४) पौरं सुतीयति जनं समरान्तरेऽसावन्तःपुरीयति विचित्रचरित्रचुञ्चुः । नारीयते समरसीम्नि कृपाणपाणेरालोक्य तस्य चरितानि सपत्नसेना।।४०४।। (५-६) मृधे निदाघघर्मांशुदर्श पश्यन्ति तं परे। स पुनः पार्थसञ्चारं सञ्चत्यवनीपतिः ।४०५॥ [सू० १३० ] एतद्द्विलोपे क्विप्समासगा ।।८९।। प्रत्यय होकर 'नारीयते' बनता है। इसलिए तीन प्रकारकी वाचकलुप्ताके उदाहरण इस एक ही श्लोकमें पाये जाते हैं। श्लोकका अर्थ निम्नलिखितप्रकार है -- (२-४) यह [राजा अपने ] नगर-निवासी [प्रजा ] जनोंको पुत्रके समान समझता है। विचित्र चरित्रसे प्रसिद्ध ['तेन वित्तश्चुञ्चुप्चणपौ' [अष्टा० ५, २, २६] इस सूत्रसे चुञ्चुप् प्रत्यय होकर 'विचित्र चरित्रचुञ्चुः' पद बनता है]। यह राजा युद्धक्षेत्रमें अन्तःपुरके समान आचरण करता है[अर्थात् अन्तःपुरके समान स्वच्छन्दरूपसे विचरण करता है] और युद्धभूमिमें तलवार हाथमें लिये हुए उसके चरित्र [व्यवहार] को देखकर शत्रुसेना [भयके मारे स्त्रीके समान आचरण करती है ॥४०४। इस प्रकार वाचकलुप्ताके चार उदाहरण यहाँतक हो गये। अब कर्म और कर्तामें णमुल्-प्रत्ययके होनेपर दो प्रकारकी वाचकलुप्ताके उदाहरण अगले एक ही श्लोकमें दिखलाते हैं। इसमें 'निदाघघर्मां- शुदर्शम्' पदमें 'निदाघघर्मांशुमिव पश्यन्ति' इस विग्रहमें 'उपमाने कर्मणि च' [३, ४, ४५ ] इस सूत्रसे णमुल्-प्रत्यय होता है। और 'पार्थसञ्चारं सञ्चरति' इसमें इसी 'उपमानादाचारे' सूत्रमें 'चकार' के ग्रहणसे कर्तामें णमुल्-प्रत्यय होता है। श्लोकका अर्थ निम्नलिखितप्रकार है -- युद्धमें शत्रु उस [राजा ] को ग्रीष्मकालके सूर्यके समान [दुःसह प्रतापवाला ] देखते हैं और वह राजा [युद्धभूमिमें ] अर्जुनके समान [निर्भय होकर ] विचरण करता है॥४०५॥ यहाँ निदाघघर्मांशुमिव पश्यन्ति' इस विग्रहमें 'उपमाने कर्मणि च' [अष्टा० ३, ४, ४५ ] इस सूत्रसे 'निदाघघर्मांशुं' इस कर्मके उपपद रहते 'दृश' धातुसे णमुल्-प्रत्यय होकर 'निदाघघर्मांशुदर्शम्' यह मान्त अव्ययपद बनता है। उसके साथ 'कषादिषु यथाविध्यनुप्रयोगः [ ३, ४, ४६ ] इस सूत्रसे जिस धातुसे णमुल् प्रत्यय होता है उसीके अनुप्रयोगका विधान होनेसे 'दृश' धातुका ही अनुप्रयोग होकर 'निदाघघर्मांशुदर्श पश्यन्ति' यह प्रयोग कर्मके उपपद रहते णमुल्-प्रत्यय होकर बनता है। इसी श्लोकके उत्तरार्द्धमें 'पार्थ इव सञ्चरणं' इस विग्रहमें 'पार्थ' रूप कर्ताके उपपद रहते 'चर' धातुसे णमल्-प्रत्यय होकर 'पार्थसञ्चारं' यह मान्त अव्ययपद बनता है और उसके साथ 'सञ्चरति'का अ्नुप्रयोग होता है। द्विलुप्ता उपमाके पांच भेद इस प्रकार यहाँतक छह प्रकारकी पूर्णोपमाके बाद पाँच प्रकारकी धर्मलुप्ता, दो प्रकारकी उपमानलुप्ता और छह प्रकारकी वाचकलुप्ता इन तेरह प्रकारकी एकलुप्ताके भेदोंका प्रदर्शन कराया गया है। अब आगे पाँच प्रकारकी 'द्विलुप्ता' उपमाका प्रतिपादन करेंगे। उसमें सबसे पहिले दो प्रकारकी धर्मवाचकलुप्ताका प्रतिपादन करते हैं- [सूत्र १३०]-इन [धर्म तथा वाचक ] दोका लोप होनेपर १. क्विप्गत तथा २. समासगत [दो प्रकारकी द्विलुप्तोपमा होती है] ।।८६।।
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का० ६०, सू० १३१ ] दशम उल्लास: ४५५
एतयोर्धर्मवाद्योः । उदाहरणम् -- (१) सविता विधवति विधुरपि सवितरति तथा दिनन्ति यामिन्यः । यामिनयन्ति दिनानि च सुखदुःखवगीकृते मनमि ।।८०५६।। (२ ) परिपन्थिमनोराज्यशतैरपि दुराक्रमः । सम्णरायप्रवृत्तोऽसौ राजते राजकुञ्जरः ॥।6०3। [सू० १३१ ] धर्मोपमानयोलोंपे वृत्तौ वाक्ये च दृश्यते।
इन दोनों अर्थात् धर्म तथा वादि [ उपमावाचक पदों ] का [लोप होनेपर दो प्रकारकी लुप्तोपमा. होती है ]। उदाहरण [जैसे ] -- (१) [मनुष्यके ] मनके सुखाधीन [सुखसे परिपूर्ण ] होनेपर [प्रचण्ड ] सूर्य भी चन्द्रमाके समान [आह्लाददायक हो जाता है] और दुःखाधीन होनेपर [आह्वाददायक ] चन्द्रमा भी सूर्यके समान [असह्य दुःखदायक ] हो जाता है। [इसी प्रकार सुखके समय अन्धकारमयी ] रात्रियाँ भी [ प्रकाशमय] दिन बन जाती हैं और [दुःखके समय प्रकाशमय ] दिन भी [अन्धकारमयी ] रात्रि [में परिणत ] हो जाते हैं।४०६।। इस श्लोकमें १. 'विधवति', २. 'सवितरति', ३. 'दिनन्ति' तथा ४. 'यामिनयन्ति' ये चार क्विवन्त प्रयोग पाये जाते हैं। इन चारों प्रयोगोंमें 'विधरिव आचरति विधवति' आदि विग्रहमें 'कर्तुः क्यड सलोपश्च' [अष्टा० ३, १, ११] इस सूतरके अ्न्तर्गत 'सर्वप्रातिपदिकेभ्य आचार क्विव्वा वक्तव्यः' इस वार्तिकसे आचारार्थमें कविप्-प्रत्यय होकर 'विधवति', 'सवितरति' आदि प्रयोग बनते हैं। यहाँ आचार अर्थमें क्विप-प्रयय होता है उसी आचारको समानधर्म कहा जा सकता है इमलिए यह धर्मलोपका उदाहरण नहीं हो सकता है, यह शङ्गा की जा सकती है। परन्तु यहाँ उस आ्चारार्थके सूचक क्विप- प्रत्ययका 'वेरपृक्तस्य'[६, १, ६७] इस सूत्रसे सर्वापहारी लोप हो जाता है। उसका कोर् अ्ंं शेप नहीं रह जाता है, इसलिए इसको धर्मलोपका उदाहरण माना गया है। इसीलिए उद्योतकारने लिखा है कि -- "यद्यपि कवपप्रकृतेः कर्तभूतस्वसाद्श्यप्रयोजकाचारे लक्षणेति क्थं धर्मलोपः, तथापि तन्मात्- बोधकाभावात् लोपव्यवहारः।" धर्म तथा इवादिके लोपमें समामगा लुप्तोपमाका उदाहरण देते हैं- (२) शत्रुगण जिसपर सैकड़ों मनोरथोंसे भी विजय नहीं प्राप्त कर सकते हैं इस प्रकारका युद्धमें लगा हुआ यह श्रेष्ठ राजा शोभित हो रहा है ।४०७।। यहाँ 'राजा कुज्जर इब राजकुञ्जर:' इम प्रयोगमें 'उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे' [२, १, ५६] इस सूत्रसे समाम होकर 'राजकुञ्जरः' प्रयोग बनता है। यद्यपि यहाँ 'राजते' इसको सामान्यधर्म कहा जा सकता है परन्तु समासविधायक सूत्रमें 'सामान्याप्रयोगे' सामान्यधर्मका प्रयोग न होनेपर ही समासका विधान किया गया है, इसलिए 'राजतें' रूप 'सामान्यधर्मको अ्विवक्षित मानकर, धर्म तथा वादिके लोपमें यह समासगा लुप्तोपमाका उदाहरण दिया गया है। [सूत्र १३१]-धर्म तथा उपमानका लोप होनेपर समासगा तथा वाक्यगा [दो प्रकारकी द्विलुप्ता उपमा ] पायी जाती है।
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४५६ काव्यप्रकाश: [ का० ६०, सू० १३२-१३३
टुण्टुण्णन्तो मरिहसि कण्टअकलिआइं केअइवणाइं। मालइकुसुमसरिच्छं भमर ! भमन्तो ण पाविहिसि ।।४०८।। [टुण्टुणायमानो मरिप्यसि कण्टककलितानि केतकीवनानि। मालतीकुसुमसदृशं भ्रमर भ्रमन् न प्राप्स्यसि ।। इति संस्कृतम् ] 'कुसुमेण समम्' [ कुसुमेन समम् ] इति पाठे वाक्यगा । [सू० १३२ ] क्याच वाद्युपमेयासे आसे निरासे। अरातिविक्रमालोकविकस्वरविलोचनः । कृपाणोदग्रदोर्दण्डः स सहस्रायुधीयति।।४०९।। अत्रात्मा उपमेयः । [सू० १३३ ] त्रिलोपे च समासगा ।।९० ।। त्रयाणां वादिधर्मोपमानानाम् । उदाहरणम् --
(३) काँटोंसे भरे हुए केतकीके वनोंमें टुन-टुन [ याचना ] करते हुए घूम-घूमकर मर जाओगे, पर हे भ्रमर ! मालतीके कुसुमके सदृश [सुन्दर अन्य पुष्प ] न पाओगे ।।४०८।। यहाँ मालतीकुसुम उपमेय तथा 'सदृश' उपमावाचक शब्द दोका ग्रहण किया गया है। धर्म तथा उपमानका प्रयोग नहीं हुआ है। इसलिए यह द्विलुप्ताका उदाहरण है। 'मालतीकुमुमसदृश' यह समस्त पद है इसलिए यह समासगाका उदाहरण है। (४) इसी श्लोकमें यदि 'कुसुमसदृशं'के स्थानपर 'कुसुमेन समं' यह पाठ कर दिया जाय तो वाक्यगा [का उदाहरण ] हो जायगा। (सूत्र १३२) -- वादि [उपमावाचक शब्द ] तथा उपमेय [इन दो ] का लोप होनेपर क्यज्गत [एक प्रकारकी द्विलुप्तोपमा ] होती है। [सूत्रमें आये हुए ] 'आसे' [ पदका अर्थ 'निरासे' ] लोप होनेपर [यह होता है]। (५) शत्रुओंके परात्रमको देखनेसे जिसकी आँखें [ प्रसन्नताके कारण ] चमक उठी हैं इस प्रकार- का, तलवारके कारण भयङ्गर हाथवाला, वह [ राजा] सहस्रायुध [कार्तवीर्य अर्जुन ] के समान प्रतीत होता है।।४०६।। यहाँ 'सहस्रायुधमिव आत्मानमाचरति सहस्रायुधीयति' यहउपमानादाचारे' इस सूत्रसे आचारार्थमें क्यच्-प्रत्यय होकर रूप बनता है। इसमें- आत्मा उपमेय है [ उसका तथा उपमावाचक बादिका लोप होनेसे यह भी द्विलुप्ताका उदाहरण 意 ], त्रिलुप्ताका एक भेद [सूत्र १३३ ] -- तीनका लोप होनेपर समासगा [त्रिलुप्तोपमा ] होती है ॥।६०।। तीन अर्थात् वादि [उपमावाचक ], धर्म तथा उपमानका [लोप होनेपर त्रिलुप्ता उपमा केवल एक प्रकारकी होती है]। उदाहरण [जैसे ]-
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का० ६०, मू० १३३] दशम उल्लास ४५७ तरुणिमनि कृतावलोकना ललितविलासवितीर्णविग्रहा। स्मरशरविसराचितान्तरा मृगनयना हरते मुनेर्मन:॥४१०॥ अत्र 'सप्तम्युपमान' इत्यादिना यदा समासलोपौ भवतस्तदेदमुदाहरणम् ।
नवयौवनमें झाँकती [ प्रवेश करती ] हुई, [इसलिए ] सुन्दर हाव-भावोंको अपना शरीर प्रदान कर देनेवाली [अर्थात् सुन्दर हाव-भावोंसे युक्त ], कामदेवके बाणोंसे व्याप्त मनवाली मृगनयना मुनिके [भी] मनको लुभा लेती है ॥४१०।। यहाँ 'मृगनयने इव चञ्चले नयने यस्याः सा मृगनयना' इस विग्रहमें 'अनेकमन्यपदार्थे' [२, २, २४] इस सूत्रमें आये हुए 'सप्तम्युपमानपूर्वपदस्य बहुव्रीहिरुत्तरपदलोपश्च' इस वार्तिकसे समास होनेपर केवल उपमानवाचक 'मृगनयन' पदका ग्रहण होने तथा १. उपमान, २. चञ्चलत्व आदि सामान्यधर्में तथा ३. वादि उपमावाचक पद, तीनोंका लोप होनेसे यह त्रिलुप्ता उपमाका उदाहरण है। 'मप्तम्युपमानपूर्वपदस्य' इत्यादि वार्तिकका यह अभिप्राय है कि सप्तम्यन्त अथवा उपमान- वाचक पूर्वपद जिसका है उसका उत्तरपदके साथ बहुव्रीहि समास होकर उत्तरपदका लोप हो जाता है। यहाँ 'मुगनयने इव नयने यस्याः' इस विग्रहमें 'मृगनयने' यह उपमानवाचक पूर्वपद है। उसका 'नयने' के साथ बहत्रीहि समास और उत्तरपद 'नयने' का लोप होकर 'मृगनयना' पद बनता है। कातन्द्रव्याकरण- कारने ऐसे स्थलोपर 'मृग' पदको 'मृगनयन' अरमें लक्षणा मानी है। उसके अनुसार 'मुग इव नयने यस्या: सा मृगनयना' इस प्रकारका समास यहाँ होता है। उस दशामें मृगपद ही उपमानवाचक पद हो जाता है इसलिए यह उपमानलुप्ता नहीं हो सकती है। 'सप्तम्युपमानपूर्वपदस्य' इत्यादि वार्तिकके अनुसार समाम होनेपर 'मृगनयने इव नयने यस्याः सा मृगनयना' यह विग्रह होता है इसमें 'मृगनयने' यह उपमानवाचक पूर्वपद है उसका 'नयने के साथ बहुव्रीहि समास होता है। उस समासके कारण उपमानवाचक पूर्वपद 'मृगनयने' का जो उत्तरपद अर्थात् 'नयने' पद है उसका लोप हो जाता है इसलिए यह उपमानलोपका भी उदाहरण हो सकता है। इसी बातको ध्यानमें रखकर अगली पंक्तिमें लक्षण- समन्वय करते हुए ग्रन्थकार लिखते हैं- जब 'सप्तम्युपमानपूर्वपदस्य बहुब्रीहिरुत्तरपदलोपश्र' इत्यादि [ वार्तिक ] से समास तथा [उत्तर- पदका ] लोप होता है तब यह [त्रिलुप्ता उपमाका ] उदाहरण होता है [कातन्त्रव्याकरणके अनुसार मृगपदकी मृगनयन अर्थमें लक्षणा मानकर समास करनेपर उपमानवाचक मृगपदके विद्यमान रहनेसे यह त्रिलुप्ता उपमाका उदाहरण नहीं हो सकता है ]। ऊपर 'मृगनयना' यह तिलुप्ता उपमाका उदाहरण दिया गया है। इसमें केवल उपमेयमात्रका उपादान किया गया है, शेष तीनका लोप होनेसे यह त्रिलुप्ताका उदाहरण बनता है। इसी प्रकार कुछ लोग उपमानमात्रका उपादान होनेपर भी त्रिलुप्ता उपमा मानते हैं। और उसके उदाहरणरूपमें आयःशूलिकः' यह उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। 'तेनान्विच्छति' इसके अधिकारमें 'अयःशूलदण्डाजिनाभ्यां ठक्ठजी' ५, २, ७६ इस सूत्रसे 'अयःशूल' शब्दसे ठक्-प्रत्यय करके 'आ्यःशूलिकः' यह प्रयोग बनता है। · 'अयःशूलमिव अः' शूलम् साहसम्। तेनान्विच्छति व्यवहरति इति आ्रायःशूलिकः । 'यो मृदुनोपायेन • अ्रन्वेष्टव्यानर्थान् तोक्ष्णेनोपायेनान्विच्छति स आ्रयःशूलिक:' इति महाभाष्यम्। अर्थात् जो मृदु उपायसे साध्य अर्थके लिए साहसपूर्ण तीक्ष्ण उपायोंका प्रयोग करता है उसको 'आयःशूलिकः' अर्थात् साहसिक
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४५८ काव्यप्रकाश: [का० ६०, सू० १३३ क्ूरस्याचारस्यायःशूलतया ऽध्यवसायात् 'अयःशूलेनान्विच्छति आयःशूलिकः' इत्यतिशयोक्तिः, न तु कूराचारोपमेयतैक्ष्ण्यधर्मवादीनां लोपे त्रिलोपेयमुपमा। एवमेकोनविशतिर्लुप्ताः पूर्णाभिः सह पञ्चविशतिः । अनयेनेव राज्यश्रीदैन्येनेव मनस्विता। मम्लौ साऽथ विषादेन पद्मिनीव हिमाम्भसा ।४११।। इत्यभिन्ने साधारणे धर्मे। ज्योत्स्नेव नयनानन्दः सुरेव मदकारणम्। प्रभुतेव समाकृष्टसर्वलोका नितम्विनी ॥४१२।
कहा जाता है। अर्थात् 'अयःशूल' शब्द लक्षणासे 'कूर आचार' को बोधित करता है। 'अयःशूल'के समान कूर आचारका व्यवहार करनेवाला 'आयःशूलिकः' हुआ। यहाँ 'अयःशूल' पद उपमान है उसका उपादान किया गया है। कूर आचार उपमेय, तीक्ष्णत्वादि साधारणधर्म तथा इवादि उपमावाचक शब्द इन तीनोंका उपादान नहीं किया गया है। इसलिए यह उपमानमात्रके उपादानमें व्िलुप्ताका उदाहरण है यह पूर्वपक्षका आशय है। सिद्धान्तपक्षमें मम्मट इसको उपमाका उदाहरण नहीं मानते हैं। वे इसमें अतिशयोक्ति अलङ्कार मानते हैं। कूर आचाररूप जो उपमेय है उसका निगरण करके 'अयःशूल' रूपसे उसका अध्यवसान करनेके कारण यहाँ निगीर्याध्यवसानरूपा अतिशयोक्ति है, उपमा नहीं। इसी बातको ग्रन्थकार अगली पंक्तिमें लिखते हैं- [आयःशूलिकः इस प्रयोगमें ] कूर आचार [रूप उपमेयका निगरण करके उस ] का 'अयःशूलः' रूपमें अध्यवसान होनेसे अयःशूल [तीक्ष्ण उपाय अर्थात् साहस ] से [ अन्विच्छति] व्यवहार करता है [इस विग्रहमें सिद्ध हुआ] 'आयःशूलिक' यह [पद ] अतिशयोक्ति [का उदाहरण] है। क्रूर आचाररूप उपमेय, तैक्ष्ण्य आदि [साधारणधर्म ] और वा आदि [उपमावाचक ] के लोपमें त्रिलुप्ता उपमाका यह उदाहरण नहीं है। इस प्रकार [कुल मिलाकर ] उन्नीस प्रकारकी लुप्ता, [छह तरहकी ] पूर्णा [उपमा] के साथ [मिलकर कुल ] पचीस प्रकारकी उपमा होती है। मालोपमा और रशनोपमाकी स्थिति रुद्रटने अपने काव्यालङ्कारमें उपमाके इन भेदोंके अतिरिक्त दो प्रकारकी मालोपमा तथा दो प्रकारकी रशनोपमा और मानी हैं। मम्मट इन भेदोंका उक्त भेदोंमें ही अन्तर्भाव मानते हैं इसलिए उन्होंने उनके लक्षण आदि नहीं किये हैं। इस बातका प्रतिपादन करनेके लिए आगे 'मालोपमा' तथा 'रशनोपमा' दोनोंके चारों उदाहरण देकर वे अपने मतका प्रतिपादन करते हुए लिखते हैं- अनीतिसे राज्यश्रीके समान, दीनतासे मनस्विताके समान और पालेसे कमलनी के समान वह [नायिका ] दुःखसे मलिन [कान्तिहीन ] हो गयी ।।४११।। इसमें [म्लानतारूप ] साधारणधर्म होनेपर। और -- यह नितम्बिनी चाँदनीके समान नेत्रोंको आनन्द देनेवाली, सुराके समान मदोत्पादक और प्रभुताके समान सारे संसारको आकृष्ट करनेवाली है॥४१२॥
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का० ६०, सू० १३३ ] दशम उल्लास: ४५६
इति भिन्ने च तस्मिन् एकस्यैव बहूपमानोपादाने मालोपमा। यथोत्तरमुपमेयस्योपमानत्वे पूर्ववदभिन्नभिन्नधर्मत्वे- अनवरतकनकवितरणजललवभृतकरतरङङ्गितारथिततेः । भणितिरिव मतिर्मतिरिव चेष्टा चेष्टेव कीतिरतिविमला ।।४१३।। मतिरिव मूर्तिर्मंधुरा मूर्त्तिरिव सभा प्रभावचिता। तस्य सभेव जयश्रीः शक्या जेतुं नृपस्य न परेषाम् ।।४१४।। इत्यादिका रशनोपमा च न लक्षिता एवंविधवैचित्र्यसहस्त्रसम्भवात् उक्तभेदान- तिक्रमाच्च।
और इसमें उस [साधारणधर्म ] के भिन्न होनेपर अनेक उपमानोंके उपादानरूप 'मालोपमा' [को अलग माननेकी आवश्यकता नहीं है। इसी प्रकार ]- उत्तरोत्तर उपमेयके उपमानरूप हो जानेपर पूर्ववत् [अर्थात मालोपमाके समान ] साधारणधर्मके १. अभिन्न तथा २. भिन्न होनेपर [दो प्रकारकी 'रशनोपमा' जो रुद्रटने मानी है उसको भी अलग माननेकी आवश्यकता नहीं है। जैसे ]- निरन्तर सुवर्णका दान करनेके [सङ्कल्पके ] जललवसे भरे हुए जिसके हाथमें [ पूर्व-पश्रा्द्ावसे मिलित या प्रतिबिम्बित ] याचकसमूह तर्राङ्गत हो रहा है ऐसे हे राजन् ! आपकी वचनोंके समान मति, मतिके समान चेष्टा और चेष्टाके समान कीति अत्यन्त निर्मल है ।४१३। यहाँ 'मणितिरिव मतिः' में 'मति' उपमेय है, वही 'मतिरिव चेष्टा' इस दूसरी उपमामें उपमान बन गयी है और चेष्टा उपमेय है। यही चेष्टा अगली 'चेष्टेव कीतिः' इस तीसरी उपमामें उपमान बन गयी है। इस प्रकार उत्तरोत्तर उपमेयके उपमान होनेपर रुद्रट रशनोपमा मानते हैं। इन तीन उप- माओोंमें 'अतिविमलत्व' रूप साधारणधर्म अभिन्न है। इसलिए यह साधारणधर्मकी अभिन्नतामें रशनो- पमा'का उदाहरण हुआ। इसी प्रकार साधारणधर्मको भिन्नतामें- मतिके समान [उस राजाकी ] मूर्ति मधुर है, मूर्तिके समान [उसकी ] सभा प्रभावसे युक्त है और उसकी सभाके समान उसकी जयश्रीको दूसरे शत्रुओंके द्वारा विजय करना संभव नहीं है॥४१४॥ यहाँ [ तीनों उपमाओंमें उत्तरोत्तर उपमेयके समान हो जानेपर भी साधारणधर्मके भिन्न होनेपर दूसरे प्रकारकी रशनोपमा होती है। परन्तु इस प्रकारकी ] रशनोपमा [तथा मालोपमा दोनों ] का लक्षण [हमने] नहीं किया है। क्योंकि इस प्रकारके अनन्त वैचित्य हो सकते हैं [ उन सबके आधारपर उपमाके यदि भेद किये जायँ तो उनकी गणना ही असम्भव हो जायगी]। और [ वे सब भेद] उक्त [पचीस प्रकारके ] भेदोंसे भिन्न नहीं हैं[ इसलिए हमने दोनों प्रकारकी मालोपमा तथा दोनों प्रकार- की रशनोपमाका निरूपण नहीं किया है]। इस प्रकार इस दशम उल्लासमें ग्रन्थकारको जिन ६१ प्रकारके अर्थालङ्कारोंका निरूपण करना है उनमेंसे प्रथम उपमा अलङ्कारका यहाँतक सविस्तर निरूपण किया गया। अब इसके आगे सादश्य- मूलक दूसरे-अनन्वय-अलङ्गारका निरूपण करते हैं।
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४६J काव्यप्रकाश: [का० ११-६ः, मू० १३८-१३६
[सू० १३४] उपमानोपमेयत्वे एकस्यैवैकवाक्यगे। अनन्वय:
न केवलं भाति नितान्तकान्तिनितम्विनी सैव निर्तम्बनीव यावद्विलासायधलास्यवासास्ते तद्विलासा इव नदविलासाः ।८१५। [सू० १३५ ] विपर्यास उपमेयोपमा तयो: ॥९१।।। तयोरुपमानोपमेययोः । परिवत्तिः अर्थाद्वाक्यद्वये, इनरोपमानव्यवच्छेदपरा उप- मयेनोपमा इति उपमेयोपमा। उदाहरणम् -- केमलेव मतिर्मतिग्व कमला ननुरिव विभा विभेव तनुः। धगणीव धुतिर्धु निरिव धरणी सनत विभाति वत यस्य ।।४ १६।। [सू० १३६] सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत्। ममेन उपमानेन। उदाहरणम्-
२. सादृश्यमूलक अनन्वय अलङ्गार [सू० १३४]-एक वाक्यमें एक ही के उपमान तथा उपमेय [दोनों ] होनेपर अनन्वय [अलङ्गार ] होता है। अर्थात् अन्य उपमानका सम्बन्ध न होना ही अनन्वय [अलङ्गार] है। [उसका ] उदाहरण जैसे -- न केवल अत्यन्त सुन्दरी वह नितम्बिनी [नायिका] ही उस नितम्बिनीके समान शोभित होती है अपितु जिनमें कामदेव मानो थिरकता रहता है इस प्रकारके उसके वे [अनिर्वचनीय] हाव-भाव उसीके विलासोंके समान हैं।।४१५।। ३. सादृश्यमूलक उपमेयोपमा अलङ्गार [ सू० १३५ ]-उन दोनों [अर्थात् उपमान और उपमेय] का परिवर्तन हो जाना [अर्थात् उपमानका उपमेय तथा उपमेयका उपमानरूपमें वर्णन ] उपमेयोपमा [अलङ्गार कहलाता ] है ॥ ६१। उन दोनोंका अर्थात् उपमान और उपमेयका परिवर्तन अर्थात् दो वाक्योंमें [ परिवर्तन ] अन्य उपमानका निराकरण करनेके अभिप्रायसे उपमेयके साथ [उपमानका सादृश्य जिसमें दिखलाया जाय] यह उपमेयोपमा [का शब्दार्थ] है। उदाहरण, जैसे -- अहो इस [राजा ] की लक्ष्मीके समान बुद्धि और बुद्धिके समान लक्ष्मी, शरीरके समान कान्ति और कान्तिके समान शरीर तथा धरणीके समान धैर्य एवं धैर्यके समान धरणी सदैव शोभित होती है [ऐसा प्रभावशाली यह राजा है]।।४१६।। ४. सादृश्यमूलक उत्प्रक्षालङ्कार [सू० १३६ ]-प्रकृत [अर्थात् वर्ण्य उपमेय ] की सम [अर्थात् उपमान ] के साथ सम्भावना [अर्थात् उत्कटैककोटिक सन्देह ] उत्प्रेक्षा [कहलाती ] है।
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का० ६२, मू० १३६] दशम उल्लाम ८६१ उन्मेषं यो नम न सहते जातिवैरी निवाया- तम्य सौन्दर्यवर्ष: नीतः शान्ति प्रसभभनया वककान्त्येति हपा- ल्लग्ना मन्ये लेलिततन त पादयाः पद्मलक्ष्मीः ॥४१३।। लिमतीव तमाजज्वानि वर्षतीवाञ्जनं नमः। असत्पुरुपसेवेव दृष्टिरविफलता गता ।।४१८।। इत्यादौ व्यापनादि लेपनादिष्पतया सम्भावितम् ।
जो [मुझ कमलश्रीका ] जन्मका दैरी [चन्द्रमा ] रात्रिमें [ भी] मेरे विकासको सहन नहीं करता है, इस कमलनयनीने उस [चन्द्र ] का सौन्दर्याभिमान अपने मुखकी कान्तिसे हठात् नष्ट कर दिया है इस कारणसे [ ऐसा मानकर ] हे सुन्दर शरीरवाली प्रियतमे! प्रसन्नताके कारण कमलकी लक्ष्मी मानो तुम्हारे चरणोंमें चिपट गयी है [ आ पड़ी है]॥४१७॥ [वर्षाकालकी रात्रिके समय ] अन्धकार अङ्गोंको लीप-सा रहा है, आकाश काजलकी वृष्टि-सी कर रहा है और दुष्ट-पुरुषकी सेवाके समान दृष्टि विफल-सी हो गयी है ॥४१८॥ इत्यादिमें व्यापन आदि [उपमेय, उपमानभूत ] लेपनादिरूपसे सम्भावित [ उत्कटैककोटिक सन्देहरूप ] किये गये हैं अतः यहाँ उत्प्रेक्षालङ्गार है]। उपमा और उत्प्रेक्षाका भेदL अबतक ग्रन्थकारने उपमा, अनन्वय, उपमेयोपमा उत्प्रेक्षा इन चार अलङ्गारोंका विवेचन किया है। ये चारों अलद्कार सादृश्यमूलक अलद्गार हैं। फिर भी उनमें परस्पर भेद है। इसीलिए उनके अलग-अलग लक्षण किये गये हैं। इनमेंमे 'उपमा' और 'अनन्वय का परस्पर भेद बहुत स्पष्ट है। उपमामें उपमान और उपमेय दोनों अलग-अलग होते हैं। अनन्वयमें उपमान और उपमेय एक ही होता है। यह उपमा और अनन्वयका भेद है। इसी प्रकार उपमेयोपमाका भी उपमा तथा अनन्वय दोनोंसे भेद स्पष्ट है। उनको अलग-अलग पहिचाननेमें कोई कठिनाई नहीं होती है। किन्तु उत्प्रेक्षा और उपमाका अन्तर करना कहीं-कहीं कठिन हो जाता है। इसलिए उसपर विशेष ध्यान देनेकी आवश्यकता है। इसको दो मुख्य पहिचानें हैं। (१) मन्ये श क्के ध्रुवं प्रायो नूनमित्येवमादयः । उत्प्रेक्षावाच्का: शब्दा इव शब्दोऽपि तादृशः ।। मन्ये, शङ्के, ध्रुव, प्रायः, नूनं ये उत्प्रेक्षावाचक शब्द हैं। इनका प्रयोग उपमामे नहीं होता है। इमलिए जहाँ इन शब्दोंका प्रयोग होता है वहाँ स्पष्टतः 'उत्प्रेक्षा' अलङ्कार समझ लेना चाहिये। (२) 'इव' शब्द ऐसा है जो उत्प्रेक्षा तथा उपमा दोनोंका वाचक है। परन्तु इसमें भेदक पहिचान यह है कि उत्प्रेक्षामें 'इव' शब्दका प्रयोग प्रायः क्रियापदके साथ होता है। 'लिम्पतीव तमोऽ- ङ्गानि, वर्षतीवाञ्जन नभः ।' आदिके सदृश जब करियापदके साथ इसका प्रयोग हो तब उसको निश्चित- रूपसे उत्प्रेक्षा समझना चाहिये। (३) जब उत्प्रेक्षावाचक 'इव' पद हो और उसका सम्बन्ध क्रियापदके साथ न होकर किसी अन्य पदके साथ हो उस स्थलपर उत्प्रेक्षाका निर्णय करना जरा कठिन हो जाता है। ऐसे स्थलोंपर
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४६२ काव्यप्रकाश: [ का० ६२, सू० १३७
[सू० १३७ ] ससन्देहस्तु भेदोक्तौ तदनुक्तौ च संशयः ।।९२।। भेदोक्तौ यथा- अयं मार्तण्डः किं ? स खलु तुरगैः सप्तभिरितः कृशानुः किं ? सर्वाः प्रसरति दिशो नैष नियतम् । कृतान्तः किं ? साक्षान्महिषवहनोऽसाविति चिरं समालोक्याजौ त्वां विधदति विकल्पान् प्रतिभटाः ॥४१९॥
उत्प्रेक्षाका लक्षण विशेषरूपसे सहायक होता है। उपमाका प्राण सादृश्य है और उत्प्रेक्षाका प्राण सम्भावना है। सादृश्यस्थलमें उपमानरूप अर्थकी वास्तविक सत्ता होनी चाहिये। सम्भावनामें उपमान कल्पित होता है। उपमेयका वस्तुसत् उपमानके साथ सादृश्य होनेपर उपमा होती है और उपमेयकी कल्पित उपमानरूपेण सम्भावना होनेपर उत्प्रेक्षा होती है। बालेन्दुवक्राण्यविकासभावाद् बभुः पलाशान्यतिलोहितानि। सद्यो वसन्तेन समागतानां नखक्षतानीव वनस्थलीनाम् ।। 'बालचन्द्रमाके समान अरधचन्द्राकार और अत्यन्त लाल वर्णके पलाश [ढाक] के फूल वसन्तके समागमसे उत्पन्न वनस्थलियोंके नखक्षतोंके समान प्रतीत होते थे।' इसमें वनस्थलियोंके नखक्षत वस्तुतः विद्यमान नहीं हैं। इसलिए 'नखक्षतानीव वनस्थलीनाम्' इसमें 'इव' सादृश्यका वाचक नहीं अपितु 'सम्भावना' मात्रका बोधक है। अतः यहाँ उपमा नहीं, उंत्प्रेक्षालङ्कार है। ५. ससन्देहालङ्गार [सू० १३७]-[ उपमेयमें उपमानरूपसे ] संशय, सन्देह [नामक अलङ्गार] है। वह [उन दोनोंके ] भेदका कथन करने तथा न करनेसे [दो प्रकारका ] होता है ।६२।। इस कारिकामें ससन्देह तथा संशय दोनों समानार्थक पद आये हैं। इनमेंसे 'ससन्देह' पद लक्ष्य अलङ्कारका वाचक है और 'संशय' पद लक्षणपरक है। इसलिए उनमें पुनरुक्ति नहीं समझनी चाहिये। कारिकामें 'प्रकृतस्य समेन' इस अ्रंरशकी पिछली कारिकासे अनुवृत्ति आतो है। इसलिए 'प्रकृत' अर्रात् उपमेयका 'सम' अर्थात् उपमानके साथ समानकोटिक संशय सन्देह नामक अलङ्कार कहलाता है। यह इस कारिकाका अर्थ हुआ। उसके दोनों भेदोंके उदाहरण आगे देते हैं। [उपमान तथा उपमेय दोनोंके ] भेदका कथन करते हुए [ ससन्देहका उदाहरण ] जैसे -- यह [राजा ] क्या [अत्यन्त तेजस्वी होनेसे ] सूर्य है ? [ यह संशय हुआ परन्तु उसका सूर्यसे भेद अगले वाक्यमें कहते हैं] वह तो सात घोड़ोंसे युक्त होता है [ इसलिए यह सूर्य नहीं हो सकता है ]। तब क्या यह अग्नि है ? [ यह संशय हुआ, उसका निराकरण अगले वाक्यमें आ जाता है कि ] किन्तु यह [अग्नि ] निश्चितरूपसे सब दिशाओंमें नहीं फैलता है। [अग्निका केवल ऊर्ध्वज्वलन स्वभाव है और इस राजाका तेज चारों ओर फैल रहा है इसलिए यह निश्चितरूपसे अग्नि भी नहीं हो सकता है। तब ] क्या यह साक्षात् यमराज है ? [यह संशय हुआ ] किन्तु उस [यमराज] का वाहन तो भैंसा है [ इसलिए थमराज भी नहीं हो सकता है] इस प्रकार युद्धभूमिमें तुमको देखकर शत्रुवीर बड़ी देरतक [नाना प्रकारके विकल्प ] सन्देह करते रहते हैं।४१६।
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का० ६३, सू० १३८ ] दशम उल्लास: ४६३
अेदोक्तावित्यनेन न केवलमयं निश्चयगर्भो यावन्निश्चयान्तोऽपि सन्देहः स्वीकृतः । यथा- इन्दुः कि वव कलङ्कः सरसिजमेतत्किमम्बु कुत्र गतम् । ललितसविलासवचनैमखमिति हरिणाक्षि ! निश्चित परतः ॥४२०॥ किन्तु निश्चयगर्भ इव नात्र निश्चय: प्रतीयमान इति उपेक्षितो भट्टोद्भटेन। तदनुक्तौ यथा -- अस्या: सर्गविधौ प्रजापतिरभूच्चन्द्रो नु कान्तिप्रदः शृङ्गारैकरसः स्वयं नु मदनो मासो नु पुष्पाकरः । वदाभ्यासजड: कथन्नु विषयव्यावृत्तकौतूहलो निर्मातु प्रभवन्मनोहरमिदं रूपं पुराणो मुनिः ॥।४२१। * [सू० १३८] तद्रपकमभेदो य उपमानोपमेययोः । अतिसाम्यादनप ह्वतभेदयोरभेदः ।
इस उदाहरणमें बीच-बीचमें सन्देहका निवारण भी किया जाता रहा है इसलिए भेदोक्तिका अर्थ निश्चयगर्भ भेद कहलाता है। भेदोक्ति पदसे न केवल निश्चयगर्भरूप [एक ही प्रकारका नहीं होता है] अपितु निश्यान्त सन्देह भी स्वीकार किया गया है। जैसे -- [तुम्हारा यह मुख ] क्या चन्द्रमा है [ यदि चन्द्रमा है] तो फिर [इसमेंका कलङ्ग कहाँ गया ? क्या यह कमल है तो फिर जल कहाँ गया ? [इस प्रकार सन्देह करके ] सुन्दर विलासयुक्त वचनोंसे हे मृगनयनी, यह [ तुम्हारा मुख है यह बात बादको निश्चित कर पाया ॥४२०॥ परन्तु निश्चयगर्भ [सन्देह ] के समान यहाँ [निश्र्यान्त सन्देहमें ] निश्र्य प्रतीयमान [व्यङ्गच] नहीं होता है इसलिए भट्टोड्टने [निश्रयान्त भेदकी] उपेक्षा कर दी है [ अर्थात् इस निश्चयान्तको सन्देहालड्गारका भेद नहीं माना है]। उस [भेद] का कथन न करनेपर [सन्देहालड्गारका दूसरा उदाहरण ] जैसे -- इस [नायिका] के निर्माणमें क्या कान्तिको देनेवाला चन्द्रमा ही प्रजापति बना था [अर्थात् क्या स्वयं चन्द्रमाने अपनी कान्तिसे इसका निर्माण किया है ] अथवा केवल शृङ्गारमय कामदेव वयं अथवा पुष्पाकर मास [वसन्त इसका प्रजापति बना] क्योंकि वेदाभ्यासके कारण मूढ़मति और [शरङ्गारोचित ] विषयोंमें कौतूहलरहित बूढ़ा ब्रह्म इस मनोहर रूपका निर्माण करनेमें कैसे समर्थ हो सकता है।।४२१। ६. रूपकालड्कार [सू० १३८ ]-उपमान और उपमेयका [जिनका भेद प्रमिद्ध है उनका सादृश्यातिशयवश ] जो अभेद [वर्णन] है वह रूपक [अलङ्गार] है। अत्यन्त सादृश्यके कारण, प्रसिद्ध [अनपह्नत ] भेदवाले [ उपमान और उपमेय] का [अभेद- वर्णन रूपकालङ्गार कहलाता है ]।
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४६४ काव्यप्रकाश: [ का० ६३, सू० १३६
[सू० १३९ ] समस्तवस्तुविषयं श्रौता आरोपिता यदा ।।९३।। आरोपविषया इव आरोप्यमाणा यदा शब्दोपात्तास्तदा समस्तानि वस्तूनि विषयोऽस्येति समस्तवस्तुविषयम् । आरोपिता इति बहुवचनमविवक्षितम्। यथा- ज्योत्स्नाभस्मच्छुरणधवला बिभ्रती तारकास्थी- न्यन्तर्द्धनिव्यसनरसिका रात्रिकापालिकीयम् । द्वीपाद् द्वीपं भ्रमति दधती चन्द्रमुद्राकपाले न्यस्तं सिद्धाञ्जनपरिमल लाञ्छनस्य च्छलेन ।।४२२।।
[सूत्र १३६]-जब आरोपित [अर्थात् आरोप्यमाण अर्थ ] शब्दतः उपात्त [श्रौत] होते हैं तब [वह रूपकका ] समस्तवस्तुविषय [नामक ] भेद होता है ।।६३ ।। आरोपविषय [उपमेय ] के समान जब आरोप्यमाण [उपमान ] शब्दतः उपात्त [वाच्य ] होते हैं तब समस्त वस्तुएँ [आरोप्यमाण ] जिसका विषय है [ इस विग्रहके अनुसार वह रूपकका] समस्तवस्तुविषय [नामक भेद ] होता है। 'आरोपिताः' [इस बहुवचनान्त प्रयोगमें ] यह बहुवचन अविवक्षित है [ अर्थात् बहुत-से आरोप्यमाण होनेपर ही समस्तवस्तुविषय नामक रूपकका भेद होता हो यह आवश्यक नहीं है]। [समस्तवस्तुविषय नामक रूपकभेदका उदाहरण ] जैसे -- चाँदनीरूप भस्मसे व्याप्त होनेके कारण धवलवर्ण, तारिकारूप अस्थियों [हड्डियों] को धारण किये हुए और अन्तर्धान [सब वस्तुओंको छिपा लेने] के व्यसनकी रसिका, यह रात्रिरूप कापालिकी चन्द्रकलारूप कप्मलमें कलङगके बहानेसे सिद्धाञ्जनचूर्णको रखे हुए द्वीप-द्वीपान्तरोंमें घूमती फिरती है।४२२ ।। इस उदाहरणमें रात्रिके ऊपर कापालिकीका आरोप किया गया है। वही प्रधान रूपक है। उसके उपपादनके लिए अङ्गरूपमें ज्योत्स्नापर भस्मका, तारकोंपर अस्थिका, चन्द्रकलापर कपालका और लाञ्छनपर सिद्धाञ्जनपरिमलका आरोप किया गया है। ये सब अङ्गभूत रूपक हैं। उपमा और रूपकके भेदक धर्म यहाँ 'रात्रिकापालिकी' पदमें 'रात्रिरेव कापालिकी रात्रिकापालिकी' तथा 'रात्रिः कापालिकी इव इति रात्रिकापालिकी' ये दो प्रकारके विग्रह हो सकते हैं। पहिली अवस्थामें 'मयूरव्यंसकादयश्च' अष्टा० २, १, ७२ इस सूत्रसे समास होगा और 'रात्रिरेव कापालिकी' इस रूपमें रात्रि तथा कापालिकीका अभेद होनेसे रूपकालङ्कार होगा क्योंकि उसमें रात्रिके ऊपर कापालिकीका आरोप होता है। दूसरे 'रात्रिः कापालिकी इव' इस विग्रहमें दोनोंका अभेद नहीं अपितु साम्य प्रतीत होता है इसलिए उपमा अलङ्कार होगा। और उस दशामें 'उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे' अष्टा० २, १,५६ इस सूत्रमें उपमित समास होगा। इस प्रकार इस उदाहरणमें रूपक तथा उपमा दोनों अलङ्कार सम्भव है इसलिए उन दोनोंके सन्देहके कारण सन्देहसङ्कर अलङ्गार मानना चाहिये, रूपक नहीं, इस प्रकारकी शङ्का हो सकती है। इस शङ्काके निराकरणके लिए ग्रन्थकारने अगली पंक्ति लिखी है। उसका आरशय यह है कि जहाँ उपमा या रूपकमें किसी एक पक्षमें निर्णय करनेका कोई हेतु सुलभ हो वहाँ सन्देहका अवसर नहीं रहता है अपितु उस विनिगमक हेतुके आधारपर एक पक्षमें निर्णय हो जाता है। जहाँ कोई ऐसा विनिगमक हेतु उपलब्ध न हो सके वहाँ सन्देहसङ्करालङ्कार माना जा सकता है। प्रकृत उदाहरणमें रूपकपक्षमें निर्णय करानेवाले अ्नेक विनिगमक हेतु विद्यमान हैं। इसलिए यहाँ रूपकका निश्चय हो
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का० ६४, सू० १४० ] दशम उल्लास: ४६५ अत्र पादत्रये अन्तद्धनिव्यसनरसिकत्वमारोपितधर्म एवेति रूपकपरिग्रहे साधक- मस्तीति तत्मङ्कराशक्का न कार्या। [सू० १४०] श्रौता आर्थाश्च ते यस्मित्नेकदेशविर्वत तत्। केचिदारोप्यमाणाः शब्दोपातताः, केचिदर्थयामथ्यदिवसेया इत्येकदेशविवर्त्तनाद् एकदेशविर्व्ति। यथा -- जस्य रणन्तेउरए कर कुणन्तस्स मण्डलग्गलअम् । रससंमुही वि सहसा परंमुही होइ रिउसेणा ।।४२३।। [यस्य रणान्तःपुरे करे कुर्वतो मण्डलाग्रलताम् । ·रससम्मख्यपि सहसा पराङमुखी भवति रिपुसेना । इति संस्कृतम्] अत्र रणस्यान्तःपुरत्वमारोप्यमाणं शव्दोपात्तम्। मण्डलाग्रलताया: नायिकात्वम्, रिपुसेनायाश्च प्रतिनायिकात्वम् अर्थसामर्थ्यावसीयते इत्येकदेशे विशेषेण वर्त- नादेकदेशविरवर्ति।
जानेसे इसमें सन्देहसङ्करालद्कारकी शङ्का नहीं करनी चाहिये। रूपकपक्षके उन विनिगमक हेतुओ्र््रोंमें 'अ्न्तर्धानव्यसनरसिका' यह विशेषण मुख्य है। यह विशेषण कापालिकीपक्षमे तो बन जाता है परन्तु रात्रिपक्षमें ठोक तरहसे नहीं बनता है, इसलिए उसके आधारपर यहाँ रूपकका ही निश्चय होता है। इसी बातको ग्रन्थकारने इस प्रकार लिखा है -- यहाँ अन्तर्धानव्यसनरसिकत्व [रात्रिमें स्वाभाविक नहीं अपितु] आरोपित धर्म ही है इसलिए तीनों चरणोंमें [ अर्थात् पहिले तीन पादोंमें आये हुए 'ज्योत्स्नाभस्मच्छुरणधवला' आदि पदोंमें ] रूपक माननेमें [साधक ] विनिगमक हेतु विद्यमान है इसलिए [ उसके द्वारा रूपकपक्षमें निर्णय हो जानेसे उपमा तथा रूपकके सन्देह ] सङ्करकी शङ्गा नहीं करनी चाहिये। [सूत्र १४०]-जिस [रूपक ] में वे [ अर्थात् आरोपित धर्म कुछ अंशमें ] श्रौत [अर्थात् शब्दतः उपात्त और कुछ अंशमें] आर्थ [अर्थात् अर्थतः आक्षिप्त ] हों वह एकदेशविर्वत [रूपक] होता है। कुछ आरोप्यमाण शव्दसे गृहीत और कुछ अर्थके साम्थ्यसे आक्षिप्त होते हैं इसलिए एकदेशमें [विशेषेण स्पष्टरूपेण वर्तनात् ] स्पष्टरूपसे विद्यमान होनेसे वह एकदेशविवति [रूपक ] होता है। जैसे -- जिसके रणरूप अन्तःपुरमें खङ्गलता [तलवार] को हाथमें पकड़ते ही युद्धोत्साहसे बढ़ती हुई [रससम्मुखी ] भी शत्रुसेना सहसा भाग खड़ी होती है [ पराङमुखी भवति ]॥४२३॥ यहाँ 'रण'के ऊपर 'अन्तःपुरत्व' रूप आरोप्यमाण शब्दतः उपात्त है परन्तु 'खङ्गलता' [मण्डला ग्रलता] का [आरोप्यमाण ] 'नायिकात्व' तथा 'रिपुसेना' का. [आरोप्यमाण' 'प्रतिनायिकात्व' अर्थतः आक्षिप्त होता है। इसलिए [ रणान्तःपुररूप ] एकदेशमें स्पष्टरूपसे वर्तमान [विशेषेण वर्तनात्] यह एकदेशविर्वत [रूपक ] है। ३०
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४६६ काव्यप्रकाश: [का० १४, सू० १४१-१४३
[सू० १४१] साङ्गमेतत् उक्तद्विभेदं सावयवम्। [सू० १४२ ] निरङ्गन्तु शुद्धम् यथा- कुरङ्गीवाङ्गानि स्तिमितयति गीतध्वनिषु यत् सखीं कान्तोदन्तं श्रुतमपि पुनः प्रश्नयति यत्। अनिद्रं यच्चान्तः स्वपिति तदहो वेद्म्यभिनवां प्रवृत्तोऽस्याः सेक्तुं हृदि मनसिजः प्रेमलतिकाम् ॥४२४॥ [सू० १४३ ] माला तु पूर्ववत् ।।९४।। मालोपमायामिवैकस्मिन् बहव आरोपिताः । यथा- सौन्दर्यस्य तर्राङ्गणी तरुणिमोत्कर्षस्य हर्षोद्गमः कान्तेः र्मणकर्म नर्मरहसामुल्लासनावासभूः । विद्या वकगिरां विधेरनवधिप्रावीण्यसाक्षात्क्रिया बाणाः पञ्चशिलीमुखस्य ललनाचूडामणिः सा प्रिया॥४२५॥
[सूत्र १४१]-यह [समस्तवस्तुविषय तथा एकदेशविर्वत ] साङ्ग रूपक है।. उक्त दोनों भेदोंवाला सावयव [रूपक कहलाता ] है। [सूत्र १४२]-[इसके विपरीत ] शुद्ध [अर्थात् अङ्गाङ्गभावसे रहित, अन्य रूपकोंसे अमि- श्रित केवल एक अद्वितीय रूपक ] निरङ्ग [रूपक कहलाता] है। जैसे- क्योंकि यह [किशोरी नायिका ] गानेकी आवाज [सुनने ] पर हरिणीके समान अङ्गोंको निश्चल कर लेती है, प्रियतमके [ एक बार] सुने हुए समाचारको भी सखीसे बार-बार पूछती है [ बार-बार सुनना चाहती है ] और बिना नींदके भी भीतर [एकान्तमें जाकर ] सोती [ लेटी रहती ] है। इससे मैंसमझती हूँ कि कामदेवने इसके हृदयमें नयी प्रेमलताको सींचना प्रारम्भ कर दिया है, यह बड़ी प्रसन्नताकी बात है।४२ ४ ।। यहाँ प्रेमके ऊपर लतिकाका आरोप किया गया है इसलिए रूपक है। उसके अङ्गरूपमें और कोई रूपक नहीं आया है इसलिए यह निरङ्ग रूपकका उदाहरण है। [सूत्र १४३ ]-पूर्ववत् [मालोपमाके समान] माला [रूपक ] होता है ।।६४।। मालोपमाके समान एक आरोप [विषय ] पर बहुतोंका आरोप होता है [ तब मालारूपक होता है] जैसे -- स्त्रियोंकी शिरोमणि वह प्रिया, सौन्दर्यकी नदी, नव यौवनके उत्कर्षकी प्रसन्नताका प्रवाह, कान्तिका [कार्मणकर्म ] वशीकरण मन्त्र ['कार्मणं मन्त्रतन्त्रादियोजने कर्मठेपि च' ], रतिकीडाओंको उद्धावनाका आश्रयस्थान, वकोक्तिरूप वाणीकी [अलड्गारशास्त्ररूप ] विद्या [अर्थात् वकोक्तिमें निपुण ], विधाताकी अनन्त निपुणताका साक्षात्कार करानेवाली और कामदेवके [समस्त] बाणरूप है।।२२५।।
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का० ६५, सू० १४४ ] दशम उल्लास: ४६७
[सू० १४४ ] नियतारोपणोपायः स्यादारोप: परस्य यः।FR तत् परम्परितं श्लिष्टे वाचके भेदभाजि वा ।९५॥ यथा- विद्वन्मानसहंस ! वैरिकमलासङ्कोचदीप्तद्युते ! दुर्गामार्गणनीललोहित ! समित्स्वीकारवैश्वानर ! सत्यप्रीतिविधानदक्ष ! विजयप्राग्भावभीम! प्रभो ! साम्राज्यं वरवीर वत्सरशतं वैरिञ्चमुच्चैः कियाः॥४२६॥
यहाँ एक प्रियतमारूप उपमेय या आरोपविषयपर सात आरोप्यमाणोंका आरोप किया गया है और उन सातोंमें परस्पर अङ्गाङ्गिभाव नहीं है इसलिए यह निरङ्ग मालारूपक है। यहाँतक रूपकके चार भेद किये गये हैं। उसके श्लिष्ट तथा अश्लिष्ट परम्परितरूप दो भेद आगे दिखलाते हैं। [सूत्र १४४]-श्लिष्ट अथवा अश्लिष्ट [भेदभाजि] शब्दोंके होनेपर जो अन्यका आरोप [वर्णनीय होनेसे ] अवश्यापेक्षणीय [नियत अन्य ] अर्थके आरोपका कारण होता है वह परम्परित रूपक [श्लेषमूलक तथा अश्लेषमूलक दो प्रकारका ] होता है।६५।। जैसे -- हे वीरवर [ वरेषु श्रेष्ठेषु वीर ] राजन् ! विद्वानोंके मन [रूप मानसरोवर ] के हंस, शत्रुओंकी लक्ष्मीके सङ्कोचरूप कमलोंके विकास [असङ्कोच] के लिए सूर्य, दुर्गों अर्थात् किलोंके अमार्गण न खोजने- रूप दुर्गा अर्थात् पार्वतीके मार्गण अर्थात् अनुसन्धान [प्राप्ति] के लिए [नीललोहित अर्थात् ] शिव, समित् अर्थात् युद्धोंके स्वीकार करनेरूप समिधाओं [ काष्ठ या इन्धन ] के स्वीकारके लिए [ वैश्वानर] अग्निरूप, सत्यभाषणमें प्रीतिरूप और सती अर्थात् पार्वतीकी अप्रीति [नाराजी] उसके करनेमें दक्ष- प्रजापतिरूप, विजय अर्थात् शत्रुका पराभव ही विजय अर्थात् अर्जुन, उसका प्राग्भाव अर्थात् अर्जुनकी अपेक्षा प्रथम उत्पत्ति, उसके लिए भीमरूप, हे वीरवर [ वर अर्थात् श्रेष्ठोंमें वीर] आप ब्रह्माके सौ वर्षतक [वैरिञ्चं वत्सरशतं] महान् साम्राज्यको अर्थात् चक्वर्ती राज्यको] करो॥४२६॥ यह श्लिष्ट मालारूप परम्परित रूपकका उदाहरण है, क्योंकि यहाँ विद्वानोंके मनरूप उपमेय- पर मानसरोवररूप 'मानस' का आरोप होनेसे ही राजाके ऊपर हंसका आरोप हो सकता है। इसलिए यह परम्परित रूपकका लक्षण घटता है। मानस शब्द श्लिष्ट है। एक पक्षमें उसका अरथ मन और दूसरे पक्षमें मानसरोवर होता है। इसलिए यह श्लिष्ट रूपकका लक्षण उसमें समन्वित होता है। इसी प्रकार शत्रुओंको कमला अर्थात् लक्ष्मीका सङ्कोच ही कमलोंका असङ्कोच अर्थात् विकास उसके लिए दोप्तद्युति अर्थात् सूर्यरूप, इसमें शत्रुओंकी कमलाके सङ्कोचके ऊपर कमलोंके असङ्कोचका आरोप होनेसे राजाके ऊपर सूर्यका आरोप होता है इसलिए परम्परित रूपक, और कमलासङ्कोच पदके श्लिष्ट होनेसे श्लिष्ट-परम्परित रूपकका उदाहरण होता है। इसी प्रकार दुर्गका अ्ररमार्गण अर्थात् युद्धके लिए किलेकी शरण न लेनेपर दुर्गा अर्थात् पार्वतीके मार्गण अरथात् प्राप्तिका आरोप होनेसे राजाके कपर
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४६८ काव्यप्रकाश: [ का० ६५, सू० १४४ अत्र मानसमेव मानसम्, कमलायाः सङ्कोच एव कमलानामसङ्कोच:, दुर्गाणाम- मागणमेव दुर्गायाः मार्गणम्, समितां स्वीकार एवं समिधां स्वीकारः, सत्ये प्रीतिरेव सत्यामप्रीतिः, विजयः पराभव एव विजयोऽर्जुनः, एवमारोपणनिमित्तो हंसादेरारोपः । यद्यपि शब्दार्थालङ्कारोऽयमित्युक्तं वक्ष्यते च, तथापि प्रसिद्धयनुरोधादत्रोक्तः । एकदेशविवर्तति हीदमन्यैरभिधीयते।
नीललोहित अर्थात् शिवका आरोप होनेसे यह परम्परित रूपक और 'दुर्गामार्गण' पदके श्लिष्ट होनेसे श्लिष्ट-परम्परित रूपक होता है। इसी प्रकार अन्य विशेषणोंमें भी श्लिष्ट-परम्परित रूपक दिखलाते हुए ग्रन्थकार अगली पंक्तिमें लिखते हैं कि- इस [उदाहरण ] में मन ही मानसरोवर [अर्थात् मनपर मानसरोवरका आरोप ] [और वैरियोंकी] कमलाका सङ्कोच ही कमलोंका असङ्गोच [अर्थात् वैरियोंकी कमलाके सङ्कोचपर कमलोंके असङ्कोचका आरोप], दुर्गोंका अमार्गण ही दुर्गाका मार्गण [अर्थोत् दुर्गोंके उपयोग न करनेके ऊपर पावतीके अनुसन्धान या प्राप्तिका आरोप], 'समित्' अर्थात् युद्धका स्वीकार ही समिधाओंका स्वीकार [अर्थात् युद्धके स्वीकारपर समिधाओंके स्वीकारका आरोप ], सत्यकी प्रीति ही सती पार्वतीकी अप्रीति [अर्थात् सत्यकी प्रीतिपर सती पार्वतीकी अप्रीतिका आरोप ], विजय अर्थात् शत्रुओंका पराजय ही विजय अर्थात् अर्जुन [अर्थात् शत्रुपराभवके ऊपर अर्जुनका आरोप ] इन आरोपोंके कारण [राजाके ऊपर ] हंस आदिका आरोप होता है [ इसलिए यह परम्परित रूपक होता है और उसमें मानस आदि पद श्लिष्ट हैं इसलिए यह श्लिष्ट परम्परित रूपकका उदाहरण होता है]। यद्यपि [पृष्ठ ४२३ पर गुण, दोष, अलङ्कार आदिके शब्दगत या अर्थगत होनेके विषयमें अन्वय- व्यतिरेकको निर्णायक हेतु बतलानेके द्वारा, और इस श्लोकमें मानस आदि पदोंके परिवृत्त्यसह होनेसे शब्दालङ्गारत्व तथा हंसादि पदोंके परिवृत्तिसह होनेके कारण अर्थालङ्गारत्वका निर्धारण होनेसे ] यह [परम्परित रूपक पुनरुक्तवदाभास अलङ्गारके समान शब्दार्थालङ्गार अर्थात्] उभयालङ्गार है यह बात [पूर्व पृष्ठ ४२३ पर प्रायः अर्थतः ] कह चुके हैं और आगे भी [ पृष्ठ ५६५ पर 'पुनरुक्तवदाभासः परम्परित- रूपकं चोभयोर्भावाभावानुविधायितया उभयालङ्गारौ' यह लिखकर स्पष्टरूपसे] कहेंगे। [इसलिए इस श्लिष्ट परम्परित रूपकका निरूपण पुनरुक्तवदाभासके साथ उभयालङ्गारके प्रकरणमें ही करना उचित था ] फिर भी [भामह आदि प्राचीन आचार्योंने उसका निरूपण अर्थालङ्गारोंमें ही किया है, इस लिए] प्रसिद्धिके अनुरोधसे [हमने भी यहाँ [अर्थालङ्गारोंके प्रकरणमें ] कह दिया है। अन्य [भामह आदि आचार्य ] इसको एकदेशविवतति रूपक कहते हैं। जैसे कि 'यस्य रणान्तःपुरे' इत्यादि उदाहरणसंख्या ४२३ में रणपर अन्तःपुरका शाब्द आरोप होनेपर भी 'मण्डलाग्रलता' पर नायिकात्वके आरोपके अर्थाक्षित होनेसे उसको एकदेशविवर्ति रूपक कहा जाता है इसी प्रकार 'विद्वन्मानसहंस' इत्यादिमें राजापर हंसका शाब्द आरोप होनेपर भी 'विद्वन्मानस'- पर मानसरोवरका आरोप अरथाक्षिप्त होनेसे इस परम्परित रूपकको भी भामह आदि अन्य आचार्य क्रदेशविव्तिरूपक कहते हैं। यह ग्रन्थकारका अ्र्प्रभिप्राय है।
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का० ६५, सू० १४४] दशम उल्लास: ४६६
भेदभाजि यथा -- आलानं जयकुञ्जरस्य दृषदां सेतुर्विपद्वारिधे: पूर्वाद्रिः करवालचण्डमहसो लीलोपधानं श्रियः । पत संग्रामामृतसागरप्रमथनकीडाविधौ मन्दरो राजन् ! राजति वीरवैरिवनितावैधव्यदस्ते भुजः ॥४२७॥ अत्र जयादेभिन्नशब्दवाच्यस्य कुञ्जरत्वाद्यारोपो युज्यते। अलौकिकमहालोकप्रकाशितजगत्त्रयः । स्तूयते देव ! सद्वंशमुक्तारत्नं न कैर्भवान् ।।४२८। निरवधि च निराश्रयं च यस्य स्थितमनिवर्तितकौतुकप्रपञ्चम् । प्रथम इह भवान् स कर्ममूतिर्जयति चतुर्दशलोकवल्लिकन्दः ।४२९।। इति च अमालारूपकमपि परम्परितं द्रष्टव्यम् । [भेदभाजि अर्थात् वाचकके ] अश्लिष्ट होनेपर [उदाहरण ] जैसे- हे राजन् ! शत्रुओंकी स्त्रियोंको वैधव्य-प्रदान करनेवाला [अर्थात् शत्रुओंका नाश करनेवाला ] आपका बाहु विजयरूप हाथीका बन्धनस्तम्भ [आलान ] है, विपत्तिरूप सागर [को पार करने ]के लिए पत्थरोंका बना [पक्का] पुल है, तलवारके प्रचण्ड तेजरूप [चण्डमहसः अर्थात् ] सूर्यका उदयाचल, लक्ष्मीके आराम करनेका तकिया, संग्रामरूप अमृतके सागरका मंथन करनेकी कीडामें मन्दराचलरूप शोभित हो रहा है।४२७।। यहाँ अलग-अलग शब्दोंसे वाच्य जयादिपर कुञ्जरत्वादिका आरोप होनेपर भुजापर आलान आदिका आरोप बनता है। [इसलिए यह परम्परित रूपक है। आरोप-विषय जयादि तथा आरोष्यमाण कुञ्जरत्वादि दोनों अलग-अलग शब्दोंसे वाच्य हैं, 'विद्वन्मानस' आदि शब्दोंके समान श्लिष्ट पदोंसे वाच्य नहीं हैं अतएव यह अश्लिष्ट परम्परित रूपक है। और इस प्रकारके अनेक आरोप एक ही भुजाके ऊपर किये गये हैं, इसलिए यह अश्लिष्ट परम्परित मालारूपकका उदाहरण है]। आगे श्लिष्ट परम्परित अमालारूपकका उदाहरण देते हैं- लोकोत्तर महादीप्तिसे [अथवा महद्यश ] से तीनों लोकोंको प्रकाशित करने और उत्तम वंश [कुल तथा बाँस] के मुक्तारत्नरूप आपकी कौन प्रशंसा नहीं करता है ॥४२८।। यहाँ आरोपविषय उत्तमकुल तथा आरोप्यमाण उत्तम बाँस दोनोंको वंशरूप एक ही श्लिष्ट शब्दसे कहा गया है। उसके द्वारा वंश अरथात् कुलके ऊपर वंश अर्थात् बाँसका आरोप किया गया है। यह आरोप राजाके ऊपर मुक्तारत्नके आरोपका निमित्त होता है। इसलिए यह अश्लिष्ट परम्परित रूपकका उदाहरण है। इसमें अ्नेक आरोप नहीं किये गये है इसलिए यह अमालारूप केवल श्लिष्ट परम्परित रूपकका उदाहरण है। आगे अश्लिष्ट अमालारूप केवल परम्परित रूपकका उदाहरण देते हैं- जिन [विष्णु भगवान् ] की अवधिरहित [अर्थात् देश-कालादिसे अपरिच्छिन्न ], आश्रयरहित [अर्थात् कूर्मावताररूपमें सारे जगत्का धारण करनेके लिए सबसे नीचे स्थित, फिर भी उस सबके धारण करनेके लिए किसी विशेष प्रयत्नकी आवश्यकता न होनेसे ] असीम-आश्चर्यमय[कौतुकप्रपञ्च आश्रवर्यका आधिक्य उसको निर्वतत अर्थात् समाप्त न करनेवाला अनिव्तितकौतुकप्रपश्च अवस्थान ] स्थिति है इस संसारमें सबसे प्रथम और चौदह लोकोंरूप [लम्बी शृद्धलात्मक ] लताके मूल [कन्द ] रूप आप सर्वोत्कर्षयुक्त हैं [ आपकी जय हो]।४२६।।
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४७० काव्यप्रकाश: [ का० ६६, सू० १४५
किसलयकरैलंतानां करकमलैः कामिनां मनो जयति। नलिनीनां कमलमुखैर्मुखेन्दुभिर्योषितां मदनः ।४३०।। इत्यादि रशनारूपकं न वैचित्र्यवदिति न लक्षितम् । [सू० १४५] प्रकृतं यन्निषिध्यान्यत्साध्यते सा त्वपह्नतिः। उपमेयमसत्यं कृत्वा उपमानं सत्यतया यत्स्थाप्यते सा त्वपह्नतिः। उदाहरणम्-
यहाँ लोकपर वल्लीका आरोप विष्णुपर कन्दत्वके आरोपका कारण होता है, इसलिए यह परम्परित रूपक होता है। लोकपर जो वल्लीका आरोप है उसमें दोनोंको अलग-अलग शब्दोंसे कहा गया है इसलिए वह अश्लिष्ट है और केवल एक ही आरोप किया गया है इसलिए अमालारूप या केवल है। इस प्रकार यह अश्लिष्ट अमालारूप परम्परित रूपकका उदाहरण हुआ। और यह अमालारूप रूपक भी परम्परित होता है, यह जानना चाहिये। रशनारूपक अनावश्यक यद्यपि मालारूपकके समान रशनारूपक भी हो सकता है, परन्तु उसमें विशेष चमत्कार न होने और इन्हीं रूपकभेदोंमें उसका अन्तर्भाव सम्भव होनेसे उसको अलग भेद माननेकी आवश्यकता नहीं है। इसी बातका प्रतिपादन करनेके लिए रशनारूपकके सम्भावित उदाहरणको देकर ग्रन्थकार अपने सिद्धान्तका प्रतिपादन करते हैं -- लताओंके किसलयरूप हाथोंसे, [योषितां अर्थात्] कामिनियोंके कर-कमलोंसे, कमलिनियोंके कमलरूप मुखोंसे और [ योषितां ] कामिनियोंके मुखचन्द्रोंसे कामदेव [कामियोंके ] मनको वशमें कर लेता है।४३०।। इत्यादि रशनारूपक चमत्कारजनक नहीं है इसलिए उसका लक्षण नहीं किया गया है। पूर्व उपमानके आपरागे चलकर उपमेय हो जानेपर 'रशनोपमा' होती है इसी प्रकार पूर्वके आरप्रारोप्य- माणके आगे चलकर आरोपविषय हो जानेपर 'रशनारूपक' होता है। यहाँ 'किसलयकरं:' में किसलय आरोपविषय है, उसपर करका आरोप किया गया है इसलिए 'कर' आरोप्यमाण है। यही कर अगले 'करकमलैः' इस रूपकमें आरोपविषय बन गया है। उसपर कमलका आारोप किया गया है इसलिए यह रशनारूपकका उदाहरण है। इसी प्रकार 'कमलमुखैः' पदमें मुख आरोप्यमाण है, वही अगले 'मुखेन्दुभिः' इस रूपकमें आरोपविषय बन गया है। इसलिए यह भी रशनारूपकका उदाहरण हो सकता है। परन्तु उसमें कोई अतिरिक्त चमत्कार न होनेसे ग्रन्थकारने उसका अलग लक्षण करनेकी आवश्यकता नहीं समझी है। ७. अपह्नति अलङ्गार [सूत्र १४५]-प्रकृत [अर्थात् उपमेय ] का निषेध करके जो अन्य [अर्थात् उपमान] की सिद्धि की जाती है वह 'अपह्नति' [अलङ्गार कहलाता ] है। उपमेयको असत्य सिद्ध करके उपमानको ही सत्यरूपसे जो स्थापित किया जाता है वह तो अपह्नति होती है।
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का० ६६, सू० १४५ दशम उल्लासः ४७१
अवाप्तः प्रागल्भ्यं परिणतरुचः शैलतनये ! कलङ्को नैवायं विलसति शशाङ्कस्य वपुषि। अमुष्येयं मन्ये विगलदमृतस्यन्दशिशिरे रतिश्रान्ता शेते रजनिरमणी गाढमुरसि ।।४३१।। इत्थं वा- बत सखि ! कियदेतत् पश्य वर स्मरस्य प्रियविरहकृशेऽस्मिन् रागिलोके तथा हि।
प्रतिविशिखमनेनोटटड्डितं कालकूटम् ।४३२।। अत्र हि न सभृङ्गाणि सहकाराणि, अपि तु सकालकूटाः शरा इति प्रतीतिः ।
यह अपह्नुति भी शाब्दी तथा आर्थी भेदसे दो प्रकारकी होती है। जहाँ प्रकृतका निषेध शब्दतः किया जाता है वह शाब्दी अपह्नुति कहलाती है और जहाँ निषेध शब्दतः न करके अर्थतः आक्षिप्त होता है वह आर्थी अपह्नुति कहलाती है। आर्थी अपह्नुतिमें प्रकृतका निषेध करनेके लिए कहीं कपटार्थक कहीं परिणामार्थक शब्दोंका ग्रहण किया जाता है। और कहीं अन्य उपायोंका भी अवलम्बन किया जाता है। उनमेंसे पहिले शाब्दी अपह्नुतिका उदाहरण देते हैं। [शाब्दी अपह्नुतिका ] उदाहरण [जैसे]- हे पार्वति [शैलतनये ] ! परिपूर्ण [परिणतरुचः ] चन्द्रमाके शरीर [अर्थात् वक्षःस्थल ] में प्रगल्भताको प्राप्त [अत्यन्त प्रौढ़] यह कलङ्ग नहीं दिखलायी देता है, बल्कि ऐसा प्रतीत होता है [ मन्ये] कि इसके अमृतके प्रवाहके शीतल वक्षःस्थलपर रतिसे परिश्रान्त हुई रात्रिरमणी [निशानामकी चन्द्र- पत्नी ] सो रही है।४३१।। यहाँ उपमेयभूत कलङ्गका निषेध करके उपमानभूत रात्रिकी स्थापना की गयी है इसलिए यह अपहनुति अलङ्कार है। इसमें भी 'कलङ्गो नैवायं' कहकर शब्दतः उपमेयका निषेध होनेसे यह शाब्दी अपह्नुति है। जहाँ प्रकृतका निषेध शब्दतः नहीं होता अपितु अरथतः आक्षिप्त होता है वहाँ आर्थी अपह्नुति होती है। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, आर्थी अपहनुतिमें कभी कपटार्थक शब्दके प्रयोग द्वारा और कभी परिणामार्थक शब्दोंके प्रयोग द्वारा प्रकृतके निषेधका बोधन किया जाता है। इन दोनों प्रकारकी आर्थी अपह्नुतिके दो उदाहरण आगे देते हैं।। अथवा [कपटार्थक शब्दके प्रयोग द्वारा आर्थी अपह्नुतिका उदाहरण ] जैसे- हाय सखि, देखो तो प्रियके विरहसे दुबले हुए रागी लोगोंके प्रति कामदेवका यह कितना वैरभाव है कि बगीचेके आमके बौरोंपर बैठे हुए [शोभित ] भौरोंके बहानेसे इसने [अपने ] प्रत्येक लाणपर काल- कूट विष लगा दिया है।।४३२।। यहाँ यह भौरोंसे युक्त आमके बौर नहीं हैं अि्तु कालकूट विषसहित [कामदेवके ] बाण हैं यह प्रतीति होती है।[इस प्रकार अर्थात् भ्रमरयुक्त सहकारोंके बौरोंका निषेध करके कालकूटयुक्त बाणोंकी स्थापना की जानेसे यह आर्थी अपह्नुतिका उदाहरण है]।
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४७२ काव्यप्रकाश: [ का० ६६, सू० १४५
एवं वा- अमुष्मिल्लावण्यामृतसरसि नूनं मृगदृशः स्मर: शर्वप्लुष्टः पृथुजघनभागे निपतितः । यदङ्गाङ्गाराणां प्रशमपिशुना नाभिकुहरे शिखा धूमस्येयं परिणमति रोमावलिवपुः ॥४३३॥ अत्र न रोमावलि: धूमशिखेयमिति प्रतिपत्तिः। एवमियं भङ्गचन्तरैरप्यूह्या।
इस उदाहरणमें प्रकृतके निषेधके लिए कपटार्थक 'छल' पदका प्रयोग किया गया है। परिणामार्थक शब्दके प्रयोग द्वारा प्रकृत अर्थके निषेधका अगला उदाहरण देते हैं- इसी प्रकार [परिणामार्थक शब्दके प्रयोग द्वारा आर्थी अपहनुतिका उदाहरण ]- निश्चय ही इस मृगनयनीके लावण्यरूप अमृतके तालाबरूप विस्तीर्ण जघनभाग [वरांगदेश ] में [सन्तापशान्तिके लिए ] शिवजीके द्वारा दग्ध किया हुआ कामदेव गिर पड़ा है जिसके अङ्गरूप अङ्गारोंके बुझनेकी सूचना देनेवाली धूमकी शिखा रोमावलिके रूपमें नाभिके कुहरमें दिखलायी देती है।४३३॥ यहाँ रोमावलि नहीं है अपितु धूमशिखा है, इस प्रकारकी प्रतीति होती है। [जिसमें प्रकृत रोमावलिका अर्थतः निषेध सूचित होता है इसलिए यह आर्थी अपह्नुतिका उदाहरण है ]। आर्थी अपह्नुतिमें प्रकृतके निषेधके लिए इन दो मार्गोंके अतिरिक्त अन्य उपायोंका भी अ्ररव- लम्बन किया जा सकता है। जैसे, सप्तम उल्लासमें उदाहरण सं० २६५ में 'इदं ते केनोक्तं' कहकर प्रकृतके निषेधका प्रदर्शन किया गया है। इसी प्रकार- अङ्गं केऽपि शशङ्िरे जलनिधे: पङ्कं परे मेनिरे सारङ्गं कतिचिच्च सञ्जगदिरे भूच्छायमैच्छन् परे । इन्दौ यद्गलितेन्द्रनीलशकलश्यामं दरीदृश्यते तत् सान्द्रं निशि पीतमन्धतमसं कुक्षिस्थमाचक्ष्महे।। हिइत्यादिरूपसे भी प्रकृतका निषेध करनेकी अन्य ही शैलो अपनायी जा सकती है। साहित्यदर्पणकारने अपह्नुतिका एक और भी स्वरूप माना है। उसका लक्षण यह किया है- गोपनीयं कमप्यर्थ द्योतयित्वा कथञ्चन। यदि श्लेषेणान्यथा वान्यथयेत् साप्यपहनुतिः। अर्थात् यदि किसी गोपनीय अर्थको कहकर फिर श्लेषके द्वारा या किसी अन्य प्रकारसे उसको छिपानेका यत्न किया जाय तो वह भी अपह्नुति अलङ्कारका उदाहरण होता है। जैसे- काले वारिधराणामपतितया शक्यते नैव स्थातुम्। उत्कण्ठितासि तरले नहि नहि सखि पिच्छिल: पन्थाः । अर्थात् वर्षाकालमें 'अपतितया' [बिना पतिके ] नहीं रहा जा सकता है ऐसा कहकर किसी नायिकाने अपनी सखीके सामने पतिमिलनकी उत्सुकताको प्रकट किया। परन्तु जब सखी उसका उपहास करके पूछने लगी कि 'अच्छा, आप पतिमिलनके लिए व्याकुल हो रही हैं ?' तब नायिकाने 'अपतितया' शब्दका श्लेषसे 'बिना गिरे', 'बिना फिसले' यह अर्थ लेकर अपने उस उत्कण्ठाव्यञ्जक मूल भावको छिपानेका प्रयत्न किया है। इसलिए यह भी अपहनुति अलङ्कारका उदाहरण है।
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का० ६६, सू० १४६ ] दशम उल्लास: ४७३ [सू० १४६] श्लेष: स वाक्ये एकस्मिन् यत्रानेकार्थता भवेत् ॥९६॥। एकार्थप्रतिपादकानामेव शब्दानां यत्रानेकोर्ऽर्थः स श्लेषः । उदाहरणम्- उदयमयते दिङमालिन्यं निराकुरुतेतरा नयति निधनं निद्रामुद्रां प्रवर्तयति क्रियाः । रचयतितरां स्वैराचारप्रवर्तनकर्तनं बत वत लसत्तेज:पुञ्जो विभाति विभाकरः॥४३४॥ अत्राभिधाया अनियन्त्रणात् द्वावप्यर्कभूपौ वाच्यौ।
८. [अर्थ ] श्लेष अल्गार [सूत्र १४६]-जहाँ एक ही वाक्यमें अनेक अर्थ हों वह श्लेष होता है ॥६६।। 'प्रत्यर्थ शब्दा भिद्यन्ते' इस नियमके अनुसार प्रत्येक शब्द एक ही अर्थका प्रतिपादक होता है। जहाँ एक ही शब्दसे दो या अनेक अर्थोंकी प्रतीति होती है वहाँ वह वस्तुतः एक शब्द नहीं होता है अपितु समानाकार अनेक शब्दोंका जतुकाष्ठन्यायसे श्लेष होता है। नवम उल्लासमें सूत्र ११९ में श्लेष नामक शब्दालङ्कारका निरूपण किया था। यहाँ अरथालङ्काररूप श्लेषका निरूपण किया जा रहा है। श्लेषके इस शब्दालङ्कारत्व तथा अर्थालङ्कारत्वरूप द्विविध स्वरूपका नियामक 'शब्दपरिवृत्तिसहत्व तथा 'परिवृत्त्यसहत्व' ही है। जहाँ शब्दका परिवर्तन करके दूसरा समानार्थक शब्द रख देनेपर श्लेष नहीं रहता है वहाँ श्लेषको, शब्दनिष्ठ होनेसे, शब्दालड्कार माना जाता है। और जहाँ शब्दका परिवर्तन कर देनेपर भी श्लेषके चमत्कारकी हानि नहीं होती है वहाँ अलङ्कार शब्दनिष्ठ नहीं अपितु अर्थनिष्ठ होता है इसलिए उसको अर्थालङ्कार माना जाता है। एक ही अर्थके प्रतिपादक शब्दोंके जहाँ अनेक अर्थ होते हैं वह ['शब्दपरिवृत्तिसह' होनेके कारण अर्थालड्गार रूप ] श्लेष होता है। [उसका ] उदाहरण [जैसे ]- इस उदाहरणमें विभाकर नामक राजाकी सूर्यके साथ समता दिखलाते हुए, स्तुति की गयी है। विभाकर यह शब्द विभाकर नामक राजा तथा सूर्य दोनोंका वाचक है। उसका परिवर्तन कर देनेपर दोनों अर्थोंकी प्रतीति न होनेसे श्लेष नहीं रहता है इसलिए यह परिवृत्त्यसह है। अतः इस अ्ंशमें शब्दश्लेष है। शेष सब विशेषण विभाकर राजा तथा सूर्य दोनों पक्षोंमें घट जाते हैं और शब्दोंका परिवर्तन कर देनेपर भी श्लेषको हानि नहीं होती है, इसलिए उनमें अर्थालङ्काररूप श्लेष होता है। देदीप्यपान तेजःसमूहसे युक्त विभाकर [नामक राजा विभाकर अर्थात् सूर्यके समान ] शोभित हो रहा है। वह [सूर्यके समान ही] उदय [वृद्धि ] को प्राप्त होता है, दिशाओंकी मलिनता [सूर्यपक्षमें अन्धकार तथा राजाके पक्षमें पापाचरण] को विनष्ट करता है, सोनेकी अवस्था [निरुत्साहता] का नाश करता है और [राजाके पक्षमें गमनागमनादिरूप तथा सूर्यपक्षमें सन्ध्योपासनादिरूप विहित ] क्रियाओंको प्रवृत्त करता है। और [सूर्यपक्षमें अभिसार आदि स्वैराचार तथा राजाके पक्षमें अन्याय, पापाचरण आदिरूप] उच्छृङ्ल आचारकी प्रवृत्तियोंका उच्छेद [कर्तन ] करता है। इस प्रकार देदीप्यमान तेज :- समूहसे विभूषित विभाकर [ राजा, विभाकर अर्थात् सूर्यके समान ] शोभित हो रहा है यह बड़ी प्रसन्नताकी बात है [बत बत] ।।४३४॥ यहाँ अभिधाका नियन्त्रण न होनेसे [विभाकर शब्दसे ] सूर्य तथा राजा दोनों वाच्य है।
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४७४ काव्यप्रकाश: [ का० ६७, सू० १४७-४८
[सू० १४७ ] परोक्तिर्भेदकै: श्लिष्टैः समासोक्तिः प्रकृतार्थप्रतिपादकवाक्येन श्लिष्टविशेषणमाहात्म्यात्, न तु विशेष्यस्य सामर्थ्यादपि, यद् अप्रकृतार्थस्याभिधानं सा समासेन संक्षेपेणार्थद्वयकथनात् समासोक्तिः । उदाहरणम्- लहिऊण तुज्झ बाहुप्फंसं जीए स को वि उल्लासो। जअलच्छी तुह विरहे ण हूज्जला दुव्वला णं सा ।।४३५।। [लब्धवा तब बाहुस्पर्श यस्याः स कोऽप्युल्लासः । जयलक्ष्मीस्तव विरहे न खलूज्ज्वला दुर्बला ननु सा ।। इति संस्कृतम् ] अत्र जयलक्ष्मीशब्दस्य केवलं कान्तावाचकत्वं नास्ति। [सू० १४८] निदर्शना। अभवन् वस्तुसम्बन्ध उपमापरिकल्पकः ॥९७।
९. समासोक्ति अलड्कार: [सूत्र १४७ ]-श्लेषयुक्त [भेदक अर्थात् ] विशेषणों द्वारा [पर अर्थात् ] अप्रकृत [के व्यवहार] का कथन 'समासेन संक्षेपेण उक्तिः' [दो अर्थोंका संक्षेपसे कथन होनेके कारण ] समासोक्ति [अलङ्कार कहलाता) है। प्रकृत [ प्रस्तुत ] अर्थके प्रतिपादक वाक्यके द्वारा श्लेषयुक्त विशेषणोंके प्रभावसे, न कि विशेष्य [पद ] के सामर्य्यसे, जो अप्रकृत अर्थका कथन है वह 'समाससे अर्थात् संक्षेपसे [ प्रकृत तथा अप्रकृतरूप ] दोनोंका कथन होनेसे' समासोक्ति [अलङ्ार कहलाता है]। [उसका ] उदाहरण [जैसे ]- तुम्हारे बाहुके स्पर्शको पाकर जिसको वह कुछ अनिर्वचनीय प्रसन्नता होती है वह जयलक्ष्मी तुम्हारे वियोगमें प्रसन्न नहीं है, निश्र्य ही दुर्बल हो गयी है।।४३५।। यहाँ केवल [विशेष्यवाचक ] जयलक्ष्मी शब्द [अप्रकृत ] कान्ता [रूप अर्थका वाचक नहीं है अपितु श्लेषयुक्त विशेषणोंके द्वारा जयलक्ष्मी शब्द नायिकाका बोधक भी होता है]। रूपक और समासोक्तिका भेद रूपक अलङ्कारमें प्रकृतपर अप्रकृत विशेष्यका आरोप होता है और समासोक्तिमें प्रकृतव्यवहारमें अप्रकृतव्यवहारका आारोप होता है। यह रूपक तथा समासोक्तिका भेद है। इसलिए 'यस्य रणान्तःपुरे' इत्यादि उदाहरण सं० ४२३ में एकदेशविवर्ति रूपकके उदाहरणमें समासोक्ति अलङ्कार नहीं होता है। और यहाँ 'लब्धवा तब बाहुस्पश' आदिमें विशेष्यका नहीं अपितु केवल व्यवहारमात्रका आरोप होनेसे रूपक नहीं होता है। यही रूपक तथा समासोक्तिका भेद है। १०. निदशंना अलड्गार 1 [सूत्र १४८]-जहाँ वस्तुका [अभवन् ] असम्भव या अनुपद्यमान सम्बन्ध [प्रकृतकीं अप्रकृतके साथ ] उपमाका परिकल्पक [उपमामें पर्यवसित ] होता है वह निदर्शना [नामक अलङ्गार] होता
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का० ६७, सू० १४८ ]-ल दशम उल्लास: ४७५
निदर्शनं दृष्टान्तकरणम्। उदाहरणम्- (१) क्व सूर्यप्रभवो वंशः क्व चाल्पविषया मतिः । तितीर्षुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम् ।।४३६।। अत्रोडुपेन सागरतरणमिव मन्मत्या सूर्यवंशवर्णनमित्युपमायां पर्यवस्यति यथा वा- (२) उदयति विततोर्ध्वरश्मिरज्जावहिमरुचौ हिमधाम्नि याति चास्तम् ! वहति गिरिरयं विलम्बिघण्टाद्वयपरिवारितवारणेन्द्रलीलाम् ।।४३७।। अत्र कथमन्यस्य लीलामन्यो वहतीति तत्सदृशीमित्युपमायां पर्यवसानम्। निदर्शन अर्थात् दृष्टान्त बनानेवाला [उपमापरिकल्पक होनेसे निदर्शना यह अन्वर्थ-संज्ञा है ]। उदाहरण [जैसे ]- (१) कहाँ सूर्यसे उत्पन्न वंश [सूर्यवंश ] और कहाँ मेरी क्षुद्र [अल्पविषया ] बुद्धि [इन दोनोंका कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता है। सूर्यवंशका वर्णन कर सकना मेरी बुद्धिके लिए सम्भव नहीं है। फिर भी मैं यह जो सूर्यवंशके वर्णनका प्रयास कर रहा हूँ सो ] अज्ञानवश दुस्तर सागरको [ 'चर्मावनद्ध पात्ररूप ] छोटी-सी नौकासे पार करना चाहता हूँ [ 'चर्मावनद्धमुडुपं प्लवः काष्ठकरण्डवत्'] ॥४३६। यहाँ मेरी बुद्धिके द्वारा सूर्यवंशका वर्णन उडुप [बाँसकी बनी हुई और चमड़ेसे मढ़ी हुई नौका या पात्रविशेष ] से सागरके पार करनेके समान है, इस उपमामें [ इस श्लोकवाक्यका ] पर्यवसान होता है। इस उदाहरणमें पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्धरूप दो वाक्यार्थोंका उपमानोपमेयभाव पर्यवसित होता है। इसलिए इसको 'वाक्यार्थनिदर्शना कहा जाता है। इसके अतिरिक्त कहीं केवल दो पदार्थोंका उपमानोपमेयभाव पर्यवसित होनेपर 'पदार्थनिदर्शना' नामक निदर्शनाका दूसरा भेद भी हो सकता है। इस पदार्थनिदशंनारूप द्वितीय भेदका उदाहरण आागे देते हैं- यह श्लोक माघकाव्यके चतुर्थ सर्गसे रैवतक-पर्वतके वर्णनके प्रसङ्गमेंसे लिया गया है। प्रातः- कालके समय रवतक-पर्वतके एक ओर उदय होते हुए सूर्यका बिम्ब और दूसरी ओर अस्त होते चन्द्रमाका बिम्ब, दोनों किसी हाथीके दोनों ओर लटकते हुए दो घण्टोंके समान प्रतीत हो रहे हैं इस बातका वर्णन करते हुए कवि कह रहा है- (२) जिसकी किरणरूप रस्सियाँ ऊपरको फैल रही हैं इस प्रकारके [अहिमधाम्नि ] सूर्यके उदय होते और [हिमधाम्नि ] चन्द्रमाके अस्त होते समय यह [ पर्वत ] लटकते हुए दो घण्टोंसे युक्त हाथीकी शोभाधारण कर रहा है।।४३७।। यहाँ दूसरे [ हाथी] की शोभाको दूसरा [पर्वत ] कैसे धारण कर सकता है [अर्थात् नहीं धारण कर सकता है इसलिए 'वारणेन्द्रलीला' रूप पदार्थका रैवतक पर्वतके साथ सम्बन्ध अनुपपन्न होकर ] उसके समान शोभाको [धारण ] करता है [इस उपमामें पर्यवसित होता है [ इसलिए यह पदार्थनिदर्शना है]। वाक्यार्थनिदर्शना तथा पदार्थनिदर्शनारूप निदर्शनाके दो भेदोंके उदाहरण ऊपर दिये गये हैं। यह निदर्शना मालारूपमें भी हो सकती है। उसका उदाहरण आगे देते हैं-
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४७६ काव्यप्रकाश: [का० ६८-६६, सू० १४६-१५१
(३) दो्भ्यां तितीर्षति तरङ्गवतीभुजङ्गमादातुमिच्छति करे हरिणाङ्कविम्वम् । मेरुं लिलङ्यिपति ध्रुवमेष देव ! यस्ते गुणान् गदितुमुद्यममादधाति ।।४३८।। इत्यादौ मालारूपाऽप्येषा द्रष्टव्या। [सू० १४९] स्वस्वहेत्वन्वयस्योदितः क्रिययैव च साऽपरा। क्रिययैव स्वरूपस्वकारणयोः सम्वन्धो यदवगम्यते साऽपरा निदर्शना । यथा -- (४) उन्नतं पदमवाप्य यो लघुर्हेलयैव स पतेदिति ब्रुवन्। शैलशेखरगतो दृषत्कणश्चारुमारुतधुतः पतत्यधः ॥४३९।। अत्र पातकियया पतनस्य लाघवे सति उन्नतपदप्राप्तिरूपस्य च सम्वन्धः ख्याप्यते। [सू० १५० ] अप्रस्तुतप्रशंसा या सा सैव प्रस्तुताश्रया ।।९८।। अप्राकरणिकस्याभिधानेन प्राकरणिकस्याक्षेपोंऽप्रस्तुतप्रशंसा। [सू० १५१ ] कार्ये निमित्ते सामान्ये विशेषे प्रस्तुते सति। तदन्यस्य वचस्तुल्ये तुल्यस्येति च पञ्चधा ।।९९।। (३) हे राजन् ! [देव]! जो तुम्हारे गुणोंका वर्णन करनेका प्रयत्न करता है वह [तरङ्ग- वती भुजङ्ग अर्थात् ] समुद्रको बाहुओंसे पार करना चाहता है, चन्द्रमाके बिम्बको हाथमें पकड़ना चाहता है और मेरु पर्वतको लाँघना चाहता है ।।४३८।। इत्यादि [उदाहरणों ] में यह [निदर्शना ] मालारूपमें भी पायी जाती है। [सूत्र १४६]-कियाके द्वारा ही अपना और अपने कारणका सम्बन्ध कथन करनेपर वह दूसरे प्रकारकी [निदर्शना] होती है। क्रियाके द्वारा ही [कार्यके ] अपने स्वरूप तथा अपने कारणके सम्बन्धकी जो प्रतीति होती है वह दूसरे प्रकारकी निदर्शना होती है। जैसे- (४) जो क्षुद्र पुरुष होता है वह ऊँचे पदको पाकर भी अनायास ही पतित हो जाता है यह जतलाते हुए पर्वतके शिखरपर स्थित पत्थरका कण [छोटा-सा दुकड़ा ] सुन्दर भन्द वायुके झोंकेसे हिलकर नीचे गिर पड़ता है [ या गिर पड़ा है]।।४३६।। यहाँ [पत्थरके कणकी] पतनक्रियाके द्वारा क्षुद्र पुरुषकी उच्च पदकी प्राप्ति और [उसके] पतनका सम्बन्ध प्रतीत होता है [इसलिए यहाँ दूसरे प्रकारकी निदर्शना है ]। ११. अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्गार [सूत्र १५०]-प्रस्तुत अर्थकी प्रतीति करानेवाली [प्रस्तुताश्रया] जो अप्रस्तुत [अर्थ ] की प्रशंसा [वर्णन है वह ही अप्रस्तुतप्रशंसा [अलङ्गार] है ।६८।। अप्राकरणिक [अर्थ] के कथनसे जो प्राकरणिक अर्थका आक्षेप है वही अप्रस्तुतप्रशंसा [नामक अलङ्गार कहलाता ] है। अप्रस्तुतके द्वारा प्रस्तुतके आक्षेपके पांच प्रकार हो सकते हैं। उन्हीं पाँचों भेदोंको अगले सूत्र में कहते हैं- [सूत्र १५१]-(१) कार्य, (२) कारण, (३) सामान्य, (४) विशेषके प्रस्तुत होनेपर
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का० ६६, सू० १५१] दशम उल्लास: ४७७
तदन्यस्य कारणादेः । क्रमेणोदाहरणम्। (१) याता: किन्न मिलन्ति सुन्दरि पुनश्चिन्ता त्वया मत्कृते नो कार्या नितरां कृशाऽसि कथयत्येवं सवाष्पे मयि। लज्जामन्थरतारकेण निपतत्पीताश्रुणा चक्षुषा दृष्ट्वा मां हसितेन भाविमरणोत्साहस्तया सूचितः ॥४४०।। अत्र प्रस्थानात्किमिति निवृत्तोऽसीति कार्ये पृष्टे कारणमभिहितम् । (२) राजन् राजसुता न पाठयति मां देव्योऽपि तूष्णीं स्थिता: कुब्जे ! भोजय मां कुमारसचिवैर्ना्यापि किं भुज्यते। इत्थं नाथ ! शुकस्तवारिभवने मुक्तोऽध्वगैः पञ्जरात् चित्रस्थानवलोक्य शून्यवलभावेकैकमाभाषते ॥४४१।। अत्र प्रस्थानोद्यतं भवन्तं ज्ञात्वा सहसैव त्वदरयः पलाय्य गता इति कारणे प्रस्तुते कार्यमुक्तम्।
उससे भिन्न [अर्थात् (१) कार्यके प्रस्तुत होनेपर कारणका, (२) कारणके प्रस्तुत होनेपर उससे भिन्न कार्यका, (३) सामान्यके प्रस्तुत होनेपर विशेषका और (४) विशेषके प्रस्तुत होनेपर सामान्यका] तथा (५) तुल्यके प्रस्तुत होनेपर [उससे भिन्न दूसरे ] तुल्यका कथन करना यह पाँच प्रकारकी [अप्रस्तुत- प्रशंसा ] होती है ।। ६ ६ । उस [कार्यादि] से भिन्न [अर्थात् ] कारण आदिका [कथन अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्गार होता है]। क्रमशः [पाँचों भेदोंके ] उदाहरण [आगे देते हैं]- (१) हे सुन्दरि ! क्या [ कार्यवश बाहर ] गये हुए [ प्रियजन ] फिर नहीं मिलते हैं ? [इस- लिए] तुमको मेरे लिए चिन्ता नहीं करनी चाहिये, तुम तो वैसे ही बहुत दुबली हो। मेरे इस प्रकार कहनेपर लज्जाके कारण स्थिर पुतलीवाले गिरते हुए आँसूको पी जानेवाले [ रोक लेनेवाले ] नेत्रसे मुझको देखकर [नायिकाने ] हास द्वारा होनेवाले मरणके प्रति उत्साह प्रदशित किया॥४४०॥ यहाँ [किसी मित्रके द्वारा ] यात्रका विचार क्यों छोड़ दिया, इस 'कार्य' [रूप अर्थ ] के पूछे जानेपर [नायकने उसके ] कारणका कथन किया है। (२) [जो राजपुत्री मुझे रोज पढ़ाया करती थी वह ] राजकन्या [आज ] मुझे नहीं पढ़ा रही है [यह क्या बात है], वे रानियाँ भी चुपचाप हैं [ उनके बोलनेकी आवाज भी सुनाई नहीं देती है], अरी कुब्जा [दासी ], मुझे खाना दे, क्या राजकुमार और [उनके ] मन्त्रियों [या मित्रों] ने अभी तक खाना नहीं खाया है [ जो मेरे खानेके लिए इतना विलम्ब कर दिया है]। हे राजन् ! आपके शत्रुके महलमें [उधरसे आते-जाते ] राहगीरोंके द्वारा पिंजड़ेसे छोड़ा गया हुआ तोता शून्य कोठेपर चित्रोंमें अङ्ङित [राज-परिवारके लोगोंको देखकर ] प्रत्येकसे इस प्रकार कह रहा है।।४४१।। इसमें आपको [ आक्रमणके लिए ] प्रस्थानके लिए उद्यत जानकर आपके शत्रु सहसा ही भागकर
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४७८ काव्यप्रकाश: [ का० ६६, सू० १५१
(३) एतत् तस्य मुखात् कियत् कमलिनीपत्रे कणं वारिणो यन्मुक्तामणिरित्यमंस्त स जड: शृण्वन्यदस्मादपि। अङ्गुल्यग्रलघुक्रियाप्रविलयिन्यादीयमाने शनैःक क ॥ कुत्रोड्डीय गतो ममेत्यनुदिनं निद्राति नान्तः शुचा ॥४४२।। अत्रास्थाने जडानां ममत्वसम्भावना भवतीति सामान्ये प्रस्तुते विशेष: कथितः । (४) सुहृद्वधूवाष्पजलप्रमार्जनं करोति वैरप्रतियातनेन यः । स एव पूज्यः स पुमान् स नीतिमान् सुजीवितं तस्य स भाजनं श्रियः ॥४४३॥ अत्र कृष्णं निहत्य नरकासुरवधूनां यदि दुःखं प्रशमयसि तत् त्वमेव श्लाध्य इति विशेषे प्रकृते सामान्यमभिहितम् । तुल्ये प्रस्तुते तुल्याभिधाने त्रयः प्रकाराः। श्लेषः, समासोक्तिः, सादृश्यमात्रं वा तुल्यात्तुल्यस्य हि आक्षेपे हेतुः। करमेणोदाहरणम् --
चले गये इस प्रकारके कारणके प्रस्तुत होनेपर [उसके ] कार्यका कथन किया गया है। [इसलिए यह अप्रस्तुतप्रशंसाके दूसरे भेदका उदाहरण है ]। सामान्यके प्रस्तुत होनेपर उससे भिन्न विशेष के कथनरूप अप्रस्तुतप्रशंसाके तीसरे भेदका उदाहरण 'भल्लट-शतक' मेंसे देते हैं। इसमें किसी मूर्खराजके वर्णनमें कवि कह रहा है- (३) कमलिनीके पत्तेपर स्थित पानीकी बंदको उस मूर्खने जो मोती समझा यह तो उसके मुखसे बहुत छोटी-सी [ मूर्खताकी] बात है। इससे भी बड़ी [ मूर्खताकी ] बात [यह ] सुनो कि अँगुलीके अगले भागसे धीरेसे उठानेपर [अँगुलीमें लगकर ही सूख जानेके कारण ] उसके लुप्त होनेसे, मेरा मुक्तामणि उड़कर कहाँ चला गया इस सोचके मारे वह रात-दिन सो नहीं पाता है।४४२। यहाँ सूर्खोंकी अनुचित स्थानपर भी ममत्वबुद्धि हो जाती है इस सामान्य बातके [कथनके ] प्रस्तुत होनेपर विशेष [व्यक्ति]का कथन किया है। विशेषके प्रस्तुत होनेपर सामान्यके कथनरूप चतुर्थ भेदका उदाहरण आगे देते हैं-श्रीकृष्णके द्वारा नरकासुरके मार दिये जानेपर नरकासुरके मन्त्री उसके मित्र शाल्व राजाको इसका बदला लेनेके लिए उत्साहित करते हुए कह रहे हैं- (४) जो पुरुष वैरका बदला लेकर अपने मित्रकी स्त्रियोंकी आँखोंके आँसू पोंछ सकता है वही पूज्य है, वही मर्द है, वही नीतिज्ञ और लक्ष्मीका अधिकारी है और उसीका जीवन सफल है॥४४३॥ यहाँ यदि तुम कृष्णको मारकर नरकासुरकी स्त्रियोंके दुःखको दूर कर सकते हो तो तुम्हीं प्रशंसा- के पाद्र हो सकते हो इस विशेषके प्रस्तुत होनेपर। जो कोई वैरका बदला लेकर मित्रकी स्त्रियोंका दुःख दूर करता है वही श्लाध्य होता है] यह सामान्यका कथन है[ यह अप्रस्तुतप्रशंसाके चौथे भेदका उदाहरण है]। (५) तुल्यके प्रस्तुत होनेपर [उससे भिन्न दूसरे ] तुल्य अर्थके कथनके तीन प्रकार हो सकते
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का० ६६, सू० १५१] दशम उल्लास: ४७६
(५ क) पुंस्त्वादपि प्रविचलेद्यदि यद्यधोऽपि यायाद्यदि प्रणयने न महानपि स्यात् अभ्युद्धरेत्तदपि विश्वमितीदृशीयं केनापि दिक् प्रकटिता पुरुषोत्तमेन।।४४४।। (५ ख) येनास्यभ्युदितेन चन्द्र गमितः क्लान्ति रवौ तत्र ते युज्येत प्रतिकर्त्तुमेव न पुनस्तस्यैव पादग्रहः । क्षीणेनैतदनुष्ठितं यदि ततः किं लज्जसे नो मना- गस्त्वेवं जडधामता तु भवतो यद्वयोम्नि विस्फूर्जसे ॥४४५।।
हैं। (१) श्लेष, (२) समासोक्ति तथा (३) सादृश्यमात्र [ये तीन ] तुल्य अर्थसे [प्रस्तुत ] तुल्यका आक्षेप करानेमें हेतु हो सकते हैं। क्रमशः [उन तीनों प्रकारोंके ] उदाहरण [आगे दिखलाते हैं ]- । यह उदाहरण भी भल्लटकवि-विरचित 'भल्लटशतक' में ७६ संख्यापर आाया है। शत्रुके द्वारा अपहरण किये हुए राज्यका पुनरुद्धार करनेके लिए किसी राजाको उत्तेजित करते हुए उसका मन्त्री राजासे कह रहा है कि- (५ क)-यदि पुरुषत्वका भी परित्याग करना पड़े, यदि नीच-मार्गमें भी जाना पड़े और याचना [प्रणयन ] के कारण क्षुद्र भी बनना पड़े तो भी संसारका उद्धार करना ही चाहिये, यह मार्ग किन्हीं अपूर्व पुरुषोत्तमने [विष्णु भगवान्ने मोहिनीरूप, कूर्मरूप, वराहरूप और वामन आदि रूप धारण करके ] दिखला दिया है॥४४४।। यहाँ वर्णनोयरूपसे सत्पुरुषके प्रस्तुत होनेपर उसके सदृश विष्णुका कथन होनेसे और उसमें 'पुंस्त्वात्' एवं 'पुरुषोत्तमेन' पदोंके श्लिष्ट होनेसे श्लेषमूलक अप्रस्तुतप्रशंसा है। यहाँ यह शङ्का हो सकतो है कि राजारूप प्रस्तुत अर्थको ही प्रथम प्रतोति यदि मान ली जाय तो यहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार नहीं हो सकता है। इस शङ्काका यह समाधान किया गया है कि यद्यपि 'पुरुषोत्तम' पदसे राजा तथा विष्णु दोनों अरथोंकी प्रतीति होतो है, परन्तु पुरुषोत्तमपद विष्णु अरथमें रूढ़ है और राजाके बोधनमें उसको यौगिक पद मानना होगा। 'योगात् रूढ़िबलायसो' अथवा अवयवशक्तेः समुदायशक्तिर्बलीयसी' इन नियमोंके अनुसार अवयवशक्तिसे गम्य यौगिक राजारूप अर्थकी अपेक्षा समुदायशक्तिसे बोधित विष्णुरूप रूढ़ अर्थकी ही प्रथम उपस्थिति होनेसे राजारूप अर्थ आक्षेपसे ही प्रतीत होता है इसलिए यह अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कारका ही उदाहरण है। इसोलिए दोनों अरथोंके तुल्य- रूपसे वाच्य न होनेके कारण यहाँ श्लेष-अलद्कार मुख्य नहीं है। आगे समासोक्तिमूलक अप्रस्तुतप्रशंसाका उदाहरण देते हैं- (५ ख) -- हे चन्द्र ! जिस [सूर्य] ने उदयमात्रसे तुम्हारी कान्तिको मलिन कर दिया है उस सूर्यसे [अपने इस अपमान और अपकर्षका ] बदला लेना ही [तुम्हारे लिए ] उचित था, न कि उसीके पैरों [पादोंका दूसरे पक्षमें किरणों] का ग्रहण करना। फिर भी क्षीण [दुर्बल और दरिद्र ] होनेसे यह [अपमान करनेवालेका पादग्रहण ] भी यदि किया तो क्या तुम्हें तनिक भी लज्जा नहीं आती है [ तुम
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४८० काव्यप्रकाश: [ का० ६६, सू० १५१
(५ ग) आदाय वारि परितः सरितां मुखेभ्यः किन्तावदजितमनेन दुरर्णवेन। क्षारीकृतं च वडवादहने हुतं च पातालकुक्षिकुहरे विनिवेशितं च ।४४६।। इयं च काचित् वाच्ये प्रतीयमानार्थानध्यारोपेणैव भवति। यथा- अब्धेरम्भःस्थगितभुवनाभोगपातालकुक्षे: पोतोपाया इह हि बहवो लङ्गनेऽपि क्षमन्ते। आहो रिक्तः कथमपि भवेदेष दैवात्तादानीं को नाम स्यादवटकुहरालोकनेऽप्यस्य कल्पः ॥४४७।। क्वचिदध्यारोपेणैव यथा-
बड़े बेशर्म हो। और इतना अपमान सह कर भी] जो तुम आकाशमें चमक रहे हो इससे तुम्हारी [जड- धामता शीतकान्तित्व, निस्तेजस्कता या ] मूर्खता ही [सिद्ध ] होती है।।४४ ५।। यहाँ विशेष्यवाचक 'चन्द्र' पदमें श्लेष नहीं है। केवल श्लिष्ट विशेषणोंके माहात्म्यसे इस चन्द्र और सूर्यके व्यवहारपर प्रस्तुत सधन और निर्धनके अथवा विजयी तथा पराजित राजाओंके व्यवहारका आक्षेप होनेसे यह समासोक्तिमूलक अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्गारका उदाहरण होता है। आगे सादृश्यमात्रहेतुक तप्रस्तुतप्रशंसाके तीसरे भेदका उदाहरण देते हैं- 'शार्ङ्गघरपद्धति'में इसको शुक नामक किसी कविका पद्य बतलाया गया है। परन्तु क्षेमेन्द्रकी 'शचित्यविचारचर्चा में इसे अभिनवगुप्तके गुरु भट्टेन्दुराजका पद्य माना है। (५ ग)-सब ओरसे नदियोंके मुहानेसे पानी लेकर इस दुष्ट समुद्रने क्या किया [उस मीठे सुस्वादु जलको ] खारा कर दिया, बड़वानलमें झोंक दिया और [जो बचा-खुचा पानी रहा उसको ] पातालके पेटके गढ़ेमें (सैंतकर) रख दिया॥४४६। यहाँ निर्धन प्रजाजनोंके मुखके ग्रासको अर्थात् स्वल्प धनको उनसे अनुचित करों आदिके द्वारा लेकर उसका अपव्यय करनेवाले किसी राजा या कृपण व्यक्तिका वर्णन प्रस्तुत होनेपर उसके तुल्य समुद्रका वर्णन किया गया है। और यह [तुल्यके प्रस्तुत होनेपर तुल्यके कथनरूप पश्चम प्रकारकी अप्रस्तुतप्रशंसा ] वाच्य अर्थमें प्रतीयमान [व्यङ्गच ] अर्थके अध्यारोपके बिना भी होती है, जेसे- (५ घ) -- जलसे भूवलय और पातालकी कुक्षिको भर देने [व्याप्त कर लेने ] वाले समुद्रको जहाजोंकी सहायतासे बहुत-से लोग पार करनेमें भी समर्थ हो सकते हैं, परन्तु यदि यह कहीं खाली [ पानीसे रहित ] हो जाय तो इसके उस भयड्गर गढ़ेको [ पार करनेकी क्या बात ] देख सकनेका भी साधन कया हो सकेगा॥४४७॥ यहाँ प्रजाजनका उत्पीड़न करनेवाले दुष्ट राजा आदिका भण्डार यदि धन-धान्यसे भरा रहे तभी प्रजाजनोंका कुशल है। यदि उसके कोषमें धनको कमी हुई तो वह प्रजापर धन-प्राप्तिके लिए अत्याचार करेगा, उससे बचनेका कोई मार्ग नहीं निकलेगा। यह प्रतीयमान अर्थ है। इस वाच्य अर्थके स्वतः ही सम्भव होनेसे उसपर प्रतीयमान अरथके अध्यारोपकी आवश्यकता नहीं होती है। कहीं [ वाच्यार्थपर प्रतीयमान अर्थके ] अध्यारोपसे ही [ अप्रस्तुतप्रशंसा ] होती है। जैसे --
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का० ६६, सू० १५१ ] दशम उल्लास: ४८१
कस्त्वं भो: ? कथयामि दैवहतकं मां विद्धि शाखोटकं वैराग्यादिव वक्षि साधु विदितं कस्मादिदं कथ्यते। वामेनात्र वटस्तमध्वगजनः सर्वात्मना सेवते न च्छायाऽपि परोपकारकरणे मार्गस्थितस्यापि मे ॥४४८॥ क्वचिदंशेष्वध्यारोपेण यथा-
यह श्लोक आनन्दवर्द्धनाचार्य-प्रणीत 'ध्वन्यालोक'के तृतीय उद्योतमें पृष्ठ ४१७ पर भी आया है। इसमें शाखोटक वृक्षके साथ किसी व्यक्तिके वार्तालापका वर्णन किया गया है। शाखोटक वृक्षका अर्थ अभिनवगुप्तपादाचार्यने लोचनमें 'श्मशानाग्निज्वालावलीढलतापल्लावादिरूपस्तरुविशेषः' अर्थात् श्मशानके अ्र्प्रग्निको ज्वालाओरोंसे जिसके पत्ते आदि जल गये हैं इस प्रकारका वृक्ष किया है। 'काव्यप्रकाश' की उद्योत नामक टीकामें 'शाखोटको भूताधिवासो वृक्षविशेषः' बतलाया है। (५ ङ) -- [प्रश्न ]-अरे तू कौन है ? [उत्तर ] -- बतलाता हूँ कि मुझको अभागा शाखोटक [श्मशानकी अग्निसे जले हुए पत्ते आदिसे रहित सिहोराका वृक्ष ] समझो। [प्रश्न ]-कुछ वैराग्यसे [ यह बात] कह रहे हो [ऐसा प्रतीत होता है] ? [उत्तर ]-ठीक समझा। [प्रश्न ]-क्यों, ऐसा क्यों [किस कारणसे ] कह रहे हो ? [उत्तर ]-यहीं बायीं ओर बड़का पेड़ है, पथिक लोग उसका ही सब प्रकारसे आश्रय लेते हैं, और मैं मार्गमें खड़ा हूँ फिर भी मेरे पास परोपकार करनेके लिए [फल आदि तो दूर रहे] छाया भी नहीं है [ इसीलिए मैं अपनेको अभागा कहकर अपना परिचय दे रहा हूँ] ॥४४८॥ यहाँ किसी ऐसे प्रस्तुत व्यक्तिकी प्रतीति हो रही है जो किसी-न-किसी प्रकार दूसरोंकी सहायता करनेके लिए उत्सुक है परन्तु या तो वह धनादिसे हीन हो गया है अथवा नीच जातिका है, इसलिए वह न सहायता कर पाता है, न लोग उसकी सहायताको स्वीकार करते हैं। इस कारण वह दुःखी है। यहाँ शाखोटक वृक्षके साथ वार्तालाप सम्भव नहीं है इसलिए उस वाच्यार्थके ऊपर नीच जातिके अथवा निर्धन दाता आदिरूप प्रतीयमान अर्थका अध्यारोप करके ही अर्थकी प्रतीति होती है। इसलिए यह अध्यारोपमूलक अप्रस्तुतप्रशंसाका उदाहरण है। आगे आंशिक अध्यारोपमूलक तीसरे प्रकारके भेदका उदाहरण देते हैं। भल्लट कतिकृत 'भल्लटशतक' में यह १८वाँ पद्य है। इसमें किसी मिथ्याभाषी, कानोंके कच्चे, मित्र-शत्रुका विचार न करनेवाले और तत्त्वहीन राजाकी सेवा करनेवाले पुरुषको उस ओरसे निवृत्त करनेका प्रयत्न किया जा रहा है। अप्रस्तुत हाथी और भौरेके वर्णन द्वारा प्रस्तुत सेव्यसेवकका आरक्षेप होनेसे अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्धार है। इसमें हाथोके रसनाविपर्ययका उल्लेख किया गया है। हाथीकी जिह्वा अन्य प्राणियोंकी जिह्वासे उलटी होती है। अर्थात् उसका अगला भाग होंठके पास न होकर भीतरकी ओर कण्ठमें होता है। अग्निके शापसे हाथियोंकी जीभमें इस प्रकारका परिवर्तन हो गया यह बात पुराणोंमें कही गयी है। श्लोकका अर्थ इस प्रकार है- ३१
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४८.२ काव्यप्रकाश: [का० १००१, सू० १५१
दृष्टिः सा मदविस्मृतस्वपरदिक् किं भूयसोक्तेन वा। सर्व विस्मृतवानसि भ्रमर ! हे यद्वारणोऽ्द्याप्यसौ अन्तःशून्यकरो निषेव्यत इति भ्रातः ! क एष ग्रहः ॥४४९॥ अत्र रसनाविपर्यासः शून्यकरत्वं च भ्रमरस्यासेवने न हेतुः । कर्णचापलं तु हेतु: मदः प्रत्युत सेवने निमित्तम् । [सू० १५२ ] निगीर्याध्यवसानन्तु प्रकृतस्य परेण यत् प्रस्तुतस्य यदन्यत्वं यद्यर्थोक्तौ च कल्पनम् ॥।१००।। कार्यकारणयोर्यश्च पौर्वापर्यविपर्ययः । विज्ञेयाऽतिशयोक्तिः सा।
कहीं आंशिक अध्यारोपसे [अप्रस्तुतप्रशंसा] होती है। जैसे- (५ च) -- हे भ्रमर ! [क्या तुम हाथियोंके ] उस अद्भुत जिह्वाके परिवर्तन [उल्टी हो जाने ] को, उस [असाधारण ] कानोंकी चपलताको और मदके कारण अपने और दूसरेके मार्गका ध्यान न रखने वाली दृष्टिको, अधिक क्या कहा जाय इन सब बातोंको भूल गये हो जो अपनेको भगानेवाले [वारण करनेवाले ] और भीतरसे खाली हाथ [तत्त्वहीन ] इस हाथीकी सेवा कर रहे हो। अरे भाई, यह तुम्हारा कैसा [अनुचित ] आग्रह है[ जो तुम इसको छोड़कर कहीं दूसरी जगह नहीं चले जाते हो]।४४६। यहाँ रसनाका विपर्यय तथा अन्तःशून्यकरत्व [ये दोनों अंश] भ्रमरके द्वारा [हाथी की ] सेवा न करनेके हेतु नहीं हैं। केवल कानोंकी चपलता [ उसके पास न जानेका ] हेतु है। और मद [असेवनका हेतु ही नहीं ] बल्कि [उल्टा ] सेवन करनेका हेतु है। [इस प्रकार यहाँ कुछ अंशमें प्रतीयमान अर्थका अध्यारोप होता है और कुछ अंशोंमें नहीं। अतः यह आंशिक अध्यारोपका उदाहरण है ]। अप्रस्तुतप्रशंसा तथा समासोक्तिका भेद अलद्कारोंके पूर्वोक्त वर्गीकरणमें अप्रस्तुतप्रशंसा तथा समासोक्ति दोनों अलङ्कार 'गम्य श्रपम्या- श्रित' अलङ्कारवर्गमें माने गये हैं। इन दोनोंमें एक अरथर वणित होता है वह दूसरेका आक्षेप कराता है। यह उन दोनोंकी समानता है। उन दोनोंका भेद यह है कि अप्रस्तुतप्रशंसामें अप्राकरणिक अर्थसे प्राकरणिक अर्थका बोध होता है और समासोक्तिमें प्राकरणिकसे अप्राकरणिक अरथका आक्षेप होता है। १२. अतिशयोक्ति अलङ्कार आगे 'अतिशयोक्ति' अलङ्कारका लक्षण करते हैं। अलङ्कारोंके पूर्वोक्त वर्गीकरणमें अतिश- योक्तिको अध्यवसायमूलक अभेदप्रधान अलङ्कार माना है। इसका लक्षण आगे करते हैं। [सूत्र १५२] (१) उपमानके द्वारा [परेण] [ उपमेयका ] निगरण [अन्तर्भाव, पृथक् कथन न करना] करके जो [आहार्य अभेद निश्चय कल्पित अभेद कथनरूप ] 'अध्यवसान' करना है वह [प्रथम प्रकारकी ], (२) प्रस्तुत अर्थका अन्य रूपसे वर्णन [द्वितीय प्रकारकी ], (३) 'यदि' के समानार्थक
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का० १०१, सू० १५२ ] दशम उल्लास: ४८३ (१) उपमानेनान्तर्निगीर्णस्योपमेयस्य यदध्यवसानं सैका। यथा- कमलमनम्भसि कमले च कुवलये तानि कनकलतिकायाम्। सा च सुकुमारसुभगेत्युत्पातपरम्परा केयम् ।४५०।। अत्र मुखादि कमलादिरूपतयाऽध्यवसितम् । (२) यच्च तदेवान्यत्वेनाध्यवसीयते साऽपरा यथा- अण्णं लडहत्तणअं अण्णा विअ का वि वत्तणच्छाआ। सामा सामाण्णपआवइणो रेह च्चिअ ण होई।४५१।। [अन्यत् सौकुमार्यमन्यैव च कापि वर्तनच्छाया । श्यामा सामान्यप्रजापते: रेखैव च न भवति ॥ इति संस्कृतम् ] शब्द लगाकर जो कल्पना करना [वह तृतीय प्रकारकी ] और (४) कार्य-कारणके पौर्वापर्यका जो विपर्यय है वह [चतुर्थ प्रकारकी अतिशयोक्ति समझनी चाहिये। (१) उपमानके द्वारा भीतर निगल लिये गये [अर्थात् पृथक् न कहे हुए ] उपमेयका जो अध्यवसान [अर्थात् उपमानके साथ आहार्य या कल्पित अभेदनिश्रय ] होता है [ वह प्रथम प्रकारकी] यह [अतिशयोक्ति ] होती है। जैसे -- [अपनी प्रियतमाको देखकर उसकी सखीके प्रति नायककी यह उक्ति है ] बिना जलके कमल [रूप नायिकाका मुख ], कमलमें दो नील कमल [रूप नेत्र ] और वे [ एक कमल तथा दो नील कमल नायिकाके गौरवर्ण शरीररूप ] सोनेकी लतामें [ लगे हुए हैं] और वह [ सोनेकी लतारूप शरीर भी ] सुकुमार तथा सुन्दर है यह कैसी अनर्थ-परम्परा है॥४५०॥ यहाँ [उपमानरूप कमल आदिके द्वारा उपमेयभूत] मुख आदि [का निगरण करके] कमल आदिरूपसे अभिन्नतया निश्च्त किये गये हैं [ इसलिए यह प्रथम प्रकारकी अतिशयोक्तिका उदाहरण है]। इस प्रथम प्रकारकी अतिशयोक्तिमें उपमानके द्वारा उपमेयका निगरण करके उपमानके साथ उसका आहार्य अभेद निश्चय किया गया है। अर्थात् इसमें धर्मीका अभेद प्रतिपादन किया गया है। अतिशयोक्तिके दूसरे भेदमें धर्मीका अभेद नहीं होता है इसी बातको 'प्रस्तुतस्य यदन्यत्वं' इस कारिका- के द्वारा कहते हुए द्वितीय भेदका लक्षण करते हैं- (२) और जो उस ही [अर्थात् प्रस्तुत ] का अन्य [अपूर्व ] रूपसे [ आहार्य अर्थात् कल्पित ] भेद निश्चय किया जाता है [ अर्थात् समानजातीय वस्तुको उससे भिन्न असमानजातीय बतलाया जाता है ] यह दूसरे प्रकारकी [अतिशयोक्ति ] होती है। जैसे -- [उस नायिकाका ] सौन्दर्य कुछ और ही [लोकोत्तर ] है और [उसके 'वर्तते इति वर्तनं शरीरम्'] शरीरकी कान्ति [भी] कुछ और ही [अलौकिक-सी] है। [उष्णकालमें शीत देहवाली और शीतकालमें उष्णदेहवाली षोडशवर्षदेशीया नायिकारूप] 'श्यामा' साधारण [संसारके बनानेवाले ] ब्रह्माकी रचना ही नहीं हो सकती है ।४५१।। यहाँ लोकप्रसिद्ध सौन्दर्य तथा शरीरकान्तिका ही कविने 'अन्य' अर्थात् अलौकिक लोकोत्तर- रूपमें वर्णन किया है। इसलिए यह द्वितीय प्रकारकी अतिशयोक्तिका उदाहरण है। तृतीय प्रकारकी अतिशयोक्तिका वर्णन करते हैं।
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४८४ काव्यप्रकाश: [का० १०१-२, सू० १५३ (३) 'यद्यर्थस्य' यदिशब्देन चेच्छब्देन वा उक्तौ यत्कल्पनम् [अर्थादसम्भविनो- डर्थस्य ] सा तृतीया। यथा- राकायामकलङ्गं चेदमृतांशोर्भवेद् वपुः । तस्या मुखं तदा साम्यपराभवमवाप्नुयात्।।४५२।। (४) कारणस्य शीघ्रकारितां वक्तुं कार्यस्य पूर्वमुक्तौ चतुर्थी। यथा -- हृदयमधिष्ठितमादौ मालत्याः कुसुमचापवाणेन। म० गगध चरमं रमणीवल्लभ ! लोचनविषयं त्वया भजता ।।४५३।। [सू० १५३ ] प्रतिवस्तूपमा तु सा ।।१०१।। सामान्यस्य द्विरेकस्य यत्र वाक्यद्वये स्थिति: । साधारणो धर्मः उपमेयवाक्ये उपमानवाक्ये च कथितपदस्य दुष्टतयाइभिहितत्वात् शब्दभेदेन यदुपादीयते सा वस्तुनो वाक्यार्थस्योपमानत्वात् प्रतिवस्तूपमा । यथा -- (३) 'यद्यर्थ'के अर्थात् 'यदि' शब्दसे अथवा [ उसके समानार्थक ] 'चेत्' शब्दके द्वारा कथन करने- में जो कल्पना अर्थात् असम्भव अर्थकी कल्पना है वह तीसरे प्रकारकी [अतिशयोक्ति होती है] जैसे -- पूर्णिमाकी रात्रिमें यदि चन्द्रमाका बिम्ब कलङूरहित हो तब उस [नायिका] का मुख चन्द्रमासे सादृश्यरूप पराभवको प्राप्त कर सकता है।४५५॥ (४) कारणकी शीघ्रकारिताको कहनेके लिए कार्यका [कारणकी अपेक्षा ] पूर्वकथन करनेपर [कार्यकारणके पौर्वापर्यकी विपर्ययरूप ] चौथी तरहकी [अतिशयोक्ति होती है]। जसे -- हे रमणीवल्लभ [स्त्रियोंके प्रिय नायक] ! पुष्प ही जिसका धनुष तथा बाण है उस कामदेवने मालती [नायिका]के हृदयपर पहिले ही अधिकार कर लिया और तुमने दृष्टिगोचर होकर बादमें [उसके हृदयपर अधिकार कर पाया]।४५३॥ यह् श्लोक दामोदरगुप्त-विरचित 'कुट्टनीमत' नामक काव्यमें ६६ संख्याका पद्य है। इसलिए 'काव्यप्रकाश' के व्याख्याकार महेश्वरने इसमें 'मालत्याः'के स्थानपर 'मालव्या' पाठ मानकर इसे 'मालविकाग्निमित्र' नाटकमें अग्निमित्र राजाके प्रति दूतीकी उक्ति बतलाया है। यह असङ्गत है। इसी प्रकार सुधासागरकारने इसको 'मालतीमाधव' नाटकमें माधवके प्रति कहा हुआर वतलाया है वह भी असङ्गत है, क्योंकि इन दोनों नाटकोंमें यह पद्य नहीं पाया जाता है। १३. प्रतिवस्तूपमालङ्कार अलद्कारोंके वर्गीकरणमें तुल्ययोगिता, निदर्शना, दृष्टान्त, दीपक आदिके समान 'प्रतिवस्तूपमा'- को भी 'गम्य औपम्याश्रित' अलङ्गार माना गया है। तदनुसार उसका लक्षण करते हैं- [सूत्र १५३ ] जहाँ एक ही साधारणधर्मको दो वाक्योंमें दो बार [भिन्न शब्दोंसे] कहा जाय वह प्रतिवस्तूपमा [अलङ्गार] होती है॥१०१।। [एक ही] साधारणधर्म, उपमेयवाक्य तथा उपमानवाक्यमें [ एक ही शब्दसे कहनेपर ] कथित-
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का० १०२, सू० १५३ ] दशम उल्लास: ४८५
(१) देवीभावं गमिता परिवारपदं कथं भजत्वेषा। न खलु परिभोगयोग्यं दैवतरूपाङ्ितं रत्नम् ।।४५४।। (२) यदि दहत्यनलोऽत्र किमद्भुतं यदि च गौरवमद्रिषु किन्ततः । लवणमम्बु सदैव महोदधेः प्रकृतिरेव सतामविषादिता ।।४५५।। इत्यादिका मालाप्रतिवस्तूपमा द्रष्टव्या। एकवमन्यत्राप्यनुसर्त्तव्यम्।
पदता [पुनरुक्ति ] दोष होनेके कारण भिन्न शब्दोंसे जब गृहीत किया जाता है तो वह वस्तु अर्थात् वाक्यार्थके उपमान होनेसे प्रतिवस्तूपमा [अलङ्गार] कहलाता है। जैसे- (१) देवीभावको प्राप्त [अर्थात् पटरानी-पदपर अभिषिक्त] यह [रानी] साधारण स्त्री [परिवारपद ] अब कैसे समझी जा सकती है, देवताके रूपसे अङ्कित रत्न [साधारण आभूषण आदिके रूपमें] उपभोगके योग्य नहीं होता है।।४५४।। इस उदाहरणमें उत्तरार्द्धका वाक्यार्थ उपमानरूप है तथा पूर्वार्द्धका वाक्यार्थ उपमेयरूप है। इसलिए वस्तु अर्थात् वाक्यार्थके उपमान-उपमेय होनेसे तथा उनके एक ही 'अनौचित्य' रूप धर्मको पूर्वार्द्धमें 'कथं भजतु' पदसे तथा उत्तरार्द्धमें 'न खल् परिभोगयोग्यं' पदसे कहा गया है। यह प्रतिवस्तूपमा अलङ्कार भी (१) केवलरूप तथा (२) मालारूप दो प्रकारका होता है। इनमेंसे केवलरूपका उदाहरण यह दिया गया है। मालारूप प्रतिवस्तूपमाका उदाहरण आगे देते हैं- (२) यदि अग्नि जलाता है तो इसमें आश्र्वर्यकी बात क्या है ? यदि पहाड़ोंमें भारीपन [गौरव ] है तो इससे क्या हुआ ? समुद्रका पानी सदा ही खारा होता है और दुःखी न होना [किसी बातमें दुःख न मानना ] सज्जनोंका स्वभाव ही है।४५५॥ इत्यादि मालारूप प्रतिवस्तूपमा समझनी चाहिये। इसी प्रकार अन्य उदाहरण भी समझ लेने चाहिये। यहाँ 'स्वाभाविक धर्मका दर्शन विस्मयजनक नहीं होता है' यह साधारणधर्म भिन्न-भिन्न शब्दोंसे निर्दिष्ट किया गया है। जिस प्रकार अग्निका स्वाभाविक दाहकत्व धर्म अथवा पर्वतोंका गौरव अथवा समुद्रजलका क्षारत्वधर्म स्वाभाविक होनेके कारण चिस्मयजनक नहीं होता है इसी प्रकार सज्जनोंका 'अविषादिता' धर्म, स्वाभाविक धर्म होनेसे, विस्मयका जनक नहीं है। इस प्रकार इस उदाहरणमें 'प्रकृतिरेव सतामविषादिता' इस चतुर्थ चरणका वाक्यार्थ उपमेय है और शेष तीन चरणोंके वाक्यार्थ उपमानरूप हैं, इसलिए यह मालारूप प्रतिवस्तूपमाका उदाहरण होता है। प्रतिवस्तूपमा तथा दृष्टान्तालङ्गारका भेद प्रतिवस्तूपमालङ्कारके बाद अ्रपरगले सूत्रमें दृष्टान्तालड्कारका लक्षण है। 'प्रतिवस्तूपमा'के लक्षणमें आये हुए 'वाक्यद्वये' पदको अनुवृत्ति यहाँ 'दृष्टान्त'के लक्षणमें भी जाती है। 'वाक्यद्वये' अरथात् उपमान- वाक्य और उपमेयवाक्य दोनोंमें 'एतेषां' अर्थात् उपमान, उपमेय और साधारणधर्म इन तीनोंका 'प्रतिबिम्बनम्' अरथात् बिम्बप्रतिबिम्बभाव होनेपर दृष्टान्तालड्कार होता है। यह दृष्टान्तालङ्कारका सामान्य लक्षण है। प्रतिवस्तूपमामें एक ही सामान्यधर्म उपमानवाक्य तथा उपमेयवाक्यमें भिन्न- भिन्न शब्दों द्वारा पुनरुक्तिभयसे भिन्न-भिन्न रूपमें कहा जाता है। परन्तु दृष्टान्तालड्कारमें उपमानवाक्य तथा उपमेयवाक्यमें दो भिन्न-भिन्न धर्म सादृश्यके कारण शपम्यके प्रयोजक होते हैं। इसलिए प्रति-
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४८६ काव्यप्रकाश: [ का० १०२, सू० १५४ [सू० १५४] दृष्टान्तः पुनरेतेषां सर्वेषां प्रतिबिम्बनम् ॥१०२।। एतेषां साधारणधर्मादीनाम् । दृष्टोऽन्तो निश्चयो यत्र स दृष्टान्तः (१) त्वयि दृष्ट एव तस्या निर्वाति मनो मनोभवज्वलितम् । आलोके हि हिमांशोविकसति कुसुमं कुमुद्वत्याः ।४५६।।
वस्तूपमा तथा दृष्टान्तालङ्कारका भेद प्रतिपादन करते हुए, 'प्रतापरुद्रयशोभूषण' आदिमें वस्तुप्रतिवस्तु- भावमें प्रतिवस्तूपमा, तथा बिम्बप्रतिबिम्बभाव होनेपर दृष्टान्तालड्वार माना है। एक ही या अभिन्न साधारणधर्मका पुनरुक्तिसे बचनेके लिए भिन्न शब्दोंसे कथन करना 'वस्तुप्रतिवस्तुभाव' कहलाता है और वह प्रतिवस्तूपमालङ्कारका प्रयोजक होता है। 'एकस्यार्थस्य शब्दद्वयेनाभिधानं वस्तु-प्रतिवस्तु- भावः'। विभिन्न दो धर्मोंके सादृश्यके कारण शपम्य-प्रयोजक रूपमें उपमानवाक्य तथा उपमेयवाक्यमें पृथक् उपादानको 'बिम्बप्रतिबिम्बभाव' कहते हैं और वह दृष्टान्तालङ्कारका प्रयोजक होता है। 'द्वयोद्विरुपादानं बिम्बप्रतिबिम्बभावः'। यही दृष्टान्तालङ्कारका प्रतिवस्तूपमासे भेद है। इसी भेदको सूचित करनेके लिए मूल सूत्रमें 'पुनः' पदका विशेषरूपसे ग्रहण किया गया है। 'एतेषां सर्वेषां प्रतिबिम्बन'- का अभिप्राय यह है कि उपमानका उपमेयके साथ, उपमानसे सम्बद्ध विशेषणादिका उपमेय-सम्बद्ध विशेष- णादिके साथ तथा साधारण धर्मको साधारणधर्मके साथ बिम्बप्रतिबिम्बभाव होना चाहिये। दृष्टान्तवाक्य अर्थात् उपमानवाक्य तथा दार्ष्टान्तिकवाक्य अर्थात् उपमेयवाक्यके इस बिम्बप्रतिबिम्बभावसे दार्ष्टान्ति- कवाक्यकी यथार्थताका निश्चय हो जाता है। इसलिए इसका नाम दृष्टान्तालद्वार रखा गया है। इस नाममें आया हुआ 'अन्त' शब्द निश्चयार्थका बोधक है। 'अन्तोऽध्यवसिते मृत्यौ स्वरूपे निश्चयेऽन्तिके' इस वैजयन्तीकोशके अनुसार 'अन्त' शब्दका 'निश्चय' अर्थ भी होता है। यही अर्थ यहाँ अभिप्रेत है। इसलिए जहाँ दृष्टान्तवाक्यके द्वारा दार्ष्टान्तिक वाक्यके अरथका निश्चय देखा जाय वहाँ दृष्टान्तालड्कार होता है। 'दृष्टोऽन्तः निश्चयो यत्र स दृष्टान्तः' यह 'दृष्टान्त' इस नामका अर्थ होता है। इन सभी बातोंका प्रतिपादन ऋष्टान्तालङ्कारके लक्षणसूत्रमें आगे बड़ी सुन्दरताके साथ किया है। १४. दृष्टान्तालङ्कार अलङ्कारोंके पूर्वोक्त वर्गीकरणमें प्रतिवस्तूपमाके समान दृष्टान्तालङ्कार भी 'गम्य शपम्याश्रित' अलद्कार माना गया है। उसका लक्षण निम्नलिखित प्रकार है- [सू० १५४ ]-इन [ उपमान, उपमेय, उनके विशेषण और साधारणधर्म आदि ] सबका [भिन्न होते हुए भी औपम्यके प्रतिपादनार्थ उपमानवाक्य तथा उपमेयवाक्यमें पृथगुपादानरूप ] 'बिम्ब- प्रतिबिम्बभाव' होनेपर दृष्टान्तालङ्गार होता है॥१२०॥ इनका [अर्थात् उपमान, उपमेय, उनके विशेषण और ] साधारणधर्म आदिका [बिम्बप्रतिबिम्ब- भाव होनेपर दृष्टान्तालङ्गार होता है। यह दृष्टान्तका लक्षण हुआ। आगे 'दृष्टान्त' शब्दका अवयवार्थ देते हैं]। जहाँ [दृष्टान्तवाक्य या उपमानवाक्यके साथ बिम्बप्रतिबिम्बभावके द्वारा दार्ष्टान्तिकवाक्य या उपमेयवाक्यके अर्थका ] 'अन्त' अर्थात् निश्चय देखा जाता है वह दृष्टान्त [अलङ्गार होता है यह दृष्टान्त शब्दका अर्थ है। इसलिए दृष्टान्तालङ्गारका नामकरण अन्वर्थ है। उसका उदाहरण। जैसे ]- (१) तुमको [अर्थात् नायकको ] देखते ही उस [नायिका] का कामसे सन्तप्त हृदय शान्त हो
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का० १०३, सू० १५५] दशम उल्लास: ४८७
एष साधर्म्येण। वैधर्म्येण तु- (२) तवाहवे साहसकर्मशर्मणः करं कृपाणान्तिकमानिनीषतः । भटा: परेषां विशरारुतामगुः दधत्यवाते स्थिरतां हि पांसवः ॥४५७॥ [सू० १५५ } सकृद्वृत्तिस्तु धर्मस्य प्रकृताप्रकृतात्मनाम् । सैव क्रियासु बह्मीषु कारकस्येति दीपकम् ॥१०३। प्राकरणिका प्राकरणिकानामर्थादुपमानोपमेयानां धर्मः क्रियादि: एकवारमेव यदुपा- दीयते तत् एकस्थस्यैव समस्तवाक्यदीपनाद् दीपकम्। यथा-
जाता है [ इसके लिए दृष्टान्त देते हैं जैसे ] चन्द्रमाको देखनेपर कुमुदिनीका फूल खिल उठता है।४५६। यहाँ नायक तथा चन्द्रमाका, नायिका तथा कुमुदिनीका और मन तथा कुसमका, मनोभव- सन्तप्तत्व तथा सूर्यसन्तप्तत्वका निर्वाण तथा विकासका बिम्बप्रतिम्बभाव होनेसे दृष्टान्तालड्कार है। यह साधम्यंसे दृष्टान्तालङ्गारका उदाहरण है। वैधर्म्यसे दृष्टान्तालङ्कारका उदाहरण तो निम्नलिखित श्लोक है- (२) [हे राजन् ! ] साहसपूर्ण कामोंमें आनन्द प्राप्त करनेवाले तुम्हारे तलवारकी ओर हाथ बढ़ाते ही शत्रुओंके सैनिक तितर-बितर हो गये [भाग खड़े हुए]। वायु न चलनेपर ही धूल स्थिर रहती है [ आँधी आनेपर धूल नहीं टिक सकती है]।।४५७।। इसमें धूल तथा शत्रु-सैनिकोंका और पलायन एवं अस्थिरत्वका बिम्बप्रतिबिम्बभाव है? 'पांसवः अवाते स्थिरतां दधति' इसका 'वाते स्थिरतां न दधति' इस रूपमें पर्यवसान होनेसे यह वैधर्म्यसे दृष्टा- न्तालङ्कारका उदाहरण होता है। २४. दीपकालड्कार दृष्टान्तालङ्कारके बाद दीपकालङ्कारका निरूपण करते हैं। प्रतिवस्तूपमा, दृष्टान्त, निदर्शना आदिके समान दीपकालङ्कार भी 'गम्य औपम्याश्रित' अलङ्कार है। यह दीपकालङ्कार दो प्रकारका होता है, एक क्रिकयादीपक और दूसरा कारकदीपक। दोनोंके लक्षण एक ही कारिकामें करते हैं- [सूत्र १५५] (१) प्रकृत [प्राकरणिक अर्थात् उपमेय ] तथा अप्रकृत [अप्राकरणिक अर्थात् उपमान]के [क्रियादिरूप] धर्मोंका एक ही बार ग्रहण [वृत्ति = ग्रहण ] किया जाय [अर्थात् जहाँ एक ही क्रियादिरूप धर्मका अनेक कारकोंके साथ सम्बन्ध हो वहाँ करियादीपक नामक दीपकका एक भेद होता है। इसी प्रकार ] (२) बहुत-सी क्रियाओंमें एक ही कारकका ग्रहण [ 'सैव' अर्थात् 'सकृद्वृत्ति:' एक ही बार ग्रहण ] यह दीपक [अलङ्गारका दूसरा भेद अर्थात् कारकदीपक ] होता है ।।१० ३।। प्राकरणिक और अप्राकरणिक अर्थात् उपमान तथा उपमेयका क्रियादिरूप धर्म जो एक ही बार ग्रहण किया जाता है वह [जैसे दरवाजेकी देहलीपर रखा हुआ दीपक कमरेके बाहर और भीतर दोनों जगह प्रकाश करता है उसी प्रकार वाक्यमें केवल एक जगह ग्रहण किया गया क्रियादिरूप धर्म अनेक कारकोंके साथ सम्बद्ध होकर देहलीदीपकन्यायसे ] एक जगह स्थित भी समस्त वाक्यका दीपक होनेसे
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४८८ काव्यप्रकाश: [ का० १०३, सू० १५५
(१) किवणाणं धणं णाआणं फणमणी केसराईं सीहाणं। कुलवालिआणं त्थणआ कुत्तो छिप्पन्ति अमुआणं ।।४५८।! [कृपणानां धनं नागानां फणमणिः केसराः सिंहानाम् । कुलवालिकानां स्तना: कुतः स्पृश्यन्तेऽमृतानाम् ॥ इति संस्कृतम् ] कारकस्य च बह्नीषु क्रियासु सकृद्वृत्तिर्दीपकम् यथा- (२ ) स्विद्यति कूणति वेल्लति विचलति निमिषति विलोकयति तिर्यक्। अन्तर्नन्दति चुम्बितुमिच्छति नवपरिणया वधू: शयने ।४५९।।
[अनेक कारकोंके साथ एक क्रियाका सम्बन्ध होनेपर प्रथम प्रकारका ] दीपकालङ्गार होता है। [इस क्रियादीपकका उदाहरण] जैसे- (१) कृपणोंके धन, स्पोंके फणकी मणि, सिंहोंके केसर और कुलीन बालिकाओंके स्तनोंको उनके जीवित रहते [बिना मरे] कैसे छुआ जा सकता है ।४५८।। यहाँ 'स्पृश्यन्ते' यह एक ही क्रियापद है। उसके ही साथ धन, फणमणि, केसर और स्तन आदि अ्नेक कारकोंका सम्बन्ध होनेसे यह श्लोक 'क्रियादीपक'का उदाहरण होता है। इसमें वर्णनीय होनेसे कुलबालिकाओंके स्तन प्रकृत हैं और उपमेयरूप हैं। कृपणोंका धन, नागोंके फणकी मणि, सिंहोंके केसर ये सब अवर्ण्य होनेसे अप्रकृत हैं और उपमानरूपमें प्रतीत होते हैं। (२) [इसी प्रकार ] बहुत-सी क्रियाओंमें एक बार कारकका ग्रहण [अर्थात् अनेक क्रियाओंके साथ एक कारकका सम्बन्ध ] होनेपर [कारकदीपक नामक दूसरे प्रकारका ] दीपक [अलङ्गार ] होता है। जैसे- नवोढा वधू [पतिके] पलँगपर [जाकर कभी ] पसीनेसे तर हो जाती है, [पतिके आलिङ्गन करनेके लिए उद्यत होनेपर ] संकुचित हो उठती है, [उसपर भी पतिके न माननेपर आलिङ्गनपाशसे बचनेके लिए ] सिकुड़ जाती है या मुंह फेर लेती है, करवट बदल लेती है, आँखें बन्द कर लेती है [ परन्तु उत्सुकतावश ] तिरछी आँखोंसे देखती है, मनमें प्रसन्न होती है और चुम्बन करना चाहती है।४५६॥ यहाँ स्विद्यति, कूणति आदि आठ क्रियाएँ इस वाक्यमें आयी हैं, परन्तु उन सबके साथ कर्तारूपमें केवल 'नवपरिणया वधूः' इस एक ही कर्तृपदका प्रयोग किया गया है। इसलिए यह कारकदीपक नामक दीपकालङ्कारके दूसरे भेदका उदाहरण है। दीपकालङ्कारमें प्रकृत तथा अपकृत दो भिन्न प्रकारके पदार्थोंमें एक धर्मका सम्बन्ध होता है। परन्तु यह नियम क्रियादीपकमें ही पाया जाता है। अर्थात् जहाँ एक क्रियाके साथ अनेक कारकोंका सम्बन्ध होता है वहाँ उन कारकोंमें प्रकृत अर्ात् वर्ण्य तथा अप्रकृत अर्थात् अवर्ण्य दोनों प्रकारके कारक होने चाहिये। जसे कि 'कृपणानां धनं' आदि श्लोकमें कृपणके धन अथवा कुलबालिकाओंके स्तन इनमेंसे किसी एकको प्रकृत या वर्ण्य तथा शेषको अप्रकृत माना जा सकता है। परन्तु अनेक क्रियाओंके साथ एक कारकके सम्बन्धरूप कारकदीपकका जो यहाँ 'स्विद्यति कूणति' आदि श्लोक उदाहरणरूपमें दिया गया है उसमें सभी करियाएँ प्रकृत हैं। अप्रकृत क्रिया कोई भी नहीं है। अतः यह प्रकृत करियाओंमें एक कारकके सम्बन्धसे दीपकालङ्कारका उदाहरण है। सब करियाओंके अप्रकृत होनेपर दीपकका उदाहरण
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का० १०४, सू० १५६ ] दशम उल्लास: ४८६
[सू० १५६ ] मालादीपकमाद्यं चैद्यथोत्तरगुणावहम् । पूर्वेण पूर्वेण वस्तुना उत्तरमुत्तरं चेदुपक्रियते तन्मालादीपकम्। यथा -- संग्रामाङ्गणमागतेन भवता चापे समारोपिते देवाकर्णय येन येन सहसा यद्यत्समासादितम् । कोदण्डेन शरा: शरैररिशिरस्तेनापि भूमण्डलं तेन त्वं भवता च कीतिरतुला कीर्त्या च लोकत्रयम् ।।४६०।।
निम्नलिखित श्लोक हो सकता है- दूरीकरोति कुर्मात विमलीकरोति चेतश्चिरन्तनमघं चुलुकीकरोति। भूतेषु किञ्च करुणां बहुलीकरोति सङ्गः सतां किमु न मङ्गलमातनोति । यहाँ केवल सत्सङ्ग वर्ण्य या प्रकृत है। उसका जिन क्रियाओंके साथ कर्तृपदके रूपमें सम्बन्ध होता है उन सबका वर्णन अभिप्रेत न होनेसे वे सब अप्रकृत हैं। इस प्रकार अप्रकृत क्रियाओंके सम्बन्धमें दीपकालङ्कारका यह उदाहरण दिया गया है। इसी प्रकार प्रकृत तथा अप्रकृत दोनों प्रकारकी क्रियाओंके साथ एक ही कारकका सम्बन्ध होनेपर दीपकालङ्कारका निम्नलिखित उदाहरण दिया जाता है- वसु दातूं यशो धातुं विधातुमरिमर्दनम् । त्ातुं च मादृशान् राजन् ! अतीव निपुणो भवान् । यहाँ वसुदान तथा स्वत्राणरूप दो करियाएँ वर्ण्य होनेसे प्रकृत हैं और यशो धातुम्, अरिमर्दनं विधातुम् आदि क्रियाएँ वर्ण्य न होनेसे अप्रकृत हैं। उन प्रकृत तथा अप्रकृत दोनों प्रकारकी क्रियाओरोंके साथ 'नृप' रूप एक कर्तृपदका सम्बन्ध होनेसे यह दीपकालड्कारका उदाहरण है। ऐसी अवस्थामें दीपकके लक्षणवाली कारिकाके पूर्वार्द्धमें आये हुए 'प्रकृताप्रकृतात्मनाम्' पदका सम्बन्ध उत्तरार्द्धमें नहीं जोड़ना चाहिये। केवल पूर्वार्द्धमें उसका सम्बन्ध करके प्रकृत तथा अप्रकृत अरथोंके साथ एक धर्मका सम्बन्ध होनेपर दीपक होता है यह अर्थ करना चाहिये। उत्तरार्द्धमें अ्रनेक क्रियाओरोंके साथ एक कारकका सम्बन्ध होनेपर दूसरे प्रकारका कारकदीपक होता है यह अर्थ करना चाहिये। 'प्रकृताप्रकृतात्मनाम्' पदका उत्तरार्द्धमें भी सम्बन्ध जोड़नेपर उक्त उदाहरणोंकी सङ्गति नहीं हो सकेगी। [सू० १५६ ]-यदि पूर्व-पूर्व [वस्तु ] उत्तर-उत्तरकी उपकारक [गुणाधायक ] हो तो माला- दीपक [अलङ्गार ] होता है। पूर्व-पूर्वकी वस्तुके द्वारा यदि उत्तर-उत्तरकी वस्तुका उपकार [गुणाधान ] किया जाय तो वह मालादीपक [अलङ्गार ] होता है। जैसे- हे राजन् ! संग्रामभूमिमें आये हुए आपके धनुष [की प्रत्यश्चा ] को चढ़ानेपर जिस-जिसने जो-जो सहसा प्राप्त किया सो सुनो। [सबसे पहिले आपके चढ़े हुए] धनुषने बाण [प्राप्त किये ], बाणोंने शत्रुओंके सिर [पाये, बाणोंने धनुषसे छूटकर शत्रुओंके सिरोंको काट दिया। इसलिए ] उस [शत्रुके सिर ] ने पृथ्वी [ पायी ], उस [भूमण्डल ]ने [राजा रूपमें ] आपको [ पाया] और आपने अतुल कीति [पायी ] तथा कीतिने तीनों लोक पाये [ अर्थात् आपकी कीति तीनों लोकोंमें व्याप्त हो गयी] ।४६०।
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४६० काव्यप्रकाश: [का० १०४, सू० १५७ [सू० १५७ ] नियतानां सकृद्धर्म: सा पुनस्तुल्ययोगिता ।।१०४।। नियतानां प्राकरणिकानामेव अप्राकरणिकानामेव वा। क्रमेणोदाहरणम्- (१) पाण्डु क्षामं वदनं हृदयं सरसं तवालसं च वपुः । आवेदयति नितान्तं क्षेत्रियरोगं सखि ! हृदन्तः ॥४६१॥ (२) कुमुदकमलनीलनीरजालिलंलितविलासजुषोर्दृ शो: पुरः का। अमृतममृतरश्मिरम्बुजन्म प्रतिहतमेकपदे तवाननस्य ।।४६२।।
१६. तुल्ययोगितालङ्कार अलङ्कारोंके वर्गीकरणमें 'तुल्ययोगिता' अलङ्कार भी निदर्शना, प्रतिवस्तूपमा आदि अलङ्कारोंके समान 'गम्य औपम्याश्रित' अलङ्कार है। आगे उसका लक्षण करते हैं- [सूत्र १५७]-नियत [अर्थात् या तो केवल प्रकृत या केवल अप्रकृत अर्थों]का एक धर्मके साथ सम्बन्ध होनेपर वह 'तुल्ययोगिता' [अलङ्गार] होता है।१०४। नियतोंका अर्थात् [केवल ] प्राकरणिकोंका अथवा [केवल ] अप्राकरणिकोंका ही एक धर्मके साथ सम्बन्ध होनेपर। कमसे [दोनों ] उदाहरण [निम्नलिखित प्रकार हैं]- (१) हे सखि ! तेरा पीला पड़ा हुआ सूखा चेहरा, स्नेहसे भरा हुआ हृदय और अलसाया हुआ शरीर तेरे हृदयके असाध्य रोगको सूचित करता है। ['क्षेत्रियच् परक्षेत्रे चिकित्स्यः' जिस रोगकी चिकित्सा इस शरीर अर्थात् इस जन्ममें न हो सके उस असाध्य रोगको 'क्षेत्रिय रोग' कहते हैं]।४६१॥ यहाँ विरहके अनुभावरूपमें मुखकी पाण्डुता और क्षामता, हृदयकी सरसता तथा शरीरकी अलसता आदि ये सभी वर्ण्य या प्रकृत अर्थ हैं। उनके साथ 'आवेदयति' रूप एक क्रियाका सम्बन्ध है। इसलिए यह तुल्ययोगिता अलङ्कार है। दीपकालङ्कारमें एक प्रकृत और एक अप्रकृत अपर्थके साथ एक धर्मका सम्बन्ध होता है। तुल्ययोगितालङ्कारमें दोनों अर्थ या तो प्रकृत हों या फिर सभी अप्रकृत हों यह आ्र्परवश्यक है। यही दीपकसे तुल्ययोगितालङ्कारका भेद है। सभी प्रकृत अरथोंके साथ एक धर्मके सम्बन्धका यह उदाहरण दिया है। अब सभी अप्रकृत अथोंके साथ एक धर्मके सम्बन्धका दूसरा उदाहरण देते हैं- (१) [नायक, नायिकासे कह रहा है कि] तुम्हारी सुन्दर और हाल-भावोंसे भरी हुई इन आँखोंके समाने कुमुद, कमल और नीलकमलोंकी पंक्ति क्या है [ इनमेंसे कोई भी तुम्हारी आँखोंकी बराबरी नहीं कर सकता है] और तुम्हारे मुखके सामने अमृत, [अमृतरश्मि अर्थात् ] चन्द्रमा और कमल एकदम मात खा गये हैं।४६२॥ यहाँ नायिकाकी आँखों तथा मुखके सौन्दर्यका वर्णन करना है इसलिए पूर्वार्द्धमें नेत्र तथा उत्तरार्द्ध- में मुख, वर्ण्य होनेसे, प्रकृत हैं। उनके उपमानरूप पूर्वार्द्धमें कुमुद, कमल और नीरजालि तथा उत्तरार्द्धमें अमृत, अमृतरश्मि, अम्बुजन्म, सब अप्रकृत हैं। पूर्वार्द्धमें उन सब अप्रकृत अरथोंके साथ 'का' पदसे अ्भि- व्यङ्गय अधिक्षेप या निन्दारूप एक धर्मका सम्बन्ध पाया जाता है। इसी प्रकार उत्तरार्द्धमें कुमुद, कमल आदि सभी अप्रकृत अथोंके साथ 'प्रतिहतत्व' रूप एक धर्मका सम्बन्ध होनेसे ये दोनों तुल्ययोगिताके उदाहरण होते हैं।
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का० १०५, सू० १५८] दशम उल्लास: ४६१
[सू० १५८] उपमानाद् यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः। अन्यस्योपमेयस्य। व्यतिरेक आधिक्यम् । क्षीण: क्षीणोऽपि शशी भूयो भूयोऽभिवर्धते सत्यम्। विरम प्रसीद सुन्दरि ! यौवनमनिव्ति यातं तु ।।४६३।। इत्यादावुपमानस्योपमेयादाधिक्यमिति केनचिदुक्तम्, तदयुक्तम्। अत्र यौवनगता- स्थैर्याधिक्यं हि विवक्षितम् ।
१७. व्यतिरकालड्कार पूर्वोक्त वर्गीकरणमें 'व्यतिरेकालङ्कार' को भी 'गम्य औपम्याश्रित' अलङ्कारवर्गमें माना गया है। उसका लक्षण आगे करते हैं- [सूत्र १५८]-उपमानसे अन्य [अर्थात उपमेय] का जो [विशेषेण अतिरेकः व्यतिरेक: ] आधिक्य [का वर्णन] वह ही व्यतिरेक [अलङ्गार] होता है। अन्यका अर्थात् उपमेयका। व्यतिरेक अर्थात् आधिख्य। [उदाहरण जैसे ]- हे सुन्दरि ! मान जाओ [ मानको छोड़ दो] और [मेरे ऊपर ] प्रसन्न हो जाओ। चन्द्रमा बार-बार क्षीण होकर भी फिर-फिर पूर्ण हो जाता है यह सत्य है, परन्तु बीता हुआ यौवन तो फिर वापस नहीं आता है। [इसलिए हे सुन्दरि ! मानको छोड़ दो और इस यौवनका उपभोग करनेके लिए] प्रसन्न हो जाओ ।४६३॥ अलङ्कारसर्वस्वकार रुय्यकने उपमानसे उपमेयका आधिक्य होनेपर अथवा न्यूनता होनेपर दोनों अ्रवस्थात्र्रोंमें व्यतिरेकालङ्कार माना है। इसलिए उन्होंने उसका लक्षण 'उपमानादुपमेयस्याधिक्ये विपर्यये [ उपमेयादुपमानस्याधिक्ये न्यूनत्वे ] वा व्यतिरेकः' यह किया है और विषय अर्थात् उपमेयसे उपमानके आधिक्यके वर्णनमें 'क्षीणः क्षीणः शशी' इत्यादि श्लोकको उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया है। उनका अभिप्राय यह है कि इस श्लोकमें उपमेयभूत यौवनकी अपेक्षा उपमानभूत चन्द्रमाके आधिक्यका वर्णन किया गया है क्योंकि यौवन तो एक बार बीत जानेपर फिर वापस नहीं आता है परन्तु चन्द्रमा बार- बार क्षीण होकर भी फिर-फिर पूरा हो जाता है। इसलिए उपमेयरूप यौवनकी अपेक्षा उपमानरूप चन्द्रमाका आधिक्यवर्णन होनेसे यह दूसरे प्रकारके व्यतिरेकका उदाहरण है। यह रुय्यकका मत है। परन्तु काव्यप्रकाशकार इस मतसे सहमत नहीं हैं। उनके मतमें यहाँ चन्द्रमाके आधिक्यका वर्णन इष्ट नहीं है। अपितु यौवनमें अस्थैर्याधिक्यका वर्णन ही अभिप्रेत है। इसलिए यह चन्द्रमा तो इतना अस्थिर क्षणभङगुर नहीं है, क्योंकि वह तो क्षीण होकर भी पूरा हो जाता है। परन्तु यौवन दुबारा नहीं लौटता है। इसलिए वह चन्द्रमाकी अपेक्षा अधिक अस्थिर है। यह श्लोकका भाव है। इसलिए यहाँ उपमानसे उपमेयका आधिक्य होनेसे यह प्रथम प्रकारके व्यतिरेकका ही उदाहरण है। यह काव्यप्रकाशकारका मत है। अपने इसी मतका वे अगली पंक्तियोंमें प्रतिपादन करते हैं- [क्षीण: क्षीणोऽपि शशी ] इत्यादि [उदाहरण ] में उपमान [चन्द्रमा ] का उपमेय [यौवन] से आधिक्य [रवणित ] है यह किसी [अलङ्कारसर्वस्वकार रुय्यक ] ने कहा है। किन्तु वह उचित नहीं है। [क्योंकि ] यहाँ [उपमेय ] यौवनगत अस्थर्यका आधिक्य ही [कविको ] विवक्षित है।
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४६२ काव्यप्रकाश: [का० १०५-६ सू० १५६ [सू० १५९ ] हेत्वोरुक्तावनुक्तीनां त्रये साम्ये निवेदिते ।।१०५।। शब्दार्थाभ्यामथाक्षिप्ते श्लिष्टे तद्वत् त्रिरष्ट तत्। व्यतिरेकस्य हेतुः उपमेयगतमुत्कर्षनिमित्तम्। उपमानगतमपकर्षकारणम्। तयोर्द्व- योरुक्तिः एकतरस्य द्वयोवा अनुक्तिरित्यनुक्तित्रयम्। एतद्ेदचतुष्टयम् उपमानोपमेयभावे शब्देन प्रतिपादिते, आर्थेन च क्रमेणोक्ताश्चत्वार एव भेदाः आक्षिप्ते चौपम्ये तावन्त एव। एवं द्वादश। एते श्लेषेऽपि भवन्तीति चतुर्विशतिर्भेदाः । करमेणोदाहरणम् --
इस व्यतिरेकालङ्कारके चौबीस प्रकार हो सकते हैं। उन सबका वर्णन अगली कारिकामें करते हैं। १. उपमानसे जो उपमेयका आधिक्यवर्णन है उसमें उपमेयके आधिक्यके हेतु तथा उपमानके अपकर्षके हेतु इन दोनोंका वर्णन होनेपर व्यतिरेकका प्रथम भेद होता है। २. इन दोनोंमेंसे किसीके न कहने (अर्थात् दोनोंके अनुक्त होने) अथवा, ३. उत्कर्षहेतुके अनुक्त होने, ४. अथवा अपकर्षहेतुके अनुक्त होनेपर अनुक्तिके क्रमशः तीन भेद हो जाते हैं। इस प्रकार व्यतिरेकके चार भेद हो जाते हैं। इन चारों भेदोंमें साम्य कहीं शाब्द, कहीं आर्थ और कहीं आक्षिप्त होता है इसलिए प्रत्येकके तीन भेद होकर ४ x३ = १२ भेद बन जाते हैं। ये बारह भेद श्लेषमूलक या अश्लेषमूलक होनेसे दो प्रकारके होकर व्यतिरेकके कुल १२x२ = २४ भेद बन जाते हैं। इन्हीं चौबीस भेदोंको अगली कारिकामें इस प्रकार दिखलाते हैं- [सूद्र १५६]-[उपमेयके उत्कर्षहेतु तथा उपमानके अपकर्षहेतु ] दोनों हेतुओंके उक्त होनेपर [व्यतिरेकका एक भेद होता है। उपमेयके उत्कर्षहेतुके अनुक्त होनेपर दूसरा, उपमानके अपकर्षहेतुके अनुक्त होनेपर तीसरा और इन दोनोंके एक साथ अनुक्त होनेपर चौथा इस प्रकार तीन ] अनुक्तियोंके होनेपर [तीन भेद, कुल मिलकर चार भेद व्यतिरेकके हुए। इनमें भी इवादि शब्दके द्वारा शब्दतः अथवा तुल्यादि शब्दोंसे अर्थतः ] साम्यके [इवादि ] (१) शब्दके द्वारा [अथवा तुल्यादि पदोंसे ] (२) अर्थके द्वारा निवेदित होनेपर और (३) [साम्यसूचक इवादि तथा तुल्यादि दोनोंके अभावमें साम्यके ] आक्षिप्त होने [ पूर्वोक्त चारों भेदोंके तीन भेद होकर ४ X ३ = १२ भेद हो जाते हैं। ये सब भेद श्लेषके बिना ही होते हैं] इसी प्रकार श्लेष होनेपर भी बारह भेद और होकर [१२+१२=२४ कुल ] वह २४ [त्रिरष्ट ८ X३ = २४ ] प्रकारका होता है। व्यतिरेकके हेतु उपमेयगत उत्कर्षका कारण और उपमानगत अपकर्षका कारण [दो होते हैं]। उन दोनोंकी उक्ति [होनेपर व्यतिरेकका एक भेद होता है]। उन दोनोंमेंसे किसी एककी अथवा दोनोंकी अनुक्ति इस प्रकार तीन तरहकी अनुक्ति। ये [ सब मिलाकर ] चार भेद होते हैं। उपमान उपमेयभावके [उपमावाचक इवादि ] (१) शब्दके द्वारा, [तुल्यादि शब्दों अथवा तुल्यार्थमें हुए 'वति' प्रत्ययके द्वारा साम्यके ] (२) अर्थ द्वारा प्रतिपादित होनेपर क्रमशः [दोनों प्रकारसे ] पूर्वोक्त चार-चार भेद ही होते हैं [ अर्थात् आठ भेद हो जाते हैं। इवादि तथा तुल्यादि दोनों प्रकारके शब्दोंके अभावमें ] साम्यके आक्षिप्त होनेपर उतने ही [चार ही ] भेद होते हैं। इस प्रकार [मिलकर] बारह भेद हुए। ये [बारहों भेद ] श्लेषमें भी होते हैं, इसलिए [ कुल मिलाकर १२X२ = २४ ] चौबीस भेद हो जाते हैं। कमशः उनके उदाहरण [आगे देते हैं]-
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का० १०६, सू० १५६] दशम उल्लास: ४६३ (१) असिमात्रसहायस्य प्रभूतारिपराभवे। अन्यतुच्छजनस्येव न स्मयोऽस्य महाधृतेः ॥४६४॥ अत्रैव तुच्छेति महाधृतेरित्यनयोः पर्यायेण युगपद्वाऽनुपादानेऽन्यद् भेदत्रयम् । एव मन्येष्वपि द्रष्टव्यम् । अत्रेवशब्दस्य सद्भ्ावाच्छाब्दमौपम्यम्। ारी
(२) असिमात्रसहायोऽपि प्रभूतारिपराभवे। नैवान्यतुच्छजनवत्सगर्वोडयं महाधृतिः ।।४६५॥ अत्र तुल्यार्थे वतिरित्यार्थमौपम्यम् ।
(१) केवल तलवारकी सहायतावाला [अर्थात् सैन्यादिरहित अकेला ] महाधैर्यशाली यह राजा प्रबल शत्रुओंके पराजित हो जानेपर भी अन्य तुच्छजनोंके समान अभिमानयुक्त नहीं [ दिखलायी] देता है ।४६४॥ यहाँ राजा उपमेय है। उसके उत्कर्षका कारण 'महाधृति' कथित है। इसी प्रकार अ्रन्यतुच्छ- जनरूप उपमानके अपकर्षका कारण 'तुच्छत्व' उक्त है। इसलिए दोनों हेतुओंकी उक्तिमें व्यतिरेकाल- द्वारके प्रथम भेदका यह उदाहरण हुआ। 'अरिपराभव' सामान्यधर्म है और श्लेषका अभाव है। इसी [ उदाहरण ] में 'तुच्छ' इस [उपमानके अपकर्षहेतु अथवा] 'महाधृतेः' इस [ उपमेयके उत्कर्षहेतु ] इन दोनोंके पर्यायसे, अथवा एक साथ ग्रहण न करनेपर दूसरे [अनुक्तीनां तये'वाले ] तीन भेद होते हैं। इसी प्रकार अन्य उदाहरणोंमें भी समझना चाहिये। इसमें [ 'अन्यतुच्छजनस्येव' में] 'इव' शब्दका ग्रहण होनेसे उपमानोपमेयभाव शाब्द [शब्दसे कथित ] है। इसी उदाहरणमें 'अन्यतुच्छजनस्येव' पदमें उपमावाचक 'इव'को हटाकर 'तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः' इस सूत्रसे वति-प्रत्यय करके 'नैवान्यतुच्छजनवत्सगर्वोडयं महाधृतिः' ऐसा पाठ कर देनेपर यही आर्थसाम्यमें 'हेत्वोरुक्तौ' का उदाहरण हो सकता है। इसलिए इसी प्रकार परिवर्तन करके यही श्लोक दुबारा दिया गया गया है। (२) इसका अर्थ ४६४ के समान ही है।४६५॥ यहाँ [ 'इव'के स्थानपर 'तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः इस सूत्रसे ] तुल्यार्थमें 'वति' [प्रत्यय ] है, इसलिए [उपमाप्रकरणमें पृष्ठ ४४५ पर दिखलाये गये नियमके अनुसार] आर्थ सादृश्य [औपम्य] है। पूर्वश्लोकके समान यह उदाहरण भी मूलतः 'हेत्वोरुक्ती' का है। अर्थात् इसमें उपमेयके उत्कर्ष- हेतु 'महाधृति' का तथा उपमानके अपकर्षहेतु 'तुच्छत्व'का कथन है। परन्तु पूर्व उदाहरणके समान.ही यदि यहाँ भी 'तुच्छत्व' अथवा 'महाधृति' का पर्यायसे ग्रहण न किया जाय अथवा दोनोंका युगपद् ग्रहण न किया जाय तो यही 'अनुक्तीनां तये' के तीन उदाहरणोंके रूपमें परिवर्तित हो जायगा। इस प्रकार इस श्लोकमें 'आर्थ औपम्य'के चारों उदाहरण बन जाते हैं। पहिले श्लोकमें 'शाब्द औपम्य'के चारों उदाहरण हो गये थे। इस प्रकार दो श्लोकों द्वारा अथवा एक ही श्लोकमें पाठ-परिवर्तनों द्वारा व्यतिरेकके आठ भेदोंके उदाहरण ग्रन्थकारने दिखला दिये हैं। आगे आक्षिप्त साम्यमें व्यतिरेकका उदाहरण देते हैं-
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४६४ काव्यप्रकाश [का० १०६, सू० १५६
(३) इयं सुनयना दासीकृततामरसश्रिया । आननेनाकलङ्केन जयतीन्दं कर्लाङ्गिनम् ।।४६६।। अत्रेवादितुल्यादिपदविरहेण आक्षिप्तैवोपमा । (४) जितेन्द्रियतया सम्यग्विद्यावृद्धनिषेविणः । अतिगाढगुणस्यास्य नाब्जवद्दङगुरा गुणाः ।।४६७।। अत्रेवार्थे वतिः, गुणशब्द: श्लिष्ट:, शाब्दमौपम्यम्। (५) अखण्डमण्डलः श्रीमान् पश्यैष पृथिवीपतिः । न निशाकरवज्जातु कलावैकल्यमागतः।।४६८।। (३) सुन्दर नेत्रोंवाली यह [नायिका ] कमललक्ष्मीको भी तिरस्कृत करनेवाले अलङ्गरहित मुखसे कलडूी चन्द्रमाको पराजित कर रही है।४६६।। यहाँ [शाब्द उपमाके प्रयोजक ] इवादि तथा [आर्थ उपमाके प्रयोजक ] तुल्यादि [दोनों प्रकारके ] पदोंका अभाव होनेसे उपमा [सादृश्य ] आक्षिप्त ही है। इसमें उपमेयरूप मुखके उत्कर्षहेतु अकलद्ित्व तथा उपमानरूप चन्द्रमाके अपकर्षहेतु कलद्कित्व दोनोंका ग्रहण है, इसलिए यह 'हेत्वोरक्तौ' का उदाहरण है। यदि उसीमें अकलङ्कित्व तथा करलाद्कित्व- रूप हेतुंका अलग-अलग पर्यायसे ग्रहण न किया जाय अथवा दोनोंका युगपद् ग्रहण न किया जाय तो यही 'अनुक्तीनां तये' तीन प्रकारकी अनुक्तियोंके तीन उदाहरणोंके रूपमें परिवर्तित हो जायगा। इन चारोंमें सादृश्य आक्षिप्त रहेगा अतः यह आक्षिप्त सादृश्यवाले व्यतिरेकके चार भेदोंका उदाहरण हो सकता है। इस प्रकार यहाँतक व्यतिरेकके श्लेषरहित बारह भेदोंके उदाहरण दिखला दिये हैं। आगे श्लेषयुक्त व्यतिरेकके उदाहरण दिखलाते हैं -- (४) जितेन्द्रिय होनेसे विद्यावृद्ध [पण्डित ] जनोंकी भली प्रकार सेवा करनेवाले अत्यन्त दृढ़ [धर्य आदि ] गुणोंसे युक्त राजाके [उक्त धैर्यादि ] गुण कमलके [गुण अर्थात् सूत्रोंके ] समान [भडगुर अर्थात् तुरन्त ] टूट जानेवाले नहीं हैं।।४६७।। यहाँ राजा उपमेय और अब्ज कमल उपमान है। उपमेयके उत्कर्षहेतु 'अतिगाढगुणत्व' तथा उपमानके अपकर्ष हेतु 'भङगुरत्वगुण' दोनोंका उपादान किया गया है, अतः यह 'हेत्वोरुक्तौ'का उदाहरण है। इन दोनों हेतुओंका पर्यायसे या युगपद् अनुपादान होनेपर यही 'अनुक्तीनां तये' के तीन उदाहरणोंके रूपमें परिवर्तित किया जा सकता है। 'अब्जवत्' पदमें जो वति-प्रत्यय हुआ है वह 'तत्न तस्येव' इस सूत्रसे हुआ है इसलिए उपमाके प्रकरणमें पृष्ठ ४४५ पर कहे हुए सिद्धान्तके अनुसार शाब्द शपम्य है। और 'गुण' शब्दमें श्लेष पाया जाता है। इस प्रकार यह श्लेषमूलक शाब्द शपम्य में व्यतिरेकके 'हेत्वोरुक्तौ' भेदका उदाहरण है। और वह थोड़े हेर-फेरसे 'अनुक्तीनां तये' के तीन उदाहरणोंके रूपमें भी परिवर्तित किया जा सकता है। यहाँ 'इव'के अर्थमें 'वति-प्रत्यय' है। 'गुण' शब्द श्लिष्ट [एक पक्षमें धैर्यादि गुणोंका और दूसरे पक्षमें सूत्रका वाचक ] है। औपम्य शाब्द है। (५) देखो, अखण्डित [चन्द्रपक्षमें सम्पूर्ण अथवा राजपक्षमें समृद्ध ] मण्डल [राजपक्षमें राजसमूह अथवा चन्द्रपक्षमें चन्द्रबिम्ब ] से युक्त और श्रीसे परिपूर्ण यह राजा वतामाले समान कभी भी कलाओं [के ज्ञान]से रहित नहीं होता ।।४६८।।
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का० १०६, सू० १५६] दशम उल्लास: ४६५ अत्र तुल्यार्थे वतिः, कलाशब्दः श्लिष्टः । मालाप्रतिवस्तूपमावत् मालाव्यतिरेकोऽपि सम्भवति। तस्यापि भेदा एवमूह्याः। दिङमात्रमुदाह्ियते यथा- (६-१) हरवन्न विषमदृष्टिर्हरिवन्न विभो विधूतविततवृषः रविवन्न चातिदुःसहकरतापितभू: कदाचिदसि ।४६९।। अत्र तुल्यार्थे वतिः, विषमादयश्च शब्दा: श्लिष्टाः । (७-२क) नित्योदितप्रतापेन त्रियामामीलितप्रभः । भास्वताऽनेन भूपेन भास्वानेष विनिजितः।४७०।। अत्र ह्याक्षिप्तवोपमा, भास्वतेति श्लिष्टः ।
यहाँ तुल्यार्थमें वति-प्रत्यय है, [इसलिए ४४५ पृष्ठपर कहे नियसके अनुसार वह आर्थ औपम्यका उदाहरण है]। कला शब्द [एक पक्षमें चौसठ प्रकारकी कलाओं और दूसरे पक्षमें चन्द्रमाकी सोलह कलाओंका वाचक होनेसे ] श्लिष्ट है। इसमें उपमानभूत चन्द्रमाके अपकर्षका हेतु 'कलावैकल्य' तथा उपमेयगत उत्कर्षका हेतु 'कला- वैकल्यका अभाव' दोनों उक्त हैं। अतः यह 'हेत्वोरुक्तौ'का उदाहरण है। इन दोनों हेतुओंमें से एक-एकके क्रमशः अनुक्त होने अथवा दोनोंके युगपत् अनुक्त होनेपर यही उदाहरण 'अनुक्तीनां तये के उदाहरणरूपमें परिवर्तित किया जा सकता है। मालाप्रतिवस्तूपमाके समान मालाव्यतिरेक भी हो सकता है। उसके भी इसी प्रकार [२४] भेद समझ लेने चाहिये। दिग्दर्शनके लिए [ तीन] उदाहरण देते हैं- (६-१) हे राजन् ! आप कभी महादेवके समान विषमनेत्र [तीन नेत्रवाले अथवा असमदृष्टि ] नहीं रखते हैं, विष्णुके समान महान् वृष [वृष अर्थात् धर्म, हरिपक्षमें वृषासुरको] नष्ट करनेवाले नहीं होते हैं और न कभी सूर्यके समान अत्यन्त असह्य करों [ टैक्सों, सूर्यपक्षमें किरणों] से पृथिवीको सन्तप्त करने- वाले हैं।४६६॥ यहाँ तुल्यार्थमें वति-प्रत्यय है [ इसलिए ४४५ पृष्ठपर र वणित नियमके अनुसार आर्थ औपम्य है]। विषम [वृष तथा कर ] आदि शब्द श्लिष्ट हैं। यहाँ एक साथ हर, हरि तथा रवि इन तीनके साथ राजाका व्यतिरेक दिखलाया गया है, इसलिए यह 'मालाव्यतिरेक' का उदाहरण है। इसमें राजा उपमेय है, हर आदि तीन उपमान हैं। उपमानगत अपकर्षहेतु 'असमदृष्टित्व' आर्परदि कहे हैं, उपमेयगत उत्कर्षहेतु नहीं कहे हैं। इसलिए 'अनुक्ति' का उदाहरण है। 'हेत्वोरुक्तौ'का आरक्षिप्त साम्यवाला श्लेषमूलक उदाहरण आागे देते हैं- (७-२क) जिसका प्रताप सदा विद्यमान रहता है इस प्रकारके इस तेजस्वी [ या सूर्यरूपी ] राजाने रात्रिके समय जिसकी कान्ति विलीन हो जाती है इस प्रकारके इस सूर्यको पराजित कर दिया॥४७०॥ यहाँ [इवादि तथा तुल्यादि दोनों प्रकारके पदोंके न होनेसे ] साम्य आक्षिप्त ही है। 'भास्वता' यह पद [दोनों पक्षोंमें भिन्नार्थका बोधक होनेसे ] श्लिष्ट है। सूर्यपक्षमें 'भास्वता'का अर्थ दीप्तियुक्त होता है और राजाके पक्षमें 'सूर्यरूप राजा' अर्थ होता है ]।
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४६६ काव्यप्रकाश: (का० १०६, सू० १५६
यथा वा- (८-२ख) स्वच्छात्मतागुणसमुल्लसितेन्दुबिम्बं बिम्बप्रभाधरमकृत्रिमहृद्यगन्धम्। यूनामतीव पिबतां रजनीषु यत्र तृष्णं जहार मधु नाननमङ्गनानाम्।४७१।। अत्रेवादीनां तुल्यादीनां च पदानामभावेऽपि क्लिष्टविशेषणैराक्षिप्तैवोपमा प्रतीयते। एवञ्जातीयका: श्लिष्टोक्तियोग्यस्य पदस्य पृथगुपादानेऽपि भेदाः सम्भवन्ति। तेऽ- प्यनयैव दिशा द्रष्टव्याः । इसमें 'भूप' पद उपमेय, 'भास्वान्' उपमान है। उपमेय 'भूप'का उत्कर्षहेतु 'नित्योदित प्रता- पत्व' तथा उपमानभूत भास्वान्का अपकर्षहेतु 'त्रियामामीलितप्रभत्व' दोनों उक्त हैं, अतः यह 'हेत्वोरुक्तौ' का उदाहरण है। 'विनिजितः' पदसे उन दोनोंका साम्य आक्षिप्त होता है। अगला उदाहरण ऐसा देते हैं जिसमें साम्यका आक्षेप करानेवाले निर्जित आदि शब्दोंका भी प्रयोग नहीं हुआ है। केवल श्लिष्ट विशेषणोंके द्वारा साम्यका आक्षेप होता है। इसी भेदको दिखलाने- के लिए यह दूसरा उदाहरण दिया है। इसमें वसन्तका वर्णन है। श्लोकका भाव यह है-वसन्त ऋतुकी मनोहर रात्रियोंमें नवयुवक लोग अपनी प्रियतमाओंके साथ बैठकर मद्यका और उसके साथ ही उनके अधरोंका पान करते हैं। अत्यन्त मधुपान कर चुकनेपर मधुपानकी इच्छा तो समाप्त हो जाती है परन्तु अङ्गनाओंके अधरपानको इच्छा फिर भो बनी ही रहती है, समाप्त नहीं होती है। 'यत्र वसन्ते रजनीषु अतीव पिबतां यूनां तृष्णां मधु जहार' मधु तो तृष्णाको दूर कर देता है अर्थात् मधुकी तृष्णा तो समाप्त हो जातो है किन्तु 'अङ्गनानाम् त्राननं तृष्णा न जहार' स्त्रियोंके त्र्प्रानन या अ्र्प्धरपानकी तृष्णा समाप्त नहीं होती है। श्लोकके पूर्वार्द्धमें 'स्वच्छात्मतागुणसमुल्लसितेन्तुबिम्बम्' 'बिम्बप्रभाधरम्' और 'अप्रक्रृ- त्रिमह्द्यगन्धम्' ये तीन विशेषण पद हैं जो 'मधु' तथा 'आनन' दोनों पक्षोंमें लगते हैं। इन्हीं श्लिष्ट विशेषणोंके द्वारा मधु तथा आननका साम्य आक्षिप्त होता है। श्लोकका अर्थ- (८-२ ख) [मद्के ] निर्मल स्वरूपतारूप गुणके कारण जिसमें चन्द्रबिम्बकी परछाई पड़ रही है [और पुराना हो जानेके कारण ] कुन्दरूके फलके समान [रक्तवर्णकी ] कान्तिको धारण करनेवाला तथा स्वाभाविक मनोहर गन्धसे युक्त मद्य जहाँ [जिस वसन्त ऋतुमें ] रात्रिमें अत्यधिक [मद्यका ] पान करनेवाले युवकोंकी तृष्णाको निवृत्त कर देता है, परन्तु निर्मलस्वरूप [अत्यन्त गौरवर्णके कारण] परिपूर्ण चन्द्रमण्डलके समान और कुन्दरूके फलके समान [रक्तवर्ण ] अधरवाले तथा स्वाभाविक हृद- याकर्षक गन्धसे युक्त स्त्रियोंके मुख, उनका अत्यधिक पान करनेवाले युवकोंकी तृष्णाको निवृत्त करनेमें समर्थ नहीं हुए ।।४७१।। यहाँ [इस उदाहरणमें, शाब्द औपम्यके प्रयोजक ] इवादि तथा [आर्थ औपम्यके प्रयोजक ] तुल्यादि पदोंके अभावमें भी श्लिष्ट विशेषणोंसे [मधु तथा आननकी सादृश्य,रूप ] उपमा आक्षेपसे प्रतीत होती ही है। इस प्रकारके भेद श्लेषयोग्य पदोंके [ उपमानके विशेषणरूपसे तथा उपमेयके विशेषण- रूपसे ] अलग-अलग ग्रहण करनेपर भी बन सकते हैं। [प्रकृत उदाहरणमें जो श्लिष्ट पद हैं वे उपमान तथा उपमेय दोनोंके सम्मिलितरूपसे विशेषण हैं, अलग-अलग नहीं। इसी बातको दिखलानेके लिए इस पंक्तिमें 'पृथक्' पदका ग्रहण किया गया है]। उन [भेदोंके उदाहरणों ] को भी इसी प्रकार समझ लेना चाहिये।
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का ० १०६-७, सू० १६०] दशम उल्लास: ४६७
[सूत्र १६० ] निषेधो वक्तुमिष्टस्य यो विशेषाभिधित्सया ।१०६॥ / वक्ष्यमाणोक्तविषयः स आक्षेपो द्विधा मतः। विवक्षितस्य प्राकरणिकत्वादनुपसर्जनीकार्यस्य अशक्यववतव्यत्वमतिप्रसिद्धत्वं वा विशेषं वक्तुं निषेधो निषेध इव यः सवक्ष्यमाणविषय उक्तविषयश्चेति द्विधा आक्षेपः । कमेणोदाहरणम्- (१) ए एहि किपि कीएवि कएण णिक्विव भणामि अलमहवा। अविआरिअकज्जारंभआरिणी मरउ ण भणिस्सम् ॥४७२॥ [ ए एहि किमपि कस्या अपि कृते निष्कृप ! भणामि अलमथवा। अविचारितकार्यारम्भकारिणी म्रियता न भणिष्यामि । इति संस्कृतम्] (२) ज्योत्स्ना मौक्तिकदाम चन्दनरसः शीतांशुकान्तद्रवः कर्पूर कदली मृणालवलयान्यम्भोजिनीपल्लवाः । अन्तर्मानसमास्त्वया प्रभवता तस्याः स्फुलिङ्गोत्कर- व्यापाराय भवन्ति हन्त किमनेनोक्तेन न ब्रूमहे ।।४७३।।
१८. आक्षेपालङ्गार [सूत्र १६०]-जो बात कहना चाहते हैं उसमें विशेष उत्कर्ष प्रकट करनेके लिए जो उसका निषेध किया जाय वह १. वक्ष्यमाणविषयक [अर्थात् जो बात आगे कहनी है उसका पहिलेसे निषेध कर देना इस तरह ] और २. उक्तविषय [अर्थात् पूर्वकथित बातका निषेधरूप ] आक्षेप [अलङ्गार] दो प्रकारका होता है। विवक्षित अर्थात् प्रकृत होनेसे जिसको गौण या उपेक्षणीय नहीं किया जा सकता है ऐसे अर्थके अवर्णनीयत्व अथवा अतिप्रसिद्धत्वरूप विशेषताको बतलानेके लिए जो निषेध अर्थात् निषेध-सा [न कि वास्तविक निषेध] करना वह, १. वक्ष्यमाणविषयक [अर्थात् आगे कहे जानेवाली बातका कहे बिना पहिले ही निषेध-सा कर देना] और २. उक्तविषयक [अर्थात् बातको कहकर फिर उसका निषेध कर देना ] यह दो प्रकारका 'आक्षेप' [अलङ्गार] होता है। कमसे [दोनोंके ] उदाहरण [आगे देते हैं]- (१) अरे निष्ठुर ! इधर तो आओ, किसीके लिए कुछ कहना चाहती हूँ। अथवा बिना विचारे काम करनेवाली उसको मर जाने दो, मैं कुछ नहीं कहूँगी ॥४७२॥ यहाँ वियोगिनी नायिकाकी सखी नायकके पास उसका सन्देश लेकर आयी है। परन्तु उसकी दशाको कहनेके पहिले ही उसका निषेध-सा कर रही है। अतः यह वक्ष्यमाणविषयक निषेधरूप आरक्षेपका उदाहरण है। उक्तविषयक निषेधरूप आक्षेपका दूसरा उदाहरण देते हैं- (२) हृदयके भीतर बैठे हुए तुम्हारे कारण [अर्थात् तुम्हारे वियोगमें ] चाँदनी, मुक्ताकी माला, चन्दन-रस, चन्द्रकान्तमणिका जल, कपूर, केला, मृणालके वलय और कमलिनीके पत्ते भी उसके लिए आग बरसानेका काम करनेवाले हो रहे हैं। अरे तुमसे यह सब कहनेसे क्या लाभ ? इसलिए हम नहीं कहेंगी॥४७३।
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४६८ ०९४ काव्यप्रकाश: [का० १०७-८, सू० १६१-६२ [सूत्र १६१ ] क्रियाया: प्रतिषेधेऽपि फलव्यक्तिर्विभावना ।१०७॥ हेतुरूपत्रियाया निषेधेऽपि तत्फलप्रकाशनं विभावना। यथा -- कुसुमितलताभिरहताऽप्यधत्त रुजमलिकुलैरदष्टापि। परिवर्त्तते स्म नलिनीलहरीभिरलोलिताप्यघूर्णत सा।४७४।। [सूत्र १६२ ] विशेषोकितिरखण्डेषु कारणेषु फलावचः ।V मिलितेष्वपि कारणेषु कार्यस्याकथनं विशेषोक्तिः। अनुक्तनिमित्ता उक्तनिमित्ता अचिन्त्यनिमित्ता च । कमेणोदाहरणम्- (१) निद्रानिवृत्तावुदिते द्युरत्ने सखीजने द्वारपदं पराप्ते। इ्लथीकृताश्लेषरसे भुजङ्गे चचाल नालिङ्गनतोऽङ्गना सा।४७५।।
यहाँ बातको कह देनेके बाद फिर उसका निषेध किया गया है इसलिए यह उक्तविषयक निषेधा- भासमूलक आक्षेपालङ्कारका उदाहरण है। १९. विभावना अलङ्कार अलङ्कारोंके पूर्वोक्त वर्गीकरणमें दूसरा वर्ग 'विरोधमूलक अलङ्कार'का है। प्रकृत 'विभावना' अलङ्कारको इसी 'विरोधमूलक अलङ्कार' वर्गमें गिना गया है। आगे उसका लक्षण आदि करते हैं -- [सूत्र १६१]-[ 'क्रियतेऽनयेति क्रिया' इस व्युत्पत्तिके अनुसार यहाँ क्रिया शब्द कारणका बोधक है। इस ] कारणका [अभाव या ] निषेध होनेपर भी फलकी उत्पत्ति [का वर्णन] होनेपर विभावना [अलङ्गार] होता है। हेतुरूप करिया [अर्थात् कारण ] का निषेध [अथवा अभाव ] होनेपर भी फलकी उत्पत्ति विभावना [अलङ्गार कहलाता ] है। जैसे- खिली हुई लताओंसे ताडित न होनेपर भी वह [ नायिका ] पीड़ाको प्राप्त हो रही थी, भ्रमर- कुलसे न काटे जानेपर भी तड़प रही थी और कमलिनियोंसे युक्त लहरोंके चक्करमें पड़े बिना भी चक्कर खा रही थी॥४७४॥ यहाँ लताओंकी चोट पीड़ाका हेतु हो सकती थी, भ्रमरका काटना तड़पनेका और कमलिनियोंकी लहरोंके चक्करमें फँस जाना चक्कर आनेका कारण हो सकता था। परन्तु उन कारणोंका निषेध करनेपर भी कार्यका प्रक शन किया गया है। इसलिए यह विभावनालङ्वारका उदाहरण है। २०. विशेषोक्ति अलड्गार यह विशेषोक्ति भी विरोधमूलक अलङ्कार माना गया है, उसका लक्षण आगे देते हैं- [सूत्र १६२]-सम्पूर्ण कारणोंके होनेपर फलका न कहना विशेषोक्ति है। [प्रसिद्ध ] कारणोंके एकत्र होनेपर भी कार्यका कथन न करना विशेषोक्ति [अलङ्कार ] होता है। वह १. अनुक्तनिमित्ता, २. उक्तनिमित्ता तथा ३. अचिन्त्यनिमित्ता [इस तरह तीन प्रकारकी ] होती है। कमसे [तीनों ] उदाहरण [जैसे ]- (१) निद्रा खुल जानेपर, सूर्यका उदय हो आनेपर, सखियोंके [शयनकक्षके ] दरवाजेपर आ जानेपर और उपपति [भुजङ्ग ] के आलिङ्गनके रसको त्याग देनेपर भी वह आलिङ्गन [ बाहुपाश ] से विचलित नहीं हुई।४७५॥
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का० १०८, सू० १६३] दशम उल्लास:
(२) कर्पूर इव दग्धोऽपि शक्तिमान् यो जने जने। नमोऽस्त्ववार्यवीर्याय तस्मै मकरकेतवे।४७६।। (३) स एकस्त्रीणि जयति जगन्ति कुसुमायुधः । हरताऽपि तनुं यस्य शम्भुना न वलं हृतम् ॥४७७।। [सू० १६३ ] यथासंख्यं क्र्मेणैव क्रमिकाणां समन्वयः ॥१०८।। यथा- एकस्त्रिधा वससि चेतसि चित्रमत्र देव! द्विषां च विदुषां च मृगीदृशां च। तापं च सम्मदरसं च रति च पुष्णन् शौर्योष्मणा च विनयेन च लीलया च।।४७८।।
यहाँ निद्रानिवृत्ति, सूर्यका उदय हो जाना तथा सखियोंका घरके द्वारपर आ जाना सब त्लिङ्गन- परित्यागके कारण उपस्थित हैं परन्तु नायिका आलिङ्गनका परित्याग नहीं कर रही है। इसलिए कारणके होनेपर भी कार्यके न होनेसे विशेषोक्ति अलङ्कार है। और उसका निमित्त नहीं बतलाया गया है इसलिए यह अनुक्तनिमित्ता विशेषोक्तिका उदाहरण है। (२) जो [कामदेव ] कपूरके समान भस्म हो जानेपर भी जन-जनमें शक्तिमान् हो गया है, उस अप्रत्याहत पराक्रमवाले कामदेवको नमस्कार है।४७६॥ यहाँ भस्म हो जाना शक्तिक्षयका कारण है। उसके विद्यमान होनेपर भी कामदेवकी शक्तिका क्षय नहीं हुआ है। यह कारणके होनेपर भी कार्यके न होनेसे विशेषोक्ति अलङ्कार है। परन्तु यहाँ उसका कारण या निमित्त 'अवार्यवीर्यत्व' कहा हुआ है। अतः यह उक्तनिमित्ता विशेषोक्तिका उदाहरण है। आगे अचिन्त्यनिमित्ता विशेषोक्तिका उदाहरण है। (३) फूलोंके अस्त्र धारण करनेवाला वह [कामदेव ] अकेला ही तीतों लोकोंको पराजित कर देता है, जिसके शरीरका अपरहण करके भी शिवजी उसकी शक्तिका विनाश नहीं कर पाये ॥४७७॥
२१. यथासंख्य अलङ्गार [सूत्र १६३]-कमसे कहे हुए पदार्थोंका उसी कमसे समन्वय होनेपर यथासंख्य अलङ्गार होता है ॥१०८॥। जैसे -- हे देव ! आप अकेले ही शत्रुओं, विद्वानों तथा मृगनयनियोंके मनमें, [शत्रुओंके मनमें ] शौर्यकी गरमीसे सन्तापको उत्पन्न करते हुए, [विद्वानोंके मनमें ] विनयसे आनन्दरसको बढ़ाते हुए और सौन्दर्यसे मृगनयनियोंके मनमें रतिको उत्पन्न करते हुए तीन रूपोंमें रहते हैं यह आश्चर्यकी बात है ॥४७८॥ इसमें द्वितीय चरणमें कमसे कहे हुए 'द्विषाम्' 'विदुषाम्' और 'मृगीदृशाम्' का तृतीय चरणमें कहे हुए 'तापम्', 'सम्मदरसम्' और 'रतिम्' के साथ तथा चतुर्थ चरणमें कहे हुए 'शौर्योष्मणा', 'विनयेन' और 'लीलया' के साथ उसी कमसे अन्वय होता है इसलिए यह यथासंख्य अलङ्कारका उदाहरण है।
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५०० काव्यप्रकाश: [का० १०६, सू० १६४
[सू० १६४] सामान्यं वा विशेषो वा तदन्येन समर्थ्यते। यत्तु सोऽर्थान्तरन्यास: साधर्म्येणेतरेण वा ॥१०९॥ साधर्म्येण वैध्म्येण वा सामान्यं विशेषेण यत् समर्थ्यते, विशेषो वा सामान्येन सोऽर्थान्तरन्यास:। कमेणोदाहरणम्- निजदोषावृत्तमनसामतिसुन्दरमेव भाति विपरीतम्। पश्यति पित्तोपहतः शशिशुभ्र शङ्मपि पीतम् ।।४७९।। (२ ) सुसितवसनालङ्कारायां कदाचन कौमुदी- महसि सुदृशि स्वैरं यान्त्यां गतोऽस्तमभूद्विधुः । तदनु भवतः कीर्तिः केनाप्यगीयत येन सा प्रियगृहमगान्मुक्ताशङ्का क्व नासि शुभप्रदः ॥४८०।
२२. अर्थान्तरन्यास अलड्गार यह भी गम्य औपम्याश्रित सादृश्यमूलक अलड्कार है। [सूत्र १६४]-सामान्य अथवा विशेषका उससे भिन्न [अर्थात् सामान्यका विशेषके द्वारा अथवा विशेषका सामान्य] के द्वारा जो समर्थन किया जाता है वह अर्थान्तरन्यास [अलङ्गार] साधर्म्य तथा वैधम्यसे [दो प्रकारका ] होता है॥१०ह।। साधर्म्य या वैधम्यसे (१) सामान्यका जो विशेषसे समर्थन अथवा (२) विशेषका जो सामान्यसे समर्थन किया जाता है वह अर्थान्तरन्यास [अलङ्गार २X२ = ४ प्रकारका ] होता है। क्र्मशः [उन चारों भेदोंके ] उदाहरण [आगे देते हैं]- (१) अपने ही दोबसे जिनका मन व्याप्त हो रहा है उनको अत्यन्त सुन्दर वस्तु भी [विपरीत] बुरी जान पड़ती है। पित्तसे पीडित [पाउडु या कमला रोगसे ग्रस्त पुरुष ] को चन्द्रमाके समान शुभ्र शङ् भी पीला दिखलायी देता है।४७६॥। foe यहाँ 'अपने मनमें दोष होनेपर अच्छी बात भी बुरी मालूम होती है' इस सामान्य सिद्धान्तका समर्थन 'पीलिया रोगके रोगीको शङ्ग भी पीला दिखलायी देता है' इस विशेष उदाहरणके द्वारा किया गया है। इसलिए यह साधर्म्यके द्वारा विशेषसे सामान्यके समर्थनका उदाहरण है। (२) सुन्दर शुभ्र वस्त्रों एवं आभूषणोंको धारण किये हुए किसी दिन चन्द्रमाकी चाँदनीमें सुनयना नायिका अभिसारके लिए [प्रियके गृहको ] जा रही थी कि इतनेमें चन्द्रमा अस्त हो गया [और चाँदनीमें सफेद वस्त्र धारण करके नायिका अभिसारके लिए इस कारणसे निकली थी कि चाँदनीके प्रकाशमें सफेद वस्त्र दूरसे दिखलायी नहीं देंगे। परन्तु चन्द्रमाके अस्त हो जानेसे स्थिति एकदम उलटी हो गयी। अब अँधेरा हो जानेसे उसके सफेद कपड़े और अधिक दूरसे दिखलायी देने लगे। इससे वह नायिका घबड़ा गयी ] तभी किसीने आपकी [राजाकी ] कीतिका गान किया [जिससे फिर चाँदनीसे भी अधिक शुभ्र प्रकाश हो गया, क्योंकि कवियोंके यहाँ कीतिका वर्ण शुभ्र माना गया है] जिससे वह निश्शङ्क होकर [अर्थात् अब मुझे कोई नहीं देख सकेगा ऐसा निश्चवय करके] प्रियके घर चली गयी। आप कहाँ कल्याणप्रद नहीं हो ।४८०।।
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का० ११०, सू० १६५] दशम उल्लास: ५०१
(३) गुणानामेव दौरात्म्याद् धुरि धुर्यो नियुज्यते। असञ्जातकिणस्कन्धः सुखं स्वपिति गौर्गलि: ॥१८१।। (४) अहो हि मे वह्वपराद्धमायुपा यदप्रियं वाच्यमिदं मयेदृशम् । त एव धन्या: सुहृदः पराभवं जगत्यदृष्ट्वैव हि ये क्षयं गताः ॥४८२।। [सू० १६५ ] विरोधः सोऽविरोधेऽपि विरुद्धत्वेन यद्वचः । वस्तुवृत्तेनाविरोधेऽपि विरुद्धयोरिव यदभिधानं स विरोधः । यहाँ 'क्व नासि शुभप्रदः' इस सामान्यसे अभिसारिकाके उपकाररप विशेपका समर्थन किया गया है। इसलिए यह साधर्म्य द्वारा सामान्यसे विशेषके समर्थनरूप अर्थान्तरन्यासका उदाहरण है। (३) गुणोंके ही दौरात्म्यके कारण [धुरं वहतीति धुर्यः] उत्तम बैल [अथवा कार्यकुशल पुरुष ] सदा जुएमें जोता जाता है। दुष्ट बैलके कन्धेपर दाग भी नहीं लगता और वह आनन्दसे सोता रहता है ।४८ १ । गुणवान् उत्तम पुरुष ही सदा कार्यमें पीसे जाते हैं इस सामान्य बातका दुप्ट बैलके उदाहरण द्वारा विशेषसे समर्थन किया गया है। इसलिए यह वैध्म्यसे अर्था्तिरत्यास अलद्गारका उदाहरण है। 'गलि: गौः' में गलि शब्दका अर्थ अनेकों टोकाकरोने भिन्न-भिन्न प्रकारसे किया है। 'य आ्रसब्जितं युगं वलात् पातयति स गौर्गलिरित्युद्योतः । धूःस्पर्शमात्रेण यः स्वयं पतति स गौर्गलिनामा वृपभ इति सुधा- सागरः । गलि: कुत्सितगल इति चन्द्रिका। कुत्सितो गलोसास्तीति गलिरिति सरस्वतीतीर्थः । गलि: कार्याकुशलो वृष इति माणिक्यचन्द्रः । सगर्थोऽप्यधर्वहो दुष्ट इति महेश्वरः।' (४) अरे, मेरी लम्बी आयुने यह बड़ा अपराध किया है कि जिससे मुझे इस प्रकारका [ सुहृद्धि- नाशका ] अप्रिय [समाचार ] कहना पड़ रहा हैं। वे ही वास्तवमें धन्य हैं जो संसारमें सुहृद्के पराभवको देखे बिना ही मृत्युको प्राप्त हो जाते हैं ।४८२।। यहाँ सामान्यसे विशेषका वैधम्यसे समर्थन किया गया है इसलिए अर्थान्तरन्यास अ्पलङ्कार है। २३. विरोधालङ्कार [सूत्र १६५] -- वास्तवमें विरोध न होनेपर भी [विरोधकी प्रतीति करानेवाले ] विरुद्धरूपसे जो वर्णन करना यह विरोध [या विरोधाभासनामक अलङ्गार] होता है। वास्तवमें अविरोध होनेपर [या विरोध न होनेपर ] भी जो दो विरुद्धोंका कथन करना है वह विरोध [या विरोधाभास अलङ्गार ] होता है। पृष्ठ ४३ पर सूत्र १० में जातिशब्द, गुणशब्द, क्रियाशब्द तथा यदृच्छाशब्द (या द्रव्यशव्द) इन चार प्रकारके शब्दोंका वर्णन किया जा चुका है। इनमेंसे जातिका जातिशब्द, गुणशब्द, क्रियाशव्द औौर द्रव्यशब्द चारोंके साथ विरोध हो सकता है। इसी प्रकार गुण तथा करियाशब्द एवं द्रव्यका चारोंके साथ विरोध हो सकता है। परन्तु जातिका गुणके साथ जो विरोध है वह पहिली बार गुणके साथ जातिके विरोधमें ही आ चुका है इसलिए गुणका विरोध गुणादि तीनके साथ गिनने योग्य रह जाता है। इसी प्रकार क्रियाका दोके साथ विरोध गिनने योग्य रह जाता है, शेष दोकी गणना पहिले भेदोंमें ही श चुकी है। इसी प्रकार द्रव्यके विरोधके तीन भेदोंकी गणना पहिले आ चुकी है इसलिए उसका एक ही भेद रह जाता है। इस प्रकार जातिके चार, गुणके तीन, क्रियाके दो और द्रव्यका एक, कुल मिलाकर विरोधके ४+३4२+१= १० दस भेद होते हैं। इन्हींको अगले सूत्रमें दिखलाते हैं-
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५०२ काव्यप्रकाश: [का० ११०-११, सू० १६६
[सू० १६६ ] जातिश्चतुर्भिर्जात्याद्यैविरुद्धा स्याद् गुणस्त्रिभिः ॥ ११० । क्रिया द्वाभ्यामपि द्रव्यं द्रव्येणैवेति ते दश। क्रमेणोदाहरणम्- (१) अभिनवनलिनीकिसलयमृणालवलयादि दवदहनराशिः । सुभग ! कुरङ्गदृशोऽस्या विधिवशतस्त्वद्वियोगपविपाते ॥४८३॥ (२) गिरयोऽप्यनुन्नतियुजो मरुदप्यचलोऽब्धयोऽप्यगम्भीराः। विश्वम्भराऽप्यतिलघुर्नरनाथ ! तवान्तिके नियतम् ।४८४।। (३) येषां कण्ठपरिग्रहप्रणयितां सम्प्राप्य धाराधर- स्तीक्ष्णः सोऽप्यनुरज्यते च कमपि स्नेहं पराप्नोति च। तेषां सङ्गरसङ्गसक्तमनसां राज्ञां त्वया भूपते! पांसूनां पटलै: प्रसाधनविधिनिर्वर्त्यते कौतुकम् ।।४८५॥।
[सूत्र १६६ ]-जातिका जाति आदि चार [जाति, गुण क्रिया तथा द्रव्य ] के साथ विरोध हो सकता है, गुणका गुणादि [गुण, क्रिया तथा द्रव्य ] तीनके साथ, क्रियाका किया तथा द्रव्य [दो ] के साथ और द्रव्यका [केवल ] द्रव्यके साथ विरोध हो सकता है। इस प्रकार ये दस प्रकारके [विरोध या विरोधा- भास अलङ्गार ] होते हैं। कमशः उन [दसों भेदों ] के उदाहरण [आगे देते हैं ]। जातिके गुणादिविरोधके चार उदाहरण- (१) हे सुभग ! दैवात् तुम्हारे वियोगरूप वज्र्रके गिरनेपर उस [नायिका ]के लिए नूतन कमललनीके पत्ते और मृणालके वलय आदि [ जो उसकी गर्मोको शान्त करनेके लिए प्रयुक्त किये जाते हैं वे सब ] दावाग्निका ढेर बन जाते हैं ।।४८३।। 5 इसमें नलिनीकिसलय, मृणालवलय आदि जातिशब्द हैं और दवदहन भी जातिवाचक शब्द है। इन दोनोंका विरोध है। नलिनीकिसलय या मृणालवलय कभी दहनरूप नहीं हो सकते हैं। इस प्रकार जातिका जातिके साथ विरोध है। परन्तु नलिनीकिसलयादिमें भी विरहोद्दीपकतया औपचारिक दहनत्व मानकर उस विरोधका परिहार किया जा सकता है। इसलिए यह विरोधाभासका उदाहरण है। जातिका गुणके साथ विरोध प्रदर्शन करनेवाला उदाहरण देते हैं- (२) हे राजन् ! आपके सामने पर्वत भी निश्चय छोटे हो जाते हैं, वायु भी अचल, समुद्र भी गम्भीरतारहित और पृथिवी भी निश्रय हलकी हो जाती है।४८३।। इसमें गिरि आदि जातिवाचक शब्दोंका जो अनुन्नतत्वादि वणित है उनमें जातिका गुणके साथ विरोध दिखलाया गया है। उसका अभिप्राय वर्णनीय राजाकी उन्नतिके वर्णनसे है। इसलिए उसका परिहार हो जानेसे विरोधाभास अलङ्कार है। (३) हे राजन् ! आपकी जो तीक्ष्ण [निष्ठुर ] तलवार [धाराधर: खङ्ग: ] है वह भी जिन [शत्रु राजाओं]के गलेका आलिङ्गन करके अनुरक्त [अनुरागयुक्त और दूसरी ओर खूनसे लाल ] हो जाती है और किसी अपूर्व स्नेह [प्रेम तथा पक्षान्तरमें रक्तसे प्राप्त चिक्कणता ] को प्राप्त हो जाती है।
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का० १११, सू० १६६ ] पप्रा दशम उल्लास: ५० ३
(४) सृजति च जगदिदमवति च संहरति च हेलयैव यो नियतम् । अवसरवशतः शफरो जनार्दनः सोऽपि चित्रमिदम् ।४८६।। (५) सततं मुसलासक्ता बहुतरग्रहकर्मघटनया नृपते ! द्विजपत्नीनां कठिना: सति भवति कराः सरोजसुकुमाराः ॥४८७॥ (६) पेशलमपि खलवचनं दहतितरां मानसं सतत्त्वविदाम् । परुषमपि सुजनवाक्यं मलयजरसवत् प्रमोदयति ॥४८७।
युद्धभूमिके लिए उत्सुक उन [राजाओं]को आप धूलमें मिलानेका काम करते हैं] यह आश्चर्यकी बात है।४८ ५।। इसमें धाराधर अर्थात् खङ्ग जातिवाचक शब्द है उसका अनुराग तथा स्नेह प्राप्तिरूप क्रियाके साथ विरोध दिखलाया गया है। परन्तु उनका रुघिरसम्पर्ककृत लौहित्य तथा चिक्कणतापरक अरथ करनेपर विरोधका परिहार हो जाता है इसलिए यह विरोधाभासका तीसरा उदाहरण है। जातिका द्रव्यके साथ विरोध दिखलानेवाला चौथा उदाहरण देते हैं- (४) जो इस जगत्को अनायास ही बनाते, रक्षा करते और बिगाड़ते हैं वे जनार्दन भी कालवश मछली [मत्स्यावतार ] बन जाते हैं यह बड़े आश्र्वर्यकी बात है ।४८६।। जो जनार्दन हैं वे मछली कैसे हो सकते हैं यह शफरत्व जातिका जनार्दनरूप द्रव्यसे विरोध है परन्तु भगवान्की लीलासे सब कुछ हो सकता है इसलिए वे मत्स्यावतार भी धारण कर लेते हैं। इस प्रकारकी व्याख्यासे उस विरोधका परिहार हो जाता है, इसलिए यह जातिका द्रव्यके साथ विरोधाभासका उदाहरण है। गुणके गुणादिके साथ विरोधके तीन उदाहरण गुणका गुणके साथ विरोध दिखलानेवाला विरोधाभासका पाँचवाँ उदाहरण देते हैं- (५) हे राजन् ! सदैव मूसलमें लगे रहनेवाले और नाना प्रकारके घरके कामोंके करनेसे कठोर पड़े हुए ब्राह्मणोंकी स्त्रियोंके हाथ आपके होनेपर कमलके समान कोमल हो रहे हैं [ अर्थात् आपने ब्राह्मणोंको इतना दान दिया है कि अब उनकी पत्नियोंको कोई काम नहीं करना पड़ता है, इसलिए उनके हाथ कमलके समान कोमल हो गये हैं]।।४८७।। यहाँ कठिनत्व और सुकुमारत्व गुणोंका विरोध है। और आपके दिये हुए दानके कारण उनको अब काम नहीं करना पड़ता है इसलिए उनके हाथ सुकुमार हो गये हैं इस प्रकारकी व्याख्यासे उस विरोधका परिहार हो जाता है, अतः यह विरोधाभासका पाँचवाँ उदाहरण है। गुणका क्रियाके साथ विरोध प्रदर्शित करनेवाला विरोधाभासका छठा उदाहरण देते है- (६) दुष्ट पुरुषोंका मधुर वचन भी [ उस मधुर भाषणके ] रहस्यको समझनेवालोंके मनको अत्यन्त सन्तप्त करता है। और सज्जन पुरुषोंका कठोर वचन भी [उस कठोरताके रहस्यको जानने- वालोंको ] चन्दनके रसके समान आनन्दित करता है ॥४८८॥ यहाँ पेशलत्व गुणका दाह क्रियाके साथ और परुषत्व गुणका प्रमोदन क्रियाके साथ आपाततः विरोध प्रतीत होता है। और वक्ताओंके खलत्व तथा सुजनत्वके द्वारा उसका परिहार हो जाता है। इसलिए यह विरोधाभासका छठा उदाहरण है।
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५०४ काव्यप्रकाश: [का० १११, सू० १६६ (७) कौञ्चाद्रिरुद्दामदृषद्दृढोसौ यन्मार्गणानर्गलशातपाते। अभून्नवाम्भोजदलाभिजातः स भार्गवः सत्यमपूर्वसर्गः ॥४८९॥ (८) परीच्छेदातीतः सकलवचनानामविषयः पुनर्जन्मन्यस्मिन्ननुभदपथं यो न गतवान्। विवेकप्रध्वंसादुपचितमहामोहगहनो विकार: कोऽप्यन्तर्जडयति च तापं च कुरुते ।।४९०। (९) अयं वारामेको निलय इति रत्नाकर इति श्रितोऽस्माभिस्तृष्णातरलितमनोभिर्जलनिधिः । क एवं जानीते निजकरपुटीकोट रगतं क्षणादेनं ताम्यत्तिमिमकरमापास्यति मुनिः।४९१।। की
गुणका द्रव्यके साथ विरोधप्रदर्शक विरोधाभासका सातवाँ उदाहरण देते हैं- TDfर(७) बड़ी-बड़ी कठोर शिलाओंसे दुर्भेद्य यह कौंच नामक पर्वत भी जिन [ परशुराम ] के अप्रति- हत वज्तके समान तीक्ष्ण बाणोंकी वृष्टिसे नवीन कमलके पत्तेके समान कोमल [सुभेद्य ] हो गया वे भार्गव [परशुराम ] सचमुच ही लोकोत्तर पुरुष हैं।४८६।।
कि) यहाँ कोमलत्व गुणका कौञ्चाद्रि द्रव्यके साथ आपाततः विरोध प्रतीत होता है। परन्तु परशु- रामके प्रतापसे वह सुभेद्य हो गया इस रूपसे उसका परिहार हो जाता है। अतः विरोधाभासका सातवाँ उदाहरण है। परशुराम द्वारा क्रौञ्चाद्रिके भेदनकी कथा पुराणप्रसिद्ध है। क्रियाके क्रियादि दोके साथ विरोधके दो उदाहरण जातिके जात्यादि चारके साथ और गुणके गुणादि तीनके साथ विरोधके प्रदर्शक विरोधाभासके ४+३= ७ सात उदाहरण अवतक दे चुके हैं। अब करियाके किया और द्रव्य दोके साथ विरोधके दो उदाहरण आगे देते हैं- (८) पृष्ठ १८३, श्लोक सं० १०७ पर इस श्लोकका अर्थ देखिये॥४ह०।। इसमें 'जडयति च तापं च कुरुते' इन दोनों क्रियाओंका विरोध है। परन्तु विरहके वैचित्यसे कालभेदसे उसका विरह कभी सन्तापदायक होता है और कभी उसकी स्मृति आनन्ददायक हो उठती है। इस प्रकार विरोधका परिहार हो जानेसे यह विरोधाभासका आठवाँ उदाहरण है। क्रियाका द्रव्यके साथ विरोधप्रदर्शक नवम उदाहरण देते हैं- (e) यह [समुद्र ] जलका एक [अपूर्व या ] मुख्य अगार है और रत्नोंका आकर है ऐसा समझकर तृष्णासे व्याकुलमन होकर हमने इसका आश्रय लिया था। पर यह किसको मालूम था कि अपने हाथकी अञ्जलिके कोनेमें समाये हुए और बड़े-बड़े मगरमच्छ जिसमें तड़फड़ा रहे हैं ऐसे इस [समुद्र ] को [अगस्त्य ] मुनि तनिक देरमें ही सोख जायेंगे ।।४ E १ ।। यहाँ अगस्त्यमुनिके द्वारा समुद्रका पी जाना आपाततः असम्भव होनेसे पानत्रियाका अगस्त्य तथा समुद्ररूप दोनों द्रव्योंके साथ विरोध प्रतीत होता है। अतः यह विरोधाभासका नौवाँ उदाहरण है।
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का० १११-११२, सू० १६७-६८ ] दशम उल्लास: ५०५ (१०) समदमतङ्गजमदजलनिस्यन्दतर्राङ्गणीपरिष्वङ्गात् । क्षितितिलक ! त्वयि तटजुषि शङ्करचूडापगापि कालिन्दी ।४९२।। [सू० १६७ ] स्वभावोक्तिस्तु डिम्भादे: स्वक्रियारूपवर्णनम् ॥१११॥ स्वयोस्तदेकाश्रययोः । रूपं वर्ण: संस्थानं च। उदाहरणम्- पश्चादंघ्री प्रसार्य त्रिकनतिविततं द्राघयित्वाङ्गमुच्चै- रासज्याभुग्नकण्ठो मुखमुरसि सटां धूलिधूम्रां विध्य। घासग्रासाभिलाषादनवरतचलत्प्रोथतुण्डस्तुरङ्गो मन्दं शब्दायमानो विलिखति शयनादुत्थितः क्ष्मां खुरेण ।।४९३।। [सूत्र १६८] व्याजस्तुतिर्मुखे निन्दा स्तुतिर्वा रूढिरन्यथा। व्याजरूपा व्याजेन वा स्तुतिः ।
द्रव्यका द्रव्यके साथ विरोधका एक उदाहरण -- (१०) हे राजन् ! आपके किनारेपर उपस्थित होनेपर [ अर्थात् गङ्गानदीके किनारे आपकी सेनाका पड़ाव पड़नेसे आपकी सेनाके ] मदयुक्त हाथियोंके मदजलके प्रवाहसे उत्पन्न [मदधाराकी कृष्ण- वर्ण] नदीके [धारामें ] मिल जानेसे [शिवजीके मस्तकपर रहनेवाली ] गङ्गा नदी भी [जलके कृष्णवर्ण हो जानेसे ] यसुना बन गयी है।४६२।। यहाँ गङ्गा और यमुना नदी-रूप द्रव्योंका परस्पर विरोध है। जो गङ्गा है वह यमुना नहीं हो सकती है। परन्तु मदजलकी श्यामतासे गङ्गा यमुना-सी श्याम हो जाती है, ऐसा अर्थ करनेसे उस विरोधका परिहार हो जाता है। यह विरोधाभासका दसवाँ उदाहरण है। २४. स्वभावोक्ति अलङ्गार [सूत्र १६७]-बालक आदिकी अपनी [स्वाभाविक ] क्रिया अथवा रूप [अर्थात् वर्ण एवं अवयवसंस्थान ] का वर्णन स्वभावोक्ति [अलङ्गार कहलाता ] है ।।१११।। केवल अपनेमें [अर्थात् बालक आदिमें ] रहनेवाले [क्रिया या रूपका वर्णन ], रूप [शब्दसे यहाँ] रँग और संस्थान [अर्थात् अवयवोंकी बनावट दोनों का ग्रहण करना चाहिये]। [बाणभट्टकृत 'हर्षचरित'के तृतीय उच्छ्वाससे स्वभावोक्तिका ] उदाहरण [जैसे ]- पीछेकी दोनों टाँगें फैलाकर त्रिक [रीढ़की हड्डीके अन्तिम छोर ] को झुकानेसे लम्बे शरीरको यथासम्भव ऊपरकी ओर उठाते हुए, गर्दनको झुकाये हुए मुखको छातीमें लगाकर और धूलि धूसरित अयालोंको हिलाकर घासका ग्रास लेनेकी इच्छासे जिसका होठ तथा मुख निरन्तर चल रहा है इस प्रकारका सोकर उठा और धीरे-धीरे हिनहिनाता हुआ घोड़ा खुरोंसे भूमि खोद रहा है॥४६३॥ सोकर उठे हुए घोड़ेकी स्वाभाविक क्रियादिका वर्णन होनेसे इसमें स्वभावोक्ति अलङ्कार है। २५. व्याजस्तुति अलङ्गार [सूत्र १६८ ]-प्रारम्भमें [देखनेमें ] निन्दा अथवा स्तुति मालूम होती हो परन्तु उससे भिन्न [अर्थात् आपाततः दीखनेवाली निन्दाका स्तुतिमें अथवा स्तुतिका निन्दा] में पर्यवसान होनेपर व्याजस्तुति [अलङ्कार] होता है। [व्याजस्तुति पदका अर्थ दो प्रकारसे हो सकता है, उसको दिखलाते हैं] व्याजरूपा स्तुति
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५०६ काव्यप्रकाश: [का० ११२, सू० १६६
करमेणोदाहरणम्- (१) हित्वा त्वामुपरोधवन्ध्यमनसां मन्ये न मौलि: परो लज्जावर्जनमन्तरेण न रमामन्यत्र संदृश्यते। Fery ST यस्त्यागं तनुतेतरां मुखशतैरेत्याश्रितायाः श्रियः प्राप्य त्यागकृतावमाननमपि त्वय्येव यस्याः स्थितिः ॥४९४॥ (२) हे हेलाजितबोधिसत्त्व ! वचसां कि विस्तरैस्तोयधे ! नास्ति त्वत्सदृशः परः परहिताधाने गृहीतव्रतः । तृष्यत्पान्थजनोपका रघटनावैमुख्यलब्धायशो- भारप्रोद्वहने करोषि कृपया साहाय्यक यन्मरोः ॥४९५॥ [ सू० १६९ ] सा सहोक्तिः सहार्थस्य बलादेकं द्विवाचकम् ॥११२॥ एकार्थाभिधायकमपि सहार्थवलाद् यत् उभयस्याप्यवगमकं सा सहोक्तिः। यथा-
[अर्थात् जहाँ देखनेमें निन्दा प्रतीत हो पर वास्तवमें स्तुति हो वह व्याजरूपा स्तुति होनेसे व्याजस्तुति कहलाती है। और जहाँ देखनेमें स्तुति प्रतीत हो परन्तु वास्तवमें निन्दा हो वहाँ] व्याजेन स्तुति [इस अर्थसे व्याजस्तुति कहलाती है ]। कमसे [दोनों प्रकारसे ] उदाहरण [देते हैं]- हे राजन् ! मैं समझता हूँ कि आपके सिवा आश्रितजनोंकी प्रार्थनाका अनादर करने [ उपरोधः अनुरोध: आश्रितजनोंकी प्रार्थना, लक्षणासे आश्रित जनोंके अङ्गीकाररूप अनुवर्तनसे वन्ध्य अर्थात् शून्य है मन जिनका, उनको स्वीकार न करने ] बालोंका सिरमौर दूसरा कोई नहीं है और लक्ष्मीसे अधिक निर्लज्ज भी दुनियामें दूसरा कोई दिखलायी नहीं देता है। जो सैकड़ों मार्गोंसे [ पास ] आकर आश्रय लेनेवाली लक्ष्मीका त्यागकर देता है और त्यागसे उत्पन्न अपमानको सहकर भी जो आपके पास ही बनी रहती है [ ऐसी लक्ष्मीसे बढ़कर निर्लज्ज दूसरा कोई नहीं है]।।४६४।। इसमें प्रारम्भमें राजाकी निन्दा प्रतीत होती है परन्तु उसका पर्यवसान स्तुतिमें होता है, इसलिए यह व्याजस्तुतिका उदाहरण है। (२) अनायास ही बोधिसत्त्व [परोपकारी बुद्ध भगवान्]को भी जीत लेनेवाले हे समुद्रदेव ! आपसे बढ़कर परोपकारका व्रत लेनेवाला कोई दूसरा नहीं दीखता है। जो आप प्यासे पथिकजनोंका [जलदान द्वारा होनेवाले ] उपकार करनेमें विमुखताके कारण बदनाम हुए मरुदेश [रेगिस्तान ]के [उस अपयशके ] भारको उठानेमें हाथ बँटाते हो [ अर्थात् जैसे मरुभूमिमें प्यासे आदमीको पानी नहीं मिलता है ऐसे ही तुम्हारे पास भी प्यासेकी प्यास बुझानेकी सामर्थ्य नहीं है] ॥४६५। इसमें प्रारम्भमें समुद्रकी स्तुति जान पड़ती है परन्तु उसका पर्यवसान निन्दामें होता है। यह द्वितीय प्रकारको व्याजस्तुतिका उदाहरण है। २६. सहोक्ति अलङ्कार [सूत्र १६६]-जहाँ सह [ शब्दके ] अर्थकी सामर्थ्यसे एक पद दोका वाचक [दो पदोंसे सम्बद्ध] हो वह सहोक्ति कहलाती है॥११२॥
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का० ११३, सू० १७० ] दशम उल्लास: ५०७ सह दिअहणिसाहिं दीहरा सासदण्डा सह मणिवलयेहिं वाप्पधारा गलन्ति । तुह सुहअ विओए तीअ उव्विग्गिरीए सह अ तणुलदाए दुव्वला जीविदासा ।।४९६।। [सह दिवसनिशाभिः दीर्घा: श्वासदण्डाः सह मणिवलयैर्वाष्पधारा गलन्ति। तव सुभग ! वियोगे तस्या उद्विग्नायाः सह च तनुलतया दुर्बला जीविताशा॥ इति संस्कृतम् ] श्वासदण्डादिगतं दीर्घत्वादि शाब्दम्। दिवसनिशादिगतं तु सहार्थसामर्थ्यात् प्रतीयते। [सू० १७० ] विनोक्तिः सा विनाऽन्येन यत्रान्यः सन्न नेतरः । क्वचिदशोभनः क्वचिच्छोभनः । कमेणोदाहरणम्-
एकार्थवाचक होनेपर भी जो सहार्थकी सामर्थ्यसे दोनोंका बोधक होता है वह सहोक्ति [का स्थल होता ] है। जहाँ जिन वस्तुओ्रंका सहभाव वणित होता है उनमेंसे एक प्रधान और दूसरा अप्रधान होता है। और 'सहयुक्तेऽप्रधाने' इस पाणिनिसूत्र के अर्पनुसार अप्रधानमें तृतीया तथा प्रधानमें प्रथमा विभक्तिका प्रयोग होता है। जैसे 'पुत्रेण सह आगतः पिता'। इसमें पिता प्रधान और पुत्र अप्रधान है। इसलिए 'पुत्रेण' में तृतीया तथा 'पिता' में प्रथमा विभक्तिका प्रयोग होता है। यहाँ 'पिता' ही 'आगतः' क्रियाका कर्ता होता है। 'आगतः' क्रियाका 'पिता' पदके साथ ही साक्षात् अन्वय हो सकता है, 'पुत्रेण' पदके साथ नहीं। इसलिए 'आगतः' पद एकार्थसम्बद्ध एकार्थाभिधायी है। परन्तु 'सह' पदकी सामर्थ्यसे पुत्र शब्दके साथ उसका गौणरूपमें सम्बन्ध होता है। इसलिए वह द्विवाचक हो जाता है। इस प्रकार 'सह' शब्दके प्रयोगसे जहाँ काव्योचित विशेष चमत्कार आ जाता है वहाँ सहोक्ति अलद्कार होता है। सहोक्तिका उदाहरण देते हैं- हे सुभग ! तुम्हारे वियोगमें व्याकुल हुई उस [नायिका ] के रातके और दिनके साथ-साथ श्वास-दण्ड बढ़ते जा रहे हैं [ श्वासके अतिदीर्घ और प्रचुर होनेसे 'श्वासदण्डाः' कहा है। वियोगमें दुबली हो जानेके कारण हाथके कड़े अपने-आप निकलकर गिर पड़ते हैं और उन ] मणिवलयोंके साथ आँसुओंकी धारा गिरने लगती है। और उसकी कोमल देहलताके साथ जीवनकी आशा क्षीण होती जा रही है।।४६६।। [इसमें 'श्वासदण्डाः' जो प्रथमान्त पद हैं उनके प्रधान होनेके कारण उनके साथ ] दीर्घत्वादि [का ] शाब्द [साक्षात् सम्बन्ध ] है। दिवस-निशा आदि [जो तृतीयान्त पद हैं उनके अप्रधान होनेसे उन ] के साथ सहार्थके बलसे [अर्थतः] प्रतीत होता है। २७. विनोक्ति अलड्कार [सू० १७०]-जहाँ दूसरेके बिना दूसरा अर्थ सुन्दर न हो [सन् न स्यात् ] अथवा [नेतर: ] असुन्दर न हो [ किन्तु शोभन हो वह दो प्रकारकी विनोक्ति होती है ]। [अर्थात् ] कहीं अशोभन [सन् न स्यात् ] और कहीं [ इतरः अशोभनः न किन्तु] शोभन हो। कमसे [दोनों प्रकारकी विनोक्तिके ] उदाहरण [देते हैं] --
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५०८ काव्यप्रकाश: Lका० ११३, सू० १७१
(१) अरुचिर्निशया विना शशी शशिना सापि विना महत्तमः । उभयेन विना मनोभवस्फुरितं नैव चकास्ति कामिनोः ॥४९७॥ (२) मृगलोचनया विना विचित्रव्यवहारप्रतिभाप्रगल्भः । अमृतद्युतिसुन्दराशयोऽयं सुहृदा तेन विना नरेन्द्रसूनु: ।४९८।। [सू० १७१ ] परिवृत्तिविनिमयो योऽर्थानां स्यात् समासमैः ॥११३॥ परिवृत्तिरलङ्कारः । उदाहरणम् -- (२) लतानामेतासामुदितकुसुमानां मरुदयं मतं लास्यं दत्त्वा श्रयति भृशमामोदमसमम् । लतास्त्वध्वन्यानामहह दृशमादाय सहसा ददत्याधिव्याधिभ्रमिरुदितमोहव्यतिकरम् ।।४९९।। (१) रात्रिके बिना [दिनमें ] चन्द्रमा कान्तिहीन हो जाता है और चन्द्रमाके बिना वह [रात्रि ] भी अत्यन्त अन्धकारमयी रहती है। [उन निशा तथा शशी] दोनोंके बिना कामियोंके कामका विलास शोभित नहीं होता है।।४६७।। कयहाँ रात्रिके बिना चन्द्रमा और चन्द्रमाके बिना रात्रिकी अशोभनीयताका वर्णन किया गय। है यह पहली विनोक्तिका उदाहरण है। दूसरी विनोक्तिका उदाहरण आगे देते हैं- (२) यह राजपुत्र मृगलोचना [के चवकरमें सब भूल जाता है। परन्तु ] उसके न होनेपर नाना प्रकारके व्यवहारकी प्रतिभासे युक्त हो जाता है। इसी प्रकार ] किसी दुष्ट मित्रके साथ महादुष्ट बन जाता है परन्तु] उस [दुष्ट ] मित्रके न होनेपर चन्द्रमाके समान शुद्धहृदय हो जाता है॥४६८।। इस श्लोकमें मृगलोचना तथा दुष्ट मित्रके न होनेपर राजपुत्रकी शोभनताका वर्णन किया है इसलिए यह दूसरे प्रकारकी विनोक्तिका उदाहरण है। २८. परिवृत्ति अलङ्गार [सूत्र १७१ ]-पदार्थोंका समान अथवा असमान [उत्तम अथवा हीन पदार्थों] के साथ जो परिवर्तन [का वर्णन] है वह परिवृत्ति [अलङ्गार कहलाता] है।११३। कारिकामें' परिवृत्ति' तथा 'विनिमय' दोनों पर्यायवाचक शब्दोंका एक साथ प्रयोग किया गया है। इसलिए पुनरुक्ति-सी प्रतीत होती है। उसके निवारणके लिए, अ्थवा इन दोनोंमें कौन-सा लक्ष्यपद है और कौन-सा लक्षणपद है इस शङ्काका निवारण करनेके लिए 'परिवृत्तिरलङ्गारः' यह लिखा गया है। अर्थात् यहाँ 'परिवृत्ति' यही लक्ष्यपद है शेष 'विनिमयः' पद उसका लक्षण है। परिवृत्ति अलङ्गार है। [परिवृत्तिका ] उदाहरण [जैसे]- यह वायु फूलोंसे लदी लताओंको उनका प्रिय नर्तन [लास्य ] देकर उनके अनुपम सुगन्धको जी-भरकर [भृशम् अत्यर्थ ] ले रहा है। और लताएँ तो [विरही] पथिकोंकी दृष्टिको सहसा लेकर उनको मानसिक वेदना [आधिस्तु मानसी व्यथा ], शारीरिक रोग, चक्कर आना, रोदन और मोहका सम्पर्क प्रदान करती हैं।४६८।।
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का० ११४, सू० १७२] दशम उल्लास: ५०६ अत्र प्रथमेऽर्धे समेन समस्य द्वितीये उत्तमेन न्यूनस्य। (१) नानाविधप्रहरणैनृप ! सम्प्रहारे स्वीकृत्य दारुणनिनादवतः प्रहारान्। दृप्तारिवीरविसरेण वसुन्धरेयं निर्विप्रलम्भपरिरम्भविधिर्वितीर्णा ॥५००।। अत्र न्यूनेनोत्तमस्य । [सू० १७२ ] प्रत्यक्षा इव यद्धावाः क्रियन्ते भूतभाविनः तड्गाविकम् । भूताश्च भाविनश्चेति द्वन्द्वः। भावः कवेरभिप्रायोऽत्रास्तीति भाविकम्। उदाहरणम्- आसीदञ्जनमत्रेति पश्यामि तव लोचने। भाविभूषणसम्भारां साक्षात्कुर्वे तवाकृतिम् ।५०१॥ आद्ये भूतस्य द्वितीये भाविनो दर्शनम्।
यहाँ पूर्वार्द्धमें समसे समका और उत्तरार्द्धमें उत्तमसे न्यूनका [विनिमय ] है। पूर्वार्द्धमें लास्य लताओ्र्पोंको प्रिय होनेसे उपादेय है और आ्र्प्रामोद वायुको प्रिय होनेसे उपादेय है। इसलिए समसे समका विनिमय है। उत्तरार्द्धमें दृष्टि उत्तम और प्रिय है उससे आधि-व्याधि आदिका विनिमय किया है अतः यह उत्तमसे हीनके विनिमयका उदाहरण है। हे राजन् ! बलगवित शत्रुसमुदायने युद्धमें भयङ्गर गर्जन करनेवाले तुम्हारे नाना प्रकारके शस्त्रोंसे [किये गये ] प्रहारोंको स्वीकार कर वियोगरहित चिर आलिङ्गन करनेवाली यह वसुन्धरा तुमको प्रदान की है॥५००।। इसमें न्यून [प्रहारों]से उत्तम [वसुन्धरा ] का [विनिमय किया गया है] । २९. भाविक अलड्कार [सूत्र १७२]-अतीत और अनागत पदार्थ [भावनावश कविके द्वारा] जो प्रत्यक्षसे कराये जाते हैं उसको भाविक [नामक अलङ्गार ] कहते हैं। भूत और भावी यह द्वन्द्वसमास है। [भूताश्र ते भाविनः इस प्रकारका कर्मधारयसमास नहीं है]। भाव अर्थात् कविका [अतीत अनागतको भी प्रत्यक्षवत् दिखलानेका ] अभिप्राय यहाँ [रहता] है इसलिए इसे भाविक [कहते हैं]। उदाहरण [जैसे]- [प्रिये] इनमें अञ्जन लगा हुआ था इस प्रकारके तुम्हारे नेत्रोंको मैं देख रहा हूँ और आगे होनेवाले आभूषणोंसे अलङकृत तुम्हारी [अनागत ] आकृतिको [भावनावश ] साक्षात् देख रहा हूँ॥५०१।। पूर्वार्द्धमें अतीतका और उत्तरार्द्धमें अनागतका दर्शन है।
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५१० काव्यप्रकाश: [का० ११४, सू० १७३
[सू० १७३ ] काव्यलिङ्गं हेतोर्वाक्यपदार्थता ।।११४।। (१) वाक्यार्थता यथा- वपुःप्रादुर्भावादनुमितमिदं जन्मनि पुरा पुरारे ! न प्रायः क्वचिदपि भवन्तं प्रणतवान्। नमन्मुक्तः सम्प्रत्यहमतनुरग्रेजप्यनतिभाक् महेश ! क्षन्तव्यं तदिदमपराधद्वयमपि ॥५०२॥ (२) अनेकपदार्थता यथा- प्रणयिसखीसलीलपरिहासरसाधिगतै- ललितशिरीषपुष्पहननैरपि ताम्यति यत्। वपुषि वधाय तत्र तव शस्त्रमुपक्षिपतः पततु शिरस्यकाण्डयमदण्ड इवैष भुजः ॥५०३॥ एकपदार्थता यथा-
३०. काव्यलिङ्ग अलङ्गार [सू० १७३ ]- हेतुका वाक्यार्थ अथवा पदार्थ [ एकपदार्थ अथवा अनेकपदार्थ ] रूपमें कथन करना काव्यलिङ्ग [अलङ्गार] होता है॥११४। [हेतुकी ] वाक्यार्थता [होनेपर काव्यलिङ्गका प्रथम उदाहरण ] जैसे -- (१) हे, शिवजी महाराज ! इस शरीरके उत्पन्न होनेसे यह अनुमान होता है कि पूर्वजन्ममें मैंने आपको प्रायः कभी नमस्कार नहीं किया। अब इस जन्ममें नमस्कार करता हुआ मैं मुक्त हो जाऊँगा इसलिए शरीर न रहनेसे आगे भी आपको नमस्कार नहीं कर सकूँगा। सो मेरे इन दोनों अपराधोंको क्षमा करना॥५०२।। इसमें 'पुरा जन्मनि भवन्तं न प्रणतवान्' और 'अग्रेऽप्यनतिभाक्' इन वाक्योंका अर्थ अपराध- द्वयका हेतु है। यद्यपि अनमन स्वयं अपराधस्वरूप है इसलिए उनमें साधारणतः हेतु-हेतुमद्द्राव नहीं है परन्तु अनमनको हेतु और उससे उत्पन्न दुरित या अदृष्टको हेतुमान् कहा जा सकता है। अनेकपदार्थरूप [हेतुके ] होनेपर [काव्यलिङ्गका दूसरा उदाहरण है]- (२) [ 'मालतीमाधव' नाटकके पश्चमाङ्गमें मालतीके वधके लिए उद्यत अघोरघण्टके प्रति माधव कह रहा है कि ] -- प्रेम करनेवाली सखियोंके द्वारा परिहासरसमें पाये हुए कोमल शिरीषपुष्पकी चोटसे भी जो व्याकुल हो जाती है उस [मालती ]के शरीरपर [उसके ] मारनेके लिए शस्त्र उठानेवाले तेरे सिरपर यमदण्डके समान अचानक [मेरा] यह हाथ पड़ता है ॥५०३। यहाँ 'वपुषि शस्त्रमुपक्षिपतः' ये अनेक पद भुजपातके हेतु हैं। इनमें मुख्य त्रियाका अभाव होनेसे यह पदसमुदाय वाक्य नहीं बन पाया है और एकपद भी नहीं है। इसलिए इसको अनेकपद या खण्डवाक्य कहा जा सकता है। इसी खण्डवाक्यके लिए यहाँ 'अनेकपदार्थ' शब्दका प्रयोग किया गया है। हेतुकी वाक्यरूपताका उदाहरण पहिले (श्लोक ५०२ में) दिया था। [हेतुके ] एकपदार्थरूप होनेपर [काव्यलिङ्गका तीसरा उदाहरण ] जैसे --
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का० ११५, सू० १७४] दशम उल्लास: ५११ (३) भस्मोद्धूलन ! भद्रमस्तु भवते रुद्राक्षमाले ! गुभं हा सोपानपरम्परां गिरिसुताकान्तालयालङकृतिम्। अद्याराधनतोषितेन विभुना युष्मत्सपर्यासुखा- लोकोच्छेदिनि मोक्षनामनि महामोहे निधीयामहे ॥।५०४।। एषु अपराधद्वये पूर्वापरजन्मनोरनमनम्, भुजपाते शस्त्रोपक्षेपः, महामोहे सुखालो- कोच्छेदित्वं च यथाक्र्ममुक्तरूपो हेतुः । [सू० १७४ ] पर्यायोक्तं विना वाच्यवाच्यकत्वेन यद्वचः । वाच्यवाचकभावव्यतिरिक्तेनावगमनव्यापारेण यत्प्रतिपादनं तत्पर्यायेण भङ्गय- न्तरेण कथनात् पर्यायोक्तं। उदाहरणम् -- यं प्रेक्ष्य चिररूढाउपि निवासप्रीतिरुज्झिता। मदेनैरावणमुखे मानेन हृदये हरे: ॥५०५॥ अत्रैरावणशकौ मदमानमुक्तौ जाताविति व्यङ्गचमपि। शब्देनोच्यते तेन यदेवोच्यते तदेव व्यङ्गयम्। यथा तु व्यङ्गयं न तथोच्यते।
(३) हे भस्मलेपन ! तुम्हारा कल्याण हो, हे रुद्राक्षकी माला ! तुम सुखी रहो। हाय शिवालयकी अलङ्गारभूत सीढ़ियो ! [आज तुम भी मुझसे सदाके लिए छूटी जा रही हो क्योंकि ] आराधनासे प्रसन्न हुए शिवजी आज हमको तुम्हारे सेवासुखके प्रकाशको नष्ट कर देनेवाले मोक्ष नामक महान्धकारमें डाल रहे हैं [ इसलिए हम आप सबसे विदा माँग रहे हैं। यह किसी शिवभक्तकी उत्ति है] ॥५०४॥ [काव्यलिङ्गके ] इन [तीनों उदाहरणों ] मेंसे [ प्रथम श्लोकमें ] पूर्वजन्म तथा अगले जन्ममें नमस्कार न करना अपराधद्वयमें [हेतु है। दूसरे श्लोकमें ] शस्त्र उठाना भुजपातमें [ हेतु है। तीसरे श्लोकमें ] सुखके प्रकाशका नाशकत्व महामोहमें [हेतु है। इसलिए इन तीनों उदाहरणोंमें ] कमानुसार उस-उस प्रकारके [१. वाक्यार्थरूप, २. अनेक पदार्थरूप और ३. एकपदार्थरूप ] हेतु हैं [ इसलिए काव्यलिङ्ग अलङ्गार है]। ३१. पर्यायोक्त अलद्गार [सूत्र १७४] वाच्य-वाचकभावके बिना [व्यञ्जनारूप व्यापारके द्वारा प्रकारान्तरसे] जो [वाच्यार्थका ] कथन करना वह पर्यायोक्त [अलङ्गार कहलाता ] है। वाच्य-वाचक भावसे भिन्न [व्यञ्जनारूप ] बोधन व्यापारके द्वारा जो [वाच्यार्थका] प्रति- पादन करना है वह 'पर्यायसे' अर्थात् प्रकारान्तरसे कथन करनेके कारण पर्यायोक्त [अलङ्गार कहलाता ] है। उदाहरण [जैसे ]- जिस [हयग्रीव ] को देखकर मदने ऐरावतके मुखपर और मानने [हरि ] इन्द्रके हृदयमें निवास करनेकी चिरकालसे जमी हुई प्रीति भी छोड़ दी ॥५०५॥ यहाँ ऐरावत और शक्र [कमशः] मद तथा मानसे मुक्त हो गये [ ऐरावतका मद और इन्द्रका अभिमान नष्ट हो गया] यह व्यङ्गय अर्थ भी [ मदने ऐरावतके मुखमें और अभिमानने इन्द्रके हृदयमें
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५१२ काव्यप्रकाश: [ का० ११५, सू० १७४ यथा गवि शुक्ले चलति दृष्टे 'गौः शुक्लश्चलति' इति विकल्पः यदेव दृष्टं तदेव विकल्पयति न तु यथादृष्टं तथा। यतोऽभिन्नासंसृष्टत्वेन दृष्टं भेदसंसर्गाभभ्यां विकल्पयति।
निवासके पुराने प्रेमको छोड़ दिया है, इस प्रकार प्रकारान्तरसे ] शब्दके द्वारा [वाच्यरूपसे ] कहा जा रहा है। इसलिए जो [ यहाँ शब्दके द्वारा वाच्यरूपसे ] कहा जा रहा है वही व्यङ्गच है। किन्तु अन्तर इतना है कि ] जिस रूपमें व्यङ्गय है उस रूपमें नहीं कहा जा रहा है[ अर्थात् व्यङ्गयसे भिन्नरूपमें कहा जा रहा है। क्योंकि व्यङ्ग्च अर्थ यह है कि ऐरावतका मद और इन्द्रका अभिमान नष्ट हो गया, वे दोनों मद और मानसे मुक्त हो गये। परन्तु वाच्यार्थका रूप उससे भिन्न यह है कि मदने ऐरावतके मुखमें रहनेका और मानने इन्द्रके हृदयमें रहनेका पुराना प्रेम छोड़ दिया]। यहाँ यह शङ्का होती है कि वाच्य तथा व्यङ्गय दोनों भिन्न प्रकारके अर्थ है। जो वाच्य है वह व्यङ्गय नहीं हो सकता है और जो व्यङ्गय है वह वाच्य नहीं हो सकता है। आप एक ही श्लोकमें, एक ही अर्थको वाच्य तथा व्यङ्गय दोनों बतला रहे हैं यह बात युक्तिसङ्गत नहीं है। इस शङ्गाका समाधान करनेके लिए ग्रन्थकार निर्विकल्पक तथा सविकल्पक ज्ञानका उदाहरण देते हैं। जिस प्रकार वाच्य तथा व्यङ्गय अर्थ विपरीत प्रतीत होते हैं उसी प्रकार निर्विकल्पक तथा सविकल्पक ज्ञान भी विपरीत प्रतीत होते हैं। जो सविकल्पक है वह निर्विकल्पक नहीं और जो निर्विकल्पक है वह सविकल्पक नहीं होता। फिर भी एक हो विषय, सविकल्पक तथा निर्विकल्पक रूपमें प्रकारभेदसे अनुभूत होता है। दोनोंका विषय एक हो होता है परन्तु प्रकारमें भेद होता है। एक हो घटका सविकल्पक ज्ञान भी विषय होता है और निर्विकल्पक ज्ञान भी। इसलिए जो निर्विकल्पक ज्ञानसे गृहीत होता है वहो सविकल्पक ज्ञानसे भी गृहोत होता है। किन्तु जिस रूपमे निर्विकल्पक ज्ञानसे गृहीत होता है उस रूपमें सविकल्पक ज्ञानसे गृहात नहीं होता। दोनोक। विषय एक होते हुए भी प्रकारमें भेद होता है। इसी प्रकार यहाँ जो अर्थ शब्द द्वारा वाच्यरूपसे कहा जा रहा है वही प्रकारान्तरसे व्यङ्गयरूपसे कहा जा सकता है। इसी बातको अगली पंक्तियोंमें ग्रन्थकारने इस प्रकार लिखा है- जैसे चलती हुई सफेद गायको देखकर [अर्थात् गायका निर्विकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान होनेके बाद] 'सफेद गाय चल रही है' इस प्रकारका सविकल्पक ज्ञान होता है। जिस [वस्तु ] को [निविकल्पकरूपमें] देखा उसीका सविकल्पक ज्ञान होता है। किन्तु जिस रूपमें [निर्विकल्पक ज्ञानकालमें ] देखा उस रूपमें [सविकल्पक ज्ञान ] नहीं होता। क्योंकि [निर्विकल्पक ज्ञानकालमें बौद्धमतमें ] भेदरहित [अतद्व्यावृत्ति] और अन्य दर्शनोंके मतमें विशेष्यविशेषणभाव या नामजात्यादिरूप ] संसर्गरहित रूपमें [वस्तु निर्वि- कल्पक ज्ञानकालमें ] देखी जाती है और [बौद्धमतमें ] भेद [तद्व्यावृत्ति ] तथा [अन्य मतोमें नाम जात्यादिके ] संसर्गसे युक्तरूपसे सविल्पक ज्ञानका विषय होती है [इसलिए एक ही वस्तुके वाच्य और प्रकारान्तरसे व्यङ्गय होनेमें कोई आपत्तिकी बात नहीं है यह ग्रन्थकारका अभिप्राय है ]। इस पंक्तिमें थोड़ी-सी दार्शनिक सिद्धान्तोंकी झलक आ गयी है। उन सिद्धान्तोंके ज्ञानके बिना इस पंक्तिके अभिप्रायको समझ सकना सम्भव नहीं है, इसलिए उन सिद्धान्तोंका थोड़ा-सा परिचय यहाँ करा देना आवश्यक है।
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का० ११५, सू० १७४ ] दशम उल्लास: ५१३
न्यायादि दर्शनोंमें प्रत्यक्षज्ञानके दो भेद माने गये हैं एक 'निर्विकल्पक ज्ञान' और दूसरा 'सविकल्पक ज्ञान'। चक्षुका घट आदि पदार्थोंके साथ सम्बन्ध होनेपर उनका प्रत्यक्षज्ञान होता है। प्रथम क्षणमें प्रत्येक प्रत्यक्षज्ञान निर्विकल्पक होता है और बादको वह सविकल्पक ज्ञानके रूपमें परिणत हो जाता है। 'नामजात्यादियोजनाहीनं वस्तुमात्रावगाहि ज्ञानं निर्विकल्पकम्' यह निर्विकल्पक ज्ञानका लक्षण है। अर्थात् जिस ज्ञानमें वस्तुके नाम, जाति, विशेषण आदिका भान न होकर केवल वस्तुके स्वरूपमात्रकी प्रतीति होती है उसको निर्विकल्पक ज्ञान कहते हैं। यद्यपि प्रत्येक वस्तुका ज्ञान होते ही उसके नाम, जाति आदिकी प्रतीति होती है इसलिए सामान्यरूपसे हमारा प्रत्येक ज्ञान 'सविकल्पक ज्ञान' के रूपमें ही अनुभवमें आता है। परन्तु वास्तवमें प्रथम क्षणमें वह नाम, जात्यादिके संसर्गसे रहित ही होता है। इस प्रकारके 'निर्विकल्पक' ज्ञानके समझानेके लिए बालकके ज्ञानको उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया गया है। बालकके सामने एक घड़ो रख दी जाय तो बालकको उस घड़ीका ज्ञान उसी प्रकारका होगा जिस प्रकारका हमको होता है। घड़ीकी गोल आकृति, सफेद डायलपर बन हुए अङ्क, उसकी सुइयाँ आदि जैसी हमको दिखलायी देती हैं उसो प्रकारकी बालकको भी दिखलायी देती हैं। हमारे और उसके ज्ञानके जहाँतक वस्तुके स्वरूपज्ञानका सम्बन्ध है कोई अन्तर नहीं होता है। भेद केवल इतना है कि हम वस्तुके नामादिको जानते हैं इसलिए वस्तुको देखते ही हमें उसके नाम, जात्यादिका स्मरण हो आता है इसलिए हमारा ज्ञान अगले क्षणमें 'सविकल्पक' बन जाता है। परन्तु बालकको घड़ीके नाम, जाति आदि धर्मोंका ज्ञान नहीं है इसलिए उसका ज्ञान 'नामजात्यादियोजनाहीन' और 'वस्तुमात्नावगाही' ही रहता है। इसीको 'निर्विकल्पक' ज्ञान कहते हैं। इसलिए 'निर्विकल्पक' ज्ञानके समझानेके लिए बालकके ज्ञानको ही उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया जाता है, 'बालमूकादिविज्ञानसदृशं निर्विकल्पकम् ।' निर्विकल्पक तथा सविकल्पक ज्ञानके इन लक्षणोंको समझ लेनेपर यह स्पष्ट हो जाता है कि एक ही विषयका पहिले 'निर्विकल्पक' ज्ञान होता है और फिर उसीका सविकल्पक ज्ञान होता है। अर्थात् इन दोनों ज्ञानोंका विषय एक ही होता है परन्तु प्रकारका भेद होता है। जो घट त्रादि 'निर्विकल्पक'- में देखे जाते हैं वे ही 'सविकल्पक' के भी विषय होते हैं। परन्तु जिस रूपमें 'निर्विकल्पक' में देखे जाते हैं उस रूपमें 'सविकल्पक' में नहीं देखे जाते हैं। 'निर्विकल्पक' में नाम, जात्यादिके संसर्गसे रहित वस्तुका भान होता है परन्तु 'सविकल्पक' में नामजात्यादिका संसर्ग भासता है। इसी बातको ग्रन्थकारने 'यदेव दृष्टं तदेव विकल्पयति न तु यथा दृष्टं तथा' इस पंक्तिसे कहा है। 'निर्विकल्पक' और 'सविकल्पक' ज्ञानके जो लक्षण ऊपर किये हैं उनके अनुसार 'निर्विकल्पक' ज्ञान 'नामजात्यादिको योजनासे रहित' तथा 'सविकल्पक' ज्ञान 'नामजात्यादिको योजनाके सहित' होता है। 'निर्विकल्पक' ज्ञान नामजात्यादिके संसर्गसे रहित होता है इसलिए 'असंसृष्टविषयक' होता है और 'सविकल्पक' ज्ञान 'संसर्गविषयक' होता है। यह सामान्य सिद्धान्त है। परन्तु बौद्ध दार्शनिकोंका सिद्धान्त इससे भिन्न है। बौद्धदर्शन क्षणभङ्गवादी दर्शन है। उसके मतमें सभी पदार्थ क्षणिक हैं। कोई भी पदार्थ दो क्षण टिकनेवाला नहीं है। इसलिए नित्यपदार्थकी कल्पना तो उनके मतमें सम्भव ही नहीं है। इसलिए बौद्ध लोग जातिको नहीं मानते हैं। नैयायिकके मतसे जाति नित्य पदार्थ है। वही 'सविकल्पक' ज्ञानका विषय होती है। परन्तु बौद्ध नित्य पदार्थको नहीं मानता है इसलिए उसके मतमें जाति 'सविकल्पक' ज्ञानका विषय नहीं है। बौद्धोंने उसके स्थानपर 'अपोह' पदार्थको माना है। 'अपोह' का अर्थ है 'अतद्व्यावृत्ति'। 'अतद्व्यावृत्ति'का अर् है 'तद्धिन्नभिन्नत्व'। नैयायिक मतमें घटके 'सविकल्पक' ज्ञानमें घटत्व जातिका ज्ञान होता है और घट शब्दका सङ्केतग्रह भी जातिमें ही होता है।
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५१४ काव्यप्रकाशः [का० ११५, सू० १७५-१७६
[सू० १७५ ] उदात्तं वस्तुन: सम्पत् । सम्पत् समृद्धियोगः । यथा- मुक्ता: केलिविसूत्रहारगलिता: सम्मार्जनीभिह ताः प्रातः प्राङ्गणसीम्नि मन्थरचलद्वालांघ्रिलाक्षारुणाः । दूराद्दाडिमबीजशङ्गितधियः कर्षन्ति केलीशुका यद्विद्वन्द्धवनेषु भोजनृपतेस्तत् त्यागलीलायितम् ।५० ६।।3 [सूत्र १७६ ] महतां चोपलक्षणम् ।११५।। उपलक्षणमङ्गभावः अर्थादुपलक्षणीयेऽथे। उदाहरणम्-
अर्थात् घटशब्दका अर्थ व्यक्ति नहीं, जाति ही होता है। परन्तु बौद्धमतमें जातिके स्थानपर सर्वत्र 'अपोह' 'अतद्व्यावृत्ति' या 'तन्द्िन्नभिन्नत्व' से जातिका काम निकाला जाता है। अतः बौद्धमतमें 'कल्पनापोढमभ्रान्तं प्रत्यक्ष निर्विकल्पकम्' यह प्रत्यक्षका लक्षण किया है। इसमें 'कल्पना' शब्दसे नामादि भेदोंका ही ग्रहण होता है। उस 'कल्पना' रूप भेदोंसे रहित निर्विकल्पक ज्ञान ही प्रत्यक्ष प्रमाण है। इसलिए बौद्धमतमें 'निर्विकल्पक' ज्ञान 'कल्पना' से रहित या भेदरहित होता है और 'सविकल्पक ज्ञानमें 'कल्पना' या भेदकी प्रतीति होती है। इसी बातको यहाँ ग्रन्थकारने 'अभिन्नासंसृष्टत्वेन दृष्टं भेदसंसर्गाभ्यां विकल्पयति' लिखकर प्रतिपादन किया है। 'अभिन्न' पदका अरथ 'कल्पनापोढम्' है और 'असंसृष्ट' का अर्थ संसर्गरहित है। बौद्धमतमें निर्विकल्पक ज्ञान 'कल्पनापोढम्' भेदरहित होता है और अन्य मतोंमें वह संसर्गरहित अर्थात् नामाजात्यादिके संसर्गसे रहित होता है। इसी प्रकार सविकल्पक ज्ञान बौद्धमतमें 'कल्पनायुक्त' या भेदयुक्त और अन्योंके मतमें संसरगयुक्त अर्थात् नामजात्यादियोजना- सहित है। इसलिए ग्रन्थकारने बौद्धमत तथा नैयायिकादिके मतोंका साथ-साथ उल्लेख करते हुए ही अभिन्नासंसृष्टत्वेन इत्यादि पंक्ति लिखी है। ३२. उदात्त अलडकार F. [सूत्र १७५]-वस्तुकी समृद्धि [का वर्णन], उदात्त अलङ्गार कहलाता है। [सूत्रमें आये हुए ] 'सम्पत्' [शब्दका अर्थ ] समृद्धिका योग है। जैसे -- [राजा भोजकी स्तुति करते हुए कवि कहता है कि -- ] विद्वानोंके भवनोंमें सुरतकेलिके अवसर- पर [मुक्ताहारके भीतरका डोरा टूट जानेके कारण] सूत्रहीन हारसे गिरे हुए और झाडुओंसे बुहारकर इकट्ठे किये हुए, धीरे-धीरे चलती हुई बालाओंके पैरोंके महावर [की कांति] से लाल-लाल दीखते हुए मोतियोंको मनोरञ्जनके लिए पाले हुए तोते अनारके दाने समझकर खींच रहे हैं यह राजा भोजके दानकी महिमा है।५०६॥ इसमें विद्धानोंके मवनोंकी उत्कृष्ट सम्पत्तिका वर्णन होनेसे उदात्त नामक अलङ्कार है। [सूत्र १७६ ]-और जो किसी प्रधान वर्णनीय अर्थमें ] महापुरुषोंका [उसके प्रति] अङ्गभाव [गौणत्वप्रदर्शन ] है [ वह भी दूसरे प्रकारका उदात्त अलङ्गार है]। [सूत्रमें आये हुए ] उपलक्षण [शब्दका अर्थ ] अङ्गभाव [गौणत्व ] है। अर्थात् प्रधान [उपलक्ष- णीय ] अर्थमें [रामादि सदृश महापुरुषोंके अङ्गभावका वर्णन होनेपर भी उदात्तालङ्गार होता है। उसका] हरण [जंसे ]-
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का० ११६, सू० १७७] दशम उल्लास: ५१५ तदिदमरण्यं यस्मिन् दशरथवचनानुपालनव्यसनी। निवसन् बाहुसहायश्चकार रक्षःक्षयं राम: ।५०७। न चात्र वीररस: तस्येहाङ्गत्वात्। [सू० १७७ ] तत्सिद्धिहेतावेकस्मिन् यत्रान्यत् तत्करं भवेत् । समुच्चयोऽसौ तस्य प्रस्तुतस्य कार्यस्य एकस्मिन्साधके स्थिते साधकान्तराणि यत्र सम्भवन्ति स समुच्चयः । उदाहरणम्- (१) दुर्वाराः स्मरमार्गणाः प्रियतमो दूरे मनोत्युत्सुक गाढं प्रेम नवं वयोऽतिकठिना: प्राणा: कुलं निर्मलम्। स्त्रीत्वं धैर्यविरोधि मन्मथसुहृत् काल: कृतान्तोऽक्षमो नो सख्यश्चतुरा: कथं नु विरह: सोढव्य इत्थं शठः ॥५०८।। लङ्कासे लौटते समय पुष्पक विमानमें बैठे हुए लक्ष्मण दण्डकारण्यको दिखलाते हुए अङ्गवसे कह रहे हैं कि-] यह वह वन है जिसमें रहते हुए दशरथकी आज्ञापालनका ब्रत लिये रामने अकेले ही राक्षसोंका नाश किया था॥५०७॥ यहाँ वर्णनीय दण्डकारण्यका उत्कर्ष दिखलानेके लिए उसके प्रति रामको अङ्गरूपमें उपस्थित किया है। इसलिए दूसरे प्रकारके उदात्तालङ्कारका उदाहरण है। यहाँ यह शङ्का हो सकती है कि यहाँ वीररसको व्यङ्गय मानकर इसे रसध्वनिका उदाहरण माना जा सकता है। तब इसे उदात्ता- लङ्कारका उदाहरण क्यों मानते हैं ? इस शङ्काका उत्तर ग्रन्थकारने यह दिया है कि- यहाँ वीररस [अर्थात् रसध्वनि ] नहीं है। उस [वीररस ]के [ वर्णनीय दण्डकारण्यमें] अङ्ग होनेसे। ३३. समुच्चयालङ्कार [ सू० १७७ ]-उस [कार्य ] की सिद्धिका एक हेतु विद्यमान रहनेपर भी जहाँ अन्य [हेतु भी] उसका साधक हो जाय वह समुच्चय [अलङ्गार कहलाता ] है। उस प्रस्तुत कार्यके एक साधक हेतुके होनेपर भी जहाँ अन्य साधन भी हो जाते हैं वह समुच्चय [अलङ्कार ] होता है। उदाहरण [जैसे ]- [१]कामदेवके बाणोंसे बचना ही कठिन है [ उसपर भी ] पति दूर [परदेश ] गये हुए हैं, मन [सुरतव्यापारके लिए ] अत्यन्त उत्सुक हो रहा है। प्रेम अत्यन्त प्रगाढ़ है, नया यौवन है, प्राण बड़े कठोर हैं [ निकलनेवाले नहीं], कुल निर्मल है[ इसलिए किसी अन्यके समान स्वैर-विहार भी सम्भव नहीं है। तब फिर धैर्य धारण करके बैठ जाओ। पर यह भी असम्भव है क्योंकि] स्त्रीत्व धैर्यका विरोधी है। कामदेवका परममित्र वसन्तकाल है [ इसमें धेर्य धारणकी क्या कथा ? तब फिर यमराजसे ही प्रार्थना करो परन्तु नहीं] यमराज [भी इस विषयमें ] कुछ कर नहीं सकते परन्तु सखियाँ भी चतुर नहीं हैं ऐसी दशामें इस दुष्ट विरहको कैसे सहन किया जाय ॥५०८॥
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५१६ काव्यप्रकाश: [का० ११६, सू० १७७
अत्र विरहासहत्वं स्मरमार्गणा एव कुर्वन्ति तदुपरि प्रियतमदूरस्थित्यादि उपात्तम्। एष एव समुच्चय: सद्योगे, असद्योगे, सदसद्योगे च पर्यवस्यतीति न पृथक् लक्ष्यते। तथाहि- (२) कुलममलिनं भद्रा मूर्तिर्मतिः श्रुतिशालिनी भुजबलमलं स्फीता लक्ष्मीः प्रभुत्वमखण्डितम् । तीहासा प्रकृतिसुभगा ह्येते भावा अमीभिरयं जनो कार व्रजति सुतरां दर्प राजन् ! त एव तवाङकुशाः ॥।५०९॥ अत्र सतां योगः। उक्तोदाहरणे त्वसतां योगः । (३) शशी दिवसधूसरो गलितयौवना कामिनी सरो विगतवारिजं मुखमनक्षरं स्वाकृतेः । प्रभुर्धनपरायण: सततदुर्गतः सज्जनो नृपाङ्गणगतः खलो मनसि सप्त शल्यानि मे ॥५१०। अत्र शशिनि धूसरे शल्ये शल्यान्तराणीति शोभनाशोभनयोगः।
यहाँ कामदेवके बाण ही विरहको असह्य बना देते हैं, उसके ऊपर फिर प्रियवियोग आदिका भी वर्णन किया है [ इसलिए यहाँ समुच्चयालङ्गार है]। यह समुच्चय १. सत् पदार्थके योगमें, २. असत् [अशोभन] के योगमें और ३. शोभनाशोभन [दोनों] के योगमें [तीन भेदोंमें ] समाप्त होता है इस- लिए [ उन तीनों भेदोंके ] अलग लक्षण नहीं किये हैं। [सत्के योग आदिके] उदाहरण [जैसे ]- [२ ]आपका कुल उज्ज्वल है, आकृति बड़ी सुन्दर है, बुद्धि वेदानुसारिणी है, भुजाएँ अत्यन्त बलशालिनी, अपार लक्ष्मी और अखण्डित प्रभुत्व आपके पास है। ये सब पदार्थ स्वभावतः ही सुन्दर हैं। इनके कारण यह [साधारण ] आदमी अभिमानमें भर जाता है परन्तु हे राजन् ! आपके लिए वे ही [अभिमानसे ] निवारण करनेवाले [अंकुश ] हैं [ यह बड़े आश्रर्यकी बात है।] ।।५०ह। यहाँ [सब] उत्तम [पदार्थोंका योग है। और पहिले [कहे हुए उदाहरण सं० ५०८] में अशोभन पदार्थोंका योग है। सदसद्योगमें भर्तहरिके नीतिशतक का निम्नलिखित पद्य उदाहरणरूपमें देते हैं- [३]१. दिनमें कान्तिहीन चन्द्रमा, २. यौवनसे रहित कामिनी, ३. कमलोंसे शून्य तालाब, ४. सुन्दर आकृतिवाले मनुष्यका विद्याविहीन मुख, ५. धनका लोभी राजा, ६. सदा कष्ट भोगनेवाला सज्जन और ७. राजाका कृपापात्र दुष्ट पुरुष, ये सात मेरे मनमें शल्यके समान [चुभते या कष्ट देते] हैं॥५३० । यहाँ चन्द्रमाका कान्तिहीन हो जाना ही कष्टदायक [शल्य ] है उसपर [गलितयौवना कामिनी आदि ] अन्य शल्य [कष्टदायक अन्य कारण] भी इकट्ठे हो गये हैं [ इसलिए समुच्चय अलङ्गार है] यह शोभन और अशोभनका योग दिखलाया है [ इसमें चन्द्रमा, कामिनी आदि शोभन और अशोभन खलका योग होनेसे यह सदसद्योगका उदाहरण माना गया है ।।
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का० ११६, सू० १७८] दशम उल्लास: ५१७
[सू० १७८ ] स त्वन्यो युगपत् या गुणक्रियाः ।११६॥ भार कीहिए गुणौ च क्रिये च गुणक्रिये च गुणक्रियाः । कमेणोदाहरणम्- (१) विदलितसकलारिकुलं तव वलमिदमभवदाशु विमलं च सक सकड प्रखलमुखानि नराधिप ! मलिनानि च तानि जातानि ।५११। ४T (२) अयमेकपदे तया वियोग: प्रियया चोपनतः सुदुःसहो में। नववारिधरोदयादहोभिर्भवितव्यं च निरातपत्वरम्यैः ॥५१२।। (३) कलुषं च तवाहितेष्वकस्मात् सितपङ्गेरुहसोदरश्रि चक्षुः। पतितं च महीपतीन्द्र ! तेषां वपुषि प्रस्फुटमापदां कटाक्षैः ॥५१३॥
[सू० १७८ ]-अथवा दो गुणों या दो क्रियाओं अथवा एक गुण और एक क्रिया [इस रूपमें गुणक्रियाओं]का एक साथ वर्णन [भी दूसरा समुच्चयालङ्गार कहलाता है।] [सूत्रमें आये हुए 'गुणक्रियाः' पदमें द्वन्द्वसमास इस प्रकार करना चाहिये जैसा कि वृत्तिमें दिखलाया है। उसके अनुसार इस 'गुणत्रियाः' पदका अर्थ यह होगा कि १. दो गुण, २. दो क्रियाएँ, ३. एक गुण और एक क्रिया [ ये सब मिलकर] 'गुणक्रियाः' हुए [इनका इस रूपमें युगपद् वर्णन होनेपर दूसरे प्रकारका समुच्चयालङ्गार होता है] कमसे [तीनों प्रकारके ] उदाहरण [आगे देते हैं। जैसे]- (१) हे राजन् ! समस्त शत्रुओंका नाश करनेवाली तुम्हारी यह सेना जैसे ही निर्मल [कीति- शालिनी] हुई वैसे ही दुष्टोंके मुख मलिन [उदास] हो गये ।।५११। यहाँ विमलत्व तथा मलिनत्वरूप दो गुणोंका एक साथ होना 'चकार' के दो बार प्रयोगसे सूचित होता है। अतः यहाँ समुच्चयालद्कार है। [क्रियाके यौगपद्यमें 'विकमोर्वशीय के चतुर्थ अङ्गसे पुरूरवाकी उक्तिको उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया गया है। पुरूरवा कह रहे हैं कि]- (२) प्रियतमा [उर्वशी ] के साथ यह दुस्सह वियोग जैसे ही अकस्मात् उपस्थित हुआ वैसे ही नवीन मेघोंके आ जानेसे धूपरहित दिन मनोहर होने लगे ॥५१२। यहाँ 'उपनतः' तथा 'भवितव्यं' दो क्रियाओरोंका यौगपद्य 'चकार' के दो बार प्रयोगसे व्यक्त हो रहा है इसलिए यहाँ भी समुच्चयालङ्कार है। एक गुण तथा एक क्रियाके यौगपद्यका उदाहरण देते हैं- (३) हे राजन् ! श्वेतकमलके समान आपकी आँख शत्रुओंके प्रति जैसे ही मलिन [करोधसे रक्त ] हुई कि उनके शरीरपर आपत्तियोंके कटाक्ष स्पष्टरूपसे पड़ने लगे ॥५१३॥ काव्यप्रकाशकारने समुच्चयालङ्कारके लक्षणमें काव्यालङ्कारकार रुद्रट तथा अलङ्कारसवंस्वकार रुय्यकके लक्षणोंकी आलोचना की है। समुच्चयके पहिले स्वरूपमें रुद्रटने सद्योग, असद्योग और सदसद्योग ये तीन भेद दिये थे। मम्मटका कहना है कि समुच्चयका पर्यवसान तो स्वयं ही इन तीनमेंसे किसी-न-किसी रूपमें होगा इसलिए उनका अलग लक्षण करनेकी आवश्यकता नहीं।
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५१८ काव्यप्रकाश: [ का० ११७, सू० १७६
'धुनोति चासिं तनुते च कीतिम्' इत्यादेः, 'कृपाणपाणिश्च भवान् रणक्षितौ ससाधुवादाश्च सुराः सुरालये।' इत्यादेश्च दर्शनात् 'व्यधिकरणे' इति 'एकस्मिन् देशे' इति च न वाच्यम्। [सू० १७९] एकं क्रमेणानेकस्मिन् पर्यायः । एकं वस्तु क्र्मेणानेकस्मिन् भवति क्रियते वा स पर्यायः। अत्र क्रमेणेति समुच्चयव्यावर्तनाय। क्रमणोदाहरणम्- (१) नन्वाश्रयस्थितिरियं तव कालकूट ! केनोत्तरोत्तरविशिष्टपदोपदिष्टा । प्रागर्णवस्य हृदये वृषलक्ष्मणोऽथ कण्ठेऽधुना वससि वाचि पुनः खलानाम्।५१४॥ समुच्चयके युगपद् या 'गुणक्रियाः' रूप दूसरे भेदके विषयमें रुय्यकका यह मत है कि युगपत् होनेवाले गुणक्रिया आदि एक ही अधिकरणमें न होकर भिन्न-भिन्न अधिकरणमें होने चाहिये तभी समुच्चयालङ्कार होगा। उन्होंने समुच्चयके इस दूसरे भेदका लक्षण करते हुए स्पष्ट ही लिखा है कि- व्यधिकरणे वा यस्मिन् गुणक्रिये चैककालमेकस्मिन् । उपजायेते देशे समुच्चयः स्यात् तदन्योऽसौ ॥ रुद्रट-काव्यालङ्कार ७,२७। इसमें रुद्रटने यह कहा है कि युगपत् होनेवाले गुणक्रियादि एकदेश एककालमें और भिन्न अ्रधिकरणमें होने चाहिये। परन्तु मम्मट इससे सहमत नहीं हैं। उनका कथन है कि आगे दिये हुए उदाहरणोंमेंसे- '[राजा ] तलवार को चलाता है [ और उसके साथ ही अपनी ] कीतिका विस्तार करता है।' इत्यादिमें ['धुनोति' तथा 'तनुते' दोनों क्रियाएँ एक ही अधिकरण-राजामें रहती हैं, भिन्न अधिकरणमें नहीं]। इसलिए व्यधिकरणमें युगपत् गुण या करिया होनेपर समुच्चयालङ्गार होता है यह कहना उचित नहीं है। [इसी प्रकार ] 'आप जैसे ही युद्धभूमिमें तलवार हाथमें पकड़ते हैं वैसे ही स्वर्गमें देवता लोग साधुवाद करने लगते हैं।' इत्यादिमें [क्रियाओंके भिन्नदेशमें ] देखे जानेसे 'व्यधिकरणे' भिन्न अधिकरणमें और 'एकस्मिन् देशे' एक देशमें [ये जो दो बातें रुद्रटने अपने समुच्चयालङ्गारके लक्षणमें कही हैं वे दोनों बातें ] नहीं कहनी चाहिये। ३. पर्याय अलड्कार [सूत्र १७६]-एक कमसे अनेकमें [होता है अथवा किया जाता है तब ] पर्यायालङ्गार होता है। एक वस्तु कमसे अनेकमें हो, या की जाय वह पर्याय [अलङ्गार] होता है। [यह पर्याय अलङ्गार पहिले कहे हुए पर्यायोक्त अलङ्गारसे भिन्न है]। सूत्रमें 'कमेण' यह पद ससुच्चयालङ्गारसे इसका भेद दर्शानेके लिए है। कमसे [पर्याय अलङ्गारके 'भवति' तथा 'क्रियते' इन दोनों भेदोंके ] उदाहरण [जैसे]- (१) हे कालकूट [विष ] ! तुमको उत्तरोत्तर विशिष्ट पदवाले आश्रयमें रहनेकी स्थिति किसने बतलायी है कि पहिले [तुम ] समुद्रके हृदयमें [ भीतर रहते थे ], फिर शिवजीके कण्ठमें [आये] और अब दुष्टोंकी वाणीमें रहते हो ।।५१४।।
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का० ११७, सू० १७६] दशम उल्लास: ५१६
यथा वा- (२) बिम्बोष्ठ एव रागस्ते तन्वि ! पूर्वमदृश्यत। अधुना हृदयेऽप्येष मृगशावाक्षि ! लक्ष्यते ।५१५॥ रागस्य वस्तुतो भेदेऽप्येकतयाऽध्यवसितत्वादेकत्वमविरुद्धम्। -(३) तं ताण सिरिसहोअररअणाहरणंमि हिअअमेक्करसम् । बिम्बाहरे पिआणं णिवेसिअं कुसुमबाणेण ।।५१६।। [तत्तेषां श्रीसहोदररत्नाहरणे हृदयमेकरसम् । बिम्बाधरे प्रियाणां निवेशितं कुसुमवाणेन । इति संस्कृतम् ]
यहाँ एक कालकूटके अनेक स्थानोंपर रहनेका वर्णन किया गया है इसलिए पर्याय अलङ्कारका उदाहरण है। परन्तु यहाँ भिन्न आश्रयोंमें जानेका कोई प्रयोजक नहीं बताया गया है इसलिए यह 'क्रियते'- का नहीं अपितु 'भवति'का उदाहरण है। इसमें एक कालकूट अनेक स्थानोंमें स्वयं गया है। परन्तु केवल वास्तविक एकत्वमें ही नहीं, कहीं-कहीं आरोपित एकत्वमें भी यह अलङ्कार हो सकता है। इसके दिखलानेके लिए दूसरा उदाहरण देते हैं- [२ ]हे तन्वि ! पहले तो केवल तुम्हारे कुन्दरूके सदृश [लाल ] ओष्ठमें ही राग दिखलायी देता था किन्तु हे मृगशावकके समान [चञ्चल ] नेत्रोंवाली ! अब तो यह राग तुम्हारे हृदयमें भी दिखलायी पड़ने लगा है।५१५।। यहाँ [ओष्ठ और हृदय दोनोंके ] रागका वस्तुतः भेद होनेपर भी [ शब्दसादृश्यके कारण उन दोनोंमें केवल ] औपचारिक एकत्व मान लेनेसे एकत्वका विरोध नहीं होता। इन दोनों उदाहरणोंमें क्रमशः 'एक आश्रयमें स्थिति' तथा 'राग' स्वयं अनेकमें गये हैं उनका प्रयोजक कोई दूसरा नहीं है। अतः वे दोनों 'एकमनेकस्मिन् भवति' इस रूपमें पर्याय अलङ्कारके उदाहरण थे। अगला उदाहरण इस प्रकारका देते हैं जिसमें अन्य प्रयोजकके द्वारा 'एकमनेकस्मिन् करियते' है। यह उदाहरण ध्वन्यालोककार आनन्दवर्धनाचार्यके 'विषमबाणलीला' नामक काव्यमें आया है। स्वयं आनन्दवर्धनाचार्यने 'ध्वन्यालोक' के द्वितीय उद्योतमें इस श्लोकको उद्धुत किया है और उसे अपने 'विषम- बाणलीला' काव्यसे लिया हुआ बतलाया है। [३ ]उन [राक्षसों ] का वह मन [जो पहिले बिष्णुजीके ] कौस्तुभमणिके अपहरणमें लगा हुआ था उसको कामदेवने [प्रियाणां पदसे यहाँ मोहिनी अर्थ अभिप्रेत है अतः ] मोहिनीके अधरबिम्बमें आसक्त कर दिया है ॥५१६॥ 'श्रीसहोदररत्नाहरणे के स्थानपर कहीं 'श्रीसहोदररत्नाभरणे' पाठ भी पाया जाता है। उस पक्षमें 'श्रीसहोदररत्न' अर्थात् कोस्तुभमणि जिनका आरभूषण है ऐसे विष्णुजीमें आसक्त राक्षसोंके मनको कामदेवने मोहिनीके बिम्बाधरमें लगा दिया यह अर्थ होता है। प्राकृत भाषामें लिङ्ग और वचनका नियम नहीं होता है इसलिए एक ही मोहिनीके लिए प्राकृतमें 'प्रियाणां' यह बहुवचनका प्रयोग किया गया है, संस्कृतमें उसका एकवचनमें ही अनुवाद करनेसे सङ्गति ठीक लग सकती है।
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५२० काव्यप्रकाश: [का० ११७, सू० १८०
[सू० १८० ] अन्यस्ततोऽन्यथा अनेकमेकस्मिन् क्रमेण भवति क्रियते वा सोऽन्यः। त्रमेणोदाहरणम्- (१) मधुरिमरुचिरं वचः खलानाममृतमहो प्रथमं पृथु व्यनक्ति। अथ कथयति मोहहेतुमन्तर्गतमिव हालहलं विषं तदेव ।।५१७।। (२) तद्गेहं नतभित्ति मन्दिरमिदं लब्धावकाशं दिव: सा धेनुर्जरती नदन्ति करिणामेता घनाभा घटाः। स क्षुद्रो मुसलध्वनिः कलमिदं सङ्गीतकं योषिता- माश्चर्यं दिवसैद्विजोऽ्यमियतीं भूमि समारोपितः ।।६१८।। अत्रैकस्यैव हानोपादानयोरविवक्षितत्वान्न परिवृत्तिः ।
यहाँ राक्षसोंका मन पहिले कौस्तुभमणिकी प्राप्तिके लिए उत्सुक अथवा विष्णु भगवान्के स्वरूपमें तत्पर था, वह मोहिनीके बिम्बाधरमें आसक्त कर दिया गया और उसका प्रवर्तक कामदेव है। इसलिए यह 'एकमनेकस्मिन् क्रियते' इस रूपके पर्यायालङ्कारका उदाहरण है। [सूत्र १८० ]-उसके विपरीत [अर्थात् 'अनेकमेकस्मिन् भवति करियते वा' इस रूपमें] दूसरे प्रकारका [पर्याय अलङ्गार] होता है। [पहिले लक्षणमें 'एकमनेकस्मिन् भवति क्रियते' यह बात कही गयी थी। अब उससे विपरीत ] अनेकके क्रमशः एकमें होने अथवा किये जानेपर वह दूसरे प्रकारका [पर्यायालड्गार] होता है। कमसे [दोनों प्रकारके ] उदाहरण जैसे -- मधुरताके द्वारा मनको हरण करनेवाला दुष्ट पुरुषोंका वचन पहिले तो अमृतकी वृष्टि-सी करता है किन्तु आश्रर्य है कि बादको [विचार करनेपर ] वही मूच्छित कर देनेवाले [कष्टदायक] भीतर छिपे हुए हालाहल विषको प्रकट करता है।५१७॥ यहाँ अमृतव्यञ्जन और विषकथनरूप अनेक अर्थ एक खलवचनमें कमसे होने हैं, उनका कोई प्रयोजक हेतु कथित नहीं है इसलिए यह 'अनेकमेकस्मिन् भवति' का उदाहरण है। [कहाँ ] वह टूटी-फूटी दीवारोंका घर और [कहाँ आज ] यह गगनचुम्बी महल, [कहाँ इसकी] वह बूढ़ी गाय और [कहाँ आज ] ये मेघोंके समान और [काले-काले और ऊँचे ] हाथियोंकी पंक्तियाँ चिंघाड़ रही हैं, कहाँ वह मूसलका क्षुद्र शब्द और कहाँ [आज सुनायी देनेवाला ] सुन्दरियोंका यह मनोहर संगीत। आश्चर्य है इन [थोड़े-से ] दिनों द्वारा ही यह दरिद्र ब्राह्मण [सुदामा ] इतनी अच्छी हालतपर पहुँचाया गया ॥५१८॥ यहाँ ब्राह्मणमें वह घर, मन्दिर आदि अ्नेकके सम्बन्धका वर्णन किया गया है और उसका प्रयोजक दिवसोंको बतलाया है। इसलिए 'अनेकमेकस्मिन् क्रियते' रूप पर्याय अलङ्कारका उदाहरण है। यहाँ एक ही कर्ता ['कर्तृकर्मणो: कृति' इस सूत्रसे कर्तामें षष्ठी होनेसे एक ही कर्ता यह अर्थ करना चाहिये] के [ एक वस्तुके ] त्याग [और उसके बदलेमें दूसरी वस्तुके ] ग्रहणकी विवक्षा न होनेसे [ यहाँ परिवृत्ति [अलङ्गार] नहीं है [ अर्थात् ] जहाँ एक कर्ता द्वारा एक वस्तुका त्याग करके उसके बदलेमें दूसरी वस्तुका ग्रहण किया जाता है वहीं परिवृत्ति अलङ्गार होता है। इसके साथ ही परिवृत्ति अलङ्कारमें
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का० ११७, सू० १८१] दशम उल्लास: ५२१
[सू० १८१] अनुमानं तदुक्तं यत् साध्यसाधनयोवच: ।११७।
एकके द्वारा त्याग की गयी वस्तुको दूसरा ग्रहण करता है। इस 'तद् गेहं' इत्यादि श्लोकमें इस प्रकारकी बात नहीं है, इसलिए यहाँ परिवृत्ति अलङ्गार नहीं है। यही परिवृत्ति तथा पर्यायका भेद है ]।
३५. अनुमान अलड्कार [सूत्र १८१ ]-साध्य और साधनका जो कथन वह अनुमान (अलड्गार) कहा गया है ॥११७। यह अनुमान अलङ्कारका लक्षण नैयायिकोंके अनुमानके आधारपर किया गया है। परन्तु यहाँ नैयायिकोंके अनुमानप्रमाणसे केवल साध्य तथा साधन दो ही शब्दोंका ग्रहण किया.गया है। अनुमानमें तो इनके अतिरिक्त पक्ष, सपक्ष, विपक्ष, दृष्टान्त आदि अन्य अ्नेक वस्तुओंकी आवश्यकता होती है। उनका ग्रहण न करनेसे यह लक्षण अपूर्ण रह जाता है। यह शङ्का की जा सकती है। उसके समाधानके लिए ग्रन्थकारने अगली पंक्ति लिखी है। उसका आशय यह है कि साध्य और साधन इन दो शब्दोंके ग्रहणसे ही यहाँ अनुमानोपयोगी समस्त शब्दोंका ग्रहण हो जाता है। इस प्रकरणमें भी कुछ दार्शनिक पुट आ गया है इसलिए न्यायके पारिभाषिक शब्दोंको ठीक तरहसे समझ लेनेपर ही इस पंक्तिका भाव स्पष्ट हो सकेगा। अतएव उनका परिचय कराना आवश्यक है। पर्वतादिमें कहीं धूमको उठता देखकर वहाँ वह्निका अनुमान सबको ही होता है। इस अनुमानमें धूम साधन तथा वह्नि साध्य कहलाता है। धूमको देखकर जो वह्निका अनुमान होता है उसका कारण यह है कि हमने धूम और वह्निको अनेक बार साथ-साथ देखा है। इन दोनोंके भूयःसहचारदर्शनसे हमको उनके स्वाभाविक सम्बन्धका अर्थात् 'जहाँ-जहाँ धूम होता है वहाँ-वहाँ वह्नि रहता है' इस व्याप्ति- सम्बन्धका ज्ञान हो गया है। इसलिए जब हम किसी जगह केवल धूमको देखते हैं तो वहाँ न दिखलायी देनेवाले वह्निका भी अनुमान कर लेते हैं। 'यत्र-यत्र धूमस्तत्न तत्र वह्निः' जहाँ-जहाँ धूम होता है वहाँ- वहाँ वह्नि होता है इस स्वाभाविक सम्बन्धका नाम व्याप्ति है। इस व्याप्तिके बलसे जो वह्निका ग्रहण कराता है वह धूमादि 'साधन' या 'लिङ्ग' कहा जाता है और व्नि 'साध्य' कहलाता है। यह साधन तथा साध्यका स्वरूप हुआ। इस साधन या लिङ्गकी साध्यके साथ जो 'व्याप्ति' है वह दो प्रकारकी होती है-एक 'अन्वय- व्याप्ति' और दूसरो 'व्यतिरेकव्याप्ति'। 'यत्र-यत्र धूमस्तत्व तत्र वह्निः' जहाँ-जहाँ धूम होता है वहाँ- वहाँ वह्नि होता है यह 'अन्वयव्याप्ति' हुई। इसके विपरीत जहाँ-जहाँ वह्निका अभाव होता है वहाँ-वहाँ धूमका भी अभाव होता है 'यत्र-यत्र वह्नयभावस्तत्र तत्न धूमाभावः' यह 'व्यतिरेकव्याप्ति' कहलाती है। धूम और वह्निमें यह दोनों प्रकारकी व्याप्ति पायी जाती है। अर्थात् इसकी दोनों प्रकारकी व्याप्तिमें उदाहरण मिल जाते हैं। जहाँ-जहाँ धूम होता है वहाँ-वहाँ वह्नि होता है। इस 'अन्वय-व्याप्ति' में महानस अर्थात् पाकशाला [रसोईधर ] उदाहरण है। क्योंकि महानसमें धूम तथा वह्निको साथ-साथ देखा जा सकता है। इसलिए 'अन्वयव्याप्ति' में महानस उदाहरण होता है। इसके विपरीत जहाँ-जहाँ वह्निका अभाव होता है वहाँ-वहाँ धूमका भी अभाव होता है यह 'व्यतिरेकव्याप्ति' कहलाती। इस 'व्यतिरेक- व्याप्ति' में महाह्नद या तालाब उदाहरण है। तालाबमें वाह्निका अभाव है तो वहाँ धूमका भी अभाव है। इस प्रकार धूम हेतुकी अन्वयव्याप्ति तथा व्यतिरेकव्याप्ति दोनोंमें उदाहरण मिल जाते हैं इसलिए यह 'अन्वयव्यतिरेकी' कहलाता है।
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५२२ काव्यप्रकाश: [का० ११७, सू० १८१
पक्षधर्मान्वयव्यतिरेकित्वेन त्रिरूपो हेतु: साधनम् । धर्मिणि अयोगव्यवच्छेदो व्यापकस्य साध्यत्वम्। यथा- यत्रता लहरीचलाचलादृशो व्यापारयन्ति भ्रुवं यत्तत्रैव पतन्ति सन्ततममी मर्मस्पृशो मार्गणाः ।
परन्तु कुछ हेतु ऐसे होते हैं जिनमें दोनों प्रकारकी व्याप्तिमें उदाहरण न मिलकर केवल किसी एक ही प्रकारकी व्याप्तिमें उदाहरण मिलते हैं। ऐसे हेतु जिनमें केवल अन्वयव्याप्तिमें उदाहरण मिलता है 'केवलान्वयी हेतु' कहलाते हैं और जिन हेतुओंक़ा केवल व्यतिरेकव्याप्तिमें उदाहरण मिलते हैं वे 'केवलव्यतिरेकी' कहलाते हैं। इनमेंसे जो अन्वयव्यतिरेकी हेतु होता है उसमें पक्षसत्त्व, सपक्षसत्त्व, विपक्षव्यावृत्तत्व, अबाधित- विषयत्व तथा असत्प्रतिपक्षत्व ये पाँच रूप अवश्य पाये जाते हैं। इनमेंसे किसी भी रूपका अभाव होनेपर वह हेतु, शुद्ध हेतु न होकर 'हेत्वाभास' माना जाता है। इन पाँच रूपोंमें जो पक्ष, सपक्ष और विपक्ष शब्द आये हैं उनके विशेष अर्थ हैं। पक्षका लक्षण है 'सन्दिग्धसाध्यवान् पक्षः' जिसमें साध्य वह्नि आदि सिद्ध होनेके पूर्व सन्दिग्ध अवस्थामें रहते हैं उसको 'पक्ष' कहते हैं। जैसे 'पर्वतो वह्निमान्' आदि पूर्व- प्रदर्शित अनुमानमें पर्वतमें वह्निका सन्देह हीता है। इसलिए पर्वत 'पक्ष' है। 'सपक्ष'का लक्षण 'निश्चितसाध्यवान् सपक्षः' जिसमें साध्य वह्नि आदि निश्चितरूपसे रहते हैं, यह किया गया है। जैसे उक्त अनुमानमें महानस अर्थात् पाकशालामें वह्नि निश्चितरूपसे विद्यमान रहता है इसलिए महानस 'सपक्ष' कहलाता है। इसी प्रकार विपक्षका लक्षण 'निश्चितसाध्याभाववान् विपक्षः' यह किया गया है अ्थात् जिसमें साध्य वह्नि आदिका अभाव निश्चितरूपसे रहता है उ सको विपक्ष कहते हैं। मुख्य रूपसे पक्षसत्त्व, सपक्षसत्त्व और विपक्षव्यावृत्तत्व इन तीनों धर्मोंका हेतुमें होना आवश्यक है। अन्य दो अर्थात् अबाधितविषयत्व तथा असत्प्रतिपक्षत्वको इन्हींके भीतर समाविष्ट किया जा सकता है। इसलिए ग्रन्थ- कारने यहाँ 'त्रिरूपो हेतुः साधनम्' तीनों रूपोंसे युक्त हेतु ही साधन कहलाता है यह कहा है। उन तीनों धर्मोंको ग्रन्थकारने 'पक्षधर्मत्वान्वयित्वव्यतिरेकित्वेन' इस शब्दसे कहा है। इसका अर्थ होता है पक्ष- धर्मत्व, अन्वयित्व तथा व्यतिरेकित्व ये तीन हेतुके स्वरूप हैं। इनको ही न्यायमें पक्षसत्त्व, सपक्षसत्त्व तथा विपक्षव्यावृत्तत्व नामसे कहा गया है। तीनों रूपोंसे युक्त हेतुका ही यहाँ 'साधन' शब्दसे ग्रहण किया जाता है। अतः उसके ही अन्तर्गत अनुमानप्रमाणके प्रसङ्गमें प्रयुक्त होनेवाले सब शब्दोंका अन्तर्भाव हो जाता है। इसलिए यहाँ साध्य-साधन शब्दोंके ग्रहण द्वारा अनुमानोपयोगी समस्त शब्दोंका ग्रहण समझ लेना चाहिये यह ग्रन्थकारका अभिप्राय है। पक्षधर्मत्व [पक्षसत्त्व ], अन्वयित्व [सपक्षसत्त्व ] तथा व्यतिरेकित्व [विपक्षव्यावृत्तत्व ] रूपसे तीन धर्मोंसे युक्त [त्रिरूप: ] हेतु 'साधन' [कहलाता ] है। और [धर्मी अर्थात् ] पक्षमें व्यापक [अर्थात् वह्नि आदि] के अभावका निषेध अयोगव्यवच्छेद [अर्थात् अभावका अभाव अर्थात् अवश्य सत्ता ही उसका ] साध्यत्व है [ अयोगव्यवच्छेदका अर्थ यहाँ अन्यूनातिरिक्तविषयत्व है ]। [अनुमान अलङ्गारका उदाहरण ] जैसे -- जलतरङ्गोंके समान अत्यन्त चञ्चल नेत्रोंवाली ये [प्रसिद्ध तरुणियाँ ] जहाँ जिसपर अपनी आँख चला देती हैं वहीं ये [ कामदेवके ] मर्मवेधी बाण जो निरन्तर गिरने लगते हैं इससे विदित होता है
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का० ११८, सू० १८२] दशम उल्लास: ५२३ धावत्यग्रत एव शासनधरः सत्यं सदासां स्मरः ॥५१९॥ साध्यसाधनयो: पौर्वापर्यविकल्पे न किन्चिद्वैचित्र्यमिति न तथा दशितम्। [सू० १८२ ] विशेषणैर्यत्साकृतैरुक्तिः परिकरस्तु सः। अर्थाद्विशेष्यस्य। उदाहरणम्- महौजसो मानधना धनार्चिता धनुर्भृतः संयति लब्धकीर्तयः । न संहतास्तस्य न भेदवृत्तयः प्रियाणि वाञ्छन्त्यसुभिः समीहितुम् ॥५२०। कि धनुषको चढ़ाये हुए और बाणके ऊपर ही हाथ रखे हुए उनका आज्ञाकारी कोधयुक्त कामदेव सचमुच सदा इनके आगे-आगे ही दौड़ता रहता है।५१६।। यहाँ पूर्वार्द्धमें कहा हुआ अर्थ साधनरूप है और उत्तरार्द्धमें कहा हुआ अर्थ साध्यरूप है। इसलिए यहाँ अनुमानालङ्कार है। यत् और तत् शब्दोंसे उन दोनों धर्मोंकी व्याप्ति सूचित की गयी है। रुद्रटने अनुमानालद्कारके दो भेद किये हैं-एक वह जिसमें पहिले साधनका कथन हो और बादमें साध्यका कथन हो और दूसरा वह जिसमें पहिले साध्यका और बादमें साधनका कथन हो। जैसे यह श्लोक जो ऊपर दिया है उसमें पहिले साधन कहा गया है और साध्य बादमें कहा गया है इसलिए वह पहिले भेदका उदाहरण है। पहिले साध्य तथा बादमें साधनका कथन जहाँ हो उस प्रकारका उदाहरण भर्तृहरि- के 'नीतिशतक' का निम्नाङित श्लोक है- मधु तिष्ठति वाचि योषितां हृदि हालाहलमेव केवलम्। अरत एव निपीयतेऽधरो हृदयं मुष्टिभिरेव ताडयते।। मम्मटके मतमें इस साध्य-साधनके पौर्वापर्यके परिवर्तनके चमत्कारमें कोई अन्तर नहीं आता है, इसलिए इस प्रकारका अलग भेद करनेकी आवश्यकता नहीं है। इसी बातको वे अगली पंक्तिमें कहते हैं- साध्य और साधनके आगे-पीछे बदलनेसे कोई विचित्रता नहीं होती है, इसलिए [रुद्रटके समान] उस प्रकारको नहीं दिखलाया है। ३६. परिकर अलङ्कार [सूत्र १२८ ]-अभिप्राययुक्त [साकूत ] विशेषणोंके द्वारा जो [किसी बातका ] कथन करना है वह परिकर [अलङ्गार कहलाता] है। अर्थात् विशेष्यका [साभिप्राय विशेषणोंसे कथन करना परिकरालङ्गार कहलाता है]। उदाहरण (जैसे)- 'किरातार्जुनीय' महाकाव्यके प्रथम सर्गमें दुर्योधनका समाचार देते हुए युधिष्ठिरके प्रति उनका गुप्तचर कह रहा है कि- महाबलशाली, आत्मगौरवकी भावनासे युक्त, धनसे सत्कृत, [किसी दुर्भावनासे ] न मिले हुए और न परस्पर विरोधी, युद्धमें लब्धकीति धनुर्धारी अपने प्राणों[ के बलिदान ]से भी उस [दुर्योधन] के अभीष्टको सिद्ध करना चाहते हैं॥५२०॥ यहाँ 'महौजसः', 'मानधनाः' आदि विशेषण धनुर्धारियोंके दुर्योधनके प्रति स्वाभाविक प्रेमको
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५२४ काव्यप्रकाश: [का० ११८, सू० १८३ यद्यप्यपुष्टार्थस्य दोषताभिधानात् तवनिराकरणेन पुष्टार्थस्वीकार: कृतः तथाप्येक- निष्ठत्वेन बहूनां विशेषणानामेवमुपन्यासे वैचित्र्यमित्यलङ्कारमध्ये गणितः । निगूढमपि वस्तुनो रूपं कथमपि प्रभिन्नं केनापि व्यपदेशेन यदपहनूयते सा व्याजोक्तिः। न चैषाऽपह्नुतिः प्रक्ृताप्रकृतोभयनिष्ठस्य साम्यस्येहासम्भवात् । उदाहरणम्- सूचित करनेके लिए दिये गये हैं। जो अपने प्राणोंकी भी बाजी लगाकर दुर्योधनका प्रिय कार्य करना चाहते हैं सो कुछ दुर्योधनके भयसे डरकर या चाटुकारीके लिए नहीं अपितु स्वाभाविक प्रेमवश ही ऐसा कर रहे हैं। वैसे तो वे स्वयं महाबलशाली और युद्धमें ख्याति पाये हुए हैं इसलिए दुर्योधनसे डरनेका कोई प्रश्न ही उनके सामने नहीं है। और वे स्वाभिमानी हैं इसलिए चाटुकारिता उनको छू भी नहीं सकती है। अतः उनका सारा व्यापार स्वाभाविक स्नेहवश ही है यह विशेष अभिप्राय इन विशेषणोंसे निकलता है। अतः यहाँ परिकरालङ्कार है। यहाँ प्रश्न यह होता है कि साभिप्राय विशेषणोंके होनेपर आपने परिकरालङ्कार माना है परन्तु वह तो कोई अलद्कार नहीं केवल दोषाभावरप है क्योंकि यदि साभिप्राय विशेषण न होंगे तो निरर्थक होंगे। उस दशामें, जैसा कि पहिले कहा जा चुका है, तपुष्टार्थत्व दोष होगा। साभिप्राय विशेषणोंसे उस अपुष्टार्थत्वका परिहार हो जाता है, उसको अलद्कार मानना उचित नहीं। इसका समाधान करनेके लिए ग्रन्थकारने अगली पंक्तियाँ लिखी है। समाधानका आशय यह है कि जहाँ इस प्रकारके अ्नेक विशेषण एक विशेष्यके साथ जुड़ते हैं तब कुछ विशेष चमत्कार वाक्यमें आ जाता है इसलिए इसको अलङ्कार माना है। इसी बातको कहते हैं- यद्यपि अपुष्टार्थको दोष कहनेसे उसके निराकरणसे [दोषाभावरूप ] पुष्टार्थका स्वीकार किया गया है। [उसको अलङ्गार मानना उचित नहीं है] फिर भी एक [विशेष्य ] में रहनेवाले अनेक विशे- षणोंको इस प्रकारसे [एक वाक्यमें ] रखनेसे [वाक्यमें विशेष प्रकारका ] वैचित्य आ जाता है इसलिए [इसको ] अलङ्कारोंमें गिना गया है। जयदेवने अपने 'चन्द्रालोक' में विशेष्यांशके साभिप्राय होनेपर परिकराङकुर नामक अलङ्कार माना है। उसके विषयमें सुधासागरकारका यह मत है कि वहाँ भी विशेषणांशर्की ही साभिप्रायता माननी चाहिये, क्योंकि विशेषणके बिना केवल विशेष्यांश किसी प्रकारसे भी साभिप्राय नहीं हो सकता है। इसलिए परिकराङकुरको अलग अलद्कार माननेकी आवश्यकता नहीं है। मम्मटकृत काव्यप्रकाश समाप्त कुछ विद्वानोंका मत है श्रीमम्मटाचार्यकृत 'काव्यप्रकाश' यहाँपर ही समाप्त हो जाता है। इससे आगेका भाग मम्मटाचार्यका नहीं अपितु अल्लटसूरिका बनाया हुआ है। इस सम्बन्धमें 'कृतः श्रीमम्मटाचार्यवयें: परिकरावधिः। प्रबन्ध: पूरितः शेषो विधायाल्लटसूरिणा ।।' यह श्लोक हम पहले ही उद्धृत कर चुके हैं। ३७. व्याजोक्ति अलङ्कार [he [सूत्र १८३ ] प्रकट हुए वस्तुके स्वरूपको किसी बहानेसे छिपाने [के प्रयत्न या वर्णन] को व्याजोक्ति [अलङ्गार] कहते हैं ॥११८॥ वस्तुका गुप्त स्वरूप भी जब किसी प्रकार प्रकट हो जाय तो किसी बहानेसे उसको छिपानेका
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का० ११८, सू० १८३ ] दशम उल्लास: ५२५
शैलेन्द्रप्रतिपाद्यमानगिरिजाहस्तोपगूढ़ोल्लसद्- रोमाञ्चादिविसंष्ठुलाखिलविधिव्यासङ्गभङ्गाकुलः । हा शैत्यं तुहिनाचलस्य करयोरित्यूचिवान् सस्मितं समा शैलान्तःपुरमातृमण्डलगणैर्दृष्टोऽवताद्वः शिवः ।५२१।। अत्र पुलकवेपथू सात्त्विकरूपतया प्रसृतौ शैत्यकारणतया प्रकाशितत्वादपलपित- स्वरूपौ व्याजोक्ति प्रयोजयतः ।
जो प्रयत्न किया जाता है वह व्याजोक्ति [अलङ्गार कहलाता ] है। [अपहनुति अलङ्कारसे व्याजोक्तिका भेद दिखलाते हैं] और यह [व्याजोक्ति ] अपहनुति [अलङ्गारके अन्तर्गत] नहीं [ हो सकती] है [ क्योंकि अपहनुतिमें प्रकृत और अप्रकृत अर्थात् उपमेय और उपमानका साम्य विवक्षित होता है, उस साम्यके द्वारा ही उपमेयका अपह्लव किया जाता है। परन्तु ] यहाँ [व्याजोक्तिमें ] प्रकृत तथा अप्रकृतका साम्य नहीं होता है [ यही अपह्नुति तथा व्याजोक्तिका भेद है]। उदाहरण [जैसे ]- [शिव-पार्वतीके विवाहमें कन्यादानके अवसरपर ] हिमालयके द्वारा सम्पित किये जाते हुए पार्वतीके हाथके स्पर्शसे समुद्भूत रोमाश्वादि [आदि शब्दसे कम्परूप सात्त्विक भावका भी ग्रहण होता है] के कारण [वैवाहिक विधिके ] सारे क्रिकया-कलापके गड़बड़ा जानेसे [ मेरी रति प्रकट हो गयी इस शङ्गासे] घबड़ाये हुए [और उसके छिपानेके लिए] 'हाय, हिमालयके हाथ बड़े शीतल हैं' कहनेवाले [और उनके इस बहानेको समझ लेनेवाली ] हिमालयके अन्तःपुरकी स्त्रियाँ और [ब्राह्मी आदि ] मातृमण्डल एवं [नन्दी आदि] गणोंके द्वारा मुस्कुराते हुए देखे गये शिव तुम्हारी रक्षा करें ॥५२१॥ यहाँ [पार्वतीके हाथके स्पर्शसे उत्पन्न सात्त्विकभावरूप ] रोमाश्व तथा कम्प सात्त्विकभावरूपसे प्रकट हो गये परन्तु [हिमालयके हाथके स्पर्शसे ] शैत्यके कारण हुए हैं इस प्रकार प्रकाशित करते हुए [उनकी सात्त्विकभावरूपताको ] छिपाया गया है इसलिए वे व्याजोक्ति [अलङ्गार] को सूचित करते हैं।
३८. परिसंख्या अलडार जिस प्रकार अनुमान अलङ्कार न्यायदर्शनके प्रतिपाद्य अनुमान प्रमाणके आधारपर बनाया गया है उसी प्रकार परिसंख्या अलङ्कारका आधार मीमांसादर्शनके परिसंख्याविधिको माना जा सकता है। मीमांसादर्शनमें विधिके तीन भेद किये हैं-१. सामान्यविधि, २. नियमविधि तथा ३. परिसंख्या- विधि। जहाँ सर्वथा अप्राप्त बातका विधान किया जाता है वह सामान्यविधि कहलाती है। 'अग्निहोत् जुहुयात् स्वर्गकामः' आदि अ्रत्यन्त अ्र्प्रप्राप्त अ्रर्थका विधान करते हैं इसलिए वे सामान्यविधिरूप कहे जाते हैं। पाक्षिक प्राप्ति होनेपर नियमविधि होती है जैसे 'ब्रीहीनवहन्ति' इसमें व्रीहि अर्थात् जौका अवघात अर्थात् कूटनेका विधान किया गया है। जौके कूटनेका प्रयोजन उसके छिलकोंको दूर करना है। छिले हुए जौसे पुरोडाश तैयार किया जाता है और उसकी यज्ञमें श्ाहुति दी जाती है। इसलिए जौके वितुषी- करण अर्थात् छिलका हटानेके लिए अवघातका विधान किया गया है। यह वितुषीकरण या छिलका हटानेका कार्य नखविदलन द्वारा भी हो सकता है। जैसे खरबूजेके बीज छीले जाते हैं इसी प्रकार जौ
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५२६ काव्यप्रकाशः [ का ११६, सू० १८४
[सू० १८४ ] किंचित्पृष्टमपृष्टं वा कथितं यत्प्रकल्पते । तादृगन्यव्यपोहाय परिसंख्या तु सा स्मृता ।।११९।। प्रमाणान्तरावगतमपि वस्तु शब्देन प्रतिपादितं प्रयोजनान्तराभावात्सदृशवस्त्व- न्तरव्यवच्छेदाय यत्पर्यवस्यति सा भवेत्परिसंख्या। अत्र च कथनं प्रश्नपूर्वक तदन्यथा च परिदृष्टम्। तथोभयत्र व्यपोह्यमानस्य प्रतीयमानता वाच्यत्वं चेति चत्वारो भेदाः । क्मेणोदाहरणम् -- (१) किमासेव्यं पुंसों ? सविधमनवद्यं द्युसरितः किमेकान्ते ध्येयं ? चरणयुगलं कौस्तुभभृतः । भी छीले जा सकते हैं। ऐसा सोचकर कोई कूटनेके बजाय नखविदलन द्वारा वितुषीकरणमें प्रवृत्त हो सकता है। उस अवस्थामें अवघातकी प्राप्ति नहीं रहेगी। अर्थात् अवघातकी एक पक्षमें प्राप्ति होती है, एक पक्षमें नहीं। इसलिए यह पाक्षिक प्राप्ति है। इस पाक्षिक प्राप्तिमें जब नखविदलनपक्षमें अवघातकी प्राप्ति नहीं रहती उस समय प्रापक नियमविधि लागू होती है। उसका अभिप्राय यह है कि अवघातके द्वारा वितुषीकरण करना चाहिये। तीसरा भेद 'परिसंख्याविधि' है। जहाँ दोनोंकी युगपत् प्राप्ति हो वहाँ उनमेंसे एकका निषेध करनेवाली विधि 'परिसंख्याविधि' कहलाती है। वैसे परिसंख्याका स्वरूप तो विधिपरक होता है परन्तु उसका फलितार्थ अन्यके निषेधमें होता है। जैसे 'पञ्च पञ्चनखा भक्ष्याः' यह वाक्य देखनेमें भक्ष्यताका विधान कर रहा है पर उसका आशय भक्षणके विधानमें नहीं अपितु 'पञ्चपञ्चनखव्यतिरिक्ता अभक्ष्याः पाँच पञ्चनखोंसे अतिरिक्तके भक्षणका निषेध करनेमें है। इसीके आधारपर यहाँ परिसंख्या अलङ्कारका निरूपण किया गया है। इस परिसंख्या अलङ्कारमें भी कही हुई बातका फलितार्थ अन्यका निषेध करनेमें होता है। वह अन्यका निषेध कहीं प्रश्नपूर्वक और कहीं अप्रश्नपूर्वक दो प्रकारसे हो सकता है और जिस वस्तुका निषेध किया जा रहा है वह भी कहीं वाच्यरूप और कहीं व्यङ्गयरूपसे दो प्रकारकी हो सकती है। इस प्रकार परिसंख्याके चार भेद हो जाते हैं। [सूत्र १८४]-कोई पूछी गयी या बिना पूछी हुई कही गयी बात जो उसी प्रकारकी अन्य वस्तुके निषेधमें पर्यवसित होती है वह परिसंख्या कहलाती है ॥११६॥ अन्य प्रमाणसे ज्ञात वस्तु भी जब [अनुवादरूपमें ] शब्दसे प्रतिपादित होकर, [उस प्रतिपादनका ] अन्य प्रयोजन न होनेसे अपने सदृश अन्य वस्तुके निषेधमें परिणत हो जाती है वह परिसंख्या [अलङ्गार] होता है। यहाँ अन्यके निषेधमें पर्यावसित होनेवाली वस्तुका ] कथन [कहीं] प्रश्नपूर्वक और [कहीं उससे भिन्न अर्थात् ] बिना प्रश्नके [दो प्रकारका] देखा जाता है और दोनों जगह जिसका निषेध किया जा रहा है वह [कहीं] व्यङ्गय और [कहीं] वाच्य [दो प्रकारका ] होता है। इस प्रकार [परिसंख्याके ] चार भेद होते हैं। कमसे [चारों भेदोंके ] उदाहरण [जैसे]- १. प्रश्नपूर्वक प्रतीयमानव्यवच्छेद्य परिसंख्याका उदाहरण देते हैं- मनुष्योंको किसका सेवन करना चाहिये ? [यह प्रश्न है, इसका उत्तर देते हैं कि गङ्गाके उत्तम तटका [अर्थात् अन्य नदियोंके तट अथवा स्त्रीनितम्बादिका सेवन नहीं करना चाहिये]। एकान्तमें
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का० ११६, सू० १८४ ] दशम उल्लास: ५२७ किमाराध्यं ? पुण्यं किमभिलषणीयं ? च करुणा यदासक्त्या चेतो निरवधि विमुक्त्यै प्रभवति ॥५२२॥ (२) कि भूषणं सुदृढ़मत्र ? यशो न रत्नं कि कार्यमार्यचरितं सुकृतं न दोषः । किं चक्षुरप्रतिहतं धिषणा न नेत्रं जानाति कस्त्वदपर: सदसद्विवेकम् ।५२३। (३) कौटिल्यं कचनिचये करचरणाधरदलेषु रागस्ते। काठिन्यं कुचयुगले तरलत्वं नयनयोर्वसति ॥५२४।।
किसका ध्यान करना चाहिये ? [इस प्रश्नका उत्तर है कि कौस्तुभधारी [श्रीकृष्ण भगवान् ] के चरण- युगलका [ध्यान करना चाहिये अन्य किसी देवका या स्त्री आदिका ध्यान नहीं करना चाहिये]। किसकी आराधना करनी चाहिये ? [इस प्रश्नका उत्तर है] पुण्यकी [ उसका फलितार्थ है-पापकी नहीं ]। और किसकी कामना करनी चाहिये ? [इस प्रश्नका उत्तर है कि ] करुणाकी [फलितार्थ है -- अन्य हिंसादिकी कामना नहीं करनी चाहिये ]। जिन [दयुसरित् आदि ] के प्रेमसे चित्त सदाके लिए मुक्तिकी प्राप्ति कर सकता है॥५२२॥ यहाँ गङ्गातट, विष्णुके चरणयुगल आदिका सेव्यत्व पुराणादिमें प्रसिद्ध ही है इसलिए उनके सेव्यत्वका प्रतिपादन करना इस पद्यका प्रयोजन नहीं है अपितु उनसे भिन्न स्त्रीनितम्बादि अन्य सांसारिक वस्तुओंकी सेव्यताका निषेध करनेके लिए इसकी रचना हुई है। इसलिए यह परिसंख्याका उदाहरण है और वह भी प्रश्नपूर्वक व्यङ्गयव्यवच्छेद्य परिसंख्याका। २. प्रश्नपूर्वक वाच्यव्यवच्छेद्य परिसंख्याका दूसरा उदाहरण देते हैं- इस संसारमें चिरस्थायी रहनेवाला अलङ्गार कौन-सा है ? [यह प्रश्न है, इसका उत्तर देते हैं कि] यश [ही चिरस्थायी रहनेवाला अलङ्गार है] रत्न नहीं। [मनुष्यको ] क्या करना चाहिये ? [इस प्रश्नका उत्तर है कि ] सज्जनों द्वारा किया जानेवाला पुण्य कर्म [ही करने योग्य है] दोष [ या पाप ] नहीं। कहीं भी व्यर्थ न होनेवाला [ अर्थात् अपरोक्ष अर्थोंको भी देख सकनेमें समर्थ ] नेत्र कौन-सा है ? [इस प्रश्नका उत्तर है कि ] बुद्धि [ही अपरोक्ष अर्थोंको देख सकनेवाला नेत्र है। यह बाह्य ] आँख नहीं। [उत्तर देनेवालेके उत्तरोंसे सन्तुष्ट होकर प्रश्न करनेवाला उत्तरदाताकी प्रशंसा करते हुए कह रहा है कि ] तुम्हारे सिवा भले-बुरेके भेदको पहिचाननेवाला और कौन हो सकता है ॥५२३॥ यह यश आदिका चिरस्थायित्व सर्वविदित ही है इसलिए उसका प्रतिपादन इस पद्यका प्रयोजन नहीं है अपितु रत्नादिके चिरस्थायित्वका निषेध करना ही प्रयोजन है। यह निषेध प्रश्नपूर्वक किया जा रहा है और जिसका निषेध किया जा रहा है वह रत्नादि भी यहाँ शब्दतः उपात्त होनेसे वाच्य है। इसलिए यह प्रश्नपूर्वक वाच्यव्यवच्छेद्य परिसंख्याका उदाहरण है। ३. अप्रश्नपूर्वक प्रतीयमानव्यवच्छेद्य परिसंख्याका तीसरा उदाहरण देते हैं- [हे प्रिये ] तुम्हारे केशपाशमें वक्रता [घुंघरालापन ], तुम्हारे हाथ, पैर और अधरमें राग [लालिमा ], कुचयुगलमें कठोरता और आँखोंमें चश्चलता निवास करती है॥५२४॥ यहाँ केशपाशमें कुटिलता है इससे हृदयमें कुटिलता नहीं है। हाथ, पैर और अधरमें राग है,
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५२८ काव्य प्रकाश: [ का० १२०, सू० १८५
(४) भक्तिर्भवे न विभवे व्यसनं शास्त्रे न युवतिकामास्त्रे। चिन्ता यशसि न वपुषि प्रायः परिदृश्यते महताम् ।।५२५।। [सू० १८५ ] यथोत्तरं चेत्पूर्वस्य पूर्वस्यार्थस्य हेतुता । तदा कारणमाला स्यात् उत्तरमुत्तरम्प्रति यथोत्तरम् । उदाहरणम् -- जितेन्द्रियत्वं विनयस्य कारणं गुणप्रकर्षो विनयादवाप्यते। गुणप्रकषण जनोऽनुरज्यते जनानुरागप्रभवा हि सम्पदः ॥५२६॥ इससे अन्य पुरुषमें राग नहीं है, कुचयुलगमें कठोरता है इससे हृदयमें कठोरता नहीं है और आँखोंमें चञ्चलता है इससे मनमें चञ्चलता नहीं है, यह अभिप्राय होनेसे यह परिसंख्याका उदाहरण है। इसमें जिनका निषेध किया जा रहा है उनका शब्दतः ग्रहण नहीं किया गया है और न प्रश्नोत्तरके रूपमें बात कही गयी है, इसलिए यह अप्रश्नपूर्विका व्यङ्गयव्यवच्छेदिका परिसंख्याका उदाहरण है। ४. अप्रश्नपूर्विका वाच्यव्यवच्छेदिका परिसंख्याका चौथा उदाहरण देते हैं- प्रायः महापुरुषोंकी परमात्मामें भक्ति पायी जाती है सम्पत्तिमें नहीं, उनको शास्त्रमें व्यसन [रुचि ] होता है कामदेवके अस्त्ररूप युवतियोंमें [व्यसन ] नहीं होता। उनको यशकी चिन्ता होती है शरीरकी चिन्ता उनमें नहीं देखी जाती है।५२५।। यहाँ जिनका निषेध किया जा रहा है उन विभव आदिका शब्दतः ग्रहण किया गया है और बातक। प्रतिपादन बिना प्रश्नके हुआ है इसलिए यह अप्रश्नपूर्विका वाच्यव्यवच्छेदिका परिसंख्याका उदाहरण है ३९. कारणमाला अलड्गार [सूत्र १८५]-जहाँ अगले-अगले अर्थके प्रति पहिले-पहिले अर्थ हेतु [रूपमें वणित ] हों वहाँ कारणमाला [नामक अलङ्गार ] होता है। [यहाँ उत्तरम्-उत्तरं प्रति] अगले-अगलेके प्रति यह 'यथोत्तरम्' [ पदका समास तथा अर्थ है ]। उदाहरण [जैसे ]- जितेन्द्रियत्व विनयका कारण है और विनयसे गुणोंका प्रकर्ष प्राप्त होता है। गुणोंके प्रकर्षसे लोगोंका अनुराण होता है और जनानुरागसे सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है ॥५२६॥ यहाँ उत्तर-उत्तरके प्रति पूर्व-पूर्वकी हेतुताको उपलक्षण मानकर पूर्व-पूर्वके प्रति उत्तर-उत्तरकी हेतुता वर्णित होनेपर कारणमाला अलङ्कार होता है। यहाँ यद्यपि अ्नेक कार्योंका वर्णन होनेसे कार्यमाला भी पायी जाती है फिर भी इसमें कारणके ऊपर ही कविका विशेष संरम्भ प्रतीत होता है, इसलिए यह कारणमाला अलङ्गार ही माना जाता है। उद्भट आदि आचार्योंने एक 'हेतु' अलङ्कार भी माना है। वह 'हेतु' अलङ्कार मम्मटके 'काव्यलिङ्ग' तथा 'कारणमाला' दोनों अलङ्कारोंसे भिन्न है। उसका लक्षण अभेदेनाभिधा हेतुरहेतोहेतुमता सह'-हेतु और हेतुमान् अर्थात् कार्य और कारणका अभेद वर्णित होनेपर 'हेतु' अलङ्कार होता है, यह किया है। मम्मट उस रूपमें 'हेतु'को अलग अलङ्कार नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि 'आयुर्घृ तम्' आदिमें कार्यकारणका अभेद प्रदर्शित किया गया है परन्तु उसमें कोई विशेष चमत्कार नहीं है इसलिए उसको अलङ्कार मानना उचित नहीं है। इसलिए हमने उसका लक्षण नहीं किया है। हमारे मतमें काव्यलिङ्गका ही दूसरा नाम हेतु अलङ्कार है। इसी बातको आगे कहते हैं-
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का० १२०-१२१, सू० १८६ ] दशम उल्लास: ५२६
"हेतुमता सह हेतोरभिधानमभेदतो हेतुः" इति हेत्वलङ्कारो न लक्षितः । आयुर्धृतमित्यादिरूपो ह्येष न भूषणतां कदाचिदहंति वैचित्र्याभावात् । अविरलकमलविकासः सकलालिमदश्च कोकिलानन्दः । रम्योऽयमेति सम्प्रति लोकोत्कण्ठाकरः काल: ।५२७॥ इत्यत्र काव्यरूपतां कोमलानुप्रासमहिम्नैव समाम्नासिषुरन पुनर्हेत्वलङ्कारकल्पन- येति पूर्वोक्तकाव्यलिङ्गमेव हेतुः [सू० १८६ ] क्रिकियया तु परस्परम् ॥१२०। वस्तुनोर्जननेऽन्योन्यम्। अर्थयोरेकक्रियामुखेन परस्परं कारणत्वे सति अन्योन्यनामाऽलङ्कारः । उदाहरणम्-
'हेतुमान् [कार्य]के साथ हेतु [कारण ]का अभेदसे कथन करना 'हेतु' होता है।' [इस प्रकार उङ्धट आदिने जिस 'हेतु' का लक्षण किया है] उस हेतु अलङ्कारका हमने प्रतिपादन नहीं किया है [ उस 'हेतु' अलङ्गारका हमने लक्षण नहीं किया है]। क्योंकि 'आयुर्घृतम्' [आयुके कारण- भूत घीको आयु कह देने ] आदिके समान चमत्काररहित होनेके कारण वह कदापि अलङ्गार कहलाने योग्य नहीं है। इसपर शङ्का यह होती है कि आगे कहे जानेवाले 'अविरलकमलविकासः' इत्यादि श्लोकको जो कि उद्धटके अनुसार 'हेतु' अलङ्कारका उदाहरण है, भामह आदि प्राचीन आचार्योने भी काव्यरूप माना है, यदि आप 'हेतु' अलङ्ारको नहीं मानते हैं तो इस श्लोकमें काव्यरूपता न बननेसे भामह आदिके साथ आपका विरोध आता है। इस शङ्काका समाधान मम्मट यह करते हैं कि भामह आदिने जो इसमें काव्यरूपता मानो है वह तो कोमल अनुप्रासके सद्भावसे बन जाती है। इसलिए 'हेतु'को अलग अलङ्गार माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है। इसी बातको ग्रन्थकार अगली पंक्तिमें निम्नलिखितप्रकार कहते हैं- निरन्तर कमलोंका जिसमें विकास हो रहा है, समस्त भ्रमर-समूहको मस्त करनेवाला, कोकिलाओंका आनन्दस्वरूप और संसारको उत्कण्ठित करनेवाला यह रमणीय [वसन्त ] काल आ रहा है।।५२७।। इसमें [ भामह आदिने ] कोमल अनुप्रासके कारण ही काव्यरूपताका प्रतिपादन किया है, न कि 'हेतु' अलङ्गारकी कल्पना करके [ उसे काव्यरूप माना है]। इसलिए पूर्वोक्त काव्यलिङ्ग [अलङ्गार ] ही 'हेतु' [ अलङ्गार कहा जा सकता ] है। [उससे भिन्न उद्धटका कहा हुआ यह हेतु अलङ्कार मानने योग्य नहीं है]। ४०. अन्योन्य अलड्कार [सू० १८६]-क्रियाके द्वारा दो पदार्थोके एक-दूसरेके उत्पादनमें [ 'यत् वैचित्यं' यह अध्याहार करके अर्थ होगा] अन्योन्य [अलङ्गार कहलाता ] है। एक क्रियाके द्वारा दो पदार्थोंके परस्पर कारण होनेपर अन्योन्य नामक अलङ्गार होता है। जैसे --
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५३० काव्यप्रकाश: [ का० १२१-१२२, सू० १८७ हंसाणं सरेहिं सिरी सारिज्जइ अह सराण हंसेहिं। अण्णोण्णं विअ एए अप्पाणं णवर गरुअन्ति ॥५२८।। [हंसानां सरोभि: श्रीः सार्यतेजथ सरसां हंसैः । अन्योन्यमेवैत आत्मानं केवलं गुरूकुर्वयन्ति ।। इति संस्कृतम्] अत्रोभयेषामपि परस्परं जनकता मिथःश्रीसारतासम्पादनद्वारेण [सू० १८७] उत्तरश्रुतिमात्रत ः । प्रश्नस्योन्नयनं यत्र कियते तत्र वा सति ॥१२१।। असकृद्यदसम्भाव्यमुत्तरं स्यात् तदुत्तरम्। (१) प्रतिवचनोपलम्भादेव पूर्ववाक्यं यत्र कल्प्यते तदेकं तावदुत्तरम्। उदाहरणम् -- वाणिअअ हत्थिदन्ता कुत्तो अम्हाणं वग्धकित्ती अ। जाव लुलितालअमुही घरम्मि परिसक्कए सोण्हा ।।५२९।। [वाणिजक ! हस्तिदन्ताः कुतोऽस्माक व्याघकृत्तयश्च। यावत् लुलितालकमुखी गृहे परिष्वक्कते स्नुषा । इति संस्कृतम् ] हस्तिदन्तव्याघ्रकृत्तीनामहमर्थी ता मूल्येन प्रयच्छेति केतुर्वचनम् अमुना वाक्येन समुन्नीयते।
तालाबोंके द्वारा हंसोंकी शोभा बढ़ती है और हंसोंके द्वारा तालाबोंकी श्रीवृद्धि होती है। ये दोनों एक-दूसरेके द्वारा अपने ही गौरवको बढ़ाते हैं॥५२८॥ यहाँ एक-दूसरेकी श्रीवृद्धिके द्वारा दोनों एक दूसरेके कारण [जनक] हैं। ४१. उत्तर अलड्कार [सू० १८७]-उत्तरके श्रवणमात्रसे जहाँ प्रश्नकी कल्पना की जाती है [ वह उत्तर अलङ्गार होता है] अथवा प्रश्नके होनेपर अनेक बार जो असम्भाव्य उत्तर दिया जाय वह [दूसरे प्रकारका ] उत्तर अलङ्कार होता है। उत्तरकों सुनकर ही जहाँ पूर्ववाक्य [अर्थात् प्रश्न ]की कल्पना कर ली जाय वह एक प्रकारका उत्तर [अलङ्गार] होता है। जैसे -- हे वणिक् ! जबतक चश्चल अलकों [ लटों]से युक्त मुखवाली यह पुत्रवधू घरमें घूमती है तबतक हाथीदाँत और व्याघ्रचर्म हमारे यहाँ कहाँ मिल सकते हैं ? [क्योंकि पुत्र तो इसको छोड़कर बाहर जाता नहीं तब कौन इन चीजोंको लाये] ॥५२६॥ [यह व्याधका उत्तरवाक्य है। इसके सुनने मात्रसे प्रश्नरूप ] मैं हाथीदाँत और व्याघ्रचर्म लेना चाहता हूँ तुम मूल्य लेकर उनको दो इस क्रय करनेवालेके वाक्यकी कल्पना इस उत्तरवाक्यके द्वारा की जाती है [ अतः यहाँ उत्तर अलङ्गार है]। यहाँ यह शङ्का हो सकती है कि प्रश्न होनेपर उत्तर दिया जाता है इसलिए प्रश्न कारण है, उत्तर कार्य है। उत्तर सुननेसे प्रश्नका ज्ञान करना कार्यसे कारणका ज्ञान है। इसलिए इसको या तो काव्यलिङ्ग अलद्दार कहा जा सकता है अथवा फिर अनुमान अलङ्कारके भीतर इसका अन्तर्भाव
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का० १२२, सू० १८७ ] दशम उल्लास: ५३१ न चैतत् काव्यलिङ्गम्, उत्तरस्य ताद्रूप्यानुपपत्तेः । नहि प्रश्नस्य प्रतिवचनं जनको हेनुः। नापीदमनुमानम्, एकधमिनिष्ठतया साध्यसाधनयोरनिर्देशादित्यलङ्कारा- न्तरमेवोत्तरं साधीयः । (२) प्रश्नादनन्तर लोकातिकान्तगोचरतया यदसम्भाव्यरूपं प्रतिवचनं स्यात्तद- परमुत्तरम् । अनयोश्च सक्ृदुपादाने न चारुताप्रतीतिरित्यसकृदित्युक्तम् । उदाहरणम् -- का विसमा देव्वगई कि लद्धं जं जणो गुणग्गाही। कि सोख्खं सुकलत्तं किं दुक्खं जं खलो लोओ ।५३०।। Pg हो सकता है। इसलिए इस उत्तर अलङ्कारको अलग नहीं मानना चाहिये। इस शङ्काका समाधान करने के लिए ग्रन्थकारत््रगली पंक्तियोंमें काव्यलिङ्ग तथा त्रनुमान दोनों अपलङ्कारोंसे इस उत्तर अलङ्कारका भेद दिखलाते हैं। काव्यलिङ्ग अलङ्कारसे तो इस उत्तर अलङ्कारका यह भेद है कि यहाँ उत्तरसे प्रश्नकी कल्पना को जाती है परन्तु प्रश्न उत्तरका ज्ञापक हेतु है, कारक हेतु नहीं। काव्यलिङ्ग अलङ्कार कारक या उत्पादक हेतुके होनेपर ही होता है। ज्ञापक हेतु काव्यलिङ्ग अलङ्कारका विषय नहीं है। अतः यहाँ काव्यलिङ्ग अलद्दार नहीं हो सकता है। अनुमान अलङ्कार यहाँ इसलिए नहीं हो सकता है अनुमानस्थलमें साध्य वह्नि तथा साधन धूप, दोनों एकधर्मी अर्थात् पक्षमें रहते हैं। पक्षमें धूमके होनेपर पक्ष पर्वतादिमें ही वन्निकी सिद्धि होती है। परन्तु यहाँ साध्य अर्थात् प्रश्न केता वणिकनिष्ठ है और साधन अर्थात् उत्तर व्याधनिष्ठ है। इसलिए दोनोंके एकधर्ममिनिष्ठ न होनेसे अनुमान नहीं है। इसलिए यह उत्तरालङ्कार काव्यलिङ्ग तथा अनुमान दोनों अलङ्कारोंसे भिन्न तीसरा अलग ही अलद्कार है। इसी बातको ग्रन्थकार अगली पंकतियोंमें कहते हैं- यह काव्यलिङ्ग [अलङ्गार] नहीं है। क्योंकि उत्तर [अर्थात् प्रतिवचन काव्यलिङ्गका कारक ] हेतु नहीं हो सकता है। [ताद्रूप्यानुपत्तेः अर्थात् हेतुत्वानुपपत्तेः ] क्योंकि [ हेतु कारक और ज्ञापक भेदसे दो प्रकारका होता है। इनमेंसे काव्यलिङ्गका विषय केवल कारक हेतु होता है। ज्ञापक हेतु उसका विषय नहीं होता है। परन्तु यहाँ] उत्तर प्रश्नका कारक हेतु नहीं है, अतः यह काव्यलिङ्ग नहीं हो सकता है]। और न यह अनुमान [अलङ्गार] हो सकता है। क्योंकि यहाँ साध्य [प्रश्न ] और साधन [उत्तर ] दोनोंका एकधमिनिष्ठरूपसे निर्देश नहीं किया गया है [ अनुमानमें जिस पर्वतादिरूप धर्मी अर्थात् पक्षमें धूमादि साधन रहता है उसी धर्मोमें साध्य वह्नि रहता है। यहाँ साधनरूप प्रतिवचन व्याधनिष्ठ और साध्यरूप प्रश्न वणिकनिष्ठ है अतः भिन्नाधिकरण होनेके कारण यह अनुमान अलङ्कार भी नहीं है] इसलिए उत्तरको अलग अलङ्गार मानना ही उचित है। [उत्तर अलङ्गारका दूसरा भेद दिखलाते हैं] -- अथवा प्रश्नके बाद जो अलौकिक असम्भाव्य-सा उत्तर [अनेक बार ] दिया जाता है वह दूसरे प्रकारका उत्तर [अलङ्गार है। इन दोनोंके एक बार कहनेमें चमत्कारकी प्रतीति नहीं होती है इसलिए 'लक्षणमें असकृत्'] 'अनेक बार'यह कहा है। उदाहरण जैसे]- दुर्ज्ञेय क्या है ? दैव [भाग्य ] की गति [दुर्ज्ञेय]। क्या प्राप्त करने योग्य है ? गुणग्राही जन। सुख क्या है ? उत्तम भार्या और दुःख क्या है ? दुष्ट आदमी ॥५३०।
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५३२ काव्यप्रकाश: [का० १२२-२३, सू० १८८
[का विषमा दैवगतिः कि लब्धव्यं यत् जनो गुणग्राही।
कणशान किं सौख्यं सुकलत्रं किं दुःखं यत् खलो लोक: ॥ इति संस्कृतम् ] प्रश्नपरिसंख्यायामन्यव्यपोहे एव तात्पर्यम् । इह तु वाच्ये एव विश्रान्तिरित्य- नयोरविवेक: । [सू० १८८ ] कुतोऽपि लक्षितः सूक्ष्मोऽप्यर्थोऽन्यस्म प्रकाश्यते ॥१२२॥ धर्मेण केनचिद् यत्र तत् सूक्ष्मं परिचक्षते। कुतोऽपि आकारादिङ्गिताद् वा। सूक्ष्मस्तीक्ष्णमतिसंवेद्यः । उदाहरणम् -- वक्त्रस्यन्दिस्वेदविन्दुप्रवन्धैर्दृष्ट्वा भिन्नं कुङकुमं कापि कण्ठे। पुंस्त्वं तन्व्या व्यञ्जयन्ती वयस्या स्मित्वा पाणौ खड्गलेखां लिलेख ।।५३१।। अत्राकृतिमवलोक्य कयापि वितर्कितं पुरुषायितम्, असिलतालेखनेन वैदग्ध्या- दभिव्यक्तिमुपनीतम्। पुंसामेव कृपाणपाणितायोग्यत्वात्। यथा वा -- इत्यादि अभी परिसंख्याके भेदोंमें प्रश्नपूर्विका परिसंख्या दिखलायी थी और उसका 'किमासेव्यं पुंसां' (श्लोक ५२२) इसी प्रकारका उदाहरण दिया था। इसलिए यह शङ्का उपस्थित होती है कि प्रश्नपूर्विका 'परिसंख्या' और 'उत्तर' के इस दूसरे प्रकारमें परस्पर क्या भेद है ? इस प्रश्नका उत्तर ग्रन्थकार अगली पंक्तिमें इस प्रकार देते हैं कि- प्रश्न [पूर्विका] परिसंख्यामें अन्यका निषेध करनेमें ही तात्पर्य होता है और यहाँ [अन्यके निषेधमें तात्पर्य न होकर ] वाच्यार्थमें ही विश्रान्ति हो जाती है यही इन [ प्रश्नपूर्विका परिसंख्या तथा प्रश्नपूर्वक उत्तररूप ] दोनों [अलङ्कारों]का भेद है। ४२. सूक्ष्म अलङ्गार [सूत्र १८८ ]-दुर्ज्ञेय [सूक्ष्म] भी अर्थ किसी भी प्रकारसे जान लिया गया है यह बात [अथवा जाना हुआ सूक्ष्म अर्थ भी] जहाँ किसी [स्मारक] धर्मसे दूसरेको बतलायी जाती है उसको सूक्ष्म [अलङ्कार] कहते हैं। किसी भी अर्थात् आकार या चेष्टा आदिसे। सूक्ष्म अर्थात् तीक्ष्णबुद्धिवालोंके ही समझने योग्य। उदाहरण [जैसे ]- [सम्भोगके बाद निकलती हुई सखीके ] मुखपरसे [नीचे गलेकी ओर] बहनेवाले पसीनेकी बूंदों- की धारासे [नायिकाके ] कण्ठमें लगी हुई केसरको बिगड़ी हुई देखकर किसी [सूक्ष्म दृष्टिवाली] सखीने मुसकराते हुए [ उस सुभुक्ता ] सुन्दरीके [सुरतकालीन ] पुरुषायितको सूचित करते हुए [ पुरुषत्वसूचक] तलवारकी तस्वीर [उसके ] हाथपर बना दी ॥५३१। यहाँ [कृतसम्भोगा सखीकी ] आकृतिको देखकर किसी [सखी]से [सुरतकालमें किये हुए उसके ] पुरुषायितको ताड़ लिया और [उसके हाथपर ] तलवारका चिह्न बनानेके द्वारा चतुरतासे उसको प्रकाशित कर दिया, क्योंकि पुरुषोंके ही हाथमें तलवार योग्य होती है। अथवा [इङ्गितसे लक्षित अर्थके प्रकाशनका उदाहरण ] जैसे-
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का० १२३-१२४ सू० १८६-१६०] दशम उल्लास: ५३३
सङ्केतकालमनसं विटं ज्ञात्वा विदग्धया। हसन्नेत्रार्पिताकूतं लीलापझ्मं निमीलितम् ॥५३२।। अत्र जिज्ञासितः सक्केतकालः कयाचिदिङ्गितमात्रेण विदितो निशासमयशंसिना कमलनिमीलनेन लीलया प्रतिपादितः । [सू० १८९] उत्तरोत्तरमुत्कर्षो भवेत्सार: परावधि: ॥१२३।। पर: पर्यन्तभागोऽवधिर्यस्य धाराधिरोहितया तत्रवोत्कर्षस्य विश्रान्तेः । उदाहरणम्- राज्ये सारं वसुधा वसुधायां पुरं पुरे सौधम् सौधे तल्पं तल्पे वराङ्गनानङ्गसर्वस्वम् ॥५३३॥ [सू० १९०] भिन्नदेशतयात्यन्तं कार्यकारणभूतयोः । युगपद्धर्मयोयंत्र ख्यातिः सा स्यादसङ्गति ॥१२४॥ इह यद्देशं कारणं तद्देशमेव कार्यमुत्पद्यमानं दृष्टं यथा धूमादि। यत्र तु हेतुफल- रूपयोरपि धर्मयोः केनाप्यतिशयेन नानादेशतया युगपदवभासनम्, सा तयोः स्वभावो- त्पन्नपरस्परसङ्गतित्यागादसङ्गतिः । उदाहरणम्-
किसी चतुरा [उपनायिका ]ने हँसकर नेत्रोंमें अभिप्राय लानेवाले उपपतिको [मिलनेके ] सङकेत- समयको जाननेकी इच्छा इसकी है यह जानकर [हाथमेंका ] लीलाकमल बन्द कर दिया ॥५३२॥ यहाँ जिज्ञासित सङकेतकालको किसी [विदग्धा उपनायिका ]ने इशारेसे समझ लिया और रात्रि समयके सूचक कमलको बन्द करनेके द्वारा सुन्दरताके साथ उसको प्रकाशित कर दिया है [ इसलिए यह सूक्ष्म अलड्कारका उदाहरण है ]। ४३. सार अलङ्कार [सूत्र १८६]-जहाँ पराकाष्ठापर्यन्त उत्तरोत्तर [अगले-अगले ] का उत्कर्ष वणित हो वह सार [नामक अलङ्कार] होता है॥१२३। पर अर्थात् चरम भाग [पराकाष्ठा ] जिसकी अवधि है। क्योंकि करमशः बढ़ते हुए उसी [पराकाष्ठा]में उत्कर्षकी विश्रान्ति होती है। उदाहरण [जैसे-] राज्यका सार पृथ्वी है, पृथ्वीमें नगर, नगरमें राजमहल, महलमें [सारभूत ] पलॅग और पलँगका [भी सार ] कामदेवका सर्वस्वभूत वराङ्गना है ॥५३३। ४४. असङ्गति अलङ्गार [सूत्र १६०]-जहाँ कार्यकारणभूत दो धर्मोंकी भिन्नदेशतया और [युगपत् ] एक साथ प्रतीति हो वह असङ्गति [अलङ्कार ] होता है ॥१२४। लोकमें जिस स्थानपर कारण होता है उसी स्थानपर कार्यकी उत्पत्ति देखी जाती है। जैसे धूमादि [कार्य वहीं उत्पन्न होता है जहाँ उसका कारण वह्नि आदि रहता है]। परन्तु जहाँ कार्यकारणभूत दो धर्मोंकी किसी विशेषताके कारण भिन्न देशमें [अथवा] एक साथ प्रतीति होती है उन दोंनों की
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५३४ काव्यप्रकाश: [osp [का० १२५, सू० १६१ जस्सेअ वणो तस्सेअ वेअणा भणइ तं जणो अलिअं। दन्तक्खअं कवोले वहूए वेअणा सवत्तीणं ।।५३४।। [यस्यैव व्रणस्तस्यैव वेदना भणति तज्जनोऽलीकम् । दन्तक्षतं कपोले वध्वा वेदना सपत्नीनाम् ।। इति संस्कृतम् ] एषा च विरोधबाधिनी न विरोधः, भिन्नाधारतयैव द्वयोरिह विरोधिताया: प्रतिभासात् । विरोधे तु विरोधित्वम् एकाश्रयनिष्ठमनुक्तमपि पर्यवसितम्। अपवाद- विषयपरिहारेणोत्सर्गस्य व्यवस्थितेः । तथा चैवं निर्दाशतम्। [सू० १९१ ] समाधि: सुकरं कार्यं कारणान्तरयोगतः । साधनान्तरोपकृतेन कर्त्रा यदक्लेशेन कार्यमारब्धं समाधीयते स समाधिर्नाम। उदाहरणम्- मानमस्या निराकर्त्तु पादयोमे पतिष्यतः । उपकाराय दिष्टयेदमुदीर्णं घनगजितम् ।५३५॥।
स्वभावजन्य परस्पर सङ्गतिके त्याग देनेसे असङ्गति [अलङ्गार होता] है। [असङ्गतिका] उदाहरण [जैसे ]- जिसके घाव होता है उसीको वेदना होती है [ यह बात जो ] लोग कहते हैं वह झूठ है। [क्योंकि पतिके द्वारा किया गया] दन्तक्षत वधूके गालमें है और [उसको देखकर ] सपत्नियोंके हृदयमें वेदना होती है।।५३४।। व यह [असङ्गति ] विरोधकी बाधिका है। [स्वयं ] विरोध [अलङ्गार ] रूप नहीं है। क्योंकि यहाँ [कांरणभूत दन्तक्षत तथा कार्यभूत वेदना ] दोनोंका विरोध भिन्नाधारतया ही प्रतीत हो रहा है। विरोध [अलङ्गार]में बिना कहे भी एक आश्रयनिष्ठ विरोधित्व ही फलित होता है, क्योंकि अपवादके स्थलको छोड़कर सामान्य नियम [उत्सर्ग ] ही सर्वत्र रहता है। यही बात [विरोधाभासके निरूपणमें ] दिखलायी भी है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि जहाँ भिन्नाधिकरण धर्मोंका एकाधिकरणमें आ जानेके कारण विरोध प्रतीत होता है वह विरोधाभासका विषय है और जहाँ समानाधिकरण धर्मोंकी वैयधिकरण्येन प्रतीतिके कारण विरोधका भान हो वहाँ असङ्गति अलद्कार ही होता है। यह इन दोनोंका भेद है। ४५. समाधि अलङ्कार [सूत्र १६१ ] -- जहाँ अन्य कारणके आ जानेसे कार्य सुकर हो जाता है वहाँ समाधि [अलङ्गार] होता है। [पूर्वसिद्ध कारणोंके अतिरिक्त ] अन्य कारणकी सहायता प्राप्त हो जानेसे जहाँ कर्ता प्रारम्भ किये हुए कार्यको सरलतासे सम्पादन कर लेता है वह समाधि [नामक अलंकार] होता है। उदाहरण [जैसे]- इस [नायिका]के मानको दूर करनेके निमित्त इसके पैरोंपर गिरनेके लिए उद्यत मेरी सहायताके लिए भाग्यसे मेघोंका गर्जन होने लगा [ जिससे इसका मान तत्काल ही दूर हो गया] ॥५३५॥
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का० १२५-१२६, सू० १६२-१६३ ] दशम उल्लास: ५३५
[सू० १९२] समं योग्यतया योगो यदि सम्भावितः क्वचित् ॥१२५।। इदमनयोः श्लाध्यमिति योग्यतया सम्बन्धस्य नियतविषयमध्यवसानं चेत्तवा समम्। तत्सद्योगेऽसद्योगे च। उदाहरणम्- (१) धातुः शिल्पातिशयनिकषस्थानमेषा मृगाक्षी रूपे देवोऽप्ययमनुपमो दत्तपत्रः स्मरस्य। जातं दैवात्सदृशमनयोः सङ्गतं यत् तदेतत् शृङ्गारस्योपनतमधुना राज्यमेकातपत्रम् ॥५३६।। (२) चित्रं चित्रं बत बत महच्चित्रमेतद्विचित्रं जातो दैवादुचितरचनासंविधाता विधाता। यन्निम्बानां परिणतफलस्फीतिरास्वादनीया यच्चैतस्या: कवलनकलाकोविदः काकलोकः ।५३७। [सू० १९३ ] क्वचिद्यदतिवैधम्यान्न श्लेषो घटनामियात् । कर्तुः क्रियाफलावाप्तिनै वानर्थश्च यद् भवेत् ॥१२६।
४६. सम अलड्कार [सूत्र १६२]-यदि कहीं [ दो विशेष वस्तुओंका ] योग्यरूपसे सम्बन्ध वणित हो तो सम [नामक अलङ्कार ] होता है ।।१२०।। यह इन दोनों [विशेष वस्तुओं ] का [सम्बन्ध ] श्लाघ्य है इस प्रकार योग्य होनेसे नियत [वस्तु ] विषयक सम्बन्धका निश्च्चय [अध्यवसान ] हो तो [वहाँ] 'सम' [नामक अलंकार ] होता है। १. उत्तम [वस्तुओंके ] योगमें और २. असद् वस्तुओंके योगमें [इस तरहसे यह दो प्रकारका ] होता है [दोनों प्रकारके ] उदाहरण [जैसे ]- (१) यह मृगाक्षी [नायिका ] ब्रह्माके रचनाकौशलकी परीक्षाकी कसौटी है और कामदेवका भी [साम्मुख्यके लिए], आह्वान करनेवाला यह राजा भी रूपमें अनुपम है। भाग्यसे इन दोनोंका जो यह मेल हो गया है इससे अब शृङ्गारका एकच्छत्र राज्य आ गया है [ यह समझना चाहिये। यह सद्योगमें सम अलङ्गारका उदाहरण है। ] ।।५३३।। (२) देखो,देखो आश्चर्य, महान् आश्चर्यकी विचित्र बात है कि भाग्यसे विधाता उचित सृष्टि- रचनाका करनेवाला हो गया। क्योंकि [उसने ] नीमकी पकी हुई निबौलियोंके अपूर्व रस [स्फीति ] को पान करने योग्य बनाया है और उसके खानेकी कलामें निपुण काकसमुदायको बनाया है ॥५३७॥ यहाँ काक और निबौलोके सुन्दर सम्बन्धका वर्णन किया गया है। ये दोनों ही हीन श्रेणीके असत् पदार्थ हैं इसलिए यह असद्योगमें 'सम' अलङ्गारका उदाहरण है। ४७. विषम अलङ्कार [सूत्र १६३]-(१) कहीं [सम्बन्धियोंके ] अत्यन्त वैधर्म्यके कारण जो उनका सम्बन्ध न बनता प्रतीत हो [वह एक प्रकारका विषमालंकार होता है। और दूसरे प्रकारका विषम अलंकार
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५३६ काव्यप्रकाश: १ छT [ का० १२७, सू० १६३ गुणक्रियाभ्यां कार्यस्य कारणस्य गुणत्रिये।RD P कमेण च विरुद्धे यत् स एष विषमो मतः ॥१२७॥ (१) द्वयोरत्यन्तविलक्षणतया यत् अनुपपद्यमानतयैव योगः प्रतीयते, (२) यच्च किञ्चिदारभमाण: कर्ता क्रियायाः प्रणाशात् न केवलमभीष्टं यत्फलं न लभेत यावदप्राथि- तमप्यनर्थं विषयमासादयेत् (३) तथा सत्यपि कार्यस्य कारणरूपानुकारे यत् तयोर्गणौ (४) क्रिये च परस्परं विरुद्धतां व्रजतः स समविपर्ययात्मा चतूरूपो विषमः । कमेणोदाहरगम्- (१) शिरीषादपि मृद्ङ्गी क्वेयमायतलोचना। अयं क्व च कुकूलाग्निकर्कशो मदनानलः ॥५३८॥ (२) सिंहिकासुतसन्त्रस्तः शशः शीतांशुमाश्रितः । जग्रसे साश्रयं तत्र तमन्यः सिंहिकासुतः ॥५३९॥
वहाँ होता है जहाँ कि ] (२) कर्ताको [अपनी] करियाके [अभीष्ट ] फलकी प्राप्ति न हो और उलटा अनर्थ हो जाय [तो वह दूसरे प्रकारका विषमालंकार कहलाता है] और (३) कार्यके गुण तथा (४) क्रियासे जो कारणके गुण तथा क्रियाका क्रमशः वैपरीत्य हो वह [तीसरे तथा चौथे प्रकारका ] विषम [अलंकार ] होता है।।।।१२६- १२७।। (१) दो [सम्बन्धियों]के अत्यन्त भिन्न होनेके कारण जो उनका सम्बन्ध अनुपपद्यमानरूपसे ही प्रतीत होता है [ वह प्रथम प्रकारका विषमालंकार होता है]। (२) जहाँ किसी [ कार्य ] को आरम्भ करनेवाला कर्ता क्रियाका नाश हो जानेसे न केवल अपने अभीष्ट फलसे ही वश्वित हो जाय बल्कि अप्राथित अनर्थविषयको प्राप्त हो [वह दूसरे प्रकारका विषमालंकार होता है। और कार्यके कारणके अनुरूप होनेपर भी जो उनके गुण (३) और करिया (४) विरुद्ध हो जायँ तो वह सम [अलंकार]के विपरीत स्वरूपवाला चार प्रकारका विषम [अलङ्कार] होता है। कमसे [चारों भेदोंके ] उदाहरण [आगे देते हैं। जैसे ]- ग (१) सिरस [के फूल ] से भी अधिक कोमल अङ्गोंवाली कहाँ यह दीर्घलोचना [नायिका] और कहाँ तुषाग्निके समान असह्य यह कामाग्नि ॥५६८॥ यहाँ मदनानल और नायिका दोनोंके अत्यन्त विलक्षण होनेसे उनका सम्बन्ध अनुपन्न-सा प्रतीत हो रहा है इसलिए यहाँ विषमालङ्वार है। श्लोकमें दो बार क्व-शब्दके प्रयोगसे नायिका तथा मदनानलके सम्बन्धकी अनुपपद्यमानता व्यङ्गय है। विषमालङ्कारके दूसरे भेदका उदाहरण है -- (२) शेरनीके बच्चेसे भयभीत होकर हरिण [अपनी रक्षाके लिए] चन्द्रमाकी शरणमें गया किन्तु [वहाँ भी उसकी रक्षा न हो सकी बल्कि वहाँ ] उसको [दूसरे सिहिकापुत्र अर्थात्] राहुने आश्रय [अर्थात् चन्द्रमा ]के सहित ग्रस लिया॥५३६॥ यहाँ शेरसे बचनेके लिए मृगने चन्द्रमाकी शरण ली थी परन्तु उसको इष्ट फलकी प्राप्ति न हो सकी। उलटे राहुके द्वारा शाश्रय सहित ग्रस लिये जानेसे अनर्थकी प्राप्ति हो गयी है। फ्रा आा
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का० १२७, सू० १६३ ] y37 दशम उल्लास:
(३) सद्यः करस्प्शमवाप्य चित्रं रणे रणे यस्य कृपाणलेखा।29 0p] तमालनीला शरदिन्दुपाण्डु यशस्त्रिलोक्याभरणं प्रसूते ॥५४०।। (४) आनन्दममन्दमिमं कुवलयदललोचने ददासि त्वम् । TTE
विरहस्त्वयैव जनितस्तापयतितरां शरीरं मे ॥५४१॥ अत्रानन्ददानं शरीरतापेन विरुध्यते। एवम्- विपुलेन सागरशयस्य कुक्षिणा भुवनानि यस्य पपिरे युगक्षये। मदविभ्रमासकलया पपे पुनः स पुरस्त्रियैकतमयैकया दृशा ॥५४२॥ इत्यादावपि विषमत्वं यथायोगमवगन्तव्यम् ।
(३) प्रत्येक युद्द्धमें जिसके हाथका स्पर्श प्राप्त करके तमालके समान नीलवर्णकी तलवार तुरन्त ही तीनों लोकोंके अलङ्गाररूप, शरदिन्दुके समान शुभ्रवर्णके यशको उत्पन्न करती है ॥५४०॥ यहाँ कार्यभूत यश औौर कारणभूत कृपाण दोनोंके गुण एक-दूसरेसे विपरीत हैं। कृपाण तमालके समान नीलवर्ण है परन्तु उससे शरदिन्दुके समान शुभ्रवर्ण यशकी उत्पत्ति वणित है। इसलिए यह विषमालङ्कारके तीसरे भेदका उदाहरण है। यह श्लोक पद्मगुप्तके 'नवसाहसाङ्कचरित'का है। (४) हे कमलदलके समान नेत्रोंवाली [प्रिये] ! तुम तो इस अमित आनन्दको प्रदान करती हो परन्तु तुमसे उत्पन्न हुआ विरह मेरे शरीरको अत्यन्त सन्तप्त करता है॥५४१॥ यहाँ [कारणभूत नायिकाका ] आनन्ददान, [कार्यभूत विरहके ] शरीरसन्तापका विरोधी है। [इसलिए कारण तथा कार्यकी क्रियाओंके विपरीत होनेके कारण यह विषमालङ्कारके चौथे भेदका उदाहरण है]। तइस विषम अलङ्कारका विरोधालङ्कारसे यह भेद है कि विरोधालङ्कारमें विरोधियोंका सामानाधि- करण्य अपेक्षित होता है, यहाँ विरोधियोंका सामानाधिकरण्य नहीं है। वे कार्य तथा कारणरूप भिन्न अधिकरणोंमें रहते हैं। इसी प्रकार यह असङ्गति अलङ्कारसे भी भिन्न है क्योंकि असङ्गति अलङ्कारमें कार्य-कारणकी भिन्नदेशता आवश्यक होती है, यहाँ कार्य-कारण दोनों एक ही देशमें रहते हैं। इसी प्रकार- जिस समुद्रशायी [विष्णु भगवान्] की विशाल कोखमें प्रलयकालमें सारे लोक विलीन हो जाते हैं उसी [श्रीकृष्ण]को मद्यके नशेके कारण पूरे रूपसे न खुलनेवाली एक ही आँखसे नगरकी एक ही स्त्रीने पी लिया [सादर अवलोकन किया]॥५४२।। इत्यादिमें यथायोग विषम [अलङ्गार ] समझना चाहिये। 'यथायोग विषमत्व' समझ लेना चाहिये यह जो यहाँ कहा है इसका अभिप्राय यह है कि विषमा- लङ्कारमें जिन चार प्रकारके वैषम्योंका उल्लेख किया गया है उनमेंसे कई प्रकारके वैषम्य यहाँ बन सकते हैं और उनसे भिन्न प्रकारके वैषम्यका भी उपपादन हो सकता है। उदाहरणार्थ, यहाँ जिस शरीरके कुक्षिरूप अवयवमें सारा लोक समा जाता है उस सम्पूर्ण शरीररूप अवयवीको एक स्त्रीने एक ही अपूर्ण अधखुली दृष्टिसे पान कर लिया यह अवयव और अवयवीका योग अनुपपद्यमान है। इसी प्रकार एक
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५३८ काव्यप्रकाश: [ का० १२८, सू० १६४
[सू० १९४ ] महतोर्यन्महीयांसावाश्रिताश्रययो: क्रमात्'। आश्रयाश्रयिणौ स्यातां तनुत्वेऽप्यधिकं तु तत् ।१२८।। आश्रितमाधेयम् आश्रयस्तदाधारः । तयोमहतोरपि विषये तदपक्षया तनू अप्याश्रयाश्रयिणौ प्रस्तुतवस्तुप्रकर्षविवक्षया यथाक्रमं यत् अधिकतरतां व्रजतः तदिदं द्विविधम् अधिकं नाम । करमेणोदाहरणम्- (१) अहो विशालं भूपाल ! भुवनत्रितयोदरम्। माति मातुमशक्योऽपि यशोराशिर्यदत्र ते ॥५४३॥ (२) युगान्तकालप्रतिसंहृतात्मनो जगन्ति यस्यां सविकासमासत। तनौ ममुस्तत्र न कैटभद्विषस्तपोधनाभ्यागमसम्भवा मुदः ॥५४४॥
जगह विष्णुकी कुक्षि लोगोंका पान करनेवाली [कर्ता] है और दूसरी जगह शरीररूप होनेसे पानका विषय [पानका कर्म] है। यह दूसरी अनुपपद्यमानता है। जगदाधार जगदीश्वरको नेत्रके एक भागसे पान कर जानेका अत्यन्त वैलक्षण्य होनेसे तृतीय प्रकारकी अनुपपद्यमानता है। इसलिए अनेक प्रकारका वैषम्य होनेसे यहाँ भी विषमालद्वार है। ४८. अधिक अलडार [सूत्र १९४]-[स्वभावतः ] महान् आधेय और आधारके कमसे आधार और आधेय छोटे होनेपर भी [विर्णनीय वस्तुके उत्कर्षबोधनके लिए] महान् दिखलाये जायं तो वह [दो प्रकारका ] अधिक [अलङ्गार ] होता है।१२८।। आश्रित अर्थात् आधेय और आश्रय अर्थात् उसका आधार। उन दोनोंके [स्वरूपतः ] महान् होनेपर भी उनकी अपेक्षा छोटे भी आधार तथा आधेय[अर्थात् बड़े आधेयकी अपेक्षा छोटे आधार और बड़े आधारकी अपेक्षा छोटे आधेय ] प्रस्तुत वस्तुके उत्कर्षको कहनेकी इच्छासे जो अधिक [बड़े] करके वणित किये जाते हैं वह दो प्रकारका अधिक [अलंकार] होता है। करमशः [दोनों भेदोंके ] उदाहरण [जैसे ]- (१) हे राजन् ! यह तीनों लोकोंका पेट बड़ा विशाल है जिसमें आपका यश अपरिमेय होनेपर भी समा गया है॥५४३॥ यहाँ यशोराशि आधेय है, उसकी अपेक्षा उसका आधार 'भुवनत्ितयोदर' छोटा है। परन्तु उस यशोराशिके महत्त्वको प्रदर्शन करनेके लिए उस लघुतर आधारकी भी विशालताका वर्णन 'अहो विशालं भपाल भुवनत्रितयोदरम्' कह कर किया गया। अतः यहाँ अधिक अलङ्कारका आश्रय-लाघव- रूप प्रथम भेद है। आधेय-लाघवरूप दूसरे भेदका उदाहरण आगे देते हैं- (२) प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंको अपने भीतर लयकर लेनेवाले विष्णु भगवान्के जिस शरीरमें सारा जगत् अपने विस्तार सहित समा जाता है उस शरीरमें तपोधन [नारद मुनि ]के आगमनसे उत्पन्न हुई प्रसन्नता न समा सकी।।५४४।। यहाँ आधेय प्रसन्नता आधारभूत कृष्णदेह (भगवच्छरीर) की अपेक्षा अल्प होनेपर भी उसके उत्कर्षप्रदर्शनके लिए उसके आधिक्यका वर्णन किया गया है, अतः यह अधिक अलङ्कारके आधेय- लाघवरूप दूसरे भेदका उदाहरण है।
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का० १२६, सू० १६५ ] दशम उल्लास: ५३६
[सू० १९५ ] प्रतिपक्षमशक्तेन प्रतिकतु' तिरस्क्रिया। गवत nं [12] b)] या तदीयस्य तत्स्तुत्यै प्रत्यनीकं तदुच्यते ॥१२९॥
न्यक्कृतिपरमपि विपक्षं साक्षान्निरसितुमशक्तेन केनापि यत् तमेव प्रतिपक्षमुत्कर्षयितुँ तदाश्रितस्य तिरस्करणम् तदनीकप्रतिनिधितुल्यत्वात् प्रत्यनीकमभिधीयते। यथानीकेड- भियोज्ये तत्प्रतिनिधिमूतमपरं मूढतया केनचिदभियुज्यते, तथेह प्रतियोगिनि विजेये तदीयोऽन्यो विजीयते इत्यर्थः । उदाहरणम्- त्वं विनिजितमनोभवरूपः सा च सुन्दर ! भवत्यनुरक्ता। पञ्चभिर्युगपदेव शरैस्तां तापयत्यनुशयादिव कामः ॥५४५॥ यथा वा- यस्य किञ्चिदपकर्त्तुमक्षमः कायनिग्रहगृहीतविग्रहः । कान्तवक्त्रसदृशाकृति कृती राहुरिन्दुमधुनाऽपि बाधते ॥५४६॥ इन्दोरत्र तदीयता सम्बन्धिसम्बन्धात्।
४९. प्रत्यनीक अलङ्गार [सूत्र १६६ ] अपने प्रतिपक्षी [शत्रु]का अपकार कर सकनेमें असमर्थ [व्यक्ति ] के द्वारा उस [प्रतिपक्षी]के किसी [ सम्बन्धी वस्तु]का जो उसकी स्तुतिमें पर्यवसित होनेवाला तिरस्कार करना है वह प्रत्यनीक [अलङ्गार] कहलाता है ॥१२६॥ अपना तिरस्कार करनेवाले प्रतिपक्षीका भी साक्षान् अपकार करनेमें असमर्थ किसी [ व्यक्ति] के द्वारा [फलतः ] उसी प्रतिपक्षीके उत्कर्ष सम्पादनार्थ जो उसके आश्रितका तिरस्कार करना है वह [प्रतिः प्रतिनिधिप्रतिदानयो: १. ४, ६२ इस पाणिनिसूत्रके अनुसार प्रति शब्द यहाँ प्रतिनिधिके अर्थमें है। ] अनीक [सेना] के प्रतिनिधिके तुल्य होनेसे [ यह अलङ्गार] प्रत्यनीक [नामसे] कहा जाता है। जैसे सेनाके ऊपर आक्रमण करनेके अवसरपर किसीके द्वारा मूर्खतासे उसके प्रतिनिधिभूत दूसरेपर आक्रमण कर दिया जाता है इसी प्रकार यहाँ प्रतिपक्षीको विजय करनेके स्थानपर उसके सन्बन्धी दूसरेको विजय किया जाता है [ इसलिए इस अलङ्कारकी प्रत्यनीक यह अन्वर्थ संज्ञा है]। उदाहरण [जैसे ]- हे सुन्दर [नायक] ! तुमने कामदेवके सौन्दर्यको जीत लिया है, [कामदेव तुम्हारा तो कुछ नहीं बिगाड़ पाता है परन्तु ] वह [नायिका ] तुमपर अनुरक्त [तुम्हारी ] है इसीलिए पाँचों बाणोंसे एक साथ ही उसको अत्यन्त पीड़ित कर रहा है।५४५।। अथवा जैसे -- [श्रीकृष्णके द्वारा राहुके 'कायनिग्रह' अर्थात् ] सिर काट डाले जानेके कारण उनसे वैर मानने- वाला [गृहीतविग्रहः ] राहु जिस [कृष्ण] का कुछ भी बिगाड़ सकनेमें असमर्थ होनेपर उसके [कृष्णके ] सुन्दर मुखके समान आकृतिवाले चन्द्रमाको आज भी पीड़ित कर रहा है[ और इसीसे अपनेको कृतकृत्य मानता है]।५४६।।
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५४० काव्यप्रकाश: [का० १३०, सू० १६६
[सू० १९६ ] समेन लक्ष्मणा वस्तु वस्तुना यन्निगूह्यते। निजेनागन्तुना वापि तन्मीलितमिति स्मृतम् ॥१३०॥ सहजमागन्तुकं वा किमपि साधारणं यत् लक्षणं तद्द्वारेण यत्किञ्चित् केनचिद्वस्तुना वस्तुस्थित्यैव बलीयस्तया तिरोधीयते तन्मीलितमिति द्विधा स्मरन्ति। करमेणोदाहरणम्- (१) अपाङ्गतरले दृशौ मधुरवक्वर्णा गिरो विलासभरमन्थरा गतिरतीव कान्तं मुखम्। इति स्फुरितमङ्गके मृगदृशः स्वतो लीलया तदत्र न मदोदयः कृतपदोऽपि संलक्ष्यते ।।५४७।
अत्र दृक्तरलतादिकमङ्गस्य लिङ्गं स्वाभाविकं साधारणं च मदोदयेन तत्रा- प्येतस्य दर्शनात्।
यहाँ [कृष्णके साक्षात् ] सम्बन्धी [मुख ] के साथ सम्बन्ध होनेसे चन्द्रमा उन [कृष्णका ] परम्परासे सम्बन्धी है।
५०. मीलित अलङ्कार [सूत्र १९६ ]-जहाँ अपने (१) स्वाभाविक अथवा (२) आगन्तुक [तिरोधायक तथा तिरोधीयमान दोनोंमें समानरूपसे रहनेके कारण ] साधारण चिह्नसे किसीके द्वारा वस्तुका आच्छादन कर दिया जाय वह मीलित [अलङ्गार] कहलाता है ॥१३०। (१) स्वाभाविक अथवा (२) औपाधिक [आगन्तुक ] जो कोई [तिरोधीयमान एवं तिरो- धायकका] साधारण चिह्न, उससे जो किसीका किसी वस्तुके द्वारा बलवान् होनेसे वास्तविकरूपमें [अन्य वस्तुका ] तिरोधान कर देना है वह मीलित [अलङ्गार ] कहलाता है। और वह भी [ सहज तथा आगन्तुक भेदसे ] दो प्रकारका होता है। कमसे [दोनों भेदोंके ] उदाहरण [जैसे ]- (१) [नायिकाके ] नेत्र प्रान्तोंमें [कटाक्ष करनेमें ] चश्चल हो रहे हैं, वाणी मधुर और वक्रोक्ति- पूर्ण है, गति सौन्दर्यातिशयके कारण मन्द है और मुख अत्यन्त सुन्दर हो रहा है। इस प्रकार मृगनयनीके सुन्दर शरीरमें विलासका स्वयं ही उदय हो रहा है। इसलिए इसमें [ मादक द्रव्यके सेवनसे अथवा धनादिके कारण होनेवाले ] मदके उदयको कोई स्थान ही नहीं मिला दिखता है।५४७।। यहाँ नायिकाके शरीरमें दृक्तरलत्व आदि स्वाभाविक चिह्न पाये जाते हैं। इसलिए साधारण चिह्न हैं। ये चिह्न मदकी अवस्थामें भी होते हैं। इस प्रकार स्वाभाविकतया प्रसिद्ध होनेके कारण बलवान् होनेसे उनके द्वारा 'मदोदय' रूप वस्तुका तिरोधान कर दिया गया है, अतः मीलित अलङ्कार है। यहाँ नेत्रोंकी चश्चलता आदि शरीरके स्वाभाविक चिह्न हैं और मदोदय [मदिरादिजन्य-नशे] के समान [चिह्न ] हैं। क्योंकि उन नशा आदिके होनेपर भी ये देखे जाते हैं।
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का० १३१, सू० १६७ ] दशम उल्लास: ५४१
(२) ये कन्दरासु निवसन्ति सदा हिमाद्रे- स्त्वत्पातशङ्कितधियो विवशा द्विषस्ते। अप्यङ्गमुत्पुलकमुद्वहतां सकम्पं तेषामहो बत भियां न बुधोऽप्यभिज्ञः ॥५४८॥ अत्र तु सामर्थ्यादवसितस्य शैत्यस्य ओगन्तुकत्वात् तत्प्रभवयोरपि कम्पपुलकयो- स्ताद्रूप्यं समानता च भयेष्वपि तयोरुपलक्षितत्वात्। [सू० १९७ ] स्थाप्यतेऽपोह्यते वापि यथापूर्व परं परम्। विशेषणतया यत्र वस्तु सैकावली द्विधा ।१३१।। पूर्व पूर्व प्रति यथोत्तरस्य वस्तुनो वीप्सया विशेषणभावेन यत्स्थापनं निषेधो वा सम्भवति सा द्विधा बुधैरेकावली भण्यते। कमेणोदाहरणम्-
(२) हे राजन् ! तुम्हारे जो शत्रु तुम्हारे आक्रमणके भयसे विवश होकर सदा हिमालयकी कन्दराओंमें रहते हैं उनके [तुम्हारे भयके कारण] काँपते हुए और रोमान्चयुक्त शरीर धारण करनेपर भी [यह कम्प और रोमाश्च हिमालयके शैत्याधिक्यके कारण है ऐसा समझकर ] बुद्धिमान् व्यक्ति भी उन [शत्रुओं] के भयको [अनुमान द्वारा ] नहीं जान पाता है।।५४८।। यहाँ [हिमालयकी कन्दराओंमें निवास करनेके कारण उसके ] सामर्थ्यसे निश्चित किये गये शैत्यके आगन्तुक [धर्म] होनेसे उस [ शैत्य ]से उत्पन्न कॅपकॅपी और रोमाश्व भी उसी प्रकारके [अर्थात् आगन्तुक धर्म ] हैं। और उनकी [भयजन्य कम्प तथा रोमाश्वके साथ ] समानता भी है। क्योंकि भय [के अवसरों]में भी उन [कम्प तथा रोमाश्व] दोनोंको देखा जाता है। इस प्रकार यहाँ हिमालयके सामीप्यके कारण प्रबल शीतरूप वस्तु आगन्तुक एवं भय-चिह्नोंके साथ मिलते हुए साधारण कम्प तथा रोमाञ्चरूप चिह्नोंसे, भयरूप वस्तुको तिरोहित कर रही है अतएव यह भी मीलितके दूसरे भेदका उदाहरण है। ५१. एकावली अलङ्कार [सूत्र १९७] -- जहाँ पूर्व-पूर्व वस्तुके प्रति उत्तर-उत्तर वस्तु विशेषणरूपसे (१) रखी जाय अथवा (२) हटायी जाय वह दो प्रकारका एकावली अलंकार होता है।१३१॥ पूर्व-पूर्व वस्तुके प्रति उत्तर-उत्तर [बादमें आयी हुई] वस्तुका अनेक बार [वीप्सया ] विशेषण- रूपसे (१) प्रतिपादन अथवा (२) निषेध होता है वह दो प्रकारका एकावली अलङ्कार विद्वानोंके द्वारा कहा जाता है। कमसे [दोनों भेदोंके ] उदाहरण [जैसे ]- यह श्लोक पद्मगुप्त-प्रणीत 'नवसाहसाङ्कचरित'के प्रथम सर्गमें राजा विक्रमादित्यकी राजधानी उज्जयिनीके वर्णनमें आया है। इसमें पुर-शब्दका प्रयोग विशेषरूपसे ध्यान देने योग्य है। 'पुर'का साधारणतया प्रचलित अर्थ 'नगर' है परन्तु वह यहाँ सङ्गत नहीं हो सकता है। इसलिए 'अगारे नगरे पुरम्' इस अमरकोषके अनुसार, अथवा 'गृहोपरिगृहं पुरम्' इस धरणीकोशके अनुसार 'पुर' शब्द 'घरके ऊपरके कमरे' का बाचक है। श्लोकका अर्थ इस प्रकार है-
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५४२ काव्यप्रकाश: [ का० १३२, सू० १६८ (१) पुराणि यस्यां सवराङ्गनानि वराङ्गना रूपपुरस्कृताङ्गयः। रूपं समुन्मीलितसद्विलासम् अस्त्रं विलासाः कुसुमायुधस्य ॥५४९॥ (२) न तज्जलं यन्न सुचारुपङ्गजं न पङ्गजं तद्यदलीनषट्पदम्। न षट्पदौडसौ कलगुन्जितो न यो न गुज्जितं तन्न जहार यन्मनः ॥५५०॥ पूर्वत्र पुराणां वराङ्गना:, तासामङ्गविशेषणमुखेन रूपम्, तस्य विलासाः, तेषा- मप्यस्त्रम् इत्यमुना क्रमेण विशेषणं विधीयते। उत्तरत्र प्रतिषेधेऽप्येवं योज्यम्। [सू० १९८] यथाऽनुभवमर्थस्य दृष्टे तत्सदृशे स्मृतिः । स्मरणम् यः पदार्थ: केनचिदाकारेण नियतः यदा कदाचिदनुभूतोऽभूत्, स कालान्तरे स्मृति-
(१) जिस [उज्जयनी नगरी]में घर सुन्दरियों [वराङ्गनाओं] से युक्त हैं, और उन सुन्दरियोंके शरीर रूपसे युक्त हैं, रूपसे हाव-भाव [विलास ] प्रकट हो रहे हैं, और वे विलास कामदेवके [ अस्त्रका काम कर रहे] हैं ॥५४६।। इसमें पहिले चरणमें 'पुर'का विशेषण 'वराङ्गना' है। दूसरे चरणमें 'वराङ़गना' का विशेषण 'रूपपुरस्कृताङ्गयः' रखा गया है। इसी प्रकार तीसरे चरणमें 'रूप'का विशेषण 'समुन्मीलितसद्विलास' रखा गया है और चौथे चरणमें उन विलासोंको 'कुसुमायुधका अस्त्र' बनाया गया है। इस प्रकार पूर्व-पूर्वके प्रति विशेषणरूपमें उत्तर-उत्तरके स्थापित किये जानेसे यह पहिले प्रकारके एकावली अलङ्कारका उदाहरण है। दूसरें प्रकारके निषेधात्मक एकावलीका उदाहरण आागे देते हैं- (२) जिसमें सुन्दर कमल न हों वह जल [जलाशय ] ही नहीं है, जिसके भीतर भ्रमर न बैठे हों वह कमल नहीं है, जो मनोहर गुञ्जन नहीं करता है वह भ्रमर ही नहीं है और जो मनको हरण न कर ले वह गुञ्जन ही नहीं है ।५५०।। हिन्दीके किसी कविने इस श्लोकका पद्यानुवाद इस प्रकार किया है- सो नहिं सर जित सरसिज नाहीं, सरसिज नहिं जेहिं अलि न लुभाहीं। अलि नहिं जो कल गुञ्जनहीना, गुञ्जन नहिं जु मन न हरि लीना।। पहिले श्लोकमें 'पुर' के [विशेषणरूपमें ] वराङ्गना, [फिर] उनके विशेषणरूपमें सौन्दर्य [रूप], उसके [विशेषणरूपमें] विलास और उनके [विशेषणरूपमें] अस्त्र, इस प्रकार कमसे विशेषणकी स्थापना की गयी है [ अतः वह प्रथम एकावलीका उदाहरण है]। दूसरे श्लोकमें इसी प्रकार निषेधके विषयमें भी योजना कर लेनी चाहिये। ५२. स्मरण अलड्गार [सूत्र १६८ ]-उस [पहिले देखी हुई वस्तु ] के समान [दूसरी वस्तु ]को देखकर [अथवा सुनकर, अर्थात् पूर्वदृष्ट वस्तुके सदृश वस्तुका किसी प्रकारसे ज्ञान प्राप्तकर] पूर्व अनुभवके अनुसार वस्तुकी स्मृति होना स्मरण [नामक अलङ्गार कहलाता] है। जो पदार्थ किसी आकारविशेषसे निश्च्ित है [ अर्थात् ] कभी [उस रूपसे ] अनुभव किया गया
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का० १३२, सू० १६६ ] दशम उल्लास: ५४३
प्रतिबोधाधायिनि तत्समाने वस्तुनि दृष्टे सति यत्तथैव स्मर्यते तद्भ्वेत्स्मरणम्। उदाहरणम्- निम्ननाभिकुहरेषु यदम्भः प्लावितं चलदृशां लहरीभिः । तन्द्गवैः कुहरुतैः सुरनार्यः स्मारिताः सुरतकण्ठरुतानाम् ।५५१॥ यथा वा- करजुअगहिअजसोआत्थणमुहविणिवेसिआहरपुडस्स। सम्भरिअपञ्चजण्णस्य णमह कण्हस्स रोमाञ्वं।।५५२। [करयु गगृहीतयशोदास्तनमुखविनिवेशिताधरपुटस्य। संस्मृतपाञ्चजन्यस्य नमत कृष्णस्य रोमाञ्चम् ।। इति संस्कृतम् ] [सू० १९९ ] भ्रान्तिमानन्यसंवित् तत्तुल्यदर्शने ।१३२॥ तदिति अन्यद् अप्राकरणिक निर्दिश्यते। तेन समानं अर्थादिह प्राकरणिकम् आश्रीयते। तस्य तथाविधस्य दृष्टौ सत्यां यद् अप्राकरणिकतया संवेदनं स भ्रान्तिमान्। न चैष रूपकं प्रथमातिशयोक्तिर्वा। तत्र वस्तुतो भ्रमस्याभावात्। इह च अर्थानु- गमनेन संज्ञाया: प्रवृत्तेः; तस्य स्पष्टमेव प्रतिपन्नत्वात् । उदाहरणम्- हो, दूसरे समय [स्मृतिके कारणभूत ] संस्कारोद्बोधक समान वस्तुके देखनेपर उसका जो उसी रूपमें स्मरण होता है वह स्मरण [नामक अलङ्गार ] होता है। उदाहरण [जैसे ]- यह स्मृति कहीं इसी जन्ममें अनुभूत अर्थकी होती है और कहीं पूर्वजन्ममें अनुभूत अर्थकी । इस प्रकार इस अलङ्कारके दो भेद हो जाते हैं। उसी कमसे पहिले इस जन्मकी अनुभूत वस्तुकी स्मृतिका उदाहरण देते हैं। इस श्लोकमें सुरनारियों अरथात् अप्सराओंकी जलकीड़ाका वर्णन करते हुए कवि कहता है- (१) चश्वल नेत्रोंवाली अप्सराओंकी गहरी नाभिके कुहरोंमें लहरोंने जो पानी फेंका उससे उत्पन्न [कुहरुत ] 'कुह' इस प्रकारकी [अनुकरणात्मक ] ध्वनिसे अप्सराओंको [अपने ] सुरतकालीन कण्ठध्वनिका स्मरण हो आया॥५५१॥ अथवा जैसे- (२) दोनों हाथोंमें यशोदा [माता ]के स्तनको पकड़कर उसपर होठ लगाये हुए [स्तनोंके शङ्गसदृश होनेसे ] पाश्वजन्य [नामक अपने शङ्ङ]का स्मरण करनेवाले कृष्णके रोमाश्चको नमस्कार करो ॥५५२॥ ५३. भ्रान्तिमान् अलङ्गार [सूत्र १६६]-उस [अन्य अप्राकरणिक वस्तु ]के समान [प्राकरणिक वस्तु]के देखनेपर जो अन्य वस्तु [अप्राकरणिक अर्थ]का भान होता है वह भ्रान्तिमान् [अलङ्गार कहलाता] है ॥१३२॥ [कारिकामें आये हुए] 'तत्' इस पदसे 'अन्य' अर्थात्' 'अप्राकरणिक' का निर्देश किया गया है। उसके समान अर्थात् प्राकरणिकका यहाँ ग्रहण किया जाता है। उस प्रकारकी उस [अप्राकरणिकके सदृश प्राकरणिक ] वस्तुके देखनेपर [जो उस प्राकरणिक वस्तु]को अप्राकरणिकरूपसे प्रतीति है वह भ्रान्तिमान् [अलङ्गार] कहलाता है।
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५४४ काव्यप्रकाश [का० १३३, सू० २०० माणर प5स कपाले मार्जार: पय इति करान् लेढि शशिन:। सौकानलक।ए तरुच्छिद्रप्रोतान् बिसमिति करी सङ्कलयति। रतान्ते तल्पस्थान् हरति वनिताऽप्यंशुकमिति प्रभामत्तर्चन्द्रो जगदिदमहो विप्लवयति ।५५३।। [सू० २००] आक्षेप उपमानस्य प्रतीपमुपमेयता। तस्यैव यदि वा कल्प्या तिरस्कारनिबन्धनम् ॥१३३॥ (१) अस्य धुरं सुतरामुपमेयमेव वोढुं प्रौढमिति कैमर्थ्येन यदुपमानमाक्षिप्यते (२) यदपि तस्यैवोपमानतया प्रसिद्धस्य उपमानान्तरविवक्षयाऽनाद रार्थमुपमेयभावः कल्प्यते, तदुपमेयस्योपमानप्रतिकूलवर्तित्वादुभयरूपं प्रतीपम्। कमेणोदाहरणम्-
इस प्रकार यह रूपक, अथवा [निगीर्याध्यवसानरूपा ] प्रथमा अतिशयोक्ति नहीं है। क्योंकि उन दोनोंमें वास्तवमें भ्रम नहीं होता है और यहाँ अन्वर्थ संज्ञा [अर्थानुकूल नाम ] होनेके कारण उस [भ्रान्ति]की स्पष्ट स्वीकृति होनेसे [ यह भ्रान्तिमान् अलङ्कार रूपक तथा प्रथम अतिशयोक्ति दोनोंसे भिन्न है। भ्रान्तिमान्का] उदाहरण [जैसे ]- 'शार्ङ्गधरपद्धति' में इसे भासका श्लोक बतलाया गया है। इसमें चन्द्रमाकी निर्मल चाँदनीका भ्रान्तिमान् अलङ्कार द्वारा सौन्दर्य प्रदर्शित करते हुए कवि कहता है कि -- खप्परमें [पड़ी हुई] चन्द्रमाकी किरणोंको यह दूध है ऐसा समझकर बिल्ली चाट रही है। वृक्षके छिद्रों [पत्तोंके बीचमें ] से निकलती हुई [ किरणों ] को हाथी मृणालदण्ड समझ लेता है। स्त्री सुरतसम्भोगके बाद पलँगपर फैली हुई [ किरणोंको ] यह शुभ्र वस्त्र है यह समझकर समेटने लगती है। इस प्रकार प्रभासे मत्त चन्द्रमा इस संसारको भ्रममें डाल रहा है यह बड़े आश्चर्यकी बात है ।५५३॥ ५४. प्रतोप अलङ्कार का [सूत्र २००] उपमान [की सत्ता ] पर आक्षेप [अर्थात् उसकी व्यर्थताका प्रतिपादन ] करना [प्रथम प्रकारका ] प्रतीप [अलड्गार होता ] है। अथवा [उस उपमानके ] अनादरके [सूचनके ] लिए यदि उसी [ उपमान]को उपमेय बना दिया जाय [तो वह दूसरे प्रकारका प्रतीप अलङ्गार होता है॥१३३॥ (१) इस [उपमान]के कार्यको उपमेय ही भली प्रकारसे सम्पादन करनेमें समर्थ है फिर इस [उपमान]की रचना किसलिए की गयी है इस प्रकार जो उपमान [ की सत्ता ] पर आक्षेप किया जाता है [ वह प्रथम प्रकारका प्रतीप अलङ्गार होता है] और (२) जो उसी उपमानरूपसे प्रसिद्धका [उसके लिए ] दूसरे उपमान बनानेकी विवक्षा करके [प्रसिद्ध उपमानके ] तिरस्कारके लिए उसकी जो उपमेयरूपमें कल्पना कर ली जाय वह [भी ] उपमेयके [प्रसिद्ध ] उपमानके प्रतिकूलवर्ती होनेसे दोनों प्रकारका प्रतीप [अलङ्गार] होता है। कमसे [दोनों प्रकारके ] उदाहरण [जैसे ]-
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का० १३३, सू० २००] दशम उल्लास: ५४५
(१) लावण्यौकसि सप्रतापगरिमण्यग्रेसरे त्यागिनां देव ! त्वय्यवनीभरक्षमभुजे निष्पादिते वेधसा। इन्दुः किं घटितः किमेष विहितः पूषा किमुत्पादितं चिन्तारत्नमदो मुधैव किममी सृष्टाः कुलक्ष्माभृतः ॥५५४॥ (२) ए एहि दाव सुन्दरि कण्णं दाऊण सुणसु वअणिज्जम् । तुज्झ मुहेण किसोअरि चन्दो उअमिज्जह जणेण ।५५५।। [अयि एहि तावत् सुन्दरि ! कर्ण दत्त्वा शृणुष्व वचनीयम्। तव मुखेन कृशोदरि ! चन्द्र उपमीयते जनेन ।। इति संस्कृतम् ] अत्र मुखेनोपमीयमानस्य शशिनः स्वल्पतरगुणत्वात् उपमित्यनिष्पत्त्या 'वअणिज्जम्' इति वचनीयपदाभिव्यङ्गयस्तिरस्कारः । क्वचित्तु निष्पन्नैवोपमितिक्रियाऽनादरनिबन्धनम् । यथा-
(१) सौन्दर्यसागर, तेजस्वियोंके गौरवरूप और दाताओंके [ त्यागिनां ] नायक हे राजन् ! पृथिवीके भारको धारण करने योग्य भुजाओंवाले आपको उत्पन्न करनेके बाद ब्रह्माने चन्द्रमाको क्यों बनाया ? [उसका कार्य तो सौन्दर्यनिधान होनेसे आप ही कर सकते थे]। इस सूर्यको क्यों बनाया ? [आपके तेजसे ही उसका काम पूरा हो जाता] और यह चिन्तामणि [रत्न ] क्यों उत्पन्न किया ? [उसका कार्य याचकोंकी तृप्ति तो आप ही कर रहे हैं]। और [पृथ्वीके भारको धारण करनेके लिए जब आपकी भुजाएँ विद्यमान हैं तब ] इन कुलपर्वतोंकी रचना व्यर्थ ही क्यों की ? ॥५५४॥ यहाँ लावण्यादि गुणोंसे युक्त राजाके होनेपर चन्द्रमा आदि प्रसिद्ध उपमानोंकी व्यर्थता सूचित की गयी है इसलिए यह प्रथम प्रकारके प्रतीप अलङ्कारका उदाहरण है। हिन्दीका निम्नलिखित पद्य इस प्रकारके प्रथम प्रतीप अलद्दारका सुन्दर उदाहरण है- जहँ राधा आनन उदित निसि बासर आनन्द। तहाँ कहा अरविन्द हैं कहा बापुरो चन्द॥ यहाँ उपमेयभूत राधा-आननके सामने उपमानभूत अरविन्द तथा चन्द्रकी व्यर्थता प्रदर्शित कर उनका तिरस्कार किया गया है। अतः यह प्रतीप अलङ्कारका उदाहरण है। प्रसिद्ध उपमानकी उपमेयरूपसे कल्पना करनेपर दूसरे प्रकारका प्रतीप अलङ्कार होता है उसका उदाहरण आगे देते हैं- (२) हे सुन्दरि ! तनिक इधर आओ और कान लगाकर [अपनी ] इस निन्दाको सुनो। हे कृशोदरि ! देखो लोग तुम्हारे मुखसे चन्द्रमाको उपमा देते हैं।५५५॥ यहाँ मुख [रूप उपमान ]के साथ जिसकी उपमा दी जा रही है -उस [ उपमेय ] चन्द्रमाके [तुम्हारे मुखकी अपेक्षा ] कम गुणोंसे युक्त होनेके कारण यह उपमा बनती ही नहीं है इस प्रकार 'वचनीयं' पदसे [चन्द्रमाका ] तिरस्कार व्यङ्गय है। कहीं उपमितिक्रिया उत्पन्न होकर ही [प्रसिद्ध उपमानके ] तिरस्कारका कारण होती है। जैसे- ३५
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५४६ काव्यप्रकाश: [का० १३४, सू० २०१ (३) गर्वमसंवाह्यमिमं लोचनयुगलेन किं वहसि मुग्धे। सन्तीदृशानि दिशि दिशि सरःसु ननु नीलनलिनानि ।५५६॥ इहोपमेयीकरणमेवोत्पलानामनादरः । अनयैव रीत्या यदसामान्यगुणयोगात् नोपमानभावमपि अनुभूतपूर्वि तस्य तत्कल्पनायामपि भवति प्रतीपमिति प्रत्येतव्यम्। यथा- (४) अहमेव गुरुः सुदारुणानामिति हालाहल ! तात ! मा स्म दृप्यः । ननु सन्ति भवादृशानि भूयो भुवनेऽस्मिन् वचनानि दुर्जनानाम् ।५५७॥ अत्र हालाहलस्योपमानत्वमसम्भाव्यमेवोपनिवद्धम् । [सू० २०१ ] प्रस्तुतस्य यदन्येन गुणसाम्यविवक्षया । ऐकात्म्यं बध्यते योगात् तत्सामान्यमिति स्मृतम् ॥१३४। अतादृशमपि तादृशतया विवक्षितुं यत् अप्रस्तुतार्थेन सम्पृक्तमपरित्यक्तनिजगुणमेव तदेकात्मतया निवध्यते तत्समानगुणनिबन्धनात्सामान्यम् । उदाहरणम् -- (३) हे मुग्धे ! इन दोनों आँखोंके ऊपर तुम इतना अपार अभिमान क्यों करती हो। ऐसे नील कमल तो तालाबोंमें चारों ओर पाये जाते हैं।५५६॥ यहाँ कमलोंको उपमेय बना देना ही उनका अनादर करना है [ क्योंकि वे तो सदा उपमानरूपसे ही प्रसिद्ध रहे हैं]। इसी प्रकार [जो वस्तु ] असाधारण गुणके कारण पहिले कभी उपमान नहीं बनी है [ अर्थात् जो उपमानरूपसे प्रसिद्ध नहीं है] उसकी उस [उपमान ] रूपमें कल्पना होनेपर भी प्रतीप [अलङ्गार] होता है यह समझना चाहिये। जैसे -- (४) अरे बेटा हलाहल ! मैं ही अत्यन्त भयडगूर लोगोंका गुरु हूँ ऐसा समझकर अभिमान न करो, इस संसारमें आप ऐसे दुर्जनोंके बहुतेरे वचन पाये जाते हैं ॥५५७॥ यहाँ हालाहलका असम्भाव्य उपमानत्व दिखलाया है [ जो कि प्रसिद्ध नहीं है, यहाँ केवल दुर्जन- वचनोंके सामने उसकी हीनता दिखलानेके लिए उसको उपमान बनाया गया है ]। ५५. सामान्य अलङ्गार [सूत्र २०१ ]-प्रस्तुत [वर्णनीय वस्तु] के [अन्य ] अप्रस्तुतके साथ सम्बन्धसे [दोनोंके] गुणोंकी समानताका प्रतिपादन करनेकी इच्छासे जो [उन दोनोंके ऐकात्म्य ] अभेदका वर्णन है वह सामान्य [नामक अलङ्गार कहलाता] है ।१३४।। वैसा [अर्थात् अप्रस्तुत अर्थके समान ] न होनेपर भी उस रूपमें कहनेकी इच्छासे जो अप्रस्तुत अर्थसे सम्बद्ध होकर अपने गुणका परित्याग किये बिना ही उस [अप्रस्तुत] के साथ अभिन्नरूपसे वणित किया जाता है वह [ उन दोनोंके ] समान गुणोंके कारण [एकात्मरूपसे ्वणित] होता है इसलिए 'सामान्य' [इस अन्वर्थ नामसे ] कहा जाता है। उदाहरण [जैसे ]-
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का० १३४, सू० २०१ ] दशम उल्लास: ५४७
(१) मलयजरसविलिप्ततनवो नवहारलताविभूषिताः सिततरदन्तपत्रकृतवक्त्ररुचो रुचिरामलांशुकाः । शशभृति विततधाम्नि धवलयति धरामविभाव्यतां गताः प्रियवसति प्रयान्ति सुखमेव निरस्तभियोऽभिसारिकाः ।५५८॥ अत्र प्रस्तुततदन्ययोरन्यूनानतिरिक्ततया निबद्धं धवलत्वमेकात्मताहेतुः । अत एव पृथग्भावेन न तयोरुपलक्षणम्। यथा वा- (२) वेत्रत्वचा तुल्यरुचां वधूनां कर्णाग्रतो गण्डतलागतानि। भृङ्गा: सहेलं यदि नापतिष्यन् कोऽवेदयिष्यन्नवचम्पकानि ॥५५९॥ अत्र निमित्तान्तरजनिताऽपि नानात्वप्रतीतिः प्रथमप्रतिपन्नमभेदं न व्युदसितु- मुत्सहते, प्रतीतत्वात्तस्य प्रतीतेश्च बाधायोगात् ।
(१) चन्दनके रसको शरीरमें लगाये हुए, नवीन हारसे अलंकृत, अत्यन्त शुभ्र हाथीदाँतके बने दन्तपत्र [आभूषण ] से मुखको सजाये, सुन्दर एवं निर्मल वस्त्र धारण किये हुए अभिसारिकाएँ [रात्रिमें] चन्द्रमाकी चाँदनीके फैलनेसे पृथिवीके शुभ्र हो जानेपर [शुभ्र अलङ्गारादिसे युक्त होनेसे उस चाँदनीमें ही मिल जानेके कारण ] दिखलायी न देनेसे निर्भय होकर प्रियतमके घरको जा रही हैं ॥५५८॥ यहाँ प्रस्तुत [अभिसारिका ] और अप्रस्तुत [चन्द्रमा ] दोनोंका एक-सा [अन्यूनानतिरिक्त ] कहा गया धवलत्व, उनकी एकात्मता [अभेद] का हेतु है। इसलिए दोनोंकी अलग-अलग प्रतीति नहीं हो रही है। कही-कहीं प्रस्तुत और अप्रस्तुत दोनोंके भेदकी प्रतीति बादको होती है, उससे पूर्वकालिक एकात्मताका बाध होता है। ऐसे स्थलपर सामान्य अलङ्कार होता है। इस दृष्टिसे सामान्य अलङ्कारका दूसरा उदाहरण देते हैं- अथवा जैसे- (२) बेतकी छालके समान कान्तिवाली [अत्यन्त गौरवर्ण ] वधुओंके कानोंसे गालोंपर लटकते हुए नवीन चम्पक [के फूलों] पर यदि मँडराते हुए [ सहेलं ] भौंरे न आते तो [गालोंके रङ्गमें मिल जानेसे] उनको कौन जान सकता था [अर्थात् ये वधुएँ कानमें चम्पकके फूल धारण किये हुए हैं इसका पता चलना कठिन था]।५५६॥ यहाँ [भ्रमरपतनरूप ] अन्य कारणसे उत्पन्न [प्रस्तुत कपोल तथा अप्रस्तुत चम्पकके ] भेदकी प्रतीति भी [भ्रमरपतनसे ] पहिले प्रतीत हुए अभेदज्ञानका निषेध करनेमें समर्थ नहीं है। उस [अभेद] प्रतीतिके उत्पन्न हो चुकने और उत्पन्न प्रतीतिका बाध [अनुत्पत्ति ] सम्भव न होनेसे [उत्तरवर्तिनी भेदप्रतीति पूर्ववर्ततनी अभेदप्रतीतिका निवारण करनेमें समर्थ नहीं है। अतः गुणसारूप्यकी विवक्षासे प्रस्तुत-अप्रस्तुतकी अभेदप्रतीति वणित होनेके कारण यह सामान्य अलङ्गार] है। यहाँ 'प्रतीति' का अर्थ अभेदज्ञानकी उत्पत्ति है तथा 'बाध'का अर्थ अनुत्पाद है। जब एक बार प्रस्तुत वधुओंके कपोल तथा अप्रस्तुत चम्पक-पुष्पोंके अभेदकी प्रतीति भ्रमरोंके पतनके पूर्व हो चुकी
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५४८ काव्यप्रकाश: [ का० १३५-१३६, सू० २०२ का० [सू० २०२] विना प्रसिद्धमाधारमाधेयस्य व्यवस्थितिः । एकात्मा युगपद्वृत्तिरेकस्यानेकगोचरा ।।१३५।। सोड अन्यत् प्रकुर्वतः कार्यमशक्यस्यान्यवस्तुनः । तथैव करणं चेति विशेषस्त्रिविधः स्मृतः ॥१३६॥ (१) प्रसिद्धाधारपरिहारेण यत् आधेयस्य विशिष्टा स्थितिरभिधीयते स प्रथमो विशेष: यथा- दिवमप्युपयातानामाकल्पमनल्पगुणगणा येषाम् । रमयन्ति जगन्ति गिर: कथमिह कवयो न ते वन्द्याः ॥५६०॥ (२) एकमपि वस्तु यत् एकेनैव स्वभावेन युगपदनेकत्र वर्तते स द्वितीयः । यथा- यो सा वसइ तुज्झ हिअए सा च्चिअ अच्छीसु सा अ वअणेसु। अह्मारिसाण सुन्दर ओआसो कत्थ पावाणं ।।५६१। [ स्ता वसति तव हृदये सैवाक्षिषु सा च वचनेषु । का तीर अस्मादृशीनां सुन्दर ! अवकाशः कुत्र पापानाम् ॥ इति संस्कृतम् ] आ है तब भ्रमरपतनके बाद होनेवाली उन दोनोंकी भेदप्रतीतिसे वह उत्पन्न ही नहीं हुई यह तो नहीं सूर्य कहा जा सकता है। इसलिए बादमें उत्पन्न भेदप्रतीतिसे पूर्वोत्पन्न अरभदप्रतीतिका बाध नहीं होता है यह ग्रन्थकारका अभिप्राय है। इसलिए यहाँ सामान्य अलङ्कार है। तर्थ ५६. विशेष अलङ्गार [सूत्र २०२]-१. प्रसिद्ध आधारके बिना आधेयकी स्थिति[का वर्णन होनेपर एक प्रकारका विशेष अलङ्गार होता है], २. एक पदार्थकी एक ही रूपसे अनेक जगह एक साथ उपस्थिति [का वर्णन भि होनेपर दूसरे प्रकार का विशेष अलङ्गार होता है], ३. अन्य कार्यको करते हुए उसी प्रकारसे [अथवा है अनायास ] किसी अशक्य वस्तुका उत्पादन [वर्णन होनेपर तीसरे प्रकारका विशेष होता है ] इस प्रकार उ तीन तरहका विशेष [अलङ्गार] माना गया है ।१३६। उ (१) प्रसिद्ध आधारका परित्याग करके जो आधेयकी विशेष प्रकारकी स्थितिका वर्णन किया जाता है वह पहिले प्रकारका विशेष होता है। जैसे -- [ स्वर्गवास होनेपर भी प्रचुर गुणोंसे युक्त जिनकी [काव्यरूप ] वाणी संसार [सहृदय जनों ] को मे
प्रलयपर्यन्त आह्लादित करती रहती है वे कवि वन्दनायोग्य क्यों न माने जायँ ॥५६०॥ (२) एक ही वस्तु स्वरूपसे एक साथ अनेक जगह जो वणित होती है वह दूसरे प्रकारका [विशेष अलङ्गार ] होता है। उसका उदाहरण ] जैसे -- अ्र्प्र वह [नायिका ] तुम्हारे हृदयमें रहती है, वह [तुम्हारी ] आँखोंमें [ बसी है और वही [ तुम्हारे] वचनोंमें रहली है। तब हे सुन्दर ! हमारी जैसी अभागिनियोंके लिए [ तुम्हारे पास ] स्थान ही कहाँ हो सकता है ।।५६१।
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का० १३५-१३६, सू० २०२] दशम उल्लास: ५४६
(३) यदपि किञ्चिद्रभसेन आरभमाणस्तेनैव यत्नेनाशक्यमपि कार्यान्तरमारभते सोऽपरो विशेषः । उदाहरणम् -- स्फुरदद्भुतरूपमुत्प्रतापज्वलनं त्वां सृजताऽनवद्यविद्यम् । विधिना ससृजे नवो मनोभूभुवि सत्यं सविता बृहस्पतिश्च ।५६२॥।
यथा वा- (४) गृहिणी सचिवः सखी मिथः प्रियशिष्या ललिते कलाविधौ। करुणाविमुखेन मृत्युना हरता त्वां वत कि न मे हृतम् ॥५६३। सर्वत्र एवंविधविषयेऽतिशयोक्तिरेव प्राणत्वेनावतिष्ठते तां विना प्रायेणालङ्कारत्वा- योगात् । अत एवोक्तम् --
(३) और जो [दूसरे अशक्य कार्यको भी करूँगा इसका विचार किये बिना ] जल्दीसे किसी कार्यको प्रारम्भ करनेवाला [कर्ता ] उसी प्रयत्नसे किसी अशक्य दूसरे कार्यको उत्पन्न कर देता है वह तीसरे प्रकारका विशेष होता है। जैसे -- हे राजन् ! अद्भुत [लोकोत्तर ] सौन्दर्यसे युक्त, अत्यन्त तेजस्वी और उत्तम विद्यासे विभूषित आपको उत्पन्न करते हुए ब्रह्माने [ उसी प्रयत्नसे अनायास ] सचमुच पृथ्वीपर दूसरे नवीन कामदेद, दूसरे सूर्य और दूसरे बृहस्पतिकी रचना कर दी है॥५६२॥ यहाँ राजाके निर्माणरूप एक कार्यको करते हुए विधाताने उसी प्रयत्नसे दूसरे कामदेव, सूर्य तथा बृहस्पतिरूप अशक्य कार्यको उत्पन्न किया। इस प्रकारका वर्णन होनेसे यह तीसरे प्रकारके विशेष अलङ्कारका उदाहरण है। इसी प्रकारका एक उदाहरण और देते हैं। इस उदाहरणके देनेके प्रयोजनकी व्याख्या भिन्न- भिन्न प्रकारसे की गयी है। किन्हींके मतसे पिछले श्लोकमें 'उत्पन्न किया है', वह बात शब्दतः कथित है। इसलिए वह वाच्य कार्यान्तरका उदाहरण है। अगला श्लोक उससे भिन्न व्यङ्गय कार्यान्तरके उदाहरणरूपमें उपस्थित किया गया है। चक्रवर्ती आदिका मत है कि पहले सृष्टिरूपमें कार्यान्तरके उत्पादनका उदाहरण दिया था, अब संहाररूपमें कार्यान्तरके उत्पादनका दूसरा उदाहरण देते हैं। (४) [हे प्रये इन्दुमति ! तुम मेरी ] गृहिणी, मन्त्री, एकान्तकी सखी, मनोहर कलाओं [अथवा कामकला] के विषयमें प्रिय शिष्या [सब ही कुछ थी], निर्दय मृत्युने तुमको हरण करके बताओ मेरा क्या हरण नहीं कर लिया [मेरा सर्वस्व ही लूट लिया है] ।५६३। बिना आधारके आधेयकी व्यवस्थिति, एक वस्तुकी एक ही रूपसे अनेकत्न युगपत् स्थिति और ग्रन्य कार्यको करते हुए कार्यान्तरकी उत्पत्ति यह सब वास्तवमें सम्भव नहीं है, तब इन स्थितियोंमें विशेष अलङ्कार कैसे माना जाय यह शङ्का यहाँ हो सकती है। उसके समाधानके लिए ग्रन्थकारने अगली पंक्ति लिखी है; उसका आशय यह है कि- इस प्रकारके विषयमें सर्वत्र अतिशयोक्ति ही [उस अलङ्गारके ] प्राणरूपमें स्थित होती है। क्योंकि उस [अतिशयोक्ति]के बिना प्रायः अलङ्गारत्व ही नहीं बनता है। जैसा कि [भामहने अपने 'काव्यालड्गार' में ] कहा है-
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५५० काव्यप्रकाश: [का० १३७, सू० २०३ का 'सैषा सर्वत्र वक्रोकि्तिरनयार्थो विभाव्यते। यत्नोऽस्यां कविना कार्य: कोऽलङ्कारोऽनया विना ।।' इति। [स
[सू० २०३] स्वमुत्सृज्य गुणं योगादत्युज्ज्वलगुणस्य यत्। भवे वस्तु तद्गुणतामेति भण्यते स तु तद्गुणः ।१३७।। वस्तु तिरस्कृतनिजरूपं केनापि समीपगतेन प्रगुणतया स्वगुणसम्पदोपरक्तं तत्प्रतिभा- समेव यत्समासादयति स तद्गुणः । तस्याप्रकृतस्य गुणोऽत्रास्तीति। उदाहरणम्- विभिन्नवर्णा गरुडाग्रजेन सूर्यस्य रथ्या: परित; स्फुरन्त्या। रत्नैः पुन्यत्र रुचा रुचं स्वामानिन्यिरे वंशकरीरनीलै: ॥५६४॥ अत्र रवितुरगापेक्षया गरुडाग्रजस्य, तदपेक्षया च हरिन्मणीनां प्रगुणवर्णता ।
[जिस अतिशयोक्तिका वर्णन पहले किया जा चुका है] वह अतिशयोक्ति ही सब अलङ्गारोंमें रूप सौन्दर्यकी आधायिका [वक्रोक्ति ] होती है इस ही [अतिशयोक्तिरूप वक्रोक्ति ] से अर्थ अलंकृत किया जाता है [ विभाव्यते]। इस [की सिद्धि]के विषयमें कविको यत्न करना चाहिये, इसके बिना कौन-सा [क अलङ्गार हो सकता है? अपे यहाँ 'अतिशयोक्ति' तथा 'वकरोक्ति' शब्दोंका प्रयोग हुआ है। ये दोनों दो भिन्न-भिन्न अलङ्कारोंके घो नाम भी है। परन्तु यहाँ उन अलङ्कारोंका ग्रहण इन शब्दोंसे नहीं करना चाहिये। क्योंकि उनके मर लक्षण सब अलङ्कारोंमें नहीं पाये जा सकते हैं। इसलिए अलङ्कारविशेषके लिए जो इन शब्दोंका प्रयोग है, उसको योगरूढ़ और यहाँ प्रयुक्त हुए इन दोनों शब्दोंको यौगिक मानकर उनको भिन्नार्थक समझना चाहिये। ५७. तद्गुण अलङ्गार ५. [सूत्र २०३] जब न्यून गुणवाली प्रस्तुत वस्तु अत्यन्त उत्कृष्ट गुणवाली [ अप्रस्तुत वस्तु ]के सम्बन्धसे अपने स्वरूंप [या गुण]को छोड़कर उस [अप्रस्तुत वस्तु]के रूपको प्राप्त हो जाती है उसको इस तद्गुण [नानक अलङ्गार] कहते हैं ॥२३७॥ 'अ किसी समीपस्थ [अप्रस्तुत ] वस्तुके द्वारा उसकी उत्कृष्ट गुणसम्पत्तिसे उपरक्त होनेके कारण अ अपने स्वरूपका अभिभव करके जो [प्रस्तुत ] वस्तु उस [समीपगत वस्तु ] के स्वरूप [प्रतिभास]को प्राप्त हो जाती है वह उस [अप्रस्तुत ]का गुण इस [प्रस्तुत वस्तु ]में आ गया है इस [व्युत्पत्ति]के कारण [ तद्गुण [इस नामका अन्वर्थ अलङ्गार कहलाता] है। उदाहरण [जैसे]- माघकाव्यके चतुर्थ सर्गमें रैवतकपर्वतके प्रकरणमें सूर्यके अश्वोंका वर्णन करते हुए कवि कह रहा है कि- यु [गरुड़के अग्रज अर्थात् सूर्यके सारथि ] अरुण [की रक्तवर्ण कान्तिके आधिक्य ] से भिन्न रंगको है प्राप्त हुए सूर्यके घोड़े जहाँ [जिस रैवतकपर्वतपर स्थित ] बाँसके [अत्यन्त हरिद्वर्ण ] अंकुरोंके समान हरिद्वर्ण मरकत मणियोंकी चारों ओर फैलती हुई कान्तिसे फिर अपनी [हरिद्वर्ण ] कान्तिको प्राप्त कराये गये ।।५६४।। यहाँ सूर्यके घोड़ोंकी अपेक्षा [गरुडाग्रज अर्थात् सूर्यके सारथि ] अरुण [के वर्ण]का उत्कर्ष है ज ग
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का० १३८, सू० २०४ ] दशम उल्लास: ५५१ [सू० २०४ ] तद्रूपाननुहारश्चेदस्य तत् स्यादतद्गुणः । यदि तु तदीयं वर्ण सम्भवन्त्यामपि योग्यतायाम् इदं न्यूनगुणं न गृह्हीयात्तदा भवेदतद्गुणो नाम। उदाहरणम्- धवलोसि जहवि सुन्दर तहवि तुए मज्झ रज्जिअं हिअअं। राअभरिए वि हिअए सुहअ णिहित्तो ण रत्तोसि ।।५६५।। [धवलोऽसि यद्यपि सुन्दर ! तथापि त्वया मम रञ्जितं हृदयम् । रागभरितेऽपि हृदये सुभग ! निहितो न रक्तोऽसि । इति संस्कृतम्] अत्रातिरक्तेनापि मनसा संयुक्तो न रक्ततामुपगत इत्यतद्गुणः । किं च तदिति अप्रकृतम् अस्येति च प्रकृतमत्र निर्दिश्यते। तेन यत् अप्रकृतस्य रूपं प्रकृतेन कुतोऽपि निमित्तात् नानुविधीयते सोऽतद्गुण इत्यपि प्रतिपत्तव्यम्। यथा -- [क्योंकि उसके कारण सूर्यके हरिद्वर्ण अश्वोंका रंग बदलकर लाल-सा हो गया था परन्तु ] उसकी भी अपेक्षा [रैवतकपर्वतपर स्थित ] हरे रंगकी [मरकत ] मणियोंके वर्णकी उत्कृष्टता है [ क्योंकि सूर्यके घोड़ोंका अरुणके सम्प्कसे जो रंग बदल गया था उसको रैवतकपर्वतके पास सूर्यका रथ जानेपर वहाँकी मरकत मणियोंकी कान्तिने बदलकर फिर हरा कर दिया। अतः यहाँ तद्गुण अलङ्गार है]। हिन्दीका निम्नलिखित पद तद्गुण अलङ्कारका सुन्दर उदाहरण है- अधर धरत हरिके परत ओठ दीठि पट जोति। हरित बाँसकी बाँसुरी इन्द्रधनुष रँग होति ।।-बिहारी ५८. अतद्गुण अलङ्गार [सूत्र २०४]-[योगादत्युज्ज्वलगुणस्य इसकी पूर्व सूत्रसे अनुवृत्ति आती है उसको मिलाकर इस सूत्रका अर्थ होगा कि अत्यन्त उत्कृष्ट गुणवाली समीपस्थ वस्तुका योग होनेपर भी न्यूनगुणवाले 'अस्य' अप्रकृत ] इसके द्वारा उस [प्रस्तुतके गुणका अनुसरण न किये जानेपर [तद्गुणके विपरीत ] अतद्गुण होता है। यदि योग्यता [अर्थात् उसके ग्रहण करनेका उपाय सामीप्यादि ] होनेपर भी यह न्यूनगुणवाला [अप्रस्तुत ] उस [ प्रस्तुत ]के वर्णको ग्रहण नहीं करे तो अतद्गुण नामका अलङ्गार होता है। उदाहरण [जैसे]- हे सुन्दर ! तुम यद्यपि धवल [गौरवर्णके ] हो फिर भी तुमने मेरे हृदयको रँग दिया 'अनुराग- युक्त कर दिया ] है। और मैंने तुमको राग [अनुराग, पक्षान्तरमें लालरंग]से युक्त हृदयमें रखा, फिर भी है सुभग ! तुम अनुरक्त नहीं हुए ।।५६५।। यहाँ अत्यन्त अनुरक्त हृदयसे संयुक्त होनेपर भी [ नायर] अनुरक्त नहीं हुआ इसलिए अतद्गुण [अलङ्गार] है। और यहाँ 'तत्' शब्दसे अप्रकृतका तथा 'अस्य' पदसे प्रकृतका निर्देश किया गया है। इसलिए जो अप्रकृतके रूपको किसी भी कारणसे प्रकृत ग्रहण नहीं करता है वह अतद्गुण होता है यह भी [अतद्- गुणका दूसरा रूप ] समझना चाहिये। जैसे --
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५५२ काव्यप्रकाश: [का० १३८-१३६, सू० २०५-६
गाङ्गमम्बु सितमम्बु यामुनं कज्जलाभमुभयत्र मज्जतः । राजहंस ! तव सैव शुभ्रता चीयते न च न चापचीयते ।५६६।। [ सू० २०५ ] यद्यथा साधितं केनाप्यपरेण तदन्यथा ।।१३८।। तर्थव यद्विधीयेत स व्याघात इति स्मृतः । येनोपायेन यत् एकेनोपकल्पितं तस्यान्येन जिगीषुतया तदुपायकमेव यदन्यथा- करणम्, स साधितवस्तुव्याहतिहेतुत्वाद् व्याघातः । उदाहरणम्- दृशा दग्धं मनसिजं जीवयन्ति दृशैव याः । विरूपाक्षस्य जयिनीस्ताः स्तुवे वामलोचनाः ॥५६७॥ [सू० २०६ ] सेष्टा संसृष्टिरेतेषां भेदेन यदिह स्थिति: ॥१३९।। एतेषां समनन्तरमेवोक्तस्वरूपाणां यथासम्भवमन्योन्यनिरपेक्षतया यदेकत्र शब्दभागे एव अर्थविषये एव उभयत्रापि वा अवस्थानं सा एकार्थसमवायस्वभावा संसृष्टिः । गङ्गाका जल शुभ्र है और यमुनाका जल कज्जलकी तरह काला है। किन्तु हे राजहंस ! दोनों जगह स्नान करने [ तैरने, डुबकी लगाने ] पर भी तुम्हारी वैसी ही शुभ्रता रहती है [ गङ्गाजलमें स्नान करनेसे ] न तो बढ़ती है और न [ यमुनाके जलसे ] कम होती है ।५६६।। हिन्दीका निम्नलिखित पद्य अतद्गुण अलङ्कारका सुन्दर उदाहरण है- लाल, बाल-अनुराग सों रँगत रोज सब अंग। तऊ न छोड़त रावरो अंग साँवरो रंग।। ५९. व्याघात अलङ्कार [सूत्र २०५]-किसी बातको कोई जिस प्रकारसे सिद्ध करे [बनावे] उसको उसी प्रकारसे यदि दूसरा बदल दे [बिगाड़ दे ] उसको व्याघात अलड्गार कहते हैं। जिस उपायसे एक [व्यक्ति ]ने जिस [कार्य या वस्तु]को बनाया हो उसको जीतनेकी इच्छासे दूसरा उसी उपायसे उसे जो बदल डाले वह सिद्ध की हुई वस्तुके व्याघात [बिगाड़ देने] का हेतु होनेसे 'व्याघात' [इस अन्वर्थ संज्ञावाला अलङ्गार ] कहलाता है। उदाहरण [जैसे ]- [शिवजीके द्वारा अपने तीसरे ] नेत्रसे भस्म किये हुए कामदेवको जो [अपने ] नेत्र [के कटाक्ष]से हो जीवित कर देती हैं इस प्रकार [शिवजीको भी जीत लेनेवाली उन सुन्दरियोंकी हम स्तुति करते हैं [राजशेखरकविरचित 'विद्धशालभञ्जिका'से ]॥५६७॥ ६०. संसृष्टि अलड्गार [सूत्र २०६ ]-इन [ 'एतेषां' पदमें बहुबचन अविवक्षित है। इसलिए दो या अधिक अलङ्गारों] की यहाँ [ काव्य यो वाक्यमें ] भेदसे [ परस्पर निरपेक्षरूपसे ] जो स्थिति है वह संसृष्टि [नामक अलङ्गार] मानी जाती है ।१३६।। इनकी अर्थात् अभी [नवम तथा दशम दो उतलासोमं] कहेहुए [शब्दालङ्कार तथा अर्थालङ्गारों]
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का० १३६, सू० २०६ ] दशम उल्लास: ५५३ तत्र (१) शब्दालङ्कारसंसृष्टिर्यथा -- वदनसौरभलोभपरिभ्रमद्भ्रमरसम्भ्रमसम्भृतशोभया। चलितया विदधे कलमेखलाकलकलोऽलकलोलदृशाऽन्यया ।।५६८।। (२) अर्थालङ्कारसंसृष्टिस्तु- लिम्पतीव तमोऽङ्गानि वर्षतीवाञ्जनं नभः । असत्पुरुषसेवेव दृष्टिर्विफलता गता ।५६९।। पूर्वत्र परस्परनिरपेक्षौ यमकानुप्रासौ संसृष्टि प्रयोजयतः। उत्तरत्र तु तथाविधे उपमोत्प्रेक्षे। (३) शब्दार्थालङ्कारयोस्तु संसृष्टिः-
की यथासम्भव [अर्थात् कहीं केवल शब्दालङ्गारोंकी, कहीं केवल अर्थालङ्गारोंकी या कहीं दोनोंकी, जैसे जहाँ बन जाय ] तो एक ही शब्दभागमें अथवा अर्थभागमें अथवा दोनों जगह, परस्पर निरपेक्षरूपसे स्थिति है वह [दो या अधिक अलङ्गारोंके ] एकार्थमें सम्बन्ध ही जिसका स्वरूप है इस प्रकारकी संसृष्टि होती है। (१) उनमें शब्दालङ्गारोंकी संसृष्टि [का उदाहरण ] जैसे- [माघकाव्यके छठे सगसे ऋतुवर्णनके प्रसङ्गमेंसे यह श्लोक लिया गया है]। अपने मुखकी सुगन्धिके लोभसे [ मुखके ऊपर ] मँडराते हुए भ्रमरके आतङ्गसे [घबड़ाकर ] और भी अधिक शोभाको धारण करनेवाली [और भ्रमरके भयसे इधर-उधर ] भागती हुई, केशपाशके गिरनेसे [और भी अधिक] चञ्चल नेत्रोंवाली [ के भागने ] से सुन्दर मेखला [तउड़ी] का सुन्दर शब्द होने लगा।।५६८।। यहाँ पूर्वार्द्धमें 'मकार'के तथा तृतीय चरणमें 'लकार' के अ्र्प्रनेक बार प्रयोगके कारण अरनुप्रास अलद्कार है। चतुर्थ चरणमें 'लकलो लकलो' की आवृत्ति होनेसे यमकालङ्कार है। ये दोनों शब्दालङ्वार इस एक श्लोकमें परस्पर निरपेक्षरूपसे स्थित हैं। अतः यहाँ शब्दालङ्कारोंकी संसृष्टि है। (२) अर्थालङ्गारोंकी संसृष्टि तो [निम्नलिखित उदाहरणमें देखी जा सकती है] -- अन्धकार अङ्गोंका लेपन-सा कर रहा है, आकाशसे सुरमा बरस-सा रहा है और दुष्ट पुरुषकी सेवाके समान दृष्टि विफल हो गयी है।५६६।। इसके पूर्वार्द्धमें लेपनविषयक तथा वर्षणविषयक उत्प्रेक्षा और उत्तरार्द्धमें 'असत्पुरुषसेवेव' में उपमालङ्कार पाया जाता है। ये दोनों अर्थालङ्कार हैं और इस श्लोकमें उन दोनोंकी परस्पर निरपेक्ष- रूपसे स्थिति है। इसलिए इस श्लोकमें दो अर्थालङ्गारोंकी संसृष्टि है। इसी बातको आागे कहते हैं- पहिले श्लोक [५६८]में परस्पर निरपेक्ष [रूपसे स्थित ] यमक तथा अनुप्रास [दो शब्दालङ्गार ] संसृष्टिकी रचना कर रहे हैं और दूसरे उदाहरण [५६६] में उसी प्रकारके [अर्थात् परस्पर निरपेक्ष] उपमा तथा उत्प्रेक्षा [रूप दो अर्थालङ्गार ] संसृष्टिके प्रयोजक हैं [ इसलिए पहिला श्लोक शब्दालङ्गारोंकी संसृष्टिका तथा दूसरा अर्थालङ्गारोंकी संसृष्टिका उदाहरण है ]। (३) शब्द और अर्थ दोनों प्रकारके अलङ्गारोंकी संसृष्टिका उदाहरण, जैसे --
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५५४ काव्यप्रकाश: [का० १४०, सू० २०७
सी णत्थि एत्थ गामे जो एअं महमहन्तलाअण्णं । तरुणाण हिअअलूडिं परिसक्कन्तीं णिवारेइ ॥५७०। [स नास्त्यत्र ग्रामे य एनां महमहायमानलावण्याम् । तरुणानां हृदयलुण्ठाकीं परिष्वक्कमानां निवारयति । इति संस्कृतम्] अत्रानुप्रासो रूपकं चान्योन्यानपेक्षे। संसर्गश्च तयोरेकत्र वाक्ये छन्दसि वा समवतत्वात्। [सू० २०७ ] अविश्रान्तिजुषामात्मन्यङ्गाद्गित्वं तु सङ्करः। एते एव यत्रात्मनि अनासादितस्वतन्त्रभावाः परस्परमनुग्राह्यानुग्राहकतां दधति स एषां सङ्कीर्यमाणस्वरूपत्वात् सङ्करः । उदाहरणम्- (१) आत्ते सीमन्तरत्ने मरकतिनि हृते हेमताटङ्कपत्रे लुप्तायां मेखलायां झटिति मणितुलाकोटियुग्मे गृहीते।
इस ग्राममें ऐसा कोई [ युवक] नहीं है जो निखरते हुए सौन्दर्यवाली और तरुणोंके हृदयको वशमें कर लेनेवाली इस [सुन्दरी ] को रोक सके ॥५७०। यहाँ पूर्वार्द्धमें [णत्थि एत्थ 'त्थ'का ] अनुप्रास [रूप शब्दालङ्गार ] तथा उत्तरार्द्धमें [ 'हृदय- लुण्ठाकीं' पदमें ] रूपक अलङ्गार दोनों परस्पर निरपेक्ष [रूपसे स्थित] हैं। और उनके एक वाक्य अथवा [एक ] छन्दमें एकत्र होनेसे संसृष्टि होती है। यहाँ संसर्गका अर्थ 'संसृष्ट' है, यद्यपि शब्दालङ्कारका मुख्य आश्रय शब्द तथा अर्थालङ्कारका आश्रय मुख्यरूपसे अर्थ होता है। परन्तु एक वाक्य अथवा एक छन्दरूप एक आश्रयमें उन दोनोंके स्थित होनेसे शब्दालड्कार तथा अर्थालङ्कारकी भी एकत्र 'संसृष्टि' होती है यह आशय है। ६१. सङ़कर अलड्कार अ्नेक अलङ्गारोंकी एक वाक्यमें स्थिति होनेपर संसृष्टि तथा सङ्कर दो अलङ्कार माने जाते हैं। जहाँ अनेक अलङ्कार परस्पर निरपेक्षरूपसे स्थित होते हैं वहाँ 'संसृष्टि' अलङ्कार होता है यह बात अभी 'संसृष्टि'के लक्षणमें कह चुके हैं। इसके विपरीत जहाँ उन अनेक अलङ्गारोंकी सापेक्ष स्थिति होती है वहाँ सङ्करालङ्कार माना जाता है। यह सङ्करालङ्कार भी तीन प्रकारका होता है-३. अङ्गाङ्गिभाव- सङ्कर, २. सन्देहसङ्कर तथा ३. एकाश्रयानुप्रवेशसङ्कर। इन तीनोंके लक्षण तथा उदाहरण आागे देंगे। इनमेंसे पहिले 'अङ्गाङ्गिभावसङ्कर'का लक्षण करते हैं। (१) अङ्गाङ्गभावसङ्कर [सूत्र २०७ ]-अपने स्वरूपमात्रमें जिनकी विश्रान्ति न हो [अर्थात् जो परस्पर निरपेक्ष स्वतन्त्र- रूपसे अलङ्गार न बनते हों] उनका अङ्गाङ्गिभाव होनेपर [प्रथम प्रकारका ] सङ्कर होता है। ये ही [ पूर्वोक्त अलङ्गार] जहाँ अपने स्वरूपमात्रमें स्वतन्त्ररूपसे स्थित नहीं होते हैं और परस्पर अनुग्राह्य-अनुग्राहक भावको प्राप्त हो जाते हैं वहाँ इनके स्वरूपके [ एक-दूसरेके साथ ] संकीर्ण हो जानेसे 'संकर' अलङ्गार होता है। उदाहरण [जैसे ]- (१) हे राजन् ! [तुम्हारे डरके मारे] जङ्गलोंमें भागती हुई तुम्हारे शत्रुओंकी स्त्रियोंके
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का० १४०, सू० २०७ ] दशम उल्लास: ५५५ शोणं विम्बोष्ठकान्त्या त्वदरिमृगदृशामित्वरीणामरण्ये राजन् ! गुञ्जाफलानां स्रज इति शबरा नैव हारं हरन्ति ।।५७१।। अत्र तद्गुणमपेक्ष्य भ्रान्तिमता प्रादुर्भूतम्, तदाश्रयेण च तद्गुणः सचेतसां प्रभूतचमत्कृतिनिमित्तम्, इत्यनयोरङ्गाङ्गिभावः। यथा वा- (२) जटाभाभिर्भाभि: करधृतकलङ्काक्षवलयो वियोगिव्यापत्तेरिव कलितवैराग्यविशदः ।
मरकतमणियोंसे युक्त शिरोभूषणको छीन लेनेपर [अर्थात् सबसे पहिले शिरोभूषणके दीखनेसे पहिले जंगली भीलोंने छीन लिया। उसके बाद] सोनेके बने ताटङ्गपत्र [कानके आभूषणों]के निकाल लेनेके बाद, तगड़ीको तोड़ लेनेपर, मणियोंसे जटित नूपुरोंको ले लेनेपर भी [सिरसे पैरतक सारे आभूषण तो भीलोंने छीन लिये किन्तु उन स्त्रियोंके] कुन्दरूके सदृश [रक्तवर्ण ] ओष्ठकी कान्तिसे लाल हो रहे [शुभ्रमोतियोंके ] हारको यह घुंघुचियोंकी माला है ऐसा समझकर भील नहीं छीनते हैं ॥५७१॥ यहाँ [बिम्बोष्ठकी कान्तिसे सफेद मोतियोंका हार भी लाल मालूम देता है यह 'तद्गुण अलङ्गार' है। उस ] 'तद्गुण' के कारण [मोतियोंके हारमें गुञ्जाफलकी मालाकी भ्रान्ति हो जानेसे] 'भ्रान्तिमान्' [अलङ्गार] उत्पन्न हो गया है और उस [भ्रान्तिमान् के कारण 'तद्गुण' [अलङ्गार] सहृदयोंके लिए और भी अधिक चमत्कारजनक हो उठा है। इसलिए इन दोनों [ के एक दूसरेके उपकारक होनेसे उन] का अङ्गाङ्गिभावसंकर है। इस प्रकार यह दो अलङ्कारोंके सङ्करका उदाहरण दिया था। अब बहुतसे अलङ्कारोंके सङ्करका अगला उदाहरण देते हैं। (२) अथवा [बहुत अलङ्गारोंके संकरका उदाहरण ] जैसे -- इस श्लोकमें मुख्यरूपसे रूपकालङ्कारका आश्रय लेकर रात्रिके आकाशमें घूमनेवाले चन्द्रमाका वर्णन किया है। रूपकालङ्कारके प्रयोग द्वारा कविने चन्द्रमाको योगी या कापालिकका रूप प्रदान किया है। यह सारा वर्णन साङ्गरूपक द्वारा किया गया है। इसमें १. चन्द्रमा कापालिक या योगी है। २. उसकी पीतवर्णकी किरणें कापालिककी जटाएँ हैं। ३. चन्द्रमाका जो भस्मके समान शुभ्र वर्ण है सो मानों कापालिक भस्म लपेटनेके कारण शुभ्र हो गया है। ४. कापोलिक श्मशानमें घूमा करता है, चन्द्रमा आकाशमें घूम रहा है इसलिए आकाश श्मशानके समान है। ५. श्मशानमें कोयला, हड्डियाँ आदि पड़ी रहती हैं। आकाशमें फैले हुए तारे अस्थिसमूहके समान हैं ६. कापालिक रुद्राक्षकी माला धारण करता है, चन्द्रमाका कलङ्ग ही रुद्राक्षका वलय है। ७. योगी किसी अप्रिय कारणके उपस्थित होनेसे विरक्त होकर योगकी शरणमें आता है, चन्द्रमाने वियोगियोंके कष्टको देखकर वैराग्य धारण कर लिया है। इस प्रकार कविने चन्द्रमाको योगी मानकर साङ्गरूपक द्वारा उसका सुन्दर वर्णन किया है। (१) इसमें मुख्य रूपसे तो रूपक अलङ्कार है किन्तु उसके साथ-साथ 'वियोगिव्यापत्तेरिव कलितवैराग्य- विशदः' मानो वियोगियोंके दुःखके कारण वैराग्ययुक्त है इस अंशमें 'उत्प्रेक्षा' है। (२) 'पितृवन इव व्योम्नि' इस अंशमें उपमा और (३) 'भस्मापाण्डुः', 'वैराग्यविशदः' आदि अनेक पदोंमें श्लेष अलङ्कार पाया जाता है। इसलिए इसमें चार अलङ्कारोंका परस्पर अङ्गाङ्गिभावसङ्कर है। श्लोकका अर्थ निम्नलिखित प्रकार है-
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काव्यप्रकाश: का० १४०, सू० २०७
शशी भस्मापाण्डुः पितृवन इव व्योम्नि चरति ।।५७२।। उपमा, रूपकम्, उत्प्रेक्षा, श्लेषश्चेति चत्वारोऽत्र पूर्ववत् अङ्गाङ्गितया प्रतीयन्ते।
जटाओंके समान [पीत या शुभ्रवर्णकी ] किरणोंसे उपलक्षित [इत्थंभूतलक्षणे २. ३, २१ इस सूत्रसे उपलक्षणमें तृतीया है इसलिए योगियोंकी जटाओंके समान शुभ्र किरणोंसे उपलक्षित, इस अंशमें उपमालड्गार है ], हाथमें कलङ्गरूप रुद्राक्ष मालाको धारण किये हुए [कलङ्गरूप अक्षवलयमें रूपकालङ्गार है], वियोगियों [अर्थात् विरहियों तथा वियुक्त होनेवाले विषयों] के नाशके कारण उत्पन्न वैराग्य [अर्थात् विषयोंके प्रति अनुरागका अभाव और चन्द्रमाका उदय हो चुकनेके बाद उदयकालीन लौहित्यके अभाव ] के कारण शुभ्र [सफेद और दूसरे पक्षमें निर्मल हृदयसे युक्त], [इस अंशमें श्लेषानुप्राणित उत्प्रेक्षालङ्गार है। ] चश्वल तारासमूहरूप कपालों [कपालकी हड्डियों] से जिसका तल व्याप्त हो रहा है इस प्रकारके [पितृवन इव ] श्मशान-सदृश [इस अंशमें उपमा अलङ्गार] आकाशमें भस्मके समान शुभ्र [अथवा भस्म लपेटनेके कारण शुभ्र योगी-सा कापालिकरूप ] चन्द्रमा घूम रहा है।।५७२।। यहाँ उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा और श्लेष ये चारों [अलङ्गार ] पूर्व [उदाहरण ] के समान अङ्गाद्गि- भावसे [संकीर्ण ] प्रतीत होते हैं [ इसलिए इसमें बहुत-से अलङ्गारोंका संकर है ]। इसमें 'जटाभाभिर्भाभिः', 'पितृवन इव व्योम्नि' इन दोनों भागोंमें उपमालङ्वार है। 'कलङ्ग एव अक्षवलयः', तथा 'तारापरिकर एव कपालास्थि' इन दोनों भागोंमें रूपक अलङ्कार है। 'वियोगि- व्यापत्तेरिव' इस अंशमें उत्प्रेक्षालङ्कार है और 'कलितवैराग्यविशदः'के 'विशद' पदमें श्लेषालङ्कार है। इन चारों अलङ्ारोंकी यहाँ अङ्गाङ्गिभावसे स्थिति है। क्योंकि 'वियोगिव्यापत्तेरिव' इस उत्प्रेक्षाके कारण ही वैराग्यकी उत्पत्ति सम्भव होनेसे 'विशदः' पदके श्लेषके प्रति उत्प्रेक्षाका उपकारकत्व है। श्लेष दोनों स्थलोंके रूपकों तथा उपमाओंका प्रयोजक होता है क्योंकि उसीके द्वारा 'जटाभाभिःकी उपमा और 'कलङ्काक्षवलय' का रूपक सङ्गत होता है। इस प्रकार 'तारापरिकरकपाल' रूप रूपक 'पितृवन इव व्योम्नि' इस उपमाका उपकारक होता है क्योंकि उपमाका बीज सादृश्य है। आकाश और श्मशानका वास्तविक कोई सादृश्य नहीं है। उक्त रूपकमें ताराओंपर जो कपालका आरोप किया गया है उसी रूपित सादृश्यसे उपमाका समन्वय होता है। इस प्रकार इसमें चारों अलङ्गारोंका अङ्गाङ्गिभाव होनेसे यह अङ्गाङ्गिभावसङ्गरका उदाहरण है। इस श्लोकका प्रधान अलङ्कार तो समासोक्ति है क्योंकि विशेषणोंकी समानतासे यहाँ चन्द्रमामें योगिव्यवहारकी प्रतोति हो रही है। इसलिए समासोक्ति अलङ्कार स्पष्ट ही प्रतीत होता है। फिर भी ग्रन्थकारने यहाँ उसका उल्लेख नहीं किया है इसका कारण स्पष्टता ही है, ऐसा कुछ व्याख्याकारोंका मत है। दूसरे व्याख्याकारोंका यह भी कहना है कि 'व्योम्नि' और 'भाभिः' आदि कुछ विशेषण दोनों पक्षमें सङ्गत नहीं होते हैं इसलिए यहाँ समासोक्ति है ही नहीं। रूपकपक्षमें विनिगमक हेतु इस उदाहरणमें 'करधृतकलङ्काक्षवलयः' पदमें सिद्धान्तरूपसे रूपकालङ्कार माना गया है। परन्तु इसपर यह आशङ्का की जा सकती है कि यहाँ 'मयूरव्यंसकादयश्च' इस सूत्रसे 'कलङ्क एव अरक्षवलयं'
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का० १४०, सू० २०७ ] दशम उल्लास: ५५७ कलङ्ग एवाक्षवलयम्' इति रूपकपरिग्रहे करधृतत्वमेव साधकप्रमाणतां प्रति- पद्यते। अस्य हि रूपकत्वे तिरोहितकलङ्करूपम् अक्षवलयमेव मुख्यतयाऽवगम्यते, तस्यैव च करग्रहणयोग्यतायां सार्वत्रिकी प्रसिद्धिः। श्लेषच्छायया तु कलङ्कस्य करधारणम् असदेव प्रत्यासत्त्या उपचर्य योज्यते। शशाङ्केन केवलं कलङ्कस्य मूर्त्यैव उद्वहनात्। 'कलङ्कोऽक्षवलयमिव' इति तु उपमायां कलङ्कस्योत्कटतया प्रतिपत्तिः। न चास्य करधृतत्वं तत्त्वतोऽस्तीति मुख्येऽप्युपचार एव शरणं स्यात्। इस प्रकारका समास करनेपर रूपक होता है। परन्तु यहाँ 'उपमितं व्याघादिभिः सामान्याप्रयोगे' इस सूत्र के द्वारा 'कलङ्कोऽक्षवलयमिव इति कलङ्काक्षवलयम्', इस प्रकारका उपमित समास भी किया जा सकता है। उस दशामें यहाँ उपमालङ्वार होगा। ऐसी स्थितिमें उपमा तथा रूपक दोनोंके होनेसे यहाँ आगे कहा जानेवाला 'सन्देहसङ्कर' माना जा सकता है। स्पष्टरूपसे रूपक नहीं माना जा सकता है। इस शङ्काके समाधानके लिए ग्रन्थकारने अ्प्रगला अनुच्छेद लिखा है। उसका आ्राशय यह है कि जहाँ किसी विशेष अलङ्कारके पक्षमें कोई साधक या बाधक हेतु नहीं मिलता है वहीं सन्देहसङ्कर अलङ्कार होता है। यहाँ इस प्रकारके साधक-बाधक प्रमाणोंका अभाव नहीं है अपितु रूपकपक्षमें साधक प्रमाण तथा उपमापक्षका बाधक प्रमाण विद्यमान है इसलिए उपमा या रूपक-उपमामूलक सन्देहसङ्कर नहीं अपितु निश्चितरूपसे रूपकालङ्वार मुख्य है। यही बात ग्रन्थकार अगले अनुच्छेदमें इस प्रकार कहते हैं- 'कलङ्ग ही अक्षवलय' इस प्रकार रूपकके स्वीकार करनेमें 'करधृतत्व' ही साधकताको प्राप्त होता है [ क्योंकि अक्षवलयको ही हाथमें धारण किया जाता है, इसलिए कलङ्गको जो 'करधृत' कहा है वह 'कलङ्ग एव अक्षवलयं' इस रूपकके माननेपर ही ठीक बनता है, उपमाके माननेपर ठीक नहीं बनता है। अतः यहाँ रूपक ही मानना उचित है]। इस [कलङ्गाक्षवलयं]को रूपक माननेपर [चन्द्रमाके] कलङ्गरूपको दबाकर अक्षवलय ही [करधृतत्वके कारण ] मुख्यरूपसे प्रतीत होता है। क्योंकि उस अक्षवलय ]के ही करग्रहण [हाथमें पकड़ने ] योग्य होनेकी सर्वत्र प्रसिद्धि है। [कलङ्गको हाथसे नहीं पकड़ा जा सकता है इसलिए] कलङ्गका करसे धारण करना वस्तुतः सत् न होनेपर भी [कर शब्दका दूसरा अर्थ किरण भी होनेके कारण ] श्लेषकी सहायता [छाया]से कलङ्गके आधारभूत चन्द्रमण्डलकी [किरणोंके साथ सम्बन्धरूप ] प्रत्यासत्ति होनेके कारण उपचार [गौणी वृत्तिसे ] सङ्गत होता है। क्योंकि चन्द्रमा तो कलङगको केवल शरीरसे ही धारण करता है [ करसे नहीं ]। [इस प्रकार यहाँतक रूपककी साधक युक्तिका उल्लेखकर उपमाके बाधक हेतुका प्रदर्शन अगली पंक्तियोंमें करते हैं]। 'कलङ्गू अक्षवलयके समान' इस [उपमित समासके आधारपर ] उपमा माननेपर [अक्षवलयके स्थानपर ] कलङ्डकी ही प्रधानतया प्रतीति होगी और उस [कलङ्ग]में करधृतत्व वास्तवमें नहीं होता है इसलिए प्रधान [अर्थ कलङगके करधृतत्व ]में भी उपचारका ही सहारा लेना होगा, अतः उपमा नहीं मानी जा सकती है]। इसका आशय यह है कि 'कलङ्ग एव अक्षवलयं' इस रूपकके माननेपर अक्षवलय प्रधानरूपसे प्रतीत होता है। कलङ्क उसके भीतर गौण-सा, तिरोहित-सा हो जाता है। 'अक्षवलय' प्रधान विशेष्य
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५५८ काव्यप्रकाश: [का० १४० सू० २०७ एवंरूपश्च सङ्कर: शब्दालङ्कारयोरपि परिदृश्यते यथा -- राजति तटीयमभिहतदानवरासातिपातिसारावनदा। गजता च यूथमविरतदानवरा सातिपाति सारा वनदा।५७३।। अत्र यमकमनुलोमप्रतिलोमश्च चित्रभेदः पादद्वयगते परस्परापेक्षे। होता है और 'करधृतत्व' उसका विशेषण होता है। अक्षवलयमें करधृतत्व साक्षात् बन जाता है। लक्षणा नहीं करनी पड़ती है। 'कलङ्क', जो रूपकपक्षमें अप्रधान अर्थ है, उसमें 'करधृतत्व' अर्थात् हाथमें पकड़ा जाना साक्षात् नहीं बनता है इसलिए 'कर' का 'किरण' अर्थ मानकर और उन किरणोंका कलङ्कके आधार- भूत चन्द्रमण्डलके साथ सम्बन्ध होनेसे उस सम्बन्ध अथवा प्रत्यासत्तिके द्वारा लक्षणासे कलङ्कमें भी औपचारिक करधृतत्व आ जाता है। इस पक्षमें उपचारका आश्रय 'अक्षवलय' रूप मुख्यार्थमें नहीं अपितु 'कलङ्क' रूप अ्रमुख्यार्थमें लेना होता है। 'अ्क्षवलय' रूप मुख्यार्थमें 'करधृतत्व' रूप विशेषणकी सङ्गति बिना लक्षणाके ही बन जाती है। 'गुणे त्वन्याय्यकल्पना' इस सिद्धान्तके अनुसार अ्रमुख्यार्थमें 'अन्याय्य- कल्पना' अर्थात् लक्षणाका आश्रय लेनेमें दोष नहीं होता है। परन्तु अब मुख्यार्थमें उस लक्षणाकी कल्पना की जाती है तो यह दोषाधायक हो जाती है। उपमापक्षमें 'कलङ्कोऽक्षवलयमिव इति कलड्का- क्षवलयम्' ऐसा माननेपर 'कलङ्क' मुख्यार्थ होता है। उसमें 'करधृतत्व' साक्षात् रूपसे नहीं बनता है अपितु लक्षणाके द्वारा ही 'करधृतत्व' की सङ्गति होती है। इसलिए अमुख्यार्थमें नहीं अपितु मुख्यार्थमें भी लक्षणारूप 'अन्याय्यकल्पना' का आ्राश्रय लेना होता है जो कि अनुचित है। इसलिए उपमा माननेमें वाधक होनेसे यहाँ उपमा नहीं मानी जा सकती है। रूपकपक्षमें साधक होनेसे निश्चितरूपसे रूपक ही मानना उचित है यह ग्रन्थकारका अभिप्राय है। शब्दालड्गारोंका अङ्गाङ्गिभावसङ्कर अलड्कारसर्वस्वकारका मत है कि शब्दालङ्कारोंमें परस्पर उपकार्योपकारकभाव नहीं बनता है, इसलिए दो या अधिक शब्दालङ्कारोंमें अ्ङ्गाङ्गिभावसङ्कर नहीं होता है। दो या अ्धिक शब्दालङ्कारोंके होनेपर संसृष्टि ही होती है। किन्तु काव्यप्रकाशकार दो या अधिक शब्दालङ्कारोंमें भी उपकार्योपकारक- भाव मानकर अङ्गाङ्गिभावरूप सङ्कर स्वीकार करते हैं। अगली पंक्तिमें इसी बातका प्रतिपादन करते हुए वे शब्दालङ्कारोंके अङ्गाङ्गिभावसङ्करका उदाहरण देते हैं- जैसे कि -- इस प्रकारका [अङ्गाङ्गिभावरूप ] सङ्कर दो [ या अधिक शब्दालङ्गारोंमें भी देखा जाता है। जिसमें दानवों अर्थात् दैत्योंका रास अर्थात् क्रीडा अथवा सिंहनाद समाप्त या नष्ट [अभिहत ] हो गया है इस प्रकारकी [अभिहतदानवरासा ], जिसमें ध्वनि करता हुआ नद वेगसे बह रहा है इस प्रकारकी यह तटी [ पर्वतकी प्रान्तभूमि ] शोभित हो रही है। और निरन्तर मदजलसे शोभित [अविरतदानवरा ] बलिष्ठ [सारा] एवं [वनानि द्यति खण्डयति इति वनदा] वनोंका विनाश करनेवाला [गजानां समूहो जगता ] हाथियोंका समूह यूथकी अत्यन्त रक्षा करता है [अतिपाति] ।।५७३।। इसमें [पूर्वार्द्ध तथा उत्तरार्द्ध दोनों भागोंमें 'दानवरा सातिपाति सारा वनदा' इस भागकी आवृत्ति होनेसे ] यमक [रूप शब्दालङ्गार ] तथा [इस यमक अंशमें जो अक्षर आये हैं उनको उलटे-सीधे दोनों तरहसे पढ़नेपर वही पाठ बन जाता है इसलिए ] अनुकूल-प्रतिकूल चित्रकाव्य [रूप शब्दालङ्गार] का
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का० १४०, सू० २०८ ] दशम उल्लास: ५५६ [सू० २०८ ] एकस्य च ग्रहे न्यायदोषाभावादनिश्चयः ॥१४०।। द्वयोबहूनां वा अलङ्काराणामेकत्र समावेशेऽपि विरोधान्न यत्र युगपदवस्थानं न चैकतरस्य परिग्रहे साधकं तदितरस्य वा परिहारे वाधकमस्ति येनैकतर एव परिगृह्यत स निश्चयाभावरूपो द्वितीयः सङ्करः, समुच्चयेन सङ्करस्यैवाक्षेपात् । उदाहरणम् -- (१) जह गहिरो जह रअणणिब्भरो जह अ णिम्मलच्छाओ। तह किं विहिणा एसो सरसवाणीओ जलणिही ण किओ ॥५७४॥
भेद, दोनों पादोंमें परस्पर एक-दूसरेकी अपेक्षासे [अङ्गाङ्गिभावसे ] विद्यमान है [अतः यहाँ दो शब्दालङ्गारोंका अङ्गाङ्गभावसङ्कर है। यहाँ 'पादद्वयगते परस्परापेक्षे' यह नपुंसकलिङ्गके प्रथमाके द्विवचनका प्रयोग है। यमक भी द्वितीय तथा चतुर्थ चरणरूप दो पादोंमें है और चित्रभेद भी उन्हीं दोनों पादोंमें है। इसलिए दोनों 'पादद्वयगत' हुए। 'पादद्वयगतं च (यमकं) पादद्वयगतश्च (चित्रभेदः) इस विग्रहमें 'नपुंसकमनपुंसकेनै कवच्चान्यतरस्याम्' इस सूत्रसे नपुंसकलिङ्ग शेष रह गया है। इसलिए 'पादद्वयगते' यह नपुंसकलिङ्गका ही प्रयोग किया है। पादयमक और अनुलोम-प्रतिलोम चित्रकाव्य दोनों ही दुष्कर हैं इसलिए वे दोंनों ही विद्वानोंके लिए मनोरञ्जक होते हैं और जहाँ उन दोनोंकी स्थिति मिल जाय तो उससे दोनोंका सौन्दर्य बढ़ जाता है। यह तो सोनेमें सुगन्धकी-सी बात हो जाती है। यहाँ दोनों पादोंमें दोनों अलङ्कार पाये जाते हैं इसलिए वे परस्पर शोभाधायक हैं। इसलिए उन दोनोंको परस्परापेक्ष मानकर अ्रङ्गाङ्गि- भावसङ्करका उदाहरण इसको माना है। दूसरे लोगोंका मत यह है कि यहाँ 'अ्ङ्गाङ्गिभावसङ्कर' नहीं है अपितु 'एकाश्रयानुप्रवेश' रूप तीसरे प्रकारका सङ्कर है। (२) सन्देहसङ्कर [सूत्र २०८]-किसी एकके माननेमें साधकप्रमाण [न्याय ] अथवा दूसरेके ग्रहण करनेमें बाधकके होनेसे [ दो या अधिकसे अलङ्गारोंमें किसी एकका ] जो निश्चय न हो सकना है वह सन्देहसङ्कर [रूप दूसरे प्रकारका सङ्कर ] होता है।।१४०।। दो अथवा अधिक अलङ्गारोंका एक जगह समावेश होनेसे जब वहाँ एक साथ स्थिति सम्भव नहीं है और न उन दोनोंमेंसे किसी एकके स्वीकार करनेमें साधकप्रमाण, अथवा उससे भिन्न [अल्गार]- को स्वीकार करनेके लिए [आधारभूत ] बाधक प्रमाण नहीं पाया जाता, जिससे वहाँ किसी एकको ही स्वीकार कर लिया जाय, वह निश्र्याभावरूप [सन्देहसड्गर नामक ] दूसरे प्रकारका सङ्कर [अलङ्गार] होता है। [सूत्रमें आये हुए समुच्चयार्थक ] च शब्दसे [ पूर्वसूत्रमें स्थित ] सङ्करकी ही अनुवृत्ति होनेसे [आक्षेपात् अनिश्रयः अर्थात् सन्देहसङ्गर अलङ्गार होता है]। उदाहरण [जैसे ]- हाट [समुद्र ] जैसा गम्भीर, जैसा रत्नोंसे भरा हुआ और जैसा निर्मल कान्ति वाला है। भगवान्ने इस समुद्रको वैसा स्वादिष्ट जलयुक्त क्यों नहीं बनाया है ॥५७४।
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५६० काव्यप्रकाश: [ का० १४०, सू० २०८ [यथा गभीरो यथा रत्ननिर्भरो यथा च निर्मलच्छायः । तथा किं विधिना एष सरसपानीयो जलनिधिर्न कृतः ॥ इति संस्कृतम्] अत्र (१) समुद्रे प्रस्तुते विशेषणसाम्यादप्रस्तुतार्थप्रतीते: किमसौ समासोक्तिः, (२) किमब्धेरप्रस्तुतस्य मुखेन कस्यापि तत्समगुणतया प्रस्तुतस्य प्रतीते: इयमप्रस्तुत- प्रशंसा इति सन्देहः । यथा वा- (२) नयनानन्ददायीन्दोर्विम्वमेतत्प्रसीदति। अधुनापि निरुद्धाशमविशीर्णमिदन्तमः ॥५७५॥ अत्र (१) किं कामस्योद्दीपकः कालो वर्तते इति भङ्गयन्तरेणाभिधानात्पर्यायोक्तम्, उत (२) वदनस्येन्दुविम्वतयाऽध्यवसानादतिशयोकितिः, कि वा (३) एतदिति वकत्रं निर्दिश्य तद्रूपारोपवशाद्रूपकम्, अथवा (४) तयो: समुच्चयविवक्षायां दीपकम्, (५) अथवा तुल्ययोगिता, (६) किमु प्रदोषसमये विशेषणसाम्यादाननस्यावगतौ समासोक्तिः, (७) आहोस्वित् मुखनैर्मल्यप्रस्तावादप्रस्तुतप्रशंसा इति बहूनां सन्देहादयमेव सङ्करः। यहाँ १. समुद्रके प्रस्तुत होनेपर विशेषणोंकी समानतासे अप्रस्तुत [पुरुषरूप ] अर्थकी प्रतीति होनेसे क्या यह समासोक्ति [अलङ्गार ] है, अथवा २. क्या अप्रस्तुत समुद्रके द्वारा उस [समुद्र]के समान [गाम्भीर्यादिसे युक्त ] किसी प्रस्तुत [पुरुष]की प्रतीति होनेसे यह अप्रस्तुतप्रशंसा [अलङ्गार ] है इस प्रकारका सन्देह [संकर ] होता है। यह दो अलङ्कारोंके सन्देहसङ्करका उदाहरण दिया था। आगे दोसे अधिक अलङ्कारोंके सन्देहसङ्करका उदाहरण देते हैं। अथवा जैसे -- नेत्रोंको आनन्द देनेवाला यह चन्द्रमाका बिम्ब चमक रहा है किन्तु दिशाओंको आच्छादित करने- वाला यह अन्धकार अब भी नष्ट नहीं हुआ।५७५।। यहाँ १. क्या यह कामका उद्दीपन करनेवाला समय है यह बात प्रकारान्तरसे कही जा रही है इसलिए पर्यायोक्त [अलङ्गार है ? अथवा २. क्या मुखके चन्द्रमारूपसे निश्रय करनेसे अतिशयोक्ति [अलङ्गार ] है, अथवा ३. क्या यह 'एतत्' इस देशरूप मुखका निर्देश करके उसमें [चन्द्रमा ]के रूपका आरोप होनेसे रूपक [अलङ्गार ] है अथवा ४. उन दोनोंके प्रकृत मुख तथा अप्रकृत चन्द्रके साथ 'प्रसीदति' रूप एक क्रियाके [सम्बन्धरूप ] समुच्चयकी विवक्षामें दीपक [अलङ्गार ] है अथवा ५. [चन्द्र तथा मुख दोनोंके प्रस्तुत होनेसे दीपकके बजाय ] तुल्ययोगिता [अलङ्गार ] है अथवा ६. क्या सन्ध्याकाल [के वर्णन ]में विशेषणोंकी समानतासे मुखकी प्रतीति होनेसे समासोक्ति [अलङ्कार ] है, अथवा ७. मुखकी निर्मलताके [वर्णनके ] प्रसङ्गमें [अप्रस्तुत चन्द्रमाका वर्णन होनेसे ] अप्रस्तुतप्रशंसा है। इस प्रकार बहुत-से अलङ्गारोंका सन्देह होनेसे यह सन्देहसङ्गर [अलङ्गार] ही है।
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का० १४०, सू० २०८ ] दशम उल्लास: ५६१ यत्र तु न्यायदोषयोरन्यतरस्यावतारः तत्रैकतरस्य निश्चयान्न संशयः। न्यायश्च साधकत्वमनुकूलता। दोषोडपि वाधकत्वं प्रतिकूलता। तत्र-" TभFPक K ETPO सौभाग्यं वितनोति वक्त्रशशिनो ज्योत्स्नेव हासद्युतिः ॥५७६।। इत्यत्र मुख्यतयाऽवगम्यमाना हासद्युतिर्वक्त्रे एवानुकूल्यं भजते इत्युपमायाः साधकम्। शशिनि तु न तथा प्रतिकूलेति रूपकं प्रति तस्या अबाधकता। वक्त्रेन्दौ तव सत्ययं यदपरः शीतांशुरभ्युद्यतः ॥५७७॥
किसी पक्षमें साधक या बाधक प्रमाणोंका अभाव होनेपर ही यह सन्देहसङ्कर होता है। जहाँ किसी पक्षमें साधक अथवा किसी पक्षमें बाधक प्रमाण मिल जाय वहाँ सन्देह न रहकर एक पक्षमें निर्णय हो जाता है इसलिए सन्देहसङ्कर नहीं होता है यह बात अगली पंकितिमें कहते हैं- जहाँ [किसी एक अलंकारके स्वीकार करनेमें न्याय अर्थात् ] साधक प्रमाण अथवा [दोष अर्थात्] बाधक प्रमाण मिल जाता है वहाँ किसी एकका निश्रय हो जानेसे संशय नहीं होता है। [सूत्रमें आये हुए] 'न्याय' [ शब्द ] का अर्थ साधकत्व अथवा अनुकूलता और [सूत्रमें आया हुआ] 'दोष' [ पद ] भी बाधकत्व अथवा प्रतिकूलताका बोधक है। उनमेंसे [साधक प्रमाणके होनेसे सन्देहके अभावका उदाहरण देते हैं]- चाँदनी जैसे चन्द्रमाके सौन्दर्यकी जनक होती है उसी प्रकार हासकी कान्ति मुखचन्द्रकी शोभाका विस्तार कर रही है।५७६॥ यहाँ मुख्य रूपसे प्रतीत होनेवाली हासकी कान्ति मुखके ही अनुकूल होती है इसलिए उपमाकी साधिका है, चन्द्रमाके प्रति उसकी वैसी प्रतिकूलता नहीं है इसलिए रूपकके प्रति बाधक नहीं है। यहाँ यह शङ्का हो सकती है कि जहाँ किसी एक पक्षमें साधक या बाधक प्रमाण मिलता है वहाँ एक ही प्रमाण एकका साधक और दूसरेका बाधक हो सकता है। जो प्रमाण एकका बाधक हैं वह स्वयं ही दूसरेका साधक हो जाता है या जो किसी एकका साधक है वह स्वयं ही दूसरेका बाधक हो जाता है। तब फिर दोनोंके अलग-अलग कहने या उदाहरण देनेको क्या आवश्यकता है ? इस शङ्काका समाधान करनेकी दृष्टिसे ग्रन्थकारने यह पंक्ति लिखी है। उनका आशय यह है कि यद्यपि एकका साधक अर्थतः दूसरेका बाधक बन सकता है अथवा एकका बाधक अर्थतः दूसरेका साधक बन सकता है, फिर भी उन दोनों प्रमाणोंके स्वरूपमें भेद अवश्य होता है। साधक प्रमाणमें साधक अंशकी प्रधानता रहती है, बाधक प्रमाणमें वाधक अंशकी प्रधानता रहती है। दूसरा कार्य वे गौणरूपसे अर्थापत्ति द्वारा हो करते हैं। इसलिए उन दोनोंके उदाहरण अलग-अलग दिये जाते हैं। पूर्वोक्त श्लोकमें 'हासद्युति का मुखके साथ समन्वय जैसा अनुकूल बैठता है वैसा चन्द्रमाके विपरीत नहीं बैठता है। इस दृप्टिसे उसको मुखका साधक प्रमाण ही कहा जा सकता है, चन्द्रमाका बाधक नहीं। इसलिए 'हासदयुतिः' पद 'वक्त्रशशिनः' पदमें 'वक्त्रं शशीव' इस उपमाका साधक है, 'वक्त्रमेव शशी' इस रूपकका बाधक नहीं है। इसलिए इसे 'साधक, प्रमाणसम्बन्धी उदाहरण समझना चाहिये। तुम्हारे मुखचन्द्रके विद्यमान रहते यह जो दूसरा चन्द्रमा उदित हो रहा है [ वह व्यर्थ ही है] ।५७७। ३६
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५६२ काव्यप्रकाश: [ का० १४०, सू० २०८
इत्यत्रापरत्वमिन्दोरनुगुणं न तु वक्त्रस्य प्रतिकूलमिति रूपकस्य साधकतां प्रतिपद्यते न तूपमाया बाधकताम्। राजनारायणं लक्ष्मीस्त्वामालिङ्गति निर्भरम् ॥५७८॥। इत्यत्र पुनरालिङ्गनमुपमां निरस्यति। सदृशं प्रति परप्रेयसीप्रयुक्तस्यालिङ्ग- नस्यासंभवात्। पादाम्बुजं भवतु नो विजयाय मञ्जु- मञ्जीरशिञ्जितमनोहरमम्बिकायाः ।५७९।।
वहाँ 'अपरः' शब्दका प्रयोग चन्द्रमाके [अर्थात् मुखको चन्द्रमा मानने अर्थात् 'वक्त्रमेवेन्दुः वक्त्रेन्दु:' इस प्रकारका -- 'मयूरव्यंसकादयश्च' इस सूत्रसे समास करके रूपक माननेके ] अनुकूल है [वक्त्रमिन्दुरिव इस उपमित समासके द्वारा] उपमा [माननेमें उतना ] प्रतिकूल नहीं है, इसलिए [यह ] रूपकका साधक होता है, उपमाका बाधक नहीं होता है। p इस प्रकार 'वक्त्रशशिनः' तथा 'वक्त्रेन्दौ' पदोंमें जहाँ रूपक तथा उपमाका सन्देह हो सकता था वहाँ क्रमशः पहिलेमें उपमाका साधक 'हासदुति' रूप प्रमाण और दूसरेमें रूपकका साधक 'अपरः' शब्दका प्रयोगरूप प्रमाण मिल जानेसे एक पक्षमें निर्णय हो गया है। इसलिए ये दोनों साधक प्रमाणके द्वारा एक पक्षमें निर्णय होनेके उदाहरण हैं। आगे बाधक प्रमाणोंके आधारपर संशयका निवारण कर निश्चयके उदाहरण देते हैं। राजा रूप नारायण [अर्थात् विष्णुस्वरूप, न कि विष्णुसदृश ] आपको लक्ष्मी अतिशय-आलिङ्गन करती हैं।५७८॥ यहाँ 'राजा एव नारायण: राजनारायण:' इस प्रकार रूपकपरक समास भी हो सकता है और 'राजा नारायण इव राजनारायण:' इस प्रकारका उपमापरक समास भी हो सकता है। इसलिए रूपक तथा उपमामेंसे कौन-सा अलङ्कार यहाँ माना जाय यह सन्देह हो सकता है। उस सन्देहका निवारण यहाँ उपमाके बाधक प्रमाणके द्वारा होता है। लक्ष्मीका आलिङ्गन ही यहाँ उपमाका बाधक प्रमाण है। लक्ष्मी विष्णु या नारायणकी पत्नी हैं। यदि वह उपमालङ्कार माना जाय तो 'राजा नारायणके सदृश है' यह अरथ निकलता है। उस दशामें यदि राजा नारायणस्वरूप नहीं अपितु नारायणके सदृश है तो लक्ष्मीके द्वारा उसका तलिङ्गन नहीं बन सकता है, क्योंकि कोई पतिव्रता स्त्री पतिके सदृश व्यक्तिका आलिङ्गन नहीं करती है। इसलिए यह उपमाका बाधक प्रमाण है। यद्यपि यही रूपकका साधक प्रमाण भी हो सकता है परन्तु ग्रन्थकारने उपमाबाधकताकी प्रधानता मानकर ही इसको उदाहरणरूपमें प्रस्तुत किया है। यही बात अगली पंक्तिमें कहते हैं। और यहाँ [इस उदाहरणमें लक्ष्मीका ] आलिङ्गन उपमाका निवारण करता है। [पतिके] सदृशके प्रति दूसरोंकी स्त्रीका आलिङ्गन सम्भव नहीं है। इस प्रकार उपमाके बाधक प्रमाणका उदाहरण देकर अब रूपकके बाधक प्रमाणका उदाहरण देते हैं। श्लोकका केवल उत्तरार्द्धमात्र यहाँ उद्धृत किया गया है। धर्माचार्यकृत देवी पार्वतीकी स्तुतिमें लिखे गये 'पञ्चस्तवी' नामक काव्यके तृतीय स्तवका यह पद्य है। नूपुरकी मधुर ध्वनिसे युक्त पार्वतीका चरणकमल हमारे लिए विजय प्रदान करनेवाला हो ॥५५६॥
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का० १४१, सू० २०६] दशम उल्लास: ५६३ इत्यत्र मञ्जीरशि्जितम् अम्बुजे प्रतिकूलम्, असम्भवादिति रूपकस्य बाधकम् । न तु पादेऽनुकूलमित्युपमायाः साधकमभिधीयते । विध्युपमर्ददिनो बाधकस्य तदपेक्षयोत्कट- त्वेन प्रतिपत्तेः । एवमन्यत्रापि सुधीभिः परीक्ष्यम् । [सू० २०९] स्फुटमेकत्र विषये शब्दार्थालङकृतिद्वयम् । व्यवस्थितं च अभिन्ने एव पदे स्फुटतया यदुभावपि शब्दार्थालङ्कारौ व्यवस्थां समासादयतः सोडप्यपर: सङ्करः। उदाहरणम्-
नूपुरकी मधुरध्वनिसे युक्त पार्वतीका चरणकमल हमारे लिए विजय प्रदान करनेवाला हो। यहाँ 'पादाम्बुज' पदमें 'पाद एव अम्बुजम्' इस प्रकारका समास करनेसे रूपकालङ्वार होता है; उस अवस्थामें 'अ्रम्बुज' की प्रधानतया या विशेष्यरूपमें प्रतीति होती है। उसमें 'मञ्जीरशिञ्जित' नूपुरध्वनिका साक्षात् अन्वय सङ्गत नहीं होता है। यही रूपकके माननेमें बाधक है। यहाँ यह शङ्का हो सकती है कि नूपुरध्वनिको जैसे रूपककी सङ्गतिमें बाधक माना जा रहा है उसी प्रकार 'पादोऽम्बुजमिव इति पादाम्बुजम्' इस उपमाका साधक क्यों न मान लिया जाय? इसका उत्तर ग्रन्थकार यह देते हैं कि वहाँ पैरमें अम्बुजत्वका विधान करनेवाले अर्थात् पैरको अम्बुज बना देनेवाले रूपकका निराकरण करनेवाले 'मञ्जीरशिञ्जित' रूप बाधकका उपमासाधकत्वकी अपेक्षा रूपकबाधकत्व प्रबलरूपमें प्रतीत हो रहा है, इसलिए इसे उपमासाधकका उदाहरण न कहकर रूपक- बाधक' प्रमाणका ही उदाहरण मानना उचित है। यही बात ग्रन्थकार अगली पंक्तिमें कहते हैं- इस [उदाहरण ] में 'मञ्जीरशिञ्जित' [अर्थात् नूपुरध्वनि ] अम्बुजमें असम्भव होनेसे उसके प्रतिकूल और [पैर-रूप जो अम्बुज इस ] रूपकका बाधक है न कि [ कमलके समान जो पैर इस प्रकारसे] पैरके अनुकूल है। इसलिए वह उपमाका साधक है, यह नहीं कहा जा सकता है। [पैरमें अम्बुजत्वका ] विधान करनेवाले [रूपक]का निराकरण करनेवाले बाधकके उस [उपमासाधकत्व] की अपेक्षा प्रबलरूपसे प्रतीत होनेके कारण [ इसको रूपकके बाधक प्रमाणके रूपमें लेना ही उचित है, उपमासाधक- रूपमें नहीं]। इसी प्रकार अन्य उदाहरणोंमें भी विद्वानोंको समझना चाहिये। ३. एकाश्रयानुप्रवेशसङ्कर [सूत्र २०६]-एक [पदरूप ] स्थानपर दो शन्दालङ्गार और अर्थालङ्गार [सन्दिग्धरूपसे या अङ्गाङ्गभावरूपसे न होकर ] स्पष्ट [असन्दिग्ध ] और अलग-अलग व्यवस्थितरूपसे] रहते हैं [वह भी एकाश्रयानुप्रवेश नामसे सङ्गरका तीसरा भेद होता है]। एक ही पदमें स्पष्टरूपसे जो शब्दालङ्गार और अर्थालङ्गार दोनों व्यवस्थित होते हैं वह तीसरे प्रकारका [ एकाश्रयानुप्रवेश ] सङ्कर होता है। जैसे -- रत्नाकरकविकृत 'हरविजय' काव्यके उन्नीसवें सर्गमें सन्ध्यावर्णनके प्रसङ्गसे यह पद्य लिया गया है। इसमें कविने दिवसको कमल बनाकर उसके संङ्कोच अर्थात् दिवसके अवसान, सन्ध्याकालका वर्णन किया है। इसलिए उसमें रूपकालङ्वार है। उस दिवसरूप कमलमें किरणरूप केसर और सूर्यरूप कणिका अरथात् कमलके बोचका बीजकोष, आठों दिशाओंको दिवसरूप अरविन्दके आठ दलरूप
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स्पष्टोल्लसत्किरणकेसरसूर्यविम्बविस्तीर्णकणिकमथो दिवसारविन्दम् । श्लिष्टाष्टदिग्दलकलापमुखावता रबद्धान्धकारमधुपावलि सञ्चुकोच ।।५८०।। अत्रैकपदानुप्रविष्टौ रूपकानुप्रासौ। [सू० २१०] तेनासौ त्रिरूप: परिकीतितः ।।१४१ ।। तदयं (१) अनुग्राह्यानुग्राहकतया, (२) सन्देहेन,। (३) एकपदप्रतिपाद्यतया च व्यवस्थितत्वात त्रिप्रकार एव सङ्करो व्याकृतः । प्रकारान्तरेण तु न शक्यो व्याकर्तुम्। आनन्त्यात्तत्प्रभेदानामिति।
और सन्ध्याकालके अन्धकारको मधुपावलि मानकर साङ्ग रूपकका वर्णन किया है। इसके तीन चरणोंमें एक ही पदमें रूपक तथा अनुप्रास दोनों अलद्दार साथ-साथ पाये जाते हैं। जैसे 'किरणकेसर' पदमें किरणोंपर केसरका आरोप होनेसे रूपक तथा ककारकी आवृत्ति होनेसे अनुप्रास दोनों अलङ्कार स्पष्ट हैं। और वे दोनों एक ही अभिन्न पदमें रहते हैं इसलिए यह 'एकाश्रयानुप्रवेशसङ्कर'का उदाहरण है। इसी प्रकार 'सूर्यबिम्बविस्तीर्णकणिक' में सूर्यके ऊपर कणिक अर्थात् बीजकोषका आरोप होनेसे रूपक तथा वर्ण की आवृत्ति होनेसे अनुप्रास दोनों शब्दार्थालद्कार एकाश्रयमें अनुप्रविष्ट हो रहे हैं। इसी प्रकार तीसरे चरणमें 'श्लिष्टाष्टदिग्दलकलाप' में दिक्के ऊपर दलका आरोप होनेसे रूपक तथा ष्टकार तथा लकारकी आवृत्ति होनेसे अनुप्रास दोनों शब्दार्थालङ्कारोंके विद्यमान होनेसे एकाश्रयानुप्रवेशसङ्कर पाया जाता है। श्लोकका अरथ निम्नलिखित प्रकार है- स्पष्टरूपसे निकलती हुई किरणरूप केसरसे युक्त सूर्यबिम्बरूप विस्तीर्ण बीजकोषवाला एवं खिली हुई आठ दिशारूप पॅँखुड़ियोंसे युक्त रात्रिके प्रारम्भमें फैले हुए अन्धकाररूप भ्रमरपंक्तिसे भूषित दिवसरूप कमल बन्द हो गया ॥५८०।। इसमें [तीनों चरणों] में रूपक [अर्थालङ्गार] तथा अनुप्रास [शब्दालङ्गार ] एक ही पदमें समाये हुए हैं। [इसलिए यह सङ्करके तीसरे भेदका उदाहरण है ]। क[सूत्र २१०]-इसलिए यह [सङ्करालङ्गार ] तीन प्रकारका माना जाता है।।१४१।। इसलिए यह [सङ्कर] १. अनुग्राह्य-अनुग्राहकरूपसे, २. सन्देहरूपसे और ३. एकपदप्रति- पाद्यरूपसे व्यवस्थित होनेके कारण तीन प्रकारका ही सङ्कर माना गया है। अन्य प्रकारसे [अर्थात् प्रत्येक अलङ्कारका नाम लेकर दूसरे अलङ्कारके साथ उसका सङ्कर ] नहीं दिखलाया जा सकता है क्योंकि [ऐसा करनेसे तो सङ्गरके ] अनन्त भेद हो जायँगे [ इसलिए तीन ही प्रकारका सङ्कर माना जाता है]। जैसा कि पहिले लिखा जा चुका है 'काव्यप्रकाश' में कुल ६१ अर्थालङ्कारोंका वर्णन किया गया है। वे ६१ अलङ्कार यहाँ समाप्त हो जाते हैं। इसलिए वस्तुतः अलङ्कारनिरूपणका प्रकरण यहीं सपाप्त हो जाता है। इसके बाद इस उल्लासका जो भाग शेष रह जाता है उसमें दो बातोंका विवेचन किया गया है। एक तो यह कि इन अलङ्कारोंके शब्दालङ्कार तथा अर्थालङ्काररूपसे जो भेद किये गये हैं उसका क्या आधार है ? अर्थात् किस नियमके द्वारा हम यह निर्णय कर सकते हैं कि अमुक अलङ्गार- को शब्दालड्वार या अमुक अलङ्कारोंको अर्थालङ्कार माना जाय ? और दूसरी बात यह है कि अलङ्कारोंमें जो दोष आते हैं उन सबका अन्तर्भाव पहिले हुए दोषोंके ही अन्तर्गत हो जाता है। उनसे भिन्न अलंकारोंके कोई अलग दोष माननेकी आवश्यकता नहीं है। सम्प्रति अलङ्कारनिरूपणके प्रसङ्गका उपसंहार करते हुए वे शब्दालड्दार तथा अर्थालङ्कारोंके विनियामक विषयका प्रारम्भ करते हैं-
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का० १४१ सू० २१० ] दशम उल्लास: ५६५ प्रतिपादिताः शब्दार्थोभयगतत्वेन त्रैविध्यजुषोडलङ्वाराः। क जीव कुतः पुनरेष नियमो यदेतेयां तुल्येपि काव्यशोभातिशयहेतुत्वे कश्चिदलङ्कारः शब्दस्य, कर्चिदर्थस्य, कश्चिच्चोभयस्येति चेत् उक्तमत्र यथा काव्ये दोषगुणालद्दाराणों शब्दार्थो- भयगतत्वेन व्यवस्थायाम् अन्वयव्यतिरेकावेव प्रभवतः निमित्तान्तरस्याभावात्। ततशच योऽलङ्कारो यदीयान्वयव्यतिरेकावनुविधत्ते स तदलङ्कारो व्यवस्थाप्यते इति। एत एवं च यथा पुनरुक्तवदाभासः परम्परितरूपक चोभयोर्भावाभावानुविधायितया उभयालङ्कारौ तथा शब्दहेतुकार्थान्तरन्यासप्रभृतयोऽपि द्रष्टव्याः । अर्थस्य तु तत्र वैचि- त्रयम् उत्कटतया प्रतिभासते इति वाच्यालङ्कारमध्ये वस्तुस्थितिमनपेक्ष्यैव लक्षिताः ।
शब्दालद्कार तथा अर्थालङ्गारोंकी व्यवस्था शब्दगत, अर्थगत तथा उभयगत तीनों प्रकारके अलङ्कारोंका वर्णन हो गया। [प्रश्न ]-इन अलङ्गारोंमें काव्यशोभाके अतिशय हेतुत्वके समानरूपसे रहनेपर भी उनमेंसे कुछ शब्दके अलङ्कार, कुछ अर्थालङ्गार और कुछ उभयालङ्कार माने जाते हैं, यह नियम किस आधारपर बनाया गया है यह पूछो तो ? [उत्तर यह है कि ] इस विषयमें पहिले कह चुके हैं कि -- काव्य में गुण, दोष तथा अलङ्कारोंकी शब्दनिष्ठता, अर्थनिष्ठता या उभयनिष्ठताकी व्यवस्थामें, अन्य कोई निमित्त न होनेसे, अन्वय-व्यतिरेक ही नियामक होते हैं। इसलिए जो अलङ्गार [शब्द और अर्थमेंसे] जिसके अन्वय-व्यतिरेक- का अनुसरण करता है वह उसका अलङ्गार माना जाता है। 'तत्सत्त्वे तत्सत्ता अन्वयः, तदभावे च तदभावो व्यतिरेकः' यह अन्वय-व्यतिरेकका अर्थ है। किसी विशेष शब्दके रहनेपर ही जो अलङ्कार रहे, उस शब्दको हटाकर उसका पर्यायवाची शब्द रख देनेपर न रहे, वह अलङ्कार उस शब्दविशेषपर आश्रित है, उस शब्दविशेषके अ्न्वय-व्यतिरेककाअ््प्रनुसरण करता है इसलिए शब्दालङ्कार कहलाता है। इसी प्रकार जो अलङ्कार शब्दका परिवर्तन करके उसके समानार्थक शब्दान्तरके रख देनेपर भी बना रहे वह शब्दके ऊपर नहीं अपितु अर्थके ऊपर आश्चित है, अर्थके अन्वय-व्यतिरेकका अनुसरण करता है इसलिए वह अर्थालङ्वार कहलाता है। और जो शब्द तथा अर्थ दोनोंके अन्वय-व्यतिरेकका अनुसरण करता है वह उभयाल्वार होता है। इस प्रकार [उदाहरण सं० ३६२ 'तनुवपु' इत्यादिमें ] पुनरुक्वदाभास और [उदाहरण सं० ४२६ 'विद्वन्मानसहंस' इत्यादिमें ] परम्परित रूपक [शब्द तथा अर्थ ] दोनोंके अन्वय-व्यतिरेक [भावाभाव]का अनुसरण करनेवाले होनेसे उभयालङ्गार कहलाते हैं। इसी प्रकार शब्दहेतुक अर्थान्तर- न्यास आदि भी [उभयालङ्गार ] समझने चाहिये। परन्तु उन [अर्थान्तरन्यासादि ] में अर्थका चमत्कार प्रबलरूपसे प्रतीत होता है इसलिए वस्तुस्थिति [अर्थात् उनकी उभयालङ्गारता ] की उपेक्षा करके उनको अर्थालङ्गार [वाच्यालङ्गार]में गिनाया गया है। इसका आशय यह है कि "पुनरुक्तवदाभास' अलङ्कारके 'तनुवपु' इत्यादि उदाहरण [ श्लोक- संख्या ३६२]मैं तनु, कुञ्जर, रक्त, धाम, हरि, विष्णु ये शब्द परिवर्तनको सहन नहीं करते हैं अर्थात् उनको बदलकर उनके पर्यायवाचक अन्य शब्द रख देनेपर वह चमत्कार या अलङ्कार नहीं रहता है।
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इसके विपरीत उसी श्लोकमें प्रयुक्त वपु, करि, रुध्िर, इन्द्र शब्द परिवृत्तिसह हैं अर्थात् यदि उनको बदलकर उनके स्थानपर समानार्थक दूसरे शब्द रख दिये जायँ तो भी अलङ्कार बना ही रहता है। इसलिए यह 'पुनरुक्तवदाभास' कुछ अंशमें शब्दके और कुछ अंशमें अर्थके अन्वय-व्यतिरेकका अनुसरण करता है इसलिए यह उभयालङ्कार माना जाता है। इसी प्रकार परम्परित रूपकके 'विद्वन्मानसहंस' इत्यादि उदाहरण (सं० ४२६) में 'मानस' आदि कुछ पद परिवृत्त्यसह और 'हंसादि कुछ पद परिवृत्तिसह हैं अर्थात् मानस आदि पदोंका परिवर्तन कर देनेपर अलङ्कारका चमत्कार नहीं रहता है, परन्तु हंसादि पदोंको परिवर्तित कर देनेपर भी अलङ्कारकी कोई हानि नहीं होती है। इसलिए यह भी कुछ अंशोंमें शब्दके और कुछ अंशोंमें अर्थके अन्वय-व्यतिरेकका अनुसरण करता है, इसलिए उभयालङ्वार माना जाता है। शब्दहेतुक अर्थान्तरन्यासको भी उभयालङ्कार मानना चाहिये। इसका उदाहरण निम्नलिखित श्लोकमें पाया जाता है- उत्पादयति लोकस्य प्रीति मलयमारतः । ननु दाक्षिण्यसम्पन्नः सर्वस्य भवति प्रियः ॥ यहाँ दाक्षिण्यसम्पन्न सबका प्रिय होता है इस सामान्यसे मलयमारुतके प्रीतिजनकत्वका समर्थन किया गया है। इसलिए यहाँ अर्थान्तरन्यास अलङ्कार है। इस अलङ्कारका मूल यहाँ 'दाक्षिण्यसम्पन्नः' यह शब्द है। मलयमारुत दक्षिण दिशासे आता है इसलिए वह 'दाक्षिण्यसम्पन्न' है। 'अनेकमहिला- समरागो दक्षिण: कथितः' जिसका अ्नेक नायिकादिके प्रति समान अनुराग हो वह नायक दक्षिण- नायक कहलाता है। वह 'दाक्षिण्यसम्पन्न' नायक जैसे सबको प्रिय होता है ऐसे ही 'दाक्षिण्यसम्पन्न' मलयमारुत सबको शह्लादित करता है। इस प्रकार सामान्यसे विशेषके समर्थनरूप इस अर्थान्तर- न्यासका बीज या आधार 'दाक्षिण्यसम्पन्नः' शब्द है। यदि उसको बदलकर कोई अन्य शब्द रख दिया जाय तो यह अलङ्कार नहीं रहेगा। इसलिए इस अंशमें अर्थान्तरन्यास अलङ्कार शब्दके अन्वय- व्यतिरेकका अनुसरण कर रहा है अर्थात् शब्दालङ्कार है, इसलिए सामान्यतः अर्थालङ्कारमें परिगणित होनेपर भी कहीं-कहीं शब्दके अन्वय-व्यतिरेकका अनुगामी होनेसे शब्दहेतुक अर्थान्तरन्यासको भी उभयालङ्कार मानना चाहिये यह ग्रन्थकारका आशय है। अलङ्कारसवस्वकार रुय्यकका खण्डन अलङ्कारसर्वस्वकार रुय्यकने शब्दालङ्कार, अर्थालङ्कार तथा उभयालङ्कारके भेदक हेतुकी विवेचना करते हुए लिखा है कि- 'योऽलङ्कारो यदाश्रितः स तदीयोऽलङ्कारः। तेनाश्रयाश्रयिभाव एव शब्दार्थोभयालङ्कार- व्यवस्थायां बीजम्, नान्वयव्यतिरेकौ।' इस प्रकार अलङ्कारसर्वस्वकार रुय्यकने अन्वय-व्यतिरेकको अलङ्कारोंकी शब्दनिष्ठता या अर्थ- निष्ठताका नियामक न मानकर उसके स्थानपर 'आश्रयाश्रयिभाव'को उसका नियामक माना है। परन्तु काव्यप्रकाशकार उससे सहमत नहीं हैं इसलिए इस मतका खण्डन करनेके लिए उन्होंने अगली पंक्ति लिखी है। उसका आशय यह है कि आप जिस आश्रयाश्रयिभावकी कल्पना कर रहे हैं वह आश्रयाश्रयिभाव भी तो अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा ही निर्धारित होता है, क्योंकि यदि अन्वय-व्यतिरेक न माना जाय तो किन्हीं दो पदार्थोंमें आश्रयाश्रयिभावका भी निर्णय नहीं हो सकता है। इसलिए आश्रयाश्रयिभावकी अपेक्षा अन्वय-व्यतिरेकको ही शब्दनिष्ठतादिका नियामक मानना उचित है। यह
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का० १४२, सू० २११ ] दशम उल्लास: ५६७ योऽलङ्कारो यदाश्रितः स तदलङ्कार इत्यपि कल्पनायाम् अन्वयव्यतिरेकावेव समाश्रयितव्यौ तदाश्रयणमन्तरेण विशिष्टस्याश्रयाश्रयिभावस्याभावात्। इत्यलङ्काराणां यथोक्तनिमित्त एव परस्परव्यतिरेको ज्यायान् । [सू० २११ ] एषां दोषा यथायोगं सम्भवन्तोऽपि केचन। उक्तेष्वन्तर्भवन्तीति न पृथक् प्रतिपादिताः ॥१४२। (१) तथाहि अनुप्रासस्य (क) प्रसिद्धयभावो (ख) वैफल्यं (ग) वृत्तिविरोध
ग्रन्थकारका अभिप्राय है। इसीको वे अगले अनुच्छेदमें निम्नलिखित प्रकार कहते हैं- 'जो अलङ्गार [शब्द और अर्थमेंसे ] जिसके आश्रित रहता है वह उसका अलङ्कार होता है' [यह जो अलङ्कारसर्वस्वकारने माना है उनकी ] इस कल्पनामें भी अन्वय-व्यतिरेकका ही आश्रय लेना होगा। उसका [अर्थात् अन्वय-व्यतिरेकका ] आश्रय लिये बिना विशिष्ट [किन्हीं दो पदार्थों]का आश्रयाश्रयिभाव नहीं बन सकता है। इसलिए अलङ्कारोंका उस [अन्वय-व्यतिरेकरूप ] हेतुके आधारपर ही [यह शब्दालङ्कार है, यह अर्थालङ्गार है और यह उभयालङ्गार है इस प्रकारका ] परस्पर भेद मानना अधिक अच्छा है। वामनाभिमत अलङ्गारदोषोंका खण्डन इस प्रकार शब्दालङ्कार, अर्थालङ्कार आदिके नियामक हेतुका निर्णय करनेके बाद अब अलङ्कारदोषोंकी विवेचना प्रारम्भ करते हैं। इस प्रकरणको ग्रन्थकारने मुख्यतः वामनके मतका खण्डन करनेके लिए आरम्भ किया है। वामनने अपने 'काव्यालङ्कारसूत्र' में अनुप्रास, यमक, उपमा, उत्प्रेक्षा आदि अलङ्कारोंके अनेक दोष दिखलाये हैं। काव्यप्रकाशकार अलङ्कारदोषोंको अलग माननेकी आरव- श्यकता नहीं समझते हैं। इसलिए इस लम्बे प्रकरणमें वामनके मतका खण्डन करेंगे। इस विषयमें ग्रन्थकार मम्मटका सिद्धान्तमत यह है कि जिन दोषोंकी गणना सप्तम उल्लासमें की जा चुकी है उनसे भिन्न अलङ्कारके अन्य दोष नहीं होते हैं। अलङ्कारोंमें जो दोष हो सकते हैं उनका अन्तर्भाव पूर्वोक्त दोषोंमें ही हो जाता है। इसी बातका प्रतिपादन करनेके लिए यहाँ वामन द्वारा प्रस्तुत अलङ्कारदोषोंके उदाहरण लेकर, उनका अन्तर्भाव पूर्वोक्त दोषोंमें दिखलानेका प्रयत्न करेंगे। [सूत्र २११]-इन [ अलङ्गारों ]के यथायोग कुछ दोष सम्भव होनेपर भी उक्त दोषोंमें ही अन्तर्भूत हो जाते हैं इसलिए उनका अलग प्रतिपादन नहीं किया है ।।१४२।। वामन आदि प्राचीन आचार्योंने अलङ्कारोंके दोषोंका भी निरूपण किया है। काव्यप्रकाशकार उन दोषोंकी सत्ता तो मानते हैं फिर भी उनका मत है कि उनका अन्तर्भाव सप्तम उल्लासमें कहे हुए दोषोंके भीतर ही हो जानेसे उनका अलग प्रतिपादन करनेकी आवश्यकता नहीं है। अतः इस ग्रन्थमें उनका प्रतिपादन न होनेसे ग्रन्थमें अपूर्णतादोष नहीं समझना चाहिये। यह ग्रन्थकारका आशय है। आगे कुछ उदाहरण देकर इसी बातको स्पष्ट करते हैं। (१) अनुप्रासदोषोंका अन्तर्भाव जैसे कि अनुप्रासमें प्रसिद्धिका अभाव, वैफल्य [अर्थात् चमत्काराजनकत्व ] और [उपनाग-
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इति ये त्रयो दोषा: ते प्रसिद्धिविरुद्धताम् अपुष्टार्थत्वं प्रतिकालवर्णता च यथाकमं न व्यतिकामन्ति, तत्स्वभावत्वात्। कमेणोदाहरणम्- (क) चक्री चक्रारपङक्ति हरिरपि च हरीन् धूर्जटिर्धूर्ध्वजाग्रान् अक्षं नक्षत्रनाथोऽरुणमपि वरुण: कवराग्नं कुबेरः। रंहः संघः सुराणां जगदुपकृतये नित्ययुक्तस्य यस्य स्तौति प्रीतिप्रप्तन्नोऽन्वहमहिमरुचेः सोऽवतात् स्यन्दनो वः ।।५८१।। अत्र कर्तृ कर्मप्रतिनियमेन स्तुतिः अनुप्रासानुरोधेनैव कृता न पुराणेतिहासाविषु तथा प्रतीतेति प्रसिद्धिविरोधः । (ख) भण तरुणि ! रमणमन्दिरमानन्दस्यन्दिसुन्दरेन्दुमुखि। यदि सल्लीलोल्लापिनि ! गच्छसि तत् कि त्वदीयं मे ।५८२।। अनणुरणन्मणिमेखलमविरतशिञ्जानमञ्जुमञ्जीरम्। परिसरणमरुणचरणे ! रणरणकमकारणं कुरुते ।।५८३। अब्र वाच्यस्य विचिन्त्यमानं न किञ्चिदपि चारुत्वं प्रतीयते इत्यपुष्टार्थतैवानु- प्रासस्य वैफल्यम् ।
रिकादि] वृत्तियोंका विरोध ये तीन दोष [प्राचीन आचार्योंके मतसे ] होते हैं। वे कमशः प्रसिद्धिविरुद्धता, अपुष्टार्थत्व और प्रतिकूलवर्णता [रूप पहिले कहे हुए दोषों ] से अलग नहीं हैं। उसी प्रकारके स्वभाववाले होनेसे [इनका अन्तर्भाव पूर्वोक्त दोषोंमें ही हो जाता है]। क्मसे [तीनोंके] उदाहरण [जैसे]- (क) सूर्यका वह रथ, जिसके पहियोंके अरोंकी स्तुति चक्री अर्थात् विष्णु भगवान् करते हैं, घोड़ोंकी प्रशंसा इन्द्र करते हैं, ऊपर लगी पताकादिकी स्तुति शिवजी करते हैं, चन्द्रमा जिसके धुरेकी बड़ाई करते हैं, वरुण जिसके [सारथि ] अरुणकी, अक्षके अग्रभागकी कुबेर और देवताओंका समूह जिसके वेगकी प्रशंसा करता है, जगत्के कल्याणके लिए सदैव लगा रहनेवाला सूर्यदेवका वह रथ तुम्हारी रक्षा करे ॥४५१॥ यहाँ कर्ता और कर्म [अर्थात् चक्री चक्रारपंक्ति आदिके रूप ]के प्रतिनिधि रूपमें स्तुतिका वर्णन अनुप्रास [का सौन्दर्य बनाने]के अनुरोधसे किया गया है। किन्तु पुराण, इतिहास आदिमें उस प्रकारकी प्रसिद्धि नहीं है। इसलिए [ अनुप्रासका यह प्रसिद्धयभावरूप दोष पूर्वोक्त] प्रसिद्धिविरुद्धता [के ही अन्तर्गत ] है। (ख) आनन्ददायक [शरत्पूर्णिमाके] सुन्दर चन्द्रमाके समान मुखवाली, मनोहर हावभावके साथ बात करनेवाली, रक्तचरणोंवाली हे सुन्दरि ! तगड़ीको जोर-जोरसे बजाती और निरन्तर नूपुरकी ध्वनि करती हुई तुम यदि अपने प्रियके घरको जाती हो तो तुम्हारा वह जाना [ त्वदीयं तत्परिसरणं] मुझे व्यर्थ ही क्यों सता रहा है।५८२-५८३।। यहाँ [केवल अनुप्रासका वैचित्य है] परन्तु विचार करनेपर भी [उससे ] अर्थका तनिक भी
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का० १४२, सू० २११ ] दशम उल्लास: ५६६ (ग) 'अकुण्ठोत्कण्ठया' इति। अत्र शृंगारे परुषवर्णाडम्बरः पूर्वोवतरीत्या विरुध्यत इति परुषानुप्रासोऽत्र प्रतिकूलवर्णतैव वृत्तिविरोधः । (२) यमकस्य पादत्रयगतत्वेन यमनमप्रयुक्तत्वं दोषः । यथा -- भुजङ्गमस्येव मणिः सदम्भा ग्राहावतीर्णेव नदी सदम्भाः । दुरन्ततां निर्णयतोऽपि जन्तोः कर्षन्ति चेतः प्रसभं सदम्भाः ॥५८४॥ (३) १. उपमायामुपमानस्य जातिप्रमाणगतन्यूनत्वम् अधिकता तादृशी अनु- चितार्थत्वं दोषः । जा २. धर्माश्रये तु न्यूनाधिकत्वे यथाक्रमं हीनपदत्वमधिकपदत्व च न व्यभिचरतः । कमेणोदाहरणम् --
चारुत्व प्रतीत नहीं होता है इसलिए अनुप्रासकी विफलता [अर्थात् अनुप्रास-वैफल्यरूप दोष, पूर्वोक्त दोषोंके अन्तर्गत अपुष्टार्थता [दोष] ही है। (ग) 'अकुण्ठोत्कण्ठया' यह [सप्तमोल्लासका उदाहरणसंख्या २०८।] यहाँ शृंगाररसमें कठोरवर्णोंका बाहुल्य पूर्वोक्त [अर्थात् अष्टम उल्लासमें गुणविवेचनके प्रसङ्गमें कही हुई ] रोतिसे विरुद्ध होता है। इसलिए परुष वर्णोंका अनुप्रासरूप जो वृत्तिविरोध [अनुप्रासका दोष ] है वह प्रतिकूलवर्णता [रूप पूर्वोक्त दोषरूप ] ही है [ उससे भिन्न नहीं है]। (२) यमकदोषका अन्तर्भाव यमकका तीन चरणोंमें स्थापन अप्रयुक्तत्व दोष है। जैसे -- [दम्भी कपटी पुरुषके संसर्गका ] परिणाम बुरा होगा इस बातको जाननेवाले [ दुरन्ततां निर्णय- तोऽपि जन्तो: ] पुरुषोंके चित्तको भी, साँपकी पानीदार [आबदार ] मणिके समान और घड़ियालोंसे भरी हुई किन्तु स्वच्छजलयुक्त नदीके समान, कपटी हठात् [अपनी ओर ] खींच लेते हैं ॥५८४॥ इस श्लोकके केवल तीन चरणोंमें 'सदम्भाः' पदको आ्रदृत्ति होनेसे यह पादत्यगत यमकका उदाहरण है। यमककी इस प्रकारकी पादत्रयगत स्थितिको वामन आरप्रदि प्राचीन आ्र्प्राचार्योंने पृथक् अलक्कारदोष माना है। परन्तु काव्यत्रकाशकार मम्मटक मतानुसार उसका अ्रन्तर्भाव पहिले कहे हुए अप्रयुक्तत्व दोषके अन्तर्गन हो जाता है। इमलिए उसको अलग माननेकी आवश्यकता नहीं है। (३) उपमादोषोंका अन्तर्भाव २. उपमा [ अलङ्गार]नें उपमानकी जातिगत अथवा परिमाणगत न्यूनता अथवा उसी प्रकारकी [जातिगत तथा परिमाणगत] अधिकता[जिसे प्राचीन बामन आदिने उपमादोषोंमें अलग गिनाया है वस्तुतः पूर्वोक्त] अनुचितार्थत्व दोषरूप है। १. [साधारण ] धर्ममें रहनेवाले न्यूनत्व और अधिकत्व कमशः हीनपदत्व तथा अधिकण्दत्व [रूप पूर्वोक्त दोषों]से भिन्न नहीं हैं। कमशः [उन सबके उदाहरण [जैसे ]-
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१. (क) चण्डालैरिव युष्माभिः साहसं परमं कृतम् ।।५८५।। (ख) वह्निस्फुलिङ्ग इव भानुरयं चकास्ति ।।५८६ ।ए तीर ह (ग) अयं पद्मासनासीनश्चक्र्वाको विराजते। युगादौ भगवान्वेधा विनिर्मित्सुरिव प्रजाः ।५८७। (घ) पातालमिव ते नाभि: स्तनौ क्षितिधरोपमौ। वेणीदण्डः पुनरयं कालिन्दीपातसन्निभः ।५८८।। अत्र चण्डालादिभिरुपमानैः प्रस्तुतोऽर्थोत्यर्थमेव कदर्थित इत्यनुचितार्थता। २. (क) स मुनिर्लाञ्छितो मौञ्ज्या कृष्णाजिनपटं वहन्। व्यराजन्नीलजीमूतभागाश्लिष्ट। इवांशुमान् ।।५८९।। १. उपमानका न्यूनाधिक्य उपमानकी जातिगत न्यूनताका उदाहरण देते हैं- (क) चाण्डालोंके समान आप लोगोंने अतिसाहस ['साहसं तु दम्भे दुष्कर्मणि अविमृश्यकृते धाष्टयें।' इति हेम: ] किया है॥५८५॥ वामनकी 'काव्यालङ्कारसूत्रवृत्ति' में इसे उपमानकी जातिगत न्यूनताके उदाहरणरूपमें उद्धृत किया गया है, क्योंकि इसमें चाण्डालको उपमान बनाया गया है। काव्यप्रकाशकारके मतसे पूर्वोक्त अनुचितार्थत्वदोषमें ही इसका अन्तर्भाव हो जाता है। (ख) यह सूर्य आगकी चिनगारीके समान शोभित हो रहा है ।५८६।। इसे वामनने उपमानके परिमाणगत न्यूनत्वदोषका उदाहरण माना है, क्योंकि इसमें 'भानु का उपमान 'वह्निस्फुलिङ्ग' को बनाया है जो परिमाणमें उपमेय सूर्यसे कहीं अधिक न्यून है। काव्यप्रकाश- कार पूर्वोक्त अनुचितार्थत्वदोषमें ही इसका भी अन्तर्भाव मानते हैं। (ग) कसलरूप आसनपर बैठा हुआ यह चकवा ऐसा शोभित हो रहा है मानों सृष्टिके प्रारम्भमें प्रजाओंको उत्पन्न करनेकी इच्छासे पद्मासनपर ब्रह्मा बैठे हों ।५८७॥ यहाँ उपमेय चक्रवाक है और ब्रह्माको उसका उपमान बनाया गया है। इसे वामनने उपमानके जातिगत आधिक्यका उदाहरण माना है। मम्मट इसे भी अनुचितार्थत्व मानते हैं। (घ) तुम्हारी नाभि पातालके समान [गहरी ], स्तन पहाड़ोंके समान [ऊँचे ] और वेणीदण्ड यमुनाप्रवाहके सदृश [कृष्णवर्ण ] है॥५८८॥। वामनने इसे उपमानके परिमाणगत आधिक्य दोषका उदाहरण माना है। काव्यप्रकाशकार इसे भी पूर्वोक्त अनुचितार्थत्वदोषके अन्तर्गत मानते हैं। इन [उदाहरणों ] में चाण्डाल आदि उपमानोंने वर्णनीय अर्थको अत्यन्त निकृष्ट कर दिया है इसलिए [इन सब उदाहरणोंमें ] अनुचितार्थता [दोष] है। २. साधारणधर्मका न्यूनाधिक्य साधारणधर्मकी न्यूनताका हीनपदत्वमें अ्र्पन्तर्भाव करते हुए उदाहरण देते हैं- (क) मूंजकी मेखला और मृगके चर्मको धारण किये हुए वे नारद [ मुनि] नीलमेघखण्डसे आवृत सूर्यके समान शोभित हुए ।।५८६।।
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का० १४२, सू० २११ ] दशम उल्लास: ५७१ अत्रोपमानस्य मौञ्जीस्थानीयस्तडिल्लक्षणो धर्मः केनापि पदेन न प्रतिपादित इति हीनपदत्वम्। (ख) स पीतवासाः प्रगृहीतशार्ङ्गो मनोज्ञभीमं वपुराप कृष्णः । शत-ह्रदेन्द्रायुधवान्निशायां संसृज्यमानः शशिनेव मेघः ॥५९०॥ FITER JHT
अत्रोपमेयस्य शङ्गादेरनिःरदेशे शशिनो ग्रहणमतिरिच्यते इत्यधिकपदत्वम्।
यहाँ उपमान [सूर्य]का मौञ्जीस्थानीय विद्युत् रूप धर्म किसी पदके द्वारा प्रतिपादित नहीं किया गया है इसलिए हीनपदत्वदोष है। इसका आशय यह है कि उपमेय नारदमुनि हैं। उनके साथ पीतवर्णकी मूंजकी मेखला तथा कृष्णमृगचर्मरूप दो धर्मोंका सम्बन्ध है। दूसरी ओर उपमान सूर्य है। परन्तु उनके साथ कृष्णमृगचर्मके स्थानपर नोलजीमूतका सम्बन्ध तो है, पर पीतवर्णकी मोञ्जीस्थानीय किसी धर्मका सम्बन्ध नहीं है। इसलिए वामनने इसे उपमानगत धर्मन्यूनताका उदाहरण माना है। परन्तु काव्यप्रकाशकार इसे पहिले कहे हुए 'होनपदत्व' का ही उदाहरण मानते हैं। अगला उदाहरण उपमानगत धर्माधिक्यका देते हैं। उसमें श्रीकृष्ण उपमेय हैं और मेघ उपमान है। श्रीकृष्णके साथ 'पीतवासाः' और 'प्रगृहीतशार्ङ्ग'' ये दो विशेषण लगे हुए हैं। परन्तु उपमानभूत मेघके साथ कृष्णके पीतवस्त्रोंके स्थानपर 'शतह्रदा' अर्थात् विद्युतका और शार्ङ्ग धनुषके स्थानपर इन्द्र- धनुषका सम्बन्ध तो व्णित है ही, उसके त्तिरिक्त चन्द्रमाके साथ मेघका भी सम्बन्ध दिखलाया गया है। इसकी टक्करमें कृष्णके साथ 'शङ्द' का सम्बन्ध दिखलाना चाहिये था। उसके न होनेसे प्राचीन वामन आदिके मतसे इस श्लोकमें उपमानगत धर्माधिक्यरूप दोष आता है। पर काव्यप्रकाशकार इसे पूर्वोक्त अधिकपदत्वके ही अन्तर्गत मानते हैं। श्लोकका अर्थ निम्नलिखितप्रकार है- (ख) पीताम्बरधारी और शृङ्गके बने हुए धनुषको लिये हुए कृष्ण, विद्युत् एवं इन्द्रधनुषसे युक्त, और रात्रिमें चन्द्रमाके साथ मिलते हुए मेघके समान सुन्दर एवं भयङ्कर [एक ही साथ दोनों प्रकारके ] रूपको प्राप्त हुए ।।५६०।। इसमें उपमेय [श्रीकृष्ण]के शङ्गादि [धर्म]का कथन न होनेसे [ उपमानभूत मेघमें ] चन्द्रमाका ग्रहण अधिक हो जाता है। इसलिए इसमें अधिकपदत्वदोष है। ३. लिङ्गभेद और वचनभेद वामन आदि आचार्योंने उपमान तथा उपमेयके लिङ्गभेद एवं वचनभेदको भी उपमालङ्कारका दोष माना है। काव्यप्रकाशकारका इस विषयमें यह मत है कि जहाँ उपमान-उपमेयके लिङ्गभेद अरथवा वचनभेदके कारण साधारणधर्ममें भी लिङ्ग या वचनभेदरूप अन्तर आ जाता है वहीं वे दोषाधायक होते हैं। और उस दशामें भी उनको अलग दोष न मानकर 'भग्नप्रक्रम' दोषके अन्तर्गत ही समझना चाहिये। लिङ्गभेद या वचनभेदमें 'भग्नप्रक्रम' दोष इसलिए होता है कि उपमान-उपमेयमें लिङ्गभेद या वचनभेद होनेपर साधारणधर्मका एक जगह तो वाच्यरूपमें यथाश्रुत अन्वय हो जाता है, परन्तु दूसरेके साथ फिर लिङ्गविपर्ययकी कल्पना करके प्रतीयमान धर्मके रूपमें अ्र्न्वय होता है। इसलिए उन दोनोंमें वाच्य तथा प्रतीयमानताका भेद हो जानेसे भग्नप्रकम दोष हो जाता है और जहाँ उपमान-उपमेयमें लिङ्ग या वचनका भेद होनेपर भी साधारणधर्ममें कोई परिवर्तन नहीं होता है. वह दोनोंके साथ यथाश्रुतरूपमें
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३. लिङ्गवचनभेदोऽपिउपमानोपमेययोः साधारण चेत् धर्ममन्यरूपं कुर्यात्तदा एकतरस्यैत्र तद्धर्मसमन्वयावगतेः सविशेषणस्यैव तस्योपमानत्वमुपमेयत्वं वा प्रतीयमानेन धर्मेण प्रतीयते इति प्रकान्तस्यार्थस्य स्फुटमनिर्वाहादस्य भग्नप्रक्रमरूपत्वम्। यथा- (क) चिन्तारत्नमिव च्युतोऽसि करतो धिङमन्दभाग्यस्य मे ॥५९१॥ (ख) सक्तवो भक्षिता देव ! शुद्धा: कुलवधूरिव ।५९२।।
ही तन्वित हो जाता है, वहाँ किसी प्रकारका दोष ही नहीं होता है। इसलिए लिङ्गभेद तथा वचनभेदको अलग उपमादोष माननेकी आवश्यकता नहीं है। इसी बातको ग्रन्थकार अगले अनुच्छेदमें कहते हैं- उपमान तथा उपमेयका लिङ्गभेद या वचनभेद यदि साधारणधर्मको परिवर्तित [अथवा किसी एकके ही साथ अन्वित होने योग्य अर्थात् असाधारणधर्म ] कर दे तो [ उपमान या उपमेयमेंसे] किसी एकके साथ उस [साधारण ] धर्मके अन्वयकी प्रतीति होनेसे [ उपमान-उपनेयमेंसे जिसका लिङ्ग या वचन साधारणधर्मके लिङ्ग या वचनसे मिलता हुआ है] उसका उपमानत्व या उपमेयत्व [साधारणधर्मरूप] विशेषणसे युक्तका ही होता है और दूसरी जगह [ अर्थात् उपमान-उपमेयमेंसे जिसके साथ साधारणधर्मका लिङ्ग और वचन नहीं मिलता है वहाँ लिङ्गविपरिणामके द्वारा] प्रतीयमान धर्मसे [ उपमानत्व अथवा उपमेयत्व ] प्रतीत होता है इसलिए [ एक जगह वाच्यरूपसे और दूसरी जगह प्रतीयमानरूपसे साधारणधर्म- का अन्वय होनेके कारण ] प्रकान्त [उपमालङ्गार]का स्पष्टरूपसे निर्वाह [अर्थात् तुरन्त प्रतीति ] न होनेसे 'भग्नप्रकमत्व' [दोष होता ] है। जैसे- (क) हा धिक् ! चिन्तामणिके समान [चिन्तित अर्थको देनेवाले] तुम मन्द-भाग्य मेरे हाथसे गिर गये हो।।५६१।। इसमें 'चिन्तारत्न' यह उपमानवाचक पद नपुँसकलिङ्गमें है और उपमेयभूत 'त्वं' पुल्लिङ्गमें हैं। 'च्युतः' यह साधारणधर्म भी पुल्लिङ्गमें है। इसलिए उपमेयके साथ तो 'च्युतः' इस साधारणधर्म- का वाच्यरूपसे यथाश्रुत अ्न्वय हो जाता है। परन्तु 'चिन्तारत्नं' रूप उपमान पदके साथ तुरन्त अ्व्वय नहीं होता है। उसमें लिङ्गविपरिणाम आर्दिकी कल्पनामें विलम्ब होनेसे प्रतीयमानरूपसे ही साधारण- धर्मका अन्वय होनेसे 'भग्नप्रकमता' दोष हो जाता है। इस प्रकार यह लिङ्गभेदका उदाहरण दिया। वचनभेदका उदाहरण आगे देते हैं। (ख) हे राजन् ! कुलवधूके समान शुद्ध, सत्तुओंको खाया ॥५६२॥ यहाँ 'सक्तवः' यह बहुवचनमें पठित उपमेयपद है और एकवचनमें पठित 'कुलचधूः' यह उपमान- वाचक पद है। 'शुद्धाः' यह बहुवचनान्त साधारणधर्मका वाचक पद है। इस बहुवचनान्त 'शुद्धाः' पदका 'सक्तवः' के साथ तो वाच्यरूपमें यथाश्रुत अत्वय हो जाता है परन्तु एकवचनान्त उपमानवाचक 'कुलवधूः' पदके साथ वचनविपरिणामकी कल्पना द्वारा प्रतीयमानरूपमें ही उसका अन्वय होता है। इसलिए एक जगह वाच्य और दूसरी जगह प्रतीयमानरूपसे साधारणधर्मका अन्वय होनेसे ('भग्न- प्रक्रमता' दोष होता है। और वचनविपरिणाममें विलम्ब होनेके कारण उपमालङ्वारकी सद्ः प्रतीति या स्फुट निर्वाह भी नहीं होता है। इसलिए भी 'भग्नप्रक्रमता' दोष होता है।
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का० १४२, सू० २११ ] दशम उल्लास: ५७३
यत्र तु नानात्वेऽपि लिङ्गवचनयीः सामान्याभिधायि पद स्वरूपभेद नापद्यते न तत्रैतद्दूषगावतारः। उभयथापि अस्यानुगमक्षमस्वभावत्वात्। यथा- (क) गुणैरनध्यें: प्रथितो रत्नैरिव महार्णवः ॥५९३। (ख) तव्वेषोऽसदृशोऽन्याभि: स्त्रीभिर्मधुरताभृतः।P दधते स्म परां शोभां तदीया विभ्रमा इव ॥।५९४॥
लिङ्गभेदकी अदोषता और जहाँ [उपमान तथा उपमेयके ] लिङ्ग एवं वचनमें [नानात्मक ] भेद होनेपर भी साधारण- धर्मके वाचक पदके स्वरूपमें परिवर्तन नहीं होता है वहाँ इस [साधारणधर्मवाचक पद]का [उपमान तथा उपमेय ] दोनोंके साथ [उसी रूपसे ] अन्वय हो सकता है इसलिए इस [लिङ्गभेद या वचनभेदरूप वामनोक्त ] दोषके आनेका अवसर ही नहीं आता है। जैसे -- (क) बहुमूल्य रत्नोंसे जैसे समुद्र प्रसिद्ध है इसी प्रकार वह राजा अतिश्रेष्ठ गुणोंसे प्रसिद्ध हुआ ।। ५६३॥ यहाँ उपमानवाचक 'रत्नैः' पद तथा उपमेयवाचक 'गुणः' पदमें लिङ्गभेद है। रत्न शब्द नपुँसकलिङ्ग तथा गुण शब्द पुल्लिङ्ग है। परन्तु उन दोनोंमें लिङ्गभेद रहते हुए भी तृतीयामें दोनोंके रूप एक समान ही बनते हैं। अतः 'अ्रनध्यैः' इस साधारणधर्मवाचक पदका दोनोंके साथ यथाश्रुत अ्न्वय हो जाता है, इसलिए यहाँ उपमान-उपमेयका लिङ्गभेद दोपाधायक नहीं माना जा सकता है। वचनभेदकी अदोषता इसी प्रकार वचनभेदके दोषाधायक न होनेका उदाहरण आगे देते हैं- (ख) उस [नायिका]का मधुरतासे भरा हुआ वेष उसके मधुरतापूर्ण हाव-भावोंके समान अन्य स्त्रियोंसे भिन्न होनेसे अत्यन्त शोभाको धारण कर रहा था ॥५६४॥ यहाँ 'तद्वेषः' यह उपमेयवाचक पद एकवचनान्त तथा 'विभ्रमाः' यह उपमानवाचक पद बहु- वचनान्त है। 'असदृशः', 'मधुरताभृतः' औरर 'दधते' ये तीनों पद साधारणधर्मके वाचक है। साधारण- धर्मवाचक तीनों पदोंके एकवचन तथा बहुवचन दोनोंमें ही एकसे रूप बनते हैं। इसलिए जब उपमान- वाचक बहुवचनान्त 'विभ्रमाः' के साथ इनका अन्वय होता है तब वे बहुवचनान्त रूप माने जाते हैं और जब उपमेयवाचक एकवचनान्त 'तद्वेपः' पदके साथ इनका अन्वय होता है तब एकवचनान्त माने जाते हैं। इसलिए उपमान-उपमेयमें वचनभेद होनेपर भी उससे साधारणधर्मवाचक पदोंके स्वरूपमें कोई परिवर्तन न होनेसे यहाँ कोई दोष नहीं आता है। 'असदृशः' पद एकवचन तथा बहुवचन दोनोंमें बन सकता है। 'समान इव पश्यति इति सदृशः' इस विग्रहमें 'त्यदादिषु दृशोऽनालोचने कञ, च' [३-२-६०] इस सूत्रमें पठित 'समानान्ययोश्चेति वाच्यम्' इस वार्तिकसे 'समान' शब्द उपपद रहते 'दृश' धातुसे कर्तामें 'कञ-प्रत्यय' और 'दृग्दृशवतुषु' [६-३-८६] सूतरसे 'समान'को 'स' आ्रप्रादेश होकर 'सदृश' बनता है और उसका प्रथमाके एकवचनमें 'सदृशः' रूप होता है। इसके विपरीत उसी 'समान इव पश्यति' इसी विग्रहमें 'किवप् च' [३-२-७६] इस सूत्रसे कवप्-प्रत्यय होता है तब 'सदृश्' शब्द बनता है। उससे प्रथमाके बहुवचनमें 'सदृशः' रूप बनता
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५७४ काव्यप्रकाश [ का० १४२, सू० २११ ४. कालपुरुषविध्यादिभेदेऽपि न तथा प्रतीतिरस्खलितरूपतया विश्रान्तिमासादय- तीत्यसावपि भग्नप्रक्रमतयैव व्याप्तः । यथा -- (क) अतिथिं नाम काकुत्स्थात्पुत्रमाप कुमुद्वती। पश्चिमाद् यामिनीयामात् प्रसादमिव चेतना ।।५९५।। अत्र चेतना प्रसादमाप्नोति न पुनरापेति कोलभेदः । है। इसी प्रकार 'मधुरताभृतः' में भृत पदको यदि क्त-प्रत्ययान्त माना जाय तो 'भृतः' यह प्रथमाके एकवचनका रूप होगा और यदि उसको क्विप्-प्रत्ययान्त माना जाय तो 'भृतः' यह प्रथमाके बहुवचन- का रूप होगा। इसी प्रकार भ्वादिगणपठित 'दध् धारण' धातुसे प्रथमपुरुषके एकवचनमें 'दधते' यह रूप वनता है और जुहोत्यादिगण-पठित 'डुधाञ्न धारणपोपणयोः' धातुसे प्रथमपुरुषके बहुवचनमें 'दधते' रूप बनता है। ४. कालभेद और पुरुषभेद वामनादिने जिस प्रकार उपमान-उपमेयके लिङ्गभेदमें तथा वचनभेदको उपमाका दोप माना है इसी प्रकार उपमामें कालभेद, पुरुषभेद, विध्यादिके भेदको भी उन्होंने उपमाका दोप माना है। परन्तु काव्यप्रकाशके मतमें जैसे लिङ्गभेद और वचनभेदका अन्तर्भाव 'भग्नप्रकमता' दोषमें हो जाता है उसी प्रकार कालभेद, पुरुषभेद तथा विध्यादिभेदका भी अन्तर्भाव 'भग्नप्रक्रमता' दोषमें हो जाता है, क्योंकि वहाँ भी काल, पुरुष आदिके विपरिणामके बिना उनका उपमान-उपमेय दोनोंके साथ यथा- श्रुतरूपमें अन्वय नहीं हो सकता है। इसलिए एक जगह वाच्यरूपसे और दूसरी जगह विपरिंणाम आदि द्वारा प्रतीयमानरूपसे उनका अ्न्वय होनेसे 'भग्नप्रकमता' दोप आ ही जाता है। इसी बातको ग्रन्थकार अगले अनुच्छेदमें कहते हैं- [उपमामें ] काल, पुरुष तथा विधि आदिका भेद होनेपर भी [ जैसे कि काल, पुरुष, विधि आदिके ऐक्यस्थलमें होती थी] उसी प्रकारसे अस्खलितरूपसे [अर्थात् कालादिका विपरिणाम किये बिना उपमान-उपमेयकी ] प्रतीतिकी समाप्ति नहीं होती है इसलिए यह [काल, पुरुष, विधि आदिका भेद] भग्नप्रकमतासे ही व्याप्त है [ अर्थात् जहाँ-जहाँ कालभेद, पुरुषभेद या विध्यादि भेद रहता है वहाँ भी भग्नप्रकरभता दोष होता है]। जैसे- (क) रात्रिके अन्तिम पहरसे जैसे चेतना प्रसन्नताको प्राप्त करती है इसी प्रकार [कुमुद नामक नागराजकी बहिन] कुमुद्वतीने ककुत्स्थ-कुलमें उत्पन्न हुए [ राजा कुश]से अतिथि नामक पुत्रको प्राप्त किया ।५६५॥ यहाँ चेतना [बुद्धि प्रातःकालमें ] निर्मलताक्रो [प्रतिदिन ] प्राप्त करती है [ इसलिए उपमानमें वर्तमान कालका प्रयोग होना चाहिये था] न कि प्राप्त किया[इस भूतकालवाचक पदका प्रयोग किया जाना चाहिये था] इसलिए कालभेद है। इसको वामनने उपमादोष माना है, परन्तु काव्यप्रकाशकार उसका अन्तर्भाव 'भग्नप्रक्रमता' दोषमें ही मानते हैं। इसी प्रकार पुरुषभेदका उदाहरण आागे देते हैं। यह श्लोक 'रत्नावली' नाटिकासे लिया गया है। 'रत्नावली' नाटिकाके प्रथम अङ्कमें वासवदत्ताके प्रति वत्सराज उदयनकी उक्ति है कि --
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का० १४२, सू० २११ ] दशम उल्लास: ५७५ (ख) प्रत्यग्रमज्जनविशेषविवक्तमूर्तिः कौसुम्भरागरुचिरस्फुरदंशुकान्ता। विभ्राजसे मकरकेतनमर्चयन्ती बालप्रवालविटपप्रभवा लतेव ।५९६।। सर अत्र लता 'विभ्राजते' न तु 'विभ्राजसे' इति सम्बोध्यमाननिष्ठस्य परभागस्य असम्बोध्यमानविषयतया व्यत्यासात् पुरुषभेदः । (ग) गङ्गेव प्रवहतु ते सदैव कीतिः ।५९७। इत्यादौ च गङ्गा 'प्रवहति' न तु 'प्रवहतु' इति अप्रवृत्तप्रवर्त्तनात्मनो विधेः । (ख) तुरन्त स्नान करनेके कारण विशेषरूपसे निर्मल रूपवाली और कुसुम्भ रागसे रँगे हुए उज्जवल वस्त्र [साड़ी]को धारण किये हुए कामदेवकी पूजा करती हुई तुम नवीन किसलयोंवाली शाखाकी जननी [प्रभव: ] लताके समान शोभित हो रही हो ।।५६७।। इसमें 'लता' उपमानवाचक तथा 'त्वं' उपमेयवाचक पद है। 'विभ्राजित होना' उन दोनोंका साधारणधर्म है। परन्तु लतापक्षमें 'विभ्राजते' इस प्रथमपुरुषके एकवचनमें ही उसका अन्वय हो सकता है और उपमेयभूत 'त्वं के साथ 'विभ्राजसे' इस पदका यथाश्रुत अन्वय हो जाता है। इसलिए पुरुषभेदके कारण एक जगह वाच्य और दूसरी जगह प्रतीयमान अर्थरूप साधारणधमका अन्वय होनेसे यहाँ पुरुषभेदरूप उपमादोष है। यह वामनका मत है। परन्तु काव्यप्रकाशकारके मतसे यहाँ भी 'भग्नप्रकमता' दोष ही मानना उचित है। यही बात वे अगली पंक्तिमें कहते हैं- यहाँ लता [ के साथ ] 'विभ्राजते' [इस प्रथमपुरुषका प्रयोग होना चाहिये]। कि 'विभ्राजसे' [इस मध्यमपुरुषका]। इसलिए सम्बोध्यमान [जिसको सम्बोधन करके राजा उदयन यह श्लोक कह रहे हैं उस वासवदत्ता ] विषयक [विभ्राजसे इस ] पदके अन्तिम भाग [से, इस प्रत्ययांश ]के [सम्बोध्यमान उपमेयवाचक पदसे भिन्न लतारूप ] असम्बोध्यमानविषयक रूपसे परिवर्तन होनेसे [अर्थात् लतापक्षमें 'विभ्राजसे'के स्थानपर 'विभ्राजते' इस प्रकारका विपरिणाम करना अनिवार्य होनेसे वामनके मतमें] पुरुषभेददोष है [ जो काव्यप्रकाशकारके मतमें भग्नप्रकमताके अन्तर्गत हो जाता है]। विधिभेदका उदाहरण आगे देते हैं -- (ग) गङ्गाके समान तुम्हारी कीति सदा प्रवाहित होती रहे ।५६७।। यहाँ गङ्गा 'बहती है' न कि 'बहे' यह [ अर्थात् गङ्गापक्षमें 'प्रवहतु' के स्थानपर 'प्रवहति' पदका अन्वय ठीक बनता है। 'प्रवहतु' पदका प्रयोग ठीक नहीं बनता है] इसलिए अप्रवृत्तप्रवर्तनात्मक विधिका [विधिभेदरूप दोष है]। यहाँ शङ्का हो सकती है कि दोनों जगह 'प्रवहतु' पदका ही अन्वय मान लेनेमें क्या हानि है ? इसके समाधानके लिए कहते हैं कि विधिके अप्रवृत्तप्रवर्तनरूप होनेसे गङ्गापक्षमें अप्रवृत्तके प्रवर्तनरूप विधिका सम्भव न होनेसे 'प्रवहतु' पदका प्रयोग नहीं हो सकता है। इसका यह अभिप्राय है कि लिङ, लोट्, तव्यत् आदि प्रत्यय 'विधिप्रत्यय' कहलाते हैं। इन विधिप्रत्ययोंका काम अप्रवृत्तको किसी विशेष कार्यमें प्रवृत्त करना है। गङ्गा नदी तो स्वयं ही सदा
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एवंजातीयकस्य चान्यस्यार्थस्य उपमानगतस्यासम्भवाद् विध्यादिभेदः ।
बहती रहती है। उसको बहनेके लिए प्रवृत्त नहीं किया जाता है। इसलिए गङ्गापक्षमें विधिप्रत्ययकी सङ्गति नहीं लगती है। अतः उस पक्षमें 'प्रवहतु' पदका यथाश्रुत अ्न्वय सम्भव न होनेसे उसका 'प्रवहति' इस वर्तमानकालके रूपमें विपरिणाम करना अनिवार्य हो जाता है। इसलिए वामनने इसे अलग 'उपमादोष' माना है। परन्तु काव्यप्रकाशकार उसको भी 'भग्नप्रक्रमता' दोषमें ही अन्तर्भुक्त मानते हैं। इस प्रकार ['चिरं जीवतु स ते पुत्रो मार्कण्डेयो मुनिर्यथा।' इत्यादि वाक्योंमें प्रयुक्त आशीर्वादादि- रूप ] अन्य अर्थके भी [मार्कण्डेयमुनि जैसे ] उपमानमें सम्भव न होनेसे [ अथति इस वाक्यके उपमानभूत मार्कण्डेयमुनि तो समाप्त हो चुके, उनके साथ 'जीवतु' इस 'आशीर्वचन'की यथाश्रुत सङ्गति असम्भव है इसलिए] विधि आदिका [भेद अर्थात् ] विपर्यास होता है [ जो वामनके मतमें विधिभेदरूप उपमादोष होता है। और हमारे काव्यप्रकाशकारके मतमें भग्नप्रकरमतादोषमें अन्तर्भुक्त हो जाना है]। उपमादोषोंके निराकरणका एक और सुझाव कालभेद, पुरुषभेद, विध्यादिभेदको दामतने अलगसे उपमादोष माना है। काव्यप्रकाशकारने भी उनको दोष तो माना है परन्तु अलग दोष न मानकर सप्तम उल्लासमें कहे हुए 'भग्नप्रक्मता' दोपके भीतर ही उनका अन्तर्भाव किया है। इस विषयमे एक और सुझाव भी सामने आया है। इसके अनुसार कालभेदादि किसी भी रूपमें दोष नहीं है। ऐसे स्थलोंपर कालभेद आदिको साधारणधर्म न मानकर किसी अन्य ही धर्मको, जिसका कि उपमान तथा उपमेय दोनोंके साथ समानरूपसे अन्वय हो सके, साधारण- धर्म मानना चाहिये। वह धर्मान्तर चाहे शब्दतः उपात्त अर्थात् वाक्यमें उच्चरित हो अथवा प्रतीयमान हो। कालभेदादि दोषके प्रयोजक धर्मके स्थानपर इस प्रकारके उच्चरित अथवा प्रतीयमान अन्य धर्मको साधारण धर्म मान लेनेपर इन दोषोंकी अ्वतारणाका प्रसंग ही नहीं रहता है जैसे 'काम इव सुन्दरोऽयं राजा भाति' अथवा 'काम इवायं राजा भाति' इन उदाहरणोंमें यदि 'भाति को साधारणधर्म माना जाय तब तो उपमानभूत 'काम के साथ उसके वर्तमानकालमें विद्यमान न होनेसे वर्तमानकालको 'भाति' क्रियाका यथाश्रुत त्रन्वय सम्भव न होनेसे कालभेददोष होगा। परन्तु यदि 'भाति'को छोड़कर 'सुन्दरत्व'को साधारणधर्म मान लिया जाय तो यह दोप नहीं रहता है। 'यह सुन्दरत्व' धर्म 'काम इव सुन्दरोऽयं राजा 'भाति' इस प्रथम वाक्यमें उच्चरित या शब्दतः उपात्त है और 'काम इवायं राजा भाति' इस दूसरे वाक्यमें उच्चरित न होकर प्रतीयमान है। इस प्रकार 'भाति' इस क्रियाका सम्बन्ध तो केवल उपमेयभूत राजाके साथ ही होता है, उपमानभूत काम' के साथ उसका सम्बन्ध नहीं होता है। सुन्दरत्वका सम्बन्ध दोनोंके साथ समानरूपसे हो सकता है। तब कालभेदको दोष क्यों माना जाय ? इसी प्रकार पुरुषभेदका जो 'विभ्राजसे मकरकेतनमर्चयन्ती' आदि उदाहरण दिया है वहाँ भी 'विभ्राजसे' को साधारणधर्म न मानकर 'विविक्तत्व को, जो श्लोकमें पठित हैं, साधारणधर्म मान लिया जाय तो पुरुषभेदरूप दोषका भी अवसर नहीं रहता है। इसलिए इन काल, पुरुष, विध्यादिमें भेदको न तो वामनके अनुसार अलगसे उपमादोष माननेकी और न काव्यप्रकाशकारकी पद्धतिसे 'भग्नप्रक्रमता' दोषमें उसका अन्तर्भाव करनेकी ही आवश्यकता है। आगे यही लिखते हैं-
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कका० १४२, सू० २११ ] दशम उल्लास: ५७७ ननु समानमुच्चारितं प्रतीयमानं वा धर्मान्तरमुपादाय पर्यवसितायामुपमायामुपमे- यस्य प्रकृतधर्माभिसम्बन्धान्न कश्चित्कालादिभेदोऽस्ति ।
[प्रश्न ] उच्चरित अथवा प्रतीयमान किसी दूसरे साधारणधर्मको लेकर उपमाका पर्यवसान माननेपर [उपमानके ही सदृश ] उपमेयका भी प्रकृत [साधारण] धर्मके साथ सम्बन्ध हो जानेसे कोई कालभेद [आदि दोष] नहीं होता है। इस सुझावपर आपत्ति और उसका समाधान इस प्रकार कालभेद, पुरुषभेद आदिके पहिले दिखलाये हुए उदाहरणोंमें तो पूर्व सुझाव द्वारा प्रदर्शित नियमसे कथञ्चित् काम चल सकता है। परन्तु 'युधिष्ठिर इवायं सत्यं वदति' इत्यादि उदा- हरणोंमें 'सत्यं वदति' यह साधारणधर्म शब्दतः उपात्त है। उस दशामें 'युधिष्ठिरः सत्यमवादीत् न तु वदति' युधिष्ठिर सत्य बोलते थे न कि बोलते हैं इस प्रकार उपात्त साधारणधर्मके द्वारा जहाँ उपमान- उपमेयका सादृश्य प्रतीत होता है वहाँ तो कालभेदको दोष मानना ही होगा। यह बात पूर्वोकत सुझावके विरोधमें काव्यप्रकाशकारकी ओररोरसे कही जा सकती है। इसको मनमें रखकर पूर्वपक्षी उसका समाधान पहिले ही यह कर देता है कि इस प्रकारके प्रयोगोंमें 'सत्यवादित्व' अर्थात् 'सत्यवदनशीलत्व', सत्य बोलनेकी आदतको साधारण धर्म मानेंगे। 'युधिष्ठिर इवायं सत्यं वदति' का अरथ 'युधिष्ठिर इव सत्यवादी अयं सत्यं वदति' यह करके, सत्यवदनक्रिया नहीं, अपितु 'सत्यवदनशीलत्व' रूप स्वभावको उपमान- उपमेयका साधारणधर्म मान लेनेसे कालभेदादि दोषोंको न अलग माननेकी आवश्यकता रहती हैं और न उनका 'भग्नप्रक्रमता' में अ्र्न्तर्भाव माननेकी ही आ्रवश्यकता रहती है। यह पूर्वपक्ष है। सुझावपर दूसरी आपत्ति और उसका समाधान इस पूर्वपक्षके विपरीत यह शङ्का की जा सकती है कि 'युधिष्ठिर इवायं सत्यं वदति' का अपपर्थ जब आप 'युधिष्ठिर इव सत्यवादी अयं सत्यं वदति' यह करेंगे तो 'सत्यवादी अयं सत्यं वदति' इस प्रयोगमें पुनरुकित दोष आ जायगा। इस दोषका निवारण पूर्वपक्षी 'रपोष पुष्णाति' धन देकर पुष्ट करता है इत्यादि प्रयोगोंके उदाहरणों द्वारा करता है। जैसे 'रै' शब्दके उपपद रहते 'पुष्' धातुसे 'स्वे पुषः' (३-४-४०) इस सूत्रसे प्मुल्-प्रत्यय और 'कषादिषु यथाविध्यनुप्रयोगः' इत्यादि सूत्रसे 'पुप्' धातुका अनुप्रयोग होकर 'रपोष पुष्णाति' प्रयोग बनते हैं और उनमें जिस प्रकार पुनरुकिति नहीं मानी जाती है उसी प्रकार 'सत्यवादी सत्यं वदति' इस प्रकारके प्रयोगोंमें भी पुनरक्तिकी शङ्का नहीं करनी चाहिये। यह पूर्वपक्षीका कथन है। इस सुझावका सारांश इसका सारांश यह हुआ कि कालभेद आदिको वामनने जो उपमादोष माना है और काव्य- प्रकाशकार जो उनका अन्तर्भाव 'भग्नप्रकमता' दोषमें करनेका यत्न कर रहे हैं ये दोनों ही बातें अनावश्यक हैं। जहाँ उपमान और उपमेयमें कालभेदादियुक्त पदोंके द्वारा साधारणधर्मकी उपस्थिति होती है वहाँ उनको छोड़कर शब्दतः उच्चरित अथवा प्रतीयमान किसी अ्न्य धर्मको साधारणधर्म मानकर भी सादृश्य या उपमाका समन्वय किया जा सकता है। उस दशामें इन दोषोंके त्नेका प्रसङ्ग ही नहीं आयेगा। जहाँ कहीं उपात्त धर्म ही साधारणधर्मके रूपमें प्रतीत होता है और वह भी कालभेदादिसे युक्त होता है वहाँ 'युधिष्ठि डवायं सत्यं वदति' जैसे उदाहरणोंमें 'सत्यवादित्वस्वभाव'को साधारणधर्म मानकर उसका परिहार किया जा सकता है। उसे ऐसे प्रसङ्गोंमें होनेवाली पुनरुक्तिकी सम्भावनाके निवारणक
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काव्यप्रकाश: [ का० १४२, सू० २११
यत्राप्युपात्तेनैव सामान्यधर्मेण उपमाऽवगस्यते यथा 'युधिष्ठिर इवायं सत्यं वदति' इति, तत्र युधिष्ठिर इव सत्यवाद्ययं सत्यं वदतीति प्रतिपत्स्यामहे। 'सत्यवादी सत्य वदति' इति च न पौनरुक्त्यमाशङ्कनीयम्। 'रैपोषं पुष्णाति इतिवत्' युधिष्ठिरसत्यवदनेन सत्यवाद्ययमित्यर्थादगमात्। सत्यमेतत् किन्तु स्थितेषु प्रयोगेषु समर्थनमिदं न तु सर्वथा निरवद्यम् । प्रस्तुत- वस्तुप्रतीतिव्याघातादिति सचेतस एवात्र प्रमाणम् । ५. असादृश्यासम्भवावप्युपमायामनुचितार्थतायामेव पर्यवस्यतः । यथा- (क) ग्रश्नामि काव्यशशिनं विततार्थरश्मिम् ।५९८।।
लिए 'रंपोष पुष्णाति' आदि प्रयोगोंमें अपनायी जानेवाली नीतिका अवलम्बन करना चाहिये। इसलिये कालभेद आदि दोषोंका कोई अस्तित्व नहीं है। अतः उनका अन्तर्भाव करनेका यत्न भी व्यर्थ है। इसी पूर्वपक्षको अगले अनुच्छेदमें इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है- और जहाँ [वाक्यमें] उपात्त साधारणधर्मके द्वारा ही उपमा [अर्थात् सादृश्य ]-की प्रतीति होती है, जैसे यह युधिष्ठिरकी तरह सत्य बोलता है, वहाँ भी 'युधिष्ठिरके समान सत्यवादी स्वभाववाला यह सत्य बोलता है' यह अर्थ लेंगे [ उस दशामें 'सत्यं वदति' के बजाय 'सत्यवादित्व' अर्थात् सत्य बोलनेकी 'किया' नहीं अपितु 'स्वभाव' साधारणधर्म होगा। इससे कालभेदका दोष नहीं आयेगा ]। सत्यवादी सत्य बोलता है इस प्रकार [का अर्थ माननेपर उसमें ] पुनरुक्तिकी शङ्गा भी नहीं करनी चाहिये, क्योंकि 'रैपोषं पुष्णाति' इत्यादिके समान युधिष्ठिरकी तरह सत्य बोलनेके कारण सत्यवादी यह [सत्य बोलता है ] इस अर्थकी प्रतीति होती है [ अतः यहाँ पुनरुक्तिकी शङ्का भी नहीं हो सकती है]। यह मार्ग प्राचीन प्रयोगोंतक ही सीमित है (सिद्धान्त) इस पूर्वपक्षका निराकरण ग्रन्थकार अगली पंक्तिमें यह कहकर करते हैं कि -- [उत्तर-आपका कहना ] ठीक है। [महाकवियोंके काव्योंमें ] पाये जानेवाले प्रयोगोंके विषयमें तो वह समाधान ठीक है किन्तु वह सर्वथा निर्दोष [मार्ग] नहीं है। कालभेद आदिके होनेपर प्रस्तुत वस्तु [अर्थात् उपमा]की प्रतीतिमें बाधा होनेसे [कालभेद आदिको भग्नप्रक्रमताके अन्तर्गत दोष मानना ही चाहिये ] इस विषयमें सहृदय लोग ही प्रमाण हैं। असादृश्य और असम्भवदोष इनके अतिरिक्त उपमामें असादृश्य तथा असम्भवको भी वामनने उपमादोष माना है। काव्यप्रकाशकार उन दोषोंका पूर्वोक्त 'अनुचितार्थता' दोषमें अन्तर्भाव करते हुए लिखते हैं कि- ५. उपमामें असादृश्य तथा असम्भवत्व भी 'अनुचितार्थता' [दोष ]में ही पर्यवसित होते हैं [अर्थात् उनको भी अलग दोष न मानना उचित है] जैसे -- (क) फैली हुई अर्थरूप किरणोंसे युक्त काव्यरूप चन्द्रमाकी रचना करता हूँ ॥५६८॥
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का० १४२, सू० २११ ] दशम उल्लास: ५७६
तार्थत्वम् । अत्र काव्यस्य शशिना अर्थानां च रश्मिभिः साधम्यं कुत्रापि न प्रतीतमित्यनुचि- (ख) निपेतुरास्यादिव तस्य दीप्ताः शरा धनुर्मण्डलमध्यभाजः । जाज्वल्यमाना इव वारिधारा दिनार्धभाजः परिवेषिणोऽर्कात् ।।५९९।। अत्रापि ज्वलन्त्योऽम्बुधाराः सूर्यमण्डलान्निष्पतन्त्यो न सम्भवन्तीत्युपनिबध्यमानो- जर्थोनौचित्यमेव पुष्णाति। (४) १. उत्प्रेक्षायामपि सम्भावनं ध्रुवेवादय एव शब्दा वक्तु सहन्ते न यथाशब्दो- डपि। केवलस्यास्य साधर्म्यमेव प्रतिपादयितुं पर्याप्तत्वात्। तस्य चास्यामविवक्षितत्वादिति तत्राशक्तिरस्यावाचकत्वं दोषः । यथा -- (क) उद्ययौ दीघिकागर्भात् मुकुलं मेचकोत्पलम् । नारीलोचनचातुर्यशङ्कासङकुचितं यथा ॥६००॥ इसमें [कहा हुआ] काव्यका चन्द्रमाके साथ और अर्थोंका रश्मियिोंके साथ सादृश्य [काव्य- शास्त्रादिमें अन्यत्र ] कहीं भी नहीं मिलता है इसलिए [ यह वामनका कहा हुआ असादृश्य दोष वस्तुतः पूर्वोक्त ] अनुचितार्थत्व [दोष ही] है। (ख) [धनुषके खींचनेपर ] गोलाकार धनुषके बीचमें स्थित उस [राजा ]के मुखसे दीप्त बाण ऐसे गिर रहे थे जैसे मानो मध्याह्नके समय परिवेषयुक्त [सूर्य या चन्द्रमाके चारों ओर कभी-कभी गोलाकार धेरा दिखलायी देता है उसको 'परिवेष' कहते हैं] सूर्यसे जलती हुई पानीकी धाराएँ गिर रही हों ।५हहा यहाँ भी जलती हुई पानीकी धाराएँ सूर्यमण्डलसे गिरती हुई सम्भव नहीं हैं इसलिए [ उपमान- रूपमें ] वणित यह अर्थ अनौचित्यका ही प्रदर्शक होता है। (४) उत्प्रेक्षाके दोषोंका विवेचन इस प्रकार उपमाके जो दोष वामनने अलग गिनाये हैं उन सबका अन्तर्भाव पूर्वोक्त दोषोंमें ही हो सकता है इसलिए उनको अलग दोष माननेकी आवश्यकता नहीं है इस बातका यहाँतक प्रतिपादन करके अब आगे उत्प्रेक्षाके दोषोंका भी इसी प्रकार पूर्वोक्त दोषोंमें ही अन्तर्भाव दिखलाते हैं- १. उत्प्रेक्षा [अलङ्गार]में भी [ उसके मुख्य लक्षणरूप] सम्भावनाको 'ध्रुवम्', 'इव', 'सा' आदि शब्द ही बोधित कर सकनेमें समर्थ हैं[ 'मन्ये शङ्गे ध्रुवं प्रायो नूनमित्येवमादयः । उत्प्रेक्षावाचकाः शब्दा इव शब्दोऽपि तादृशः ॥'] यथा शब्द [उत्प्रेक्षाके हेतुभूत सम्भावनका बोधन करनेमें समर्थ ] नहीं है। अकेले इस [यथा शब्द ] की साधर्म्यको ही बोधित करनेमें सामर्थ्य है और वह [साधर्म्य ] इस [उत्प्रेक्षा]में विवक्षित नहीं है। इसलिए उस [ उत्प्रेक्षाके लक्षणभूत 'सम्भावन'के बोधन ]में इस [यथा शब्द]की असामर्थ्य, अवाचकत्व दोष है। जैसे -- (क) बावड़ीके भीतरसे कलिकाकार नीलोत्पल इस प्रकार निकला मानों नारियोंके लोचन- सौन्दर्यातिशयकी शङ्गासे [भयभीत ] सडकुचित हो रहा हो।।६००।। यहाँ उत्प्रेक्षालङ्कार है। उसमें उत्प्रेक्षाके वाचक शब्दके रूपमें 'यथा' शब्दका प्रयोग किया 6.गया है। परन्तु जैसा कि अभी कह चुके हैं, अकेले 'यथा' शब्दका प्रयोग केवल सादृश्यका सूचक होता है। उत्प्रेक्षामें सादृश्य विवक्षित नहीं होता है अपितु 'सम्भावना' या 'उत्कटैककोटिक सन्देह' ही विवक्षित
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५८० काव्य प्रकाश: [ का० १४२, सू० २११ २. उत्प्रेक्षितमपि तात्त्विकेन रूपेण परिवर्जितत्वात् निरुपाख्यप्रख्यं तत्समर्थनाय यदर्थान्तरन्यासोपादानं तत् आलेख्यमिव गगनतलेऽत्यन्तमसमीचीनमिति निर्विषयत्वमे- तस्यानुचितार्थतैव दोषः। यथा- (ख) दिवाकराद्रक्षति यो गुहासु लीनं दिवाभीतमिवान्धकारम्। क्षुद्रेऽपि नूनं शरणं प्रपन्ने ममत्वमुच्चैः शिरसामतीव ।।६०१।। अत्राचेतनस्य तमसो दिवाकरात् त्रास एव न सम्भवतीति कुत एव तत्प्रयोजित- मद्रिणा परित्राणम् ? सम्भावितेन तु रूपेण प्रतिभासमानस्यास्य न काचिदनुपपत्तिरवर- तीति व्यर्थ एव तत्समर्थनायां यत्नः । (५) साधारणविशेषणवशादेव समासोकितिरनुक्तमपि उपमानविशेषं प्रकाशयतीति तस्यात्र पुनरुपादाने प्रयोजनाभावात् अनुपादेयत्वं यत्, तत् अपुष्टार्थत्वं पुनरुक्तं वा दोषः । यथा- होता है। वह केवल 'यथा' शब्दसे बोधित नहीं होता है। इसलिए यहाँ उत्प्रेक्षावाचक शब्दके रूपमें 'यथा' शब्दका प्रयोग करनेसे अवाचकत्व दोष होता है। २. [उत्प्रेक्षालङ्गारमें ] उत्प्रेक्षित [अर्थ] भी वास्तविकरूपसे हीन [केवल कल्पनात्मकमात्न ] होनेसे [ वन्ध्यापुत्र, खपुष्प आदिके समान ] असत् जैसा ही होता है। उसके समर्थनके लिए जो कहीं अर्थान्तरन्यास [अलङ्गार]का आश्रय लिया जाता है वह [समर्थनीय अर्थके असत् होनेसे ] आकाशमें बनाये [निराधार ] चित्रके समान अत्यन्त अनुचित है। इसलिए [उत्प्रेक्षित अर्थका ] निर्विषयत्व [सर्वथा अविद्यमानत्व ] भी ] अनुचितार्थत्व दोष ही होता है। जैसे -- (ख) जो [हिमालय पर्वत ] दिनमें [सूर्य]से डरकर [हिमालयकी ] गुफाओंमें छिपे हुए अन्धकारको सूर्यसे मानों बचाता है, क्योंकि ऊचे सिरदालों [अर्थात् महापुरुषों ] की नीच शरणागतके प्रति भी अत्यन्त ममता हो जाती है [ इसलिए उन्नत सिरवाला हिमालय क्षुद्र अन्धकारकी भी सूर्यसे रक्षा करता है सो उचित ही है]।६०१।। इसमें [रवणित ] अचेतन अन्धकारमें सूर्यसे भय ही नहीं बनता है इसलिए उस [भय]से प्रयोजित हिमालयके द्वारा रक्षाकी बात ही कैसे बन सकती है ? और [केवल ] सम्भावितरूपसे प्रतीत होनेवाले इस [भय या परित्राणरूप वाक्यार्थ]में कोई अनुपपत्ति नहीं आती है इसलिए उसके समर्थनका [जो यत्न यहाँ अर्थान्तरन्यास द्वारा किया गया वह] यत्न व्यर्थ ही है। (५) समासोक्तिके दोषोंका अन्तर्भाव इस प्रकार उपमाके दोषोंको तथा उत्प्रेक्षा एवं अर्थान्तरन्यासके दोषोंको अलग माननेकी आवश्यकता नहीं है इस बातका उपपादन यहाँतक किया। अब आगे समासोक्तिके दोषोंकी विवेचना करते हैं -- [उपमान-उपमेय दोनों पक्षोंमें लगनेवाले साधारण विशेषणोंके द्वारा समासोक्ति [अलङ्रार]
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का० १४२, सू० २११ ] दशम उल्लास: ५=१ (क) स्पृशति तिग्मरुचौ ककुभ: करैर्दयितयेव विजृम्भिततापया । अतनुमानपरिग्रहया स्थितं रुचिरया चिरयापि दिनश्रिया ॥६०२। अत्र तिग्मरुचे: ककुभां च यथा सदृशविशेषणवशन व्यक्तिविशेषपरिग्रहेण च नायकतया नायिकात्वेन च व्यक्तिः तथा ग्रीष्मदिवसश्रियोऽपि प्रतिनायिकात्वेन भविष्य- तीति कि दयितयेति स्वशब्दोपादानेन ?
भी उपमानविशेषको प्रकाशित करती है इसलिए यहाँ [समासोक्ति अलङ्कारमें ] उस [उपमानविशेष]का फिर [अलगसे ] ग्रहण करनेमें कोई प्रयोजन न होनेसे [उस उपमानको शब्दतः ग्रहण करनेपर ] जो 'अनुपादेयत्व' [नामका समासोक्तिका दोष प्राचीन आचार्योंने माना ] है। वह [प्रकृतमें व्यर्थ या अनुपयुक्त होनेके कारण] 'अपुष्टार्थत्व' अथवा [प्रकारान्तरसे प्रतीत अर्थका शब्दतः पुनः कथन होनेसे] 'पुनरुक्ति' दोष है। जैसे- सूर्य [रूप नायक ] के करों [हाथों और किरणों ] द्वारा [नायिकारूप ] दिशाओंका स्पर्श करनेपर [ग्रीष्म दिनोंकी ] प्रौढ़ा दिनश्री [रूप प्रतिनायिका ] अत्यन्त सन्ताप [मनःखेद तथा उष्णता- तिशय]से भरी हुई और अत्यन्त मान [दिनोंकी दीर्घता और नायिकापक्षमें कोप ]को धारण करके [दयितया इव ] प्रेमिकाके समान देरतक सुन्दर लगती रही ।।६०२। यहाँ [दोनों पक्षोंमें लग सकनेवाले ] साधारण विशेषणोंके द्वारा और सूर्य तथा दिशाओंमें [कमशः पुल्लिङ्ग तथा स्त्रीलिङ्गरूप ] लिङ्गविशेषका ग्रहण होनेसे सूर्य तथा दिशाओंमें [क्मशः ] नायक तथा नायिकारूपसे प्रतीति जैसे [स्वयं ही ] हो जाती उसी प्रकार ग्रीष्मकालकी दिनश्रीमें प्रतिनायिकारूपसे प्रतीति [स्वयं ही ] हो जायगी इसलिए [ उस प्रतिनायिकात्वको ] 'दयितया' इस [उपमान-वाचक ] स्वशब्दसे प्रतिपादन करनेसे क्या लाभ ? [इसलिए इस उदाहरणमें जो 'दयितया' पदका ग्रहण किया गया है उसको प्राचीन आचार्योंने समासोक्तिका 'अनुपादेयत्व' नामक अलङ्गारदोष माना है, परन्तु काव्यप्रकाशकारके मतमें वह 'अपुष्टार्थत्व' अथवा 'पुनरुत्त:व' मेंसे किसी भी पूर्वोक्त दोषके अन्तर्गत हो सकता है]। श्लेषोपमा और समासोक्तिका भेद इस प्रकार 'स्पृशति तिग्मरुचौ' इत्यादि समासोक्ति अलङ्कारके उदाहरणमें साधारण विशेषणोंके द्वारा ही सूर्यमें नायकत्व, दिशाओंमें नायिकात्व और ग्रीष्मदिनश्रीमें प्रतिनायिकाके व्यवहारकी प्रतीति सम्भव होनेपर भी जो उपमानवाचक 'दयितया इव' पदका प्रयोग किया गया वह प्राचीन आचार्योंके मतसे 'अनुपादेयत्व' नामक अलङ्कारदोषका और काव्यप्रकाशकारके मतसे 'अपुष्टार्थत्व' अथवा पुन- रुक्तत्वका प्रयोजक है यह बात यहाँतक कही है। इसपर यह शङ्का हो सकती है कि इस श्लोकमें समासोक्ति अलङ्कार माननेमें यदि दोष आता है तो उसको न माना जाय। उसके स्थानपर यहाँ 'श्लेषोपमालङ्वार' मान लेना अधिक अच्छा होगा। 'जैसे किसो नायकके द्वारा नायिकाका स्पर्श किये जानेपर प्रतिनायिकाको सन्ताप होता है उसी प्रकार सूर्यके द्वारा दिशाओंका स्पर्श किये जानेपर ग्रीष्मकालकी दिनश्रीको उग्र सन्ताप हुग्रा'। इस प्रकार इर े
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५८२ काव्यप्रकाश: [ का० १४२, सू० २११ श्लेषोपमायास्तु स विषयः यत्रोपमानस्योपादानमन्तरेण साधारणेष्वपि विशेषणेषु न तथा प्रतीतिः। यथा- स्वयं च पल्लवाता म्रभास्वत्करविराजिता। प्रभातसन्ध्येवास्वापफललुब्धेहितप्रदा ।।६०३।। समासोक्ति नहीं अपितु उपमा अलङ्कार है और उसमें 'कर', 'ताप' आदि पदोंमें श्लेष होनेसे यह 'श्लेषो- पमा' का उदाहरण हो सकता है। इस शङ्काका समाधान ग्रन्थकार अगली पंक्तिमें करेंगे। उनके समाधानका यह आशय है कि-'श्लेषोपमा' वहीं मानी जा सकती है जहाँ उपमानका शब्दतः ग्रहण किये बिना साधारण विशेषणोंके द्वारा स्पष्टरूपसे उसकी प्रतीति नहीं होती है। यहाँ तो 'दयिता' इस उपमानपदका ग्रहण किये बिना भी साधारण विशेषणोंके द्वारा ही ग्रीष्मकी दिनश्रीमें प्रतिनायिकात्वकी स्पष्टरूपसे प्रतीति हो सकती है। इसलिए इस प्रकारके उदाहरणोंमें 'श्लेषोपमा' नहीं अपितु समासोक्ति ही माननी चाहिये। अन्यथा समासोक्तिके सभी उदाहरणोंमें श्लेषोपमा सम्भव होनेसे समासोक्तिका उदाहरण मिलना ही कठिन हो जायगा। इसीलिए श्लेषोपमा और समासोक्तिका विषयविभाग करना आवश्यक है। और वह इसी आधारपर किया जा सकता है कि जहाँ उपमानका ग्रहण किये बिना साधारण विशेषणोंके द्वारा उपमानकी स्पष्टरूपसे प्रतीति सम्भव न हो वहाँ श्लेषोपमा माननी चाहिये और उपमानपदका शब्दतः प्रतिपादन भी करना चाहिये। परन्तु 'स्पृशति तिग्मरुचौ' जैसे उदाहरणोंमें जहाँ कि साधारण विशेषणोंसे ही उपमानकी प्रतीति हो जाती है, समासोकिति ही माननी चाहिये और उपमानपदका अलगसे प्रयोग नहीं करना चाहिये। समासोक्ति तथा श्लेषोपमाके इसी भेदको स्पष्ट करनेके लिए ग्रन्थकार अगली पंक्ति लिखकर उसका उदाहरण देते हैं -- श्लेषोपमाका विषय वही होता है जहाँ विशेषणोंके समान होनेपर भी उपमानविशेषका ग्रहण किये बिना उस प्रकारकी [स्पष्ट ] प्रतीति नहीं हो सकती है। जैसे -- [पार्वती न केवल अपने सम्बन्धियोंके महत्त्वके कारण ही अपितु ] स्वयं भी नवकिसलयोंके समान लाल-लाल और चमकते हुए हाथोंसे शोभित और [मोक्ष आदि रूप 'अस्वाप'] दुर्लभ फलके लोभी [मुमुक्षु ] जनोंकी कामनाको सिद्ध करनेवाली [ प्रभातसन्ध्यापक्षमें पल्लवोंके समान ] रक्तवर्ण सूर्यकी किरणोंसे शोभायमान और प्रातःकालके समय 'अस्वाप' जागरणके स्नानादि फलके लोभी जनोंके इष्टको सिद्ध करनेवाली प्रभातसन्ध्याके समान है]।६०३। यह श्लोक नवम उल्लासमें श्लोकसंख्या ३७८ पर भी आ चुका है। इसमें 'प्रभातसन्ध्या' उपमानवाचक पद है। यदि उसको शब्दतः उपात्त न किया जाय तो केवल 'पल्लवाता म्रभास्वत्कर- विराजिता' और 'अस्वापफललुब्धेहितप्रदा' इन विशेषणोंके द्वारा उसकी स्पष्टरूपसे प्रतीति नहीं हो सकती है। इसीलिए यहाँ समासोक्ति अलङ्कार नहीं अपितु 'श्लेषोपमा' ही माननी चाहिये। परन्तु 'स्पृशति तिग्मरुचौ' इत्यादि पूर्वोक्त उदाहरणमें प्रतिनायिकारूप उपमानकी प्रतीति 'दयितया' पदका ग्रहण किये बिना भी साधारण विशेषणोंके द्वारा ही हो सकती है इसलिए उसमें श्लेषोपमा माननेका अवसर नहीं है। यहाँ समासोक्ति ही माननी होगी और समासोक्तिमें उपमानपदका पृथक् ग्रहण अनुचित है।
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का० १४२, सू० २११ ] दशम उल्लास: ५८३ (६) अप्रस्तुतप्रशंसायामपि उपमेयमनयव रीत्या प्रतीतं न पुनः प्रयोगेण कदर्थतां नेयम्। यथा- आहूतेषु विहङ्गमेषु मशको नायान् पुरो वार्यते मध्येवारिधि वा वसंस्तृणमणिर्धत्ते मणीनां रुचम् । व्रद्योतोऽपि न कम्पते प्रचलितुं मध्येऽपि तेजस्विनां धिक् सामान्यमचेतनं प्रभुमिवानामृष्टतत्त्वान्तरम् ॥६०४।। अत्राचेतनस्य प्रभोरप्रस्तुतविशिष्ट सामान्यद्वारेणाभिव्यवतौ न युक्तमेव पुनः कथनम्। तदेतेऽलङ्कारदोषा यथासम्भविनोन्येऽप्येवंजातीयका: पूर्वोक्तयैव दोषजात्या अन्तर्भाविता न पृथक् प्रतिपादनमर्हन्तीति सम्पूर्णमिदं काव्यलक्षणम् । (६) अप्रस्तुतप्रशंसाके दोष इसी प्रकार उ्ट आदि प्राचीन आचार्योंने अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्गारमें भी साधारण विशेषणोंके द्वारा ही प्रस्तुत अर्थ की प्रतीति हो जानेसे उसका शब्दतः ग्रहण होनेपर भी 'अनुपादेयत्व' नामक अलङ्गार- दोष अलग माना है। परन्तु काव्यप्रकाशकार उसको भी अपुष्टार्थत्व या पुनरुक्तत्वं दोषके ही अ्न्तर्गत मानते हैं। इसी बातको स्पष्ट करते हुए आगे लिखते हैं कि- अप्रस्तुतप्रशंसा [अलङ्गार]में भी उपमेय [अर्थात् प्रस्तुत अर्थ, साधारण विशेषणों द्वारा ] इसी प्रकारसे [शब्दतः उपादानके बिना ही प्रतीत हो जाता है उसको दुबारा शब्दसे कथन करके दूषित नहीं करना चाहिये। जैसे -- पक्षियोंको बुलानेपर आगे बढ़कर आनेवाले मच्छरको भी [ पक्षधारी होनेके कारण ] नहीं रोका जा सकता है [ उसी सामान्यके कारण ] समुद्रके भीतर पड़ा हुआ तुच्छ तणमणि भी [ पद्मराग आदि बहुमूल्य ] मणियोंकी बराबरी करता है और [जिस सामान्यके कारण सूर्य-चन्द्रमा आदि ] तेजस्वियोंके साथ चलनेमें जुगुनूको भी भय नहीं मालूम होता है [ वह भी अपनेको तेजस्वी समझता है] उस अन्य विशेषताओंका विचार करनेमें असमर्थ राजाके समान जड़ सामान्य [जातिमात्र ]को धिक्कार है ॥६०४॥ इसमें [गुणों और विशेषताओंको पहिचाननेमें असमर्थ ] मूर्ख राजा [जिसकी निन्दा अभीष्ट है उस प्रस्तुत अर्थ ]की विशेषणोंसे युक्त [विशिष्ट ] सामान्यके द्वारा अभिव्यक्ति हो जानेपर फिर उसका [प्रभो: इस ] शब्दसे कहना उचित नहीं है। इसलिए यहाँ प्रभु शब्दका उपादान होनेसे इसमें 'अनुपादेयत्व' दोष है। काव्यप्रकाशकारके मतमें उसका अन्तर्भाव पूर्वोक्त 'अपुष्टार्थत्व' अथवा 'पुनरुक्तत्व' दोषमें हो सकता है। इस प्रकार [वामनादि प्राचीन आचार्योंके माने हुए] ये अलङ्गारदोष और इसी प्रकारके अन्य भी जो दोष सम्भव हों, वे सब पहिले कहे हुए दोषोंके वर्ग [जाति ] में ही अन्तर्भूत हो जाते हैं। उनका अलग वर्णन करना उचित नहीं है [ इसलिए उनका हमने प्रतिपादन नहीं किया है]। [इसलिए हमारा लिखा हुआ] यह काव्यलक्षण सम्पूर्ण है।
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५=४ काव्यप्रकाश: [का० १४२, सू० २११ इत्येष मार्गो विदुषां विभिन्नोऽप्यभिन्नरूपः प्रतिभासते यत्। न तद्विचित्रं यदमुत्र सम्यग्विनिमिता सङ्घटनैव हेतुः । इति काव्यप्रकाशेऽ्थालङ्कारनिर्णयो नाम दशम उल्लासः । समाप्तश्चायं काव्यप्रकाशः । अ्रव ग्रन्थकार अपने ग्रन्थकी समन्वयात्मक प्रवृत्तिका संकेत करते हुए उसको समाप्त करते हैं- इस प्रकार [भामह, वामन, उड्डट, आनन्दवर्धन आदि प्राचीन ] विद्वानोंका [रससम्प्रदाय, ध्वनिसम्प्रदाय, रीतिसम्प्रदाय, अलङ्कारसम्प्रदाय आदि रूपसे ] भिन्न-भिन्न प्रतीत होनेवाला यह काव्य [निरूपण ] मार्ग भी जो [इस काव्यप्रकाश ग्रन्थमें समन्वित पद्धतिसे निरूपित होकर ] अभिन्न-सा प्रतीत हो रहा है वह कोई विचित्र बात नहीं है, क्योंकि भली प्रकारसे [ समन्वयात्मक भावनासे ] की हुई रचना ही उसका कारण है। इस उपसंहारात्मक श्लोकसे दो बातें प्रतीत होती हैं। एक वात तो यह है कि काव्यप्रकाश- कारके पूर्व साहित्यशास्त्रपर जिन अ्र्नेक आ्र्प्राचार्योंने ग्रन्थोंकी रचना की थी उनमें किसीने ध्वनिपर, किसी- ने रीति या गुणोंपर, किसीने अलद्कारोंपर, किसीने वक्रोक्तिपर विशेषरूपसे बल दिया था। और जिसने जिस विषयको लिया उसीको काव्यका आत्मा प्रतिपादन किया। ध्वनिवादियोंके मतमें 'काव्यस्यात्मा ध्वनिः' ध्वनि ही काव्यका आत्मा माना गया है। रीतिमार्गके प्रवर्तक आचार्य वामनके मतमें 'रीति- रात्मा काव्यस्य' काव्यका आत्मा रीति ही है। वकोक्तिजीवितकार कुन्तक वकोक्तिको ही काव्यका जीवन मानते हैं। इसी प्रकार कोई रसको, कोई अलङ्गारको काव्यका आत्मा मानते हैं। इस प्रकार पूर्वाचार्योंमें बहुत-कुछ मतभेद दिखलायी देता है। काव्यप्रकाशकारने अपने ग्रन्थमें उन सब मतोंका समन्वय करनेका प्रयत्न किया है इसलिए उनकी इस समन्वयात्मक रचनाशैलीके कारण ध्वनि, रीति, रस, अलङ्कार आदि सभी विषयोंका समावेश और विवेचन उनके इस ग्रन्थमें पाया जाता है और उनमें किसी प्रकारका विरोध नहीं भासता है। इसी बातका सङ्केत ग्रन्थकारने इस श्लोकमें किया है। दूसरी बात यह भी प्रतीत होती है कि यह 'काव्यप्रकाश' ग्रन्थ, जैसा कि पहिले कहा जा चुका है, श्री मम्मटाचार्यकी कृति है परन्तु वे इस ग्रन्थको केवल परिकरालङ्कारतक ही लिख सके थे, उसके बाद उनका देहान्त हो जानेसे या किसी अन्य कारणसे अधूरे पड़े हुए ग्रन्थके शेष भागकी रचना अल्लटसूरि नामक किसी विद्वानने की है। इस प्रकार दो भिन्न-भिन्न विद्वानों द्वारा लिखा जानेपर भी रचनाशैलीकी अत्यन्त समानताके कारण यह सारा ग्रन्थ एक ही व्यक्तिकी रचना-सा जान पड़ता है। काव्यप्रकाशमें अर्थालङ्गारनिर्णय नामका यह दशम उल्लास समाप्त हुआ। यह काव्यप्रकाश [ग्रन्थ भी] समाप्त हुआ। उत्तरप्रदेशस्थ 'पीलीभीत'-मण्डलान्तर्गत 'मकतुल'-ग्रामनिवासिना, श्रीशिवलालवख्शीमहोदयानां तनुजनुषा, वृन्दावनस्थगुरुकुलविश्वविद्यालयाधिगतविद्येन तत्रत्याचार्यपदमधिष्ठिता एम० ए० इत्युपपदधारिणा 'विद्यामार्तण्डेन' श्रीमदाचार्यविश्वेश्वरसिद्वान्तशिरोमणिना विरचिता 'काव्यप्रकाशदीपिका' हिन्दीव्याख्या समाप्ता। समाप्तश्चायं ग्रन्थः ।
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प्रथम परिशिष्ट
काव्यप्रकाशस्थ सूत्रोंकी अकारादिक्रमसे सूची
सूत्र पृष्ठ सूत्र पृष्ठ [अ] उपमानाद्यदन्यस्य ४६१
अगूढ़मपरस्याङ्ग १६६ उपमानानुपादाने ४५१
अतादृशि गुणीभूत० ३१ उपमानोपमेयत्वे ४६० अनुकरणे तु ३४५ [ए] अनुमानं तदुक्तं ५२१ एकं क्रमेणानेकस्मिन् ५१८ अनुस्वानाभसंलक्ष्य० १४७ एकस्य च ग्रहे' अनेकार्थस्य शब्दस्य ७७ एकस्याप्यसकृत्पर: ४०५ अन्यस्ततोऽन्यथा ५२० एतद्द्विलोपे ४५४ अन्योन्ययोगादेवं २१४ एवमप्यनवस्था ७३ अपास्य च्युतसंस्कार० २८१ एषां दोषा यथायोगं ५६७ अप्रस्तुतप्रशंसा या ४७६ . एषां भेदा थथायोगं २११ अर्थशक्त्युद्धवो १५२ [ओ] अर्थाः प्रोक्ताः पुरा ८२ श्ज:प्रकाशक: ४०६ अर्थे सत्यर्थभिन्नानां ४०६ [क] अर्थोऽपुष्ट: कष्टो ३२६ करुणे विप्रलम्भे ३८६ अलङ्कारोऽथ १४७ कर्णावतंसादि० ३४१ अविवक्षितवाच्यो कारणान्यथ अविश्रान्तिजुषा० ५५४ कार्ये निमित्ते सामान्ये ४७६ [आ] काव्यलिङ्ग ५१० आक्षेप उपमानस्य ५४४ किञ्चित् पृष्टमपृष्टं वा ५२६ आश्रयैक्ये विरुद्धो यः ३७२ कुतोऽपि लक्षितः ५३२ शह्लादकत्वं ३८८ केचिदन्तर्भवन्त्येषु S2000 ३६० [इ] केषान्चिदेता ४०६ इदमुत्तममतिशयिनि २८ कोऽप्यलक्ष्य०19 ६३ [उ] कोमला परै: ४०६
उत्तरश्रुतिमात्रतः ५३० क्यचि वाद्युपमेयासे ४५६ उत्तरोत्तरमुत्कर्षो ५३३ क्रियया तु परस्परम् ५२६ उदात्तं वस्तुन: ५१४ क्रियाया: प्रतिषेधेऽपि ४६८ उपकुर्वन्ति तं १४ 7०८ ३८१ क्वचिद्यदति० ५३५
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५८६ काव्य प्रकाश:
सूत्र पष्ठ सूत्र पष्ठ
[ख] [न] ख्यातेऽर्थे ३४५ न दोष: स्वपदेनोक्ता० ३६५ [ग] नाभिधा समयाभावात् ७०
गुणवृत्त्या ३६० निगीर्याध्यवसानं तु [] निदर्शना 636 छेकवृत्तिगतो द्विधा ४०४ नियतानां सकृद्धम:
[ज] नियतारोपणोपायः ४६७
जातिश्चतुर्मि० ५०२ निरङ्गं तु शुद्धम् ४६६
[त] निर्वेदग्लानि० १३६ १३८ तच्च गूढमगूढं वा निर्वेदस्थायिभावो ४हा तच्चित्रं यत्र वर्णानां निषेधो वक्तुमिप्टस्य .४३८ [प] तत्र व्यापारो ६६ पदस्यापि ४०७ तत्सिद्धिहेता० ५१५ पदानां स 6०७ तथा शब्दार्थयोरयम् ४३६ पदेऽ्यन्ये १६३ तददोषौ शब्दाथौ १६ पदैकदेशरचना० १७६ तदाभासा १४१ परिवृत्तिविनिमयो ५०८ तदेवं पञ्चधा मतः ४०६ परोक्तिर्भेदक: तदेषा कथिता ६६ पर्यायोक्तं विना ५११ तद्भूर्लाक्षणिक: ६६ पादतद्द्ागवृत्ति ४०६
तद्युक्तो व्यञ्जक: ८१ पुनरुक्तवदाभासो ४३८
तद्रूपकमभेदो य ६३ पूर्णा लुप्ता च ४४३
तद्रूपाननुहारश्चद ५५१ प्रकृतं यन्निषिध्यान्यत् ४७०
तद्वद् धर्मस्य ४५० प्रतिकूलवणमुपहत० 300
तात्पर्यार्थोऽपि ३५ प्रतिपक्षमशक्तेन ५३६ तेन नार्थगुणा ३६२ प्रतिवस्तूपमा तु सा ४८४ तेनासौ त्रिरूप: ५६४ प्रत्यक्षा इव ५०६ तेषां चान्योन्य० १८७ प्रबन्धेऽप्यरथंशक्तिभ: १७५ तेषाम् अर्थव्यञ्जकतोच्यते प्रयोजनेन सहित is
[द] प्रस्तुतस्य यदन्यन ५४६
दीप्त्यात्मविस्तृते० ३८६ प्रोक्ता: शब्दगुणाश्च ३६३
दुष्टं पदं श्रुतिकटु २६६ [ब]
दृष्टान्त: पुनरेतेषां ४८६ बीभत्सरौँद्र रसयो: ३८६
[घ] [भ] भावस्य शान्तिरुदय: १४३ धर्मोपमानयोलापे ४५५ भिन्नदेशतयात्यन्तं ५३३
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प्रथम परिशिष्ट ५८७
सूत्र पृष्ठ सूत्र पृष्ठ भेदा अरष्टादशास्य तत् १६१ वक्तृवाच्यप्रबन्धानां ३०६ भेदाभावात्प्रकृत्या० ४२१ वक्त्राद्यौचित्य० ३४६ भेदाविमौ च सादृश्यात् ६२ वर्णसाम्यमनुप्रासः ४०४ भेदास्तदेकपञ्चाशत् १८६ वाक्ये द्वयुत्थ: १६३ भ्रान्तिमान् ५४३ वाच्यभेदेन भिन्ना ४१५ [म] वाच्यादयस्तदर्था: ३५ महतां चोपलक्षणन् ५१४ वादेलों पे समासे ४५२ महतोर्यन्महीयांसा०५5 ५३८ विना प्रसिद्ध० ८४८ माधुर्यव्यञ्जक: ४०६ विनोक्ति: सा ५०७ माधुयौं ज:0 2799 ३८८ विपर्यास उपमेयोपमा ४६० माला तु पूर्ववत् ४६६ विरोधः सोऽविरोधेऽपि मालादीपकमाद्यं ५०१ ४८६ विवक्षितं चान्यपरं मुख्यार्थबाधे तद्योगे ६३ ५१ विशिष्टे लक्षणा मुख्यार्थहतिर्दोषो १549 ७६ २६६ विशेषणैर्यत् मुख्य रसेऽपि 9५ ५२३ १४६ मूध्नि वर्गान्त्यगा: विशेषा: स्युस्तु ७६
[य] ३६३ विशेषोक्तिरखण्डेषु ४६८ यत्सोऽर्थान्तरयुक विषय्यन्तःकृतेऽन्यस्मिन् ८१ ६१ यथानुभवमर्थस्य ५४२ वृत्तावन्यत्न तत्र वा ४०८ यथासंख्यं क्रमेणैव ४६६ वेदखाब्धि० १८७ यथोत्तरं चेत् ५२८ व्यङ्गयेन रहिता ६७ यदुक्तमन्यथा 97 ४०१ व्यभिचारिरस० 93 ३५७ यद्यथा साधितं ५५२ व्याजस्तुतिर्मुखे ५०५ यस्य प्रतीतिमाधातुं ब्याजोक्तिश्छद्मनो० ७० ५२४ ये रसस्याङ्गिनो ५6 2001 ३८० व्याप्नोत्यन्यत् ३६० योग आद्यतृतीयाभ्याम् ३६४ [श] [₹] शब्दचित्रं वाच्यचित्र० ३२ रतिर्देवादिविषया १४० शब्दप्रमाण०
रतिर्हसिश्च १३५ शब्दस्य ४३८ शब्दार्थचित्रं यत्पूर्व ६४ २६३ रसादोनामनन्तत्वाद् १६२ शब्दार्थोभय० १६१
लक्षणा तेन षड्विधा [ल] शरेषुयुगखेन्दवः १८७
६६ शाब्दस्तु लाटानुप्रासो ४०७ लक्ष्यं न मुख्यं ७२ शुष्केन्धनाग्निवत् ३६० [व] वक्तृ-बोद्धव्य० शृङ्गारहास्यकरुण० ३६४ ८२ श्रुतिमात्रेणशब्दात्तु ११५
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काव्यप्रकाश:
सूत्र पष्ठ सूत्र पष्ठ श्रौता आर्थाश्च ४६५ सालङ्कार: २१४ श्लेष: स वाक्ये सा सहोक्ति: ५०६ [स सेष्टा संसृष्टिरेतेषां ५५२ सकृद्वृत्तिस्तु ४८७ सोऽनेकस्य सकृत्पूर्वः ४०४ सङ्केतितश्चतुर्भेदो ४३ स्थाप्यतेऽरपोह्यते वापि ५४१ सञ्चार्यादेविरुद्धस्य१८ ३६७ स्थितेष्वेतत्समर्थनम् ३४४ स त्वन्यो ५१७ स्फुटमेकत्र विषये ५६३ समं योग्यतया ५३५ स्मर्यमाणो विरुद्धोऽपि 200/ ३७३
समस्तवस्तुविषयं ४६४ स्याद्वाचको लाक्षणिक: ३४
समाधि: सुकरं ५३४ स्वभावोक्तिस्तु ५०५
स मुख्योऽर्थस्तत्न ५० स्वमुत्सृज्य गुणं ५५० समेन लक्ष्मणा वस्तु ५४० स्वसिद्धये पराक्षेप: ५३
सम्भावनमथोत्प्रेक्षा ४६० स्वस्वहेत्वन्वयस्योक्ति: ४७६ सर्वेषां प्रायशोऽर्थानां ४० [ह] ससन्देहस्तु भेदोक्तौ ४६२ साक्षात्सङ्कतितं हेत्वभावान्न ४२ साऽग्रिमा हेत्वोरुक्ता० ४४३
साङ्गमेतत् ४६६ [त्र]
साधर्म्यमुपमाभेदे ४०४ त्रिलोपे च समासगा ४५६
सामान्यं वा विशेषो वा ५०.० सारोपान्या तु ६१ ज्ञानस्य विषयो ६६
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द्वितीय परिशिष्ट
काव्यप्रकाशस्थ उदाहरणोंकी वर्णक्रमानुसारिणी सूची]
पद्य श्लोकसंख्या पद्य श्लोकसंख्या
अइ पिहुलं जलकुंभं १३ अन्यत्न व्रजतीति का ३३ अकलितपस्तेजोवीर्य० २५२ अन्यास्ता गुणरत्नरोहण० २१६ अकुण्ठोत्कण्ठया पूर्ण २०८ अपसारय घनसारं ३४३
५६६ ३६८ अखण्डमण्डल: श्रीमान् ४६८ अपाङ्गतरले दृशौ ५४७
अण्णं लडहत्तणश्र ४५१ अपाङ्गसंसगि तर्राङ्गतं १८३
अतन्द्रचन्द्राभरणा ७२ अपूर्वमधुरामोद० २८८ अतिथि नाम काकुत्स्थात् ५६५ अप्राकृतस्य चरितातिशयैः २३४ अतिपेलवमतिपरिमित० १०३ (बृ०) अबिन्दुसुन्दरी नित्यं अतिविततगगनसरणि० २५६ अब्धेरम्भःस्थगित० ४४७ अत्ता एत्थ िमज्जई १३६ अभिनवनलिनीकिसलय० ४८३ अत्यायतैनियमकारिभि० ३६५ अरमित: समितः प्राप्तैः ५६ अत्युच्चा: परितः स्फुरन्ति ११८ अ्मुष्मिंल्लावण्यामृत० ४३३ ११५ अमुँ कनकवर्णाभं ६६
अत्िलोचनसम्भूत १५८ अमृतममृतं क: सन्देहः २१६
अदृष्टे दर्शनोत्कण्ठा १२८ अयमेकपदे तया वियोग: ५१२
अद्यापि स्तनशैलदुर्ग० २३६ अयं पद्मासनासीन: ५८७ अद्रावत्र प्रज्वलत्यग्निरुच्चैः ३४७ अयं मार्तण्ड: कि स खलु ४१६
अधिकरतलतल्पं २२२ अयं वारामेको निलय० ४१६
अनङ्गमङ्गलगृहा० १४१ अ्यं स रशनोत्कर्षी ११६
अनङ्गरङ्गप्रतिम ३४६ ३३८
अनणुरणन्मणि० ५८३ अयं सर्वाणि शास्त्राणि ३७४
अनन्तमहिमव्याप्त० ३६५ अरातिविकमालोक० ४०६
अनन्यसदृशं यस्य २६६ अरिवधदेहशरीर: ३६०-ु
अनयेनेव राजश्री: अ्रुचिर्निशया विना अनवरतकनकनवितरण० ४१० अरे रामाहस्ताभरण २८४
अनुरागवती सन्ध्या ३८३ अथित्वे प्रकटीकृतेऽपि २७८
अन्त्प्रोतबृहत्कपाल० २६६ अलङ्कार: शङ्काकर० ३७०
अन्यत्र यूयं कसुमावचायं २० अलमतिचपलत्वात् १६७
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काव्यप्रकाश:
पद्य श्लोकसंख्या पद्य श्लोकसंख्या अलससिरोमणि धुत्ताणं ६० आलिङ्गितस्तत्न भवान् १५४ अलं स्थित्वा श्मशाने ६३ आलोक्य कोमलकपोल० ३२४ अलौकिकमहालोक० ४२८ आसीदञ्जनमत्नेति ५०१ अबन्ध्यकोपस्य १४८ (टी०) आहूतापि पदं ददाति (प्रदीपकार) अवाप्त: प्रागल्म्यं ४३१ आहूतेषु विहङ्गमेषु ६०४ अवितथमनोरथपथ० ३६६ (टी०) इतः स दैत्यः प्राप्तश्री: पविरलकमलविकास ५२७ इदमनुचितमक्रमश्च २२ अविरलकरवाल० १२० इदं ते केनोक्तं कथय ३६५ अष्टाङ्गयोगपरिशीलन० २७१ इन्दुः किं क्व कलङ्क ४२० असितभुजगभीषणा ४०३ इयं सुनयना दासीकृत० ४६६ असिमात्रसहायस्य ४६४ उत्र णिच्चलणिप्पंदा असिमात्र सहायोऽपि ४६५ उत्कम्पिनी भयपरि० १८७ असोढा तत्कालोल्लसद० १२२ उत्कृत्योत्कृत्य ४२ असौ मरुच्चुम्बित० १६० उत्तानोच्छनमण्डक० ३०५ अ्स्त्रज्वालावलीढ० २६० उत्फुल्लकमलकेसर० १४७ अ्स्या: कर्णावतंसेन २८७ उत्सिक्तस्य तप:परा० ५२ म्या: सर्गविधौ ४२१ उदयति विततोर्ध्वरश्मि० ४३७ अहमेव गुरु: सुदारुणानां ५५७ उदयमयते दिङमालिन्यं ४३४ अ्रहो केनेदृशी बुद्धि: ३५५ उदेति सविता ताम्र: २४५ अ्रगो विशालं भूपाल ५४३ उद्देशोऽयं सरसकदली० १७ श्रहो हि मे बह्वपराद्व० ४८२ उद्यौ दीघिकागर्भात् ६०० अहौ वा हारे वा ४४ उन्नतं पदमवाप्य यो लघुः ४३६ आ्कुञ्च्य पाणिमशुचि ३७ उन्निद्रकोकनदरेण० ११४ आकृष्टकरवालोऽसौ ३६६ उन्मेषं यो मम न सहते ४१७ आगत्य सम्प्रति बियोग० १२५ उपकृत बहु तत्र २४ आज्ञा शकरशिखामणि० २७६ उपपरिसरं गोदावर्या: २६६ आत्ते सीमन्तरत्ने ५७१ उब्यंसावत्र तर्वाली २१५ आत्मारामा विहितरतयो ३०८ उल्लास्य कालकरवाल० ५४ आदाय चापमचलं ३८४ ए एहि किंपि कीएवि ४७२ आदाय वारि परितः ४४६ ए एहि दाव सुन्दरि ५ू५५ आदावञ्जनपुञ्जलिप्त० २ ० ० एकस्त्रिधा वससि चेतसि ४७८ आदित्योऽयं स्थितो ६५ एकस्मिन् शयने ५१ आ्नन्दममन्दमिमं ५४१ एतत्तस्य मुखात् कियत् ४४२ आनन्दसिन्धुरति० १६२ एतन्मन्दविपक्व० १४२ आलानं जयकुञ्जरस्य ४२७ एद्दहमे त्तत्थणिश्रा ११
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द्वितीय परिशिष्ट
पद्य श्लोकसंख्या पद्य श्लोकसंख्या एषोऽहमद्रितनयामुख० २३५ कि लोभेन विलाङ्भितः १६५ एहि गच्छ पतोत्तिष्ठ ३४१ कुमुदकमलनीलनीर० ८६२ शणिदं दोब्वल्लं १४ कुरङ्गीवाङ्गानि स्तिमितयति ८२४ ओ्ल्लोल्लक रअरगण० कुलममलिनं भद्रा मूर्ति ५०६ औत्सुक्येन कृतत्वरा ३३१ कुविन्दस्त्वं तावत्पटयसि १३३ क: कः कुत्र न घुर्घुरायित० २२५ कुसुमितलताभिरहता ४७४ कण्ठकोणविनिविष्टमीश ४५ कृतमनुमतं दृष्टं वा ३६ कथमवनिप दर्पो १३४ २५६ कपाले मार्जार: पय० ५५३ कृतं च गर्वाभिमुख १०८ कमलमनम्भसि ४५० . (वृ०) कृपाणपाणिश्च भवान् (वृ०) कमलमिव मुखं (टी०) कृष्णो वैरिविमर्दने कमलेव मतिर्मतिरिव ४१६. केसेसु बलामोडिश्र ६५ ५५२ कैलासस्य प्रथमशिखरे ६४ करवाल इवाचारस्तस्य ४०० कैलासालयमाल० ११७ क रवालकरालदोःसहायो १६१ कौटिल्यं कचनिचये ५२४ करिहस्तेन सम्बाधे ३०४ (टी०) कौटिल्यं नयने (प्रदीपकार) कर्पूर इव दग्धोऽपि ४४६ कामन्त्य: क्षतकोमला० ३४० कर्पू रधूलिधवल० ३२६ केङ्कारः स्मरकामुकस्य २२६ (टी) कलशे परममहत्त्वं (प्रदीपकार) क्रोधं प्रभो संहर ३३० कलुषं च तवाहितेष्व० ५१३ कौञ्चाद्रिरुद्दामदृषद्दृढो ४८६ कल्याणानां त्वमसि महसां १६४ क्व सूर्यप्रभवो वंश: ४३६ कल्लोलवेल्लितदृषत् २७७ क्वाकार्य शशलक्ष्मण: ५३ (टी० कवीनां सन्तापो (प्रदीपकार) 1 ३३२ कस्त्वं भो: कथयामि ४४४ कस्मिन्कर्मणि सामर्थ्य० २०६ क्षणदासावक्षणदा ८२
कस्स व ण होड रोसो क्षिप्तो हस्तावलग्नः ३४२ १३५ काचित्कीर्णा रजोभि: क्षीण: क्षीणोऽपि शशी ४६३
कातर्यं केवला नीति: २५० १८५ क्षुद्रा: सन्त्रासमेते ४०
(टी०) काराविऊण खउरं खणपाहुणिश्रा देअर १११ का विसमा देव्वगई ५३० खिद्याति कूणति वेल्लति ४५६ किमासेव्यं पुंसां ५२२ खलववहारा दीसन्ति ७४ किमिति न पश्यसि कोपं २४० गङ्गव प्रवहतु ते ५६७ किमुच्यतेऽ्स्य भूपाल० २०७ गच्छाम्यच्युत दर्शनेन १२७ किवणाणं धणं णात्राणं ४५८ गर्वमसंवाह्यमिमं ५५६ किसलयक रैर्लतानां ४३० गाङ्गम्बु सितमम्बु ५६६ किं भषणं सुदृढमत्र ५२३ गाढकान्तदशनक्षत० ६३
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५ह२ काव्यप्रकाश:
पद्य श्लोकसंख्या पद्य श्लोकसंख्या
गाढालिङ्गनवामनीकृत० ३११ जटाभाभिर्भाभि: ५७२
६६ जनस्थाने भ्रान्तं १२४ गामारुहम्मि गामे १०१ (टी०) जलं जलधरे क्षार० गाम्भीर्यगरिमा तस्य ३६७ जस्स रणन्तेउरए करे ४२३
गाहन्तां महिषा निपान० २५१ जस्सेअ वणो पस्सेश ५३४
गिरयोंऽप्यनुन्नतियुजो ४८४ जह गहिरो जह रतण० ५७४
गुणानामेव दौरात्म्यात् ४८१ जं परिहरउं तीरइ २१७
गुणैरनध्यः प्रथितो ५६३ जा ठेरं व हसन्ती ६७
गुरुअणपरवस पिश्र २१ जाने कोपपराङमुखी ४७
गुरुजनपरतन्त्रतया ३५६ जितेन्द्रियतया सम्यक ४६७
गुहिणी सचिवः सखी ५६३ जितेन्द्रियत्वं विनयस्य ३१५
गृहीतं येनासी: परिभव० ५६१ ५२६
गोरपि यद्वाहनता १६८ जुगोपात्मानमत्नस्तः १६४
ग्रन्थामि काव्यशशिनं ५६८ जे लङ्कागिरिमेहलासु ६८
ग्रामतरुणं तरुण्या: ३ जोहणाई महुरसेण ह२
ग्रीवाभ ङ्गाभिरामं ४१ ज्याबन्धनिष्पन्दभुजेन २६०
चकासत्य ङ्गनारामा: ३६१ ज्योत्स्नाभस्मच्छुरणधवला ४२२
चकितहरिणलोललोचनाया: ३९४ ज्योत्स्ना मौक्तिकदाम ४७:
चक्री चकारपंक्ति ५८१ ज्योत्स्नेव नयनानन्दः ४१२
चण्डालैरिव युष्माभि: ५८५ टुण्टुण्णन्तो मरिहसि ४०८
चत्वारो वयमृत्विज: २३२ णवपुण्णिमामिशंकस्स 55
चन्द्रं गता पद्मगुणान्न २६५ णिहुअरमणम्मि लोअण० ३२६
चरणत्रपरित्राण० २६४ णोल्लेइ अणोल्लमणा १८
चापाचार्यस्त्रिपुर० २०२ तइआ मह गंडत्थल० १६
२३१ २१३ चित्ते विहद्टदि ण टुद्टदि तत उदित उदारहारहारि० ३४५ ४०२ चित्रं चिदं बत बत ततः कुमुदनाथन ५३७ ततोऽरुणपरिस्पन्द० ५१६ चित्रं महानेष बताबतार: ४३ तं ताण सिरिसहोअर० ५१६ चिन्तयन्ती जगत्सूर्ति ८१ चिन्तारत्नमिव च्युतोऽसि तथाभूतां दृष्ट्वा १५ ५६9 २२१ चिरकालपरिप्राप्त० १६६ जगति जयिनस्ते ते तदप्राप्तिमहादुःख० ८० २५८ जगाद मधुरां वाचं २६३ तदिदमरण्यं यस्मिन् ५०७
(टी०) जगाद विशदां वाचं तद् गच्छ सिद्धयै कुरु . २६६
जड्डाकाण्डोरुनालो १५० तद् गेहं नतभित्ति ५१६
11 २३३ तद्वेषोऽसदृशोऽन्याभिः ५६४
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द्वितीय परिशिष्ट ५६३ पद्य श्लोकसंख्या पद्य श्लोकसंख्या तनुबपुरजधन्योऽसौ ३६२ देशः सोऽ्यमरातिशोणित० तपस्विभिर्या सुचिरेण १४६ दैवादहमद्य तया तरुणमनि कलयति ११० दोभ्यां तितीषति तरङ्ग० ८३८ तरुणमनि कृतावलोकना ८१० (वृ०) द्वयं गतं सम्प्रति तवाहवे साहसकर्म० ४५७
१८६ 11 तस्याधिमात्रोपायस्य १७६
२५३ तस्या: सान्द्रविलेपन० ५० द्वारोपान्तनिरन्तरे ताणं गुणग्गहणाणं १०२ धन्यस्यानन्यसामान्य० ३६८ तामनङ्गजयमङ्गलश्रियं ३२३ धन्यासिं या कथयसि ६१ ताम्बूलभृतगल्लोऽयं १८० धम्मिलस्य न कस्य १८२ ताला जातन्ति गुणा ३१६ धवलोसि जह वि ५६५ तिग्मरुचिरप्रतापो ५५ धातुः शिल्पातिशय० ५३६ तिष्ठेत्कोपवशात्प्रभाव० ३१२ धीरो विनीतो निपुणो २११ तीर्थान्तरेषु स्नानेन १४४ (वृ०) धुनोति चासि तनुते तुह वल्लहस्स गोसम्मि ८३ न केवलं भाति नितान्त० ४१५ ते दृष्टिमात्रपतिता अ्पि १४० न चेह जीवितः कश्चित् तेऽन्यैर्वान्तं समश्नन्ति १७६ न तज्जलं यन्न सुचारु० ५५० ते हिमालयमामन्त्र्य २४७ न त्रस्तं यदि नाम १६७ त्वमेवं सौन्दर्या स च २२६ नन्वाश्रयस्थितिरियं ५१४ त्वयि दृष्ट एव तस्या: ४५६ नयनानन्ददायीन्दोः ५७५ त्वयि निबद्धरते: प्रिय० २३६ नवजलधर: सन्नद्वोऽ्यं ६१३ त्वं मुग्धाक्षि विनैव ३१ नाथे निशाया नियते: २४४ त्वं विनिजितमनोभव० ५४५ नानाविधप्रहरणैर्नप ५०० त्वामस्मि वच्मि विदुषां २३ नारीणामनुकलमाचरसि त्वामालिख्य प्रणयकुपितां २५४ ३६ नाल्प: कविरिव स्वल्प० दन्तक्षतानि करजैश्च ३८२ ३३६ निजदोषावृतमनसां ४७६ दर्पान्धगन्धगज० ६२ नित्योदितप्रतापेन ४४० दिवमप्युपयातानां ५६० निद्रानिवृत्तावुदिते ४६५ दिवाकराद्रक्षति यो ६०१ निपेतुरास्यादिव तस्य पूहह दीघोङवेवीङसमः कश्चित् २६७ निम्ननाभिकुहरेपु यदम्भ: ५५१ दुर्वारा: स्मरमार्गणा: ५०८ निरवधि च निराश्रयं ४२६ दूरादुत्सुकमागते २६ निरुपादानसम्भार० ५७ दृशा दग्धं मनसिजं २६७ निर्वाणवैरदहनाः ३०६ देव त्वमेव पाताल० ३८० (टी०) निर्वातपद्मोदर० (प्रदीपकार) देवीभावं गमिता ४५४ निशितशरधिया ८५
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५६४ काव्यप्रकाश:
पद्म श्लोकसंख्या पद्य श्लोकसंख्या निःशेषच्युतचन्दनं २ प्रागप्राप्तनिशुम्भ० ३१६ न्यक्कारो ह्ययमेव मे १८३ प्राणेश्वरपरिप्वङ्ग० २६१ पथि पथि शुकचञ्चू० प्राप्ता: श्रियः सकलकाम० २७२ पथित्र ण एत्थ प्राभ्रभ्राड्विष्णुधामाप्य १७४ परापकारनिरतैः २४१ प्रियेण संग्रथ्य विपक्ष० परिच्छेदातीत: २३७ १०८ प्रेमार्द्रा: प्रणयस्पृशः ३२ ४६० प्रेयान् सोऽयमपाकृत: परिपन्थिमनोराज्य ४०७ प्रौढच्छेदानुरूपोच्छलन० परिमृदितमृणालीम्लान० ३५३ ५८ परिम्लानं पीनस्तनजघन० फुल्लुक्करं कलमकूरणिहं ३१० ३५१ बत सखि कियदेतत् परिहरति रति म्ति ४३२ ३२७ पविसन्ती घरवारं बन्दीकृत्य नृपद्विषां बिम्बोष्ठ एव रागस्ते ११६ पश्चादङघ्री प्रसार्य ५१५ ४६३ ब्राह्मणातिकमत्यागो पश्श्येत्कश्चिच्चल चपल १३० १२३ पाण्डु क्षामं वदनं भक्तिप्रह्वविलोकन० ३७२ ३३३ भक्तिर्भवे न विभवे ४६१ ५२५ पातालमिव ते नाभि: भण तरुणि रमण० पादाम्बुजं भवतु नो भद्रात्मनो दुरधिरोह० ५७६ १२ पितृवसतिमहं व्रजामि भम धम्मित्र वीसद्धो १३८ १७७ पुराणि यस्यां सवराङ्ग्गनानि भस्मोद्धूलन भद्रमस्तु ५४६ ५०४ पुंस्त्वादपि प्रविचलेत् भासते प्रतिभासार ४४४ ३८८ पृथुकार्त्तस्वरपात्रं भुक्तिमुक्तिकृदेकान्त० १७८ ३०७ भुजङ्गमस्येव मणिः ३७ ५८४ पेशलमपि खलवचनं भूपतेरुपसर्पन्ती १७५ ४८० पौरं सुतीयति जनं भूपालरत्न निर्दैन्य० ४०४ २६१ प्रणयिसखीसलील० भूयो भूय: सविध० १०६ ५०३ प्रत्यग्रमज्जनविशेष० ५६६ भूरेणुदिग्धान् नवपारि० ३३५ (टी०) प्रत्याख्यानरुचेः कृतं भ्रभिमरतिमलस० १२५६ प्रथममरुणच्छाय: मतिरिव मूर्तिर्मधुरा १३६ ४१४ प्रधनाध्वनि धीरधनुर्ध्वनि० १०५ मथ्नामि कौरवशतं १३१ प्रयत्नपरिबोधितः २८२ मधुपराजिपराजित० ३६६ प्रसादे वर्तस्व प्रकटय ३२८ मधुरिमरुचिरं वच: ५२७ प्रस्थानं वलयै: कृतं ३५ मनोरागस्तीव्रं विषमिव ३४४ प्रागप्राप्तनिशुम्भ० २१० मन्थायस्तार्णवाम्भ:प्लुत० ३५२ ३१८ मलयजरसविलिप्त० ५५८
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द्वितीय परिशिष्ट ५६५
पद्य श्लोकसंख्या पद्य श्लोकसंख्या
मसृणचरणपातं २२७ यश्चाप्सरोविभ्रम० १६६ महदे सुरसंधम्मे २७३ (टी०) यत्मिन् पञ्च पञ्चजना: महाप्रलयमारुत० २४३ यस्य किन्चिदपकर्त्तु० ५४६ महिलासहस्सभरिए ७१ यस्य न सविधे दयिता ३५६ महीभृतः पुत्रवतोऽपि २५८ यस्य मित्ाणि मित्राणि ७३ महौजसो मानधना: ५२० यस्यासुहृत्कृततिरस्कृति० ११३ माए घरोबरणं ६ याता: कि न मिलन्ति ४४० मातङ्गा: किमु वल्गितैः ३०० यावकरसार्द्रपाद० १४५ माता नतानां सङ्कट्र: ३८६ युगान्तकालप्रतिसंहृतात्मनो ५४४ मात्सर्यमुत्सार्य १३३ ये कन्दरासु निवसन्ति ५४८ २६३ येन ध्वस्तमनोभवेन ३०३ मानमस्या निराकर्त्त ५३५ ये नाम केचिदिह १८६ मारारिशकरामेभ० ३८५ येनास्यम्युदितेन चन्द्र ४४५ मित्रे क्वापि गते सरोरुह० ३४६ येषां कण्ठपरिग्रह० ४८५ मुक्ता: केलिविसूत्रहार० ५०६ येषां तास्त्रिदशेभदान० २२८ मुखं विकसितस्मितं यषां दोर्बलमेव दुर्बल० १०४ मुग्धे मुग्धतयव ७६ योऽविकल्पमिदमर्थ० १६२ (टी०) मुनिर्जयति योगीन्द्रो योऽसकृत्परगोत्नाणां ३७७ मूर्ध्नामुद्वृत्तकृत्ता० १५६ रइकेलिहिणिश्रसण० ह७ ३५० रक्ताशोक कृशोदरी क्व नु ३०१ मृगचक्षुषमद्राक्षम् २६६ ३२० मृगलोचनया विना ४६८ रजनिरमणमौले: ३७५ मृदुपवनविभिन्नो १५३ रसासार रसा सार० ३८६ मृधे निद घर्मांशु० ४०५ राईसु चन्दधवलासु ८४ यं प्रेक्ष्य चिररूढ़ापि ५०५ राकायामकलङ्कं चेत् ४५२ यः कौमारहर: राकाविभावरीकान्त० १४६ य: पूयते सुरसरिन्मुख० २०४ राकासुधाकरमुखी ४६ यत्तदूजितमत्युग्रं १६३ राजति तटीयमभिहत० ५७३ यत्रानुल्लिखितार्थमेव २७४ यत्रता लहरीचलाचलदृशः राजनारायणं लक्ष्मीः ५७८ ५१६ यथायं दारुणाचार: १४३ राजन् राजसुता न पाठयति ४४१
यदा त्वामहमद्राक्षम् २६८ राजन्विभान्ति भवतः २१२ यदानतोऽ्यदानतो ३६६ राज्ये सारं वसुधा ५२२ यदि दहत्यनिलोऽत् २७३ राममन्मथशरेण ताडिता २५५ यद्वञ्चनाहितमतिर्बहु ३१३ रामोऽसौ भुवनेष १०६
यशोऽधिगन्तुं सुख० रुधिरविसरप्रसाधित० ७७ २४६ रे रे चञ्चललोचनाञ्चित० १०३
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काव्यप्रकाश:
पद्य श्लोकसंख्या पद्य श्लोकसंख्या लग्नं रागावृताङ्गया २४२ विपुलेन सागरशयस्य ५४२ २८१ विभिन्नवर्णा गरुडा० ५६४ 13 २८५ विमानपर्यङ्गतले लग्न: केलिकचग्रह० वियदलिमलिनाम्बु० ३३७ २३८ २७ लतानामेतासामुदित० विहलंखलं तुमं सहि लहिऊण तुज्झ बाहु फंसं ४३६ वेगादुड्डीय गगने लावण्यं तदसौ कान्ति: २१४ ७५ वेत्नत्वचा तुल्यरुचां ५५६ लावण्यौकसि सप्रताप० ५५४ (वृ०) व्यानम्रा दयितानने लिखन्नास्ते भूरमि १०० शक्तिर्निस्त्रिशजयं लिम्पतीव तमोऽङ्गानि २५४ ४६८ शनिरशनिश्च तमुच्चैः ५६६ शरत्कालसमुल्लासि० लीलातामरसाहतो शशी दिवसधूसरो १५७ १५२ वक्त्रस्यन्दिस्वदबिन्दु० ५३१ शिरीषादपि मृद्ङ्गी वकाशन ५१० वक्त्राम्भोजं सरस्वत्यघि० ५३८ २७५ वव्त्रेन्दौ तव सत्ययं ३०२ ५७७ शून्यं वासगृहं ३० वदनसौरभलोभ० ५६८ शैलन्द्रप्रतिपाद्यमान० वदनं वरवणिन्यास्तस्याः ३६० श्यामां श्यामलिमान० ५२१ वद वद जितः स शत्रुः २७२ ३१४ श्रितक्षमा रक्तभुवः वपुःप्रादुर्भावादनुमित० १६६ ५०२ श्रीपरिचयाज्जडा वपुर्विरूपाक्षमलक्ष्य० १० १६१ श्रुतेन बुद्धिर्व्यसनेन वस्त्रवैदूर्यचरणै: २८० १८१ (टी०) श्रोणीभागस्त्यजति ्वह्निस्फुलिङ्ग इव ५८६ षडधिकदशनाडीचक्र० वाणिअ्र्र हत्थिदन्ता ३०६ ५२६ सलकरणपरवीसाम० वाणीरकुडंगुड्डीण० ४०१ १३२ स एकस्त्रीणि जयति ४७७ वाताहारतया जगद् २८३ (व०) सकलकलं पुरमेतत् वारिज्जन्तो वि पुणो ८६ सक्तवो भक्षिता देव ५६२ विकसितसहकार० २१८ सक्कतकालमनसं ५३२ विदलितसकलारिकुलं ५११ विदोर्णाभिमुखाराति० संग्रामाङ्गणमागतेन २३०; ४६० २८६ विद्वन्मानसहंस सततं मुसलासक्ता: ४२६ ४८७ विधाय दूरे केयूर० २७० सत्यं मनोरमा रामा: ३३४ विनयप्रणयैककेतनं २०५ स त्वारम्भरतोऽवश्य० ३६३; ३६४ विनायमेनो नयता० विनिर्गतं मानदमात्म० ३६२ सदा मध्ये यासामियममृत० २५७ ५ सदा त्नात्वा निशीथिन्यां २६८ विपरीतरए लच्छी २४६ १३७ सद्यः करस्पर्शमवाप्य ५४०
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द्वितीय परिशिष्ट ५६७ पद्य श्लोकसंख्या पद्य सद्वंशमौक्तिकमणिः श्लोकसंख्या ३८१ सेयं ममाङ्गेषु सुधारस० सन्नारीभरणोमाय० ३६२ सो णत्थि एत्थ गामे २५ स पीतवासा: प्रगृहीत० ५६० सोऽध्यैष्ट वेदान् ५७० समदमत ङ्गजमदजल० ४६२ सोऽपूर्वो रसनाविपर्यय० १७० स मुनिर्लाच्छितो सो मुद्धसामलंगो ४४६ सम्प्रहारे प्रहरणै: ५८६ ८७ सम्यग्ज्ञानमहाज्योति० ३२५ सौन्दर्यसम्पत्तारुण्यं १५५ सौन्दर्यस्य तर्राङ्गणी २६२ सरला बहुलारम्भ० ३८७ सौभाग्यं वितनोति ४२५ सरस्वति प्रसादं मे ३६७ स्तुम: कं वामाक्षि ५७६ स रातु वो दुश्च्यवनो ४८ सर्वस्वं हर सर्वस्य १७१ स्तोकेनोन्नतिमायाति स्निग्धश्यामलकान्ति० ३७६ सविता विधवति विधुरपि ३७६ स्पष्टोल्लसत्किरण० ११२ ४०६ सव्रीडा दयितानने ५८० सशोणितैः क्रव्यभुजां ३२२ स्पृशति तिग्मरुचौ स्फटिकाकृतिनिर्मल: ६०२ ससार साकं दर्पेण ३३६ स्फुरदद्भुतरूपमुत्प्रताप० २२२ सह दिशहणिसाहिं ३६८ स्नस्तां नितम्बादव० ५६२ सहि णवणिहुवणसमरम्मि ४१६ स्वच्छन्दोच्छलदच्छ० १६० ४ सहि विरइऊण माणस्स ६६ स्वच्छात्मतागुणसमु० ४७१ साकं कुरङ्गकदृशा १२१ स्वपिति यावदयं निकटे सा दूरे च सुधा० स्वप्नेऽपि समरेषु २६: साधनं सुमहद्यस्य १६६ ३६३ १५० स्वयं च पल्लवाताम्र० ३७८; ७०३ साधु चन्द्रमसि पुष्करै: १८८ स्वर्गप्राप्तिरनेनैव ३४८ सा पत्युः प्रथमापराघ० ३४ स्विद्यति कूणति ४५६ सायकसहायबाहो: १७२ हन्तुमेव प्रवृत्तस्य २८६ सायं स्नानमुपासितं ७६ हरत्यघं सम्प्रति ४६ सा वसइ तुज्झ हिशए ५६१ हलवन्न विषमदृष्टिः ४६६ साहेन्ती सहि सुहतं ७ हरस्तु किञ्चित्परिवृत्त० १२६ सिंतकरकररुचिरविभा ३१५; ३६१ हंसाणं सरेहि सिरी ५२६ सिहिकासुतसन्त्रस्तः ५३६ हा धिक सा किल १४६ सुधाकरकरकराकार० १६५ हा नृप हा बुध हा कवि० २२० सुरालयोल्लासपर: १७८ हा मातस्त्वरितासि ३८ सुव्वइ समागमिस्सदि १६ हित्वा तामुपरोध० ४६४ सुसितवसनालङ्कारायां २६७; ४८० हुमि अवहत्थिअ्रेहो ३२१ सुहृद्वधूवाष्पजल० ४४३ हृदयमधिष्ठितमादौ ४५३ सृजति च जगदिदमवति ४८६ हे हेलाजितबोधिसत्त्व ४६५
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ज्ञान
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आचार्य विश्वेश्वरकी दो अन्य व्याख्याएँ
ध्वन्वालोक-श्री मदानन्दवर्द्धनाचार्य-कृत लक्षणग्रन्थोंमें इसका अन्यतम स्थान है। हिन्दी माध्यमसे संस्कृत पढ़नेवाले साहित्यानुरागियोंके लिए यह संस्करण अत्यन्त उपयोगी है। मूल्य : ८०.००
निर्वतम्- वास्काचार्यकृत। वेदके अर्थज्ञानके लिए इस ग्रन्थका महत्त्वपूर्ण स्थान है। वस्तुतः यह 'निघष्टु' का व्याख्या-ग्रन्थ है और वेदके क्लिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण शब्दोंका अर्थज्ञान करानेवाला है। मूल्य : १00.00
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मुद्रक - रत्ना ऑफसेट्स लिमिटेड, कमच्छा, दाराणसी फोन : 392820