Books / Kavya Prakasa Shashi Kala Vyakhya Hindi Translation Satya Vrata Simha Chowkambha 1998

1. Kavya Prakasa Shashi Kala Vyakhya Hindi Translation Satya Vrata Simha Chowkambha 1998

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२५० काव्यप्रकाश:

ज्याबन्धनिष्पन्दभुजेन यस्य विनिशश्व्वसद्वक्त्रपरम्परेण। कारागृहे निर्जितवासवेन लङ्केश्वरेणोषितमाप्रसादात् ॥ २ु६॥ इत्यत्र केवलो ज्याशब्दः । प्राणेश्वरपरिष्वङ्गविभ्रमप्रतिपत्तिभिः । मुक्ताहारेण लसता हसतीव स्तनद्वयम् ॥ २६०॥ अत्र मुक्तनामन्यरत्नामिश्रितत्वबोधनाय मुक्ताशब्द:। सौन्दर्यसम्पत्तारुण्यं यस्यास्ते ते च.विभ्रमा । षट्पदान पुष्पमालेव कानू नाकर्षति सा सखे!॥ २६१॥ अत्रोत्कृष्टपुष्पविषये पुष्पशब्दः। निरुपपदो हि मालाशब्द: पुष्पस्जमेवा- भिधत्ते। (दोष-समाधान महाकवि-प्रयोगों में न कि सर्वत्र ) (७८) स्थितेष्वेतत्समर्थनम् ॥५८॥ न खलु कर्णावतंसादिवज्जघनकाञ्ीत्यादि क्रियते। जगाद मधुरां वाचं विशदाक्षरशालिनीम ॥ २६२॥ '(कार्तवीर्य वह था) जिसके कारागार सें इन्द्रविजयी लङ्केश्वर (रावण) भी प्रत्यज्जा के बन्धन से निश्चेष्ट भुजदण्ड लिये, दसों सुर्खों से आह भरते, तब तक पड़ा रहता था जब तक उस पर छुटकारे की आज्ञा की कृपा न हुआ करती थी।'-(रघुवंश, षष्ठसर्ग की) इस सूक्ति में, वहाँ केवल 'ज्या' शब्द का ही प्रयोग उचित है (जैसा कि महाकवि ने किया ही है) इसी प्रकार यहां अर्थात्- इस सुन्दरी के स्तनद्ूय, ऐसा लगता है जैसे, प्रियतम के आलिङ्गन में, उन-उन हाव-भावों की स्मृति में, अपने सुन्दर मुक्ताहार के बहाने, हँस से रहे हों।' इस 'सूक्ति' में 'हार' के बदले जो 'मुक्ताहार' शब्द का प्रयोग है (और 'हार' और 'मुक्ता' एक ही वस्तु है-'मुक्ता ग्रैवेयकं हारः') उसमें भी कोई 'अपुष्टत्व' अथवा 'पौन- रुक्तय' नहीं क्योंकि यहाँ 'मुक्ताहार' से एक विशेष अर्थ की अर्थात् अन्य रत्नों से अमिश्रित शुद्ध मौक्तिकगुम्फित माला की प्रतीति अभिप्रेत है। इसी प्रकार यहां अर्थात्- 'अरे मित्र भला वह रमणी, जिसके पास सौन्दर्य की सम्पत्ति हो, तारुण्य हो और वैसे-वैसे हाव भाव हों, भला भौरों को आकृष्ट करने वाली पुष्पमाला की भांति, किन्हें अपनी ओर आकृष्ट नहीं किया करती !' इस सूक्ति में 'माला' के बदले जो 'पुष्पमाला' शब्द का प्रयोग है उसमें भी 'पुप्प' शब्द 'अपुष्टत्व' दोषग्रस्त नहीं, क्योंकि इसके द्वारा माला में सुन्दर से सुन्दर फूलों के गुथे हुये होने का अभिप्राय विवच्ित है। यहां ऐसी शङ्का तो निर्मूल ही समझी जानी चाहिये कि 'रत्न' आदि की 'माला' की सम्भावना को दूर करने के लिये 'पुष्पमाला' पद का प्रयोग किया गया क्योंकि बिना किसी विशेषग के ही 'माला' शब्द पुष्प की ही माला का वाचक हुआ करता है। (तात्पर्य यह है कि यहां 'पुष्पमाला' का अभिप्राय उत्कृष्ट पुष्पों की माला है और इसलिये 'पुष्प' शब्द अपुष्ट अथवा पुनरुक्त नहीं)। इस दोष समाधान का वास्तविक भभिप्राय यह नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति ऐसा ही प्रयोग किया करे और कोई दोष न हो, अपितु यह कि महाकवियों ने जहां ऐसे पद प्रयुक्त किये हैं, जो आपाततः अपुष्ट अथवा पुनरुक्त प्रतीत हो सकते हैं, उनमें अभिप्राय- विशेष की विवत्ता से दोष की सम्भावना दूर की जा सकती है। इसलिये आवश्यक यही है कि महाकवियों द्वारा प्रयुक्त 'कर्णावतंस' आदि पदों की देखा-देखी से सभी लोग ऐसे ही प्रयोग न किया करें क्योंकि महाकवि लोग भी, किसी

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सप्तम उल्लास: २५१

इत्यादौ क्रियाविशेषणत्वेऽपि विवक्षितार्थप्रतोतिसिद्धौ 'गतार्थस्यापि विशे- ष्यस्य विशेषणदानार्थ क्वचित्प्रयोग: कार्यः'-इति न युक्तम्। युक्तत्वे वा, F चरणत्रपरित्राणरहिताभ्यामपि द्रुतम्।

इत्युदाहार्यमिति- पादाभ्यां दूरमध्वानं व्रजन्नेव न खिद्यते ॥ २६३।।

('निर्हेतुत्व' का समाधान ) (७९) ख्यातेऽर्थे निर्हेतोरदुष्टता। चन्द्रं गता पद्मगुणान्न भुंक्ते पद्माश्रिता चान्द्रमसीमभिख्याम्। उमामुखंतु प्रतिपद्य लोला द्विसंश्रयां प्रीतिम्राप लक्ष्मीः ॥२६४॥

विशेषाभिप्राय की विवत्ा से, भले ही 'कर्णावतंस' आदि पढ प्रयुक्त कर दें, ऐसा नहीं कि मनमाना 'जघनकाञ्ची' आदि अपुष्ट अथवा पुनरुक्त पदों का प्रयोग किया करते हैं अथवा करें भी तो कोई दोष न हो। इसीलिये ऐसी रचना अर्थात्- 'वह विशदाक्षरयुक्त मधुर वाणी बोली' आदि में, जहाँ प्राचीन आलंकारिक वामन ने 'उक्तार्थपदता' दोष का परिहार इस दृष्टि से किया है कि 'गतार्थ रहने पर विशेष्य का प्रयोग भले ही न हो किन्तु यदि उसके लिये विशेषण प्रयुक्त किये जांय तो उसका प्रयोग कहीं किया भी जाय तो ठीक है', वस्तुतः बात यह है कि 'अपुष्टत्व' अथवा 'पौनरुक्त्य' दोष हटाया नहीं जा सकता क्योंकि जब कवि-वितत्ित सभी अभिप्राय क्रियाविशेषण के प्रयोग में भी अर्थात् 'जगाद मधुरं विद्वान् विशदाक्तरशालि च' इस प्रकार प्रतिपादन में भी (जिसमें दोष की सम्भावना ही नहीं) स्पष्ट झलक उठें, तो 'उवाच मधुरां वाचं विश- दाक्षरशालिनीम्' इस अपुष्ट पदयुक्त रचना के प्रति क्या आग्रह ! वस्तुतः 'किसी विशेष्य के गतार्थ रहने पर भी उसे विशेषण से युक्त करने के लिये उसके प्रयोग का औचित्य वहाँ ही है जहाँ बिना ऐसा किये (बिना विशेष्य का प्रयोग किये), विशेषण प्रयोग के असंभव हो जाने से, विवत्तित अर्थ की ही प्रतीति न हो रही हो' जैसे कि यहाँ- 'यह व्यक्ति ऐसा है जो जूते की सुरक्षा से शून्य भी पैरों से, चाहे कितनी दूर और कितना शीघ्र भी क्यों न हो, चलते दुःख नहीं उठाया करता।' (जहां 'पादाभ्याम' इस गतार्थ को भी विशेष्य के प्रयोग की आवश्यकता है क्योंकि बिना इसके 'चरणन्रपरित्राण- राहित्य' रूप विशेषण से विवत्ित अर्थ की सगति नहीं बैठती। 'चरणत्रपरित्राणराहित्य' को क्रिया-विशेषण तो बताया नहीं जा सकता क्योंकि 'चरणन्र' (जूते के द्वारा) 'परित्राण' (संरक्षण) की आवश्यकता चलने की क्रिया के लिये नहीं अपितु पैरों के ही लिये हुआ करती है) 'निर्हेतुत्व' दोष वहां नहीं हुआ करता, जहां हेतुरूप से अवस्थित कोई वस्तु प्रसिद्ध वस्तु हुआ करती है। जैसे इस सूक्ति अर्थात् 'सुन्दरता, जो कि यदि चन्द्रमा के साथ रहे तो कमल की विशेषता (सौरभ आदि) नहीं पा सके और यदि कमल के साथ रहे तो चन्द्रमा की विशेषता (ज्योत्स्ना आदि) न पा सके, पार्वती के मुख में रहती हुई, चञ्चल होने पर भी, दोनों (चन्दमा और कमल) की द्विविध सुषमा से सुशोभित होती हुई एक अपूर्व संतोष पाने लगी।' में, सुन्दरता के लिये, पद्मगुण और चन्द्रगुण के उपभोगाभाव (न भुङ्क्ते) के किसी हेतु के अभिधान के न होने में 'निर्हेतुत्व' की आशंका नहीं, क्योंकि (यहां हेतुरूप से

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२५२ काव्यप्रकाश: अत्र रात्रौ पद्मस्य सङ्कोच:, दिवा चन्द्रमसश्च निष्प्रभत्वं लोकप्रसिद्धमिति 'न भुङ्क्ते' इति हेतुं नापेक्षते। (पद-दोष का यथास्थान समाधान ) (८०) (अ)नुकरणे तु सर्वेषाम्॥ सर्वेषां श्रुतिकटुप्रभृतीनां दोषाणाम्। यथा- मृगचक्षुषमद्राक्षमित्यादिकथयत्ययम्। पश्यैष च गवित्याह सुत्रामाणं यजेति च ।। २६५॥ ( वक्त्रादिवैशिष्ट्य में दोष के औपचारिक गुणत्व अ्रथवा अकरिश्चित्करत्व की संभावना ) (८१) वक्त्रादयौचित्यवशाद्दोषोऽपि गुणः क्वचित्कचिन्नोमौ ॥५२।। (वत्त-बोद्धव्य-व्यङ्गयार्थ-चैशिष्ट्य से 'कष्टत्वादि' की गुणरूपता ) वक्तृ-प्रतिपाद्य-व्यङ्ग्य-वाच्य-प्रकरणादीनां महिम्ना दोषोऽपि क्वचिद्- उपयुक्त) रात में कमल के संकोच और दिन में चन्द्रमा की निप्प्रभता-दोनों ऐसे हैं जो लोकप्रसिद्ध हैं (और इसलिए जिनका उपादान ही अकिज्ञित्कर है)। जितने भी पढ़ादि दोष प्रतिपादित किये जा चुके हैं उन्हें वहाँ दोष नहीं माना जाया करता जहाँ परोक्त का 'अनुकरण' अभिप्रेत रहा करता है। यहाँ 'सर्वेषाम्' से अभिप्राय है श्रुतिकटु प्रभृति पद-पदांश-वाक्यादि-गत दोषों से। उदाहरण के लिए- 'देखो, यह क्या कहता है? यह कहता है-'मृगचन्तुषमद्राक्षम्'-'मृग के चत्तुओं के समान चन्तुओं वाली (सुन्दरी) को मैंने देखा।' देखो, यह और क्या कहता है? यह कहतां है 'गविति'-यह गौ है और 'सुत्रामाणं यज'-सुत्रामा (इन्द्र) का भजन करो।' यहाँ यह स्पष्ट है कि 'मृगचनुषम द्राक्तम्' में (जहाँ शङ्गारव्यक्षक मधुर वर्ण उचित हैं) 'अद्राक्षम्' यह पद श्रुतिकटुत्व का दष्टान्त नहीं, क्योंकि यह वक्ता की शक्ति नहीं अपितु 1 वक्ता द्वारा अन्य की उक्ति की अनुकृति है । इसी प्रकार 'गविति' (गो+इति) में 'चयुतसंस्कृतित्व' नहीं, क्योंकि (भले ही यहाँ व्याकरण के नियम अर्थात् 'न केवला (प्रत्ययरहिता) प्रकृतिः प्रयोत्व्या'-इस सिद्धान्त का उल्लंघन हो किन्तु) यह केवल परोक्त का अनुकरण है। इसी प्रकार 'सुत्रामाणम्' में 'अप्रयुक्तत्व' इसलिए नहीं क्योंकि यहां भी परोक्तानुकरण ही अभिप्रेत है। तात्पर्य यह है कि 'पुरोवाद' अथवा 'अनुकार्य' की स्थिति में तो यहाँ दोष होगा ही किन्तु यहाँ 'अनुवाद' अथवा 'अनुकरण' है और 'अनुवाद' अथवा 'अनुकरण' में जो पद जैसा हो उसे वैसा ही रखना अनिवार्य है, इसलिए यहाँ दोप नहीं माना जायगा) उपर्युक्त दोष ही वक्तृ-स्वभाव आदि के औचित्य के अनुसंधान में कहीं (प्रकृत रस- भावादि के उत्कर्षक होने के कारण) उपचारतः गुण मान लिये जाते हैं और कहीं ऐसा भी संभव है कि (प्रकृति रसभावादि के उत्कर्प अथवा अपकर्षक कुछ भी न होने से) ये न गुण माने जाय और न दोष ही। वक्ता-बोद्धव्य-रसभाव-वाच्य और प्रकरण आदि (जिनका स्वरूप तृतीय उल्लास में प्रतिपादित है) के वैशिष्ट्य की शक्ति से, कहीं ऐसा भी संभव है कि (उपर्युक्त्त) दोष गुण रूप प्रतीत हों और कहीं यह भी संभव है कि वे न तो गुण सरीखे लगें और न दोष सरीखे।

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सप्तम उल्लास: २५३

गुणः क्चिन्न दोषो न गुणः । तत्र वैयाकरणादौ वक्तरि प्रतिपाद्ये च, रौद्रादौ च रसे व्यङ्गये कष्टत्वं गुणः । क्रमेणोदाहरणम्। (वक्तृ-वैशिष्टय से 'कष्टत्व' की गुणरूपता) दीघीङवेवीङ्समः कश्िद् गुणवृद्ध योरभाजनम्। किप्प्रत्ययनिभः कश्चिद्यत्र सन्निहिते न ते ॥ २६६ ॥ (बोद्धव्य-वैशिष्टय से 'कष्टत्व' की गुणरूपता ) यदा त्वामहमद्राक्षं पदविद्याविशारदम्। उपाध्यायं तदाऽस्मार्ष समस्प्राक्षं च सम्मदम् ॥ २६७॥ रसभावादि व्यङ्ञयाथ-चैशिष्ट्य से 'श्रुतिकटुत्व' की गुणरूपता ) अन्त्रप्रोतबृहत्कपालनलकक्रूरक्कणत्कंकण-

पीतच्छर्दित रक्तकर्दसघन प्राग्भारघोरोल्लख- द्वयालोलस्त नभारभैरववपुर्दर्पोद्धतं धावति ॥ २६८ ॥ तात्पर्य यह है कि यदि वक्ता वैयाकरण हो (व्याकरणशास्त्र का प्रगाढ विद्वान् हो या न हो अपने व्याकरण-विज्ञान के प्रदर्शन का इच्छुक हो) अथवा यदि बोद्धव्य (श्रोता) वैयाकरण हो अथवा यदि व्यङ्गयरसभाव रौद्रादि (वीर और बीभत्स)-रूप हो तब, वह दोष, जिसे 'कष्टत्व' कहते हैं, दोष नहीं, अपितु गुण माना जाया करता है। क्रमशः जैसे कि- यहाँ कोई तो ऐसा है जो 'दीघीड़' और 'वेवीङ' धातुओं के समान न तो गुण (पाण्डित्य, दान, शौर्य आदि) का पात्र है और न वृद्धि (समृद्धि-धनसम्पदा) का ही। (जैसे दीवीड़ धातु-दीधीङ् दीप्तिदेवनयो :- में 'गुण' और वेवीङ् धातु-बेवौड़ वेतिनातुल्ये-में 'वृद्धि' का 'दीघोवेवीटाम्' १.१.६-इस सूत्र से निषेध हुआ करता है वैसे ही यहाँ कुछ ऐसे लोग हैं जो पाण्डित्यादिरूप गुण और धनधान्यादि रूप वृद्धि-समृद्धि के अपवाद हैं) और कोई क्विप प्रत्ययवत् ऐसा (सर्वलुप्त) है कि उसके समीप रहते किसी दूसरे में भी न तो गुण (पाण्डित्यादि रूप) ही फटक पाता है और न वृद्धि (धनादि समृद्धि ) ही फटक पाती है। (जैसे पाणिनि सूत्र 'कडिति च' से विहित 'क्विप्' प्रत्यय के योग में सवत्र गुण और वृद्धि निषिद्ध हैं वैसे ही ऐसे व्यक्ति के संयोग से अन्यत्र भी पाण्डित्यादि गुण और धन-धान्यादि वृद्धि असंभव ही है। [उपर्युद्धृत सूक्ति में यद्यपि 'कष्टत्व' स्पष्ट है किन्तु यह देखते कि यहाँ वक्ता के वैया- करण होने से और उसकी व्याकरणसम्बन्धी व्युत्पत्ति की प्रतीति होने से सहृदय पाठक उद्विग्न नहीं होते, इसे दोप के बदले, गुण ही मानना ठीक है।] 'जब मैंने शब्दानुशासनशास्त्रनिष्णात आप का दर्शन किया तब वस्तुतः मुझे अपने उपाध्याय की ही स्मृति हो आयी और एक अपूर्व आनन्द मिलने लगा। [यहाँ भी जो 'कष्टत्व' है वह वस्तुतः, इस वचन के एक महावैयाकरण के प्रति निर्दिष्ट होने से किसी प्रकार का उद्ेग नहीं उत्पन्न करता और इसलिए इसे दोष भी नहीं माना जा सकता।] 'यह कौन है जो अँतडियों में पिरोयी बड़ी-बड़ी खोपड़ियों और जाँघ की हड्डयों के बने, भयङ्कर रूप से खनखनाते कंगनों और ऐसे ही दूसरे नाना प्रकार के गहनों की विक- राल ध्वनि से आकाश-मण्डल को प्रतिध्वनित करती हुई और पी-पीकर उगले गये रक्त के कीचड़ में सने शरीर के ऊपरी भाग पर डरावने से दिखाई पड़ने वाले, लम्बेलम्ब

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२५४ काव्यप्रकाश:

(वाच्य की महिमा से 'कष्टत्व' का गुणभाव ) वाच्यवशादथा- मातङगा: ! किमु वल्गितः किमफलैराडम्बरैर्जम्बुकाः! सारङ्ा! महिषा ! मदं ब्रजथ कि शून्येषु शूरा न के।

सिन्धुध्वानिनि हुङ्कृते स्फुरति यत्तद्वर्जितं गर्जितम्॥ २६६॥ अत्र सिंहे वाच्ये परुषा: शब्दाः । (प्रकरण की महिमा से कष्टत्व' का गुणभाव ) प्रकर णवशादथा- रक्ताशोक ! कृशोदरी क्व नु गता त्यक्त्वानुरक्तं जनं नो दृष्टेति मुधैव चालयसि किं वातावघूतं शिर:। उत्कण्ठाघट मनषट् पद्घटासङ्गटटृदष्टच्छद- स्तत्पादाहतिमन्तरेण भवतः पुष्पोद्रमोऽयं कुतः ॥ ३८० ॥ अत्र शिरोधूननेन कुपितस्य वचसि। (रसभावादि-राहित्य में दोष को न तो दोष होना और न गुण होना ) (शब्दचित्र से 'कष्टत्व' का दोष-गुणाभाव) क्वचिन्नीरसे न गुणो न दोषः। यथा- लटकते, हिलते-डुलते स्तनों के बोझ से भयक्कर लगती हुई, बड़े घमण्ड से, विकट रूप से, दौड़ती चली आरही है।' [यहाँ, भवभूतिकृत महावीरचरित-१म अङ्क की इस सूक्ति में, 'श्रुतिकटुत्व' स्पष्ट है किन्तु वीभत्स रस के व्यङ्गय रहने से इसे दोष कहना तो दूर रहे गुण ही मानना पड़ता है। ] वाच्य के औचित्य से 'कषत्व' के गुण भाव का उदाहरण-'अरे गजराजगण! तुम्हारे गर्जन से क्या! अरे शगालों के झुण्ड ! तुम्हारे व्यर्थ के चिल्लाने से क्या! अरे मृग- समूह और महिपवृन्द ! तुम्हारे उन्मत्त प्रलाप से क्या! अरे, जहाँ कोई वलिष्ठ न हो वहाँ तो सभी शूर हुआ करते हैं ! अरे वही गर्जन तो गर्जन है जो क्रोधोद्रेक से विकटा- कार केंसर-कलाप वाले, समुद्र से गम्भीर निनाद वाले, मातङ्ग-विनाशी सिंह के सामने किया जाय !' यहाँ सिंह रूप वाच्य के औचित्य से सिंह वर्णन में प्रयुक्त समासबहुल विकट वर्णों में 'कष्टत्व' कोई दोष नहीं अपि तु गुण है। प्रकरण के औचित्य से 'कष्टत्व' के गुणभाव का उदाहरण- 'अरे रचाशोक! मुझ स्निग्धजन को छोड़, बता वह कृशोदरी सुन्दरी किधर चली गयी ! क्या वायु-वेग से काँपते सिर से तुमने यों ही कह दिया कि तुझे वह दीख न पड़ी! अरे बिना उसके पादाघात के तुम्हारे ये फूल, जिनकी पंखुड़ियाँ ललचाये भौंरों के झुण्ड के झुण्ड के टूट पड़ने से टूट टूट कर गिरती-पड़ती दिखाई दे रही हैं, कहाँ से निकल पड़े?' यहाँ (विप्रलम्भ शृङ्गाररूप मुख्य रस की व्यक्षकता की दृष्टि से अनुचित भी) जो चिकट वर्ण-विन्यास है वह दोप नहीं अपि तु ( रक्ताशोक के) शिरोधूनन से उत्पन्न (विरही वक्ता के) क्रोध के प्रकाशक होने से गुण ही है (क्योंकि अङ्गभूत कोप के प्रकर्ष में अङ्गी रूप से अवस्थित चिप्रलम्भ भी प्रकृष्ट रूप से ही व्यक्त हो रहा है)। रस-शून्य सन्दर्भ के लिये 'दोष' न तो कोई दोष है और न गुण! जैसे कि (मयूरकृत सूर्यशतक की यह स्तव-सूक्ति) :-

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सप्तम उल्लास: २५५

दीर्घाघ्रातानघौघैः पुनरपि घटयत्येक उल्लाघयन् यः। घर्माशोस्तस्य वोऽन्तर्द्विगुणघनघृणानिध्ननिर्विघ्नवृत्ते- दत्तार्घाः सिद्धसङघैर्विदधतु घृणयः शौघ्रमंहोविघातम्॥ ३०१॥ (श्लेषादि में 'अरप्रयुक्त' तथा 'निहृतार्थ' की अरपरदोषता) अप्रयुक्तनिहतार्थौ श्लेषादावदुष्टौ। यथा- देन ध्वस्तमनोभवेन बलिजित्कायः पुरा स्त्रीकृतो यश्च्ोद्वृत्तभुजङ्गहारवलयो गंगां च योऽघारयत्। यस्याहु: शशिमच्छिरोहर इति स्तुत्यं च नामामराः पायात्स स्वयमन्धकक्षयकरस्त्वां सर्वदोमाधवः ॥ ३०२ ॥ 'उन उप्णकिरण भगवान् भास्कर की, जो अपने हृदय में भरपूर पड़ी कृपा के द्वारा प्राणिमात्र के विध्न-विनाश में निरन्तर निरत रहा करते हैं, जो गले हुये नाकों और पैरों और हाथों वाले, घावों से घृणाजनक अङ्गप्रत्यङ्गों वाले, घर्घर शब्द से भरे कण्ठों वाले और पाप-संताप-संघात से भयङ्कर रूप से घिरे हुये कुष्ठग्रस्त लोगों को नीरोग कर सुन्दर बनाया करते हैं, वे किरणें, जिनकी सिद्धसङ्गों द्वारा सदा अर्चा-पूजा हुआ करती है, शीघ्र हमआप सबके पाप का नाश करें।, [ जहाँ, कवि का हृदय एकमात्र शब्द-चित्रण में रम रहा है, जो भी 'कष्टत्व' है उसमें न तो कोई दोष है (क्योंकि जब रस विवत्तित नहीं तो अपकर्ष किसका !) और न कोई गुण (क्योंकि अनुप्रास-मात्र के संपादक होने से विकट वणों में गुणव्यञ्जकता कैसी!)। श्लेषादि-बन्ध में 'अप्रयुक्तत्व' और 'निहतार्थत्व' कोई दोष नहीं। जैसे कि- (विष्णु-पक्ष में ) वे 'माधव' (मा लच्मीस्तस्याः धवः पतिः) लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु, 'येन अनः ध्वस्तम्' जो शकट (शकटासुर) का विध्वंस कर चुके हैं, 'येन अभवेन' 'वलिजित्कायः पुरास्त्रीकृतः' जो अजन्मा होते हुये भी मोहिनी रूप में वलिदैत्यविजयी शरीर प्रकट कर चुके हैं, 'यश्रोद्वृत्तभुजंगहा'-जो दुराचार कालियनाग का वध कर चुके हैं, 'रवलयः' जो नामरूपात्मक जगत के अवसान हैं, 'यः अगं गाञ्ज अधारयत्'-जो (कृष्णरूप में) गोवर्धन पर्वत का उत्तोलन और (वराह-रूपमें) वसुन्धरा का संरक्षण कर चुके हैं, 'अमराः यस्य शशिमच्छिरोहर इति स्तुत्यं नाम आहुः जो देवों के द्वारा शशिमथन-राहु के मस्तक- निकृन्तक रूप से सदा पूजनीय रहा करते हैं, 'स्वयमन्धकक्षयकरः जो यादवों की वास- भूमि (द्वारका) के निर्माता हो चुके हैं और जो 'सर्वद' चतुर्वरग के प्रदाता हैं, स्वयं साक्तात् तुम्हारी रक्षा करते रहें।'

'वे 'उसाधव' पार्वतीपति भगवान् शङ्कर 'येन ध्वस्तमनोभवेन पुरा वलिजित्कायः (शिव-पक्ष में)

अस्त्रीकृतः' जो मन्मथमर्दन हैं और त्रिपुरासुर-वध सें भगवान् विप्णु के शरीर को अपना वाण वना चुके हैं, 'यश्चोद्वृत्तभुजङ्गहारवलयः' जो भगद्वर भुजङों को हार और वलय रूप से धारण किया करते हैं, 'यश्च गङ्गामधारयत्' जो (गंगावतरण में) सस्तक पर भगवती भागीरथी को रख चुके हैं, 'यस्य शिरः शशिमत्' जो सिर पर चन्द्रकला को भूषण रूप से बैठाये रहा करते हैं, 'यस्य च नाम अमरा हर इत्याहुः' जो देवों द्वारा 'हर' इस नाम से निरन्तर पूजे जाया करते हैं, 'अन्धकक्षयकरः' जो अन्धकासुर के हन्ता हैं और 'सर्वदा' सदा स्वयं सात्षात् तुम्हारा कल्याण करते रहें।'

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२५६ काव्यप्रकाश:

अत्र माधवपच्े शशिमदन्धकक्षयशबदावप्रयुक्तनिहतार्थी। ('अश्लीलत्व' का यथासम्भव गुणभाव ) अश्लीलं क्वचिद् गुणः । यथा सुरतारम्भगोप्ठयान्, 'द्वयर्थैः पदैः पिशुनयेच्च रहस्यवस्तु' इति कामशास्त्रस्थितौ- (वाक्यगत व्रीडाव्यजजक 'अश्लीलत्व' की गुणरूपता ) करिहस्तेन सम्बाधे प्रविश्यान्तर्विलोडिते। उपसर्पन् ध्वजः पुंसः साधनान्तविराजते ॥ ३०३॥ ( वाक्यगत जुगुप्साव्यज्जक 'अश्लीलत्व' की गुणरूपता ) शमकथासु- उत्तानोच्छूनमण्डूकपाटितोदरसन्निभे। क्लेदिनि स्त्रीव्रणे सक्तिरकृमे: कस्य जायते॥ ३०४॥ (वाक्यगत अ्ररमङ्गलव्यञ्ञक 'अरश्लीलत्व' की गुणरूपता ) निर्वाणवैरदहना: प्रशमादरीणां नन्दन्तु पाण्डुतनयाः सह माधवेन। उपर्युक्त सूक्ति में माधव (विष्णु) पक्ष में 'शशिमत्' पद, जो कि 'राहु' रूप अर्थ में 'अप्रयुक्तत्व' दोष ग्रस्त है और 'अन्धकक्षय' पद, जिसमें यादव 'वासभूमि' रूप अर्थ की दृष्टि से 'निहतार्थत्व' है वस्तुतः इसलिये दुष्ट नहीं माने जाया करते क्योंकि बिना इनके यहाँ श्लेष का निर्वाह सम्भव नहीं। 'अश्लीलत्व' भी स्थान-विशेष में गुण ही है जैसे कि रतिक्रीडा-विषयक वार्तालाप में क्योंकि कामशास्त्र की मर्यादा है कि 'रहस्य-गोपनीय कामवार्ता द्वयर्थक पर्दों द्वारा सूचित की जानी चाहिये'। उदाहरण के लिये- 'वीर पुरुष का वीरध्वज, गजघटा के शुण्डादण्डों से विलोडित तुमुल शत्रु-सेना के बीच पहुँच कर, चारों ओर फहराते हुये, कितना सुन्दर लग रहा है !' [ यहाँ वीडाव्यक्षक 'अश्लीलत्व' स्पष्ट है क्योंकि यहाँ यह अभिप्राय प्रतिपादित हो रहा है-'कामी पुरुष का लिङ्ग 'करिहस्त'-योनिशैथिल्यापादक अङ्गुलि-प्रयोग से चिलोडित रमणी के मदन मन्दिर (योनिदेश) में पहुँच कर रति-लीला करता हुआ विराजमान है।' किन्तु यहाँ सुरतगोष्ठी की वार्ता होने से और कामविषयक व्युत्पत्ति के प्रकाशन किये जाने से इसे गुण ही माना जाता है!] इसी प्रकार शम-कथा ( वैराग्यजनक वार्तालाप) में भी 'अश्लीलत्व' गुण रूप से रहा करता है जैसे कि- 'केवल कीड़े को छोड़ कर भला ऐसा और कौन है जो उलटे मरे पड़े फूले हुये' मेंढक के पेट के समान दीख पड़ने वाले, रजासाव से भरे नारी के योनिरूप फोड़े में आसक्त होना चाहे।, [ यहाँ वैराग्य-जनक घृगा के अनुभव के लिये जो जुगुप्साव्यक्षक वाक्य है उसमें 'अश्लीलत्व' दोष नहीं अपि तु गुण है] अथवा जैसे कि- 'अब, जब कि शत्रुओं (कौरवों) का कलह शान्त कर दिया जायगा, शत्रुता की आग बुझाये पाण्डव तो कृष्ण के साथ आनन्द करेगे और अनुचर परिचर-समेत कुरु-पुत्रगण (दुर्योधन आदि) प्रजाजन को अनुरक्तऔर वशंवद बनाये, पारस्परिक वैर-विरोध दूर

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सप्रम उल्लास: २५७

रक्तप्रसाधितभुव: क्षतविग्रहाश्र् स्वस्था भवन्तु कुरुराजसुताः सभृत्याः।३०५॥ अत्र भाव्यमङ्गलसूचकम्। ('संदिग्धत्व' (वाक्यगत) की गुणरूपता ) सन्दिग्धमपि वाच्यमहिम्ना ककचिन्तयतार्थप्रतीतिकृत््वेन व्याजस्तुति र्यव- सायित्वे गुणः यथा- पृथकातस्वरपात्रं भूषितनिःशेषपरिजनं देव !। विलसत्करेणुगहनं सम्प्रति सममावयोः सदनम्॥ ३०६॥ ('अरप्रतीतत्व' का गुणभाव) प्रतिपाद्यप्रतिपादकयोर्ञत्वे सत्यप्रतीतत्व्रं गुणः । यथा- आत्मारमा तिहितरतयो निविकल्पे समाधौ ज्ञानोद्रेकाद्विघटित तमोग्रन्थयः सत्त्वनिष्ठाः। हटाये स्वस्थ हो जाँय।' यहाँ (वेणीसंहार १म अङ्क की इस सूक्ति में) जो 'अश्लीलत्व' है (अर्थात् 'रक्तप्रसाधितभुवः' कट-मर कर भूतल को लोहूलुहान किये 'चतविग्रहाः' टुकड़े-टुकड़े हुये अङ्गप्रत्यङ्ग वाले समृत्य कौरवगण 'स्वस्थाः भवन्तु' मर जायेंगे-इस रूप

होने से गुण है। का वाक्यार्थ) बह दोप नहीं अपि तु भावी कौरवगण-सम्बन्धी अमङ्गलाशंसन के सूचक

'संदिग्ध' भी कहीं तब गुण ही हो जाया करता है जब उसका अन्त वहाँ हुआ करता है जहाँ वाच्य (वर्णनीय विषय) शक्ति से प्रकृत अर्थ के प्रश्यायन के साथ २ व्याजस्तुति हुआ करती है। जैसे कि- 'महाराज ! (मुझे क्या चाहिये) मेरा तो सदन (घर) अब राजभवन बन रहा है! आपका राजभवन यदि 'पृथु+कार्तस्वर+पात्र' है (बड़े बड़े स्वणपात्रों से भरपूर है) तो मेरा भी 'पृथुक + आर्तस्वर + पात्र' है (भूख प्यास के मारे चिल्लाते-बिलबिलाते बचचों से भरा है), आपका राजभवन जैसे 'भूषित +निःशेष+परिजन है (आभूषणों से लदे अनुचर-परिचरों से व्याप्त है) वैसे ही मेरा भी भवन 'भू+उषित +निःशेष +परिजन' (भूमि पर ही लेटने वाले बाल-बच्चों आदि से व्याप्त है। और इतना ही क्यों? आपका राजभवन यदि विलसत्करेणु गहन' ही है (सुन्दर सुन्दर हाथी, हथिनियों से भरा है)

से धूसर है)। तो मेरा भी भवन 'विलसत्क-रेणु-गहन ही है (चिलों में डेरा-डण्डा डाले चूहों की धूल

[ यहाँ 'पृथकार्तस्वरपात्र' आदि विशेषण-पद संदिग्ध हैं क्योंकि यहाँ क्या 'पृथूनि कार्तस्वरस्य पात्राणि यत्र तत्' आदि अर्थ लिया जाय या 'पृथुकानामार्तस्वरस्य पात्रम्' आदि अर्थ लिया जाय-यह सन्देद बना हुआ है। किन्तु तब भी यहाँका 'संदिग्घत्व' दोष के बदले गुण ही है क्योंकि इसके द्वारा अन्ततोगत्वा प्रकृत नृप की ही व्याजस्तुति हो रही है जिससे कविगत नृपविषयक रतिभाव ही व्यक्त हो रहा है।] 'अप्रतीतत्व' भी तब गुण ही हुआ करता है जब कि वक्ता और श्रीता दोनों में से किसी में भी अभिप्राय की अप्रतीति की संभावना नहीं रहा करती। जैसे कि- 'यह मोहान्ध (दुर्योधन) भला उन परात्पर भगवान् कृष्ण को कैसे जान सके जिन्हें चिदानन्दैकतान, निर्विकल्प योगनिरत आत्मसाक्षात्कार से मिथ्याज्ञानजन्य संस्कार का नाश कर चुकनेवाले और एकमात्र सत्वनिष्ठ योगीजन तमोगुण और रजोगुण से सर्वंदा अस्पष्ट रूप में, अपनी नित्यविभूति में विराजमान, देखा करते हैं।' १७ का०

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२५६ काव्यप्रकाश: WWw. यं वीक्षन्ते कमपि तमसां ज्योतिषां वा परस्तात् तं मोहान्ध: कथमयममुं वेत्ति देवं पुराणम्॥ ३०७॥ स्वयं वा परामर्शे यथा- षडधिकदशनाडीच क्रमध्यस्थितात्मा हृदि विनिहितिरूप: सिद्धिदस्तद्विदां यः । अविचलितमनोभिः साधकर्मृग्यमाण: स जयति परिणद्धः शक्तिभिः शक्तिनाथः ॥३०८॥ ('ग्राम्यत्व' की गुणरपता ) अधमप्रकृत्युक्तिषु ग्राम्यो गुणः । यथा- फुल्लुक्करं कलमकूरणिहं वहन्ति जे सिन्धुवारविडवा मह वल्लहादे। जे गालिदस्स महिसीदहिणो सरिच्छा दे किं च मुद्धविअइल्लपसूणपुक्जा।। ३०६॥ (पुष्पोत्करं कलमभत्तनिभं वहन्ति ये सिन्धुवारचिटपा मम चल्लभास्ते। ये गालितस्य महिषीदघ्नः सदृक्षा- स्ते किश् मुग्ध विचकिलप्रसृनपुंजाः ॥ ३०९॥) [ यहाँ (वेणीसंहार १म अङ्क की इस सूक्ति में) 'निर्विकल्प' आदि पद योगशास्त्र के परिभाषिक पद होने से सर्वसाधारण के लिये अप्रतीत हैं किन्तु भीम और सहदेव के लिये जो कि यहाँ वक्ता और श्रता हैं और योगशास्त्रमर्मज्ञ हैं, इनमें 'अप्रतीतत्व' कहाँ? और इसी लिये सहृदय सामाजिक भी, साधारणीकरण की महिमा से, यहां रस-प्रतीति किया ही करते हैं।] इसी प्रकार वक्ता के 'स्वयं परामर्श'-'तत्वपर्यालोचन' में भी 'अप्रनीतत्व' दोप के बदले, गुण ही हुआ करता है।? जैसे कि- 'वही ज्ञान, इच्छा और कृति शक्ति से खचित 'शक्तिनाथ'-'पार्वतीपति महादेव' सबसे बड़े, सर्वत्र विराजमान हैं जो पोडशनाडी चक्र (इडा, पिङ्गला, सुपुग्ना, अपराजिता, गान्धारी, हस्तिजिह्वा, पूपा, अलम्बुपा, कुहू, शङ्गिनी, तालुजिह्वा, हमजिह्वा, विजया, कामदा, अमृता, और बहुला-इन सोलह नाडियों के मण्डल से बने मणिपूर नामक चक्र) के मध्य में आत्मतत्व रूप से अवस्थित हैं, जिनका ज्योतिर्मयस्वरूप हृदय में निरन्तर विद्यमान है जो इस रहस्य के जानने वालों के लिये आठों सिद्धिओं के प्रदाता हैं और जो कि विषयान्तरव्यावृत्तचित्त वाले साधकों के अनुसंधान के चिषय हैं।' [यहां मालतीमाधव, पञ्चम अङ्क की इस सूक्ति में आगममात्र प्रसिद्ध भी नाडीचक्र आदि पद 'अग्रतीतत्व' दोष ग्रस्त नहीं अपितु गुण ही हैं क्योंकि यहां योगिनी कपाल- कुण्डला इनके प्रतिपाद्य विपयों का स्वयं पर्यालोचन करती उपस्थित की गयी है।] अधमप्रकृति अर्थात् चिट-चेट-विदूपक आदि नीच पात्रों की उक्तियों में 'ग्राम्यत्व' भी गुण ही हुआ करता है। जैसे कि- 'सिन्धुवार के वे पौधे मुझे बड़े सुन्दर लगते हैं जिनपर साठी चावल के भात के समान फूलों के गुच्छे झूलते रहा करते हैं और मल्निका के वे फूल भी लुभावने लगा करते हैं जो थक्ा बांधे दही के समान दख पड़ा करते हैं।'

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सप्तम उल्लास: २५६

अत्र कलम-भक्त-महिषी-दधिशब्दा आ्रम्या अपि विदूषकोक्तौ।

न्यूनपदं क्वचिद् गुणः । यथा- ('न्यूनपदता' का गुणभाव )

गाढालिङ्गनवामनीकृत कुच प्रोद् भूतरोमोद्गमा सान्द्रस्नेहर सातिरेकविगलच्छ्रीमन्नितम्बाम्बरा। मा मा मानद माऽति मामलमिति क्षामाक्षरोल्लापिनी सुपा किं न मृता नु किं मनसि मे लीना विलीना नु किम् ॥३१०॥ क्कचिन्न गुणो न दोषः । यथा- तिष्ठेत्कोपवशात्प्रभावपिहिता दीर्घ न सा कुप्यति स्वर्गायोत्पतिता भवेन्मयि पुनर्भावार्द्रमस्या मनः । तां हर्तुं विबुरधाद्विषोऽपि न च मे शक्ता: पुरोवर्तिनीं सा चात्यन्तमगोचरं नयनयोर्यातेति कोऽयं विधिः ॥ ३११॥ अत्र पिहितेत्यतोऽनन्तर 'नैतद्यतः' इत्येतै्न्यूनैः पदैविशेषबुद्धेरकरणान्न गुणः । उत्तरा प्रतिपत्तिः पूर्वा प्रतिपत्ति बाधते इति न दोषः । यहां (राजशेखरकृत कर्पूरमञ्जरी के प्रथम जवनिकान्तर की इस सूक्ति में) 'कलम- भक्त' और 'महिषीद्धि' शब्द यद्यपि ग्राम्य हैं किन्तु विदूषक की उक्ति होने से इनमें 'ग्राम्यत्व' दोष नहीं अपि तु (हास्यपरिपोषकता के कारण) गुण ही हो रहा है। 'न्यूनपदता' भी कहींकहीं गुण ही है जैसे कि-'गाढालिङ्गन से दबे स्तनयुग वाली, आनन्द के रोमाञ्जों से भरी, सान्द्र प्रणयानन्द के उद्ेक के कारण सुन्दर नितम्ब से गिरे पड़े परिधान वाली और अस्पष्ट सुग्ध शब्दों में 'प्रियतम ! बस करो, अब रहने दो' इत्यादि बोलती हुई वह सुन्दरी, पता नहीं उस समय नींद लेने लगी या सदा के लिये सोने लगी या मेरे मन में लीन होने लगी या मुझमें बिलकुल घुल-मिल गयी !' यहाँ (अमरुकशतक की इस सूक्ति में) 'मा-मा' (नहीं, नहीं) इस स्थान पर 'आयासय' (तंग करो) और 'माति' (अधिक नहीं) इस स्थान पर 'पीडय' (दुःख दो) ये पद जो अपेक्षित थे, नहीं हैं, किन्तु इनका यहां न होना ही अच्छा है क्योंकि तभी तो यहां नायिका के आनन्द-संमोह के आधिक्य की अभिव्यक्ति हो रही है। कहीं ऐसा भी है कि 'न्यूनपदता' न तो गुण हो और न दोष ही। जैसे कि- 'क्या ऐसा तो नहीं कि अप्सरा होने के कारण मेरी प्यारी उरवशी क्रोध में आकर यहीं कहीं अन्तर्हित हो गयी हो? किन्तु ऐसा भला कैसे ! बहुत देर तक तो उसने कभी मुझ पर क्रोध किया नहीं! तब क्या स्वर्ग में जाने के लिये ऊपर उड़ गयी? किन्तु ऐसा कैसे ! उसका मन तो निरन्तर मुझ में रमना चाहता है ! भला मेरे सामने दानवों की भी क्या शक्ति जो उसे हरण कर ले जाँय ! किन्तु वह तो कहीं दिखायी नहीं पड़ती! अरे भगवान् ! यह सब क्या हो गया! क्या होने को है!' यहां (विक्रमोर्वशीय के चतुर्थ अंक की इस सूक्ति में) 'तिष्टेत् कोपवशात् प्रभाव- पिहिता' इसके बाद 'नैतद् यतः' (ऐसा नहीं? क्योंकि) ये पद न्यून हैं (और इसी प्रकार 'स्वर्गायोत्पतिता भवेत्' के बाद भी 'नैतद् यतः' यहपद, जो अपेक्षित है, नहीं है) किन्तु इनकी न्यूनता यहां कोई गुण नहीं क्योंकि इनके द्वारा, यहां जो वितर्क विवत्तित है उसमें, कोई विशेषता नहीं उत्पन्न की जाती। किन्तु ऐसा भी नहीं कि इन पदों की न्यूनता यहाँ दोष हो क्योंकि यहां जो उत्तरभाविनी प्रतीति है (अर्थात 'दीर्घ न सा

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२६० काव्यप्रकाश:

('अररधिकपदता' की गुणरूपता ) अधिकपदं क्वचिद् गुणः । यथा- यद्वञ्च्वनाहित मतिर्बहुचाटुगर्भ कार्योन्मुखः खलजनः कृतकं व्रवीति। तत्साधवो न न विदन्ति विदन्ति किन्तु कर्तु वृथा प्रणयमस्य न पारयन्ति ॥ ३१२ ॥ अत्र 'विदन्ति'-इति द्वितीयमन्ययोगव्यवच्छेदपरम्। यथा वा- वद वद जितः स शत्रुर्न हतो जल्पश्च तव तवास्मीति। चित्रं चित्रमरोदीद्वा हेति परं मृते पुत्रे ।। ३१३।। इत्येवमादौ हर्षभयादियुक्ते वर्क्तारे। ('कथितपदता' का गुणरूप से रहना ) कथितपदं क्वचिद् गुण: लाटानुप्रासे अर्थान्तरसंक्रमितवाच्ये विहितस्यानु वाद्यत्वे च । क्रमेणोदाहरणम्।

कुप्यति' और 'मयि पुनर्भावार्दमस्या मनः' की प्रतीति) उसके द्वारा पूर्वभाविनी प्रतीति (अर्थात् 'तिष्ठेत् कोपवशात् प्रभावपिहिता' और 'स्वर्गायोत्पतिता भवेत्' की प्रतीति) स्वयं ही (बिना 'नैतद् यतः' इस निषेधपरक पद के उपादान के ही) बाधित दिखायी दे रही है। (तात्पर्य यह है कि जब 'दीघ न सा कुप्यति' अथवा 'मयि पुनर्भावार्द्रमस्या मनः' की उक्ति से ही 'तिष्ठत् कोपवशात् प्रभावपिहिता' अथवा' स्वर्गायोत्पपिता भवेत्' का निषेध वाच्यवत् प्रतीत हो रहा है तब "नैतद् यतः' (ऐसा नहीं, क्योंकि) इन पदों के न होने पर भी हानि क्या ?) कहीं-कहीं 'अधिकपदता' भी गुण है जैसे कि- 'अपने स्वार्थसाधन में लगे किंवा प्रतारण में दत्तचित्त दुष्ट लोग जो चाटुकारिता की बातें बनाया करते हैं उन्हें, ऐसा नहीं कि भले लोग न समझते हों, वे समझते सब कुछ हैं, किन्तु कुछ करते इसलिये नहीं कि प्रेम, चाहे बनावटी क्यों न हो, है तो प्रेम ही!' यहां 'न न विदन्ति' के बाद भी जो 'विदन्ति' पद प्रयुक्त किया गया उसमें 'अधिकपदता' का दोष भी गुण ही है क्योंकि इसके द्वारा यहां अन्ययोग व्यवच्छेदरूप' (अर्थात् स्वयं अनुभव करने के अभिप्राय के अतिरिक्त दूसरों को कहने-सुनाने के अभिप्राय के व्यावर्त्तनरूप) एक विशेष अभिप्राय की प्रतीति हो रही है। अथवा जैसे कि- 'बोलो, बोलो क्या वह शत्रु हारा या नहीं? 'तुम्हारी, तुम्हारी शरण में हूं' ऐसा बोलते हुये उसे छोड़ दिया! किन्तु वह अपने पुत्र के मारे जाने पर 'हाय !' हाय !' करके, बुरी-बुरी तरह रोने-बिलखने लगा।' यहां 'वद वद जितः स गत्रु' में हर्ष, 'तव तवास्मीति में भय, 'चित्रं चित्रमरोदीत्' में विस्मय और 'हा हेति' में विषाद से व्याप्त हृदय वक्ता के होने से अधिकपद्ता भी गुण ही है दोप नहीं। 'कथितपदता' भी कहीं-कहीं गुण ही है जैसे कि लाटानुप्रास में (क्योंकि तभी लाटानुप्रास का निर्वाह संभव है), अर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनि में (क्योंकि इसके द्वारा विशेषाभिप्राय की अभिव्यक्ति अभिग्रेत रहा करती है) और पूर्ववाक्य के विधेय के उत्तर वाक्य में अनुवादरूप से रहने में (क्योंकि तभी अभिमत अभिप्राय का निर्वाह हो सकता है)। क्रमशः उदाहरण ये हैं :- 必 $ ッ ド

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सप्तम उल्लास: २६१

(लाटानुप्रास में) सितकरकररुचिरविभा विभाकराकार ! धरणिघर ! कीर्तिः। पौरुषकमला कमला सापि तवैवास्ति नान्यस्य ।। ३१४॥ (अर्थान्तरसंक्रमित-वाच्यध्वनि में ) ताला जाअंति गुणा जाला दे सहिअएहिं घेप्पन्ति। रइकिरणणुग्गहिआइँ होन्ति कमलाइँ कमलाइँ॥ ३१५॥ तदा जायन्ते गुणा यदा ते सहृदयैगृह्न्ते। रविकिरणानुगृहीतानि भवन्ति कमलानि कमलानि ॥ (विहित के अनुवाद्यत्व में) जितेन्द्रियत्वं विनयस्य कारणं गुणप्रकर्षो विनयादवाप्यते। गुणप्रकर्षेण जनोऽनुरज्यते जनानुरागप्रभवा हि सम्पदः ॥ ३१६ ॥ (पतत्प्रकर्षता की गुणरूपता ) उदाहते 'प्रागप्राप्ते'त्यादौ ॥ ३१७ ॥ ('समाप्तपुनरात्तता' का अर्प्रपवाद ) पतत्प्रकर्षमपि क्वचिद् गुणः । यथा- 'हे 'विभाकराकार' -सूर्य सदृश प्रतापी ! 'धरणिधर' महाराज! आपकी कीर्ति वस्तुतः 'सितकरकररुचिरविभा' चन्द्रमा की किरणों की भाँति आह्लादजनक कान्ति वाली है और आपकी 'पौरुषकमला' पराक्रमलच्मी तथा 'कमला' राजलच्मी दोनों ऐसी हैं जो किसी दूसरे की नहीं।' (यहाँ 'कर कर' 'विभा विभा' 'कमला कमला' इत्यादि में जो लाटानुप्रास है उसके निर्वाहकरूप से 'कथितपदता' को गुण ही कहा जायगा।) 'गुण तो तभी गुण हैं जब उन्हें सहृदय अपने में आधान करें, उनका सर्म समझें। वे ही कमल वस्तुतः कमल हैं जिन्हें सूर्य-किरण की कृपा प्राप्त है।' (यहाँ 'कमलानि कमलानि' में कथितपदता स्पष्ट है किन्तु दूसरा 'कमलानि' पद असाधारण सौन्दर्य का व्यक्षक होने से अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य है जो कि बिना 'कथितपदता' के सम्भव नहीं। इसलिये यहाँ 'कथितपदता' गुण है दोष नहीं।) 'जितेन्द्रियता तो कारण है नम्रता का और नम्रता कारण है गुण-महिमा का। गुण-महिमा से ही लोगों का प्रेम प्राप्त होता है और लोगों के प्रेम प्राघ होने से सारी संपदा प्राप्त होती है।' (यहाँ पूर्व वाक्य में जो विहित है वह उत्तर वाक्य में अनुवाद्यरूप से उपात्त है अर्थात् पूर्व वाक्य में 'जितेन्द्रियता' के कारणरूप से जिस नम्रता को विधेयरूप से रखा गया उसे ही उत्तर वाक्य में गुणमहिमा के कारण भाव से अनुवाद्य (उद्देश्य) रूप से उपस्थित किया गया और यह सब इसलिये जिससे यहाँ जो 'कारणमाला' अलंकार है उसकी रूप रेखा निखर जाय। इस प्रकार यहाँ 'कथितपदता' अपेक्षित होने से गुण है न कि कोई दोष।) 'पतत्प्रकर्षता' भी कहींकहीं गुण ही है जैसे कि पहले उदाहरण रूप से उद्ष्टत 'प्रागप्राप्तनिशुम्भशांभ वधनुद्वेधाविधाविर्भवत्' आदि सूकि में (यहाँ चतुर्थपाद में भगवान् शङ्कर की, गुरुरूप से स्मृति में, क्रोधभाव के न होने से, मसृणपद्बन्ध में जो 'पतम्प्र० कर्षता' है वह गुण ही है दोष नहीं।)

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२६२ काव्यप्रकाश: 3 समाप्तपुनरात्तं क्वचिन्न गुणो न दोषः । यत्र न विशेषणमात्रदानार्थ पुन- रप्रहणम् अपि तु वाक्यान्तरमेव क्रियते। यथा अत्रैव 'प्रागप्राप्तेत्यादौ'॥३१८॥ ('अस्थानस्थसमासता' की गुणरूपता ) अपदस्थसमासं क्वचिद् गुणः। यथा-उंदाहते 'रक्ताशोके'त्यादौ ॥३१६॥

गर्भितं तथव यथा- ('गर्भितत्व' की गुणरूपता )

हुभि अवहत्थिअरेहो णिरङ्कसो अह विवेअरहिओ वि। सिविखो वि तुमम्मि पुणो पत्तिहि भत्तिं ण पसुमरामि ॥ ३२०॥ भवाम्यपहस्तितरेखो निरङ्कुशोऽथ विवेकरहितोऽपि। स्वप्नेपि त्वयि पुनः प्रतीहि भक्ति न प्रस्मरामि॥ अत्र प्रतीहीति मध्ये दृन्नप्रत्ययोत्पादनाय। एवमन्यदपि लक्ष्याल्लच्ष्यम्। (रस-दोष ) (८२) व्यभिचारिरसस्थायिभावानां शब्दवाच्यता। कष्टकल्पनया व्यक्तिरनुभावविभावयोः ॥६० ॥ 'समाप्नपुनरात्तता' भी कहीं ऐसा होता है कि न तो कोई दोष हो और न गुण ही बने और ऐसा वहाँ संभव है जहाँ पूर्वसमाप्त का पुनः ग्रहण विशेषण-मात्र के देने के लिये नहीं अपि तु एक सवथा भिन्न वाक्य की रचना के लिये हो। जैसे कि इसी 'प्रागप्राप्तनिशुंभशांभ वधनुरद्वेधाविधाविर्भवत्' आदि सूक्ति में (जहाँ 'येनानेन जगत्सु खण्डपरशुदेवो हरः ख्याप्यते' में जो 'समाप्तपुनरात्तता' है उसमें दोष इसलिये नहीं क्योंकि यह एक भिन्न वाक्य है न कि पूर्व-समाप्त विषय का, एक प्रकार का, विशेषण रूप से पुनः उपादान। किन्तु ऐसा भी नहीं कि इसे यहाँ गुण मान लें क्योंकि इसके द्वारा किसी विशेष अभिग्राय की प्रतीति होती नहीं दिखायी देती।) 'अस्थानस्थसमासता' भी कहीं कहीं गुण है जैसे कि पूर्वोदाहृत 'रक्ताशोक कृशोदरी क्व नु गता' इत्यादि सूक्ति में (जहाँ शङ्गार में अनुचित भी दीर्घ समास-बन्ध करोधोन्माद के परिपोषक होने से दोष नहीं अपि तु गुण रूप से अवस्थित है)। 'गर्भितत्व' भी कहींकहीं गुण ही है जैसे कि-'महाराज! चाहे कभी मैं निर्मर्याद हो जाऊँ, उच्छङ्गल बन जाऊँ या विवेकशून्य लगा करूं किन्तु स्वप्न में भी, ETHE km ऐसा निश्चय जान रखिये, देसा नहीं हो सकता कि आप की भक्ति भूल बैहूँ।' यहाँ (आनन्दवर्धनाचार्य की 'विषमबाणलीला' में काम के प्रति यौवन की इस उक्ति में) जो एक वाक्य के बीच में ही 'प्रतीहि' (जान रखिये) यह दूसरा वाक्य पड़ा है उसमें 'गर्भितत्व' तो अवश्य है किन्तु इसमें दूषकता नहीं अपि तु भूषकता है क्योंकि इसके द्वारा 'दृढप्रत्यायन' रूप अभिप्रायविशेष की प्रतीति हुआ करती है जो कि यहाँ विवच्ित है। इसी प्रकार अन्य दोषों की भी गुणरूपता अथवा अकिञ्ञचित्करता काव्य-साहित्य में यथासंभव स्वयं समझ लेनी चाहिये। ये दोष हैं रस के दोष- ९. व्यमिचारिमावों, रसों और स्थायिभावों की स्वशब्दवाच्यता, २. अनुमावों और विमावों की अभिव्यक्ति में कष्टकल्पना ३. प्रकतरस के विर्द्ू विमाव-अनुभाव और व्यमिचारिभाव की वर्णना 8. अक्गभून रस की पुनः पुनः दीक्षि ५. अनवसर में रस-वणना

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सप्तम उल्लास: २६३

ग्रतिकूलविभावादिग्रहो दीप्तिः पुनः पुनः । अकाण्डे प्रथनच्छेदौ अङ्गस्याप्यतिविस्तृतिः ॥ ६१॥ अङ्गिनोऽननुसन्धानं प्रकृतीनां विपर्ययः । अनङ्गस्याभिधानं च रसे दोषा: स्युरीदृशाः ॥६२॥ ( १. व्यभिचारिभावादि की स्वशव्दवाच्यता ) (क-व्यभिचारिभाव की स्वशब्दवाच्यता) स्वशब्दोपादानं व्यभिचारिणो यथा- सव्रीडा दयितानने सकरुणा मातङ्गचर्माम्बरे सत्रासा भुजगे सविस्मयरसा चन्द्रेऽमृतस्यन्दिनि। सेर्ष्या जहुसुतावलोकनविधौ दीना कपालोदरे पार्वत्या नवसङ्गमप्रणयिनी दृष्टिः शिवायाऽस्तु वः ॥३२१॥ अत्र व्रीडादीनाम्। व्यानम्रा दयितानने मुकुलिता मातङ्गचर्माम्बरे सोत्कम्पा भुजगे निमेषरहिता चन्द्रेऽमृतस्यन्दिनि। मीलद्भ्रू: सुरसिन्धुदशनविधौ म्लाना कपालोदरे, इत्यादि तु युक्तम्।

६. अनवसर में रस-विच्छेद ७. अप्रधान (प्रतिनायक आदि रसवर्णना के उपकरणों) का अत्यन्त विस्तृत वर्णन ८. प्रधान (रस-वर्णना के मुख्य उपकरणों) का विस्मरण ९ .. प्रकृति-गत औचित्य के प्रतिकूल वर्णन और १०. रस के अनुपकारक का वर्णन।

दोष है। जैसे कि- व्यभिचारिभाव के पारिभाषिक शब्दों द्वारा व्यभिचारी भाव का वर्णन भी रस का

'भगवती पार्वती की वह दृष्टि, जो कि प्रियतम शिव के सममुख वीडा से भरी, उनके गजचर्म के परिधान के सामने करुणा से भरी, उनके आभूषणभूत सर्प के दर्शन में त्रास- युक, उनके सुधास्यन्दी शेखररूप चन्द्र के दर्शन में विस्मय रस में पगी, उनके जटाजूट पर बैठी जाह्नवी के आगे ईर्ष्या से कलुषित उनके हाररूप मुण्डमाल को देखते दैन्य टपकाती और उनसे नवमिलन में प्रणयमयी रहा करती है, आप सबका कल्याण करती रहें।' यहाँ 'ब्रीडा आदि व्यभि चारिभावों का उनके पारिभाषिक संज्ञापदों से जो अभिधान है वह एक रस-दोष है (क्योंकि इन संज्ञा-पदों से रसानुभव का सम्बन्ध कहाँ ? वस्तुतः बात तो यह है कि इन पारिभाषिक संज्ञा-पदों के एक के वाद एक सुनने से मन तो व्यभिचारिभावों के नाम-स्मरण में लग जाता है और इनकी जो भी अभिव्यक्षना है वह स्फुरित नहीं हो पाती और जब यह स्फुरित न हो तो रस-प्रतीति का विघात तो हुआ ही हुआ है)। किन्तु यहीं यदि यह पाठान्तर कर दें- 'व्यानम्रा दयितानने मुकुलिता मातङ्चर्माम्बरे। सोत्कम्पा भुजगे निमेषरहिता चन्द्रेऽमृतस्यन्दिनि॥ मीलद्भ्र: सुरसिन्धुदर्शनविधौ म्लाना कपालोदरे। पार्वत्या नवसंगमप्रणयिनी दृष्टि: शिवायास्तु वः॥' तो (यह रस-दोष नष्ट हो जाय और) सब ठीक हो जाय !

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२६४ काव्यप्रकाश:

(ख-रस की स्वश्दवाच्यता) रसस्य स्वशब्देन शृङ्गारादिशब्देन वा वाच्यत्वम्। क्रमेणोदाहरणम्- (सामान्यतः रस शब्द द्वारा रस का अरपभिधान ) तामनङ्गजयमङ्गलश्रियं किव्दुच्चभुजमूललोकिताम्। नेत्रयोः कृतवतोऽस्य गोचरे कोप्यजायत रसो निरन्तरः ॥ ३२२॥ (विशेषतः शज्गारादि शब्द द्वारा रस का अर्भिधान) आलोक्य कोमलकपोलतलाभिषिक्त- व्यक्तानुरागसुभगामभिराममूर्तिम्। पश्यैष बाल्यमतिवृत्य विवर्तमान: शृङ्गारसीमनि तरङ्गितमातनोति ॥३२३ ॥

स्थायिनो यथा (ग-स्थायिभावों की स्वशब्द-वाच्यता)

सम्प्रहारे प्रहरणै प्रहाराणाम्परस्परम्। ठणत्कारैः श्रुतिगतैरुत्साहस्तस्य कोऽप्यभूत् ॥ ३२४॥

रस का सामान्यतः अपने वाचक शब्द द्वारा अथवा विशेषतः शंगारादि शब्द द्वारा अभिधान भी रस का दोष है। जैसे कि क्रमशः- 'कामसम्बन्धी विजय की मङ्गल-लचमी किंवा कुछ-कुछ उठी अपनी भुजाओं के मूल-देश (कुच-सन्धि-देश) को दिखा देने वाली उस सुन्दरी को, आँखों में बसाते ही, जो अविच्छिन्न रस (रति-रस) उत्पन्न हुआ उसका भला वर्णन कैसे किया जाय !' [यहाँ 'रस' शब्द का जो उपादान है जिसके द्वारा शङ्गाररस की अभिव्यक्ति विवच्षित है वह एक दोष है क्योंकि इसके द्वारा आस्वाद का अपकर्ष प्रतीत होता है, उत्कर्ष नहीं। यहीं यदि 'कोऽप्यजायत विकार आन्तरः' कर दिया जाय तो उचित विभावादि के आक्षेप से शंगार की अभिव्यक्ति भी हो जाय और आस्वाद का उत्कर्ष भी बना रहे।] 'देखो, यह यौवन, इस सुन्दर रूप वाली किं वा कोमल कपोलों पर (रोमाञ्ज आदि के द्वारा) अभिव्यक्त रति-कामना से और भी सुन्दर लगने वाली, इस सुन्दरी को देख देख कर अपने बाल्यभाव का उल्लंघन करता प्रतीत हो रहा है और शङ्गार की सीमा में खेलने में निरन्तर लगा दिखायी दे रहा है।' [यहाँ यधपि यह ठीक है कि शद्गार पद के द्वारा, संभोगोचित विभावादि के आक्षेप में संभोग शद्गार अभिव्यक्त हुआ करता है किन्तु इसना तो निश्चित है कि 'शक्कार' पद इसके आस्वाद को बढ़ाने के बदले घटाने का ही काम करता है।]

ही है, जैसे कि- इसी प्रकार स्थायिभावों का भी उनके पारिभाषिक शब्दों द्वारा अभिधान रस-दोष

संग्राम में, अस्त्र-शरस्त्रों के परस्पर प्रहार से उत्पन्न झंकारों की भयद्ठर ध्वनि ने, उस शूरवीर योद्धा के हृदय में उत्साह भाव भरा, उसका वर्णन करना असंभव है। इस सूक्ति में 'उत्साह' रूप वीररस के स्थायी भाव का उसके पारिभाषिक 'उत्साह'-शब्द से अभिधान अनुचित है क्योंकि इसके द्वारा वीररस की उस्कृष्ट अभिव्यक्ति संभव नहीं (किन्तु यहीं यदि 'प्रमोदस्तस्य कोऽप्यभूत्' कर दिया जाय, तो यह दोष नहीं रह सकता)।

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सप्तम उल्लास: २६५

अत्रोत्साहस्य- ( २ अप्रनुभावादि की अर्प्रभिव्यक्ति में कष्टकल्पना ) (४) कर्पूरधूलिधवलद् युतिपूरधौत- दिङाण्डले शिशिररोचिषि तस्य यूनः ।

व्यक्तस्तनोन्नतिरभून्नवयौवनां सा ॥ ३२५॥ अत्रोद्दीपनालम्बनरूपा: शृङ्गारयोग्या विभावा अनुभावपर्यवसायिनः स्थिता इति कष्टकल्पना। (ख-विभाव की कष्टसाध्य अभिव्यक्ति ) (५ ) परिहरति रति मति लुनीते स्खलति भृशं परिवर्तते च भूय: । इति बत विषमा दशाऽस्य देहं परिभवति प्रसभं किमत्र कुमः ॥ ३२६ ॥ अत्र रतिपरिहारादीनामनुभावानां करुणादावपि सम्भवत्कमिनीयरूपो वि भावो यत्नतः प्रतिपाद्यः । ( ३ प्रकृत रस-विरुद्ध विभावादि वर्णना ) (क-प्रकृतरस-विरुद्ध विभाव तथा व्यभिचारिभाव की वर्णना ) (६) प्रसादे वर्तस्व प्रकटय मुदं संत्यज रुषं प्रिये। शुष्यन्त्यङ्गान्यमृतमिव ते सिञ्वतु वचः । (अनुभाव की कष्टकल्पना से अभिव्यक्ति भी रस का एक दोष है जैसे कि)- 'जब कि शिशिरकिरण चन्द्रमा ने अपनी कर्पूर-धूलि सी धवल चन्द्रिका से सारी दिशाओं को धो-पोंछ कर निर्मल बना दिया, तब वह नवयुवती, अपने शिरोशुक के एक विचित्र ढंग से संभालने में, अपने उन्नत उरोजों को दिखाती हुई, उस युवा-प्रेमी के नेत्रों की गोचर-भूमि में आ विराजी (दिखाई पढ़ी)। यहाँ अनुभाव की जो अभिव्यक्ति है वह अविलम्ब नहीं अपि तु कष्टकल्पनापूर्वक है क्योंकि यहाँ संभोगशृङ्गारोचित चन्द्र-चन्द्रिका-रूप उद्दीपन विभाव और नवयुवती-रूप आलम्बन विभाव दोनों होते हुये भी ऐसे हैं जो स्तम्भ स्वेदादि रूप (नायकगत) अनुभाव के अनायास अभिव्यञ्जक नहीं हो पाते! (विभाव की कष्ट कल्पना से अभिव्यक्ति भी रस-दोष ही है। जैसे कि)- 'यह विरह की दशा इस युवा-प्रेमी की देह की ऐसी दुर्दशा कर रही है कि न तो इसमें किसी वस्तु के लिये कोई रुचि रह गयी है, न यह किसी वस्तु को पहचान पाता है, न यह अपने को सम्हाल सकता है और निरन्तर इसका हाल बिगड़ता ही जा रहा है। क्या किया जाय, कुछ पता नहीं वलता!' यहाँ रति-परिहार (सर्वत्र अरुचि भाव) आदि अनुभाव ऐसे वर्णित हैं कि ये करुण आदि (अर्थात् भयानक और वीभत्स रस) में भी संभव हैं जिससे यहाँ प्रस्तुत (नायक- निष्ठ विप्रलम्भ शङ्गार) रस का कान्ता-रूप आलम्बन विभाव अविलम्ब प्रतीत नहीं हो पाता (और जब ऐसा न हो तो आस्वाद-विघ्न भला कैसे न हो!) (प्रकृत रस-विरुद्ध विभाव और व्यभिचारि-भाव के वर्णन में रस-दोष, जैसे कि) 'प्रिये ! अब तो कृपा कर, प्रसन्नता दिखा, क्रोध छोड़, मेरे इस सूखते शरीर पर अपनी चचन-सुधा का दिड़काव कर दे और क्षण भर के लिये, कम से कम, अपना ह तो मेरेमुँ

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२६६ काव्यप्रकाश:

निधानं सौख्यानां क्षणमभिमुखं स्थापय मुखं न मुग्धे ! प्रत्येतुं प्रभवति गतः कालहरिणः ॥ ३२७ ॥ अत्र शृङ्गारे प्रतिकूलस्य शान्तस्यानित्यताप्रकाशनरूपो विभावस्तत्प्रका- शितो निर्वेदश्च व्यभिचारी उपात्तः । (सत्र-प्रकृतरस-विरुद्ध अनुभाव की वर्णना ) णिहुअरमणम्मि लोअणपहम्पि पडिए गुरुअण मज्भम्मि। सअलपरिहारहिअआ वणगमणं एव्त महइ वहू ॥ ३२८ ।। (निभृतरमणे लोचनपथे पतिते गुरुजनमध्ये। सकलपरिहारहृदया वनगमनमेवेच्छति वधूः ॥ ३२८ ॥) अत्र सकलपरिहार-वनगमने शान्तानुभावौ। इन्धनाद्यानयनव्याजेनोप- भोगार्थ वनगमनं चेत् न दोषः। (४ अङ्गभूतरस की पुनः पुनः दीप्ति ) (७) दीप्रिः पुनः पुनर्यथा कुमारसम्भवे रतिविलापे। सामने रख, वह मुँह जो मेरे सुख का एक मात्र निधान है। अरी मुग्धे! यह तो सोच कि एक बार यदि यह समयरूपी हिरन चौकड़ी भर दे तो फिर लौट कर आने का नहीं! यहाँ जो प्रकृत श्रंगार रस है उसके विरुद्ध शान्तरस के उद्ीपन विभाव का अर्थात् समय की क्षण-भङ्गुरता का वर्णन किया गया है जो कि (रसास्वाद से विव्नभूत होने से) यहाँ रस का विघातक है और साथ ही साथ इस उद्दीपन विभाव से प्रकाशित निर्वेद रूप (शान्तरस का स्थायी भाव) जो व्यभिचारी भाव है, वह भी यहाँ प्रकृत शङ्गार रस का विघातक ही है। (प्रकृत रस विरुद्ध अनुभाव के उपादान में रस-दोष, जैसे कि) 'यह वधू अपने गुप्त प्रेमी को, अपने बड़े-चूढ़ों के बीच देखती हुई, वर का सारा काम- काज छोड़, बस, उसके साथ वनगमन करना ही चाह रही है।' यहाँ 'सकल-परिहार' 'सब काम-काज का छोड़ना' और 'वनगमन' 'वन में जाने के लिये तयार हो जाना' वस्तुतः शान्त रस के अनुभाव हैं जिनका उपादान यहाँ प्रकृत विप्रलम्भ शङ्गार का विच्छेद ही कर रहा है, न कि पोषण। किन्तु यदि यहाँ वर्णित वनगमन इन्धन आदि के लाने के बहाने से गुप्त प्रेमी के साथ रति-लीला के लिये माना जाय तो यहाँ यह रस- दोप-प्रकार नहीं रह सकता। अङ्गभूत रस-भावादि का अविच्छिन्न रूप से प्रकाशन भी आस्वाद-वेरस्य का ही कारण ह जेंसा कि 'कुमारसम्भव' में, रतिविलाप-प्रसङ्ग में, स्पष्ट प्रतीत होता है। टिप्पणी-महाकवि कालिदास के 'कुमारसम्भव' (४र्थ सर्ग) में वर्गित रतिविलापमें रस- ध्वनि-दाशनिकों को जो दोष दिखायी दिया करता है वह दोष है अङ्गभूत रस की अभिव्यक्ति की अविच्छिन्न धारावाहिकता का दोष। आनन्दवर्धनाचार्य की उक्ति है- 'पुनश्चायमन्यो रसभङ्ग हेतुरवधारणीयो यत् परिपोष गतस्यापि रसस्य पौनः पुन्येन दीपनम्। उपभुक्तो ही रसः स्वसामग्रीलब्धपरिपोष: पुनः 7199 पुनः परामृश्यमाण: परिम्लानकुसुमकल्पः कल्पते॥ (ध्वन्यालोक, तृतीय उद्योत-कारिका १९ की वृत्ति ) जिसे अमिनवगुप्ताचार्य ने कालिदास के कुमारसम्भव के रतिविलाप के दृष्टान्त पर इस प्रकार स्पष्ट किया है-

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सप्तम उल्लास: २६७

( ५ अनवसर में रस-वर्णना ) (८) अकाण्डे प्रथनं यथा-वेणीसंहारे द्वितीयेSङ्केऽनेकवीरक्षये प्रवृत्ते भानु- मत्या सह दुर्योधनस्य शृङ्गारवर्णनम्। (६ अ्रनवसर में रस-विच्छेद ) (६) अकाण्डे छेदो यथा वीरचरिते द्वितीयेऽक्के राघवभार्गवयोर्धाराधि- रूढे वीररसे 'कङ्कणमोचनाय गच्छामि' इति राघवस्योक्तौ। 'ननु कालिदासः परिपोषंगतस्यापि करुणस्य रतिविलापेषु पौनः पुन्येन दीपन- मकार्षीत, तत्कोडयं रसविरोधिनां परिहारनिर्वन्ध इत्याशङ्कयाह-पूर्वे (विशङ्गलगिर) इति-न हि वसिष्ठादिभिः कथञ्ञिद् यदि स्मृतिमार्गस्त्यक्तस्तद्वयमपि तथा त्यजामः। (ध्वन्यालोकलोचन पृ० ३५५ चौखम्बा ) यहाँ आचार्य मम्मट ने रसध्वनि-तत्त्वज्ञानियों की इसी मान्यता का पुष्टीकरण किया है। किन्तु जहाँ आचार्य अभिनवगुप्तकालिदास के महाकवि होने के कारण उनकी रतिविलाप-वर्णना के इस दोष का यथा कथनरित् परिहार करना चाहते है वहाँ आचार्य मम्मट इस स्पष्टतया रस-दोष मान लेते हैं। अनुवाद-विना अवसर के रस-विस्तार भी एक प्रकार का रस का विघातक ही है जैसे कि 'वेणीसंहार' के द्वितीय अङ्क में, जहाँ बड़े-बड़े वीरों (भीप्म आदि) के विनाश का प्रसङ्ग है, भानुमती औौर दुर्योधन का शङ्गार-वर्णन किया जाना। टिप्पणी-आचार्य आनन्दवर्धन ने इस रस दोष-प्रकार का उल्लेख इस प्रकार किया है- 'अयं चापरो रसभङ्गहेतुरवगन्तव्यो यत् ..... अकाण्ड एव प्रकाशनं (रसस्य) अन. वसरे च प्रकाशनं रसस्य यथा प्रवृत्त प्रवृत्तविविधवीरसंचये कल्पसंक्षयकल्पे संग्रामे रामदेवप्रायस्यापि तावन्नायकस्यानुपकान्तविप्रलम्भशङ्गारस्य निमित्तमुचितमन्तरेणेंव शृङ्गारकथायामवतारवणने। न चैंवं विधे विषये दैवव्यामोहितत्वं कथापुरुषस्य परिहारो यतो रसबन्ध एव कवेः प्राधान्येन प्रवृत्तिनिबन्धनं युक्तम्। (ध्वन्यालाक तृनीयोद्योत, पृ० ३६३ चौखम्बा ) जिसमें आचार्य अभिनवगुप्त ने वेणीसंहार के द्वितीय अङ्क का भी आक्षेप देखा है जैसा कि उनकी इस उक्ति से स्पष्ट है- 'अपि तावदिति शब्दाभ्यां दुर्योधनादेस्तद्वूर्णनं दूरापास्तमिति वेणीसंहारे द्वितीयाङ्क- मेवोदाहरणत्वेन ध्वनति। (ध्वन्यालोकलोचन, पृष्ठ ६६३ चौखम्ब। ) यहाँ आचार्य मम्मट ने अभिनवगुप्ताचार्य की मान्यता का ही स्पष्टीकरण किया है। अनुवाद-चिना अवसर के रस का विच्छेद कर देना भी एक प्रकार का रसदोप है जैसे कि (भवभूतिकृत) 'महावीर चरित' के द्वितीय अङ्ठ में जहाँ राम और परशुराम का युद्धोत्साह अविच्छिन्न रूप से अभिव्यक्त हो रहा है राम का 'कङ्कणमोचन' (विवाह के दशम दिन के उत्सव) के लिये जा रहा हूँ'-कह कर युद्धोत्साह से विरत हो जाना (जिससे रामगत वीररस के आस्वाद में विध्न पड़ गया)। टिप्पणी-भनन्दवर्धनाचार्य ने 'अनवसर में रस-विच्छेद' को 'अकाण्ड एक विच्छित्तिः' (ध्वन्यालोक ३. १९) कहा है और इसे इस प्रकार स्वष्ट किया है- 'तत्रानवसरे विरामो रसस्य यथा नायकस्य कस्यचित् स्पृहणीयसमागमया नायिकया कयाचित् परां परिपोषपद्वी प्राप्ते ऋ्रङ्गारे विदिते च परस्परानुरागे समागमोपायचन्तो- चितं व्यवहारमुरसृज्य स्वतन्त्रतया व्यापारान्तरवर्णने' यहाँ आचार्य मम्मट ने इसी 'अकाण्ड-विच्छित्ति' रूप रस-दोष को महावीरचरितनाटक के द्वितीय अङ्क के दृष्टान्त पर स्पष्ट किया है।

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२६८ काव्यप्रकाश:

(७ अङ्ग अरथवा अ्र्प्रप्रधान ( प्रतिनायक आरदि ) का त्र्प्रतिविस्तृत वर्णन ) (१०) अङ्गस्याप्रधानस्यातिविस्तरेण वर्णनं यथा हयग्रीवत्रघे हयग्रोवस्य। (८ अङ्गी अर्थात् प्रधान (नायकादि) का अपरामर्श) (११) अङ्गिनोऽननुसंधानम् यथा रत्नावल्यां चतुर्थेडङ्के बाभ्रव्यागमने सागरिकाया विस्मृतिः । ( ९ प्रकृतिगत औचित्य के प्रतिकूल वर्णन ) (१२) प्रकृतयो दिव्या अदिव्या दिव्यादिव्याश्च, वीररौद्रश्ृङ्गारशान्तरस- अनुवाद-अङ्ग अथवा अप्रधान (प्रतिनायक आदि रस-वर्णना के उपकरणों) का आवश्यकता से अधिक विस्तार से वर्णन करना भी रस दोष है जैसे कि 'हयग्रीववध' महाकाव्य में (प्रधान नायक विष्णु के बदले) हयग्रीव का (प्रतिनायक का) अत्यधिक विस्तृत वर्णन। टिप्पणी-काश्मीरक मेण्ठकृत 'हयग्रीववष' आजकल उपलब्ध नहीं, किन्तु प्राचीन आलक्का- रिक इससे पूर्णतया परिचित हैं। मम्मट ने इस महाकाव्य को अन्यत्र भी उद्धृन किया है। इस महाकाव्य में अप्रधान (प्रतिनायक) वर्णन रूप रस-दोष मी मम्मट ने ही दिखाया है। 'काव्य- प्रभास' की 'सारबोधिनी' व्याख्य। के रचयिता ने 'हयग्रीववध' सम्बन्धी इस रस-दोष का इस प्रकार निरूपण किया है- 'हयग्रीवस्य जलकेलि-वनविहार-रतोत्सवादेर्नायकापेक्षया विस्तरेण वर्णनं हयग्रीवस्य नायकत्वमेव प्रत्याययति न प्रतिनायकत्वमिति दोष:। न च 'वंशवीर्यश्रुतादीनि वर्णयित्वा रिपोरपि' इत्यादिना विरोध इति वाच्यम्। यद्गुणवर्वेन रिपोर्वर्णनेन नायकोत्कर्षप्रति- पादनं तत्रैवाऽस्य तात्पर्यात् न तु वनविहारादावपि। अत एवाह-'तज्जयान्नायकोतकर्ष- कथनं च धिनोति नः' इति।' अनुवाद-अङ्गी अर्थात् प्रधान रूप से अवस्थित नायकादि को (अवान्तर विषयों के वर्णन में) भूल सा जाना भी रस-दोष ही है जैसे कि 'रत्नावली' के चतुर्थ अङ्क में बाभ्रव्य (महाराज सिंहलेश्वर के कन्चुकी) के आगमन से सागरिका (मुख्यनायिका रतनावली) का (नायक वत्सराज द्वारा) एक प्रकार से विस्मरण (जिससे नाटिका का प्रतिपाद्य शृङ्गार रस विच्छिन्नप्राय सा हो गया है)। टिप्पणी -- आचार्ये आनन्दवर्धन ने प्रबन्ध की रसव्यञ्जकता के निमित्तों में 'अङ्गो के अनुसंधान' को भी एक निंमित्त माना है जैसा कि उनका स्पष्ट कथन है- 'इदं चापरं प्रबन्धस्य रसव्यक्जकत्वे निमित्तं यदुद्दीपनप्रशमने यथावसरमन्तरा रसस्य, यथा रत्नावल्यामेव। पुनरारब्धविश्रान्ते रसस्याङ्गिनोऽनुसन्घिश्च, यथा तापसवत्सराजे।'

और जिस पर अमिनवगुप्ताचार्य की यह व्याख्या है- (ध्वन्यालोक पृष्ठ ३४१ चौखम्बा )

'रसस्येति। रसाङ्गभूतस्य कस्यापीति यावत्। तापसवत्सराजे हि वासवदत्ताविषयो जीवितसर्वस्वाभिमानात्मा प्रेमवन्धस्तद् विभावाद्यौचित्यात् करुणविप्रलम्भादिभूमिका गृहनू समस्तेतिवृत्तव्यापी। राज्यप्रत्यापत्या हिं सचिवनीतिमहिमोपनतया तद्ङ्गभूतपद्मा- वतीलाभानुगतयाऽनुप्राण्यमानरूपा परमामभिलषणीयतमतां प्राप्ता वासवदत्ताधिगतिरेव तत्र फलम। निर्वहणे हि 'प्राप्ता देवी भूतधात्री च भूय: संबन्धोऽभूद्दर्शकेन' इत्येवं देवी- लाभप्राधान्यं निर्वाहितम्। ... तेन स एव वासवदत्ताविषयः प्रेमबन्धः कथावशादाशङ्कय-

यहाँ आचार्य मम्मट न प्रबन्ध की रस-व्यअ्जकता की इस विशेषता के विपर्यय को ही अङ्गा के विस्मरणरूप (अहिनोऽननुसंधानम्) रस-दोष के रूप में मान लिया है-। अनुवाद-(जिस प्रकृति के लिये जो वर्णन अनुचित हो, उसका वहाँ वर्णन प्रकृति·

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सप्तम उल्लास: २६६

प्रधाना धीरोदात्त-धीरोद्धत-धीरललित धीरप्रशान्ताः, उत्तमाधममध्यमाश्च। रतिहासशोकाद्भुतानि अदिव्योत्तमप्रकृतिवत् दिव्येष्तपि । किन्तु रतिः सम्भोग- शृङ्गाररूपा उत्तनदेवताविषया न वर्णनीया। तद्वर्णनं हि पित्रोः सम्भोगवर्ण- नमिवात्यन्तमनुचितम्। क्रोधं प्रभो ! संहर संहरेति यावद्विरः खे मरुतां चरन्ति। तावत् स र वह्निर्भवनेत्रजन्मा भस्मावशेषं मदनंचकार ॥ ३२६ ॥। इत्युक्तवद् भ्रुकुट्यादिविकारवर्जितः क्रोध: सदः फलदः स्वर्गपातालगगन- समुद्रोल्लद्वनाद्युत्साहञ्च् दिव्येष्वेव। अदिव्येषु तु यावदवदानं प्रसिद्धमुचितं वा तावदेवोपनिबद्धव्यम्। अधिकं तु निबष्यमानमसत्यप्रतिभासनं नायकवद्वर्तित- व्यम् न प्रतिनायकवत इत्युपदेशेन पर्यवस्येत्। विपर्यय रूप रस दोष है) तात्पर्य यह है कि प्रकृति (अर्थात् नायकादि) के तीन प्रकार हुआ करते हैं-दिव्य (देवतारूप इन्द्र आदि), अदिव्य (मनुष्यरूप वत्सराज आदि) और दिव्यादिव्य (मनुष्यरूप से अवतीर्ण देवभूत राम-कृष्णादि)। और इन तीनों के धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरललित और धीरप्रशान्त-ये चार भेद हैं जो कि वस्तुतः वीररस- प्रधान, रौद्ररस-प्रधान, शङ्गाररस-प्रधान और शान्तरस-प्रधान-इन चार प्रबन्धनायक-भेदों से सम्बन्ध रखते हैं। पुनः यह द्वादशविध प्रकृति-भेद (गुणोत्कर्ष-गुणापकर्ष और गुणोत्क- र्षापकर्ष के कारण) उत्तम, मध्यम और अधम रूप से ३६ प्रकार का है। इस प्रकृतिगत औचित्य के निर्वाह के लिये आवश्यक यह है कि रति, हास, शोक और अद्भुत आदि का वर्णन दिव्य प्रकृतियों (इन्द्रादि नायकों) के सम्वन्ध में भी उसी प्रकार किया जाना चाहिये जिस प्रकार अदिव्य किंतु उत्तम (मनुष्यरूप वत्सराज आदि) प्रकृति के सम्बन्ध में किया जाया करता है। किन्तु दिव्यप्रकृतियों (देवरूप नायकों) में भी जो उत्तम दिव्य प्रकृतिभेद है, उसके प्रसङ्ग में, संभोग शङ्गार रूप रति का वर्णन कदापि नहीं किया जाना चाहिये। क्यों? इसलिये कि उत्तमदिव्य-प्रकृतिगत संभोग का वर्णन उतना ही अनुचित है जितना कि अपने माता-पिता के संभोग का वर्णन ! साथ ही साथ, करोधादि का भी वर्णन जैसा कि (कालिदास के कुमारसंभव, श्य सर्ग की) इस सूक्ति अर्थात्- 'जैसे ही आकाश में देववृन्द की यह वाणी कि 'देवाधिदेव ! कोध अब शान्त कीजिये' सुन पढ़ी वैसे ही महादेव की नेत्र-वहि ने मदन को जलाकर राख कर दिया।' में स्पष्ट है, जहाँ (मनुष्यों की भाँति) भृकुटि भंग आदि विकारों की छुआछृत भी नहीं और जिसका परिणाम अविलम्ब अनिवार्यरूप से प्रतीत हो रहा है, दिव्य प्रकृतियों के प्रसङ्ग में किया जा सकता है। इसी प्रकार दिव्य प्रकृतियों के सम्बन्ध में स्वर्गगमन, पाताल गमन, ससुद्रलंघनादि रूप अतिमानुष उत्साह का भी वर्णन उचित ही है। किन्तु इनका वर्णन यदि अदिव्य (मानवरूप) प्रकृतियों के सम्बन्ध में किया जाय तो यह सब उसी हद तक किया जाना चाहिये जिस हद तक उनका अवदान (भूतपूर्व चरित अथवा वृत्त) जा सके अथवा जिस हद तक (उनके सम्बन्ध की) लोकप्रसिद्धि जा सके अथवा जिसमें वस्तुतः औचित्य हो। अब यदि इस सर्यादा के विरुद्ध अदिव्य प्रकृति-वर्णन में अतिशयोक्ति की गयी तो परिणाम यही होगा कि जो कुछ अतिमानुष-वर्णन है वह असत्य प्रतीत होगा और जब यह सब असत्य प्रतीत हो जायगा तब यह उपदेश कि 'नायक के समान आचरण करना चाहिये न कि प्रतिनायक के समान' (जो कि सरस काव्य का परम प्रयोजन है) कैसे मिल सकेगा!

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२०० काव्यप्रकाश: M दिव्यादिव्येषु उभयथाऽपि। एवमुक्तस्यौचित्यस्य दिव्यादीनामिव धीरो- दात्तादीनामध्यन्यथावर्णनं विपर्ययः। तत्रभवन् भगवन्नित्युत्तमेन न अधमेन मुनिप्रभृतौ न राजादौ, भट्टारकेति नोत्तमेन राजादौ प्रकृतिविपर्ययापत्तेर्वाच्यम्। एवं देशकालवयोजात्यादीनां वेषव्यवहारादिकमुचितमेवोपनिबद्धव्यम्। इसी प्रकार जो दिव्यादिव्य प्रकृतिभेद है उसके संबन्ध में इन भावों की वर्णना दिव्य और अदिव्य दोनों प्रकृतियों के औचित्य का निर्वाह करते हुये की जानी चाहिये। निष्कर्ष इसका यह निकला कि जिस प्रकार दिव्यादिप्रकृतिभेदगत औचित्य के विरुद्ध वर्णन में प्रकृति-विपर्यय रूप दोष उत्पन्न हो जाता है उसी प्रकार इनके धीरोदा- त्तादि रूप अवान्तर भेदों के सम्बन्ध में भी औचित्य-विरुद्ध वर्णन प्रकृति-विपर्यय ही है, अन्य कुछ नहीं। एक प्रकृति-विपर्यय यह भी है कि आमन्त्रण (सम्बोधन) सम्बन्धी औचित्य का उल्लंघन किया जाय। इसीलिये आमन्त्रण के इस सम्प्रदाय की रक्षा में उत्तम प्रकृति के द्वारा ही न कि अधम प्रकृति के द्वारा भी, मुनि प्रभृति के ही सम्बन्ध में, न कि राजा आदि के सम्बन्ध में भी, 'तत्र भवन्' अथवा 'भगवन्' आदि सम्बोधन प्रयुक्त किये जाने चाहिये और यदि 'भट्टारक'-यह सम्बोधन प्रयुक्त किया जाय तो इसका भी राजा आदि के सम्बन्ध में उत्तम प्रकृति के द्वारा प्रयोग अनुचित ही मानना चाहिये। प्रकृति-विपर्यय और प्रकार का भी है और इसलिये जिस देश, जिस काल, जिस अवस्था और जिस जाति के जिस किसी वेष-आचार-यवहार आदि का वर्णन किया जाय वह उनके औचित्य के अनुरूप ही किया जाना चाहिये। टिप्पणी-आचार्य मम्मट ने 'प्रकृति-विपयंय' रूप रसदोष को आनन्दवर्धनाचार्य द्वारा निर्दिष्ट प्रबन्धसम्बन्धी रस व्यक्षकता के निमित्त 'मावौचित्य' के प्रतिकूल आचरण करने में माना है। आचार्य आनन्दवर्धन ने अपने धन्यालोक (तृतीय उद्योत) की १० वीं कारिका अर्थात्- विभावस्यानुभावस्य सञ्चायौंचित्यचारुगः। विधि: कथाशरीरस्य वृत्तस्योत्प्रेत्तितस्य च।। ... प्रबन्धस्य रसादीनां व्यक्षकत्वे निबन्धनम्॥' की वृत्ति में भावौचित्य के प्रसङ्ग में 'प्रकृति' निरूपण (जो कि आचार्य मरत-सम्मत है) इस प्रकार किया है- भावौचित्यं तु प्रकृत्यौचित्यात्। प्रकृतिर्ह्यत्तममध्यमाधमभावेन दिव्यमानुषादिभावेन च विभेदिनी। तां यथायथमनुसृत्यासंकीर्ण: स्थायीभाव उपनिबध्यमान औचित्यभाग भवति। अन्यथा तु केवलमानुषाश्रयेण दिव्यस्य, केवलदिव्याश्रयेण वा केवलमानुपस्यो तसाहादय उपनिवध्यमाना अनुचिता भवन्ति। तथा च केवलमानुषस्य राजादेवर्णने सप्तार्ण वलङ्गनादि-लक्षणा व्यापारा उपनिबध्यमाना: सौष्ठवभृतोऽपि नीरसा एव नियमेन भवन्ति तत्र त्वनौचित्यमेव हेतुः। ननु नागलोकगमनादयः सातवाहनप्रभृतीनां श्रयन्ते, तद्लोकसामान्यप्रभावाति- शयवर्णने किमनौचित्यं सर्वोर्वीभरणक्षमाणां क्षमाभुजामिति? नैतदस्ति। न वयं ब्रमो यत्प्रभावातिशयवर्णनमनुचितं राज्ञाम, किन्तु केवलमानुषाश्रयेण योत्पाद्यवस्तुकथा क्रियते तस्यां दिव्यमौचित्यं न योजनीयम् । दिव्यमानुप्यायां तु कथायामुभयौचित्ययोजन मविरुद्धमेव। यथा पाण्डवादिकथायाम्। सातवाहनादिषु तु येषु यावदवदानं श्रूयते तेषु तावन्मात्रमनुगम्यमानमनुगुणत्वेन प्रतिभासते। व्यतिरिक्तं तु तेषामेवोपनिवध्यमान- मनुचितम्।". ननु यदुत्साहादिवर्णने कथञ्ञिद्दिव्यमानुप्याद्यौचित्यपरीक्षा क्रियते, तक्क्रियताम्, रत्यादौ तु तया किं प्रयोजनम्? रतिर्हि भारतवर्षोचितेनेव व्यवहारेण दिव्यानामपि वर्णनी- येति स्थितिः? नैवम्। तत्रौचित्यातिकमेण सुतरां दोषः। तथा ह्यधमप्रकृत्यौचित्येनोत्तम- प्रकृते शङ्गारोपनिबन्धने का भवेन्नोपहास्यता ! त्रिविधं प्रकृत्यौचित्यं भारतवर्षेऽप्यस्ति

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सप्रम उल्लास: २७१

(१० रस के अनुपकारक का वर्णन) (१३) अनङ्गस्य रसानुपकारस्य वर्णनम्। यथा कर्पूरमञ्जर्या नायिकया स्वात्मना च कृतं वसन्तवर्णनमनादृत्य वन्दिवर्णितस्य राज्ञा प्रशंसनम्। 'ईदशा' इति। नायिकापादप्रहारादिना नायककोपादिवर्णनम्। उक्त्तं हि ध्वनिकृता- अनौचित्याहते नान्यदुरसभङ्गस्य कारणम्। औचित्योपनिबन्धस्तु रसस्योपनिषत्परा ॥ इति ॥ शृङ्गारविषयम्। .तस्मादभिनयार्थेऽनभिनेयार्थे वा वाक्ये यदुत्तमप्रकृते राजादेरु- त्तमप्रकृतिभिर्नायिकाभिः सह ग्राम्यसम्भोगवर्णनं तत् पित्रोः सम्भोगवर्णनमिव सुतराम- सभ्यम्। तथैवोत्तमदवतादिविषयम्। न च सम्भोगशङ्गारस्य सुरतलक्षण एवेंकः प्रकारः, यावदन्येऽपि प्रभेदाः परस्परप्रेमदर्शनादयः सम्भवन्ति,ते कस्मादुत्तमप्रकृतिविपये न वर्ण्यन्ते! तस्मादुत्साहवद्रतावपि प्रकृत्यौचित्यमनुसर्त्तव्यम्। यत्वेवंविधे विपये महाकवी- नामप्यसममीच्यकारिता लच्ये दृश्यते स दोष एव।' यहाँ यह स्पष्ट हे कि रसदोष-प्रसङ्ग में 'प्रकृतिविपर्यय' रूप रस-दोष-प्रकार का जो अनुसन्धान मम्मट ने किया है उसमें उनकी ध्वनिमर्मज्ञता और रसतत्ववेदिता वस्तुतः झलक उठी है। 'प्रकृति- विपर्यय' रूप रस-दोष के सद्भाव में, कान्तासम्मित काव्य में 'उपदेशयोग' रूप प्रयोजन भी सुरक्षित नहीं रह सकता-यह जो मम्मट का निर्देश है वह है काव्य रहस्य-वेदी आचार्य अभिनवगुप्त की इस मान्यता अर्थात्- एतदुक्तं भवति-यत्र विनेयानां प्रतीतिखण्डना न जायते तादग वर्णनीयम्। तत्र केवलमानुपस्य एकपदे सप्तार्णवलङ्वनमसम्भाव्यमानतयाऽनृतमिति हृदये स्फुरदुपदेश्यस्य चतुर्वर्गोपायस्याप्यलीकतां बुद्धौ निवेशयति। रामादेस्तु तथाविधमपि चरित पूर्वप्रसिद्धि- परस्परोपचितसम्प्रत्ययोपारूढमसत्यतया न चकास्ति।' (लोचन ३३१, पृ० चौखम्बा) का नैषष्ठिक अनुवर्तन ! अनुवाद-'अनङ्ग' अर्थात् अमुख्य अथवा रस के अनुपकारक का वर्णन भी एक रस- दोप ही है, जैसे कि 'कर्पूरमज्जरी' (प्रथमजवनिकान्तर) में नायिका (विभ्रमलेखा) द्वारा और स्वयं (नायक चण्डपाल द्वारा) किये गये वसन्त वर्णन की उदेक्षा करके चारण- वर्णित वसन्त-वैभव की ही राजा (नायक चण्डपाल) द्वारा प्रशंसा (जिससे प्रकृत संभोग शद्गार रूप रस की अभिव्यक्ति में कोई सहायता नहीं मिलती)। यहां कारिका में 'ईदृशाः' 'इस प्रकार के' का अभिप्राय यह है कि परिगणित रस-दोष तो प्रदर्शनार्थ हैं और भी ऐसे ही अनौचित्य मूलक रस-दोप सम्भव है जैसे कि नायिका द्वारा नायक पर पादप्रहार करने और नायक द्वारा नायिका पर कुद् होने आदि का वर्णन करना। 'अनौचित्य' ही रस-विघातक है-इसका तो ध्वनिकार ने स्पष्ट प्रतिपादन कर दिया है- 'अनौचित्य के अतिरिक्त रसभङ्ग का और कौन सा कारण ! और औचित्य का अनु- पालन ! वही तो वस्तुतः रस का परम रहस्य-वास्तविक मर्म-है; टिप्पणी-आचार्य मम्मट ने रस-दोष का जो विशद विचार किया है वह आनन्दवर्षनाचार्ये और आचार्य अभिनवगुप्त की प्रबन्ध-रस-ध्वनि-मीमांसा का एक समीचीन और वैज्ञानिक अध्ययन है। मम्मट के पूर्ववर्ती आलक्कारिक रुद्रट ने भी 'विरस' नामक एक अर्थगत दोप का उल्लेख अवश्य किया है जैसा कि काव्यालक्वार (११. १२-१४) की इन पंक्तियों अर्थात्- 'अन्यस्य यः प्रसङ्गे रसस्य निपतेद्रसः क्रमापेतः। चिरसोऽसौ स च शक्यः सम्यग ज्ञातुं प्रबन्धेभ्यः।। तव वनवासोऽनुचितः पितृमरणशुचं विमुञ्च किं तपसा। सफलय यौवनमेतत् सममनुरक्तेन सुतनु मया॥

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२७२ काव्यप्रकाश:

M (रस-दोषों का यथास्थान अरपवाद) इदानीं क्वचिददोषा अप्येते-इत्युच्यन्ते। (व्यभिचारी भाव की 'स्वशब्दवाच्यता' के दोष का अपवाद) (८३) न दोषः स्वपदेनोक्तावपि संचारिण: क्वचित्। यथा- औत्सुक्येन कृतत्वरा सहभुवा व्यावर्तमाना हिया तैस्तैर्बन्धुवधूजनस्य वचनैर्नीताभिमुख्यं पुनः । दृष्टाडम वरमात्तसाध्वसरसा गौरी नवे संगमे संरोहत्पुलका हरेण हसता श्लिष्टा शिवायास्तु वः ॥३३०। अत्रौत्सुक्यशब्द इव तदनुभावो न तथा प्रतीतिकृत्। अत एव 'दूरादुत्सु- कम्' इत्यादौ व्रीडाप्रेमाद्यनुभावानां विवलितत्वादीनामिवोत्सुकत्वानुभावस्य सहसा प्रसरणादिरूपस्य तथा प्रतिपत्तिकारित्वाभावादुत्सुकमिति कृतम्। यः सावसरोऽपि रसो निरन्तरं नीयते अबन्धेषु। अतिमहतीं वृद्धिमसौ तथैव वैरस्यमायाति ॥' से स्पष्ट है किन्तु मम्मट की ध्वनिवाद-समस्त रस-दोष मीमांसा बहुत दूर पहुँची हुई है। यद्यपि मम्मट की रस दोष-समीक्षा में ध्वनिकार की इन कारिकाओं अर्थात्- 'विरोधिरससम्बन्धि-विभावादिपरिग्रहः। विस्तरेणान्वितस्यापि वस्तुनोऽन्यस्य वर्णनम् ॥ अकाण्ड एव विच्छित्तिरकाण्डे च प्रकाशनम्। परिपोष गतस्यापि पौनःपुन्येन दीपनम्। रसस्य स्याद् विरोधाय वृत्यनौचित्यमेव च।। (व्वन्यालोक ३. १८,१९ ) का आधार अवश्य प्रतीत हो रहा है किन्तु इस आधार पर 'रस-दोष' का स्वरूप-निरूपण अलङ्गार शास्त्र के 'दोष-बाद' में मम्मट की एक देन है। अनुवाद-उपर्युक्त रस-दोषों में से कुछ ऐसे भी हैं जो कहीं-कहीं दोष नहीं साने जाया करते। इनका प्रतिपादन अब किया जा रहा है- कहीं-कहीं व्यभिचारी भाव की स्वशब्द-वाच्यता दोष नहीं हुआ करती। उदाहरण के लिये-'नव-मिलन के लिये प्रियतम के पास जाने की उत्कण्ठा से शीघ्रता में पड़ी, नवोढ़ा की स्वाभाविक लज्ा से पीछे सुड़ने में भी लगी, अपने-बन्धु-वधूजन के समझाने बुझाने से आगे बढ़ती हुई, अपने पति शंकर को आगे देख भयभीत, किन्तु हँसते हुये उनके द्वारा आलिङ्गित होकर रोमाञ्च से भरी पार्वती आप सब का कल्याण करती रहें।' यहाँ (रतनावली नाटिका के नान्दी पद में) 'औत्सुक्य' रूप व्यभिचारी भाव का, उसके पारिभाषिक शब्द द्वारा अभिधान तो अवश्य है किन्तु इसमें 'स्वशब्दवाच्यता' का दोष नहीं क्योंकि यहां जो इस व्यभिचारी का 'त्वरा' (शीघ्र गमन) रूप अनुभाव है वह ऐसा असाधारण अनुभाव नहीं जिसके द्वारा उत्सुकतारूप व्यभिचारी भाव ही अभिव्यक्त हो सके (क्योंकि 'त्वरा' रूप अनुभाव तो भय का भी व्यक्षक हो सकता है!) और इसी लिये साक्तात् 'औतसुक्य' रूप पारिभाषिक व्यभिचारिभाव-बोधक पद का उपादान करना पड़ा है। एक और प्रसङ्गके देखने से भी यही सिद्ध होता है कि कहीं-कहीं व्यभिचारिभाव का स्वशब्दोपादान आवश्यक हुआ करता है, जैसे कि- 'दूरादुत्सुकमागते विवलितं सम्भाषिणि स्फारितं संश्लिप्यत्यरुणं गृहीतवसने किञ्नाञ्जितभ्रलतम्। मानिन्याश्चरणानतिव्यतिकरे बाष्पाम्तुपूर्णे क्षणं चनतुर्ज़ातमहो प्रपञ्जचतुरं जातागसि प्रेयसि॥' इस (चतुर्थ उल्लास में, पूर्वोदाहृत महाकवि अमरुक की) सूक्ति में, जहां 'बरीडा' 'प्रेम"

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सप्तम उल्लास: २७३

(विरुद्ध विभावादि ग्रहण की यथास्थान अदोषता) (८४) सञ्चार्यादेर्विरुद्धस्य वाध्यम्योक्तिर्गुणावहा ॥ ६३॥ (विरुद्ध व्यभिचारिभाव के उपादान की गुणरूपता ) बाध्यत्वेनोक्तिर्न परमदोषः, यावत्प्रकृतरसपरिपोषकृत्। यथा- क्काकार्य शशलक्ष्मणः क च कुलम्-इत्यादौ ॥ ३३१ ॥ अत्र वितर्कादिषु उद्धतेष्वपि चिन्तायामेव विश्रान्तिरिति प्रकृतरसपरिपोषः । आदि रूप व्यभिचारिभावों का तो 'विवलन' आदि रूप असाधारण अनुभावों द्वारा अभिव्यक्त हो सकने के कारग स्वशब्दोपादान नहीं दिखाई देता, किन्तु उत्सुकता (औत्सुवय) रूप व्यभिचारिभाव का, उसके 'त्वरा' रूप अनुभाव द्वारा निःसन्दिग्ध रूप से अभिव्यञ्ञन होता न देख कर (क्योंकि 'त्वरा' द्वारा भयादि भी प्रकाशित हुआ करते हैं) साक्षात् ('दूरादुत्सुकमागते' इस रूप से.) स्वशब्दोपादान द्वारा अभिधान किया गया है। rc 1 कहीं-कहीं प्रकृत रस-विरुद्ध भी रस के अङ्गभूत व्यभिचारी आदि (विभाव और अन्ु- भाव) का उपादान तब दोष होना तो अलग रहे, गुण हो जाया करता है जब कि वह इस प्रकार से निर्दिष्ट हो कि वाधक न हो कर वाध्य हो जाय। प्रकृत रस के विरोधी भी व्यभिचारी भाव की यदि ऐसी वर्णना की जाय कि वह (बाध न होकर) वाध्य रूप से प्रतीत हुआ करे तो उसे केवल दोष का अभाव ही नहीं अपि तु एक गुण कहा जायगा क्योंकि वह तो प्रकृत रस का और भी अधिक परिपोषक है। जैसे कि-'क्वाकार्य शशलचमणः क च कुलम्'आदि (चतुर्थ उल्लास में उद्षृत 'विक्रमो- र्वंशीय' नाटक की सूक्ति) में, क्योंकि यहाँ 'वितर्क' आदि (जो कि शमभाव के व्यभि- चारीभाव हैं) प्रकाशित होकर भी अन्ततोगत्वा 'चिन्ता' रूप (शृङ्गाररस के अङ्गभूत) व्यमिचारी भाव द्वारा बाधित होकर उसी में विलीन होते प्रतीत हो रहे हैं और परिणाम यह होता है कि (शान्त रस की प्रतीति तो होती नहीं, अपि तु) प्रकृत रस-वस्तुतः भावशबलता-की ही प्रतीति और भी अधिक चमत्कार पूर्ण हो उठती है। टिप्पणी-यहाँ आचार्य मम्मट ने ध्वनिकार की इस मान्यता अर्थात्- 'विवच्षिते रसे लब्धप्रतिष्ठे तु विरोधिनाम्। बाध्यानामङ्गभावं वा प्राप्तानामुक्तिरच्छला ।।' (ध्वन्यालोक ३.२०) का अनुसरण किया है। ध्वनिकार ने प्रकृत रस-विरुद्ध रस के अङ्गों का बाध्यत्व रूप से वर्णन वस्तुतः प्रकृतरस का परिपोष माना है जैसा कि उनकी इस उक्ति अर्थान्- 'तत्र लब्धप्रतिष्ठे तु विवचिते रसे विरोधिरसाङ्गानां बाध्यत्वेनोक्तावदोषो यथा- क्वाकार्य शशलचमणः क च कुलं भूयोऽपि दृश्येत सा दोषाणां प्रशमाय मे श्रुतमहो कोपेऽपि कान्तं मुखम्। किं वच्यन्त्यपकल्मषाः कृतघियः स्व्रप्नेऽपि सा दुर्लभा चेतः स्वास्थ्यसुपैहि कः खलु युवा धन्योऽधरं पास्यति॥' से सिद्ध है और जैसा कि इसके अभिनवगुप्त-कृत इस व्याख्यान अर्थात्- 'वितर्क और्सुक्येन' मतिः स्मृत्या, शङ्का दैन्येन, ध्तिश्चिन्तया च बाध्यते। एतच्च द्वितीय द्योतारम्भ एवोक्तमरमाभि :- (अत्र हि वितकौंतसुव्ये, मतिस्मरणे। शङ्कादैन्ये धृतिचिन्तने परस्परं बाध्यबाधकभावेन द्वन्द्वशो भवती, पर्यन्ते तु चिन्ताया एव प्रधानतां ददती परमास्वादस्थानम्।) से निःसंदिग्धरूप से स्पष्ट है। 5 १८ का

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२७४ काव्यप्रकाश: 32 क(ध्वनिकार से मतभेद) पाण्डुक्षामं वदनं हृदयं सरसं तवालसं च वपुः।F आवेदयति नितन्तं न्ेत्रियरोगं सखि ! हृदन्तः ॥ ३३२॥ इत्यादौ साधारणत्वं पाण्डुतादीनामिति न विरुद्धम्। (प्रकुतरस-चिरुद्ध विभाव की वाध्यत्वरूप से उत्ति में गुण ) सत्यं मनोरमा रामाः सत्यं रम्या विभूतयः ।जतात किन्तु मत्ताङ्गनापाङ्गभङ्गलोलं हि जीवितन् ॥ ३३३॥। इत्याद्यमर्ध बाध्यत्वेनैवोक्तम्। जीवितादपि अधिकमपाङ्गभङ्गस्यास्थिरत्व- अनुवाद-(ध्वरनिकार ने, प्रकृतरस-विरुद्ध रस के व्यभिचारी भाव आदि की वाध्य- रूप से और स्वभावतः अङ्गभावप्राप्ति रूप से उक्ति में जो रस-दोष के बदले रसपरिपोष माना है, वह तो सर्वथा युक्तियुक्त है किन्तु) इस प्रकार की सूक्ति जैसे कि-'अरी सखी! तुम्हारा यह पीला-पीला सूखा हुआ मुँह, तुम्हारा यह सरस (प्रेममय किंवा कफ युक्त) हृदय और तुम्हारी यह अलसायी देह-यह सब बस एक ही ओर संकेत कर रहे हैं और वह है तुम्हारे हृदय के भीतर एक असाध्य (यच्त्मारूप) प्रेस का रोग !' इत्यादि के लिये भी यह कहना कि यहाँ भी प्रकृत (शंगार) रस-विरुद्ध रस (करुण) के अंग अर्थात् पाण्डुता आदि अनुभावों की 'समारोपित अङ्गभाव-प्राप्ति' के कारण कोई दोष नहीं, अपि तु गुण है, ठीक नहीं प्रतीत होता, क्योंकि यहाँ पाण्डुता, कामता आदि अनुभाव ऐसे नहीं जो एकान्ततः करुणरस के ही उपयुक्त हों, अपि तु ऐसे हैं, जो विप्रलम्भशङ्गार के भी उपयुक्त हैं और जब ऐसी बात है इन्हें 'प्रकृतरस-विरुद्ध रस का अङ्ग' क्योंकर मान लिया जाय! और जब कि वस्तुतः ये प्रकृतरस के प्रतिकूल नहीं, अपि तु सर्वथा अनुकूल हैं, तब यहाँ प्रतिकूलता के समाधान का क्लेश किस काम का! टिप्पणी-ध्वनिकार आनन्दवर्धन ने 'पाण्डु क्षामं वदनम् आदि में प्रतिकूल-विभावादि-ग्रहण रूप रस-दोष का समाधान किया है जैसा कि उनका स्पष्ट कथन है- 'समारोपितायामप्यविरोधो यथा-पाण्डुक्षाममित्यादौ।' (ध्वन्यालोक, श्य उद्दयोत, पृष्ठ ३६८) और जैसा कि आाचार्य अभिनवगुप्त का इस प्रसक्ग में व्याख्यान है- 'समारोपितायामिति-अङ्गभावप्राप्ाविति शेषः। पाण्डुक्षामंवदनं हृदयं सरसं तवालसंच वपुः। आवेदयति नितान्तंक्षेत्रियरोगं सखि हृदन्तः॥ अत्र करुणोचितो व्याधि: श्लेष्मभङ्ग्या स्थापितः।' किन्तु मम्मट का यहाँ जो ध्वनिकार से मतभेद है वह भी असंगत नहीं अपि तु युनियुक है क्योंकि नाट्यज्ञास्त्र की परम्पर। के अनुसार 'व्याधि' करुण रस का ही नहीं अपितु विप्रलम्भ शरृङ्गार का भो भङ्ग ही है- 'व्याध्युन्मादापस्मारजाड्यप्रसरणादि भिर्विप्रलम्भोभिनेतव्यः।' तुवा-(प्रकृत रस के पतिकूल रस के विभाव की वाध्यत्वरूप से वर्णना भी प्रकृतरस का एक परिपोष ही है, जैसे कि) इस सूक्ति अर्थात्- 'यह ठीक है कि रमणियाँ एक मनोमोहक वस्तु हैं और इसमें भी कया लन्देह की सभो वैभवविलास मनोहर हुआ करते हैं! किन्तु यह जीवन ! यह तो सका तरुगीकटाच्षयत् चञ्जल-अस्थिर-रहा करता है!' में, जहाँ पूर्वार्ध, जो कि शङ्गार का विसाव है, उत्तरार के द्वारा, जिसनें शान्त का विभाव स्पष्ट है, बाधित होकर शान्त का और भी अधिक चमरकारपूर्वक परिपोष करता प्रतीत हो रहा है।

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सप्तम उल्लास: २७५

मिति प्रसिद्धभङ्गरोपमानतयोपात्तं शान्तमेव पुष्णाति न पुनः शृङ्गारस्यात्र प्रती- तिस्तदङ्गाप्रतिपत्तेः ।न तु विनेयोन्मुखीकरणमत्र परिहारः, शान्त-शृङ्गारयोनै- रन्तर्यस्याभावान्। नापि काव्यशोभाकरणम्, रसान्तरादनुप्रासमात्राद्वा तथा भावात्। साजहाँ यह आशंका कि पूर्वार्धप्रतिपाद्य (मनोरम रमणी और मनोहर विलासरूप) शृङ्गार-विभाव के बाध्यरूप से अवस्थित रहने पर भी उत्तरार्धगत 'मत्ताङ्गनापाङ्गभङ्ग:'रूप शङ्गार के अनुभाव द्वारा पुनः श्रङ्गार की प्रतीति के साथ शान्त के विरोध की सम्भावना जागरूक है' ठीक नहीं क्योंकि यहाँ जो 'मताङ्गनापाङ्गभङ्ग' रूप पद का उपादान है-और यह ठीक भी है क्योंकि जीवन की चज्जलता से भी नारी-कटाक्ष ही वस्तुतः अधिक चञ्जल हुआ करता है-उसके द्वारा शङ्गार की प्रतीति तो असम्भव ही है क्योंकि अस्थिरता के इस लोक-प्रसिद्ध उपमान के उपादान से शङ्गार के अङ्गभूत विभावादि का क्या सम्बन्ध! (शङ्गार से तो इसका सम्बन्ध तब होता जब कि इसे रतिरूप स्थायीभाव के अनुभाव के रूप में प्रतिपादित किया गया होता!) यहाँ तो इस उपमान के द्वारा एकमात्र शान्त- रस का ही परिपोष किया जा रहा है (और तब शान्त-शङ्गार का यहाँ विरोध कैसा! और जब विरोध नहीं तब यहाँ ध्वनिकार (ध्वन्यालोक, पृष्ठ ३९९) की विरोध-परिहारसम्बन्धी कष्ट-कल्पना किस काम की!) यहाँ यदि किसी प्रकार यह मान भी लिया जाय कि sho host शृङ्गार के अङ्गभूत विभावादि की प्रतीति होने से शङ्गार की प्रतीति स्वाभाविक है और शान्त-शङ्गार का विरोध भी अवश्यंभावी है तब भी यह कैसे मान लिया जाय कि इसका ध्वनिकार-सम्मत जो 'विनेयोन्मुखीकरणरूप' परिहार है (जिसका अभिप्राय यह है कि कवि ने काव्य प्रेमियों को 'गुडजिह्निका' न्याय सेचीनी में लपेटी कड़वी औषध के दृष्टान्त से-शङ्गार की प्रतीति कराकर शान्त की ओर उन्मुख करना चाहा है।) वह युक्तियुक्त है! यहां तो इस प्रकार के विरोध-परिहार की सम्भावना भी नहीं उठती क्योंकि यहां ऐसा कहां कि शङ्गार और शान्त दो परस्पर विरोधी रसभाव विना किसी व्यवधान- बीचविचाव के ही साथ-साथ उपस्थित हों! (यहां तो शङ्गार की प्रतीति ही असंभव है। शृङ्गार की यदि प्रतीति हो जाय तो शान्त तो दूर भाग खढ़ा हो!) यहां ऐसी भी कल्पना (जैसे कि ध्वनिकार ने की है) कि सकलजलमनोहर शद्गार के अङ्ग के समावेश से इस काव्य का सौन्दर्य द्विगुणित हो रहा है जिससे शान्त-शङ्गार का विरोध स्वयं हट गया है, निष्प्रयोजन ही है क्योंकि यहां जो काव्य-सौन्दर्य है वह (शङ्गार के अङ्ग के समावेश के कारण नहीं, अपितु) शङ्गार से सर्वथा भिन्न शान्तरस के विराजमान रहने से है अथवा यदि चाहें यह भी कह सकते हैं कि कोमल अनुप्रास-बन्ध के कारण यह काव्य एक रमणीय काव्य है। टिप्पणी-'सत्य मनोरमा रामाः' आदि सूक्ि में आचार्य सम्मट ने प्रतिकूल विभावादि का वाध्यरूप से उपादान मान कर दोष के बदले रस-परिपोष सिद्ध किया है किन्तु ध्वनिकार की धारणा इस प्रसङ्ग में दूसरी है। ध्वनिकार का यहाँ यह कथन है- (ध्वन्यालोक, ३य उद्योन, कारिका ३० ) विनेयानुन्मुखीकर्तु काव्यशोभार्थमेव वा। तद्विरुद्वरसस्पर्शस्तदङानां न दुष्यति ॥' शृङ्गारविरुद्धरसस्पर्शः शङ्गाराङ्गानां यः स न केवलमविरोधलक्षणयोगे सति न दुष्यति यावद्विनेया मुल्सुखीकर्तु काव्यशोभार्थमेव वा क्रियमाणो न दुष्यति। शङ्गाररसाङ्गरुन्पुखी- कृता: सन्तो हि विनेया: सुखं विनयोपदेशान् गृहन्ति। ...... किं च शृङ्गारस्य शकलजन- मनोहरासिरामत्वात्तदङ्गसमावेशः काव्ये शोभातिशयं पुव्यतीत्यनेनापि प्रकारेण विरोधिनि रसे शृङ्गाराङ्गसमावेशो न विरोधी। ततश्र- 'सत्यं मनोरमा:' "जीवितम् ॥, इत्यादिषु नास्ति रसविरोधदोषः।'

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२७६ काव्यप्रकाश:

(रस-विरोध के परिहार के उपाय) (८५) आश्रयैक्ये विरुद्धो यः स कार्यो भिन्नसंश्रयः । रसान्तरेणान्तरितो नैरन्तर्येण यो रसः ॥ ६४॥ IIT(आश्रयैक्य-विरोध और नैरन्तर्य-विरोध-दोनों का समाधान) वीर-भयानकयोरेकाश्रयत्वेन विरोध इति प्रतिपक्षगतत्वेन भयानको निवे- शयितव्यः। शान्तशृङ्गारयोस्तु नैरन्तर्येण विरोध इति रसान्तरमन्तरे कार्यम्। यथा-नागानन्दे शान्तस्य जीमूतवाहनस्य 'अहो गीतम् अहो वादित्रम्'-इत्य- द्भुतमन्तनिवेश्य मलयवतीं प्रति शृद्गारो निबद्धः। जिसका आचार्य अमिनवगुप्त ने ऐसा पुष्टीकरण किया है- 'अन्न हि शान्तविभावे सर्वस्यानित्यत्वे वण्यमाने न कदाचिद्विभावस्य श्रङ्गारभङ्गया निबन्ध: कृतः, किन्तु सत्यमिति परहृदयानुप्रवेशेनोक्तम्। न खल्वलीकदैराग्यकौतुकरुचि प्रकटयामः, अपि तु यस्य कृते सर्वमभ्यरथ्यते तदेवेदं चलमिति, तत्र मत्ताङ्गनापाङ्गभङ्गस्य शृंगारं प्रति संभाव्यमानविभावानुभावत्वेनाङ्गस्य लोलतायामुपमानतोक्तेति प्रियतमाकटा- क्षो हि सर्वस्याभिलषणीय इति च तत्प्रतीत्या प्रवृत्तिमान् गुडजिह्वकया प्रसकानुप्रसक्ताव- स्तुतत्वसंवेदनेन वराग्ये पर्यवस्यति विनेयः।' धन्यालोकलीचन पृ० ४००) वहाँ आचार्य मम्मट की जो ध्वनिकार के मत की आलोचना है वह युत्तियुक्त है। यहां ध्वनिकार की दृष्टि में श्रृद्गार के अङ्गों का, उनके सहृदय-हृदयावर्जक होने और काव्यशोभाधायक होने के कारण शृङ्गार-विरुद्ध शान्त में समावेश रसपरिपोष का कारण सिद्ध हो रहा है किन्तु काव्यप्रकाशकार ने इसके विपरीत यह सिद्ध किया है कि यहाँ मनोरम रमणी और वैभवविलासरूप शृङ्गार के विभाव का शान्त द्वारा बाध्यत्वरूप से जो वर्णन है उसकी दृष्टि से यदाँ 'प्रतिकूल विभावादि ग्रह' रूप रस-दोष नहीं फटक पाता। 'मत्ताङगनापाङ्गभङ्ग'-पद के कारण ध्वनिकार और आचार्य अभिनवगुप्त को जो यहाँ शृक्गार और शान्त का विरोध दिखाई पढ़ा है उसे काव्यप्रकाश कार ने जिस प्रकार निर्मूल सिद्ध किया है वह भी सर्वथा समीचीन है। अनुवाद-यदि आश्रय अथवा आलम्बन के एक होने के कारण दो रसों में परस्पर विरोध हो तो इसका परिहार यह है कि एक का आश्रय (आलम्बन) बदल दिया जाय और यदि ऐसा हो कि दो रस, एक के बाद एक, अव्यवहितरूप से रहने में विरुद्ध हो रहे हों तो उनके विरोध का शमन इस प्रकार किया जा सकता है कि उनके बीच में किसी एक दूसरे रस का व्यवधान डाल दिया जाय । आश्रयैक्य के कारण रस-विरोध संभव है जैसे कि वीर और भयानक में (क्योंकि एक ही व्यक्ति में उत्साह और भय भला एक साथ कैसे रह सकें!) किन्तु इस विरोध की शान्ति का एक सहज उपाय है और वह यह है कि भयानक रस का वर्णन प्रतिपक्ष (प्रतिनायकादि) के सम्बन्ध से कर दिया जाय (जिससे पत्ष-नायकादि-गत वीर का और भी अधिक परिपोष हो जाय)। इसी प्रकार नेरन्तर्य-अव्यवहित सान्निध्य-के कारण भी रस विरोध हुआ करता है जैसे कि शान्त और शङ्गार का, किन्तु इसके परिहार का भी उपाय है और वह है इन दोनों रसों के बीच में एक दूसरे रस का समावेश कर देना, जैसा कि 'नागानन्द' नाटक में स्पष्ट है,जहाँ नायक जीमूतवाहन के सुखभोगवैरस्य-विषयक शमभाव और मलयवती- विषयक रतिभाव में, इनके अव्यवहितरूप से प्रकाशन के कारण जो विरोध होता, उसे इन दोनों के बीच में 'अहो गीतम् अहो वादित्रम्'कैसा सुन्दर गाना, कितना सुन्दर

दिया गया है। बजाना' आदि रूप से अद्भुत रस अर्थात् विस्मयभाव के संनिवेश द्वारा, दूर कर

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सप्रम उल्लास: २७७

(प्रबन्ध के ततिरिक्त मुक्तक काव्य में रस-विरोध और उसका समाधान ) न परं प्रचन्धे यावदेकस्मिन्नप वाक्ये रसान्तरव्यवधिना विरोधो निवर्तते। यथा- भूरेणुदिग्धान् नवपारिजातमालारजोवासित बाहुमध्याः । गाढं शिवाभि: परिरभ्यमाणान् सुराङ्गनाश्लिष्टमुजान्तरालाः॥३३३॥ सशोणितैः क्रव्यभुजां स्फुरद्भि: पक्षेः खगानामुपवीज्यमानान्। परप संधीजिताश्चन्दनवारिसेकै: सुगन्धिभिः कल्पलतादुकूलः ॥३३४॥F विमानपर्यङ्कतले निषण्णाः कुतूहलाविष्ठतया तदानीम्। निदिश्यमानॉल्ललनाङ्रुलीभिर्वीराः स्वदेहान् पतितानपश्यन्॥ ३३५॥ अत्र बीभत्स-शृङ्गारयोरन्तर्वीररसो निवेशितः । टिप्पणी-आचाय मम्मट ने यहाँ ध्वनकार को इन सूक्तियों का अनुवर्तन किया है- 'चिरुद्वुँकाश्रयो यस्तु विरोधी स्थायिनो भवेत्। स विभिन्नाश्रयः कार्यस्तस्य पोषेऽप्यदोषता।' 'ऐका धिकरण्य विरोधी नैरन्तर्यविरोधी चेति द्विविधो विरोधी, तत्र प्रबन्धस्थेन स्थायि- नाडङ्गिना रसेनौचित्यापेक्षया विरुद्धैकाश्रयो यो विरोधी यथा वीरेण भयानकः सविभिन्ना श्रयः कार्यः । तस्य वीरस्य य आश्रयः कथानायकस्तद्विपक्षविषये सन्निवेशयितव्यः। तथा सति च तस्य विरोधिनोऽपि यः परिपोषः स निर्दोषः। विपक्षविषये हि भयातिशय- वर्णने नायकस्य नयपराक्रमादिसम्पत् सुतरामुद्योतिता भवति।' 'एकाश्रयत्वे निर्दोषो नैरन्तर्ये विरोधवान्। रसान्तरव्यवधिना रसो व्यङ्ग्यः सुमेधसा॥ यः पुनरेकाधिकरणत्वे निर्विरोधो नैरन्तर्ये तु विरोधी स रसान्तरव्यवधानेन प्रबन्धे निवेशयितव्यः। यथा शान्तशृङ्गारादी नागानन्दे निवेशितौ। और साथ ही साथ किया है लोचनकार की इस समीक्षा का समर्थन- 'यस्तु स्थायी स्थाय्यन्तरेणाSसंभाव्यमानकाश्रयत्वाद् विरोधी भवेद् यथोत्साहेन भयं स विभिन्नाश्रयत्वेन नाय्रकविपक्षादिगामित्वेन कार्यः । तस्य विरोधिनोऽपि तथा कृतस्य तथा निबद्धस्य परिपुष्टतायाः प्रत्युत निर्दोषता नायकोत्कर्षाधानात्। अपरिपोषणं तु दोष एवेति यावत्। 'एकाश्रयत्वेन निमित्तेन निर्दोषः न विरोधी किन्तु निरन्तरत्वेन निमित्तेन विरोध मेति स तथाविधविरुद्धरसद्वयाविरुद्धेन रसान्तरेण मध्ये निवेशितेन युक्त: कार्यः। प्रबन्ध इति बाहुल्यापेन्षं, मुक्तकेऽपि कदाचिदेवं भवेदपि, यद्वच्यति एकवाक्यस्थयोरपि। ( धवन्यालोक तथा लोचन, ३८७३८८ पृष्ठ) अनवाद-केवल प्रबन्ध काव्य में ही नहीं अपितु एक-वाक्य में भी रस-विरोध हो तकता है और उसका भी निवारण-प्रकार यही है कि दो विरुद्ध रसों के बीच एक और रस का प्रकाशन किया जाय (जो दोनों से अविरुद्ध हो)। उदाहरण के लिए- 'देवत्व-प्राप्ति के बाद, देव-विमान के पर्यक्क पर बैठे शूरवीर योद्धा लोग एक ओर तो अपने चक्षस्थल पर लटकती पारिजात की माला से सुरभित-सुशोभित होने लगे और दूसरी ओर अप्सराओं की अंगुलिओं के संकेत से दिखाये गये, युद्धभूमि में पड़े, अपने धूलिधूसरित शरीर को भी देखने लगे, एक ओर तो सुराङनाओं के आलिङ्गन का आनन्द लेने लगे और इतना ही क्यों एक ओर जब चन्दन जल के छिड़काव से शीतल सुगन्धित कल्पलता के पंखों की हवा खाने लगे तो दूसरी ओर मांसभक्ती पक्तिओं के बड़े बड़े रक्तरक्षित डैनों की, अपने शर्वों पर फड़फड़ाहट भी देखने लगे। कैसा कौतूहल रहा होगा उनका !'

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काव्यप्रकाश:

(रस-विरोध-परिहार का एक अरपरन्य निमित्त) (८६) स्मर्यमाणो विरुद्धोऽपि साम्येनाथ विवक्षितः। । 5 अङ्गिन्यङ्गत्वमापौ यौ तौ न दुष्टौ परस्परम् ॥ ६५॥ (विरुद्ध रस के स्तृतिरूप से उपनिबन्ध में दोष-परिहार) अयं स रशनोत्कर्षी पीनस्तनविमर्दनः । नाभ्यूरुजघनस्पर्शी नीवीविस्त्रंसन: करः ॥ ३३६॥ एतद् भूरिश्रवसः समरभुवि पतित हस्तमालोक्य तद्वघूरभिदधी। अत्र पूर्वावस्थास्मरणं शृङ्गाराङ्मपि करुणं परिपोषयति। (विरुद्ध रसों की साम्यविवक्षा में अविरोधिता ) दन्तक्षतानि करजैश्र विपाटितानि

दत्तानि रकमानसा मृगराजवध्धा

यहाँ यह स्पष्ट है कि वीसत्स और शङ्गार के बीच वीररस का समावेश किया हुआ है और वह इसलिये जिसमें इन विरुद्ध रसों का विरोध शान्त हो जाय (और अन्ततो- गत्वा वीर की एक विचित्रता के साथ और भी अधिक उत्कृष्ट अभिव्यक्ति हो उठे।) टिप्पणी-काव्यप्रकाशकार ने यहां ध्वनिकार की इम मान्यश का अनुमोदन किया है- 'रसान्तरान्तरितयोरेकवाक्यस्थयोरपि। निवतते हि रसयोः समाधेशे विरोधिता॥' रसान्तरव्यवहितयोरेकप्रबन्धस्थयोर्विरोधिता निवर्तत इत्यत्र न काचिद् भ्रन्तिः। यस्मादेकवाक्यस्थयोरपि रसयोरुक्तया नीत्या विरुददता निवतते यथा-भूरेणुदिग्धान् ·.· इत्यादी। अत्र हि शङ्गारवीभत्सयोस्तद्ङ्गयोर्वा वीररसव्यवधानेन समावेशो न विरोधी। (ध्वन्यालोक, पृष्ठ ३९५ ) अनुवाद-प्रकृत रस का विरोधी भी रस यदि प्रकृत रस के साथ स्मृति-रूप से उपनिबद्ध हो तो इससें कोई रसदोष नहीं, साथ ही साथ प्रकृत रस-विरुद्ध भी यदि कोई रस प्रकृत रस के साथ साम्यभाव से विवच्षित हो, तो भी कोई रस दोष नहीं और इसके अतिरिक्त यदि परस्पर विरुद्ध भी दो रस किसी प्रकृतप्रधान रस-भाव के अङ्गउपकारक बन जायँ तब तो रस-दोष की सम्भावना ही कहाँ!

जसा कि) :- (प्रकृत रस-चिरुद्ध रस के स्मृतिरूप से समावेश में कोई रस-दोप नहीं हुआ करता 'ओह ! यही वह हाथ है जो कभी कटि मेखला खींचा करता था! पीन कुरचो का मर्दन किया करता था! नाभि और नितम्ब का स्पर्श किया करता था! नीवी-बन्ध को ढीला किया करता था! किन्तु अब ! अबतो उसकी याद हीबच रही है', यहाँ (महाभारत स्त्रीपर्व, २४ अध्याय की इस सूक्ति में) भूरिश्रवा की वधू का, संग्राम में पड़े भूरिश्रवा के हाथ को देखकर करुण-कदन वर्णित है। यहाँ यह स्पष्ट है कि रशनाकर्पगादि रूप शरृंगार के अनुभावों का, करुण से विरुद्ध होने पर भी, स्मरण दशा में जो वर्णन है उससे यहां करुण का विरोध होना तो दूर रहे, प्रत्युत, परिपोष ही किया जा रहा है। है जैसे कि) (साम्यरूप से विवक्षित होने पर भी दो विरुद्व रसों का विरोध शान्त रहा करता

हे भगवान् वोधिसत्व ! आपके 'प्रोद्िन्नसान्द्रपुलक'-शरणागतरक्षण के लिये (और पत्ान्तर में-अनुरागाधिक््य के कारण) आनन्द से रोमांचित शरीर में मुनियों ने 'मृगराजवधू'-सिंहिनी द्वारा 'रक्तमनसा' रुधिरपान की इच्छा से (पत्तान्तर में प्रेमार्द

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सप्तम उल्लास: २७६

अत्र कामुकस्य दन्तक्षतादीनि यथा चमत्कारकारीणि तथा जिनस्य। यथा वापरः शृङ्गारी तदवलोकनात्सस्पृहस्तद्वत् एतद्दृशो मुनय इति साम्यविवक्षा। (परस्पर विरुद्ध रसों की, एक रस-भाव के अङ्गरूप से उपस्थिति में, अर्विरोधिता) क्रामन्त्यः क्षतकोमलाङ्गुलिगलद्रक्तः सदर्भाः स्थली: पादैः पातितयावकैरिव गलद्वाष्पाम्बुधौताननाः।

दावामिं परितो भ्रमन्ति पुनरष्युद्यद्विवाहा इव ॥ ३३८ ॥ अत्र चाटुके राजविषया रतिः प्रतीयते। तत्र करुण इव शृङ्गारोऽप्यङ्गमिति तयोन विरोधः। यथा- हृदय से) किये राये 'दन्तक्षत'-दातों के घाव (पत्तान्तर में प्रणयलीला के दन्तक्षत) और 'नख-चत'-नखों के खरोच (पत्तान्तर में रतिकेलि के नखक्षत) को बड़ी लालसा से (इस भाव से कि उनका कब सौभाग्य होगा कि ऐसी करुणा की सिद्धि उन्हें भी होगी!) देखा।' इस सूक्ति में, जहाँ शान्त और शद्गार का पारस्परिक विरोध शान्त प्रतीत हो रहा है। इस विरोध-शान्ति का कारण है शान्त और शङ्गार की साम्य-विवत्ता क्योंकि यहाँ जो प्रतीति है वह इस प्रकार की है-एक दृष्टि से तो शान्त और शङ्गार की अनुभाव- साम्यविवत्ा अर्थात किसी कामुक के हृदय में नायिका-प्रदत्त दन्तक्षत और नखक्तत से 中 百 行 冷 书 色 आानन्द की अनुभूति और बोधिसत्व के हृदय में, सिंहिनी द्वारा उनके शरीर पर किये गये दांतों के घाव और नखों के खरोच से परमानन्द की प्राप्ति का परस्पर साम्य और दूसरी दृष्टि से शान्त और शङ्गार की उद्दीपन विभाव-साम्य-विवत्ता अर्थात् किसी कामुक के हृदय में दूसरे किसी कामुक के शरीर पर दृष्टिगोचर होने वाले दन्तक्षत आदि दर्शन से रतिविपयक अभिलाषा और मुनिजन के हृदय में बोधिसत्व के शरीर पर दिखाई देने वाले सिंहिनी के दांतों और नखों के आघात के दर्शन से स्वविषयक करुणवेदिता अथवा प्रशम- भावना की अभिलाषा का परस्पर साम्य। (अभिप्राय यह है कि यहाँ परस्पर विरुद्ध भी शङ्गार और शान्त बोधिसत्वरूप आलम्बन-माहात्म्य से अपना पारस्परिक विरोध छोड़ कर साम्यभाव से रह रहे हैं और कवि ने इन विरुद्ध रसों का साम्य समासोक्तिसंसृष्ट विरोधाभास अलंकार की महिमा से उपनिबद्ध कर दिखाया है।) (दो परस्पर विरुद्ध रसों की भी विरोध-शान्ति सम्भव है यदि वे एक प्रधान रस-भाव के अङ्गरूप से उपनिबद्ध हों, जैसे कि, यह सूक्ति- 'राजन् ! आपके शत्रुओं की अब यह दशा है कि उनकी स्त्रियाँ दर्भाक्करों से भरी वनस्थली पर (पत्तान्तर में कुशास्तरण से युक्त विवाह-होम की वेदी पर) अपनी चत विक्षत कोमल अङ्गुलियों से लो हूलुहान, मानो अलक्तक की लाली लिये, पैरों से भटकती- फिरतीं, निरन्तर गिरते शोक के आँसुओं (पत्तान्तर में होम धूम के आँसुओं) से भीगे मुँह लिये, आप के सैनिकों से घबरायीं (पत्तान्तर में वर के नव मिलन से भयभीत) और अपने पतियों के हाथों का सहारा लिये (पत्तान्तर में पाणि-्रहण हो चुकने पर) जङ्गलों में लगी आग के आस-पास (वैवाहिक अभ्नि के चारों ओर) ऐसे घूमती दिखाई दे रही हैं जसे उनका पुनः विवाह होने जा रहा हो।' जहाँ, राजविषयक स्तुति होने से, राजविषयक रति भाव ही प्रधानतया, आस्वाद का विषय है जिसकी अपेक्षा परस्पर- चिरुद्ध भी करुण और शङ्गार, अंगरूप से उपनिबद्ध हो कर (उसी प्रकार अंग रूप से साथ-साथ निबद्ध हो कर जिस प्रकार एक राजा के आगे उसके दो सेनापति अपना

सूक्ति अर्थात्- वैर-वैमनस्य छोड़ कर साथ-साथ रहा करते हैं) निर्विरोध पढ़े है। वस्तुतः जैसे इस

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२६० काव्यप्रकाश:

एहि गच्छ पतोत्तिम वद मौनं समाचर। एवमाशाग्रहग्रस्तैः क्रीडन्ति धनिनोऽर्थिभिः ॥ ३३६॥

योर्न विरोधः । इत्यत्र एहीति क्रीडन्ति गच्छेत क्रीडन्तीति क्रीडनापेक्षयोरागमन गमन-

क्षिप्तो हस्तावलग्नः प्रसभमभिहतोऽप्याददानोंऽशुकान्तं गृहन् केशेष्वपास्तश्चरणनिपतितो नेक्षितः संभ्रमेण। आलिङ्गन् योऽवधूनस्त्रिपुरयुवतिभिः साश्रनेत्रोत्पलाभिः कामीवार्द्रापराधः स दहतु दुरितं शांभवो वः शराग्निः ॥३४०॥ इत्यत्र त्रिपुररिपुप्रभावातिशयस्य करुणोड्ङ्गम् तस्य तु शृङ्गारः तथापि न करुणे विश्रान्तिरिति तस्याङ्गतैव। अथवा प्राग यथा कामुक आचरति स्म तथा शराग्निरिति शृङ्गारपोषितेन करुणेन मुख्य एवार्थ उपोद्वल्यते। उक्तं हि- 'कुछ मिलने की आशा-पिशाची के फेर में पढ़े याचक लोगों साथ धनी लोग यह खेल खेला करते हैं-एक बार 'आओ' कह कर बुलाते हैं; फिर 'जाओ' कह कर हटाते हैं, एक बार 'बैठो' कह कर बैठाते हैं; फिर 'उठो' कह कर उठाते हैं और एक वार जब 'वोलो' कह कर बुलवाते हैं तो दूसरी बार 'चुप रहो' कह कर चुप भी करा देते हैं !' में, परस्पर विरुद्ध भी गमनागमनादि की क्रियायें क्रीडा के अङ्गरूप से रहने के कारण अविरुद्ध प्रतीत हो रही हैं वैसे ही उपर्युक्त्त 'क्रामन्त्यः'आदि सूक्ति में स्वभावतः विरुद्ध भी करुण और शङ्गार राज-विषयक रतिभाव के अङ्गरूप से रहने के कारण, परस्पर निविरुद्व रूप से पड़े हैं। अथवा यह सूक्ति अर्थात्- 'त्रिपुर दाह में प्रवृत्त महादेव शङ्कर का वह शर-दहन-बाणाग्नि वर्षण जो आँखों में आँसू लिये त्रिपुरवधुओं के द्वारा, एक आर्द्रापराध (पहली बार ही अपराध करने वाले) कामी की भाँति, हाथ से हटाने पर भी हाथ पकढ़ लेने वाला, मना किये जाने पर भी बलारकारपूर्वक अञ्ञल छूता हुआ, धक्के खाकर भी केशपाश को बिना छूए न मानने वाला, पैरों पर पड़ने पर भी सम्भ्रमवश बिना देखे दुतकारा गया और आलिङ्गन कर लेने पर भी फटकारा गया ऐसी लीलाओं में बिना लगे नहीं मानता, आप सब के पाप-सन्ताप को जला कर राख कर दे।' यहाँ त्रिपुरान्तक शिव के महाप्रभाव के प्रति कविनिष्ठ रतिभाव का प्राधान्य स्पष्ट है जिसकी अपेक्षा करुण (वरतुतः त्रिपुरसुन्दरियों की व्याकुलता का करगोद्दीपन विभाव) अङ्गरूप से उपनिबद्ध है और जो शङ्गार (वस्तुतः करालम्बनादि रूप शङ्गार का अनुभाव) प्रतीत हो रहा है वह करुण के अङ्गरूप से प्रतीत हो रहा है और अन्ततोगत्वा परस्पर विरुद्ध भी करुण और शृद्गार शिवविषयक कविगत रतिभाव के आगे (किसी राजा के आगे उसके सेनापति और उस सेनापति के किसी सेवक की भाँति) निर्विरोध सहायक रूप से उपस्थित प्रतीत हो रहे हैं। वैसे शङ्गार की अपेक्षा यहाँ करुण अवश्य प्रधान है किन्तु शिवविषयक रतिभाव के आगे करुण भी अप्रधान ही है जिससे करुणरस की उत्कट प्रतीति यहाँ असंभव है क्योंकि यहाँ तो शङ्गार द्वारा परिपुष्ट करुण भी वस्तुतः त्रिपुर- रिपुविषयक रतिभाव को ही, जो कि प्रधान है, प्रबल रूप से प्रकाशित करने में तत्पर दिखायी दे रहा है और ऐसा इसलिये क्योंकि यहाँ किसी कामुक द्वारा किये गये किसी रमणी के करालग्बन आदि के समान शंभु-शराग्नि द्वारा त्रिपुर-सुन्दरियों के करालग्वन आदि के वर्णन में शद्गार के अनुभावों को करुण के विभावों के उपमान रूप से प्रस्तुत किया गया है। यहाँ यदि यह कहा जाय कि करुण के अंगरूप से अवस्थित शङ्गार त्रिपुरान्तक विषयक

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सप्तम उल्लास: २८१

गुण: कृतात्मसंस्कार: प्रधानं प्रतिपद्यते प्रधानस्योपकारे हि तथा भूयसि वतते॥ इति । कविनिष्ठ रतिभाव का अङ्ग कैसे हो जाय तो इसके लिये यह प्राचीन युक्ति ही निर्णायक है- 'वह गुण अथवा अप्रधान वस्तुतः अधिकाधिक रूप से किसी प्रधान का उपकारक सिद्ध हुआ करता है जो कि अपने किसी अंग अथवा उपकारक द्वारा उपकृत होकर उस प्रधान का अङ्ग बना करता है।' टिप्पणी-(क) यहाँ प्रकृत-विरुद्ध रस के स्मर्यमाण रूप से उपनिवन्ध में प्रकृतरस के परिशेष की जो युक्ति है उमका आधार यह है 'वाक्यार्थीभूतस्यापि कस्यचित् करुगरस- विपयस्य तादृशेन शृङ्गारवस्तुना भङ्गिविशेषाश्रयेण संयोजनं रसपरिपोषायेव जायते। यतः प्रकृतिमधुराः पदार्थाः शोचनीयतां 'प्राप्ताः प्रागवस्थाभाविभिः संस्मर्यमाणैविलासैरधिक- तरं शोकाचेशमुपजनयन्ति। यथा-'अयं स रशनोरकर्षी इत्यादौ। (धवन्यालोक पृष्ठ ३७६) यद्यपप ध्वनिकार ने रसाविरोध के निमित्तों में स्मर्यमाण रूप से विरुद्ध रस के समावेश को कोई स्थान नहीं दिया क्योंकि ध्वनिकार का यह कथन, 'चिप्तो हस्तावलग्नः' आदि सूक्ति में जो दो विरुद्ध रसों के अन्यपरक होने में विरोधाभाव है उसी का एक समर्थन-प्रकार है किन्तु आचार्य मम्मट ने इस युक्ति को विरुद्ध रसों के अविरोध के एक निभित्तरूप से मान लिया है जिसमें कोई अनौचित्य नहीं। (ख) साम्य-विवक्षा के निमित्त से विरुद्धरसों की अविरोधिता का जो मम्मट ने प्रतिपादन किया है उसका आधार ध्वनिकार आनन्दवर्धन की यह उक्ति है- 'उत्कर्षसाम्येऽपि तयोर्विरोधासंभवाद् यथा, एकतो रोदिति प्रियाऽन्यतः समरतूर्यनिर्घोषः। स्नेहेन रणरसेन च भटस्य दोलायितं हृदयम् ॥' (ध्वन्यालोक पृष्ठ ३८३) (ग) एक अङ्गी रस के उपकारक रूप से दो परस्पर विरुद्ध रसों के समावेश में जो रसा- विरोध है उसका ध्वनिकार कृत प्रतिपाद्न यह है- 'इयं चाङ्गभावप्राप्तिरन्या यदाधिकारिकत्वात् प्रधान एकस्मिन् वाक्यार्थे रसयोर्भाव- योर्वा परस्परविरोधिनोद्वयोरङ्गभावगननं तस्यामपि न दोपः। यथोक्तं चषिप्तो हस्तावलग्न. इत्यादौ। कथं तत्राऽविरोध: इति चेत्, द्वयोरपि तयोरन्यपरत्वेन व्यवस्थानात्। अन्यपर- त्वेऽपि विरोधिनो: क्थं विरोधनिवृत्तिरिति चेत्, उच्यते विधौ विरुद्धसमावेशस्य दुष्टत्वं नानुवादे। ......... किञ्च नायकस्याभिनन्दनीयोदयस्य कस्यचित् प्रभावातिशयवर्णने तत्प्रतिपक्षाणां यः करुणो रसः स परीक्षकाणं न वैक्लव्यमादधाति प्रत्युत प्रीत्यतिशयनिमित्ततां प्रतिपद्यत इत्यतस्तस्य कुण्ठशक्तिकत्वात्तद् विरोधविधायिनो न कश्विद्दोषः। ... तदत्र त्रिपुरयुवतीनां शांभवः शराग्निरारद्पिराधः कामी यथा व्यवहरति स्म तथा .....

व्यवहृतवानित्यनेनापि प्रकारेणास्त्येव निर्विरोधत्वम्। तस्माद् यथा यथा निरुप्यते तथा तथात्र दोषाभाव:। (ध्वन्यालोक पृ० ३६९-३७७) (घ) आचार्य मम्कट ने परस्पर अङ्गाद्िभाव सम्वन्ध से सम्बद्ध दो रसों के एक प्रकृत रस के उत्कर्षकरूप से उपस्थिन रहने में मीर्मामादर्शन की युक्ति का प्रमाण दिया है। मीमासा में 'गुणानां च परार्थत्वात्'-यह एक 'न्याय' है जिसका अभिप्राय यह है कि दो अङ्गभून पदार्थो में, उनके साम्य के कारण, अङ्गाङ्गिभावसम्बन्ध असंभव है किन्तु यह एक सामान्य विषय है जिसका अपवाद है-गुणः कृतात्मसंस्कारः प्रधानं प्रतिपद्यते।' जिसका अभिप्राय यह है कि एक गुण भी कभी दूसरे गुग से (गुण = अङ्ग अथवा विशेषण= अप्रधान पदार्थ) सम्बद्ध होकर प्रधान का उत्कर्षाधायक हुआ करता है।

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६२ काव्यप्रकाश:

(रस के विरोधाविरोध का वास्तविक अर्प्रभिप्राय ) प्राकप्रतिपादितस्य रसस्य रसान्तरेण न विरोधो नाप्यङ्गाङ्गिभावो भवति इति रमशब्देनात्र स्थायिभाव उपलक््यते।

इति काव्यप्रकारो दोपदर्शनो नाम सतम उल्लासः।।७।।

अनुतद- यहाँ एक रस के दूलरे रस के साथ विरोध अथवा अविरोध अथवा अङ्गङ़ि- भाव का अभिप्राय है एक स्थायीभाव के दूसरे स्थायीभाव से विरोध अथवा अविरोध अथवा अज्गाज्ञिभाव गा। रस के विरोध और विरोध परिहार के ग्सन् में रस शब्द का प्रयोग विगलितवेद्यानरूरस्पर्शरूप उस रस (अस्वाद ब्रह्मानन्द-सहोदर काव्यानन्द) के लिये नहीं जिसका पहले (चतुर्थ उल्लास में) प्रतिपादन किया जा चुका है और जिसमें विरोध और विरोध-समाधान और अङ्गाङ्गिभाव की कल्पना भी नहीं उठ सकती, अपि तु उसके लिये-उसका उपरहग (संकेत ) है-जिसे वस्तुतः स्थायीभाव कहना चाहिये। टिप्पणी-नाव्यशास्त्र के आचार्य निगलितवद्यानतरस्पशरूप रस और स्थायीभावनदोनों के परस्पर विरोध को "स विरोध' के रूप में मानते रहे है। ध्वनिकार ने रस-विरोध के इन दोनों अभिद्रायों को इस प्रकार सपष्ट किया है :- 'एतच् सर्वं (अविरोधिनां विरोधिनां च रसानामङ्गाङ्गिभावेन समावेशे प्रवन्धेष्ववि- रोधित्वादि) येषां रसो रसान्तरस्य व्यभिचारी भवति इति दर्शनं तन्मतेन उच्यते। मतान्तिरे तु रसानां स्थायिनो भावा उपचाराद्रसश्देनोक्तास्तेषामङगत्वं निर्विरोधमेव।'

और लोचनकार का भी ऐसा ही अभिमत है :- (ध्वन्यालोक पृष्ठ ३८७)

'एतदुकं भवति-अङ्गभूतान्यपि रसान्तराणि स्वविभावादिसामग्रया स्वावस्थायां यद्यपि लब्धपरिपोषाणि चमत्कारगोचरतां प्रतिपद्यन्ते, तथापि स चमत्कारस्तावत्येव परितुप्य न विश्राम्यति किंतु चमत्कारान्तरमनुधाव्रति। सर्वत्रैवाङ्गाङ्गिभावेऽयमेवोदन्तः। यथाह तत्र भवान्- 'गुणः कृतात्मसंस्कारः प्रधानं प्रतिपद्यते। प्रधानस्योपकारे हि तथा भूयसि वर्त्तते ॥' (ध्वन्यालोक, पृष्ठ ३७९) किन्तु आचार्य मम्मट ने यहाँ रसविरोध और रसाविरोध का अभिप्राय 'स्थायी विरोभ' और 'स्थाच्यविरोध' ही लिया है।

सप्तम उल्लास समाप्त।

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अष्टम उलास:

(गुणनिरूपणात्मक:) एव दोषानुक्त्वा गुणालङ्कारविवेकसाह- ('गुण और अलंकार' का वैधर्म्य) (८७) ये रसस्याङिंगनो धर्माः शौर्यादय इवात्मनः उत्कर्ष हेतवस्ते स्युरचलस्थितयो गुणा ॥ ६६ ॥ अनुवाह- इस प्रकार (सप्तम उल्लास में) दोषों का निरूपण कर चुकने पर (काव्य- लक्षण का अनुसरण करते हुये) अब 'गुण' और 'अलङ्गार' का वैधर्न्य बताया जा रहा है (जिससे गुण-स्वरूप स्पष्टतया प्रतीत हो सके )- जिस प्रकार शरीर में प्रधानतया विराजमान (चित्स्वरूप) आत्मा के कौर्य आदि धर्म आत्मा के साथ अपटथक सिद्ध अथवा नियतावस्थित रहा करते हैं और आत्म-तत्व की ही श्री-वृद्धि किया करते हैं उसी अकार काव्य में प्रधानतया विराजमान (आनन्दरूप) रस के भी माधुय, ओज और प्रसाद रूप धर्म, रस के साथ अपृथक सिद्ध किंदा नियमतः अवस्थित रहते हुये, रसतत्व की ही श्री-वृद्धि किया करते हैं और इसीलिये रस के गुण कहे जाया करते हैं। टिप्पणी-(क) सम्भवतः अलक्कारशास्त्र के उद्धन-काल से ही 'गुण' को काव्य की एक विशेषता माना जाता आ रही है। किन्तु जहाँ प्राचीन आलक्कारिक 'गुण' को शब्द और अर्थ के शोभावह धर्म के रूप में देखते दिखाते आये हैं वहाँ अलक्गारशास्त्र के नवीन आचार्य-ध्वनिवादी आचार्य-'गुण' को रसरूप काव्यार्थ का अपृथक सिद्ध धर्म सिद्ध चर चुके हैं। आचार्य गम्मर की गुण-सम्बन्धी मान्यता ध्वनिवाद के प्रवर्तक और प्रतिष्ठापक आचार्य आनन्दवर्धन और अभिनः गुप्त की गुण-सम्बन्धी मान्यता का समर्थन है। ध्वनिवादी आचार्य रसरूप काव्यार्थ और गुग में द्रव्य-गुण-भाव नहीं अपितु धर्मि-धर्मभाव मानते हैं क्योंकि द्रव्य गुण भाव मानने में समनाय सम्बन्ध का ानना अनिवार्च हो जाय और समताय-सम्बन्ध के मानने पर यह भी मानन आवश्यक हो जाय कि द्रव्यभून रसरूप काव्यार्थ, नैयायिकों की इस मान्यता के अनुसार वि. द्रव्य अपनी उत्पत्ति के क्षण में निर्गुण है, (क्षणं द्रव्यमगुण तिष्ठति ) क्षणसर द्रव्य गुग-शन्य रहा करता है! 'रस' और 'गुण' में ध्वनिवादी आनार्य 'अपृपक सिद्धि' 'नियतावस्थिति' का सम्बन्ध मानते हैं जिसका अभिप्राय यही है कि 'रस' और 'गुण' का बौद्धिक निश्लेषण भले ही किया जा सके किन्तु ऐसा नहीं हो सकता कि 'रस' क्षगभर भी गुण से पृथक रह सके अथवा 'गुग' हो 'रस' से क्षगभर भी अलग रह जाय। (ख) आचार्य आनन्दवर्धन की जिस गुग-सम्वन्धी मान्यता का यहाँ आचार्य मम्म ने अनुसरण किया है वह धनन्यालोक ( पृष्ठ २०४) जो इन पडित्त्तयों में स्पष्ट झलकू रही है- 'तमर्थमवलम्वन्ते येऽङ्गिनं ते गुणाः स्मृताः।' ये तमर्थ रसादिलक्षणमद्गिनं सन्तसच- लम्बन्ते ते गुणा: शौर्यादिवद्।' जिनका यही अभिप्राय है कि मुण काव्यरूप अर्थात रसरूप अङ्गी धर्मी से सम्बन्ध रखते वाले हुआ करते हैं न कि काव्य के अङ्गभूत शब्द्र और अर्थ से। आचार्य अभिनवगुप्त की गुण-सम्बन्धी दृष्टि भी, जो कि वस्तुतः ध्वनिकार की उपयुक्त दृष्टि से ही प्रभावित है, गुण को रस के धर्म-रस से अनृबक सिद्ध-रूप में ही देखनी है- 'ते च (माधुयोज सादा एच त्रयो गुणाः) प्रतिपत्रास्वादमयाः सुख्यतया तन आस्वादये उपचरिता रसे ततस्तद्त्यञ्जकयो: शब्दार्थयोरिति' (ध्वन्यालोकलोचन, पृष्ठ २१३

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२८४ काव्यप्रकाश: आत्मन एव हि यथा शौर्यादयो नाकारस्य तथा रसस्यैव माधुर्यादयो गुणा न वर्णानाम । कचित्तु शौर्यादिसमुचितस्याकारमहत्वादेदर्शनात्, 'आकार एवास्य शूरः' इत्यादेव्यवहारादन्यत्राशूरेऽपि वितताकृतित्वमात्रेण 'शूर' इति क्वापि शूरेऽपि मूर्तिलाघवमात्रेण 'अशूरः' इति अविश्रान्तप्रतीतयो यथा व्यवह- रन्ति तद्वन्मधुरादिव्यञ्जकसकुमारादिवर्णानां मधुरादिव्यवहारप्रवृत्तेरमधुरादिर- साङानां वर्णानां सौकुमार्यादिमात्रेण माधुर्यादि मधुरादिरसोपकरणानां तेपाम सौकमार्या देरमाघुर्यादि रसपर्यन्तविश्रान्तप्रतीतिबन्ध्या व्यवहरन्ति। अत एव माधुर्यादयो रसधर्माः समुचितैर्वर्णेव्यंज्यन्ते न तु वर्णमात्राश्रयाः। यथषां व्यञ्ञ- कत्वं तथोदाहरिष्यते। अनुवाद-माधुर्य, ओज और प्रसाद-धे गुण (क्योंकि अन्तिम विश्लेषण में ये ही तीन गुण बच रहते हैं) यहाँ 'रसधर्म' इसलिये कहे गये हैं क्योंकि ये 'रस' के ही सुण हैं न कि वर्णों के, क्योंकि शौर्य आदि धर्म भी तो आत्मा के ही गुण हुआ करते हैं शरीर के कहाँ ? काव्य-तत्व-ज्ञानियों के लिये तो 'गुण' रस-धर्म ही हैं और वैसे ही हैं जैसे आत्म- तत्व-ज्ञानियों के लिये 'शौर्य' आदि आत्म धर्म हैं। यह तो आत्म-याथात्य के अनुभव में अशक्त लोगों की बात है कि कहीं ( आत्म-वर्म) शौर्यादि का अभिव्यज्जक कोई लम्बा- चौड़ा आकार-प्रकार दिखाई दिया और उसी को कह दिया-'कितना शूर है यह आकार !' अथवा कहीं वस्तुतः डरपोक किसी व्यक्ति की लम्बी-चौड़ी डील-डौल दिखाई दी और उस व्यक्ति को कह दिया-'यह तो बड़ा शूर है' अथवा कहीं वस्तुतः शूर-वीर भी किसी व्यक्ति की छोटी-ठिगनी देह देख कर कह दिया कि-'यह तो डरपोक है'! इसी प्रकार (रस के धर्म) माधुर्य, ओज आदि के अभिव्यक्षक सुकुमार, कठोर आदि वर्णों को ही मधुर (माधुर्य गुणपूर्ण) ओोजस्वी (ओज से समन्चित ) आदि कह बैठना अथवा वस्तुतः ओज़स्वी रौद्रवीरादि रसों के अभिध्यक्षक चणों की, उनकी केवल (आपाततः प्रतीत) सुकुमारता-मसृणता आदि के देखते, माधुर्ययुक्त आदि कह देना अथवा वस्तुतः मधुर श्रृङ्गारादि रसों के अभिव्यक्षक वर्णो को, केवल उनकी असुकुमार श्रुति के कारण, अमधुर आदि कह चलना उन्हीं लोगों की बाते हैं जो 'रसपर्यन्तविश्रान्तिप्रतीतिवन्ध्य' हैं अर्थात् ऐसे हैं जिनकी काव्यानुभूति रसरूप काव्यतत्व तक पहुँचने में असमर्थ है। वस्तुस्थिति तो यही है कि माधुर्य आदि गुण रस के धर्म हैं, रस से सर्वथा अपृथक सिद्ध हैं न कि वर्गों के धर्म हैं, वर्णों में नियतावस्थित हैं। वर्ण तो रसधर्मभूत माधुर्य आदि गुणों के अभिव्यक्षन-साधन हैं और किस प्रकार वर्णों के द्वारा माधुर्य आदि अभिव्यक्त हुआ करते हैं इसका तो आगे विशद सोदाहरग विवेचन किया ही जा रहा है। टिप्पणी-(क) वर्ण नहीं मधुर हुआ करता, रस मधुर हुआ करता है-यह मान्यता आचार्य आनन्दवर्धन की मान्यता है और उन सभी सहृदय काव्य-भावुकों की मान्यता है जिनकी काव्वानुभूति काव्य के परमार्थ-रस-तक पहुंचा करती है। आचार्य आनन्दवर्धन का इसीलिये कहना है- 'शृङ्गार एव मधुरः परः प्रह्लादनो रसः। तन्मयं काव्यमाश्रित्य माधुर्य प्रतितिष्टति ॥' 'शङ्गार एव रसान्तरापेक्षया मधुरः प्रह्लादहेतुत्वात्। तत्प्रकाशनपरशब्दार्थंतया काव्यस्य स माधुर्यलक्षणो गुणः ।' (ध्वन्यालोक २.८) अर्थात् सभी रसों की अपेक्षा शृङ्गाररस ही परम मधुररस है और ऐसा इसलिये है क्योंकि इलके अनुभव में मन जितना उल्लसित होता है उतना और किसी रस के अनुभव में कहाँ! श्रव्यता अथवा धतिसुखदता के कारण किन्हीं शब्दों को मधर कहना, जैमा कि प्राचीन आलक्कारिक आचार्य भामह का मत है-(श्व्यं नातिसमस्तार्थेशब्दं मधुरमिष्यते-काव्यालक्कार २.२.२.) इसलिये अनुपपन्र है क्योंकि श्रव्यता अथवा श्रुतिसुखदता का सम्बन्ध केवल 'माधुर्य' से ही नहीं

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अष्टम उल्लास: २=५

(अलद्कार : शब्दार्थशोभाधायक ) (२७) उपकुर्वन्ति तं सन्तं येडङ्गद्वारेण जातुचित्। हारादिवदलंकारास्तेऽनुग्रासोपमादय: ॥।६७ ।।

अपितु 'ओज' से भी जहाँ-तहाँ (जैसे कि 'यो यः शस्त्रं विभत्ति' आदि वेणीसंहार नाटक की सूक्ति में) दिखाई पड़ा करता है। आचार्य मम्मट ने यहां ध्वनिकार की इस माधुर्यगुण-मीमांसा का सवथा अनुरूरण किया है। (ख) ओजस्वी तो रस हो सकता है वर्ण कहां ?- यह समीक्षा ध्वनि-दार्शनिक आनन्द वर्धना- चार्य की ही समीक्षा है जैसा कि ध्वन्यालोक (२.९) की इन पंक्ियों से सष्ट है- 'रौद्धादयो रसा दीप्त्या लच्यन्ते काव्यवर्तिनः। तद्व्यक्तिहेतू शब्दार्थावाश्रित्यौजो व्यवस्थितम्।।' जिनका यही अभिप्राय है कि ओजस्वी रस तो रौद्ररस है अथवा वीररस है क्योंकि इन रसों का ही अनुभव ऐसा है कि सहृदय सामाजिक का हृदय उद्दोप्त हो उठता है। श्रते कठोरता के कारण शब्दों को ओजस्त्री मानना स्वया असंगत है। ध्वनिकार की इस ओजसगीक्षा का भी यहाँ आचार्य सम्मट ने स्थरण किया है। अनुवाद-'जिन्हें 'अलङ्कार' कहना चाहिये, जैसे कि शब्द के अलक्कार-अनुप्रास आदि और अर्थ के अलङ्कार-उपमा आदि वे उसी भाँति हैं, जिस भाँति हार आदि आभूषण हुआ करते हैं। अर्थात् जैसे हार आदि आभूषण कण्ठ आदि अङ्ग के सौन्दर्यवर्द्धक हुआ करते हैं वैसे ही अनुप्रास और उपमा आदि अलद्कार शब्द और अर्थरूप अङ्ग के सौन्दर्य- वर्धक हुआ करते हैं। यह एक दूसरी बात है कि कभी जैसे किसी सुन्दरी के कण्ठ का आभूपण उसके वास्तविक सौन्दर्य-उसके सुन्दर व्यक्तित्व-में चार चांद लगा दे वैसे ही कभी किसी कविता के शब्द अथवा अर्थ का अलद्वार उसके वास्तविक सौन्दर्य-उसके रसरूप आत्मतत्व-के भी चमक उठने में हाथ बँटा दे। टिप्पणी-(क) आचार्य आनन्दवर्धन ने अलक्गारो की रसरूप काव्यात्मतत्व दर नहीं अपितु वाच्य-दाचकरूप अङ्ग पर अवलम्बित सिद्ध किया है। उनका यह कथन है- 'अङ्गाश्रितास्त्वलङ्कारा मन्तव्याः कटकादिवत्।। 'वाच्यवाचकलक्षणान्यङ्गानि ये पुनः (अवलम्बन्ते ) तदाश्रितास्तेऽलंकारा मन्तव्याः कटकादिवत्।' (ध्न्यालोकलोचन २.६) जिसका तात्पर्य यह है कि अनुपरास और उपमा आदि और अर्थ के अलक्कार साक्षात् तो अद्गों के अलंकार है-वचक और वाच्च रूप काव्याङ्ों के श्ञोभावर्षक हैं और वैसे ही है जैसे कि कामिनी-शरीर के कटक कुण्डल आदि आभूषण। ध्वनिकार की इस उपर्युक्त धारगा का ही िश्लेषण लोचनका ने इन पंक्तियों में किया है- 'अलङ्कार्यव्य तिरिक्तश्चालक्कारोऽभ्युपगन्तव्यः लोके तथा सिद्धत्वात् यथा गुणिव्यतिरिक्तो गुणः । गुणालङ्कारव्यवहारश्च गुणिन्यलङ्कायें च सति सुक्तः । स चास्मत्पक् एवोपपन्नः।' (ध्वन्यालोकलोचन २. ६) जिनका निष्कर्ष यही है कि प्राचीन अतक्ारशास्त्र में 'गुण' और 'अलंकार' की चर्चा तो होती आा रही थी विन्तु 'गुण' और 'अलङ्वार' की यह चर्च निराधार थी क्योंकि न तो प्राचीन आलङ्कार्क रसरूप 'गुणी' से परिचित थे, जिसकी दृष्टि से माधुर्य आदि गुण वस्तुतः 'गुण' पता चलते और न रसरूप 'अलक्वार्य' से, जिसकी अपेक्षा अनुपास आदि अलद्धार वस्तुतः 'मलक्र' के रूप में दिखाई देने। 'गुण' और 'लक्गार' बिना 'गुणी' और 'अतद्ार्य' के विवेन के कोई अभिप्राय रखते नहीं प्रतीत हो सकते। 'गुण' तो 'हणी' स सदा अपृथक सिद्ध होगा किन्तु 'अलद्वार' के लिये 'ालद्वार्य' से स्ाप सम्बद होना आवश्यक नहीं। अलक्कार तो रसरूप काव्यात्मतत्त्व के अक्गभूत वाच्य-वाचक को ही साक्षात् अलंकृत कर सकेगा। अङ के अलद्वार

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२=६ काव्यप्रकाश:

('अ्लङ्गार' का रस से परंम्परया सम्बन्ध-यह सम्बन्ध नियत नहीं अपितु अ्रनियत ) ये वाच्य-वाचक लक्षणाङ्गातिशयमुखेन मुख्यरसं सम्भविनमुपकुर्वन्ति ते कष्ठादङ्गानामुत्कर्षघानव्वारेण शरिरिणोऽपि उपकारका हारादय इवालङ्काराः। यत्र तु नास्ति रसस्तत्रोक्तिवैचित्र्यमान्नपर्यवसायिनः। क्चित्तु सन्तमपि नोपकु- र्वन्ति। सथाक्रममुदाकरणानि- यदि अङ्गी को अलंकृत दिखावें तब तो वस्तुतः 'अलङ्गार' हुये। किन्तु ऐसी बात सदा होती नहीं। नभी तो महाकवि ने कहा है- 'किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम्।' ( अभिज्ञानशाकुन्तल-१) इसलिये 'गुण' और 'रस' में धर्मधर्मिभाव सम्बन्ध तथा 'रस' और 'अलक्वार' में भूष्यभूषक भाव सम्बन्ध मानना अनिवार्य है। 'धर्म' और 'धर्मी' तो सदा नियमतः सहावस्थित होंगे किन्तु भूतय (अलक्कार्य ) और 'भूषक' (अलद्कार) परम्परया सम्बद्ध होंगे। जिसे 'अलक्कार्य' कहते हैं वइ न तो श द है और न अर्थ अपितु शब्दरार्थशरीर 'काव्य' हैं-'रस' है। शब्द के अलङ्कार सरूप अलक्कार्य के वाचकरूप अङ् और अर्थ के अलक्कार रसरूप अलक्कार्य के वाच्यरूप अङ्ग के चलद्वार है। जैसे हार-केयूर आदि को कामिनी व्यक्तित्व का नहीं अपि तु कामिनीकलेवर का ही अलक्वार कहा जाता है वैसे ही अनुप्रास-उपमा आदि को भी कविताव्यक्तित्व का नहीं अपितु कविता-कलेवर-शब्द और अर्थ-का ही अलक्कार कहा जाना चाहिये। आचार्य मम्मट ने ध्वनिवाद की इसी 'गुण' और 'अलक्कार' सम्बन्धी मान्यता का यहाँ मम्थन किया है और इसी दृष्टि से अपनी काव्य की परिभाषा में 'पुनः क्वापि अनलंकृती शब्दार्थौ तत् (काव्यम्)' यह कहा है। अनुवाद-(जिन्हें कविता के 'अलङ्कार' कहा करते हैं वे तो 'गुण' से सर्वथा भिन्न हुआ करते हैं क्योंकि) कविता के 'अलङ्कार' वे हुआ करते हैं जो कविता के 'वाचक' और 'वाच्य'-शब्द और अर्थ-रूप अङ्गों के सौन्दर्य की वृद्धि किया करते हैं और उसी प्रकार किया करते हैं जिस प्रकार हार आदि आभूषण किसी सुन्दरी के कण्ठ आदि अङ्गों की। किन्तु अलङ्कारों से वाच्य-वाचक रूप अङ्गों की सौन्दर्यवृद्धि तभी सम्भव है जब कि कविता का व्यक्तित्व, कविता का रसरूप आत्मतत्व सुन्दर हो क्योंकि आभूषणों से भी कण्ठ आदि अङ्गों की सौन्दर्य-वृद्धि तभी हुआ करती है जब कि उन्हें धारण करने वाली स्त्री सुन्दर हुआ करे-सुन्दर व्यक्तित्व वाली रहा करे। अन्यथा तो जैसे किसी कुरूप स्त्री के हार आदि आभूषण देखने वालों के लिये केवल दृष्टिवैचित्य से लगने लगते हैं वैसे ही कुरूप कविता-नीरस कविता-के अदुप्रास आदि अलद्गार पढ़ने वालों के लिये केवल उक्ति वैचित्र्य से प्रतीत हुआ करते हैं। 'अलङ्वारों' के सम्बन्ध में एक और भी बात है और वह यह है कि अलक्कार कभी कभी रससथी कविता में भी किसी शोभा का आधान नहीं किया करते (जिससे यह रपष्ट है कि कविता में गुण का जो महत्त्व है वह अलंकार का नहीं)। यहाँ उदाहरगों के द्वारा क्रमशः यह स्पष्ट किया जा रहा है कि अलद्कार (१) किस प्रकार शन्द और अर्थरूप अङ्गों की शोभावृद्धि द्वारा किसी सुन्दर कविता के व्यक्तित्व इस के शोआावर्द्धक हुआ करते हैं, (२) किस प्रकार किसी कविता के असुन्दर-नीरस- रहने पर केवल उक्ति वैनिध्य प्रकार लगा करते हैं और (३) किस प्रकार कभी कविता के रसख्प व्यक्तित्व के लिये सर्वथा अकिञ्जित्कर भी दिखायी दिया करते हैं- १-(अर्थात् अलङ्कार का शब्द और अर्थ में सौन्दर्याधान करते हुये 'रस' रूप काव्यात्मतत्व का उत्कर्षाचह होना)-

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अष्टम उल्लास: २८७

अपसारय घनसारं कुरु हार दूर एव कि कमलै:।ऐसी अलमलमालि ! मृणालैरिति वदति दिवानिशं वाला ॥ ३४१॥ इतयादी वाचकमुखेन। मनोरागस्तीव्ं विषमित विसर्पत्यविरतम् प्रसाथी निर्धूमं ज्वलति विधुतः पावक इव। हिनस्ति प्रत्यङ्गं ज्वर इव गरीयानित इतो न मां त्रातुं सातः प्रभवति न चास्बा न भवती ।।३४२।। इत्यादौ वाच्यमुखेनालङ्कारी रसमुपकुरुतः॥ चित्ते विहद्ठदि ण टुद्टदि सा गुणेसुं सेज्जासु लोद्टदि विसट्टदि दिम्मुहेसुं। बोलम्मि बट्टदि पत्दृदि कव्बबन्धे F भाणेन टुट्टदि चिरं तरुणी तरटी ॥ ३४३॥ (चित्ते विघटते न त्रुय्यति सा गुणेषु शय्यासु लुण्ठति विसपति दिङमुखेषु। वचने व्त्तते प्रवर्त्तते काव्यबन्धे ध्यानेन त्रुटयति चिरं तरुणी प्रगल्भा ।। ३४३ ॥।) जैसे कि 'वह असहाय मुग्धा तो दिन-रात यही घोला करती है-अरी सखी! कर्पूर का क्या काम, हार हटा दे, कमल किस लिये लायी, मृणाल मेरे पास मत रख !' इस (दामोदरगुप्तकृत कुट्टनीमत १०२ की) उपर्युक्त सूक्ति में जो 'अनुप्रास' हैं (क्योंकि 'अपसारय घनसारं कुरु हारं' तथा 'अलमलमालि मृगालैः' में र और ल की आवृत्ति बड़ी कोमल है) वह इसीलिये 'अलंकार' है क्योंकि इसके द्वारा इस सूक्ति के वाचकरूप-शब्दरूप-अङ्ग की जो शोभावृद्धि हो रही है वह अन्त में इस सूक्ति के व्यक्तित्व चिप्रलम्भ श्रङ्गार रस-की उत्कर्ष-वृद्धि में सहायक दिखाई दे रही है। और जैसे कि (मालतीमाधव २ य अङ्क की) इस सूक्ति अर्थाद्- 'अरी सखी! (माधव के प्रति) मेरे मन का राग अभी यदि एक तीव्र विष की भांति मेरे अङ्ग-प्रत्यङ्ग में व्याप्त हो रहा है तो अभी वायु-वेग से झककोरी भयकर आग की भांति मुझे जला देना चाहता है और अभी तो ऐसा लग रहा है जैसे सननिात ज्वर की भाँति कभी एक, कभी दूसरे अङ्गअङ्ग को शून्य बना रहा हो। अब क्या पिता और क्या माता-कोई भी मुझे नहीं बचा सकता !' में जो उपमा है (क्योंकि 'विषमिव', 'पावक इ4', 'उबर इच' सर्वत्र उपमा ही उपसा तो है) वह इसीलिये 'अलद्कार' है क्योंकि यह, इल सूक्ति के वाच्यरूप-अर्थरूप अङ्ग की शोभा बढ़ाती, अन्त में इसके वास्तविक व्यक्तित्व विप्रलम्भ शरक्गार रूप रस का भी उत्कर्ष बढ़ाती ग्रतीत हो रही है।[ 157 २-(अर्थात् अलह्वार का कविता मेंरस भाघ के अविवक्ित होनेपर उत्तिवैचिच्यमात्र प्रतीत होना-जैसे कि प्रथम उल्लास में उदाहत 'स्वच्छनदो चलवच्छुच्छ' आादि रचना )। ३-अर्थात् " उज्वार का कहीं किली रसमयी सूक्ति के दिये अकिज्वित्कर वने रहना जैसे वि :- (राजशेखरकृत 'कर्पूरमजरी' के द्वितीय जवनिकान्तर की) इस सूक्ति अर्थात- 'यह कर्मूर मज्ञरी क्या प्रत्यक्ष और कया चित्न-दोनों में अद्भुत रूप से ही सु.दरह जितनी वह प्रत्यक्षतः गुणवती है उतनी चत्र में भी लग रही है। अभी यदि यह सेरी शय्या पर मेरे साथ है तो अभी जिघर देगता हूँ उघर ही दिखाई देरही है। मे जीत के बोल और मेरे काव्य के बन्ध में तो वह जाती है किन्तु मेरे ध्यान में यदि अभी

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काव्यप्रकाश:

इत्यादौ वाचकमेव। मित्रे क्वापि गते सरोरुहवने बद्धानने ताम्यति क्रन्दत्सु भ्रमरेषु वीच्य दयितासन्नं पुरः सारसम्। चक्राह्वेन वियोगिना बिसलता नास्वादिता नोक्भिता कण्ठे केवलमर्गलेव निहिता जीवस्य निर्गच्छतः ॥ ३४४॥ इत्यादौ वाच्यमेव न तुरसम्। अत्र बिसलता न जीवं रोद्घुं क्षमेति प्रकृताननुगुणोपमा । (गुणालङ्कारवैधर्म्य-समीक्षा का निष्कर्ष) एष एत्र च गुणालङ्कारप्रविभाग: । (भट्टो्टट सम्मत गुणालंकार-विवेक का निराकरण) एवं च 'समत्रायवृत्त्या शौर्यादयः संयोगवृत्त्या तु हारादय इत्यस्तु गुणा- लङ्काराणां भेद:, ओजःप्रभृतीनामनुप्रासोपमादीनां चोभयेषागपि समवाय- वृत्या स्थितिरिति गड्डलिकाप्रवाहेणैवैषां भेदः' इत्यसिधानमसत्। आयी हुई है तो तुरत उससे बाहर चली जाती दीख रही है।' में जो अलङ्वार है अर्थात् परुषानुप्रास (टवर्ग की यत्र-तत्र-सर्वत्र आवृत्ति ) उसके द्वारा इस सूक्ति के वाचक- रूप अङ्ग में भले ही कोई विचित्रता उत्पन्न हो जाय, किन्तु इससे इसके विप्रलम्भ श्रद्गार- रूप रसमच व्यक्तित्व को क्या लाभ ! और इसी प्रकार इस सूक्ति अर्थात्-'जैसे ही प्रियावियोगविधुर चक्रवाक ने (सायङ्काल के समय) सारसी के साथ सारस को देखा और उसका मित्र-सूर्य इस दुःखद दृश्य को देवते ही, कहीं अन्यत्र चल पड़ा, उसका पड़ोसी कमल-वन अपन सुँह बन्द किये शोकनग्न होने लगा और उसके देखने वाले भ्रमर गुश्जन करते रो उठे कि उसके मुँह की मृणाल लता न तो खायी ही गयी और न फेंकी ही गयी, बस, ऐसी दीखने लगी मानो उसके निकलते प्राण को रोकने के लिये, गले के द्वार पर लगी अर्गला (सिटकनी-किल्ली) हो!' में जो उपमा है (क्योंकि 'बिसलता अर्गला इव निहिता' तो उपमा-बन्ध ही है) वह इस सूक्ति के वाच्यरूप अङ्ग में कोई विचित्रता भले ही झलका जाय किन्तु इसके विप्रलम्भ शक्गाररसरूप वास्तविक व्यक्तित्व में तो कोई भी विशेपता, नहीं झलका सकती। यह उपमा तो वस्तुतः इस सूक्ति के विप्रलम्भश्ङ्गाररूप रसमय व्यक्तित्व के सर्वथा प्रतिकल पड़ती दीख रही है क्योंकि कहां तो चक्रवाक के विप्रलग्भ की यह उकटता और कहां चक्रवाक का, अपने निकलते प्राण को रोकने के लिये, अर्गला की भांति, विपलता का गले में लगा लेना! (विग्रलम्भ में प्राण के निकलने का वर्णन रस परिपोष है न कि प्राण के रोकने का वर्गन।) अब यह स्पष्ट हो गया कि 'गुण' और 'अलङ्कार' में जो परस्पर भेद है वह यही है कि जहां 'गुग' रस के धर्म हैं और रस से अपृथक सिद्ध रहा करते हैं वहां अलङ्कार न तो रस के धर्न हैं और न रस से अपृथक सिद्ध ही रहा करते हैं। 'गुग' और अलङ्कार' के इस उपर्युक्त वैधर्म्य,से प्राचीन आलङ्कारिकों (भट्टोन्भट आदि) का यह मत कि 'लौकिक 'गुण' और 'अलक्कार' भले ही परस्पर भिन्न हुआ करें' क्योंकि लौकिक 'गुण' जैसे ि 'शौ्य' आदि तो समवायसम्बन्ध हे सम्बद्ध रहा करते हैं और लौकिक 'अलक्कार' जेले कि हार आदि संयोगसम्बन्ध से सम्बद्ध रहने वाले हुआ करते हैं किन्तु काव्य के 'गुण' और 'अलङ्कार' में परस्पर भेद मानना तो केवल गताजुग तिकतामात्र है क्योंकि क्या ओज आदि काव्य के 'गुण और क्या अनुप्रास-उपमा आदि

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अष्टम उल्लास:

(वामन-सम्मत गुणालद्कार-वैधर्म्य भी असंगत) ह1 यदप्युक्तम् 'काव्यशोभायाः कर्त्तारो धर्मा गुणास्तदतिशयहेतवस्त्वलङ्काराः' इति तदपि न युक्तम् यतः किं समस्तैगुणः काव्यव्यवहार, उत कतिपयैः । यदि समस्तैः तत्कथमसमस्तगुणा गौंडी पाञ्चाली च रीतिः काव्यस्यात्मा। अथ कतिपयः, ततः- अद्रावत्र प्रब्लत्यग्निरुच्चैः प्राज्यः प्रोद्यन्नुल्लसत्येष धूमः ॥ ३४५॥ इत्यादावोज:प्रभृतिषु गुणोषु सत्सु काव्यव्यवहारप्राप्तिः। स्वर्गप्राप्तिरनेनैव देहेन वरवणिनी। अस्या रदच्छदरसो न्यक्करोतितरां सुधाम्॥३४६ ॥ इत्यादौ विशेषोक्तिव्यतिरेकौ गुणनिरपेक्षी काव्यव्यवहारस्य प्रवर्त्तकौ। काव्य के 'अलङ्कार'-दोनों ऐसे हैं जो कि काव्य के साथ-शब्द और अर्थ के साथ-समवाय वृत्ति से-अपृथकसिद्धि रूप सम्बन्ध से-ही सम्बद्ध दिखाई दिया करते हैं, सर्वथा असंगत ही सिद्ध हो रहा है। टिप्पणी-यहाँ आचार्य मम्मट ने भटट उद्भट के जिस गुणालक्कार-साम्यविषयक वचन का उद्धरण दिया है वह भट्ट उद्भट के काव्यालक्कार-सारसंग्रह' में तो कहीं नहीं मिलता। ऐसा प्रतीत होता है कि वह 'वचन' भट्ट उद्भट के 'मामह विवरण' नामक ग्रन्थ का उद्धरण है जो कि मम्मट के समय प्राप्य था, किन्तु अव अलभ्य है। अनुवाद-इसी प्रकार प्राचीन आलङ्कारिकों (जैसे कि भट्ट वामन आदि) की यह मान्यता भी कि 'गुण' और 'अलङ्कार' इसलिये परस्पर भिन्न हैं क्योंकि जहां 'गुण' (शब्द और अथं के) ऐसे धर्म हैं जिनसे काव्य में सौन्दर्य का आधान हुआ करता है बहां 'अलङ्कार' ऐसे हैं जो गुण द्वारा निष्पन्न काव्य-सौन्दर्य के बढ़ाने वाले हुआ करते हैं।' वस्तुतः ठीक नहीं जंचती। क्यों? इसलिये कि यदि (शब्दार्थ-धर्म) 'गुण' से काव्य में शोभाधान हुआ करता है, तो यह पूछाजा सकता है कि 'क्या सभी के सभी गुण मिलकर काव्य में शोभा का आधान किया करते हैं या एक आध ही? यदि इसका यह उत्तर हो कि 'सभी के सभी गुण मिलकर काव्य में शोभा का आधान किया करते हैं' तब फिर इस प्रश्न अर्थात् 'गौडी रीति' अथवा 'पाञ्चाली रीति' अर्थात् ऐसी पदरचना, जिसमें सभी के सभी गुण नहीं रहा करते, क्योंकर काव्य की आत्मा मानी गयी? का क्या उत्तर ? अब यदि इस संकट से बचने के लिये यह कहा जाय कि 'एक आध ही गुण काव्य में शोभा का आधान कर दिया करते हैं' तब तो इसका यही अभिप्राय होगा कि ऐसी पद-रचना अर्थात्-'यहां इस अद्रि (पर्वंत) पर अग्नि प्रचंड रूप से प्रज्ज्वलित • हो रही है और यह वह धूम-समूह है जो ऊपर उठता दिखाई दे रहा है' इत्यादि, भी (जो रसभाव-शून्य होने से कदापि कविता नहीं हो सकती) इसलिये कविता मान ली जाया करेगी क्योंकि इसमें शब्द और अर्थ के धर्म माने गये एक-आध ओज आदि गुण तो मान ही लिये जायेंगे! ताथ ही साथ 'अलंकार' को 'गुण द्वारा निष्पन्न काव्य सौन्दर्य का वर्द्धक' कहना भी तो सवथा असंगत ही है क्योंकि ऐसी भी पद-रचना काव्य ही (चित्रकाव्य ही सही) कही जाया करती है जिसमें 'गुण' 'शोभाधायक भले ही न हों, 'अलङ्कार' शोभावर्धक अवश्य हुआ करते हैं। उदाहरण के लिये यही पद-रचना- 'एक सुन्दर स्त्री का पाना सचमुच मनुष्यशरीर से ही स्वर्ग-सुख का पाना है क्योंकि तभी तो इस सुन्दरी का अधर-रस सुधा-रस को भी मात कर रहा है।' जिसमें किसी भी माधुर्य-रस आदि गुण द्वारा सौन्दर्याधान नहीं किया जा रहा है, किन्तु उसे काव्य ही (चित्र काव्य ही सही) कहेंगे और इसलिये कहेंगे क्योंकि दो दो अलंकार 6 १६ का०

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अर्थात् विशेषोक्ति और व्यतिरेक ('विशेषोक्ति' तो इस दृष्टि से कि वरवर्णिनी में दिव्य देहाभाव-रूप एक गुण की न्यूनता की कल्पना करके भी स्वर्गसाग्य सिद्ध किया गया है-'एकगुणहानिकल्पनया साम्यदाढयें विशेषोकिः' वामन-काव्यालङ्कार सूत्र ४.३,२३, और व्यतिरेक इस दृष्टि से कि अधर रस-रूप उपमेय का सुधारस-रूप उपमान से आधि- क्य वर्णित है-'उपमेयस्य गुणातिरेकित्वं व्यतिरेकः'-वामन काव्यालंकार सूत्र ४३.२२) शोभाधायक और शोभावर्धक दोनों लग रहे हैं। टिप्पणी-(क) 'गुण' और 'अलक्कार' में भट्टोन्टट आदि प्राचीन आलङ्कारिक साध्म्य ही मानत रहे हैं। अलक्कारसर्वस्वकार रुय्यक ने भी इन आलक्कारिकों की 'गुणालक्कारसाम्यवादी' ही कहा है-'उद्भटादिभिस्तु गुणालंकाराणां प्रायशः साम्यमेव सूचितम्। विषयमात्रेण भेदप्रतिपादनात्। संघटनाधर्मत्वेन चेष्टे :- अलक्कारसर्वस्व पृष्ठ ३, 'गुण' और 'अलद्कार' का वैधम्य-वाद तो सर्वप्रथम मट्ट वामन का ही प्रवर्तित 'वाद' है। भट्ट वामन ने 'रीति' को-गुणविशिष्ट पदरचना को-काव्य की आत्मा कहा है- 'रीतिरात्मा काव्यस्य।' 'रीतिर्नामेयमात्मा काव्यस्य। शरीरस्येवेति वाक्यशेषः। किं पुनरियं रीतिरित्याह- 'विशिष्टा पदरचना रीतिः।' विशेषवती पदानां रचना रीतिः।' कोऽसी विशेष इत्याह- 'विशेषो गुणात्मा।' वच्यमाणगुणरूपो विशेषः।' 'सा त्रेधा वैदर्भी गौडी पाञ्चाली चेति।' तासां गुणभेदाद भेदमाह- 'सगग्रगुणोपेता वैदर्भी।' 'समग्रैरोजःप्रसादप्रभृतिभिः गुणैरुपेता वैदर्भी नाम रीतिः।' अत्र श्लोक :- 'अस्पृष्टा दोषमात्राभिः समग्रगुणगुम्फिता। विपञ्चीस्वर सौभाग्या वैदर्भी रीतिरिष्यते॥' 'ओोज: कान्तिमती गौडीया। अत्र श्लोक :- 'समस्तात्यु द् भटपदामोज:कान्तिगुणान्विताम्। गौडीयामपि गायन्ति रीति रीतिविचक्षणाः ॥' 'माधुर्यसौकुमार्योपपन्ना पांचाली।' तथा च श्लोक :- 'आश्लिष्टश्लथभावां तु पुराणच्छायान्विताम्। मधुरां सुकुमारां च पाञ्जचालीं कवयो विदुः॥' (काव्यालद्कार सूत्रवृत्ति १, २, ६. १३ ) और 'गुण' को काव्यशोमा का निदान शब्दार्थ-धर्म माना है जिससे 'अलंकार' जो कि गुण द्वारा शोमासमन्वित काव्य में अतिशय-उत्कर्ष के आधायक बताये गये हैं, स्पष्टतया गुण-भिन्न सिद्ध किये गये हैं- तत्रौज:प्रसादादयो गुणाः, यमकोपमादयस्त्वलंकारा इति स्थिति: काव्यविदाम्। तेषां किं भेदनिबन्धनमित्याह- 'काव्यशोभायाः कर्तारो धर्मा गुणाः' 'ये ख़लु शब्दार्थयोर्धर्माः काव्यशोभां कुर्वन्ति, ते गुणाः, ते चौजःप्रसादादयः, न यमकोपमादयः, कैवल्ये तेषा (यमकोपमादीना) मकाव्यशोभाकरत्वात्। ओजःप्रसादा- दीनां तु केवलानामस्ति काव्यशोभाकरत्वमिति।' 'तदतिशय हेतवस्त्वलंकारा- । तस्या: काव्यशोभाया अतिशयस्तदतिशयः तस्य हेतवः। तु शब्दो व्यतिरेके। अलंका- राश्र यमकोपमादयः । अत्र श्लोकौ-

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अष्टम उल्लास: २६१

इदानीं गुणानां भेदमाह- (गुण-प्रकार-निरूपण ) TV (८९) माधुर्य्यौजःप्रसादाख्यास्त्रयस्ते न पुनर्दश। 'युवतेरिव रूपमङ्गं काव्यं स्वदते शुद्धगुणं तदप्यतीव। विहितप्रणयं निरन्तराभिः सदलङ्कारविकल्पनाभिः॥ यदि भवति वचश्च्युतं गुणेभ्यो वपुरिव यौवनवन्ध्यमङ्गनायाः।

'पूर्वे नित्याः।' अपि जनदयितानि दुर्भगत्वं नियतमलङ्करणानि संश्रयन्ते ॥।'

'पूर्वे गुणाः नित्याः, तैर्विना काव्यशोभानुपपत्तेः।' (काव्यालक्कार सूत्रवृत्ति ३.२.१-३ ) यह आचार्य मम्मट ने वामन के 'गुणालक्कारभेदवाद' को उन्हीं के 'रीतिवाद' से असमअस खाया है और वस्तुतः युक्तिपूर्वक असमअ्जस दिखाया हैं क्योंकि समग्रगुणविशिष्ट पदरचना अर्थात् 'वैदर्भी' रीति यदि काव्य की आत्मा हुई तो असमग्रगुण-विशिष्ट पदरचना 'गौडी' और 'पाञ्चाली' ीति तो काव्य की आत्मा कदापि नहीं कही जा सकती। 'वैदभीं' के साथ 'गौडी' और 'पाञ्चालो' को भी काव्य की आत्मा मानने से यही निष्कर्ष निकलता है न तो रीति काव्य की आत्मा है और न 'गुण' ही शब्द और अर्थ के धर्म हैं। अब जब कि 'गुण' शब्द और अर्थ के धर्म नहीं तव 'गुण' का यह स्वरूप-विवेक गुा काव्यशोभाधायक है, किस काम का ? (ख) 'गुण' और 'अलंकार' का यह भेद-वाद भी कि 'गुण' तो काव्यशोभाकारक नित्य शब्दार्थ-धर्म हैं और 'अलंकार' ह काव्यशोभा के अतिशयाधायक अनित्यशब्दार्थ-धर्म, वस्तुतः अनुपपन्न ही है क्योंकि तब या तो 'गौडी' और 'पाञ्जाली' को, जिन्हें रोति मानकर काव्य की आत्मा कही गयी है, रीति ही नहीं मानना पड़ेगा या 'चित्रकाव्य' को काव्य की श्रेणी से बाहर निकाल देना पड़ेगा जो असंभव है। ऐसी भी पद-चनायें, जिनमें नित्य शब्दार्थ-धर्म गुण न भी हों, अलंकार द्वारा सुन्दर बना दी जाया करती हैं और काव्य-श्रेगी में स्थान पाया करती हैं। इससे तो यही सिद्ध है कि जब तक रस रूप 'धर्मी' का-'गुणी' का अत्तित्व न जाना जाय तब तक माधुर्य-प्रसाद आदि 'गुण' निराधार और निराश्रय ही रहेंगे। इसी भांति रस रूप 'अलंकार्य' में विश्वास रखे बिना अनुप्रास और उपना आदि अलंकार भी निरर्थक और निरुद्देश्य ही रहा करेंगे। अनुवाद-('गुण' और 'अलंकार' के ध्वनिवाद-सम्मत भेद के निर्धारित हो चुकने पर) अब यह बताया जारहा है कि गुण कितने प्रकार के हैं- गुण (जो कि वस्तुतः रस-धर्म हैं ) तीन ही हैं-( १) माधुर्य, (२) ओज और (३) प्रसाद, न कि दस ( जैसा कि भट्ट वामन आदि आचार्य मानते आये हैं)। टिप्पणी-रीति-वाद के प्रवर्त्तक आचार्य भट्ट वामन ने 'गुण' को, जो कि उनके असार नित्य शब्दार्थ-धर्म है, दस प्रकार का माना है-(१) ओज, (२) प्रसाद, (३) श्ले7, (४) समता, (५) समाधि (६) माधुर्य, (७) सौकुमार्य, (८) उदारता, (९) अर्थव्यक्ति और (१०) कान्ति क्य कि उनका स्पष्ट कथन है-

'बन्धः-पदरचना, तस्य गुणाः बन्धगुणाः-ओजःप्रभृतयः। (काव्यालंकार सूत्रवृत्ति ३. २-४ ) ये उपर्युक्त १० गुण शब्द के भी गुण है और अर्थ के भी गुण है। शब्द गुण होने में इनका स्वरूप कुछ और है और अर्थगुण होने में कुछ और। शब्द-गुण होने में इनका स्वरूप यह है-

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(क्रमशः गुणत्रय-निरूपण) एषां क्रमेण लक्षणमाह- (माधुर्य-स्वरूपनिरूपण ) (९१) आह्लादकत्वं माधुर्य्यं शृङ्गारे द्ुतिकारणम् ॥ ६८॥ १. ओज :- पदन्यासस्य गाढत्वं वदन्त्योज: कवीश्वराः। अनेनाधिष्ठिता: प्रायः शब्दाः श्रोत्ररसायनम् ॥ २. प्रसाद-श्लथत्वमोजसा मिश्रं प्रसादं च प्रचचते। अनेन न विना सत्यं स्वदते काव्यपद्धतिः॥ ३. श्लेष-यत्रैकपदवदभावः पदानां भूयसामपि। अनालच्षितसन्धीनां स श्लेष: परमो गुणः । ४. समता-प्रतिपादं प्रतिश्लोकमेकमार्गपरिग्रहः। दुर्बन्धो दुर्विभावश्र समतेति मतो गुणः ॥ ५. समाधि-आरोहन्त्यवरोहन्ति क्रमेण यतयो हि यत्। समाधिर्नाम स गुणस्तेन पूता सरस्वती॥ ६. माधुर्य- बन्धे पृथकृपदत्वं च माधुर्यमुदितं बुधैः। अनेन हि पदन्यासा: कामं धारामघुश्च्युतः॥ ७. सौकुमार्य-बन्धस्याजरठत्वं च सौकुमार्यमुदाहृतम्। एतेन वर्जिता वाचो रूचत्वान्न श्रुतिक्षमाः ॥ ८. उदारता-विकटत्वं च बन्धस्य कथयन्ति ह्युदारताम्। वैचित्र्यं न प्रपद्यन्ते यया शून्या: पदकमाः ॥ ९. अर्थव्यत्ति-पश्चादिव गतिर्वाचः पुरस्तादिव वस्तुनः। यत्रार्थव्यक्तिहेतुत्वात्सोऽर्थव्यक्ति: स्मृतो गुणः।। १०. कान्ति-औज्जवल्यं कान्तिरित्याहुर्गुणं गुणविशारदाः । पुराणचित्रं स्थानीयं तेन वन्ध्यं कवेर्वच:॥ यथा विच्छिद्यते रेखाचतुरं चित्रपण्डितैः।

और अर्थ गुण होने में यह- तथैव वागपि प्राज्ञैः समस्तगुणगुम्फिता ॥ काव्यालक्कार सूत्रवृत्ति ३.१)

१. ओज-अर्थस्य प्रौढिरोजः । २. प्रसाद-अर्थवैमल्यं प्रसादः। ६. माधुर्य-उक्तिवैचित्र्यं माघुर्यम्।

३. श्लेष- घटना श्लेष: । ७. सौकुमार्य-अपारुष्यं सौकुमार्यम्।

४. समता-अवैषम्यं समता। ८. उदारता-अग्राम्यत्वमुदारता।

५. समाधि-अर्थदृष्टिः समाधिः। १०. कान्ति-दीप्तरसत्वं कान्तिः । १ का० सूत्रवृत्ति ३. २. १-।४) धवनिवादी आचार्य इस 'दशगुणवाद' को निराधार सिद्ध करते हैं क्य कि उनका दृष्टि में 'गुण' रस-धर्म है और तीन ही ह क्य कि रसास्वाद में सामाजिक हृदय की तीन ही अवस्थायें जैसे कि (१ द्रुति, (२) दीप्ति और ।३ प्रसन्नता सम्भव हैं· माधुर्य गुण शृङ्गारादि रसास्वाद में सहृदय- हृदय की 'द्रुति' से सम्बद्ध है, ओज गुण रौद्रादि रसास्वाद में सामाजिकचित्त की 'दीप्ति' से सम्बद्ध है और प्रसाद गुण सर्व रससाधारण गण है क्योंकि मन की प्रसन्नता सभी रसे के आस्वाद में सिद्ध है। अनुवाद-अब (रसधर्मभूत माधुर्यं, ओज और प्रसाद) इन तीनों गुणों का स्वरूप बताया जा रहा है- जिसे 'माधुर्य' कहते हैं वह एक ऐसा आह्राद अथवा आनन्द है, जैसे कि शङ्गार रस

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शृङ्गारे अर्थात् सम्भोगे द्रुतिर्गलितत्वमिव। श्रव्यत्वं पुनरोजःप्रसादयोरपि। (माधुर्य का तारतम्य) (९१) करुणे वि्रलम्भे तच्छान्ते चातिशयान्वितम् ।

अत्यन्त द्रुतिहेतुत्वात्। (तारतम्य का कारण )

(सम्भोग शृङ्गार रस) के आस्वाद का आनन्द जिसमें (काव्य और नाट्य के) सहृदय सामाजिक का मन पिघलता सा प्रतीत हुआ करता है-ऐसा लगा करता है जैसे उसमें कोई अलौकिक कोमलता व्याप्त हो गयी हो। टिप्पणी-आचार्य मम्मट ने यहां 'माधुर्य' का जो स्वरूप बताया है वह ध्वनिकार की माधुर्य- समीक्षा के ही अनुसार है। ध्वनिकार ने शरृङ्गार को परम मधुर-परमाह्लादमय रस कहा है और माधुर्य को इसी में प्रतिष्ठेत माना है। तात्पर्य यह है कि शरृङ्गार के आस्वाद में माधुर्य का आह्लाद है क्योंकि श्रृङ्गार की अनुभूति सामाजिक हृदय को एक अलौकिक द्रुति-कोमलता से मर दिया करती है। लोचनकार ने इसीलिये स्पष्ट कहा है- 'रतौ हि समस्तदेवतिर्यङ्नरादिजातिष्वविच्छिन्नैव वासनास्त इति न कश्चित्तत्र तादृग यो न हृदयसंवादमयः, रतेरपि हि तच्चमत्कारोऽस्त्येव। अत एव मधुर इत्युक्तम्। मधुरो हि शर्करादिरसो विवेकिनोऽविवेकिनो वा स्वस्थस्यातुरस्य वा झटिति रसनानिपति तस्तावदभिलषणीय एव भवति।' (ध्वन्यालोकलोचन २७ ) जिसका अभिप्राय यह है कि श्रृङ्गार के आस्वाद में नो सर्वजन साधारण की अधिकाधिक तन्मयता है वही शृङ्गार का माधुर्य है। अनुवाद-यहाँ (कारिका में) 'शद्गार' में (माधुर्य) का अभिप्राय है 'सम्भोगशङ्गार' में (माधुर्य) का (क्योंकि सम्भोगश्ङ्गार रस ही मधुर रस है और इसी की अपेक्षा माधुर्य के तारतम्य का निर्धारण सम्भव है)। यहां जिसे 'द्रुति' कहा गया है वह है 'सामाजिक हृदय का पिघल उठना' अद्भुत सुकुमारता से भर उठना। 'माधुर्य' को 'श्रव्यता' 'श्रुतिसुखदता' मानना (जैसा कि आचार्य भामह का मत है-श्रव्यं याति समस्तार्थशब्दं मधुरमिष्यते (काव्यालङ्कार) वस्तुतः अनुपपन्न है क्योंकि 'श्रव्यता' अथवा 'श्रुतिसुखद्ता' माधुर्य में ही नहीं अपि तु 'ओज' और 'प्रसाद' में भी रहा करती है (जो कि माधुर्य से स्वथा भिन्न स्वरूप के गुण हैं)। (सम्मोग शरङ्गार तो मधुर है ही किन्तु) सम्भोग श्ङ्गार जो माधुर्य है उसकी अपेक्षा अधिक माधुर्य करुण रस में है, करुण रस के माधुर्य से बढ़ कर माधुर्य है विप्रलम्भ शरृद्गार में और शान्त रस में जो माधुर्य है वह तो विप्रलम्भ शंगार के माधुर्य से भी बढ़ाचढ़ा है। यहां (संभोगशद्गार, करुण, विप्रलम्भ श्रंगार और शान्त रस में) जो माघुर्य का तारतम्य बताया गया है वह इसीलिये क्योंकि सहृदयहृदय की सुकुमारता संभोग शंगार से अधिक करुण में, करुण से अधिक विप्रलम्भ शङ्गार में और विप्रलम्भ शङ्गार से भी अधिक शान्त रस में देखी जाया करती है। टिप्पणी-माधुर्य का क्रमशः प्रकरष ध्वनिकार की दृष्टि से इस प्रकार है- 'शृंगारे विप्रलम्भाख्ये करुणे च प्रकर्षवत्। माधुर्यमार्द्रतां याति यतस्तन्राधिकं मनः ॥' (ध्वन्यालोक २.८) जिसका यही अभिप्राय है कि सम्मोग शृंगार यदि मधुर हे तो किप्रलम्भ श्रंगार मधुरतर है और करुण है मधुरतम। किन्तु आचार्य मम्मट की दृष्टि यहां कुछ और है। आचार्य मम्मट ने सम्भोग को मधुर, करुण को मधुरतर, विप्रलम्भ को मधुरतम और शान्त को माधुर्य की पराकाष्ठा माना है। ऐसा

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(ओरजः स्वरूप-निरूपण) (९२ ) दीप्त्यात्मविस्तृतेर्हैतुरोजो वीररसस्थिति ॥ ६९ ॥ चित्तस्य विस्ताररूपदीप्तत्वजनकमोजः । (श्रोज-तारतम्य) (९३) बीभत्सरौद्ररसयोस्तस्याधिक्यं क्रमेण च। (तारतम्य का कारण) वीराद्वीभत्से, ततो रौद्रे सातिशयमोजः। (प्रसाद-स्वरूप निरूपण ) (९४) शुष्केन्धनाग्निवत् स्वच्छजलवत्सहसैव यः ॥ ७० ॥ व्याप्नोत्यन्यत्प्रसादोSसौ सर्वत्र विहितस्थितिः । प्रतीत होता है कि जैसे ध्वनिकार ने अपने वैयक्तिक अनुभव के आधार पर माधुर्य-प्रकर्ष का निर्देश किया, वैसे ही काव्यप्रकाशकार ने भी अपने वैयक्तिक अनुभव की दृष्टि से माधुर्य-तारतम्य का निरूपण किया। यहां ध्वनिकार और उनके परमानुयायी आचार्य मम्मट का कोई सैद्धान्तिक भेद नहीं अपि तु केवल दृष्टिमेद ही दिखाई देता है। अनुवाद-'भोज' वह गुण है जिसे सामाजिक हृदय का प्रज्वलन-घधक उठना कहा जा सकता है जो कि वीररस में स्वभावतः हुआ करता है और जिससे ऐसा लगा करता है जैसे चित्त की सारी शीतलता अकस्मात् नष्ट हो गयी और बदले में चित्त उद्दीप्त हो उठा। यहां (कारिका में) ओज के 'आत्मविस्तृति के हेतु' होने का अभिप्राय है ओज के सामाजिक चित्त के विस्तार अथवा प्रज्वलन अथवा धघक उठने के निमित्त होने का। टिप्पणी-आचार्य आनन्दवर्धन के अनुसार 'ओज' का स्वरूप चित्त की दीप्ति का ही स्वरूप है। चित्त की दीप्ति का अभिप्राय है चित्त की उज्ज्वलता का-चित्त के जल उठने का। आचार्य अभिनवगुप्त ने इसी लिये कहा है- 'दीप्ति: प्रतिपत्तुहृंदये विकासविस्तारप्रज्वलनस्वभावा। सा च मुख्यतया ओजःशब्द- वाच्या।' (ध्वन्यालोकलोचन २.९) यहां आचार्य मम्मट ने 'आत्मविस्तृति' का 'चित्तविस्तार' अथवा 'चित्त-प्रज्वलन' अर्थ वस्तुतः ध्वन्यालोकलोचन के ही अनुस्रण पर लिया हैं। ध्वनिकार और लोचनकार की दृष्टि से तो 'दीप्ति' सर्वप्रथम रौद्ररसास्वाद में है किन्तु काव्यप्रकाशकार की दृष्टि से इसे वीररसास्वाद में अनु- भव किया जा सकता है। अनुवाद-वीररस तो ओजस्वी है ही किन्तु उससे अधिक ओजस्वी है बीभत्सरस और बीभत्सरस से भी अधिक ओजस्वी रस है रौद्ररस। वीररस की अपेक्षा बीभत्सरस के और बीभत्सरस की भी अपेक्षा रौद्ररस के अधिक ओजस्वी होने का जो कारण है वह यही है कि वीररस की अपेक्षा बीभत्स में और बीभरस की अपेक्षा रौद्र में सामाजिकजन का चित्त अधिक धघक उठा करता है। दिप्पणी-धनिकार और लोचनकार में ओज का तारतम्य कुछ और है काव्यप्रकाश कार में कुछ और। ध्वनिकार तो रौद्र को ओनस्वी और वीर को रौद्र से अधिक ओजस्वी मानते हैं किन्तु काव्यप्रकाशकार ने वीर की अपेक्षा बीभत्स और बीभत्सकी अपेक्षा रौद्र को अधिक ओजस्वी माना है। यहां भी सिद्धान्त का भेद नहीं। जो भी भेद है स्व्रानभव विश्लेषण का भेद है। अनुवाद-जिसे 'प्रसाद' गुण कहते हैं वह सभी रसों का एक ऐसा धर्म है जिससे सामाजिक-हृदय इस प्रकार भर उठता है जिस प्रकार अग्नि के द्वारा सूखा इन्धन अथवा जल के द्वारा साफ कपड़ा।

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(प्रसाद-सर्वरससाधारण गुण ) अन्यदिति। व्याप्यमिह चित्तम्। सर्वत्रेति। सर्वेषु रसेषु सर्वासु रचनासु च। (रसधम रूप गुण उपचारतः शब्द और अर्थ के गुण कहे जा सकते हैं।.) (९५) गुणवृत्या पुनस्तेषां वृत्तिः शब्दार्थयोमेता ॥ ७१॥ गुणवृत्त्या उपचारेण। तेषां गुणानाम्-आकारे शौर्यस्येव। अनुवाद-यहाँ (कारिका में) जो 'अन्यत' पद है उसका अभिप्राय है 'न्याप्य' का (क्योंकि 'व्याप्नोति' से 'प्रसाद' रूप 'व्यापक' का निर्देश किया जा चुका है) और 'व्याप्य' का अभिप्राय है सहृदय-हृदय का (क्योंकि सहृदय-हृदय ही प्रसाद से व्याप्त हुआ करता है-प्रसन्न हुआ करता है)। 'सर्वत्र' से अभिप्राय है सभी रसों और साथ ही साथ सभी (रसमयी) रचनाओं से क्योंकि 'प्रसाद' सभी रसों और सभी रसमयी रचनाओं का धर्म है। वस्तुतः तो माधुर्य, ओज और प्रसाद ये तीनों गुण रस के ही धर्म अथवा गुण हैं। इन्हें शब्द और अर्थ का भी गुण कहा जा सकता है किन्तु ऐसा कहना उपचारतः ही कहना होगा (मुख्यतः कदापि नहीं)। यहाँ (कारिका में) 'गुणवृत्ति' का अभिप्राय है 'उपचारतः' का। 'तेषाम्'-का अभिप्राय है माधुर्य, ओज और प्रसाद-इन तीनों गुणों का। तात्पर्य यह है कि जैसे आत्मा के धर्म शौर्य आदि उपचारतः शरीर धर्म कहे जा सकते हैं वैसे ही रस-धर्म भी माधुर्य आदि उपचारतः शब्द-गुण और अर्थगुण कहे जा सकते हैं! टिप्पणी-(क) ध्वनिकार लोचनकार-दोनों आचार्यों ने माधुर्य, भज और प्रसाद को रस-धर्म सिद्ध कर यही सिद्ध किया है कि इन गुणों को यदि शब्द-गुण और अर्थ-गुण कहा जाय तो यह समझ कर कहा जाय कि 'उपचार' का आश्रय लिया जा रहा है। ध्वनिकार का कहना है- 'तत् (माधुर्य) प्रकाशनपरशब्दार्थतया काव्यस्य स माधुर्यलक्षणो गुणः।'

और इस पर लोचनकार का कहना है- (ध्वन्यालोक २.७ )

वस्तुतः माधुर्य नाम शङ्गारादे रसस्यैव गुणः। तन्मधुररसाभिव्यञ्जकयोः शब्दार्थयो- रुपचरितं मधुरशङ्गाररसाभिव्यक्तिसमर्थता शब्दार्थयोर्माधुर्यमिति हि लक्षणम्।'

ओज के सम्बन्ध में भी यही बात है क्योंकि ध्वनिकार की यही मान्यता है- (ध्वन्यालोकलोचन २. ७.)

'रौद्रादयो रसा दीप्त्या लच्यन्ते काव्यवर्तिनः। तद्व्यक्तिहेतू शब्दार्थावाश्चित्यौजो व्यवस्थितम् ॥I (5वन्यालोक २.९) और इस पर लोचनकार की भी यहां धारणा है- 'सा (दीप्तिः) च सुख्यतया ओजश्शब्दवाच्या। तदास्वादमया रौद्राद्याः। तया दीप्त्या आस्वादविशेषात्मिकया कार्यरूपया लच्यन्ते रसान्तरात् पृथकतया। तेन कारणे कार्योपचाराद् रौद्रादिरेवौज:शब्दवाच्यः। ततो लक्षितलक्षणया तत्प्रकाशनपरः शब्दो दीर्घसमासरचनावाक्यरूपोऽपि दीप्िरित्युच्यते। ...... तत्प्रकाशनपरश्चार्थः प्रसन्नैर्गमक- र्वाचकैरभिधीयमानः समासानपेच्यपि दीप्तिरित्युच्यते। (ध्वन्यालोकलोचन २९) यही बात प्रसाद के सम्बन्ध में भी है। ध्वनिकार ने इसी लिये कहा है- 'समर्पकत्वं काव्यस्य यत्तु सर्वरसान् प्रति। स प्रसादो गुणो ज्ञेय: सर्वसाधारणक्रियः ॥' और इसी लिये लोचनकार का भी यह कथन है- (ध्वन्यालोक २.१०)

'समर्पकत्वं सम्यगर्पकतवं हृदयसंवादेन प्रतिपतन् प्रति स्वात्मावेशेन व्यापारकत्वं

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(वामन-सम्मत 'दशगुण' वाद का खण्डन ) कुतस्त्रय एव न दश इत्याह- (९६) केचिदन्तर्भवन्त्येषु दोषत्यागात्परे श्रिताः । अन्ये भजन्ति दोषत्वं कुत्रचिन्न ततो दश ॥ ७२॥ बहूनामपि पदानामेकपदवद्भासमानात्मा यः श्लेषः, यश्चारोहावरोहक्रमरूपः समाधि:, या च विकटत्वलक्षणा उदारता, यश्चौजोमिश्रितशैथिल्यात्मा प्रसाद:, तेषामोजस्यन्तर्भावः। पृथक्पदत्वरूपं माधुर्य भङ्गया साक्षादुपात्तम् प्रसादेनार्थ- झटिति शुष्ककाष्ठास्निदृष्टान्तेन अकलुषोदकद्ृष्टान्तेन च। तद्कालुष्यं ग्रसन्नत्वं नाम सर्वरसानां गुणः उपचारात्त तथाविधे व्यङ्गयेऽ्थे यच्छव्दार्थयोः समर्पकत्वं तदपि प्रसादः। (धन्यालोकलोचन २.१०) यहाँ आचार्य मम्यट ने ध्वनि-दार्शनिकों की इस उपर्युक्त गुण-विवेचना का ही पुष्टीकरण किया है। (ख) आचार्य मम्मट ने इसी गुणसम्बन्धी मान्यता के अनुसार 'सगुग' शब्द और अर्थ को काव्य कहा है क्योंकि सगुण शब्द और अर्थ का अभिप्राय गुणाभिव्यअ्ञक शब्द और अर्थ है और शब्द और अर्थ के गुणाभिव्यञ्जक होने का अभिप्राय है रसाभिव्यञ्जन-समर्थ होने का। अनुवाद-गुण दश नहीं अपि तुतीन ही हो सकते हैं-इसका विचार किया जा रहा है- गुण तीन ही हो सकते हैं अर्थात् माधुर्य, ओज और प्रसाद न कि दस। क्यों? इस लिये कि दस गुणों में से कुछ तो ऐसे हैं जो इन तीनों में अन्तर्भूत देखे जा सकते हैं, कुछ ऐसे हैं जो गुण नहीं, अपि तु दोषाभाव मात्र हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो कहीं-कहीं गुण होना तो दूर रहे दोष बने प्रतीत हुआ करते हैं। (भट्ट वामन का) दश-शब्दगुणवाद और दश-अर्थगुणवाद सर्वथा अनुपपन्न है क्योंकि शब्द के और अर्थ के इन दस गुणों में कुछ का तो माधुर्य आदि तीन ही गुणों में अन्तर्भाव, कुछ की गणरूपता के बदले दोषाभावरूपता और कुछ की गुणता के स्थान पर दोषता ही युक्तिसंगत है। जैसे कि- (क) शब्द के इन गुणों का ओज आदि में अन्तर्भाव स्पष्ट है- १ 'श्लेष' का-(संधिसौष्ठव किं वा एकस्थानीयवर्णोपन्यास के कारण) अनेक पदों की एक पद्वत् प्रतीति को जो 'श्लेष' कहा गया है (मसृणत्वं श्लेषःयस्मिन् सति बहून्यपि पदान्येकवद्धासन्ते का. ३. १. १०) वह 'ओज' अर्थात् गाढबन्धता अर्थात् ओज गुण की अभिव्यक्षक रचना में ही समा जाता है। २ 'समाधि' का-'आरोह'-गाढबन्धता और 'अवरोह' बन्धशैथिल्य के सुन्दर संमिश्रित विन्यास को जो 'समाधि' कहा गया है (आरोहत्वरोहक्र्कमः समाधि: का. ३.१.१२) वह वस्तुतः 'ओज' अर्थात् ओजोव्यक्षक पदविन्यास में सर्वथा अन्तर्भूत है। (३) 'उदारता' का-पदों की विकटता अथवा सुन्दर विच्छेद के कारण नृत्यत्प्रायता को जो 'उदारता' गुण कहा गया है ( विकटत्वमुदारता यस्मिन् सति नृत्यन्तीव पदानीति जनस्य वर्णभावना भवति तत् विकटत्वं लीलायमानत्वम् का. ३.१.२२) वह तो 'ओज' नें-ओजोव्यक्षक रचना में-ही समाया दिखायी देता है। और इसी भाँति- (४) 'प्रसाद' का-गाढबन्धता के अंश लिये बन्धरैथिल्य को जो 'प्रसाद' गुण माना गया है ( 'शैथिल्यं प्रसादः'। बन्धस्य शैथिल्यं शिथिलत्वं प्रसादः। नन्वयमोजोविपर्यं- यात्मा दोप: तत्कथं गुण? इत्यत आह-'गुणः संप्लवात्'। गुणः प्रसाद: ओजसा सह संप्ल- वात्। शुद्धस्तु दोष एव। ...... 'स त्वनुभवसिद्धः'। स तु संप्लवस्तु अनुभवसिद्धः तद्विदां

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अष्टम उल्लास: २६७

व्यक्तिर्गहीता। मार्गाभेदरूपा समता क्वचिद्दोषः। तथा हि 'मातङ्गा: किमु वल्गितैः' इत्यादौ सिंहाभिधाने मसृणमार्गत्यागो गुणः कष्टत्वग्राम्यत्वयोर्दुष्टता- भिधानात्तत्निराकर णोनापारुष्य रूपं सौकुमार्यम् औज्ज्वल्यरूपा कान्तिश्च स्वीकृता। एवं न दश शब्दगुणाः ।

रत्नादिशेषवत् का. ३. १.६-८) वह ओज में-ओज गुण की अभिव्यक्षक पदरचना में- अन्तर्भूत होने के अतिरिक्त और कुछ नहीं करता। (५) 'माधुर्य' का-पृथकपदता-असमस्तपदता अथवा अदीर्घसमस्तपदता को जो 'माधुर्य' कहा गया है (पृथक्पदत्वं माधुर्यम्। वन्धस्य पृथक्पदत्वं यत् तत् माधुर्यम्। ...... समासदैर्ध्यानिवृत्तिपरं चैतत् का. ३.१.२०.) उसे तो मधुररसव्यञ्जक असमस्त अथवा अदीर्घ समस्त पदबन्ध के औपचारिक माधुर्य गुण में स्पष्टतयाले ही लिया गया है। (६) क-'अर्थव्यक्ति' का-पदों की अविलम्बतया अर्थोपस्थापकता को जो 'अर्थव्यक्ति' गुण कहा गया है (अर्थव्यक्तिहेतुत्वमर्थव्यक्तिः-यत्र झटित्यर्थप्रतिपत्तिहेतुत्वम् स गुणः अर्थव्यक्तिरिति का. ३.१.२३.) वह सर्वरससाधारण किं वा सर्वरचनासाधारण 'प्रसाद' गुण से कोई अतिरिक्त गुण नहीं दिखाई दे सकता।

करता है जैसे कि- ख-शब्द का एक गुण ऐसा भी माना गया है जो कहीं 'गुण' के बदले 'दोष' लगा

'समता'-मार्गभेद' को-'जिस वैदर्भी आदि रीति से उपक्रम हो, उसी से 'उप- संहार' को-जो 'समता' नामक गुण माना गया है (मार्गाभेद: समता-मार्गस्य अभेद्: मार्गाभेद: समता। येन मागेणोपकमः तस्य अत्याग इत्यर्थ, श्लोके प्रबन्धे चेति-का. ३. १.११) वह सर्वत्र गुण नहीं अपितु यत्र-तत्र 'दोष' ही हुआ करता है। ऊदाहरण के लिये- 'मातङ्गा: किसु वल्गितैः किमफलैराडम्बरैर्जम्बुका: सारङ्गा महिषा मदं ब्रजथ किं शून्येषु शूरा न के। कोपाटोपसमुद्भटोत्कटसटा कोटेरिभारे: पुरः सिन्धुध्वानिनि हुड्कृते रफुरति यत् तद् गर्जितं गर्जितम ॥' इत्यादि (सप्तम उल्लास में उद्ध्ृत सूक्ति) में यदि मार्ग के अभेद-समता गुण-का कवि ने ध्यान दिया होता तव तो यहाँ कोई गुण नहीं अपि तु दोष ही हुआ होता। इस सूक्ति के रचयिता ने यहाँ सिंहवर्णन में जो अपने मार्ग का-मसृण वर्णयुक्त पदरचना का परित्याग किया उसमें तो वाच्यौचित्य के कारण एक सौन्दर्य दिखाई दे रहा है! 'समतागुण' तो यहाँ 'दोष' हो गया होता! (ग) कतिपय शब्द गुण ऐसे भी हैं जो गुण नहीं अपि तु दोषाभाव रूप हैं जैसे कि- (१) 'सौकुमार्य'-सौकुमार्य' को 'अपारुष्य''श्रुतिसुखदत्व' कहा गया है (अजरठत्बं सीकुमार्यम्-बन्धस्य अजरठत्वम् अपारुव्यं यत्, तत् सौकुमार्यम्-का. ३.१.२१) किन्तु यह 'सौकुमार्य' कष्टत्व अथवा श्रुतिकटुत्व नामक दोष के अभाव के अतिरिक्त और कुछ नहीं प्रतीत होता (अपरुप्य=श्रुतिपारुष्य, श्रुतिकदुत्व का अभाव)। इसी प्रकार- (२) 'कान्ति'-'कान्ति' कहा गया है 'औज्ज्ल्य' को-सहृदयहृदयहारिणी पदशोभा को (औज्ज्ल्यं कान्तिः-बन्धस्योज्जवलत्वं नाम यत् असौ कान्तिरिति, तदभावे पुराणच्छाये- त्युच्यते.का.३.१,२५) कान्ति यह स्पष्ट है कि यह 'कान्ति' 'ग्राम्यत्व'नामक दोष के अभाव के सतिरिक्त और कुछ भी नहीं। अर्थ के दस गुणों में भी यही बात दिखाई देती है क्योंकि कतिपय अर्थ गुण ऐसे हैं जो माधुर्य आदि में ही अन्तर्भूत हैं, कतिपय ऐसे हैं जो गुण होने के बदले दोष हैं और कतिपय ऐसे भी हैं जो गुण नहीं अपि तु दोपाभाव मात्र हैं। जैसे कि- (१) 'ओज' जिसे 'ओज' नामक अर्थ गुण कहा गया है जिसका अभिप्राय यह (निम्नलिखित) पञ्चविध 'प्रौढि' अथवा 'प्रौढता' (क. ३.२.२) है, जैसे कि-

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२६८ काव्यप्रकाश: M पदार्थे वाक्यरचनं वाक्यार्थे च पदाभिधा। प्रौढिव्योससमासौ च साभिप्रायत्वमस्य च।। इति या प्रौढि: ओज इत्युक्तं तद्वैचित्रयमात्रं न गुणः। तदभावेऽपि काव्य-

म्याणं निराकरणेन च साभिप्ायत्वरूपमोज:, अर्थवैमल्यात्मा प्रसाद:, उक्तिवै- चितयरूपं माधुर्यम्, अपारुष्यरूपं सौकुमार्यम्, अग्राम्यत्वरूपा उदारता च स्वीकृ- (क) पदार्थ के लिये वाद्यरचना (एक पदार्थ का अनेक-पदोपादानपूर्वक प्रति- पादन, उदाहरण के लिये-'अथ नयनससुत्थं ग्योतिरत्रेरिव यौः, अन्न चन्द्रपद्वाच्येऽर्थे 'नयनसमुत्थं ज्योतिरत्ेः' इति वाक्यं प्रयुक्तम्) (ख) वाक्यार्थ के लिये पदरचना-(एक पद के उपादान से अनेक पदार्थों का अभिधान-उदाहरण के लिये-दिव्येयं न भवति, किन्तु 'मानुषी'ति वक्तव्ये 'निमिषति' इत्याहेति) (ग) व्यार (एक वाक्यार्थ का अनेक वाक्यों द्वारा प्रतिपादन-उदाहरण के लिये- 'अयं नानाकारो भवति सुखदुःखव्यतिकरः सुखं वा दुःखं वा न भवति भवत्येष च ततः। पुनस्तस्मादूर्ध्व भवति सुखदुःखं किमपि तत्- पुनस्तस्मादूध्व भवति न च दुःखं न च सुखम् ॥ धहाँ 'सुखदुःखव्यतिकरः नानाकारो भवति' इस एक वाक्यार्थ को र्य, श्य और थर्थ चरणों में अनेक वाक्यों द्वारा प्रतिपादित किया गया है।) (घ) समास ( एक वाक्य के द्वारा अनेक वाक्यार्थों का अभिधान-जैसे कि- 'ते हिमालयमामन्त्र्य पुनः प्रेच्य च शूलिनम्। सिद्धं चास्मै निवेद्यार्थ तद्विसृष्टाः खमुद्ययुः॥' जहाँ पूरा श्लोक एक वाक्य है किन्तु अनेकों वाक्यार्थों का संक्षेप कर रहा है।) और (ङ) साभिप्रायत्व (ऐसा पदप्रयोग, जो अन्य पदों से भी, चाहे वे अप्रयुक्त ही क्यों न हों, विवक्षित अभिप्राय प्रकाशित कर दे-उदाहरण के लिये- 'रतिविग लित बन्धे केशपाशे सुकेश्याः' जहाँ 'सुकेशी' यह एक पद केशसौन्दर्य की विचित्रता और शक्तिमत्ता का अभिप्राय प्रकाशित करने में समर्थ है।) वह वस्तुतः अर्थ का गुण नहीं अपि तु एकमात्र एक उक्ति वैचित्य है क्योंकि कहाँ तो 'गुण' का काव्य-व्यवहार का निदान होना और कहाँ इस 'ओज' नामक अर्थ-गुण का-'प्रौढि' के प्रथम भेदचतुष्ट्य का अन्ततोगत्वा उक्तिवैचित्य मात्र बन जाना जिसके होने से न तो कोई रचना 'काव्य' हो सके और न तो होने से 'अकाव्य'! अन्तिम 'साभिप्रायत्व' रूप 'प्रौढि' भी ओज नामक अर्थगुण क्यों होने लगी क्योंकि यह तो 'अपुष्टार्थत्व' नामक दोष का अभाव मात्र है! (२) 'प्रसाद'- जिसे 'प्रसाद नामक अर्थगुण कहा गया है जिसका अभिप्राय है अर्थ का वैमल्य अथवा विवचित अर्थ के समर्पक पद प्रयोग में अर्थ की प्रसन्नता ('अर्थ- वैमल्यं प्रसाद :- अर्थस्य वेमल्यं प्रयोजकमात्रपदपरित्रहे प्रसाद, यथा-सवर्णा कन्यका रूपयौवनारम्भशालिनी।' का. ३. २. ३) वह अर्थ का गुण नहीं अपि तु केवल 'अधिक पदत्व' नामक दोष का अभाव रूप ही है। (३) 'माघुर्य'-जिसे 'माधुर्य' नामक अर्थ का गुण बताया गया है जिसका अभिप्राय है 'उक्तिविचित्रता' का ('उक्तिवैचित्र्यं माधुर्यम्' यथा- 'रसवदभृत क: संदेहो मधून्यपि नान्यथा मधुरमधिकं चूतस्यापि प्रसन्नरस फलम्।

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अष्टम उल्लास: 3M LN तानि। अभिधास्यमानस्वभावोक्त्यलङ्कारेण रसध्वनिगुणीभूतव्यङ्गयाभ्यां च वस्तुस्वभावस्फुटत्वरूपा अर्थव्यक्ति: दीप्तरसत्वरूपा कान्तिश्च स्वीकृता । क्रम- कौटिल्यानुल्बणत्वोपपत्तियोगरूपघटनात्मा श्लेषोऽपि विचित्रत्वमात्रम् अवैषम्य- सकृदपि पुनर्मध्यस्थः सन् रसान्तरविज्नो वदतु यदिहान्यत् स्वादु स्यात् प्रियादशनच्छदात्॥ -का. ३.२१० ) वह 'अनवीकृतत्व' दोष के अभाव के अतिरिक्त और क्या! (४) 'सौकुमार्य'-सौकुमार्य' नामक अर्थ गुण, जिसका अभिप्राय और कुछ नहीं अपि तु अपारुष्य' है ('अपारुष्यं सौकुमार्यम'-परुषेऽर्थेऽपारुप्यं सौकुमार्यमिति। यथा मृतं यशःशेषमित्याहुः, एकाकिनं देवताद्वितीयमिति, गच्छेति साधयेति च-का. ३.२.११) वस्तुतः 'गुण' नहीं अपि तु अमङ्गल रूप 'अश्ीलत्व' दोष का अभावमात्र ही है। इसी प्रकार- (५) 'उदारता'-'उदारता' को जो अर्थ गुण कहा गया है जिसका अभिप्राय है 'अग्राम्यता' का ('अग्राम्यत्वमुदारता'-ग्राम्यत्वप्रसङ्गे अग्राम्यत्वमुदारता यथा- 'त्वमेवंसौन्दर्या स च रुचिरतायाः परिचितः कलानां सीमानं परमिह युवामेव भजथः। अपि द्वन्द्वं दिष्ट्या तदिति सुभगे संवदति वा- मतः शेषं चेत्स्याज्तमिह तदानीं गुणितया ॥ वह 'ग्राम्यत्व' नामक दोष के अभाव के अतिरिक्त और क्या ! का. ३.२.१२)

(३) 'अर्थव्यक्ति' - 'अर्थव्यक्ति' को जो एक अर्थगुण माना गया है जिसका अभि- प्राय है वस्तु स्वभाव की स्फुटता का ( 'वस्तुस्वभावस्फुटत्वमर्थव्यक्तिः'। वस्तूनां भावानां स्वभावस्य स्फुटत्वं यत् असौ अर्थव्यक्ति: यथा- 'प्रथममलसैः पर्यस्ताग्रं स्थितं पृथुकेसरैर्विरलविरलैरन्तः पत्रैर्मनाङमिलितं ततः। तदनुवलनामात्रं किञ्ञिद् व्यधायि वहिर्दलैमुकुलनविधौ वृद्धाब्जानां बभूव कदर्थना।।' का. ३.२.१३) वह तो स्पष्टरूप से 'स्वभावोक्ति' अलङ्गार में ही, जिसका स्वरूप-निरूपण यहाँ आगे (१०म उल्लास में) किया ही जा रहा है, अन्तर्भूत है (क्योंकि 'स्वभावोक्ति' का अभिप्राय है वर्णनीय वस्तुमात्र के स्वभाव-रूप-वर्ण-संस्थान-की स्पष्टोक्ति का!) (७) 'कान्ति-'जिसे 'कान्ति' नामक अर्थगुण मानागना है, जिसका अभिप्राय है 'दीप्रसता' का। 'दीप्तरसत्वं कान्तिः'-दीप्ताः रसाः शङ्गारादयो यस्य स दीप्तरसः, तस्य भावो दीप्तरसत्वं कान्ति: यथा- 'प्रेयान् सायमपाकृतः सशपर्थ पादानतः कान्तया द्वित्राण्येव पदानि वासभवनाद् यावन यात्युन्मनाः । तावत् प्रच्युतपाणिसंपुटलसन्नीवीनितम्वं पतो धावित्वैव कृतप्रणाममहहा प्रेम्णो विचित्रा गतिः ॥ (का. ३, २, १४) उसका तो यथासंभव 'रसध्वनि' अथवा 'रसवद्लक्काररूप अपराङ्गव्यङ्गय गुणीभूत- व्यङ्गच' में अन्तर्भाव अनायास किया जा सकता है। (८) 'श्लेष'-यह 'श्लेष' नामक अर्थगुण, जिसे एक ऐसी 'घटना' अथवा 'अर्थ- योजना' कहा गया है जिसमें 'क्रम' और 'कौटिल्य' एक परिपाटी-अनुसरण और उसके उल्लंघन-दोनों का ऐसा युक्तिपूर्ण संयोग दिखायी दिया करता है जिसमें न तो एक बढ़ा दिखाई दे और न दूसरा घटा 'घटना श्लेषः'। क्रमकौटिल्यानुल्बणत्वोपपत्तियोगो घटना। स श्लेष: यथा- 'दृष्टवैकासनसंगते प्रियतमे पश्चादुपेत्यादरादेकस्या नयने निमील्य विहितक्रीडानुबन्धच्छलः। ईषद्वक्रितकंधरःसपुलकः प्रेमोल्लसन्मानसामन्तर्हासलसत्कपोलफलकां धूर्तोऽपरां चुम्बति।

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३०० काव्यप्रकाश:

स्वरूपा समता दोषाभावमात्रं न पुनर्गुणः । क खल्वनुन्मत्तोऽन्यस्य प्रस्तावेऽ- न्यदभिद्ध्यात्। अर्थस्यायोनेरन्यच्छायायोनेर्वा यदि न भवति दर्शनं तत् कथं काव्यम्-इत्यर्थदृष्टिरूपः समाधिरपि न गुणः (दश अर्थगुणवाद के खण्डन का उपसंहार) (९७) तेन नार्थगुणा वाच्याः ॥ वाच्या: वक्तव्याः । (रसध्मरूप गुणत्रय ) (९८) प्रोक्ता: शब्दगुणाश्र ये।। वर्णाः समासो रचना तेपां न्यंजकतामिताः ॥ ७३॥

के कस्त इत्याह- (क्रमशः गुणत्रय के अभिव्यज्ञकों का निरूपण)

वह कोई गुण नहीं क्योंकि इससे रसभाव का क्या उपकार! वह तो केवल कवि- चातुर्यमात्र है (जो कि रसभाव के प्रतिकूल ही लगा करता है!) (९) 'समता'समता' को, जिसका अभिप्राय है 'अविषमता'का ('अवैषम्यं समता')। अवैषम्यं प्रक्रमाभेदः समता। क्वचिद्धि प्रक्रमोऽपि भिद्यते यथा- 'कास्विदवगुण्ठनवती नातिपरिस्फुटशरीरलावण्या। मध्ये तपोधनानां किसलयमिव पाण्डुपत्राणाम् ।' (का. ३.२.५.) अर्थगुण क्यों कहा जाय ! इसे तो एकमात्र प्रक्रमभङ्गरूप दोष का अभाव ही मानना युक्तिसंगत है। क्योंकि कोई भी व्यक्ति, जब तक वह उन्मत्त न हो, ऐसा कभी नहीं किया करता कि कहना तो प्रारम्भ करे कुछ और उसे छोड़कर कहने चल पड़े कुछ ! इसी प्रकार (१०) 'समाधि'-'समाधि' की जिसका अभिप्राय है 'अयोनि ' - नवीन अथवा अन्यच्छायायोनि'-प्राचोन काव्यार्थ के दर्शन का ('अर्थदृष्टिः समाधिः')। अर्थस्य दर्शनं दृष्टिः। समाधिकारणत्वात् समाधिः। अवहितं हि चित्तमर्थान् पश्यतीत्युक्तं पुरस्तात। अर्थो द्विविधोऽयोनिरन्यच्छायायोनिश्च।.अयोनिः अकारणः अवधानमात्रकारणः इत्यर्थः। अन्यस्य काव्यस्य च्छाया अन्यच्छाया, तद्योनिः ॥-(का. ३. २. ७.) अर्थगुण मानना इसलिये निरर्थक है क्योंकि वह काव्य ही क्या जो न तो कवि का नवीन अर्थदर्शन हो और न प्राचीन अर्थदर्शन ! (अयोनिरूप अथवा अन्यच्छायायोनिरूप काव्यार्थ तो काव्यशरीर- निर्वाहक अर्थमात्र है अर्थगुण कसे!) इस उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि अर्थगुणवाद एक निरर्थक किंवा निराधार वाद है। यहाँ (कारिका में) 'वाच्याः' का अभिप्राय है 'वक्तव्यः' का न कि 'वक्तुं शक्या। ? का, क्योंकि वामन आदि आलङ्कारिकों ने अर्थगुणों का प्रतिपादन तो किया ही है जिसके सम्बन्ध में यहाँ, उपर्युक्तविवेचन से, यह सिद्ध किया जा रहा है कि ऐसा प्रतिपादन न किया जाना चाहिय क्योंकि गुग तीन ही हैं-माधुर्य-ओज और प्रसाद और ये तीनोंही रस-धर्म हैं न कि और कुछ। माधुर्य, ओज, प्रसाद का अभिप्नाय यह है कि वस्तुतः ती ये तीनों गुग आस्वादरूप हैं जिन्हें उपचारतः रसरूप आस्वाद्य का गुण कह सकते हैं और उपचारतः ही रसाभिव्य- जक शब्द गुण भी कह सकते हैं। अब उन्हें शब्दगण कहने का जो अभिप्राय है वह यह है कि शब्द अर्थात् वर्ण-समास और रचना इनके अभिव्यक्षन-साधन हैं। कौन शब्द अर्थात् कैसे वर्ण, कैसे समास और कैसे पदविन्यास किस किस गुण के अभिव्यक्षक हैं-इसका विचार किया जा रहा है-

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अष्टम उल्लास: ३०१

(माधुर्यगुण के अभिव्यञ्जक )श :ाड (९९) मूध्नि वर्गान्त्यगा: स्पर्शा अटवर्गा रणौ लघू। अवृत्तिर्मध्यवृत्तिर्वा माधुर्ये घटना तथा ॥ ७४॥ (पद-रचना अ्रप्रथवा संघटना) ट-ठ-ड.ढ वर्जिता: कादयो मान्ता: शिरसि निजवर्गान्त्ययुक्ता: तथा रेफल- कारौ हस्वान्तरिताविति वर्णाः समासभावो मध्यमः समासो वेति समासः तथा माघुर्यवती पदान्तरयोगेन रचना माधुर्यस्य व्यञ्ञका। उदाहरणम्- अनङ्गरङ्गप्रतिमं तदङ्गं भङ्गीभिरङ्गीकृतमानताङ्गयाः। कुर्वन्ति यूनां सहसा यथताः स्त्रान्तानि शान्तापरचिन्तनानि ॥३४७॥ ('ओररज' के अभिव्यञ्ञक ) (१००) योग आद्यतृतीयाभ्यामन्त्ययो रेण तुल्ययोः । 'माधुर्य' के जो अभिव्यञ्जक हैं वे ये हैं- (१) वर्ण-जैसे कि ट, ठ, ड और ढ को छोड़ कर वे स्पर्शसंज्ञक ('क'से 'म' पर्यन्त) वर्ण, जो कि अपने वर्ग के अन्त्यवर्ण जैसे कि ङ, ज, ण, न और म से संयुक्त होकर मधुर वर्णध्वनि के उत्पादक हुआ करते हैं (जैसे कि अनङ्ग, कु्ज इत्यादि) और साथ ही साथ, लघु अर्थात हस्वस्वर से व्यवहित रेफ और णकार भी। (२) समास-जैसे कि असमास अथवा मध्यम समास अवृत्ति या मध्यवृत्ति और (३) रचना-जैसे कि उपर्युक्त्त माधुर्यव्यक्जकवर्णादि वाली। यहॉँ (कारिका में) 'अटवर्गाः' का अभिप्राय है ट, ठ, ड और ढ के अतिरिक्त वर्णों का, 'स्पर्शाः' का अभिप्राय है 'क' से लेकर 'म' तक के वर्णों का (कादयो मावसाना' स्पर्शा:), 'मूर्ध्नि वर्गान्त्यगाः' का अभिप्राय है क से म पर्यन्त वर्णों के, अपने अपने आगे अपने अपने वर्गों के अन्तिम वर्णों से संयुक्त हुये रहने का 'रणौ लघू' का अभिप्राय है हस्वस्वर से व्यवहित रेफ और णकार का। इस प्रकार ये तो हुये माधुर्य व्यञ्जकवर्ण। 'अवृत्ति' का अभिप्राय है समास के अभाव का और 'मध्यवृत्ति' का अभिप्राय है मध्यम समास का-इस प्रकार यह हुई समास की माधुर्यव्यञ्जकता। 'तथा घटना का अभिप्राय है मधुर अर्थात् उपर्युक्त माधुर्यव्यज्ञकवर्णादि बाली रचना अथवा पदसंघटना का इस प्रकार यह हुई रचना अथवा संघटना की माधुर्यव्यञ्जकता। उदाहरण के किये यह सूक्ति- 'हाव-भावो ने उस आनताङ्गी (स्तनभार से झुकी) सुन्दरी की अनङ्ग की रङ्गभूमि बनी देहलता को इस भाँति अपना लिया कि नवयुवकों के हृदय अन्य विषयों की चिन्ता भूल भाल कर उसी में रमने लगे।' जहाँ वर्ण जैसे कि अपने-अपने वर्गों के अन्त्यवर्णों से संयुक्त 'ग' और 'त' वर्ण (जैसे कि 'अर्नग' 'रंग' आदि में और 'शान्त चिन्तन' आदि में) और हस्वस्वर से व्यवहित रेफ (जैसे कि 'अनंगरंगप्रतिमम्' आदि में), 'समास' जैसे कि 'अनंगरंगप्रतिमम्' का मध्यमसमास तथारचना ( जैसे कि 'प्रतिमं तदंगम्, भंगीभिरंगीकृतम्' आदि में माधुर्य व्यक्षक वर्णों वाली पदसंघटना) तीनों की माधुर्यव्यक्जकता स्पष्ट है क्योंकि यहां जो विप्रलम्भ शंगाररस है वही माधुर्यस्रोत के रूप में विराजमान है। अनुवाद-ओज के जो अभिव्यञ्जन-साधन हैं- (१) वर्ण- जैसे कि कवर्ग आदि वर्गों के प्रथम (क, च, ट, त, प) और तृतीय

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३०२ काव्यप्रकाश:

टादि: शषौं वृत्तिदैर्ध्य गुम्फ उद्धूत ओजसि ॥ ७५॥ वर्गप्रथमतृतीयाभ्यामन्त्ययोः द्वितीय-चतुर्थयोः रेफेण अध उपरि उभयत्र वा यस्य कस्यचित् तुल्ययोस्तेन तम्यैव सम्बन्ध: टवर्गोऽर्थात् णकारवर्जः शकारषकारौ दीर्घसमास: विकटा सङ्घटना ओजसः । उदाहरणम्- मूर्ध्नामुद्वृत्तकत्तेत्यादि ॥ ३४८ ॥ ('प्रसाद' गुण के अरपभिव्यञ्जक ) (१०१) श्रुतिमात्रेण शब्दात्तु येनार्थग्रत्ययो भवेत्। साधारण: समग्राणां स प्रसादो गुणो मतः ॥ ७६ ॥ (ग, ज, ड, द, ब) वर्णों का उनके अपने-अपने अन्त्य (वर्गों के प्रथम वर्णों के अन्त्यवर्ण ख, छ, ठ, थ, फ और वर्गों के तृतीय वर्णों के अन्त्य वर्ण घ, झ, ढ, ध, भ)वर्णों से संयोग अथवा नैरन्तर्य (जैसे कि 'पुच्छ' 'बद्ध' आदि में), रेफ का नीचे, ऊपर अथवा दोनों ओर से किसी वर्ण से संयोग जैसे कि वक्त्र, निर्ह्वाद आदि), समान वर्णों का परस्पर संयोग (जैसे कि वित्त, चित्त आदि में), ट; ठ, ड और ढ वर्ण तथा शकार और पकार। (२) वृत्ति -जैसा कि दीर्घवृत्ति और दीर्घ समास और - (३) रचना-जैसे कि उपर्युक्त्वर्णादि वाली उद्धत पदसंघटना। यहां (कारिका में 'आद्यतृतीयाभ्यामन्त्ययाः योगः' का अभिप्राय है 'वर्गों के प्रथम वर्गों का अपने अन्त्य वर्गों अर्थात् द्वितीय वर्णों और वर्गों के तृतीय वर्णों का अपने अन्त्य वर्णों अर्थात् चतुर्थ वर्णों से संयोग' का, 'रेण योगः' का अभिप्राय है ऊपर, नीचे अिथवा दोनों ओर से रेफ के किसी वर्ण से संयोग का, 'तुल्ययो: योगः' का अभिप्राय है उस वर्ण के उसी वर्ण से संयोग का, 'टादिः' का अभिप्राय है णकार को छोड़कर टवर्ग अर्थात् ट, ठ, ड और ढ का और 'शषौ' का अभिप्राय है तालव्य 'श' और मूर्धन्य 'प' का-इस प्रकार ये हुये ओज के अभिव्यक्षक वर्ण। यहां 'वृत्तिदैध्य' का अभिप्राय है दीर्घसमास का-यह हुई वृत्ति' अथवा समास की ओजोव्यअ्जकता। इसी प्रकार जो ओज की अभिव्यज्ञजक रचना है अर्थात् उपर्युक्त वर्णादि वाली विकट पटसंघटना उसी को यहाँ (कारिका में) 'उद्धत गुम्फ' कहा गया है। उदाहरण के लिये यह सूक्ति-

धौतेशाङघ्िप्रसादोपनतजय जगजातमिथ्यामहिम्नाम्। कैला सोल्लासनेच्छाव्य तिकर पिशुनोत्सर्पिदर्पोद्घुराणां दोष्णां चैषां किमेतत् फलमिह नगरीरक्षणे यत् प्रयासः।।' (सप्तम उल्लास में अनूदित ) जहाँ क्या वर्ण (जैसे कि उस वर्ण का उसी से संयोग-उद्वृत्त, कृत्त आदि में, रेफ का ऊपर, नीचे और दोनों ओर से वर्गों से संयोग जैसे कि 'उत्सर्पि', 'दर्प', 'गलद्रक्त' आदि में; वर्गों के प्रथम और तृतीय र्णों का द्वितीय और चतुर्थ वर्णों से संयोग-जैसे कि 'कैलासोल्लासनेच्छा' 'दर्पोद्घुर' आदि में और मूर्धन्य ष आदि) क्या वृत्ति-दैर्ध्य जैसे कि उद्वृत्तकृत्त ... महिम्नाम् आदि का लम्बा समास) और क्या विकट पदसंघटना ? सभी के सभी भोज का ही अभिव्यक्षन करते प्रतीत हो रहे हैं। 'प्रसाद' गुण के अभिव्यक्षक ये हैं-

हो जाय। (१) वर्ण-वे सुकुमार अथवा विकट सभी शब्द जिनके श्रवणमात्र से अर्थप्रतीति (२) वृत्ति-वह वृत्ति अथवा समास जो श्रुतिमात्र से अर्थप्रत्यायक हो जाय और

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अष्टम उल्लास: ३०३

समग्राणां रसानां सङ्घटनानां च। उदाहरणम्- परिम्लानं पीनस्तनजघनसङ्गादुभयत- स्तनोर्मध्यस्यान्तः परिमिलनमप्राष्य हरितम्। इदं व्यस्तन्यासं श्लथभुजलताच्तेपवलनैः कृशाङ्गयाः सन्तापं वदति बिसिनीपत्रशयनम्॥ ३४६॥ (वर्ण-वृत्ति-संघटना के उपर्युक्त गुणाभिव्यज्ञन-नियम का अपवाद) (३) रचना-वह रचना जो श्रवणमात्र से अर्थप्रतीति करा दे। यहाँ (कारिका में) 'समग्राणां साधारणो गुणः' का अभिप्राय है (प्रसाद गुण के) सभी रसों कि वा सभी रसमयी पदरचनाओं के सामान्य गुण होने का। उदाकरण के लिये यह सूक्ति- यह कमलिनी-किसलय की शय्या जो पीन कुचयुग किं वा नितम्ब भाग के सम्पर्क से दोनों ओर मिसली दिखाई देरही है, स्तनों के मध्य भाग से स्पर्श न पाकर हरी-भरी लग रही है और धीरे धीरे हिलती-डुलती भुजलता से जहाँ-तहाँ छूजाने से अस्तव्यस्त भी प्रतीत हो रही है, कृशाङ्गी (रत्नावली) की विरह-व्यथा को वस्तुतः बताती दीख रही है। [जहाँ माधुर्योचित वर्ण, मध्यम समास किंवा अनुद्धत गुम्फ सभी के सभी प्रसाद का ही अभिव्यञ्ञन करते लग रहे हैं।] टिप्पणी-(क) यहाँ आचार्य मम्मट ने वर्ग, वृत्ति और रचना (संघटना) की गुणत्रय व्यञ्जकता का जो प्रतिपादन किया है वह ध्वनिकार और लोचनकार की मान्यताओं का एक युक्तपूर्ण समर्थन है। ध्वनिकार के अनुसार वर्ण की रसव्यज्जकता यह है- 'शषौ सरेफसंयोगो डकारश्चपि भूयसा। विरोधिनः स्युः शङ्गारे तेन वर्णा रसच्युतः ॥ त एव तु निवेश्यन्ते बीभत्सादौ रसे यदा। तदा तं दीपयन्त्येव तेन वर्णा रसव्युतः॥ जिसका विश्लेषण लोचनकार ने इस प्रकार किया है- (ध्वन्यालोक ३. ३.४) 'एतदुक्तं भवति-यद्यपि विभावानुभावव्यभिचारिप्रतीतिसम्पदेव रसास्वादे निबन्ध- नम्, तथापि विशिष्टश्रुतिकशब्दसमर्प्यमाणास्ते विभावादयस्तथा भवन्तीति स्वसंवित्सि- द्धमदः। तेन वर्णानामपि श्रुतिसमयोपलच््यमाणार्थानपेच््यापि श्रोत्रैकग्राह्यो मृदुपरुषात्मा स्वभावो रसास्वादे सहकार्येच।' जिसका तात्पर्य यह है कि वैसे रसास्वाद में विभावादि से अभिव्यक्त वासनास्थित रत्यादि स्थायीभाव का ही आस्वाद मिला करता है किन्तु विभावादि जब मृदु अथवा परुष वर्णों वाले शब्दों द्वारा उपनिबद्ध हों तब तो यह स्वाभाविक ही है कि अर्थनिरपेक्ष वर्णस्वभाव-वर्णमार्दव अथवा वर्णपारुष्य-भी रसास्वाद के साथ-साथ आस्वादविषय हो जाय। आचार्य मम्मट ने वर्णों की इस रसव्यअ्कता को ही यहाँ गुणव्यजकता के रूप में दिखाया है- (ख) वृत्ति अथवा समास किंवा संघटना की रसव्य्जकता जिसके आधार पर आचार्य मम्मट ने यहाँ वृत्ति अथवा समास और संघटना की गुणव्यञ्जकता सिद्ध की है ध्वनिकार और लोचनकार के अनुसार यह है- 'असमासा समासेन मध्यमेन च भूषिता। तथा दीर्घसमासेति त्रिधा संघटनोदिता॥ वाश्चित् गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती माधुर्यादीन् व्यनक्ति सा। रसान्'-(ध्वन्यालोक ३. ५-६) विशिष्टघटनयैव लभ्यते।' (ध्वन्यालोकलोचन पृष्ठ ३१३) अनुबाद-वैसे तो माधुर्य-ओज और प्रसाद की अभिव्यक्षक (वर्ण-वृत्ति और)

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३०४ काव्यप्रकाश:

(वर्ण-वृत्ति-संघटनानियम के उल्लंघन के निमित्त) (१०२) वक्तृवाच्यप्रबन्धानामौचित्येन क्वचित्कचित् । रचनावृत्तिवर्णानामन्यथात्वमपीष्यते ॥ ७७॥ क्कचिद्वाच्य प्रबन्धानपेक्षया वकत्रौचित्यादेव रचनादयः। यथा-

कोणाघातेषु गर्जत्प्रलयघनघटान्योन्यसङ्घटटचण्डः । कृष्णाक्रोधाग्रदूतः कुरुकुलनिधनोत्पातनिर्घातवातः केनास्मत्सिह नाद प्रतिरसितसखो दुन्दुभिस्ताडितोऽसौ ॥ ३५०॥ अत्र हि न वाच्यं क्रोधादिव्यञ्जकम् अभिनेयार्थ च काव्यमिति तत्प्रतिकूला उद्धता रचनाद्यः । वक्ता चात्र भीमसेनः । क्वचिक्द्वतृप्रबन्धानपेक्षया वाच्यौचित्यादेव रचनादयः।

पदरचना भिन्न-भिन्न प्रकार की ही हुआ करती है जैसा कि अभी-अनी निर्दिष्ट किया जा चुका है किन्तु कहीं-कहीं अन्य प्रकार के औचित्य के कारण इस गुणाभिव्यक्जनसमर्थ वर्ण-वृत्ति-संघटना-नियम का. उल्लंघन भी हुआ करता है। वर्ण, वृत्ति और रचना (संघटना) के इस गुणाभिव्यक्जन-नियम का जो कहीं-कहीं उल्लंघन हुआ करता है उसके कारण ये हैं- (१) वक्तृगत औचित्य अर्थात् कबिगत किं वा कविनिबद्धवक्तृगत औचित्य (२ ) वाच्यगत औचित्य अर्थात् वर्णनीय विषय का औचित्य और (३) प्रबन्धगत औचित्य अर्थात् भिन्न-भिन्न महाकाव्य-मुक्तक नाटक-कथा-आख्या- यिका-चम्पू आदि गत औचित्य कहीं-कहीं केवल वक्तृगत औचित्य से चाहे वहाँ वाच्य और प्रबन्ध का कोई औचित्य विल्कुल न हो, वर्ण, वृत्ति और रचना का नियम टूट जाया करता है। जैसे कि- (वेणीसंहार १म अङ्क में भीमसेन की इस उक्ति में) 'सहदेव ! किसने रण भेरी बजा दी, यह रण-भेरी, जो हमारे सिंहनाद के प्रतिध्वान सरीखी भयक्कर है, जो हमारी द्रौपदी के क्रोध की सर्वप्रथम सूचना दे रही है, जो कुरु- यंशविनाश के चिह्नभूत प्रलयकालीन झंज्ञानिल की ध्वनि सी सुनाई पड़ रही है, जो भिन्न भिन्न मुरज-मृदङ् आदि बाद्ययन्त्रों के वादनकाल में सहसा सुन पड़ने वाले गरजते घन- मण्डल के संघर्ष की भाँति प्रचण्ड प्रतीत हो रही है और, और जो समुद्रमंथन के समय विनुब्ध कलकलबहुल अपार पारावार को विलोडित करने वाले मन्दराचल की गंभीर ध्वनि की भीषणता से भर उठी है।' यहाँ जो वर्ण-वृत्ति और संघटना हैं वे एकमात्र वक्ता भीमसेन के व्यक्तित्व के अनुसार हैं क्योंकि जब कि यहाँ वाच्य केवल प्रश्नरूप है न कि क्रोधादि का-रौद्रादि दीप्रस का अभिव्यन्जक और जब कि यह उक्ति अभिनेय प्रबन्ध नाटक-की उक्ति है जिसमें दीघं- समासा संघटना आदि का कोई स्थान नहीं तब इस प्रकार की वर्ण-वृत्ति-रचना क्योंकर हो! इस प्रकार की वर्ण-वृत्ति-रचना यहाँ गुणाभिव्यन्जन-नियन के अनुसार नहीं अपितु एकमात्र वक्तृगत औचित्य से ही दिखाई दे रही है। इसी भाँति कहीं-कहीं केवल वाच्यगत भौचित्य से, चाहे वहाँ वक्ता और प्रबन्ध का

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अष्टम उल्लास: ३०५

यथा- प्रौढच्छेदानुरूपोच्छलनरयभवत्सैंहिकेयोपघात-

कुर्वत्काकुत्स्थवीर्यस्तुतिमिव मरुतां कन्धरारन्ध्रभाजाम् झाङ्कारर्भीममेतन्निपतति वियतः कुम्भकर्णोत्तमाङ्गम्॥३५२॥ क्कचिद्वक्तृवाच्यानपेक्षाः प्रबन्धोचिता एव ते। तथा हि-आख्यायिकायां

औचित्य कदापि न हो, वर्ण-वृत्ति रचना के गुणाभिव्यञ्जन नियम का-गुण-पारतन्त्र्य- सिद्धान्त का-उल्लंघन देखा जाया करता है जैसे कि यहाँ- 'यह गिरा! यह गिर पढ़ा आकाश से कुम्भकर्ण का भयक्कर मस्तक! ऐसा मस्तक जो मानो कटी हुई गर्दन के छिद् में प्रवेश करती हवा के झांय-झांय से वीर राम के परा- कम की प्रशस्ति गा रहा हो! ऐसा मस्तक जिसे सूर्यसारथि ऐसे देख रहा हो मानो उस (मस्तक) के सहसा कट जाने के कारण उस (मस्तक) की आकस्मिक वेगपूर्ण उछाल से उसे (सूर्यसारथि को) राहु का भ्रम हो रहा हो और इसीलिए घोड़ों की घबराहट रोकने के लिए अपना रथ तिरछा किये उसे एकटक देखते जा रहा हो!' [ यहाँ अभिनेयात्मक प्रबन्ध और वैतालिकरूप वक्ता की दृष्टि से तो परुष वर्ण, दीर्घं समास किंवा उद्धत गुम्फ का कोई औचित्य नहीं किन्तु कुम्भकर्ण के मस्तकरूप वाच्य (वर्णनीय विषय) का औचित्य यहाँ ऐसा है जो इस प्रकार की वर्ण-वृत्ति-संघटना का नियामक हो रहा है।] इसी प्रकार कहीं-कहीं केवल प्रबन्धगत औचित्य से, चाहे वहाँ वक्ता और वाच्य का कोई भी औचित्य न हो, वर्ण-वृत्ति और रचना का विपर्यय युक्तियुक्त ही हुआ करता है। जैसे कि-(१) शङ्गार रस के रहने पर भी यदि प्रबन्ध 'आख्यायिका' हो (जैसे कि हर्षचरित आदि) तो वहाँ कोमल वर्ण, अल्प अथवा मध्यम समास तथा मधुर पदरचना का कोई नियम नहीं। (२ ) रौद्र रस के होने पर भी यदि प्रबन्ध 'कथा' हो (जैसे कि त्ेमेन्द्रकृत पद्य- कादम्बरी) तो वहाँ परुष वर्ण, दीर्घसमास तथा उद्धत पदरचना का नियम नहीं रहा करता। और, (३) रौद्रादि रस के होते हुए भी यदि प्रबन्ध नाटकादि रूप हो तो वहाँ दीर्घसमास कर्णकठोरवर्ण और विकट पदबन्ध का कोई नियम नहीं पालन किया जाया करता। और इतना ही क्यों, इसी दृष्टि से अन्यत्र भी जैसे कि मुक्तक-संदानितक-कलापक- कुलक आदि प्रबन्धों में संघटना आदि के नियम का वैपरीत्य स्वयं भी देखा जा सकता है। टिप्पणी-(क) आचार्य मम्मट ने 'संघटना' को जा यहा 'गुणपरतन्त्र'-'गुणाधीन'-कहा है उसका आधार ध्वनिकार की यह उक्ति है- 'गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती माधुर्यादीन् व्यनक्ति सा (संघटना)।' (ध्वन्यालोक ३. ६) यद्यपि ध्वनिकार ने अपनी इस उक्ति मे 'गुणाधीन संघटना अथवा नटनाधीन गुण' का बड़ा विशद विचार किया है किन्तु आचार्य मम्मट को यह विचार-विमर्श यहाँ अभिप्रेत नहीं क्योंकि उन्होंने यहाँ ध्वनिकार को परिनिष्ठित धारणा का अनुसरण करते हुए विविध प्रकार की वर्ण-वृत्ति- रचना को, उनके गुणाभिव्यञ्जक होने के कारण, गुण दीन ही स्वीकार कर लिया है। (ख) संघटनादि में गुण-पारतन्त्र्य के नियम के अतिरिक्त अन्य भी नियामक हैं जिनगा 27 २० का०

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३०६ काव्यप्रकाश:

श्रृङ्गारेऽपि न मसृणवर्णाद्यः, कथायां रौद्रेऽपि नात्यन्तमुद्धताः, नाटकादौ रौद्रेSपि न दीघसमासाद्यः । एवमन्यदप्यौचित्यमनुसर्तव्यम्। इति काव्यप्रकाशे गुणालङ्कारभेदनियतगुणनिर्णयो नाम अष्टमोल्लासः ॥८॥

ध्वनिकार और लोचनकार ने युक्तिपूर्वक निरूपण किया है। ध्वनिकार ने 'वक्ता' और 'वाच्य' के औचित्य को कहीं-कहीं संघटना का नियामक इस प्रकार बताया है- 'नन्नियमे हेतुरौचित्यं वक्तृवाच्ययोः ॥ तत्र वक्ता कविः, कविनिबद्धो वा, कविनिबद्धश्चापि रसभावरहितः रसभावसम- न्वितो वा, रसोऽपि कथानायकाश्रयस्तद्विपत्ताश्रयो वा, कथानायकश्च धीरोदात्तादिभेद- भिन्नः पूर्वस्तदनन्तरो वेति विकल्पाः। वाच्यं च ध्वन्यात्मरसाङ्गं, रसाभासाङ्गं वा, अभिने- यार्थमनभिनेयार्थं वा, उत्तमप्रकृत्याश्रयं तदितराश्रयं लेति बहुप्रकारम' इत्यादि। (घत्रन्यालोक ३. ६) और इसी प्रकार 'विषय' और 'प्रबन्ध' के औचित्य को भी वर्ण-वृत्ति-रचना का नियामक सिद्ध किया है- 'विषयाश्रयमप्यन्यदौचित्यं तां नियच्छति। काव्यप्रभेदाश्रयतः स्थिता भेदवती हि सा ।' 'वत्तृवाच्यगतौचित्ये सत्यपि विषयाश्रयमन्यदौचित्यं सङ्गटनां नियच्छति। (धवरन्यालोक ३. ७ ) यहाँ आचार्य मम्मट ने ध्वनिदर्शन की उपर्युक्त रचना-नियामक-दृष्टि से ही वर्ण-वृत्ति- रचना के वैपरीत्य का यत्किव्चित निरूपण कर दिया है।

अष्टम उल्लास समाप्त

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नृवम उहास: (शब्दालंकारनिरूपणात्मकः ) (शब्दालंकारः स्वरूप औरप्र भेद-विवेचन ) गुणविवेचने कृतेऽलङ्काराः प्राप्तावसरा इति सम्प्रति शब्दालङ्कारानाह- (शब्दालंकार के भेद : प्रथम-वक्रोक्ति-अलंकार) (१०३) यदुक्त्तमन्यथावाक्यमन्यथाऽन्येन योज्यते। श्लेषेण काक्का वा जेया सा वक्रोक्तिस्तथा द्विधा॥ ७८ ॥ (वक्रोक्ति के अवान्तर भेद) तथेति श्लेषवक्रोक्ति: काकुवक्रोक्तिश्च। तत्र पदभङ्गश्लेषेण यथा- नारीणामनुकूलमाचरसि चेज्जानासि कश्च्चेतनो वामानां प्रियमादधाति हितकृन्नैवाबलानां भवान्। युक्तं किं हितकर्तनं ननु बलाभावप्रसिद्धात्मनः सामथ्य भवतः पुरन्दरमतच्छेदं विधातुं कुतः ॥ ३५२॥ अनुवाद-गुणों के विवेचन कर लेने के बाद अब अलद्कारों के विचार का अवसर है और इसलिये (पहले ) यहां शब्द के अलक्कारों का निरूपण किया जा रहा है। टिप्पणी-मम्मट के अनुसार शब्द के ये ६ अलक्कार हैं जैसा कि काव्यप्रकाश के टीकाकार श्री सोमेश्वर ने कहा है- 'वक्रोक्तिरप्यनुप्रासो यमकं श्लेषचित्रके। पुनरुक्तवदाभासः शब्दालड्कृतयस्तु षट्।' इन्हीं द को शब्द का अलक्कार यहां इसलिये माना गया है क्योंकि इनमें शब्द का परिवर्त्तन कर देने से अलक्कार का भी रूप नष्ट हो जाया करता है। प्रयुक्त शब्द के परिवर्त्तन की असहन- शीलता ही शब्दालक्वार की पहचान है। अनुवाद -- किसी के एक अभिप्राय वाले वाक्य की किसी के द्वारा दूसरे अभिप्राय में योजना, चाहे वह श्लेष (प्रयुक्त शब्द के अन्य अर्थ) के आधार पर हो चाहे काकु (ध्वनि-विकार) के द्वारा हो, वक्रोक्ति अलद्कार है, जिसके दो भेद हैं-१ ला, श्लेष- वक्रोक्ति और २रा, काकुवक्रोक्ति। टिप्पणी-मम्मट ने शब्दालद्कारों में सर्वप्रथम 'वक्रोक्ति' का निरूपण एक विशेष अभिप्राय से किया है। आचार्य भामह के अनुसार तो 'वक्रोक्ति' अलद्कारों का निगूढ रहस्य है- 'सैषा सर्वैव वक्रोक्तिरनयार्ऽर्थो विभाव्यते। यत्नोऽस्यां कविना कार्यः कोऽलल्टारोऽनया विना॥ (काव्यालक्कार २. ८५) और कुन्तक ने तो इसे काव्यसर्वस्व के ही रूप में स्वीकार किया है- 'शब्दार्थो सहितौ वक्रकविव्यापारशालिनि। बन्धे व्यवस्थिती काव्यं तद्विदाह्ादकारिणि ॥' (वक्रोक्तिजीवित १.७ ) मम्मट वक्रोक्ति-सम्बन्धी इन धारणाओं के समर्थक नहीं। इन्हें 'वक्रोक्ति' में शब्द के एक अलङ्कार की झलक दिखायी देती है क्योंकि वक्र उक्ति अथवा उक्ति-वक्रता शब्द की ही चारुता है। 'वक्रोक्ति काव्य की आत्मा नहीं'-इस सिद्धान्त का भी सूक्ष्म संकेत यहां मम्मट ने वक्रोक्ति को शब्दालक्कार के क्षेत्र में ही सीमित कर स्पष्ट रूप से कर दिया है। अनुवाद-यहां 'इस प्रकार से' का अभिप्राय है (श्लेष से) श्लेषवक्रोक्ति और (काकु से) काकुवक्रोक्ति का। इन दोनों भेदों में से सभङ्ग पदश्लेष के द्वारा श्लेष- वक्रोक्ति, जैसे कि यहां- '(वक्ता) अरे भाई ! यदि तुम नारीजन के अनुकूल व्यवहार करने वाले हो तब तो सचमुच समझदार हो। (श्रोता) भला ऐसा भी कौन समझदार होगा जो शत्रुज केन

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३०८ काव्यप्रकाश:

अभङ्गश्लेषेण यथा- अहो केनेदृशी बुद्धिर्दारुणा तव निर्मिता। त्रिगुणा श्रयते बुद्धिन तु दारुमयी क्कचित्॥ ३५३॥ काक्का यथा- गुरुजनपरतन्त्रतया दूरतरं देशमुद्यतो गन्तुम्। अलिकुल कोकिलललिते नैष्यति सखि! सुरभिसमयेऽसौ॥ ३५४॥ हित की बात करेगा! (वक्ता-) तो क्या तुम अबलाजन के हितकारी नहीं बनना चाहते ? (श्रोता) भला ! अबलारूप से प्रसिद्ध स्त्रीजन का अहिताचरण भी किसी के लिये कभी अच्छा हो सकता है ? (वक्ता-) अरे ? बलासुर-विनाशी इन्द्र की इच्छा का उल्लङ्घन करना तुम्हारे सामर्थ्य में कहाँ? अभङ्ग पदश्लेष के द्वारा श्लेषवक्रोक्ति, जैसे कि यहाँ- '(वक्त्ता-) ओह ! किसने तुम्हारी बुद्धि ऐसी दारुण (क्रर) बना दी! (श्रोता-) भला किसी की बुद्धि भी कभी दारमयी (काठ की बनी) सुनी है? अरे बुद्धि तो त्रिगुणात्मक हुआ करती है !' काकु के द्वारा वकोक्ति अर्थात् काकु वक्रोक्ति, जैसे कि यहाँ- 'अरी सखी ! बड़े बूढ़ों की परतन्त्रता में पढ़ने के कारण, दूरदेश के लिये प्रस्थान करने वाले वे क्या भला इस अलिकुल और कोकिलों के द्वारा रमणीय वसन्त काल में नहीं आवेंगे!' टिप्पणी-(क) यहां 'नारीणामनुकूलम्' इत्यादि रचना में जो 'श्लेष-वक्रोक्ति' है वह पदों के मङ्ग अथवा खण्ड करने के कारण है। वक्ता के पद 'नारीणाम्', जिसका अभिप्राय स्त्रीजन का था- को श्रोता ने 'न+अरीणाम्' के रूप में तोड़-मरोड़ लिया, 'वामानाम्' का स्त्री-अर्थ न लेकर शत्रु-अर्थ ले लिया 'हितकृत' से हितकारक (हितं करोतीति हितकृत् ) अर्थ न निकाल कर अहित- कारक (हितं कृन्तति छ्िनत्ति इति हितकृत्) अर्थ निकाल लिया और अबला-अर्थ के व्याख्यानरूप से प्रयुक्त 'बलामावप्रसिद्धात्मनः' पद में बळ अर्थात् बलासुर के अभाव अथवा नाश के कारण प्रख्यात इन्द्र का अभिप्राय ढूंढ़ लिया! यहां परस्पर वक्ता और ओता एक के द्वारा अपने अभिप्रेत अर्थ में प्रयुक्त्त पदों को दूसरे अर्थों में ले ले कर अपनी-अपनी बुद्धि और उक्ति की बारीकियां दिखाना चाहते हैं। यहाँ और तो शब्द ऐसे हैं जो एक से अधिक अर्थ के वाचक हैं जिससे इनके खण्ड-खण्ड करने की आवश्यकता नहीं, किन्तु 'नारीणामनुकूलमाचरसि' में 'नारीणाम्' पद ऐसा है जिसका बिना खण्ड किये तो अभिप्राय 'ख्कियों का' है किन्तु 'न + अरीणाम्' के रूप में खण्ड कर देने पर 'शत्रुओं का नहीं' अर्थ निकल पड़ता है। यध्पि यहाँ ऐसे भी पद हैं जिनका पद-भङ्ग के बिना भी, एक अर्थ के बदले दूसरा अर्थ लिया गया हैं किन्तु मम्मट ने इसे समझ पदश्लेष के द्वारा वक्रोक्ति इसलिये माना है क्योंकि सभी उक्ति-वक्रता यहां स्त्री-अर्थ में प्रयुक्त 'नारीणाम्' पद के 'न+अरीणाम्' के रूप में भङ्ग करने पर ही प्रारम्म होती है। (ख) मम्मट ने केवल अमङ पदश्लेष के कारण 'वक्रोक्ति' का उदाहरण देने के लिये 'अहो केनेदृशी' इत्यादि उद्धरण दिया है। यहां 'दारुणा' पद का प्रयोग वक्ता ने तो क्रर अर्थ में किया था किन्तु श्रोता ने इससे 'दारु अथवा काठ से' अर्थ निकाल लिया। इन दोनों अर्थों में 'दारुणा' पद का सङ्गचह्ीं किया गया। यहां भी कवि वक्ता और ओोता के उक्ति-चमत्कार दिखाने में लगा हुआ है। (ग) काकु अथवा ध्वनि-विकार के आधार पर वक्रोक्ति 'गुरुजनपरतन्त्रतया' इत्यादि में है। राँ नायिका ने तो विना किसी काकु के 'नैष्यति' पद का प्रयोग किया था जिसका अभिप्राय संदि-'नहीं आर्वेगे' था किन्तु सखी ने एक दूसरे ढज् से इसका उच्चारण कर इसका दूसरा ही

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नवम उल्लास: ३०६

(द्वितीय-अरनुप्रास अलङ्घार ) (१०४) वर्णसाम्यमनुप्रासः। स्वरवैसादृश्येऽपि व्यक्जनसदशत्वं वर्णसाम्यम्। रसाद्यनुगतः प्रकृष्टो न्यासोऽनुप्रास: । (अनुप्रास के अवान्तर भेद) (१०५) छेकवृत्तिगतो द्विधा। छेका विद्ग्धा: वृत्तिर्नियत वर्णगतो रसविषयो व्यापारः। गत इति छेकानु प्रासो वृत्यनुप्रासश्च्।

किन्तयो: स्वरूपमित्याह- (छेकानुप्रास-निरूपण )

(१०६) सोऽनेकस्य सकृत्पूर्वः । अनेकस्य अर्थाद् व्यञ्जनस्य सकृदेकवारं सादश्यं छेकानुप्रासः। उदाहरणम्- ततोऽरुणपरिस्पन्दमन्दीकृतवपुः शशी। दधे कामपरिक्षामकामिनीगण्डपाण्डुताम् ॥३५५॥

अभिप्राय 'भला कैसे नहीं आवेंगे?' निकाल दिया। बिना किसी भी पद के भङ्ग अथवा अमङ् के ही केवल काकुध्वनिविकार के कारण अर्थ कितना बदल गया! इन तीनों उदाहरणों में यह स्पष्ट है कि 'वक्रोक्ति' अलक्कार शब्द का अलंकार है क्योंकि यहाँ प्रयुक्त शब्दों के बदले यदि दूसरे शब्द रख दिए जाँय तो उक्ति-वक्रता ही नष्ट हो जायगी। अनुवाद-वर्णों अर्थात् व्यञ्ञनों का जो सादृश्य है उसे 'अनुप्रास' कहते हैं। टिप्पणी-अनुप्रास का शब्दार्थ है-रसादिभिरनुगतः प्रकृष्ट आसो न्यासः अर्थात् इस प्रकार का शब्दचयन जिसमें सदृश व्यन्जनों का रसमावादि के अनुकूल ऐसा अव्यवहित विन्यास हो जो मनोरअ्क लगे। अनुवाद-यहाँ 'वर्णसाम्य' का अभिप्राय है स्वरों के असमान अथवा विसदृश्य होने पर भी व्यञ्जन-सादृश्य का होना, क्योंकि 'अनुप्रास'कहते हैं (व्यक्षनों की) ऐसी आवृत्ति को जिसमें बहुत व्यवधान न हो और जो रसभावादि के अनुकूल हो। यह दो प्रकार का है। पहलाछेकगत अर्थात् चतुर कवि द्वारा प्रयुक्त किंवा सहृदय- हृदय-हारी और दूसरा वृत्तिगत-अर्थात् वृत्ति-शब्द-संघटना-पर आश्रित अथवा उसका परिपोषक। यहां 'छेक' का अभिप्राय 'विदग्ध'-चतुर का है । 'वृत्ति' कहते हैं वर्णविशेष के रसाभिव्यक्जनविषयक व्यापार को। 'गत' अथवा आश्रित होनेका तात्पर्य है (पहले का) छेकानुप्रास और (दूसरे का) वृत्यनुप्रास कहा जाना। अनुप्रास के इन दोनों भेदों के स्वरूप का निरूपण इस प्रकार से है-

'छेकानुप्रास'। एक से अधिक (व्यक्षन) का एक बार जो सादृश्य है वह तो है पहला अर्थात् 'अनेकस्य'-अर्थात् एक से अधिक व्यज्ञन का 'सकृत्'-एक बार जो 'सादृश्य'-साम्य है वह छेकानुप्रास है। जैसे कि यहाँ- 'इसके बाद अरुण-परिस्पन्द (सूर्य-सारथि के संचरण) से मन्द-कान्ति चंद्र ने किसी काम-परिच्ाम (रतिखिन्न) कामिनी के कपोल की शुभ्रता धारण कर ली।' टिप्पणी-'ततोऽरुणपरिस्पन्द' इत्यादि रचना ऐसी है जिसमें न् और व् (जैसे कि 'परिस्पन्द-

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३१० काव्यप्रकाश:

(वृत्त्यनुप्रास-निरूपण) (१०७) एकस्याप्यसकृत्परः ॥ ७९॥ एकस्य अपिशब्दादनेकस्य व्यक्षनस्य द्विर्बहुकृत्वो वा सादृश्यं वृत्त्यनुप्रासः। (वृत्ति-विचार ) तत्र-

(१०९) ओजःप्रकाशकैस्तैस्तु परुषा उभयत्रापि प्रागुदाहृतम्। (११०) कोमला परैः ॥ ८० ॥ परैः शेषः । तामेव केचिद् ग्राम्येति वदन्ति। उदाहरणम्- अपसारय घनसारं कुरु हारं दूर एव किं कमलैः। अलमलमालि ! मृणालैरिति वदति दिवानिशं बाला ॥ ३५६॥ (वृत्ति-विषयक अरप्रन्यमत) (१११) केषांचिदेता वैदर्भीप्रमुखा रीतयो मताः । एतास्तिस्त्रो वृत्तय: वामनादीनां मते वैदर्भी गौडी-पाञ्चाल्याख्या रीतयो मताः। मन्दीकृत' में (तथा ण और ड् (जैसे कि 'गण्डपाण्डुताम्' में) व्यजनों का एक बार सादृश्य प्रतीत होता है। व्यञ्जनों की ऐसी हो आवृत्ति रसभावादि की प्रतीति में व्यवधान नहीं उपस्थित करता और इसलिए इसे छेक अथवा विदग्ध कवि किंवा सहृदय जन का अनुप्रास कहा जाता है। अनुवाद-दूसरा अर्थात् वृत्यनुप्रास वह है जिसका रूप है एक अथवा एक से अधिक व्यअ्ञन का एक से अधिक बार सादृश्य। 'एकस्य'-एक का और 'अपि'भी-शब्द के प्रयुक्त होने के कारण-एक से अधिक व्यक्षन का दो.बार अथवा कई बार जो सादृश्य है वह वृत्यनुप्रास है। इस वृत्यनुप्रास के प्रसङ्ग में (वृत्तियों के सम्बन्ध की) बात ऐसी है- 'उपनागरिका' वृत्ति वह वृत्ति है जिसमें माधुर्य के अभिव्यक्षक वर्ण अथवा व्यक्षन हो और 'परुष' वह जो ओज के प्रकाशक वर्णों वाली कही जाती है। इन दोनों वृत्तियों के जो उदाहरण हैं वे पहले ही (अर्थात् अष्टम उल्लास में, उप- नागरिका के लिये 'अनङ्गरङ्गप्रतिमम्' इत्यादि और परुषा के लिये 'मूर्ध्नामुद्वृत्तकृत्त' इत्यादि) दिये जा चुके हैं। दूसरे अर्थात् माधुर्य और ओज के प्रकाशक वर्णों के अतिरिक्त वर्णों वाली जो वृत्ति है वह 'कोमला' वृत्ति है। यहाँ 'दूसरे' (वर्णों) से अभिप्राय है (माधुर्य और ओज के अभिव्यक्जक वर्णों के) अतिरिक्त वर्णों से। इस वृत्ति को कुछ लोग (जैसे कि आलक्कारिक उद्भट इत्यादि), 'ग्राम्या' वृत्ति कहा करते हैं। जैसे कि- 'रातदिन यह विचारी 'कपूर दूर करो, हार हटाओ, कमल का क्या काम, मृणाल की क्या जरूरत'-बस यही अपनी सखिओं से कहा करती है!'

तीन रीतियाँ हैं। ये ही तीनों वृत्तियाँ वामन इत्यादि प्राचीन आलक्कारिकों के मत में वैदर्भी प्रभृति (उपनागरिका, परुषा और कोमला) इन्हीं तीनों वृत्तियों को वामन आदि आचार्य (क्रमशः) वैदर्भी, गौडी और पाञ्जाली नाम की तीन रीतियाँ माना करते हैं।

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नवम उल्लास: ३११ MWM8WwM (लाटानुप्रास) (११२) शाब्दस्तु लाटानुप्रासो भेदे तात्पर्यमात्रतः ॥ ८१॥ टिप्पणी-(क) भामह के पहले से ही काव्य में वृत्ति-विचार होता आरहा है। यद्यपि भामह ने 'वृत्ति' की दृष्टि से वृत्ति-विचार नहीं किया है किन्तु 'ग्राम्यानुप्रास' 'लाटीयानुप्रास' इत्यादि रूप से अनुप्रास के विभाग में 'ग्राम्या' (मम्मट की कोमला) आदि वृत्तियों का संकेत अवश्य कर दिया है। भामह के इसी संकेत के स्पष्टीकरण में उद्भट ने अनुप्रास का यह स्वरूप बताया है- 'सरूपव्यञ्जनन्यासं तिसृष्वेतासु वृत्तिषु। पृथक् पृथगनुप्रासमुशन्यि कवयः सदा ॥' (काव्यालक्कारसार संग्रह १. ७) और वृत्ति-गत अनुप्रास की तीनों वृत्तियों-'परुषा', 'उपनागरिका' और 'ग्राम्या'-का स्वरूप- निरूपण किया है। यद्यपि उद्भट ने वर्ण-विन्यास के वैचित्र्य के प्रयोजन का अन्वेषण नहीं किया किन्तु उनके व्याख्याकार श्री इन्दुराज ने 'रसाभिव्यक्ति' के रूप में त्रिविधवृत्तिगत अनुप्रास के प्रयोजन का उल्लेख स्पष्टतया कर दिया है- 'त्रिष्वेतेषु यथायोगं रसाद्यभिव्यक्त्यनुगुणेषु वर्णव्यवहारेषु यः सरूपाणं व्यञ्जनानां पृथक् पृथगुप निबन्धस्तमनुप्रासं कवयस्सदेच्छन्तीति। अतस्तास्तावद् वृत्तयो रसाद्यभिव्य- कत्यनुगुणवर्णच्यवहारात्मिका: ताश्च तिस्रः परुषोपनागरिकाग्राम्यत्वभेदात्। (काव्यालक्कारसार संग्रह पृष्ठ ५) इस प्रकार 'वृत्त्यनुप्रास' की जो भेदमीमांसा इन तीनों वृत्तियों के विश्लेषण के रूप में हो चुकी थी उसे मम्मट ने सहर्ष स्वीकार कर लिया है। मम्मट को रुद्रट की पाँच वृत्तियाँ और उनके आधार पर वृत्तिगतअनुप्रास के पाँच भेद जैसा कि इन पंक्तियों (काव्यालंक्कार २.१९) अर्थात्- 'मधुरा प्रौढा परुषा ललिता भद्रेति वृत्तय: पञ्च। वर्णानां नानात्वादस्येति यथार्थनामफलाः॥' में स्पष्ट है, इसलिये अभिप्रेत नहों क्योंकि ये उनके ध्वनिवाद की दृष्टि से जब रसाभिव्यंजक गुण तीन हैं तो उन गुणों के अभिव्यंजक वर्णों की वृत्ति भी तीन से अधिक नहीं हो सकती। वैसे तो मम्मट की दृष्टि में रसाभिव्यञ्जक त्रिविध गुणों के अतिरिक्त इन वृत्तियों का भी कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं। 'उपनागरिका' आदि का निरूपण भी प्राचीन आलक्कारिक-मत का अनुवादमात्र ही है। 'वैद्भी' 'गौडीया' और 'पाञ्ाली' (विशिष्टा पदरचना रीतिः। सा त्रेधा वैदर्मी गौडीया पाव्चाली चेति-काव्यालक्कार सूत्रवृत्ति १. ७.९) को 'वृत्त्यनुप्रास' की तीन वृत्तियों में इसलिये अन्तर्भूत किया है क्योंकि मम्मट की दृष्टि में न तो रीति काव्य की आत्मा है जो कि वामन का सिद्धान्त है और न इसमें वृत्ति के अतिरिक्त और कोई निगूढ रहस्य है। मम्मट के 'वृत्ति' और 'रीति' के अभेद का आधार आनन्दवर्धनाचार्य की यह उक्ति है :- 'वर्णसंघटनाधर्माश्च ये माधुर्यादयस्तेऽपि प्रतीयन्ते, तनततिरिक्तवृत्तयोऽपि याः कैश्वि- दुपनागरिकाद्याः प्रकाशिता:, ता अपि गताः श्रवणगोचरम्, रीतयश्च वैदर्भीप्रभृतयः।'

और है इसकी अभिनवगुप्तपादाचार्य की यह मीमांसा- (ध्वन्यालोक, निर्णयसागर, पृष्ठ ५)

'नैव वृत्तिरीतीनां तद्व्यतिरिक्तरवं सिद्धम्। तथा ह्यनुप्रासानामेव दीप्षमसृणमध्यवर्ण- नीयोपयोगितया परुषत्वललितत्वमध्यमत्वस्वरूपविवेचनाय वगन्रयसंपादनार्थं तिस्नोऽनु- प्रासजातयो वृत्तय इत्युक्ताः। वर्तन्तेऽनुप्रासभेदा आस्विति। तस्माद्वृत्तयोऽनुप्रासेभ्योऽ नतिरिक्तवृत्तयो नाऽभ्यधिकव्यापारा:।' (धवन्यालोकलोचन पृष्ठ ५.६) अनुवाद-(उपर्युक्त वर्णानुप्रास के अतिरिक्त) एक शब्दानुप्रास भी है जिसे लाटानुप्रास कहते हैं जिसमें समानार्थक किन्तु भिन्नतात्पर्य वाले शब्दों का सादृश्य रहा करता है।

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३१२ काव्य प्रकाश:

शब्दगतोऽनुप्रासः शब्दार्थयोरभेदेऽप्यन्वयमात्रभेदात् लाटजनवल्लभत्वाच्च लाटानुप्रासः । एष पदानुपास इत्यन्ये।

(११३) पदानां सः । (लाटानुप्रास के भेद )

स इति लाटानुप्रासः । उदाहरणम्- यस्य न सविधे दयिता दवदहनस्तुहिनदीधितिस्तस्य । यस्य च सविधे दयिता दवदहनस्तुहिनदीधितिस्तस्य ।। ३५७॥ (११४) पदस्यापि। अपिशब्देन स इति समुच्चीयते। उदाहरणम्- वदनं वरवर्णिन्यास्तस्याः सत्यं सुधाकरः। सुधाकरः क नु पुनः कलङ्कविकलो भवेत् ॥ ३५८ ॥ यह अनुप्रास (निरर्थक वर्णों की आवृत्ति नहीं अपि तु) ऐसे सार्थक वर्णों की आवृत्ति है जहाँ पर शब्द और अर्थ के अभिन्न होने पर भी तात्पर्य का भेद रहा करता है और जिसे लाट देश के कविजन का प्रिय अनुप्रास होने के कारण 'लाटानुप्रास' कहा जाता है। कुछ आलक्कारिक इसे ( वर्णानुग्रास से सर्वथा भिन्न बताने के लिये) पदानुप्रास भी कहा करते हैं। टिप्पणी-मम्मट ने यहाँ अनुप्रास के दो मुख्य भेद किये हैं-१ला वर्णानुप्रास और २रा पदानुप्रास। पहला अर्थात् वर्णानुप्रास तो अवाचक वर्णों की आवृत्ति है जिसके छेकगत और वृत्तिगत दो भेद बताये जा चुके हैं और दूसरा अर्थात् पदानुप्रास वाचक पद की आवृत्ति है जिसे लाटानुप्रास कहते हैं। आलक्कारिक उद्मट का यहाँ ऐसा कथन है- 'स्वरूपार्थाविशेषेऽपि पुनरुक्तिफलान्तरम्। शब्दानां वा पदानां वा लाटानुप्रास इत्यपि॥ अनुवाद-यह एक से अधिक पदों की आवृत्ति में भी होता है- यहाँ 'वह' का अभिप्राय है 'लाटानुप्रास' का। जैसे कि- 'जिसके पास उसकी कोई प्रियतमा नहीं, उसके लिये शीतांशु-चन्द्र भी दावानल है और उसके लिये, जिसके पास उसकी कोई प्रियतमा है, दावानल भी शीतांशु चन्द्र है।' टिप्पणी-लाटनुप्रास के उपर्युक्त उदाहरण मे एक से अधिक समानार्थक पदो की, तात्पर्य मात्र का भेद रख कर, आवृत्ति की गई है। इस दृष्टि से यह लाटानुप्रास यहाँ 'अनेकपदगत' लाटानुप्रास कहा जाता है। यहाँ तात्पर्य-भेद का अभिप्राय यह है-'यस्य न सविधे दयिता' इत्यादि के पूर्वार्द्ध में 'दवदहन' (दावानल) तो उद्देश्य है और 'तुहिनदीधिति' (शीतांशु चन्द्र ) है विधेय, किन्तु उत्तरार्द्ध में 'तुहिनदीविति' उद्देश्य बना दिया गया है और 'दवदहन' बन गया है विधेय। इन शब्दों के समानार्थक होने पर भी इनकी पुनरावृत्ति जिस दृष्टि से यहाँ की गयी है वह है इनके उद्देश्य-विधेय-भाव का परस्पर परिवर्त्तन जिसके कारण यहाँ अन्वयभेद है जो कि तात्पर्य- भेद में परिणत हो जाता है। अनुवाद-इसे एक पद की आवृत्ति में भी देख सकते हैं। यहाँ (अपि) 'भी' शब्द 'उस' अर्थात् लाटानुप्रास का समुचायक है। जैसे कि- उस वरवर्णिनी का मुख क्या सचमुच सुधाकर-चन्द्रमा है। किन्तु सुधाकर (चन्द्रमा) भला निष्कलक्क कहाँ हो सकता है!'

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नवम उल्लास: ३१३

(११५) वृत्तावन्यत्र तत्र वा । नाम्नः स वृत्त्यवृत्त्योश्र एकस्मिन् समासे भिन्ने वा समासे समासासमासयोवा नाम्नः प्रातिपदि- कस्य न तु पदस्य सारूप्यम्। उदाहरणम्- सितकरकररुचिरविभा विभाकराकार! धरणिधर ! कीर्तिः। पौरुषकमला कमला साऽपि तवैवास्ति नान्यस्य ॥ ३५६॥ (११६) तदेवं पञ्चधा मतः ॥ ८२॥ (यमक अलङ्कार ) (११७) अर्थे सत्यर्थभिन्नानां वर्णानां सा पुनः श्रुतिः॥ यमकम् टिप्पणी-यहाँ पर केवल एक पद अर्थात् 'सुधाकर' (चन्द्रमा) पद की ही आवृत्ति है। यद्यपि यहाँ आवृत्त पद का अर्थ अभिन्न है किन्तु प्रथम प्रयुक्त सुघाकर पद के विधेय होने और द्वितीय प्रयुक्त सुधाकर पद के उद्देश्य होने से तात्पर्य-भेद है जिसके कारण इसकी आवृत्ति की गयी है। इस प्रकार का लाटानुप्रास 'रकपदगत' लाटानुप्रास है। अनुवाद-यह वहाँ भी होता है जहाँ किसी प्रातिपदिक पद की, एक समास में अथवा भिन्न समास में अथवा समास और असमास में आवृत्ति प्रतीत होती है। यहाँ पर पद का नहीं अपितु नाम अथवा प्रातिपदिक (धातुभिन्न और प्रत्ययभिन्न सार्थक शब्द-स्वरूप) का ही सारूप्य-सादृश्य-अपेक्ित है जो कि चाहे एक समास में हो, चाहे भिन्न समास में हो और चाहे समास और असमास में हो। जैसे कि- 'हे विभाकराकार (प्रचण्डप्रताप) महाराज ! सितकर-कर (चन्द्रकिरण) की भाँति रुचिरकान्तिवाली जो कीर्ति है वह आप की ही है और पौरुष-कमला (विजय श्री) तथा कमला (राज्यश्री) भी किसी दूसरे की नहीं आपकी ही हैं।' टिप्पणी-यहाँ 'सितकरकररुचिर विभा' इत्यादि उदाहरण प्रातिपदिकगत लाटानुप्रास का उदाहरण है। इस उदाहरण में प्रातिपदिकगत लाटानुप्रास के तीनों प्रकार स्पष्ट दिखायी देते हैं। 'सितकरंकररुचिर विभ।' में 'कर', 'कर' की आवृत्ति तो एक समास में नाम-पद की आवृत्ति है और 'सितकरकररुचिर विभा विभाकराकार' में 'विभा', 'विभा' की जो आवृत्ति है वह भिन्न समास में नामपद की आवृत्ति का दृष्टान्त है। अब जो समास और असमास में नामपद की आवृत्ति है वह दिखाई देती है 'पौरुषकमला कमला' में-समस्त और असमस्त 'कमला' पद की आवृत्ति में। अनुवाद-यह अनुप्रास (अर्थात् लाटानुप्रास) इस प्रकार से (अर्थात् अनेक पद की, एक पद की, एक समासगत प्रातिपदिक की, भिन्नसमासगत प्रातिपदिक की और समस्तासमस्त प्रातिपदिक की आवृत्ति के कारण) पाँच प्रकार का हुआ करता है। 'यमक' अलंकार वह है जिसमें, अर्थ के होने पर, भिन्न-भिन्न अर्थ वाले वर्ण अथवा वर्णसमूह की पूर्वक्रमानुसार आवृत्ति हुआ करती है। टिप्पणी-'यमक' का शब्दार्थ है-'यम द्ौ समजातौ तत्प्रतिकृतिर्यमकम्' अर्थात् 'यम' अथवा जोडुए पैदा हुए दो जीव की प्रतिकृति अथोत् चित्ररचना। रुद्रट ने अपने काव्यालद्वार में 'यमक' की जो परिभाषा दी है अर्थात्- 'तुल्यश्रुतिकमाणामन्यार्थानां मिथस्तु वर्णानाम। पुनरावृत्तिर्यमकं प्रायश्च्छन्दांसि विषयोऽस्य॥'

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३१४ काव्यप्रकाश: MmnBnmm 'समरसमरसोय' मित्यदावे केषामर्थवत्वेऽन्येषामनर्थकत्वे भिन्नार्थानामिति न युज्यते वक्तुम् इति अर्थे सतीत्युक्तम्। सेति सरो रस इत्यादिवैलक्षण्येन तेनैव क्रमेण स्थिता।म ('यमक' के भेद-प्रभेद ) (११८) पादतद्भागवृत्ति तद्यात्यनेकताम् ॥८३॥ प्रथमो द्वितीयादौ, द्वितीयस्तृतीयादौ, तृतीयञ्चतुर्थे, प्रथमस्त्रिष्वपीति सप्त। प्रथमो द्वितीये तृतीयश्चतुर्थे प्रथमश्चतुर्थे द्वितीयस्तृतीये इति द्वे तदेवं पादजं नव- भेदम्। अर्धावृत्ति श्लोकावृत्तिश्च्व्वेति द्वे। द्विघा विभक्ते पादे प्रथमादिपादादि- भागः: पूर्ववत् द्वितीयादिपादादिभागेषु, अन्तभागोऽन्तभागेष्विति विशतिर्भेदाः। श्लोकान्तरे हि नासौ भागावृत्तिः । त्रिखण्डे त्रिशत् चतुः खण्डे चत्वारिंशत्। जिसका अभिप्राय है-समान रूप से सुने जाने वाले और समान परिपाटी वाले मिन्नार्थक किंवा भिन्न-प्रयोजन वर्णों की पुनरावृत्ति 'यमक' है जिसका व्यापक क्षेत्र 'पद्य' है-उसका प्रभाव मम्मट की यमक-परिभाषा पर स्पष्ट प्रतीत होता है। अनुवाद-यहाँ 'अर्थ होने पर' का अभिप्राय यह है-यदि (एकार्थक वर्णावृत्ति वाले 'लाटानुप्रास' से यमक का भेद करने के लिये) यह कहा जाय कि यमक अलङ्कार में भिन्नार्थक वर्ण की आवृत्ति विवत्ित है तो 'समरसमरसोऽयम्'इत्यादि स्थानों पर 'यमक' नहीं हो सकता क्योंकि यहाँ पहला 'समर' रूप वर्णसमुदाय तो सार्थक है और दूसरा अर्थात् 'समरस' का भाग 'समर' रूप वर्णक्रम निरर्थक है। अब यदि 'अर्थ होने पर' अथवा 'यदि अर्थ हो तब' (भिन्नार्थक वर्ण अथवा वर्णसमृह की पुनः श्रुति को यमक) कहा जाय तब 'समरसमरसोयऽम्' इत्यादि में भी, जहाँ एक वर्ण-परिपाटी सार्थक और उसके समान दूसरी वर्ण-परिपाटी निरर्थक क्यों न हो, 'यमक' सर्वथा संगत होगा। साथ ही साथ यहाँ 'सा पुनः श्रुतिः' अर्थात् उसी वर्णावृत्ति (पूर्वक्रमानुसारिणी वर्णावृत्ति) का कथन इसलिये आवश्यक है क्योंकि यमक 'सरो रसः' इत्यादि जैसी व्युत्क्रम वाली (क्योंकि यहाँ वर्ण-साम्य तो है किन्तु वर्ण-कम में भेद है) वर्णावृत्ति से भिन्न प्रकार की (अर्थात् समान आनुपूर्वी वाली) वर्णावृत्ति में ही माना जाय। सबसे पहले तो यमक के दो भेद हैं-१ला पादवृत्ति (श्लोक के चतुर्थांश में रहने वाला) और र पादांशवृत्ति (अर्थात् श्लोक के चतुर्थांश के भी अंश में उपलब्ध ) और इन भेदों के अवान्तर भेदों के साथ तो इसके अनेकानेक प्रकार हैं। पादवृत्ति अथवा पादगत यमक अलङ्कार ग्यारह प्रकार का है। सात प्रकार तो इसके इस दृष्टि से हैं-(१) प्रथम पाद की द्वितीय पाद में आवृत्ति होने से (२) प्रथम पाद की तृतीय पाद में आवृत्ति होने से (३) प्रथम पाद की चतुर्थ पाद में आवृत्ति होने से (४) द्वितीय पाद की तृतीय पाद में आवृत्ति होने से (५) द्वितीय पाद की चतुर्थ पाद में आवृत्ति होने से (६) तृतीय पाद की चतुर्थ पाद में आवृत्ति होने से और (७) प्रथम पाद की ही द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ पाद में आवृत्ति होने से। (८) वां प्रकार इस यमक का है प्रथम पाद की द्वितीय पाद में और तृतीय पाद की चतुर्थ पाद में आवृत्ति का और (९) वां प्रथम पाद की चतुर्थ पाद में और द्वितीय पाद की तृतीय पाद में आवृत्ति का। अब रहा(१०)वां-वह है आधे श्रोक की आवृत्ति और (११) वां-है पूरे श्रोक की आवृत्ति। पादभागवृत्ति अथवा पादांशगत जो यमक है उसके तो अनेक प्रकार हैं जैसे कि यदि श्लोक के प्रत्येक पाद के दो-दो भाग कर दिये जाँय तब पादवृत्ति के ही समान यहाँ भी आवृत्ति होने से पहले तो ये २० भेद हो जायेंगे-( १) प्रथम पाद के आद्य भाग की द्वितीय पाद के आद्य भाग में आवृत्ति (२) प्रथम पाद के आद्य भाग की तृतीय पाद के

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नवम उल्लास: ३१५

प्रथमपादादिगतान्त्यार्घादिभागो द्वितीय पादादिगते आद्यार्घादिभागे यम्यते इत्याद्यन्वर्थतानुसरणेनानेकभेदम्, अन्तादिकम् आद्यन्तिकम् तत्समुच्चय:, मध्यादिकम् आदिमध्यम् अन्तमध्यम् मध्यान्तिकम् तेषां समुच्चयः। तथातस्मि न्नेव पादे आद्यादिभागानां मध्यादिभागेषु अनियते च स्थाने आवृत्तिरिति प्रभूततमभेदम् । तदेतत्काव्यान्तगडुभूतम् इति नास्य भेदलक्षणं कृतम्। आद्य भाग में आवृत्ति (३) प्रथम पाद के आद्य भाग की चतुर्थ पाद के आद्य भाग में आवृत्ति (४) द्वितीय पाद के आद्य भाग की तृतीय पाद के आद्य भाग में आवृत्ति (५) द्वितीय पाद के आद्य भाग की चतुर्थ पाद के आद्य भाग में आवृत्ति (६) तृतीय पाद के आद्य भाग की चतुर्थ पाद के आद्य भाग में आवृत्ति (७) प्रथम पाद के आद्य भाग की द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ पाद के आद्य भाग में आवृत्ति (८) प्रथम पाद के आद्य भाग का द्वितीय पाद के आद्य भाग से और तृतीय पाद के आद्य भाग का चतुर्थ पाद के आद्य भाग से (एकत्र) सारूप्य (९) प्रथम पाद के आद्य भाग का तृतीय पाद के आद्य भाग और द्वितीय पाद के आद्य भाग का चतुर्थ पाद के आद्य भाग से ( एकत्र) सारूप्य और (१०) इन सब के साथ अर्द्ध भाग की आवृत्ति। और इसी प्रकार प्रथमादि पादों के अन्त्यभाग की द्वितीयादि पादों के अन्त्यभाग में आवृत्ति होने से १० और भेद, जिससे दोनों मिलकर २० भेद हुये। (यहां पादगत यमक के समान ११, ११ भेद मिला कर २२ भेद इसलिये नहीं हो सकते क्योकि) यहां 'क्लोकावृत्ति' नामक भेद, भाग की आवृत्ति के श्लोकान्तर में रोचक न होने के कारण, नहीं माना जाता। इस रीति से यदि पाद के तीन खण्ड किये जांय तो उनमें आवृत्ति होने से तीस भेद होंगे और यदि चार खण्ड, तो चालीस भेद। (ये भेद तो हुये सजातीय भागावृत्ति अर्थात् एक पाद के आद्य भाग की दूसरे पाद के आद्य भाग में आवृत्ति की दृष्टि से।) अब प्रथम पादादि के अन्तिम और अर्द्धादिक भाग की द्वितीय पादादि के आद्य और अर्द्धादिक भाग में आवृत्ति तथा परस्पर योग के कारण (अर्थात् विजातीय भागावृत्ति की दृष्टि से) इसके जो भेद हैं वे तो अनेक हैं जैसे कि अन्तादिक ( प्रथम पाद के अन्त्य अर्द्ध भाग की द्वितीय पाद के आद्य अर्द्ध भाग में आवृत्ति), आद्यन्तिक (प्रथम पाद के आद्य अर्द्धभाग की द्वितीय पाद के अन्त्य भाग में आवृत्ति), उभय ससुच्चय (प्रथम पाद के आद्य और अन्त्य भाग की द्वितीय पाद के अन्त्य और आद्य भाग में आवृत्ति), मध्यादिक (श्लोक के तीन-तीन अथवा चार-चार खण्डों में पूर्व पाद के मध्यभाग की उत्तर पाद के आदि भाग में आवृत्ति), आदिमध्य (पूर्व पाद के आदि भाग की उत्तर पाद के मध्यभाग में आवृत्ति), अन्त मध्य (प्रथम पाद के अन्त्य भाग की द्वितीय पाद के मध्य भाग में आवृत्ति), मध्यान्तिक (पूर्वपाद के मध्यभाग की द्वितीय पाद के अन्त्य भाग में आवृत्ति) और इन दोनों अर्थात् अन्तमध्य और मध्यान्तिक का समुच्चय (पूर्वपाद के अन्त्य और मध्य भाग की द्वितीय पाद के मध्य और अन्त्य भाग में आवृत्ति)। इसी प्रकार यह भी सम्भव है कि एक ही किसी पाद में आद्यादिक भागों की मध्या- दिक भागों में आवृत्ति हों और पादादि-व्यवस्थारहित गद्यादि में तो किसी वर्ण-परिपाटी की कहीं भी आवृत्ति हो सकती है और इस प्रकार इसके भेद-प्रभेद और भी बहुत अधिक हो गये। इन भेद प्रभेदों की परिभाषा यहां कदापि विवक्षित नहीं क्योंकि ये काव्य के रसास्वाद में वस्तुतः वैसे ही विध्नदायक हैं जैसे ईख के रसास्वाद में उसकी एक पर एक गांठें। टिप्पणी-(क) मम्मट के पूर्ववर्ती आलक्कारिकों ने यमक के भेद-प्रभेदों का साङ्गोप न्व वर्णन किया है। यहां मम्मट ने प्राचीन अलक्कार शास्त्र की यमक-सम्बन्धी मान्यता का निर्वाह तो अवश्य किया है किन्तु साथ ही साथ यह भी संकेत स्पष्टरूप से कर दिया है कि यमक के विविध बन्धों के प्रति कवि अथवा सहृदय की रुचि काव्य और रसास्वाद के लिये नितान्त हानिकर है।

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३१६ काव्यप्रकाश:

दिङ्मात्रमुदाहनियते- सन्नारीभरणोमायमाराध्य विधुशेखरम्।। सन्नारीभरणोऽमायस्ततस्त्वं पृथिवीं जय ॥ ३६० । की विनायमेनो नयताऽसुखादिना विना यमेनोनयता सुखादिना। महाजनोऽदीयत मानसादरं महाजनोदी यतमानसादरम्॥ ३६१॥ स त्वारम्भरतोऽवश्यमबलं विततारवम्। सर्वदा रणमानैषीदवानलसमंस्थितः ॥ ३६२॥ सत्त्वारम्भरतोऽवश्यमवलम्बिततारवम्। सर्वदारणमानैषी दवानलसमस्थितः ॥ ३६३ ॥ (ख) मम्मट के मत में काव्य की दृष्टि से यमक का क्या और कितना महत्त्व है यह तो इसीसे स्पष्ट है कि मम्मट ने यमक के भेद-प्रभेदों और उनके भी अवान्तर भेदों के 'नामकरण' में कोई मी ऐसी रुचि नहीं दिख्ायी जो कि उनके पूर्ववर्त्ती आलक्कारिकों ने दिखा रखी है। यमक के इन मिन्न-भिन्न भेदों के वे सुन्दर-सुन्दर नाम काव्यप्रकाश में नहीं गिनाये गये जो कि प्राचीन अलक्कार अ्रन्थों जैसे कि रुद्रट के 'काव्यालक्वार' में ही बड़े मनोयोग से गिनाये गये हैं। रुद्रट ने पादवृत्ति यमक के उपर्युक्त ११ प्रकारों के क्रमशः ये नाम दिये हैं-मुख, संदंश, आवृत्ति, गर्भ, संदष्टक, पुच्छ, पंक्ति, युग्मक, परिवृत्ति, समुद्ग और महायमक। और साथ ही साथ सबका लक्षण-उदाहरण बताते हुये यमक-बन्ध के प्रति कवियों को प्रोत्साहिन तक किया है :- इति यमकमशेषं सम्यगालोचयद्भिः सुकविभिरभियु क्ैर्वस्तु चौचित्यवद्भिः। सुविहितपदभङ्गं सुप्रसिद्धाभिधानं तदनु विरचनीयं सर्गबन्धेषु भूग्ना।।' अनुवाद-इसलिये इसके कुछ भेदों के ही उदाहरण दिये ज़ा रहे हैं- (काव्यालक्कार २. ५९)

(१) 'हे महाराज ! सन्नारीभरणोमाय' -सव्नारीभरणा (पतिव्रता स्त्रियों की एकमात्र शोभा अथवा भरण-पोषणक्कारिणी) उमा के अय (प्राप्तिस्थान अथवा परमपद) चन्द्रशेखर (भगवान् शिव) की आराधना करते हुये, 'सन्नारीभरण' (संग्राम में शत्रु- पक्ष के राज-सैन्य के विनाशक) तथा अमाय (निष्कपट) आप सार्वभौम सम्राट हो जाँय।' (यहाँ प्रथम पाद के 'सन्नारीभरणोमाय' रूप वर्ण-समूह की तृतीय पाद में आवृत्ति होने से 'संदंश' नामक 'यमक' है।) (२ ) यह महापुरुष (अयं महाजनः ) शत्रु के मान का मर्दन करने वाला (मानसात्) और दुर्जनों का दमन करने वाला (महाज नोदी) होकर भी अपनी प्राण रक्षा में निरत लोगों को रुला कर (यतमासादरं, यतमाननां मरणप्रतिक्रिया- व्यावृतानां सादं खेदं राति ददातीति क्रियाविशेषणम्) प्राणिलोक के प्राणहारक (असुरवादिना) सब को नीचा दिखाने वाले (ऊनयता) सब के सुख के संहारकर्ता (सुखादिना) और-सब को मृत्युलोक में पहुँना देने वाले (नयता) यमराज के द्वारा (यमेन) विना किसी अपराध के ही (एनो विता) कितनी शीघ्रता से (अरं) नष्ट- भ्रष्ट हो गया (अदीयत)! (यहाँ 'युग्मक' नाम का यमक है क्योंकि प्रथम पाद की द्वितीय पाद में आवृत्ति है और तृतीय पाद की चतुर्थ पाद में।) (३) स (उस) अलसं अवान् (शीघ्रतापूर्वक समर में प्रस्थान करने वाले ) अस्थितः (विष्णुपरायण किंवा प्रचण्ड-प्रतापी) सत्त्वारम्भरतः (पराक्रम के कार्यों में नित्य निरत) सर्वदारणमानैषी (शत्रु-संहार में अपने मान के रक्षक और ) दवानल- समस्थितः (शत्रु-वन में दावानल के समान विराजमान राजा ने) भरतः (अपने प्रबल प्रभाव से) चिततारवम् (सिंहनाद करते हुये) सर्वंदा (सदा ही) अवश्यं (वश में न आने वाले भी किन्तु पुनः) अबलं (निर्बल बने) अबलम्बिततारवम् (प्राण रक्षा के

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नवम उल्लास: ३१७

अनन्तमहिमव्याप्विश्वां वेधा न वेद याम्। या च मातेव भजते प्रयते मानवे दयाम् ॥ ३६४॥ यदानतोऽयदानतो नयात्ययं न यात्ययम्। शिवेहितां शिवे हितां स्मरामितां स्मरामि ताम् ॥:६५॥ सरस्वति ! प्रस्ादं मे स्थितिं चित्तसरस्वति ! सर स्वति कुरु क्षेत्रकुरुक्षेत्र-सरस्वति !॥ ३६६॥ ससार साकं दर्पेण कन्दर्पेण ससारसा। शरन्नवाना बिभ्राण नाषिभ्राण शरन्नत्ा ॥ ३६७॥ मधुपराजिपराजित-मानिनीजनमनः सुमनः सुरभि श्रियम्। अभृत वारितवारिजविप्लवं स्फुटितताम्रतताम्रवणं जगत् ॥३६८॥

लिये जंगलों में छिपे) आरं (अरि-समूह को) रणमानैषीत् (रणभूमि में बलात्कारपूर्वक पकड़ मंगाया।)-यहाँ 'महायमक' है जिसमें पूरे श्लोक की ही आवृत्ति का चमत्कार दिखायी दे रहा है। महायमक और शब्दश्लेष में एक भेद है जिसका ध्यान रखना भावश्यक है। शब्दश्लेष में तो एक ही प्रयत्न से दो वाक्यों का उच्चारण होता है किन्तु महायमक में प्रयत्न-द्यपूर्वक। (४) ( उस जगन्माता परमेश्वरी दुर्गा के चरणरज हमारे मनोरथों को सफल बनावें) याम (जिस) अनन्तमहिमव्याप्तविश्वां (अनन्त महिमा से विश्व-ब्रह्माण्ड में व्याप्त देवी को) वेधा न वेद (ब्रह्मा भी तत्वतः नहीं पहचान पाते) च (और) (या मातेव प्रणते मानवे दयां भजते) जो कि माता की माँति अपने आगे प्रणत मनुज पर सदा दया-दृष्टि रखा करती है। (श्री आनन्दवर्धनाचार्य के 'देवीशतक' के इस श्लोक में 'संदष्टक' नामक यमक अलङ्कार है क्योंकि यहाँ द्वितीय पाद के अन्तभाग 'न वेद याम्' की चतुर्थ पाद के अन्त भाग में आवृत्ति है।) (५) (शिवेहितां) भगवान् शंकर की कामना-भूमि, (स्मरामितां) कामदेव के द्वारा अपरिच्छिन्न सौन्दर्यशालिनी कि वा (शिवे हितां) निरन्तर लोककल्याण में लगी (तां स्मरामि) उस परमेश्वरी दुर्गा को नमस्कार है, जिसके (अभयदानतः) मङ्गल-दानों के द्वारा (यदानतः) निरन्तर प्रणत (अयं) भक्तजन (नयात्ययं न याति) कभी भी दुर्माग पर नहीं चला करते। (आनन्दवर्धनाचार्य के 'देवीशतक' की इस रचना में 'आद्यन्तिक' यमक अलंकार है क्योंकि यहाँ एक ही पाद में आदि भाग की अन्तभाग में सुन्दर आवृत्ति दिखाई दे रही है।) (६) ( हे सरस्वति ) हे वाग्देवि ! दुर्गे! (क्षेत्रकुरु्षेत्र सरस्वति ) हे भक्त-जन के कुरुक्षेत्ररूपी हृदय-क्षेत्र की आप्लाविनि ! देवि!) (प्रसादं सर) मुझ भक्त-जन पर प्रसन्न हो और (मे चित्त-सरस्वति) मेरे मनः समुद्र में (स्थितिं स्वति कुरु) अपना सुन्दर निरन्तर आवास बना लो। ('देवीशतक' की इस रचना में पूर्वार्द्ध में 'आद्यन्तिक' और उत्तरार्द्ध में आद्यन्तिक किं वा अन्तादिक दोनों का 'समुच्चय' स्पष्ट झलक रहा है।) (७) ( ससारसा) कमलों अथवा सारसों के साथ (नवानाः) अपछ्ठिल मार्गों से रमणीय (नाविभ्राणा) पत्तियों के कल-कूजन से सुरम्य (शरं बिभ्राणा) कास-कुसुम से अतिशय कमनीय (नवा शरत्) नयी-नयी यह शरद् ऋतु (कंदर्पेण साकं) मानो हृदयोन्मादक मदन के साथ (दर्पेण ससार) अपने अभिमान में चूर आ ही पहुँची। यहाँ पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध दोनों में आद्यन्तिक और अन्तादिक का 'समुच्चय' है।) (८) ( मधुपराजिपराजितमानिनीजनमनः सुमनः सुरभि) मानिनी जन के हृदयों को भ्रमरों के मधुर गुन से पराजित करने वाले फूलों के द्वारा सर्वंतः सुरभित, (वारित-

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३१८ काव्यप्रकाश:

एवं वैचित्र्यसहस्त्रैः स्थितमन्यदुन्नेयम्।

(११९) वाच्यभेदेन भिन्ना यद् युगपद्भाषणस्पृशः । (श्लेष)

श्लिष्यन्ति शब्दा: श्लेषोऽसावक्षरादिभिरष्टधा॥ ८४॥ (श्लेष के मेद) अर्थभेदेन शब्दभेदः इति दर्शने काव्यमार्गे स्वरो न गण्यते इति च नये वाच्यभेदेन भिन्ना अपि शब्दा यद् युगपदुच्चारणेन श्लिष्यन्ति भिन्नं स्वरूप- मपहुवते स श्लेष । स च वर्ण-पद-लिङ्ग-भाषा-प्रकृति-प्रत्यय-विभक्ति- वचनानां भेदादष्टघा। वारिजनिप्लवं) तुषारपात के अभाव में प्रसन्न कमल वनों से सुशोभित, (स्फुटितताम्र- तताम्रवणं) मञ्जरियों से भरे और रक्त किशलयों से कमनीय आम्रकाननों से सर्वत्र रमणीय (जगत् ) यह सारा संसार-इस वसन्त काल में (श्रियं अभृत) एक अद्भुत सौन्दर्य से भर उठा। (महाकवि रत्नाकर के 'हरविजय महाकाव्य' के इस श्लोक में ऐसे यमक भेदों का समुच्चय है जिनमें वर्ण-समूह अनियत स्थान में आवृत्त हो रहे हैं।) इसी प्रकार 'यमक' के नाना भेदों के नाना प्रकार के चमत्कारों से भरे अनेकानेक उदाहरण स्वयं काव्य साहित्य में देखे जाते हैं। टिप्पणी-(क) 'काव्यालद्कार' के रचयिता आचार्य रुद्रट ने 'नियतस्थानावृत्ति' यमक के प्रकारों की गणना तो संभव मानी है किन्तु 'अनियतस्थानावृत्ति' यमक को असंख्य प्रकार का ही कहा है- 'यमकानां गतिरेषा देशावयवावपेक्षमाणानाम्। अनियतदेशावयवंत्वपरमसंख्यं सदेवास्ति।' आचार्य मम्मट ने प्राचीन आलंकारिकों की मान्यता की रक्षा की ही दृष्टि से यहाँ 'यमक' के कतिपय भेदों का विवेचन किया है। (ख) मम्मट के अनुसार यमक-बन्ध में कविजन का अभिनिवेश अनुचित है क्योंकि मम्मट की दृष्टि में आनन्दवधनाचार्य की यह धारणा- 'ध्वन्यात्मभूते शृङ्गारे यमकादिनिबन्धनम्। शक्तावपि प्रमादित्वं विप्रलम्भे विशेषतः ।' काव्य-सौन्दये की रक्षा के लिये अत्यन्त अपेक्षित है। अनुवाद-'श्लेष' वह अलंकार है जिसमें अर्थ-भेद के कारण परस्पर भिन्न भी शब्द, उच्चारण-सारूप्य के कारण, एकरूप प्रतीत हुआ करते हैं। यह अक्षर इत्यादि के इस प्रकार के सारूप्य के कारण, आठ प्रकार का हुआ करता है। टिप्पणी-(क) 'दलेष' के भूल में जी बात छिनो है वह है मिन्नार्थक शब्दों के पारस्परिक भेद की अप्रतीति, जिसका कारण है ऐसे शब्दों में, वर्णों की समान आनुपूर्वी के होने से, उच्चारण की समानता। (ख) मम्मट की नप-परिभाषा रुद्रट की स्लेष-परिभाषा का अनुसरण करती है। रुद्रट ने श्लेष का ऐसा ही स्वरूप-निरूपण किया है- 'वत्तुं समर्थमर्थं सुश्लिष्टाक्लिष्टविविधपदसंधि। युगपदनेकं वाक्यं यत्र विधीयेत स श्लेषः॥

अन्रायं मतिमद्भिर्विधीयमानोऽष्टधा भवति ॥' ( काव्यालंकार ४.१, २) अनुवाद-'श्लेष' कहते हैं परस्पर भिन्न-भिन्न अर्थ रखने वाले भी शब्दों में, ऐकरूप्य- अभेद की प्रतीति को, जिसका 'अर्थभेदेन शब्दभेदः'-यदि अर्थ भिन्न-भिन्न हैं तो शब्द भी भिन्न-भिन्न ही होंगे' (उद्भट सिद्धान्त) की दृष्टि से तो यह अभिप्राय है कि परस्पर भिन्न स्वरूप भी शब्द उच्चारण-सारूप्य के कारण भिन्न-भिन्न न प्रतीत होकर एक से प्रतीत

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नवम उल्लास: ३१६

क्रमेणोदाहरणम्- अलङ्कारः शङ्काकरनरकपालं परिजनो 11

विशीर्णाङ्गो भङ्गी वसु च वृष एको बहुवयाः। अवस्थेयं स्थाणोरपि भवति सर्वामरगुरो- विंधौ वक्रे मूध्नि स्थितवति वयं के पुनरमी ॥ ३६६॥ पृथुकात्तस्वरपात्रं भूषित निःशेषपरिजनं देव !। विलसत्करेणुगहनं सम्प्रतिसममावयोः सदनम् ॥ ३७० ॥ भक्तिप्रह्वविलोकनप्रणयिनी नीलोत्पलस्पर्धिनी ध्यानालम्बनतां समाधिनिरतैर्नीते हितप्राप्तये। लावण्यस्य महानिधी रसिकतां लक्ष्मीद्दशोस्तन्वती युष्माकं कुरुतां भवार्तिशमनं नेत्रे तनुर्वा हरेः ॥ ३७१॥

हुआ करें, किन्तु इस दृष्टि से (जो कि वास्तविक दृष्टि है) कि 'काव्यमार्ग में स्वरादिभेद की कोई विवत्ा नहीं (क्योंकि ऐसा होने से श्लेष-सौन्दर्य ही नष्ट हो जायगा) इसका जो अभिप्राय है वह है भिन्नार्थक भी शब्दों में, एक प्रकार के उच्चारण के कारण, उनके स्वरूप-भेद के तिरोहित हो जाने का। यह श्लेष (वस्तुतः सभङ्गपदश्लेष) वर्ण, पद, लिङ्ग, भाषा, प्रकृति, प्रत्यय, विभक्ति और वचन इन आठ भेदक उपाधियों के कारण आठ प्रकार का हुआ करता है। इन (श्लेष भेदों) के क्रमशः ये उदाहरण हैं :- (१) वक्रे विधौ-अष्टमी चन्द्र-शकल पत्तान्तर में कुटिल भाग्य के मस्तक पर विराजमान रहने पर जब कि देवाधिदेव भगवान् शङ्कर की भी यह अवस्था कि भीषण नरमुण्ड ही अलक्कार रह जाय, विकलाङ्ग भृङ्गी (गण विशेष) ही एक मात्र सेवक बच जाय और जीर्ण-शीर्ण एक वृषभ (नन्दी) ही केवल धन के नाम पर दिखाई देने लगे, तब भला हम सरीखे तुच्छ मनुजों की क्या बात! [ यहाँ 'विधु' और 'विधी' दोनों शब्दों का सप्तमी-एकवचनान्त रूप 'विधौ' है और इस प्रकार दोनों में उच्वारण-सारूप्य होने से एक रूपता की जो प्रतीत है वह वर्ण श्लेष है, जैसा कि रुद्रट का भी मत है- 'यत्र विभक्ति-प्रत्यय-वणवशादकरूप्यमापतति। वर्णानां विविधानां वर्णश्लेषः स विज्ञेय:॥'] (२ ) हे महाराज ! अब तो आपका और हमारा आवास एक रूप ही हो रहा है- यदि आपका आवास 'पृथु-कातस्वर-पात्र' विपुल स्वर्ण-पात्रों से परिपूर्ण, 'भूषितनिःशेष- परिजन' सजे-धजे अनुचर-परिचरों से भरपूर और 'विलसत्करेणुगहन' सुन्दर-सुन्दर हथिनियों से सजा-धजा है तो हमारा भी आवास 'पृथुकाऽर्त्तस्वरपात्र' भूखे-प्यासे बाल- बच्चों के करुणक्रन्दन का एकमात्र स्थान, 'भूषितनिःशेषपरिजन' भूमि पर ही बैठने-उठने वाले समस्त पुत्र कलत्रादि से भरपूर और 'विलसत्करेणुगहन' डेरा-डाले पड़े हुये चूहों की विल की धूल से धूसरित है। [यहाँ पर श्लेष हैं क्योंकि ये समस्त पद अर्थभेद से भिन्न पद होने पर भी उच्चारण-सारूप्य के कारण एकरूप बन रहे हैं। ] (३) भगवान् विष्णु के वे नेत्र अथवा उनकी वह मूर्ति आप सब की भव-वाधा की शान्ति करे। कैसे नेत्र और कैसी मूर्ति? 'भक्तिप्रह्वविलोकन प्रणयिनी' (नेत्र तो) भक्तजनों पर दया-दृष्टि रखने में निरन्तर तत्पर (और मूर्ति) भक्त जनों के दर्शन का एकमात्र केन्द्र; 'नीलोत्पलस्पर्धिनी' (नेत्र तो) नील-कमल की सुन्दरता से होड़ लगाने वाले (और मूर्ति) सुन्दरता में नील कमल से बढ़ी-चढ़ी, 'ध्यानालम्बनतां समाधिनिरतैर्नीते हितप्राप्तये' (नेत्र तो) परमपद के इच्छुक समाधिनिरत योगियों के ध्यान के एकमात्र आलम्बन बने

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३२० काव्यप्रकाश:

एष वचनश्लेषोऽपि। महदे सुरसन्धम्मे तमवसमासङ्गमागमाहरणे। हरबहुसरणं तं चित्तमोहमवसर उमे सहसा ॥ ३७२॥ अयं सर्वाणि शास्त्राणि हदि ज्ञेषु च वत्त्यति। सामथ्यकृदमित्राणां मित्राणं च नृपात्मजः ॥ ३७३॥ (और मूर्ति) मनोरथ-सिद्धि के इच्छुक योगि-जन के ध्यान का केन्द्र वनी; 'लावण्यस्य महानिधी' (नेत्र तो) सौन्दर्य के असीम आधाररूप से विराजमान (और मूर्ति) सौन्दर्य की अक्षय निधि, और साथ ही साथ 'लच्मीदृशोः रसिकतां तन्वती' (नेत्र तो) महालक्ष्मी की दृष्टि में रतिभाव के प्रकाशक (और मूर्ति) महालच्मी के हृदय में रतिभाव को अंकुरित करनेवाली ! यही वचन-श्लेष का भी उदाहरण है। [ यहाँ 'लिङ्गश्लेष' है। लिङ्गश्लेष का लक्षण यह है- 'स्त्री पुंनपुंसकानां शब्दानां भवति यत्र सारूप्यम्। लघुदीर्घत्वसमासैलिङ्गश्लेष: स विज्ञेयः॥'(रुद्रट काव्यालक्वारः ४. ८) अर्थात् दीर्घ के हस्व होने, हस्व के दीर्घ होने अथवा समास के कारण जो स्त्रीलिङ्ग, पुंल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग के शब्दों का रूप-सादृश्य हुआ करता है वह लिङ्गश्लेष है। यहाँ 'भक्तिप्रह्लविलोकन प्रणयिनी' जब नेत्र का विशेषण है तब नपुंसक लिंग का शब्द है और जब मूर्ति का, तब स्त्रीलिंग का। यहीं पर वचन-श्लेष भी है क्योंकि नेत्र का विशेषण यह समस्त पद तो प्रथमा के द्विवचन का रूप है और मूर्ति का विशेषण, प्रथमा के एकवचन का रूप। यही बात अन्य विशेषणों के सम्बन्ध में भी यथासंभव घटित होती है।] (४) ( हे उमे ! मे महदे आगमाहरणे तं सुरसन्धं समासंगं अव, अवसरे (च) बहु. सरणं चित्तमोहं सहसा हर) हे परमेश्वरि दुगे! इस जीवन के महोत्सवरूप वेद विद्योपार्जन में देवों के द्वारा भी सदा अभीप्सित मेरे मनोयोग की निरन्तर रक्षा करो और समय-समय पर प्रसरणशील मनोमोह का भी शीघ्र ही अपसारण करो। (यह तो संस्कृत भाषा में श्लोक और उसका तात्पर्य हुआ) और (मम देसु रसं धम्मे तमवसम् आसम् गमागमा हरणे। हरवहु। सरणम् तम् चित्रमोहम् अवसरउ मे सहसा) हे हर-बधु गौरि ! तुम्हीं एकमात्र शरण हो, धर्म-कर्म में मेरी प्रीति उत्पन्न करो, जन्ममरण के निदान इस संसार में मेरी तामसी प्रवृत्ति का नाश करो और मेरा मनोमोह शीघ्र दूर हो जाय (यह प्राकृत भाषा में श्लोक और उसका अभिप्राय रहा)। [यहाँ संस्कृत और प्राकृत भाषा की भिन्न रचनायें उच्चारण-सारूप्य के कारण एकरूप हो रही हैं और इसलिये यहाँ भाषा श्लेप है। ] (५) (अमित्राणां मित्राणां च सामर्थ्यकृत् अयं नृपात्मजः) शत्रुओं के सामर्थ्य का नाशक और मित्रों के सामर्थ्य का विकासक यह राजकुमार (सर्वाणि शास्त्राणि हृदि ज्ञेषु च वच्यति) अपने हृदय में समस्त शास्त्रों को धारण करेगा और साथ ही साथ शास्रज्ञों में इनका प्रवचन भी करेगा। [ यहाँ प्रकृति-श्लेष है। प्रकृति-श्लेष की परिभाषा यह है- सिद्धधन्ति यत्रानन्यैः सारूप्यं प्रत्ययागमोपपदैः। प्रकृतीनां विविधानां प्रकृतिश्लेष: स विज्ञेयः ॥ (रुद्रट काव्यालङ्कार ४, २४) अर्थात् एक प्रकार के प्रत्यय, भागम अथवा उपपद के कारण नाना प्रकार की 'प्रकृति' की जो समानरूपता होती है वह प्रकृति-श्लेष है। यहाँ 'वच्यति"वह' और 'वच्' दो भिन्न धातुओं के 'लूट' का रूप है जो कि परस्पर एकरूप प्रतीत हो रहा है। इसी प्रकार 'सामर्थ्यंकृत्' में 'कृन्त' और 'कृ' धातुओं से क्विप् प्रत्यय के कारण रूप-साम्य हो गया है।

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नवम उल्लास: ३२१

रजनिरमणमौले: पादपद्मावलोक- क्षणसमयपरापापूर्वसम्पत्सहस्रम्। प्रमथनिवह्मध्ये जातुचित्त्वत्प्रसादा- दहमुचितरुचि: स्यान्नन्दिता सा तथा मे ॥ ३७४॥ सर्वस्वं हर सर्वस्य त्वं भवच्छेदतत्परः । नयोपकारसाम्मुख्यमायासि तनुवर्तनम्॥ ३७५॥ (१२०) भेदाभावात्प्रकृत्यादेर्भेदोऽपि नवमो भवेत् ।

प्रकृति-श्लेष यह इसलिये हैं क्योंकि प्रकृति में जो भिन्न-रूपता है वह प्रत्यय के कारण एकरूपता में परिणत प्रतीत हो रही है। ] (६) हे देवि ! यदि तुम्हारी दया हो जाय तो मैं भी चन्द्रशेखर भगवान् शङ्कर के चरण-कमल के ध्यान में ही अनन्त अलौकिक ऐश्वर्य की प्राप्ति करते हुये, प्रमथ-वृन्द में स्थान पाने में उत्कट उकण्ठा से भरा तुम्हारे मनोरखन का साधन बन जाऊँ और तब मेरा गणाधिपत्य तो सिद्ध ही हो जाय ! [यहाँ प्रत्यय-श्लेष है जिसका लक्षण यह है- 'यत्र प्रकृतिप्रत्ययसमुदायानां भवत्यनेकेषाम्। सारूप्यं प्रत्ययतः स ज्ञेयः प्रत्ययश्लेषः ।' ( रुद्रटकाव्यालङ्कार ४. २६ ) अर्थात् यदि प्रत्यय के कारण भिन्न २ प्रकृति-प्रत्यय समुदायों में सारूप्य हो जाय तो उसे प्रत्यय-श्लेष कहते हैं। 'रजनिरमणमौलेः' इत्यादि रचना में 'नन्दिता' में श्लेष है क्योंकि यह पद, जो कि कृदन्त तृच और तल रूप तद्धित-दोनों प्रत्ययों के कारण सिद्ध होता है और भिन्न २ अर्थ जैसे कि (नन्द्+तृच् = नन्दिता) आनन्ददायक और (नन्दिन्+तल्=नन्दिता) नन्दित्व अथवा गणाधिपत्य का वाचक है वस्तुतः दो होते हुये भी एकरूप प्रतीत हो रहा है।] (७) (शिव के प्रति एक दस्यु की उक्ति ) हे (हर) महादेव ! आप ही सब के सर्वस्व हैं, आप ही सब के संसार के निवर्त्तक (मुक्ति-प्रद) हैं और आप ही अपने स्वरूप की ऐसी स्थिति रखा करते हैं जो कि नीति के सर्वथा अनुकूल किं वा लोक- कल्याण के सवदा अनुरूप है। (उस दस्यु की अपने पुत्र के प्रति उक्ति) हे पुत्र ! तू सब का सर्वस्व-हरण कर ले सब के घर में सेंध लगाने में कमर कस ले, किसी के प्रति प्रत्युपकार की भावना न रख, और अपनी ऐसी जीविका बना ले जो दूसरे को आतङ्गित करती रहे। [ यह विभक्ति-श्लेष का उदाहरण है। यहां 'हर' इत्यादि पद 'सुबन्त' और 'तिङन्त दोनों है और भिन्न-भिन्न अर्थों के वाचक हैं किन्तु उच्चारण-सारूष्य के कारण एकरूप हो रहे हैं। रुद्रट ने अपने काब्यालङ्कार (४.२८) में विभक्ति-श्लेष का जो लक्षण दिया है अर्थात्- 'सारूप्यं यत्र सुपां तिडं तथा सर्वथा मिथो भवति। सोऽन्र विभक्तिश्लेषः ।I' वह यहाँ सवथा घटित हो रहा है।] टिप्पणी-उपर्युक्त आठों प्रकार के श्लेष समङ्ग-पद-श्लेष कहे जाते हैं। प्राचीन अलक्कार शास्त्र में समङ्-षद-श्लेष को ही शब्दालक्कार माना गया है और इसकी रचना के लिये कवियों को उत्साहित भी किया गया है जैसा कि रुद्रट की निम्न उक्ति से स्पष्ट प्रतीत होता है- 'शब्दानुशासनमशेषमवेत्य सम्यगालोच्य लच्यमधिगम्य च देशभाषाः। यत्नादधीत्य विविधानभिधानकोषाज् श्लेषं महाकविरिमं निपुणो विदध्याव्।।' काव्यालद्वार ४. ३५ ) 28 अनुवाद-'श्लेष' का (इन आठों सभङ्ग-पद श्लेष-प्रकारों के अतिरिक्त) एक नवां भी

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३२२ काव्यप्रकाश: 3M 3 नवमोऽपीत्यपिर्भिन्नक्रमः । उदाहरणम्- योऽसकृत्परगोत्राणां पक्षच्छेदक्षणक्षमः। शतकोटिदतां बिभ्रद्विबुधेन्द्रः स राजते ॥ ३७६ ॥ अत्र प्रकरणादिनियमाभावात् द्वावप्यर्थो वाच्यौ। ननु स्वरितादिगुणभेदात् भिन्नप्रयत्नोच्चार्य्याणां तद्भावादभिन्नप्रयत्नोच्चा- र्याणां च शब्दानां बन्धेSलङ्कारान्तरप्रतिभोत्पत्तिहेतुः शब्दश्लेषोडर्थश्लेषश्चेति द्विविधोऽप्यर्थालङ्कारमध्ये परिगणितोऽन्यैरिति कथमयं शब्दाऽलङ्कारः।

प्रकार है ( अर्थात् अभङ्गपद श्लेष) जिस में शब्द, विना किसी शब्द भेद के कारण जैसे कि (पूर्वप्रतिपादित) 'प्रकृति' आदि से भिन्न हुये भी भिन्न-भिन्न अर्थ का अभिधायक हुआ करता है। यहाँ 'भेदोऽपि नवमः' का अभिप्राय है 'नवमोऽपि भेदः' अर्थात् नवाँ भी भेद, क्योंकि यह 'अपि' (भी) का क्मान्वय नहीं अपितु तर्युत्कमान्वय विवक्ित है। इसका उदाहरण है- '(राजपक्ष में ) अनेकों बार शत्रु-राजवंश के समर्थकों को छिन्न-भिन्न करने में अविलम्ब सन्नद्ध किंवा सहस्रकोटिदानी की महिमा से मण्डित यह महाबुद्धिमान् राजेन्द्र वस्तुतः विराज रहा है। (इन्द्र-पत्त में) अनेकों बार बड़े-बड़े पर्वतों के विदारण में सदा समर्थ, वज्र के द्वारा शत्रु-संहार में निरत देवराज इन्द्र विराज रहे हैं। यहां कोई ऐसे प्रकरण इत्यादि नहीं जो कि दोनों अर्थों में से किसी एक का नियन्त्रण करने वाले हो इसलिये दोनों अर्थ (राजपत्तगत तथा इन्द्रपक्ष-गत) वाच्यार्थ ही हैं (जिसमें 'श्लेष' का स्वरूप है) टिप्पणो-(क) 'योऽसकृत परगोत्राणाम्' इत्यादि रचना अमङ्गपदश्लेष के उदाहरण के रूप में यहां उद्धृत् की गयी है। काव्य में ध्वनि-तत्त्व के मानने वाले आलक्कारिको के लिये'इस प्रकार के श्लेष और अभिधामूला व्यञ्जना का पारस्परिक वैध्म्य बताना आवश्यक है। आचार्य मम्मट ने इसीलिये कहा है कि प्रकरण आदि के नियन्त्रण के अभाव में भी अर्थ-द्य की जो प्रतीति है वह तो अभङ्ग श्लेष का विधय है और प्रकरणादि के नियन्त्रण के सद्भाव में अर्थान्तर की प्रतीति ध्वनि का विषय है। (ख) मम्मट ने 'श्ळेष' रूप शब्दालद्कार में रुद्रट के 'शब्दश्लेष' को तो 'समङ् पदश्लेष' के रूप में अन्तर्भूत किया है और उद्भट के अर्थश्लेष का अन्तर्गणन किया है 'अभङ्गपदश्लेष' के रूप में (श्लेष-विषयक प्राचीनमत-निराकरण तथा अभङ्गपद श्लेष में शब्दालंकार-समर्थन) अनुवाद-(प्रश्न)-यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है-(सभङ्गपद श्लेष किसी प्रकार शब्दालंकार भले ही हो) अभङ्गपद श्लेष को शब्दश्लेषालंकार कैसे मान लिया जाय? जब की अन्य प्राचीन आलंकारिक (जैसे कि उद्धट, रुय्यक आदि) इसे अर्थश्लेषालंकार कह चुके हैं और इसलिये कह चुके हैं क्योंकि जब स्वरितादि स्वरभेद से भिन्न-भिन्न भी प्रयत्न से उच्चारित शब्दों में एकरूपता-प्रतीति रूप 'शब्दश्लेष' अन्य अलंकारों के आभास के उत्पादक होने के कारण अर्थ-श्लेष ही हो तब बिना किसी स्वरादिभेदप्रयोज्य प्रयत्नादि-भेद के ही भिन्न-भिन्न अर्थ-प्रत्यायक एकशब्दरूप श्लेष (अभङ्गपदश्लेष) जिसमें अन्य अलंकारों के आभास के उत्पादन का भी सामर्थ्य है अर्थश्लेष नहीं तो और क्या ? टिप्पणी-यहाँ मम्मट ने उद्धट और उनके व्याख्याकार श्रीप्रतीदार इन्दुरान की मान्यता

स्वरूप यह हैं- का संकेत किया है उन्हट के अनुसार 'शलष्ट' (अर्थात् मम्मट-सम्मत 'श्लेष') अलंकार का

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नवम उल्लास: ३२३

उचयते-इह दोषगुणालङ्काराणां शब्दार्थगतत्वेन यो विभागः सः अन्वय- व्यतिरेकाभ्यामेव व्यवतिष्टते। तथा हि-कष्टत्वादिगाढत्वाद्यनुप्रासाद्यः व्यर्थ- त्वादिप्रौढ याद्युपमादयस्तद्भाव-तद्भावानुविधायित्वादेव शब्दार्थगतत्वेन व्यव- स्थाप्यन्ते। स्वयं च पल्लवाताम्रभास्वत्करविराजिता। इत्यभज्गः प्रभातसन्ध्येवास्वापफललुब्धेहितप्रदा ॥ ३७७ ॥ इति सभङ्गः, -TR इति द्वावपि शब्दैकसमाश्रयाविति द्वयोरपि शब्दश्लेषत्वमुपपन्नम् न वाद्य स्यार्थश्लेषत्वम्। अथेश्लेषस्य तु स विषयः यत्र शब्दपरिवर्त्तनेऽपि न श्लेषत्व- खवण्डना यथा- 'एकप्रयत्नोच्चार्याणं तच्छायां चैव बिभ्रताम्। स्वरितादिगुणैर्भिन्नैर्बन्धः श्लिष्टमिहोच्यते॥ अलंकारान्तरगतां प्रतिभा जनयत् पदैः। द्विविधरर्थशब्दोक्तिविशिष्टं तत् प्रतीयताम्॥'

और इन्दुराज के द्वारा इसका उन्मीलन यह- ( काव्यालंकार सारसंग्रह ४. ९-१०)

'एवज्ज रिलष्टं द्विविधमप्युपमाद्यलंकारप्रतिभोत्पादनद्वारेणाऽलंकारतां प्रतिपद्यते। ...... अलंकारान्तराणामत्र प्रतिभामात्रं न तु पदबन्धः ।' तात्पयं यह ह क 'शलष्ट' चाह वह 'शब्द शलिष्ट' हो (जिसमें स्वरादिभेद से द्विविध रूप के शब्द अथवा वस्तुतः द्विविध शब्द परस्पर सादृश्य के कारण एकरूप-अभिन्न-लगा करते हैं) या 'अर्थ शलिष्ट' हो (जिसमें भिन्नार्थक किन्तु समानरूप के शब्द भिन्न-भिन्न अर्थ का बोधन किया करते है) अर्थ का अलंकार है क्योंकि इसमें उपमादि अलंकारों के अवभासन का सामर्थ्य रहा करता है। अनुवाद-किन्तु इसका समाधान यह है-यहाँ (अलङ्कारशास्त्र में) दोष, गुण और अलङ्गारों के शब्दगत तथा अर्थगत रूप से विभाजित होने की जो व्यवस्था है उसमें एकमात्र 'अन्वय' और 'व्यतिरेक' के सिद्धान्त का ही हाथ है। क्योंकि (शब्द के) श्रुतिकटुत्व आदि दोष अथवा ओज (गाढबन्ध) आदि गुण अथवा अनुप्रास आदि अलङ्कार और (अर्थ के) अपुष्टार्थत्व आदि दोष अथवा ओज (म्रौढि) आदि गुण अथवा उपमा आदि अलङ्गार की जो (शब्दगत और अर्थगत रूपसे) विभागव्यवस्था की गयी है उसका एकमात्र कारण है उस शब्द अथवा अर्थ के सन्भाव अथवा असद्भाव का उस दोष, गुण अथवा अलक्कार के द्वारा अनुवत्तन किया जाना। 'श्लेष' के सम्बन्ध में भी यही बात लागू होती है क्योंकि इस प्रसङ्ग अर्थात् 'स्वयं च पञ्लवाताम्रभास्वत्करविराजिता'- पल्लव के समान अरुणवर्ण और दीप्तिमय करों से सुशोभित-किंवा 'अस्वापफललुब्घेहित- प्रदा'-कष्टलभ्य (मोक्षरूप) फल के इच्छुक लोगों की कामना की पूर्ति करने वाली यह भगवती गौरी उस प्रभात-संध्या की भाँति है जो कि 'पञ्चवाताम्रभास्वत्करविराजिता'- पञ्चव के समान अरुणवर्ण सूर्य-किरणों से सुशोभित-किंवा 'अस्वाप फललुब्धेहितप्रदा'- अस्वाप अर्थात् जागरण के फल (स्नान-संध्यादि) के चाहने वाले लोगों की अभीष्टदायिनी हुआ करती है।' इत्यादि में जो अभङ्गपद (जैसे कि 'पल्लवाताम्रभास्वत्करविराजिता' में) और सभङ्ग पद (जैसे कि 'अस्वापफललुब्धेहितप्रदा' में) श्लेष हैं वे दोनों ही (अन्वय-व्यतिरेक के सिद्धान्त के अनुसार) एकमात्र शब्द पर आश्रित हैं और इसलिये इन दोनों का शब्द- श्लेष माना जाना युक्तियुक्त है न कि पहले अर्थात् अभङ्गपद श्लेष (पल्लवाताम्र इत्यादि) का अर्थश्लेष कहा जाना (और दूसरे अर्थात् सभङ्गपद श्लेष का शब्दश्लेष कहा जाना।) (इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अर्थश्लेष का कहीं भी कोई प्रसः नहीं क्योंकि) अर्थश्लेष का तो वहाँ प्रसङ्ग है जहाँ शब्द के परिवर्तन किये जाने पर म 'श्लेष'-भङ्ग नहीं हुआ करता जैसे कि यहाँ अर्थात्-

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३२४ काव्यप्रकाश: 32 स्तोकेनोब्रतिमायाति स्तोकेनायात्यधोगतिम्। अहो सुसदृशी वृत्तिस्तुलाकोटे: खलस्य च ॥ ३७८ ॥ न चायमुपमाप्रतिभोतपत्तिहेतुः श्लेषः अपि तु श्लेषप्रतिभोत्पत्तिहेतुरुपमा । तथा हि-यथा 'कमलमिव मुखं मनोज्ञमेतत्कचतितराम्' इत्यादौ गुणसाम्ये क्रियासाम्ये उभयसाम्ये वा उपमा। तथा- 'सकलकलं पुरमेतज्जातं सम्प्रति सुधांशुबिम्बमिव।' इत्यादौ शब्दमात्रसाम्येऽपि सा युक्तव। तथा ह्युक्तं रुद्रटेन- स्फुटमर्थालङ्कारावेतावुपमासमुच्चयौ किन्तु। आश्रित्य शब्दमात्रं सामान्यमिहापि सम्भवतः ॥ इति। न च 'कमलमिव मुखम्' इत्यादि: साधारणधमेप्रयोगशून्य उपमाविषय इति वक्तु युक्तम् पूर्णोपमाया निर्विषयत्वापत्तेः। 'बढ़े आश्चर्य की बात है कि किसी दुष्ट व्यक्ति और तुलाकोटि (तराजू की डंडी) की एक सरीखी ही हालत हुआ करती है अर्थात् दोनों थोड़े ही में ऊपर चढ़ जाते हैं और थोड़े ही में नीचे उतर आते हैं।' (जहाँ 'स्तोकेनोन्नतिमायाति' के बदले 'अल्पेनोद्रेक- मायाति' आदि कर देने पर भी अर्थ दो ही निकलते हैं अर्थात् तुलाकोटि के सम्बन्ध में 'ऊर्ध्वंगमन' और 'अधोगमन' रूप और खलजन के सम्बन्ध में 'अहंकार' और 'दर्पनाश' रूप) साय ही साथ 'पञ्लवाताम्रभास्वतंकरविराजिता' इत्यादि में जो अभङ्गपद श्लेप है उसके लिये यह कहना भी उचित नहीं कि इसके द्वारा यहाँ (भगवती गौरी और प्रभात- संध्या में औपम्य की दृष्टि से) उपमा के आभास की प्रतीति हुआ करती है क्योंकि वस्तुतः जो बात यह है वह तो है उपमा के द्वारा ही यहाँ श्लेष के आभास की प्रतीति के होने की बात। (यहाँ यह भी नहीं कहा जा सकता कि शब्द-साम्य मान्र के कारण 'पल्लवाताम्र' इत्यादि में उपमा कैसे ? क्योंकि) जैसे उपमा गुण-साम्य अथवा क्रिया-साम्य अथवा गुण-क्रिया-साम्य के कारण ऐसे प्रसङ्ग जैसे कि 'कमल के समान मनोहर यह मुख कितना शोभित हो रहा है' में मानी जाया करती है वैसे ही इसे शब्द-मात्र के साम्य में भी जैसा कि 'सकलकल (कोलाहल भरा) यह नगर इस समय सकलकल (पूर्णमण्डल ) चन्द्र- बिम्ब के समान हो रहा है' इत्यादि ग्रसङ्ग में स्पष्ट है, मानना सवथा युक्तिसंगत है और इसीलिये तो (काव्यालङ्कार के रचयिता, आचार्य) रुद्रट ने कहा है- 'यद्यपि यह ठीक है कि उपमा और समुच्चय (गुण, क्रिया और इन दोनों के साधर्म्य के कारण) निश्चित रूप से अर्थालंकार हैं किन्तु यह भी ठीक है कि इन्हें शब्दमात्र के साधर्म्य में भी देखा जा सकता है।' (अब श्लेष के प्रसंग में कहीं-कहीं शब्द-मात्र साम्य के कारण उपमा-औपम्य-मान लेने का यह अभिप्राय निकाल लेना कि 'कमलमिव मुखं मनोज्ञम्' इत्यादि में उपमा के बदले अर्थश्लेष मानना पड़ेगा क्योंकि 'निरवकाशा हि विधयः सावकाशान् विधीन् बाधन्ते' के सिद्धान्त के अनुसार निरवकाश श्लेष (क्योंकि उपमा तो अन्यन्न विना श्लेष के भी होती है-सावकाश-है, किन्तु यहाँ श्लेष उपमा के बिना नहीं हो सकता-निरवकाश-है) के द्वारा सावकाश उपमा बाधित हो जाया करेगी और इस प्रकार उपमा 'कमलमिव मुखम्' जैसे प्रसङ्ग में ही रह जायगी न कि 'कमलमिव मुखं मनोज्ञमेतत्' जैसे प्रसंग में, जहाँ-'मनोश' रूप साधारण धर्म के उपमान और उपमेय दोनों में अनुगत होने के कारण 'मनोज' शब्द वस्तुतः दो पृभक शब्द होते हुये भी समानोचचारण के कारण एक

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नवम उल्लास: ३२४

देव! त्वमेव पातालमाशानां त्वं निबन्धनम्। त्वं चामरमरुद्भूमिरेको लोकत्रयात्मकः ॥ ३७६॥ इत्यादि: श्लेषस्य चापमाद्यलङ्कारविविक्तोऽस्ति विषय इति। द्वयोर्योंगे सङ्कर एव। उपपत्तिपर्यालोचने तु उपमाया एवायं युक्तो विषयः अन्यथा विषया पहार एव पूर्णोपमाया: स्यात्। न च- अबिन्दुसुन्दरी नित्यं गलल्लावण्यबिन्दुका। इत्यादौ विरोधप्रतिभोत्पत्तिहेतुः श्लेषः अपि तु श्लेषप्रतिभोत्पत्तिहेतुर्वि- रोधः। नह्यत्रार्थद्वयप्रतिपादकः शब्दश्लेषः द्वितीयार्थस्य प्रतिभातमात्रस्य प्ररो- रूपश्िष्ट है, ठीक नहीं क्योंकि) यहाँ ऐसी भी कोई संभावना नहीं कि जहाँ पर साधारण धर्म के वाचक शब्द का प्रयोग न हुआ करे जैसे कि 'कमलमिव मुखम्' इत्यादि में वहीं 'उपमा' मानी जाय, क्योंकि तब तो यह भी मानना पड़ेगा कि 'पूर्णोपमा' नाम का कहीं कोई अलक्कार ही नहीं। साथ ही साथ (यहाँ ऐसा भी कहना कि उपमा और श्लेष के विषय के परस्पर संकीर्ण रहने के कारण उपमा के द्वारा श्लेष बाधित हो जाया करेगा, युक्तिसंगत नहीं प्रतीत होता क्योकि) श्लेष का क्षेत्र उपमा आदि अलंकारों के क्षेत्र से सर्वत्र संकीर्ण ही तो नहीं हुआ करता! श्लेष का अपना भी चेत्र है जैसे कि यहाँ- '[विष्णु-पक्ष में ]-(देव!त्वमेव पातालम्) हे भगवन् ! आप ही पाताल हैं, (त्वमेव आशानां निबन्धनम्) अ.प ही भूलोक हैं, (त्वमेवामरमरुद्भूमिश्च) और आप ही स्वर्गलोक हैं, (त्वमेव एको लोकत्रयात्मकः) वस्तुतः एक ही आप भुवनत्रयात्मक हैं।' [राजपक्ष में ] (देव त्वमेव पाता +अलम्) हे महाराज ! आप ही एक मान्र परम रक्षक हैं, (आशानांत्वं निबन्धनम्) आप ही याचकजन की अभिलाषाओं के निर्वाहक tho 5 gho . 1 हैं, (त्वं चामरमरुद्भूमिः) चँवरों की हवा आप की ही सौभाग्य-विभूति है और वस्तुतः आप ही (एको लोकत्रयात्मकः) अकेले सब के रक्षक, सब के दाता और सर्वसुख-सम्पन्न हैं। (जहाँ पर एक अर्थ के नियामक प्रकरणादि के अभाव में दोनों भर्थों के वाच्यार्थ होमे के कारण न तो उपमा की सम्भावना है और न तुल्ययोगिता की, अथवा और किसी अलङ्कार की ही।) (अब यह तो सिद्ध ही हो गया कि श्लेष का विषय उपमा के विषय से संकीण नहीं और इसलिये यदि यहाँ उपमा भी प्रतीत हो तो जो बात माननी ठीक होगी वह यही कि) वैसे यहाँ एक दृष्टि से दोनों अर्थात् उपमा और श्लेष का (इनके क्षेत्रों के पृथक्- पृथकव्यवस्थित होने के कारण इन दोनों में बाध्य बाघक-भाव की सम्भावना न हो सकने से) संकर हैं अर्थात् दोनों सम-प्राधान्य भाव से मिले-जुले हैं। (इसका यह अभिप्राय नहीं कि सर्वत्र श्लेष और उपमा का संकर ही रहा करेगा क्योंकि) वस्तुतः यदि विचार किया जाय तो वह सब क्षेत्र उपमा का ही क्षेत्र युक्तितः सिद्ध होगा जहाँ उपमा प्रधान हो और श्लेष उसका अङ्ग। और नहीं तो (सर्वत्र जैसे कि 'कमलमिव मुखं मनोज्ञमेतत्' इत्यादि में भी उपमा और श्लेष का संकर मानने से) पूर्णोपमा का क्षेत्र ही कहाँ रह जायगा! इस दृष्टि से 'अबिन्दुसुन्दरी नित्यं गलल्लावण्यबिन्दुका'-'पार्वती जल में प्रतिबिम्बित चन्द्र के समान सुन्दर हैं जिनसे लावण्य की बूँदें टपकती रहती हैं' इत्यादि सूक्तियों में भी ऐसा नहीं कि जो श्लेष है (अर्थात् अप्सु प्रतिबिम्बितः इन्दुस्तद्वत् सुन्दरी अबिन्दुसुन्दरी किंवा अ+बिन्दु+सुन्दरी अबिन्दुसुन्दरी) उससे विरोधाभास ('अ + बिन्दुसुन्दरी"

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३२६ काव्य प्रकाश:

हाभावात्। न च विरोधाभास इव विरोध: श्लेषाभास: श्लेषः। तदेवमादिषु वाक्येषु श्लेष प्रतिभोत्पत्तिहेतुरल ङ्कारान्तरमेव। तथा च- सद्वंशमुक्तामणिः ॥ ३८० ॥ नाल्प: कविरिव स्वल्पश्लोको देव ! महान् भवान् ॥ ३=१॥ अनुरागवती सन्ध्या दिवसस्तत्पुरःसरः। अहो दैवगतिश्चित्रा तथाऽपि न समागमः ॥३=२ ॥ आदाय चापमचलं कृत्वाऽहीनं गुणं विषमदृष्टिः ! यश्चित्रमच्युतशरो लक्ष्यमभाद्कोन्नमस्तस्मै ॥ ३८३॥ भला 'गलल्लावण्य बिन्दुका' कैसे) की प्रतीति मान ली जाय क्योंकि वस्तुतः यहाँ जो बात है वह तो यह है कि विरोधाभास ही के द्वारा यहाँ श्लेष का आभास हो रहा है क्योंकि यहाँ जो शब्द है उसके द्वारा दोनों अर्थों का अभिधान नहीं हो रहा। यहाँ तो वस्तुतः (बिन्दुरहित होने पर भी बिन्दुसहित होने का) जो दूसरा अर्थ है वह (शब्दशक्ति की महिमा से) आपाततः प्रतीत भले ही हो जाय अन्त में शाब्द-बोध का विषय कहाँ ? (और इस प्रकार श्लेष ही अन्त में कहाँ?) और ऐसा भी नहीं कि जैसे विरोध के आभास में विरोधालद्कार मान लिया जाया करता है वैसे ही श्लेष के भी आभास में श्लेषालक्कार मान लिया जाया करे! (क्योंकि वास्तविक विरोध में दोष होने से विरोध के आभास में भले ही विरोधालङ्कार माना जाय जो कि युक्तियुक्त है किन्तु श्लेष तो यदि कहीं वस्तुतः हुआ तो वहाँ श्लेषालद्कार माना जायगा और यदि श्लेष का आभास ही रहा तो श्लेषालङ्कार वहाँ कहाँ?) निष्कर्ष यही निकला कि ऐसे सन्दर्भों में श्लेष नहीं अपि तुश्लेष के आभास के उत्पादक दूसरे-दूसरे अलंकार ही माने जायेंगे ( क्योंकि चमरकार उन्हीं पर निर्भर है न कि श्लेष पर (उदाहरण के लिये यदि इन संदर्भों- (१) यह राजा 'सद्वंशमुक्तामणि' है अर्थात् सद्वंश के समान सद्वंश में उत्पन्न मुक्ता मणि है (यहाँ श्लेष रूपक का निर्वाहक है न कि स्वतन्त्र रूपसे 'अलंकार' बन रहा है। यहाँ जो अलंकार है वह एकदेशविवर्त्ति रूपक है)। (२) हे महाराज ! आप महान् हैं, आप भला किसी कुद्र कवि के समान स्वल्पश्लोक (तुद्र रचनाकार-थोड़ी की्त्ति वाले) कहाँ ? (यहाँ 'स्वल्पश्लोक' में जो श्लेष है उसके द्वारा व्यतिरेकालंकार का निर्वाह हो रहा है और इस प्रकार जो अलंकार है वह श्लेष नहीं अपि तुश्लेषमूलक व्यतिरेक है (क्योंकि यहाँ अन्य कविरूप उपमान की अपेक्षा राजरूप उपमेय का आधिक्य वर्णन किया जा रहा है)। (३) सन्ध्या तो अनुरागवती (प्रेम में पगी और लाली लिय हुये ) है, और दिन है उसका पुरस्सर-उसके सदा अनुगत और आगे २ रहने वाला) किन्तु विधाता की माया भी कैसी विचित्र है कि दोनों का समागम ( परस्पर मिलना और रतिसुख) कभी हो ही नहीं सकता! (यहाँ जो अलंकार है वह है समासोक्ति क्योंकि यहाँ श्रिष्ट विशेषणों की महिमा से नायक-नायिका के व्यवहार की प्रतीति हो रही है) न कि श्लेष जिसकी यहाँ, अभिधा के संध्या और दिन रूप अर्थ में नियन्त्रित हो जाने के कारण, कोई सम्भावना ही नहीं।) (४) उस (महाधनुर्धारी) को नमस्कार है जो 'विषमद्ृष्टि'-त्रिनयन' है और जिसने 'अचलचाप'-'मन्दर पर्वतरूपी 'धनुष' को हाथ में ले, 'अहीन'-सर्पराज वासुकि को उसमें 'गुण' प्रत्यञ्चा के रूप में कस कर, 'अच्युतशर' विष्णु को बाण बना, 'लच्य'

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नवम उल्लास: ३२७ WM

न तु श्लेषत्तम्। शब्दश्लेष इति चोच्यते अर्थालङ्कारमध्ये च लच्ष्यते इति कोऽयं नयः। किं च वैचित्र्यमलङ्कार इति य एव कविप्रतिभासंरम्भगोचरस्तत्रैव विचि- त्रता इति सैवाऽलङ्कारभूमिः। अर्थमुखप्रेक्षित्वमेतेषां शब्दानामिति चेत्, अनुप्रासादीनामपि तथवेति तेऽप्यर्थालङ्काराः किं नोच्यन्ते। रसादिव्य अकस्वरूपवाच्यविशेषसव्यपेक्षत्वेऽपि ह्यनुप्रासादीनामलङ्कारता। शब्दगुण- दोषाणामप्यर्थापेक्षयैव गुणदोषता अर्थगुणदोषालङ्काराणां शब्दापेक्षयैव व्यव- स्थितिरिति तेऽपि शब्दगतत्वेनोच्यन्ताम्। 'विधौ वक्रे मूर्ध्नि' इत्यादौ च वर्णा- त्रिपुरासुर रूप लच्य का ऐसा वेधन किया कि सभी आश्चर्यचकित रह गये! (उस धनुर्घर को नमस्कार है जो 'विषमदृष्टि'-लच्य से बहकने वाली आँखों वाला,-'अचलचाप' निष्क्रिय धनुष धारण किये, 'हीन गुण' उसमें जीर्ण-शीर्ण प्रत्यक्चा लगाये, 'अच्युतशर' विना वाण-सोक्ष के ही लच्य का वेध करने वाला हो गया! कितना आश्चर्य है! (यहाँ जो अलक्कार है वह श्लेष नहीं अपितु श्लेषमूलक विरोधाभास है।) को देखें तो इनमें श्लेष का होना नहीं अपि तु कमशः एकदेशविवर्ति रूपक, श्लेषमूलक व्यतिरेक, श्िष्टविशेषणा समासोक्ति और श्लेषमूलक विरोधाभास का ही होना युक्तियुक्त है और यह भी कैसी बेतुकी बात कि अलंकार का नाम तो रखा जाय शब्द श्लेष (जैसा कि 'प्रभातसंध्येवाताम्र्भास्वत्करविराजिता' इत्यादि संदर्भ के सम्बन्ध में श्री इन्दुराज का निर्देश है) और इसका लक्षण किया जाय अर्थालङ्कारों के बीच ! (यहाँ यह भी कहना ठीक नहीं कि नाम तो शब्द-श्लेष इसलिये रखा गया क्योंकि इसमें विजातीय शब्दों की एकरूपता की प्रतीति है और अर्थालंकारों में इसका लक्षण इसलिये किया गया क्योंकि वस्तुतः यह अर्थ का अलंकार है क्योंकि) वस्तुतः बात ऐसी है कि जो विचित्रता है वही अलकार है और इस प्रकार शब्द अथवा अर्थ में जहाँ भी कवि की प्रतिभा का संरम्भ कार्यकर दिखाई पड़े वहीं विचित्रता है और वहीं अलंकार है। (इसलिये शब्द-वेचित्र्य के कारण शब्दश्लेष को शब्दालंकार ही मानना उचित है न कि अर्थालंकार।) अब यदि यहाँ यह आग्रह हो कि श्लिष्ट शब्द भी अर्थ-सापेक्ष हुआ करते हैं (और इसलिये शब्द-श्लेष अर्थालंकारों में मानना पड़ेगा) तब तो यह भी मानना पड़ेगा कि शब्दों की अर्थ-सापेक्षता के कारण अनुप्रास आदि भी अर्थालंकार ही हैं! अनुप्रास आदि को भी तो अलंकार इसलिये माना जाया करता है क्योंकि इनमें रस-भावादि के व्यअ्जक वाच्य विशेष की अपेक्षा रहा करती है! (यहाँ यह कहना भी तो युक्तियुक्त नहीं कि अनुप्रास आदि शब्द के अलंकार इस लिये हुये क्योंकि इनमें वर्णध्वनि-वैचित्र्य का महत्व है, क्योंकि) अर्थ की अपेक्षा तो सर्वत्र दिखाई देती है। शब्द के गुण अथवा दोष भी तो इसीलिये गुण अथवा दोष माने गये हैं कि इनमें भी अर्थ की अपेक्षा विद्यमान है! (इन्हें भी तब अर्थ का गुण अथवा दोष क्यों न मान लिया जाय!) और इतना ही क्यों ? जो.जो अर्थ के गुण अथवा दोष अथवा अलंकार हुआ करते हैं उनमें क्या शब्द की अपेक्षा नहीं हुआ करती! फिर उन्हें शब्द का गुण अथवा दोष अथवा अलंकार क्यों नहीं माना जाया करता! (यहाँ यह भी कहना ठीक नहीं कि एक प्रयत्न से शब्दों के उच्चरित होने के कारण ही अर्थश्लेष अर्थ-श्लेष हुआ करता है क्योंकि) इन सब बातों के अतिरिक्त यह भी सोचने की बात है कि यदि एक प्रयत्न से शब्द उच्चरित होने में ही अर्थश्लेष है तब 'विधौ वक्रे

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३२८ काव्यप्रकाश: M दिश्लेषे एकप्रयत्नोच्चार्यत्वेऽर्थश्लेषत्वं शब्दभेदेऽपि प्रसज्यतामित्येवमादि स्वयं विचार्यम्। मूर्ति' इत्यादि वर्णश्लेष भी जहाँ 'विधु' और 'विधि' आदि स्पष्टतया भिन्न-भिन्न शब्द हैं, अर्थश्लेष ही क्यों न कह दिये जाँय। टिप्पणी-(क) यद्यपि प्राचीन आलंकारिक जैसे कि भामह और दण्डी 'श्लेष' को एक अलंकार के रूप में मानते आये हैं किन्तु इसका विशद विश्लेषण उद्भट और इन्दुराज से प्रारम्भ होता है। मामह के अनुसार 'शलेष' का यह स्वरूप है- 'उपमानेन यत्तत्वमुपमेयस्य साध्यते। गुणक्रियाभ्यां नाम्ना च श्लिष्टं तद्भिधीयते॥' (काव्यालंकार ३. १४) जिसमें यह स्पष्ट है कि 'शलेष' शब्दालंकार नहीं किन्तु अर्यालंकार है और उपमादि अलंकारों की पृष्ठभूमि के रूप में रहा करता है। दण्डी की श्लेष-परिभाषा यह है- 'श्लिष्टमिष्टमनेकार्थमेकरूपान्वितं वचः । तदभिन्नपदं भिन्नपद्प्रायमिति द्विधा ॥' (काव्यादश २. ३१० ) जिसमें 'अभिन्नपद' तथा 'मिन्नपद' रूप से विभक्त 'श्लेष' अर्थालंकार हो माना गया है और इसलिये माना गया है क्योंकि इसके द्वारा अन्य वाच्यालंकारों की रूपरेखा प्रकट हुआ करती है-'श्लेष: सर्वासु पुष्णाति प्रायो वक्रोक्तिपु श्रियम्।' आलंकारिकों में 'श्लेष' का वैज्ञानिक विश्लषण करने वालों में सर्वप्रथम स्थान उद्धट का है। उ्भट ने श्लेष का स्व्ररूप और प्रकार ही निर्धारित नहीं किया, क्षेत्र भी निर्धारित कर दिया है :- 'एकप्रयत्नोष्चार्याणां तच्छायां चैव बिभ्रताम्। स्वरितादिगुणैर्भिन्नैर्वन्धः श्लिष्टमिहोच्यते॥ अलंकारान्तरगतां प्रतिभां जनयत्पदैः। द्विविधैरर्थशब्दोक्तिविशिष्टं तत्प्रतीयताम्॥ (काव्यालंकार सारसंग्रह ४. ९९०) उन्ट के व्याख्याकार इन्दुराज ने उद्धटसम्मत 'श्लेष'-निरूपण में उद्भट की मान्यताओं कीं जो पुष्टि की है उससे अलंकारसर्वस्वकार 'रुय्यक' की श्लेष-मीमांसा पूर्णतया प्रभावित है। इन सभी आलंकारिकों की दृष्टि में 'श्लेष' अर्थ का अलंकार माना गया है न कि शब्द का। (ख) 'श्लेष' को शब्द और अर्थ-दोनों के पृथक पृथक अलंकार के रूप में स्वीकार करनेवाले आचार्यों में रुद्रट सर्वप्रथम हैं जिनकी यह धारणा है- 'वक्रोक्तिरनुप्रासो यमकं श्लेषस्तथा परं चित्रम्। शब्दस्यालंकारा: श्लेषोऽर्थस्यापि सोऽन्यस्तु ॥' (काव्यालङ्कार २-३) और जिसमें यह स्पष्ट है कि 'शलेष' शब्द का अलंकार है और वह श्लेष जो अर्थ का अलंकार है 'अर्थ-श्लेष' कहा जाना चाहिये। आचार्य मम्मट ने अपने श्लेष विवेचन में रुद्रट की ही दृष्टि यथासंभव अपनायी है किन्तु उद्भट और इन्दुराज की आलोचना में रुद्रट की भी मान्यताओं का परिष्कार कर दिया है। (ग) मम्मट का 'इलेष-विवेचन' रुय्यक के 'श्लेष-विवेचन' की आलोचना कहा जा सकता है। रुय्यक के अर्थालंकाररूप श्लेष के दोनों भेदों-शब्दश्लेष (सभङ्गपदश्लेष ) और अर्थश्लेष (अमङ्गपदश्लेष)-को मम्मट ने शब्दालंकार श्लेष के ही दो भेद के रूप में माना है। रुय्यक के अनुसार तो समझ और अमङगपदश्लेष इसलिये अर्थ के अलंकार हैं क्योंकि अलंकार-व्यवस्था के आश्रयाश्रयिभावरूप मौलिक सिद्धान्त की दृष्टि से यहाँ और कोई संभावना नहीं :- 'पूर्वत्रकवृन्तगतफलद्वयन्यायेनार्थह्वयस्य शब्दश्लिष्टत्वम्। अपरत्र जतुकाष्ठन्यायेन स्वयमेव श्रिष्टत्वम्। पूर्वत्राऽन्वयव्यतिरेकाभ्यां शब्दहेतुकत्वाच्छन्दालंकारत्वमिति चेत् न-आश्रयाश्चयिभावेनाSलंकारत्वस्य लोकवद्व्यवस्थानात्।' (अलंकारसर्वस्व पृष्ठ १२४) किन्तु मम्मट की दृष्टि में 'समङ्ग' और 'अभङ्गपद'-दोनों श्लेष-प्रकार इसलिए शब्दालंकार हैं क्योंकि अळंकार-व्यवस्था के 'अन्वय-व्यतिरेक' रूप वास्तविक सिद्धान्त के अनुसार यहाँ अन्य कोई कबरना नहीं हो सकती।

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नवम उल्लास: ३२६

(१२१ ) तच्चित्रं यत्र वर्णानां खड्गाद्याकृतिहेतुता ।। ८५।। ( चित्रालंकार )

सन्निवेशविशेषेण यत्र न्यस्ता वर्णाः खड्ग-मुरज-पद्माद्याकारमुल्लासयन्ति तच्चित्रं काव्यम्। कष्टं काव्यमेतदिति दिङ्मात्रं प्रदर्श्यते।

(घ) प्राचीन आलंकारिक 'श्लेष' को, जहाँ वह अन्य अलंकारों की प्रतिभा का उत्पादक हुआ करता है, मुख्य मानते रहे हैं जिसकी अपेक्षा उससे उत्पन्न अन्ध अलंकारों के आभास गौण हो जाया करते हैं। इसी दृष्टि से 'स्त्रयं च पछवाताम्र' आदि सूक्ति में 'श्लेष' को उपमा की प्रतिभा (आभास) का उस्पत्ति-हेतु माना जाता आ रहा है। मम्मट ने श्लेष को अन्य अलंकारों की प्रतिभा का उत्पत्तिहेतु तो अवश्य माना है किन्तु इसीलिए यह सिद्धान्त स्थापित किया है कि 'स्वयं च पल्लवाताम्र' आदि जैसे प्रसङ्गों में दलेष तो गौण रहा करता है और अन्य अलंकार जैसे कि यहां उपमालंकार मुख्यरूप से प्रतीत हुआ करता है। तात्पर्य यह है कि 'स्त्रयं च पल्वाताम्र' सरीखे प्रसङ्गों में उद्भट का 'उपमाप्रतिभोत्पत्तिहेतु श्लेष' मम्मट की दृष्टि मे 'श्लेघ- प्रतिभोत्पत्ति हेतु उपमा' है अन्य कुछ नहीं। (ङ) रुय्यक तो श्लेष को 'अनवकाश' मानते हैं और अन्य उपमादिअलंकारों को 'सावकाश और इसलिये इसे इन उपमादि अलंकारों का अपवाद कहते हैं- 'तेनालंकारान्तरविविक्तो नास्य विषयोऽस्तीति सर्वालंकारापवादोऽयम् (श्लेषः) इति स्थितम्' (अलंकारसर्वस्व पृष्ठ १३२) किन्तु मम्मट ने इलेष का स्वतंत्र क्षेत्र भी निश्चित रूप से सिद्ध कर दिया है। मम्मट ने श्लेष के लिये उद्भट और इन्दुराज-सम्मत 'एकप्रयत्नोच्चार्यता' के सिद्धान्त की आवश्यकता को भी निमूल बताया है क्योंकि काव्य में स्वरादि-भेद की कोई विवक्षा नहीं-'काव्यमार्गे स्वरो न गण्यते'। अ्रनुवाद-'चित्र' वह अलंकार है जिसे वर्ण-विन्यास में खड्गादि वस्तुओं की आकृतियों का प्रकाशन कहा करते हैं। (वैसे तो अमूर्त वर्णों की कोई आकृति नहीं, किन्तु) 'चित्र' काव्य वह काव्य है जिसमें एक रचना-विशेष में विन्यस्त वर्ण (वर्णानुमापक लिपियाँ) खड्ग, मुरज, पद्म इत्यादि की आकृतियों का निर्माण करते प्रतीत होते हैं। टिप्पणी-अग्निपुराण (३४२ अध्याय) में 'चित्र' अलंकार का यही स्वरूप निर्दिष्ट किया हुआ है- 'अनेकधावृत्तवर्णविन्यासः शिल्पकल्पना । तत्तत्प्रसिद्धवस्तूनां बन्ध इत्यभिधीयते॥' अर्थात् वर्णों के द्वारा-व्णों के एक विशिष्टविन्यास के कारण-कविगण जो वर्णशिल्प-निर्माण किया करते हैं, जिसमें भिन्न-भिन्न आकार-प्रकार की वस्तुओं की रूपरेखा देखी जा सकती है, वह एक 'चित्र' है और एक अलंकार अथवा वैचित्र्य है। रुद्रट ने भी 'काव्यालंकार' में चित्र की ऐसी ही परिभाषा दी है- 'भङ्गयन्तरकृततत्क्रमवर्णनिमित्तानि वस्तुरूपाणि। साङ्कानि विचित्राणि च रच्यन्ते यत्र तच्चित्रम्॥ अर्थात् कवियों के द्वारा एक विचित्रता से बनायी गयी वर्णों की जो रचना-परिपाटी है जिसमें चक्र, पद्म, खड्ग आदि वस्तुओं की आकृति देखी जा सकती है, वह 'चित्र' अलंकार है। अनुवाच-ऐसी काव्य-रचना कष्टसाध्य है (और रस-भावादि की दृष्टि से अनुपयुक्त भी है) इसलिये इसका किञ्ञिन्मात्र ही निर्देश यहां अपेक्ित है। जैसे कि :-

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३३० काव्यप्रकाश:

उदाहरणम्- मारारिशक्रामेभमुखैरासाररंहसा। 9m साराख्धस्तवा नित्यं तदार्तिहरणक्षमा ॥ ३८४॥ माता नतानां सङ्गट्टः थ्रियां बाधितसंभ्रमा। मान्याऽथ सीमा रामाणां शं मे दिश्यादुमादिमा ॥ ३८५ ॥ (खड्गबन्धः) सरला बहुलारम्भतरलालिवलारवा। वारलाबहुलामन्दकरलाबहुलामला ॥ ३=६ ॥ ( मुरजबन्धः ) भासते प्रतिभासार ! रसाभाताहताविभा। भावितात्मा शुभा वादे देवाभा बत ते सभा ॥ ३८७॥ ( पत्मबन्धः ) रसासार ! रसा सारसायताक्ष ! क्षतायसा। सातावात ! तवातासा रक्षतस्त्वस्त्वतक्षर !॥३८८ ॥। ( सर्वतोभद्रम्) सम्भविनोऽप्यन्ये प्रभेदा: शक्तिमात्रप्रकाशका न तु काव्यरूपतां द्धतीति न प्रदर्श्यन्ते। १. (खड्गबन्ध) 'मारारिशक्ररामेभमुखैरासाररंहसा सारारब्धस्तवा' मार-कामदेव, शक्र-इन्द्र, राम-रघुनन्दन अथवा परशुराम तथा इभमुख-गणेश के द्वारा अनवरत रूप से किंवा बड़े मनोयोग से रचे गये सुन्दर-सुन्दर स्तोत्रों की एक मात्र भूमि, 'नित्यं तदार्ति- हरणक्षमा' सदा उन सब के ताप-संताप के निवारण करने की शक्ति रखने वाली, 'नातनां माता' प्रणतजन की जननी, 'श्रियां संघट्टः' समस्त विभूतियों की संगम-स्थली, 'बाधित- संभ्रमा' भक्तजन के भय को भगाने वाली, 'मान्या' सभी के द्वारा पूजनीय 'आदिमा' सृष्टि का परम कारण, 'अथ रामाणां सीमा' और रम्यता की पराकाष्ठा 'उमा' भगवती पार्वती 'मे शं दिश्यात्' मुझे सुख-शान्ति दें। २. (मुरजबन्ध) 'सरला' मेघ-निर्मुक्त अथवा (सरला) कास पुष्प से शोभित, 'बहुलारम्भतरलालिबलारवा' नाना प्रकार के फूलों के लोभी किंवा इतस्ततः भ्रमण करने वाले भ्रमर-समूहों के संगीत-नाद से सुन्दर, 'वारलाबहुला' मदकल कलहंसों से व्याप्त, 'अमन्दकरला' राजाओं की (विजय-यात्रा में ) उद्योग शीलता का एक मात्र कारण तथा 'बहुलामला' कृप्णपक्ष की रात्रियों में भी आकाश की निर्मलता का यह निदान शरद्ऋतु कितनी सुहावनी लग रही है। ३. (पद्मबन्ध) हे 'प्रतिभासार' -हे महाप्राज्ञ महाराज ! 'रसाभाता' परस्पर प्रेम- भाव में पगी, 'अहताविभा' अप्रतिहत प्रतापवाली, 'भावितात्मा' आत्म-दर्शन में निपुण किंवा 'वादे शुभा' तत्वचिन्तन और तत्व-विचार में कुशल 'ते सभा' आप की यह राज- सभा 'बत देवाभा' कितने आश्चर्य की बात है कि देवसभा सरीखी लग रही है! ४. (सर्वतोभद्र) 'हे रसासार' -हे पृथिवी के परम श्रेष्ट 'सारसायतात्त' कमल के समान विशाललोचन, 'सातावात' अज्ञानान्धकार के नाशक, 'अतक्षर' महादानी महाराज! 'रक्षतः तव रसा' आपकी रक्षा में यह राज्य-भूमि 'क्षतायसा' सदा दुर्जनों के उपद्रव से रहित, किंवा 'अतासा' समस्त उपद्रवशून्य 'अस्तु' हो जाय। वैसे तो इसके अन्य भी अनेकानेक भेद-प्रभेद हो सकते हैं किन्तु इनका यहाँ निरूपण इसलिये अपेक्ित नहीं क्योंकि ये सब के सब कविजन की (शब्द-शिल्प की) शक्ति के प्रकाशक भले ही हों काव्य के स्वरूप के प्रकाशक कभी नहीं हो सकते हैं। टिप्पणी-(क) ये उपर्युक्त चित्र-बन्ध इस प्रकार देखे जा सकते हैं :-

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नवम उल्लास: ३३१

(१) खड्गबन्ध

गरिश क्रश मे भ मुखे रासाबरं ह 112 न्याथ सीमादिमा) सा क्षतान ताना संघ हरे रर ब्व स्तवानित्द तदार्तिह रणक्ष गमाणा क बधित सभ

(२) मुरजबन्ध मेदिश्यादु

स ल ब ला

त ला ब ला व वा।

वा ला ब ला म ल्ट X क ला ब ला म ला

(३) पद्मबन्ध उत्तरादिक ईशानविदिक् वायुविदिक् त्माश बत वादे

तावि आा सते पूर्वदिक पश्चिमादिक ताह सातू प्रल

अग्निविदिक् नैऋरत विदिक् दक्षिणाविदिक्

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३३२ काव्यप्रकाश:

(पुनरुक्तवदाभास) (११२) पुनरुक्तवदाभासो विभिन्नाकारशब्दगा । एकार्थतेव भिन्नरूपसार्थकानर्थकशब्दनिष्ठमेकार्थत्वेन मुखे भासनं पुनरुक्तवदाभासः। स च- (पुनरुक्तवदाभास के भेद ) (१२३) शब्दस्य सभङ्गाभङ्गरूपकेवलशब्दनिष्ठः।

(४) सर्वतोभद्र

र सा सा र र सा सा र

सा य ता क्ष क्ष ता य सा

सा ता वा त त वा ता सा

र क्ष त स्त्व स्त्व त क्ष र

(ख) मम्मट के पूर्ववर्ती आलक्कारिक जैसे कि रुद्रट आदि चित्रालंकार के भेद-प्रभेदों के प्रदर्शन सें पर्याप्त रुचि रख चुके हैं। रुद्रट ने स्पष्ट कहा है-

इत्यादिभिरन्येरपि वस्तुविशेषाकृतिप्रभवैः॥ भेदैरविभिद्यमा नं संख्यातुमनन्तमर्ति नैवालम्। (काव्यालंकार ५, २-४) किन्तु मम्मट की दृष्टि में ये सभी बन्ध नीरस होने के कारण हेय हैं और इसीलिये मम्मट ने इनकी और कवियों को उत्साहित भी नहीं किया जैसा कि रुद्रट ने किया है :- 'इत्थं स्थितस्यास्य दिशं निशम्य शब्दार्थवित् क्षोदितचित्रवृत्तः। आलोच्य लच््यं च महाकवीनां चित्रं विचित्रं सुकविर्विदध्यात्।।' अनवाद-'पुनरुक्तवदाभास' वह अलंकार है जिसे विभिन्न आकार वाले अर्थात् भिन्न-भिन्न वर्ण-क्रम वाले शब्दों में एक एकार्थकता का आभास कहा करते हैं। परस्पर भिन्न-भिन्न रूप वाले, सार्थक किंवा निरर्थक शब्दों की आपाततः जो एकार्थ- कता की प्रतीति है वही 'पुनरुक्तवदाभास' अलंकार है। एक वह पुनरुक्तवदाभास है जो केवल शब्दगत हुआ करता है। केवल शब्दगत जो पुनरुक्तवदाभास अलंकार है वह सभङ्ग और अभङ्ग दोनों प्रकरार के

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नवम उल्लास: ३३३

उदाहरणम्- अरिवधदेहशरीरः सहसा रथिसूततुरगपादातः । भाति सदानत्यागः स्थिरतायामवनितलतिलकः ॥ ३८६॥ चकासत्यङ्गनारामाः कौतुकानन्दहेतवः । तस्य राज्: सुमनसो विबुधाः पार्श्वेवर्तिनः ॥ ३६० ॥ (१२४ ) तथा शब्दार्थयोरयम् ॥ ८६ ॥ उदाहरणम्- तनुवपुरजघन्योऽसौ करिकुञ्जररुधिररक्तखरनखरः । तेजोधाम महः पृथुमनसामिन्द्रो हरिर्जिष्णुः॥ ३६१॥ शब्दों में हुआ करता है जिससे उसे सभङ्गशब्दगत और अभङ्गशब्दगत कहा जाया करता है) जैसे कि- (१) 'अरिवधदेहशरीरः' (अरिवधदा शत्रुविनाशिनी ईहा चेष्टा येषां ते अरिवधदेहाः ये शरिणः शरयुक्त बाणवर्षिणो योधास्तान् ईरयति प्रेरयतीति अरिवधदेहशरीरः) शत्रु- विनाश पर दत्तचित्त अपने वीर-सैनिकों को प्रेरित करने वाला, 'सहसा रथिसूततुरगपा- दात-' (सहसा शीघ्रं बलाद्वा रथिभिः सुष्ठु उताः संबद्धाः तुरगाः अश्वाः पादाताः पदाति- काश्च यस्य सम9) बलपूर्वक अपने रथारोहिओं के साथ अपने अश्वारोहिओं और पदातिओं को सन्नद्ध रखने वाला और 'स्थिरतायामगः' समरभूमि में अडिग रहने वाला पर्वंत (सदृश) 'अवनितलतिलकः' यह पृथ्वी-तिलक राजा 'सदानत्या भाति' सर्वदा अपने विनय के कारण सुशोभित हुआ करता है। [ यहां जो पुनरुक्तवदाभास है वह सभङ्गशब्द-निष्ठ है क्योंकि 'देह-शरीर', 'सारथि- सूत' और 'दान त्याग' शब्द यहाँ ऐसे प्रयुक्त हैं जिनमें आपाततः अर्थैक्य की प्रतीति हो रही है और जो वस्तुतः सभङ्ग हैं। यहाँ 'देह-शरीर' शब्द तो सार्थक और सभङ्ग है किन्तु 'सारथि-सूत' में प्रथम निरर्थक है और अन्तिम सार्थक। वैसे ये दोनों ही सभङ्ग शब्द हैं। 'दान-त्याग' में दोनों शब्द सभङ्ग हैं किन्तु निरर्थक हैं। ] (३) 'तस्य राज्ञ:' 'उस राजा के, 'अङ्गनारामाः' रमणिओं के साथ निरन्तर विहार करने वाले, 'कौतुकानन्दहेतवः' नाना प्रकार की क्रीडाओं के द्वारा सबको आनन्दित रखने वाले और 'सुमनसो विबुधाः' सब के शुभचिन्तक किंवा महावुद्धिमान्, 'पार्श्ववर्तिनः' पार्श्ववर्ती लोग, 'चकासति' कितने शोभित हो रहे हैं। [यह उदाहरण अभङ्गशब्दनिष्ठ पुनरुक्तवदाभास का है। यहाँ 'अङ्गना-रामा' कौतुक-

अखण्ड हैं। ] आनन्द' और 'सुमनस्-विबुध' शब्द आपाततः एकार्थवाची प्रतीत हो रहे हैं और अभङ्ग- और दूसरा पुनरुक्तवदाभास अलंकार वह है जो शब्दार्थोभयनिष्ठ-शब्द और अर्थ दोनों में रहने वाला-हुआ करता है। जैसे कि- 'असौ हरिः' यह वनराज सिंह 'तनुवपुः' कृशकाय होते हुये भी 'अजघन्यः' अमित- बलशाली है। 'करिकुअ्जररुधिररक्तखरनखरः' मारे गये गजराजों के रुधिर से सने लाल-लाल तीचण नखों वाला है, 'तेजोधाम' एक मात्र तेज का आधार है, 'महःपृथुमनसामिन्द्रः' शक्ति के कारण स्वाभिमानी प्राणियों में सबसे बड़ा और 'जिष्णुः (अस्ति)' सबको पराजित करनेवाला है।

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३३४ काव्यप्रकाश:

अत्रैकस्मिन् पदे परिवर्त्तिते नालद्वार इति शब्दाश्रयः अपरस्मिस्तु परिवर्ति- तेऽपि स न हीयते इत्यर्थनिष्ट इत्युभयालङ्कारोऽयम्। इति काव्यप्रकाशे शब्दालंकारनिर्णयो नाम नवम उल्लासः॥६॥

[यहां जो पुनरुक्तवदाभास है वह शब्दार्थोभयगत है यहां 'तनु-वषु' शब्दों की शरीरार्थकता, 'करि-कुज्जर' की गजार्थकता, 'रुधिर-रक्त' की शोणितार्थकता, 'तेजः- धाम-महस' शब्दों की तेजस्वितार्थकता तथा 'इन्द्र-हरि-जिष्णु' शब्दों की देवेन्द्रार्थकता आपाततः ही प्रतीत होती है, वस्तुतः है नहीं। ] इस उदाहरण में यदि 'तनु', 'कुअर', 'रक्त' इत्यादि रूप शब्दों में परिवर्तन कर दिया जाय तो यह अलंकार ही नहीं रह सकता, इसलिये यहां यह शब्दनिष्ठ है और यदि 'वपुः', 'करि' 'रुधिर' इत्यादि रूप शब्दों को परिवर्तित भी कर दिया जाय तो यह अलंकार नष्ट भी नहीं होता, इसलिये यहां यह अर्थनिष्ठ है और इसी दृष्टि से इसे 'शब्दार्थोभयनिष्ट' अथवा 'शब्दार्थोभयगत' भी कहा गया है। [ यहां तनु, कुक्षर, रक्त, धाम, हरि और जिप्णु शब्द तो ऐसे हैं जिनमें परिवर्तन नहीं किया जा सकता अर्थात 'परिवृत्त्यसह' हैं किन्तु वपु, करि, रुधिर और इन्द्र शब्द ऐसे हैं जिनमें परिवर्तन करने पर भी अलंकार की क्षति नहीं होती अर्थात् 'परिवृत्ति-सह' हैं। इस प्रकार अन्वय-व्यतिरेक के सिद्धान्त का अनुसरण करते हुए यहां पुनरुक्तवदाभास को शब्दार्थद्वयगत मानना सर्वथा उचित और युक्तियुक्त है।] टप्पणी-क) संभवतः अलंकारशास्त्र में 'पुनरुक्तवदाभास' रूप अलंकार का निरूपण आचार्य उद्भट का ही कार्य है। आचार्य उद्धट के अनुसार अलंकार का नाम 'पुनरुक्तवदाभासम्' है जिसकी परिभाषा यह है- पुनरुक्ताभासमभिन्नवस्त्विवोद्भासि भिन्नरूपपदम् ।' ( काव्यालक्कारसारसंग्रह १.१) जिससे यह स्पष्ट हे कि मिन्नरूप दो पदों का एकार्थरूप से प्रतीति में इस अलंकार की रूप- रेखा रहा करती है। यद्यपि आचार्य उद्भट ने स्पष्टतया यह नहीं कहा कि पुनरुक्तवदाभास शब्द का अलंकार है अथवा अर्थ का अलंकार है अथवा शब्दार्थालंकार है किन्तु मम्मट ने अपनी पुनरुक्तवदाभास-समीक्षा में यही सिद्ध किया है कि 'पुनरुक्तवदाभास' शब्दालंकार है और है साथ ही साथ उभयालंकार। मम्मट की ही मान्यता का समर्थन उद्भट के व्याख्याकार राजानक तिलक ने अपनी 'काव्यालंकारसारसंग्रहविवृति' में किया है। (ख) काव्यप्रकाशकार के 'पुनरुक्तवदामास' के लक्षण- 'पुनरुक्तवदाभासो विभिन्नाकारशब्दगा, एकार्थतेव' का तात्पर्य अलंकारसर्वस्वकार की 'पुनरुक्तवदाभास' परिभाषा-'आमुखावभासनं पुनरुक्तवदाभासम्' का खण्डन भी है। 'अलंकार सर्वस्व' के अनुसार तो 'पुनरुक्तवदाभास' अर्थ का अलंकार है- 'अर्थपौनरुक्त्यादेवार्थाश्रितत्वादर्थालंकारत्वं ज्ञेयञ्ज।' किन्तु 'काव्यप्रकाश' के अनुसार यह 'शब्द' का अलंकार है और है साथ ही साथ उभयालंकार। नवम उल्लास समाप्त

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दशुम उहास: (अर्थालंकारनिरूपणात्मकः)

अर्थालङ्कारानाह- (अर्थालङ्कार : स्वरूप औरर प्रकार विवेचन )

(१२५ ) साधम्यमुपमा भेदे ( १-उपमा अप्र ल ्का र:)

अनुवाद-(शब्दालद्कारों के निरूपण के बाद) अब अर्थालद्कारों का निरूपण किया जा रहा है- टिप्पणी-आचार्य मम्मट के अनुसार निम्नाक्कित अलक्कार अर्थालक्कार हैं जैसा कि काव्यप्रदीपकार ने सक्कलित किया है- 'उपमानन्वयस्तद्वदुपमेयोपमा ततः। उत्प्रेक्षा च ससंदेहो रूपकापहुती तथा ॥ श्लेषस्तथा समासोक्तिः प्रोक्ता चाथ निदर्शना। अप्रस्तुतप्रशंसातिशयोकती परिकीर्तिते॥ प्रतिवस्तूपमा तद्वद् दृष्टान्तो दीपकं तथा। तुल्ययोगितया चैव व्यतिरेकः प्रकीर्तितः ॥ १६

प्रकीर्तितस्तथाच्ेपस्तथैव च विभावना। विशेषोक्तिर्यथासंख्यं तथैव परिकीर्तितम् ॥ तथा चार्थान्तरन्यासविरोधाभाससंज्ञकौ। स्वभावोक्तिस्तथा व्याजस्तुतिःप्रोक्तं सहोक्तियुक्॥ विनोक्तिपरिवृत्ती च भाविकं काव्यलिङ्गयुक्। पर्यायोक्तमुदात्तंच समुच्चय उदीरितः ॥ पर्यायश्चानुमानं च प्रोक्तः परिकरस्तथा। व्याजोक्तिपरिसंख्ये च माला कारणपूर्विका ॥ 3४ 34

अन्योन्यमुत्तरं सूच्मसारौ तद्वद्संगतिः! समाघिश्र समेन स्याद् विषमस्त्वधिकेन च ॥। ४७ ४८

प्रत्यनीकं मीलितं च स्यातामेकावलीस्मृती। आ्रन्तिमांश्र प्रतीपेन सामान्यं च विशेषयुक्। तद्गुणातद्गुणौ चैय व्याघातः परिकीर्तितः। संसृष्टिसङ्करौ चैवमेकषष्टिः क्रमोदिता ॥' अनुवाद-'उपमा' वह अलंकार है जिसे उपमान और उपमेय का, उनमें भेद होने पर भी, परस्पर साधारणधर्म से सम्बद्ध होना कहा जाता है। टिप्पणी-(क) 'साधर्म्य' का यहाँ मम्मट ने प्रयोग किया है 'सादृश्य' का नहीं। काव्यप्रकाश के अनेक टीकाकार 'साधर्म्य' पद की उपयोगिता के समर्थक हैं। किन्तु कुछ ऐसे भी टीकाकार हैं जो 'साध्म्य' को 'सादृश्य' का ही पर्यायवाचक मानते हैं। वस्तुतः मम्मट की दृष्टि में 'साधर्म्य' और 'सादृश्य' एकार्थक शब्द नहीं अपितु भिन्न-मिन्न अभिप्राय रखने वाले शब्दर हैं। हम कह सकते हैं-'अनेनायं सदृशः-' यह इसके सदृश-समान है। किन्तु जब ऐसा कहते हैं तो मन में यही रखते हैं कि इन दोनों में जो सादृश्य है वह किन-किन धर्मो के कारण है। अर्थात् दो वस्तुओं के 'सादृश्य' में उनका साधर्म्य-उनका परस्पर समान अथवा साधारण धर्म से सम्बन्ध प्रयोजकरूप से दिखायी दिया करता है। उद्योतकार ने इसीलिये स्पष्ट कहा है-'सादृश्यं च साधारणधर्मप्रयोज्यो धर्मविशेषः' अर्थात् दो, वस्तुओं जैसे कि उपमान और उपमेय का परस्पर नो 'सादृश्य' है वह उनका एक विशेषधर्म है जो उनमें अनुगत करके साधारणधर्म के कारण हुआ करता है। (ख) सभी आलक्कारिक अर्थालङ्कारों के निरूपण का प्रारम्भ 'उपमा'- निरूपण से ही करसे आरहे हैं। इसका कारण है 'उपमा' का अनेकानेक अर्थालङ्गारों में मूलरूप से होना और

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३३६ काव्यप्रकाश:

उपमानोपमेययोरेव न तु कार्यकारणादिकयोः साधर्म्य भवतीति तयोरेव समानेन धर्मेण सम्बन्ध उपमा। भेदग्रहणमनन्वयव्यवच्छेदाय। काव्य-सौन्दर्य में विशेषरूप से सहायता पहुँचाना। 'अलक्कारसरदस्वकार' ने इसीलिये कहा है- 'उपमैवानेकप्रकार वैचित्रयेणाने का लक्क्ारबीजभूता।' (ग) यद्यपि द्रव्य-गुण-क्रिया और जातिरूप पदार्थ का अपना-अपना स्वरूप और अपना- अपना स्वमाव नियत है और साथ ही साथ उनकी देश-काल-व्यवस्था भी व्यवस्थित ही है और इस प्रकार उनका वर्णन उनके प्रातिस्विकस्वरूप और स्वभाव के वर्णन को ही समझना चाहिये, किन्तु यदि हृदय रसाविष्ट है तो यह त्वाभाविक है कि एक वस्तु का स्वरूप अथवा स्व्रभाव दूसरी वत्तु के स्वरूप अथवा स्वमाव के रूप में प्रकाशित किया जाय। 'उपमा' अलक्कार की ओर जो प्रवृत्ति है उसका यही मूल कारण है। 'उपमा' भी वक्तृविशेष की वैयक्तिक विशेषताओं का ही अनुसरण किया करता हैं। यदि वक्ता एक रागी व्यक्ति हो तो किसी स्त्री के स्वरूप और स्वभाव का वर्णन इमी प्रकार से करना चाहेगा- 'अमृतस्येव कुण्डानि सुखानामिव राशयः। रतेरिव निधानानि योषितः केन निर्मिताः॥' विरक्तप्रकृति के वक्ता के हृदय से स्री का स्वरूप इसी प्रकार प्रकेट होगा- 'एता हसन्ति च रुदन्ति च कार्यहेतोर्विश्वासयन्ति च नरं न च विश्वसन्ति। तस्मान्नरेण कुलशीलसमन्वितेन वेश्या श्मशानसुमना इव वर्जनीया।' दिखायी देगा- और मध्यस्थ अथवा तटस्थ व्यक्ति इस प्रसङ्ग में इसी प्रकार अपनी अभिव्यक्ति करता 'दर्शनादेव नटवद् हरन्ति हृदयं स्त्रियः। सुविश्वस्तेप्यविश्वस्ता भवन्ति च चरा इव ॥' (घ) 'उपमा' वस्तुतः कवि का वह काव्य-दृष्टि है जिसके द्वारा उसे चराचर जगत् की एक मधुर झाँको मिला करती है। 'उपमा' की साधना कवि की समदृष्टि-साधना है और इस साधना में जिसकी सिद्धि होती है वह है 'सौन्दर्य'। उपमा का यह महार हस्य है। अनुवाद-'साधर्म्य' अथवा समानधर्मता रूप सम्बन्ध कार्य-कारण आदि में नहीं अपि तु 'उपमान' और 'उपमेय' में ही हो सकता है और इसीलिये उन्हीं दोनों अर्थात् उपमा और उपमेय का ही जो समान धर्म से सम्बन्ध है उसे ही 'उपमा' कहते हैं। यहाँ (उपमा के लक्षण में) 'भेद' शब्द का प्रयोग इसलिये किया गया जिसमें 'उपमा' को 'अनन्वय' से (जहाँ उपमेय और उपमान का पारमार्थिक भेद विवत्ित नहीं रहता) पृथक् किया जा सके। टिप्पणी-(क) 'उपमा'-लक्षण-वाक्य में 'उपमान' और 'उपमेय' का उल्लेख न होने पर भी 'साधर्म्य' का जो उल्लेख है उसी के द्वारा 'उपमान' और 'उपमेय' का आक्षेप-स्वभावतः हो जाता है क्योंकि 'साधर्म्य' साधारणधर्मरूप सम्बन्ध जिन किन्हीं दो पदार्थों में होगा उनमें परस्पर उपमानोपमेयभाव रहेगा ही। (ख) 'अनन्वय' अलक्कर में 'उपमान' और 'उपमेय' में पारमार्थिक भेद का अभाव ही रहा करता है जैसे कि 'रामरावणयोर्युद्ध रामरावणयोरिव' इत्यादि में एक ही वस्तु उपमान और उपमेय दोनों रूपों में विद्यमान है। 'यहाँ उपमान नहीं हो सकती क्योंकि यहाँ जो साधर्म्य अभिप्रेत है वह उतना चमत्कारजनक नहीं जितना कि वहाँ जहाँ 'उपमान' और 'उपमेय' मिन्न मिन्न है जैसे कि

लिये कहा है- 'कमलमिव मुखं मनोजमेतत' इत्यादि में। काव्यप्रकाश की 'सुधासागर' टीका के रचयिता ने इसी- उपमानोपमेययोर्भेदश्चतुर्धा-उपात्तः, अनुपात्तः, आरोपितः, तिरोहितश्चेति। अर्थात् उपमान और उपमेय में चार प्रकार का भेद है-१ उपात्त, जैसे कि वाच्योपमा में, जैसे कि रूपक में। २ अनुपात्त, जैसे कि व्यङ्गयोपमा में, ३ आरोपित, जैसे कि अनन्बय में और ४ तिरोहित,

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दशम उल्लास: ३३७

(उपमा के भेद-प्रभेद-१ पूर्णोपमा और उसके ६ प्रकार) (१२६) पूर्णा लप्ा च। उपमानोपमेयसाधारणधर्मोपमाप्रतिपादकानामुपादाने पूर्णा एकस्य द्वयो- स्त्रयाणां वा लोपे लुप्ता। (१२७) साडग्रिमा ! . श्रौत्यार्थी च भवेद्वाक्ये समासे तद्विते तथा॥ ८७॥ अग्रिमा पूर्णा। यथेववादिशब्दा यत्परास्तस्यैवोपमानताप्रतीतिरिति यद्यप्युपमानविशेषणा- न्येते तथापि शब्दशक्तिमहिम्ना श्रुत्यैव षष्ठीवत् सम्बन्धं प्रतिपादयन्तीति तत्सद्भावे श्रौती उपमा। तथव 'तत्र तस्येव' इत्यनेनेवार्थे विहितस्य वतेरुपादाने। 'तेन तुल्यं मुख'मित्यादावुपमेये 'एव तत्तुल्यमस्य' इत्यादौ चोपमाने अनुवाद-'उपमा' के (सर्वप्रथम) दो भेद हैं-पूर्णोपमा और लुप्तोपमा। 'पूर्णोपमा' वह है जहाँ उपमान, उपमेय, साधारणधर्म और उपमावाचक शब्द-ये चारों (उपमा के अंग) स्पष्टतया निर्दिष्ट रहा करते हैं और 'लुप्तोपमा' वह जहाँ इनमें से एक अथवा दो अथवा तीन का लोप-अनिर्देश-रहा करता है। टिप्पणी-'पूर्णोपमा' का अर्थ है 'पूर्णावयवा उपमा' और 'लुंहोपमा' का 'लुप्नावयवा उपमा'। अनुवाद-यहां जो पूर्वनिर्दिष्ट उपमा है (अर्थात् पूर्णोपमा) उसके (सर्वप्रथम) दो भेद हैं-शौती और आर्थी, किन्तु ये दोनों ही वाक्य, समास और तद्धित के क्षेत्र में संभव हैं (इसलिये इस उपमा के ६ भेद हुये-१. वाक्यगा श्रौती, २. वाक्यगा आर्थी, ३. समासगा श्रीती, ४. समासगा आर्थी, ५ तद्धितगा श्रौती और ६. तद्धितगा आर्थी)। (कारिका में) अग्रिमा' पद का अभिप्राय है पूर्णा उपमा का। यहाँ 'उपमा' को श्रौती इसलिये कहा गया है क्योंकि यह ऐसी होती है जहाँ उपमा- नोपमेय भाव 'यथा' 'इव' 'वा' आदि शब्दों के श्रुतिमात्र से ही प्रतीत हुआ करता है। यद्यपि यह ठीक है कि 'यथा' 'इव' 'वा' आदि (उपमाप्रतिपादक अव्यय) शब्द जिसके आगे प्रयुक्त हुआ करते हैं उसी में उपमानता की प्रतीति करवाया करते हैं और इस दृष्टि से इन्हें 'उपमान' का विशेषण कहा जा सकता है किन्तु यह भी ठीक है कि इन शब्दों की अभिधा शक्ति ऐसी है कि इन्हीं के द्वारा, केवल इनके श्रवण-मात्र से ही उपमान और उपमेय के 'साधम्य' रूप सम्बन्ध की भी उसी प्रकार प्रतीति करवायी जाया करती है जिस प्रकार षष्ठी विभक्ति के द्वारा स्व-स्वामिभावरूप सम्बन्ध की (क्योंकि 'राज्ञो राज्यम्' इत्यादि में जो षष्ठी विभक्ति है वह भले ही अपने प्रकृतिभूत 'राजन्' शब्द के अर्थ में स्वामित्व की प्रतीति कराने वाली होने से उसका विशेषण हो जाय किन्तु इसी के द्वारा राजा और राज्य में स्व-स्त्रामिभावरूप सम्बन्ध भी तो स्वभावतः बताया जाया करता है)। इसी प्रकार इसे 'श्रौती' वहाँ भी कहते हैं जहाँ 'तत्र तस्येव' (अष्टाध्यायी ५१.११६) सूत्र से 'इव' के अर्थ में (अर्थात् सादृश्यप्रयोजक साधारणधर्म-सम्बन्ध रूप अर्थ में) 'वति' प्रत्यय प्रयुक्त रहा करता है। अब 'उपमा' को 'आर्थी' जो कहा गया है वह इसलिये क्योंकि इस प्रकार की उपमा में 'तुल्य' आदि शब्दों का जो प्रयोग हुआ करता है उसमें 'साधर्म्य' की प्रतीति आक्षेपगम्य हुआ करती है ( शब्दलभ्य अथवा साच्षाद्गम्य नहीं) क्योंकि तुल्य आदि शब्द ऐसे हैं २२ का०

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३३८ काव्यप्रकाश:

एच 'इद् - पश नुल्य'मित्युभयतरापि तुल्यादिशवदानां विश्रान्तिरिति साम्य- पर्योलोचनया तुल्यताप्रतीतिरिति साधर्म्यस्यार्थत्वात्तल्यादिशब्दोपादाने आर्थी, तद्वत् 'तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिरि'त्यनेन विहितस्य वतेः स्थितौ। 'इवेन नित्यसमासो विभक्त्यलोपः पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वं चे'ति नित्यसमासे इवशब्दयोगे समासगा। क्रमेणोदाहरम्- १ (वाक्यगा श्रीती पूर्णोपमा ) स्वप्नेऽपि समरेषु त्वां विजयश्रीर्न मुख्ति। प्रभावप्रभवं कान्तं स्वाधीनपतिका यथा ॥ ३६२॥ २ ( वाक्यगा आर्थी पूर्णोपमा ) चकितहरिणलोललोचनायाः क्रुधि तरुणारुणतारहारिकान्ति । कि जब हम कहते हैं 'तेन तुल्यं मुखम्' 'उस ( कमल) के तुल्य मुख है' तब ये केवल उपमेय (मुख) का ही निर्दश कर अपना अर्थ समाप्त कर देते हैं, जब हम कहते हैं 'तत्तल्यमस्य' 'वह (कमल) तुल्य है इस (मुख) के' तब ये उपमान (कमल) का ही निर्देश कर अपना सादृश्यअभिप्राय समाप्त करते दिखायी देते हैं और जब हम कहते हैं 'इदं च तच् तुल्यम्'-'यह (मुख) और वह (कमल) तुल्य हैं' तब ये दोनों अर्थात् उपमान और उपमेय का निर्देश कर अपना सादृश्यरूप अर्थ बता कर चुप हो जाते हैं। इस प्रकार होता यह है कि जब हम साम्य अथवा साधर्स्य (साधारणधर्मरूप सम्बन्ध) का अनुसन्धान कर चुकते हैं तभी तुल्यता अथवा सादृश्य की प्रतीति हुआ करती है (अर्थात् यहाँ साध्म्य शब्द प्रतिपाद्य नहीं अपि तु अर्थलभ्य रहा करता है)। इसी प्रकार इसे वहाँ भी 'आर्थी' कहा करते हैं जहाँ 'तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः' (अष्टाध्यायी ५.१.११५) सूत्र से 'तुल्य' के (सामान्य सादृश्य रूप) अर्थ में विहित 'वति' प्रत्यय का प्रयोग रहा करता है। (श्रीती) समासगा उपमा वहाँ हुआ करती है जहाँ 'इवेन नित्यसमासो विभक्त्य- लोप: पूर्वपद्प्रकृतिस्वरत्वं च' इस कात्यायन-वार्तिक के द्वारा नित्यसमास होने पर 'इव' शब्द प्रयुक्त हुआ करता है ( जैसे कि 'जीमूतस्येव भवति प्रतीकम्' इस ऋचा में प्रयुक्त 'जीमूतस्येव' पद में)। टिप्पणी-उपमा में 'शौती' और 'आर्थी विभागव्यवस्था का वस्तुतः जो मूल है वह है (श्रौती में) साधर्म्यं की शब्दलभ्यप्रतीति और (आर्थी में) साधर्म्य की अर्थलभ्यप्रतीति का होना। अनुवाद-क्रमशः उदाहरण ये हैं :- 'महाराज ! विजय-श्री आप सरीखे प्रभुत्वसम्पन्न महापुरुष को, संग्राम में, स्वप्न में भी उसी प्रकार नहीं छोड़ना चाहती जिस प्रकार कोई स्वाधीनपतिका नायिका अपने परमानुरक्त प्रियतम को स्वप्न में भी नहीं छोड़ा करती।' [ यहाँ 'विजयश्री' उपमेय है और 'स्वाधीनपतिका' है उसका 'उपमान''न मुञ्जति' अर्थात् अपरित्याग 'साधर्म्य' अथवा साधारणधर्मरूप सम्बन्ध है और 'यथा' है उपमा- वाचक शब्द। उपमा के ये चारों अंग असमस्तपद द्वारा प्रतिपाद्य हैं और इसलिये यहाँ जो उपमा है उसे वाक्यगा औीती पूर्णोपमा समझना चाहिये।] 'इस बात से कि कुपित होने पर चकित हरिणी के ( चज्चल नेत्रों के) समान चज्जल नयनों वाली इस नायिका का औषस-राग की भाँति रक्त-किं वा रमणीय मुख और यह

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दशम उल्लास: ३३६

सरससिजमिदमाननं च तस्या: सममिति चेतसि सम्मदं विधत्ते॥ ३६३॥। ३ (समासगा श्रौती पूर्णोपमा )

दिव्यः प्रभाभिरनपायमयैरुपायैः। शौरिर्भुजैरिव चतुर्भिरदः सदा यो लक्ष्मीविलासभवनैरभुवनं बभार ॥ ३६४॥ (उसके हाथ का) कमल एक सरोखे लगने लगते हैं, चित्त में आनन्द का उद्रेक हो उठता है।' [ यहाँ 'आनन' है उपमेय और उपमान है 'सरसिज'। दोनों का साधारण धर्म है तरुण अरुण ( उषा की लाली) की सी उत्कट लालिमा की रमणीयता और उपमा-वाचक शब्द है 'समम्'-समान, जो कि असमस्तपद है। इसलिये यहाँ जो उपमा है वह है वाक्यगा आर्थी पूर्णोपमा। 'आर्थी' इसलिये क्योंकि यहाँ साधर्म्य अथवा उपमान और उपमेय का परस्पर साधारणधर्म से सम्बद्ध होना साक्षात् शब्द-प्रतिपाद्य नहीं अपि तु अर्थ- सामर्थ्य-लस्य है। 'सरसिजमिद्मानन् च समम्' 'यह कमल और वह मुख एक सरीखे हैं' वस्तुतः जिस अभिप्राय का प्रत्यायक है वह है कमल और मुख का परस्पर सादृश्य होने से एकरूप प्रतीत होना। इस प्रतीति के बाद ही हमें इन दोनों के सादृश्य के प्रयोजक इन के पारस्परिक साध्म्य की प्रतीति हुआ करती है जिसमें शब्द का हाथ उतना नहीं रहा करता जितना कि वाच्य सामर्थ्य का अथवा हमारी अपनी भावना-शक्ति का।] उसी प्रकार 'ये महाराज परिणाम में भी विशुद्ध, दुष्ट शत्रुओं के नियन्त्रण में समर्थ महाप्रभाव, महोन्नत, चिरस्थायी किंवा राज्य-श्री के वैभव-विलास के एकमात्र आधार अपने साम-दाम-दण्ड और भेद रूप चारों उपायों से साम्राज्य के योग-क्षेम में लगे रहा करते हैं जिस प्रकार भगवान् विष्णु (कृष्ण) अपने आजानुलम्बी, दानव दमन, दिव्य, महैश्वर्यशाली, शाश्वत किं वा लच्मी के विलास के एक मात्र अवलम्ब चारों भुज-दण्डों से भुचन-मण्डल के पालन-पोषण में। [ यहां 'भुजदण्ड' उपमान, 'उपाय-चतुष्टय' उपमेय, 'अत्यायत' आदि होना साधारण धर्म और 'इव' उपमावाचक शब्द-ये चारों उपमाङ्ग विद्य्मांन हैं। इसलिये यह उपमा श्रौती पूर्णोपमा है और इसे समासगा इसलिये कहा जाता है क्योंकि 'भुजैरिव' पद व्यस्त पद नहीं अपि तु समस्त पद है जहाँ 'इवेन समासो विभवत्यलोपः' इत्यादि वार्तिक-नियम के अनुसार सुप्सुप समास और विभक्ति का अलोप-दोनों हो रहे हैं।] यहाँ 'समासगा श्रौती पूर्णोपमा' मानने में एक आपत्तिहो सकती है वह यह है- 'भुजैरिव' यह पद यदि एक समस्त पद हुआ तो 'अत्यायतैः'इत्यादि विशेषणों का अन्वय इसके एकदेश अर्थात् 'भुजैः' के साथ कैसे हो सकेगा ? अन्वय का सिद्धान्त तो यह है कि 'पदार्थः पदार्थेनान्वेति न तु पदार्थेकदेशेन' अर्थात् एक पदार्थ दूसरे पदार्थ के साथ तो अन्वित हो सकता है किन्तु दूसरे पदार्थ के एकदेश-एक अंग-के साथ कभी नहीं। अब यदि 'अत्यायतैः' इत्यादि विशेषणों का 'भुजैः' के साथ अन्वयही असंभव है तो 'अत्याय- तत्व' आदि साधारण धर्म भी कैसे हो सकते हैं और तब समासगा उपमा भी यहाँ कैसे? इस आपत्ति का निराकरण इस प्रकार किया जा सकता है-यद्यपि 'भुजैः' पदार्थ नहीं अपि तु पदार्थेकदेश है क्योंकि 'भुजैरिव' इस पदार्थ का ही यह अंग है और इसलिये 'अत्यायतैः' इत्यादि विशेषणों का शाब्दिक अन्वय यहां नहीं हो सकता किन्तु आर्थिक अन्वय में तो कोई आपत्ति नहीं हो सकती और इसलिये यहाँ 'समासगा श्रौती पूर्णोपमा' मानने में कोई भी दोष नहीं। वैयाकरणों की यह भी एक मान्यता है कि विशेषणों का

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३४० काव्यप्रकाश:

M MM ५ (समासगा आर्थी पूर्णोपमा ) अवितथमनोर्थपथप्रथनेषु प्रगुणगरिमगीतश्रीः । सुरतरुसदृशः स भवानभिलषणीयः क्षितीश्चर ! न कस्य ॥ ३६४॥ ६ (तद्धितगा श्रौती तथा आर्थी पूर्णोपमा ) गाम्भीर्यगरिमा तस्य सत्यं गङ्गाभुजङ्गवत्। हुरालोकः स समरे निदाधाम्बररत्नवत्॥ ३६५॥ (एक आ्रशंका औरपौर उसका समाधान ) स्वाधीनपतिका कान्तं भजमाना यथा लोकोत्तरचमत्कारभू: तथा जयश्री- स्त्वदासेवनेने त्यादिना प्रतीयमानेन विना यद्यपि नोक्तेवैंचित्रयम्। वैचित्यं चाल- क्वार: तथापि न ध्वनिगुणीमूतव्यङ्ग चव्यवहारः। न खलु व्यङ्गयसंस्पर्शपरामर्शा दत्र चारुताप्रतीतिः अपि तु वाच्यवैचित्र्यप्रतिभासादेव। रसादिस्तु व्यङ्गयोऽ- शाब्दिक अन्वय उपमेय में हो और आर्थिक अन्वय हो उपमान में। यहाँ महाभाष्यकार के प्रयोग जैसे कि 'किमोदनः शालीनाम्' इत्यादि के अनुसार, जहाँ एक पदार्थ के साथ दूसरे पदार्थेकदेश का भी अन्वय स्पष्ट दिखायी दे रहा है, 'भुजैः' और उसके 'अत्यायतैः' इत्यादि विशेषणों का अन्वय शास्त्रसंमत ही है, अन्यथा नहीं।] 'हे महाराज! प्रजाजन के सफल मनोरथों के मार्गो का सदा विस्तार करने में अपने महनीय गुणों के कारण सर्वस्तुत्य लक्ष्मी-सम्पन्न आप भला कल्पवृक्ष की भांति किसी की अभिलाषा के पात्र नहीं!' [यहाँ उपमान 'सुरतरु' उपमेय 'भवान्'-आप साधर्म्य 'प्रगुणगरिमगीतश्रीत्व' और उपमावाचक शब्द सुरतरु-'सदश' ये चारों उपमाङ्ग विद्यमान हैं और उपमान तथा उपमाप्रतिपादक शब्दों का समास भी है इसलिये यहाँ समासगा आर्थी पूर्णोपमा है। ] 'वस्तुतः इन (महाराज) की गम्भीर्यगरिमा गङ्गाभुजङ्गवत् (समुद्रवत् किंवा शन्तनुवत्) है और समर में ये वस्तुतः निदाघाम्बररत्नवत् (ग्रीष्मकालीन सूर्यवत्) हैं।' [ यहाँ पूर्वार्द्ध में तद्धितगता शौती पूर्णोपमा है क्योंकि उपमेय-'तस्य' और साधारण धर्म-'गाम्भीयगरिमा' तो हैं ही, साथ ही साथ उपमान 'गङ्गाभुजङ्ग' में 'गङ्गाभुजङ्गस्येव' इस अर्थ में 'तन्र तस्येव' इस तद्धित-सूत्र से 'वति' प्रत्यय भी है। इसके उत्तरार्द्ध में जो उपमा है वह 'तद्धितगा आर्थी पूर्णोपमा' क्योंकि उपमेय 'सः' और साधारणधर्म 'दुरालोकत्व' के साथ-साथ 'निदाघाम्बररत्न' इस अर्थ में 'तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः' इस सूत्र-नियम से 'वति' प्रत्यय विद्यमान है। ] यहाँ यह आशङ्का की जा सकती है कि जब 'स्वप्नेऽपि समरेषु' इत्यादि काव्य- सूक्तियों में इस प्रकार के व्यङ्ग्यार्थ अर्थात् 'जैसे स्वाधीनपतिका नायिका अपने प्रियतम के सङ्ग-सुख में एक अलौकिक चमत्कार का कारण बन जाती है वैसे ही विजय-लक्ष्मी आप (राजा) के सङ्ग-सुख में' इत्यादि के बिना कोई विचित्रता नहीं और जो विचित्रता है वही अलद्कार है तब इन्हें 'ध्वनि' अथवा 'गुणीभूतव्यङ्गयं काव्य' क्योंकर न मान लिया जाय ? किन्तु इसका समाधान यह है कि इन्हें ऐसा नहीं माना जा सकता क्योंकि इनमें जो भी चारुता की प्रतीति है वह इनके वाच्य-वैचित्र्य (उपमा वैचित्र्य) के ही अनुसंधान में है, न कि इनमं छिंपे व्यङ्गयार्थ और उसके अनुसंधान में। यहाँ ऐसी भी आशक्का हो सकती है कि (जब चित्रकाव्य के भेद-प्रभेदों का सोदाहरण लक्षण-निरूपण यहाँ अभिप्रेत है और 'स्वप्नेऽपि' इत्यादि काव्य-सूक्तियों में व्यअथार्थ-चारत्व की अपेता है तो) पहले कुछ अर्थात् चित्र (अव्यङ्गय) काव्य के

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दशम उल्लास: ३४१ 3m. V र्थोऽलङ्घारान्तरं च सर्वत्राव्यभि चारीत्यगणयित्वैव तदलक्कारा उदाहताः।तद्रहि- तत्वेन तु उदाहियमाणा विरसतामावहन्तीति पूर्वापरविरुद्धाभिधानमिति न चोदनीयम्। FIR (२ लुप्तोपमा औरौर उसके १९ प्रकार ) (१२८ ) तद्वद्धर्मस्य लोपे स्यान्न श्रौती तद्धिते पुनः। (धर्मलुप्तोपमा के पांच प्रकार) धर्मः साधारणः। तद्धिते कल्पबादौ त्वार्थ्येव तेन पञ्च। प्रकारों के निरूपण का प्रस्ताव और बाद में कुछ अर्थात् व्यङ्गयार्थ की अपेवा रखने वाले सन्द्भों का उदाहरण-इस प्रकार परस्पर विरुद्ध बातें क्यों ? किन्तु इसका समाधान यह रहा है कि यहां कोई भी बात उलटी-पुलटी नहीं कही गयी क्योंकि ये जो उदाहरण यहां दिये गये हैं वे इसलिये नहीं दिये गये कि इनमें रसादिरूप व्यङ्ग्यार्थ अथवा अन्य किसी अलङ्कार का अस्तित्व है-क्योंकि रसादिरूप व्यङ्ग्यार्थ तो सर्वत्र अव्यभिचरित सत्ता हो सकती है-अपितु इसलिये कि इनमें वाच्य-वैचित्र्य का निरूपण अभिप्रेत है। अब यहां यह कहना कि ऐसे उदाहरणों को क्यों न चुना गया जो एकमात्र चिन्न-काव्य के उदाहरण हों, ठीक नहीं जंचता क्योंकि सर्वथा रसभावादिरहित अथवा अलङ्कारान्तर- शून्य संदर्भों को यदि उदाहृत किया जाय तो उनमें काव्यगत आस्वाद कहां से मिलेगा! टिप्पणी-आचार्य मम्मट के मत में यहाँ ध्वनिकार की यह मान्यता अर्थात्- 'रसभावादितात्पर्यमाश्रित्य विनिवेशनम् । अलंकृतीनां सर्वासामलङ्कारत्वसाधनम्॥ ध्वन्यात्मभूते शृङ्गारे समीच्य विनिवेशितः । रूपकादिरलङ्कारवर्ग एति यथार्थताम्॥' (ध्वन्यालोक २ य उद्योत) इत्यादि ओतप्रोत है जिसके कारण अलक्कार-निरूपण के प्रसङ्ग में सवथा रसभावादिरूप व्यङ्गयार्थ-शून्य संदर्भों के उदाहरण यहां अभिप्रेत नहीं। ऐसा कहा भी मया है- 'रसध्वनिर्न यत्रास्ति तत्र वन्ध्यं विभूषणम्। मृताया मृगशावाच्याः किं फलं हारसंपदा।।' यदि ऐसा बात न हाता तो यहाँ 'उपमा' के लिये 'गौरिव गवयः', 'उत्प्रेक्षा' के लिये 'नूनं स्थाणुनाडनेन माव्यम्', 'रूपक' के लिये 'लोष्टः पाषाणः और इसी प्रकार अन्य अर्थालङ्कारों के लिये ऐसे ही वैचित्य-रहित संदर्भ क्योंकर नहीं उदाहृत किये जाते ! अनुवाद-वह 'लुप्तोपमा' जो कि धर्म (साधर्म्य) के लोप होने पर होती है वैसे तो पूर्णोपमा की ही भांति (श्रीती तथा आर्थी-वाक्यगा, समासगा तथा तद्धितगा) हुआ करती है किन्तु (इव के अर्थ में विहित वति प्रत्ययरूप) तद्धित में यह 'श्रौती'नहीं हो सकती। यहां 'धर्म' का अभिप्राय है 'साधारणघर्म' का। ('तद्धित में-इव' के अर्थ में विहित 'वति' रूप तद्धित प्रत्यय में श्रौती नहीं हुआ करती-का अभिप्राय यह है कि) 'तुल्य' के अर्थ में विहित 'कल्पप' आदि प्रत्ययरूप तद्धित में यह आर्थी हो सकती है। इस प्रकार इसके (धर्मलुप्ता उपमा के) पांच ही प्रकार (अर्थात् वाक्य श्रौती और आर्थी, समासगा श्रौती और आर्थी तथा तद्धितगा आर्थी) हुआ करते हैं। टिप्पणी-'धर्मलुप्ता तद्धितगा उपमा' इसलिये श्रोता नहीं हुआ करनी क्योंकि 'इव' के अर्थ में विहित तद्धितप्रत्यय के प्रयोग में ही औौती होना संभव है। 'इव' के अर्थ में विहित 'वति' रूप तद्धितप्रत्यय ऐसा है जो साधारणधर्म की आकांक्षा किया करता है। अब जब कि साधारणधम के अनुपादान में यह प्रत्यय ही असंगत है, तब 'तद्धितगा धर्मलुप्ता उपमा' भी शरौतो कैसे हो सकेगी ? वह 'वर्धलुप्ता उपमा' जो कि यहां 'तद्धितगा आर्थी' कही गयी है तुल्यार्थ 'वति' रूप तद्धित के प्रयोग में नहीं अपितु कल्पप्, देश्य, देशीयर आदि तद्धित के प्रयोग में ही संभव है क्योंकि तुल्यार्थक 'वति' प्रत्यय भी वस्तुतः किया-साम्य की आकांक्षा करने वाला प्रत्यय है जो कि अन्ततोगत्वा साधारणधर्म के अनुपादान में असंगत ही है।

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३४२ काव्यप्रकाश:

उदाहरणम्- 0r (१ धर्मलुप्ता वाक्यगा श्रौती उपमा) धन्यस्यानन्यसामान्यसौजन्योत्कर्षशालिनः । करणीयं वचश्चेतः सत्यं तस्यामृतं यथा ॥ ३६७॥ ( २ धर्मलुप्ता वाक्यगा आर्थी उपमा ) आकृष्टकरवालोऽसौ संपराये परिभ्रमन्। प्रत्यथिसेनया दष्टः कृतान्तेन समः प्रभुः॥३९८॥ (३ धर्मलुप्ता समासगा श्रौती तथा आर्थी किंवा तद्वितगा आर्थी धर्मलुप्तोपमा) करवाल इवाचारस्तस्य वागमृतोपमा। विषकल्पं मनो वेत्सि यदि जीवसि तत्सखे ! ॥ ३९९॥

शनुवाद-इसके उदाहरण ये हैं- 'मेरे मन! तुम्हें तो उस असाधारण किंवा महनीय सौजन्य वाले सजन पुरुष के अमृत के समान वचन का अनुसरण करना चाहिये।' [यहां उपमान 'अमृत' उपमेय 'वचन' तथा उपमावाचक शब्द 'यथा'-तीनों विद्यमान हैं किन्तु उपमान और उपमेय के साधारण धर्म जैसे कि 'परिणामसौरस्य' आदि का उपादान नहीं है। इसलिये यहां धर्मलुप्ता वाक्यगा श्रौती उपमा है।] 'संग्राम में तलवार खींचकर सर्वत्र घूमता हुआ यह राजा शत्रुसेना को यमराज के समान दिखायी पड़ने लगा।' [ यहां उपमान 'कृतान्त', उपमेय 'राजा' तथा उपमावाचक शब्द-'सम' तीनों हैं किन्तु उपमान और उपमेय के साधर्म्य जैसे करता इत्यादि अतिप्रसिद्ध होने के कारण अनुपात्त हैं। इसलिये यहां जो उपमा है वह 'धर्मलुप्ता' है। इसे 'वाक्यगा' इसलिये मानना उचित है क्योंकि उपमावाचक शब्द 'सम' का उपमान 'कृतान्त' के साथ समास नहीं किया हुआ है। यह 'आर्थी' इसलिये है क्योंकि यहाँ तुल्यार्थक 'सम' श्द प्रयुक्त है जो कि अर्थ-सामर्थ्य के द्वारा साधर्म्य का आक्तेप कराने वाला है।] 'अरे मित्र! यदि कहीं तुम जीवित रह सके तब यह जान लोगे कि उस दुष्ट का कर्म है कृपाण के समान, वचन है अमृत के समान और मन! वह तो वस्तुतः विषकल्प (विषसदृश ) है।' [यहां उपमान 'करवाल' उपमेय 'आचार' तथा समस्त उपमावाचक शब्द 'इव' (क्योंकि यहां 'ह्वेन नित्यसमासो विभक्त्यलोपः' इत्यादि नियम के अनुसार सुपसुप् समास और विभक्त्यलोप है) तो हैं किन्तु साध्म्य जैसे कि घातकता आदि का ग्रहण नहीं किया गया है जिसके कारण यहां समासगा धर्मलुप्ता श्रौती उपमा हुई। साथ ही साथ उपमेय 'वचन' और उपमावाचक तुल्यार्थक 'उपमा' शब्द के साथ समस्त उपमान रूप 'अमृत' पद भी प्रयुक हैं किन्तु मधुरता आदि साधारण धर्म के अनुपादन में धर्म का भी लोप है, इसलिये यहां समासगा धर्मलुप्ता आर्थी उपमा हुई। 'मन विषकल्प है' में जो उपमा है वह है तद्धितगा आर्थी धर्मलुप्ता उपमा, क्योंकि यहां 'विपादीपन्न्यूनम्-' विष सदश-अर्थ में 'ईषदसमातौ कल्पव्देश्यदेशीयरः' इस तद्धित सूत्र से जो कल्पप्

करता है। ] अस्थथ चिहित है वह सादृश्य अर्थ का रखने वाला है जिसमें साधर्म्य अर्थ-लभ्य रहा

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दशम उल्लास: ३४३

(उपमानलुप्तोपमा के २ प्रकार ) (१२९) उपमानानुपादाने वाक्यगाऽथ समासगा ॥ ८८ ॥ सअलकरणपरवीसामसिरिविअरणं ण सरसकव्वस्स। दीसइ अहव णिसम्मइ सरिसं अंसंसमेत्तेण। ४००।। (सकलकरणपरविश्रामत्त्रीवितरणं न सरसकाव्यस्य। दृश्यतेऽथवा निशम्यते सदृशमंशांशमात्रेण ॥ ) कव्वस्सेत्यत्र कव्वसममिति सरिसमित्यत्र च गूणमिति पाठे एषैव समासगा। (वाचकलुप्ता उपमा के ६ प्रकार ) (१३०) वादेलोंपे समासे सा कर्माधारक्यचि क्यडि। कर्मकर्त्रोर्णमुलि वह 'लुप्तोपमा' जो उपमान के लोप में हुआ करती है दो प्रकार की है-१ ली चाक्यगा और ररी समासगा। टिप्पणी-उपमानलुप्ता उपमा 'तद्धितगा' इसलिये नहीं हो सकती क्योंकि उपमाप्रतिपादक जो 'वति' प्रभृति तद्धित प्रत्यय हैं वे 'उपमान'-पद से ही विहित किये जाया करते हैं। अब जब उपमान ही लुप्त हुआ तब 'वति' आदि तद्धित प्रत्यय भी कैसे हो सकते हैं? साथ ही साथ यह उपमा 'औौती' भो नहीं हुआ करती क्योंकि 'इव' आदि जो साधर्म्यवाचक पद हैं वे उपमान में अन्त्रित होकर ही अपने अर्थ-'साधर्म्य'-का प्रतिपादन किया करते हैं। अब जब कि उपमान के लोप से इन पदों का भी उपादान असंभव ह तो यहाँ 'श्रौती' की क्या सम्भावना ? इसलिये उपमानलुप्ता उपमा केवल 'वाक्यगा आर्थी' और 'समासगा आर्थी' दो प्रकार की ही हुआ करती है। इसीलिये प्रदीपकार ने यहां कहा है- 'अत्र तद्धितगा न संभवति उपमाप्रतिपादकस्य तद्धितस्य वतिकल्पनादेरुपमानादेव विधानेन उपमानाऽनुपादानेसंभवात्। न वा श्रौती इवादीनामुपमानमात्रान्विततया तदनुपादाने तेषामप्यनुपादानात। अतो वाक्यसमासयोरेव तयोरप्यार्थ्येवेति द्विप्रकारा लुप्तोपमानोपमा।' अनुवाद-(इसका यह उदाहरण है)- जो समस्त इन्द्रियों का विषयान्तर वैमुख्य और उससे उत्पन्न परमानन्दवैभव- वितरण किसी सरस काव्य का हुआ करता है, उसके लेशमात्र के भी तुल्य न तो कहीं दिखायी देता है और न सुनायी पढ़ता है।' TH [ यहाँ उपमेय 'काव्य' साधारण धर्म 'सकलकरणपरविश्रान्तिश्रीवितरण' तथा वाक्यगत उपमावाचक तुल्यार्थकपद 'सदश' ये तो उपात्त हैं किन्तु उपमान का उपादान नहीं किया गया। इसलिये यहाँ वाक्यगा उपमानलुप्ता आर्थी उपमा हुई।] यही (उपमानलुप्ता आर्थी उपमा) यहाँ 'समासगा' हो जायगी यदि 'कव्वस्स'- (काव्यस्य)-के बदले 'कव्वसमम्'-'काव्यसमम्' और 'सरिसम्'-(सदशम्)-के बदले (समम् सौर सदृशम् की पुनरुक्ति हटाने के लिये) 'णूणम्'-नूनम्' कर दिया जाय। वह ळुप्तोपमा 'वा' इत्यादि उपमावाचक पदों के लोप में अर्थात् समास में, कर्मकारक से विहित क्यच् प्रत्यय के प्रयोग में, अधिकरण कारक से विहित क्यचू प्रत्यय के प्रयोग में, क्यङ् प्रत्यय के प्रयोग में, कर्मोपपदक 'णमुल' प्रत्यय के प्रयोग में और कर्तृकारकोपपदक 'णमुल' प्रत्यंय के प्रयोग में हुआ करती है।

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३४४ काव्यप्रकाश:

वाशब्दः उपमाद्योतक इति वादेरुपमाप्रतिपादकस्य लोपे षट् समासेन कर्मणोऽधिकरणाच्चोत्पन्नेन क्यचा कर्तुः क्यडा कर्मकर्त्रोरुपपद्योर्णमुला च भवेत्। उदाहरणम्- (समासगा वाचकलुप्ता धरपरार्थी उपमा ) तत: कुमुदनाथेनकामिनीगण्डपाण्डुना। नेत्रानन्देन चन्द्रेण माहेन्द्री दिगलंकृता। ४०१॥ तथा- (२ बहुपदसमासगा चाचकलुप्ता आर्थी उपमा ) असितभुजगभीषणासिपत्रो रुहरुहिकाहित चित्ततूर्णचारः। पुलकिततनुरुत्कपोलकान्तिः प्रतिभटविक्रमदर्शनेऽयमासीत् ॥४०२॥ टिप्पणी-त्राचक लुप्तोपमा का 'वाक्यगा' होना इसकिये असम्भव है क्योंकि ऐसे वाक्यों जैसे कि 'मुखं चन्द्रः काशते' इत्यादि में, जहां उपमावाचक पद लुप्त हैं, उपमा की प्रतीति की ही सम्मावना नहीं। साथ ही साथ इसका 'तद्धितगा' अथवा श्रौतो होना भी सवथा असंभव है क्योंकि 'इव' आदि पद और 'वति' प्रमृति तद्धित प्रत्यय ऐसे हैं जो औपम्य के प्रतिपादक हुआ करते हैं और यदि इनका प्रयोग किया गया तो उपमावाचक पद का लोप होना असंभव हो गया। इसलिये वाचकलुप्रोपमा 'समासगा' ही हो सकनी है और ६ प्रकार वालो ही है। यहाँ (कारिका में) जो 'वा' शब्द है वह उपमावाचक शब्द है। इसलिये 'वा' आदि उपमावाचक शब्दों के लुप्त रहने पर यह (वाचक लुप्ता) उपमा जो हुआ करती है वह ६ प्रकार की है जैसे कि (१) 'समास' में, (२) कर्मकारक से विहित 'क्यच्' में, (३) अधिकरण कारक से विहित 'क्यच' में, (४) कर्तृकारक से विहित 'क्यड' में, (५) कर्मोपपद 'णमुल' प्रत्यय के विधान में और (६) कत्रुपपद 'णमुल' प्रत्यय के प्रयोग में। इसके उदाहरण ये हैं- 'इसके बाद ही कामिनी-कपोल-पाण्डुर नेत्रों के आनन्द-दायक और कुमुदों के विकास करने वाले चन्द्रमा ने प्राची दिशा को सुशोभित कर दिया।' (महाभारत-द्राणपर्व- अध्याय १८४ ) [यहाँ 'कामिनीगण्डपाण्डु' में वाचकलुप्ता समासगा उपमा है क्योंकि 'कामिनीगण्ड इव, कामिनीगण्डवद्दा पाण्डुः' इस विग्रह-वाक्य में पाणिनि के सूत्र 'उपमानानि सामा- न्यवचनैः' से समास हो जाने पर समास के द्वारा ही उपमा की प्रतिपत्ति होने के कारण 'इव' आदि उपमाबोधक पदों का लोप हो गया है। इसे द्विपदसमासगा वाचकलुप्ता उपमा कह सकते हैं। ] 'अपने शत्रुओं के पराक्रम के दर्शन में यह (महावीर) राजा वस्तुतः कृष्णसर्प- भयक्कर-खड्ग-धारी, संहार की अभिलाषाओं से व्याकुल चित्त होने के कारण संग्राम में सर्चत्र सत्वर संचरण करने वाला, शौर्योद्रेक से रोमाज्जित शरीर किंवा क्रोध से लाल कपोल फलकों से भयावह लगने लगा।' [यहां जो वाचक लुप्ता उपमा है वह 'बहुपद समासगा' है क्योंकि 'असितभुजगः कृष्णसर्प हच भीषण: असि: खड्ग एव पत्रं यस्य' इस विग्रह वाक्य में उपमान 'असित भुजग', उपमेय 'असिपत्र' तथा साधारण धर्म 'भीषण' इन तीनों के समस्त पद बन जाने पर उपमावाचक पद 'इव' का लोप स्पष्ट दिखाई दे रहा है।]

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दशम उल्लास: ३४५

(३ कर्म कारक से विहित क्यच्, अधिकरण कारक से विहित क्यच् तथा कतृकारक से विहित क्यङ के प्रयोग में वाचकलुप्ता उपमा) पौरं सुतीयति जनं समरान्तरेऽसा- वन्तःपुरीयति विचित्रचरित्रचुञ्ुः । नारीयते समरसीम्नि कृपाणपाणे. रालोक्य तस्य चरितानि सपत्नसेना ।। ४०३ ।। (४ कर्मोपपदक तथा कर्तृकारकोपपदक 'णमुल' के प्रयोग में वाचकलुप्ता उपमा ) मृधे निदाघघर्माशुदर्श पश्यन्ति तं परे। स पुनः पार्थसंचारं संचरत्यवनीपतिः॥४०४॥ (द्विलुप्ता-धर्म + वाचकलुप्ता-उपमा के २ भेद) (१३१ ) एतद्विलोपे क्विप्समासगा ॥ ८९ ॥

'यह राजा बिचित्र चरित्र वाला है जो पौरजन को पुत्रवत् पालता है, समराङण में अन्तःपुर की भाँति विचरण करता है और जिस खड्गधारी के चरित्र को देखने वाली युद्ध में पड़ी शत्रुसेना स्त्री की भाँति डरती रहा करती है।' [यहाँ 'पौरं जनं सुतीयति में 'सुतीयति' पद ऐसा है जो 'सुतमिव आचरति पालयति' इस अर्थ का बोधक है और जहाँ 'उपमानादाचारे' इस पाणिनिसूत्र से उपमानवाचक कर्मभूत् 'सुत' पद से 'क्यच' प्रत्यय विहित होने से उपमाचक 'इव' पद का लोप हो गया है। इस प्रकार यहाँ कर्मपद से विहित क्यच् के प्रयोग में वाचकलुप्ता उपमा हुई। अब 'असौ समरान्तरेऽन्तःपुरीयति' में जो वाचकलुप्ता उपमा है वह 'अधिकरणाच्चेति वक्तव्यम्' इस वार्तिक-नियम के अनुसार अधिकरण-पद 'अन्तःपुर' से विहित (कयोंकि यहाँ अर्थ है-अन्तःपुरे इव आचरति स्वच्छन्दं विहरति) क्यच् प्रत्यय के प्रयोग में है। साथ ही साथ 'सपत्नसेना नारीयते' में जो वाचकलुप्ता उपमा है वह 'कर्तुः क्यङ् सलोपश्' इस पाणिनिसूत्र के अनुसार उपमानभूत कर्तृवाचक 'नारी' पद से आचार अर्थ में विहित (क्योंकि यहां अर्थ है-नारीव आचरति बिभेति) क्यङ् प्रत्यय के प्रयोग में हैं।] 'संग्राम में शत्रुगण तो उस राजा को ग्रीष्मकालीन सूर्य सा देखते हैं। वहां वह अर्जुन सा निर्भय विचरण किया करता है।' [यहाँ 'निदाघघर्माशुदर्श पश्यन्ति' में जो उपमा है वह है वाचकलुप्ता उपमा क्योंकि 'निदाघघर्माशुमिव पश्यन्ति' इस अर्थ में उपमानवाचक कर्मभूत 'निदाघघर्मांशुम' इस पद के उपपद रूप से हते 'दश्' धातु से भाव के अर्थ में 'उपमाने कर्मणि च' इस पाणिनि-सूत्र से णमुल प्रत्यय होने पर 'निदाघघर्मांशुदर्शम' पद निष्पन्न हुआ है जिसमें उपमान 'निदाघघर्मांशु' उपमेय 'राजा' तथा साधारणधर्म 'पश्यन्ति' दर्शन करना-ये तीनों तो विद्यमान हैं किन्तु उपमावाचक 'इव' पद लुप्त है। स.य ही 'पार्थसज्जारं सञ्चरति' में भी यही वाचकलुप्तोपमा दिखायी देती है क्योंकि 'पार्थ इव सञ्चरति' इस अर्थ में उपमानवाचक कर्तृभूत 'पार्थ' पद के उपपद होने पर 'सम्' उपसर्गपूर्वक, 'चर' धातु से भावमें 'णमुल' प्रत्यय के प्रयोग में जो 'पार्थसञ्जरण' पद बनता है उसमें उपमान 'पार्थ' उपमेय 'राजा' पथा साधारण धर्म 'सञ्जचरण' ये तो विद्यमान हैं किन्तु उपमावाचक 'इव' पद लुप्त है। ] वह ळुप्तोपमा जो इन दोनों अर्थात उपमावाचक तथा साधारण धर्म-के लोप में होती है दो प्रकार की है-१ली क्विप्गा और ररी समासगा।

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३४६ काव्यप्रकाश: M.s. एतयोर्द्धर्मवाद्योः। उदाहरणम्- ( १ क्विदूगा धर्मोपमावाचक लुप्ता उपमा ) सविता विधवति विधुरपि सवितरति तथा दिनन्ति यामिन्यः । यामिनयन्ति दिनानि च सुखदुःखवशीकृते मनसि ॥ ४०५॥ ( २ समासगा धर्मोपमावाचक लुप्ता उपमा ) परिपन्थिमनोराज्यशतैरपि दुराक्रमः । संपरायप्रवृत्तोऽसौ राजते राजकुञ्जरः॥ ४०६॥ (द्विलुप्ता-धर्मोपमानलुप्ता-उपमा के २ प्रकार) (१३२) धर्मोपमानयोलोंपे वृत्तौ वाक्ये च दृश्यते । टुण्टुण्णन्तो मरिहसि कण्टअकलिआइँ केअइवणाइं। मालइकुसुमसरिच्छं भमर ! भमन्तो ण पाविसिहि॥ ४८७॥ टिप्पणी-साधारण धर्म और उपमावाचक पद-इन दोनों का यदि उपादान न हो तो इस लुप्तोपमा अर्थात् धर्मोपमावाचक लुप्तोपमा का 'वाक्यगा' होना असम्भव है। क्योंकि 'मुखं-चन्द्रः' इस वाक्य में उपमेय और उपमान के होने पर भी उपमा की प्रतीति असम्भव है। इसका 'तद्धि- तगा' होना भी असम्भव ही है क्योंकि कल्पप प्रभृति जो तद्वित प्रत्यय हैं वे ही उपमा प्रतिपादक हैं और जब ये प्रयुक्त हुये तो धर्म+उपमावाचक लुप्तोपमा भी कैसे हो? यहाँ 'श्रीती' भेद भी नहीं हो सकता क्योंकि 'इवादि' रूप उपमा वाचक के लुप्त रहने पर इसे शौती कैसे कहा जाय? अन्ततो गत्वा यह द्विलुप्ता अर्थात् धमोपमावाचक लुप्ता उपमा केवल किपगा और समासगा दो ही प्रकार की हो सकेगी। अनुवाद-यहां 'एतयोः' का अभिप्राय है 'साधारण धर्म' और 'उपमावाचक पद' इन दोनों का। इसके उदाहरण ये हैं :- 'जब मन सुख और दुःख के वशीभूत हो तो कमशः सूर्य चन्द्रतुल्य लगता है और चन्द्र सूर्यतुल्य; रातें दिन के समान लगती हैं और दिन रातों के समान।' [ यहां 'विधवति', सवितरति', 'दिनन्ति' तथा 'यामिनयन्ति'-ये चारों पद ऐसे हैं जिनमें 'सर्वप्रातिपदिकेभ्यः क्विप वा वक्तव्यः' इस वार्तिकनियम के अनुसार उपमान- वाचक 'विधु' 'सविता', 'दिन' तथा 'यामिनी' इन कर्तृभूत प्रातिपदिकों से आचार अर्थ में (जैसे-विधवति विधुरिवाचरति-इत्यादि) कविप प्रत्यय प्रयुक्कत हैं और क्विप् प्रत्यय ऐसा है जो तुल्याचार रूढ साधारण धर्म का वाचक है। इस प्रत्यय का 'वेरपृक्तस्य' इस पाणिनि सूत्र से नित्य लोप हुआ करता है जिसके कारण यहां 'इव' पद के लोप के साथ-साथ साधारण धर्म-जैसे कि आह्लादकत्व इत्यादि लुप्त हा हैं। इसलिये यह लुप्तोपमा यहाँ क्विप्गा धर्म +वाचक लुपा कही जाया करती है। ] संग्राम में प्रवृत्त यह राजकुश्षर, (गजेन्द्रपराक्रम राजा ) जिसे शत्रुओं के असंख्य मनोरथ कभी भी नहीं पा सकते वस्तुतः बढ़ा सुन्दर लग रहा है। [ यहाँ जो लुप्तोपमा है वह समासगा धर्म+वाचक लुप्तोपमा है क्योंकि 'राजकुञ्जरः' (राजाडयं कुज्जर इव) पद ऐसा है जिसमें 'उपमितं व्याघ्रादिभिः समान्याSप्रयोगे' इस पाणिनि-सूत्र से साधारण धर्म के अप्रयोग में समास होने पर उपमावाचक 'इव' पद का भी लोप हो गया है। ] यह लुप्तोपमा जो कि-साधारण धर्म और उपमानवाचक पद के लुप्त रहने पर होती है, समास और वाक्य-इन दोनों में देखी जा सकती है।

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दशम उल्लास: ३४७

(टुण्टणायमानो मरिष्यति कण्टककलितानि केतकीवनानि। मालतीकुसुमसदृक्षं भ्रमर ! भ्रमन् न प्राप्स्यसि ॥ ४०७॥) कुसुमेण सममिति पाठे वाक्यगा। ( द्विलुप्ता-उपमेयोपमावाचकलुप्ता-उपमा का १ प्रकार) (१३३) क्यचि वाद्युपमेयासे। आसे-निरासे- अरातिविक्रमालोकविकस्वर विलोचनः । कृपाणोदग्रदोर्दण्डः स सहस्रायुधीयति॥४०८ ॥ अत्रात्मा उपमेयः । (त्रिलुप्ता-धर्मोपमानवाचक लुप्ता-उपमा का १ प्रकार) (१३४) त्रिलोपे च समासगा ॥ ९० ॥

इसका उदाहरण :- 'अरे भ्रमर ! काँटों से भरे केतकीवन में टुनटुनाते घूमते हुये तुम भर भले ही जाओ किन्तु मालती का सा फूल कहीं न पा सकोगे !' [यहां 'मालतीकुसुमसरिच्छम्'-मालतीकुसुमसदृत्तम् में जो लुप्तोपमा है वह है समासगा धर्मोपमानलुप्ता उपमा क्योंकि उपमेय 'मालती' और उपमावाचकपद 'सदत्त' ये दोनों तो विद्यमान हैं किन्तु उपमान (कोई अन्य पुष्प) तथा साधारण धर्म (सौरभ आदि) का लोप है। ] यहां ही यदि 'मालतीकुसमसरिच्छं' के बदले 'मालतीकुसुमेण समम्' कर दिय। जाय तो यही वाक्यगा (धर्मोपमानलुप्तोपमा) हो जायगी। यह लुप्तोपमा जो कि उपमेय तथा उपमावाचक पद के लोप में हुआ करती है क्यच् प्रत्यय के प्रयोग में देखी जा सकती है। यहाँ 'वाद्युपमेयासे' मे 'आसे' (असु क्षेपणे) का अर्थ है लोप होने अथवा अनुपादान का। ( उदाहरण के लिये)- 'कृपाण धारण करने के कारण भीषण भुजदण्ड किंवा शत्रुओं के पराक्रम के दर्शन में प्रसन्न-नेत्र वह (प्रतापी राजा) सहस्रायुध (कार्तवीर्य अर्जुन) की भाँति अपने आप को (संग्राम में) माना करता है।' यहाँ ('सहस्त्रायुधीयति'-सहस्रायुधं कार्तवीर्यमर्जुनगिव आत्मानमाचरति में) उपमेय (जो कि लुप् है) आत्म-पद है। [इस उदाहरण में उपमान 'सहस्रायुध' और साधारग धर्म 'आचरति'-दुर्जयं मन्यते दुर्जयमानिता-तो बिद्यमान हैं किन्तु उपमावाचक 'इव' तथा उपमेयभूत कर्मपद 'आत्मानम्' लुप् हैं जिसके कारण यह उपमेयोपमावाचकलुत्ता उपमा हुई। यहाँ 'उपमा- नादाचारे' इस पाणिनि सूत्र से उपमानवाचक 'सहस्रायुधम्' इस कर्मपद से आचार- तत्समान व्यवहाश-अर्थ में क्यच् प्रत्यय हुआ है। ] वह लुप्तोपमा जो तीन अर्थात् साधारण धर्म, उपमान और उपमावाचक पद के लोप में होती है 'समासगा' हुआ करती है। टिप्पणी-जब उपमा के तीन-तीन अंग जैसे कि साधारणधर्म उपमान-पद तथा उपमावाचक शब्द लुप्त हो जाँय तब वाक्य में अथवा तद्धित में तो यह लुप्तोपमा असम्भव ही है क्योंकि वहाँ औपम्य की प्रतीति ही नहीं हो सकती। किन्तु समास में औपम्य की प्रतीति होने से यह 'समासगा' अवश्य हो सकती है।

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३४८ काव्यप्रकाश:

त्रयाणां वादिधर्मोपमानानाम्। उदाहरणम्- तरुणिमनि कृतावलोकना ललितविलासवितीर्णविग्रहा। स्मरशरविसराचितान्तरा मृगनयना हरते मुनेर्मनः ॥४०६॥ अत्र सप्तम्युपमानेत्यादिना यदा समासलोपौ भवतस्तदेदमुदाहरणम्। (उपमेय + वाचक + धर्मलुप्तोपमा (प्रतीहारेन्दुराजमत) का खण्डन ) क्ररस्याचारस्यायःशूलतयाऽध्यवसायात् अयःशून्ेनान्विच्छति आयःशूलिक इत्यतिशयोचतन्न तु क्ररचारोपमेय-तैदण्यधर्म-वादीनां लोपे त्रिलोपेयमुपमा। उपमा के २५ भेद एवमेकोनविंशतिर्लुपा: पूर्णाभिः सह पञ्विंशतिः । अनयेनेव राज्यश्रीरदैन्येनेव मनस्विता। मम्लौ साऽथ तिषादेन पद्मिनीव हिमाम्भसा ॥ ४१० ॥ अनुवाद-यहाँ 'त्रयाणाम्' का अभिप्राय है-उपमावाचक पद, साधारण धर्म और उपमान-इन तीनों का। जैसे कि- 'अपने तारुण्य का अनुभव करने वाली, ललित हाव-भावों के लिये अपने अंग-प्रत्यङ्ग को समर्पित कर चुकने वाली और काम के बाणों से विद्ध हृदयवाली मृगनयना सुनि का भी मन चुरा ही लेती है।' यहाँ 'सप्तम्युपमानपूर्वपदस्य बहुचीहिरुत्तरपदलोपञ्न' इस कात्यायन-वार्तिक के अनुसार जब (मृगनयना में) समास तथा उत्तरपदलोप होंगे तब यह उदाहरण संगत समझा जायगा। ['मृगनयना' पद में यदि 'मृग' शब्द को लाक्षणिक मान कर मृग का अर्थ 'मृग- लोचन' समझा जाय तब (मृग इव नयने यस्या साः मृगनयना इस अभिप्राय में) यह उदाहरण संगत नहीं होगा क्योंकि यहां उपमानवाचक मृग पद तो विद्यमान ही है। इसलिये 'मृगलोचने इव (चज्जले) नयने यस्याः' इस अभिप्राय में यहाँ 'अनेकमन्यपदार्थे' इस पाणिनिसूत्र से सम्बद्ध 'सप्तम्युपमानपूर्वपदस्य बहुव्रीहिरुत्तरपदलोपश्च' इस कात्यायन-वार्तिक के अनुसार जब समास किया जायगा तब उपमानवाचक 'मृगलोचन' इस पूर्वपद के उत्तरपदभूत 'लोचन' शब्द का लोप और केवल उपमेयभूत 'नयन' का उपादान दोनों स्पष्ट प्रतीत होंगे। इसी नियमानुसार समास होने पर यहाँ 'उपमानवाचक 'लोचन' पद, साधारण धर्म 'चज्जलता' तथा उपमावाचक शब्द 'इव' के लोप में त्रिलुप्ता-धर्मोपमान वाचकलुप्ता-उपमा होगी। (आलक्कारिक प्रतीहारेन्दुराज के अनुसार) यहाँ यह मानना कि त्रिलुप्ता उपमा (जैसे उपमान और धर्म और वाचक शब्द-इन तीनों के लोप में हो सकती है वैसे ही) उपमेय, धर्म और वाचक शब्द के भी लोप में संभव है जैसे कि 'आयःशूलिकः' में जहाँ (अयःशूलदण्डाजिनाभ्याम् ठक्ठजौ ( पाणिनिसूत्र ५.२.७६) से ठक विधान है और 'अय:शूल' रूप उपमानमात्र तो शब्दतः उपात्त है किन्तु) 'क्रराचरण' रूप उपमेय, तीचणत्वादिरूप साधारणधर्म और 'इवादि' रूप उपमावाचक तीनों लुप्त हैं, वस्तुतः युक्तिसंगत नहीं क्योंकि 'आयःशूलिकः' में (उपमानोपमेय भाव की प्रतीति कहां ? यहाँ) तो 'क्रूराचरण' का 'अयःशूल' से सर्वथा तादात्म्य-स्थापन और स्वरूप-निगरण है जो कि 'अतिशयोक्ति' का विषय है (न कि उपमा का)। इस प्रकार 'पूर्णोपमा' के ६ भेदों के साथ 'लुप्तोपमा' के १९ भेदों को मिला देने से उपमा के २५ भेद हुये।

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दशम उल्लास: ३४६ 3 टिप्पणी-(क) अलंकार शास्त्र में 'सादृश्य' (मरतमुनि और दण्डी), 'साम्य' (भामह, वामन तथा रुद्रट-'समानगुणादि'= साम्य) तथा 'साध्म्य' (उद्भट, रुय्यक और मम्मट) इन तीन शब्दों द्वारा औपम्य के अभिप्राय प्रकाशन की परम्परा रही है। दण्डी के 'सादृश्य' और मामह के 'साम्य' के बदले मम्मट ने 'साधर्म्य' का प्रयोग उद्भट की उपमा-मीमांसा की दृष्टि से किया है। भामह की उपमा-परिभाषा तो यह थी- 'विरुद्ेनोपमानेन देशकालक्रियादिभिः। उपमेयस्य यत्साम्यं गुणलेशेन सोपमा ।I'

और 'उद्धट' की उपमा-समीक्षा थी यह- (काव्यालंकार २.३०)

'यच्चेतोहारि साधर्म्यमुपमानोपमेययोः । मिथोविभिन्नकालादि शब्दयोरुपमा तु तत्।।' मम्मट ने इन दोनों का सार अपने 'साध्म्यमुपमाभेदे' इस उपमा-लक्षण में संचित ओर सुरक्षित किया। मम्मट के 'भेदे' इस एक शब्द में भामह के 'देशकालक्रियादि-विरोध' और उद्ट के 'मिथोविभिन्नकालादि वाच्यत्व' इन दोनों अमिप्रायों का समन्वय स्पष्टतया प्रतीत होता है। इस प्रकार मम्मट की उपमा-परिभाषा जितनी संक्षिप्त है उतनी सारगर्भित भी। 'साध्म्यमुपमाभेदे' इन तीन शब्दों में उपमा का वास्तविक स्वरूप झलक उठता है। (ख) मम्मट के उपमा-प्रकार-निरूषण पर उद्भट का प्रभाव स्पष्ट दिखायी देता है। उद्भट के अनुसार उपमा का श्रेणी-विभाग यह है :- उपमा -

पूर्णोपमा (पञ्चविधा) लुप्तोपमा (द्वादशविधा)

वाक्यावसेया समासावसेया तद्धितावसेया 1

१ श्रीती २ आर्थी ३ आर्थी ४ श्रीती ५ आर्थी - १ वाक्यावसेया समासावसेया सुब्धातुप्रत्ययावसेया कृदवसेया १२ तद्धितावसेया - 1

एकलोपा ४ द्वितयलोपा ५ त्रितयलोपा १० कर्मोप- ११ कत्रुप- 1

भानिका मानिका 1 २ धर्म- ३ वाचक- क्यजवसेया ८ क्यङवसेया ९ क्विबवसेया लुप्ता लुप्ता (क्रुंपमोनिका )

६ कर्मोपमानिका ७ अधिकर णोपमानिका किन्तु मम्मट ने 'उपमा' का विभाग इस प्रकार किया है :- उपमा (पूर्णोपमा-षडविधा) :-

श्रीती आर्थी - 1 1 1 - १ वाक्यगा २ समासगा ३ तद्धितगा ४ वाक्यगा ५ समासगा तद्धितगा

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३५०

तथा लुप्तोपमा-( एकोनविशतिविधा) - -

एकलुप्ता द्विलुप्ता त्रिलुप्ता

धमलुप्ता धर्मोपमान-

उपमानलुप्ता वाचकलुप्ता धर्मवाचकलुप्ता धर्मो पमानलुप्ता धर्मो पमेयलुप्ता वाचव लुता 3

  • 1 1 1 १९ समास

  • (आर्थी)

वाक्यगा समासग। तद्धितगा ६ वाक्यगा ७ समासगा १८ क्यजगा समासगा १६ वाक्यगा समासया (आर्थी) काव्यप्रकाश:

(आर्थी) किबगा

1 X (आर्थी) १४ (आर्थी) १५ (आर्थी)

१ श्रौती २ आर्थी ३ श्रीती ४ आर्थी | ५ आर्थी (आर्थी) १७ (आर्थी)

८ समासगा (आर्थी) 1 सुब्धातुप्रत्ययगा 1

  • क्यजगा क्यङ्षा णमुलगा

1 1

११ वतुंयपदक्यज्ञा (आर्थी)

९ कर्मोपपद- १० अधिकरणोपपद- १२ कर्मोपपद-

क्यजगा (आर्थी) १३ कर्त्रु पद-

क्यजगा (आर्थी) णमुलगा (आर्थी) णमुलगा (आर्थी)

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दशम उल्लास: ३५१

इत्यभिन्ने साधारणे धर्मे। ज्योत्स्नेव नयनानन्दः सुरेव मदकारणम्। प्रभुतेव समाकृष्टसर्वलोका नितम्बिनी ॥ ४११॥ इति भिन्ने च तस्मिन् एकस्यैव बहूपमानोपादाने मालोपमा। मम्मट के उपमाविभाग से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि इन्हें उद्भट की उपमा-विभाजन प्रणाली मान्य है। 'उद्भट' के उपमा-विभाग से मम्मट के उपमा-विभाग में जो भेद है वह यह है :- उभ्भटसम्मत उपमा-विभाग मम्मटसम्मत उपमा-विभाग १ प्रतीहारेन्दुराज की समीक्षा में उद्भट के १ मम्मट के अनुसार 'पूर्णोपमा' के ६ प्रकार अनुसार 'पूर्णोपमा' के ५ प्रकार हैं क्योंकि हैं। मम्मट के अनुसार पूर्णोपमा के 'समा- 'समासगा' पूर्णोपमा में 'श्रौती'-भेद नहीं हो सगा-भेद' में श्रीती और आर्थी दोनों रूप सकता। राजानक तिलक की समीक्षा में संभव है। उद्भट के अनुसार भी पूर्णोपमा के ६ ही भेद हैं। २ उद्भट के अनुसार लुप्तोपमा १२ प्रकार की २ मम्मट के अनुसार लुप्तोपमा १९ प्रकार है जैसा कि प्रतीहारेदुरान का मत है। किन्तु को है। राजानक तिलक के अनुसार उद्भटमत में लुप्तोपमा १५ प्रकार की है। (ग) मम्मट ने उद्भट की ही माँति 'पूर्णोपमा' और 'लुप्तोपमा' के विभाग में व्याकरण- सम्बन्धी व्युत्पत्ति का प्रदर्शन किया है। उद्भट के लिये तो ऐसा करना ठीक भो कहा जा सकता है क्योंकि वे अलंकार-वाद के समर्थक थे, किन्तु ध्वनि-वाद के महान् समर्थक होने पर भी मम्मट ने ऐसा क्यों किया ? समझ में नहीं आता। ऐसा प्रतीत होता है कि अलंकारवादी आचार्य उद्भट के उपमा निरूपण का ही परिष्कार मम्मट ने यहाँ उचित समझा और इसलिये उद्मट के ही निर्दिष्ट उपमा प्रकारों की संख्या को १७ या २१ से २५ कर दिया। मम्मट की की हुई उपमा की भेद-संख्या-वृद्धि इस दृष्टि से तो सर्वथा युक्तिसंगत है कि इसमें संस्कृत काव्य- साहित्य की उपमाओं के वैचित्रय का एक वैज्ञानिक वर्गीकरण सम्पन्न हो जाता है। मम्मट ने अलंकार की दृष्टि से संभवतः उपमा का भेद-प्रभेद निरूपण इसलिये नहीं किया कि या तो ऐसा किया ही नहीं जा सकता क्यों कि ऐसा करने से अनेकों अर्थालंकार उपमा के भेद-रूप में अन्तर्भूत हो जायेंगे या ऐसा करने से उपमा-योजना की संस्कृतमाषा संबन्धी विशेषताओं का पता नहीं चल पायेगा। अनुवाद-ऐसे संदर्भ जैसे कि- 'विरह व्यथा के कारण वह (नायिका) इस प्रकार मुरझाई हुई है जिस प्रकार अनीति के कारण राज्यश्री, दीनता के कारण मनस्विता और हिमजलवर्षा के कारण पग्मिनी (सुरझ्ा जाय)।' इत्यादि में, जहाँ एक ही साधारण धर्म (म्लानता) का उपादान है, अथवा ऐसे संदर्भ जैसे कि- 'यह नितम्बिनी चन्द्र-चन्द्रिका की भाँति नेत्रों को आनन्दित करने वाली, मदिरा की भाँति उन्मत्त बनाने वाली और प्रभुता की भांति सब को वश में रखने वाली है।' इत्यादि में। जहाँ भिन्न २ साधारण धर्म उपात्त हैं एक और प्रकार की उपमा हो सकती है जिसे, एक ही उपमेय के लिये अनेक उपमानों के (सजातीय और विजातीय पुष्पों के से) गुम्फन के कारण 'मालोपमा' कहा गया है और इसी प्रकार ऐसे संदर्भ, जैसे कि-

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३५२ काव्यप्रकाश: यथोत्तरमुपमेयस्योपमांनत्वे पूर्ववदभिन्नाभिन्नधर्मत्वे- अनवरतकनकवितरणजललवभृतकरतरङ्गितार्थिततेः। भणितिरिव मतिर्मतिरिव चेष्टा चेष्टेव कीर्तिरतिविमला॥४१२॥ मतिरिव मूर्त्तिर्मधुरा मृर्त्तिरिव सभा प्रभावचिता। तस्य सभेव जयश्रीः शक्या जेतुं नृपस्य न परेषाम् ॥ ४१३॥ इत्यादिका रशनोपमा चन लक्षिता एवंविधवैचित्रयसह स्रसंभवात् उक्त भेदानतिक्रमाच्च। (२ अरनन्वय अरप्र ल द्व् ा रा. ) (१३५) उपमानोपमेयत्वे एकस्यैवैकवाक्यगे। 'निरन्तर स्वर्ण-दान के लिये हाथ में रखे संकल्प-जल की बूँदों से याचकों को उद्वे- ल्लित-उच्छूसित करनेवाले (महादानी) इस राजा की बुद्धि इसकी वाणी जैसी; चेष्टा इसकी बुद्धि जैसी और कीर्ति इसकी चेष्टा जैसी विमल है। और साथ ही साथ इसकी मूर्ति ऐसी मधुर है जैसी इसकी मति (बुद्धि), इसकी सभा ऐसी प्रभावशालिनी है जैसी इसकी मूर्ति और इसकी जयश्री-वह तो इसकी सभा की ही भांति शत्रुओं के लिये अजेय है' इत्यादि में, जहां मालोपमा की ही भांति अभिन्न किं वा भिन्न २ साधारण धर्म का उपादान है किन्तु जिसमें पूर्व-पूर्ववर्त्ती उपमेय उत्तरोत्तर (जैसे रशना-करधनी की एक किंकिणी और दूसरी किंकिणी में क्रमशः पूर्वापर सम्बन्ध चलता रहता है वैसे ही) उपमान के रूप में जुड़े दिखाई देते हैं, एक ऐसी भी उपमा संभव है जिसे 'रशनोपमा' कहा गया है, किन्तु इन दोनों का और ऐसे ही अन्यान्य संभाव्य उपमा-प्रकारों का यहाँ निरूपण इसलिये अभिप्रेत नहीं क्योंकि सब से पहले तो ये पूर्वोक्त उपमा-प्रकारों में ही यथासंभव अन्तर्भूत हैं और साथ ही साथ यहां यह भी बात है कि इस प्रकार के विचित्र उपमा-बन्ध की कोई इयत्ता ही नहीं हो सकती। टिप्पणी-उपमा के प्रकार-निरूपण में मम्मट ने आचार्य भामह की सी दृष्टि रखी है। 'माला', 'शना' आदि के गुम्फनवैचित्र्य के आधार पर उपमा के विचित्र २ बन्धों की न तो कोई इयत्ता है और न इनमें उपमा के सामान्य अभिप्राय से अतिरिक्त कोई अन्य विशेषता है-इसलिये 'मालोपमा' 'रशनोपमा' आदि २ उपमा-प्रकारों का विवेचन और विश्लेषण, निरर्थक प्रयास मात्र मानकर, मम्मट ने नहीं किया है। भामह की भी यही धारणा रही है जैसा कि इस पंक्ति अर्थात्- 'मालोपमादि: सर्वोऽपि न ज्यायान् विस्तरो मुधा।' (काव्यालङ्वार २. ३८) में स्पष्ट ह। उद्भट न भा 'मालोपमा' आदि का निरूपण इसालिये नहीं किया। उपमा के बन्ध- वैचित्र्य क आधार पर तो उपमा-विभाग सर्वप्रथम दण्डी का ही उपलब्ध होता है। आचार्य दण्डी ने धर्मोपमा, वस्तूपमा, विपर्यासोपमा, नियमोपमा, अनियमोपमा, अतिशयोपमा, उत्प्रेक्षितोपमा, मोहोपमा, चटूपमा आदि अनेकानेक उपमा-भेदों का विवेचन किया है। मम्मट की दृष्टि में 'उपमा-चक्र' का ऐसा वर्णन इसलिये युक्तियुक्त नहीं कि इसमें उपमा के मूलभूत सिद्धान्त के आधार पर उपमालक्वार का कक्षा-विभाग नहीं देखा जा सकता। अनुवाद-'अनन्वय' वह अलक्कार है जिसमें एक ही वस्तु एक ही (औपम्यप्रति- पादक) वाक्य में उपमान और उपमेय दोनों रूपों में प्रतीत होती है। टिप्पणी-'अनन्वय' का शब्दार्थ है-'न विद्यतेऽन्वयः सम्बन्धोडर्थादुपमानान्तरेण यत्र सोड- नन्वयः' अर्थात् किसी उपमेय का अपने से भिन्न किसी उपमान से साधारणधर्मतारूप सम्बन्ध का न रखना। अभिप्राय यह है कि किसी प्रकार के भेद के अभाव में भी भेदकमूलक सादृश्य का उपचार करक जहाँ एक ही धर्मीं (वस्तु) में उपमानोपमेय भाव प्रतिपादित किया जाय जिससे

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दशम उल्लास: ३५३

अनन्वयः । एपमानान्तरसम्बन्धाभावोऽनन्वयः । उदाहरणम्- न केवलं भाति नितान्तकान्तिर्नितम्बिनी सैव नितम्बिनीव। यावद्विलासायुधलास्यवासास्ते तद्विलासा इव तद्विलासाः ॥४१४॥ ( ३ उपमेयोपमा अरप्रा लंका र ) (१३६) विपर्यास उपमेयोपमा तयोः । तयोरुपमानोपमेययोः परिवृत्तिः अर्थाद्वाक्यद्वये इतरोपमानव्यवच्छेदपरा उपमे येनोपमा इति उपमेयोपमा।

यह प्रतीत हो कि उसके सदृश अन्य कोई वस्तु नहीं और न उसका अन्यत्र कोई साधर्म्य है तो वहाँ जो अलक्कार होता है वह 'अनन्वय' है। निष्कर्ष यह निकला कि 'स्वेन स्वस्योपमाऽनन्वयः' अर्थात् अपने से ही अपनी उपमा रखना, 'अनन्वय' है। 'अन्वय' कहते हैं सम्बन्ध को। और अनन्वय ! 'यत्र अन्वयः उपमानान्तरसम्बन्धी नास्ति स अनन्वयः'। अर्थात् जहां अपने से भिन्न किसी उपमान से साधर्म्य स्थापित न किया जाय वहां 'अनन्वय' अलक्कार है। 'उपमा' का सौन्दर्य तो साम्य की प्रतीति में है किन्तु 'अनन्वय' का भी एक वैचित्र्य है और वह है अन्य उपमानों से साधर्म्य-संबन्ध के व्यवच्छेद में। 'अनन्वय' होने के लिए यह आवश्यक है कि उपमानरूप पद भी एक दी हो, भिन्न नहीं, क्यों कि 'अस्याः वदनमिवास्याः वक्त्रम्' इसका मुख इसके मुह की भांति है- अनन्वय नहीं। इसीलिये काव्यप्रकाश के एक व्याख्याकार (चक्रवर्ति भट्टाचार्य) ने कहा है- 'एवकारेण भिन्नशब्द बोध्यत्वव्यवच्छेदः शब्दतोरऽर्थतश्चैकत्वस्य विवक्षितत्वात्।' यदि 'शब्दभेद' कर दिया जाय तो कहीं 'अर्थभेद' के अवभास की संभावना न हो जाय इसलिये 'अनन्वय' में उपमेय और उपमानवाचक पद अभिन्न रखे जाते हैं। 'उपमा' में उपमान और उपमेय का वास्तविक भेद और अनन्यय में आहार्य भेद होने से दोनों का चमत्कार पृथक पृथक है। अनुवाद-'अनन्वय' (शब्द) का अभिप्राय है (उपमेय का) अपने से भिन्न किसी उपमान के साथ साधम्य-सम्बन्ध का न रखना। जैसे कि :- 'परम सुन्दरी यह नितम्बिनी इसी नितम्बिनी की (अपनी ही) भांति सुन्दर नहीं लगती अपि तु काम-केलि के आवास इसके विलास भी इसी के विलास सरीखे हैं।' [यहां 'वह नितम्बिनी अपने ही समान है और उसके हाव-भाव भी उसी के हाव- भाव के समान हैं' यह प्रतीति 'अनन्वय'-उपमानान्तरसम्बन्धाभाव-की प्रतीति है जिसके कारण यहां 'अनन्वय' अलङ्कार है। ] 'उपमेयोपमा' वह अलंकार है जहां दोनों (अर्थात् उपमान और उपमेय) की परस्पर परिवृत्ति प्रतिपादित की जाय (अर्थात् जहां 'उपमान' और 'उपमेय' उपमेय और उपमान बनते दिख़ाई दें। यहां 'दोनों' का अभिप्राय है 'उपमान' और 'उपमेय' का। (विपर्यास का अर्थ है) परिवृत्ति अथवा परिवर्तन (उपमानोपमेयभाव का उपमेयोपमानभाव के रूप में बदलना) जो कि तभी सम्भव है जब दो वाक्य में उपमाबन्ध हो (क्योंकि एक वाक्य में परिवर्तन की सम्भावना नहीं)। इस प्रकार 'उपमेयोपमा' का अभिप्राय हुआ उपमेय के द्वारा उपमा, जिसका अभिप्राय है किसी एक उपमान के अतिरिक्त अन्य उपमानों का व्यवच्छेद। जैसे कि :- २३ का०

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३५४ काव्यप्रकाश:

उदाहरणम्- कमलेव मतिर्मतिरिव कमला तनुरिव विभा विभेव तनुः। धरणीव घृतिर्धृतिरिव धरणी सततं विभाति बत यस्य ।। ४१५॥ ( ४ उत्प्रेक्षा अलंकार) (१३७) संभावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत् । समेन उपमानेन। उदाहरणम्- उन्मेषं यो मम न सहते जातिवैरी निशाया- मिन्दोरिन्दीवरदलदृशा तस्य सौन्दर्यदर्पः। नीतः शान्ति प्रसभमनया वक्त्रकान्त्येति हर्षा- ल्लग्ना मन्ये ललिततनु ! ते पादयोः पद्मलक्ष्मीः ॥४१६॥ 'कैसी विचित्र बात है कि इस (राजा) की बुद्धि इसकी लच्मी की भांति, लक्ष्मी बुद्धि की भांति, शोभा रूप-रेखा की भांति, रूप-रेखा शोभा की भांति, धति धरणी की भांति और धरणी ति की भांति निरन्तर विराजती रहा करती है।' टिप्पणी-यहां यह शंका हो सकती है कि जब काव्यप्रकाशकार ने उपमा के मूलभूत सिद्धान्त के आधार पर ही उपमाप्रवारों का निरूपण अभिप्रेत समझा जिससे 'मालोपमा' 'रशनोपमा' आदि अगणित उपमा-बन्धों की पृथक गणना अनावश्यक हो गयी तब 'उपमेयोपमा' को 'उपमा' से पृथक अलंकार क्यों मान लिया ? किन्तु इसका समाधान यह है कि 'उपमेयोपमा' में उपमानान्तर (उपमेयभिन्न अन्य उपमान) का जो तिरस्कार रहा करता है वह 'उपमा' से, जहां दो भिन्न वस्तुओं में उपमानोपनेयभाव विवक्षित है, एक विलक्षण ही चमत्कार है। मम्मट ने जैसे उपमा से 'अनन्वय' को पृथक माना क्योंकि इसे 'अनन्वयोपमा' मान कर, जैसा कि रुद्रट ने माना है, 'उपम।' में इसलिये समाविष्ट नहों किया जा सकता क्योंकि जहाँ 'उपमा' के लिये उपमेय से भिन्न उपमान के रहने पर ही औषम्य प्रतीति अपेक्षित हो वहा 'अनन्वय' में एक ही वस्तु में उपमानोपमेयभाव रहे, वैसे ही उन्होंने 'उपमा' से 'अमेयोपमा' को एक पृथक वाच्य-सौन्दर्य माना और अतिरिन् अलंकार के रूप में स्वीकार लिया। अनुवाद-'उत्प्रेक्षा' वह अलंकार है जिसे प्रकृत (उपमेय) की उसके समान (अप्रकृत) उपमान-के साथ तादात्य-सम्भावना कहा करते हैं। यहां 'समेन' (संभावनम्) का अभिप्राय है 'उपमानेन' उपमान के साथ (एक- रूपता की संभावना) का। जैसे कि :- १. 'अरी सुन्दरी! प्रतीत तो ऐसा होता है कि कमल की सुन्दरता इसलिये प्रसन्नता पूर्वक तुम्हारे पैरों में आ विराजी है कि इन्दीवरनयनी तुम्हीं ऐसी रही जिसने अपनी मुखशोभा से बलारकारपूर्वक उस चन्द्रमा का सौन्दर्य दर्प चूर कर दिया जो कि रात में उस (कमल की सुन्दरता) का सहज शत्रु बना उस (कमल-शोभा) के उल्लास को सहन नहीं कर सकता रहा।' [यहां नायिका के चरणों में स्वभावतः लिपटी पझमशोभा तो प्रकृत (उपमेयरूप) है और इसकी तादात्म्य-संभावना जिससे की गयी है वह है उस नायिका की मुख-शोभा से चन्द्रमा के सौन्दर्य-दर्प के दमन किये जाने के कारण प्रसन्नतापूर्वक उस (नायिका) के परों में लिपटने वाली पझम-शोभा। 'प्रदीपकार' ने इसीलिये कहा है-'अन्न पद्म- लच्म्या: कामिनीचरणयोः स्वभावलग्नत्वं यथोक्तहर्षहेतुकलग्नत्वतादात्म्येन संभावित-

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दशम उल्लास: ३५५

लिम्पतीव तमोऽङ्गानि वर्षतीवाञ्जनं नभः । असत्पुरुषसेवेव दृष्टिर्विफलतां गता॥ ४६७ ॥ इत्यादौ व्यापनादिलेपनादिरूपतया संभावितम्। (५ ससन्देह अलंकार ) (१३८) ससन्देहस्तु भेदोक्तौ तदनुक्तौ च संशयः ॥९२ ॥ भेदोक्तौ यथा- अयं मार्तण्ड: किं? स खलु तुरगैः सप्तभिरितः कृशानुः किं सर्वाः प्रसरति दिशो नैष नियतम्। कृतान्तः कि? साक्षान्महिषवहनोऽसाविति चिरं समालोक्याजौ त्वां विद्धति विकल्पान्प्रतिभटाः ॥४१८॥ २. 'ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे अँधेरा अंग-अंग में लेप लगा रहा हो, आकाश काजल बरसा रहा हो और आँखें दुष्ट-सेवा की भांति व्यर्थ हो गयी हों।' यहां पर (उपमेयभूत) अन्धकार के प्रसार की (उपमानभूत) लेपन-अञ्जन-वर्षण आदि के साथ एकरूपता की संभावना की गयी है। टिप्पणी-(क) आचार्यमम्मट ने अपने उत्प्रेक्षा लक्षण में भामह के इस उत्प्रेक्षा-निरूपण अर्थान्- 'अविवच्ित सामान्या किञ्ञिच्चोपमया सह। अतद् गुणक्रिया योगादुत्प्रेक्षाऽतिशयान्विता ॥' (काव्यालंकार २. ९० ) और उद्भट के इस उत्प्रेक्षा-समीक्षण अर्थत्- 'साम्य रूपा विवक्ायां वाच्येवाद्यात्मभिः पदैः। अतद्गुणक्रियायोगादुतप्रेक्षाSतिशयान्विता।। लोकातिक्रान्तविषया भावाभावाभिमानतः । संभावनेयमुत्प्रेक्षा .... '॥'

का एक सुन्दर संक्षेप किया है। (काव्यालंकारसारसंग्रह ३.३ -४)

(ख) मग्मट को रय्यक-संमत उत्प्रेक्षा प्रकार निरूपण अभीष्ट नहीं। रुव्यक ने तो उत्प्रेक्षा के भेद-प्रभेदों को अनन्त कह कर छोड़ा है-'एषा गतिर्वाच्योतेक्षायाः।".अतश्चोक्तवच्य- माणप्रकारवैचित्रयेणानन्त्यमस्याः।' (अलंकारसवस्व्र ७२-७३ पृष्ठ) किन्तु मम्मट ने 'सम्भावन' अथवा 'उत्प्रेक्षण' के असीम वैचित्र्य की दृष्टि से उत्प्रेक्षा के वर्गीकरण को अनावश्यक समझा है। अनुवाद-'ससंदेह' अलंकार वह है जिसमें (उपमेय की उपमान के साथ एकरूपता में) एक (सादृश्यमूलक) संशय अथवा संदेह रहा करता है जो कि 'भेदोकि' (उपमेय और उपमान में किसी वैधर्म्य के स्पष्ट कथन ) और 'भेदानुक्ति' (उपमेय और उपमान में किसी वैधर्म्य के अकथन) दोनों प्रकार से संभव है। टिप्पणी-यद्यपि 'उत्प्रक्षा' अथवा संभावना भी एक प्रकार की संशयात्मक प्रतीति ही है किन्तु 'उत्प्रेक्षा' और 'ससंदेह' पृथ्क अलंकार हैं। कारण यह है कि 'उत्प्रेक्षा' में तो संमावना का पलड़ा एक पक्ष में (उपमेय की उपमानरूपता-प्रतीति में) भारी रहा करता है। किन्तु 'ससंदेह' में उपमेय और उपमान की परस्पर तादात्म्य-प्रतीति के दोनों पलड़े बराबर रहा करते हैं। इसीलिये कहा गया है-'संशयश्चात्र समकोटिको ग्राह्यः इत्युत्प्रेक्षाव्युदास:।' 'प्रकृत' और 'अप्रकृत' में ऐकरूप्य की संदिग्ध प्रतीति कविप्रतिमोत्थापित हो होनी चाहिये अन्यथा 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' भी 'ससंदेह' अलङ्कार हो जायगा। अनुवाद-जहाँ भेद (वैधर्म्यं) की उक्ति हो (वहाँ ससंदेह). जैसे कि- 'क्या यह सूर्य तो नहीं? किन्तु उसके रथ में तो सात घोड़े जुते रहते हैं! क्या यह अझनि तो नहीं? किन्तु वह तो सर्वत्र एक साथ व्याप्त नहीं। तब क्या यह कृतान्त रहा?

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३५६ काव्यप्रकाश:

भेदोक्तावित्यनेन न केवलमयं निश्चयगर्भो यावन्निश्च्यान्तोऽपि सन्देहः स्वीकृतः । तथा- इन्दुः किं क् कलङ्कः सरसिजमेतत्किमम्बु कुत्र गतम्। ललितसविलासवचनैमुखमिति हरिणाक्षि! निश्चितं परतः ॥४१६॥ किन्तु निश्चयगर्भ इव नात्र निश्चयः प्रतीयमान इति उपेक्षितो भट्टो्वटेन। तदनुक्तौ तथा- अस्या: सगविधौ प्रजापतिरभूच्चन्द्रो नु कान्तिप्रदः शृङ्गारकरसः स्वयं नु मदनो मासो नु पुष्पाकरः! किन्तु वह तो महिषवाहन है! इस प्रकार, हे महाराज! आपके शत्र-सैनिक आपको संग्राम में देख-देख कर संकल्प-विकल्प किया करते हैं।' [यहां 'क्या यह सूर्य है या कुछ और ?' यह है संशयात्मक प्रतीति का स्वरूप। प्रकृत (उपमेय-राजा) और सम (उपमान-सूर्य) की इस संदिग्ध तादात्म्य-प्रतीति का जो मूलकारण है वह है प्रताप की दुर्निरीच्यता। इसी प्रकार 'क्या यह अग्नि है या अन्य कोई वस्तु?' 'यमराज है या और कोई !' इन संशयात्मक प्रतीतियों में जो मूलहेतु है वह है दुराधर्षता और सर्वसंहारिता। साथ ही साथ यहां भेद की भी उक्ति है क्योंकि 'सात घोड़े के रथ का होना' इत्यादि उपमानभूत सूर्य की तो विशेषता है किन्तु उपमेयभूत राजा की नहीं। ] 'भेद-वैधर्म्य-की उक्ति में' (संशय के होने) का अभिप्राय यह है कि यह (ससंदेह- प्रकार) केवल निश्चय गर्भ नहीं (जैसा कि उपर्युक्त उदाहरण-'अयं मार्तण्डः किम्' आदि में स्पष्ट है जहां उपमेय-राजा-का पहले सूर्य-रूप उपमान से वैधम्य प्रद्शित करके भी बाद में कृशानुरूप उपमान के साथ तादात्म्य-संशय किया गया है) अपितु निश्चयान्त भी हुआ करता है जैसे कि- 'क्या यह चन्द्रमा तो नहीं? किन्तु इससें कलङ्क कहाँ ! तब क्या यह कमल रहा? किन्तु फिर जल कहां चला गया! इस प्रकार अन्त में कहीं, अरी मृगनयनी! तुम्हारे मधुर विलास-पूर्ण वचनों से यह निश्चय हो पाया कि यह तुम्हारा मुख है।' [ यहां जो 'ससंदेह' अलंकार है वह निश्चयान्त है क्योंकि चन्द्र और कमलरूप उपमानों से, ललित सविलास वचन के कारण, वैधर्म्य के दर्शन के हो चुकने पर, मुख का अन्य किसी उपमान से तादात््य-संदेह नहीं किया गया है।] किन्तु इस (निश्चयान्त ससंदेह-प्रकार) को भट्ट उद्भट ने नहीं माना क्योंकि 'निश्चय- गर्भ' में निश्चय के व्यङ्गय होने से जो चमत्कार है वह यहां (निश्चयान्त में, जहाँ निश्चय वाच्य रहा करता है जैसे कि 'इन्दुः किं क्व कलङ्गः' इत्यादि में) नहीं प्रतीत हुआ करता। किन्तु वस्तुतः बात यह है कि इसे भी 'ससंदेह' का प्रकार मानना कोई अनुचित नहीं क्योंकि निश्चय भले ही वाच्य हो कविप्रतिभा तो वैधर्म्यं बता कर भी साधर्म्य संशय यहां कर ही रही है। भेद-वैधर्म्य-की अनुक्ति में (ससंदेह) जैसे कि :- 'क्या इस सुन्दरी (उर्वशी) की सृष्टि का प्रजापति कान्तिदायक चन्द्रमा है? अथवा साक्षात् शङ्गारमय कामदेव है? या मधुमास है? क्योंकि वेदाभ्यास के कारण कुण्ठितबुद्धि, संसार के सुन्दर विषयों में निरुत्सुक तथा एक मात्र मननरत बुड्ढे ब्रह्मा का सामर्थ्य कहां जो इस मनोहर रूप को रच दे!'

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दशम उल्लास: ३५७

वेदाभ्यासजड: कथन्नु विषयव्यावृत्तकौतूहलो निर्मातुं प्रभवेन्मनोहरमिदं रूपं पुराणो मुनिः ॥४२० ॥ ( ६ रूपक अलंकार) (१३९) तदूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः। अतिसाम्यादनपहुतभेदयोरभेदः।

[ कालिदास के 'विक्रमोर्वशीयम्' की इस उक्ति में जो 'ससंदेह' अलंकार है उसमें उपमेय-प्रजापति का उपमान चन्द्र आदि से वैधर्म्य प्रतिपादित नहीं। यहाँ उपमेय की उपमानरूपता की प्रतीति में जो कविप्रतिभोत्थापित संशय है उसका स्वरूप यह है- सृष्टिकर्ता चतुर्मुख ब्रह्मा तो वेदाभ्यास जड़ रहे, वे भला उर्वशी की सृष्टि कैसे कर सकें! तब उर्वशी का सृष्टिकर्ता कौन ? क्या चन्द्रमा? क्या मदन ? अथवा क्या वसन्त ?] टिप्पणी-(क) मम्मट ने इस 'ससंदेह' अलंकार का 'ससंदेह' नाम भामह और उद्मट का अनुसरण करते हुये माना है। रुद्रट के अनुसार इस अलंकार का नाम 'संशय' है जैसा कि इस उक्ति अर्थात्- 'वस्तुनि यत्रैकस्मिन्ननेकविषयस्तु भवति संदहः। प्रतिपत्तुः सादृश्यादनिश्चयः संशय स इति ॥।' (काव्यालंकार ८.५९) से स्पट है। रुय्यक ने इसका नामकरण 'संदेह' किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि रुद्रट के 'संशय' और रय्यक के 'संदेह' इन दो-दो नामों का भेद-भाव मिटाने के ही लिये मम्मट ने इसका भामह-सम्मत नाम ही ठीक समझा है। (ख) मम्मट की निश्चयान्त-संदेह-सम्बन्धी इस युक्ति अर्थात्- 'किं तु निश्चयगर्भ इव नात्र निश्चयः प्रतीयमान इति उपेक्षितो भट्टोन्भटेन।' का क्या आधार है? पता नहीं चलता। न तो उद्भट के 'काव्यालंकारसारसंग्रह' में निश्चयान्त संदेह का कोई खण्डन है और न उद्भट के दोनों टीकाकारों-इन्दुराज और तिलक-में से ही किसी ने इस सम्बन्ध की उद्भट की मान्यता का कोई उल्लेख किया है। संभवतः मम्मट का यह उल्लेख भट्टोन्भट के 'भामहकाव्यालक्कार विवरण' नामक आजकल अप्राप्य ग्रन्थ के आधार पर हो। वैसे 'निश्चयानतसंदेह' मम्मट ने 'रुद्रट' के अनुसार स्व्रीकार किया है। अनुवाद-उपमेय और उपमान का जो अभेद-अभेदारोप अथवा काल्पनिक अभेद-है उसे 'रूपक' अलक्कार कहा जाता है। टिप्पणी-'रूपक' शब्द का अर्ध है-रूपयति एकतां नयतीति रूपकम्-अर्थान एकता अथवा अभेद की प्रतीति का उत्पादन। अभिप्राय यह है कि उपमान और उपमेय के भिन्न स्वरूप में प्रकाशित होने पर भी दोनों में अत्यन्त साम्य के प्रदर्शन के लिये काल्पनिक अभेद का किया जाना 'रूपक' है। जैसे कि 'मुखं चन्द्रः'-'सुख चन्द्र है'-इत्यादि में मुख और चन्द्र के अपनेअपने स्वरूप में प्रकाशित होने पर भी दोनों में अभेद का आरोप किया गया है। अभेद के आरोप का 'रूपक' अलक्कार होना तभा सम्मव है जत यह कविप्रतिमाप्रसूत हो क्योंकि 'लोष्टः पाषाणः' इत्यादि में जैसा आरोपित अभेद है वह रूपक नहीं। अनुवाद-अभेद के आरोप का हेतु है (उपमेय और उपमान में) अतिसाम्य अथवा धर्मबाहुल्य और यह 'अभेद' वहां संभव है जहाँ उपमान और उपमेय अपने वैधर्म्य में प्रकाशित हो रहे हों। (क्योंकि यहाँ भेद का अपह्वव नहीं अपितु भेद होने पर भी अभेद की कल्पना हुआ करती है।)

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३५८ काव्यप्रकाश:

(रूपक के भेद-प्रभेद ) क ( १ साज्गरूपक-समस्तवस्तुविषय-प्रकार ) (१४०) समस्तवस्तुविषयं श्रौता आरोपिता यदा ॥ ९३ ॥ आरोपविषया इव आरोप्यमाणा यदा शब्दोपात्तास्तदा समस्तानि वस्तूनि विषयोऽस्येति समस्तवस्तुविषयम्। आरोपिता इति बहुवचनमविवक्षितम्। यथा- ज्योत्स्नाभस्मच्छुरणधवला बिभ्रती तारकास्थी- न्यन्तर्द्धानव्यसनरसिका रात्रिकापालिकीयम्। द्वीपाद द्वीपं भ्रमति दधती चन्द्रमुद्राकपाले न्यस्तं सिद्धाञ्जनपरिमलं लाञ्छनस्य च्छलेन ।। ४२१॥ अत्र पादत्रये अन्तर्द्धानव्यसनरसिकत्वमारोपितधर्म एवेति रूपकपरित्रडे साधकमस्तीति तत्संकराशंका न कार्या। (साङ्गरूपक- एकदेशविवति-प्रकार ) (१४१) श्रौता आर्थाश्र ते यस्सिन्नेकदेशविवर्ति तत् ।

जहाँ आरोपित अर्थात् उपमान शब्द-प्रतिपाद्य रहे वह रूपक 'समस्तवस्तुविपय' कहा जाता है। 'समस्तवस्तुविषय' का अभिप्राय है 'समस्तानि वस्तूनि विपयोऽस्य' अर्थात् वह रूपक जिसमें सभी (आरोपित) वस्तु अर्थात उपमान शब्द-विपय अथवा शब्द-प्रतिपाद्य हुआ करें। इस प्रकार 'समस्तवस्तुविषय' रूपक तब होता है जब आरोप विषय (उपमेय) की भांति आरोप्यमाण (उपमान) भी शब्द-प्रतिपाद्य रहा करते हैं। यहां 'आरोपिताः' में जो बहुवचन है वह विवच्ित नहीं ( क्योंकि सूत्र में वचन किसी विशेष अभिप्राय का बोधक नहीं हुआ करता-सूत्रे लिङ्गवचनमतन्त्रम्।) उदाहरण के लिये- 'चाँदनी का भस्म लपेटे उजली दनी, तारों की अस्थियाँ सम्हाले, अपने अन्तर्धान के कौतुक में लगी यह रात की योगिनी अपने चन्द्रमारूपी सुदाकपाल (सप्पर) में लान्छन के वहाने सिद्धाज्ञन का चूर्ग धरे सर्वत्र स्वच्छन्द विचरती दिखाई दे रही है।' नहाँ यह शङ्का कि ('कापालिकी की भाँति रात्रि, भस्म की भाँति ज्योत्स्ना के अंगलेप से शुभ्र वनी' इत्यादि अभिप्राय में 'उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे' इस सूत्र से 'रात्रिकापालिकी' इत्यादि में उपमित समास मान कर उपमा क्यों नहीं? और मयूरव्यंसकादि समास मान कर रूपक तो है ही, जिससे ) उपमा के साथ रूपक का संदेह-संकर क्यों नहीं? ठीक नहीं जँचती क्योंकि 'अन्तर्धान्यसनरसिकता' रूप धर्मे ऐसा है जो (आरोपविपय अर्थात् उपमेयभूत रात्रि का धर्स नहीं अपितु) वस्तुतः आरोपित-उपमान का ही धर्म है (अर्थात् चेतन कापालिकी में ही संभव है) जिससे इस सूक्ति के तीनों चरणों में वस्तुतः रूपक-बन्ध का ही समर्थन किया जा रहा है (न कि उपमा का क्योंकि उपमा होने से इस धर्म को अचेतन रात्रि में भी समन्वित होना चाहिये जो कि असंभव है)। 'एक देशविवर्ति'रूपक वह है जिसमें आरोपित अर्थात् उपमान शब्दगम्य तथा अर्थ- गम्य दोनों प्रकार का हुआ करता है।

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दशम उल्लास: ३२६

केचिदारोप्यमाणाः शब्द्रोपात्ताः केचिदर्थसामर्थ्यादवसेयाः इत्येकदेशविव र्त्तनात् एकदेशतिवर्त्ति। यथा- जस्स रणन्तेउरए करे कुणन्तस्स मण्डलग्गलअम्। रससंमुहीवि सहसा परंमुही होइ रिउसेणा।। ४२२॥ (यस्य रणान्तःपुरे करे कुवतो मण्डलाग्रलताम्। रससंमुख्यपि सहसा पराङमुखी भवति रिपुसेना II) अत्र रणस्यान्तःपुरत्वमारोव्यमाणं शब्दोपात्तन् मण्डलाग्रलतायाः नायिका- त्वम् रिपुसेनायाश्च् प्रतिनायिकात्वम् अर्थसामर्थ्यादवसीयते इत्येकदेशे विशेषेण वर्त्तनादेकदेशविवर्ति। (१४२ ) साङ्गमेतत् । उक्ता्विभेदं सावयवम्। रूपक के 'एकदेशविवर्ति' होने का अभिप्राय है उसका (किसी रूपक संघात के) किसी एक अवयव में विशेषरूप से अर्थात् शब्दतः स्फुटरूप में प्रकाशित होते रहना और यह तब संभव है जब कुछ आरोप्यमाण-उपमान-तो शब्द-प्रतिपाद्य हों और कुछ ऐसे हों जो अर्थ-सामर्थ्य के द्वारा प्रतीत हुआ करें (अर्थात् अर्थगम्य हों।) जैसे कि- 'रणरूपी अन्तःपुर में ( प्रियारूप) खड्गलता का पाणिग्रहण करने वाले जिस (राजा) की (प्रतिनायिकारूप) शत्रुसेना वीररसरंग में पगी होने पर भी (प्रेमाविष्ट होती हुई भी) सहसा (संग्राम से-प्रियमिलन से) पराङ्मुख होती हुई ही दिखाई दिया करती है।' यहाँ जो रूपक है वह 'एकदेशविवर्ति' रूपक है क्योंकि (आरोपविषय अथवा उपमेय) 'रण' का अन्तःपुररूप जो आरोप्यमाण-उपमान है वह तो है साक्षात् शब्द-प्रतिपाद्य किन्तु 'खड्गलता' के लिये नायिकारूप और रिपुसेना के लिये प्रतिनायिकारूप आरोप्य· माण-उपमान ऐसे हैं जो अर्थसामर्थ्य के कारण (रण के अन्तःपुर-रूपण की उपपत्ति के द्वारा) प्रतीत होते हैं। यह रूपक 'साङ्ग' सावयवरूपक है (क्योंकि यहां अङ्गभूत रूपकों के साथ अङ्गी अथवा प्रधान का रूपण हुआ करता है।) उपर्युक्त दोनों प्रकार के अर्थात् 'समस्तवस्तुविषय' और 'एकदेशविवर्ति' जो रूपक हैं वे 'साङ्ग' अर्थात् सावयवरूपक कहे जाते हैं। टिप्पणी-रूपक के 'साङ्ग' अथवा 'सावयन' होने का आभप्राय है एक ऐसे रूपक-समुदाय के होने का जिसमें एक प्रधान रूपक अपने अनेक सहायक रूपकों के साथ विराजमान हो! एक तब संभव है जत्र एक रूपक में दूसरे रूपक अङ्ग बन जाँय-एक आरोप में दूसरे आरोप सहायक हो जाँय। 'समस्तवस्तुविषय' और 'एकदेशविवति' रूपक ऐसे हैं यहाँ एक आरोप अनेक अन्य आरोपों के द्वारा परिपुष्ट हुआ करता है। उदाहरण के लिये 'ज्योत्स्नाभस्मच्छुरणधवला' इत्यादि में कवि की प्रतिभा यदि रात्रि को कापालिकी के रूप में प्रस्तुत करती है तो उसका पूर्ण- चित्र प्रदरशित करने के लिये अन्य सहायक रूपणों (ज्योत्स्ना के मस्मरूपण इत्यादि) की भी रचना कर डालती है। इसी प्रकार 'जस्स रणन्तेउरए' आदि में 'मण्डलाग्रलता' का व्यङ्गय 'नायिका' रूप रूपण ऐसा है जो कि प्रधान है और 'रण' के अन्तःपुररूप में रूपण इत्यादि ऐसे हैं जो अप्रधान हैं और इसलिये उसी के मुखापेक्षी हैं। 'रूपक' के साङ्ग होने में एक पृथक चमत्कार है और 'मालारूपक' होने में पृथक। मालारूपक को यदि रूपकमौक्तिकों की माला कहें तो साङ्गरूपक को रूपण मौक्तिकों की मअ्जरियों का समन्वय कहेंगे।

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३६० काव्यप्रकाश: W3M (२ निरज्गरूपक -शुद्धनिरज्ज-प्रकार ) (१४३) निरङ्गन्तु शुद्धम् यथा- कुरङ्गीवाङ्गानि स्तिमितयति गीतध्वनिषु यत् सखीं कान्तोदन्तं श्रुतमपि पुनः प्रश्नयति यत्। अनिद्रं यच्चान्तः स्वपिति तदहो वेदम्यभिनवां प्रवृत्तोऽस्याः सेक्तुं हृदि मर्नासजः प्रेमलतिकाम् ॥४२३॥

(१४४) माला तु पूर्ववत् ॥९४॥ मालोपमायामिवैकस्मिन् बहव आरोपिताः। यथा- सौन्दर्यस्य तरङङगणी तरुणिमोत्कर्षस्य हर्षोद्रमः कान्तेः कार्मणकर्म नर्मरहसामुल्लासनावासभूः। विद्या वक्रगिरां विघेरनवधिप्रावीण्यसाक्षात्क्रिया बाणा: पञ् शिलीमुखस्य ललनाचूडामणिःसा प्रिया ॥४२४॥ अनुवाद-वह रूपक जो कि 'निरङ्ग' रूपक कहलाता है शुद्द् अर्थात् रूपकान्तर से अमिश्रित (अङ्गाङ्गिभावरहित) हुआ करता है। जैसे कि-'इस बात से कि यह गीत की ध्वनियों के सुनते ही कुरङ्गी की भांति अपने अङ्गों को निश्चल बना देती है, पहले सुने हुए भी अपने प्रियतम का हाल बार बार अपनी सहेली से पूछती रहती है और पलकों के खुले रहने पर भी सोती रहा करती है, यही प्रतीत होता है कि मनसिज (काम) ने इसके हृदय में नयी नयी निकली प्रेम-लता का पटाना प्रारम्भ कर रखा है। [ यहाँ केवल 'प्रेम' में 'लता' का आरोप कविकल्पना ने किया है न कि उसके परि- पोषण के लिये अन्यत्र कहीं दूसरे का आरोप। इसीलिये यह रूपक 'निरङ्ग' (केवल- अङ्गाङ्गिभावशून्य) रूपक है।] यही रूपक पूर्वप्रतिपादित (मालोपमा) की भाँति 'मालारूपक' भी हुआ करता है। टिप्पणी-निरङ्गरूपक के भी दो प्रकार संभव हैं-१ला केवल निरङ्गरूपक औौर २रा भाला- निरङ्गरूपक। इस लिये प्राचीन आचार्यों का यहाँ कथन है-'निरङ्गस्यैव वैचित्रयान्तर माह- माला त्विति'। जिस प्रकार एक उपमेय के अनेक उपमानों से साम्य-प्रदर्शन में 'मालोपमा' संभव है उसी प्रकार एक उपभेय में अनेक उपमानों के आगेप में 'मालारूपक' भी संभव है। अनुवाद-मालोपमा (में एक उपमेय के अनेक उपमानों से साम्य प्रदर्शन) की भाँति इस रूपक में एक उपमेय में अनेक उपमानों का आरोप हुआ करता है जिससे इसे 'माला- रूपक' कहते हैं। जैसे कि- 'यह (मेरी) प्रेयसी सौन्दर्य की तरङ्गिणी है, यौवनोद्गम का आनन्द है, कान्ति की वशीकरण-क्रिया है, रतिविलास की निवासभूमि है, वक्रोक्तियों की विद्या है, विधाता की निस्सीम निर्माण-कला की प्रत्यक्ष अनुभूति है, पञ्चबाण की शर-समष्टि है और है स्त्री जाति की शिरोमणि।' [ यहाँ जो रूपक है वह मालारूपक (निरङ्ग) है क्योंकि एक उपमेयभूत प्रेयसी में अनेक उपमान आरोपित किये गये हैं। यह निरङ्ग इसलिये है क्योंकि यहाँ 'तरङ्गिणी' आदि के रूपण के परिपोषक अन्य रूपण नहीं हैं।]

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दशम उल्लास: ३६१

(३ परम्परित रूपक-श्लिष्ट परम्परित-प्रकार ) (१४५) नियतारोपणोपायः स्यादारोपः परस्य यः । तत्परम्परितं श्लिष्टे वाचके भेदभाजि वा ॥ ९५॥ यथा- (श्लिष्टशव्दनिबन्धन परम्परित) विद्वन्मानसहंस ! वैरिकमलासंकोचदीप्द्युते! दुर्गामार्गणनीललोहित ! समित्स्वीकारवैश्वानर !। सत्यप्रीतिविधानदक्ष ! विजयप्राग्भावभीम ! प्रभो ! साम्राज्यं वरवीर ! वत्सरशतं वैरिक्र्मुच्चः क्रियाः ॥४२५॥ अत्र मानसमेव मानसम्, कमलायाः संकोच एव कमलानामसंकोचः, दुर्गाणाममार्गणमेव दुर्गायाःमार्गणम्, समितां स्वीकार एव समिधां स्वीकारः, सत्ये प्रीतिरेव सत्यामप्रीतिः, विजयः पराभत्र एव विजयोऽर्जुनः, एवमारोपण- निमित्तो हंसादेरारोपः । यद्यपि शब्दार्थालंकारोऽयमित्युक्तं वच््यते च तथापि प्रसिद्धानुरोधादत्रोक्त: एकदेशविर्वा्त्ति हीदमन्यैरभिधीयते। भेदभाजि यथा- 'परम्परित' रूपक वह रूपक है जिसमें किसी प्रमुख रूपण के निमित्तभूत अन्य (आनुषङ्गिक) रूपण रहा करते हैं। यह दो प्रकार का होता है-१ला जिसमें (निमित्त- भूत रूपक के उपमेय और उपमानवाचक) पद क्िष्ट हों (श्रिष्टशब्दनिबन्धन परम्परित) और ररा जिसमें ( इस प्रकार के) पद अश्रिष्ट हों (अश्िष्टशब्दनिबन्धन परम्परित)। टिप्पणी-'परम्परित' रूपक का भिप्राय है-' म्पर। सज्जाता यस्य तत्परम्परितम्' अर्थात् वह रूपक जिसमें आरोप की एक परम्परा प्रतीत हो अर्थात् जहां एक प्रमुख रूपक और उसके अन्य आनुषङ्गिक रूपकों में कार्यकारणभाव अवभासित हुआ करे। परम्परित रूपक और साङ्गरूपक एक नहीं अपितु परस्पर भिन्न हुआ करते हैं क्योंकि पहले में तो वर्णनीय (मुख्य) आरोप के लिये अन्य (आनुषङ्गिक ) आरोप उस्के कारण रूप से रहा कर ते हैं किन्तु दूसरे में ( अर्थात साङ्गरूपक में), जो अङ्गरूपक है. वे अङ्गिरूपक (मख्यरूपक) के परिषोषण के लिय पड़े रहते हैं। अनुवाद-उदाहरण के लिये-'हे महाप्रतापी महाराज! विद्वानों के (मानसरूप) मानस के राजहंस, शत्रुओं के ( कमल-असंकोच विकास-रूप) कमला (लक्ष्मी) संकोच के सूर्य, (दुर्गामार्गण-पार्वती-अनुनय-रूप) दु्गों के अमार्गण (अननुसंधान) के महादेव, (समिधा-कवलनरूप) संग्राम के अङ्गाकरण के वैश्वानर (अग्निदेव), (सती- दुर्गा-की अप्रीति के विधानरूप) सत्य की प्रीति के विधान के दक्ष (प्रजापति) और (विजय-अर्जुन के प्रथम जन्मरूप) विजय प्रारम्भ के भीम (भीमसेन) आप अपने साम्राज्य का अनन्त काल तक शासन करते रहें।' यहाँ (उपमेयभूत राजा में) 'हंस' सूर्य, शिव आदि के जो आरोप हुये हैं उनमें निमित्तरूप से रहने वाले आरोप हैं-'मानस' पर मानस (मानससरोवर) का आरोप, 'कमला-संकोच' पर कमल-असंकोच का आरोप, 'दुर्ग-अमार्गण (अनन्वेषण)' पर दुर्गा-मार्गण का आरोप, 'समित्-(संग्राम)-स्वीकार' पर समित्-(समिधा)-स्वीकार का आरोप, 'सती-प्रीति' पर सती-अप्रीति का आरोप और 'तिजय' (शत्रुपराभव प्रारम्भ) पर विजय-अर्जुन-जन्म का आरोप। यद्यपि अन्य (प्राचीन) आलङ्कारिकों ने इस (श्रिष्टशब्दनिबन्धन-परम्परित) रूपक को उभयालक्कार कहा है और आगे चलकर यहाँ (काव्यप्रकाश के संकरालंकार निरूपण प्रकरण में) भी ऐसा ही कहा जायगा किन्तु यहाँ इसे अर्थालङ्कार प्रकरण में इसीलिये

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३६२ काव्यप्रकाश:

(अश्लिष्टशब्दनिबन्धन माला-परम्परित रूपक ) आलानं जयकुञ्जरस्य दषदां सेतुर्विपद्वारिधे: पूर्वाद्रि: करवालचण्डमहसो लीलोपधानं श्रिय: ! सङग्रामामृतसागरप्रमथनक्रीडाविधौ मन्दरो राजन् ! राजति वीरवैरिवनितावैधव्यदस्ते भुजः ॥४३६॥

युज्यते। अत्र जयादेर्भिन्नशब्दवाच्यस्य कुञ्जरत्वाद्यारोपे भुजस्य सालानत्वाद्यारोपो

(अमाला-( केवल ) परम्परित रूपक ) अलौकिकमहालोकप्रकाशित जगत्त्रयः । स्तूयते देव ! सद्वंशमुक्तारत्नं न कैर्भवान् ॥ ४२७ । गिनाया गया है क्योंकि प्राचीन (भामह आदि) आचार्यों की दृष्टि में यह अर्थालङ्काररूप से ही प्रसिद्ध है और संभवतः इसीलिये अन्य आलंकारिक इसे एकदेशविवर्ति रूपक कहा करते हैं ( जो कि स्पष्टरूप से अर्थालंकार है क्योंकि कुछ उपमान इसमें शब्दप्रति- पाद्य जैसे कि 'विद्वन्मानसहंस' इत्यादि में 'हंस' आदि और कुछ अर्थ गम्य जैसे कि 'मानस-(मानससरोवर) आदि हैं।) टिप्पणी-जिस 'विद्वन्मानसहस' आदि सूक्ति को, श्रिष्टपरम्परित रूपक के उदाहरण के रूप में, रुय्यक ने उद्धृत किया था उसी को मम्मट ने भी उद्धृत किया है। मम्मट की दृष्टि से तो यह उभयालंकार है किन्तु रुय्यक की इस मान्यता-श्लेषगभ तु रूपके रूपकहेतुकस्य श्लेषस्य तृतीयकक्तायां रूपक एव विश्रान्तिरिति रूपकेण श्लेषो बाध्यते। (अलंकारसवस्व पृष्ठ १२६-काव्यमाला) का रूम्मान करते हुये मम्मट ने इसे अर्थालंकार प्रकरण में स्थान दिया है। अनुवाद-(प्रधान रूपण के निमित्तभूत रूपण में आरोप्यमाणउपमान और आरोप- विषय-उपमेय के वाचक पदों के भिन्न रूप-अश्लिष्ट होने में (माला) परम्परित रूपक, जैसे कि :- 'हे महाराज ! शत्रुओं की स्त्रियों के वैधव्य-दान में दक्ष आपका यह भुजदण्ड जय- कुक्षर का बन्धन स्तम्भ है, विपत्ति-सागर का संतरण-सेतु है, करवाल-सूर्य का उदयाचल है, राजलचमी का लीलोपधान (सुख की नींद सोने का तकिया) है, और है संग्रामरूपी अभृतसागर की मन्थन-विधि का मन्दराचल।' वहाँ अश्लिष्ट शब्दों द्वारा प्रतिपाद्य 'जय' आदि अर्थों पर अश्लिष्ट शब्दों द्वारा ही प्रतिपाद्य 'कुश्र' आदि अर्थों के जो आरोप किये गये हैं वे 'भुजदण्ड' पर 'आलान' (गज बन्धनस्तम्भ) आदि के आरोप के लिये सर्वथा युक्तियुक्त निमित्त हैं (जिससे कि यहाँ अश्लिष्टशब्दनिबन्धन परम्परित रूपक है और जैसा कि यहाँ धागे में पिरोये फूलों की भांति एक भुजरूप उपमेय में अनेक उपमान आरोपित हैं इसे माला-परम्परित रूपक कहा करते हैं।) 'हे महाराज ! अपने अलौकिक यश से तीनों लोकों को प्रकाशित करने वाले, 'सद्वंश- ुक्तारत्न'-महान् राजवंश के सौक्तिकमणि-आप की प्रशंसा भला कौन है जो नहीं किया करता !' [ यहाँ श्लिष्टशब्दुनिबन्धन अमाला (केवल) परम्परित रूपक है क्योंकि आरोप विषय (उपमेय-राजकुल) तथा आरोप्यमाण (उपमान प्रशस्त वेणु) दोनों एकही श्िष्ट 'सद्वंश' शब्द द्वारा प्रतिपाद्य हैं। साथ ही साथ 'राजा' पर 'मौक्तिक' के आरोप का निमित्त भी दिया गया है जो कि 'राजकुल' पर 'प्रशस्त वेणु' के आरोप सें स्पष्ट है। यहाँ एक उपमेय में अनेक रूपणों का गुम्फन नहीं इसलिये इसे केवल (अमाला) परम्परित रूपक कहा जाता है। ]

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दशम उल्लास: ३६३

निरवधि च निराश्रयं च यस्य स्थितमनिवर्त्तितकौतुकप्रपञ्चम् । प्रथम इह भवान् स कूर्ममृत्तिर्जयति चतुर्दशलोकवल्लिकन्दः ॥ ४२६ ॥ इति च अमालारूपकमपि परम्परितं द्रष्टव्यम्। (रशनारूपक ? ) किसलयकरैलवानां करकमलैः कामिनां मनो जयति। नलिनीनां कमलमुखैमुखेन्दुभिर्योषितां मदनः ॥४२६॥ इत्यादिरसनारूपकं न वैचित्र्यवदिति न लक्षितम्।

तथा 'हे भगवन् ! अनन्त आश्चयों से भरे कालातीत किं वा देशातीत अस्तित्व वाले आदि कूर्मावतार आप ही एकमात्र चतुर्दश सुवनवल्ली के कन्दुरूप से विराजमान हैं।' (यहाँ अश्लिष्टशब्दनिबन्धन अमाला परम्परित रूपक है। 'अश्लिष्ट' इसलिये क्योंकि 'चतुर्दशलोकवल्लिकन्दः' में आरोपविषय 'लोक' पद तथा आरोप्यमाण 'वल्लि' पद श्िष्ठ नहीं हैं। 'अमाला' इसलिये क्योंकि विष्णुरूप उपमेय-सूत्र में 'कन्द' के अतिरिक्त अन्य उपमान-पुष्प नहीं गूथे गये और 'परम्परित' इसलिये क्योंकि 'विष्णु' में 'कन्द' के आरोप के निभित्तरूप से 'लोक' में 'वल्ली'-(लता) का आरोप स्पष्ट दिखाई दे रहा है। ] ये उपर्युक्त जो उदाहरण हैं उनमें परम्परित रूपक का वह स्वरूप दिखाई दे सकता है जिसे अमाला परम्परित (अर्थात् केवल परम्परित) कहा गया है। ऐसे प्रसङ्ग जैसे कि- 'कामदेव कामियों का मन जीतने लगा-लताओं के किसलय-करों से, रमणियों के कर कमलों से, नलिनियों कें कमल-मुखों से और युवतियों के सुख-चन्द्रों से सब को वशीभूत करने लगा है।' इत्यादि में ( जहाँ पूर्वपूर्वर्ती उपमान जैसे कि 'कर', 'कमल' और 'मुख' उत्तरोत्तर उपमेय के रूप में परिणत होते हुये किसी करधनी की किक्किणियों की भाँति आगे-पीछे होते दिखाई देते हैं) एक और प्रकार का भी रूपक, जिसे रशनारूपक कहा करते हैं, दिखाई दे सकता है, किन्तु इसका यहाँ पृथक निरूपण इसलिधे अपेक्ित नहीं क्योंकि इसमें कोई ऐसा अभिनव चसत्कार नहीं जो पूर्वनिर्दिष्ट रूपकप्रकारों में न हो। टिप्पणी-मम्मट का रूपक-लक्षण-'तद्रपकमभेदो य उपमानोपमेययोः' वस्तुतः भामह के इस रूपक लक्षण अर्थात्- 'उपमानेन यत्तर्वस्ुपमेयस्य रुप्यते। गुणानां समतां हष्टवा रूपक नाम तहिदु: ॥' (काव्यालङ्कार २. २१) और उद्भट के इस रूपक निरूपण अर्थात् --- 'श्रुत्या सम्बन्धविरहाड् यत्पदेन पदान्तरम्। गुणवृत्तिप्रधानेन युज्यते रूपकं तु तत ।।' (काव्यालक्कारसारसंग्रह १.११) का सारगभिंत संचेप है। 'उपमानोपमेययो: अभेदः' इन दो शब्दों में भामह के 'गुणानां समतां दृष्टा उपमानेन यदुपमेयस्य तत्वं रूप्यते' और उद्भट के 'श्रुत्या संबन्धविरहाद् यद् गुणवृत्तिप्रधानेन पड़ेन पदान्तरं युज्यते' का निष्कर्ष निकाल लिया गया है। (ख) मम्मट ने रूपक के भैद-प्रभेद की व्यवस्था रुय्यक के अनुसार स्वीकार की हे। रुय्यक का रूपक-विभाग यह है :-

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३६४ काव्य प्रकाश:

(७ अपहुति अलंकार ) (१५६) प्रकृतं यन्निषिध्यान्यत्साध्यते सा त्वपहनुतिः । उपमेयमसत्यं कृत्वा उपमानं सत्यतया यत्स्थाप्यते सा त्वपह्नुतिः। उदाह- रणम्-

रूपक

1 निरवयव (निरङ्ग) सावयव (साङ्ग ) परम्परित 1 1 1 १ केवल (शुद्ध) २ माला ३ समस्तवस्तु ४ एकदेश रूपक रूपक विषय विवर्ति

श्लिष्ट शब्द निबन्धन अश्लिष्ट शब्द निबन्धन

  • 1 ५ केवल (शुद्ध ) ६ माला ७ केवल (शुद्ध) ८ माला और मम्मट का रूपक विभाग यह- रूपक

  • साङ्ग निरङ्ग परम्परित 1 - - 1 समस्तवस्तुविषय एकदेशविवर्ति शुद्ध माला श्लिष्ट अश्लिष्ट 1

शुद्ध माला शुद्ध माला मम्मट ने 'मालोपमा' को उपना का अतिरिक्त प्रकार न मानकर भी 'मालारूपक' को रूपक का अवान्तर भेद तो मान लिया है, किन्तु रशना-रूपक को रूपक का भेद नहीं माना है। यहाँ वस्तुतः रुद्रट की रशना-रूपकसम्बन्धी मान्यता का मम्मट ने खण्डन किया है। अनुवाद-अपह्नति अलंकार वह है जहाँ प्रकृत का निषेध करके (उपमेय को असत्य प्रतिपादित करके) अन्य अर्थात् अप्रकृत-उपमान(की सत्यता) की सिद्धि की जाती है। टिप्पणी-मम्मट का अपहुति-निरूपण वस्तुनः रुद्रट के इस अ.हुनि-लक्षग अर्थात्- 'अतिसाम्यादुपमेयं यस्यामसदेव कथ्यते सदपि। उपसानमेव सदिति च विज्ञेयापहनुतिः सेयम् ॥ (काव्यालक्कार ८. ५७) का संक्षेप है। एक प्रकार से मम्मट ने अपने इस लक्षण में रुय्यक के अपहति-लक्षण-'विषय- स्यापह्ववेऽपह्नतिः' की, जिसमें अप्रकृत के साधन अथवा स्थापन का स्पष्ट निर्देश नहीं है, आलो- चना भी कर दी है। अपहुति के भेद-प्रभेद-निरूपण का कोई विशिष्ट सैद्धान्तिक आधार न होने से मम्मट ने 'एवमियं भङ्गयन्तरैरप्यूह्या' कह कर वही बात कही है जो दण्डी ने 'इत्यपह्नतिमेदार्ना लक्ष्यो लक्ष्येषु विस्तरः' (काव्यादर्श २, ३०९) कहकर प्रकट की थी। अनुवाद-'अपह्नति' का अभिप्राय है 'उपमेय' की असत्यता का (शब्दतः अथवा अर्थतः) प्रतिपादन और उपमान की सत्यता की स्थापना। उदाहरण के लिये-

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दशम उल्लास: ३६५

अवाप्ः प्रागल्भ्यं परिणतरुच: शैलतनये ! कलङ्को नैवायं विलसति शशाङ्कस्य वपुषि। अमुष्येयं मन्ये विगलद्मृतस्यन्दशिशिरे रतिश्रान्ता शेते रजनिरमणी गाढमुरसि॥४३०॥ इत्थं वा- बत सखि ! कियदेतत् पश्य वैरं स्मरस्य प्रियविरहकृशेऽस्मिन् रागिलोके तथा हि। उपवनसह कारोद्भासिभृङ्गच्छलेन प्रतिविशिखमनेनोट्टृङ्किंतं कालकूटम् ॥४३१॥ अत्र हि न सभृङ्गाणि सहकाराणि अधितु सकालकूटाः शरा इति प्रतीतिः । एवं वा- अमुष्मिँल्लावण्यामृतसरसि नूनं मृगद्श: स्मरः शवप्लुष्टः पृथुजघनभागे निपतितः । यदङ्गाङ्गाराणां प्रशमपिशुना नाभिकुहरे शिखाधूमस्येयं परिणमति रोमावलिवपुः ॥४३२॥ अन्र न रोमावलि: धूमशिखेयमिति प्रतिपत्ति: एवमियं भङ्गयन्तरैर्यूह्या। (पार्वती के प्रति भगवान् शंकर की उक्ति ) शैलत नये! सकलकलापूर्ण इस चन्द्रमा के विम्ब पर स्पष्टरूप से प्रकट होने वाला यह कलङ्क नहीं विराज रहा, यह तो वस्तुतः निशा-नायिका है जो सुधास्यन्द से शीतल उसके वक्त स्थल पर रति-क्रीडा से शिथिल हुई गाढ निद्रा में पड़ी सो रही है। [ यहाँ उपमेयभूत 'कलङ्क' की 'नैवायम्' इस नकारात्मक शब्द द्वारा असत्यता की व्यवस्था और उपमानभूत रात्रि की सत्यता की स्थापना होने से (शाब्दी) अपहनति है।] अथवा इस प्रकार से- 'अरी सखी! कितने दुःख की बात है कि प्रियचिरह से खिन्न हम सरीखे प्रेमी जन पर कामदेव इतना द्वेष रख रहा है कि अपने बाणों-उपवनों की आम्रमक्जरियों को उन पर मँडराते भौरों के बहाने कालकूट में डुवा २ कर सजा रहा है।' यहाँ जो चमत्कार प्रतीत हो रहा है वह (उपमेय) भौंरों से भरी सहकार-मंजरिओं के निषेध द्वारा (उपमान) कालकूट में डुबाये काम बाण के स्थापन में है। [यहाँ उपमेयभूत भृङ्गों की सत्यता का 'छल' शब्द से आचिप्त निषेध और उपमान- भूत कालकूट की सत्यता का स्थापन होने से (आर्थी) अपहुति हुई।] अथवा इस प्रकार से भी- 'अरे रसिक! इस मृगनयनी के सौन्दर्यसुधा-सरोवर मांसल जघन भाग में हो न हो, मदन ही, महादेव की नेत्रवह्नि से जला-झुलसा (अपनी संताप-शान्ति के लिये) डुबकी लगा रहा है क्योंकि उसके अङ्गों के अङ्गारों के बुझने की सूचना देने वाली यह धूमशिखा ही है जो कि इस (मृगनयनी) के नाभिगह्वर में रोमावलि के रूप में प्रकट हो रही है।' यहाँ जो बात प्रतीत हो रही वह यह है कि (इस मृगनयनी के नाभिगह्वर में) यह रोमाचलि नहीं अपितु (झुलसे मदन के अङ्ग के अङ्गारों से निकलती) धूमशिखा है। [ यहाँ 'धूमशिखा रोमावलिवपुः परिणमति' में 'परिणास' शब्द के अर्थ-सामर्थ्य से

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३६६ काव्यप्रकाश:

( ८ श्लेष अलंकार) (१४७) श्लेपः स वाक्य एकस्मिन् यत्रानेकार्थता भवेत् ॥९६॥ एकार्थप्रतिपादकानामेव शब्दानां यत्रानेकोर्ऽर्थः स श्लेषः । उदाहरणम्- उदयमयते दिङ्मालिन्यं निराकुरुतेतरां नयति निधनं निद्रामुद्रां प्रवत्तयति क्रिया । रचयतितरां स्वैराचार प्रवर्त्तनकर्त्तनं बत बत लसत्तेजःपुक्ो त्रिभाति विभाकरः॥४३३॥ अत्राभिधाया अनियन्त्रणात् द्वावप्यर्कभूपौ वाच्यौ। उपमेय-'रोमावलि' का अपह्वब तथा उपमान-धूमशिखा' का समर्थन प्रतीत होता है और इसलिये यह (आर्थी) अपह्ुति है।] इसी प्रकार अन्य अनेक विचित्र ढंग हैं जिनमें अपहनुति का स्वरूप देखा जा सकता है। 'श्लेष' अलङ्कार वहाँ होता है जहाँ एक वाक्य में अनेक अर्थ अभिहित हुआ करते हैं। टिप्पणी-शब्दालक्वारों में जिस 'इलेष' का परिगणन है वह तो है शब्द-श्लेष, किन्तु अर्थालक्कार-प्रकरण का यह अलक्कार अर्थ-श्लेष अलद्वार है। शब्द्र-श्लेष में तो शब्द ऐसे हुआ करते हैं जिनमें परिवृत्ति-परिवर्तन होने से अलक्कार का स्वरूप ही नष्ट हो जाता है किन्तु अर्थ- इलेष में बात ऐसी नडीं क्योंकि यहाँ जो शब्द अनेकार्थ-प्रतिपादक हुआ करते हैं उनमें परिवर्तन भी संभव है। 'श्लेष' का यहाँ जभिप्राय है 'इष्यतोरऽर्थो यत्र' अर्थात वह अलंकार जहाँ दो अर्थ एक शब्द के आधार पर परस्पर संतक्त हों। एक वृन्त पर लटके दो फलों की भाँति एक शब्द पर अवलम्बित दो अर्थ जड़ां हो वहाँ जो अलङ्कार समझा जाता है वह है अर्थ श्लेष। अनुवाद-('वाक्ये एकस्मिन्ननेकार्थता यत्र स श्लेषः' का) यहाँ जो अभिप्राय है वह यह है :- यदि एक अर्थ के बोधक शब्दों का (प्रकरण आदि के नियन्त्रण से परे और साथ ही साथ बुछ वैचित्र्य-पूर्ण) अनेक अर्थ हो तो वह अलङ्कार (अर्थ) 'श्लेष' है। उदाहरण के लिये :- (सूर्य-पक्ष में) 'कितनी प्रसन्नता की बात है कि भगवान् भास्कर अपने तेजःपुञ्ज में विराजमान उदित हो रहे हैं, चारों ओर का अन्धकार दूर कर रहे हैं, प्राणिमात्र की निद्धा-तन्द्रा का नाश कर रहे हैं, आह्िक कर्मों में सब को प्रेरित कर रहे हैं और उन प्रवृत्तियों का उच्छेद जो रात की शरण में पनपा करती हैं।' (राज-पक्ष में ) 'कितनी प्रसन्नता की बात है कि हमारे महाराज विभाकर अपने राजतेज में विराजमान सभी समृद्धियों से सुशोभित हो रहे हैं, प्रजाजन के दुःख.दारिद्रय को दूर भगा रहे हैं, उनके आलस्य किंघा निरुत्साह का नाश कर रहे हैं, उन्हें अपने-अपने आचार-व्यवहार में प्रवृत्त कर रहे हैं और कर रहे हैं उन प्रवृत्तियों का मूलोच्छेद जो स्वच्छन्दता और उद्दण्डता में पनपा करती हैं।' यहाँ ('उदयमयते' इत्यादि शब्दों की) अभिधा का (प्रकरण आदि अभिधा- नियामकों में से किसी के द्वारा भी) नियन्त्रण नहीं हो रहा और इसलिये दोनों सूर्यगत तथा राजगत अर्थ स्पष्ट प्रतिपादित किये जा रहे हैं। टिप्पणी-गम्मट ने यहाँ 'इनेष' का स्वरूप तो रुद्रट के इस अर्थ-श्लेष-लक्षण अर्थात्- यत्रैकमनेकार्थर्वाक्यं रचितं पदैरनेकस्मिन्। अर्थे कुरुते निश्चयमर्थश्लेष: स विज्ञेयः॥' (काव्यालङ्वार १०.१)

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दशम उल्लास: ३६०

(९ समासोक्ति अलंकार) (१४८) परोक्तिर्भेदकः श्लिष्टः समासोक्ति: प्रकृतार्थ प्रतिपादकवाक्येन श्लिष्टविशेषणमाहात्म्यात् न तु विशेष्यस्य साम- धर्यादपि यत् अप्रकृतस्यार्थस्याभिधानं सा समासेन संक्षेपेणार्थद्वयकथना- त्समासोक्ति: । उदाहरणम्- लहिऊण तुज्फ बाहुपफंसं जीए स कोवि उल्लासो। जअलच्छी तुह विरहे ण हूज्जला दुव्वला णं सा ॥ ४३४ ॥ (लब्ध्वा तव बाहुस्पश यस्या: स कोऽप्युल्लासः । जयलद्मोस्तव विरहे न खलूज्ज्वला दुर्बला ननु सा ॥४३४॥) अत्र जयलक्ष्मीशब्दस्य केवलं कान्तावाचकत्वं नास्ति। के आधार पर निर्धारित किया है किन्तु रुद्रट द्वारा प्रतिपादित अर्थश्लेष के शुद्ध भेदों जस कि विरोध, वक्रोत्ति, व्याजोक्ति इत्यादि और संकीर्ण-भेदों को इसलिये नहीं माना है क्योंकि रुख्यक ने अपनी श्लेष-मीमांसा में यह पहले ही सिद्ध कर दिया था कि इलेष का न तो अन्य अलंकारों से रर्वथा पृथक कोर्ड नरिषय है और न ऐस ही है कि इसे अन्य किसी अलंकार में अन्तर्भूत ही किया जा सके-तेनालङ्कारान्तरविविक्तो नास्य विषयोऽस्तीति सर्वालंकारापवादोऽयम् (श्लेष) इति स्थितम्-( अलंकार मर्वम्त काव्यमाला १३२ पृष्ु)। अनुवाद-'समासोक्ति' वह अलद्कार है जिसे श्लिष्ट-प्रकृत तथा अप्रकृत दोनों अर्थों में संगत विशेषणों की 'परोक्ति' (पर-अप्रकृत अर्थ अर्थात् अप्रकृत वस्तुगत व्यवहाररूप ghe gho cho अर्थ की बोधकता) कहा करते हैं। 'समासोक्ति' का अभिप्राय है समासतः अर्थात संक्षेपतः दो उपमानोपमेयभूत अर्थों का अभिधान। यह तब संभव है जब एक प्रस्तुतार्थबोधक वाक्य के द्वारा किसी दूसरे अप्रस्तुत अर्थ का ( वस्तुतः अप्रकृत वस्तुगत व्यवहाररूप अर्थ का) अभिधान (ब्यञ्जना द्वारा बोधन) हुआ करे और ऐसी बात हो यहां प्रयुक्त विशेष्यवाचक पद के सामर्थ्य से नहीं अपितु ऐसे विशेषणवाचक पदों की महिमा से जो कि श्लिष्ट हों, प्रकृत तथा अप्रकृत दोनों अर्थों के प्रतिपादन में समर्थ हों। उदाहरण के लिये- 'हे वीर ! वह जय-श्री जो कि कभी तुम्हारे बाहु-स्पर्श को पाकर एक अनिर्वचनीय आनन्द मनाया करती थी, अब जब कि तुम चल बसे, सुन्दर भला क्यों लगे, अत्यन्त दीन हीन हो रही है।' यहाँ पर (विशेष्यवाचक) 'जयलच्मी'-'जयश्री'-शब्द केवल ऐसा है जो 'कामिनी' रूप (अप्रकृत) अर्थ का वाचक नहीं (किन्तु अन्य जो विशेषण-वाचक पद हैं वे तो उस अप्रकृत कामिनी-व्यवहाररूप अर्थ के अभिव्यञ्जक हैं ही जो कि प्रकृत 'जयलचमी' के व्यवहाररूप वाच्यार्थ का उत्कर्ाधायक वन रहा है जिसमें कि 'समासोक्ति' का चमत्कार है।) टिप्पणी-'समासोति' भी एक प्राचीन अलंकार है। भामह और उद्मट के अनुसार 'समासीति' कहते हैं समान विशेषण के सामश्र्य से प्रकृतपरक वाक्य द्वारा अप्रकृत सर्व के अभिधान को-'प्रकृतार्थेन वाक्येन तत्समानेर्विशेषणैः। अप्रस्तुतार्थकथनं समासोकि:।' काव्यालंकार सारसंग्रइ २. १०। मम्मट ने अपना समासोकि लक्षग रय्यक के समासोक्ति-लक्षण- 'विशेषणानां साम्यादप्रस्तुतस्य गम्यत्वे समासोक्ति:। (अलंकारसर्वस्व पृष्ठ १०७) से प्रभावित होकर किया है वयोंकि 'विशेषगसाम्य' का नो अभिप्राय स्य्यक का है, जैसा कि इन पंक्तिओं अर्थात्-

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३६८ काव्यप्रकाश:

(१४९ ) निर्दशना । ( १० निदर्शना-अ्रलंकार )

अभवन् वस्तु सम्बन्ध उपमापरिकल्पकः ॥ ९७॥ निदर्शनं दृष्टान्तकरणम्। उदाहरणम्- क्क सूर्य प्रभवो वंशः क चाल्पविषया मतिः। तितीर्षुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम् । ४३५॥ अत्रोडुपेन सागरतरणमिव मन्मत्या सूर्यवंशवर्णनमित्युपमायां पर्यवस्यति। यथा वा- उदयति विततोर्ध्वरश्मिरज्जावहिमरुचौ हिमधाम्नि याति चास्तन्। वहति गिरिरयं विलम्बिघण्टाद्वयपरिवारितवारणेन्द्रलीलाम् ।।४४६॥। 'गम्यत्वमप्रस्तुतनिष्ठंतु समासोक्तिविषयः। तत्र च निमित्तं विशेषणसाम्यम्। विशे- व्यस्यापि साम्ये श्लेषप्राप्तेः । विशेषणसाम्याद्वि प्रतीयमानमप्रस्तुतं प्रस्तुतस्यावच्छेदकतया पतीयते। अवच्छेदकत्वं च व्यवहारसमारोपो नतु रूपसमारोपः' अलंकारसर्वस्व, पृष्ठ १०९) में स्पष्ट है, वहः अभिप्राय नम्मट का है जो कि 'श्लिष्टविशेषणमाहात्म्यात् न तु विशेष्यस्य सामर्थ्यादपि' इम वृत्ति-वाक्यांश में प्रतीत छोता है। अनुवाद-'निदर्शना' अलंकार कहते हैं वस्तुओं अर्थात् वाक्याथों अथवा पदार्थों के ऐसे सम्बन्ध अथवा समन्वय को जो (आपाततः) भले ही अनुपपन्न हो किन्तु (अन्त में) उपमानोपमेयभाव में परिणत हो जाय। 'निदर्शन' का अभिप्राय है-'दृष्टान्तकरण' अथवा उदाहरण-प्रदर्शन। जैसे कि- 'कहां तो सूर्य-संभूत रघुवंश ! और कहां हमारी सीमित बुद्धि !! मैं जो मोहवश करना चाह रहा हूँ (अर्थात् रघुवंश की रचना) वह तो बस उद्ुप (डेंगी, छोटी नाव) के द्वारा दुस्तर पारावार का नैरना है।' यहां जो 'निदर्शना' है वह 'वाक्यार्थ-निदर्शना' है क्योंकि 'तितीपुर्दुस्तरं मोहादुडुपे- नास्मि सागरम्' का वाक्यार्थ (अर्थात् उडुप के द्वारा दुस्तर सागर का तैरना) ऐसा है जिसका 'कव सूर्यप्रभवो वंशः क्व चाल्पविषयामतिः' के वाक्यार्थ (अर्थात् कहां तो सूर्यवंश और कहां हमारी बुद्धि) से कोई सम्बन्ध तो नहीं दिखाई देता किन्तु अप्रकृत वाक्यार्थ (तितीर्पुर्दुस्तरम् आदि) का प्रकृत वाक्यार्थ (क्क सूर्यप्रभवः आदि) के साथ औपम्य- उपमानोपमेयभाव-मान लेने पर दोनों की असम्बद्धार्थता समाप्त हो जाती है और एक दूसरे का निदर्शन (उदाहरण) बन जाता है ]। यहां (वाक्यार्थों की असम्बद्धार्थकता में) जो उपमानोपमेयभाव अन्ततः प्रतीत होता है वह यह है-'मेरी बुद्धि के द्वारा सूर्य-वंश का वर्णन उडुप के द्वारा सागर के संतरण के समान है।' अथवा जैसे कि- 'उस समय (पूर्णिमा की तिथि में), जब कि अपनी-अपनी रश्मिरज्जुओं को दूर ऊपर फैलाये सूर्य तो उदित हो रहा हो और चन्द्रमा अस्त, यह (रैवतक) पर्वत ऐसा लगता है कि दोनों ओर लम्बे लटकने वाले दो घंटों से सुशोभित किसी गजराज की शोभा को धारण कर रहा हो।' [ यहां जो निदर्शना है वह पदार्थ-निदर्शना है क्योंकि एक पदार्थ अर्थात् 'वारगेन्द्र लीला' दूसरे पदार्थ अर्थात 'रेवतक पर्वत' से असम्बद्ध होकर अन्ततोगत्वा परस्पर एक उपमानोपमेयभाव में परिणत हो जाता है।]

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दशम उल्लास: ३६६

अत्र कथमन्यस्य लीलामन्यो वहतीति तत्सदृशीमित्युपमायां पर्यवसानम्। दोर्भ्यां तितीरषति तरङ्गवतीभुजङ्ग: मादातुमिच्छनि करे हरिणाङ्कबिम्बम्। मेरुं लिलङ्वयिषति ध्रुवमेष देव ! यस्ते गुणान् गदितुमुद्यममादधाति।।४३७।। इत्यादौ मालारूपाऽप्येषा द्रष्टव्या। (निदशना का एक अन्य प्रकार ) (१५०) स्वस्वहेत्वन्वयस्योक्ति: क्रिययैव च साडपरा। क्रिययैव स्वस्वरूप-कारणयोः सम्बन्धो यदवगम्यते साऽपरा निदर्शना, यथा- उन्नतं पदमवाप्य यो लघुर्हेलयैव स पतेदिति ब्रुवन्। शैलशेखरगतो दृषत्कणश्चारुमारुतधुतः पतत्यधः ॥४३८।। अत्र पातक्रियया पतनस्य लाघवे सति उन्नतपदप्राप्तिरूपस्य च सम्बन्ध: ख्याप्यते। यहाँ यह अनुपपत्ति कि एक (गजराज) की लीला दूसरा (पर्वत) कैसे धारण करले, अन्ततः जहां समाप्त होती है वह एक औपम्य है जिसका रूप है-'एक (गजराज) की लीला के समान जो लीला है उसका धारण दूसरा (पर्वत) कर रहा है।' ऐसे प्रसङ्ग जेसे कि- 'हे महाराज ! जो व्यक्ति आपके गुणों का वर्णन करना चाहता है वह चाहता है सरित्पति (सागर) को अपने हाथों से तरना, चन्द्र-बिम्ब को हथेली में पकड़ना और मेरु पर्वत को लांघ कर पार कर जाना' इत्यादि में यह निर्दशना माला-निदर्शना के रूप में भी देखी जा सकती है। (यहां 'यः तव गुणान् गदितुमिच्छति' का वाक्यार्थ 'दोभ्यां तरङ्गवतीभुजङ्गं तितीर्षति' इत्यादि के वाक्यार्थों से असम्बद्ध होकर अन्ततः 'सागर तरण आदि के समान तुम्हारा गुण-वर्णन है' इत्यादि मालारूप उपमानोपमेयभाव में परस्पर सम्बद्ध हो रहा है।) दूसरे ढंग की 'निदर्शना' वह है जिसे क्रिया के द्वारा कार्य और कार्य-हेतु में सम्बन्ध (कार्यकारणभावरूप सम्बन्ध) का अभिधान कहते हैं। क्रिया के द्वारा ही अपने स्वरूप और अपने कारण में सम्बन्ध का जो अवगमन है वह है एक और प्रकार की निद्शना। जैसे कि- 'पर्वत-शिखर पर आरूढ शैलकण मन्दमारुत के झोंके से भी नीचे गिर पढ़ता है वह यह बताया जाता है कि जो चुद्र है उसे ऊँचे पद पर बैठ जाने पर भी शीघ्र ही नीचे गिर जाना पड़ता है।' यहां 'पतति' (नीचे गिरने) की क्रिया के द्वारा पतन रूप कार्य और उसके कारण अर्थात् चुद्रता होने पर उन्नत पद् की प्राप्ति का जो परस्पर सम्बन्ध (कार्यकारणभाव रूप) है वह प्रतिपादित हो रहा है (जो कि 'तुद्रता रहने पर उन्नत पद-प्राप्ति किसी

हो जाता है।) के पतन का उसी प्रकार कारण है जिस प्रकार शैलकण का' इस निदर्शन में परिणत

टिप्पणी-मम्मट ने अरने निदर्शना-लक्षण में उद्भट के इस निदर्शना-लक्षग अर्थात्- 'अभवन् वस्तुसंबन्धो भवन्वा यत्र कल्पयेत्। उपमानोपमेयत्वं कथ्यते सा निदर्शमा ।' (काव्यालक्कार सारसंग्रइ ५,१०) २४ का

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३७० काव्यप्रकाश:

( ११ अरप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार ) (१५१) अप्रस्तुतप्रशंसा या सा सैव प्रस्तुताश्रया ॥ ९८ ॥ अप्राकरणिकस्याभिधानेन प्राकरणिकस्याच्षेपोऽप्रस्तुत प्रशंसा। (अप्रस्तुत प्रशंसा के भेद प्रभेद ) (१५२) कार्ये निमित्तो सामान्ये विशेषे प्रस्तुते सति। तदन्यस्य वचस्तुल्ये तुल्यस्येति च पश्चधा ॥ ९९॥ तदन्यस्य कारणादे:। क्रमेणोदाहरणम्- (१ 'कार्य' प्रस्तुत रहने पर अरप्रप्रस्तुत कारण का वर्णन ) याता: किन्न मिलन्ति सुन्दरि ! पुनश्चिन्ता त्वया मत्कृते नो कार्या नितरां कृशाऽसि कथयत्येवं सबाष्पे मयि। लज्जामन्थरतारकेण निपतत्पीताश्रुणा चक्षुषा दृष्टा मां हसितेन भाविमरणोत्साहस्तया सूचितः । ४३६॥ का संक्षेप किया है। साथ हो साथ वामन के द्वारा निर्दिष्ट निदर्शन-अलक्कार के इस स्वरू अर्थात्- 'क्रिययैव स्वतदर्थान्वयख्यापनं निदर्शनम् (काव्यालंकार सूत्रवृत्ति ४. २०) को निदर्शना के एक प्रकार के रूप में माना है। मम्मट की माला-निदर्शना सम्बन्धी मान्यता का आधार रुय्यक की यह उक्ति अर्थात्- 'इयमपि क्वचिन्मालयापि भवन्ती दृश्यते। यथा- अरण्यरुदितं कृतं शवशरीरमुद्दर्तितं स्थलेऽब्जमवरोपितं सुचिरमूषरे वर्षितम्। श्वपुच्छुमवनामितं बधिरकर्णजाप: कृते धतोऽन्धमुखदर्पणो यदबुधो जनः सेवितः ॥' इत्यादि है। अनुवाद-'अप्रस्तुतप्रशंसा' वह अलंकार है जिसे अप्रस्तुत अथवा अप्रकृत (वस्तु) की ऐसी प्रशंसा अथवा वर्णना कहते हैं जो कि प्रस्तुत (अर्थात् प्रकृत) अर्थ की प्रतिपत्ति का आश्रय (निमित्त) हुआ करती है। 'अप्रस्तुतप्रशंसा' का अभिप्राय है अप्राकरणिक अर्थात् अप्रस्तुत (विषय) के प्रति- पादन के द्वारा प्राकरणिक (प्रस्तुत) विषय का आक्षेप अथवा प्रत्यायन। यह (अप्रस्तुतप्रशंसा) पांच प्रकार की है :- १ली-यदि 'कार्य' प्रस्तुत (प्राकरणिक हो तो अप्रस्तुत 'कारण' का वर्णन। २री-यदि 'कारण' प्रस्तुत रहे तो अप्रस्तुत 'कार्य' का निरूपण। ३री-यदि प्रस्तुत विषय 'सामान्य' हो तो अप्रस्तुत 'विशेष' का अभिधान। ४थी-यदि 'विशेष' प्रस्तुत हो तो अप्रस्तुत 'सामान्य' का कथन, और ५वीं-यदि परस्पर तुल्य वस्तुओं में से एक प्रस्तुत रहे तो दूसरी का, जो कि अप्रस्तुत है, प्रतिपादन। 'तद्न्यस्य' उस (अर्थात् प्रकृत कार्य आदि) से भिन्न के वर्णन का यहां अभिप्राय है (अप्रकृत) कारण आदि वर्णन का। इनके क्रमशः उदाहरण ये हैं :- (किसी प्रेमी का, अपने मित्र के प्रति, अपनी प्रिया का वृत्तान्त-वर्णन) जैसे ही आंखों से आंसू बहाते मैंने अपनी प्रियतमा से कहा-'प्रिये ! जाने वाले लोग तो लौट कर आया ही करते हैं। तब मेरे लौट आने की चिन्ता में क्यों घुलो ! क्यों अपनी देह गलाओ !' कि वह अपनी आंखों में आंसुओं को गिरने से रोकती हुई लज्त हो एकटक मुझे देखने लगी और एक दम हंस पड़ी जिससे यही पता चला कि उसका (मेरे वियोग में) अपने न बचने का निश्चय पक्का ह चुका है।'

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दशम उभ्मास: ३७१ WWWW अत्र प्रस्थानात्किमिति निवृत्तोऽसीति कार्ये पृष्टे कारणमभिहितम्। (२ 'कारण' प्रस्तुत रहने पर अरप्रप्रस्तुत कार्य का वर्णन ) राजन् ! राजसुता न पाठयति मां देव्योऽपि तूष्णीं स्थिता: कुब्जे ? भोजय मां कुमार ! सचिवैर्नाद्यापि कि भुज्यते। इत्थं नाथ ! शुकस्तवारिभवने मुक्तोऽष्वग: पञ्चरा- च्चित्रस्थानवलोक्य शून्यवलभावेकैकमाभाषते। ४४०॥ अत्र प्रस्थानोद्यतं भवन्तं ज्ञात्वा सहसैष त्वदरयः पलाथ्य गता इति कारणे प्रस्तुते कार्यमुक्त्कम्। (३ 'सामान्य' के प्रस्तुत रहने पर 'विशेष' का चर्णन) एतत्तस्य मुखात्कियत् कमलिनीपत्रे क्णं वारिणो यन्मुक्तामणिरित्यमंस्त स जडः शण्वन् यद्स्मादपि। अङ्गुल्यग्रलघुक्रियाप्रविलयिन्यादीयमाने शनैः कुत्रोड्डीय गतो ममेत्यनुदिनं निद्राति नान्त: शुचा ।। ४४१॥ अत्रास्थाने जडानां ममत्वसंभावना भवतीति सामान्ये प्रस्तुते विशेष: कथितः। (४ 'विशेष' के प्रस्तुत रहने पर 'सामान्य' का वर्णन ) सुहद्वधूबाष्पजलप्रमार्जनं करोति वैरप्रतियातनेन यः। स एव पूज्य: स पुमान् स नीतिमान् सुजीवितं तस्य स भाजनं श्रियः ॥४४२।। अत्र कृष्णं निहत्य नरकासुरवधूनां यदि दुःखं प्रशमयसि तत् त्वमेव श्लाध्य इति विशेषे प्रकृते सामान्यमभिहितम्। यहाँ प्रस्तुत विषय है 'प्रस्थान करने वाले थे, क्या रुक गये ?' यह (प्रस्थान- निवृत्तिरूप) कार्य-विषयक प्रश्न किन्तु वर्णन किया गया है (अग्रस्तुत) कारण (अर्थात् प्रिया के भावी मरणोत्साह) का। 'महाराज ! (आपके आक्रमण के भय से शून्य पढ़े) आपके शत्रु प्रासाद में पथिकों के द्वारा पिंजड़े से छुड़ाया गया पालतू सुरगा ऊपर की सूनी अटारी पर उड़ कर वहां चित्रित लोगों को देख एक-एक कर पूछ बैठता है-'राजन् ! राजकुमारी मुझे पढ़ाती नहीं' 'रानियाँ मुझसे कुछ बोलती नहीं' 'अरी कुड़ी दासी ! मुझे खिलाती क्यों नहीं!' और 'क्या राजकुमार और उनके साथी कुछ खाये पीये नहीं?' यहाँ जो प्रस्तुत विषय है वह तो है कारण अर्थात् विजय-यात्रा के लिये सन्नद्ध (यहाँ वर्णन के विषय) राजा का पता लगा कर उसके शत्रओं का सहसा घरबार छोड़ कर भाग खड़ा होना, किन्तु जिसका अभिधान किया गया है वह है (अप्रस्तुत) कार्य (अर्थात् शून्यभवन में चित्रलिखित राजवर्ग से पालतू सुग्गे का बोलना।) 'यह कौन सी बड़ी बात कि 'वह मूढ़ कमल के पत्ते पर पानी की बूँदों को मोती के दाने मान बठा'! अरे! इससे भी बढ़ कर तो यह है कि 'उसने उन पानी की बूँर्दों को अपनी अँगुली से उठाते ही उन्हें विलीन होते देख 'मेरा मोती कहाँ उड़ गया' कह-कह कर अपना मन मसोस लिया और चिन्ता के सारे सोना भी भूल गया !' यहाँ जो प्रस्तुत है वह तो है एक सामान्य विषय अर्थात् मूढ़ों की यों ही किसी वस्तु में ममता किन्तु जिसका वर्णन है वह है एक विशेष विषय (अर्थात् एक निर्दिष्ट मूढ़ की कमल-पत्र पर पड़े जलकण में मुक्ता की ममता, जो कि अप्रस्तुत है।) 'वही पूजा के योग्य है, वही पुरुष कहे जाने योग्य है, वही नीति-निपुण है, वही

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३७२ काव्यप्रकाश:

तुल्ये प्रस्तुते तुल्याभिधाने त्रयः प्रकारा श्लेष:, समासोक्ति, सादृश्यमात्रं वा तुल्यात्तुल्यस्य हि आच्षेपे हेतु: । क्रमेणोदाहरणम्- ( १ श्लेष हेतुका अ्रप्रप्रंस्तुतप्रशंसा ) पुंस्श्वादषि प्रविचलेद्यदि यद्यघोऽपि यायाद्यदि प्रणयने न महानपि स्यात्। ॥ अभ्युद्धरेत्तदपि विश्वमितीदृशीयं केनापि दिक प्रकटिता पुरुषोत्तमेन ।। ४४३ ।। ( २ समासोक्ति हेतुका अप्रप्रस्तुतप्रशंसा ) येनास्यभ्युदितेन चन्द्र ! गमितः क्लान्ति रवौ तत्र ते युज्येत प्रतिकत्तुमेव न पुनस्तस्यैव पादग्रहः। लक्ष्मी का भाजन है और है उसी का जीवन वस्तुतः जीवन जो कि शत्रुओं से वैर का बदला लेकर अपने मित्रों की स्त्रियों के आँसू पोछा करता है।' यहाँ जो प्रस्तुत है वह तो एक विशेष विषय अर्थात् (नरकासुर के मित्र शाल्व के प्रति उसके मंत्री की यह उक्ति कि) कृष्ण को मारकर यदि नरकासुर की रानियों का दुःख उसने दूर कर दिया तभी वह सबका प्रशंसनीय है (अन्यथा नहीं), किन्तु जिसका वर्णन किया गया है वह है एक सामान्य विषय (अर्थात् जो भी वैर का बदला लेता है वह प्रशंसनीय है इत्यादि)। तुल्य विषय के प्रस्तुत रहने पर तत्तुल्य अप्रस्तुत विषय के वर्णन के तीन प्रकार संभव हैं क्योंकि श्लेष (अर्थात् विशेषण और विशेष्यवाची सभी पदों की उभयार्थकता), समासोक्ति (अर्थात् विशेषणवाची पद की उभयार्थ-बोधकता और (श्लेष के अभाव में भी) सादृश्यमात्र के सद्भाव से ही ऐसा संभव है कि एक (प्रस्तुत) तुल्य विषय के अभिधान से उसके तुल्य अन्य (अप्रस्तुत) विषय का आक्षेप अधवा प्रत्यायन हो जाय। इसके क्रमशः उदाहरण ये हैं :- '(प्रस्तुत राजविषयक अर्थ) शौर्य से भी च्युत हो जाय, वैभव से भी हाथ धोले और सहायता की याचना से तुच्छ भी बन जाय किन्तु तब भी शत्रुओं से छीना गया अपना राज्य पुनः हस्तगत कर ले-यह है वही रीति जो कि किसी महापुरुष राजा ने प्रदर्शित की है ! (तब भला महाराज ! आप इसे क्योंकर नहीं कर दिखाते?) और इससे आच्िप्त- [ '(अप्रस्तुत विष्णुविषयक अर्थ) मोहिनीरूप में पुरुषत्व से भी रहित हो जाँय, कूर्मावतार में पातालगमन भी कर लें और वामनरूप में बलि के आगे याचक भी बन बैठे किन्तु तब भी समस्त विश्व का भरण-पोषण करते रहे-यह है वह रीति जो उस अलौकिक विष्णुमूर्ति परमपुरुष ने प्रकट कर दिखाई है !' यहाँ जो अप्रस्तुतप्रशंसा है वह श्लेषहेतुका अप्रस्तुतप्रशंसा है क्योंकि वर्णन के लिये प्रस्तुत जो विषय है वह तो है एक राजा और उसके तुल्य भगवान् विष्णु का जो वर्णन हो रहा है वह है एक अप्रस्तुत विषय। अब यहाँ विशेष्यवाचक पद 'पुरुषोत्तम' तथा विशेषणवाचक अन्य समस्त पद श्लिष्ट हैं इसलिए इसे श्लेषहेतुका अप्रस्तुतप्रशंसा कहा जाता है। ] 'अरे चन्द्र ! जिस सूर्य के उदय में तुम ज्योत्स्नाहीन हो जाया करते हो उसके प्रति जहाँ तुम्हें प्रतीकार की भावना उचित है वहाँ तुम उलटे उसका पादग्रहण-उसकी किरणों का अपने में आधान-किया करते हो! यदि यह कहो कि क्षीण-कलाहीन-होने के कारण ऐसा हुआ तब तो तुम्हें लज्जत होना चाहिए न कि व्योम मण्डल में अभिमान के

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दशम उल्लास: ३७३

क्षीोनैतदनुष्ठितं यदि ततः कि लज्जसे नो मना- गस्त्येवं जडधामता तु भवतो यद्वयोम्नि विस्फूर्जसे ॥४४४॥। ( ३ सादृश्यमात्रहेतुका अ्र्प्र प्रस्तुतप्रशंसा ) आदाय वारि परितः सरितां मुखेभ्यः किन्तावदर्जितमनेन दुरर्णवेन। क्षारीकृतं च बडवादहने हुतं च पातालकुक्षिकुहरे विनिवेशितं च ।। ४४५॥ इयं च काचित् वाच्ये प्रतीयमानार्थाऽनध्यारोपेणैव भवति यथा- अब्घेरम्भः स्थगितभुवनाभोगपातालकुत्तेः पोतोपाया इह हि बहवो लंघनेऽपि क्षमन्ते। आहो रिक्तः कथमपि भवेदेष दैवात्तदानी को नाम स्यादवटकुहरालोकनेऽप्यस्य कल्पः ॥४४६॥ क्वचिदध्यारोपेणैव यथा-

साथ उदित दिखाई देना चाहिए ! यह सब तुम्हारी जडधामता-शीत चन्द्रिका-का प्रभाव नहीं तो और क्या है?' [ यहाँ जो अप्रस्तुतप्रशंसा है वह है समासोक्तिहेतुका अप्रस्तुतप्रशंसा क्योंकि अप्रस्तुत विशेष्यवाचक 'चन्द्र' और 'रवि' पद के अश्लिष्ट होने पर भी विशेषणवाचक अन्य पदों के श्लेष-माहात्म्य से एक प्रस्तुत विषय का आक्षेप हो रहा है जो कि किसी निर्धन और सधन व्यक्ति का वृत्तान्त है।] 'इस तार सागर ने सभी ओर से सरिताओं के संगमों से पानी ले-ले कर क्या कर लिया! मीठे पानी को या तो खारा कर दिया या बाडवाग्नि में जला दिया या पाताल के पेट में पहुँचा दिया।' [यहाँ सादृश्यमात्रहेतुका अप्रस्तुतप्रशंसा इसलिए है क्योंकि अप्रस्तुत क्षारसागर के वर्णन से, एक प्रस्तुत असत्पुरुष का वर्णन हो रहा है जिसमें न तो विशेष्य और विशे- षण वाचक पद ही श्लिष्ट हैं और न श्लिष्ट विशेषण की ही महिमा छिपी है। ] (तुल्य विषय के प्रस्तुत रहने पर तत्तुल्य अप्रस्तुत विषय के वर्णन में होने वाली) यही अप्रस्तुतप्रशंसा एक और ही प्रकार की तब हो जाती है जब कि :- (१) एक वाच्य अप्राकरणिक अर्थ पर, उसके उपपन्न रहने के कारण, किसी व्यङ्ग्य आकरणिक अर्थ का आरोप न किया जाय। जैसे कि :- 'यह तो संभव है कि एक को कौन कहे अनेकों सामुद्रिक व्यवसायी उस समुद्र को पार कर जाँय जिसकी जलराशि पृथिवी के विस्तार और पाताल के पेट पर एक साथ छा सकती है किन्तु ऐसा कौन है जो उसके विशाल गम्भीर गर्त को उस समय देख सके जब कि दैववश उसका पानी कहीं सूख जाय !' [ यहाँ एक प्रतीयमान अर्थ है जो कि यह है-किसी अत्याचारी दुष्ट राजा का दरिद्र हो जाने की अपेक्षा समृद्ध रहना कहीं अच्छा है। किन्तु इस प्रतीयमान अर्थ का यहाँ वाच्यार्थ पर कोई आरोप इसलिए नहीं किया गया क्योंकि वह (वाच्यार्थ) स्वतः ही संभाव्यमान अथवा उपपन्न है।] (२) यही (अप्रस्तुतप्रशंसा ) तब भी संभव है जब कि वाच्यार्थं पर उसके अनुपपन्न हो सकने के कारण व्यङ्गयार्थ का आरोप कर दिया जाय। जैसे कि :-

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३७४ काव्यप्रकाश:

कस्त्वं भोः ? कथयामि दैवहतकं मां विद्धि शाखोटकं वैराग्यादिव वक्षि साधु विदितं कस्मादिदं कथ्यते। वामेनात्र वटस्तमध्वगजनः सर्वात्मना सेवते न च्छायाऽपि परोपकारकरणे मार्गस्थितस्यापि मे ॥ ४४७॥ क्वचिदंशेष्वन्यारोपेण यथा- सोऽपूर्वो रसनाविपर्ययविधिस्तत्क्णयोश्च्ापलं दृष्टि साः मद्विस्मृतस्वपरदिक किभूयसोक्तेन वा। सर्व विस्मृतवानसि ध्रमर ! हे यद्वारणोऽद्याप्यसौ अन्तः शून्यकरो निषेव्यत इति भ्रातः ! क एष ग्रहः ॥ ४४८ ॥ अत्र रसनाविपर्यासः शून्यकरत्वं च भ्रमरस्यासेवने न हेतुः कर्णचापलं तु हेतु: मदः प्रत्युत सेवने निमित्तम्। '(पथिक पूछता है) अरे ! कौन हो तुम? ( श्मशान का पेड़ उत्तर देता है) भाई क्या बताऊँ! यही समझ लो कि मैं दुर्भाग्य का मारा कोई हूँ। (पथिक) बड़े विरक्त होकर बोल रहे हो? (वृक्ष) तब तो तुम मुझे जान ही गये किन्तु ऐसा क्यों है? यह तो सुन लो-हमारी बांयी ओर जो वट-वृक्ष है उसकी छाया का सहारा तो पथिक जन बड़े आदर से लिया करते हैं किन्तु रास्ते में खढ़े हुए भी मेरी छाया ऐसी है जिसका कोई भी उपयोग नहीं, जिससे किसी का कुछ भला नहीं।' [यहाँ जो प्रतीयमान अर्थ है वह है किसी अधम जाति के दानी का, किसी सत्पात्र के द्वारा, उसका दिया कुछ न लेने से, निर्वेद। यहाँ इस प्रतीयमान अर्थ का आरोप इसलिए आवश्यक है क्योंकि अचेतन वाच्यार्थभूत शाखोटक के साथ किसी चेतन व्यक्ति की उक्किप्रत्युक्ति की उत्पत्ति नहीं हो सकती। प्रदीपकार का इसलिये यहाँ यह कहना है-'अत्र वाध्यशाखोटके संबोध्यत्वोच्चारयितृत्वादिकमनुपपन्नमिति प्रतीय- मानाध्यारोप:।'] (३) यही (अप्रस्तुतप्रशंसा ) कभी कहीं वाच्यार्थ पर व्यङ्गार्थ के अंशतः आरोप में भी हुआ करती है। जैसे कि :- 'अरे भ्रमर ! क्या यह सब कुछ भूल पड़े कि जिसकी जिह्वा भी अपूर्व रूप से विपर्यस्त (उलटी-अग्निशाप से हाथी की जिह्वा-परिवृत्ति पुराणों में वर्णित) है (अर्थात् जिसके कुछ बोलने का कोई ठिकाना नहीं), जिसके कान सदा चज़्ल रहा करते हैं [ जो किसीके कुछ भी कहने से अपना मन बदल डालता है] और वस्तुतः अधिक कुछ कहने-सुनने से क्या! जिसकी आंखें निरन्तर मदजल के गिरते रहने से अपने-पराये का मार्ग नहीं देख पातीं [ जो मदावलेप के कारण अच्छेबुरे की पहचान नहीं कर पाता ] उसी अस्थि मांसरहित शुण्डादण्ड वाले [ निर्धन ] वारण [मत्त गजराज-सेवक के निरादर करने वाले स्वामी] की सेवा में अपने आपको खपाये जा रहे हो! यह सब तुम्हारा कैसा दुराग्रह!' [ यहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा इस प्रकार है-'गज' और 'अरमर' का वृत्तान्त, जिसका यहां वर्णन हो रहा है, अप्रस्तुत है और इसके सदृश निरादरकर्त्ता और भक्त-स्वामी और सेवक का जो वृत्तान्त है वह श्लेष की महिमा से आकिप्त है।] यहाँ 'रसनाविपर्यय' (जिह्वा के विपर्यस्त होने) 'अन्तःशून्यकरत्व' (सूंड के भीतर से खोखले होने) को तो भ्रमर के लिये गज-सेवा से मुँह मोड़ने का हेतु कहा नहीं जा सकता (और इसलिये इस अंश में वाच्य-गज भ्रमररूप अर्थ पर व्यङ्ग्य सेव्य- सेवकरूप अर्थ का आध्यारोप अपेक्षित है।) किन्तु 'कर्णचापल' (कानों का बार-बार फटफटाते रहना) तो इसका हेतु अवश्य है (जिससे इस अंश में वाच्यार्थ पर व्यङ्गयार्थ

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दशम उल्लास: ३७५

( १२ अतिशयोक्ति-अप्रल्गार ) (१५३) निगीर्याध्यवसानन्तु प्रकृतस्य परेण यत् । प्रस्तुतस्य यदन्यत्वं यद्यर्थोक्तौ च कल्पनम् ॥ १०० ॥। कार्यकारणयोर्यश्र पौर्वापर्यविपर्ययः। विज्ञेयाऽतिशयोक्ति: सा

का आरोप आवश्यक नहीं) अब 'मद' के सम्बन्ध में तो यह ठीक ही है कि यह भ्रमर की गज-सेवा का हेतु है (और ऐसा होने से यहाँ भी गज-भ्रमररूप वाच्यार्थ में सेव्य- सेवकरूप व्यङ्ग्यार्थ का अध्यारोप उचित ही है)। टिप्पणी-मम्मट ने अपने अप्रस्तुत प्रशंसा-लक्षण में उद्ट की इस आप्रस्तुत प्रशंसा- परिभाषा अर्थात्- अधिकारादपेतस्य वस्तुनोऽन्यस्य या स्तुतिः। अप्रस्तुतप्रशंसेयं प्रस्तुतार्थानुबन्धिनी ॥' (काव्यालंकार सारसंग्रह ५.८) का परिष्कार किया है। यद्यपि-भामह अभवा उद्भट ने अप्रस्तुत की प्रशंसा द्वारा प्रस्तुत के अभिधान में कोई कारण गवेषणा नहीं की है किन्तु उद्भट के व्याख्याकार श्री प्रतीहार इन्दुराज ने, जैसा कि काव्यालंकारसारसंग्रहवृत्ति की इन पंक्तियों- 'अधिकारादुपवर्णनावसरादपगतस्य प्राकरणिकादपरस्य वस्तुनो यत्रोषनिबन्धः सा अप्रस्तुतप्रशंसा। न चैवमपि तस्या उन्मत्तप्रलापप्रख्यता यतः सा केनचित् स्वजन्येन (सम्बन्धेन) प्रस्तुतमर्थमनुबध्नाति।' से स्पष्ट है, अप्रस्तुत-वर्णन से प्रस्तुत के प्रत्यायन में एक सम्बन्ध का उल्लेख अवश्य किया है:। यह सम्बन्ध क्या है? इसका विशद निरूपण तो अलंकारसवंस्वकार का किया हुआ है जैसा कि इन पंक्तियों अर्यात्- 'न चाऽप्रस्तुतादसंबन्धे प्रस्तुतप्रतीतिः अतिप्रसङ्गात्। संबन्धे तु भवन्ती न त्रिविधं संबन्धमतिवर्त्तते । तस्यैवार्थान्तरप्रतीतिहेतुत्वोपपत्तेः । त्रिविधश्च संबन्धः-सामान्य- विशेषभावः, कार्यकारणभावः, सारूप्यं चेति।' में स्पष्ट है। अप्रसीतुत-प्रशंसन से प्रस्तुत की प्रतीति में यही त्रिविध सम्बन्ध 'अप्रस्तुतप्रशंसा' के भेद-निर्शय का भ आधार है। इसी संबन्ध की दृष्टि से 'अप्रस्तुत' प्रशंसा' के ये भेद रुय्यक ने गिनाये हैं :- (क) सामान्यविशेषभावरूप सम्बन्ध में :- १. सामान्य से विशेष की प्रतीति। २. विशेष से सामान्य की प्रतीति। (ख) कार्यकारणभावरूप सम्बन्ध में :- १. कार्य से कारण की प्रतीति। २. कारण से कार्य की प्रतीति। (ग) सारूप्य संबन्ध में :-- १. साधर्म्यपूर्वक-तुल्य से तुल्य की प्रतीति २. वैधर्म्यपूर्वक-तुल्यसे तुल्य की प्रतीति। मम्मट ने यद्यपि अप्रस्तुत प्रशंसा के ही भेद बताये हैं जो कि रुय्यक के अनुसार सिद्ध हैं किन्तु अप्रस्तुत से प्रस्तुत के अभिधान में विभाजकरूप से उपयुक्त त्रिविध सम्बन्ध का उल्लेख नहीं किया है। तुल्य से तुल्य की प्रतीति में अप्रस्तुतप्रशंसा के विवेचन में मम्मट ने कुछ और विशेषता दिखाई है जो कि रुय्यक के अलंकारसर्वस्व में अस्पष्ट है। अनुवाद-'अतिशयोकि' वह अलंकार है जिसमें (१) उपमेय का ऐसा अध्यवसान कारपनिक अभेद-निश्चय किया जाय कि वह उपमान में पृथक निर्दिष्ट न दिखाई दे (अर्थात् उपमेय का उसके वाचक शब्द से ग्रहण न हो), (२) वर्ण्य विषय का उससे

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३७६ काव्यप्रकाश:

( १ ली तरपरतिशयोक्ति ) उपमानेनान्तर्निगीर्णस्योपमेयस्य यद्ध्यवसानं सैका यथा- कमलमनम्भसि कमले च कुवलये तानि कनकलतिकायाम्। सा च सुकुमारसुभगेत्युत्पातपरम्परा केयम् ॥४४६॥ अत्र मुखादि कमलानिरूपतयाऽध्यवसितम्। ( १री अर्प्रतिशयोक्ति) यच्च तदेवान्यत्वेनाध्यवसीयते साडपरा यथा- अण्णं लडहत्तणअं अण्णा विआ का वि वत्तणच्छाआ। सामा सामण्णपआवइणो रेह च्चिअ ण होई ॥ ४५० ॥ (अन्यं यत्सौकुमार्यमन्यैव च काऽपि वर्तनच्छाया। श्यामा सामान्यप्रजापतेः रेखैव च न भवति ॥) (३री अरप्र तिशयोक्ति ) 'यद्यर्थस्य' यदिशब्देन चेच्छव्देन वा उक्तौ यत्कल्पनम् (अर्थादसम्भ- विनोऽर्थस्य) सा तृतीया। यथा- राकायामकलङ्कं चेदमृतांशोर्भवेद्वपुः । तस्या मुखं तदा साम्यपराभवमवाप्नुयात् ॥४५१॥ भिन्न प्रकार से वर्णन किया जाय, (३) 'यदि' शब्द के अभिप्राय में किसी असंभाव्य अर्थ की कल्पना की जाय और (४) कार्य तथा कारण के पौर्वापर्य-पूर्वापरभाव का वैपरीक्य प्रदर्शित किया जाय। वह अर्थात् पहली अतिशयोक्ति, जिसमें उपमान में अन्तर्मग्न (अर्थात् अपने स्वरूप में अनुपस्थित अथवा अपने वाचक शब्द के द्वारा अनुपात्त) उपमेय का अध्यवसान अथवा काल्पनिक अभेद-निश्चय किया हुआ रहता है जैसे कि :- 'विचित्रता की यह बात कैसी! बिना जल के कमल (नायिका का मुख) खिल उठा, कमल पर नीलोत्पल युगल (नायिका के दोनों नेत्र) निकल पड़े, ये कमल और कुवलय कनकलता (नायिका की अंगयष्टि) पर आ विराजे और यह कनकलता भी ऐसी- वैसी नहीं अपितु सुन्दर और सुकुमार, कोमल और मनोहर।' यहाँ कमल इत्यादि (उपमानों) के साथ मुख इत्यादि ( उपमेयों) के तादात््य का अध्यवसान-काल्पनिक दृढनिश्चय किया गया है (अर्थात् उपमान और उपमेय के परस्पर भिन्न होने पर भी उपमान का तादात्म्य उपमेय में प्रदशित हुआ है।) दूसरी अतिशयोक्ति जिसमें प्रस्तुत विषय अपने भिन्नरूप में वर्णित हुआ करे, जैसे कि- 'इसकी सुकुमारता कुछ और! शरीर-शोभा भी कुछ और ! इस नचयौवना को उसने नहीं रचा जो सबको रचा करता है !' [यहाँ भभेद में भेद का अध्यवसाय है क्योंकि प्रस्तुत नायिका-सौन्दर्य के लोक- प्रसिद्ध स्त्री-सौन्दर्य होने पर भी प्रस्तुत नायिका सौन्दर्य को स्त्री-सौन्दर्य से भिन्न भेद प्रदर्शित किया गया है। ] तीसरी अतिशयोक्ति, जिसमें 'यदि' अथवा 'चेत्' शब्द के द्वारा किसी ऐसे अर्थ की कल्पना की जाय जिसकी संभावना न हो, जैसे कि- 'यदि पूर्णिमा की रात में ऐसा चन्द्र निकले जिसमें कोई कलङ्क न हो, तब कहीं उससे अपनी समानता देख हसं (अद्भुत सुन्दरी) का मुख अपना कोई अपमान समझे!' [यहाँ पूर्वाद में जो पूर्णिमा के चन्द्र में कलक्ट के अभाव की कल्पना है वह तो

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दशम उल्लास: ३७७

(४थी अतिशयोक्ति ) कारणस्य शीघ्रकारितां वक्तुं कार्यस्य पूर्वमुक्तौ चतुर्थी यथा- हृदयमधिष्ठितमादौ मालत्याः कुसुमचापबाेन। चरमं रमणीवल्लभ ! लोचनविषयं त्वया भजता ॥ ४५२॥ ( १३ प्रतिवस्तूपमा अप्रलंकार ) (१५४ ) प्रतिवस्तूपमा तु सा ।। १० १ ।। सामान्यस्य द्विरेफस्य यत्र वाक्यद्ये स्थितिः ।

असम्बन्ध में सम्बन्ध की कल्पना है और उत्तरार्द्ध में नायिका के मुख और चन्द्रमा के पूर्ण बिम्ब में साम्यरूप सम्बन्ध होने पर भी जो असम्बन्ध की कल्पना है वह है सम्बन्ध में असम्बन्ध की कल्पना। ] चौथी अतिशयोक्ति वह है जिसमें कारण की कार्यकारिता की शोघ्रता बताने के लिए कार्य का कारण के पहले ही निष्पन्न होना बता दिया जाय। जैसे कि- 'नायिकाओं के प्रेमी नवयुवक ! यह रही मालती जिसके हृदय पर पहले तो उसका अधिकार हुआा जिसके धनुष और बाण दोनों कुसुम के हैं और बाद में उसका जिस पर उसकी निगाह पड़ी और वह हो तुम !' (दामोदर गुप्त, कृट्टनीमत १६) [यहां कारण तो है नवयुवक का मालती के द्वारा देखा जाना और कार्य है मालती के हृदय में उसके प्रति प्रेम का उत्पन्न होना, किन्तु कारण की कार्यकारिता की शीघ्रत बताने के लिये वर्णन किया गया कार्य का ही पहले हो चुकना अर्थात् मालती के हृदय में इस नवयुवक के देखने के पहले ही उसके प्रति प्रेम का उत्पन्न हो जाना।] टिप्पणी-'अतिशयोक्ति' के स्वरूप तथा भेद-निणय में सर्वप्रथम महत्त्व उद्भट का है। 'भामह' के इस अतिशयोक्ति-निरूपण अर्थात्- 'निमित्ततो वचो यत्तु लोकातिक्रान्तगोचरम् । मन्यतेतिशयोक्तिं तामलङ्कारतया बुधाः ॥'

अथवा दण्डी के इस अतिशयोक्ति-निरूपण अर्थात् -- (काव्यालक्कार २. ८१.)

'विवत्ा या विशेषस्य लोकसीमातिवर्तिनी। असावतिशयोक्तिः स्यादलंकारोत्तमा बुधाः॥

में 'अनिशयोक्ति' का वह रूप स्पष्ट नहीं जो कि उद्भट ने अपनी इस परिभाषा अर्थात्- (काव्यादर्श २. २१४ )

'निमित्ततो वचो यत्त लोकातिक्रान्तगोचरम्। मन्यतेऽतिशयोक्तिं तामलङ्कारतया बुधाः ॥ भेदेऽनन्यत्वमन्यत्र नानात्वं यत्र बध्यते। तथा संभाव्यमानार्थनिबन्धेऽतिशयोक्तिगीः ॥ कार्यकारणयोर्यत्र पौर्वापर्यविपर्ययात्। आशुभावं समालम््य बध्यते सोडपि पूर्ववत्।'

द्वारा स्रष्ट किया है। (काव्यालङ्कारसारसंग्रह २. ११-१३) मम्मट ने उद्मट की ही दृष्टि अपनायी है किन्तु 'निगीर्याध्यवसानं तु प्रकृतस्य परेण यत्' की अतिशयोक्ति-धारणा मम्मट की अपनी है जिसका आगे के आलक्कारिकों ने स्वागत किया है। मम्मट का यही 'निगीर्याध्यवसान' मम्मट के बाद अलक्कारशास्त्र में अतिशयोक्ति की रूप-रेखा के रूप में माना गया है जो कि पण्डितराज जगन्नाथ के इस अनिशयोक्ति लक्षग अर्थात्- 'विषयिणा विषयस्य निगरणमतिशयः, तस्योक्तिः (अतिशयोक्तिः )' में स्पष्ट झलक रहा है। अनुवाद-'प्रतिवस्तूपमा' वह अलद्कार है जिसमें एक ही साधारण धर्म का, उपमान वाक्य और उपमेयवाक्य-दोनों वाक्यों में, दो बार उपादान ('कथितपदता' दोष के निवारण के लिए भिन्न-भिन्न शब्द द्वारा कथन) हुआ करता है।

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३७८ काव्यप्रकाश:

साधारणो धर्मः उपमेयवाक्ये उपमानवाक्ये च कथितपदस्य दुष्टतयाऽ- भिहितत्वात् शब्दभेदेन यदुपादीयते सा वस्तुनो वाक्यार्थस्योपमानत्वात् प्रतिवस्तूपमा। यथा- देवीभावं गमिता परिवारपदं कथं भजत्वेषा। न खलु परिभोगयोग्यं दैवतरूपाङ्कितं रत्नम् ॥ ४५३ ॥ यदि दहत्यनलोऽन्र किमद्भुतं यदि च गौरवमद्रिषु किन्ततः । लवणमम्बु सदैव महोद्धे: प्रकृतिरेव सतामविषादिता ॥४५४॥ इत्यादिका माला प्रतिवस्तूपमा द्रष्टव्या। एवमन्यत्राप्यनुसत्तव्यम्।। ( १४ दृष्टान्त अलंकार) (१५५) दृष्टान्तः पुनरेतेपां सर्वेषां प्रतिबिम्बनम् ॥ १०२॥ 'प्रतिवस्तूपमा' का अभिप्राय है वस्तु अर्थात् वाक्यार्थ का उपमानरूप से उपस्थित रहना और यह तब संभव है जब कि उपमेयवाक्य और उपमानवाक्य-दोनों वाक्यों में एक ही साधारण धर्म का भिन्न-भिन्न शब्दों द्वारा कथन किया जाय जिसमें 'कथितपदता' जिसे एक दोष कहा गया है, न हो सके। उदाहरण के लिये :- 'महाराज ! जिसे आपकी महारानी होने का सौभाग्य प्राप्त है वह अब अन्तःपुर की सामान्य रमणी कैसे बन जाय। वह रत्न, जिस पर देवता की मूर्ति अंकित हो, भला आभूषण के काम में कभी कैसे लाया जाय !'प्रतिवस्तूपमा की मालारूप से भी रकना दिखाई देती है। जैसे कि :- 'यदि अग्नि में दाह है तो आश्चर्य क्या! यदि पर्वतों में गौरव है तो क्या हुआ ! यदि महासागर का जल खारा है तो कौन सी नयी बात ! और यदि विषण्ण नहीं होना महापुरुषों का स्वभाव है तो संदेह क्या !' इत्यादि प्रसङ्गों में स्पष्ट है। यही माला-प्रतिवस्तूपमा अन्यत्र भी (जैसे कि वहाँ जहां वैधम्यं विवत्ित है) देखी जा सकती है। [ यहां उपमेय वाक्य है-'प्रकृतिरेव सतामविषादिता' और उपमानवाक्य एक नहीं तीन २ हैं-'यदि दहत्यनलोऽत्र किमन्भुतम्', 'यदि च गौरवमद्रिपु किं ततः', और 'लवण- मम्बु सदैव महोदधेः'। इस प्रकार यहां एक उपमेय वाक्य का तीन उपमान वाक्यों से औपम्य प्रदर्शित किया जा रहा है। यहां जो साधारण धर्म है वह तो एक प्रकार का ही है अर्थात् वस्तुओं के स्वभाव के सम्बन्ध में किसी प्रकार का आश्चर्य न करना, किन्तु इसका चारों वाक्यों में भिन्न-भिन्न शब्दों जैसे कि 'किमन्भुतम्' 'किं ततः' 'सदैव' और 'प्रकृतिरेव' के द्वारा कथन किया जा रहा है।] टिप्पणी-'प्रतिवस्तूपमा' का शब्दार्थ है 'प्रतिवस्तु प्रतिवाक्यार्थमुपमा साधर्म्य साधारणधर्मो वाडस्याम्' अर्थात् वह अलङ्कार जिसमें प्रत्येक वाक्यार्थं (उपमेयविषयक किंवा उपमानविषयक्र) में उपमा अर्थात् साधर्म्य का कथन हो। तात्पर्य यह है कि उपमा में पदार्थो का वाच्यरूप से साम्य विवक्षित है किन्तु प्रतिवस्तूपमा में वाक्यार्थों का जो साम्य अभिप्रेत है वह वाच्यरूप से नहीं अपितु गम्यरूप से अभिप्रेत है। उपमा में पदार्थों का औपम्य शाब्दिक है और प्रतिवस्तूपमा में जो वाकयार्थों का औपम्य है वह है आर्थिक। यह प्रतिवस्तूपमा 'केत्रल' और 'माल।' दोनों प्रकार से रची जाया करती है और जैसे यह साधर्म्य में संभव है वैसे ही वैधर्म्य में भी। अनुवाद-दष्टान्त वह अलङ्कार है जिसमें उपमेय वाक्य और उपमान वाक्य-दोनों वाक्यों में इन सबका अर्थात् उपमान, उपमेय और साधारण धर्म का विस्वप्रतिबिस्वभाव झलका करता है।

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दशम उल्लास: ३७६

एतेषां साधारणधर्मादीनाम् दष्टोऽन्तो निश्चयो यत्र स दष्टान्तः । त्वयि दृष्ट एव तस्या निर्वाति मनोभवज्वलितम्। आलोके हि हिमांशोर्तिकसति कुसुमं कुमुद्वत्याः ॥४५५॥ एष साधर्म्येण, वैधर्म्येण तु- तवाहवे साहसकमशर्मणः करं कृपाणान्तिकमानिनीषतः । भटा: परेषां विशरारुतामगुर्दधत्यवाते स्थिरतां हि पासवः ॥४५६॥

यहाँ 'एतेषाम्'-'इन सबका' का अभिप्राय है साधारण धर्म आदि का और 'दष्टान्त' कहते हैं दृष्टान्तभूत वाक्यार्थ में दार्ष्टान्तिक वाक्यार्थ के अन्त अथवा प्रामाण्य निश्चय को और ऐसा जहां हो वह अलंकार। जैसे कि :- 'काम-संतप्त उस (नायिका का) मन तुम्हारे दर्शनमात्र से शान्त हो जाता है क्योंकि इन्द्र के देखने मात्र से ही तो कुमुदिनी का फूल खिल उठता है।' [यहां नायक और चन्द्र, नायिका और कुमुदिनी, मन और कुसुम, मनोभवसंतप्त और सूर्यकिरणदग्ध तथा प्रसन्नता और विकास में विम्बप्रतिबिम्बभाव झलक रहा है। साथ ही साथ दृष्टान्त वाक्यार्थ अर्थात् 'आलोके हि हिमांशोविकसति कुसुमं कुमुद्दत्याः' में दार्श्टान्तिक वाक्यार्थ अर्थात् 'त्वयि दृष्ट एव तस्या निर्वाति मनो मनोभवज्वलितम्' का प्रामाण्य निश्चय भी हो रहा है क्योंकि नायकदर्शन और कामसंताप-निर्वाण में जो कार्यकारणभाव अभिप्रेत है उसकी व्याप्ति का निश्रय दृष्टान्तवाक्य में अभिप्रेत हिमांशु- दर्शन और कुमुद्वती-विकास में स्पष्ट हो जाता है।] यह जो दृष्टान्त अलङ्कार है उसमें साध्म्यं अथवा साधारण धर्म रूप सम्बन्ध का कथन है। अब वैधर्म्य अथवा विरुद्ध धर्म सम्बन्ध के द्वारा भी 'दष्टान्त' संभव है जो कि इस उदाहरण से स्पष्ट है- 'सहाराज ! जब रणाङ्गण में साहसिक कर्मों में ही संतुष्ट होने वाले आप अपना हाथ अपनी तलवार के पास ले जाना चाहते हैं तब यही होता है कि शत्रुओं के सैनिक भाग खड़े होते हैं क्योंकि वायु के न बहने पर ही तो धूलिकण इधर-उधर नहीं उड़ा करते!' [ यहाँ 'दधत्यवाते स्थिरतां हि पांसवः' इस दृष्टान्त वाक्य और 'तवाहवे' इत्यादि दार्ध्टान्तिक वाक्य में साधर्म्य का नहीं अपितु वैधर्म्य का प्रदर्शन है किन्तु 'दधत्यवाते स्थिरतां हि पांसवः' का वैधर्म्य 'वाते तु पांसवः स्थिरतां न दधति' इस साधर्म्य में ही अन्त होता है और इस प्रकार यहाँ 'दष्टान्त' अलंकार दिखाई देता है। यहाँ बिम्बप्रति विम्ब भाव भी स्पष्ट प्रतीत होता है क्योंकि शत्रुसैनिक और धूलिकण किंवा पलायन और अस्थैर्य में परस्पर जो सम्बन्ध है वह उपमानोपमेयभाव का ही सम्बन्ध है। टिप्पणी-दृष्टान्त में भी वाक्यार्थो का ही औपम्य अभिप्रेत रहा करता है और यह शब्द- बोध्य नहीं अपितु अर्थ-गम्य हुआ करता है। यहां दृष्टान्त वाक्य के उपमान, उपमेय और साधारण धर्म के दार्ध्टान्तिक वाक्य में प्रतिबिम्बित होने का अभिप्राय है दृष्टान्त वाक्य के उपमानादि और दार्ष्टान्तिक वाक्य के उपमानादि में बिम्बप्रतिबिम्बभाव का होना। इनमें बिम्बप्रतिबिम्बभाव होने का तात्पर्य है इनका भिन्न-भिन्न होना न कि एकरूप से रहना। 'बिम्बप्रतिबिम्बभाव' कहते हैं दो वस्तुओं (दो अ्थो) के दो बार उपादान-कथन को-'दयोरथयोदिरुपादानं बिम्चप्रतिनिम्बभावः' (प्रतापरुद्रयशोभूषण)। 'बिम्वप्रतिबिम्बभाव' तभी संभव है जब विशेष्य और विशेषण दोनों में सादृश्य का निर्देश हो न कि एकत्व का। आचार्य अप्पयदीक्षित का इसीलिये कथन है-'वस्तुचे भिन्नयोरप्युपमानोपमेयध्मयोः परस्पर सादृश्यादभिन्नयोः पृथगुपादानं बिम्बनतिबिम्वमावः।' 'दृष्ान्त' में तो बिम्ब प्रतिबिम्बभाव' अपेक्षित है किन्तु प्रतिबस्तूपमा में 'वस्तु-प्रतिवस्तुमाव' और इसीलिये

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३८० काव्यप्रकाश: M. (१५ दीपक अलंकार) (१५६) सकृद्व्ृत्तिस्तु धर्मस्य प्रकृताप्रकृतात्मनाम् । सैव क्रियासु वह्वीषु कारकस्येति दीपकम् ॥ १०३ ॥ ( १ क्रियादीपक ) प्राकरणिकाप्राकरणिकानामर्थादुपमानोपमेयानां धर्मः क्रियादि: एकतार- मेव यदुपादीयते तत् एकस्थस्यव समस्तवाक्यदीपनाद दीपकम्, यथा- किवणाणं धणं णाआणं फणमणी केशराइ सीहाणं। कुलवालिआणं त्थणआ कुतो छिप्पन्ति अमुआणम्॥४५७ ॥ (कृपणानां धनं नागानां फणमणि: केसराः सिंहानाम्। कुलबालिकानां स्तना: कुतः स्पृश्यन्तेऽमृतानाम् ॥) ( २ कारकदीपक ) कारकस्य च बह्वीपु क्रियासु सकद्वृत्तिर्दीपकम्, यथा- ये दोनों दो भिन्न-भिन्न स्वरूप के अलकार हैं। 'वस्तु-प्रतिवस्तुमाव' का अर्थ है एक अर्थ का दो शब्द्रों के दारा अभिधान अथवा कथन-'एकस्यार्थस्य शब्द्रद्येनाभिधानं वस्तुप्रतिवस्तुमावः।' अनुवाद-'दीपक' वह अलंकार है जिसमें ( १) प्रकृत (उपमेय) और अप्रकृत (उपमान) के (गुणक्रियादि रूप) धर्म का एक बार उपादान अथवा कथन हुआ करता है और (२) साथ ही साथ वह भी 'दीपक' ही है जिसमें एक ही कारक (कर्ता, कर्म, करण, संग्रदान और अधिकरण में से किसी एक) का अनेकों क्रियाओं से सम्बन्ध विवत्ित रहा करता है। यहाँ 'प्रकृताप्रकृतात्मनाम्' का अभिप्राय है प्रकृत-प्राकरणिक और अप्रकृत-अप्रा- करणिक का अर्थात उपमेय और उपमान का। 'धर्म' से यहां जो विवत्ित है वह है क्रिया आदि (अर्थात् क्रिया और गुण) और 'सकृद्वृत्ति' का तात्पर्य है (इस धर्म का) एक ही बार उपादान अथवा ग्रहण। इस प्रकार 'दीपक' को दीपक इसलिए कहते हैं क्योंकि यहां एक स्थान पर ही उपस्थित (एक बार ही उपात्त) क्रियारूप अथवा गुण- रूप धर्म समस्त (प्रकृत तथा अप्रकृतगत ) वाक्य का प्रकाशक हुआ करता है अर्थात् दोनों में समन्वित हो जाया करता है। इसका उदाहरण यह है :- 'जीते जी कृपणों का धन, सर्पों का फग-रत्न, सिंहों का केसर और सती साध्वी कुलबधुओं का स्तन, भला कैसे संभव है कि कोई हाथ लगा ले!' [ यहाँ प्रकृत अथवा प्राकरणिक तो है 'कुलवधुओं का स्तन' जिसके लिये 'कृपणों के धन' 'सपों के फण-रत्न' और 'सिंहों के केसर' को अप्रकृत (उपमान) के रूप में कवि ने उपस्थित किया है। अब इनमें अर्थात् प्रकृत (उपमेय) और अप्रकृत (उपमान) में स्पर्श की क्रिया के रूप में जो साधारण धर्म वर्णित है वह एक बार ही वर्णित है किन्तु सर्वत्र समन्वित है। इसलिए यहां क्रियादीपक अलंकार है। इसी प्रकार गुणदीपक भी हो सकता है जैसे कि यहाँ- श्यामलाः प्रावृषेण्याभिर्दिशो जीमूतपंक्तिभिः। भुवश्च सुकुमाराभिर्नवशाद्वलराजिभिः॥' जहां श्यामगुणरूप साधम्य एकत्र विराजमान होने पर भी प्रकृत तथा अप्रकृत दोनों में अन्वित दिखाई देता है। ] कारक का अनेकों क्रियाओं से सम्बन्ध होने पर जो दीपक अलंकार हुआ करता है (जिसे 'कारकदीपक' कहा जाता है) वह इस प्रकार के उदाहरणों में (दिखाई देता) है :-

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दशम उल्लास: ३८१

स्व्रिद्यति कूणति वेल्लति विचलति निभिषति विलोकयति तिर्यक्। अन्तर्नन्दति चुम्नितुमिच्छति नवपरिणया वधूः शयने ॥४८॥ (१५७) मालादीपकमाद्यं चेद्यथोत्तरगुणावहम्। पूर्वेण पूर्वेण वस्तुना उत्तरमुत्तरं चेदुपक्रियते तन्मालादीपकं, यथा- संग्रामाङ्गणमागतेन भवता चापे समारोपिते देवाकर्णय येन येन सहसा यद्यत्समासादितम्। कोदण्डेन शराः शरैररिशिरस्तेनापि भूमण्डलं तेन त्वं भवता च कीर्त्तिरतुला कीर्त्या च लोकत्रयम्॥ ४५६॥ नवोढा वधू जब पति के पर्यङ्ग पर जाती है तब पसीने-पसीने हो जाया करती है, सङ्कोच में आ जाया करती है, मुँह घुमा लिया करती है, सामने नहीं लेटा करती, आँखें बन्द कर लिया करती है, तिरछी निगाह से देखा करती है, मन ही मन प्रसन्न हुआ करती है और साथ ही साथ पति के मुख का भी चुम्बन करना चाहती है।' [ यहाँ एक ही वधूरूप कर्तृकारक अथवा एक ही शयनरूप अधिकरणकारक अनेकों क्रियाओं जैसे कि पसीने पसीने होना इत्यादि से सम्बन्ध वर्णित किया गया है। इसलिये यहाँ 'कारकदीपक' अलङ्कार है। यहाँ तो सभी क्रियायें प्रकृत हैं किन्तु ऐसा भी संभव है कि अप्रकृत क्रियाओंसे भी एक ही कारक का सम्बन्ध प्रदर्शित किया जाय। जैसे कि यहाँ :- 'दूरीकरोति कुमति विमलीकरोति चेतश्चिरन्तनमघं चुलुकीकरोति। भूतेषु किं च करुणां बहुलीकरोति सङ्ग: सतां किमु न मङ्गलमातनोति॥' जहाँ पर क्रि्यायें तो सभी अप्रकृत हैं किन्तु सत्सङ्गरूप कर्तृकारक सभी में समन्वित है। इसी प्रकार यही कारकदीपक वहाँ भी होता है जहाँ कुछ क्रियायें प्रकृत और कुछ अप्रकृत हों।] यही दीपक अलक्कार तब 'मालादीपक' कहा जाता है जब पूर्व-पूर्व-वार्णेत वस्तु उत्तरोत्तर-वर्ण्य वस्तु में उत्कर्ष का आधान करती प्रतीत होती है। यहाँ (आद्यवस्तु के यथोत्तर गुणावह होने का) जो अभिप्राय है वह है पूर्ववर्णित वस्तु का आगे वर्णन की जानेवाली वस्तु के प्रति-उपकारक-उत्कर्षाधायक होते चलने का और ऐसी विशेषता जिस दीपक में हुआ करती है वह दीपक 'मालादीपक' कहा जाता है। जैसे कि :- 'महाराज ! संग्रामाङ्गण में धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ाये आपके पहुँच जाने पर जिस जिस ने सहसा जो-जो पाया वह सुनिये-आपके धनुष ने बाण पाया, बाणों ने शत्रुओं का मस्तक पाया, शत्रुओं के मस्तक ने भूमि पायी, भूमि ने आप को पाया, आपने कीर्ति पायी और कीर्ति ने पाया त्रैलोक्य।' [ यहाँ पूर्व-पूर्व वर्णित वस्तु उत्तरोत्तर वर्ण्य वस्तु के उत्कर्ष में उपकारक सिद्ध हो रही है जिससे अन्त में कवि के मुख्य विषय राज-यश का उत्कर्ष और भी अधिक चमरकारजनक हो रहा है जिस प्रकार किसी माला में पहले-पहले गूँथे फूलों के द्वारा बाद में पिरोये जाने वाले फूलों के गूँथने में सहायता मिला करती है उसी प्रकार इस दीपक प्रभेद में भी पहले वर्णित वस्तुएँ आगे आाने वाली वस्तुओं के वर्णन में एक विशेषता का ही आधान किया करती हैं।) टिप्पणी-आचार्य मम्मट ने 'दीपक' की रूप-रचना का जैसा विश्लेषण किया है उसमें प्राचीन आलक्कारिकों जैसे कि उद्धट और रुद्रट की माव्याओं का समन्वय तो है वही किन्तु साथ ही साथ अपनी भी मान्यता का उद्धाटन है। उद्धट की 'दीपक' की परिभाषा यह थी-

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३८२ काव्यप्रकाश:

(१६ तुल्ययोगिता-अलंकार) (१५८) नियतानां सकृद्मः सा पुनस्तुल्ययोगिता ॥ १०४॥ नियतानां प्राकरणिकानामेव अप्राकरणिकानामेव वा, क्रमेणोदाहरणम्- पाण्डुक्षामं वदनं हृदयं सरसं तवालसं च वपुः । आवेदयति नितान्तं क्षेत्रियरोगं सखि ! हृदन्तः । ४६० ॥ कुमुदकमलनीलनीर जा लिललित विलासजुषोर्द्टशोः पुरः का। अमृतममृतरश्मिरम्बुजन्म प्रतिहतमेकपदे तवाननस्य । ४६१ ॥ 'आदिमध्यान्तविषयाः प्राधान्येतरयोगिनः । अन्तर्गतोपमा धर्मा यत्र तद्दीपकं विदुः॥'

और रुद्रट की यह- (काव्यालङ्कारसारसंग्रह १.१४)

'यत्रैकमने केषां वाक्यार्थानां क्रि्ियापदं भवति। तद्ूरकारकपदमपि तदेतदिति दीपकं द्वेधा॥' (काव्यालक्कार ७.६४) उद्मट से तो यह पता लगता है कि दीपक अलक्कार में उपमानोपमेयभाव का अन्तर्गत- अन्तर्भूत होना उसकी रूपनिष्पत्ति के लिये आवश्यक है और रुद्रट से पता चलता है दीपक के बन्धविन्यास का अर्थात अनेक वाक्या्थों में एक क्रियापद अथवा उनमें एक कारकपद की रचना के चमत्कार का। रुद्रट की दीपक-परिभाषा में जो कमी थी वह थी दीपक में, इसे 'वास्तव'-प्रकार के अलक्कार मानने के कारण, औपम्य-उपमानोपमेयभाव की अन्तर्व्याप्ति न मानने की। मम्मट ने वस्तुतः रुद्रट की परिभाषा को ही उद्मट के विश्लेषण की दृष्टि से अपनी परिभाषा में परिमार्जित कर दिखाया है। मम्मट को प्राचीन आलक्कारिकों के निरूपित दीपक-प्रभेद जैसे कि आदिदीपक, मध्यदीपक आदि इसलिए ठीक नहीं जँचे क्योंकि क्रियापद अथवा कारकपद के स्थान-निर्णय की ओर भी दृष्टियाँ हो सकती हैं और इन दृष्टियों से दोपक अलङ्गार की यदि भेद-प्रभेद-मीमांसा की जाय तब तो दीपक में भी चित्रालद्कार सरीखी की ही विित्रतायें होने लगें। मम्मट ने 'दीपक' की परिमाषा में इस बात का ध्यान रखा है कि प्रतिवस्तूपमा से दीपक का स्व्रूप पृथक झलक जाय। प्रतिवस्तूपमा में तो प्रकृत तथा अप्रकृत-गन धर्म असकृत् निर्दिष्ट रहा करते हैं किन्तु दीपक में इनका सकृत निर्देश ही एक अलग चमत्कार है। अनुवाद-'तुल्ययोगिता' वह अलङ्कार है जिसमें नियम अर्थात् वर्णनीयरूप से स्वीकृत प्रकृत अथवा अप्रकृत के (गुण अथवा क्रिया रूप ) साधारण धर्म का एक बार उपादान (ग्रहण) किया जाय। यहाँ 'नियमात्' का अभिप्राय है (कवि के द्वारा वर्णनीय रूप से निश्चित) केवल प्राकरणिक का अथवा केवल अप्राकरणिक का। क्रमशः उदाहरण ये हैं :- १. 'अरी सखी! तुम्हारा यह पीला-दुबला मुँह, यह प्रेम में पगा मन, यह शिथिल पड़ा शरीर जिस बात की वस्तुतः सूचना दे रहा है वह है तुम्हारे हृदय का असाध्य (प्रेम ) रोग !' [ यहाँ पाण्डु-वदन इत्यादि विरह के अनुभव के रूप में कवि के द्वारा निर्धारित विषय हैं और प्रकृत हैं। इन केवल प्रस्तुत अथवा प्राकरणिक विषयों के लिए एक ही साधारण धर्म-आवेदन अथवा सूचन (आवेदयति) एक ही बार उपात्त है जो कि सब में अन्वित है। इसलिये यहाँ जो तुल्ययोगिता है उसमें केवल प्रकृत वस्तुओं के धर्म का सकृत् निर्देश दिखाई दे रहा है। ] २. अरी सुन्दरी ! इन सुन्दर-मनोहर हाव-भावों वाली तुम्हारी आँखों के आगे कुमुद और कमल नीलोत्पल क्या हैं! और तुम्हारे मुँह के सामने अमृत और अमृतांशु (चन्द्र) और अम्बुज तो एक साथ ही हार खाये पड़े हैं।'

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दशम उल्मास: ३८३

(१७ व्यतिरेक अपलंकार) (१५९) उपमानाद्यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः। अन्यस्योपमेयस्य व्यतिरेक आधिक्यम्। क्षीण: क्षीणोऽपि शशी भूयो भूयोऽभिवर्धते सत्यम्। विरम प्रसीद सुन्दरि ! यौवनमनिवर्ति यातं तु ॥४६२॥ इस्यादावुपमानस्योपमेयादाधिक्यमिति केनचिदुक्त तदयुक्तमत्र यौवनगता स्थैर्याधिक्यं हि विर्वाक्षतम्। (व्यतिरेक के भेद-प्रभेद) (१६०) हेत्वोरुक्तावनुक्तीनां त्रये साम्ये निवेदिते ॥ १०५॥ शब्दार्थाभ्यामथाक्षिप्ते श्लिष्टे तद्वत् त्रिरष्ट तत्। यहाँ जो तुल्ययोगिता है उसमें केवळ अप्रकृतवस्तुओं के धर्म का सकृत्-निर्देश प्रतीत हो रहा है क्योंकि पूर्वार्द्ध में कुमुद, कमल और नीलनीरज, जिनके धर्म का अर्थात् प्रकृतनायिका के मुख-सौन्दर्य से अधित्षिप्त होने का 'का' पद के प्रयोग द्वारा, एक बार ही निर्देश हुआ है, सब के सब अप्रकृत हैं-उपमान हैं। यही बात उत्तराद्धमें आनन के उपमानमूत अमृत, अमृतांशु और अम्बुज के सम्बन्ध में 'प्रतिहतम्' के सकृत् निर्देश में प्रतीत होती है। ] टिप्पणी-'तुक्ययोगित।' का अभिप्राय है-तुल्य अर्थात् परस्पर समान योग अर्थात् सम्बन्ध अथबा अन्बय का होना। जिस अलंकार में प्रस्तुत अथवा अप्रस्तुत में एक धर्म का अन्वय-संबन्ध प्रदशित हो वह अलंकार तुल्ययोगिता अलक्कार है। दीपक (प्रथम प्रकार) में भी एक धर्म का सकृत् निर्देश अभिप्रेत है किन्तु वहाँ प्रकृत और अप्रकृत दोनों में ऐसी बात होती है। यहाँ तुल्य- योगिता में एक धर्म का अन्वय या तो केवल प्राकरणिक में विवक्षित है या केवल अप्राकरगिक में उपमानोपमेय भाव का अन्तर्भाव यहाँ भी है किन्तु यहाँ साधारण धर्म उभयगत-उपमानगत तथा उपमेयगत नहीं, अपि त या तो केवल प्रकृतगत है या केबल अप्रकृतगत । अनुवाद-'व्यतिरेक' वह अलंकार है जिनमें उपमान की अपेक्षा उपमेय का व्यतिरेक (गुणविशेष के कारण आधिक्य अथवा उत्कर्ष) बताया जाय। यहाँ 'अन्यस्य'-'दूसरे का' का अभिप्राय है 'उपमेय का' और 'व्यतिरेक' कहते हैं आधिक्य-उत्कर्ष को। ऐसे प्रसङ्ग जैसे कि :- 'अरी सुन्दरी ! भब तो प्रसन्न हो। देखो-चन्द्रमा चाहे जितना भी त्षीण-कलारहित क्यों न हो जाय, सच तो यह है कि, फिर वह कला-पूर्ण हो जाया करता है किन्तु यह यौवन ; यदि एक बार यह चला गया तो फिर कभी लौटने का नहीं।' इत्यादि के लिए किसी ने (अलंकारसर्वस्व के रचयिता रुय्यक ने ) जो यह कहा कि यहां भी (एक प्रकार का) व्यतिरेक है क्यों कि उपमेय ( यौवन) की अपेक्षा उपमान (चन्द्रमा) का उत्कर्ष प्रतिपादित किया गया है, वह वस्तुतः उचित नहीं किया क्योंकि यहाँ भी जो बात है वह (उपमेयभूत) यौवनसम्बन्धी अस्थिरता के ही व्यतिरेक- उत्कर्ष की है ( न कि उपमानभूत चन्द्रमा के व्यतिरेक अथवा उत्कर्ष की)। 'व्यतिरेक' चौबीस प्रकार का है-(१) व्यतिरेक के दोनों हेतुओं अर्थात् उपमेय- गत उत्कर्ष और उपमानगत अपकर्ष के हेतुओं के स्पष्ट प्रतिपादन में, (२-३-४) उत्कर्ष- हेतु के अप्रतिपादन में, अपकर्षहेतु के अकथन में और इन दोनों की अनुक्ति में, और इन्हीं चारों भेदोंमें प्रत्येक में तीन प्रकार जैसे कि (१) साधर्म्य के (इवादि) शब्द द्वारा निवेदन (२) साधर्म्य के अर्थ-सामर्थ्य द्वारा अभिधान (तुल्यादि शब्द द्वारा प्रतिपादन और

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३८४ काव्यप्रकाश:

व्यतिरेकस्य हेतुः उपमेयगतमुत्कर्षनिमित्तम् उपमानगतमपकर्षकारणप् तयोद्वयोरुक्ति: एकतरस्य द्वयोर्वा अनुक्तिरित्यनुक्तित्रयम्। एतद्गेदचतुष्टयमुपमा- नोपमेयभावे शव्देन प्रतिपादिते आर्थन च क्रमेणोक्ताश्चत्वार एव भेदा: आक्षि- प्ते चौपम्ये तावन्त एव, एवं द्वादश। एते श्लेषेऽपि भवन्तीति चतुर्विशति- भैदा: क्रमेणोदाहरणम्- ( १ उत्कर्षनिमित्त की उक्ति में शाब्द-साधर्म्य-प्रयोज्य अश्लिष्ट शब्दनिबन्धन व्यतिरेक) असिमात्रसहायस्य प्रभूतारिपराभवे। अन्यतुच्छ जनस्येव न स्मयोऽस्य महाधृतेः ॥४६३॥ अत्रैव तुच्छेति महाधृतेरित्यनयोः पर्यायेण युगपद्वाऽनुपादानेऽन्यत् भेदत्र यम्। एतमन्येष्वपि द्रष्ठव्यम् अत्रेवशब्दस्य सद्धावाच्छान्दमौपम्यम्। (३) साधर्म्यं के आत्षेप अथवा-अभिव्यक्षन होनेसे यह १२ प्रकार का हो जाता है (जिसमें शब्द अश्िष्ट रहा करते हैं) और इन बारहों प्रकारों में यदि शब्द श्लिष्ट रहे तो इसके (श्लिष्टशब्द-निबन्धन) बारह भेद और मिलाकर इसके २४ प्रकार हो जाते हैं। यहां 'हेत्वो: उक्तौ' का तात्पर्य है-व्यतिरेक के जो हेतु हैं जैसे कि (१ला) उपमेयगत व्यतिरेक (उत्कर्ष) के हेतु और (२रा) उपमानगत व्यतिरेक (अपकर्ष) के हेतु- उन दोनों के स्पष्ट कथन का। 'अनुक्तीनां त्रये' का अभिप्राय है व्यतिरेक निमित्तों का तीन प्रकार से यदि अप्रतिपादन हो तब, जैसे कि किसी एक का अप्रतिपादन (जिसके दो प्रकार हैं जैसे कि) या तो केवल उत्कर्षनिमित्त का अप्रतिपादन या केवल अपकर्ष निमित्त का अप्रतिपादन और दोनों का ही अप्रतिपादन। इस प्रकार व्यतिरेक के (उत्कर्ष-निमित्त की उक्ति के एक भेद और उसकी अनुक्ति के तीन भेदों को मिला कर) ये चारों भेद ऐसे हैं जिनमें उपमानोपमेयभाव उपमावाचक (इवादि शब्द द्वारा स्पष्ट प्रतिपादित हुआ करता है। यहीं यदि उपमानोपमेयभाव अर्थ- सामर्थ्य के द्वारा तुल्यादि शब्द प्रयोग द्वारा, जहां औपम्य शाब्द न होकर आर्थ हुआ करता है) प्रतिपादित रहे तो इसके चार भेद और हो गये। और यहीं चार प्रकार तब और हो गये जब उपमानोपमेय भाव (न तो शब्द-वाच्य हो और न अर्थलभ्य हो अपितु) आ्षेप के द्वारा-व्यञ्ञना के द्वारा-प्रतीत हुआ करे। इस प्रकार (इन सब को मिला देने पर) इस (व्यतिरेक) के बारह भेद हुये ( जहाँ यह स्पष्ट है कि शब्द श्लिष्ट नहीं हैं)। अब जब कि ये बारहों भेद वहाँ भी संभव हैं जहाँ श्लिष्ट शब्द का प्रयोग है तब (शलिष्ट- शब्द-निबन्धन व्यतिरेक के १२ प्रकारों को मिला कर) इसके चौबीस (२४) भेद स्पष्ट हो गये। क्रमशः इनके उदाहरण दिये जा रहे हैं :- 'महाधीर किंवा खड्गमात्रसहाय इस राजा को, जब कि इसने अनेकों प्रबल शत्रुओ को पराजित किया, अन्य तुच्छ राज-गण की भांति कोई भी गर्व न हुआ!' (यहां कोई भी शब्द श्लिष्ट नहीं, अरिपराभवरूप साधर्म्य शब्द-लभ्ष्य है, 'उपमा- वाचक 'इव' शब्द के प्रयोग में उपमानोपमेयभाव शब्द-वाच्य है और साथ ही साथ है उपमेयगत उत्कर्ष (महाधैर्य) और उपमानगत अपकर्ष (तुच्छता) की उक्ति।) इसी उदाहरण में यदि केवल तुच्छतारूप उपमानगत अपकर्ष की उक्ति न हो, या केवल महाधैर्यरूप उपमेयगत उत्कर्ष की उक्ति न रहे अथवा एक ही साथ इन दोनों (अर्थात् उत्कर्ष-हेतु और अपकर्ष-हेतु) का कथन न किया जाय तो व्यतिरेक-निमित्त की अनुक्ति के तीनों भेदों का लक्षण घटित हो जायगा। जैसे कि- (१) उपमानगत अपकर्ष की अनुक्ति में :- 'नान्यराजजनस्येव न स्मयोऽस्य महाषतेः।'

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दशम उल्लास: ३८५

(२ उत्कर्ष निमित की उत्ति में आरर्थ साधर्म्य-प्रयोज्य अश्लिष्ट शब्दनिबन्धन व्यतिरेक) असिमात्रसहायोऽपि प्रभुतारिपराभवे। नैवान्यतुच्छ जनवत्सगर्वोडयं महाधुतिः ॥४६४॥। अत्र तुल्यार्थे वतिरित्यार्थमौपम्यम्। (३ उत्कर्ष-हेतु की उक्ति में, व्यङ्गथ साधर्म्य-प्रयोज्य, त्रश्लिष्ट शब्द-निबन्धन व्यतिरे; ) इयं सुनयना दासीकृततामरसश्रिया। आननेनाकलङ्केन जयतीन्दुं कलङ्किनम् ॥४६५॥ अत्रेवादितुल्यादिपदविरहेण आक्षिप्तैवोपमा। (२) उपमेयगत उत्कर्ष की अनुक्ति में :- 'अन्यतुच्छुजनस्येव न स्मयोऽस्य महीपतेः।' (३) दोनों की अनुक्ति में :- 'नूनमन्यजनस्येव न स्मयोऽस्य महीपतेः।' आगे के उदाहरणों में भी यही बात (अर्थात् क्रमशः उत्कर्ष-निमित्त के अनुपादान, अपकर्षनिमित्त के अनुपादान और एक ही साथ दोनों के अनुपादान की बात) देख कर अनुक्ति के तीन प्रकारों का (एक ही उदाहरण में) स्वरूप पहचान लेना चाहिये। उपर्युक्त उदाहरण में जो उपमानोपमेयभाव है वह शब्द-लभ्य है क्योंकि (उपमावाचक) 'इव' शब्द प्रयुक्त हुआ है। 'यह महाधीर राजवीर, जो केवल अपने खड्ग का सहारा लिया करता है, अनेकों प्रबल शत्रुओं को पराजित करने में, अन्य तुच्छ राजगण के तुल्य कभी भी दर्पान्ध नहीं दिखाई देता। [यहाँ शब्दों में श्लेष नहीं, अरिपराभवरूप साधर्म्य शब्द-प्रतिपाद्य है, उपमानगत अपकर्ष 'तुच्छत्व' और उपमेयगत उत्कर्ष 'महाधैर्य', जो व्यतिरेक के निमित्त हैं, स्पष्ट प्रतिपादित हैं और जो औपम्य है वह आर्थ-अर्थवललभ्य है क्योंकि 'अन्यतुच्छजनवत्' में जो 'वति' प्रत्यय प्रयुक्त है वह 'तुल्य' के अर्थ में विहित है। ] यहाँ जो औपम्य-उमानोपमेयभाव-है वह (शब्द-लभ्य नहीं अपितु) 'तुल्य' के अर्थ में 'वति' प्रत्यय के विधान होने के कारण आर्थ है-अर्थ-सामर्थ्य के द्वारा प्रतीत होता है। (यहाँ भी पहले उदाहरण की भांति उत्कर्ष और अपकर्ष के हेतु की अनुक्ति में व्यतिरेक के तीन प्रकारों का स्वरूप स्वयं देख लेना चाहिये, जैसे कि :- (१) उपमानगत अपकर्ष की अनुक्ति में :- 'नैवान्यराजजनवत् सगर्वोऽयं महाषतिः।' (२) उपमेयगत उत्कर्ष की अनुक्ति में :- 'नैवान्यतुच्छजनवत् सगर्वोऽयं महीपतिः।' (३) दोनों की अनुक्ति में :- 'नूनं नैवान्यजनवत् सगर्वोडयं महीपतिः।' 'यह सुनयना कमल को भी दास बना देने वाले अपने अकलङ्क (अत्यन्त सुन्दर) मुख से उस चन्द्र को तो पराजित कर ही दिया करती है जो कलङ्क-युक्त है।' [ यहाँ भी कोई श्रिष्ट शब्द नहीं, उत्कर्ष और अपकर्ष के निमित्तों का भी अभिधान है किन्तु जो उपमानोपमेयभाव है वह आत्िप्त-व्यङ्ग्य रखा गया है। ] यहाँ जो औपम्य-उपमानोपमेयभाव-है वह आत्तिप्त-व्यङ्ग्य है क्योंकि यहाँ न तो इवादि शब्द का प्रयोग है (जहां साधर्म्य शब्द-लभ्य रहा करता है) और न तुल्यादि शब्द का (जहाँ साधर्म्यं अर्थ-लभ्य हुआ करता है। (यहां भी पहले उदाहरणों की भांति 2 २५ का०

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३८६ काव्यप्रकाश:

( ४ उत्कर्ष-निमित्त की उक्ति में, शाब्द-साम्य-प्रयोज्य, श्लिष्ट-शब्द निबन्धन व्यतिरेक ) जितेन्द्रियतया सम्यग्विद्यावृद्धनिषेविणः । अतिगाढगुणस्यास्य नान्जवद्धङ्गुरा गुणाः ॥४६६ ।। अत्रेवार्थे वतिः गुणशब्द: श्लिष्टः शाब्दमौपम्यम्। ( ५ उत्कर्षनिमित्त की उक्ति में आर्थ-साम्य-प्रयोज्य श्लिष्टशब्दनिबन्धन व्यतिरेक ) अखण्डमण्डलः श्रीमान् पश्यैष पृथिवीपतिः। न निशाकरवज्जातु कलावैकल्यमागतः ।। ४६७ ।। व्यतिरेक-निमित्त की अनुक्ति के तीन प्रकारों को स्वयं समझ लेना चाहिये। जैसे कि (१) उपमानगत अपकर्ष की अनुक्ति में :- 'आननेनाकलङ्गेन जयत्यमृतदीधितिम्।' (२) उपमेयगत उत्कर्ष की अनुक्ति में :- 'आननेन मनोज्ञेन जयतीन्दुं कल्विनम्।' (३) दोनों की अनुक्ति में :- 'आननेन मनोज्ञेन जयत्यमृतदीधितिम्।') 'जितेन्द्रिय होने के कारण विद्यावृद्धों-बड़े-बढ़े विद्वानों-के सत्संग में लगे और अत्यन्त प्रबल (धैर्यादि) गुणों वाले (बलवान् तन्तुओं से बने) इस ( राजा के जो गुण 'तन्तुसंघात' हैं (जैसे कि विद्या, बुद्धि आदि) वे कमल की भांति क्षणभंगुर नहीं (अपितु दढ हैं।) [ यहां 'गुण' शब्द श्लिष्ट शब्द है उपमानगत अपकर्ष जैसे कि भङ्गुरता और उपमेयगत उत्कर्ष जैसे कि दढता-दोनों का उपादान है और 'इव' के अर्थ में 'वति' अ्त्यय भी 'अब्जवत्' में प्रयुक्त है जिससे साम्य यहां शब्द-लभ्य प्रतीत हो रहा है। यहां भी व्यतिरेकनिमित्त की अनुक्ति के तीनों प्रकारों का स्वरूप यथास्थान पढ परिवर्तन के द्वारा स्वयं देखा जा सकता है। जैसे कि- (१) उपमानगत अपकर्ष की अनुक्ति में :- 'अतिगाढगुणस्यास्य न तामरसवद् गुणाः।' (२) उपमेयगत उत्कर्ष की अनुक्ति में :- 'सत्कर्मनिरतस्यास्य नाब्जवद्धङ्गुरा गुणाः।' (३) इन दोनों की अनुक्ति में :- 'सत्कर्मनिरतस्यास्य न तामरसवद् गुणाः ।'] यहां जो उपमानोपमेयभाव है वह शब्द-वाच्य है क्योंकि यहां (जैसे कि अब्जवत् में) जो 'वति' प्रत्यय विहित है वह 'इव' शब्द के अभिप्राय में विहित है। 'गुण' शब्द यहां श्लिष्ट शब्द है (जिससे यहां जो व्यतिरेकालंकार है वह श्लिष्ट शब्द-निबन्धन है)। 'देखिये कितने आश्चर्यं की बात है कि अखण्ड-मण्डल (द्वादशविध राजमण्डल से समृद्ध किंवा पूर्ण-बिम्ब) किंवा श्रीसम्पन्न (राज्यश्री से समन्वित तथा शोभायुक्त) यह राजा कभी भी चन्द्रमा की भांति कला-विकल (ललित कलाओं के ज्ञान से रहित तथा पोडश कलाओं से शून्य) नहीं हुआ करता!' [ यहां व्यतिरेक के हेतुओं का अभिधान है क्योंकि उपमेय 'राज' गत उत्कर्ष अखण्ड- मण्डलता तथा उपमान 'चन्द्र'गत अपकर्ष-कला-विकलता दोनों का कथन किया गया है, श्लिष्ट 'कला' शब्द का प्रयोग है और जो उपमानोपमेयभाव है वह अर्थ-लभ्य रखा गया है। ]

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दशम उल्लास: ३६७

अत्र तुल्यार्थे वतिः कलाशब्द: श्लिष्टः । भाला प्रतिवस्तूपमावत् मालाव्यतिरेकोऽपि सम्भवति तस्यापि भेदा एव- मूह्या: दिङ्मात्रमुदाहियते यथा- हरवन्न विषमदृष्टिर्हरिवन्न विभो विधूतविततवृषः । रविवन्न चातिदुःसहकरतापितभू: कदाचिदसि ॥४६८ ॥ अत्र तुल्यार्थे वतिः विषमादयश्र शब्दा: श्लिष्टाः। नित्योदितप्रतापेन त्रियामामीलितप्रभः । भास्वताऽनेन भूपेन भास्वानेष विनिरजिंतः ॥ ४६६।। यहां 'निशाकरवत्' में जो 'वति' प्रत्यय प्रयुक्त है वह 'तुल्य' के अर्थ में है (जिससे यहां औपम्य शाब्द नहीं अपितु अर्थ-लभ्य है) और जो 'कला' शब्द प्रयुक्त है वह श्लिष्ट शब्द है (जिससे यहां व्यतिरेक, श्लिष्ट-शब्द निबन्धन बन रहा है)। यहां भी व्यतिरेक- निमित्त की अनुक्ति के तीनों भेदों को स्वयं विचारपूर्वक देख लेना चाहिये। जैसा कि :- (१) उपमानगत अपकर्ष की अनुक्ति में :- 'अखण्डमण्डलो ह्योष श्रीमानुद्धतविक्रमः। न निशाकरवन्ञातु दृश्यतां वसुधाधिपः।' (२) उपमेयगत उत्कर्ष की अनुक्ति में :- 'बहुलारिगतोऽप्येष श्रीमानुद्धतविक्रमः । न निशाकरवज्जातु कलावैकल्यमागतः॥' (३) दोनों की अनुक्ति में :- 'बहुलारिगतोऽप्येष श्रीमानुद्धतविक्रमः । न निशाकरवज्जातु दृश्यतां वसुधाधिपः ॥' इसी व्यतिरेक का, मालाप्रतिवस्तूपमा की भांति, मालाव्यतिरेकरूप भी संभव है और उसके जो भेद-प्रभेद हैं उन्हें स्वयं समझ लेना चाहिये। केवल निदर्शन के लिये यही पर्याप्त है, जैसे कि :- 'महाराज? आप (अद्भुत हैं क्योंकि) महादेव के समान विषमदृष्टि (त्रिलोचन तथा असमदर्शी) नहीं, विष्णु भगवान् के समान 'विधूतविततवृष'-(अरिष्टासुरहन्ता तथा अधर्मपरायण) नहीं और न सूर्य के समान 'अतिदुःसह करतापितभूः'-(असह्य उष्ण किरणों

वाले) हैं।' से पृथिवी को संताप पहुँचाने वाले तथा असह्य राज-कर से प्रजाजन को दुःखित करने

यहाँ (हरवत्, हरिवत् और रविवत् प्रयोगों में) जो 'वति' प्रत्यय है वह 'तुल्य' के अर्थ में विहित है (जिससे औपम्य शाब्द न होकर आर्थ हो गया है) और 'विषम' आदि जो शब्द हैं वे श्लिष्ट शब्द हैं (जिनके कारण यहां श्लिष्टशब्दनिबन्धन माला व्यतिरेक का स्वरूप झलक रहा है)। इस उदाहरण ( अर्थात् उत्कर्ष-हेतु की उक्ति में, व्यङ्गय-साम्य-प्रयोज्य, श्लिष्ट- शब्दनिबन्धन व्यतिरेक के उदाहरण) जैसे कि :- 'तेजस्वी किंवा सूर्यरूप इस राजा ने, जिसमें पराक्रम किंवा प्रखरताप निरन्तर विराजमान है, उस (आकाशवर्ती) सूर्य को जीत रखा है जिसकी प्रभा रात में प्रायः नष्ट रहा करती है।' [यहां 'भास्त्रता' तथा 'प्रताप' शब्द श्लिष्ट हैं, व्यतिरेक के दोनों निमित्त जैसे कि उपमानगत अपकर्ष-रात में सूर्यरश्मियों का नष्टप्राय हो जाना और उपमेयगत प्रकर्ष- नित्योदित प्रताप स्पष्ट निर्दिष्ट हैं। यहाँ भी, पहले की भाँति, व्यतिरेक-निमित्त की अनुक्ति में जो तीन व्यतिरेक-भेद हैं उनका स्वरूप देखा जा सकता है। जैसे कि- (१) उपमानगत अपकर्ष की अनुक्ति में- 'नित्योदितप्रतापेन पङ्कजावलिनन्दनः । भास्वताऽनेन भूपेन भास्वानेष विनिर्जितः ॥I'

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३=८ काव्यप्रकाश:

अत्र ह्याक्षिप्तैवोपमा भास्वतेति शलिष्टः । यथा वा- स्वच्छात्मतागुणसमुल्लसितेन्दुबिम्बं बिम्बप्रभाधरमकृत्रिमहद्यगन्धम्। यूनामतीव पिबतां रजनीषु यत्र तृष्णां जहार मधु नाननमङ्गनानाम् ॥४७०॥ अत्रेवादीनां तुल्यादीनां च पदानामभावेऽपि श्लिष्टविशेषणैराक्षिप्तैवोपमा प्रतीयते एवञ्जातीयका: श्लिष्टोक्तियोग्यस्य पदस्य पृथगुपादानेऽनयेऽपि भेदाः सम्भवन्ति तेऽप्यनयैव दिशा द्रष्टव्याः। (२) उपमेयगत प्रकर्ष की अनुक्ति में- 'समरासक्तमनसा त्रियामामीलितप्रभः । भास्वताऽनेन भूपेन भास्वानेष विनिर्जितः॥।' (३) इन दोनों व्यतिरेक-निमित्तों की अनुक्ति में- 'समरासक्तमनसा पङ्ढजावलिनन्दनः। भास्वताऽनेन भूपेन भास्वानेष विनिर्जितः ॥'] में जो उपमानोपमेयभाव है वह (न तो शब्द-प्रतिपाद्य है और न अर्थसामर्थ्यलभ्य, अपितु) आत्िप्त-व्यङ्गय है और 'भास्वता' पद ऐसा है जो श्लिष्ट है। (क्योंकि इसके कान्तिसम्पन्न और सूर्य दोनों अर्थ वाच्यरूप से यहाँ अभिप्रेत हैं)। अथवा यहाँ जैसे कि-'यही वह वसन्त है जब रात्रियों में पान-क्रीडासक्त प्रेमी युवकों की मधुपान-लालसा तो अपनी निर्मलता के कारण अपने में चन्द्रबिम्ब को प्रतिबिग्वित करने में समर्थ, अत्यन्त रक्तवर्ण किंवा स्वाभाविक सौरभ से मनोहर मद्य के द्वारा दूर कर दी जाया करती है किन्तु उनकी अधरपान-लालसा को युवतियों के वे मुख नहीं दूर कर पाते जो अत्यन्त सुन्दर होने के कारण पूर्णचन्द्र की भाँति मनोरम, बिम्बाधरयुक्त किंवा बिना किसी मुखवास आदि के ही एक नैसर्गिक सुगन्ध से भरे रहा करते हैं।'- में न तो इवादि पदों का (जहां औपम्य शाब्द हुआ करता है) प्रयोग है और न तुल्यादि पदों का ही (जिनमें औपम्य आर्थ रहा करता है)। यहां जो उपमानोपमेयभाव है वह श्लिष्टविशेषणपदों के द्वारा तिप्त-व्यङ्गरूप से प्रतीत हो रहा है। इस प्रकार के व्यतिरेक के अन्य भी भेद-प्रभेद संभव हैं जिनमें श्लिष्टार्थकपद पृथक् पृथक रूप से (जैसे कि केवल उपमान के विशेषण के रूप से अथवा केवल उपमेय के विशेषण के रूप से) प्रयुक्त हुआ करें। इन भेद-प्रभेदों के उदाहरण इसी (पूर्वप्रति- पादित) दृष्टि से स्वयं ढूंढे जा सकते हैं। टिप्पणी-'व्यतिरेक' के स्वरूप और भेद-निरूपण में मम्मट ने प्राचीन आलक्कारिकों की अपेक्षा एक भिन्न दृष्टि रखी है। 'भामह' का 'व्यतिरेक' इस रूप का था- 'उपमानवतोऽर्थस्य यद्विशेषनिदर्शनम्। व्यतिरेकं तमिच्छन्ति विशेषापादनाद् यथा ॥' (काव्यालंकार २. ७५) जिसमें उपमान की अपेक्षा उपमेय में 'विशेषापादान'-अपेक्षित था। दण्डी ने 'व्यतिरेक' का यह स्वरूप देखा था- 'शब्दोपात्ते प्रतीते वा सादृश्ये वस्तुनोद्वयोः। तत्र यद्भेदकथनं व्यतिरेकः स कथ्यते।' ( काव्यादर्श २. १८०) जिसमें उपमेय का स्पष्टतः उत्कर्षापादन और उपमान का यथाकथन्वित् अपकर्षापादन-दोनों अभिप्रेत थे। उन्ध्ट ने व्यतिरेक में स्पष्टतया उपमान और उपमेय दोनों के विशेषापादन का उल्लेख किया था-

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दशम उल्लास: ३८६

( १८ आच्तेप अलद्कार और उसके भेद) (१६१) निषेधो वक्तुमिष्टस्य यो विशेषाभिधित्सया ॥ १०६॥ वक्ष्यमाणोक्तविषयः स आक्षेपो द्विधा मतः । विवक्षितस्य प्राकरणिकत्वादनुपसर्जनीकार्यस्य अशक्यवक्तव्यत्वमतिप्रसि- द्वत्वं वा विशेषं वक्तुं निषेधो निषेध इव यः स वद्त्यमाणविषय उक्तविषयश्च्ेति द्विधा आच्तेप:। 'विशेषापादनं यत्स्वादुपमानोपमेययोः । निमित्तादष्टिटष्टिभ्यां व्यतिरेको द्विधा तु सः॥' (काव्यालक्कारसारसंग्रह २.६) 'रुद्रक' की दृष्टि में 'व्यतिरेक' अलक्कार की रूप-रेखा में उपमेय कि वा उपमान दोनों के यथासंभव आधिक्य का वर्णन अमीष्ट था-जैसा कि इन पंक्तियों से स्पष्ट है :- (१) यो गुण उपमेये स्यात्तत्प्रतिपन्थी च दोष उपमाने। व्यस्तसमस्तन्यस्तौ तो व्यतिरेकं त्रिधा कुरुतः ॥ (काव्यालक्कार .८६) (२ ) यो गुण उपमाने वा तत्प्रतिपन्थी च दोष उपमेये। भवतो यत्र समस्तौ व्यतिरेकोऽयमन्यस्तु।' रुय्यक ने भी रुद्रट की ही भाँनि व्यतिरेक का यही लक्षण निर्धारित किया था- 'भेद प्राधान्ये उपमानादुपमेयस्याधिक्ये विपर्यये वा व्यतिरेकः।' किन्तु मम्मट ने इस प्राचीन दृष्टि के बदले अपनी नवीन दृष्टि रखी और 'व्यतिरेक' में उपमान की अपेक्षा उपमेय के आधिक्य अथवा उत्कर्ष के आपादन का ही निर्धारण किया और इसी की विविध संभावनाओं जैसे कि उपमेय के उत्कर्ष और उपमान के अपकर्ष के निमित्तों के उपादान और अनुपादान आदि के विश्लेषण के आधार पर व्यतिरेक का २४ प्रकार बताया। राजानक तिलक ने अपनी काव्यालक्कारसारसंग्रहविवृति में मम्मट का ही अनुसरण करते हुए व्यतिरेक का स्वरूप तथा प्रकार-विवेचन किया। मम्मट ने 'क्षीणः क्षीणोऽपि शोशी' आदि में रुद्रट-निर्दिष्ठ 'उपमानाधिक्य' रूप व्यतिरेक का ही खण्डन किया और संभवतः इस खण्डन में ही उन्हें व्यतिरेक- निरूपण की नयी प्रेरणा भी मिली। अनुवाद-'निषेध' वह अलङ्कार है जिसमें किसी विशेष बात की विवसा (जैसे कि जिस वस्तु का वर्णन करना है उसके वर्णन की आवश्यकता अथवा जिस वस्तु का वर्णन किया जा चुका हो उसकी अत्यन्त प्रसिद्धि) की दृष्टि से, उस विषय का वर्णन निषिद्ध किया जाय जो प्राकरणिक होने के कारण वर्णन के योग्य हो (अथवा वर्णन के अयोग्य ही क्यों न हो)। यह आक्षेप दो प्रकार का हुआ करता है-(१ला) वच्यमाणविषयक आक्षेप और (२) उक्तविषयक आक्षेप। यहाँ 'निषेध' का अभिप्राय वस्तुतः निषेध नहीं अपितु निषेध का आभास है (क्योंकि आपाततः यहाँ जो निषेध की प्रतीति होती है वह अन्त में एक विशेष उद्देश्य के लिये विधि के रूप में ही परिणत हो जाती है।) 'वक्तुमिष्टस्य' का तात्पर्य है उस विषय का जो विवक्षित हो, प्राकरणिक-प्रस्तुत होने के कारण ऐसा हो जिसकी उपेक्षा न की जा सके, 'विशेषाभिधित्सया' का अर्थ है किसी विशेष उद्देश्य के प्रकट करने की इच्छा से और यहाँ जो विशेष उद्देश्य है वह या तो किसी कारणवश किसी विषय के वर्णन का अशक्य- असंभाव्य होना है या किसी विषय का अत्यधिक प्रसिद्ध होना है (जिससे उसके कथन की आवश्यकता नहीं)। यह इस प्रकार का निषेध दो रूपों में हो सकता है-(१ला) वच्यमाण-विषय-निषेध (जिसमें विशेष उद्देश्य 'अशक्यवक्तव्यता'-वर्णन की असंभाव्यता है)। और (२र) उक्तनिषय निषेध (जिसमें विशेष उद्देश्य 'अतिप्रसिद्धि' बर्णनीय विषय की सर्वजनसंबेद्यता है)। 'आपेप' अलद्कार के जो दो प्रकार हैं (अर्थात् वचयमाण

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३६० काव्यप्रकाश:

क्रमेणोदाहरणम्- ए एहि किपि कीएवि कएण णिक्किव भणामि अलमहवा। अविआरिअकब्जारम्भआरिणी मरठ ण भणिस्सम् ॥ ४७१॥ ( ए एहि किमपि कस्या अपि कृते निष्कृप ! भणामि अलमथवा। अविचारितकार्यारम्भकारिणी म्रियतां न भणिष्यामि ॥४७१॥ न्योत्स्ना मौक्तिकदाम चन्दनरसः शीतांशुकान्तद्रवः कर्पूरं कदली मृणालवलयान्यम्भोजिनीपल्लवाः । अन्तर्मानसमास्त्वया प्रभवता तस्या: स्फुलिङ्गोत्कर- व्यापाराय भवन्ति हन्त किमनेनोक्ेन न ब्रूमहे॥। ४७२॥ (१९ विभावना अलंकार ) (१६२) क्रियायाः ग्रतिषेधेऽपि फलव्यक्तिर्विभावना ॥ १०७॥ विषयक आत्षेप और उक्तविषयक आत्षेप) वे निषेध के इन दो रूपों के ही कारण हैं। क्रमशः आक्षेप के (द्विविध भेदों के) ये उदाहरण हैं :- (१) 'अरे निठुर! यहाँ तो आओो, मुझे तुमसे किसी के लिये कुछ कहना है, या रहने दो तुमसे यह सब क्या कहूँ! बिना कुछ सोचे-समझे मनमाना करने वाली, अच्छा है, यही मर जाय !' [ यहां विरहिणी नायिका का विरह-दुख वर्णन का विषय अवश्य है किन्तु इसका वर्णन किया जाना निषिद्ध कर दिया गया है और ऐसा इसलिये जिससे इसकी मर्मान्ति- कता की अभिव्यक्ति हो जाय। यहाँ निषेध में जो उद्देश्य-विशेष छिपा है वह है विरहिणी की विरहपीडा के मर्मान्तक होने के कारण उसके वर्णन की आवश्यकता (अशक्यवक्तव्यता) और इसलिये यहाँ जो आच्तेप है वह वच्यमाणविषयक आक्षेप है।] (२) 'क्या चाँदनी, क्या मौक्तिकमाला, क्या चन्दनलेप, क्या चन्द्रकान्तमणिशीतल जल, क्या धनसार, क्या कदली, क्या मृणालवलय और क्या कमलदल-अरे ये सबके सब, उस (नायिका) के लिये, जिसके हृदय में तुम आ विराजे हो (और जिसे इस प्रकार लंतप्त कर रहे हो), केवल आग की चिनगारिओं का ही काम करते दीख पड़ रहे है। ओह ! इन सब बातों से क्या! अच्छा है मैं कुछ न कहूँ!' [यहाँ विरह-वेदना में चाँदनी आदि से संतप्त होने का वर्णन करके भी जो इस वणंव का निषेध किया जा रहा है वह उक्तविषयक निषेध है क्योंकि विरहिणी के लिय इन वस्तुओं से संतप्त होना सर्वजनविदित है-अतिप्रसिद्ध है। इसलिये यहाँ जो आनेप है वह उक्तविषयक आक्षेप है। ] टिप्पणी-मम्मट का आक्षेप-लक्षण भामह ( काव्यालक्कार २.६८) और उद्भट (काव्या- लक्कारसार संग्रह २.२) के आक्षेप-लक्षण का अनुसरण करता है। उद्भट ने आक्षेप अलक्कार का स्वरूप इस प्रकार बताया है- 'प्रतिपेध ह्र्वेष्टस्य यो विशेषाभिधित्सया। आस्षेप इति तं सन्तः शंसन्ति कवयः सदा ॥ जिसका अभिप्राय यह है कि कतियों की एक ऐसी भा भङ्गीमणिति-विचित्र उक्ति-हुआ करती है जिसमें वह अर्थ, जिसका विधान करना आवश्यक हो, एक ऐसे निषेध के व्याज से वर्णित किया जाता है कि निपेध होने पर भी अ्रन्त में विधिरूप में ही परिणत हो जाया करता है और इस प्रकार एक नमत्कार का जनक बन जाता है। यद्पि मम्मट की कारिका में 'निषेध' का स्पष्ट उल्लेख है किन्तु वृत्ति में 'निषेधो निषेव इव' कहकर निषेध को निषेधाभास के रूप में स्वरीकार किया गया है क्योंकि बिना इसके 'आक्षेप' का अलक्कार-वाच्यवैचिषय होना असंभव ही है। अनुवाद्-'विभावना' वह अलद्वार है जिसमें करिया (क्रियतेऽनयेति क्रिया कारणम्

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दशम उल्लास: ३६१

हेतुरूपक्रियाया निषेधेऽपि तत्फलप्रकाशनं विभावना यथा- कुसुमितलताभिरहताऽप्यधत्त रुजमलिकुलैरदष्टाऽपि। परिवत्तते स्म नलिनीलहरीभिरलोलिताऽप्यघूर्णत सा ॥ ४७३॥ (२० विशेषोक्ति अ्रलंकार) (१६३) विशेषोक्तिरखण्डेषु कारणेषु फलावच: । (विशेषोक्ति के तीन भेद) मिलितेष्वपि कारणेषु कार्यस्याकथनं विशेषोक्तिः। अनुक्तनिमित्ता उक्तनि- मित्ता अचिन्त्यनिमित्ता च। अर्थात् किसी (प्रसिद्ध) कारण का प्रतिषेध करके भी (उसके फलस्वरूप) कार्य की उत्पत्ति का वर्णन किया जाय। यहाँ 'क्रियायाः' का अभिप्राय है (उस क्रिया का नहीं, जो कि धातु का अर्थरूप हुआ करती है अपितु) हेतुरूप क्रिया का (जैसा कि वैयाकरणों का मत है)। इस प्रकार इस हेतुरूप क्रिया के निषेध अथवा प्रतिषेध के होने पर भी जो उसके फल-उसके कार्य-का प्रकाशन है वह विभावना (प्रसिद्ध कारण के निषेध में कारणान्तर की कल्पना-विभाव्यते कल्प्यते कारणमस्यामिति विभावना) है। जैसे कि :- 'वह (विरहिणी) कुसुमित लता की चोट के बिना ही पीडित होती रही, भ्रमरों के काटने के बिना ही लोट-पोट जाती रही, और नलिनी-पत्र की (मन्द-समीर की) लहरियों के बिना ही चकरा जाती रही।' [यहाँ पीडा के हेतु लता के आघात, लोट-पोट के हेतु भ्रमर के दंश और चकरा जाने के हेतु नलिनीलहरियों के अभाव में भी जो इन हेतुओं के पीडा आदि फलों का प्रकाशन है। वह इसलिये विभावना है क्योंकि इससे विरहाषिक्य रूप हेतु की कल्पना हो जाती है। ] टिप्पणी-काव्यप्रकाशकार ने विभावना की जो परिभाषा की है उस पर मामह और उद्धट (काव्यालंकारसारसंग्रह २.९) की इस परिभाषा अर्थात्- 'क्रियायाः प्रतिषेधे या तत्फलस्य विभावना। जेया विभावनैवासौ समाधी सुलभे सति॥ का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है। कारणके अभाव में भी कार्य की उत्पत्ति का जो वर्णन है वह वस्तुतः एक ऐसी भावना अथवा उत्पत्ति का वर्णन है जो कि आपततः विरुद्ध सा अभासित होता है अनुवाद-'विशेषोक्ति' वह अलंकार है जिसमें समस्त प्रसिद्ध कारण के सद्भाव में भी उनके फल-उसके कार्य-का असद्वाव वर्णित हो। यहाँ 'अखण्ड' का अभिग्राय है 'सम्मिलित' अथवा समस्त का। और ऐसे कारणों के (वस्तुतः कारण से क्योंकि यहां बहुवचन विवत्षित नहीं, जैसा कि कहा गया है-सूत्रे लिङ्गवचनमतन्त्रम्) रहने पर भी कार्य के न होने का जो कथन है वह विशेषोक्ति (किसी विशेष बात की उक्ति का किसी विशेष प्रकार की उक्ति) है। (कारण के होने पर भी कार्य के न होने का जो कथन है उसके तीन निमित्त हैं जिनके कारण) यह 'विशेषोक्ि' तीन प्रकार की हुआ करती है-१ली-अनुक्तिनिमित्ता (वह, जिसमें प्रकरण आदि के द्वारा अज्ञात निमित्त का अकथन हो), २ी-उक्तनिमित्ता (वह, जिसमें निमित्त का कथन कर दिया जाय) और ररी-अचिन्त्यनिमित्ता (वह, जिसमें निमित्त ऐसा हो जो अचविन्त्य रहे)। इसके क्रमशः उदाहरण ये हैं :-

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३६२ काव्यप्रकाश:

क्रमेणोदाहरणम्- ( १ अनुक्तनेमत्ता विशेषोक्ति ) निद्रानिवृत्तावुदिते द्युरत्ने सखीजने द्वारपदं पराप्ते। श्लथीकृताश्लेषरसे भुजङ्गे चचाल नालिङ्गनतोङ्गना सा ।। ४७४।। (२ उक्तनिमित्ता विशेषोक्ति) कर्पूर इव दग्धोऽपि शक्तिमान् यो जने जने। नमोऽस्त्ववार्यवीर्याय तस्मै मकरकेतवे॥४७५॥ ( ३ अर्रचिन्त्यनिमित्ता विशेषोक्ति ) स एकस्त्रीणि जयति जगन्ति कुसुमायुधः । हरताऽपि तनुं यस्य शम्भुना न बलं हतम् ॥ ४७६॥ ( २१ यथासंख्य अलद्वार ) (१६४) यथासंख्यं क्रमेणैव क्रमिकाणां समन्वयः ॥१०८। 'वह नायिका नींद के टूटने पर भी, भगवान् सूर्य के उदित होने पर भी, सखियों के 'शयन-मन्दिर के द्वार पर पहुंचने पर भी और आलिङ्गन के आनन्द में अपने प्रेमी के ढीले पड़ जाने पर भी, ऐसा न कर पायी की आलिङ्गन करना छोड़ दे।' [यहां आलिङ्गन के परित्याग के कारण जैसे कि निद्धा-भंग, सूर्योदय आदि के सद्भाव में भी आलिङ्गन-परित्याग-रूप कार्य के अभाव का कथन है जिसमें विशेषोक्ति अलङ्कार है। यह विशेषोक्ति अनुक्तनिमित्ता यहां इसलिए है क्योंकि अनुरागाधिक्यरूप निमित्त की यहां उचि नहीं है।] 'उस अकुण्ठितशक्ति मकरकेतन (कामदेव) को नमस्कार है जो कपूर की भांति (भगवान् शिव की नेत्र-वह्नि में) जल जाने पर भी सर्वत्र जन-जन में अपनी शक्ति से व्याप्त हैं।' [कविराज राजशेखर की इस उक्ति (बालरामायण श्य अङ्क) में उक्त निमित्ता विशेषोक्ति है क्योंकि शक्तिध्वंस के कारण शरीरदाह के होने पर भी शक्तिध्वंसरूप कार्य का अभाव वर्णित है और इस वर्णन का निमित्त भी यहां प्रतिपादित है जो कि काम की अवार्यचीर्यता-अकुण्ठितशक्ति है।] 'तीनों लोकों को वही अकेला कुसुमायुध (कामदेव) जीता करता है जिसके शरीर का नाश कर देने वाले भी शिव ने बल का नाश नहीं किया।' [ यहां बलनाश के कारण शरीर-नाश के सद्भाव में भी बलनाशरूप कार्य का अभाव वर्णित है जिसका निमित्त अचिन्त्य है। इसलिए यहां अचिन्त्यनिमित्ता विशेषोक्ति है।] टिप्पणी-भामड और उद्भट ने 'विशेषोनि' । ममीक्ष' को है वह इस प्रकार है- 'यत्सामग्रयेऽपि शककीनां फलानुत्पत्तिबन्धनम्। विशेषस्याभिघित्सातस्त द्विशेषोकतिरुच्यते ।' यहां जो शक्तियों का (कारकशनय्र के।) + ग्रथ यवा सामस्त्य है वही मम्मट की कारिका में कारणों को अखण्डता (अववणडेषु का णेपु अनुवाद-'यथासंख्य' वह अल्कार है जिसमें पदार्थों का, जिस क्रम से वे उपनिबद्ध हों, उसी क्रम से (आगे उपनिबद्ध होने वाले पदार्थों के साथ) समन्वय अथवा सम्बन्ध हुआ करता है। (जैसे पहले निर्दिष्ट पदार्थ का बाद में निर्दिष्ट प्रथम पदार्थ से, दूसरे का दूसरे से आदि)।

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दशम उल्लास: ३६३

एकस्त्रिधा वससि चेतसि चित्रमत्र देव! द्विषां च विदुषां च मृगीद्दशां च। तापं च सम्मदरसं च रति च पुष्णन् शौर्योष्मणा च विनयेन च लीलया च।।४३७॥ ( २२ अर्थान्तरन्यास अलंकार औप्रर उसके चार प्रकार ) (१६५) सामान्यं वा विशेषो वा तदन्येन समर्थ्यते। यत्तु सोऽर्थान्तरन्यासः साधर्म्येणेतरेण वा ॥ १०९॥ साधर्म्येण वैधर्म्येण वा सामान्यं विशेषेण यत् समर्थ्यंते विशेषो वा सामा- न्येन सोऽर्थान्तरन्यास: । क्रमेणोदाहरणम्- ( १ साधर्म्य हेतु के द्वारा विशेष से सामान्यका समर्थन) निजदोषावृतमनसामतिसुन्दरमेव भाति तिपरीतम्। पश्यति पित्तोपहतः शशिशुभ्रं शङ्गर्माप पीतम् ॥४७८॥

जैसे कि-'महाराज! एक ही आप, कितने आश्चर्य की बात है कि शत्रुओं, विद्वानों और रमणियों के हृदय में अपने प्रखर पराक्रम, विनय और विलास के द्वारा सन्ताप, आनन्द और प्रेम उत्पन्न करते हुये विराजमान रहा करते हैं।' टिप्पणी-'यथासंख्य' को अलंकार इसीलिए माना गया है क्योंकि यहाँ पहले-पीछे वर्णन किये गये पदार्थो के यथाक्रम सम्बम्ध में एक वैचित्र्य प्रतीत हुआ करता है। वैसे यहाँ कवि- प्रतिमा का कोई हाथ नहीं, यहाँ जो कुछ भी है वह केवल एक बाह्य वैचित्य का अनुभव जो कि रचना-कौशल का परिणाम है। यहाँ पदार्थों में किसी प्रकार का उपमानोपमेयभाव विवक्षित नहीं। इसीलिये उद्भट ने कहा है- भूयसामुपदिष्टानामर्थानामसधर्मणाम्। क्रमशो योऽनुनिर्देशो यथासंख्यं तदुच्यते॥ (काव्यालक्कार सार संग्रह ३.२ ) अनुवाद-'अर्थान्तरन्यास' वह अलंकार है जिसे साधर्म्य और वैधर्म्य की दृष्टि से 'सामान्य'का विशेष द्वारा और 'विशेष' का सामान्य द्वारा समर्थन अथवा उपपादन कहते हैं। (सामान्य का साधर्म्य द्वारा विशेष से समर्थन, सामान्य का वैधर्म्य द्वारा विशेष से समर्थन, विशेष का साधर्म्य द्वारा सामान्य से समर्थन और विशेष का वैधर्म्य द्वारा सामान्य से समर्थन-इस प्रकार दोनों समर्थन हेतुओं के दोनों प्रकारों के समर्थनों में अनुगत होने के कारण यह अर्थान्तरन्यास चार प्रकार का हुआ करता है)। यहाँ 'साधर्म्य' और साधर्म्य से इतर अर्थात् 'वैधर्म्य' का अभिप्राय है समानधर्मता और विरुद्धधर्मता का। 'अर्थान्तरन्यास' का तात्पर्य है साध्म्यरूप समर्थन हेतु अथवा वैधम्यरूप समर्थन हेतु के द्वारा 'सामान्य' का 'विशेष' से समर्थन और 'विशेष' का 'सामान्य' से समर्थन किया जाना। क्रमशः उदाहरण ये हैं :- 'अपने ही दोषों से जिनका मन आक्रान्त है उन्हें सुन्दर से सुन्दर भी वस्तु बुरी ही लगा करती है। उस मनुष्यको, जिसके शरीर में पित्त का उपद्रव बढ़ा रहता है, चन्द्रमा की भाँति श्वेत शङ्ग भी पीला दिखाई दिया करता है। [ यहाँ 'अपने ही दोषों से.लगा करती है' इत्यादि एक सामान्य विषय है जिसकी उपपत्ति के लिए 'उस मनुष्य को ... दिखाई दिया करता है' इत्यादि रूप एक अन्य विशेष अर्थ का न्यास किया गया है। यहाँ जो समर्थन-हेतु है यह साध्य है।]

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३६४ काव्यप्रकाश:

( २ साधर्म्य हेतु के द्वारा 'सामान्य' से 'विशेष' का समर्थन) सुसितवसनालंकारायां कदाचन कौमुदी- महसि सुदृशि स्वैरं यान्त्यां गतोऽस्तमभूद्विधुः। 11 20 तदनु भवतः कीत्ति: केनाप्यगीयत येन सा प्रियगृहमगान्मुक्ताशङ्का क्व नासि शुभप्रदः ॥४८६॥ (३ वैधर्म्य के द्वारा विशेष से सामान्य का समर्थन)

11 803 गुणानामेव दौरात्म्याद् धुरि घुर्यो नियोज्यते। असंजातकिणस्कन्धः सुरं स्वपिति गौर्गलिः॥ ४८० ॥ THIE (४ वैधर्म्य के द्वारा सामान्य से विशेष का समर्थन) अहो हि मे बह्वपराद्धमायुषा यदप्रियं वाच्यमिदं मयेदशम् । त एव धन्या: सुहृदः पराभवं जगत्यदष्टवैव हि ये क्षयं गताः ।। ४८१।। 'महाराज! कभी ऐसा हुआ कि चाँदनी के छिटकते कोई श्वेतवसना और उज्जवल आभरणों से सजी नायिका अभिसार के लिए निकली और मार्ग में ही चाँद डूब गया किन्तु जैसे ही किसी ने आपका कीर्ततिगान गाया कि (चारों ओर चाँदनी देख) वह नायिका निःशङ्क होकर अपने प्रियतम के घर पहुँच गयी-भला आप कहाँ और कब लोगों के लिये कल्याणकारी नहीं!' [ यहाँ 'सुसितवसनालङ्कारायाम्' आदि में एक विशेष विषय का अभिधान किया जा रहा है जिसे 'क नासि शुभप्रदः' इत्यादि एक सामान्य विषय से समर्थित किया गया है। यहाँ जो समर्थन हेतु है वह 'समानधर्मता' है।] 'यह तो गुणों का अपराध है कि कार्यकुशल मनुष्य ही कार्य में नियुक्त किया जाता है क्योंकि जो बैल, जुभा रखते ही बैठ जाता है वह भला आराम से क्यों नहीं सोवे और उसके कंधे पर जुए का चिह्न क्यों कर हो !' [यहाँ 'घुरि घुर्यो नियोज्यते' इत्यादि एक सामान्य विषय के रूप में प्रतिपादित है जिसका समर्थन 'सुखं स्वपिति गौर्गलिः' इस विशेष विषय के द्वारा, वैधर्म्य की दृष्टि से किया जा रहा है। ] 'ओह ! यह तो मेरे दीर्घजीवी होने का ही पाप है कि ऐसी अप्रिय बात मुके ही कहनी पड़ी। सचमुच वे ही लोग धन्य हैं जो इस संसार में अपने मित्र का दुःख देखने के पहले ही मर चुके होते हैं।' [ यहाँ 'त एव धन्याः' इत्यादि रूप सामान्य विषय द्वारा 'अहो हि मे बह्वपराङमा युषा' इत्यादि रूप एक विशेष विषय का समर्थन किया जा रहा है। यहाँ जो समर्थन-हेतु हैं वह वैधर्म्य रूप है।] टिप्पणी-'अर्थान्तरन्यास' का अभिप्राय है अनुपपन्न होने के कारण सम्भाव्यमान एक अर्थ की उपपत्ति के लिए किसी दूसरे अर्थ का न्यास अथवा स्थापन करना। यहां दो अर्थों में जो परस्पर सम्बन्ध है वह समर्थ्य-समर्थकभावरूप सम्बन्ध है। समर्थ्य-समर्थकभावरूप सम्बन्ध तो 'दृष्टान्त' अलक्कार में भी है किन्तु वहाँ सामान्य का समर्थन सामान्य से और विशेष का समर्थन विशेष से हुआ करता है। 'अर्थान्तरन्यास' में ऐसी बात नहीं क्योंकि यहाँ सामान्य का समर्यन विशेषसे और विशेष का समर्थन सामान्य से किया जाता है। 'काव्यलिङ' अलंकार में भी दो अर्थो में समथ्य-समर्थक भाव रहा करता है किन्तु यहाँ कार्य का समर्थन कारण से और कारण का समर्थन कार्य मे किया जाया करना है। विवरणकार ने इसलिए ऐसा कहा है- 'अनुपपद्यमानतया संभाव्यमानयोः सामान्यविशेषयोरुपपादनार्थं तयोरन्यतररूपो- दाहरणोपन्यास:अर्थान्तरन्यासः। कार्यकारणयो: परस्परं दष्टान्तदार्टन्तिकभावविरहातू नैव

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दशम उल्लास: ३६५

(२३ विरोध-विरोधाभास अलंकार ) (१६६) विरोध: सोऽविरोधेऽपि विरुद्धत्वेन यहूच: । वस्तुवृत्तेनाविरोधेऽपि विरुद्धयोरिव यदभिधानं स विरोधः। (विरोधाभास के १० भेद ) (१६७) जातिश्चतुर्भिर्जात्याद्यैर्विरुद्धा स्याद् गुणैस्त्रिमिः ॥११०॥ क्रिया द्ाभ्यामपि द्रव्यं द्रव्येणैवेति ते दश। क्रमेणोदाहरणम्- अभिनवनलिनीकिसलयमृणालवलयादि दवदहनराशिः । सुभग! कुरंगद्दशोऽस्या विधिवशतस्त्वद्वियोगपविपाते ॥४८२॥ तयोः समर्थ्य-समर्थकभावः सम्भवतीति न तत्कृतप्रभेद: स्वीकृतः। 'अर्थान्तरन्यास' वस्तुतः सामान्य अथवा विशेष अर्थ की उपपत्ति के लिए दृष्टान्त का उपन्यास है। यहाँ कार्य की उपपत्ति का समर्थन कारण से और कारण की उपपत्ति का समर्थन कार्य से इसलिए अभिप्रेत नहीं क्योंकि कार्य और कारण में वह सम्बन्ध नहीं हो सकता जो दार्टान्तिक और दृष्टान्त में हुआ करता है। 'अर्थान्तरन्यास' में जो बात है वही कवि की कल्पना के द्वारा किसी वस्तु की ऐसी काव्यात्मक सिद्धि है जिसमें 'व्याप्ति' और 'पक्षसत्त्व' के प्रतिपादन की इसलिए कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि कवि के दिये दृष्टान्त में ही ये अन्तर्व्याप्त रहा करते हैं। अनुवाद-'विरोध' (विरोधाभास) वह अलंकार है जहाँ दो वस्तुओं का, उनमें वस्तुतः किसी प्रकार के विरोध के न होने पर भी, ऐसा वर्णन किया जाय जिससे उनमें विरोध की प्रतीति उत्पन्न हो जाय। यहाँ 'अविरोधेऽपि'-'अविरोध में भी' का तात्पर्य है वस्तुस्थिति की दृष्टि से किसी प्रकार के विरोध के न रहने पर भी। 'विरुद्धत्वेन यद्वचः' का अभिप्राय है दो (अविरुद्ध भी) वस्तुओं का ऐसा प्रतिपादन मानो वे परस्पर विरुद्ध हों। इस प्रकार 'विरोध' कहते हैं वस्तुतः अविरुद्ध वस्तुओं का ऐसा वर्णन जिसमें विरोध का आभास अथवा प्रतिभास मिला करे। वस्तुओं में वे १० प्रकार के विरोध संभव हैं (जिनके कारण विरोधाभास १० प्रकार का हुआ करता है) :- १. जाति का जाति से विरोध २. जाति का गुण से विरोध ६. गुण का क्रिया से विरोध

३. जाति का क्रिया से विरोध ७. गुण का द्रव्य से विरोध ८. क्रिया का क्रिया से विरोध ४. जाति का द्रव्य से विरोध ९ क्रिया का द्रव्य से विरोध ५. गुण का गुण से विरोध इनके क्रमशः उदाहरण ये हैं :- १०. द्रव्य का द्रव्य से विरोध

१ (जाति का जाति से विरोध-प्रतिभास) 'अरे प्रेमी युवक ! दुर्भाग्यवश तुम्हारे वियोग के वज्रपात में इस मृगनयनी के लिये कोमल कमलिनी के किशलय और मृणाल के वलय इत्यादि सभी के सभी दावाग्निपुंज हो रहे हैं।' [ यहां 'नलिनीपल्लव' आदि में नलिनीपल्लवता आदि रूप जाति का 'दावाभनि' में अनुगत 'दावाग्नित्व' रूप जातिभूत धर्म से विरोध है और इस प्रकार नलिनीपल्लव आदि दावाग्नि नहीं हो लकते किन्तु विरह की उद्दीपकता के कारण यहां परस्पर विरुद्धजातियों का उपचारतः विरोध दूर किया जारहा है जिससे विरोधाभास की प्रतीति हो जाती है। यहां 'रूपक' का भ्रम नहीं हो सकता क्योंकि रूपक के प्रसङ्ग जैसे कि 'मखं चन्द्रः'

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३६६ काव्यप्रकाश:

( २ जाति का गुण से विरोध )

विश्वंभराऽप्यतिलघुनरनाथ ! तवान्तिके नियतम् ॥४८३॥ ( ३ जाति का क्रिया से विरोध ) येषां कण्ठपरित्रहप्रणयितां संप्राप्य धाराधर- स्तीचण: सोऽ्यनुरज्यते च कमपि स्नेहं पराप्नोति च। तेषां संगरसंगसक्तमनसां राज्ञां त्वया भूपते ! पांसूनां पटलैः प्रसाधनविधिर्निर्वत्यते कौतुकम् ॥ ४=४॥ ( ४ जाति का द्रव्य से विरोध) सृजति च जगदिदमवति च संहरति च हेलयैव यो नियतम्। अवसरवशतः शफरो जनार्दनः सोऽपि चित्रमिदम् ॥४८५॥ (५ गुण का गुण से विरोध) सततं मुसलासक्ता बहुतरगृहकमेघटनया नृपते!। द्विजपत्नीनां कठिनाः सति भवति कराः सरोजसुकुमाराः ॥४८६॥ इत्यादि में चन्द्र और मुख में जो अभेद है वह चमत्कारजनक है। विरोधाभास में जैसे कि 'अभिनवनलिनीकिसलयमृणालवलयादि दवदहनराशिः' जैसे प्रसङ्ग में जो चमतकार है वह अभेद में नहीं अपि तु अभेद से उत्थापित विरोध के प्रतिभास में है। यहां अभेद में विरोध के प्रतिभास से जो अभिप्राय प्रकाशित करना अभिप्रेत है वह है विरह की अवस्था का अत्यन्त अद्भुत होना।] 'महाराज ! आप के समीप यही निश्चित है कि पर्वत भी ऊँचे नहीं, वायु भी वेगवाली नहीं, समुद्र भी गंभीर नहीं और पृथिवी भी बढ़ी नहीं।' [ यहां पर्वत आदि में 'उन्नतत्व' आदि गुणों से जो विरोध घिवचित है उसका परि- हार कवि वर्णन के विषय राज-प्रभाव की महनीयता के द्वारा किया जा रहा है जिससे विरोधाभास की प्रतीति हो रही है] 'महाराज ! यह आश्चय है कि संग्राम की रङ्गभूमि में आसक्तचित्त जिन प्रतिपक्षी राजगण के कण्ठालिङ्गनलीला में आपका तीचण कृपाण इतना अनुरक्त (रक्तसे लाल) हुआ करता है और इतना अनिर्वचनीय स्नेह भाव (रक्त से चिकनापन) प्रदर्शित किया करता है उन्हीं का प्रसाधन आप धूलिकणों से किया करते हैं (उन्हीं का मस्तक काट काट कर आप उन्हें धूलिधूसरित बना दिया करते हैं)।' [ यहां 'खड्गत्व' जाति का अनुरक्त होने और स्नेह प्राप्त करने की क्रिया से जो विरोध है उसका परिहार रुधिर सम्पर्क से लालिमा और चिकनापन के अभिप्राय द्वारा किया गया है जिसमें 'विरोधाभास' स्पष्ट हो रहा है।] 'यह आश्चर्य है कि जो जनार्दन (भगवान्, विष्णु) अनायास इस जगत् की रचना किया करें, अनायास रक्ता किया करें और अन्त में अनायास इसे नष्ट भी किया करें वे ही कालवश मत्स्य के रूप में परिवर्तित हो जाँय।' [यहां 'मत्स्यत्व' जाति का जनार्दन रूपी द्रव्य से जो विरोध है उसका परिहार जनार्दन की लीला-महिमा के द्वारा अभिप्रेत है जिससे यहां 'विरोधाभास' है।] 'महाराज ! यह तो आप जैसे महादानी की महिमा है कि ब्राह्मण-गृहिणियों के वे हाथ जो सदा मूसर पकड़ने और नाना प्रकार के गृहस्थी के का्मों के करने घरने के कारण कढ़े हुआ करते हैं, कमल के समान कोमल हो रहे हैं।'

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दशम उल्लास: ३६७

( ६ गुण का क्रिया से विरोध ) पेशलमपि खलवचनं दहतितरां मानसं सतत्त्वविदाम् । परुषमपि सुजनवाक्यं मलयजरसवत प्रमोद्यति ॥४८७।। ( ७ गुण का द्रव्य से विरोध ) कौख्ाद्रिरुद्दामदषद्द्ृढोऽसी यन्मार्गणानर्गलशातपाते। अभून्नवाम्भोजदलाभिजातः स भार्गवः सत्यमपूर्वसर्गः ॥४८८॥ ( ८ क्रिया का क्रिया से विरोध) परिच्छेदातीतः सकलवचनानामविषयः पुनर्जन्मन्यस्मिन्ननुभवपथं यो न गतवान्। विवेकप्रदूध्वंसादुपचितमहामोहगहनो विकार: कोऽप्यन्तर्जडयति च तापं च कुरुते ॥४८॥ (९ क्रिया का द्रव्य से विरोध) अयं वारामेको निलय इति रत्नाकर इति श्रितोऽस्माभिस्तृष्णातरलितमनोभिर्जलनिधिः। क एवं जानीते निजकरपुटीकोटरगतं क्षणादेनं ताम्यत्तिमिमकरमापास्यति मुनिः ॥४0 ॥ [यहाँ कठिनता और सुकुमारता के गुणों का जो विशध प्रदर्शित है वह दानमहिमा के द्वारा परिहृत हो रहा है जिससे यहाँ 'विरोधाभास' स्पष्ट है।] खलों के कोमल भी वचन तत्वज्ञानियों के हृदय जलाया करते हैं और सज्जनों की कठोर भी बातें उन्हें चन्दनरस की भाँति आनन्दित किया करती हैं।' [यहाँ कोमलता के गुण का दाह की क्रिया से और कठोरता के गुण का आनन्दित करने की क्रिया से जो विरोध है वह खलता और सुजनता की महिमा से दूर किया जा रहा है जिससे यहाँ 'विरोधाभास' स्पष्ट है] 'वे परशुराम वस्तुतः एक अलौकिक अवतार हैं जिनके बाणों के अनवरत किवा अत्यन्त तीचण आघात से बड़े-बड़ी शिलाओं से सुदृढ़ भी क्रौंच पर्वत नये कमल के किशलय के समान कोबल बना दिया गया।' [यहाँ कोमलता के गुण का कौञ्जपर्वतरूपी द्रव्य से जो विरोध है उसका उपशमन भागंच के बाणों की शक्ति के द्वारा किया जा रहा है जिससे 'विरोधाभास' की प्रतीति हो रही है। ] 'कोई विचित्र मनोभाव, जिसका विश्लेषण संभव नहीं, जिसे शब्दों से प्रकट नहीं किया जा सकता, जिसका इस जन्म में कौन कहे' पहले जन्मों में भी कोई अनुभव न हो सका होगा और जिसके कारण विवेक का ऐसा ध्वंस हो रहा है कि मन में महामोह सवथा व्याप्त है, मेरे हृदय को मुग्ध (शीतल) बना रहा है और सन्तप्त भी करता जा रहा है। ( मालतीमाधव १०) [यहाँ माधव के विरह की विचित्रता से शीतल बनाने और सन्तप्त ने की क्रियाओं का विरोध परिहृत किया जा रहा है जिसमें 'विरोधाभास' झलक उठता है। 'तृष्णा के कारण वित्िप्तचित्त हमलोग इस समुद्र का इसलिए आश्रग लिया करते हैं कि यह जल और रत्नों का एकमात्र निधान है तथा रत्नों का एकमात्र आव है, किन्तु यह किसे पता है कि क्षणभर में ही महामत्स्यों और मकरों से विस्ुब्ध यह जलराशि महा- मुनि अगस्त्य के चुल्ल में आकर उनके पेट में पहुँच जायगी। (भल्लाटशतक-श्लोक १०८)

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३६८ काव्यप्रकाश:

( १० द्रव्य का द्रव्य से विरोध)

क्षितितिलक ! त्वयि तटजुषि शङ्करचूडापगाऽपि कालिन्दी ॥४६१॥ (२४ स्वभावोक्ति अलंकार ) (१६८) स्वभावोक्तिस्तु डिम्भादेः स्वक्रियारूपवर्णनम् ॥१११॥ स्वयोस्तदेकाश्रययोः । रूपं वणः संस्थानं च। उदाहरणम्- पश्चादंघी प्रसाय त्रिकनतिविततं द्राघयित्वाऽङ्गमुच्च- रासज्याभुग्नकण्ठो मुखमुरसि सटां धूलिधूम्रां विधूय । घासग्रासाभिलाषादनवरतचलत्प्रोथतुण्डस्तुरङ्गो मन्दं शब्दायमानो विलिखति शयनादुत्थितः दमां खुरेण ।४६२।। [यहाँ जो विरोध है वह पान की क्रिया और उसके कर्तृकारक अगस्त्यरूप द्रव्य और कर्मकारक समुद्ररूप द्रव्य में है किन्तु तपस्या के प्रभाव से इसके परिहारमें 'विरोधाभास' स्पष्ट हो रहा है।] 'हे महाराज ! हे पृथिवीतिलक ! आप जब तट पर खड़े हैं तब मदोन्मत्त सैन्यगज- समूह की मदजल-धाराओं के सम्पर्क से यह (हर-जटा-सुन्दरी) गंगा भी यमुना न हो जाय तो और क्या हो !, [यहाँ गङ्गा और जमुनारूप द्रव्यों का परस्पर विरोधी गजमदधार की श्यामता से परिहृत है और विरोधाभास का स्वरूप उन्मीलित हो रहा है।] टिप्पणी -- 'विरोध' अलंकार को वाच्य का अलंकार इसलिये कहा जाता है कि यहाँ यथाश्रुत शब्द से विरोध प्रतीत तो हुआ करता है किन्तु इस शब्द्र के अन्यत्र तात्पर्य होने के कारण इसका परिहार हो जाया करता है और यह विरोध के प्रतिभासमें परिवर्तित होकर चमत्कार उनका बन जाया करता है। यह विरोध तभी वाच्यालंकार है जब कि वाच्यार्थ में विरोध प्रतीत हुआ करता है जिसके लिये विरोध सूचक 'अपि' 'च' आदि शब्द सहायक रहा करते हैं। किन्तु यदि व्यङ्ग्यार्थ में विरोध प्रतीत हो तो वहाँ 'विरोधालंकार ध्वनि' हुआ करती है न कि विरोधा- लंकार। 'विरोध' अलंकार वस्तुतः कवि को उस कल्पना का शब्दमय अवतार है जो किसी विशेष विवक्षा के कारण प्रजापति की सृष्टि में परिवर्तन किया करती है, नीरस को सरस बनाया करती है और जो परुष है उसे बनाया करती है कोमल। अनुवाद-'स्वभावोक्ति' वह अलंकार है जिसे (पदार्थों जैसे कि) बालक आदि की प्रकृतिसिद्ध क्रिकया अथवा उनके रूप का वर्णन कहा करते हैं। यहाँ 'स्वक्रियारूप वर्णनम्' में 'स्व-'अपने' का अभिप्राय है 'स्वयोः' का-एक मात्र अपने में समवेत अथवा समाश्रित रहने वालों का (अर्थात् क्रिया का और रूप का)। 'रूप' का यहाँ जो तात्पर्य है वह 'वर्ण'-रंग' का है और है साथ ही साथ 'संस्थान'-'अंग- अ्रत्यंग विन्यास' का भी। उदाहरण के लिये- 'सोकर उठा हुआ घोड़ा पिछले दोनों पैरों को फैलाये, पीठ के झुकाने के कारण लम्बी देह किये, गर्दन टेढ़ी करने से छाती पर मुँह सटाकर धूलि-धूसर केसर को हिलाते हुये घास खाने की इच्छा से दोनों ओठों को चलाते धीरे २ हिनहिनाते अपने अगले खुरों से नीचे की जमीन खोदता जा रहा है।' [यहाँ 'स्वभावोकति' है क्योंकि अश्वमात्र की स्वाभाविक क्रिया किंवा इसके अंग-प्रत्यंग विन्यास का जो वर्णन है उसका चमरकार स्पष्ट प्रतीत हो रहा है।] टिप्पणी-पहले से ही आचार्य मामह के 'स्वभावोक्ति' को अलंकार माना जाता आा रहा है। मामह का यह कथन-

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दशम उल्लास: ३६६

(२५ व्याजस्तुति अलंकार ) (१६९) व्याजस्तुतिर्मुखे निन्दास्तुतिर्वा रूढिरन्यथा। व्याजरूपा व्याजेन वा स्तुतिः । क्रमेणोदाहरणम्- हित्या त्वामुपरोधवन्ध्यमनसां मन्ये न मौलि: परो लज्जावर्जनमन्तरेण न रमामन्यत्र संदृश्यते। यस्त्यागं तनुतेतरां मुखशतैरेत्याश्रिताया: श्रियः प्राप्य त्यागकृतावमाननमपि त्वय्येव यस्या: स्थितिः॥४६३।। 'स्वभावोक्तिरलंकार इति केचित् प्रचक्षते। अर्थस्य तदवस्थत्वं स्वभावोऽभिहितो यथा ॥ (काव्यालंकार २. ९३ इस बात का सूचक है कि 'स्वभावोक्ति' में भी एक चमत्कार है। किन्तु भामह की इस मान्यता अर्थात्- 'सैषा स्वैव वक्रोक्तिरनयारऽर्थो विभाव्यते। यत्नोऽस्यां कविना कार्य: कोऽलक्कारोऽनया विना।।' (काव्यालंकार २.८५) से कुछ भ्रम में पड़ कर अन्य आलक्कारिक जैसे कि आचार्य कुन्तक आदि इसे अलक्कार नहीं मान सके ! आचार्य कुन्तक का स्पष्ट कथन है :- 'अलक्कारकृतां येषां स्वभावोक्तिरलङ्कृतिः। अलङ्कार्यतया तेषां किमन्यद्वशिष्यते॥' वाद के आलङ्कारिकों में एक प्रबल पक्ष 'स्वभावोकति' को एक वाङमय-प्रकार मानने के लिये उत्सुक है और इसकी यही धारणा है कि-भिन्नं द्विधा स्वभावोक्तिर्वक्रोक्तिश्चेति वाड् मयम्। आचार्य अभिनव गुप्त ने इसी धारणा का इस सुन्दरता से समर्थन किया है :- 'काव्ये च लोकनाट्यधर्मिस्थानीयेन स्वभावोक्तिव क्रोक्तिप्रकार द्वयेनालौकिकप्रसन्नमधुरौ- जस्विशब्दसमर्प्यमाणविभावादियोगादियमेव रसवार्ता।' यद्यपि काव्यप्रकाशकार ने 'स्वभावोक्ति' में वाङ्मय की किसी विभाजक उपाधि का दर्शन नहीं किया, किन्तु इसे वाच्य का एक वैचित्र्य तो अवश्य ही स्वीकार किया। काव्यप्रकाशकार का स्वभावोक्ति-निरूपण वस्तुतः उद्भट के इस स्वभावोत्ति लक्षण अर्थात्- 'क्रियायां संप्रवृत्तस्य हेवाकानां निबन्धनम्। कस्यचिन्मृगडिम्भादेः स्वभावोक्तिरुदाहृता।' (काव्यालंकारसारसंग्रह ३.५) का अनुसरण करता है। काव्यप्रकाशकार की दृष्टि में 'रसवत्' के अलंकार न होने के कारण स्वभावोक्ति-रसवत् और भाविक के- 'चस्तुनश्चित्तवृत्तेश्च संघाद स्फुटता प्रथा। स्वभावोक्ते रसवतो भाविकस्य च लक्षणम्॥' इस प्रकार के सूक्ष्म-विश्लेषण की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। अनुवाद-'व्याजस्तुति' वह अलंकार है जिसे आपाततः (किसी वस्तु की) निन्दा किन्तु अन्ततोगत्वा (उसकी) स्तुति अथवा आपाततः (किसी वस्तु की) स्तुति किन्तु अन्त में (उसकी) निन्दा कहा करते हैं। 'व्याजस्तुति' का अभिप्नाय है व्याजरूपा स्तुति (अर्थात् ऐसी स्तुति जो निन्दा का एक बहाना हो) अथवा व्याज-बहाने से स्तुति (अर्थात् ऐसी स्तुति जो आपाततः तो निन्दा प्रतीत हो किन्तु अन्त में स्तुति में परिणत हो जाय।) इसके क्रमशः (कारिकानिर्दिष्ट क्रम से) उहाहरण ये हैं :- 'राजन् ! मुझे तो यही स्पष्ट लग रहा है कि आपको छोड़कर न तो आश्रितों के अनुरोध से रिक्तहृदय आश्रयदाताओं का कोई दूसरा शिरोमणि है और न लक्ष्मी को छोड़ कर कहीं अन्यत्र (स्त्री जाति में) कोई निर्लज्जता दिखाई देती है क्योंकि आप तो

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४०० काव्यप्रकाश:

(निन्दापर्यवसायिनी स्तुति) हे हेलाजितबोधिसत्त्व ! वचसां कि विस्तरस्तोयधे! नास्ति त्वत्सदशः परः परहिताधाने गृहीतव्रतः । तृष्यत्पान्थजनोपकार घटनावैमुख्यलव्धायशो- भारप्रोद्वहने करोषि कृपया साहायकं यन्मरोः ॥४६४॥ (२६ ) सहोक्ति अपरलंकार ) (१७०) सा सहोक्ति: सहार्थस्य बलादेकं द्विवाचकम् ॥११२ ॥ एकार्थाभिधायकमपि सहार्थबलाद् यद् उभयस्याप्यवगमकं सा सहोक्तिः। यथा- सह दिअहणिसाहिं दीहरा सासदण्डा सह मणिवलयेहिं वाप्पधारा गलन्ति। तुह सुहअ विओए तीश उ०्बग्गिरीए सह अ तणुलदाए दुव्वला जीविदासा। ४६५॥ ऐसे ठहरे जो नानाविध उपायों से आप पर आश्रित लचमी का सदा परित्याग (दान) किया करते हैं और लच्मी ठहरी ऐसी जो आपके परित्याग (दान) से अपमानित हो होकर भी सदा आप ही के साथ रहता चाहती है।' [ यहाँ निन्दापूर्वक व्याजस्तुति है। राजा की आपाततः निन्दा उसके महादान किंवा श्री-समृद्धि की स्तुति में परिणत हो रही है।] 'हे महाकारुणिक भगवान् बुद्ध के विजेता ! महासागर ! विशेष कुछ कहने से क्या, बस इतना ही कहना है कि परोपकार व्रत का तुम्हारे समान कोई दूसरा व्रती नहीं हो सकता! क्योंकि यह तो तुम्हारी अनुकम्पा है जो तुम उस मरुस्थल की सहायता किया करते हो जिसे प्यासे पथिकों के अपकार करने के अयश-भार को सदा ढोना पड़ा करता है। [ यहाँ 'स्तुति के व्याज से समुद्र की, उसके खारे और पीने के अयोग्य जल के कारण' निन्दा का प्रतिपादन है जिसका चमत्कार स्पष्ट प्रतीत हो रहा है। टिप्पणी-गचार्य मम्मट के अनुसार 'व्याजस्तुति' अलंकार दो प्रकार का है क्योंकि यहाँ केवल स्तुतिपर्यवसायिनी निन्दा ही विवक्षित नहीं अपितु निन्दापर्यवसायिनी स्तुति भी अभिप्रेत है। किन्तु प्राचीन आलक्कारिक भामह और उद्मट की दृष्टि में 'व्याजस्तुति' एक मात्र निन्दा के व्याज के द्वारा स्तुति ही है। उद्भट ने इसीलिये व्याजस्तुनि' का यह स्वरूप बताया है- शब्दशक्तिस्वभावेन यत्र निन्देव गम्यते। वस्तुतस्तु स्तुतिः श्रेष्ठा व्याजस्तुतिरसौ मता॥ जिसका तात्पर्य यह है कि 'व्याजस्तुति' का चमत्कार इसी में है कि शब्दों की अभिधायक शक्ति भले ही 'निन्दा' का बोध कर।वे किन्तु पदार्थ पर्यालोचन के द्वारा जो वाक्यार्थ निकले वह स्तुतिपरक ही हो। इस प्रकार मम्मट के अनुसार तो व्याजस्तुति दो प्रकार की है-१ व्याजरूपा स्तुति और २ व्याज से (निन्दाच्ाज से) स्तुनि, किन्तु भामह और उन्भट आदि प्राचीन आलक्का रकों की दृष्टि में यह केवल एक प्रकार की ही है और वह प्रकार है-व्याज से निन्दा के बहाने स्तुनि का। नुबाद-'सहोक्ति' वह अलंकार है जिसे सह (साथ) आदि शब्द के अर्थसामर्थ्य से एक पद की अनेकार्थबोधकता कहा करते हैं। 'सहोक्ति' का अभिप्राय है (सहभाव की उत्ति) एक अन्वित अर्थ के अभि- धायक भी पद की, 'सह' शब्द के अर्थसामर्थ्य से, दो अन्वित अर्थ की बोधकता। इसका उदाहरण यह है :-

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दशम उल्लास: ४०१

(सह दिवसनिशाभिर्दीर्धाः श्वासदण्डाः सह मणिवलयर्बाष्पधारा गलन्ति। तच सुभगवियोगे तस्या उद्विग्नायाः सह च तनुलतया दुबला जीविताशा॥ ४९५॥} श्वासदण्डादिगतं दीर्घत्वादि शाब्दम् दिवसनिशादिगतं तु सहार्थसा थर्या- त्प्रतिपद्यते। (२७ विनोकि अलंकार) (१७१) विनोक्ति: सा विनाऽन्येन यत्रान्यः सन्न नेतरः । क्वचिदशोभनः क्वचिच्छोभनः । क्रमेणोदाहरणम्- ( १ अ्रशोभनबोधक विनोक्ति अलंकार) अरुचिर्निशया विना शशी शशिना सापि विना महत्तमः ॥ उभयेन विना मनोभवस्फुरितं नैव चकास्ति कामिनोः ॥४६६॥ 'अरे प्रेमी युवक! तुम्हारे वियोग में व्याकुल उस नायिका की सांसें दिन-रात के साथ-साथ लम्बी लम्बी होती जा रही हैं, आँसुओं की धारायें मणिवलयों के साथ-साथ नीचे गिरा करती हैं और जीवन की आशा! वह तो उसकी तनुलता के साथ-साथ दुर्बल ही होती जा रही है।' यहाँ 'श्वास-प्रश्वास' आदि में 'दीर्घत्व' आदि का अन्वय तो शाब्द है (क्योंकि दोनों में सामानाधिकरण्य है-दोनों प्रथमान्त होने से विशेषण-विशेष्यभाव से सम्बद्ध हैं किन्तु 'दिवस-निशा' आदि में 'दीर्घत्व' आदि का अन्वय 'सह' शब्द के अर्थ के अन्वय के सामर्थ्य से प्रतीत होता है (अर्थात् अर्थबल-लभ्य है।) टिप्पणी-यद्यपि 'सहोक्ति' को रूप-रचना मे भगवान् पाणिनि के सूत्र-'सह युक्तऽप्रधाने' (२. २. १९) से 'सह' अर्थ के योग में, तृतीया-विधान आवश्यक है और इसलिये यह वहाँ संभव है जहाँ गुण और प्रधानभाव से रहने वाले दो पदार्थ, कुछ तो शब्द की मर्याद। से और कुछ अर्थ के सामर्थ्य से, एक धर्म से अन्वित प्रतीत हुआ करते हैं किन्तु इसका अलंकार होना-चमत्कारा- धायक बनना तब युक्तियुक्त हुआ करता है जब इसे-अमेदाध्यवसान (अतिशयोक्ति) का अनु- प्राणन मिला करता है। इसीलिये 'पुत्रेण सहागतः पिता' आदि चमत्कारहीन वाक्यों में 'सहोक्ति' अलंकार नहीं हुआ करता। काव्यप्रकाश के व्याख्याकार माणिक्य चन्द्र का भी इसीलिये कहना है -- 'सहोक्तौ द्वयोरपि प्रकृतयोरप्रकृतयोर्वा ग्रहणात् काल्पनिकमौपम्यं तत्र तृतीयान्तस्य गुणभावादुपमानत्वं शेषस्य प्राधान्यादुपमेयत्वम्।' अनुवाद-'विनोक्ति' वह अलंकार है जिसमें एक के बिना दूसरे के अशोभन होने अथवा शोभन होने का वर्णन अभिप्रेत हुआ करता है। यहाँ कारिका के 'सन् न' का अभिप्राय है कहीं ( एक के बिना दूसरे का) असुन्दर लगना और 'नेतरः' का तात्पर्य है कहीं (एक के बिना दूसरे का) सुन्दर लगना। क्रमशः इन दोनों प्रकारों के उदाहरण ये हैं :- 'रात के बिना तो चन्द्रमा कान्तिहीन (अशोभन) है और चन्द्रमा के बिना रात अंधेरी (असुन्दर) है और इन दोनों के बिना प्रेमिका और प्रेमिकाओं की प्रणयलीला अच्छी नहीं लगती।' [ यहाँ एक अर्थात् रात आदि के बिना दूसरे अर्थात् चन्द्रमा आदि के अशोभन- असुन्दर लगने का प्रतिपादन है जिससे यहाँ अशोभन-प्रतिपादिका विनोक्तिविनाभाव की 33 २६ का०

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४०२ काव्यप्रकाश: 3M ( २ शोभनबोधक 'विनोक्ति' अलंकार ) मृगलोचनया विना विचित्रव्यवहारप्रतिभाप्रभाप्रगल्भः । अमृतद्युतिसुन्दराशयोऽयं सुहदा तेन बिना नरेन्द्रसूनुः ॥४६७॥ ( २८ परिवृत्ति अलंकार ) (१७२) परिवृत्तिर्विनिमयो योऽर्थानां स्यात्समासमैः ॥११३॥ परिवृत्तिरलङ्कारः । उदाहरणम्- ( १ सम के सम से और साथ ही साथ न्यून के उत्तम से विनिमय में परिवृत्ति) लतानामेतासामुदितकुसुमानां मरुदयं मतं लास्यं दच्वा श्रयति भृशमामोदमसमम् । लतास्त्वद्ध्वन्यानामहह दशमादाय सहसा ददत्याधिव्याधिभ्रमिरुदितमोहव्यतिकरम् ॥४६८॥ अत्र प्रथमेऽर्घे समेन समस्य द्वितीये उत्तमेन न्यूनस्य। ( २ न्यून से उत्तम के विनिमय में परिवृत्ति ) नानाविधप्रहरणैरनृप ! सम्प्रहारे स्वीकृत्य दारुणनिनादवतः प्रहारान्। उक्ति है। इसे सहोक्ति अलंकार की ध्वनि इसलिये नहीं कहा जा सकता क्योंकि 'बिना माव' की उक्ति में एक पृथक् ही चमत्कार है।] 'यह राजकुमार उस मृगनयनी प्रेमिका के बिना तो नाना प्रकार के (शासन- सग्बन्धी) कार्यकलाप में एक अद्धुत प्रतिभा के प्रदर्शन से अत्यन्त निपुण (सुन्दर) लगा करता है और उस ( नीच) मित्र के न रहने पर चन्द्र के समान स्वच्छ हृदय दिखाई दिया करता है।' [यहाँ किसी राजकुमार की किसी प्रेमिका और किसी दुष्ट मित्र के बिना शोभनता- सुन्दरता का प्रतिपादन है जिसमें शोभनताबोधक विनोक्ति अलंकार है।] टिप्पणी-यद्यपि 'विनोक्ति' के बन्ध में पृथक, बिना आदि के योग में विहित तृतीया विभक्ति ही अपेक्षित है किन्तु इसके अलंकार होने के लिये यह आवश्यक है कि वर्ण्य वस्तु की स्वाभाविक सुन्दरता अथवा असुन्दरता, जो कि किसी अन्य वस्तु के संपर्क से निखरती नहीं प्रतीत होती, निखरी हुई प्रतिपादित की जाय। अनुवाद-'परिवृत्ति' वह अलंकार है जिसमें किसी एक समान वस्तु का दूसरी समान चस्तु से विनिमय अथवा किसी एक असमान वस्तु का दूसरी असमान वस्तु से विनिमय (परिवर्तन) वर्णित किया जाय। यहाँ जो भलंकार का नाम है वह 'परिवृत्ति' है (न कि विनिमय) उदाहरण के लिये- 'यह वायु फूलों से भरी लताओं को तो एक सुन्दर लास्यनृत्य (का उपदेश) दे रही है और उनसे उनकी अनुपम सुरभि लेती जा रही है और ये लतायें क्या कर रही हैं? लेती तो ये हैं सहसा विरहियों की दृष्टि (अपनी ओर उनके ध्यान का आकर्षण) और देती हैं उन्हें पीड़ा, रोग, दिग्भ्रम, रोना-धोना और मनोमोह का सम्पर्क।' यहाँ प्रथमार्घ में तो लास्य के बदले सौरभ के विनिमय में सम का सम से विनिमय है और उत्तरार्ध में आकर्षण के बदले आधि-व्याधि आदि के विनिमय में उत्तम से न्यून का विनिमय है। 'राजन् ! आपके वीग शत्रु सैनिकों ने आपसे जो लिया है वह तो है संग्राम में आपके

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दशम उल्लास: ४०३

दष्टारिवीरविसरेण वसुन्धरेयं निविप्रलम्भपरिरम्भविधिर्वितीर्णा ॥४६६॥ अत्र न्यूनेनोत्तमस्य । ( २९ भाविक अलंकार) (१७३) प्रत्यक्षा इव यद्भावाः क्रियन्ते भूतभाविनः । तन्द्ाविकम्। भूताश्च भाविनश्चेति द्वन्द्वः। भावः कवेरभिप्रायोऽत्रास्तीति भाविकम् । उदाहरणम्- आसीदञ्जनमत्रेति पश्यामि तव लोचने। भाविभूषणसंभारां साक्षात्कुर्वे तवाकृतिम्॥ ५०० ॥ आद्ये भूतस्य द्वितीये भाविनो दर्शनम्। नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का अयक्कर प्रहार और आपको जो दिया है वह है आपका अगाढ़ आलिङ्गन करने वाली यह वसुन्धरा।' यहाँ न्यून से (अर्थात प्रहार से) उत्तम का (अर्थात् वसुन्धरा का जो) विनिमय विवच्ित है (उसके कारण परिवृत्ति का एक और ही प्रकार का चमत्कार अभिप्रेत है। टिप्पणी-आचार्य मम्मट ने 'परिवृत्ति' के दो मुख्य प्रकार अर्थात् 'समपरिवृत्ति' और 'असमपरिवृत्ति' बताये हैं। इन दोनों प्रकारों में जो वाच्य-विच्छित्ति है वह वरतुतः एक प्रकार के उपमानोपमेयभाव की अभिव्यक्ति है क्योंकि दी जाने वाली (त्यज्यमान) और ली जाने वाली (आदियमान) वस्तुओं में यदि यह सम्बन्ध न प्रतीत हो तो केवल विनियम के कारण इसे परिवृत्ति कलंकार नहीं कहा जा सकता। 'परिवृत्ति' में जो विनिमय है वह त्याग और आदान से सम्बद्ध वस्तुओं में परस्पर औपम्य का अवगमक है। लौकिक लेन-देन विनिमय मले ही हो 'परिवृत्ति' अलंकार नहीं। अनुवाद-'भाविक' अलंकार वह है जिसे भूत और भविष्य काल से सम्बद्ध पदार्थों का ऐसा वर्णन कहा जाता है जिसमें वे प्रत्यक्षवत् प्रतीत होने लगते हैं। य हाँ कारिका में 'भूतभाविनः' का अभिप्राय है भूत और भविष्य काल के पदार्थों का क्योंकि यहाँ भूताश्च (भूतकालवर्ती) और भाविनश्च (भविष्यकालवर्ती) में द्वन्द समास है (न कि कर्मधारय)। 'भाविक' का शब्दार्थ है वह (अर्थात् उस प्रकार का वर्णन) जिसमें कवि (अथवा कविनिबद्ध वक्ता) का भाव अर्थात् अभिप्राय अनुस्यूत रहा करता है। उदाहरण के लिये- 'प्रिये ! मैं तुम्हारी वे आंखें देख रहा हूँ जिनमें कभी अक्जन तू ने लगाया था! मेरी आँखों के आगे तुम्हारा वह रूप झलक रहा है जो कभी पहने जाने वाले अलद्गारों से चमक उठेगा !' यहाँ पूर्वार्ध में तो अतीत के अञ्जन और उत्तरार्ध में भविष्य के भूषणसंभार के सौन्दर्य का एक (भावनामय) साक्षात्कार (स्पष्ट प्रतिपादित) हो रहा है। टिप्पणी-'भाविक' अलंकार की रूप-रेखा का दर्शन अलंकारशास्त्र की प्राचीनतम परम्परा है। आचार्य मामह ने सबसे पहले इसका स्वरूप-दर्शन इस प्रकार किया- 'भाविकत्वमिति प्राहुः प्रबन्धविषयं गुणम्। प्रत्यक्षा इव दृश्यन्ते यत्रार्थाः भूतभाविनः॥' (काव्यालंकार ३.५३) यहाँ 'भाविक' को वाच्यालङ्कार की सीमा का अतिक्रमण करने वाला एक प्रबन्धव्यापी काव्य- सौन्दर्य माना गया है। क्योंकि भामह के अनुसार भाविक अलक्कार वस्तुतः काव्य का एक ऐसा सौन्दर्य है जिसमें शब्द की अनाकुलता, अर्थ की विचित्रता और उदात्तता तथा कथावस्तु की

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808 काव्यप्रकाश:

(३० काव्यलिङ्ग अलंकार ) (१७०) काव्यलिङ्गं हेतोर्वाक्यपदार्थता ॥ ११४॥ (प्रथम प्रकार ) वाक्यार्थता यथा- वपुः प्रादुर्भावादनुमितमिदं जन्मनि पुरा पुरारे न प्रायः क्वचिदपि भवन्तं प्रणतवान्। नमन्मुक्तः संप्रत्यहमतनुरग्रेऽ्यनतिभाक महेश ! क्षन्तव्यं तदिदमपराधद्वयमपि ॥ ५०१॥ निपुण व्णना सब कुछ ओतप्रोत है। आचार्य दण्डा की दृष्टि में भी 'भाविक' का वही स्वरूप है जो आचार्य मामह की दृष्टि में है क्योंकि दण्डी के अनुसार 'भाविक' का जो स्वरूप- तन्वाविकमिति प्राहुः प्रबन्धविषयं गुणम्। भावः कवेरभिग्रायः काव्येष्वासिद्धिसंस्थितः। परस्परोपकारित्वं सर्वेषां वस्तुपर्वणाम् । विशेषणानां व्यर्थानामक्रिया स्थानवर्णना।। व्यक्तिरुक्तिकमवलाद् गंभीरस्यापि वस्तुनः । भावायत्तमिदं सर्वमिति तव्वाविकं विदुः।' (काव्यादश २.३६४-३६६) इन उपर्युक्त पंक्तियों से प्रतीत होता है वह भामह का ही देखा-दिखाया है। आचार्य उद्भट ने भी 'भाविक' का जो साक्षात्कार किया है- 'प्रत्यक्षा इव यन्नार्था दृश्यन्ते भूतभाविनः। अत्यद्दुताः स्यात्तद्वाचामनाकुल्येन भाविकम् ॥"

बह पहले से ही किया जाता आ रहा है। इन प्राचीन आचार्यो की ही भविक सम्बन्धी मान्यता का स्पष्टीकरण आलंकारिक इन्दुगज की ये पंकतियाँ- 'वाचामनाकुलता व्यस्तसम्बन्धरहितलोकप्रसिद्धश्दोपनिबन्धनात झगित्यर्थप्रतीति- कारिता। तस्यां हि सत्यां कवे: सम्बन्धी यो भाव आशयः शङ्गारादिरससंव लितचतुर्वर्गोपा- यभूत विशिष्टार्थोल्लेखीव स कविनेव सहृद्येः श्रोतृभिः स्वाभिप्रायाभेदेन तत्तत्काव्यप्रति- बिम्बितरूपतया साक्षात्कियते। ..... तदेवंविध हेतुनिबन्धं कविश्रोतृभावद्वितयसंमीलनात्मकं भाविकं द्ष्टव्यम्। ( काव्यालङ्कारसारसंग्रह, पृष्ठ ७९-८०), कर रही हैं। यद्यपि आचार्य मम्मट ने 'भाविक' अलंकार के लक्षण में वही बात रखी है-जो कि आचार्य मामह की परम्परासे चली आ रही है किन्तु जहां प्राचीन काव्याचार्य 'भाविक' में एक काव्य- रहस्य देखते आ रहे है वहां आचार्य मम्मट ने इसमें वाच्यसौन्दर्य का साक्षात्कार किया है क्योंकि काव्य-रहस्य तो कुछ और है-'काव्यस्यात्मा ध्वनिः'। 'माविक' के सम्बन्ध में जो रहस्य- भावना इन प्राचीन पंक्तियों अर्थात्- 'रसोल्लासी कवेरात्मा स्वच्छे शब्दार्थदर्पणे। माधुर्यौजोयुतप्रौढे प्रतिबिम्ब प्रकाशते॥ संपीतस्वच्छशब्दार्थद्राविताभ्यन्तरस्ततः । श्रोता तत्साम्यतः पुष्टिं चतुर्वर्गे परां व्रजेत् ॥' में अिव्यक्त हुइ है उनका विश्लेषण ध्वनि-तत्त्व के द्रष्टा आचार्यो ने काव्य में रसभावादि के स्वरूपोन्मीलन में स्पष्ट कर दिया है और इसलिये मम्मट,ने 'माविक' के महत्त्व से प्रभावित होते हुये भी उसे अलक्कार की कोटि में स्थान दिया है जिसमें प्राचीन परम्परा की रक्षा के साथ- साथ नवीन मान्यता की पुष्टि भी प्रतीत हो रही है। अनुवाद-'काव्यलिङ्ग' वह अलङ्कार है जिसमें वाक्यार्थ रूप से तथा पदार्थरूप से हेतु का अर्थात् स्वतः अनुपपन्न प्रतीत होने वाले अर्थ के उपपादक का अभिधान अथवा प्रतिपादन हुआ करता है। हेतु की वाक्यार्थरूपता (और उसमें काव्यलिङ्ग अलंकार) जैसे कि :- 'हे त्रिपुरान्तक महादेव! मुझे मेरे इन दो अपराधों के लिये क्षमा करें। मेरा पहला

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(द्वितीय प्रकार ) अनेकपदार्थता यथा- प्रणयिसखीस लीलपरिहासरसाधिगतै- ललित शिरीषपुष्पहननैरपि ताम्यति यत्। वपुषि वधाय तत्र तव शस्त्रमुपक्षिपतः पततु शिरस्यकाण्डयमदण्ड इवैष भुजः ॥ ५०२ ॥ (तृतीय प्रकार ) एकपदार्थता यथा- भस्मोद्घूलन ! भद्रमस्तु भवते रुद्राक्षमाले ! शुभं हा सोपानपरम्परां गिरिसुताकान्तालयालंकृतिम्। अप्याराधनतोषितेन विभुना युष्मत्सपर्यासुखा- लोकोच्छेदिनि मोक्षनामनि महामोहे विधीयामहे॥ ५०३॥

अपराध यह कि मैंने कभी भी अपने पूर्वजन्मों में आपकी भक्ति न की, जिसका प्रमाण इस जन्म के अतिरिक्त और क्या! और मेरा दूसरा अपराध ! वह है आगे भी आपकी भक्ि का मुझसे न हो सकना क्योंकि अब जब आपका भक्त मैं मुक्त हुआ तो इस शरीर-संपर्क के छुटे भक्ति कहाँ !' [यहाँ आर्तभक्त की भगवान् शिव से जो क्षमा-याचना है वह एक अपराध के लिये है और उस अपराध का जो हेतु है वह है 'अनमन' भक्ति न करना। यह हेतु वाक्यार्थरूप से यहाँ प्रकाशित हुआ है क्योंकि यह 'पुरा क्कचिदपि नाहं प्रणतवान् भवन्तम्' और 'अग्रेऽ ्यहमनतिभाग' इन अवान्तर वाक्यों के अर्थ के रूप में यहाँ अभिप्रेत है।] हेतु की अनेक पदार्थरूपता (और उसमें काव्यलिङ्ग) जैसे कि :- 'अरे पापाधाम ! जिस मालती की देह, प्रेमरसमाती सखियों के हास परिहास के प्रसंग में शिरीष के कोमल फूल की हलकी मार से भी व्यथित हो उठती है, उस पर, उसका वध करने के लिये, इस शस्त्र का प्रहार करने वाले तेरे सिर पर, देख, मेरा यह भुजदण्ड अचानक यमदण्ड के समान वस अब गिरना ही चाहता है!' (मालतीमाधव ५) [ यहाँ महाकवि भवभूति ने माधव के भुजदण्ड के अघोरघण्ट के सिर पर गिरने का जो हेतु प्रतिपादित किया है वह है अघोरघण्ट के द्वारा मालती के शरीर पर शस्त्र-पात। यह शस्त्रपातरूप हेतु न तो यहाँ वाक्यार्थ-प्रतिपाद्य है और न एकपदार्थलभ्य है अपितु अनेक पदों के जैसे कि 'वपुषि शस्त्रमुपत्िपतः' आदि के अभिप्राय के रूप में अभिहित है।] हेतु की एकपदार्थता (और उसमें काव्यलिङ्ग) जैसे कि :- 'अरे भस्म के लेप ! अरी रुद्राक्ष की माला ! अरी शिव मन्दिर की सुन्दर सोपान- पंक्तियाँ ! अब मैं कहां और तुम सब कहाँ! जाओ, तुम्हारा कल्याण हो। अब तो आज से मुझे भक्तभावन भगवान् की आराधना की दया से उस मोक्षरूप महामोह में पड़े रहना है जिसमें तुम सबके संग-साथ के सुख का प्रकाश कहाँ से रह सकता है!' [ यहाँ मोक्ष के महामोह होने का जो हेतु है वह है भस्म आदि के सुखालोक का उच्छेद और यह हेतु एक पद के अर्थात् एक समस्त 'युष्मतसपर्यासुखालोकोच्छेदिनि' पद के अर्थ के रूप में उपस्थित है।]

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४०६ काव्यप्रकाश:

एषु अपराधद्वये पूर्वापरजन्मनोरनमनम् , भुजपाते शस्त्रोपन्तेपः महामोहे सुखालोकोच्छेदित्वं च यथाक्रममुक्तरूपो हेतुः। (३१ पर्यायोक्त अरप्र लंकार) FTG

(१७५) पर्यायोक्तं विना वाच्यवाचकत्वेन यदचः । वाच्यवाचकभावव्यतिरिक्तेनावगमनव्यापारेण यत्प्रतिपादनं तत्पर्यायेण भङ्गयन्तरेण कथनात्पर्यायोक्तम्। उदाहरणम्- यं प्रेच््य चिररूढाऽपि निवासप्रीतिरुज्फिता। मदेनैरावणमुखे मानेन हृदये हरेः ॥ ५०४॥ इन उपर्युक्त उदाहरणों में, जैसा कि क्रमशः यथास्थान प्रतिपादित किया जा चुका है, जो हेतु विवत्तित है वह यह है-पहले में, दोनों अपराधों का हेतु पूर्वजन्म और भावी जन्म में शिव की भक्ति का न हो सकना, दूसरे में, (माधव के) भुजपात का हेतु (अघोरघण्ट का मालती पर) शस्त्र-प्रहार और तीसरे में, मोक्ष के महामोहरूप होने का हेतु भक्तिसुख के आलोक की उच्छिन्नता। टिप्पणी-'काव्यलिङ्ग' आलक्कारिकों की एक प्राचीन मान्यता है। 'काव्यलिङ्ग' का अभिप्राय है कवि की कल्पना के द्वारा वर्ण्य अर्थ को उपपत्ति के लिये एक ऐसे लिङ्ग अथवा हेतु का उपनिबन्ध जो लौकिक अथवा तार्किक हेतु सर्वथा भिन्न हो। लौकिक अथवा तार्किक हेतु जैसे कि 'दण्डेन घटः' दत्यादि में चमत्कार कहाँ! चमत्कार तो काव्यलिङ्ग (हेतु) में है और इसीलिये इसे अलंकार माना गया है। हेतु दो प्रकार का हो सकता है- 'सिसाधयिषितार्थस्य हेतुर्भवति साधकः। कारको ज्ञापकश्चेति द्विधा सोऽप्युपदिश्यते ॥' यहाँ 'काव्यलिङ्ग' अलंकार में जो हेतु अभिप्रेन है वह 'कारक' हेतु है न कि 'ज्ञापक' हेतु। उद्योतकार ने इसीलिये कहा है-'काव्यलिङ्गजानुमितिस्तु न कविना श्रोतुर्युबोधयिषिता किन्तु श्रोजर्युंत्पिपादयिषिता।' जिसका अभिप्राय यह है कि काव्यलिङ्ग अलङ्कार में अभिप्रेत अनुमिति ऐसी नहीं हुआ करती जो काव्य के श्रोता को कवि द्वारा बोधित करायी जाय अपितु ऐसी जिसे कवि शरोता के मन में उत्पन्न कराया करे। 'काव्यलिङ्ग' की कल्पना यद्यपि अलंकारिकों ने शास्त्रलिङ्ग के आधार पर ही की है किन्तु इसे काव्य का अलंकार इसलिये माना है कयोंकि यहाँ कवि-कल्पना का हाथ रहा करता है जैसा कि आलंकारिक इन्दुराज का कथन है :- 'पक्षधर्मतान्वयव्यतिरेकानुसरणगर्भतया यथा ताकिकप्रसिद्धा हेतवो लोकप्रसिद्धवस्तु- विषयत्वेनोपनिबध्यमाना वैरस्यमावहन्ति न तथा काव्यहेतुः, अतिशयेन सर्वेपां जनानां योऽसौ हृदयसंवादी सरसः पदार्थस्तनिष्ठतया उपनिबध्यमानत्वात्। अतः काव्यलिङ्गमिति काव्यग्रहणमुपात्तम् ।' (काव्यालङ्कारसारसंग्रह, पृष्ठ ८१) अनुवाद-'पर्यायोक्त' वह अलंकार है जिसे वाच्यार्थ का एक ऐसा प्रतिपादन कहा करते हैं जो वाच्य वाचकभाव से भिन्न प्रकार का हुआ करता है। 'पर्यायोक्त' का अभिप्राय है पर्याय के द्वारा अर्थात् एक अन्य प्रकार की विचित्रता के द्वारा (वाच्यार्थ का) कथन अथवा प्रतिपादन। यहां जिस पर्याय अथवा प्रकार से वाच्यार्थ का प्रतिपादन विवत्ित है वह है अवगमन-व्यापार अर्थात् व्यक्षनव्यापार का

के लिये :- प्रकार क्योंकि यही वह प्रकार है जो वाक्यवाचकभाव से सर्वथा भिन्न है। उदाहरण 'जिस (दानवराज हयग्रीव) को देखकर मद ने तो ऐरावत के मुखमण्डल में निवास करने का पुराना प्रेम छोड़ दिया और अभिमान ने छोड़ा देवराज इन्द्र के हृदय में डेरा जमाये रहने का मोह !'

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दशम उल्लास: ४०७

अत्रैरावणशक्रौ मदमानमुक्तौ जाताविति व्यंग्यमपि शब्देनोच्यते तेन यदे- वोच्यते तदेव व्यंग्यम् यथा तु व्यंग्यन्न तथोच्यते तथा गवि शुक्ले चलति दृष्टे गौः शुक्लश्चलति इति विकल्पः यदेव दृष्टं तदेव विकल्पयति न तु यथा दृष्टं तथा यतोऽभिन्नासंसृष्टत्वेन दृष्टं भेदसंसर्गाभ्यां विकल्पयति।

यहाँ जो अर्थ वाक्यार्थरूप से विवच्ित था अर्थात् (दानवराज हयग्रीव के डर से) ऐरावत की मद-हानि और इन्द्र की मान-हानि, उसका एक भिन्न प्रकार से अर्थात् मद का ऐरावत के मुख में निवास करने का प्रेम छोड़ देना और मान का इन्द्र के हृदय में रहने का मोह छोड़ देना-इस प्रकार से प्रतिपादन किया जा रहा है। अब यह जो प्रतिपादन-प्रकार है उसमें 'ऐरावत और इन्द्र मदरहित और मानरहित हो गये' यह व्यङ्गयार्थ प्रतीत हो रहा है किन्तु यह व्यङ्ग्यार्थ (गूढ नहीं क्योंकि) सात्ताव शब्द द्वारा प्रतिपादित प्रतीत हो रहा है जिससे यही निष्कर्ष निकलता है कि जो अर्थ यहाँ शब्दतः अभिहित है वही व्यङ्ग्य (व्यक्षना-प्रतिपाद्य) भी है क्योंकि इस अर्थ का उस रूप से प्रतिपादन नहीं किया जा रहा जिस रूप से यह व्यङ्ञ्यार्थ बना रहता। एक रूप अर्थ में भिन्न प्रकार से प्रतिपादन वैसे ही संगत है जैसे एकरूप वस्तु में निर्विकल्पक और सचिकल्पक ज्ञान का होना संगत है क्योंकि जब कहीं किसी मनुष्य को गोत्व-शुक्लत्व- चलनक्रिया और उनके आश्रय का ( एक प्रकार का ज्ञान) निर्विकल्पक ज्ञान हो चुकता है तब वहीं उसे 'गौः शुककश्चलति' इस भिन्न प्रकार का ज्ञान-सविकल्पक ज्ञान-हो जाया करता है। यहाँ इन दोनों प्रकार के अनुभवों में वस्तु तो एकरूप ही है क्योंकि जिसका निर्विकल्पक प्रत्यक्ष हुआ है उसी का सविकल्पक प्रत्यक्ष हो रहा है। यहां ऐसा नहीं कि जिस प्रकार से निर्विकल्पक अनुभव हुआ उसी प्रकार से सविकल्पक अनुभव भी किया गया क्योंकि निर्विकल्पक अनुभव में न तो भेद अथवा अतद्व्यावृत्ति (बौद्धदर्शन की ज्ञानमीमांसा के अनुसार) ही विषय रूप से अवस्थित है और न संसर्ग अथवा नाम-रूप- जात्यादि विशेषण ही (जैसा कि व्याकरणदर्शन का मत है)। यह तो सविकल्पक अनु० भव में संभव है कि भेद (अतद्व्यावृत्ति) अथवा संसर्ग (नामरूपजात्यादिविशेषण) के अवगाहन से विशिष्ट ज्ञान हो, क्योंकि निर्विकल्पक ज्ञान में गोत्व तथा उसके आश्रय, शुक्लत्व तथा उसके आश्रय, और चलनक्रिया तथा उसके आश्रय का जो अनुभव है वह परस्पर असंबद्धरूप से है किन्तु सविकल्पक ज्ञान में इन्हीं गोत्वादि का जो अनुभव हुआ करता है वह परस्पर संसृष्ट-विशेषणविशेष्यभाव से विशिष्ट-रूप से हुआ करता है। टिप्पणी-'पर्योयोक्त' एक प्राचीन अलक्कार है। भामह की दृष्टि में इसका स्वरूप यह है- 'पर्यायोकतं यदन्येन प्रकारेणाभिधीयते।' (काव्यालङ्कार २.८) और उद्धट ने इसे इस प्रकार स्पष्ट किया है- 'पर्यायोक्तं यदन्येन प्रकारेणाभिधीयते। वाच्यवाचकवृत्तिभ्यां शून्येनावगमात्मना।।' (काव्यालक्कारसारसंग्रह ४. ६) 'अर्थमिष्टमनास्याय साक्षात्तस्यैव सिद्धये। यत् प्रकारान्तराख्यानं पर्यायोक्तं तदिष्यते॥' (काव्यादर्श २. २९५ ) यहां काव्यप्रकाशकार ने 'पर्यायोक्त' अलक्कार का जो स्वरूप बताया है वह इन प्राचीन आलंकारिकों के अनुसार ही है। भेद इतना ही है कि भामह और दण्डी में 'अन्य प्रकार' अथवा 'प्रकारान्तर' का जो स्वरूप अस्पष्ट है वह मम्मट में 'अवगमन-व्यापार'-'व्यञ्ञन-व्यापार' के रूप में स्पष्ट हो गया है। तात्पर्य यह है कि व्यअ्जना के द्वारा वाच्यार्थ का अभिधान 'पर्यायोक्त' अलंकार है। व्यज्जना के द्वारा वाच्यार्थ का अभिधान 'ध्वनि' नहीं क्योंकि यहां जो चमत्कार है वह व्यङ्गयार्थ का नहीं अपितु उक्तिवैचित्र्य का है।

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४05 काव्यप्रकाश: m (३२ उदात्त अलंकार ) (१७६) उदात्तं वस्तुनः सम्पत- सम्पत्समृद्धियोग: यथा- मुक्ता: के लिविसूत्रहारगलिताः सम्मार्जनीभिर्हृताः प्रातः प्राङ्गणसीम्नि मन्थरचलद्बालांघरिलाक्षारुणाः । दूराह्ाडिमबीजशङ्गितधियः कर्षन्ति केलीशुका यद्विद्वद्भवनेषु भोजनृपतेस्तत् त्यागलीलायितम् ॥ ५०५॥। (उदात्त का एक अन्य प्रकार ) (१७७)-महतां चोपलक्षणम् ॥ १५५ ॥ उपलक्षणमङ्गभावः अर्थादुपलक्षणीयेऽर्थे। उदाहरणम्- तदिदमरण्यं यस्मिन्दशरथवचनानुपालनव्यसनी। निवसन् बाहुसहायञ्च्कार रक्षःक्षयं रामः ॥ ५०६॥ न चात्र वीररसः, तस्येहाऊ्त्वात्। अनुवाद-'उदात्त' वह अलंकार है जिसे वस्तु की समृद्धि का वर्णन कहा करते हैं। यहाँ 'संपत्' का अभिप्राय है ( वस्तु के) समृद्धियोग का अर्थात् वस्तु की ऐश्वर्य- शालिता का। जैसे कि- 'पण्डितजनों के घरों में, जो रतिलीला में टूटे मौक्तिकमालाओं के मोती प्रातःकाल आंगन में झाडू से बहारे हुए होने और अलसाई चाल से चलने वाली नवयौवना युव- तियों के पैर में लगी महावर से लाल दीखने के कारण दूर से अनार के दानों के संदेह में क्रीडाशुकों के द्वारा चोंच से इधर-उधर पकड़े जाते दिखाई दिया करते हैं वह सब महाराज भोज की महादानलीला नहीं तो और क्या है?' [यहाँ पण्डितों के भवनों की उत्कट समृद्धि का जो वर्णन है और इसके द्वारा महा- राज भोज की ऐश्वर्यशालिता का जो प्रतिपादन है उसमें 'उदात्त'अलंकार की छुटा दिखाई दे रही है। वस्तुओं के समृद्धि-सम्बन्ध के इस प्रकार के वर्णनों में अतिशयोक्ति (सम्बन्धा- तिशयोक्ति) का अनुप्राणन स्पष्ट है।] यही 'उदात्त' अलंकार वहाँ भी होता है जहाँ किसी वर्ण्यवस्तु के प्रसंग में (उसके विशेषण रूप से) महापुरुषों का वर्णन किया जाया करता है। यहाँ 'उपलक्षण' का अभिप्राय है उपलक्षणीय होने अर्थात् मुख्यरूप से वर्णनीय विषय में अङ्गरूप से रहने का। उदाहरण के लिए- 'यही वह अरण्य (दण्डकारण्य) है जहाँ महाराज दशरथ की आज्ञा के पालन में दत्तचित्त किंवा अपने बाहुबल पर ही निर्भर राम कभी निवास करते रहे हैं और (खर- दूषण आदि) राक्षसों का संहार कर चुके हैं।' यहाँ (बाहुवल पर निर्भर राम के द्वारा राक्स-विध्वंस आदि अनुभावों की वर्णना से) वीररस की अभिव्यक्ति मानना ठीक नहीं क्योंकि यह सब अङ्गरूप से विवत्ित है (और जिसका ग्रह अंग है वह है दण्डकारण्य का वर्णन और इसलिये राम के उदात्त-चरित के इस वर्णन में 'उदात्त' अलंकार है।) टिप्पणी-'मामह' ने 'उदात्त' का स्वरूप बताया है उसमें महापुरुषों की महत्ता का प्रतिपादन प्रतीत होता है। मामह के समकालवर्ती अज्ञातनामा कुछ आलंकारिक उदात्त से 'विभूतिमहत्त्व' समझते रहे हैं। दण्डी ने उदात्त-सम्बन्धी इन दोनों मान्यताओं को 'उदात्त' अलंकार के स्वरूप-निरूपण में स्थान दिया है-

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दशम उल्लास:

(३३ समुच्चय अलङ्कार ) (१७८) तत्सिद्धिहेतावेकस्मिन् यत्रान्यत्तत्करं भवेत् । समुच्योऽसौ, तस्य प्रस्तुतस्य कार्यस्य एकस्मिन्साधके स्थिते साधकान्तराणि यत्र सम्भ- वन्ति स समुच्चयः । उदाहरणम्- दुर्वाराः स्मरमार्गणा: प्रियतमो दूरे मानोऽत्युत्सुकं गाढं प्रेम नवं वयोऽतिकठिना: प्राणाः कुलं निर्म्मलम्। स्त्रीत्वं धैर्यविरोधि मन्मथसुहृत् काल: कृतान्तोऽक्षमो नो सख्यश्चतुराः कथन्नु विरहः सोढव्य इत्थं शठः॥ ५०७॥ अत्र विरहासहत्वं स्मरमार्गणा एव कुर्वन्ति तदुपरि प्रियतमदूरस्थित्यादि उपात्तम् । 'आशयस्य विभूतेर्वा यन्महत्त्वमनुत्तरम्। उदात्तं नाम तं प्राहुरलङ्कारं मनीषिणः । गुरोः शासनमत्येतुं न शशाक स राघवः। यो रावणशिरश्च्छेद-कार्यभारेष्वविक्लवः॥ रत्नभित्तिषु संक्रान्तैः प्रतिविम्बशतर्वृतः । ज्ञातो लङ्केश्वरः कृच्छ्रादाञ्जनेयेन तत्वतः॥ पूर्वत्राशयमाहात्म्यमन्नाभ्युदयगौरवम् । सुव्यज्जितमिति प्रोक्तमुदात्तद्वयमप्यदः ।' (काव्यादर्श २.३०१-३०३) बाद के आलक्कारिक जैसे कि उद्भट 'उदात्त' से इसी द्विविध प्रकार का प्रतिपादन मानते हैं :- 'उदात्तमृद्धिमद्वस्तु चरितं च महात्मनाम्। उपलक्षणतां प्राप्तं नेतिवृत्तत्वमागतम्॥' (काव्यालंकार सारसंग्रह, पृष्ठ ५७) यहाँ काव्यप्रकाशकार का 'उदात्त'-लक्षण उद्भट की 'उदात्त'-परिभाषा का ही अनुसरण करता है। 'उदात्त' अलक्वार में जो वस्तु-वर्णन अभिप्रेत है वह आरोपित वस्तु-वर्णन है और इसलिए हसका 'स्वभावोक्ति' से, जहाँ यथावद्वस्तु-वर्णन हुआ करता है और 'माविक' से, जहाँ यथावद्दस्तु- वर्णन में कवि का हृदय संवाद भी प्रकाशित हुआ कर ता है, भेद स्पष्ट है। अनुवाद-'समुच्चय' वह अलङ्कार है जिसमें किसी प्रस्तुत कार्य की सिद्धि के वर्णन में किसी एक कारण के रहते, अन्य कारण की भी साधकता का समावेश प्रतिपादित किया जाया करता है। यहाँ 'तरि्सिद्धिहेतौ' का अभिप्राय है उस अर्थात् प्रस्तुत रूप से वर्ण्य कार्य के किसी एक साधक (कारण) की उपस्थिति का, 'अन्यत्तत्करं' का तात्पर्य है 'अन्य साधकों अथवा कारणों' का। इस प्रकार 'समुच्चय' वह हुआ जहाँ एक कार्य-साधन में अन्य अथवा कारणों का। इस प्रकार 'समुच्चय' वह हुआ जहों एक कार्य-साधन में अन्य कारणों का समुदोग प्राप्त हो जाय। उदाहरण के लिए- 'काम के बाणों का सहना असम्भव, प्रियतम पास में नहीं, मन है अत्यन्त उत्सुक, प्रेम इतना अधिक बढ़ा है कि कुछ कहा नहीं जा सकता, जवानी चढ़ती पर है, प्राण निक- लने से रहे, कुल रहा अत्यन्त विशुद्ध, स्त्री होने के नाते धैर्य-धारण सरल नहीं, समय है वसन्त का-काम के परममित्र का, मौत भी असमय में नहीं मिल सकती और सखियों में कोई भी ऐसी नहीं जो प्रियतम से मिला दे-ओह ! अब भला यह मर्मान्तक विरह कैसे सहा जाय।' यहाँ 'समुच्चय' अलंकार इसलिए है क्योंकि विरह की असह्यतारूप कार्य-सिद्धि में काम के बाणों की दुर्वारता के कारणरूप से उपस्थित रहने पर भी 'प्रियतम के प्रवास' इत्यादि रूप अनेक कारणों का वर्णन किया जा रहा है।

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४१० काव्यप्रकाश:

समुचय के सम्बन्ध में अन्यमत और उसका खण्डन एप एव समुच्चय: सद्योगेऽसद्योगे च पर्यवस्यतीति न पृथक लक्ष्यते, तथाहि- कुलममलिनं भद्रा मूर्तिर्मतिः श्रुतिशालिनी भुजबलमलं स्फीता लक्ष्मीः प्रभुत्वमखण्डितम्। प्रकृतिसुभगा ह्येते भात्रा अमीभिरयं जनो व्रजति सुतरां दर्प राजन् ! त एव तवांकुशाः ॥ ५०८॥ अत्र सतां योग: । उक्तोदाहरणे त्वसतां योगः । शशी दिवसधूसरो गलितयौवना कामिनी 112 सरो विगतवारिजं मुखमनक्षरं स्वाकृतेः। प्रभुधनपरायणः सततदुर्गतः सज्जनो नृपाङ्गणगतः खलो मनसि सप्र शल्यानि मे ॥ ५०६॥ अत्र शशिनि घूसरे शल्ये शाल्यान्तराणीति शोभनाशोभनयोगः। (समुच्चय का एक अन्य प्रकार ) (१७९) स त्वन्यो युगपद् या गुणक्रियाः ॥ ११६ ॥ ऊपर ('तत्सिद्धिहेतौ' इत्यादि कारिका में) 'समुच्चय' का जैसा स्वरूप बताया जा चुका है वह (प्राचीन काव्याचार्यों द्वारा पृथक पृथक निर्दिष्ट) सद्योग, असद्योग किंवा सदसद्योगरूप समुच्चय में स्पष्टतया घटित होता है जिससे यहाँ 'समुच्चय' अलङ्कार का त्रिविध (सद्योगादिरूप) समुच्चय की दृष्टि से लक्षण अभिप्रेत नहीं माना गया। उदाहरण के लिये (निम्नाङगित पक्ियों अर्थात्)- 'राजन् ! कुल का महान् होना, शरीर का सुन्दर होना, बुद्धि का शास्त्राभ्यास से विशद होना, बाहुबल की विपुलता, धन.सम्पत्ति की समृद्धि और अकुण्ठित-प्रभुता- 每 一 石 川 信 話 ये ही वे स्वभावतः सौभाग्य-सूचक पदार्थ हैं जिनसे और लोग तो अभिमान में चूर रहा करते हैं, किन्तु आप ऐसे हैं जिनके लिये ये सब के सब निरभिमानिता के ही कारण हैं।' में जो सद्योग अर्थात् प्रस्तुत नृपविषयक विनयरूप कार्य की सिद्धि में कुलवैमल्यादि रूप स्वभावसुन्दर समीचीन साधनों का उपादान है उसमें भी 'समुच्य' का पूर्वोक्त लक्षण ही संगत है। 'दुर्धाराः स्मरमार्गणाः' इत्यादि, जो यहाँ 'समुच्चय, के उदाहरणरूप में उद्धत हैं वहाँ 'स्मरमार्गण' आदि असमीचीन पदार्थों का योग अथवा सम्बन्ध स्पष्ट देखा जा सकता है। और इसी प्रकार यहाँ अर्थात्- 'वह चन्द्रमा जो दिन के कारण कान्तिहीन लगे, वह युवती जिसका यौवन चल बसे, वह सरोवर जिसके कमल उजड़ जाय, वह मुख जिसमें जैसा रूप हो वैसी विद्या नहीं, वह स्वामी जो धन के लोभ में पड़ा रहे, वह सजन जो सद्ा दुर्दशाग्रस्त हो और वह दुष्ट जो राजप्रासाद में सदा विचरता रहे-ये हैं वे सात तीर जो मेरे हृदय में चुभते रहा करते हैं।' में भी समुच्चय ही है जहाँ सत (शोभन) किंग असत् (अशोभन) का योग विवक्ित है क्योंकि स्वतः शोभन चन्द्र की दिवस-धूसरतारूप अशोभनता जिस हृदय-व्यथा के कारणरूप से वर्णित की गयी उसी के लिये अन्य शोभन वस्तु जैसे कि कामिनी आदि का उनकी अशोभनता जैसे कि यौवन-हानि आदि से सम्बन्ध भी कारणरूप से समुचित प्रतिपादित किया गया। यही 'समुच्चय' एक और प्रकार का भी हुआ करता है जहाँ 'गुग-क्रिया' का यौगपद्य- 出 业 的 学

एक समय म सहभाव-प्रतिपादित किया जाया करता है।

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दशम उल्लास: ४११ M गुणौ च क्रिये च गुणक्रिये च गुणक्रियाः। क्रमेणोदाहरणम्- ( १ गुण-यौगपद्य में 'समुच्चय') विदलितसकलारिकुलं तव बलमिदमभवदाशु विमलं च। प्रखलमुख़ानि नराधिप! मलिनानि च तानि जातानि ॥ ४१० ॥ ( २ क्रिया -यौगपद्य में 'समुच्य') अयमेकपदे तया तियोग: प्रियया चोपनतः सुदुःसहो मे। नववारिधरोदयादहोभिभंवितव्यं च निरातपत्वरम्यैः ॥५११॥ (३ गुण और क्रिया के यौगपद्य में 'समुच्चय') कलुषं च तवाहितेष्वकस्मात्सितपङ्केरुहसोदरभ्रि चक्षुः। पतितं च महीपतीन्द्र ! तेषां वपुषि प्रस्फुटमापदां कटाक्षैः ॥ ५१२॥ (परमत का निराकरण ) धुनोति चासिं तनुते च कीर्तिमित्यादेः, कृपाणपाणिश्च भवान् रणक्षितौ ससाधुवादाश्च सुराः सुरालये। यहां 'गुण और क्रिया के यौगपद्य' का अभिप्राय है-१ गुणों का यौगपद्य, २ क्रियाओं का यौगपद्य और ३ गुण और क्रिया का यौगपद्य, क्योंकि गुणौ च (गुण और गुण) क्रिये च (क्रिया और क्रिया) गुणक्रिया :- द्वन्द्वसमास तथा गुणश्च क्रिया च (गुण और क्रिया- द्वन्द्व समास) और तदनन्तर 'गुणक्रियाश्च गुणत्रिये च गुणक्रियाः' (एकशेष) इस प्रकार 'गुणक्रियाः' शब्द की निप्पत्ति यहाँ अभिप्रेत है। क्रमशः उदाहरण ये हैं :- 'राजन् ! आपके शत्रुकुल का संहार करने वाली आपकी यह सेना तो शीघ्र ही निर्मल हो गई और उन खलजनों के मुख भी मलिन ही पड़ गये।' [यहां दो बार 'च' 'और' के प्रयोग से विमलता और मलिनता रूप गुणों का यौग पद्य-एक समय में सहभाव-स्पष्ट प्रतिपादित है] 'प्रिया उर्वशी से मेरा जैसे ही यह अकस्मात् दारुण वियोग आ पहुँचा वसे ही नये-नये मेघों के घिर आने में वर्षा के सुहावने दिन भी आ धमके।' (विक्रमार्वशीयम् ४) [ यहां वियोग के 'आ पहुँचने' (उपनतः) और वर्षा के दिनों के 'आ धमकने' (भवितव्यम्) की क्रियाओं का एक समय सहभाव दो'च'के द्वारा स्पष्ट प्रतीत हो रहा है।] 'राजन् ! एक ओर तो श्वेत कमल की सी शोभा वाली आपकी दृष्टि शत्रुओं पर अकस्मात् (क्रोध से) लाल हो गयी और दूसरी ओर उन शत्रुओं के शरीर पर गिरी विपत्तियों की तिरछी निगाहें।' [ यहां दृष्टि का 'कलुषता' (लालिमा) रूपी गुण और विपत्तियों के कटाक्षों की 'पतन-'रूप क्रिया-दोनों का समुच्चय दो चकार के प्रयोग से, स्पष्ट पता चल रहा है।] अनुवान-कुछ काव्याचार्यों का यह कहना कि केवल 'वैयधिकरण्य'-भिन्न-भिन्न अधिकरण-आधार के होने पर ही (गुण-क्र्किया का यौगपद्य) समुच्चय माना जाय, ठीक नहीं जँचता क्योंकि 'धुनोति चासि तनुते च कीर्त्तिम्'-यह राजा अषनी तलवार तो चला ही रहा है अपनी कीर्ति भी साथ ही साथ फैला रहा है' इत्यादि में सामानाधिकरण्य- एक ही राजरूप आधार-में भी समुच्चय स्पष्ट दिखायी दे रहा है। इसी प्रकार कुछ का यह मानना भी कि सामानाधिकरण्य-एक ही देश में (गुण-क्रिया का सहभाव) समुच्चय है (वैयधिकरण्य में नहीं) उचित नहीं प्रतीत होता क्योंकि 'कृपाणपाणिश्च भवान् रणच्षिती ससाधुवादाश्च सुराः सुरालये-राजन् ! यहां तो संग्राम में आप हाथ में खड्ग लिये विराज रहे हैं और वहां स्वर्ग में देवगण आप की जय मनाते खड़े हैं।' इत्यादि में भी

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४१२ काव्यप्रकाशः

इत्यादेश्व दर्शनाद् व्यधिकरणे इति एकस्मिन्देशे इति च न वाच्यम्। (३४ पर्याय अलंकार) ( १८०) एक क्रमेणानेकस्मिम् पर्यायः। एकं वस्तु क्रमेणानेकस्मिन्भवति क्रियते वा स पर्यायः । क्रमेणोदाहरणम्- (एक वस्तु के वास्तविक एकत्व में भी उसके अ्र्प्रनेक स्थान पर रहने के क्रम में 'पर्याय') नन्वाश्रयस्थितिरियं तत्र कालकूट ! के नोत्तरोत्तर विशिष्टपदोपदिष्टा। प्रागर्णवस्य हृदये वृषलक्ष्मणोऽथ कण्ठेऽधुना वससि वाचि पुनः खलानाम् ॥५१३॥ अलंकार तो 'समुच्चय' ही है। किन्तु यहां वैयधिकरण्य-भिन्न देश में क्रिया का यौगपद्य विवत्ित है (सामानाधिकरण्य-एक देश में नहीं।) टिप्पणी-प्राचीन काव्याचार्यों जैसे कि भामह, दण्डी, उद्भट आदि के अलक्कार-ग्रन्थों में 'समुच्चय' अलक्कार का विश्लेषण नहीं किया गया है। 'समुच्चय' का स्वरूप-निरूपण रुद्रट के काव्यालद्कार और रुय्यक के अलक्कार-सूत्र तथा सर्वस्व में स्पष्ट किया हुआ है। यहां काव्यप्रकाश- कार ने 'समुच्चय' के अपने लक्षण-विश्लेषण में रुद्रट और रुय्यक के ही मत का परिष्कार किया है। रुद्रट की ही 'सद्योग', 'असद्योग' और 'सदसद्योग' में त्रिविध समुच्चय की मान्यता, नो कि काव्यालक्कार ( ७. १९) की इन पंक्तियों :- 'यत्रकन्नानेकं चस्तु परं स्यात्सुखावहाद्येव। ज्ञेयः समुच्चयोऽसौ त्रेधाऽन्यः सदसतोर्योगः॥' में स्पष्ट है, काव्यप्रकाशकार के 'एष एव समुच्चयः सद्योगेऽसद्योगे सदसद्योगे च पर्यवस्यतीति न पृथकलभ्यते' इस प्रकार के खण्डन का विषय है। साथ ही साथ केवल 'व्यधिकरण' में अथवा केवल 'समानाधिकरण' में समुच्चय की धारणा भी रुद्रट की ही हैं जैसा कि काव्यालक्वार (७.२७) क कथन है :- 'वय धिकरणे वा यस्मिन् गुणक्रिये चैककालमेकस्मिन्। उपजायेते देशे समुच्चय:स्यात्तदन्योऽसौ ॥' जिसकी आलोचना मम्मट ने 'व्यधिकरणे' इति 'एकस्मिन् देशे' इति च न वाच्यम्- इस रूप से की है। मम्मट ने 'सदयोग', असदयोग' तथा 'सदसदोग' में त्रिविध समुच्चय अलक्कार के जो उदाहरण दिये हैं जिनमें 'समुच्चय' की अपनी परिभाषा संगत बतायी है वे रुय्यक के अलक्कारसर्वस्व के हैं। इस प्रकार यहां 'रुय्पक' की समुच्चय-संबंधी धारणा की भी स्पष्ट आलोचना है। 'समुच्चय' अलंकार के मूल में कार्य कारण की एककालात्मक विपर्यय रूपा अतिशयोक्ति है। 'समुच्चय' में अनेक कारणों की एक कार्यसिद्धि में स्पर्द्धा रहा करती है और इसीलिए यहां 'खले कपोतन्याय' की संगति मानी जाया करती है। ऐसी बात 'समाधि' अलङ्गार में नहीं होती क्योंकि वहां 'काकतालीयन्याय' से एक कारण की कार्यसिद्धि में अन्यकारणों की सहायता रहा करती है। अनुवाद-'पर्याय' वह अलङ्कार है जहां एक वस्तु का क्रम से (कालभेद से) अनेक वस्तुओं से सम्बन्ध प्रतिपादित हो अथवा किया जाय। 'पर्याय' का अभिप्राय है 'क्रम' का अर्थात् एक वस्तु के अनेक अधिकरण में (काल- कम से) होने का अथवा किये जाने का। कमशः जैसे कि :- 'अरे कालकूट! किसने तुम्हें इस प्रकार से रहना, जिसमें क्रमशः एक के बाद एक ऊंचा स्थान ही तुम्हें मिलता गया, सिखा दिया क्योंकि कहां तो पहले तुम रहे समुद्र के पेट में, फिर रहने लगे महादेव के कण्ठ में और अब रह रहे हो दुष्टों के मुंह में !'

[ यहां कालकूटरूप एक वस्तु का अनेक स्थानपर कालक्रम से रहना बिना किसी (भल्लटशतक ४ )

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दशम उल्लास: ४१३

यथा वा- वस्तु के आरोपित एकत्व में भी अ्र्प्रनेक स्थान पर उसकी स्थिति में ( 'पर्याय') बिम्बोष्ठ एव रागस्ते तन्वि ! पूर्वमदृश्यत। अधुना हृद्येऽप्येष मृगशावाक्षि ! लक्ष्यते ॥ ५१४॥ रागस्य वस्तुतो भेदेऽ्येकतयाध्यवसितत्वादेकत्वमविरुद्धम्। ( २ एक वस्तु की अ्र्प्रनेकत्र स्थिति की व्यवस्था करने में 'पर्याय') तं ताण सिरिसहोअररअणाहरणम्मि हिअअमेक्करसम्। बिम्बाहरे पिआणं णिवेसिअं कुसुमवाणेण। ५१५॥ (तत्तेषां श्रीसहोदररत्नाभरणे हृदयमेकरसम् । बिम्बाधरे प्रियाणां निवेशितं कुसुमवाणेन ॥। ) (अन्य प्रकार का 'पर्याय') (१८१) अन्यस्ततोऽन्यथा। अनेकमेकस्मिन् क्रमेण भवति क्रियते वा सोऽन्यः । क्रमेणोदाहरणम्- (१ अ्रप्रनेक वस्तु की एक आ्र्प्राधार पर क्रम से अ्रप्रवस्थिति के होने में पर्याय ) मधुरिमरुचिरं वचः खलानाममृतमहो प्रथमं पूथु व्यनक्ति। हेतु के ही प्रतिपादित है जिसमें 'पर्याय' अलंकार स्पष्ट प्रतीत हो रहा है। यद्यपि समुद्र आदि आधारों के भिन्न-भिन्न होने से वस्तुतः कालकूट रूप एक आधेय वस्तु भी भिन्न-भिन्न है किन्तु इसका अभेदाध्यवसान विवच्ित है क्योंकि कालक्रम से एक वस्तु की एक स्थान के अतिरिक्त अन्यत्र भी स्थिति संभव है। ] 'अरी कृशाङ्गी ! पहले तो यह राग (लाली और प्रेम) तुम्हारे बिम्बाधर में ही दिखाई देता रहा और अब ? अब तो अरी मृगनयनी! इसे तुम्हारे हृदय में स्पष्ट देखा जा सकता है !' (नवसाहसाङ्कचरित ६.६० ) [ यहां बिना किसी हेतु-निर्देश के एक ही रागरूप वस्तु की क्रम से ओठ और हृदय में स्थिति प्रतिपादित है जिसमें 'पर्याय' का चमत्कार स्पष्ट है।] यहां यद्यपि ओष्ठ में राग से 'लाली' और हृदय में राग से 'स्नेह' का अर्थ ही विवच्ित है और इस प्रकार रागरूप पदार्थ एकरूप नहीं अपितु परस्पर भिन्नरूप है किन्तु श्लेष के कारण दोनों में अभेद का अध्यवसान होने से एक वस्तु की अनेकन्र स्थिति में 'पर्याय' की रूपरेखा यहां भी दिखाई देती है। 'राक्सों का वह मन जो पहले भगवान् विष्णु के आभूषण-कौस्तुभमणि-के अपहरण में लगा था अन्त में कामदेव द्वारा लगा दिया गया मोहिनी के बिम्बाधर में !' (विषमबाणलीला-आनन्दवर्धन) [यहां कामदेव के द्वारा एक हृद्यरूप वस्तु की कौस्तुभ के अपहरण और मोहिनी के ओष्ठ में जो स्थिति-व्यवस्था वर्णित है उसमें पर्याय स्पष्ट है। ] पर्याय एक और प्रकार का भी हो सकता है जिसे पूर्वोक्त पर्याय का वैपरीत्य कहा करते हैं। यहां पूर्वोक्त पर्याय से वैपरीत्य का अभिप्राय है अनेक वस्तु की एक आधार पर क्रम से (कालभेद से) अवस्थिति के होने का अथवा किये जाने का। जैसे कि क्रमशः, 'कितने आश्चर्य की बात है कि पहले तो (सुनने पर ) दुष्टों की चिकनी-नुनड़ी बातें अमृत की मिठास सी टपका देती हैं और बाद में (सोचने पर ) ऐसा करती हैं कि हालाहल की कटुता से हृदय ही मूर्च्छित हो जाय।'

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४१४ काव्यप्रकाश:

अथ कथयति मोहहेंतुमन्तर्गतमिव हालहलं विषं तदेव ॥ ५१६॥ ( २ अ्रनेक वस्तु की एक आ्र्प्राधार पर क्रम से अ्र्प्रवस्थिति के सम्पादन में पर्याय ) तद्गेहं नत्तभित्ति मन्दिरमिदं लब्धावकाशं दिव: सा धेनुर्जरती नदन्ति करिणामेता घनाभा घटाः। स क्षुद्रो मुसलध्वनिः कलमिदं सङ्गीतकं योषिता- माश्चयं दिवसैद्विजोऽयमियतीं भूमिं समारोपितः । ५१७॥ अत्रैकस्यैव हानोपादानयोरवित्रक्षितत्वान्न परिवृत्तिः । (३५ अरप्रनुमान अप्रलंकार ) (१८२) अनुमानं तदुक्तं यत् साध्यसाधनयोवच: ॥११७।। पक्षधर्मान्वयव्यतिरेकित्वेन त्रिरूपो हेतुः साधनम्, धर्मिणि अयोगव्यव- चछेदो व्यापकस्य साध्यत्वंम् यथा- [ यहां एक ही खलवचन में क्रमशः अमृत की मिठास और हालाहल की कटुता की अवस्थिति बिना किसी प्रयोजक हेतु के वर्णित है जिससे पूर्वोक्त पर्याय के वैपरीत्य में- एक अन्य प्रकार का पर्याय स्पष्ट है। ] 'कितने आश्चर्य की बात है कि कुछ ही दिनों में यह द्विज (सुदामा) इस ऐश्वर्य पर पहुँच गया! चारों ओर दबी-झुकी वह झोपड़ी अब यह अभ्रंकष राजप्रासाद दीख रही है, पहले की उस बूढ़ी गाय का रँभाना अब काली-काली मेघमाला सी गज-घटा की गर्जना है और कभी की मूसर की चुद्र ध्वनि के बदले अब केया है ! अब तो कलकण्ठी कामिनियों की मीठी तान सुनायी पड़ रही है !' [ यहां एक ही द्विजरूप आधार पर गेह-मन्दिर आदि अनेक वस्तुओं की अवस्थिति (अर्थात् एक द्विजरूप वस्तु का अनेक गेहादिरूप वस्तुओं से स्वस्वामिभावरूप सम्बन्ध) प्रतिपादित है और 'दिवसैः'-'कुछ ही दिनों से' इस प्रयोजक हेतु का भी निर्देश है जिसमें पूर्वोक्त पर्याय के विपरीत एक भिन्न प्रकार का पर्याय स्पष्ट प्रतीत हो रहा है।] यहां उपर्युक्त उदाहरण में ('पर्याय' ही अलक्वार है) परिवृत्ति अलद्कार नहीं कयोंकि यहां गेह, मन्दिर आदि वस्तुओं में किसी प्रकार का लेन-देन अभिप्रेत नहीं। (अर्थात यहां ऐसा कुछ प्रतिपादित नहीं किया जा रहा कि एक कोई (कर्तृभूत) व्यक्ति अपनी कोई वस्तु जैसे कि गेह आदि किसी को दे रहा हो और दूसरे की कोई वस्तु जैसे कि मन्दिर आदि बदले में ले रहा हो। यहां तो वस्तुतः एक द्विजरूप आधार पर गेह-मन्दिर आदि अनेक वस्तुओं की कला-भेद से स्थिति ही विवत्ित है जिससे 'पर्याय' का सम्बन्ध हे न कि 'परिवृत्ति' का)। टिष्पणी-मम्मट के 'पर्याय'-निरूपण का आधार रुय्यक का 'पर्याय'-निरूपण है। रुय्यक के पर्याय-विवेचन में एक वस्तु की अनेकत्र स्थिति और अनेक वस्तुओं की एकत्र स्थिति में आरोह और अवरोह के वैलक्षण्य का विश्लेषण है किन्तु मम्मट के पर्याय विवेचन में एक वस्तु की स्पष्टीकरण है: अनेकत्र स्थिति और अनेक वस्तुओं की एकत्र स्थिति में संभव-सम्पादन के अभिप्राय का अनुवाद-'अनुमान' वह अलङ्कार है जिसमें साध्य-साधन-भावरूप से किसी अर्थ का प्रतिपादन किया जाया करता है। यहां 'साधन' का अभिप्राय (जैसा कि न्याय में) है त्रिप्रकारक हेतु का, अर्थात् हेतु के सत्च (पत्त का तात्पर्य है अनुमिति का आधार जैसे 'पर्त्रतो वह्निमान् धूमात' में 'पर्वत' पत्ष है जहां 'अग्नि' का अनुमान किया जा रहा है। इस 'पत्ष' में हेतु अर्थात् 'धूम' की वृत्तिता अथवा अवस्थिति को हेतु का 'पक्षसत्व' अथवा 'पक्षधर्मता'

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दशम उल्लास: ४१५

यत्रैता लहरीचलाचलद्दशो व्यापारयन्ति भ्रुवं यत्तत्रैव पतन्ति सन्ततममी मर्मस्पृशो मार्गणा: । तच्च क्रीकृतचापमश्ि््ितशरप्रेङ्गत्करः क्रोधनो धावत्यग्रत एव शासनघरः सत्यं सदाऽडसां स्मरः ॥४१८॥ साध्य-साधनयोः पौर्वापर्यविकल्पे न किंचिद्वैचित्र्यमति न तथा द्शितम्। कहते हैं।) अन्वयित्व अथवा सपक्षसत्व ('पर्वत' रूप पत्तका जो 'सपक्ष' है जहाँ 'अभ्नि' की अवस्थिति निश्चित है जैसे कि महानस (पाकशाला) उसमें 'धूम' रूप हेतु की वृत्तिता को कहा जाता है 'अन्वयित्व' अथवा 'सपक्षसत्व') और व्यतिरेकित्व अथवा विपत्ाद् व्यावृत्तत्व (पर्वतरूप पक्ष तथा महानसरूप सपक्ष का जो विपक्ष है जहाँ अग्नि की अवस्थिति का अभाव निश्चित है जैसे कि जलाशय आदि उसमें 'धूम' रूप हेतु की अवृत्तिता-अनुपस्थिति-को कहा करते हैं धूमरूप हेतु का व्यतिरेकित्व अथवा विपक्ाद् व्यावृत्तत्व)-इन तीनों रूपों का। 'साध्यत्व' का तात्पर्य है धर्मी-अथवा धूमादि- रूप हेतुयुक्त पार्वतादि 'पत्त' में व्यापक-अर्थात् हेतु (धूमादि) की अपेत्षा न्यून देश में न रहने वाले-अग्न्यादि के 'अयोगव्यवच्छेद' अथवा नियत संबन्ध का। (यद्यपि 'पर्वतो वह्निमान् धूमात्' इत्यादि अनुमान के दष्टान्त हैं क्योंकि यहाँ पर्वतरूप 'पत्ष' में धूमरूप हेतु की वृत्तिता है (पत्तसत्व), 'महानसरूप 'सपक्ष' में भी धूम की वृत्तिता निश्चित है। (सपक्षसत्व) और जलाशयरूप विपक्ष में धूम की वृत्तिता का अभाव है (विपत्ाद- व्यावृत्तत्व) जिससे यहां पर्वतरूप 'पक्ष' में वह्िरूप 'साध्य' का अनुमान किया जा रहा है, किन्तु यह अनुमान 'अनुमानालंकार' नहीं हुआ करता। 'अनुमान' तो काव्य का अलंकार तभी हो सकता है जब उसमें कवि-प्रतिभा और कवि-कल्पना का हाथ रहे जिससे चमत्कार की प्रतीति हो सके)। उदाहरण के लिये :- 'ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कामिनी-जन का वशवर्ती किंवा प्रेमी युवकों पर क्रुद्ध और इसीलिये धनुप पर प्रत्यञ्चा खींचते हुए बाणों पर बार-बार हाथ फड़काते कामदेव सदा (दिग्विजय के लिये सन्नद्ध) युवतियों के आगे-आगे दौड़ता चला करता है क्योंकि जिधर भी तरंग-चञ्चल नेत्रों वाली रमणिओं की भौंहें तन जाया करती हैं उधर ही काम के ये मर्मान्तक बाग अविलम्ब छूटते ही दिखायी दिया करते हैं।' [यहाँ कति-कल्पना-प्रसूत जो 'साध्य' है वह है 'रमणियाँ जिनके आगे मदन योद्धा दौड़ता चल रहा है' और इस 'साध्य' की सिद्धि का जो हेतु है वह है तरुणियों की तनी भृकुटि के रूप में बाण-मोक्ष का काम का स्थानक (धनुर्धारी योद्धा की बाण चलाने की वीर-सुद्रा)। यद्यपि यहाँ लोकसिद्ध कोई व्याप्ि नहीं किन्तु कवि प्रतिभाप्रसूत तो ज्याप्ति है ही। इस प्रकार यहाँ 'अनुमान' अलंकार का स्वरूप स्पष्टतया उन्मीलित है जिसे अनुमान की प्रक्रिया में इस प्रकार कहा जा सकता है-'एताः (रमण्यः) चक्रीकृतचापं सदा पुरोधावन्मदनभटाः निरन्तरनिपतन्मर्मान्तकशरशोभिभ्रव्यापारकस्थानकत्वात्।' यहाँ यह कहना कि 'अनुमान' अलक्कार का एक और प्रकार क्यों नहीं माना जाय (जहाँ पूर्वोक्त प्रकार के विपरीत, जिसमें 'साधन' का कथन पहले और 'साध्य' का बाद में हुआ है. पहले तो 'साध्य' का कथन हो और बाद में 'साधन' का) ठीक नहीं जँचता क्योंकि 'साध्य-साधन के पूर्वापरभाव के विपर्यय में कोई चमत्कार-विशेष नहीं दिखाई देता और इसीलिए यहाँ अनुमान के ऐसे प्रकार का प्रतिपादन नहीं किया जा रहा।] टिप्पणी-'अनुमान के काव्यालक्कार बनने में कवि-कल्पना का हाथ आवश्वक है। काव्या- नुमान तर्कानुमान से इसीलिए सर्वथा विलक्षण हुआ करता है। 'अनुमान' में प्रत्याय्य-प्रत्यायक- माव का होना स्वामाविक है क्योंकि यहां जो अप्रतीत हुआ करता है उसका प्रत्यायन अभिप्रेत

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४१६ काव्यप्रकाश:

(३६ परिकर अलंकार) (१८३) विशेषणैर्यत्साकृतैरुक्ति: परिकरस्तु सः । अर्थाद्विशेष्यस्य। उदाहरणम्- महौजसो मानधना धनार्चिता धनुभृतः संयति लब्धकीर्तयः। न संहतास्तस्य न भेदवृत्तयः प्रियाण वाञ्छन्त्यसुभिः समीहितुम् ॥५१६॥ यद्यप्यपुष्टार्थस्य दोषताभिधानात्तन्निराकरणोन पुष्टार्थस्वीकार: कृतः, तथाप्ये- कनिष्ठत्वेन बहूनां विशेषणानामेवमुपन्यासे वैचित्र्यमित्यलङ्कारमध्ये गणितः। (३७ व्याजोक्ति अलंकार)

निगूढ मपि वस्तुनो रूपं कथमपि प्रभिन्नं केनापि व्यपदेशेन यदपह्नयते सा रहा करता है। .. अनुमान में समथ्य लगर्थरू-भाव नहीं क्योंकक यहाँ प्रनीत का-ज्ञात वस्तु का- प्रत्यायन नहीं हुआ करना। इस दृष्टि से अनुमान का काव्यलिङ्ग से भेद सिद्ध होता है। अनुवाद-'परिकर' वह अलंकार है जिसमें साभिप्राय विशेषणों के द्वारा प्रकृत अर्थ का प्रतिपादन किया जाया करता है। 'यहाँ साकूतैर्विशेषणैरुक्तिः' में जिसकी उक्ति अथवा परिपुष्टि विवचित है वह 'विशेष्य'भूत अर्थ है (अन्य कुछ नहीं)। उदाहरण के लिये :- 'महाराज दुर्योधन का क्या कहना, जिसके मनोरथों को पूरा करने के लिये बड़े बड़े महातेजस्वी, स्वाभिमानी, धन-समृद्धि के द्वारा पुरस्कृत, अनेकानेक संग्रामों में लब्धप्रतिष्ठ, शत्रुपक्ष से सवथा विमुख और स्वपक्ष में एकमत से अवस्थित धनुर्धारी योद्धा प्राणों की बाजी लगाये पड़े हैं।' (किरातार्जुनीय-१ सर्ग) [ यहाँ 'धनुर्भृतः'-यह विशेष्यभूत अर्थ 'महौजसः' इत्यादि विशेषणों द्वारा इसलिये परिपुष्ट किया जा रहा है जिसमें प्रस्तुत दुर्योधन प्रताप रूप अर्थ का उत्कर्ष स्पष्टतया प्रतीत हुआ करे! 'महौजसः' आदि विशेषणों में जो कवि का अभिप्राय छिपा है वह दुर्योधन के धनुर्धारी योद्धाओं की अप्रधर्ष्यता, महाशूरता आदि है। ] यहाँ यह शंका उठ सकती है-जब अर्थ की पुष्टि ही 'परिकर' है तब इसे 'अपुष्टार्थ- त्व' रूप दोष (जिसका विवेचन सातवें उल्लास में हो चुका है) का अभाव क्यों न मान लिया जाय (जिससे 'परिकर' अलक्कार की यहाँ कल्पना न करनी पड़े)? किन्तु इसका समाधान यह है-( एक आध विशेषण के अभिग्राय-गर्मित होने में भले ही अपुष्टार्थत्व- रूप दोष का अभाव भी मान लिया जाय, किन्तु) जब यह स्पष्ट है कि एक विशेष्य में अन्वित अनेकों साभिप्राय विशेषणों के उपनिबन्ध में एक चमत्कार रहा करता है तो इस 'चमत्कार' को ( परिकर अलङ्कार के रूप में) अलङ्कारों में क्यों न गिना दिया जाय ! टिप्पणी-'परिकर' अलंकार का आधार विशेषणों का वैचित्र्य है। विशेषणों का विचित्र ढङ्ग से अगेत् विशेष्य के अधिकाधिक परिपोषक होने के रूप में प्रयोग तभी हो सकता है जब कवि, उनके द्वारा अपने हृदय के अभिप्राय अथवा मनोभाव को अभिव्यक्त करना चाहता हो। यद्यपि साभिभाथ विशेषणों में कवि का अभिप्राय व्यङ्ञय रहा करता है किन्तु अन्ततोगत्वा इसके द्वारा वाक्यार्थ ही उपस्कृत किया जाया करता है जिससे इस काव्य-वैचित्रय को अलक्कार-परिकर अलक्कार-माना गया है न कि ध्वनि । नुवाद-'व्याजोक्ति' अलंकार वह है जिसमें स्पष्टतया प्रकट भी वस्तुस्वरूप का, किसी व्याज से छिपा कर, वर्णन किया जाया करता है। यहां 'उद्धिन्न' का अभिप्राय है 'अस्फुट भी वस्तु-स्वरूप के किसी चिह्न विशेष आदि

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दशम उल्लास: ४१७

व्याजोक्तिः। न चैषाऽपह्नुतिः प्रकृताप्रकृतोभयनिष्ठस्य साम्यस्येहासम्भवात्, उदाहरणम्-

हा शैत्यं तुहिनाचलस्य करयोरित्यूचिवान् सस्मितं

अत्र पुलकवेपथू सान्त्रिकरूपतया प्रसृतौ सैत्यकारणतया प्रकाशितत्वादप- लपितस्वरूपौ व्याजोक्ति प्रयोजयतः । ( ३८ परिसंख्या अलक्कार ) (१८५) किंचित्पृष्टमपृष्टं वा कथितं यत्प्रकल्पते। तादृगन्यव्यपोहाय परिसंख्या तु सा स्मृता ॥ ११२ ॥ प्रमाणान्तरावगतमपि वस्तु शब्देन प्रतिपादितं प्रयोजनान्तराभावात्सदश- वस्त्वन्तरव्यवच्छेदाय यत्पर्यवस्यति सा भवेत्परिसंख्या। अत्र च कथनं प्रश्न- के द्वारा स्फुटरूप से प्रतीत होने का'। 'छद्मना' का तात्पर्य है 'किसी व्यपदेश (बहाने) अथवा काल्पनिक कारण आदि के उपन्यास का'। और 'निगूहन' कहते हैं 'अपङ्रव'-छिपाने को। इस प्रकार जहाँ अस्फुट भी वस्तुस्वरूप किसी चिह्न आदि द्वारा स्फुट प्रतीत होने पर पुनः किसी ब्याज से छिपा कर वर्णित हो वहाँ 'व्याजोक्ति' अलंकार हुआ करता है। अपह्वव के अभिप्राय के यहाँ अन्तर्भूत होने से ऐसा नहीं माना जा सकता कि यह (व्याजोक्ति) अपहुति अलंकार ही है क्योंकि यहाँ प्रकृत (उपमेय) और अप्रकृत (उपमान) में किसी प्रकार की साम्यविवक्षा नहीं रहा करती (जिसका कि अपहुति में अवश्यंभाव अपेक्ित है)। उदाहरण के लिये :- 'वे महादेव जो पर्वतराज हिमालय के द्वारा समर्पित पार्वती के करतल के स्पर्श से रोमाञ्चित और कम्पित हो विवाह मङ्गल की विधियों को अस्तव्यस्तरूप से निभाते हुये चकित होते रहे और पर्वतराज के अन्तःपुर की नारियों और नन्दी आदि गणों के द्वारा अपने भाव-विकारों के ताड़ लिये जाने पर 'पर्वतराज हिमालय का हाथ ठण्ढा है' 'कह कर मुसकरा उठे, आप सब का सदा मंगल करते रहें।' यहाँ जो 'रोमाञ्ज' और 'कम्प' ( जिनका वर्णन किया गया है) वस्तुतः सात्विकभाव के रूप में (पार्वतीविषयक शिवगत रतिभाव के अनुभाव के रूप में) उद्धिन्न अथवा अभिव्यक्त प्रतीत हो रहे हैं, उनका अपलाप किया जा रहा है क्योंकि उन्हें पर्वतराज हिमालय की शीतलता के द्वारा सम्भूत बताया जा रहा है। इस प्रकार ये (रोमाज्ज और कम्प) 'व्याजोक्ति' के यहाँ प्रयोजक हैं। टिप्पणी-आलक्कारिकों न 'व्याजो(क्त' को एक भिन्न अलक्कार इसीलिये माना है क्योंकि यहाँ 'अपलापमात्र' का अभिप्राय एक प्रकार का चमत्कार है। अपहुति में भी 'अपलाप' है किन्तु वहाँ दूसरा उद्देश्य-सादृश्य की अभिव्यक्ति है। अनुवाद-'परिसंख्या' वह अलंकार है जिसमें पूछी गयी अथवा न पूछी गयी किसी वस्तु का ऐसा शब्दतः प्रतिपादन हो जो अन्त में अपने समान किसी अन्य वस्तु के व्यवच्छेद (निषेध) में परिणत हो जाय। 'परिसंख्या' कहते हैं 'वर्जनबुद्धि' को अर्थात् जब अन्य प्रमाणों से अवगत भी किसी वस्तु का शब्दतः प्रतिपादन किया जाया करता है तब इसमें और प्रयोजन तो होता २७ का०

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४१८ काव्यप्रकाश:

पूर्वकं तदन्यथा च परिदृष्टम्, तथोभयत्र व्यपोह्यमानस्य प्रतीयमानता वाच्यत्वं चेति चत्वारो भेदा:। क्रमेणोदाहरणम्- (प्रश्नपूर्विका व्यज्जथव्यवच्छेद्या परिसंख्या) किमासेव्यं पुंसां सविधमनवद्यं दुसरितः किमेकान्ते ध्येयं चरणयुगलं कौस्तुभभृतः । किमाराध्यं पुण्यं किमभिलषणीयं च करुणा यदासक्त्या चेतो निरवधि विमुक्त्यै प्रभवति ॥५२१॥ ( २ प्रश्नपूर्विका वाच्यव्यवच्छेद्या परिसंख्या ) किं भूषणं सुदृढमत्र यशो न रत्नं किं कार्यमार्यचरितं सुकृतं न दोषः। किं चक्षुरप्रतिहतं धिषणा न नेत्रं जानाति कस्त्वदपरः सदसद्विवेकम् ॥५२२॥ ( ३ अप्र प्रश्नपूर्चिका व्यज्ञयव्यवच्छेद्या परिसंख्या) कौटिल्यं कचनिचये करचरणाधरदलेषु रागस्ते। काठिन्यं कुचयुगले तरलत्वं नयनयोवसति ॥५२३॥ नहीं, जो भी बात होती है वह है उस वस्तु के समान अन्य किसी वस्तु के व्यवच्छेद अथवा व्यावर्तन (निराकरण) की बात। यहाँ जो कथन अथवा शब्दतः प्रतिपादन हुआ करता है वह प्रश्नपूर्वक भी हो सकता है और बिना प्रश्नपूर्वक भी। साथ ही साथ प्रश्नपूर्वक कथन हो या विना प्रश्न के कथन हो, जिस वस्तु का व्यपोहन (निराकरण) किया जाया करता है वह भी दो प्रकार से हो सकता है (१) या तो वह व्यङ्गचरूप से रहे और (२) या वाच्यरूप से रहे। इस प्रकार 'परिसंख्या' चार प्रकार की हुई (१) प्रश्नपूर्विका व्यङ्गयव्यवच्छेद्या, (२) प्रश्नपूर्विका वाच्यव्यवच्छेद्या (३) अप्रश्न- दूर्विका व्यङ्गयव्यवच्छेद्या और (४) अप्रश्नपूर्विका वाच्यव्यवच्छेद्या। क्रमशः इसके उदाहरण ये हैं :- 'मनुष्यों के द्वारा सेव्य कौन सी वस्तु है? भगवती भागीरथी का पावन तट, एकान्त में ध्येय कौन सी वस्तु है? कौस्तुभाभरण भगवान् विष्णु का चरणयुगल, आराधना के योग्य क्या है ? पुण्य और किसकी सदा चाह होनी चाहिये ? करुणा की, ओह ! वस्तुतः ये ही वे वस्तुएँ हैं जिनमें यदि मनुष्य का मन रम जाय तो शाश्वत मोक्ष मिलना बायें हाथ का खेल हो जाय !' [ यहाँ 'परिसंख्या' है क्योंकि शास्त्रविदित गंगातट-सेवनादि का प्रतिपादन इसीलिये है जिसमें गंगाभिन्न नदीतट-सेवनादि की व्यावृत्ति समझी जाय।] यहाँ अन्य व्यवच्छेद व्यङ्ग्य है वाच्य नहीं। 'वह कौन सा भूषण है जो कभी नष्ट न हो? यश, न कि रत्न; वह कौन सा कार्य है जिसका करना उचित है? महात्माओं के द्वारा आचरित पुण्यकार्य, न कि पापकृत्य; वे कौन से नेत्र हैं जो सर्वदर्शक हैं? बुद्धि, न कि चर्मचन्तु और वह कौन सा व्यक्ति है जो इन सब बातों को जानता है? तुम्हीं, न कि और कोई।' [ यहाँ 'परिसंख्या' है क्योंकि अन्य प्रमाणों से अवगत भी यश आदि की भूषणता इसीलिये प्रतिपादित है जिसमें यश आदि के अतिरिक्त रत्न आदि की भूषणता की व्यावृत्ति हो जाय। यहाँ जो व्यावृत्ति है वह 'न' के प्रयोग में वाच्य है। ] 'प्रिये! कुटिलता तेरे केशपाश में है (न कि तेरे अन्तःकरण में) राग तेरे हाथ, पैर

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दशम उल्लास: ४१६

(अप्रश्नपूर्विका वाच्यव्यवच्छेद्या परिसंख्या) भक्तिर्भवे न विभवे व्यसनं शास्त्रे न युवतिकामास्त्रे। चिन्ता यशससि न वपुषि प्रायः परिदृश्यते महताम् ॥ ५२४ ॥ ( ३९ कारणमाला अलंकार) (१८६) यथोत्तरं चेत्पूर्वस्य पूर्वस्यार्थस्य हेतुता। तदा कारणमाला स्यात्, उत्तरमुत्तरम्प्रति यथोत्तरम् । उदाहरणम्- जितेन्द्रियत्वं विनयस्य कारणं गुणप्रकर्षो विनयादवाप्यते। गुणप्रकर्षेण जनोऽनुरज्यते जनानुरागप्रभवा हि सम्पक्षः॥५२५॥ ('हेतु' अरलङ्कार को मान्यता का खण्डन) 'हेतुमता सह हेतोरभिधानमभेदतो हेतु'रिति हेत्वलङ्कारो न लक्षितः। आयुघृतमित्यादिरूपो ह्येष न भूषणतां कदाचिद्हति वैचितयाभावात्। और ओठ में है ( न कि किसी दूसरे के लिये तेरे मन में), कड़ापन तेरे कुर्चों में है (न कि तेरे हृदय में) और तेरे नेत्र भले ही चज्जल हों मन चज्जल नहीं)।' [ यहाँ केशपाश आदि में कुटिलता आदि के प्रतिपादन से हृदय में कुटिलता आदि की व्यावृत्ति अभिव्यक्त हो रही है। ] 'महापुरुषों की आसक्ति तो भगवान् शिव के प्रति हुआ करती है न कि वैभव-विलास के प्रति, उनमें व्यसन शास्त्र का हुआ करता है न कि काम के अमोध अस्त्र-युवती-का और उनकी चिन्ता! वह यश के लिये भले ही हो, देह (और उसके सुख-दुख) के लिये कभी नहीं।' [ यहाँ महापुरुषों की शिव के प्रति आसक्ति आदि के प्रतिपादन से वभवादि के प्रति आसक्ति आदि की व्यावृत्ति अभिप्रेत है जो कि शब्दतः प्रतिपादित की जा रही है। ] टिप्पणी-पद्यपि आलकारिकों ने 'परिसंख्या' अलंकार की रूप-रेखा मीमांसा की 'परिसंख्या- विधि' के आधार पर निर्धारित की है क्योंकि जैसे 'परिसंख्याविधि' का अभिप्राय निषेध-पर्यवसायी (अन्त में निषेधात्मक ) हुआ करता है वैसे ही 'परिसंख्या' अलंकार का भी अभिप्राय शब्दतः प्रतिपाद्य के वर्जन और उससे भिन्न के संख्यान (वर्णनीयख्प से गणन) का ही हुआ करता है, किन्तु जहां अलंकारशास्त्र की 'परिसंख्या' में कवि-प्रतिभा का हाथ रहा करता है वहाँ मीमांसाशाख की 'परिसंख्या' में शास्त्र-प्रेरणा का। अनुवाद-'कारणमाला' वह अलंकार है जिसमें उत्तरोत्तरवर्ती अर्थ के प्रति पूर्वपूर्ववर्त. अर्थ कारणरूप से उपनिबद्ध हुआ करते हैं। यहाँ 'यथोत्तरम्' का अभिप्राय है 'उत्तरोत्तरवर्ती' (अर्थ) का (न कि जैसा आगे हो वैसे का)। जैसे कि :- 'जितेन्द्रियता से नम्रता आती है, नम्रता से गुणसमृद्धि होती है, गुणसमृद्धि से लोगों का प्रेम मिलता है और लोगों के प्रेम से मिलती है सारी संपदा।' [यहाँ 'जितेन्द्रियता से नम्रता, नम्रता से गुणसमृद्धि, गुणसमृद्धि से जनानुराग और जनानुराग से संपदा की प्राप्ति के वर्णन में पूर्वपूर्ववर्ती अर्थ उत्तरोत्तरवर्ती अर्थ के प्रति कारणरूप से उपनिबद्ध है।] यहाँ (आचार्य रुद्रट के अभिमत) 'हेतु' अलंकार का-जिसमें हेतुमान् (कार्य) के साथ हेतु (कारण) का अभेदपूर्वक अभिधान विवच्ित माना गया है-निरूपण अभिप्रेत

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४२० काव्यप्रकाश:

अविरलकमलविकास: सकलालिमदश्च कोकिलानन्दः । रम्योऽयमेति संप्रति लोकोत्कण्ठाकर: कालः ॥५२६ ॥ इत्यत्र काव्यरूपतां कोमलानुप्रासमहिम्नैव सामाम्नासिषुर्न पुनर्हेत्वलक्कार- कल्पनयेति पूर्वोक्तकाव्यलिङ्गमेव हेतु:। (४० अन्योन्य अलंकार) (१८७) क्रियया तु परस्परम् ॥ १२० ॥ वस्तुनोजननेऽन्योन्यम्,- नहीं क्योंकि 'कार्य के साथ कारण का अभेदतः अभिधान'वैसा ही है जैसा कि 'आयुर्घृतम्' आदि का प्रयोग जहाँ आयु (हेतुमत्-कार्य) के साथ घृत (हेतु-कारण) का अभेदतः अभिधान तो अवश्य है किन्तु) जिसमें न तो कोई चमत्कार है और न अलंकार बनने की च्षमता। यहाँ यह आशंका कि यदि 'हेतु' अलंकार को अलंकार न माना गया तब इस सूक्ति अर्थात् :- 'अब आ ही पहुँचा-वह सुहावना समय आ पहुँचा जो कमलों का शाश्वत विकास है, भ्रमरों का मदोन्माद है, कोकिलों का आनन्दोल्लास है और प्राणिमात्र में प्रेम का जनक !' में प्राचीन काव्याचार्य (रुद्रट) सम्मत काव्यात्मकता निराधार हो जायगी, ठीक नहीं जँचती क्योंकि यहां (अविरलकमलविकास:आदि सूक्ति में) प्राचीन काव्याचार्यों के अनुसार जो काव्यमयता है वह (यहाँ वसन्तकालरूप कारण और कमलविकासादिरूप कार्यों में अभेदतः अभिधान की भ्रान्ति से, 'हेतु' अलंकार की कल्पना पर निर्भर नहीं अपितु कोमल वर्णविन्यास आदि के वैचित्र्य पर निर्भर है। (क्योंकि यहाँ भी वसन्त कालरूप कारण और कमल विकासादिरूप कार्य के अभेदाभिधान में 'आयुर्घृतम्' की भाँति शुद्ध सारोपा लक्षणा ही है) अन्त में निष्कर्ष यही है जिस 'काव्यलिङ्ग' अलंकार का पहले प्रतिपादन किया जा चुका है उसी को हेतु (अथवा काव्यहेतु ) भले ही कह लिया जाय ('हेतु' नाम का काव्यलिङ्ग से पृथक कोई अलंकार नहीं हो सकता)। टिप्पणी-इसमें कोई सन्देह नहीं कि मामह के पहले से ही काव्याचार्यो की परम्परा में हेतु अलंकार माना जाता आा रहा है क्योंकि 'हेतुश्र सूच्मो लेशोऽथ नालंकारतया मतः। समुदाया- भिधानस्य वक्रोक्त्यनभिधानतः II' (काव्यालंकार २८६) इस प्रकार 'हेतु' की ही मान्यता का खण्डन मामह ने किया है। बाद के आचार्य दण्डी ने इसी 'हेतु' की पुनः स्थापना (काव्यादर्श २. २३५-२५९) की है और इसके विविध विकल्पों का रूप-निरूपण किया है। दण्ड की 'हेतु'- सम्बन्धी इस उक्ति अर्थात् :- 'तेडमी प्रयोगमार्गेषु गौणवृत्तिव्यपाश्रयाः। अत्यन्तसुन्दरा दृष्टास्तदुदाहृतयो यथा ॥' से 'हतु' मलंकार होने में 'सारोपा गौणी लक्षणा' का आधार स्पष्ट प्रतीत होता है। आचार्य मम्मट ने यहाँ जिस प्राचीन आलंकारिक की हेतुसम्बन्धी मान्यता की आलोचना की है वह 'उद्भट' नहीं, जैसा कि वामनाचार्ये की काव्यप्रकाशव्याख्या (बालबोधिनी पृष्ठ ७०६) में भ्रमवश उल्लेख है अपितु 'रुद्रट' हैं क्योंकि रुद्रट ने ही अपने काव्यालंकार (७. ८२) में हेतु का यह लक्षण किया है :- 'हेतुमता सह हेतोर भिधानमभेदकृद् भवेद् यत्र। सोऽलंकारो हेतुः स्यादन्येभ्यः पृथकभूतः॥' आचार्य मम्मट का -हेतु'-रण्डन सर्वथा युक्तिसंगत है। अनुवाद-'अन्योन्य' वह अलंकार है जिसे क्रिया के द्वारा पदार्थों के परस्पर उत्पादक होने का चमरकार कहा जा सकता है।

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दशम उल्लास: ४२१

अर्थयोरेकक्रियामुखेन परस्परं कारणत्वे सति अन्योन्यनामाऽलद्कारः। उदाहरणम्- हंसाणं सरेहिं सिरी सारिब्जइ अह सराण हंसेहिं। अण्णोण्णं विअ एए अप्पाणं णवर गरुअन्ति ॥ ५२७॥ (हंसानां सरोभिः श्रीः सार्यते अथ सरसां हंसैः । अन्योन्यमेव एते आत्मानं केवलं गरयन्ति ॥५२७ ॥) अत्रोभयेषामपि परस्परं जनकता मिथः श्रीसारतासम्पादनद्वारेण।

(१८८) उत्तरश्रुतिमात्रतः । (४१ उत्तर अलंकार )

प्रश्नस्योन्नयनं यत्र क्रियते तत्र वा सति ॥ १२१ ॥ असकृद्यदसंभाव्यमुत्तरं स्यातत्दुतरम् । ('उत्तर' का प्रथम प्रकार )

उदाहरणम्- प्रतिवचनोपलम्भादेव पूर्ववाक्यं यत्र कल्प्यते तदेकं तावदुत्तरम्।

वाणिअअ हत्थिदन्ता कुत्तो अम्हाणँ वग्घकित्तीअ। जावलुलिआलअमुही घरम्मि परिसक्कए सोण्हा ॥ ५२८ ॥ वह अलङ्कार जिसे 'अन्योन्य' कहते हैं वहाँ हुआ करता है जहाँ पदार्थों में एक क्रिया अर्थात् एकजातीय क्रिया के उत्पादन के द्वारा (न कि साक्षात्) परस्पर कार्यकारण की प्रतीति हुआ करती है। उदाहरण के लिये :- 'हंसों की शोभा तो सरोवरों से बढ़ायी जाया करती है और सरोवरों की शोभा बढ़ायी जाया करती है हंसों से क्योंकि ये दोनों परस्पर एक दूसरे के महत्व के ही तो वर्द्धक हैं।' यहाँ दोनों अर्थात् हंसों और सरोवरों में जो परस्पर जन्यजनक भाव की संभावना हो रही है वह (वस्तुगत्या नहीं अपितु) उनके परस्पर एक दूसरे की शोभा वृद्धि के संपादन करते रहने के कारण (और इसीलिये इस सूक्ति में 'अन्योन्य' अलङ्कार अभिप्रेत है। टिप्पणी-'अन्योन्य' अलक्कार का यहाँ जो स्वरूप निर्दिष्ट है उसका आधार रुद्रट की यह अन्योन्य परिभाषा है :- 'यत्र परस्परमेकः कारकभावोऽभिधेययोः क्रियया। संजायेत स्फारिततत्वविशेषस्तदन्योन्यम्॥' (काव्यालंकार ७. ९१) किन्तु रुद्रट की परिभाषा में 'क्रिया के द्वारा पदार्थो के निर्विलक्षण कारकभाव' में यदि अस्फुटता है तो काव्यप्रकाशकार की परिभाषा में 'क्रिया के द्वारा पदार्थो के जन्यजन्यकमाव' में स्फुटता है। संभवतः रुख्यवा के 'अन्योन्य'-लक्षण-परस्परं क्रियाजननेऽन्योन्यम्' के द्वारा अन्योन्य का जो स्वरूप परिष्कृत हुआ है उसी का यहाँ भी उन्मीलन हो रहा है। अनुवाद-'उत्तर' अलङ्कार वह है जिसमें या तो (प्रश्न के न होने पर भी) उत्तर के श्रवणमात्र से प्रश्न की कल्पना कर ली जाय या प्रश्न के रहते हुए भी ऐसे उत्तर की कल्पना की जाय जिसकी साधारणतया कोई संभावना भी न करे। यहाँ (दो प्रकार के उत्तर का निर्देश है जिसमें) पहला 'उत्तर का प्रकार वह है जहाँ प्रतिवचन अर्थात् उत्तर के प्रतिलभ्भ अथवा अवबोध से ही पूर्ववाक्य (प्रश्नवाक्य) का उन्नयन अथवा अनुमान कर लिया जाया करता है। जैसे कि :-

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४२२ काव्यप्रकाश:

(वाणिजक ! हस्तिदन्ता: कुतोऽस्माकं व्याघ्रकृत्तयक्ष। यावल्लुलितालकमुखी गृहे परिष्वक्कते स्नुषा ॥ ५२८॥) हस्तिदन्तव्याघ्रकृत्तीनामहमर्थी ताः मूल्येन प्रयच्छेति क्रेतुर्वचनम् अमुना वाक्येन समुन्नीयते। न चतन् काव्यलिङ्गम् उत्तरस्य ताद्रूप्यानुपपत्तेः । नहि प्रश्नस्य प्रतिवचनं जनको हेतुः। नापीदमनुमानम् एकधर्मिनिष्ठतया साध्य- साधनयोरनिर्देशादित्यलंकारान्तरमेवोत्तरं साधीयः । ( 'उत्तर' का द्वितीय प्रकार ) प्रश्नादनन्तरं लोकातिक्रान्तगोचरतया यदसंभाव्यरूपं प्रतिवचनं स्यात्तद परमुत्तरम् अनयोश्च सकृदुपादाने न चारुताप्रतीतिरित्यसकृदित्युक्तम्। उदाहरणम्- का विसमा देव्वगई कि लद्धं जं जणो गुणग्गाही। कि सोक्खं सुकलत्तं किं दुक्खं जं खलो लोओ ॥। ५२६॥ (का विषमा दैवगतिः किं लब्धव्यं यज्जनो गुणग्राही। किं सौख्यं सुकलत्रं किं दुखं यत्खलो लोकः॥ ५२९॥

'(वणिक के प्रति व्याध की उक्ति)-अरे वणिक! मेरे घर में भला जब तक घुंघराले वालों वाली मेरी पुत्रवधू विराजे, हाथी के दाँत और बाघ के चमड़े कहाँ से मिल सकेंगे !' यहाँ (व्याध के) प्रतिवचन अथवा उत्तरपरक वाक्य से विक्रेता (वणिक) के इस प्रश्न का उन्नयन अथवा अनुमान हो रहा है-'अरे व्याध ! सुझे चाहिये हाथी के दांत और बाघ के चमड़े लाओ और जो मूल्य हो ले लो !' यहाँ 'काव्यलिङ्ग' अलंकार का संदेह न होना चाहिये क्योंकि यहाँ उत्तरवाक्य को (उससे अनुमित प्रश्न वाक्य के प्रति) हेतु नहीं माना जा सकता। (हेतु तो दो ही प्रकार का सम्भव है कारक अथवा ज्ञापक, तब) भला उत्तर को प्रश्न का कारकरूप हेतु कैसे कहा जाय ! (हाँ ज्ञापकरूप हेतु तो इसे कहा जा सकता है किन्तु 'काव्यलिङ्ग' के लिये हेतु का कारकरूप हेतु होना अपेक्षित है न कि ज्ञापकरूप हेतु )। 'उत्तर' अलङ्कार को 'अनुमान' अलंकार से भी गतार्थ नहीं माना जा सकता क्योंकि 'अनुमान' में जो बात आवश्यक है वह है साध्य और साधन का एकधर्मी में साध्य-साधन भावरूप से निर्देश और यहाँ (उत्तर में) भला ऐसा निर्देश कहाँ (क्योंकि यहाँ उत्तर से प्रश्न के अनुमान होने पर भी साध्य की निर्देश तो कहीं नहीं)! इसलिये अच्छा तो यही है कि 'उत्तर' को (काव्यलिङ्ग और अनुमान से सर्वथा भिन्न) एक अन्य अर्थालङ्कार-प्रकार ही मान लिया जाय। 'उत्तर' का दूसरा प्रकार वह है जहाँ प्रश्न के बाद एक ऐसा उत्तर मिले जो इसलिये दुर्शेय प्रतीत हो क्योंकि अन्य किसी प्रमाण के द्वारा इसका परिचय न प्राप्त किया जासके। इस 'उत्तर'-प्रकार में प्रश्न और उत्तर का एक बार से अधिक होना इसलिए अपेक्ित है क्योंकि इनके एक बार ही होने में कोई चमत्कार नहीं ( और जब चमत्कार ही नहीं तो 'अलट्घार' कहाँ से आ जाय !) उदाहरण के लिये- 'वह कौन सी वस्तु है जो बड़ी विकट है। भाग्य की चाल; ऐसी कौन वस्तु है जो दुरलभ हो ? गुण का ग्राहक व्यक्कि, वह वस्तु क्या है जिसे सुख कहते हैं ? पतिव्रता स्त्री और वह क्या है जिसे दुःख कहा जाता है? बस, दुष्टों का संग !' यहाँ 'का विषमा' आदि अनेक बार किये गये प्रश्नों के 'दैवगतिः' आादि जो अनेक बार दिये गये उत्तर हैं वे सर्वजनसंवेदय नहीं अपि तु एक प्रकार से अप्रसिद्ध किं वा अलौकिक उत्तर हैं और इसीलिये यहां 'उत्तर' अलक्कार का चसर्कार है। ]

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दशम उल्लास: ४२३

('परिसंख्या' (प्रश्नपूर्विका परिसंख्या) से 'उत्तर' का भेद )

त्यनयोर्विवेक: । प्रश्नपरिसंख्यायामन्यव्यपोहे एव तात्पर्यम् इह तु वाच्ये एव विश्रान्तिरि-

(४२ सूक्ष्म अलङ्कार ) (१८९) कुतोऽपि लक्षितः सूक्ष्मोऽप्यर्थोऽन्यस्मै प्रकाश्यते ॥१२२॥ धर्मेण केनचिद्यत्र तत्सूक्ष्मं परिचक्षते। कुतोऽपि आकारादिङ्गिताद्वा सूत्मस्तीचणमतिसंवेद्यः। उदाहरणम्- वक्त्रस्यन्दिस्वेदबिन्दुप्रबन्धै- र्दष्ट्वा भिन्नं कुङ्गमं कापि कण्ठे। पुंस्त्वं तन्व्या व्यस्जयन्ती वयस्या स्मित्वा पाण। खड्गलेखां लिलेख ॥ ५३० ॥ अत्राकृतिमवलोक्य कयाऽपि वितर्कितं पुरुषायितं असिलतालेखनेन वैद- गध्यादभिव्यक्तिमुपनीतं पुंसामेव कृपाणपाणिता योग्यत्वात्। 'उत्तर' अलङ्कार और 'प्रश्नपूर्विका परिसंख्या' अलङ्कार में परस्पर भेद इसी से स्पष्ट है कि यहाँ 'प्रश्नपूर्विका परिसंख्या' का (जैसे कि 'किमासेव्यं पुंसाम्' आदि प्रसङ्गों में) तात्पर्य वस्तुतः अन्यव्यपोह अन्यव्यवच्छेद (जैसे कि रत्न आदि के निराकरण) में रहा करता है वहाँ 'उत्तर' का तात्पर्य निगूढ वाच्यार्थ (जैसे कि दैतगति में अधिकाधिक वैषग्य आदि) के ही प्रतिपादन में। टिप्पणी-मम्मट का उत्तरालक्कार-लक्षण रुद्रट के इस उत्तरालक्कार-निरूपण अर्थात्- 'उत्तरवच नश्रवणादुन्नयनं यत्र पूर्ववचनानाम् । क्रियते तदुत्तरं स्यात् प्रश्नादप्युत्तरं यत्र ।।' (काव्यालक्कार ७.९३) से प्रभावित है किन्तु रुद्रट के 'प्रश्नादप्युत्तरं यत्र तदुत्तरम्' के विकल्प में बह वात स्पष्ट नहीं जो कि मम्मट के 'असकृद् यदसंभाव्यमुत्तरं स्यात्तदुत्तरम्' में स्पष्ट हो रही है। संभावतः रय्यक की 'उत्तरात् प्रश्नोन्नयनमसकृदसंभाव्यमुत्तरं चोत्तरम्' (अलक्कारसर्वस्व-काव्यमाला, पृष्ठ २१६) इस 'उत्तर' परिभाषा के आधार पर मम्मट ने उत्तरालक्कार का विवेचन किया है। अनुवाद-'सूच्म' अलङ्कार वह है जिसमें किसी व्यापक हेतु (आकार अथवा इङ्गित) के द्वारा प्रतीत भी अर्थ किसी असाधारण (स्मारक) धर्म के उपन्यास से सहृदयहृदय- संवेद्य बनाकर प्रतिपादित किया जाय। यहाँ 'कुतोऽपि' 'किसी प्रकार से भी'-का अभिप्राय है 'आकार द्वारा' अथवा 'चेष्टा द्वारा' का। 'सूच्म' से तात्पर्य है 'सहृदयमात्रसंवेदय' से। जैसे कि-'किसी सखी ने अपनी प्रियसखी किसी नायिका के कण्ठ में उसके मुखमण्डल से टपके स्वेदबिन्दुओं की धार से उसके कुङ्कुम के बहे मुखराग को गले में लगा देख, सुसकुरा कर, उसकी हथेली पर (पत्रावली-रचना के बदले) एक खड्ग का रेखाचित्र ऐसा रच दिया जिससे उसकी पुरुषायित रतिलीला स्पष्ट सूचित होने लगी। यहाँ 'सूचम' अलद्कार के रूप में जो अर्थ चमरकारपूर्ण प्रतीत हो रहा है वह है नायिका की 'पुरुषायित' रतिकरीडा का सहृदयसंवेद् अर्थ क्योंकि यद्यपि यह अर्थ नायिका के आकार (अर्थात् कण्ठ में कुङ्कुम के मुखराग) के निरूपण से ही उसकी सखी पर स्पष्ट प्रकट है (जैसा कि यहाँ प्रतिपादित है) किन्तु उसकी सखी की रची उसकी हथेली पर पत्रावली के रूप में खड्गाकार रेखा के (स्मारक चिह्न) द्वारा जो उसे (नायिका

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४२४ काव्यप्रकाश:

यथा वा- संकेतकालमनसं विटं ज्ञात्वा विदग्धया। ईषन्नेत्रार्पिताकूतं लीलापद्मं निमीलितम् ॥५३१ ॥ अत्र जिज्ञासितः संकेतकाल: कयाचिदिङ्गितमात्रेण विदितो निशासमयशं- सिना कमलनिमीलनेन लीलया प्रतिपादितः । (४३ 'सार' अलंकार) (१९०) उत्तरोत्तरमुत्कर्षो भवेत्सारः परावधिः ॥ १२३ ॥ परः पर्यन्तभागोऽवधिर्यस्य धाराधिरोहितया तत्रैवोत्कर्षस्य विश्रान्तेः। उदाहरणम्- राज्ये सारं वसुधा वसुधायां पुरं पुरे सौधम्। सौधे तल्पं तल्पे वराङ्गनाऽनङ्गसर्वस्वम् ॥५३२॥ के प्रति या अन्य सखियों के प्रति) पुनः प्रकाशित किया जाता हुआ प्रतिपादित किया गया है उसमें एक वैचित्र्य है क्योंकि किसी स्त्री की हथेली पर कृपाण की रेखा की रचना, जिसका औचित्य पुरुष की हथेली पर है क्योंकि कृपाणधारण पुरुष का धर्म है, एक सूच्म अर्थ का ही अभिव्यञ्जन कर सकती है (और वह अर्थ है नायिका की विपरीत रतिक्रीडा का ही अर्थ)। अथवा यहाँ :- 'किसी परमविदग्ध उपनायिका ने कुछ-कुछ आँखों के सङ्केत से ही अपने मन की बात बता चुकने वाले किसी उपपति को देख और यह जान कर कि वह मिलन की घड़ी पूछ रहा है ऐसा किया कि अपने हाथ में मनोविनोद के लिये रखे कमल की पङ्गड़िओं को सिकोड़ ललया।' 'यहां 'सूच्म' अलङ्कार के रूप में जो अर्थ चमत्कार है वह है रात के समय के सूचक कमलनिमीलनरूप चेष्टा विशेष द्वारा 'मिलन की घड़ी' की सूचना का अर्थ क्योंकि यद्यपि यह अर्थ, यहां प्रतिपादित उपपति के नेत्रों के संकेत से भी प्रतिपन्न है किन्तु 'लीलाकमल के उपनायिका द्वारा सिकोड़ लेने के''चेष्टाविशेष से इसका जो प्रतिपादन है उनमें एक चमतकार आा गया है क्योंकि यह सूक्ष्ममतिवेद्य बन गया है। टिप्पणी-भामह के पहले भी आलंकारिक 'सूक्ष्म' अलद्कार को एक अतिरिक्त अतक्कार मानते रहे हैं किन्तु मामह ने इसे इसलिये अलद्कार नहीं माना क्योंकि इसमें कोई उक्ति-वैचित्रय नहीं, सूचम :.. नालङ्कारतया मतः। समुदायाभिधानस्य वक्रोकत्यनभिधानतः॥।' काव्यालङ्कार २. ८६)। दण्डी के अनुसार 'सूक्ष्म' अलङ्कार एक स्व्रतन्त्र अलङ्कार हे- इङ्गिताकारलच्योऽर्थः सौचम्यात् सूच्म 'इति स्मृतः ।' ( काव्यादर्श २. २६०) रुद्रट ने भी 'सूक्ष्म' नामक अलद्कार को एक पृथक अलङ्कार क रूप में देखा है :- 'यत्रायुक्तिमदर्थो गमयति शब्दो निजार्थसंबद्धम्। अर्थान्तरमुपपत्तिमदिति तत् संजायते सूक्ष्मम् ।' (काव्यालक्कार ७, ९८) किन्तु रुद्रट का सूक्ष्म-लक्षण वह नहों जो दण्डी का हे अथवा रुय्यक का है। काव्यप्रकाशकार ने वस्तुतः रुय्यक की दृष्टि से 'सूक्ष्म' का स्वरूप-दर्शन किया है। अनुवाद-'सार' अलङ्कार वह है जिसमें किसी का उत्कर्ष वर्णन उत्तरोत्तर पराकाष्ठा पर पहुँचता प्रतिपादित हुआ करता है। यहां उत्कर्ष की 'परावधि' का अभिप्राय है किसी की उत्तरोत्तर उत्कृष्टता के वर्णन का अन्त में पराकाष्ठा पर पहुँस कर समाश होने का। उदाहरण के लिये- 'राज्य में र्यादि कोई सार है तो है पृथिवी, पृथिवी में यदि कोई सार है तो वह है

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दशम उल्लास: ४२५

(४४ असंगति अलंकार) (१९१) भिन्नदेशतयाऽत्यन्तं कार्यकारणभूतयोः। युगपद्धर्मयोर्यत्र ख्यातिः सा स्यादसंगतिः ॥ १२४ ॥ इह यद्देशं करणं त द्देशमेव कार्यमुत्पद्यमानं दृष्टं यथा धूमादि। यत्र तु हेतुफल- रूपयोरपि धर्मयोः केनाप्यतिशयेन नानादेशतया युगपदवभासनं सा तयो: स्वभावोत्सन्नपरस्परसंगतित्यागाद संगतिः। तस्सेअ गणो वस्सेअ वेअणा भणइ तं जणो अलिअम्। दंतक्खअं कत्ोले बहूए वेअणा सयत्तीणम्॥५३३॥ (यस्येव व्रणस्तस्यैव वेदना भणति तज्जनोडलीकम् । दन्तक्षतं कपोले वध्वा वेदना सपत्नीनाम् ॥ ५३३ ॥

नगर, नगर में यदि कोई सार है तो वह है सौध (प्रासाद), सौध में यदि कोई सार है तो वह है पर्यङ्क और पर्यङ्क में जो सारतत्व्र है वह है मदनसर्वस्व एक सुन्दरी!' [ यहाँ अनेक वस्तुओं की उत्कृष्टता का प्रतिपादन है किन्तु पूर्वपूर्ववर्णित वस्तु का उत्कर्ष अन्तिम (सुन्दरीस्त्री-रूप) वस्तु में ही चरम सीमा पर पहुँचता प्रतीत हो रहा है जिसमें 'सार' अलङ्कार की रूपरचना स्पष्ट है। ] टिप्पणी-काव्यप्रकाशकार ने 'सार' भलक्कार का स्वरूप रुद्रट के इम सार-निरूपण- 'यत्र यथा समुदायाद् यथैकदेश क्रमेण गुणवदिति। निर्धार्यते परावधि निरतिशयं तद् भवेत् सारम् ॥' (काव्यालङ्कार ७,९६) के आधार पर दखा है और इसका उदाहरण भा वही दिया है जो कि रुद्रट का दिया हुआ है क्योंकि 'राज्ये सारं वसुधा' आदि सूक्ति रुद्रट के काव्यालक्कार (७,९७) की ही सूक्ति है। अनुवाद-'असंगति' अलङ्गार उसे कहते हैं जिसमें कार्यकारणरूप से अवस्थित धर्मों का ऐसा प्रतिपादन किया जाय कि भिन्न देश में भी, वे अपने किसी उत्कर्ष विशेष के द्वारा, साथ ही साथ अवस्थित प्रतीत हुआ करे। वैसे तो लोक में यही देखा जाता है कि कारण का जो देश हो उससे उत्पन्न होने वाले कार्य का भी वही देश हुआ करता है जैसे कि धूम आदि रूप कार्य वहीं देखे जाते हैं जहां अग्नि आदिरूप कारण उपस्थित रहें। किन्तु काव्य में ऐसी बात सदा नहीं हुआ करती क्योंकि यहां तो कार्यकारणरूप से अवस्थित भी धर्मों की स्थिति, उनके किसी उत्कर्षविशेष के कारण, भिन्न-भिन्न देशों में भी, एक समय में ही, प्रतिपादित हुआ करती है। यहीं वस्तुतः 'असंगति' अलक्गार की रूपरेखा है क्योंकि 'असंगति' का अभिप्राय है कार्य और कारण का अपनी स्वाभाविक संगति अर्थात् एकदेश में उपस्थिति का परित्याग कर देना। जैसे कि :- 'लोग जो ऐसा कहा करते हैं कि जिसे घाव हो उसे ही पीडा होती है ठीक नहीं क्योंकि घाव तो वधू के कपोल पर रहे और पीडा हो रही है सपतनीजन को।' यहां कार्य और कारण-पीडा और दन्तक्षत-इस प्रकार वर्णित है कि ये अपनी स्वाभा विक संगति-एकत्र अवस्थिति-का परित्याग करते प्रतीत हो रहे हैं जिससे वधू के कपोलों पर पड़े पति के दन्तक्षत की सपत्नियों के लिये असह्यता का अभिप्राय विशेष रूप से स्पष्ट प्रतिपादित किया जा रहा है। इसलिये यहां जो अलङ्कार है वह 'असंगति' है।

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४२६ काव्यप्रकाश:

('अ्र्प्रसंगति' का 'विरोधाभास' से भेद) एषाच विरोधबाधिनी न विरोध: भिन्नाधारतयैव द्वयोरिह विरोधितायाः प्रतिभासात्। विरोधे तु विरोधित्वमेकाश्रयनिष्ठमनुक्तमपि पर्यवसितम् अपवाद- विषयपरिहारेणोत्सर्गस्य व्यवस्थितेः। तथा चैवं निदर्शितम्। (४५ 'समाधि' अलंकार ) (१९२) समाधिः सुकरं कार्य कारणान्तरयोगतः। साधनान्तरोपकृतेन कर्त्रा यदक्लेशेन कार्यमारब्धं समाधीयते स समाधि- र्नाम। उदाहरणम्-

('असंगति' अलंकार को 'विरोधाभास' अलंकार से गतार्थ नहीं किया जा सकता क्योंकि) 'असंगति' अलंकार 'विरोधाभास' नहीं अपितु विरोधाभास के (यथास्थान) बाधकरूप में रहा करता है क्योंकि 'असंगति' में जो कार्य और कारण में अनुपपत्तिरूप विरोध रहा करता है वह उनके भिन्न देश में उपस्थित होने में ही प्रतीत हुआ करता है। इसके विपरीत 'विरोधाभास' में जो बात है जिसका विरोधाभास के निरूपण के प्रसंग में उल्लेख नहीं किया गया, वह यह है कि यहां विरोध (कार्य और कारण की अपनी स्वाभाविक संगति के परित्याग में ही नहीं अपितु) भिन्न-भिन्न देशवर्ती वस्तुओं की एकदेशवर्तिता में भी रहा करता है और यहां ऐसा समझना इसलिये आवश्यक है क्योंकि 'विरोधाभास' तो एक उत्सर्गशास्त्र के समान है और 'असंगति' है अपवादशास्त्र के समान और इस प्रकार (प्रकल्प्य वाऽपवादविषयं तत उत्सर्गोऽभिनिविशते' इस नियम के अनुसार) 'निरोधाभास' वहां ही संभव है (अर्थात् विरोधसामान्य के प्रसङ्गों में) जहां 'असंगति' (जो इसका अपवाद है क्योंकि यह विरोधविशेष जैसे कि कार्य और कारण की भिन्नभिन्न देश में अवस्थिति के प्रसङ्गों में हो संभव है) की संभावना नहीं। वस्तुतः इन सब बातों को ही ध्यान में रख कर यहां 'असंगति' का (ऐसा लक्षण-निरूपण और) निदर्शन किया गया। टिप्पणी-'असंगति' का स्वरूप रुद्रट के अनुसार यह रहा- 'विस्पष्टे समकालं कारणमन्यत्र कार्यमन्यत्र। यस्यामुपलभ्येते विज्ञेयाऽसंगतिः सेयम् ॥' (काव्यालङ्कार ९. ४८) और इसी का दर्शन काव्यप्रकाशकार ने यहाँ अपने असंगति-विवेचन में किया है। 'असंगति' में 'अतिशय' का यह सिद्धान्त- 'यत्रार्थधर्मनियमः प्रसिद्धिबाधाद्विपर्ययं याति। कश्चित् क्वचिदतिलोकं स स्यादित्यतिशयस्तस्य ।।' (काव्यालक्कार ९.१) अन्तर्भूत है जिसे काव्यप्रकाशकार न 'हेतुफलरूपयोरपि धर्मयोः केनाप्यतिशयेन' इत्यादि उक्ति में स्वीकार किया है। अनुवाद-'समाधि' अलङ्कार वह है जिसमें किसी कार्य के, (उसके नियत कारण के अतिरिक्त भी) अन्य कारणों के संयोग से, सौकर्य (अनायास सिद्धि अथवा सम्पूर्णतया सिद्धि) का प्रतिपादन अपेक्ित रहा करता है। 'समाधि' कहते हैं प्रारम्भ किये गये कार्य के समाधान अथवा सम्पादन को और ऐसा इसलिये क्योंकि कार्यकर्ता को (कार्य के नियत साधन के अतिरिक्त भी) अपने कार्य में अन्य साधनों के द्वारा सहायता मिल जाया करती है जिससे उसका कार्य बिना भयास के सन्पूर्णतया संपन्न हो जाया करता है। उदाहरण के लिये :-

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दशम उल्लास: ४२७

मानमस्या निराकर्त्तु पादयोमें पतिष्यतः । उपकाराय दिष्ट्येदमुदीर्ण घनगजिंतम्॥।५३४।। (४६ 'सम' अलंकार) (१९३) समं योग्यतया योगो यदि सम्भावितः क्वचित् ॥१२५।। इदमनयोः श्लाध्यमिति योग्यतया सम्बन्धस्य नियत विषयमध्यवसानं चेत्तदा समम्, तत्सद्योगेऽसद्योगे च। उदाहरणम्- धातु: शिल्पातिशयनिकषस्थानमेषा मृगाक्षी रूपे देवोऽप्ययमनुपमो दत्तपत्रः स्मरस्य। जातं दैवात्सदृशमनयोः संगतं यत्तदेत- चछङ्गारस्योपनतमधुना राज्यमेकातपत्रम् ॥५३५।। चित्रं चित्रं बत बत महच्चित्रमेतद्विचित्रम् जातो दैवादुचितरचनासंविधाता विधाता। 'जैसे ही मैंने प्रियतमा का मान दूर करने के लिये उसके पैरों पर गिरना प्रारम्भ किया वैसे ही अकस्मात् भाग्यवश मेघ की गर्जना भी मेरी सहायता के लिये हो गयी [ यहाँ 'समाधि' है क्योंकि 'माननिराकरण' रूप कार्य के 'पादपतन' रूप कारण के द्वारा सम्पन्न होते ही 'मेघगर्जन' रूप अन्य कारण भी सहायक रूप से उपस्थित होता हुआ प्रतिपादित किया जा रहा है। ] टिप्पणी-काव्यप्रकाशकार का 'समाधि'-लक्षण आचार्य दण्डी के इस समाहित (समाधि) लक्षण अर्थात्- 'किञ्ञिदारभमाणस्य कार्य दैववशात् पुनः। तत्साधनसमापत्तिर्या तदाहु: समाहितम् ॥।' (काव्यादर्श २. २९८) का अनुसरण करता है और काव्यप्रकाशकार ने इसका जो उदाहरण-'मानमस्या' आदि दिया है वह भी काव्यादर्श (२. २९९) की ही सूक्ति है। अनुवाद-'सम' अलद्कार उसे कहते हैं जिसमें किन्हीं वस्तुओं के ऐसे सम्बन्ध का प्रतिपादन हो जो कि सर्वसम्मति से स्वथा उचित प्रतीत हो। 'सम' का अभिप्राय है किन्हीं दो वस्तुओं के ऐसे मेल का जिसे श्लाध्य मानें और जिसकी निश्चयरूप से प्रतीति हो जाया करे। यह मेल (संयोगादिरूप अथवा कार्य- कारणभावरूप सम्बन्ध ) दो प्रकार का हो सकता है या तो दो सद् वस्तुओं का मेल हो या दो असद् वस्तुओं का मेल हो। उदाहरण के लिये :- (१) 'यह तो वस्तुतः प्रेम का एकच्छत्र राज्य ही विराजमान है कि इन दोनों का अर्थात् एक तो उस मृगनयनी सुन्दरी का, जो कि विधाता के रूपनिर्माणकौशल की कसौटी सी ही है और दूसरे इस अनुपम राजकुमार का, जो कि कामदेव को भी सुन्दरता का प्रमाणपत्र देने में समर्थ है, भाग्यवश ऐसा सम्बन्ध जुट गया कि सभी का मन रह गया।' [यहां मृगनयनी नायिका और कामाधिक सुन्दर राजकुमार-दोनों शोभन पदार्थों का संयोग वर्णित है जिसमें सद्योग में 'सम' अलंकार का रूप स्पष्ट है।] (२) 'कितनी विचित्रता है, कितना आश्चर्य है, कैसी अनोखी बात है कि विधाता भी अब सृष्टिनिर्माण में औचित्य का ध्यान रखने लगे ! क्योंकि जहां नीम के पके फलों

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४२८ काव्यप्रकाश: M यन्निम्बानां परिणतफलस्फीतिरास्वादनीया यच्चतस्या: कवलनकलाकोविद: काकलोकः ॥ ५३६॥ (४७ 'विषम' अलङ्कार ) (१९४) क्वचिद्यदतिवैधर्म्यान्न श्लेषो घटनामियात्। कर्तुः क्रियाफलावाप्तिर्नैवानर्थश्र यद्भवेत् ॥१२६॥ गुणाक्रियाभ्यां कार्यस्य कारणस्य गुणक्रिये। क्रमेण च विरुद्धे यत्स एष विषमो मतः ॥१२७॥ द्रयोरत्यन्तविलक्षणतया यद् अनुपपद्यमानतयैव योग: प्रतीयते(१) यच्च किं- चिदारभमाण: कर्त्ता क्रियायाः प्रणाशात् न केवलमभोष्टं यत्फलं न लभेत याव दप्रार्थितमप्यनर्थ विपयमासादयेत् (२) तथा सत्यपि कार्यस्य कारणरूपानुकारे यत् तयोर्गुणौ क्रिये च परस्परं तिरुद्धतां व्रजतः (३,४) स समविपर्ययात्मा चतूरूपो विषमः । (निमकौड़ियों) का स्वाद रचा गया वहाँ उसके पहुँचे हुए जानकार कौए भी बना ही दिये गये !' [ यहां नीम के फल के स्वाद और उसके गुणग्राही कौओं-दोनों निकृष्ट वस्तुओं-का उचित योग विवत्ित है जिसमें असद् योग में 'समालंकार' स्पष्ट प्रतीत हो रहा है।] टिप्पणी-काव्यप्रकाशकार ने अपने सम-लक्षण में रुद्रट के इस 'साम्य'-लक्षण-अर्थात्- 'अर्थक्रियया यस्मिन्नुपमानस्येति साम्यमुपमेयम्। तत्सामान्यगुणादिककारणया तन्भवेत्साम्यम्। सर्वाकारं यस्मिन्नुभयोरभिधातुमन्यथा साम्यम्। उपमेयोत्कर्षकरं कुर्वीत विशेषमन्यत्तत् ।I' (काव्यालंकार ८, १०५, १०७) का ही परिष्कार किया है जिसमें अलक्कारसर्वस्वकार की भी सम्मति, जैसा कि इस कथन अर्थात् -- 'अन्त्यभेद (अननुरूपसंसर्ग) विपर्ययस्तु चारुत्वात्समाख्योऽलद्कारः। स चाभिरूपाड नभिरूपविषयत्वेन द्विविधः।' (अलंकारसर्वस्व-काव्यमाला पृष्ठ १६७) सं स्पष्ट प्रतीत होती है। अनुवाद-'विषम' अलंकार (जो कि 'सम' अलद्कार का विपर्ययरूप है) वह है जिसमें (१) कहीं दो सम्बद्धरूप से विवत्ित पदार्थों का, उनके अति वैलत्तण्य के कारण, परस्पर सम्बन्ध ही अनुपपन्न प्रतीत हुआ करे, (२) कहीं कर्ता को उसकी क्रिया का फल मिलना तो दूर रहे उलटे जो मिले वह एक अनर्थ हो, (३) कहीं कार्य के गुण से कारण के गुण का विरोध ही प्रतीत हो और (४) कहीं कार्य की क्रिया से कारण की क्रिया भी विपरीत लगती रहे। यहां जिस 'विषम' अलंकार का निरूपण है वह वस्तुतः (पूर्वोक्त) 'सम' अलंकारका विपर्ययरूप ही है। इसके वस्तुतः ये चार रूप (प्रकार) देखे जा सकते हैं :- (१) दो सम्बद्धरूप से अभिप्रेत पदार्थों का ऐसा सम्बन्ध जो उनके परस्पर अधिक वैधर्म्य के कारण अनुपपन्न सा प्रतीत हुआ करे। (२ ) किसी कार्य के कर्त्ता का अपनी क्रिया में अभीष्ट फल के उत्पादन के असामर्थ्य के कारण इष्टसिद्धि से भी वञ्चित रह जाना और अनिष्ट भी उलटे गले मढ़ लेना। (३) ( कारण और कार्य के गुण और व्यापार में स्वभावतः सादृश्य के अवश्यंभावी होने पर भी) कार्य के गुण का कारण के गुण से विरुद्ध पड़ जाना।

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दशम उल्लास: ४२६

क्रमेणोदाहरणम्। ( १ प्रथम विषम-प्रकार ) शिरीषादपि मृद्वङ्गी क्वेयमायतलोचना। अयं क्व च कुकूलाग्निककशो मदनानलः ॥५३७॥ ( २ द्वितीय विषम -प्रकार ) सिंहिका सुतसंत्रस्तः शशः शीतांशुमाश्रितः । जग्रसे साश्रयं तत्र तमन्यः सिंहिकासुतः ॥ ५३८॥ ( ३ तृतीय विषम - प्रकार ) सदः करस्पर्शमवाप्य चित्रं रणे रणे यस्य कृपाणलेखा। तमालनीला शरदिन्दुपाण्डु यशस्त्रिलोक्याभरणं प्रसूते ॥५३१॥ (४ चतुर्थ विषम-प्रकार ) आनन्दममन्दमिमं कुवलयदललोचने ! ददासि त्वम्। विरहस्त्वयैव जनितस्तापयतितरां शरीरं मे ॥ ५४० ॥ अत्रानन्ददानं शरीरतापेन विरुष्यते। एवं- विपुलेन सागरशयस्य कुक्षिणा भुवनानि यस्य पपिरे युगक्षये। मदविभ्रमासकलया पपे पुनः स पुरस्त्रियैकतमयैकया हशा॥ ५४१॥ (४) कार्य की क्रिया का कारण की क्रिया से विरुद्ध हो जाना। क्रमशः विषम के इन चारो प्रकारों के उदाहरण ये रहे :- कहां तो शिरीष-कुसुम से भी अधिक सुकुमार शरीर वाली यह आयतलोचना सुन्दरी! और कहाँ तुषानल से भी अधिक दुःसह यह मदनानल (प्रेमसन्ताप)!' (पझमगुप्तः नवसाहसाङ्कचरित १६. २८ ) [ यहाँ नायिका और मदनानल का सम्बन्ध, उनके स्वाभाविक किंवा अत्यधिक वैषम्य के कारण अनुपपन्न सा ही प्रतिपादित किया जा रहा है।] 'एक सिंहिकासुत (सिंहिनी के शावक) के डर से तो शशक (खरगोश) गया चन्द्रमा का आश्रय लेने किन्तु दूसरे सिंहिकासुत (राहु) ने चन्द्रमा के साथ-साथ उसे भी ग्रस लिया!' [यहाँ शशक की इष्टप्राप्ति से वञ्चना और अनिष्ट से उलटे मुठभेड़ दो-दो प्रतिपादित हैं।] कितनी विचित्र बात है कि महाराज नवसाहसाङ़ की तमाल-पत्र के समान काली तलवार, जब-जब संग्राम में उनके हाथों का स्पर्श पा जाती है तब-तब शरच्चन्द्र के समान ऐसे शुभ्र यश की सृष्टि कर बैठती है जिससे त्रिलोक ही विभूषित हो जाय !' (नवसाहसाङ्कचरित १.६२ ) [यहाँ कार्यभूत यश और कारणभूत कृपाण के शुभ्र और कृष्ण गुणों में परस्पर विरोध ही स्पष्ट विवक्षित है। ] 'अरी नीलोत्पलनयने ! प्रिये ! कहाँ तो तू (अपने संयोग में) मुझे इतना अधिक आनन्द दे और कहां तुम्हारा दिया वियोग मुझे इतना अधिक दुःखद लगे।' यहां (नायिका की) आनन्द देने की क्रिया (उसके विरह की) 'संतत करने' की क्रिया से विरुद्ध है। इसी प्रकार ऐसे प्रसङ्ग जैसे कि :- 'कल्पान्तकाल में जो सागरशायी भगवान् (विष्णु के अवतार) श्री कृष्ण अपनी

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४३० काव्यप्रकाश:

इत्यादावपि विषमत्वं यथायोगमवगन्तव्यम्। ( ४८ 'अधिक' अलंकार) (१९५) महतोर्यन्महीयांसावाश्रिताश्रययोः क्रमात्। आश्रयाश्रयिणौ स्यातां तनुत्वेऽप्यधिकं तु तत् ।१२८।। आश्रितमाधेयम् आश्रयस्तदाधारः तयोमहतोरपि विषये तदपेक्षया तनू अप्याश्रयाश्रयिणौ प्रस्तुतवस्तुप्रकर्षविवक्षया यथाक्रमं यद अधिकतरतां व्रजतः नदिरद द्विविधम् अधिकं नाम। क्रमणोदाहरणम्- ( १ आ्र्रधार-महत्त्व वर्णनरूप 'अरप्रधिक') अहो विशालं भूपाल ! भुवनत्रितयोदरम्। माति मातुमशक्योऽपि यशोराशिर्यदत्र ते॥ ५४२॥ विशाल कुत्ति में चनुर्दश भुवनों दो आत्मसात् कर लेते हैं उन्हें ही मदघूर्णित किंवा अर्धोन्मीलित नयनों वाली एक ही किसी नगर-रमणी ने अपनी एक ही आंख में भीतर भर लिया (प्रेम से हृदय में रख लिया)। 'शिशुपालवध १३ सर्ग) इत्यादि में भी यथासंभव (अर्थात् जैसे कि यहां अवयव 'कुत्ति' और अवयवी 'शरीर' के पीने के कर्ता किंवा पीने के कर्म होने रूप वैषम्य में) इसी 'विषम' अलंकार की रूप-रेखा देखी जा सकती है। टिप्पणी-'विषम' का निरूपण रुद्रट (काव्यालंकार ९. ४५ ने इस प्रकार किया है- 'कार्यस्य कारणस्य च यत्र विरोधः परस्परं गुणयोः। तद्वत् क्रिययोरथवा संजायेतेति तद्विपमम् ॥' जिसमें काव्यप्रकाशकार के दो विषम-भेद तो स्पष्ट झलक रहे हैं किन्तु दो और विषम-भेद जैसे कि-'क्वचिद्यद्तिवैधर्म्यान्न श्लेषो घटनामियात्' और 'कर्तुः क्रियाफलावाप्तिनैवानर्थश्र यद्वेत्' ऐसे हैं जिनका आधार रुय्यक का यह विषम लक्षण है- 'विरूपकार्याऽनर्थयोरुत्पत्तिर्विरूपसंघटना च विषमम्। अलंकारसर्वस्व (काव्यमाला पृष्ठ १६५) अनुवाद-'अधिक' अलंकार वह है जिसे किसी बड़े 'आधेय' और 'आधार' में उनके छोटेभी 'आधार' और 'आधेय' का क्रमशः ऐसा वर्णन कहा जाता है जिसमें वे बड़े लगा करें। यहां 'आश्रिताश्रययोः का अभिप्राय है आश्रित अर्थात 'आधेय' और आश्रय अर्थात् उसके 'आधार' का। इन 'आधेय' और 'आधार' की अपेक्षा, जो अपने आप में भले ही विशाल हों, यदि उनसे सम्बद्ध छोटे भी 'आधार' और 'आधेय' का, वर्ण्य वस्तु के उत्कर्षबोध के लिये बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया जाय तब जो 'अलंकार' होता है वह 'अधिक' अलंकार है जिसके दो प्रकार संभव हैं (१) आधार-महत्व-वर्णनरूप 'अधिक' और (२) आधेय महत्त्व वर्णनरूप 'अधिक'। करमशः जैसे कि :- 'महाराज ! क्या यह आश्चर्य की बात नहीं कि कहाँ तो इस भुवनत्रय का इतना विशाल उदर हो और कहाँ उसमें न समा सकने वाली भी आपकी यशोराशि उसमें अँट जाय।' [यहाँ आधाररूप भुवनत्रय के उदर की विशालता का वर्णन अन्ततोगत्वा यहाँ वर्णनीय यशोराशि के उत्कर्ष का ही बोधक है।]

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दशम उल्लास: ४३१

(२ आ्रधेय-महत्त्व वर्णनरूप अ्रप्रधिक ) युगान्तकालप्रतिसंहृतात्मनो जगन्ति यस्यां सविकाशमासत। तनौ ममुस्तत्र न कैटभद्विषस्तपोधनाभ्यागमसम्भवा मुदः ॥५४३॥ (४९ 'प्रत्यनीक' अलंकार) (१९६) प्रतिपक्षमशक्तेन प्रतिकर्तु तिरस्क्रियम् । या तदीयस्य तत्स्तुत्यै प्रत्यनीकं तदुच्यते ॥१२९॥ न्यक्कृतिपरमपि विपक्षं साक्षान्निरसितुमशक्तेन केनापि यत् तमेव प्रतिपक्ष- मुत्कर्षयितुं तदाश्ितस्य तिरस्करणम् तदनीकप्रतिनिधितुल्यत्वात्प्रत्यनीकमभि- धीयते। यथाऽनीकेऽभियोज्ये तत्प्रतिनिधिभूतमपरं मूढतया केनचिदभियुज्यते तथेह प्रतियोगिनि विजेये तदीयोऽन्यो विजीयते इत्यर्थः। उदाहरणम्- त्वं विनिर्जितमनोभवरूपः सा च सुन्दर ! भवत्यनुरक्ता। पञ्भिर्युगपदेव शरैस्तां तापयत्यनुशयादिव कामः ॥४४४॥ 'युगान्त में समस्त जीव-जन्तु को अपने में आत्मसात् कर लेने वाले जिन कैटभारि भगवान् कृष्ण के शरीर में चौदहों भुवन समा जाया करते हैं उनके उसी शरीर में तपोधन नारद के स्वागत का आनन्द न समा सका !' [ यहां 'आधेय आनन्द के महत्व का जो वर्णन है उसमें चमत्कार है जिससे 'अधिक' अलंकार की रूप रेखा स्पष्ट हो रही है।] टिप्पणी-स्द्रट का 'अधिक' लक्षण है- 'यत्रान्योन्यविरुद्धं विरुद्धबलवत् क्रिया प्रसिद्धं वा। वस्तुद्दयमेकस्माजायत इति तन्भ्रवेदधिकम् ॥ यत्राधारे सुमहत्याधेयमवस्थितं तनीयोऽपि। अतिरिच्येत कथञ्चित्तद्धिकमपरं परिज्ञेयम् ॥' (काव्यालंकार ९.२६, २८) किन्तु काव्यप्रकाशकार ने इसमें से द्वितीय प्रकार के अधिक के लक्षण को ही 'अधिक' अलंकार का वस्तुतः स्वरूप विश्लेषण माना है। अनुवाद-'प्रत्यनीक' अलंकार उसे कहते हैं जिसमें वर्णन का विषय प्रतिपक्ष का तिरस्कार न होकर, क्योंकि उसका तिरस्कार असमर्थतावश नहीं किया जा सकता, प्रतिपक्ष के सहायक का तिरस्कार हुआ करता है जो अन्ततोगत्वा प्रतिपक्ष के उत्कर्ष का अवगमक हो जाता है। 'प्रत्यनीक' अलंकार का अभिप्राय है 'अनीक' (प्रतिपत्ष-सैन्य) का नहीं (क्योंकि अपकारक होने पर भी उसका सामना करना कठिन है) अपितु उसके प्रतिनिधिभूत, उस पर आश्रित अन्य विपक्ष का ऐसा तिरस्कार-वर्णन जो अन्त में अनीक-प्रतिपक्ष का ही उत्कर्षवर्धक हो। इसे 'प्रत्यनीक' इसलिये कहा करते हैं क्योंकि यहां प्रतियोगीशत्रु के पराजय के बदले उसके प्रतिनिधि का पराजय वैसे ही विवत्ित रहा करता है जैसे यदि किसी को प्रतिपक्ष-सैन्य से भिड़ना हो तो, असमर्थता के कारण, उससे न भिड़ कर उससे सम्बद्ध उसके प्रतिनिधिभूत सैन्य से ही भिड़ जाय। उदाहरण के लिये :- 'हे सुन्दर युवक! तुम तो रहे मदन को भी अपने सौन्दर्य से पराजित करने वाले और तुम्हारी वह (प्रेयसी) हुई तुम्हीं में प्रेम-पगी, तभी तो ऐसा है कि मदन द्वेषवश अपने पांचों बाणों से एक साथ उसे पीडित किया करे।'

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४३२ काव्यप्रकाश: 3M यथा वा- यस्य किश्च्च्िदपकर्त्तुमक्षमः कायनिग्रहगृहीतविग्रहः। कान्तवक्त्रसदशाकृतिं कृती राहुरिन्दुमधुनाऽपि बाधते ॥ ५४५॥ इन्दोरत्र तदीयता सम्बन्धिसम्बन्धात्। (५० 'मीलित' अलंकार) (१९७) समेन लक्ष्मणा वस्तु वस्तुना यन्निगूद्यते। निजेनागन्तुना वापि तन्मीलितमिति स्मृतम् ॥१३०॥ सहजमागन्तुकं वा किमपि साधारणं यत् लक्षणं तद्द्वारेण यत्किंचित् केन- चिद्वस्तु वस्तुस्थित्यव बलीयस्तया तिरोधीयते तन्मीलितमिति द्विघा स्मरन्ति, क्रमेणोदाहरणम्- अपाङ्गतरले दसौ मघुरवक्रवर्णा गिरो विलासभरमन्थरा गतिरतीव कान्तं मुखम्। इति स्फुरितमङ्गके मृगद्दशः स्वतो लीलया तदत्र न मदोदयः कृतपदोऽपि संलक्ष्यते ॥ ५४६ ॥ [ यहां 'प्रत्यनीक' अलंकार इसलिए है क्योंकि काम के द्वारा अपने विजयी सुन्दर युवक को पीडा पहुँचाने के बदले उसकी प्रेयसी को पीडित करने का वर्णन किया जा रहा है।] अथवा- 'शिरश्छेद के कारण वैरभाव रखनेवाला राहु वैर के प्रतिशोध में ऐसा तत्पर है कि भगवान् कृष्ण का तो कुछ नहीं बिगाड़ सकता, किन्तु उनके सुन्दर मुख के समान सुन्दर चन्द्रमा को अभी भी पकड़ने में लगा ही रहा करता है।' (शिशुपालवध १४ सग) यहां (प्रत्यनीक है क्योंकि राहु के द्वारा कृष्ण का कुछ न बिगाड़ सकने पर चन्द्रमा के बिगाड़ने का जो वर्णन है वह इसलिये है क्योंकि) चन्द्रमा कृष्ण का सम्बन्धी है और ऐसा इसलिए क्योंकि कृष्ण के मुख के साथ चन्द्रमा का सादृश्यात्मक सम्बन्ध विवत्ित है। टिप्पणी-यद्यपि काव्यप्रकाश का प्रत्यनीकस्वरूप रुद्रट के काव्यालक्कार (८.९२) के इस प्रत्यनीक-निरूपण- 'वक्तमुपमेयमुत्तममुपमानंतजिगीपया यत्र। तस्य विरोधीत्युक्त्वा कल्प्येत प्रत्यनीकंतत्।।' के अनुसार है किन्तु इसका विवेचन रुय्यक के प्रत्यनीक-लक्षण- 'प्रतिपक्षतिरस्काराशक्तौ तदीयस्य तिरस्कारः प्रत्यनीकम्। (अलंकारसर्वस्व पृष्ठ २०६) के आधार पर किया गया है। अनुवाद-'मीलित' वह अलक्कार है जिसमें किसी के द्वारा किसी वस्तु का, किसी दूसरी वस्तु से, किसी स्वाभाविक अथवा आकस्मिक चिह्न के कारण तिरोधान अथवा निगूहन (छिपाना) वर्णित हो। यहां 'समेन लक्ष्मणा' का तात्पर्य है 'साधारण लक्षण अथवा चिह्न द्वारा' का। निजे- नागन्तुना वा' का अभिप्राय है (इस चिह्न के) 'सहज-स्वाभाविक होने अथवा आगन्तुक- नैमित्तिक होने' का। इस प्रकार जहां किसी के द्वारा, किसी वस्तु से, उसके स्वभावतः प्रबल होने के कारण, किसी दूसरी वस्तु का तिरोहित किया जाना वर्णित हो तो वहां जो अलंकार है वह 'मीलित' अलंकार है जो कि दो प्रकार का हो सकता है। (१) स्वाभाविक चिह्न द्वारा निगूहन में और (२) नैमित्तिक चिह्न द्वारा तिरोधान में। जैसे कि क्रमशः- 'इस मृगनयनी सुन्दरी के अंग-प्रत्यङ्ग में जब मदन-लीला रवयं स्फुरित हो रही है क्योंकि आंखें हैं बहुत अधिक चंचल, बोली है मीठी और बांकपन लिये, चाल है विलास के

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दशम उल्लास: ४३३

व्येतस्य दर्शेनात्। अत्र दक्तरलतादिकमङ्गस्य लिङ्गं स्वाभातरिकं साधारणं च महोदयेन तत्रा

ये कन्दरासु निवसन्ति सदा हिमाद्रे- स्त्वत्पातशङ्कितधियो विवशा द्विषस्ते। अप्यङ्गमुत्पुलकमुद्वहतां सकम्पं तेषामहो बत भियां न बुधोऽप्यभिज्ञः॥ ५४७॥ अत्र तु सामर्थ्यादवसितस्य शैत्यस्य आगन्तुकत्वात्तत्प्रभवयोरपि कम्पपुल- कयोस्ताद्रप्यं समानता च भयेष्वपि तयोरुपलक्षितत्वात्। (५१ 'एकावली' अलंकार) (१९८) स्थाप्यतेऽपोह्यते वापि यथापूर्व परं परम्। विशेषणतया यत्र वस्तु सैकावली द्विधा॥ १३१ ।। पूर्व पूर्व प्रति यथोत्तरस्य वस्तुनो वीप्सया विशेषणभावेन यत्स्थापनं निषेधो वा सम्भवति सा द्विधा बुधैरेकावली भण्यते। क्रमेणोदाहरणम्- ( १ विशेषणरूप से विधान में ) पुराणि यस्यां सवराङ्गनानि वराङ्गना रूपपुरस्कृताङ्गथः। रूपं समुन्मीलित सद्विलासमस्त्र विलासा: कुसुमायुधस्य॥ ५४८॥

भार से धीमी-धीमी और मुख इतना मनोहर लग रहा है तब भला मदपान, यदि वह किया भी गया हो तो पता कैसे चल पाय !' यहाँ आँखों की चज्जलता आदि के द्वारा जो कि नायिका के शरीर के स्वाभाविक चिह्न हैं, मदपानजन्य इन्हीं चिह्नों का निगूहन स्पष्टतया प्रतीत हो रहा है। 'राजन् ! यह कैसे दुःख की बात है कि आपके उन शत्रुओं का, जो आपके आक्रमण से घबराये, रोमाज्जित और कम्पित शरीर लिये हिमालय की खोहों में रहते आ रहे हैं, आपसे डरते रहना बुद्धिमानों की भी बुद्धि में नहीं आया करता !' यहाँ (शत्रुओं के) भयजनित जिन कम्प और रोमाञ्ज के निगूहन का वर्णन है उसके कारण हैं हिमालय की ठंढ से होने वाले और इसलिये आगन्तुक (नैमित्तिक) कस्प और रोमाज़। टिप्पणी-रुद्रट का जो 'पिहित' नामक अलक्वार है वही काव्यप्रकाशकार का 'मीलित' है। रुद्रट का निर्दिष्ट पिहित-स्वरूप यह है- 'यत्रातिप्रबलतया गुणः समानाधिकरणमसमानम्। अर्थान्तरं पिदध्यादाविर्भूतमपि तत् पिहितम् ॥I' ( काव्यालक्कार ९. ५०) और यही मम्मट के उपर्युक्त मीलित-लक्षण में उन्मीलित किया हुआ है जिनमें रुय्यक की भी सम्मति है जैसा कि अलक्कारसर्वस्व (पृष्ठ २१०) की मीलित-परिभाषा-'वस्तुना चस्त्वन्तर- निगूहनं मीलितम्' से प्रतीत होना है। अनुवाद-'एकावली' वह अलङ्कार है जिसमें पूर्व-पूर्व वणित वस्तु के लिये उत्तरोत्तर वणित वस्तु का विशेषरूप से या तो विधान हो या निषेध हो। जहाँ पूर्व-पूर्व (वर्णित) के प्रति उत्तरोत्तर (वर्णित) वस्तु का अनेक बार विशेषण रूप से या तो विधान किया जाय या प्रतिषेध किया जाय उसे काव्यशास्त्र के जाननेवाले लोग 'एकावली' अलद्कार कहा करते हैं। जैसे कि क्रमशः- '(उज्जयिनी वह थी) जहाँ के अन्तःपुर थे सुन्दरियों से भरे, सुन्दरियाँ थीं रूप से 35 २६ का०

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४३४ काव्यप्रकाश:

( २ विशेषणरूप से निषेध में ) न तज्जलं यन्न सुचारुपङ्कजं न पङ्कजं तद्यदलीनषट्पदम्। न षट्पदोऽसौ कलगुञ्चितो न यो न गुज्ञितं तन्न जहार यन्मनः ॥५४६॥ पूर्वत्र पुराणां वराङ्गनाः, तासामङ्गविशेषणमुखेन रूपम्, तस्य विलासा:, तेषामप्यस्त्रमित्यमुना क्रमेण विरोषणं विधीयते उत्तरत्र प्रतिषेधेऽप्येवं योज्यम्। (५२ स्मरण अलंकार) (१९९) यथाऽनुभवमर्थस्य दृष्टे तत्सदृशे स्मृतिः। स्मरणम्- यः पदार्थ:केनचिदाकारेण नियतः यदा कदाचिदनुभूतोऽभूत् स कालान्तरे स्मृतिप्रतिबोधाधायिनि तत्समाने वस्तुनि दृष्टे सति यत्तथैव स्मर्यते तन्गवत्स्मरणम्। उदाहरणम्- (इस जन्म में अरप्रनुभूत अर्थ की स्मृति के वर्णन में 'स्मरण' अलंकार) निम्ननाभिकुहरेषु यदम्भः प्लावितं चलदशां लहरीभिः। तद्गवैः कुहरुतैः सुरनार्यः स्मारिताः सुरतकण्ठरुतानाम् ॥५५०॥ विभूषित अङ्ग-प्रत्यङ्ग वाली, उनका रूप था विलास से मनोहर और उनके विलास थे काम के साक्षात् अस्त्र!' (नवसाहसाङ्कचरित १म सर्ग) '( यह शरद् ऋतु है) जिसमें ऐसा कोई जल नहीं जहाँ सुन्दर कमल न हों, ऐसा कोई कमल नहीं जिस पर भ्रमर न बैठ रहे हों, ऐसा कोई भ्रमर नहीं जो मधुर गुआार न कर रहा हो और ऐसी कोई गुआ्जार नहीं जो मनोमोहक न हो।' (भट्टिकाव्य सर्गं २ ) पूर्वोक्त (पुराणि यस्यां इत्यादि) उदाहरण में अन्तःपुर के लिये सुन्दरियों, सुन्दरियों के अंग के लिये रूप, रूप के लिये विलास और विलास के लिये कामायुध को क्रमशः 帝 信 新 市 विशेषण रूप से विहित किया गया है। और उपरोक्त (न तज्जलम् आदि) उदाहरण में, जहाँ निषेध का अभिप्राय स्पष्ट है, क्रमशः पूर्ववर्णित वस्तुओं में उचरवर्णित वस्तुओं को विशेषणरूप से ही पिरोया सा गया है। टिप्पणी-'एकावली' का अभिप्राय है 'एकलड़ की माला' का। जिस प्रकार 'एकलड़ी' में पहले पिरोये मोती की सुन्दरता बाद में पिरोये मोती के दानों से बढ़ायी जाया करती है उसी प्रकार 'एकावली' रूप वाच्यालङ्कार में भी पहले वर्णित वस्तु को बाद में वर्णित वस्तु से विशिष्ट बनाया जाया करता है। 'एकावली' अलक्कार में उत्तरोत्तर वर्णित वस्तु का पूर्व पूर्व वणित वस्तु के लिये 'विशेषण' रूप से रहने का अभिप्राय है उसका (उत्तरोत्तर वर्गित वस्तु का) उसके (पूर्व-पूर्व वर्णित वस्तु) के लिये उत्कर्षवर्धक प्रतीत होना, क्योंकि विशेषण का अभिप्राय है वह पदार्थ जिसके सम्बन्ध से स्वरूपतः अवगत किसी पदार्थ में वैशिष्टथ की प्रतीत हुआ करे। 'एकावली' में 'मालोपमा' की भ्रान्ति नहीं हो सकती क्योंकि जहाँ 'मालोपमा' में एक उपमेय के अनेक उपमान मालारूप से पिरोये रहते हैं वहाँ 'एकावली' में 'औपम्य' के अभिप्राय का अभाव रहा करता है। अनुवाद-'स्मरण' वह अलङ्कार है जिसे किसी पूर्वानुभूत वस्तु की, उसके समान किसी दूसरी वस्तु के अनुभव से उद्बुद्ध स्मृति (का वर्णन) कहा करते हैं। 'स्मरण' अलंकार में जो बात है वह है किसी विशिष्ट आकार की पूर्वानुभूत वस्तु की ऐसी स्मृति जो कभी उसके समान तथा उसकी स्मृति के प्रतिबोधक (उद्बोधक) किसी दूसरी वस्तु के दर्शन से जग उठे। उदाहरण के लिये :- 'चज्जलाक्षी अप्सराओं के समान सुन्दर नारियों के गम्भीर नाभिकुहर में (जलक्रीडा

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यथा वा- (पूर्वजन्मानुभूत वस्तु की स्मृति के वर्णन में स्मरण अलद्कार) करजुअगहिअजसोआत्थणमुहविणिवेसिआहरपुडस्स। संभरिअपक्राजण्णस्स णमह कण्हस्स रोमाव्जम्॥५४१॥ (करयुगगृहीतयशोदास्तनमुखविनिवेशिताधरपुटस्य। संस्मृतपाश्चजन्यस्य नमत कृष्णस्य रोमाश्चम् ॥५५१॥ ( ५३ 'भ्रान्तिमान्' अलंकार ) (२००) भ्रान्तिमानन्यसंवित्तत्तुल्यदर्शने ॥ १३२ ॥ तदिति अन्यत् अप्राकरणिकं निर्दिश्यते। तेन समानम् अर्थादिह प्राकरणि- कम् आश्रीयते। तस्य तथाविघस्य दृष्टौ सत्यां यत् अप्राकरणिकतया संवेदनं स भ्रान्तिमान्। न चष रूपकं प्रथमातिशयोक्तिवा तत्र वस्तुतो भ्रमस्याभावात् इह च अर्थानुगमनेन संज्ञायाः प्रवृत्तेः तस्य स्पष्टमेव प्रतिपन्नत्वात्।

के समय) लहरियों ने जो जल उछ्ाल-उछ्याल कर डाला उससे उत्पन्न ध्वनि उन्हें (नारियों को ) रतिक्रीड़ा के रतिकूजन की याद दिलाने लगी।' [ यहाँ जो 'स्मरण' अलंकार है वह इस जन्म में अनुभूत वस्तु की, उसके समान वस्तु के दर्शन से उत्पन्न स्मृति के वर्णन में है।] और जैसे कि :- 'दोनों हाथों से पकड़े हुये यशोदा माता के स्तनों पर (दुग्धपान में) अपने अधर- पुटों को सटाये तथा उनके द्वारा पाञ्जजन्य का स्मरण करते हुये भगवान् कृष्ण के रोमाजों को (आप लोग) अपने मन में बसा लें।' [यहां बालकृष्ण की, दुग्धपान के समय, यशोदा के स्तनों के स्पर्श से, पूर्वजन्मानु- भूत पाञ्चजन्य की स्मृति के वर्णन में 'स्मरणालंकार' का सौन्दर्य स्पष्ट प्रतीत हो रहा है।] टिप्पणी-काव्यप्रकाश के स्मरण-लक्षण पर रुय्यक की इस त्मरण-परिभाषा अर्थात- 'वस्तुविज्ञेषं दृष्टा प्रतिपत्ता स्मरति यत्र तत्सदशम्। कालान्तरानुभूतं वस्त्वन्तरमित्यद: म्मरणम् ।' ( काव्यालङ्गार ८.१०९) का प्रभाव स्पष्ट है। कवल स्मृतिमात्र में 'स्मरण' अलक्कार नहां। यह तो पूर्वानुभूत वस्तु की ऐसी स्मृति में संभव है जिसमें प्रत्यक्ष दृष्ट वस्तु के साथ पूर्वानुभूत वस्तु का सादृश्य प्रतीत हुआ करता है। इसे 'अनुमान' नहीं माना जा सकता क्योंकि यहाँ अनुभव और स्मृति के विषयों में किसी प्रकार को व्याप्ति अथवा अविनाभाव की कोई विवक्षा नहीं रहा करती। अनुवाद-'भ्रान्तिमान्' वह अलंकार है जिसमें प्राकरणिक के दर्शन में, अप्राकरणिक के साथ उसके सादृश्य के कारण, अप्नाकरणिक प्रतीति का निरूपण किया जाय। यहां 'तत्तल्यदर्शने' में 'तत्' के द्वारा 'अन्यत्' 'दूसरे' अर्थात् 'अप्राकरणिक' का निर्देश किया गया है। अप्राकरणिक के तुल्य अथवा समान प्राकरणिक ही हो सकता है और इसीलिये यहाँ वही अभिप्रेत है। इस प्रकार अप्राकरणिक के समान प्राकरणिक के दर्शन में प्राकरणिक का जो अप्राकरणिक के रूप में निश्चयात्मक ज्ञान है उसी में 'भ्रन्तिमान्' अलक्कार की रूप-रेखा रहा करती है। 'भ्रान्तिमान्' में 'रूपक'का अथवा 'अतिशयोक्ति' (निगीर्याध्यवसानरूपा अतिशयोक्ति) का त्रम नहीं होना चाहिये क्योंकि जहाँ स्वारसिक भ्रम रूपक अथवा अतिशयोकि में नहीं रहा करता (क्योंकि रूपक अथवा अतिशयोक्ति में जो भ्रम सम्भव है वह व्यङ्गय- काल्पनिक है न कि स्वाभाविक अथवा अनाहार्य) वहाँ इस 'भ्रान्तिमान्' में इसकी स्पष्ट

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४३६ काव्यप्रकाश: m उदाहर णम्- कपाले मार्जार: पय इति करॉल्लेढि शशिन स्तरुच्छिद्रप्रोतान् बिसमिति करी संकलयति। रतान्ते तल्पस्थान् हरति वनिताऽयंशुकमिति प्रभामत्तश्चन्द्रो जर्गाददमहो विप्लवर्यात ॥ ५५२॥ (५४ 'प्रतीप' अलंकार ) (२०१) आक्षेप उपमानस्य प्रतीपमुपमेयता । तस्यैव यदि वा कल्प्या तिरस्कारनिबन्धनम् ॥ १३३ ॥ (प्रतीप के दो भेद) अस्य धुरं सुतरामुपमेयमेव वोदुं प्रौढमिति कैमर्थ्येन यदुपमानमाक्षिप्यते यदपि तस्यवोपमानतया प्रसिद्धस्य उपमानान्तरविवक्षयाऽनादरार्थमुपमेय- भाव: कल्प्यते तदुपमेयस्योपमानप्रतिकूलवर्तित्वादुभयरूपं प्रतीपम् ! प्रतीति हुआ करती है क्योंकि 'भ्रान्तिमान्' इस नाम में ही, इस शब्द के अर्थ के साथ, भ्रम (स्वारसिक भ्रान्ति) का सम्बन्ध निविंवादरूप से सिद्ध है। उदाहरण के लिये :- 'कितने आश्चर्य की बात है कि अपनी कान्ति के अभिमान में चूर यह चन्द्रमा सारे संसार को भ्रान्त बनाते दिखाई दे रहा है-कहीं तो बिल्ियां खप्परों में पड़ी चांदनी को दूध मान कर चाट रही हैं, कहीं हाथी पेढ़ों की झुरमुट में छनी चांदनी को कमल नाल समझ रहे हैं और कहीं कोई रमणी पलंग पर लोटती चांदनी को रतिकीड़ा के बाद अपना शुभ्रवस्त्र जान उठाने को तैयार है।' [ यहां (प्रस्तुत) चन्द्रकिरणों में, (अप्रस्तुत) दुग्ध आदि के साथ सादृश्य होने से जो अनुभव हो रहा है वह उन (किरणों) का नहीं, अपितु दुग्ध आदि (अप्रस्तुतवस्तुओं) का और इस प्रकार यहां सादृश्यज्ञान से भ्रन्ति विवच्षित है जिसमें 'भ्रान्तिमान्' अलंकार स्पष्ट है। टिप्पणी-भ्रान्तिमान्' अलंकार केवल भ्रान्ति में नहीं अपितु सादृश्चप्रयुक्त्त ्रान्ति में है। और 'सादृश्यप्रयुक्त भ्रान्ति' भी यहाँ ऐसी होनी चाहिये जिसमें कवि-प्रतिभा का हाथ हो। इसी लिये अलंकार-सर्वस्वकार का कथन है-'सादृश्यहेतुकापि भ्रान्तिविंच्छित्यर्थ कविप्रतिभोत्था- पितव गृह्यते।' अनुवाद-'प्रतीप' वह अलद्कार है जिसमें या तो उपमान का निषेध अथवा निन्दन वर्णित हो या उपमान का, उसे अनादृत करने के कारण, उपमेयरूप से वर्णन किया जाय। (प्रतीप का पहला प्रकार वह है। जिसे उपमान का आक्षेप कहते हैं।) उपमान के आक्षेप से अभिप्राय है उपमान के निष्प्रयोजन होने से और उपमान की निच्प्रयोजनता इसीलिये मानी जा सकती है कि उसका जो भी प्रयोजन हो वह उपमेय के द्वारा ही सम्पन्न समझ लिया जाय। (प्रतीप का दूसरा प्रकार वह है जिसे उपमान का, अनादर करने के कारण उपमेय रूपसे वर्णन करते हैं) उपमान की उपमेय के रूप में कल्पना तभी हो सकती है जब कि लोकप्रसिद्ध (चन्द्रादिरूप) उपमान का तिरस्कार अभिप्रेत हो और यह तिरस्कार जिस रूप से संभव है वह है (चन्द्रादिरूप) उपमान के लिये ही एक अन्य उपमान अर्थात वस्तुतः (मुखादिरूप) उपमेय की उद्भावना। ये ही दोनों 'प्रतीप' के प्रकार हैं कयोंकि 'प्रतीप' का अभिप्राय है उपमेय के उपमान से प्रतिकूल हरने का।

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दशम उल्लास: ४३७

क्रमेणोदाहरणम्- ( १ उपमेय के रहते हुये उपमान के वैफल्य में 'प्रतीप') लावण्यौकति सप्रतापगरिमण्यग्रेसरे त्यागिनां देव ! त्वय्यवनीभरक्षमभुजे निष्पादिते वेघसा। इन्दुः किं घटितः किमेष विहितः पूषा किमुत्पादितं चिन्तारत्नमदो मुधैव किममी सृषाः कुलक््मामृतः ॥५५३॥ ( २ उनमान के तिरस्कार में 'प्रतीप' ) ए एहि दाव सुन्दरि कण्णं दाऊण सुणसु वअणिज्जम्। तुडफ मुहेण किसोअरि चन्दो उअमिज्जइ जणेण ॥ ५४४ ॥ (थि एहि तावत्सुन्दरिं कर्ण दत्त्वा शणुष्व वचनीयम् । तव मखेन कुशोदरि ! चन्द्र उपमीयते जनेन ॥ ५५४ ॥) अत्र मुखेनोपमीयमानस्य शशिनः स्वल्पतरगुणत्वादुपमित्यनिष्पत्या वअ- णिज्जमिति वचनीयपदाभिव्यङग्यस्तिरस्कारः । ( उपमान के एक और प्रकार के तिरस्कार में 'प्रतीप') क्वचित्तु निष्पन्नैवोपमिति क्रियाऽनादरनिबन्धनम्। यथा- गरवमसंवाह्यमिमं लोचनयुगलेन किं वहमि मुग्धे !। सन्तीहशानि दिशि दिशि सरःसु ननु नौलनलिनानि ॥५५५॥ इहोपसेयीकरणमेवोत्पलानामनादरः। अनयेव रीत्या यदसामान्यगुणया-

हुसके क्रमशः उदारण ये हैं :- 'राजन् ! जब कि विधाता ने सौन्दर्य के निधान, महनीय प्रतापशाली, महादानी किंवा पृथिवी-रक्षण में समर्थ भुजदण्ड वाले आपको ही रच दिया तब चन्द्रमा को क्यों रचा ? सूर्य को क्यों बनाया? चिन्तामणि की क्यों सृष्टि की? और कुलाचलों की भी तो व्यर्थ ही गढ़ डाला !' [ यहाँ उपमान के आत्तेप में उसके अपकर्ष का इसलिये प्रतिपादन है जिससे

स्पष्ट हो जाय। ] वण्य राजरूप उपमेय में सभी आतित उपमानों के गुणों के समन्वय का अभिप्राय

'अरी सुन्दरी! अरी कृशोदरी! इधर तो आ और कान दे अपनी इस निन्दा पर कि लोग अब तेरे मुख को चन्द्रमा के समान कहने लगे!' यहां जुख और चन्द्र में औपम्य की निष्पत्ति इसलिये नहीं दिखाई देती क्योंकि (उपनेयभून ) सुख की अपेक्षा चन्द्ररूप उपमान सें (सौन्दर्यादि) गुणों की कमी है। इस औपम्य की अनिप्पत्ति का ही अभिप्राय 'वअगिज्जम्' (वचनीयम्) इस पद के द्वारा प्रकाशित किया जा रहा है जिससे उपमान का तिरस्कार हो रहा है। कहीं (ग्रतीप' में ही) उपमान का तिरस्कार ऐसा भी हो सकता है जिसमें औपम्य की निष्पत्ति ही कारण हो। उदाहरण के लिये :- 'अरी मुग्धे! तुझे अपनी आँखों का इतना अधिक अभिमान क्यों, जब कि, जिघर देखो उधर ही, सरोवरों में ऐसे अनेकों नीलकमल विराज रहे हैं।' यहां भी उत्पलरूप उपमान का ही अनादर अभिप्रेत है और वह इसलिये है क्योंकि उसे उपमेयरूप से उपनिबद्ध किया जा रहा है। (यहां सौन्दर्य गर्वित नेत्र अधिक

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काव्यप्रकाश:

गात् नोपमानभावमपि अनुभूतपूर्वि तस्य तत्कल्पनायामपि भवति प्रतीपमिति प्रत्येतव्यम्। यथा- अहमेव गुरु: सुदारुणानामिति हालाहल तात मास्म दृप्यः । ननु सन्ति भवाद्ृशानि भूयो भुवनेऽस्मिन् वचनानि दुर्जनानाम्॥५५६॥ अत्र हालाहलस्योपमानत्वमसम्भाव्यमेवोपनिबद्धम्। (५५ सामान्य अलंकार ) (२०२) प्रस्तुतस्य यदन्येन गुणसाम्यविवक्षया । ऐकात्म्यं वध्यते योगात्तत्सामान्यमिति स्मृतम् ॥१३४॥ अतादृशमपि तादृशतया विवक्षितुं यत् अप्रस्तुतार्थेन संपृक्तमपरित्यक्तनिज- गुणमेव तदेकात्मतया निबध्यते तत्समानगुणनिबन्धनात्सामान्यम्। गुणशाली और उत्पल न्यून गुणशाली बताये जा रहे हैं। जो उपमेय होता है वह उपमान से इसलिये न्यून होता है क्योंकि उपमान से ही उसका सादृश्य सिद्ध किया जाया करता है। यहां प्रसिद्ध सौन्दर्य नीलकमलों का ही नायिका के नयनों से औपम्य सिद्ध किया जा रहा है जिसमें उपमा-निष्पत्ति तो अवश्य है किन्तु लोक-प्रसिद्ध उपमान नीलकमलों का तिरस्कार ही स्पष्ट विवत्ित है)। इसी तरह प्रतीप में एक और भी प्रकार संभव है जिसमें किसी वस्तु को उसके असाधारणगुण-सम्पन्न होने के कारण, किसी उपमेय की तुलना में, उपमान वस्तुतः न बन सकने पर भी, उपमान के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाय। जैसे कि :- 'अरे हालाहल (विष)! तेरा यह कैसा अभिमान कि संसार की दारुग वस्तुओं में तू ही महादारुण है! अरे इस संसार से तो तुझ सरीखे खलवचनों की कोई कमी ही नहीं।' यहां दारुणता में निरुपम हालाहल का खलवचनों के उपमान के रूप में कथन किया गया है। जिससे अनुपम वस्तु की उपमानता के उपन्यास में एक अन्य ही प्रतीप-प्रकार दिखायी दे रहा है)। टिप्पणी-काव्यप्रकाश का 'प्रतीप'-निरूपण अलंकारसर्वस्त्र के 'प्रतीप'-निरूपण का अनुसरण करता है। 'प्रतीद' में 'व्यतिरेक' का भ्रम नहीं हो सकता क्योंकि जहां 'प्रतीप' का अभिप्राय उपमान का 'अपकर्ष' है वहां 'व्यतिरेक' का अभिप्राय 'उपमेय' का आधिक्य है। यहां 'उपमेयोपभा' की भी भ्रान्ति नहीं हो सकती क्योंकि जहां 'उपमेयोपमा' में परस्पर उपमानोपमेय- भाव की प्रतोति अपेक्षित है वहां 'प्रतीप' में उपमान की उपमेय रूप से कल्पना इसलिये है कि इसके द्वारा उपमान की अपकृष्टता का बोध हो। अनुवाद-'सामान्य' अलंकार वह है जिसमें प्रस्तुत और अप्रस्तुत पदार्थ के योग में, दोनों के गुण-साम्य के प्रतिपादन के लिये, दोनों की एकरूपता का प्रतिपादन किया जाय। यहां 'गुण-साम्यविवत्रया' में गुणसाम्य की 'विवत्ता' का जो अभिप्राय है वह है अ्रस्तुत वस्तु की अप्रस्तुत वस्तु से वस्तुतः समानता न होनेपर भी समानता का प्रतिपादन करना। 'प्रस्तुतस्य यदन्येन' में 'अन्य' का तात्पर्य है अप्रस्तुत पदार्थ का। इस प्रकार 'योगादैकात्म्यं बध्यते' का अर्थ है अप्रस्तुत वस्तु से सम्बद्ध तथा अपने गुणों से युक्त प्रस्तुत वस्तु का ऐसा प्रतिपादन जिसमें वह अप्रस्तुत वस्तुसे पृथक् न प्रतीत हो! इस प्रकार 'सामान्य' को 'सामान्य' इसलिये कहते हैं क्योंकि यहां समानगुणसम्बन्ध की विवचा रहा करती है। जैसे कि :-

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दशम उल्लास: ४३६ 3 VAN उदाहरणम- मलयजरसविलिप्ततनवो नवहारलताविभूषिताः। सिततरदन्तपत्रकृतवक्त्ररुचो रुचिरामलांशुकाः ॥५५६॥ शशभृति विततधाम्नि धवलयति धरामविभाव्यतां गताः । प्रियवसति प्रयान्ति सुखमेव निरस्तभियोऽभिसारिकाः॥ ४५७॥ BR

तत्र प्रस्तुततदन्ययोरन्यूनानतिरिक्ततया निबद्धं धत्रलत्वमेकात्मताहेतुः अत एव पृथग्भावेन न तयोरुपलक्षणम्। यथा वा- वेत्रत्वचा तुल्यरुचां वधूनां कर्णाग्रतो गण्डतलागतानि। भृङ्गा: सहेलं र्याद नापतिष्यन् कोऽवेदर्रिष्यन्नवचम्पकानि ॥ ५५८॥ अत्र निमित्तान्तरजनिताऽपि नानात्वप्रतीतिः प्रथमप्रतिपन्नमभेदं न व्युद- सितुमुत्सहते प्रतीतत्वात्तस्य प्रतीतेञ्च् बाघायोगात। (५६ 'विशेष' अलंकार) 6 (२०३) विना प्रसिद्धमाधारमाधेयस्य व्यवस्थितिः । एकात्मा युगपद्वृत्तिरेकस्यानेकगोचरा ॥ १३५॥ 'चारों ओर चांदनी विखेरता हुआ चाँद जब सारी पृथिवी को धवलता में डुबो रहा है तब चन्दनचर्चित शरीर वाली, मोती की माला से अलंकृत, शुभ्र कर्णाभरण से बढ़ती मुख-कान्ति वाली और स्वच्छ सुन्दर परिधान से सुशोभित अभिसारिकायें भला कैसे पहचानी जाँय ? और क्योंकर न निडर हो अपने प्रिय-जनों के घरों में शान्तिपूर्वक पहुँच जाँय !' यहाँ प्रस्तुत अभिसारिका और अप्रस्तुत चांदनी में धवलता रूप गुण की ऐसी सम- भावरूप स्थिति का वर्णन है, जिससे इन दोनों में एकरूपता प्रतीत हो रही है और इन्हें पृथक-पृथक् पहचानना कठिन हो रहा है। अथवा जैसे कि- 'यदि भौंरे झूम-झूम कर न मंडराते तब भला वेतसवल्क (बेंत की छाल) सरीखी कान्ति वाली बधुओं के कानों से कपोलफलक तक झूलती (कर्णाभरणरूप) चम्पा की कलियों को कोई केसे पहचान पाता !' यहाँ भी 'सामान्यालंकार' ही है क्योंकि प्रस्तुत कपोलफलक और अप्रस्तुत चम्पक- कोरक की पूर्वानुभूत एकरूपता प्रतीत हो रही है जिसे दूर करना अ्रमर-पातरूपी निमित्त से उत्पन्न इन दोनों की पार्थक्य-प्रतीति के लिये भी संभव नहीं हो रहा है क्योंकि एक- रूपता की प्रतीति जब उत्पन्न हो गई तो उसकी अनुत्पत्ति की संभावना कहाँ ! टिप्पणी-'सामान्य' में तो अनुभूत एकरूपता की प्रतीति विवक्षित है और 'भ्रान्तिमान्' में उस एकरूपता की प्रतीति, जो स्मृति का विषय हो। यहाँ 'रूपक' की मी संभावना नहीं क्योंकि 'रूपक' में तो उपमेय की उपमानरूप से प्रतीति हुआ करती है और यहां उपमेय और उपमान की एक रूप से प्रतीति। यहां 'तद्गुण' का भी संदेह नहीं क्योंकि 'तदगुण' अलक्कार में उपमेय अपने गुणों का परित्याग करने के कारण उपमान के गुणों को ग्रहण करता है और यहाँ उपमेय और उपमान अपने गुणों को बिना छोड़े ही गुण साम्य की दृष्टि से एकरूप प्रतीन हुआ करने हैं। अनुवाद-'विशेष' वह अलंकार है जिसमें (१)बिना लोकप्रसिद्ध आधार के किसी आधेय वस्तु की अवस्थिति प्रतिपादित की जाय, (२) एक वस्तु की अनेक वस्तुओं में, एक ही समय, एकरूप की वृत्ति अथवा स्थिति का वर्णन किया जाय और (३) एक कर्ता की,

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४४० काव्यप्रकाश:

अन्यत्ग्रकुर्वतः कार्यमशक्यस्यान्यवस्तुनः । तथैव करणं चेति विशेषस्त्रिविध: स्तमृः ॥ १३६॥ ('विशेष' के तीन भेद } प्रसिद्धाधारपरिहारेण यत् आधेयस्य विशिष्टा स्थितिरभिधीयते स प्रथमो विशेषः । यथा- दिवमप्युपयातानामाकल्पमनल्पगुणगणा येषाम्। रमयन्ति जगन्ति गिरः कथमिह कवयो न ते वन्दाः ॥४५६॥ एकमपि वस्तु यत् एकेनैव स्वभावेन युगपदनेकत्र वर्तते स द्वितीयः । यथा- सा वसइ तुब्फ हिअए सा च्चिअ अच्छीसु सा अ वअणोसु। अह्मारिसाण सुन्दर ओआसो कत्थ पावाणम् ॥ ५६०॥ (सा वसति तव हृदये सैवाक्षिषु स च वचनेषु। अरस्मादृशीनां सुन्दर अवकाशः कुत्र पापानाम् ॥ ५६० ॥) यदपि किंचिद्रभसेन आरभमाणस्तेनैव यत्नेनाशक्यमपि कार्यान्तरमारभते सोऽपरो विशेष:। यथा- स्फुरदद्भुतरूपमुत्प्रतापञ्लनं त्वां सृजताऽनवद्यविद्यम्। विधिना समृजे नवो मनोभूभुवि सत्यं सविता बृहस्पतिश् ॥ ५६१ ॥ एक कार्य करते हुये ही, अन्य किसी अशक्य कार्य में, पूर्वकार्य की भाँति ही, क्षमता का अभिधान किया जाय। इस प्रकार 'विशेष' तीन रूपों वाला हुआ करता है। यहाँ प्रथम प्रकार का 'विशेष' तो वह है जिसमें किसी आधेय वस्तु की, उसके प्रसिद्ध आ्राधार के न होने पर भी, एक विशिष्ट स्थिति का वर्णन किया जाया करता है। जैसे कि :- 'दिवंगत भी वे कविगण जिनकी अनन्तगुणमयी कविता कल्पान्त तक सारे संसार को आनन्दित किया करती है, क्योंकर सबके समादर के पात्र न हों !' [ यहाँ कविरूप आधार के विना ही आधेयभूत कविता की अवस्थिति का वर्णन है जिसमें 'विशेष' का प्रथम भेद स्पष्ट प्रतीत हो रहा है।] दूसरे प्रकार का 'विशेष' वह है जिसमें एक ही वस्तु की, एक रूप से, अनेक स्थान पर, एक समय में ही अवस्थिति का प्रतिपादन किया जाय। जैसे कि :- 'अरे सुन्दर युवक! हम सरीखी अभागिनों के लिये तुम्हारे पास स्थान कहाँ जब कि वस वही (युवती) तुम्हारे हृदय में रहे, वही तुम्हारी आँखों में बसे और वही घिराजे तुग्हारी वाणी पर !' [यहाँ एक ही कामिनी की, एकरूप से, एक समय में ही, हृदय, नेत्र और वाणीरूप आधार पर अवस्थिति प्रतिपादित की जा रही है।] तीसरा 'विशेष'-प्रकार वह हुआ जिसमें त्वरावश किसी एक कार्य का करने वाला, एक ही प्रयत्नपूर्वक, किसी दूसरे अशक्य कार्य में भी हाथ डालते हुये वणित हो। उदाहरण के लिये- 'राजन् ! विस्मयजनक सौन्दर्य, जाउ्वल्यमान प्रतापानल किंवा विशुद्धविद्यासे विभू- पिन तुम्हें बना वाले विधाता ने इस संसार में एक नया कामदेव बना दिया एक अभूत- पूर्व सूर्य रच दिया और कर दिया उस बृहस्पति का निर्माण जो सचमुच अपूर्व है !'

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दशम उल्लास: ४४१

यथा वा- गृहिणी सचिवः सखी मिथः प्रियशिष्या ललिते कलाविधौ। करुणाविमुखेन मृत्युना हरता त्वां बत किं न मे हतम् ॥ ५६२॥ सर्वत्र एवंविधविषयेऽतिशयोक्तिरेव प्राणत्वेनावतिष्ठते तां विना प्रायेणा- लङ्कारत्वायोगात् अत एवोक्तम्- सेषा सर्वत्र वक्रोक्तिरनयार्ऽर्थो विभाव्यते यत्नोऽस्यां कविना कार्यः कोडलङ्कारोऽनया बिना ॥ इति। (५७ 'तद्गुण' अलंकार) (२०४) स्वमुत्सृज्य गुणं योगादत्युज्ज्वलगुणस्प यत् । वस्तु तद्गुणतामेति भण्यते स तु तद्गुण: ॥ १३७॥ [यहाँ प्रकृत राजनिर्माणरूप कार्य करने वाले विधाता के द्वारा, एक ही प्रयत्न से, अशक्यनिर्माण कामदेव आदि की सृष्टि के वर्गनों में 'विशेष' का तीसरा प्रकार र्पष्ट प्रतीत हो रहा है। ] अथवा यहाँ जैसे कि- 'ओह ! निटुर दैध ने तुझे (तुझ प्राणसमा इन्दुमती को) जय मुझसे छीन लिया तब सब कुछ-मेरी गृहिणी, मेरा सचिव, मेरी सखा, मेरी ललिनकलाविधि की प्रिय शिप्या-सभी कुछ तो छीन लिया !' २घुबश ८) [यहाँ भी इन्दुमती हरणरूप एक ही कार्य-रत मृत्यु के द्वारा, एक ही प्रयत्न में, सचिवादि हरणरूप अनेक अशक्य कार्यों का किया जाना प्रतिपादित है जिरुनें 'विशेष' का यही प्रकार स्पष्ट परिलत्ित हो रहा है।] यहाँ यह शंका कि आधार के अभाव में आधेय की अवस्थिति के प्रतिपादन और एक प्रयत्न में दो-दो कार्यों के करने के वर्णन में अलंकार कैसा जब कि धे बातें ही वस्तुतः बेतुकी हों, ठीक नहीं क्योंकि यहाँ जो बेतुकापन सा लग रहा है वह वस्तुतः श्रेतुकापन नहीं अपितु एक ऐसी उक्ति है जिसे अतिशय अथवा वैचित्र्यविशेष से की गयी उक्ति कहा करते हैं और वस्तुतः जहाँ कहीं भी ऐसा प्रसंग हो वहाँ बेतुकापन की बात नहीं अपितु ऐसे ही अतिशय के अभिधान की बात समझनी चाहिये जिनमें विचित्रना का प्राण अथवा रहस्य किया है और जिलके बिना प्रायः कोई भी अलंकार 'अलंकार' नहीं माना जा सकता। वस्तुतः इसीलिये ऐसा कहा जा चुका है :- 'यह सब अतिशय के द्वारा अभिधान जो कि सर्वत्र अलंकार-प्रसङ्गों में पाया जाता है वस्तुतः एक उत्ति-वेचित्य है और यही वह रहस्य है जिसके द्वारा कहीं भी अलंकारमयता लाया जाया करती है, जिससें कवियों को सतत प्रयत्नशील रहना पड़ता है और जिसके बिना 'अलंकार' नाम की कोई वस्तु नहीं दिसाई देती !' टिप्पणी-'काव्यप्रकाश' के विशेष' विवे न का बाधार कद्रट की गह 'विशेण'-परिमाषा है :- 'किञ्रिदवश्याधेयं यस्मिन्नभिधीयते निराधारम्। ताहयुपलभ्यमानंविेयोडसी विशेन इति। य त्रैकमने कस्मिन्नाधारे वस्तु विद्यमानतया। युगपवभिधीयतेSसा रप्रान्यः स्याद्विरोप डति॥ यत्रान्यत् कुर्वाणो युगपत्कार्यान्तरं च कुर्वीत। कर्तुमशक्यं कर्ता विज्ञेयोऽसी विशेपोडन्यः॥ 'कय्यक' की यह 'विशेष' मीमांमा अर्थान्- काव्यालंकार ०. १, ७, ९)

'अनाधारमाधेयमेकमनेकगोचरमशक्यवस्त्वन्तरकरणं विशेषः"। (अलं. म., पृ. =७१) भी इसी दृष्टि की है। अनुाद-'तद्गुण' अलङ्कार वह है जिसमें उत्कृष्ट गुणशाली अप्रस्तुत विषय के

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४४२ काव्यप्रकाश:

वस्तु तिरस्कृतनिजरूपं केनापि समीपगतेन प्रगुणतया स्वगुणसंपदोपरक्तं तत्प्रतिभासमेव यत्समासादयति स तद्गुणः तस्याप्रकृतस्य गुणोऽत्रास्तीति। उदाहरणम्- विभिन्नवर्णा गरुडाग्रजेन सूर्यस्य रथ्या: परितः स्फुरन्त्या। रत्नैः पुनर्यत्र रुचा रुचं स्वामानिन्यिरे वंशकरीरनीलैः ॥ ५६३॥ अत्र रवितुरगापेक्षया गरुडा्रजस्य तदपेक्षया च हरिन्मणीनां प्रगुणवर्णना। (५८ अतद्गुण अलंकार) (२०५) तद्रूपाननुहारश्वेदस्य तत्स्यादतद्गुणः । यदि तु तदीयं वर्ण सम्भवन्त्यामपि योग्यतायामिदं न्यूनगुणं न गृह्ीया- त्तदा भवेदतद्गुणो नाम। सम्बन्ध से न्यूनगुणयुक्त प्रस्तुत विषय अपने स्वरूप को छोड़कर अप्रस्तुत के स्वरूप का ग्रहण करके प्रंतिपादित किया जाय। 'तद्गुण' का अभिप्राय है उस (प्रकृत) का जिसमें अप्रकृत का गुण हो। जिसमें अप्रकृत का गुण हो वह प्रकृत वस्तु ही हो सकती हे। इस प्रकृत वस्तुमें अप्रकृत वस्तु का गुण तभी हो सकता ह जब कि इसका अपना गुण, अपना रूप, अपनी समीपवर्ती प्रकृष्ट गुण वाली अप्रकृत वस्तु की गुणसमृद्धि के संपक में आकर अभिभूत हो जाय और उसा के रूप-रङ्ग में अपने आप को रङ्ग ले। जसे कि :- 'यही वह रेधतक पर्वत है जहाँ ऊषा की लाली की चारों ओर फैली कान्ति से (पहले तो) स्वतः हरिद्वर्ण (हरे रङ्ग की) भी सूर्य-किरणें रक्तवर्ण बना दो जाया करती है और वाद में वश-करीर (बांस के कोंपल) की भाँति नीलवर्ण क मरकत-मणियों की फलती आभा से पुनः अपना पहला रङ्ग (हरा रङ्) पा लिया करती हैं।' (शिशुपालवध ४) यहाँ सूर्य-किरणों की अपेक्षा उषा की लाली की उत्कृष्टवर्णता और उपा की लाली की अपेक्षा मरकतमणियों की प्रकृष्टगुणशालिता विवत्ित है। टिप्पणी-काव्यप्रकाशकार ने 'तद्गुण' का स्वरूप अलक्कारसर्वस्वकार की दृष्टि से देखा है। अलङ्कारसर्वस्त्र (पृष्ठ २१३.) में यह 'तद्गुण'-लक्षण है- 'स्वगुणत्या गादत्युत्कृष्टगुणस्त्रीकारस्तद्गुणः ।' ऐसा प्रतीत होता है कि रुय्यक और मम्मट ने रुद्रट के इस 'तद्गुण' लक्षण- 'य स्मिन्नेकगुणानामर्थानां योगलच्य रूपाणाम्। संसर्गे नानात्वं न लच्यते तद्गुणःस इति।' को ती न माना किन्तु उनके इस तद्गुण-विश्लेषण अर्थात्- (काव्यालङ्कार ९. २२ ) 'अस मानगुणं यस्मिन्नतिवहलगुणेन वस्तुना वस्तु।संसृष्टं तद्गुणतांधत्तेऽन्यस्तद्गुणः स इति॥ को स्वीकार कर लिया। (काञयालक्कार ९२४) अनुवाद-'अतद्गुण' अलङ्कार वह है जिसमें प्रकृष्टगुण प्रकृत के संसर्ग में आकर, न्यूनगण भी अप्रकृत का, उस (अर्थात् प्रकृत) के गुण का अनुहरण न करना प्रतिपादित किया जाय। 'अतद्गुण' (तद्गुण के विपर्यय) का अभिप्राय है-एक वस्तु (अर्थात् अप्रकृत) के द्वारा, जो कि न्यूनगुण हो, दूसरी अधिक गुण वाली वस्तु (अर्थात् प्रकृत) के गुण का तब भी ग्रहण न किया जाना जब कि इसकी पूरी संभावना हो। जैसे कि :-

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दशम उल्लास: ४४३

उदाहरणम्- धवलोसि जहवि सुन्दर तहवि तुए मज्फ रज्जअं हिअअं। राअभरिए वि हिअए सुहअ णिहित्तो ण रत्तोसि॥५६४॥ (धवलोऽसि यद्यपि सुन्दर ! तथापि त्वया मम रञ्जितं हृदयम्। रागभरितेऽपि हृदये सुभग ! निहितो न रक्तोऽसि ॥५६४॥) ('अ्रतद्गुण' की एक अपरन्य प्रकार की संभावना ) अत्रातिरक्तेनापि मनसा संयुक्तो न रक्ततामुपगत इत्यतद्गुणः । किच तदिति अप्रकृतम् अस्येति च प्रकृतमत्र निर्दिश्यते। तेन यत् अप्रकृतस्य रूपं प्रकृतेन कुतोऽपि निमित्तान्नानुविधीयते सोऽतद्गुण इत्यपि प्रतिपत्तव्यम्। यथा- गाङ्गमम्वु सितमम्बु यामुनं कज्जलाभमुभयत्र मज्जतः । राजहंस ! तव सैव शुभ्रता चीयते न च न चापचीयते ॥ ५६५॥ (५९ 'व्याघात' अलंकार ) (२०६) यद्यथा साधितं केनाप्यपरेण तदन्यथा ॥ १३८ ॥ तथैव यद्विधीयेत स व्याघात इति स्मृतः । येनोपायेन यत् एकेनोपकल्पितं तस्यान्येन जिगीषुतया तदुपायकमेव यद- न्यथाकरणं स साधितवस्तुव्याहति हेतुत्वाद्वयाघातः । 'अरे सौभाग्यशाली युवक ! शुभ्रवर्ण के होते हुये भी तुम मेरे हृदय में लाली (प्रेम) ही पैदा कर गये और मैं! मैं तो अपने राग (प्रेम) रंजित हृदय में तुम्हें बसाकर भी तुम्हें अनुरक्त (लाल) नं बना सकी !' (गाथासप्तशती ७. ६५) [यहाँ 'अतद्गुण' इसलिये है क्योंकि अत्यन्त रागमय (लाली से भरे) हृदय के सम्पर्क में आने पर भी सुन्दर युवक के अनुरक्त (लाल) न होने का ही प्रतिपादन है।] यहाँ 'अतद्गुण' में एक और भी संभावना हो सकती है जो कि यह है-कारिका में 'तद्रूपाननुहार' में 'तत्' 'उस' का अभिप्राय है 'अप्रकृत' का और 'अस्य' का तात्पर्य है 'प्रकृत' का। इस प्रकार 'अतद्गुण' वहाँ भी माना जायगा जहाँ किसी कारणवश प्रकृत के ही द्वारा अप्रकृत के गुण का अनुहरण (ग्रहण) न प्रतिपादित हो। जैसे कि :- 'अरे राजहंस! तुम जहाँ स्वच्छ गंगाजल और काले यमुना-जल दोनों में डुबकी लगाने वाले हो वहाँ न तो तुम्हारी स्वच्छता कुछ बढ़ती हो दिखाई देती है और न घटती ही जान पड़ती है।' [ यहाँ प्रकृत राजहंस का अप्रकृत गंगा और यमुना जल के गुणों का अग्रहण प्रतिपादित है जिसमें 'अतद्गुण' अलंकार का ही रूप स्पष्ट झलक रहा है।] टिप्पणी-'अतद्गुण' तद्गुण का ही विपर्यय है। रुय्यक ने इसीलिये 'अतद्गुण' का यह लक्षण किया है- 'सति हेतौ तद्गुणाननुहारोऽतद्गुणः।' (अलंकारसर्वस्व २१४ पृष्ठ ) वस्तुतः रुय्यक के दिये जो 'अतद्गुण' के उदाहरण हैं वे ही काव्यप्रकाशकार ने भी उद्धृत किये हैं। अनुवाद-'व्याघात' अलंकार वह है जिसमें किसी एक के द्वारा एक उपाय से सिद्ध कार्य किसी दूसरे के द्वारा विजयाभिलाषा के प्रदर्शन में उसी उपाय से विपरीत अथवा असिद्ध किया हुआ प्रतिपादित हो। 'व्याघात' का अभिप्राय है 'पूर्बसाधित वस्तु के विनाश के कारण होने' का। जब एक के द्वारा किसी एक उपाय से सिद्ध किया गया कार्य, उसे जीतने की इच्छा से, किसी दूसरे

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४४४ काव्यप्रकाश:

उद़ाहरणम्- हशा दग्धं मनसिजं जीवयन्ति हशैव याः । विरूपाक्षस्य जयिनीस्ताः स्तुवे वामलोचनाः ॥ ५६६॥ (६० 'संसृष्टि' अलंकार ) (२०७) सेष्टा संसृष्टिरेतेषां भेदेन यदिह स्थितिः ॥ १३९ ॥ (संसृष्टि के तीन प्रकार ) एतेषां समनन्तरमेवोक्तस्वरूपाणां यथासम्भवमन्योन्यनिरपेक्षतया यदेकन्र शव्दभागे एव अथविषये एव उभयत्रापि वा अवस्थानं सा एकार्थसमवायस्व- भात्रा संसृष्िः।

चलितया विद्धे कलमेखलाकलकलोऽलकलोलहशाऽन्यया॥५६७॥ के द्वारा, उसी उपाय के प्रयोग से, असिद्ध अथवा विपर्यस्त बना दिया जाय तो वहाँ पू्यसाधित वस्तु के विपर्यय में 'व्याघात' स्पष्ट ही है। जैसे कि :- 'जो वामलोचनायें अपनी आँखों से उस काम को पुनरुजीवित किया करती हैं जिसे विरुपान (त्रिनयन भगधान् शिव) की आंख भस्म कर चुकी है, उन विरूपाक्विजयिनी रमणियों के आगे भला क्योंकर न सिर झुक जाय !' [ यहाँ आँखों के द्वारा ही जला देने और जिला देने में कार्य-वैजात्य स्पष्ट ही है। अदपि विरुपान्ष की आँख और वासलोचनाओं की आंखों में कोई एकरूपता नहीं और न किसी प्रकार का व्याघात ही अभिप्रेत डे किन्तु दोनों में नेत्रमात्र रूप वस्तु की एक- जातीयता तो है ही जिसके कारण वैजात्य भी स्पष्ट ही है।] टिप्पणी-सुद्रट का व्याधात लक्षण यह है :- 'अन्येरप्रतिहतमपि कारणमुत्पादनं न कार्यस्य। यस्मिन्नभिधीयेत व्याघातः स इति विज्ञेयः ॥' (काव्यालंकार ९. ५२) किया है :- कन्तु काव्यपकाशकार ने इसका अनुसरण न कर रुय्यक के निम्न व्याघात-लक्षग का अनुसरण 'यथासाधितस्य तथैवान्येनाऽन्यथाकरणं व्याघातः' ( अलंकारसर्वस्व पृष्ठ १७३) अनुवाद-'संसृष्टि'अलंकार वह है जिसे पूर्वप्रतिपादित अलंकारों की परस्पर निरपेक्षता में भी एकत्र अवस्धिति का चमरार कहा करते हैं। 'संसृष्टि' का अभिप्राय है 'एकार्थसमवाय' का अर्थात् एक शब्द अथवा अर्थ अथवा शब्दार्थरूप काव्य-वस्तु में एक से अधिक अलंकारों के सस्वन्ध का, क्योंकि अब तक जिन- जिन अलंकारी का स्वरूपनिरुपण हो चुका है उनके लिये अर्थात् यथासंभव एक से अधिक शब्दालंकारों, अर्थालंकारों और उभयालंकारों के लिये यह संभव है कि वे एक दूसरे की परस्पर किली अपेक्षा के विना भी काव्य में अथवा चन्तुतः काव्य के शब्दरूप भाग, अर्थरूप भाग और शब्दार्थरूप भाग में एक ही स्थान पर अवस्थित रहें। इस प्रकार (केयूरादि भूषणों में जटित भिन्नभिन्न मणियों के समान) एक से अधिक अलंकारों की, परस्पर निरपेच रहते हुये भी जो एकत्र अवस्थिति है (जिसमें एक अलग ही चमत्कार है) वही 'संसृष्टि' अलंकार है। पहली संसृष्टि अर्थात् एक से अधिक शब्दालंकारों की 'संसृष्टि' जैसे कि :- 'वदन-सौरभ के लोभ से मैंडदाने वाले भ्रमरों के भय से एक विचित्र विलास वाली

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दशम उल्लास: ४४५

अर्था लङ्कारसंसृष्टिस्तु- लिम्पतीव तमोऽङ्गानि वर्षतीवाञ्जनं नभः । असत्पुरुषसेवेव दृष्टिर्विफलतां गता ॥ ५६८ ॥

उपमोत्प्रेक्षे। पूर्वत्र परस्परनिरपेक्षी यमकानुप्रासौ संसृष्टिं प्रयोजयतः उत्तरत्र तु तथाविधे

शब्दार्थालङ्कारयोस्तु संसृष्टि :- सो णात्थि एत्थ गामे जो एअं महमहन्तलाअण्णं। तरूणाण हिअअलूडिं परिसक्कन्तीं णिवारेइ॥५६६॥ (स नास्त्यत्र ग्रामे य एनां महमहायमानलावण्याम् । तरुणानां हृदयलुण्टाकीं परिष्वक्कमाणां निवारयति॥५६९॥) अन्रानुप्रासो रूपकं चान्योन्यानपेक्षे संसर्गश्र तयोरेकत्र वाक्ये छन्दसि वा समवेतत्वात्! किंवा अलकावली की अस्तव्यस्तता से चंचल नयनों वाली कोई युवती जिधर भी चली उधर ही उसकी कलमेखला (सुन्दर करधनी) का कलकल सुनाई पड़ने लगा।' (शिशुपालवष ६) दूसरी 'संसृष्टि' अर्थात् एक से अधिक अर्थालंकारों की 'संसृष्टि' जैसे कि :- 'चारों और घोर अन्धकार ! ऐसा लगता है कि अंधकार सारे शरीर में अंगराग लगा रहा हो, आकाश अंजन की वर्षा कर रहा हो और प्राणिमात्र की दृष्टि दुष्ट सेवा की भाँति व्यर्थ हो रही हो।' इन उपर्युक्त उदाहरणों में पहले में जो 'संसृष्टि' अलंकार है वह है परस्पर निरपेक्ष अनुप्रास (जैसे कि 'भ' और 'ल' की आवृत्ति में) और यमक-(जैसे कि 'कलमेखला- कलकलोऽलकलोलदशा' में 'कलोलकलोल' इस रूप की निरर्थक वर्णों की पुनः श्रुति में) इन दोनों शब्दालंकारों के यहाँ (काव्य के शब्दात्मक भाग में) एकत्र अवस्थिति के कारण। इसी प्रकार दूसरे में जो 'संसृष्टि' है वह है उपमा (जैसे कि 'असत्पुरुषसेवेव दृष्टिविंफलतां गता' में) और उत्प्रेक्षा-(जैसे कि 'लिम्पतीव तमोऽङ्गानि' में) इन दोनों अर्थालंकारों के परस्पर निरपेक्ष रहते हुये भी यहाँ (काव्य के अर्थात्मक अंश में) एकत्र अवस्थान के कारण। तीसरी संमृष्टि अर्थात् शब्दालंकार और अर्थालंकार की 'संसृष्टि' जैसे कि :- 'इस गाँव में कोई भी ऐसा युवक नहीं जो इस सौनदर्य की कस्तूरी से मतवाली और तरुणों के हृदय लूटने वाली का इधर-उधर घमण्ड में चूर होकर घूमनाफिरना छुड़ा सके।' यहाँ एक अलंकार तो है शब्दालंकार अर्थात् अनुप्रास (जैसे कि 'त' 'थ' रूप व्यञ्जनों के एक बार साम्य में छेकानुप्रास ) और दूसरा है अर्थालंकार अर्थात् रूपक (जैसे कि 'हृदयलुण्टाकीम्' में) और ये दोनों हैं परस्पर निरपेक्ष, किन्तु संबद्ध, एकत्र अवस्थित। इनकी 'एकत्र स्थिति' का अभिप्राय है इनके एक वाक्य में (चाहे बाक्य को अर्थावच्छिन्न शब्दरूप माने, या आकांक्षादियुक्त पदसमूह माने या अनेक वाक्यों की एकवाक्यता की दृष्टि से देखें) रहने अथवा एक छन्द, एक संघटना, एक पद्यात्मक अथवा गद्यात्मक रचना में अवस्थित होने का। टिप्पणी-मामह ने 'संसृष्टि' को एक अलंकार अवश्य माना था जैसा कि उनके 'काव्यालंकार' (३. ४९ ) की निम्न उक्ति से स्पष्ट है। 'वरा विभूषा संसृष्टिवंह्वलङ्कारयोगतः। रचिता रत्नमालेव सा चैवमुदिता यथा॥'

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४४६ काव्यप्रकाश:

( ६१ 'संकर' अलंकार) (२०८) अविश्रान्तिजुषामात्मव्यङ्गाङ्गित्वं तु संकरः । एते एव यत्रात्मनि अनासादितस्वतन्त्रभावाः परस्परमनुग्राह्यानुग्राहकतां द्धति स एषां संकीर्यमाणस्वरूपत्वात्संकरः। उदाहरणम्- (दो अलंकारों का 'संकर') आत्ते सीमन्तरत्ने मरकतिनि हते हेमताटंकपत्रे लुप्तायां मेखलायां भ्क्टिति मणितुलाकोटियुग्मे गृहीते। शोणं बिम्बोष्ठकान्त्या त्वदरिमृगद्दशामित्वरीणामरण्ये राजन्गुञ्जाफलानां स्नज इति शबरा नैव हारं हरन्ति ॥ ५७० ॥

'मामह' के व्याख्याकार उद्भट ने भी इसका :- 'अलङ्कृतीनां बह्नीनां द्वयोर्वापि समाश्रयः। एकत्र निरपेक्षाणां मिथः संसृष्टिरुच्यते ॥' (काव्यालक्कारसारसंग्रइ ६.५) इत्यादि दृष्टि से विवेचन कर दिया था, किन्तु काव्यप्रकाशकार ने इन प्राचीन आलंकारिकों की संसृष्टि सम्बन्धी धारणा के बदले 'अलंकारसर्वस्व' के रचयिता 'रुय्यक' की संसृष्टिसमीक्षा का ही अनुमोदन किया है। 'रुय्यक' की :-- 'संसृष्टिस्त्रिधा-शब्दालङ्कारगतत्वेन, अर्थालङ्कारगतत्वेन, उभयालङ्कारगतत्वेन च'। (अर्थालद्वारसर्वस्व-काव्यमाला पृष्ठ २४४) यह उक्ति ही काव्यप्रकाश के-'एतेषां (अलङ्गाराणाम्) ... एकत्र शब्दभाग एव, अर्थविषय एव उभयत्राऽपि वाऽवस्थानम् सा एकार्थसमवायस्वभावा संसृष्टिः' इस संसृष्टि-विवेचन का आधार है। यद्यपि काव्यप्रकाशकार ने 'संसृष्टि' का वही विश्लेषण किया है जो अलंकार सर्वस्वकार का किया हुआ है किन्तु काव्यप्रकाशकार 'संसृष्टि' में संयोग-न्याय और 'संकर' में समवाय-न्याय नहीं मानते इसलिये 'संसृष्टि' के लिये तिलतण्डुलन्याय' और 'संकर' के लिये 'नीरक्षीरन्याय' की किसी कल्पना के बिना ही त्रिविध 'संसृष्टि' और त्रिविध 'संकर' का निरूपण कर देते हैं। अनुवाद-'संकर' अलंकार वह है जिसे पूर्वोक्त अलंकारों की, अपने आप में स्वतन्त्र- रूप से अवस्थित न हो सकने के कारण, परस्पर अङ्ग और अङ्गी (अनुग्राहक और अनुग्राह्य अथवा उपकारक और उपकार्य) रूप से (काव्य के शब्दभाग, अर्थभाग अथवा शब्दार्थगत भाव में) अवस्थिति कहा करते हैं। ('संकर' का पहला प्रकार-अङ्गाङ्विभावरूप संकर) यहां अलंकारों के 'संकर' का अभिप्राय है अलंकारों के अपने स्वरूप में अवस्थित न रह कर परस्पर उपकार्योपकारक भावरूप सम्बन्ध में बँध जाने का। जब कि एक से अधिक अलंकार इस प्रकार रहने लगे तब उनका स्वरूप परस्पर संकीर्ण हो गया। यहां जो 'संकर' अलंकार कहा जा रहा है वह वस्तुतः अङ्गाङ्गिभावापन्न अलंकारों के स्वरूप- सम्मिश्रण का ही चमत्कार है। उदाहरण के लिये :- 'महाराज! शबरों और किरातों ने वन-वन में भटकती-फिरती आपकी शत्रुनारियों के नीलम-जड़े शिरोभूषण उतार डाले, सोने के कनफूल ले लिये, कमर की करधनी छूट ली और मणियों के बने पेरों के बिछुए भी छीन लिये, किन्तु हार न ले पाये ! और ले भी कैसे पावें जब कि उन रमणियों के बिम्बसदश अधरों की आभा से लाल बने हार उन्हें गुक्ा की लड़ियां लगा करें !'

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दशम उल्लास: ४४७ अत्र तद्गुणमपेक्ष्य भ्रान्तिमता प्रादुर्भूतं तदाश्रयेण च तद्गुणः सचेतसां mww

प्रभूत चमत्कृति निमित्तमित्यनयोरङ्गाङ्गिभावः। यथा वा- (दो से अरधिक अलंकारों का 'संकर') जटाभाभिर्भाभि: करघृतकलङ्काक्षवलयो वियोगिव्यापत्तेरिव कलितवैराग्यविशदः। परिप्रेखत्तारापरिकर कपालाङ्किततले शशी भस्मापाण्डुः पितृवन इव व्योम्नि चरति ।।५७१।। उपमा रूपकम् उत्प्रेक्षा श्लेषश्च्ेति चत्वारोऽत्र पूर्ववत् अङ्गाङ्गितया प्रतीयन्ते। कलङ्क एवाक्षवलयमिति रूपकपरिग्रहे करधृतत्वमेव साधकप्रमाणतां प्रतिपद्यते। अस्य हि रूपकत्वे तिरोहितकलङ्करूपम् अक्षवलयमेव मुख्यतयाऽवगम्यते तस्यैव च करग्रहणयोग्यतायां सार्वत्रिकी प्रसिद्धिः । श्लेषच्छायया तु कलंकस्य कर- यहां ('विम्बोष्टकान्त्या शोणम्' में) जो 'तद्गुण' अलंकार है उसकी अपेक्षा से ('गुज्जाफलानां स्नजः' में) 'आ्रन्तिमान्' अलंकार की रूप-रेखा प्रकट हो रही है। किन्तु यह 'तद्गुण' यहां ऐसा नहीं जो स्वतन्त्ररूप से चमत्कारकारक लगे क्योंकि इसे भी 'भ्रान्तिमान्' की सहायता अपेक्ित है। इस प्रकार 'भ्रन्तिमान्' से उपकृत 'तद्गुण' का जो परस्पर अङ्गाङ्गिभाव सम्बन्ध है वही यहां 'संकरालंकार' है क्योंकि यही वह चमतकार- विशेष है जो यहां सहृदयों के अनुभव का विषय है। अथवा जैसे कि :- 'यह भस्म के समान (भस्म रमाये सा) शुभ चन्द्रमा (योगी) ऐसा लगता है जैसे सर्वत्र बिखरे नक्षत्रों के नरमुण्डों से भरे श्मशान सरीखे आकाश में रमण कर रहा है। इसकी चांदनी है जटाओं सी पीली-पीली, इसके किरणसमूह (हाथ) में कलंक है रुद्राक्ष- माला के समान लगा हुआ और इसकी शुभ्रता! (चित्तशुद्धि, योगी पक्ष में) वह है विर- हियों को संतप्त करने (योगी-पक्ष में आत्म-स्वरूप से सतत वियुक्त विषयों के विध्वंस करने) के कारण ऐसी कि निरन्तर लालिमा को छोड़ती (वीतरागता को बढ़ाती-योगीपक्ष में) अधिकाधिक स्वच्छता (चित्त की विमलता-योगीपक्ष में) में ही बढ़ती जा रही है।' यहां उपमा ( जैसे कि 'जटाभाभिर्भाभिः', 'पितृवन इव व्योग्नि' में), रूपक ('कलं- काक्षवलयम्', 'तारापरिकरकपाल' में), उत्प्रेक्षा (जैसे कि वियोगिव्यापत्तेरिव में) और श्लेष (जैसे कि 'वैराग्यविशदः' में) ये चार-चार अलंकार पूर्वोक्त उदाहरण की भांति परस्पर अङ्गाङ्गिभाव से अवस्थित प्रतीत हो रहे हैं। (यहां यह शंका कि जब 'कलंकाक्षवलयम्' में 'कलंक एव अक्षवलयम्' ऐसा समास होने से 'रूपक' तथा 'कलंकः अक्तवलयमिव' ऐसा समास होने से उपमा-दोनों की संभावना है तब इसे रूपक-उपमा का संदेह-संकर न मानकर रूपक क्यों मान लिया जाय ठांक नहीं लगती।) वस्तुतः बात यह है कि (यहां 'उपमा-रूपक' का 'संदेह'-संकर नहीं हो सकता क्योंकि) यहां 'करधृत' रूप जो विशेषण है उसके द्वारा 'रूपक' की ही सिद्धि (न कि उपमा की) की जा रही है। 'कलङ्काक्षवलगम्' मेंक इसी से सिद्ध है कि यहां कलंकरूप उपमेय को तिरोहित करने वाले अत्तवल्यरूप उपनान की ही विशेष्यरूप से प्रतीति हो रही है क्योंकि इसी (अक्षवलयरूप) विशेष्य में 'करषत' रूप विशेषण का सवथा समन्वय संभव है। (यहां यह भी हीं कहा जा सकता कि कलंक के साथ 'करग्राह्यत्व'रूप साधारण धर्म का सम्बन्ध न हो सके तब सादृश्याधिक्य पर आश्रित 'रूपक' भी कैसे ! क्योंकि) यद्यपि यह

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काव्यप्रकाश:

धारणमसदेव प्रत्यासच्या उपचर्य योज्यते शशांकेन केवलं कलंकस्य मूर्त्यैत्र उद्ध हनात्। कलंकोऽक्षत्रलयमिवेति तु उपमायां कलंकस्योत्कटतया प्रतिपत्तिः। न चास्य करधृतत्वं तत्त्व्रतोऽस्तीति मुख्येऽप्युपचार एत शरणं स्यात्। एवंरुपश्च संकरः शब्दालङ्कारयोरपि परिदृश्यते। यथा- राजति तटीयमभिहृतदानवरासाऽतिपातिसारावनदा। गजता च यूथमविरतदानवरा साडतिपाति सारा वनदा ॥ ५७२ ॥ अत्र यमकमनुलोमप्रतिलोमश्च चित्रभेद: पादद्वयगते परस्परापेक्षे। ('संकर' का दूसरा प्रकार-संदेहरूप संकर ) (२०९ ) एकस्य च ग्रहे न्यायदोषाभावादनिश्चयः ॥ १४० ॥ द्वयोबहूनां वा अलङ्काराणामेकत्र समावेशेऽपि विरोधान्न यत्र युगपद्वस्थानम् न चकतरस्य परिग्रहे साधकम् तदितरस्य वा परिहारे बाधकमस्ति। येनैकतर एव परिगृह्येत स निश्चयाभावरूपो द्वितीयः संकरः समुच्चयेन संकरस्यैवाक्षेपात्, ठीक है कि कलङ्क का करग्रहण (हाथ में लेना) संभव नहीं क्योंकि चन्द्रमा का विम्ब ही कलक्क धारण करने वाला हुआ करता है न कि उसका किरण-कलाप किन्तु 'करछृत' विशेषण में 'कर' पद के श्लिष्ट होने से (अर्थात् हाथ और किरण दोनों के अर्थों के उपस्थाापक होने से) इसके द्वारा कर (किरण) के साथ सामीप्य-संबन्ध से सदा अवस्थित चन्द्रमण्डल का सम्बन्ध जब कलङ्क से जुड़ जायगा तब रूपक की रूप-रेखा में आपत्ति कहाँ! यदि यहाँ उपमा मानी जाय तब तो 'कलक्कोऽक्तवलयमिव' इस अभिप्राय में मुख्यरूप से-विशेष्यरूप से-कलङ्ठ की ही प्रतीति होगी (न कि अत्तवलय की) और 'कलंक' में जब 'कर्त' (हाथ में लिया गया) साधारणधर्म स्वभावतः संगत न हुआ तब कलङ्करूप विशेष्य में भी उपचार (लक्षणा ) ही एकमात्र अर्थ प्रत्यायन का साधन रह जायगा ( जो कि इसलिये ठीक नहीं क्योंकि, विशेष्य में उपचार के आश्रय लेने की अपेक्षा विशेषण में उपचार का आश्रय लेना ही युक्तिसंगत माना गया है)।

जैसे कि :- यह (अङ्गाङ्गिभावरूप) संकर दो शब्दालंकारों में भी स्पष्ट प्रतीत हुआ करता है।

'यही वह पर्वत-भूमि है जो 'अभिहतदानवरासा' दैत्यों के सिंहनाद से प्रतिध्वनित किंवा 'अतिपातिसारावनदा' चज्जल तथा ध्वनिमुखर जलप्रवाह से भरी है और जिसमें 'अविरतदानवरा' निरन्तर प्रवाहित होने वाले मदजल से सुशोभित, 'सारा' बलशाली तथा 'वनदा' वनों को विनुब्ध करने वाली 'गजता' हाथियों की टोलियाँ 'यूथमतिपाति' अपने-अपने झुण्डों की रक्षा करती घूम रही हैं।' यहां (द्वितीय और चतुर्थ पाद में) यमक और 'अनुलोम' तथा 'प्रतिलोम' प्रकार ( हरवरिजय ५ )

के चिन्नालंकार दोनों एक दूसरे की अपेक्षा करते हुए (अङ्गाङ्गिभाव से) पड़े हैं (जिसमें सहृदयों का मन इसलिये रम जाता है क्योंकि जहाँ इनमें से प्रत्येक अलंकार की योजना कष्टसाध्य है वहाँ इन दोनों को इतनी सुन्दरता से निबाहा गया है)। यह 'संकर' इस प्रकार का है जिसे अनिश्चिय संदेह-संकर कहा गया है क्योंकि यहां दो अलंकारों में से किसी एक के निश्चय का न तो कोई (न्याय) साघक प्रमाण रहा करता है और न कोई (दोष) बाघक प्रमाण ही मिला करता है। यह दूसरे प्रकार का 'संकर' अनिश्चयात्मक अथवा संदेह 'संकर' है क्योंकि जब दो अथवा दो से अधिक अलंकारों में एक काव्य में रहने में (छाया और आतप की भांति) विरोध होने लगे और एक ही समय में इनमें से किसी एक के स्वरूप के निश्चय में न तो कोई साघक प्रमाण हो जिससे उसे स्वीकार किया जाय और न कोई बाधक प्रमाण हो

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दशम उल्लास: ४४६

उदाहरणम- जह गहिरो जह रअणणिन्भरो जह अ णिम्मलच्छाओ। तह किं विहिणा एसो सरसवाणीओ जलणिही ण किओ॥५७३ ॥ (यथा गभीरो यथा रत्ननिर्भरो यथा च निर्मलच्छायः । तथा किं विधिना एष सरसपानीयो जलनिधिर्न कृतः ॥ ५७३ ॥) अत्र समुद्रे प्रस्तुते विशेषणसाम्यादप्रस्तुतार्थप्रतीतेः किमसौ समासोक्तिः किमब्धेरप्रस्तुतस्य सुखेन कस्यापि तत्समगुणतया प्रस्तुतस्य प्रतीतेः इयम- प्रस्तुतप्रशंसा इत सन्देहः। यथा वा- नयनानन्ददायीन्दोर्बिम्बमेतत्प्रसीदति। अधुनापि निरुद्धाशमविशीर्णमिदन्तमः ॥५७४॥ अत्र किं कामस्योद्दीपकः कालो वर्तते इति भङ्गचन्तरेणाभिधानात्पर्यायोक्तम् उत वदनस्येन्दुबिम्बतयाऽध्यवसानादतिशयोक्तिः कि वा एतदिति वक्त्रं निर्दिश्य तद्रूपारोपवशाद्रूपकम् अथवा तयोः समुच्चयविवक्षायां दीपकम् अथवा तुल्ययो- गिता किमु प्रदोषसमये विशेषणसाम्यादाननस्यावगतौ समासोक्ति: आहोस्वि- नमुखनैर्मल्यप्रस्तावादप्रस्तुतप्रशंसा इति बहूनां सन्देहादयमव संकरः। जिससे उसे अस्वीकार ही किया जाय तव यहाँ जो अलंकारों का सांकर्य होगा वह अनिश्चयात्मक-संदेहरूप ही होगा। इसीलिये यह संकर-प्रकार संदेह-संकर कहा जाता है क्योंकि पहली कारिका से 'संकर' की ही अनुवृत्ति यहाँ विवच्ित है जिसके लिये समुच्चयबोधक 'च' का प्रयोग ही प्रमाण है। उदाहरण के लिये :- (दो अलंकारों का संदेह-संकर) 'विधाता ने यह सागर, जैसा गहरा, जैसा रत्नपूर्ण और जैसा स्वच्छ-सुन्दर बनाया वैसा, पता नहीं, मीठा पानी वाला क्यों कर न बनाया !' यहाँ क्या 'समुद्र' के वर्णनीय रूप से प्रस्तुत रहने पर, श्रिष्ट ( गभीर आदि) विशेषणों की महिमा से, अप्रस्तुत (पुरुषविशेष रूप) अर्थ की प्रतीति में 'समासोक्ति' मानी जाय ? अथवा क्या अप्रस्तुत समुद्ररूप अर्थ के वर्णन द्वारा. उसके समानधर्मा होने के कारण, किसी प्रस्तुत (पुरुष-विशेषरूप) अर्थ की प्रतीति होने से 'अप्रस्तुतप्रशंसा' समझी जाय ? वह है वह संदेह (जिसका निवारण किसी साधक अथवा बाघक प्रमाण के अभाव में असंभव है और जिसका चमत्कार यहां 'संदेह-संकर' का चमरकार है) जो कि यहां स्पष्ट प्रतीत हो रहा है। अथवा जैसे कि :- (दो से अधिक अलंकारों का 'संदेह' संकर) 'नेत्रों का आनन्ददायक यह चन्द्रबिम्ब चमक रहा है किन्तु दिङ्मण्डल का आच्छादक यह अन्धकार अभी भी सर्वथा नष्ट हुआ नहीं प्रतीत होता है।' यहाँ क्या 'वह समय आ पहुँचा जिसमें काम उत्तेजित हुआ करता है' इस व्यङ्गयरूप अर्थ के उक्ति-वैचित्र्यपूर्वक प्रतिपादन में 'पर्यायोक्त' है? अथवा क्या मुखरूप प्रकृत के अप्रकृत चन्द्रबिम्ब के रूप में अध्यवसान (निश्चय) होने से 'अतिशयोक्ति' है ? या ऐसा है कि 'एतत्' (यह) इस पद से निर्दिष्ट 'मुख' रूप उपमेय पर चन्द्रबिम्बरूप उपमान के आरोप में 'रूपक' है ? या ऐसा तो नहीं कि 'एतत्' (मुख) और 'इन्दुबिम्ब' (चन्द्रबिम्ब) इन दोनों के समुच्चय (परस्पर निरपेक्ष भी अनेक पदार्थों के एक साथ अवस्थान जैसे कि-इन्दुबिम्बं प्रसीदति एतद् वक्त्रं च प्रसीदति) की दृष्टि से (क्रिया.) दीपक हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि (मुख और चन्द्रबिम्ब दोनों के प्रकृत अथवा भप्रकृत 36 २६ का०

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४५० काव्यप्रकाश:

यत्र तुन्यायदोषयोरन्यतरस्यावतारः तत्रकतरस्य निश्चयात्न संशयः।न्यायश्च साधकत्वमनुकूलता दोषोऽपि बाधकत्वं प्रतिकूलता, तत्र- सौभाग्यं वितनोति वक्त्रशशिनो उयोत्स्नेव हासदयुतिः ॥ ५३५॥ इत्यत्र मुख्यतयाऽवगम्यमाना हासद्युतिवक्त्रे एवानुकूल्यं भजते इत्युपमायाः साधकम् शशिनि तुन तथा प्रतिकूलेति रूपकं प्रति तस्या अबाधकता। वक्त्रेन्दौ तव सत्ययं यदपरः शीतांशुरभ्युद्यतः ॥ ५७६ ॥ इत्यत्रापरत्वमिन्दोरनुगुणं न तुवक्त्रस्य प्रतिकूत्तमिति रूपकस्य साधकतां प्रतिपद्यते न तूपमाया बाधकताम्। होने से औपम्य के आक्षेप में) 'तुल्ययोगिता' ही हो? या प्रदोषकाल के वर्णन में (चन्द्रबिम्ब के प्रकृत होने से) आनन्ददायकत्वरूप विशेषण की समानता के कारण (अप्रकृतरूप) 'मुख' की प्रतीति में 'समासोक्ति' हो? या कहीं (प्रस्तुत) मुख की निर्मलता के वर्णन से अप्रस्तुत (चन्द्रबिम्ब) के अभिधान में 'अप्रस्तुतप्रशंसा' हो? इस प्रकार जब एक नहीं अनेक अलंकारों में से किसी के स्वरूप-विनिश्चय में कोई साधक- बाधक प्रमाण नहीं तो यह अलंकार-संकर नहीं तो और क्या है ? संदेह संकर की संभावना वहां नहीं हुआ करती जहां न्याय (साधक प्रमाण) और दोष (बाधक प्रमाण)-इन दोनों में से किसी भी एक की उपस्थिति में किसी भी अलंकार का स्वरूप निश्चय हो जाय। यहां 'न्याय' का अभिप्राय है (किसी अलंकार के) 'साधक' अथवा 'अनुकूल प्रमाण' का और 'दोष' का अभिप्राय है उसके 'बाधक' अथवा 'प्रतिकूल प्रमाण' का। (साधक प्रमाण का उदाहरण) इस सूक्ति अर्थात :- 'चांदनी जैसे चन्द्रमा की सुन्दरता बढ़ाया करती है वैसे हँसी चन्द्रमुख की सुन्दरता बढ़ाती रहती है।' में स्पष्ट है। क्योंकि जिस (विशेषणभृत) 'हासद्युति' हासशोभा की मुख्यतया (अर्थात् बिना किसी उपचारसम्बन्ध के) प्रतीति हो रही है उसके 'मुख'- रूप (विशेष्यभूत) अर्थ में अनुकूल होने से 'उपमा' अलंकार (वक्त्रं शजीव वक्त्रशशिनः) की सिद्धि तो स्पष्ट है। किन्तु जहां तक 'रूपक' (वक्त्रं शशीव वक्त्रशशिनः) का प्रश्न है वहां इस (विशेषणभूत) 'हासद्युति' की न तो कोई (विशेष्यभूत चन्द्ररूप अर्थ में) अनूकूलता है (क्योंकि चन्द्रमा में हंसी का होना असंभव है) और न कोई विशेष प्रतिकूलता ही (क्योंकि उपचारतः 'हास' का अभिप्राय 'विकास' लिया जा सकता है)। इस प्रकार रूपक के साधक अथवा बाधक प्रमाण के अभाव में यहां 'उपमा' और 'रूपक का संदेह संकर निर्मूल है। इसी प्रकार इस सूक्ति अर्थात्- 'प्रिये ! जब कि तुम्हारा यह मुख चन्द्र विराजमान है तब यह दूसरा चन्द्र (आकाश में) क्या निकल पढ़ा !' में 'रूपक' का साधक प्रमाण तो विद्यमान है क्योंकि 'वक्त्रमेव इन्दुः-वक्त्रेन्दुः' में चन्द्र (रूप उपमान) की प्रधानरूप से प्रतीति में 'अपरत्व-द्वितीयचन्द्र के अस्तित्व' की उक्ति तो अनुकूल पढ़ती है (क्योंकि बिना 'मुख' में 'चन्द्र' के तादाल्यारोप के 'अपरः शीतांशुरभ्युद्यतः-दूसरा चन्द्र क्या निकल पड़ा' ऐसा कहना अनुपपन्न है)। किन्तु यहां 'उपमा' (वक्त्रम् इन्दुरिव वक्त्रेन्दुः) का जहां तक प्रश्न है वहां 'अपरत्व' की उक्ति प्रतिकूल भी नहीं ( क्योंकि उपमा में मुख) की प्रधानरूप से प्रतीति होने में 'चन्द्रसदृश मुख के रहते इस (आकाशवर्ती) दूसरे चन्द्र से क्या ?' इस अर्थ की कथंचित् योजना करने पर 'अपरत्व' का अभिप्राय अनुपपत्न नहीं होता और न वस्तुतः यह उपपत्न ही है (क्योंकि 'चन्द्रसदृश मुख' में प्रधानतया जब मुख की प्रतीति अभिप्रेत है तब 'चन्द्र' पें 'अपरत्व' की प्रतीति असंभव है क्योंकि चन्द्र एक ही है दो नहीं)।

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दशम उल्लास: ४५१

राजनारायणं लक्ष्मीस्त्वामालिङ्गति निर्भरम्॥ ५७७ ॥ इत्यत्र पुनरालिङ्गनमुपमां निरस्यति सदशं प्रति परप्रेयसीप्रयुक्तस्यालिङ्गन- स्यासम्भवात्। पादाम्बुजं भवतु नो विजयाय मञ्जु-

इत्यत्र मञ्जोरशिख्जितं अम्बुजे प्रतिकूलम् असम्भवादिति रूपकस्य बाघकम् न तु पादेऽनुकूलमित्युपमायाः साधकमभिधीयते विध्युपमर्दिनो बाधकस्य तद- पेक्षयोत्कटत्वेन प्रतिपत्तेः । एवमन्यत्रापि सुधीभिः परीक्ष्यम् । [यहाँ निष्कर्ष यह निकला कि साधक प्रमाण के सद्भाव में जब किसी एक अलंकार की उत्कट संभावना हो जैसे कि 'सौभाग्यं वितनोति' आदि में 'उपमा' की अथवा 'वक्त्रेन्दौ तव' इत्यादि में 'रूपक' की; तब 'सन्देह-संकर' की संभावना इसलिये नहीं हो सकती क्योंकि इसके लिये दो अथवा दो से अधिक अलंकारों में जिस तुल्यकोटि का संशय अपेक्षित है, उसका यहाँ अभाव है।] इसी प्रकार किसी अलंकार के बाघक-प्रमाण के सद्भाव में भी उसका किसी दूसरे अलंकार के साथ 'संदेह-संकर' असंगत ही है। जैसे कि :- 'रजन् ! आप राज नारायण (विष्णुरूप राजा) हैं, लच्मी बढ़े अनुराग से आपका आलिंगन किया करती है।' इस सूक्ति में जहाँ उपमा (राजा नारायण इव राजनारायण:) की संभावना 'आलिङ्गन' की उक्ति के द्वारा दूर कर दी गयी है, क्योंकि लक्ष्मी का आलिंगन नारायण (उपमान) के साथ तो उपपन्न है किन्तु नारायण-सदृश (राजा-उपमेय) के साथ इसलिये उपपन्न नहीं क्योंकि नारायण की प्रेयसी (लक्ष्मी) के लिये ( नारायण को छोड़ कर) नारायण-सदश किसी पुरुष (यहाँ राजा) का आलिंगन सर्वथा अनुचित है, वहाँ इसका यहाँ वस्तुतः विराजमान 'रूपक' (राजा एव नारायणः राजनारायणः) के साथ 'संदेस-संकर' नहीं हो सकता। इसी प्रकार- मज्जीर के मधुर शिक्जा-रव से मनोहर भगवती पार्वती के चरणकमल हमें विजयी बनाया करें।' इस सूक्ति में जहां 'रूपक' (पाद एव अम्बुजम्-पादाम्बुजम्) का बाधक प्रमाण 'मक्जीरशिक्षित' की उक्ति में उपलब्ध है, क्योंकि 'मऔजीर की शिज्षा' 'पाद' (चरण) में 'अम्बुज' के तादात्म्यारोप के इसलिये प्रतिकूल पड़ती है क्योंकि 'अम्बुज' में ग्जीर-ध्वनि असंभव है, वहाँ इसके साथ यहां वस्तुतः अभिप्रेत 'उपमा' (पादः अम्बुजमिव पादाम्बु- जम्) का 'संदेह-संकर' कैसे ! यहां 'मन्जीरशिक्षित' की उक्ति 'चरण' के लिये अनुकूल होने से 'उपमा' का साधक प्रमाण भी नहीं मानी जा सकती क्योंकि इसके द्वारा 'पाद' में 'अम्बुज' के तादात्म्यारोप विधान (रूपक) का जैसे उग्ररूप से उपमर्दन (निराकरण) किया जा रहा है वैसे उपमा का समर्थन नहीं। वस्तुतः साधक अथवा बाधक प्रमाण के सद्भाव में दो अलंकारों के संदेह-संकर की संभावना इसी प्रकार काव्यरसिक अन्यत्र स्वयं भी दूर कर सकते हैं। टिप्पणी-यहाँ काव्यप्रकाशकार ने संदेह संकर के निरूपण में आचार्य उद्भट की इस संदेह- संकर-परिभाषा अर्थात्- 'अनेकालंक्रियोल्लेखे समं तद्वृत्यसंभवे। एकस्य च ग्रहे न्यायदोषाभावे च संकरः॥' (काव्यालंकार सार संग्र६ ५.११) का आधार स्व्रीकार किया है। इस परिभाषा में 'न्याय' और 'दोष' साधक और बाधक प्रमाण का जो संकेत है उसका स्पष्टीकरण श्री प्रतीहार इन्दुराज का किया हुआ है :-

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४५२ काव्यप्रकाश:

('संकर' का तीसरा प्रकार-एक पद प्रतिपाद्यरूप संकर) (२१०) स्फुटमेकत्र विषये शब्दार्थालंकृतिद्वयम्। व्यवस्थितं च, अभिन्ने एव पदे स्फुटतया यदुभावपि शब्दार्थालङ्कारौ व्यवस्थां समासा- द्यतः सोऽप्यपर: संकरः! उदाहरणम्- स्पष्टोल्लसत्किरण केसरसूर्यबिम्बविस्तीर्णकणिकमथो दिवसारविन्दम्।

अत्रैकपदानुप्रविष्टौ रूपकानुप्रासौ। ('संकर' के त्रैविध्य का स्पष्टीकरण ) (२११) तेनासौ त्रिरूपः परिकीर्तितः ॥ १४१ ॥ 'ननु यद्यनेकालंकारोल्लेखे युगपद्वृत्यसंभवे च संदेहसंकरत्वमेवं सति यत्र प्रतिभा मात्रेणानेकस्मिन्नलद्टारे उल्लिख्यमाने यस्य साधकं प्रमाणसस्ति स उपादीयते यस्य तु बाधकं प्रमाणं विद्यते स त्यज्यते तत्राप्यने कालंकारोल्लेखस्य समं तद्वृत्य संभवस्य चसंभवात् संदेहसंकरत्वं प्रसज्जतीत्याशङ्कयोक्तम्-एकस्य च ग्रहे न्यायदोषाभावे चेति। न्यायः सा- धकं प्रमाणं दोषोबाधकं प्रमाणम्। यत्राऽनेकालंकारोल्लेखे युगपद्वृश्य संभवे च एकतरस्य ग्रहणे साधकबाधके प्रमाणे समस्तव्यस्ततया न विद्येते तत्र संदेहसंकरः। तेन नानिष्ट प्रसङ्ग: । तथा हि यत्र साधकबाधके प्रमाणे सामस्त्येन विद्येते तत्र यस्य साधकं प्रमाण- मस्ति तस्योपादानादबाघकस्य प्रमाणोपेतस्य च त्यागादेकस्य ग्रहणं भवति। यत्रापि साधकबाधकप्रमाणयोवैयस्त्येनाऽन्यतरस्य विद्यमानता तन्रापि प्रतिभोव्लिख्यमानानेका- लङ्कारमध्यात् साधकप्रमाणोपेतस्योपादानात् प्रमाणशून्यस्य चोपेच्यत्वात्तथा दाघकप्रमाणो- पेतस्य परित्यागात्तदितरस्य च पूर्वोल्लिखितस्य पारिशेष्येणोपादानादेकस्य ग्रहो भवति। यत्र तु साधकबाधकप्रमाणाभावस्तत्र संदेह एव। (काव्यालंकारसारसंग्रह लघुवृत्ति पृष्ठ ६८-६९)

प्रतीत हो रहे हैं। यहाँ काव्यप्रकाशकार वस्तुतः इन्दुराज की उपर्युक्त न्याय दोष समीक्षा का ही अनुसरण करते

अनुवाद-यह 'संकर-प्रकार' वह है जिसे एक समान पद में शब्द और अर्थ दोनों के अलंकारों की अवस्थिति कहा करते हैं। 'संकर' का एक और प्रकार वह है जिसमें एक ही (सुबन्त अथवा तिडन्तरूप) पद

के लिये- अथवा पद-समूह के शब्दालंकार और अर्थालंकार दोनों उपस्थित रहा करते हैं। उदाहरण 'यह 'दिवसारविन्द' (दिन-कमल) जिसका बीजकोश पूर्ण प्रकाशित किरण केसरो से विभूषित सूर्यबिम्ब के रूप में झलक रहा है, जिसका पटल-संकोच आठों दिशाओं के प्रदोषकालीन अन्धकार के आवरण में प्रतीत हो रहा है और जिसकी मधुपावली तमस्तोम के रूप में भीतर घिरी है, अब बंद पड़ा दिखाई दे रहा है।' (हरविजय १९) यहां 'एकपदप्रतिपादय संकर' है क्योंकि एक पद में ('किरणकेसर' सूर्यबिम्बविस्तीर्ण- कर्णिक' और 'दिग्दलकलाप' इन प्रत्येक पदों में) 'रूपक' तथा 'अनुप्रास'-(एक अर्थालंकार और दूसरा शब्दालंकार) दोनों अवस्थित हैं। इस प्रकार पूर्वप्रतिपादित दृष्टि से 'संकर' के तीन भेद सिद्ध हैं। टिप्पणी-भामह की दृष्टि में तो 'संकर' कोई भलंकार-प्रकार ह नहीं। यद्यपि दण्डी की 139 'नानालंकार संसृष्टिः संकीण तु निगदते। अङ्गाङ्गिभावावस्थानं सर्वेषां समकक्षता। हत्यलक्कार संसृष्टेर्लक्षणीया हयी गतिः ॥' (काव्यादर्श २ं.३५९-३६०)

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दशम उलास: ४५३

तदयमनुगाह्यानुग्राहकतया सन्देहेन एकपदप्रतिपाद्यतया च व्यवस्थितत्वा- त्त्रिप्रकार एव संकरो व्याकृतः । प्रकारान्तरेण तु न शक्यो व्याकर्तुम् आन- न्त्यात्तत्प्रभेदानामिति प्रतिपादिता: शब्दार्थोभयगतत्वरेन त्रैविष्यजुषोऽलङ्काराः। कुतः पुनरेष नियमो यदेतेषां तुल्येऽपि काव्यशोभातिशयहेतुत्वे कश्चिदलङ्कारः शब्दस्य कश्चिदर्थस्य कश्िचचोभयस्येति चेत्। (अलंकारों के श्रेणी-विभाग का आधार 'अन्वय-व्यतिरेक' का सिद्धान्त) उक्तमत्र यथा काव्ये दोषगुणालङ्काराणं शब्दार्थोभयगतत्वेन व्यवस्थाया- मन्वयव्यतिरेकावेत प्रभवतःनिमित्तान्तरस्याभावात्। ततश्च योऽलङ्कारो यदीया- न्वयव्यतिरेकावनुविधत्ते स तदलङ्गारो व्यवस्थाप्यते इति, एवं च यथा पुनरुक्त- इस उक्ति में 'संकाण' शब्द का प्रयोग हे किन्तु यहाँ यह स्पष्ट है कि संकर और संसृष्टि में कोई

प्रतीत होता है- भेद-भाव नहीं रखा गया। 'संकर' का 'संसृष्टि' से पृथक विश्लेषण तो सर्वप्रथम उन्भट का किया

अनेकालङ क्रियोल्लेखे समं तद्वृत्यसंभवे। एकस्य च ग्रहे न्यायदोषाऽमावे च संकरः॥ शब्दार्थवर्त्यलंकारा वाक्य एकत्र भासिनः। संकरो वैकवाक्यांशप्रवेशाद्वाभिधीयते॥ परस्परोपकारेण यत्रालंकृतयः स्थिताः। स्वातन्त्र्येणात्मलाभं नो लभन्ते सोऽपि संकरः॥ (काव्यालंकारसारसंग्रह ५.११-१३) और उद्धट के व्याख्याकार इन्दुराज का सर्वप्रथम 'संकर' के चार भेदों का नामकरण किया मिलता है। बाद के आलंकारिकों जैसे कि 'रुय्पक' और 'काव्यप्रकाशकार' के संकरनिरूपण में चस्तुतः उन्भट और इन्दुराज की संकर-मीमांसा का हो प्रभाव स्पष्ट झलकता है। काव्यप्रकाशकार ने उ्भट और इन्दुराज के द्वितीय संकर-भेद (शन्दार्थवर्त्यलंकारा वाक्य एकत्र भासिनः। संकरो वा) को 'संसृष्टि' सिद्ध कर संकर के तीन ही प्रकार माने हैं। अनुवाद-यहाँ अङ्गाङ्गिभाव, संदेह तथा एकपदप्रतिपाद्यता की त्रिविधव्यवस्था के आधार पर 'संकर' के तीन भेदों का प्रतिपादन किया गया है। यहाँ किसी अन्य व्यवस्था जैसे कि उपमा-रूपक, अनुप्रास-उपभा, अनुप्रास-रूपक इत्यादि ढंग से पृथक-पृथक् अलंकारों की सांकर्य-व्यवस्था) का आश्रय लेना वस्तुतः इसलिये असंभव है क्योंकि पृथक-पृथक अलंकारों के 'सांकर्य' में 'संकर' के अनन्त भेद-प्रभेदों का न तो कोई निरूपण संभव है और न निर्णय। अन्त में यहाँ यह कहना उचित प्रतीत होता है कि जिन-जिन अलंकारों का (नवम तथा दशम उल्लास में) अब तक प्रतिपादन किया जा चुका है, वे (१) शब्दालंकार, (२) अर्थालंकार और(३)उभयालंकार, इन तीन ही श्रेणियों में विभक्त तथा समन्वित हैं। यहाँ यह कहा जा सकता है कि जब अलंकारों में काव्य की शोभा-वर्द्धकता की दष्टि से कोई भेद नहीं तब क्योंकर किसी अलक्कार को शब्दमात्र का अलङ्कार, किसी को अर्थ-मात्र का अलङ्कार और किसी को शब्द और अर्थ दोनों का अलंकार मान लिया जाय। किन्तु ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि जैसा कि पहले ही (अर्थात् नवम उल्लास में, श्लेपालङ्कार-निरूपण के प्रसंग में) कहा जा चुका है, काव्य में दोष, गुण और अलङ्गारों की जो भी व्यवस्था है उसमें एकमात्र 'अनन्वय-व्यतिरेक' के सिद्धान्त का ही हाथ है जिसके आधार पर किसी दोष अथवा गुण अथवा अलङ्कार को शब्द, अर्थ अथवा शब्दार्थ का दोष, गुण अथवा अलङ्कार कहा जाया करता है। तात्पर्य यह है कि (दोष, गुण अथवा) अलङ्कारों के कक्षा-विभाग में अन्य किसी सिद्धान्त के कार्यकर न होने से यही मानना युक्तिसंगत प्रतीत होता है कि जो अलङ्कार शब्द अथवा अर्थ अथवा शब्द और अर्थ में जिस किसी के अन्वय (सद्भाव ) और व्यतिरेक (असद्भाव) का अनुसरण करे उसे उसी (शब्द अथवा अर्थ अथवा शब्द और अर्थ दोनों) का अलक्कार मानना

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४५४ काव्यप्रकाश:

वदाभास: परम्परितरूपकं चोभयोर्भावाभावानुविधायितया उभयाSलङ्कारौ तथा शब्दहेतुकार्थान्तरन्यासप्रभृतयोऽपि द्रष्टव्याः । अर्थस्य तुतत्र वैचित्र्यम्। उत्क- टतया प्रतिभासते इति वाच्यालक्कारमध्ये वस्तुस्थितिमनपेत्यैव लक्षिताः । (अलंकारों के श्रेणी-विभाग में आरश्रयाश्रयिभाव-व्यवस्था) योऽलक्कारो यदाश्रितः स तदलङ्कार इत्यपि कल्पनायाम् अन्वयव्यतिरेकावेव उचित है। कुछ अलंकारो जैसे कि 'पुनरुक्तवदाभास' (जैसे कि 'तनुवपुरजन्योऽसौ' आदि नवम उल्लास में उद्ष्टत संदर्भ) और परम्परितरूपक (जैसे कि 'विद्वन्भावसहंस' आदि) को जो उभयालंकार कहा जाता है वह वस्तुतः 'अन्वय-व्यतिरेक' की व्यवस्था के आधार पर ही, क्योंकि इनमें जो बात दिखाई देती है वह यही है कि ये अलंकार शब्द और अर्थ दोनों के 'अन्वय' (सद्भाव) और 'व्यतिरेक' (असद्भाव) का अनुसरण किया करते हैं ( जैसे कि 'तनुवपुः' आदि में 'तनु' शब्द तो परिवृत्यसह है-हटाया नहीं जा सकता, he sho A8 इसलिये 'तनु' शब्द के भाव में होने और अभाव में न होने से यहाँ पुनरुक्तवदाभास शब्द का अलद्कार है और 'वपुः' शब्द ऐसा है जो परिवृत्ति सह है-हटाया जा सकता है, इसलिये इसके पर्यायवाचक शब्द के सद्भाव में भी इस अलङ्कार के होने से यहाँ पुनरुक्त- वदाभास अर्थ का अलंकार है। इसी प्रकार 'विद्वन्मानसहंस' आदि में 'मानस' शब्द के परिवृत्यसह होने और 'हंस' शब्द के परिवृत्ति-सह होने के कारण यहाँ जो रूपक है वह शब्दगत और अर्थगत दोनों है)। इसी प्रकार अन्य भी अलंकार जैसे कि-'अर्थान्तरन्यास' आदि, वस्तुतः जहाँ वाचक अथवा शब्द के अन्वय-व्यतिरेक का अनुसरण किया करें, वहां उभयालंकार ही कहे जाने चाहिये। यद्यपि वस्तुस्थिति यही है कि ये अलङ्कार उभ- यालंकार हैं किन्तु इन्हें इस दृष्टि से वाच्य अथवा अर्थ के अलद्कारों की श्रेणी में रखा गया है कि इनमें वाचक वैचित्र्य की अपेक्षा वाच्य चैचित्र्य की प्रतीति विशेषरूप से चमत्कारजनक हुआ करती है। (इसी प्रकार जहाँ वाचक-वैचित्र्य ही विशेष प्रतीत हो वहां 'पुनरुक्तवदाभास' आदि शब्द के अलंकारों की ही श्रेणी में रखे गये हैं।) अलंकारों के श्रेणी-विभाग के सम्बन्ध में ऐसी जो कल्पना की गयी है कि जो अलंकार शब्द अथवा अर्थ अथवा शब्द और अर्थ में जिस पर आश्रित हो उसे उसी का अर्थात् शब्द अथवा अर्थ अथवा शब्द और अर्थ का अलङ्कार कहा जाना चाहिये, यद्यपि 'आश्र- याश्रयिभाव' का निर्देश करती है किन्तु यहां भी वस्तुतः 'अन्वय व्यतिरेक' का ही सिद्धान्त निर्णायकरूप से उपस्थित है। जब तक 'अन्वय-व्यतिरेक'रूप निर्णायक का आधार न माना जाय तब तक 'आश्रयाश्रयिभाव' की व्यवस्था ऐसी विशिष्ट व्यवस्था नहीं वन सकती जिस पर निर्भर हुआ जाय और निश्चितरूप से कहा जाय कि अमुक अलद्कार शब्द के, अमुक अर्थ के और अमुक शब्द और अर्थ के अलङ्कार हैं। (क्योंकि यदि अन्वयव्यतिरेक के बिना केवल 'आश्रयाश्रयिभाव' को ही अलङ्कार विभाग का आधार मान लिया जाय तो 'उत्प्रेक्षा' को, जहां संभावना का आश्रय कत्रि का चित्त हुआ करता है, अर्थ का अलंकार कैसे कहा जा सकेगा!) अन्ततोगत्वा निष्कर्ष यही निकला कि अलद्वारों के कक्षा-विभाग में (आश्रयाश्रयिभाव नहीं अपितु) 'अन्वय- व्यतिरेक' ही वस्तुतः निर्णायक है और इसी के आधार पर शब्दालक्कार और अर्थालक्कार का परस्पर भेद समीचीनरूप से समझा समझाया जा सकता है। टिप्पणी-यहाँ 'काव्यप्रकाश'कार ने 'अलंकारसर्वस्व' का अलक्कार-विभाग-निर्णयसम्बन्धी 'आश्रयाश्रयिभाव' व्यवस्था की आलोचना की है। अलंकारसर्वस्वकार की दृष्टि में शब्दालंकार, अर्थालंकार और उमयालंकार के भेद का आधार अन्वयव्यतिरेक का सिद्धान्त नहीं अपितु आश्रया- श्रविभाव (उपस्कार्योपस्कारकमाव) का सिद्धान्त है- 'लोकवदाश्याश्रयिभावश्च तत्तदलक्कारनिबन्धनम्। अन्वयव्यतिरेकौ तु तत्कार्यत्वे

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दशम उल्लास: ४५५

समाश्रयितव्यौ। तदाश्रयणमन्तरेण विशिष्टस्याश्रयाश्रयिभावस्याभावादित्यलङ्का- राणां यथोक्तनिभित्त एव परस्परव्यतिरेको ज्यायान्। (अलंकार दोष और उनका दोष सामान्य में अन्तर्भाव ) (२१२) एषां दोषा यथायोगं सम्भवन्तोऽपि केचन। उक्ेष्वन्तर्भवन्तीति न पृथक् प्रतिपादिताः ॥१४२। (अनुप्रास के दोषों का पूर्वोक्त दोषों में अन्तर्भाव ) तथा हि अनुप्रासस्य प्रसिद्धच्यभावो वैफल्यं वृत्तिविरोध इति ये त्रयो दोषा: ते प्रसिद्धिविरुद्धताम् अपुष्टार्थत्वं प्रतिकूलवर्णतां च यथाक्रमं न व्यतिक्रामन्ति तत्स्वभावत्वात्। क्रमेणोदाहरणम्- चक्री चक्रारपड्किं हरिरपि च हरीन् धूर्जटिर्धूर्ध्वजाग्रान् अक्षं नक्षत्रनाथोऽरुणमपि वरुण: कूबराग्रं कुबेरः। रंह: संघः सुराणां जगदुपकृतये नित्ययुक्तस्य यस्य स्तौति प्रीतिप्रसन्नोऽन्वहमहिमरुचेः सोऽवतात्स्यन्दनो वः ॥५=०॥ प्रयोजकौ। न तदलङ्कारत्वे। तदलङ्कारप्रयोजकत्वे तु श्रौतोपमादेरपि शब्दालङ्कारत्वप्रसङ्गात्। तस्मादाश्रयाश्रयिभावेनैव चिरन्तनमतानुसृतिरिति।' (अलंकारसर्वस्व 'काव्यमाला' पृष्ठ २५७) अलंकार विभाजन की आश्रयाश्रयभाव-व्यवस्था' एक प्राचीन व्यवस्था है। भोजराज ने अलंकार-विभाजन में इसी को आधारभूत माना है। इस व्यवस्था का खण्डन और इसके बदले 'अन्वयव्यतिरेक' के सिद्धान्त का समर्थन काव्यप्रकाश की अपनी मान्यता है। अनुवाद-इन अब तक प्रतिपादित अलङ्कारों में 'दोप' भी हुआ करते हैं, जिनका निरूपण प्राचीन आलक्काररिक करते आये हैं, किन्तु इनका यहाँ पृथकरूप से प्रतिपादन इसलिये अभिप्रेत नहीं क्योंकि (दोष-निरूपण-प्रकरण-७म उल्लास में ) पूर्वप्रतिपादित दोषों में ही अलंकार-दोष भी यथासंभव अन्तर्भूत हैं। टिप्पणी-'मामह' से 'रुद्रट' तक सभी प्राचीन आलंकारिक अलंकार-निरूपण के साथ-साथ अलंकार-दोष-विवेचन भी करते आये हैं। इन्हीं प्राचीन आलंकारिकों ने दोष सामान्य का भी Tp TH ahe the दिग्दर्शन कराया है। काव्यप्रकाशकार की दृष्टि में दोष-सामान्य के अतिरिक्त क्षेष-विशेष जैसे कि अलंकार-दोष आदि का निरूपण अनावश्यक है क्योंकि अलंकार दोष कोई अतिरिक्त दोष नहीं अपितु दोष-जाति में ही अन्तर्गणित हो सकते हैं। यहाँ काव्यप्रकाशकार ने भामह और रुद्रट की अलंकार-दोष-सम्बन्धी मान्यताओं की आलोचना की है और अलंकार-दोषों को दोष सामान्य में अन्तर्भूत कर अपने ग्रन्थ की सर्वाङ्गममीचीनता का भी निर्देश किया है। अनुवाद-जैसे कि 'शब्दालङ्कारों) में 'अनुप्रास' के जो ये तीन दोष अर्थात् (१) प्रसिद्धयभाव, (२) वैफल्य और (३ ) वृत्तिविरोध (प्राचीन आलक्कारिकों के द्वारा) पृथक रूप से प्रतिपादित किये गये हैं उनके सबंध में यह स्पष्ट है कि ये प्रसिद्धिविरुद्धत्व (प्रसिद्धिहतत्व), अपुष्टार्थत्व तथा प्रतिकूलवर्णत्व इन (दोष-प्रकरणोक्त) दोषों के अतिरिक्त अन्य कोई दोष नहीं क्योंकि उनका स्वरूप वही है जो इनका है। कमशः जैसे कि :- 'संसार के उपकार में नित्यतत्पर उष्णांशु भगवान् सूर्य का वह रथ आप सबका कल्याण करता रहे जिसकी चक्रारपंक्ति (पहियों में लगे कीलक समूह) की स्तुति चक्री (विष्णु) किया करते हैं, जिसके हरिगण (अश्व-समूह) की स्तुति (हरि) इन्द्र किया करते हैं, जिसके ध्वजाग्रभाग की स्तुति धूर्जटि (शिव) किया करते हैं, जिसके अन्त (चक्र) की स्तुति नक्षत्रनाथ (चन्द्र) किया करते हैं जिसके 'अरुण' सारथि की स्तुति वरुण किया करते हैं, जिसके कूबराग्र (युगन्धर-जुए) की स्तुति कुबेर किया करते हैं, और

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४५६ काव्यप्रकाश:

अत्र कर्तृकर्मप्रतिनियमेन स्तुतिः अनुप्रासानुरोधेनैव कृता न पुरातिहा- सादिषु तथा प्रतीतेति प्रसिद्धिविरोधः । भण तरुणि ! रमणमन्दिरमानन्दस्यन्दिसुन्दरेन्दुमुखि!। यदि सल्लीलोल्लापिनि गच्छससि तत् किं त्वदीयम्मे ॥ ५८१॥

परिसरणमरुणचरणे रणरणकमकारणं कुरुते ॥ ५८२॥ अत्र वाच्यस्य विचिन्त्यमानं न किंचिदाप चारुत्वं प्रतीयते इत्यपुष्टार्थतैवा- नुप्रासस्य वैफल्यम्। 'अकुण्ठोत्कण्ठया' इति। अत्र शृङ्गारे परुषवर्णाडम्बरः पूर्तोक्तरीत्या विरुध्यत इति परुषानुप्रासोऽत्र प्रतिकूलवर्णतव वृत्तिविरोधः । (यमक के दोषों का पूर्वोक्त सामान्य-दोषों में अ्र्रन्तर्भाव) यमकस्य पादत्रयगतत्वेन यमकमप्रयुक्तत्वं दोष: । यथा- भुजङ्गमस्येव मणिः सदम्भा ग्राहावकीर्णेत नदी सदम्भाः । दुरन्ततां निर्णयतोऽपि जन्तोः कर्षन्ति चेतः प्रसभं सदम्भा ॥५८३ ॥

जिसके वेग की स्तुति प्रतिदिन प्रसन्नतापूर्वक देव-संघ किया करता है।' (मयूरकृतसूर्य- शतक) यहाँ 'चक्र।' आदि के द्वारा क्रमशः 'चक्रारपंक्ति' आदि की जो स्तुति है वह केवल अनुप्रास की ही दृष्टि से उपनिबद्ध की गयी है न कि पुराण अथवा इतिहास आदि में इन- इन के द्वारा इन-इन को स्तुति के किसी वर्णन के आधार पर। इस प्रकार 'स्ताचक' और 'स्तव्य' के सम्बन्ध में किसी प्रसिद्धि के न होने पर यहां जो 'प्रसिद्धयभाव'रूपअलक्वारदोष कहा गया है वह 'प्रसिद्धिहत' के अतिरिकत और कुछ भी नहीं। इसी प्रकार यहां अर्थात्- 'भरी आनन्द-स्यन्दी किं वा सुन्दर इन्दुसदृश मुख वाली! अरी लीलापूर्ण आलाप- संखाप वाली ! अरी अलक्तक-रक्त चरण वाली सुन्दरी! कहो, ऐसा क्यों है कि जब तू अपने रमण मन्दिर (प्रियतम के घर) जाया करती है तब तेरा मणिमेखला के अनुरणन से रमणीय तथा निरन्तर शिक्जनपूर्ण मज्जीर से मनोहर वहां परिसरण (गमन) अकारण ही मेरे मन में उत्कण्ठा उत्पन्न किया करता है।' में 'अनुप्रास' के जिस 'वैफल्य'रूप दोष को अलङ्कारदोष के रूप में प्राचीन आलङ्कारिक पृथक बताया करते हैं वह वस्तुतः 'अपुष्टार्थत्व'रूप में इसीलिये अन्तर्भूत हो रहा है क्योंकि यहां जो कुछ भी वर्ण-वैचित्र्य है उसके द्वारा यहां 'वाच्य' अर्थ में, चाहे जितना भी सोचा जाय, कोई भी सौन्दर्य उत्पन्न होता नहीं प्रतीत होता। इसी प्रकार (सप्तम उल्लास में उदाहृत) 'अकुण्ठोत्कण्ठय।' इत्यादि सूक्ति में जिस 'वृत्ति-विरोध' रूप अनुप्रास-दोष का पृथक परिगणन किया गया है वह मी 'प्रतिकूल- वर्णत्व' रूप (सामान्य) दोष में ही समा जाता है क्योंकि यहां जो परुषावृत्ति में अनुप्रास है (जिसमें ठकाररूप) कर्कश वर्ण-विन्यास चित्त का वितोभक हो रहा है, वह, जैसा कि (अष्टम उल्लास के गुण निरूपण-प्रसंग में) पहले कहा जा चुका है, शङ्गार-रस के (जिसके लिये उपनागरिका वृत्ति उचित है) सर्वथा प्रतिकूल है। इसी प्रकार 'यमक' का तीन चरणों में निबन्धरूप जो दोष 'अलंकार-दोष' मानकर पृथक् परिगणित हुआ है वह भी 'अप्रयुक्तत्व'रूप (सामान्य) दोष में ही अन्तर्भूत दिखायी देता है। जैसे कि :- 'सदम्भ' (कपटी) मनुष्य, सर्प के 'सदम्भ' ( चमकीले) फणामणि और भयंकर जऊजन्तुओं से भरी 'सद़ग्भ' (जल पूर्ण) नदी की भांति उस व्यक्ति का भी चित्त अपनी

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दशम उल्लास: ४५७

(उपमा के दोषों का पृथक् परिगणन अनावश्यक) ROIRPINI उपमायामुपमानस्य जातिप्रमाणगतन्यूनत्वम् अधिकता वा तादृशी अनुचि- तार्थत्वं दोषः । धर्माश्रये तु न्यूनाधिकत्वे यथाक्रमं हीनपदत्वमधिकपदत्वं च न व्यभिचरतः । क्रमेणोदाहरणम्- चण्डालैरिव युष्माभिः साहसं परमं कृतम्॥४८४॥ र्वह्निस्फुलिङ्ग इव भानुरयं चकास्ति ॥ ५८५॥ अयं पद्मासनासीनश्चक्रताको विराजते। युगादौ भगवान्वेधा विनिर्मित्सुरिव प्रजाः ॥५६ । पातालमिव ते नाभिः स्तनौ क्षितिधरोपमौ। वेणीदण्ड: पुनरयं कालिन्दीपातसन्निभः ॥ ५६७ ॥ अत्र चण्डालादिभिरुपमाने: प्रस्तुतोऽर्थोऽत्यथमेव कदर्थित इत्यनुचितार्थता। स मुनिर्लान्छितो मौञ्ज्या कृष्णाजिनपटं वहन्। इवांशुमान् और खींच लिया करते हैं जो उनके संग-साथ के अन्तिम दुःखद परिणाम से पूर्णतया परिचित रहा करता है।' इत्यादि में ( जो तीन चरणों में यमक-बन्ध है वह कोई अतिरिक्त अलंकार-दोष नहीं अपितु 'अप्रयुक्तत्व दोष का ही एक निदशन है क्योंकि यमक का एक-दो अथवा चारों चरणों में निबन्ध भले ही कवि-प्रयोग में प्रसिद्ध हो तीन चरणों में कदापि नहीं है)। (अर्थालंकारों के दोषों में) उपमा के 'न्यूनोपमान' और 'अधिकोपमान' रूप दोषों (जिनमें 'उपमेय' की अपेक्षा उपमान में जातिगत अथवा परिमाणगत न्यूनता अथवा अधिकता विवत्ित है) का तो 'अनुचितार्थत्व'रूप (सामान्य) दोष में ही अन्तर्भाव स्पष्ट है। इनके अतिरिकत उपमा के 'न्यूनधर्मत्व' और 'अधिकधर्मत्व'रूप साधारणधर्म- सम्बन्धी दोष भी कोई पृथक दोष नहीं क्योंकि इनका जो कुछ स्वरूप है वह क्रमशः 'हीनपदृत्व' और 'अधिकपदत्व'रूप सामन्य दोषों के स्वरूप से कदापि भिन्न नहीं। उदाहरण के लिये क्रमश :- १. 'चण्डालों के समान तुम लोगों ने महासाहस (दुष्करकर्म) कर दिखाया।' २. 'अझनिस्फुलिङ्ग की भांति यह सूर्य चमक रहा है!' ३. 'पद्म के आसन पर आसीन किंवा सृष्टि के प्रारम्भ में संसार निर्माण के इच्छुक ब्रह्मा के समान यह चक्रवाक विराज रहा है।' ४. 'तुम्हारी नाभि ठहरी पाताल सी, दोनों स्तन रहे दो पर्वतों की भांति और बालों का यह वेणीवन्ध ! यह तो यमुनाप्रवाह सा ही है।' इन उपर्युक्त रचनाओं में जो 'न्यूनोपमान' और 'अधिकोपमान' रूप दोष हैं वे उपमा- अलंकार के कोई विशिष्ट दोष नहीं अपितु (पूर्वप्रतिपादित) 'अनुचितार्थत्व'रूप सामान्य दोष के ही निदर्शन-प्रकार हैं क्योंकि 'चण्डाल' आदि निकृष्ट उपमानों के द्वारा 'शूर सैनिक' आदि उपमेयों में निन्दा और उपहास आदि का जो अभिप्रायप्रकाशन है वह 'अनु- चितार्थता' अर्थानौचित्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इसी प्रकार- ५ 'मुअ-मेखला से सुशोभित किंवा कृष्णमृगचर्मधारी वे मुनि (नारद) ऐसे लगने लगे जैसे नील नीरदखण्ड से संपृक्त्त सूर्य हों!' इस उक्ति में जिस 'न्यूनधर्मत्व'रूप अलंकार-दोष का प्रतिपादन किया गया है वह

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४५८ काव्यप्रकाश:

अत्रोपमानस्य मौस्ीस्थानीयस्तडिल्लक्षणो धर्मः केनापि पदेन न प्रतिपा- दित इति हीनपदत्वम्। स पीतवासा: प्रगृहीतशार्ङ्गो मनोज्ञभीमं वपुराप कृष्णः । शतहदेन्द्रायुधवान्निशायां संसृज्यमान: शशिनेव मेघः ॥ ५८६॥ अत्रोपमेयस्य शङ्गादेरनिर्देशे शशिनो ग्रहणमतिरिच्यते इत्यधिकपदत्वम्। लिङ्गवचनभेदोऽपि उपमानोपमेययोः साधारणं चेत् धर्ममन्यरूपं कुर्यात्तदा एक- तरस्यैव तद्धर्मसमन्वयावगतेःसविशेषणस्यैव तस्योपमानत्वमुपमेयत्वं वा प्रती- यमानेन धर्मेण प्रतीयते इति प्रक्रान्तस्यार्थस्य स्फुटमनिर्वाहादस्य भग्नप्रक्रम- रूपत्वम्। यथा -- चिन्तारत्नमिव च्युतोऽसि करतो धिङ्ान्दभाग्यस्य मे ॥ ५६० ॥ सक्तवो भक्षिता देव ! शुद्धाः कुलवधूरिव ॥ ५६१ ॥ वस्तुतः 'हीनपदत्व' नामक सामान्य दोष में ही अन्तर्भूत है क्योंकि यहां मुन्जमेखला लां्छुनरूप उपमेय (नारद) गत धर्म का तो शब्दतः प्रतिपादन है किन्तु उसके स्थानीय विद्यल्लतारूप उपमान (सूर्य) गत धर्म का किसी भी पद के द्वारा न तो प्रतिपादन है और न यथाकथञ्चित् प्रत्यायन। यही बात इस उक्ति अर्थात्- ६. 'पीताम्बरधारी किंवा शा्ङ्गधनुर्धर कृष्ण का शरीर विद्युत् और इन्द्रधनुष से युक्त तथा चन्द्रमा से संक्रिष्ट रात के मेघ के समान सुन्दर और भयंकर लगने लगा।' में जो 'अधिकधर्मत्व'रूप अलंकार-दोष है वह वस्तुतः 'अधिकपदृत्व' नामक दोष से कोई अतिरिक्त दोष नहीं क्योंकि उपमेय (श्रीकृष्ण) में शङ्ग संपकरूप धर्म का निर्देश किये बिना उपमान (मेघ) में चन्द्र-संपर्करूप धर्म का निदंश 'अधिकपदत्व' नहीं तो और क्या है? उपमा के इन उपयुक्त दोषों के अतिरिक्तऔर भी जो 'भन्नलिङ्गत्व' और 'भिन्नवचनत्व' नामक दो दोष प्राचीन आलकारिका ने निरूपित किये हैं वे भा वस्तुतः 'भअ्नप्रक्रमत्व' नामक प्रसिद्ध दोष में ही समा जाते हैं क्योंकि उपमान और उपमेय में यदि लिङ्गभेद और वचनभेद रहे तब साधारण धम के रूप में अभिप्रेत धर्म आसाधारण प्रतीत होने लगे और जब ऐसी बात हो जाय तब साधारण धर्म के रूप में उपात्त उस धर्म का सम्बन्ध उपमान और उपमेय दोनों से न होकर किसी एक से ही रह जाय और इसका परिणाम क्या निकले! यही कि जहां जो उपमानोपमेयभाव (औपस्य) स्त्रभावतः साधारणधर्मरूप उपात्त विशेपण से विशिष्ट वस्तुओं में रहना चाहिये वहां वह यथाकथञ्जित् (लिङ्ग अथवा वचन विपरिणाम आदि के द्वारा) आचिप्त (अध्याहृत) और इसीलिय अनुपात्त साधर्म्य के द्वारा अपना निर्वाह करता दिखाई दिया करे। यह सब 'भग्नप्रक्रमत्व' के अतिरिक्त और क्या है? उपमाका प्रक्रम तो कर दिया गया किन्तु उसका निर्वाह न किया जा सका क्योंकि जब लिङ्ग अथवा वचन का विपरिणाम करने पर औपम्य की प्रतीति हुई तो उपमा के प्रक्रम (उपोद्धात) को भंग न हुआ तो और क्या हुआ। उदाहरण के लिये ये उक्तियां अर्थात्- ७. 'मैं भी कैसा अभागा हूँ कि तुम मेरे हाथ में आकार भी वैसे ही कहीं खो गये जसे चिन्तारत्न (चिन्तामणि) खो जाय।' ८. 'राजन् ! मैंने कुलवधू सरीखे पवित्र सत्त का आस्वाद लिया।' पर्याय हैं (जिनमें पहले अर्थात् 'चिन्तारत्नमिव' आदि में 'च्युतः' रूप जो साधारग धर्म उपात्त है वह पुल्लिंग पुरुषरूप उपमेय में तो अन्वित हो रहा है किन्तु 'चिन्तारतम्' इस नपुंसकलिङ्ग में उपमान में बिना लिङ्गविपरिणाम के घटित नहीं होता जिसका परिणाम यह होता है कि वाच्यधर्मविशिष्ट उपमेय का प्रक्रम आतिप्त (अध्याहृत) धर्मविशिष्ट उपमान के द्वारा खण्डित हो जाता है। इसी प्रकार दूसरे अर्थात् 'सक्तवो भक्षिताः' आदि में बहुत्वविशिष्ट शुद्धत्वरूप उपात्त साधारण धर्म तो 'सक्तवः' रूप उपमेय में संगत है

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दशम उल्लास: ४५६

यत्र तु नानात्वेऽपि लिङ्गवचनयोः सामान्याभिधायि पदं स्वरूपभेदं नाप- द्यते न तत्रैतद्दूषणावतारः उभयथापि अस्यानुगमक्षमस्त्रभावत्वात्। यथा- गुणैरनध्यैः प्रथितो रत्नैरिव महार्णवः ॥ ५६२॥ तद्वेबोऽसदशोऽन्याभिः स्त्रीभिर्मधुरताभृतः । दधते स्म परां शोभां तदीया विभ्रमा इव॥ ५६३॥ कालपुरुषविध्यादिभेदेऽपि न तथा प्रतीतिरस्खलितरूपतया विश्रान्तिमा- साद्यतीत्यसावपि भग्नप्रक्रमतयैव व्याप्तः । यथा- अतिथिं नाम काकुत्स्थातपुत्रमाप कुमुद्वती। किन्तु एकत्वविशिष्ट वधूरूप उपमान में बिना वचन-विपरिणाम के सर्वथा असंगत ! और इसका परिणाम यही कि उपमेय के वाच्य साधारण धर्म का प्रक्रम उपमान में साधारण धर्म के आक्षेप अथवा अध्याहार के द्वारा टूट जाय)। यह एक दूसरी बात है कि लिङ्भेद अथवा वचनभेद के रहते हुये भी वहाँ यह 'भझ्नप्रक्रमत्व' रूप दोष नहीं रहा करता जहाँ साधारण धर्म का वाचक पद ऐसा हुआ करता है जिसका स्वरूप इसलिये नहीं बिगड़ा करता क्योंकि वह उपमेय और उपमान दोनों में अनायास समन्विता हो जाया करता है। जैसे कि- ९. 'जिस प्रकार (अनर्ध्य) बहुमूल्य रतनों से महासागर प्रसिद्ध है उसी प्रकार (अनर्ध्य) पूजनीय गुणों से यह राजा प्रसिद्ध है।' १० 'उस नायिका का 'मधुरताभृतः' माधुर्यपूर्ण किंवा 'अन्याभिः स्त्रीभिरसदृशः' अन्य युवतियों के असमान वह वेष वस्तुतः उसी के 'मधुरतामृतः' मधुरता से भरे किंवा 'अन्याभिः स्त्रीभिरसदृशः' अन्य युवतियों से सर्वथा विचित्र लगने वाले विभ्रमों-हावभावों के समान अत्यन्त सुन्दर लगने लगा।' में पहले अर्थात् 'गुणैरनध्यैः' आदि में उपमेयभूत 'गुण' और उपमानभूत 'रत्न' के परस्पर भिन्न-भिन्न लिङ्गवाचक शब्द होने पर भी 'अनध्यैः' इस बहुवचनान्त साधारण धर्मरूप विशेषण का उनके साथ अपने उपात्त स्वरूप में ही अनायास अन्वय हो रहा है और दूसरे अर्थात् 'तद्वेषः' इत्यादि में उपमेयभूत 'वेषः' और उपमानभूत 'विभ्रमाः' के परस्पर भिन्न-भिन्न वचनान्त शब्द होने पर भी 'असदशः' (समान शब्द के उपपद रहने पर दृश धातु से कर्ता के अभिप्राय में कज् प्रत्यय-समान इव पश्यतीति सदशः न सदशः 'असदृशः'-एकवचनान्तरूप तथा समान शब्द के उपपद रहने पर दश भातु से कर्त्ता के अभिप्राय में ही क्विप प्रत्यय-समाना इव दृश्यन्त इति सदशाः न सदशाः 'असदशाः' बहुवचनान्तरूप), 'मधुरताभृतः' (मधुरतया भृतः पूरितः मधुरतामृतः-एकवचनान्तरूप तथा मधुरतां बिभ्रति धारयन्तीति मधुरतामृताः-बहुवचनान्तरूप) और 'दघते' ('दध धारणे'-इस भ्वादिगणस्थ धातु के लट्-एकवचन का रूप तथा 'डुधाज् धारणपोषणयोः' इस जुहोत्यादिगणस्थ धातु के लट्-बहुवचन का रूप) इन साधारण धर्मवाचक शब्दों का इनके साथ अपने उपात्त स्वरूप में ही अन्वय स्पष्ट हो रहा है। इसलिये यहाँ लिङ्ग अथवा वचन के भेद में भी प्रकम-भंग की कोई संभावना नहीं। अब उपमा के 'काल-भेद', 'पुरुषभेद' तथा 'विधि-भेद' आदिरूप जो प्राचीन आलक्कारिक-सम्मत दोष हैं ये भी वस्तुतः कोई अतिरिक्त अलंकार दोष नहीं क्योंकि इनमें भी 'भग्नप्रक्मता' ही वस्तुतः ओतप्रोत है क्योंकि यदि कालादिभेद के होने से औपम्य की प्रतीति कुछ ऐसी विपरीत हो जाय तो कालादि-साम्य के होने से न हो तो इसे भी प्रक्रम-भङ्ग के अतिरिक और क्या कहा जा सकता है! उदाहरण के लिये- ११. 'कुमुद्वती (महारानी) ने काकुतस्थ (महाराज कुश) से अतिथि नामक पुत्र

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४६० काव्यप्रकाश:

पश्चिमाद्यामिनी यामात्प्रसादमिव चेतना ॥ ५६४।। अत्र चेतना प्रसादमाप्नोति न पुनरापेति कालभेदः। प्रत्यग्रमज्जनविशेषविविक्तमूर्तिः कौसुम्भरागरुचिरस्फुरदंशुकान्ता। विभ्राजसे मकरकेतनमर्चयन्ती बालप्रवालविटपप्रभवा लतेव ॥ ५६५॥ अत्र लता बिभ्राजते न तु बिभ्राजसे इति सम्बोध्यमाननिष्ठस्य परभागस्य असम्बोध्यमानविषयतया व्यत्यासात्पुरुषभेदः । गङ्गेव प्रवहतु ते सदैव कीर्त्तिः ॥ ४६६॥ इत्यादौ च गङ्गा प्रवहति न तु प्रवहतु इति अप्रवृत्तप्रवर्त्तनात्मनो विधेः। एवं जातीयकस्य चान्यस्यार्थस्य उपमानगतस्यासम्भवाद्विध्यादिभेदः। ननु समानमुच्चारितं प्रतीयमानं वा धर्मान्तरमुपादाय पर्यवसितायामुपमा- यामुपमेयस्य प्रकृतधमाभिसम्बन्धान्न कश्चित्कालादिभेदोऽस्ति, यत्राप्युपात्तेनैव को वैसे ही प्राप्त किया जैसे चेतना (बुद्धि) रात्रि के पिछले पहर से प्रसाद (उद्दोधन- स्फुरण) को प्राप्त करती है।' में जो कालभेद है, क्योंकि कुमुद्वती (उपमेय) के साथ जो 'अतिथि प्राप' (लिट) अतिथि (घुवंश १७ )

नामक पुत्र को 'ग्राप्त किया' का सम्बन्ध है और चेतना (उपमान) के साथ 'प्रसादं प्राम्ोति' (लट) उद्वोधन 'प्राप्त करती है' का, वह भग्नप्रक्रमता नहीं तो और क्या है? इसी प्रकार यहाँ अर्थात्- ६२. अरी! अभिनव, स्नान से स्वच्छ सुन्दर बनी, कुसुम्भराग से रंजित रमणीय परिधान वाली ! तू तो कामदेव की पूजा में लगी किसी नवपल्लव मनोहर शाखाकाण्ड की प्रसवभूमि लता सी (जो कि नवजलसेक से विशेष सुन्दर तथा कुसुम्भ की लाली की भाँति लाली लिये पुष्परज से भरी हो) सुन्दर लग रही है।' में जो 'पुरुषभेद' ('लता विभ्राजते' 'तवं विभ्राजसे') उपमानगत प्रथमपुरुष तथा (रत्नावलो १) उपमेयगत मध्यमपुरुष में परस्पर भेद-रूप दोष है वह भग्नप्रक्मता' में ही अन्तर्भूत है क्योंकि संबोधित (वासवदत्तारूप) वस्तुविषयक 'विभ्राजसे' क्रिया के शेषांशभून 'से' प्रत्यय का संबोधन के अयोग्य लता के साथ तब तक सम्बन्ध नहीं हो सकता जब तक इसका विपरिणाम ('से' का 'ते'-विभ्राजते-के रूप में परिवर्तन) न हो जाय। इसी प्रकार- १३. 'राजन् ! आपकी कीर्ति गंगा की भाँति सदा सर्वत्र प्रवाहित होती रहे।' इत्यादि प्रसङ्गों में जो 'विधि-भेद' रूप दोष है क्योंकि जहाँ 'कीर्तिः प्रवहतु' में अप्रवृत्त प्रवर्त्तनरूप (आशीर्वादात्मक)'विधि' है वहाँ (उपमानभूत) गंगा के लिये इस विधि को 'प्रवहति' के रूप में परिवर्तित करना पड़ता है, वह प्रक्रम-भंग नहीं तो और क्या है? यहाँ प्रेरणा अथवा प्रवर्त्तनारूप विधि के व्यत्यास (भेद) में इस प्रकार के 'प्रार्थन' तथा 'आशंसन' आदिरूप अन्य अर्थों के भी व्यत्यास (भेद) अन्तर्भूत हैं क्योंकि यहाँ भी ये जिस रूप से उपमेय (अथवा उपमान) में संगत होते हैं उस रूप से उपमान (अथवा उपमेय) में नहीं हुआ करते। यह सभी विध्यादिरूप दोष 'भग्नप्रक्रमता' में ही वस्तुतः समाया हुआ है। इन उपर्युक्त दोष ग्रस्त उदाहरणों के सम्बन्ध में ऐसा कहा जा सकता है कि जैसा कि यहां साधारण धर्म के ही उपात्त अथवा अध्याहृत (उच्चरित अथवा प्रतीयमान) रूप- भेद (जैसे कि 'अतिथिं नाम' आदि में साक्षात् उपात्त 'प्राप' भूतप्राप्ति से भिन्न तथा उससे आच्िप्त केवल 'प्राप्ति' रूप साधारण धर्म-भेद) के आधार पर उपमा सवथा निप्पन्न है जिसमें उपमेय के साथ भी कालादिरूप विशेषता से रहित शुद्ध साधारण धर्म का समन्वय हो रहा है इसलिये इनमें काल-भेद आदि अलंकार-दोष (वस्तुतः भगनप्रक्रमतारूप दोष) नहीं है। इसी प्रकार कुछ ऐसे भी प्रसङ्गों, जैसे कि 'युधिष्ठिर

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दशम उल्लास: ४६१

सामान्यधर्मेण उपमाऽवगम्यते यथा 'युधिष्ठिर इवायं सत्यं वदती'ति तत्र युधि- फठिर इव सत्यवाद्ययं सत्यं वद्तीति प्रतिपत्स्यामहे, सत्यवादी सत्यं वदतीति चन पौनरुक्त्यमाशङ्कनीयम् रैपोषं पुष्णातीतिवत् युधिष्ठिर इव सत्यवद्नेन सत्यवाद्ययमित्यर्थावगमात्। सत्यमेतन् , किन्तु स्थितेषु प्रयोगेषु समर्थनमिद- न्नतु स्वथा निरवद्यम् प्रस्तुतवस्तुप्रतीतिव्याघातादिति सचेतस एवात्र प्रमाणम्। असादृश्यासम्भवावप्युपमायामनुचितार्थतायामेव पदवस्यतः। यथा- ग्रथ्नामि काव्यशशिनं विततार्थरश्मिम् ॥ ५६७॥ अत्र काव्यस्य शशिना अर्थानां च रश्मिभिः साधम्य कुत्रापि न प्रतीत- भित्यनुचितार्थत्वम्। निपेततुरास्यादिव तस्य दीप्ताः शरा धनुमण्डलमध्यभाजः । जाज्वल्यमाना इव वारिधारा दिनार्धभाज: परिवेषिणोऽर्कात ॥५६८॥। इवायं सत्यं वदति' आदि में, जहाँ केवल 'सत्यं वदति' (सत्यवदनकर्तृत्व) रूप उपात्त साधर्म्य है और इस कालभेद-भिन्न साधर्म्य से न तो किसी अन्य शुद् साधर्म्य का अध्याहार संभव है और न उपादान, कालभेद-रूप दोष का एक और प्रकार का समाधान किया जा सकता है अर्थात् यह कहा जा सकता है कि 'युधिष्टिर इवायं सत्यं वदति' में (उपमेयगत सत्यवद्नक्तृत्व का उपमानगत सत्यवदनकर्तृत्व से) कालभेद प्रतीत हो रहा है वह वस्तुतः है नहीं क्योंकि 'युधिष्ठिर इवायं सत्यं वदति' में जो औप- ग्यप्रतीति है वह 'युधिष्ठिर इव सत्यवादी अयं सत्यं वदति' इस रूप में रहा करती है (अब जब कि 'युधिष्ठिर इवायं सत्यं वदति' का 'युधिष्ठिर इव सत्यवादी अयं सत्यं वदति' यह अर्थ हुआ तब कालभेद कहाँ! क्योंकि 'सत्यवादित्व-सत्यवदनशीलत्वरूप त्रैकालिक साधारणधर्म किसी एक काल से अवच्छिन्न कैसे !) और जिस प्रकार 'रपोषं पुष्णाति' '(यह व्यक्ति) धन के मुक्त हस्त से व्यय द्वारा पालन-पोषण करता है' जैसे प्रयोग में कोई पुनरुक्ति नहीं रहा करती (क्योंकि यहाँ पुष्टिरूप धात्वर्थ में ही सामान्यविशेषभाव की दृष्टि से विशेषणविशेष्यभाव अभिप्रेत है) उसी प्रकार 'युधिष्ठिर इव सत्यवादी अयं सत्यं वदति' में भी, जिसमें 'युधिष्ठिर इव सत्यवदनेन सत्यवादी अयम्' यह अर्थ स्वरूप स्पष्ट प्रतीत हुआ करता है, पुनरुक्ति कहाँ ? यह सब दोष-समाधान है! किन्तु सहृदय स्वयं ही बता सकते हैं कि यह सब क्या है ! क्योंकि वस्तुतः बात तो यह है कि एक आध प्रयोगों में भले ही 'रैपोषं पुष्णाति' के प्रयोग-नियम के समर्थन की भाँति काल-भेद का समर्थन कर दिया जाय किन्तु यह सब समर्थन इसलिये सर्वथा समीचीन नहीं क्योंकि जब प्रस्तुत वस्तु अर्थात् उपमा की प्रतीति में (साधारण धर्म की प्रतीति के चिलम्ब से) विघ्न पड़ जाय तब 'भग्नप्रक्रमत्व' का निवारण क्या हुआ और कैसे हुआ! TP उपमा के अन्य दो दोष जैसे कि 'असादृश्य' और 'असम्भव' भी कोई अतिरिक्त दोप नहीं अपितु 'अनुचितार्थत्व'रूप सामान्य दोष में ही निःसंदिग्धरूप से अन्तर्भूत दिखाई देते हैं। जैसे कि- १४. 'मैं तो किरणतुल्य अर्थ से प्रकाशमान चन्द्रसदृश काव्य की रचना में लगा हूँ।' इस उक्ति में जो 'असादृश्य' नामक उपमालङ्कार-दोष प्राचीन अलङ्गारशास्त्र में माना गया है वह 'अनुचितार्थत्व' के अतिरिक्त और कुछ नहीं क्योंकि यहाँ 'का्य' का चन्द्र से और 'अर्थ' का किरणों से जो 'सादृश्य' स्थापित किया जा रहा है वह वस्तुतः एक अनुचिन अर्थ है। क्योंकि न तो इसमें कोई कवि-प्रसिद्धि है और न कोई साध्म्य। इसी प्रकार- १५. 'जैसे मध्याह्नवर्ती कि वा कुण्डलाकार तेजोमय सूर्यबिम्ब से प्रदी जलधारा निकले वैसे ही धनुर्मण्डलमध्यवर्ती उस राजा के तूणीर से-मानों मुख से ही-प्रजज्वलित बाणवर्षा होने लगी।'

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४६२ काव्यप्रकाश:

अत्रापि ज्वलन्त्योऽम्बुधारा: सूर्यमण्डलान्निष्पतन्त्यो न सम्भवन्तीत्युपनि- बध्यमानोर्डर्थोऽनीचित्यमेव पुष्णाति । (उत्प्रेक्षा के दोषों का दोष-सामान्य में अरन्तर्भाव) उत्प्रेक्षायामाि सम्भावनं ध्रुवेवादय एव शब्दा वक्तुं सहन्ते न यथाशब्दोऽपि केवलस्यास्य साधर्म्यमेव प्रतिपादयितुं पर्याप्तत्वात् तस्य चास्यामविवक्षितत्वा- दिति तत्राशक्तिरस्यावाचकत्वं दोषः । यथा- उदयौ दीघिकागर्भान्मुकुलं मेचकोत्पलम्। नारीलोचनचातुर्यशङ्कासङ्कचितं यथा ॥५६६॥ उत्प्रेक्षितमपि तात्विकेन रूपेण परिवर्जितत्वात् निरूपाख्यप्ररयं तत्समर्थ- नाय यदर्थान्तरन्यासोपादानं तत् आलेख्यमिव गगनतलेत्यन्तमसमीचीनमिति निर्विधयत्वमेतस्यानुचितार्थतैव दोषः । यथा- इस उक्ति में जिस 'असंभव-रूप दोष का निरूपण किया गया है वह वस्तुतः 'अनुचि- तार्थत्व' में ही समाया हुआ है क्योंकि 'सूर्यमण्डल से प्रदीप्त जलधारा के वर्षणरूप' असम्भव अर्थ का उपनिबन्ध अर्थ के अनौचित्य के बढ़ाने के अतिरिक्त और क्या हो सकता है ? टिप्पणी-प्राचीन आलङ्कारिक जैसे कि भामह आदि उपमा के दोषों का दोष-सामान्य से पृथक परिगणन कर चुके हैं। भामह ने 'उपमा' के ये दोष गिनाये हैं :- 'हीनताऽसंभवो लिङ्गवचोभेदो विपर्ययः। उपमानाधिकत्वं च तेनासदृशताऽपि च ॥ त एते उपमादोषा: सप्त मेधाविनोदिताः। सोदाहरणलच्माणो वर्ष्यन्तेऽत्र च ते पृथक॥' (काव्यालक्कार २.३९-४०)

करते हुये कहा है :- वामन ने भी 'काव्यालक्कारसूत्रवृत्ति' (४र्थ अधिकरण सूत्र ४) में मामह का ही अनुसरण

'हीनत्वाधिकत्व लिङ्गचचनभेदाSसादृश्याSसंभवास्तद्दोषाः (उपमादोषा:)' सुद्रट ने उपर्युक्त उपमा-दोष-सप्तक को न मानते हये भी उपमा के ४ दोष तो माने ही हैं- 'सामान्यशब्दभेदो वैषम्यमसंभवोऽप्रसिद्धिश्व। इत्येते चत्वारो दोपा नासम्यगुपमायाः ॥' ( काव्यालक्कार ११.२४) यहाँ काव्यप्रकाशकार ने प्राचीन आलङ्कारिकों की इसी मान्यता का खण्डन किया है जो कि सर्वथा युक्तियुक्त है। काव्यप्रकाशकार ने इन उपमा-दोषों के उदाहरण भी वे ही रखे हैं जो मामह, वामन आदि आचार्यों के हैं। काव्यप्रकाश की दृष्टि वस्ततः अलक्गारशास्त्र के विषयों के निरूपण में एक वैज्ञानिक दृष्टि है। अनुवाद-उत्प्रेक्षा में 'यथा' शब्द के प्रयोग में जो 'अशक्तशब्दत्व'रूप दोष बताया गया है वह वस्तुतः कोई पृथक अलंकारदोप नहीं, अपितु 'अवाचकत्व'रूप दोष में ही अन्तर्भूत है क्योंकि 'संभावन'-'उत्प्रेक्षण' के अभिप्राय प्रकाशन में समर्थ 'ध्रुवम्', 'इव' (मन्ये, शंके) आदिके बदले केवल 'साधम्य'-प्रतिपादक 'यथा शब्द का प्रयोग एक ऐसा प्रयोग है जो इसीलिये उत्प्रेक्षा में अशक्त-असमर्थ है क्योंकि उत्प्रेक्षण का अवाचक है। जैसे कि- १. 'नीलकमल की वह कली, जो वापी के बीच निकली ऐसी निकली जैसे (अपनी अपेक्षा) नारी लोचन के सौन्दर्य के आधिक्य के कारण सिमटी-सकुचायी हुई हो।' में (जहाँ उत्प्रेक्षावाचक 'ध्रुवम्' के बदले 'संभावन' में असमर्थ 'यथा' का प्रयोग है) जो 'अशक्तशब्दत्वरूप' उत्प्रेक्षा दोष है वह 'अवाचकत्व' दोष के अतिरिक्त और क्या है? इसी प्रकार उत्प्रेक्षा का वह दोष जिसे 'निर्विषयत्व' दोष कहा जाता है, जिसका अभिप्राय वास्तविकता से सर्वथा परे और इसीलिये सर्वथा मिथ्यारूप किसी संभावित

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दशम उल्लास: ४६३

दिवाकाराद्रक्षति यो गुहासु लीनं दिवा भीतमिवान्धकारम् । क्षुद्वेऽपि नूनं शरणं प्रपन्ने ममत्वमुच्चःशिरसमतीव ॥ ६०२ ॥ अत्राचेतनस्य तमसो दिवाकरात्व्रास एव न सम्भवतीति कुत एव तत्प्रयो- जञितमद्रिणा परित्राणम्, सम्भावितेन तु रूपेण प्रतिभासमानस्यास्य न काचि- दनुपपत्तिरवतरतीति व्यर्थ एव तत्समर्थनायां यत्नः । (समासोक्ति के दोष-सामान्य में अरन्तर्भाव-समर्थन) साधारणविशेषणवशादेव समासोक्तिरनुक्तमपि उपमानविशेषं प्रकाशयतीति तस्यात्र पुनरुपादाने प्रयोजनाभावात् अनुपादेयत्वं यत्तत् अपुष्टार्थत्वं पुनरुक्तं वा दोष: । यथा- स्पृशति तिग्मरुचौ ककुभः करैदयितयेव विजुम्भिततापया। अतनुमानपरित्रहया स्थितं रुचिरया चिरयापि दिनश्रिया ॥ ६०१॥ अत्र तिग्मरुचे: ककुभां च यथा सहशविशेषणवशेन व्यक्तिविशेषपरिग्रहेण च नायकतया नायिकात्वेन च व्यक्ति: तथा ग्रीष्मदिवसश्नियोऽपि प्रतिनायिका- त्वेन भविष्यतीति कि दयितयेति स्वशब्दोपादानेन। (उत्प्रेक्षित) अर्थ के समर्थन अथवा उपपादन के लिये, शून्य में चित्र खींचने की भाँति, किसी 'अर्थान्तर न्यास का असमीचीन उपनिबन्ध है, वस्तुतः 'अनुचितार्थत्व'रूप दोष के अतिरिक्त और कुछ नहीं। जैसे कि इस सूक्ति अर्थात्- २. 'यही वह हिमालय है जो दिन में सूर्य से डरे हुये से और इसलिये कन्दराओं में लुके-छिपे अन्धकार की जान बचाया करता है और ऐसा क्यों न हो जब कि बड़ों में शरणागत छोटे के लिये भी ममता ही रहती है!' में, जहाँ न तो अचेतन अन्धकार के लिये सूर्य से डरने की बात सम्भव है और न इस (कुमार संभव १)

डर के कारण हिमालय के लिये उसे बचाने की ही, वहाँ ऐसे एकमात्र काल्पनिकरूप से प्रतीत होने वाले और इसी कारण उपपत्ति अथवा अनुपपत्तिकी संभावना से दूर अर्थ का समर्थन इसीलिये तो 'निर्विषय' होगा क्योंकि व्यर्थ का प्रयास होने से 'अनुचित' माना जायगा और अनुचित कहा जायगा ? समासोक्ति अलङ्कार में जिस 'अनुपादेयत्व'रूप अलक्कारदोष का निरूपण (प्राचीन आलक्कारिकों द्वारा) हुआ है वह वस्तुतः 'अपुष्टार्थत्व' अथवा 'पुनरुक्तत्व' (अर्थपौनरुत्तय) नामक दोष में ही अन्तर्भूत है क्योंकि साधारण विशेषण के सामर्थ्य से ही अनुक्त भी उपमानविशेष की प्रकाशिका 'समासोक्ि' में उपमान-विशेष के निष्प्रयोजन शब्दतः प्रतिपादन में जो 'अनुपादेयत्व' है वह 'अपुष्टार्थता' (प्रतीत उपमान का पुनः अभिधान जिसमें प्रस्तुत अर्थ की कोई पुष्टि न हो) अथवा 'पुनरुक्ति' (अर्थसामर्थ्य से प्रतीत भी उपमान का पुनः शब्दतः प्रतिपादन) के अतिरिक्त औौर क्या है! जैसे कि इस सूक्ति अर्थात्- ३. 'जब सूर्य ने अपने करों (किरणों तया हाथों) से दिशाओं का स्पर्श करना प्रारम्भ किया तव (ग्रीष्म) दिन-श्री अत्यन्त सन्ताप (मनःखेद) से भरी, बड़ी (पुरानी )

लगने लगी।' होने पर भी, सुन्दर तथा अत्यधिक मान(दीर्घता तथा कोप)वती किसी प्रेमिका सी में जो 'अनुपादेयत्व' नामक अलङ्कारदोष बताया गया है क्योंकि जब सूय और दिशाओं में सदृश विशेषणसामर्थ्य (कर से स्पर्श करना और कर से स्पृष्ट होना) तथा व्यक्तिविशेष (सूर्यवाचक पुँल्लिङ्ग शब्द और दिशावाचक स्त्रीलिङ्ग शब्द) के स्वीकार द्वारा नायक नायिकाभाव के स्पष्टीकरण में ग्रीष्मदिनश्री की प्रतिनायिकारूप से प्रतीति भी स्वभावतः सिद्ध है तब 'दयितया' इस उपमान शब्द के प्रयोग का क्या प्रयोजन ! इसमें या तो 'अपुष्टार्थत्व' है या 'पुनरुक्ति'।

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४६४ काव्यप्रकाश:

श्लेषोपमायास्तु स विषयः यत्रोपमानस्योपादानमन्तरेण साधारणोष्वपि विशेषणोषु न तथा प्रतीतिः। यथा- स्वयं च पल्लवाताम्रभास्वत्करविराजिता। प्रभातसन्ध्येवास्वापफललुब्धेहितप्रदा ॥ ६०२॥ इति (अप्रस्तुतप्रशंसा के दोष का दोष-सामान्य में अ्र्प्रन्तर्भाव)

नेयम्। यथा- अप्रस्तुतप्रशंसायामपि उपमेयमनयैव रीत्या प्रतीतं न पुनः प्रयोगेण कदर्थतां

आहूतेषु विहङ्गमेषु मशको नायान् पुरो वार्यते यहाँ 'स्पृशति तिग्मरुचौ' इत्यादि सूक्ति में श्लेषोपमा मानकर (यह मानकर कि यहाँ 'जैसे किसी प्रेमी के द्वारा किसा एक प्रेमिका के छुये जाने से दूसरी प्रेमिका को दुःख होता है वैसे ही सूर्य के द्वारा दिशाओं के छुए जाने से ग्रीष्मदिनश्री को सन्ताप होने लगा'-यह अर्थ है) उपमान विशेष के 'अनुपादेयत्व'रूप दोष का निवारण भी नहीं किया जा सकता क्योंकि यहाँ श्लेषोपमा कहाँ ! श्लेषोपमा तो वहां होती है, जैसे कि-'स्वयं च पल्लवाताम्र' इत्यादि सरीखी सूक्तियों में) जहाँ विशेषण के सादृश्य में भी बिना उपमान विशेष के उपादान के उपमान की वैसी स्पष्ट प्रतीति नहीं हुआ करती जैसे कि समासोक्ति में हुआ करती है (अर्थात् श्लेषोपमा तो वह है जहाँ उपात्तसाधर्म्य के उपमेयमात्र में ही अन्वित रहने के कारण उपमान का उपादान आवश्यक हो जाता है जैसे कि 'स्वयं च' आदि सूक्ति में 'प्रभातसंध्या'रूप उपमान के बिना उपमा-चमत्कार प्रतीत नहीं हो सकता किन्तु 'स्पृशति' इत्यादि में जो समासोक्ति है उसमें 'दयितया'रूप उपमान विशेष इसलिये व्यर्थ प्रतीत होता है क्योंकि साधारण विशेषण के सामर्थ्य से ही इसकी प्रतीति स्वभावतः हो जाती है)। टिप्पणी-काव्यप्रशकार की दृष्टि में 'श्लेषोपमा' कोई अलंकार नहीं। 'श्लेषोपमा' तो 'काव्यादश' की दृष्टि में एक अलंकार है जैसा कि इस उक्ति अर्थात्- 'शिशिरांशुप्रतिस्प्द्धि श्रीमत् सुरभिगन्धि च। अम्भोजमिव ते वक्त्रमिति श्लेषोपमा स्मृता ॥' (काव्यादर्श २.२८) में स्पष्ट है। यहाँ 'स्वयं च पल्लवातान्र' आदि जिस सूक्ति में 'शलेषोपमा' मानकर 'स्पृशति तिग्म- रुची' आदि सूक्ति में श्लेषोपमा की संभावना की खण्डन किया गया है वह आचार्य उद्भट के 'कुमार संभव' काव्य की सूक्ति है। किन्तु इस 'स्वयं च पल्लवातात्र' आदि सूक्ति में आचार्य उद्भट ने 'अर्थश्लिष्ट' का स्वरूप निर्धारित किया है न कि 'श्लेषोपमा' का। संभवतः श्री प्रतीहार इन्दुराज की पंक्तियों अर्थात्- 'एतयोश्च द्योरप्यर्थश्लेषशब्दश्लेषयोरुपमाप्रतिभोत्पत्तिहेतुत्वम्। 'प्रभातसंध्या' ह्यत्रो- पमानं 'भगवती' उपमेया 'इव' शब्दश्चोपमानोपमेयभावं द्योतयति। शब्दव्यतिरेकेण तु. साधारणो धर्मोडर्थाधिकरणोऽत्र न विद्यते। तेन नेयसुपमा अपितु श्लेष उपमाप्रति- भोत्पत्तिहेतुः ।' ( काव्यालंकारसारसंग्रहवृात्त, पृष्ठ ६०) की आलोचना के रूप में काव्यप्रकाशकार ने 'स्वयं चे पछलवाताम्रम्' आदि को ''्रषप्रतिभोत्पात्तहदु' उपमा मान कर इसके लिये 'श्लेषोपमा' इस संक्षिप्त शब्द का प्रयोग किया है। अनुवाद-'अप्रस्तुतप्रशंसा' में भी जो 'अनुपादेयत्व'रूप अलंकारदोष माना जाता है वह भी 'अपुष्टार्थत्व' अथवा 'पुनरुक्ति' नामक दोप में भी समा जाता है क्योंकि जब यहाँ भी साधारण विशेषणसामर्थ्य से ही प्रस्तुत (उपमेय) की प्रतीति स्वाभाविक है तब इसके प्रत्यायन के लिये पुनः शब्दोपादान 'अपुष्टार्थता' अथवा 'पुनरुक्ि' नहीं तो और क्या है! उदाहरण के लिये इस सूक्ति अर्थात् :- 'धिक्कार है उस जातिमात्र को, उस अचेतन तथा स्वरूपतारतम्य के आलोचन से शून्य किसी (अविवेकी तथा अविचारक) तुच्छ नृप सरीखे सामान्य को, जिसका यही

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दशम उल्लास: ४६५ mBuMM मध्येवारिधि वा वसंस्तृणमणिधत्ते मणीनां रुचम्। खद्योतोऽपि न कम्पते प्रचलितुं मध्येऽपि तेजस्विनां घिक् सामान्यमचेतनं प्रभुमिवानामृष्टतत्त्वान्तरम् ॥६०३ ।। अत्राचेतनस्य प्रभोरप्रस्तुतविशिष्टसामान्यद्वारेणाभिव्यक्तौ न युक्तमेव्र पुनः कथनम् । (अन्य अलंकार-दोषों का भी पृथक् गणन अनावश्यक) तदेतSलद्कारदोषा: यथासम्भविनोऽन्येऽपयेवंजातीयकाः पूर्वोक्तयैव दोषजा- त्याऽन्तर्भाविता; न पृथक् प्रतिपादनमहन्तीति सम्पूर्णमिदं काव्यलक्षणम्। (अरन्तमङ्गल ) इत्येष मार्गो विदुषां विभिन्नोऽप्यभिन्नरूपः प्रतिभासते यत्। न तद्विचित्रं यदमुत्र सम्यग्विनिमिंता सङ्वटनैव हेतुः ॥१॥ इति काव्यप्रकाशेऽर्थालङ्कारनिर्णयो नाम दशमोल्लासः।

अभिप्राय है कि पक्षियों की दौड़ में मच्छर के दौढ़ने से भी कोई क्षति नहीं, रत्नाकर में पड़े मणियों के बीच वहाँ पड़े काँच की गणना में भी आपत्ति नहीं और न प्रकाशमान पदार्थों की गणना में जुगनू के ही गिन लिये जाने में कोई दोष हो !' (भलरशतक ६९) में, जहाँ समर्थ विशेषणों से विशिष्ट सामान्य (जातिमात्र) रूप अप्रस्तुत के द्वारा ही प्रस्तुतरूप अविवेकग्रस्त किसी नृप की प्रतीति स्वाभाविक है, पुनः 'प्रभुमिव' इस रूप से प्रस्सुत का व्यर्थ उपादान 'अपुष्टार्थता' अथवा 'पुनरुक्ति' के अतिरिक्त और क्या है! निष्कर्ष यह निकला कि जब ये अलंकार-दोष और इनके अतिरिक्त और भी अलंकार दोष जो (प्राचीन आलंकारिकों द्वारा) इसी प्रकार के बताये गये हैं, वस्तुतः दोषप्रकरण में निरूपित दोप-सामान्य में ही अन्तर्भत किये जा सकते हैं, तब इनका पृथक् प्रतिपादन अनुचित नहीं तो और क्या है! (काव्यप्रकाश में काव्य-स्वरूप का पूर्णनिरूपण) उपसंहार में ऐसा निवेदन अनुचित नहीं कि अब तक काव्य स्वरूप, काव्य-प्रकार आदि का जैसा निरूषण किया गया उसे चतुरस् तथा सर्वतोभद्र समझना चाहिये। यहाँ-इस 'काव्यप्रकाश' में-जो कार्य किया गया है वह काव्य-शास्त्र के विषयों का एक चतुरस्र किंवा समीचीन गुम्फन मात्र है किन्तु यही वह गुम्फन-वैचित्र्य है जिसके द्वारा प्राचीन अलंकार-शास्त्र में पृथक-पृथक रूप से प्रतिपादित भी काव्य-विषय (अलंकार, गुण, रीति, ध्वनि, रस आदि) एके समन्वित, समक्जसरूप में झलक उठते हैं। इससे बढ़ कर एक काव्य-समीच्षात्मक कृति का और वैचिश्य क्या ! टिप्पणी-कव्यप्रकाश के इस अन्त-मङ्गल-क्रोक का अन्य अभिप्राय अर्थात् 'मम्मट की कृति की अलक द्वारा पूर्ति' का भाव भी लिया जाता आ रहा है। उदाहरण के लिये काव्यप्रकाश के सर्वप्रथम व्याख्याकार माणिकचन्द्र (११५९ ई०) ने यहाँ यह कहा है- 'अथ चायं ग्रन्थोऽन्येनारब्घोऽपरेण च समर्थित इति द्विखण्डोऽपि सङटनावशादखण्डायते। 'काव्यप्रकाशसंकेत' के रचयिता 'रु्यक' का भी ऐसा ही कथन है-'एतेन महामतीनां प्रसरणहेतुरेष ग्रन्थो अ्न्थकलाऽनेन कथमप्यसमाप्नत्वादपरेण च पूरितावशेषत्वात् द्विखण्डोऽप्यखण्डायते।' 'काव्यप्रकाशनिदर्शन' के प्रणेता राजानक आनन्द (१६६५ ई० ) ने मां यहाँ यही अभिप्राय स्पष्ट किया है- कृतः श्रीमम्मटाचार्यवर्येः परिकरावधिः। प्रबन्ध: पूरितः शेषो विधायाऽलकसूरिणा॥ इस प्रकार यहाँ निष्क्व यह है कि यह अन्त-मङ्गल 'अलक' रचित है जिसमें अलक ने मम्मट के 'परिकर' तक रचित काव्यप्रकाश की अपने द्वारा समञस पूर्ति का संकेत किया है। दशम उल्लास समाप्त

३० का०

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(अन्तमङगल)

नाटयशास्त्रस्य नाटधे तां वीक्षां प्रेक्षकसम्मताम्। काव्ये सञ्जारयामास भामहो यस्तमाभजे॥१॥ काव्यालङ्कारतश्वस्य भामहेत्ितमर्मणः काव्यादर्शे कृताऽन्वीचा दण्डिना येन तं नुवे ॥२ ॥ उन्धटं तमलक्कारसारसङग्रहकारिणम् । नुवे दृष्टाभिधातर्वं काव्याचार्यगणोद्धटाम्॥ ३॥ वामनं तं भजे येन काव्यतत्वस्य मालिका। रीतिसूत्रेण लोकस्य तुष्टयै पुष्टयै च निर्मिंता॥४॥ सर्वालक्वारसौन्दये काव्यसौन्दर्यदर्शिनम् । प्रणमामि मुदा तञ्च रुद्रटं विमलेक्षणम् ॥५॥ काव्यमानन्द इत्येवं यस्यासौ शेमुषी सदा। आनन्दवर्धनाचार्यं परानन्देन तं भजे ॥६॥ काव्यमीमांसकं नौमि नान्ना यो राजशेखरः। यस्कृतिह्यशशिष्टाऽपि चमरकारैककारणम्॥ ७ ॥ मुकुलं नौमि तं यस्य प्रज्ञालोकेन साभिधा। मुकुलीकृतकाव्यार्था काव्यज्ञैरीच्षिता पुरा॥८॥। नान्नाऽभिनवगुप्तो यः काव्याचार्यविचक्षणः। रसिकाचार्यवर्यश्र तं स्मरामि सदा हृदि॥ ९ ॥ मम्मटं तं हि पूर्वेषामेतेषामंशधारिणम्। 'काव्यप्रकाश'दानेन लोकम्पृणमथाभजे ॥ १० ॥ काव्यप्रकाशो येनाऽयं व्याख्याभिख्यासु दीपितः। सुब्रह्मणयं तमाचार्यं सेवेऽहं परया मुदा॥ ११॥ शमिति

समाप्तश्च्ाऽयं ग्रन्थ:

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काव्यप्रकाश-श्लोकानुक्रमणिका 116

इलोकाकक इ्लोकाक

अ अमितः समितः प्राप्तैः ५8 अड् पिहुलं जलकुम्भं १३ अमुष्मिल्लावण्यामृत ४३२ अकलिततपस्तेजोवीर्य २५१ अमुं कनकवर्णाभं १६

अकुण्ठोत्कण्ठया पूर्ण २०७ अमृतममृतं क: सन्देहः २१५

अखण्डमण्डलः श्रीमान् ४६७ अयमेकपदे तया वियोग: ५११

अण्णं लडहत्तणअं ५८६ ४५० अयं पद्मासनासीनः

अतन्द्वचन्द्राभरणा ७२ अयं मार्तण्ड: किं स खलु ४१८

अतिथिं नाम काकुत्स्थात् ५९४ अयं वारामेको निलय ४९०

अतिपेलवमतिपरिमित २०२ अयं स रसनोत्कर्षी ११६, ३३६

अतिचित तगगनसरणि २५५ अयं सर्वाणि शास्त्राणि ३७३

अत्ता एत्थ णिमज्इ १३६ अरातिविक्रमालोक ४0८

अत्यायतैनियमकारिभि ३९४ अरिवधदेहशरीरः ३८९

अत्युच्चा परितः स्फुरन्ति ४९६ ११८ अरुचिनिंशया विना

अत्रासीत्फणिपाश १९५ भरे रामाहस्ताभरण २८३ २७७ अन्निलोचनसम्भूत १५८ अर्थित्वे प्रकटीकृतेऽपि ३६९ अदृष्टे दर्शनोरकण्ठा अलङ्कार शङ्काकर १२८ १९७ अद्यापि स्तनशैलदुर्ग २३८ अलमति चपलत्वात् अलसशिरोमणि घुणंत्ता ५०

अद्रावत्र प्रज्बलत्यग्निरुचै: ३४५ अलं स्थित्वा शमशाने ९३

अधिकरतलतल्पं २२३ अलौकिकमहालोक ४२७

अनङ्गमङ्गलगृहा १४१ ३४७ अवन्ध्यकोपस्य १४८ अनङ्गरङ्गप्रतिमं तदङ्गं अवाप्तः प्रागल्भ्यं ४३०

अनणुरणन्मणि ५८२ अवितथमनोरथपथ ३९५

अनन्तमहिमव्याप्त ३६४ अनन्यसददशं यस्य अविरलकमलविकास: २५६ २६८ अनयेनैव राज्यश्री अविरलकरवाल १२०

४१० अष्टांगयोगपरिशीलन २७०

अनवरतकनकवितरण ४१२ असितभुजगभीषणा ४०२

अनुरागवती सन्ध्या ३८२ असिमात्रसहायस्य ४६३

अन्त्रप्रोतबृह्त्कपाल २९८ असिमात्रसहायोऽपि ४६४

अन्यत्र यूयं कुसुमावचायं २० असोढा तत्कालोल्लसद १२२

अन्यत्र बजतीति का ३३ असौ मरुच्चुम्बित १९० ३५९ अन्यास्ता गुणरत्नरोहण २१८ अस्त्रज्वाला वलीळप्रति अपसारय घनसारं २४१, ३५६ अस्या: कर्णावतंसेन २८६

अपाङ्गतरले दशौ ५४६ अस्या: सर्गविधौ ४२०

अपाङ्गसंसर्गि तरङ्गितं १८४ अयमेव गुरुः सुदारुणानां ७३८

अपूर्वमधुरामोद २८७ अहो केनेदशी बुद्धि: ३५३

अप्राकृतस्य चरितातिशयैः २३३ अहो विशालं भूपाल ५४२

जन्धेरर स्थगित ४४६ अहो हि मे बहपराद ४८१

अभिनवन लिनीकिसलय ४८२ अहौ वा हारे वा ४४

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४६८ काव्यप्रकाशः

ट्लोकाक इलोकाकू आ उपपरिसरं गोदावर्याः २६५ आकुन्च्य पाणिमशुचि ३१ उव्यसावत्र तर्वाली २१४ आकृष्टकरवालोऽसी ३९८ आगत्य सम्प्रति वियोग उल्लास्थ कालकरवाल ५४ १२५ आज्ञा शक्रशिखामणि ए २७८ आत्ते सीमन्तरत्ने ए एहि दाव सुन्दरि ५५४ ५७० आत्मारामा विहितरत एकस्त्रिधा चससि चेतसि ४७७ ३०७ आदाय चापमचलं एकस्मिन् शयने ५१

आदाय वारि परितः ३८३ १४१ ४४५ एतत्तस्य मुखारि्कियत्

आदावज्जनपुंजलि एतन्मन्दविपक्क १४२ आदित्योऽयं स्थितो २०० एद्दहमे त्तत्थ णिआ ११ ९५ आनन्दममन्दमिमं ५४० एषोऽहमद्रितनयामुख २३४ आनन्दसिन्धुरति आलानं जयकुल्जरस्य १६२ एहि गच्छ पतोत्तिष्ठ ३३९

ओ आलिंगितस्तत्र भवान् ४२६

आलोक्य कोमलकपोल १५४ ओण्णिद्दं दोब्बल्लं १४

आसीदुअनमत्रेति ३२३ ओल्लोल्लकर अरअण ७०

आहूतेषु विहंगमेषु ५०० और्सुक्येन कृतत्वरा ३३० ६७३ इ क

इद्मनुचितमक्रमश्च कः कः कुत्र न घुधुरायित २२४

इदं ते केनोकं कथय २२२ कण्ठकोणचिनिविष्ट ४५

इन्दुः किं क कलङ्कः २६४ कथमवनिपदर्पो १३४

इयं सुनयना दासीकृत ४१९ कपाले मार्जार: पयः ५५२ ४६५ कमलमनम्भसि ४४९ कमलेव मतिमतिरिव ४१५ उण णिच्चलनिष्पन्दा ८ करजुअगहिअजसोअ ५५१ उत्कम्पिनी भयपरि १८७ करवाल इवाचारस्तस्य ३९९ उत्कृश्योस्कृत्य कृत्ति करवालकरालदो:सहायो १९१ उत्तानोच्छूनमण्डूक ४२

उत्फुल्लकमलकेसर ३०४ करिहस्तेन संबाधे ३०३

१४७ कर्पूर हव दग्धोऽपि ४७५ उत्सिक्तस्य तपःपरा ५२ कर्पूरधू लिधवल ३२५ उद्यति विततोर्ध्वररिमि ४३े६ कळुषं च तवाहितेस्व ५१२ उद्यमयते दिङमालिन्यं उदेति सविता ताम्र: ४३३ कल्याणानां त्वमसि महसां १९४ २९६ उद्देशोडयं सरसकदली २४४ कल्लोलवेख्लित दषत् १७ ४४७ उदयौ दीघिकागर्भात् कस्तवं भो: कथयामि ७९९ २०५ उभ्नतं पदमवाप्य यो लघु: कस्मिन् कर्मणि सामर्थ्य

उष्निद्रकोकनदरेणु ४३८ कस्स वाण होड रोसो १३५

उन्मेषं यो मम न सहते ११४ काचित्कीर्णा रजोभि: २४९ ४१६ कातर्य केवला नीति: १८५ उपकृतं बहु तत्र २४ का विसमा देव्व गई ५२९

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श्लोकानुक्रमणिका ४६९

इ्लोकाक्क श्लोकाकक किमासेव्यं पुंसां ५२१ गाढालिङ्गनरहसुज्जुअम्मि ६६ किमिति न.पश्यसि कोपं २३९ गाढारुहम्मि गामे १०१

किमुच्यतेऽस्य भूपाल २०६ गाम्भीर्यगरिमा तस्य ३९६

किवणाणं ध्णं णागाणं ४५७ गाहन्तां महिषा निपान २५०

किसलय करलतानां ४२९ गिरयोप्यनुन्नतियुजो ४८३

किं भूषणं सुदृढमत्र ५२२ गुणानामेव दौरात्म्यात् ४८०

किं लोभेन विलंघित: १९५ गुणैरनध्येः प्रथितो ५९

कुमुदकमलनीलनीर ४६१ गुरुअणपरवशपिय २१

कुरङ्गीवाङ्गानि स्तिमितयति ४२३ गुरुजन परतन्त्रतया ३५४

कुलममलिनं भद्रामूर्ति ५०८ गृहिणीसचिवः सखी ५६२

कुविन्दस्तवं तावत्पटयसि १७३ गृहीतं येनासी: परिभव २६३

कुसुमितलताभिरहता ४७३ गोरपि यद्वाहनतां १६८

कृतमनुमतं दृष्ट वा यः ३९, २५८ ग्रथ्नामि काव्यशशिनं ५९७

कृतं च गर्वाभिमुखम् १०८ ग्रामतरुणं तरुण्या: ३

केसेषु वलामोडिअ ६५ ग्रीवाभङ्गाभिरामं ४१

कैलासस्य प्रथमशिखरे ६४ च

कैलासालयभाल चकाशत्य ङ्गनारामा: ३९० ११० कौटिल्यं कचनिचये ५२३ चकितहरिणलोललोचना ३९३ ५८० क्रामन्त्यः च्षतकोमलाः ३३८ चक्री चक्रारपंकिं

२२५ चाण्डालैरिवं युष्माभि: ५८४ क्रेङ्कारः स्मरकार्मुकस्य क्रोधं प्रभो संहर ३२९ चत्वारो वयमृस्िजः १३१

चन्द्रं गता पद्मगुणान्न २९४ ४८८ क्कव सूर्यप्रभवो वंशः ४३५ चरणत्रपरित्राण २९३

क्काकार्य- शशलघ््मणः ५३, ३३१ चापाचार्य स्त्रिपुर २०१, २३०

क्षणदासावत्तणदा चित्ते विहदृदि ण टुद्ददि ३४३ ८२ सषिप्तो हस्तावलमः ३४० चिन्रं चित्रं बत बत ५३६ चित्रं महानेष बतावतार: ४३ तीण: त्ीणोऽपि शशी ४६२ ८१ चुद्रा: सन्त्रासमेते ४० चिन्तयन्ती, जगत्सूतिं चिन्तारत्नमिव च्युतोऽसि ५९० ख १११ चिरकालपरिप्राप्त १६९ खणपाहुणआ देअर खलववहारा दीसन्ति ७४ ज

खिद्यति कुण्णति वेल्लति ४५८ जगति जयिनस्ते ते २५७

ग जगाद मधुरां वाचं २९२

गंगेव प्रवहतु ते ५९६ १५०, २३२

गच्छाम्य च्युत दर्शनेन १२७ जटाभाभिर्भाभि: करशृत ५७१

गर्वमसंवाहमिमं ५५५ जनस्थाने भ्रान्तं १२४

गाङ्गमम्बु सितमम्बु ५६५ जस्स रणंतेउरए करे ४२२

गाढकान्तदशनष्त ६३ जस्सेभ वणो तस्सेअ ५३३

३१० जह गहिरो जह रअण ५७३

3

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४७० काव्यप्रकाशः

इरोकाक्क इलोकाङ्क जं परिहरिअं तीरई २१६ ताम्बूलमृतगल्लोडयं १८० जाठेरं व हसन्ती ६७ ताला जाअन्ति गुणा ३१५ जाने कोपपराडमुखी ४७ तिग्मरुचिरप्रताप: ५४ जितेन्द्रियतया सम्यक ४६६ तिष्टेत्कोपवशात् प्रभाव ३११ जितेन्द्रियत्वं विनयस्य ३१६,५२४ तीर्थान्तरेषु स्नानेन १४५ जुगोपात्मानमन्नस्त १६४ जे लंकागिरिमेहलासु तुह चल्लहस्स गोसम्मि ८३ १४० जोह्वइ महुरसेण ६८ वे दृष्टिमात्रपतिता ९२ ज्याबन्धनिप्पन्दभुजेन तेऽनयैर्वान्तं समश्नन्ति १७६

ज्योत्साभस्मच्छुरणधवल २८९ ते हिमालयमामन्वय ३४६

जोत्स्ना मौक्तिकदाम ४२१ त्वमेवं सौन्दर्या स च २२८

जोतस्नेव नयनानन्द ४७२ त्तयि दष्ट एव तस्या: ४५५ त्वयि निवद्धरतेः प्रिय २३५ ट त्वं मुग्धात्ि चिनैव ३१ टुण्टुण्णंतो मरिहसि ४०७ त्वं विनिजितमनोभव ५४४ ण त्वामस्मि वच्मि विदुषां २३ णवपुण्णिमामि ८८ त्वामालिख्य प्रणयकुपितां ३६ णिहुअरमणंभिलोअण णोल्लेइ अणोल्लमणा ३२८ द दन्तक्षतानि करजैश्र ३३७ त दर्पान्धगन्धगज ६२ तइआ मह गंडत्थल दिवमप्युपयातानां ५५९ तत उदित उदारहारहारी १६ २१२ दिवाकराद्रक्षति यो ६०० तत: कुमुदनाथेन ४०३ २९६ ततोऽरुणपरिष्पन्द दीधीङ्वेवीड़सम:

तं ताण सिरिसहोअर ३५: दुर्वाराः स्मरमार्गणा ५०७ ५१५ तथाभूतां द्ृष्टा दूरादुतसुकमागते २९ १५, २२० दशा दुग्धं मनसिजं ५६६ तदप्राप्तिमहादुःख ८० देव त्वमेव पाताल ३७९ तदिदमरण्यं यस्मिन् ५०६ देवीभावं गमिता ४५३ तद्च्छ सिद्धये कुरु १९८ देशः सोऽयमरातिशोणित २०८ तद्गेहं नतभित्ति ५१७ दैवादहमद्य तया २६ तद्वेषो सदशोऽन्याभि: ५९३ दो्भ्यां तितीषति तरङ्ग ४३७ तनुवपुरजघन्योऽसौ ३९१ द्वयं गतं सम्प्रति ५८६, २५२ तपस्विभिर्या रुचिरेण १४६ द्वारोपान्तनिरन्तरे २२ तरुणिमनि कलयति ११० ध तरुणिमनि कृतावलोकना ४०९ धन्यस्याऽनन्यसामान्य ३९७ तवाहवे साहसकर्म ४५६ धन्यासि या कथयसि ६ १ तस्याधिमात्रोपायस्य १७९ धमिल्लस्य न कस्य १८२ तस्या: सान्द्रविलेपन ५० धवलोसि जह वि ५६४ ताणं गुणम्गहणाणं १०२ धातु: शिल्पातिशय ५३५ तामनङ्गजयमङ्गलश्रियं ३२२ धीरो विनीतो निपुणो २१०

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श्लोकानुक्रमणिका ४७१

श्लोकाड्क इन्ेकाङ़ु न पुराणि यस्यां सवराङ्गनानि ५४८ न केवलं भाति नितान्त ४१४ पुंस्त्वादपि प्रविचलेत् ४४३ न चेह जीवितः कश्चित् ९४ पृथुकार्तस्वरपात्रं ३०६, ३७० न तज्लं यन्न सुचारु ५४९ पेशलमपि खलवचनं ४८७ न त्रस्तं यदि नाम १६७ पौरं सुतीयति जनं ४०३ नन्वाश्रयस्थितिरियं ५१३ प्रणयिसखीसलील ५०२ नयनानन्ददायीन्दोः ५७४ प्रत्यग्रमज्जनविशेष ५९५ नवजलधरः सन्नद्धोऽयं १६३ प्रथममरुणच्छाय: १३९ नाथे निशाया नियते: २४३ प्रधनाध्वनि धीरधनुर्ध्वनि १०५ नानाविधप्रहरणैर्नृप ४९९ प्रयत्नपरिबोधितः २८१ नारीणामनुकूलमाचरसि ३५२ प्रसादे वर्तस्व प्रकटय ३१७ नाल्प: कविरिव स्वल्प ३८१ प्रस्थानं वलयेः कृतं ३९ निजदोषावृतमनसां ४७८ प्रागप्राप्तनिशुम्भ २०१, ३१७, ३१८ नित्योदित प्रतापेन ४६९ प्राणेश्वरपरिष्वङ्ग २९० निद्धानिवृत्तावुदिते ४७ प्राप्ताः श्रिय: सकलकाम २७१ निपेतुरास्यादिव तस्य ५९८ प्राभ्रभ्राड्विष्णुधामा १७४ निम्ननाभिकुहरेषु यदम्भ: ५५० प्रियेण संग्रथ्य विवन २३६ निरववि च निराश्षयं च ४२८ प्रेमार्द्रा: प्रणयस्पृशः ३२ निरुपादानसम्भार ५७ प्रेयान् सोऽयमपाकृत: ९८ निर्वाणवैरदहना ३०५ प्रौढच्छेदानुरूपोच्छुलन ३५१ निशितशरघिया फ निःेषच्युतचन्दनं फुल्लुक्कर कलमकूरणिहं ३०९ न्यक्कारो ह्ययमेव मे १८२ ब प वत सखि कियदेतत् ४३१ पथि पथि शुकचञ्ञ ९९ बन्दीकृत्य नृप द्विषां ११९ पंथिअ ण एत्थ ५८ बिम्बोष्ट एव रागस्ते ५१४ परापकारनिरत: २४० ब्राह्मणातिक्रमत्यागो १३० परिच्छेदातीतः १०७, ४७९ भ परिपन्थिमनोराज्य ४०६ भक्तिप्रह्वविलोकन ३९१

परिमृदितमृणालीम्लान २८ भक्तिर्भवे न विभवे ५२४

परिग्लानं पीनस्तनजघन ३४५ भण तरुणि रमण ५८१

परिहरति रति मतिम् ३२६ भद्रात्मनो दुरधिरोह १२

पविसंती घरवारं ९.० भम धम्मिअ वीसद्धो १३८ पश्चादंघी प्रसार्य ४९ भस्मोद्धूलन भद्रमरतु ५०३

पश्येत्कश्चिच्चल चपल १२६ भामते प्रनिभासार पाण्डु तामं वदनं ३३२, ४६० पातालमिव ते नाभि: भुक्तिमुक्तिकृदेकान्त ५८७ भुजङ्गमस्येव मणि: ५८३ पादाम्वुजं भवतु नो ५.५८ भूपतेरुपसर्पन्ती ९७५ पिन वसतिमहं व्रजामि भृपालरत्र निर्देन्य २६०

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४७२ काष्यप्रकाश:

इलोकाकक इलोकाकू

भूयो भूय: सविध १०६ यथाडयं दारुणाचार: १४३

भूरेणुदिग्धान् नवपारि ३३४ यदा त्वामहमद्राक्तम् २९७

भ्रमिमरतिमलस १२६ यदानतोऽयदानतो ३६५

म यदि दहत्यनिलोsत्र २७२, ४५४

मतिरिव मूर्तिर्मधुरा ४१३ य द्ख्जनाहितमतिबंहु ३१२

मथ्नामि कौरवशतं १३१ यशोऽधिगन्तुं सुख २४५

मधुपराजिपराजित ३६८ यश्चाप्सरोविभ्रम १९९

मधुरिमरुचिरं वच: ५१६ यस्य किञ्विदपकर्तु ५४५

मनोरागस्तीवं विषमिव ३४२ यस्य न सविधे दयिता ३५७

मन्थायस्तार्णवाम्भ: ३५० यस्य मित्राणि मित्राणि ७३

मलयजरसलिप्त ५५७ यस्यासुहृत्कृत तिरस्कृति ११३

मसृणचरणपातं महदे सुरसंधम्मे २२६ याता: कि न मिलन्ति ४३९

यावकरसार्द्रपाद १५

महाप्रलयमारुत ३७२

महिलासहस्सभरिए २४२ युगान्तकालप्रतिसंहृता ५४३

७१ ये कन्दरासु निवसन्ति ५४७

महीभृत: पुत्रवतोऽपि महौजसो मानधनाः २४७ येन ध्वस्तमनोभवेन ३०२

माए घरोवअरणं ५१९ ये नाम केचिदिह १८९

६ येनास्यभ्युदितेन चन्द्र ४४४ मातङ्गा: किमु वल्गितैः माता नतानां संघट्ट: २९९ येषां कण्ठपरिग्रह ४८४

मात्सर्यमुत्सार्य ३८५ येषां तास्त्रिदशेभदान २२७

मानमस्या निराकर्तुम् १३३, १६२ येषां दोर्बलमेव दुबल १०४

१९२ मारारिशक्ररामेभ ५२४ योऽविकल्पमिदमर्थ

मित्रे क्वापि गते सरोरुह ६८४ योऽसकृत्परगोत्राणां ३७६

मुक्ता: केलिविसूत्रहार ३४४ र. ५०५ रह के लिहिअणिअसण ९७ मुखं चिकसितस्मितं ९ मुग्धे सुग्धतयेव रक्ताशोक कृशोदरी ३००, ३१९ ३७४

मृध्नो मुद्वृत्तकृत्ता रजनिरमणमौले: १५९, ३४८ रसासार रसा सार ३८८

२९१ राईसु चंदधचलासु ८४

मृगलोचनया विना ४९७ मृदुपवनविभिन्नो राकायामकलङ्क' चेतू ४५१

१५३ राकाविभावरीकान्त १५६

मृधे निदाघघर्मांशु ४५४ राकासुधाकरमुखी ४९

य राजति तटीयमभिहत ५१२

यं प्रेचय चिररूढापि ५०४ राजनारायणं लक्ष्मी: ५७७

यः कौमारहरः १ राजन् राजसुता न पाठयति ४४०

यः पूयते सुरसरिन्मुख २०३ राजन् विभान्ति भवतः २११

यत्तदूजितमत्युग्रं :१९३ राज्ये सारं वसुधा ५३२

य त्रानुल्लिखतार्थमेब २७३ राममन्मथशरेण ताडिता २५४

सवेसा लहरीचलाचतदश, ५१८ | रामोऽसी भुवनेपु १०९

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ग्लोकानुक्रमणिका ४७३

श्रोकाङ्ड श्रोकाङ्क

रुधिरविसरप्रसाधित ७७ विमानपर्यक्कतले ३५३ रे रे चञ्जललोचनाश्चित १०३ चियदलिमलिना २७

ल चिहलं खलं तुमं सहि

लग्नं रागावृताङ्गया २४१, २५३, २ू०, २५४ वेगादुड्डीय गगने २१३

लग्न: केलिकचग्रहः ५५८ २३७ वेतत्वचा तुल्यरुचा

लतानामेतासामुदित ४६८ श

लहिऊण तुज्झ बाहुप्फंसं ४३४ शक्तिर्निस्तिरिंशजेयं तव २५३

लावण्यं तदसौ कान्ति: ७५ शनिरशनिश्च तमुच्चैः हर

लावण्यौकसि सप्रताप ५२३ शरत्कालसमुल्लासि १५७

लिखन्नास्ते भूमिं १०० शशी दिवसवूसरो ५०६

लिम्पतीव तमोडङ्गानि ४१७, २६८ शिरीपादपि सृद्ङ्गी १३७

लीलातामरसाहतो १५२ ३०१

व शूनयं वासगृहं ३०

वक्त्रस्यन्दिस्वेदबिन्दु ५३० शंलेन्द्रप्रतिपाद्यमान ५२०

वक्त्राम्भोजं सरस्वत्यधि २७४ श्यामां श्यामलिमान २७५ श्रितक्षमा रक्तभुवः १६६ वक्त्रेन्दी तव सत्ययं ५७६ ५६७ श्रीपरिचयाज्डा अपि १० वदनसौरभलोभ .२७६ वदनं नरवर्णिन्या: ३५८ श्रतेन ब्रुद्धि्व्यसनेन

वद वद जितः स शत्रुः ३१३ ष

वपुः प्रादुर्भावादनु ५०१ षडधिकदशनाडीचक्र ३०८

वपुर्विरूपाक्षमलक्ष्य १६१ स वस्त्रवैदूर्यचरणैः १८१ सअलकरणपरवीसा ४०० वह्निस्फुलिङ्ग इव स एकस्त्रीणि जयति ४७६ वाणिअअ हत्थिदन्ता: ५२८ सक्तवो भक्षिता देव वाणीरकुडंगुड्डीण १३२ सक्केतकालमनसं ५३१ वाताहारतया जगत् २८२ संग्रामाङ्गणमागतेन २२६, ४२६ वारिज्जन्तो त्िपुणो 5६ सततं मुसलासक्ता: ४८६ विकसित सहकारतार २१७ सत्यं मनोरमा रामा ३३३ विद लित सकलारिकुलं ५१० स त्वारम्भरतोऽवश्य २६२ विदीर्णाभिमुखाराति सत्वारम्भरतोऽवश्य ३६३ विद्वन्मानसहंस ४२५ सदा मध्ये यासामिय २५६ विघाय दूरे केयूर २६६ सदा स्नात्वा निशीथिन्यां २६७ विनय प्रणयैककेतनम् २०४ सद्य: करस्पर्शमवाप्य ५३६ विनायमेनो नयता ३६१ सद्वंशमुक्तामणिः ३८० विनिर्गतं मानदमात्म सज्नारीभरणोपाय ३६० विपदोऽभिवन्त्य विक्रमं २४८ स पीतवासा: प्रगृहीत विपरीअरए लच्छी ३७ समदमतङ्गजमदजल ४६१ विपुलेन सागरशयस्य . २४१ स मुनिर्लान्छितो विभिन्नवर्णा गरुडा ५६३ संप्रहारे ग्रहरणै: ३२४

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४७४ काव्यप्रकाश:

श्रोकाङ्क श्रोकाक्क

१५५ सोऽपूर्वो रसनाविपर्यय ४४८

सरला बहुलारम्भ ३८६ सो सुद्धसामलंगो सरस्वति प्रसादं मे ३६६ सौन्दर्यस्य तरद्गिणी ४२४

स रातु वो दुश्च्यवनो १८१ सौभाग्यं वितनोति ५७५

सर्वस्वंहर सवस्य स्तुम: कं वामाक्षि ४5 ३७५ सविता विधवति विधुरपि ४०५ स्तोकेनोन्नतिमायाति ३७८

सब्रीडा दयितानने ३२१ स्निग्धश्यामलकान्ति ११२

सशोणितैः क्रव्यभुजां ३३५ स्पष्टोल्लसत्किरण ५७६

ससार साकं दर्पण ३६७ स्पृशति तिग्मरुचौ ६०१

सह दिअहणिसाहि ४६र स्फटिकाकृतिनिर्मल: २२१

सहि णत्रणिहुवणसमरम्मि स्फुरद्ङ्भुत रूपमुत्प्रताप ५६१

सहि विरइऊण माणस्स ६६ स्नस्तां नितम्वादव १६०

साक कुरङ़कदशा १२१ स्वच्छन्दोच्छलदच्छ ४

सा दूरे च सुधा १६६ स्वच्छात्मतागुणसमु ४७०

साधनं सुमहद्यस्य स्वपिति यावदयं निकटे २६१ साधु चन्द्रमसि पुष्करै: 355 स्वप्नेऽपि समरेषु त्वां ३६२

सा पत्युः प्रथमापराध ३४ स्वयं च पल्लवाताम्र ३७७, ६०२ सायकसहायबाहो: ७२ स्वर्गप्राप्तिरनेनैत्र ३४६ सायं स्नानमुपासितं ७६ सा वसइ तुज्झ हिअए ५६० ह साहेन्ती सहि सुहअं ७ हन्तुमेव प्रवृत्तस्य २८५ सितकरकररुचिरविभा ३१४, ३५६ ४६ सिंहिकासुतसंत्रस्तः हरत्यघं सम्प्रति हेतु: ५३८ हरवन्न विषमदृष्टि ४६८

सुधाकरकराकार हरस्तु किञ्ञित्परिवृ ११६ सुरालयोल्लासपरः १७८ हंसाणं सरेहिं सिरी ५२७ सुव्वह समागमिस्सदि १६ हा घिक सा किल १४६ सुसितवसनालंकारायां २६६, ४७६ हा नृप हा बुध हा कवि २१६

सुहद्दधूबाष्पजल ४४२ हा मातस्त्वरितासि ३८ सृजति च जगदिदमवति ४८२ ४६३ सेयं ममाङ्गेषु सुधारस हित्वा स्वासुपरोध २५ हुमि अवहत्थिअरेहो ३२० सो णत्थि एत्थि गामे ५६६ हृदयमधिष्ठितमादौ ४५२ सोऽध्येष्ट वेदान् १७० हे हेलाजितबोधिसश्व ४६४

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S.N. SAR RAR