1. Kavya Prakasa Vyakhya Srinivasa Shastri 1970
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त्रथ मम्मटाचार्यविरचितः काव्यप्रकाशः
[समीक्षात्मक भूमिका-भापानुवाद-व्यास्या-विवेचनात्मकटिप्प्णीसहित:]
गुरुपा दानां नवतीर्थवेदान्तव्याकरखाचार्याएं डाक्तरोपाधिघारिणाम्
नि्देशेन
गुरुकुलंडोरलीभूतपूर्वाचार्येण कुरुक्षयविश्वविद्यालयप्राध्यापकेन डॉ० श्रीनिवासशास्त्रिणा सम्पादित:
प्रकाशक : रतिराम शास्त्री साहित्य मराहार, सुभाष वाजार, मेरठ। संशोधित एवं परिवद्धित वृतीय संस्करण. व्यासपूर्णिमा वि० सं०,२०२७ई १६७० ई० मूल्य : वारह रुपये
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प्रकाशक : रतिराम शास्त्रो प्नव्यक्ष : साहित्य भण्डार, सुभाष बाजार, मेरठं।
प्रथम संस्करण, व्यासपूणिमा, वि० सं० २०१७ (१६६० ई०) द्वितीय संस्करण, श्रावसो, वि० सं० २०२४(१६६७ ई०) तृतीय संस्करसा, व्यासपूर्शिमा, वि० सं० २०२७ (१६७० ई०)
मूल्य : बारह रपपे
लेखक के अन्य ग्रन्थ १. मृच्छफटिक संस्कृत टीका, हिन्दी व्यास्या २. शिशुपालवध (प्रथम सर्ग) ३. कादम्बरी (पूर्वधि) ४. लघुकौमुदी (मन्धि आदि) ५. दशरूपक ६. एम० ए० संस्कृत व्याकरण ७. रनानुवादप्रभा ८. वाचस्पतिमिश्र द्वारा बौद्धदर्शन का विवेचन (शोध प्रबन्ध) ६. न्यायचिन्दुटीका हिन्दी व्याख्या (प्रेस में)
मुद्रक : राजकिशोर शर्मा मध्यक्ष सर्वोदय प्रेस, २६४, जत्तोवाड़ा, मेरठ। (दूरभाष : ४३५२)
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साकस्थने
वागदेवतावतार आचार्य सम्म्ट की अमर कृति काव्यप्रकाश की यह हिन्दी व्याख्या पाठको की सेवा में प्रस्तुत की जा रही है। इसके आ्रम्भ में संस्कृत अलक्गार- वास्त्र के विकास-कम का संक्षिप्त परिचय देकर उसमें आचार्य मम्मट के महत्व को 'स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। विस्तार-भय से कई आवश्यक अंश छोड़ देने पड़े हैं। हिन्दी-व्याख्या का करम यह रक्खा गया है कि प्रथमतः वारिका, वुत्ि तथा उदाहरए आदि का हिन्दी में अ्रवकिल अनुवाद किया गया है। तदनन्तर उसकी यथा- वश्यक व्यास्या की गई है तथा किसी लक्षण को उसके उदाहरण में घटित करके दिखलाया गया है। मूलग्रन्थ का शब्दराः अनुवाद करने का प्रयत्न किया गया है। मनुवाद के बीच में कुछ आवश्यक शब्द तथा उनकी व्युत्पत्ति आदि कोष्ठक मे दिये गये हैं। वस्तुतः संस्कृतभापा एक समास-प्रधान भाषा है, उसमे अल्पशब्दों द्वारा भ्रमित मर्थ प्रकाशन की शक्ति है अतः अन्य भाषा में उसका अविकल अनुवाद करते समय शब्दाध्याहार आादि का आश्रम लेना ही पड़ता है। इसी हेतु अनुवाद मे वहीं- कहीं शिविलता या पस्पष्टता की मलक मिलना भी सम्भव है। 'प्रभा' नामक इस हिन्दी व्यास्या में ग्रन्थोकत वस्तु की विशद-व्याख्या करने का प्रयास किया गया है; इसी लिये यमनतन्न उक्त अ्थों की आवृत्ति भी हो गई है। यथावसर तुलनात्मक तथा व्याख्यात्मक टिप्पणियां भी दी गई है जिनमें कहों-कही आधुनिक विद्वानों के मत का भी निर्देश कर दिया गया है। सक्षपतः इस व्यास्या में यह प्रयास किया गया है कि मूलग्रन्थ के अर्थ-स्फुटन के साथ-साध एतत्प्रतिपादित वस्तु का तुलनात्मक दृ्टि से भी पनुशीलन किया जा सके। यद्यपि काव्य प्रकाश पर विविध व्याख्याओ के होते हुए यह नवीन प्रयास निररथक सा ही है, तथापि इसके लेखन की आ्वश्यकता तब अनुभव हुई जव कुछ ग्रन्याशों के स्पष्ट न होने से छात्रों की आतुरता का अनुभव किया गया। इसे गुरु- गोविन्द को कृपा से प्राप्त प्रसाद का उनकी सेवा में सम्पस मात्र ही समझना चाहिये। इसमें जो भी ग्राह्य है, वह उन तपस्वी गुरुजनों का ही है, जिन्होंने अद्य- पर्यन्त अपने विलक्षए त्याग, तपस्या एवं सतत प्रयत्नों से आचार्य मम्मट की इस पद्भुत कृति को केवल जीवित हो नहीं रकखा है अपितु इसे विशद से विशदतर बनाने का भथक परिश्रम किया है। इसमें जो अग्राह्य है वह लेखक की अल्पवुद्धि का स्खलन हो कहा जा सकता है। आशा है विवेकशील विद्वज्जन उसके प्रति उदार दृष्टि का परिचय देंगे। इस व्याख्या में अ्र्नेक महानुभावों तथा ग्रन्थों से सहायता ली गई है, पत्र-तत्र उनका उल्लेख भी किया गया है।
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संस्कृत वाङ्मय के नवीन' अध्ययन तथा अनुसंन्धान को प्रोस्साहन देने वाने आदरणीय डॉ० धर्मेन्द्रनाथ शास्त्री (भूठपूर्व अध्यक्ष, संस्कृत विभाग, मेरठ कालिज), संस्थापक भारतीय विद्या संस्थान, देहली की व्याख्या-शेली ने हमारा मार्गनिर्दशन किया है। उनके प्रति कृतजता-प्रकाशन लेखक की शक्ति से बाहर है। विशेपरप से वामनाचार्य भलकीकर की वालवोमिनी टीका, हदिसद्र शवर्मा की नागेरवरी टीका, डॉ० गङ्गानाथ भा का अंग्रजी अनुवाद आादि का आधार इसमें लिया गया है। काव्यप्रकाश के उपलब्ध हिन्दी एवं अंग्रजी अनुवाद तथा व्यास्याओों और अलङ्धारशास्त्र के अन्य ग्रन्थों ने भी हमारा यथोचित उपकार किया है। विपय- प्रवेश के लेखन में विशेपरूप से वागनाचार्य अलकीकर की प्रस्तावना, थी M. P.V. काऐे की History of Sauskrit Poetics, वलदेव उपाध्यायकृंत संस्कृत. साहित्य का इतिहास तथा काव्यप्रकाश की नाना भूमिकाओं आदि का तधार लिया गया है। इन सभी महानुभावो तथा ग्रन्थों का आभार-प्रदर्शन करना हमारा परम क्तव्य है। एक सुव्युत्पन्न तरएा प्रिग राजेन्द्रकुमार शास्त्री बी० ए० ने भी-अपनी स्पष्ट सम्मतियों द्वारा तथा प्रूफसंशोधन आदि में सहयोग प्रदान करके । इस कार्य में ड़ी सहायता प्रदान की है, वे साधुवाद के पात्र हैं। साहित्य भण्डार के अध्यक्ष श्री रतिराम शास्त्री के अनुरोध से ही इस. गुरु- कार्य का समापन हो सका है अरतः वे अवश्य ही. साधुवाद के भाजन हैं। 1
साधन तथा शक्ति के अभाव से इस मुस्तक में जो कुछ भी कमियां रह गई हैं, स्नेहशील विद्वज्जनो के सत्परामर्श से उन्हे दूर करने का प्रयास किया जायेगा।
मातृ नवमी नेखफ वि० सं० २०१७
तृतोय संस्करग
छात्रों की रुचि तथा विद्वज्जनों के सत्परामर्श से इस ग्रन्थ के द्वितीय संस्करण में पर्याप्त संशोधन और परिवर्द्धन किया गया-था। फिर भी जो कुछ कमियां प्रतीत हुई, उनकी पूर्ति का तृतीय संस्करण में प्रयास किया गया है। भायाहै ह ग्रन्थ पाठकों के लिये और अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकेगा।
व्यास पूणिमा, लेखक
वि० सं० २०२७ -4
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विषयानुक्रमणिका
विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ प्रथम उल्लास २०. वाच्यार्यनिएयिक संयोगादि २१. व्यञ्जकशब्द का स्वरूप ६७ १. मङ्गलाचरण १ तृतीय उल्लास २. काव्य-प्रयोजन ६ [भथंव्यञ्जकता-निरुपण] : ३. काव्य-हेतु १३ १. आार्थी-व्यञ्जना, ४. काव्यस्वरूप २. अर्थव्यञ्जकता में शब्द की ५. काव्य-भेद (म्वनि मादि) २३ सहकारिता १०६ द्वितीय उल्लास चतुर्थ उल्लास i[शब्द तथा प्ररमं का स्वरूप-निरुपण] [ध्यनिकाव्य का निरूपण] १. शब्द और अ्ररथ के तीन प्रकार ३३ १. लक्षणामूलक (भविवक्षितवाच्य) २. सात्पर्यायं; अभिहितान्वयवाद ध्वनि काव्य के दो प्रकार-सर्था, तथा अन्विताभिधानवाद ३४ न्तरसंकतिवाच्य तथा अत्यन्त-) ३· भर्थों की व्यञ्जकता ३८ तिरस्कृतवाच्य ,१११ ४. वाचक शठद का स्वरूप ४१ २. अभिधामूलक (विवक्षितान्यपरवाच्य) ५. चार प्रकार का सङ्केतित सथं ४३ ध्वनि काव्य के दो प्रकार-अलक्ष्य- ६. अभिधावृतति ५३ कमव्यङ्गय तथा लक्ष्यकरमव्यङ्गय ७. लक्षणावृत्ति ५४ : ११६ म. उपादान तथा लक्षणलक्षणा २. अलक्ष्यकरमव्यङ्गघ ध्वनि के व भेद. ह. मीमांसकाभिमत उपादान- ११७ लक्षणा का खण्डन ५६ (i) रसध्व्नि का स्वरूप ११६ .१०. मुकुलभट्ट के मत का सण्डन ६३ भट्टलोल्लट का' रसोत्पत्तिवाद'-१२१ ११. सारोपा-साध्यवसाना ६४ शाङकुम का 'रसानुमितिवाद' १२. गोसी तथा शुद्धा ६६ भट्टनायक का 'रसभुक्तिवाद' १२६ १३. गोर्वाहीक आदि में लक्ष्य- अभिनवगुप्त का 'रसाभिव्य-, विपयक मतभेद ६७ क्तिवाद' १२६ १४. अन्य सम्बन्धों से होने वाली रस की अलोकिकता लक्षणा ७३ मिलित विभावादि द्वारा -. १५. लक्षणा के भेद ७४ रसाभिव्यक्ति १६. लाक्षशिक शब्द का स्वरूप रस-प्रकार १४१ १७. व्यञ्जनावुति (शान्दी) १८. तक्षणामूलक व्यञ्जना शृङ्गार (सम्भोग, विप्रलम्भ) १४३ בס हास्यरस १४६ १६. अभिधामूलक व्यञ्जना 55
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विषय पषठ चिपय n 4 करुणरस १४६ (i) भगूढव्यङ्गय पृष्ठ
रोद्ररस १५०. (ii) २२०
वीररस १५१ (iii) २२२
भयानकरस २३०
बीभत्स रंस १५२ (iv) अस्फुटव्यड्डभ १५२ (v) सन्दिग्घप्रावान्य २३२
यद्भुत रस १५३ (vi) .२३२
रसों के स्थायी भाव व्यभिचारी भाव १५४ (ii) तुल्यपाधान्य काक्वाक्षिप्त '२३३
१५५ (viii) असुन्दर २३३ २३४ शान्तरस १५७ २. (ii) भावध्वनि गुरीभूतव्यङ्गम के भेद प्रभेद २३५ १५८ ३. (iii) रसाभास ध्वनि · (iv) भावाभास ध्वनि १६२ ( व्यञ्जनावृति की स्थापना :२३७ ध्वनि की व्यञ्जनाप्रतिपाद्यता २३८
(v) १६३(ii) भावशान्ति-ध्वनि १६४' व्यङ्गचार्थ' अभिधावृत्ति बोध्य नहीं
(vi) भवोदय ध्वनि .. २४७
(vi) भावसन्धि-ध्वनि १६५ (iii). व्यङ्गयव्यञ्जकभाव वाच्यवाचक भाव से भिन्न है। (viii) भावशवलता ध्वनि १६६ (iv) वाच्य तथा व्यङ्गच स्ेपरयं का भेद२ ५८ २५६
٠لا के भेद (v) वाचकता औोर व्यञ्जकता का १६७ का भेद २६२ (i) शब्दशक्तिमूलक ध्वनि १६६ (vi) EEDELEE व्यङ्गचार्थ लक्षावृत्तिवोष्य नहीं (फ) अलङ्कारध्वनि १६६ PEY (ख) वस्तुष्वनि १७३ (vii) शब्दवरह्मवादी और व्यञ्जना २६७ (ii) अर्थशक्तिमुलक ध्वनि १७४ (viii) अनुमान से व्यडग्यार्थ प्रतीति (क) स्वतः सम्भवी अर्थ के ४ भेद १७६ नही २६८ कविप्रोढोक्तिसिद्ध के १७६ पष्ठ उल्लास -२७३ [शब्दार्थचित्र-निरूपण] ४ भेद १८१ १. शब्दचित्र २७६ (iii) उभयशक्तिमूलकध्वनि १६५ २. थर्थनिन्न २७७ ५. ध्वनिप्रकार विवेचन सप्तम उल्लास २७६ F
(i) ध्वनि के १८ भेदों का संकलन १८६ [काव्य-दोपों का निरूपस] (ii) ध्वनि के ५१ भेदों का संकलन २१३ १. दोपसामान्यलक्षस २७६ (iii) संकर तथा संसृष्टि से ध्वनि- ₹. पद-दोप- '२८० भेद २१४ श्रुतिकट्, न्युतसंस्कृति, मप्रयुक्त पञ्चम उल्लास असमर्थ, निहृतार्थ, अनुचितार्थ,: निस्यंक, पवाचक, अपलील, सन्दिग्ध १. गुणोभूतव्यङ्गम के द भेद २१६. अपरतीत, ग्राम्य, नेमार्थ, विलप्ट,
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भंविमृष्टविधेयांश, विरद्धमतिकृत्, पल्पना द्वारा अभिव्यकिति, प्रतिकूल ३. वाकयदोप- २६७ विभाय आदि का ग्रहण, पुनः पुनः .श्रतिकटुता, अभयुत्तता, निह्तार्थता दीप्ति, अनवसर में रस विस्तार या प्रनुचितार्थंता, प्वाचकता, पश्लीलता विच्छेद, भङ्ग का अ्रत्यन्त विस्तार, सन्दिग्धता, धप्नतीतता, ग्राम्यता, प्रङ्भी की उपेक्षा, प्रकृतिविपयंम, नेयार्थता, विलिष्टता, भविमृष्टविधे- रस के अनुपकारक का बखन। यौरात्व, विरुद्वमतिवृत्त। ६. कुद रस-दोपों की पदोपता ३६१ ४. पदकदेशगत दोप- ३१२ १०. रसविरोध- परिहार के उपाय २०६ थ तिकटु, निहृतार्थ, निरर्यक, भप्टम उल्लास ४०६ प्रवाचक, प्रश्लोल, सन्दिग्ध, नेयार्यं, [गुए-निरुपण] परपयुक्तत्वादि की भिन्नता १. गुख-स्वरप विवेचन ४०६ ५. वाक्यमानगत दोग- ४०६ प्रतिकूलवसाता, ३१८ २. मलद्कारस्वरूप विवेचन उपहृतयिसर्गता, ३. भट्टोद्भट के गुसालङ्कार विवेक लुप्तविसर्गता, विसन्धिता, हतवूत्तता, का सण्डन ४१३ न्यूनपदत्व, अधिकपदत्व, कषितपदत्व, ४. वामन के गुणालद्वार-विवेक पतत्प्रकपत्व, समाप्तपुनरातत्व, का खण्डन ४१४ सर्धा्तिरकवाचकत्व, अभवन्मतयोगत्व, ५. गुए भेद निरूपण ४१६ भनभिहितवाच्यत्व, अ्स्थानस्थपदत्व, (i) माधुयें ४१७ संकीएंता (ii) पज ४१८ गभितत्व, प्रसिद्धिहृतत्व, भग्नप्न्नमत्व (iii) प्रसाद ४१६ भकमत्व, अमतत्व। ६. वामन-सम्मत दस गुणों का ६. अर्थदोप- ३४६ खण्डन ४२०
- अपुष्ट, कष्ट, व्याहत, पुनरुक्त, दुष्फम, ७. माधुर्यगुव्यञ्जक वर्णादि ४२६ ग्राम्य, सन्दिग्य, निहेतु. प्रसिद्धिविरद्ध, ८. शोजव्यञ्जक वर्गादि ४२७ विद्याविरुद्ध, अनवीकृत, सनियमपरि- ह. प्रसादव्यब्जक शब्दादि
- वृत्त, अनियमपरिवृत्त, विगेपपरिवृत, १०. वक्तुर्वैशिष्टय आदि के कारण अविशपपरिवृत, साकाक्ष, गुणाव्यञ्जकता का अपवाद ४२८ अपदयुक्त, सहचरभिन्न, नवम उल्लास प्रकाशितविरुद्ध, [शब्दालद्वार निरुपण] ४३२ विध्ययुक्त, .. पनुवादयुक्त, त्यक्तपुन: स्वीकृत १. वकोकि ४३३ तथा अरलील।. २. अनुप्रास ४३५ ७. दोप समाधान- ३६५ उपनागरिका आदि वृत्ति-विचार ४३६ 5. रस-दोप- ३८२ ३. यमक ४४० व्यभिचारी भाव रस तथा स्थायी ४. क्लेप ४४५ भावों का स्वशन्द द्वारा कथन, (i) श्लेप-भेद ४४५ पनुभाव औौर विभाव की कष्ट (ii) शब्द-श्लेप तथा अर्थ-स्लेप-
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विपयक उद्भट आदि के ३३. समुच्चय तथा उसके प्रकार मतका खण्डन ४५० ३४. पर्याय तथा उसके भेद ५५४
५. चितालद्वार -४५६ ३५. अनुमान ६. पुनरुक्तवदाभास ४६३ ३६. परिकर ५६२
दशम उल्लास ३७. व्याजोकि ५६५ ३८. परिसंख्या ५६६ १. उपमा तथा उसके भेद ४६६. ३६. कारणमाला "५६६ २. अ्नन्वय (i) 'हेतु' अलङ्कार का खण्डन'५६६ ३. उपमेयोपमा ४६६ / ४०. अन्योन्य ५७१ ४. उत्पक्षा ४८७ ४१. उत्तर तथा उसके भेद ५. ससन्देह ५७१ ४२. सूक्ष्म ५७४ ६. रूपक तथा उसके भेद। ४३. सार ५७५ ७. अपह तिः ५०० ४४. पसङ्गति द. भ्रथ-श्लेप ४५. समाघि- २७५ ५०२ ५७७ ६. समासोक्ति ५०३ ४६. सम- ५७ १०. निद्शना ५०५ ४७.विपम तथा उसके प्रकार ५७६ ११. अप्रस्तुतप्रशंसा तथा उसके भेद.५०७ ७८. अधिक ५८२ १२. अतिरायोक्ति तथा उसके, भेद. ५१४ ४६. प्रत्यनीक ५८३ १३. प्रतिवस्तुपमा ५१६ ५०. मीलित ५८५ १४. द्प्टान्त ५१म ५१. एकावली ५८७ १५. दीपक तथा उसके भेद "५२० ५२. स्मरण १६. तुल्ययोगिता .५२२ ५३. भ्रान्तिमान् १७. व्यतिरेक तथा उसके भेद- ५२३ ५४. प्रतीप तथा उसके भेद, ५६१ १८. आक्षेप ५३१ ५५.'सामान्य १६. विभावना' ५३२ ५६. विशेष तथा उसके भेद २०. विशेषोकिति तथा उसके भेद ५३३ ५७. तद्गुए २१ यथासंख्य ५३४ ५६. अतद्शुए २२. अर्थान्तरव्यास तथा उसके भेद ५३४ ५६. व्याघात ६०२ २३. विरोध तथा उसके भेद ५३७ ६०. संसृष्टि ६०४ २४. स्वभावोक्ति ५४२ ६१. सङर तथा उसके भेद ६०५ ५४३ X X २५. व्याजस्तुति· २६. सहोकि ५४४ (i) शब्दालक्कारादि के विभाजन २७ विनोकि तथा उसके प्रकार ५४५ का आाधार ६१५ २८. परिवृत्ति ५४६ (ii) प्राचीनोक्त अलद्ार दोप २६: भाविक ५४७ और उनका दोप-सामान्य ३०. काव्यशिङ्ड तथा उसके भेद ५४६ में अन्तर्भाव ६१५ ३१: पर्यायोक्ति ५५० (iii) पन्तमन्कस ३२. उदात ५५३ is
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विषय-प्रवेश
१. भलंद्धार शास्त्र का महत्व-काव्यप्रकाश आराष्कारणास्त् का एक अ््नुपम ग्रन्थ है। वाङ्मय में भनक्व्वारशास्प्र का महत्त्वपूर्ण स्थान है। सलस्ास्त्र के द्वारा काव्य या साहित्य के गुए-दोपों का विवेचन किया जाता है। कविजन की कीति का प्रसार अलङ्धारशास्त्र के आपार पर ही हुआ करता है। इसके अध्ययन से ही कविजन काव्य के गुए-दोप आादि का ज्ञान प्राप्त करते हैं। यह व्युत्पति-जनन का एक मुख्य साधन है। जिस प्रकार भापा-ज्ञान के लिये व्याकरण अपेक्षित है उसी प्रकार काव्य-रचना मे नपुण्य प्राप्त करने के लिये भी अलङ्वारशास्त्र के अ्रनुशीलन की आवश्यकता है। काव्योतत्ति में ही नहीं, काव्य-प्रसार में, काव्य को'लोकप्रिय बनाने में भी अलद्धारशास्न महत्वपूगां योग-दान करता है। यह आलोचकों का मागदर्शक है। जिस प्रकार न्याय विद्या समस्त दर्भनगास्त्र का दीपक है दसी प्रकार मलद्वारगास्म काव्य का प्रदीप है। अतः वेदशास्त्र से लेकर सामान्य साहित्य तक के अध्ययन में अलद्गारशास्त्र के ज्ञान को उपयोगिता है। व्याकरण इत्यादि छः + वेदाङ्गों के समान अलद्धारपास्त्र का अध्ययन भी अनिवार्य है। इसी हेतु राजशेसर ने इसे सप्तम वेदाङ्ग माना है-"शिक्षा फल्पो व्याफरसं निरक्त छन्दोविचिति: ज्योतिषं च पडद्गानि" इत्याचार्याः। 'उपकारकत्वादलद्धारः सप्तममन्गम्'इति पायावरीय: । ऋते च तत्स्वूपपरिज्ञानाव वेदार्थानवगतिः।' (काव्यमीमांमा १.२)। राजशेखर के अनुसार तो यह अतद्दारशास्त्र आन्वीकषिकी (तर्क), नयी, वार्ता और दण्डनीति-इन चार प्रसिद्ध विद्याओ का सार भाग है। अतएव पञ्चम विद्या है-'पञ्चमो साहित्यविद्या, इति यायावरीयः। सा हिचतसृखामपि विद्यानां निष्यन्दः'। (काव्यमीमांसा १.२)। यह अ्रलङ्गारशास्त्र कवि औप्रौर सहृदय दोनों का मार्गदर्शक है अतएव इसके बिना काव्य के उक्त प्योजनों की सिद्धि नही हो सकती तथा काव्य अपने प्रयोजनों को निष्पन्न करने के लिये अलद्धारशास्तर की अ्पेक्षा रखता है। काव्य के अथं-ज्ञान, सौन्दरयबोध तथा रसास्वादन में भी अलङ्धारशास्त की महती उपयोगिता है इसलिये इसका महत्त्व सर्वविदित ही है। २. अलङ्गारशास्त्र का नामरुरण-आ्रधुनिक आलीचनाशास्त्र के एक अद् के रूप में ही प्राचीनकाल में अलङ्गारशास्त्र था। उसमें आधुनिक आलोचना के समान 45 किसी काव्य की सर्वाङ्गीसा आलोचना तो नही होती -थी, किन्तु आलोचना के 1 ;- सिद्धान्तों का विवेचन करते हुए उपलब्ध काव्यों में से उसके उदाहरण दिसला दिये जाते थे। उसमें बव्य के गुण, दोप, असङ्वार तथा पथावगर शब्द और अथ आदि का भी विवेचन किया जाता था तथापि प्राचीन आनङ्कारिकों ने विशेपरूप से इसे अलद्वारनास्त्र नाम से ही पुकारा था। इसी से भामह, वामन तथा उद्भट' थरादि ने
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४ ] काव्यप्रकाश
अथवा शास्त्रो से सम्बन्ध है। बात यह है कि काव्य में विविध विष्यों का वर्णन होता है अतः काव्य-विवेचनात्मक शास्त्र का सामान्यतः विविध विषयों से सम्बन्ध होना स्वाभाविक ही है; किन्तु कुछ शास्त्रों से इसका गहन सम्बन्ध है अर्थात् अलद्गार- शास्त्र के अध्ययनार्थ उनका यत्किञ्चित् अनुशीलन भी अपेक्षित है। जैसे- (क) अलङ्धारशास्त्र और व्याकरण-व्याकरसशास्त्र समस्त विद्याओं का आघार माना जाता है, क्योंकि समस्त विद्याए, विशेषतः काव्य, शब्दाशित ही हैं। शब्दों का अनुशासन करने वाला व्याकरण ही है इसी से यह प्रमुख वेदाङ् माना जाता है 'मुखं ध्धाकरएं स्मृलम्' । साहित्यशांस्त्र से भी इसका घनिष्ठ सम्बन्ध है, मतः यहाँ वैयाकरणों का बड़े आदर के साथ स्मरण किया गया है। माना जाता कि काव्यशास्त्र में ध्वनि शब्द का व्यवहार वैयाकरणों का अ्नुसरण करके ही किया गया है। काव्यपकाश में संकेतित शब्दों का विभाजन 'सङ्गतितश्चतुर्भेदो जात्या- दिजातिरेव वा' भी महाभाप्य के आधार पर ही किया गया है-(चतुष्टयी शब्दार्ना प्रवृति:)। शब्द के स्वरूप-विवेचन में भतृ हरि के वाक्यपदीय का उद्घरख दिया गया है-'नहि गौः स्वरूपेण गौ.' तथा अरथ-निर्धारिण में 'संयोग' 'प्रकरण' आदि सहायक होते हैं यह दिखलाने के लिये 'संयोगो विप्रयोगरच' इत्यादि भतृ हरि को कारिका को उद्धुत किया गया है। यही नही अलद्दार-चिवेचन में भी व्याकरस का पर्याप्त प्रभाव दृप्टिगोचर होता है; उपमा का विभाजन 'वति' प्रत्यय तथा 'वयच्' आदि प्रत्ययों के ज्ञान की अपेक्षा रसता है। यभ-तत व्याकरस के सास्त्रीय प्रयोगों का भी आश्रय लिया गया है; जैसे 'विभावना' के 'लक्षण में 'कियायाः प्रतिषेथेऽ्रपि' में वयाकरणों के आधार पर ही 'करिया' का अर्थ 'हेतु' किया गया है। शब्दार्थ और अलद्ार-विवेचन के अतिरिक्त गुए-दोष आदि के विवेचन में भी व्याकरसशास्त्र अ्त्यन्त सहायक है। इसी हेतु भामह तथा वामन ने शब्द-शुद्धि के अ्धिकरणा का समारम्भ किया था- सम्प्रति काव्यसमयं शब्दशुद्धिज्व दर्शयितु प्रायोगिकास्पमधि- करसमारम्पते। (काव्यालद्वारसूत ५-१) । चयुतसंस्कृति जसा काव्ये-दोप तो व्याक करस ज्ञान पर ही निर्भर है। साथ ही व्याकरए के समान ही यहाँ पभिषा, लक्षखा तथा व्यज्जना भादि वृत्तियों का विचार किया जांता है। वस्तुतः व्याकरं-प्रतिपा- दित शब्दों की मुचारु प्रयोगविधि अलद्दारशास्त्र में निरूपित है तभी तो विद्वानों का कथन है 'व्याकरणशास्त्रस्पंय पुर्दभूतमिदं शास्त्रम्'अतएव व्याकरणशास्त्र साहित्य- शास्त्र का अत्यन्त सहायक है, यह निविवाद है। (स) अलद्धार शास्त्र और तर्कशास्त्र-तर्कशास्त्र प्रमाणशास्त्र है। इसमें शब्द की अभिधा आदि वृतियों पर भी विचार किया गया है। इन विपयो पर साहित्य- शास्त भी विस्तारपूर्वक विचार करता है; अ्भिधावृत्तिमातृका, शब्द-व्यापार विचार मदि में तो इन पर मुख्य रूप से विचार किया गया है। 'ध्वनि' के विवेचन में भी तर्कशास्त का ज्ञान प्रनेक्षित है; क्योंकि शंकुक आबि आ्राचार्य रस को त्रनुमान का ही
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विषय-प्रवेश
विषय मानते हैं तथा व्यक्तिविवेककार आादि ने व्यद्धपार्थ या ध्यनि वा अनुमान में ही मन्तर्भाव करने का प्रयास किया है। इसी प्रकार शब्दालद्वार और अर्थालद्कार मादि के विवेचन मे तर्कशास्मप्रसिद्ध अन्वयव्यतिरेक का आशय सिया गया है तथा भनुमान और काव्यलिङ्ग जमे अलद्वार तर्कशास्त्र के ज्ञान की अपेक्षा रखते हैं। (ग) अलद्धारशास्त्र और पूर्वमोमांसा-पूवमीमांसा शब्द, वाक्य आदि का विवेचन करने वाला शास्त्र है। भतड्कारशास्त्र के भट्टलोल्लट आदि व विपय प्र्पराचार्य मीमांसा मतानुयायी ही है अतः इस शास्त्र पर मीमांसाशास्त्र का पर्यात प्रभाव दृष्टि- गोचर होता है। काव्यप्रकाश में शब्द के प्रकारचतुष्टय का निरूपण करके मीमांसा- काभिमत 'जातिरेव' का भी निरपण किया गया है। इसी प्रकार तात्पर्य नामक मीमांसकों की राब्दवृत्ि का उल्लेख करते हुए 'अभिहितान्वयवाद' और 'अन्विता- भिधानवाद' का विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है। प्रसङ्गवशात् मीमासा के कतिपय न्याय-'यत्पर: शब्दः स शब्दार्यः' आदि का प्रयोग तथा 'श्र तिलिद्ध०' इत्यादि वलीयस्त्ववोधक नियम और कुमारिल तथा प्रभाकर की अर्थारपति का उल्लेख भी काव्यप्रकाश तथा साहित्यदपस आदि मे मिलता है। अतएब पू्वंमी मांसाशास्त्र के साथ भी साहित्यशास्त्र का पर्याप्त सम्बन्ध है। (घ) अलङ्गारशास्त्र और मनोविज्ञान-अलद्धारशास्त्र का मनोविज्ञान से भी धनिष्ठ सम्बन्ध है। भारतीय पुरातत्त्व में मनोविज्ञान पृथक शास्त्र के रूप में विकसित नहीं हुआ, दर्शनशास्त्र आदि में ही इसकी कुछ मान्यताओं एवं तत्वो का यत्र-तय विश्लेपण कर दिया गया है किन्तु आधुनिक युग में यह शास्त्र अत्यन्त रामृद्ध हो चला है। यह मनोविज्ञान अलद्दारणास्त्र में अपना एक विशेष स्थान रसता है। रस-विवेचन का तो यह आधार ही है। स्थायीभाव और संचारीभाव आदि के रूप में साहित्यमनीपियों ने स्वाभाविक तथा नैमित्िक मानसिक वृत्तियो का सूक्ष्म विवेचन किया है। इस प्रकार रस-सिद्धान्त को हृदयंगम करने के लिये मनोविज्ञान का आंशिक ज्ञान अत्यन्त अपेक्षित है। (3) अन्य शास्त्रों से सम्बन्ध-उपर्यु कत शास्त्रो के प्रतिरिक्त अरन्प शास्त्रों का भी अलङ्गारशास्त्र पर प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। जैसे-रस-विवेचन में सांस्य तया वेदान्त के सिद्धान्तों की भलक है। यहाँ चमत्कारचन्द्रिका, मन्दारचम्पू तया रसगङ्गाधर आदि ने उपनिपद् के उद्धरण ('रसो व सः' आदि) दिये हैं। इसी प्रकार दोप-निराय के प्रकरण में योगणास्त्र, कामशास्त्र तथा अर्थशास्त्र इत्यादि की मान्यताओं का उल्लेख किया गया है। संक्षेप में यह अलद्दारशास्त्र विविध विद्याओो से गहन सम्वन्ध रखता है। इसके सम्थक अववोध के लिये विविध शास्त्रों का ज्ञान नितान्त आवश्यक है। ५. अलद्धारशास्त्र का आर्विभाव- • यद्यपि अलङ्गकार-शास्त्र का उद्भव बहुत याद में हुआ, जैसा कि प्रग्रिम पृष्ठों में विचार विया जायेगा, तथापि दाव्य रधा कान्योतकर्यक अरसद्दार आदि धर्मों का
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का व्यंप्रकारी * अत्यन्त प्राचीन काल से प्रयोग किया जाता था। भारतीय श्रय भाषा के आदि ग्रस्थ: ऋग्वेद में भी अ्रनेक स्थलों पर अलद्धारों का चमत्कार परिलक्षित होता है।" अ्रनेक ऋचाओं में अलङ्कृत काव्यमय भाषा में उच्चकोटि के काव्य का दर्दन होता है; जसे 'उपा-स्तुति' सम्बन्धी निम्न मन्त्र मे ही- अरभातेव पुस एति प्रतीची गर्तारुगिय सनये धनानाम्। जायेव पत्य उशती सुवासा उचा हस्र व निरिखीते अप्सः । ऋ० १.१२४.६॥ इस मन्न में उपमा का चमत्कार है। निरुक में उपमा के उदाहुरण के रूप में ऋग्वेद के अ्नेक मन्त्रों को उद्घृत किया गया है। उपमा के समान ही अतिशा- योक्ति, व्यतरेक तथा उत्प्रेक्षा आदि विविध अलद्धार वेदों में दष्टिगोचर होते हैं (देखिये P. V. Kane-History of Sanskrit Poetics. पृ० ३१४, ३१५)।, इसी प्रकार ब्राह्मण ग्रन्थो और उपनियदों में भी काव्यत्व एवं भलड्कार आदि के अ्नेक उदाहरस मिलते हैं। तंदनन्तर रामायगा और महाभारत में तो उच्चकोटि का काव्य पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है। ध्वन्यालोक तथा काव्यप्रकाश आदि में इन महाकाव्यों के उदाहरया भी दिये गए हैं (गृधगोमायुसंबाद आदि)। यद्यपि महाभारत को अनेक विद्वान् काव्य की अपेक्षा धर्मशास्त्र अ्थवा पुराएंतिहास की कोटि मे रखना उचित समझते हैं तथापि रामाय एक उच्चकोटि का काव्य है, इसमें सन्देह नही। आचार्य यास्वा के निरुक्त्त तथा पाशिनि की अप्टाध्यायी के अनुशीलन से यह भी विदित होता है, कि उस समय काव्यों का पर्याप्त विकास हो चुका था। राजशेखर का कथन है कि स्वयं पाशिनि ने 'जाम्ववतीजय' नामक एक काव्य की रचना की थी। वार्तिक तथा महाभाप्य में तो वासवदत्ता, सुमनोत्तर आदि आख्यायिकाओं; कंसवध, बालिबन्ध आदि नाटकों का उल्लेस भी किया गया है। प्राचीन बौद्ध ग्रन्यो से भी विदित होता है कि बुद्धकाल पर्यस्त भारतीय साहित्य के विविध अङ्गो का पर्याप्त विकास हो चुका था। साहित्य का विकास हो जाने पर साहित्यिक विवेचन की ओर विद्वानों का ध्यान जाना स्वाभाविक है; क्योंकि साहित्य-निधि के समृद्ध हो जाने परं उसकी परस करने के लिये लक्षण-प्रन्थों का निर्मण हुआ ही करता है। ये लक्षण-ग्रन्थ ही कवियों की स्वच्छन्द विहारिसी कल्पना को मर्यादा में रखते है। ये उपसब्ध काव्य कृतियों के आधार पर हो आविभूत होते हैं तथागि भावी साहित्यकारों के निर्दधक होते हैं और उनका ययेप्ट नियन्त्रण भी करते हैं। फलतः तत्कालीन समृद्ध साहित्य ने. लक्षणा -ग्रन्थों को प्रोत्साहित किया तथा काव्य के विविध भ्रङ्गों का विवेचन होने लगा, काव्य के स्वरूप, भेद तथा गए-दोपों पर विचार किया जाने लगा। बस, साहित्य-सर्जन की घारा दो मार्गों मे प्रवाहित होने लगी-निर्माण तथा समीक्षा। एक ओर तो प्रतिभागाली कविगएं उच्चकोटि के साहित्य का निर्माग करने में तत्पर रहे और दूसरी ओर विवेकशील विद्वान् साहित्य के स्वरूप
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विपय-प्रवेश
का विवेचन करते हुए उसको समीक्षा करने लगे। यही साहित्यशास्त्र के भाविर्भाव की कहानी है।, ६. परलद्गारशास्त्र का इतियुत - संक्षेप में संस्कृत साहित्य-शास्त्र का इतिहास तीन युगो में विभक्त किया जा सकता है। (१) प्रथम युग-भामहाचायं (७०० ई०) से पूर्व; मारम्भ का समय। (२) द्वितीय युग-मम्मट (१०५०-११०० ई०) से पू्व; स्वतन्त्र उद्भावना का समय 1 · (३) तृतीय युग-(मम्मट के अनन्तर) सामञ्जस्य तथा समन्वय का समय। साहित्यशास्त्र का प्रारम्भिक युग अलद्धारशास्त्र की उत्पत्ति किस समय हुई यह निएय करना सम्भव नहीं प्रतीत होता । इसके विषय में विविध प्रवाद हैं। भरतमूनि ने नाट्यशास्त्र की उत्पत्ति ब्रह्मा से मानी है। इसी प्रकार राजशेसर की काव्यमीमांसा के अनुसार शङ्तर भगवान् ने इस शास्थ्र की शिक्षा व्रह्मा को दी थी। ब्रह्मा ने अन्य ऋषियों को इसका उपदेश किया। तब इस शास्त्र का १८ अधिकरणों में विभाजन किया गया और प्रत्येक अधिकरण का एक एक आचार्य द्वारा निरूपण किया गया- 'तन्न कविरहस्यं सहस्राक्ष: समाम्नासीत्, औक्तिकमुवितिगर्भः, रतिनिर्सयं सुवसंनाभ: अनुप्रासिकं प्रचेतायन .; यभो समकानि; चित्रं चित्राङ्गदः शब्दस्लेषं शेष :; वास्तवं पुलस्त्य; श्रपम्यमोपफायन; अतिशयं पाराशरः पर्यश्लेपमुतय्यः उभपालङ्ारिक कुबेर: बैनोदिकं कामदेव :; स्पकनिरूपणीयं भरत .; रसाधिकारिक नग्दिकेश्वर :; दोपाधिकारिक विषण: गुखोपादानिकमुपमन्यु: औपनिपदिक फुचुमार: - इति।' (काव्यमीमांसा, कविरहस्यम् श्र० १) इस कथन की प्रामासिकता विवाद-ग्रस्त है। आज इन रचनाओं-का यत्किञ्चित् अंश 'भरत का नाट्यशास्त्र' आदि ही उपलब्ध है। अ्न्य रचनाएँ तो बहुत समय पूर्व ही काल के गर्भ में विलीन हो चुकी होंगी। राजशेखर ने भी उनके उच्छेद की ओर संकेत किया है-'इत्यस्धारञ्च प्रफीसत्वात् सा किञ्चि- विचच्छिदे। 'उपयुक्त आचार्यों मे से सुवर्एनाभ और कुचुमार के नाम कामसूत्र (११ १३-१७) में भी उपलब्ध होते हैं। नन्दिकेश्वर का उल्लेख आचार्य - अभिनवगुप्त ने भी किया है। इसी प्रकार र्ीतरत्नाकर में भी साहित्यशास्त्र के आाचार्यों में नन्दिकेश्वर' का नाम लिया गया है। काव्यादर्श की टीका 'हृदयंगमा' के अनुसार काश्यप और चररुचि आदि ने काव्यादर्श से पूर्व लक्षणश्ास्त्रों की रचना की थी-पूर्वेयां काशयपवररुचिप्रमृतौनामाचार्याएं लक्षराश्ञास्त्रासि -संहृत्य पर्यालोच्य। कव्यादर्श की अन्य टीका 'शुतानुपालिनी में भी काश्यप, ब्रह्यदत्त और नन्दिस्वामी का उल्लेस किया गया है। यद्यपि उनके ग्रन्थ आज उरलब्ध नहीं हैं तथापि इन प्रमाखों से यह विदित होता है कि भारत मे साहित्यशास्त्र का उदय अत्यन्त प्राचीन काल में हो चुका था। कतिपय अन्य प्रमाणों से भी इस बात की पुष्टि होती है- निघष्टु (१.१३) में ऋम्वेद से १२ उदाहरण चुनकर उन्हें 'उपमा, बतलाया
प्रकाशित हो चुका है। १. नन्दिकेश्वर का अअ्रभिनय दर्पण, के० एल० मुखोपाध्याय कलकत्ता से
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4 J. काव्यप्रकाश
गया था जैसे-'इदमिव इदं यथा' अग्तिनं इत्यादि। इसकी व्याख्या करते समय निरुक्तकार यास्कमुनि ने अपनें पूर्वर्ती आचार्य गार्ग्य का उपमा-तक्षणा उद्घुत किया है, जो अत्यन्त वैज्ञानिक है-अर्थात, यद् अ्रतत तत्सदृशमिति गार्ग्यंः। यस्क ने पूणोपमा तथा लुप्तीपमा का भेद भी स्पष्ट किया है-ुप्तोपमा यर्थोपमानोत्या- चक्षते (३. १८)। इसके पश्चात् पाशिनि आ्रराचार्य ने भी उपमित, उपमान आदि शब्दों का प्रचुर प्रयोग किया है। इससे विदित होता है कि पाशिनि से पूर्व ही उपमा के चार, अङ्गों का विवेचन किया जा चका था। आचार्य पासिनि ने शिलालि और कृशाश्व के द्वारा निर्मित नट-सूत्रों का भी निर्देश किया है। इसी प्रकार वेदान्त- सूयों में भी उपमा (३. २. १८) तथा रपक (१.४. १) अलड्कारों का नामनिर्देश किया गया है। अलड्कारनास्न के उपलब्ध ग्रन्थों से पूर्वकालीन अश्नयोप, कालिदास आदि के काव्यों में भी साहित्पिक लक्षणों का व्यवस्थित प्रयोग परिलक्षित होता है.। इससे यह मानना पड़ता है कि उस समय तक अ्रनेक अलङ्कारों के स्वरूप प्रादि का विवेचन किया जा पुका था। साथ ही रुद्रदामन (१५० ई०) के शिलालेस से भी विदित होता है कि उस समेय तक काव्य के गद्य और पद्य दो भेद माने जाने लगे' थे, इन दोनों का अलट्कृत होना आवश्यक समझा जाता था। स्फुट, मधुर कान्त भादि काव्य-गुशों का भी निरदेश हो चुका था, जिनका कि आगे चेलंकर 'काव्यादेश में निस्मण किया गया है। इसी प्रकार नासिक के शिलालेस में भी, जो रुद्रदामन् -(जुनागढ) के शिलालेख सेपूर्वकालीन है, अनेक आलडकारिक संकेत प्राप्त होते हैं।- इनसे अर्वाचीन हरिपेशकृत समुद्रगुप्त की प्रगस्ति (चतुर्थ शताव्दी) आदितो इस बात के ही स्पष्ट प्रमाण हैं कि उस समय से बहुत पूर्व ही साहित्यशारत्र का व्यवस्थित विवेचन हो चका था। 1 अब विचारणीय यह है कि अराइकारशास्त्र की सर्वप्रथम व्यवस्थित रचना, कौनसी है? कुद् विद्वानों का मत है कि अग्निपुराए ही अलड्कारशास्त्र का प्रथम लक्षण-ग्रन्थ है। किन्तु यह विचारणीय ही है। (१) पग्तिपुरा- काव्यप्रकाशादर्श के लेखक महेश्वर का कथन है कि भरतमुनि ने अग्निपुराय के आधार पर साहित्यास्त्र का कारिकाओं में प्रसयन किया। काव्यरसास्वादनाय मह्निपुराएादिप्टां साहित्यप्रक्रियां भरतः संक्षिप्ताभि: फारिकामिनिबंबन्ध। इसी प्रकार बुद्ध अन्य टीकाकारों ने भी वह्धिपुराण को अलड्कारशास्त् का. प्रथम स्रोत-स्वीकार किया है। किन्तु अगििपुराणकी-प्राचीनता में विद्वानों को सन्देह है। कुद विद्वान् तो उसे दयम तथा एकादरा शताब्दी की रचना मानते हैं। अलड्कारणास्त के किसी प्राचीन आचार्य ने अग्निपुराण का उल्लेस भी नही किया, अर्वांनीन आचाय (१४ इताब्दी) विश्नाथ ने ही स्पष्ट रूप से अग्निपुराण का नाम-निर्देश किया है। प्रायः सभी प्राचीन आचार्यो ने भरत के नाट्यशास्त्र का ही बार बार उल्तेस किया है अतः वही भलङ्कार शास्त का प्रथम ग्रन्थ कहा जा सकता है। •अग्निपुराण एक विश्वकोप है। इसमें ऐसे अ्र्रनेक विषयों का विवेचन है,
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विषम-प्रवेद
जिनमें मध्यकातीन भारत के लोग रनि रसते से। इसमें कुछ साहित्यिक विपयों का भी विवेन किया गया है। इसके पतिपय अध्यायों में काव्य-शास्तवियपक विवेचन भी है; जैसे-प्रध्याय ३३६ में काव्यलक्षण तथा काव्यभेद (संस्पृत औौर प्रावृत,'गद्य, पद्य तथा मिश्रन) तथा कया, यरयायिका और महाकाव्य का स्वरूप निस्पणा किया गगा है। अध्याय २३७ में रूपक पर विचार किया गया है तथा ३३८ मे रग, स्थायी भाव, विभाव, पनुभाय तथा व्यभिचारी भाव आदि के निरुपस के साथ-नाथ नायक और नामिका के गुखो का बन है। ३३६ में पाज्चाली, गोडी, वंदर्भी औौर लाटी नामक बार रीतियो एवं भारती, सात्वती कँशिकी तथा भारमटी नामक पार वृतियों का विवरण है। मध्याय ३४०, ३४१ में विविध प्रकार के भङ्गचालन एवं प्रभिनय का, ३४२ से ३४४ तक अलद्वारों का तथा ३४५-३४६ में काव्य के मुगवदोपों का विवेचन किया नया है। इस प्रकार काव्यशास्त्र विषयक ३६२ शलोक इन अध्यायों में है। किन्तु इनमे भनेक दलोक नाट्ययशास्त्र से लिये गये प्रतीत होते हैं। अ्रग्निपुराग के अलक्वार-विवेचन पर काव्यादशं तथा भामह के भलद्वार-निरूपण का भी प्रभाव पर्लिक्षित होता है। ऐसा भी आभास मिलता है कि ध्वव्यानोर में प्रतिष्ठित ध्वनि-विद्ान्त से भी अग्निपुराए परिचित है। इन कारणों से विद्वग्जन अग्निपुराण को अलद्धारशास्त्र की प्रथम कृति स्वीकार नही करते (देसिसे P. V. Kane H S P. पृo ५-१०) (२) नाट्यशास्त्र साहित्य शास्त्र का प्राचीनतम उपराब्य ग्रन्थ भरतमुनिकृत नाट्यशास्त्र ही माना जाता है।इसके रचनाकाल का टीक निर्चय नहीं किया जा सक है। कुछ विद्वानों का कथन है कि यह एक काल की रचना नही, अपितु पताब्दियों के साहित्यिक प्रयाम का फल है। म0 हरप्रसाद शास्त्री आदि विद्वानों के मत में आचार्य भरत का समय ईस्वी पूर्व द्वितीय शताब्दी है। प्रो० कीथ के मतानुसार नाट्यशास्त्र का समय ईसा की तृतीय शताब्दी से पूर्व नहीं हो सकता। इस प्रकार नाट्यगास्त्र का समम २०० ई० पूर्व से ३०० ईस्वी तक के मध्य में दोलायमान है। बाह्य और आभ्यन्तर प्रमाणों से भी इसके कालनिर्घारण में थोड़ी हो सहायता मिलती है। कालिदास ने विक्मोवर्शीय नाटक मे भरतमु्ति का स्पष्ट निर्देश किया है- गु्निना भरतेन यः प्रयोगो भवतीप्वप्टरसाधयो निबद्ध:। सलिताभिनयं तमद्य भर्ता महतां द्वष्टुमना: स लोकपालः ।। (अ्रङ्ग १) इससे प्रतीत होता है कि कालिदास से पूर्व ही नाट्याचार्य भरत एक पौरासिक व्यक्तित्व धारस कर चुके थे; किन्तु कालिदास का समय भी अभी अनिर्धारित ही है। नाट्यशास्त्र के अन्तः साक्ष्य से भी उसकी प्राचीनता सिद्ध होती है। उसमें ऐन्द्रव्याकरण तथा यास्क के उद्वरस तो हैं किन्तु पागिनिव्याकरण के नहीं। उसकी भाषा तथा विषय प्रतिपादन की शौली भी प्राचीनता को प्रकट करती है। अलद्धार शास्त्र के सभी आचार्षों ने भरतमुनि का आदर के साथ स्मरण किया है। आचार्य मम्मट ने रस-मूत्र को उद्धत करते हुए उनका नाम निर्देश किया'
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- काव्यप्रकाश.
गया था जैसे-'इदमिव इद यया' अग्निन इत्यादि। इसकी व्याख्या करते समय निरुककार यास्कमुनि ने अपने पूर्ववर्ती आचारय गार्ग्य का उपमा-लक्षणा उद्घुत किया है, जो अ्त्यन्त वैज्ञानिक है-अर्थात, यद् अ्तत तत्सदृशमिति गाग्य:। यास्क ने पूोंपमा तथा सुप्तोपमा का भेद भी स्पप्ट किया है-तुप्तोपमाग्यर्थोपमानीत्या- चक्षते (२. १८)। इसके पश्चात् पाणिनि आचार्य ने भी उपमित, उपमान आदि शब्दों का प्रचुर प्रयोग किया है। इससे विदित होता है कि पाशिनि से पूर्व ही उपमा के चार शङ्गों का विवेचन किया जा चुका था। आचार्य पागिनि ने शिलालि और कृशास्व के द्वारा निर्मित नट-सूत्रों का भी निर्वद किया है। इसी प्रकार वेदान्त- सूत्रों में भी उपमा (३. २. १८) तथा रूपक (१. ४. १) अलङ्कारों का नामनिर्देद किया गया है।, अलड्काररास्त्र के उपलब्ध ग्रन्थों से पूर्वकालीन, अश्वधोप, कालिदास प्ादि के काव्यों में भी साहित्यिक लक्षणों का व्यवस्थित प्रयोग परिलक्षित होता है। इससे यह मानना पड़ता है कि उस समय तक अनेक अलङकारों के स्वरूप आदि का विवेचन किया जा चुका था। साथ ही रुद्रदामन् (१५० ई०) के शिलालेख से भी विदित होता है कि उस समय तक काव्य के गद्य और पद्य दो भेद माने जाने लगे थे, इन दोनों का अलड्कृत होना आवश्यक समझा जाता था। स्फुट, मंधुर कान्त आदि काव्य-गुसों का भी निर्देधे हो चुका था, जिनका कि आगे चलकर 'काव्यादर्श, में निरूपस किया गया है। इसी प्रकार नासिक के मिलालेख में भी, जो रुद्रदमन् (जूनागढ) के शिलालेम से पूर्वकालीन है, अनेक आ्रालड्कारिक सरंकेत प्राप्त होते हैं। इनसे अर्वाचीन हरिपेसकृत समुद्रगुप्त की प्रशस्ति (चतुर्थ पताब्दी) आदि तो इस बात' के ही स्पष्ट प्रमाण हैं कि उस समय से बहुत पूर्व ही साहित्यशारत्र का व्यवस्थित विवेचन हो चुका था। 1. अब विचारणीय यह है कि अलङ्कारशास्न की सर्वप्रथम व्यवस्थित रचना कौनसी है ? कुछ विद्वानों का मत है कि अग्निपुराए ही अलङ्कारशास्त्र का प्रथम, लक्षस-ग्रन्थ है। किन्तु यह विचारणीय ही है। - (,१). श्रग्तिपुरास- काव्यप्रकाशादर्श के लेखक महेद्वर का कथन है कि भतमुनि ने अग्निपुराए के आवार पर साहित्यशास्त्र का कारिकाओं में प्रखयन किया। काव्यरसास्वादनाय वह्निपुरासादिप्टां साहित्यप्रक्रियां भरतः संक्षिप्ताभिः कारिकाभिनिर्यबन्ध। इसी प्रकार कुछ. अन्य टीकाकारो ने भी वह्धिपुराए को-अलङ्कारघास्र का प्रयम स्रोत-स्वीकार किया है-। किन्तु अग्तिपुराए की प्राचीनता में विद्वानों को सन्देह है। कुछ विद्वान् तो उसे दयम तथा एकादश शताब्दी की रचना मानते हैं। अलङ्कारशास्थ के किसी प्राचीन आचार्य ने अग्निपुराण का उल्लेख भी नही किया, अर्वाचीन आचार्य (१४ पताब्दी) विश्नाथ ने ही स्पष्ट रूप से अग्निपुरास का नाम-निर्देश किया है। प्रा्यः सभी प्राचीन आचारयो ने भरत के नाट्यशास्त्र का ही वार बार उल्लेस किया है पतः वही मलङ्कार शास्न का प्रयम ग्रन्थ कहा जा सकता है। पग्तिपुरास एक वि्वकोप है। इसमें ऐसे अनेक विषयों का विवेचन है,
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जिनमें मध्यकालीन भारत के लोग रुचि रसते थे। इसमें कुछ साहित्यिक विपयों का भी विवेचन किया गया है। इसके कतिपय अध्यायों में काव्य-मास्तविपयक विवेचन भी है। जैसे-प्रध्याय ३३६ में काव्यलक्षण तथा काव्यभेद (संस्कृत औोर प्राकृत, गद्य, पद् तथा मिथ्र) तथा कया, भार्पायिका और महाकाव्य का स्वरूप निरुपण किया गगा है। अध्याय ३३७ में रूपक पर विचार किया गया है तथा ३३८ मे रस, स्थायी भाव, विभाव, सनुभाव तथा व्यभिचारी भाव सादि के निरुपए के साथ-साथ नायक और नामिका के गुखों का बरणन है। ३३६ में पाञ्चाली, गौडी, वंदर्भी और लाटी नामक चार रीतियो एवं भारती, सात्वती कँसिकी तथा भरभटी नामक चार वृत्तियों का विवरत है। अध्याय ३४०, ३४१ मे विविध प्रकार के भङ्गचालन एवं प्रभिनय का, ३४२ से ३४४ तक अलद्धारों का तथा ३४५-३४६ में काव्य के गुग-दोपों का विवेनन किया गया है। इम प्रकार काव्यशास्य विषयक ३६२ इलोक एन अध्यायों में है। किन्तु इनमे पनेव इलोक नाट्ययशास्त्र से लिये गये प्रतीत होने हैं। भग्तिपुराग के अलद्धार-विवेचन पर काव्याद्र तथा भामह के प्रसद्दार-निरपण का भी प्रभाव परिलक्षित होता है। ऐसा भी आभास मिलता है कि ध्वन्यालोर में प्रतिष्ठित ध्वनि-सिद्धान्त से भी प्ग्निपुराए परिचित है। इन कारणों से विद्वज्जन अग्निपुराए को अलद्धारशास्त्र की प्रथम कृति स्वीकार नही करते (देखिय P. V. Kane H S P. पृo x-t०) (२) नाट्यशास्त्र साहित्य शास्त्र का प्राचीनतम उपलब्ध ग्रन्थ भरतमुनिकृत नाव्यशास्त्र हो माना जाता है। इसके रचनाकाल का ठीक निश्चय नही किया जा सका है। कुछ विद्वानों का कथन है कि यह एक काल की रचना नहीं, अपितु शताब्दियों के साहित्यिक प्रयास का फल है। म० हरप्रसाद शास्त्री आदि विद्वानों के मत में आचार्य भरत का समय ईस्वी पूर्व द्वितीय शताब्दी है। प्रो० कीथ के भतानुसार नाट्यशास्त्र का समय ईसा की तृतीय शताब्दी से पूर्व नहीं हो सकता। इस प्रकार नाट्यशास्त्र का समय २०० ई० पूर्व से ३०० ईस्वी तक के मध्य में दोलायमान है। वाह्य और आभ्यन्तर प्रमाणों से भी इसके कालनिर्घारण में थोड़ी ही सहायता मिलती है। कालिदास ने वित्रमोवंशीय नाटक मे भरतमुनि का स्पष्ट निर्देश किया है- भुनिना भरतेन यः प्रयोगो भवतीष्वष्टरसाथ्रयो निबद्धः। सलिताभिनयं तमद्य भर्ता महतां द्रष्टुमनाः स लोकपातः ॥। (ङ्ग १) •इससे प्रतीत होता है कि कालिदास से पूर्व ही नाट्याचार्य भरत एक पौराशिक व्यक्तित्व धारण कर चुके थे; किन्तु कातिदास का समय भी अभी अनिर्धारित ही है। नाट्यशास्त्र के अन्तः साक्ष्य से भी उसकी प्राचीनता सिद्ध होती है। उसमें ऐन्द्रव्याकर तथा मास्क के उद्वरण तो हैं किन्तु पाशिनिव्याकरण के नही। उसकी भापा तथा विषय प्रतिपादन की शाली भी प्राचीनता को प्रकट करती है। अलद्दार शास्त्र के सभी आचार्यों ने भरतमुनि का आदर के साथ समरण किया है। आचार्य मम्मट ने रस-मूत को उद्ध त करते हुए उनका नाम नि.
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है। नाट्यशास्त्र की उपलब्ध पुस्तकों में ३६ या ३७ अध्याय हैं। अभिनव भारतो के अनुसार इसमे ३६ अध्याय ही हैं-'पटत्निशफं भरतसूत्रमिदं' विवृण्वन्। किन्तु अभिनवगुप्त ने ३७वे अध्याय पर भी 'अभिनवभारती' नामक व्यास्या लिसी है। नाट्यशास्त्र में लगभग ५००० इ्लोक है तथा कुछ गद्य भाग भी हैं। नाट्यशाइत्र के तीन गश है-(१) गद्य-भाग-यह सूत्र तथा भाष्य के रूप में है जिसकी शैली यास्क के निरुक्त की शैली के समान है; जैसे-विभावानुभाव- व्यभिचारिसंयोगाद्सनिप्पत्तिः । को वा दृष्टान्त इति चेत् उच्यते। यथा नाना व्यञ्जनौयधि ... रसत्वमाप्नुवन्ति। ऋपय ऊचुः । रस इति कः पदार्थः । अग्रोच्यते, प्रस्वाद्यरवात्। (नाट्यशास्त्र अ० ६)। कुछ विद्वानों का विचार है कि यह सूत्र- भाष्य रूप अश ही इस ग्रन्थ का मूलभाग है, अन्य अ्ंश कालान्तर में जोड़े गये हैं।' (२) सूयविवरसस्वभावा फारिका-सूत्र-भाष्य के अभिप्राय को विस्तारपूर्वक सम- काने के लिए अनेक कारिकाए हैं, जिनमे विविध शङ्काओं का समाधान भी किया गया है (३) अन्य श्लोक, जो तीन प्रकार के हैं-(i) मानुवश्य इलोक-भरत नाट्यशास्त्र में १५ इलोक तथा १६ आर्या दन्द ऐसे हैं, जिनका इस नाम से उल्लेख किया गया है। अभिनवभारती (६.३५) मे ऐसा प्रतीत होता है कि नाट्यविपयव कुछ मन्तव्य गुरुशिप्यपरम्परा से प्रचलित थे, उनका ही 'अन्नानुवंस्यो श्लोको भवतः' इत्यादि रूप से नाव्यशास्त्र में सग्रह कर दिया गया है। (ii) सून्नानुविद्ध दलोक- म्रनेक पद्यो को 'सूचामुविद्व' आर्ये भयतः' इत्मादि प्रकार से उद्ध त किया गया है। इनमें सूत्र का भाव सरलता से प्रकट किया गया है। अभिनवभारती के अनुनीलन से प्रतीत होता है कि ये कारिकाएँ भरत-रचित ही हैं। (iii) पूर्वाचार्यो की कारिकाएँ-'भवन्ति चान दलोकाः' अथवा 'अवारये भवतः' इत्यादि रूप से भी लगभग १०० पद्य उद्धत किये गये हैं। अभिनवभारती के अनुसार ये पद्य प्राचीन सचार्यों के है, जिन्हे भरतमुनि ने उद्घृत कर दिया है-ता एता हार्या एक प्रघट्टफतया पूर्वाचार्म लंक्षणात्वेन पठिता मुनिना सु सुलसंग्रहाय यथास्थानं निवेशिता:' (प०६) नाट्यनास्त्र में विविध ललित कलाओो का निरूपण किया गया है। इसका मुख्य प्रतिपाद्य विषय 'नाट्य' ही है। प्रारम्भ में नाटक की उत्पत्ति तथा रद्षमन्न मादि का विनद विवेचन किया गया है। आगे चलकर अभिनय के विविध प्रकारों तथा रूपक के श्रङ्गों का यभास्थान विस्तारपूर्वक निरपस किया गया है। सन्गीत वाद्य तथा स्वर ताल (२६-३२) आदि का भी वर्शन किया गया है। प्भिनय तथा सङ्गीत के अतिरिक्त भावी अलङ्गारशास्त्र के विविध अ्ङ्गों का निरुपस भी नाव्य- शास्त्र में मिलता है। भतरमुनि रस-सम्प्रदाय के प्रवर्तक माने जाते हैं। उन्होंने नाट्यशास्त्र के पष्ठ अध्याय में विभावादि से रसनिप्पत्ति का वर्न, किया है तथा, रसों के बएां तथा देवता आदि का उल्लेख किया है। सप्तम अध्याय में स्थायीभाव विभाव,अनुभाव तथा संचारी भावों का विशद विवेचन किया है। पोडश अध्याय में छन्दों तथा सप्तदण में चार-उपमा, रूपक दीपक और यमक-अलद्व्ारों तथा दस काव्यदोपों एवं दरा काव्यनगुगों का निरुपस किया है।
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विपय-प्रवेश [ ११
'भरत की यह कृति नाव्य-शास्त्र का अनूठा ग्रन्थ है। यह भारतीय अलद्धारशास्त्र का आदि स्रोत है। इस नाव्यशास्त्र पर मथासमय अ्र्नेक टीकाएं लिखी जाती रही थी। सम्भवतः नाट्यशास्त्र पर कोई वातिक ग्रन्थ भी लिखा गया था, जिंसके लेसक शीहर्प थे। इसी प्रकार महाराज नान्यदेवकृत भरतभाष्य का भी उल्लेस किया जाता है। इनके अतिरिक अभिनवभारती में राहुलकृत कारिका,' मानृमुप्त तथा कीतिघर की टीका आदि के मत उद्घुत किये गये हैं। उद्भट, तोल्लट, संकुक तथा भट्टनायक आादि ने भी नाव्यशास्य की व्यास्या की थी। इन सभी के मतो को अभिनवगुप्त ने उद्पुत किया है। इनमें से अधिकतर टीकाए उपलब्घ नही है। वतमान टीकामों में तो अभिनवभारती ही नाव्यश्ास्त्र की सर्वश्रेष्ठ -
व्यास्या है। '(३) प्रारम्भिक युग के धन्य आाचार्य-(i) मेधावी-भामह ने दो स्थलों पर मेघावी का उल्लेख किया है। कुद आचार्यों के अनुसार मेघाविरुद्र (रुद्रट) यह पूएं नाम है। अन्य प्राचीन ग्रन्यों में भी 'मेघाविर्द्र' का उत्लेख मिलता है; किन्तु उनके विषय मे निश्चित रूप से कृछ नहीं कहा जा सकता। (ii) बौद्ध विद्वान् अश्वयोप, प्रसन्द, वमुवन्धु तथा धर्मकीति आदि ने भी अङ्कार शास्त्र पर रचनाएं की थीं, जिनके विषय मे विद्वानों मे वमत्य है। (iii) विप्लु धर्मोत्तरपुराण में भी नाव्य तथा अलङ्कारविषयक पर्याप्त सामग्री है। विद्वानों का कथन है कि इसमें नाट्यशास्थ्र का अनुसरण किया गया है। (v) भट्टिकाव्य-इस काव्य के चार काण्ड है जिनमें से तृतीय काण्ड (प्रसननकाण्ड) में ३म अलद्धारों तथा माधुर्य गुण के उदाहरस दिये गये हैं। भट्टिकाव्य के अनुशीलन से ज्ञात होता है कि यहाँ भामह या दण्डी का अ्नुसरण नही किया गया है। कुछ विद्वानों का विचार है कि भट्टि का काल भामह से पूर्वही है। द्वितीय युग (७०० ई० से १०५० तक) (१) भामह-आमहाचार्य,अलङ्कार-रम्प्रदाय के प्रवर्तक थे। उनका काव्यालद्वार' ही अलद्धार -शास्त्र की प्रथम स्वतन्त्र-तथा व्यवस्थित रचना है। बहुत समय तक मलक्वार शास्त्र तथा भामह का नाम-निर्देश ही किया जाता रहा; किन्तु बीसवी पताब्दी के आ्ररम्भ में 'काव्यालङ्वार' का प्रकाशन हुआ और अलङ्वार शास्त्र का यह प्रथम ग्रन्थ उपलब्ध हो सका। भामह के जीवन आदि के विपय में कुछ ज्ञात नहीं है-।, बेवल 'काव्यलङ्गार' के अन्तिम पद्य से इतना ज्ञात होता है कि उनके पिता का नाम 'रकिलिगोमिन्' था। इस नाम के अनुसार यह भी अनुमान किया जाता है किभामह बोद्ध थे; किन्तु इस विपय में कोई पुप्ट प्रमाए नही मिलता। यह माना जाता है कि भामह, काइमीरदेशीय थे। भामह का समय विवाद का विषय रहा है। 'दण्डी और भामह में कौन- । पूर्ववर्ती है' इस विषय पर भी विद्वानों में विवाद रहा है। अ्नेक विद्वानो ने प्रवलतर, प्रमाणों से यह सिद्ध करने का प्रवार किया है कि भामह ही दण्डी के पूर्ववर्ती हैं।.
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१२ काव्यप्रकाश
फिर भी भामह के समय का सम्यक निर्धारस कठिन ही है। कुछ विद्वानीं का कथन है कि भामह ने प्रत्यक्ष का लक्षस बौद्धाचार्य दिस्ताग (४२०-५००) के अनुसार दिया है धमकीति (लगभग ६२०) के अनुसार नहीं अतएव इन दोनों के मध्य में ही भामह का समय मानना चाहिए। श्रीयुत काणोमहोदय का कथन है-It has already been showa from other evidence that भामह could not bave flourished earlier than 700 A. D. (H S P. yo ₹?0) ! 'काव्यालङ्गार' भामह को अमरता प्रदान करने वाला ग्रन्थ है। इसमें ६ परिच्छेद हैं तथा ४०० पद्य हैं; प्रायः सभी अ्नुप्टभ् हन्द हैं। प्रथम परिच्छेद में 'सर्व' को नमस्कार करने के पश्चात् काव्य के प्रयोजन, स्वरूप तथा भेदों का विवेचन किया गया है। द्वितीय परिच्छेद के पूर्व भाग में माबुर्य, प्रसाद तथा ओरोज गुसो का तथा द्वितीय परिच्छेद के उत्तर भाग एवं तृतीय परिच्छेद में अ्लद्दारों का वएन किया गया है। चतुर्थ परिच्छेद में एकादश काव्य-दोपों का निर्देश करके उनमें से दस का विस्तृत विवेचन किया गया है। पञ्चमपरिच्छेद में प्रतिज्ञा हेतु दृष्टान्त तथा प्रमाण आदि के स्वरूप का विवेचन करते हुए न्यायविरोघी (ग्यारहवें) दोप का वियद LT
वर्णन किया गया है और पष्ठ परिच्छेद में शब्द-युद्धि (सौशब्ध) का विचार किया गया है। काव्यालद्वार पर उद्भट को-भामह्वृत्ति या भामहविवरस-नामक-टीका-थी, जो उपलब्ध नहीं है; प्रतिहारेन्दुराज आदि ने उसका उल्लेख किया है। भामहाचार्य का नाम प्राचीनतर आचार्य के रूप में स्मरण किया गया है। ध्वन्यालोक में भामहे ा दो बार (१-१३ तथा ३-३७) उल्लेख किया गया है। अभिनवगुप्त ने भी ध्वन्यालोकलोचन में उनका लक्षसकार के रूप मे निर्देश किया है। काव्यप्रफासकार ने अपनी मान्यता की पुष्टि के लिए 'रूपकादिरलङ्गार:' (उल्लास ६) तथा 'संपा सर्बत्र वक्रोषित' (उल्लास १०, विशेष अलङ्धार) इत्यादि भामह-ग्रन्थ का उद्धरण दिया है। भामह को साहित्यशास्त्र को मुख्य देन यह है-(i) शव्दायों सहिती काध्यम्' कहते हुए शव्दाथंयुगल के सामब्जस्य को काव्य मानना (ii) भरतप्रति- पादित दस काव्यगुणों का माधुर्य, भोज तथा प्रसाद तीन गुणों में अन्तर्भव करना (iii) अलद्गारों का व्यवस्थित विवेचन तथा वकोकि को अलद्गारों का बीजे स्वीकार करना। इस प्रकार भामह प्रथग आचार्य हैं, जिन्होने भारतीय अलङ्गारद्यास्त्र का. विशुद्ध सास्त्रीय विवेचन किया है। (२) दण्डी-आचार्य दण्डी वुद अंशों में रीति-सम्प्रदाय के उद्भावक हैं औोर आांशिक रूप में अलद्धार-सम्प्रदाय के पोपक भी। 'अवन्तिसन्दरी' कया के भाधार पर मे महाकवि 'भारवि' के प्रपौत् से और पल्लवनरेश की राजसभा में सुसा-पूर्वक जीवन व्यतीत करते थे; किन्तु भारवि और दण्डी के इस सम्बन्ध को श्रव सर्वसम्मत नही माना जाता, अपितु भारवि के मिन्न दामोदर को इनका प्रपितामह माना जाता है। इनकी रचनाओं से यह प्रतीत होता है कि ये दाश्षिसात्य थे। यद्यपि दण्डी का समय निश्चित नहीं है तथापि विद्वानों ने इनकी पूवसीमा में सूदक तथा वाणभट्ट को निर्धारित किया है क्योंकि 'लिम्पतोय तमोजप्ानि' यह मृच्छकटिक का पद्य
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विषम-प्रवेश [ १३ काव्यादर्शं में उद्घुत किया गया है तथा इनकी रचना में वालभट्ट के भावों की छाया भी परितक्षित होती है। प्रो० पाठक (Indian Antiquary 1952) का विचार है कि दण्डी वाययपदीय के कर्ता भतृ हरि (६५०) से अर्वाचीन हैं। डा० वेलवल्कर ने भी दण्डी का समय सप्तम शताब्दी का उत्तरार्घ स्वीकार किया है। नयम शताब्दी के ग्रन्थों में दण्डी का नामोल्लेस प्राप्त होता है अतः उनकी अन्तिम सीमा नवम शताब्दी के पर्चात् नहीं हो सकती। यद्यपि मैवसमूलर, वेवर, मैक्डानल इत्यादि विद्वानों के मतानुसार दण्डी का समय पष्ठ शताव्दी है तथापि नवीन विवेचना के अनुसार सप्तम शताब्दी का उत्तरायं ही दण्डी का समय माना जाता है। दण्डी की तीन रचनाएं हैं-दशकुमार चरित, छन्दोविचिति तथा काव्यादशं। 'काव्यादर्द' मलद्वार शस्त्र का ग्रन्थ है। इसमें ४परिच्छेद हैं तथा श्लोक संख्या ६६० है। प्रथम परिच्छेद में काव्य-लक्षणा, काव्य-भेद, वैदर्भी तथा गौड़ी दो रीतियाँ, दसगुए तथा प्रतिभा, शृत और सभियोग (सतत अभ्यास) नामक तीन काव्य-हेतुमों का वर्खन किया गया है। द्वितीय परिच्छेद में ३५ अलद्धारों का सोदाहरस निरूपण किया गया है। तृतीय परिच्छेद में यमक चित्रबन्ध तथा प्रहेलिका के १६ प्रकारों का विस्तार-पूर्वक वरंन किया गया है, तथा चतुर्थ परिच्छेद में दोषों का विवेचन किया गया है। काव्यादर्श पण्डित समाज में विशेष प्रिय रहा है। इसकी शैली ललित और प्रवाहपूर्ण है। भामह के काव्यलद्वार में तार्किक तथा विचारात्मक शेली है। काव्यादर्श के अनुवाद कई भाषाओ्रो [कसडभापा में-'कविराज मार्ग' सिंघली में सिय-बस-लकर (स्वभापालङ्कार) तथा तिब्बती में भी) में उपलब्ध हैं। दण्डी की कतिपय विशेषताएं इस प्रकार हैं-(i) उनके अनुसार गद्य के दोनों प्रकार कथा और अ्रस्यायिका में कोई वास्तर्विक भेद नहीं होता (यद्यपि भामह के अनुसार दोनों का स्पप्ट भेद है। । (ii) उन्होंने दस गुगों का विवेचन किया, जबकि भामह ने गुणनय में ही उनका समावेश कर दिया था। (iii) वैदर्भी और गौडी रीति का स्पष्ट भेद किया। इस प्रकार उन्होने रीति-सम्प्रदाय का मार्ग प्रशस्त - कर दिया, यद्यपि उन्हें किसी विशोप साम्प्रदाय में वाँघना कठिन है; कयोंकि उन्होंने गुगा तथा अलङ्गारों का भी विशद विवेचन किया है। (३) भट्टोदभट-राजतरङ्म्िणी के अनुसार उद्भट कार्मीर के राजा जया- पीड़ को राजसभा के सभापति थे। वे अलक्कार-सम्प्रदाय के पोपक थे। उनका समय प्रायः निश्चित सा ही है; क्योकि उन्होने भामह के काव्यालद्ार पर भामह-वृद्ति नामक टौका लिखी है तथा ध्वन्यालोककार (नवी शताब्दी) ने धनेक बार उद्भट का आदर-पूर्वक उल्लेस किया है। अतएब उङ्ट का समय आठवी शताब्दी के लगभग है। उनका जयापीड़ की राजसभा में होना भी इसी का समर्थन करता है। उद्भट की तीन रचनाओं का उल्लेख मिलता है-(१) भामहविवरए (२) कुमारसम्भव काव्य (जो कविकुलगुरु कालिदास के कुमारसम्भव के समान ही था, जिसके अलक्वारविषयक उदाहरए उपलब्ध हैं) (३) अलङ्गारसारसंग्रहद।
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१६ ] काव्यप्रकाश
मम्मट के प्रतीप और समासोक्ति के साथ जिनकी पृधक-२ समानता है। समस्त अर्यालद्ट्ारों को उपमा-प्रपञ्च के रूप में स्वीकार करना। (v) कविसमय के अनुसार पथवा अर्थविशेष बोधकता के कारण कुछ शब्दों की शुद्धता का प्रतिपादन। इसके शतिरिक्त 'दोप' आदि के विधय में भी वामन की कुछ निजी मान्यताये हैं, जिनका अर्वाचीन आधार्यों ने यथावसर उल्लेख एवं खण्डन किया है। काव्यप्रकाश में भी यन-तत्र ऐसे स्थल हैं। (५) स्द्रट का काव्यालद्कार-ग्द्रट की जीवनी आदि का अधिक परिचय नही मिलता । सम्भवतः ये काश्मीर के निवासी थे। इन्होने किसी आचार्य का नाम निर्ददे नहीं किया फिर भी इनके समय का निर्धारस करना अधिक कठिन नहीं है; क्योंकि इनका अलद्धार विवेचन भामह,. दण्डी औौर उद्भट की अपेक्षा अधिक वैज्ञानिक है; अतएव यह निश्चित ही है कि ये उनसे अर्वाचीन हैं। साथ ही दशम शताब्दी के राजशेखर आदि आचार्यों ने इनके अनेकशः उद्घरण दिये हैं। भ्भिनवगुप्त तथा मम्मट (उल्लास ६) ने भी रुद्रट का उल्लेस किया है। अतः रुद्रट का समय ६०० ई० के लगभग ही है। राम्भवतः ये ध्वनिकार (६२X-८७X) के समकालीन हैं। स्द्रट का काव्यालद्गार एक विस्तृत ग्रन्थ है। यह मी कहा जाता है कि 'पृङ्भारतिलक' नामक ग्रन्थ भी रुद्रट का ही है; किन्तु इसकी पुष्टि में कोई प्रबल प्रमाण नही मिलता। काव्यालङ्गार पर नमिसाधु की प्राचीन टोका है। इसमें १६ भध्याय हैं और ७३४ पद्य । साहित्यशास्त्र का व्यापकरूप से विवेचन करना ही इस ग्रन्थ का उद्दद्य प्रतीत होता है। इसी हेतु इसमें काव्यलक्षण, काव्यप्रयोजन, वृतति, भापा, चिन्नबन्ध, अथलिङ्वार, नायक तथा नायिका के भेद, रस तथा कथा साख्यारमिका आदि का विशद विवेचन किया गया है। स्द्रट अनद्धार-सम्प्रदाय-के पोपक हैं, यद्यपि उन्होंने भरत के रर-सिद्धान्त की महत्ता भी स्वीकार की है-'तस्मात्कतव्य यत्नेन महीमसा रसयुंवतम्'। रद्रट ने सर्वप्रथम अलद्धारों का वैज्ञानिक रूप से विभणन किया। उन्होंने वास्तय, योपम्य, अतिय और स्लेप-इन चार मुल तत्वों को अलङ्वार-विभाजन का आधार बनाया। भामह और उद्दभट आदि के अभिमत कुद अलद्कारों की उन्हंननि नवीन व्यास्या की, कुछ नवीन नाम रसे। उन्होने कुछ नवीन अलद्दारों की भी उद्भा- बना की। बाद के यचामों ने उनके मन्तव्य की समीक्षा की है। मम्मट ने भी फई स्थलों पर रद्रट से मत-भेद प्रकट किया है। जैसे-सदट का वाजरेप-नामह और मम्मट की ब्याजोकि है; स्द्रटका-'जाति' अलद्ार ही दण्डी तथा गम्मट को स्वभादोकि है। इसी प्रकार रद्रट के 'हेतु' नामक अलद्वार को मम्मट ने पृथक नहीं माना। संक्षेप में श्री काणे महोदय के अनुसार सुद्रट की विभेष देन यह है-(i) भ्रसन्गा- रो की वैज्ञानिक विभागन (ii) 'प्रेयस्' नामक ददम रंस की मान्यता (iii) रीति को विरोप गहत्त्व न देना (iv) गुए-निरूपण के प्रति उपेक्षा (v), "भाय' नागक सवद्ार की स्नीकृति; जिसमें व्यञ्जना-मिद्धान्त का वीज निंहित है।
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विपय-प्रवेश [ १७
(६) पनन्दवर्धन का ध्यत्यालोक-सानार्य अानन्दवर्धन का-नाम-साहित्य- EEE श्ास्त्र में अमर है। 'ध्वन्यालोक' उनकी उज्जवल कीति को सदा आलोकित करता रहेगा। पणशितराज जगसाथ ने उन्हें साहित्यशारप्र कामार्ग-व्यवस्थापक कहा. है "ध्वनिकृतामालद्वारिकसरशिव्यवस्थापफत्वात्। व्वनिकार के जीवनवृत्त के विपय में कुछ शधिक ज्ञात नहीं है। उनके ग्रन्थ देवीशतक (इलोक १०१) से केवल इतना संकेत मिलता है कि उनके पिसा का नाम जोए-था। राजनराङिगसी के अनुसार वे काश्मीर-नरेश अवत्तिवर्मा (८५५-८५३) की सभा के सुपसिद्ध विद्वान् थे- मुक्ताकख: शिवस्वामी कविरानन्दवर्वनः । प्रथां रत्नाकरशचागात् साम्रज्येश्वन्तिवर्मस: ॥ अन्य प्रमाणों से भी इमी समय की पुप्टि होती है। एक ओर तो आ्नन्दवर्घन ने उम्भट (८०० ई०) का मत उद्घृत किया है और दूसरी ओर राजशेखर (६oo- ६२५) ने आानन्दवर्धन का उल्लेख किया है; अतएव आनन्दवर्वन का समय ८५० ई० चे, आस-पामवही है। ध्वन्यालोक के अतिरितत अजुनचरित, विपमवासलीला, देवीमतक तथा तत्त्वालोक भी आनन्दवर्धन की रचनागं है। उनमें से प्रथम तीनो के उदाहरए ध्वन्यालोक में मिलते हैं। "'तत्वालोक' एक दर्शन-ग्रन्थ है। आनन्दवर्षन की विमल कीर्ति विशेपतः ध्वन्यालोक पर आवारित है। व्वन्यालोक के तीन अंश है- (१) कारिका, जिनकी संख्या (२ है। (२) वृत्ति अर्थात् कारिकाओं की गद्यमय व्यास्या। (३) उदाहरस, जिनमें से अधिकांश प्राचीन फाव्योंसेउद्धृत किये गये हैं; परन्तु कुछ आनन्दवर्घन के अपने भी हैं। कारिका और वृति के रचयिता के विषय में विद्वानों में मतभेद है। प्रचलित धारणा के अनुसार कारिका तथा वृति दोनों के रचयिता आनन्दवर्धन ही है। प्रतिहारेन्दुराज, कु्तक, महिमभट्ट,क्षेमेन्द्र तया मम्मट आादि के ग्रन्यो से भी यही प्रतीत होता है। किन्तु लोचनकार अभिनव- गुप्त.ने 'मूलग्रन्थकृत' (कारिकाकार) और 'ग्रन्थकृत' (वृतिकार) शब्दों का पृर्थक् 'रं प्रयोग किया है, जिसके आधार पर प्रो० जेकोवी, कीथ तथा काछे आदि का मेत है कि कारिकाकार तथा वृत्तिकार दोनों भिन्न २ हैं। यह भी कहा जाता है कि कारिकाकारकानाम-'सहृदय' (सहुयमनः पीतपे) है और वृत्तिकार आानन्द- वर्धन हैं-सहृदयानामानन्दो मनसि लभता प्रतिष्ठाम्। डा० सकरन ने इस भेद- सिद्धान्त का खण्डन किया है। ध्वन्यालोक की अन्तिम कारिका से यही विदित होता है कि भानन्दवैर्घन हो दोनों के रचयिता हैं।fa सत्काव्यतत्वविधयस्फुरितप्रसुप्तफल्पं मन.सु परिपक्वधियां मदासीत्,। तद्व्याकरोत्सह दयोदय ल्षाभहेतोरानन्दवर्धन इति प्रथिताभिधानः ॥ इस प्रकार यह विषय विवादग्रस्त ही है कि कारिका तथा वृत्ति के रचयिता - भिन्न २ है अथवा एक ही (विशेष देसिये P. V. Kane, HSP. पृष्ठ १५६-१६०) ध्वन्यालोक भारतीय साहित्य शास्त्र में नवयुगप्रवर्तक ग्रन्थ है। इसमें ग्रन्थकार की मौनिक उद्भावना, सूक्ष्म विषेननशक्तिऔौर मनननीलता का परिचय मिलता
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१८ काव्यप्रकाण
है। इसकी गसी पौढ़, विद्वस्तापूणं तथा रोचक है। इस ग्रन्थ में चार उद्योत हैं। प्रथम उद्योत में ध्वनिविरोधी विविध दृष्टिकोणों (अ्रभाववाद, भक्तिवाद और ्रनिव- चनीयवाद) का उल्लेख करके उनका निराकरण किया गया है तथा ध्वनि के स्वरूप को स्थापना की गई है। द्वितीय तथा "तृतीय उद्योत में ध्वनि के प्रकारों का विराद विवेचन किया गया है तथा चतुर्थ उद्योत में ध्वनि की उपयोगिता का निरुपण है। आनन्दवर्धन ध्वनि सम्प्रदाय के प्रवतक माने जाते है। यद्यपि उनका मुख्य उद्दक्य ध्वनि-सिद्धान्त का प्रतिपादन था तथापि उन्होंने साहित्यशास्त्र को भ्रनेक नवीन सिद्धान्त प्रदान किये हैं-(i) अभिधा लक्षणा से भिन्न व्यञ्जना नामक शब्द- व्यापार की स्थापना; जैसा कि काव्यप्रकाशदपण में विश्वनाथ ने कहा है-'इति फाव्यपुरुपावतारस्य निसिलशास्प्रतत्त्ववेदिन: श्रीमदानन्दवर्घंनाचार्यस्य (्वनिप्रन्य- कारस्य) पृथग्व्यञ्जनव्यापारस्थापनम्' (ii) काव्य में प्रतीयमान सर्य की प्रधानता का निरूपण। (iii) सनासोकि, पर्यायोकति आदि अ्द्गकारों से भिन्न ध्वनि का" स्वरूप विवेचन। (iv) व्पन्जय अर्थ के आधार पर काव्य का (ध्वनिकाव्य, गुरीभूत- व्यङ्गय दि) भेद-विवेचन तथा ध्वनिकाव्य के भेद-प्रभेद। (v) रस, भाव तथा रसाभास आदि का विवेक और रस तथा रसवत् बद्कार आदि का भेद-प्रदर्शन। (vi) गुए और अद्ककारों का भेद-प्रतिपादन, गुणों, का रस-से-सहज-सम्बन्ध-किन्तु,- संघटना का अनिवार्य सम्बन्ध नही। (vii) रसपरिपाक का विवेचन, रसों के विरोधा- विरोध तथा रस-दोपों की ओर भी संकेत। (viii) चित्रकाव्य का संक्षिप्त विवेचन तथा उसकी मवाञदनीयता का निरुपण। उपर्युक्त विवेचन से साप्ट है कि ध्वन्यालोक मे ध्वनि रूप काव्य की आात्मा का साङ्गोपाङ्ग प्रतिपादन किया गया है। आचार्य मम्भट की विशद काव्य-विचेषना का आधार अधिकाश में ध्वन्यालो ही है जैसा कि प्रस्तुत व्यास्या में मथावसर निरूपित किया गया है। ध्वन्यालोक कौ अभिनवगुप्तकृत लोचन व्यास्या (सहृदया- लोकलोचन या ध्वन्यालोकलोचन ही) विशेष प्रसिद्ध है; यद्यपि लोचन से पूर्व 'चन्दिरिका' नामक कोई अन्य व्यार्या भी विद्यमान थी। अभिनवगुप्त ने उसका उल्लेम करते हुए भनेक स्थलों पर मत-भेद प्रकट किया है। (७) राजशेसर की काय्ममीमांत्ा-इरमें साहित्यशास्त्र के रस, अलद्धार आदि विविध विष्यों का स्वतन्त्र विवेचन नहीं किया गया, भैपितु कवि तथा आापार्यो का उल्लेस काव्यस्वरूप, कविकर्तव्ये तथा कवि-समय आदि या विगद वरन किया गया है। वस्तुत: यह सवियों का मार्ग निर्ददक प्रत्थ है। मसन्धासयास्त के इतिहास की दृष्टि से काव्पमीमांसा का पर्याप्त महत्व है। (८) मुकुलभट्ट को अमिषावतिमाटर-मुफुलमट्ट भट्टकत्लट के पुप्र थे। राजतरङ्गिणी के अनुसार भट्टकल्वट अवन्तिवर्मा (८५५-८६३ ई०) के राज्यकाल में थे। अभिघावृत्तिमानृक नामक ग्रन्थ में १५ करिकाएं हैं, जिन पर स्ववििव वृत्ति है। इस ग्रन्थ में मुख्य और लाक्षसिक गब्दों य विस्तार से विवेचन किया गरा है। लकसा के विवेवन में कावप्रमाशकार ने भी अभिघायुतिमातृवा' का
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आाश्रम लिया है। यम-तब मुकुलभट्ट का सण्डन भी काव्यप्रकाश में किया गया है। 'काव्यप्रकाश-संकेत, मैं माणिक्यचन्द्र ने अनेक बार अ्रभिषावृत्तिमातृका को उद्धतः किया है। मुकुलभट्ट प्रतिहारेन्दुराज के गुरु थे। (६) भट्टनायक का हुदयदर्पस-रससून के व्याख्याकारों में भट्टनायक का मुख्य स्थान है। अभिवगुप्त तथा मम्मट ने भट्टनायक के मत का उल्लेस किया है। साहित्यशास्त्र के अन्य लेखकों ने भी भट्टनायक का मत उद्ध त किया है। हृदयद्रर्पसं. उनकी रचना कही जाती है, जो अनुपतब्य है। भट्टनायक का समय ध्वनिकार के अनन्तर तथा अभिनवगुप्त से भूर्व है। क्योकि उन्होने बतलामा है वि- ध्वनि का तात्पर्य है-रस (रसध्वनि) और ध्वनिकार का वस्तुध्वनि तथा अलड्कार व्वनि मानना उचित नहीं है। रस-निष्पति के विषय में भट्टनायक का 'भुक्तिवाद; भी अपना विशेप स्थान रखता है। देिये पृष्ठ १११-११३) । (१०) कुन्तक का चकोषितिजीवित- कुन्तक काश्मीर के निवासी थे। वे अभिनवगुप्त के समफलीन ही हैं। उनका एकमात्र ग्रन्थ 'यनोकिजीवित' है जो अघूरा ही प्राप्त हुआ है। इसके तीन अ है-कारिका वृति और उदाहरस। ग्रन्थ में नार उन्मेप हैं। प्रथम उन्मेष में काव्यलक्षण तथा कव्यप्रयोजन आदि का विचार किया गया है। द्वितीय उन्मेप में वर्सविन्यासवकता अर्थात् अनुपरारा तथा यमन आदि का निरुपण है। तृतीय उन्मेप में वाकयवचित्र्यवत्रता (वस्तुवकता) अर्यात् अनूठे ढंग से अरथािद्वारों का वर्णन किया गया है। चतुर्थ उन्मेप मे प्रकरस बकता है, जिसमें ध्वनि सादि के उदाहरस दिये गये हैँ। कुन्तक वकोकि सम्प्रदाय के प्रवतक हैं। वे वत्रोकि को ही काव्य का प्राश मानते हैं 'वकोक्ति: काव्यजीवितम्'। 'वकोकिजीचित; एक महत्त्वपूणं रचना है। उसमें मौलिकता है तथा गम्भीर विवेचन भी। कुन्तक ने भामह, दण्डी, उद्भट तथा आानन्दवर्धन को उद्पृत किया है तथा यथावसर उनकी आलोचना भी की है। उन्होंने वक्ोकि के आधार पर ही अलडकारों का निरूपण किया है, ध्वनि या व्यङ्जय की मान्यता का विरोध किया है और वत्रोकि में ही इसका समावेश किया है- उपचार-वऋ्रतादिभि: समस्तो ध्यनिप्रपञ्चः स्वीकृतः । (विशेष देखिये बकोविति- सम्मदाय का निरुाण)। काव्यप्रकाश के टीकाकार सोमेश्वर तथा माणिक्यचन्द्र ने कई, स्थलों, पर कुन्तक की कारिकाए, उद्घृत की हैं; किस्तु मम्मट ने नुन्तक का उल्लेख नही किया। 1 (११) अभिनवगुप्त-मध्यकालीन साहित्य-सेवियों में अ्रभिनवगुप्त का स्थान अ्रत्यन्त ऊंचा है। 'परा्नरिशिका' की टीका के अ्न्त में तथा ईश्वरप्रत्यभिज्ञा- विवृतिविमशिनी, के अन्त में अभिनवगुप्त ने अपना संक्षिप्त परिचय दिया है। वे कास्मीर केनिवासी थे। उनका समय दशग गताव्द्री के लगभग निर्धारित किया गया है। अभिनवगुप्त शिव के भक्त थे और उन्होने धनेक आपार्यों के चरणों में बैठकर शिक्षा प्राप्त की थी। उनकी प्रतिभा तथा विद्वता अनूठी थी। फलतः उन्होने षिविध विषयों पर रचनाएं की। उनका 'तन्न्नालोकु' तन्नसास्त्रविपयर उत्कृप्ट ग्रन्थ
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है। कुछ स्तोन जैसे 'भैरवस्तव' आदि भी उन्होंने लिसे। कारमीर के शैवदर्शन (प्रत्यभिज्ञाघ्ास्त्र) पर उन्होंने 'ईश्वरपत्यभिज्ञाविमशिनी' नामक वृति लिसी। उनके अलड्कार शास्त्र के गुरु भट्ट इन्दुराज ये तथा नाट्वशास्त्र के गुरु थे-काव्य- कौतुक' नामक ग्रन्थ के लेखक भट्टतौत। अभिनगुप्त ने 'काव्यकौतुक' पर भी कोई व्यास्या लिखी थी। आज साहित्य शास्त्र में उनके दो ग्रन्वरत्न ही विशेप चिर्यात हैं। एक है-व्वन्यालोक की टीका 'ध्वन्यालोकलोचन' और दूसरा है- भरतनाट्यशास्त्र की टीका 'अभिनवभारती.। अभिनवगुप्त की दोनों रचनाए साहित्यशास्त्र के दो प्रमुख सम्प्रदायों (रस तथा ध्वनि) की प्रामाशिक व्याख्याएँ है। उत्तरकाल के प्रायः सभी उच्चकोटि के लेखको ने रस और व्वनि के विवेचन में अभिनवगुप्त का अनुसरण किया है। काव्यप्रकाशकार ने रससिद्धान्त के निरूपण में अरभिनवगुप्त का अ्त्यन्त सम्मान के साथ उल्लेख किया है - इति श्रीमवाचार्याभिनवगुप्तपादाः । अ्रन्यन्न भी श्रनेक स्थलों पर काव्यप्रकाश मे ध्वन्यालोकलोचन की छाया स्पष्टतया भलकती है, जिसका यथावसर प्रस्तुत व्याख्या में निर्दश किया गया है। कही तो मममंट तथा. अभिनव- गुप्त की विषय प्रतिपादन-शैली तथा भाषा में भी आ्रश्नर्यजनक साम्य है। सम्भवतः इसी साधार पर यह किवदन्ती भी है कि अभिनवगुप्त और मम्मट,एक ही है। (१२) धनञ्जय का दशरूपक - धनञजय नाटय-विषय के लेखक हैं। उन्होंने अपने पिता तथा आथयदाता का उल्लेस अपने ग्रत्य के अन्त में किया है। धनञ्जम तथा उनके भाई धनिक दोनों परमारवंशीय राजा मुञ्ज (६७४-६४ ई०) की राजसभा के सम्मानित कवि थे। धनिक ने ददारूपक पर 'अवलोक' नामक टीका लिखी तथा 'काव्य-निर्रय' नामक एक अतद्धार-ग्रन्थ की भी रचना की। यह 'काव्य-निर्णय' नामक ग्रन्थ आ्राज उपलब्ध नहीं है। दशरूपक में नाव्यरास्त्र के सिद्धान्तो का संक्षेप से वंन किया गया है। इसमें चार 'प्रकाश' हैं तथा ३०० कारिकाएँ हैं। इन कारिकाओं पर धनिक की 'अवलोक' नामक वृति है, जो गद्य मे है। इस वृत्ति में उदाहरसस्वरूप कई काव्यों तथा नाटकों के पद्य उद्धुत किये गये हैं। प्रथम प्रकाश मे रूपको "का वर्गान तपा वस्तु के भड्गों का वगन है। द्वितीय प्रकाश में नायक-वसन; वृतीय में रूपक के भेद तथा लक्षणों का वसान किया गया है। चतुर्य प्रकाश में रंस को विवेचना है।w दमरूपककार का प्रमुख उद्ददय वस्तु, नेता मोर रस का विप्लेपस है। पी० वी० कारे का गत है कि रम-निष्पत्ति के विषय ेवे भटटनायक के अनुयायी है मर्ात् वे भावकत्ववादी (भुक्तिवादी) है, (HSP. पृ० २४६), प्रो० कीथ का विचार है कि मभिनवगुप्त का रस-सिद्धान्त ही दशरूपक का सभिमत है (सं० नाटक पृ० ३४२)। वस्तुतः रस के विषय में उनका एक विशिष्ट मत प्रतीत होता है। वे प्वनिवाद का सण्डन करते हैं और व्यञ्जना को तात्पम वृति से भिस्न नहीं मानने-तहत्पर्या- नतिरेकाच्च स्पञ्जनीवस्य न धवनि।अतः. रस व्यन्धय न होकर- काव्य. का तास्पर्वार्य ही है। विभावादि भावक हैं औौर रस नाव्यमान-'असोन रसादीना फाय्येन सह व्यङ्ुपत्यञ्जरूभायः। कि तहि भाव्यभावपसम्बन्यः। काव्यं हि भावर्क भाव्या रसादम.'-धनिक। उन्होने नाश्वरग में शान्त रस या भी, विरोप किया
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है-शमगपि केचित् प्राह्ः पुष्टिर्नाट्येपु नंतस्य। दृशय काव्यविदेचन की दृष्टि से दशरूपक का महत्त्वपूर्ण स्थान है। - (१३) महिमभट्ट का व्यक्तिविवेक-महिमभट्ट काश्मीर के निवासीथे। उनका पूरा नाम राजानक महिमभट्ट था। उनक समय एकादश शताब्दी के लगभग माना जाता है। 'व्यक्तिविवेक' उनका प्रसिद्ध ग्रन्थ है जिस पर एक अ्धूरी टोका भी उपलब्ध हुई है। इस ग्रन्थ में तीन विमर्श हैं। प्रथम विनर्श में ध्वनि के (यनार्थंः दब्दो वा' ध्वन्या १.१३) लक्षण को उद्धृत करके उसका अनुमान में अन्तर्भाव दिखलाया गया है। द्वितीय बिमसें मे 'अनौचित्य' का विवेचन है। यह अनोचित्य दो प्रकार का है अन्तरङ्ग और वहिरङ्ग्। अन्तरङ्ग अनौचित्य से तात्पयं है विभाव अनुभाव आादि विषयक दोप; और वहिरङ्भ अनोचित्य का अर्प्रभिप्राय है-विधेया- विमर्श आदि (पांच) दोप। तृतीय विमर्श में ध्वन्यालोक के लगभग चालीस उदाहरणों में यह दिखलाया गया है कि ये वस्तुतः अनुमान के ही विषय है। व्यक्तििवेककार का मुख्य उद्देश्य ध्वनि का अनुमान में अन्तर्भाव करना है-अनुमानान्तर्भाव सर्वस्यँव ध्वनेः प्रकाशवितुम्। व्यक्तिविवेक कुरते प्रशाम्य महिमा परां वाचम् ।।' उनके मतानुसार दो प्रकार का अर्थ है-नाज्य तथा अनुमेय। अनुमेय अर्थ तीन प्रकार का है-वस्तु, अलद्वार तथा रस। वस्तु और अलद्कार वाच्य भी हो सकते हैं; किन्तु रस अनुमेय ही.है। इस प्रकार समस्त ध्वनि का त्नुमान में ही अन्तर्भाव हो जाता है-याउपि विभावादिभ्यो रसादीनां प्रतीतिः सानुमान एवान्तर्भवितुमहंति। विभावानुभाव- व्यभिचारिप्रतीतिहि रसादिप्रतीतेः साधनमिध्यते. तववं सर्वस्मॅय ध्वनेरन्- मानान्तर्भावाम्युपगमः अरमानिति। उत्तरकालीन ध्वनि मार्ग के आचार्यो द्वारा महिमभट्ट की कठोर आलोचना की गई है। टीकाकारों का मत है कि काव्य-प्रकाश, पञ्चम उल्लास के 'ननु वाच्यादसम्बद्ध''इत्यादि अवतरण में आचार्य मम्मट ने व्यक्ति-विवेककार का ही सण्डन किया है। इसका तात्पर्य व्यक्तिविवेक के निम्न अवतरण से अत्यधिक साम्य रखता है-केवलं योडसौ भ्रमसविधी हेतुभावेन हप्तपञ्चानन-व्यापारस्तन्रोपास स एव विमृश्यमान: परम्परया थामिकस्य तलियेषे पर्यवस्यति तमोर्बाध्यवाधकभावेनायस्यानात्।' (पृ० ११३)। यह भी प्रतीत होता है कि काव्य-प्रकाशकार ने दोपो के विवेचन में व्यक्तिवियेक का पर्याप्त माया में मनुसरस किया है किन्तु मम्मट ने महिमभट्ट या व्यक्तिविवेक का कही नामोल्लेख नही किया। (१४) भोजराज- भोजराज का समय ग्यारहवी शताब्दी का प्रारम्भिक फाल .,'
माना जाता है। उनके नाम से अनेक रचनायें प्रसिद्ध हैं। वे रामायणाचम्पू आदि काव्य ग्रन्थों के भी रचयिता माने जाते हैं। वर्मशास्त्र, वैद्यक और योगशास्त्र पर भी उनके ग्रन्थ हैं। इस प्रकार द४ ग्रन्थों के लेखकों के रूप मे भोजराज विख्यात हैं। विद्वानों का कथन है कि इनमें से कुछ ग्रन्थ भोजराज के आश्रित पण्डितों तथा कवियों द्वारा लिखे गये होगे। अलङ्धारशास्त्र में उनके दो ग्रन्थ हैं-'शारस्वतीकण्ठाभरए', और
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है। कुछ स्तोन जैसे 'भरवस्तव' आदि भी उन्होंने लिसे। काश्मीर के शवदर्शन (प्रत्यभिज्ञाशास्त्र) पर उन्होंने 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी' नामक वृति लिखी। उनके अलङ्कार शास्त के गुरु भट्ट इन्दुराज थे तथा नाट्वशास्त्र के गुरु थे-'काव्य- कोतुक'नामक ग्रन्थ के लेसक भट्टतौत। अभिनगुप्त ने 'काव्यकौतुक' पर भी कोई व्यास्या लिसी थी। आज साहित्य गास्त मे उनके दो ग्रन्यरत्न ही विशेष विख्यात हैं। एक है-ध्वन्यालोक की टीका 'ध्वन्यालोकलोचन' और दूसरा है- भरतनाट्यशास्त्र की टीका 'अभिनवभारती अभिनदगुप्त की दोनों रचनाए साहित्यगास्त्र के दो प्रमुख सम्प्रदायों (रस तथा ध्वनि) की प्रामाशिक व्यारपाएं है। उत्तरकाल के प्रायः सभी उच्चकोटि के लेखकों ने रस और ध्वनि के विवेचन में अभिनवगुप्त का अनुरारण किया है। कान्यप्रकाश्षकार ने रससिद्धान्त के निरूपण मे अभिनवगुप्त का अ्रत्यन्त सम्मान के साथ उल्लेख किया है- इति श्रीमदाचचार्याभिनयगुप्तपादाः । धन्यम भी श्रनेक स्थलों पर काव्यप्रकाश में ध्वन्यालोकलोचन की छाया स्पष्टतया मलकती है, जिसका यथावसर प्रस्तुत व्याख्या मे निर्देश किया गया है। कही रतो मम्मेट तथा अगिनव- गुप्त की विषय-प्रतिपादन-बँली.तथा भाषा में भी आश्चर्यंजनका साम्य है। सम्भवतः इसी आधार पर यह निवदन्ती भी है कि अभिनवगुप्त औौर मम्मट एक ही हैं। (१२) धनञ्जय का दशरपक-धनन्जय नाट्य-विषय के लेखक हैं। उन्होंने अपने पिंता तथा आभयदाता का उल्लेख अपने ग्रन्थ के अन्त में किया है। धनञ्जय तथा उनके भाई धनिक दोनों परमारवंशीय राजा मुं्ज (६७४-६४ ई०) फी राजसभा के सम्मानित कवि थे। धनिक ने दशरूपक पर 'अवलोर' नामक टीका लिखी तथा 'काव्य-निरणय' नामक एक अलद्धार-अन्थ की भी रचना की । यह 'काय्य-निरंय' नामक ग्रन्थ प्राज उपलब्ब नही है। दशरपक में नाट्यशास्त के सिद्धान्तों का संक्षेप से वगन किया गया है। इसमें चार 'प्रकाश' हैं तथा ३०० कारिकाएँ हैं। इन कारिकाओं पर धनिक की 'अवलोक' नामक वृत्ति है, जो गद्य में है। इस वृति में उदाहरसस्वरूप कई काव्यों तथा नाटकों के पद्य उद्धुत किये गये हैं। प्रथम प्रकान में रूपकों का-वसंन तथा वस्तु के अङ्गों का चरांन है। द्वितीय प्रकाश में ना्यक-वणन; तृतीय में रूपक के भेद तथा लक्षणों का वणंन किया गमा है। चतुर्थ प्रकास-मे रस-की विवेचना है। .. दशल्पककर का प्रमुख उद्दद्य वस्तु, नेता औोर रस का विश्लेयए है। पी० वी० कारे का मत है कि रम-निम्पतति के विषय में.वे भट्टनायर के भनुयायी हैं पर्पात् वे भावफत्ववादी (भुक्तिवादी) है, (HSP. पृ० २४६), प्रो० कीथ का विचार है कि अभिनवगुप्त का रम-सिद्धान्त ही वशरूपक का अ्रभिमत है (सं नाटक पृ० ३४२)। वस्तुतः रस के विषय में उनका एक विगिष्ट मत प्रतीत होता है। वे ध्वनिवाद का सण्डन करते है और व्यञ्जना को तात्पर्य वृति से भिन्न नहीं मानते-तात्पर्मा- नतिरेकाच्च व्यञ्जनीयस्य न ध्वनिL।ग्रसः. रस बङम न होकर-काव्प.का सात्पर्यार्य ही है। विभावादि भावक हैं और रम भाव्यमान-पतो न रसादीनां फाव्येन सह व्यद्व्यञ्जरभायः। कि तहि भाव्यभावमसम्यन्य:। कार्व्यं हि भायर्क भाव्या रसादय.'-पनिक। उन्होंने नाट्यग्म में शान्त, रम का भी, विरोप बिया
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है-शममदि केचित् प्राहः पुष्टिर्नाट्येपु नतस्य। दृश्य काव्यविवेचन की दृष्टि से दशरूपक का महत्त्वपूर्ण स्थान है। (१३) महिमभट्ट का व्यक्तिविचेक-महिमभट्ट काश्मीर के निवासी थे। उनका पूरा नाम राजानक महिमभट्ट था। उनका समय एकादश सताब्दी के लगभग माना जाता है। 'ध्यक्तिविवेक' उनका प्रसिद्ध ग्रन्थ है जिस पर एक अ्रधूरी टोका भी उपलब्ध हुई है। इस ग्रन्थ मे तीन विमर्श है। प्रथम विमशं में ध्वनि के (यन्नार्थः सब्दो वा' ध्वन्या० ११३) लक्षणा को उद्घुत करके उसका अनुमान में अन्तर्भाव दिखलाया गया है। द्वितीय विमरश में 'अनीचित्य' का विवेचन है। यह अनीचित्य दो प्रकार का है अन्तरङ और वहिरङ्ग। अन्तरङ्् अनोचित्य से तात्पयं है विभाय अनुभाव आदि विषयक दोप; और वहिरङ्ज अनीचित्य का अ्प्रभिप्राय है-विधेया- विमर्श आदि (पांच) दोप। तृतीय विमर्श में ध्वन्यालोक के लगभग चालीस उदाहरणों में यह दिसलाया गया है कि ये वस्तुतः अ्नुमान के ही विपम हैं। व्यक्तिविवेककार का मुख्य उद्देश्य ध्वनि का अनुमान में भन्तर्भाव करना है-'अनुमानान्तर्भाव सर्वस्पैय घवनेः प्रकाशयितुम्। व्यक्तिविवेक फुरते प्रराम्य महिमा परां वाचम् ।।' उनके मतानुसार दो प्रकार का अर्थ है-वाच्य तथा अनुमेय। अनुमे अर्थ तीन प्रकार का है-वस्तु, अलझ्वार तथा रस। वस्तु और अलद्गार वाच्य भी हो सकते हैं; किन्तु रस अनुमेय ही है। इस प्रकार समस्त ध्वनि का अ्नुमान में ही अन्तर्भाव हो जाता है-याउपि विभावादिम्यो रसादीनां प्रतीतिः सानुमान एवान्तर्भवितुमरहति। विभावानुभाष- व्यभिचारिप्रतीतिहि रसादिप्रतीतेः साघनमिध्यते .* रदेवं सर्वस्यंध ध्वनेरनु- मानान्तर्भावाभ्युपगमः धमानिति। उत्तरकालीन ध्वनि मार्ग के आचार्यों द्वारा महिमभट्ट की कठोर आलोचना की गई है। टीकाकारों का मत है कि काव्य-प्रकाश, पञ्चम उल्लास के 'ननु वाच्यादसम्बद्ध'' इत्यादि अवतरण मे आचार्य मम्मट ने व्यक्ति-विवेककार का ही सण्डन किया है। इसका तात्पर्य व्यक्तिविवेक के निम्न अवतरण से अत्यधिक साम्य रखता है-केवलं योइसौ भ्रमशविधी हेतुभावेन हप्तपञचानन-व्यापारस्तत्रोपासः स एव विमृश्यमान: परम्परया धामिकस्य ततनिषंघे पर्यवस्पति तयोर्बा्यलाघकभावेनावस्थानात्।' (पृ० ११३)। यह भी प्रतीत होता है कि काव्य-प्रकाशकार ने दोपों के विवेचन में व्यक्तिविवेक का पर्याप्त मान्रा में अमुसरण किया है किन्तु सम्मट ने महिमभट्ट या व्यक्तिविवेक का कही नामोल्लेस नही किया। (१४) भोजराज- भोजराज का समय ग्यारहवी शताब्दी का प्रारम्भिक काल माना जाता है। उनके नाम से अनेक रचनाये प्रसिद्ध हैं। वे रामायएचम्पू आ्परादि काव्य ग्रन्थों के भी रचयिता माने जाते हैं! धर्मशास्त्र, वैद्यक और योगशास्त्र पर भी उनके ग्रन्थ हैं। इस प्रकार द४ ग्रन्थों के लेखकों के रूप में भोजराज विस्यात है । विद्वानों का कथन हैं कि इनमे से कुछ ग्रन्थ भोजराज के आशित पण्डितीं तथा कनियों द्वारा लिसे गये होगे। अलद्धारशास्त्र में उनके दो ग्रन्थ है-'सरस्वती कण्ठाभरण' और
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है। कुछ स्तोत्र जैसे 'भैरवस्तव' आदि भी उन्होने लिसे। काश्मीर के मवदर्शन (प्रत्यभिज्ञाशास्त्र) पर उन्होंने 'ईश्वरप्रत्यभिन्ञाविमर्शिनी' नामक वुति लिखी। उनके अलडकार शास्त्र के गुरु भट्ट इन्दुराज थे तथा नाट्वशास्त्र के गुरु थे-'काल्- कोतुक' नामक ग्रन्थ के लेसक भट्टतौत। अभिनगुप्त ने 'काव्यकीतुक' पर भी कोई व्याख्या लिखी थी। आज साहित्य शास्त्र में उनके दो ग्रन्थरत्न ही विशेष विख्यात हैं। एक है-व्वन्यालोक की टीका 'ध्वन्यालोकलोचन' और दूसरा है- भरतनाव्यमास्त्र की टीका 'अभिनवमारती। .- अभिनवगुप्त की दोनों रचनाएं साहित्यगास्त्र के दो प्रमुख सम्प्रदायों (रस तथा ध्वनि) की प्रामाशिक व्याख्याएँ हैं। उत्तरकाल के प्रायः सभी उच्चकोटि के लेखकों ने रस और ध्वनि के विवेचन में अभिनवमुप्त का अनुसरण किया है। काव्यप्रकाशकार ने रससिद्धान्त के निरूपण में अभिनवगुप्त का अत्यन्त सम्मान के साथ उल्लेख किया है - इति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तपादाः । अन्यन भी अ्रनेक स्थलों पर काव्यप्रकाश में ध्वन्यालोकलोचन की छाया स्पष्टतया भलकती है, जिसका यथावसर प्रस्तुत व्याख्या में निर्देश किया गया है। कहीं तो मममेट तथा अभिनव- गुप्त की विषय-प्रतिपादन-शैली तथा भापा में भी भाश्चर्यजनक साम्य है। सम्भवतः इसी आधार पर यह किवदन्ती भी है कि अभिनवगुप्त और मम्मट एक ही हैं। (१२) धनञ्जय का वशरूपक-धनज्जय नाट्य-विषय के लेखक हैं। उन्होंने अपने पिता तथा आथयदाता का उल्लेख अपने ग्रन्थ के अन्त में किया है। धनञ्जय तथा उनके भाई धनिक दोनों परमारवंशीय राजा मु्ज (६७४-६४ ई०) की राजसभा के सम्मांनित कवि थे। धनिक ने दशरूपक पर 'अवलोक' नामक टीका लिखी तथा 'काव्य-निरएय' नामक एक अलद्वार-ग्रन्थ की भी रचना की। यह 'काव्य-निराय' नामक ग्रन्थ आ्रज उपलब्ध नही है। दशरूपक में नाव्यशास्त्र के शिद्ान्तों का संक्षेप से वणन किया गया है। इंसमें चार 'प्रकाश' हैं तथा ३०० कारिकाएँ हैं। इन कारिकाओं पर घुतिक की 'पवलोक' नामक वृति है, जो मद्य में है। इस वृत्ति मे उदाहरसस्वसप कई काव्यों तथा नाटकों के पद्य उद्धुत किये गये हैं। प्रथम प्रकाश में रूपको -का वरसन तथा यस्तु के अडगों का वणान है। द्वितीय प्रकाश में नायना-वर्णन; तृतीय में रुपक के भेद तथा लक्षणो का बसन किया गया है। चतुर्थ प्रकाश में रस की-विवेचनाहै। दशसपककार का प्रमुस वद्दक्य वस्तु, नेता औौर रस का विश्लेपस है। पी० वी०काछे का मत है कि रम-निम्पति के विषय में वे भटटनायक के भनुयायी हैं पर्थात् वे भावकत्ववादी (भुत्तिवादी) है, (HSP. पृ० २४६), प्रो० कोथ का विभार है कि मर्भिनवगप्त का रस-सिद्धान्त ही दशरूपक का अ्रभिमत है (सं० नाटक पृ० ३४२)। वस्तुतः रस के विषय में उनका एक विशिष्ट मत प्रतीत होता है। ने ध्वनिवाद का सण्डन करते हैं और व्यं्जना को तात्पयं वृति से भिन्न नहीं मानने-तात्पर्मा- नतिरेकाच्च स्प्जनीयस्य न ध्वनि:। प्रव: रस व्वन्य न होकरकाव का सात्पर्पार्य ही है। विभावादि भावक हैं और रम भाव्यमान-'सतोन रसावोनो काव्पेन सह व्यसमध्यम्जरभाय:। कि तहि भाव्यभायकसम्यन्यः। फाय्य हि भापर्क भाव्या रसादम:'-पनिक। उन्होने नाट्रग में शान्त रस बा भी विरोप बिया
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हे-शममपि केचित् प्राहः पुष्टिर्नाट्येषु नंतस्य। दृशय काव्यविवेचन की दृप्टि से दशरूपक का महत्त्वपूर्ण स्थान है। (१३) महिमभट्ट का व्यक्तिविवेक-महिमभट्ट काश्मीर के निवासी थे। उनका पूरा नाम राजानक महिमभट्ट था। उनका समय एकादश शताब्दी के लगभग माना जाता है। 'व्यक्तिविवेक' उनका प्रसिद्ध ग्रन्थ है जिस पर एक अधूरी टीका भी उपलब्ध हुई है। इस अन्थ मे तीन विमर्श हैं। प्रथम विमर्दं में ध्वनि के (यत्रार्थः शब्दो वा' ध्वन्या० ११३) लक्षण को उद्घुत करके उसका अनुमान में अ्न्तर्भाव दिखलाया गया है। द्वितीय विमर्श में 'अनौचित्य' का विवेचन है। यह अ्नौचित्य दो प्रकार का है अन्तरङ् और वहिरङ्ग। अन्तरङ्ज् अनीचित्य से तात्पर्यं है विभाय अनुभाव आदि विषयक दोप; और वहिरङ्ध अनोचित्य का अभिप्राय है-विधेया- विमरश आदि (पांच) दोप। तृतीय बिमर्श में ध्वन्यालोक के लगभग चालोस उदाहरणों मे यह दिखलाया गया है कि ये वस्तुतः अनुमान के ही विपय है। व्यक्तिविवेककार का मुख्य उद्देश्य ध्वनि का अ्नुमान में अन्तर्भाव करना है-'अनुमानान्तर्भाव सवस्यव घवनेः प्रकाशयितुम्। व्यक्तिविवेकं फुस्ते प्रसाम्य महिमा परां वाचम् ।।' उनके मतानुसार दो प्रकार का अर्थ है-वाच्य तथा अनुमेय। अ्नुमेय अरथ तीन प्रकार का है-वस्तु, अलद्वार तथा रस। वस्तु और अलद्दार वाच्य भी हो सकते हैं; किन्तु रस अनुमेय ही है। इस प्रकार समस्त ध्वनि का अ्र्पनुमान में ही अ्र्न्तर्भाव हो जाता है-याऽपि विभावादिभ्यो रसादीनां प्रतीतिः सानुमान एवान्तर्भवितुमहंति। विभावानुभाय- व्यभिचारिप्रतीतिहिं रसादिप्रतीतेः साधनमिध्यते . रुदेवं सर्वस्यष ध्वनेरन- मानान्तर्भावाम्युपगमः श्रयानिति। उत्तरकालीन ध्वनि मार्ग के आचार्यों द्वारा महिमभट्ट की कठोर आलोचना की गई है। टीकाकारों का मत है कि काव्य-प्रकाश, पञ्चम उल्लास के 'ननु वाच्यादसम्बद्ध'o' इत्यादि प्रवतरण में आचार्य मम्मट ने व्यक्ति-विवेककार का ही खण्डन किया है। इसका तात्पर्य व्यक्तिविधेक के निम्न अवतरण से अत्यधिक साम्य रखता है-केवलं योऽसौ भ्रमविधी हेतुभावेनं हप्तपञ्चानन-व्यापारस्तन्नोपात स एव विमृश्यमान: परम्परया धारमिकस्य तन्निषेघे पर्यवस्पति तयोर्बाध्यवाघकभावेनावस्थानात्।' (पृ० ११३)। यह भी प्रतीत होता है कि काव्य-प्रकाशकार ने दोपों के विवेचन में व्यक्तिविवेक का पर्याप्त मात्रा में अनुसरण किया है किन्तु मम्मट ने महिमभट्ट या व्यक्तिविवेक का कही नामोल्लेख नही किया। *- (१४) भोजराज- भोजराज का समय ग्यारहवीं शताब्दी का प्रारम्भिक काल माना जाता है। उनके नाम से अनेक रचनायें प्रसिद्ध हैं। वे रामायएचम्पू आदि काव्य ग्रन्थों के भी रचयिता माने जाते हैं। घर्मशास्त्र, वैद्यक और योगशास्त्र पर भी उनके अ्रन्थ हैं। इस प्रकार म४ ग्रन्थों के लेखकों के रूप मे भोजराज विरयात हैं। विद्वानों का कथन है कि इनमे से कुछ ग्रन्थ भोजराज के आशित पण्डितों तथा कनियों द्वारा लिसे गये होगे। अलङ्धारशास्त्र में उनके दो ग्रन्थ हैं-'सरस्वतीकष्टाभरण' और
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'भृक्कारप्रकाश'। इनमें से मरस्वतीकण्ठाभरण अ्धिक लोक-प्रिय रहा है। इसमें ५ परिच्छेद हैं। प्रथम परिच्छेद में काव्यप्रयोजन, काव्यलक्ख, १६ पददोप, १६ वाक्यदोप और १६ अर्थेदोप तथा २४ शब्दगुों का निरुमस किया गया है। द्वितीय परिच्छेद में २४ शब्दालद्वारों का, तृतीय में २४ अर्थालद्वारों का, चतुर्य में '२४ उभयालङ्गारों का तथा पञ्चम परिच्छेद में रस भाव आदि का विवेचन किया गया है। इस ग्रन्थ में ६४३ कारिकाएं हैं, जिनमें से कुछ काव्यादर्श व्वन्यालोक तथा अन्य ग्रन्थों से उद्वृत की गई हैं। दूसरा ग्रन्य 'शृङ्भारप्रकाश' एक विशालकाय ग्रन्थ है। यह विद्वत्समाज में अधिक प्रसिद्ध नहीं है। इसमे ३६ अध्याय हैं। इसमें रस तथा नाट्य का विस्तार से विवेचन किया गया है। भोजराज के कतिपय मन्तव्य विल्कुल अनूठे हैं- (i) प्रत्येक दोप गुए आदि को नियत संख्या १६, २४ आदि में व्यवस्थित करना। (ii) उपमा, भपहनुति तथा समासोकि जैसे अलद्कारो को उभयालद्वार मानना। (iii) रीतियों का शव्दालद्वारो में अन्तर्भाव तथा ६ रीतियों (वंदर्भी, पाञ्चाली, गोडीया, आवन्तिका, लाटीया, मागधी) का निरुपस । (iv) मीमांसा के ६ प्रमागों को अर्थालक्कार-के अन्तगत रसना (v) एकमात्र शृद्धार फो रस मानकर अन्य रसों को उसका विकार, मानना तथा आाठ रसों का निरूमण इत्यादि। उत्तरकालीन आनार्यों ने भोज के मन्तव्ों का उल्लेख किया है तथा आ्ासोचना भी की है। काव्यप्रकाशसंकेत (टीका) के लेखक माशिक्यचन्द्र ने कतिपय स्थलों पर भोज सथा कण्ठाभरणा का उल्लेस किया है, किन्तु काव्यप्रकाश मे उनका कोई उद्घरण परिलक्षित नही होता। केवल उदातालद्वार के उदाहरण में 'भोजनुपतेस्तत्यागलीला- यितम्' यह निर्देश अवश्य मिलता है। (१५) क्षेमेन्द्र को शचित्यविचारचर्चा-क्षेमेन्द्र कारमीर के विवासी थे। उनका समय प्रायः निश्भित सा ही है। औचित्यविचारचर्चा नामक ग्रन्थ के अ्न्त में 'तस्य भीमदनन्तराजनृपते फाले फिलायं कृतः' यह उल्लेस किया गया है। इमी प्रकार 'कृविकण्ठाभरण' के अन्त में भी। कारमीरननरेश अनन्तराज का समय १०२८ से १०६३ ई० है। साथ ही क्षेमेन्द्र अभिनवगुप्त (ददम सताब्दी का पन्तिग समय) के सिथ्य थे। सतः क्षेमेन्द्र का समय ६६० से १०६६ ई० के वीच मानना उचित प्रतीत होता है। शेमेन्द्र ने अ्नेक ग्रन्थों की रचना की थी। जैमे 'भारतमघ्जरी', 'वहृलयामज्जरी', 'गुपृत्ततिलक' इत्याद्ि। 'सुयृचतिलक' छन्दयास्मनिपयम ग्रन्थ है, जिसमे छन्दों वाा गेनक गैली में विवेचन किया गया है। मीनित्वविनारचर्चा और 'कविरुष्ठाभरणा' उनकी साहित्यमास्म यिपयक रचनाये हैं। औ्ररनित्यविनारचर्चा मैं भोनित्य' की विराव विवेचना की गई है (देसिये, आामे भोनित्व सम्प्रदाय का निरूण)। इममें श्षेमेन्रकत पारिकायें तथा वृति है तया निजिय ग्रन्यों ने उदभुव धनेक उदाहरण है। 'कविरुष्ठाभरगा' में पांन मन्घि (पनुच्धेर) तथा ५५ वारियाये हैं। इसमें कवि तथा पव् के वाहा मापनों का विवेनन किया गया है। सेमेन्द्र के मनेक मौलिक सिद्धाग्न है। ये अनद्वारमास्न में 'सोचित्व-गम्प्रदाय' के प्रवर्तंक है।
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'कान्यप्रकाश में क्षेमेन्द्र का उल्लेस नहीं किया गया। इस प्रकार एकादश शताब्दी के मध्य तक अलट्दारशास्त्र में अ्रप्रनेक नवीन मोरग अमनाए गये। कंतिपय सम्प्रदायों अथवा वादों का आविर्भाव हुआ; खण्डन-मण्डन का ही युग रहा। यद्यपि ध्वनिकार तथा श्रौचित्य-प्रवर्तक आचार्यों ने साहित्यशास्त्र को समन्वित मार्ग पर ले जाने का प्रयास किया तथापि उनका दष्टिकोस भी काव्य के 'विशेषतंत्व (ध्वनि या औचित्य) की ओोर ही अ्रधिक रहा। मानो समन्वय के मार्ग का उद्घाटन किसी विशिष्ट प्रतिभा की प्रतीक्षा फर रहा था। तृतीय युग (सामञ्जस्य तथा समन्वय का समय) १. मम्मट और उनका काव्यप्रकाश-एकादशा शताब्दी के उत्तराधं मे भारतीय साहित्य गगन मे आचार्य मम्मट के रूप में एक जाज्वल्यमान नक्षत्र का उदय हुआ। दुर्भाग्य से मम्मट के जीवन वृत्त के सम्बन्ध में कोई प्रामाशिक सामग्री उपलब्ध नही होती। काव्यप्रकाश के टोकाकारों ने जनशुति के सधार पर कुछ बाते अवश्य लिखी हैं। (i) 'निदर्शन' नामक टीका से विदित होता है कि मम्मट काश्मीर निवासी थे और शंवमतानुयायी थे। 'मम्मट' इस नाम से भी उनका काश्मीरिक होना प्रकंट होता है। 'चिकु' पद काश्मीर आदि की भापा में ही अश्लीलार्थक है-इस प्रकार के उदाहरण मम्मट का कारमीरिक होना सूचित करते हैं। (ii) कांव्यप्रकाश की 'सुघासागर' टीका में भीमसेनदीक्षित (१७ वीं शताब्दी) ने मम्मट के विपय में यह उल्लेस किया है कि मम्मट काश्मीरदेशीय थे, वे जैयट के पुन्र थे और उन्होंने काशी में आकर विविध शास्त्रों का अध्ययन किया था। महाभाप्य-प्रदीप व्यांस्यां के रचयिता वॅयट तथा चतुर्वदभाप्यकार उवट (ओोवट) ये दोनों मम्मट के कनिष्ठ आाता थे। किन्तु इस कथन की प्रामासिकता निसनिदिग्व नही, क्योंकि उवट ने स्वयं ही यह उल्लेख किया है कि वे (उघट) आनन्दपुर के निवासी वचट के पुप्र थे- आ्ानन्दपुरवास्तव्यवञ्रटास्यस्य सुनुना । (iii) यह भी अ्नुध ति है कि प्राचार्य मम्मट नपधीमचरित के रचयिता श्री हर्प के मामा थे। मम्मट का अध्ययन उच्चकोटि का था। ऐसा प्रतीत होता है कि ने व्याकरण शास्न मे विशेष रुचि रसते थे। उन्होने यध-तत महाभाष्य तथा वाक्यपदीय को उंद्धुत किया है। महाभाष्य के अनुसार शब्दों की 'चतुष्टयी' प्रवृत्ति को स्वीकार किया है। उपमा का विभाजन व्याकरणशास्त्र के आधार पर किया है। अनेक स्थलों पर व्याकरण के पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग किया है, जैसे ससद्ति अलद्धार में- अपवादविषयपरिहारेशोत्सगस्य व्यवस्थितेः' तथा विभावना अलद्धार में 'किया' शब्द का हेतु के अर्थ में प्रयोग। साथ ही मम्मट ने 'शब्दव्यापारविचार' (निर्सयसागर द्वारा प्रंकासित) नामक ग्रन्थ में शब्द-वृत्ति का गम्भीर विवेचन किया है। मम्मद का समय-यह तो निश्चित ही है कि आचार्य मम्मट का आविर्भाव उस युग में हुआ, जबकि (११-१२ सताब्दी) काश्मीर में एक नवीन साहित्यिक- चेतना का स्फुरण हो रहा था, किन्तु मम्मट के समय का नियतरूप से निघरररिस-4 नहीं किया जा सका है। उन्होंने अपने समय आदि का कही उल्लेख नही किया।
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केवल अन्तः साक्ष्य और वाह्य प्रमाणों के आधार पर उनका समय निर्धारित किया जाता है। उन्होंने अ्भिनवगुप्त (जो कि १०१५ ई० तक विद्यमान थे) तया नवसाहसाङ कचरित (निर्माणकाल लगभग १००५) को उद्धुत किया है; उदात अलद्ार के उदाहरस में भोजराज का भी उल्लेख किया है-यद्विद्वद् भवनेषु भोजनपतेस्तत्त्यागलीलामितम् । विद्वानों का मत है कि भोजराज का राज्यकाल १०५४ ई० से भगे नही जा सकता। इससे प्रतीत होता है कि काव्यप्रकाश का निर्मासकाल १०५० ई० से पहले नही है। यही काव्यप्रकाश की पूर्व सीमा है। इसकी अपर सीमा ११४३ ई० से आगे नहीं मानी जा सकती। कारएा यह है कि हेमचन्द्र सूरि ने लगभग ११४३ ई० में काव्यानुशासन लिसा है तथा उसमें मम्मट का स्पप्टतया उल्लेख किया है। माशिक्यचन्द्र ने सम्वत् १२१६ तदनुसार सन् ११५६- ६० ई० में काव्यप्रकाशसंकेत नामक टीका लिखी है। इससे यह विदित होता है कि द्वादरा शताबद्ी के आरम्भ सो पूर्व ही मम्मट के काव्यप्रकाश की स्याति का प्रसार हो चुका था और यह माहित्यशास्त्र में पठन-पाठन का विषय हो गया था। इसलिये काव्यप्रकाश का निर्माण ११०० ई० पर्यन्त अवश्य हो चुका होगा। इसका निर्माण- काल १०५० और ११०० ई० के मध्य मे ही होना चाहिये तथा मम्भट का समय ग्यारहवी शताब्दी का मध्य भाग ही माना जाता है। काय्यप्रकाश-काव्यप्रकाश भारतीय अलङ्कारशास्त्र का अ्रपद्वितीय ग्रन्थ है। साहित्यगास्त्र में पताब्दियों से प्रवाहित होने वाली विविध धारामों से अनुपाखित होने वाला यह पवित्र गज्गा-प्रवाह है। उत्तरकालीन समस्त सिद्धान्तों का यह भूलस्त्रोत है। वेदान्त दर्शन मे जो शारीरक भाष्य का महत्त्व है, व्पाकरसशास्त्र में जो महाभाप्य का अनुपम स्थान है, वही साहित्यशास्त्र में मम्मट के काव्यप्रकाश का है। इसी हेतु काव्यप्रकाण साहित्यशास्त्र का 'पकार' ग्रन्थ है। उत्तरकालीन विद्वानों ने काव्यप्रकार तथा मम्मट का श्त्यन्त आदर के साथ र्गरस किया है। मुधासागरकार भीमसेनदीक्षित ने उन्हें 'वाग्देवतावतार' बतलाया है। यह प्रसिद्धि है कि मम्मट ने परिकर पलड्कार पर्यन्त काव्यप्रकाश की रचना की थी। अग्रिम अंद को अलकसूरि या अल्लटमूरि ने पूर्एं किया। काव्यत्रकान के स्वप्रथम व्यास्याकार मािकयचन्द्र ने भी लिसा है-'पय पायं प्रत्योऽ्येनारव्यो- उपरेश च सम्पितः'। इसीप्रकार फाव्यपवाश के पन्तिम श्लोर की व्याम्या में पनेरु टोकाकारों ने इसी कथन की पुष्टि की है। 'निदशन' नामक टीका के लेमक राजानकानन्द ने तो स्पप्टतगा ही उल्लेरा हिया है। प्रमरनतक के टीकाकार अजुनदेव के विवागनुमार तो समस्त काव्पप्रकाश की रचना मम्मट औोर मसक (मल्लट) ने मिलकर की घी-वयोदाहुतं दोपनिर्एपे मम्मटासकार्म्यो प्रसादे वर्तास्व'। इसके आयार पर मनेक अनुमान मिये जाते हैं। वुद विद्वानों का पयन है कि माव्यमतण की रचना में 'अलर्पूरि' का भी सहयोग था। मन्य विद्वानों (Dr. H. R. Divakar आदि) का मन है कि कारिका भाग मम्मटपुत है औौर मास्यप्रकाग- यूति भलकगूरि विरचित्व है।
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काव्यप्रकाश के तीन अंश हैं-१. कारिका २. वृत्ति और २. उदाहरण। कारिकाओं की संख्या १४२ है इन कारिकाओं का २१२ सूत्रों में विभाजन किया जाता है। काव्यप्रयाश की स्नेक टीकाओं (काव्यप्रकाशाद्श' सुधासागर, प्रदीप, उद्योत तथा प्रभा आदि) में इनका 'सूत्' नाम से व्यवहार किया गया है। उन पर गद्यवुति है तथा लगभग छः सौ (६००) पद्य उदाहरण रूप मे प्रस्तुत किये गये हैं। कुछ व्यास्याकारो का कथन है कि ये कारिकाएँ भरतमुनि-निमित हैं तथा मम्मट ने केवल इन कारिकाओं पर वृत्ति ही लिखी थी। जैसा कि 'साहित्यकौमुदी' के अत में विद्याभूपण का कथन है-मम्मटाद किमाभित्य मितां साहित्यकौमुदीम्। वृति भरतसून्रालं थीविद्यासुपरो व्यधात्। इसी प्रकार अ्रत्य कई व्यास्याकारो का भी मत है। इन मतों का आधार यह है-(i) काव्यप्रकाश की कुछ कारिकाएँ नाटघ- शास्त से उद्ध त की गई है जैसे-शृङ्गारहास्य ... स्मृताः' 'रतिर्हासश्च', निर्वेद- ग्लानि'नामत.' (चतुर्थ उल्लास) । (ii) प्रथम कारिका के उपोद्यात में कारि- काकार का अन्यपुरुष में स्मरण किया गया है-प्रन्थकृत् परामृशत। (iii) कारिका तथा वृति में कहीं-काहीं मतभेद दृष्टिगोचर होता है; जसे रूपक के लक्षण में (१० उल्लास)-समस्तवस्तुविषयं थोता आरोपिता यदा'। इस कारिका पर वृत्ति है-बहुवचनमविवक्षितम्। यदि कारिकाकार और वृत्तिकार एक ही होते तो यह मतभेद न होता। दूसरे व्यास्याकार इन युक्तियों का खण्डन करते हुए अनेक युक्ति तथा प्रमाों के आधार पर यह सिद्ध करते हैं कि कारिका तथा वृत्ति दोनों आचार्य मम्मट ही की रचनाएँ हैं। उनके कथन का निप्का यह है-(i, मम्मट ने वहीं यह नहीं कहा कि वे अन्यनिर्मित कारिकाओ पर वृति लिख रहे है। वृत्ति में पृथक रूप में कोई मङ्गल भी नहीं किया गया। (ii) कारखान्यय कार्याशि० इत्यादि कारिका (चतुर्थ उल्लास) के अर्थ की पुष्टि के लिये 'उक्त' हि भरतेन-विभावानुभाव०' इत्यादि को प्रमासरूप में उद्ध त किया गया है। भला, भरत की उक्ति की प्रामाणिकता के लिये उनकी अन्य उक्ति का कथन कैरे सङ्कृत हो सकता है ? (iii) 'साङ्ग मेत- त्रिरङ्ग तु शुद्ध माता तु पूर्ववत्' इस कारिका में 'पूर्ववत्' शब्द के द्वारा मालापमा का निर्देश किया गया है; किन्तु मालोपमा तो वृत्ति मे निरूपित की गई है, कारिका में नही। इससे स्पष्ट है कि कारिका तथा वृति एक ही आचार्य की कृति है। अन्य प्रमाणों से भी इसी मत की पुष्टि होती है- (v) काव्य प्रकाश के किसी प्राचीन टोकाकार मारिक्यचन्द्र, जयन्त, सरस्वतीतीर्थ, सोमश्वर आदि ने कारिकाकार औौर वुत्तिकार में कोई भेद नहीं किया। प्रत्युत 'दुरितशान्तये प्रन्थकृंतु संस्तौति नियतिकृतेति' प्रदीपकार के इस कथन को व्याख्या करते समय उद्योतकर का कथन है-ग्रन्थकृत् मम्मटः, वस्तुतः यहाँ मम्मट ने संस्कृत लेखकां की पद्धति का अनुसरण करते हुए अपने आपको अन्यपुरुष मे प्रकट किया है (मि० प्रायेण ग्रन्थकारा: स्वमतं परोपदेशेन व्र वते-मेघातिथि, मनु० १.४) (v) हेमचन्द्र ने भी अपने काव्यानुशासन में कारिकाकार के रूप में मम्मट का ही उल्लेख किया है-'यथाहु मम्मटः अ्मूढमपरस्याङ्ग:'। इसी प्रकार काव्यप्रकाश के.
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अनेक टीकाकारों तथा अ्न्य उत्तरकालीन आचार्यों के ग्रन्थों से यही विदित होता है कि कारिका तथा ति दोनो आचार्य मम्मट की कृति हैं। यह अवश्य है कि मम्मट ने उदाहरणों के पतिरित्त अन्य सामग्री भी कहीं भ्रविकलरप से तथा कही आंशिक परिवर्तन करके काव्यप्रकाश में समाविष्ट कर दी है; जैसे-'शृङ्गारहास्य' 'रतिर्हासश्च' इत्यादि भरतमुनि की कारिकाए अ्रविकलरुप में गृहीत की गई है: 'निर्वेदम्लानि इत्यादि मे आशिक परिवर्तन (प्रयान्ति रस- रूपतां के स्थान पर 'समास्यातास्तु नामतः') कर दिया गया है। इसी प्रकार रप्तम उल्लास में 'करवितंसादिषदे' इत्यादि वामनाचार्य के सूभ तथा यृत्ि से लिया गया है। मन्य कई स्थानों में अभिनयगुप्त तथा वामन आदि की छाया स्पष्ट परि- लक्षित होती है। काव्यप्रकाश में दश उल्लास है। प्रथम उल्लास में काव्यप्रयोजन, काव्यहेतु, काग्यलक्षणा तथा काव्यभेद (उत्तम, मध्यम, प्रधम काव्य) का निस्पस है। द्वितीय में वाचक, लाक्षमिक तथा व्यञ्जक शब्दों एवं वाच्य, लक्ष्य तथा उयङगभ अर्थों का वरंन है। तृतीय में वाच्य आदि अर्थ किस प्रकार व्यञ्जक होते हैं यह निरूपित किया गया है। चनुर्थ में-व्वनि (उत्तम काव्य के अविवकितवाच्य तथा विवक्षितान्यपरवाच्य दो भेदी तथा उसके प्रभेदो का निरपण करते हुए रस-सिद्धान्त का विगद विवेचन किया गया है। पञ्वम में-गुणीभूतव्यद्धघ (मध्यमकाव्य) का बगंन करते हुए व्यञ्जना को सिद्धि की गई है। पच्ठ में नित्रकाव्य (भधमकाव्य); सप्तम में दोतों का विवेचन किया गया है। अ्प्टम उल्लास में गुगा तथा अलड़कारों का भेद निरूपित करके मापुय, भोज तथा प्रसाद तीन गुखीं का निसं य किया गया है। नवम में शब्दालद्वार तथा दशम उल्लास में अर्यालङ्ाारों का विवेचन किया गया है। इस प्रकार काव्यप्रकाश में साहित्यशास्न के प्रायः समस्त विषयों का विशद विवेचन किया गगा है; केवल नाटप' विपय पर विचार नहीं किया गया। काव्यप्रकाश का प्राधार-काव्यप्रकाश एक अलड्कारमास्त्र का समन्व- मात्मक ग्रन्थ है। इसमे प्राचीन आचार्यों की उपलब्ध सामग्री का मथावश्यक उपयोग किया गया है। उसकी युक्तियुक्त समीक्षा भी की गई है तथा एक सामब्जस्य- पूएं मान्यता निर्धारित करने का सफल प्रयाग किया गया है। जिन प्राचीन भावामों अथवा स्न्यों का नाम-निर्दश करते हुए उनके मत अयवा वचन को काव्यप्रकाश में उद्घुत किया गया है वे ये हैं-भश्न, महाभाग्यकार, तोल्तट, शाइ्युक, भट्टनायक, वामयपदीय, उद्भट, रद्ट, ध्वनिकार तथा अभिनवगुप्त। भामहु तथा वाभन फो उद्घृत करते हुए भी उनका नामोल्लेस नही किया गया। कातिदाम, मसूर, चासं तथा हप आदि कवियों का प्रमनभयनात् निकसें सवस्य किया गया है; विन्तु किंसी कवि को कृति को उदाहरस रूप में प्रस्तुत करते ममम कवि का नामोल्लेग नही किया गया। प्रायः निम्नलिमिन इवियो या या्यों यी कृत्रियों को उदयुत किया गय है-कासिदास, भवभूधि, पमरनतर, क्मू रमस्जरी, बुट्नीमत, चण्डीशसर, नव- साहसालुगरित, नामानन्द, वानरामापस, भट्टि, भतृ हरि, भल्लट, भास, गाप, रंसावनी,
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राघवानन्द, विज्जका, विद्वशालभज्जिका, विप्णपुराग, वेणीसहार, हयग्रीववध, हरविजय (मि०, श्रीकासोमहोदय पृo २५६)। मम्मट की काव्य-विवेचना का आधार मुख्यतया भरत, ध्वनिकार, उद्भट, भामह, वामन, रुद्रट तथा अभिनवगुप्त को रचनाएं हैं। मम्मट ने उनके प्रति समादर भी प्रकट किया है, किन्तु अवसर के अनुसार उनकी स्पष्ट आलोचना करने मे भी उन्होंने संकोच नहीं किया। उदाहरणार्थ (i) ध्वन्यालोक का पर्याप्त मात्रा में अनुसरण करते हुए भी मम्मट ने सप्तम उल्तास के अन्त में 'सत्य मनोरमा0' इत्यादि मे ध्वनिकार की आलोचना की है। (ii) ्लेप के प्रकरण (उल्लास ६) में भट्टोद्भट की मालोचना की गई है। (iii) यद्यपि मम्मट ने र्द्रट का कुछ अंस् (लगभग ३० पद्य) स्वीकृत किया है, उनके अलद्धार निरुपए पर रद्रट का पर्याप्त प्रभाव परिलक्षित होता है तथापि कई स्थलो पर रुद्रट की मालोचना भी की है; जैसे- समुच्चय अलद्धार के विवेचन में- 'व्यधिकरणे' इति 'एकस्मिन् देशे' इति न वाच्यम्, इसी प्रकार हेतु अलद्वार की मान्यता के खण्डन में भी कुछ व्याख्याकारों के अ्नुसार रु्द्रट की ओर ही संकेत है। अनुमान अलद्धार के निरूपए में 'साध्यसाधनयो:" 'दशितम्' में भी र्द्रट की आलोचना की गई है। (iv) काव्यप्रकाश में भामह 'की रूपकादि' इत्यादि तीन कारिकाएँ पष्ठ उल्लास मे तथा 'सैपा सर्वत्र वक्रोविति०' इत्यादि कारिका 'विशेष' अलद्ार के निरुपण के समय (दशम उल्लास में, प्रमाण रूप में उद्ृत की गई हैं तथापि कई स्थलों पर भामह की आलोचना भी है; जैसे 'अध्यत्वं पुनरोजः प्रसादयोरपि' (अप्टम उल्लास) इत्यादि में भामह की इस मान्यतां के निराकरण की ओर ही संकेत है-'शव्यं नातिसमस्तार्थ काव्यं मधुरमिष्यते। (v) काव्यप्रकाश में वामन के काव्यालङ्कारसून की कतिपय उत्तियों को आ्र्त्मसात कर लिया गया है; जैसे-शक्ति: कवित्ववीजरूपः संरकारविशेषः (प्रथमउल्लास) इत्यादि उक्ति में और 'कर्णावतंसादि' (सप्तम उल्लास) इत्यादि में काव्याल- दारसूत्र की भापा तथा भावों की छाप है; तथापि कई स्थलों पर वागन की कठोर आलोचना भी की गई है; जैसे-गुए और अलद्दारों के भेद विवेचन में तथा दश गुणों के खण्टन मे (vi) व्यञ्जना का अनुमान में ही अन्तर्भाव हो जाता है' महिम- भट्ट की इस स्थापना का खण्डन 'ननु 'बाच्यादसम्बद्ध" इत्यादि अवतरण (पञ्चम उल्लास) में किया गया है। इसके अतिरिक्त कुछ टीकाकारों तथा आालोचकों की यह भी धारणा है कि 'सय्यक' (अलङ्ारसर्वस्वकार) का भी बहुत अधिक प्रभाव काव्यप्रकाश मे परित- क्षित होता है। उनके मतानुसार काव्यप्रकाश में कई स्थलों पर र्य्यक के मत की आलोचना की गई है; किन्तु अन्य विद्वान् रय्यक पर ही मम्मट का प्रभाव मानते हैं'। सय्यक के टीकाकार जयरथ ने भी इसका स्पप्ट उल्लेस किया है। क्षेमेन्द्र तथा भोज आदि यद्यपि मम्मट से पूर्ववर्ती माने जाते हैं; किन्तु उनके मतो का स्पप्टतया ग्रहस या निराकरण काव्यप्रकाश में परिलक्षित नहीं होता। जिन आाचायों के मतों का ग्रहण या निराकरस काव्यप्रकाश में माना जाता है उनका व्याख्या में यथास्थान दिग्दशंन कराया गया है।
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काव्यप्रकाश की टोकाएं तथा टीकाकार-काव्यपकास की लेसन दासी सूत्रात्मक है'। यह ग्रन्थ अत्यन्त गम्भीर, मारगभित तथा पाण्डित्यपूर्ण है। भ्रतः इसके उद्भवकाल से ही समभने समझाने का प्रमास किया जाता रहा है फिर भी यह दु्गम ही बना है। काव्यप्रकाश के एक प्राचीन टोकाकार महेदवर भट्टाचारय का कथन भी है-'काव्यप्रपशस्य फृता गुहे गुहे टीका तथाप्येष तर्थव दुगमः । काव्यप्रकाश की अनेक टोकाओो का यन-तम उल्लेरा किया जाता है। इनमें से कुछ उपलब्ध हैं तथा प्रकाशित भी हुई हैं। उपलब्ध टीकाओं में से सबसे प्राचीन टीका। (१) 'काव्यप्रफाशसंकेत' नामक है। इसके लेसव गुजरात देश के एक जन विद्वान् माशिनयचन्द्र है। जिन्होंने स्वय ही इसका रचनाकाल विशम सं० १२१६ (११५९-६० ई०) लिसा है- रसववत्र प्रहाधोशवतसरे (१२१६) मासि माघवे। फाव्ये काव्यप्रकाशस्य सकेतोऽयं समयित: ।। इस टीका में किसी प्राचीन टीका या टीकाकार का स्पप्ट रुप में नामोल्लेस नहीं किया गया तथापि यह सम्भव है कि इससे पूर्व कोई और टीका भी लिसी गई हो। (२) 'वालचितानरज्जनी' इसके लेखक सरस्वतीतीर्थ हैं। जिन्होने 'स्मृतिदपख' 'तर्करत्न' और 'तर्करत्नदीपिका' यादि ग्रन्थ भी लिसे थे। उन्होंने भी किसी टीका- कार के मत को उद्घुत नही किया। उनका समय द्वादसा गताब्दी माना जाता है। (३) 'काव्यप्रकारदोषिका' (दगिका) जिसके रचयिता एक गुजराती विद्वान् जयन्त- थे। उनका समय चतुर्दश गताब्दी है जैसा कि उन्होंने टीका के मन्त मे स्वयं ही निर्देश किया है-'संवत १३४० वर्षे ज्येप्ठयदि ३ रवी पुरोहित श्रीजमन्तभट्टेन ..... विरचितेय काव्यप्रफाशवीपिका (४) 'सकेस या काव्यादरद' जिसके प्रहोता मोमेरवर है जिनका कोई विशेष इतिवुत्त उपलब्ध नहीं होता। (५) काय्य- प्रकाशदरपण-जिसके रचयिता साहित्यदर्पसकार विश्वनाथ कविराज है। उनका समय तेरहवीं चौदहवी पताब्दी माना जाता है। (६) 'विस्तारिका-इसके रचपिता परमानन्द चनवर्ती भट्टाचार्य थे, जो एक बङ्तदेशीय नैयायिक थे। उनका समय ४ वी सताब्दी के भारा पास ही है। (७) 'निर्वेदन या सारसमुच्चय'- इसके लेखक कारमीर के आनन्द यवि (१५ वीं शताब्दी) थे। (८) 'सारयोपिनी' इनके सेसक श्री बतमलाञ्छन भट्टावार्य (१५ वी शताब्दी) ये। इनकी लेगन सनी सरन तथा सुबोध प्रती होती है। (६) 'काध्यप्रदीय'- यह टीका मत्यन्त महत्वपूण है। इसी हेतु भागे घलकर इसकी व्यारया के रूप में 'भा तथा उद्योत' नामक टीकाएँ लिसी गई थी। इमके तेलक मिथितावासी पण्टित नोविन्दठनकर (१६-१७ चवाली) थे। उन्होंने काव्यप्रदीप के मारम्भ तथा समाप्ति में सपना संक्षिप्त परिगम दिया है। यस्तुतः उन्ही के सब्दों में मह टीका अनुपम है-परसीतयन्तु सन्तो मनसा सन्तोपनीलषेन। इममद्भुतं प्रदीप प्रकारमवि यः प्रकाशयति ॥ (१०) भ्रय्गं- इसके रचमिता चन्तदमीय विद्ान् महेश्वरभट्टावार्य (१७ वीं गतानी) मे। थ्री मलकौफर वामनाचार्य का मन है-इपं दि मादर्सास्यटीका नातीय समोबोता।
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विषय-प्रयेश [ २६ (११) काय्यप्रकाश टोका-इस हे लेसर पमलाकरभट्ट (१७ वीं शताब्दी) थे, जो मीमांसा के विद्वान् एक महाराष्ट्री वाहाण थे और जिन्होंने अनेक ग्रन्थों की रचना की थी। उन्होंने अपने 'निसायसिन्धु' नामक ग्रन्थ के अ्न्त में अपने समय की ओोर संकेत किया है। (१२) 'नररिहमनीया'-इसके लेराक नरसिहठवकुर थे। सम्भवतः वे प्रदीपकार गोविन्वटयकुर के वंदज मे। उनकी टीका (नरसिंहमनीपा) अपूर्णरूप में ही उपलब्ध होती है। (१३) उदाहरसचन्द्रिफा-गके रचयिता वैद्यनाथ थे। जो एक नैंयायिक विद्वान् थे। उन्होने टीका समाप्ति का समय स० १७४० लिसा है। वे वैद्यनाथ 'प्रतापसद्रयणोभूपण' ग्रन्थ के लेसक विद्यानाथ से अर्वाचीन हैं। (१४) 'सुधासागर' -इसके रचयिता भीमसेनदीक्षित थे। जो विशेषकर वैयाकरण थे। उनका समय १८ वीं पताब्दी है। उन्होंने अपनी टीका के आरम्भ में तथा समाप्ति में मपने वंश तथा देशकाल शादि का स्पप्ट परिचय दिया है। इन टीकाओं के प्रतिरिक्त वालवोधिनी-टोकाकर भलकीकर वामनाचार्य ने राघवकृत अवचूरि टिप्पगी तथा महेन्द्रकृत 'तात्पर्यविवरण' नामक टिप्पणी यादि कव्यप्काश की टीकाग्रों का उल्लेश किया है। साथ ही 'प्रदीप' नामक टीका पर लिखी गई उद्योत और प्रभा नामक टीकार्ये भी काव्यप्रकाश की व्यास्या मे विशेष रूप से सहायक हैं। उद्योत टीका के रचयिता महावयाकरण नागेनभट्ट हैं। जो नव्यव्पाकरण के अद्वितीय आचार्य है तथा विविध विपयों पर अ्नेक ग्रन्थो के प्रसोता हैं। उनकी उद्योत टीका काव्यप्रकाश के गूढार्थ को प्रकट करने वाली है। उपयुंक्त टीकाओ के अतिरिक्त काव्यप्रकाश पर श्रन्य भी अ्रनेक टीकायें की गई थी जिनका यत्रनतन्न उल्लेस मिलता है। उपयुक्त टीकाओों में माशिक्यचन्द्र, सोमेर्वर, सरस्वतीय तथा जयन्त की प्राचीन दीकार्ये विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। रुचक का 'काव्यप्रकाशसंकेत' भी एक उपयोगी टीका है तथा गोविन्दटवकुर की 'प्रदीप' व्याख्या विभेप विद्वत्तापूगं है। इन विविध टीकाओ से काव्यप्रकाश की लोकप्रियता एवं महत्ता प्रकट होती है। आधुनिक काल में उपलब्ध १६ टीकाग्रों का सार-संग्रह करके भलकोकर वामनाचार्य ने वालबोघिनी' नामक टीका की रचना की है, जो आज विद्वानों तथा विद्यार्थियों का समान रूप रो उपकार करती है। हरिशंकर शर्मा की 'नागेश्वरी' नामक सरल संक्षिप्त टीका भी काव्यप्रकाश के अध्ययन में विशेष सहायक है। (२) र्य्यक का अलङ्धारसर्वस्व-हय्यक काश्मीरी थे। प्रायः विद्वानों ने उनको मम्मट से अर्वाचीन ही माना है :- उनका समय १२ वी शताब्दी का मध्य भाग माना जाता है; किन्तु काव्यप्रकाश की टीकाओं के अनुशीलन से ऐसा प्रतीत होता है कि काव्य-प्रकाश में यत्र तय रुय्यक की मान्यताओं का सण्डन किया गया है जैसे- 'शब्दश्लेपोऽर्यश्लेपचति दविविधोऽप्यर्थालडकारमप्ये परिगणितोऽन्यंः' (काव्य-प्रकाश नवम उल्लास में श्लेप निरूपण)-इस पक्ति की व्याख्या में टीकाकारों ने 'अन्येः' का अर्थ-अ्रनडकारसवस्वकारादिभि: किया है। दूसरी ओर काशोमहोदय का कथन है कि स्य्यक ने काव्य-प्रकाश को उद्घृत किया है तथा उसकी आलो-
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प्रदान की। उनका समय १७ वी पताब्दी का मध्यभाग है। उन्होंने अनेक प्रन्ग सिमे ये जिनमें रक्षगद्वाघर, चिय्रमोमासासण्डन अलज्धारणास्त्र पर हैं, मनोरमावुचमदिनी व्याकरस पर तथा मुधालहरी आदि (पांच) और जगदाभरगा, आसफविलास, प्राखो- भरसा, भामिनीविलास तथा यमुनावशानचम्पू आदि काव्यप्रन्थ है। जगनाथ एक उच्चकोटि के कवि तथा समालोनक पे। उनका संस्कृत भाषा पर अद्भुत अधिकार था। उनका रगगनभाघर एक विनिष्ट बेली का ग्रन्थ है। उन्होंने किसी वस्तु का प्रथमतः लक्षण किया है फिर उसका स्वनिमित उदाहरस देते हुए विगद व्यास्यान किया है तदनन्तर अपने पूर्ववर्ती आचार्यों के दष्टिकोगा की समीक्षा की है। वे प्रतिभाशाती कवि से और गम्भीर विद्वान तथा सूक्ष्म विवेनक भी थे। उनकी तक दक्ति सनठी थी। फमतः उनकी आलोचना मे न्याय का अधिक अंद विद्यमान है। उनकी लेखन शैली प्रौड़ है तथा विचार मौलिक हैं। उनका ग्रन्थ मधूरा ही उपलब्ध है। धवन्यालोरु, माव्यप्रकाश, अलक्कारसवस्व तथा साहित्यदर्पसा एत्यादि सभी की उन्होंने समीक्षा की है। उनके अ्रनुगार काव्य का लक्षस है-रमएोयार्य प्रतिपादप: शरदः फा्यम्। उन्होंने 'प्रतिभा' को ही एकमाम काव्य का हेतु माना है। गाव्प के चार भेद किये हैं-उत्तमोत्तम, उत्तम, मध्यम तभा सघम। रम, ध्वनि तथा मलद्वारों का भी विगन विवेवन किया है। 'रसगभ्गापत' अनकारनाल का तक विन्नकसा ग्रन्थ है। इगमे नव्यन्याय की विपय-विवेनन गैली का प्रयोग किया गया है। इसमें वव्यप्रकाण के काव्पतक्षमा आदि की सालोचना की गई है तथाि काव्यपनाण के समान उच्च सम्मान को यहद ग्रम्थ नहीं प्राप्त फर सका। पण्डितराज के पदचात भी समय समय पर संसकृतत साहित्यलास्त में पनेक ग्रन्थों की रचना होती रही है। जिनमें आगाघरभट्ट (१८ वी बती) मे अनसार- दीपिका यादि तीन पन्थ प्रौर विश्वेश्वर पण्डित के मनसारकोग्नुभ आदि पांच अ्रन्थ विशेष उल्ोसनीय हैं। इस प्रकार संस्तृत भाषा का साहित्यमास्त प्रत्यन्त गमृद्ध है। आपुनिर सलोसनाशास्य से यह नितान्त भिन्न है तथापि आधुनिक पालोचना के अनेक श्ध इसमें इष्टिगोचर होते हैं। इसका अपना पृषक स्वरप है तया महत्त्व भी। विस्व के भागोचनाशास् में इसका विशिष्ट स्थान है। *७. अलस्मारशास्त्र के सम्प्रदाय औरर मम्मट की देन उपर के विवेचन से विदित होता कि भारतीय मनकवूार पारत में मनेश मत या चाद प्रचसित रहे जो अमद्वार मास्त के गम्पशग कहणाते ह। मनसारमपरय कें टोकापार समुद्रबन्ध ने इन सम्पदायों के उदधव पर विवार किया गया है। इनके माविर्भाय या मूस हेतु काव्य का स्वरुप ही है। काम्य की भातमा नया है? इग सगाया पर विचार बरते २ विविय मानार्यं मिस्न २ परिगामों पर पद्चे। किसी
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ने अलङ्कार को ही काव्य की आत्मा समझा, किसी ने रीति को, किसी ने ध्वनि को, कोई रसपर्यन्त प्रनीति को पहुंच सका। इस प्रकार एक अभिन्न काव्यस्वरूप ही भिन्न २ आचार्यो के दृष्टिभेद से नाना रूपों में भामित होने लगा और अलद्वार 'शास्त के निम्नलिसित मुष्य सम्प्रदाय हो गये- (१) रससम्प्रदाय-उपलब्ध साहित्य में रस्ष-शिद्धान्त के सबसे पाचीने व्यास्याकार भरतमुनि ही है। उन्होंने नाट्यशास्य के पष्ठ और सप्तम अ्ध्यायों में रस तथा भावों का विवेचन किया है। नाट्यनास्त्र के अनुशीलन से प्रतीत होता है कि उनके पूर्व ही रस-सिद्धान्त का श्रविर्भाव हो.चुका.था.। राजशेखर का कथन है कि नन्दिकेश्वर ही रस-सिद्धान्त के प्रवतंक मे। नाट्यशास्त्र मे रस वा विशद विवेचन किया गया है। नाट्यशास्त्र का कथन है-न हि रसाद ऋते करिचदर्थः प्रवर्तते । रसविंपयक मूलसूय है विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाढ् रसनिष्पत्तिः। इस सून की विविध व्याख्याएँ उत्तर काल में होती रही हैं। साथ ही मलद्वारवादी तथा रीतिवादी आाचार्य भी किसी न किसी रूप से काव्य मे रस की सत्ता को स्वीकार करते रहे हैं। यह रस-सिद्धान्त मनोवैज्ञानिक आधार पर विकसित हुआ है। इसमें मन की मूलभूत प्रदुत्तियो पर विचार किया. गया है और उनके सहायक भावों पर भी-। "इसका विवेचन साहित्य के वैज्ञानिक अनुगोलन में भी महत्वपूर्णं. योग प्रदान कर सकता है। 4 रसनिप्पत्तिसूय के चार प्रसिद्ध व्यास्याकर हैं-नोल्लट, शह्ध क, भट्टनायक और अ्भिनवगुप्त। काव्यप्रकासकार ने रसनिरुपण में इनके मतों का विशद विवेचन किया है। इनके कमशः उत्पतिवाद, अनुमितिवाद, भक्तिवाद तथा अभिव्यक्तिवाद- ये चार रसविपयकवाद प्रसिद्ध है। इनमे से अभिनवगुप्त-का अभिव्यक्तिवाद हो सम्मट यदि आचार्यों को अ्रभिमत है। रसगङ्भाघर के अनुसार रसविपयक आठ बाद है। रस की संस्या के विषय में भी मतभेद हैं। भरत और धनञ्जय के मतानुसार नाट्य में आठ हो रस है-शङ्गार, हास्य, करुए, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स और रौद्र। उनके अनुसार नवम रस 'शान्त' की नाट्य में पुष्टि नहीं होती। काव्य- प्रकाशकार के मतानुसार काव्य-नास्थ सभी मे 'शान्त' रस भी होता है। ध्वनिकार ने महाभारत में शान्त रस की प्रधानता मानी है। अभिनवगुप्त का कथन है कि मोक्ष कुा-सायन होने के कारगा शान्तरस ही प्रमुख रस है-शा्तप्राय एवास्वादः। र्द्रट ने पप्रयानु: नामक दशम रस की कल्पना की थी। अभिनवगृप्त से पूर्व कुछ श्रचार्य स्नेह, भक्ति आ्ादि को भी पृथक रस मानते थे। आचार्य मम्मट ने उनका भाव में ही समावेश किया है-रतिर्देवादिविपया व्यभिचारी तथाज्जितः। भावः प्रोक्तः । -साहित्यदर्पणकार ने वात्सल्य को पृथक रस ही माना है। इस प्रकार भरतमुनि से लेकर रसगङ्गाघर तक रस की विस्तृत विवेचना होती -रही है। यद्यपि सभी 'वाश्यं रसात्मक काव्यम्' कहने वाले नही हैं, तथापि प्रायः सभी अलद्वार सम्प्रदायों ने रस की महत्ता को स्वीकार किया है। रससिद्धान्त के विस्तृत : अध्ययन के लिए-नाव्यशास्त्र, ध्वन्यालोक, ददरूपक, अभिनवभारती, ध्वन्यालोक- लोमन, साहित्यदर्पसा, रसतरङ्िगी तथा रमगङ्गाघर आदि विरेप उपयोगी हैं।
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आचार्य गम्भट ने भी रस का विशद विवेचन किया है तथा घाव्यस्वरूप में रस का साक्षात् निर्देश न करते हुए भी रस को काव्य का प्रधान तरच माना है। (२) अलङ्धारसम्प्रदाय-इस सम्प्रदाय के प्रवतक भामहाचार्य माने जाते हैं। किन्तु अलद्धारों का विकास धीरे धीरे हुआ था। भरतमुनि ने यमक, उपमा, रूपक और दीपक इन चार अलस्ारो का निर्दश किया था। भामह, दण्डी, उद्भट तथा भोज आदि साचार्यो ने अलद्धारों का विस्तृत विवेचन किया और पागे चलकर कयलयानन्द में अलद्दारों की संस्या १३५ तक पहुंच गई। अलद्धारों के स्वरूप में भी पर्याप्त मन्तर होता गया। सुद्रट ने मलद्गारों के विभाग के लिए चार (श्रोपम्य, वास्तव, प्रतिशय तथा पलेप) मूल आधार भी निर्धारित किये। फिर विद्याघर (एकपली में) ने भी अलंक्कारों की युक्तिपूएं विवेनन की। अलद्धार सम्प्रदाय के अनुसार अलद्वार ही काव्य में प्रधान है यह फाव्यता या प्रयोजक है-तदेवमलद्गारा एव काव्ये प्रधानमिति प्राच्याना मतम् (पलद्धार- सर्वस्व पृ० ३, ७)। किन्तु इसका यह अभिप्राय नही है कि इस सम्प्रदाय मे रस अथवा ध्वनि सादि का कोई महत्व नही स्वीकार किया गया। दण्डी ने 'रसवत्' अलङ्गार का निरूपण किया था तथा भाठ-रसों का भी उल्लेस किया था-वह स्वप्टरसापता रसवत्ता समृता गिराम्1 उद्भट ने भी रसवत्-पलङ्गार का निरूपए करते हुए स्थायी भाव, विभाव तथा सं्चारी भावों की धोर संकेत किया था। रतगज्वाघरकार का कथन है कि प्राचीन मालद्वारिकों ने ध्वनि (व्यङ्प) आदि को भी अप्रत्यक्षरूप में स्वीकृत किया था; वयोंकि समासोकि, ध्यानोकि, पर्यायोक्ति तथा चयोकि आदि अलङ्षागें का निर्पणा करते हुए उन्होंने प्रतीयमान भर्य को पनायास ही स्वीकार कर लिया था, जैसे-पत्रोक्त गम्यतेऽन्योमंस्तत्समानविशेपए: सा समासोवित: (भामह २ ७६)। इगी प्रकार गुगों को भी एम सम्प्रदाय ने स्वीनए किया-था। ककन्तु,इस सम्प्रदापके अनुसार मलद्वार ही. कामनिर्वाहक धर्म था, रस मादि नही; प्रतः यहाँ रम आदि को अलद्वार का उपकारक (पद्) गाव बना दिया गया था पथवा रस आदि को एक प्रकार का भलभार ही मान लिया गया था। मनद्ारसम्प्रदाय के मुख्य आचारय आमह तथा उद्भट है, दण्डी ने भी रीति के साथ २ मलद्वार की महता सव्रीकार की है। कुदट तथा पतिहारेन्द्राज, यादि भी इम मन के विशेष समर्यक हैं। मावायं मम्मट ने मलद्वार को भी वाष्यत्व का प्रयोजक माना है; किन्तु सपन अलद्वार की स्पष्ट प्रतीति (रफुटता) को माव्यतव के लिये अनिवाय नहीं माना-धनसङकृती पुनः कापि से यही प्रकट होता है। (३) रीतिसम्प्रदाय-नाव्यवास्त में ही 'रोति' के बीज विदमान है ता दण्डी ने भी रोति के स्वरूप तपा वैदर्भी और गोटी आादि के भेद मन प्रतिपादन किया है; रिन्तु धेतिनस्परदाय के प्रमुर भापाय यामन ही माने बाते है। इम मत के अनुमार गेति हो काव्य की मात्मा है। गुगाविगिष्ट रनना मा गाम रीमि है। शनएप इसमें गुगों का भसमिक महत्व है, इमी मे रोनिगम्प्रदाय मो पुापनसमप्रदाप
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भी कहा जाता है। वामन ने वैदर्भी, गोडीया और पाड्चाली इनतीन रोतियों- का विशाद विवेचन कियां और गुण तथा अलद्ारों का भेद स्पष्ट किया। उन्होंने शब्द तथा अर्थ के दस २ गुणों का भी निरूपण किया। साथ ही यह भी बतलामा- कि वुदर्भी रीति: में सभी दस गुए होते-हैं, गौडी.के०लिये-ओ्ज-और कान्ति-तथा पाञचाली के लिए-माधुर्य औौर प्रसाद गुए ही आवश्यक हैं-समग्रगुखा वैदर्भी, श्रोज :- कान्तिमती गौडीया, माधुयसौकुमार्योपपन्ना पाञचाली। वामन के अनुसार गुए का सात्परय 'कृव्यगोभाकारय धर्म' है। इस प्रकार काव्यशोभाकारक शब्द औौर ग्रर्थ के धर्मों से युक्त पद-रचना को रीति करते हैं। 1. 1 रीति शब्द का व्युत्पत्तिलम्य अथं है-गति, मार्ग या प्रस्थान। वामन के उपरान्त इसका भिन्न २ प्रकार से स्वरूप-निरूपण किया गया है। रुद्रट ने चँदर्भी गोडीया, पाञचाली तथा लाटीया-इन चारों रीतियों का उल्लेख किया है। आ्नन्द- वर्घनाचार्य की पदसंघटना भी रीति का ही परिष्कृत रूप है जो रस आदि को व्यक्त्त करती है-व्यनक्ति सा रसादीन् (्व० ३.५)। राजशेखर के अनुसार वचन-विन्यास का कम ही रीति है-वचनविन्यासकमो रीतिः। भोजराज के अनुसार रीति का अर्थ है-कवि-गमन मार्ग और रीति शब्द गत्यर्थक रीड् घातु से बना है। उन्होने ६ रीतियाँ मानी हैं- वैदर्भी, पाञ्चाली, गौडीया, आवन्तिका, लाटीया और मागधी। आागे चलकर विश्वनाथ कविराज ने रीति का विशद विवेचन किया है। उन्होंने ध्वनिकार की प्रेरसा प्राप्त करके रीति का एक समन्वित लक्षस प्रस्तुत किया है.। 'पदसंघटना रीतिरङ्गसंस्था विशेषवत् ।उपकर्श्ी रसादीनाम्-(सा० ६-१)। उनके अनुसार चार रोतियाँ हैं-वैंदर्भी चाय गौडी च पाज्चाली, लाटिका तथा। सारांग यह है कि काव्य के विशेष मार्ग या पद्धतियाँ ही रीति कहलाती है विदर्भ आदि प्रदेशों में उनका विशेष प्रयोग होने के कारण उन्हीं प्रदेशों के नाम पर ये प्रसिद्ध हो गई हैं। रोति और प्रवृति आादि में अन्तर- रीति तथा प्रघृत्ि-भरत मुनि ने भारती, सात्वती, कैशिकी और आरभटी- इन चार वृत्तियों का वर्णन किया है और इन्हें नाट्य की जननी कहा है वृतयो नाट्यमातर:।साथ ही यह भी वतलाया है कि कैशिकी वृत्ति-शृङ्गार और हास्य मे, सात्वती-वीर, रोद्र और अद्भ त मे; आरभटी-भयानक, बीभत्स और रौद्र में तथा भारती-करुण और अद्भुत मे होती है। ये वृत्तियां नाट्यवृत्ि नाम से भी प्रसिद्ध हैं वस्तुतः नायक आदि का मानसिक, वाचिक और कायिक व्यापार नाट्य में वुत्ति कहलाता है (दश० २.४७) । प्रवृत्ति इससे भिन्न है (दश० २.६३)। इसके द्वारा नाना देशो के वेश, भाषा तथा आचार आदि प्रकट हुआ करते हैं-पृथिव्यां नानादेश- घेशभायाचारवार्ता' स्यापयतीति प्रवुत्तिः । किन्तु रीति केवल विशिष्ट पदरचना का नाम है अतएव प्रवृत्ति और रीति का भेद स्पष्ट ही है। रीति और वृत्ति-उद्भट ने परुपा, उपनएरिका तथा ग्राम्या (कोमता)- इन तोन वुत्तियों का निरूपण किया था। आचार्य मम्मट ने वृत्यनुपास के प्रसन्त में इनका उल्लेख किया है तथा यह भी बतलाया है कि इन तीनों को ही वामन भादि ने वैदर्भी, गौडीया और पाञ्चली रीति कहा है-एतास्तिलो वृत्तयो वामना
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दोनां मते वैदर्भी-गोडी-पाज्चाल्यास्या रोतयो मता: (काव्य० ६, मनुप्रास) । मम्मट के अनुमार वति का अर्थ है-नियत वगों का रसानुकल व्यापार-वृतिनिय- तवसांगतो रसविययो व्यापार: (काव्य ६) । संक्षेप में उन्दट के मतानुसार मे वृत्तियां वर्-व्यवहार मात्र हैं। सद्रट इन्हें शब्दवबहाररूप वृत्ि मानते हैं। मानन्दवर्घेन के मतानुसार रसानुकूल वांचव्यवहार ही वृति है तथा आचार्य मम्मट रसानुपूल बएं व्यवहार को ही वृत्ति मानते हैं। रीति और वृत्ति के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय में आचार्यों के तीन मत हैं-(i) वसं-व्यवहार या रसानुकल वरां-विन्यास रूपी वृत्तियां रीतियों से भिन्न है-कुछ आचार्यों ने इसकी ओोर संकेत गाम किया है। (ii) वृति औौर रीनि एक ही है-माचाय भम्मट का यही स्पष्ट मत है तथा पण्डितराज गगनाथ ने भी दोनों गब्दों का समान रूप से व्यवहार किया है-(iii) वृत्तियाँ रीति के श्रङ्ग है-आचार्य वामन तथा विश्वनाय कविराज की यही मान्यता प्रतीत होती है (मि०, हिन्दी काव्यालस्गारगून की भूमिका पृ० ५४।। राजशेरार के अनुसार प्रवृत्ति, वृत्ति औौर रीति तीनों क भन्तर इस प्रकार है- त्षत्र वेपविन्यासक्रमः प्रवृत्ति; विलासविन्यासकमो वृत्ति; यचनवित्यासकमो रोति: (काव्यमीमांसा, ३) आ्चार्म मम्मट ने वृति या रीति का विस्तृत विवेचन नहीं किया बिन्तु गुरों या असद्वारों के द्वारा परम्परया उनका समन्यय कर लिया है। आधुनिक आलोननाशास्त्र में जो शैली या काव्पशैली कही जाती है यह. भी रीति से बुद अंशों में भिन्न ही है। अभिव्यञ्जना की रीति का नाम ही पोली है, वह विचारों का परिधान है, प्रतिपाद विचारों के अनुकूल वावय, दब एवं वलो के विन्यास को योजना है। (४) वकोकि सम्प्रदाय-साहित्य में 'वक्रोति' शब्द का प्रयोग भत्यन्त प्राचीन है। अलद्धार शास्त्र में भी भागह तथा दण्डी के समय से ही यनोकि का महत्व समभा जाता रहा है। भामह या विचार था कि बन सर्थ याते शब्दों का प्रयोग काव्य का अलसार होता है-वकाभियेयनबरोवितरिष्टा याचामसङ्ककृति: (काव्यलाद्वार १.३६)। अभिनवमुप्त ने मामह का उदयरण देते हुए बनोकि का स्वरप इस प्रकार स्पप्ट किया है-शन्दस्य हि यशना अभिेयस्य व पशता लोफोती -: एॉन रपेसायस्थानम् मर्यान् लोकोत्तर रूप से नब्द मर्थ की पवस्थिति हो गम तथा मयं की यकता है। भागहाचा्य ने वयोरिंत औोर मतिगयोत को पर्पाप- मानकर दसे समस्न मसद्वारों की जीदनदायिनी बतनाया है। संपा सबंत्र यकोकिरनयात्रयों विभाव्यते। मतनोन्दर्या कविना कार्य: फोमक्वारोजमा बिना॥। मम्मट ने भामहू की डग उक्ति को उद्युत किया है औौर माशिक रूप में इसकी प्रामाशिकता को स्यीकृत किया है। माचायं दण्डी ने दो प्रवार मी उकि मानी है-रतमायोकि नवा बमोकन भिन्नं दिया स्वभावोकितंत्रोसिचेनि वाह- ममम्। मतः उनने मानगार म्याभानिक नथन से भिन्न (दसेग से मुद्द) मनूटा नयन वनोरित है। यामग और स्दट ने मदोति को एह पनद्वार हो माना, था
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विपय-प्रवेश 1.३७
जिसका आागे चलकर मम्मट, स्य्यक तथा हेमचन्द्र आदि ने अनुसरण किया। किन्तु आचार्य कुन्तक ने भामह तथा दण्डी के आधार पर ही अपनी अनूठी प्रतिभा के बल सें वकोकि के एक नवीन स्वरप की स्थापना की। उन्होंने वकोकि का स्वरूप
इसकी व्यास्या इस प्रकार की गई है-बफ्रोकि: प्रसिद्धाभिधानव्यतिरेकिसो विचिन्न वा मिधा। वंदग्ध्यं कविकौशलं सस्य भङ्गी विस्छिति:। इस प्रकार चक्रोकिति का भभिप्राय है-कविकोशल पर शाधरित, जनसाधारण से विलक्षस प्रकार का कथन्। कुन्तक ने वकोक्ति को ही काव्य की आात्मा या जीवन बतलाया है। यह वकोकि। मुख्य रूप से पाँच प्रकार की होती है (१) वएवकता, (२) पदवन्रता, (३) वाकय- वक्ता, (४) अर्थवयता, (५) प्रवन्यवनता।' !चकोकि सम्प्रदाय के अनुसार व्वनि और व्यङ्गय का समावेश वफोकि में ही हो जाता है; जसे कि अलङ्कारसवंस्वकार ने वकोक्तिकार के दृष्टिकोण का विवेचन करते हुए निरूपित किया है-उपचारवक्रताभि: रमस्तो ध्वनिप्रपञ्चः स्वीकृत: । वकोकतिजीवितकार ने वैचित्र्यवत्रता आदि के अन्तगंत यह भी निर्देश किया है कि उचित रस तथा भाव आदि की योजना के द्वारा काव्य में किस प्रकार: चास्ता उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकरण मे विप्रलम्भ तथा करुण आदि के उदाहरण भी दिये गये हैं तथा यह भी निर्धारित किया गया है कि, रसवत् प्रेयस'.इत्यादि, भलद्वार नहीं, अपि तु अलुङ्धार्य है। इस सम्प्रदाय के अनुसार माधुर्य, प्रसाद और भोज़ आदि गुणों का तथा अलद्धारो का भी वकोकि में ही अन्तर्भाव किया गया, है-वावयस्य वक्भावोऽन्यो विद्यते यः सहल्रघा। यत्रालङ्गारवर्गोडसी सर्वोप्यन्तभें- विध्यति।' संक्षेप मे यह वफोकि ही काव्य की आत्मा है। इस विशेष प्रकार के. क्विव्यापार के द्वारा ही सहदयजन काव्य का आ्स्वादन करते हैं। (५) ध्वनिसम्प्रवाय-'ध्वनि' की प्रेरणा वैयाकरणों के स्फोट सिद्धान्त से मिली थी। काव्यंशास्त्र में ध्वनिसम्प्रदाय के प्रचर्तक आ्नन्दवर्धंनाचार्य हैं; किन्तु, ध्वनिवाद की उद्भावना उससे पूर्व ही हो चुकी थी, जैसा कि ध्वनिकार ने ही निर्देध किया है-का व्यास्यात्मा ध्वनिरिति युपयंः समाम्नातपूर्व.। ध्वनिकार से पूर्व आलद्दा रिकों आदि ने भी पर्याय, ममासोक्ति आदि अलद्गारों के निरूषण में एक प्रतीयमान अर्थ को स्वीकार किया था। अभिनवगुप्त ने उद्भट और वामन आदि को ध्वनि में साक्षी माना है। ध्वनिकार से पूर्व ध्वनि का विरोव भी होता रहा था। ध्वनिकार ने तीन प्रकार के ध्वनि-विरोधियों का निरदश किया है-१ अभाववादी जो ध्वनि, का अभाव मानते रहे। २. भक्तिवादी, जो ध्वनि का लक्षणा में अन्तर्भाव करते रहे। ३. अनिर्वचनीयतावादी, जो ध्वनि का अनुभव करते हुए भी उसकी व्यास्या असम्भव मानते रहे। इन विरोधों का परिहार करते हुए आनन्दवर्वन ने अपनी अनुपम प्रतिभा के आधार पर ध्वनिवाद की स्थापना की। उन्होंने साहित्यशास्त्र में एक सूक्ष्म सिंद्धान्त का आविर्भाव किया। किन्तु समय-समय पर ध्वनिवाद का प्रवल विरोध किया गया;, अनेक आ्र्पराचार्यों ने व्यञ्जनावाद का निषेध किया। भट्टनायक ने भावकत्व औरौर भोजकृत्व;
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फाव्यप्रकार
नामक काव्य की दो सक्तियाँ मानकर चारू सर्थ का भावन तथा रस का आस्वादन उन्हीं के द्वारा माना। दशस्पककार धनश्जय तथा ध्निक ने व्यदष म्थ फा तात्पर्थार्य में ही अन्तर्भाव किया और व्यञ्जना वृति का निषेध किया। फिर अभिनव- गुप्त ने भट्टनायक की मान्यता को छिन-भिन्न कर दिया। किन्तु वकोकिकार कुन्तक तथा व्यक्तिविवेककर महिम भट्टने ध्वनि की स्थापना का प्रवल विरोध किया। कुन्तक ने ध्वनि को बयोकि के अन्तर्गत माना, महिमभट्ट ने व्यञ्जना का प्रनुमान में ही अन्तर्भाव किया, व्यङ्गार्थ को भनुमेय बतलाया।-पाचारयंमम्मट ने समस्त विरोषों का खण्डन करके सुचाररूप से व्यञ्जना की स्थापना की और यह व्यं्जना- बाद साहित्य के क्षेत्र में श्रमर हो गया। ध्वनि-सिद्धान्त रम-सिद्धान्त का पोपक है। इसक आधार ही यह है कि जो रस काव्य की भात्मा कहा गया है यह वाच्य नहीं होता अपितु व्यङ्गय (ध्यनित) ही हुआ करता है-सारभूतो हार्थ: स्वशमदानभिषेयत्वेन प्रकाशितः सुतरामेव शोना- मावहति। प्रसिड्धिश्चेयमस्त्येव विदग्धविद्वत्वरियत्यु यदभिमततरं वस्तु व्यम्पलवेन प्रकाश्यते न साक्षाच्छन्दवाच्यत्वेनव (ध्वन्यालोक)। ध्यनिकार (ध्वनि० ४५) ने रसादिरूप वस्तु को ही कवि का लक्ष्य माना है-व्यङ् यव्यञ्जरभावेजिमन् विविये सम्भवत्यपि। रसादिमय एकतिमन कवि: स्ादवयानयान्। धयनिकार ने व्यपधार्य के वस्तु, अलद्वार और रसादि-ये तीन प्रकार माने हैं। रसादि में भावा साभास तया भावाभास आदि का भी समावेश है, जैमा कि ध्वनि की व्यास्या में आचार्य मम्मट ने विवेचन किया है। यद्यपि ध्यनिकारने 'फाव्यरयात्मा ध्यनिः' यह म्यापना की है: किन्तु इसके द्वारा रगस्प काव्यात्मा में ही उनका सात्पयं है जैसा कि सोचनकार ने स्पष्ट ही कहा है-तेन रस एव वस्तुन पराम्मा वरत्वसङ्गारध्वनी तु सवंया रसं प्रति पर्यवर्पेते इति याच्यादुत्कृप्टो तो इस्यभिप्रावेख काव्यस्या त्मेति सामान्येनोक्तम् । यह ध्वनि मया है? ध्यनिकार के मतानुसार यह काव्ययिनेष ध्यन है जहा धर्थ अपने स्वस्प की तया शब्द अपने भभिषेय अ्थ को गोए करके 'उस (सरम) घयं को व्यक्त करते हैं। वह प्रतीयमान अर्य विलकण हो होता है जो रमखियों के सायण्य पादि के ममान महाकवियों को वासी में भागित होता है- प्रतोयमानं पुनरन्यदेव वस्त्वरित यालीपु महाशयीनाम्। पत् तत् मसिद्धाघमवातिरिक विनाति सावण्यमियासनातु ॥ (प्यनि० १४) एम ध्यनि को काव्य की आारमा वतमाते हुए स्वनिकार ने गुए, मगदार तपा पदसंघटना कूप रोति यादि ना भी विवेधन किया है और उनन के साथ उनका सम्बन्य स्थापिस किया है। यन गब् अ्रत्यत्त स्पापन है। सोयनकार के मनुसार इसके पाच अ्थ है- मनोतप्कार इति पञचप्यमयु योग्यम। शम्देज्य ब्यापार ध्यद्ुर्प गमुदाये घ। प्यात् (i) गन्मनि-जो सनित करता है-खवनति मः सः प्ज्जरु: शबदः ध्यनिः। (ii) धर्व्यनि-जो स्पनित करता या परागा है- स्वनति ध्यनमति वा म सः स्यम्भरोज्यं: ध्यनि:। (ii) उद्प वर्द- रो पनित रिया जाता है-प्यनते इति ध्पनि: पयाति रमादि, पस्तु तथा मनद्वार रूप भर्प।
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विषय प्रवेश ३६
(iv) शब्दार्थ-व्यापार, जिसके द्वारा ध्वनित किया जाता है-ध्वन्यते प्रनेन इति ध्यनिः, प्रर्थात् व्यञ्जना-व्यापार। (v) ध्वनिकाव्य-जिसमें वस्तु, अलक्गकार तथा रसादि व्वनित होते है-ध्वन्यतेऽस्मिश्निति ध्वनि: अर्थात् ध्वनिप्रधान काव्य। इस प्रकार घ्वनि सिद्धान्त विविध अलद्धार-सम्प्रदायों के समन्वय की ओर संकेत करता है। इस दिशा में ध्वन्यालोक से काव्यप्रकासकार को महती प्रेरणा मिली है। (५) औचित्य सम्प्रदाय-श्रचित्य सम्प्रदाय के प्रवर्तक क्षेमेन्द्र माने जाते है। किन्तु अन्य सम्प्रदायों की भाति औ्चित्यवाद का जन्म भी इसके प्रतिष्ठापक के जन्म से बहुत पूर्व ही हो चुका था। नाट्यशास्त्र (२२, ६६) में वेशभूपा आदि के श्रोचित्य का निर्देश किया गया था- प्रदेशजो हि वेषस्तु न शोभां जनविप्यति। मेखलोरसि बन्धे व हास्पायंवोपजायते।। आनन्दवर्धनाचार्य ने स्पष्ट ही घोपित किया था कि रस का परमरहस्य यह श्रौचित्य ही है और श्रचित्य का त्रभाव ही रस-भङ्ग का हेतु है- मनोचित्याव ते नान्यद्रसभङ्गस्य कारसम् । प्रसिद्धोचित्यवन्धस्तु रसस्योपनियत् परा ॥ (घ्वनि० वृत्ति, कारिका ३.१४) आानन्दवर्धन ने इस औचित्य की विशद व्याख्या की थी। किन्तु क्षेमेन्द्र ने औोचित्यविचारचर्चा में इरे काव्य का मूलतत्त्व स्वीकार किया और इसे रस का जीवन (प्राण) बतलाया- श्रौवित्यस्य चमत्कारकारिसशचारचर्य सो। रसजीवितभूतस्य विचारं कुरुतेऽधुना।। 'श्चित्य' का क्या अभिप्रीय है? इसका विवेचन करते हुए क्षेमेन्द्र ने बतलाया है-उचितं प्राहुराचार्या: सदृशं किल यस्य तत्। उचितस्पच मो भावस्त- दौचित्यं प्रचक्षते ॥ (कारिका ७) शर्थात् जो जिसके अनुकूल है वही उचित कहलाता 'है और आ्चार्यजन 'उचित' के भाव को ही औ्चित्य कहा करते हैं। श्रचित्यविचार- चर्चा में पद, वाक्य, प्रवन्ध, अर्थ, गुएा, अलङ्वार, रस, पिया, कारक, सिङ्ग, वचन देश तथा काल आदि के शचित्य का विचार किया गया है और उसके उदाहरस तथा प्रत्युदाहरण देखकर स्पप्ट किया गया है। समन्वित काव्य-विबेचना में क्षेमेन्द्र का महत्त्वपूणं स्थान है। क्षेमेन्द्र या 'अचित्यविचारचर्चा' को आनार्य भम्मट ने कहीं उद्घृत नहीं किया। सम्भवतः आचार्य मम्मट के समय तक इस सम्प्रदाय ने विशेष ख्याति न प्राप्त की होगी। किन्तु शचित्य की ओर मम्मट का ध्यान अवश्य गया था और उन्होंने रस-दोप विवेचन के प्रसद्भ (सप्तम उल्लास) में ध्वन्यालोक की 'अनौचित्या- हते, (३१४) चक्ति को उद्घृत भी किया है। साहित्यशास्त्र को आ्रचार्य मम्मट की देन आचार्य मम्मट ने उपयुक्त अलद्धार सम्प्रदायों में से किसी एक का अ्नु- सरसां नहीं किया, यद्यपि उन्हें ध्वनिवाद के प्रचारक तथा समर्थक के रूप में स्मरस किया जाता है। उनके काव्यप्रकाश में आ्ररम्भ से अन्त तक ध्वनितत्व का ही प्ाधार ग्रहूण किया गया है। ध्वनिकार ने अपनी अ्साधारस मेधा के बल पर जिस सार्व-
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० काव्यप्रकाश
भोम ध्वनि-सिद्धान्त की प्रतिष्ठा की थी, अभिनवगुप्त ने जिसका रस आदि के साथ सुन्दर सामब्जस्य किया था और अभिनवगुप्त के शिष्य क्षेमेन्द्र ने श्रचित्व-सम्पदाप मे जिसका समन्वित रूप प्रस्तुत किया था, उस ध्वनितत्व को आ्चाय मम्मट ने काव्य की उत्तमता का प्रयोजक माना है। फिर भी वे केवल पवनि को काव्य की आत्मा नहीं मानते। उन्होने विविध काव्य-वादों में एक समन्वित मार्ग का उद्ाटन किया है। काव्य की वास्तविक आत्मा की अनुभूति कराने का प्रयास किया है। वस्तुतः 'काव्य' किसी वाद-विशेप से सम्वन्ध नहीं रखता। विविंध काव्य-सम्प्रदायों के आचार्यों ने काव्य के एक एक पहलू का निरूपएा किया था। उन्होंने तत्त्वदर्शी मनीषी की भांति काव्य के व्यापक स्वरूप पर दष्टिपात नहीं किया। आ्रचार्य मम्मद ने काव्य के क्षेत्र मे समन्वय का यह महान् काय किया है। अ्रलद्दारशास्त्र के प्रथम आ्रचार्य भामह ने काव्य के अलङ्कार, रचता-तौन्दर्य आदि का ही मुस्य रूप से विवेचन किया था। आचार्य दण्डी ने इस वियेचन को कुद्य अ्धिक विस्तृत बनाया। रीतिवादी आचार्य वामन ने अलद्धार का सर्य व्ापक कर दिया-सौन्दयमलद्गार:, गुणों की प्रधानता मानी; इसी प्रकार स्द्रट भादि परतङ्कारिकों ने काव्य का सुछ और अ्रधिक विदाद विवेचन किया। किन्तु भलद्वारवादी औरौर रीतिवादी आचार्य काव्य के बहिरद्त का ही निरूपण करते रहे उनका ध्यान काव्य की कलात्मकता की शोर ही रहा। उन्होंने काव्यानुभूति प्रथवा रस की ग्रोर ध्यान न दिया। उघर रस-सम्प्रदाय में एक विशेष प्रकार के आनन्द को ही कबिता का सर्वस्व मान सिया गया और विचार तथा कल्पना तत्त्व की ओर से उदासीनता दिसलाई गई। व्यनिकार ने इन त्रुटियों को पहचाना और काव्य का सामब्जस्प- पूएं विश्लेपण करने का प्रयास किया, किन्तु ध्वनिसम्प्रदाय का भी मुरुय लकष्य ध्वनिनिमपस ही बना रहा-'तेन यमः सहुदयमनःप्रीतये तरस्वट्पम्' (ध्वनि० १, १)। चकोकिसम्प्रदाय ने ध्वनि, रस तथा अलद्धार आदि को ममन्वित करने हुए भी उक्ति-वचिध्य' को ही अपने समक्ष खमा। क्षेगेन्द्र ने समसत काव्यास्गों के भचित्य की औोर ध्यान दिया; किन्तु यह भी इम नवीन प्रस्थान के उद्भावक मात होफर रह गये। उसमें प्राण-प्रतिष्ठ न कर सके। प्राचायं मम्मट ने काव्य के वहिरद्त तथा अन्तरद् दोनों पक्षों की भोर ध्यान :दिया। उन्होंने प्राचीन आचार्यों के एकाल्जो काव्य-लक्षणों को समन्वित करके एक सर्वाज्गपूणं काव्य-लक्षसा का निस्पण किया। ऐसा लक्षणा कि जिसमें कविता-कामिनी का शरीर गब्द और पर्थ के रूप में प्रकट हो रहा है, उसवी आात्मा समुसो द्वारा प्रभिव्यक्त हो रही है; पदोपो के द्वारा उसके वहिरङ्त तथा अ्न्तरद्द की निर्दोषठा भलर रही है औौर यथासम्भव उचित अनद्वारों की योजना से उसका सायन प्रस्कुटित हो रहा है। गभी प्राचीन तथा सर्वाचीन नकतों की प्रपेक्षा मम्मट का -फाम्प-नक्म (तददोपो गव्दाथी अनलहकृती पुनः पयापि) मधिक व्यापय है। यह -सर्यपाही है। काम्यकला तथा गहदमानुभृति दोनों का मंगह इसमें हो जाता है। इसमें काय्प मे समरन मत परिलिकित होते हैं। यदि 'काव्य' का स्वर्प गब्दों के द्वागा प्रभिश्गक किया जा गाना है यदि भविता की फोई परिभाषा हो सपती है
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अथ काव्यप्रकाश:
m:i: ग्रथ प्रथम उल्लास:
- ,7 अ्रन्धारम्भे विघ्नविघाताय समुचितेष्रदेवतां अन्धकृत परामृशति-) नियतिकृतनियमरहितां ह्वादेकमयीमनन्यपरतन्त्राम्। नवरसरुचिरां निरमितिमादधती भारती कवेर्जयति ॥१। वाग्देवतावतार मम्मट का काव्यप्रवाश काव्य-विवेचना का एक प्रामाशिक ्थ है। 'काव्य-प्रकाश' शब्द का अर्थ, है-काव्य, का 'प्रकाश।"यहां काव्य के वेविध श्ङ्भों पर विशद प्रकाश डाला गया है। विषय-वस्तु का विभाजन उल्लासों .किया गया है। उल्लार अर्थात् प्रकाश की एक "भलक (Flash)-परिच्छेद या रध्याय । प्रत्येक उल्लास मे काव्य के किसी विशेष अ्रङ्भ का विवेचन है। मजल लोक से आरमभ करके प्रथम उल्लास में काव्य के प्रयोजन, कारण तथा स्वरूप का नणय किया जा रहा है। अनुवाद-ग्रन्थ (काव्यप्रफाश) के ग्रारम्भ में ग्रन्थफार (भाचार्य मम्मट) यप्नों (प्रारब्ध फार्य के प्रतिबन्धकों) के बिनांश के लिये ययोचित (प्रतिपाद्य.विषय प्रर्थात् काव्य-विवेचना के अनुरप) इष्ट-देवता (कवि भारती) का स्मरण करते हैं अर्थात् उसकी स्तुति करते हैं)। [निरमितिम् आादधती कवेः भारती जयति-यह प्रधानवावय है, शेष द्वितीयान्त 'निमिति' के विशेषण है। जो (कविवासी) निर्यत (अदृष्ट आदि) विरचित नियमों से रहित,' केवल"अनिन्दमयी (ह्लादेन एकमयी=ह्वादमात्रंप्रचुरा, या हादमात्र- सर्वभांवा, फविभारती से अन्य (समवायी आादि कारख) करी अघीनता से विमुक्त, (शृङ्मंारादि) नवरसों से रमखीय काव्यसृष्टि को मकट करती है, वह फवि की शाग्देवी सबसे उत्कृष्ट है (मैं ग्रन्थकार उसकी स्तुति करता है) ॥१॥ -.- -२₹ 'प्रभा-(१) संस्कृत-वाङमय में 'ग्रन्थ' शब्द का विशेष भर्थ होता है।' जिस संदर्भ या वाक्यकदम्बक में पांच भङ्ग होते हैं, वह ग्रन्थ कहलाता है। वे पोंच भज् में हैं-
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YR ] मव्यप्रकाग
दोपों का सुन्दर सामज्जस्य और उनका वैश्ञानिक विभाजन, (xii) मतद्कारों का रस तया प्यनि के साथ समन्यय, (xiii) प्राचीन ग्वो की समीक्षा करते हुए मलद्दारों का विवाद विवेचन; उद्भट, स्द्रट मादि की मनेक मनस्ारविपयक मान्यताओं का परिप्कार (xiv) शव्दालङ्कार, अर्यानद्कार तथा सभयालस्कार नो मान्यता का आधार-निरसाय। (xv) प्रयीोतपसड्कार दोपों का सामान्य दोपों में भन्तर्भाव। उपयुक्त विवेचन से यह प्रतोत होता है कि मम्मट का दष्टिकोए रामन्यप- बादी रहा है। काव्यालोचना के क्षेत्र में स्न्होंि व्यवस्था स्पापित की है। मसडकार- शास्त में नवीन मार्गों के उद्भावक भामह, वामन और आनन्दवर्यन, कुन्तक और क्षेमेन्द्र की थेसी में ये नहीं हैं। उनका एक अनूठा मार्ग है, ये मसदारनास्त्र के सर्वप्रथम आपार्य है, जिन्होंने साहित्य-जगत् के विविध यादों को सदा के लिये समाप्तप्रायः कर दिया भौर विविय समीक्षानलियों का सुन्दर समन्यय किया है। उन्होंने ऐसे सावभौम सिद्धान्त की प्रतिष्ठा की है जो मुग-युग तक सवमान्य रहेगा। वस्तुतः आ्राचार्य गम्मट वाग्देवतायतार है।
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त्रथ
काव्यप्रकाश:
प्रभाख्यहिन्दीव्याख्यासहित: थ प्रथम उल्लासः [काव्यस्य प्रंयोजन-कारण-स्वरूप-निरसायात्मक:] 1. अ्न्थारम्भे विध्नविघाताय समुचितेष्टदेवतां अन्थकृत् परामृशति -- ) नियतिकृतनियमरहितां ह्वादकमयीमनन्यपरतन्त्राम्। नवरसरुचिरां निरमितिमादधती भारतो कवेर्जयति ।।१।। वारदेवतावतार मम्मट का काव्यप्रकाश काव्य-विवेनना। का एक प्रामाणिक न्य है। 'काव्य-प्रकाश' शब्द का, अर्थं, है-ाव्य का 'प्रकाश।यहाँ काव्यके वविध अङ्गों पर विशद प्रकाश डाला गया है। विषय-वस्तु का विभाजन उल्लासों ह. किया गया है। उल्लार अर्थात् प्रकाश की एक भलक (Flash)- परिच्छेद या रध्याय। प्रत्येक उल्लास में काव्य के किसी विनेप अङ्भ का विवेचन है।-मङ्गल लोक से आरम्भ करके प्रथम उल्लास में काव्य के प्रयोजन, कारण तथा स्वरूप का नखय किया जा रहा है। अनुवाद-प्रन्थ (काव्यप्रकाश) के झारम्भ में ग्रन्थफार (भाचार्य मम्मट) वेप्नों'(प्ररब्घ कार्य के प्रतिबन्धकों) के विनाश के लिये ययोचित (परतिपाद्य विषय र्थात्' काव्य-विवेचना के अनुरप) इप्ट-देवता (कवि, भारती) का स्मरख करते हैं अर्थात् उसकी स्तुति करते हैं)। - [निर्मितिम् आदधती कवेः भारती जयति-यह प्रधानवाक्य है, शेष द्वितीयान्त निमिति' के विशेपत हैं। जो (कविवासी) नियत (शदृष्ट आदि) विरचित नियमों से रहित,'फेवल आनन्दममी (हादेन एकमयी=ह्वादमान्नपचुरा या हो दादमान- वभावा, फविभारती से अ्रन्य (समवायी 'आदि कारस) की पधीनता सेविमुक्त्त, (शृभ्मारादि) नवरसों से रमखीय फाव्यसृष्टि को प्रकट करती है, वह फवि की शग्देवी सबसे उत्कृष्ट है (मैं प्रन्थकार उसकी स्तुति करता हूँ) ॥१। - प्रभा-(१) संस्कृत-वाडभय में 'ग्रन्थ' शब्द का विशेष अर्थ होता है.। जिस
ये है -... संदर्भ या वाक्यकदम्वक में पाँच भ्रङ्भ होते हैं, वह ग्रन्य कहलाता है। वे पाँच प्रङ्त
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पालप्रकाण:
नियतिशपत्या नियतरूपा सुखदुःसमोद्दम्वभावा परमाएवाद्य पादान- कर्मादिसह्कारिकारगपरतन्त्रा पड्डसा न च हथ व तैः ताटशी प्रद्वाणों निर्मिति-
विषमो विशयश्चम पूर्वपक्षस्तयोत्तरम्। निसंपश्चेति पञ्चाङ्क शास्त्रेधिकरएं रमृतम्।। यहाँ 'विराय' शब्द का परर्थं सन्देह है। प्रस्तुत ग्रन्थ मे इन मङ्गों की गुन्दर योजना को गई है। यहीं काव्य के स्वर्प, हेतु तथा प्रकार आपरदि मनेरु तत्नों का प्रतिपादन किया गया है। ये ही इसके प्रतिपाद्य विषय है। इनके विवेचन में भनेष स्थलों पर एक ही विषय में विभिन्न मन्तव्य उपस्थित हो जाते हैं जिससे संभय हो जाना स्वाभाविक ही है। यहाँ पूर्यपक्ष, उतरपक्ष तथा यथास्थान निर्णय का भी निरुपस करते हुए ग्रन्थकार ने विशाद विवेचन कि्या है। 'प्रारम्भ' शब्द का मर्थ (सक्षणा द्वारा)-आ्रारम्भ करने मे पूर्व है; कयोकि महलाचरण के अन्र ही ग्रन्थ का आरम्भ किया जाता है। ग्रतिशीम विध्नो का विनाण ही सक्षसा का प्रयोजन है। ! 'विं्नविघाताय-रा गद में तादर्थ्य में चतुर्थी है। कायंसिद्धि के प्रतिबन्परु जो पदृष्ट है उन्हें विष्न महने हैं। ग्रन्थफृत्-मम्मट (द०, विपयप्रवेश)। ज्ञानार्थंक या स्पर्शार्यक 'परामृमति' प्रवृत में सतुत्यथं. (To invoke) है, पयोंकि महल इनोड़ के जयति पद से यही म्वनित हो रहा है। (२) अन्यकार 'नियतत' भादि कारिका द्वारा मविभारतीस्तवनस्प भगता- परस करने हैं। गह्गलाचरस करना निष्टापार परमपरा प्राप्त है जेता कि महा- भाय्यकार पतननलि ने भी रहा है 'मङ्लावीनि हि शास्त्रासि प्रथम्ते वोरपुरपासि भवन्ति, धायुप्मतपुरपासि घ अध्येतारत्च सिदार्पा: मवा र्पुः। यहां पर पषि-भारती को स्तुनि पी गई है। भारती की सुति दी मह्न का स्वरप है। यधि-भारती=कयिनागी। उसकी अविष्ठानी देवी सरमती है। कविवासी तथा सरस्वती अपिष्ठेय मौर पमिष्टाश्री) में सभेद मानकर दोनों की स्तुति मैं प्रत्थकार का तालपं है। मचार्य मम्मट मे गवि-भारती को रमुति करसे हुए इन पतियों में काव्य के मनोकिक स्वम्प या दिवदनन कराया है। सोकीसर यर्गनानिपुष पषि की कृति ही वाव्य है, यह वविरृति विधाना की मृष्टि से पिनशए है पगिष्टत नियमों से नहीं बंधी, मार्पमाग्णभाव शी भहुभापीं में नही जकडी। केयल मानवमयी रचना ह। नय रर्गों मे रगगोय है समा महदप- 1 ददयासाइक है। रग प्रगार यहां स्वतिरेक पतद्वार व्यद्तम है; करोकि भषि-भारती को निमिति के उततर्ष -वर्नद्वारा यहाँ कविभार्ती (वरपमेय) पा धर्तुमृम विपावा दी मृष्टि (उपमान) से अतं म्यक होगा है। 11 अनुयाद्-विपासन सी मृष्टि सो ऐगी है दिसका स्वदप (पद्ष्ट या प्रृतति
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प्रथम उल्लास: .[ ३
र्निमायाम्। एतद्विलक्षणा तु कविवाड्निमिति:, अत एव जयति, जयतीत्यर्थेन च नमर्कार आत्िप्यत इति तां प्रत्यस्मि प्रसत इति लभ्यते॥
नियम सपी) नियति की शक्ति से नियत है, जिसका स्वभाव सुख दुःख तथा मोहात्मक है, जो परमाशु आदि समवाधिकारण तथा फर्म आदि सहकारिकारण के सधीन है, जिसमें ६ रस (मधुर, अम्ल, कटु, कपाय, लवस और तिक्त) हैं, किन्तु उन रसों के द्वारा (त := रसः) भी वह (सृष्टि) हृदय फो सदा प्रिय लगने वाली ही नहीं है (पयोंकि फढु शरादि रस अर्परुचिकर भी होते हैं)। कवि-वासी की सृष्टि तो इस (विघाता की सृष्टि) से वितक्षस है। इसीलिये = यह (विधाता की सृष्टि से) वत्कृष्ट है। 'जयति' इस शब्द के अर्थ (उत्कृष्टता) से 'नमस्फार अभिध्यक् होता है। 'भक्षिप्यते व्यज्यते; व्यञ्जना द्वारा, नमस्कार का बोध होता है ।] अतएव मैं (ग्रन्थकार) उस (कवि भारती) के प्रति प्ररात हूँ।, उसे प्रसाम करता हूँ, यह धर्थ प्राप्त होता है। प्रभा-मङ्भलानरण की इस कारिका मे कविवादनिमिति अर्थात् काव्य को विधाता की गृष्टि से उत्कृष्ट दिखाया गया है। इस उत्कृप्टता के चार हेतु हैं :- (१) नियतिकृतनियमरहिता :- कविकृति नियतिकृत नियमो से रहित है। यह उसको प्रथम विलक्षणता है, विघाता की यह सृष्टि अटप्ट, नियामकशक्ति: पथवा प्रकृति (निर्यति) के नियमों (The Laws of nature) से नियन्त्रित होती है।। यहां प्रकृति के नियमों या अप्ट के विधान के अनुसार ही प्रत्येक कार्य होता है।- जसे- -पुप्पों मे सुगन्ध होती है या धार्मिक विश्वासों के अनुसार इस शरीर को त्याग कर , ही स्वर्ग-प्राप्ति होती है, किन्तु काव्य-जगत् की मृष्टि इससे विलक्षण है। यह नियति के अटल नियमों से बंधी हुई नही, यहाँ कार्य-कारए भाव का कठोर नियन्त्रण नही। यहाँ तो मुम से भी सौरभ हो सकता है, यश भी सौरभ का रप धारए कर सकता है (मुरभियनः अथवा यशः सौरभ) । कवियों के इस अनूठ संसार में इसी शरीर से स्वर्ग-प्राप्ति भी सम्भव है-स्वर्ग-प्राप्तिरनेनव देहेन वरवणिनी।। कहा भी है- सपारे काव्य-संसारे फविरेव प्रजापतिः। ययास्म रोचते विश्वं तर्थव परिवतते ॥ भत एव कविकृति नियतिकृतनियमरहिता है। (२) ह्वादंकमयी :- कविकृति केवल आनन्दमयी है,- सुख-दुःस-मोहात्मक नहीं। विघाता की सृष्टि सुख-दुःस.मोहात्मक प्रकृति की, विकृति है, अतः-वहं मुख- दुःख-मोह रूप है। कवि की विलक्षण रचना में दुःख और मोह का तो लेर भी नहीं, वह के वल आानन्दात्मक है, आह्हाद प्रदान करने वाली है। कविता का मुख्य प्रयोजन ही एक विलक्षण आानन्द की प्राप्ति कराना है। यद्यपि काव्य में शोक-भय
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४ ] काव्यपकाग:
तया जुगुप्सा आदि प्रति हूल मनोभावों का वसंग भी किया जाता है तयादि फांम की इग तरोभूमि में आ्रकर विषिय विशेषी भाव भी रसात्मक हो जाते हैं, ये करगा भयानक और वीभला आदि रमों ने रूप में परिणत होकर विनशए आानन्द का मास्वादन कराते हैं। अ्रतएय श्रमार्य मम्मट ने मचि-मृष्टि को 'ह्षारई कमपी'-फेवन मानन्दात्मक अथवा मानन्द-प्रचर बतनाया है। : ' **
(३) अनन्यपरतत्या :- कवि-कृति शन्य कारणों के अ्धोन नहीं । विपाता की मृष्टि समवासी, असमयायी तथा निमित तीन प्रकार के नारणों के अधीन है। किन्तु कवि की मृष्टि इससे बिलदांस है, यह निमी वाह्य सांधन की भपेका नहीं रसती, वह तो कवि की स्वतन्त्र आनन्दवति का प्रोद्भाग माघ है, प्रतिभा का प्रोच्छलन मान है-'मानन्दोन्यतिता शकि: एृजत्यात्मानमारमना'। कवि-प्रतिभा, निपृसता और भभ्यास ये हो काव्य-फुरण के एक मान हेतु हैं। यह शब्द और पय आादि के पधीन नही, अपितु नव्दादि हो कवि-प्रतिभा का अनुगरग परते हैं। पवएव फविवाय अनन्यपरतत्ता है। जैसा कि प्रदोपफार ने कहा है- "आयेस्तत्प्रतिभायार्च अ्न्यो व धात्मनः (भारत्या.) परः तदायतत्वरहिताम्" इति॥ (३) नयरसदचिरा :- कवि-कृति नव रगों से मनोहर है। विषाता, फी सृष्टि में ६ रम है-मथुर, भम्ल, कट, कपाद, लवस और तिक्त। ये ६ रग ररवदा मौर सवंया मनोरम ही नहीं होते; ययोंकि कदु रस प्रतिकल भी होता है तथा मपुर आादि भी सदा भनुषूल एवं रुचिकर नहीं हुमा करते। पतएय वल्मा की गृष्टि इन रसों द्वारा मयंथा मनोरम हो नहीं होती। कविकृति इससे विनशस है।'प्रथम सो कविन्कृति में शृद्धार, यीर, गंरगा आदि नय-रन होने हैं। द्वितीय ये सभी रस मदा रुधिर एवं आनन्वपरद दुपा करते है। राम्-जगत में रम का सभिभ्राय दो ह- एक विलक्षए मानन्द। यह भी ध्यान रगने गोग है कि वस्तुमः सहटयो के हृद्य में ही रग की मनुभूति होती है, यविकृति में रग नहीं गाते। वह सो सेवन निसी रथापी माव को व्यत्त परने याले विभाव आादि का यगन पग्के महदर्षों पौ उम मा भस्पा- दन पराती है। पसः यविकृति को 'वरमरनिग' बहना औौरपार्यि ही है। कवि-भारती दारा प्रा की मृष्टि मे विरशण एक अलोफिक मृष्टि मा परादुर्भान होता है। पगी हेतु षषि सौ वासी उसगे उरय्ट है। 'भवएर भापार्य मम्मट पव्पप्ररान के शारम्भ में उसपे प्रणाम करती है। +
y .. ' टिप्पणो :- (i) नियत-म्वाल्यारारों मे निर्यात गब्द के कई र्ष किये -है जसे-मसापारए धर्म, भटष्ट, निमामक शाकि, पति इरयादि। गोरम मदि ३वर्मों को नियत फरने के भारण ममापारस धर्म 'कममतत्र' आादि 'मग' गहना : ह मोर वस्कृत नियम है-जह। क मसरप है यहाँ सोरभवियेय होता है। मकिनृति सदहित है। 'निर्यति' शब्द का 'भाम्प' या 'देष' मादि पर्प भी मोो्तमिद ही
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प्रेथम उल्लास: ५-
है। स्वर्गादि का निमित (कर्मों से उत्पन्न संस्कारविशेष) 'अदृष्ट'ही नियति है। कुछ व्याख्याकारों का विचार है कि आचार्य मम्मट काश्मीरिक थे ओर काइमीर के शंवदर्शन से पूर्णतया परिचित भी, अतः यहां 'नियति' शब्द शवदर्शन का पारिभाषिक शब्द है। शैव-दर्शेन के ३६ तत्वो में से 'निर्यात, भी एक है। वहाँ. - इसका अरथ 'माया का कार्य' है तथा यह संसार के कार्य-कारण-भाव के नियमन का सामर्थ्य रखती है-नियतिर्योजनां घते विशिष्टे कार्य-मण्डले (प्रभिनवगुप्त" तन्त्रालोक '६.२०२)। साथ ही यह प्राणियों के भोक्तृत्व में भी सहायक है। सांस्य के अनुसार प्रकृति की नियामक शक्ति ही निर्यात है जो प्रकृति से अभिन्न हो है,अतः नियतिकृत नियम = प्रकृति के नियम 'Laws of nature' (डा० ग्गानाथ भा।
(ii) सुख-्दु.स-मोह-स्वभावा-आ्राचा्यं मम्मट ने सांख्य के अनुसार विघाता: - की सृष्टि को सुख-दुःस-मोह-स्वभावा कहा है। यह सृष्टि प्रकृति का परिणाम या विकार (कार्य) है। प्रकृति सत्त्व, रजस्, तमस् गुणों वाली है। सत्त्व या सत्यगुण: मुख स्वभाव वाला है, रजोगुए डु.स्र स्वभाव वाला औौर तमोगुए मोह .स्वभाव। बाला है। मोह का अयं भ्रान्ति है। कार्य या परिणाम में कारण के गुश, श्रन्वित, होते हैं इसी से यह सृप्टि सुख-दुःख-मोह-स्वभावा है। (सुखदुःखमोहाः स्वभावाः मस्या: तादुशी प्थवा सुखदुःमोहानां स्वस्यां भाव उत्पत्ति: यस्यां तादृशी) । ...! ir (iii) परमाण्वादि-प्रदीपकार ने इस पद का अर्थं किया है-"परमाण्वादि *
यत् समवायिकारएं तदीयरच यः स्पन्दस्तत्प्रभृतिसहकारिपरतन्त्रा" ''तत्प्रभृति' इति निमित्तसंग्रहः। इस प्रकार समवायी, असमवायी तथा निमित तीनों कारणों फा ग्रहस होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि आचार्य 'मम्मट ने 'सहकारिकारण' शब्द का अप्रधान कारण अर्थात् उपादान-भिन्न सभी कारणों के लिये प्रयोग किया" है। 'परमाण्वादि' में आदि शब्द मत-वैविध्य को प्रकट करता है; जैसे कि न्याय- वैशेषिक के अनुसार परमाण ही मृष्टि के उपादान या समवायी कारण है; सांस्य योग के अनुसार प्रकृति उपादान कारण है, इसी प्रकार उपादान कारण के विपय' में विविध मत है। 'कर्म का अर्थ है-उत्तेपण आदि न्याय-वैशेपिक निरूमित पाँच फर्म या स्पन्दरूप मे एक कर्म; अथवा कर्मोत्पत अदष्ट; अथवा मोमांसा के अनुसार विहित निपिन्न कर्मो से उत्पन्न 'अपूर्य'।"आदि' शब्द से गृहीत न्याय-वैशेषिक के अरनुसार ईश्वरेच्छा आदि (निमित)-ये (अ्समचायी तथा निमित्तरूप) सहकारी कारण है।
(iv) नवरसाः यस्यां सा नवरसा, सा चासी रुचिरा च-इति (बहुब्रीहि गर्भ कर्मधारय) अथवा- नवसंरयाका: रसाः नवरसाः तः रुचिरा-इति (तृतीया समास) ।
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: j पांव्यप्रकांश:
वदाभिघेयं सपरयोजनमित्याद्द- काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये। सद्यः परनिवृं तये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे ॥२।। ., अनुवाद- इस ग्रन्थ में (इह) जो प्रतिपाद विषय (फायप) है यह प्रयोनन- सहित है यह (फाय्यं यरसे पादि कारिका में) बतलाते हैं- फाव्य (रचना) यश (प्राप्ति) के लिये, घन-भजन के लिये, व्यवहार शान के सिपे भमबस के विनाश या निवारण के लिये (शिवात् मङ्तसात् इतरव् समझतं सत्य दातये), तुरन्त ही परमानन्द (को प्राप्ति) के लिये- (परा उत्कृष्टा निर्यसि: भानग्दः तस्म) तथा प्रियतमा के समान उपदेश देने के लिये (होता है) ॥२॥ प्रभा :- यहा यससे (पर के लिये) आदि में तादर्य्य में धतुर्या विभकत है, जैसे-मुक्तये हरि भजति। अर्वकृत्-"पर्यस्य करगम् भजनम्" प्यतृत्ध तसमे (धन प्राप्ति के निये) इस अर्थ में फृ धातु से विवय प्रत्यय (सम्पदादिम्यः वियय्, वासिक, सू० ३.३.७८) होता है। इसी प्रकार "व्वहारस्व वेदर्न शानमिति" व्यवदार- वित् तस्म व्यवहारविदे (व्यवहार श्ञान के लिये) तथा उपदेशस्य योजनम् उदेशयुज् सस्मे उपदेशपुजे (उपदेश प्रवान के लिये)। टिप्पशी-प्राचीन काल से ही भारत के मनीपियों ने फाव्य या साहिरिय के प्रयोजन पर बिनार किया है। "यहा गला कला के लिये" (Art for Ari's Sake) की बात को नहीं माना गया और न भाधुनिक उपयोगितावाद को ही बाज्य- भूमि में प्रतिष्ठित किया गया है मपितु काव्य के दष्ट तथा अद्प्ट दोनों प्रहार के प्रयो- जन माने गये हैं। नाटय या काव्य के प्रयोजन पर सर्वप्रथम भरत ुनि मे (तृ० प० दताब्दी) में विचार हिया था। उनमन पायन है- पेदविधे तिहासानामास्यानपरिषत्पनम्। निनोदगननं सोमे नाट्यमेतव् भविप्यतति।। युःशार्ताना अमार्तार्ना शोरसार्नी सपस्विगाम्। विभामजनन सोके नाट्यमंतक् भविष्वत।। पर्थान् नास्य कसा का प्रवोजन है- नोफ का मनोरज्जन एवं शोकपोडिस तथा परियानत जनों ना विधान्ति प्रदान करना। भरत मुनि के परचाम् जर्यों अो साहिस्वि वियेयना का विकाण होने लगा स्ों रवों मव्य के प्रयोकन पा भी विनव विवेवन किया गया। पानसारिय पाचापं भागत के पतुमार- पर्मापंकाममोरयु पंचसम्मं पसायु थ। परोति कोति प्रोति प गाधुकाध्यनिवेमलम्।। धर्यान् गराख् का मगुनोनन (१) धर्म, धर्म, माम सभा मोस नानक पुष्यामं-धमुष्टय एवं कनामों में नियुसता (२) यसः प्राष्मि सपा (३) ि या नारता है। पाचायं भामत के उदवान नीतिपादी भामायं पामन ने काम के पवोमन पर रिपार परने हुए निगा-फार्य तम् वृष्टारष्टार्म मीसिकीनिदेतुनव्(रा.
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प्रंथम उल्लास:
"कालिदासादीनामिव यशः श्रीहपादेर्धावकादीनामिव धनम् राजा- दिगतोचिताचारपरिज्ञानम्, आरदित्यादेमयूरादीनामिचानर्थनिवारखम्, अर्थात सत्काव्य के दो प्रयोजन है-१. दृष्ट २. अटप्ट। दृष्ट प्रयोजन है- प्रीति और ग्रदप्ट प्रयोजन है-कीति। टीकाकारों के अनुसार यहां पर दो प्रकार की प्रीति विवक्षित है एक तो काव्य-श्रवण के अनन्तर सहृदयों के हृदय में होने वाला आानन्द और दूसरी इष्टप्राप्ति तथा अनिष्टर्पारहार से उत्पन्न होने वाला मुख। यहां कीति को स्वर्ग का साधन माना गया है-"कीति स्वर्गफलामाहुरासंसारं, विर्पाश्चत की।" इसी से कीति को अदृष्ट प्रयोजन कहा गया है। तदनन्तर ध्वनिवादी आचार्य आनन्दवर्धन ने भी 'प्रीति' को ही काव्य को- प्रयोजन वतलाया-तेन व्रमः सहदयमनः प्रीतये तत्स्वरुम (घवन्यालोक ११)।' किन्तु ध्वनिवादी आचार्य आनन्दवर्धन तथा आचार्य अभिनवगुप्त की 'प्रीति' की व्यास्या रीतिवादी आचार्यों की व्यास्या से भिन्न है। यह तो उस विलक्षस आनन्द का नाम है जो सहृदयों के हृदय की अनुभूति का विषय है, अ्रथवा रसावादी आचार्य जिसे रसास्वादन या रसानुभूति कहते हैं। तभी तो प्राचार्य भोजराज की "कीति प्रीति च विन्दति" (सरस्वती कण्ठाभरण १:४) इस उक्ति की व्यास्या करते हुए व्यास्याकार रत्नेश्वर ने 'प्रीति' का इस प्रकार विवेचन किया है-"प्रीतिः सम्पूर्णकाव्यार्थसमुत्त्थः आ्रानन्दः" । ध्वनिवादियों द्वारा प्रतिपादित काव्य के इस मुख्य प्रयोजन को वाद के आचार्यों ने अपना आदर्श वाक्य सा वना लिया। नवीन वकोक्तिवाद का उद्घाटन करते हुए भी आचार्य कुन्तक ने: काव्य का यही प्रयोजन बतलाया- धर्मादिसाधनोपाय सुकुमारकमोदितः। फाव्यबन्धोऽभिजातानां हृदयाह्वादकारक:। (चकोक्िजीवित १.४) आचार्य मम्मट ने काव्य-प्रयोजन विपयक विभिन्नवादोंका समन्वित रूप हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है। अपने से पूर्व समस्त य्रचार्यों (अलङ्गारवादी, रोतिवादी, ध्वनिवादी, वक्रोक्तिवादी तथा रस्षवादी) के मत का 'ही समन्वय उन्होंने नहीं किया' अपितु काव्य को केवल कला का चमत्कार मानने वालों अथवा केवल मनोविनोद का साधन समझने वालों अथवा अर्थशास्त के उपयोमितावाद की कसोटो पर कसने बालों के समक्ष भी एक 'समन्वयदृष्टि' प्रस्तुत कर दी एवं "काव्यं यशरो" इत्यादि '* फारिका में काव्य के ६ प्रयोजनों का निरुपण किया। 1 अनुवाद-'[यत्काव्यं पश :- धनम्-आचारपरिज्ञानम्-अनयंनिवारसम्- आनन्दम् उपदेशं च यथायोगं कचे: सहृदयस्य च करोति-यह अ्रन्वय है] जो फाव्य (१) कालिदास आदि के समान यश ।प्राप्ति), (२) श्री हर्ष इत्यादि से धावफ पादि (कवियों) के समान धन (प्राप्ति), (३) राजा आदि के उचित प्चार- व्यवहार (राजादिगतः राजविषयक: समुचिताचार:) का ज्ञान, (४) सूर्य आदि (की पूजा) से मयूर आदि कवियों के समान अमङ्ल का निवारस करता है।
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काव्यप्रकाग:
सकल प्रयोजनमौलिभूतं समनन्तरमेव रसारवादनसमुद्भृतं विगलितवेया- न्तरमानन्दं, प्रभुसम्मितशव्दप्रधानवेदादिशास्त्रेभ्यः सुदत्सम्मितार्थतात्पर्य: प्रभा-'काव्यं बसमे' मादि कार्रिका तथा इसकी वृति में माचाय मम्मट ने काव्य के प्रयोजनों पर बिनार किया है। उनके अनुमार काव्य के ६ प्योजन हैं- (१) काथ्यं मसासे-फाव्य यग के लिये होता है। फाल् निर्मास से कवि को कीति का प्रसार होता है। कवियुनगुर कासिदास ने बाब्ा द्वारा हो कोति प्राप्त की थी। दसी प्रकार दण्डी, भारवि तथा बाछ आदि ने काव्य द्वारा स्वफीति का प्रमार किया था। यद्यपि कालिदास यादि ने फाव्य-्द्वारा धन भी प्राप्त रिया। इसी प्रंकार धावक आादि ने यम भी प्राप्त किया तयापि प्रधानता की रष्टि से यह। पर नामनिर्ददा किया गया है सर्थान मालिदास के फाव्प ने प्रधानतया उनकी कौति का विस्तार किया। (२) अपछृते- काव्य पन प्राप्ति के लिये होता है। कवितन काव्य-रपना करफे पनोपाजंग करते रहे है। भोजपवन्य मे ऐनी प्रनेक कथाएँ संकमित है। हिन्दी-साहित्य का रीति-युग भी इसके लिये प्रसिद् ही है। यह भी सोतन्प्रिदि है कि पायक नामर कवि ने महाराज हुगं के नाम से 'रस्नापनी' नाटिका सिगी औौर दुप्कत धन-राणि प्राप्त की। पस्तुतः मध्य गुग मे मर्थ-प्राप्ति काष्य या विरोष प्रयोजन हो गया था। (३) व्ययहारविये-काय्य व्यवहारन्ञान के लिये होना है। रामायणादि महाकाव्यों के मनुचीलन से सह्दयो को राजा आदि के हो नही (आादि पद मे गृहोत) मन्नी, गुरु यदि सथा पिता-पुन्र, माना-पुत्र और भाई-भाई मादि मे उचित पाधार का ज्ञान होता है। राजा आदि मे अयहारों या काव् द्वारा सहज में हो जञान होना सम्भय है, दतिहास मादि के द्वारा मह इनना सुलभ नहीं। (*) शविये तरदतये-गिव या सर्थ है, गस्वास या गहन। सिव से भिनन (पतर) विवेतर=अमभस। काव्य समसल निवारण के निये होता है। यदा गम्मट वे ममूर वषि को गया पी भर संपेन पिया है। यह यवि हॉँय्लन को गजगभा म रस्न था। परमर (मरमुद की पकन्य विग्नामसि मादि) मे अनुगार महावि वास इमना भगिनीपति गवं मिन था। दैवान वाला कौ पस्नों के नाप से इसे भृष्छ रोग हो गया। वस्टरोगापान मपूर मति मे सू्य नमवान् की स्तुति में बन रनोरहो पा एक माध्य रगा। उगगे नगस होकर सूर्य मे उसहे शरीर बो मौरोग मर दिया। मजूर कवि वा बाम्प 'मपूरमगरम्' या 'मू्पंगगरम्' नाम से प्ििर है । सनुवाद-(५) सपा नो (पम्) जार (भपूर्य) सानगद, को, जपस बरता है जो (पानन) पाम के (पर माति) रुमास प्रयोगनों में सुशम (मोगिभूत) है औौर काम्य-ममएर के सनन्तर (शसः) हो रसास्याइन से साव्भृंत होना है एवं मिसें सग्य शेप पशरप (वेद्यातरदूगरी मानने सोम् यापुए) रिगनित पदात विोि
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प्रथम उल्लास:
वत्पुराएादीतिहा सेभ्यश्च शब्दार्थयोर्गु एाभावेन रसाङभूतव्यापारप्रव तया विलचएं यत्काव्यं लोकोत्तरवर्णानानिपुसकविकर्म तत् कान्तेव सर- संतापादनेनाभिमुखीकृत्य रामादिवद्वर्तितव्यं न रावसादिवदित्युपदेशं च यथायोगं कवे: सहृद्यस्य च करोतीति सवथा तत्र यतनीयम्।।
हो जाते हैं। (६) और जो (फाव्य) राजा या स्वामी के समान शब्द हैं प्रधान जिनमें ऐसे वेद आदि शास्त्रों से तथा मित्र के समान पर्थ में तात्पय रखने वाले पुरास तथा, इतिहासों से विलक्षण है; क्योंकि रस के सहायक (प्रङ्भभूत) व्यापार (विभाव," अ्रनुभाव और व्यभिचारी भावों का संयोजन या व्यञ्जना) में तत्पर (प्रवस) होने के कारख उसमें शब्द और अय दोनों की गौसता (गुसभाव) है, लोकोत्तर वगाना में निपु कवि को कृति वह (काव्य) प्रिया के समान सरसता उत्पन्न फरके (थोता या पाठक को) अपने विषय की ओोर अभिमुख करके 'राम के समान वतना चाहिये' रावस के नहीं' इत्यादि उपदेश (इन ६ प्रयोजनों में से) यथायोग कवि तथा सहृदय के लिये करता है। उस फाव्य के विषय में (तन्न) सब प्रफार से (निर्भाण' तथा आास्वाद में) प्रयत्न करना चाहिये।
प्रभा-(५) सद्यः परनिय तपे-काव्य तुरन्त (पढ़ने के साथ) ही आनन्द का मनुभव कराने के लिये है। अरन्यकार ने स्वयं 'सकल-आनन्दं' वाक्यांश द्वारा,, इसकी व्यास्या की है। यहाँ पर एक विलक्षण आनन्द को ही परनिर्वृति अर्थात, उत्कृष्ट प्ानन्द कहा गया है। आचार्य मम्मट के अनुसार इस अलौफिक आनन्द की. अनुभूति ही काव्य का ुख्य प्रयोजन है। यह ऐसा प्रयोजन है जो अन्य समस्त प्रयोजनों में शीर्पण्य है। यह आनन्द रसास्वादन से निप्पन्न होता है तथा रसास्वादन रूप ही है। टीकाकारों के अनुसार 'रसास्वादन', इत्यादि का अर्थ है-रस=1 स्थायीभाव (रस्यते आस्वाद्यते), रसास्वादन=स्थायी भाव का विभावानुभाव सञ्चारी भावों से संयोजन, इस संयोजन के अनन्तर ही (अविलिम्बेन) वह आनन्द, जो रसास्वादन रूप है निष्पन्न हो जाता है। यही सद्यः परनिर्वृति है। इस अलौकिक; आ्रानन्दाभूति के समय रसयिता को अन्य ज्ञेय वस्तुओं का ज्ञान नहीं रहता। तभी तो इस आानन्द को ब्रह्मानन्द-सहोदर कहा गया है। समाघिस्थ योगी को जैसा आ्रनन्द होता है चैसा ही काव्य-रसास्वादन का विलक्षए आ्नन्द है।
i (६) कान्तासम्मिततमोपदेशपुजे-काव्य प्रियतमा के समान उपदेश प्रदान करने के लिये है। ग्रन्थकार ने प्रभुसम्मित ..... 'उपदेनं करोति' इस अवतरण में इसकी व्याख्या की है। अभिप्राय यह है कि किगी कार्य को करने के लिये प्रायः (फ) प्रभुतुल्य, (स) मिन्न-तुल्य तथा (ग) कान्ता-तुल्य उपदेशों से वाह्य प्रेरणा मिला करती है। (क) वेद शास्तों का उपदेश राजा या स्वामी की आज्ञा के रामान
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है, उसमें दब्द अर्थात् नामन की प्रधानता है। जिस प्रकार कोई स्वामी सेषक फो "तुम ऐसा कारो" यह प्रदेश देकर किसी वार्य मे नियुक कर देता है, उसी प्रकार वेद शास्त भी उ्योतिष्टोमादि पप्टसाधन में, इपैनयागादि अनिप्टसाधन में तपा विसेपफल रहित गन्ध्मावन्दनादि में मणुम्य को प्रवुत कर देते है। (ग) दुराल. इतिहासादि का उपदेग मित्र के तुत्य है। जिग प्रकार कोई मिनन भसो भाति प्रयोजन -- को समनाकर किसी कार्म के सिमे प्रेरखा देता है दनी प्रकार पुराऐतिहासादि नी। (ग) सृनीय उपदेश कान्ता-नुत्य होता है। जिर प्रकार कोई प्रियतमा सरसता के साथ सपने पति को थपनी बास भुनाने के लिये अमिमुसत करफे किसी पाये मे लिये प्रेरणा देती है उनी प्रकार काव्य भी भोता को रसमग्ण करके जोवनोपयोगी शिक्षा थो औौर संकेत कर देता है। पतः फाव्य का उपदेश कान्ता-सम्मित उपदेश है। फाव्य का उपदेश वेद शास्त तथा पुरासोनिहान आदि से विनक्षस है। पयों ? बात यहु है कि वह रसन्योजना मे तत्पर रहता है और उसमें येद के रामान शब्द की या पुराऐेतिहास के समान भर्थ की प्रधानता नहीं होती अवितु उसमें शब्द और भये दोनों गोए हआ करते हैं तथा रम नो प्रधानवा रहती है; मर्पार रह सादि की अभिष्यक्ि में महायक जी विभाय आदि की योजना है अपवा जो व्यज्जना रुप काव्प का व्यापार है. उसी में काव्य तत्र रहता है। ऐगा इमसिये होता है, कयोंकि वह भलोफिक वसाना में निपुसा कषि की मृति है, उनमे किगी भाव का वगंन ऐेगा नमरफार्पूएं एवं सरगरप में किया जाता है कि शीता' या पाठक अनायास ही फास्प-प्रमिपाय विषय की भोर भाकपित हो जाते ह पीर उममें रगमग्न होहर मनजाने में ही गव्य द्वारा भभिस्यक उपवेस पो प्रहस कर Ga &) The roet does not merely show the way, but giveth so sweet a prospcct into the way, as will entice avy man to inter into it. Sidney (Apology for poetry)-म ग्रभ्ानाय भा द्वारा उस्ुत । इसी से काष्प का उपदेश पियानुस्य है। मंक्षेप में पेद सास्त्रों के उदेगों में पादं म भाग है, उनम सात्य का नग्न राप है। पुराठेतिहग के उपरंषों में मिषो के समान दितसुदि है. पल के साप निवस्य को भारता का मोग है; पर गाम नह जरेसा फान्मा के मुर व्मनों के गगान सरभ भो ऐ उसमे गौसय है, दव्यमाहता हे उगमे 'सस्यं नियं मुन्हर' का मामस्जरय है । यपायोगं करोति-सानापं मम्मट के गिनार में बाम् मे ६ प्रशोशों में से मुद पर गद मे साम सम्बत्य है, मूस मा गहतप अमामिद के गाथ ओोर उस
कसगना हे लिंपे दी सोड़ दिया है। म्वसाबरों ने इम पर हिनार मन के पििभ गत मसतुन किये है। क. रामनाणार्यं से मनायुकार मरता, धर्म सगा परवर्मनारार का कदि में ही सम्कप है गावहारजान तपा उदेम ना गहत्प मे हो समा परनियुदि या भी सहरूप से ही (रमारससे दोगी महरमान था
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मथंम उल्लास: ११
सिद्धान्त मत प्रतीत होता है। तथापि विचारणीय है कि संस्कृत साहित्य के अ्रनेक स्तोत्र काव्य पाठकों के द्वारा अनर्थ-निवारण के हेतु पढ़े जाते हैं, फिर क्या अनर्थं निवारस का सामान्यतः भी पाठवा या सामाजिक से सम्बन्ध नहीं मानना चाहिये ?. साथ हो युद् विद्वानों का विचार है कि इन समस्त प्रयोजनो का कवि तथा सहृदय दोनो के साथ सम्बन्ध है। तो क्या व्यवहार-ज्ञान एवं उपदेश अ्थवा रसास्वादन का, कवि से भी सम्बन्ध हो सकता है ? जहां तक व्यवहार-ज्ञान की बात है कवि को अपने ही काव्य से व्यवहार- ज्ञान हुआ करता है, यह बात समभ में नही आती; क्योकि काव्य तो कवि के विचार तथा भावों को अभिव्यं्जना है। उपदेश के विदय में भी वही बात है। हाँ संकल्पित विचारों एवं भावित भावों का हृदय पर प्रभाव पड़ना अनिवार्य है, अतः- कवि भी स्वकृति में प्रथित विचारों से प्रभावित हो सकता है। किन्तु यह प्रभाव सामाजिक के उपदेश-ग्रहण से भिन्न प्रकार का होगा, इसमें सन्देह नही। फिर इसे उपदेश-ग्रहण की कोटि में रकसा भी जा सकता है या नही, यह विचारणीय है। कवि को रसानुभूति होती है या नहीं ? यह अ्त्यन्त विवादग्रस्त विपय. रहा है। इस विषय में स्पष्ट दो मत है-प्रथम यह है कि रसास्वादन सहृदयों को ही होता है, कवि को नहीं। द्वितीय यह है कि रस-योजना में रसास्वादन या. रसचव एा भी निहित है अतएव रस-योजना में तत्पर कविगण रसास्वादन भी करते ही है। दोनों मतों के समन्वयार्थ यह बात कही जाती है कि रसास्वादन काल में कवि भी सहृदय कोटि में आ जाता है। एक बात अवश्य है कि यदि सामाजिक के.समान कवि को भी स्वकाव्य से रसानुभूति होती ही है तो दोनों की आ्रानन्दानुभूति में एक विशेष अन्तर होता है, दोनो भिस्ष प्रकार की स्थितियाँ हैं तथा मृथक-पृथक् विचारणीय भी। वस्तुतः तो कवि का श्रनन्द सहृदय की रसानुभूति से, विलक्षण ही है, जिसे मनीपियों ने 'स्वान्त: सुख' कहा है। टिप्पखी-(i) आचार्य गम्मट द्वारा प्रतिपादित काव्य के प्रयोजन अत्यन्त व्यापक है। इनमें उत्तम, मध्यम तथा अधम सभी प्रकार के काव्य-प्रयोजनों का समावेश हो जाता है। मम्मट ने काव्य का मुख्य (पारमार्थिक) प्रयोजन शनन्दानुभूति (परनिवृति) को स्वीकार किया है। किन्तु साहित्य तो जीवन की व्याख्या है तथा उसे जीवन से पृथक नही किया जा सकता, भवएव सरसोपदेश भी काव्य का एक भावशयक प्रयोजन माना जाता है तथा, आचार्य मम्मट ने इसे मौलिभूत प्रयोजन के साथ समन्वित कर दिया है। उन्होने रस-योजना मे तत्पर काव्य के उपदेश के रूप में. इसका निरुपण किया है। इस प्रकार मम्मट का टप्टिकोए पाइचात्य समीक्षकों के, सााथ एक अद्भुत साम्प रखता है- ' To teach, to please, there are the poets aim, or at once
उद्धुत) to profit and to amuse. Horace-Ars poetica. (म० गङ्गानाथ भा द्वारा
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₹२ मव्य प्रराश: 444 144
(ii) प्रायः सभी भारतीय माहित्य-समीशको ने परम सश्य पुरपार्यं-ुप्टप' को साहित्य का प्रयोजन माना है। मम्मट गे पूर्वं भावह और उन्तक में मराका स्पष्ट। उल्लेस किया था; माचार्य वामन ने प्रीति में इसका 'रामावेश किया थी तपा' माचापं अमिनवगुप्त ने कीति यादि के ममान मानन्द में ही इनका समावेद कर दिया था :- 12 "पषेस्तावत् फीत्याउरि श्रीतिरेव गम्पाया। ...... भोतुर्खा व समुत्पसिप्रोती पर्दाि स्तः तयापि तम् प्रोतिरेय प्रधानम्। अन्यथा प्रभुसम्मितैम्यो बैदादिम्यी
यासम्मितत्यसक्षसो विशेष इति प्रामान्येनानन्द एवोक:। चतुषगम्युस्पतेदपि धानग्व एव पार्यस्तिकं मुषयं फसम्।" (ध्यन्वालोफलोचन),
मम्मट के पदनात् विश्वनाय पविभग आदि के 'वातुवंगपसप्राप्ति: मुसादत्पधियामप, गाव्यादय-पह स्पष्ट हो कहा है। फिर माणाय मम्मट ने 'चतुवंग-फल-प्राप्ति' का माध्य-प्रयोजन के रूप में उत्लेद कयों नही पिया। ऐगा प्रतीत होता है कि वेद भारत तभा पुनततिहास से विलकस काम के सरगोपर्देश आादि मे ही माचायं मग्मट ने पतुवंग को प्राप्ति का समावेस कर दिया है। मम्मद ने जिस 'मनन्द' पो मास्य का मोशिभूत प्रयोजन बवताया ह यह सो काथ्य पदन पा थवस के अनन्तर होने माला रसासमक पानन्द हो है, उसना स्स् प्रामीन माचायों को प्रीति के समान व्याप नहीं मतः मम्मट के धनुसार वागन या भभिनयगुपता के समान भ्रीति (मानन्द) के भीतर 'यगुवंग-पल-प्राप्ति' पा ममानेय नहीं किया जा गरता, यह सष्ट की है। (iii) आायायं मम्मट ने प्रामः गभी प्रामीन भतो ना नमन्व कर दिया है। उनके काव्य प्रयोगनो पे सगर्गन की्नि औौर भीति ही नही, पर्णचाराम-ान के सिने गगगोगदेण भी ह। साप ही उन्होंने ममसपाग्ति, गनननाम पोर सारिकि मान जैंगे सौहिक प्रयोनों मे भी मही मुमाया है घोर समझद निवार के धामिक रष्टि-कोण को भी ध्याग मे सता है। सम्ामबती कयुनिक दृषष्टि- फोल के विपेचन मे भी मम्मट का माषववोभन-(िपार महनपूर योग के राका ह। गंसेर मे इगमे मारपोगजमारि जीयन भा उसोशि मारी ्शोत् है,र् योषन सरि मारनंकारी इतोस क गणा विपेतर शडि के मप में शामिक मौर पियशरा पानम पप्ति के रृप में मनोर्यन, पमाहार ए् नामसे इ्िकोत भी पिदमान है।
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प्रथम उल्लास: [ १३
प: एव मस्य प्रयोजनमुक्त्वा कारएमाह- 7 पाकिर्निपुछता लोकशस्नकाव्याद्यवेक्षणात्। काव्यज्ञशिक्षयाऽभ्यास इति हेतुस्तदुद्दवे॥३।। 1-
: अनुवाद-इस प्रकार काव्य का प्रयोजन बतलाकर उसका (उद्भव एवं रफुरस फा) हेतु बतलाते हैं :- (फाव्य-रचना की) शक्त, लोफ (जीवन), शास्त्र तथा फाव्य इत्पादि के निरीक्षण एवं अनुशोलन से होने वाली निपुएता (व्युत्पति) और काव्यज्ञों (कवि एवं समीक्षकों) से शिक्षा प्राप्त रमे अभ्यास करना -यह (तीनों मिलफर) उसके उद्भव का कारए है।३॥ टिप्परी-रुवि की विलक्षण कृति इस काव्य का उद्भव कैसे होता है? कवि के व्यक्तित्व मे कौनसी विशेप बात होती है, जिससे सहृदयों को श्रह्हादित करने वाले काव्य का स्फुरण हो जाता है। इन बातों पर विचार करके विवेचकों 'ने कविं के काव्यमय व्यत्तित्व का विश्नेपण किया है। आधुनिक आलोचक भी •कविता-समीक्षा के लिये उसके सप्टा के व्यक्तित्व का विश्लेपण आवश्यक समभते हैं। 7 भारतीय साहित्य-समीक्षकों में आलङ्धारिक भामह ने काव्य-हेतु का निम्न प्रकार से विवेचन किया था- फाव्यं तु जायते जातु कस्य चित् प्रतिभावतः । - शवाभिधेये विज्ञायृत्वा तदिदुपासनम्॥ ;, विलोश्यान्यनिवन्धांश्च कार्यः फाव्यक्रियादरः ॥"(फाव्यालङ्गार २५)। इस कथन से यह विदित होता है कि भामहाचार्य के विचार में प्रतिभा ही •काव के उदूभव का मुख्य हेतु है, अन्य शब्दार्थ-ज्ञान इत्यादि हेतु तो वश्य हैं, : किन्तु सहग्यक मान है।
किया थो- आचार्य दण्डी ने काव्य-हेतु-विवेचना को और भी -परिष्वृत रूप, में प्रस्तुत
- नसर्गिकी च प्रतिभा थृतंघ बहु निर्मलम्। : :अमन्दश्चाभियोगोऽस्या: कारणं काव्यसम्पव.।। इसके पदचास् रीतिवांदी आ्चार्य वामन ने भी- 'लोको विद्या प्रकीसञ्च फाव्यांडंनि' (काव्यालव्वारनूनबृति; १.३.१) "इस प्रकार काव्य हेतु के रूप में तीन बातों का उल्लेख किया। इसके भतिरिक्त ध्वनिवादी आचार्य आ्रनन्दवघन तथा अभिनवगुप्त ने भी कांव्य के हेतु का मत्र तनन 'उल्लेंस किया है-अनेन शनन्त्यमायाति कवीनां प्रतिभागुरः। ४०१'
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१४ फारप्ररन:
शक्ति: कवित्वयीजरूप: संस्कारविशेष: यां बिना कार्व्य न पसरेम प्रखृतं वा उपदसनीयं स्थात्। नोकस्य श्याबरजङ्गमात्मकलोफपृत्ताय शास्रामां दन्दोव्याफरणाभिधानकोशफताधतु र्गंगजतुरगसद्गादिलस गामन्यानां काव्यानां च महाफविसम्वन्यिनाम, आरदिमद्यादितिदासा- दीनां न विमर्शनाद् व्युत्पतति: । काव्य कतु विचारयितु' प ये जानन्ति तमुपदेशेन करगे योजने घ पीन, पुन्येन प्रयृत्िरिति नयः समुविता न ु व्यग्तास्तत्य काव्यरयोह्ये निर्मासे समुल्लासे घ ेसुन्नं तु देतप:। राजनेगर की 'याज्य-मोमांसा से यह भी विदिव होता है कि 'मजस' नामक गोई मानापं 'मस्याग' पे माम्य का मुम्य हेतु मागते रहे। थावापं गम्मट ने नाव्ा-हेतु-विवेन मे सभी प्राचीन गनों का सार प्रदस किया है औौर सति निपुस्ना तथा सम्यास को समुदित रूप से पाम् पा हेतु बललाया है। मम्मट के हेतु-विवेक पर पापायं दण्डी के हेयु-विवेशन का पर्याप्त प्रभार एण्टिगोपर होता है, सदयधि दण्दो के (प्रतिभा, भृत औौर अभियोग) सबद भवन्प ही गम्मट मे मिसन है। दण्डी ने भी तीनों को गण्मिनित रुप मे ही वाम्प का तेतु पतनापा था। गाम ही न्टट के माव् वेतु-विरेधन का भी काम्यमराय पर सप्ट पभार परिमशिन होता है। आपायं राट मे भी नकि, सुशनि चोर सन्याग को गम्मिलित रप में पाब्य का हेतु बनमाया पा त्ितयमिदं व्याप्रियते शकि्मु स्पतिरापासः'। परनुाद-(१) तहि पर्मात् रशिष का मूस कारस (बीजरम) एक विसेव प्रकार का (स्वामायिक) संरवार जिसके बिना काव्म का पादुर्भाव समषा प्रसार नहीं हो सरता और परि प्रापुर्भाय हो भी जाएे तो यह (पात) उपहात रा विषय होगा। (-) निपुसता: सोह सर्पात् जड़ चेनन रप जगत के रपवटार, ससत्र वर्पान् एन्ड, ग्याररल श्यकोस, (नृश्यसंगीतावि) कता, गुरारमनममुषटय हपी-गोड़े, सेलवार पादि मे स्वरप का प्रतिपादन करने बासे सा्यों और महापाकियों के कायों तथा (यहा) 'बादि' रम् द्वारा वृहीत इतिहासादि के सनुसीसन से होने थासी (काप्पनिपनक) ुरपसि (निपुलता)। (३) तो पाव्य-रचना तमा विभेषना करना नामते हैं (बाम्यत) उनरे उदरेस (सिंद्ा) के अनुसार माम्यनिर्मास औोर दस -ोवना (सममा, रममोभ्षा) सै सगना (पपाल)- पे तोनो सम्मि-
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प्रथम उल्लास १५
पकि बा है? मम्मट के अनुमार नवित्व का मूलकारस (वीजरूप) एक विशेष प्रकार का संस्कार ही शक्ति है। अर्थान क्ति में एक सहज शक्ति होती है, जिसके कारस कवि-हृदम में बविता के भावों का प्रोदभास होना रहता है। यह रावरिति जन-नमाधारग को अपेक्षा पिलकस होती है, एक दिव्य-दृष्टि होती है। प्राचीन एवं पर्वाचीन समालोचकों द्वारा वषित 'पतिभा' का मम्मट ने गक्ति' नाम से उल्लेस किया है। यह काव्य की रचना का ही कारगा नहीं है भपितु प्रतिभा में चमत्वार से ही कोई रान्य महदयजनों का मादरभाजन होता है। यदि किसी कवि में प्रतिभा नही है और वह हठात् काव्य-निर्मागा कर सेता है, तो उसका घाव्य उपहासास्पद ही होता है, सहुदयजन उसका आादर नहीं करते। (२) निपुणताः- नोकयत शास्त्र तथा काव्यादि के निरीक्षण एवं अनुसीलन से जो निपुसता प्राप्त होती है, यह भी काव्य के निर्माण तथा उत्कर्प का हेतु है। 'नियुगता' शब्द का ही अर्थ ग्रन्यगार ने 'युत्पति' किया है। भिन्न-भिन्न प्रकार की वस्तुओं के विषय में भली-भांति ज्ञान होना तथा रसादिविषयक दृढतर संस्कार हो जाना ही व्युत्पति, है अथवा पाण्डित्य को भी व्युत्पति कहते हैं। जव प्रतिभावाली कवि चरामर जगत के व्यवहारो का निरीक्षण करता है तो उसे भनुभूति प्राप्त होती है। विङ्गलादि छन्दवास्थ्र, पाशिनीय आदि व्याकरए, शब्द- कोश, नृत्यगीतादि ६४ कलाओं, मनुस्मृति आदि धर्मगास्त्र, गर्गादि अथवा कौटिल्य प्रसपीत अर्थंशास्त्र, वात्स्यायनादिकृत वमशास्त्र, न्याय आदि मोक्षशास्त्र तथा दाथी-घोड़ा आदि सम्यन्धी ग्र्थ और धनुर्वेद के ग्रन्थ आदि (शास्त्रों) के अमुशीलन सें विविध विद्याओों का ज्ञान एवं पाण्डित्य प्राप्त होता है। वाल्मीकि आदि कवियों के काव्यों के अध्ययन से रसादिविययक संस्कार दुढ़ हो जाता है तथा काव्य-शैली आदि का सम्यक वोध हो जाता है और रुचि भी परिष्कृत हो जाती है। ऐसा कवि इतिहासादि ग्रन्थों से आस्यानादि का आधार ग्रहस करके काव्य का निर्माए करता है, तो उसका काव्य उत्कृष्ट होता है। संक्षेप में लोकवृत्त-निरीक्षण, शास्त्रों का अनुशीतन, काव्य का आस्वादन तथा इतिहासादि के विभर्श से जो अनुभूति तथा पाण्डित्य प्राप्त होता है वही व्युत्पत्ति या निपुरता वही गई है। (३) प्रन्यास :- काव्यों से शिक्षा प्राप्त करके अभ्यास करना भी काव्य के निर्माण तथा उत्कर्ष का हेतु है। कारिका में काव्यज उनको कहा गया है, जो काव्य-रचना करना जानते हैं अथवा काव्य की आलोचना करते हैं। ऐसे सहृदयजनों से शिक्षा अथवा निर्देश-प्राप्त वारके प्रतिभाशाली कवि बार-वार काव्य का निर्माण करता है तथा दब्दादि की सुन्दर योजना करता है, यही अभ्यास कहलाता है.। यहाँ काव्यज्ञ का अर्थ है-कवि तथा समालोचक। IF.i .:- इति हेतुस्तदुद्भवे-कारिका के इस अंश की व्याख्या करते हुए भाचायं मम्भट स्पष्ट करते हैं कि शक्ति, निपुसता तथा अभ्यास तीनों मिलकर (समुदिता:)
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१४ J कव्यप्रकार:
शक्ति: कवित्ववीजरूपः संसकारविशेष: यां विना काव्यं न प्रसरेत् प्रसृतं वा उपह्सनीय स्यात् लोकस्य स्थावरजङ्गमात्मकलोकयृत्तरय शास्त्राएं छन्दोव्याकरणाभिधानकोशकला चतुर्वर्गगजतुरगखड् गादिलक्ष .राग्रन्धानां काव्यानां च महाकदिसम्बन्धिनाम, आदिप्रददयादितिदासा- दीनां च विमर्शनाट् व्युत्पत्तिः । काव्यं कतु विचारयितु' च ये जानन्ति तदुपदेशेन करे योजने च पौनः पुन्येन प्रवृत्तिरिति त्रयः समुदिता न तु व्यग्तास्तर्य काव्यस्योद्गवे निर्माणे समुल्लासे च हेतुर्न्न तु देतव:। राजशेखर की 'काव्य-मोमांसा से यह भी विदित होता है कि 'मन्दल' नामक कोई आचार्य 'अभ्यास' को काव्य का मुख्य हेतु मानते रहे। आचार्य सम्मट ने काव्य-हेतु-विवेचन में सभी प्राचीन मतों का सार अ्ह किया है और शक्ति, निपुता तथा अम्यास को समुदित रूप से काव्य का हेतु बतलाया है। मम्मट के हेतु-विवेक पर आचार्य दण्डी के हेतु-विवेचन का पर्याप्त प्रभाव टृष्टिगोचर होता है, यद्यपि दण्डी के (प्रतिभा, श्रुत और अभियोग) शब्द भवथ्य ही मम्मट से भिन्न है। दण्डी ने भी तीनों को सम्मिलित रूप से ही काव्य का हेतु बतलाया था। साथ ही स्द्रट के काव्यनेतु-विवेचन का भी काव्यप्नकाश पर स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है। आचार्य स्ट्रटने भी क्ति, व्युत्पत्ति और अभ्याम को सम्मिलित रूप में काव्य का हेतु बतलाया था- 'त्रितयमिदं;व्याप्रियते श्क्तिव्युं त्पत्तिरम्यासः'। पनुवाद-(१) शक्ति सर्थात् कवित्य का मूल कारस (बोजरूप) एक विशेष प्रकार का (स्वाभाविक) संस्कार: जिसके बिना फाव्य का प्रादुर्भाव प्रथवा पसार नहीं हो सकता और यदि प्रादुर्भाव हो भी जाये तो वह (फाध्य) उपहास का विषय होगा। (२) निपुसता=तोक अर्थात जड़ चेतन रूप जगत् के व्यवहार, शास्त्र अर्यात् खन्द, व्याकरण शब्दकोश, (नृत्यसंगीतावि) फला, पुसपार्य-चतुप्टम हाथी-घोड़े, तलवार आादि के स्वरप का प्रतिपादन करने वाले ग्रन्थों और महाफायियों के काय्यों तथा (यहा) 'मादि' शब्द द्वारा मृहीत इतिहासादि के अनुशीतन से होने वालो (काय्यविपयक) व्युत्पत्ि (निपुरता)। (३) जो फाव्य-रचना तथा विवेवना करना जानते हैं (काव्यज) उनके उपवेश (शिक्षा) के अनुसार काव्य-निर्माए और शब्द-योजना (प्रथया, रसयोजना) में बार-वार लगना (प्रभ्यास)-ये तीनों सम्मि- लित रूप से न कि पृथक- प्रथक फाव्य के निर्माण तथा उत्कयं के हेतु है: (हेतुः) न कि काव्य-उद्भव के ये तीन पृथक-पृयष फ़ारण है (हेतव.) प्रभा :- पक्ति, निपुएता और भम्यास तीनों सम्मिलित रूप में काव्य के स्फृरग का हेतु होते हैं। इन तीनों की व्यास्या इस प्रकार की गई है- (१) शक्ति :- मम्मट ने काव्य-हेतु में शैकि को प्रथम स्थान दिया है। यद
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प्रथम उल्लाग: १५
गकि क्या है? मम्मट के सनुसार कवित्व का मूलकारस (वीजरूप) एक विशेष प्रकार का संस्कार ही पक्ति है। अर्थात् कवि में एक सहज शक्ति होती है, जिसके फारस कवि-हृदय में कविता के भावों का प्रोद्भास होता रहता है। यह पचित जन-साधारण की पपेक्षा मिलक्षण होती है, एक दिव्य-दूष्टि होती है। प्राचीन एवं भर्वाचीन ममालोनकों द्वारा कपित 'प्रतिभा' का मम्मट ने पक्ति नाम से उल्लेस किया : है। यह फाव्य को रचना का ही कारग नहीं है अपितु प्रतिभा मे चमर्कार से ही मोई प्रान्प सहृदयजनों का मादरभाजन होना है। यदि किसी कवि में प्रतिभा नहीं है और वह हठात् काव्य-निर्मास कर लेता है, तो उसका काव्य उपहासासपद ही होता है, सहुदयजन उमका भादर नहीं करते। 1 (२) निपुसता :- जांकवृत शास्त तथा काव्यादि के निरीक्षण एवं भनुनीलन से जो निपुसाना प्राप्त होती है, वह भी काव्य के निर्माण तथा उत्कर्प का हेतु है। 'निपुगाता' शब्द का ही पर्थ ग्रन्थार ने 'बयुत्पति' किया है। भिन्न-भिस्न प्रकार की वस्तुओं के विषय में भली-भाति ज्ञान होना तथा रसादिविपयक दृढ़तर सस्कार हो जाना ही व्युत्पति है. अथवा पाण्डित्य को भी व्युत्पत्ति कहते हैं। जब प्रतिभाशाली कवि पराचर जगत के व्यवहारो का निरीक्षस करता है तो उसे अनुभूति प्राप्त होती है। गिन्भलादि दन्दशास्थ, पाशिनीय आदि व्याकरण, शब्द- कोश, ृख्यगीतादि ६४ य्लाओों, मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्र, गर्गादि अथवा कौटिल्य प्रसीत अर्थशास्त्र, वात्स्यायनादिकृत कामशास्त्र, न्याय आदि मोक्षशास्त्र तथा हाथी-घोड़ा आदि सम्बन्धी ग्रन्थ और धनुर्वेद के ग्रन्थ आदि (शास्त्रों) के अनुशीलन से विविध विद्याओों का ज्ञान एवं पाण्डित्य प्राप्त होता है। वाल्मोकि आदि कवियों के काव्यों के अध्ययन से रसादिविषयक संस्कार दढ़ हो जाता है तथा काव्य शैली आदि का सम्यक बोध हो जाता है और रुचि भी परिष्कृत हो जाती है। ऐसा - कवि इतिहासादि ग्रन्थों से आध्यानादि का आधार ग्रहस करके काव्य का निर्माण करता है, तो उसका काव्य उत्कृष्ट होता है। संक्षेप में लोकवृत्त-निरीक्षण, शास्त्रों का अनुसीलन, काव्य का आस्वादन तथा इतिहासादि के विमर्श सो जो अनुभूति तथा पाण्डित्य प्राप्त होता है वही व्युत्पत्ति या निपुगांता कही गई है। (३) सम्यास :- काव्यों से शिक्षा प्राप्त करके अभ्यास करना भी काव्य के निर्माण तथा उत्कर्ष का हेतु है। कारिका में काव्यज्ञ उनको कहा गया है, जो काव्य-रचना करना जानते हैं अथवा काव्य, की आलोचना करते हैं।ऐसे ; सहदयजनों से शिक्षा अथवा निर्देश प्राप्त करके प्तिभाशाली कवि बार बार काव्य क निर्माण करता है तथा शब्दादि की सुन्दर योजना करता है, यही अभ्यास कहलाता है। यहाँ काव्यज का अर्थ है-कवि तथा समालोचक। i :, इति हेतुस्तद्ुद्भवे-कारिका के इस अ्रंश की व्याख्या करते हुए आचाय मम्मट स्पष्ट करते है कि शक्ति, निपुणता तथा अम्याम तीनों मिलकर (समुदिता:)
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- काव्यप्रकाश:
काव्य के निर्माण तथा उत्कर्ष का हेतु है अथात इनकी कारणता दण्डचफादि न्याय से है-जिस प्रकार दण्ड चक आदि सभी मिलकर घट-निर्माण करते हैं, इसी प्रकार वाकि, निपुणता और अभ्यास तोनो परस्पर-सापेक्ष हो पर ही काव्योद्भव के हेतु हैं; अलग अलग (व्यस्ताः) नही। पतः इनकी कारएता सृगारणिमणि न्याय से नहीं है-जिस प्रकार तिनकों से अरणि औौर मणि की प्रपेक्षा किये बिना ही भाग जलाई जाती थी और अरणि नामेक काष्ठ-विक्षेप से भी तथा सूर्यकान्त मगियों की सहायता से भी स्वतन्न्न रूप से भाग जलाई जाती थी, वे तीनों अलग अलग अग्नि जलाने के कारण माने जाते हैं, इग प्रकार यहा दाक्ति, निपुएता और अ्भ्याम पृथक पृथक काव्योद्भव के कारण नही। ये तीनों •मिल कर एक कारस बनाते हैं। अतएय 'हेतु' इम एकवचन का प्रयोग इनके लिये किया गया है, 'हेतवः' इस बहवचन का नहीं। अभिप्राय यह है कि चाहे काव्य की उत्पत्ति इनमें से एक २ हेतु से भी हो जाये किन्तु उत्कृप्ट काव्य की उत्पत्ति के 1लिये तीनों का साथ-साथ होना अनिवार्य है (उद्भव=उत्कृष्ट उत्पत्ति)॥ टिप्परपी :- (क) उपयुक्कत व्यास्या मे प्रतीत होता है कि मम्मट ने 'शक्ि' मन्द का प्रयोग प्रतिभा के पर्याय रूप में किया है पहने प्रानन्दवद्ध नाचायं तथा अभिनवगुप्त ने भी शक्ति और प्रतिभा में एकलपता स्वीनर की थी- शक्ति: प्रतिभानं वणनीयवस्तुविधयनूतनोल्लेखशालित्वम्। (ध्वन्यालोकलोधन) उन्होंने प्रतिभा को काव्य का वीजरूप ही, नही माना 'था झपितु * अंपूर्व वस्तु का निर्मागा कगने वाली एक विनेष प्रकार की प्रज्ञा कहा था। ऐसी पज्ञां जो सर्वदा नूतन निर्माण में समर्थ होनी है। "प्रतिभा प्रपूर्य वस्तु निर्मालक्षमा प्रज्ञा"। मम्मट के प्रतिभाविषयक मन्तव्य पर जहां ्वनिवाद का प्रभाव परिलक्षित होता है वहां रीतिवादी वामन का प्रभाव भी स्पप्ट है। यद्यपि वामन ने प्रतिभा का मुस्य हंप से उलोख नहीं किया 'प्रकीएं' में ही उसका नमावेश किया है तथापि मम्मट की मक्ति की व्यास्या काव्यालह्कांर सून को छाथा सी लगती है-कवित्व- 11 योजं प्रतिरभानम् । कवित्वस्य बीज कवित्ववीज' जन्मान्तरागतसस्फार विशेष: केश्चित्, मस्मातु बिना काव्यं न निप्पंद्यते, निम्पंत्न याऽवहास्यायतनं स्पात्।
दन प्राचीन आाचारयों से प्रभावित होकर 'भी मम्मट ने 'ात्ति' को नेवीन रूप में प्रकट किया है। मम्मट के पू्ववर्ती राजशेसर ने सक्ति के दो फार्य माने थे- 'प्रतिभा और व्युत्पति;अर्थात् प्रतिभा और पक्ति को एक 'रूप न मानकर भिनन 'माना था-"शकिफतृ केहि प्रतिभाष्युत्पतिषमंसी" (काव्यमीर्माना ४) मम्मट ने इस गक्ति और प्रतिभा के भेद को न मानकर गक्ति और प्रतिनो को एक रूप रा निरुपित किया प्रतिभा के दो भेदों को भी ममान्य-ठदरायां तथा स्वनियादियों के सीय रीतिवादियों का समन्वय कर दिया।
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प्रथम उल्लास: [:१७:
(स) निपुणता या व्युत्पत्ि की व्याख्या में भी मम्मट की समन्वयात्मक प्रवृतति, का दर्शन होता है। वामनाचार्य ने विद्या को काव्य का श्रद्भ माना है और लोकवृत्त- ज्ञान तथा गास्तों के परिज्ञान को काव्य-रचना के लिये आवश्यक बतलाया है। उन्होने दन्द आादि का पृथक-पृथक उल्लेख किया है। अलङ्धारवादी आचार्य रुदट ने : भी व्युत्पत्ति का स्वरूप बतलाते हुए लिखा है-
युक्तायुक्तविवेको व्युत्पत्तिरियं समासेन ।। (काव्यालङ्कार ११८)- इस प्रकार रुद्रट ने वामन के लोकवृत्त-ज्ञान, तथा विद्या इत्यादि को व्युत्पति में समन्वित कर दिया। तदनन्तर ध्वनिवादियों ने व्युत्पत्ति को प्रतिभा-स्फुरण, माधन के रूप में प्रस्तुत किर्या- शक्त: प्रतिभानं यएंनीयवस्तुविषयनूतनोल्लेसशालित्वम्।
(ध्वन्यालोकलोचन ३), यहाँ "तदुपयोगि" शब्द का ग्रहण किया गया है, जिससे स्पष्ट है कि प्रतिभा; के स्फुरण में सहायक तथा वस्तु-विमर्श से उत्पन्न निपुणता को ही ध्वनिवादी 'व्युत्पति' कहते है। आचार्य मम्मट के 'व्युत्पत्ति' के स्वरूप में इन सभी मतो का सार समन्वित है। लोकवृत्त-निरीक्षण, शास्त्रो के प्वेक्षण और काव्यो के अनुशीलन से उत्पक्ष होने वाली निपुणता ही व्युत्पत्ति-है। यह व्युत्पत्ति काव्य के उद्भव में प्रतिभा को- सहायक है। यह निपुणता कवि की कृतियों मे स्पष्ट भलका करती है।, 17 7 1 (ग) अभ्यास-मम्मट के पूर्ववर्ती शाराङ्वारिकों ने अभ्यास के विविध स्वरूप उपरियत किये थे। भामह के अनुसार ग्रभ्यास का स्वरूप है- शब्दाभिधेये विज्ञाय फृत्वा तहिदुपासनम्। विलोवयान्यनिबन्धांशच कार्यः काव्यसमादर:।। (काव्यालद्वार १ १०)* वामन ने 'अभियोग' अर्थात् काव्य-रचना का अभ्यास, वृद्धसेवा औोर पदायास TF
एवं वाक्मविन्यास का अभ्यास (अवेक्षण) आदि के रूप में अभ्यास को समुपस्थित किया था। राजशेवर ने- अविच्छेदेन शीलनमम्यासः स हि सर्वगामी सर्वत निरति- शर्य कौशलमाधत' (काव्यमीमांसा), इस प्रकार से निरन्तर अभ्यास को काव्य-रचना 4 का हेतु वतलाया था। ध्वनिवादी अ्रभिनवगुप्त ने भी सहृदय शब्द की व्यास्या करते हुए अभ्यास का स्वरूप इस प्रकार दिखलाया था-'येपां काव्यानुशोलनाम्यासवशाव् विशदीभूते मनोमुकुरे वर्णनीयतन्मयोभवनयोग्यता ते स्वहृदयसंवादभाजः सहृदयांः' । (हंवन्यालोकलोचन १.१)। - इन सभी का समन्वित रूप मम्मटकृत अस्यास की व्यास्या में उपलब्प
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5 काव्यप्रकाग:
वंमेस्य कारयमुक्त्वा स्वरूपमाह- ' (१) तददोपी शब्दार्थी समुलावनलङ्कृती पुनः कवापि॥
तीत होती है। ोता है। उनकी व्यारया वामन तथा र्द्रट के अभ्यास-निरूपण से प्रभावित सी
अनुवाद-इस प्रकार इस (फाव्य) के कारए को वतलाकर (ग्रन्थकार सफे स्वरूप का निरूपए करते हैं। [शब्दाथों तत् (काव्यम)-यह अ्रन्वय है] ऐसे शब्ा और त्र्य काव्य हैं जो फांव्यत्व-विघातक) दोषों से रहित हैं, (माधुर्यादि) गुखों से युक्त हैं औौर घाहे कहीं स्फुट) अतद्धार रहित भी हैं। (१) [अलङकृतिः अलङ्कारः, नास्त अलद्कृतिः यपोः तो (शब्दाथों") अनल-' कृती अर्थात् ऐसे शब्द और पाथं जिनमें अलद्धार-योजना न हो ]। टिप्पणी-मम्मट के पूचवर्ती तथा परवर्ती अनेवा आचार्यों ने काव्यनस्वसप रे विवार किया है। अवङ्गारवाद के प्रयतक भागह का लक्षमा है-"दाब्दारथी हिती काव्यम्" अर्थात् जहां शब्द और अ्र्थ' में विशेष प्रकार का सहभाव है लद्वार योजना के द्वारा उनका सौन्दर्य वढ़ गया है, ऐसे विशिष्ट शब्द और अर्थ नव्य कहलाते हैं। दण्डी के मत में 'अलङ् कृत दव्दार्थयुगस' ही काउ्य का स्वरूप उनके अनुसार काव्य का लक्षण है-'शरीरं तावदिष्टार्य-व्यवच्छिना पदावली।' ेतिवादी आचार्य वामन ने अलङ्गारवादियों के लक्षण को कुछ अधिक सूक्षम बनाने प्रयास किया है- " काय्यं ग्राह्यमलङ्गारात् (१.१.१)- काव्यशब्दोप्यं गुएालङ्कारसंस्कृतयोः व्दार्थयोर्वतते। भकत्या तु शब्दार्थमान्रवचनोज्य गृह्यते (वृति)। सौन्दयंमलङ्वार: ११'२) इस प्रकार वामन ने अनद्धार का अर्थ 'सोन्दय' किया। इसी सौन्दर्य के नरस फाव्य उपादेम होना है, तथा वास्तव मे माधुर्यादि गुमा और सौन्दर्य से ब्लङ कृत शब्द और अरथ ही काय्य है, केवल शब्द और अरय के लिए काव्य शब्द न व्यवहार गोए है, यह भी बतलाया'। ह वनिवादी आचार्यो की दृष्टि विदेप रूप से पव्य की आत्मा की ओोर हो। काव्य के शरीर रूप से प्रसिद्ध शब्द औोर अर्य की और उन्होंने कम'ध्यान दया। ध्यनिकार के"काव्यस्पात्मा ध्वनिः" अथवा 'राहवयहृदमाह्यादि शग्त्राथमयं- वमेय काव्यलक्षराम्' आदि के द्वारा काव्य की सात्मा ध्वनि, मालाद मयया रम हो, औोर मालोचकों का ध्यान गया। किन्तु यह लक्षणा भी विशेषतया सामाजिक की प्टि से ही महत्त्वपूर्ण रहा। काथ्य का ऐसा स्वरप इसके द्वारा प्रस्तुस् न किया जा का जो सर्वाङ्गीय हो। ..
:"राजसेसर ने पाव्यपुरप की कल्पना करके माव्य स्वरूप में शब्द, भर्य, गुए, 7
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प्रथम उल्लाम:
दोपगुणललिद्वारा: वच्यन्ते। क्वापीत्यनेनैतदाह यत्सर्वत्र सलङ्वारी:) षवचित्त स्फुटालद्वारविरहेऽपि न काव्यत्वद्दानिः। यथा- यः कौमारहर: स एव हि बरस्ता एव चैत्रतंपा- स्ते चोन्मीलतमालतीसुरभयः मीढाः कदम्चानिलाः६ सा वैवार्म तथापि तम सुरतव्यापारलीलाविघो रेवारोघसि वेतसीतरुनले चेतः समुत्कएठते ।१॥ अत्र स्फुटो न कश्चिदलद्वार: रमस्य च प्राघान्यान्नालङ्गारंता ।। रस और अलद्वार सभी का सामज्जस्य करगे का प्रयास किया। बकोकिकार कुन्तक ने भी यद्यपि 'वोकित फाव्यजीवितम्' यह मानते हुए 'विदग्धभाङ्गभगिति' 'को ही काव्य बतलाया तथापि काव्य-स्वरनप की व्यास्या करते हुए उसके सभी अ्रद्धों की औोर ध्यान दिया। तदनन्तर काव्य-सक्षणा में समन्वय की ओर प्रवृत्ति बढ़ती रही। एक ओर भोगराज ने काव्य का यह स्वरूप वतलाया- प्रदोपं गुएवत् फाव्यमलङ्धारंराङकृतम्। रसान्वितं कघि. कुवन् कीति प्रौति च विन्दति ॥
दूसरी और क्षेमेन्द्र ने शचित्य को ही काव्य का प्रास कहा- (सरस्वतीकण्ठाभरसं)
श्रौचित्यं रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम। इन सभी लक्षमों का समन्वित रूप आचार्य मम्मट के कव्य-स्वरूप में हष्टिं गोचर होता है-'तददोपी शब्दारथौं सगुसावनलड्कृती पुनः ववापि।' मम्मट के परनात् साहित्यदर्पगाकार विश्वनाथ कविराज ने 'वाकयं रसात्मक फाव्यम्' कहते हुए मम्मट के काव्यलक्षणा में दोप दिखलाये तथा पण्डितराज जगनाथ नें (रसगगङ्गाधर' में) 'रमशोयार्थप्रतिपादक: शब्द काव्यम' इस प्रकार से काव्यस्वरुप का विवेचन किया; किन्तु मम्मट के लक्षणा की व्यापकता उनमें नहीं मिलती। प्रमुवाद-(काव्य कहे जाने वाले शब्द और अर्थ के) दोप, गुए औौर अलदूारों का निरपस आागें (सप्तम उल्लास में दोप, अष्टम में गुख तथा नवम प्रीर बंशम में अलद्धार) किया जायेगा। (अनलड्कृती पुनः पवापि में) पवापि अर्थात् 'कहों पर' ऐशा कहने से (अभिन्नाम यह है) प्रायः सर्वत्र अलङ्कृत शब्द: और भर्थ, काव्य कहे जाते हैं; किन्तु यदि कहीं पर स्फुट (स्पष्ट) बलद्गार न भी 'हो तो यही (अदोपता घौर सगुसता होने पर) फाव्यत्व फी हानि नहीं होती। जैसे-"यद्यपि मेरा नियतम वही है जिसने मेरे कौमार्यका हरस किया; ये वे ही चंत्र की रात्रिया हैं. विकसित मालती की सुगन्ध वालो, कदम्ब नामक वृक्षों से बहने वाली उन्मादक (प्रोढ़ा :- रत्युद्दीपका:) हमाएँ भी वही हैं (जो पहले थीं) और में (अस्मि='अहम' चर्थ में अव्यय) भी वही हूँ, (फोई दूसरी नहीं) तथापि वहाँ नमदा के तट परं (रेवारोघसि) वेवलता के नीचे सुरत हेदु (गमनादि) व्यापार सम्बन्धी तोती
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२०:1. काव्यप्रकाशः
(वेअरचना, आदि) सम्पादन (लीला-वियो) के लिए मेरा मन उत्कण्ठित हो रहा है।" इस पद्य में कोई स्पष्ट रूप से प्रतीत होने वाला. (स्फुट) अलद्गार .नहीं, है,, और (विप्रतम्भशङ्गार) रक्ष की प्रधानता होने के कारख यह यंहां, भलद्धार नहीं है (भर्यात् रसवत् यादि अतद्धार भी य ही नहीं है)॥ प्रभा :- काव्य का स्वरूप बतलाते हुए आचार्य मम्मट ने, उस, नब्दार्थ-युगल को काव्य कहा है जो दोप-रहित हो तथा गुएसहित हो औौर, जो अलद्वारों से अलङ् कृत हो, किन्तु यदि कही स्पष्ट अलक्वार न भी हों तो भी काव्पत्व की क्षति. नहीं होती है। इस प्रकार काव्य के लक्षणा में चार अ्रंग हैं। (१) शब्दाथों तत् (काव्यम्) कीहगी ? (कैसे शब्द और अरथ काव्य हैं। ? (२) भदोषी (३) सगुखौ, (४) अनलइकृती पुनः कवापि। यहाँ पर अदोपौ, सगुसी तथा अनलडकृती पुनः मवापि -- ये तीन गब्दाथों के विशेषण हैं। काव्यप्रकाश के टीकाकारों ने प्रत्येक पद की व्याख्या विस्तार से की है। (१) शब्दारथों ततः-शब्द और अ्रथ दोनों मिलकर काव्य हैं। इस कथन में शब्द और अर्थ के विशिष्ट साहित्य (गब्दार्थों सहिती काव्यम्) की ओर संकेत हैं/। इसके द्वारा सामान्य वाङमय इतिहासादि से साहित्य या काव्य को पृथक किया जाता रहा है। प्ाचीन विवेचकों की यह भी मान्यता रही है कि शब्द, और भप फाव्य का शरीर है-काव्यस्य शब्दारथों शरीरम्। अतः यहाँ विघिष्ट प्रकार के सब्दार्थ-युगल को ही काव्य कहा गया है। सहृदयाह्हादकारिता अथवा रसव्यं्जकता आादि शब्दार्थंयुगल में ही है तथा काव्यं श्रुतं, काव्प पठितं एवं काव्यं बुद्धम् इत्यादि व्यवहार से भी शब्दार्थयुगल काव्य कहलाता है, यह बात सप्ट ही है। "इसीलिए" पण्डितराज जगनाथ का यह आक्षेप कि दब्दारथंयुगल को काव्य मानने में कोई प्रमा नही है, भी भ्रयुक्त ही है। वस्तुतः नागेशभट्ट यदि रमगङ्गाघर के टीवपसये ने ही उनके भ्क्षपों का निराकरण कर दिया है। (२) अदोपो :- यह शब्दार्थ-युगल का बिनेपस है। दोपरहित नब्दार्थ-युगस हो सनव्य पद का अधिकारी है। किन्तु संसार में सर्वया दोपरहित तो कोई वरतु है ही नहीं। इसलिए भाव यह है कि काम्पत्व के विपांतक जो च्युतसंस्कृति मोदि दोप हैं वे नही होने चाहिये। आचार्य मेम्मट के विचार में दोप रसादि के अपक्पंक यां विषातक होते हैं, गुों का प्ररभाव माय ही दीप नही हैं.। इसी हेतु 'सगुणो' से पृथक 'मंदोपों' पदं-दिया गया है। अभिप्राय यह है कि यदि कोई कविकृति सहद्यों के हृदय को प्राहादित करती है किन्तु उसमें फोई शास्त्रोक्त दोप भी है पर यह दोप काय्पत्व का विधातक नही तो उसके काव्य होने में कोई सन्देह नहीं। अंतः मम्मट पे इस लक्षरं में भदोपता को वही सभिप्रांय है जो प्राचीन आाचार्यों ने निम्न गब्दों में निरुपित किया है- फोटानुविद्वरत्नादिसाधारण्येन काय्यता। दुष्टय्वपि मेता म्त्र रसाघयनुगम. रृटः ।।
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प्रथम उल्लास:
सर्थात् जिस प्रकार कीटानुविंद्ध रत्न मी रत्न ही है इसी प्रकार जिस दब्दार्थ- F. ही है। सुगल में रसादि की स्पष्ट योजना है उसमे यदि कोई दोप भी हो तो भी वह कांव्य
(३) सगुणी :- (i) सगुता भी शब्दार्थयुगल का विशेषण है। माधुरय झोज़ और प्रसाद नामक गुखों से विशिष्ट दोपरहित शब्दार्थयुगल काव्य' हैं, :. गुएरहित शब्दार्थयुगल काव्य नहीं। यद्यपि मम्मट के मत मे गुंस रसा रसनिष्ठ है, (ये रसस्याद्िनो घर्माः) तथापि परम्परा से ये शब्द और श्र्थ के भी धर्म कहे जाते हैं, क्योंकि रस की अभिव्यञ्जना शब्द और भर्थ द्वारा ही होती है। मम्मट ने 'कंहा भी है-गुणवृतत्या पुनस्तेपां वृत्ति: शब्दार्थयोमता (सूत्र ६५) अर्थात् माघुर्यादि 'गुसों को मौएरूप से शब्दार्थनिष्ठ माना जाता है। इस प्रकार यहाँ गुए' शब्द गुशाभिव्यञ्जक अर्य में है; अर्थात् गुगाभिव्यञ्जक शब्द और अरथं। अतएव नीरस काव्य में भी यह लक्षए घटित हो जाता है (उद्योत), क्योंकि गुराभिव्यन्जक शब्द और अथं नीरस काव्य में भी रह सकते है; किन्तु उसमें रस का परभावहोने के फारण माधुर्य आदि गुणों का होना तो सम्भव नही है (रसाभावे गुसाभावात्)। (ii) सगुखता विशेपण से दव्दार्थसाहित्य रूप काव्य की सहृदयाह्लादकता अथवा रसाभिव्यञ्जकता भी प्रकट होती है। अतः रसवादियों एवं ध्वनिवादियों के काव्य- स्वरूप का भी इसमें समन्वय हो जाता है। साथ ही सगुसता शपचार्रिक 'रूप में मध्यम तथा प्म काव्य में भी विद्यमान रहती है; क्योंकि उनके लिए भी यह मधुर है तथा यह तोजस्वी है इत्यादि गौए व्यवहार हुआ करता है अतः मध्यंम और प्रधम काव्य भी इससे लक्षित हो जाते हैं। यदि 'समुसो' के स्थान,पर 'सरसंता' या 'रसवत्ता' को विशेषण बनाया जाये तो वह भी औपचारिक ही होगा, क्योंकि रसानुभूति तो सहदयों के हृदय में होती है, काव्य तो केवल उसका प्रयोजक है अर्थात् शब्दार्थयुगल या वाक्य को रसवत् कहना उपचारमान ही प्रतीत होता है। साथ ही जिन काव्यों में वस्तु तथा अलद्दार की प्रधानता है, उनमे रसात्मकता का । लक्षण अव्याप्त है। मम्मट का 'सगुगौ' विशेषण ही इसके लिये उपयुक्त है। . (४) अनलङ् कृती पुनः पवापि :- टीकाकारों का विचार है कि अनलङ कृती शब्द में नत ईपदर्थक (अल्पताबोधक) है, इस अल्पता का अर्थ है-अस्फुटता। भतः जिन्हें काव्य कहा जाता है ऐसे शब्दार्थ प्रायः अलद्वार युक्त होते हैं, किन्तु यदि कहीं पर स्फुट अलद्गार को प्रतीति न होती हो तो भी शब्दार्थसाहित्य में पदोपता एवं सगुणता के रहने के कारण काव्यत्व स्वीकार करना पड़ता है-यह तात्पर्य है। 'सालद्वारों' मात् कहने से यह तात्पर्य प्रकट नही होता अतःमम्मट ने भलङ्कारसहिती या सालद्वारी पद का प्रयोग नहीं किया। भाव यह है कि अलद्वारों फी स्फुटता काव्यत्व के लिये अनिवार्य नही। वही-कहीं अलङ्कारों के स्फुट न होने पर भी काव्य होता ही है; किन्तु स्फुट तथा अस्फुट दोनों प्रकार के अलद्वांर से धून्म शब्दार्थयुगल मम्मट के मत मे काव्य नहीं होता। स्फुट अलङ्गार-रहित काव्य :का उदाहरण है-'यः कोमारहर:' इत्यादि। 14 1-4
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काव्यप्रकांश:
अ्रत्न स्फुटी न "अलङ्धारता :- सिलाभट्टारिका नामक काइमीरी कवयित्री के : "यः कौमारहर" आदि उदाहरण में एक नायिका की मनोदशा का वणन किया गया है। उसकी प्रियतम के प्रति नित्य नवीन उत्कफ्ठा का बशन है। यहाँ विभलम्भ शद्गार की सुन्दर अभिव्यञ्जना हुई है। मम्मट के विचार मे यहां किसी अतक्कार की स्फुट प्रतीति नही होती फिर भी यह उत्तम काव्य है। कविराज विश्वनाथ ने यहाँ विभावना और विशेपोकि मूलक सन्देह संकर की स्फुट प्रतीति मानी है, किन्तु काव्यप्रकाश की प्रदीप तथा उद्योत टीकाओं ने विश्वनाथ के मत का स्पप्टतया खण्डन किया है। भाव यह है :- कारण का अभाव होने पर भी कार्योत्पत्ि का वर्णन विभा- बना है। वर तथा अन्म उपकरणों की अनुपभुकति (=उपभोग, न करना) उत्कष्ठा फा कारण है। उस कारण (अनुपभक्ति) के न होने पर भी उत्कण्ठा के होने का यरान किया गमा है, अतः बिभावना है। किञन्च, कारण के होने पर भी कार्य के प्रभाव का वणन विशेपोक्ति है। यहाँ उपमुक्तता (उपभोग कर सेना) मनुत्ण्ठा का कारण है। उस उपभुक्तता के होने पर भी अनुत्कण्ठा नही होती, अतः विशेपोक्ति है। किन्तु ये दोनों ही अलद्ार यहाँ स्फुछ नहीं। यहाँ 'न' शब्द के द्वारा ('चेतोड- नुत्कण्ठित न' इत्यादि) कारए या कार्य का अभाव नही वतलाया गया, अपितु उनको अ्रर्थतः (आर्यी) प्रतीति हो रही है। इस प्रकार यहां विभावना और विरेयोकि अस्पुट हैं तथा उनके अस्फुट होने के कारण उनके आधार पर होने वाला सन्देह संकर भी अस्फुट है (मि० वाल०) । यहाँ अलङ्धारवादियों की ओर से यह शद्दा होती है कि विप्रलम्भ शृव्वार की प्रतीति होने से इस पद्य मे 'रसवत्' नामक अलद्वार तो स्पप्ट है ही फिर यह अलङ्वार-रहित कैसे है ? इसके उत्तर में मम्मट का यही कहना है कि जहां रस की प्रधानता होती है वहाँ रसवत् अलङकार नहीं होता और यहां विप्रलम्भ शृद्गार रस की प्रधानता है अतः रसवत् अद्वार नहीं हो सकता। यहा उनके मत के अनुसार हो पाडा तथा समाधान किया गया है। आचार्य मम्मट ने तो 'रसवत्' अलद्ार की अलद्वारों मे गखना ही नहीं की। इस प्रकार वव्य का लक्षमा है-काव्यत्व विधातक दोपों से रहित, गुरों के प्रभिव्यन्जक, स्फुट या अस्फुट असद्वारों से गुक शटार्थयुगल कतव्य हैं। इसका सक्ष्य चार प्रकार का काव्य होगा-१.सग्स स्फुदालद्वार सहित; २. रार्स अस्फुट मलद्गार सहित; ३ नीरस स्पुनटालद्वार सहित; ४. नीरस अस्पुट प्रसद्वार राहित। यहां शब्दार्थयुगल की पदोपता, गुणाभिव्यञ्जकता तथा अलक्लारयुरता सीनों ही काव्यत्व के लिये अनिवार्य है। टिप्पशी-आचार्य मम्मट के काव्य-स्वरूप-विचार पर अनेक मानायों ने भाशेप किसे हैं। इग आचार्यों में साहित्यदर्पगाकार विश्वनाय कविराज विनेष उत्सेसनीय है। उन्होने दस सक्षम के सभी परशी पर भाकेष किये हैं। उनका कहना है कि यदि सवंथा दोप रहित को बाव्य कहा जाय तो "म्सनरो एममेय" इस्वादि ; ध्यन काव्य में 'विषेयाविमर्म' दोष है अतः यह भी काव्य के ेत े निकस जायेगा; किन्तु ध्वनिनतत्व के पोपक आनन्दवर्वंनाचार्य ने इमे ध्वनि के सुन्दर उदाहरण के ;रूप में प्रस्तुत किया है। यदि 'मदोपों' का सरघ है-'ईपद्दोयो' सर्वा मलदोपगुक्त शन्दावंयुगन' वम सो पहने की आवस्वकता ही नही, मर्गोक कोटेोुविवरतयन
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प्रंथम उल्लासः
: तद्भेदान क्रमेणाह- (२) इदमुत्तममतिशयिनि व्यङ ग्ये वाच्याद् ध्वनिवुध: कथितः:।४।। रसादियुक्त काव्य श्रुतिकटता आदि दोप होने पर भी कार्व्य ही है। दर्प एवर के इन आद्ेपो का टीकाकारों ने विस्तार से उत्तर दिया है। संक्षेप, मे उनके अनुसार 'अदोषों' का अभिप्राय है कि काव्नत्व के विधातक दोपों से रहित शब्दार्थयुगल काव्य है. किन्तु विधेयाविमर्स दोप उक्त पद्म में काव्यत्व का विघातक नहीं है। ,और, 'अदोषों का 'ईपद्दोपौ' अर्थ मम्मट को अभिप्रेत ही नहीं है अत; दर्पशाकार का प्रक्षेप निरयक है। सौहित्यदर्पसकार "सगुशो" पर आक्षेप करते हुए कहते हैं कि गुए तो रस के धर्म हैं फिर इन्हें शब्दार्थ के घर्म कहना उचित नही और यदि "संमुखो" का अर्थ "गुणाभिव्यञ्जकौ" भी माना जाये तो भी यह विशेषणा असंगत है; क्योंकि गुएभिव्यञ्जक शब्द और भर्थ काव्य में उत्कर्पाधायक है, उसके स्वरूपाधायक नही। दर्पकार के इस आक्षेप का उत्तर यही दिया गया है कि काव्य का स्वरूंप भी गुराभिव्यञ्जक शब्द और अ्र्थ की अपेक्षा करता है। "अनलडकृती पुनः क्यापि" पर आक्षप करते हुए दर्पसाकार ने कहा है"कि अलड्कृत शब्दार्थ काव्य में उत्कर्ष उत्पन्न करते हैं, वे उसके स्वरूप के श्रद्त नही हैं। वस्तुतः काव्य का सार है'चमत्कार, अलद्गार भी चमत्कार के हेतु हैं अतएव 'काव्य स्वरूप के अद्ध हैं, ही। फिर भी इस पद से मम्मट ने अलद्दारो की गौएता की ओ्ोर अवश्य सक्केत किया है। इस प्रकार इस विशेपणा से मम्मट के काव्य-लक्षण में काव्य= कला तथा काव्यू-रस के महत्त्व का समन्वय भी हो जाता है तथा अलद्गार शास्त की काव्य-सम्बन्धी विशेपताओं का संग्रह हो जाता है। संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि मम्मट का काव्य-लक्षण सामाजिक तथा कवि दोनों की दृष्टि से पूर्णं है, कृति और अनुभूति दोनों से सम्बन्ध रखने वाला है। इसमे प्राचीन मतों का समन्वित रूप है। अलङ्गारवादी, रोतिवादी 'वक्रोकिकार 'ध्वनिवादी सभी सम्प्रदायों के काव्यलक्षणा इसमें आर्र' मिलते हैं। सरस्वतीकण्ठाभरण के "निर्दोपं गुएवत्" आदि काव्य-स्वरूप के साथ इसका अ्त्यधिक 'साम्यहै। दर्पएकार या पण्डिराज जगनाथ ने इसकी कटु आलोचना अवश्य की है, किन्तु वे इसरे अधिक व्यापक और सर्वग्राह्य काव्य-ल्स न दे सके । वृस्तुतः तो काव्य' का स्वस्न अलौकिक है, काव्य तो लोकोत्तर-पर्णाना-निपुए कधि-कर्म है। उसे 'लक्षण-या परिभाषा के पिजरे में कसे बांघा जा सकता है। अरपरनुवाद्-उस (काव्य) के भेदों को क्रमशः कहते हैं :- [वाच्याद् व्यङ्ये प्र्रतिशयिनि इदं, (काव्यं) उत्तरमं (तदेव) युधः ध्वनिः - + फथित: -पह अन्वय है।] यह (फाव्य) वाच्चार्थ (मुखमार्थ) की झपेक्षा व्यड्ग्यार्य (प्रतीयमान अर्थ) फे बढ़ जाने पर अर्थात् अधिक चमत्कार-जनक होने पर उत्तम (काव्य) होता है। उसे ही पण्डितों (कांव्प-मर्मज्ञों) ने 'ध्यनि' कहा है। (२)
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3x .: 1. कांव्पप्रकाश:
इदमिति काव्यं वुघवैयाकरणैः प्रधानभूतसफोटरूपव्यङ्गपव्यख्ञकस्य शब्दुरय ध्वनिरिति व्यवदार: कृतः ततस्तन्मतानुसारिभिरन्यरपि न्यग्भा- वितवाच्यव्यङ्गयव्यज्जनक्षमश्य शब्दाथयुगलस्य। - टिप्पसी :- काव्य के भेद प्रभेदों पर प्राचीनकाल से ही विचार किया जाता रहा है गामहाचार्य ने काव्य के दो भेद किये थे-गद्य काव्य और पद्य। काव्य। उन्होंने वृत्तबन्ध और श्रवृत्तवन्व दो प्रकार की रचना की दृष्टि से ये भेद किये थे। रीतिवादी आचार्य वामन ने भी काव्य के इन दो प्रकारों का निरुपए करके (काव्यं गद्यं पद्र्, काव्यालद्धारसूत्र १३.२१) गद्य और पद्य के भी रचना के अनुसार प्रमेक प्रभेद किये। उन्होंने प्राचीन आचार्यों की "गद्य कवीनो निफषं यदन्ति" पहु उक्ति देकर गद्य को प्राथमिकता दी तथा गद्य-पद्य रूप काव्य के दो भेद किये प्रबन्ध तथा मुक्तक-तदनिवद निवद्धञ्च (१.३.२७) । उन्होंने प्रबन्ध काव्यों में दस प्रकार के रूपक नाटवादि को श्रंष्ठ बतलाते हुए कहा-सन्दर्भेंधु दशरूपफ'थरेयः (१.३'३०) । आचार्य दण्डी ने 'गद्य'और 'पद्य' नामक दो काव्य-भेदों में 'मिश्र' आमक तीसरा भेद और जोड़ दिया। दण्डी ने गद्यगद्य-मिश्रित नाटकों का काव्य में प्रन्तर्भाव करने के लिये 'मिश्र' नामक काव्य-भेद की उदभावना की, यद्यपि प्राचीन रास में ही भरत मुनि नाटक वने 'काव्य' बतला चुके थे। भामह औौर दण्डी ने भापा के आघार पर भी काव्य के तीन भेद किये- १. संस्कृत काव्य, २. प्राकृत काव्य, ३. अपभ्रदा काव्य, 1 सु्द्रट ने इनमें ३ प्रकार नौर जोड़ दिये-४. मागघ काव्य, ५. पैशाच काव्य औौर ६, दोरसेन फाव्य 1 इसी नकार अलद्कार और रीति सम्प्रदाय के आचार्यों ने काव्य के अ्रन्य भी भेद प्रभेद पिये, जनमें महाकाव्य, कथा, आस्यायिका, चम्पु तथा नाटक, प्ररुरस आदि विविध रूपकों का उल्लेस किया था। ध्वनिवादी आाचायों ने काव्य के इस भेद प्रभेद की ओर अधिक ध्यान नही देया सथापि आचार्य आनन्दवर्वन ने प्राचीन आचायों के अभिमत अनेक काव्य- भेदों का उल्लेस किया है। "यतः काव्यस्य प्रभेदा मुक्तके संस्कृतप्रासत्तापभ्रम्षनिवद्ध, सन्दानितय- विरोपक फलानक कुलवानि, पर्यापबन्ध:, परिकया, राण्डकयासमसकये, सगसन्यः, नभिनेयार्थम् मास्यायिकाकये हत्येवमादयः ।" (३७) इसके पतिरित्त मानन्दवर्यंनाचार्य ने काव्य के दो भेद तथा उनसे भिन्न को गाष्याभाम कहते हुए तीन भेद किये हैं-१. ध्वनि २. गुणीभूतष्यङ्वग्य सथा ३ै. न-गुएाप्रधानार्म्या व्यन्तमस्ययं व्यवस्यिते काव्ये उभे ततोज्यव्त् तच्विमममिधीयते ध्वन्यालोक ३.४२)। उनका अनुसरण करके सम्मट ने भी उपयुक्त तीन भेद करसे ए उनका उत्तम, मध्यम तथा पवर काव्य के रूप में निर्दश किया है। मम्मद ने पञमना के माधार पर ही काव्य के उत्तमा्दि भेद किये हैं. जैगा कि भागे स्पष्ट
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प्रंथम उल्लास: 44
अनुवाद-(फारिका में) 'इदम' शब्द का अभिप्राय 'फाव्य' है। "बुधें.' (=विद्वानों ने) का अभिप्राय यह है कि वैयाकरणों ने प्रधानभूत (भुख्य) स्फोट रूप जो व्यङ्ग्य (प्रकाश्य) उसके व्यञ्जफ (प्रकट करने वाले 'घट' आदि) शब्द के लिए 'ध्वनि' इस शब्द का व्यवहार (प्रयोग) किया है। इसलिए (ततः=तस्मात्) उन (पंयाकरणों) फे मत का अ्नुसरण करने वाले अन्यों (ध्वनिवादियों) ने भी वाच्य (मुस्य).अर्थं. को दवा देने (न्यग्भावित) वाले व्यङ्ा्प्र अर्थ फो व्यञ्जना में समर्थ शब्दार्थयुगल के लिये 'ध्वनि' शब्द का व्यवहार किया। प्रभा-साहित्य जगत् में ध्वनिवादियो ने 'ध्वनि' शब्द का व्यवहार r वैयाकरणों का अनुसरस करके किया है। बात यह कि जिन ध्+अ्+ट्+अ (घट) भादि वरणों का मुख से उच्चारण किया जाता है और श्रोत द्वारा श्रवण किया जाता है ये नाद या ध्वनि कहलाते है। ये ध्वनियां आशुतर विनाशी हैं इस लिये त्रनेक वशों के समुदाय रूप पद औौर पदो के समुदाय रूप वाक्य का निर्मार नही हो सकता। फिर अर्थ-बोच होना असम्भव है। इस लिये वैयाकरणों ने घ्+श +द्+अ आदि वर्णों के अतिरिक्त बुद्धि मे स्थित एक स्फोट नाम का नित्य शब्द माना है। ये ध्वनियाँ उस स्फोट को व्यक्त करती है (ध्वनति स्फोट व्यनोक्ति इति ध्वुनिः) और स्फोट रूप शब्दात्मा (शब्दव्रहा) अर्थ को प्रकट करता है (स्फुटति भर्थ: यस्मात् सः स्फोट: ) । मम्मट के अनुसार काव्यशात्र में ध्वनि शब्द का अर्थ है-व्यजुथ-प्रधान शब्दार्थयुगल रूप काव्य। फ) जिस प्रकार वैयाक रस प्रधानभूत स्फोट की प्र्भिव्यक्ति करने वाले (बणों) को ध्वनि कहते हैं इसी प्रकार साहित्य-मर्मक्ञ अपने साक्षात् अपर्थ (वाच्य) की अपेक्षा प्रधानभूत किसी व्यङ्गयार्थ की व्यञ्जना करने वाले शब्दार्थयुगल रूप काव्य को ध्वनि कहते हैं। (ध्वनति इति ध्वनि.) । अथवा (२) जिस काव्य में'वाच्यार्थ की प्रधानता होती है वहाँ श्द और अर्थ अपने मुख्य स्वरूप को प्रकट करते हैं किन्तु जिस काव्य में व्यन्धधार्थ की प्रधानता होती है वहां व्यङ्गचार्य मुख्य (वाच्य) अर्थ को दवा देता है और अधिक चमत्कारकारी होता है ऐसे काव्य को 'ध्वनि' कहते हैं, (ध्वन्यते व्यज्यतेऽस्मिप्निति ध्वनिः)। वैयाकरणों का अ्नुसरण करके साहित्य के विवेचकों (ध्वनिवादियों) ने व्यञ्जेना-प्रवान काव्य के लिये ध्वनि शब्द का प्रयोग किया था। इसी से आचार्य मम्मट ने व्यङ्गयप्रधान उत्तम काव्य को ध्वनि कहा है। व्यञ्जना-प्रधान होने के कारण ही मम्मट ने इसे उत्तम काव्य कहा है। टिप्पणो :- (१) आचार्य मम्मट का काव्य-भेद निरूपए ध्वनिवादी आचोर्य मानन्दवर्घन का अनुसरसा करता है। यहाँ ध्वन्यालोक अन्य के आधार पर ही का स्वरूप दिखलाया गया है। ध्वनिकार का कथन है-
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२६ 1 कार्व्पप्रकाश: +444+4
यथा- निश्शेपच्युत चन्दनं स्तनतंर्ट निर्मृ प्टरागोडघरो नेत्रे दूरमनब्जने पुलकिता तन्वी तचेयं तनुः। यधार्थ: शब्दों या तमर्यमुपसजंनीकृतस्वारथो। धय एक्तः काव्य विशेष: स ध्वनिरिति सुरिभि: फवितः ॥ (ध्वन्यालोक १.१३) अर्थात् जहां अरय स्वयं को तथा शब्द अपने (वाच्य) अर्थं को गोए करके (न्यग्भावित) उस (व्यङग्य रूप) विशेष अर्थ को व्यक्त करते हैं उस काव्यविशेप को विद्वानों ने ध्वनि कहा है। ध्वनिकार के भाय को मम्मट ने विशेष रूप से स्पष्ट कर -+ दिया है। (२) व्यन्जनाप्रधान काव्य के लिये ध्वनि शब्द का व्यवहार बैमाकरणों का अनुसरस करके किया गया है, यह बात भी पहले आनन्दवर्षन ने उपयुक्कत कारिका में 'सूरिभि:' की व्याल्पा करते हुए कही थी-"प्रंथमे हि विद्वासो यंपाफरणा, व्याकरणमूलत्वात् सर्वविद्यानाम। ते घ भ्रयमासपु यहॉतु ध्वनिरिति व्ययहरन्ति। तर्थयार्न्यस् तन्मतानुसारिभि: सरभि: काव्यतत्वार्थदशिभिरवात्यवाचक संमिध: शब्दात्मा काव्यमिति व्यपदेश्यो व्यञ्जवत्वसाम्याद् ध्वनिरित्युक्त ।" (्वन्यालोक १'१३) इससे स्पष्ट है कि काव्य के क्षेत्र में 'ध्वनि' शब्द का प्रयोग आनन्दवर्घन के पूर्वकाल से ही नसा था रहा था। आनन्दववंन ने सो ध्वनि-विषवक सुव्यवस्थित ग्रन्थ का निर्मा किया था; अतः काव्यप्रकान वृत्ति में स्थित "धन्यः" पद का अभिप्राय वही है जो मानन्दवयंन के 'गूरिभि:' पद का है। इस लिये टोकाकारों ने जो "अन्य :- प्रानन्दवर्धनाचार्मप्रभृतिभिः" यह अर्थ किया है, यह सद्भत नहीं। इसी प्रकार कारिका का 'वुर्धः' शब्द भी आनन्दवधंन के 'ूरिभि:' पद से मर्य में ही है। इसका अ्रन्वय वृति में 'अन्यः' शब्द मे साथ करना ही उचित है। 'बुथः' म अभे 'बंपाकरणं:' नही। (३) ध्यन्यालोक के उपास्याकार अभिनवगुप्त ने ध्यनि शब्द के पाच सभिप्राय ग्रहण किये है-१. वाच्ण(घ्वनति प्ति ध्वनिः) २. घाचक (ध्यनति द्ति स्वनिः) ३. व्यङ्ग्यार्थ (ध्वन्पते दति ध्वतिः); ४ रयन्जना व्यापार (ध्यननं ध्वनिः) ५. ध्वनि काव्य (घ्यन्यतेस्मिमिति ध्वनिः)। यानावं मम्मट ने तो स्वन्चालोक के ध्यनि-ाव्य-मक्षसा का सारांस मात्र हो यहाँ पस्तुत किया है। अनुवाद-(उत्तम फाघ का उदाहरस है) जैसे-हे भूठ योनने थाली (मुभ जसे) शियजन को पोड़ा को न समभने माती दवती, तू तो यहाँ से बापड़ी पर स्नान करने गई थो, न कि उस अघम (नायक) के पास, वर्शोकि तेरे स्तनों के फोर का चन्दन पूरातमा डूट गया, तेरे प्धर को सालिमा साफ हो गई: निमृस्ट:
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प्रैंयम उल्लास: २७
मिध्यावादिनि दूति बान्घवजनस्याज्ञातपीडागमे, वापीं स्नातुमितो गताऽसि न पुनस्तस्थाधमस्यान्तिकम् ॥२। पपव् तदन्तिकमेव रन्तु गताऽसीति प्राधान्येनाऽघमपदेन व्यज्यते। रागः मस्य), तेरे नयनों के कोने काजलशून्य हो गये और यह पतली, फाया अथवा फृश शरीर (तन्वी तनुः) पुलकित हो गया है। यहाँ पर "उस (नायक) के पास हो सू रमर करने के लिए गई थी" यह मुख्य तमा भधम शब्द से व्यड्ग्य अर्थ निकलता है (व्यज्यते)। प्रभा-'निःशेषच्युतचन्दनम्'-इत्यादि पद्य को आचार्य मम्मट ने ध्वनिकाव्य के उदाहरए रूप में उद्धृत किया है। प्रस्तुत पद्य में कोई विदग्धा नायिका अपनी दूती के अनुचित व्यवहार पर उसे ताट़ना दे रही है कि तू बाबड़ी पर स्नान करने गई थी, उस अ्धम के रामीप नही गई। यह (नियेधरुप) इसका वाच्यार्थ है। स्नान की दशा का ही शब्दों द्वारा वर्णन किया गया है; किन्तु वक्ता, बोद्धा तथा अवसर-विशेष के अनुसार इस काव्य का यह अर्य निकलता है-"वापी पर स्नान करने का तो बहाना है तू तो उस अ्रधम के साथ रमण करने गई थी।" यही (विघिरूप) इसका व्यङ्चथ अर्थ है। यह अथं वाच्यार्थ की अपेक्षा विशेष चमत्कारी है। अतःयंह ध्वनिकाव्य है। ध्वनि-काव्य की मुख्य विशेपता ही यह है कि उसमें वाच्यार्थ की अपेक्षा व्यङ्गघार्थ अधिक चमत्कारक होता है। अरधम पद का वाच्यार्थ है-दु.खदायक व्म करने वाला (दुःसप्रयोजककर्मशील) किन्तु यहाँ विशेष बक्ता औौर बोद्धा के होने से प्रधम शब्द का व्यङ्यार्य 'अन्य नायिको-सम्भोग द्वारा वेदना उत्पन्न करने वाला' हो जाता है अतः प्रघानरूप से 'अघम' शब्द ही व्यज्जक है। उसके साथ मिलकर 'चन्दन- च्यवन' आदि पद भी रमण दशा के घोतक होते है। हिप्पी-(१) साहित्यदर्पसकार के अनुसार 'यहाँ विपरीतलक्षणा द्वारा प्रभीष्ट अर्थ की व्यञ्जना होती है। अतः अर्थकम यह है-(i) वाच्यार्थ है-वापी- गमनं तदन्तिके न गमनं च, (ii) लक्ष्यार्थ है-वाप्या न गमनं तदन्तिके च गमनम् और (iii) व्यङ्गथायं है-तद्रमणम्। किन्तु मम्मट के अनुसार यहाँ विपरीतलक्षणा नहीं (प्रदीप) । तदगुगोर यहाँ दो ही भर्थ हैं। वाच्यार्थ है-(i) वापीगमनं तदन्तिके च न गमनम् भौर (ii) व्यङ्गपार्य है-तदस्तिकमेव रन्तु गमनम्। 7 (२) प्राधान्पेन प्रधमपदेन व्यज्यते-यहाँ 'प्राधान्येन' (मुख्य रूप से) इस शब्द का 'अ्रघमपदेन' के साथ अन्वय है। भाव यह है कि 'रमण के लिये गई'- यह अर्थ मुस्यरूप से अधम शब्द के द्वारा व्यक्त 'होता है। चन्दन-च्यवग आादि'तो जिस प्रकार रमसा के द्वारा हो सकते हैं, उसी प्रकार स्नान के द्वारा भी। अतः वे अघमपद के बिना स्वतन्त्र, रूप से 'रमस' के व्यञ्जक नहीं; किन्नु 'सधमे' शब्द स्वतन्द्र रूप से इस अर्थ का व्यञ्जक है,। यही इसकी प्रयानता हे। .:
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२८:1 कवगप्रकाश:
(३) अतादशि गुणीभूतव्यङ्क ग्य.तु.मध्यमम्। अतादशि वाच्यादनतिशायिनि। यथा- ग्रामतरुसं तरुया नववञ्जुलमब्जरीसनाथकरम्। 1. पश्यन्त्या भवति मुहुर्नितरां मलिना मुखच्छाया ॥३॥ TY
अत्र वब्जुलतागृह्दे दत्तसक्कता नागतेति व्यङ्गथ' गुणीभूत तद्पेक्षया वाच्यस्यैव चमत्कारिख्वात्॥ अनुवाद-व्यडम्प अ्र्य के (व्यड्ग्ये) ंसा अर्या् यांच्यार्थ की अपेक्षा 'विशेष चमत्कारक न होने पर (अतादृशि) 'तो मध्यम काव्य होता है। इसे हो (फाव्यतत्वज्ञों ने) गुसीभूतव्यक्ग्य वाहा है। (३) 1
(फारिका में) अतादृदि (यंसा न होने पर) का अभिप्राय है-याच्यार्य से बढ़कर न होने पर। जंसे-(मध्यम काव्य फा उदाहरस) 1
"नवीन अशोक प्रथवा वेतस (वञ्जुस) को मञ्जरी से सुशोभित (सनाप) हाथ वाले, ग्राम के उस युवक को बार-वार देलती हुई युवती के मुरा की कान्ति (छाया) प्रत्यन्त मलिन हो रही थी।" यहां पर "वञ्जुल लतागृह में (मित्तन का) जिसने संकेत दिया था वह सुम नहीं आई"" यह व्ङ्तरमार्यं गौए हो (दब) गया है, ययोंकि इसकी स्रपेक्षा याच्यार्थ (मुस की कान्ति का मलिन हो जाना) हो अधिक चमत्कारक है। प्रभा-आचार्य मम्मट ने ऐसे काव्य को मध्यम काव्य कहा है, जिसमें व्यज्गपायं होता तो है किन्तु यह वाच्यार्थ से बढकर नही होता। वाच्यार्थ से दवा रहता है, गोए होता है। वाच्यार्यं ही उसकी अपेक्षा सहदयों को अधिक मानन्द प्रदान करता है। व्यज्नयार्यं के जोस हो जाने के कारग यह काव्य व्यङ्थप्रधान ध्यनि काव्य से निम्न कोटि का माना गया है; चयोंकि ध्वनिवादियों ने व्यञ्जना को ही काव्य की उत्तमता का प्रयोजक माना है। मानन्दवरद नाचाय ने इम काव्य को 'गुणीभूतव्यङ्गय' नाम से ही पुकारा था । मम्मट ने इसको संज्ञा 'मध्यम फाव्य' कर दी। इस प्रकार उत्तम अर्थात् ध्वनि काव्य में व्यनपार्य की प्रधानता है, मध्यम मर्थात् गुसीभूतव्यद्भय काव्य में व्यज्तयार्ष गौस हो जाता है और वाच्याम भधिक मत्फारक होता है। 'ग्रामतयसम् मादि' उदाहरय को आचार्य सद्रट ने भावासद्व्वार के उदाहरस के रूप में भपने "काव्यालद्वार" ग्रन्थ में प्रस्तुत किया है। दम पघ का व्यमपार्य सहदयों के हदय को इतना भाहादित नहीं करता जितना कि 'मुसव्छायामासिन्यरुप' वाच्यापं। भाव यह है कि यहां विप्रलम्भाभास (ऋृद्ार) भास्वादनीय है समा 'सद्सनम जो व्यद्नुपारयं है वह मुगमातिन्यरूप वाध्यापं (पनुभाव) के दाऱा ही विप्रसम्भाभास
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प्रथम उल्लास: २६
का पोपक है, स्वतन्त्र रूप से नहीं। श्रतः व्यङ्त य-पर्थ वाच्यार्थ की पपेक्षा गौए हो गया है,. इसी से गुणीभूतव्पन्गम का उदाहृग्ग है। टिप्पंी-(i) शचार्य मम्मट ने 'मुखोभूतय्यङ्गय' यह नामे तथा इसका स्वरप ध्वन्यालोक के आधार पर हो दिमाया है। आनन्दवद नांचार्य के अनुसार 'गुगी भूतव्यङ्गय' का स्वमप है- ग प्रकारोज्यो गृणीभूतव्यङ्गघः काव्यरय दृश्यते।' यत्र व्यज्जघान्वये वाच्पचारत्वं स्यात् प्रकषयत् ॥ (ध्वन्यालोक'३३५) । ध्वन्यालोककार, की दृष्टि में भी ध्वनि और गृणीभूतव्यङ्गय काव्य में. व्यङ्गघार्ष की प्रधानता और अप्रधानता का ही भ्रन्तर है जैसा कि कहा भी है- ढयङ्भपोर्डयो ललनालावण्यप्रस्मो यः प्रतिपादितस्तस्य प्राधान्ये ध्वनिरित्युक्तम्। तस्य तु.गुएभावेन वाच्यचारुत्वप्रकष गृशीभूतव्यङ्गघो नाम फाव्य-प्रभेदः प्रकल्प्यते।" (ध्वन्यालोक ३.३५ वृति) तथा दूसरे स्थल पर भी यही भाव संक्षेपतः प्रकट किया हैं -- व्यङ्तयार्यस्य प्राधान्ये ध्वंनिसशितः काव्यप्रकार:, गुएभावे तुगुसीभूतध्यङ्गभ्नता।" (ध्वंन्यालोक ३.४२ वृति)
'(ii) नि को उत्तम काव्य और गुणीभूतव्यङ्गयं को मध्यमकाव्य कहना आंचार्य मम्मट की निजी उद्भावना है । ध्वनिकार ने ध्वनि तथा गुसीभूतव्यङ्गच को 'काव्य का पृथक् २ प्रकार माना है, वे प्रतीयमान अर्थ को ही 'सहृदयों के हृदय का'शह्लादकारी बतलाते हैं। साथ ही गुणीभूतव्यङ्मय को उन्होंने "ध्वनिनिष्यन्द' रूप" अर्थात् ध्वनि का ही एक प्रवाह-"घयनेः निष्यन्दः ध्वनिनिष्यन्दः से एव रूपं" यस्य तादृशः" (अर्थात् ध्वनि के एक प्रवाह के, समान) वतलाया है- "तदयं ध्वनिनिप्यन्दरूप द्वितीयोऽपि महाकविविषयोतिरमसीयो लक्षीयः, सहृदमः सर्वया नास्त्येव सहृदयहुदयहारिए:, काव्यस्य स प्रकारो यत्र न प्रतीयमानार्यसंस्पर्शन सौभाग्यम्। तदिदं काव्यरहस्यं परमिति सूरिभिर्विभावनीयम्।" (ध्वन्यालोक ३े३७) इसका, अभिप्राय यही है कि ध्वनि का स्थान प्रथम है, गुणीभूतव्यङ्गय का द्वितीय। ध्वनि को काव्य की आत्मा बतलाना-"काव्यास्यात्मा ध्वनिः" ,और. गुशीभूतव्यद्य को काव्य का एक, अन्य दिसाई देने वाला प्रकार-प्रकारोऽ्यो। गुसीभूतव्यङ्ग्य: काध्यस्य दृश्यते" कहना भी इर बात की पु्टि करता है कि गुणीभूतव्यङ्गथ, ध्वनि की अपेक्षा निम्म कोटि का काव्य है। ध्वन्यालोक की पूंर्वापर संभ्गति से भी यही विदित होता है, अत: मम्मट की उत्तम, 'मध्यम आदि कल्पना का बीज ध्वन्यालोक में ही उपलब्ध है, किन्तु इससे गुसीभूतव्यङ्गय की रमणीयंता में सन्देह नहीं हो सकता।
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३२ कोव्यप्रकाण:
विनिर्गतं मानदमात्ममन्दिराङ्गवत्युपश्नव्य यदच्छ्याऽपि यम्।
इति काव्यप्रकाशे काव्यस्य प्रयोजनकारणरवरूप- विशेषनिर्यायो नाम प्रथम उल्लास: ॥
अन्य तीथों से विशेपता दिखाने के कारग व्यतिरेक असद्वार भी व्यङ्नप हो सकता है तयापि यह व्यङ्गय अ्स्फुटतर है तथा उसमें कवि का तात्पय नहीं प्रतीत होता। कवि का तात्पर्य तो अनुप्रास का चमरकार दिखलाने में है। यहाँ शब्द की भंकार एवं अ्रनुप्रास-प्रचुरता तथा दीघ समासादि शब्द-चमर्कार में व्यङ्गय अर्थ तिरोहित हो जाता है। कवि ने 'छ' वर्ए के प्रचुर प्रयोग से उदलते हुये जल का शब्द-चिन्न प्रस्तुत किया है तथा महपिहरप, शराहिफाह्वाय दार, दरी और मन्द-मन्द भादि में अनुप्रास का चमत्कार दिसाने के लिये ही कवि प्रयास करता दिसलाई देता है। अनुवाद-(रायुषों के) मान-मदन करने वाले जिस (वंत्यराज हुयप्रीय) को अपने राजप्रासाद (मन्दिर) से बिना किसी उद्देव्य के (यों ही, इच्छानुसार) ही निकला हुम सुनकर घवराहट के साथ इन्द्र ने जिसकी भगंसा गिरावी है ऐसी अरमरावती (मानों) भम के फारस सांसे बन्द की हुई सो प्रतीत होती है। प्रभा :- 'विनिगतम्" इत्यादि अर्थचित का उदाहरण है। यह काशमीरिक मेण्ठकवि प्रगोत 'हयग्रीववध नाटक' से उद्घृत किया गया है। यद्यषि यह कहा जा सकता है कि यहाँ हयग्रीय का बौर रस व्यङ्गथ है, उसी के विभादादि की इम काव्य में योजना की गई है तथापि कषि का तात्पर्य विशेपरूप से उस्पेक्षा अलद्वार में ही है। यह द्वार बन्द की हुई अमरावती में भय से निमीित नेवों वाली नापिका की संभा- बना करता है और यही उत्पेक्षा विशेष चगतारक है। व्यास्याकार नरसिंह् टस्कर विचार है कि हयग्रीय इग नाटक का प्रंतिनायक है परतः उसको चौर रस यहा व्यङ्गय नहीं हो सकता। गहा काव्य का समत्कार सतपेक्षा नामक थर्वलिद्वार के ही आशित है औोर कोई भी रफुटतया प्रतीयमान व्यज्गपार्य यहाँ नहीं सतएद यह र्ष- चिंन या वाच्यचित्र ही कहा गया है। 'इस प्रकार काव्यप्रकाश के इस प्रथम उल्लाम मे वाय्य का प्रयोजन, फास्प का कारंस तथा काव्य का स्वरप दिसलाया गया है। पति प्रथम उल्नास:
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4+4+4
1 अथ द्वितीय उल्लास: a 1a
~ क्रमेण शब्दार्थयो: स्वरूपमाह- (५) स्याद्वाचको लाक्षणिक: शब्दोऽत्र व्यञ्जकस्त्रिधा। अत्रति काव्ये। एपां स्वरूपं वद्तयते। (६) वाच्यादयस्तदर्था: स्यु :-
आाचार्य मम्मट ने ऐसे शब्दार्थयुगल को काव्य कहा है जो दोपरहित गुससहित तथा प्रायः अलड्कृत भी होते हैं (तददोपो शनदाथी सगुसावनलङकृती पुनः षजाषि)। इस लक्षणा में शब्द तथा अर्थ विशेप्य हैं, अन्य पद इनके विशेषण-हैं। अ्तः यहाँ कमशः पहले शब्द का और फिर अर्थ का स्वरप बतलाया जा रहा है। प्रसिद्ध होने के कारए यहाँ शब्द का लक्षण नही दिया गया, अपितु सब्दों के प्रकार य ही कथन किया गया है। अनुवाद-(अव ग्रन्यफार) क्रमशः शब्द तथा शर्थ के स्वरूप की बतलाते
यर्हा (काव्य में)- १. वाचक, २. लाक्षसिक और ३. व्यज्जक (यह). तीन प्रकार का शब्द होता है। (फारिका में) 'अन्न' (यहौ) का अभिप्राय हैकाव्य में। इन (धाचक, 'लाक्षसिक और ध्यञ्जक शब्दों) का स्वरूप (झगे) कंहां जायेगा। (५), 1 - वाच्य आदि उन (वाचक आदि शब्दों) फे (तदर्था :- तेषां शब्दानाम् अर्थोः) अर्थ होते हैं (कारिका में वाच्यादि का अभिप्राय है)-वाच्यार्थ, लक्ष्यारथचोर व्पङ्गघार्थ। (६) i। '' प्रभा-काव्य भूमि में तीन प्रकार के शब्द होते हैं :- वाचक (Expressive) "लक्षक (लाक्षणिक Indicative) तथा व्यज्जक (Suggestive) 1 उनके सथ होते है-वाच्य, लक्ष्य तथा व्यङ्गम। यह कहा जा सकता है कि किसी शब्द का एक (१) मुख्य भर्थं होता है -जसे 'गौ' शब्द का अर्थ है एक सास्ना (=गल कम्बल) आदि वाला पयुविशेष। गौ शब्द से इसी अर्थ (वस्तु) को सामान्यतः प्रतीति होती है।इस मुख्य मर्य (वाच्यार्थ expessed) को प्रकट करने वाला 'गो' आदि शब्द वाचक कहलाता है। -: इस मुख्य भर्यं के अतिरिक्त शब्द से अ्रन्य अर्थ भी प्रकट होते है; जैसे-(२) 'कुसी' :"का आदेश है (चेयर का आार्डंर है) यहां कुर्सी पदेश नही दे सकती भतः*फुरसी'
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३४ काव्यप्रकाश:
(७)-तात्वर्योडर्योऽपि केपुचित् ॥६।।
समन्वये तापर्यार्थो विशेषवपुरपदार्थोऽपि वाक्यार्थः समुल्लसतीत्यभिषि- पदार्थानां
तान्वयवादिनां मतम्। वाच्य एव वाक्यार्थ इत्यन्विताभिघानवादिनः।
शब्द अपने मुख्याथं को छोड़कर कुर्सी पर बैठे व्यक्ति के अर्थ में आया है। 'मुस्याषं से सम्बद्ध इस अ्थ को शब्द का राक्ष्यार्थ (Indicated) कहते हैं और जिस शब्द से यह प्रकट होता है उसे लाक्षसिक या लक्षक गब्द कहते हैं। (३) इसी प्रकार "सायंकाल हो गया" इस वाक्य से अनेक श्रोता अपनी अपनी परिस्थिति के अनुसार पतिरिक्त अर्थ भी ग्रहण करते हैं। कोई समझता है पूजा का समय हो गगा, फोई "कहता है-"भ्रमण का समय हो गया।" इस अतिरिक् (Additional) घर्थ को ही शब्दों का व्यङ्ग्य (Suggested) अर्थ कहते हैं और जिस सब से यह पर्य मभिव्यक्त होता है उसे व्यञ्जक शब्द कहते हैं। इन तीन प्रपगर मे अर्थो को प्ररुट :करने वासी शब्द की तीन वृततियां (शक्ति, व्यापार) मानी गई हैं-पर्भिषा, लक्षखा और व्यख्जना। टिप्परी-शब्द किस प्रकार अ्रय को प्रकट करता है इरा बात पर विचार फरके विद्वानों ने शब्द की वृत्तियों (व्यापार), वा विवेचनं किया है। व्याकरए, 5 मीमांसा और न्याय-वैशषिक तथा योग आंदि में सब्दनवुति पर पर्याप्त विचार किया गया है। उनकी मान्यताएँ पृथक् २ है। परायः अभिया, पृक्षसा नामक पुतियों को 'सभी ने स्वीकार किया है। भीमांसक तात्पय वृति को भी मानवे हैं। कुद वैयाक- रसों ने बडे विस्तार से व्यं्जना वृति का भी निरूपस किया है। साहित्य के केन में संदुभट, रुपट, राजसेसर तथा वामन आादि से पहले भी शण्द-वृचि पर मुद विचार किया था; किन्तु वे प्रायः सभिया और लकखा पर ही-विचार करते रहे। यागे घसकर ध्वनि के उद्भय के साथ व्य्जनायृति का विषेनन साहित्य घास्त्र में होने सगा। मानन्दवर्यन औोर अभिनवगुप्त ने इसका मिस्तृत विवेचन किया है। राभी मरतो का सार-संग्रह करते हुए मम्मट ने साहित्य के शेत में सब्द को तीन यूर्तिया स्वोनर मो है-' पभिघा, २. लक्षखा, ३. व्यञ्जना। दसी से तीन प्रार के स्षनतों तभा सीन प्रकार में अयों का भी विवेचन किया है। अनुवाद-किन्हीं (पर्यात् अमिहितान्ववयादियों) के मत में (नेपुषित्= केपाञ्चित्, चष्ठी के अर्भ में सप्तमो धथया केसुचित् मतेयु) 'सात्पर्पारय' (purport- . sense) भी एक मर्यं है। 1
प्रनिहितान्यमवादियों (कुमारिसनट्ट के मतानुवामी मोमोसकों) का मत है कि साकोकषा (पदों को पारस्परिक चपेक्षा), योग्यता (पनों.की पारापरिक चन्वप- योग्यता) औोर सनिधि (पदों को एफमुद्ायुवारढता) के फारस,जिनवा स्वरष
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द्वितीय उल्लास:
आगे ('जात्यादिर्जातिरेव वा' कारिफा ८ में) वतलाया जायेगा, उन पदोरथों! का ाग्रन्यय अर्थात् परस्पर सम्बन्ध होने पर एक तात्पर्य रूप अर्थ प्रफट होता है' (समुल्ल- सति); जो कि वाच्यार्थ आदि से विलक्षण आकार का है (बिशेषवपु :- विलक्षस शरोर वाला), वावय में आये हुए पदों का अर्य नहीं है (अपदार्थः) अपितु'(सतपर्य वृति से प्रकटित) वाकय फा शर्थ है। .।. अन्विताभिधानवादी (गुरु प्रभार भट्ट) का मत है (अन्विताभिधानवादिनः :मतम् इत्यनुपञ्जनीयम्) कि जो वाक्य प अर्थ है, वह वाच्य-अर्थ (अर्थात्, वांच्यायं के अन्तगत) हो है। (७) frr
7 .. प्रभा-जो गब्द पभिधा, लक्षणा अथवा व्यञ्जना वृत्ति से किसी धर्थ को प्रकट करता है, वही सार्थक पद है (शक्त पदम्) । शब्द का अ्ररथ जाति, गुए, करिया इत्यादि होता है, जिसका विवेचन ग्रन्थकार ने १० वे सूभ में किया है। सार्थक दब्दों के समूह को वाक्य कहते हैं; (पदसामूहो वाक्यम)। किन्तु केवल शब्दों का 1. समूहमान सम्यक अथंबोध में सगर्थ नही होता अपि तु आकांक्षा, योग्यता औोर सन्निधि होने पर ही बब्दों का परस्पर (उचित रूप से) अन्वय होता है और तभी राम्क अर्थ-बोध होता है। इन आकांक्षा आदि के स्वरूप का अनेक भांचायों ने प्रतिपादन किया है। व्यकिरण, न्याय तथा साहित्य शास्त्र आदि में इनका स्पष्ट .विवेचन किया गया है। i. प्रांक्षा-सम्यक अर्थ-बोध के लिए यह आवश्यक है कि पदों में पारस्परिक आकांक्षा हो। (पदस्य पदान्तरव्यतिरेकप्रयुक्तान्वयाननुभावकत्वमकांक्ष-तर्क स ग्र) "जव वक्ता किसी पद का उच्चारण करता है अथवा थोता उसका श्रवए करता है स्षो एक (गाम् आदि) के वाद दूसरे पद (आनय आदि) की विवक्षा या जिनासा ।होती है। यह अर्थवोधन या अर्थवोध सम्बन्धी आकांक्षा वास्तव में मानव-हृदय में होती है किन्तु 'एक शब्द का दूसरे के विना अन्वय-बोध कराने का प्सामर्थ्य' शब्दों की पारस्परिक आ्कांक्षा कही जाती है; जैसे -'जलेन सिनचंति' यहीँ 'जलैन' "शब्द के श्रवणानन्तर यह 'आ्राकांक्षा होती है-कि करोति ?" और केवल 'सिञ्नति' "पद श्रवणानन्तर आ्रकांक्षा होती है-'कः' ? अथवा 'केन ?' अतः यहाँ दोनों पद एक दूसरे की अपेक्षा रखते हैं ौर ये साकांक्ष हैं तथा इनसे सम्यक् अथंबोध होता है। श्राकंक्षा के बिना शब्द-समुदाय प्रामाणिक नहीं अर्थात उससे सम्यक् अर्थ बोध 'नहीं होता;'जैसे-गोः, अश्यः, पुरपः, हस्ती' इत्यादि पदसमूह से कोई निश्चयात्मक -- झञांन नहीं होता। योग्मता-सम्यक् अर्य बोध के लिए पदों मे एक दूसरे से अ्रन्वंय की योग्यता होनी चाहिए। योग्यता का अर्थ है-पदार्थों के पारस्परिक सम्बन्ध में किसी प्रकार की बाघा न होना' (अर्थावायो योग्यता); जैसे-'जलेन सिञ्चति' 1 इस वाकय में प्रयुक्त 'जस' पद के संर्थ में अर्थात् जलरूप वस्तु में सीचने नो योग्मता
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फाव्यप्रकाग:
है इसी हेतु इस वाक्य से सम्यक अर्थ-बोध होता है। "मोग्यता' के बिना फोई शाब्द- समुदाय अप्रामाशिक है, चहसम्यक पर्थ-वोध नहीं कराता; जैसे 'भग्निना : सि्वति' यह प्रमाण नहीं, कयोंकि भग्नि का कार्य जसाना, पकाना आदि है उसका (सींचना). से सम्बन्ध नहीं हो सकता, अतः मग्नि औौर सिञ्चन के पारसरिक सम्बन्ध में बाघा पड़ती है। : सत्निधि-'साकांक्ष पदों का एक बुद्धि का विषम होना' सन्रिधि या प्ासति : कही जाती है। साकंक पदों की सनिषि के लिए उनके बीच में अ्पवोप में वापा डालने वाले अन्य पदों का न होना तथा उन पदों का अवतिम्ब उप्चारस करना- : ये दो यातें आवश्यक है; जैसे-'जनेन सिञ्वति' मे दोनों पद पारत्परिक सामिष्य .होने पर ही सम्यक अथंबोष कराते हैं। 'सप्िधि' के बिना पदनसमुदाय मप्रामाखिक है, वह सम्यक अर्थवोध नहीं कराता; जैसे 'पयंतः सादति अग्तिमानु वेववत्तः' यह। पर्वतः-प्रग्निमान के वीच में अर्थवोध मे बाघा डालने याले पद 'सादति' का -प्रयोग है मतः सन्निपिरहित होने से यह शब्दनसमुदाय सम्यकु अथयोपक नहीं। इमी • प्रर यदि फोई 'गाम्' मन्हने के पष्टों या दिनी परचात् "'आनय' शब्द का उच्चारण : करे तो यह नव्द-समुदाय सननिधि रहित होने से ठीफ ध्यचोध न करा सकेगा।- "उपयुत्त विवेचना से स्पष्ट है कि सकांक्षा, योग्पता और सनिषि मुक्त चब्दों के समूह को वाकय कहते हैं उसी से पूरां भ्यं-वोध होता है। पय विचारणीय यद है कि यह वाक्य से प्रतीत होने वाला मर्थ (१) शब्दों के पृथर-पृपक भ्यो का ,समूहमान्र होता है भथवा (२) शब्दों के अर्थ से भिन्न कोट नवीन धर्य होता है? इस विपय में मीमांसक आचार्य कुमारित भट्ट का मत है कि शब्दों के अर्भ सो मिन्न एक नवीन भर्थ वाक्यार्थें के रूप मे प्रकट हमा करता है। इसका नम यह है फि पद मपनी अभिया. आदि वृत्ति से किन्ही सर्थों गने मनगनपरम प्रफट फर देते हैं। उसके वाद उन भर्षों का परापर सम्बन्ध हो जाता है भर्यात सब्दों द्वारा भभिहित (Expressed) भरथों का वाद में भन्वय (परस्पर सम्बत्प) होता है (पमिहिनानाम् पन्पमः)। इस विचार या वाद (तत्सम्बन्धी यादः ममिहितान्ययवादः) को भावन के कारस कुमारित भट्ट के अनुयामी 'मभिहितान्यययावी' कहे जाते है। इनके गय में पदार्थों का पारत्परिक सम्बन्य मयवा संचय या संसर्ग वाकष मा मर्थ है। वह पदार्पों से विशेष प्रकार का है, मतः पदों के द्वारा यह प्रफट नही हो सकता। उसे प्रकट करने के लिये. एक विनेय दाक्कि या वृत्ति को उर्भावना भरनी चाहिए। यही 'तालपर्य वृति' है, फमतः तालयंबुकि से वावार्ण या बोध होता है और मद यृति पभिधा, लक्षसा तथा व्यञ्जना नामक शन्द की सीन सूतियीं से भिन्न वृति है।- विनन्तु प्रमाकर (नोमासक) का मन है कि पदों से पररपर सम्यन्प न रपने बासे पृपकदृपका भर्य यी प्रतीति नहीं होनी भवि्ति परापर-गम्बद मर्पान् भन्यित
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द्वितीय उल्लासं:
अर्थ की ही। प्रतीति होती है इस प्रकार शब्दअन्वित अर्थ का ही कथन करते हैं (भन्वितानाम् अ्रभिघानम्) । इस वाद को मानने के कारय प्रभाकर अन्विताभिधान बादी कहे जाते हैं। इस मत के अनुसार वाक्य का भर्थ भी वाच्यार्य ही है, वह पदसमुदायरूप वाक्य का साक्षात् अर्थं है; तात्पर्यवृत्ति से प्रकट होने वाला कोई भ्रागन्तुक प्ररथ नहीं, जंसा कि कुमारिल ने कल्पित किया है। इसी से इनके मतानुसार तात्पयंवृत्ति मानने की आवश्यकता नहीं। टिप्परी-(i) अभिहितान्वयवादी-काव्यप्रदीप आदि के अनुसार न्याय-"' + वैशेषिक तथा कुमारिल भट्ट के अनुयायी भीमांसक अभिहितान्वयवादी हैं। वस्तुतः इस मत के समर्थकों में कुगारिल भट्ट के अनुयायी ही विशेष प्रसिद्ध हैं। उनका विचार है कि पदों में केवल पदार्थबोधन की ही शक्ति है। पदार्थों के अन्वय पर्थात्! पारस्प्रिक सम्बन्ध को प्रकट करने का सामर्थ्य शब्दों में नहीं होता । भन्वय या संसर्ग' रूप भ्रथ तो तात्पर्यारय-है, वह-वाच्य अथसे विलक्षस प्रकार का होता है और आकांसा भादिसे. युक्त शब्दों का सम्बन्धहो जाने पर भासित हुआ करता है-। वह पदों का अर्थ नहीं अपि, तु पदार्थ से पृथवा है और वाक्य का अरयहै। जिस प्रकार, वाक्याथं"' "को पकुट करने के लिए अभिषा शक्ति मानी जाती है किन्तु इसी से लक्ष्याथ का भी *बोब नहीं हो जाता अतः लक्ष्यार्थ को प्रकुट करने के लिए लक्षणा. नाम की द्वितीये शब्दवुत्ति, कौ कल्पना करनी पड़ी है, इसी प्रकार तात्पर्यार्थ को पकट करने के लिए तात्पयवति नामक एक और शब्द-वृत्ति माननी चाहिय। बात यह है कि वृत्ति के" बिना अर्थ बोध हो ही नहीं सकता.।अतः वाक्य का अ्ररयं जो संसर्ग (-अन्वय) है' उसको प्रकट करने के लिए तात्पयं नामक वृत्ति स्वीकार करनी ही पड़ेगी और वाच्यार्थ के समान तात्पर्यार्य भी होता है, यह मानना पड़ेगा। उदाहरसार्य 'घटं करोति' (घड़ा बनाता है) यहां 'घट' शब्द से घटरूप वस्तु का-बोध होता है 'अम्' प्रत्यय ये कर्मत्व का और 'करोति' करिया से कृति (करना या बनाना) का। किन्तु यह कर्मत्व घटवुत्ति है अर्थात् 'घट' 'करना' का कर्म है यूह अयं (वृतिता) तो' आकांक्षादि के कारण 'घटम् और 'करोति' का अ्न्वय हो जाने पर तात्पर्यवृत्ि से ही भासित होता है। 'तभी 'घटवृत्तिकर्मत्वानुकला कृतिः' यह बोध होता है।" मभिहितान्वयवाद का अभिप्राय यही है-पहले पदार्थ-वोध होता है तब वावयार्थ बोध होता है।पदों के शुद्ध झर्थ मे ही व्यवहारादि से संकेतग्रह होता है।इसी हेतु' सर्वथा नवीन वाक्य मे भी वाक्यार्थ-प्रतीति हो जाती है। यतः वाक्य का प्रत्येक शब्द' अपने-अपने अर्य का अभिमान करता है और आकांक्षादि के कारण उन भयों का परस्पर अ्रन्वप हो जाता है तथा तात्प्य नांमक वृत्ि के द्वारा वाक्यार्थं-बोष हो" जाता है/- (ii) अन्विताभिधानवादी प्रभाकर का विचार है कि अलग-लग अर्थ, "जो कि परस्पर सम्बंद्ध नहीं, प्रकट हो ही नहीं सकते। जैसे-'वह पढ़ता है" इस साधा- रस वाक्य में 'वह' का अर्थनोष उद्दश्य रूप 'कोई व्यक्ति' के भ्राकार में होता'
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३८ कांव्यप्रकाश:
(८) सर्वेपां प्रायशोऽर्थाना व्यञ्षकत्वमपीष्यते।। है और 'पढ़ता है' का विधेयरूप 'पढना प्रिया' के आकार में। यहां पृथक-ृथक शनों का अर्थचोध होने के अनन्तर उनका अन्ययहोता हो, ऐगा प्रतीत नहीं होता। वस्तुतः दाक्तिग्रह या संकेतग्रह भी अ्रन्वित पथं में ही हुआ करता है, जैये-पिता आदि (उत्तम वृद्ध) ने बड़े भाई आदि (मध्यमवृद्ध) से कहा 'देवदत्त गामानय'- '(देवदत गाय लाओो)। इस वाक्य फो समीप वैठे बालक ने सुना और -देसा कि उनका बड़ा भाई (देवदत्त) सास्नादिमान एक विशेय प्रवार के पशु को लाया है तो यालक ने अनुमान कर लिया कि 'गामानग' इस अ्लण्ड वायय का उस सासनादिमान् पशु को लाने' में अभिप्राय, था। इसके वांद वह चालक पिता के यह कहने पर फि 'गां नय (गाय को ले जायो), 'श्वमाहर' (घोड़े को लाग्रो).देवदस को गाय से, जाते हुमे देखता है तो इतरान्वित 'गाम्' आादि के अथ का प्रहणा कर सेता है। इस प्रकार व्यवहार से, जो पत्तिय्रह होता है वह केवलपदार्थ में नहीं होवा अपि तु मन्वित पदार्थ में ही होता है सर्यात् 'गामु' आादि पछ रिशान्वित कारक पद मे झक्तिपह होना है तया 'मनम' आदि का करकान्नि किराबद में शक्तियह होता है। यहा यह भी ध्यान रखने योग्य है कि सामान्यतः कियामान से अन्यित बारम मादि में ही शक्िग्रह होता है किसी विेष 'पनयन' आदि किया से सन्वित में नही । जय पव्वित" में ही शक्तिय्रह होता है तो वाक्य-ववसनन्र ग्रन्तार्य की प्रतीति हो जाना रम्भव ही है अतः प्रन्वय या संसम बोध के लिये तत्पिय: नामक वृति की कलाना अनापर है। यह कहा जा सकता है कि प्रभाकर के मत में वाक्न अ्सष्डार्भबोपठ है, वारतिक- इकाई (uait) है। उसमें से कमिम रूप से या व्यावहारिक दृष्टि से सब्दो मो पृपस कर लिया जाता है। (iii) यहा विनारणीय यह है कि मांचाये म्म संकमद कों इन में इनदीनों मतों से स फोन सा अभिप्रेत है? बास्याकारों का बिवार है कि 'भिहितान्वयवाद' ही सम्मेट को अभीष्ट है। उन्होंने तात्पयं वृति मो स्वीरर किया है कवोंकि ये फई, स्मनों पर इसका उत्नेस करते हैं, जैगे-पभियातात्पयंतक्षलाम्यो स्वापारान्तरेश गम्या (मून्र ३१, व्यापारोऽनपसपयनीय: (उ० प)। वम्तुगः यह गुष्ट ही है कि सम्बट ने चपनी दृष्टि से तीन प्रकार के शम्द यीर सर्म का पहिले निर्देस कर दिया है। यह सो मम्पों का (केपुनित्) मत दिगलाया है। भगः साटायोर्य नामक कोर्ट पृथक सरयं मम्प को भमीप्द नहीं। कपर उद्पृत गन्बभों में बन्होंने सात्यं मृति का उलोग सह प्रस्त करने के लिये ही किया है किवालय यृति मानने पर भी व्यम्जना यो प्रवाव स्यीकार करना पड़ेगा। .- अनुवाद-प्रापः (पाच्, सत्य, ध्वसपाि) समर्त धर्भो की भी स्यम्य। कता (किसी अर्घ को म्ञ्चना करना) सभोष्ट है। (८)
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द्वितीय उल्लास:
तत्र वाच्यत्ययथा-। माए घरोवअयरणं अ्जहु एात्थि ति साहिअं तुमए । + ता भण किं करसिज्जं एमेअ ए वासरो ठाई ॥धान rअ (मातगृ होपकरणमय् खलु नास्तीति साघितं त्वया।: i तदू भगा कि करणीयमेवमेव न वासर: सथायी ।६।। अत्र स्वैरविद्याराधिनीति व्यज्यते। लच्यस्य यथा-। साहेन्ती सहि सुहृयं खणो खणे दूम्मिआसि मन्फकएग सव्भावणेहकरणिज्जसरिसअं दाव विरइश्ं तुमए ॥।7 (साघयन्ती सखि, सुभगं तणो कषणो दूनासि मत्कृते।' सद्भावनेहकरसीयसहशकुं तावद्विरचितंत्वया ॥श व प्रभा-आचार्य मम्मट ने तीन प्रकार के शब्दों का निर्दश किया है"'और उनमें 'व्यञ्जक' शब्द भी बतलाया है। इस प्रकार शब्दों मे व्यञ्जकता है, यहं स्पष्ट हीहै। यह व्यञ्जकता अरथों में भी होती है, यहाँ यही बतलाया गया है। वाच्यादि तीन प्रकार के अ्ररपों का ऊपर निर्देश किया गया है। इन सभी अथों में ययासंभद" किसी अन्य (चमत्कारपूर्ण) अर्थ को अभिव्यक्त करने का सामर्थ्य होता है। 'यह" सामय्यं सर्वन नही होता अपितु वक्ता, शोता और अवसर के अनुसार हुआ करता है-अतएव कारिका में 'प्रायमः' कहा गया है। कारिका में 'अपि' शब्द का अ्न्वय" अर्थानां के साथ है-(अर्थानामपि); जिसका अभिप्राम यह है कि शब्दों के साथ-साथ भ्रथों में भी व्यञ्जकता होती है (प्रदीप) । मतान्तर (उद्योतकर) के अनुसार 'अि' सब्द का अन्वय व्यञ्जकता के साथ है (व्यञ्जकत्वमपि)। भाव यह है कि वाच्य, सक्ष्य और व्यङ्य अर्थ किसी अ्न्य अर्थ की व्यन्जना का कार्य भी करते हैं और' तब भी वे अपने वाच्य आदि रूपों को नहीं छोड़ते। अनुवाद्-उन (वाच्, लक्ष्य, व्यङ्गघ अर्थी) में वाच्य अर्थ की (व्यञ्ज- कता जँसे-हे माता, तुमने ही बतलाया है (साधितम्) कि. आज घर में (इन्धन," शाफादि) सामग्री नहीं है, तो तू हो बता कि क्या फरना चाहिये ? (अयवा यया कुछ न करना चाहिये ?) क्योंकि बिन तो इसी प्रकार स्थिर रहने वाला नहीं है ।।६॥
निकलता है। यहाँ (कहने वाली) स्वच्छन्द विहार को अभिलापिखी है-यह व्यङ्धार्थ
प्रभा-उद्धृत श्लोक में वाच्यार्थ से व्यञ्गयसर्थ की प्रतीति होती है। यहाँ ववतृवेशिष्ट्य के कारण (अर्थात् किसी स्वैरविहारिणी नायिका/ की यह उक्ति है, इस हेतु) श्रोता को यह प्रतीति हो जाती है कि कहने वाली स्वच्छन्द-विहार के। लिये जाना चाहती है। अनुवाद-लक्ष्प, अरथ फी दयज्जफत।; जसे-'हे ससि, मेरे लिए (उस) सुन्वर (सुभग) नायक को मनाती हुई तुम प्रति क्षएा दुःखी हुई हो। सव्भाव प्रौर-
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४०. j1 काव्यप्रकाश: 4
श्रत्र मतिप्रियं रमयन्त्या र्वया शत्रुत्वमाचरितमिति ल््यम्। तेन चः फामुकविषयं सापराघत्व पकाशनंव्यङ्नगयम्,। व्यङ्गपस्य यथा- उअ्र सिरचल सिप्पंदा भिसिसीपत्तग्म रेहड़ बलाआ। सिम्मलमरगअभाश्ररणपरिटिया सहूखसुत्ति व्व॥८ ॥ (पशय निश्चलनिस्पन्दा विसिनीपन्ने राजते बलाका। निर्मलमरकतभाजनपरिस्थिता शङ्खशुक्तिरिव ।। म ॥- अत्र निरपन्दत्वेन आश्वस्तत्वं तेन च जनरहितत्वम् आः सक्कत- स्थानमेतदिति कयाचित् कब्चित् प्रत्युच्यते।अथवा मिध्या वदसि, न त्वमत्रागतोऽभूरिति व्यज्यते ।। हनेह में करने योग्य उषित फार्य (सद्भावसनेहयोः करणीय कार्य सद्शम चचितम्) हो सुमने किया है [अथवा सद्भाव और स्नेह से जो करना चाहिये वसा ही (सद्भाव- स्नेहार्म्या यत् फरणीयं तेन सद्शम) फाय तुमने किया है]।।७।। · यहा पर 'मेरे प्रिय के साथ रमए करने वाली तुमने (मेरे साथ) दघता का व्यवहार किया है" यह लदय है और इस लक्ष्य द्वारा व्यड्ग्य है-यह प्ररुट करना कि कामुक पति (तथा ससी भी) अपराधपुकत है। - प्रभा-(i) यहां सद्यार्य से व्यङ्ार्थ की प्रतीति होती है। प्रिय को मनाने F
के लिये प्रेपित, किन्तु उसके साय रमएा करके भाई हुई गसी के प्रति किसी नाषिका की यह उक्ति है; अतः वोडव्य-वैंशिष्टय (श्रोता की विनिष्टता) के कारस सह्दय जनों को यह (व्यङ्गधार्य) प्रतीति होती है कि यह नायिका कामुक पति तथा ससी के अपराध को प्रकट कर रही है। अपनी ससी के अपराप को भांप लेने वाली नायिका की इग उकति में सद्भाम तथा स्नहस्पी (मित्रता) मुस्यारय का घाप हो जाता है पतः विपरीत अयं लक्षित होने लगता है। 'मटनम्' का राध्यायं 'विसाहसम' (भनुचित), 'मतते' का लभ्यारग 'स्वक्ृते' मोर 'दूनानस' का राष्यार्थ 'हुष्टानम' होता है। इस प्रकार मेरे प्रिय के साथ रमए करके तूने मनता का आाचरए निया है; यह सदयारथं प्राप्त होता है औोर इमके द्वारा उपयुक्त घमत्कारूर्ण अ्यस्भार्य मौ प्रतीति होती है। 41 ६.r (ii) यहाँ यह द्स्टव्य ह कि लथ्य सर्थ के माम जाय व्यसुष सर्घ भी प्राट हो रहा है (व्यन्जपत्वमपि)। 7
अनुवाद-ध्यसम्न धर्य की व्पम्मरता, जंसे- 'मम बेसो कमनिनी (बिसिनी), के पत्र परं बैटी यह बलाका (बपुतो न घसती है (निर्मस), न हिमती है 'निस्पन्दा) और ऐती सोभायमा है मानों स्वब्छ नीतम: (नोसमलि) के पात्र पर शंारभुकि हो ॥८।। "' :यहाँ पर निरपन्दना (वाध्यामं) से विस्रम्पता (भचवा निर्ममता) स्वत्तप है और निर्भपता से निरजनता व्यदष्य है मतएब किसो (नाविस्ा) के द्वारा हिगी
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द्वितीय उल्लास: [ ४१
वाचकादीनां क्रमेगा स्वरूपमाछ- (६) साक्षात्सक्केतितं योऽर्थमभिधत्ते स वाचक: ॥।७॥ ॥
शब्दोऽ्थचिशेष प्रतिपाद्यतीति यश्य सत्नाव्यवधानेन सङ्केतो-गृह्यते-स ... वाचक: (संकेत स्थान के इच्छुरु नामफ) के प्रति व्यञ्जना द्वारा यह धोतित किया जा रहा है (उच्यते=व्यञ्जनया प्रतिपाद्यते) कि यह संकेत स्थान है। (विप्रलम्भषङ्गार में, व्पस्गम यह है) अथवा "तुम भूठ बोलते हो, तुम यहाँ नहीं आये थे" यह (बलाका. की निर्भयता के द्वारा प्रतीत होने वाले जन-सञ्चार के अभाव रूप व्यङ्गध से) ग्रभि- व्यक्त हो रहा है। प्रभा-(१) 'उभ्र' शब्द प्राकृत में 'पश्य' के अपर्थ मे श्रव्यय है। निश्चल- निस्पन्दा-'निश्चला चासौ निस्पन्दा च' इस प्रकार दोनों विशेपणों का कर्मधारय, समास होता है जैसे-शीतोप्एं जलम्'। शह्धगुक्ति का अर्थ प्रायः टीकाकारों ने 'सीपी के भावगर का राह्धनिरमित पाय' किया है। वस्तुतः जैसे-'मुक्ताशुक्ति' आदि शब्द- एक विशेष वस्तु को प्रकट करते हैं उसी प्रकार शहशुक्ति भी शह्धरूप में परिएत होने से पूर्व का प्रकृतिजन्य शह्ध रूप ही है। बलाका से उसी की समानता दिखलाना अधिक सङ़त प्रतीत होता है। (२) यह हालकवि की गाथासप्तशती का पद्य है। इसमें बलाका की निश्च- लता का वणंन करके उसकी निर्भयता को व्यक्त किया गया है और निर्भयता रूप, व्यङ्गपार्यं के द्वारा उस स्थान की निर्जनता अभिव्यक्त होती है। प्रसङ्ग अ्रथवा विशेष अवसर के कारण इरा निजनता की प्रतीति द्वारा सहुदय-जन दो प्रकार का अर्थे समझ लेते हैं-(१) संयोगपक्ष में कोई नामिका उपनायक से कहती है कि यह निर्जन स्थान है अतः यही उचित संकेत स्थल है। (२) विप्रलम्भ पक्ष में जब नायक कहता है कि तुम यहाँ नहीं आई, मैं तो यहाँ आया था; तब नायिका व्यञ्जना द्वारा प्रकट करती है कि बलाका की निर्भयता से यहाँ मनुष्य के आ्गमन का अभाव द्योतित हो .. रहा है अतः भूठ वोलते हो, तुम यहाँ नहीं आये थे। टीकाकारो के विचार में इर स्थल पर निर्जनता ही व्यङ्तयार्थ से पभिव्यक्त. होने वाला दूसरा व्यङ्घार्थ है। इस निर्जनता रूप व्यङ्गचार्थ के उपयुक्त दो प्रकार के फलितार्थ हैं। वस्तुतः ये फलितार्थ ही सहृदयों के हृदयाह्लादक हैं। फिर क्या इन्हें तृतीय कोटि का व्यङ्गय माना जाये ? यह चिन्तनीय है। 1. अनुवाद-वाचक (लक्षक तथा व्यञ्जक) आदि शब्दों का कमरा: स्वरूप, मतलाते हैं :- जो शब्द साक्षात् संकेत किये गये प्र्थ का बोध कराता है, वह वाचक शब्द फहलाता है।', ''इस लोकव्ययहार में (इह) जिस (शब्द) का संकेतग्रह नहीं हुआ उस शब्द "! के अरर्थ की प्रतीति नहीं होती अतः संकेतग्रह है सहायक जिसका (संकेतः संकेतग्रह)
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४२ 1 काव्यपकाश:
सहाय: मस्य तादृश:) ऐसा शब्द ही किसी विशेष अर्भ का बोध कराता है। इस हेतु जिस शब्द का (यस्म) जिस अर्भ या वस्तुः में (पत्न) बिना व्यवधान के (साक्षात् दप से) संकेत-प्रहण किया जाता है वह (शब्द) उस (पथं) का याचक कहलाता है। (६)
प्रभा-वाचक शब्द किसे कहते है? उसका क्या स्वरूप है? यह रपष्ट करते हुए मम्मट ने बतलाया है कि सांसारिक व्यवहार में जिस शब्द का जिस धर्थ में संकेत-ग्रहणा किया जाता है उस अभ की ही प्रतीति उस शब्द से होती है। यदि सकेत-ग्रहण न हो तो शब्द से अ्रर्थ की प्रतीति नही हो सकती। यह संहेत थया है ? 'इस शब्द का यह अथं है' अथवा 'इस भर्थं का प्रतिपादक यह शब्द है' (पस्मातृ' शब्दाद् अयमर्थो यौद्धव्य:) इस प्रकार की सामाजिक मान्यता ही सवेत है। जो व्यक्ति किसी शब्द के विषय में इस सकेत या मान्यता से अपरिचित होते है वे उसका पयं-्ोध नही कर सरने। यह संकेत दो प्रकार का हो सकता है, एफ साशात् रप में और दूसरा ववहित रूप में (परम्परया), जैमे-वट (बड़) एक वृक्ष का नाम है युक्ष रूप प्रर्थ में 'घट' शब्द का साक्षात् रूप से संकेत है। किन्तु जिरा ग्राम में फोई विशाल वट-वुक्ष है उसे भी यदि चट ग्राम (बटो ग्रामः) या बड़-जाव पहा जाता ह तो मन परम्परया सनेत हैं, अर्थात् ग्राम मे 'वट' शब्द बा साक्षात् रूप से संफेत नहीं। जय फिसी शब्द का साक्षात् रूप से किसी अर्थ में संकेत होता है तो यह शब्द उस भर्य का वाचक कहलाता है। कपर के उदाहरख में 'ट' शब्द पट वुक्ष रुप मर्य का वाचक है, यट ग्राम रप सर्व का नहीं।
टिप्पली-शब्द से सर्य की प्रतीनि किस प्रकर होती है ? दूम विषम पर व्याकरणा तथा न्यायन्यैमेगिक शदि में विस्तार से विचार किया गवा है। मकिप्रह या संकेतप्रह को सहायता से ही कोई शब्द मिसी अर्थ का बोप करा सवता है मन्यथा नहीं, यह सर्वसम्मत सिद्धान्त है। दम मंदेग को 'कि' तवा 'ममय' नाम से भी दर्माया गमा है। यह संफेत यया है? वाच्यन्यायक भाव की नियामक एक मान्यता ही सगम यासंहन हैक पुनरयं समयः१ धभिपानाभियेमनियमनियोग: । न्याययातिक २, १.५६] इन समय मा गहेत के पहसप पा शरूप को प्रकार भा हो सर्ता है :- (१) 'मो' मजर मा वाब् यह गागनादिमान् सर्थ।"पवया महूग सारनारिमान् धर्य को यो गहते है।" पराधीन नैवाधितों के मनुगार ईदपरे च्यारप मकेस हो गतिै हिन्तु नवीनों के अनुगार हिसी के द्वारा भी तिया दपा सरोन (मंफेा माष) सकि है। जिन गम ना किसी सर्व में साझात् रुप से पतिषह या सोनण्रह होता है यह पाद उ मर्ण का पायक बहलाता है। मास्नव मे अग एक ऐना प्रतोष है जो निसी मर्ग को माधान् क मे पाट करता है और सती का बापक पहसाता दे, यह मर्रा दसरा मास्य पहा जाता है।
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द्वितीय: उल्लासः [' ४३७
' (१०) सङ्गेंतितश्चतुर्भेदो जात्यादिर्जातिरेव वा। 7 यद्यप्पर्थक्रियाकारितया प्वृत्तिनिवृत्तियोग्या व्यक्तिरेव, तथाऽ्यान- 1
याद्-व्यभिचाराच्य तन्र सङ्केतः कतु न युज्यत इति.गौ: शुवलश्चलो, डित्थ इत्यादीनां विषयविभागों न प्रोप्नोतीति च तदुपोघावेव सङ्गतः।7 अनुवाद-जिस भ्रर्थ में संकेत किया जाता है वह चार प्रकार का है- जाति यादि (अर्था्त् जाति, गुए, किया और यद्च्छा) अथवा केवल (एफ ही प्रंकार फा) जाति ए्प ही है। (१०) प्रभा-जिस अर्थ में किसी पद का सक्केत किया गया है वह सक्कतित अर्थ। कहलाता है। शब्द का यह रा्टरेतित अथं किस रूप मे होता है? अथत् शब्द का' संकेत द्रव्य या व्यक्ति में होता है अथवा जाति में, इस विषय में न्यायादि में विस्तार' से विवेचन किया गया है, और पदार्थ क्या है? इस सम्बन्ध मे विविध मत प्रस्तुत किये गये हैं। किन्हीं (नव्य नैयामिक) के मत में व्यक्ति (द्रव्य) ही पदार्थ है, व्यक्ति में ही पद का संकेत-ग्रह होता है। मोमांसक की दृष्टि में समस्त पदों का संकेत- ग्रह वस्तु के सामान्यरूप अर्थात् जाति में ही होता है। न्याय-वैशेपिक के अनुसार जाति-विशिष्ट व्यक्ति पदार्थ है। बौद्धमत मे 'अपाह' ही शब्दार्थ है। आचार्य मम्मट ने सभी मतों का प्रसक्कनुमार आगे उल्लेस किया है। प्रस्तुत कारिका में उन्होने दो मतों का ही निर्दन किया है १ सक्कतितः चतुर्भेदः जात्यादिः। २. जातिरेव वा।' जसा कि ग्रन्थाकार आगे स्वयं ही निरुपण करेंगे सङ्टतित अ्र्थ चार प्रकार का है-यह पद-वैज्ञानिक वैयाकरणों का मत है। ये चार प्रार हैं-जाति, गुए मिया और यदच्छा। इसलिए महाभाष्यकार पतञ्जलि ने चार प्रकार के शब्द माने है १. गाति शब्द-वे शब्द हैं जो जाति या सामान्य के अभिधायक हैं। जैसे-गो शब्द गोत्व जाति का बोध कराता है। २. गुगा शब्द-वे शब्द हैं जो गुणो के वाचक है, जसे 'युक्त'आदि शब्द। ३. क्रिया शब्द-वे शब्द है जो किया का बोध कराते हैं।। ये दो 'प्रकार के है किया की साध्यावस्था को कहने वाले तिङ्न्त शब्द 'परचत' आदि और करिया की सिद्धावस्था को बतलाने वाले घवन्त आदि शब्द जैस पाक: (पच् + घन्) ४. यदृच्छा शब्द्र-वे शब्द हैं जो इच्छानुसार किसी व्यक्ति के नाम के रूप मे प्रयुक्त किये जाते हैं;जैसे किसी बैल का नाम 'डित्त्' रख लिया अयवा किसी बालक का नाम 'पप्पू' रख लिया। इस प्रकार के सज्ञा शब्द ध्यक्ति का बोध कराते हैं। वंमाकरणों के अनुसार इस सङ्गतित अर्थ का चतुर्विघ विभाग दिसलाकर आचार्य कम्मट ने; विकल्प रूप से मीमासक का मत प्रकट किया है 'जातिरेव वा'- भथवा जाति ही एक संकेतित अर्थ है।' अनुवाद्-यद्यपि (दूध देना. आदि). प्रयोजनीय कार्य (धर्थंकिया-अर्थस्यः प्रयोजनस्य किया) फरने के फारए (ग्रहसादि के निमित) प्रवृत्ि तया (त्याग के।
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काव्यप्रकारा:
निमित) नियृत्ति के योग्य व्यक्ति हो है तयापि व्यक्तियों के भनन्त होने के कारए तथा व्यभिचार (दोप के प्रसङ्ग) के कारण व्यक्ति में संफेत करना (मानना) उचित नहीं है-इस हेतु से (इति) और (यदि प्रत्येफ शब्द का अ्ररयं व्यक्ति होगा तो) दित्य (इस संज्ञा वाला) शुक्त (रंग का) बैंल (जातिवाचक) चसता है (किया) इत्यादि" शब्दों के अर्य का मेद (विपयविभागः) नहीं होगा (बर्योंकि सभी एक व्यक्ति के वाचक होगे) इस हेतु से भी (इति च) उस व्यक्ति की उपाषि (धर्म या विरेयए जात्यादि) में हो सद्धा तग्रह होता है। प्रभा-आ्रापाततः ऐमा प्रतीत होता है कि शब्दों का संकेतग्रह् व्यगित रप मर्य में ही होना चाहिए क्योंकि व्यक्ति से हमारे जीवन के व्यवहार सिद्ध होते है। गौ व्यक्ति ही दूध देना आदि प्रमोजनों को पू्णं करने वासी है (प्रयंकियाकारी है। तथा दूध दोहने मादि के लिये गौ व्यक्ति मे ही देवदत आदि की प्रवृत्ति देशी जातो है औोर सीगों कौ चोट (गृङ्भाघात) से बचने के लिये गो व्यक्ति से नियृति देसी जाती है। अतः प्रवृत्ति औौर निवृत्ति के योग्म व्यक्ति ही है। जीवन का व्यवहार व्यक्ति से सम्बन्ध रसता है। व्यवहार द्वारा हो प्रथम संकेतग्रह भी होता है इसीलिये 'व्यक्ति' ही पदार्थ है यह गंका होती है। 'तथापि' इत्यादि मे ग्रन्थवार इसका रामाधान करते है कि व्यक्ति में सट्स- ग्रह मानने में तीन वाधायें है-(१) सानन्त्य (२। व्यभिचार (३) विपयविभागा- प्राप्ति। अत. ध्यक्ति में सद्ू तग्रह न. मानकर उपाधि में ही रा्तव्रह मानना उर्चित है। अभिप्राय यह है कि यदि व्यक्ति में सम्कतगरह माना जापे तो दो विवल हो सकते हैं :- १. यया समस्त व्यक्तियों में राम्त्रेत-प्रहस के परचात् व्यवहार का निर्वाद होता है पयवा २. किसी एक व्यक्ति में संकेतग्रह के परचात् हो व्यवहार का निर्याह हो जाता है। यदि इनमें से प्रयम विफल्प माना जाये तो मटिनाई यह है क व्यक्ति तो मनन्न हैं, वे एक साथ एक देश में उपस्थित नहीं हो सकते; मसः उनमें : राङ् सम्रह हो ही नहीं सकता (माननत्व)। द्वितीय विन्प को माने तो पापति यह है कि जिस व्यक्नि में सकेत-प्रह हमा है उसाये भिन्न व्यक्ति यी उस गब्द से प्तीति न होगी औोर यदि होगी तो सकेतित मर्य का ही शब्द से बोध होता है' यह नियम भन्त हो जायेगा और फिर सो गो शब्द से भख्व की प्तीति भी होने सगेगी, यह। मनियम अर्वान् व्यभिनार दोप होगा। इन पाननत् मोर व्यमिचार नामक दो बापामों के परण व्यक्ति मे साख्दसमरद हो ही नही सरता। मदि किसी प्रफार व्यकति में संकेतव्रह मान भी निया जानेवो पद के विभिन्न पभों का भेद प्ररट ने हो गनेगा; कयोकि सय सो "मौःसुदादः घसी हिरपः" भर्गात हित्य नामक सहेद बैन जा रहा है दम वाक्य में गोः का थर्ष गोतमप नाविमाग, 'दुकस.' का धग दुफसर मुमवान्, 'गतः' का अर्प 'वगरप निवागन' और 'दिरप:' का मर्ष दितपगंनयान् होगा । एफ मोहप व्यपक्ति ही इन पारों गमों रा
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द्वितीय: उल्लास: ४५
अरथं होगा; क्योंकि व्यक्तिवादी के मत में व्यक्ति ही इन चारों का प्रवृतिनिमित है और वह गोव्यकति एक ही है अतः विषय-विभाग न होगा। तब तो ये चारों शब्द :पर्याय हो जायेगे और इनका साथ २ प्रयोग भी न हुया करेगा; जैसे 'घदः कलशः' का सहप्रयोग नहीं होता। इन तीनों दोपों के कारण व्यक्ति में संकेतग्रह न मानकर व्यक्ति की जो चार प्रकार की उपाधि सर्थात् विशेपण या विशेष धर्म (जाति, गुण, किया और संज्ञा) । है, उसमें ही संकेतग्रह मानना चाहिये। इर प्रकार 'जाति' इत्यादि भिन्न २ प्रवृत्ति निमित होने से इन पब्दों का सह प्रयोग उचित ही है। जहाँ तक व्यवहार-निर्वाह की बात है, उपाधि-शाक्तिवाद में शब्द से गोत्व आदि जाति का बोध होता है और जाति व्यक्ति के बिना रह नहीं सकती अथवा उसका लाना आदि नही हो सकता, इस हेतु आ्क्षेप से व्यक्ति में व्यवहार का निर्वाह हो जाता है। - टिप्पसो :- (i) अ्थकियाकारितर-यहां पर 'अर्थ' शब्द का अ्रभिप्राय 'प्रयोजन' (कारय) है प्त्येक वस्तु किसी प्रयोजन को सिद्ध करती है जैसे गाय दुग्ध प्रदान करती है, घड़ा जलाहरणरप कार्य का सम्पादन करता है। यही इन वस्तुओं की अर्यकिया है; अर्थाय किया अ्थक्रियां अथवा अथस्य करिया अर्थक्रिया। जलाहरस रूपा किया ही घट की अथनिया है। घथकिया करोति इति सर्थकियाकारी तस्य -भाव: अयंकरियाकारिता-अर्थ+किया+V कृ+शिनि+-तल्। इम प्रकार-वस्तुभों का किसी कार्य को करने का सामर्थ्य ही अर्थकियाकारिता कहा जाता है। यह बौद्ध दर्शन की भूमि में विशेष प्रसिद्ध शब्द है। (ii) प्रवृत्तिनिवृत्ियोग्या :- जब हम किसी अर्थ का प्रमाण द्वारा ग्रहण 'करते हैं तो उसके प्रति तीन प्रकार की बुद्धि उत्पन्न होती है-ग्रहण, त्याग तथा उपेक्षा (उपादान-हान तथा उपेक्षा) जिस वस्तु को हम ग्रहण करना चाहते हैं उसको लने के लिए प्रवृत्त होते हैं। वस्तु को ग्रहण करने की चेप्टा ही प्रवृत्ति कहलाती है। जिरा वस्तु को हम हानिकर समभते हैं उसे त्यागने की चेप्टा करते हैं तथा जिसके प्रति उपेक्षा वुद्धि होती है उसके प्रति उदासीन रहते हैं। इन वस्तुओं से हम निवृत्त होते हैं, प्रतिषिद्ध या द्विप्ट एवं उपेक्षित वस्तुओं से बचना ही निवृत्ति है।
1में नहीं। · यह प्रवृत्ति तथा निवृत्ति व्यक्ति के प्रति ही हो सकती है जाति अर्थात् गोत्व आदि
- (iii) उपाधि :- एक या भ्रनेक वस्तुओं के ऐसे धर्म को उपाधि कहते हैं जो उन्हें दूसरी चस्तुओं से भिन्न भी करता है। यह विशेपण या विशेष धर्म कहा जा सकता "है, दूसरी वस्तुओं से पार्थकय प्रकट करने के कारण यह भेदक या व्यवच्छेदक धर्म भी है। जाति (सामान्य) गुएा, किया और संज्ञा सभी उपाधि के भन्तरगत हैं, संबः 'गोव्व' आदि जाति की अपेक्षा उपाधि एक व्यापक बुद्धि है।
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४४ 1 कव्यप्रकाग:
निमित) निवृत्ति के भोग्य स्पक्ति हो है तथापि व्यक्तियों के प्नन्त होने के कारस तथा व्यभिचार (वोप के प्रसद्द) के कारए व्यक्ति में संकेत करना (मानना) जतत नहीं है-इस हेतु से (इति) और (यदि प्रत्येक शब्द का अर्य व्यक्ति होगा तो) डित्य (इस संज्ञा पाला) घुश्ल (रंग का) मंस (जातिमाचय) चसता है (करिया) 'एत्यारि' शब्दों के सर्य का भेद (विपयविभागः) नहीं होगा (क्योंकि सभी एक नमकि के थाचक होंगे) इस हेतु से भी (इति घ) उस व्यक्ति की उपाधि (धर्म या विशेषए जात्यादि) में ही सङ्च तग्रह होता है। प्रभा-प्रापाततः ऐसा प्रतीव होता है कि शब्दों का संकेतग्रह व्यक्ति रुप अर्थ में ही होना चाहिए ययोंकि व्यक्ति से हमारे जीवन के व्यवहार सिद्ध होते हैं। गौ व्यक्ति ही दूध देना आदि प्रयोजनों को पूणं करने वाली है (भयंतियाकारी है। तथा दूध दोहने आदि के लिमे गो व्यत्ति में ही देवदत आदि की प्रयुति देवी जाती है और सीगों की चोट (पृद्भापात) से वचने के लिये गो व्यक्ति से निदुधि देसी जाती है। अतः प्रयुति औीर नियुतति के मोग्य व्यक्ति ही है। जीवन का य्यवहार: ध्यक्ति से सम्बन्ध रखता है। व्यवहार द्वारा ही प्रथम संकेतग्रह भी होता है इसीसिये. 'व्यवति' ही पदार्थ है यह गंका होती है। 'तथापि' इत्यादि से ग्रन्थकार इसका रामाधान करते है कि व्यक्ति में म्त त- ग्रह मानने में तीन बाबार्ये है-(१) आनन्त्य(२। व्यभिचार (३) विपयविभागा- प्रप्ति। मत, व्यक्ति में सद्ततगह न मानकर उपाधि में ही सभ्तपद मानना उचित है। अभिप्राय मद है कि यदि व्यक्ति में सन्टतग्रह माना जाये सो दो विकल् हो सफते है :- १. यया समस्त व्यक्तियों में राह्ट्रत-ग्रहण के परचात् व्यवहार का निर्याह होता है अयवा २. किसी एक व्यक्ति में संकेतग्रह के परचान हो व्ययहार या निर्वाह हो जाता है। यदि इनमें से प्रथम वियल्प माना जाये सो कठिनाई यह है ि व्यक्ति तो मनन्त है, वे एक साथ एक देश में उपस्थित नहीं हो सपचे; धतः उनमें सद्ध तमह हो ही नहीं सकसा (भ्राननत्य)। द्वितीय विपस्प मो माने तो भापति यह ह कि जिस व्यक्ति मे ववेत-व्रह हुआ है उससे भिस व्यक्ति की उस सब्द से प्रतीति न दोगी औौर यदि होगी तो गफेतित अर्थ का ही शब्द से बोध होता है' मह निपम भन्न हो जायेगा और फिर तो गो शब्द से भश्व को प्रतीति भी होने सगेगी, मह, अनियम सयात् व्यभिवार दोप होगा। इन माननव औरव्यभिमार नाम दो भाषामों के फारल ववित में सम्ट्रतमरद हो ही नहीं सकता। मदि किसी प्रकार व्यक्ति में संकेतम्रह मान भी लिया जाएे सो पद के विभिन्न ममों का भेर प्रट न हो सफेगा; क्योंनि तब सो "योःशुपत पत्षो दिरप:" सर्मान् गिप नामक सफेद बैन जा रहा है दग पाहर में 'ोः का धर्म मोलरम परातिगान्, 'सुपन.' का धर्य कुनामय गुसवान्, 'गनः' का सर्म 'वननरूप ियाजान पोर "दि' का धर्म टिसपगंगाशान होगा। एक गोदय अति ही इ भारो परलो की
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द्वितीय: उल्लासः ४५
अथ होगा; मयोंकि व्यक्तिवादी के मत में व्यक्ति ही इन चारों का प्रवृत्तिनिमित्त है :औौर वह गोव्यक्ति एक ही है अतः विपय-विभाग न होगा। तब तो ये चारों शब्द ;पर्याय हो जायेंगे और इनका साथ २ प्रयोग भी न हुआ करेगा; जैसे 'घटः कलराः' का सहप्रयोग नहीं होता। इन तीनों दोपों के कारण व्यक्ति में संकेतग्रह न मानकर व्यक्ति की जो चार प्रकार की उपाधि अर्थात् विशेषण या विशेष धर्म (जानि, गुण, किया और संज्ञा) 1 हैं, उसमें ही संकेतग्रह मानना चाहिये। इस प्रकार 'जाति' इत्यादि भिन्न २ प्रवृत्ति निमित्त होने से इन शब्दों का सह प्रयोग उचित ही है। जहाँ तक व्यवहार-निर्वाह की बात है, उपाधि-शक्तिवाद में शब्द से गोत्व आदि जाति का बोध होता है भौर जाति व्यक्ति के बिना रह नहीं सकती अथवा उसका लाना आदि नही हो सकता, इस हेतु आक्षेप से य्पक्ति में व्यवहार का निर्वाह हो जाता है। 1; टिप्पणी :- (i) अथकरयाकारिता-यहाँ पर 'अर्थ' सब्द का अभिप्राय 'प्रयोजन' (कार्य) है प्रत्येक वस्तु किसी प्रयोजन को सिद्ध करती है जैसे गाय दुग्ध प्रदान करती है, घड़ा जलाहरएरप कार्य का सम्पादन करता है। यही इन वस्तुओं को पथनिया है; अर्थाय किया अयंकियां अ्रथवा सर्यस्य किया अर्थकिया। जलाहरण रूपा निया ही घट की अथंमिया है। अथक्रिया करोति इति सर्थकियाकारी तस्य भावः अ्रयंक्रियाफारिता-शर्थ+श्रिया+V कृ+शिनि+तल्। इस प्रकार-वस्तुओों का किसी कार्य को करने का सामर्थ्य ही अथकियाकारिता कहा जाता है। यह बौद्ध दर्शन की भूमि में विशेष प्रसिद्ध गब्द है। (ii) प्रवृतिनिवृत्तियोग्या :- जव हम किसी अरं का प्रमाण द्वारा ग्रहए 'करते हैं तो उसके प्रति तीन प्रकार की बुद्धि उत्पन्न होती है-ग्रहण, त्याग तथा उेक्षा (उपादान-हान तथा उपेक्षा) जिस वस्तु को हम ग्रहस करना चाहते हैं उसको लेने के लिए प्रवृत्त होते हैं। वस्तु को ग्रहण करने की नेप्टा ही प्रवृति कहलाती है। जिस वस्तु को हम हानिकर समभते हैं उसे त्यागने की चेप्टा करते हैं तथा जिसके प्रति उपेक्षा बुद्धि होती है उसके प्रति उदासीन रहते हैं। इन वस्तुओं से हम 'निवृत्त होते हैं, प्रतिबिद्ध या द्विप्ट एवं उपेक्षित वस्तुओं से बचना ही निवृति है। यह प्रवृत्ति तथा निदृत्ति व्यक्ति के प्रति ही हो सकती है जाति अर्थात् गोत्व आदि 1 मे नही। - (iii) उपाधि :- एक या अ्र्नेक वस्तुओं के ऐसे धर्म को उपाधि कहते हैं जो वन्हें दूसरी वस्तुओं से भिन्न भी करता है। यह विशेपण या विशेष धर्म कहा जा सकता है, दूसरी वस्तुओं से पार्थवय प्रकट करने के कारस यह भेदक या व्यवच्छेदक धर्म भी है। जाति (सामान्य) गुए, किया और संज्ञा सभी उपाधि के अन्तं्गत हैं, अतः 'गोत्व"आदि जाति की अपेक्षा उपाधि एक व्यापक बुद्धि है।
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1 पाव्यप्रकाप ::
गो है यदि ऐेमा न होता तो चित्र लिसित गो की भाकृति भी वस्तुतः गो कहगाती। मनः वस्तु मो स्वरप देने वाला 'गोत्व' 'घटत्व' आदि धर्म ही जाति पहसाता है। वाययपदीय की उक्ति से भी यही अर्थ प्रतीत होता है-कोई गो मपने स्वरूप गे- *व्यक्तिगतरप से-'गो' नहीं (अ्रथवा गौ शब्द के व्यवहार का विपय नहीं) यदि ऐगा होता तो घट, आदि भी गो हो जाते 1.चौर, गो अपने रूप से (स्वतः ही) भगो नहीं (भचवा 'मह गाय नहीं' इस व्यवहार का वियय नही), किन्तु बात यह है कि उसमें "गोल का सम्वन्ध है र्थात् उसमें सगनाय सम्वन्य से गोत्य रहता है इसलिए वह मौ है, पदार्य का स्वरूप उगपी नाति के बरण ही होता है। मयवा गोरव मादि जाति के ज्ञान से ही उसमें 'यो गब्द का व्यवहार होता है। यह जाति यस्तुधर्म होने के कारमा यादृच्छिक [कल्पित] संत्ञा से भिन्न है, सिन्न धर्म होने मे साध्यरूप किया से भिन्न है तथा वस्तु का श्रासाप्रद घ्में होने से विशेष प्रतीति 'के हेतुमान गुल से भिनन है। गुए (विशेषाषानहेतुः)-द्वितीय उपाधि गुख दे, जो पस्तु का मिद्ध भर्ग है शौर किमी वस्तु में विशेष पतीति का हेतु है। गोल्व जाति थाली दो या ध्पिर गौ ग्तितों में 'कृपपा गोः,'शुक्ता मो:' इत्यादि रूप से कृच्छ और सुक्न सादि गुसों के द्वारा ही भेद की प्रतति होनी है, पतः मुस गजानीय वस्नुरो को एक दूसरे से पृयक करने वाले है, राजातीय-व्यावतंक है। जाति या नामान्य तो वस्तु का स्वम्पापायक है और गुगा यर्तु में विशोषता उत्पन्न करने याला है। यही दोगों में स्पष्ट अन्तर है। क्रिया (पूर्यापरीभुतावययः)- वस्तु की वृखीय उपापि वियारूप है। यह वम्तु का धर्म तो है विन्तु साध्यनस्था में है, भभी उत्पाय है। इमा एक पंग पहने होता है दूमरा वाद में हो रहा है, सीनग होने यामा है, अगे-भतत मनाने के लिए सूल्े पर पार रसना [मधिभदल]. यहां ताप सगना और फिर पान को चनारना (भनतारसा] पादि विभिन्न कियात है। उनका बुद्धित समुदाय ही पायग पिया कहलाती है। अ्रतः िया. के अवयव नम से पदित होते है उसके सपबज पूर्यापरीभूत है-नहसे मोर वाद में होने घाते है। बिया भरनी साध्यसरण के कारस हो जानि तथा गुवा से भिन्न है, पर्योकि से दोनों तो पस्तु के मिद्व धर्म है। पद्च्छा-चस्तु यो सनुर्य उपाभि है-यहलदा। मसंस में मद् बम्यु का धर्म 'नहीं, पपि सु व्यवहार के लिये कत्पित गंगा मान है उसी मे यह परन के धर्म भाति, गुछ नगा किया से निम है। फोई वस्ता (दृपय सादि का पाना) परने बैम पा नाम दित्य' रा सेता है। पिया सबने सुत्र का नाम 'देवात' मादि रस मेता है। मे नाम मपश संसाने मादृब्याक है, चना की सेस्छा से हो। यामी है। जिगर नामग्य रिया नाता ह उम व्यकि में वका सेष्छा मे वपापि के रूप में देनर दादि गम्द पो र्पान मा मलम बर मेता है। ए बरक गम क संमाषम 'या इष्पगन भी बहे है।
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द्वितीय उल्लास: ४६
: 'परमाएवादीनां त्ु गुसमध्यपाठात, पारिभापिकं गुएत्वम।: यह गब्द कया है ? इसका स्वसप 'हित्यादि' ..... स्वरूप तक की पंकितियों में वतलांया गया है-हम जब इ+इ-त्+-थ+अ आदि क्षसिरु वशों को सुनते हैं तो भन्तिम वरस 'म्र' के गाथ पूर्व वणों (इ इ आदि) के अनुभव' से उत्पन्न' संस्कारों की सहायता से रफोटरप 'डित्थ' शब्द का स्वर् अभिव्यक्त हो। जाता है। उसमें वगों के भम का ज्ञान नहीं होता किन्तु एक पद का अनुभव होता है।r। टिप्पसो-(i)- यहाँ भाष्यकार के 'गुए शब्द के द्वारा' अभावादि वाचवा शब्दों का भी ग्रहणा होता है। वास्तव मे यहाँ जाति, किया और संज्ञा, शब्दों से मिन्न सभी शब्द गुएवाची हैं-संज्ञाजातिकियागव्दान हित्वऽन्ये गुसवाचिनः।".बोतो गुएवचनात्' सूत्र पर तत्त्वयोघिनी। (ii) वाक्यपदीय-यह भ्तृ हरि (सप्तम शताब्दी) का व्याकरण-शास्त्र विषयक ग्रन्थ है। इसके नीन भाग है-(१) ब्रहा या, आगम काण्ड, (२) वाकय, काण्ड, (३) पद मा प्रकीर्ण कण्ड। ( (iii) लव्चराताकम्-जात्या प्राप्तव्यवहारयोग्यताकम्। 'भाव ' यह" है"फिी गरिव आदि जानि के द्वारा गोपिण्ड मे गौ कहलाने की योग्यता आती हैं इस प्रकार गभी गायों में गो व्यवहार होने पर झुक्न आदि गुस एक 'गौ को * दसरीं कृप्ण आदि गौ से विशिष्ट (भिन्न) दिसलाते हैं। यहाँ 'वैशेपिक' के उस मन्तव की ओर भी संकेत है जिसके अनुसार प्रथम क्षसा में जातियुक्त द्रव्य उत्पन होता है'। उरा क्षणा में वह गुएरहित (निगुंखा) रहता है और द्वितीय क्षमा में गर उस्पनन होते हैं। इस प्रकार प्रथम क्षण में सत्ता (स्वरूप) को प्राप्त कर 'लेने वाली वस्तु में ही गुएा विशिष्टता उत्पन्न करते है। अनुवाद्-(वंशेषिक शास्त्र में) गुखों के मध्य में परमासु आदि फा. पाठ होने के कारस उन्हें (परमाध आदि को) पारिभाषिक रूप से गुए कहा जाता है वस्तुतः परमातु आदि जाति शब्द ही है)। i NA 'FTE"' प्रभा-वैशैषिक शास्त्र में परंमाणु शब्द का दो अ्ररथों में, प्रयोग किया गया है-एक तो पृथ्वी आदि चार भूतों के उस सब से छोटे कएा के लिये जिसका भरगे. विभांग नहीं हो सकता, जैसे पृथ्वीपरमाणु, जलपरमाशु यादि ।: यह परमाण वैदेषिक के अनुसार एक द्रव्य है। इसमें परमाणृत्व रूप जाति के कारण ही परमार गब्द का व्यवहार होगा। दूसरे, सबसे छोटे परिमाण को परमालु परिमाख कहते हैं पर्थात् परमाण का परिमाण (:परमाखुत्व=पारिमण्डल्य) भी परमाणु कहा-जाता है। वंह वैशेषिक की दृष्टि से गुएा है। अतः वहाँ परमाए शब्द गुरवाचक होगा,।) इसी प्रकार आदि शब्द (परमाण्वादीनाम्) से संगृहीत परममहत विभुत्वा भादि,के) विषय में भी शङ्डा हो सकती है। आ्ंत्मा तथा, व्रकाश आदि को बनेिक- में.
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वबतप्रफान:
गुमा कियायटच्द्रानां वरतुत एकरूपाणगामध्याभयमेदाद् भेद इव लच्यते, यथ करय सुखस्य खड्गमुकुरतेलाय्यालम्बनभेदात्। हिमपय: राज्षरादाश्रयेषु परमार्थतो भिग्नेपु शुपलादिपु यद्वशेन शुपत: शुफल दत्याथभिन्नाभिधानप्रत्य योपत्तित्तन्दुयलत्वादि सामन्यम। गुद्दत- एहुलादिपा का दिप्वेवमेव पाकत्वादि। वालवृतशुकाद दीरितेपु डित्यादि- परममहत परिमात वाता कहा गया है पर्थोत सबमे बड़ा परिभाग परममहत् है। थैसेपिक की दृष्टि से यह गुख है भतः परममहत् गब्द भी गुगवाचम होगा। इस नड़ा के समापान के लिये ग्रन्थकार ने गरमापादीनागगलम्।, इस्यादि कहा है। जिसका भाव यह है कि परमाग्स्व ादि प्रासभद धर्म है, पतः परमाएु मादि बब्ा वारुय में जातिवाचन हो है। वैशेषि शारग में जो परिगा नामफ गूए के अन्तर्गन इनकी गसाना को है, यह इन्हें पारिभापित गुए नाम दिया गया है, अर्यात् वह भाक (भोपचारिक) प्रयोग है। उनसे इनके जातिवाचर दाम होने में फोई भन्तर नहीं आाता। अनुवाद-(भिन्न-भिस्न पदाथों" में विदयमान) गुस, निया तथा मदुसदातमर संशामों के धारतव में (स्वर्यतः) एक रप होने पर भी वालम के भेद सी (उनमें) भेद सा प्रतोत होता है, जंत एक हो मुस राइग, द्पस तथा संग मदि आातम्बन भेर से मिनन-भिन्न प्रतीत होने लगता है। प्भा-पद गुगलप, नियारूप औौर मंशारुप उपाधियों को गुकेत का विपम माना गया है। किन्तु भिनन-२ वस्तुमीं में सुकरादि रुप मिन्न है; बैगे वद दूप और धीनी मे शुावसं भिस र है, तब इनमें मेफेन मानना कमे सम्मय है,? मे शुबमादिं विविम व्यतित ही है, इनमें संकेत मानने मे वही धानस्व मोर सपगिपाद दोष होगा जो व्यकति में संवेत मानने में पापक है। इससे रामाधान रप में पन्मसर 'तुग्"".मानम्बननेशम्' इत्पदि पहते हैं। ममिशार यह है कि सब्र सुशप पदार्मो- पासर, दूध सथा मोनी आदि में रहने यापा शुक्त ऊुएा एक ही है. उनमें फोई वास्मयिक भेद नहीं। मेवल वाधय के भेर मे ही भिम् २ परशो में रे माो 'नुपस' में मिसता भी प्रतीत हो रही है, नैमे एक शी मुद को जब नमवार में, दवख में भपवा संस में ऐेगा जाता है सो यह प्रनितिम्व के धपारों की निन्या के कारस पपरियनित होने हए मी मिन्न सा पीव होने सगता है। जा सुकगाि
नहों। सर्वेत्र एंररप हो दै तो इनरो उपापि मानकर मधेत प्रशा में मोई मार्पात
अनुवाद-(भो्गांगक का मन है (ि) हिम दुम्म तमा डाव पाहि में रये पाने सुस्सावि मुला वातुनः मिन्न-निम् है। उन मिन्न-निम्न सुश्न गूलों में जिसरे कारत (दंद्यरोन) यह युकर है, 'यह भी सुशन है इग प्रफार का समान अमम्यबदार (पभिमानं) और प्नोनि उत्तम होती है, यह सुशराम पाररि गामान्य या नात है। इसो प्रार गुड़ मोर माय्त शदि को (भिम्नमित्र) पार्पपणा में पापत्य भ्रारि
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द्वितीय उल्लास:
शब्देपु च प्रतिक्षणं मिद्यमानेपु डित्थादयर्थेपु वा डित्थत्वाद्यरतीति सर्वेपां शव्दानां जातिरेव प्रवृत्तिनिमित्तमित्यन्ये। तद्वान् अपोहो वा शब्दार्थ: कैश्चिदुक्त इति प्रन्थगौरवभयात् प्रकृता: नुपयोगाच्य न दर्शितम। सामान्य है। और इसी प्रकार वालक, वृद्ध तथा शुक आदि के द्वारा उच्चारित, (भ्रतएव भिन्न-भिन्न) 'डित्य' आरदि शब्दों में - अ्रथवा प्रतिक्षणा बदलते हुए (बाल्य -. काल, योवन आदि में परिवतित होते हुए अथवा प्रतिक्षए वृद्धिह्वासपुक्त)-' 'डित्थ' आादि व्यक्तियों में-डित्यत्व आदि सामान्य है। इस हेतु समस्त शब्दों का संकेत- विषम (प्रवृत्तिनिमित्त) जाति ही है-ऐसा कोई (मीमांसक) कहते हैं। प्रभा-जाति, गुएा, करिया तथा यहच्छा ये चार उपाधियाँ हैं जिनमें शब्द का संकेत किया जाता है। शुक्लादि गुए भिन्न भिन्न आधारों में भी 'वस्तुतः" एक ही है अतः उनको उपाधि मानकर संकेतग्रह किया जाना सम्भव है। इस बाताकोः मीमांसक स्वीकार नहीं करते। आचार्य मम्मट ने 'जातिरेव वा' कारिकांश से उन्हीं, के मत का निर्दश किया है। उनका कथन है कि हिम, दुग्ध तथा शह् आदि में रहने वाला शुक्ल गुा भिनन भिन्न है और उसे एक मानकर सामान्य उपाधि नहीं कहा जा सकता तथ. उसमें संकेतग्रहण सम्भव ही नहीं है। अतः भिन्न भिंनन शुक्ल- .? '
गुरों में रहने वाली शुक्लत्व जाति माननी चाहिये। उस घुक्लत्व जाति में ही सकेंत प्रहं होता है, इसलिये कोई आपत्ति नही। इस प्रकार गुड़ तथा चावल आदि की पाककरिया भिल्ष भिन्न हैं किन्तु उनमें पाकत्व जाति तो है। संज्ञा शब्दों में भी सामान्य रहती ही है; जैसे-बालक, वृद्ध और झुक आदि के बोले हुए 'राम रांम' शब्द भिन्न भिन्न हैं, उनमें ही रामत्व जाति है। अथवा यंदि समान्य या 'जाति अ्रर्थ का ही धर्म है तो जिस पिण्ड का नाम डित्य आदि रखा जाता है वह पिण्ड बाल्य, योवन तथा वुद्धत्व में भिन्न भिन्न है या कहिये कि शरीर तो प्रतिक्षण' परि- वर्तनंशील है, अतः एक प्रतीत होने हुए भी क्षए २ में भिन्न ही है; इसीलिये डित्य संज्ञक व्यक्तियों में 'डित्थत्व नामक सामान्य रहती है। इस प्रकार 'नित्यमेकमनेका- नुगतं सामान्यम्' इस लक्षण वाली सामान्य है जो गुएा, निया तथा संज्ञा के विषय में सर्वन विद्यमान है और सामान्य या जाति ही शब्दों की प्रवृति का निमित है।' टिप्पणी-मीमांसक के मतानुसार जाति ही पदार्थ है। प्रत्येक शब्द_जाति या सामान्य का हो वाचक है। 'गामानय' इत्यादि मे 'गाम्' का अरथं 'गोत्व' ही होता है किन्तु जाति से व्यक्ति का आ्रक्षेप हो जाता है। अतः व्यक्ति का आानयनादि होता है। जाति से व्यक्ति का आक्षेप कैसे हो जाता है, यह १३ सूत्र की व्याल्या में।: स्पष्ट किया जायेगा। अनुवाद्-जाति-विशिष्ट व्यक्ति (तद्वान्=जातिमान्) : अयया-भपोह (पतदुव्यावृत्ति) ही शब्दार्थ है यह किन्हीं (कमशः प्राचीन नयायिक और बौद्ध)-ने कहा है। इनका प्रन्थ विस्तार के भय से तथा प्रस्तुत विषय में उपयोग न होने के? कारस यहाँ विवेचन नहीं किया (न साघफवाधकदर्शनेन दशितम)।
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काव्यप्रकाश:
गुराक्रियायटटच्छ्ानां वस्तुत एकरूपासामध्याश्यभेदादू भेद इव लच््यते, यर्थकस्य मुखस्य खड्गमुकुरतैलाद्यालम्चनभेदात्। हिमपय: शद्वाद्यापयेपु परमार्धतो भिन्नेपु शुक्लादिपु यद्वशोन शुप्ल: शुकल इत्याद्यभिन्नाभिधानप्रत्य योत्पत्तिस्तच्छुक्लत्वा दिसामान्यम्।, गुडत- एडला दिपा का दिष्वेवमेव पाकत्वादि। वालवृद्धशुकाद्य दीरितेपु डित्यादि- परममहत् परिमाग वाला कहा गया है अर्ात् सवसे बड़ा परिमास परममहत् है। वैधेपिक की दृष्टि से यह गुए है अतः परममहृत् शब्द भी गुरावाचक होगा। इस शङ्का के समाधान के लिये ग्रन्थकार ने 'परमाण्वादीनां .... गुसत्वम्'।, इत्यादि कहा है। जिसका भाव यह है कि परमाणृत्व आदि प्रासप्रद धर्म है, पतः परमाए आदि शब्द वास्तव में जातिवाचक ही हैं। वैशेषिक शास्त्र में जो परिमाए नामक गुए के अन्तर्गत इनकी मएना की है, वह इन्हें पारिभाषिक गुए नाम दिया गया है, अर्यात् वह भाक (औपचारिक) प्रयोग है। उससे इनके जातिवाचक शब्द होने मैं कोई अन्तर नहीं आता। अनुवाद-(भिन्न-भिन्न पदार्थों में विद्यमान) गुए, किया तथा मद्च्छात्मक संज्ञापों के वास्तव में (स्वरूपतः) एक रूप होने पर भी आथय के भेद से (उनमें) नेद सा प्रतोत होता है, जैसे एक ही मुस सडग, दर्पख तथा तैल भादि मालम्वन नेव से भिन्न-भिन्न प्रतोत होने लगता है।
माना गया है। किन्तु भिन्न-२ वस्तुओं में शुक्लादि रूप भिन्न२ है; जैसे यह् दूध 1 प्रभा-यहाँ गुगारूप, वियारूप और संज्ञारुप उपाधियों को संकेत का विषय
मौर चीनी के शुवलवसं भिंन २ हैं, तब इनमें संकेत मानना कसे सम्भव हैं? ये, छुंक्लादि विविध व्यकति ही हैं, इनमे संकेत मानने से दही ्नन्त्य, औौर व्यभिचार दोष होगा जो व्यक्ति मे संवेत मानने में वाधक है। इसके समाधान रूप में ग्रन्धकार 'गुए' .. आालम्बनभेदात्' इत्यादि कहते हैं। अभिप्राय यह है कि सब शुक्ल पदार्थों- यह्न, दूध तथा चीनी आदि में रहने वाला 'शुकल गुख एक ही है, उनमें कोई वास्तविक भेद नहीं। केवल आधय के भेद से ही भिन्न २ पदार्थो में रहने वाले 'शुक्ल' में भिन्नता सी प्रतीत हो रही है, जैसे एक ही मुस को जब तलवार में, दपए में श्रथवां तल में देखा जाता है तो वह प्रतिबिम्ब के साधारों की भिनता के कारंए अपरिवतित होते हुए भी भिन्न सा प्रतीत होने लगता है। जब शुक्तादि स्वेंश्रं एकरप ही है तो एनको उपाधि मानकर संकेत ग्रहण में काई भापति नहीं । !अनुवाद- (मोमांसक का मत है कि) हिम, दुग्ध तथा शद्ड आदि में रहने वाले शुकसादि गुस वस्तुतः भिन्न-भिन्न हैं। उन भिन्न-भिन्न धुंवल गुखों में जिसफे कारस (पद्बशेन) यह शुकल है, 'वह भी युक्त है' इस प्रकार का समान, शव्दम्पवहार (सभिधानं) और प्रतीति उत्पन्न होती है, वह युंक्तत्व आदि सामान्य मा जाति है। इसी प्रकार गुड़ औौर चाघल आदि सो (निल-भिन्न) पाककरियां में पाकत्व मदि
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द्वितीय उल्लास:
शब्देपु च प्रतिक्षगां मिद्यमानेपु डित्थाद्यर्थेपु वा डित्थत्वाद्यस्तीति सर्वेपां शब्दानां जातिरेव प्रवृत्तिनिमित्तमित्यन्ये। तद्वान् पोहो वा शब्दार्थ: कैश्चिदुक्त इति ग्रन्थगौरवभयात् प्रकृता नुपयोगाच्च न दर्शितम्। सामान्य है। और इसी प्रफार वालक, ृद्ध तथा शुकु आदि के द्वारा उच्चारित, (अतएव भिन्न-भिन्न) 'डित्य' आदि शब्दों में - अरथवा प्रतिक्ष बदलते हुए (वाल्य -: , काल, योवन आदि में परिवर्तित होते हुए अथवा प्रतिक्षस बुद्धिह्ासयुक्त) 'डित्य' आदि व्यक्तियों में-डित्यत्व आदि सामान्य है। इस हेतु समस्त शब्दों का 'संकेत- विषय (प्रवृत्तिनिमित्त) जाति ही है-ऐसा फोई (मीमांसक) कहते हैं। प्रभा-जाति, गुए, करिया तथा यहच्छा ये चार उपाधियाँ है जिनमें शब्दं का संकेत किया जाता है। युक्नादि गुा भिन्न भिन्न आधारों में भी वस्तुतः एक ही है अतः उनको उपाधि मानकर सकेतग्रह किया जाना सम्भव है। इस बोत को। मीमांसक स्वीकार नही करते। आचार्य मम्मट ने 'जातिरेव वा' कारिकांश से उन्हीं के मत का निर्देश किया है। उनका कथन है कि हिम, दुग्ध तथा शह्ध आदि में रहने वाला शुक्ल गुए भिन्न भिन्न है और उसे एक मानकर सामान्य उपाधि नहीं कहा जा सकता तथ, उसमें सकेतग्रहणा गम्भव ही नही है। अतः भिन्न,भिन्न शुंक्लं, गुगों में रहने वाली शुक्लत्व जाति माननी चाहिये। उस शुक्लत्व जाति में ही संकेंतग्रह होता है, इसलिये कोई आपत्ति नही। इस प्रकार गुड तथा चावल आदि की पाकत्रिया भिन्न भिन्न है किन्तु उनमें पाकत्व जाति तो है। संज्ञा शब्दों में भी सामान्य रहती ही है; जैसे-बालक, वृद्ध औोर शुक आदि के बोलें हुए 'राम राम' शब्द भिनन भिन्न हैं, उनमें ही रामत्व जाति है। अथवा यदि समान्य या जाति अररथ का ही धर्म है तो जिस पिण्ड का नाम डित्थ आदि रखा जाता है वहं, पिण्ड बाल्य, यौवन सथा वृद्धत्व में भिन्न भिन्न है या कहिये कि शरीर तो प्रतिक्षण परि- वतनशील है, अतः एक प्रतीत होते हुए भी क्षमा २ मे भिन्न ही है; इसीलिये डित्थे संज्ञक व्यक्तियों में 'डित्थत्व नामक सामान्य रहती है। इस प्रकार 'नित्यमेकमनेका- नुगतं सामान्यम्' इम लक्षस वाली सामान्य है जो गुए, किया तथा सज्ञा के विपय में" सवत विद्यमान है और सामान्य या जाति ही शब्दों की प्रवृति का निमित्त है।", "दिप्पणी-मीमांसक के मतानुसार जाति ही पदार्थ है। प्रत्येक' शब्द ,जाति या सामान्य का ही वाचक है। 'गामानय' इत्यादि में 'गाम्' का अर्थ "गोत्व' ही होता है किन्तु जाति से व्यक्ति का आ्क्षेप हो जाता है। अतः व्यक्ति काआ्नयनादि होता है। जाति से व्यक्ति का आक्षेप कैसे हो जाता है, यह १३ सूत की व्यास्या में।.' स्पष्ट किया जायेगा। अनुवाद्-जाति-विशिष्ट व्यक्ति (तद्वान्=जातिमान्) -अथवा संपोह (भतद्व्यावृत्ति) हो शब्वार्थ है यह किन्हीं (कमश. प्राचीन नैयायिक, धोर बौद्ध)- ने कहा है। इनका ग्रन्थ विस्तार के भय से तथा प्रस्तुत विपय में उपयोग न होने के फारए यहाँ विवेचन नहीं किया (न साधफवाधकदर्शनेन दशितम्)।
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काव्यप्रकाश: 44
i परभा :- (१) तद्वान-प्राचीन नैयायिको का विचार है कि न व्यक्ति में शब्द की शक्ति है, न जाति मात्र में; क्योंकि यदि व्यक्ति में शक्ति या संकेत माना जाये तो आनन्त्य तथा व्यभिचार दोप आते हैं और जांति में शक्ति मानी जाये तो व्यंकिकी प्रतीति नही हो सकती, इसलिए जाति-विशिष्ट व्यक्ति में शक्ति है तथा व्यक्ति विशेष को न लेकर सामान्य रूप से जातिमान् ही शब्द का अर्थ है। ॥। pis (२) अपोह :- बौद्ध दार्शनिकों का मत है कि व्यक्ति या जाति शब्दार्थ नहीं हो सकता, क्योंकि व्यक्ति में तो आनन्त्यादि दोप सर्वसम्मत ही हैं औ्रर जाति ! या 'सार्मान्य' नामक जो भावपदार्थ नैयायिक आदि ने माना है एक तो वह"नित्य हो ही नहीं सकता; क्योंकि समस्त वस्तु ही क्षणिक हैं, दूसरे मो व्यक्तियों के अ्तिरिक्त ऐरे किसी गोत्व नामक भाव पदार्थ की वाह्य जगत् में प्रतीति नहीं होती जो समस्त गो व्यक्तियों में समान रूप से रहता हो। जब समान्य या जाति का अभाव ही है तो उसमें शक्तिप्रह कैसे हो सकता है ? फिर पदार्थ क्या है? संङ् त- ग्रहं का विषॅय कया है? अपोह अर्थात् अतद्व्यावृत्ति रूप अर्थ ही संक्कृत का विषय है। जय हम गो शब्द का प्रयोग करते हैं तो गो के अतिरिक्त (भगौ) समस्त पदोर्थों की व्यावृत्ति हो जाती हैं। 'यह गौ है' इरका अर्थ होता है कि समस्त गोभिन्न अर्थ.अर्थात् अस्वादि से यह भिन्न है। ये गोभिस (अगौ) अर्थ ही अतद (वहं अर्यात गौ नहीं) हैं। गौ शब्द से इन सब को हटा दिया जाता है यही है अगोव्यावृत्ति प्रथवा अतद्व्यावृत्ति; 'इसे ही कहते हैं-प्रपोह, और यही है, शब्द के सङ्त का विषय या प्रवृत्िनिमित । यह अतद्व्यावृति रूप अर्थ वस्तुतः निपेघा-" त्मक है, भावात्मक नहीं, इसे भ्रान्ति से बाह्य जगत् में विद्यमान भाव पदार्थ मान लिया गया है।" टिप्परणी-सद्त,तित अर्थ क्या है ? इस विषय में आचार्य मम्मट ने निम्न मत प्रस्तुत किये हैं :- (१) महाभाप्यकार-जाति, गुख, मिया तथा यहच्छा-ये चार उपाघियां सङ्कतित अथ है। (२) मीमांसक-केवल जाति, (३) प्राचीन नैयायिकजाति-विशिष्ट व्यक्ति, (४) बौद्ध-प्रपोह। इनके अतिरिक्त केवल. व्यक्तिवाद का भी उल्लेस किया गया है, जो नव्य नैमायिक या मत है।, इनमेंसे मम्मट का अभिमत कौन सा मत है ? इम पर व्यारयाकारों ने विधार किया है। नरसिहठयकुर के अनुमार व्यक्ति पक्ष ही विचारसह है (तस्माद, व्यक्तिपक्ष.,एव श्षोदकमः) भ., वामन ने महाभाष्यकार के मत घो ही मम्मट का मिप्रेत बतलाया है। जिसका आधार ये युक्तियां है-मम्मट ने (१) प्रथम उल्लास में "वुर्षः वैयाकरणं :... तन्मतानुसारिभिरन्यरपि"-इम कथन द्वारा यह 'प्रति- पार्दित किया है कि अलङ्कारिक आचा्य सामान्यत. व्याकरस के मन्तव्यो का अनुसरग करते हैं। (२)महांभाध्यकार के जात्यादिवाद बा विस्तार से विवेचन कियाँ है तथा उसमें सम्भावित भाक्ेषों का निराफरगं भी किया है। (३) दशम.
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द्वितीय उल्लास:
(१'१) स मुख्योऽर्थस्तन्न मुख्यों व्यापारोऽस्याभिधच्यते ॥८॥ l. l :. :स इति साक्षात्सङ्कतितः। अप्स्येति शंब्दस्य। उल्लास मे जाति आादि चार पदार्थ के आधार, पर विरोध अलद्दार के दस भेद किये हैं। (४) जातिवाद की व्याख्या के अन्त मे 'इत्यन्ये' तथा जातिविशिष्टवाद और अपोहवाद के साथ 'कश्चिदुक्तः' आदि शब्दों का प्रयोग किया है; किन्तु जात्यादिवाद के अरन्त में नही। (५) अपने शब्द-व्यापार-विचार नामक ग्रन्थ में स्पष्ट ही जात्यादिवाद की स्थापना की है। वस्तुतः महाभाप्यकारोक्त मत में ही - आाचार्य मम्मट का स्वरस है; किन्तु यहां मम्मट के मत को निर्धारित करने के लिय युक्तियों की आवश्यकता नही। मम्मट ने तो 'सङ्कतितरचतुभेदो जात्यादि: इस कारिका में स्वमत का निर्देश करके उसकी विस्तार से व्याख्या की है तथा स्वकथित चतुविध प्रवुत्तिनिमित में भाष्यकार की सम्मति दिखलाई है। अनुवाद्-यह (साक्षात् सङ़कतित) अर्थ ही मुख्य अर्थ (कहा जाता)' है। "उस साक्षात् सङ्कतित अर्थ के विषय में (तप्रेति विषय सप्तमी) इस (शब्द) फा "जो मुख्य व्यापार या वृति है वह अभिधा कहलाती है। (कारिका में) सः' (वह) का अभिप्राय है-साक्षात् सङ्कतित और अस्य (इसका) का अभिप्रीय है-शव्व का । (११) प्रभा :- (१)कुछ विवेचकों का विचार था कि वाच्य, अरथ के समान चतुर्थ अर्थ भी है जिसे मुस्य अर्थ कहते हैं। सक्ष्य तथा व्यङ्गघ - आचार्य मेम्मट उनका समाधान करते हुए बतलाया है कि वह साक्षात्संकेतित श्रर्थ 'ही मुख्यार्थ 1, कहलाता है। प्रथम प्रकट होने के कारण ही वह मुस्य अर्थ है जैसा वि कहा भी है-"शब्दव्यापारात् योर्डर्योऽव्यवधानेन गम्पते सोडर्यों मुख्यः स हि यथा सर्वम्यो हस्तादिम्योऽवयवेन्य: पूर्व मुखमवलोकयते तथा सर्वेम्यः' प्रतीय मानेम्योऽर्यॅभ्यः पूर्वमयगम्यते तस्मात् मुखमिव मुस्यः इति 'शाखादिभ्यो यंः (५.३.१०३) इति पारि निसूत्रेण यप्रत्यय: ।". (२)साक्षातसंकेतित अर्थ में जो शब्द का किसी प्रकार की'बाघा आदि के बिना मुख्य व्यापार है, वही अभिवावृत्ति कहलाती है। इसे शक्ति कहते भी कहते हैं। शक्ति और संकेत शब्दों का भी कही कही समान रूप से व्यवहार किया जाता है। वस्तुतः दोनों में भेद है 'इस शब्द से यह अरय समझना चांहिये' (अस्मात् पदादयमर्थो बोद्धव्यः) इस प्रकार की मान्यता ही संकेत है। यह संकेत शक्ति का साहक है। शक्ति या अभिघा वह व्यापार (वृति) है, जिससे साक्षात् संकेतित अ््थ का बोघ होता है यया गो 'शब्द का सास्नादिमान् अर्थ में सङ्कतग्रह होने के पश्चात् गो शब्द से सङ्गतित गोस्प अर्थ की प्रतीति होती है। इस प्रतीति का जनक, शब्द का
'अरंह है-' व्यापार सभिंधा या शक्ति कहलाता है। अतः 'पक्ति' सक्कृत् नही अपितु स भ्कत
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५४ 1 कांव्यप्रकाश:
- (१२) मुख्यार्थवाधे तद्योगे रूढितोऽथ प्रयोजनात् । अन्योडर्थो लक्ष्यते यत् सा लक्षणारोपिता क्रिया ॥ह।
'सङ्भ' तग्राह्यं' शवत्याख्यपदार्थान्तरमभिधा'। कहीं-कहीं अ्भिधा, लक्षरण और स्यञ्जना तीनों को ही शब्दशक्ति (यां शक्ति) कहा गया है (तिस्रः शब्दस्य शत्तयः सा० द०२.३) वहाँ 'शक्ति' शब्द 'वृति' शब्द का समानार्थक है।" 1. अनुवाद-मुस्य अर्थ का बाघ होने पर औरउस (मुख्यार्थ) के साथ + सम्बन्ध (योग) होने पर प्रसिद्धि (रूढि) से या प्रयोजन से जिस वृति के द्वारा (यत् यपेत्यर्थकमव्ययम्) अ्रन्य अर्थ की प्रतीति होती है, वह (शब्द में) कल्पित (प्ारोपित) वृत्ति या व्यापार (पिया) लक्षणा है। (१२) 1 *,4 4 प्रभा-वाचक शब्द के निरूपण के पश्चात् लाक्षशिक शब्द का स्वरूप बतलाना है अतएव प्रथम लक्षणा का स्वरूप दिखाते हैं। शब्द के जिस व्यापार - द्वारा मुख्य से भिन्न अर्थे लक्षित होता है वह लक्षणा वृति कहलाती है (अन्योड़यों लक्यते यत् सा लक्षरणा) यही लक्षणा का स्वरूप है, परिभाषा या लक्षस है। अभिधा वुति से इसका भेद प्रकट करने के लिये 'आरोपिता क्रिया' ये शब्द जोड़े गये हैं।, इन शब्दों का वृत्ि में शब्दव्यापार: (=करिया) सान्तरार्थनिष्ठः (-आरोपिता)-यह अर्थ किया गया है। अधिकाश टीकाकारो के अनुसार इसका भाव यह है कि लक्षणा एक ऐसा व्यापार है जो साक्षात् रूप से वाच्यार्थ मे रहता है; किन्तु परस्पर सम्बन्ध से शब्द में रहता है। उदाहरसाथं "गङ्गायां घोषः" में 'गङ्भा' शब्द से अभिया वृर्त्ति द्वारा 'गङ्गाप्रवाहः' अर्थ का बोध होता है। यही चाच्यार्थ है जो 'गङ्गातट' को लक्षित करता है। इस प्रकार लक्ष्यार्थं (गङ्गातट) के वोधन का व्यापार वस्तुतः वाच्यार्थ (गङ्गाप्रवाह) में है, तथापि वाच्यार्य के धर्म - (व्यापार) व शब्द में आरोप कर लिया जाता है तथा शब्द को लाक्षसिक कहा जाता है अतः लक्षणा शब्द का आरोपित (Superimposed) व्यापार है। इस व्याख्या के लिये 'सान्तरार्थनिष्ठ' शब्द की व्युत्पत्ति मे क्लिप्टं कल्पनाएं भी की गई हैं। किन्तु काव्य-प्रकाश की पदन्योजना एवं (मशिवयचन्द्र आदि की) प्राचीन टीकाओं से यह अर्थ दूर चला गया प्रतीत होता है। वस्तुतः प्रभिधा शब्द का मुस्य व्यापार है, उसकी लोक प्रसिद्ध शक्ति है वह साक्षात् सद्दतित अर्य का बोध कराती है। किन्तु कभी कभी मुयार्थ का वाघ तथा उससे सम्बन्ध होने पर रुढि या प्रयोजन के आधार पर शब्द में एक अमुख्य व्यापार की कल्पना कर सी जाती है। वह सब्द का साक्षात् (मुख्य) व्यापार नही होता; वर्योंकि यह गब्द का सान्तरार्थ निष्ठ व्यापार है। शब्द प्रयमतः मुस्य अर्य का बोध कराता है और उसके बोधन में बाघित होकर अन्य (लक्ष्य) अ्ररथं का बोध कराता है। लक्ष्य-प्रर्य-सान्तर= मन्तर या व्यवयान सहित= व्यवहित है; कयोंकि मुस्याय बाघ आदि होने पर शब्द से
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द्वितीय उल्लास:
उसका बोध होता है। अतः व्यवहित अर्थं (-लक्ष्य-सर्थं) का बोध कराने वाले व्यापार को शब्द का आरोपित व्यापार कहा गया है। इस प्रकार शब्द के मुख्य-एवंलोक प्रसिद्ध व्यापार (अ्रभिवा) की तुलना में लक्ष्यार्थ कल्पित या आरोपित, शब्द व्यापार है। सानन्तरार्यनिष्ठ := अन्तर व्यवधान तेन राह वरतते इति सान्तर :: (मुख्यार्थवाधा- दयुपस्थित्या) व्यवहितो योर्ऽ्र्यः लक्ष्यरूपः, तन्निष्ठ := तद्विपयक (तद्बोधकः) इत्यर्थः। मुख्पार्ययाध-मुस्यार्थबाघ, मुस्यार्थयोग (तद्योग) तथा रूढ़ि अ्थवा प्रंयोजन से तीन समुदित रूप से लक्षणा के हेतु हैं। जैसा कि ग्रन्थकार ने २५ सूत्र की व्याख्या मे स्वयं हो कहा है-"मुख्यारयंबाघादिप्यं हेतुः"। किन्हीं 1के भतमे मुख्या यंबाघ का अभिप्राय यह है कि शब्द का जो वाक्यार्थ हे वह अनुपपंत्र होजाये (अन्वयानुपपत्ति)। किन्तु यह अरथ मानने पर 'काकेम्यो दधि रक्ष्यताम, इत्यादि' में लक्षणा न होगी; क्योंकि यहाँ वाच्यार्थ है-'कौमो से दही की रक्षा करना'-इस भर्थ में अन्वय बन ही रहा है. अन्वयानुपपत्ि नहीं। फिर भी यहाँ 'काक' शब्द"की दव्युपघातक में लक्षणा मानी जाती है तथा इस वाक्य का यह अभिप्राय (तात्पर्म) माना जाता है-"कोये, कुत्त आदि जो दध्युपधातक (दही को विगाड़ने वलि) हैं उनसे दही के रक्षा करना"। इस लिये 'मुख्यार्थंबाच' का अर्थ अन्वयानुपपति नही, अपि तु तात्पर्यानुपपत्ति करना चाहिये (मि०, नागेसभट्ट, परंमलघुमञजूव) । तात्वर्व न बन सकना या सात्पर्यानुपपति लक्षणा का मूल कारण है, यह लक्षाबीज कहा गया है-'तात्पर्यानुपपतिः लक्षसाबीजम्'। मुरयायंयोग-शब्द से जिस अन्य भ्रर्थात् अमुख्य भर्थ की प्रतीति होती है उसका मुख्य अर्थ से सम्बन्ध होता है। वह सम्बन्ध सामीप्य आदि किसी "प्रकार का हो सकता है। -- रूदितोऽय प्रयोजनात्-कहीं रूदि अर्थात् प्रसिद्धि के कारण बब्द"से भमुख्य अ्रर्थ की प्रतीति होती है और कही किसी विशेष प्रयोजन को ध्यान में रख कर लाक्षणिक शब्दों का प्रयोग किया जाता है। यहाँ पर नरसिंहठवकुर आदि व्यास्याकारों का मत है कि यहाँ मम्भट को 'रूढिलक्षखा और प्रयोजनलक्षणा' दो भेद करना सभीष्ट है; किन्तु अन्य व्याख्याकार इससे सहमत नही। यह मी द्वप्टव्य है कि रूढि अथवा प्रयोजन लक्षणा का मुख्य हेतु है, इसी से लक्ष्यार्थ का निर्धारण होता है अन्यथा मुख्यार्य-वाघ होने पर मुख्य-अर्थ से सम्बद्ध किसी भी अरय मे . लक्षणा होने लगे। 'गङ्गाया घोपः' आदि में घोष शब्द की मेढक' आदि में ही वैयों न लक्षणा हो जाय ? - -- टिप्पखी :- (i) लाक्षणिक शब्दों का प्रयोग तो मानव ने भापा शान की प्रारम्भिक अवस्था मे ही करना आरम्भ कर दिया होगा किन्तु 'लकसावृति' का भन्वेपए भी अ्त्यन्त प्राचीन है। विश्व के प्रथम भाषा-वैज्ञानिक नियककार यास्क
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काव्यप्रकाश:
ने श्राह्मणा ग्रन्थों में 'भाक्त' प्रयोगों का उल्लेर किया है-बहुभक्तवादोनि हि 'ब्राह्मशानि भर्वन्ति'। यह 'भक्ति' या मौणवृत्ति ही आगे चलकर लक्षणा के रूप में विकसित हुई। मीमांसा सूनो तथा गोत्म के न्याय सूनों में भी लक्षणा के बीज मिलते हैं। कालान्तर में न्यायादि दर्शन तथा व्याकरण में इसका अधिकाषिक विवेचन होने लगा। प्राचीन प्लङ्गारिको में उद्भट ने। 'गुणवृत्ति' के नाम से एक वुत्ति का उल्लेख किया था। आपार्य वामन के समय-तक लक्षरा का पर्याप्त व्रिवेचन हो चुका था, ऐसा प्रतीत होता है; क्योंकि काव्यालद्वारमनवृति में गोए तथा लाक्षाणक अर्थ को मिन्न भिन्न रूप मे बतलाया गया है साथ ही लक्षर अनेक : निमितो से होती है यह दिसलाते ,हुए-'सादृश्याल्लक्षखा चफ्रोकि:' (४-३-८) यह कहा गया है। ध्वनिवादी, आनन्दवर्धन ने, भक्ति, गुएवृति शादि शब्दों द्वारा लक्षणा का. उल्लेस किया है और लक्षणा के द्वारा 'ध्वनि' व्यङ्गध नही है-यह दिसलाया है। समाचार्य अभिनव गुप्त ने लक्षणा का स्वरप इस प्रकार प्रदर्शित किया ह- (:मु्यार्थ वाधादिसहफार्यपेक्षार्थ पतिभासनशक्तिलक्षणाशक्ति: (घ्वन्यालोकलोचग उद्योत, १) ।मम्मट, के लक्षणा के स्वरप-विवेचन में प्राचीन मती का प्रभाव है औोर एक वज्ञानिक विवेचन भी। प्राचीनों की अत्यानुपपत्ति तथा तात्पर्यानुपपत्ि आादि को आचार्य, मम्मट ने 'गुस्यार्थबाघ' में संकलित कर दिया, 'सहचरस' (न्यायसूत् FRTR-६१) इत्यादि, को तथा, प्राचीन अलद्गारिकों ब्न: t" अभिधेपेन सम्वन्धात् सादृश्यात्. समवायतः। वंपरीत्यात् क्रियायोगाल्लक्षला पञ्चया सता॥, 7: .इत्यादि ५ निमितों को तद्योगे (मुख्ययोगे) में समन्वित कर दिया और लक्षणा के विवध रूपों को ग्रहण करने के लिये 'रढितोऽय प्रयोजनात्' यह नृतीय पद समएा ·. के हेतु में सम्मिमित कर दिया। इस प्रकार यह लक्षगा का एक सर्वागीण लक्षणा निप्पन हो गया और वाद के विश्वनाथ कविराज जैसे साहित्य-विवेचकों को भी सम्मटके इस लक्षण की चाया ही देनी पढ़ी- 1: सुख्यार्थबाधे तय्युत्तो मयाज्योडय: प्रतीयते। ,रहः प्रयोजनाद्वाजसौ लक्षएा शक्तिरपिता ॥ (साहित्यदर्वख२,५), (ii) आरोपिता -- (भपिता राह०' द०)-मम्मट ने लक्षण को आरोपित फल्पित) वृत्ति कहा है। यह कत्पित वुत्ति है इसका या भिप्राय है? मीमांसक के मतानुसार 'अभिधा' शब्द की स्वाभाविक शक्ति है लंक्षखा 'अस्वाभाविक' है यही अय है। प्राचीन नैयायिक के अनुसार शक्ति या अ्रभिधा ईस्वरेच्छी से उदभावित है, किन्तु लक्षएंग मनुष्यकल्पित ह-पही भाव है। अ्न्यमतों के अनुसार 'अभिया' साक्षात् संकेतित अये को कहती है है अतः सरवं-सिद्ध सवपृति है सब्द का मुख्य व्यापार है; "किन्तु सक्षसा अमुस्य अ्रय को कहती है, अतः मारोपिता या कल्पिता वृति है।"
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कर्मणि फुशल इत्यादो दर्भप्रह्णादयोगाढु, गङ्गायां धोप इत्यादी च गङ्गादोनां घोपाद्याघारत्वासम्भवाद, मुख्यार्थस्य बाधे विवेचकत्वादौ सामीप्ये च सम्बन्धे, रूढितः प्रसिद्ध: तथा गङ्गातटे घोप इत्यादे: प्रयोगाद् येपां न तथा प्रतिपत्ति: तेपं पावनत्वादीना धर्माणं तथा पतिपाद्नात्मन: प्रयोजनाच्य मुख्येनामुख्यो लक्यते यन, स आरोपितः शदव्यापारसान्त- राधेनिष्ठो लक्षणा -- अ्््रनुवाद-'फर्म में कुशल है' इत्यादि (वाक्य) में कुशग्रहसा आदि का 11 सम्वन्य न होने से (अथवा कुशग्रहए सम्बन्वी योग्यता न होने से), गङ्गना पर घोसियों फो बस्ती (धोप) है, इत्यादि (वाक्य) में गङ्गा (प्रवाह) आदि, घोष आदि का आाधार नहों हो सकते, इस फारख (कुशाग्रहुल एवं प्रवाहरप) मुख्याथं का वाध हो जाता है (वाधे-बाध होने पर); विवेकशीलता (जो कुशग्राहक तथा चतुर दोनों में हैं) एवं (गंगा का तट के साथ) समीपता रूप सम्बन्ध है (सम्यन्धे-सम्बन्ध होने पर)। (फर्मरि कुशल.' में रुढि धर्थात् प्रसिद्धि से तथा ('गंगायां घोप.' में) गंगा तट पर घोध हैँ' इत्यादि कथन से जिन पवित्रतादि गुखों की वैसी (विशेपरूपेर) प्रतीति नहीं होती थी, उन (पवित्रतादि) गुसों की वैसी (विशेषरुंपेण) प्रतीति : कराने रूप प्रयोजन से-जो मुख्यार्थ से उपलक्षित (मुख्येनेति इत्यंभूतलक्षसे, तृतीया) अ्रमुख्य अर्य की प्रतीति होती है, वह व्यवहित अर्यात् असाक्षात् अर्य में रहने वाला (सान्तरार्थंनिष्ठ :- सान्तरो व्यवहितो योऽर्थः तनिष्ठः तद्विपयकः, कल्पित आरोपित) 'शब्द-व्यापार ही लक्षसा है। 'प्नभा-लक्षणणा के हेतु में-१ मुख्यार्थबाघ २. मुख्यार्थयोग तो 'सभी लक्ष्यीयों में समान है किन्तु कही तो रुदिहेतुक लक्षणा होती है, कही प्रयोजनंहेतुंक, अतः इस विषय मे विभाग है। इसी से ग्न्थकार ने साथ २ दो उदाहरणं, दिये, हैं। 'कर्मसि कुशलः' यह रूढि के कारण होने वाली लक्षणा का उदाहरस है। यहाँ लक्षणा की परिभाषा (लक्षण) इस प्रकार घटित होती है-कुशल शब्द का साक्षात् (मुख्य) अर्थ है-कुश या दर्भ नामक घास को लाने वाला (कुशान दर्भान् लाति इति) 'कर्म 'में कुशल है' यहाँ कुणा-ग्राहक रूप गर्थं सङ्गत नहीं होता। इस मुख्यार्थ का बाघ हो जाता है। इस असङ्गति का निराकरण करने के लिये यह शब्द 'दक्ष' या, चतुर' रूप लक्ष्यार्थ का प्रतिपादन करता है। कैसे ? कुशा के पत्ते बड़े तीक्ष्या 'होते है। वे लाने वाले के हाथ आदि को काट देते हैं अतः 'कुशोत्पाटन' या कुशानयन' के लिए एक विवेकशीलता की आवश्यकता है। वैसी ही विचेकशीलता किसी कार्य को भली-भांति करने के लिये भी अपेक्षित है। यही 'साधर्म्य' सम्बन्ध 'है। फिर दक्ष या चतुर अर्थ ही क्यों हो जाता है ? क्योंकि लोक में 'कुशल" बब्द, 'का 'दक्ष' या 'चतुर' अर्थ प्रसिद्ध (रढ़) है। इस प्रकार 'कर्मरि कुशलः" में कुशल शब्द की 'दक्ष' श्र्थं.में लक्षणा होती है।
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-7 काव्यप्रकांग:
(१३) स्वसिद्धये पराक्षेपः परार्थ स्वसमपसम। उपादानं लक्षसं चेत्युक्ता शुद्धंव सा द्विधा ।१०। गङ्गायां धोप :- यह दूरारा उदाहरणा प्रयोजनवती लक्षणा का है।' तथा हि-'गह्ायां घोपः' का सीघा सा अर्थ है-'गङ्गा पर धोप अर्थात् धोसियों को बस्ती है'। किन्तु गङ्गा शब्द का मुख्य अर्य, है जलधारा या प्रवाह और उसपर धोप !ग्राम हो नही सकता या कहिये कि वह घोप का आधार नही हो राकता; अंतः" मुख्यार्थ का वाघ हो जाता है तथा यहाँ प्रयोजन के कारण गङ्गा से सम्बद तट में सकार मानी जाती है-गह्ातट गङ्गा की वारा के रामीप है अतः गङ्गा के साथ तट का सामीप्य सम्वन्ध है। 'गङ्गा' शब्द से गङ्गा-तट का लक्षणानद्वारा बोध कराने मे प्रथोजन यह है कि इससे शीतता, पावनता आदि की प्रतीति होती है; क्योंकि गङ्गा में शीतता, पावनता है। यदि 'ङ्गा-तटे घोपः' सर्थात् 'ङ्भातीर पर घोष ' है ऐसा वाक्य-प्रयोग किया जाय तो शीतता-पावनतादि की वैसी प्रतीति नही होगी, गन्गा से दूर भी तो गङ्गातीर पर 'घोप' हो सकता है। जहा गङ्गा को कीतता- पावनतादि का कोई सम्बन्ध न हो। अतएव 'ङायां घोप' आदि में गङ्गाशब्द की गङ्गा -तीर में लक्षणा होती है। टिप्पणी :- (i) साहित्यदपसकार ने रूढि लक्षणा के 'कर्मणि कुशलः' उदाहरण को पयुक्त बतलाया है। उनका कथन है कि 'कुशल' शब्द, लाक्षणिक नहीं अपितु वाचक है। यद्यपि इसका व्युत्पतिलम्य अ्रर्य कुश-ग्राहक है तथापि इसका मुख्य अथ तो दक्ष या निपुस ही है। शब्द के दो प्रकार के अर्थ हैं-एक व्युत्पत्ति से प्राप्त होने वाला-व्युत्पतितम्य (etymological) और दूसरा व्यवहार से प्राप्त होने वाला प्रवुतिम्य (current)। व्युत्पत्तिलम्य अर्थ मुख्य नहीं होता अ्रपितु प्रवुत्तिलम्य अरयं मुस्य हुआ करता है। यदि व्युत्पत्तिलम्य अर्थ को ही मुख्य माना जायेगा तो 'गौसेते' इत्यादि मे भी लक्षणा होने लगेगी; क्योंकि 'गच्छति इति गोः' (गमेडोंः) इस प्रकार गो शब्द की व्युत्पत्ति होती है और गौ के सोते समय इस शब्द का प्रयोग वाघित हो जायेगा (साहित्यदपण २.५) । वस्तुतः माचार्य मम्मद ने जो 'कुशल' शब्द में लक्षणा मानी है इसमें एक परम्परा का मनुसरण किया गया है। उनसे पूर्व कुमारिलभट्ट ने यहां लक्षणा मानी थी तथा वाद में अ्नेक आचा्य कुशल, मण्डप आदि शब्दों मे लक्षणा मानते रहे। इस दृष्टिकोए से व्यत्पतिलम्य अ्रर्थ ही मुख्य होता है (ii) तथा प्रतिपादनातमनः प्रयोजनाच्च-उस प्रकार से प्रतीति कराने रूप प्रयोजन से । यहाँ 'तथा' की व्याख्या तीन प्रकार से की गई है। फलतः (क) तथा=विशेपतः, अर्थात् शौत्य-पावनत्वादि घने तीर में प्रतीति कराना, अथवा (स) जिस प्रकार गङ्गा में सैत्य-पावनत्वादि है उसी प्रकार तीर में प्रतीति कराना, अथवा (ग) शत्य पावनत्वादि के प्तिशय की तीर मे (किञ्च घोप में भी) प्रतीति कराना-प्रयोजन है। " अनुवाद-अपनी (अर्थात् शश्य या मुस्य अरथं को) सन्वयसिद्धि के तिये दूसरे (प्रमुख्य) अर्थ को उपस्यित करना उपादान (फहलाता) हूँ तथा दूसरे (प्रशप) (सोरादि) के लिये अपने (शब्दायं, प्रवाहादि) को सम्पित कर देना या त्यागना सक्षएा (कहलाता) है। इस प्रकार उपादान और लक्षएा दप से (इति) वह, दो प्रकार की उपादानसक्षणा तथा लक्षएलक्षसा) घुद्धा लक्षला ही कही गई हूँ। (१३)
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द्वितीय उल्लास: -4
'कुन्ता: प्रविशन्ति' 'यष्यः प्रविशन्ति' इत्यादौ, कुन्तादिभिरात्मनः प्रवेशसिद्धयर्थ खवसंयोगिनः पुरुषा: आत्िप्यनते, तत उपादानेनेयंलक्षया। गौरनुबन्ध्य इत्यादौ श्रुतिचोदितमनुबन्धनं कथ मे स्यादिति जात्या .. प्रभा-प्रर्थान्तरसंकमितवाच्यध्यनि आदि के विवेचन के लिये ग्रन्थकार ने लक्षणा के भेदों का निरूपण किया है। सर्वप्रथम लक्षणा के दो भेद है शुद्धा और गोणी। शुद्धा लक्षणा के भी दो भेद हैं-१. उपनदानलक्षणा तथा २. लक्षण- लक्षणा। उपादानलक्षणा वहाँ होती है जहाँ कोई शब्द सपने गुस्यार्य की सङ्गति के लिय स्वसम्बद्ध किसी अ्न्य अर् को प्रस्तुत कर लेता है जैसे-कुन्ताः प्विशन्ति। लक्षणालक्षा वहाँ होती है, जहाँ कोई शब्द अन्य अर्थ के लिये अपने अर्थं का त्याग कर देता है; जैसे 'ल्ायां घोप:' इत्यादि। यहाँ आचार्य सम्मट ने उपादान तथा लक्षण का स्वरूप वतलाकार ईन दोनों के निमित्त से होने वाली दो प्रकार की शुद्धा लक्षणा का निरुपण किया है। (१) उपादान का अर्थ है ग्रहण अतः उपादानलक्षखा मे कोई शब्द अपने अर्थका त्याग न करता हुआ तात्पर्य सिद्धि के लिये दूसरे अर्थ को प्रस्तुत कर देता. है। ; इस अभिप्राय से 'रदीपकार' ने कहा है-'स्वार्थापरित्यागेन परार्थलक्षसमुपा- दानम्' इसी से वैयाकरणों ने इसे 'अजहल्लक्षणा' या अजहत्स्वार्था वृति' कहा है। साहित्यदर्पगा कार ने इस अभिप्राय को स्पप्ट करने के हेतु कहा है ---! मुख्यायंस्पेतराक्षेपो वाक्यार्थेऽन्वयसिद्धये। स्यादात्मनोऽप्युपादानादेषोपादानलक्षख्ा ।। (साहित्यदर्पण २.६) (२) लक्षण का अपर्थ है-दूसरे का उपलक्षण ( परस्योपलक्षसम्) अ्ररथमा दूसरे अर्थ के लिये स्वार्थ का परित्याग (परार्थ स्वसमप सम्)। लक्षस-लक्षणा में कोई शब्द अपने अर्थ को त्यागकर अन्य अर्थ का उपराक्षक मात्र हो जाता है। इसी से 'प्रदीपकार' ने कहा है-'स्वार्यपरित्यागेन परार्थोपस्थापनं लक्षणाम्'। यही जहत्स्वार्था वृति या जहल्लक्षणा भी कहलाती है। साहित्यदर्पसकार ने इस भाव को निम्न प्रकार से दिखाया है- अर्परं स्वस्य याक्यारथ परस्यान्वमसिद्धये। उपलक्षसाहेतुत्वादेपा लक्षसालक्षणा ॥। (साहित्यदपस २.७) अनुवाद्-(उपादानलक्षणणा का उदाहरण) 'भाते आा रहे हैं' 'लाठियां आा रही हैं' इत्यादि वाकयों में (प्रवेशन किया में अन्यवयानुपपति के कारण) 'कुन्त' आदि के द्वारा अपने प्रवेश की सिद्धि के लिये पपने श्रथों से सम्बद्ध (कुन्त-धारी तथा यष्टिधारी) पुरुषों का ग्रहस किया जाता है। इस हेतु (ततः) स्वार्थ को न छोड़कर परार्य परहण करने के कारए (उपादानेन) यह उपादानलक्षला हूं। (मोमांसक निदिष्ट उपादानलक्षणा का उदाहरस) 'गौरनुबन्ध्यः' अर्थात् गौ फा पलम्भन करना चाहिये' इत्यादि (वाक्यों) में बेद-विहित (श्रतिचोदितम्)
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६० j 1 घरव्यप्रकाश:
व्यक्तिरात्षिप्यते न तु शव्देनो्यते 'विशेष्य नाभिधा ग्छेत्तीएशक्ति विशेपणे इति न्यायाद-इत्युपादानलक्षणा तु. नोदाइत्त व्या। नः हन् परयोजनमस्ति न.वा रूढिरियम व्यक्त्यविनाभावित्वात्त जात्या जयक्ति- रातिप्यत; यथा क्रियतामित्यत्र कर्त्ता, कुर्वित्यत्र कर्म, प्रविश पिएडीमित्यादो गहं भक्षये त्यादि च। पीनो देवदत्तो दिवा न भुड्क इत्यन्न च रात्रिभोजनं न लक्ष्यते। श्रुतार्थापत्त रर्थापत्तर्वा तस्य विपयत्वात्। आलम्भन मेरा (गोत्व जाति का) कसे सम्भव हं ? इस (मुस्यार्थबाध) 'हेतु से (इसि) गोत्वरूप जाति के द्वारा गोव्यक्ति का ग्राक्षेप कर लिया जाता हं, (गोव्यक्ति को) शब्द से (अभिधा द्वारा) नहीं कहा जाता; क्योंकि यह न्याय अर्थात् नियम हं कि विशेषण (गोत्वादि) के बोध कराने में जिसकी शक्ति क्षीसा हो गई है वह अभिधा विशेष को स्पर्श नहीं फरती अर्थात् विशेष्य या व्यक्ति को नहीं कह, सकती, (गच्घेत् यायात् स्पृशेत्-भ. वामन) । (सण्डन) यह उपादानलक्षणा का उदाहरण तो नहीं देना चाहिये; पर्योंकि यहाँ फोई प्रयोजन नहीं है; अथवा यह रूढ़ि भी नहीं है। यहां तो जाति द्वारा व्यक्ति का अनुमान फर लिया जाता है (आ्रक्षिप्यते); क्योंक जाति व्यक्ति के बिना नहीं रहती ('व्यवत्यविनाभाषी' व्यक्ति बिना न भवति इति) है! जैसे-'करिर्यताम्' किया जाय) यहाँ पर कर्ता (भवता आदि), 'कुरु' (करो) यहाँ पर कर्म" (फार्यम्) प्रादि; 'प्रविश' प्रचिष्ट हो, यहां गृहम्ं (घर में), 'पिण्डीम्' (चूरमा) यहाँ भक्षय (साग्रो) आदि का आक्षेप होता है। 'देयदत्त दिन में नहीं साता फिर भी मोटा है, यहाँ पर रात्रि में खाना - लक्षरा द्वारा नहीं प्रतीत्ष होता; क्योंकि रात्रि-भोजन (तस्प) की प्रतीति धतार्था- पत्ति या अर्थापति का विषय है। प्रभा-आाचार्य मम्मट उपदानलक्षणा का उदाहरस देते हैं-कुन्ताः प्रविशन्ति' 'यप्टयः प्रविशन्ति' आदि। कुन्त या यष्टि मे प्रवेशन-कार्य सम्भव नहीं; क्योकि प्रविष्ट होना चेतन का धर्म है अतः यहाँ मुख्यार्थ का बांध हो जाता है। कुन्त आदि शब्द अपने अर्थ की सक्कति के लिये अपने से सम्वन्य रसने वाले पुरुषों का स्राक्षप कर रोते हैं। 'कुन्त' का अरथ कुन्तधारी पुरु्प हो जाता है। यह 'कुन्त' "शब्द अपने अरथं को रसते हुए परार्थ का भी ग्रहण कर लेता है अत' यहां उपादान- लक्षणा है। कुन्तों की अधिकता का वाध कराना ही इसका प्रयोजन है। 'धतिखो 'यान्ति', 'काकेम्य: दवि रक्ष्यताम्' आदि भी इसके उदाहरय है। 'गोरनुवन्व्यः'- मीमासक लोग 'गौरनुवन्ध्यः' इत्यादि स्थलों पर उपादान सक्षणा मानते हैं। उनका अभिप्राय है कि गो' सब्द का साक्षात् अर्य गोहव (जाति) है और जब वेद में मो के पलम्भन का विधान किया गवा है तो गोत्य जाति मद 'सोचती है कि वेद में बिहित यह आलम्मन मेरा करो हो सकता है ? वब सपने भर्य
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द्वितीय उत्तास: [। ६१-
को मङगति के लिये लक्षणा द्वारा गौ व्यक्ति को प्रस्तुत कर देती है। यदि कहो कि अभियावृत्ि से ही यहाँ 'गो' शब्द गोनव्यक्ति का बोध क्यों नही करा देता, तो, इसका उत्तर यही है कि 'गो' शब्द प्रथमतः अभिधावृत्ति मे विशेपण अरथति गोत्व- का बोध कराता है। 'नागहीतयिशेपखा बुद्धिविशेप्ये चोपजायते' यह न्याय भी है।' इस प्रकार अभिया की शक्ति विशेषण के बोध में ही समाप्त हो जाती है औ्रौर अभिधा विशेष्य (व्यक्ति) का बोध नहीं करा सकती। जैसा कि विशेष्यम्०' इत्यादि न्याय भी है। अतः यहां उपादानलक्षणा है। 3 आचार्य मम्मट कहते है कि यहाँ उपादानलक्षणा नही हो सकती। यह ठीक। है कि यहाँ मुख्यार्ययाध और मुस्यार्थ से सम्बन्ध (तद्योग) है किन्तु लक्षणा रूढि या प्रयोजन से होती है; इनमे से कोई एक (अ्रन्यतर) लक्षणा का अनिवार्य हेतु है। यहां पर रूढि है न प्रयोजन। वस्तुतः यहाँ पर जाति से व्यक्ति का आ्रक्षेप हो जाता, है; वधोंकि जाति (गोत्वादि) व्यक्ति के बिना नही रहती अतः उसका आक्षेपकर लेती है। इस प्रकार नित्यप्रति के जीवन में भी या तो अरथ का आक्षेप होता है, जैसे 'कियताम्' के द्वारा सम्मुस स्थित कर्ता का; अथवा शब्द का आ्क्षेप होता है, जैसे (प्रविश' के द्वारा 'गृहम्' आदि गब्द का। इमी प्रकार वुद्ध मीमांसकों ने 'पीनो देवदत्तः दिवा न भुड्क' इत्यादि स्थल में उपादान सक्षणा द्वारा राषि-भोजन की प्रतीति मानी है। आ्रचार्य मम्मट का कथन है कि यहाँ 'रात्रि-भोजन' की प्रतीति लक्षणा से नहीं होती; अपितु कुमारिल के मत में थतार्थापति से और प्रभाकर के मत में अर्थापति मात्र से रात्रि-भोजन -- की प्रतीति होती है। इंत्यादि श्रुति है, जिसके द्वारा ज्योतिष्टोम याग मे गौ के अनुबन्धन (आलम्भन,हनन) का विधान किया गया है। इसमें गौ शब्द को मण्डनमिश्र ने उपादानलक्षणा के उदाहुरणरूप में प्रस्तुत किया है। यहाँ उसी का सण्डन आचार्य मम्मट ने किया है, यह भ० वामन का मत है। अन्य मतानुसार यहाँ मुकुलभट्ट की इस मान्यता का खण्डन है-"तस्ोदाहरसं गौरनुवन्ध्य इति।'.जातिस्तु व्यक्तिमन्तरेए यागसाघन- भावं न प्रतिपद्यते इति शब्दप्रत्यायितजातिसामर्थ्यादत्र जातेराधयभूता व्यत्तिराक्षि- पपते। तेनासौ लाक्षसिकी।" अभिधावृत्तिमातृका।" नह्यन प्रयोजनमस्ति-लक्षणा का प्रयोजन होता है -- मुख्य घर्थ में रहने' वाले किसी विशोप गुए या घर्म (attribute) की प्रतीति कराना; 'जैसे 'गङ्गायां घोप:' में गङ्भा शब्द के मुख्य अरथ (जलप्रवाह) में रहने वाले शत्व-पावनत्व आदि धर्मों को प्रतीति कराना लक्षणा का प्रयोजन है किन्तु 'गो' शब्द की गोव्यक्ति में लक्षणा मानने में तो कोई प्रयोजन नहीं; कयोंकि 'गो' शब्द का मुख्यार्यं गोत्व जाति है औौर उस (गोत्व) में कोई भी धर्म या गुए नहीं रह सकता (वैदेषिक आदि के अनुसार साामन्य अर्थात् जाति, समवाय और विशेष नामक पदार्थों में कोई, धन्य धम नहीं रहता)। न वा रुदिरियम्-रुदि लक्षणा वहां होती है जहां (१) कोई चब्द
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६२ ] काव्यप्रकार:
गङ्गायां घोप इत्यत्र तटस्य घोपाधिकरणत्वसिद्धये गङ्गाशब्द: स्वार्थ- मपयति, इत्येवमादी लक्षऐोनेपा लक्षणा। अपने मुख्य अर्थ मे भाषा में प्रचलित हो, (२)जब वह दूसरे (लक्ष्य) श्रर्थ मे रूद हो जाये तो अपने मुख्य अर्थ को छोड़ दे; जैसे 'कुशल' आदि शब्द हैं किन्तु 'गो' शब्द का गोलव जाति के अर्थ में कभी भापा में प्रचलन नहीं रहा और जव यह शब्द गोव्यक्ति का बोधक होता है तब भी अपने 'गोत्वजाति' रूप मुख्य अपर्थ को बिल्कुल छोड़ नहीं दता; क्योकि गोव्यक्ति में गोत्वजाति रहती ही हे इस प्रकार यहां रूदि लक्षणा नही हो सकती। (ii) 'पीनो देवदत्तः दिवा न भुङक' आदि मे भी मुकुभट ने उपादान लक्षणा मानी है। उसका सण्डन आचार्य मम्मट ने यहाँ किया है। अथवा स्वमत की पुष्टि के लिये अर्थापत्ि का प्रसिद्ध उदाहरण ही यहाँ दिखलाया गया है। (iii) शृतार्थापति और अ्रपर्ापत्ति- भीमांसक के मतानुसार अर्धापति एक पृथक् प्रमाण है। इसका साधन है अन्यथानुपपत्ि अ्रर्थात् जहां किसी वात को माने बिना (अन्यया) कोई प्रत्यक्षसिंद्ध बात नहीं वन पाती, अनुपपन्र या असद्भत रहती है; ऐसे स्थत पर उस पूर्व बात को अर्थापति द्वारा अनुमित या कल्पित कर लिया जाता है; जैसे दिन मे न साने वाले देवदत्त का मोटापन रामि-भोजन की कल्पना के बिना नही बनता अतः सर्यापति द्वारा 'रात्री-भोजन' का आक्षेप हो जाता है। अर्थापति के विषय में दो मत हैं (१) श्रतार्थापति-कुमारिल भट्ट का मत है कि 'श्रत' अर्थात् शब्द अनुपपत्र होकर श्न्य शब्द की कल्पना करता है मोर उस शब्द या वाक्य से अर्थ-बोध होता है; जैसे 'द्वारम् यह शब्द 'पिधेहि' कियापद की कस्पना करता है। यही पदाव्याहार कहलाता है-शरतात् शब्दात् अर्थस्य ' आपतिः थ्तार्थापतिः । इसके अनुसार उपयुक्कत वावय मे 'रात्रो भुङ्क' इस शब्द की कल्पना होती है। (२) अ्थार्पति (अर्थार्यापतति)-प्रभाकर (गुग) के मतानुसार टष्ट या थृत अर्थं अनुपपन्र होकर अन्य-पर्थ की कल्पना करता है (अर्थादर्यस्यापत्िः) मही अर्थापति है। इसे अर्थाष्याहार भी कहते हैं जैसे-'व्वारम्' शब्द का अर्यं 'पिधेहि' अर्य (दिया) की कल्पना करता है। गुरु मत के अनुसार उपयु क्त उदाहरस में- 'राि भोजन' रूप श्रथ का भ्रक्षेप होता है शब्द का नही। अनुवाद्-'गंगायां घोप:' यहां पर गंगा तट घोसियों की बस्ती [धोष] का आधार है, इस बात की सिद्धि के लिए गंगा शब्द अपने [प्रवाह रप] प्रयं को
लदख है। त्याग देता हूँ। इस प्रफार स्वायं सगमंशरूप लक्षण से उपलक्षित यह सक्षस-
प्रभा-लदासलक्णा का उदाहरण है-'गन्गायां घोपः' मर्थात् 'ङ्गा धोसियों की बस्ती है।' यहाँ 'झा' नब्द तटरूप अयं का बोय कराने के निये अपने वाच्य अ्य प्रवाह को छोड़ देता है और तटरप अयं का बोप कगना है। मतः यदा 'परायं स्वसमर्पखम्' मर्ात् दूमरे अर्थ के लिये स्वारय
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द्वितीय उल्लास: [ ६३
उभयरूपा चेयं शुद्धा उपचारेणामिश्रितत्वात्। अनयोर्लच्यस्य लक्षकस्य च न भेदरूपं ताटस्थ्यं तटादीनां गङ्गादिशब्द: प्रतिपादने तत्त्व- प्रतिपत्तौहि प्रतिपादुयिपितप्रयोजनसम्प्रत्ययः गङ्गासम्वन्घमात्रप्रतीतौतु गङ्गातटे. घोप इति मुख्यशब्दा भिघानाल्लक्षणायाः को.भेद:। - चा परित्याग किया गया है-यही लक्षण' कहलाता है। इस प्रकार के तक्षण से उपलक्षित लक्षणा ही लक्षसा-लक्षणा होती है अतः यहाँ लक्षण-लक्षर है। अ्नुवाद्-यह (उपयुक्त्त) दोनों प्रफार की (उपादानलक्षा तथा लक्षए- लक्षसा) लक्षणा शुद्धा फहलाती है; क्योंकि ये दोनों उपचार अर्थात् सादृश्यास्य सम्जन्ध से मिश्रित नहीं है। (मुकुलभट्ट के मत का खण्डन) शुद्धा लक्षसा के इन दोनों रूपों में (अनमोः) लक्ष्म (तीरादि) और लक्षक (गंगा आदि) में परस्पर भेद-प्रतीति रूप उवासीनता नहां हू। जय गंग। शादि शब्दों के द्वारा तट आदि का बोध होना है तो (शवय) और लक्ष्य अर्थात् प्रवाह तथा तट फी) प्रभेद.प्रतीति होने पर ही (तत्त्वं गंगादित्वम् प्रथवा अ्भेदं) शंत्यपावनत्वादि रूप प्रयोजन जो वक्ता को कहना अभीष्ट है (प्रति- पादयितुमिष्टस्य), उसकी प्रतीति (सम्प्रत्यव) होती है गंगा से सम्बन्ध मात्र की प्रतीति होने पर तो 'गंगातटे घोषः' (गंगा के तट पर घोसियों फी बस्ती है) इस प्रयार मुक्ष्य पर्थात् वाचक शब्द के प्रयोग से लक्षणा के प्रयोग का क्या प्न्तर रह जायेगा? प्रा-आचार्य मम्मट ने आगे लक्षणा के दो मेद दिखलाये हैं-१. शुद्धा औोर २. गोगी। शुद्धा और गोणी लक्षखा में किस आधार पर परस्पर भेद है ? इसका विवेचन करते हुए मम्मट कहते हैं कि जहाँ उपचार का मिश्रण होता है वह गोणी लक्षणा है और जहां उपचार का मिश्रण नहीं होता वह शुद्धालक्षसा है। यहां उपचार का अर्थ है-साहयमुलक गौए प्रयोग (जैसे 'पुरुपसिंह' यहाँ कौर्य शौर्यादि गुरो के सादृश्य के कारए सिंह शब्द की कौर्यादिगुणयुक्त में लक्षणा होती है)। मुकुलभट्ट ने शुद्धा और गौसी लक्षमा का भेद दिम्वलाते हुए वाहा है-'गौर्वाहीकः इत्यादि गौणी लक्षणा में मुरुषार्थ और लक्ष्यार्थ का सादृश्य रूप सम्वन्ध से अभेद प्रतीत होता है; किन्तु शुद्धा लक्षसा में मुख्यार्थ और लक्ष्यार्थ का भेद प्रतीत होता है:। यही भेद-प्रतीतिरूप ताटस्थ्य है, जिसे उदासीनता या ओदासीन्य भी कहते हैं, और यह उदासीनता हो शुद्धा लक्षसा का गौखी से भेदक है। इस प्रकार मुकुलभट्ट के मत में 'गङ्गायां घोपः' आदि में गङ्गा तथा तट का परस्पर भेद बना रहता है, दोनो सलग अलग प्रतीत होते हैं किन्तु 'गोर्वाहीक, आदि में श्रभेद-प्रतीति होती है। भेद प्रतीति को ही ताटस्थ्य कहते हैं। : . आचाय मम्मट इस मत का सण्डन करते हैं वे कहते हैं कि 'गन्भायां ' घोपः' इस शुद्ध लक्षणा में गङ्गा के मुस्यार्थ 'प्रवाह' और नव्यार्थ 'तट'में भेद (ताटस्थ्य)- की प्रतीति नहीं होती; अपि तु गङ्गा का तद से अभेद प्रतीत होता है मर्थात सट की
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६४ ] फागप्रकारा:
(१४) सारोपाऽन्या तु ययोक्तौ विपयी विषयस्तथा। आरोष्यमाखः आररोपविथयश्च यत्रानपह् तभेदौ सामानाधिकर- एयेन.निर्दिश्येते, सा लक्षणा-सारोपा.। .. (१५) विपय्यन्तः कृतेऽन्यस्मिन् -. सा-स्यात्साध्यवसानिका॥११॥ 1 विपयिसाSडरोप्यमाणनानत. कृते निगीर्स अन्यत्मिन्नारोपविपये सति साध्यवसाना स्यात्। गङ्गात्व (सत्व) के रूप में प्रतीति होती है और तभी शीतत्व, पावनत्वादि की तट में प्रतीति होती है। गीतलता आदि का बोध कराना ही लक्षणा का प्रयोजन है। यदि यहाँ गझ्गा और तट में अभेद-प्रतीति न होती और तट (लक्ष्यार्थ) का प्रवाह (मुग्यार्थ) से केवल सामीप्य सम्बन्ध ही प्रतीत होता अथवा केवल तीर की प्रतीति, होती तो 'गङ्गायां घोप:' का वही अर्थ होता जो 'ग्रङ्गातटे घोपः' का है। तव इस लक्षणा के प्रयोग में कोई विशेषता न होती। अतएव मुकुलभट्ट का यह मत कि' जहां अभेद-प्रतीति हो वहाँ गौली लक्षसा और जहां भेद-प्रतीति हो वहाँ, शुद्धा। लक्षणा होती है, उचित नही। टिप्पशी-उपचार शब्द के दो अर्थ हैं (१) किसी सम्बन्ध के कारए किसी वस्तु का उसके अवाचक शब्द द्वारा व्यवहार, जसा कि न्यायवार्तिक में कहा है --- निमिताद् अतद्भावेऽपि तदुपचारः (२) प्रदीपकार के अनुमार-'उपचारशच सादृश्य" सम्बन्धेन प्रवृत्ति: सादृश्यातिशयमहिम्ना भिग्नयोर्भेदप्रतीतिस्थगनं घा'। न्यायवार्तिक का अर्थ सामान्य है, किन्तु प्रदीपकार का अरथं पारिभारषिक है। मुकुतभट्ट ने द्षेनों को कमग गुद्धोपचार' तथा 'गोगोपचार' कहा था। काव्यप्रकाश मे यहाँ प्रदोपोक्त को कमराः शुद्धोपचार तथा 'गोणोगचार' कहा था। काव्यप्रराश में यहाँ प्रद्ीपोक्त 'उपवार' शब्द का ही ग्रहग किया गया है। साहित्यदर्पगकार ने भी यही मत स्त्रीकर किया है-"पूर्वा तूपचारामिथसाच्छ दा। उपचारो हि नामात्यन्तं विशक- सितयो: शब्दयोः सावृश्यातिशयमहिम्ना भेदप्रतीतिस्यगनमात्रम्।', (साहित्य- दर्पए २६। अनुवाद-जित् लक्षणा में (यत्) विपयी (थारोप्यमाण 'ा' आदि) औ्ौर विषय (श्ररोप का विषय 'वाहीक' आदि) दोनों अपने-मपने एपं में (तथा=शवएपेए) फहे जाते हैं वह एक (अन्या) सारोपा लक्षरा हैं। जहां आारोप्यमाए (भो आादि) और आरोप के वियय (याहोक शदि) का भेद दिपाया नहीं जाता (अनपह्न तमेदौ-नहीं छिपाया गया हूँ भेद' जिनका), उन दोनों का समानाधिकरशारूप में निर्देश किया जाता हुँ वह सारोपा सक्षला है। (१४) : जहाँ विषयी (भौ आदि) के द्वारा अन्य अर्थात् घारीप के विपय (पाहीफ़ सादि) को सपने भीतर लीन फर लिया जाता है, वह साध्यपसानिरा लक्षणा होती हं। (फारिका में) वियपिखा=आरोप्यमाए (गौ शादि) के द्वारा भत्यस्मिन्= आरोप के विषय (वाहीरु आदि) के प्रन्तः कृते राति=निगोएं हिये जाने (निगलने) पर साध्यनमाना लक्षका होती है। (१५)
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प्रभा-प्राचार्य मम्मट ने लक्षणा के प्रथम दो भेद किये-उमादानलक्षखा और लक्षमा लक्षणा। इन दोनो भेदों को उन्होंने शुद्ध तक्षणा कहा। तदनन्तर 'यहां पर लक्षणा के दो भेद आरोप तथा अध्यवसान की दृष्टि से किये-सारोपा और साध्ययसाना। यहाँ आरोप का अर्थ है-विषय (वाहीक सदि) और विषयी (गौ आदि). को वृथक् २ प्रस्तुत करना (विषयविपविखोभेंदेनोपन्यासः-प्रदीप)॥ आरोपसहित होने से यह लक्षणा 'सारोपा' है, जैमे-गौर्वाीक:। यहाँ आारोप्यमाण गो और आरोपविषय वाहीक दोनों कहे गये है। अध्यवसान का अर्थ है-'विषयी के द्वारा विषय को छिपा लेना' (विषविरा विषयतिरोभावः-प्रदीप)। अ्ध्यनसान सहित होने से यह लक्षणा साध्ययसाना है, जैसे-गोरयम्। यहाँ गौ रूपः विपयी के द्वारा विषय अर्थात् वाहीक का तिरोभाव या निगरस हो गया है; दोनों का भेद। छिपा कर अभेद दिसलाया गया है। ;टिप्पणी-(i) प्रदीपकार के मतानुसार 'अन्या तु' का अरभिप्राय है-"अन्य अथृत् गौगी आरोपाध्यवसानास्या भिदयते न तु उपादानलक्षणाम्यामिति तु शब्दार्थः ।"
रूप में। (ii) कारिका के 'तथा' शब्द का तात्पर्य है-'अनपह्न तभेदौ', अपने ही
(iii) विपयी=आरोप्यमास=लक्षक=उपमान (गौ आदि) 41
7 .- , विषय=आरोप का विषय=लक्ष्य=उपमेय (वाहीक आ्ररादि) (iv) कुद आचार्य गौणी नाम की पृथक शब्दवृति मानते थे; जैसे' पराचार्य कुमारिल भट्ट के अनुसार- परभिधेयाविनाभूतप्रतीतिर्तक्षणोच्यते। लक्ष्यमाण गुएयोगाद् वृतेरिष्ठा तु गौखता। इसी प्रकार सरस्वतीकण्ठाभरण में भोजराज ने भी कहा है-शब्दो हि मुख्यागौसीलक्षणाभिरर्थ विशेषप्रतिपत्तिनिमित भवत।" ऐसे मतों का प्रतिवाद करने के लिए आचार्य मम्मट गौली वृत्ति को लक्षणा में अन्तभूत करते हुए यहाँ लक्षणा के सारोपा आदि भेदों का निरूपस करते हैं। ध्वनिवादियों ने गोणी- वृति का लक्षणा वृत्ति में ही अन्तर्भाव किया है। (v) मम्मट के आरोप औरर अध्यवसान के विवेचन पर मुकुलभट्ट का प्रभाव- परिलक्षित होता है। मुकुलभट्ट ने 'अभिषावृतिमातृका' में लिखा है-'यत्रोपचर्य- मासे नोपचर्य मासा विषय स्वरूपं नापह यते तघ्नाध्यारोपः ।' यत्र तूपचर्यमाणविषय- स्योपचर्य मास इन्तर्लीनतया विवक्षितत्वात् स्वरूपापह, नवः कियते तननाध्यवसानम्।' मम्मट के सरोपा तथा साध्यवसाना लक्षणा के स्वरूपनिरूपण का विश्वनाय: कविराज पर स्पष्ट प्रभाव है- 1 विषयस्या निगी एंस्ान्यतादात्म्य प्रतीतिकृत्। सारोपा स्यापनिगीर्सस्य मता साध्यवसानिका ॥ (२'८)
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६६ ]1 काव्यप्रकाश: .4
'(१६) भेदाविमी च सादृश्यात्सम्वन्वान्तरतस्तथा "गौणौ शुद्धौ च विज्ञेयौ- 1
इमावारोपाध्यवसानरूपी सादश्यहेतू भेदौ गौर्वाद्दीक' इत्यत्र 'गोरंयम्' इत्यत्र च। ग अनुवाद-लक्षणा के ये दोनों (सारोपा और साध्यवसाना नामक). भेद, सादृश्यरूप सम्बन्ध से हों तो गौसी तथा अ्रन्य सम्बन्धों (जन्यजनकभान आदि) से, हों तो शुद्ध लक्षएा समभनी चाहिये। (१६) ii1 ये दोनों सारोपा औपरर साध्यवसाना नामक सादृव्य के कारण होने वाले। (लक्षखा के) मेद क्रमशः 'गौर्वाहीफ' (वाहोक बॅल है) यहाँ पर तथा 'गौरयम्':(यह" तो मैल है) यहां पर हैं। । प्भा-'सारोपा और साध्यवसाना' इन दोनों सक्षगाओं के भी दो दो प्रफार होते हैं' जैसे-'सारोपा' दो प्रकार की है-१. गौणी सारोपा २. शुद्धा सरोपा।" साध्यवसाना भी दो प्रकार की है-१. गोएी साध्यवसाना २. शुद्धा माध्यवसाना। इस प्रकार 'सारोपा' और 'साध्यवसाना' लक्षर दोनों के गौए तथा शुद्ध दो दो भेद होते हैं। जहाँ सादृस्य सम्वन्ध के कारण लक्षसा होती है' यहाँ तो 'गौणी सारोपा' तथा गौसी 'साध्यवसाना' कही जाती है और जहाँ साहृस्य मे प्रतिरिक्त कोई और सम्बन्ध नियामक रहता है वहाँ शुद्धा सारोपा और 'युद्धा साध्यवसाना' होती है। गौसी सारोपा का उदाहरण है-'गोवाहीकः'। वाहीक शब्द का अर् है- १. लाहीक, (बाल्हीक) नामक देशविशेप में रहने वाला अयवा २. असम्य या भसंस्कृत' व्यक्ति, (बहिमंवो वाहीकः शास्त्रीयाचाराद् बहिमूतः, इत्पर्थः) ।'वाहीक बैल है. यहा. जो बैल और वाहीक का सामानाधिकरण्य कहा, गया है, वह मसम्भव है;, अ्तः मूसंता आदि गुगों के सादृस्य के कारण 'गो' शब्द की वाहीक। (जाडयादि-विगिष्ट) में लक्षणा हो जाती है। इसी प्रकार गोसी साध्यवसाना का उदाहरस है 'मोरवम्'। शुद्धा सारोपा (पायुर्षृ तम्) युखा माध्यवमानां (पापुरेवेदम) के उदाहरण - आगेप्रदर्शित किये जाएंगे। िपसी (i) सामानाविकरण्य-जव समान विभक्ति वाले दो (या भ्रधिक) पदों का एक ही वस्तु (अधिररण=आधार=सभिधेय) के लिगे प्रयोग किया जाता है तो ये पद समानाधिकरस कहलाते हैं (समानम् अधिकरणं वमोःते 4 समानायिवरसे)। समानाधिकरण के भाव को सामानाधिकरव्य (समानाधिकरण +प्यत) पहते हैं। 'मौर्वाीकः' में 'गोः' और 'वाहीक' दोनों पद ममान बिभार याले हैं, दोनों एक ही व्यकि (वाहीक) के लिये प्रयुक हुए हैं। अतः ये दोनों समानाषिकरण है, भयषा इनना सामानाधिकरष्प से निर्हेन किया गया है।
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द्वितीय: उल्लास:
अत्र हि स्वार्थसह्चारिणो गुणाः जाड्यमान्य्यादयो लक्ष्यमायाः अपि गोशव्दस्य परार्थाभिधाने अवृत्तिनिमित्तत्वमुपयान्ति इति केचित्।" सर्थसहचारिगुणाभेदेन परार्थगता गुणा एव लच््यन्ते, न तु परार्थोडभि- घीयत इत्यन्ये। साधारगागुणाश्रयत्वेन परार्थ एव लक्ष्यत इत्यपरे। (ii) यहाँ पर आचार्य मम्मट ने यह भी स्पप्ट रूप से संकेत कर दिया है कि 'गोणी' में लक्षसा के समान ही मुख्यार्थवाध, मुस्यारथयोग तथा रूढ़िया द प्रयोजन-ये तीनों हेतु होते हैं; अतः इसका लक्षणा मे अन्तर्भाव करना युक्तियुत्त, हो है; उदाहरसारयं गौर्वाहीक: मे अभिवा द्वारा उक्त गो और वाहीक के तादातम्य का बाघ हो जाता है, जडता आदि सामारस गुलों से युक्त होना ही मुख्यार्थ ,(गो),; और लक्ष्यार्थ (वाहीक) का सम्बन्ध है और दोनों में एकरूपता की प्तीति हो। प्रयोजन है, जिसे विस्तार से आगे स्पष्ट किया जा रहा है। । अनुवाद-(गौर्बाहीक ादि में लक्ष्यमामविययक मतभेद है)१. कुछ आ्राचार्यों का मत है (केचित्) कि गौर्वाहीक: इत्यादि स्थल में (अन्)शब्द ।(स्व=॥ गो आदि) के अर्थ (गोत्वादि) के साथ-साथ एक व्यक्ति में रहने वाले।(स्वस्य गोशेन्द-]१ स्य अ्ररथन गोत्वजात्या एकस्मिन्नर्थ व्यक्तिरुपे सह चरन्तीति, तादुशाः)जाडयमान्यावि गुलों का लक्षणा द्वारा बोध होता है और वे लक्षणा द्वारा प्रतोत होकर भी (अपि) .: शभिधावृति से परार्थ अर्थात् वाहीक का बोध कराने के लिये गो शब्द.केप्रवृ्ति-॥ निमित्त (शक्यतावच्छेदक) हो जाते हैं। · ' (२) दूसरे कहते हैं कि गोत्व (स्वार्थ=स्व पर्थात्. गो' शब्द का धर्थं) के :- साथ (एक व्यक्ति में) रहने वाले (जाडघमान्दयादि) गुसों के सादृवय सथवो भभिन्नता। के कारख (पभेदेन=साजात्पेन) वाहीक में रहने वाले : (जाडघमान्यादि) : में ही- लक्षसा होती है। वाहीक रूप परार्य (गुसी) का भी अभिधा वृति द्वारां बोध नहीं करामा जाता। । (३) अन्य (स्वीय) जनों का मत है कि साधारण मुख ।(जाडपमान्याबि): का।आश्रय होने के कारस परार्थ अथात् वाहीक का ही लक्षसा द्वारा बोध होता है। ,1' ". (17 T7) 1. प्रभा :- 'गौर्वाहीकः आदि में लक्षरा कैसे कार्य करती है ? इस का विवेचन करते हुए 'आचार्य मम्मट ने 'यहाँ लक्ष्यार्थ घया है ? एवद्विप्यक तीन मतों को' उल्लेख किया है।- (१) गो शब्दात्-अंभिधया गोत्वम्, (तस्य बाये) लक्षणाया स्वार्थसहचरिताः॥* गुरंग: (गोगता:' जाडधादयः), पुनः'अभिघया वाहीकः । प्रथम मतानुसार गो शब्द से अ्रभिघा द्वारा गोत्व का बोध होता है " उसका" चाष होने परं स्वारयं (गोत्व) के साथ ए व्यक्ति में रहने वाले जो जाडयमान्यादि गुग है जनका लक्षणा द्वारा बोध होता है परर्थात् जाध्यमान्य्यादि गुग लक्ष्य है। प्रीर लक्षणा
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काव्यप्रकाश: 4
द्वारा बोघित जाडयमान्यादि को प्रवृत्तिनिमित्त अर्थात् वक्यतावच्छेदक मानकर 'गो शन्द अ्रभिषावृति द्वारा- जाडघादियुक्त वाहिक का बोध कराता है।, यही, परार्थ है। इस प्रकार 'गो' शब्द का वाहीक के साथ अभेदान्वय हो जाता है और लक्षणा तथा अभिधा दोनों वृतियो द्वारा यह वामयार्थ हो जाता है-"जाउघवद- भिन्नो माहोक:"अर्थात् जाडयादि-गुणविगिप्ट से अभिन्न वाहीक है। मम्मट ने केचित् (मोई) शब्द द्वारा इस मत में अरननि दिखलाई है। बात यहं है एक तो गो शब्द का वाहीक में संकेत न होने के कारस यह अभिघावृति से वाहीक का बोध नहीं करा सकता; दूसरे जाडयादि गुए तो लक्ष्य है ये शकम नहीं; मतः वे शब्द का प्रव तिनिमित नही हो सकते। शब्द का प्रवृत्िनिमित तो वाच्यायं ही हु करता है। तीसरे अभिधावृत्ि गो शब्द से गोत्व सर्थ का बोध कराने के परंचात् समाप्त हो जाती है और वाहीक का बोध कराने के लिए पुनर्जीवित नहीं होगी। : (२) अतः द्वितीय मत दिसलाते हैं-गोशब्दात् अ्रभिधया गोत्वम् (तस्य वाये) लक्षणया गोगतजाडयादि-सजातीया: गुगाः (वाहीकगताः जाउमादयः), भक्षपेय अनुमानेन या वाहीक: । :. गोल्व आादि (स्वाथं) के साथ रहने वाले जो जाटघमान्यादि गुगा हूँ उनसे भमिन्न अथवा उनके सजातीय ही वाहीक मे रहने वाले जाडपादि गुसा है। उन गुणों का ही लक्षणा द्वारा बोध होता है, गुएी (जादयादिविशिष्ट) का नहीं। क्योकि उसका बोध तो वाहीक शब्द से आक्षेप द्वारा ही हो जाना सम्भव है। इस मत, के अनुसार वाहीकगत जाडयादि गुख लक्ष्य है। तय यह याकयारयं होता है-'गोग- तजाडधसजातीयजाउयवान् वाहीक' अर्थात् गौ में रहने वाले जाडमादि के सजालीय जाडयादि वाला वाहीक है। 'धन्ये' (दूसरे) कहकर इस मत में पररच दिसलाई गई है। बात यहं है कि यदि जाडमादि गुएों में लक्षणा होगी तो इनका मुखी या धर्मी वाहीफ के साथ सामानायिकरण्य नहीं हो सकता। लक्षणा मानकर भी अनुमान मानना सचित नही। (३) इसी हेतु तृतीय मत दिसलाते हैं-गोशव्दात्-प्रभिभया गोस्वम्, (वस्य वाधे) सक्षणाया सामारमगसाधयतया वाहीर:। , जाडपादि गुए गो भौर वाहीक दोनों में रहने वाले हैं अतः मे. साथारए गुए हैं, सामान्यधमं है। इनका आथय है-वाहोक। इसी हेतु वाहोक में 'गो' सब्द को सक्षणा हो जाती है। जाटपादि साधारस गुलों को रसना ही इस सक्षछा का आाधार है, यही मुस्यायमोग है। इम मत के मनुसार परार्य भर्यात् जाइयादि- गुएविशिष्ट वाहीक अर्य में गो सब्द की लक्षणा होती है। इस प्रकार 'गो' तथा 'वाहीक दोनों शब्द एक ही मर्य का बोय कराते हैं परोर 'जाडमाटिगुएविशिष्टो वाहीर:' भर्यात् जाडमादि गुग से विपिष्ट बाहीक है, यह यारपायं बो हो जाता है। व्यास्याकारों का मत है कि यह सृतीय मत मम्मट का स्वकीय मतहै।
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द्वितीय उल्लासं!
उत्त्चानयन्न-(मानान्तरविरोधे तु मुख्यार्थस्यापरिग्रहे) 'अभिघेयाविनाभूत प्रतीतिलेक्षसोच्यते। लक्ष्यमासगुमैर्योगादू वृत्त रिष्ठा तु गौएता ।' इति॥ अविनाभावोऽत्र सम्बन्वमात्रम्, न तु नान्तरीयकत्वम्।' तच्चे हि मञ्चाः क्रोशन्तीत्यादौ न लक्षसा स्याद्। अविनाभावे चाक्पेेव सिद्ध- लक्षणाया नोपयोग इत्युक्तम्। अपरे शब्द का प्रयोग ही इसका सूचक है (न परे अपरे स्वीया इत्यार्यः इत्यस्मम्मतमिति भाव :- वामन)। टिप्पणी :- (i) वाक्य तावच्छेदक-जिस अर्थ में शब्द की शक्ति होती है, वह दवयार्थ कहलाता है जैसे गो शब्द की शक्ति है गोत्व में, अतः गोत्वया गोत्वविशिष्ट गोव्यक्ति शवयार्थ है। वह शक्यार्थ जिस रूप से होता है वही शक्य- तावच्देदक कहलाता है अर्थात् शकम का धर्मे या उपाधि ही वाक्यतावचछेदक है। यदि शाक्यार्थ गोत्व (मीमासक के अनुसार) है तो शक्यतावच्छ्ेदक 'गोत्वत्व' ' होगा और यदि शक्यार्थ गोत्वविशिष्ट गोव्यक्ति (न्यायानुसार) है तो शक्यतायच्छेदक 'गोत्व' होगा। शक्यतावच्छेदक ही शब्द का प्रवृत्तिनिमित्त होता है जैसे गोत्व ही'गो शब्द का प्रवृत्तिनिमित्त है। (ii) 'गौर्वाहीकः, आदि में लक्ष्य क्या है ? एतद्विपयक तीनों मंतों का साहित्यदर्पसकार ने भी प्रायः इसी प्रकार विवेचन किया है तथा तृतीय मत को स्वाभिमत दिखलाते हुए स्प्ट रूप में लिखा है-''तस्मादन्न गोशव्दो मुख्यय। वृत्या वाहीकशव्देन सहान्वय मलभमानोऽज्ञत्वादिसाधर्म्यसम्बन्धाद वाहीकार्य सक्षयति।" (साहित्य दर्पण २.६) अनुवाद्-अन्यन्न (तन्न्नबातिक में) कहा भी है "अभिधावृति से बोष्य (अ्रभिधेय) अरथात् वाच्यार्थ से सम्बन्ध रखने वाले (अ्रविनाभूत पदार्थ की प्रतीति हो लक्षणा कही जाती है; किन्तु लक्षला द्वारा बोधित (लक्ष्यमा) गुसों के योग से होने वाली (अर्थ की प्रतीति कराने याली) शब्द-वृत्ति को गौएे वृति मानना इप्ट है। यहाँ (उपयुक्त कारिका में) अविनाभाव का अभिप्राय सम्बन्ध मात्र है, ध्याप्ति अथवा नान्तरोयकता नहीं (अन्तरा =- बिना, तन्नभवः अन्तरीयः, म प्रन्त- रीयः नान्तरीयः अर्थात् अविनाभावी-जिसके बिना जो न होता हो; तस्य भावः नान्तरीयकत्वम् अर्थात् व्याप्ति) मदि व्याप्ति रप अर्थ लिया जाये तो 'मञ्नाः कोशन्ति' इत्यादि में लक्षणा नहीं हो सकती । और, अविनाभाव या व्याप्ति सम्वध होने पर तो आक्षेप (अनुमान या अर्ार्पति) द्वारा ही तात्पर्य-सिद्धि हो जायेगी, प्रतः सक्षसार का कोई उपयोग न होगा, यह (स्वसिद्धपे० इत्यादि कारिका की व्यास्या में) फहा जा चुका है।
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· र्का्यप्रकाश:
प्रभा :- 'गोर्वाहीक:, इत्यादि में साधारण गुणों के माश्य 'से जाटभादि- .विशिष्ट (परार्थ) में लक्षणा होती है। इस स्वमत की पुष्टि के हेतु आचार्च मम्मट ने कुमारिलभट्ट: की 'अभिघेयादि' उक्ति को प्रमासरूप में उद्घुत किया है इस उक्ति 71 मैं लक्षखा तथा गौगी वृति का स्वरूप संक्षेप में दिखलाया गया है। इसका भाव यह है-कि जहां वाच्यार्थ से सम्बद्ध पदार्थ की प्रतीति होती है वहां लक्षणा होती है जसे 'गङ्गायां घोप:' में वाच्यार्थ प्रवाह से सम्वद्ध तट आदि की प्रतोति नकषणा है। जहाँ लक्ष्यार्थ के (विशेपण के रूप में प्रतीत होने वाले) जाडघ आदिगुगों के ''सम्बन्ध से अन्य अर्य की 'प्रतीति होती है वहाँ गौणी वृति है। 'जैसे-'गोर्वाहीक: में जाडयादिगुए विशिष्ट में लक्षणा है। यहां जाडयादि की लक्यार्थ के विनेषण के 'रूप में प्रतीति होती है। इन गुणों के सम्बन्ध से 'गो' 'शब्द वाहीके पदार्थ को उपस्थित करता है इसी से यहाँ गोणी वृत्ति है। 1. तश्यातिक की कारिका में अभिधेयाविनाभूतप्रतीतिलंक्षणा' यह कहा १ गया है। आचार्य मम्मट बतलाते हैं कि यहाँ अविनाभाव का अर्थ सम्चन्ध मात है। - दार्रंनिक भापामें अर््रविनाभाव का अर्थ होता है-व्याप्ति। एक के बिना, दूसरे बा i न होना ही 'अविनाभाव' है, जैसे अ्र््रग्नि के बिना धम नहीं होता। अविनाभाव फा ह समानार्थक शब्द 'नान्तरीयकत्व' है (येन विना यप्न, भवति तन्नान्तरीयकम्')। लक्षणा के लिये राम्न्वमात्र ही अपक्षित होता है व्याप्ति जैसा विरेष सम्बन्ध नहीं। - मीमासकों को भी यही प्रभीष्ट है। यदि व्याप्ति रप सम्बन्ध द्वारा अन्य पदार्थ की ३- प्रतीति हुआ करती तो 'मन्चा: कोगन्ति' में जो मन्य शब्द की मञ्वस्य पुरु्पों में लक्षणा होती है, वह न होती वर्योकि गच्च का मन्चस्य व्यक्तियों के साथ अविना- भाव या व्याप्ति सम्बन्ध नहीं है। दूमरी वात यह भी है कि यदि वाच्चार्थ, मर - सक्ष्यायं में अविनाभाव सम्बन्ध माना जायेगा तो अ्रनुमान या अर्थापति द्वारा ही सद्षयार्थ की प्रतीति हो जायेगी फिर लक्षणावृति मानने की पमा आवस्यकता है,? 11 .: :टिप्पणी-तन्त्रवार्तिक-जैमिनि के पूर्वभीमांसा सूनों पर शावरभाप्य ३. (शबर स्वामी का भा्य) है। कुमारिल भट्ट ने शावरभाष्य की टीका-सीन ग्रन्थो द्वारा की है। मीमांसा के प्रथम अध्याय का प्रयम पाद जो तर्कपाद कहलाता है, उसके शावरभाव्य पर 'इलोकवासिक' नामक ग्रत्थ है। प्रयम सध्याप के द्विवीय पाद, से लेकर तृतीय अध्याय के अन्त तक के शावरभाष्य पर 'तन्न्यालिक' नामक स्रन्थ है, जो गद्य तथा मद्य में है। यहा उसी से 'भिषेयानिना' इस्वादिकारिका लो गई है। शावरभाथ्य के दोप भाग पर कुमारित ने संधिप्त टिप्पणिया की है : जो 'टुप्टीका' महलाती है। r: (ii) 'लक्यमाणगसं: योगात्'-पद की अनेम प्रकार से उपास्वा की गई है (इ०, भ वामन)। उनमें यह व्यास्या मम्मट की मभिमत प्तीन होती है- सश्यमाएास्य= वाहीकर्य, गुर्गा :- मोवाहीक्माधारसं: नाउपादिभि: सोगात
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द्वितीय उल्लास:
सम्बन्धान्तरम। एवमादो च कायंकारएभावादिलक्षसपूर्वे आर्प्ररोपाध्य-
: अत्न गौणभेदयोर्भेदेऽपि तादरूप्यपतीतिः सर्वथेवाडभेदाबगमश्च बसाने।
परंयोजनम। शुद्धभेदयोस्त्वन्यवैलक्षएयेनाव्यभिचारेए च कार्यकारित्वादि। सम्बन्धात् या पृत्ति := गोशव्दस्य वाहीकार्योपस्थापकता नाम सब्व्यापारः तस्या: गौसता इष्टा; अर्यात लक्ष्य अर्थ वाहीक के जो गी और वाहीक में 'रहने वाले (जाड्य आदि) साधारण गुख है, उनके सम्बन्ध से गोशब्द का वाहीक अर्थ को अकट कराने वांला व्यापार गौणी वृति कहलाता है। अनुवाद-(शुद्ध सारोपा तथा साध्यवसाना) 'घृत आयु है' यह भायु ही है' इत्यादि स्थलों पर सादृश्य से भिन्न कार्यकारणभाच आदि दूसरे प्रकार के सम्बन्ध होते है, तथा इनमें फार्यकारसभाव आदि रूप सादृध्य-भिन्न सम्बन्ध के कारेण से 1
: (कार्यकारणभावादि) लक्षसं स्वरूपं यस्य तथाभूतः सादृश्यातिरित्तः सम्बन्ध: पूर्यो " हेतुभूतो ययोस्ते) ही आारोप ('आयुघृ तम्' में) तथा अध्यवसान (आयुरेवेदम्' में) होते हैं। ': 'भ्भा-सारोपा और साध्यवसाना लक्षणा जहाँ सादृश्य से भिन्न' सम्बन्ध के 1 कारस होती हैं वहाँ वे शुद्धा लक्षसा कहलाती है। उनके उदाहरण क्रमशः ये हैं- "'धायुघु' तम्' अर्यात् 'घृत आायु है' यह शुद्धा सारोपा का उदाहरए है। 'यहाँ 'घृत' कारण या जनक है और 'आयुः' कार्य या जन्य है। यहां किसी प्रकार का सादृश्य 1नही, कार्यकारणभाव सम्बन्ध से ही आ्यु शब्द की घृत में लक्षणा होती है और 'आायुर्रामन्न' घृतम्' अरथात् 'ायु से अपभिन्न घृत है' यह वाक्यार्थ हो जाता है।"यहाँ विपयी (आरोप्यमाण) आयु तथा विषय (आरोपाश्रय) घृत दोनों को अपने 'रूरप में 'कहा गया है अतः यहां शुद्धा सारोपा लक्षसा है। 1. "आयुरेवेदम्'-यह शुद्धा साध्यवसाना का उदाहरण है। यहाँ 'इदें' शब्द 'सामने उपस्थित धृत आदि के लिये आया है। सादय्यातिरिक्त कार्यकारणभाव से आयु शब्द लाक्षणिक है। 'आयुरभिन्नमिदम् अपर्थात् 'आायु से अभिन्न 'यह है'इस प्रकार वाक्यार्थ बोध होता है। यहाँ आरोप्पमाए (विपयी) 'आयु' के द्वारा आरोपा- !शरय (विषय) घृत को निगीसं कर लिया गया है अर्थात् दोनों का भेद तिरोहित 'हो गया है अतः यहाँ शुद्धा साध्यवसाना लक्षणा है। यहाँ 'इदम्'(=यह) शब्द सामने उपस्थित वस्तु के रूप मे घृत' को कहता है, भृत के रूप में नहीं। इसलिये यहाँ आरोप के विपय का पृथक् निर्देश 'ही है अपि तु उसका निगरस हुआ है तथा सोध्यवसाना शुद्धा लक्षणा है। इसका संनन्दिग्ध उदाहरण है-घृत पीने वाले को देखकर यह कहना-'गयु: पिवति'।"यहीवात 'गौरमम्' आदि साध्यावसाना गोणी के उदाहरण में भी है। ''अनुवादु् :-- [आरोप तथा अध्यवसान के प्रयोजन] यहां पर (चारों उदांहरसाो में गौसी के दो (गासी सारोपा तथा गौली साध्यवसाना) भेदों में से 'गौर्वाहीफ:'
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आदि" (सारोपा) में (गौ तया बाहीक का परस्परं) भेद होने पर भी एकरूपता '(सद् पता) को प्रतीति कराना लक्षणा का प्रयोजन है और 'गौरयम्' आदि (साध्य- वसाना) में गो और वाहीक के नेद-ज्ञान के यिना (सवंथा) पभेद को प्रतीति करोना :प्रयोजन है। शुद्धा के दो (शुद्धा सारोना और शुद्धा गोएी) मेदों में तो 'परायुपु' त्म्' आदि (सारोपा) में अन्य (दुग्धादि) की प्रपेक्षा विलक्षणरूप से फार्य (भायुववि "आादि) करने की (फार्यकारित्व) और 'आयुरेवेदम्' आदि (साध्यवसाना) में नियम से (बिना व्यभिवार के) कार्य (आयुर्वृद्वि आदि) करने की प्रतीति कराना प्रयोजन हैं। प्रभा-सारोपा तथा साध्यवसाना लक्षणा गौसी और युद्धा के भेद से दो दो प्रकार की कही गई हैं। ये चारों भेद प्रयोजनवती लक्षणा के अ्रन्त्गत भाते हैं इनमें रूढिलक्षा नही होती। चारों के कया क्या प्रयोजन होते हैं यही उपयुककत 'अभ गोएभेदयो:' इत्यादि अवतरण में वतलाया गया है। संक्षेप में-गोएी सारोपा : का प्रयोजन है-भिन्न २ भासित होने वाले विषयी तथा विषय में एकरपता भर्थात् सादात्म्य की प्रतीति कराना, जैस गगौर्वाहीक: मे गौ और वाहीक पृथक् २ प्रतीत होते है किन्तु सादृश्य की महिमा से लक्षणा द्वारा गो और वाहीक में तादात्म्प या एकरूपता की प्रतीति हो जाती है। इसी प्रकार गौसी साध्यवसाना का प्रयोजन है-विपमी तथा निपय में अभेद की प्रतीति कराना, जैसे-'गौरयम्' में दोनों की पृथक प्रतीति नहीं होती; क्योकि यहाँ वाहीक पद का प्रयोग नहीं किया गया; औौर सक्षसा द्वारा दोनों में पूरषप से अ्भेद की प्रतीति हो जाती है। शुद्धा के दोनों भेदों का प्रयोजन इस प्रकार है कि-शुद्धा सारोय तो, भन्य की भपेक्षा विलकस कार्य करने की पाक्ति आदि का बोध कराती है, जैरा आयुष्'स्षम' कहने से यह प्रतीति होती है कि घृन में आायु बढ़ाने की धक्ति दूध आदि की अपेक्षा अधिक है। इसी प्रकार शुद्धा साध्यवसाना का प्रयोजन है-अव्यभिचार सर्मान् नियम से कार्य करने की शक्ति आदि की प्रतीति कराना, जैसे 'मायुरेवेदम्' कहने से - यह प्रतीत होता है कि धुत निश्चित रूप से (अरनिवार्य रप से) आयु को बड़ाने बाला है। टिप्पसी-यहाँ प्रश्न यह है कि मम्मट ने ऊर (गून १३, 'नयोः न ... ताटस्य्यम्'-वृति) यह स्थापना की है-"शुदा तक्षखा के दोनों भेदों उपादान धोर लक्षएतक्षखा में भी वाच्यार्थ और लक्ष्यार्यं में अभेद की प्रतीति हुआ करती है।" फिर यहाँ केवल गौगी सक्षणा का ही अभेद-प्रतीति प्रयोजन क्यों बतलाया है? गुवा का क्यों नही ? इसका उत्तर यह है कि यस्तुनः गौली और शुद्धा दोनों में 1 हो वाच्याथं तथा लक्यार्थ के पभेद की प्रतीति हुआ करती है वयाषि भन्तर मह है कि गोसी में तो केवल माव स्भेद की प्रनोवि हो प्रयोजन होगा है; किन्तु शुदा में मभेद की प्रतीति होने पर विनभस-कार्य कारित्व सदि ध्रन्य प्रवोजनों की भी . प्रतीति होती है। यकषं तो मम्मट ने प्रत्ेक नक्षखा के प्रशार का मुग्ण मयोजन ही बतनाया है। (मि०, पदीप पा० १०)
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द्वितीय उल्लास: [ ७३
यवचित् तादर्थ्यादुपचार:, यथा-इन्द्रार्था स्थूण! इन्द्रः। क्वचित् रवस्वामिभावाद्, यथा राजकीय: पुरुपो राजा। क्वचिद्वयवावयविभा- बाद, यथा-श्रम्रहस्त इत्यत्रापमान्नेऽवयवे हस्तः। ववचित् तात्कर्म्याद, यथीं- अतक्षा तक्ा। अनुवाद्-(अ्रन्य सम्बन्धों से होने वाली लक्षणा) कहीं तादय्यं (तस्म इवं तदर्यंम् सस्य भाव: ताद्थ्यम् पर्थात् उपकार्योपकारक भाव) सम्बन्ध से लक्षणा (उप- चारः) होती है, जैसे इन्द्र (फी पूजा) के लिये जो खम्भा है उसे 'स्यूख इन्द्रः' या 'इन्द्रः इयम्' फहा जाता है। कहीं सेवक और स्वामी (स्वस्वामिभाव रप सम्बन्ध से लक्षणा होती है, जैसे राजकीय पुरुप को 'पुरुपः राजा' या राजाऽ्यम्' ॥कहीं भंश तथा समग्रयस्तु (भवयव-पवयविभाव) रूप सम्बन्ध से लक्षखा होती है, जैसे- भ्रग्रहस्तः' यहां पर अप्र-भाग मात्र में हस्त शब्द का प्रयोग होता है। कहीं उसका काय करने रूप (तत्क्मफारित्वात्) सम्बन्ध के कारस लक्षरण होती है, जसे-जो बढ़ई नहीं (अतक्षा) उसे (बढ़ई फा कार्य करने के कारए) बढ़ई (तक्षा) कहा जाता है। प्रभा-'राम्बन्धान्तरतस्तथा' इत्यादि मे आ्चार्य मम्मट ने बतलाया, है कि जहां सादृश्यास्य सम्बन्ध के कारण सारोपा तथा साध्यवसाना लक्षणा होती है वहाँ वह गौणी है जहाँ अन्य सम्बन्ध के कार होती है वहाँ शुद्धा है। अन्य सम्बन्ध (सम्वन्धान्तर) के अन्तगत कार्यकारसभावादि ग्रनेक सम्बन्ध हैं। जिनमें से कार्य- कारएभाव सम्बन्ध के उदाहरण 'आयु्धु तम्' आदि दिये जा चुके हैं। कार्यकारस- भाव सम्बन्ध के पततरिक्त (सादृश्य-भित्र) ग्न्य सम्बन्धों से होने वाली लक्षणा के कुद् उदाहरए 'यवचित्' इत्यादि अवतरण मे दिखलाये जा रहे है,। ये समस्त लक्षणाएँ शुद्धा लक्षणा के अन्तर्गत आती है। इनके भी सारोपा तथा साध्यवसाना भेद से दो दो प्रकार के उदाहरण हो सकते हैं। जैसे तादर्थ्य से होने वाली लक्षणा में 'स्थूणा इन्द्रः' यह शुद्धा सारोपा का उदाहरण होगा, 'इन्द्र दयम्' अथवा 'इन्द्र ऐवेयम्' यह साध्यवसाना उदाहरए होगा। यहाँ इन्द्र भब्द लाक्षशिक है। यह (स्थूगा) इप्ट प्रदान करने वाली है-इस बात की प्रतीति कराना ही लक्षा का प्रयोजन है। किसी राजकर्मचारी 'अमात्य' आदि को 'राजपुरुपोऽयं राजा' (सारोपा) अथवा 'राजाज्यम्' (साध्यवसाना) कहना भी स्वस्वामिभावसम्बन्ध से होने दाली लक्षणा है। यहाँ इसकी आज्ञा नहीं लांधनी चाहिये-यह प्रयोजना व्यज्जथ है। 'अग्रहस्तः' (अथवा हस्तः) इत्यादि में 'म्ग्र' च तत् हस्तरचेति अ्रग्रहस्तः' यह कर्मधारय समास है। यहाँ 'अग्र' अवयव है तथा हुस्त अवयवी। हुस्त शब्द की अ्रवयवावयवि- भावसम्बन्ध से अग्रमात्र में लक्षणा होती है। हस्ताग्र में बल की अधिकता की प्रतीति कराना ही प्रयोजन (व्यसघ) है। तक्षा-कोई व्यक्ति बढई न हो [अतक्षा] वह वढ़ई के कार्य में निपुण हो तो उसका 'पुरुषोञ्यं तक्षा' अथवा 'अय तक्षा' इस प्रकार से निर्देश किया जाता है यहाँ उस (तक्षन्-बढ़ई) का काम करने के कारग प्रयुक्त्त हुआ 'तक्षा' शब्द लाक्षणिक है। उसके कार्य की निपुसाता पो प्रकट करना रूप प्रयोजन ही
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७४ 1 काव्यप्रकाश:
-(.१७) लक्षरणा तेन पड्विधा ॥ १२) । I. आययभदाभ्यां सह। 'व्यङ्गय है। इस प्रकार साहृत्यातिरिक्त अ्नेक सम्बन्यों से होने वाली शुद्धा 'लक्षण होती है। टिप्पर-(i) यहाँ आाचार्य मम्मट ने 'उपचार' शब्द का लक्षणा मा गोए व्यव्हार के अर्थ में प्रयोग किया है। वस्तुतः उपचार शब्द का प्रसिद्ध ।अर्य ही है-अतच्छन्दस्य तच्छन्देनाभिधानमुपचारः' । उसी अर्थ। में यहाँ इम : शब्द का प्रयोग किया गया है। 'तादथ्य' इत्यादि सम्बन्धों से होने वाली लक्षणा प्रामीनकाल से प्रसिद्ध है गोतम के न्यायमूतर (२-२-६१) मे इसका उत्लेख है। " अनुवांद-उक्त प्रकार से (तेन) लक्षरंा छः प्रफार को है। ,न*" पूर्वोक्त (श्राद्) दो भेदों (उपादानलक्षर औौर लक्षसलक्षणा) के सांथ मिलकर (लक्षरण के) ६ प्रकार होते हैं। (१७) प्रभा-यहाँ लक्षणा का उपसहार'करते हुए आचार्य मम्मट ने बतलाया है कि उपयुक्त विवेचन के आधार पर लक्षेशा ६ प्रकार की है। ये ६ प्रकार कौन से हैं इस विषय में व्यास्याकारों के विभिन्न मत है। ऊपर के प्रत्य के 'पधार पर तो ऐसा प्रतीत होता है कि १. शुद्धा सारोपा, २. युद्धा साध्यवसाना, ३. गोली सारोपा, ४. गोणी साध्यवसाना, ये चार अंभी प्रतिपादित भेद त्था ५.उपादान- लक्षणा औोर लक्षसालक्षणा मे दो पुर्व प्रतिपार्दित भेद सब मिनकर छः प्रकार की सक्षसा है। जिसमे चार प्रकार शुद्धा लक्षणा के है और दो मौणी लक्षणा के हैं। संक्षेप में मम्मटकृत ६ भेद इस प्रकार हैं :- सक्षसा
मुद्धा गोी
उपादान लक्षरा सारोपा - गाध्यवसाना गारोपा साध्पचसाना (कुन्ता: (ग्गावा (धायुपु तम्) (भापुः (गोर्जाहीक:) (गोर्यम्) प्रविशन्ति) घोप:) पवम्) मम्मट का यह विभाजन वैज्ञानिक नही कहा जा सपता क्योंकि इसमे भिस भिस भेदीं का संकर हो जाता है। उदाहरगमायं 'मायुप् तम्'-'भापुरेवेदम्' नो नमशः शुद्धा सारोपा तथा शुद्धी साध्ययमाना के उदाहरस दिये गये है, ये मदाल- लक्षखा के भी उदाहरण हो गचते है। कारग यह है कि इनमें 'भापुः' शमा सपने वाच्चारयें को विल्तुल छोड़ देता है। इससिये प्रदीप यादि टीरा के मनुगार सक्षणा के पः भेद वास्तव में इम प्रकार है :- प्रयमनः सकसा के दो भेद है-
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द्वितीय उल्लासः
.१. शुद्धा, २. गौसी। फिर शुद्धा के दो भेद हैं-उपादानलक्षणा भोर वक्षसलक्षसा। उपादानलक्षसा तथा लक्षण-लक्षणा भी दो दो प्रकार की हैं, सारोपा और साध्य- बसाना। इस प्रकार शुद्धा के चार भेद हैं। और गौणी के दो भेद हैं-सारोपां तथा साध्यवसाना। संक्षेप में लक्षणा के ये ६ भेद इस प्रकार हैं- -
लक्षणा
शुन्ा गोगी
उपादानलक्षणा लक्षसालक्षणा ५ सारोपा ६ साध्यवसाना (गौर्वाहीक:) (गौरयम्) 1
१ सारोपा २ साध्यवसाना ३ सारोपा ४ साध्यवसाना उपादानलक्षणा उपादानलक्षणा लक्षणलक्षणा लक्षणालक्षणा कुन्ताः पुरुपाः (कुन्ताः प्रविशन्ति) (आयु्षृतम्) (आ्रयुरेवेदम्, प्रविशन्ति) ' यह विभाजन भी पूएतया सन्तोपजनक नहीं। कारण यह है कि (i) काव्य गङ्गायां घोपः) +
प्रकाश के निरुपण से यह प्रकट नही होता कि उपादान और लक्षणलक्षरा थे दोनों : लक्षखणा, के अवान्तर भेद है औौर इनके सारोपा तथा साध्यवसाना दो भेद हुआ करते हैं। सम्भवतः प्रदीपकार इत्यादि ने पूर्वोक्त दोप का निराकरण करने के लिये ही यह विभाजन कर दिया है। (ii) ऐसा विभाजन करने पर भी गीणी के भेदों के साथ लक्षण-लक्षणा का सांकर्य बना ही रहता है; क्योकि 'गौर्वाहीक' और 'गारयम्' में सक्षण-लक्षणा के भी उदाहरण हो सकते हैं तथ तो 'शुद्ध व सा द्विधा' (सूत् १३)- यह कथन भी सङ्भत नहीं होता। (iii) इस प्रकार गौणी और शुद्धा का भी पृथक् विभाजन नही रह पाता। फलतः काव्यप्रकाश के लक्षणा-विभाजन को वैज्ञानिक दृष्टि से व्यवस्थित नहीं कहा, जा सकता तथापि यह सादा और सरल है तथा व्यवहारिक दृष्टि से उपयोगी है; चयोंकि प्रयोजनवती लक्षखा के प्रायः सभी उदा- हरणों को इन ६ भेदों के अन्तर्गत रवसरा जा सकता है। टिप्पसी-(i) यद्यपि लक्षणा के रूटा और प्रयोजनवती-ये भी दो विभाग माने जाते है, अतः 'लक्षणा तेन पडविधा' यह उक्ति सद्भत नही प्रतीत होती तथापि प्रयोजनवती लक्षणा, ६ प्रकार की है-यह अभिप्राय है इसलिये कोई दोप नहीं; ऐसा नरसिंहठक्कुरादि टीकाकारों का मत है। वस्तुतः तो 'रूढ्वितोऽय प्रयोजनात् में 1. भचार्य मम्मट ने लक्षणा के हेतु का निर्देश किया है, लक्षसा का विभाग नही ; दिखलाया। रूठिकृत भेद का तो सागे १८ वे सूत्र में निरुपए किया जा रहा है भ्रतः हाँ पर ६ भेदों क परिगसन युक्तियुक्त ही है।
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७t j कव्यिमकोशः
(ii) यहाँ पर लक्षणा के भेदों काविवेचन काव्य-भेद निरूपण में उपयोगी होने के कारण विशेष रूप से किया गया है, जैसे कि उपादानलक्षसा.अर्यान्तर संकमितवाच्य ध्वनि में उपयोगिनी है इसी प्रकार अन्य लक्षणा-भेदों के विषय में भी है। इस विवेचन में आनार्य मम्मट की दृष्टि विगेपतः लक्षणामूलक व्यञ्जना के प्रतिपादन की ओोर रही है। इसी हेतु मुकुलभट्ट आदि के लक्षणा-विभाग को उन्होंने युक्ति-युक्त नही माना है। मुकुलभट्ट के अनुसार भी लक्षणा के ६ भेद हैं जो इस प्रकार हैं- सक्षणा
शुद्धा उपचारमिशा
उपादान सक्षणा शुद्धोपचार मिया गोलोपचारमिया
सारोपा साध्यवसाना सारोपा साध्यवसाना (iii) समालोचकों का विचार है कि विश्वनाय का लक्षणा-विभाजन (सा० द० २) अधिक व्यवस्थित है। विश्वनाथ ने लक्षणा के ८० भेद मिये हैं (दर०, आागे गु० २१ टि०)। फिर भी उस विभाजन मे यह दोप है कि यह सैद्धान्तिक मधिक हे, व्यवहारिक कम। उसमे ऐसे ऐसे उदाहरस दिये गये हैं जिनका भाषा में प्रयोग दृष्टिगोचर नहीं होता (गजेन्द्रगडकर)। (iv) अर्वाीन आचार्य पण्टितराज जगसाय ने भी रसगभ्गापर में प्रापः गम्मटकृत लक्षणा-विभाजन को ही अपनाया है :- लक्षरा
मिस्टा पयोजनपती
शुदा
सारोरा माधवमाना जहतस््व्रार्था मजहृत्रवार्या सारीया माभ्ययगाना (सभगा) (उपादान) सह ध्यान देने योम् है कि यहाँ काष्यपफास-निदिष्ट विभाजन मपनाया गया है; प्रदीप आदि का विभाजन नही। हिन्तु यढ़ी उपासन मसखा की मनहुत्स्वार्या मोर नमणान्लक्षमा को जहतवार्या वदा गया है।
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द्वितीय उल्लास: [' ७७
साच (१८) व्यङ् ग्पेन रहिता रूढौ सहिता तु प्रयोजने। प्रयोजनं हि व्यब्जनव्याप।रगम्यमेव।। (१६) तच्च गूढ़मगूढं वा- तच्चेति व्यङ्गथम्।
अनुवाद :- और यह लक्षणा - रूढि या प्रसिद्धि होने पर व्यङ्गभ भपं से रंहित होती हैं तथा प्रयोजन होने पर व्यङ्गघ के अर्थ से मुक्त होती हैं। क्योंकि (हि) प्रयोजन तो व्यञ्जना के व्यापार द्वारा ही बोध्य है (व्यञ्जन हपो यो व्यापार: तद्गम्यम्) । (१८) 1 वह व्यस्गुम धथं सहदयमात्रवद (गूढ=छिपा हुआ) अथवा जनसाधारण- येद्य (पगूद=प्रपन्ट) होता है। (कारिका में) 'तत् घ' का अभिप्राय हूँ-व्यस्सघ भर्थ। (१६) प्रभा-आाचायं मम्मट ने प्रथमतः लक्षणा के उपाधिकृत छः भेदों का प्रतिपादन किया। यहाँ पर 'सा न' इत्यादि द्वारा लक्षणा के व्यन्जना की दृष्टि से' होने वाले तीन भेदो का निरूपणा करते हैं। व्यञ्जना की दृष्टि से लक्षणा दो प्रकार' की है-१ अव्यङ्गया तथा २. सव्यङ्या। रुदि के हेतु से होने वाली लक्षणा भव्यङ्गपा है। वहाँ प्रसिद्धिमान के कारण लक्षणा हो जाती है। 'कर्मि कुशलः आ्रदि मे कोई प्रयोजन तो व्यङ्गथ होता नहीं। प्रयोजन के हेतु से होने वाली लक्षसा व्यङ्गथ सहित या राव्यङ्भया होती है। प्रयोजन की अ्भिव्यक्ति व्यञ्जना द्वारा ही होती है। भभिया या लंक्षणावृति से प्रयोजन की अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। इसी से'प्रयोजनवती लक्षणा सवत्र व्यङ्गय सहित ही होती है, जैसे 'गङ्गायां घोपः' इत्यादि में 'सीतलता' आदि की प्रतीति कराना प्रयोजन है उसका व्यञ्जना व्यापार से ही बोध होता है। वस्तुतः प्रयोजन-प्रतीति व्यङ्गधार्थ का ही एक नाम है (तथा च प्रयोजनव्यङ्ग घयोरेकार्थत्वात्-बालवोघिनी)। सव्यद्धया लक्षणा में व्यङ्गघार्थ दो प्रकार का होता है-एक तो गूढ व्यङ्गथ मोर दूसरा अगूढ व्यङ्गय। कही तो व्यञ्जना से प्रतीत होने वाला यह अर्थ इतना मूढे-गहरा या गम्भीर होता है कि केवल सहृदय जन, ही इसका आनन्द ले सकते हैं। कहीं यह व्यङ्गधार्थ भ्रगूढ या प्रकट रूप से प्रतीत होने वाला होता हैं तंथा. काव्य-वासना से जिनकी बुद्धि परिष्कृत नहीं हुई है ऐसे जन भी उसको समझ लेते- हैं। इस प्रकार यह सव्यद्धया लक्षणा दो प्रकार की हो जाती है-१. मूढव्यङ्गथा और २. भगूदब्यङ्गथा!
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७ =. ]. काव्यप्रकार:
गृढं यथा- 1. मुख विकसितम्मितं,वशितवक्रिमम च्षितं i1+
समुच्छनितविभ्रमा गतिरपारतसंस्था मति:। i उरो मुकुलित स्तन जघनमंसबन्ोद्धुरं वतेन्दुबदनातनौ तरुशिमोद्गमो मोदते ।।६।। :/ अनुवाद :- गूदय्यस्घ (यहां है), जैसे - 'अहो (यत) इस चन्द्रमुखी (मुन्दरी) के शरीर में (अभिनव) यौवन पाा भाविर्भाव (तरुशिमा+उद्गमः) हो रहा है (मोदते=स्फीतो भवति)। देसो, इसका मुख ऐसा है, जिसमें मुरकान सिली है (विकसितं स्मितं यत्र ताद्गम्), इसकी दृष्टि (प्रेक्षितम्) ऐसो है जिसने वश्ता या वाकिपन को 'अपने घश में कर लिया है (वशिते: वक्रिमा येन तथाभूतम्), इसकी चाल ऐसी है जिसमें (विविध) हाव-भाव छलक रहे है (समुच्छलिताः विभ्रमाः हायघिशेया: यस्याम्, तथाभूता)। इसकी बुद्धि ऐसी है जिसने समस्त सीमाएं घोड़ वी हैं (अपास्ता त्यक्ता संस्था नियतविपयवतित्यं यया तावशी), इसका यदास्यल ऐसा है जिस्षमें फली के समान सतन सिल उठे हैं (मुफुसिती भुकुलाफारो ईपदुपती या स्तनो यय) इसके जघन अवयवों के दृढ़ गठन के फारण (भसंबन्पेन) विसक्षल रतियोग्य (उवधुरम) हो रहे है। (इस प्रकार स्मित अवि से तारप्य भभिव्यक्त हो रहा है. यहं भाव है): ॥ ६।। I8 प्रभा- यह गूढ व्यन्नथ का उदाहरण है। कोई युवक किमी नययौयना तडसी को देसकर यह कह रहा है। यहाँ (१) स्मित में पुपप का धर्म अर्यात विकास बाधित हो जाता है गथा उस (विकास) की हास्योन्मुक्तता मे लक्षखा होती है-(पुष्प के समान) सोरभ आदि ब्यनहथ है। (२) दृष्टि में चेतन, धर्म यशीकरण मा बाघ होने के फारस स्वाधीनता' में लक्षणा होती है तथा 'मुक्तानुराग' व्यस्नम है। (३) विधम में, मूर्वंदव जलादि का उच्छनन रूप धर्म वाघित होने के कारसा 'प्रुरता' (बाहृत्य) वना लक्षणा से बोष होता है, तथा 'सफसमनोहारिता' व्यहथ है। (v) मति में चेतन के धर्म सर्यादा-त्याग (संस्था) का वाघ होने के फारस 'पवीरता में सक्षणा होती है। पहले मुग्धावस्था में गुरुजनी के सामिध्य में बुद्धि मर्वाद को म्वीनर थरनी घी. किन्तु यीवन के प्रस्पुदित होने पर वह मुग्घता तथा मर्यादा का भाम जावे रहे-इस प्रकार 'मनुराग की अधिकता'का व्यञ्जना द्वारा बोर्ष होता है। (x) स्तंनों में मुकुतित होना रप पृष्प के धर्म का बाप हो जाता ह पत: 'काठिन्य' की सधरग मे 'प्रतीति होती है तथा 'मातीदवनयोसपता' क्यसनप है। (९) जघन में पेवन के. धमें उदघुरता (स्फूति) का वाप होने के कारख 'बिनवस रविपोषत में सक्षग्ा होतो हैं सथा 'रमगोयता' व्यक्तम है। (७) योजनोदगम में भेतन के धर्म मोर का बाय होने के कारमा 'उत्करप' लन्ित होता है सपा 'हृह्सियता व्वसुय है। यह।
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द्वितीय उल्लास: ७६
शंगृदं यथा- श्रीपसचियाज्जडा-अपि भवन्त्यभिज्ञा विद्ग्धचरितानाम।
अत्रोपदिशतीति। उपदिशति कामिनीनां योवनमद एव ललितानि॥१०॥
-(२०) तदेषा कथिता त्रिधा॥१३॥ अठयद्गया गृढव्यङ्गपा श्रगूढव्यत्षपा च। तद्भुर्लाक्षशिक :- शब्द इति सम्वध्यते, तद्भूस्तदाश्रयः। सवंत प्रयोजनवती लक्षणा है तथा कुछ न बुछ व्यङ्गचार्थ विद्यमान है किन्तु काव्य- वासना से परिपकव बुद्धि वाले सहृदय जन ही उस व्यङ्धच का आ्रनन्द प्राप्त कर सकते हैं प्रतः 'यहाँ 'गूढव्यङ्गय' है और यह गूढव्यह्या लक्षणा का उदाहरण है। -ii अनुवाद :- अगूव्यङ्गघ (यहाँ हं), जंसे- .- 'परज्ञानी जन भी (जडा अ्पि) लक्ष्मी के सम्बन्ध (परिचय) से विदग्ध (चतुर- प्रगतभ) जनों के व्यवहारों (चरित्र=चाल ढाल) के ज्ञाता हो जाते हैं। यौवन का मद ही रमसी जनों को रतिविलास (ललितम् सिखला देता है ।।१०।। : यहां 'उपदिशति' यह पद शरगूदध्यङ्गघ हैँ। *। प्रभा-य्रह अ्गूदव्यङ्भघ का उदाहरण है। यहाँ पर 'उपदिशति' (सीख: देना) यह चेतन का धर्म है अवः यौवन मद में इसका होना सम्भव नहीं तथा इससे, केवल 'प्रकट करना' अर्थ लक्षित होता है। 'बिना प्रयास के ही रतिविलास का ज्ञान हो जाता है, मह व्यङ्गय अर्थ है। यह व्पङ्गय इतना स्पष्ट (अगूढ) है कि सहुदय जनों के समान अन्य जन भी सहज ही इसे समझ सकते हैं। अतएव यह अगूढ-, व्यह्मा लभणा का उदाहरण है। अनुवाद :- इस कारस (तत्-तस्मान) यह लक्षसा, तीन प्रकार की कही गई है-१-अव्यङ्धचा २: गूढव्यङ्गचा और ३. अ्रगूडव्यङ्गचा। (२०) + .उस लक्षणा का आश्रय (तद्भू) शब्द लाक्षिक कहलाता है। यहां, लाक्षणिक' से शब्द, का सम्बन्ध है। 'तद्भू' का भ्रर्थ है-उसका आथय ।(२१) I व्यास्या-आ्ाचार्य मम्मट ने प्रथमतः लक्षणा के दो भेद किये -- १, उपादाम लक्षणा २ लक्षणलक्षणा। ये दोनों भेद शुद्धा लक्षणा के अन्तर्गत हैं यह भी बतलाया 1फिर अन्य दृष्टि से सारोपा और साध्यवसाना दो प्रकार की लक्षणा बतलाई।। इन दोनों के शुंद्ा और गौशी के भेद से दो-दो भेद होकर चार प्रकार हुएं तथा लक्षणा के ६ भेद हो गये-'लक्षखा 'तेन पडविधा'। किन्तु काव्य की उत्कृप्टता तो व्यद्धधार्थ की प्रधानता पर निर्भर है; 'अत व्यन्गय की दृष्टि से भो लक्षखा पर विचार किया और उसके तीन भेद किये-अव्यदथा, गुढव्यङया
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काव्यप्रकार:
तथा अगूडव्यतथा। जिनका विवेचन १६ मूम की व्यास्या में किया जा चुका है। अ्रव विचारणीय यह है कि इस, प्रकार मम्मट के मतानुसार लक्षणा के कितने भेद होते हैं ? प्रदीपकार के अनुसार उपाधि वे कारण लक्षरणा में पूर्वोक छः भेद हैं तथा व्यन्जना बे दष्टि से यहां कहे गये ३ भेद हैं; किन्तु नरसिह्ठयकुरादि के मतानुसार मम्मट ने 'व्यङ्गय'न रहिता रुढौ, सहिता तु प्रमोजन' में नंमशः निस्टा तथा प्रयोजनवती का लक्षणा किया है। इससे पूर्व प्रयोजनवती के ६ भेदों क निर्पम किया है किन्तु निम्हा का कोई भेद नही बतलाया। इस प्रकार व्यह्गयरहित रदिलक्षणा एक प्रकार की है तथा पूर्वोक्त पड्त्रिया प्रयोजनवती ब्यन्नपरहित रूहिलक्षणा एक प्रकार की है तथा पूर्वोक्त पड्विधा प्रयोजनवती लक्षरा गूढव्पङ्गय और अ्मूदव्यस्मय रूूप से दो दो प्रकार की है अर्यात् १२ प्रकार को है, कुल मिलाकर १३ प्रकार की लक्षणा होती है। वस्तुतः, 'मा च' से आरम्भ करके 'तदेपा कथिता मिया' तर के सक्षणा- विवेचन पर आचार्य गम्मट ने विनेप वग दिया है। यहाँ व्यं्जना को दृष्टि से ही लक्षम्ा के विभाग किये गये हैं तथा काव्य-विवेचन की दृप्टि मे यही विभाग विदेप- कर उंपयोगी है। उसी हेतु लक्षणा के सवान्तर भेदों की ओर ध्यान न देते हुए यहाँ 'वदेवा कयिता विधा' इस प्रकार से लक्षसा के भेद-विवेचन का उपगंहार किया गया है। तद्भुर्लाक्षलिक :- उस लक्षणा का आश्रय जो शब्द है यह लाक्ागिक शब्द गहलांता है 'स्पाद् वाचको लाक्षणिक:' इस प्रकार (१ सून में) शब्द के वाचक पादि भेदशय का द्वितीय उल्लान के आरम्भ में निर्देशें किया गया था। समी प्ररन् में यहां लाक्षसिक' शब्द बतलाया गया है अनः यही से सब' का यहाँ मम्बन्प होता है। विभिस्न भेदों यासी उग लक्षम्ा का आयय होने माला मब्द ही लाभलिए है भर्यात् नक्ष्यार्य का योषा शब्द लास्षणिक कहलाता है। 1 टिप्प्लो-लक्षमा के भेद-प्रभेद भनेव पानार्यों ने किये है। माहित्पगास्त्र, न्याय तया उया हरसनास्त्र आदि में मिन्न र प्रकार मे लकगा-विभाग का विमेचन किया गया है। मम्मट से पूर्व भी कई आचारयों ने म पर बिनार किया था। मम्मट के बाद के आचार्यों ने भी इसका विशद विवेधन किया है। साहितय- द्पस्रकार ने सक्षमा के प्रथम तो ४० भेद किये है-पदेवं सपलामेवारवत्वा- रिझन मता युर्ध: (साहित्य-दर्पएा २.११) । मे ४० भेद हैं८ प्रकार की सवनससा फ१र प्रकार की प्रयोजनवती। फिर पदगत और याननगतरूप मे दोन्दो भेद होकर 5० भेद होते हैं। संक्षेप में फविराज विन्वनाय म लक्षरा-विभाव इम प्रकार (- प्रयगपत: सक्षणा के दो प्रवार ह-१ मउतपला २ प्रोननवती=२ इनमे से प्रद्येक के दो भेव होत है-उपदाननसछा तपा नसएातसाखा -२X२या ४ इनमें ये भी प्रश्येक मे दो भेव होते है-गागेपा तमा साध्यपसाता=४४२याद इनमे से भी प्रश्येक के दो भेद होते हैं- मुद्ा मोर मोगी =८X२ या १९
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-(२२) तत्र व्यापारो व्यञ्ञजनात्मकः । कुत इत्याह- (२३) यस्य प्रतीतिमाधातु' लक्षरा समुपास्यते ।१४।!" फले शन्दैकगम्येऽन व्यक्षनान्नापरा क्रिया। प्रयोजनप्रतिपिपादयिपया यत्र लक्षणया शब्दुप्रयोगस्तन्न नान्यतरत- तपतीतिः अपि तु तम्मादेव शब्दात्। ने चात व्यस्जनाटतेऽन्यो व्यापार:। इस प्रकार १६ मेदों मे र भेद रुढलक्षणा के तथा = प्रयोजनवती के है। प्रयोजनवती के ८ भेदों के भी २ प्रकार होते हैं-गूढव्यङ्गया तथा अगूढव्यङ्गथ। =८X२ या. १६ प्रयोजनवती के १६ प्रकारों के फिर दो दो भेद होते हैं-धर्मगत, धर्मिगत =१६x२ या ३२' • अतएव ८ रूढलक्षगा -- ३२ प्रयोजनवती लक्षणा= ४० लक्षणा के भेद + हैं। इनमें ४० के भी दो दो भेद होते हैं-पदगत और वाक्यगत =४०X२"या '56 अनुवाद :- उस लाक्षसिक शब्द में (तत्र) जो व्यङग्य को प्रफट करने वाला व्यापार है (व्यङ्ग्यप्रकाशान्फूल:) वह व्यञ्जनस्वरूप ही है। (२२) ऐसा कयों ? इस पर ग्रन्यकार कहते हैं- जिस (शंत्य पावनत्यादि) प्रयोजन को प्रतीति को उत्पन्ष करने के लिये (आघातुम) लक्षणा का आधम लिया जाता है (समुपास्यते), इस फल-प्रतीति में जो कि 'एक मात्र लाक्षिक शब्द का हो विषय है, व्यञ्जना के प्तिरिक्त कोई सन्य व्यापार नहीं। प्रयोजन की प्रतीति कराने की इच्छा से जहाँ (बङ्गायां घोषः-इत्यावि में) लक्षरण द्वारा शन्द-प्रयोग किया जाता है, वहाँ अन्य (अनुमानादि) द्वारा उस पयोजन की प्रतीति नहीं होनी अपितु उसी शब्द के द्वारा होती है और इस प्रयोजन प्रतीति के विषय में (पत) वयञ्जना के प्रतिरिक्त अन्य कोई व्यापार नहीं हो सफता। (२३) . पृभा-वाचक और लाक्षणिक शब्द का निरूपण करने के पश्चात् व्यञ्जक शब्द का निरूपस करना है तथा उसके लिये व्यञ्जना का स्वरूप बतलाना है। यह व्यञ्जना शाब्दी तथा आर्थी दो प्रकार को होती है! शाब्दी व्यञ्जना भी दो प्रकार की है-अरभिधामुला तथा लक्षणामूला। यद्यमि अभिघा मुख्य वृति, है। लक्षणा का भी वह आधय है अतः पहिते अभिवामूला व्यञ्जना का विवेचन करना चाहिये ; तथापि 'तत्र व्यापारो व्यञ्जनात्मक:', इत्यादि: द्वारा अन्थकार प्रथमतः- लक्षणामूला व्यञ्जना- का प्तिपादन करते हैं
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काव्यप्रकाण:
तथा दि- (२४) नाभिधा समयाभावात् गङ्गायां घोप इत्यादौ से पावनत्वादयो धर्मास्तटाद्ी परतीयन्ते न सत्र गंद्गादिशब्दा: संक्वतिताः। इसका कारग है-(१) बहामूता वज्जना अधिक प्रमिद्ध है, (२) गहाँ समसा का प्रसभ्ध चल रहा है तथा (३) प्रगोजन को प्रतोति कमे होती है. यह जाने बिना सव्यद्या या प्रयोजनवती लक्षणा ना विवेधन पुर्ए नहीं होता। 'यस्म' इत्यादि का भाष यह है कि 'गङ्गायां घोरः' इत्यादि मे लाक्षिक सब्दों का प्रयोग इस हेतु किया जाता है कि उनसे शीनत्वपावनत्वादि, किभी प्रयोजन की प्रतीति हो सके। यंह प्रयोजन कहीं गूढव्यद्धय के रूप में तथा वही अगूडव्यम्गय के रप में प्रकंट होता है। किन्तु इसकी लाक्षसिक शब्द द्वारा ही नवंत प्रतीति होती है। कोई अनुमान आदि अन्य प्रमास इसकी प्रतीति कराने वाला नहीं है। यह लाथसि शब्द बयंजना, नामक इयापार द्वारा हो प्रयोगन या फूल को प्रतीति कराता .. ऐै; भगः सक्षणामूलक वपन्जना को स्वीकृति अनिवार्य है। टिप्प्ली-(i) यद्यति वैयाकरणों से पेरखा पाहर साहित्य ास्त्र में व्यञ्जना वृति की उदभावना पहिले ही हो चुकी थी तयापि आ्नन्दवयंन ने इसकी भली भांति स्थापना की। फिर भी अनेक पाचार्यों ने इसे रजीकार नहीं निया; जसे. मुकुलमट, भटटनायक, कुन्तक, धनस्जय तथा महिमभट्ट आदि मानावं इसका विरोध करते रहे। मम्मट, विश्वनाय, जगनाय पत्मानि भाषा्य इसके प्रयत रामर्पुक हैं। यही मम्मट ने लक्षता औौर मभिया से भेरे दिगनाते, हुए व्यज्जना यूति के स्वरूप तथा प्रकाशें का विरव विवेनन किया है तथा पञ्चम उस्लाम में विरोषियों के पाशेषों का निराकुरण करके मुटड प्रमाखों के आाधार पर वं्मना का समर्थन किया है। '' (i) विश्वनाथ कविराज ने भी प्रापः इन्हीं बब्दों में राक्षगामूतकं वज्जना का निरुपए किया :- 1 सकलोपास्वते माय' कृते सत प्रवोगगन्। यपा प्रत्याय्यते सा स्यार व्यञ्जना लक्षसाधमा । (साहिसदर्स २१५) " अनुवाद :- रामय अर्तात् रङ्तू से न होने के कारल (प्रयोगन की प्रनीति में) प्रमिया नामक हबेदव्यापार (समर्य) नहीं है 'द्ारयों पोम' इत्यादि रमसों पर सटै यादि में जो पवित्रिता आदि पम (मवोनन रप में) प्तीत होते है, उनमें पहादि सब्ब को रांकू स नहां किया गया है। (२४) T+''प्रमा-प्रयोगन की प्रतीति पराने याना व्न्जना नामक स्यपार ही है। क्योंकि भमिया, जो गमा बी मुम्ब पृतति है, उन के द्वारा प्रवोजन की प्रजीवि नदी ह सपनी।पभिषा, पृति द्वारा जमी धर्मे मी प्रतीति शेवी है जिसरमे गग कैी
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द्वितीय उल्लास:
(२५) हेत्वभावान्न लक्षरा ॥१५॥ :) मुख्यार्थबाघादित्रयं हेतुः। तथा च- (२६) लक्ष्यं न मुख्यं नाप्यत्र वाधो योग: फलेन नो। न प्रयोजनमेतस्मिन् न च शब्द: स्खलद्गतिः ।१६॥. । यथा गद्गाशब्द: स्रोतसि सवाघ इति तटं लक्ष्यति, तद्वत यदि तटेडपि सवाधः स्यात् तत् प्रयोजनं लक्षयेत। न घ तटं मुख्योऽर्थः ।नाप्यंत्र, वाघः। न च गङ्गाशव्दार्थस्य तटस्य पावनत्वाद्य लक्षीयै. सम्व्ः। नपि परयोजने। लक्ष्ये किञ्चित् प्रयोजनम्। नापि गङ्गाशब्दस्तटमिव प्रयोजनं. प्रतिपाद्यितुमसमर्थ: । संकेत होता है। किन्तु जब गङ्भायां घोपः' आदि का प्रयोग किया जाता है तो -- लक्षमा द्वारा गढ्गा सब्द तट का बोध कराता है तथा तट मे शीतलता र पविय्रता आदि की प्रतीति कराना ही लक्षसा का प्रयोजन माना जाता है। इन शीतलता आादि की प्रतीति अभिवा वृति द्वारा नही हो सकती; क्योकि गङ्भादि'- शब्द के ये सङ्तित अर्थ,नही हैं। जब ये सद्कतित अर्थ नहीं है तो अभिया, वृत्ति, द्वारा, इनका बोध कैसे संभव है? अनुवाद- हेतु के न रहने से (प्रयोजन की प्रतीति में) लक्षणा भी (समयं)- नहीं है। मुख्यार्थ-बाध आदि (मुस्यार्थयोग तथा रूदि या प्रयोजन) लक्षणा के. तोन हेतु हैं। (२५) जैसे कि-यहां लक्ष्य (तीरादि) मुस्यार्षं नहीं, (तीरादि लक्ष्यार्थ में) यहाँ (घोपादि का आ्रशय होना रुप) अर्थ का बाध भी नहीं है। तीरावि पर्थ का (पावनत्व यादि) फल के साथ साक्षात् सम्बन्ध भी नहीं है। और, इस (शीतत्वाबि- प्रयोजन को लक्षणा) में अन्य फोई प्रयोजन भी नहीं है; तथा गङ्गा आदि/शब्वा: (प्रयोजन के प्रतिपादन में) अ्रसमर्थ (स्सलदगतिः= प्रच्युतसामथ्यंः) भी नहीं है।- जसे गद्धा शब्द प्रवाह रूप अरथं में आाधित होकर लक्षला द्वारा-तट का- बोध कराता है उसी प्रफार यदि तट में भी बाघित होता तो प्रयोजन का लक्षला : द्वारा बोध कराता। किन्तु (प्रथम तो)-तट मुस्यार्थ नहीं, न तट रूप -अर्थ में वाघ हो है; गङगा शब्द के (लक्ष्य) अर्थ तट का पावनत्वादि (यदि उन्हें सक्ष्य माना"" जाय) लक्ष्यार्थों से सम्बन्ध भी नहीं है; और प्रयोजन को लक्ष्य मानने में फोई औौर प्रयोजन भी नहीं है तथा जैसे गङ्गा शब्द (मुरयार्थवाधादि के बिना) तट अर्थ-के.
नहीं है। (२६) प्रतिपादन में असमर्थ है उसी प्रकार प्रयोजन का प्रतिपादन करने में भसमर्य :?
प्रभा-लक्षसा-वृत्ति के द्वारा भी प्रयोजन कौ प्रतीति नही हो सकती क्योंकि इसमें दो विकल्प हो सकते है (१) एक सक्षणा से तीर आादि की प्रतीति होनेपर !?
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काव्यप्रकाश:
तथा हि- (२४) नाभिधा समयाभावात् गङ्गायां घोप इत्यादो े पावनवादय धर्मास्ाद प्रतीयन्ते न तन्र गंङ्गादिशब्दा: सङ्कतिताः। इसका कारण है-(१) लक्षणामूला व्यञ्जना अधिक प्रसिद्ध है, (२) यहाँ सक्षणा का प्रसङ्ध चल रहा है तया (३) प्रयोजन की प्रतीति कस होती है, यह जानें बिना सम्पद्धया या प्रयोजनवती तक्षसा का विवेचन गू नही होता।यस्प इत्यादि का भाव यह है कि गज्गाया घोष:' इत्यादि में वाक्षणिक, शब्दों व प्रयोग इस हेतु किया जाता है कि उनसे क्षीतत्वपावनत्वादि किसी प्रयोजन की प्रतीति हो सके। यंह प्रयोजन कहीं मूढव्यङ्गय के रूग में तथा कही अगूढव्यङ्गय के रूप में प्रकंट होता है। किन्तु इसकी लाक्षिक शब्द द्वारा ही सवत्र प्रतीति होती है।, कोई अनुमान आदि अन्य प्रमाण इसकी प्रतीति कराने वाला नहीं है। यह लाक्षसिक शब्द व्यञ्जना नामक व्यापार द्वारा हो प्रयोगन या फस की प्रतीति काराता, है; अतः लक्षणामूलक व्यज्जना की स्वीकृति-अनिवार्यहै। 1 , टिप्परंी-(i) यद्यषि वैयाकरणों से प्रेरणा पाकर साहित्य शास्त्र में व्यञ्जना वृति की उद्भावना पहिले ही हो चुकी थी तथापि आनन्दवर्धन ने इसकी भली भांति स्थापना की। फिर भी अ्नेक आचार्यों ने इसे स्वीकार नहीं किया; जैसे-मुकुलभट्ट, भट्टनायक, कुन्तक, धनञ्जय तथा महिमभट्ट आदि आचार्य इसका विरोध करते रहे। मम्मट, विश्वनाथ, जगनाथ इत्यादि आाचार्य इसके प्रवत समर्थक हैं। यहीँ मम्मट ने लक्षा और अ्भिया से भेद दिखलाते हुए व्यज्जना वृति के स्वरूप तथा प्रकारों का विशद विवेचन किया है तथा पञ्चम उल्लास में विरोधियों के आक्षेपों का निराकरण करके सुदृढप्रमाणों के आधार पर व्यञ्जता, का समर्थन किया है। (ii) विश्वनाथ कविराज ने भी प्रायः इन्हीं शब्दों में राक्षरीमूलक व्यञ्जना 4 का निरूपण किया :- ' 'लक्षणोपास्यते यत्य कृते तत' प्रयोजनम्। - वया प्रत्याय्पते सा स्याद व्यञ्जना लक्षसाथया ॥ (साहित्यदपण रं१५) ·अनुवाद :- समय अर्थात् सङ्ड ते ने होने के फारस (प्रयोजन की प्रतीति में) अभिंघा नमक शब्द-व्यापार (समर्थ) नहीं है 'गङ्गायां घोषः' इत्यादि स्थलों पर तटे आादि में जो पवित्रिता शादि धर्म (प्रयोजन रूप में) प्रतीत होते हैं, उनमें गङ्गादि शब्बे कर संड् त नहों किया गया है। (२ं४) 7 प्रमां-प्रंयोजन की प्रतीति कराने वाता व्यंञ्जना नामक व्यापोर हीहै" ममोंकि अभिधा, जो बब्द की मुस्य वृत्ति है, उसके द्वारी प्रयोजन की प्रतीति नहीं हो सकेवी। अभिया, वृत्ि द्वारा उसी अर्थ की प्रतीति होती है जिसमें शब्द का
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द्वितीय उल्लास:
मुख्यार्थवाघादिन्नयं हेतुः। (२५) हेत्वभावान्न लक्षणा ॥१५॥ )
तथा च- (२६) लक्ष्यं न मुख्यं नाप्यत्र बाधो योग: फलेन नो। न प्रयोजनमेतस्मिन् न च शब्द: स्खलद्गतिः ॥१६।. यथा गङ्गाशब्द: सत्रोतसि सवाघ इति तटं लक्षयति, तद्वत् यदि तटेडपि सवाधः स्यात् तत् प्रयोजनं लक्षयेत्। न च तटं मुख्योऽर्थः ।नाप्यंत्र, वाघः। न च गङ्गाशब्दार्थस्य तटस्य पावनत्वाद्यलक्षणीयै. सम्वन्घः ।नापि प्रयोजने। लक्ष्ये किञ्चित् प्रयोजनम्। नापि गङ्गाशब्द्स्तदमिव प्रयोजनें, प्रतिपादयितुमसमर्थः । संकेत होता है। किन्तु जब गङ्गायां घोष:' आदि का प्रयोग किया जाता है तो- लक्षणा द्वारा गङ्गा शब्द तट का बोध कराता है तथा तट में शीतलता औ्र पचित्रता आदि की प्रतीति कराना ही लक्षणा का प्रयोजन माना जाता है।इन : शीतलता आदि की प्रतीति अभिधा वृति द्वारा नही हो सकती; क्योंकि, गङ्गादि: शब्द के ये सङ्कतित, अर्थनही. हैं। जय ये सङ्केतित अर्थ नही है तो अभिधावृत्ति, द्वारा इनका बोध कैसे संभव है? .'i .* अ्ननुवाद्- हेतु के न रहने से (प्रयोजन की प्रतोति में) लक्षसा भी (समर्य) .. नहीं है। मुस्यार्थ-बाध आदि (मुख्यार्थयोग तथा रूढि या प्रयोजन) लक्षणा के- तीन हेतु हैं। (२५) जैसे कि-यहाँ लक्ष्य (तीरादि) मु्यार्थ नहीं, (तौरादि लक्ष्यार्थ में) वहां (घोषादि का आधय होना रूप) प्रर्थं का बाघ भी नहीं है। तीरादि भर्थ का (पावनत्व यादि) फल के साथ साक्षात् सम्बन्य भी नहीं-है। और, इस (शीतत्वावि: प्रयोजन की सक्षणा) में श्रन्य कोई प्रयोजन भी नहीं है; तथा गङ्गा आदि:शब्दतत (प्रयोजन के प्रतिपादन में) अ्रसमर्थ (रसलद्गतिः= प्रच्युतसामभ्यंः) भी नहीं है। जसे गङ्गा शब्द प्रवाह रूप अर्थ में आधित होकर लक्षसा द्वारा तट का बोध कराता है उसी प्रकार यदि तट में भी वाघित होता तो प्रयोजन का लक्षणा द्वारा बोध कराता। किन्तु (प्रथम तो) तट मुस्यारय नहीं, न तट रूप धर्थ में बाघ हो है;गङ गा शब्द के (लक्ष्य) अर्थ तट का पावनत्वादि (यदि उन्हें लक्ष्य माना जाय) लक्ष्यायों: से सम्बन्ध भी नहीं है। और प्रयोजन को लक्ष्म मानने में फोई और - प्रयोजन भी नहीं है तथा जसे गङ्गा शब्द (मुख्यारयबाधादि के बिना) तट अयंफे .- प्रतिपादन में असमर्थ है उसी प्रकार प्रयोजन का प्रतिपादन करने में असमर्य, नहीं है। (२६) ।. प्रभा-लक्षणा-वृत्ति के द्वारा भी प्रयोजन की प्रतीति नहीं हो, सकती ध्योंकि इसमें दो विकल्प हो सकते हैं (१) एक लक्षणा से तीर आदि को प्रतीति होने पर
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८४-1 चाव्यप्रकाग: 44
(२७) एवंमप्यनवस्था स्याद् या मूलक्षयकारिणी।
द्वितीय लक्षणा से प्रयोजन की प्रतीति होती है (द्वितीय लक्षणावादी) त्रथवा। (२) एक ही लक्षणा से प्रयोजन-विभिष्ट, तीर आदि की प्रतीति हो जाती है (विलिष्ट लक्षरपावादी)। इनमे से प्रथम मत ठीक नहीं। कार्स यह है कि लक्षणा के तीन हेतु है-१. मुख्यार्थवाघ २. मुस्याथयोग तथा ३. रूदि या प्रयोजन। यहां ये तीनों हेतु नही हैं, अतः शीतत्वपावनत्वादि प्रयोजन लक्ष्य नही हो सकते। ये तीनों हेतु यहाँ नही हैं यह स्पप्ट ही है; कवोकि प्रथम हेतु मुस्यार्थवाध है। जिस प्रकार गङ्गा शब्द प्रवाह रूप अर्य में वाधित होकर तट रूप अर्थ का नक्षणा द्वारा बोध कराता है; इसी प्रकार यदि तीरादि घोपादि का आधार न हो सक्ता तो तीरादि धर्थ मे भी वह वाघित हो जाता तथा शीतत्वपावनत्वादि में लक्षणा हो जाया करती। किन्तु यहाँ मुस्यार्थ-बाध नही है; क्योकि प्रथम तो तीर गङ्गा का मुम्यार्थ ही नही है, यदि 'तीर' को मुम्यार्य भी मान ले तो तीर रूप अर्थ में कोई वाघा भी नहीं है। लक्षणा का द्वितीय हेतु है-मुम्यार्थ से साक्षात्सम्बन्ध। यदि पावनत्वादि को लक्ष्य माना जाये तो गङ्गा शब्द के लक्ष्यार्थ 'तीर' से उनका साक्षात् सम्बन्ध होना चाहिये किन्तु यहाँ पावनत्वादि का तटरूप अर्थ से साक्षात् सम्बन्ध'नही है।~पावन -* त्वादि का साक्षात् सम्बन्ध तो गङ्गा-प्रवाह से है लक्षणा का तृतीय हेतु है-रूदि प्रथवा प्रयोजन। स्पप्ट ही है कि गहाँ रूढि नहीं हो सकती। रही प्रयोजन की बात अर्यात् यदि पावनत्वादि प्रयोजन को लक्ष्य माना जाय तो उसका कोई अन्य, प्रयोजन मानना पड़ेगा। वह प्रयोजन यहाँ नहीं है। ग: : यदि कोई कहे कि मुख्यार्थवाय आदि हेतुत्रय के' बिना ही यहां लक्षणा यों न मान ली जाये ? तो उत्तर है-न च शब्द: रसलद्गतिः=नापि गङ्गाशन्द- स्तटमिव प्रेयोजन प्रतिपादयितुम् असमर्थः। जैसे गङ्गा शब्द तटादि का साक्षात् वोष कराने में असमर्थ होकर लक्षणा द्वारा तट का बोध कराता है इसी प्रकार यदि प्रयोजन के प्रतिपादन में भी असमर्थ होता तो प्रयोजन को लक्ष्यार्थ माना जा सकता था । किन्तु गङ्भा शब्द पावनत्वादि की प्रतीति में सर्वथा असमर्थ (रसलद्गति :- क्षीए हो रही है गति अर्थात् अपर्थं बोधन सामर्थ्य जिसकी) नहीं: अमि तु इसी शब्द से प्रयोजन की प्रतीति हो जाती है। अतएव प्रयोजन में लक्षणा नहीं हो सकती, 'अभिधा' का न हो सकना पहले ही' दिखलाया' जा चुका 'है, इस प्रकार प्रयोजन की प्रतीति हेतु व्यञ्जना नामक शब्द-व्यापार को ही स्वीकार करना पड़ता है।। अनुवाद :- प्रयोजन को लक्ष्य मानने पर भी (एवमपि) मनवस्था (दोष) होगी जो (मनवस्था) मूल का ही विनाश करने वाली है।
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द्वितीय उल्लांस:
एवमपि प्रयोजनं चेल्लदयते तत् प्रयोजनान्तिरेय तदपि प्रयोजना- न्तरेशोति प्रकृताप्रतीतिकृद् अनवस्था भवेत्। ननु पावनत्वादिध्मयुक्तमेव तटं लक्यते गङ्गागाखतटे घोप इत्यतो- धिकस्यार्थक्य प्रतीतिश्च प्रयोजनमिति विशिप्टे लक्षखा, तत्क व्यख्नये- त्याह- 1. (२८) प्रयोजनेन सहितं लक्षणीयं न युज्यते ॥।१७॥
(सूत्र में) 'एवमपि' का अभिप्राय है-यदि प्रयोजन भी लक्ष्य है तो वह (प्रयोजन भी अ्न्य प्रयोगन (अ्रन्यत् प्रयोजनं प्रयोजनान्तरम् तेन) से लक्ष्य" होगा, यह (अन्य प्रयोजन भी) किसी तीसरे प्रयोजन रूप हेतु से इस प्रकार प्रयोजन शृद्खला में लक्षणा मानने पर (इति) अनवस्था हो जायेगी जो प्स्तुत तोशादि प्रथवा पावनत्वादि की भी अप्रतीति कराने वालो (अ्रप्रतीतिकृत्) होगो। (२७) प्रभाइतना होने पर भी यदि कोई कहे कि प्रयोजन तो लक्ष्य ही है: और उसमें लक्षखा मानने के लिये अन्य प्रयोजन भी हो सकता है; जैसे तीरनिष्ठ पावनत्वादि को लक्ष्य मानने मे घोपनिष्ठ पावनत्वादि प्रयोजन व्यङ्जय है, तब तो इस प्रकार प्रयोजन का भी दूसरा प्रयोजन होगा और दूसरे प्रयोजन का भी कोई और प्रयोजन होगा तथा इस प्रयोजन परम्परा की कहीं समाप्ति न हो सकेगी और अरनवस्था हो जायेगी। यह अनवस्था पावनत्वादि प्रयोजन की अ्थवा लक्षणा द्वारा तट की प्रतीति भी न होने देगी अर्थात् मूल का ही विनाश कर देगीः। यद्यपि बीजाकुर परम्परा के समान जो अनवस्था होती है वह दोप नहीं समझी,जाती तथापि जो अनवस्था मुलक्षयकारिसी होती है वह तो दोप है ही (मूलक्ष तिकरी चाहुरनवस्था च दूपसम्। इस प्रकार द्वितीयलक्षणावादी के मत का निराकरण करने के लियेदो युक्तियाँ दिम्वलाई-(i) मुस्यार्थबाघ आदि का प्रभाव और (ii) अनवस्था दीपे। अव विशिष्टलक्षणाबादी के मत को प्रस्तुत करके उसका निराकरण करते हैं- अनुयाद :- (शङ्धा या प्रश्न होता है; 'ननु प्रश्ने, दिरोधोक्ती वा' कि [गस्गायां घोषः आदि में] पावनत्वादि धर्म-पुर्त ही 'तट' सक्षित होता है, औ्रर 'ङ्गापास्तटे घोपः [अर्थात् गङ्गा के तट पर घोसियों की बस्ती है] को भपेक्षा सधिक अर्थं की प्रतीति कराना [लक्षणा का] प्रयोजन है; इस प्रकार प्रयोजन विशिष्ट [पावनत्वादिविशिष्ट तट] में लक्षरण होती है, तो व्यञ्जना से क्या [लाम] इस पर ग्रन्थकार कहते हैं [इत्याह] कि पावनत्वादि प्रयोजन सहित तद को लक्ष्य मानना उचित नहीं। (२८) कयों? इसका उत्तर है- -
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काव्यिप्रकागं:
नामफुत।इत्याह- (२६) ज्ञानस्य विपयो ह्यन्यः फलमन्यदुदाहृतम्। प्रत्यक्षादेनीलादिविपयः फलं च प्रकटता सवित्तिरवा । (३०) विशिष्टे लक्षखा नैवम- व्याख्यातम्। -(३१) विशेषा: स्युस्तु लक्षिते ।१६॥ तटादी ये विशेपा: पावनत्वादयसते चाभिघातात्पर्य लक्षणाभ्यो -- व्यापारान्तरेख गम्याः । तच्च व्यव्जन-ध्वनन-द्योतनादिशब्दृवाच्यमवश्य- मेपितव्यम्।
जैसे ('हि शब्द प्रसिद्धचर्यक है) ज्ञान का विषय ज्ञंान से श्न्य होता है और फले या प्रयोजन भी (ज्ान से) अन्य फहा गया है (उवाहृतम्), प्रत्यक्ष आवि ज्ञान का विषय नीलावि है और फल (मोमांसफ के मत में) जातता प्रथवा (नैयायिफ के मत में) अनुव्यवसाय है। (२६) इस युक्ति से (एवम्) प्रयोजनमिशिष्ट में लक्षणा नहीं होती। विशिष्टे लक्षसा नंवम्, यह स्पष्ट ही है-('व्यास्यांतम्' का यही भाघ है) (३०) किन्तु विशेष धर्मे (पावनत्वादि) तो लक्षणा द्वारा बोधित तट शादि में 1(सक्षिते) प्रतीत होते हैं। (३१) तट आदि में जो पावनत्व आदि विशेष धर्म प्रतीत होते है पभिघा, तात्पर्य तया लक्षणा के अतिरित्त किसी अ्रन्य वृत्ति (शब्द-व्यांपार के द्वारा उनका बोष होना चाहिये (गम्याः); और व्यञ्जन, ध्यवन पथवा द्योतन आदि (किसी भी) शन्द फी वाच्य वह वृति अ्रवश्य माननी चाहिये। (३०) प्रभा-व्यन्जना से ही पावनत्वादि की प्रतीति होती है-इस मत बा विरोध करने के हेतु झंका हो सकती है कि प्रयोजनविशिष्ट अर्थ मे ही लक्षण होती है। इस प्रकार 'ाङ्गारया घोप:' इस वाक्य में पावनत्वविशिष्ट तट लक्ष्य है। लक्षणा का प्रयोजन है-'गङ्भायास्तटे धोप:' इर वाक्य से प्रकट होने वाले अर्थ की पपेक्षा एक विशेष प्रकार के अर्थ की प्रतीति कराना। अतः पावनत्वादि विशिष्ट तट में "लक्षसा मानने से ही कंम चल सकता है तो फिर व्यञ्जना को क्या आवश्यक्ता है? आनार्य मम्मट इस याद्दा का समाधान 'प्रयोजनेन .. नैवम्' अवतरस द्वारा करते हैं। इनमें हेतु यह है-ज्ञानस्य विपयो हन्यः फलम् भन्यद् उदाहृतम्"अर्थात् विशिष्टतक्षसा मानने मे ज्ञान-सम्वन्धी सामान्य नियम (geral rule) का विरोध होता है। करो ? ज्ञान का विवेचन करने वाले विद्वानों ने ज्ञान के विषय तथा फल को भिन्न भिन्न ही स्वीकार किया है। उदाहरखारयंमीमांसक के मतानुसार-'अयं घट:' एस
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द्वितीय उल्लास:
प्रकार प्रत्यक्ष रूप से घट-जञान-हो जाने के परचात् 'जातो घटः'अथवाः 'मया घटो ज्ञातः' यह प्रतीति -होती, है। इस अकार की प्रतीति तभी हो-सकतीःहै जबकि ज्ञान द्वारा घट में कोई विशेपता उत्पन्न कर दी जाय। यह विसेपता (ज्ञानद्वारा उत्पन्न .. किया हुआ फल) एक विरोप घर्म या गुए है जिसे भीमांसक प्रकटता या जातता 1 (menifestedness or apprehendedness) नाम से पुकारता है। नैयायिक के मतानुसार-'अयं घटः' इस प्रत्यक्ष ज्ञान के पश्चात् 'घटमहं जानामि' यह प्रतीति होती है, जिसे 'अनुव्यवसाय' (Apperception) कहा जाता है। जो जञाता में रहता है, घट आदि में नहीं । आचार्य मम्मट ने इसे ही 'संवित्ति' कहा है। यह मनुव्यवसाय या संविति प्रत्यक्ष ज्ञान का फल है। इस प्रकार प्रत्यक्ष ज्ञान का विपय : घट या नील आदि है और फल है-झातता या संवित्ति। ज्ञान-सम्बन्धी इस नियम से दो भाव निकलते है-(१) ज्ञान का विषय और ज्ञान का फल परस्पर मिन्न होते है तथा (२) ज्ञान-विषय और ज्ञान-फल दोनों दी ज्ञान से भिन्न होते हैं। इन दोनों के आधार पर 'ज्ञानस्य उदाहृतम्' 1 आदि पंक्ति की दो व्यास्याएँ की जाती हैं :- (१) प्रथम व्यास्या-इस व्यास्या का आधार है-'ज्ञानस्य०' इत्यादि का यथाश्रृत अर्थ। ज्ञानस्य विषय: अन्यः, फलं व श्न्यत्-ज्ञानविपयात् ज्ञानफलम् भन्यत् अर्थात ज्ञान का विषय और ज्ञान का फल परस्पर भिन्न होते हैं। जैरी- ज्ञान-पटज्ञान या नीलज्ञान ज्ञान-विषय-घट या नील आदि वस्तु ज्ञान-फल-(कुमारिल मीमांसक) प्रकटता; (नैयायिकादि) सविति। किन्तु पावनत्वादिविशिष्ट तट मे लक्षसा मानने पर- ज्ञान- पावनत्वादिथिशिष्टतटज्ञान ज्ञान-विपय-पावनत्वादिविशिष्ट तट ज्ञान-फल-पावनत्वादि। यहाँ ज्ञान-विषय और ज्ञान-फल में भेद नहीं है; क्योंकि ज्ञानफल, (पावन- स्वादि) भी -ज्ञान के विषय (पावनत्वादि-विशिष्ट तट) के अन्तर्गत ही है ।. इस प्रकार ज्ञान-राम्बन्धी सामान्य नियम का विरोव होता है।
- ; इस पर पूर्वपक्षी विभिष्टलक्षसाबादी की ओोर से यह त्क दिया जाता है- लक्षणा का फन या प्रवोजन पावनत्वादि नही अपि तु पावनत्वादि-प्रतीति (पावनत्व 'आदि का ज्ञान) है। 'प्रत्यक्षादेः."सवितिर्वा' इत्यादि कथन से भी यही सिद्ध होता है कि जो ज्ञान-जन्य होता है यही ज्ञान का फल होता है; ज्ञान-जन्य-प्रतीति का विषय फल नही हुआ करता। जब हम नील (या घट) को देखते हैं तो नील, ज्ञान (या घटनान) फल प्रकटता या संविति होता है जो कि ज्ञान-जन्म (ज्ञान से
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.- e६1 1 । र्कोव्यंपकॉशोंः
एवं लक्षणामूलं व्यक्षकतवमुक्तमभिधामूल त्वाह- 1 (३२) अनेकार्थस्य शब्दस्य वाचकत्वे नियन्न्निते।:' संयोगारद्य रवाच्यार्थधीकृद् व्यापृतिरञ्जनम् ॥१६॥ r
1- " उत्पन्न होने वाला है) । फिर तो विशिष्टलक्षखा मानने पर, ज्ञान-सम्बन्धी, सामान्य 1 नियम का विरोध कैसे होगा ? क्योकि- ज्ञान-पावनत्वादि विशिष्टतट-ज्ञान ज्ञानविषय-पावनत्वादि विशिष्ट तट 1 ज्ञानफल-पावनत्वादि प्रतीति (ज्ञान) - यहाँ ज्ञान का विषय अवस्य ही ज्ञान के फल से भिन्न है। 1
इस पूर्वपक्ष के निराकरण के लिये 'ज्ञानस्य' .. 'उदाहृतम् की निम्नलिखित व्याख्या करनी चाहिये। (२) द्वितीय व्याख्या-ज्ञानात् ज्ञानविषयः अन्यः ज्ञानात् ज्ञानफलं च अ्न्यत; पर्थात् ज्ञान से ज्ञान का विषय भिन्न होता है और ज्ञान से ज्ञान का फल भी भिन्न होता है। किन्तु विशिष्ट लक्षणा मानने पर यह भेद नहीं बनता; जैसे कि- ज्ञान-पावनत्वादिविशिष्टतट ज्ञान ज्ञानविपय पावनत्वादिविशिष्ट तट ज्ञानफल-पावनत्वादि ज्ञान। यहाँ ज्ञान का फल जो 'पावनत्वादिज्ञान' है उसका ज्ञान के स्वरप पावन- त्वादिविशिष्टतटज्ञान में ही अन्तर्भाव हो जाता है; बयोकि विशेपण का ज्ञान हुए सिना विशेष्य या विशिष्ट का ज्ञान नही हुआ करता (नागृहीतविशेषणा बुद्धि: विशेष्ये चोपजायते)। इस प्रकार यहाँ ज्ञान तथा ज्ञान-फल में कोई भेद नही रहता तथा विशिष्ट लक्षखा मानने में ज्ञान-सम्बन्धी सामान्य नियम का विरोध होता है। - फलतःविशिष्ट में लक्षखा मानना युक्तिसङ्भृत नहीं। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि इस प्रयोजन की प्रतीति न अ्रभिधा से हो सकती है न तात्पर्य नामक मीमांसकाभिमत वृत्ति द्वारा और नक्षण द्वारा भी इसका बोध नहीं हो सकता। अतः इसकी प्रतीति के लिये अभिघा, तात्पर्य और लक्षणावुनि से अतिरिक्त कोई और गब्दकी वृत्ति स्वीकार करनी पड़ती है। शब्द के इसी व्यापार को व्यन्जना, दयोतन, ध्वनन या प्रत्यायन प्रर भूचन आदि कहा जाता है। इसकी स्वीकृति अनिवार्य है। अनुवाद :- (भभिवामूलक व्यञ्जना).इस प्रफार लक्षणामसक व्यञ्जना T का कथन फरके अब अभिधामूलक व्यञ्जना का निरुपण करते हैं 'अ्नेक अर्यं वाले (अनेकार्यस्य) शब्द की संमोग, वियोग आदि के द्वारा + वाचकता नियत हो जाने पर जो उसके वाच्यायं (सङ्तरतित) से भिन्न किसी सग्य
: कहसाता है ! 'अर्थ फी प्रतीति (घी) कराने वाला व्यापार (व्यावृतिः) है यह भञ्जन या व्यञ्जना
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द्वितीय उल्लास:
संयोगो विप्रयोगशच साहचर्य विरोघिता अर्थः पकरएं लिङ् शब्दस्यान्याय सन्निघिः। सामथ्यमौचिती देशः कालो व्यक्ति: खराद्य: शब्दार्थश्यानवच्छ्ेदे विशेपस्मृतिहेतवः॥ प्रभा-लाक्षणिक सब्दों के समान ही वाचक सब्द भी व्यञ्जना द्वारा किसी विसेष अरथं की प्रतीति कराते हैं। वाचक शब्दों द्वारा विशेष अरय की अभिव्यक्ति किस प्रकार होती है "आाचार्य मम्मट ने 'अनेकार्थस्येति' आदि कारिका में इसका निरुपस किया है। भाव यह है कि-वर्शों का समुदाय रूप जो पद या शब्द है 1 1 उसकी कही कही अनेव अथों में शक्ति होती है। प्रवृत्तिनिमित के भेद से उसके पनेक अर्थ होते हैं। किन्तु प्रकरणादि के द्वारा जिस अरथ मे तात्पर्य ग्रहख होता है, यही अय उपस्थित होता है; अन्य मर्थ नही। जय प्रकरण या संयोग, वियोग आदि से (जिनका आगे विवेचन किया जा रहा है) किसी शब्द के वाच्यार्थ का निर्धारस या नियन्न्रण हो जाता है तब भी कभी-कभी उस वाचक शब्द के द्वारा सन्य अथे की अभिव्यक्ति हो जाया करती है। यद्यषि वस्तुतः वह अर्थ उस शब्द का वाच्यायं होता है तथापि संयोग शादि के द्वारा एव अ्रथ में निमन्त्ित हो जाने के कारए अभिधा वति उसका बोध नहीं करा सकती। इसीलिए उसे अवाच्यार्थ कहा गया है। जो शब्द-व्यापार उस अर्थ को प्रकट करने में समर्थ है वही व्यञ्जनावृत्ति कही जाती है। यही अभिधामूला व्यज्जना है। टिप्पणी-(i) लक्षणामूता व्यञ्जना-वह व्यञ्जना है जो लक्षणा के - अ्रन्वय-व्यतिरेक का अनुसरण करती है (उद्योत)। जहाँ प्रयोजनवती लक्षणा होती है वहां लक्षणामूला व्यञ्जना अयश्य होती है (अ्न्वय); क्योकि तक्षणा मे प्रयोजन की प्रतीति व्यञ्जना द्वारा ही हुआ करती है। जहाँ प्रयोजनवती लक्षणा नहीं होती वहां लक्षणामूला व्यञ्जना भी नही होती (व्यतिरेक) । (ii) अभिधामूला व्यञ्जना-यह व्यञ्जना श्रभिधा के साथ अनिवार्य रूप से नहीं रहती। प्रत्येक वाचरु गब्द व्यञ्जक नहीं होता अपितु किसी विशेष परि- स्थिति में ही कोई वाचक शब्द व्यञ्जक हुआ करता है, जिसका कि 'अ्रनेकार्थस्य' इत्यादि में वसन किया गया है। भाव यह है कि अभिवामूला व्यज्जना वहाँ होती है जहाँ (१) किसो शब्द के दो या दो से अधिक वाच्यार्थ हों (२) संयोग दि से निपन्मित होकर अभिया वृति उनमें से एक ही अर्थ का बोध कराती हो, दूसरे का नही। (३) फिर भी साथ साय दूसरे (वाच्य) अर्य की प्रतीति (व्यज्जना) हो जाये। इस दूसरे अर्थं की व्यज्जना अभिधा के आधार पर होती है अतः यह भभिघामूला व्यञ्जना कहलाती है। अनुवाद :- संयोग, विप्रयोग, साहचर्य, विरोधिता, शर्थ, प्रकरस, लिंग, अन्य शब्द की निकटता, सामर््य, योग्यता (भचिती), देश, काल व्यक्ति (सि्ल) तथा स्वर इत्यादि किसी शब्द के वाच्यार्य का निर्सय न होने पर वियक्षित-मर्य (विशेष) के बोध का कारस होते हैं।
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काव्यप्रकार:
इत्युक्तदिशा सशहूचको हरिः अशड्खचको हरिरित्युन्यते। राम- लक्ष्माचिति दाशरथी रामार्जुनगतिस्तयोरिति भार्गवकात्त वीययोः। स्थाु' भज भवच्छिदे इति हरे। सव जानाति देव इति युप्मदर्ये। कुपितो मकरध्वज इति कामे। देवस्य पुरारातेरिति शम्भी। मधुना मत्तः कोकिल इति वसन्ते। पातु वो दवितामुखमिति साममुख्ये। भात्यत्र परमेश्वर इति राजघानोरुपाद शाद्राजनि। चित्रभानुर्विभातीति दिने रचो, रात्री बहौ। मिन्रं भातीति सुहृदि। मित्रो भातीति रवी। इन्द्रशत्ुरियादौ.वेद एव, न काव्ये स्वरो विशेषभतीतिकृत्। उक्त रोति से (कमशः उदाहरस है)- शह और चक़ से युक्त हरि यहाँ (संयोग से) तथा 'अशङ्धचको हरिः' यहां (विभाग से) 'हरि' शब्द 'वित्णु' अ्थ में नियन्त्रित है। 'राम और लक्ष्मसा' यहां (साह्चर्य से) दोनों, शब्द दशरय-पुत्र में, 'उन दोनों की बशा (गतिः) राम और अरजं न के समान हैं, यहाँ (विरोध के फारण) 'राम' शब्द परशुराम (भागव) तथा अजुन शब्द कातचीय में; संसार-छेदन फे लिये स्यास को भजो यहाँ (अ्रयं=प्रयोजन के द्वारा) स्याए 'शब्द' शिय में, 'देव सब जानते हैं यहाँ प्रफरख से 'देव' शब्द 'आाप' फे अर्थ में; 'मकरध्वज, फुंपित हो गया' यहाँ (फोप रूप लिङ्ग अर्थात् चिह्न से) मकरध्वज शब्द काम में, 'देव पुराराति का' यहाँ (पुराराति शब्द के साम्निध्य से) 'देव' शब्द सिव में; 'मधु से मतवाली फोयल' यहाँ (सामर्थ्य से) 'मधु' शब्द वसन्त में, 'प्रिया का मुख तुम्हारी रक्षा करे' यहाँ (ओचित्य के कारण) 'मुख' शब्द सांमुख्य पर्थ में; ' 'यहा परमेदंवर, शोभायमान है' यहाँ देश (विशेष) के फारय परमेश्वर शब्द राजा अर्थ में, 'चित्रभान प्रफाशमान है, यहाँ (फालविशेष से) दिन में (चित्रभानु शब्व) सूर्य में तथा रात्री में पग्नि में; 'मित्रं भाति' यहाँ (नपुंसक लिंग होने से) मिन्र शब्द सुहृद् अर्थ में तथा 'मित्रो' , भाति यहाँ (पुलिग होने से) मित्र शब्द सूर्य अरथं में नियन्त्रित होता है इसी प्रकार 'इन्द्रशत्रु' इत्यादि में वेदों में ही न कि काव्य में भी (उदात्तादि) स्वर विशेष प्रतीति कराने वाला होता है। प्रभा-आानार्व भम्मट ने कारिका में बतलाया है कि संयोग वत्यादि अेका- र्ैंक पदों के वाच्यार्थ को निर्वारित करने वाते हैं। यहाँ पर भतृ हरि (वाकयपदीय २.३१७,३१८) की कारिका उद्वृत्ष करते हुए संयोगादि का विवेचन किया गया 'हैं 'शन्दार्थंस्यानवच्छेदे विशेषामृतिहेतवः' का अभिप्राय येह है कि बुद् सद्दीं के अनेक अर्थ होते हैं ऐसे शब्दा के अर्थ में सन्वेह (अनवच्घेद=पनिसय सन्देह) हो जाता है। जब गव्द के वाच्यार्थ का निश्चम नहीं होता तब गयोग आदि ही विवक्षित सर्थ का ज्ञान कराते हैं इमलिये संयोगादि भर्वनिर्गाय के हेतु होत हैं जंसे- (१) संयोग-संयोग का अर्य है-प्रसिद्ध सम्वन्ध। यह संयोग वाचकता बा
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द्वितीय उल्लास: [, ६१
• नियामक है; जैसे 'सगस्वचपो हरिः' भादि में हरि शब्द भच्युत (विप्स) का बाँचक है। यदपि 'हरि' शब्द के यम, अनिल, शुक,फषि, शिंह शदि अ्रनेक अ्रर् होते हैं तथापि दासत औौर चक्र का विप्णु भगवान् से सम्बन्ध प्रसिद्ध है इसी हेतु यहाँ हरि "शब्द का वाच्यार्थ विप्णु है, यह निरय होता है।' (२) विप्रयोग-विप्रयोग का अर्थ है-विभाग. अथवा प्रसिद्ध सम्बन्य का प्रभाव। मद्यपि यह विप्रयोग संयोगपूर्यक हो होता है तथापि विभाग की प्रधानता होने के कारए इसका पृथका उल्लेस किया गया है। 'अशहवचको हरिः' आदि में विप्रयोग द्वारा यह निर्सय हो जाता है कि यहां अनेकार्थक हरि शब्दविप्सु का वाचक है। वात यह है कि जसे दास, चक्र का संयोग र्विष्सु के साथ प्रसिद्ध है, . "उसो प्रकार इनका विप्रयोग भी विप्सु से ही सम्भव है। (३) साहचर्य -एक कार्य में साथ साथ रहना, सदश होना तथा स्वामी-भृत्य रप से साथ रहना आदि साह्चर्य के अर्थ हैं। साहचर्य के द्वारा "रामलद्मणौ" यहाँ पर 'राम, तथा 'लक्ष्मस' पद से दमरय पुत्र राम और लक्ष्मण का प्रहण होता है। : यद्यपि राम शब्द के बलराम, परशुराम, मनोज आदि प्नेक अर्थ हैं तथा लक्ष्मण शब्द के भी सारस और दूर्योधनपु्र यादि अ्रनेक अर्थ है। (४) विरोयिता-विरोधिता का अर्थ है-प्रसिद्ध वैर या साथ न रहना (सहानवस्थान) । विरोधिता के द्वारा 'रामार्ज नगतिस्तमोः' इत्यादि स्थल पर 'राम, का वाच्यार्थ परुराम तथा 'अरजुन' का कातवीर्य (सहस्रवाहु) होता है परशुराम तथा कार्तवीर्य का वैर इतिहास पुरासादि में प्रसिद्ध ही है। सहानवस्थान रूप विरोघिता का उदाहरण है 'छायातपो' छाया शब्द के कान्ति, छाँह मादि अनेक अर्थं है; किन्तु इस द्वन्द्वरामारा मे छाया का अर्थ अनातप होता है। (v) अर्थ-अर्थ का तात्पर्य है-ऐसा फल जो अन्य प्रकार से साव्य न हो (अनन्ययाराज्य)। 'स्थाण भज भर्वाच्छदे' यहां पर अर्थ अपर्थात् फल की दृष्टि से स्थाए' का अर्थ 'शिव' होता है यद्यपि ठूंठ, शङ्ट, रुद्र आदि 'स्थाए' शब्द के मनेवा अर्थ हैं तथापि भव-वाघा हरएा के लिये शिव का भजन ही हो सकता है अतएव महां स्याण का भर्थ एकमान शिव ही होता है। (६) प्रकरस-प्रकरण का अरथ है वक्ता और श्रोता को बुद्धि में किसी वात - का होना (ववतृशोतृयुद्धिस्थता)। यदि राजा को सम्बोधित करके कोई कहता है कि 'सरव जानाति देव:' अर्थात् 'देव सब जानते है' तो यहां प्रकरस के कारए 'देव' शब्द का अर्थ 'आप' अर्थात् राजा ही होगा; क्योंकि बकता और शरोता दोनों की बुद्धि में यही अर्थ विद्यमान है। देव शब्द के राजा, मेघ, सुर आदि अनेक अर्थ होते हैं तथापि प्रकरगा अर्थ का नियामक हो जाता है। प्रकरण और अर्थ में भेद है- प्करण केवल बुद्धिस्थ (अ्शाब्द) है; किन्तु अर्थ या फल शब्दों द्वारा कहा जाता है।
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काव्यप्रकशि:
(७) सिङ्ग- िङ्ग का अर्थ है सयोग से भिन्न सम्बन्ध द्वारा दूसरे पक्ष की व्यावृत्ति कराने वाला धर्म (नागेश्वरी) अथवा ससाधारण ध्मं (चत्व्त्यादि)। इसका उदाहरण है-'कुपितो मकरध्वजः' 1 'मकर (मगर) के आकार.की, धवजा है जिसकी (कामदेव) अथवा 'मकर ही है ध्वजा जिसकी' (रामुद्र) इत्यादि.विग्रह- वशात् मकरध्वज शब्द के ग्रनेक भर्थ है, किन्तु समवाय सम्बन्ध से कोप, समुद्र आदि में नही रहता अतः कोपरूप लिङ्गा चिन्ह या, असापारय धर्म द्वारा मकरध्वज का अय कामदेव है, यह निश्चय हो जाता है। 1 (5) अन्य शब्द की सलिधि-इसका तात्पये है कि जहाँ अनेकार्थक शब्द के साथ किसी नियत अर्थ वाले शब्द का सामानाधिकरण्य होता है, वहाँ उस अनेकार्थक शब्द की वाचकता का निएय हो जाता है, जिसे-'देवस्य पुरारातेः' यहाँ देव शब्द के (राजा, मेघ आदि) अ्रनेकार्थ है: किन्तु 'त्निपुराराति' अर्थात् त्रिपुर का शयु इस पद के साथ 'देव' शब्द का सामानाधिकरण्य है। राजा आदि तो त्रिपुराराति हो नहीं सकते अतः यह'यहाँ पर केवल शिय का ही वाचक हो सकता है, इर प्रकार पुराराति शब्द की सन्निधि से यहाँ 'देव' शब्द का अरथ 'शिव' है यह निश्चित हो जाता है। (६) सामर्थ्य-सामर्थ्य का अर्थ है-कारणता। 'मधुना मतः कोकिलः' इस वाक्य में 'मधु' शब्द है, जिसके वसन्त, मकरन्द, शहद, मद्य इत्यादि अ्रनेक सर्थ,है; किन्तु कोकिल को मतधाला करने का सामर्थ्ये वसन्त के पतिरिक्त किसी मे नहीं है. अतएब यहाँ पर 'मधु' शब्द का अरथ 'वरन्त ऋतु' है यह निश्चय हो जाता है। (१०) औचिती-औचिती का अर्थ है, शौनित्य अथवा सोग्यता। 'भातु वो दयितामुसम्' इत्यादि वाक्य में 'मुख' शब्द है, जिसके मुग्, प्रारम्भ, साम्मुम्य में यादि अनेक अर्थं हैं; किन्तु प्रियतमा (दयिता) की अनुकूलता या साम्मुख्य मे ही उत्प- ण्ठित प्रेमो के परिवाए (अथवा मनोरय-साधन) को योग्यता है, अतएव यहा पर 'मुखम्' का अरथ साम्मुस्य या अनुकूलता ही होता है। (११) देश-देश-विदेश (नगर, ग्राम, आदि) के कारण किसी सब्द का अर्थ नियन्त्रित हो जाता है, जैसे 'भात्यय परमेश्वर"' दस वाक्य में 'परमेश्वर' शब्द है, जिसके विप्णा, शिव, राजा आदि अ्नेक अयें है; किन्तु राजधानी रूप देश-विदेद - के कारए यहां 'परमेश्वर' शब्द का अर्थ राजा होता है। (१२) फाल-समय-विशेष (रामि, दिवस आदि) के कारग किसी शब्द का अर्थ-निरय होता है; जैसे-'चित्रभानुविभाति' यहाँ चिनभानु शब्द है, जिसके 'चिन्ाः भानवः किरणा: यस्य' इम विग्रह से सूर्य, सग्निआदि सनेक भर्व हो मकते हैं; किन्तु यदि दिन में इस वाकय का प्रयोग होता है तो पि.ा शन्द का अर्थ होता है-नूयं। यदि राति में इस वास्य का प्रयोग होता ह है 13 शब्द क प्र्थ होता है-अग्नि।"
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द्वितीय उल्लास: [६३
(१३) ध्यक्तिसे तात्पर्य हे-वुंल्लिन्न, स्त्रीलिङ्क आदि। इसके द्वारा भी अ्रनेकार्थक शब्दों की वाचकता नियन्तिरित होती हैं, जैगे-मिन भाति' अथवा 'मित्रो भाति' इन वाबपों में मित्र शब्द का प्रयोग भिन्न २ लिङ्गों में किया गया है। कोमादि के अनुसार मिन शब् के मूर्य तथा मुहृद आदि श्नेक अरथ होते हैं किन्तु यहाँ पर प्रथम वावय में नपुसकलित् होने के कारस मिन शब्द का अर्थ सृहद
होता है। होता है और द्वितीय वाक्य में पुल्ति्ञ होने के कारस 'मिन' शब्द का अर्थ सूर्य
(१४) स्वर-रवर का अभिप्राय है-उदात्त, अ्नुदात स्वरित आदि। स्वर के द्वारा केवल वेदो में ही भ्रनेकार्थक शब्दों की वाचकता नियन्त्रित होती है, लोककाव्य में स्वर को अर्य-नियामकता नहीं मानी जाती। इसका उदाहरणा है- 'इन्द-पपुः' इन्द्र-शयु शब्द के अनेक अर्थ हैं जैसे-(१) इन्द्रः शभ्ु: शातयिता पस्प (बहुवीहि) अर्थात् इन्द्र है नाशक जिसका वह व्यक्ति (२) इन्द्रस्य मय्: (= धालयिता) (पष्ठी ततपुरप); अर्थात् इन्द्र का नाशक। समास की भिन्नता के कारए इसके स्वर में भी भेद हो जाता है-प्रथम विग्रह (बहुब्रीहि) मे यह आद्युदात्त (बहुध्रीहौ) प्रकृत्या पूर्यपदम्, पा० ६.२.१) -होता है और द्वितीय विग्रह (पष्ठी तत्पुरुव) में अन्तोदात (सनासस्य, पा० ६१२२३) होता है। इसी हेतु यहाँ पर स्वर के कारस अर्थ-निर्गय होता है। वेद एव न काव्ये स्वरो विशेषप्रतीतिकृत्-आाचार्य मम्मट का विचार है कि काव्यों में उदात्तादि स्वर अर्थनियामक नही होते। केवल वेद में ही स्वर अरथ के नियामक होते हैं। इस मत पर आक्षेप करते हुए कूछ आलोचक कहते हैं कि उदात्तादि स्वर तथा का कुरुप स्वर काव्य में भी विशेपप्रतीतिकृत् होते है, जैसा कि उदांतादि के विषय में भरत मुनि का कथन है। उदात्तशचानुदात्तरच स्वरितः कम्पितस्तया। वर्णाश्चत्वार एव स्यु. पाठ्ययोगे तपोधना: ।। तन्न हास्यश्ृङ्गारयोः स्वरितोदातर्वीररौव्राद्भुतेपु उदात्तकम्पितः करुखवा- हसत्यभयानकेषु अनुवात्तस्वरितफम्तिवंसें: पाठ्यमुपपादमेत् (नाटयशान १६-४३) i. इस प्रकार उदात्तादिस्वर रसविदेप की प्रतीति में सहायक है तथा 'मथ्नामि कौरंवशतम्' आदि उदाहरों में काकु स्वर को भी विशेषार्थ का अभिव्यज्जक माना गया है। साचार्य मम्मट के समर्थक विद्वान् इसका उत्तर देते हैं कि काव्य में उदात्तादि स्वर अ्रथवा काकु आदि अभिधानियामक नहीं होते अपि तु केवल भघं विशेष के व्यञ्जक हुआ करते हैं। इसी हेतु, काव्य में अनेकार्थक समस्तपदों में इ्लेप माना जाता है; जैसा कि आचार्य भम्मट ने ११६ सूत्र की वृत्ति में कहा भी है 'काव्य-माग स्वरो न गण्यते'। काकु भी अर्थव्य्जक हो होता है, जंसा कि प्रदीप-
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६४ काव्यप्रकान:
आदिमद्दणात- एद्दहमेत्तत्थसियय्ा पदद्दमेतेहिं शच्छ्रिवत्त हिं। एदह मेत्तावत्था एदहमेत हिं दिअएहिं ॥११॥'
इत्यादावभिनयादय:।
कार का कथन है-फाकुस्थले तु न नानार्थाभिघाननियमन किन्त्वपदार्थस्येय व्यञ्च- नम् ।' अतः स्पप्ट ही है कि काव्प में स्वर अ्रभिधानियामक नहीं होते। टिप्पी-शक्तिगह-नियामक कारसों का विवेचन भारतीय वाङ्मय में प्राचीन समय से होता रहा है। व्याकरण, दर्शन तथा साहित्य शास्त्र में सर्वप्रथम महाभाष्यकार पतञ्जलि मुनि ने इसका उत्लेस किया था। आचार्य भतृ हरि ने 'संयोगो विप्रयोगश्च' आदि कारिका में प्रसिद्ध शत्त-नियामक तत्वों का संग्रह कार। दिया। आगे चलकर व्याकरगासास्त में इसका विशद विवेन किया गया है। नागेश भट्ट ने लघुमन्जुपा में शक्ति-नियामकता का विस्तारपूर्वक विवेचन किया है। अनुवाद :- (स्वरादयः में) 'आदि' शब्द के ग्रहए से -- (चह नायिका) इतने ही दिनों में इतने से (ऐसे) स्तनों वाली (एतावन्मायी स्तनी मस्याः तादूशी) इतनी सी (ऐपी) नेत्र पुटों से युक्त तथा ऐसी अवस्था याली हो गई है । ११ ॥ इत्यादि में अ्रभिनय आरादि (अभिधा के नियामक होते हैं)।' :
प्रभा :- भतृ हरि की 'संयोगो विप्रयोगर्चेति' कारिका मे 'स्वरादयः' कहा गया है। यहाँ 'आदि' शब्द से अभिनय तथा अपदेश इत्यादि का ग्रहग होता है। उपयुक्त श्लोक अ््रभिनय द्वारा शर्थ-निरंय का उदाहरण है। इसके सन्दर्भ के विषय में दो मत है :- चन्द्रिकाकार का मत है कि यहाँ किमी अनुराग-युक्त 'नायक के पूछने पर कोई दूती नायिका के सौन्दर्य का वर्शन कर रही है। उद्योतकार के मतानुसार यहाँ नायक के चिरप्रवास के कारण होने ,वाली नायिका की दशा का वगन किया गया है। दोनों प्रसङ्गो में वत्ता की अभिनय के अनुसार मथा-योग्य अर्य-वोष होता. है। हाथ आदि के अभिनय से अ्थवा नारिकेल, आ्ामलक आादि पदार्थ के प्रति संकेत यहां स्तन आदि की विशालता अथवा लघुता का बोध होता है। कमलदल आादि के संकेत से नेतों के परिणाम का ज्ञान होता है. उच्चता तथा पुष्टि आादि के प्रदर्शन से नायिका की अवस्था का बोध होता है। i' इस प्रकार जो 'एतावत्' (इतना) शब्द (बड़ा, छोटा, ऊंचा, नीचा इत्यादि)! अनेक अथों का बोध : कराने मे समर्थ है उसका अभिनय द्वारा अ्य-निएंय किया जाता है,। 'अभिनयादय:' में आदि शब्द से 'अपदेश' का ग्रहण होता है (प्रदोप):।"
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द्वितीय उल्लास: ६५
· इत्थं संयोगादिभिरर्यान्तिराभिघायकत्वे निवारितेऽप्यनेकार्थस्य शव्दस्य यत्वचचिदर्थान्तरप्रतिपादनं तत्र नाभिघा नियमनात्तसयाः। नच लक्षसा मुख्याथवाघाय्यभावाद, अपि त्वञ्जनं व्यञ्जनमेव व्यापार:। चथा-' भद्रात्मनो दुरधिरौदतनोविशालवंशोत्रतेः कृतशिलीमुखसडग्रहर्य। : यंश्यानुपप्तवगतेः परवारशस्य दानाग्युसेकसुभगः सततं करोडभूत्।।१२।। अपदेश का अर्थ है-विवक्षित अर्थ का हाथ आदि से निर्देश। 'इतः स दैक्ष्मः प्राप्तश्रीः ।(घुमारसम्भव २.५५) में अपदेश के कारसा नानार्थक 'इतः' शब्द की वाचकता 'वक्ता' में नियन्त्रित हो जाती है क्योंकि वह हाथ से अपनी ओर संकेत करता है। अ्रनुवाद :- उक्तप्रकार से (इत्यं) संयोग आदि द्वारा अनेकार्थक शब्द के श्रन्य अ्र्परयों का निवारस कर देने पर (तथा एक अर्थ का निश्चय कर देने पर) भी जो' (वह) कहीं (वक्तृ-वंशिष्टयादि' की सहायता से) अन्य अर्थ की प्रतीति कराता है, वहाँ (उस पर्थ को प्रतीति में) अभिधा नहीं क्योंकि उसका (संयोगादि द्वारा (निय- न्तरर हो जाता है; (लक्षसा के हेतु) मुख्यार्थयाघ इत्यार्दि के न होने से (वहा) लक्षर भी नहीं अपि तु श्रञ्जन अर्यात् व्यञ्जना नामक शब्द का व्यापार (वृत्ि) ही है। प्रभा-प्रस्तुत अ्रवतरण में ग्रन्थकार ने अ्नेकार्यस्य दब्दस्य' आदि कारिका की व्यास्या करने हुए अभिधामूलक व्यन्जना का स्वरूप-निरुपणा किया है। जिन संयोग-विप्रयोग आदि की विशद व्याख्या की गई है वे अनेकार्थक शब्द की। एकार्यवाचकत्ता निर्धारित कर देते हैं तथा अन्य अथों का निवारण कर देते हैं। वह शब्द अभिवा द्वारा एक प्राकरशिक अर्थ का बोध कराते हुए भी शोता या वक्त्ता आ्रदि की विभेपता के कारण अथवा कवि के सिल्प-कौशल द्वारा कहीं कही किसी अन्य अर्थ की प्रतीति करा देता है। इस विभेप अर्थ की प्रतीति कराने वाला शब्द- व्यापार अभिधा नहीं होता, क्योंकि वहाँ संयोगादि द्वारा अभिवेय (वाच्य) अर्थ का निर्धारण किया जा चुका है। वह विशेष अर्थ लक्षणा वृति द्वारा भी नहीं आ सकता, कयोकि मुस्यार्थचाघ, मुस्यार्थयोग तथा रूदि या प्रयोजन रूप लक्षणा का हेतु यहाँ विद्यमान नहीं है।अतः इस विशेष अर्थ की प्रतीति कराने वाला जो शब्द का व्यापार है वह अ्रञ्जन या व्यञ्जना (अञ्ज्यतेऽर्यचिशेषःअ्रनेनेति) कहलाता है। i r 'अ्रनुवाद :- जैसे (प्राकरसिक अर्थं, राजा के पक्ष में) जिसका अन्त.करस ोभन हैं (भद्रः आात्मा यस्य), जिसका शरीर दूसरों के द्वारा अपराजेय है (दुरधि रोहा परररनभिभवनीया तनु यस्य); जिसकी महान् वंश में स्याति है (विशाले बशे उम्नति: स्पातियंस्य अथवा विशालवशस्योत्नति: यस्मात्), जिसने वाए चलाने का (दूढ), अभ्यास, किया है (कृतः शिलोमुसानां वाशगानां संग्रहोम्यासो येन), जिसका ज्ञान या, गृति प्रवाधित है (अनुपप्लवा अवाघिता गतिर्यस्य), ऐसे शतु निवारक (परवारण) जिस राजा फा (यस्म) हाथ निरन्तर दान के (संकल्प) जत के द्वारा सींचे जाने से सुन्दर (दानस्य अम्बुजलसेकेनं सुभगः) था।
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६६ ] काव्यप्रकाण:
, (प्रतीयजमान अर्यं, हाथी-पक्ष में) जिसकी जाति (भद्र मन्द शदि म गज जातियाँ हैं) भद्र है (भद्र जातीय) जिसके शरीर पर (प्रत्युच्च होने के कारस) चढ़ना कठिन है, जिसका पृथ्ठदण्ड (वंश) अत्यन्त ऊंघा है, जिसने (स्वमदगन्ध के कारएध्रमरों (शिलीमुख) को इकट्ठा (संग्रह) किया है, जिसकी चाल अनुद्धत या धीर है (अनुपप्लवा=अनुद्धता) ऐसे, जिस (यस्य) उत्कृष्ट गज का (परस्य उत्कृष्टस्य वारसस्य,- गजस्थ) शुण्डाइण्ड (कर) निरन्तर मद दान) जल के द्वारा सिक्त होने से सुन्दर या। प्रभा-'भद्रात्मनः' इत्यादि अभियामूलक शाब्दी व्यञ्जना का उदाहरस है। यहाँ पर किसी राजा का वर्णन किया गया है। प्रकरण के अनुसार राजा के पक्ष में इसका उपर्युक्त प्रथम अर्थ होता है। कवि-कौशल के कारए तथा सहदयों को प्रतिभा के द्वारा यहाँ गज-पक्ष में भी सर्थ-प्रतीति होती है। अतः राजा वाच्यार्थ है तथा गज प्रतीयमान अर्थ है। इस गज-विपयक अर्थ की प्रतीति व्यं्जना द्वारा हो होती है। बात यह है कि यहाँ पर अभिधा वृति प्राकरसिक नृपराम्बन्वी अर्थ का बोध कराके शान्त हो जाती है, मुख्यार्थंबाघ आदि न होने से यहाँ लक्षणा हो ही नही गकती; तात्पर्यग्राहक प्रकरणादि के अभाव मे तात्पर्यवृत्ति द्वारा भी इस विशेष अर्थ की प्रतीति नहीं हो सकती अतः यह प्रतीयमान अरय व्यङ्गय ही है भोर. इसकी बोधिका वृति है-व्यञ्जना। यहाँ इनेप इत्यादि अलद्गारो द्वारा ही दोनों अरथों का बोष हो राकता है फिर इसके लिये व्यञ्जना मानने की क्या आवस्यकता है यह शङ्ा भी निमूल है-' क्योंकि इलेप आदि से व्यं्जनावृति का क्षेत्र भिस है-जहां नानार्थक शब्दों का प्रयोग होने पर प्रकरणादि द्वारा एक साथ अनेक अ्रयों में वक्ता का सात्पय गृहीत होता है वहाँ सलेप माना जाता है, जहाँ क्मेण धनेक अथों में बक्ता का तात्पर्य होता है वहाँ आवृत्ति होती है जैसे 'पक्षा: भज्यन्ता भुज्यर्ता दीव्यन्त,म्', किन्तु जहाँ एक अर्थ में ही बक्त्ता का तात्पर्य होता है वहाँ व्यन्जना द्वारा ही अन्यार्थं का ग्रहणं हुआ करता है। 'भद्रात्मनः' उदाहरण में प्रकरस द्वारा एक अर्थ में ही सभिया नियन्धित हो गई है। अतः द्वितीय सर्थ की प्रतीति व्यञ्जना से होती है। 'टिप्पखी (१) गव्द बिना वृति के अर्थ-वोध नहीं कराता। यृति का अर्थं है-शव्दनिष्ठ व्यापार। श्रभिधेय अर्थ का बोध कराने के लिए भभिषा वृति मानी जाती हैं, लक्ष्यार्थ-बोध के लिये लक्षसाृति। किन्तु कही २ साक्षगििक तया वाचक शब्द एक विशेष अर्य की प्रतीति कराते है जो भष सक्षणा वा भ्ररभिषा का विषय नही हो सकता; जैसे-'गङ्गायों घोप:' इत्यादि में गन्भर शब्द लक्षसा द्वारा सटरूप अर्थ का बोध कराने के साथ २ गत्यपावनतवादि प्रयोजन की प्रतीति भा कराता है, इसी प्रकार 'भद्रात्मनः' इत्यादि उदोहरण में वा्यार्थ के अतित्ति एक विशेष अर्थं भौ प्रतोति होती है। शब्द से इस प्रकार की विरेष प्रतीति कराने वाला भी शब्द
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द्वितीय उल्लास:
(३३) तद्य क्तो व्यञ्जक: शब्द :- तद्य को व्यन्जनयुक्त: । -(३४) यत्सोऽर्थान्तरयुक् तथा। अर्थोऽपि व्यञ्जकसात सहकारितया मतः ॥(२०) तथेति व्यञ्जक: । ॥ इति काव्यप्रकाशे शब्दार्थस्वरूपनिसयो नाम द्वितीय उल्लासः॥ "व्यापार होना चाहिये वही व्यञ्जना नामक व्यापार है। कहा भी है- 1 "व्यञ्जना च शक्िलक्षसाद्यजन्यप्रतीतिजनक: पदादिगती व्यापारः"। (२) अ्रभिधा और तक्षणा दोनों शब्द के व्यापार हैं, शब्दाश्रित है। अतएव 1 तन्मूलक व्यञ्जना भी शव्दाशिता अर्थात् शाब्दी ही है, यह अभिप्नाय है-(प्रदीप)। 1 अनुवाद-उरा (तत्) व्यन्जन से धुक्त शब्द व्यन्जक फहलाता है। (कारिका में) 'तद्युक्त:' शब्द का अभिप्राय है-व्यञ्जनयुक्त अर्थात् व्यञ्जना से युक्त । (३३) 1 क्योंकि (यत्-मस्मात् फारसात) वह शब्द (सः) अपने अर्थ के व्यवधान से युक्त होता हुआ (अर्थस्य अन्तरेख व्यवधानेन युक्तः) व्यञ्जक होता है (तथा) पतएव फाव्य में (तत्र) शब्द का सहकारी होने के कारण अर्थ को भी व्यञ्ज्कं माना गया है। (कारिका में) तथा शब्द का अभिप्राय है-व्यञ्जक (३४) प्रभा-व्यञ्जक शब्द के निरूपण-हेतु आचार्य मम्मट व्यञ्जना कीसिद्धि करके 'तद्युक्तो व्यञ्जक शब्दः' इस सूत् द्वारा व्यञ्जक शब्द का स्वरूप बतलाते है। जो लाक्षणिक शब्दों में प्रयोजन की प्रतीति कराने वाला व्यञ्जना नामकशब्दे व्गिापार कहा गया है (तन व्यापारो वञ्जनात्मक: सूत्र २२)- तथा जो "अंवाच्यार्थ- धीकृद् व्यापृति: अञ्जनम् (मूत २२) यहाँ पर अभिधा के नियमित हो जाने पर प्रवाच्य-अर्थ की प्रतीति कराने वाला व्यवन्जन व्यापार बतलाया गया है, उस व्यञ्जन व्यापार से युक्त शब्द व्यं्जक कहलाता है। यहाँ पर यह शाड्ा होती है कि जब केवल शब्द ही व्यञ्जक होता है तो शब्दार्थयुगल रूप काव्य को ध्वनि कसे कहा जा सकता है, वयोकि वह तो व्यञ्जक नही है। 'यत्स' इत्यादि सूत्र द्वारा इसका उत्तर देते हुए ग्रन्यकार कहते हैं कि शब्द प्रथमतः अपने वाच्यार्थ या लक्ष्यार्थ का बोध कराता है तदनन्तर व्यङ्चार्थ का वोष कराता है अतः व्यङ्जयार्थ की प्रतीति कराने में वह स्वकीय अर्थ से व्यवहित होता है (अर्थान्तरयुक); अर्थात् उसका मुख्याथं आदि भी ब्यङ्गचार्थ-वोघन मे सहकारी होता है। इसी हेतु वाच्य-ग्रथ भी प्रतीयमान अर्थ का व्यञ्जक माना जाता है। यहाँ शब्द प्रधान रूप से व्यञ्जक होता है उस शब्द का समानार्थक दाब्द रख देने पर
जाती है। व्यश्जना नहीं रहती (शव्दपरिवृत्यसहृत्य) । अतएव यह शाब्दी व्यज्जना कही
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काव्यप्रकाश:
टिप्पणो-(i) संक्षेप में अभिधा तथा लक्षणा से भिन्न व्यञ्जना वृति की स्वीकृति अनिवार्य है। वह व्यञ्जना दो प्रकार की है-शव्दनिष्ठा (गाव्दी) और अर्थनिष्ठा (आर्थी)। शाब्दी-व्यज्जना भी दो प्रकार की है-लक्षणामूला और अभिया- मूला । प्रयोजनवती सक्षणा मे प्रयोजन की प्रतीति कराने वाला शब्द का व्यापार लक्षसामूला व्यञ्जना है। शनेकार्थक शब्दों में अ्भिधा के आधार पर होने वाी व्यञ्जना अभिधामूला है। (ii) अभिधा, लक्षणा और व्यञ्जना आदि का पारस्परिक भेद यह है- -(१) अभिधा शब्द की रववन्न वृत्ति है, यह अ्न्य वृति पर आशित नहीं। लक्षणा वृत्ति अभिधा पर आशित है, वह मुख्यार्थ-वाध आदि हेतुओं पर आधारित है। - साथ ही रूढि लक्षसा तो व्यञ्जना के बिना हो सकती है; किन्तु प्रयोजनवती : लक्षणा में व्यञ्जना का व्यापार भी अनिवार्य है। शाब्दी व्यञ्जना अभिया या लक्षसा पर आधित रहती है। किन्तु दर्स (मूभ ६१) घेप्टा (उदा० २२) आदि रें को व्यञ्जकता अभिवा या लक्षणा पर शश्रित नहीं होती। (२) वाच्यार्थ शब्द का साक्षात अर्थ होता है। वाच्यार्थ का बाघ होने "पर हो सकष्यार्थ होता है शरतः एक ह स्थम में वाच्यार्य तथा लक्ष्यार्थ दोनों नहीं
1.1 होते। किन्तु एक ही स्थल पर वाच्यार्थ तथा गङ्गयार्थ अथवा लक्ष्यार्थ तथा व्यङ्गयार्थं साथ साथ हो सकते हैं। (३) कोई शब्द केवल वाचक हो सकता है, केवल लक्षक (लाक्षसिक) हो सकता है किन्नु केवल व्यन्जक नही। साथ ही एक ही शब्द एक स्थल पर वाचक तथा व्यञ्जक अथवा लाक्षिक तथा व्यञ्जक हो सकता है; किन्तु वाचक तथा लाक्षणिक नही हो सकता। · • इस प्रकार फाव्यप्रकाश में शब्द-और शर्थ के स्वर्प वा निरलय करने थाता यह द्वितीय उल्तार समाप्त होता है। ॥ दमि दिलीय तल्लाम: ।I
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ग्रथ तृतीय उल्लासः [भयंव्यञ्जफतानिर्ंयात्मक:] । (३५) अर्था: प्रोक्ता: पुरा तेपाम्- अर्था वाच्य-लद््य-व्यङ्गथा। तेपां वाचक-लाक्षणिक-व्यञ्ञजकानामं।
कीदशीत्याइ- -(३६) अर्थव्यञ्जकतोच्यते।
(३७७) वक्तृबोद्धव्यकाकूनी वाक्यवाच्यान्यसन्निधे: ॥२१॥ प्रस्तावदेशकालादेवे शिष्ट यात्प्रतिभाजुषाम् । योऽयंस्यान्यार्थवोहेतुर्व्यापारो व्यक्तिरेव सा ॥।२२।। वोद्धव्यः प्रतिपाद्यः। काकुर्ध्वनेविकारः। प्रस्तावः प्रकरगम। अर्थेश्य वाच्य-लक्ष्य व्यङ्गपात्मनः । द्वितीय उल्लास मे अ्भिधा और लक्षणा से पृथक् व्यञ्जना का स्वरूप दिखलाकर उमके दो भेदों (शाब्दी और आर्थी) में से शाव्दी व्यज्जना का निरय किया जा चुका है। साथ ही "सर्वेंपां प्रायतोऽ्यानां व्यञ्जकत्वमपीप्यते (पू्न') में आर्थी व्यञ्जना की ओर संकेत भी किया गया है। प्रस्तुत उल्लास में आर्थी व्यञ्जना या अर्थव्यञ्जकता का निरूपण करते हैं। अनुवाद :- उन (वाचक, लक्षक तथा व्यञ्जर शब्दों) के प्रर्थं पहले (पुरा) कहे जा चके हैं (३५) वे अर्थ हैं-वाच्य, लक्ष्य तथा व्यङ्गघ। उनके पर्थात् वाचफ, साक्षशिक तथा व्यञ्जक शब्दों के। (यहाँ पर) चर्थों (ाच्य, लक्ष्य तथा बहच) को व्पञ्जकता का निरपल किया जाता है। (३६) (वह अर्थव्पञ्जकता) फँसी है? यह बतलाते हैं- [वश्त्रादीनां वैशिप्टधात् पतिभाजुपाम् अन्यार्थधीहेतुः यः अर्थस्य व्यापारः सा व्यक्ति: -एव-यह सन्वय है] वक्ता, बोद्धव्य (जिसे बोध फराना है), फाकु (ध्वनि-विकार), तथा (धक्ता और बोदव्य से) भिन्न व्यक्ति की समीपता (अन्यसननिधे.) एवं प्रकरण, देश, काल (यसन्त शादि) इनकी विशिष्टता या विलक्षरता के फारए प्रतिभायुक्त सर्थात् 'सहदयजनों को (पाच्य, लक्ष्य से) अन्य अर्य (व्यङ्गथ) की प्रतीति का हैतुभूत भो अर्य का व्यापार है, ह प्यञ्जना ही है।
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१०० काव्यप्रकार: 4
(कारिका में) बौद्धव्य=प्रतिपन्द्य (भतिपादमितु योग्यः); जिसे बोघ कराने के लिये फुछ पाहा जाये। धाकु सर्थात् ध्वनिविकार। प्रस्ताव अर्थात् प्रकरण। सर्थस्म अर्थात् वाच्य, लक्ष्य तथा व्यङ्परूप अर्य का। प्रमा- वह पर्थ-व्यञ्जना कया है ? वाचक, लक्षक तथा वञ्जक शब्दों के भर्थं है-वाच्य, लक्ष्य और व्यङच। इन वाच्य आदि प्ररयों से भी वक्तवंशिप्ट्य हादि के कारण सहृदयों को एक विशेष अर्थ की प्रतीति हो जाया करती है। उस. विशेष अर्थ की प्रतीति कराने वाने ये अर्धहो होते हैं। ये (वाच्य आदि)-यर्थ जिस व्यांपार द्वारा उस विशेष (अंतीयमान).अर्थ.की पतीति कराते है,वह प्रर्थं- व्यापार ही आर्थी व्यञ्जना है। संक्षेप में-वक्तृबैनिष्ट्य आदि के कारण सहदयों को विशेप अर्थ की प्रतीति कराने वाला अर्थ-व्यापार हो आर्थी व्यञ्जना है।, यह विशेष अयं की प्रतीति प्रतिभा-सम्पननों को ही होती है। काव्य की भावना से जिनको युद्धि परिपतव हो जाती है, नवनवोन्मेपसालिनी प्रज्ञा जिन्हें मिली है; उन काव्य-रक्षिकों को हो विशेष अर्थ की प्रतीति हुआ करती है। किन्तु उस प्रतीति में वक्तृर्वशिष्ट्य आदि अलग २ या कई एक साथ (व्यस्त-समस्त रूप से) मिलकर सहकारी होते हैं। वक्ता, बोद्धव्य तथा प्रकरणादि की विलक्षसता के -- फारस ही यह विनेप अर्थ की प्रतीति हुआ करती है। आचार्य मम्मट ने विरेपार्य - प्रतीति के निम्नाद्ित कारगा बतलाये हैं- १. वक्ता, २. वोदव्य, ३. कावु, ४. वानय, ५. वाच्य, ७. प्रस्ताव, ८. देश. ६. काल, तथा चेप्टा-आदि की विशिष्टता। 'कालादेः' मे आदि शब्द के द्वारा चेच्टा इत्यादि का प्रहस होता है। इनमे से प्रत्येक की विलकषसता कसे होती है? इसका (उदाहरण सहित) आगे, विवेचन किया जा रहा है। इस उल्लास मे दिये गये यार्थी व्यन्जना के सभी उदाहरय उत्तम काव्य या ध्वनि के हैं। टिप्वसी (i) वावयं च वाच्य च वाकगवाच्ये ताभ्यां सहित: 'अन्यगनिषि :- यह विग्रह है। व्यक्ति := व्यन्जना; व्यज्यते नया इति। (ii) काव्य में दो प्रकार ये अर्थ होता है १. आंपतरमणीय, 3. पर्यस्त- रमखौप। यह पर्यन्तरमुीय पर्थ ही सददयों को यानन्द देने बाता विशेद भर्थ जो मार्थी व्यञ्जना द्वारा-पभिव्यक हमा करता है। (iii) आचार्य मम्मट पविकृति तथा गहृदय-प्रतिभा दोनों ही मर्स- व्यश्जकता का कारसा मावते है। वकतषैरिप्ट्य आदि कविकर्मनियद्ध ही होते हैं,
11 तथा 'प्रतिभागुषा+'कहने से सह्दयमायवेदय ही यह विशेप सर्थ होता है- यह प्रकट होता है! (ii) पार्थी व्यञ्जना के विवेवन में विशवनाय गविराज ने बहुत कुछ घानार्य मम्मट का अनुसरस किया है (गाहित्यदर्नसा २.१६) 1 उन्होंगे भी वक्तवैनिप्ठप
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तृतीय उल्लासं: +
क्रमेणोदाहरति= १. अइपिहुलं जलकुभं घेत्त ए समागद्हि सहि तुरिभम्। समसेअसलिलणीसासगीसहा बीसमामि खंगाम् ।१३।। ? (अतिपृथुल जलकुम्भ, गृहीत्वा समागताडस्म सखि, त्वरितम्। श्रमस्वेदस लिलनिःश्वास निःसहा विश्राम्यामि चणम्।।/- अ्त्र चौर्यरतगोपनं गम्यते। २. ओशिवद® दोब्बल्लं चिन्ता अलसत्तणा सणीस सिअ्रम्।। हir मम मन्दभाइशीए केरं सहि तुही अहह परिहवई।।१1।" (शन्निद्रय' दौर्वल्यं चिन्तालसत्वं सनिःश्वसितम। मम मन्दभागिन्या: कृते सखि त्वामपि अ्रहद! परिभवति ॥T ऋत्र दूत्यास्तत्कामुकोपभोगो व्यज्यते। आदि को अर्थ-व्यञ्जकता का कारस माना है; किन्तु काव्यानुशीलन-प्रतिभा, कराम उल्लेख नही किया। 1
::. अनुवाद :- क्रमशः उदाहरख- हे ससी, मै चहत बड़े जल के घड़े को लेकर शोघ्रतां से आई हूँ, मै श्रम के कारए प्रस्वेद जल तथा निश्वास से (चलने में) असमर्य हूँ. (श्रमात् यो स्वेदस लिल निःश्वासी ताम्यां निःसहा अक्षमा) अतः क्षस भर विध्राम करूँगी ॥१३॥, : यहाँ पर (वषतू-वशिष्टथ से) चोरी से की गई रति का घिपाना प्रतोत होता है (गम्यते)। i :: प्रभा-यह वक्तृ-वंशिष्ट्य के कारण विशेप-अर्य की प्रतीति का" उदाहरण- है। जत लाने के मार्ग में उपनायक से रति-कीड़ा करने वाली कोई नायिका अपनी सखी से कह रही है। यहाँ कहने वाली स्त्री (वक्तृ) विशाल घट को लाने का वणान करके अपनी थकावट को प्रकट करती है; यही वाच्यार्थ है। इसके द्वारा. अन्य अर्थ की व्यञ्जना होती है। जो प्रतिभा-सम्पन्न सामाजिक यह जानते है कि यह कामिनी दुशचरिया है, उन पर यह प्रकट हो जाता है कि, यह अपनी कावट का वर्णन करके चोरी से की गई रति-लीना को छिपा रही है। । -अ्रनुवाद-२ हे ससित, सेव है (अ्रहह) कि मुझ अभागिनी के हेतु तुझे भी नि.श्वाससहित नोंद उचटना (त्रोसिश्घम), दुरबलता, चिन्ता तभा आलस्य,पीडित, फर रहे हैं । १ ८।] यहाँ पर (योद्धव्य-वशिष्ट से) पूती का उस (नायिका) के नायक-द्वारा उपभोग व्यक्त हो रहा है। : प्रभा-यह वोद्धव्य-वंरिष्ट्य के कारण विशेपन्र्थ की प्रतीति का,उदाहरण :- है। अपने पति से रति-बीड़ा करके आने वाली दूती को भांग कर कोई: नाषिका: दूती से फह रही है। यहां बोद्व्य दुती है जिसकी दुप्ट चेप्टातरों को पहचे भी जाना।
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१२: 1 कीव्यप्रकाश:
३. तथाभूतां दृष्टवा नृपसदसि पाळ्चालतनयां वने व्याघः साघ सुचिरमुपितं वल्कलघरैः। विराटस्यावासे स्थतमनुचितारम्भनिभृतं गुरुः खेद खिन्ने मयि भजति नाद्यापि कुरुपु ॥१४॥ श्रत्र मयि न योग्य: खेद: कुरुपु तु योग्य-इति काक्वा म्रकाशयते। न च वाच्यसिद्धयङ्गमन्न काकुरिति गुणीभूतव्यङ्गयत्वं शङ्कय प्रश्नमानेणापि काकोर्विश्रान्तेः । गया है, अतंः वोद्धव्य-वैशिष्ट्य के कारण इस पद्य के वाच्यार्थ द्वारा सहृदयो को यह प्रकट (व्यङ्गय) हो रहा है कि यह नार्यिका अपने पति द्वारा इस दूती के उपभोग को प्रकट कर रही है। अनुवाद-3. राजसभा में घैसी (तथाभताम् अर्ात् रजास्वलावस्या में दुःशासन द्वारा जिसके वस्त और केश सीचे गये) पञ्चाल देश के राजा की पुत्री (बरौपदो) को देसकर और वल्कलघारी हम लोगों का व्याघों के साथ वन में रहना (उचितम्) एवं राजा विराट के गृह में अनुचित (पाचकावि) फार्य (श्ारम्भ) फरते हए गुप्त रप से ठहरना देखकर (भी) गुरु अर्भात् युधिष्ठिर पाज भी मुभ (भोम) ंत्न (विषण्स) पर त्रोध करते हैं (भजसि), फौरवों पर नहीं ?।१X 'इस पद्य में फाकु अर्यात् ध्वनि परिवर्तन से यह प्रफट किया जा रहा है कि मुझं पर क्रोध करना उचित नहीं, अपि तु फौरवों पर क्रोध करना उचित है 'यहाँ पर फाकु धर्थात् ध्वनि-विकार, वाच्यार्थ.की सिद्धि-का.साधन.(भभ्) है.,इसलिये यहाँ गुलीभूतव्यङ्गय नामक फाव्य है (न कि ध्वनि)'-ऐसी शङ्टा न करनी चाहिये (न शङ्धचम्), कयोंकि फाफु द्वारा प्रकट होने वाले प्रश्नमात्र से भी (काकोः व्यन्नथन प्रश्गमान्रेशाि) वाच्यार्य की परिसमाप्ति हो सफती है (विभान्ते :- धाच्यार्भस्य पर्यवस्षानात्)। प्रभा-यह काकु के वशिष्ट्य के कारस विशेष-अर्थ की प्रतीति का उदाहरए है"। भावावेश या उद्दक्य विशेष के कारण एक विशेष प्रकार की परिवतित ध्वनि काकु कहलाती है-भिन्नकण्ठध्वनिर्धीर: फाकुरित्यभिषोयते'। उपयुक्त (वेणीसंहार १·११ नाटक के) पद्य में भीमसेन सहदेव से कह रहे हैं कि गुर अर्थात् युषिष्ठिर मुझ खिल्न के प्रति कोय करते हैं और आ्ाज भी फौरयों के प्रति कोध नही करे। यह वाच्यार्थ है। इस से काकु अर्थात् ध्वनि-विकार के कारण यह व्यन्जना होती है- कि मेरे प्रति फ्रोष (सेद) करना उचित नही, अपि तु कोरवों के प्रति कोध करना उचित है। यहाँ पर यह सन्देह हो सकता है कि उपयुक्त उदाहरस में ध्यनिकाव्य है. मथवा गुसीभूतव्यस्गय ? अर्यात् व्यम्नधार्य वाच्यार्य की भपेकषा भषिक चमतकारक है मथवा वाच्यार्थ का मङ्जरूप ही है। पू्वपक्ष है कि यहां पर गुणीभूतव्यभभम है, किन्तु आायापं मम्मट का मत है कि ध्वनिषाव्य है। 7
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तृतीय उल्लास:
पूर्व !पक्ष' का आशय है- यहां पर काकु के बिना वाच्यार्ग की परिसमाप्ति (सिद्धि) ही नहीं होती; क्योंकि जो क्रोध का पात नहीं, उस भाई पर क्रोध करना और जो कोध के पात्र हैं, उन कोरवों पर घोध न करना-अयुक्त है। अतः वाच्यार्थ निष्पन्न नहीं होता। काकु द्वारा व्यङ्यार्थ की प्रतीति होकर ही यहाँ वाच्यार् की सिद्धि होती है। इसी हेतु यह काकु वाच्यार्थ को निष्पन्न कराने में सहायक मात्र है, वाच्चार्य की सिद्धि का श्ङ्ज है-साघनमात्र है और काकु द्वारा व्यङ्गय सर्थ की यहाँं प्रधानता नहीं तथा यह काव्य (काववाक्षिप्त) गुणीभूत व्यङ्ग्य है। इस पर आ्चार्य मम्मट कहते हैं-'प्रश्नमाघेणापि" काकोः विधान्तेः। इस वाक्य की व्याख्या दो प्रकार से की गई है- (१) काको: व्यङ्गचन प्रश्न- मात्र सापि वाच्यार्थस्य विश्रान्ते :- काकु द्वारा प्रकट होने वाले प्रश्नमांत्र से ही वाच्यार्थ निप्पन्र हो सकता है अतः काकु से व्यक्त विशेष अर्थ वाच्यसिद्धि का त्रङ्ग नहीं। भाव यह है कि यहाँ पर काकु दो कार्य कराती है-एक तो प्रश्न को उपास्वत करती है और दूसरे विशेष अर्थ की प्रतीति कराती है। काकु या ध्वनि परिवर्तन द्वारा 'कुरुपु न भजति ?' इस प्रकार ये प्रश्न की उद्भावना करकेः ही यह वाकयार्थ निष्पन्न हो जाता है- "क्या गुरु मुझ पर क्रोध करते हैं भर कौरवों पर नही ?" इस प्रकार वाच्यार्थ निष्पन्न हो जाने पर काकु द्वारा 'यहा व्यद्धपार्थ अभिव्यक्त होता है-'गुरु को मुझ पर कोध करना उचित नही, 'अपषितु' कारवों पर क्रोध करना उचित है।' यह व्यङ्घार्थ वाच्च सिद्धि का अ्रज्ज"नहीं, अपितु प्रधान है। यही व्यङ्गयार्थ सहृदयों के लिये प्रधिक हृदवाह्लादक हैं, वाच्यार्थ. से बढ़कर है। इसलिये यह व्वनि-काव्य है। (२) नेति प्रश्नकाववापि वाक्यार्भमतीतिपर्यवसानात्; अर्थात् 'न' में स्थित- 1
यकु से ही वाक्यार्थ निप्पन्न हो जाने के कारण विशिष्ट काकु बाच्चार्थ की सिद्धि का ऋ्रङ्ध नहीं। भाव यह है कि यहाँ दो स्थलों पर काकु हो सकती है।- 'नाद्यापि कुरुपु' के 'न' (नज्) मे काकु मानने पर, भी प्रश्न की प्रतीति हो जायेगो. तथा वावयार्थ निष्पन्न हो जायेगा। फिर यहाँ जो 'सेद सिन्ने मयि भजति नाद्यापि कुर्पु'-इस समुदाय में विशिष्ट काकु है, उससे व्यवत होने वाला उप्युकत अर्थ वाच्यसिद्धि के लिये आवश्यक नहीं तथा यहाँ व्यलुवार्थ वाच्सिद्धि का भ्रङ्भ न होगा (प्रदीप)। यही अर्य अधिक सङ्त प्रतीत होता है कयोकि यह 'काकुवंशिष्टसातु' शब्द से साक्षात् रूप में प्रतीत होता है। टिप्पणी-काव्यप्रकाश के पञ्चम उल्लास में मव्यमकाव्य या गुसीभूत- व्युङ्गय का विवेचन किया जायेगा। इस गुशीभूतव्यङगय क = भेद है, जिनमें चाच्यसिद्धघज्न औौर काववाक्षिप्त नामक दो भेद भी है। वाच्यसिद्वयन्न वहाँ होती है जहाँ बाच्यार्प की सिद्धि नङ्गयार्थ के अ्रधीन होती है; किन्तु जब काकु के द्वारा पक्षिप्त या अनुमित व्यङ्य वाच्यार्घ में होने वाते वाध को दूर करता है, कात्रु: के बिना वाच्यार्थ ही नहीं वन सकता तो वहाँ कावाक्षिप्त गुणीभूतञ्ङ्भभ होता।
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१०४ j. काव्यप्रकोशं :-
pt४. तइशा मह गए्डत्थलणिमिअं दिटिठ ए ऐसि अए्सत्तो। :. एसिहं सच्चेत शरहं ते अ कवोला ए सा, दिट्ठी ॥१६।।: iri (तदा मम गए्डरथलनिसग्नां दष्टि नानैपीरन्यत्र। ir । इदानीं सैवाहं तौ च कपोलो न च सा दृष्टि: ।।) .अत्र मत्सखीं कपोल्षप्रतिविम्यितां पशयतस्ते दप्टिरन्यैवाभूत, चलि- तायान्तु तरयामन्यैव जातेत्यहो,प्रच्छनकामुकत्वं ते इति व्यज्यते। ५. उद्द शोऽयं सरसकदलीश्रेणिशोभातिशायी, । कुञ्जोत्कपाडकुरितरमसीविंभ्रमो नर्मदायाः । ·*-: किञ्चैतस्मिन् सुरतसुहदस्तन्वि ते बान्ति वाता: f क पयेपामम्र सरति कलिताडकाएडकोपो मनोभू:।१७।। गर। अन्र रतार्थ प्रविशेति व्यदयम। है; जैसे 'मध्नामि कौरवशतम्' इत्यादि उ० १३१ मे है। वस्तुतः प्रस्तुत स्थल 'पर काक्वाक्षिप्त गरीभूतव्यङ्जय होने की शङ्ता है, वाच्यसिद्धयङ्ज की नहीं। श्रतः यह चिन्तनीय है कि यहाँ मम्मट ने स्पष्टतः 'काववाक्षिप्त का उल्लेख क्यों नही किया। अनुवाद :- ४ तब तो (जब यह कामिनी मेरे समीप थी) मेरे फपोल पर गड़ी हुई (निमग्नाम् अनिमेपतमा लग्नाम्) दृष्टि को तुम अन्यम्न, नहीं ले जाते थे। इस समय (उसके चले जाने पर) मैं वही हूँ, (मेरे) दोनों कपोल भी ये ही हैं, किन्तु यह दुष्टि नहों ॥१६॥ यहाँ पर व्यञ्जना द्वारा यह प्रकट होता है (व्यज्यते) कि मेरे कपोल पर प्रतिषिम्भित मेरी ससी को देजते हुए तो तुम्हारी दृष्टि कुछ और ही (प्रन्यय) थी फिन्तु उसके चले जाने पर और ही (घसो स्निग्या तथा अनिमेया नहीं) हो गई। भनूठी हं'(अहो), तुम्हारो यह पच्छनकामुकता (गुप्त प्रेम)। प्रभा-यह वावयवेशिष्टय से होने वाली विशेपार्यं की प्रतीति का उदाहरण हैं। नायक के दृष्टि-भेद से 'उसका अन्य प्रियतमा के प्रति प्रच्यानानुराग है'-इस बात को जानने वाली नायिका की यह उक्ति है। यहों पर 'तदा' और 'इदानीम्' इन दोनों पदों द्वारा गमन: उपनायिका की उपस्थिति तथा अनुपस्थिति प्रकट होती हैं। इन दोनो पदों के रूप में ही यहाँ वाक्य-वैशिष्टम है। यहाँ वानय-वैशिष्टम फे कारण सहृदय जनों को वाच्यार्थ के द्वारा एक विशेष व्यह्गम पर्य की प्रतीति होती है, जो विशेष चमत्कारजनर है। उसी व्यङ्भार्य का 'मन' ..... मज्यते' अवनरस द्वारा ग्रन्थकार ने निरपण किया है। : अनुवाद :- ५. 'हे फृशाडिग (तन्वि), नमंदा नवी (के सट) का यह ऊँचा *, प्रवेश हरे-भरे घोलों की पंक्तियों की शोभा से प्तिरमशोम है (सरसफबलीना थप्याः शोभया प्रतिशाबी), इसमें सतागूहों की पुप्पसमुद्धि के फारस कामिनियों के (हवय में) विशेष हाय (=विध्रम-"द्वार से पित की चञ्चलता) पहकुरित हो जाते हैं (भशचुरितः अप्न्नेवोत्पादितः) और इसमें सुर्त में सहायक (रतिश्रमजन्य रोद को हरने यालो) ये हपाएँ चलती हैं, जिनके घमे-झागे भनवसर में फोप करने वाला (रत्पितः पृतः अ्फाण्डे अनवसरे फोपो देव तादूनः) कामदेव चाा करता है॥t७।।
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तृतीय उल्लास:
६. गोल्लेइ अरद्दमणा अत्ता मं घरभरम्मि सश्लम्मि। खणमेत्त जइ संकाइ होइ एा व होइ वीसामो।१म॥ (नुदत्यनारद्र'मना: शवश्रूर्मा गृद्दभरे सकले। क्षसामात्रं यदि सन््यायां भवति न वा भवति विश्राम:।।) पत्र सन्ध्यासङ्कतकाल इति तटस्ष्थं प्रति कयाचिद् द्योत्यते.। :.
यहां पर-(वाच्यवंशिष्टय से) यह व्यङ्गत हूँ कि सुरत के लिये प्रवेश करो। प्रभा-यह वाच्यवैशिष्टध के कारण होने वाली विशेप अरथ की प्रतीति का उदाहरस है। कामुक अथवा द्ूती किसी नायिका के प्रति कहती है। यहाँ, विशेषणों की विलक्षणता के कारण सहृदयजनों को एक विशेष व्यङ्गय रूप अर्थ की प्रतीति होती है। वह व्यङ्गचार्थ है-'सुरत के लिये प्रवेश करो' नायक का यह भाव। ('सुरतार्थ प्रविशेति यन्नायिकायाः प्रेरण तत्सामाजिकान् प्रति व्यज्यते'- उद्योत)। वाकय-वं शिष्टध और वाच्य-वैशिष्टध में अन्तर है। पदो का समूह ही वाक्यर है'। जब वाक्य मे 'तदा' इदानीम्' इत्यादि ऐसे पदो का प्रयोग किया जाता है जो विशेष परिस्थिति की व्यञ्जना करते हैं तो वाक्य-वशिष्ट्य कहलाता है। किन्तुः जब वाच्यार्थ के विशेषणो से प्रकरणोपयोगी अरथों की व्यञ्जना होती है तो' वाच्यार्थ-वैशिष्ट्य होता है। तदा मम० (उदा० १६) मे वाक्य-वैशिष्ट्य है, किन्तु प्रस्तुत उदाहरस में नर्मदोद्दश' के विशेषण जो 'सरस०' और 'कुज्जो०' इत्या्दि है) उनसे उस स्थान की रमणीयता और एकान्तता व्यक्त हो रही है।"इसी प्रकार 'वाताः' के सुरतं०' इत्यादि विशेपस से वायु की सुरत में अनुकूलता एव 'येपामग्रे6' से कामदेव की अपरिहार्यता आदि व्यक्त होते हैं। अनुवाद-६ 'कठोर हृदय वाती सास मुझे घर के समस्त कार्यों में लगा दिया फरती हैं (नुदति-प्ररयति) यदि क्षस भर को अ्रवकाश मिलता है तो" सांपकाल ही' नहीं तो (या) मिलता हो नहीं' ॥१८॥ यहाँ पर-सन्ध्या का समय राङ्क्तकाल है' यह (बयता तथा बोद्व्म आदि से) भिन्न व्यक्ति (तटस्य-उदासीन अर्थात् उपनायक) के प्रति फोई नायिका व्यज्जना द्वारा प्रकट करती है। 16 प्रभा-यह अन्यसलिधि-वैशिष्ट्य के कारणा होने वाली अर्थव्यञ्जकता का उदाहरस है। गुंरुजनो के वीच उपनायक से बात करने में असमर्थ, कोई नायिका सङ्टू तकाल को प्रकट करने के लिये अपनी पड़ोसिन से सास की बुराई कर रही है। यहाँ वक्ता और वोद्धव्य आदि से भिन्न उपनायक ही तटस्य व्यक्ति है। उसके सात्तिध्य की विशिष्टता के करण सहदयजनों को वाच्यार्थ के द्वारा एक विशेष:
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१०६ काव्यप्रकाश:
७. सुन्वइ समागमिर्सदि तुष्म पिश्रो अज्ज पहरमेत्तग। एमेअ किति चिट्ठसि ता सहि सज्जेसु- करणिज्जम्:॥६॥ (श्रुयते समागमिष्यति तव प्रियोऽद्य प्रहर मात्रेख। - एवमेव किमिति तिष्ठसि तत्सखि, सब्जय करणीयम्।।) पन्रोपपति प्रत्यभिसतु प्रस्तृतान युक्तमिति कयाचिन्निवायते। 5. अन्यन्न यूय फुसुमावचायं कुरुष्वमन्नारिम करोमि सख्य:।" ..· नाहूं हि दूरं भ्रमितु' समर्था प्रसीदतायं रचितोऽब्जलिर्वः॥२०॥ अर्थ को प्रतीति होती है। वह विदेष अर्थ या ब्यङ्गयार्थ है-सायंकाल हो मिसन का समय है। यहाँ पर भिन्न मिनन शब्दों के वाच्यार्थ से निम्न प्रकार की अर्थ-व्यञ्जना, होती है-'अनाद्र मना:' से थकावट के बहाने से भी अवकाश नही, 'कले' से समस्त कार्य-व्यग्रता, 'सवथ' से आाज्ञा की अनतिकमसीयता तथा 'राध्याकाले' से उसी समय- अवसर है, इत्यादि। अनुवाद-७. हे ससी, सुना जाता है कि तेरा प्रियतम साज पहर भर में हो आाने वाला है इरालिये (तत्) तू यों ही कर्यो बंठी है, जो करना हं (करसोय) यह कर ले ।११।। यहां पर उपपति के प्रति सभिसरण के लिये उद्यत नायिका को कोई (सप्ती) रोक रही है कि यहां जाना उचित नहीं। प्रभा-यह प्रकरणा अथवा प्रस्ताव-वेशिष्ट्य के कारण होने वाली अर्थ. व्यञ्जकता का उदाहरय है। उपपति के निकट जाने को प्रस्तुत किसी नायिका सो. उसके पति के आगमन की बात सुनकर कोई सखी यह कह रही है। यहाँ पर भभिसरण के योग्य वेप-विन्यास आदि का पकरण है। "पति के आगमन की बात कहती हुई राखी भभिसरण का निषेध कर रही है"-यह प्रकरण-वैशिप्टभ के कारण सहदयंजनों को प्रतीत हो जाता है। यही व्यङ्गचार्थ है जो प्रकरस-विलकरता के फारण वाच्यार्ध द्वारा प्रकट हो रहा है। यहां 'पर-'अरघ्य' शब्द से 'भाज ही'कलान्तर में वही, '्रहरमोनस' रो- मदिलम्य, 'समागमिप्यति' से-सम्यस् पूर्र काम होकर माने याला सै अः तुरन्त' हो फिर नही लोटेगा, 'कयते' से सभी गुना है-इत्यादि भर्धों को व्यज्जना होती है। 1 : अनुवाद-८ 'परी सखियों, तुम कहा अव्यय्न पुप्तनघयन करो, दरा स्थान पर मैं (भस्मि-प्रहम, पुष्पवयन) फरती है, कर्योंकि में बहुत दवूर तक घूमने में समयं नहीं हूं, मैं तुम्हारे (यः) हाय जोड़ती हूं (पञ्जति: रचितः), तुम प्रसप्न स जामो (क्पा करो) ॥२०॥
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तृत्तीय उल्लास: [.१०७:
अत्र विविक्तोडयं देश इति प्रच्छन्नकामुकरत्वयाऽभिसार्यतामितिः आश्वरतां प्रति कयाचिन्निवेद्यते॥ ६. गुरुपणपरवस पिश्न किं भणामि तुद मंदभाइणी अहकम्। शज्ज पवासं वच्चसि वच्च सभं जेन्व सुएसि करसिज्जम् ॥२१॥ (गुरुजनपरवश प्रिय, किं भणामि तव मन्दभागिन्यद्दम्। अद प्रवासं व्रजसि वज स्वयमेव श्रोध्यसि करखीयम्।।) अत्राद्य मघुसमये यदि प्रजसि तदाह तावदू न भवामि तव न. जानामि गतिमिति व्यज्यते।
यहाँ पर-(देश-चंशिष्ट्य से) 'यह एकान्त प्रदेश है इसलिय गुप्त वेषधारी मेरे उपपति को तुम भेज दो' (अभिसा्यतां-प्रयंताम्) यह विश्वसनीय (आश्वस्ता) सखी के प्रति किसी (नामिका) के द्वारा निवेदन किया जा रहा है। प्रभा :- यह देशवंशिष्टय के कारण होने वाली अर्थ-व्यञ्जकता का उदाहरण है। अपने उपपति के साथ आई हुई प्रिय सखी (आर्व्रंस्ता) को देखकर कोई नायिका अपनी सखियों ये कह रही है। यहाँ पर ससियों को पुथ्प-बयन के लिये अन्यम भेजकर एक स्थान को निर्जन बनाया गया है अतएव यहाँ देश-वेशिष्टय है। इस देश-वंशिष्टय के कारस सहृदयजनों को यह प्रतीति होती' है कि'कोई नायिका अपनी प्रिय सखी से गुप्त कामुक को इस विविक्त प्रदेश मे भेजने' की बात कह रंही है"। यहाँ पर वावयार्थ का सम्बन्ध सामान्य सलियो से है और और व्यङ्तचार्थ का सम्बन्ध प्रिय सखी से ही। •यहां पर 'कुसुमावचायम् इस शब्द से जहां तक पुप्प मिले दूर तक जाना, .. 'मूयम्' (बहुचन) से भयादि का न होना। 'अन' से विजनता तथा 'अञ्जलिव' से सब के लिये एक अञ्जलि प्रदान करने के कारण असामर्थ्य-इत्यादि व्यङ्नथ है। अनुवाद :- ६ 'हे गुरुजनों के अ्धीन प्रियतम, मैं तुमसे क्या कहूं, मैं तो अभागिनी हूं। यदि तुम परदेश को जाते हो, तो जाग्ो, मुझे जो करना है (फरसीयम्) उसे स्वयं ही लुन लोगे ।।२१।। यहां पर (कालवंशिष्ट्य से) भाज इस वसन्त ऋतु में यदि (परदेश) जाते. हो तब मैं तो जीवित नहीं रहंगी, तुन्हारी दशा को तो मैं नहीं जानती।', मह, व्यञ्जना द्वारा प्रकट हो रहा है। पभा :- यह काल-वैंशिष्ट्य से होने वाली अर्थव्यञ्जकता का उदाहरएा है। परदेश जाने के लिए उद्यत किसी नायक से नाविका कह रही है। यहां 'भद' शब्द
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१०६ i काव्यंप्रकाश:।
आदिग्रद्णचचेष्टादेः। तत्र चेष्टाया यथा- " द्वारोपान्तनिरन्तरे मनि तथा सौन्दर्यसारश्रिया।. प्रोल्लास्योरुयुगं परस्परसमासक्त समासादितम्। आनीतं पुरतः शिरोंशुकमघः चिप्ते चले लोचने, वाचस्तत्र निवारित, प्रसरमं सङ्कोचिते दोलते ॥२॥ पपन्न, चेष्टया प्रचछन्नकान्तविषय आकृतविशेपो ध्वन्यते। द्वारा उक्त वसन्त काल के वशिष्ट्य" से सहुदयों को यह प्रतीति होती है- 'प्रियतम मैं तो तुम पर ही आथित हूँ इस समय तुम्हारे जाने पर मैं जीवित'न रहूँगी।' यहाँ पर 'गुरुजनपरवश' शद्द से गमन की अनिवार्यता 'प्रिय' से दुःसोत्कटता,- आदि फी व्यञ्जना होती है। अनुवाद :- (फारिफा में) आदि (फालादेः) शब्द के. ग्रहस से चेप्टा आदि का प्रहण होता है। उनमें से घेप्टा की अर्थव्यञ्जकता; जैसे- 'जब मैं द्वार के अत्यन्त निकट पहुँचा तो (सफल) सौन्दर्य को सार-भूत शोभा, माली (गौन्दयंसारा थी: यस्याः), उस (नार्यिका) ने अपने दोनों उसपरों को फलाकर (प्रोल्लास्य) फिर परस्पर मिला लिया (रामासादितम्), शिर के भोंचल को आगे (पुरतः) कर लिया, चञ्चल नेत्रों को नीचा कर लिया, उरा समय (तभ) (मुख मूंब कर) वचन का प्रसार रोक दिया (वाच.प्रसरणं निवारितम) तब भुजसताओं फो सिफोड़ लिया' ॥२२॥ - - यहाँ पर चेष्टा-द्वारा गुप्त प्रियतम के प्रति घपना विशेष अभिग्राय (याकूत- विरोप:) प्रकट किया जा रहा है। प्रभा :- सूत्र मे 'कालादेः' में प्रयुक्त आादि शच्य के द्वारा, घेष्टा दि का प्रहस होता है। 'द्वार' आदि पेष्टार्वगिष्ट्य के कारण वान्य द्वारा अर्थस्सञ्जकता का उदाहरण है। वेप बदलकर अपने सम्बन्ध में नायिका की विसेन चेष्टाओ्रों को जानने वांला कोई नीयके अपने मिन से कह रहा है। यहाँ पर नामिकां को चेष्टामों का वसंन बाच्चार्थ हैं। उसके द्वारा राहद्यंजनों की एक विशेष भरग की प्रतीति हो रही है। नायिका का विशेष अभिन्नाय ही बद्गधार्ग है, 'जो एव भाार है- 'यह मरे धनुराग हेतु आे'। सथवा वह समभोग बृज़ार के सम्यारी माप रज्जा के रूप में है अथवा आारमिनंन-मार्दि विषयक है। यहाँ पर उसपों के परस्पर मिलाने से गापरपंन' (स्पृष्टम), धाने धस्त करने से 'गुप्त रूर से आगमन', 'नेम-सन्चार से गूयास्त का मभ्दूत कात', मुग बद्द करने से 'ान्तिपुर्वक आागगन', भुजसक्गोचन से 'प्रातिन्जन' आदि ध्यनित होते है।-
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तृतीय उल्लास:
निराकाङक्षवप्रतिपत्तये प्राप्तावसरतया च पुनः पुनरुदाहियते। वष्त्नादीनां मिथः संयोगे द्विकादिभेदेन, अ्रनेन क्रमेण लक्ष्यव्यङ्गपयोश्च
(३८) शब्दप्रमाणवेद्योरऽर्थो व्यनक्त्यर्थान्तरं यतः। अथस्य व्यञ्जकत्वे तच्छव्दस्य सहकारिता ॥२३।। 11 शव्देति। न हि प्रमाणानतरवेद्योरऽर्थो व्यञजक: ॥ ॥ इति काव्यप्रकाशेऽर्थव्यव्जकतानिर्सयो नाम तृतीयोल्लास:॥।३।। अनुवाद-आाकांक्षारहित (प्रत्येक का क्या उदाहरस है? इस प्रकार की जिज्ञासा-निवुत्तिपूर्वक) बोध कराने के लिये तथा अ्वकाश या अवसर होने के कारस पृथक २ (पुलः पुन.) उदाहरए दिये गये हैं। वक्ता, बोद्धव्य आदि का परस्पर संयोग होने पर द्विकर्वशिष्टय आदि के भेद से अर्थ-व्यञ्जरूता का उदाहरस जान लेना चाहिये (उदाहार्यम्) तथा इसी कम से लक्ष्य और व्यङ्ग्य (अथों) की अर्य- व्यञ्जकता फे उदाहरण भी जान लेना चाहिये। ** प्रभा-आर्थी व्यञ्जना के इन दस उदाहरणों में वाच्य अर्थ की व्यञ्जकता दिखलाई गई है। इसी प्रकार यह समभना चाहिये कि वक्ता आदि के वैशिष्टय से लक्ष्य और व्यङ्गय अर्थ भी किसी अन्य अर्थ के व्यञ्जक हुआ करते हैं। अनुवाद-कयोंकि शब्द प्रमाण के द्वारा जाना हुआ (वाच्यन्लक्ष्य तथा व्यङ्ग्य) अर्थ ही व्यञ्जना द्वारा.अ्रन्य अर्थ की प्रतीति कराता है (व्यनक्ि) इसलिये (तत्-तस्मात्) अ्रथं.को.व्यञ्जकता में शब्द को सहकारिता मानी जाती है॥३८॥ 'शब्द' इत्यादि का अभिप्राय है कि (शब्द से भिन्न) किसी और प्रमास से जाना हुआ श्रर्यं व्यञ्जक नहीं होता। प्रभा-आर्थी व्यञ्जना में वाच्यादि अर्थ ही प्रधानतया अन्य-अर्थ का व्यन्जकहोता है इसका अभिप्राय यह नहीं कि यहाँ शब्द की व्पञ्जकता होती ही नही। वस्तुतः शब्दार्थयुगल ही काव्य है और जब शब्द और अर दोनों ही विशेष र्थ की प्रतीति कराते हैं तभी कोई काव्य ध्यनि-काव्य कहलाता है। अतएव आचार्य मम्मट का कथन है कि अर्थ की व्यञ्जता में शब्द भी सहायक होता है; कयोकि काव्य में जिस वाच्य, लक्ष्य तथा व्यङ्गय रूप अर्थ के द्वारा कोई अर्थ व्यक्त होता है वह वाच्यादि अर्थ तो किसी शब्द द्वारा ही नेय है। वह शब्द प्रमाण से हो जाना जाता है, अन्य प्रत्यक्षादि प्रमाणों द्वारा नही। इसी लिये सार्थी व्यञ्ना में जब्द की भी सहकारिता मानी जाती है। यहाँ पर अर्थ प्रधानतया व्यञ्जक होता है तथा शब्द सहायक रूप में। काव्य में शब्द-प्रमाण द्वारा ज्ञेय अर्थ (वाच्यादि) ही अन्य अ्र्थ के व्यञ्जक होते हैं। यदि कोई वस्तु अन्य प्रत्यक्षादि प्रमास से जानी जाती है तो वह व्यञ्जक नही होती। इसलिये अर्थ की क्म्जकता में शब्द की स्थिति मनिवाय है।
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११० काव्यप्रकाश:
इस प्रकार जहां शब्द (वाचक आादि) व्य्जक है यहाँ वे अर्थान्तरयुक्त 1 1 होफर ही व्यञ्जक होते हैं और जहां वाच्यादि, अर्थ व्यञ्जक हैं वहाँ वे शब्दों द्वारा ज्ञात होकर ही अ्न्य अर्थ के व्यञ्जक होते हैं, अतः शाब्दी तथा मार्थी दोनों प्रवार की व्यञ्जना में वब्दार्थयुगल ही अर्थ-विशेप की प्रतीति कराते हैं तथा ऐसे दब्दायं- युगल-को ही-व्वनिकाव्य वाहा जाता है। टिप्पसी-(i) आचार्य मम्मट के 'यत्सोरऽ्यान्तरयुक' (२.२०) तथा 'शब्द प्रमाण-वेद्योज्यः' (३.२३) ये दोनों सूत् कमदाः शब्दी व्यञ्जना में अर्थ की सह- कारिता तथा आर्थी व्यञ्जना में शब्द की सहकारिता का प्रतिपादन करते हैं। इस मान्यता का आधार ध्वनिकार की यह (११३)' उक्ति है-यमार्थः शब्दो वा तमर्थमुपमर्जनीकृतस्वार्या। व्यडक: काव्यविशोपः स ध्वनिरिति सूरभिः कपितः॥ साहित्यदर्पणा (२'१८) में इर मान्यता को इस प्रकार स्पप्ट किया गया है- शब्दवोष्यो व्यनवत्वर्थः शब्दोऽप्यर्थान्तराश्यः 1 एकस्य व्यञ्जकत्वे तदन्यस्य सहरारिता -: 1 (ii) शारांस यह है कि (१) प्रयोजनवती सक्षणा के स्थल पर नियममित रूरो तथा अनेकार्यक शब्द के प्रयोग में विशेष परिस्थिति में ही शब्दी व्यञ्जना होती है। वहाँ किसी शब्द का समानार्थक (पर्याय शब्द) रसने पर व्यञ्जना नहीं रहती (शब्दपरिवृत्त्यसहत्व) प्रतः वह शाब्दी या शव्दाधित है। (२) जय किसी शब्द द्वारा प्रथमतः वाच्य, लक्ष्य या व्यङ्प अर्थ का बोध होताहै ॥औीर फिर उस अर्थ से किसी व्यङ्गय की प्रतीति होती है तय भा्षी व्य्जना हुआ करती है। यहाँ किसी शब्द का पर्याम रस देने पर भी व्यञ्जना बनी रहती है (शव्दपरिवृमिसहत्व)। (३) यद्यपि शब्द की व्यञ्जकता में भर्प तथा सर्य की व्यञ्जकता में शब्द भी साहकारी होता है तथापि किसी एक की प्रधानता के कारण ही शाब्दी या मार्थी व्यज्जना कही जाती है-(प्रापान्येन व्यपदेशाः अवन्ति) । i इस प्रकार फाव्यप्रकाश में आर्थी व्यञ्गना का निर्एय करने वाता मह सृतोय उल्लास समाप्त होता है। । इति वृतीय उल्लास: ॥
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प्रथ चतुर्थ उल्लासः
- } यद्यपि शब्दार्थयोनिणये कृते दोषगुणालक्काराएं स्वरूपमभिघानीयं तथाऽपि धर्मिि प्रदर्शिते धर्माणां हेयोपादेयता ज्ञायत इति प्रथम काव्य- .भेदानाछ- [लक्षणामूलक'ं ध्वनिकाव्यम्] (३६) अविवक्षितवाच्यो यस्तन्न वाच्यं भवेद् धवनौ। ध्वनि. अर्थान्तरे सङकमितमत्यन्तं वा तिरस्कृतम् ॥२४॥ इस (चतुर्थ) उल्लास में ध्वनिकाव्य के भेदों तथा अवान्तर भेदों का विस्तार- पूर्वक बरान किया जा रहा है। अनुवाद-यद्यर्पि शब्द और अर्थ का निसाय कर लेने पर (के पश्चात्) दोप, गुख तथा अलद्धारों का स्वरूप कहना चाहिये; तथापि धर्मों सर्थात् काव्य का (प्वान्तर भेदों सहित) निरूपस किये जाने पर ही धर्मो (दोप, गुए तथा अलद्धारों) को हेयता (दोषों को त्याज्पता) तथा प्राहयता (गुए तथा अलद्धारों की उपादेमता) 'जा्नी जाती है इस लिये (ग्रन्थकार) प्रथम काय के भेदों को बतलाते हैं- घिस्षमें वाच्यार्य अविविक्षित पर्थात् अ्रनुपयुक्त (अ्न्चय के पयोग्य) होता है ऐसा जो (यः) ध्वनि काव्य है, उस ध्वनि काव्य में वाच्यार्थ १. किसी अन्य (चाच्यलक्ष्य- साघारस) अर्थ में परित हो जाता है अथवा २. अत्यन्त तिरस्कृत होता हुं। [इस
'तिरस्कृतवाच्य] प्रफार अविविक्षितवाच्य ध्वनि के दो मेद हैं-१. अर्थान्तरसंक्मितवाच्य २. अ्रत्यन्त-
प्रभा-आचार्य मम्मट ने 'तददोपो शब्दार्थी' समुसाावनलड् फृती पुनः व्वापि' इस प्रकार काव्यलक्षणा का निरूपण किया है। इस लक्षणा मे शब्दार्थीं यह विशेप्यपद है, शेप तीन विशेपण हैं अतः प्रथमतः शब्दार्थयुगल के स्वरूप तथा भेदों का विवेचन किया है। उसके परचात् दोप, गुए, अलद्वारों का निरुपए करना चाहिये, उनके :निरूपण का ही यहाँ अवसर है। किन्तु दोष, गुएा तथा अलद्वार तो काव्य के घर्म हैं और काव्य धर्मी है। जब तक काव्य का अ्रवान्तर भेदों सहित निरूपण न किया जाये धर्मों का विवेचन भली भाँति नही हो सकता तथा दोपों की हेयता और गुए आदि की उपादेयता का भी ठीक र ज्ञान नहीं हो सकता। इसी हेतु यहाँ पहले काव्म के ·भेदों का निरूपण किया जा रहा है। प्रंथम उल्लास में काव्य के तीन भेद किये गये हैं-१ उत्तम (ध्वनि): मध्यम (गुीभूतव्यङ्गय) और ३. अधम (चित्रकाव्य) । उनमें से महा ध्वनिकाव्य के भेद-प्रभेदों का विवेचन किया जा रहा है। ध्वनि के प्रयमतः
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११२ ] काव्यप्रकार:
लक्षणामूलगृद्वव्यद्गयप्राधान्ये सत्येव अविवसषितं वाच्यं 'ध्वनौ' इत्यनुवादाद् वनिरिति ज्षेयः। दो भेद होते हैं १. लक्षणामूलक अथवा अविवक्षितवाच्य, २. ग्रभिघामूतक
प्रस्तुत कारिका में अविविक्षितवाच्य ध्वनिकाव्य का स्वरप वतलाया तथा उसके दो भेदों-क. अर्थान्तरसंभमितवाच्य और स. सत्यन्ततिरस्कृ का निरुपण बि्या गया है, जो कारिका वृति की व्यास्ता में स्पष्ट होगा। निप्पो आचार्य गम्मट ने ध्वनिकाव्य के भेव-प्रभेदों में ध्यनिक अनुसरस किया है। जयनिकार का कथन है-अस्ति ध्यनि:। स घाविवकित -वितक्षितान्यपरवाच्यश्चेति द्विविध: सामान्येन (घ्वन्यालोक १.१३ वृति) तथा-अर्यान्तरे संक्मितमत्यन्तं या तिरस्कृतम्। प्रविवक्षितवाच्यरय धवनंय्यिं दिया मतमु ॥ (ध्वन्पालोक ( 1 साहित्यदर्पसाकार मे भी ध्वनि के भेद-विवेचन में काव्य-प्रकांश की का ही अनुमरस किया है, (देखिये, साहित्यदपस ४.२,३) .. अनुवाद-लक्षणामूलक गूढव्यस्गप की प्रधानता होने पर हो चाच्यार्य अ्रविवक्षित होता है यह पविवक्षितवाच्य ध्यनिकाय्य है यह जानना (जैंयः); प्योंकि (फारिका में) "वनी' इस (पद) के द्वारा (पहिते मष्म ध्यनिः' शब्द का) अनुवाद किया गया है। पभा-'सक्षणामूल' इत्यादि अवतरण में आचार्य सम्मट ने कार्रिय अंविवक्षितवाच्यो यः' अभ वी व्यास्या की है। यहाँ अविवतितवान्य रवनि का गक्षेप में स्वस्य निर्दश किया गया है। अभिप्राय यह है कि 'पविषकित शदद मे ही इस धनि का स्वरप निहित है। इसमें वाच्यार्थ अविवश्षित म तातपयं का अविपम हुमा करता है। वाच्या्थे वाषित हो जाता'है तथा लदयार्थ बोध कराता हुया किभी व्यहचार्य की प्रतीति कराता है। इमी से दर स्वनि सक्षणामूलक ध्यति फाव्य भी कहा जाता है। यहाँ जो व्जम रुप मर्म होत :वह गूढ होता है-गहदयमायसंवेद होता है। इसी व्यम्नपार्य की महाँ प्रधानता मोरती है अर्थात यह लदयार्थं की भपेक्षा "अधिक नमत्कोरपूर हम करता है। प्रंकार सपियक्षितवाच्य-ध्वनि-गन्य में. तोग विभेदताय होती है,-(1)5 'सपाणामूनक बयसथ होता है; (२) जो इनचार्य होता है वह गूट होता है, प नहीं। 2. राजपाथप्ी प्रधानता-होती है यह सदयाय"से 'पपिक" पगलाग होता है। 'अविविशितवाघ्यो यः'इर परिकाम से अपयुंक धर्म इस सवार प्रम्प :संपी हे-जहाँ वाच्यायें अविवकित होता है (पवितशित वार्च्य मन) धर स 1मुलर मूढस्पसप की प्रधानता होने पर ही यह अविवकित होता है ऐना जो पया
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चतुर्थं उल्लासः ११३
१. यत्र च वाच्यं क्वचिद्नुपयुज्यमानत्वादर्थान्तरे परिणमितम्। यथा-1:(I : त्वामस्म चच्मि विदुयां समवायोऽत्र तिष्ठति। आरत्मीयां मतिमास्थाय स्थितिमत्र विघेहि तत् ॥२३।। - अरत्र वचनादि उपदेशादिरूपतया परिणामति॥ 1
है-'यः ध्वनिः' क्योंकि यत और तत शब्द परस्पर साकाडक्ष है तथा 'तम' के समानाधिकरण रूप मे 'ध्वनि' का सप्तम्यन्त 'घ्वनौ' प्रयुक्त किया गया है। अतः 'यः' के समानाधिकरण रूप में 'ध्वनिः' शब्द का अध्याहार स्वतः सिद्ध ही है।" -टिप्पशी-(i) 'विवक्षित'शब्द का अरयं 'अभिप्राय, तात्पर्य' आदि होता है; जसा कि कहा गया है- विवक्षितम मिप्रायः फलं भावः प्रयोजनम्। तात्पयंमिति पर्यायशब्दा. वाक्याथंगोचरा.। (i) 'अनुवाद' का अरथ है-जानी हुई, बात को किसी उद्देश्य से पुनः कहनो- प्रप्तिस्य अनु पशचात् कथन सम्योजनम्-अनुवादः (न्यायसूत्नवृति २-१-६५) । यहाँ पर 'यः' के साथ ध्वनिशब्द आक्षेपसिद्ध है, अतः 'ध्वनो' इस पद का 'तब' के समानाधिकरसरप में पुनः प्रयोग किया गया है तथा अ्नुवादमात्र है। अनुवाद्-१. अर्थान्तरसंक्रमित अविवक्षितवाच्य में (तत्न) कहीं तो (क्यचित्) वाच्यार्थ (अपने रूप में) अनुपयुक्त (अविवक्षित या अ्नभिप्रत) होने के कारए किसी प्रन्य अर्थ में (अर्थान्तरे-वाच्यलक्ष्यसावारण घर्य में) परिखत (संक- मित) हो जाता है। (यह अर्थान्तरसंक्मित पविवक्षितवाच्य ध्वननि काव्य है) जैसे- :'मैं तुम्हें यह बसलाता हूँ (अस्मि=अहुं, वह्िम) कि यहाँ पण्डितों का समुवाय उपस्थित है, इसलिये (तत्) तुम अपनी बुद्धि का श्राम लेकर (प्रास्थाय= आलम्बय) यहां सावधानी से व्यवहार करना (स्थिति विधेहि=सावधानवतंन कुछ).11R३11. 1 क ह यहां पर कहना सादि (घडिमि) उपदेश रूप में परिसत होता है। प्रभा-अर्थान्तरसकरमित अविवक्षितवाच्य ध्वनिकाव्य वहां होता है जहां व्यञ्ज़क.रूप. में आने वाला वाध्यार्थ अपने स्वरूप में (प्रकरण की हृष्टि,से).अ्रनुप- पुक्त हो, जाता है.तथा-सपने से. भिन्न, विसी.अर्थमें(पर्थान्तरे) परिणत हो जाता है; किन्तु वह मन्य अर्थ ऐसा हुआ करता है जो वाच्य तथा लक्ष्य दोनों अरथों से. समान- रूप से सम्बन्ध रखता है। संक्षेप में व्यञ्जक रूप में स्थित मुस्यायं की स्वर्भिंत् किन्तु अपने ही विरेष रूप अर्थ (लक्ष्म) में परियति हो मर्थान्तरसफान्ति है। प्रथवा बाच्यार्थ का प्रकारान्तर से लक्ष्य हो जाना ही अर्थान्तरसंकान्ति है। ऐसा उपादान- लक्षमा के स्वल में ही होता है-। जैसे-'काकेम्यो दधि रक्ष्यताम्' यहां वाच्य होते 1 हए 'भी 'कारक' पद का सर्थ 'दध्युपमातक' रूप में लक्ष्य है। 1+
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११४ काव्यप्रकार:
२. कवचिद्सुपपद्यमानतया अत्यन्तं तिरस्कृतम्। यथा- .. उपकृतं बहु तत्र किमुच्यते सुजनता प्रथिता भवता परम्। विद्वदीहशमेव सदा सखे सुखितमारव ततः शरदां शतम् ॥२४॥ एतदपकारिएं प्रति विपरीतलक्षणया करिचिद्वद्ृति।
पर्थान्तरसंकमित अविवक्षितवाच्य ध्वनिकाव्य का उदाहरण 'त्वामरिम वच्मि' मादि सुक्ति है। विद्वानों की सभा में जाते हुए किसी व्यक्ति से नसके पिता या गुरु आादि का यह कथन है। यहाँ क्रोता को लक्षम करके वक्तव्य बात कही जा रही है, अतएव 'त्वाम्' (तुभको) अस्मि (पहूं, मैं) वच्मि (कहता हू), ऐसा फहना अनुपयुक्त है तथा मे पद अपने से भिन्न किन्तु अपने रूप विशेपभूत (सवसम्वद्ध) भन्य भर्य मे परिणत हो जाते हैं। '्वाम्' म लक्ष्य-प्रर्थ हो जांता है उपदेशमोग्य सुभको (उपदेश्य त्वाम्), 'स्मि' का 'यथानचक्ता में' (भाप्तोऽम्), राभा 'वच्मि' का 'उपदेश करता हूँ' (उपदिशामि)। इस सक्ष्यार्थ के द्वारा हितकारिता ब्यह्नथ है। इसी प्रकार 'विदुषाम्' तथा 'आात्मीयां' अ्रन्यार्यं में परिणत होकर-'मन्ययाघरस करने पर उपहसनीयता होगी' इस अर्थ की प्रतीति कराते हैं। टिप्पणी-(i) 'अर्थन्तरसंप्मितवाच्य' आदि शब्द परिभाषिक से हो गये हैं। इनका व्युत्पत्तिकृत अपरय इस प्रकार है- (पर्यान्तरसषंकगितश्चासी याच्यरव पर्यान्तरतंकमितवात्य: तत्म (तरसम्बत्यि- स्वेन) ध्वनि:। (कमंधारयगनं-वष्ठीतत्पुरपः) पथवा धर्यान्तरसंकरमितं वाच्यमरित यस्य सोधर्यान्तरसंकमितवाच्यः, स धा्मी व्वनिदद अर्थान्तरसंत्रमितयार्ा्वननि:
दर्पणकार ने 'अर्यान्तरसंकमितवाच्य का स्वस्प इस प्रकार प्रदर्तित किया है-यत्र स्वयमुपपुज्यमांनो मुटयोऽमं: सथदिशपपापन्तिरे परिशामति, तन्र मुदया-
(साहित्यदर्पण ४०३) अनुंचाद-(२. प्रामन्ततिरस्कृत)-कहीं-कहीं (थास्याथं) उपपुरत न होने के फारस मरमन्ततिररकृत (थन्मार्पललर) हो जाता है,जसे- 'हे मिन्न, सापने दहुत उपकार किया है., इसः विषय में (सन).तया कहा जाये; सापने तो फेवल (परं-फेवसम्) सज्जनता दिससाई है (प्रमिताप्रफटिता)।
रहो ।२४।! इसलिये (ततः) ऐगा ही करते हुए (विदपल्), संकड्डों वर्यो (सरर्व) तक मुसपूर्वक यहु (बात) कोई विपरीत समाखा द्वारा सयकारी के प्रति कहता है। पमा पयनतिसृत अविवतितवान्य व्यनिव वहा ोष ैज व्यञ्जरु भप में भाने वाला याप्यारथं (नरए की दृष्टिसै) सरने, स्पकप, मि, मनुप- मृक हो जावा है सपा सपने सर्प का गगभा त्ाग करहे गन्यार्ष या सशक मात्र हो
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चतुर्थ उल्लास:
[भभिधामूल ध्वनिकाव्यम] (४०) विवक्षितं चान्यपरं वाच्यं यत्रापरस्तु सः । जाता है। यहां वाच्यार्थ अत्यन्त-तिरस्कृत इसीलिए कहा जाता है कयोकि वह अपने स्वरूप का त्याग कर देता है.औौर लक्ष्यार्थके-वोधनका उपाय मान बन जाता है। ऐसा उपादानलक्षणा-से-भिन्न लक्षणा के स्थल-में ही होता-है; जैसे 'ङ्गायां घोष.' में गङ्गा' का अर्थ तीररुप अ्ररथ में परिसत हो जाता है। + अ्त्यन्ततिरस्कृत अविविक्षितवाच्य ध्वनि का उदाहरण है-'उपकृतम्' भांदि। अनेक अपकारों द्वारा पीड़ित किसी व्यक्ति की अपने अपकारी के प्रति यह इक्ति है। प्रकरखादि से यहाँ पर बोद्धव्प (जिससे बात कही जा रही है) व्यक्ति का अपकारी होना ज्ञात है, अतः उसके उपकारादि की स्तुति रूप जो मुख्यार्थ है वह वाधित होकर बिपरीत अर्थ को लक्षित करता है; जैसे-'उपकृतम्' सब्द लक्षणा' द्वारा 'अपकृतम्'के अर्थ-में परिणत हो जाता है, इसी प्रकार सुजनता का दुर्जनता, 'सखे' का 'शत्र' एव 'मुसितम्' का 'दुखितम्' आदि लक्ष्यार्थ होते हैं। विपरीतं लक्षसा द्वारा उपयुक्त पद लक्ष्यार्थ बोधकमान् रह जाते हैं तथा अपकार की अधिकता की (व्यञ्जना) द्वारा प्रतीति कराते हैं। टिप्पखी-(i) अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य शब्द का विवरस इस प्रकार है- सत्यन्ततिरस्कृतशचासी वाच्यश्चेति अत्यन्ततिंरस्कृतवाच्य,तत्य ध्यनिः। अथदा धत्यन्ततिरस्कृतं वाच्मं यत्र से ध्वनिः, अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यध्वनिः। दर्पखकार के अनुसार अत्यन्यतिरस्कृतवाच्य का विवरण है- यृत्र: पुत्रः स्वार्थ सवथा परित्यजप्नर्थान्तरे परिसमति, तत्र मुस्यार्थस्यात्यन्ततिरस्कृत-
:- ha(ii) अर्थान्तरसकरमित तथा अ्रत्यन्त तिरस्कृत शविवक्षितवाच्य (सक्षण- (सा० द०. "३)
मूलक) व्वनि काव्यों का पारस्परिक अन्तर-यद्यपि दोनों में वाच्यार्थ अविवक्षित होता हैं, वह लक्ष्यार्थ की प्रतीति कराता हुआ किसी व्यङ्तयार्थ को अ्रभिव्य्क्त कराता है -'तथाविधाम्या च ताम्या व्यङ्गयरयैष विशेष: (ध्वन्यालोक २.१); तथापि दोनों में स्पष्ट अन्तर है। अर्थान्तरसंक्मित में वाच्यार्थ अपने विशेष रूप में परियात हो जाता है, वाच्य-लक्ष्यसाधारण अर्थ का बोध करता है सथवा कहिये कि स्वांयं का सर्वथा, त्याग न करता-हुआ.परार्थ का बोध कराता है। उपादानलक्षणा के स्थलों पर अर्थान्तरसंककमितवाच्य होता है किन्तु अ््यन्ततिरस्कृत में वाच्यारयं अपने स्वरूप का सर्वेधा त्याग कर देवा है तथा केवल लक्ष्याथं का बोधक होता है। उपादानलक्षसा से भिन्न लक्षणा के स्पलों पर अ्रत्यन्ततिरस्कृतवाच्य होता है। :/- अ्रतुचाद- (स. अभिधामूलक ध्वनि) जिस ध्वनि में (पत्र) वाच्यायं अपने स्वरप से अन्वय-योग्य होता हुआ (िवश्षितम्) भी (च) अन्यपर सर्थात् ध्यद्गमार्यं- परक (वहधनिष्ठ) होता है वह दूसरी अर्थात् विवक्षितान्यपरयाच्य स्वति है॥४०॥
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११४ काव्य प्रकाश:
२. क्वचिद्नुपपद्यमानतया अत्यन्तं तिरस्कृतम्। यथा- उपकृतं बहु तत्र किमुच्यते सुजनता प्रधिता भवता परम्।- विद्वददशमेव सदा सखे सुखितमास्व ततः शरदां शतम् ॥२४॥ एतदपकारिएं प्रति विपरीतलक्षएया कश्चिद्वदृति। अर्था्तरसंकमित अविविक्षितवाच्य स्वनिकाव्य का उदाहरए 'स्वामदिम वच्मि' आादि सूक्ति है। विद्वानों की सभा में जाते हुए किसी व्यक्ति से उसके- पिता या गुरु आदि का यह कधन है। यहाँ धोता को लक्य करके. वत्ष्य बाव कही जा रही है, अतएव 'त्वाम्' (तुभको) अ््रस्मि (भहं, मैं) वच्मि (कहता हूँ), ऐसा कहना भनुपयुक्त है तथा मे पद अपने से भिन्न किन्तु अपने रूप विशेषभूत (रवसम्यद्) भन्न मर्थ मे परिणत हो जाते हैं। 'त्वाम्' का लक्ष्य-ध्र्थ हो जांता है उपदेशमोग्य सुझको (उपदेश्यं त्वाम्), 'भ्रस्मि' का 'यथाजचका में' (भाप्तोडम), तमा, 'वष्मि' का 'उपदेश करता हू' (उपदिगामि)। इस सदयार्थ के द्वारा हितकारिता व्यसुप है। इसी प्रकार 'विदुषाम्' तथा 'आत्मीया' अन्यार्थ में परित होकर-'मन्यपापरण करने पर उपहसनीयता होगी' इस अर्थ को प्रतीति कराते हैं। टिप्पणी-(i) अर्थन्तरसंकमितवाच्य' आादि शब्द परिभाषिक से हो गये हैं। इनका व्युत्पत्तिकृत भर्य इस प्रकार है- (पर्थान्तरसंकमितश्चासी वात्यरव सर्थान्तरसंकमितवाच्य: सत्य (तरसम्भनधि स्येन) ध्वनि: । (कर्मवारयगभं-पण्ठीतत्पुरुपः) अयया अर्थान्तरवकमितं माच्यमहित
(यहुब्री हिगभं रमघारयः) दर्पसकार ने 'अर्थान्तरमंकमितवाच्य' का स्वर्प इस प्रकार प्रदर्ित किया है-पत्र स्वयमुपपुज्यमानो मुतयोऽ्यं: स्वविशेपरपार्डयातरे परिएमति, तत मुकर्या
(साहित्यद्पस ४२) अनुंवाद-(२. प्रतयन्ततिरसकृत)- कहा-कहों (वास्याय) उपपुर् म होने •के कारस प्रत्यन्ततिररफृत (मन्यायंलशर) हो जाता है जसे- हे मिन्न, पापने घहन उपरार किया है, इसः विपय में (तन्) नया कहा जाये; मापने सो फेवल (परं-फेवलम्) सज्जनता दिद्ालाई है (प्रपिताप्रकटिता)। इसलिये (ततः) ऐसा हो करते हुए (विदपत्) संवड़ों वर्तों (परर्स) तक मुनपुवक व्हो URYI 4 यह (यात) कोई विपरीत सक्षसा द्वारा अपकारी से प्रति रहता है। ... -प्रभा-प्त्ततिरसवृस धविवतितवाच्य स्वनिकाम्य यहाँ होत है व्यं्जक रप में पाने याला याप्पार्थ (पकरए की टटिटि, सी.) सपने स्वक ह, अनुप- मुकु हो जागा है तथा सपने सर्म का गर्वया रगाग करठें सम्वार्य या सधक गात हो
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चतुर्थ उल्लास: ११७
तत्र-
(४२) रसभावतदाभासभावशान्त्यादिरक्रमः । भिन्नो रसाद्यलङ्कारादलङ्कार्यतया स्थितः ॥२६॥ - व्यञ्जक होते हैं-विभाव, अनुभाव आदि। विभावादी के द्वारा रसागिव्क्ति हाती है (रसस्तं) अरतः वे हेतुरूप हैं। फिर यह स्पष्ट ही है कि विभावादि पूर्वकाल में होंगे तदनन्तर रस की अभिव्यक्ति होगी। अतएव वहाँ व्यञ्जक और व्यङ्गय का एक कन पवश्य होगा, पोर्वापर्य (पूर्व तथा अपर का भाव) होगा। किन्तु उस पोर्वारय का अनुभव नही होता। क्यों? रसोद्र क से सहृदय जनों का चित् आप्लुद हो 'जाता है तथा प्रत्यन्त शिघ्रता से घटित होने वाले व्यञ्जक और व्यडगघ में किसी करम पा अनुभव नहीं कर पाता, ठीक इसी प्रकार, जैसे कि यदि किसी तिक्ष्सा सूचिका आादि से शत- शत कमल पत्रों को वेधा जाता है तो कौन पत्र पहले बेधा गया कौन बाद में इसका प्रनुभव नहीं होता। अलक्ष्यकमव्यङ्ग्य के अन्तर्गत ही उपयुक्त अर्थ निहित है- सलक्यः अ्रज्ञेय: व्यञ्जफेन=(वाच्येन अर्थात् विभावानुभावाद्यर्येन सह) क्रमः पौर्यापर्मम् यस्य एवंभूतं व्यङ्गघ यस्मिन् तावुकः । यह अलक्ष्यकमव्यङ्गय ध्वनिकाव्य अत्यन्त चमत्कारी होता है ग्रन्थकार ने 'कोर्ऽपि' (कोई विलक्षण) शब्द द्वारा यह प्रकट किया है। विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि का दूसरा भेद लक्ष्यकमव्यङ्गय है। वहा पर व्यञ्जक और व्यङ्गय का भ्रम स्पष्टतः लक्षित हुआ करता है। टिप्पसी-आचार्य मम्मट ने यहाँ पर ध्वनिकार का ही अनुसरण किया है- असंलक्ष्यक्रमोद्योत. क्रमेए ध्ोतित: पर: । विवक्षिताभिधेयस्य ध्वनेरात्मा द्विधा मतः ॥ (६वनयालोक २.२). किन्तु ध्वनिकारकृत संज्ञा की स्पष्टतार्थकता यहां नहीं रही है। उनकी असंलक्ष्यकमव्यङ्गभ (सम्यङ् न लक्षयितु शक्यः क्रमो यस्य तादय उद्योत उद्योतन- व्यापारोडस्येति बहुब्रीहि :- ध्वन्यालोकलोचन) संज्ञा मे 'असंलक्ष्य' शब्द के प्रयोग से अधिक विपदता एवं अर्थ-स्फीत्ता है। दर्पसकार ने इस स्थल पर ध्वनिकार का कुछ प्धिक अनुसरख किया है- घियक्षिताभिषेयोऽपि द्विभेद: प्रयमं मतः । भसंलक्ष्यत्रमो पत्र व्यङ्गणो लक्ष्यक्रमस्तया ॥ (साहित्यदपण ४-४) अरनुषाद-[१. अलद्यमतमव्यक्चय] उन (पलक्ष्यकमय्यङ्गभ तथा लक्ष्ययम व्यङ्गप) में (तन्न) रस (भृङ्गारादि) भाव (रति आदि), रसाभास तया भाषाभारा भावशान्ति (व्यनिवारी मादि नावों की शान्ति)-इत्यादि प्रतक्ष्यतम (पननः) होते हैं, जहां कि ये (रस इत्यावि) प्रल्धाथ घर्थात् प्रधान होने के कारस रमादियद् मदि अलद्धारों से भिन्न रूप में स्गित है ।।४२॥
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११६ काव्यप्रकाप:
अन्यपरं व्यङ्गधनिष्ठम्। एप च। :---- (:४·१) कोऽप्यलक्ष्यकमव्यङ््यो लक्ष्यव्यङ्श्यक्रमः पर: ॥२५॥ अलच््येति न खेलु विभावानुभावव्यभिचारिएं एव रस, अपि .. तु रसस्तैरित्यस्ति करमःसतुलाघवान्द्ते .* igatr (कारिका में) 'अन्यपरम्' भर्थात् व्यज्ज धार्य (अम्म) में निष्ठ। प्रभा :- 'विवक्षितम्' इत्यादि सूत्र द्वारा आचार्य मम्मट ने विवक्षितान्यपर वाच्य घ्वनि काव्य का स्वरूमनिर्देश किया है। इसमें वाच्यारय विवकित होता है, प्रकरण की हष्टि से अव्वय योग्य होता है अथवा तातपय का विषय तो रहवा है। किन्तु वह अपने से अधिक रमणीय व्यन्नथ मर्थ की प्रतीति कराने के हेतु धपने स्वरूप को गोए बना देता है: व्यहधपरक हो जाता है। वहां व्यज्नपाय ही पर्यन्तरमणीय होता है; वाच्यार्थ.तो केवल-उसकी प्रतीति का उपायमान होता है। सतएव वाच्यागं व्य्यनिष्ठ अर्मात् व्यङ्तयरप अर्थ में विशान्त हो जाया करता है; जंसा कि बब्द के अर्थ से ही स्पष्ट है-'विनशितम् अन्यपरं च वाच्यं यन'।' जहाँ यह ध्वनि-भेद होता है वहाँ पर भभिधामूलक व्यङ्नभ (भर्य) की प्रमानता होती है। इसमें व्यध अर्थात ध्वनि अभिया के-माधार पर-होतीहै या कहिये कि प्रथमतः पभिघावति द्वारा वास्यार्य- बोध होता है-औोर तब-ममिधा- मूलक उयब्जना द्वारा सुहृदयमायवेध एक विलक्षस मर्य की प्रतीति हुमा करती है। इसी से इस ध्वनि को सभिधामूलकध्वनि भी कहा जाता है। टिंप्पसो- (i) वाच्यार्थ की 'विवसा' (तात्पर्य-विषयता) मौर भन्यपरता (व्यन्नधनिष्ठता) में कोई विरोध नहीं, क्योंकि वह वास्यारयं व्यकुपपरक रप से ही विवसत होता है अथवा वह अपने स्वरूप को दिपाता हुआ सा व्यसघार्ये की प्रतोति में ही सपा रहता है-नन व विवक्षा घान्यपरत्यं घेति विदवम्। मन्मपररवे- नैय वियससात् को विरोध: (ददन्यालोकलोचन, उद्योत १)। अमुवाद्-(भ मियामूलक ध्यनि, फाव्य के सो नेव) औौर यह (विवक्ितान्य- परवास्पप्दनि) एक सो पनियंधनीय पमरकारकारी (कोऽपि) मल्पतमध्यरुप औोर दूसरी (पर) सक्ष्म्यङ्गपनम होती है ()- 1. -/ 6 ससदयगाम इससिये कहा गमा है (पमश्येति) बर्योकि विभाव, अनुभाव मोर व्यमिघारिभाव ही रस नहीं है. किन्तु उनके द्वारा सा (पमिष्यत" होता है)।- रष, हेसु (इति) कम सो है; पर वह सीप्रता के कारए परितकित नहीं होता। प्रना :- पाचार्य मम्मट विवकितान्यपरवांच्य ध्यनि के भेद बसलाते हैं कि यह दो प्रफार की होती है-१. मद्यपमस्भप 'तवा २. मधयनगभ्यस्ृप। प्रथम प्रफार में ध्यम्जरु (गाच्यामें) मोर व्यद्ापार्य का नम परिनतिय नहीं होगा। नेमा हि अल्लपार मे म्मे स्पष्ड किया है, बह। रमादि हो म्वम्ञय होगे है मीर बनसे
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चतुर्थ उल्लासः :११७
तत्र-
(४२) रसभावतदाभासभावशान्त्यादिरक्रमः । भिन्नो रसाद्यलङ्कारादलङ्कार्यतया स्थितः ॥२६।। व्यञ्जक होते हैं-विभाव, अनुभाव आदि। विभावादी के द्वारा रसानिन्यकि हाती है (रसस्तः) अतः वे हेतुरूप है। फिर यह स्पष्ट ही है कि विभावादि पूर्वकाल में होगे सदनन्तर रस की अभिव्यक्ति होगी। अतएव वहाँ व्यञ्जक और व्यङ्गच का एक कप पवश्य होगा, पौर्वापर्य (पूर्व तथा अपर का भाव) होगा। किन्तु उस पौर्वारय का अनुभव नहीं होता। क्यों? रसोद्र क से सहृदय जनो का चित्त आप्लुत हो जाता है तथा अत्यन्त शिघ्रता से घटित होने वाले व्यञ्जक और व्यङ्गथ में किसी क्म का अनुभव नहीं कर पाता, ठीक इसी प्रकार, जैसे कि यदि किसी िक्ष्सा सूचिका आदि से शत- शत कमल पत्रों को वेधा जाता है तो कौन पन्र पहले बेधा गया कौन बाद में इसका प्रनुभव नहीं होता। अलक्ष्यकमव्यङ्गय के अन्तर्गत ही उपयुक्त भ्र्थ निहित है- अलदयः प्रज्ञेय: व्यञ्जफेन=(वाच्येन पर्थात् विभावानुभावाद्यर्थेन सह) फ्रमः पौर्धापर्यम् यस्य एवंभूतं व्यङ्गथ यस्भिन् तादृशः । यह अलक्ष्यक्मव्यङ्गय व्वनिकाव्य प्रत्यन्त चमत्कारी होता है ग्रन्थकार ने 'कोर्ऽपि' (कोई विलक्षण) शब्द द्वारा यह प्रकट किया है। विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि का दूसरा भेद लक्ष्यकमव्यङ्गय है। वहाँ पर व्यञ्जक और व्यङ्ुथ का कम स्पष्टतः लक्षित हुआ करता है।
किया है- टिप्परणी-आचार्य मम्मट ने यहाँ पर ध्वनिकार का ही अनुसरस
मसंलक्ष्यक्रमोद्योत. क्मे घ्योतितः पर. । विवक्षिताभिघेयस्य ध्वनेरात्मा द्विधा मतः ॥ (घबन्यालोक २.२) किन्तु ध्वनिकारकृत सज्ञा की स्पष्टतार्थकता यहाँ नहीं रही है। उनकी असंलक्ष्यकरमव्यङ्गय (सम्पङ् न सक्षययतु' शकयः कमो यस्य ताहश उद्योत उद्योतन- व्यापारोडस्येति बहुव्रीहि :- ध्वन्यालोकलोचन) संज्ञा मे 'असंलक्ष्य' शब्द के प्रयोग से अधिक विपदता एवं अर्य-स्फीतता है। द्पसकार ने इस स्थल पर ध्वनिकार का कुछ अधिक अनुसरए किया है- वियक्षिता भिघेयोऽवि द्विभेदः प्रथम मतः । प्रसंलक्ष्यत्रमो यत्र व्यङ्गघो लक्ष्यकमस्तया ।। (साहित्यदर्पण ४-४) अनुयाद-[१. अलश्यममव्यङ्गण] उन (अलक्ष्यकमव्यङ्गय तया लक्ष्यकम उय्रय) में (तग्न) रक्ष (शृङ्गारादि) भाव (रति आदि), रसाभास तया भावाभास भावशान्ति (व्यभिवारी आदि नावों की शान्ति)-इत्यादि भलक्ष्यक्रम (भनम.) होते हैं, जहाँ कि मे (रस इत्यादि) अलङ्गार्थ सर्थात् प्रधान होने के कारण रमाहियत आादि अलद्धारों से भिन्न रूप में स्थित है।४२॥
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काव्यप्र कार:
आदिग्रहसाद् भावोद्य-भावसन्धि-भावशवलत्वानि। प्रधानतया यत्र स्थितो रसादिस्तन्रालङ्कार्य:, यथोदाहरिप्यते। पर्प्रन्यन्न तु प्रधाने वाक्यार्थे यत्राज्ञ्भूतो रसादिस्तत्र गुसीभूतव्यब्गये, रस-
उदाहरिष्यन्ते :
(कारिका में) आदि (भावशान्त्यादि) शन्द के प्रहदा से भावसन्धि औोर भावशबलत्य (का प्रहल होता है)।
जहां पर रस आदि प्रधान रप से स्थित रहता है वहां (पलक्ष्यकमध्यसुप में) यह अलङ्ड्ा्य होता है, जंसा कि आागे उदाहरस दिया जायेगा। अन्य रुपसों पर सो जहां वाक्म का उद्देश्यसूत (याश्याये=यापमोद्देश्ये) फोई सन्य धर्म (रस, वस्तु यादि) प्रधान (भङ्गो) होता है तथा मे रस आदि सङरप (उत्कपंक) होते हैं, [स गुएीमूतध्य्गय में-रसवत्, प्रेप, कजस्वी, समाहित प्रापि भेसदार होते हैं। उनका गुरणीमूनध्यङ्गय के निरूपए में (पञ्चम उल्लास में) उवाहरए दिया जायेगा। प्रमा-'रस' इत्यादि कारिका द्वारा मराचार्य मम्मट ने वियशितान्यपर वाच्य (प्रविधामूलक ध्वनि) के प्रयम भेद अलक्यक मव्यसुप के अवासार भेरों को दिखलाया है तथा रस और रसवद अलह्कार आदि के सन्तर को भी स्पष्ट पिया है। मभिप्राय यह है-कि अलक्ष्यकमव्यय प्यति में जो व्यज्ञभ हआ करते है वे है- १: रस, २. भाव, ३. रसाभान; ४. भावाभाग, ५. भावशान्ति, तथा यादि चन् से गुहित, ६. भावोष्य, ए. नावसन्यि औ्रोर C. भावरवसता । मै रसादि मनदव- कमव्य दवय प्वनन में प्रधान रूप में स्थित होसे है. व्यनि की सातमा होते है मोर मन्य समस्त गुए तवा भतङ्शर आदि इनकी हो पादस के प्रपोमा होते है; मतद्ब ये रस आदि वहां पर मवखाय होते है। जैमा कि 'घून्यं यानवूह' द्वत्यादि उदाहरखों से स्पप्ट होगा। सार्सप यद है कि जहा रनादि प्रधान रूप मे रमूय है, यहाँ मलभ्यकरव्पपुय व्यनि होती है किन्तु जहाँ पर मे मतधान र से रहा करते हैं, कोई अन्य मर्य वाक्य का उदभ्पभूत होगा है- मम्ती या प्रमान होगा है; तामा ये (रग मदि) उसके सत होहर भाते है घर्पात उनके उरकष की यि के निये पयुक होते है.। वहाँ मे 'मससूर' नहीं होते, अपितु भरद्वार (ददकर्णावायक) रूप में आते है। ऐमा मृतीदाम्यपूच मध्मम भास्य) में छोटा ऐै। यहीं 'रमपत्' मदि अनसूरों का विषय है। जैसे 'मर्म ग रममोहपी' हवाि (११६ उदाहरस) में रसवन् मनदार है: द्श प्रधान रस नाए मे कमा भृंगारं उमपा मत्त होवर साया े-पोपर है मनः इहा भृगार की दृष्टि से मुसीनूय-
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चतुर्थ उल्लास: . ११६
तन्र रसस्वरूपमाह- · (४३) कारणान्यथ कार्याि सहकारोणि यानि च। रत्यादे: स्थायिनो लोके तानि चेन्नाठकाव्ययोः ॥२७॥ विभावा अ्रनुभावास्तत् कथ्यन्ते व्यभिचारिण: । व्यक्त: स तैविभावार्द्यः स्थायीभावो रसः स्मृतः ॥२८॥ उक्त' हि भरतेन-'विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिप्पत्तिरिति' ष्यङ्गय काव्य है। इसी प्रकार 'भाव' आदि की अ्र्प्रधानता के विषय में भी समझना चाहिये। संक्षेप में-रस के शज्ग होने पर रसवत्, भाव के भङ्ग होने पर प्रेय, रसाभास और भावाभास के अ्रङ्ग होने पर ऊर्जस्वी; भावशान्ति के अ्रङ्भ होने पर समाहित आदि अलद्कार होते हैं। इनका उदाहरए सहित विशद विवेचन पञ्चमो- ल्लास में गुणीभूतव्यङ्भय के प्रकरण में किया जायेगा। शरनुवाद-उन (रसभावादि) में रस का स्वरूप-निरूपस करते हैं- लोक में स्थायी रति (ललनादि विषयक प्रीति) आदि चित्तवुतिविशेष के 'जो कारस (ललनादि जनक कारण तथा चन्द्रोदय आदि परिपोषक कारस) तथा कार्य (रत्यादिजन्य फायिक वाचिक तथा मानसिक भेद से अनेक प्रकार के फटाक्ष, भुजोत्क्षेप आवि) और सहकारी (रत्यादि के सहायक निर्वेद इत्यादि) भाव है; उनका यदि नाट्य तथा काव्य में वणन किया जाता है तो ये (रसनों के द्वारा) क्रमशः विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी भाव कहे जाते हैं। उन विभावादि के द्वारा (तं.) प्रथषा उनके सहित (सहुदयजनों के हृदय में) व्पज्जना द्वारा व्यक्त किया हमा (व्यक्त=प्रास्वाद्यता प्राप्त) वह स्थायी भाव (रस सम्प्रवाय के आचार्यो द्वारा) रस कहा गमा है। भरतमुनि ने कहा भी है-विभाव, अनुभाव तथा सं्चारिभाव के संयोग से रस की निध्पत्ि होती है। प्रभा-'कारणान्यथ' इत्यादि कारिकाओं मे आचार्य मम्मट ने रस का स्वरूप-विवेचन किया है तथा रस के कारयाभूत जो विभावादि हैं उनका, लोक से विलक्षण स्वरूप मी बतलाया है। सामान्यतः रस का स्वरूप यह है-कि विभाव पनुभाव और सर्चारी भाव के संयोग से परिपुष्ट होकर रति आदि स्थायी भाव आास्वादन योग्य हो जाते हैं तथा रस कहलाते हैं। यह कहा जा सकता है कि मानव हृदय में स्नेह (रति) इत्यादि कुछ भाव (चितवृत्तिविशेष) अविच्छ्परूप से रहते हैं, वे सदा ही व्यक्त दशा में नहीं रहते किन्तु वासना रूप (संस्कार दक्षा) में सूक्ष्मरपेण विराजमान रहते हैं। उन्हें ही साहित्य-मर्मज्ञों ने स्थायी भाव कहा है :औौर उनका विविम प्रकार से बर्गोकरणा किया जाता है। इन स्नेह आदि भाव के उद्बोष का जो नोक में कारया होता है प्रर्यात एक स्नेह (रति) आदि का उत्पादक
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१२० काध्यप्रकाप:
कारण रमली आादि औौर दूमरा उसका परिपोपक फारए चन्द्रोदय आदिववही लोकोत्तरवएंनानिपुए कवि-कृति में भातम्वन तथा उद्दीपन विभाव कहा जाता है। (सोक में) प्रम आदि का हृदय में आविर्भाष होने पर जो (स्थायी भाय के माश्रम में) भुजा फड़कना शदि चेप्टाए होती है वे ही माव्य-भूमि में अनुभाष है तथा रनेह (रति) आदि भाव के प्राविर्भव में जो सहकारी कारण निर्वेद आदि होते हैं ये ही काव्य में व्यमिचारी या सञ्चारी भाव कहलाते हैं। संक्षेप में रतास्वादन प्रकार यह है-सहृदय-जनों के हृदय में रति भादि गाव वासना रूप से सदा विद्यमान रहता है। मालम्वन विभाव के द्वारा यह रथायी भाव आविर्भूत हो जाता है और उद्दीपण विभाव द्वारा प्रदीप्त हो जाता है। मनुभाव उसको प्रतीतियोग्य बना देते हैं। एवं व्यभिवारी भाव उनको परिपुष्ट कर देते है। इस प्रकार इन सबके संयोग से स्थायी भाव व्यञ्जनावति द्वारा व्यक्त हो जाता है प्रथत् रसन योग्य (मास्वादन योग्य) हो जाता है। रसवादियों ने उसी को रख कहा है। भाचार्य मम्मट ने उपयूक्त कथन की पुष्टि के िये भरतमुनि के विभावादि सूय को उदृत किया है। मम्मट के मत में इम सून का उपयुक्त ही तालय है। टिप्पणी-(i) भारतीय साहित्य में रस सम्पदाय प्रत्यन्त प्राचोन है किन्तु प्राजकल प्रचलित रम-मिद्धान्त के प्रयम सायार्य भरतमुनि माने जाते है। भखतमुमि के विभाव०' इत्मादि सूय में रक-निप्पत्ति वा स्वरूप-निर्पसा किया गया है। इस सूत को मनेक प्राचार्यों द्वारा विभिस्न व्वास्यायें की गई हैं। कान्यप्रपाश मे इससे चार प्रकार की व्यास्वामों का उल्लेस किया गया है। (ii) जंसा कि काव्यप्रकायवति की परप्िम स्वास्या से स्पप्ट होगा पाचाय • मम्मट का रस-स्वमप-विवेधन भभिनव गुप्त के आघार पर है। साहितयर्पएकार का कबन भो इन्ही का अनुकरण नरता है- वि.ावेनानुभावेन रपक: सं्चारिसा तया। रहतामेति रत्मादि: स्थापिभाय: सचेतसाम्। (साहिलपसा ३१)- (iii) यद्यपि सोक की टषिटि से मलवादि रति मादि नाय मो रक्तति के फारए है, प्रस्नेद तथा भुजोरक्षेप परदि कार्य है औरनिवदे यादि सहकारी है वपाि र-निम्पति को दषष्टि से अ्यात सामानिक के दृदय में रसास्वादन के विपार से. सो पे विमाव, पगुभाव तपा सज्धारी भाव के सोहेतर रूप को मारखा कारके रसदुवोष मे कारस ही होते हैं जसा कि दर्पसपार गे यहा भी है- कारए का्पसञ्चारियपा पपि हि तोरसः। रसोनबोपे विनावासा: कारसान्येय से मता: 11 मा० द ३१४) 'स्थायी तथा समबारी मा्वी का वियय विषेयन पगे (सुत ४x, ४i) विनाय-रति भादि रगाबी मा्गे को रस कप में सयावनीय विभाय पहसाव है। मै दो प्रकार क ६-मातभबत धौर
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चतुर्थ उल्लास: "१२१
एतद्विवृस्वते- विभावैरललनोद्यानादिभिरालम्वनोदीपनकारएै: रत्या- दिको भावो जनितः, धनुभावैः कटाक्षमुजाक्षपप्रभृतिभिः कार्येः प्रतीति- योग्यः कृतः, व्यभिचारिभिरनिर्वेदादिभि: सहकारिभिरुपचितो मुख्यया वृस्या रामादावनुकार्ये तद्र पतानुसन्धानान्नत्त केऽपि प्रतीयमानो रस इति भट्टलोल्लटप्रभृतय: । उद्दीपन। उदाहरएार्थ लोक मे दुष्यन्त के मन में शकुन्तला को देखकर रंति भाव का प्रादुर्भाव होता है और उद्यान, चन्द्रिका आदि से उस रति भाव का उद्दीपन होता है अतः ये रति भाव के कारण हैं। इसी अधार पर काव्य-नाट्य में वित शकुन्तला नादि शरृद्धार रभ के आ्र्लम्बन विभाव कहलाते हैं तथा उद्यान चन्द्रिका आादि उद्दीपन विभाव। इनका यह (विभाव) नाम विभावन व्यापार के कारण होता है। ये सामाजिक के हृदय मे वासना रूप से स्थित रति आदि स्थायी भावों को विभावित करते हैं अर्थात उनमें आ्स्वाद की योग्यता उत्पन्न करते हैं-यही विभावन व्यापार है। इसी प्रकार अन्य रसो के भी शलम्बन तथा उद्दीपन विभाव समझने चाहियें। अनुभाव-अनु पश्चाद् भवन्ति इत्यनुभावाः। लोक में दुष्यन्त आादि के मन में रति आदि के भाव का उद्बोध होने के पर्चात् भुजोत्क्षप (भुज पड़कना) आदि व्यापार होता है यह रति आदि भाव को सूचित करता है, रति प्ररादि का कार्य रूप (रल) है। काव्य-नाट्य में व्शित यही भुजाक्षेप आदि अनुभावन व्यापार के कारण -अनुभाव कहलाता है। अनुभावन व्यापार का अ्प्रभिप्राय है-सामाजिक की चित्तवृति को तन्मय करना, भाव में लीन करना। काव्य-नाट्य मे भुजोतक्षप आादि के वर्णन का परामशं करके सामाजिक की चित्तवृति रति आदि भाव में तन्मय हो जाती है अतः ये अनुभाव कहनाते हैं। ये सात्विक, कामिक और वाचिक भेद से कई प्रकार 'के होते हैं। सात्विक भाव शठ हैं- स्वेद. स्तम्भोऽय रोमाञ्चः स्वरभङ्गोऽय वेपथुः। 'वंवर्ण्यभ् ग्रक प्रलम इत्यष्टी सात्विकाः मताः ॥। कटाक्ष, भुजोक्षेप आदि कारयिक अनुभाव हैं तथा मधुर वचन आदि वाचिक। भिश्न २ रसों के अनुभायो का नाट्य-शास्त्र के सप्तम अध्याय में वर्णन किया गया है। अनुवाद-[१. भट्टलोल्लट-रसोतपत्ि] भट्टलोल्लट इत्यादि आाचाय इस (भरंतमुनि के सुत्र) की (इस प्रकार) व्याध्या करते हैं (विवृण्वते)-विभाव अर्यात् ललना आदि आलम्बन औौर उद्यान आदि उद्दीपन कारणों द्वारा जो 'रति' आादि "'भाव उत्पम्न हो जाता है; अनुभाव अर्थात् कटाक्ष, भुजफड़कना आदि कार्यों से प्रतीति के योग्य किया जाता है; व्यभिचारी भाव अर्था्त निर्वेद आबि सहकारियों द्वारा पुप्ट -(उपचित) किया जाता है और साक्षात् रूप से (मुख्यया वृत्या) अनुकार्य(जिसका पनुकरण या प्रगिनय किया जाता है उस) राम आदि में रहता है, फिन्तु नर्तक "(नट) में भी रामादिल्पता का अनुभव होने के फारस वह (स्थायी) उस्मं भी प्रतीत होता है, यही रस है।
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१२० काव्यप्रकाशे:
कारए रमखी आदि और दूसरा उसका परिपोषक कारए चन्द्रोदय आदि-वही लोकोत्तरबसंनानिपुए कवि-कृति में आलम्वन तथा उद्दीपन विभाव कहा जाता है। (लोक में) प्रम आदि का हृदय में आविर्भाव होने पर जो (स्थायी भाव के आाशय मे) भुजा फड़कना आदि चेप्टाए होती है वे ही काव्य-भूमि में अनुभाव हैं तथा स्नेह (रति) आदि भाव के आ्विर्भाव में जो सहकोरी कारण निर्वेद आदि होते हैं वे ही काव्य में व्यभिचारी या सब्चारी भाव कहलाते हैं।, संक्षेप में रसास्वादन प्रकार यह है-सहृदय-जनों के हुदय में रति भादि भाव वासना रूप से सदा विद्यमान रहता है। आालम्बन विभाव के द्वारा वह-स्थायी भाव आविभूत हो जाता है और उद्दीपन विभाव द्वारा प्रदीप्त हो जाता है। अनुभाव उसको प्रतीतियोग्य बना देते हैं। एव व्यभिचारी भाव उनको परिपुष्ट कर देते 'हैं। इस प्रकार इन सबके संयोग से स्थायी ाव व्यञ्जनावृति द्वारा व्यक्त हो जाता है अथात् रसन योग्य(आस्वादन योग्य) हो जाता है। रसवादियों ने उसी को, रस कहा है। आचार्य मम्मट ने उपयुक्त कथन की पुष्टि के लिये भरतमुर्नि के विभावादि .सूत को उद्धृत किया है। भम्मट के मत में इस सूत् का उपर्युक्त ही तात्पय है। -टिप्पसी-(i) भारतीय साहित्य में रस सम्प्रदाग प्रत्यन्त प्राचीन है किन्तु आाजपल प्रचलित रस-सिद्धान्त के प्रथम आचार्य भरतमुनि माने जाते हैं। भरतमुनि के 'विभाव' इत्यादि सूघ में रस-निष्पत्ति का स्वरूप-निरुपस किया गया, है।-इस सूत् की प्रनेक आचार्यों द्वारा निभिन्न व्पास्पायें की गई हैं।काव्यप्रकाश में इसकी चार प्रकार की व्याख्याओं का उल्लेस किया गया है। (ii) जैसा कि काव्यप्रकाशवृत्ति को अप्रिम व्यास्या से स्पप्ट होगा आचार्य गम्मट का रस-स्वरप-विवेचन अभिनव गुप्त के आधार पर है। साहित्य दर्पसकार का कथन भी इन्हीं का अनुकरण करता है- विनावेनानुभायेन, व्यक्त सञ्चारिखा तथा। रसषतामेति रत्यादिं: स्थायिभाव: सचेतसाम् ।,(साहित्यदर्पए ३- १),- (iii) यद्यपि लोक की दृष्टि से लसनादि रति आदि भाव की उत्पति के कारण है, प्रस्वेद तथा भुजोतक्षेप आदि कार्य हैं और निर्वद भादि सहकारी हैं तथापि रस-निष्पा्ति की दृष्टि से अर्थात सामाजिक के हृदय में रसास्वादन के विचार से. तो ये विभाव, अनुभाव तथा सजचारी भाव के लोकोत्तर रूप को धारणा करके रसद्वोष 7 के कारण ही होते हैं जैसा कि दर्पसकार ने वहा भी है- फारण-कार्यसञ्चारिरपा अपि हि लोकतः। रसोबुबोये विभावाद्या: कारसान्येय ते मताः ॥सा० द० ३१४) (iv) स्थायी तथा सञ्चारी भावों का विपद विवेधन आगे (सून ४५, ४६) मैं किया जायेगा। विभाय-रति सादि स्थायी भागे को रस रूप गे आस्वादनीय बनाने वाले मुख्य कारए विभाव कहलाते हैं। ये दो: प्रकार के है-आालम्वन औड़
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चतुर्थ उल्लास: "१२१
दिको भावो जनितः अनुभावैः कटाकमुजाक्षपप्रभृतिभिः कार्यैः प्रतीति- योग्य: कृतः, व्यभिचारिभिर्निर्वेदादिभिः सहकारिभिरुपचितो मुख्यया वृत्त्या रामादावनुकार्ये तद्र पतानुसन्वानान्न्त्तकेऽपि प्रतीयमानो रस इति भट्टलोल्लटप्रभृतय: । उद्दीपन। उदाहरणाय लोक मे दुप्यन्त के मन में सकुन्तला को देखकर रति भाव का प्रादुर्भाव होता है और उद्यान, चन्द्रिका आदि से उस रति भाव का उद्दीपन होता है अतः ये रति भाय के कारण हैं। इसी अधार पर काव्य-नाटय में वित शकुन्तला अदि शृङ्गार रम के झलम्वन विभाव कहलाते हैं तथा उद्यान चन्द्रिका 5आादि उद्दीपन विभाव। इनका यह (विभाव) नाम विभावन व्यापार के कारस होता है। ये सामाजिक के हृदय में वासना रूप से स्थित राि आदि स्थायी भावों को विभावित करते हैं अर्थात् उनमे आस्वाद की योग्यता उत्पन्न करते हैं-यही विभावन व्यापार है। इसी प्रकार अ्न्य रसो के भी आलम्न तथा उद्दीपन विभाव समझने चाहियें। अनुभाव-अनु पश्चाद् भवन्ति इत्यनुभावाः। लोक में दुष्यन्त आदि के मन में रति आदि के भाव का उद्योष होने के परचात् भुजो्स्षप (भुज पड़कना) आदि व्यापार होता है यह रति मदि भाव को सूचित करता है, रति आदि का कार्य'रूप (कल) है। काव्य-नाट्य में व्णित यही भुजाक्षेप आदि अनुभावन व्यापार के कारए -अनुभाव कहलाता है। अनुभावन व्यापार का अभिप्राय है-सामाजिक की चित्तवुति को तन्मय करना, भाव में लीन करना। काव्य नाट्य मे भुजोदक्षेप आदि के वर्णन का परामर्श करके सामाजिक की चित्तवृत्ति रति आदि भाव मे तन्मय हो जाती है अरतः ये अनुभाव कहनाते हैं। ये सात्विक, कायिक और वाचिक भेद से कई प्रकार के होते हैं। सात्विक भाव आठ है- + स्वेद. स्तम्भोऽय रोमाञ्य: स्वरभङ्गोऽथ वैपथुः । •वैवर्ष्यभ् प्रथ प्रलय इत्यष्टी सात्विकाः मताः ॥ कटाक्ष, भुजोक्षेप आदि कायिक अनुभाव हैं तथा मधुर वचन आदि वाचिक। िन्न २ रसों के अनुभावो का नाट्य-शास्त्र के सप्तम अध्याय मे वर्खन किया गया है। अनुवाद-[१. भट्टलोल्लट-रसोत्पत्ि] भट्टलोल्लट इत्यादि आचार्य इस (भरतमुनि के सुत्र) की (इस प्रकार) व्याख्या करते हैं । विवृण्वते)-विभाव अर्यात् ललना आदि मालम्बन और उद्यान आदि उद्दीपन कारणों द्वारा जो 'रति' भादि - भाव उत्पन्न हो जाता है; अनुभाव अर्थात् फटाक्ष, भुजफड़कना आादि कार्यों से प्रतीति के योग्प किया जाता है; व्यभिचारी भाव अर्था्त् निर्वब भाबि सहकारियों द्वारा पुष्ट -(उपचित) किया जाता है और साक्षात् रूप से (मुष्यमा वुत्या) अनुशार्य (जिसका पनुकरख या अभिनय किया जाता है उस) रान पदि में रहता है, किन्तु नतंक '(नट) में भी रामादिइपता का अनुभव होने के कारस वह (स्यायी) उसमें भी होता है, यही रस है।
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१२२ काव्यप्रकाश:
प्रभा-भरतमुनि के "विभावानुभावव्यमिचारिसंयोगाद रस-निष्पत्ति:" इस सून के व्याख्याकारों में भट्ट लोल्लट प्रथम है। उनकी व्याख्या में रस का गरथ है- नायक-नायिका को अनुभूत होने वाला रत्यादि स्यायीभाव और निष्पत्ति का प्थ है-उत्पत्ति। इसी हेतु यह मत 'रसोत्पतिवाद' कहा जाता है। यह मत मीमांसा- सिद्धान्त पर आरधारित है। उनके मतानुसार ललना और उद्यानादि लोकिक, सामग्री ही आलम्बन तथा उद्दीपन विभाव हैं वे रामादिगत रत्यादि भाव के जनक एवं उद्योषक हैं। रामादिगत भुजाक्षेप आदि ही अ्रनुभाव हैं, जिनके द्वारा रत्यादि स्थायी भाव प्रतीति योग्य हो जाता है औौर निर्वेद आदि सहकारी रूप जो सज्वारी भाव है। उनकी सहायता से पुष्ट हो जाता है। वह रसरूप स्थायी भाव मुख्यतया रामादि के हृदय में होता है; किन्तु जब राम के समान वेशभूपादि से सुमज्जित होकर कोई परभिनेता राम का पभिनय करता है तब सामाजिक जन उसमें ही रामत्व का भारोप कर लेते हैं। भाव यह है कि जिस प्रकार रज्जु को सप समझने से भय उत्पन्न होता है इसी प्रकार रामादिगत रति नाख्यादि नैपुण्य के द्वारा नटादि में भासित होने लगती है तथा सहृदय सामाजिक के हृदय में एक विशेष चमत्कार का अनुभव कराती है. औौर वही रस पदवी को धारसा करती है। टिप्पसी-(i) संक्षप मे भट्टलोल्लट के अनुसार यह सूयार्थ होता है-स्यायिनां विभा्व: (कारणः) संयोगात् (उत्याद्योत्पादकभावरुपाव), अनुभावः (कार्यः) संयोगाव (गम्य-गमकभावरूपात), व्यगिचारिभिः (सहकारिभिः) संयोगाव (पोष्यपोषक मावरू याद) रसस्य निप्पति. (कमेस-उत्पत्तिः, अरभिव्यक्ति: पुष्टिश्च)भवति। (ii) भट्टलोल्लट के मतानुसार स्थायी भाव और रम का अन्तर यही है कि विभाव, अनुभाव आदि द्वारा परिपुष्ट हुआ स्थायी भाव ही रस सज्ञक होता है; किन्तु वे दोनों साक्षातरूप से अनुकार्य राम आदि में रहते हैं भोर भनुकर्ता नट आदि में उनका अनुभव हुआ करता है। (iii) तद पतानुसन्धानात्-नट के नाट्यनपुण्य आदि द्वारा सामाजिकों को नट में रामत्व का आभास होने लगताहै और वे नाटक आदि दर्शन से चमत्कृत हो जाया करते हैं। व्यास्याकारों ने अ्नुसन्धान शब्द के विविध अर्थ किये हैं :- (१) गतके तरकाले रामत्वाभिमानाद् इति मिवरसकार:, () रामत्वारोपाद इवि सारवोधिनीका रोदोतकारादमः (३) एकोभावरूपमनुसन्धानम् इति अभिनवगुप्तः । (iv) भट्टलोल्लट आदि आचार्यों की व्याख्या में नायक-नामिका को अनुभूव होने वाले स्थायी भाव से भिन्न (काव्य-नाट्यादि द्वारा अभिव्यक्त) रस का विवेचन न हो सका। महां लौकिक 'रति' आदि स्थायीभाव ही रस कहलाए.। इसके अनुसार अनुकार्य 'राम' आदि मे ही रस-निष्पत्ति होती है, सामाजिक में नहीं; मरतः सामा- -जिक के हृदय में नमत्कार का अनुभव कसे संभव हो सकता है? किञ्च इस प्रकार सामाजिक को होने वाली रस-प्रतीति भ्रान्तिमात्र होगी और काव्य आादि भमोत्पादक होगे अतः उपादेय न होंगे। वस्तुतः काव्य आदि से रसानुभूति होती है, यह सभी सहदयों के अनुभव से सिद्ध होता है।
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चतुर्थ उस्लासः रसप्रलमध अनुभान न
राम एवायम् अयमेव राम इति, न रामोऽयमित्यौत्तरकालिके वाघे रामोऽ्यमिति, राम: स्याद्वा न वाड्यमिति, रामसहशोऽयमिति च.सम्यङ- मिध्यासंशयसादृश्यप्रतीतिभ्यो विलक्षसया चित्रतुरगादिन्यायेन रामोऽय- मिति प्रतिपतत्या प्राह्य नटे- सेयं ममाङ पु सुवारसच्छटा सुपूरकपू रशलाकिका हशो:। मनोरथश्रीमनसः शरीरिणी प्राऐेश्वरी लोचनगोचरं गता ।।२५। दैवादह्मद्य तया चपलायतनेत्रया वियुक्तश्च। अविरलविलोलजलद: काल: समुपागतश्चायम्॥२६॥
च नटेनैव प्रकाशितैः कारणकार्यसहकारिभिः कृत्रिमेरपि तथाऽनभिमन्य- मानैर्विभावादिश्दव्यपदेश्यः 'संयोगाद्' गम्यगमकभावरूपाद् अनुमीय- मानोऽपि वर्तुसौन्दर्यवलाद् रसनीयत्वेनाथ्यानुभीयमानविलक्षग: स्था- यिर्चेन सम्भाव्यमानो रत्यादिर्भावसतत्रासननपि सामाजिकानां वासनया चव्यमाणो रस इति श्रीशङ्क कः। अनुवाद-२. श्री शङ्ध क का मत है-'यह राम ही है' या 'यही राम है' : इस प्रकार की (इति) सम्यक् प्रतीति; यह राम नहीं' इस ज्ञान से बाद में (भौतर- 1
फालिके) बाघ हो जाने पर 'यह राम है इस प्रकार को मिथ्याप्रतीति, 'यह राम है या नहीं' ऐसी संशमप्रतीति तथा 'यह राम जंसा है' इस प्रकार की सादृध्य-प्रतीति :(इन चार प्रकार के ज्ञानों) से विलक्षस प्रतीति द्वारा चित्रतुरगन्याय से नट में यह राम है' ऐसी प्रतीति हो जाती है (गाहों नटे-प्रतीतियोग्य नट में-'अनुमीयमानोऽ़पि' इससे अन्वय है)। औ्र- 'सेयम्' इत्यादि (सम्भोगशुद्गार) अ्रथवा 'दवाद्' इत्यादि (विप्रलम्भभङ्गार) (अयवा.अन्य रस सम्बन्धी) काव्य के अ्र्थ का साक्षात् अनुभव करने के कारए ; (प्रनुसन्धानवलात्) और स्वयं नट के हो द्वारा शिक्षा एवं उसके अ्ररस्यास से सम्पादित (निर्वसित) अपने नाट्य कार्य से प्रकाशित कारस, कार्य तथा सहकारी के द्वारा- जो कि कृत्िम होते हुए भी वैसे नहीं समझे जाते (सथानभिमन्यमानः=कृत्रिमत्वेन अमुहीतंः) और विभावादि नाम से कहे जाते हैं (ध्यपदेश्यः)-व्याप्तिरूप (गन्यगम- कभाव) सम्बन्ध से (नट में सामाजिकों द्वारा) 'रति' आदि भाव अनुभोयमान होता है.। औौर, वह (स्थायी रति भाव यादि अनुमित होते हुए भी अनुमीयमानोऽपि) सपने सौन्दर्य के कारण (वस्तुतः रत्यादेः सौन्वरयबलात्) आ्स्वाद-योग्य होने से (रसनोयत्येन) अन्य अनुमोयमान वस्तु (धूम द्वारा शग्ति सादि) की अपेक्षा विलेक्षसा प्रकार का होता है। वह (रति आादि भाव) नट में (तत्र) न होता हुआ भी (भस- 'पपि) उसमें सयत प्रतीत होता है। (स्थायित्वेन संभाव्यमान.) तमा सामाजिको की वांसना द्वारा पस्याद्यमान होकर (चही स्थामी) रस कहलाता है।
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१२४ काव्यप्रकाश:
इलोकानुवाद :- सेयमिति-यहो यह (मेरी) पाएंशवरी मन से (भ्रब) नेशों का विषय हो गई है (पर्थात् पहले मन में ही यी अब बाहर भी दिखाई दी है)। जो मेरे श्रद्गों में (के लिये) अमृत रस की वर्पा है, नेत्रों के लिमे भरी पूरी कपूर (भञ्जन) की शलाका है, मेरे मनोरयों को सुर्तिमती सम्पत्ति है' ।२५॥ वैवादिति-'वैवयोग से में भ्ाज उस चञ्चल औौर विशाल नेत्रीं वाली (घपले धयते वव नेत्रे यस्या, ताद्शी तमा) सुन्दरी से विलग हो गया हूँ और सबंत्र घूमने वाले घने मेघों से युक्त (अविरला निविडा विलोला संवंत सञ्चारिसो जलवा मत्र) यह समय (यर्धाकाल) आा गया है॥।२२।। प्रभा :- रस-सूय के द्वितीय व्यास्याकार आाचार्य शाङ्ट्र क के मतातुसार विभाव आदि के द्वारा अनुमाप्य अ्नुभापक रूप सम्बन्ध से (संयोगात) स्थायी रूप रस की नट में अनुमिति (निष्पत्ति) होती है। इसी हेतु यहं मत, 'रसानुमितिवांद' कहलाता है। यह मत न्याय-सिद्धान्त पर पधारित है। इस सिद्धान्त के अनुसार सामाजिक की रसानुगति में चार सोपान कहे जा सकते हैं- (१) नट में राम की प्रतीति-जिस प्रकार चित्राद्धित अश्व में वालकों को 'यह घोड़ा है' ऐसी प्रतीति होती है उसी प्रकार सामाजिकों को नट मे 'रामोज्यम' यह प्रतीति हो जाती है। अ्रतः नट में राम की प्रतीति चित्रतुरमन्याय से होती है, जो कि दर्शनशास्त्र मे मानी गई चारं प्रकार की अर्थात सम्यक्, मिथ्या, संकय और सादृव्य प्रतीति से विलक्षस है। प्रकृत में सम्मक प्रतीति का रूप होता- 'राम एवायम्' अथवा 'अयमेव रामः'। मिथ्या प्रतीति सब' होती जबकि प्रथम 'रामोऽय' यह ज्ञान हो जाता और तदनन्तर 'न रामोयम्' इस ज्ञान से पूर्व ज्ञान का बाध होता। संचय ज्ञान यह होता-'रामो वा तद्भिन्नी वा तथा साहध्यज्ञान होता-'रामसदशोऽयम्'। नट मैं होने वाली 'रामोज्य' यह पतीति इस चारो प्रकार के ज्ञान से ही भिन्न है। (२) कारण काय सहकारी में विभावादि व्यपदेश-नट भृङ्गारादि रस के काव्य का पाठ करता है और सहृदय सामाजिक उस काव्य के अर्थ की साक्षाव सी अनुभूति कर लेते हैं (अनुसन्धान=कविविवक्षितार्यस्य साक्षादिव करसम्) तथा नट अपनी शिक्षा एवं अभ्यास-कौशल से अभिनय द्वारा नायकगत रति आादि भाव के कारए (नायिका आदि) कार्य (भुजाक्षेप आदि) सहकारी (निर्वेद आदि) को प्रकट करता है। वस्तुतः सभी कृत्रिम होते हैं, किन्तु सामाजिक उनको कृमिम नहीं समभते भोर काव्य तथा नाटक में उनको विभाव, अनुभाव तथा सख्चारी भाव के :नाम से व्यवहृत करते हैं। (३) विभावादि द्वारा नट में स्थायी रति आद्दिका अनुमान-संयोग का भर्थ है-गम्यगमकमाव सम्बन्ध। गम्य अर्थान साध्य औरगमक परर्थात साथक या हेतु। विभाव आदि के होने पर रति आदि भाव अवश्य होता है-इस प्रकार के भ्याप्ति
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चतुर्थ उल्लास: १२५?
रूप सम्बन्ध से विभावादि के द्वारा नट में रति आादि भाव का अनुमान कर लिया जाता है। यहाँ व्यतिरेकी हेतु है-यथा-'रामोऽयं सीताविषयकरतिमान्, सीतात्म- कविभावादिसम्बन्धित्वात सीताविपयककटाक्षादिमत्वाद वा यन्नैवं तन्नैवं यथाऽयम्। (४) सामाजिकों द्वारा रसचवण-अ्विद्यमान रतति आदि भाव का ही नंट में अनुमान किया जाता है। यह अनुमीयमान रति आदि भाव सौन्दर्ययुक्त वस्तु होने से भास्वादनीय है, कलात्मक होने से अन्य अनुमित वस्तुओं की अपेक्षा विलक्षण होता है; इसी हेतु सामाजिकगए अपनी धारावाहिनी इच्छा (वासना) के द्वारा इसका आास्वादन करते हैं। नटादि मे अनुमित सामाजिक द्वारा आस्वाद्यमान रति आदि भाव ही रस है-यह अभिप्राय है। इम मत का सारांश यह है-जैसे कुहरे से आच्छन प्रदेश में धूम की भ्रान्ति होने से घूम के साथ नियम से रहने वाली (व्यापक) अग्नि का अनुमान हो जाता है; इसी प्रकार नट द्वारा स्वकोशल से 'ये विभावादि मेरे हैं'; इस प्रकार प्रकटित, वस्तुतः विद्यमान विभाव आदि से तन्नियत (व्यापक) रति आदि का अनुमान कर लिया जाता है। उसी नट में अनुमीयमान रति का अपने सौन्दर्य के कारए सामा- जिकों-द्वारा आस्वादन किया जाता है और वह रस रूप कही जाती है। अतएव शङ्क क के मतानुसार रसानुमिति ही रसनिप्पत्ति है। टिप्पसी-(i) शी शङ् क के भत में सूत का सारांश यह है-'स्थायिनो विभावादिभि: संयोगात-अनुमाप्यानुमापकभावरूपात सम्वन्धात रसस्य निप्पत्तिरनु- मिति:'। (ii) रस-सूत्र की व्याख्या करते हुए श्री शङ्क क ने 'रसोत्पत्तिवाद' का खण्डन करके रसानुमितिवाद को स्थापना की थी। अभिनवगुप्ताचार्य ने अभिनव भारती में उनके मत का विशद विवेचन किया है। ::- + (iii) राम एवायम, अयमेव राम :- यह निश्चयात्मक ज्ञान अर्थाद सम्पक प्रतीति का उदाहरण है। विवेचकों ने 'एव' शब्द के तीन अर्थ बतलाये हैं-(१) आयोग- व्यवच्छेद (२) अन्ययोगव्यवच्छेद (३) अत्यन्तायोगव्यवच्छेद; जेसा कि कहा भी है- धयोगमन्ययोगं च अ्रत्यन्तायोगमेव च। तयवच्छ्िनति धर्मत्य एवकारस्त्रिया मतः ॥ :यहाँ पर 'अय' विशेष्य अथवा उद्दक्ष्य है तथा राम विशेषण या विधेय-। 'राम एवायम्' मे एव का अ्रन्वय राम (विशेषस) से है तथा 'एव का अर्थं है- प्रयोगव्यवच्छेद अर्थात् असम्बन्ध का निवारस। इस प्रकार वाक्य का अर्थ होगा- 'यह राम से भिन्न नही है'। अयं' में रामत्व वा अक्षम्बन्ध नही है अपितु सम्बन्ध दी है-यह तात्पर्य होता है। 'भयमेव रामः' में एव का भ्रत्वय 'अयम्' (विशेष्य) से है तथा एव का अर्थ है-अन्ययोग-व्यवच्छेद; अर्थात् 'अरयम्' से भिन्न में रामत्व के सम्वन्ध का निवारए। तब वाक्य का अरथ होगा-'यही राम है भन्य कोई नहीं' 'अरयम्' से नन्य में रामत्व का सम्बन्य नहीं है-यह तात्यं होता है।
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१२६ काव्यप्रकार:
रति आदि का साधारसीकरए हो जाता है और सहुदय जन भोजकत्व व्यापार के द्वारा उसका आस्वादन कर लेते हैं। टिप्पलो-(i) भट्टनायक के मतानुसार रस-सूत्र का अ्रथं है-"विभावादिभि: संयोगात् भोज्यभोजकमावसम्बन्धात रसस्य निप्पत्तिभुकि: ।" भट्टनायक के मत का विशद विवेचन आचार्य अभिनवगुप्त ने ध्वन्यालोक की लोचन नाम्नी व्यास्या में किया है। आचार्य मंम्मट ने यहाँ पर उसका सारांशमान ही दिया है। (ii) भट्टनायक का मत है कि अ्रन्य शब्दों में अर्ाभिघायकता नामक एक ही व्यापार होता है जो दो प्रकार का है-साक्षात अर्य को कहने वाला (भमिया) भौर व्यवहित अर्थ को कहने वाला (लक्षरणा)। किन्तु काव्य-नाट्य में प्रर्थाभिघायवतव, भावकत्व तथा भोजकत्व नामक तीन व्यापार होते हैं। अधिकांश टीकाकारों ने 'भोगेन भुज्यते' का अर्थ-भोजकत्व नामक व्यापार से भोगा जाता है-यह किया है-भोगेन भोजकत्वनामक-व्यापारेशोति उद्योतादयः। साचार्य सभिनवगुप्त की वपारया से भी ऐसा ही प्रतीत होता है-तेन न पतीयते नोतपद्यते नामिव्यज्यते फाव्येन रसः । किन्त्वत्यशबदर्वलक्षण्यं काव्यात्मनः शन्दस्य त्र्यंशताप्रसादात्। नातामियायकत्वं वाच्यविषयं, भावकत्वं रसादिविषय, भोगकृत्वं सहृदपविद्यवमिति प्रयोशसूता व्यापाराः । (ध्वन्यालोक-लोचन) सारबोघिनी आदि टीकाओं ने भोग का अर्यं'साक्षात्कार' किया है। इस
व्यापार नहीं। मत के अनुसार 'भोग' का अर्थ आस्वादन मात्र है। कोई भोजक नाम का विशेष
(iii) सह्वोद् कप्रकाशाननदमयसविद्विधान्तिस्तत्व-भट्टनायक केभनुसार रस-भोग का स्वरप यही है। 'संविदिविश्रान्ति' रस-भुक्ति का एक रूप है मर्थाद् 'प्रकाश' की अ्रनन्योन्मुखता। इसे ही शँव दर्दन में 'बिमश' कहते है जिसका मर्थ है 'ग्रहम्' आ्राकारक प्रतीति या आ्र्ात्ममात् विधान्ति। (विमर्शं-व्यास्या):, (iv) भट्टनायक की दैन-भट्टनायक का मत यद्यपि भाज सिद्धान्त मेत नही माना-जाता तथापि रम-शिद्ान्त में भट्टनायक की एक प्रपूर्व देन है। वह है- साधारणीकरए। वरव्य आदि कलाओं का एक विलकण व्यापार साधारणीकरय (Universalization) कहलाता है। इसके द्वारा विभाव ादि सामान्य रूप मे सामाजिक के समक्ष प्रस्तुत होते है। विभावादि का साधारलीकरण हो जाने पर रति आादि' भाव का भी साधारणीकरत हो जाता है अर्थात' रामादि सम्बन्धी रति भाव सामान्य रति रूप में (रतित्वरूपेए) सामाजिक के समक्ष उपस्थित होते हैं। इस साधारणीकरण का कारस काव्य की एक विनेष बक्ति है, जिसे भट्टनायक 'भावकस्तर' व्यापार कहते हैं। भावकत्त्र= साधारसीकरस। प्रदीपकांर के अनुसार साधारणीकरणों का अ्ररथ है-सीता आदि की सामान्य कामिनी आदि के रूप में प्रतीति होना। वस्तुतः साधारसीकरण वा भाव है-शृद्गार आदि रस के प्राततम्बन विभाव मादि के रुप में शीता आदि की प्रशीति होना (उद्योन)। इस व्यापार के
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चतुर्थ उल्लासः १२६
:लोके प्रमदादिभिः स्थाय्यनुमानेऽ्भ्यासपाटववतां काव्ये नाट्य च तैरेव कारमत्वादिपरिहारेस विभावनादिव्यापारवतत्वादलौकिकविभावा- : दिशव्दृव्यवहाथ्येमेमैचेते, शत्रोरेवैते, तटस्थस्यैवैते; न ममैवैते, न शनोरेवैते,
साधारएयेन प्रतीतैरभिव्यक्त: सामाजिकानां वासनात्मतया स्थित: स्थायी रत्यादिको नियतप्रमातृगतत्वेन स्थितोऽपि साधारणोपायवलात् तत्काल द्वारा साधारणीयकृत 'रति' आदि स्थायी भाव का सुहृदयों द्वारा आरस्वादन (भोग) किया जाता है। भट्टनायक के अनुसार सहृदयों के मन मे अविद्यमान ही रति आदि FER भाव का भावकत्व तथा भोजकत्व नामक व्यापारों द्वारा आस्वादन होता है। इस रसभोग का स्वरूप विलक्षण है। इस प्रकार भट्टनायक ने रस-भोग की अलौकिकता की ओर भी सकेत किया तथा रसाभिव्यक्तिवाद का मार्ग प्रशस्त कर दिया। . r .- (V) भट्टनायक के द्वारा भी रस का सम्यक विवेचन न हो सका। भावकत्व तथा भोजकत्व नामक व्यापारों की एक एक अनूठी कल्पना इसमें रही तथा सामाजिक में अविद्यमान रत्यादि भाव का ही-आ्स्वादन बतलाया गया। किञ्च राम आदि के रतिभाव की सामाजिक को भावना नहीं हो सकती; क्योंकि सामाजिक ने उसका प्रनुभव नहीं किया। यदि व्यञ्जना द्वारा सामाजिक के हृदय में रति यदि की भावना माने तब तो व्यञ्जना से ही रसास्वाद हो जायेगा, फिर भावकत्व और भोजकत्व व्यापारों की क्या आवश्यकता है? अनुवाद-आचार्य अभिनवगुप्त का मत है-लोक (काव्य नाट्य से भिन्न 'सथल) में प्रमदा (उद्यान कटाक्ष) आदि के द्वारा रति आदि (स्थामी) का अनुमान करने में निपुए सामाजिकों के हुदय में ('पाटयवतां' का 'सामाजिकाना' से प्रन्वय है तथा ते :- प्रतीतः का प्रभिध्यक्तः स्थायी आदि से अव्वय है) वासनारूप से स्थित रति आदि स्थायी भाव है, जो काव्य और नाट्य में उन्हीं (ऐसे प्रभदा आदि) के द्वारा प्रभिध्यक्त हो जाता है (अभिध्यक्त)-जो कारएत्वादि रूप को छोड़फर :विभावना (रसास्वाद-योगयता का आविर्भाव कराना) आादि व्यापार करने के कारय मलोकिक विभाव (परनुभाव तथा व्यभिचारी) आदि सब्दों से व्यवहृत होते हैं तथा 'ये (विभाय आदि) मेरे ही है, 'ये शत्रु े ही हैं', 'ये उदासीन के ही है'-इस :प्रकार से विशेष ्यक्ति से) सम्बन्ध की स्वीकृति औरेमेरे नहीं है' प्रथवा मुे -से सम्यन्ध नहीं रखते), 'मेरे शत्रु के नहीं हैं, 'उदासोन के नहों है' इस प्रकार से :विशेष सम्बन्ध का निषेध (परिहार); इन दोनों प्रकार की व्ययस्था का निश्चय न होने से (नियमानंध्यवसामात्) सामान्यरूपे प्रतोत होते हैं। यद्चवि यह स्थायी भाव एक सामाजिक के भीतर व्यक्तिगत प्रमाता के रप में ही (निमतप्रमातृगतत्वेन), स्थित होता है तथावि साधारण उपायो के बल से [साधारणीकृत (genealised)
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१३० काव्यप्रकाश:
• न प्रमात्ना सकलसहृद्यसंवादभाजा साधारएयेन स्वाकार इवाभिन्नोSि गोचरीकृतशचर्व्यमाणतैकप्राणी विभावादिजीवितावघिः पानकरसन्यायेन चव्यमाण: पुर इव परिस्फुरन् हृदयमिव प्रविशत् सर्वाङ्गीएमिवालिङ्गन् अन्यत्सवमिव तिरोदघद् व्रहमारवादमिवानुभावयन् अलौकिकचमत्कारकारी शृङ्गारादिको रसः । विभावादि उपायों से], उस समय सीमित प्रमातृभाव के नष्ट होजाने के कारस आादिमूत हुआ है (उन्मिषित) अन्य ज्ञेय के सम्पर्क से रहित असीमित प्रमात-भाव जिसका ऐसे प्रमाता के द्वारा समस्त सहुवय-जनों को भासित (संधावभाजा= सम्मतिशालिना) होने वाले सामान्य रूप से मरनुभूत होता है (गोचरीकृतः)। यह रति आदि अपने आकार के समान अभिन्न रूप से प्रनुसूत होता हमा भी भास्वाद- मात्न स्वर्प वाला (चर्मपमासता एक: प्रासा: यह्य), विभाव मदि को स्थिति पर्यन्त रहने वाला, पानक रस (विशेष वस्तु) के समान आस्वाद्यमान (पर्थ्यमासः), (साक्षात् रूप से) सामने प्रस्फुरित होता हुआ सा, हृदय में प्रवेश करता हमा सा, समस्त क्ङ्गों में व्याप्त होकर प्तिङ्भन करता हुआ सा, अन्य (विभावावि से भिन्न) सबको ढकता हुआ सा तथा म्रहमानुभव के आनन्द का सा अनुभव कराता हमा अलोकिक चमत्कार करने वाला भृद्धार आदि रस कहा जाता है। प्रभा-रम-मूत्र के सव श्रेष्ठ व्यास्याकार आचार्य-अ्ररभिनव सुप्त हैं। उनकी व्यास्या ही बाद के आ्चार्यों द्वारा स्वीकृत हुई है। उनके मतानुसार-स्थायी भाव का विभाव आदि के साथ व्यङ्गयव्यञ्जक भाव रूप संयोग होने से रस की श्रभिव्यक्ति होती है। इसी हेतू उनका मत रस-व्यक्तिवाद नाम से विश्रुत है। उनका मत ही वस्तुतः झलसार शास्त्र का सिद्धान्त है। रस-प्रक्रिया यह है :- (१) लोके-सामाजिकानां वासनात्मतया स्थित: स्थायी-सामाजिक के हृदय में संस्कार रूप से, सूक्ष्मतया स्थित रति आदि स्थायी भाव होते हैं। जिनके हृदय में ये संस्कार जितने ही जागरूक होते हैं वे उतना ही अिक रसास्वादन कर सफते हैं। किन्तु जिनके संस्कार नष्टप्राथः हो जाते हैं वे काव्यननाट्य में रसास्वादन नही कर सकते। वासनारूप से स्थित स्थायीभाव भी उन्हीं सामाजिकों में सम्यक श्र्मिम्पक्त होता है, जिन्होंने लौकिक जीवन में ललना, उद्यान तथा कटाक्ष मादि के. द्वारा रवि प्रदि की वार वार अनुमित्ि की है और उसमें निपुलता प्राप्त करती है, अर्थाद जो रसिक हैं, विरक्त नहीं हो गये हैं। इस प्रकार सहृदय सामाजिकों में ही (काव्य- नाट्य से) रत्यादि भाव की (व्यञ्जना द्वारा) अमिर्व्यात्त हुमा करती है मोर सहृदयता के लिये सहज संस्कार (वासना एवं रत्यादि भावों को समझने की निपुसता आावश्यक है। (२) काव्ये नाट्ये व तंरेव अलोकिकविभायादिाव्वव्यवहाय: साघारग्पेन -
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प्रतीत: 'अ्रभिव्यक :- काव्य-नाटय में भी सहृदयों के हृदय में उन्हीं प्रमदा आदि के द्वारा रति आदि स्थायी भाव की अभिव्यक्ति हुआ करती है। किन्तु कला की झलोकिक शक्ति (अभिव्यञ्जना) द्वारा काव्य-नाट्य के क्षेत्र में ये प्रमदा आदि रत्यादि स्थायीभाव के कारण, कार्य और सहकारी नहीं कहे जाते अपि तु विभाव, अनुभाव औौर सञ्चारी भाव नामक अलौकिक (काव्यात्मक) शब्दों द्वारा इनका व्यवहार किया जाता है। यहाँ पर ये विभाव आदि नाम सार्थक ही हैं; विभावना का अर्य है-मूक्ष्म रत्यादि में आस्वादयोग्यता का आ्रविर्भाव कराना (इत्यादीनाम् आास्वाद्योग्पतानयनरूपाविर्भावन विभावनम्)। इसी व्यापार के कारण ललना आदि विभाव कहलाते हैं। इसी प्रकार रत्यादि भावों को अनुभव का विषय कराने वाले अनुभाव हैं (रत्यादीनाम् अनुभवविपयीकरयाम् अनुभावनम्) .तथा विशेष रूप से रत्यादि भावों का सचारण करने वाले सञ्चारी या व्यमिचारी भाव हैं (रत्यादीनां सब्चारणं व्यभिचारगम्। काव्य की इसी अलौकिक अभिव्यञ्जना शक्ति के कारण विभावादि का साधारणीकरण हो जाता है।-चात यह है कि लोक जीवन में तीन प्रकार की वस्तुएं है-कुछ अपनी है, कुछ शत्रु की ही हैं तथा कुछ तटस्य या उदासीन की-ही है। काव्य नाट्य में सहदय जन विभावादि के साथ इन तीनों सम्बन्धों में से किसी एक का भी अनुभव नही करते। यदि उन्हें विभाव आदिस्वकीय प्रतीत होने लगे तो "अन्य लोगों के समक्ष अपनी रति, आदि को प्रफट करने मे लज्जा काअनुभव होगा, रसास्वाद नहीं। शत्र सम्बन्धी विभावादि हैं, ऐसाअनुभव-करने. पर दपभाव ।जागरित होगा तथा उन विभावादि को उदासीन-सम्बन्धी जातकर भी उपेक्षा ही हो ससकती है। अतएव सम्बन्धविशेष की स्वीकृति का निश्चय नही हो. पाता। इसी प्रकार सम्बन्धविशेष के परिहार का भी निश्चय नहीं होता, यदि ऐसा हो जाता तो ये विभावादि किसी के न रहते, गगनकुसुमवद हो जाते। तात्पर्य यह है कि लोक- जीवन में अ्नुभव होने वाले तीनों सम्बन्ध पर्थात स्वकीयत्व ;- गरकीयतव और उपेक्ष- ग्रीयुत्व. की स्वीकृति या निवृत्ति नहीं होती अपि तु काव्य-नाट्य मे कला की अलोकि- कता के कारए एक विलक्षण प्रतीति होती है अर्थात सामान्यरूपेण 'यह कामिनी है-इस प्रकार कामिनीत्वादि रूप से सीता आदि की प्रतीति हो जाया करती है अरथवा केवल शङ्गार आदि रस के आतम्बन विभाव आदि के रूप में सीता आदि की प्रतीति होगी है। और इसी प्रतीति द्वारा सहदयों के हृदय में रत्वादिभाव की अभिष्यक्ति हो जाया करती है। (३) नियत ..... प्रमात्रा- गोचरीकृत :- यहां यह शद्धा हो सकती है कि प्रमाता के प्रत्येक अनुभव के साथ उसकी व्यक्तिगत भावना जुड़ी होती है; अ्रतः सहृदय सामाजिक के हृदय में जो वासना रूप में स्थित रत्यादि भाव हैं वे व्यक्ति- विशेप से सम्बन्ध रखने वाले हैं तथा भिन्न-मिन्न रत्यादिभावों की कारण-सानग्री द्वारा ही उदयुद्ध होने वाले हैं, इसलिये सामान्य रूप से प्रत्ीममान विभावादि के
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१३२ काव्यप्रकार:
द्वारा भी रति आदि भावों की समस्त सहृदय जनों को साधारसतया प्रतीति कैसे हो सकती है ? इसका समाधान करते हुए से आचार्य मम्मट कहते हैं कि विभावादि जो रत्यादि की अभिव्यक्ति के उपाम है काव्य-नाट्य में उनका स्ाधारणीकरण हो जाता है अतएव रसास्वादकाल (तत्काल) में प्रमाता भी नियत, सीमित भथवा परिमित नहीं रहता एवं उसके हृदय में एक ऐसी विशेष प्रकार की चित्तवुति का सदय हो जाता है, जिसमें किसी अन्य ज्ञय का सम्पर्क नहीं हुआ करता तथा वह अपरिमित(असीम)प्रमाना हो,जाता है और इस अपरिमित सवस्था में रति मादि की-सामान्य रूप से प्रतीति होती है श्" - हो जाता है। रति आदि भाव के इस .. अनुभव किया करते हैं। (सकलमहदयसंवादभाजा- सकलसहदयानो संवाद मजात इति तेन; यह साधारण्येन का विशेषण है। इसका अथ है -- समस्त सहृदयों की समान अनुभूति का विषय जो सामान्य रूप है उसके द्वारा)। कला की शवित के द्वारा प्रमाता-या सामाजिक का व्यक्तितव असीमित हो जाता है, ... अपरिमित हो जाता-है-। इसीमे उसकी व्यक्तिगत-भावना-मिट -जाती है और वह रति मादि ाव को सामान्यरूपेण अनुभव करता है।'- (४) स्वाकार इव.चर्व्यमास :- मद्यपि प्रमाता को यह अ्रमिव्यक्त रति आदि. भाव आस्वाद (रस) रूप में (अथवास्वचिद्रपमें) तथा अपने से अभिन्न रूप में अनुभूत होता है-(गोचरीकृतः)-तथापि यह आस्वादन का विषय अरात् आस्वाद्य मान (चर्व्यमाण) कहा जाता है; क्योंकि जिस "प्रकार जाता या ज्ञान को स्वर्य' प्रकाश मानने वाले के मत में अपना आकार ही ज्ञय होता है उसी प्रकार-प्रमांता से अभिन्न होने वाला आस्वाद भी, आस्वादन का विषय होता है; मंथवा जैसे योगाचार (विज्ञानवादी) बौद्ध दार्शनिक के मत में ज्ञान का पकार तथा उससे अभिन्न ही वाह्य वस्तु है तथापि वह ज्ञय कही जाती है। इसी प्रकार अ्मिव्यक्त रत्यादि के ऑस्वादरूप या चिद्रंप होते हुये भी रस आ्स्वाद्यमान कहा जाता है। इस प्रकार अभिव्यक्त रति आदि भाव रस है। उस रस का स्वरूप-केवलमास्वादन- मात्र ही है, वस्तुतः आस्वादन से भिन्न आस्वाद्य वहाँ नहीं होता। भौर, वंहू प्रस्वाादन (चर्वसा) तभी तक होता है जब तक कि विभाव ादि रहते हैं। विभावादि के सभाव में उसका पस्वादन नहीं होता। फित्तु-विभावादि-को-प्रतीति पृथक रूप से नहीं होती अपि तु एक अखष्डात्मक रस की ही प्रतीति होती है; जैसे- इलायची, कालीमिर्च, मिश्री, केसर तथा कपूर आदि के मिथस से जो पानक या प्रपाएक नामक पेय पदार्थ बनता है उसका रस उन समस्त वस्तुमों से विलसण होता है इसी प्रकार विभावादि से विलक्षण अलोकिक रूप में ही रस का आस्वादन होता है। पुर इब-शृद्धारादिको रसः-काव्य-नाट्य के द्वारा भास्वाघमान रस बिलक्षस होता है. यह चित्त न दति तथा विस्तार करता है मोर उसे एक भनूठी
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अवस्था में ले जाता है जिसे चमत्कारावस्था कह सकते हैं; अर्थात् यह लौकिक सुखों से विलक्षण एक अलौकिक आनन्द है। इसी हेतु सहृदय सामाजिक को इसकी अनुभूति करते समय ऐसा लगता है मानो वह रस साक्षात रूप से सामने प्रस्फुरित हो रहा हो, हृदय में प्रविष्ट सा हो रहा हो, प्रत्येक अ्रद् में अमृत का-सिञन्वन कर-रहा हो और अपुने (रस के) अतिरिक्त अन्य समस्त संसार को आच्छादित सा कर रहा हो तथा ब्रह्मज्ञान का सा आनन्द अनुभव-करा रहा हो। अभिनवगुप्त के मत का सारांश यह है-सहदयों के हृदय में रति आादि भाव संस्कार रूप से विद्यमान होते हैं-ने-सहृदय जन लोऊ मे ललना याद-(कारगों) के द्वारा रति आदि का अनुमानकरने में निपुसहोते हैं। काव्य-नाट्य मे कारखत्या: दि को त्याग कर वे ललनादि अलीकिक विभाव-आदि का रूप धारण कर दते है तथा काव्य की शक्ति से सामान्य विभाव आदिके रूप में-प्रतीत होने-लगते है। सहदयों में स्थित रति आदि भाव इन्हीं के द्वारा व्यञ्जना से भभिव्यक्त होकर भांस्वादित किया जाता है-।-इस प्रकार का विलक्षण आस्वाद ही रस कहलाता है।- यह स्थायी-भाव से विलक्षण है। टिप्पखो-(i) अ्रभिनवगुप्त के मतानुसार सुतनार्थ यह है-"स्थायिनां विभा- वादिभि: व्यङ्गयव्यञ्जकभावरूपात् सम्बन्धात (संयोगाव) रसस्य अ्भिव्यक्ति: निष्पत्तिः)"। अ्भिनवगुप्त एक ओर ध्वन्यालोक (लोचन) के व्याख्याकार है तथा दूसरी और नाट्यशारत पर 'अभिनव-भारती नामक व्यारूया के लेखक। इसी से उन्होंने ध्वनि सम्प्रदाय तथा रससिद्धान्त का सुन्दर समन्वय किया है। अतएव वे संमोगाव का अ्य 'व्यखपव्यञ्जकभावरूपा' करते हैं औोर 'निष्पत्ति' का अर्थ भभिव्यक्ति। (ii) आचार्य मम्मट ने अभिनवगुप्त के रसाभिव्यक्ति-विवेचन का सारार्थ ही संक्षेप में दिया है। अभिनवगुप्त ने ध्वन्यालोक लोवन तथा पभिनव-भारती में रस-तत्व का विस्तारपूर्वक विवेचन किया है। उनके शन्दों में रस एक अलीकिक वस्तु है जो स्थायी भाव से विलक्षण है (स्थामिविलक्षणा एव रसः), तथा 'चर्व्यमाण- तंकसारः' है। अभिनव भारती के मनुसार सूवार्थ यह है-तेन विभावादिसंयोगाव् रसना मतो निष्पद्यतेऽतस्तथाविधरसनागोचरो लोकोतरोडपों रस इति तात्पर्य सुननस्य ।' (अरभीनवभारती पृ० २८६) (iii) रसचरवंणा की मम्मटोक्त प्रक्रिया का दर्पसकार ने (साहित्यदर्पण ३.२-११ में) विस्तृत विवेचन किया है। उनके अनुसार प्रावतनी वासना भी रसा- स्वाद का हेतु हे- न जायते तदास्वादो बिना रत्यादिवासनाम्। वासनाचेदानोन्तनी पात्तनी घ रसास्वादहेतु: " (साहित्यद्पण ३.८)
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१३४ घचेव्यप्रकार्श:
स च न कार्यः विभावादिविनाशेऽपि तस्य सम्भवप्रसङ्गादू। नापि ज्ञाप्य: सिद्धस्य तस्यासम्भवात्।अपि तु विभावादिभिर्व्यब्जितश्चर्वणीयः। कारकज्ञापकाभ्यामन्यत् थव दष्टमिति चेद, न क्वचिद् दष्टमित्यलौकिक- त्वसिद्ध र्भू पसमेतन दूपएम्। (iv) वासनात्मतया स्थितः स्थायी-जिम प्रकार' काव्य-सृष्टि के हेतु "कवि मे प्रतीमा, निपुसता और अभ्यास अपेक्षित है इसी प्रकार काव्यादि द्वारा रस-चर्वर के लिए सामाजिक के हृदय में वासनारूप से स्थित रत्यादि का होना (सहज शकि) तथा लोक के प्रमदादि के द्वारा रत्यादि के अनुमान का अम्थास एवं उससे भजित निपुराता भावश्यक :है। ..* रस की अलीकिकता अनुवाद्-(१) वह रस (विभावादि का) फार्य नहीं; क्योंकि (यदि वहु, फार्य हो तो) विभायादि (जो कि निमित्तकारस हो सकते हैं) के नाश होने पर भी उस (रस) की स्थिति होने लगेगी। वह रस (विभावादि के द्वारा) जाप्य भी नहीं; कयोंकि वह (पहले ही) सिद्ध अर्यात् विद्यमान नहीं है, अपि तु विभावादि से व्यञ्जना द्वारा व्यक किया गया तथा पस्वावनीय है। यदि कोई कहे कि कारक.(करने वाला) तथा जापक (बोध कराने वाला) से भिस्न (हेतु) कहाँ देखा गया है? तो (उत्तर है कि) कहीं नहीं देखा गया और रस की अलीकिकता को सिद्धि में यह बात भूषए है, दूपण नहीं। प्रभा-आचार्य अभिनवगुप्त के मतानुसार वह रस विभावादि के द्वारा अमि- व्यक्त हुआ करता है अतएव विभावादि रसाभिव्यक्ति के हेतु हैं । किन्तु लोक में तो दो प्रकार के हेतु होते हैं-१. कारक २ आपक 1 जैसे-किसी घट, की मिट्टी आदि उपादान कारण तथा कुम्भकार एवं दण्ड आदि निमित्त कारण (कारक हेतु) होते हैं, पट उनका कार्म होता है। यदि रस को कार्य माना जाय तो विभावादि V.S.E.M. उसके (दण्ड आदि के समान) निमित्तकारण ही माने जा सवते हैं तब तो विभावादि के नष्ट हो जाने पर भी 'रस' स्थित रहना चाहिए; क्योंकि निमित कारस का नारा हो जाने पर भी कारय स्थित रह राकता है जैसे दण्ड आदि बा नाथ हो जाने पर भी घटरूप कार्य की स्थिति बनी रहती है। किन्तु विभाव मदि के नष्ट हो जाने पर रस की प्रतीति नहीं हुआ करती। इसलिए रस विभावादि कार्य नहीं। तब वया विभावादि रस के जञापक हैं और रस ज्ञाप्य है? नहीं, वह रस शांप्य नहीं कहा जा सकता; क्योंकि लोक मे जो 'घट' आादि वस्तुएं पहले से ही विद्यमान (सिद्ध) होती हैं, दीपक यादि उन्हीं के जञापक हुआ करते हैं ; विन्तु रस तो विभावादि के पूर्व विद्यमान हो नहीं होता। अतएव रस न तो कार्य है न ही शाम्य प्रपि तु विभावादि रस की व्यञ्जना करते हैं, अभिव्यक्ति करते हैं। रस ध्यन्गभ
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चतुर्थ उल्लास: १३५
चर्वसानिष्पस्या तस्य निष्पत्तिरुपचरितेति कार्योऽ्युच्यताम्। लौकि- कप्रत्य क्षादि-प्रमाएताटस्थ्या ववोघशा लिमित यो गिज्ञान-वेद्यान्तरसंसपर्शरहि- तरवात्ममात्रपर्यव सित परिमितेत रयोगिसंवेदन-विलक्षणलोकोत्तरखवसंवेदन- गोचर इति प्रत्येयोऽप्यभिधीयताम्। है तथा सहदयों द्वारा इसका आस्वादन किया जाता है। कारक और आपक हेतु से भिंध व्यञ्जक हेतु चाहे लोक में न हो; किन्तु काव्य नाट्य में तो है। यही वाला की विलक्षणाता है, अलाकिकता है। यह रस अलौकिक तत्त्व है अतः यदि इसका हेतु मलोकिक है तो इसमें आश्चर्य ही कया ? अनुवाद्-(२) क्योंकि (चवरगा-विशिष्ट रति आदि स्थायी भाव ही रस है) घर्षणा अर्थात् आस्वादन की उत्पत्ति होने से उस (रस) की उत्पत्ति भी गोए रूप से कही जाती है (उपचरिता), इसी से रस को कार्य भी कहा जा सकता है (वस्तुतः वह का्य नहों) । वह रस-१. लोफिक प्रत्यक्षादि ज्ञान, २. मत्यक्षादि प्रमाणों को अपेक्षा किये बिना (प्रमासताटस्थ्य) न्ञान प्राप्त करने वाले 'पुञ्जान' संज्ञफ (मित) योगियों के ज्ञान तथा ३. अन्य जय के सम्पर्क से रहित, आात्ममात्र- विषयक 'युक्त' संज्ञक (परिमितेतर=मितयोगी से भिन्न) योगियों की अ्नुभूति से- चिलक्षस अलोकिक स्वसंयेदन का विषय है, इसलिए ज्ञेय या ज्ञाप्य (प्रत्येय) भी फहा जा सकता है। प्रभा-जब रस कार्य या ज्ञाप्य नहीं तो 'उत्पन्नो रसः' 'ज्ञाप्यो रसः' इत्यादि व्यवहार कैसे सम्भन है ? बात यह है कि जब आस्वादन या घर्वला होती है तभी 'रस' की अभिव्यक्ति मानी जाती है और आस्वादन की उत्पत्ति या निरप्पाति हुआ करती है। इसी हेतु 'रस उत्पन्न हुआ' इत्यादि गोए रूप से (धीपचारिक) प्रयोग देखा जाता है। वस्तुतः रस कार्य नहीं, यह कहा जा चुका है। वह रस शञांप्य नहीं है तथापि एक विशेष रूप में ज्ञाप्य मा ज्ञेय कह दिया जा सकता है। हा, उसकी ज्ञाप्यता है लोकोत्तर ही। लोक में तीन प्रकार के ज्ञान होते हैं; जैसे प्रथम ज्ञान वह है जो जनसाधारए को प्रत्यक्ष आदि के द्वारा होता है। द्वितीय ज्ञान वह' है जो साधना-निरत युञ्जान नामक मोगियों को प्रत्यक्षादि प्रमाणों के बिना हो सविकल्पक समाधि में हुआ करता है, जिसमें ज्ञाता और श्ञेय का भेद बना रहता है। वह योगज प्रत्यक्ष होता है, जिसमें लौकिक प्रमाणों की आवश्यकता नहीं होतीं। तृतीय ज्ञान वह है जो युक्त या सिद्ध नामक योगियों को निर्विकल्पक समाधि में होता है। उस ज्ञान में आ्त्मानुभूति मात्र होती है अ्न्य ज्ञेय वस्तु का सम्पर्क नहीं होता। किन्तु रस की अनुभूति इन तीनों प्रकार के ज्ञानों से विलक्षण है, वह अली- किक ही है। रंस तो स्वसंवेदन का विषय है, इसमें लौकिकज्ान की भाति किसी विषय का सम्पर्क नहीं, योगज-प्रत्यक्ष की भाति साधन-निरपेक्षता नही (क्योकि
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१३६ काव्यप्रकार:
तद्ग्राहकं च न निर्चिकल्पकं विभावादिपरामर्शप्रधानत्वात्ं। नापि सविकल्पकं चर्व्यमाशास्यालौकिकानन्दमयस्य स्वसंवेद्नसिद्धत्वात्। उभयाभावस्वरूपस्य चोभयात्मकत्वमपि पूर्ववल्लोकोत्तरतामेव गमयति न तु विरोधमिति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तपाढाः।
विभावादि से अ्भिव्यक्त रस का ही सवेदन होता है) तथा युक्त योगियों के ज्ञान जैसी आात्ममान्नविपयता नहीं, क्योंकि विभावादि के द्वारा अ्रभिव्यक्त होने वाला रस स्वसंवेद्य है इसी हेतु उसमें एक लोकोत्तर ज्ञाप्यता है ही। अभिप्राय यह है कि रस मुख्य अर्थ में कार्य या ज्ञाप्य नहीं; किन्तु औपचारिक अर्थ में कार्य या श्ञाप्य कहा जा सकता है। अनुवाद-(३) उस (रस) का प्रहण करने वाला ज्ञान (सचेदन) निषि- कल्पक नहीं है, क्योंकि उसमें विभावादि के सम्बन्ध (परामर्श) की प्रधानता रहती। है। वह सविकल्पक भी नहीं; क्योंकि आस्वाद्यमान तथा अलोकिक आ्नन्द स्वरूप उस: रस की स्वानुभूति मात्र से ही सिद्धि हो जाती है। उभयाभावस्वूप (अर्थात् निषि-, कल्मक और सविकत्पक ज्ञान दोनों से भिल्न होने वाले) रस-संवेदन में उभमात्मकता (अर्थात् निर्विकल्पक और सविकल्पक ज्ञान दोनों के स्वरूप को रखना) भी.पहिते (कारक-ज्ञापक) की भाँति उसकी अलोकिकता को प्रकट करती है, विरोध को नहीं- यह श्रीयुत माचार्य सभिनवगुप्त (वियुण्धते) रस-सूत्र को व्यारया करते हैं:। प्रभा-रस स्वसवेदन का विषय है औौर संवेदन भी ज्ञान ही है। ज्ञान दी, प्रकार का होता है :- १. निर्विकल्पक तथा २. सर्विकल्पक। निर्विकल्पक ज्ञान 'कुद है' (किन्वित्) इस प्रकार का होता है। वह अव्यक्त या अस्पष्ट सा रहता है। वस्तु के नाम, रूप (श्वेतादि) जाति (मोत्व आदि) की योजना उसमें नहीं रहती। उसमें विशेष्य-विशेषस आदि सम्वन्ध का बोध नहीं होता। इसके विपरीव सविकल्पक ज्ञान में नाम, जाति आदि का उल्लेख रहता है उसमे ज्राताशीय भदि की स्पष्ट प्रतीति हुआ करती है; जसे 'यह इ्यामा गौ है' इत्यादि। रसानुभूति निविकल्पक ज्ञान का विषय नहीं; क्योंकि उसमें विभावादि का परामर्श अवश्यम्भावी है। जब विभावादि की स्पष्टतया प्रतीति के द्वारा रसानुभूति होती है तो वह निविकल्पक ज्ञान का ग्राह्य कैसे हो सकता है। वह रस सविकल्पक ज्ञान का विषय इमलिये नहीं कहा जा सकता; क्योंकि रस तो आस्वाद रूप ही है, मलोफिक मानन्द म्वरूप ही है। संवेदन से भिन्न संवेध वस्तु कोई नहीं। आस्वादन मोर मास्वाघ में भेद नही। अतएव वहाँ नाम जात्यादि के उल्लेस की सम्भावना हो नहीं। 1 इस प्रकार रमानुभूति निविकल्पक तथा सविकल्पक दोनों शानों से मिम्र है,
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चतुर्थ उल्लास: १३७
सतः उभयाभाव स्वरप है। इसी प्रकार वह उभयात्मक भी है; क्योंकि दो विरुद्ध वस्तुओं में से एक का अभाव द्वितीय का भावरूप होता है अतएब जब वह निर्विकल्पक नही तो वह सविकल्पक होगा तथा जब वह सविकल्पक नहीं तो; निर्विकल्पक होगा। किन्तु इस प्रकार रसानुभूति का उभयाभावरुप होना विरोध को सूचित नही करता अपि तु रस की अलौकिकता को ही बतलाता है। जैसाकि .: कार्य और ज्ञाप्य के विषय में कहा गया है; बात यह है कि लौकिक वस्तु में विरुद्ध .. धर्म नही रह सकते और रस मे विरुद्ध धर्म युगपत् रहते है, जो कि अनुभव सिद्ध हैं, इससे यही प्रकट होता है कि वह रस कोई आालीकिक वस्तु है। टिप्पणणीः-श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तपादा: में श्री. आचार्य तथा पादाः आरदि' प्रत्यन्त सम्मानसूचक शब्दों के प्रयोग से यह प्रतीत होता है कि अभिनवगुप्त का मत ही आचार्य मम्मट का अभिमत है। वस्तुतः आचार्य अभिनवगुप्त ही रस- सिद्धान्तं के रहस्य का उद्घाटन करने वाले हैं। उनके 'रसाभिव्यक्तिवाद' में ही रस-विवेचना का विकसित तथा मनोवैज्ञानिक रूप उपलब्ध होता हैं। रस-सिद्धान्त, के लिये उनकी अपूर्व देन है। भट्टलोल्लट आदि (रसोत्पत्तिवादी) आचार्य नायक- सम्बन्धी स्थायी भाव को ही रस मानते रहे और उसकी नटगत भ्रान्ति द्वारा ही सामाजिक के हृदय में विशेष प्रकार के चमत्कार की कल्पना करते रहे। (रसानु-' मितिवादी) श्री शङ्ग क ने नटादि में अनुमित रत्यादिभाव का ही सामाजिक द्वारा आस्वादन मान लिया। (रसभुवितवादी) भट्टनायक ने रस की व्याख्या में अलोकिक। तत्व की मोर ध्यान दिया, तथा कनाओं के द्वारा साधारणीकरण की एक अनूठी उद्भावना की। अभिनवगुप्त ने रस-सिद्धान्त का परिष्कृत स्वरूप हमारे समक्ष प्रस्तुत किया। उनकी मुख्य देन है- (i) विभावादि के साधारसीकरण की विशद व्वास्या-जमा कि ऊपर विवेचन किया जा चका है। (ii) कला के द्वारा प्रमाता के व्यवतत्व का अपरिमित होना-भट्टनायक ने रत्यादि भाव के साधारगीकरण की ओर तो संकेत किया था, किन्तु उसमें सहृदय सामाजिक के अपरिमित होने तथा उसके व्यक्तिगत अनुभव के सपरिमित होने का उल्लेख नहीं था। आचार्य अभिनवगुप्त ने काव्यादि कलाओं के द्वारा प्रमाता की असीमता का उल्लेख किया। उनके अनुसार प्रमाता का परिमित प्रमातृभाव फला की शक्ति से अपरिमित हो जाता है अर्यात महृदम के स्वरूप का विकास हो जाता है, उसका आरत्म-विस्तार हो जाता है और वह इसी अवस्था में स्वहृदय में वासनारूपी में स्थित विभावादि द्वारा अभिव्यक्त रत्यादि स्थायी भाव का" प्रास्वादन करता 'है यही भास्वादन रस कहलाता है। (iii) रस की अलोकिकता-मद्यपि रस की अलोकिकता का उल्लेख भट्टनायक ने कर दिया था। भट्टनायक ने 'रम को 'परत्रह्मास्यादसविपः' भी वतलाया
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१३८. काव्यप्रकाश:
[मिलितविभावादिभ्य: रसाभिव्यक्ति:] व्यावादयो विभावा भयानकस्येव वीरा-दत-रौद्राणाम, श्रश्रपाता द्योडनुभावा: शृङ्गारस्येव करुण-भयानकयो:, चिन्ताद्यो व्यभिचारिय
निर्दिष्टाः। शृङ्गारस्येव वीर-करुण-भयानकानामिति पृथगनकान्तिकत्वात् सूत्र मिलिता
था, तथापि अभिनवगुप्त ने उसकी विलक्षणता और अलौकिकता पर विशेष बल दिया। उसकी अनुभूति का पुर इव परिस्फुरन 'आदि द्वारा) अनुठा स्वरूप बतलाया। उसे कार्य तथा ज्ञाप्य वस्तुओं से विलक्षण बतलाया तथा उसके प्राहक स्व-संवेदन को निर्विकल्पक एवं सविकल्पक ज्ञानों से विलक्षण ही निरूपित किया। (IV) रसानुभूति की अलोकिकता-लोक या योगदर्शन आदि में प्रसिद्ध जो लौकिक ज्ञान, योगज प्रत्यक्ष तथा निर्विकल्प समाघि का आत्मसाक्षात्कार है, रसानुभूति उनसे विलक्षण है। जो निरविकल्पक समाधि से भी परे बेदान्त का ब्रह्मसाक्षात्कार है, रसानुभूति उसके ही समान अलौकिक है किन्तु कुछ उससे विलक्षणा भी है, क्योंकि रसानुभूति के समय विभावादि का परामर्श होता है। (V) रसाभित्यक्तिवाद की स्थापना-अभिनवगुप्त ने यह स्थापना की कि विभावादि द्वारा रस की अभिव्यक्ति है। इस प्रकार उन्होंने धवनिवाद केसाथ रस-सिद्धान्त का सुन्दर समन्वग किया। इसके लिए आचार्य भभिनवगुप्त ने सर्व- प्रथम रति आदि भाव को सामाजिक के हृदय में वासना रूप में स्थित बतलाया। फिर व्यञ्जना या ध्वनन व्यापार द्वारा उसकी अभिव्यक्ति का निरूपए किया। भट्टनायक द्वारा कल्पित भावकत्व तथा भोजकत्व व्यापार को आचार्य भभिनवगुप्त ने व्यञ्जना के अन्दर समाविष्ट किया तथा रसाभिव्यक्तिवाद का विषद रूप निर्धारित किया। (VI) आचार्य मम्मट ने अभिनवगुप्त के इस समन्वित मार्ग का अनुसरए किया और साहित्य-शास्न के विविध वादों का साम्जस्य करते हुए उन्हनि एक, सुदृढ साहित्यिक पद्धति का निमाण किया। यम-तष विरोध करते हुए भी साहित्य- विवेधक उसी पद्धति पर आारूढ रहे। विभाव आदि से समुदित रूप में रसाभिव्यक्ति अनुवाद्-व्याप्रादि विभाव भयानक रस के समान वोर, भद्भुत तथा रौद्र रसों के भी (विभाव) होते हैं। इसी प्रकार अ्रभन पात इत्यादि अनुभाव शृङ्गा- रादि के समान क्सा तथा भयानक रस के भी (सनुभाव) होते हैं तथा धिन्ता सादि व्यभिचारी भाव शृङ्गार के समान वीर, करण तथा मयानक रसों के भी (व्यभि धारो भाव) होते हैं-इसलिये विभावादि को पृथक-पृथक उयञ्जरता कहना अन. फान्तिक (ट्पभिवारी) है; पतएय भरत-सुत्र (विभावादि०) में तथा स्वसूत्र (व्यककः स सैः) में विभाव, अनुभाव औोर वयभिचारी भाषों को मिलाकर (दरन्द) सगास् द्वारा तथा 'तैः' शब्द से) रस का कारण कहा गया है।
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चतुर्थ उल्लास:
वियद्लिमलिनाम्युगर्भमेघं मधुकरकोकिलकृजितैर्दिशां श्रीः!
इत्यादौ। धरगिरभिनवाङ्ग राङटङ्का प्रगातिपरे दयिते प्रसीद मुग्घे॥२७।।
प्रभा-यहाँ परशङ्का होती है कि भरत मुनि ने रस सूयों में तीनों (विभावादि) का द्वन्द्व समास द्वारा वर्यों निर्देश किया है तथा काव्य-प्रकाश की कारिका में भी 'व्यक्तः सः तः' यहां बहुवचन से ही क्यों निदश किया गया है; क्योंकि इससे तो यह प्रकट होता है कि ये तीनों मिलकर ही रसके व्यञ्जक होते हैं। आचार्य मम्मट 'व्याघादि' अवतरण द्वारा इस राड्ड्ा का समाधान करते हैं। भाव यह है कि कोई भी विभाव आदि किसी एक रस का ही विभाव आदि नहीं होता; जैसे-'्याघ' भयानक रस का विभाव हो सकता है उसी प्रकार वीर रस का भी विभाव हो सकता है। यही दशा अनुभाव और व्यभिचारी भावों की है। वे किसी एक रस के साथ नियतसाहचर्य नहीं रखते अथवा किसी एक स्थायी के साथ ही उनका सम्बन्ध नहीं होता। तब यदि 'विभावेन संयोगात' इत्वादि प्रकार से रसाभिव्यक्ति का कारण कहा जाता तो यह कथन व्यभिचार-युक्त हो जाता; क्योंकि कोई विभावादि नियमतः किसी एक रस की अभिव्यक्ति का कारण नहीं। जब मिलितों की कारणता कही गयी है तब कोई अनियमितता (व्यभिचार) नही होती। जैसे- बन्धुनाश आदि विभाव, अश्पासादि अनुभाव तथा चिन्तादि व्यभिचारी भाव से मिलकर करुण रस की ही अभिव्यक्ति होती है, अन्य रस की नहीं। इसलिए विभाव. अनुभाव तथा व्यभिचारी भाव तीनों को मिलित रूप में ही रसाभिव्यक्ति का हेतु कहा गया है। अनुचाद्-['वियद्' आरदि उदाहरणों का 'यद्यपि' आदि भ्रग्रिम ग्रन्य से- प्रन्वय है] अरी मुग्धे, प्रशाम करने में तत्पर (इस अपने) प्रियतम पर प्रसन्न हो. जाओ; क्योंकि आकाश त्रमर के समान श्याम सजल मेघों से युक्त है (प्रतिमलिना-, म्युगर्भा: मेघा: यन्), मधुकर की गुज्जार तथा कोकितों की कूक (कुजित) से दिशाओं को शोभा (श्रीः) बढ़ रही है। पृथ्वी नवीन प्रङ्ग रूपी टांकियों को गोद में लिये हुए है (परभिनवाः भङ्कुरा एव धङक टड्डा यस्यां तादुशी) ।२७॥ इत्यादि स्थलों पर (केवल विभाव-वर्णन है) प्रभा-मानिनी नामिका के प्रति ससी की इस उक्ति का सात्पर्य (न्यङ्गयार्थ) है-कपर, सामने तथा नीचे उद्दीपक कारणों के उपस्थित रहने से मानभज्ट अद्वयंभावी है अतः प्रियतम पर स्नेह दृष्टि डालो। यहाँ केवल प्रियतम रूप भलम्वन तथा 'मेघ' आदि उद्दीपन विभावों का वर्खन किया गया है।
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१४०. काव्यप्रकाशः
परिमृदितमृसालीम्लानमङ्ग प्रवृत्तिः, कथमपि परिवारप्रार्थनाभि: क्रियासु। कलयति च हिमांशो्निष्कलङ्कस्य लक्ष्मीमभिनवकरिदन्तच्छ्ेदकान्तःकपोल: २।। इत्यादौ। दूरादुतुकमागते विवलितं सम्भापिशि स्फारितं संरिलिष्यत्यरुएं गृह्ीतवसने किळचाब्चितभ्रलतम्।
इत्यादौ च। चनुर्जातमहो पपब्चचतुरं जातागसि प्रेयसि ॥२६॥।
यद्यपि अनुवाद-'इस मालती के ('पस्या. यह शब्द इलोक के पूर्व है) धङ्ग भसले हुए (परिमृवत) मृसाली के समान सुरकाये हुए हैं; पारिवारिक जन (सखीसमह) की प्रार्यनामों के द्वारा इसकी कथन्यित (आवश्यक) कार्यों में प्रवृत्ति होती है; तया इसका नवीन काटे हुए हाथी दाँत के समान गौर वर्सं (अ्रभिनवी यः फरिदन्तनछेवः तद्वत् फान्तः) कपोल निप्कलड्ध हिमकर की शोभा को धारए करता है (फल- यति) ॥२८॥। इत्यावि स्थलों पर (केवल अनुभाय-वर्णना है)। पभा-यह मालती-माघव का पद्य है। माघव अपने ससा मकरन्द के पति मालती का वर्शन कर रहा है। यहां केवल 'परिमृदित0' आदि अनुमावों के द्वारा मालती की कामसंतप्तता आदि का वर्णन किया गया है। अनुवाद्-'पहो, जिस प्रियतम से कोई अपराध हो गया है (जातम् भागः अपराघो यस्मात्) उसके प्रति मानिनी नाषिफा की (मानिन्याः) पातें (चक्षुः) विचिनन व्यापार में फुडल हो गई है; वमोंकि दूर से देस कर (दुष्टे इति शेष:) उत्सुक हो गई, समोप झाने पर (लज्जा से) भक गई (विवलितम्-तिर्ववकृतम् संकुचितं वा) उसके बोलने पर सिल जठी (स्फारितम्), पालिङ्न करने पर लाल हो गई, भांचल पकड़ लेने पर युद भौहे सिकोड़ तों (पश्िता भूलता मेन), घरलों में प्रलाम फरने पर (घरएायो: मानतिः प्रसाम: तस्य व्यतिकर: समूहःयस्म तादृश). मध जल से पूएं दृष्टि वाली हो गई ।२६।। इत्यादि स्यल में (केवल व्यभिचारी भाव की बर्सना है।) प्रभा-यह अमरुरातक का पद्य है। मानिनी नायिका ने नायक को फटकार दिया, परन्तु नायक के पुनरागमन पर नामिका की नेत्र किया विचिन्न हो गई। यहाँ केवल धोत्मुक्य, सीडा आदि व्यभिचारी भावों का वयन किया गया है। अनुवाद-पद्यपि यहां पर (उपयु क म्दो में) (प्रथम में) केवल विभावों का (द्वितीय में) फेवल अनुभावीं का तपा (तृतीय में) चौससुषम, चोडा, हर्ष, फप,
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चतुर्थ उल्लास: १४१
प्रसादानां च व्यभिचारिणां केवलानामन्र स्थितिः तथाऽप्येतेपामसाधा- रसत्वमित्यन्यतमद्वयाक्षेपकत्वे सति नानैकान्तिकत्वमिति। तद्विरोपानाह- (४४) शृङ्गारहास्यकरुणरीद्रवीरभयानकाः । वीभत्सान्द् तसंज्ञौ चेत्यष्टी नाटे रसाः स्मृताः ॥२६॥ प्रसूया एवं प्रसाद आदि व्यभिवारी भावों का हो साक्षात् उल्लेख (स्थिति.) है, तथापि (यहां पर) इन की मुख्यता (असाधारणत्व) है इस हेतु से अन्यत्मों (विभाव- अनुभाव तथा व्यभिचारी भाव) में से (शेप) दो की प्रतीति (भक्षेप) हो जाती है तथा (उनकी मिलितरूप में रसाभिव्यञजकता में) व्यभिचार नहीं होता। प्रभा-यहाँ पर यह शङ्ा होती है कि 'वियद्' इत्यादि स्थलों पर केवल विभाव आादि के वर्णन से भी रसानुभूति होती है अतः विभाव, अ्रनुमाव भौर व्यभिचारी भाव सम्मिलित रूप में रसाभिव्यक्ति के कारण हैं यह नियम नहीं बनता, मिलितकारणता में व्यभिचार दोप आता है। आचार्य मम्मट 'तथापि' आदि भव- तरण द्वारा इस शाङ्ा का समाधान करते हैं। बात यह है कि किसी-किसी स्थल पर केवल विभाव या केवल अनुभाव अ्थवा केवल व्यभिचारी भाव का उल्लेख होता है, यह सत्य हे; किन्तु वहाँ भी विभावादि तीनों मिलकर ही रसाभिव्यक्ति के हेतु होते हैं। जिसका निर्दश किया जाता है वह साक्षाव बोष्य या मुख्य होता है और वह शेप दो को उपस्थित (भाक्षिप्त) कर देता है। अतएव विभावादि सम्मिलित रूप मे ही रस-निष्पत्ति के हेतु हैं। टिप्पशी "तदयं सिद्धान्तः-मिलितानामेव रसनिष्पत्िहेतुत्वम्, यत्र तु एक एव निर्दिष्टः, तत्रापि तेनवान्ययो: द्वयोराक्षेपेए रसनिष्पत्तिरिति।"-बालवो- घिनी। इस प्रकार रसाभिव्यक्ति में विभावादि की दण्डचक्र्ादित्याय से संभूयकार- एता है, तृगारसिमसिन्याय से पृथक कारता नहीं। अनुवाद्-उस (रस के भेदों का वर्णन करते हैं)- भृद्गार, हास्य, फरुण रोद्र, वीर, भयानक, वीभत्स और अद्भुत नामक ये नाट्य पर्थात् अरभिनयात्मक काव्य में भाठ रस कहे गये हैं। (४४) प्रभा-'ङ्गार' इत्यादि नाट्य-शास्त्र की (अध्याय ६-१६) कारिका है। उसे ही आचार्ये मम्मट ने अविकल रूप में उद्धुत कर दिया है। रस सामान्य का लक्षणा ऊपर कहा जा चुका है। प्रत्येक रस के स्वरूप का ययास्थान निर्देश किया जायेगा। नाट्य अर्थात् अभिनयात्मक काव्य में आाठ ही रस होते हैं; किन्तु शम्प या पाठ्यकाव्यों में शान्त रस नामक नवम रस भी होता है, यह अभिप्राय है। प्रवस्था- नुकृति हो नास्य है। उसमें शान्त रस की संभावना नही; ययोंकि वान्त रस क
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4 १४२ काव्यप्रकान:
स्वरूप तो सर्वविषमोपरति मात्र है और रोमाज्वादि के बिना किसी भाव का भभि- नय नहीं हो सकता। इसके अ्तिरिक्त संगीत आदि का भी श्ान्त रस के साथ विरोध है। इसी हेतु दशरूपककार ने नाट्य में शान्त रस की पुष्टि का स्पष्ट शब्दों में विरोध किया है- रत्युत्साहजुगप्ताः क्रोधो हास: स्मयो भयं शोक। शममदि केचित्माह्ग: पुष्टिर्नारट्येषु नैतत्य I (दगरूपक ४-३२) कुछ विद्वानों का विचार है-कि नाट्य में भी श्ानत रस होता है। जैसे -- नागानन्दादि नाटक में शान्त रस की प्रधानता है। शान्त-रस-विपयक गीतवाद्य का भी उसके साथ विरोध नहीं। आाचार्य मम्मट ने नाट्य, काव्य दोनों के लिये सामा न्यरूप से स्वसम्मत आठ रसों का निरूपए किया है तथा 'शान्तोऽपि नवमी रसः स्मृतः' यहाँ नाट्य श्रध्य दोनों में ही शान्तरस की सत्ता स्वीकार की है। टिप्पसी-(i) नाट-शास्त्र की इस कारिका में आाठों रसों को इस कम से रसने का विशेष अभिप्राय है, जिसका स्पष्टीकरसा अभिनव भारती (६.१६) में किया गया है। (ii) कुद याचायों ने भक्ति तथा वात्सत्य को भी पृथक रस माना है। स्पं- गोस्वामी ने 'भक्तिरसामृतसिन्वु' और 'उज्ज्वतन्नील मणि' नामक ग्रन्थों में भकि रस का विस्तारपूर्वक निरुपण किया है। विश्वनाथ कविराज ने 'वस्सल रस' की स्वीकृति को मुनीन्द्र-सम्मत बतलाया है- रफुट चमतकारितया वत्सलं व रसं विदु:। स्थायी वत्सलता स्नेह: पुत्राद्यलस्यन मतम् । (सा० द० ३.२४१) आचार्य मम्मट को मान्यता है कि भक्ति यादि का 'भावध्वनि' में ही भन्त- रभव हो जाता है। उनकी मान्यता प्राचीन परम्परा से अनुपराखित है। भाचाय प्रभिनवगुप्त ने स्पप्ट ही कहा है-याद तास्यापिकः रनेहो रस इति त्वसत्'। 'काध्यानुशासनकार' आचार्य हेमचन्द्र का भी मही मत है- 'हनेहो भरि्तिर्वात्सत्यमिति हि रतेरेव विशेषा. । तुल्ययो. या परत्वररति: स स्नेहः। अनुतमस्य उत्तमे रतिः प्रसपितः सैव भवितपववाच्या। उत्तमस्य धनुतमे रति: घारसल्यम् एवमादी व विषये भावस्यवास्वाद्मखवम्। (iii) इन रसों में प्रधानता औौर मपधानता की दृष्टि से विचार करके कुध • भाचा्यों ने एक या अनैक मूल रसों की मल्पना की है। मवभूति ने करस को ही मूलरस माना है-'एको रसः फसस एव' (उत्तर०) भोजराज का कथन है- 'शुद्धारमेव रभनाद् रसमागनाम:' (शृङ्गारप्नकाश)-हम तो प्रास्वादनीय होने से एकमान पृद्वार को ही रस कहते हैं। नारायस पण्डित ने 'चमतकारसारत्यात सय- नाप्पद्भुनो रसः' (साहित्यदर्पस)-यह कहकर अद्भुन को ही भूलरस माता है। भमिनव गुप्त के अनुमार शान्तरस हो मूलरस है (!) (पमिनर भारती) । भरतमुनि
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चतुर्थ उल्लास:
१. तत्र शृङ्गारस्य द्वौ भेदौ-सम्भोगो विप्रलम्भरच। तन्नाद्यः पर-
गसयते। यथा- शून्यं वासगृहं विलोक्य शयनादुत्थाय किन्चिच्छने- र्निद्रा व्याजमुपागतस्य सुचिरं निवएय पत्युमु खम्। चिस्नव्धं परिचुम्व्य जातपुलकामालोक्य गएडस्थलीं लज्जानम्रमुखी प्रियेए हसता वाला चिरं चुम्विता॥३०। ने भाठ रसों में से शद्धार, रौद्र, वीर तथा बीभत्स को प्रधान रस माना है। इन चारो से क्रमशः हास्य, करुण, अद्भुत और भयानक रसों की उत्पत्ति मानी है। सम्भवतः रसों का यह उत्पाद्य-उत्पादक भाव एवं प्राधान्य-अ्प्राधान्य व्यक्तिगत दृष्टिकोण पर आश्रित है, विशुद्ध वैज्ञानिक आधार पर नही। (iv) यहां एक शङ्का यह भी होती है कि रस तो आनन्दात्मक होते हैं फिर दुःखमय करुण आदि रस कैसे हो सकते हैं और यदि इन्हें सुखात्मक मान भी लिया जाय तो इनसे पश्रुपातादि नहीं होना चाहिये। इसका समाधान यही है कि काव्य- नाट्य में शोक के हेतु भी अलौकिक विभावादि रूपता को प्राप्त हो जाते हैं और वे मानन्द का ही अनुभव कराते हैं। यही बात बीभत्स तथा भयानक रस के विषय में भी है। करुण रस के अभिनय को देखने सादि से जो प्श्नपात होता है वह तो चित के द्रवित हो जाने के कारण ही होता है दुःख के कारणा नहीं। जैसा कि दर्मसाकार :ने (साहित्यदर्पएा ३.५-3 मे) स्पष्ट किया है। इसके विपरीत नाट्यदपसकार रामचन्द्र, गुएचन्द्र ने समस्त रसों को दो भागों मे विभक्त किया है-सुखात्मक तथा दु.खात्मक। उन्होंने शृद्गार, हास्प, वीर, श्रद्ध त और शान्त रस को सुखात्मक माना है किन्तु करुण, रौद्र, बीभत्स और भयानक को दुःखात्मक माना है (ना्यदपंए पृo १५६) । आ० विश्वेश्वर का कथन है कि अभिनवगुप्त ने प्रत्येक रस को उभयात्मक रस माना है, अर्थात् प्रत्येक रस.में सुख और दुःख दोनों का समावेश रहता है (काव्यप्रकाश सू० ४४)। वस्तुतः यह कथन विचारणीय है। अनुवाद-उन रसों में भद्धार रस के दो प्रकार हैं-सम्भोग तथा विप्रलम्भ। उनमें से प्रथम (घद्यः) नायक तथा नायिका के परस्पर अवलोशन, •परालिङ्वन, अघरपान, परिचुम्बन, आादि की सनन्तता के कारए अगरित प्रकार का -(भपरिच्छेद) है किन्तु एक सम्भोग ही गिना जाता है जैसे- 'शायनगृह को सूना देखकर धोरे से शय्या पर से थोड़ा उठकर, निद्रा के बहाने से पड़े हुए पति के मुख को बड़ी देर तकु देखकर (निर्वण्य) निःङतया (कपोल प्रा्तों का) चुम्वन किया तव प्रिय के कपोलस्थल को पुलफ-युक्त (पुलकित) देखकर लज्जा से नम्नमुखी उस (मुग्घा) वाला का हँसते हुए प्रियतम ने चिरकाल तक चुम्वन किया ।३०॥
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१४४ काव्यप्रकाश:
तथा- त्वं सुग्धान्ि विनैव कब्चुलिकया धत्से मनोहारिणीं लक्ष्मीमित्यभिवायिनि प्रियतमे तद्वीटिकासंसपृशि। शाय्योपान्तनिविष्टसस्मितसखीनेत्रोत सवानन्दितो निर्यातः शनकैरलीकवचनोपन्यासमालीजनः।।३१।। तथा-हे सुन्दर नेत्रों वाली, तुम तो चोली के बिना ही मनोहारिली शोभा (लक्ष्मी) धारसा करती हो' प्रियतम के यह कहने पर तथा उस (घोलो) फ गांठ (खोलने के लिये) छूने पर (तस्या वीटिका पत्थि तां संत्पृशि सति) शम्या के समीप (सटकर) बैठी हुई (निविष्टा) तथा मुसफराती हुई नामिका (सखी) के नेत्रों की
गंई ।३१। 'उत्फुंल्लता (उत्सव) से आनन्वित सखियाँ भूठी बात बना बनाकर 'धीरे धौरे चलो
प्रभा :- (१) शङ्गार शब्द की व्युत्पत्ति है-'शृङ्गस्य भार्गमन (भरम) हेतुयस्य स शृद्गारो रसः''ृङ्ध' श्द ्वा ा्तें काो र् ें प्रयुक्त हुआ है (शृङ्ग' हि मन्मथोद्भेदः) । रतिप्रकृतिक रस ही ऋङ्गार रस है। मन के अनुकूल पदार्थों में सुम्ानुभूति ही रति कहलाती है (रतिर्मनोनुकलेजर्ये मनसः प्रवर- यितम्)। शद्भार के आ्लम्न विभाव नायक तथा नाविका होते हैं उद्यान, चन्द्रिका आदि उद्दीपन विभाव होते हैं; भ्र विक्षेप, कटाक्ष आदि अनुभाव होते हैं तथा सज्जा, हास इत्यादि व्यभिचारी भाव होते हैं। (२) परस्पर अनुरागयुक्त नायकननायिका के दर्शन स्परशन भादि के वन "द्वारा जहां सृङ्गार रस की अनुभूति होती है, वह संयोगशङ्गार रस है। इस पार स्प्रिक प्रेम में दर्शन, रपशनादि अ्रसंरूप रतिकेलियाँ होती है अतएब उनके विचार से सभ्भोग शृङ्गार अनन्त प्रकार का हो सकता है किन्तु इन सबको एक मानकर सम्भोगभृङ्गार ही कहा जाता है। :::- सम्भोगशंङ्ार दो प्रकार का है-(फ) नाविकारब्ध और (स) नायकारव्य। (क) 'धून्य' इत्यादि नामिकारन्य का उदाहरण है। यह अमरातक का पंथ हैं। इसमें प्रथम काम-विकार से युक्त मुग्या नायिका द्वारा भार्घ सम्भोग शृद्वार का बंन किया गया है; वयोंकि साहित्य शास्त्र के अनुसार पहिते नारी के अनुराग का वशन ही उचित है। यहां पर नायक आलम्वन है, जून्यगृह, नायक-निद्वादि वदीपन है। मुख-दर्शन-चुम्बनादि अनुभाव है। लग्जाहास-हर्गादि व्यभिवारी माव है। रति स्था- यीभाव है और सहृदय सामाजिक नामकविपयर नाविकानिष्ठ रवि के सद्ेकका प्रास्वादन करते है। (स) 'स्वं मुन्धाधि' इत्यादि नायकार्प समभोग पद्वार का उदाहरस है। यह भो ममरुशतक का पद्य है। गाढ पालिभन में प्रवृत नावक की नाविका के प्रति
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चतुर्थ उल्लासः १४५
अपरस्तु = अर्प्रमिलापविरहे-पर्या-प्रवास: शापहेतुक इतिःपञ्चविघि :- ।-
(१) प्रेमार्द्रा: प्रणयसपृशः परिचयादुद्गाढरागोद्या- स्तास्ता मुग्घददशो निसर्गमधुराश्चेष्ट भवेयुमयि। यास्वन्तः करस्य वाह्यकरणव्यापाररोघी चसा- दाशंसापरिकल्पितारवपि भवत्यानन्दसान्द्रो लयः ।३२।। उक्ति है। यहाँ मुग्घाक्षी आलम्वन है। नयन-सौन्दर्य-अङ्गशोभादि उद्दीपन है। आभा- पएग-ग्रन्थिस्पर्शन आदि अनुभाव हैं। उत्कष्ठादि व्यभिचारी भाव हैं। रति स्थायी- भाव है और सहृदय सामाजिक नायिकाविषयक नायकनिष्ठ रति के उद्रक का मास्वादन करते हैं। अनुवाद-दूसरा (विप्रलम्भ भृङ्गार) तो (१) अभिलाषा, (२) विरह, (३) ईष्या, (४) प्रवास (५) शाप-इन हेतुओं से होने के कारण पाँच प्रकार का होता है। उनके क्रमशः उदाहरण हैं :- (१) 'उस मुग्याक्षी (मालती) की प्रेम-पगी, अविचलित अनुराग (प्रराय) से पुक्त (प्रसवं स्पृशन्तीति) तथा परिचय के कारण गाढ अनुराग से भरी स्वभाव से मधुर वे नाना (ताः ताः) चेष्टाएं (हाव-भावादि) मेरे प्रात होवे, जिन (घेष्टाओं) में मनोरथ से फल्पना कर लेने मात्र से भी (बिना अनुभव किये भी) क्षएा भर बाह्येन्द्रियों के व्यापार को रोकने वाली, आ्नन्द से सान्द्र (घनीमूत) मन को तन्मयता (लघः) हो जाती है ।।३२।। ** "प्रभा :- जहाँ नायकननायिका में गाढ-प्रनुराग होता है किन्तु परस्पर मिलन नहीं हो पाता वहाँ विप्रलम्भ पङ्गार होता है-'यत्र तु रतिः प्रकृष्टा नाभीष्टमुपति विप्रर्लम्भोऽसो'। (सा० दर्पए ३-१८७) तथा सम्भोगसुखास्वादलोभेन विशेपेस प्रलम्पते आत्माञ्ञमेति विप्रलम्भः । (काव्यानुशासन २-३०)। अभिलाष इत्यादि में से प्रत्येक के साथ 'हेतुक' शब्द का अन्वय होता है अतः अभिलापहेतुक इत्यादि भेद से विप्रतम्भपद्गार ५'प्रकार का होता है- (१) अभिनाप का अर्थ है-पूर्वराग; उन दो व्यक्तियों का पारस्परिक प्रेम जिनको मिलन का अवसर नहीं प्राप्त हुआ है। यदि वे दोनों दूर देश में स्थित होते हैं तो भी यह विप्रलम्म अभिलायहेतुक ही कहा जाता है, प्रवासहेतुक नहों। (२) विरह का अर्थ है-मिलन के पश्चाव (क) दोनों में से एक के अनुराग-शून्य होने पर अथवा (ख) अनुराग होने पर भी दववश या गुरुजनों से लज्जा आादि के कारण समीप रहने पर भी पुनः मिलन न होने पर। (३) ईर्ष्या शब्द उपलक्षरमान्र है, इससे मानहेतुक विप्रलम्भ लक्षित होता है। सपती में भ्रनुरक्त नायक के प्रति कोप (ईष्या) से या प्रसाय के कारए जो मान होता है उससे होने वाला. विप्रलम्भ
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१४६ काव्यप्रकान:
(२) अन्यन्न त्रज़तीति का खलु.कथा. नाप्यसय ताद्दक गुहृद् थो मां नेच्छति नागतश्च हद्दद्दा कोडयं विधे: प्रक्रम:।' इत्यल्पेतर कल्पनाकव लितस्वान्ता निशान्तान्तरे वाला वृत्तविवर्त्त नव्यतिकरा नाप्नोति निद्रां निशि॥३३। एपा विरद्दोत्किठिता। ईर्व्याेतुक कहा गया है। (४) प्रवास का भर्थ है-दो अनुरक्त व्यक्तियों का कार्य- वश मिन्न-भिन्न प्रदेशों मे रहता। यद्यपि यह विरह का ही एक प्रकार है सथापि विरहोत्कणठिता औोर प्रोपितपतिका नायिका के भेद से इन दोनों में भेद कर, दिया गया है। (५) शाप के कारण होने वाला विप्लम्भ दापहेतुक है। साहित्यदपसकार ने विप्रलम्भ के चार भेद माने हैं-मूर्बानुराग, मान, परवास और करुणविप्रलम्भ। नामक आदि के मुद्छित हो जाने की सवस्था में करुर विप्लम्भ होता है उसका मम्मट के विरहहेतुक में ही अन्तर्माव किया जा सकता है।, मम्मट के अनुसार तो शाप, ईर्ष्या, प्रवास इन तीनों से मिन्न कारयों द्वारा जो मिलन के पश्चाद वियोग होता है वह सब विरहहेतुक ही है (मि०, प्रदीप, सू० ४४)। 'प्रेमार्द्राः' इत्यादि अभिलावहेतुक विप्रलम्भ शुद्ार का उदाहरण है। यह मालतीमाथव (पञ्चमाङ्ग) नाटक का पद् है। माधव नामक नायक मालती के प्रति स्वाभिलाप प्रकट करके मन ही मन कह रहा है। यहां मालती मालम्बन है।। उसके विलासों का रमरण उद्दीपन है। इच्छा अनुभाव है। अभिलापा द्वारा व्ज्ाय उत्कण्ठा व्यभिचारी भाव है, रति स्थायी भाव है। प्रेम, प्रसायं तथा राग शब्दों के भर्थ में अनवर है। यह मेरा है मैं इसका हूं' इस प्रकार का स्नेहभाव प्रेम है। प्रेम जब परस्पर अवलोरुन आदि से दढ़ हो जावा है तथा किसी एक के भनेव अपराध करने पर भी विर्चालत नहीं होता है सो प्रशप कहलाता है। अधिक परिचय के कारस मनन्दित करने में समर्य प्रसाय ही रा ब्हलाता है (उदयोव)। अनुवाद-(२) "ये (नायक) कहीं दूसरे स्थान.पर (दूसरी मामिका के यहा) धले जायें, इसकी तो बात भी नहीं। उनका कोई वंसा मित्र भी नहीं (जिसके साथ यहाँ चले जायें)। ऐसी भी बात नहीं हैकि.वे मुझे न चाहले हों (मी मा नेच्यति-यहाँ फाकु है-इच्छत्येय यह भाव है) फिर भी आये नहां, मोह 1े पहू मियाता को कसी, गति है (प्रकम :- प्रारम्भः) है?", इस प्रकार भनल्व कल्पनाओं।े पसित दृदय वालो वाला नयनगृह के भौतर (निशास्तान्तरे) करबटे महलतो हई (वृत्तः विवस नानो पाश्यंपरियर्तनाना व्पतिकरः सम्यन्धः पश्याः ताहशो) रात्री में नींद नहीं लेने पाती म३१।। यह: पिरहोत्कण्ठिता नामक नाधिका है।
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पतुर्थ उल्लास: :२४७
(३) सा पत्युः प्रथमापराघसमये सरयोपदेशं विना : नो जानाति सविभ्रमाङगवलनावक्रोक्तिसंसूचनम्। स्वच्छरच्छ कपो लमूलगलितैः पर्यस्तनेत्रोत्पला वाला केवलमेव रोदिति लुठल्लोलालकैरश्रुभिः ।।३॥ (४) प्रस्थानं वलयैः कृतं प्रियसखैरस रजस्र गतं धृत्या न क्षएमासितं व्यवसितं चित्त न गन्तु पुरः। यातु निश्चितचेतसि प्रियतमे सर्वे समं प्रस्थिता: गन्तव्ये सति जोवित, प्रियसुहत्सार्थः किमु त्यज्यते ॥३५ प्रभा='मन्मन्न' इत्यादि विरहृहेतुक 'विप्रलम्भ' शृद्गार का उदाहरए है। यहां नायक के यथा समय उपस्थित न होने पर 'विरहोत्कण्ठिता' नामिकाकी दशा का वसन किया गया है। इसमें अनागतपति आलम्बन है। अनागमन आदि उद्दीपन हैं। विवत्तनादि अनुभाव हैं। 'ह ह'ह इत्यादि से सूचित विस्मय व्यभिचारी भाव है। विरहोत्कण्ठिता नायिका का लक्षस है- भागन्तु कृतचित्तोऽपि दैवान्नाताति यत्प्रियः । तदनागमनदुःखार्त्ता विरहोत्कण्ठिता मता।। अनुवाद-(३) 'यह (मुग्धा) नायिका अपने पति के पहले अपराध के पवसर पर सखियों के कुछ सिखाये बिना (ससयेन-सौहार्वेन उपदेशः सदयोपवेशः; मित्रतापूर्वक उपवेश) हाव-भावपूर्वक (भौह आदि) अ्रङ्गों को वक्र करना तथा वकोवित्यों द्वारा (भाव) प्रकट करना नहीं जानती। बिसरे हुए चञ्चल बालों से युवत वह नामिका कमल जैसे नेत्रों को चारों ओर घुमाती हुई निर्मल कपोलों के मूल से ढलती हुई स्वच्छ आंसुओ्रों द्वारा फेवल रुदन कर रही है ॥३४॥ प्रभा-'सा' इत्यादि ईव्यहितुक विप्रलम्भ शृङ्गार का उदाहरण है। यह अमरुशतक का पद्य है। इसमें कोई सखी किसी नवोढा के दुःख का वगन कर रही है। यहाँ पति झलम्बन है, अपराध उद्दीपन है, रोदन आदि अनुभाव हैं, उससे व्युक्कय प्रसूया, व्यभिचारी भाव है तथा रति स्थायी भाव है। यहाँ पर अन्य नायिका में नांमक की झासक्ति होने के कारए ईर्ष्या है। अनुवाद-(४) 'भरे जीवन (जीषित), प्रियतम द्वारा जाने का निश्चित सनबनासेने पर (निश्चितं घेतो यस्य तपामूते सति) समस्त सुहव् (सवें) साथ हो चसे दिये हैं,(देख तो) हाथों के फंगनों ने प्रस्थान कर दिया है, प्रिय के मिन्न माँसू निरन्तर (भजस्न) निकल रहे हैं, धंयं से तो क्षस भर भी न ठहरा गया घोर चित्त, ने.मागे जाने की हो ठान ती (व्यवसितम् उद्यक्तम्) । हे जीवन, तेरा जाना अवश्यम्भावी हो (गन्तव्य) है; फिर तु प्रियतम के इन सुहृद्मों का सङ्ग (माये) व्यों छोड़ रहा है? ।३x ।I
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१४८ फाव्यप्रकान:
(x) त्वामालिख्य प्रणायकुपितां धातुरागैः शिलाया- मात्मानं ते चरसपतितं यावदिच्छामि कतुम्। श्रस्त्र रताचन्मुहुरुपचितह् ष्टिरालुप्यते मे क्र रस्तस्मित्नपि न सहते सङमं नौ कृतान्तः ।३६।। हास्यादीनां क्रमेमोदाहरयाम्। .आकुञ्च्य पासिमशुचि मम मूर्ध्नि वेश्या मन्त्राम्भसां प्रतिपदं पृपतैः पवित्रे। तारस्वन प्रथितथूत्कमदात् प्रद्दारं हा हा इतोऽहमिति रोदिति विष्णुशर्मा ।३७॥ प्रभा-'प्रस्थानम्' आ्रदि प्रवासहेतुक 'विप्रलम्भ शङ्गार का उदाहरए है- (अ्रमरशतक) : गुरुजनों के आदेश आदि से पति के परदेश जाते समय कोई नायिफिा अपने प्राणों को उलाहना दे रही है। यहाँ प्रियतम आलम्बन है, उसका प्रस्थानादि उद्दीपन हैं, हाथों की कृशता आदि अनुभाव हैं और कृदता द्वारा व्यङ्गप चिन्ता व्यभिचारी भाव है, रति स्थायी भाव है। अनुवाद-(५) 'हे पिये, प्रम से कुपित तुभको तेर भदि से शिसा पर चितित करके (भलित्य) ज्यों ही मैं (यक्ष) अपने भापफो तेरे चरलों में नत फरना चाहता हूं त्यों ही बार-बार बढ़ते हुए (उपचित :- प्रबवः) पष्र्मों से मेरो दृष्टि ढक (भर) जाती है। निदेधी विधाता मलेस्य में (वस्मिन्) भी हम बोमों का (नो) मिलन सहन नहीं करता ॥३६॥ प्रभा-'त्वाम्' इत्यादि शापहेतुक विप्लम्भ का उदाहरणा है। मेधदूत के इस पद्य में कुवेर के शाप द्वारा विरह-संतप्त यक्षराज स्वप्रिया को लक्ष्य करके मेप मे कह रहा है। यहाँ पर नामिका आलम्यन है, उसका प्रसमकोप उद्दीपन है, परणों में पतनादि अनुभाव है तथा कृतान्त के प्रति 'प्रसूया' व्यभिचारी भाव है, रवि स्थायी भाव है। अनुवाद्-हात्य आादि (रसों) के कमश उदाहरल है :- २. (हास्य) 'विप्ए शर्मा 'हाम, हाम में मर गया' यहकहकर रोता है; 'घेव मन्न्नों से पवित्र जल के विन्दुर्मों द्वारा (प्रप्तः) प्रत्येक प्रवमण में (प्रतिपदं प्रतिस्यानम्) पवित्र किये हुए मेरे सिर पर वेश्या ने सपने 'सपवित्र हाप को मुट्ठी वांध कर (आंकुक््य) ऐसा प्रहार किया है जिसमें सीव ध्वनि मौ, तपा विस्तृत यू, यू शब्द था (प्रयिती विस्तारितः 'ृतु' दति दाग्व: पत्र)' ॥३७॥ प्रभा-'माकुश्च्य' आादि हास्मरस का उदाहरया है। हास्यरस हासप्रकृतिक होता है। हास्य-रस का स्थामी भाव 'हास' है। म हास पमिप्राय है-वाछी-देश मादि की विकृतियों के द्वारा चित्त का विकास। जैसा कि कहा भी है- यागादिवकृत वेतोविफासो हास इप्यते (साहिरयदपए न.१०६)
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चतुर्थ उल्लास: १४६
३. हा मातस्त्वरिताऽसि कुत्र किमिदं ह्या देवता: क्वाऽशिप: धिक प्राखान् पतितोऽशनिहु तवहस्तेऽङ्ग पु दग्घे हशौ। इत्थं घर्घरमध्यरुद्वकरुणा: पौराङनानां गिर- श्चित्रस्थानपि रोदयन्ति शतघाः कुर्वन्ति भित्तीरपि ।३t॥ विकृत प्रकार तथा चेष्टादि वाला व्यक्ति हास्य रस का श्लम्बन होता है, उसकी चेष्टाएँ उद्दीपन होती है; नेत्र-सङ्कोच, मुस्कराना आदि अनुभाव होते हैं तथा निद्रा मालस्य आदि इसके व्यभिचारी भाव होते हैं। प्रस्तुत उदाहरण में विप्णु शर्मा आलम्बन है, उसका रोदन उद्दीपन है, देसने-सुनने वालों का मुस्कराना या हुंसना आदि अनुभाव है द्रष्टा की चपलता आदि व्यभिचारी भाव हैं। यहाँ पर सहृदय सामाजिकों के हृदय में वासनारूप में विद्यमान 'हास' नामक स्थायीभाव विभावादि द्वारा व्यक्त होकर हास्य रस का मास्वादन कराता है। अनुवाद-३. (करुख) "हा मातः, तुम शोघ्ता से कहाँ चली ? यह पया ? हाय देवों, (विषकार तुम्हारी पूजा), (साधु ब्राह्मणों के) आशीर्धाद कहां हैं? प्रासों को घिक्कार है। हाय ! तुम्हारे अङ्गों पर वच्त्-तुल्य अग्नि (हुतवहः) गिर गई, नेत्र जल गये (मा पशुभ दर्शन से हमारे नेत्र जल गये)"-नगर की नारियों की इस प्रकार घरघराती हुई, मध्य में रुद्ध हुई करुए वासियां (गिर) चित्र लिखित व्यक्तियों को रला देती है, भित्तियों को भी शतधा (विदीसं) कर रही है॥३८॥ प्रभा-'ह। मातः !' इत्यादि करुण रस का उदाहरण है। करुण रस का स्थायी भाव शोक है। प्रिय वस्तु के नष्ट हो जाने से जो चित की व्याकुलता होती है, वही शोक कहलाता है-'इष्टनाशादिभिश्चेतोवश्ल्व्यं शोकशब्दभाक्' (सा० द० ३.१७७) जिसके लिए शोक किया जाता है (शोच्य) वही आलम्बन होता है। उसकी दाह आदि भवस्था उद्दीपन है, दैवनिन्दा, क्दन आदि अनुभाव हैं तथा मोह, व्याधि ग्लानि-विपाद आदि व्यभिचारी भाव हैं। प्रस्तुत उदाहरण में मृतक रानी आलम्बन है उसका दाह आादि उद्दीपन है, रुदन अनुभाव है; दैन्य ग्लानि आादि व्यभिचारी भाव हैं। यहाँ पर सहृदय सामाजिक में शोकप्रकृतिक करुए रस अ्भिव्यक्त होता है। •टिप्प्सी-(1) करु रस और विप्रलम्भ (शृङ्गार) में भेद है। क्योंकि दोनों के स्थायीभाव भिन्न २ (शोक-रति) हैं तथा विप्रलम्भ में पुनमिलन की भाथा बनी रहती है- शोकस्थायितया भिन्नो विप्रलम्भादम रसः । i. विप्रलम्भे रतिः स्थायी पुनः सम्भोगहेतुकः ॥ (सा० द० ३.२२६) यह कहा जा सकता है कि वियोग दो प्रकार का होता है-१. प्रस्यायी भोर २. स्थायी। दो प्रेमियों का जो अस्थामी वियोग होता है वह विप्रलम्भ के
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१५० काव्यप्रकाश:
४. कुंतमनुमतं दृष्टं वा यैरिदं गुरुपातकं मनुजपशुभिन्निमर्यो दैर्भवद्विरुदायुघै:। नरकरिपुणां साध तेपां सभीमकिरीटिना- भयमममसृडमेवोमांसै: करोमि दिशा बलिम्।३६॥ अन्तगत आाता है। दोनों में से एक की मृत्यु हो जाने पर जो स्थायी वियोग होता वह करुए के अन्तगत आता है। उसमें मिलन की आाशा ही नहीं रहती। संस्कृत साहित्य में कुछ ऐसे भी सन्दर्भ हैं जिनमें एक, प्रेमी के परलोक पले जाने पर भी मिलन की आाशा बनी रहती है, जैसे कादम्वरी के पुण्डरीक मोरं महाश्वेता के वृतान्त में। विश्वनाथ ने ऐसे स्थलों पर करसविप्रसम्भ नामक विप् सम्भ श्रद्गार का भेद माना है (सा० द० ३.२०६)। वस्तुतः यहाँ भोकाश वाली से पूर्व करुणा है, आकाश वासी के परचास् मिलन की आाशा होने पर रति भाव: का उद्भव होने से विप्लम्भ भृज्गार होता है। फिर भी यह सन्दर्भ भमश्य ही दो जीवित प्रेमियों के वियोग से भिन्न है। अ्रतः कहना न होगा कि एक के परलोक चले जाने पर भी उसी शरीर से पुनः मिलन को आत्ा होने पर कछविप्रसम्भ होता है। यदि फिर मिलन की आशा न हो या अन्य शरीर में मिलन की भारा हो तो करण रस ही होता है। इसी प्रकार जहां वस्तुतः एक की मृत्यु न हुई हो किन्तु उसकी सृत्यु रामभं सी जाये और मिलन की आशा ही समाप्त हो जाये, जसी उत्तररांमचरित के 'राम औोर सीता के वुतान्त में; वहाँ करसा रस ही होगा। फलतः उसी जन्म में पुनः मिलन की आशा का होना या न होना विप्रसम्भ और कर का मुख्य भेदक तंत्व है। मिलन की भाशा से ही रति भाव का उद्भय होता है; वही विप्रसम्भ का रथायी भांव है। (ii) महाकवि भवभूति के भततानुमार वस्सरत ही एक मानरत है- एको रसः करएा एव निमितनेवाढ, भिन्नः पृथक पृथगियाधमते विवर्तान। 1= मामत युदसुदतरभमयान् विकारानम्भो कया सलिलमेद सु तासमरत्षम् ।। अनुवाद-४ (रोद्र) 'जिन मर्यायाहोन, नरपधु आप लोगों मे हुविमार उठाकर यह (गुरु दोल का बघरुप) महापातफ किया है, करने कौ सम्मति दी है, भयया देसा है। यह में (अश्वत्यामा) नरकासुर-शम सर्थात् कृप्स सहित उन सेभी भीम, भसुंन (किरीट) आदि घाप सोगों के रक्त (पमृक) पर्दो तपा भांस से दिशासों को बसि प्रदान करता हूं ttt६। पमा-'पृस्म्' इत्यादि रौद्र रस का उदाहरण है। रौद्र रस का स्यायी आाव करोध है। विरोधियों के प्रति जो हृदय में सोक्साता या प्रतिरोष की भावना है यही पोष कहलाता है-'पतिपूसेपु संदम्यरपायबोयः कोप इप्बत' (पा० द० १७७)
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चतुर्य उल्लास: १५१
५. चद्रा: सन्त्रासमेते विजहत हरय: चुस्सशक् भकुम्भा युष्मद्द हेपु लज्जां दति परममी सायका निष्पतन्तः। सौमित्रे तिष्ठ पात्रं त्वमसि न हि रुपा नन्वहं मेघनाद: किन्चिद्ध् भङ्गलीलानियमितज लघि राममन्वेपयामि॥४०॥ इसका पलम्बन शन् होता है। शय की चेष्टाएँ उद्दीपन होती हैं तथा भयड्र मारकाट' संग्राम के वातावरण मे इसकी विशेपरूप से उद्दीप्ति होती है। भुजाएँ होकना, शस्त्रोत्क्षेपण, उग्रता, कम्प, मद, रोमाञ्च आदि इसके अनुभाव हैं। मोह, ममर्ष आादि इसके व्यभिचारी भाव हैं। प्रस्तुत उदाहरण वेणीसंहार का एक पद्य है। यह गुरु द्रोए के बध के पदचात् अजुन आादि के प्रति अद्वत्थामा की उत्ति है। यहाँ पर अर्जुनादि आ्रलम्वन है। पिता की हत्या, पास्त्रधारण आदि उद्दीपन हैं, प्रतिज्ञा अनुभाव है। प्रतीयमान गर्व ही व्यभिनारी भाव है। सहृदय सामाजिक में कोधप्रकृतिक रौद्र रस अभिव्यक्ति होता है। अनुवाद-५' (वीर) 'हे क्षुद्र वानरों (हरयः). तुम भय को छोड़ दो, कयोंकि इन्द्र के हाथी (ऐरावल) के गण्डस्थत को चुसित (क्षुण्स) करने वाले मेरे ये बास तुम्हारे शरीरों पर गिरते हुए फेवल (परम्) लज्जा धारस करते हैं। हे सुमित्रा-पुत्र लक्ष्मसा, ठहरो, तुम मेरे क्रोध (रवां) के पात्र नहीं हो, प्रसिद्ध हो है (नन) कि मैं तो मेघनाद हूं। मैं तो उम राम को खोजता हू, जिसने अपनी भौहों की थोड़ी सी वकता मात्र से जलनिधि को वश में (नियमितः-वशीकृतः) कर तिया गा।४०l1 प्रभा-'क्षुद्राः' इत्यादि वीर रस का उदाहरण है वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है। कार्य करने में (आनन्दपूर्ए) स्थिर उद्योग का नाम उत्साह है- 'कार्यारम्मेधु सरम्भ: स्थेयानुतसाह उच्यते ।' विजेतव्य आदि ही वीर रस का आालम्बन विभाव होता है, उसकी चेष्टाएं आदि उद्दीपन हैं युद्धादि की सामग्री अथवा धन्य सहायकों का अन्वेपए आदि अनुभाव हैं, धैर्य, मति, गर्वँ आदि व्यभिचारी भाव हैं। प्रस्तुत उदाहरण हनुमलाटक से उद्धृत किया गया है। यह मेघनाद की घानरों आदि के प्रति उक्ति है यहाँ पर राम आलम्वन है, राम का समुद्र बाँधना उद्दीपन है, क्षुद्रों के प्रति उपेक्षाभाव तथा राम के प्रति स्पर्धा अनुभाव है। ऐरावत के मस्तक-भञ्जन की स्मृति तथा 'लज्जा दधति' से प्रतीयमान गर्व व्यमिचारी भाव हैं। सह्दय सामाजिक में उत्साहप्रकृतिक वीर रस की अभिव्यक्ति होती है। टिप्परी-(i) वीर रस के अ्रनेक भेद किये गये हैं। दशरूपककार ने युद्ध- वीर दानवीर तथा दयावीर तीन भेद किये हैं। साहित्यदर्पसकार ने 'धर्मवीर' सहित सार भेद किये हैं। ऊपर का उदारस युद्धवीर का है। दानवीर वलि सदि, दयावोर जीमूतवाहन आादि तथा धर्मवीर युधिप्ठिर आदि.प्रसिद्ध है। कुछ विद्वानों का
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'१५२ काव्यपकोन:
६. मीवाभङ्गाभिरामं मुहुरनुपतति श्यन्दने बद्धहष्टिः पश्चार्घेन प्रविष्टः शरपतनभयादू भूयसा पूर्वकायम्। दभ रद्धावलीहैः श्रमचितृतमुखभ्न शिभि: कीर्णव्त्मा पशयोद्ग्रप्लुतत्वाद्वियति बहुतरं स्तोकमुर्व्या प्रयाति॥४।। ७. उत्कृत्योत्कृत्य कृति प्रथममथ पृथत्सेधभूयांसि मांसा- न्यंसरिफकू पृष्ठपिएड् यादयंव यव सुल भान्युमपूतीनि जरप्वा। विचार है कि वीर रख युद्धवीर मे ही हैं, दान आदि का उत्साह तो 'भाव के अन्तंगत भाता है। (ii) रोद्र तथा वीर रस का भेद स्पष्ट ही है। प्रथम तो दोनों के स्थायी भाव (कोध, उत्साह) ही भिन्न २ हैं, द्वितीय रोद्र रस में विवेक का मभाव रहता है, क्रोध, में विवेक कहाँ ? किन्तु वीर रस में विवेक स्पप्ट रूप में विद्यमान रहती है। 'रोद्र रस' मे मुख और नेनों की लालिमा था वर्सन होता है उसमें मोह मोर विस्मय होता है। अनचाद-६ (भयानक) 'हे सारशय, देसो घपने पीछे चसते हुए रप, पर बार-बार ग्रोघा घुमाकर सुन्दर दृष्टि डालता हुआ, माएा लगने के भम से अंपने शरीर के पिछले भाग से अगले भाग में सिमटता हुआ, परिधम के कारए सुले हंए मुख से गिरती हुई परघंचर्वित दर्भों को मार्ग में विसेरता हुआ, यह (मृग) ऊरो पलांग मारने के कारल अधिकांश आ्रकाश में ही (चल रहा है) मूमि पर तो थोड़ा सा चलता है।।४१॥ प्रभा-'गीवा' इत्यादि भमानक रस का उदाहरख है। भयानक रस का स्थायीभाव 'भय' है। किसी भीपए वस्तु के काटण चित्त में जो विकलता हो जासी है वही चितवृत्ति भय कहलाती है-'शोद्रशवत्या सु जनितं चितरवंव्लय्पद भयम्। (सा० द०३-१७८) जिससे भय उत्पन्न होता है वही इसका भालम्बन है: भीषम वस्तु की चेष्टाए हो उद्दीवन हैं, ववस्यं, गद्गदुस्वर स्वेद, रोमाञ्च, पतायन मादि अनुभाव हैं तथा काङ्दा, संधम, मरसा आदि व्यमिचारी भाव है। प्रस्नुत उदाहरण सफुन्तला नाटक मे उद्घृत किया गया है। यहं राजा दुष्पन्त की सागधि के प्रति उक्ति है। इसमे मृग के भय का वर्गन किया गया है। यहां पीधे चलने वाला रय या राजा मालम्यन है, पारपतन, उदीपन है श्रीमावक्तादि मनुनाव है, श्रम आदि व्यम्रिवारी भाव है: सहदव सामाजिन में भपवकृतिक मया नक रस की मभिव्यक्ति होती है.। अनुवाद :- U-(घोभसस) 'क्षुघा से पीडित (भास) सभी ओोर' तासा +- हम्ा, दांत निकाले हुये यह दरिद्व प्रंत (प्रेतेयु रद:) पहमे चर्म को (हति) उमड उपेद कर त पय बन्छे (यम) उनमूल (उफक) तथा उद्ा के ऊपरी भांत (पृवद-3ो] आदि मु.न कुर क कारएपुरत(पृपना महता उतसेपेन उच्छिततया सूर्यासि) सोव्र बुगन्य वसस मास को साकर (नगया) सपनी मोद में
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चतुर्थ उल्लास: १५३
आत्तः पर्यस्तनेत्रः प्रकटितदशन: पेतरङ्क: करङ्गा- दङ्कस्थादस्थिसंस्थं रथपुटगतमपि क्रव्यमव्यप्रमत्ति ॥४श : 5. चित्रं महानेप वतावतार जव कान्तिरेपाडभिनवैव भङ्गि:। लोकोत्तरं- धैर्यमहो प्रभाव: काऽप्याकृतिनू तन एप सर्गः॥।४३।। पड़ ग्रस्थि पञ्जर (करड) में से भस्थियों के ऊचे नीचे भागों में (स्थपुट) निम्नो- 'तभागः) स्थित कच्चे मांस को (कव्यम्) घीरे २ (अव्यप्रम्-शनसंथा भर्वत तथा) 'खा रहा है'।।४२।। प्रभा-'उत्कृत्य' इत्यादि 'बीभत्स' रस का उदाहरणा है। बीभत्स रस का स्थायीभाव जुगुप्सा है। किसी घृरास्पद वस्तु के दोपदर्शन से उत्पन्न होने वाला घूणा-भाव ही जुगुप्सा कहलाता है-'दोपेक्षणाविभिगर्हा जुगुप्सा विषयोद्भवा' (सा० दर्पण ३.१७६)। दुर्गन्ध, मांस, रुधिर इत्यादि इसके आलम्बन है। उनमें कोड़ पड़ना आदि उद्दीपन हैं, थूकना, मुंह फेरना इत्यादि अनुभाव है तथा मोह, व्याधि, मरण आदि व्यभिचारी भाव है। मालती-माधव के प्रस्तुत उदाहरण में माधव शमशान में शवभोजी प्रेत को देखकर कह रहा है। यहाँ शव या प्रतरङ् ही आलम्बन है, शच को काटना मांस खाना आदि उद्दीपन हैं, दर्शक के थूकना, नाक सिकोड़ना इत्यादि अनुभाव हैं तथा उद्दगे आदि व्यभिचारी भाव हैं। सहृदय सामाजिक मे जुगुप्साप्कृतिक बीभत्स रस की अभिव्यक्ति होती है। टिप्पणी-यद्यपि हास्म तथा बीभत्स रस-वएना में लौकिक हास एवं --
जुगुप्सा भाव के 'आश्रय' रूप किसी व्यक्ति का स्पष्टवर्गन नहीं होता तथापि उस दृश्य को देखने वाले किसी व्यक्ति का पपुमान कर लिया जाता है अथवा उसके प्राक्षेप के बिना ही सामाजिक को रस-चरवखा हो जाती है। इसका विपद-विवेचन रसगङ्गाघर में किया गया है। 1 अनुवाद-८ (अ्रद्भुत) 'महो (बत, हर्ष सूचक), यह महान् भ्रवतार तो मद्भुत (चित्र) है। यह काग्ति ओर कहाँ है ? (लोकोततर है)। इसकी भङ्गिमा (गमन-उपवेशनादि) विलक्षण या अपूर्व ही है। धय अलौकिक है। घहो ! इसका प्रभाव, यह भाकृति कोई विलक्षस ही है (का्प) ! यह नवीन सृष्टि (सर्ग) है।।४३॥ प्रभा-'चित्रम्' इत्यादि अद्दभुत रस का उदाहरण है। अदभृत रस का स्थायीभाव 'विस्मय' है। विलक्षण वस्तुओं के दर्शन श्रवस शदि से जो चित्त का एक विकास सा होता है वही विस्मय कहलाता है-विविधेय पदार्थेप लौकसी: मातिवर्तिपु। विस्फारश्चेतसो यस्तु स विस्मय उदाहृतः, (सा० द०३१८०) । इसका आलम्बन विलक्षण वस्तु है, उस वस्तु का मु-वसन ही उद्दीपन है; स्वेद रोमाज्य, नेत्र- विकास आदि अनुभाव है, बितर्क, आवेग, हर्प भादि व्यभिचारी भाव हैं।
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१२६ काव्यप्रकाय:
नाध्य में सम्चारी या व्यभिचारी भाव कहलाते हैं। ये भाव किसी स्थायी भाष में विचित्रता उत्पन्न करके चले जाते हैं, किसी रस के आस्वादन पर्यन्त नियत रूप से नहीं रहते। किसी रस के साथ इनका निमत सम्बन्ध भी नहीं होता। इनमें से फोई एक भी कई रसों का उपकारक हो सकता है। अ्रतः भनियत होने के कारए भी मे व्यभिचारी भाव कहलाते हैं। इनको संख्या ३३ है। साहित्यद्पए आादि ग्रन्थों में इनके विशेष लक्षए और यथासम्भव उदाहर- सादि दिखलाये गये हैं संक्षेप में इनके स्वरप इस प्रकार हैं :- (१) निर्वेद-तत्वज्ञान या ईर्प्यादि से अपने सम्बन्ध में तुच्छता का भाव। (२) ग्लानि-मनस्ताप भादि से उत्पन्न निरुत्साह। (३) शङ्धा-दूसरे की कूरता शादि से अनर्य-चिन्तन, (४) असूपा- परगुणासहिप्ुता (५) मद-समोह तथा आनन्द का मिशस, (६) अम-पाना पादि से उत्पन्न म्लानि का काररप चित्तवृतिविशेय, (७) आलस्य-उद्योग में परुचि, (८) वन्य-दुर्गति मादि के कारण मन की भ्रोजस्विता का नाश, (६) चिन्ता- हित की पपाप्ति से होने वाला भाव, (१०) मोह-दु.खादि-चिन्तन से चित्त की धून्यता, (११) स्मृति-पूर्वाुभूत वस्तु-विषयक ज्ञान, (१२) धुति-मभीष्ट अर्य की प्राप्ति में इच्छा-निवृत्ति, (१३) यीडा-चित का संङ्कोच, (१४) चपसता-कपादि के कारए चित्त की अस्थिरता, (१५) हर्ष-इप्ट-प्राप्ति आदि से मन की प्रससता, (१६) आायेग-अ्रनथ की अधिकता से मन की घवराहट, (१७) जाउप-चिन्तादि के कारण कार्य में पटुता का प्रभाव, (१८) गवं-धनादि के कारस होने वाला मद, (१६) विषाव-प्रारम्भ किसे कार्य मे असफलता के कारए उत्साहनाघ, (२०) प्रोतु- वय-वाञ्छित प्राप्ति में विलम्ब न सह सकना, (२r) निद्ा-समादिव इन्द्रियों की व्यापार-धून्मता, (२२) अपस्मार-अत्यन्त दु.ख के कारए समृतिनाश, (२३) सुप्त- निद्रावस्था में विषय का सनुभव न होना, (२४) प्रबोध-निद्रा के पर्चात वंत्ृन्य प्राप्ति, (२५) समर्य-स्थिरतर कोप, (२६) मवहित्या-नज्जादि के कारस हर्ष आादि का गोपन, (२७) उप्रता-प्पमान ादि के कारए चित की प्रपण्डता, (२८) मति- शाह्तोपदेश आादि से पर्थ का निर्चय, (२६) वयामि-विर्हादिपस मनः-संताप, (३०) उन्माव-सतिपात आदि से पित-विभ्रम, (११) मर-मूर्न्धा मचवा प्रासों का निष्कमण, (३२) न्रास-मनः-शोभ, (३३) बितर्क-सन्देह में पड़कर विचार फरना। इन ३३ में से कोनसे किस रस के सम्बारी होते हैं। इमक भी व्वास्याकारों ने परिगशन किया है (प० उद्योत) इनके भविरिक्त स्थायी भाव भी कभी-कमो व्यमिचारी नाव हो जाया करते है जैसे-हास ऋृद्जार औोर वीर मे, रवि हास्व कदरा भोर गान्त में, कोध और वीर में, नय कस्स और नसार में, जुगुप्मा ममा- मक औोर ग्रान्त में, विस्मय प्रायः सभी रसों मे नया सरसाह रौद्र एवं पास्प में व्यमि- पारी होता है (उद्योस)।
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चतुर्थ उल्लास:
निर्वेदस्यामङ्गलपायस्य प्रथममनुपादेयत्वेऽप्युपादानं व्यभिचारि- त्वेडपि स्थायिताSभिघानार्थ तेन- :(४७) निर्वेदस्थायिभावोऽस्ति शान्तोऽपि नवमो रसः । अही वा हारे वा कुसुमशयने वा हपदि वा मसो वा लोष्ठे वा वलवति रिपौ वा सुहृदि वा। -. दसं वा स्त्रेणे वा मम समदशो यान्ति दिवसा: क्वचित्पुएयारएये शिव शिव शिवेति प्रतपतः ॥।४४।। अनुवाद्-निर्धेद (स्वावमाननारूप या विषय-वैराग्यरूप होने से), प्रायः ममङ्भल रूप है, पतएय वह प्रारम्भ में ग्रहस करने योग्य (उपादेम) नहीं तथापि 'ध्यभिचारीभाव होकर भी यह स्थायी भाव है' यह बतलाने के लिये उसका प्रथम प्रहण किया गया है। [स्थायी तथा व्यभिचारी भावों के मध्य में पाठ होने के फारस वह उभमरूप है यह अभिप्राय है] इससे (शुद्धार आदि के प्रतिरिक्त) जिसका निर्वेद स्थायीभाव है वह 'शान्त' रसष भी नवम रस है। (४७) जैसे- 'सर्प या हार में, फूलों की सेज या पापाण में, मशि या मिट्टी के ढेते में चलवान शत्रु या मित्र में, तिनके या स्त्रीसमूह (स्त्रगम) में-समान भाव (दृष्टि) रखते हुए किसी (भपवित्र) स्थान पर अथवा पवित्र वन में 'शिव शिव शिव' यह बोलते हुये (जीवन्मुक्त हो जाने से शिव शिव बोलना भी अ्न्यंक है, भतः 'प्रलपतः- मनरथंक वदत.' का प्रयोग किया गया है) मेरे दिन व्यतीत होते हैं॥४४।। प्रभा-(१) भरतसूत्रों में स्थायीभाव निरूपण के पश्चाद 'निर्वेद' इत्यादिं व्यभिचारी भावों का निरूपण किया गया है। व्यभिचारी भावों में सर्वप्रथम 'निर्वेद' का उल्लेख करने का भभिप्राय यह है कि आचार्य भरत इसे स्थायी भावों में भी गिनना चाहते हैं; मन्यथा 'निर्वद' को सर्वप्रथम क्यों रखते; क्योंकि 'अपने पापको तुच्छ समभना' या 'विपयों से वराग्य भाव' ही 'निर्वेद है औौर यह संसारी जीवों के लिए तो अमङ्गल रूप ही है। 'अमङ्भलप्रायः' में 'प्रायः' शब्द का प्रयोग इस हेतु किया गया है, क्योंकि ईर्ष्यादि से उत्पन्न निर्वेद को श्रमङ्भल नहीं माना जाता। शह्त रस का स्थायी भाव निर्वद है। इसे 'शम' भी कहते हैं। शम या निर्वेद का अभिप्राय है-'वैराग्यदशा मे आत्म-रति से होने वाला आनन्द- 'शमो निरोहावस्थायामात्मविश्रामजं सुखम् (सा० द० ३.१८०) । मिथ्यात्व रूप से भाव्यमान जगत ही शान्त रस का आलम्वन है, पवित् आश्रम, तीर्य, महापुरुष- सङ्भ आदि इसके उद्दीपन हैं,रोमाञ्व आदि अनुभाव हैं तथा स्मृति मति जीवदया आदि इसके व्यभिचारी भाव हैं। * :: 5' (३) 'महौ' इत्यादि कश्मीरदेशस्य श्रीमदुत्लराज का पद्य है। यह भतृ हरिं केवंराग्य रावक में भी विद्यमान है। वराग्यपतक आदि में अन्य कवियों के'पंघ
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१६० काव्यप्रकाण:
हरत्यघं सम्प्ति हेतुरेष्यतः शुभस्य पूर्वाचरितैः कृतं शुभैः। शरीरभाजां भवदीयदर्शन व्यनक्ति कालत्रितयेऽपि योग्यताम् ॥४६।। एवमन्यद्प्युदाह्दार्यम्। A पब्जितव्यभिचारी यथा- जाने कोपपराङ् मुखी प्रियतमा रवप्नेऽय टष्टा मया 11 4 मामां सरपृश पाणिनेति रुदती गन्तु प्रवत्तापुर:। प्रभा-'कण्ठ' इत्यादि देवविषयक रति का उदाहरण है। 'यह काइमीरिक कवि शीमदुत्पलाना्य-प्रशीत परमेश्वरस्त्ोतार्वलि से उद्धृत किया गया है। यहा पर महादेव आालम्बन है, 'ईद' पद प्रतिपाध ऐश्वरय उद्दीपन है, रतव अनुभाव है, भुवि, समरए मादि व्यभिचारी भाव है तथा दिव विपयक रतिभाय की भमिष्यक्ति होती है औौर सहृदय मामाजिक भाव-मग्न हो जाते हैं। यह 'रसध्वनि' नहीं मानी जाती; जयोंकि कान्ताविषयक रति से सहृदयों को जिस उत्कृष्ट आनन्द की प्राप्ति होती है, उसकी देवादिविपयक रति से नही हुआ करती। कान्ताविपयक पपुप्टा रति भथवा उदयुद्धमान रति का उदाहरण कुमार- संभव का यह पद्य है :- हुरस्तु किञ्चित् परिवृ्तधपश्यम्रोदयारम्म इवाम्वुराि:। उमासुखे विम्नफलापरोप्ठे व्यापारयामास विलोचनानि॥ अनुवाद-(मुनि विधमक रति भाय) 'हे मुने' आापका बदन गरीरयारियों की (मृत,पर्तमान तथा भविष्य) तोनों कालों में योग्यता को दपक करता है। (यह वशत) वतंमान फाल में पाप (पध) को हर लेता है, आाने वाले (एप्पतः) बस्वाल का हेतु है, पहले (जन्म में) किये हये शुभ कायों से (प्राप्त) हमा है ॥४<।i' इस प्रकार भन्य (गुर, विषयक रति आदि के) उदाहरस भी रेस सेना चाहिये। : प्रभा-'हूरित' इत्यादि मुनिविपियक रवि या उदाहरस है। यह मामराम्य के प्रथम सरग मे नारद मुनि के प्रति श्रीकृष्ण की उति है। श्रीकृष्ण के रति भाव का भालम्वन नारद मुनि है, दर्शनयोग्यता प्रफट करना उद्ीपन है।. वौकृप्स को यह उक्ति हो पनुभाव है मोर इसके द्वारा व्पसप 'हूरष' हो अ्यमिमारी भाव है। थोपृप् मुनिविषियक रति-भाव जानने वाले सामाजिक के हृदय में भाव-निष्पातति होती है। इमी प्रकार गुरुविपयक रत आादि के विषय में भी समफना पाहिए। " अनुवाद-(दिभायाडि के द्वारा) मुशय रप से सभ्यित सपभवारी का उदाहरए. जसे 'है भातः, पाज मेंने श्वप्त में सपनी निया को कोर के फारल मुह फेरे हुए देसा। 'मुभ्हे हाप से मत डुमो ऐसा बहकर वह रोनी हृई यह पाने (पुरः)
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चतुर्थ उल्लास: १६१
नो यावत्परिरभ्य चाटुशतकैराशवासयामि प्रियां: भ्रातस्त।वद्हूं शठेन विधिना निद्रादरिद्रीकृतः।।४७।। अत्र विधिं प्रत्यसूया। (४६)-तदाभासा अनीचित्यप्रवर्तिताः ।- :. तदाभासा रसाभासा भावाभासाइच।
चलने लगी। जब तक रूठी हुई प्रिया का थालिंगन करके सँकड़ों मीठे वचनों (चाटु-मनौती) से मैं उ को मना भी न पाया या कि तब तक दुष्ट विधाता ने मुर्झ निद्रारहित कर दिया। मुझे ऐसा निश्चय है (जाने निश्चिनोमि ॥४७॥ :- ' इस उदाहुरस में विधाता के प्रति 'ध्रस्या' (प्रभिव्यक्त हो रही है)। । : प्रभा-जाने' इत्यादि प्रधान रूप से व्सित व्यभिचारी भाव का उदाहरण है। यह किसी कान्ता-विपुक्त की अपने मित्र के प्रति उक्ति है। यहाँ पर शठता के वरंन रूप अनुभाव द्वारा नायक की विधाता के प्रति पमूया प्रधानरूप से प्रतीत हो रही है। 'जाने', 'शठ' इत्यादि शब्दों से अपकारिता का निर्णय हो जाने के कारण 'अमूया' का प्रकर्ष' व्यक्त होता है। यहाँ विधि आलम्बन है, विधाता की दुजनता उद्दीपन है, उसे दाठ कहना अनुभाव है। प्रधान रूप से व्यक्त किर्या हुआ :मसूया' नामक व्यभिचारी ही यहाँ 'भाव' पद वाच्य है। अतः यहाँ पर 'भाव क़्वनि' है। अ्मनुवाद्-भ्रनुचित रूप में प्रयुत्त होने वाले रस तथा भाव ही रसाभास एव भावाभास कहलाते हैं। [कारिका मे] तदाभास का भभिप्राय है-रसाभास तथा भावाभास। प्रभा-भरतमुनिप्रभृति काव्य-नाट्य कोविदों ने रस तथा भाष आदि की भिव्यन्जना के हेतु बु नियम निर्धारित किये हैं। वे नियम शास्त्र-मर्यादा यां लोक-मर्यादा को ध्यान में रखकर निश्चित किये गये हैं। इसी से मुनिपत्नीविषयक रति आदि का वर्शन प्रतिपिद्व या वर्जित माना गया है। इसी 'प्रकोर अ्न्य रसों में भी कुछ वर्णन प्रतिपिद्ध माने जाते हैं। यहाँ पर शास्त्र तथा लोक का उल्लंघन करने वाले प्रतिपिद्धविपयक वणन ही अनुचित रूप में 'प्रवृत्त होने वाले कहे गये हैं,। जो रस या भाव अनुचित रूप में प्रवृत्त होते हैं, वे ही -रसाभास या भावाभास कहलाते हैं। इस अनौचित्य का निश्चय सहुदयों के द्वारा ही किया जाता है। जहाँ सहृदयजनों के मतानुसार रसादि की अनुचित प्रवृत्ति है वहीं रसाभास आदि हो जाते हैं। जैसे-शृद्गार, में उपनायकादि विपयक रति-वएन रसाभास ही कहा जाता है।। इसी प्रकार गुर आर्दि को आ्रलम्वन मानकर 'हास' या क्रोध का बंन हास्पाभास या रौद्राभास होता है। म्राह्मसबध आदि के प्रति उत्साह पपवा नीचपान-
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१६२ काव्यप्रकापा :.
तन्न रसाभासो यथा- स्तुम: कें वामाक्ि, चएमपि विना यं.न रमसे चिलेमे क: प्राणान् रएमखमुखे यं मृगयसे। सुलग्ने को जातः शशिमुखि, यमालिङ्गसि बलात् तप: श्रीः करयैपा मदननगरि, ध्यायसि तु यम ।४८।। स्य उरसाह वीर रस में, उत्तमपान गत भय का वर्णन नयानक में तथा नीप पात में दम का वर्सन शान्त में रसाभास होता है (ना० द० ३-२६२-२६४)। टिप्पी :- (i) वास्तव में भारतीय साहित्य मे आद्शवादी हष्टिकोय के परिणामस्वरप ही रसाभारा आदि की विवेचना की गई है। यहाँ 'काय्य काव्य के तिये' (Poetry for the sake of Poetry) को शिद्धान्त नहीं माना गया पपि सु 'काव्य जीवन के लिए है' (Poetry for the sake of life) भथवा काम्य जीवन के उत्कयं के लिए है' यह पुरुपार्थ-चतुप्टय का साधन है-यह सिद्धान्त माना गया है। इसी हेतु लोक तथा शास्त्र का अतिक्रमण करके प्रवुत्त होने वाले रसादि को मनोचित्य-प्रवृत्त कहा गया है तथा उन्हें 'रसाभास' आदि नाम दिया गया है। (ii) कुछ साहित्याचार्यों के अनुसार पशु-पक्षिगत रत्यादि का वहान आमास- रूप ही है। ऐसा प्रतीत होता है कि काव्य-प्रफाशकर के अनुसार पशु-पदिगत रत्यादि वरणन में भी रस-चर्वशा होती है, ययोंकि काव्य-प्रकाश यत्ति में शपोवान- झाभिरामम्' इत्यारि मृगविण्यक भयानक रस का उदाहरण (४१) दिया गया है; तथा 'मिन्न ववापि गते' इत्यादि (३४४) में विपतम्भ शृद्धार में भी तिर्यग्विपमक रति का उदाहरसा दिया गया है। (iii) रसास्वादन के पदचात ही रस के मनीभित्य का योध होता है सपा समी यह प्रतीति होती है कि यह रसाभास है मसएव यहां इस प्रकार रसमद्त नहीं हो जांता जिस प्रकार याच्य-वाचक के अनोनितय से हो जाता है। इसी से रवनदोषों में इसकी गएना नहीं होती। अनुवाद-नन (रसाभास तपा भावाभारा) में रसाभासा (मह) है, जमे- 'हे सुन्दर मेत्रों थासी, हम (उस) किस (भाग्यशासी) को प्रसंसा कहे? जिसके बिना तुम क्षएा मर को भी प्रसन्न नहीं रहती। जिसे तुम सोजती हो, वह ऐसा कोन है मिसने संप्रामकषी मम (मस) के सम्मुत (पूयजन्म में) आासा समदिन किये हैं (बिलेने=दत्तवान्) (सभी त्षो वह सुम्हारे द्वारा सम्मेवलरपी रवर्म का प्रपिकारी दधा, यह भाव है)। भरो चन्द्रमुसी, जिसे तुम'बलात् सामिज्वन करती हो यह सुमुहते में उत्पम्न दप कौन (पुवक) है? भरी कामदेव की मगरी, मिस्का सू ध्यान करती है, उस किसकी यह सपस्या में भमित सम्प्ति (तपः थी रूपोजग्या
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चतु्य उल्लास: :१६३
अ्नत्रानेककामुर्फतावपयमभिलापं तस्याः 'स्तुम' इत्याद्यनुगतं बहुव्या- पारोपादानं व्यनक्ति। भावाभासो यथा- राकासुधाकरमुखी तरलायताक्षी सा स्मेरयौवनतरद्वितविभ्रमाङ्गी। तत्कि करोमि विद्धे कथमत्र मैत्री तत्स्वीकृतिव्यतिकरे क इवाभ्युपायः॥४६॥ । अत्र चिन्ता थनोचित्यप्रवर्तिता। एवमन्येऽप्युदाहार्याः। यहाँ पर उस (सुन्दरी) के 'सतुम.' इत्यादि से सम्वद्ध (अनुगत) (रमण- प्रन्येषख आदि) बहुकामुकविषयक (बहुषु ये व्यापाराः) व्यापारों का ग्रहस (उपादान) उसकी अनेक कामुकविषयक अभिलाया को व्यक्त करता है ।पन तस्याः 'सतुमः' इत्याद्यनुगतं बहुव्यापारोपादान (तस्या) प्रनेकामुकविषयमभिलायं व्यनकत्ति-यह अन्वय है] प्रभा-स्तुमः इत्यादि किसी कामुक की वेश्या या परकोया के प्रति उकि है। इसमें नायिका के बहुकामुकविपयक रमसा, अन्वेषण आादि व्यापारो का वर्णन किया गया है अतएव नायिका की अनेक कामुकविपयक अभिलापा प्रवाट होती है श्रौर यहा बहुनायक विषयक रति का वरणन है। इसी से यह रत्याभास है।
उल्लेख किया है- टिप्परणो-रत्याभास का परिगणन करते हुए साहित्यदर्पसकार ने निम्न
उपनायकसंस्थायां मुनिगुरुपतनीगतायां च। घहुनायफविषयायां तथानुभयनिष्ठामाम् ग प्रतिनायकष्ठित्वे तद्वदथमपात्रतिर्यगाविगते। शृङ्गारेग्नौचित्यम्-[सा० द० ३.२६३] अनुवाद-भावाभास (यहाँ है), जैसे- 'वह (सीता) तो ऐसी है, जिसका मुख पूलिमा के चन्द्रमा के समान है, जिसके नेत्र चञ्चल तथा दोर्घ हैं, जिसके भ्रद्भों में अभिनव यौवन (स्मेरम् ईपत्प्रकाशं नूतनम्) से विविध विलास (विभ्रम) तरंगित हो रहे हैं [स्मेरयोवनेन तरजिंता: विभ्रमा: पेपु तथामूतानि प्रद्गानि यस्या: तादुशी । तो मैं क्या कर ? इस (सीता) में मित्रता किस प्रकार कर' ? उसकी (यह मेरा है इस प्रकार की) स्वीफृति के सम्बन्ध में (व्यतिकरे) कौनसा उपाय है? पर्यात् कोई नहीं ॥४ह॥ .. " यहाँ पर अनुचित रूप से प्रवुत होने बाला 'चिन्ता' नामफ भाव है।'इस # प्रकार सन्यों (रसाभास तथा भावाभास) के भी उदाहरख दिये जा सफते हैं। प्रभा-'राका' इत्यादि भावाभास का उदाहरा है। यह सीता के प्रति रावण की उत्ति है। यहाँ 'चिन्ता' रूप व्यभिचारी भाव की प्रधानता है किन्तु यह चिन्ता अनुचित रूप से प्रवृत्त होने वाली है। इसके अनोचित्य के विषय में व्यांख्या- फारों के विभिन्न मत है। कुछ व्यास्याकारों का 'कथन है-'साहित्यश्ास्त्र की दृष्टि से भौचित्य यह है कि पहले स्भी के राग का वरंन किया जाय तब पुरुष के राग
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१६४ काव्यप्रकाश:
(५०) भावस्य शान्तिरुदय: सन्धि: शवलता तथा ॥३६॥ क्रमेणोदाहरएम्-
: कि वत्तरचर एारऽऽन तिव्यतिकर व्याजेन गोपाय्यते। : इत्युक्ते पच तदित्युदीर्य सदसा तत्संप्रमाष्टु मया साऽडर्लिप्टा रभसेन तत्सुसवशातन्व्या च तद्वित्मृतम्।५०l अत्र कोपर्य।
का; किन्तु यहां पर अनुरागरहित सीता में रावस के भनुराग का वणन किया गया है मतः यहाँ पर रविभाव अनोचित्य-प्रवृत्त है और उसका व्यनिचारी भाव ओ 'चिन्ता' है वह भी अनीचित्य प्रवतत है।' उद्योतकार के मतानुवार सो 'मेंत्री वर्य विदये' इस कयन से मैभी का पभाव सिद्ध ही है अतः मननुरक सीता के प्रति यहा रतिभाव प्रफट किया गया है जो उमयनिष्ठ न होने के कारए मनुचित है सपा सद्विपयक 'चिन्ता' अनीनित्य-प्रवत ही है। अ्रनुचाद-भावशान्ति, भावोदय, भायसन्यि तथा भावशवसता (ये भाषणा- नमादि है) इनके नमदः उदाहरंस आगे दिये जाते हैं-,
भावशान्ति आदि का उल्लेस किया गया है। वे मावशान्ति मादि धार है जो ऊपर की कारिका मे बतनाये गये हैं रपभिवारी भावों की घार दगापों के कारण ही ये चतुविध माने गये है-उत्पत्तिसन्पियावत्यान्तयो व्यभिपारियाम्। ददा दचतस एव स्पु: । अनुवाद -- (भावशान्ति) उस (सपरनी) के यने (सान्) (बगन पादि) मनुलेपन वाले र्तनप्रदेश के माठासिंङ्गन (प्रलेय) के बिग्हों से सुर्ु सपने यदस्पल को मेरे परसों पर प्रसाम करने के बहाने से (परएयो: आामलेः वयतिकर: सम्चद्ध: तव्द्यागन) क्यों छिपाते हो ?- नादिका के यह कहने पर (बदुषती) मैने "यह (मुद्रा बिह्न) कहाँ है? 'यह कटुकर (उदीय) सहता उस पिस। को मिटाने के लिये वेग से (रभसेन) उसका मालिसन किया औोर उस पसादो में का पालिदन के गुस से उससो भुला दिया*॥।%।। : यहाँ पर कोप (स्यमिवारी भाव) की शाग्ति है। प्रभा-'तस्याः' इरयादि नाम गान्ति का उदाहरत है। यह समरयमक क पद है। कोई पुप्ट नायक घपनी साक्टिरिता नामिका के कोप दमा कोरयाग्त के मशंन कर रहा है। यहों पर सामाजिक को भो रगारवाद होता है उष्में कोरखम भाव की शान्ति ही विशेष रूप से समसारूर्व है।
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चतुर्थ उल्लास: १६५
एकस्मन् शयने विपक्षरमसीनामग्रहे मुग्घया सदो मानपरिमहग्लपितया चाटूनि कुर्वन्नपि। आवेगादवघीरितः प्रियतमस्तूप्णी स्थितस्तत्तरां मा भूतसुप्त इवेत्यमन्दवलितमोवं पुनर्वीचितः।।५१।। अरत्रोत्सुक्यस्य। दत्सिक्तस्य तप: पराक्रमनिधेरभ्यागमादेकतः सत्सङ्गप्रियता च वीररभसोत्फालश्चं मां कपतः। वैदेहीपरिरम्भ एप च मुहुश्चैतन्यमामीलय-
अत्नावेगहर्षयोः। न्नानन्दी हरिचन्दनेन्दुशिशिर: स्निग्घो रुणद्धथन्यतः ॥५२।।
.अनुवाद-(भावोदय) एक हो शय्या पर (पड़ हुमे नायक के द्वारा) सपती का नाम प्रहए किये जाने पर 'मुग्धा (नायिका) तत्काल ही मानप्रहणा से खिन्न हो गई तथा उसने घाट वचन कहते हुए नियतम का भी कोधावेश(आवेगात्) 'वह सोया सा न हो जाय' इस प्रकार (उत्सुकता से) गर्दन को बहुत तिरछा करके (भमन्वं वलिता यकिकृता पीया यत्र तद्यथा स्यात् तथा-क्रियाविशेषण) देखां ।X१॥ {i-i यहाँ पर औतसुक्य (नामक भाष) का सबय है। - प्रभा-'एकस्मिन' इत्यादि भावोदय का उदाहरण है,। यहम मरुशतक क़ा पद्य है। यहाँ पर औत्सुक्य रूप व्यभिचारी भाव का उदय हुदय को चमत्कृत करता है। इसी से यह 'भावोदय' नामक व्वनि का स्थल है। यवपि यहाँ कोपशान्ति भी है तथापि वह चमतकाराधायक नही; क्योंकि उस्षके अनुनावों की यहाँ वर्ना नहीं की गई। अनुाद्-(भावसन्धि) 'गर्वयुक्त, तपस्या और पराक्रम के निधि परशुराम के आगमन से एक और तो सत्सङ्ग का प्रम तथा विरोचित उत्साह का उद्रेक (वोरस्य रभसः उत्साह: तस्पोत्फाल उद्द कः। मुभको सोंच रहा है और दूसरी ओोर मानन्दवायक, बार २ चतन्य को विषयान्तर से हटाने वाला, हरिचन्दन औौर इन्दु के समान शौतल तथा स्निग्ध (हरिचन्वनेन इन्दुना च समं शिशिर. घासौ स्निग्धः घ) सीता का पालिङ्गन भुझे रोकता हैं।।४२।। महां पर पावेग तथा हर्य की सन्धि है। 1'प्रभा-'उस्सिक्तस्य' इत्यादि भाव-सन्धि का उदाहरण है। यह महावीर धरित नाटक का पद्य है। यह परधुराम के आ्रगमन पर राम की उक्ति है। यहाँ पर आवेग रूप व्यभिचारी पूर्वाद्धगम्य है तथा हर्परूप व्यभिचारी उतराद् गम्य है। इन दोनों का एक साथ आस्वादन होता है अतएब दोनों की मिलन रूप सन्धि होने 74 से यहाँ भावसन्धि है।
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५६६ • मव्यप्रंकाश:
कवकार्य शशनदमण क्व च कुलं भूयोगपि टशयेत सा दोपाणां प्रशमाय नः श्ुतमद्दो कोपेग कान्तं मुखम्। किं वच्यन्त्यपकल्मपा कृतविय: स्वप्नेऽ्रपि.सा.दुर्लभा. .. चेतः स्वास्थ्यमुपैदि क: खलु युवा धन्योगघरं घास्यति ।।५३।।
भावस्थितिस्तूक्ता उदाहवता च। अनवाद-(नायशयलता) 'कहाँ तो (मेरा) यह अनुचित का्य (उबशी- प्रम) औौर कहाँ चन्द्रमा (दशः लक्ष्म पिन्न' यस्य तस्य) का फुल। (वया धपपा हो कि) फिर भी यह दिखाई पड़े। हमारा शास्त्र- थपरा(थृत) दोषों के निवारस के लिए हो तो है? यहो ! क्रोध में भी उसका गुल सुन्दर था। पापहोन (भपग्त फल्मपं येम्य: सावुंशाः) तथा सवाचार में बुद्धि रसने वाले (कृते सवाचारे थी. मेव ते) कया कहेंगे ? अरे वह तो श्वप्न में भी दुनंभ है। हे चित, यू स्वस्पता को प्राप्त हो (धैयं धारस कर)। मरे, कौन भाग्ययान् ुयफ है जो उस मुन्दरी का प्रथर पान करेगा ?' ॥५ ३। यहाँ पर (कयाकारय समसकमणा: पन व कुसम्-में श्यङ्रप) बितक, (भुपो- 5वि वुश्पेत सा ममा-में) सोत्मुष्य, (वोपास प्रशमाय नः श्र्सम्-में) मति, (कोपेडवि कान्तं मुसम्-में) स्मरल, (कि वक््पन्ति आाषिं में) शस्द्ूर (स्वप्नेि सा दुरंभ-मे) वन्य,]चितः स्वास््यमुर्षहि-में) पूति तथा (कः रसु युया धन्योऽपरं धात्यति-में] चिन्ता नामक [मनेक] भायों की सबलता है। भावस्यिति तो ऊपर कही गई है तमा उदाहरल भी किया गया है। प्रभा-'वाकार्य' इत्यादि भावनवलता का उदाहरए है-विनमोनंगीय के इस पद्य में उपसी को देखकर राजा विकम वह रहे है। जहां प्रतोममोन उतरोतर भाव पूर्व पूर्य-माव को उपम्दित करके चगतार उत्पम करो है, पहाँ भावशयसमा यही जाती है भाष सन्धि में फेवल दो भावों का योग होता है बिन्तु भावन बसता में दो मे अधिक भावों मन योग रहता है। यहाँ पर पूर्व २ बिसकें आदि भाष का उपम्दन करके (पाधवर) उतरोसर पत्मुन आदि (प्रतीयमान) भाव सहदय सामाजिकों में नमराधाबर होते हैं मतएन यह भावशबनता है। महा बिसर्ह आादि ८ भावों की सबलता है। (२) मार्या्मति-परि कोई घढ्ता करे कि भाव शान्ति पादि के समान मायस्थिति भो भावों की एक मवस्या है वह यृथक बमों नहीं करो गयी ? तो इसका रामाधान यही है कि 'भाव शान्ति' मदि अवरयामों ना सभाब हो भार्वस्यतिहै पठः यह पूर्य निमपति '्भाव' द्ारा हो गठापं हो गई। उर निषस्य '्यभभारी सपाश्थिस:' (सून x८) में रिया गमा है औौर उसशा उदाहरस 'ोतरादमुखी' हत्यादि दिया गया है।
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चतुर्थ उल्लास: १६७
(५१) मुख्ये रसेऽपि तेऽड गित्वं प्राप्नुर्वन्ति कदाचन ॥ ते भावशान्त्याद्यः । अरद्गित्वं राजानुगतविवाहप्रवृ त्तभृत्यवत्।" ['संलक्ष्यत्रमव्यङ्ग यध्वनि' काव्य-निरूपणम्] (५२) अ्र्नुस्वानाभसंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्थितिस्तु यः ॥३७॥ शब्दार्थोभयशक्त्युत्थस्त्रिघा स कथितो ध्वनिः ।
अनुवाद्-रस के मुख्य होने पर भी वे (भावशान्ति आादि) कभी कभी प्रधानता (पद्वित्व) को प्राप्त हो जाते हैं। (कारिका में) ते घर्ात् भावशान्ति इत्यादि। 'प्रद्गित्व' सर्थात् राजा. के द्वारा किया जाता है अनुगमन जिसका ऐसे विवाह के लिए जाते हुए मृत्यु के समान । प्रभा-यहा पर यह शङ्का हो सकती है कि जहाँ व्यमिचारी भाव प्रधानतया व्यञन्जित माना जाता है वहाँ भी कोई मुख्य रस विद्यमान होता ही है फिर तो वह 'रसध्वनि' ही है वहाँ भावध्वनि आदि कैसे मानी जा सकती है; क्योकि भाव आदि तो रस के अ्रङ्ग हैं अतः ये सभी गौए हैं 'मुख्ये' इत्यादि अवतरण में आचार्य मम्मट ने इनका समाधान किया है। अभिप्राय यह है कि रस के मुख्य होने पर भी कभी भाव आर्दि की प्रधानतया विवक्षा होती है। अन्यत्र अङ्गरूप में स्थितरहने वाले भी ये भाव आदि वहां पर रस की अपेक्षा विशेष चमत्कारक होते हैं, अतएव इन्हें 'भ्रङ्गी' (प्रधान) मानना पड़ता है। इनकी यह प्रधानता आपततः होती है वस्तुतः तो ये रस का ही उत्कर्ष बढाते हैं; जैसे-अपने विवाह के समय कोई राजभृत्य अलङ्कृत होकर अश्वादि पर जा रहा हो फिर राजा उसके पीछे हो, वहाँ पर दर्शकगण भृत्य को देखकर विस्मित हो जाते हैं और फिर राजा की प्रशंसा करते है कि यह कसा अनुग्रहशील राजा है। वहाँ अन्ततः राजा का उत्कर्ष ही प्रकट होता है। अतएव भावध्वनि आदि में भी वस्तुतः रस का ही उत्कर्ष प्रकट होता है। 'भावशान्त्यादयाः' में 'भावश्य शान्त्यादयरच' यह द्वन्द समास है। भाव स्थति तथा भावशान्ति आदि यह भर्थ होता है। अनुवाद-प्रतुरन (भनुस्वान) के समान सदय है क्रम जिसका ऐसे व्यङ्गार्यं की स्थिति जिसमें होती है (पनुस्यानाभः संलक्ष्यः क्मः यस्य सरय व्यङ्गय- हय स्थिति: यत्मिन् सः) वह संलक्ष्यक्रमध्यङ्गय ध्यनि है। यह प्यनि शब्द, 'भ्रभं तथा उभय (शब्द तथा अ्ररथं) की व्यज्जना द्वारा उत्पन्त होने के कारस तीन प्रकार की कही गई है :-
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१६६ काव्यप्रकोशा:
उभयशक्तमूलानुरनरूपव्यङ्गपर चेति त्रिविध:। १ शम्ददक्तिमूलक अनुरसरपध्यद्य २. धमशवितिमूलक अनुरगामरूप- धयद्ुप तथा. ३. उभयशक्तिमूलक अनुरसनपध्यङ्गभ-इस ्यन्तयध्यनि तीन प्रकार की है। भांति संलश्यभम
प्रभा-असंलद्पयमव्यन्गमध्वनि का निरपण करने के परचाद् भाचाय मम्मट 'अनुस्वान इत्यादि कारिका द्वारा संसक्ष्यकमध्यन्ुष ध्वनि के स्वर्प"तपा" प्रकारों का निर्देश करते है। अनुस्वांन का धर्थ है-मनुरशन, घण्टा भादि बजाने केपरचात प्रधान शब्द की प्रतीति के अनन्तर जो हल्का सा शब्द निकसा करता है वही अमुरणनं कहलाता है। वहां मुस्य शब्द तथा अनुरंन का कम स्पप्टसः प्रत्ीव हुमा करता है। इसी प्रकार जिस 'उयनिकाव्य" में 'व्यञ्जक एवं 'व्यन्भप का' कम अर्यात् पौर्यापर्यभाव प्रतीत होता है, वह संसक्ष्यममव्यद्वप म्वनि है। यहां शब्द, थये तथा शन्दार्थ (उभय) तीन प्रकार की व्यज्जनाशरित द्वारा अनुरसारूप व्यङ्धारयं की प्रवीति होती है, इसी हेतु यह संसक्ष्मकमध्यन काव्य तीन प्रकार का माना गया है- (१) शब्दरावितमूसापुरणनसवध्यन्भप- इसमें शब्द (गब्दी स्ञ्जन) द्वारा वरतु या मलद्धाररप अनुरसनसटतव्यङ्गपार्य को समिव्यक्ति होते है। इसे चकदयवितमूलक इस हेतु कहा जाता है कि जिस शब्द से जो व्यनपार्य प्रकट होता है उसके पर्याय शब्द द्वाग वह व्यद्धपारयं प्रफट नही होता सर्थाद गम्द परिवर्तन से यह अर्थ नहीं निकलता इममें 'शब्द पर्वृत्यसहृत्व' ह। (अग्याि मूलत्वं घ एतवेघ, मत नैव शब्देन सबपं-प्रतीतिनं सु पर्यामान्तरेसावि-प्रवप। इसबा 'मन्ददावस्ुन्धूब' भी कहते हैं। (२) पयंशविछिमूसानुरसनस्न्म्पभ्गप-इगमे वर्प (मार्षी व्यञ्जना) के द्वारा रनुरसनसस व्यसपार्थ की मभिव्यकि होती है। इमे सर्थदक्तिमूसफ कहूने या भभिप्राम यह है कि किसी गब्द के पर्याय द्वारा भी यही अर्य ममिम्यक्ष हो जाता है पर्थात् पर्याय प्रयोग करने पर भी वह उपममार्ये बना रहता है। दग्म 'शद्दपरियुसिगहृत्व' है। मरे पर्थदनत्यृद्दधव ध्वनि भो बहती है। (३) उनवशकतमलानुस्रप व्यमय-नहा नद् घोर पदं (साभी तथा भार्षी ब्यञ्जना) दोनों मे द्वारा मनुरान महत ब्ङ्मपायं की समिष्ित हांती है। यहाँ गब्द औौर पर्म दोनों ही ब्यद्पार्थ मी प्रसीति करते है भगः मिन्न मिन्न संगो में परियुत्यमह तमा परियूतिसह् 'दोनों प्रकार के सगों की प्रधानत रहसी है। टिएकली-(i) मावार्य मग्मट ने अपतति के प्रमम सो मेद निंप :- १. पविवशितवाच्य (मससान्मूतक) और २. विवशियानमपरवाष्य (पभिभा-
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चतुर्थ उल्लासः १६६
(५३) अलद्दारोऽय वस्त्वेव शब्दाद्यनावभासते ॥३य ॥ प्रधानत्वेन स ज्ञेय: शब्दशवत्युद्धवो द्विधा ॥ वस्त्वेचेति अनलद्धारं वस्तुमात्रम्। १.आघयोयथा- 123
•उल्लास्य कालकरवालमहाम्युवाहं देवेन येन जठरोजितगर्जितेन. निर्वापितः सकल एव रणे रिपूणां धाराजलेस्त्रिजगति ज्वलित: प्रतापः॥२४॥ सूलक)। फिर अविवक्षितवाच्य के १. अर्धान्तर सक्मित तथा २. अ्ह्यन्ततिरस्कृत- से दो भेद किये। विवक्षितान्यपरवाच्य के भी दो भेद किये-१. असंलक्ष्मकरमव्यङ्गय तथा २, संलक्ष्यक्रमव्यज्जय।असलक्ष्यकम व्वनि का विवेचन ऊपर किया जा चुका है। यहां पर संलक्ष्यकम ध्वनि का निरुपए परारम्भ करते हैं। (ii) ध्वन्यालोक (२-९६) मे संलक्ष्यकम स्वनि का विवेचन इस प्रकारकिया गया है। कमेए प्रतिभात्यात्मा योऽनस्वानसन्निभ: शब्दार्थंशाक्तिम लत्वात् सोपि द्वेधा व्यवस्थितः। यहाँ घ्वन्यालोककार ने सलक्ष्यतमव्यङ्गय् ध्वनि के दो ही भेद प्रदशित किये हैं। उभयमूलक घ्वनि का कोई निर्देश नहीं किया। (iii) संलक्ष्यतमध्वनि के निरुपस मे विश्वनाथ कविराज ने मचाय मम्मेट के पथ का ही अनुसरण किया है- + .. . -
शब्दार्थोभयशक्त्युत्ये व्यद्धर्थं इनुरयानसनिमे। ध्वनिर्लकष्यकमव्यस्धस्निविध: कथितो सुरघः । (सा० दर्पण ४-६) अनुवाद-उन (विविध ध्वनियों) में जिस ध्वनि में अतद्गार ' (उपमावि) पथवा वस्तु मात्र शब्दों द्वारा प्रधान रूप से अ्भिव्यक्त होते हैं वह शब्द की शकि से होने चाली (शब्दशकतपुद्भव) प्वर्नि (अतङ्धारध्वति और वस्तुध्यनि मेद से) 'बो प्कार की है। (३८) (कारिका में) वस्त्वेव (वस्तु-+एव) का अरभिप्राय है-अलङ्गाररहित वरतु- iv, i मात्र। मभा-संलक्ष्यक्रम ध्वनि के उपयुक्त तीन भेदों में से प्रथम 'अर्थात् 'शब्द- दाक्त्युद्दभव ध्वनि के दो भेद है-१. अलङ्गारध्वनि, २. वस्तुव्वनि। अलद्वार ध्वनि में शषाब्दी व्यञ्जना के द्वारा अलङ्गाररूप व्यज्नघार्थ होता है। वही सहृदयों के लिये विशेष चमत्कारजनक हुआ्र करता है। वस्तु ध्वनि मे केवल वस्तु की ही शान्दीव्य कजना द्वारा प्रतीति हुआ करती है। यद्यपि अलद्वार भी 'वस्तु' के अन्तर्गत भा जाते है तथापि अलद्धाररूप व्यङ्गय और अलद्वार-भिन्न व्यङ्गय (वस्तुमान) को गोवली- वदन्याय से पृथक-पृथक दिखलाया गया है। ) अनुवाद-भाध् (पहता) मर्यात् शन्दशत्तिमूलक प्रतद्धार धवनि का
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१७० कंाव्यप्रकाय:
श्त्र वाक्यरयासम्यद्धार्थाभिवातकत्वं मा प्रसाड्क्षीदिति प्राकरसि काप्राकरणिकयोरुपमानोपमेयभावः कल्पनीय इत्यत्रोपमालक्ारो व्यङ्गप:। तिग्मरुचिरप्रतापो विधुरनिशाफृद्विभो, मघुरलीलः। मतिमानतत्त्ववृत्तिः प्रतिपदपक्षापसीविभाति भवान्।।xx।l अत्रैकेकस्य पदश्य द्विपदृत्वे विरोधाभासः। उदाहरण है-[प्रकरण प्राप्त राजपक्ष में] फकठोर (जठर) और बसवत् (कमित) सिहनाव करने वाले जिस राजा ने (वेवेन) शत्रुसंहारक (काल) लडग की महती धारा रूप जल के विस्तार (पम्बु धाराजलं तत्य वाहः प्रसरशम्) को प्रसरता द्वारा धमिकु करके (उल्लास्य) सड्गधारा की कान्तियों (जल-पानी) द्वारा नरिनुवन में जगमगाते हुए अपने शभुपों के समस्त प्रताप को सप्राम में घुझा दिया (निर्वापित:)'। (पपाकरसिक इन्द्र पक्ष में] गगम्भीर गजन करने वासे जिस इन्द्र (देव) मे त्रिभुवन में धर्या सूघक [कालकर-कप्ररिमम् सथया वर्यासूचकं कासं वर्णाकातं करोति प्रफटमति इति] नवोन मेघ को (वालाम्युवाहम्) प्रकट करके जलपतन के कोलाहल बोच (रस) भूससाधार जल से जल के शयुमों भर्मात् सूर्यं पादि का प्रकुष्ट (सकस) ताप शान्त कर किया।' (यह व्यद्नधारमं है) ।४४॥ यहाँ पर धार के असम्बद्ध-पयं कथन का सवसर न था जाय इस हेतु प्रकरण से प्राप्त (राजा) तथा प्रकरण से भिन्न (इन्) में उपमानोपमेम भाय को कस्पना करनी होती है; पतएय यहाँ उपमालद्वार व्वस्प है। प्रभा-'उम्लास्य' आदि पद्य में प्रकरण के द्वारा अभिभा-ाकति राज-प्रताप के वणन में नियन्तित हो गई है फिर भी यहा एक अन्य (इ्द्र गम्बन्भी) भपं मतीत हो रहा है। गतः यहां प्राकर्शशर राजप्रतापन्यन वाच्यार्थ है तथा धमारुरलिक इन्द्र-प्रताप-वरणन व्यन्नपार्य है। यदि इन दोनों अभों में कोई पारतपरिक सम्बाय न माना जाय सो नात्य पराम्यद-मय का अरभिधामक होने लगेगा सपवा यह महा जा सकना ह कि जब 'करवालम् उल्लास्य' यादि महने से ही प्राकरसिक भर्य सभ् प हो सकता है तो उसमे 'कात' विसेषस निर्थक हो जायेगा इसलिए वाक्य ससम्य- दर्य का अभिपामक होगा। इस दोय के निवारण हेतु यहों पर राजा तपा इन्द्र में सादृदय सम्बन्य मानना उषित है। इसीसिए दुस काब्य में प्रधान कप से उपमाससार ही व्यसय है, यही मधिक पमरकारक है। यह मतद्तररूप व्यन्तपार्य शाब्दरी स्च्न- ना का नियय है; पर्योंकि यहो परिवृत्यह दाब्यों का प्रयोग किया गया है, यदि 'देवेन' के स्यान पर 'भूपेन' मदि का प्रयोग कर दिया जाय तो उपयुंक ययद्रपाये अनन्ट न हो सकेगा। अनवाद-'हे राजन् (बिभो), पाप (दुप्टों पर) कडोर तथा (सरशनों पर) मनोहर प्रताप याते, सपुस्रों के संहारक (दिमुरला सपूएा मिशेष निया मरर्स, तरकर्ता), मपुर येष्टामों याने, मति घवर्पात् बुद्धि औौर भान अर्पान् भ्रमास (
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चतुर्थ उल्लास:
शरमित: समितः प्राप्तैरुत्कर्पह्पद, प्रभो, श्रहितः सहितः साधुयशोभिरसतामसि ॥५६॥ अन्नापि, विरोघाभांसः। I . निरुपादानसम्भारमभित्तावेव तन्वते। जगच्चित्रं नमस्तम्मे कलाश्लाघ्याय शुलिने ।।५७।। बोनों के) द्वारा तत्त्व (ययार्थ वस्तु) में व्यवहार (यृत्ति) रखने वाले, पग-पग पर स्वजनों (पक्ष) के मार्गदर्शक (भग्सी) होकर शोभायमान है।।५X॥ : यहाँ पर एक एक पद के (तोड़कर) दो-दो पद बना लेने पर विरोषाभास मलङ्गार (शाब्दो व्यञ्जना द्वारा) व्यङ्य है। प्रभा-'तिग्म' इत्यादि सभङ्गपदमूलक विरोधाभास (अलङ्कारध्वनि). का उदाहरण है। यहाँ एक एक पद मानने पर प्राकरणिक अर्थ प्राप्त हो जाता है। प्रकरणं आदि द्वारा अभिधाशक्ति राजविषयक (विरोधरहित) अर्थ में नियन्त्रित हो जाती है; किन्तु सहुदयो को एक एक पद की दो दो पदों के रूप में प्रतीति होने से अ्रपाकरणिक विरोध का आभास भी होता है। जैसे- ।''तिग्मरुचि:+श्रप्नतापः,-गूर्य होकर भी प्रताप रहित, 'विधुः+अनिशाकृ्स'- चन्द्रमा भी रात्रिकारक नहीं, 'विभ:+विभाति'-भा (दीप्ति) रहित होकर भी दिप्तिमान्, 'मधुः+अ्रलील:'-वसन्त भी लीलाशून्य, 'मतिमान्+अतत्ववृत्ति:'- बुद्धिमान् भी मिथ्यावस्तु में रुचि रखने वाला, 'प्रतिपद्+अपक्षाग्रणीः'-प्रतिपदा तिथि होकर भी पक्ष (पखवाड़ा) की आदिभूत नहीं। 'यहां विरोधाभास शाब्दी व्यञ्जना द्वारा ध्वनित होने वाला मलद्वार है भतएव यहाँ अलक्ुारध्वनि है। अ्रनुचाद्-'हे (शत्रुओं के लिये) मानन्द के नाशक (हर्ष द्यति सण्डमति इति) तथा (मिग्रों के लिये) आनन्ददायक (हर्प ददाति इति) प्रभो, भाप संग्राम से (समितः) प्राप्त उत्कषों द्वारा प्रसीमित (श्रमित) हैं, दुप्टों के (भ्रसताम्) शत्तु हैं, उत्फृष्ट कीतियों से युक्त हैं (असति) ॥५६॥ यहाँ पर भी विरोधाभास (प्रधान सप से) उयड्ग्य है। प्रभा -- 'अमितः' इत्यादि अभङ्गपदमूलक, विरोधाभासालद्गार ध्वनि का उदा- - हरण है। यहाँ पर प्रकरणादि से अभिधाशक्ति उसयुंक्त अर्थ मे निमन्त्रित हो जाती है तथा पद-्भङ्ग के बिना ही प्रतीत होने वाले द्वितीय अर्थ में विरोधाभास व्यङ्गष है। जैसे -- परिमाणयून्य (अ्रमितः) भी परिमासहित (समितः) हितरहित (त्हितः) भी हितसहित (सहितः)। यह भी उल्लेखनीय है कि जहाँ 'अपि च' आदि विरोधव्यञ्जक शब्दों' का प्रयोग होता है वहाँ विरोधाभास वाच्य होता है अन्यत्र व्यङ्गय होता है-'मवि शब्दादेविरो पत्यञजकस्य भावे वाच्यत्वम् तदभावे ध्यद्त पत्वमिति-प्रदीप: । अनुवाद-'बिना (तूलिका सदि) उपकरस सामग्री के तथा बिना सामार
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२७० काव्यप्रकाश:
शत्र वाक्यस्यासम्यद्धार्थाभिघातकत्वं मा प्रसाङ्क्षीदिति प्राकरणि काप्राकरसिकयोरुपमानोपमेयभावः कल्पनीय इत्यत्रोपमालद्कारो व्यङ्थः। तिग्मरुचिरप्रतापो विधुरनिशाकृद्विभो, मघुरलीलः। मतिमानतत्त्ववृत्ति: प्रतिपद्पक्षाप्रणीविभाति भवान्॥४४।। अन्रैकेकस्य पदस्य द्विपदत्वे विरोघाभास:। उदाहरस है-[प्रकरण प्राप्त राजपक्ष में] 'कठोर (जठर) और बलवत् (कजित) सिहनाव करने वाले जिस राजा ने (देवेन) शब्रुसंहारक (काल) खड़ग की महती धारा रूप जल के विस्तार (प्रम्बु माराजल तस्य वाहः प्रसरणम्) को प्रसरता द्वारा अधिफ करफे (उल्लास्य) खड्गघारा की कान्तियों (जल-पानी) द्वारा त्रिभुवन में जगमगाते हुए अपने शत्रुद्रों के समस्त प्रताप को संग्राम में बुझा दिया (निर्वापितः)'। भप्राकरणिक इन्द्र पक्ष में] गगम्भीर गर्जन करने वाले जिस इन्द्र (देव) ने त्रिभुवन में वर्षा सूचक [कालकर-कृष्हरश्मिम् अ्रथवा वर्यासूचक काल, वर्षाकालं करोति प्रकटयति इति। नवीन मेघ को (बालाम्युवाहम्) प्रकट करके जलपतन के कोलाहल बोच (रसे) मूसलाधार जल से जल के अ्तुमों अर्थात सूर्य आदि का प्रफुष्ट (सकल) ताप शान्त कर दिया।' (यह व्यङ्धार्य है) ॥४॥ यहाँ पर वाक्य के असम्बद्ध-अर्थ कथन का भवसर न भा जाय इस हेतु प्रकरस से प्राप्त (राजा) तथा प्रकरण से भिस्न (इन्द्र) में उपमानोपमेय भाव की फल्पना करनी होती है; अतएब यहाँ उपमालद्वार व्यङ्गय है। प्रभा-'उल्लास्य' आादि वद्य में प्रकरण के द्वारा अभिधानक्त्ति राज-प्रताप के बणंन मे नियन्तित हो गई है फिर भी यहाँ एक भन्य (इन्द्र सम्बन्बी) अर्थ प्रतीत हो रहा है। अतः यहाँ प्राकरिक राज-प्रताप वणन वाच्यार्थ है तथा अपराकरलक इन्द्र-प्रताप-वर्णन व्यङ्गयार्थ है। यदि इन दोनों अ्ररथों में कोई पारस्परिक सम्बन्ध न माना जाय तो वाकय असम्बद्ध-अर्य का अमिधायक होने लगेगा अथवा यह कहा जा सकता है कि जब 'करवालम् उल्लास्य' आदि कहने से ही प्राकरणिक अर्थ सम्प न हो सकता है तो उसमें 'काल' विशेपस निरर्थक हो जायेगा इसलिए वाक्य असम्ब- दार्थ का अ्भिषायक होगा। इस दोप के निवारण हेतु यहां पर राजा तथा इन्द्र में सादृश्य सम्बन्ध मानना उचित है। इसीलिए इस काव्य में प्रधान रूप से उपमाससोद ही व्यङ्गय है, वही अधिक चमत्कारक है। यह अलद्धाररप व्यङ्गपार्प शाब्दी व्य्ज- ना का विषय है; ययोंकि यहाँ परिवृत्यसह शब्दों का प्रयोग किया गया है, यदि 'देवेन' के स्थान भर 'भूपेन' आदि का प्रमोग कर दिया जाम तो उपयुंक्त व्यद्तपार्य प्रकट न हो सकेगा। अनवाद-'है राजन् (विभो), आ्रप (दुष्टों पर) कठोर तया (सज्जनों पर) मनोहर प्रताप वाले, वयुओं के संहारक (विधुरासा-शपूरला निशेष निश्ा मरख तस्कर्ता), मधुर चेष्ठापों याले, मति अर्थात् युद्धि और मान चर्थात् प्रमार (इन
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धंतुर्थ उल्लास:
शमितः समितः प्राप्तैरत्कपैहर्पद, प्रभो, प्रहिति: सहितः साधुयशोभिरसतामसि ॥५६॥ अ्त्रोपि, विरोघाभांसः । निरुपादानसम्भारमभित्तावेव तन्वते। जगच्चित्रं नमस्तम्मै कलाश्लाध्याय शुलिने।।५७।। दोनों के) द्वारा तत्त्व (यथार्थ वस्तु) में व्यवहार (घृति) रखने वाले, पग-पग पर स्वजनों (पक्ष) के मार्गदर्शक (अप्रणो) होकर शोभायमान है ।५४॥ 7 यहों पर एक एक पद के (तोड़कर) वो-दो पद बना लेने पर विरोषाभास भलङ्गार (शाब्दी व्यञ्जना द्वारा) व्यङ्ग्य है। प्रभा-'तिग्म' इत्यादि सभङ्गपदमूलक विरोधाभास (अलद्दारध्वनि), का उदाहरण है। यहाँ एक एक पद मानने पर प्राकरणिक अर्थ प्राप्त हो जाता है। प्रकरस आदि द्वारा अभिधाशक्ति राजविपयक (विरोधरहित) अर्थ मे निमन्त्रित हो जाती है; किन्तु सहृदयों को एक एक पद की दो दो पदों के रूप में प्रतीति होने से अपाकरसिक विरोध का आाभास भी होता है। जैसे- 'तिग्मरचि :-- अ्रप्रताप:,-सूर्य होकर भी प्रताप रहित, 'विधुः+अनिशादृत'- पन्द्रमा भी रातिकारक नही, 'विभः + विभाति'-भा (दीप्ति) रहित होकर भी दिप्तिमान्, 'मधुः+अ्रलोल:'-सन्त भी लीलाशून्य, 'मतिमान्+अतत्त्ववृत्ति:'- सुद्धिमान् भी मिथ्यावस्तु में रूचि रखने वाला, 'प्रतिपर-अपक्षाग्रणीः'-प्रतिपदा तिमि होकर भी पक्ष (पसवाड़ा) की आदिभूत नही। यहाँ विरोधाभास शाब्तरी व्यञ्जना द्वारा ध्वनित होने वाला अलद्वार है अतएव यहां अलद्धारध्वनि है। : अनुवाद-'हे (शत्रुओ्रों के लिये) आानन्द के नाशक (हर्ष ध्यति सण्डयति इति) तथा (मित्रों के लिये) आनन्ददायक (हर्ष ददाति इति) प्रभो, भाप 'संप्राम से (समितः) प्राप्त उत्कर्षों द्वारा प्रसीमित (प्रमित) हैं, दुप्टों के (असताम्) शातु है, उत्कृष्ट फीतियों से युक्त हैं (असि)' ॥५६॥ यहाँ पर भी विरोधाभास (प्रधान एप से) व्यङ्प्य है। प्रभा-'अमितः' इत्यादि अभङ्गपदमूलक विरोधाभासातङ्कार ध्वनि का उदा- हरता है। यहाँ पर प्रकरणादि से अभिधाशक्ति उपयुक्कत अ्रर्थ में नियन्तिरित हो जाती है तथा पद-भङ्ग के बिना ही प्रतीत होने वाले द्वितीय अर्थ में विरोधाभास व्यङ्ष है। जैसे-परिमाणशून्य,(अमितः) भी परिमाससहित (समितः) हितरहित (अहितः) भी हितसहित (सहितः) । यह भी उल्लेखनीय है कि जहाँ 'अपि च' आदि विरोधय्य्जक शाब्दों का प्रयोग होता है वहाँ विरोधाभास वाच्य होता है अन्यम व्यङ्गय होता है-'पपि शबदादेविरोघव्यञ्जकस्य भावे वाच्यत्वम् तदभाये व्यन्तयत्वमिति-प्रदीप: । अनुवाद्-'बिना (तूलिका आदि) उपकरस सामप्री के तथा बिना
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२७२ 'काव्यप्रकाश:
अत्र व्यतिरेक: ।
के नानाकार (चित्रम्) संसार का निर्माण करने वाले उस (पनिर्वचनीय)' धन्द्रमा की कला से इलाध्य त्रिशलघर (शिव्) के लिए प्रशाम है ।५७।। यहाँ व्यतिरेक अलद्धांर व्यड्ग्य है। प्रभा-'निरुपादन' इत्यादि व्यतिरेकालद्वार ध्वनि का उदाहरस है। मह काश्मीरिक कवि नारायएभट्ट कृत स्तव-चिन्तामणि का पद्य है।" यही पर व्यज्जना द्वारा 'चित्र' शब्द आलेख्य की प्रतीति कराता है तथा 'कला' शब्द मालेस्य किया में कौशल की प्रतीति कराता है और महि-तूलिका मादि उपकरणों द्वारा चिनफलक पर चित्र रचना करने वाले कलाकारों की अपेक्षा महादेव का उत्कर्ष- प्रतीत होने लगता है। यहाँ कलाकार उपमान है तथा शिव उपमेय है अतः उपमान की अपेक्षा उपमेय का उत्कर्प प्रकट होता है, इस प्रकार व्पतिरेक अलद्धार व्यद्तषं है यहाँ चिन्र एव कला शब्द परिवृ्त्यसह है; अतएब यह शब्दशक्तिमूलक अलंङ्गार क्वनि है। अनवाद-'यद्यपि इन उदाहरणों में उपमारूप ध्वनि आदि मलड्गायं (पतङ्कृत किये जाने योग्य, ध्वनिरूप फाव्य) हैं सथापि याह्मसामसन्याय से इन्हें उपमालद्र ध्वनि शादि (अलङ्धाररूप) कहर गया है।।: :/६१".] प्रभा-अलङ्गारघ्वनि मे जो उपमालङ्वार व्वनि आदि के उदाहरण दिये गये है उनमें यह शङ्ा हो सकती है कि इनमें (व्यङ्घ) उपमा आादि की प्रधानता है या नही ? यदि प्रधानता है तो ये अतद्गार कसे ? कयोकि तव तो'ये स्वयं ही धवनिरूप काव्य हैं, किसी अन्य को तो अलाकृत करते नहीं।यदि कहा जाय कि इनकी प्रधानता नही है तो यह काव्य व्वनि कैसे होगा; कयोंकि यहां परं व्यद्थार्थ क्री प्रधानता न होगी। आचार्य मम्मट ने 'अलंकाय आदि भवतरख में इस शङ्दा का समाधान किया है। भभिप्राय यह है कि यहाँ पर 'उपमालद्वार 'आदि' प्रधान रूप से व्यङ्गय हैं अतः ये ही ध्वनि रुग काव्य हैं; मुख्य रूप से सहदयों के भाह्लादक है। यहाँ ये अलद्वार नही अपि व भलक्ाय ही हैं। फिर भी इन्हे अलड्गार कह दिया जाता है क्योंकि ये पहले (वाच्य दशा में) अलङ्गार थे, वाच्यायं की शोभा बढ़ाने वाले थे। लोक मे भी इस प्रकार पूर्वकालिक निमित के आाधार पर व्यवहार किया जाता है जसे-कोई व्यक्ति पहले बाह्मण था किन्तु सत्पश्चाछ् वोद्वभिश्ु अर्थाव श्रंमणा हो गया तो जनसाधारण उसे 'ब्राह्मण शमा' कहता है यद्यपि बौद्ध सन्यासी हो जाने पर वह य्राह्मणत्वादि के वर्ग-भेद से मुक्त हो गया है;। यही ब्राह्मर धमस न्याय कहलाता है। वास्तविक बात तो यह है कि व्यक्तधार्य में वाच्यार्य की-भपेक्षा से ही पधानता मभवा भप्रधानता देखी जाती है, रस की अपेक्षा से नहीं, कयोंकि भलङ्ा
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२. वस्तुमात्रं- पंथिए या एत्थ सत्थरमत्थि मएं पत्थरत्थले गामे। उएसा्पश्ोहरं पेविखिऊणा जइ वससि ता वससु ॥५=॥। (पंथिक, नांत्र स्रस्तरमरि्ति मनाक् प्रस्तरस्थले भामे। उन्नतपयोघरं प्रेदय यदि वससि तदा वस ॥५८॥ पत्र यद्य पभोगक्षमोऽससि तदा आ््स्स्वेति व्यज्चते। शानरशनिश्च तमुचचैनिंहन्ति कुप्यसि नरेन्द्र, यस्मै त्वम्। यत्र प्रसोदसि पुनः स भाष्युदारोऽनुद्दारश्च ।।५६।। सदि व्यङ्गय होते हुए भी रस की अपेक्षा से तो गोए ही रहते है। अतः उपमा- लद्वार ध्वनि आदि स्थमों पर भी उपमा आदि रस के अ्रद्ध ही होते हैं तथा उसको प्रलंडकृत करने के कारण अलक्कार ही है। किन्तु वे वाच्यार्थ की अपेक्षा प्रधान हैं- (प्रदीप)। अनुवाद-'हे पयिक, इस पापासमय (या मूखों के स्थान) ग्राम में अल्प (मनाक्) भी (चटाई आदि) बिछ्ाना नहीं है, किन्तु यदि उठे हुये मेघों (या स्तनों) को देखकर यहां ठहरते हो तो ठहर जाओी' ।५८I यहां पर व्पञ्जना द्वारा यह अपर्थ निकलता है (व्यज्यते) कि र याद उपनोग के लिये समर्थ हो तो यहां ठहरो। प्रभा-'पथिक' इत्यादि वस्तुमान ध्वनि का उदाहरणा है। स्वयंदूति नायिका किसी पथिक से द्वध्थक शब्दों द्वारा अपना भाव प्रकट करती है। यहां वक्तृवेशिष्टय द्वारा इस व्यङुधार्थ की प्रतीति होती है-मूखों (पत्थर) के इस ग्राम में कामशास्त (सस्तरं-शास्त्र) तनिक भी नहीं है उभरे स्तनों को देखकर यदि उपभोग समर्थ हो तो ठहरो। यहाँं पर अलह्ार व्यङ्गय नहीं। अपि तु केवल वस्तुरूप व्यङ्गय है, अरतः यहाँ वस्तुमात्र ध्वनि है। अनुवाद-'हे राजन्, आप जिसके प्रति कुपित होते हैं उसको शनिग्रह (फू र ग्रह) और वस्त बलपू्वंक मारते हैं। जिस पर तो (पुनः) आप प्रसन्न होते है वह (पुरुष आपके दिये हुए वभव द्वारा' उत्कृष्ट वाता (उदारः) तथा सानुफल पत्नी वाला (प्रनुगता दारा यस्य तयाभूतः हो जाता है॥५E।l यहाँ पर-'विरुद्ध, होकर भी (झनि, अशनि). तुम्हारे अनुगमन के लिये एक कार्य करते हैं' यह अयं ध्वनित होता है।'' प्रमा-'शनि' इत्यादि वस्तुमात्न ध्वनि का उदाहरण है। यहाँ पर पूर्वार्ध में व्यङ्चय यह है कि शनि तथा (न+शनि) अपानि परस्पर विरुद्ध है फिर भी राजा की भाज्ञा का पालन करने के लिये एक (हननरूप) कार्य करते हैं इस प्रकार की वस्तुमान को व्यञ्जना होने रे यह वस्तुध्वनि है। दलोक के उत्तरारघ में एक काये करने की प्रतीति नहीं होती अपि तु विरोध ववनित होता है मतः वहाँ परविशेषां- ल्वार व्यङ्गय है। ऐसा प्रतीत होता है कि मसककध्न तथा वस्तुष्यनि के
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क्रमेणोदाइरएम्I । [स्वतः सम्भविनोऽर्यस्य चत्वारो भेदा:]· १. अलसशिरोमणि धुत्ताएं.अग्गिमो पुति घएासमिद्धिमओ्नो।. -! इझ भखिएए एाश्रजी पफ्फुल्लविलोअसा जाश ।६०॥ : 1- (अलसशिरोमणिधू तोनामगिम: पुत्रि, धनसमृद्धिमयः ।।।" -इति भखितेन नताक्षी प्रफुल्लविलोचना जाता ॥६०।। मन्र ममवोपभोग्य: इति वस्तुना वस्तु व्यज्यते,। २. घन्याऽसि या कथयसि प्रियसङ्गमेपि विस्न्ध चाटुकशतानि रतान्तरेप। नीवीं प्रति प्रसिहिते तु फरे प्रियेण सख्यः, शपामि यदि किञ्चिदृवि रमरामि ॥६१॥। अत्र त्वमधन्या त्रहन्तु धन्येति व्यतिरेकालङ्कारः । का हो जाता है। फिर उससे आने वाता व्यङ्ष अयं भी वस्तु या अतद्वार रूप से दो प्रकार काहोता है। इस प्रकार अरथंशक्तिमूतकु ध्वनि के १२ भेद हो जाते है- ४ स्वछः सम्भवी४ पविप्रोडोकिसिद्ध+४ कविनिवद्धप्रोढोकि सिद्ध। :. :f. अनुवाद-कम मे उवाहरस है- 11 4 - १. 'हे पुत्रि, (यह वर) आालसियों में थष्ठ है, धूतों में अप्रगण्य है, धन- सम्पत्ति से पूएं है। यह कहने से (सज्जा के कारस) भुके ब्रङ्गों वाली वह कुमारो प्रफुल्लित नेत्रों थाली हो गई.।६०।। -: यहाँ (स्वत सिद्ध) थस्तु, से 'मेरे ही उपभोग-योग्य है' यह वस्तु व्यक्त होती : ; प्रभा-स्वतःसिद्ध पर्थशक्तिमूलक ध्यनि के चार भेदों मे से (१) वस्तु द्वारा हैँ।
वस्तु की व्यन्जना का उदाहरण है- 'अलस' इत्यादि । इसके पूर्वार्ष. में स्वयंवरा कुमारी के प्रति घात्री की उक्ति है उत्तराध मे कवि-वराना है। यहां पर -'अलसवा' द्वारा प्रवास की अनिच्छा 'ूतंता' द्वारा संभोग में अतृप्ति, धनसमृद्धिमत्ता के द्वारा कृपए तथा मुखी होने का निश्चय करके कुमारी के नेत हर्ष से प्रपुल्लित, हो-जाते हैं वपा लोचनों की प्रफुल्लता रूप वस्तु स्वत.सिद्ध (लोकसिद्ध) बात है। इसके द्वारा सहृदम सामाजिकों के हृदय में इस वस्तुरूप भ्ररथ की अभिव्यक्ति होती है-'यह मेरे ही उपभोग के योग्य है'। : अनुवाद-२ 'भरी ससी, तू धन्य है जो प्रिय-सङ्गम के बीच में भी विश्यास युक्त (विसब्ध) सेकड़ों प्रिय-वचन कह लेती है, भरो सहेलियों, मैं तो (सुम्हारी) सोगन्ध साती हूं (शपामि) जो प्रिय के द्वारा अपना हाथ नीवी की घोर बालते हो (पर्यात् मन में संकल्प करते ही) कुछ भी याद करती होऊं ।।६ ।।। ग: 1 महा, पर 'तू प्रथम्म,है मैं, तो धन्य हूँ' यह व्यतिरेक मतद्भार ध्यट्ग्य है। -
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चतुर्भ उल्लास: १७७
वीरव्यलोकि युधि कोपकपायकान्तिः कालीकटाक्ष इव यस्य करे कृपाखः ।६२।। अन्नोपमालक्कारेय सकलरिपुवलक्षय: चसात्करिष्यते इति वस्तु।
श्रष्ठविद्र मदलान्यमोचयनिदशन् युधि रुपा निजाघरम्॥-३॥ प्रभा-'धन्यासि' इत्यादि शाङ्ग घरपद्धति के अ्नुसार विज्जिका नामक कब- यित्री का पद्य है। यह (२) स्वतःसिद्ध वस्तु द्वारा अलद्द्ार की व्यञ्जना का उदाहरण है। रतिविषयक वार्तललाप करने वाली स्खियों में एक ससी दूसरी का उपहास करती हुई कह रही है। यहाँ पर बाच्यार्थ है-'सखी को सौभाग्य वाली कहना (घन्याडसि)' यही स्वतः सम्भवी वस्तुरूप व्यब्जक अर्थ है। इसके द्वारा यह व्यङ्गघार्थ निकलता है-'प्रिय-सङ्गम के समय तल्लीन होकर भधिक प्ानन्द भोगने वाली मैं तुभसे अधिक सौभाग्यशालिनी हूँ। यही '्यतिरेकालङ्वार' रूप अर् है जो वस्तु द्वारा व्यङ्गथ है। अनवाद-३. 'जिस राजा के हाथ में स्थित उस कृपाए को युद्ध भूमि में (शतु फे) वोरों ने कोध से अत्यन्त रक्िम (कथाय) आभा वाले फाली (दुर्गा) के कटाक्ष के समान बेखा; जो (कृपास) मदोन्मत्त गन्य-गजों (विशेष प्रकार के हाथियों) के कपाट-सद्श कपोलों के (लोहमुद्गर जँसे) अग्रभाग (फूटम् अग्रभागः तदेव कूटं लोहमुद्गर इव) पर प्रहार करने के कारएा दृढ़ (निघ्न) तथा गाढ रुधिर से रक्त (शीस) कान्ति (शोचि) वाला था ॥६२। "' यहाँ पर उपमा अलद्धार के द्वारा 'समस्त शभ्ु सेना का विनाश क्षस भर में ही कर देगा" यह वस्तु व्यक्त होती है। "', प्रभा :- 'दर्म' इत्यादि (३) स्वतः सम्भतरी अलङ्कार द्वारा वस्तु व्यञ्जना का उदाहरण है। यहाँ पर 'कालीकटाक्ष' के समान कृपास को देखा' यह उपमा है। यह उपमालद्वार ही स्वतः सम्भवी व्यञ्जक अर्थ है, कयोंकि साहस्व लोक में भी विद्यमान, है। इस उपमा द्वारा 'श्ए भर में समस्त शत्र सेना का विनाश कर देगा' इस वस्तु रूप अर्थ का व्यञ्जना द्वारा वोध है। गन्य-गज एक विशेष प्रकार का गज होता. है जिसका सक्षसा है- स्वेदं मूयं पुरीषं च भज्जां चंव मतड्गजाः। । यस्याघाय विमाधन्ति सं विद्याद गन्यहस्तिनम् ॥ अनुवाद-४ जिरा राजा ने युद्ध में कोध से सपने चोठों कोघबाकर (नि्देशन्) शत्रु नारियों के प्रयाल-पल्लव (विद्ुम-दल) सवृश झठों को, उनके पति को तोघ दन्त-क्षत-पोड़ा के संकद से छडा दिया ॥६३।।
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१७८ काव्मप्रकाश:
अत्र विरोपालङ्वारेखाऽघरनिर्दशनसमकालमेव शत्रवो व्यापादिता इति तुल्ययोगिता। मम तत्याऽप्यन्यस्य क्षतिर्निवर्ततामिति तद्बुद्धिरुत्ेद्षयत इत्युत्प्रेक्षा च। एपूदाहरगोपु स्वतः सम्भवी व्यञ्जकः । यहाँ पर विरोधाभास अलद्धार के द्वारा 'गोष्ठ घबाने के समफाल में ही शभ्ु मार दिये' यह तुत्ययोगिता तगा 'मेरी क्षति से भी अ्रन्यों (शघ्ु-नारियों) की क्षति दूर हो जाए इस प्रकार की नृप-धुद्धि को उत्पक्षा (संभावना) होने के कारए (उत्प द्षयते इति=उतपरक्षणात्) उत्प्रक्षा-पलद्धार भी र्यञ्जना द्वारा प्रकट होता है। इन ('अलस०' से लेकर 'गाढ०' तक चार) उदाहरसों में स्वतः सम्भवी अरथं व्यम्जक है। प्रना-'गाढ़' इत्यादि (४) सवतः सम्भवी अलद्धार द्वारा मतङ्गार-व्पञ्जना का उदाहरण है। यहाँ पर विरोधाभास अलद्धाररूप मर्थ व्यञ्जक है। 'जो भपने पधर को ही काटता है वह दूसरों के प्रधर को काटने से कैसे वचा सकता है? अथया ओष्ठ-दशन द्वारा शष्ठ-दशन की व्यथा का निवारस कैसे? यह विरोध प्रतीत होता है। यह विरोधाभास स्वतः सम्भवी अ्थ है। इसके द्वारा यह भर्म ध्वनित होता है कि 'राजा ने ज्यों श्रोष्ठ काटे त्यों ही शत भों का नाश कर दिया' इस प्रकार 'स्वाधरददत' 'शभ व्यापदन' इन दोनों का एक काल में होना रूप एक धर्म से सम्बन्ध है अतः तुल्ययोगिता अलद्वार व्यङ्गय है। यहाँ विरोधाभास अलद्धार से यह भर्भ भी ध्वनित होता है कि 'मानो राजा ने ऐसा सोचा कि चाहे मेरी क्षति हो जाये किन्तु शत -नारियों की क्षति का निवारस हो। अतएव यहाँ उत्प्रेक्षा अलद्वार भी व्यङ्गय है। इस प्रकार तुल्मयोगिता तथा उत्प्रेक्षा अलद्धार की संसृष्टि यहां व्यङ्जपार्थ है। टिप्परी-(i) प्रदीपकार के मतानुसार काव्यप्रकाश-वृतिस्य 'विरोधालङ्वार का अभिप्राय प्रतिशमोक्ति है तमा 'तुल्ययोगिता का अभिप्राय समुच्चम है; ययोंकि प्रस्तुत उदाहरण में विरोधाभास तथा तुल्ययोगिता अलद्धार नहीं हैं। साहित्यदपर कार के मतानुसार भी महाँ समुच्चपालद्वार ही व्यङ्गय है-'मन्न स्वतः सम्मषिना-
किन्तु विवेचकों के अनुसार मथाश्रत अर्य ही मुक्त है। इसका विराद विवेचन उद्योत तया प्रमानामक टीका में किया गया है। 3 (ii) उपयुक्त चारों उदाहरणों में स्वतः सम्भवी अर्य ही व्यञ्जक है, जो कि कमराः इस प्रकार है :- (१) 'असस' इत्यादि में-स्वतः सिद्ध वस्तु से वस्तु की स्पञ्नना। : (२) 'धन्यासि' इत्यादि में-स्वतः सिद्ध वस्तु से प्रतद्धार की उपञ्जना। (३) 'दर्प' इत्यादि में - स्वतः सिद्ध अलद्वार से वस्तु की व्यञ्ना। (v) 'गठ' इत्यादि में-स्वतः सिद्ध भलद्वार से असद्वार की व्यं्जना। -
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चतुर्थ उल्लास: १७६'
[कविप्रोदोक्तिसिद्धस्य चत्वारो भेदा:] १. कैलासस्य प्रथमशिखरे वेुसम्मूर्च्छनाभि: श्रुत्वा कीति विबुधरमणोगीयमानां यदीयाम्। स्नस्तापाङ्ा: सरसविसिनीकाएडसब्जातशङ्गा दिङ मातङ्गा: श्रवशपुलिने. इस्तमावर्त्त यन्ति ।।६४।। श्रत्र वस्तुना येपामप्यर्थाधिगमो नास्ति तेपामप्येवमादियुद्धिजननेन चमत्कारं करोति त्वत्क्रीर्तिरिति वस्तु ध्वन्यते। २. केसेसु वलामोडिअ तेए अ समरम्मि जयसिरी गहिआ। जह कन्दराहिं विहुरा तस्स दढ कंठअ्रम्मि संठचिश्रा॥६५॥ (केशेपु वलाकारेण तेन च समरे जयश्रीए हीता। यथा कन्दरा भिर्विधुरास्तन्य टढं कएठे संस्थापिताः॥६५।। अ्रनुवाद-१. फँलास की प्रमुख चोटी पर मांसुरी के रागविशेष (संमू्छना) से वेवाडनाओं द्वारा गाई जाने वाली जिस (राजा) की कीति को सुनकर, कोमल कमलनाल (चिपकने) को शङ्धा हो जाने से (ऐरावत आदि आाठ) दिग्गज नेत्रों के छोर तिरछे या चञ्चल (सस्त) करके अपने कानों के पास (पुलिन-तट) सूंड घुमाया करते हैं' ॥६४॥ :, यहां पर दस्तु (कषि प्रोदोक्तिसिद्-कीति का कानों में प्रवेश तथा फमल- नाल की शद्धा से दिमजों द्वारा सूंड धुमाना रूप) से यह वस्तु ध्वनित होती है कि (येवाम-इति) जिन (जड हाथी आदि) को (गीत आदि का) प्रयं-ज्ञान नहीं है, उनमें भी कमलनाल आदि (एयमावि) की बुद्धि उत्पन्न करके तुम्हारी कीति चमस्कार उम्पन्न करती है। प्रभा-'कैलासस्य' इत्यादि कविप्रोढोक्तिसिद्ध व्यञ्जक अर्थ के चार भेदों मे (१) वस्तु द्वारा वस्तु-व्यञ्जना का उदाहरण है। इसमें किसी राजा की कीति का वणंन है यहाँ पर व्यञ्जक अर्थ है-राजा की की्ति का देवाङ्गनाओ्रों द्वारा गाया जाना उसका दिग्गजों द्वारा सुना जाना तथा दिग्गजों द्वारा उसमें श्वेत्षता के कारण कमलनाल चिपकने की शड्ा होना। यह अ्रर्थ लोक बाह्य है, कवि कल्पना प्रसूत है। इससे यह वस्तुरूप अर्थ व्यङ्गथ हे-'उस राजा की कीति ने संवेदनाहीन जीवों मे भी संवेदना उत्पन्न कर दी'। अपनवाद-२. 'उस राजा ने पुद्धक्षेत्र में जय-लक्ष्मी को बलपू्यक केश परुड़ फर खींच लिया, तथा पवत फन्दराओं ने (अपने भोतर छिपे) शब्ुमों को (विपुराः) गाढ रूप से गले लिपटा लिया' ॥६५।।
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१८० फाव्यप्रकाश:
अत्र केशअ्रहसावलोकनोद्दीपितमदना इव कन्दरास्तद्विघुरान् कसठे गृहन्ति इत्युत्पेक्षा। एकत्र संग्ामे विजयदर्शनात्तस्यारयः पलाय्य गुहासु तिष्ठन्तीति काव्यहेतुरलङ्कारः। न पलाय्य गतास्तव्वरियोऽपि तु ततः पराभवं सम्भाव्य तान् कन्दरा न त्यंजन्तीत्यपह नुतिश्च। ३. गाढालिङ्गगारहसुज्जुशम्मि दइए लहुँ समोसरइ। माणंसिणीण माणो पीलएभीअ व्व हिश्रआहिं ॥६६।। (गाढालिङ्गनरभसोद्यते दयिते लघु समपसरति। मनस्विन्या मान: पीडनभीत इव हृदयात् ॥६६।। अन्नोत्मेक्षया पत्याहिङ्गनादि तत्र विजुम्भत इति वस्तु। (१) यहां पर (राजा के द्वारा जयशरी के) केश-ग्रहणा के वशन से जिनका काम उद्दीप्स हो भया है, वे कन्दराएं उस राजा के शत्नुथों को मानो गले लगाती हैं-यह उत्परक्षा है। (२) एक ओर संग्राम में (उस राजा की) विजम बैखकर उसके शशू भागकर गुफाओ्रों में छिप जाते हैं-यह काय्यहेतु मलङ्गार है। (३) उसके शत्रु भाग कर नहीं गये अपि तु उस (राजा) से पराजय की आशङ्धा करके कन्दराएं हो उनको नहीं छोड़ती हैं-यह अपह्न ति है। प्रभा-'केशेपु' इत्यादि (२) कवि प्रौढोकिसिद्ध वस्तु द्वारा अलद्धार- व्यञ्जना का उदाहरण है। यहाँ पर व्यञ्जक अर्थ है-शनओों को कन्दरामीं ने गले लिपटा लिया'। यह कवि कल्पना प्रसूत वस्तु है-कवि प्रौढोकि मात्रसिद्ध वस्तु है। इसके द्वारा अ्सद्धाररप अर्थ की अभिव्यक्ति होती है। यहाँ पर तीन पतक्कार व्यङ्गध हो सकते हैं-(i) उत्प्रेक्षा, (ii) काव्यहेतु (काव्यलिङ्ग) और (iii) अमह ति। इन तीनों में से किसी भी अलक्गार की व्यञ्जना हो सकती है मतः इन तीनों का 'सन्देह्रङ्कर' है अथवा तीनों की व्यञ्जना होने के कारर एक व्यञ्जकानुप्रवेश सद्वर है। अनुवाद-३. ह्ष या वेग (रभस) के साथ नियतम के गाठालिंङ्गन के तिये उद्यत हो जाने पर मानों मनस्विनी नामिका का मान, दवाने से उरा हमा सा, हृशय से श्ीघ्र ही (सघु) पूएतया चला गया’ ॥६६॥। पहां पर उतपेक्षा अलद्ार द्वारा 'प्रत्यातिज्जुन आादि वहाँ होने लगते हैं' यह वस्तु (ध्यनित होती है)। प्रभा-गाढ' इत्यादि कवि प्रोटोकिसिद्ध (३) अलद्वार द्वारा वस्तु व्यञ्जना का उदाहरस है। यह मानवती नायिकाविषयक किसी ससि की उतति है। यहाँ पर व्यञ्जक अर्थ है-मानों पीडन से भमभीत सा मान हृदय से कीघ निकल जाता है" यह 'उत्प्रक्षा' कवि प्रोढोक्तिमान सिद्ध है। इसके द्वारा व्यङ्नपार्य है मानिनी नायिका स्वयं पालिङ्न आदि कीगमों में रत हो जाती है, यह वस्तुरूप श्रभं।
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चतुर्थ उल्लास:
४. जा ठेरं व हसन्ती कइवश्रएंवुरुह्बद्धविलिवेसा' दावेइ भुश्नएमंडलमएएं विश्र जशइ सा वासी ॥६७॥। (या स्थविरमिव हसन्ती कविवद्नाम्वुरुह्वद्धविनिवेशा। · दशयति भुवनमएडलमन्यदिव जयति सा वाएी ॥६७।। ?i) .: अन्नोत्पेक्षया चमत्कारैककारणं नवं नवं जगद् अजडासनस्था निर्मिमीते इति व्यतिरेकः । एप कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नो व्यञ्जकः।, [कविनिबद्धप्रौढोक्तकिसिद्धस्य चत्वारो भेदा:] १. जे लङ्कागिरिमेहलासु खलिआ सम्भोगखिएणोरई- फारुप्फुल्लफख वली कव ल एे पत्ता दरिद्दत्तयम्। त एहिं मलआनिला विरहिणीणीसाससंपकिकिसो- जादा भत्ति चिसुत्तऐे वि वहला तारुए्णपुएणा विश्रा॥६८॥ अनुवाद-४ 'जो (काव्यरूपा) चाली मानो बूढ़े ब्रह्मा का उपहास सा करती हुई कवि के मुख-कमल में निवास करके (बद्ध. रचितः विनिवेशः स्थितियंया) भुयनमण्डल को कुछ और (विलक्ष सा=अम्यदिव) ही दिसलाती है, उसकी जम हो ।६७॥ यहां पर (हस्तन्तीय पादि) उत्प्रेक्षा के द्वारा (कमलरूप) जड प्रासन पर न मैठी हुई सरस्वती ऐसे नवीन संसार का निर्मास करती है जिसका चमत्कार हो एक मात्र फारस या प्रयोजन है'। यह व्यतिरेक अलद्गार व्यङ्त्प है। इन चारों (उदाहरसों में) कविप्रौढोकिमात्र सिद्ध अर्थ ही व्यञ्जक है। प्रभा-(१) 'या' इत्यादि (४) कविप्रोदोक्तिमात्रसिद्ध अलद्धार द्वारा अलद्धार व्यञ्जना का उदाहरण है। यहाँ पर 'हसन्तीय' इस उत्प्रक्षा से 'चमत्कारंककारएत्व' यह अर्थ प्राप्त होता है। 'अन्यदिव' इस उत्प्रेक्षा से काव्य-जगत् की प्रतीक्षण नयीनता का बोध होता है तथा 'कविवदनादि' (कवि के मुख में स्थित) से 'अजडा सनस्था' यह अर्थ प्राप्त होता है। यहाँ पर उत्प्रेक्षा रूप अर्थं व्यञन्जक है भर वह कविप्रोढोकि सिद्ध है। उसके द्वारा व्यतिरेक अलङ्कार व्यङ्गथ है। (२) उपयुक्त चारों उदाहरणों में कर्विप्रोदोक्ति मात सिद्ध अरथ ही व्यञ्जक है। संक्षेप में वह इस प्रकार है- (१) 'कैलासस्य' इत्यादि में कविप्रौडोकि सिद्ध वस्तु द्वारा वस्तु व्यञ्जना। ' (२) 'केशेषु' इत्यादि में कविप्नीओोकिसिद्ध वस्तु द्वारा मतद्गार-सञ्नना। (३) 'गाढ' इत्यादि में कविप्रोढोक्तिमिद्व अलद्धार द्वारा वस्तु-व्यञ्जना। (४) 'या' इत्यादि में कषिपोढोरिसिद्ध अलद्कार द्वारा अलद्गार-व्यञ्जना । अनुवाद्-'. 'जो वायु तड्गा के पर्वत की मेसलामों पर गिर कर, समभोग से पको हुई नागिनों के विशाल तथा ऊपर उठे हुए फखों को पंक्ति से निगते
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-काव्यप्रकाय :
(ये लक्कागिरिमेखलासु रखलिता: सम्भोगखिन्नोरगी- स्फारोदफुल्ल फ़एव लीकवलने प्राप्ता दरिद्रत्वम्। तं इदानी मलयानिला विरहिणीनिःश्वाससम्पर्किणो जाता कटिति शिशुत्वेऽपि वहलास्तारुणयपूर्णा इब ॥६८।। श्रत्र निःश्वासैः प्राप्तैरवर्या वायवः किकि, न कुर्वन्तीति वरतुना वस्तु व्यज्यते। २. सहि विरइऊण माणरस मज्म चीरत्तऐएा श्रसासम्। पिअरदंसणविहलंखलखएस्मि सहसति तेगा ओसरिअंम्॥६६।। (सखि, विरचय्य मानस्य मम धीरत्वेनाश्वासम्। प्रियदर्शनविशृङ्गलक्तणो सहसेति तेनापसृतम् ॥६६॥। अत्र वरतुनाकृतेऽपि प्रार्थने प्रसन्नेति विभावना, प्रियदर्शनरय सौभाग्यवलं धैर्येण सोढु न शक्यत इत्युस्पका वा। के फारस क्षोखता (दरिद्रत्वम) को प्राप्त हो गई थों, ये इस समय मलप-पवन हे रूप में धिरहिली नाविकाओं के इ्वासों के सम्पर्क से युक्त होकर शोघ्र ही (भटिति) बाल्यावस्था में ही यौवन से पूलं सी होफर मुष्ट हो गई है ॥६८।। यहां पर 'निश्यासों के द्वारा ऐश्वर्म प्राप्त करके पयन कया-क्या नहीं करसी है'। इस प्रकार यस्तु द्वारा वस्तु ध्यनित होती है। .. ' पभा-ये' इत्यादि (३) कबिनिबद्धप्रोळोक्तिसिद्ध वस्तु द्वारा वस्तु-व्पं्जना का उदाहरस है। कर्पू रमब्जरी नामक नाटक में राजशेसर कवि-निवद्,'विचक्षणा' नामक (कपू रमञ्जरी की) सखरी को कल्पना द्वारा प्रसूत यह अर्थ है। यहाँ पर वाच्यार्यं रूप वस्तु ही व्यञ्जक अर्थ है तथा निश्वासों द्वारा पुष्ट होकर मलयानिल के भोंके क्या क्या नही करते हैं ? यह व्यङ्गथ वस्तु है। अनुवाद-२. 'अरी ससि, (तेरे द्वारा विलाया गया) धैयं मेरे मान को (सेरे संफट में मैं सहा्यक हूं इस प्रकार) आाश्यासन बेकर भी प्रिय-वशन से (मेरे) उत्कण्ठावश चञ्चस हो जाने के अथसर पर (क्षरे) 'मैंने यह काय सहसा कर ठिया' यह कहता हुआ भाग गया ६६II यहां पर (थाच्यायं रप) वस्तु द्वारा 'प्रार्यना न करने पर भी वह प्रसन्न हो नई'-यह (कारस बिना कार्योतपति रूप) विभावना ससद्धार प्रपवा 'निष्चय हो प्रिस-वशंन की सौभाग्यशक्ति को पैयं सहन नहीं कर सकता (नहीं ठहर सकता')- यह उतेक्षा परतङ्गार व्यङृग्प है। प्रभा-'ससि', इत्यादि (२) कविनिवद् प्रोढोकिसिद्ध वस्तु द्वारा मसन्ार- व्यम्जना का उदाहरख है ? 'कर्यी मान छोड़ बठी' यह कहने वाली ससी के मठि
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चतुर्थ उल्लास:
३. ओल्लोल्ल करअर अख्ख एहिं तुह लोअणोसु मह दिएं। रस्ष सुननं पञाओ कोवेस पुणो इसे ए अक्कमिशा॥७॥ (आर्द्राद्र करजरदनकतैस्तव लोचनयोर्मम दत्तम्। रक्तांशुकं प्रसाद: कोपेन पुनरिमे नाक्रान्ते ।७।।) श्रत्र किमिति लोचने कुपिते वहसि इत्युत्तरालक्कारेण न केवलमार्द्र- नखशतानि गोपायसि यावत्त पामहं प्रसादपात्रं जातेति वस्तु । ४. महिलासहस्सभरिए तुह हिअए सुहअ सा अमाअन्ती। अरुदिसमरास्सा कम्मा अङ्ग' तुनमं वि तरगुएइ ।।७१। (महिलासहसरभरिते तव हृदये सुभग, सा अमान्ती। अनुदिनमनन्यकर्मा अङ्ग तन्वपि तनयति॥७॥॥ अत्र हेत्वलङ्वारेख तनोस्तनूकरसोपि तव हृदये न वर्तते इति * - किसी नायिका की यह उक्ति है। अचेतन 'ध्यं' में चेतन के धर्म अपसरस' का आारोप किया गया है अतः यह अर्थ कविनिवद्ध नायिका की प्रोढोक्ति मात्र सिद्ध है। इसके द्वारा विभावनाऽलद्वार पथवा उत्प्रेक्षालद्वार उपयुक्त प्रकार से ध्वनित होते हैं। अनुवाद्-३. 'हे प्रिय, मेरे ये नेत्र क्रोध से व्याप्त नहीं हैं, किन्तु तुम्हारे शरीर में (मरन्य नायिका द्वारा किये हुए) अत्यन्त आारद्र (ताजे-ताजे) नख तथा दांत के वरों (क्षत) ने मेरे नेत्रों में यह रक्त-किरखों का प्रसाद भपित किया है॥७०। यहां पर "तुम्हारे नेव्र ऋुद्ध से कयों हैं?" इस (प्रश्न के उत्तर रूप) उत्तरा- सङ्गार द्वारा 'तुम फेवल नवीन नख-क्षतों को हो नहीं छिपा रहे हो; किन्तु मैं उनकी प्रसाद-पात्र भी हुई है' यह वस्तु घ्वनित होती है। प्रभा-'आर्द्रा' इत्यादि (३) कविनिबद्धप्रोदोक्िसिद्ध अलद्वार द्वारा वस्तु- व्यंंजना का उदाहरणा है। प्रिय के शरीर में सपरनी-कृत नखक्षतादि को देखकर कुपित होने वाली नायिका की प्रिय के प्रश्न के उत्तर में यह उक्ति है। प्रकृत वाक्यार्थ द्वारा-'तुम्हारे नै क्यों कुपित हैं' ? इस प्रश्न का उन्नयन होता है। यहा कविनिबद्ध यवतृप्रोढोकि सिद्ध उत्तरालद्गार रूप अर्य ही व्यञ्जक है। उसके द्वारा उपयुक्त वस्तु की व्यञ्जना होती है। अनवाद-४ 'हे सोभाग्यपुक्त, यह (भकृत्निम प्रेम बोली मेरी ससी) सहस्र (पूर्त) स्त्रिमों से भरे हुए तुम्हारे हृदप में ने समाती हुई (अ्रमान्ती), ध्रन्म कार्यों को छोड़कर प्रतिदिन स्वतः फूद शरीर को भी (किसी प्रकार तुम्हारे हृदम में प्रवेश पाने के लिये) और फृदा फर रही है ।७?।। यहां पर हेत्वलद्धार (काव्यलिङ्ग) के द्वारा शरीर को कृश करने पर भी
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काव्यप्रकाश:
विशेपोक्तिः। एघु कविनिबद्धवफ्तृप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीरो व्यब्जक:। एवं द्वादश भेदा:॥ तुम्हारे हृदम में स्थान नहीं पाती' यह विशेपोकि ध्वनित होती है। इन (पारों उदाहरसों) में कविनिबद्धवव्तृप्रौढोकि से सिद्ध है स्वरूप (शरीर) जिसका ऐसा झर्थं ही व्यञ्जक है। इस प्रकार 'अर्थशक्तिमलक के १२ भेद है'। प्रभा-(१) 'महिला' इत्यादि (४) कविनियद्धवनतृप्रोढोकति सिद्ध अलक्कार द्वारा अलद्दार व्यञ्जना का उदाहरण है। विरह्-कृश नायिका की दशा का नायक से बगंन करती हुई सखी की यह उत्ति है। यहाँ पर कविनिबद्ध ससी की प्रोडोकि सिद्ध हेत्वलद्वार रूप मरर्थ व्यञ्जक है; हृदय में न समाने का हेतु है-उसका सहसरों सुन्दरियों से भरा होना तथा कृध शरीर को कृशतर करने का हेतु है-प्रिय के हृदय में न समा सकना। ये दोनों कविनिबद्धवक्ता के कल्पना-प्रसूत हेतु है। इनके द्वारा विशेषोक्ति अलद्दार की व्यञ्जना हो रही है अर्थात शरीर को कृशंतर करने पर भी (कारण होने पर भी) हृदय मे स्थान नही पाती (कार्म का न होना) रूप विशेषोकि भलङ्कार यहाँ व्यङ्गयार्थ है। (२) उपयुक्त चारो उदाहरणों मे कविनिवद्धव वतृप्रीठोक्तिसिद्ध भ्थ ही व्यञ्जक है। संक्षेप के वह इस प्रकार है- (१) 'ये' इत्यादि मे कविनिबद्ध ससी की प्रोठोकि सिद्ध वस्तुद्व्वारा वस्तु स्यञ्जना । (२) 'साखी' इत्यादि में कविनिवद्धा नायिका की प्रोढोकि सिद्ध वस्तु द्वारा
(३) 'आार्द्री' इत्यादि मे कवि निवद्धा नायिका के प्रोढोक्तिसिद, मलद्गार द्वारा वस्तु-व्यञ्जना। (४) 'महिला' इत्यादि में कविनियद्ध सस्ीप्रोढोक्तिसिद मलद्गार द्वारा
इस प्रकार कारिका ४० में निरूपित सर्थशक्तिमुलक संलथ्यकम-म्ङगप ड्तनि के १२ भेदों का उदाहरए सहित निरुप किया गया है। टिन्पसी-ध्वन्मालोक में जो प्रोढोक्तिमान्सिद्ध व्य्जक मर्थ एक रूप में ही कहा गया या आचाय मम्मट ने उसके दो प्रकार बतताये-१कविप्रोडोकि सिद्ध २. कविनिबद्धप्रोठोत्तिसिद्द। इन दोनों के भेद का समर्थन करते हुए विश्वनाय रविनह ने लिसा है-न सलु कवेः कविनिवदस्येव, गगाधाविष्टता अतः कवि- ननिवद्धप्रोढोक्ति: कविप्रोठोवतेरमिकं सहृदयचमतकारिणीति पृथक प्रतिपादिता (मा० दर्पण ४८)। अरथाद् कविप्रोहोकिति से कविनिवद् वक्ता की प्रोडोकि प्रधिक 3 करा प्रादि के समान कवि सो स्वर्ष अनुराग आदि से युक्त नहीं होता ।
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चतुर्थ उल्लास: १८५
[उभयश्क्तिमूलकध्वनिः] :(५५). शब्दार्थोभयभूरेक :- यथा- अतन्द्रचन्द्राभरणा समुद्दीपितमन्मथा। तारकातरला श्यामा सानन्दं न करोनि कम् ।७२।। :: अत्रोपमा व्यङ्ग्या। * अनुवाद-शब्द और अरथ (उभयशक्तिमूलक ध्वनि) एक प्रकार की है। जसे-(रात्रि पक्ष में अर्थं) 'उज्ज्वल रूप वाला चन्द्रमा जिसका सुपए है, जो काम : (मन्मय) को जगाने वाली है, जिसमें चञ्चल या अल्प (तरला) तारे हैं ऐसी श्यामा रात्रि किस व्यक्ति को आनन्दित नहीं करती ? '(श्यामा नायिका पक्ष में) आलस्य रहित (अ्रतन्द्रा) तथा कमूर (चन्द्र) नामक शिरोभूषख वाली, काम-भाव को जगाने वाली एवं जिसके नेवों के तारे 'चञ्चल हैं ऐसी श्यामा नामिका किस पुरुष को आनन्दित नहीं करती' ॥७२॥ यहां पर उपमा अलद्धार व्यङ्ग्य है। प्रभा-(t) 'अतन्द्र' इत्यादि शब्दार्थोभयशक्तिमूलक संलक्ष्यकमव्यङ्भय क्वनि का उदाहरण है। यहाँ पर उपर्युक्कत रोति से अर्थद्वय की प्रतीति होती है। यहाँ शब्द और अर्थ दोनों के द्वारा वाच्य वस्तु से उपमालङ्वार को व्यञ्जना होती है। श्यामा नायिका तथा रातरि की उपमा प्रतीत होती है और वह उपमा 'श्यामा नायिका के समान रात्रि है' अथवा 'रात्रि के समान श्यामा नायिका है' इस रूप में है। शब्दार्थशवत्युद्भव ध्वनि का यह एक ही प्रकार है, जहां वस्तु द्वारा अ्लद्दार की व्यञ्जना होती है। (२) यर्द्याप दब्दशक्तिमूलक में अर्थ तथा अर्थशक्तिमूलक मे शब्द भी व्यञ्जक होते हैं और इस प्रकार सवंप उभयशक्तिमूलक ध्वनि होनी चाहिए तथापि गोए- प्रधानभाव को दृष्टि से तीन भेद किये यये हैं, अर्थात् जहाँ शब्द ही प्रधानरूप से व्यञ्जक होता है उसके बदलने पर व्यञ्जना नहीं होती वह शब्दपरिवृत्यसह ध्वनि शब्दशक्तिमुलक है। जहाँ शब्द बदलने पर भी व्यञ्जना होती है, वह शब्द परि- वृत्तिसह ध्वनि अर्थशवितिमूलक है और जहां कुछ शब्द परिवृ्त्यसह और कुछ परि- घृतिसह होते है वहाँ उभयशक्तिमूलक ध्वनि है। 'अतन्द्र' इत्यादि उदाहरण में चन्द्र, तारका, तरल और व्यामा शब्दों का परिवर्तन करने पर घ्वनि ही नहीं रहती; किन्तु अतन्द्रा, आभरए, समुद्दीपित मौर मन्मय के स्थान पर क्रमशः उनके पर्याय अनिद्रा, भूपए, समुतेजित और काम मादि का भी प्रयोग कर दिया जाय तो घ्वनन में कोई भन्तर नहीं होगा। इस प्रफार यह उभमशक्तिमूलक ध्वनि है।
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कव्यप्रकार:
विशेपोक्तिः। एषु कविनिबद्धवपतप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्शरीरो व्यव्जकः। एवं द्वादश भेदाः॥ तुम्हारे हृदय में स्थान नहीं पाती' यह विशेषोकिति ध्वनित होती है।, इन (चारों उदाहरसों) में कबिनिबद्धवक्तृपौदोकि से सिद्ध है स्वरूप (शरीर), जिसका ऐसा अरथं ही व्यञ्जक है। इस प्रकार 'भर्थशक्तिमूलक के १२ मेद है'। प्रभा-(१) 'महिता' इत्यादि (४)कविनिबद्धववतृप्रोढोकि 'सिद्ध प्रतसगार द्वारा अलद्कार व्यज्जना का उदाहरस है। विरह-कृंश नायिका की दशा का नायक से वणन करती हुई ससी की यह उक्ति है। यहाँपर कविनिबद्ध सखी की प्रौढोकि सिद्ध हेत्वलद्कार रूप अ्र्परथं व्यञ्जक है; हृदय में न समाने का हेतु है-उसका सहसों सुन्दरियों से भरा होना तथा कृम शरीर को कृशंतर करने का हेतु है-प्रिय के हृदय में न समा सकना। ये दोनों कविनिबद्धवक्ता के कल्पनाप्रसुत हेतु हैं। इनके द्वारा विशेषोक्ति अतद्वार की व्यञ्जना हो रही है अर्थाद शरीर को कृसतर फरने पर भो (कारस होने पर भी) हृदय में स्थान नहीं पाती (कार्य का न होना) रूप विशेपोक्ति अलद्गार यहां व्यङ्गथार्थ है। (२) उपयुक्त चारों उदाहरणों में कविनिवद्धयवतृप्रोढोक्तिसिद्ध मर्थ ही व्यञ्यक है। संक्षेप के वह इस प्रकार है- (१) 'ये' इत्यादि मे कविनिबद्ध ससी की मोडोकि सिद्ध मस्तु द्वारा वस्तु भ्यञ्जना । (२) 'सखी' इत्यादि में कविनियद्धा नायिका की म्रोहोकि सिद्ध वस्तु द्वारा भलङ्ार-व्यञ्जना । (३) 'आार्द्रा' इत्यादि े वि निवद्धा नायिका के प्रोठक्तिसिट ा द्वारा वस्तु-व्यञ्जना। (x) 'महिला' इत्यादि मे कविनियद्ध ससी-प्रोहोकिसिद मलस्वार द्वारा
इस प्रकार कारिका ४० में निरूपित भर्थशक्तिमूलक संल्यकम-वङगप ध्वनि के १२ भेदों का उदाहरए सहित. निरूपण किया गया है। टिप्पसी-धवन्यालोक मे जो प्रोढोक्तिमाय्सिद्ध व्यन्तक मर्प एक रूप में हो कहा गया था आचाय मम्मट ने उसके दो प्रकार वतसाये-१कविन्रोओोकि सिद्ध २. कविनिबसपोढोकिसिद्ध। इन दोनों के भेद का रामर्यन करते हुए विदवनाय एविरड ने पिसा है-न सलु पयेः कविनियद्धस्येव गगाद्याविष्टता सतः कवि- नवदप्रोढोकि: कविप्रोडोवतेरयिक सहृदयचमतकारिीति पृथक प्रतिपादिता (मा. दर्पा ४८) । परथति कविश्रोढोकि से रविनिवद्ध दक्ता की प्रोड्रोरि भधिक SA कपा आदि के समान कवि सो स्वर्चं भनुराग आदि से मुक्त नहीं होता।
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घतुर्थ चल्लास:
[उभयशषक्तिमूलकध्व निः] (५५) शब्दार्थोभयभूरेक :- यथा- श्रतन्द्रचन्द्राभरणा समुद्दीपितमन्मथा। तारकातरला श्यामा सानन्दं न करोनि कम् ।७२।। .' अ्षत्रोपमा व्यङ्ग्या। अनुवाद-शब्द और अर्य (उभयशक्तिमूलक ध्वनि) एक प्रकार को है। जैसे-(रात्रि पक्ष में अर्य) 'उज्जवल रूप वाला चन्द्रमा जिसका सुपसा हैं, जो काम '.(मन्मय) को जगाने वाली है, जिसमें चञ्चल या अल्प (तरला) तारे हैं ऐसो इयामा रात्रि किस व्यक्ति को आनन्दित नहीं करती ? '(श्यामा नायिका पक्ष में) आ्लस्य रहित (अ्रतन्द्रा) तथा कपूंर (चन्द्र) नामक शिरोमूषण वाली, काम-भाव को जगाने याली एवं जिसके नेयरों के तारे चञ्चसं हैं ऐसी श्यामा नामिका किस पुस्ष को आनन्दित नहीं करती ॥७२॥ यहां पर उपमा अलङ्धार व्यड्ग्य है। प्रभा-() 'अतन्द्व' इत्यादि शब्दार्थोभयक्षक्तिमूलक संलक्ष्यकमव्यङय व्वनि का उदाहरसा है। यहाँ पर उपयुक्कत रीति से अर्थद्वय की प्रतीति होती है। यहाँ शब्द धोर अथ दोनों के द्वारा वाच्य वस्तु से उपमालद्वार को व्यञ्जना होती है। श्यामा नायिका तथा रानि की उपमा प्रतीत होती है और वह उपमा 'इ्यामा नायिका के समान रात्रि है'अथवा 'रात्रि के समान श्यामा नायिका है' इस रूप में है। शन्दार्यशवत्युद्दभय धवनि का यह एक ही प्रकार है, जहाँ वस्तु द्वारा मलङ्गार को व्यञ्जना होती है। (२) यद्या शब्दशक्तिमूलय में अर्थ तथा अर्यशक्तिमूलक में शब्द भी व्यञ्जक होते हैं और इस प्रकार सवध उभयगक्तिमूलक ध्वनि होनी चाहिए तथापि गौए- प्रधानभाव की दृष्टि से तीन भेद किये यये हैं, अर्यात् जहाँ शन्द हो प्रधानरूप से व्यञ्जक होता है उसके बदलने पर व्यञ्जना नहीं होती वह शब्दपरिवृत्यसह ध्वनि शब्दशकतिमूलक है। जहाँ शब्द बदलने पर भी व्यज्जना होती है, वह शब्द परि- वृत्तिसह ध्वनि अपरथशवितिमूलक है और जहाँ कुछ शब्द परिवृ्त्त्यसह और कुछ परि- पृतिसह होते है वहाँ उभयशक्तिमूलक ध्वनि है। 'अतन्द्र' इत्यादि उदाहरण में चन्द्र, तारका, तरल और श्यामा शब्दों का परिवतन करने पर घ्वनि ही नहीं रहती; किन्तु अतन्दा, आभरस, समुदीपित और मन्मय के स्थान पर कमशः उनके पर्याय मनिद्रा, भूषस, समुत्तेजित भौर काम पादि का भी प्रयोग कर दिया जाय तो ध्वनि में कोई भन्तर नहीं होगा। इस प्रफार यह उभमराक्िमुलक ध्वनि है।
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.फाव्यप्रकाश:
[ध्वनिप्रकारविवेचनम्] -(५६) भेदा श्रष्डादशास्य तव् ॥४१। अस्येति ध्वनेः। ननु रसादीनां चहुभेदत्वेन कथमष्टादशेत्यत श्राह- (५७) रसादीनामनन्तत्वान्ेद एको हि गण्यते। अनग्तत्वादिति । तथा हि नव रसाः तत्र शृङ्गारस्य दौ भेदौ सम्भोगो विप्रलम्भरच, सम्भोगस्यापि परस्परावलोकनाSडलिंङ्गन-चुम्वना-
अनुवाद-इसलिये (तत् सरमात) इस (ध्यनि) के १८ भेव होते हैं। (५६) (कारिका में) 'अ्स्य' का अ्रभिप्राय है-ध्यनि के। प्रभा-उपर्युक्त र्वनि-प्रकारों की गएना करते हुए आचार्य सम्मट ने रवनि के १८ गेद बतलाए हैं, जैसे कि ध्वन के प्रथमतः दो भेद होते हैं-१., लद्शामूलक जिरो अविवक्षितवाच्य मी कहा जाता है,. अभिघामूलक, जिसे विवक्षितान्यपर वाच्य भी कहा जाता है। फिर लक्षगामूलक ध्वनि के दो भेद होते है- (१) अर्थान्तरसंकमितवाच्य तथा (२) अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य =२ अरभिधामूलक ध्वनि में (१) असलक्ष्यकमव्यङ्भय का एक प्रकार तथा (२) संलक्ष्यकमव्यस्य १५ प्रकार को होती है जैसे- (क) शब्दशक्तिमूलक-(१) वस्तु ध्वनि (२) अलक्कार ध्नि =२ (स) अथशक्तिमूलक उपर्युक्त प्रकार से (ग) उभयशक्तिमूलक-वस्तु द्वारा अल्वारष्यञ्जना, केवल एक भेद=1
टिप्प्णी-(i) आचार्य मम्मट की ध्वनि-भेद गएना भभिनवगुप्त की ध्वनि भेद मएना के आधार पर ही है। अन्तर केवल यही है कि उन्होंने (ध्वन्यालोक- लोचन २-३१) शब्दशक्तिमूलकध्वनि वा केवल एक भेद माना है तथा श्ब्दाषों- भयशक्तिमूलक रवनि को पृथक नहीं गिनाया। अनएव उनके अनुसार १६ भेद होते हैं (पोडश मुटममेवा:) । (ii) साहित्यदपसकार ने ध्वनि भेद-गराना में मम्मट का ही अनुसरर किया है :- 'तरष्टादराधा ध्वनि.'। (साहित्यदपएा ४-६) अनुवाद-(शद्धा होती है कि जब रस आादि के महत से मेद हैं तो धर्यनन के) १८ मेद कैसे ? इसीलिये (इसका समाधान करने के लिमे) प्रन्यकार कहते हैं- रस आादि के पनन्त होने से उनका एक प्रकार (मसंलवपतमध्वनि) हो गिना जातता है। (५७)
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चतुर्थ उल्लास:
भेदाः। विप्लम्भस्याभिलापाद्य उक्ताः । तयोरपि विभावा-नुभाव- व्यभिचारिवैचित्यं, तन्नापि नायकयोरुत्तम-मध्यमा-Sघमप्रकृतित्वम्। तन्नापि देशकालाऽवस्थादिभेदा इत्येकस्यैव रसस्यानन्त्यं, का गणना त्वन्येषाम्। असलत्त्यक्रमत्वन्तु सामान्यमाशित्य रसादिध्वनिभेद एक एव गएयते। (५८) वाक्ये द्वय त्थ :- द्वष त्थ इति शब्दार्थोभयशक्तिमूलः। - (ze) पदेडय्यन्ये- (कारिका में) रसादि को 'अ्रनन्त' कहने का अभिप्राय है कि-नौ रस हैं, उनमें भी भुद्धार के दो भेद हैं-(१) साम्भोग और (२) विप्रलम्भ। समभोग शृद्गार के भी (नायकननायिका का) एक दूरारे को देसना, प्लिङ्गंन, परिचुम्बन इतयादि पुप्प-चयन, जल-फीड़ा, सूर्यास्त, चन्द्रोदम तथा पड्-ऋतु-यन इत्यादि बहुत से भेद है। विप्रलम्भ भृद्धार के अभिलाप इत्यादि भेव ('अपरस्तु' आदि) से कहे गये हैं। उन दोनों (सम्भोग और विप्रलम्भ में भी विभाष, अनुभाव तथा व्यभिचारी भाषों के नाना प्रकार (वचितय) है। उस वंचित्र्य के होने पर भी (तमावि) नायक औौर नायिका के उत्तम, मध्यम तथा प्रधम स्वभाव भी विविन्नता के हेतु हैं। उसमें भी देश (कुञ्ज आदि), काल (वसन्त आादि), अवस्था (नवयौवन आदि) के मेद वैचित्र्य के हेतु होते हैं। इस प्रकार एक शृद्धार रस की ही अनन्तता है (प्रगित भेद हैं) तो अन्यों (वीर इत्यादि रस तथा भाव आदि) की वया गएना ? इसलिए पसंलक्ष्यक्रमतारूप (रस भावादि में) साधारस धम (सामान्य) को लेफर रसादिध्यनि का एक हो प्रकार गिना जाता है। ' 'प्रभा-(१) उपयु क्त ध्वनि के १८ भेदों में असंलक्ष्यतमव्यसघ ध्वनि का एक ही प्रकार गिना गया है। अतएव यह शंका हो सकती है कि रस आदि के तो बहुत भेद हैं अतः असंलक्ष्यकम ध्वन के भी अ्रपनेक भेद हो सकते है फिर उसे एक हो क्यों गिना गया है। इसी बात का समाधान 'रसादीनाम्' इत्यादि कारिका तथा उसकी वृत्ति मे किया गया है। ग्रस्थकार का अभिप्राय यह है कि रस आदि के मनन्त भेद हैं किन्तु सभी में एवा समानता है औोर वह है 'असंलक्ष्यक्रमता' इसी को उपाधि अथवा साधारण धर्म मानकर सभी रसादि-विपयक ध्वनियों को एक गिना जाता है। साहित्यदर्प सकार ने भी, (सा० द० ४-५ में) यही बात कही है- 'तथ्ाद्यो रसभावादिरेक एथात्र गण्यते। एकोऽपि मेवोऽनन्त्वास् संस्येयस्तस्य नँव यत् । अनुवाद-शब्दार्थोभयशक्तिमूलक (द्वाम्यामुतिष्ठतीति द्वयृक्य) ध्यन वारय में ही होती है। (कारिका में) 'दवधुत्थः अर्थात् शबदर्योभयशक्तिमुलक ध्यनि। (x८)
है। (५६) सन्य सर्थान्तरसंकमितवाच्य शदि (१७) ध्यनि मेद पद (शब्ब) में भी होवे
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काव्यप्रकार:
शपपिशन्दादू वाक्येऽपि। एकावयवस्थितेन भूयसेन कामिनीव पदं- घोत्येन व्यङ्गय न वाक्यव्यङ्गयापि भारतो भासते। तत्र पद्प्रकाश्यत्वे क्रमेणोदाहरखानि- १. यस्य मित्रासि मिन्राणि शत्रवः शत्रवस्तथा। श्रनुकम्प्योऽनुकम्पयशच स जातः स च जीवति।।७३।। अत्र द्वितीयमित्रादिशब्दा आ्ाश्वस्तत्व-नियन्त्रणीयत्व-सनेषपान्त्वा- दिसंक्रमितवाच्याः । २. खलववहारा दोसन्ति दारुणा जहवि तहवि घीराएम्। हिअश्नवश्नर्सवहुमना स हु ववसात्रा विमुळकन्ति ।७४॥। (खलव्यवद्दारा दश्यन्ते दारुखा यद्यपि तथापि घीरासाम्। हृद्यवयस्यवहुमता न खतु व्यवसाया विमुह्यन्ति॥७४। 'भवि' शब्द (के प्रयोग) से ये (१७ भेव) वाश्य में तो होते ही हैँ (यह अभिप्राय है) जैसे एक ध्रवमय (नासिकादि में स्यित आामूपल से कामिनी शोभाप- मान होती है, इसी प्रकार एक पद के द्वारा प्रकाशय व्यङ्गधार्य के द्वारा वापय-वपङप काव्यरूपा वासी (भारती) चमत्कारक होती है (भासते)। प्रभा-(१) भाव यह है कि जिस (वाक्यादि) के अन्तर्गत पद का व्यद्तभाय घमत्कारक होता है वह भी ध्वनिकाव्य है। (२) शब्दार्थोभयतिमूलक क्वनि के अ्तिरिक्त मन्य ध्यनिया पद तथा वाक्य में होती हैं अतः ध्वनि के कुल प्रकार (१७x२) १=३४ हो जाते हैं। अनुवाद-उनमें (१७ प्रकार) को पदष्यनि के कमशः उदाहरस ये हैं-, १. 'जस (मनुष्य) के मिन्न विश्वासपात् (मित्र) है, तथा जिसके शत्तु पूर्ण- सथा वमन के योग्य (शत्र) हैं एयं दयापात्र वस्तुतः स्नेहपात्र हो है, वही मनुष्य शोभन जन्म वाला (जातः) है तथा यही (प्रशंसनीय रूप से) नोता है।।७ ३।। यहाँ पर द्वितीय मिन्न, शत्रु तथा अनुकम्प शम्व (कमशः) साश्यस्त (विश्वास पाघ), नियन्म (दमन) के योग्य और सनेहपान्र रूप सर्यं में संक्ानत (परित) हो जाते हैं। प्रभा-'यस्' इत्पादि (१) अविवक्षितवान्य (लक्षणामूलक) धर्थान्तर- संकमित 'पदगत' ध्वनि का उदाहरण है। यहाँ पर द्वितीय मिनादि शब्द स्ववाच्यार्य में अनुपयुक्त हैं, मतः 'माध्वस्तत्व' आदि भथं को सक्षित करते हैं। इससे नायक का उचित व्यवहार आदि व्यन्धु है, जो उपादानलदासा का फन है। यहाँ पद प्रश्येक 'मित्न' आदि शब्द से नायक को 'स्थिरस्वमावता' व्यङ्गप है 'स्ामस्मि' (उदाहरख २३) में तो 'सावधान रहना' यह बात वाक्य द्वारा व्यअथ है। यही पददयोत्य औोर वाक्यद्योत्य धर्वन का सन्तर है। अनवाद-२. 'यद्यपि धूर्तों के इयवहार दुःखदायक रिलाई पड़ते हैं वपापि हृषय एमी मित्र द्वारा अनुमोदित (द्दयमेव वयत्यी मिन सेन अहुमता मनुमोरिताः)
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चतुर्थ उल्लास: १६६
अरत्र चिमुह्यन्तीति। ३. (क) लावसयं तदसौ कान्तिस्तद्र पं स वच:क्रमः। तदा सुधामपद्मभूदधुना तुज्वरो महान् ।७५।। अ्रत्र तदादिपदैरनुभवैकगोचरा अर्थाः प्रकाश्यन्ते। यथा वा- ३. (ख) मुग्घे, मुग्घतयैव नेतुमखिल: काल: किमारभ्यते मानं धत्त्व धृति वधान ऋजुतां दूरे कुरु प्रेयसि। सख्यौवं प्रतिबोधिता प्रतिवचस्तामाह भीतानना। नीचे: शंस हृदि स्थितो हि ननु मे प्राणेश्वरःश्रोष्यति ॥७६।। धोर सोगों के उद्योग नहीं रुकते (विमुह्यन्ति) ॥७४॥ यहां पर विमुह्यन्ति यह पद (अत्यनततिरस्कृतवाच्य है)। प्रभा-'खल' इत्यादि (२) अविवक्षितवाच्य (लक्षणामूलक) अ्रप्यन्ततिरस्कृत ध्वनि का उदाहरस है। यहाँ पर अ्रचेतन (व्यवसाय) में 'विमोह' का मुख्यार्यं 'किकर्त व्य-विमूढता' नही बन सकता क्योंकि यह चेतन का धर्म है) भतएव 'विभोह' शब्द 'रुक जाना' (विराम) अर्थ को लक्षित करता है। इससे धीरों का इष्ट कार्य करना व्यङ्गत है, जो यहाँ लक्षण लक्षणा का फल है। यहाँ पर 'विमुह्यन्ति' यह पद ही व्यञ्जक है अतः व्यङ्गयार्थ पद-प्रकाश्य है किन्तु "उपकृतं बहु" इत्यादि (२४ उदाहरण) में वाक्य द्वारा व्यङ्गभार्थं चोतित होता है। यही दोनों का भेद है। अनुवाद्-३ (क) 'यह (अनुभूत) सौन्दर्य, यह कान्ति, यह रूप (प्राकार प्रथवा रंग आदि) वह बोलने का ढंग (ये सब) तब तो अमृत के समान थे, किन्तु मब तो (उसके वियोग में उनका स्मरस होने पर) अत्यन्त पीड़ादायक ज्यर से प्रतीत होते हैं ।।७४।। यहां पर 'तद' (असौ, तदा, पधुना) आदि प्दों द्वारा एकमात्र अनुभव के विषय (अवसंनीय विशेपलावण्यादि) भावों की व्यञ्जना होती है। प्रभा-'लावण्य' इत्यादि (३ क) पद- प्रकाश्य अलक्ष्यकमव्यङ्गय ध्वनि का उदाहर है। यहाँ पर वाक्य द्वारा विप्रलम्भ शृङ्गार की अभिव्यक्ति होती है। अनुभवगोचर लावण्प आादि को 'तद' आदि पर ध्वनित करते हैं तथा पद-व्यङ्गय अथों की ही यहाँ पर प्रधानता है; क्योकि अनुभूत लावण्यादि का स्मरण विप्रलम्भ का पोपक है अतएव यहाँ ध्वनि पद-प्रकाश्य है। अनुवाद-३ (स) अरी मुग्घे, तू सोधेपन (मुग्घलया=ममोचित मान आदि का आचरण किये बिना) से ही समस्त (यौवन) समय को व्यलीत करना थयों श्रीरंम्भ करती है ? मान घारस कर, घीरज घर, प्रियतम के सम्बन्ध में सरतता को दूर कर दे।" सखी के द्वारा इस प्रकार बार-बार समझाई गई। उस भयमुक्त मुस यालो (नापिका) ने यह उत्तर दिया-'ससी, घीरे से बोल नहीं तो मेरे हदय में स्थित मेरा प्राशाप्रिय सुन लेगा ।७६।।
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१६० काव्यप्काश:
श्रत्र भीताननेति। एतैन हि नीचैः शंसनविधानव्य युक्तता गम्यते। भावादीनां पदप्रकाशयत्वेऽघिकन्न वैचित्र्यमिति न तदुदाहियते। ४. रुधिरविसरप्रसाधितकरवालकरालरुचि रसुजपरिघः। फटिति भ्र कुटिविट ड्गितललाटपट्टो विभासि नृप, भीम।।।७।। अत्र भीपसीयसय भीमसेन उपमानम् । यहाँ पर 'भीतानना' इस पद में (अ्लक्ष्यभमव्यङ्गघ) ध्वनि है। इससे 'घोरे- धौरे योलने के विधान का श्नित्य प्रवह् होता है। प्रभा-'मुग्घे' इत्यादि (३ स) पद व्यक्ुष मलश्यकमध्यनि का उदाहरण है। अमरुशतक के इस पद् में सम्मोग पृङ्जार व्यङ्तय है। लावण्यम् इत्मादि उदाहरस (७५) में तो विप्लम्भ पृद्धार व्यङ्जप है। इसी दृष्टि से इस ध्वनि-भेद के दो उदाहरण दिये गये हैं। 'भीतानना' शब्द द्वारा 'मीरे-धरे बोलना ही ठोक है' यहु प्रतीत होता है। यहाँ पर 'भीतानना' पद प्रधान रूप से व्यङ्च है प्रतः यह पद-प्कारय ध्वनि है। 'शून्यं बासगृहम्' (३० उदाहरएा) इत्यादि में कोई एक पद प्रधान रूप से व्यञ्जर नहीं अतः वहाँ वाकय व्यन्नथ व्वनि है। अरनुवाद्-भाव (भावाभास) आदि के पव-प्रफादय होने में विशेष समरकार (वंचिश्र्य) नहीं है इसलिये यहां उनके उदाहरता नहीं दिये जाते है। : प्रभा-अ्रसंलक्ष्यममव्यसय ध्वनि के पद-प्रकाश्य रग-विपयक उदाहरण' ऊपर दिये गये हैं; किन्तु ग्रन्थकार आवादि रुग पदन्प्रकाश्य अरांलव्यममव्यज्गम ध्वनि के उदाहरण नही दिखला रहे है इसका कारगा यह है कि पदनव्यस्गंम भाव भावाभास आदि विशेष चेमत्कारक नहीं हुमा करतें। अ्र्पनुवाद-४ हे भयडूर (भीम) राजन्, रंक्त की धारा (विसर) मे अलड्कृत खड्गद्वारा भयानक तथा सुन्वर (कमशः शतु औौर मित्र के लिए) है भुजा रपी परिघ (लौहदण्ड-अगला) जिसके और शीम हो ध्रूमज्ज से तरसिस (बिटासित) है सलाटफलक जिसका, ऐसे तुम शोनायमान हो ।७।! यहां पर भोपस (नूप) का भोमसेन उपमान है। यह रपहम्य है। प्रभा-रधिर इत्यादि (v) संसस्यममव्यनुध पद-प्रकारय गब्दपकिमूसक र्वनि में वस्तु द्वारा मलद्वारवं्जना का उदाहरण है। यहाँ विशेषए 'भीम शब्द है उसका वाच्य अरथ है-नीपर या पाण्डववीर भीमसेन (उपमानरूप में) नुप छथा व्यन्धंघ है। 'मीम' शब्द की महिमाह व्यक होसी पंद-प्रकाश्य ध्यति है। कपरराप , उदाहरसा) T वाक्य-व्यक्म है। यहाँ पर भीम पद
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चतुर्थ उल्लासः १६१
५. भुक्तिमुक्तिकृदेकान्तसमादेशनतत्पर: कस्य नानन्दनिस्यन्दं विद्धाति सदागम: ।७न।। काचित्सङ्क तदायिनभेवं मुख्यया वृत्या शंसति। ६. सायं स्नानमुपासितं मलयजेनाङ समालेपितं
आश्चर्यन्तव चौकुमार्यमभित: क्लान्ताऽसि येनाधुना नेत्रद्वन्द्वममीलनव्यतिकरं शक्नोति ते नासितुम्॥७ह॥
द्योत्यं व्यज्यते। अरत्र वरतुना कृतपरपुरुषपरिचया क्लान्ताडसीति वस्तु अधुनापद-
अनुवाद-५ (वाच्यार्थ) 'स्वर्गादि भोग (भुक्ति) तथा मोक्ष का दिलाने वाला नियमपुर्वक (एकान्त) सम्यक उपदेश करने में तत्पर जो शष्ठ झागम (वेद- शास्त्र) है वह किस (ब्रिज) के हृदय में आनन्द का प्रवाह (निष्यन्द) नहीं करता ?' (व्यड्ग्यार्थं) 'सुरतादि भोग तथा विरह दु.ख का त्याग (मुक्ति कराने वाला) संकेत स्थान (एकान्त) को भली भांति बतलाने में तत्पर जो सुन्दर अर्यात् प्रियतम का प्रगमन है वह फिस (रमणो) के हृदय में आनन्द का प्रवाह नहीं करता ?'॥७८॥
स्तुति करती है। कोई (नापिका) सकेत देने वाले उपनायक फी ही इस प्रकार मुख्यवुति से
प्रभा-'भुक्ति' इत्यादि (५) संलक्ष्यकमव्यङ्गय पद-प्रकाश्य शब्दशक्तिमूलक - - ध्वनि में-वस्तु द्वारा वस्तु-व्यञ्जना का उदाहरण है। यह अन्यजनसननिधि में उपनायक के आ जाने पर हर्प प्रकट करने वाली नायिका की उत्ति है। यहाँ पर द्वितीय अर्थ मुख्य रूप से विवक्षित है किन्तु उसे छिपाने के लिये अप्नाकरणिक कर दि या गया है और अप्रस्तुत अर्थ को प्राकरसिक बना दिया है। वह वाच्यार्थ (मुर्य) अप्नाकरणिक होकर व्यङ्गय बन गया है-इसी हेतु 'मुख्यया वृत्त्या' का अभिप्राय है व्यञ्जनावति द्वारा (वालवाधिनी)। इस प्रकार 'सदागम' पद के द्वारा मुख्यरूप से उपपत्ति की स्तुतिरूप वस्तु ध्वनित होती है। मद्यपि यहाँ पर 'भुक्ति' 'मुक्ति' पद भी व्यञ्जक है किन्तु उनके बिना भी, प्रधानरूप से 'सदागम' पद ही व्यञ्जक है; अतः यहाँ पर पद-प्रकाश्य ध्वनि है 'पथिक' इत्यादि (५८ उदा०) में तो थ्रनेक पदों से वस्तु-व्यञ्जना होती है अवएव वहाँ वाक्षव्यङ्गय ध्वनि है। यहाँ 'सदागम' पद परिवृत्त्यसह है अतः शब्दशक्तिमूलक' घ्बनि है। अनुवाद-६ 'हे सखि, यद्यपि तुमने सन्ध्या समय स्नान किया, शरीर में वंन्दंनं का लेपन कराया, प्रकाश का मणि प्रर्थात् सूर्य सस्ताचल के शिसर को चला गया (प्रर्थात् रात्रि हो गई) तब चुम्हारा यहाँ (कुं्जावि युक्त प्रदेश में) निभमता- पू्वक आगमन हुमा तथापि जिस सुकुमारता के कारणा (पेन) तुम ऐसी धाग्त हो गई कि तुम्हारे नेत्रयुगल बिना बार २ बन्द हुए (भमोलनत्य व्यतिकर: पोनः पुन्पेन, प्रवृत्ि यघ तादुशम्) ठहर (स्थातु') नहीं सकते, तुम्हारी यह सुकुमारता भद्मुन है॥७६।। यह पर (वाच्यार्थ रूप) वस्तु द्वारा 'पर पुरुष से समागम (परिषम) करके
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१६२ काव्यप्रकाण:
७. तद्पराप्तिमहादुःखविलीनारोपपातका।,
चिन्तयन्ती जगत्सूर्ति परत्रह्मरवरूपिगाम्। निरुच्छ वासतया मुक्ति गतान्या गोपगन्यका ॥=१।। अ्रत्र जन्म सहस्त्र रूपभोत्तव्यानि दुष्कृतसुकतफलानि वियोगदु:खचि- न्तनाहादाभ्यामनुभूतानीत्युत्तम्। एवं चाशेप-चयपद्द्योत्ये प्रतिशयोकी। सुम थफ गई' यह वस्तु प्रभिव्यक्त होतो है-जो कि 'अधुना' शब्ब द्वारा प्रकाश्य है। प्रभा-'सायम्' इत्यादि (६. अर्थशत्तिमूलक संलक्ष्यकमध्वनि के द्वादश भेदों में से पद-प्रकाश्य स्वतः सिद्ध वस्तु द्वारा वस्तु-व्यञ्जना का उदाहरण है। उपनायक से रतिकीड़ा करके थकावट को दवर करने के लिये स्नान आदि कर चुरने वाती सखी के प्ति विदग्या सखी की यह उत्ति है। यहाँ पर स्वतः सम्भवी वस्तुर्प व्यञ्जक अर्थ है-ऐऐसी विचिन सुकुमारता! जिससे अब व्लान्त हो' गई।' यह वाक्यार्थ रूप वस्तु लोक सिद्ध है। इसके द्वारा व्यङ्गभ अर्थ है-'पर पुष्प के सभा गम से तुम थक गई।। 11 'इस व्यङ्गथार्थ के छोतन में 'मधुना' शब्द की प्रंधानता है-(भघुनवायं मुलमः नान्यदा कदापि हंप्ट :- इस रूप में) अतः यहाँ पद-प्रकाशय ध्वनि है।'मलस' इत्यादि (६० उदाहरण) में तो ध्वनि वावय-ध्यङ्गय ही है। अधुना के स्थान पर 'इदानीम्' आदि पद रस देने पर भी ध्वति बनी रहेगी भतः यहाँ अर्भपक्तिमूलक ध्वनि (दब्दपरिवुतिसह) है। * अनुवाद्-७,'उन (श्रीकप्स) के वियोग (धप्राप्ति) से होने वाले महादुःल के कारस जिसके समस्त पाप नष्ट हो गये थे, उनके ध्यान (चिन्ता) से होने वाने महान् पानन्द के द्वारा जिसकर पुष्य-संचय सीस हो गया था, ऐसी कोई गोपी सो परब्रह्मत्वरूप संसार के उत्पादक (जगतः सूतिः उत्पतति: यस्मात्) भौकृप्स का चिन्तन करती हुई प्रालण-वायु एक जाने से मोक्ष को प्राप्त हुई ॥८०, मर।। 'यहाँ पर सहस्रों जग्मों में भोगने योग्य पाप और पुण्यों के फल विरह-वेदना तथा ध्यान के पानन्द द्वारा भोग लिये गये (भ्रनुभूतानि)-यह कहा गया है। इस पंकार 'सशेष' (समस्त) औोर 'घम' (समूह) सबवों से ध्यक्त होने वाली (बो) प्रतिशयोकिया है। प्रभा-'तद' इत्यादि (७) पद-प्रकादय पर्धदाक्तिमूषक संसदयकम ध्वनि में स्वत: सम्भयी वस्तु द्वारा अलस्वार-व्यज्जना का उदाहरत है। यह विष्ण पुराए के दो परधों का सुम्मक है। यहां पर जन्मसह्स में भोगने योग् पापराचि के फल या भगवद्िमोग दु:स के साथ सातात्म्याध्यवसाय है जो 'प्रेपपद द्वारा दोहिए हो रहा है। इमी प्रकार जन्म जन्मानर में भोगने वोष् पुण्य-कन का गर्वा्पनतन, सुरा के साथ वादात्म्याध्यवसाय है, जो 'चय' पद द्वारा चोतित हो, रहा है। भसएय
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पतुर्थ उल्लास: १६३
- कणदाऽसावक्यदा वनमवनं व्यसनमव्यसनम्। वत वीर, तव द्विपतां पराङमुखे त्वयि पराङमुखं सर्वम् ॥म२॥ अ्रत्र शव्दशक्तिमूल विरोधाङ्ग नार्थान्तरन्यासेन विधिरपि त्वामनु· वत्तते इति सर्वपद्द्योत्यं वस्तु। ६. तुह वल्लहरस गोसस्म असि अहरो मिलाएकमलदलो। इश् एववहुआ सोऊए कुएाइ वशए महिसंमुहम्॥-३॥ ' (तव चल्लभम्य प्रभाते श्रासीदृघरो म्लानकमलद्लम्। • इति नववधू: श्रुत्वा करोति वदनं महीसम्मुखम् ॥८३॥) िगोयाध्यवसान रूपा अतिरायोक्तयां 'शोष' तथा 'चय' पदों द्वारा ध्वनित होती है। इस व्यञ्जना में 'अदोप' और 'चय' शब्दों की प्रधानता के कारए यह पद-प्रकाश्य ध्वनि है। 'धन्यासि' (६१ उदाहरण) इत्यादि मे किसी पद की प्रधानता नहीं अतः वहाँ वाक्यव्यज्जुय घ्वनि है। अनुवाद- 'य्रहो ! वीर, तुम्हारे प्रतिफूल (पराइमुस) हो जाने पर सुम्हारे शत्रुमों के (लिये) सभी प्रतिकूल हो गया है। 'क्षरादा' आनन्ददायिती रात्ि 'पक्षसवा' आनन्द न देने वाली । क्षरामुत्सवं न ददाति इति) हो गई है। 'वन' भी 'प्रवन' सर्यात् रक्षक (प्रवति इति) हो गया तथा 'व्यसन' धयसादि 'अ्रव्यतन' (सर्थात् मनोरञ्जन में असमरय प्रथवा अवोनाम् असनम्-भेड़ चराना) हो गये हैं ।८२ यहाँ पर शब्दशक्तिमूलक (क्षसदा, अक्षसदा आदि) विरोध के उपवादक (पङ्ग) अर्यान्तरन्यास के द्वारा 'विघाता भी तुम्हारा अनुसरख करता है' यह वस्तु 'सव' पद से दोतित होती है। प्रभा-'क्षसादा' इत्यादि (5) पद-प्रकाश्य अणशक्तिमूलक संलक्ष्यकम घ्वनि में-स्वतः सिद्ध मलङ्कार द्वारा वस्तु-अञ्जना का उदाहरत है। यहां पर अर्थान्तर- न्यास-मलङ्गाररूप अर्थ व्यञ्जक है। यह अर्थान्तरन्यास (शब्दशकिमूलक) 'कषणादा' शादि के अक्षरादा हो जाने के उपपादक रूप में प्रस्तुत हुआ है अर्याद जो क्षसादा है वह अक्षसादा कैसे हो जाती है? क्योकि आपके पराङमुख हो जाने पर शत्रुओं के लिये सब पराङ्मुख हो जाता है। यह अर्थान्त रन्यासरूप व्यञ्जक अथं स्वतः सम्भवी है। इसके द्वारा यह वस्तु ध्वनित होती है कि-'विधाता भी तुम्हारा अनुसरण करता है'। इस व्यञ्जना में 'सवं' पद की प्रधानता है, छतः यह पद-प्रकारय ध्वनि है। 'दर्पान्य' इत्यादि (६२ उदाहरण) में तो ऐस कोई पद नहीं है भतः वहां वावम ध्वनि है। यहाँ पर 'सव' सब्द के प्रनेक अर्थ नीं अतः अयशक्तिमूलक मलङ्गार द्वारा ही वस्तु-व्पज्जना मानी जाती है। अनुवाद-'प्रात काल तुम्हारे सियितम का अघरोष्ठ मुरकाये हए - कमस-पत्र के सनान था' इस वात को सुनकर नवदाननाविका अपना मुख यूमि को छोर कर लेती है ।८३।
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१६४ माव्यप्रकाश:
अत्र रूपकेण त्वयाजस्य मुहुर्मु हुः परिचुम्धनं तथा कृतं येन म्लानत्व- मिति मिलाणादिपद्द्योत्यं काव्यलिङ्गम्। एपु स्वतः सम्भवी व्यब्जक: । १०. राईसु चंदघवलासु ललिअमप्फालिऊए जो चावम्। एकच्छत्त विश्र कुसाइ भुनयारज्जं विजंभंतो ।४॥ रात्रीपु चन्द्रधवलासु ललितमास्फाल्य यश्चापम्। एकच्छत्रमिव करोति भुवनराज्यं विजम्भमाय:।।८४।।) अर््न्र वस्तुना येपां कामिनामसी राजा स्मरस्तेभ्यो न कशिचिद्पि तदादेशप राड मुख इति जाप्द्विरुप भोगपरैरेव तैनिशाSतिवाएते इति भुभ्र. सारज्जपद्द्योत्य वस्तु प्रकाश्यते। यहाँ पर रूपक अलद्धार द्वारा 'तूने इस (भपर) का बार बार ऐसा चम्बन किया कि इसमें म्लानता आ गई' यह काव्यलिन्ट अलद्वार 'मिसाए' आादि पद से धोतित होता है। इन (साम' आदि से लेकर 'तव' इत्यादि तक चार) उदाहरसों में स्वतः सम्भवी सर्यं व्यञ्जरु है। प्रभा-'तव' इत्यादि (E) पद-प्रकादय अर्थशाक्तमूलक संलक्ष्यक्रम ध्वनन में-स्वतः सिद्ध मलद्वार द्वारा पलङ्गार-व्यञ्जना का उदाहरया है। यह रिसी ससी की नवोढा नायिका के प्रति सक्ति है। यहाँ पर 'मधरः म्लानकमसदसम्' यहु रुपक-मलङ्काररप पररथ अञ्जन है। यह स्वतः सम्भवी अर्थ ही है। इसके द्वारा ध्वनित होने वाला पर्यं है-काव्यलिङ्न मनद्वार। जिसका स्वरूप है-नापिफा ने पघर का बार बार ऐमा चुम्बन किया कि नसमे म्लानता मा गई'। यहां 'म्लानता' में 'परिचुम्बन' हेतु है' अरतः काव्यलिङ्ज अलङ्गार है। यह व्यङ्गपार्थ (म्लानकमलदल) 'म्लान' आदि पद के द्वारा प्रधानरूप से चोतित होता है पतः यहां व्यङ्ध पद-प्रकाश्य है। 'ाकान्त' (६३ उदाहरण) इत्यादि में तो ध्वनि वाकय-व्यल्थ ही है। ऊपर के चारों उदाहरसों में वाकय-ध्वनि के समान ही प्यशक्तिमूलक (संलक्ष्यकम) स्वतः सिद्ध व्यञ्जक के पदन्वोरप पार रप समझने पाहिए। अनुवाद-१०. जो (कामदेव) धन्व-पवलित राष्रिपों में मुक्ठमार (कुसुममम) धनुष को फटकार कर ही (बालादि सन्धान करके नहीं) संसार में सपना एकच्घन राज्य करता है तक गय के साथ विचरस करता है (विजुम्भमारः मतिसाहस्ारतया व्तमान:)' ॥८YI यंहा पर वर्तु द्वारा 'जिन हामो व्पक्तियों का राजा वह कामदेव (रमरः) है, उनमें से फोई भी उसकी आाशामे बिमुस नहीं होता। इस हेतु (इति) आपसे हए उपभोग में हो तम्पर रहरुर उरके द्वारा रानि उ्पतीत की जाती है।' यह वरतु 'उुपसरग्ज' पद से तोतित (स्वतित) होती है।
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चतुर्थ उल्लास: १६५
११. निशितशरघियाऽर्पयत्यनङ्गो दशि सुदश: त्ववलं वयस्यराले। दिशि निपतति यत्र सा च तत्रव्यततकामेत्य समुन्मिपन्त्यवस्था ॥=५॥ अत्र वस्तुना युगपद्वस्था: परस्परविरुद्धा शरप प्रभवन्तीति व्यात- करपद्द्योत्यो विरोघ: । १२. वारिज्जन्तो वि पुसो सन्दावकहत्थिएए हिअ्एए। थणहरवअस्सएए विसुद्धजाई गा चलड से हारो ॥=६॥। प्रभा-'रात्रिपु' इत्यादि ( ) (अररथंशत्तिमूलक संलक्ष्यक्रम) कविप्रोढोकिति- सिद्ध ध्वनि के चार भेदो में से पद-प्रकाश्य वस्तु द्वारा वस्तु-व्यञ्जना का उदाहरण है। यह मानिनी नायिका के प्रति सखी की उक्ति है, जिसका अभिप्राय है कि मान- निर्वाह कठिन है। यहाँ पर कविप्रोठोक्तिमात्र-सिद्ध वस्तुरूप अर्थ व्यञ्जक है; जिसका स्वरूप है-'कामदेव चापस्फालन द्वारा ससार पर एच्छत्र राज्य करता है। यह पर्थ कवि-कल्पनामात्र प्रसूत है। इसके द्वारा व्वनित होने वाला वस्तुरूप अर्थ यह है-'अपने राजा कामदेव के वश में हुए कार्मियों के द्वारा जागते हुए ही निशा व्यतीत कर दी जाती है।' यह व्यङ्गधार्य 'भुवनराज्य' पद द्वारा प्रधानरूप से द्योतित होता है भ्रतः यहाँ पद-प्रकाश्य ध्वनि है। कैलामस्य (६४ उदाहरण) इत्यादि मे तो ऐमा कोई पद नहीं अतः वहाँ वाक्य-व्यङ्गथ ही ध्बनि है। अनुवाद -११. 'कामदेव अभिनव योयन को भवस्था में (शराले कुटिले धयसि) सुन्दरियों (सुहशः शोभनद्शः) के नेत्रों में अपने तोक्ष्स बागों की बुद्धि से (अर्यात् नेत्रों को अपने तीक्षण बागा समभकर) अपने वल को अरपित कर देता है (लगा लेता है)। अतएय वह (अपितबला) दृष्टि जहाँ पड़ती है वहों-(हसित, रुदित आदि दश) काम को अवस्याएं मिलकर (व्यतिकरम्-मिश्रीभावमेत्य) बारयार उत्पन्न हो जाती हैं (समुन्मिषन्ति)' ।।८५।। यहाँ पर (व्यतिकरमेत्यावस्याः समुत्मियन्ति) इस वस्तु द्वारा 'परस्पर विरुद्ध (हसित-रदित प्रादि) धवस्थाएं एक साथ प्रकट होती है यह व्यतिकर शब्द द्वारा ध्रोतित होने वाला विरोयालद्वार व्यङ्गथ है। प्रभा-'निशित' इत्यादि (११) कविनोडोक्तिसिद्ध पद-प्रकाश्य वस्तु-द्वारा अलङ्वार-व्यञ्जना का उदाहरण है। यहाँ पर कविप्रोढोकिसिद्ध वस्तुरूप भथं ष्यञ्जक है; जिसका स्वरूप है-'नेवरूपी-वाण पर कामदेव का बलार्पए तथा उस बाख के पतन स्थान पर काम-दशामों की उत्पत्ति'-यह सब कविप्रोढोपित- मात्र सिद्ध वस्तु है। इसके द्वारा विरोधालद्वार व्यङ्नघ है, जिसका स्वरूप है- 'हमित-रुदित इत्यादि परस्पर विरु्द्ध भी काम-दशाएं एक साथ प्रकट हो जाती है। यहाँ 'म्यतिकर' (एकसाथ मितकर) शब्द प्रधानरूप मे स्यन्गम भर्य को दोतित करता है पतएव पदद्योत्य क्वनि है। मेेपु (६५ उदाहरए) मे तो ध्वनि बावय द्वारा ही द्योतित होती है।
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१६६ फाव्यप्रकाश:
(वार्यमाणोऽपि पुनः सन्तापकदर्थितेन हदयेन। • स्तनभरवयस्येन विशुद्धजातिन चलत्यस्या हार:॥=६।।) अत्र विशुद्धजातित्वलक्षराहेत्वलक्वारे हारोऽनवरतं कम्पमान एवा स्ते इति स चलइपद्द्योत्यं वस्तु। १३. सो मुद्धसामलङ्गो घम्मिल्लो कलिअतलिअसिअदेह्दो। तीए खंघाहि वलं गहिय सरो सुरअसङ्गरे जअनइ ।८5॥ (स मुग्धश्यामलाङगो धम्मिल्ल: कलितललितनिजदेहः। तस्या: स्कन्वाद् वलं गृह्दीत्वा रमर: सुरतसङ्गरे जयति ।=s।I) अत्र रूपकेश मुहुर्मु हु राकर्पेशेन तथा केशपाश: स्कन्वयो: प्राप्तः यथा रतिविरतावप्यनिवृत्ताभिलाप: कामुकोऽभूदिति खंचपद्दयोत्या विभावना।
अनुवाद-१२ 'पालिङ्गन में वाधक होने के कारण) सग्ताप से पीहित (कदयित) हृदय द्वारा बार-वार हटाया हुआ भी उस (नायिका) का हार (मोतिपों को माला) उन्नतस्तनरूपी मिन्नों के निकट से नहीं हटता (स्तनभररूपयपस्यतः न चलति-इत्मर्थ :- पञचम्यर्य तृतीया पथवा स्तनभरत्य वयस्यत्वेन हेतुना न चलति इति; घयस्येन इति भाषप्रधानी निर्देशः); क्योंकि यह (हार) विशुद्ध-जाति (के मुस्तामों का सपया शुद्ध जन्म वाला) है' ॥८६।। यहां पर 'विशुद्ध जाति माला' इस स्वरूप माले काव्यलिस्त अलद्भार द्वारा 'हार निरन्तर कांपता ही रहता है' इस 'न चलति' पव से धोतित होने वाले वहतु- रूप अर्थ की व्यञ्जना होती है। प्रभा-'वार्यमाण' इत्यादि में (१२) पदप्रकाश्य कविप्रोओोक्तिमानिद्ध मलद्वार द्वारा वस्तु-व्यञ्जना का उदाहरत है। यहाँ पर कर्विप्रोढोकिमान सिंद हेत्वलदार पर्यात् काव्यलिद्ध अलद्वार व्यञ्जक अर्थ है; जिसका स्वरूप है- विशुद्ध जाति वाला होने के कारस यह हार मिन्न को नही छोडता' (बुनीन व्यक्ति महान् सङूट में भी मित्र को कब रोड़ता है ?) यह चात मविप्रोडोकिमान सिव है: पयोंकि मुक्ता की शुद्धता में कुलीनता का प्रध्यवसाय करके उसे हेतु बनाया गया है। इस काव्यलिङ्ग भलद्वार के द्वारा इस वस्तुरूप अर्म की व्यं्जना होती है कि-विपरीत रति में नायिका की माला निरन्तर हितती-इसती रहती है' यहाँ पर 'न चलति' पद प्रधान रूप से इस व्यज्गम मर्य को चोतित करवा है। (यहाँ पद का मर्घं है-वापय-भिन्न सायक वसुंसमुदाय) मरसः पद-प्रकास्प ववनि 4 % है। 'गाढालिज्जुन' ादि (६६ उदाहरस) में सो ध्वनि वानम प्रफाष्य है। अनुवाद-११. [किसी मुन्दरी का] यह केसवारा रपो रामदेव-जो सुन्बर स्मामल शरीर माला हैँ, जिसने मनोहर [केशपास हपी] शरोर को फिर प्राप्त फर लिया है-उस [नाविका] के [सरन्याथार सर्मान् सग्य शिविर दपी] कन्ये मे चल (इलि तपा सेगा) प्राप्त परके गुरतररी संग्राम में विनवी ोता है ॥
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चतुर्थ उल्लीस: १६७
१४. एवपुणिमामिश्रङ्गरस सुहत्र को त् सि भएासु मह सच्चम्। का सोहग्गसमग्गा पश्मोसरत्र्ि व्व तुह अज्ज ॥मम।। (नवपूर्णिमामृगाङ्कस्य सुभग, कस्त्वमसि भण मम सत्यम्। का सौभाग्यसमग्रा प्रदोपरजनी तवादय ॥र॥) अरत्र वस्तुना मयीवान्यस्यामपि प्रथममनुरक्तत्वं न तत इति गवे- 1 त्यादि पओसेत्यादिपद्द्योत्यं वस्तु व्यज्यते। यहां पर रूपक के द्वारा-'बारबार सोंचे जाने से केशपाश नायिका के कन्यों पर ऐसे (सुन्दर रूप से) आ पहु चे हैं कि रति की समाप्ति पर भी कामुक व्या्त्त को अभिलाया निवृत्त नहीं हुई" यह स्कन्ध पव से प्रकट होने वाला विभावना नामक अलद्धार व्यड्ग्य है। इन ('रातीपु' इन्यादि चार उदाहरणों) में ऐसा अथं व्यञ्जफ है जिसका स्वरूप कविप्रोढोक्तिमान्र से सिद्ध (निप्पक्ष) होता है। प्रभा-'स' इत्यादि (१३) पद-प्रकाश्य कविप्रौढोक्तिमान्रसिद्ध अलद्दार द्वारा अलङ्वार-व्यञ्जना का उदाहरणा है। यहाँ पर 'धम्मिलः (केशपाशः) एव स्मर:' तथा सुर-सङ्गरे' ये दो रूपक है और 'स्कन्धात्' तथा 'वलम्' मे श्लिप्ट- रूपक है। पद्य का भाव यह है-जैसे युद्ध से हटे हुए किसी व्यक्ति को उसका कोई मित्न अन्य सँन्यशिविर से सेना लेकर उसे प्रोत्साहित करता है इसी प्रकार इस नायिका का केशपाश जो साक्षात कामदेव ही है उमके कन्धों से बल प्राप्त करके सुरतभोग से निवुत्त हुए मन को फिर से प्रोत्साहित करता है। यहाँ व्यञ्जक सर्थ सर्थात रूपकालद्वार कविप्रोढोवितिमाय्र सिद्ध है। इसके द्वारा विभावना अलङ्कार की व्यञ्जना होती है; जिसका स्वरूप है-सुरताभोग में बार बार खीचे जाने से केशपाश इस प्रकार नायिका के कन्धों पर आ गये है कि रति से निवृत्त हुए भी कामुक व्यक्ति की अभिलापा निवृत्त नही होती (रत्यनिम्पत्तिर्प अभितापहेतु के प्रभाव में भी पमिलापा का नदय होना)। यहाँ पर रति-निष्पत्ति 'स्कन्ध' शब्द से द्योतित होती है; क्योंकि आकपण द्वारा केशपाश की स्कन्ध प्राप्ति प्रामः रति निष्पत्ति बिना नहीं होती अतएव यहा घ्वनि-पद-प्रकाश्य है। 'या स्थविरम्' (उदाहरण ६७) इत्यादि में तो ऐसा कोई एक पद नहीं अतएव वहाँ वाक्यव्यङ्गघ ध्वनि है। वाक्यविपयक कविप्रोढोक्िमानसिद्ध अर्थशक्तिमूलक संलक्ष्यकमध्वनि में चार भेदों ने समान ही पद-प्रकाश्य चार भेद भी होते हैं जिनके कर 'रातीपु' आदि से 'स' इत्यादि तक उदाहरस प्रस्तुत किये गये हैं। अनुवाद-१४. हे सौभाग्यशाली (प्रियतम), तुम मुन्े सच संच वताओो- कि नवोदित पूसमासी के चन्द्रमा के तुम कौन (ससा या धाता) हो ? औौर की प्रदोप रजनी के समान तुम्हारी ऐसी नायिका कौन है, जिसमें - -न (सौभाग्य) भरा है॥द॥
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१५. सहि एवसिहुवसासमरम्मि अङ्गव,ली सहीए सिविडाए। हारो शिवारिओ विश्न उच्छेरन्तो तदो कहं रमिश्म्।८।। (सखि, नवनिधुवनसमरेऽङ्कपालीसख्या निविडया। हारो निवारित एवोचिछ्रियमाणस्ततः कर्थ रमितम् ॥८६॥) अत्र वस्तुना हारच्छेदानन्तरमन्यदेव रतमवश्यमभूत, तत्कथय कोदगिति व्यतिरेक: कहंपद्गम्यः । 1. . यहाँ पर (वावयार्यरूप) वस्तु द्वारा-'मेरो जसी किसी प्र्य नायिका में भी पाप पहले मनुरक्त थे, फिर नहीं रहे यह 'नय' भादि तथा 'प्रदोप' इत्पादि पर से धोतित वस्तु व्यकत होती है। प्रभा-'नव' इत्यादि (१४) पद प्रकाश्य (पर्थमक्तमुलकसंलक्ष्यकमध्वनि में) कविनिवद प्रोढोक्तिमान सिद्ध वस्तु द्वारा वस्तु-व्यज्जना का उदाहरण है,। यह नामिका की किसी उपनायिका में अनुरक्त पति के प्रति उक्ति है। यहां पर कवि निबद्ध नामिका की प्रौळोवितमामसिद्ध वस्तुरप अर्थ व्यञ्जक है। न्रियतम का पू्शिमा के चन्द्रमा के रूप में तथा अनुरागवती अन्य नायिका का प्रदोप रजनी मे रूप मे वसन नामिका की बोदोवितमात हो है। इस यस्तुरूप अर्थ द्वारा उपसुक वस्तु की व्यञ्जना होती है। 'नय' इत्यादि शब्द द्वारा-'प्रथम प्रनुराग होना तथा 'प्रदोप' इत्पादि शब्द द्वारा-'फिर मनुराग न रहना'-इन भर्यो की व्यं्जना होती है मतः यह। पर व्यद्पार्य प्रधानरूप से पद-प्रकादय है। 'ये लट्टा' इत्यादि (उदाहरण ६८) में कोई पद प्रधान नहीं अतः वहाँ व्यस्मघार्य वाकय-प्रकाश्य है। अनुवाद-१५ परी सलि, नधीन सुरतर्पी सप्राप में वुद्ध या प्रगम्म निविडया) झलिगन (प्रमपासी) रप सक्षी ने बोध में पड़ने यासी (उष्छिपमारा) सुकता-मासा को हटा दिया समया सोड़ िया सय सूने भसी रति-कोड़ा को? (रसितम् क्रोहितिम्)' ॥=६।। 1 यहां पर वहतु द्वारा-'हार तोड़ने के पशचात् प्रवश्य ही विलसल (सम्यदेव) रति सीला हुई होगी, तो कहो यह कँसी थो' ? यह व्यतिरेक मलङ्गार 'रप' शर द्वारा बोध्य है। प्रभा-'ससि' इत्यादि (१२) पद-प्रकाश्य कविनियद् प्रोडोरिमार सिद वस्तु द्वारा मसद्वार-व्प्जना का उदाहरण है। यह नयोडा के प्रति रस्मा ससी को उत्ति है। इसमें कविनिवद्ध रसजा नायिका की ओ्रोडोसिमानसिन वरमुरूय भर्म व्यञ्ज है; जो उपयुक पद्य का वाच्यार्य रुप ही है। यहाँ पर पहसे होने वानी, रति लोला की सपेकषा हार-टूटने के परचाद होने, याती रसिस्सीता का उसषं दिशाया गया है; अतएय (उपमान की अपेक्षा उपमेय का उदपर्ष रु) व्यतिरेक ससार बनुपह। 'फर्प' शब्द विस्मन मा जिसासा का बोषक है, इसके द्वारा 'वसण
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चतुर्थ उल्लीसं:
१६. क-पविसन्ती घरवारं विवलिअवश्नणा विलोइऊणा पहमू। खंधे घेत्त स घडं हाहा पट्टोत्ति रुअ्ंसि सहि किं ति ॥६०॥ (प्रविशन्ती गृहद्वारं विवलितवदना विलोक्य पन्थानम्। स्कन्धे गृहीत्वा घटं हाहा नष्ट इति रोदिपि सखि, किम्॥ह।। अत्र हेत्वलङ्गारेण सङ्कतनिकेतनं गच्छन्तं दृष्ट्वा यदि तन्र गन्तु- मिच्छसि तदाऽपरं घट गृहीत्वा गच्छेति वस्तु किंतिपद्द्यात्यम्। 'यथा वा- ख-विह्लंखलं तुमं सहि दट्ठूए कुठेणा तरलतरदिट्ठिम । वारप्फंसमिसेण अ अप्पा गुरुओत्ति पाडि्र विहिएसो ॥ह॥॥ (विशृह्धलां त्वां सखिर, दृष्टवा कुटेन तरलतरदृष्टिम्। द्वारस्परशमिपेण चात्मा गुरुक इति पातयित्वा विभिन्नः॥६१।। अन्र नदीकूले लतागहने कृतसङ्क तमप्राप्तं गृहप्रवेशावसरे पश्चादा- गतं दृष्ट्वा पुनर्नेदीगमनाय द्वारोपघातव्याजेन बुद्धिपूर्व व्याकुलया त्वया घटः स्फोटित इति मया चिन्तितम्, तत्किमिति नाश्वसिपि, तत्समीहितसि द्वये म्रज, अहं ते श्वश्रूनिकटे सर्व समर्थयिष्ये इति द्वारस्पर्शनव्याजेनेत्यप- इनुत्या वस्तु । द्योतित होती है मतः व्यञ्जना मे क्थं पद की प्रधानता है और यह पद-प्रकाश्य ध्वनि है। 'सखि विरचय्प' इत्यादि (५६ उदाहरण) में ध्वनि वाक्यगत है। अनुवाद-१६ क 'धरी सखि, कन्धे पर (जल का) घड़ा लेकर घर के द्वार में घुसती हुई सू मुह फेर कर मार्म की ओर देसकर-'हाय घड़ा हूढ गया' यह कहती हुई वयों रोती है ॥।६०।। यहां पर हेतु-अलद्धार द्वारा-'राङ्गत स्थल को जाते हुए कामुरु को देख कर यवि तू यहां जाना चाहती है, तो दूसरा घड़ा लेकर चली जा' यह वस्तु 'फिमिति' पद से द्ोतित होती है। प्रभा-'प्रविशन्ति' इत्यादि (१६ क) पद-प्रकाश्य कविनिबद्ध प्रोडोक्तिसिद्ध मलङ्गार द्वारा वस्तु-व्यञ्जना का उदाहरण है। यहाँ पर 'रोदन' का हेतु घट-व्वस है तथा घट-घ्वंस का हेतु 'मुख फेर कर देखना' है अवएव हेत्वलद्वार अर्थात काव्य- लिद्ध अलद्ार हे। इसके द्वारा उपयुक्त वस्तु की व्यञ्जना होती है। इस व्यञ्जना में 'किमिति' पद की प्रधानता है अतः ध्वनि पद-प्रकाश्य है। यहाँ पर कुछ विवेचकों के मतानुसार हेत्वलद्वार स्त्रतः सम्भवी अर्थ है कविनिबद्धपोढोक्तिमात्र सिद्ध नही, अतएव वृत्तिकार दूसरा उदाहरस देते हैं- 'यथा वा' इत्यादि। अनुचाद-१६ स. 'भरी ससित, प्त्यन्त भार से व्याकुल (विभृत्लाम) तथा चञ्चल दुप्टि वाली तुभको देखकर घड़ ने (फुटेन) भारी तथा तुम्हारे लिये कष्टदायक समझकर (गुरुक इति) द्वार छने के बहाने से अपने आपको गिराकर फोड़ बिया' ।६?।।
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काव्यप्रकाश:
१७. जोह खइ मुहुरसेए अ विइएणतारुएएा उर्सुअमणा सा। बुडढा वि एवोणन्विश्र परवहुआ श्रहह हरइ तुह हिथअम् ॥६२॥ (ज्योतनया मधुरसेन च वितीसतारयोत्सुकमनाः सा। वृद्धाडपि नवोढेव परवधूरहृद हरति तव हद्यम् ।।६२।।) अन् काव्यलिङ्ग न वृद्वां परवछू त्वमर्मानुन्मत्वाभिलपसीति ह्व- दीयमाचरितं वक्तु' न शक्यमित्याक्ेप: परवहूपदप्रकाशयः। - 1+
यहां पर 'नदी-तट के घने लताकुं्ज में सद्भेत करने वाले कामुक को प्राप्त न करके (लौटकर) घर प्रवेश करने के समय उसे पीछे से आया देसकर फिर नदी पर जाने के लिये द्वार की टबकर के बहाने से थ्याफुल हुई सूने जानकर घड़ा फोड़ दिया है'-यह मैंने जान लिया। सब तू वर्यों धम थारस नहीं करती (पाइर्षतवि) सू सपने प्रभीष्ट की सिद्ि के लिये जा, मैं तेरी सास को सब समझा दूगी। यह वस्तु 'द्वार-स्पर्श के ब्याज से' इस (पद दोत्य) प्रपह्न ति मलदुार द्वारा समिर्यक होती है। प्रभा-'विभृहला' इत्यादि सपष्टतया (१६ स) पद-प्रकादप कविनियद महोक्तिमानसिद्ध अलद्धार द्वारा वस्ु-व्यं्जना का उदाहरत है। यहाँ पर-मचेतन घट में अपने सापको नष्ट करना'रूप चेतना का भारोप किया है मतः (पारोप मूलक) अपह ति अ्लद्धार ससी की प्रोदोपितमात्रसिद्ध है। इम अपतति समक्कार रूप व्यञ्जक अर्थ द्वारा उपर्युक्त वस्तुरूप की व्य्जना होती है। 'द्वार-सपर्य-व्याजेन' यह पद ही प्रधानरूप से उपर्युक्त भर्य का व्यं्जक है अतएव यहाँ वनि पद-प्रकाश्य है। 'मार्द्ा' इत्यादि (उदाहरस ७.) में प्रमानरूप से व्यञ्जक कोई पद नहीं है वहाँ ध्वनि वाययगत है। म्रनुवाद-१७ 'महह, (सेद है) मन्तिरिका तगा मद के पारवादन से हो जिसके हृदम में ताषण्य धर्यात् सुरत के लिये उमस पा गई है ऐती वह (बुद्रा चप- नाषिका) पर्पोंकि पर बधू है मतएव नवोडा के समान वुन्हारे हुबय को हरती है' ।।६२।! यहां पर काव्यतिस् असद्वार द्वारा-'तुम हमको छोड़कर वुज्ा परगारी की फामना करते हो, यह तुम्हारा माचरस कहने योग्य नहीं। यह माअंप (प्रम- द्वार) समित्यक होता है जो 'परयमू' पद से दोतित है। प्रभा-'ज्योतहना इत्पादि (१७) पद-प्रकाश् कवि-निवद म्रोमोतिविद मलद्वार द्वारा मतद्ार-स्पं्जना का उभररख है। यह सदपरपयू में मासस मापर के प्रति किसी तरखी की उतत है। यदो पर काम्यसिद्ध क्पञ्यक मर्म है, निवरा स्वरूप है-'परवणू होने के कारछ यह तुम्हारे चित्त को, हरयी है' अममा पमिरा मोर मय द्वारा प्राप्त रिया हुम वायम्य हृदप-हरता का हेतु यह।ं जो हेतुन्बउंन है यह कविनियल नापिका की मोडोवितमान-निष्पप् है, पारशिर नही; मर्योकि पर यधू भी यदि युदरा है वो हृदपदूरए नहीं परती। इसका महूम मर्प प्राधपनमारचूाद
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चतुर्थ तल्लासः २०१
एपु कविनिबद्धवक्तप्रौढोक्तिमान्ननिष्पन्नशरीरः। वाक्यप्रकाश्ये तु पूर्वमुदाहृतम्। शब्दार्थोभयशक्त्युद्धवस्तु पदप्रकाश्यो न भवतीति पञ्चत्रि- शद्द दा: । -(६०) प्रबन्वेऽप्यर्थशक्तिभूः ॥४२॥ है; क्योंकि 'तुम्हारा आचरण कहने योग्म नही' इसका अभिप्राय होता है-'ऐसा न किया करो इस कहने मोग्य वचन का निषेष। 'परवधू शब्द ही उपर्युक्त व्यङ्यार्थ को प्रधानरून से द्योतित करता है अतः यहाँ व्यङगप पद-प्रकाश्य है। 'महिला' इत्यादि (उदाहरण ७१) में तो ऐसा कोई एक पद-व्यञ्जक नहीं अतः वहाँ वाक्य-प्रकाश्य ध्व्नि है। अनुवाद्-(पद-प्रकाशय ध्वनि के) इन उदाहररों में कविनिवद्वववतृप्रौढो- किसिद्ध भ्रथं ही व्यञ्जरु है। वाष्य द्वारा द्योतित (कविनिचद्धमौढोक्तिसिद्ध) ध्वनि के उदाहरए पूर्व (६८-७१ उबाहुरस) दिये जा चुके हैं।
के ३५ भेद हो जाते हैं। शन्दार्योभयशक्तिमुलक ध्वनि तो पद-प्रफाशय होती ही नहीं इस प्रकार ध्यनि
प्रभा-(१) यहां पर आचाय मम्मट ने पद-प्रकाश्य अर्थशक्तिमुलक संलक्ष्य कम ध्वनि के कविनिबद्ध प्रोढोवितिसिद्ध चार भेदों का निगमन किया है जो यह से ६२ तक के उदाहरणो मे प्रद्शित की गई है। इससे पूर्व ६८ से ७१ तक के उदा- हरणों में वाक्य-प्रकाश्य भेदों का निरूपए किया जा चुका है। दोनों के भेद का यथा-स्थान निर्देश किया गया है। (२) उपयुक्त व्वनि-भेदों की गएना करते हुए बतलाया गया है कि उभय- शक्तिमूलक ध्वनि पद में नहीं होती केवल वाक्य मे (वाक्ये द्वय त्थः, सूत्र ५८) ही होती हैं अतः वाक्य-प्रकाश्य १८ भेद+पदप्रकाश्य १७ भेद मिलकर कुल ३५ भेद होते हैं। संक्षेप में भेद-गणना का यह प्रकार है- = अर्धान्तरसक्रमितवाच्य, अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य तथा अल्यकमव्यय-ये ३. भेद हैं। लक्ष्यक्रमध्वनि में शब्दशवितिमूलक (वस्तु, अलद्वार) के २ भेद तथा अरथ- कषवितिमूलक के पूर्वोक्त १२ भेद कुल मिलाकर १७ भेद हो जाते है। ये १७ वाक्य तथा पदगत होने से १७x२=३४ तथा उभयशक्तिमूलक का एक प्रकार मिलकर कुल ३५ भेद होते हैं। अनुवाद्-अर्थशवितिमूलक ध्वनि (वाक्य और पद के अतिरिक्त) प्रबन्ध में पर्यात् प्रबन्ध-प्रकाश्य भी होती है। टिप्परी-(i) प्रबन्ध का अभिप्राय है-परस्पर सम्बद्ध भ्रनेक वाक्यों का समुदाय। वह ग्रन्थरूप भी हो सकता है और अ्रवान्तर प्रकरणरूप भी हो सकता है- यह प्रदोपकार का मत है। आचार्य प्रभिनवगुप्त का भी यही मत है-सङ्घटित- वाक्यसमुदायः प्रबन्धः। चकवर्ती के अनुसार वृत्त-स्यापक वाक्य ही प्रबन्ध है (वृत प्रत्मायकं वाक्यं प्रबन्ध:) ।
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२०२ काव्यप्रफार:
यथा गृधगोमायुसंवादादौ- अलं स्थित्वा इमशानेऽस्मिन्मृघ्रगोमायुसड्कुे। कद्ढालवह्ले घोरे सर्वप्राणिभयङ्करे ॥६३॥। न चेह् जीवितः कश्चितालघर्ममुपागतः। प्रियो वा यदि वा द्वधय: प्रासिना गतिरीदृशी।।६४।। इति दिवा प्रभवतो गृधस्य पुरुपविसर्जनपरमिदं वचनम्। श्रमु कनकवर्णाभं वालमप्राप्तयोवनम्। गृधवाकयात्कथं मुढास्त्यजध्वमविशङ्गिताः ॥६५।। आ्ादित्योऽयं स्थितो मृढा: स्नेहं कुरुत साम्प्रतम्। बहुविघ्नो मुहर्त्तोडयं जीवेदप कदाचन ॥६६।। (ii) ध्वन्यालोककार ने भी ध्यनि को प्रयन्ध-प्रकान्य माना पा- अनुस्यानोपमात्मापि प्रभेवो य उवाहृतः। प्वनरस्य प्रयन्धेयु भासते सोपि केषुषित्।।
द्विप्रकार: सोपि प्रबन्धैप दोत्पते। यथा च गुभ्नगोमायुमवादादो । मम्मट के परवर्ती कविराज विस्यनाय ने भी इस विपय में सम्मट पा मनुसारणा किया है-'प्रयन्थेऽषि मतो धीरेरयंशवत्युवुनयो ध्यनिः (सा० द० ४.१०। उन्होंने 'प्रबन्ध' का सर्थ किया है-महाकाव्य (प्रबन्धे महाकायये)। (iii) इस प्रकार प्रबन्धविपयक अर्थशवितिमूलक ध्वनि के १२ मेवों को पूर्वोवत ३५ ध्वनि भेदों से मिताहर ३५+१२=४७ भेद होते हैं। अनुवाद-जंसे (महाभारत शान्ति पर्ष के) 'गधगोमापुसंवाय' हत्पादि में (प्रवन्य प्रकादम भथशक्तिमूसक र्वनि है)। (गुध की उक्तिक) 'हे मनुष्यों, गीप और सिवारों से भरे हुए, ब्हृत से परियपशचरों वासे-पतएव भयानक तथा समस्त प्रालियों के सिये मयडूर इ इमशान में मत ठहरो ।६३। 'परे, इस संसार में मृत्यु को (कालयर्म) प्राप्त हमा कोई म्यक्ति, चाहे यह किसी का प्रिय हो या सयु, फिर से जोषित नहीं होतो; क्योंकि प्रालियों की गतति हो ऐसो है (मर्यात् मरकर वे जोवित नहां होते)।६Y॥ इस प्रकार बिन में (मौसभक्षल प्रावि की) सामन्यं रसने पासे (प्रभवतः) 1 रम्र का (मृत मासक के सम्बन्धी) पुदयों के घर सोटाने के सभिग्राम से-वह वचन है। (गोमाधु की उत्ति) 'मरे मूलो, तुम अठारहिन होकर इस मालक हो, जिसफी कान्ति सुयरस-वएां के समान है, जिसने सभी मौवन प्राप्त महो बिमा, नीष के कहने से क्यों छोड़से हो7 ।ह४॥ हे मूको, अभी यहु सूर्प स्थत है, इस समय (मृतर यासक के समीप टहर हर) हनेह प्रफट करो। यह सग्पवाकाल (गुट्सं) मटुत से (मुनाबेध चारि छ्रप)
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चतुर्थ उल्लास: '२० ३
इति निशि विजम्भमाशस्य गोमायोर्जनव्यावर्त्तननिष्ठ च वचन- मिति प्रबन्ध एव प्रथते। अपन्ये त्वेकादशभेदा ग्रन्थविस्तरभयान्रोदाहताः स्वयन्तु लक्षगातोऽनुसत्त व्याः। अपिशब्दात्पदवाक्ययोः । - (६१) पदेक्देशरचनावर्रोष्वपि रसादय: तत्र प्रक्त्या यथा- रइके लिहिअणिअससकर किसल अरुद्वणअ्रए जुअलरस । रुद्दर्स तइअणअ्रं पव्वईपरिचु विझनं जअइ।।६७।। 4+
[रतिकेलिहृतनिवसनकरकिसलयरुद्वनयनयुगलस्य। रुद्रस्य तृतीयनयनं पार्वतीपरिचुम्वितं जयति॥६७।।] -
विष्नों वाला है अतः (इस मुहुर्त के चले जाने पर) सन्भयतः यह जीवित हो जाय'
यह रात्रि में (मांस भक्षस में) समर्थ शृगाल का (मृतक सम्बन्धी) मनुष्यों के इमशान न छोपने (व्यावृति) के तात्पर्य वाला-वचन है। इस प्रकार यहाँ पर वनि प्रबन्ध में ही अरयंव्यञ्जकता में समर्य है। (सर्थशक्तिमूलक ध्वनि के) अन्य एकादश प्रकारों के ग्रन्थ-विस्तार के भय - से उदाहरस नहीं दिये। उनका स्वय लक्षणों से अनुसरण करना चाहिये। (कारिका में) अपि शब्द के प्रयोग से (पर्थशक्तिमूलक ध्वनि) पद और वाषय में भी होती है। प्रभा-गुधगोमायु-सवाद महाभारत के श्षान्ति पर्व के १५३ वे अध्याय में है। यहाँ पर प्रथम पद्यद्वयात्मक गुधवचनरूप प्रबन्ध में स्वतः सम्भवी वाच्यार्थरूप वस्तु द्वारा पुरुषविरार्जनरूप वस्तु की व्यञ्जना होती है। इसी प्रकार द्वितीय पद्य- द्वयात्मक गोमायुवचनरूप प्रबन्ध में जनव्यावर्तनरूप वस्तु को व्यञ्जना होती है। यहाँ व्य्यार्थ प्रबन्ध द्वारा द्यांतित होता है, किसी वाच्य या पद द्वारा नहीं। इसी से # 4 यह प्रबन्ध-प्रकाश्य ध्वनि है। अनुवाद्-१ पद (सुबन्त तथा तिडन्त) के एकदेश पर्थात् प्रकृर्ति, प्रत्यय तथा उपसर्ग में, २. रचना सर्थात् वंदर्भी आदि रीति में अथवा बौर्ध समास भावि शब्द-विन्यास में, और ३. विशेष प्रकार के प्रक्षरों (तथा 'अपि' शब्द से, ४. प्रबम्ध) 74 में भी रसादि रूप झर्सलक्ष्यकम ध्वनि होती है। (६१) प्रकृति की व्यञ्जकता अरनुवाद-उनमें से प्रकृति द्वारा व्यञ्जकता, जंसे-(धातुरूप प्रकृति) 'रतिकोड़ा में महावेव जी द्वारा हृतवसना पावती ने (लज्जा से) मपने कर-पल्लव से जिन (महादेव) की दोनों आँसें मीच ती है उन महादेव जी का, पावंती द्वारा घुम्बित तृतीय नेवर विजयी (सर्वोत्कृष्ट) है ।६७।।
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२०४ फाव्यप्रकार:
अरत्र जयतीति न तु शोभते इत्यादि। समानेऽ्रपि हि स्थगनव्यापारे लोकोत्तरेैव व्यापारेखस्य पिघानमिति तदेवोत्कृष्टम्। यथा वा- प्रेयान् सोयडमपाकृतः सशपर्थं पादानत: कान्तया द्वित्राएयेव पदानि चासभवनाद्यावल यात्मुन्मना: । तावतपत्युत पाशिसंपुटगलन्नीवी नियन्धं धृतो घावित्वेव कृतप्रणामकमहदो प्रेम्णो विचित्ा गतिः ॥६८॥। अत्र पदानीति न तु द्वाराखि। तिद्सुपो यथा- यहाँ पर (कषि ने) जयति ('जि' यातुरष्प प्रकृति) का प्रयोग रिया है 'शोभते' इत्यादि का नहीं। यहां नेत्र बन्द करने (स्थगन) का काय समान होने पर भी पलोकिक (घम्बन रूप) ध्यापार से जो इम (तृतीय नेत्र) का धन्व करना है उससे युक्त तृतीय नेत्र उत्कृष्ट है। प्रभा :- 'रति' इत्यादि घातुम्प पदकदेश (प्रकृति) द्वारा समभोग शृज्गार को पभिव्यं्जना का उदाहरण है। यह हाल कविकृत गापासप्तरती का पद्य है। किसी ससी की नायिका के प्रति यह उत्ति है। यहां पर 'जयति' का प्रयोग करके विनिष्ट प्रकार से बन्द किये हुए (शिव के) तृतीय नेत की उसकृष्टता धभिष्यक्त की गई है, चुम्बन से नेत का बन्द करना रसोत्कर्यंक है। यदि यहाँ 'शोमसे' का प्रयोग किमा जाता तो वह उत्कृष्टता वाच्य हो जाती तथा सहदयों के हृदय में रस की घंसी प्रतीति न होती। अनुवाद्-प्रथया जैसे ('नाम' प्रकृति)-'वह यह तिमतम अपपपूर्वक (नामिका के) घरगों में भुका तथा नाविका द्वारा सपयपूर्वक हदा दिया गया। (सब) उरसुक (या सिन्न) हृदय वाला वह जम तक निवास-स्थान से बो-सीन पग भी म गया था कि तय तक प्रसामपू्यक (कृतः प्रसाम: परिमनु कमलि) बोड़कर हरता- जजसि (पाशिसंपुटे प्रसामायं कृतान्जसो) में पुलती हुई नोपोपग्पि को परड़ते हए ('धूतः' का कियाविशेपस) उतटा (प्ररपुत) उसे परड़ लिया। प्रहो, प्रेम हौ विषिन गति है'।ह८॥। यहाँ पर (कवि ने) 'दवानि' ('पद' प्रकृति) का प्रयोग दिया है 'व्वारासि' # का. नहों। प्रभा-'प्रथान्' इरयादि नाम (प्रातिपदिक) एप पदकदेश (प्रकृति) द्वारा रम्भोग गुज्धार की व्यं्जना का उदाहरता है। यहा पर 'पद' शबद से उरण्डा का पतिराय सभिग्यकत होता है, न्योंकि द्वार सक न जाने देकर दो सीन पग रसषने से पूर्व ही पकड़ सिया। इस उतण्ठावियय के द्वारा सम्भोग मृह्ार की स्पम्बना होठी है। प्रत्यय की व्यक्षकता अनुवाद-सिए (रिपा सम्बत्धी प्रम्मप) तमा सुप् (संगा सा्बाभी प्रायमो ही ध्यञ्जरुता का चबाहाए, नसे-
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चतुर्थ चल्लास: २०५
पथि पथि शुकचन्चूचारुराभाडकुरायां दिशि दिशि पवमानो वीरुघां लासकश्च। नरि नरि किरति द्राक सायकान् पुष्पधन्वा पुरि पुरि विनिवृत्ता मानिनीमानचर्चा ।।६६।। अत्र किरतीति किरसत्य साध्यमानत्वम्। निवृत्तति निवत्तनस्य सिद्धत्वं तिडा सुपा च तन्रापि क्तप्रत्ययेना्तीतत्वं दोत्यते। यथा वा- लिखन्नास्ते भूमि वह्दिरवनतः प्राणदयितो निराहारा: सख्य: सततरुदितोच्छूननयना: । (वसन्त में) प्रत्येक मार्ग में अ्रंकुरों को शोभा शुक के चञ्तु के समान मनो- हर है। प्रत्येक दिशा में लताओं (वौरुधा) का नृत्य कराने वाला वायु है, पुष्प के धनुप वाला फामदेव प्रत्येक मनुष्य पर शोघ्रता पूर्वक (दराक) बाएें को फेफ रहा है
गई है ।।६६॥। तथा प्रत्येक नगर में मानिनी नायिकानों के मान (धारस) की चर्चा समाप्त हो
यहां पर 'फिरति' इस करिया पद में तिड प्रत्यय द्वारा (तिड) प्रक्षेपणरूप व्यापार (किरण) की साध्यता तथा 'निवृता' इस पद में 'सुप् प्रत्यय द्वारा (सुपा) समाप्ति की सिद्धता एवं उस सिद्धता में भी (तभ्रापि) 'वत' प्रत्यय द्वारा अतीतता की व्यञ्जना की जा रही हैं। प्रभा-'पयि पथि' इत्यादि सुप तिङ् प्रत्यय रूप पदैकदेश द्वारा सम्भोग शृद्धार की व्यञ्जना का उदाहरण है। गहाँ पर 'किरति' का तिङ प्रत्यम तथा 'निवुता' का (प्रथमा का एकवचन) सुप प्रत्यय और कत प्रत्यय विशेष अर्थ के व्यञ्जक हैं। व्यङ्गपार्थ यह है कि 'वसन्तागमन के समय काम के बाण चलाने से पूर्व ही मानिनी नायिकाओं का मान-भङ्त हो गया।' अभिप्राय यह है-वास-प्रक्षेपण माननिवृत्ति का कारण है, वह निष्पन्न अथवा सिद्ध अवस्था में होकर ही, कारय हो सकता है किन्तु उसे यहाँ 'ति' प्रत्यय द्वारा (किरति) 'साध्य'- रूप में रक्खा गया है (भर्थात् काम ने बाए चलाये नही अपि तु चलाने जा रहा है) । माननिवृत्ि कार्य है, वह साध्य है किन्तु उसे 'निवृत्ता' इस पद से भूतार्थक 'क्' प्रत्यय द्वारा तथा सुप प्रतय द्वारा सिद्ध-प्रवस्था में दिखलाया गया है, (अर्थात् मान समाप्त हो चुका)। इस प्रकार यहाँ पर कारसा तथा कार्य का पौर्वापय (पहले पीछे होना) बदल गया है और इस अतिशायोक्ति द्वारा माननिवृत्ति की शोघ्रता एवं वसन्त ऋतु की अरत्यन्त उद्दीपकता की प्रतीति होती है, जो सम्मोग शृद्गार के उत्कर्ष की अ्भिव्पक्ति करती है। अनुवाद्-प्रथवा जसे-'हे फठोर हृदम वाली, भव तो मान को छोड़ वे, * (देस) तेरा प्रा-प्रिय नीचे भुक कर (अथवा सिर भुफा कर) (नस से) भूमि को किरोदता हुआ बाहर बैठा है। जिन्होंने भोजन नहीं किया तथा निरन्तर रदन सें जिनकी आंसे फल गई (उच्छने) ऐसी ये तेरी सखियां है, पञजर में स्थित घुकों
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२०८ काव्यप्रकाप:
(तेषां गुसम इसानां तासामुक्कयठानां तस्य प्रेम्ुः। तासां भगितीनां सुन्दर, ईदशं जातमवसानम्.।।१०२।।) मत्र गुरामद्दसादीनां बहुत्वं प्रेम्पारचैकरवं दोत्यते। पुरुपव्यत्ययश्य यथा- रे रे चब्चललोचनाब्चितरुचे, चेतः, प्रमुच्य र्यिर- प्रेमाएं महिमानमेएनयनाभालोज्य कि नृत्यसि। किं मन्ये विहरिप्यसे वत हतां मुल्चान्तराशामिमा- मेपा कएठतटे कृता खतु शिला संसारवारान्निधी।।१०३।। प्रत्र प्रहास: ।
प्रेम का और उन ('सू हो मेरा जीवन-सयस्व है' इत्यादि) उपितयों का मड ऐसा परिसाम हुआ है'।१०२। यहां पर (बहुयचन से) गुएाप्रहस आादि की विवियता (महृत्यबद्धवियित्वम्) पौर (एक वचन में) प्रमफो एकपता (एकत्वम् एकविषत्यम्) का स्यं्जना द्वारा बोप होता हैं। प्रभा-'सेपाम्' इत्पादि-पवनरय पदफदेश के द्वारा विन्तम्भ पजार की व्यञ्जना का उदाहरण है। यहां पर 'गुगप्रहय्यानाम्' दर्यादि के सवचन द्वांरा तथा 'प्रेम्णः' के एकवचन द्वारा यह व्यज्चना होती है कि गुरा ग्रहय इस्मादि श्रेम-हेतुमों के नाना विय होने पर मी प्रेम में एरुरूपता ही बनी रही उसमे परिवर्सन न हुमा। इस व्पकपार्य के द्वारा विप्रतम्भ का उत्कर्ष प्रतीतष होता है। अनुवाद-पुरुपस्यत्यय की (शाग्त रस) व्यम्नकता (का उबाहएए) नो- पञ्चल मेत्रों याली कामिनी में दवि रसने वाले, हे मेरे मन, यू हिपर प्रेम- युश्त उस (वंराग्य जनिन) सरकर्य को (महिमालम) लोड़कर वृप (एस) मपमो को बेसंकर वर्यों नाता हैं ? पमा सू समनना हैं कि मैं इसके साप बिहार कहंगा। मरे (बस-खेव) दू इस पुरी मर निग्वित (हुताम्) पात्ा को छोड़ मे, व्योंकि इस संग्रार सागर में यह (मृगनयनी) तो सेरे गसे में यापी गई सिसा (के समान) हू।t*२। यहा (पुदपरयरमम के द्वारा) प्रहास स्यपत रोता है। पमा-"ऐे रै', इत्यादि पुरषनव्यश्यम द्वारा वानत-रम की सन्जना हा उदाहरछ है। यह जिसी घाल पुरत को सपने बिस मे प्रि उकि है। यह पर 'महुं बिहरि्ये पति एवं मन्बमे' के स्थान पर महाग में (म हाखे प मन्बोसे मम्प शसम एम दष्य १/४/१०६) 'हं गर्से पर पिूशिष्यो ऐमा प्रयोग कर दिया है। प्माद मध्यमपुरय के रयान दर उमम (एनदे) मोर बरामुषप के स्वान पर ममद
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मतुर्थ सल्लास: .२०६
पूर्वनिपातस्य यथा- येपां दोर्बलमेव दुर्बलतया ते सम्मतासतैरपि प्रायः केवलनीतिरीतिशररै: कार्य किमुर्चीश्वरः। ये दमाशक, पुनः पराक्मनयस्वीकारकान्तक्रमा- स्ते स्युर्न्नैय भवादृशास्त्रिजगति द्विन्रा: पवित्रा: परम् ॥१०४॥ अत्र पराकरमस्य प्राधान्यमवगम्यते। विभक्तिविशेपस्य यथा- प्रधनाध्वनि घीरधनुर्ध्वनिभृति विधुरैरयोधि तव दिवसम्। 1
दिवसेन तु नरप, भवानयुद्ध विधिसिद्धसाधुवाद्परम्॥१०५॥ अन्न-दिवसेनेत्यप वर्गतृतीया फलप्राप्तिं दयोतयति। • (बिहृरिष्यये) का प्रयोग किया है-यही पुरुपव्यत्यय है। इसके द्वारा प्रहास की 'वयञ्जना होती है तथा शान्त रस का प्रकर्ष व्यक्त होता है। अनुवाद्-पूर्व निपात की (भाव) व्यञ्जकता (का उदाहरख), जैसे- 'हे पृथ्वी के इन्द्र (क्ष्माशक), जिन (राजाओ्ं) के पास केवल भुजाओं (दोः) का ही वल है, वे दुर्बल ही माने गये हैं, उन पृथ्वीपतियों के द्वारा भी क्या कार्य हो सकता है जो केवल नीतिशास्त्र की रीति के भाथ्रित रहते हैं किन्तु जो पराक्रम और नीति (नय) दोनों को स्वीकार करके सुन्दर (कान्त) व्यवहार (कमः आचरस- फरम.) करने वाले हैं वे त्रिभुवन में भी नहीं है, यदि होंगे तो दो या तीन तथापि फेवल (परम्) आप जैसे प्रशस्त तो है ही नहीं ॥१०४॥ यहाँ पर 'पराक्रम' की प्रधानता का बोध होता है। प्रभा-'येपाम्' इत्यादि मूर्वनिपात द्वारा भाव-व्यञ्जना का उदाहरस है। यह किसी कवि को किसी राजा के प्रति उक्ति है। यहाँ पर 'पराक्मनय' इस समस्त पद में 'नय' शब्द का पूर्व प्रयोग होना चाहिये था (अल्पान्तरम् २/२/३४) किन्तु कवि ने 'अभ्यहित्व' वार्तिक के अनुसार 'पराक्रम' का पूर्वनिपात किया है। इससे 'पराक्रम' की प्रधानता व्यक्त होती है औोर पराक्रम को प्रधान रखते हुए नीति का स्वीकार करना राजा के उत्क्य को प्रकट करता है तथा नूपवियक रति-भाव को पुष्ट करता है। अनुवाद्-विभकतिविशेष की (भाव) व्यञ्जकता, जैसे- 'हे नृप (नरप) जो बीरों के धनुष की टद्धार ध्यनि फो घारस करता था ऐसे संग्राम-मार्ग (प्रधनं युद्धमेव अरध्वा मार्ग) में वुम्हारे शत्नुभों ने दिन भर युद्ध किया (पर विजय प्राप्त नहीं की), किन्तु ग्रह्ा औोर सिद्धों के सायुवाद (वाहवाही) का पात्र होते हुए, पापने तो एक दिन में ही युद्ध समाप्त कर दिया ॥१०५॥ यहाँ पर 'वियरोन' इस शब्द में 'अपवर्गे' तृतीया है जो फलप्राप्ति को प्रकट फरती है।
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२१० काम्यप्रकारों।
भूयो भूय: सविधनगरीरथ्यया पर्यटन्तं टस्ट्वा हप्टुवा भवनवलभीतृद््वांतायनरथा। साक्षात्कामं नवमिव रतिर्भालती माधवं यद्
अन्नानुकम्पायृत्त : करूपतद्धितस्य। परिच्छेदातीतः सकलवचनानामविपय: पुनर्जन्मन्यरिमलनुभयपर्थ यो न गतवान्। प्रना ::- 'प्रधन' इत्यादि विभकि-विशेष (उपपदविभक्ति) द्ारा भाव-प्ज्जना का उदाहरणा है। यहाँ पूर्वाव्ध में 'दिवसम् भमोधि' तथा उत्तरादं में 'दिवसेन अयुद्ध' यह प्रयोग है। 'दिवस' में प्रत्यन्तसंयोग में द्वितीमा मिभकति है (पा० २/३/१) जिसका मर्थ है-दिन भर युद्ध किया पर फस प्रापि न हुई। किन्तु 'दिवसेन' में भरवर्ग-तृतीया सिभकत्त है। अपवर्ग का भर्ष है-फन-राष्ति। फल-श्राप्ति धोतन के लिये काल तथा मागवाची से अत्यन्त संयोग में सृतीया विभक्ति होती है (अपवर्मे तृतीया २/३/६)। परतएय तृतीया बिर्माक्त द्वारा दुदध रूप किया का फल विजय प्राप्ति पर्मिव्यक् होता है मोर उसके द्वारा राज-विषयक (रसि) भावप्रवर्ष की व्यं्जना होती है। अनुवाद-(तव्वित की उपन्जकता) रामभयन के पम्ने (पलमी) को कंधी सिड्टको में स्यित मालती बार बार (पितृ-मचन ह) निरट के राजमाग में भूमते हुए मापय को इस प्रकार प्रत्यक्ष रप से देखकर, जैसे रति ने नशन बेह पारल किये हुए काम को देता हो, प्रवत उंत्कष्ठा से "मर्मनत सिस् (सुतित-नसान) एवं दयनीय सद्गों से सीसा हो रही है (साम्मति-सार्यात)'-यह है जो (मन्) (मासती को उपमाता) स्वा्गिक्ता ने कहा है ॥१०६।।
है। यहां पर धनुरुम्पापंके क' तद्धितप्श्यम की (वित्सरभगद्वार) स्वश्जकता प्रभा-'भूयः' इत्यादि 'क' वदिवस्प प्रयृंति एकदेश द्वारा विप्रतम्भ + मुनार की अश्जना का उदाहरस है। यहा पर 'मङ्भहें:' में मनुकम्ता सर्ष में '' तदिन प्रत्यय ह (पनुरुम्पापाम् ५/३/०६) इस 'क' प्रश्यम द्वारा मनुरम्पािराय मोहित होता है औौर उससे मानवी के ससों की सुकुंसारता प्रक्ट होती है वथा मुहुंभारसा से दुःए-मगहिम्सुता मे ममिश्वाि होकर विशमम्म या भर्न वदप है। उपसर्ग को व्यञ्जकता अनुवाद्-(ह मिन्र मंकरत्त) बोई सद्मुन विवार (पामत्र भात) मेरे एस. ररल को सम्प कर रंहा है तथा विरहु सन्ताप आपम कर रहा है। जसा है, यह बिहार ? जो इयसा (परिष्ठद-परिमास) रहित है, सन (पाचर, लार्जालक
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चतुर्थ चल्लासः २११
विवेकमध्वंसादुप चितमहामोहगहनो विकार: कोऽप्यन्त्जडयति च तापं च कुरुते ॥१०७॥। अत्र प्रशन्दस्योपसर्गस्य। फृतं च गर्वाभिमुखं मनस्त्वया किमन्यदेवं निहताश्च नो द्विपः। तमांसि तिष्ठन्ति हि तावदंशुमान्न यावदायात्युद्याद्रिमौलिताम्॥१०=॥ श्त्र तुल्ययोगिताद्योतकस्य 'च' इति निपातस्य। रामोऽ्सी भुवनेपु विक्रमगुएै: प्राप्तः प्रसिद्धिं परा- मस्मद्वाग्यविपर्ययाद्यदि परं देवो न जानाति, तम्। तथा व्यञ्जक) शब्दों का अगोचर है पर्थात् जिसे कहा नहीं जा सकता; जो इस जन्म में कभी (अ्रन्त समय) अनुभव का विषय नहीं हुआ तथा विवेक का नाश हो
हैं.।१०७।। जाने से जिसमें महान् अज्ञानांधकार बढ़ गया है और जो दुर्लङ््य (गहन) हो गया
यहां पर उपसर्ग रूप 'प्र' शब्द की विप्रतम्भभुङ्गार) व्यञ्जकता हूँ।' प्रभा-'परिच्छेद' इत्यादि उपसर्ग (प्रकृति के एकदेश) द्वारा विप्रलम्भ शङ्गार की व्यञ्जना का उदाहरण है। मालतीमधव नाटक के इस श्लोक में माधव अपने मिय मकरन्द से अपनी सवस्था का वर्णन कर रहा है। यहाँ पर 'प्रध्वंसात्' पद में 'प्र' (उपसगं) प्रध्वंस रूप प्रकृति का एक देश है। उसके द्वारा विवेक का समूल नाश सर्थात ध्वंसप्रकर्ष द्योतित होता है। उसके द्वारा मोह की अधिकता तथा मोहाधिकय द्वारा रागातिशाय एवं रागातिशय द्वारा माधवके विप्रलम्भभृद्गार की पराकाष्ठा की (व्यञ्जना द्वारा) प्रतीति होती है। निपात की व्यञ्जकता अनुवाद-'हे राजन्, आपने गर्व को ओर (सममुख) मन किया और हमारे शशु नष्ट हो गये। ऐसा होने पर और कया ? (अन्य शस्त्रगहणादि निष्फल हैं- यह भाव है) । (वैध्म्य से दृष्टान्त है) अन्यकार तभी तक ठहरता है जब तकू सूय उदयावल के शिखर पर नहीं आता है ।१०८।। यहाँ तुल्ययोगिता के द्योतक 'च' निपात की (वीर रस) व्यञ्जकता है। प्रभा-'कृतम्' इत्यादि निपातरूप पदकदेश द्वारां वीर-रंस की व्यञ्जना का उदाहरसा है। यह नप के प्रति मन्न्री की उक्ति है। वृत्ति में 'तुल्ययोगिता' का अभिप्राय समुच्चयालद्वार है। मन का गर्वाभिमुलीकर तथा शत्रुविनाच दोनों का तुल्यकाल अर्याव एककाल से सम्बन्ध होना (समुच्चय रूप) समुच्चयालद्वार थ इस निपात द्वारा दोतित होता है और समुच्चयालद्वार से व्यञ्जना द्वारा वीर रस के प्रकर्ष की प्रतीति होती है। अनैकपदैकदेश श्र्प्रादि की व्यक्षकता।। अनुवाद-'(हे राक्षसराज), यह राम धपनी वीरता के गुलों से (चौवह) ' -1 भूवनों में बड़ी स्याति प्राप्त कर चुके हैं, वंतालिक के 'समान यह यायु, (बाति-बध
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२१२ फाष्यप्रकाश:
वन्दरीवैप यशांसि गायति मस्या्यकवाणाहति- श्रेणीभूतविशालतालविवरोद्गीरणे: स्वरैः सप्भि: ॥१०६। अत्रासाविति भुचनेप्विति गुरैरिति सर्वनाममरातिपदिकवचनानां न त्वदिति न मदिति अपि तु अ्र्त्मदित्यस्य सर्वाक्षपिसा, भाग्यविपर्यया दित्यन्यथ।संपत्तिमुखेन न त्वभावमुखेनाभिघानस्य। तरुमिमनि कलयति कलषामनुमदनघनुर्भ यो: पठत्यम। अधिवसति सकलललनामौलिमियं चकितदरिगचलनयना ॥।११०।। शरत्र इमनिजव्ययीभावकर्मभृताघाराणां स्वरूपस्य। तरुगात्ये इति, धनुपः समीप इति, मौली वसतीति, त्वादिभिरुल्ये एपां वाघकत्वे शरित में) एक वाए के माघात से उत्पनन पंकिबद् विाल (सात) साल युकों के दिरें सै प्रकाशित (उद्गोसं) सप्त रवरों (नियादादि) द्वारा जिनकी कोर्ति का गान करती है। मदि दिम्य ज्ञान वाले (देव) भी माप उनको नहां जानते सो यह हमारे भागम की विपरीतता के फारए हो ॥१०६ै।। यहाँ पर 'मसो' इह सर्वनाम को, 'भुवन' इस प्रातिपदिक को, 'ुएं:' इस बहुपचन को (पीर रस) ्यम्जफता है। तेरा नहीं, मेरा नहीं, घवि तु हमारा, समहत राझसकुस के उपस्यापक (अयया सूघक) इस (पतमव) की (सक्सराज्सकुस. द्षमध्यञ्मफता है) तपा 'भाग्यविपर्ययात्' यह सम्पत्ति को वुर्भाग्यर्प में परिसति कही गई है, भाग्म के सभाय हप में महों; प्रतः भागयविपर्मम इस कथन की (भाग्य -: परिवर्तन में) स्मञ्जकता है। प्रभा-'रामोज्यो' इत्पादि ग्रहुत से व्यं्बकों द्वारा वीर रम की व्पञ्जना का उदाहरस है। यह राघवानन्द नाटक में रायल के प्रति विभीपस की उकि है। यहों पर सर्वनाम, प्रातिपदिक तपा बहुवपन मादि मनैक प्रफार के ध्यय्जरु है मोर उन सम के द्वारा मिस्न मिस्न रप मे अनैक प्रकार के सर्म ध्यनित होत है जसा कि ऊपर प्रद्शित किया गया है। ये समह्त व्वनित अर्थ पन्ततः भीररण के स्तक होते है। सतएद यहाँ पर बीर रस मनेक स्पञ्बकों द्वारा सहप यहा गया है। अनुबाद्-'पकित घृग के समान चञ्चत मेवो वाली यह गाविका समात मुग्बरिमों के ऊपर (गोतो= शिरति) सविष्ित ऐै जवकि मौदन (इसको) (बटाम. (िर्दोपावि) रसामों को शिदा हे रहा है (सिसमतति रतति), उसका (सिम्यमृत) भ्रूसताप्रभाग (गुरस्प) कामबेद के घमुप के समीप (इसा का) सरध्ययन कर रह। है (पद्र पटत सात) u१ हैं०।। यहं पर इमनिय् मामम, सध्यवीमाय समासा और कर्ममून सापार के स्यदप को (गदार) सम्सरता है; श्योंकि (सदसिमाि' की) 'तप्सामें सें मुश्या ('अनुमदनपनु:' की) 'धनुपः समोने के मुस्य औौर (मोलिम' शी) 'मोमो वर्नात" ह सुम्म पर्मात् 'हमनिष्' सादि को 'व'आदि के समान ही थावरता है, फिर भी
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चतुर्थ चल्लासः २१३
कश्चित्तवरूपस्य विशेषो यश्चमत्कारकारी स एव व्यञन्जकत्वं प्राप्नोति। एवमन्येपामपि वोद्धव्यम्। वर्णरचनानां व्यञ्जकत्वं गुगस्वरूप- निरूपणे उदाहरिप्यते। अपिशव्दात्म्रवन्धेपु नाटकादिपु। एवं रसादीनां पूर्वगणितभेदाभ्यां सह पडभेदा:। (६२) भेदास्तदेकपश्चाशत्- व्याख्याता:।
इमनिचु आदि के स्वरूप को कोई विशेषता अवश्य है जो चमत्काराधायक है। वह स्वरूप की विशेषता ही (या स्वरूप विशेष ही) व्यञ्जक हो जाता है। प्रभा-'तरशिमनि' इत्यादि इमनिच् प्रत्यय आदि की शद्धगार-व्यञ्जकता का उदाहरस है। 'तरिमा' (इमनिच्) तथा 'तरुणत' (त्व) आदि शब्दों का संकेतित अर्थ समान ही है फिर भी इमनिच् आदि प्रत्ययों के प्रयोग द्वारा सहदयों को एक विशेप माघुर्य का अनुभव होता है अतः इमनिच् आदि का स्वरूप ही यहाँ। पर शृङ्गार रस का व्यञ्जक है। भाव यह है कि सुकुमार वसं वाले इमनिच् तद्धित द्वारा नवकोमल आयु की प्रतीति होती है 'तरुणत्व' का प्रयोग करने पर तो 'त्व'। प्रत्यय की प्रोढ़ता के कारण आयु की पोढता भलकने लगेगी। इसी प्रकार 'मनुम- दनधनु:' इस पूर्वपदार्थ प्रधान अ्व्ययीभाव समास् मे उत्तरपद 'धनुप' अ्प्रधान है। अ्रतः भरलता' के निरपेक्ष वशीकरण-सामर्थ्य की प्रतीति होती है तथा 'मौलिम्' इसेकम विभक्ति द्वारा सकलललनामौलि में व्यापकता की प्रतीति होती है जिससे सोन्दर्यातिशय को अभिव्यञ्जना होती है। यदि 'मौलो' इस सप्तम्यन्त का प्रयोग किया जाता तो एकदेश में भी आधारता का सम्भव होने से समस्त ललनाओं की मौलिभूत-इस प्रकार की व्याप्ति न होती। अनुवाद-उपयुंक्त रोति से अन्य पर्दैकदेश आदि को व्यन्जकता भी जाननी चांहिये। वरणं तथा रचना (बंदर्भी) आदि की व्यन्जकता के उदाहरण गुएस्वस्प- विवेचन के प्रकरस (अष्टम उल्लास) में दिये जायेंे। ('वर्सप्वपि' में) अरपि शब्द (के प्रयोष) से नाटक आदि प्रबन्धों में भी (रसादि व्यङ्गभ हैं) यह अभिप्राय है। उक्त रोति से रसादि (अ्रतक्यत्रम ध्वनि) के (वाबय तथा पदप्रकाशय)- पूर्व गिनाये गये मेदों सहित (ावय-पद-पदेकदेश-रचना वर्स तथा प्रबन्धप्रकाश्य), ६ भेद होते हैं। इस प्रकार ध्वनि के ५१ भेद होते है। वे भेद पूर्व गसना से व्यास्यात हो हैं। प्रभा-सूत्र ६० में उक्त ध्वनि के ४७ भेदों में भलकष्यकम रसादि ध्वनि के (i) पर्दकदेश (ii) वर्सा (iii) प्रबन्ध तथा (१v) रचना में होने वाले चार भेरों को सङ्कलित करके ५१ भेद होते हैं। संक्षेप में ५१ भेद गएना इस प्रकार है-
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२१२ फाव्यप्रकाय:
वन्दीवेष यशांसि गायति मस्यग्यैकवासहति- श्रेसीभूतचिशालतालविव रोट्गीए: स्वरैः सप्तभिः ॥१०६।। पत्रासाविति भुवनेष्विति गुसरिति सर्वनामप्रातिपदिकवचनानां, न त्वदिति न मदितिं अपि तु अ्त्मदित्यस्य सर्वाक्षपिए:, भाग्यविपर्यया- दित्यन्यथासंपत्तिमुखेन न त्वभावमुखेनाभिघानस्य।' तरुसिमनि कलयति कलामनुमद्नघनुभ वो: पठत्यम।, अधिवसति सकलललनामौलिमियं चकित हरियाचलनयना ।११०॥ कत्र इमनिजव्ययीभावकर्मभूतांघाराखां स्वरूपस्य। तरुगत्वे इति, धनुपः समीप इति, मौलौ वसतीति, त्वादिभिस्तुल्ये पपां वाचकत्वे अस्ति में) एक बाल के आाघात से उत्पन्न पंकिबद्ध विशाल (सात) ताल वुक्षों के दिगो से प्रकाशित (उद्गोरस) सप्त स्थरो (नियादादि): द्वारा जिनकी कोति का गान करती है। यदि दिव्य ज्ञान वाले (देव) भी आप उनको नहीं जानते तो यह हमारे भाग्य को विपरीतता के कारए हो ।१०६ै।। यहाँ पर 'असौ' इह सर्वनाम को, 'भुयन' इस प्रातिपदिक की, 'ुएं:' इस बहुवचन की (ोर रस) टयञ्जकता है। तेरा नहीं, मेरा नहीं, अपि तु हुमारा, समस्त राक्षसकुल के उपस्थापक (प्रथवा सूचक) इस (अस्मव्) की (सकलराक्षसक्ुल. क्षयव्यञ्जकता है) तथा 'भाग्यविपर्यमात्' यह सम्पत्ति की दुर्भाग्यरप में परिसति कहो गई है, भाग्य के सभाव रप में नहीं; अतः भाग्यविपयय इस कथन की (भाग्य- परिवतन में) व्मञ्जकता है। प्रभा-'रामोऽसी' इत्यादि बहुत से व्यञ्जकों द्वारा वीर रस की व्यञ्जना का उदाहर है। यह राघवानन्द नाटक में रावस के प्रति' विभीपण की उकि है।' यहाँ पर सर्वनाम, प्रातिपदिक तथा बहुवघन आादि अनेक प्रकार के स्पज्जफ है और उन सय के द्वारा मिस्न मिस् रूप मे भनेक प्रकार के मर्य ध्वनित होते हैं जैसा कि ऊपर प्रदर्शित किया गया है। यै समस्त ध्वनित वर्थ सन्ततः वीररस के व्यम्बरा होते हैं। अतएव यहाँ पर वीद रस भनेक व्यञ्जकों द्वारा व्यङप कहा गया है। अनुवाद-'चकित मृग के समान प्चल नेमों वाली यह नामिका समस्त सुन्दरियों के ऊपर (मोलौ=शिरति) सषिष्ठित है; जयकि यौवन (इसको) (कटास- विदरेपादि) कलाओों की शिक्षा दे रहा है (शिक्षमति सति), उसका (शिव्यमूत) भ्रूतताप्रभाग (गुपरूप) कामवेव के धनुप के समोप (कसा का) अध्ययन कर रहा है (मग्र पठति सात] ॥११०।। यहाँ पर इमनिच् प्रत्यय, सम्यमोभाष समास और क्ममुत यापार के स्वरप की (भद्दार) व्पञजकता है; वर्योंकि (तरसिमनि' को) : 'तदसत्ये' के सुस्य ('मनुमदनघनु:' की) 'धनुपः समीपे' के वुत्य और (मोलिम्' की) 'मौसो पसति' के सूल्य भर्पात् 'इमनिच्' आ्रदि की 'त्य' आादि के समान हो पाचकता है, फिर भी
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चतुर्थ चल्लास: २१३'
कश्चित््वरूपस्य विशेपो यश्चमत्कारकारी स एव व्यञ्जकत्वं प्राप्नोति। एवमन्येपामपि वोद्व्यम्। वर्शरचनानां व्यञ्जकत्वं गुगास्वरूप- निरूपएं उदाहरिज्यते। श्रपिशब्दात्प्रवन्धेपु नाटकादिपु। एवं रसादीनां पूर्वगणितभेदाभ्यां सह पडभेदाः। (६२) भेंदास्तदेकपश्चाशत्- व्याख्याताः । इमनिच आदि के स्वरूप को कोई विशेषता अवश्य है जो चमतकाराधायक है। वह स्वरुप की विशेषता ही (या स्वरूप विशेष ही) व्यञ्जक हो जाता है। प्रभा-'तरुशिमनि' इत्यादि इमनिच् प्रत्यय आदि की शृ्गार-व्यञ्जकता का उदाहरय है। 'तरणिमा' (इमनिच्) तथा 'तरुसत्व' (त्व) आदि शब्दों का संकेतित अर्थ समान ही है फिर भी इमनिच् आदि प्रत्ययों के प्रयोग द्वारा सहुदयों, को एक विशेष माधुर्य का अनुभव होता है अतः इमनिच् आदि का स्वरूप ही यहाँ। पर शृद्गार रस का व्यञ्जक है। भाव यह है कि सुकुमार वर्स वाले इमनिच् तद्धित द्वारा नवकोमल आयु की प्रतीति होती है 'तर्सत्व' का प्रयोग करने पर तो 'स्व' प्रत्यय की प्रौढ़ता के कारण आयु की पोढता भलकने लगेगी। इसी प्रकार 'अनुम- दनधनुः' इस पूर्वपदार्थ प्रधान अ्व्ययीभाव समास् में उत्तरपद 'धनुप्' श्रप्रधान है ॥: अरतः भलता' के निरपेक्ष वशीकरण-सामर्थ्य की प्रतीति होती है तथा 'मौलिम्' इस कर्म विभक्ति द्वारा सकलललनामौलि में व्यापकता की प्रतीति होती है जिससे सौन्दर्यातिशय की अभिव्यञ्जना होती है। यदि 'मौलौ' इस सप्तम्यन्त का प्रयोग किया जाता तो एकदेश में भी आधारता का सम्भव होने से समस्त ललनाओं की मौलिभूत-इस प्रकार की व्याप्ति न होती। अरनुवाद्-उपयुंक्त रति से अन्य पर्दकदेश आररदि की व्यञ्जकता भी जाननी चाहिये। वर्ण तथा रचना (वंदर्भी) आदि यी व्यञ्जकता के उदाहरण गुसास्वरप- विवेचन के प्रकरण (भ्रष्टम उल्लास) में दिये जायेंगे। ('वरोप्यपि' में) भपि शब्द. (के प्रयोग) से नाटक आरादि प्रबन्धों में भी (रसादि व्यङ्गघ है) यह अभिप्राय है। उक्त रीति से रसादि (अलक्ष्यक्रम ध्वनि) के (वाष्य तथा पदप्रफाइय) पूर्व गिनाये गये भेदों सहित (वाक्य-पद-पदैकदेश-रचना वर्स तथा प्रबन्धप्रकाश्य), ६ भेद होते हैं। इस प्रकार ध्वनि के ५१ भेद होते हैं। घे भेद पूर्व गएना से व्यास्यात ही हैं। प्रभां-सूत्र ६० में उक्त ध्वनि के ४७ भेदों में अलक्ष्यकम रसादि ध्वनि के (i) पदकदेश (ii) वर्सां (iii) प्रवन्ध तथा (iv) रचना में होने वाले चार मेरों को सङकलित करके ५१ भेद होते हैं। संक्षप में ५१ भेद गएना इस प्रकार है-
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२१४ काव्यप्कान:
(६३) - तेषां चान्योन्ययोजने ॥।४३। सङ्करेण संसृष्टया चैकरूपया। न केवलं शुद्धा एवैकपव्चाशद् भेदा भवन्ति यावत्त पां रवप्रभेदै- रेकपल्चाशता संशयाऽऽसपद्त्वेन, अनुग्राह्यानुगाद्दकतया, एकव्यब्जकानु प्रवेशेन चेति त्रिविधेन सङ्करेस परस्परनिरपेत्षरूपयेकप्रकारया संघष्ट्या चेति चतुर्भिगु मने। (६४) वेदखाब्धिवियच्चन्द्राः (१०४०४)- शुद्धभेदः सह। (६५) - शरेपुयुगसेन्दव: (१०४४५) ॥४४॥ (१) अविवक्षितवाच्यध्वनि- (i) पद प्रकाश्य अर्थान्तिरसंक्रमितवाच्य, (i1) वावयप्रकाश्य मर्थान्तर- संकमित वाच्य (iii) पद प्रकाश्य अत्यन्ततिरस्कृत वाच्य, (iv) वाकयप्रकाश्य पत्यन्ततिरस्कृत वाच्य २ (२) विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि (क) असंसक्ष्यकमव्यज्गम- (i) पद (ii) वाकय (iii) पदकदेश (iv) रचना (v) वर्ए (ri) प्रबन्ध-प्रकाशय विवक्षितान्यपरवाच्य घ्वनि (स) संलक्षमकमव्यससम- (i) शब्दशक्तिमूलक पद प्रकाश्य वस्तु व्यङ्गभ (iii) (ii) अलद्धार रूप व्पकय ध्वनि वावयप्रकारय (iv) अतद्वार रूप. भर्थपानितमूलक पद-प्रकाश्य ध्वनि १२ वाकय प्रकाश्य।, १२ प्रवन्धक प्रकाइय।। शन्दार्थोभ यण वितमूलक ध्वनि
अनुवाद-उन (५१) भेदों के तौन प्रकार के सद्ूर सपा एक प्रफार को
मन्वम है)। संमृष्टि के परस्पर गुहन करने पर-'वेदसाव्यिवियन्चत्द्ाः' भर्वनन्त (इस प्रकार (व्यमिकाव्य के) केवल (उपयुक्त) शुद्ध ही ५१ मेद नहां होते किन्तु (मावत) उनके ५१ अमने प्रभेवों से सथा १. संशयाहपद रूप २. पनुप्राह्यानुपाहकत चोर ३. एक्पञ्जकानुपेश रूप-तोन प्रकार के सरूर से एवं परस्पर निरपेक्ष रप एक प्रकार को संसृष्टि से-इस प्रकार से गुया करने पर- येद (४) स (०) अग्थि (v) वियत् (0) और चन्द्र (१)अर्यात् १०४४ भेद हो जाते हैं। (भच्ानां वामतो गतिः)। शुद्ध (इक्पायन) नेवों के साप मिलकर घर (५) इप (५) मृव (४) श (०) औौर हन्दु (१) सर्पात् १०४५४ नेव हो जाते हैं।
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चतुर्थे उल्लास: २१५
प्रभा-उपर्युक्त ध्यनि के ५१ शुद्ध भेदों में से प्रत्येक के ५१ प्रभेद हो सकते हैं अतएव ५१X५१=२६०१ ध्वनिभेद हो जाते हैं। इन भेदों में से प्रत्येक के चार चार भेद हो सकते हैं-तीन प्रकार के सङ्कर द्वारा तथा एक प्रकार की संसृष्टि द्वारा। इस प्रकार २६०१x४-१०४०४ भेद होते हैं। ध्वनि या भलङ्कारों का मेल दो प्रकार से होता है-१. सङ्कर २. संसृष्टि। जहाँ पर एक भेद का दूसरे के साथ साक्षार या परम्परा से किसी प्रकार भी सापेक्ष सम्बन्ध होता है वहां संक़र कहलाता है अर्थाव (नीरक्षीरवत्) अन्योन्य सापेक्ष मिधस को सङ़र कहते हैं। यह तीन प्रकार का होता है-(i) सदयास्पद रूप अ्रथवा सन्देह सद्कर-जहां दो व्यङ्ग्घों में से किसी एक के विषय मे 'यह या यह' (अयम् अयं वा) इस प्रकार का सन्देह होता है। (ii) अनुग्राह्मानुग्राहकरूप सक्कर-जहां दो व्यङ्गधों मे परस्पर भ्रङ्गाद्वि भाव होता है और (iii) एकव्यञ्जकानुप्रवेश रूप सद्वर-जहाँ दो व्यङ्गयार्थ एक व्यञ्जक द्वारा अभिव्यक्त किये जाते हैं। २-संसृष्टि-जहां दो व्यङ्गय परस्पय निरपेक्ष या स्वतन्त्ररूप से पृथक पृथक होते हैं, वहाँ संसृष्टि होती है; भर्थाद (तिलतण्डुलवद) परस्पर निरपेक्ष मिश्रण को ससृष्टि कहते हैं। यह एक प्रकार की है। इस प्रकार पूर्वोक्त भेद-प्रभेदों वाली ध्वनि के ये चार प्रकार और हो जाते हैं और ये १०४०४ भेद होते हैं। इन भेदों में ध्वनि के ५१ शुद्ध भेद जोड़ देने पर १०४०४५१=१०४५५ ध्वनि के भेद होते हैं। टिप्परणी-(i) व्वनिकार ने ध्वनि के कुछ भेद-प्रभेदों का विवेचन (ध्वन्यालोक ३.४४ मे) करते हुए भी ध्वनि-भेद-परिगणन की भोर विशेष ध्यान नहीं दिया। सर्व प्रथम लोचनकार ने ध्वनि के ३५ भेद-प्रभेदों का संकलन किया- 'पश्वत्रिशद् भेदा:' (२.३१)। संक्षप में ये ३५ भेद इस प्रकार हैं-अविवक्षितवाक्य ध्वनि के ४+विवक्षिता यपरवाच्य अलक्ष्यकमव्यङ्गय ध्वनि के वरएा, पद, वाक्य सछटना, प्रबन्ध (प्रकाश्म) ५+सलक्ष्यकमव्यङ्गय ध्वनि के शब्दशक्तिमूलक पद- प्रकाश्य २ तथा अर्थशक्तिमूलक २४ (कुल २६) । लोचनकार ने सङ्कर और संसृष्टि आदि की सम्भावना से भी ध्वनि का भेद- संरयान किया या और कुल ७४२० ध्वनि-भेद माने थे-सावता पब्चनियंतो मुख्यभेदानां गुरने सप्त सहस्राणि चत्वारि श्वतानि विशत्यधिकानि भर्वन्ति' (लोचन ३)। किन्तु लोचनकार की भेदगणना अधिक स्पष्ट नहीं। (ii) आाचार्य मम्मट ने भभिनवगुप्त के ३४ भेदों मे १६ (१२ अर्थशक्ति- मूलक प्रबन्ध-प्रकाश्य ध्वनि -- २ शब्दशक्तिमूलक वावय-प्रकाश्य वस्तु तथा भलद्वार रूप+१ उभयश क्तिमूलक -१ असंलक्ष्यक्रम पर्दकदेशव्यङ्गय व्वनि) भेद और जोड़ कर ध्वनि के ५१ शुद्ध भेदों की गएना की और उपयुक्तप्रकार से ध्वनि के २०४४५ भेद-प्रभेद बतलाये। मम्मट के भेद-विवेचन में ५१४५१ किया जाता है मतः इस प्रक्रिया को गुएन-प्रक्रिया कहा जा सकता है।
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२१६ काष्यपकान:
तन दिङ् मात्रमुदाहियते। खसपाहुसिय्रा देयर जाय्याप सुहृय किपि-दे भगिक्षा। मप्र्इ पडोहरवलह्ीघरम्मि अरुसिब्जउ बराई ।१११॥ (चसापाधुगिका देवर जायया सुभग, किमपि ते भणिता।' रोदिति गृहपश्चाद्भागवलभीगृद्देनुनीयतां बराकी ।।११।) अन्ञानुनय: किमुपभोगलक्षरोऽर्यान्तरे संक्रमितः किमनुंरलनन्याये नोपभोग एव व्यङ्ग्य व्यञ्जक इति सन्देह:। (iii) साहित्यदर्पसकार कविराज विश्वनाथ ने भी ध्वनि के शुद्ध भेद ५१ ही माने; किन्तु सन्दर तथा संमृष्टि से होने बाते भेदों की गएाना 'मिनन प्रफार से की। उनके अनुसार ध्यनि के प्रथम भेद में एक सजातीय औौर ५० विजातीय भेदों के साथ मिलकर ५१ प्रकार की संगृष्टि या सद्कर होगा; किन्तु द्वितीय ध्यनि प्रकार में ५० प्रकार के ही संसृष्टि या संक्कर होंगे क्योंकि, इनमें से एक भेद की गणना प्रथम ध्वमि-भेद में हो चुकी है। इसी प्रकार एक एक ध्वनि-भेद घटंता जायगा और ५१ वे शुद्ध भेंद का केवल एक ही प्रभेद परिगणनीय होगा। इसलिये ससृष्टि के कुल भेदों की संदया जानने के लिये १ से ५१ तक का योग करना होगा भर्थाद् ५१x५२ या १३२६ सद्दर-संख्या १३२६ X १=३६७८ .। 'पु Sयति प्नेद १३२६+३६७८=५३०४।तदेवमेकपस्वाशव् नेवास्तस्य धघनेमंताः। सड्ुरेए त्रिरुपेस संसृप्या चंकरूपया: वेदसाग्निशरा: (२३०४) शुद्धरिय वायाग्निसायकाः (५३५४) । (सं० द० ४१२)। अनुवाद-उनमें से विग्दर्शन के हेतु कुछ उदाहरल दिये जाते हैं- 'हे सौभाग्यशाली देयर, क्षए भर के लिमे प्रयथा उताय के सघसर पर (क्षए) सुम्हारी प्रतियि (प्राधुसिका) बनी हुई उस हती को तुम्हारी पदनी ने कुछ (भवारूप) कह दिया है.जिससे कि यह गह के पिछले नाग में स्यत छग्ने पर, (बंठो) रो रही है, उस विचारी को मना लो' ।१११॥ कया यहाँ पर अनुनम' (मनाना) शब्द (लक्षता द्वारा) उपभोगदप अर्यान्तर में संकमित है? या अनुरतन सर्थात् संलक्ष्यकमय्यस्सप की रीति से उपभोग एम व्पङ्ुपार्य का उ्यञ्जरा है-यह सन्देह है। प्रभा-'क्षए इत्यादि संगवास्पद ध्वनिद्वय संट्गर का उदाइरस है।, यह। पर देवर को अनुनय क लिए कहा गया है। अनुनय का भभिप्राय है-रदन मो वन्द कराने व व्यापार सर्वात गनाना। यहां 'अनुनय' सव्द अपने सर्प में सनुपपम होकर नपभोगादिराय वोधन के लिए तमणा द्वारा उपभोग क्री प्रतीति कराता है सयशा इसका थर्य तो 'रोदन-नियारए' ही है फिन्तु इसके द्वारा उपमोग स्यह्प
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चतुर्य उल्लास:
स्निग्घश्यामलकान्तिलिप्तवियतो वेल्लद्वलाका घनाः L वाताः शीकरिणः पयोदसुहृदामानन्दकेका: कलाः । कामं सन्तु दढ कठोरहृदयो रामोडस्म सर्व सहे वैदह्दी तु कथ भविष्यति हद्दा हा दवि, धीरा भव ॥१।२ अन्न लिप्तेति पयोद सुहदामिति च अत्यन्ततिरस्कृतवाच्ययो: संसृि-
चार्थान्तरसक्रमितवाच्यरसध्वन्योः सङ्करः। एवमन्यदप्युदाहार्यम। इति काव्यप्रकाशे ध्वनिनिर्सयो नाम चतुर्थ उल्लासः ॥४।। हे-इस प्रकार का सन्देह होता है। दोनो प्रकार से उपभोग मे ही तात्पर्य है, भ्रतः यह सन्देह दूपण नहीं भूपएा है। और यहाँ पर व्य्गचार्थ के सन्देह से अविविक्षित- वाच्य अर्थान्तरमंक्रमित ध्वनि तथा विवक्षितान्यपरवाच्य संलध्ष्यकमव्यङ्य ध्वनि का सन्देहसद्कर है जो एक अद्भुत चमत्कार उत्पन्न करता है। :- अनुवाद्-'जिन (मेघों) ने स्निग्ध और व्यामल आभा से आंकाश को व्याप्त [लिप्त] कर दिया है, जिनमें बकपक्ियाँ [बालका:] कोडा करती है भरथंवा शोभायमान हैं (बेल्लन्त्यः-बहुतरं शोभन्त्यः सविलासं सेलन्त्यो बा); वे मेघ चाहे (फामं) आकाश में घिरे रहें (घना मेघा एव घना: निविडाः), जल-कण-युक्त वायुं भले ही चलें, मेघों के मिन्र अर्थात् मयूरों की आनन्ददायक श्व्यक्त-मधुर (कलाः) केका ध्यनि भले ही हों, मैं तो अत्यन्त (दूढ़) क्ठोर हृदय वाला (सकस दुःखों का पाघ) राम हूँ, सब सहन कर लूंगा; किन्तु हाय, (सुकुमारता के फारस डुखाक्षमा) सीता कैसे (जीयित) रहेगी, हे देवि, धैर्य धारस करो ॥११२॥ यहाँ पर 'लिप्त' और 'पयोदमुहृदाम्' में अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यों की संसृष्टि है। इन दोनों अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ध्वनियों के साथ (ताम्याम्) 'रामोर्ऽस्म' इस अर्थान्तरसंकमितवाच्य ध्वनि का अनुप्राह्यानुग्राहफ भाव से तथा अर्थान्तरसंक्रमित- वाच्य एवं रसध्वनि का 'राम' पदरूप (लक्षस) एकव्यञ्जफानुप्रवेश से (दो प्रकार फा) सङ्गर है। इसी प्रकार और भी उदाहरख दिये जा सकते हैं। प्रभा-'स्निग्ध' इत्यादि अ्रनुग्राह्यानुग्राहक तथा एक्व्यञ्जकानुप्रवेश नामक संकर और उपयुक्कत (एक प्रकार की) संसृप्टि का एक ही उदाहरण है। (१) यहां पर कान्ति के द्वारा अमूर्त आकाश का लेपन असम्भव है अतएव 'लिप्त' शब्द सम्पर्क को लक्षित करता है और सम्पर्क के पतिशय (्यापन) का व्यञ्जना द्वारा बोष कराता है। इसी प्रकार जड़ मेघ में सौहाद, जो चिन की वृत्ति-विशेष है, सम्भष नही है अतएव 'सुहृत्' पद उपकारिता को लक्षित करता है (क्योंकि मेघ मयूर की केकादि ध्वनि को प्रोत्साहन देते हैं) तथा उपकारिता की अतिसयता का व्यज्जना
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काव्यप्रकाशः
द्वारा बोध कराता है। यहां 'लिप्त' तथा 'मुहुद' शब्द का वाच्यार्थ अव्यन्त, विरसकृत हो जाता है तथा अत्यन्त तिरस्कृत वाच्य व्वनियां है ये दोनों परस्प निरपेक्ष भाव से संयुक्त हो रही है अंतः दो अत्यन्ततिरसंकृतवाच्य ध्वनियों की संमृष्टि है। (२) इस श्नोक में राम का सक्ष्याय है-'सकलदुःसंपान राम'। इसके द्वारा स्वावधीरण (अपना तिरस्कार) अर्थ ब्यङ्गथ है तथा 'राम' पद पर्ान्तर- संकर्मित है। किन्तु इसका व्यङ्गयार्थ 'लिप्त' और 'मुहृद्' 'पद की ध्यनियों पर निर्भर है क्योंकि वे उद्दीपक हैं। इग प्रकार वे इसके प्रयोजक या अनुग्राहक हैं भौय।' महःउन दोनों क प्रयोज्य या अनुग्राह्य है। इसलिये उन.दोनों ध्वनियोंके सार,> 'राम' पद की ध्वनि का अनुग्राह्यानुग्राहक सम्बन्ध है तथा उन दोनों मत्यन्त-। तिरस्कृत वाच्यध्वनियों के साथ इस अर्थान्तरसंमितवाच्य ध्वनि का प्रनुप्ासानु- ग्राहक-भाव संङ्गर है। यह द्वितीय प्रकार के सङर का उदाहरणा है। (३) इस इलोक मे 'राम' पद के द्वारा स्वायधीरस के समान ही विप्रलम्भ- शृङ्गार भी व्यङ्गथ है अथवा विप्रलम्भ समस्त वाक्य का व्यङ्गय है पतएव वाश्यक देश 'राम' क भी किसी न किसी अंश में विप्नम्भशद्ार व्यङ्गय है मोर यह, रसध्वनि है । पब एक 'राम' पद रूप व्यञ्जक में स्वायधीरस सौर विप्रतम्भ-ये रयङ्गय अनुप्रविष्ट है इससे दोनों व्यङ्गषों में एक व्यञ्जफानुप्रवेशरूप सद्गर है तथा तन्मूलक अर्थान्तरसंमितवाच्च य्वनि (स्वावधीरण में) एवं रसध्वनि (विपलम्भ मे) इन दोनों का ('राम' पद रूप) एकव्यन्जकानुप्रवेश नामक समगर है। यह तृतीय प्रकार के सद्वर का उदाहरस है। इस प्रकार फाय्यप्रफाश में ध्वनिकाय्य (के-भेद-प्रभेदों) का निएय करने वाला यह चतुर्थ उल्लास समाप्त होता है। 17
.॥ इति चतुर्य उल्लासः ॥ -
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44-) A .* +4
श्रथ पञ्चम उल्लस:
एवं ध्वनौ निर्णीते गुणीभूतव्यङ्गधप्रभेदानाह- (६६) अगूढमपरस्याङ्गं वाच्यसिद्धयङ्गगमस्फुटम्। । सन्दिग्धतुल्य प्राधान्ये काक्वाक्षिप्तमसुन्दरम् ।४५।। व्यङ ग्यमेवं गुणीभूतव्यङ ग्यस्याष्टो भिदाःस्मृता :- । TB इस (पञ्चम) उल्लास में मध्यमकाव्य (गुणीभूतव्यङ्गथ) के भेद-प्रभेदों का 'उदाहुरस सहित निरपण किया जा रहा है। अरनुवाद्-इस प्रकार (भेद-प्रभेद सहित) ध्वनि का निर्णय कर चुकने पर 1 (प्रन्थकार) गुणीभूतव्यङ्गभ (मध्यम फाव्य) के अवान्तर भेदों (प्रभेद) का निस्मस करते हैं-गुशीभूतव्यङ्गय काव्य के आठ प्रकार कहे गये हैं-(१) अगूढ, (२) अप- 'रंस्याङ्ग (३) धाच्यसिद्धयङ्ग, (४) झस्फुट, (५) सन्दिग्धप्राधान्य, (६) तुल्यप्राधान्य, (७) काक्वाक्षिप्त और (८) असुन्दर। प्रभा-गुणीभूतव्यङ्गय वह काव्य है जिसमें व्यङ्गचार्थ वाच्य-अर्थ की प्रपेक्षा अप्रधान होता है अर्थात् वाच्यार्थ अधिक चमत्कारक होता है। (उसका स्वरूप-विवेचन प्रथम-उल्लास मे किया गया है)। उसके ८ भेद हैं-[१] श्रगूढव्यङ्गप वह है जहाँ असहृदयजनो को भी व्यङ्गधार्य की नीघ् प्रतीति हो जाती है। (२) अरपरस्याङ्ग वह है जहां व्यङ्गयार्थ वाक्य के तात्पर्यरूप किसी अ्न्य प्रधानभर्थ का अ्रङ्ग अर्थात् उपकारक हो जाता है। (३) वाच्यसिद्धयड्ग (वाच्यार्थस्य सिद्धः अ्रङ्गं निदानम्) वह है जहाँ वाच्यार्थ की सिद्धि व्यङ्गयार्थ के अचीन होती है। (४) अस्फुट वह है जहाँ व्यङ्गघार्थ को सहृदयजन भी सहज मे नहीं समभ 'पाते। (५) सन्दिग्धप्राधान्य (सन्दिग्ध प्राधान्यं यत्र) वहहै जहां यह सन्देहहोता है कि -' वांच्यार्थ प्रधान है अथवा ब्यङ्गयार्य। (६) तुल्यप्राधान्य (तुल्यं प्राधान्यं पत्र) वह 'है जहाँ चमरकारोत्पादन में वाच्यार्थ तथा ब्पहचार्थ का तुल्य सामर्थ्य होता है अर्थात् 'व्यङ्यार्थ की प्रधानता वाच्यार्थ की अपेक्षा अधिक नहीं होती। (७) काववाक्षिप्त वह है जहाँ कातु नामक ध्वनिविकार से आक्षिप्त बङ्यार्थ के बिना वाक्यार्य का स्वरूप ही निप्पन्न नहीं होता। (८) असुन्दर वह है वहां व्यङ्गघायं स्वभाव से ही वाच्यार्य की प्रपेक्षा कम चमत्कारपूर्ण होता है। टिप्पणी-(i) आ्रानन्दवर्वनाचार्य तथा आचार्य अभिनवगुप्त ने ध्वनि एवं गुसीभूतव्यद्धच का विवेचन करके यत्र-तय गुगीभूतव्यक्गय के प्रकारीं का उल्लेस
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१२० कव्यप्रेकांशं:
(१) कामिनीकुचकलशबद् गूढं चमत्करोति, श्रगूद तु सफुटतया वाच्यायमानमिति गुणीभृतमेव। श्रगूढं यथा- यस्यासुदृत्कृततिरसकृतिरेत्य तप्त- सूचीव्यघव्यतिकरेगा युनंकि कर्रों। 1 काऊंबी गुगमंथनभांजनमेप सोडस्म: जीवन्न सम्प्रति भवामि किमावहामि॥११।। अरत्र [जीवन्! इत्यर्थान्तरसंकमितवाच्यस्य। 1. किया था; किन्तु उन्होंने स्पप्टतया गुरगीभूतव्यस्लघ के भेद-प्रभेदो का विवेचन नहीं किया। फिर भी ध्वन्यालोक तथा लोचन में गुखीभूतव्यस्धय्-पाठ्म के विर्विध पकारों या स्वरूप सामान्यतः देगा जा. सकता है। माचायं मम्मट ने उनका भली-
दिया है। माति अनुसन्धान करके गुणीभूतव्यङ्धय के भेद-प्रभेद, विवेचन मे शास्थीय रप
।(ii) विश्वनाथ कंविराज मे भी मम्मद-कत गुगीभूतव्यङ्गप के भेद-विर्वेचन का मनुसरण किया है। तभ स्यादितराङ्ज्' फावनाक्षिप्तं घ वाच्यसिद्वयङ्गम् ॥ सन्दिग्य प्रोघान्यं तुल्यप्राधान्यमरफुटमगूडम्। व्यमंघमसुन्दरमेवं भेदःस्तरयोचिता सप्टी ।। अ्रनुवाद-(१. अगुठव्यस्प) जो व्यज्तच सुन्दरी में (अज्चलायुतं) स्नंन- फंसश के समान गूछ (सर्यात् कुछ ढफा हुमा तथा कुछ प्रक्ट) होता है, यहो घंमत्कारजनफ होता है। जो व्यक्ुम स्पष्ट रप से प्रफट है (पगूद) यह वाष्यार्ष के सामान हो जाता है (अतः सा चमत्कारक नहीं होता) तपा गुखोभूत हो (पप्रमानो) हो जाता है। प्रमूद गुलीभूतय्यङ्टग्प का उदाहुरस, जसे- 'जिसका (मेरा) वायु अपना तिरस्कार (पिफ्कर) करते हुए स्वयं (मेरी शरण में) आकर तभो हुई सौह-द्लाफा के द्वार। सपने कानों को घॅपता या (सपा- सच्जा य: उपघ: येध: सहय स्यतिरुरः पौनः पुन्यं तेन पुनात्त संयप्नाति), वही (पह) मैं करपनो के सूत्-(गुस) प्रथन कार्य का भाजन हो गया हूँ। इस समम में नोवित हो नहीं हूं अतः बमा कदं ।२१३। यहां पर 'जीवन' इस सरयान्तरसंभमिसयाम्य (पद) का रयद्म्य झयूड है। प्रभा-'वस्य' इत्यादि गृशीभूतव्यन्धप वाष्य के मर्थान्तरगंतमिनयाया ममूडम्रसप का उदाहरस है। इमके गन्दर्भ तथा पर्य के वितय में टीपपार्गे का मत-भेद एै। उद्योनकार के अनुगार 'ुहमला' बने धमुंग से किसी ने पूछा कि सुम
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पञ्चम उल्लास: २२१
उन्निद्र कोकनद रेखुपिशङ्गिताङ्गा गायन्ति मञन्जु मधुपा गृद्ददीर्घिकासु।, एतच्चकास्ति च रवेनेवचन्धुजीव- ..:
पुष्पच्छदाभमुद्याचलचुम्बि विम्बम् ॥।१४।। श्रत्र चुम्बनस्यात्यन्ततिरस्कृतवाच्यस्य। शत्रासीत् फणिपाशवन्घनविघि: शक्त्या भवद,वरे गाढं वक्षसि ताडिते हनुमता द्रोणाद्विरत्राहृतः। 1. हिव्यरिन्द्रजिदत्र लक्ष्ममाशरैरलोकान्तरं प्रापितः केना यन मृगाचि राजसपते: फृत्ता च कएठाटवी॥११ ॥ - अपने अभ्युदय के लिये प्रयास क्यो नहीं करते, इसके उत्तर में अरजुन की यह उक्ति ह है। शरागत रानु का तप्त लौह-शलाका से कणवेध करना उस समय का आचार था। जीवित व्यक्ति में जीवनाभाव नही हो सकता, अतएव 'जीवन' शब्द श्लाघ्य • जीवन रूप अर्थान्तर में संक्रमित हो जाता है और यहाँ श्लाघ्य जीवन के पभाव का बोध होता है। यहाँ पर अत्यधिक अ्नुताप व्यङ्गघ है और जनसाधारण को वाच्य- अर्थ के समान ही उसका बोध हो जाता है इसलिये यह अगूढ गुसीभूतव्यङ्गभ है। अनुवाद््-'विफसित (उस्निद्र) लाल कमल (फोकनद) की पुष्पधूति से जिनके शङ्ग पीले हो गये हैं ऐसे भ्रमर गृह्वापियों में मनोहर रूप से गुञ्जार रहे हैं और उदयगिरि का चुम्बन करने वाला तथा नवीन बन्धुजीय नामक (जपाकुसुम).पुष्प I के पत्र की कान्ति वाला यह सूर्प-बिम्ब प्रकाशित हो रहा है' ।११४।। यहां 'चुम्बन' इस अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य का (व्यङ््ग्य अगूढ है) । . ,. प्रभा-'उत्निद्र इत्यादि अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य अगूढव्यङ्गय का उदाहरए है। इस उक्ति मे प्रात.काल का वणन है। 'चुम्बति' का मुख्य अर्थ है-मुख चूमना, श्रचेतन रवि-विम्ध में यह अर्थ सर्बथा वाधित हो जाता है इर हेतु संयोग- · मात्र को लक्षित करता है तथा अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य हो जाता है ।. उदयाचल-चुम्बन द्वारा 'प्रभातागमन' व्यङ्गभ है और वह वाच्यार्थ के समान स्पष्ट है-पमढ है अतः यहाँ गुणीभूतव्यज्गय है। उपयुक्तक दोनों उदाहरण शब्ददात्तिमूलक अगूडव्यङ्भय के हैं। अनुवाद्-'हे मृगलोचनि (सीते), यहाँ पर (मुझे और लक्ष्मस को) नाग- पाश में बांधा जाने का कार्य हुम था। यहाँ (मेघनाद के) शक्ति-नामक ्रस्न " द्वारा तुम्हारे देवर (लक्ष्मण) के वृक्षस्थल में, अत्यन्त आहत होने पर हनुमान के द्वारा दोएपर्वत लाया गया था। यहां लक्ष्मण के दिव्य माखों द्वारा इन्द्र जयी मेघनाव r परलोक में पहुंधा दिया गया था और यहाँ किसी के द्वारा राक्षसराज रावस के कण्ठरूपी यन को काटा गया था ।।११५।।
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३२० i कव्यप्रेकोग: 44
(१) कामिनीकुचफलशवद् गूढ चमत्करोति, अगूदं तु स्फुटतया वाच्यायमानमिति गुणोभूतमेव। शगूढ यथा- यस्या सुहृत्कृततिरस्कृति रेत्य तप्त- सूचीव्यघव्यतिक रेण.युनंकि कसों।: I ह i, फाऊची गुगमथनभीजनमेप सोर्डस्म0: F1 () 112. जीवन्न सम्प्रति भवामि किमावहयामि॥११ै अ्रत्र (जीवन् इत्यर्थान्तरसंक्रमितवाच्यस्य्। ्। 1 किया, था; किन्तु उन्होंने स्पष्टतया गुणीभूतव्यज्धथ के भेद-प्रभेदीं बा विवेचन नहीं किया। फिर भी ध्वन्यांलोक तथा लोचन में गुगीभूतव्यङ्गम-ाम्प के विविध प्रकारों का स्वरूप सामान्यतः देसा जा सकता है। आचार्य गम्मट ने उनका भली- "भाति अनुसन्धान करके गुग्ीभूतव्यनध के भेद-प्रभेद विवेयन को शास्त्रीय रप दियां है! (Ii) विश्वनाथ कविराज ने भी मम्मट-वृत गुणीभूतव्यस्धच के मेद-विषेयन का अनुसरएं किया है। तत्न स्यादितराङ्ट्र कावणाक्षिप्तं च वाच्यसिद्धघङ्गम्। s
व्यज्लथमसुन्दरगेवं भेद:रतरयोदिता भष्टी।। अनुवाद-(१. अमूदय्यभ्भघ) जो व्यन्जप सुन्दरी के (भन्चसायुसं) स्तन- फलरा के समान गूद (पर्थात् कुद ढका हुआ तथा फुंस प्रफट) होता है, यही चमत्कारजनक होता है। जो व्यक्ुप स्पष्ट रूप से प्रकट है (समूद) यह वाष्यायं के समान हो जाता है (भतः बंसा चमत्कारक नहीं होता) सथा गुलोभूत हो (अप्रपानों) हो जाता है। अगूढ गुरोमूतव्यडग्य का उबाहरस, जंसे- 'जिसका (मेरा) शम्ु अपना तिरस्कार (पिरगार) करसे हुए स्वर्म (मेरी दारए में) भारर तनी हुई सोह-दलाका के द्वारा मपने कानों को बैधता था (तप्त- सध्या पः व्यय: वेध: तस्य स्पतिररः पौनः पुन्यं सेन युनक्त संबप्नाति), यहो (यह) मैं करवनी के सूम- (गुस) प्रयन का्यं का भाजन हो गया हूँ। इस समय मैं जोविन हो नहीं हूँ अतः क्या फर्फ ॥११३॥ यहां पर 'जोवन' इस धर्थान्तरतंभमितषाव्य (पद) का व्यट्ग्य प्रपूर है। प्रभा-'मस्प' इत्यादि गुसीमृतव्सलुप वाय्य मे सर्यान्तरगंयमियराम पगूतव्यगप का उदाहरत है। इसके गन्दभ तया सर्थ के विषय में टीफारारों॥ा मस-भेद है। उद्योंवरार के मनुगार 'ूहमता' बने अनुन हे किसी ने दूछा कि तुप
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पञ्चम उल्लास: [ २२३
कैलासालय भाललो चनरुचा निर्वर्त्तितालक्तक- न्यक्ति: पादनखद्य तिर्गिरिभुवः सा वः सदा न्रायताम्। रपर्घावन्घसमृद्धयेव, सुदृढं रूढा यया नेत्रयोः कान्तिः कोकनदानुकारसरसा सद: समुत्सार्यते ॥११७॥। अत भावस्य रसः । अत्युच्चा: परितः स्फुरन्ति गिरय: रफारास्तथाम्भोघय: तानेतानपि बिभ्रती किमपि न क्लान्ताडसि तुभ्यंनमः । :. आश्चर्येण मुहुर्मु हुः स्तुतिमिति प्रस्तौमि याबद् भुवः तावद्विभ्रदिमां स्मृतस्तव भुजो वाचस्ततो मुद्रिता: ॥११८॥ अत्र भूविषयो रत्याख्यो भावो राजविपयश्य रतिभावस्य। अनुवाद-'कैलास-वासी शिव के ललाट के नेत्र (तृतीय नेतर) फी कान्ति .. से जिस (नसद्युति) में अलक्तक (महावर) की शोभा (व्यक्ति=प्रकटता) उत्पन्न. (निर्यंत्तित) हो गई है, स्पर्धा के सातत्य से उद्दीप्त जिस (नखद्युति) के द्वारा प्रत्यन्त बढ़ी हुई लाल कमल के समान घनी (पार्वती के) नेत्रों फी ताली सहसा दूर कर दो. जाती है, वह पर्वत पुत्री (पावती) के चरस-नखों की आभा रादा तुम्हारी रक्षा. करे ।११७॥ यहाँ पर (शृङ्गार) रस, (भक्ति) भाव का श्रङ्ग है। प्रभा-'कैलास' इत्यादि उवाहरण में शृद्धार रस भक्ति-भाव का अ्रद्ध है। इसमें महादेव के प्रमाण करने पर पार्वती के मान-भङ्ग करने का वरन किया गया है। यहाँ पर 'तयताम्' से पार्वती के विषय मे कवि का भक्त भाव प्रतीत हो रहा है उसी की प्रधानता है। पार्वतीविपयक महादेवनिष्ठ सम्भोग शृङ्गार उम भक्ति- भाव का पोपक है-अ्रज्ज है। उपयु क्त दोनों उदाहरणों मे एक रस किसी अ्न्य रस या भाव का श्रद्ध हो गया है अतः यहाँ प्राचीन आलद्धारिकों के विचार से रसवत् अलद्कार है। अनुवाद-'(हे पृथ्वी), 'अत्यन्त उच्च पवत चारो और विराजमान हैं: (स्फुरन्तिं) तथा अत्यन्त विस्तीर्ण (स्फारा) सागर भी है; इन सब को धारस करती, . हुई भी तुम कुछ भी यको नहीं हो; अतः तुम्हें नमरकार है' इस प्रफार ज्यों ही मैं. बार-बार आश्चर्य के साथ भूमि की स्तुति करता हूँ, हे राजन् त्यों ही इस (विशिष्ट) पृथ्वी को भी धारस फरने वाली तुम्हारी भुजा का समरस हो जाता है, इससे (पृथ्वीं, को स्तुतिरूप) मेरी वालपी कुण्ठित (मुद्विता: संकुचिता:) हो जाती है'॥११८॥ यहाँ पर भूमिविधयक रति नामक भाव राजविधयक रति भाव को अ्रभ्भ है। प्रभा-'अत्युच्चाः' आदि उदाहरण में एक भान अन्य भाव का भ्रद्ग है। इसमें कोई कवि भोजराज की स्तुति करं रहा है। यह।ं पर कविनिष्ठ भूमिविषयक
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२२२ काव्यप्रकाश:
अत्र फेनाप्यत्रेत्यर्थशक्तिमूलानुरणनरूपस्य। 'तस्याप्यत्र' इति युक्त: पाठः। (२) अपरस्य रसादेर्वाच्यस्य वा वाक्यार्थीभृतस्य, श्रङ्ग' रसादि अ्रनुरखन- रूपं वा। यथ।- अयं स रशनोत्कर्पी पीनस्तनविमर्दनः। नाभ्यूरुजघनस्पर्शो नीवीविस्त सनः करः ॥२१६॥ शत् शृद्धारः करुसस्य। यहाँ पर 'केनापि' (सिसी ने) इसमें धर्यशक्तिमूलक संसक्यकमध्यदग्य भ्रगूद है। '(इसके स्थान पर) 'तस्याप्यन' (उसका 'भी यहा) यह पाठ उचित है (तब ध्य ङ्ग्यार्थ के गूढ हो जाने से यह प्वनिफाव्य ही हो जायेगा, यह भाव है)। प्रभा-'अमनासीत' इत्यादि अ्ररथशतिमूलक (ससद्यमम) भगूद-ध्ङ्गप का उदाहरण है। यह राजशेसरकृत वालरामायस का पद्य है। यह विगानमार्ग से अ्योघ्या लोटते हुए राम की सीता के प्रति उतति है। यहाँ पर 'केनापि इम पद के पद्वारा धोतित 'मया' (राम ने) यह सर्थशक्तिमूलक सलकष्ममवङ्गय है। वह मगूढ है अर्थात् स्पष्टतमा प्रकट ही है, भतः यहां अ्रमूढ-गुशीभूतव्यस्भ है। 'केनापि' के स्थान पर 'तस्यापि' पद रस दिया जाय तो तत् शब्द से परात्रमी रावए का बोष होगा और उसका संहार करने के कारण नायक (राम) के उत्कय की प्रतीति हगगी तथा वहाँ व्यज्तमार्य को सूरता हो जाने से ध्वनिकास्य होगा। अनुवाद-(२. अपराङ्गव्यङ्ग्ध) मन्य (पपर) अर्यात् रसादि अ्रथषा वाच्याथं,जो कि वापय का तात्पय एम से प्रधान सर्य होता है, उसका भङग कोई •रस भाव आदि (अलक्ष्यभमय्यदृग्य) अथया संलक्यकमप्यदग्य हो [दिविप] पप- राङ्जगुशोभूतव्यद्ग्घ हं, जैसे- 'यह वही (रति-लीला में) करघनी को सोंचने थाला, पीन-स्नगगों, या अर्वन "करने वाला नाभि, उर्शौर जयाग्रों का स्पश करने वाला तमा नोवेको डीला करने याला हाम है ॥।११६।। यहां पर गुझ्गार (भपर) फरस का भ्द्त है। प्रभा-'अ्रयं' इत्यादि में शस्वार सा जनम है जो करस रम का प्रम " (अवरस्वाद्न गुगीभूनव्यद्धय) हो गया है। (महाभारत दवीपवं प्रध्जाय २४) रख- भूमि में बन्द कर गिरे हुए भुन्धिया के साथ वो सेकर उसकी पत्नी विसाप कर रही है। इस सन्दर्न में भरमा रम प्रधान ते पियनाय के कारण ओोर की प्रमानमा है। भूस्यिया की पत्नी का पूर्वानुभूत (गुज्ार) रगनाफर्पशादि का स्नरण दोड का हो पोपा करता है। मतएव भ़ार रम करा रम का मत्त है और पपर- स्याह रप गुगीभूतम्यग्गप है।
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पञ्चम उल्लास: [२२३
कलासालयभाललोचनरुचा निर्वर्ततितालक्तक- . नपक्ति: पादनखद्य तिर्गिरिभुबः सा वः सदा त्रायताम। सपर्धावन्घसमृद्धयेव, सुदृढं रूढा यया नेत्रयोः it.' ॥ कान्तिः कोकनदानुकारसरसा सदय: समुत्सार्यते।।।११७।। छत्र भावस्य रसः । अत्युचचा: परितः स्कुरन्ति गिरय: स्फारास्तथाम्भोघयः तानेतानपि शभ्रती किमपि न क्लान्ताऽसि तुभ्यं नमः। : शाश्चर्येण मुहुर्मु हुः स्तुतिमिति प्रस्तीमि यावद भुवः तावद्विभ्रदिमां स्मृतस्तव भुजो वाचस्ततो मुद्रिता: ॥११८॥ त्नत्र भूविपयो रत्याख्यो भावो राजविपयस्य रतिभावस्य । अनुबाद्-'कैलास-वासी शिव के ललाट के नेत्र (तृतीय नेत्र) की क्रान्ति. से जिस (नसद्युंति) में अलक्तक (महावर) की शोभा (व्यक्ति=प्रकटता) उत्पन्न. (निर्वतित) हो गई है, स्पर्धा के सातत्य से उद्दीप्त जिस (नखद्युति) के द्वारा प्रत्यन्त बढ़ी हुई लाल फमल के समान घनो (पार्वती के) नेत्रों की ताली सहसा दवूर कर दी
परे ॥११७॥ जाती है, वह पर्वत पुत्री (पावंती) के चरण-नखों फी आाभा सदा तुम्हारी रक्षा
r. यहीं पर (शरृङ्गार) रस, (भक्ति) भाव का श्रङ्ग है। "प्रंभा-'कंलास' इत्यादि उदाहरण में शृङ्गार रस भक्तिभाव का शद्ध है।. इसमें महादेव के प्रमाण करने पर पावती के मान-भङ्ग करने का वणन किया गया है। यहाँ पर 'आयताम्' से पावती के विषय में कवि का भक्त भाव प्रतीत हो रहा. है उसी की प्रधानता है। पार्वतीविषयक महादेवनिष्ठ सम्भोग शृङ्गार उम भकि- भावं का पोपक है-भ्रङ्ग है। उपर्यु क्त दोनों उदाहरणों में एक रस किसी अ्रन्य रस या भाव का श्रङ्ग हो गया है मतः यहाँ प्राचीन आलद्वारिकों के विचार से रसवत् अलङ्गार है। अनुवाद-'(हे पृथ्वी), 'अत्यन्त उच्च पवंत चारों ओर विराजमान हैं, (स्फुरन्ति) तथा अत्यन्त विस्तीसं (स्फारा) सागर भी हैं; इन सब को धार करती हई भी तुम कुछ भी थकी नहीं हो; अतः तुम्हें नमस्कार है' इस प्रफार ज्यों ही मैं. बार-बार आश्चर्य के साथ भूमि की स्तुति करता हूँ, हे राजन त्यों ही इस (विशिष्ट) पृथ्वी को भी धारण करने वाली तुम्हारो भुजा का समरस हो जाता है, इसमे (पृथ्वीं को स्तुतिरूप) मेरी वाली कुण्ठित (मुद्धिता: संफुचिताः) हो जाती है' ।११८॥ "यहाँ पर भूमिविययक रति नामक भाव राजविपयक रति भाव को ब्रङ्ज है।. प्रभा-'अत्युच्चाः' आदि उदाहरस में एक भाव अन्य भाव का भुद्ग है। इसमें कोई कवि 'भोजराज की स्तुति कर रहा है। यहाँ पर कविनिष्ठ
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२२४ ाव्य प्रकार:
वन्दीकृत्य नृप, द्विपां मृगटशसंता: पश्यतां प्रेयसां उिलप्यन्ति प्रणामन्ति लान्ति परितरचुम्वन्ति ते सैनिका:। अस्माक कुकृतैट शोर्निपतितोऽस्याचित्यवारानिये, विध्यस्ता विपदोऽखिलास्तदिति तै: प्रत्यर्थिभि: स्तूयसे ॥११।।। श्रन्र भावस्य रसाभास-भावाभासी प्रथमार्घद्वितीयारषंद्योत्यौ। श्रचिरलकरवालकम्पनैम्र कुटीतर्जनगर्जनमुदुः। दटशे तय वैरिगां मदः स गतः क्वापि तवेक्षणे चसात ॥१२०।। रतिभाव रतिविष्यक रविभाव के उत्कर्ष को बढ़ाने चाला है अतएय भूमिशिषयक
वयप्भ है। रतिभाव राजविपयक रतिभाय का भद्ध है तथा यतां भपरस्थामर्प गुणीभूत-
अनुवाद-'हे राजन् पापके संनिकगण शत्रुओं को मृगनमनी नारिमों को वन्दी करके उनके पतियों के बैसते हुए ही (उनका अनावर फरके) उनका पातिङ्गन करते हैं (फोपशान्ति के लिये) प्रशाम करते हैं (यश में फरने के लिये) पक़ड़ सेते है (सांन्ति-गुहन्ति) घोर (कामशास्त्रानुक्त स्थस पर भी) सर्वाद्गरूप (परितः) (उग्मत से होकर) घुम्बन पारते हैं। (इस प्रकार के अनुचित कार्यो के प्रघर्तक भी) सापंफी उन शघओों के द्वारा (इस प्रकार) स्तुति को जाती है फि हे औरौषित्य के सागर, (न्यायोनित फर्म करने वाले) हमरे पुण्पों (के प्रभाव) से झाप दर्शन के विषय हुए है (दशोनिपतितः) उस (रत्) आपके द्शन से हमारी समस्त विर्यासर्या नष्ट हो गई हैं ।११६। यहां पर प्रथमार्थ से धोतित (मृङ्गार) रमाभास तथा द्वितीमयं से योतित (रति) भावभास (दोनों) रति-भाय के बङ्ग है। प्रभा-'वन्दीकृत्य' इत्यार्दि ऐवे मगर्स्वाम मुशोभूतव्त संघ का उदाहृग्ण है, जहई रगाभाग तथा भावाभाग देनों भाव के थत है। यह हिमी कन की रजविषयक स्तुति है। गह पर प्रयमायं में अनतुर्क परवती रिपवर मैनिवनिष्ठ गृदार का वर्सन है जो रगाभाग है। द्वितीयार्ध में धयुभों के प्रहत राजविषपक प्रम (रति) वा बणेन है जो भावाभास है। ये दोनों मनोपित्व मे प्रयुत होने के वाऱंग रंगाभास और भावाभाम ह। कवि का राजविषयक रतिरग जो भाव है यही यहा प्रधान है तथा स्माभाग पोर भावाभाम उमका पोपणा करने बाने (भम) है!महां पर रवाभास या भावाभाग अन्य भाव के प्रति प्रमषण में सर्वस्मित ह धन: ऊगग्विनामर सवद्वार है। अनुवाद-है राजन्, निर्तर समवार कंपाने से, भौहू तानकर (भारो पाटो इरंस प्रकार को) ससठार से तथा (टसार और सिह्नाव रप) 'पनना से यो सार्पके सतुषों का गर्य बारनवार दिसाई पड़ता या पापका बर्गन करने पर (करते हो) स्षल भर में हो यंहु न जाने कहां (वशति) पला गया ॥१र।।
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पञन्चम उल्लास: [ २२५'
श्रत्र भावस्य भावप्रशमः । साक कुरङकशा मधुमानलीलां कतु सुहृद्धिरपि चैरिणि ते प्रवृत्त। अ्न्याभिधायि तव नाम विभो, गृहीतं 11 केनापि तन्न विथमामकरोदवस्थामं।१२१।। अन्न त्रासोद्यः। T.शसोढा तत्कालोल्लसदसह्भावस्य तपसः 1 कथानां विश्रम्भे्वथ च रसिक: शैलदुहितु:। - प्रमोदं वो दिश्यात्कपटबटुवेपापनयने त्वराशैथिल्याभ्यां युगपद्भियुक्त: स्मरहरः ॥१२२ 1 यहों पर (मद रूप) भाव की शान्ति (राजभक्ति) माव का झङ्ग है। .... 7 1. प्रभा-'अ्विरत' आदि ऐसे अपराज्ट गुणीभूतव्यङ्गच का उदाहरण है, जहां; भावशान्ति भाव का अभ्ध है। यहाँ पर शत्ुओं के गर्वरूप मदनामक भाव की, श्रान्ति का वर्न किया गया है। वह कविनिष्ठ राजविषयक रतिभाव (भक्तिभाव): का पोपक हे तथा उसका अ्द्भ है। यहाँ भाव-प्रशान्ति एक भाव के अङ्भरूप में अवस्थित है अतः समाहित अलद्गार है। अनुवाद-'हे प्रभो (विभो), जैसे ही आपका शत्रु अपने मित्रों सहित बालमृग (कुरङग) जसे नेत्रों वाली सुन्दरितों के साथ मद्पान की फोडा में वृवुस होता है (प्रयृत्ते सति- प्रवृत्त होने पर) कि (इतने में हो) वहाँ किसी के द्वारा (अनेकार्थता) के कारस) अन्य-पर्थ वाचक (श्न्य अभिप्राय से) ग्रहस किये हएं आापके नाम ने (शत्रु की कम्पादियुक्त) विषम अवस्था कर दी ॥ १२१॥ ग 7
रविभाव का] अङ्ग है। यहां पर नास रूप (व्यभिचारी) भाव का उदय [भावोदय] [राज-विषयक
प्रभा-'साकम्' इत्यादि ऐसे अपराङ्ग्गुणीभूतव्यङ्गर्भ का उदाहरणं है 'जहा भावोदय भाव का अद्ध है। यह किसी राजा की स्तुति में कवि की उक्ति है। यहाँ पर विपमावस्था द्वारा त्रासरूप व्यभिचारी भाव का उदय व्यङ्गघ है। वह 'कविनिष्ठ" राजविषयक रतिभाव (भक्तिभाव) का पोपक है। अतएब यहाँ भावोदय भाव का भ्रङ्ग है तथा प्राचीनों का भावोदय नामक अलङ्गार भी है। 'अनुवाद :- '(पावंती को) 'उस अवस्था में प्रकट होती हुई [उल्लसत्] तप को दुःसह्यता [ससहभाव] को सहन करने में अ्समर्य तथा पर्वतपुत्री (पावंती) को [संसो गोष्ठी में] विश्वासपूर्वक की गई वार्ताओं में [अथवा प्रशय कथाभों में] रसं लेने वाले अतएव छल से धारस किये हुए ब्रह्मवारी वेश का परित्याग करने में एक साथ शोमता तथा शिथिलता से अ्भिभुत [भभियुक्त आफान्तः] वह कान
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काव्यप्रकाश:
अन्रावेगधैर्ययोः सन्घि:। पशये करचिचचल चपल रे का त्वराऽह कुमारी: इस्तालम्य वितर हह हा व्युलम: क्वासि मासि। इन्थं पृथवीपरिवृद्, भ्वद्विद्विपोऽरमयवृत्त :.. कन्या कन्वित्फलकिसलयन्याददाना्इभिघस ॥१२३।।
एते च रसवदाधलद्वाराः ।यदपि, भावोद्यभावसन्धिभावरावत्- त्यानि नालक्वारतया उक्तानि, तथाऽपि कश्चिद् म यादित्येवमुक्तम। यहाँ पर आ्वेग औौर धयं [व्यभिचारी भावों) की सन्धि [शिववियमक रति भाव का बङ्ग है]। प्रभा-'अमोड़ा' इत्यादि ऐसे अपराडग गुगीभूतध्यद्ग्य का उदहरण है जिसमें भावसन्यि भांव का अझ्त है। इसमें बटुवेव में पावती के निकद जाने याने मे हादेव की स्तुति की गई है। यहाँ पर शित्र में त्वरा तथा गैविल् का बहन किया गया है इमसे 'मारेग' तथा 'धैर्य' दो व्यभिचारी भाव अभिव्यक होते हैं (उयष्ष्य है)। इन-दोनों भावों की गन्यि काविनिष्ट नियविषयक रतिनाय का यत् है। यह।ं सावसन्धि किसी भाव का भ्रङ्ग हो गई है मतः प्राचीनों का भावसन्यि मलद्वार है। r: अनुवाद-'हे पृथ्यीनाथ, चन में यास, करने वाले साप्के दयु की कम्मा, जो फस, औौर कोमस-पत्र घुन रही होती है[ किसी कामुक के प्रति] इम प्रकार कहती है- 'कोई देस लेगा [शद्धा] भतः रे धञ्यल, हृद [भाग] जामो [पमूण:] परे, शीधता कया है। (घृति), में कुमारी हूं (कुमारी की स्वतन्म्रता उचित नहीं- यह समरण); हाय फा सहारा वो अम), हाय (दन्व)। यह पनु्षित साचरत है (वियोध): तुम कहा जाते हो; (उतसुरता)' । १२३।। यहां पर राड्डा, मसूया, पृति हमृति, धम, इन्य, विजोष औौर भौग्मुश् (वयभिचारी) भावों को शबलता [राजविषयरु] रतिभाय का अ्रत्त है। :- प्रभा-'पश्पेत्' मादि ऐने पपराइग गुगीभूवव्यड्म्प का उदाहरता है जिग में भावणयलता भाव बम सद है। फाहरमा समन में किसी (मनुरत) घमकता की कामुफ के प्रति गह चति है। वहां पर पू्व पूर्वनर्ती मदुा पादि भाव को इबाहर उसरीत्तर बहूत से भातों का उदय दिसलाया गया है, यही भावनमतता है। इद भावनवसता राजविपयक रति-भाव का अद्ध है। यहां भवरयता मक भार का भुझ दो गई है मतः भावभमनता भसद्वार है।: 1-अनुवाद्-मोर ये [गुस्ती भूत रम सादि] सावद आदि मसद्वार भी पहे गये है। मछति भावोदय, भारसत्य चोर, भावसमसता को [हिसी के ज्ारा] मसकार, रूप में नहीं कहा गया समानि कोई करता हो [यह गम्भाबना करये]. इसलिमे यहां बंटा गमा है।
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पञ्चम उल्लास: [ २२७
यद्यपि न नास्ति कश्चिद्विपयः यत्र ध्वनिगुणीभूतव्यङ्गययोः स्वप्रभे- दादिभि: सह सङ्कर: ससृप्टिवा नारिति, तथाऽपि, प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्तो' ति क्वचित्केन चिद्व्यवहार:। I प्रभा-प्राचीन आलङ्कारिकों ने रस आ्दि के गुणीभूत हो जाने पर उन्हें 'रसवत्' 'अलद्कार आदि के नाम से अलङ्धारों में गिनाया था'। उनके अनुमार गुणीभूत रस 'रसवत्' गुसीभूत भाव 'प्रेयस्', गुरगीभूत रसाभास तथा भावभास 'ऊर्जस्विन', गुीभूत भावशात्ति 'समाहित' नामक अलङ्गार कहलाती था.। यदपि उन्होंने भावोदय, भावसन्वि और भावशबलता आदि को अलङ्गारों में नहीं गिनाया । किन्तु जिस प्रकार अन्य रसादि का उत्कर्प बढाने के कारण रसवत् आदि को अलक्गार माना गया था उसी प्रकार भावोदय आदि को भी अलङ्कार माना ही जा सकता है। इसी सम्भावना के आधार पर आचार्य मम्मट ने भावोदय आदि का भी यहाँ उल्लेस किया है। वाद में अलद्धार- सर्वस्वकार ने भावोदय आदि को पृथक अलद्धार माना भी है। आचार्य 'मम्मेट ने तो प्रचीनों की दृष्टि से ही रसवत् आदि अलङ्गारों की बात कही है। 'वास्तव' में मम्मट इन्हें-अलद्कार नही मानते अपि तु गुशीभूतव्यस्ूध ही मानते हैं; क्योंकि जिस प्रकार गुए रस के साक्षात् उपकारक हैं इसी प्रकार ये भी रस के साक्षात् उपकारक है, किसी अ्रङ्ग का उपकार करके ये अङ्गी (रस) का उपकार नहीं करते। अलद्वार तो शब्द या अर्थ रूप ग्रद्धों की शोभा बढ़ाकर अ्रङ्गी रस का उपकार करते हैं।: टिप्पसी-(i) प्राचीनों की उक्ति है-'गुसीभूतो रसो रसवत्, भावस्तु प्रेयः, रसाभासभायाभासी ऊर्जस्वि, भावशान्ति: समाहितः । (ii) अलद्धारसवस्वकार ने भावोदय आदि को भी अलद्धार रूप में प्रतिपादित किया है- 1- रसाभावतदाभासतत्प्रशमानां निबन्धनेन रसवत्, प्रेय-ऊर्जस्विसमाहितानि, भावोदयो भावसन्धिर्भावशबलता च पृयागलङ्गार:'। 1 (iii) आचार्य मम्मट ने काव्य में 'अलङ्गार' तथा 'अलङ्गाय' का भली भांति विवेचन किया था। उनके विचारानुसार जहां रस-भाव आदि प्धानतया, व्यज्जय हैं वह उत्तम ध्वनिकाव्य है, जहाँ ये अप्रधान रूप से व्यङ्ग्य है वहाँ ये अपराङ्ग्र- गुणीभूतव्यङ्गय मध्यम काव्य के अन्त्गत आाते हैं। इसी हेनु उन्होंने 'रसवत्', आदि की अलङ्गारों में गना नहीं की, किन्तु प्राचीनों के भत का समन्वय करने के लिए यह बतला दिया -- 'एते च-रसवदाद्द्गाराः'। वस्तुतः जो रसादि अलद्वाय हैं उन्हें अलद्वार कोटि मे कँसे रक्खा जा सकता है।? अनुवाद्-यद्यपि ऐसा कोई विषय (काव्यस्थल) नहीं है जहां ध्वनिकाव्य और गुणोभूतव्यङ्गघ का किसी न किसी अपने पवान्तर भेद के साथ यङ्गाद्विभाव रूप (नीरक्षीरवत) सदर प्रथवा दोनों की प्रधानता रप (तिलतण्डुलयत्) संसृष्टि न हो; तथापि 'मुख्यता के फारए, व्यत्रहार, (व्यपदेश): होते हैं' इस (न्याय) के अनुसार कहों पर (जहां जो विशेष चमत्कारक है) किसी के द्वारा (उसी से) व्यवहार होता है, सर्थात् उसी नाम से पुकारा जाता है। :
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२२८ काव्यप्रकान:
जनस्थाने भ्रान्तं कनकमृगतृप्णान्धितघिया, वचो वैदेहदीति प्रतिपदमुद्धु प्रनपितम्। कृतालङ्गा भर्तु र्वद्नपरिपाटीपु घटना प्रभा-अपराङ्ज गुणीभूतव्यस्भम काव्य का जो 'अपं सः रघनोत््यी' भादि उदाहरख दिया गया है। उसगे करुमा रस की प्रधानता के कारणा मननिराव्य हो सकता है तथा शद्गार रस की दृष्टि रे गुगीभूतव्यद्धय भी हो सकता है। इसो प्रकार जहां रस ध्वनिकाव्य माना जाता है वहाँ पर भी भावम्वनि पवश्य होती है। इस प्रकार काव्य-स्वलों में सवभ्र ही किसी ध्वनि या गुणीभुतव्यस्गप का परसूपर मथवां इनके भेद-प्रभेदों का एक दूसरे के साथ कही सङ्कर होता है कहीं संमृष्टि होती है। जैसे-रसध्वनि में भावध्यनि उत्कर्पाधायक (उपकारप) है परतः दोनों मा संदूर है। अतः ऐरे स्थानों पर ध्यनिकाव्य माना जाय अयवा गुणीभूतष्स्प माना जाय, यह सन्देह होना स्वाभाविक ही है। आचार्य मम्मट, ने 'यद्दि' आदि वागम द्वारा इस की सम्भावना को स्वीकार करते हुए 'तयापि' आादि यानप में इसका समाधान किया है। भाव यह है कि 'पाघायेन व्यपदेशाः भयन्ति' धर्षात् किसी वस्तु में नामकरमा आदि व्यवहार मुख्यता के कारए हो होता है मतः जहा पर रसादि प्रधान रूप से व्यसय होते है अर्यात् भतिरायेन चमत्ववरक होते हैं यहाँ पर व्वनि काव्य का व्यवहार होता है, किन्तु जहाँ पर रसादि यह रूप मे (मप्रयानतया) रहफर भी विनेष चमटकारक होते है: यहां गृगीभूनव्यभ्गप काम् होता है। अयं सः रगनोतर्थी' आदि में 'करणा' रस पङ्गी भवस्य है हिन्तु यह। मन्जर्प होकर भी मृज्गार ही विशेष चमरारफ है पतः इसे गुनस्हप काव्य ही कहना उचित है, ध्वनि नहीं। :: टिपपणी-(i) यङ्गाद्वित्वावी सदूर:' योः प्रामान्ये संमृष्ः' रवि दिवेक:। (ii) भाचार्य मम्मट को उपयुबन मारता का आ्रधार सनिकार की यह उकि है- सन्दोलों हिकश्चित् प्यनेग सोमूतव्यभचस्य घ सढये दुदपते मागेंः। तभ मस्य पुक्िसहायता तम तेन व्यपदेश प्तंथ्यः।न स्वत म्यनिरागिला भकतभ्यम्। सन्यासोर ३-३६) : अनुवाद :- 'स्वसं (मन-गमपति) की ससवृप्णा (राम पस मेंनवर्संबुंग प्राप्ति को इच्छा) से पुल (बिषेररहिन) युद्ि घासे मैंने (रवि ने) मानव के रभान प्राम-नगरादि (दसडफारण्) में अमस रिंमा। 'निशबन हो (पै) कुस हे बो (राम पस में-हे मंरैहि) यम पम पर आाँमू महाते हए यह यशन व्वर्म में गोमे (प्रलपितम्), स्यामी के(भतु:) सेवा कार्य में (परियाटीणु) कौन सा भाम [वडगा]
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पञ्चमं उल्लासं:
मयाऽडप्तं रामत्वं कुशलवसुता न त्वधिगता ॥१२४।। शरत्र शब्दशक्तिमूलानुरएनरूपो रामेए सहोपमानोपमेयभावो वा- च्याङ्गतां नीतः। आगत्य सम्प्रति वियोगविसष्ठु लाङ्गी- p - मम्भोजिनीं क्वचिदृपि क्षपितत्रियामः । एनां प्रसादयति पश्य शनैः प्रभाते तन्वङ्धि, पादपतनेन सहसररिमः ॥१२५।। श्रत्र नायकवृत्तान्तोऽर्थराक्तिमूलो वरतुरूपो निरपेक्षरविक्रमलिनी- धृत्तान्ताध्यारोपेशव स्थितः ।
पर्याप्त रूपसे नहीं किया? [रावस को (लङ्गाभतुः) मुख पंकि पर (वदन परिपाटयां) शरयोजना (इपु संघटना) पर्याप्त रूप में की] । इस प्रकार मैंने रामत्व को प्राप्त फर लिया; किन्तु सुखकर धन-सम्पति [कुशल वसु धनं वस्य, तद्भावः] नहों प्राप्त की अथवा कुश-लब हैं पुत्र जिसके [फुशलवौ पुत्री मध्याः सा] ऐसी सीता फो प्राप्त न किया' ॥ १२४।। हi यरहाँ पर 'राम के साथ (वक्ता के) उपमानोपमेयभाव रूप' शब्दशक्तिमूलक :संलक्ष्य-कमव्यङ्गघ को वाच्य अर्य का अङ्ग बना दिया गया है (नोतः) । ग प्रभा-'जनस्थाने' इत्यादि ऐसे अपराङ्ग् गुणीभूतव्यङ्गय का उदाहरणा है ** जिसमे शब्दशक्तिमूलक संलक्ष्यकरमव्यङ्गय (उपमा) वाच्यार्थ का श्रङ्ग वन गया है। यह राज सेवा से बिरक किसी कवि की उक्ति है। यहाँ पर शब्द-शक्ति की महिमा से (उपयुक्क तीन पदो द्वारा) कवि (प्रकृत) तथा राम (अप्रकृत) की उपमा का व्यञ्जना द्वारा बोध हो रहा है अर्थात् 'उपमा' शब्दशक्िमूलक संलक्ष्यकमव्यङ्गप है। किन्तु यह 'ध्वनि' नही प्रत्युत 'गुीभूतव्यङ्गय' है; क्योंकि 'मैंने रामत्व प्राप्त कर लिया' (मयाप्तं रामत्वम्) इस वाच्यार्थ के उपकारक (उत्कर्पापायक) के रूप मे इसका प्रयोग किया गया है। 'जनस्थान' आदि शब्द परिवृत्यसह है; अतएव, यहाँ इसे शब्दशक्तिमूलक लक्ष्यकमव्यङ्धच कहा गया है। अनुवाद :- 'मरी फृशाद्गि, जिसने फहीं, अन्यय रात्रि व्यतीत की है ऐसा यह (सहस्र किररों वाला) सूर्य अब प्रभात-वेला में धीरे से (सज्जित सा) यहाँ आकर विरह से संकुचित (विसंफ्ठुल) गाम वाली इस कमलिनी को पाद-्पतन पर्यात् किरसों के सम्पर्क द्वारा (पयया चरगों में गिरफर प्रसाम द्वारा) प्रसन्न,कर रहा है' ।। १२५ ।। 1 यहाँ पर नायक-नाघिका का व्यवहार पर्थशक्तिमूलक संतक्ष्यमय्यद्भप वस्वुरूप: है जो स्वतन्त्र रूप से बसित (निरपेक्ष) सू्य तथा कमतनी के व्यवहारसप (याच्यार्थं) में अध्यारोपित होकर हो स्थित है।
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२३० j काव्यप्रकांदों:
(३) वाच्यसिद्धयङ्ग"यथा-" 1*भ्रमिमर तिमलसहृदयता प्रलंय मूच्छा तमः शरीरसादम्। मरगब्च जलद्भुजगजं प्रसह्य कुरुते विपं वियोगिनीनाम्॥१२६॥ अत्र हालाइलं व्यद्गय भुजगरूपस्य वाच्यस्य सिद्धिकृत् प्रभा-'आगत्य' इत्यादि ऐसे अपरामट्रगुलीभूतव्यद्भय का उदाहरण है जिसमें अर्यशक्तिमूलक रालक्यमभव्यङ्गय वस्तु वाच्यार्थ का भ्रज्त यन गई है। मह किसी सुग्या नामिका के प्रति ससी की उक्ति है। यहां पर पर्यपक्ति (सह्सरदिम बहुनायिकात्व, पादपतन-परसपतन आदि) की महिमा से शभिव्यक होने वासा नायनल्नाविका का व्यवहार रंलक्ष्यममव्यस्सम वस्तु है: उसका नायप वृप्तान् से निरपेक्ष रविकमलिनी के वृत्तान्त में आरोप किया गया है अतएय यह वाच्यार्थ (रवि- 'कमसिनी वृप्षान्त) का श्रम्ध होफर (उत्कर्ाधायय रूप मे) पाया है और यहा अपराङ्ट्र गुसीभूतव्यद्धभ है; 'ध्वनि' नहीं।
व्यङ्गय (याच्याज्) औोर आागे कहे जाने वाले याच्यनिद्धपज्ज या भेव दिसताने के लिमे ही निरपेक शब्द का प्रयोग किया गया है। भाव यह है कि जहां याध्यार्मं निरपेकष होता है, वयज्य अर्थ के बिना भी स्वतः निपपम होता है, पिर-भी मन्नप अयं वाच्य का भङ्ज वन कर उसे अधिक चमलार बना देता है, यहाँ अपरस्नास- गुरीभूतव्यन्सय होता है। जसे 'भागत्य' इत्यादि उदाहरण (१२५) में रिक- मलिनी का वृत्तान्त नायकनायिता के वुसान्त रूप ध्यमतमार्य के बिना भी निशम है, उसे अपनी सिद्धि के लिये व्यस्धथ धर्य मी मपेका नहीं फिर भी यह व्वकम उसका उतरुपं बढ़ाता है। . . इसके विपरीत जहा वाध्याय सापेदा है, वह स्वतः निष्पप्न नही होता औोर अंपनी सिद्धि के सिये व्यहपार्यं की पपेशा रसता है, यहाँ यान्यसिलमस नामर गुगीभृतव्यद्वृप होता है, जैसा कि 'समि' इत्पादि रदाहरया (१२९) मे शषष्ट होगा । अनुवाद-(३) वास्पतिरपम (का उबाहरख है); जंसे- गेप रपी सप से उत्पम दिप (जल या हासाह्त) सहसा प्राहपनाका रेस) वियोगिनी माभिरायों को चक्कर (धमि), विषयों में मरषि (परति), नरागीनडा (मससद्दपता), याहय इण्टिर्यों में निश्येष्टता (प्रतप), मूर्ा, तमो गूस़ से बमने हे सन्यता (तमः), परोरहरता (सरोसमाड), मरप्रामम दसा (नोइनगदोडममनाहजरी भरर्स परिकीतितम्) कर देता है ॥ १२६।।
को गिद्धि करता है। यहां पर (दिप रा का) स्वदथारम परस (हागाार) मुजमकप वाष्याब
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पञ्चम उल्लास:
यथा वा- .-: (x) गच्छाम्यच्युत, दर्शनेन भवतः किं तृप्तिरत्पदयते कि त्वेवं विजनस्थयोर्हतजनः सम्भावयत्यन्यथा।
माश्लिव्यन्पुलकोतकर। वि्चितततुर्गोदीं हरिः पातु व: !१२g
॥ गतल्वेन अपरत्र भिन्नवक्तृगतत्वेनेत्यनयोर्भेदः।
पभा-'भ्रमि' इत्यादि (३) वाच्यसिद्धङ्ग गुीमूतत्यङ्गय का उदाहरण है। वाच्यसिद्धयङ्ग दो प्रकार का होता है-१. एकवक्तृगतपदवाच्यंसिंद्धयन्न, २. भिन्नवक्तृगतपदवाच्यसिद्धयङ्ग। 'भ्रमि' आदि प्रथम का उदाहरण है। इस पद्य में उद्दीपन रूप में वर्पा का वर्णन किया गया है। यहाँ पर दिप शब्द का गरल-पर्थ व्यङ्गय है। विष शब्द अनेकार्थक है उसके जल, जहर (गरल) आदि अनेक वाच्यारथं होते हैं तथापि प्रकरशादि के द्वारा यहाँ जल-अर्थ में ही उसकी अभिधा नियन्तित "हो, गई है अतः यहाँ पर गरल-अर्थ उसके द्वारा व्यङ्गय ही है। 'विप' शब्द से गरत की (व्यञ्जना द्वारा) प्रतीति हो जाने पर जल में उसका अ्भेद ग्रहण होता है तिथा 'बिष' से अभिन्न जल है' इस ज्ञान से वह 'भजगाभिस जलद' से ही उसमहो सकता है-इस प्रकार 'जलद एव भुजगः' इस वाच्यार्थभूत रूपक की सिद्धि होती है; तभी भ्रमि आदि कार्यों की उपपन्नता हो सकती है। यदि यहाँ विप-का व्यङ्गपार्थ 'हालाहल' न हो तो 'भुजगसदय जलद से उत्पन्न जल' यह अर्थ होगा, फिर उस (जल) के कार्य 'भ्रमि' आदि कैसे हो सकते हैं। अनुवाद-'प्थवा जैसे-'हे अ्च्युत (फृप्ण), मैं जाती हूँ, आपके दर्शन 'मात्र से पया तृप्ति होती है? प्रत्युत इस प्रकार हम दोनों केएकान्त में स्थित होने पर दुर्जन अथवा मरे लोग (मारिते कुत्सिते हतम) कुछ और ही समभते हैं: इस:(हे अ्रच्युत) सम्बोधन की भङ्िमा (स्वरविशेष में कहना) केद्वारासुचित जो व्यय ठहरना है उसफी सिन्नता से अलसाई हुई (उदासोन) गोपो काभ्रासिज्न करते हुए रोमाञ्य समूह (पुलकोत्कर) से व्याप्त शरीर वाले श्रीकप्ण तुम्हारी रक्षा करें-।। १२७।।, , स (':' यहाँ पर 'अच्युत' इत्यादि पदों का व्यन्नभार्य 'मामन्तण' आदि: के वाच्यार्य 1फो सिद्धि का अ्रज्ज है। - और यह एफ स्थल ('श्रमि' आदि) में (कवि रूप) एकवपतृगत कपा से तथा दूसरे स्थान (गच्छामि' आादि) पर (पूर्याद्वं में गोपी, उत्तराज में कवि) भिन्नववतृगत रूप से है-मही इन दोनों का भेद है।
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२३२ i काव्यप्कार:
(v) अस्फुट यथा- पदृप्टे दर्शनोत्कपठा दप्टे विच्छ्ेदभीरता। नाटप्ट़ेन न दप्टेन भवता लभ्यते सुखम् ॥१२८॥ अन्रादृष्टो यथा न भवसि वियोगभयं च यथा नोरपदते तथा कुर्या इति क्लिष्टम्। (k) सन्दिग्वपाधान्यं चथा- हरस्तु किन्चित्परिषृत्तपैर्यइचन्द्रोदयारम्भ इवाम्बुराशि:। टमामुखे विम्वफलाघंरोप्ठे व्यापारयामास विलोचनानि ॥१२।॥ rt: मत्र परिचुम्बितुमैच्छ्दिति कि प्रतीयमानं कि वा विलोचनव्या- पारस वाच्यं प्रधानमिति सन्देदः। " "'F. पभा-गं्छामि' इत्यादि भिसनववतृगत वाच्यगिरधपज्ज गुशोभूतव्भ्गप का उदाहरस है। यहां पर 'अरच्युत' का व्यव्तमार्थ है-मेरी जैमी नामिका के शास्तिध्य में भी तुम धैयं-न्युत नहीं होते तो यहां ठहरना व्यर्य है। 'द्दनेन' म ध्यहम्मार्थ है-सम्भोग रे ही नृप्ति होगी। 'विन्तु' इत्यादि का व्यङग्प है- मरीति तो हो ही गई फिर आत्मवञ्चना थया है-पह गेद। इम 'अचनुमादि' पदों के थ्यङंग्यार्य की प्रतीति के बिना 'इत्यामन्वएभा्यूवितय् पायस्थानमेदालताग्' मे वान्यार्थं की सिद्धि ही नही होती; गयोंकि 'यृथावस्थान' ता 'मेद' सो व्यद्सवार्य ही हैं भतएम यहाँ वाच्यसिद्धयद्दग गुणीभूतव्यङ्म्य है। अंनुवाद-(४) घरपुट गुणीमूतव्य्गम (पा उदाहरस)जेो- . ' हे प्रियतस, पापफो बिना देसे, बशन की सालता बनी रहती है' बैरा सेमे पर वियोग (विस्छेद) का नम हो गाता है इस प्रफार न सापके मिना देसे सुख 'मिलता है न देरे हो' ॥ १२८ ॥ 1 यहाँ पर 'जिससे तुम पदृष्ट न हो औौर जिससे वियोग या नम उत्पन्न न हो मंसा (ऐसा) करो' मह व्यड्य भरफुट (विलष्ट) है। प्रना - 'भहप्टे' इत्यादि में ध्यद्स्पामं मरपुट या मसपष्ट है, उायुंक ्द्रांपारय की सहदपो को भी स्पष्ट प्रनीति नही होती पतुः यह मससुर मुछीभूत इयद्ष है। अनुवाद-(x) शान्दिय प्राषान्म (गुसीमूतम्यटम्म) का बदाहरस-अैंगे- धाटोद्य के प्रारम्भकात में समुद्र के समान दृय उम रगाममिा (परियुस) हो गयाहै थमं जिनका ऐगे महादेव जी बिम्या-फस के सदुस सपरोष चाते पार्पती ह के मुल पर नेत्रों को घुमाने समे' ॥१२ह॥ '', यहां पर 'सूम्यन करना छाहा' यह स्यदसारमं मपान हैह सपना भोत भुमाना' रूप याम्याम प्रमान है? यह सम्हेह है।
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पञंचम-उल्लास: ५ २३३
(६) तुल्यप्राधान्यं यथा-", ब्राह्मणातिक्मत्यागो भवतामेव भूतये। A . W- () जामदग्न्यस्तथा मित्रमन्यथा दुर्मनायते ॥१३॥ अत्र जामदग्न्य: सर्वेपां क्षत्रियाणामिव रकसां कषसात्तयं करिप्य तीति व्यङ्गयस्य 'वांच्यश्य च समं प्रांधांन्यम्। (७) काक्वाचिप्तं यथा- .. मंश्नामि कौरवशतं समरे न कोपादू दुःशासनस्थ रुघिरं न पिवाम्युरंग्त: ! .- hith -r1i. : सब्चूर्णयामि गदया न सुयोधनोरु सन्धि करोतु भवतां नृपतिः परोन ॥१३१॥ - प्रभा-'हरस्तु' इत्यादि (५) सन्दिग्य-प्राधान्य नामक गुणीभूतव्यङ्ग्य का चदाहरण है। कुमारसम्भव के इस पद्य मे वसन्तागमन के समय शिवजी को देशा का वर्णन है। यहाँ पर 'अधर चूमना चाहा' यह व्यड्ग्य है और "एक साथ तोचनंत्रयं को घुमाया' यह वाच्यार्थ है। इन दोनों में कौन प्रधान अर्थात् अधिक चमत्कारजनक है, यह सन्देह है। i. अनुवाद- (६) तुल्पप्ाधान्य (गुणोभूतव्यङ्ाय), जसे । ।', :(हे राक्षसराज,, ब्राह्मणों के अ्तिकम अरथात् अपमान करने का त्याग आपके (राक्षसों, के) ही फल्याए के लिये है, नहीं तो आपका ऐसा(जन्म ; से समस्त रहस्य जानने वाला) मित्र परशुराम (जमदग्नि की सन्तान) क्षुब्ध हो जायेगा' ॥१३०॥ यहाँ पर 'परशुराम समस्त क्षत्रियों के समान राक्षसों का भी क्षएा भर में नाश फर देगा' इस व्यङ््य अर्य की तथा वाच्यार्य की समान रूप से प्रघानता है। '"प्रभा-'ब्राह्म' इत्यादि तुल्यप्राधान्य गुरीभूतव्यड्म्य का उदाहरण है। महावीरचरित नाटक में (रावण के लिये) माल्यवन्त (मन्न्री) को परशुराम द्वारा भेजे गये, पन में यह पद्य है। यहाँ पर-'परगुराम क्षत्रियों के समान राक्षसों का भी विनाश कर देगा' यह 'दण्डप्रतीति' व्यड्ग्य है तथा 'कल्याण का उपदेश और मिनताकयन रूप' सामोपाय-वर्णन वाच्यार्य है। ये दोनों हो समान रूप से चमरकारक हैं अतः तुल्यप्राधान्य नामक गुणीभूतव्यडम्य है। अनुवाद-(७) काक्वाक्षिप्त (गुणीभूतव्यङ््य), जैसे- 'मैं संग्राम में क्रोध से कोरवझत का संहार न करगा न? दुःशासन के हृदय से रक्त न पीऊंगा न ! अपनी गदा से दुर्योघन की जङ्गामों को चूरा न करू गा न ! भापफा राजा (मेरा या प्रजा का नहीं) युधिष्ठिर (प्रामपञ्वग्रहस रूप) शर्त (पस) से सन्धि कर से ॥ १३१ ॥
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(६८) सालस्वारंर्ध्वनेस्तैश्च योग: संमृष्टिसद्वर सालद्वारैरिति। तैरेदालकारै: अलद्वारयुर्क्त श्घ तैः, तदुक' ध्वनिफृता -- 'स गुणोभूतव्यङ्गय: सालङ्ारी: रुह प्रभेदै:सैः। सङ्करसंसृप्टिम्यां पुनरप्युंगोतते बहुंघा'॥' इति॥ 'तथा कयिनियद्धप्रौठकिसिद्ध' वस्तुव्यङ््म्य अलसूफारों के परगत, वाननगत औोर प्रवन्धगत रूप से तीन २ भेद] कम हो जाते हैं तथा अष्टविध गुखीमूतव्यदम्य.के ५१-६=४२ भेद होने मे कारए गुरीभूतव्यइग्य कार्व्य के ४२x८=३२६ सु० भेद होते हैं। संमृष्टि तथा सदरादि४ भेदो के कारणा ३३६x३१६X४=४४१८४ भौर इसमे ३३६ शुद्ध भेद जोड़ने पर ४५१६२० भेद होते हैं। अनुवाद-(रसयत् अवि) प्रतद्धार रप तथा (उपमादि) याज्यातद्जारो से पुक्त (सासद्वारं:) उन (गुएीभूतव्पडग्यों) के साथ (तैः) ध्वनि का (एक प्रवार की) संमृष्टि तमा (तीन प्रफार के) सडूर द्वारा मिपस (योगः) भी होता है। (६८) (हारिका में) 'सालद्धुा: पर्थात् उन अलद्गार दप में मर्या्थत गृशोमूतय्यद्शों के साथ [पसहकृतिरसद्धार: मतद्धारेश शोभया सहिता: सासद्वारा: सं:] एवं उपमा यादि ससद्धारों से युक्त वस्तुदृप गुणोभूतय्यड्ग्यों के साय [मलद्किय ते नेनेतवसदार उपमादि: तेन सहिता: सालदाराः]। जंसा कि ध्यनिकार (घ्रानन्वयपम) मे कहा है-वह ध्यनि याष्यालदवार राहित गृलीभूतय्यदृायों के साथ, अपने (पर्यान्तररं मितयाच्यादि) भेदों के साथ सचचर तथा समृष्टि से फिर मनेर प्रकार से प्रशनत होती है। (ध्यन्यालोर :. ४४) .. प्रभा-१) पतुर्य उत्लास में (६३ सूय में) 'सरेण निस्सेस' इत्पानि द्वारा एक ध्वनि का अन्य व्वनि के साथ (रभातीय)वो मियता होता है उसका विवन किया गया है। यहाँ म्यनि के गुमीनूतवथ्यङूष्य के साप होने वाले (रिज्ातीय) मिथस का निरु्णय किया जा रहा है। (२) 'मालदूारं:' इ्यादि-पहा दो मिन्नायंक सालकार नब्दों का एक दप हुआ है (गामदारय सानदूकागरंि सालदाग: सें:) एक 'गानदुार' (गब्ह) में समद्वार वन का भावश्प (नावादंक पन) सर्थात् मद्कृति मर्द में प्ररेग पिया गया है पोर, पराद्वृति ( पोना) सहिव पर्वात् सयमेन रगयद् ममदार रुग मे हिया श्ो मुलीकभदप है, यह प्थ होडा है। दूमरे सामदार सब्द में 'मनसुर का म्पं ट जमाि सपा उमादि माधानकारो महित धभान् ये हलोव्रमन्यदस जिनमे उपभा मादि धंनदूार वास् हे यहा पर्ष होना है। जम प्रशार याला्य मम्मट बा सभिमान स है हि पयनन का (१) रमसद मदि मनसरूत में रिथन गया (२) गमा भाद बाधयानद्वारो सरित: अस्युस्प मुगीमूनमद्म्य के गाप से बा मे मिपत होता ऐ एक तो सुग .जूमरे तीन प्रफार के नहुर के रा मे। पर्ी रम
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पञ्चम उल्लास: [ २३७ 44 (६६)अन्योन्ययोगादेवं स्यान्ङ् दसंख्यातिभूयसो ।४७॥ :T: एवमनेन प्रकारेण श्र्प्रवान्तरभेदगयानेऽतिप्रभूततरा गएना; तथा हि -- शृह्ारम्यव भेदप्रभेदगएनायामानन्त्यम, का गएना तु सर्वेपाम [व्यञ्जनावृत्तिप्रतिष्ठापनम्] (१. ध्वनिस्तु व्यञ्जनाप्रतिपाद्य एव) सङ्गलनेन पुनरस्य ध्वनेस्त्रयो भेदा व्यङ्गयस्य त्निरूपत्वात्, तथा हि -- किन्चिद्वाच्यतां सहते किन्चित्त्वन्यथा, तत्र वाच्यतासहमविचिन्नं विचित्र भान्यता की पुष्टि मे आचार्य मम्मट ने 'स गणीभूतव्यङ्गर्य: इत्यादि ध्वनिकार की कारिका को उद्घृत कि्या है। - अरनुवाद-इस प्रकार परस्पर (ध्वनि तथा गुशीभूतव्यङ््य) के मिधख से इन भेदों की बहुत अधिक संस्या हो जाती है। (६६) उक्त प्रकार से (एवं अवान्तरमेदों को गणना करने पर (शुद्ध, सजातीय तथा विजातीय संमिश्रस के द्वारा) बहुत अधिक (अपरिमित) संख्या हो जाती है। जैसे कि-शद्धार के ही भेद तथा शवान्तर भेवों की गाना करने पर श्रनन्त संख्या हो जाती है फिर सब रसादिकों (के भेद-प्रभेदों) को तो क्या गिनती? .टिप्पणी-(i) आचार्य आनन्दवर्घन ने भी ध्वनि तथा गुणीभूतयव्यङ्ग्य का विचेचन करके पारस्परिक मिश्रण से ध्वनि की 'अतिभूयसी भेदसंस्या' को स्वीकाद ककया है-'तस्य च धवनेः स्वप्रमेदगु सीभूतव्यङ्गयन वाच्याल्ारंशच सङ्र- संमृष्टिव्यवस्थायां क्रियमाायां बहुप्रभेदता लक्ष्ये दृशष्यते। (ध्वन्यालोक ३ १४) । (ii) ध्वनिकार द्वरा संकेतित ध्वनि की बहु-प्रभेदता का लोचनकार ने स्पष्ट रूप से प्रतिपादन किया था। उन्होने भेद-गणना को ओर भी ध्यान दिया था। इसी प्रकार कांव्य-प्रकाश की 'अतिभूयसी सख्या' की व्यास्याकारों ने गएना भी की है किन्तु पराघं से अ्धिक संख्या हो जाने पर उन्हें भी अनन्तता की ही शरस में जाना पड़ा है। [परार्धाधिकतां याति गसनति न दशिता-सुधासागरकार]। व्यक्षना-वृत्ति की स्थापना ध्वनि औोर गुरीभूतव्यङ्गम दोनों प्रकार के काव्य में व्यङ्गघ अर्थ होता है। उस भर्थ की प्रतीति ब्यञ्जना द्वारा होती है। अत एव ध्वनि 'और गुलीभूतव्यङ्गभ के भेदों का निरूपण करके व्यञ्जना वृत्ति के विपय में होने वाली विप्रतिपतिका निराकरण करते हैं। अनुवाद-संक्षप में (संकलनं संग्रहः संक्षेपो या) तो इस (गुसाभूतव्पङग्प) के तथा ध्वनिकाव्य के ['च' के बिना भी समुच्ययार्थ-कल्पना] तीन नेद है; कयोंकि व्यंङ्ग्य (अर्थ) तीन प्रकार (वस्तु, अलद्वार तथा रस) का होता है। जैसे कि फोई ध्यङ्ग्यं (वस्तु या अतद्गार रूप होकर) शव्दाभिघेय (वाच्यतह) भी होता है मर्यात् माच्य भी हो सकता है, 'और कोई व्यङ्ग्य तो वाच्यसह (अन्यथा) नहीं होता घर्यात्
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२३६ j का व्यप्रकोशं:
(६८) सालंङ्कारै्ध्वनेस्तैश्च योग: संसृष्टिसङ्गर(v) सालद्वारैरिति । तैरेदालङ्वा रैः अ्रलङ्कारयुक्त इच तै:, तदुक्त्त' ध्वनिकृता- 'स गुसोभृतव्यङ्गय : सालक्वारैःसह प्रभेदैः खैः। 7r सङ्करसंसृष्टिभ्यां पुनरप्युद्योतते बहुंघा॥।' इति॥ तथा कविनिबद्धप्रोढोफिसिद्ध वस्तुव्यङ्रग्य अलक्ककारो के पदगत, वाक्यगत और प्रवन्धगत रूप से तीन २ भेद] कम हो जाते हैं तथा अप्टविध गुणीभूतव्यड्ग्य के ५१-६=४२ भेद होने के कारणा गुीभूतव्यङ्ग्य काव्यं के ४२X८=३३६ धुद्ध- भेद होते है। संसृप्टि तथा सङ्करादि ४ भेदों के फ़ारण, ३३६X२३६X४-४५१५८४ औौर इसमे ३३६ शुद्ध भेद जोड़ने पर ४५१६२० भेद होते हैं। अनुवाद-(रसवत् आदि) अलद्धार रूप तथा (उपमादि) वाच्यालङ्कारों से युक्त (सालद्धारं:) उन (गुसीभूतव्यङ्ग्यों) के साथ (तैः) ध्वनि का (एक प्रकार फी) संसृष्टि तथा (तोन प्रकार के) सङ्कर द्वारा मिश्रस (योगः) भी होता है। (६८) (कारिका में) 'सालङ्वारः अर्थात् उन अलद्गार रूप में, अवस्थित गुसीभतव्पड्ग्यों के साथ [अलङ्कृतिरलद्धार: अलद्धारेए शोभया सहिता: सालद्वाराः तः] एवं उपमा आदि अ्रलद्धारों से युक्त वस्तुूप गुणोभूतव्यङग्यों के साथ [अलङक्रियतेऽनेनेत्यलङ्गार: उपमादि: तेन सहिता: सालद्ाराः]। जँसा कि, ध्वनिकार, (आानन्दवर्धन), ने कहा है-'वह ध्वति, वाच्यालद्धार सहित गुसीभूतव्यड्ग्यों के साथ, अपने (अर्थान्तरसंक मितवाच्यादि) भेदों के साथ सङ्कर तथा संसृष्टि से फिर अ्रनेक प्रकार से प्रकाशित होती है। (घ्वन्यालोफ ६·४४) :. प्रभा- १) चतुर्थ उल्लास मे (६३ सूत्र में) 'सङरेण तिरुपेण' इत्यादि द्वारा एक ध्वनिका अन्य ध्वनि के साथ (सजातीय) जो मिश्रसा होता है उसका विवेचन किया गया है। यहाँ, ध्वनि, के, गुगीभूतयव्यङ्ग्य के- साथ होने;वाले (विजातीय) मिश्रस का निरूपए किया जा रहा है। (२) 'सालङ्गार:' इत्यादि-यहाँ दो भिन्नार्थक सालद्वार शब्दों का एक शेप हुआ है (सालङ्वाराश्च सालडकाराश्चेति सालद्वारा: तै:) एक 'सालद्वार' (गब्द) में अलद्धार सन्द का भावस्प (भावायक घन्) अर्थात् अलङ्कृति: अर्थ में प्रगोग किया गया है और अ्लङ्कृति (=सोभा) :सहित अर्थात् स्वयमेव रसवद् अलङ्गार रूप मे स्थित जो गुणीभूतव्यद्धग्घ है, यहं अर्थ होता है। दूसरे सालद्ार बब्द मे 'अलद्धार' का अथ है 'उपमादि' तथा उपमादि वाच्यालद्वारी महित अर्थात् ये गुगीभूतव्यङग्य जिनमे उपमा आदि अलद्दार वाच्य है; यह अर्थ होता है। इस प्रकार आचार्य मम्मट का अभिशाय यह है कि व्वनि का (१) रमवद् आदि अलङ्काररूप मे स्थित तथा (२) उपमा आदि वाच्यालङ्वारों सहित वस्तुरूप गुणीभूतव्यदग्य के साथ दो प्रकार से मिथए होता है एक सो संसृष्टि रूप में और दूसरे तीन प्रकार के सङ्र के रूप में। अपनी इस
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पञ्चम उल्लास: २३७
(६६) अन्योन्ययोगादेवं स्यान्द् दसंख्यातिभूयसी ॥४७॥ । एवमनेन प्रकारेण श्रवान्तरभेदगणनेऽतिप्रभूततरा गएना, तथा हि-गृद्ा रम्यव भेदप्रभेदगणनायामानन्त्यम्, का गएना तु सर्वेपाम।: [व्यञ्जनावृत्तिप्रतिष्ठापनम्] (१. ध्वनिस्तु व्यञ्जनाप्रतिपाद्य एव) 1 4
संङ्कलनेन पुनरस्य ध्वनेस्त्रयो भेदा व्यङ्गयस्य तिरूपत्वात्, तथा हि- किल्चिद्वाच्यतां सहते किब्चतवन्यथा, तत्र वाच्यतासहमविचित्रं विचित्र मान्यता की पुप्टि मे आचार्य मम्मट ने 'स गणीभूतव्यङ्गर्घः इत्यादि ध्वनिकार की कारिका को उद्यृत किया है। अनुवाद्-इस प्रकार परस्पर (ध्वनि तथा गुसीभूतव्यङ्ग्य) के मिश्रल से इन भेदों को बहुत अधिक संखया हो जाती है। (६६) उक्त प्रकार से (एवं अवान्तरमेदों को गसना करने पर (शुद्ध, सजातीय तथा विजातोय संमिभस के द्वारा) बहुत अधिफ (अपरिमित) संख्या हो जाती है। जैसे कि-शृद्धार के ही भेव तथा अ्वान्तर भेवो की गसाना करने पर श्रनन्त संख्या हो जाती है फिर सब रसादिकों (के भेद-प्रभेदों) की तो कया गिनती? टिप्पणी-(i) आचार्य आनन्दवर्घन ने भी ध्वनि तथा गुरीभूतयव्यङ्ग्य का विचेचन करके पारस्परिक मिश्रण से ध्वनि की 'अतिभूयसी भेदसंख्या' को स्वीकार किया है-'तस्य च ध्वनेः स्वप्रभेदगु सीभूलव्चडग्यन वाच्यालङ्कारच सद्वर- संघृष्टिव्यवस्थायां क्रियमाखयां बहुप्रभेदता लक्ष्ये दृश्यते । (ध्वन्यालोक ३१४)। (ii) ध्वनिकार ह्वरा संकेतित ध्वनि की बहु-प्रभेदता का लोचनकार ने स्पप्ट रूप से प्रतिपादन किया था। उन्होंने भेद-गएना की ओर भी ध्यान दिया था। इसी प्रकार कांव्य-प्रकाश को 'अतिभूयभी संख्या' की व्याल्याकारो ने गसना भी की 'है किन्तु परार्ध से अधिक संख्या हो जाने पर उन्हे भी अ्नन्तता की ही शरस में जाना पड़ा है। [परार्धाधिकतां याति गएनंति न दशिता-सुवासागरकार]। व्यक्षना-वृत्ति की स्थापना ध्वनि और गुसीभूतव्यङ्गच दोनों प्रकार के काव्य में व्यङ्गय सर्थ होता है। उस अर्थ की प्रतीति व्यञ्जना द्वारा होती है। अत एव ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गप के भेदों का निरूपण करके व्यञ्जना वृति के विषय में होने वाली विप्रतिपतिका निराकरण करते हैं। अनुवाद-संक्षेप में (संकलनं संग्रहः सक्षेपो या) तो इस (गुएाभूतय्यङ्ग्य) के तथा ध्वनिकाव्य के ['च' के बिना भी समुच्ययार्य-फल्पना] तोन नेद है; क्योंकि स्पङ्ग्य (धर्थ) तीन प्रकार (वस्तु, अलद्धार तथा रस) का होता है। जैँसे कि फोई ष्यड्ग्य (वस्तु या अलद्धार रूपं होकर) शव्दाभिधेय (याच्यसह) भी होता है पर्मोत माच्य भी हो सकता है, 'और फोई व्यङ्ग्य'तो वाच्यसह (अन्यथर) नहीं होता सयतति
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२३८ 1: · काव्यप्रकाश:
चेति। शविचित्रं वस्तुमात्रम् विचिन्नं तवलक्काररूपम। यद्यपि प्राधान्येन तदलक्कार्यम, तथापि ब्राह्मसश्रमसान्यायेन तथोच्यते। रसादिलक्तसारत्वर्थः स्वप्नेपयि न वाच्य:1स हि रसादिशब्देन शृङ्गारादिशच्देन वाडभिीयेत। न चाभिधीयते। तत्योगेपि विभावाद्यपयोगे तस्याऽप्रतिपत्तस्तद्प्रयोगे- पि विभावादिप्रयोगे तस्य प्रतिपत्त सचेत्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां विभावादयभि- धानद्वारेव प्रतीयते इति निश्चोयते, तेनासी व्यद्धथ एव सुख्यार्थवाघाय आावाभ पुनलक्षणीय:।
कभी भी वाच्य नहीं होता। इन दोनों में से जो 'वाच्यतासह' (प्रथम) है यह १. पविचिन्न तथा २. विचिन्न (दो प्रकार' का) है। अविचित्र (अलड्गाररहित) वस्तुमात्र है, विचित्र तो अलद्धाररूप है। मद्यपि मुख्य होने से वह (विचिन्न व्यड्ग्य) अलङ्भायं (जिसको अलड्कृत किया जोता है वह मुख्य वस्तु) है तयापि प्रहस-शंमण न्याय से उसे ैसा अरथात् अलङ्गार कहा जाता है। रसादि रूप प्रथवा रसादि नमक (लक्ष्यतेऽनेनेति लक्षसं स्वरूं 'नाम आदि) अर्थ तो स्वप्न में भी (पाभी भी) वांच्य नहीं हो सकता; क्योंकि (सामान्य रूप में) रस आदि शब्द के द्वारा पथवा (विशेषे रूप में) शद्गार आदि शब्द के द्वारा ही उसका वाच्य रूप में प्रतिपादन किया जा सकता है किन्तु (उनके द्वारा) याच्यरूप में कहा तो नहीं जातर; क्योंकि 'रस' मा 'शृद्धार' आदि पदों का प्रमोग करने पर भी, यदि विभावादि का प्रयोग ने हो, तो उस (रस आदि अर्थं) को चमत्कारानुभूंति (प्रतिपत्ति) नहीं होती तथा उन 'रस" शृद्भार आदि शब्दों का प्रयोग न होने पर भी, विभावादि का बर्सन होने पर उस (रस) की अनुभूति होती है'। अतएय सन्वय-व्यतिरेक से विभांव आवि के सभिधान द्वारा हो व्यञ्जना से रस की प्रतीति होती ह (प्रतीयते व्यज्यते), ऐा निश्चम किया जाता हूं (पभिषावृति द्वारो नहीं)। इसलिये वह' (रसार्दिरुप धर्थ) व्यञ्जना का ही विषये (व्यड्ग्य) हू। वह लक्षर का विषय (संक्ष्य) भी नहीं। क्योंकि मुख्यारयवाप (मुख्यामें योग, रूढि या प्रयोजन) आदि कर यहां प्र्रभाव है। ।" प्रभा-संकलनन-प्रयो. मेदा :- अ्रन्थकार ध्वनि, तमा गुखीभूतव्यस्म के भेद्रों का विस्तार से निरुपए करके व्यज्जना की सिद्धि के लिये उन भेदों; प, पुनः संक्षेप में प्रकारान्तर से उल्लेख करते हैं। संकलन का भर्थ है-संक्षेप। यद्यपि ध्वनि व्यापार शनन्त हैं तथापि अनुगत, उपाधि के द्वारा उन्हें तीन भेदों में रक्सा जा सकता, है, ययोंकि वस्तु, अलद्धार और रमभावादि तीन प्रकार के ही व्ङ्तप, भर्ष होते हैं। कैसे ? प्रयमतः ध्वनि दो प्रकार की होती है-वाच्यातासह और वाच्यता- ससह। वाच्यतासह वह अर्थ है जिसका अभिधावृति से भी दोध हो सकंता है।वह दो परषार का होता है -- १. अविचिय २ विचिन्न । जो, मलद्गार रहित, वस्तुमात्
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;. सर चम उल्लास' २३६
व्यङ्गथ है-वही अविचित्र है। जो अलद्वार रूप व्यङ्गचार्य है वह विचित्न कहा जाता है। ये वस्तु तथा अलद्वार कही व्यङ्गय होते हैं, कहीं. वाच्य भी !किन्तु तीमरी जो रसादि ध्वनि है, वह तो सदा व्यङ्गय ही होती है। कभी भी वाच्य नही। पद्याि प्राधान्येन-काव्य में जो आस्वाद्य तत्व है, जिसके द्वारा सहृदयोंको पानन्दानुभूति होती है वही काव्य का मुख्य-तत्व कहा जा सकता है अन्य अलङ्कारादि- उसके योभायद्ध क है। जो उसे सुशोभित करते हैं वे अलङ्वार कहलाते, हैं (अल्ङ्क्रियतेडनेन इति प्रलक्कार)। सामान्यतः उपमा आदि को अलक्गार, कहते हैं:।1ये जिस (काव्य के मुख्य तत्त्व) को अलङ्कृत करते हैं, वही अलङ्ार्य है। वह प्रधान होता है तथा अलद्दार अप्रधान या गौए होते हैं। इस दृष्टि से जब व्यज्जना से प्रतीत होने वाले उपमादि अ्रलङ्कारों के विषय में विचार करते हैं तो वे ही चमत्कारकारक है अतः ये प्रधान है 'काव्य के मुख्यतत्त्व के रूंग में हैं इम प्रधानता के कारण वस्तुतः वे अनद्धार्य हैं तथा उन्हें अलङ्कार कहना सङ्भत नहीं प्रतीत होता। फिर भी लोकव्यवहार सिंद्ध ब्राह्मण-मेणा न्याय से उन्हें अलद्दार कह दिया जाता है। जैसे=कोई ब्राहए यदि श्रमरं' (बौद्ध सन्यासी) हो जाता है तो उस दशा में व्राह्मण नहीं रहता; किन्तु-पू्व दृष्टि से उसे ब्राह्माण, (ब्राह्मएश्रमण) कह दिया जाता है। इसी प्रकार जहाँ उपमादि व्यङ्य नहीं होते, वाच्यमात्र होते हैं वहाँ वे वस्तुतः अलङ्गार हैं, व्यन्गभावस्था में यद्यपि वे अतध्धार्य हो गये हैं तथापि पूर्व दृष्टि से उन्हें अलङ्गार कह दिया जाता है। रसादिलक्षसस्त्वर्थ :- रस-भाव आदि रूप जो व्यङ्गचार्थ है वह'कभी भी वाच्य नहीं हो सकता; अर्थात् अ्भिधावृत्ति द्वारा प्रकट नहीं हो सकता, इसी से वह 'वाच्यता-असह अरथ है। यदि यह मान भी लिया जाये कि अभिघावृति द्वारारस- भाव आदि प्रकट हो सकते हैं तो रस, भाव या शृङ्गार आदि नब्दो से अभियावृतिं द्वारा इनकी प्रतीति होनी चाहिये; किन्तु होती नहीं 1 काव्यमर्मज्ञों का अनुभव बतलाता है कि जहाँ 'रस' शृङ्गार आादि शब्दों का प्रयोग किया जाता है किन्तु विभाव-धनुभाव तथा सम्चारी भाव जो रस के व्यञ्जक है; उनकी चरराना नहीं होती, वहां रसानुभूति (रस-व्यञ्जना) नही होती। इसके विपरीत 'जहां विभावादि की वर्सना: होती है और 'रस', 'शृङ्गार' आदि शब्दो का प्रयोग नहीं होता, "यहा सहज ही रस-व्यञ्जना हो जाती है। विभावादि का प्रयोग होनेपर रस-व्यञ्जना होती है, इस अ्न्वय(तत्सस्वे तत्सत्वम्) तथा विभावादि का प्रयोग न होने पर रस-व्यज्जना भी नही होती-इस व्यतिरेक (तदभावे तदभावः) से यह निएय हो जाता है कि विभावादि-वर्णना हो रस-व्यञ्जना का सावन है तथा व्यजनावृति से ही रस अभिव्यक्त होता है; अभियावृति द्वारा वह प्ररुट नहीं हो सकता। भतः रसादि-प्रतीति के लिये व्यञ्जनावृत्ति अ्रवश्य माननी मड़ेगौ। थ
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२४० 1 पञ्चम उल्लासः
लक्षशीव न भवतीति प्राक् प्रतिपादितम्। ।।" शव्दशक्तिमूले तु अ्रभिघाया. नियन्त्रऐोनानभिघेयस्यार्थान्तरस्य तेन सहोपमादेरलङ्वारस्य च निर्विवादं व्यङ्गयत्वम्। - रसादि की लक्षणा द्वारां भी प्रतीति नही हो सकती; क्योकि ' लक्षणा' के तीन हेतु हैं-मुख्यार्थबाध, मुख्यार्य-योग तथा रूढि अथवां प्रयोजन। यहां विभावादि में मुख्यार्थ का बाघ नहीं, किसी वृत्ि के बिना विभावादि का रसादि के साथ जञाप्यज्ञापक भाव सम्बन्ध भी नही हो सकता तथा रूठि और प्रयोजन का भी 'सर्वपा, प्रभाव है; क्योंकि रसास्वाद ही पर्यन्त प्रयोजन है उसकी प्रतीति में, श्रन्य, प्रयोजन की तो चर्चा भी असम्भव है। लक्षणामूलक ध्वनि में व्यञ्जना को अनिवार्यता :अनुवाद-अर्थान्तरसंक्मित तथा अत्यन्ततिरस्कृत वाच्य (लक्षसामूलक वनि) में वस्तुमात्र व्यङ्गघ्न के बिना लक्षणा हो नहीं हो सकती-यह ऊपर (द्वितीय उल्लास में 'एवमप्यनवस्था स्मात्' सूत्र २७) प्रतिपावित किया जा चुका है।- : अभिधामूलक ध्वनि में व्यञ्जना को अनिवार्यता :, : (अभिधामूलक संलक्ष्यक्रम ध्वनि के शब्दशक्तिमूलक, अरभशत्तिमूलक धौर उभयशक्तिमूलक तीन भेदों में से) शब्दशक्तिमूलक में तो अभिधा के (प्रकररादि द्वारां) नियन्त्रित हो जाने के कारण जो अ्र्भिधेय अर्थ से भिन्न (अनभिधेय) दूसरा अर्प तथा उसके साथ उममा आदि सलद्धार प्रतीत होता है उसकी व्यड्ग्यता सर्वसम्मत (निविवाद) है। :" प्रभा-ऊपर ध्वनि के तीन प्रकारों का उल्लेस किया, गया। है १-वस्तु, २-अलद्वार, ३-रस। इनमें से रस-ध्वनि अ्रभिधा और लक्षसा का विपय नहीं हो सकती, उसे व्यङ्गच ही मानना पड़ता है, यह भी प्रतिपादित किया जा चुका है। वस्तु और अलद्गार रूप ध्वनि भी व्यञ्जना-प्रतिपाद्य ही हो. सकती, है, लक्षसा आादि द्वारा उनकी प्रतीति नहों हो सकती-'परर्यान्तरः' इत्यादि अवतरण में यही बतलाया, गया है। भाव यह है कि - पूर्व विवेचन के अनुसार, घ्वति के दो मुस्य भेद है -? , अविवक्षितवाच्य (लक्षणामूलक), १, विवक्षितान्यपरवाच्य(यभिधा -: मूलक)। अविविक्नितवाच्य के दो भेद हैं-(१) भर्यान्तरसंभमित,।(२)।अत्यन्स- तिरस्कृत। तथा विवक्ितान्यपरवाच्य के भी दो भेद हैं-(१), म्सलक्ष्यममव्यन्गम,' (२) संलक्ष्यतमव्यस्भय। यदि इन पूर्वोक्त भेदों पर ऊपर सद्भलित तीन भेदों.की, दृष्टि से विचार किया जाये तो रमनभावादि मसंलक्ष्यकम के अन्तर्गत आते हैं उनकी वयहथता सिद्ध की जा चुकी है। शेप अर्वान्तरसंकमित, प्रत्यन्ततिरस्कृतः ये दोनो, वस्तु ध्वनि के तथा संलक्ष्यकम ध्वनिया वस्तु तथा मनङ्कार ध्वनि के अन्तगंत भाती हैं, उन पर कमशः विचार किया जा रहा है।
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पञन्चम उल्लास: [, २४१
अर्थशक्तिमलेऽपि विशेपे सङ्कतः कतु न युज्यत इति सामान्यरूपारं
रूपो वाक्यार्थमतत्राभिहितान्वयवादे का वार्त्ता व्यङ्गस्याभिघेयतायाम। अविवक्षितवाच्य के दोनों भेद-पर्थान्तरसभमित नथा अ्त्यन्ततिरस्कृत लक्षसामूलक है। यहाँ जो वस्तुमान्न व्यङ्जन है वह लक्षणा के प्रयोजन के रूप में है उसके बिना लक्षणा हो ही नहीं सकती। यदि उस व्यङ्गम मे भी लक्षणा 'मानी' जाये तो अन्य प्रयोजन की कल्पना करनी पड़ेगी। इस प्रकार अनवस्था हो जायेगी अंतः लक्षणमूलक ध्वनि जो सद्कलित ध्वनियों मे वस्तु-व्वनि के अत्गत भाती है, उसमें वस्तुमान् व्यङ्गय् है अर्थात् व्यञ्जना द्वारा ही उसकी प्रतीति होती है, यह मानना पड़ता है। रही संलक्ष्यन्म (अ्रभिघामूलव) ध्वनि की बात। उसके मुस्यतः तीन भेद. * हैं-शब्दशक्तिमूलक, अर्थशक्तिमूलक और उभयशतिमूलक। शब्दशक्तिमूलक भेद. में ऐमा होता है कि शब्द के अनेक अथो मे से प्रकरखादि द्वारा एक अर्थ नियत हो जाता है अर्थात् अभिघावृति का नियन्त्रण हो जाता है। अभिघावृति उसके अतिरिक्त अ्न्य अर्थ का बोध नही करा सकती। तब उस शब्द के द्वारा जो दूसरे अरर्यं (वस्तु) का बोध होता है वह सर्वथा अनभिधेय (अवाच्य) होता है: तथा। वह व्यञ्जना के द्वारा ही प्रकट होता है और उससे जो उपमा आदि अलद्कारों की. प्रतीति होती है वह भी व्यञ्जना द्वारा ही हो सकती है। शर्थशक्तिमूलक में व्यञ्जना अनिवार्य है यह आगे दिखलाते हैं- अपनुषाद्-(अर्थशक्तमूलेऽपि) व्यङग्यस्याभिघेयतायां का वार्ता ? इत्यन्वयः) जिस (अभिहितान्वयवाद) में विशेष (व्यक्ति भथवा पदार्थो का संसर्ग) में सङ्कत करना सम्भव नहीं, इसलिये सामान्य रप पदार्थों का आकांक्षा, सन्निधि तथा योग्येता के कारण होने वाला परस्पर संसर्ग, जो कि विशेष रूप है, वह किसी पद का सरय न होकर भी (तात्पर्य वृत्ि के द्वारा) वाकयाय माना जाता है, उस अभिहितान्वयवाद में अर्यशक्तिमलक व्यङ्ग्य (वस्तु तथा अलङ्धार) की अभिधेयता की तो बात ही कयां है? :"प्रभा-अथमक्तिमूलक ध्वनि में जो वस्तु तथा अलद्गार की व्यञ्जना द्वारा प्रतीति होती है वह भी अभिधा द्वारा नहीं हो सकती। वात यह है कि वाक्यार्थ के विषय में (मीमांसकों के) दो सिद्धान्त हैं-१.अभिहितान्वयवाद २. अन्विताभिधानवाद । कुमारिलमतानुयायी मीमांसकों के अभिहितान्वयवाद को दृष्टि से 'गो' आदि पदों का सामान्यरूपेण 'गोत्व' आदि में सङ्कं तग्रह होता है, विशेप मे नहीं। यहाँ 'विशेप' शब्द के दो अर्थ हो सकते हैं-१. व्यक्ति २. पदाथों कंा ससग (अन्वय)। आनन्त्य और व्यभिचार दोप के कारता व्यक्ति (विशेष) में सेंकेतग्रह हो नहीं सकता, यह ऊपर (सूय १०) कहा जा चुका है। प्भिहितान्ययवादी
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२४२ ], काव्यप्रकान:
येडप्याह :- शब्दवृद्धाभिधेयाँइच प्रत्यक्षेणात्र पश्यति। श्रोतुश्च प्रतिपन्नत्वमनुमानेन चेष्या ॥१॥ अन्यथाऽनुपपत्त्या तु चोघेच्छकिति द्वयात्मिकाम्। अर्थापतत्याऽव बोधेत सम्वन्धं त्रिप्रमाणकम्॥-।। इूति प्रतिपादितदिशा- देवदत्त गामानयेत्याद्य त्तमवृद्धवाक्यप्रयोगाई़ शान्तरं सास्नादिमन्त- मर्थ सध्यमवृद्ध नयति सति अनेनास्माव्वाक्यादेवंचिघोऽर्यः प्रतिपत्र' इति के मत में पदार्थों के पारस्परिक अन्वय या संसर्ग (विशेष) मे भी शब्दों का शक्तिग्रह नहीं होता। आकंक्षा, योग्यता और सन्निभि के कारण पदों के संसर्ग की प्तीति होती है वह (संसर्ग) विशेपरूप है। वह पदों का अर्य नहीं होता, अपि तु वाय का अर्थं होता है। इस विशेपरूप वाकयार्थ की प्रतीति तात्पयवृति द्वारा हुआ करती है। इस प्रकार प्रथमतः पदों से अभिधावृति द्वारा पदार्थों का बोध होता है। तब अन्वयरूप विशेष अर्थ (वाक्षार्थ) की प्रतीति तात्पर्यवृत्ति द्वारा होती है। उसके वाद, व्यङ्ग्य अर्थ की प्रतीति होती है। जब अभिहितान्वयवादी के मतानुसार (पदार्थसंसरग अथवा अन्वयरूप) वाक्यार्थ भी अभिघावृत्ति द्वारा प्रकट नहीं हो संकता तो वस्तु और अलद्धार रूप व्यङ्ग्मार्थ की प्रतीति अभिधा द्वारा कैसे हो सफती है ? अतः अभिहितान्वयवाद में व्यङ्ग्यार्थ की प्रतीति के लिये व्यञ्जनावृति को मानना अनिवार्य है। इसी प्रकार अन्विताभिधानवाद में भी व्यञ्जनावृति अनिवार्य है, यह आगे बतलाते हैं- : अनुवाद्-(येडव्याहु ·- अ्रन्विताभिधानवादिनः'-यह अन्यम है) .जो (भन्विताभिधानवादी) भी कहते हैं कि- 'यहां (व्युत्पति काल में) कोई, बातरू (श्रोत्र द्वारा) शब्द को (प्रयोज्य तथा प्रयोजक) वुद्ध और अभिधेय (घटावि) को (चक्षु द्वारा). प्रत्यक्ष एप से वेखता है। उसके पश्चात् ओोता (सुनने वाले-प्रयोन्य- वुद्ध) की प्रतिपन्नता अर्थात् 'घदमानय' आदि वाक्यार्थविषयक ज्ञान (सभिन्ञता) को अनुमिति के साधनरप चेष्टा (आ्रानमन आदि क्रिया से समभ लेता है (पश्वति) तब अन्ययानुपपतिरप अर्थापति द्वारा द्वमात्मिका शक्ति सर्थात् वाचकरव और वाच्यत्व रप द्विविध शक्ति को (जिसे सङ्गतकहते हैं) जान सेता है। इस प्रकार (प्रत्यक्ष अनुमान तथा थर्थापति) तीन प्रमाशों से अमिगत सङ्कतरप सम्पन्न को जानता है'।. : (उक्तकारिकाट्वय की वियृति) इस (फारिकाउम द्वारा) उक्त मार्ग से (विद्या- सवधारयति इत्पन्वय:) 'देववत्त गाय को साथो' प्रथोजरु (उत्तम) यृद्ध के इस वाक्य-प्रयोग से प्रयोज्य-वृद्ध (मध्यम) के सास्नादिमान धस्तु को एक स्थान से दूसरे स्थान को से जाने, पर देखने वाला बालक-"इस (प्रयोज्य वृद्ध) ने इस वार्प
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पञ्चम उल्लास: [,२Y३
तच्चेष्टयाऽनुमाय, तयोरखएडवाक्यार्थयोरर्थापत्या वाच्यवाचकभाव- लक्षएं सम्बन्घमवधार्य बालस्तन्न व्युत्पद्यते। परतः 'चैत्र गामानय; देवदन्त अश्वमानय; देवदन्त गां नय' इत्यादिवाक्यप्रयोगे तस्य तस्य शब्दस्य तं तमर्थमवघारयतीति अन्वयव्यतिरेकाभ्यां पवृत्तिनिवृत्तिकारिवाक्यमेव प्रयोगयोग्यमिति वाक्यस्थितानामेव पदानामन्वितैः पदाथरन्वितानामेव सङ्कतो गृह्यते इति विशिष्टा एव पदार्था वाक्यार्थो न तु पदार्थानां वैशिष्ट्यम्। द्वारा इस प्रकार का अर्थ जाना।" इस प्रकार उसकी (गाय लाना रूप) चेप्टा द्वारा अनुमान करता है और अर्थापति द्वारा उन अविभिक्त (अ्रखण्ड) वावय तथा वापयार्म के वाच्यवाचकभावरूप सम्बन्ध (शक्ति) का निर्रय करके (बालक) उस वाक्य का ज्ञान प्राप्त कर लेता है। ('परतः-अ्रवधारयति' इत्यादि द्वारा शब्द में सङ्गतग्रह दिखलाया है) तदनन्तर ('परतः 'हे चंतर, गाय को ताओ', 'देवदत्त घोड़े को लाग्रो' 'देवदत्त गाय को से जाओो', इत्यादि वाक्यों के प्रयोग में अमुक-अ्मुफ (गो आदि) शब्द का श्मुक- प्रमुक (सास्नादिमान् आदि) अर्थ है यह निश्चय कर लेता है-इस प्रकार अन्वय व्यतिरेक द्वारा प्रवृत्ति तथा निवृत्ति कराने वाला वाद्य ही प्रयोग के योग्य है इसलिये (इति) वावय में स्थित पदों का अपर्या्त् अ्न्वित पदों का प्र्प्रन्वित प्ररथों के साथ ही सद्ग त-ग्रहणा होता है। अतएव (इति) पारस्परिक संसर्गयुक्त (विशिष्ट) पदार्थ ही वाक्य का अरथं होते हैं. ऐसा नहीं कि पदार्थों का (बाद में प्रतीत होने वाला) परस्पर-संसर्ग (वैशिष्ट्य) वाक्य का अर्थ हो। प्रभा-भाव यह है कि उपयुक्त रीति से व्यवहार द्वारा ही प्रथमतः संकेत- ग्रह होता है। यह व्यवहार प्रवृत्ति तथा निवृत्ि के रूप में हुआ करता-है। जैसे प्रयोजक वृद्ध के 'गामानय' आदि वाक्य को सुनकर प्रयोज्यवृद्ध की गाय लाने में प्रवृत्ति होती है तथा 'गां नानय' वाक्य को सुनकर उसकी गाय लाने के कार्य से निवृत्ि होती है। यह प्रवृत्ति-निवृत्ति वाक्य-श्रवण से ही होती है, कभी भी, केवल 'गो' आदि पदमान्न के श्रवण से नहीं। वाक्य-प्रयोग के द्वारा ही प्रवृत्ति-निवृतति होती है, उसके विना नहीं होती-इस अन्वयव्यतिरेक (तत्सत्वे तत्सत्वम्, तदसत्वे तदसत्वम्) से वाक्य ही प्रवृत्ति-निवृति कराने वाला है। उसमे ही प्रथम शक्िग्रह होता है तथा वही प्रयोग के योग्य है। वाक्य में शक्तिग्रह के पश्चात् ही मावाप अर्थात् किसी पद के ग्रहण से (जैसे 'अश्वमानय' में 'अश्ब' पद का ब्रहए किया जाता है) तथा उद्वाप अर्थात् किसी पद के त्याग से (जैसे 'मा नय' में 'मानय' पद का त्याग कर दिया गया है) 'वाक्य के अंशभूत 'गो आदि पद का यह (भन्वित) सास्नादिमान् अर्थ वाच्य है' इस प्रकार का शक्तिग्रह होता है। प्रभाकर-मीमांसक के अनुसार शक्तिग्रह तीन प्रमाणों द्वारा होता है- (१) वह वालक 'गो' आदि शब्द को (श्रोम द्वारा) तथा बृद्ध और भ्य (गाय आादि)
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२४४ काव्यप्रकाश:
1414 यद्यपि वाक्यान्तरप्रयुज्यमानान्यपि प्रत्यभिज्ञाप्रत्ययेन तान्येवैतानि पदानि निश्चीयन्ते इति पदार्थान्तरमान्नेमन्वितः सक्कतगोचरः तथापि सामान्यावच्छादितो विशेषरूप एवासी प्रतिपद्यते व्यतिपक्तानां पदार्थानां तथाभूतत्वादित्यन्विताभिघानवादिन:। को प्रत्यक्षत: अनुभव करता है (२) मध्यमवृद्ध (श्रोता) के 'गाय लाना' आदि कार्य 'से यह अ्र्प्रनुमान किया जाता है कि 'इन शब्दीं से मध्यम वृद्ध को इस प्रकार का ज्ञान हुआ है' (३) तदनन्तर अन्यथानुपपत्ति रूप अर्थार्पत्ति द्वारा वाच्य और वाचक के सम्बन्य ऋ ज्ञान होता है; अर्थात् सम्बन्ध के बिना वाक्य से श्र्थ का ज्ञान नही हो सकता, मतः दोनों में सम्बन्ध अवश्य है, यह जाना जाता है। इरा प्रकार प्रत्यक्ष अनुमान तथा अर्थापति-इन तीनो प्रमाणों से सङ्टतग्रह होता है। अन्विताभिवानवादी प्रभाकर का मन्तव्य है कि वाक्यों में स्थित पदों का परंपदार्थ से अण्वित रूप में ही सङ्गत-ग्रह होता है; अतएव परस्परान्वित (विशिष्ट) पदार्थ ही वाक्यार्थं है तथा अन्यय-बोध के लिए तात्पर्यवृत्ति को मानने की आवश्य कता नहीं। - टिप्पणी-(i) प्रत्यक्षेणान पश्यति-यहाँ पश्यति=साक्षात् करोति, साक्षात् करता है। अतः इससे सुनता है (शृणोति) का भी ग्रहण हो जाता है।' 1: (ii) त्रिप्रमाशकम् -प्रत्यक्ष, अनुमान और अर्थापति तीन प्रमाणों द्वारा जात (सम्बन्ध) को। (iii) उत्तम वृद्ध-पिता आदि बड़े लोग, मध्यम वृद्ध-बड़े भाई आादि। (iv) विशिष्टा :- वाक्यार्थ :- यह अन्विताभिधानवाद का स्वरूप है, विशिष्ट -अन्वित। पदार्वाना वैशिट्यम्-यह अभिहितान्वयवाद का स्वरप है। वैशिटय =प्रन्वय (द्०, ऊपर मू० ७ टि० ) । अनुवाद-मद्यपि अन्य ('गामानय से भिन्न 'मां नय', 'अश्वमानय' सावि) वावय में प्रयुक्त भी शब्द प्रत्यभित्ञा द्वारा 'ये वे ही पद है'इस प्रकार निश्चित कर लिये माते हैं, इस हेतु सामान्यतः श्न्य पदार्थ (इतरान्वित ग्रनयन आदि) से सन्वित पदायं ही संद्त का विषय है, तथापि सामान्यरप (इतरान्यित आनयन आदि) से प्राचछादित विशेष एप (घटानयन आदि) में ही वह सद्टत (थसो) गृहोत होता है; षेयोंकि परस्पर-अ्रन्वित पदार्थ वैसे अर्थोत् विशेष रूप ही हुप्ना करते है-यह धत्वि ताभिधानवादियो का मत है। '7 प्रभा-जैसा कि ऊपर निर्मस किया गया है अन्विताभियानवादी के भव में दब्द परस्परान्वित अर्थ का ही अभिधान करते हैं। किन्तु इस मत में एक गट्टा हो सकती है कि गामानय में जो 'आनय' शब्द है चही 'अस्वमानय' में भी है, इस अनुभव के आधार पर यह निश्चय किया जाता है कि दोनों स्वतों पर एक ही
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पञ्चम उल्लांस:
तेपामपि मते सामान्यविशेपरूप: पदार्थ: रुङ्कतविषय इत्यतिविशेष- भूतो वाक्यार्थान्तर्गतोऽसङ्क तितत्वाद्वाच्य एव यत्र पदार्थः प्रतिपद्यते तन् दूरेऽ्यांन्तरभूतस्य निःशेपच्युतेत्यादौ विध्यादेश्चर्चा । 'आनय' पद है। तव तो 'मानय' शब्द का 'गोसम्बन्घी आनयन' या अश्व सम्बन्धी आानयन' कोई भी अर्थ न होना चाहिये। इसलिए 'गो सम्वन्धी आनयन' इत्यादि विशयेष अर्थ की प्रनीति के लिये तात्पर्य नामक विशेष वृत्ति माननी ही चाहिये। 'तथापि आदि अ्रवतरण में प्रभाकर की ओर से इसका समाधान किया गया है। अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार नैयायिक के मत में 'गोत्व' रूप से सामान्यतः शक्ति-ग्रह होने पर भी 'गो' शब्द से सदा गोविशेष का बोध होता है। इसी प्रकार यद्यपि सामान्यरूप से इतरान्वित पदार्थ में सङ्केत-ग्रह होता है तथापिं वह सङ्त-ग्रह (इतरान्वित आनयन आदि) सामान्यप्रकारक होकर भी (गवानयन आदि) विशेष रूप का अ्र्प्रनुभव कराता है। बात यह है कि बिना विशेष के कोई सामान्य नही रहती (निर्विशेपं न सामान्यम्) तथा जो परस्परान्वित अर्थात् एक दूसरे से सम्बद्ध पदार्थ होते हैं ये विशेष रूप ही हुगा करते हैं इसलिये सामान्यरूपेण आानयन आदि इतरपदार्थ से अन्वित होने पर 'गवानयन' आदि के रूप' में 'ही होता है। टिप्पसी-प्रत्यभिज्ञा-स्मृति सहित प्रत्यक्ष, पूर्व संस्कार सहित इन्द्रिय तथा वस्तु के संयोग से जो ज्ञान होता है जिसमें वस्तु की तद्र पता और 'इद' रूपता दोनों भासित होती हैं वह प्रत्यभिज्ञा है; जैसे-सोभयं देवदत्तः' इत्यादि। अनुवाद्-उन (अन्विताभिधानवादियों) के मत में भी केवल सामान्यरूपेए सर्थात इतरपदार्थान्वित-आनयनत्व आदि र्प से ही (गवायन आदि) विशेष पदार्य सद्धत का विषय है अत जिनके मत में (यत्र) अति विशेष पदार्थ (सर्थात् गवानय- नत्व रूप से गवानयन आदि) भी सङ्गत का विपय नहीं तथा अभिघाव्यापारगम्य नहीं (अ्रवाच्य) है और ('गामानय' आादि) वास्यार्थ के अन्तर्गत होकर प्रतीत होता हैं, उनके मत में 'नि.शेपच्युत' इत्यादि (उदाहृत स्थलों) में (उसके समीप ही गई थी' मादि) विधिरूप (व्यड्ग्य) अर्थ को (वाच्यता को) बात तो दूर ही है। प्रभा-अन्विताभिधानवादी प्रभाकर के भत में भी व्यज्नधार्य अ्रभिघावृतति का विषय नही हो सकता। माना कि उनके मतानुसार शब्द अभिघावृति के द्वारा परस्परान्वित पदार्थो की प्रतीति कराते हैं और अन्वय-्बोध के तिये तापयं-वृत्ति की आवश्यकता नही है; किन्तु उनके अनुसार भी सामान्यरूपेए अन्वित पदार्थों में ही सङ्कृत-ग्रहण होकर सामान्यविनेष का प्रहण होता है; अतः पतिविद्येग र्प भथं, भी अभिघावृत्ति का विषय नही है फिर ब्यङ्गधार्य सभिया-व्यापारगम्य कैसे हो सकता है ? भाव यह है कि जैसे घट वस्तुत्वरूप से वस्तुवद वा्य है पिन्तु घटत्वरूप
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३४६ j कंाव्यंप्रकांश:
धाने अन्वितविशोपसत्ववाच्य एव इत्युभयनयेऽप्यपदार्थ एवं वाक्यार्थः। से वह वस्तुपदवाच्य नही; इसी प्रकार अपर पदार्थात्वितानयनत्व रूप से सामान्य- रूपेण) 'घटानयन' (सामान्यविदोप) आानयन पद का वाच्य है किन्तु घटानमनत्व रूप से तो घटानयनत्व (अतिविशेष रूप) आनयन पद का प्रवाच्य ही रहेगा। इंसलिये उसमें सङ्क तग्रहण न होने के कारणा उसका ज्ञान वाक्य की शकि से होगा, अभिधावृत्ि द्वारा नही। और उसके पश्चात् प्रतीत होने वाले व्यङ्यार्थ में तो प्रभिघावृत्ति का प्रसङ्ग ही नहीं हो सकता। टिप्पसी-'निःशेपच्युत' आदि-यहाँ पर शब्दों द्वारा कहा तो यह गया है कि तुम नायक के पास नहीं गई (तस्यान्तिकं न गता5सि), जो, (वाच्या) निषेधरूप है; किन्तु व्यङ्गय यह है कि 'तुम अवश्य ही उसके पास गई' (तदत्तिकगेव गतासि) जो विधिरूप है। अनुवाद-अभिहितान्वयवाद में श्रनन्वित (संसर्ग-रहित) हो. अभिघायृति का विषय है (अर्थः=वृतिविययः) तथा अन्विताभिधानवाद में सपर पदार्य मात्र से प्रन्वित ही; किन्तु अ्न्वित-विशेष (अतिविशेष) रूप अरथं तो वाच्य है ही नहीं- इस प्रकार दोनों मतों में भी वाकयायं (संसर्ग) पदार्थ नहीं है अर्थात् पदन्वृति (अ्रभिधा) का विषय नहीं है। प्रभा-यहाँ तक ग्रन्थकार ने बतलाया है कि ध्वनि के सभी भेदों की प्रतीति फेवल व्यञ्जना द्वारा ही हो सकती है। एतद्विपयक युक्तियों का शारांद यह है- (१) लक्षणामूल ध्वनि के दोनों भेदों (अर्थान्तरसंकमितवाच्य और पत्यत्त- तिरस्कृतवाच्य) में प्रयोजन की व्यञ्जना के बिना लक्षणा ही नहीं हो सकती। (२) अभियामूलघ्वनि के-(क) असंलक्ष्यकम भेद में जो रसादि ध्वनि हैं, वे सदा व्यङ्गप ही होती हैं। (ख)-संलक्ष्यकम भेद मे- (i) शब्दशक्तिमूलक में वस्तु औप्रोर अलद्धार व्ङ्गय हो हुआ करते हैं। (ii) अर्थशक्तिमूलक में अर्थ व्यन्जक होता है। किन्तु प्रभिहितान्वयबाद एवं अन्विताभिवानवाद दोनों में ही वाकपार्ण का भी अमिया द्वारा बोध नहीं हो सकता, व्यंड्पार्थ की तो बात ही क्या? उभयशक्तिमूलक ध्वनि के विषय में भी यही युक्ति दी जा सकती है। अतः ध्वनि की प्रतीति के लिये व्यञ्जनावृत्ि को स्वीकृति अनिवार्य है। टिप्पसी-इन सन्दर्भ में तीन शब्दों का प्रयोग किया गया है-गामान्, सामान्यविशेप और अतिविदेप। इन सब्दों को टीकाकारों ने भिन्न २ प्रकार से व्यास्या की है। सन्दर्भ के अनुशीलन से सथा 'अनन्वितो ..... वावयार्ग:' इग उपसंहार वाकय से तो इन गब्दों का यह भर्य प्रतीत होता है-सामान्य=पनन्चित पदार्थ, पदों के ऐसे अर्भ जिनका पररपर अन्वय न हो (सामान्वरपासा,:
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पञन्चम उल्लास:
[२. व्यङ्गचार्थों न अ्भिधावृत्तिवोध्य:] यदयुच्यते 'नैमित्तिकानुसारे निमित्तानि कल्प्यन्ते' इतिः तत्र .निमित्तत्वं कारकत्व ज्ञापकत्वं वा? शव्दस्य प्काशकत्वान्न करंकतवं ज्ञापकत्वं तु अप्रज्ञातस्य कथं ज्वातत्वं च सङ्कतेनैव स चान्वितमात्रे, एव च निमित्तस्य नियतनिमित्तत्वं यावत्र निश्चितं तावन्नैसित्तिकस्य प्रतीतिरेव कथमिति नैमित्तिकानुसारे निमित्तानि कल्प्यन्तेइत्यविचारिताभिघांनम्। पृ० २४१, अनन्वितोऽ्य:० पृ० २४६) । सामान्यविशेष=केवल इतर पदार्थ से अन्वित पदार्थ (पदार्थान्तरमाव्रेण अ्न्वितः, पृ० २४४ तथा २४६); वह. इतरा- न्वित-आनयनत्व आदि रूप मे होता है तथापि घटानयन आदि रूप मे भासित हुआ करता है। अतिविशेष=उस उस वाक्य में अन्वित पदार्थ; अर्थात् घटानयनत्व रूप से अन्वित घटानयन आदि। प्रदीप टीका से भी इसी अर्थ की प्रतीति होती है- तेपामपि मते सामान्येनव रूपेण विशेष: शक्यो न तु विशेपरूपेण। तथा च पदार्थान्तरसामान्यान्विते पदानां शक्ति:। गवादिविशेषान्वितस्तु विशेषोऽ्वाच्य एवं। इस पर भी जो कुछ भीमासक नतानुयायी अभिधा द्वारा व्यङ्गय अर्य की प्रतीति मानते हैं उनकी युक्तियों का निराकरण आगे किया जा रहा है-' अनुवाद-२. जो (मीमांसकों द्वारा) यह कहा है कि नमित्तिक अर्थात् कार्य के अनुसार निमित्त की फल्पना को जाती है (अर्वात् व्यङ्गघ अरयं कार्य हूँ उसके कारस रूप में शबद को फल्पना को जाती है)। उनके प्रति ग्रन्यकार कहते हैं) उस कथन में (तत्र) निमित्तत्व (का अभिप्राय) जनकत्व है या प्रकाशकत्व? शब्द तो अर्थ का बोधक (पकाशक) है अतः उसमें (अर्थ) जनफत्व तो हो नहीं सकता। ज्ञापकत्व तो (यद्यपि उसमें हो सकता है तथापि) अ्ज्ञात का जञापकत्व कैसे हो सकता है ? और उसमें ज्ञातता सङ्कृत द्वारा ही होती है तथा वह सक्केत (अन्विताभिधानवादी के मत में) इतरान्वित मात्र (पदार्थ) में ही है (न शन्वित- विशेष में और न विधि आादि में ही)। इस प्रकार जब तक निमित्त (शब्द) फो नियत रूप से निमितता (विशेष-सङ्भ तवत्वम्=विशेष के साथ सङ्त) का निश्च्यं न हो जाये तब तक नैमित्िक (व्यनघ अर्थ) की प्तीति ही कसे हो सकती है? इसलिये 'नैमितिक के अनुसार निमित्त की कल्पना की जाती है' यह विचारपूसँ कथन नहीं। 1,4 प्रभा-मोमासको में से कुछ लोगों का कथन है कि-अदचार्य की प्रतीति किसी निमित से होती है अर्थात् नैमित्तिक है। यहाँ उसका और कोई निमित तो EFEE दृष्टिगोचर होता नहीं अत. (नैमितिकानुमारेग निमितानि कल्प्यन्ते-दरा न्याय से) शब्द को ही उसका निमित मानना चाहिये; कयोकि शब्दधवसानन्तर ही उस अर्थ की प्रतीति होती है। शब्द की निमितता किसी वृति द्वारा ही होगी अतः अभिधावृति से ही शब्द व्यङ्धधार्य का भी बोध कराता है-यह स्वीकार करना पड़ता है। जब शब्द अभिघावृत्ति द्वारा ही समस्त वाच्य या व्यहुथ ग्रर्थं का बोप
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:AN=1 काव्यप्रकोन:
ये सभिद्घति सोऽयमिपोरिव दीर्घदीर्घतरो व्यापार इति 'यत्पर: सन्दु: स शच्दार्थ' इति च विधिरेवात्र वाच्य इति, तेऽप्यतात्पर्यझञासतातपय वाचोपुक देवानांप्रिया: । तथा हि, भूतभव्यसमुच्चारणे भूतं भव्यायोप- दिश्यते इति कारकपदार्थाः क्रियापदार्थेनानवीयमाना: प्रधानक्रियानिरव स फरवक्रिया भिसम्बन्घात् साध्यायमानतां प्राप्नुवन्ति। ततश्चादृग्घदहन. न्यापेन यावदप्राप्तं तावद्विघीयते। यथा ऋत्विक प्रचरणो प्रमाणान्तरात्सिद्धे करा सकता है तो वृत्त्यन्तर-कल्पना की क्या आवश्यकता है ? आचार्य मम्मट 'तग्- सषिचारिताभिधानम्' इस ग्रन्थ द्वारा उनको उत्तर देते हैं कि-आप जो शब्द को स्पन्जयार्थ का निमित्त कहते हैं वह निमित्तता किस प्रकार की है ? यह शब्द सर्थों का जनक (कारक या उत्पादक) है या ज्ञापक (बोधक, प्रकाशक) ? शब्द भर्यं को उत्पन्न तो करता है नहीं, अतएव यह अर्थ का जनक नहीं हो सकता; हा अर्थ का प्रकाशक अवश्य हो सकता है; किन्तु यह तभी अर्थ का प्रकाशक या ज्ञापक होता है जबकि यह उस अर्थ के बोधक के रूप में ज्ञात हो, अ्न्यथा नहीं औौर शब्द की यह ज्ञातता संकेत के द्वारा होती है। अत्विताभिधानवादी के अनुसार संकेत, तो भन्वित मान्र में ही है, अन्वित विशेष में भी वह संकेत नही और जब तक विनेष रूप से संकेत न माना जाये अर्ात् किसी व्यङ्गथार्थ का नियमत रूप से किमी शब्द को निमित न मान लिया जाये तब तक शब्द के द्वारा नैमित्तिक (व्यङ्गप) भ्रर्थं की प्रतीति नहीं हो सकती। अतः अभिषावृतति द्वारा व्यङ्गधार्थ की प्रतोति असम्भव है।
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पञन्चम उल्लास: २४६
'लोहितोप्णीपा: ऋत्विजः प्रचरन्ती' त्यत्र लोहितोप्णीपत्वमात्रं विधेयं हवनस्यान्यतः सिद्ध: दध्ना जुदोतीत्यादौ दध्यादेः करसत्वमात्रं विधेयम। क्वचिदुभयविधि: क्वचित् निविधिरपि यथा रक्त पटं वयेत्यादौ एक विधि- र्द्विविधिस्त्रिविघिया। ततश्च यदेव विधेयं तत्नैव तात्पर्यमित्युपात्तस्यैव - शब्दस्यार्थे तात्पर्यन्न तु प्रतीतमात्रे। एवं हि पूर्वो धावतीत्यादावपराध्यर्थ- अपि क्वचित्तात्पय स्यात्। प्रचरन्ति' अरथात् लाल पगड़ी वाले ऋत्विक प्रचरस करते हैं, इस विधिवाक्य में (पत्र) ऋत्विक लोगों का प्रचरण (भिन्न-भिन्न कार्यो का अनुष्ठान) अ्न्य प्रमाण (क्येन-याग में ज्योतिष्टोम याग की विधि का प्तिदेश करने) से ही सिद्ध है अतः यहां लाल पगड़ी मात ही विधेय है। इसी प्रकार 'दघ्ना जुहोति' अर्थात् दही से होम करे' इस विधि वाक्य में हवन की विधि अन्य (अग्निहोत्रं जुहोति) वाक्य से ही सिद्ध है अतएव दही की साधनता (दही द्वारा हवन करे) ही विधि का विषय हूँ। इसी प्रकार कहीं दो वस्तुओं का विधान होता है फहीं तीन का, जैँसे-'रक्त पटं वय' (लाल वस्त्र बुनो) इस वाक्य में एक (रक्त गुए), दो (रक्त गुस तथा पट) अथवा तीन (रक्त गुए, पट तथा बुनना) का विधान हो सकता है। फलत. 'जिसका विधान करना है उसमें ही विधि का तात्पर्य है'। इस प्रकार 'उच्चारित' अर्थात् बोले हुए हो शब्द के (वृत्ति द्वारा उपस्थित या विधेय) अ्रर्थ में तात्पर्य रहता है न कि (किसी सम्बन्ध से भी) प्रतोत होने वाले प्रत्येक अर्थ में; यदि ऐसा हो तो 'पूर्यो धार्वत' इत्यादि में कहीं अपर आदि धर्थ में भी तात्पर्य हो जाये (क्योंकि दोनों के सापेक्ष होने से 'पूर्व' शब्द से अपर की प्रतीति भी होती है)। प्रभा-भटलोल्लट आदि आलङ्गारिकों का कथन है कि जैसे धनुर्घारी के द्वारा प्रक्षिप्त एक ही बाए एक वेग नामक व्यापार से शयु का वर्मच्छेद तथा मर्म- भेद करके प्राए हरएा कर लेता है उसी प्रकार मुकविप्रयुक्त एक ही शब्द अभिवा नामक व्यापार से वाच्य, अन्वय तथा व्यङ्गय भर्थ सब की प्रतीति करा देता है। व्यङ्गघ अर्थ के स्थल में शब्द का तात्पर्य उसी में होता है और मीमासा शास्त्र का न्याय है 'यत्परः' इत्यादि, जिसका पूर्वपक्षी अर्थ करता है-'यदर् यस्य दाब्दस्य तात्पयँ स शब्दार्थः" अर्थात् जिस अर्थ का बोध कराने के लिये किसी गब्दका प्रयोग किया जाता है, वह उस शब्द का ही अर्थ होता है। इस प्रकार व्यङ्गघार्थ भी शब्द का ही अर्थ है और वह अभिघावृत्ति का विषय ही है यह पूर्वपक्षी का भभिप्रायहै। सिद्धान्तपक्ष का कथन है कि पूर्वपक्षी ने 'यत्पर०' आदि न्याय का ययोचित भ्य नही किया। इसका अर्थ है 'यदेव विधेयं तन्नव तात्पर्यम्' अर्थात् विधिवाकयों मे किनया साध्य है। उसके लिये ही कारक शब्दों का प्रयोग किया जाता है। प्रघान किया के सम्पादन के लिये कारकों की निजी कियाएँ भी होती है जैसे 'गामानय' में 'मानमन' प्रधान निया है और गौ का चलना गौए किया है प्रधान मिया को
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२५० 1 काव्यप्रकान:
यत्त बिपं भक्षय मा चारय गृहे भुड्क्या इत्यत्र एतद्गृहे न भोकत व्यमित्यत्र तात्पर्यमिति स एव वाक्यार्थ इात। उच्यते-तन चकार एक- वाक्यतासूचनार्थः। न चाख्यातवान्ययोद्व योरङ्गाद्विभाव इति विपभक्तण. वाक्यस्य सुहृद्वाक्यत्वेनाङ्गता कल्पनीयेति विपभक्षणादपि दुष्टमेतद्गृहे भोजनमिति सर्वथा मास्य गृहे भुड्क्था इत्युपात्तशब्दाथे,एव तात्पयेम्। निर्वाहक स्वक्रिया के सम्बन्ध से कारकों में भी कुछ साध्यादा हो जाया करता है। इस प्रकार वाक्य में कुछ वस्तु प्रथमतः ही सिद्ध रूप में होती है, कुछ साध्य रूप में। साध्य वस्तु ही अप्राप्त है, उसकी सिद्धि करनी है तथा अदग्ध-दहन न्याय से उसका ही विधान होता है। इस प्रकार यत्परः इत्यादि न्याय का भाव यह है कि जो अन्य प्रमाए आदि से प्राप्त नहीं, शब्द का उमी में तात्पयं होता है।4 किञ्च, जिस अरथ में तात्पर्य होता है, उस अरथ का वाचक शब्द वाक्य में उपात या गृहीत हुआ करता है जिस शब्द का वाक्य में ग्रहण नहीं होता, उसके सर्थ मे सात्पर्य नही हो सकता। इसी हेतु कहा गया है उपात्तस्यंच शब्दस्यारथें तात्पर्यम्। यदि वाकय से प्रतीत होने वाले प्रत्येक अर्थ में शब्द का तात्पर्यं होने लगे तो 'पूर्वो धावति' का तात्पर्य 'अपरो घावति' में भी होने लगेगा क्योंकि पूर्व शब्द से विलोम रूप में 'झपर' अर्य को भी प्रतीति हो सकती है। इस प्रकार 'यत्पर:' न्याय के अनुसार अ्भिधावृति द्वारा व्यङथ अ्र्य की प्रतीति नहीं हो सकती, कयोकि वहाँ व्यङ्गभ अ्र्थ का वाचक कोई शब्द वाक्य में उपात्त नहीं हुआ करता। टिप्पसी :- आचार्य अभिनवगुप्त ने भी मीमांसा के अनुयायी सालक्वारिकों के इरा बाद का निराकरस किया है। किन्हीं व्याम्याकारों के मत में यहां पूर्वपक्षी को दो युक्तियाँ है (वालवोघिनी)-(१) शब्द का दीर्घ दीर्घतर व्यापार और (२) 'मत्पर: शब्दः इत्यादि न्याय। वस्नुतः यहाँ एक ही युक्ति दी गई है, जैसा कि ऊपर व्यास्या में दिसलामा गया है। अभिनवगुप्त के विवेचन से भी यही प्रकट होता है- योन्विताभिधानवादी 'यत्पर: गब्दः स शब्दार्थः' इति हुदये गृहीत्वा सरवद अभिधा- व्यापारमेव दीर्घदीघंम् इच्छति। (ध्वन्यालोकलोचन, उद्योत-१) 1 तपनुवाद-जो यह (कहा जाता है) कि 'वियं भक्षय मा घास्य गुहे भद्वयाः (विप सालो पर इसके घर मत साथो) यहाँ पर 'इसके घर भोजन न फरों इस पर्प में ('विपं भक्षय' इस वाक्य का) तात्पयं है, तथा वही ('मा घास्य गृहे भुङकयाः' का) वाकयार्य है [पतः उपातगम्दरपाये तात्पर्यम्' यह नियम कहा रहा ?] (उत्तर)- यात यह है कि वहाँ पर च' (थ्रौर) दोनों वायों को एक्वाक्यता सूचित करने के लिए है। द्यषि (भक्षय, भड्कयाः) दो तिटन्त (सास्यात) धटित पावमों का पङ्गाद्त्रिभाव हो नहीं सकता, तथापि सुदृद् का वाकय होने के फारस 'विप भक्षसा' वाक्य में (दूसरे वाकय के प्रति) प्रम्ुता की कल्पना करनी होगी। इस प्रकार 'इसके पर भोजन करना विपभसण से भी अभिक दोपपुक्त है' इसलिये 'रिसी
सात्प्य है। प्रकार भी इसके घर न साभो' इत्यादि, उपात् (प्रपुक्त) शब्दों के धर्म में ही
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पञ्चम उल्लास: t 14-4 यदि च शब्द्श्रुतेरनन्तरं यावानर्थो लभ्यते तावति शव्दस्याभिघैव व्यापार: ततः कथ न्राह्मण पुन्नस्ते जात: ब्राह्मणा कन्या ते गर्भिसीत्यादौ हर्पशोकादीनामपि न वाच्यत्वम् ? करमाच्च लक्षणा लक्षसीयेप्यर्थे? प्रभायहां पर पूर्वपक्षी का यह अभिप्राय है-आापका यह कथन अ्सङ्भते है कि'उपात (अर्यात् प्रयुक्त या उच्चारित) शब्द के अरथ में ही तात्पर्य होता है, प्रतीतमान्र में नही; क्योंकि विपं भक्षय मा चास्थ गूहे भुङ्क्या.' यहाँ पर यह नियम बागू नही होता। वहाँ दो वाक्य हैं-(i) 'विपं भक्षय' और (ii) 'मा चास्य' गुहे मुङ्क्याः'। इन दोनों का तात्पर्यं है-'कदाचित् भी इसके घर में न साओ'। यह दूसरे वाक्य का वाच्यार्थ है। किन्तु प्रथम वाक्य (विपं भक्षय) का भी तात्पर्य इसी में है औौर इस वाक्य में इस अर्थ के वाचक किसी शब्द का ग्रहण नहीं किया गया। सिद्धान्त पक्ष का अभिप्राय यह है कि 'मा चास्य' यहाँ पर 'च' (और) का प्रयोग किया गया है। इस 'च' का कोई अन्य प्रयोजन दिखलाई नहीं देता अतः 'च' दोनों वाक्यों का समुच्चय करता है, दोनों की एकवाक्यता को सूचित करता है। यद्यपि इन दोनों वाक्यों मे 'भक्षय' तथा 'भुङक्याः' ये प्रधान क्रियाएँ (finite verb) प्रयुक्त हुई हैं अतः यह एक दूसरे से निरपेक्ष हैं, इनमे से एक दूसरे का अङ्ग Subordinate) नहीं हो सकता, फिर इनमें अङ्गाद्भिर्भाव अथवा विशेष्य- विशेपण रूप सम्वन्ध नही वन सकता, तथापि किसी मित्र का यह उपदेश 'देना भी तो असम्भव ही है कि 'विप खालो' (विपंभक्षय)। इसलिये 'विप भक्षय' यह वाक्य स्वार्थ-बोघन मे बाघित हो जाता है तथा यह 'इसके घर में भोजन करना विपभक्षण से भी बुरा है' (विपभकरादपि दुप्टमेतद्गृहे भोजनम्) इस भर्यं को लक्षित करके 'मा चास्य' इत्यादि वाक्य का हेतुरूप मे भङ्ग हो जाता है। तब 'च' (और) शब्द के द्वारा सूचित एकवाक्यता भी हो जाती है और 'कदाचित् भी इसके र मे न खाओ' (सर्वथा नास्य गृहे भुडक्थाः) यह वाक्यार्थ होता है। - इस प्रकार यहाँ पर वाक्यस्थ शब्दों के द्वारा उपस्थापित अर्थ में ही सात्पंयें है और 'यत्पर.' आदि मीमांसोक्त न्याय का उपयुक्त ही अर्थ है। टिप्पणी-एक तिङन्त पद से युक्त पद-समुदाय वाक्य है (एकतिङ् वाक्यम्) इसलिये 'विप भक्षय, मा चास्य गुहे भुड्क्याः' ये दो स्वतन्त्र वाक्य हैं। दो स्वतन्त्र वाक्यों में परस्पर अङ्भाज्गिभाव नहीं हो सकता। मीमांसा का न्याय भी है-'गुसानां च परार्थत्वाद् असम्बन्वः समत्वात् स्यात्'। अनुवाद्-यदि शब्द-अ्रवण के अनन्तर, जितना अर्य उपलब्ध होता है, उतने में शब्द का अभिधा व्यापार हो (समर्य) हैं। तो-हे ब्राह्मस, तुम्हारे पुप्. उत्पन्न हुआ है तथा 'हे याहए तुम्हारी कन्या (भविवाहिता पुत्री) गभवती हं। इत्यादि याकयों में हुर्ष और शोफ आदि भी याच्य क्यों न माने जाएँ ? भर लद्य, भरये
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३५२ 1 काव्यप्रकाश:
दीर्घदीर्घ- तराभिघाव्यापारेखैव प्रतीतिसिद्धः। किमिति च श्रति-लिङ्ग- वाक्य-प्रकरस-स्थान-समाख्यानां पूर्वपूर्ववलीयस्त्वम् ? इत्यन्विताभिधान- वादेऽपि विधेरपि सिद्ध व्यङ्गयत्वम्। में भी लक्षला क्यों मानी जाये ? क्योंकि (इयुवत्) दीर्घ वीर्घतर (शब्द के) अभिधा नामक व्यापार से ही (लद्यार्थ की) प्रतीति हो जायगी। और फिर वयों भूति, सिन्ग, याक्य, प्रकरण, स्थान और समास्या-इन में पूर्व पूर्व (श्रति, आदि) को पर सर्यात् लिङ्ग आादि की अपेक्षा बलवत्तर माना जाय ? इस प्रकार श्रम्विताभिधानवाद में भी निःशेष इत्यादि में समीप गमन रूप) विधि की व्यङ्गचता सिद्ध होती है। प्रभा -जो मीमासकमतानुयायी भट्टलोल्लट आदि आलद्धारिक कहते हैं कि वाए के समान शब्द का भी दीर्घ, दीरघतर व्यापार होता है तथा अभिधा, नामक शब्द व्यापार द्वारा ही पदार्थ-बोध, अन्वय-बोध एवं व्यङ्गयार्थ आदि की प्रतीति हो सकती है, 'यदि च' इत्यादि अवतरण द्वारा उनको उत्तर दिया गया है। अभिप्राय यह है कि यदि शब्द-शवश के पश्चात् जो भी ज्ञान होता है वह अभिषा व्यापार द्वारा ही हो जाता है, यह माना जाये तो 'हे ब्राह्मण तुम्हारे पुत उत्पन्न हुआ है' तथा 'हे ब्राह्मण, तुम्हारी कन्या गभिशी है' इन वाक्यों के श्रवसानन्तर होने वाला हर्ष और विपाद भी वाच्यार्थ ही हो जायेगा, किन्तु ऐसा माना नही जाता । दूसरा दोप यह भी होगा, कि लक्षणा वुति की भी कोई आवश्यकता न रहेगी; क्योंकि लक्ष्यारथ की प्रतीति भी शब्द के दौर्घ-दीर्घंतर व्यापार द्वारा सभिषा से ही होने लगेगी। इसके प्रतिरिक्त ऐसा मानने पर तो मौमांसवों का श्रुति आदि का वलीयस्त्व-बोषक न्याय भी अनुचित ठहरेगा । भाव यह है कि- जैमिनि मुनि ने बतलाया है कि श्रुति आदि में पूर्व पूर्व की अपेक्षा पर पर दुर्बल होता है, क्योंकि वह विलम्ब से अर्थ का बोध कराता है। इससे पूर्व पूर्व की वतलवतरता का निर्एय होता है। यदि शब्द-अवण के पश्चात् होने वाला समस्त अर्थ-चोष अभिधा-व्यापार द्वारा ही हो जामा करे तो जैसे 'ध्ुति' द्वारा उपस्थापित भयं- प्रभिधेय है वैसे 'सिङ्गादि' द्वारा उपस्थापित अर्थं भी; फिर तो ये सभी एक फाल में ही शथं के उपरथापक होंमे और अर्थं-विप्रकर्ष (विलम्बेन अर्चोपस्थापकता) की बात जो मुनि ने पही है, अनुचित ही होगी। अतः शब्द के दोर्म दीरपतर व्यापार से व्यङ्तपार्य म प्रतीति नही हो सकती । इस प्रकार अभिघावृति से व्यत्नार्य की प्रतीति नही हो सफती। एसटरिपयक पुक्तियों का सार यह है। (१) अभिधा द्वागा सद्टृतित अर्थं का बोध होना है। किन्तु दाबद का व्यक्न पार्य के साथ सङ्ृत-प्रह नहीं होना अतःनैमितिकानुगारेख निमितानि कल्प्यन्ते" इस नियम के अनुगार भी मभिधा से उपस्गम सर्य को प्रतीति नही हो सकती।
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(२) भट्टलोल्लट आदि ने जो 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थः' इस नियम का आाश्य लेकर व्यङ्ध भर्थ को अभिधा के दीर्घ-दीर्घतर व्यापार का विषय सिद्ध कंरने का प्रयास किया है वह भी ठीक नहीं; वयोंकि (क) तात्पर्यवाचोयुक्ति के अनुसार वाक्य मे उपात्त किसी शब्द के अर्थ मे ही वाक्य का तात्पर्य होता है। किन्तु व्यञ्जना द्वारा जिस अर्थ की प्रतीति होती है, उस अ्रर्थ का वोधक कोई शब्द वावय में नही होता। " " .. (ख) प्रथम तो शब्द मे दीर्घदीर्घतर व्यापार माना नहीं जा सकता। यदि मान भी ले तो उस दशा में- (i) ब्राह्मण पुनस्ते जातः', ब्राह्मण कन्या ते गरभिणी प्रादि मे हर्ष शोक आदि भी वाच्य होने लगेंगे। (ii) लक्ष्यार्थ का बोध भी अ्र्प्रभिघा से ही हो जायेगा। (iii) मीमांसा का श्रूति लिङ्ग आदि में बलावल का सिद्धान्त भी व्यर्थ होगा। इस प्रकार व्यञ्जना वृत्ति की स्वीकृति अनिवार्य है। उसके द्वारा ही 'निःगेपच्युतचन्दन' आदि स्थलों पर समीपगमन रूप बिधि व्यङ्गय है। टिप्पणी :- (i) श्रति-पूर्वपूववलीयस्त्वम्-मीमांसा शास्त्र में चार प्रकार की विधि मानी गई है-उत्पततिविधि, विनियोगविधि, अधिकारविधि और प्रयोग विधि। इनमें अ्द्ध (गुए) और अ्ङ्गी प्रधान) के सम्बन्ध की बोधक विधि विनियोग विधि है। जिसके सन्दर्भ में यह सूय है-श्र तिलिङ्गवाक्यप्रकरणस्थानसमाख्यानां समवाये पारदोर्वल्यम् अरथविप्रकर्षात् (पूर्वमीमांसा ३.३·१४ । इस में जैमिति आाचार्य ने यह बतलाया है कि किसी वेद के मन्त्र अथवा प्रोक्षण आदि शङ्गरूप विधि का किस मुस्य यज्ञादि किया में विनियोग (Application) होता है, इस बात का निर्णय कराने वाले शति आदि ६ साधन (प्रमाण) हैं और इनमें भी यंदि दो या अधिक प्रमाण एक ही स्थल पर प्राप्त होते हैं तो आगे वाले (पर) की अपेक्षा पहला २ अधिक बलवान् होता है; अर्थात्, श्रुति, लिद्, वाक्य, प्रकरण स्थान और समाख्या में से पूर्व पूर्व (थति आदि) अग्रिम (सिङ्ग) आदि की अपेक्षा सधिक बलवान् है। इसी का नाम बलावलाधिकरण है; जैसे- (१) श्रति (Direct declaration) अन्य किसी प्रमाण की अ्पेक्षा न रखने वाले शब्द को भृति कहते है-'निरपेक्षो रवः शतिः'। यह तिङ्ग आदि की भ्रपेक्षा बलवती होती है, जसे-'कदाचन स्तरोरसी नेन्द्र सश्चसि दाशुषे'-यह ऋंचा अग्निहोत् प्रकंरण में है। इसके विषय में यह सन्देह होता है कि इसका विनियोगं इन्द्र के उपस्थान मे होना चाहिये या गाहंपत्याग्नि के उपस्थान में । इन्द्र प्रकाशन- सामर्थ्य रूप तिङ्ग के अनुसार तो इसका इन्द्रोपस्थान में विनियोग होना चाहिए, किन्तु 'ऐन्द्रथा गार्हृंपत्यमुपतिष्ठते' इस द्वितीया विभत्ति रूप 'श्ृति' के द्वारा इसका गाहंपव्य के उपस्थान में ही विनियोग होता है।
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पञ्चम उल्लास: २५५
'इन्द्राग्नी पद को छोड़कर दोनों मन्न्नों का पाठ करना चाहिये यथा दर्शयाग में 'अग्नीपोम' पद को छोड़कर दोनों मन्त्रों का पाठ करना चाहिये "यह प्रकरण द्वारा भाप्त होता है। किन्तु पूर्व वाक्य के 'इदं हुवि.' इत्यादि अवर्गिष्ट पद का अ्ग्ीपोम' पद से अन्वय है तथा उत्तर वाजय के 'इदं हुविः' इत्यादि का 'इन्द्राग्नी' से अन्वय है। यह अन्वयरूप वाक्य प्रकरण से चलवरर है इसलिये पूर्व मन्त् का 'पौर्समास्य' मे विनियोग होता है तथा उत्तर मन्त का 'दर्श' में ही। भाव यह है कि तुरन्त प्रवृत होने वाला 'वायय' चिलम्व से प्रवृत्त होने वाले धकरण का बाबक है। (४) प्रकरस (Context) परस्पर आकाक्षा को प्रकरण कहते हैं- परत्पराकांक्षा प्रकरसम्। यह स्थान की अपेक्षा वलवत्तर होता है, जैसे-राजसूय याग के प्रकरण मे अनेक सोमयागो का वणन हैं। उनमें से एक 'अभिषेचनीय' नागक सोमयाग भी है। उसकी सन्निधि में अक्षर्दोव्यति, राजन्यं जिनाति, श्ञौनः शोपमास्यापयति' यह पाठ है, अतएय ऐसा प्रतीत होने लगता है कि सन्निधि अर्थात् स्थान के कारा 'देवन' (दीव्यति) आदि 'अभिपचनीय' नामक सोमयाग के शङ्भ हैं किन्तु राजसूय का प्रकारण होने से वे राजमूय के त्रद्भ माने जाते है अर्थात् राजसूय में समाविष्ट समस्न सोमयागों के भ्रज्ज है। (५) स्थान या क्म (Position अथवा order) समान देग में होना ही स्थान कहलाता है-स्थानं समानदेशत्वम्। ममानदेशता दो प्रकार की है-१. पाठ- संमानदेगता २. अनुष्ठानममानदेशता। पाठसमानदेशता भी दो प्रकार की है- (१) यथासंख्य पाठ (२) सन्निधि पाठ। यह स्थान या कम समाख्या की अपेक्षा बलवतर है: जैसे -'घुन्धध्वं दव्याय कमें' यह मन्त्र पोरोडाशिक अर्थात् पुरोडाना सम्बन्धी है ऐसा याशिक लोगों ने वतलाया है। 'पुरोडाशस्य इदं पीरोडाशिकम्' इस समास्या के आधार पर यह मन्त्र पुरोडाश काण्ड मे अभिहित उलूखल, जुह आदि के शोधन में भी अंद् होना चाहिये, किन्तु सालाय्य पात्रों के शोधन में ही इसका विनियोग किया जाता है, क्योकि उनकी सन्निधि मे इसका पाठ किया गया है अर्थात् उनके साथ इसकी पाठसमानदेशता है। 1 (६) समास्या-(Name) यौगिक: शब्दः समाख्या। यह सवसे दुर्बल होती है। शब्द चार प्रकार का होता है-यौगिक, रूद, योगरढ तथा योगिकस्ट। योगिक वह शब्द है जहाँ अवयवार्थ (व्युत्पत्तिलभ्य अ्थ) की ही प्रतीति होती है, वही समाख्या कही जाती है। जँसे-पाचक, अध्व्युं आदि। पूवोक्त लिङ्न रूढि रूप है, वहाँ अवययशक्तिनिरपेक्ष समुदाय से अर्थ-बोध होता है। यही लिङ्ग तथा समाख्या का भेद है। मह यौगिक शब्द रूप समार्या दो प्रकार की है-(१) लौकिकी (२) वैदिकी। याजिकों द्वारा परिकल्पित समास्या लौकिकी है जैसे-'अध्वयु'। अध्वर युनक्ति' अर्यात् यजुर्वेद सम्बन्धी कर्भ करने वाला प्ध्वयु है; अतः यजुर्वेरद सम्बन्यो फर्म में अध्वयु का विनियोग होता है। वेदोक समास्या वैदिकी है; जैसे
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२५६ 1: -काव्यप्रकाश:
[३. वाच्यवाचकभावाद अ्रन्यो व्यङ्ुथव्यञ्जकभाषः] किन्च कुरु रुचिमिति पदयोषैंपरीत्ये काव्यान्तर्वर्तिनि कथं दुष्टत्वम् न हन्नासभ्योष्य पदार्थन्तिरेरन्वित इत्यनकिधेय एवेति गवमादि प्रपरि- त्याज्य स्थात्। यदि च वाच्यवाचकत्वव्यतिरेकेश व्यङथव्यख्ञकभावो नाभ्युपेयते तदासा घुत्वादीनां नित्य दोपत्वं कष्त्वादीनामनित्य दोपत्वमिति विभागक रसमनुपपत्र स्यात न यातुपपत्र सर्वस्यैव विभक्ततया प्रतिभासाद्। वाच्य 'होतृचमसः' इम वैदिक समास्या से 'होनृ' हो: चमसभक्षण' का भ्रभ्ग होता है। अब तक ग्रन्यकार ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि व्यङ्गय मर्य के ोधन के लिए व्यञ्जना वृति को स्वीकृति पनिवार्य है, यभिघावृति के द्वारा व्यङ्गप अर्थ का बोध नही हो सकता। यहां व्यञ्जना की सिद्धि के लिये साहित्यशास्त्र की दृष्टि से कुद युक्तियाँ देते हैं- अनुवाद-३ और भी-'कुरु दचिम्' इन दोनों यदों का फाय्य के भीतर घिपर्यास हो जाने पर (रचि कुरु इस रप में) दोष (दुष्टत्यं) कयों (माना जाता है) ?, क्योंकि यहाँ पर अशलील अथ (सन्धि करने पर 'चिडकु'=भग-नासा) अन्य पदार्थों से अन्वित नहीं है, अतएव (थापके मतानुसार) थनभिघेय (प्रवाच्य)ही है-इस लिये इस प्रकार के पद (दुष्ट न होंगे तथा) परित्याग के योग्य न माने जायेंगे। प्रभा-वज्जना को स्वीकार करने पर ही इम प्रकार के दोपों की व्यवस्था वन सकती है, जैसे-ययदि 'कुर रुचिम्' को उलट कर 'रचिङ् कुरु', ऐसा जिस देते हैं तो.अश्लीलता दोद समभा, जाता है; क्योंकि 'चिड्कु' शब्द कारमीरी आदि भाषाभों में अरलीलार्थबोधक (स्त्री के गुह्याज्जवानक) है। यह भश्तीत मर्थ अभियावृतिगगम्य तो हो नही सकता; गयोंकि पूर्वपक्षी के मतानुसार अ्न्वित भयों मे ही दकि, होवी है और ऐगा अरयं किनी से भी अन्वित नहीं है, अतः अभिया का विषय नही हो सकता। तब तो इने व्यञ्जनावृति का विषय मानना पड़ेगा; पन्यया यह दोप फसे होगा ? और दुप्ट होने से परित्यान्य कैसे माना जा सकेगा ? - टिप्पसी-(i) संस्कृत टीकाकारों की यह सैली रही है कि वे पूवंपकी की सोर से पूर्व दोप पा उत्तर कर्त्पत कद सेते है मर तब द्वितीय दोप को उदभूत करते हैं। प्रस्तृत अवतरणों की व्याख्या में उन्होंने, इसी दोली का अनुसरए किया है वस्तुतः तो किसी मत में अनेक दोप भी एक साथ ददयि जा सकते है 'किब्य' इत्यादि शब्द 'दोप रामुच्चय' की मोर ही सङ्टृत करते हैं। i. अनुवाद- यदि वाच्य-याचक-भाव से भिन्न व्यन्नुच स्पम्जवनाय ने माना नाये तो मसाधुत्य (ब्याकरस की अशुद्धि) परादि नित्मदोय है तथा 'वप्टत्य' (यति फटुत्य) आादि पनित्यदोप है यह विभाग करना पसम्भव होगा। किन्तु यह (विभाग) मसम्मय है नहीं; क्योंकि सनी (इसिफ) जनों को इनकी विना रप से प्रतीति
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पञ्चम उल्लास: २५७
वाचकभावव्यतिरेकेसा व्यङ्गवव्यञ्जकताश्रयणेतु व्यङ्गधस्य बहुविधत्वा- त्कवचिदेव कस्यनिदेवौचित्येनोपपद्यत एव विभागव्यवस्था । द्वयं गतं सम्प्रति शोचनीयतां समागमप्रार्शनया पिनाकिन:॥ - इत्यादौ पिनाकयादिपद्वैलक्षसयेन किमिति कपाल्यादिपदानां काव्यानुगुसत्वम्।
-होती है। वाच्यवाचक भाव से मिन्न रूप में व्यसुघ-व्यञ्जक भाव स्वीकार करने पर तो व्यङ्गथ पर्थं के प्नेक प्रकार का होने के फारस कोई (व्यङगघ) धर्थ कहीं पर उचित होगा (किसी के कहीं पर उचित होने से) अतएव (नित्य तथा अनित्य) विभाग-व्यवस्था बन जाती है। प्रभा-जो आलद्धारिक व्यञ्जना वृत्ति को नहीं मानते उन्होने भी असाधुत्व .अर्थात् व्याकरण की अशुद्धि (च्युतसंस्कृति) आ्दि को नित्य दोप माना है तथा श्रुतिकहृत्व आरदि को अपनित्य दोप बतलाया है। आ्चार्य मम्मट उनके प्रति कहते है। त्रथवा मोमासा के अनुयायी आलङ्गारिकों के प्रति कहते हैं कि यदि वाच्य- -वाचकता (अभिधावृसि) के अतिरिक्त व्यनय-व्यञ्जकभाव (व्यञ्जनावृति) को आप नही मानते तो असाधुत्व आदि नित्य दोप है, कष्टत्व आदि अनित्य दोप हैं -यह कहना असम्भव है। राब तो कष्टत्व आदि भी सर्वत दोप या अदोप ही होंगे। किन्तु यह विभाग-व्यवस्था तो स्वीकार करनी ही पड़ती है; क्योकि समस्त काव्य- ममज्ञों को इसकी प्रतीति हुआ करती है। यह विभाग-व्यवस्था व्यञ्जना को स्वीकार करने पर ही बन सकती है-असाधुत्व (व्याकरस की अशुद्धि) आदि सर्वत्र हेय हैं, अंतएव वे नित्य दोप है। श्रुतिकटृत्व आदि शृड्गार आदि की अभिव्यक्ति के प्रतिकूल हैं अ्रतः वहाँ ये दोप माने जाते हैं; किन्तु ये वीर, रौद्र आदि रसों को अभिव्यक्ति के अनुकूल है; अतः वहाँ दोप नहीं माने जाते। इस प्रकार व्यङुघ व्यञ्जकभाव में स्पतिकूल तथा अनुवाल होने से दोपों का नित्यानित्य विभाग चन सकता है औोर वह व्यन्जना के पभाव मे कैसे सम्भव है? i- -- अनुवाद्-कपाली (कपाल धारण फरने वाले) शिय के समागम की प्रार्यना नसे इस समय दोनों (चन्द्रमा फी कला तथा पार्वती) शोचनीयता को प्राप्त हो गई। 1 .- ", इत्यादि में 'पिनाफी' आदि पद से विलक्षसता के कारण कपाली आदि पदों :की काव्यानुकूलता क्यों है? -- ' 'प्रमा-व्यज्जना वृत्ति को स्वीकार करना इसलिये भी आवश्यक है क्योंकि गएक ही मब्द के पर्यायवाची पदो में से कही किसी पद का प्रयोग काव्यसीन्दर्यवद्ध क "माना जाता है, किसी का नहीं। जैसे कुमारसम्भव के 'दवय-कपालिनः' आदि पद्य मै'कपालिन्' शब्द का प्रयोग काव्य के अनुसल माना जाता है और 'पिनाविन' भन्द का नही। यहाँ पर कपालित् तथा पिनाविन् दोनो शब्यों का अनिधेयार्थं शिव
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२५८ J यव्पप्रकाग: 44
[४. स्फुट एव भेद: वाच्य व्यङ्जथारययो: ] अपि च वाच्योऽर्थः सर्वान् प्रतिपत्त न प्रति एकरूप एवेति नियतोऽसौ। न हि 'गतोऽसतमर्क:' इत्यादौ वाच्योऽर्ये: क्वचिदन्यथा भवत। प्रतीयमानस्तु तत्तत्प्रकरणवदततृप्रतिपत्त्रादिविशेषसहायतया नानाववं भजते। तथा प- 'गतोऽस्तमर्क:' इत्यतः सपत्नं प्रत्यवस्कन्दनावसर इति, श्रभिसरयमुपकम्यः तामिति, प्राप्तमायस्ते प्रेयानिति, कर्मकरणान्निवर्तामहे इति, सान्ध्यो विधि- है। यदि अभिधेयार्थं से भिनन व्यङ्गयार्थ न माना जाय तो दोनों शब्दो के प्रयोग मे समान ही अर्थ निकलता है तब एक पद (कपालिन्) यहाँ पर प्रकरण के अनुकूल है दूसरा (पिनाकिन्) नहीं यह व्यवस्था कैसे बन सकती है ? यह बात तो व्यञ्जना के महिमा से ही सिद्ध होती है। यहाँ पर शिव-निन्दा में तातर्य है। 'कपालिन' (अर्थात् अनुचि, बीभत्स, सप्पर घारस करने वाला) इस वब्द से 'शिवदर्शन' के भी अयोग्य हैं, अतः सवधा हेय है' यह अयं व्यञ्जना द्वारा प्राप्त होता है, औौर 'कपासित्' शब्द शिव के प्रति पावती के प्रेम-भाव को निवृत्त करने में समर् है। पिनाविन्' शब्द पिनाकवारी गिव का वाचक है वह वीरता छ्योतक है निन्दा-व्यञ्जक नहीं अतः यहां प्रफरण के अनुकूल नहीं। इस प्रकार 'दोपादोप व्यवस्था, नित्यानित्यदोप-व्ययस्था, शब्दों की गुणाभि- व्यन्जकता की व्यवस्था के आधार पर भी वाच्य-वाचव-भाव से भिस्न व्यन्प- व्यञ्जक-भाव मानना आावश्यक है। यदि ऐसा न माना जाये तो- (क) 'रूर्चि कुरु' आदि में जो अदलीलता दोप माना जाता है, वह मुक्तियुक्त न होगा। (ग) असाधुत्व आादि नित्य दोप हैं तथा श्र् तिकटुता आदि अतित्य दोष है, यह व्यवस्था न बनेगी। (ग) कपाली, पिनाकी आदि पर्गाय शब्दों में भी कोई एक प्रकरस के भनुरूस है, अन्य नहीं, यह नियम न चन सकेगा। मनुवाद-४ इसफे भतिरिक्त (किसी शब्द या वापय का) याध्य-अर्प समस्त बोदामों के प्रति एक ही होता है इसलिये यह नियत है; जैसे कि गतोजरस- मरु:' धर्यात् 'सूयं अस्त हो गया' इत्यादि वापय में वाच्यार्थं कहीं भिन्न रूप से नहीं होता (एक रूप ही होता है), फिन्तु मिस्न भिन्न प्रकरस के विशिष्ट पक्का और शौद्धा आादि की सहायता से ध्यमुम सर्य तो धनेक प्रकार का हो जाता है। जैसे- (यदि राजा सेनापति से कहे-गतोऽस्तमर्कः तो, 'शत्र के प्रति बलात्, पाकमस का अ्रमसर है'-यह (व्यङ्गम अय होता है): (इूती अभिसारिफा से पहे तो) 'तेरा प्रियतम भाने को है' (पराप्तमायः)-यह (यमिक परस्पर कहे.तो)-'हाय से नियुत्त होते हुँ' यह: (सेयक किसी धार्मिक से कहे सो)-सन्न्या-कार्य भरग्भ
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पञ्चम उल्लास: २५६
रुपक्रम्यतामिति, दूरं मा गा इति, सुरभयो गृहं प्रवेश्यन्तामिति, सन्तापो- डघुना न भवतीति, विक्र यवरतूनि संहियन्तामिति, नागतोऽय्यापि पेया- नित्यादिरनवधिव्यङ्गयोऽर्थरतन्र तत्र प्रतिभाति। वाच्यव्यङ्गथयोः निःशेपेत्यादी निपेघविध्यात्मा। मात्सर्थमुत्सार्य विचार्य कार्यमार्याः समर्यादमुदाहरन्तु। सेव्या नितम्बा: किमु भूधराणामुत रमरस्मेरविलासिनीनाम् ॥१३३॥
कथमवनिप, दर्पा यन्निशातासिघारा- दलनगलितमूर्ध्ना' विद्विपां स्वीकृता श्रीः। कीजिये'-यह: (कोई हितचिन्तक किसी बाहर जाने वाले से कहे तो)-'दूर मत जाना'-यहः (कोई गृहपति गोपाल से कहे तो)-'गायों को घर पहुँचाओो' -- यह (दिन में संतप्त व्यक्ति इष्ट मित्रों से कहे तो)-'अब ताप नहीं है'-यह; (दूकान- :दार मृत्यों से कहे तो)- 'विक्रेय वस्तुगं को एकत्रित करो'-यह: (प्रोपितपातिका 'किसी से पहे तो)-'भाज भी मेरा प्रियतम नहीं आया'-यह; इस प्रकार श्रनन्त व्यङ्गचार्थ भिन्न-भिन्न स्थलों पर (भिन्न-भिन्न वक्ता और थ्रोता शदि के अनुसार) प्रतीत होते हैं। प्रभा-वाच्य-वाचक-भाव से भिन्न व्यङ्घ-व्यञ्जक-भाव की सिद्धि करके यहाँ वाच्य और व्यङ्गय सथों का भेद दिखलाया जा रहा है। प्रथमतः दोनों का भेंद यह है कि किसी वाक्य का वाच्यार्थ नियत होता है-सब के तिये एक समान होता है। किन्तु व्यङ्गय अर्थ प्रकरसा के अनुसार शोता और वक्ता आ्पदि के भेद से बदलता रहता है। अनुवाद्-[वाच्यव्यङ्गचयोः (२) निषेधविध्यात्मना निश्चयरूपेए च स्व- 'रपस्य, (२) कालस्य, (३) आश्रवस्य, (४) निमित्तस्य, (५) कार्यस्य, (६) संख्यायाः, (७) विपयस्य च मेदेऽपि यद्यकत्वं तत् वयचिदपि नीलपीतादी भेदो न स्याद्-इत्य- 'न्वयः] (स्वरूप भेद) वाच्य और व्यङ्गघ (इन दोनों) अरथों में (क) 'निःशेषः' इत्यादि में (बाच्य के) निषेध रूप और (व्यङ्गघ के) विधि रूप (आत्मा=स्वरूप) होने से तया-(ख) सज्जनवृन्द, आप मात्सय (एक के पक्षपात से दूसरे के प्रति मसूया) को छोड़कर, विचार करके मर्यादापूर्वक कतव्य का (युक्ति सहित) कयन कीजिये कि पर्वतों के नितम्ब (उपत्यकाएं) सेवन योग्य है अथवा काम से मुस्कुराती हुई रमसियों के ?' ॥१ ३३॥ इत्यादि में (वाच्यार्थ के) संशयरप तथा (व्यन्नघार्य के) शान्त तपा शृङ्गारी (पुरवों) में किसी एक का निश्चय रूप होने से और (ग)-'हे राजन्' आपफो यह संभिमान यर्यो है कि तीक्ष्स असिधारा द्वारा जिनके सिर फाट गिराये गये हैं उन 'शायुओों की सम्पत्ति सापने अपना ती है (यात्मसात् कर ती है) ? धयोकि (ननु-यतः)
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२६० कागपकान, 4
ननु तव निह्तारेर्यसी कि न नीता त्रिदिंवमपगताङ्ग वैल्लभा कीर्तिरेभि:।१३४।। इत्यादौ निन्दास्तुतिवपुपा स्वरूपस्य, पूर्वपइचाद्धावेन प्रतीते: कालस्य, शव्दाश्यत्वेन शब्द-तद्देकदेश-तदर्य- वर्शा-संघटनाश्रयत्वेन च आशयस्य, शब्दानुशासनज्ञानेन प्रकरणादिसहाय- प्रतिभानैर्मल्यसहितेन तेन चावगम इति निमित्तस्य, योद्धृमान्नविदुग्घव्यप- देशयो: परतीतिमात्रचमत्कृत्योश्च करखात् कार्यस्य, गतोतमर्क इत्यादौ प्रदशितनयेन संख्याया .- कस्स वा ए होइ रोसो दट्ट या पिभाइ सव्वएं अरहरं। सभमरपडमग्घाइसि वरिश्रवामे सहसु एरिंद ॥१:५।। (कस्य वा न भनति रोपो टप्टूबा प्रियाया: सव्रसमघरम्। सभ्रमरपद्माम्नायिसि वारितवामे सदरवेदानीम ॥१३५॥) इत्यादी सखीतत्कान्तादिगततवेन विपयस्य च भेदेऽपि यद्य कतवं पय्ुसंहारक भी आापको प्रिया रूपी फीति इन मज्जहीन पुरयों के द्वारा वया स्वर्ग को नहीं (सींच) ले जाई गई'।१३४॥ इत्यादि में (याच्यारय के) निन्दार्प औ्रर (व्यङ्गपारयं के) स्ुतिरूप होने से-(१) स्वरप का भेद होने पर भी। (२) (वाच्य के) पहले किन्तु (व्यसथ के) पोछे होने से काल का भेव; 4 (३) (वाच्य के) शम्दाश्रित होने से किन्तु (व्यङ्गय के) शबव, राम्दंकदेश (प्रकृति, परत्यय आादि) शब्दार्थ, बसं तथा रचना पर प्रामित होने से भ्ाभय का मेव, (४) (वाच्य का) व्याकरस, फोश यादि शव्यानुनासन के द्वारा बोध (धयगम) होता है .तथा (व्यन्नपायं का) प्रफरस आदि सहित प्रतिभा की निर्मलता के साप उस (शब्दानुशासन) के द्वारा बोध होता है, इस प्रकार निमित का नेव: (५) (वाध्यायं के) 'केवल शम्दार्य का जञाता है' (बोताप्यं न तु सहव्यः) तथा (व्यस्गधार्म के- "यह सह्वय हैं' (सहृदयोऽ्यम्) इन स्मयहारों के करने से औौर (वाच्य के) देवस प्रतीति (भयं बोध) औौर (व्यङ्गप के) सहृदवों में (प्रतीति के साथ) समत्कार भी करने से कार्य का मेद: (६) 'सूर्व भस्त हो गया' इत्यादि में उक्त रीति से संस्या का भेद-तथा (७). 'अपनी प्रिया के अघरोष्ठ को स्षत देसकर दिस पुद्य को शोष नहों आता ? हे घमर-सहित फमस (पुपप) को सूधने वाली, रेकी हुई (धारिता) भी विन्दाघरण करने वाली (मामा) स्ती सब (अपने किये का फल) भोगो ।१२४। दत्यादि में (वाध्याें के) सुनने याली सलोविययक (गस) सथा (प्वमथार्य) :फे नामक (सा कान्ता यस्य तत्यान्तः) विपपक होने से विषय का भेव-(वाषय मोर असूप में उपनुंकत सात प्रकार का) नेव होने पर भी यवि वाक्य और ध्वमप यषेनों की एक्ता या पनेद हो सकता है सो कहीं भी गीस-पोत भाडि (गुलो
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पञ्चम उल्लास: २६१
तत्क्वचिदृपि नीलपीतादौ भेदो न स्यात्। उक्त हि-'अयमेव हि भेदो भेद्हेतुर्वा यद्विरुद्धघर्माध्यासः कारणभेदश्च'-इति। प्रंथवा इन गुखों वाले घटादि) में भेद न होगा। कहा भी है-(दो वस्तुओं में) भेव तथा भेद का हेतु यही है कि (उनमें) विरुद्ध धर्मों की प्रतीति (अध्यास) हो भौर कारणों का मेद हो। प्रभा-'वाच्यव्यङचयो :- मेदो न स्यात्' इस अवतरण में वाच्य श्रौर व्यङ्गय अर्थ की भिन्नता का प्रतिपादन करने के लिये अन्य ७ प्रकार के भेदों का निरूपण किया गया है। जो इस प्रकार है :- (१) स्वरूप भेद-इसके तीन उदाहरणा दिये गये हैं :- (क) 'निःशेष' इत्यादि में वाच्यार्थ (तुम नही गई) निषेध रूप है; व्यङ्गय भं (तुम गई) विधि रूप है। (ख) 'मात्सयं' इत्यादि में वाच्यार्थ कि भूधराणमुत विलासिनीनां नितम्या: सेव्याः ?' इस प्रश्न में संशय रूप है तथा व्यङ्गघार्थ इसके उत्तर रूप में अर्थात् रामप्रधान लोगों को पर्वत-नितम्बों का सेवन करना चाहिये तथा शृङ्गार- प्रिय लोगों को विलासिनी-नितम्बों का-निश्चय रूप है। (ग) 'कथम् आदि में वाच्यार्थ है 'अङ्गहीन शत्रुओं के द्वारा तुम्हारे जीवित रहते ही आपकी बल्लभा (कीति) का हरण किया जा रहा है अतः गर्व करना अनुचित है'। इससे निन्दा प्रतीत होती है; किन्तु व्यङ्गचार्थ-'समस्त शत्रुओं का संहार करने से आपकी कीति स्वगं में भी पहुँच गई है,' यह स्तुति रूप है। इस प्रकार वाच्यार्थ तथा व्यङ्गयार्थ- में स्वरूप भेद है। (२) काल-भेद-वाच््यार्थ के पर्चात् ही व्यङ्गयार्थ की प्रतीति होती है, यही. काल भेद है। (३) आाश्रम-भेद-शब्द से ही वाच्यार्थ की प्रतीति होती है वह ही अभिया का आश्रय है; 'किन्तु, जैसा ऊपर विवेचन किया जा चुका है, व्यङ्यार्थ का आक्षय तो शब्द, शब्दकदेश (प्रकृति प्रत्यय आदि), शब्दार्थं, वर्स तथा रचना आदि भी है।, उन सभी के द्वारा व्यङ्गघार्थ की प्रतीति होती है-यही आश्रयभेद है। (v) निमित-भेद-व्याकरण, कोग आदि जो शब्द की शिक्षा देने वाले (स्षब्दानुशासन) साधन हैं उनके द्वारा वाच्यार्थं का बोध होता है, वे ही नाच्यार्थ बोध के निमित हैं। किन्तु व्यङ्गार्य की प्रतीति उन सहृदयों को ही होती है, जिन्हे शब्द-बोध के साथ साथ उपयुक्त प्रकरण तथा वस्तृ-वैशिष्ट्य आदि का ज्ञान' हैतथा जिनकी प्रतिभा निर्मल है। अतः व्यङ्गघार्यकी प्रतीति का निमित्त है- प्रकरणादि सहित प्रतिभा की निर्मलता के साथ शब्दानुशासन ज्ञान। यही निमित- भेद है। (५) कार्य-भेद-वाच्यार्थ का कार्य या प्रभाव भिन्न है तथा व्न्पार्थ, का. भिम्न। यह कार्य-भेद दो प्रकार का है- (क) जिसे वाच्यार्भं बाा बोध होना है'
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[५. वाचकत्वव्यञ्जकत्वयोभेंदः] वाचकानामर्थािक्षा व्यञजकानान्तु न तदपेक्षत्वमिति न वाचकत्वमेव व्यब्जकत्वम्। कि च वागीरकुडंग्वित्यादौ प्रतीयमानमर्थमभिव्यज्य वाच्यं
वह तो केवल ोद्धा कहलाता है किन्तु जिसे व्यङ्गथायं की प्रतीति होती है वह बोद्धा के साथ साथ सहृदय पद का भी अधिकारी होता है भतः वाच्यार्य और व्यङ्गथार्थ भिन्न भिन्न व्यवहार रूप (व्यपदेश) कार्य के जनक है। (स) वाच्यार्थ से तो केवल प्रतीति होती है चमत्कृति नही; किन्तु व्यङ्गयार्य से चमत्कार भी होता है। प्रथवा 'व्यपदेश्ययोः ? यह पाठ है तथा एक प्रकार का ही विशिष्ट फार्य-भेद यहाँ दिसाया गया है-'वाच्य के द्वारा व्युत्पप्मान व्यक्ति को केवल प्तीति होती है तथा व्यङ्धय के द्वारा तो विदग्धपदवाच्य (व्यपदेश्य) सहृदय को नमत्कृति होती है।' (प्रदीप)। (६) संख्या नेद-'गतोऽस्तमर्क:' आदि में वाच्यार्थं तो एक ही है; किन्तु व्यङ्गपार्य भिन्न २ श्रोताओं की दृष्टि से अनेक हैं। यही वाच्य औौर व्यन्गप की संस्या मे भेद है। () विषय-मेद-['कस्य ा' इत्यादि में स्व-प्रिया के उपपति द्वारा दप्टभपर को देसकर शुद्ध हो जाने वाले नायक के प्रति अपनी ससी की निरपराधता प्रकट करने के लिये कोई चतुर स्त्री ससी से कहती है] यहां 'ससी' -- प्रकृत नायिका है, तत्फान्त (सा कान्ता मस्य) से गृहपति तथा नापक चव ग्रहस है, 'मदि' शब्द द्वारा 'प्रति- वेशिनी' तथा 'उपप्ति' इत्यादि का प्रहण होता है। यहाँ पर ससी (नाषिका) को भिड़का जा रहा है अतएव (भविनीतत्वरूप) वाच्यार्थ का विषय ससी (नाषिका) है तथा (इसे भ्रमर ने काटा है अन्य किसी ने नही) व्यङ्नघार्यं का विषय नायक है; इसी 'प्रकार मेरी ऐसी चतुरता है' इस व्यन्नथार्यं का पड़ोसिन विषय है तथा 'इसके विषय में और नोई पाद्डा न करनी पाहिये' इस व्यङ्तभायं वन विषय सास मदि है। भतः यहां वाच्या्थ तथा व्यङ्थार्थ का विषय-भेद है। इस प्रकार पूर्वोक्त (बाच्यार्थ सबके के लिये समान होता है हिन्तु व्यङ्गभार् वक्ता थोता आदि के भेद से मिस-भिनन) भेद सहित मुल 5 प्रकार का वाज्य मोर व्यन्षम अप का भेद महा दिसलाया गया है। अनुवाद-[५. घाक और व्यञ्जर का नेव) पाघकों को (सङ्द्रतित) अर्भ की पपेक्षा है किन्तु स्पम्ज्फों को उस (सङ्तनित) धर्म की चपेदा महो, इगलिपे वाघफता हो व्यं्जरता नहीं है। इसके प्रतिरिक 'पानीर बुं्न' अमादि पद (१३२) में, जहां कि प्रतीयमान वर्प (दुम्जपवेश) को म्यक करके (पम्नशिपि- सतारप) याच्य अपने हो स्वरप में रह जाता है (मास्वावन का विषय होता है);
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पञ्चम उल्लास: २६३
स्वरूपे एव यत्र विश्राम्यति तन्न गुणीभूतव्यङ्गथ डतात्पर्यभूतोऽपयर्थ स्वशब्दा- नभिधेय: प्रतीतिपथमवतरन् कस्य व्यापारस्य विषयतामवलम्वतामिति।
वहाँ गुरीभूतव्यङ्गघ (के असुन्दर भेद) में वह व्यङ्गघ-अर्थ जो तात्पर्य का विषयः नहीं तथा (जो) अपने शब्द का प्रभिधेय नहीं, प्रतीति पथ में अवतरित होता-हुम. किस (शब्द) व्यापार का विषय होगा ?
प्रभा-वाच्य और व्यङ्गथ अर्थ में ही परस्पर भेद नही है अपि तु वाचक भर व्यञ्जक भी एक दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं। बात यह कि वाचक तो उसी अंर्थ का बोध कराता है जिसमें उसका सङ्कतग्रहण किया जाता है अतः वाचकता के लिये सङ्कतित अर्थ की अपेक्षा है; किन्तु व्यञ्जकता के लिये ऐसे किसी अर्थ की अपेक्षा नही होती। साथ ही अर्थ भी व्यञ्जक होत है और निरर्थक वर्ए आदि भी व्यञ्जक होते हैं। इसलिये वाचकत्व (-शब्द का अभिधा व्यापार) ही व्यञ्जकत्व (=व्यञ्जना व्यापार) नही है।
वाचकता से व्यञ्जकता सवथा भिन्न है; क्योकि जो अर्थ अभिधावृति तथा तात्प्य वृत्ि का भी विषय नही उसकी प्रतीति किस शब्द-व्यापोर से होगी ? उदाहरणार्थ वानीरकुब्ज इत्यादि (१३२ उदाहरण) में व्यङ्जघार्थ (कुञ्ज-प्रवेश) गोए है तथा वाच्यार्थ (अङ्गशिथिलता) व्यङ्गभ की अपेक्षा विशेष चमत्कारक है)। यह पद्य असुन्दर गुणीभूतव्यङ्गच का उदाहरण है। यहाँ वाच्यार्थ ही तात्पर्य का विषय है; अतः व्यङ्गयार्थ तात्पयंभूत तो हो ही नही सकता। यह अभिधेय भी नहीं है; क्योंकि मीमांसा के 'यत्पर: इत्यादि' न्याय के अनुसारतो जो विधेय (तात्पर्य का विषय) है, वही अभिधेय है; अतएव ऐसे व्यङ्गथ की प्रतीति-हेतु अ्भिधा भौर सात्पर्यवृत्ि से भिन्न कोई शब्दव्यापार अवश्य मानना पड़ेगा। वही व्यञ्जना वृत्ति है। इसप्रकार यहाँ वाचकत्व (अभिधा) और व्यञ्जकत्व (व्यञ्जना) के दो भेद दिखलाये गये हैं-(१) वाचक शब्दों को सक्कतित भर्थ की अपक्षा हीती है, व्यञ्जक को नही। अतः अभिधा और व्यञ्जना दोनो शब्द के भलग-पलग व्यापार हैं। (२) अमुन्दर नामक गुशीभूतव्यङ्गथ में जो व्यङ्गघ अर्थ होता है, वह सात्पर्य का विषय नहीं होता, इसीलिये किसी प्रकार भी अभिधा का विषय नही हो सकता। इस प्रकार अभिधा से भिन्न व्यञ्जना की स्वीकृति मनिवार्य है। • इति शब्द वाच्य व्यङ्गच,वाचक-व्यञ्जक तथा वाचकत्व व्यज्जकत्व के भेद- प्रकरण की समाप्ति का सूचक है।
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२६४ j काव्यप्रकाश:
[६. व्यङ्गया्थों लक्षणावृत्तिबोध्योऽपि न भवति] ननु-'रामोडरिम सर्व सहे' इति, 'रामेण प्रियजीवितेन तु फृतं प्रेम्ः प्रिये नोचितम्' इति। 'रामोऽसी भुवनेपु विक्रमगुएँ: प्राप्तः प्रसिद्धि पराम्' इत्यादौ तक्ष ीयोऽप्यर्थो नानात्वं भजते विशेषव्यपदेशहेतुइच भवति तदवगमश्च शब्दार्थायत्तः प्रकरणादिसव्यपेक्षश्चेति कोडयं नूतनः प्रतीयमानो नाम !" उच्यते, लक्षसीयश्याथस्य नानात्वेऽपि अनेकार्थशब्दाभिधेयवत्रि व्यङ्गयार्थ लक्षणा का विपय नहीं अनुवाद-६. [ध्यङ्जथायं लक्षसा का विषय ही है, यह राद्टा होती है]' (क) 'मैं राम हूँ सब कुछ सहन करता हूँ' (स) 'हे प्रिये सीते'; जिसे अपना जीयन प्रिय है ऐसे राम ने तो प्रेम के अनुकूल नहीं किया' (प) यह राम अपने परारम के, गुों से समस्त भुबनों में परम स्याति को प्राप्त कर घुके हैं'। इत्यादि (उदाहरतो). में (राम का) लक्ष्यार्थं भी नाना [(क) सकलदु स पात्र (त) निप्करस (ग) सर- दूपस निहन्ला हो जाता है, यह (लक्ष्यार्थ) (पर्यान्तरसंकमित सनादि) विशेष,व्य- यहार का विषय होता है और उस (लक्ष्य) का बोध भी शब्द तथा थयं के प्रधीन होता है एवं प्रकरस (वातृ, घोद्ध आदि) आादि सापेक्ष भी होता है। सब यह प्रतोयमान सर्थात् स्वन्नघ नामक थ्ररथं कौनसा है? (उसका कया प्रयोजन ?) प्रभा-जो नैयामिक आदि अभिया से भिन्न लक्षसा को तो मानते हैं; किन्तु- व्यञ्जना को नहीं स्वीकार करते उनकी ओर मे यह राद्ता होती है कि-जिस प्रकार एक ही शब्द के नाना व्यज्यार्यें होते हैं वह अर्यान्तरसंभमितवाच्य ध्वनि- सादि व्यवहार का कारण होता है तथा प्रकरण एवं वम्ृवेशिष्ट्यादि की अपेका रसता है उसी प्रकार के धर्म सकष्य अपों मे भी देसे जाते हैं। जैसे-(i) उपयु कः रामोऽ्स्मि आदि वानयों में राम शब्द के तीन विभिन्न लक्य भर्थ है। (ii) पर्यान्तर- संभमितवाच्य आदि जो विशोषव्यपदेश हैं, उनमें लद्यार्थ भी हेतु होता ही है।- (iii) नक्ष्याथं मो प्रतीति शब्द के द्वारा होती है भतः यह पब्दाधीन है तथा मुर्यायं याय आदि इसके हेतु हैं और उनमें मुस्यायं का ज्ञान आव्यक है भतएव यह मर्मा- धीन भी है घर्वात् जिस प्रकार व्यह्यार्थ की प्रतीति शब्द मौर वर्य के द्वारा होनी है इसी प्रकार लक्ष्यारयं की भी । (iv) व्यज्षपार्य के समान सदमार्य का भी प्ररुरण, तातप्योनुपपत्ति तथा यकतृवंशित्य आदि के सधार पर बप हुआ करता है। जय सक्यायं में व्यसुप की प्रामः सभी चाते है तो व्यङ्तष भी सदप के भन्तगंत है औौर सक्षसा से उमरी प्रतीति हो सकती है, फिर व्यज्गप नामक सर्भ मो व्यज्मना मेों पृथक मानने की कपा मायसयकता है ? पूर्व पक्षी का यह ममिप्रांत है। अनुवाद -: उत्तर) मतसाया जाता है-(१) सक्षसीय ममं की पनेरसा होने पर भी यह नाना सर्प वाले (सन्धय मादि) सब्दों के बादय-सर्य के गमान:
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पञ्चम उल्लास: २६५
यतत्वमेव, न खलु मुख्येनार्थेनाऽनियतसम्बन्घो लक्षयितु शक्यते। प्रतीयः मानस्तु प्रकरणादिविपयवशेन नियतसम्वन्घः, श्रनियतसम्यन्वः सम्वद्ध सम्चन्घइच घोत्यते। न च अत्ता एत्य सिमब्जइ एत्थ अहं दिश्रहए पलोएहि। मा पहित्र, रतिअ्रन्ध्र, सेज्जाए मह गिमज्जहिसि ॥१३६॥।- (श्वश्ररत्र निमज्जति अप्रन्राऽहं दिवसके प्रल्ोकय। मा पथिक, रात्यन्घक, राय्यायामावयोर्निमंत्यसि ।१३६।।), + इत्यादौ विवस्ितान्यपरवाच्ये ध्वनी मुख्यार्थवाघः तत्कथमत्र लक्षया ? लक्षणायामपि व्यव्जनमवश्यमाश्रयितव्यमिति प्रतिपादितम्। 1: यथा च समयसव्यपेक्षाऽभिघा तथा मुख्यार्थवाघादिन्नयसमय- विशेषसव्यपेक्षा लक्षणा, अप्रत एवाभिधापुच्छभूता सेत्याहु:। 11 न चं लक्षणात्मकमेव ध्वननम्, तद्सुगमेन तस्य दर्शनात्। न च तदनुगतमेव, अभिघावलम्पनेनापि तस्य भावात्। न चोभयानुसार्येव, अवाचकवर्मानुसारेखापि तस्य दृष्टेः। न च शव्दानुसार्येव, अशब्दात्मंकः नियत (नियत सम्बन्ध चाला) ही है; क्योंकि मुख्य-अर्थ से जिसका (सामीष्य- सादृश्यादि) नियत सम्बन्ध नहीं वह लक्ष्यार्थ नहीं हो सकता। किन्तु प्रतोयमान (व्यङ्गघ) अ्थं तो प्रकरस आदि विशेष के फारस नियत सम्बन्ध वाला भी प्रफट होता है, जिसका कोई नियत सम्बन्ध नहीं ऐसा भी तथा जिसका सम्बद्ध से सम्बन्ध है-ऐसा भी अभिव्यक्त होता है। (२) और 'शवधू' इत्यादि (उदाहरसा २३) विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि में मुख्याथंबाध नहीं होता तो यहां लक्षा कंसे? (३) लक्षसा में भी (प्रयोजन-प्रतीति के लिए) व्यञ्जना का अवश्य आश्रय लेना पड़ता है यह (द्वितीय उल्लास 'यस्म" प्रतीतिमाघातुम आदि में) प्रतिपादित किया जा चुका है। (४) और जिस प्रकार परभिधा सङ्गेत-सापेक्ष है इसी प्रकार लक्षणा भी मुख्यार्थबाघ आदि तीन प्रफार के सङ्गृत-विशेष की अपेक्षा रखती है। इसोलिये वह (लक्षखा) अभिघा की पुच्छरुप (पछ के समान अर्थात् पोछे चलने वाली) है ऐसा कहते हैं। (x) व्यञ्जन-व्यापार लक्षसात्मक ही नहीं है; कयोंकि उस (लक्षसा) के पश्चात् इस (व्यञ्जना) फी (प्रवृति) देखो जाती है। यह सवंत्र लक्षणानुगत ही नहीं. होता; बयोकि अभिधा के आधार पर भी (अनेकार्थेक शब्दों फो व्यञ्जना के स्थस पर-'भद्रात्मनः' १२ आदि में) यह विद्यमान रहता है। यह इन दोनों (पभिघा औोर लक्षसा) का (नियम से) अनुसरण फरने वाला ही नहीं है; वर्योंकि जो (किसी अर्थ के) वाचक नहीं ऐसे (व्यञ्जक) वस आदि के आधार पर भी यह देसा जाता. है। यह शब्द का अनुसरस करने वाला ही नहीं है; वर्योकि शब्द से भिन्न जो नेष-
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२६६ j कंाव्यप्रकारी:
नेत्रत्रिभागावलोकनादिगतत्वेनापि तस्य प्रसिद्ध:। इति, अभिघातात्र्य- लक्षणात्मकव्यापारत्रयातिवर्ती ध्वननादिपर्यायो व्यापारोडनपलपनीय एव। तन्न अत्ता एत्थ इत्यादो नियतसम्बन्धः । 'कर्स वा स होइ रोसो'
कटाक्ष (त्रिभाग) द्वारा अवलोकन आदि हैं तद्गत भी व्यञ्जनाम्पापार प्रसिद् है। भतएव सभिधा, तात्पय तथा लक्षसा रूप तीनों (शब्द) व्यापारों के भतिरिक्तक ध्यनन (व्यञ्जना) धादि है पर्यामवाची जिसके ऐसे शब्द-व्यापार का अपसाप नहीं किया जा सकता। प्रभा-व्यङ्गयायं या प्रतीयमान घर्थ लक्ष्यार्थ से भिन्न है' यह सिद्ध करते हुए ग्रन्थकार 'उच्यते' मादि मवतरण द्वारा पूर्यपक्षी की पङ्का का समाधान करते है। लक्ष्यार्थ औौर व्यङ्गथार्थ को भिन्न २ मानने मे निम्न हेतु हैं- (१) यद्यपि एक शब्द के सनेक लक्यार्थ भी हो सकते हैं तथापि ये नियत ही होते हैं किसी 'समीप्य आदि' नियत सम्बन्ध के आधार पर ही लक्ष्यायं का बोध होता है उसके बिना नहीं, मयोंकि मुख्यारय से सम्बद्ध (तदयोगे) अर्थ में ही तक्षसा होती है। किन्तु व्यङ्गय अर्थं का प्रकरण आदि के आधार पर मुस्यायं से सम्बन्य होता भी है तो वह सदा नियत सम्बन्ध ही नहीं होता, क्योंकि (जैसे कि १३७ प्रादि भग्रिम उदाहरणों से स्पष्ट होगा) कभी यह सम्बन्ध परनियत होता है, शभी साक्षाद् सम्बन्ध न होकर परम्परा से ही होता है। (२) मुख्यार्थ वाघ होने पर सकषसा होती है; किन्तु 'पत्ता' (स्वय) इत्यादि विवश्षितान्यपरवाच्य ध्वनि के उदाहरण में मुस्यार्थ बाघ नहीं, फिर यहां जो व्यस्नम अयं प्रतीत होता है, उसमें लक्षरा कसे हो सकती है थ्यञ्जना तो होती ही है; फ्योंकि यह बिना मुस्यार्थ-बाघ के भी हो जाती है। (३) सकसा में भी प्रयोजन की प्रतिति के लिये व्यञ्जना था सहारा सेन। पड़ता है। (४ जिस प्रकार भभिया सस्ट्रेत पर निर्भर है इसी प्रकार तक्णा मुस्यारमं वाध भादि तीन प्रकार के समयों (Condition) पर निर्मर है। (५) व्यं्जना व्यापार लक्षा से निवान्त भिसन है, मनोकि (क) सरूपार्य के वाद, (स) सदका के बिना भी भभिया के सधार पर, (ग) सदासा मोर भभिया दोनों के बिना भी अवाचक वररं के द्वारा तथा (प) शन्द के बिना भी फटाश मादि से व्यद्प पर्थे की प्रतीति हमा करती है। इम प्रकार सं्जना सराला मे सर्वपा पृषक राष्द्वृत्ि है। अनुवाद-उन (नियत-सम्बन्य सदि म्यसुभों) में 'पता' (दपयू) इवाि में नियत सम्बन्ध याला (ध्पसुप) है। 'पस्य या न' (१२५ उदाहरए) इत्यादि में पमियत सम्बन्य पासा (व्हप) है तथा-
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पन्चम उल्लास: २६७
चिपरीअरए लच्छी वम्हं दठ्ठूस साहिकमलट्ठं। हरिणो दाहिएएाअएं रसाउला मत्ति ढक्फेइ।१३७॥ (विपरीतरते लक्ष्मीत्र झाएं दृष्टवा नाभिकसलस्थम्। हरेदक्िएनयनं रसाकुला फटिति स्थगयति ।।१३७।।) इत्यादी सम्बद्धसम्बन्ः । श्रत्र हि इरिपदेन दव्िसनयनस्य सूर्यात्म- कता व्यज्यते। तन्निमीलनेन सूर्यास्तमयः, तेन पद्मस्य सङ्कोच:, ततो ब्रह्मण: स्थगनं, तत्र सति गोप्याङ्गस्यादर्शनेन अ्र्प्पनिर्यन्त्रएं निधुवनविलसितमिति। [७. ब्रह्मवादिभिरपि व्यञ्जनाउङ्गीकार्या] + - पखएडबुद्धिनिर्म्रा्यो वाक्यार्थ एव वाच्य: वाक्यमेव च वाचकम् इति येडप्याहु:, तैरप्यविद्यापदपतितैः पदपदार्थकल्पना कर्तव्यैवेति तत्पक्षे ऽप्यवश्यमुक्तोदाहरखादी विध्यादिव्यङ्य एव। 'विपरीत रति के अवसर पर (विष्यु के) नाभि-कमल में स्थित ग्रह्मा को बेख कर लक्षमी सुरताकुल होकर विष्यु के दक्षिरा नेत्र को ढक लेती है ॥१:७॥ इत्यादि में (व्यङ्म्चार्थ) सम्वद्धसम्बन्ध है (अर्थार्त् वाच्यार्थ से सम्बद्ध अरथं के साथ व्यच का साक्षात् सम्बन्ध है तथा वाच्यार्थ के साथ अपत्यक्ष सम्बन्ध है); क्योंकि यहाँ 'हरि' पद से दक्षिण-नेत्र का सूर्य-रूप होना व्यञ्जना द्वारा जाना जाता है; (सूर्यचन्द्र विष्यु के दक्षिण तथा वाम नेत्र के रूप में पुरालों में प्रसिद्ध हैं)। उसके मूदने से सूर्यास्त होना (व्यङ्गय है), उससे कमल मुंदना तथा उस (पद्मसङ्गोच) से ब्रह्मा का ढक जाना व्यङ्गघ है, ब्रह्मा के तिरोहित हो जाने पर (सन्न सति) गोपनीय अङ्गो के दिखाई न देने के कारए भबाध रूप से सुरत (निधुवन)-विलास व्यङ्गय है (व्यज्यते)। प्रभा-इस प्रकार यहाँ सम्बन्ध-परम्परा के आधार पर प्रतीति-परम्परा होती है, अतः व्यङ्ग सम्बद्धसम्बन्ध है। अनुवाद्-७. जो (वेदान्ती) यह कहते हैं कि-'अखण्ड (करिया कारक आदि विभाग का बोध न करने वाली) बुद्धि (ज्ञान Cognition) के द्वारा ग्रहस किया जाने योग्य वावय का अर्थ हो वाच्य है तथा (अखण्ड) वाक्य हो वाचक है (पतः व्यङ्ग याथं में भी वायय को शक्ति है) । अ्रविद्या के चरसों में पतित पर्थात् संसार दशा में अविद्याकृत व्यवहार का पलम्बन करने वाले (अविद्यापय' पाठान्तर है) उन लोगों को भी पद तथा पदार्थ की कल्पना करनी ही पड़ेगी अतः उनके भत से भी उपयुक्त (निःशेष० इत्यादि उदाहरस में) विधि (तुम जस प्रधम के पास हो गई) आदि व्यङ्गथ ही है। प्रभा-ब्रह्मवादी वेदान्तियों का सिद्धान्त है-कि वाक्य भ्रखण्ड है उसमें क्रिया-कारक आदि का विभाग नही हो सकता, क्योंकि त्रियाकारक-भाव तो धर्म- धरमिभाव के आश्रित है और संसार मिथ्या है; अतः इसमें ध्मधमिभाव कैसे बन सकता है ? ब्रह्म निगुंख है अतः उसमें भी धर्मधमिभाव सम्भय नहीं। इसलिये,
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२६८ 1 काव्यप्रकारी.
[८. नानुमानादपि व्यङ्गचप्रतीति: ] ननु वाच्यादसम्वद्ध तावन्न प्रतीयते यतः कुतश्चिद् यस्य कस्यचिद्- पदनपदार्थ-विभाग से शून्य वावय असण्ड ही है। उमका भर्थ-ग्रहण भी भ्रसण्डरूप में ही होता है; अर्थात् वाक्यार्य-बोध में बुद्धि करिया-कारकादि-भाव को प्रहण नहीं करती; अपि तु एकरस मखण्ड वाक्यार्य का ग्रहए करती है। इस प्रकार वारय ही वाचक है और वावपार्थ ही वाच्य है तथा वज्गम सर्थ का भी वायम द्वारा ही योभ हो सकता है। उनको उत्तर देते हुए आचाय मम्मट कहते हैं कि इस मायामय संसार में भांकर जैसे उन लोगों ने सनेक भेद-प्रभेदों की कल्पना की है, पारमायिक ग्रह के भतिरिक्त व्यावहारिक सत्य को भी स्वीकार किया है। इसी प्रकार उन्हें परमामंतः मखुण्ड वाक्य मे भी पदनदार्थ की कल्पना करनी ही पड़ेगी। इस प्रकार की (परभिषाकृत) कल्पना के बिना तो भरण्ड अरथं के साथ प्रसण्ड वाक्य का वाच्य वाचका-भाव मो नहीं वन सकता क्योंकि परमायंतः सो वाचक मोर वाच्य में भंद नहीं। इसलिये व्यवहार दशा में (=भविद्यापदपतितः) वेदान्तियों को भी उपयुक्त व्यस्तम तथा व्यञ्जनावुति को स्वीकार करना नाहिये। इस प्रकार मुद्ध (प्रदीप, सारबोधिनी, वालबोधिनी) टीकाओों के. अनुसार यहां बेदान्तियों के मत की मालोचना की गई है। दूसरी (प्रभा भदि) टीवार्मी के अनुसार यहाँ गव्दवहावादी वैयाकरणों की भलोचना है। भनुहरि की स्पापना है कि असण्ड याकयस्फोट ही परमार्थतः सत्य है, पद, वएं आदि तो फस्पित ही हैं। केवल प्रमिया दशा में (सविद्यापदपतियैः=अवर्ये वतर्मनि स्थित्या, वास्यपदीय) ही वैयाकरणों ने पद-पदार्थ आदि के विभाग को स्वीरार किया है। मम्मद का कथन है कि प्रत्रिया दशा में धंयाकरणों को व्यसम भर्ग तथा व्यञ्जनायुत्ि को मी र्वीकार करना होगा। वस्तुतः वेदान्ती औोर यँमाकरए दोनों ने प्रमण्डवाक्य का सिद्धान्त माना है। यहां मम्मट ने दोनों के मतों को ही रामान रूप से मालोनना को है। टिम्पलो-ध्वन्यालोरुयोचन के अनुसीलन से यह विदित होता है कि यहा वैयाकरशों की आलोचना फी गई है-येत्प्यविभरतं रफोर्ट याश्यं तरयं पाठन सैरव्यविद्यानदपतित: सवयमनुसारखोया प्रकरिया (ध्वन्मालीफ्लोगन १४] । हिन्नु" नवीन वैवापरखों ने तो उपं्जना का विसाद विवेनन किया है पौर उगमे शयोनों ी उक्तियों पो आामार रूप में प्रस्तुत भी किया है (द्र०, मपुमज्जुषा) 1 समः तष्य यह है कि साहिश्यशास्त्र के समान व्याकरण शास्त्र में भी व्मनापुति या स्वष्ट विपेयन भर्वाचीन युग को देव है। सग्पिः) माच्य-पर्थ से सम्बन्ध न रने वाले मर्य को मो प्रतीति नहीं होती महो
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पञ्चम उल्लासः २६६
र्थस्य प्रतीते: प्रसद्गादु। एवं च सम्बन्धात् व्यङ्गधव्यञ्जकभावोऽप्रतिबन्घे डवश्यं न भवतीति व्याप्तत्वेन नियतधर्मिनिष्ठत्वेन च त्रिरूपाल्लिङ्गा- ल्लिदिज्ञानमनुमानं यत् तद्र पः पर्यवस्वति। तथा हि- भम घम्मिअ वीसद्वो सो सुएओ अज्ज मारिश्रो तेएा। गोलाएईकच्छकुडङ्गवासिका दरिशसीहेय ॥१३८॥ (भ्रम धार्मिक विश्रव्धः स शुनकोऽय मारितसतेन।
i .. गोदनदीकच्छकञ्जवासिना दप्तसिंहेन ।।१३८।। श्रत्र गृहे रवनिवृत्त्या भ्रमएां विहितं गोदावरीतीरे सिंहोपलव्घेर- 'भ्रमयानुमापयति। यद् यद् भीरुभ्रमं तत्तङ्भयकारणनिवृत्त्युपलब्घि- पूर्वकम्, गोदावरीतीरे च सिंहोपलब्धिरिति व्यापकविरद्वोपल्घिः। (यदि अ्सम्बद्ध की प्रतीति होवे) तो जिस किसी शब्द से भी जिस किसी अर्थ की प्रतीति होने लगे। और, इसप्रकार (किसी) सम्बन्ध से होने वाला जो व्यङ्गघ- व्यञ्जकभाव है वह निय्तसम्बन्ध अर्था्त् व्याप्ति के न होने पर (अ्रप्रतिबन्धे) नियम से न होगा; इसलिये सपक्ष में होना (व्याप्तत्व-सपक्षसत्त्व), विपक्ष में न होना (नियतत्व=विपक्षासत्व) तथा पक्ष में होना (धर्मो=पक्ष, धर्मिनिष्ठत्व= पक्षसत्व) इस त्रिक्प लिद्ग (हेतु) से लिङ्गी (साध्य) का ज्ञानरूप जो अनुमान है, व्यङ्जपव्यञ्जकभाव भी उस अनुमेयानुमापकभ।व (तद पः-अनुमित्यात्मकः) रूप में हो पर्मवसित (परिसात) हो जाता है। जैसे कि-'हे धार्मिक, अब निश्चिन्त होकर श्रम करो; क्योंकि गोदावरी नदी के फछार के कुं्जों में रहने वाले दपयुक़ सिह ने उस कुत्ते को आ्राज मार दिया है' ॥१३८॥। (सङ्कतस्थान की ओरर पुष्पचयनार्थ जाने वाले किसी धार्मिक के प्रति एक अभिसारिका की) इस (उकति) में कुत्ते के समाप्त हो जाने से घर में विचरण का विधान किया गया है, जो सिंह की स्थिति के ज्ञान द्वारा गोदा/वरी-तीर पर भ्रमण निषेध का अनुमान कराता है-(व्याप्ति का स्वरप है) जो (जहा) भीह का भ्रमण है उसके पूर्व (नियम से) भय-फारण के अभाव का ज्ञान होता है और गोदावरी के तीर पर सिंह की उपस्थिति का ज्ञान है-इस प्रकार (भीरत्रमस के) व्यापक (भयफारणानुपलब्धि=भयकारण के ध्रभाव का ज्ञान) के विरुद्ध (सिंहुरूप भयकारस) फो उपलब्धि हो रही है। प्रभा-अभिधा, लक्षणा तथा तात्पर्यवृत्ि द्वारा व्यङ्गभार्थ की प्रतीति नहीं हो सकती, अतः उमकी प्रतीति के लिये व्यञ्जना नामक वुत्ति वो स्वीकर करना 1 पड़ता है-यह सिद्ध हो जाने पर भी 'व्यक्तिविवेक' ग्रन्थ के निर्माता महिमभट्ट व्यञ्जना-वृत्ति का विरोध करते हुए कहते हैं'कि अनुमान द्वारा ही व्यन्नधार्ष की प्रतीति होती है; क्योंकि व्यङ्गपार्थ वाच्यार्य से नितान्त असम्बद्ध तो होता नही, यदि ऐमा होता तो किसी भी शब्द से किसी सर्थ कौ व्यञ्जना होने लगती। इमलिये
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-२७० काव्यप्रकार:
वाच्य औोर व्यङ्गप में सम्वन्ध है और इनी सम्बन्ध से व्यज्तुपव्पञ्जकुमाव बनता है। यह सम्बन्ध भी नियत सम्बन्ध है-जिसे व्याप्ति या प्रतिबन्ध कहते हैं। उस सम्वन्ध के नियमित होने के कारण ही सहृदयों को नियमतः ब्यल्लय की प्रतीति होवी है। अतः व्यङ्गभव्यञ्जकभाव वस्तुतः अनुमाप्यानुमापक रूप है प्रोर व्य्गय प्रतीति भनुमिति ही है। कसे ? 'त्रिरुपात् सिद्धात् सिङ्गजानम् अनुमानम्' भर्षात् निर्प हेतु द्वारा साध्य का ज्ञान ही पनुमान है। लिन्ग की निरूपता का पभिप्राय है- पक्ष में होना (पक्षसात्व), सपक्ष में होना (सपक्षसत्त्व) और विपक्ष में न होना (विपक्षासत्व)। उदाहरणाथं ूम प्र्प्रग्ति का सिद्ध या शापक है औौर 'पर्वतो यह्नि- मान् धुमात्' यहा पवत में वह्ि साध्य (लिङ्गी, है। यहाँ धूम पवस रूप पक्ष में विद्यमान है, पाकमाला रग सपक्ष मे विद्यमान है किन्तु गरोवर रप.विपक में नहीं है। अतएव यह घूम सक्षमानयमम्पस लिंज्न है। प्रकृत मे 'व्य्जक' ही हेतु या सिन्ग है तथा 'व्यङ्गय' माध्य य लिसी है। यहाँ भी व्यञ्जक रूप लिस में व्याप्तल (सपक्षसत्व) है अपर्थात् प्रसिद्ध व्यङ्गथायों के स्थल में ध्पश्नक प्रवस्म रहता है। इसमें नियतत्य (विपशासत्व) है अरान वाच्य आदि स्यनों में व्यम्जक नहीं होता और इसमें धर्मिनिष्ठत्व (पक्षरात्व या पकवुत्तित्व) भी है अर्थात् जिशासित व्यहुप स्थल में भी व्यन्जक विद्यमान है। अतएव अन्जक द्वारा अज्य की प्रतीति मनुमान ही है। ध्यङ्थ के एक प्रसिद्ध उदाहरण में ही देसिये- 'भ्रम धार्मिक' इत्यादि में सिहकृतरवनिवृति से गृह-भमस का विगान' रूप वाच्यायं ही व्पं्जक है। इसके द्वारा परा प्रकार व्यप्तिग्रहण होता ह-मघद भीऱ- अरमसां ततद् भयकारणाभावमानपू्वकम्'। रिन्तु गोगवरी के तट पर सिंह की उपलब्धि है अतः वहा भीर-भ्रमस य निरषेध (व्यजय) है नयोकि भीषसमल (प्रतिपेध्य) के व्यापक भयायणनुपरव्यि के विरुद्व सिह की उतन्धि हो रही है। मतः'भनुमान का स्वरप यह होता ह-गोवावरीतोरं भौरभ्रमणायोग्यम् भवरारत 'सिहोपलब्बे: (थन्नवं तन्नेयं थया ुहम्)। जिम प्रकार यहां अनुमान द्वारा वपमृम की प्रतीति होती है इसी प्रकार 'रस मा्दि की पभिव्यवित भी अनुमान द्वारा ही हर सकती है मतः स्ञ्जना पृवि की कल्पना निरषंक है-यह भाव है। टिप्प्ली-(i) य्यकिवियेनकार का गत संक्षेप मे निम्न प्रकार है- पगुमानेन्तर्भावं सवस्पंष ्वनेः प्रकाशमतुम्। व्यक्तियिवेकं कुरते प्रसम्य महिमा पर्रा वाघम्। तथा-वाज्यान्तिराभिप्यको य सामप्रीप्टा निवन्धनम्। - संधानुमितिपक्रे नो गमरुर्वेन सम्मना।। 4
पार्न विमाषादिम्यो रतादोनो प्रतोनि: सानुमान एवानाभंवियुमरति। विनाया नुभाव्यभिचारिप्रतीनिि रसाप्रिती मे: सामनमिप्पते।
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पञ्चम उल्लास: [ २७१
अ्त्रोच्यते-भीरूरपि गुरो: प्रभोर्वा निदेशेन, प्रियानुरागे, अन्येन चैवंभूतेन हेतुना सत्यपि भयकारणे भ्रमतीत्यनैकान्तिको हेतुः। शुनो विभ्यदृषि वोरत्वेन सिंहान विभेतीति विरुद्धोऽपि। गोदावरीतीरे सिंह- सद्भाव: प्रत्यक्षादनुमानाद्वा न निश्चितः, अपि तु वचनात्, न च वचन- स्य प्रामाएयमस्ति अर्थेनाप्रतिबन्धादित्यसिद्धश्च । तत्कथमेवंविघाद्ध तोः साध्यसिद्धि:।
(ii) काव्य प्रकाश में यहाँ पर सिङ्ग तथा व्याप्ति आदि का वणंन बौद्धन्याय के अनुसार किया गया है-अ्र्रनुमान द्विधा, स्वार्थ परार्थ च। तन्न स्वायं त्रिरुपाल्लिङ्गाद्यदनुमेये ज्ञानं तवनुमानम्। ...... । त्ररूप्यं पुनः लिङ्गस्यानुमेये सत्वमेव, सपक्ष एव सत्वम्, असपक्षे चासत्वमेव निश्चितम् । ...*** व्यापकविरुद्धोप- लब्धिर्यथा-नान् तुपारस्पर्शोजनेरिति। (न्यायविन्दु, द्वितीय परिच्छेद) अनुवाद-(महिमभट्ट के मत का खण्डन) इस पर कहते हैं-(फ) भीर पुरथ भी गुरु अथवा स्वामी को आज्ञा से या प्रिया के अनुराग तथा ऐसे ही किसी अन्य हेतु से भय का कारण होने पर भी (भय के स्थान पर) घमता है: इसलिये (उपयुंक्त्त) हेतु अनंफान्तिफ है। (स) कुत्ते (के स्पर्श) से डरता हुआ भी (कोई पुर्ष) वीरता के फारस सिंह से नहीं डरता, इसलिये यह (हेतु) विरुद्ध भी है। :(ग) तथा गोदावरी-तट पर सिंह की विद्यमानता प्रत्यक्ष या अनुमान द्वारा तो निश्चित की नहीं गई किन्तु फेवल वचन से ही और अर्थ के साथ नियत सम्बन्ध न होने के कारए (इस) वचन की प्रामासिकता नहीं है, इरालिये (हेतु) असिद्ध भी है। तब इस प्रकार के (अनकान्तिकतादिदोपयुक्त) हेतु से साध्य को सिद्धि कैसे हो सकती है? प्रभा-महिम-भट्ट के अनुसार मह अ्नुमान का स्वरूप बनता है-'गोदावरी- तोरं (श्व) भीरुभ्नमणयोग्यं भयकारणसिंहोपलब्धेः' अर्थात् गोदावरी तट भीरुत्रमण के अयोग्य है, क्योकि वहाँ भय के निमित्तभूत सिंह की उपलब्धि होती है। यहां पर 'भयकारमसिहोपलब्वि' हेतु है और 'इवभीरुभ्रमरायोग्यत्व' साध्य है। आचार्य मम्मट का-कथन है कि यह हेतु सद्-हेतु नही अपि तु असद्-हेतु है-हेत्वाभास है; अतएव, इससे साध्य की सिद्धि नही हो सकती। यह असद्-हेतु कसे है ? बात यह है कि 'कुत्ते से डरने वाले-(श्वभीरु) के लिये गोदावरी-तट भ्रमण-योग्य नही. यहां प्रदन यह है कि (i) वह स्वभाव से ही भीरु है या (ii) स्वभाव से वीर है या (iii) सामान्य स्वभाव वाला है। प्रथम पक्ष में तो महिम-भट्ट का हेतु सव्यभिचार (व्यभिचारी या अनकान्तिक) है; क्योंकि स्वामी या गुरु के आदेश आदि से भीर स्वभाव वाले व्यक्ति का भी भय के स्थानों पर भ्रमणा देखा जाता है। तृतीय पक्ष (सामान्य स्वभाव) में भी यही दोप है। द्वितीय पक्ष में हेतु विरद्ध है, बमोकि मुत्ते
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२५२ काव्यप्रकाश:
तथा निःशेषच्युतेत्यादौ गमकतया यानि चन्दनफयवनादीन्युपा प्तानि, तानि कारणन्तरतोडपि भवन्ति पतशचान्रैय स्नानकार्यतेनोका नीति नोपभोगे एव प्रतिवद्धानीत्यनैकान्तिकानि। व्यक्तिवादिना चाघमपदसहायानामेपा व्यन्जफत्वमुत्तम् ।न . :
चान्नाधमत्व प्रमाणप्रतिपन्नमिति कथमनुमानम। पवंविधादर्ादेवंविधो 5र्थ उपपत्यन पेक्षत्वेऽपि प्रकाशते इति व्यक्तिवादिन: पुनातद् शदूपसम्। के स्पयं से डरने वाला भी यदि बीर है तो सिंदयुक्त देश में चला जाता है। इनके प्रतिरिक्त यहा पर भयकारण सिंह को उपलब्धि (हेतु). असिद्ध भी है; कर्योकि मोदावरी तट पर सिंह का ज्ञान प्रत्यक और अनुमान आादि द्वारा नहीं हुमी; भपि ु (एक कुलटा के) वचन द्वारा हुय है जो प्रामाशिर नहीं कहा जा सफता। इस प्रकार सिंहोपलव्धि रूप हेतु का पक्ष में होना निश्चित नही है रया यह स्वरंपासित हेत्याभास है (स्वरपाशिद्वस्तु रा उच्यते य हेुराभ्ये नैवगम्े तर्फभापा) जंब यह हेतु ही दुप्ट है तो इसने साध्यसिद्धि कसे हो सनती है? भरः यहाँ पर अमए निषेध रूप व्यन्तयार्थ सनुमान म विषय नहीं हो सकता। अनुचाद-इसी प्रकार 'निशेषच्युत' इत्यादि में जो 'धन्दन-सूटना' यादि समभोग के शापक के रूप में कहे गये हैं, वे 'अन्य परकों से भी हो सकते है, 'इसीलिये 'निःशेषच्युत' इत्यादि (श्लोफ) में ही (भग्नंस) इन (चन्दन सू टमा आवि) को स्नान का कार्य कहा गया है; अतएर समभोग के साम ही इनरा नियत सम्यम्म नहीं है तथा ये अनकान्तिक है। व्यजनाबादी ने तो जिनका सहापफ सथम पव है ऐसे इन (चन्दनभ्यपन 'आादि) पदों को व्पज्जकता चतताई है। यहाँ पर धथमता भमालों से तो बंषभारित है नहीं; इसलिये (परघमता के पशरधर्मता स्वेह के वनरल) सनुमान कमे हो सक्ता है। व्याप्ति यादि (उपपत्ति) की सपेक्षा किये बिना ही 'इस प्रकार के धरप से इम प्रिकार पा भर्य प्रकट हो जाता ह- इस मत को मागने माले (इति) प्यम्ननाचारी - के मत में तो यह फोई दोष ही नहीं। प्रभा-'भम यामिक' दत्वादि ध्यनिकारोत उदाहरस में महिगभट्ट ने पनुमान दिमसाया या उसरा सण्डन कार किया जा चुका है। यहाँ पर धापान 'मम्मट स्वकोम उदाहरण 'निवेशयुत' पत्मानि में भी सनुमान का निशावरस करते है तंथा वह उजनि का स्थन ही है यह मिल करते हैं। मान यह है कि पनुर्मितियाडी "नि.दोप' धादि स्थल में 'पन्दन-यन' मादि को उपभोग ना गमकु या अनुनाक चनसाँव है। किन्तु मन्दन छटना मादि सो स्नानआादि में दाग भी हो मर्ता है। . मंसः 'नन्दन-व्ववन' का 'उपभोग के मा निवसनम्बनप (प्रतिबन्म या स्वापिति) नही, 1 फिर इसे उपभोग की सनुमिति एंसे सो गरती है? 'नन्वन-स्वपनावि' हेवु गम्पनियार 1ह-मसद हेतु है; पउः उमसे माध्यनमति नरी रो सरजी।
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पञ्चम उल्लास: [ २७३
इति काव्यप्रकाशे ध्वनिगुगीभूतव्यङ्गयसङ्गीर्भेद- निएयो नाम पञ्चम उल्लास: ।।५।। 'चन्दनच्यवनादि' के द्वारा उमके समीप गमन' (उपभोग) रूप अर्थ की व्यञ्जना तो 'अधम' पद की सहायता से हो जाती है। यदि अनुमितिवादी कहे कि प्रधम पद की सहायता से ही अनुमिति भी हो जायेगी तो यह कहना उचित नहीं। बात यह है कि यहाँ पर नायक की 'अधमता' का ज्ञान किसी प्रत्यक्षादि प्रमाण से नहीं हुआ, केवल कोपाकुलिता नायिका का यह कथन है; अतएव 'अधमता' का निश्चय नही और 'नायक मे अ्रधमता है या नहीं' इस प्रकार का पक्षधर्मता का सन्देह ही हो सकता है अत. यहां सन्दिग्धासिद्ध है और अनुमान नही हो सकता। किन्तु व्यञ्जना मे किसी व्याप्ति आादि की आवश्यकता है ही नहीं; वहाँ तो सहुदयों का यह अनुभव ही व्यङ्गयार्थ की अभिव्यक्ति करा देता है कि 'ऐसे व्यन्जक से ऐसे अर्थ की व्यञ्जना हो जाया करती है' इस प्रकार सम्भावना मान से ही व्यङ्गच-प्रतीति हो जाती है, और व्यञ्जनावादी के मत में कोई दोप नहीं आता। टिप्पसी-व्यङ्ग यार्थ की अनुमिति मानने वाला वाद ध्वनिकार से पूर्व भी प्रचलित था, महिमभट्ट इस अनुमितिवाद के विशेष समर्थक रहे अतएव काव्य- प्रकांश के टीकाकारों ने विशेपतः महिम-भट्ट का ही नाम लिया हे। आनन्दवर्घन तथा अ्रभिनवगुप्त दोनों ने ही अनुमितिवाद की सङ्का का समाधान किया है- 'य यात् भस्त्यतिसन्धानावसरः। व्यञ्जकत्वं शब्दानां गमकत्वं तच्च लिङ्गत्वम् प्रतश्य व्यङ्गघप्रतीतिलिङ्गपतीतिरेवेति सिङ्गतिद्धिभाव एव तेपां व्यङ्गपव्यज्ज भावो नापर कश्चित् ...... । न पुनरयं परमार्थो मद् व्यञ्जफत्वं लिङ्भत्वमेव सवंत्र, व्यङ्गथप्रतीतिश्च लिद्धिप्रतीतिरेघेति। (ध्वन्यालोक ३-३३) इस प्रकार काव्यप्रफाश में 'धवनिगुसीभूतव्यङ्गभ-सङ्गोएंभेदनिएय' नामफ यह पञ्चम उल्लास समाप्त होता है। इति पर्चम उल्लास्ष:
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पथ पष्ठ उल्लासः
(७०) शब्दार्थचित्रं यत्पूर्व काव्यद्वयमुदाहृतम्।
न तु शब्दचित्रेडर्थत्याचित्रत्वम अर्थचित्रे वा शब्दूरय। इस पच्ठ उन्नार में निम काव्य के भेदें का विवेचन किया जा रहा है। पनुवाद-शव्द-वित्र और अय-चिन्न नामरु जो (पयम) काम्य के हो प्रकार कर (प्रयम उल्लास में) उदाहरसपूर्यक (श्यचछन्द्र०' तथा विनिगंत) कहे गये हैं, उनमें घिन-शब ([anciful word) तथा चित्र-सर्य fanciful meaning) दोनों की प्रधान तथा प्पथान रप से स्यिति होती है। ऐमा नहीं है कि शम-चित्न में मर्य का वंचिष्य नहीं होता पपवा सर्य-वित् में शब्द का वंचिष्व नहीं होता। प्रभा-विम-काव्य केे नव्द-बिन औौर पय-चित ये दो भेद किम आाधार पर किसे गये हैं, इसका विवेचन प्रस्तुत कारिका में किया जा रहा है। मदपि प्रपम उल्लास में जो शब-चिन का उदाहरस (स्तब्ुन्द' इर्पादि) दिया गया है उसमें मन्भा की मन्व नदी मे उत्कृष्टता प्ररट होती है असः व्यततिरेकालद्वार के रूप में अर्थ-पैनिन्न विदमान है। दसी प्रकार अय-चिन के उपाहव्स (विनिगंत इत्मारि) में भी 'मानइमात्ममन्विरात्' यह। पर 'म' वस कौ भावृति से वृश्यनुपाग शष्या- सद्वार होने के कारण गबद-वैचिष् है ही; तयापि गब्द-वित् के उदादरस में शाभ :- वैत्रिन्च की प्रधानता हे और अर्व-शैनत्त गौस है। इमी प्रवार अर्प-मिन के उदाहरण में मर्य वैनिक की प्रधानता ह औौर नन्दन्वंनिन्व गोसा है। इमी हेतु इन्दे कमराः गब्द-बिम तथा मर्य-बिन कहा जाता है। भाष यह है कि पद्यपि शम-विन सपा अर्ष-पित दोनों के उदाहरणों में ही धन्-विभ् तथा सर्व-वैबिध्य दोनों ही रहा पररते है वमापि जिसशी पधानता होती है उगी के आयार पर नामरूरम किया जाता है (पापान्येन स्पनेसा: भरन्ति); अतः जदां गम्पत समरार भम-मैंचित्य मे बड़पर होता है उने गनू- विन पाहते है तपा नहीं प्रपमा नमरार गय-निष्प से बह़ार होता है उे मर्य-पिन रहे है। किछ रथन पर गग्द-वविश्व को प्रयानना है या धर्य-वैमिभ्न को, इम विषव में पषि की पिशशा ही निर्धापक है औोर कषि के गदम्भ (उगम) विवेष से ही कवि-विवक्षा का ज्ञान हुमा बरता है पर्वान यवि पद की गमा भी पारता के सिवे विवेप प्रमाम करता ुमा ए्टिगापर
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पष्ठ उल्लाम: २७५
तथा चोक्तम्- 'रूपका दिरलङ्का रस्तस्यानयैर्वहुघोदितः ।- न कान्तमपि निर्भूपं विभाति वनिताननम्। रूपका दिमलद्वारं वाह्यमाचक्ते परे। सुपां तिडां च व्युतति वाचां वाञ्दन्त्यङलकृतिम।। तदेतदाहु: सौशब्य नार्थव्युत्पत्तिरीदशी। शव्दाभिघेयालद्वारभेदादिष्टं द्वयन्तु नः ॥" इति ॥ होता है उसी में कवि-विवक्षा है, वही प्रधान है तथा उसी के आधार पर काव्य का नामकरण होता है अतएव उत्कट चमत्का रजनकता ही नामकरण का आधार है। यदि कही दोनों (शब्द और अर्थ) चमत्कारजनक हैं तो इनके संड़र-संसृष्टि आदि भी होते हैं। अनुवाद्-जंसे (दोनों की चमत्कार-जनकता के विषय में भामह ने) कहा भी है-(१) किन्हों आलङ्धरिकों ने कहा है कि अ्नेक प्रकार का रूपक य््प्रादि (अर्थालङ्वार) ही उस (फाव्य) का अलद्धार (शोभावर्द्धक) है, कयोंकि स्त्री का सुन्दर मुस भी बिना आभूपण के शोभायमान नहीं होता। (२) दूसरे भालङ्कारिक (परे) रूपक आदि (अलङ्कार) को बाह्य (बाहरी, बहिरङ्, काय्यार्यं-प्रतीति के पश्चात् प्रतीत होने वाले) कहते हैं तथा सुबन्त मौर निङ्न्त पदों के विशिष्ट-विन्यास रूप (ध्युत्यति) शब्दालङ्गार (वाचाम् अलड्फृति) को (अधिक) वाउदनीय समभते है; कयोंकि इसको ही वे शोभनशब्दयुक्त फाव्य को शोभा (शोभनशन्दस्य काव्यरय शोभनत्वं=सौशब्ध) कहते हैं, अर्थ का विशिष्टविन्यास रूप अर्थालद्गार ऐसा (चमत्कार या शोभावद्धक) नहीं। (३) हमें तो शब्दालङ्गार और अर्थातङ्कार के मेद से दोनों ही (काव्य के अलद्गार है यह) अभीष्ट है। प्रभा-शब्द-वंचित्य तथा अर्थ-वचित्र्य दोनों ही चमत्कारजनक हैं। इस कथन की प्रामासिकता के लिये आचार्य मम्मट ने भामहाचार्य के काव्यालद्वार (१-१३-१५) की कारिकाओो को उद्घृत किया है। इन कारिकाओं मे विभिन्न मत (वांदि-विप्रतिपति) दिखलाकर सिद्धान्त मत का निरपए किया गया है। किन्ही आलद्कारिकों का मत है-'सर्थालङ्गार एव आदरणीयो न तु शब्दालङ्कार:'। उनका आशय यह है कि रूपक आदि अर्थालङ्वार रसव्यञ्जक विभावादि रूप सथं के सोन्दर्य को बढ़ाते हैं अतः वे रस के उत्कर्याधायक हैं तथा वे ही काव्य के अलद्वार हैं अनुप्रास आदि शब्दालङ्कार नही, जैसे (व्पतिरेकी उदाहरण) सुडील और मुन्दर होते हुए भी कामिनी का मुख आभूपण के बिना सोभित नहीं होता इसी प्रकार सबदार्थ रूप काव्य-नरीर सगु होते हुए भी असद्वार बिना शोभा नही पाता। दूसारे आलङ्वारिकों या मत है कि 'शब्दालद्गार एवादरसीयो न त्वर्ालद्वारः'। उनका अभिप्राम है कि शब्द-श्रवण के पनन्तर चित्त भावृष्ट हो
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गथ पष्ठ उल्लासः [शब्दाथचित्रनिरुपसत्मक:] (७०) शब्दार्थचित्रं यत्पूर्व काव्यद्वयमुदाहुतम्। गुसाप्राधान्ततस्तन्र स्यितिश्चितार्थशब्दयोः ॥४८॥। न तु शब्दचित्रेडर्थमयाचित्रत्वम् अर्थचित्रे वा शन्दूस्य। दर पष्ठ उल्लास मे चित्र काव्य के भेदों का विवेचन किया जा रहा है। परनुवाद-शन्द-चित्र और अर्थ-चिन्र नामक जो (प्रम) काव्य के दो प्रकार ऊपर (प्रथम उल्लास में) उदाहरसपूर्वक (स्वच्छन्द०' तथा विनिर्गत०) कहे गये हैं, उनमें चिन्न-शब्द (fanciful word) तथा चित्र-अर्य fanciful meaning) दोनों की प्रधान तथा प्रपधान रूप से स्यिति होती है। ऐसा नहीं है कि शब्द-चित्र में अर्थ का वैचित्र्म नहीं होता पथया अरय-चित्र में शब्द का वैचित्र्य नहीं होता। * प्रभा-चित्न-काव्य के शब्द-चित्र और अर्थ-चिन्र ये दो भेद किस आाधार पर किये गये हैं, इमका विवेचन प्रस्तुत कारिका में किया जा रहा है। यद्यपि प्रथम उल्लास में जो शब्द-चिन का उदाहरण ('स्वच्छन्द' इत्यादि) दिया गया है उसमें गद्ा को अन्य नदी से उत्कृष्टता प्रकट होती है अतः व्यतिरेकालद्वार के रूंप में अर्थ-वैचिव्य विद्यमान है। इसी प्रकार अरथ-चित्रके उदाहरया (विनिर्गत इत्यादि) में भी 'मानदमात्ममन्दिरात्' यहाँ पर 'म' वर्स की आवृत्ति, से वृत्त्यनुप्रास शब्दा- लद्कार होने के कारए शब्द-वैचित्र्है ही; तयापि शब्द-वित्र के उदाहरण में शब्द- वचिन्र्य की प्रधानता है और अरय-वैचिध् गोए है। इसी प्रकार प्रथ-विंत् के उदाहरण में अर्थ-वेचिन्य को प्रधानता है और शब्द-वैचित्र्य गोए है। इसी हेतु इन्हें कमशः शब्द-चित्र तथा अथं-चित्र कहा जाता है। भाव यह है कि यद्यपि नब्द-चित्र तथा अर्य-चित्र दोनों के उदाहरणों में ही शब्द-वैचित्र्य तथा अर्य-वैचित्र्य दोनों ही रहा करते हैं तथापि जिसकी प्रधानता होती है उसी के आधार पर नामकरण किया जाता है (प्राधान्येन व्यपदेशाः भवन्ति); अ्रतः जहाँ वव्दगत चमत्कार अय-वैचित्रय से बढ़कर होता है उसे शन्द- चिन कहते हैं तथा जहाँ अभंगत चमत्कार शब्द-वंचिन्य से बढ़कर होता है उसे अर्थ-चित्र कहते हैं। किसी स्थल पर गब्द-वैचिन्रप की प्रयानता है या अर्य-वैचिभ्य की, इस विषव में कवि की विवक्षा ही निर्रापक है और कवि के संरम्भ (उत्तम) विशेष से ही कवि-विवक्षा का ज्ञान हुआ करता है अर्थात् कवि पद्य की समाप्ति पर्यन्त जिस (शब्द या अर्य) को चारता के लिये विशेष प्रयाम करता हुआ दप्टिगोपर
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पप्ठ उल्लास: २७५
तथा चोक्तम्- 'रूपका दि रलङ्गा रस्तस्यान्यैवहुघोदितः। न कान्तमपि निर्भूपं विभाति वनिताननम्। रूपकादिमलद्वारं वाह्यमाचक्षते परे। सुपां तिडां च व्युरति वाचां वाञ्छन्त्यडलकृतिम॥ तदेतदाहु: सौशब्य नार्थव्युत्पत्तिरीदशी। शब्दाभिघेयालद्वारभेदादिष्टं द्वयन्तु नः ॥" इति ॥ होता है उसी में कवि-विवक्षा है, वही प्रधान है तथा उसी के आधार पर काव्य का नामकरण होता है अतएव उत्कट चमत्का रजनकता ही नामकरण का आधार है। यदि कहीं दोनों (शब्द और अर्थ) चमत्कारजनक हैं तो इनके सङ्कर-संमृष्टि आदि भी होते हैं। अनुवाद-जैसे (दोनों की चमतकार-जनकता के विषय में भामह ने) फहा भी है-(१) किन्हों आलङ्गरिकों ने कहा है कि अनेक प्रकार का रूपक श्र्पादि (अर्थालङ्गार) ही उस (काव्य) का अलद्धार (शोभावर्द्धक) है, पयोंकि स्त्री का सुन्दर मुख भी बिना आभूपस के शोभायमान नहीं होता। (२) दूसरे भालङ्कारिफ (परे) रूपक आदि (अलद्ार) को बाह्य (बाहरी, बहिरद्ग, फाव्यार्यं-प्रतीति के पश्चात् प्रतीत होने वाले) कहते हैं तथा सुबन्त और निङ्न्त पदों के विशिष्ट-विन्यास रूप (व्युत्पति) शब्दालङ्गार (वाचाम् अलङ्फृति) को (अधिक) वाञ्दनीय समभते है; कयोंकि इसको ही वे शोभनशब्दयुक्त काव्य की शोभा (शोभनशब्दस्य काव्यस्य शोभनत्वं=सौशब्ध) कहते हैं, अर्थ का विशिष्ट-विन्यास रूप अर्थातद्गार ऐसा (चमस्कार या शोभावद्धक) नहीं। (३) हमें तो शब्दालङ्गार और पर्ालङ्गार के भेद से दोनों ही (काव्य के पतङ्गार हैं यह) अभोष्ट है। प्रभा-शब्द-वैचिन्य तथा अर्थ-वचित्र्य दोनों ही चमत्कारगनक है। इस कथन की प्रामासिकता के लिये आचार्य मम्मट ने भामहाचार्य के काव्यालद्वार (१-१३-१५) की कारिकाओ को उद्वृत किया है। इन कारिकाओं में विभिन्न मत (चादि-विप्रतिपति) दिखलाकर सिद्धान्त मत का निरूपण किया गया है। किन्ही आालङ्कारिकों का मत है-'सर्थालद्धार एव आदरणीयो न तु शब्दालद्धारः'। उनका आशय यह है कि रूपक आदि पर्थालद्वार रसव्यञ्जक विभावादि रूप अर्थ के सोन्दर्य को बढ़ाते हैं अतः वे रस के उत्कर्षाधायक हैं तथा वे ही काव्प के अलद्कार हैं अनुप्रास आदि शब्दालद्गार नहीं, जैसे (व्यतिरेकी उदाहरस) सुडौल और मुन्दर होते हुए भी कामिनी का मुख शभूपए के बिना शोभित नहीं होता इसी प्रकार शब्दार्थ रूप काव्य-शरीर सगुए होवे हुए भी अलद्गार बिना शोभा नहीं पाता। दूसरे आलद्वारिकों प मत है कि शशगदालद्वार एपादरसीयी न स्वर्थालद्वारः'। इनका अभिप्राय है कि शव्द-श्रवर के अ्रनन्तर चित्त आकृष्ट हो
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२७६ काव्यप्रकाश:
शद्दवित्रं यथा- प्रथममरुण च्छ्ायरतावत्ततः कनकप्रभः तदनु विरहोत्ताम्यत्तन्वीकपोलतलद्यु तिः। उदयति ततो ध्वान्तध्वसक्षम: चणदामुखे सरसविसिनी कन्दच्छेदच्छ विर्मृ गलाव्छन:॥१३६।।
जाता है, तब अर्य की प्रतीति होने के परचात् अर्थ-सौन्दर्य रूप अर्थालद्वारों को प्रतीति होती है अतएव अर्थालङ्गार वाह्य हैं काव्य के बहिरद्भ हैं तथा संज्ञादि शब्दों (सुबन्त) और करिया शब्दों का अनूठा प्रयोग जो वाएी या शब्द का अलद्कार कहा जाता है, वही कविता का शोभावद्धक है, अर्थालद्कार ऐसे शोभाबद्ध क नही। भामहाचार्य का मत है कि काव्य के शरीर अर्थात् शब्त तथा अरथ की शोभा बढ़ाने के कारस शब्दालद्वार तथा अर्थालद्वार दोनों ही काव्य के शोभावद्धक है। भाव यह है कि शब्द के द्वारा प्रतीत होने वाले अर्थ में तथा अथबोधक शब्द में ही वचिन्न्य (अनूठापन) या चमत्कारजनकता होती है, इसी हेतु शब्दचत्र और अर्थचित्र ये दो काव्य माने जाते हैं। कवि-जन शब्द-सौष्ठव तथा अर्थ-सौष्ठव दोनों के लिये प्रयत्नशील दृष्टिगोचर होते हैं तथा दोनों ही सहुदयजनों की अनन्दानुभूति के उपकारक हैं अतएव शब्दालद्वार तथा अर्थालङ्टार दोनो ही काव्य के शोभवद्धक हैं। टिप्पसी-(i) यहाँ व्युत्पत्ति शब्द का अर्थ है-विशेपेए, अनुप्रासादिरूपेए उत्पति: सन्निवेश := विशिष्ट, विन्यास (Elegant Placing) और शब्द तथा भयं का विशिष्ट-विन्यास अर्थात् कथन का अनूठापन ही अलद्वार है; अतएव व्युत्पति= भलङ्कार ।
अनुवाद-शव्-चित्र(का उदाहरस), जैसे-'रात्रि के प्रारम्भ में (क्षस- दामुखे) पहले तो चन्द्रमा (मृगलाच्छनः) अरुसकान्तिवाला, फिर सुवएं की आभा वाला, उसके पश्चात् प्रिय-वियोग से व्याकुल कशाङ्ग्ी के कपोलों की (पाण्ड) घूति वाला औरौर तब स्निग्ध कमलिनी-मूल-लण्ड के समान कान्ति वाला (प्त्यन्त शवेत) अतएव अ्रब्धकार नाश में समर्थ होकर उदित होता है ॥१३६॥'
प्रभा-पद्यर्पि यहाँ पर स्वभावोकिति तथा उपमादि अर्थालद्कार भी है तथापि कवि आरम्भ से समाप्तिपर्यन्त शब्द-शौष्ठव में ही उद्यत दिसलाई देता है तथां यहाँ म, त, क, ध, क्ष, छआदि वर्गों के विशिष्ट-विन्यास रूप अनुप्रास अलद्धार मे ही कविविवक्षा प्रतीत होती है। अतएव प्रधानतया शब्द-वैचिम्य ही यहाँ पर चमत्कारजनक है; स्वभावोक्ति आदि ऐसी चमत्कारजनक नहीं। इसी से यहाँ शब्द-चिम्न है।
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पष्ठ उल्लास: २७७
अर्थचित्रं यथा- ते दृष्टिमात्रपतिता अपि कस्य नात्र चोभाय पत्तमलद्दशामलकाः खलाशच। नीचा: सदैव सविलासमलीकलग्ना ये कालतां कुटिलतामिव न त्यजन्ति।१४० यद्यपि सर्वत्र काव्येऽन्ततो विभावादिरूपतया पर्यवसानम् तथापि रफुटस्य रसस्यानुपलम्भाद्व्यङ्गथमेतत्काव्यद्वयमुक्तम्। श्रत्र च शब्दार्था- लद्कारभेदाद्वहवो भेदा: ते चालङ्कारनिर्णये निर्मेष्यन्ते। इति काव्यप्रकाशे शब्दार्थचित्रनिरुपएं नाम पष्ठ उल्लास: ॥६।।
अ्रनुवाद-पर्यंचित्र (का उदाहरण), जैसे- 'बहुपक्ष्मयुक्त नेत्रों वाली सुन्दरियों के ये केश-पाश तथा खलजन केवल दृष्टि- गोचर होते ही इस संसार में किसके क्षोभ का निमित्त नहीं होते (क्षोभाय 'भवन्ति') जो (दोनों) नीच [१. केश पक्ष में नीचे लटके हुए तथा २ खलपक्ष में श्रबम] विलासपूर्वक अलीक [१. सलाट तथा २. मिथ्याभापस] में लग्न [१. मिरे हुए २. लगे हुए, आसक] हैं तथा अपनी कुटिलता [१. वक्रता २. धूर्तता] के समान फालेपन [१. श्यामवरता २. भयानकता] को नहीं छोड़ते हैं' ॥१४०।। प्रभा-यद्यपि 'ते दृप्टिम्' इत्यादि उदाहरण में अनुप्रास अलङ्गार के रूप में शब्द-वैचित्र्य भी है तथादि यहाँ 'अलक' और 'खल' का क्षोभरूप एक कार्य मे समुच्चय-कथन करने के कारए समुच्चय-अलङ्कार ही प्रधान है। क्लेप तथा उपमा भी उसी के अङ्ग है। इस अथ-वचित्र्य की प्रधानता के कारण यह अर्य-चित्र का उदाहरण है। कुद्ध व्याख्याकारों के अनुसार यहाँ दीपक अलद्धार प्रधान है। अनुवाद्-यद्यपि समस्त प्रकार के काव्य में अन्त में (प्रत्येशु वरसनीय वस्तु) विभाव (अनुभाव, सञ्चारीभाव) आदि रूप में परिसत (पर्यवसित) हो जाती है (और वे रसभावादि रूप में पर्यवसित हो जाते हैं तया चित्रकाव्य में भी कुछ न कुछ व्यङ्गघ होता है। तथाषि स्फुट (स्पष्टतया) रस (व्यङ्गपार्थ) की प्रतीति न होने के फारस इस (शग्दचित्र तथा प्र्थचित्) दो प्रकार के फाव्य को दयद्दघ्- रहित कहा गया हैं। इस (शब्दचित् तथा भर्थचित्र) में शब्दालद्गार और अर्यालद्धार के भेद से बहुत से भेद हैं उनका अलड्कार-निराय के अवसर पर (उल्लास ६-१०) निरय किया जायेगा। प्रभा-यद्यपि उपरिनिदिष्ट चित्रकाव्य के उदाहरणों मे प्रथम श्लोक में चन्द्रोदय रूप उद्दोपन विभाव का वणंन है भतः शृङ्गाररस व्यङ्नप है, द्वितीय दलोर में विप्रलम्भ व्यङ्गध है अतएव ये दोनों काव्य नितान्त व्यङ्गभरहित नही है। इसी प्रकार प्रत्येक काव्य में जो वन किया जाता है वह विभाव अनुभाव मौर सन्चारी
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२७८ j काव्यप्रकाश:
भाव के रूप में पर्यवसित हो जाता है तथा उससे किसी न किसी रस-भाव तया वस्तु आादि की अभिव्यक्ति हुआ ही करती है। इस प्रकार कोई भी काव्य नितान्त व्यङ्गचरहित नही है तथापि 'अ्रव्यङ्गय' त्ववरं स्मृतम्' चित्रकाव्य के इस लक्षणा में
विरोध नही। व्यङ्गय का अर्थ व्यङ्गघरहित नही है अपि तु स्फुट व्यङ्गय रहितं है अतः कोई
भाव यह है कि व्यन्भचार्थं की चारता के आधार पर ही उत्तम, मध्यम तथा अधम ये तीन काव्य-भेद किये गये हैं। जिस काव्य में व्यङ्गचारयं वाच्य-भर्य की अपेक्षा अधिक चमत्कारजनक है वह उत्तम ध्वनि काव्य है, जिसमें व्यङ्गचार्थ वाच्य-अर्थ की अपेक्षा अधिक चमत्काराघाक नही वह मध्यम गुसीभूतव्य सध काव्य है; किन्तु जहाँ व्यङ्गार्थ के विद्यमान होते हुए भी काव्य में उसके कारर चमत्कार नहीं होता अपि तु अतद्धारमाय के कारए चमत्कार होता है वहाँ अधम अर्थात् चित्र-काव्य है। टिप्पणी-(i) 'सफुटस्य रसस्य' में रस शब्द का अर्थ 'व्यङ्गय' है, (रस्यते आ्स्वाद्यते इति रसः) क्योकि 'स्वच्छन्द' इत्यादि में 'भाव' व्यङ्ग है रस नहीं। (ii) ऊपर की शङ्का-समाधान का आधार ध्वन्यालोक का चिन्र-काव्य सम्बन्धी विवेचन ही है। ध्वनिकार ने विस्तार से शड्ा उठाकर इस प्रकार समाधान किया है- 'सत्यं न ताटक काव्यप्रकारोऽस्ति यत्र रसादीनामप्रतीतिः। फिन्तु रस- भावादिविवक्षाशन्यः फविः शन्दालङ्गारमर्थालद्वारं वोपनिवम्नाति तदा तद्विवक्षा- पेक्षया रसादिशून्यताऽर्यंस्य परिकल्प्यते। विवक्षोपासृढ एव हि फाव्ये शब्बानामर्यः। वाच्यसामर्थ्ययशेन च कविवियक्षाविरहेऽपि तथाविये विपये रसादिप्रतीतिर्भवन्ती परिदुर्बला भवतीत्यनेनापि प्रकारेख नीरसत्वं परिकल्म्य चित्रविपयो द्यवस्थाप्यते। (ध्वनि ४२. ४३) (iii) अलद्धारों के भेद से चिनकाव्य के अ्नेक भेद हो जाते हैं जिनका भागे अलङ्कार-विवेचन के अवसर पर ही निर्याय किया जाएगा। इस प्रकार काव्यप्रकाश में शन्द-चित्र और प्रर्थचित् का निरुपस करने वाला यह पष्ठ उल्लास समाप्त होता है। इति पष्ठ उल्सास: ।
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त्रथ सप्तम उल्लास:
काव्यसवरूप निरुप्य दोपाणं.सामान्यलक्षणमाद- " . [दोपविवेचनात्मक:]
(७१) मुख्यार्थहतिर्दोषो रसश्च मुख्यस्तदाध्रयाद्वाच्यः। असः उभयोपयोगिन: स्युः शब्दाद्यास्तेन तेष्वपि सः ॥४६॥। हतिरपकर्पः । शब्दादया इत्याद्यम्रहणाद्वर्णरचने।
आचार्य मम्मट के अनुसार काव्य का लक्षण 'तददोपो शब्दार्थो सगुसावनलङ् कृती पुनः क्वापि' है। इसमे शब्दार्थ का स्वरूप-विवेचन तथा काव्य- स्वरूप का निरुपण किया जा चुका है। क्रमानुसार काव्य-दोपो का विवेचन यहाँ किया जा रहा है। काव्यदोष का स्वरूप 1 अनुवाद-काध्य के स्वरूप का निरूपण करके ग्रन्थकार दोपों का सामान्य लक्षणा-बतालाते हैं- जिससे मुख्यार्थ का अपकर्ष (हति) होता है वह दोष (कहलाता) है; और (काव्य में) रस (भावादि) ही मुखयार्य है, उस रस के द्वारा (उपकारक रूप में) पपेक्षित होने के कारण शब्द बोध्य अर्थ (वाच्य) भी मुख्य (कहलाता) है; तथा दोनों (रस तथा अरथं) के उपकारक शब्द (वर्ग-रचना) आदि होते हैं. अतएब उनमें भी वह (दोय) होता है। (कारिका में) 'हृति' का धर्थ है-अपकर्ष (विघात)। 'शब्दाघा' में आदि शब्द के प्रयोग से वसं औौर रचना का प्रहा होता है। प्रभा-दोप का सामान्यलक्षए है-'मुख्यार्थहतिः दोष,' यहाँ 'हति' का अर्थ अपकर्प है। काव्य में रस ही मुख्यार्थ है, अतः जो रस के अपधातक या अपकर्पक होते हैं, वे ही काव्य-दोप कहलाते है। यहां पर 'रस' शब्द से भाष, रसाभास, भावाभास आदि का भी ग्रहण होता है। अत. रस-भावादि के अपकर्षक ही दोप हैं। अर्थात् जिनसे रस आादि की सम्यक् अनुभूति मे वाधा उपस्थित होती है; सरस काव्य मे वे ही दोप माने जाते हैं। जिन काव्यों में रस की मुग्यता नही होती उनमें चमत्कारक (शब्दवोष्य) वाच्य, लक्ष्य तथा व्यन्प धर्थ को ही मुख्यार्थ कहा जायेगा; क्योकि अर्थ भी रस का उपकारक है (विभाव आदि धर्थ ही रस के व्यञ्जक हैं)। भतएव रसरहित काव्य में वाच्य-मदि ग्ररथों के अपकर्षक ही दोप हलाते हैं सर्थात् जो चमत्कारकारी वाक्यार्थ की प्रतीति मे बाचक होते हैं ने भी दोप हैं। एक तीसरे प्रकार के दोप हैं जो शब्द आदि के अपकर्षक होते हैं। बयोकि
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२८० 1 काव्यप्रकाश:
विशेपलक्षएमाइ-
(७२) दुष्टं पदं श्रृ तिकटु च्युतसंस्कृत्यप्रयुक्तमसमर्थम्। [पद-दोपा:]
निहतार्थमनुचितार्थ निरर्थकमवाचक त्रिधाऽशलीलम॥५०॥ वाक्य तथा पद (शब्दयते बोष्यते अनेन इति शब्द :- वाक्य, पद) और 'आदि' शब्द से गृहीत वर्एं एवं रचना आदि भी रस व्यञ्जना में सहायक होते है तथा अर्थ-वोधक होते हैं। इस लिये पद और वाक्य आदि में भी वे दोप होते हैं। संक्षेप में मुख्यार्थ के अपकर्पक ही दोप कहलाते हैं। ये तीन प्रकार से भुख्यार्थ के अपकर्षक हैं-(१) साक्षात् रसभावादि के अपकर्षव, (२) रसोपकारक धाच्य अर्थात् शब्दबोध्य अर्थ के अपकर्षक (२) रसादि तथा अर्थ के उपकारक पद, वाक्य, वणं, रचना आदि के अपकर्षक। टिप्पसी-(i) प्राचीन काल से ही आलङ्कारिक आचार्य काव्य-दोप का विवेचन करते रहे हैं। इस विवेचन का उद्दश्य यही था कि कवि लोग काव्य-दोपों से परिचित हो जाये तथा काव्य में उनका परित्याग कर दें। 'सोकर्याय प्रपञ्चः' (काव्यालङ्धारसूत्र) २-१-३। प्रायः आचार्यो ने दोप के सामान्य स्वर्प का विवेचन न करके दोप-विशेष का ही वियेचन किया था। सम्भवतः सर्व प्रथम वामन ने ही दोप-सामान्य के विवेचन की ओर ध्यान दिया। उनके अनुसार दोप का स्वरूप है- 'गुएविपर्यंयात्मानो दोष:' (२. १.१) अर्थात् दोपों का स्वरूप गुणों के विपरीत है। ध्वनिवादी आचार्य आनन्दवर्धन ने दोप के सामान्य रूप तथा भेदों का स्वतन्त्र रूप से विवेचन नहीं किमा, कही कहीं प्रसङ्गवश दोपों का उल्लेसमाप अवश्य किया है, जैसे-दविविधो हि दोष: कवेरव्युत्पतिकृतः अशक्तिकृतरच । समाव्युत्पत्तिकृतो दोप: शक्तितिरस्कृतत्वादेव कदाचित्न लद्षयते। यरत्वशक्तिकृतो दोष: सः भटिति प्रतीयते। (ध्वन्यालोक, कारिका ६) ध्वनिकार के इस उल्लेख से ही प्रतीत होता है कि ध्वनिवादियों ने 'गुए-विपर्यय' या 'गुणाभाव, रूप में दोपों को नहीं माना अपितु भावात्मक ही। इसी हेतु आचार्य मम्मद ने काव्यत्व के अपकर्पक या विधांतक को ही दोप बतलाया। (ii) मम्मेट का दोप-लक्षणा व्यापक है यह उत्तम, मध्यम सथा भघम तीनों प्रकार के काव्य-दोपों में घटित होता है। अतएब आगे चलकर काव्य-प्रकाश का दोप लक्षण ही अधिक अपनाया गया है तथा साहित्य-दर्पसकोर का दोप-सक्षए भी इससे स्पष्टतमा प्रभावित दिसलाई देता है; किन्तु 'रसापकर्षकाः दोपा:' (साहित्य दर्पण ७. १) इस लक्षण में काव्य-प्रकाश के लक्षणा जैसी व्यापकता नहीं है। (iii) कारिका में 'हृति' शब्द का अर्थ अनुत्पत्ति या विनाश ही नहीं हो सकता; वपोंकि यह अरथ मानने पर दोप का सक्षणा हो दूपित हो जायेगा तथा दोपों के नित्यानित्य की व्यवस्था भी न वन सकेगी। पददोष अनुवाद-(काव्य दोपों के) विशेष (पृथक् २) सक्षस कहते हैं-[धति-
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सप्तम उल्लीस: २८१
सन्दिग्धमप्रतीतं ग्राम्यं नेयार्थमथ भवेत क्लिष्टम् । अरविमृष्टविधेयांशं विरुद्धमतिकृत् समासगतमेव ॥५१॥ १-श्रु तिकटु परुपवर्सरूपं दुष्टं यथा-
प्रातिङ्गितः स तन्वङ्गया कार्ताथ्य लभते कदा ॥१४१।। अत्र कार्तार्ध्यमिति। कट (आदि) पदं दुष्ट भवेत्, अथ क्लिष्टादि समासगतमेव इति सम्बन्ध:] दोषयुक्त पद ये हैं-(१) श्र तिकट, (२) च्युतसंस्कृति, (३) अ्प्रयुक्त, (४) अ्समर्थ, (५) निहतार्थ, (६) अनुचितार्थ, (७) निररर्थक, (८) अ्रवाचक, (६) तीन कार (ब्रीडा, निन्दा, अशुभ) का अश्लील, (१०) सन्दिग्ध, (११) अप्रतीत, (१२) ग्राम्य, (१३) नेमाथं (जो केवल पदगत तथा समासगत भी हुआ करते हैं) तथा (१४) शलष्ट, (१५) अविमृष्टविधेयांश, (१६) चिर्द्धमतिकृत्-(जो समासगत ही होते हैं)। टिप्पसी-(i) शब्द, अ्र्थ तथा रस की क्रमशः प्रतीति होती है, तथा फाव्यलक्षणा मे भी 'शब्दारथों' मे शब्द की प्राथमिकता है अतएव पद-दोपो का ही प्रथमतः निरूपण करते हैं। यहाँ पद शब्द से सुबन्त, तिङ्न्त तथा प्रातिपदिक का 1 ग्रहण होता है (उद्योत)। (ii, व्यास्याकारों का विचार है कि 'क्रुतिकटु' मादि शब्दों से मौगिक मर्थ के द्वारा (श्रुति अर्थात् श्रव मे कटु उद्वेगजनक) उनके स्वरूप या लक्षण का भी बोध हो जाता है अतएव कारिका में गन्यकार ने पद-दोपों का विभाग तथा लक्षणा एक साथ ही प्रकट कर दिया है। वस्तुतः तो ऐसा प्रतीत होता है कि यह कारिका पद-दोपों का विभाग करती है, योगार्थ से या प्रसिद्धि से ही स्पष्ट होने के कारण प्रत्येक का लक्षण नहीं दिया गया है, जिनका स्पष्टीकरण आचार्य ने भावश्यक समभा, उनका यथावसर स्वरूप भी दिखला दिया गया है। अनुवाद-कठोर बएं वाला दुष्ट पद धृ तिकट (कहलाता) है; जैँसे-,' 'कामदेव के मङगलगृह रूपी कटाक्षों की भङ्गिमा की तरङ्गों से युक्त उस कशाङ्ग्ी रमणो के द्वारा आलिद्गित होकर वह (युवक) कब कृतायंता को प्राप्त फरेगा' ॥१४१।। यहाँ पर 'कार्ताथ्य' पद श्रतिकट है। प्रभा-श्रुति कट को वामन ने 'कप्ट' (थ तिविरस कप्टम्) नाम दिया F
या तथा मम्मट के परचात् साहित्यदर्पसकार ने 'दुःशव' नाम से पुकारा। ऊपर के उदाहरण में 'कार्ताथ्य' शब्द परुपवर्संयुक्त है, यह शरीता के लिये उद्वे गजनक है तथा रसापकर्षक है अतः यहाँ पर श्रुतिकट (दुप्ट पद) है। दोप साक्षात् या परम्परया रस के अपकर्पक होते हैं; धुतिकट्ता शृद्भार रस के आस्वादन में ही वाघक है:
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कव्यप्रकाशं:
२-च्युत संस्कृति व्याकरसलक्षपहीनं यथा- एतन्मन्दविपक्वतिन्दुकफलश्यामोदरापाएडर प्रान्तं इन्त पुलिन्दसुन्दर करस्पर्शक्षमं लक्ष्यते। तत् पल्लीपतिपुत्रि, कुञ्जरकुलं कुम्भाभयाभ्यर्थना- दीनं त्वामनुनाथते कुचयुगं पत्रावृतं मा कृथा: ॥१४२॥ अ्रत्रानुनाथते इति सर्पिपो नाथते इत्यादाविवाशिध्येव नाथतेरात्मने- पदं विहितम् (आशिपि नाथ इति) अत्र तु याचनमर्थः। तस्मादनुनाथति स्तनयुगमिति पठनीयम्। ३-अप्रयुक्त' तथाऽडम्नातमपि कविभिर्नातम्। यथा- यथाडयं दारुणाचार: सर्वदैव विभाव्यते। तथा मन्ये देवतोऽस्य पिशाची राजसोऽथ वा ॥१४३।। अंतएव यह शृद्धारनवणन में दोप है; किन्तु परुप-वरों का प्रयोग रोद्र-रस की व्यञ्जना मे सहायक ही है अतः रौद्र आादि में श्रुतिकट दोप नहीं होता। इसीलिये यह अनित्य दोप है। अनुवाद-र च्युतसंस्कृति (च्युता रखलिता संस्कृति: संस्कार: व्याकरण- लक्षानुगम. यत्र) वह दुष्ट पद है जो (भाषा के सस्कारक) व्याकरण के नियमों के विरुद्ध हो; जैसे- अरी पल्लीपति (छोटे ग्राम के स्वामी) की पुत्नि, यह तेरा स्तनमुगल, जिसका मध्यभाग (उदर) अधपके तेंदू फल के संमान श्याम है तथा तट प्रवेश कुछ पीसवर्एा हैं शबर (पुलिन्द) युवक के सुन्दर हहतमर्दन के योग्य दिखलाई देता है, इसी हेतु अपने गण्डस्थल की रक्षा के लिये प्रार्थना में कातर होकर हुस्तिसमूह (तुभसे) यह माचना करता है कि इस स्तनयुगल को पत्तों से शाच्छादित मत करो' (जिससे शवरयुवक उस ओर भ्कषित हो जाय तथा हाथियों के गण्डस्यल की रक्षा हो सके) ॥१४२ यहाँ पर 'अनुनायते' यह व्याफरएालक्षसविरु्द्ध है; कयोंकि 'सर्पियो नायते' मादि में 'माशो:' (पाशा, अभिलाषा) प्र्यं में ही 'आशिषि नाथः' (यात्िक) से 'नाय' धातु को आत्मनेपद का विधान किया गया है; फिन्तु यहां पर याचना सर्य है (भशी नहां)। इसलिये अनुनाथति स्तनयुगम्' (परस्मंपद) यह पाठ, होना चाहिये। प्रभा-'एतन्मन्दम्' आदि में 'अनुनाथते' (याचना करता है) यह पद व्याकरस की दृष्टि से अशुद्ध है, अतः व्युतसंस्कृति दोप है। 'नाथ' चातु केवल 'माशिस्'अर्थ मे ही आात्मनेपदी होती है; यह 'आशिषि नायः' कात्यायनकृतत वातिक, द्वारा नियम किया गया है। यह वातिक भ्रीटोनुसंपरिभ्यरच १/३/२१ पाणिनियूय के ऊपर है। अ्रनुवाद-३. व्याकरस आदि के द्वारा अनुशिष्ट यर पढ़ा हुआ (भाम्नातम्) होने पर भी जो पव कवियों द्वारा निविद्ध या उपेकषित है, यह पमपुक्त है, अंसे
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सप्तम उल्लांस: २८३
केनचित्प्रयुज्यते। अत्र दैवतशब्दो "दैवतानि पु'सि वा" इति पुस्याम्नातोऽपि ज
४-असमर्थ यत्तदर्थ पठ्यते न च तत्रास्य शक्तिः । यथा- तीर्थान्तरेपु स्नानेन समुपार्जितसत्कृति:। सुरस्नातर्वनीमेप हन्ति सम्प्रति सादरम् ॥१४४।। अत्र दन्तीति गमनार्थम। ५-निदतारथ यदुभयार्थमप्रसिद्ध र्थ प्रयुक्तम्। यथा- यावकरसाद्र पादप्रहारशोसितकचेन दयितेन। मुग्वा साध्व सतरला विलोक्य परिचुम्विता सहसा ॥१४५॥ अत्र शोखितशवदृस्य रुधिरलक्षणोनार्थनोज्ज्वलीकृतत्वरूपो्ऽर्थो व्यव- घीयते।
फ्योंकि वह व्यक्ति सदा ही कठोर आपरख वाला दिखाई देता है इसलिये में समभता हूँ कि इसका इष्ट देव कोई पिशाच या राक्षस है' ।१४३।। यहाँ 'दैवतः' यह (पु'ल्लिङ्ग में) अप्रयुक्त है। यद्यपि वैवतानि पुसि या' (भमरकोश) इस फोश के द्वारा दवत शब्द (विकल्प से) पुल्लिङ्ग में भी कहा गया है तथापि किसी कवि द्वारा (पु'ल्लिङ्ग में) प्रयोग नहीं किया जाता। प्रभा-यहां 'अप्रयुक्त' प्रयोग को देखकर पाठक प्रयोजनानुसन्धान में व्यग्र हो जाता है मुरुपार्थ की उपस्थिति मे विलम्ब होता है अतएव यह दोप समझा जाता है। यदि 'यमक' आदि योजना ही इसका प्रयोजन हो तो यह दोप नहीं माना जायेगा । अनुवाद-6. असमर्थ' वह दुष्ट पद है जिसका किसी अर्थ में (ध्याकर- खादि में) पाठ तो किया गया है, किन्तु (किसी सहायक के बिना) उस अरथं (को बोध कराने) में उसकी शक्ति नहीं; जैसे- 'यह पुरष जिसने अन्य तीर्थों में स्नान करके शर ठ फल-जनक पुण्य (सत्कृति) उपाजित किया है, इस समय आदरपूर्वक सुरसरिता गङ्गा को जाता है (हन्ति) । ।१४४ यहां 'हृन्ति' यह गमन अर्थ में (असमर्थ है)। प्रभा-यद्यपि 'हन् हिसागत्योः' इस धातुपाठ में 'हन्' धातु गमनार्थक भी है; किन्तु यह पद्धति (पादाभ्यां हन्यते गम्यते इति पद्धतिर्भर्गगः), जघन (वक हन्ति गच्छतीति जघनम्) आदि शब्दों में 'पद' आदि शब्दों के अथवा मार्ग आदि अर्थों के सहकार (योग) से ही गत्यर्थ को प्रकट करने का सामथ्यं रखती है। किसी सहायक के बिना 'हन्ति' धातु गमन-पर्थ का बोध कराने में समर्थ नहीं, भ्तएव कपर उदाहरण में 'हन्ति' असमर्थ (दुप्ट) पद है। मुख्यार्थ-बोध में विलम्ब पैदा करने के कारणा ही यह दोप है। अनुवाद-५. निहतार्थ वह दुष्ट पद है, जो दो (प्रसिद्ध तथा भप्रसिद्ध) अर्थ वाला होते हुए अप्रसिद्ध अर्य में प्रयुक्त किया जाता है, जैसे-'भलक्क रक्ष से
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२८४ का व्यप्रकाश:
६-अनुचितार्थ यथा- तपत्विभिर्या सुचिरेण लभ्यते प्रयत्नतः सन्निभिरिध्यते च या। प्रयान्ति तामाशुगति यशस्विनो रखाश्वमेधे पशुतामुयागताः॥१४६।। अत्र पशुपद्ं कातरतामभिव्यनक्तीत्यनुचितार्थम। ७-निरर्थकं पादपूरयमात्रप्रयोजनं चादिपद्म्। यथा- उत्फुल्लकमलके सर परागगौरद्य ते, मम हि गौरि, अभिवा्छितं प्रसिद्धयतु भगवति, युप्मत्प्रसादेन ।।१४७।। अत्र 'हि' शब्द: । भाद्रं चरणों के प्रहार द्वारा जिसके बाल कुछ-कुछ लाल (शोमित) हो गये थे ऐसे उस प्रिय ने नायिका को (रुधिर निकलने के) भय (साध्यस) से व्याकुल (तरसा) तथा मुग्ध देखकर (भय दवूर करने के लिये) सहसा उसका चुम्बन कर लिया'।१४ ५।. यहाँ पर 'शोखित शब्द के रुधिररूप (प्रसिद्ध) अर्थ के द्वारा कुछ २ लाल' एप (उज्ज्वलीकृतत्व-ईपदारक्तीकृतत्व) अर्थ व्यवहित हो जाता है। प्रभा-'शोमित' पद का प्रसिद्ध अर्थ रक्त या रधिर है किन्तु यह यहाँ पर विवक्षित नहीं, इसका अप्रसिद्ध अथ 'कुछ २ लाल' ही यहाँ विवक्षित है। 'शोसित' पद 'कुछ कुछ लाल' अर्थ में निहतार्थ है। यब्द से प्रसिद्ध अर्थ की स्षुरन्त उपस्थिति होती है तत्पश्चात् अपसिद्ध (विवक्षित) अर्थ उपस्थित होता है। उसकी प्रतीति में विलम्ब करने के कारणा ही निहतार्थ पद दोपयुक्त है। प्रसिद्ध तथा अपसिद्ध अर्थ का विवेक व्यवहार द्वारा होता है।' अनुवाद-६ अनुचितार्थं दुष्ट पद (का उदाहरण), जैसे-'जिस गति को सपस्वी-जन चिरकाल में प्राप्त करते हैं तथा याजिक लोक प्रयत्नपूर्वफ जिसकी श्र्प्रभि- लापा करते रहते हैं, उस गति को संग्राम रूपी अश्यमेध (यज्ञ) में पुता की प्राप्तं हुए यशस्वी-जन शोध्र ही प्राप्त फर लेते हैं ॥१४६॥ यहाँ पर 'पशु' शब्द कातरता (दीनता) को प्रभिव्यक फरता है। इसलिये महु अनुचितार्थक (टुप्ट पद) है। प्रभा-जो शब्द विवक्षित अर्थ को तिरस्कृत करने वाले किसी अर्थ का व्यञ्जक होता है वह 'अनुचितार्थ' (दुष्ट पद) कहलाता है। यह विवश्ित (मुख्य) पर्थ का अपकर्पक होता है। उपयुक्कक पद्य में संग्राम में भात्मवलिदान करने वानों को 'शूरता' का वर्णन करना श्रभीष्ट है, 'पतु' शब्द उनकी कातरता को अभिव्यक्त करता है अतएव यह 'अनुचितार्थ' दोपयुक्त है। व्युत्पति द्वारा कविजन इस दोप को द्वूर कर सकते हैं। अपनुवाद-७ फेवल (श्लोफ को) पाद पूति ही जिनका प्रयोजन है ऐसे 'प' 'ह' यादि पद निरयक (फहलाते) हैं। जैसे-'प्रफुल्लित कमस की केसर के पराग- सदुश दुति वाली हे भगवती पावती जी, आपकी कृपा से मेरा मनोरम सिद्ध हो'
यहाँ पर 'हि' शब्द निरर्यक है।
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सप्तम उल्लाम: [ २८५
म-शवाचकं यथा- अ्र््रवन्ध्यकोपस्य विहन्तुरापदां भवन्ति वश्या: स्वयमेव देहिनः । अमर्पशून्येन जनस्य जन्तुना न जातहार्देन न विद्विपादर: ।१४न। अत्र जन्तुपदमदातर्यर्ये विवन्ितम; तत्र च नाभिघायकम्। यथा वा -- हा धिक ! सा किल तामसी शशिमुखी द्ृष्टा मया यत्र सा तद्विच्छेदरुजाऽन्घकारितमिदं दग्वं दिनं कल्पितम्। कि कुर्म: कुशले सदैव विघुरो घाता न चेत्तत्कथं ताटग्यामवतीमयो भवति मे नो जीवलोकोऽ्धुना ॥१४१।। अंत्र दिनमिति प्रकाशमयमित्यर्थेडवाचकम्।
प्रभा-यहाँ पर 'हि' शब्द का हेतु या अवधारण आदि अर्थ सङ़त नहीं है अतएव 'हि' शब्द केवल पाद-पूर्ति के लिये है तथा निरर्थक है। निरर्थक शब्द निराकाक्ष होता है अथवा पाठक को उसके प्रयोजन का अनुसन्धान करना पड़ता है अ्रतएव वह वाक्यार्थ-बोध मे विलम्ब करने वाला है इसीलिये दोपयुक्त है। अनुवाद् -. प्रवाचक पददोप (का उदाहरण), जैसे- [किराताजु नीय में युधिध्ठिर के प्रति दोपदी की उक्ति में] 'जिसका कोध निष्फल नहीं होता (पवन्घ्य :- निप्फल:) ऐसे दूसरों की (दारिद्य्य रूपी) आपत्तियों का विनाश करने वाले वीर के सभी (शत्रु मिन्नादि) जन स्वयं हो वश में हो जाते है; कर्योंकि कोष- खून्य अर्थात् शौमहोन (आप जैसे) व्यक्ति से शत्रु जन को (जनस्य) भय (दरः) नहीं होता तथा स्नेहयुक्त (मिन्र) भी अनुदार (जन्तुना=अदान्ना) व्यक्ति का मित्र जनों (जनस्य) के द्वारा शादर नहीं होता' ।१४८॥ यहाँ पर 'जन्तु' शब्द 'भ्रदाता' (दान न करने वाला) के अर्य में विषक्षित है; किन्तु इस प्रर्थ का बोधक नहीं। अ्थवा जैसे- 'हाय धिक्कार ! जिस रात्रि में उस चन्द्रमुसी को मैंने देसा था वह तो (विघाता ने! अन्धकारयुक्त (बनाई) थो, किन्तु उस (उबशो) के वियोग की वेदना से स्रन्धकारपूर्ण इस (अनुभूयमान) बुरे (दग्ध-जता) समय को (विधाता नें) बिन अरथात् प्रकाशमय बनाया है। वया चरे ? यदि विधाता इष्ट-प्राप्ति के विषय में सदा प्रतिकल ही नहीं रहता (अर्यात् रहता ही है) तो यह संसार (जीवलोकः) भ्रब मेरे लिये बैसी (जिस में उवशी का दर्शन हुआ था) रात्रि वाला हो न (नो) हो जाता'
:1 ' यहाँ पर 'दिन' यह पद 'प्रकाशमय' इस अ्रर्थ में प्रवाचक है। [उद्योतकर आदि के अनुसार यह विकमोवंशीय नाटक में पुरुरया की उकि है, किन्तु प्राप्त संस्करणों में यह नहीं है। प्रभा-(१) अ्रवाचक वह पद है जो विवक्षित धर्म से विशिष्ट धर्मी का कही भी वाचक न हो। यह अ्वाचकता भनेक प्रवार की है :- (क) कहीं पद की
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२८६ काव्यप्रकाश:
यच्चोपसर्गसं सर्गादर्थान्तरगतम्। यथा- जक्ाकाएडोरुनालो नखकिर एल सत्के सरालीक राल: :- प्रत्यमालक्तकाभाप्रसरकिसलयो मञ्जुमब्जीरयृङ्ग: । भत्तु नृंत्तानुकारे जयति निजतनुस्वच्छलावरयवापी- सम्भूताम्भोजशोभां विदधद्भिनवो दस्डपादो भवान्या:॥।१५०।। अत्र दर्धाित्यर्थे विद्धदिति। धर्मी में यक्ति होती है, किन्तु विवक्षित धर्म में नही (ख) कही धर्म मे शक्ति होती है, किन्तु धर्मो में नहीं तथा (ग) कहीं पर पद की धर्म तथा धर्मी दोनों में शक्ति नही होती, (किन्तु पदांद की होती है)। इसमें से प्रथम भी दो प्रकार का होता है-एक अपेक्षितयोग और दूसरा अनपेक्षित योग। (२) पद के द्वारा पदार्थ के दो श्रंश विवक्षित होते हैं १. धर्म (quelity). 2. धर्मी (Substance)। अवाचक पद इनमें से किसी एक या दोनों विवक्षित भं के बोध मे अशक होता है। किन्तु असमर्थ पद वह कहलाता है जिसका किसी अर्य में पाठ तो किया जाता है किन्तु वह विशिष्ट रूप में उसका बोधव नहीं होता। (३) क-योगापेक्षित - 'अवन्ध्यकोपस्य' इत्यादि उदाहरण के पूर्वाद्ध में 'दारिद्रथ' रूप आपत्तिविघातक के रूप में दानशीलता (दातृत्व) अभिप्रेत है, उत्त- राध में उससे वैपरीत्य प्रदर्शन के लिये जन्तु' पद का 'न देने. वाला' (पदाता) इस पर्य में प्रयोग किया गया है। किसी भी (दाता या अदाता) व्यक्ति मर्थात् सर्मी को (जायते इति) 'जन्नु' कहा जा सकता है अदातृत्व (दान न देना) रूप धर्ग से विशिष्ट धर्मी को ही जन्तु नही कहा जाता औौर यहाँ पदातृत्व धर्म ही विवक्षित है। अतएब यहाँ योगिक अर्य द्वारा (अपेक्षितयोग) धर्मो में शक्त है किलन्तु धर्मं में नहीं तथा 'जन्तु' पद अवानक है। " योगानपेक्षित-'हा घिक' इत्यादि उदाहरण में 'तामसी' पद का मभिप्रेत अथं है-तमोमयता'। उससे वैपरीत्य-प्रदर्मन के सिये 'दिन' शब्द का प्रयोग प्रकाय- मयता के अय में विवक्षित है। यहां दिन शब्द की रदि द्वारा मूर्याच्छ्धिन्कालरूपी धर्मी में शत्ति है; किन्तु प्रफाशमयत्व रूप से वह गक्ति नहीं अपि तु दिनत्व रप से है।। अतएव यहाँ रूदवि द्वारा (अनपेक्षित योग) पर्मी में शक्ति नहीं तथादिन शन्द पवाचक है। + 1, (स)- द्वितीय भेद (धर्म में यत्ति धर्मी में नहीं) का उदाहरया टन्पनर ने नहीं दिया। व्यास्याकारों ने इसका उदाहरगा दिया है-जलं जलपरे क्षारमय वर्पति वारिदः'। यहाँ पर 'जलघर' शम्द की जलवरत्व रुा यर्म में शक्ति है किन्तु सागर रूप धर्मी में नहीं। अतएव यहाँ 'जलघर' शब्द दोपपुक्त है प्रवाचक है।- : अनुपाद-(ग) (तृतीय अवाचक बद यह है) जो (पर मावि) उपसर्ग के संक्षगं से पर्थान्तर का वाचक होता है, जसे-
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सप्तम उल्लास: २८७
ह-त्रिधेति बीडाजुगुप्साडमङ्गलव्यञ्जकतवाद्। यथा- क-साघनं सुमहदस्य यन्नान्यस्य विलोक्यते। तस्य घीशालिन: कोडन्य: सहेतारालितां भ्र वम् ॥१५१॥
कश्चित्केसरदूषितेक्षण इव व्यामील्य नेत्रे स्थितः। मुग्धा कुड् मलिताननेन ददती वायु स्थिता तत्र सा म्रान्त्या घूत्त तथाऽय वा नतिमृते तेनानिशं चुम्विता ॥१५०।। अपने पति महेश्वर के नृत का अनुकरण करने के अवसर पर पार्वती जो का ऊपर उठाया हुआ वह कोमल चरण (प्रसह्योर्ष्वोकृतः पादो दण्डपादोऽभिधीयते; सङ्गोंत रत्नाकर) विजयी है, जो (चरस) पावती के शरीर रूपी निर्मत लावण्य को वापी (बावड़ी) से उत्पन्न कमल की शोभा को धारण करता है (विदधत्); जिम (चर्सकमल) में जङ्गाकाण्ड ही महान् (उरु) नाल है, जो नखों की प्रभा रूपी शोभायमान केसर पक्ति से नतोमत (कराल) है, जिसमें नुतन अलक्तक की कान्ति प्रसरण के रप में फोमल पत्र है तथा मञ्जुल चरसाभूपस (मञ्जीर) हो भ्रमर हैं ।१५०। !11 वहाँ 'दधत्' के अर्थ में 'विदधत्' यह पद अवाचक है। प्रभा-यद्यपि 'दधाति' की धारण अर्थ में शक्ति है तथापि 'वि' उपसर्ग सहित दघाति (विदधाति) की शक्ति 'करण' या 'विधान' अर्थ मे नियन्त्रित हो जाती है। इसलिये 'विदधत्' शब्द घारण अर्थ में अवाचक है। क्योंकि वह धारण (धर्मी) या धारणस्व (धर्म) किसी मे भी शक्ति नहीं रखता। अनुवाद-६(कारिका के तिघाश्तीलम् में) त्रिधा अर्थात् क-लज्जा, स-घृसा और ग-ग्रमडल को प्रकट करने के कारए अइलील पद तीन प्रकार के होते हैं। जैसे- फ-(योडा) जिस बुद्धिमान् अर्थात् नीतिकुशल राजा की ऐसी विशाल सेना (साधनं) है, जैसी किसी प्रत्य की नहीं दिखाई देती, उसकी कोप से कुटिल मुकुटि को कौन सहन फर सकता है ॥१५१। स-(जुगुप्सा) 'जिसके अधर निःशह् रूप से किसी अन्य नायिका ने फाढ लिये हैं (अथवा जिसने अन्य नायिका के अघर को निःङ्ध रूप से काटा है) ऐसा कोई (विलासी) पुरुष (उसकी नायिका-द्वारा) लीला-कमल से ताडित किया गया। तब-वह-कमल-केसर से पोडित नेत्र वाला सा होकर नेव बन्द करके पड़ गया चर मुग्धा (उसकी धूर्तता फो न समभने वाली) नायिका फली के आकार वाले (गोल) सुंस से नांक के नेत्रों में (तन्न) फूंफ (वापु) देने लगी। फिर उस पुरुष नें भ्रान्ति प्रथया धूर्तता से प्रसाम-किये बिना ही, उसका निरन्तर चुम्बन किया। ('इसका कोप नष्ट हो गया'-यहु भ्रान्ति प्रभश 'कोप न्ट न होने पर भी इसका सुम्बन फर लू" यह धर्तना है। ॥१५२॥
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काव्यप्रकाश:
ग-मृदुपवनविभिन्नो मत्पियाया चिनाशादू· घनरुचिरकलापो निःसपत्ोऽय्य जातः। रतिविगलित बन्धे केशपाशे सुफेश्याः सति कुसुमसनाथे कं हरेदेप वर्हीं ॥१५३॥ पघु सावन-वायु-विनाशशब्दा व्ीडादिव्यक्षकाः । १०-सन्दिग्घं यथा- आन्तिद्गितस्तत्र भवान् सम्पराये जयश्निया। आशी:परम्परां वन्दां कर्से कृत्वा कृपां कुरु ॥१५४॥ मत्र वन्दां कि हठहतमहिलायां किंवा नमस्यामिति सन्देक:। ग-(अमङ्गल) मृडु पवन से बिसरा हुआ सधन सुन्दर मयूर-पिच्छ (कलाप- भपूर के पंखों का समूह) मेरी प्रियतमा (उर्वशी) के नष्ट (पदृश्य) हो जाने से भाज बेजोड़ (निःसपत्न :- निःशत्रु:, सदशरहितः) हो गया है। नहीं सो सुन्वर केशों वाली मेरी प्रिया के रतिकाल में जूड़ा खुले हुए तथा कुसुमों से विभूषित फेश-फलाप के होते यह मयूर (बहो) किसको प्राकृष्ट कर सकता था ॥१५३॥ इन (उदाहरणों) में साधन, वायु तथा विनाश शब्द कमशः चोडा, जुगुप्सा औौर अमझत के ध्यञ्जक हैं। प्रभा-ऊपर के उदाहरणों में (क)-'साधन शब्द पुरुपेन्द्रिय का भी वाचक हैं। सैन्यार्थक 'साधन' शब्द के द्वारा पुरपेन्द्रिम रूप अ्रन्यार्थ की प्रतीति होने के कारणा 'साघन' पद 'लज्जा' को प्रकट करता है सतः अलील है। स्र-'वायु' शब्द अंपान वायु का स्मारक है; अतः जुगुप्साव्यन्जक है तथा परलील है। ग-विभमोवंश्ीय नाटक के इस स्थल पर 'विनाश' सब्द 'मृत्यु' की प्रतीति कराता है, अतः पमङ्गस बोधक है तथा अरलील है। :अश्लील-अर्थ की उपस्थिति रस की अपकर्मक है, भथवा उससे धोता या पाठक विमुख हो जाता है, अतः वैरस्य उत्पन्न करती है इसी हेतु यह दोष है। भशलील शब्द का व्युत्पत्तिजन्य सर्थ है-मभ्यवशीकरणसम्पतिः श्रीः, सां सावि गृह्ाति द्दति श्रीलम् (र को स) इलीलम्, न श्लीलम् अश्नीलम्, पशोभन या अशिष्ट।" 1 :- अतुवाद-१०. सन्दिग्य (का उदाहरण), जैसे- उ "'संग्राम [संपराये] में जयलक्ष्मी से पलिद्वित होकर पुजनीय म्राप बग्मीप [बन्धा] (पराजित सत्रु द्वारा की हुई) आाश्ीर्योद सशी को मुनकर [कसो कृतणा] (पायुओों पर) कृपा फरे ॥१५४॥ यहाँ पर 'चन्धां' का अभिप्राय-'इसपूर्वक हुरी गई सुन्दरी पर' ('बन्जी' से सप्तमी एकयधन) यह है अथवा 'धन्दनीया फो' (द्वितीया एकवचन), यह है- इस प्रकार का सन्देह होता है।
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सप्तम! उल्लास:
११-अप्रतीतं यत्केवले शास्त्रे प्रसिद्धम्। यथा-
विधीयमानमप्येतन्न भवेत्क्म वन्घनम्:॥१४५॥ अन्राशयशव्दो वासनापर्यायो योगशास्त्रादावेव प्रयुक्ः।। १२-ग्राम्यं यत्केवले लोके स्थितम्। यथा-mह, राकाविभावरीकान्तसंक्रान्तद्य ति ते मुखम्। तपन यशिलाशोभा कटिश्च हरते मनः ॥१५६॥ ।F अत्र कटिरिति। "। प्रभा-जब कोई एक पद दो श्ररथों 'का बोधक होता है 'तथा यह' सन्देह उत्पन्न करता है कि कौन अर्थ तात्पर्य का विषय है वह पद 'मन्दिग्ध कहलाता है। ऊपर के उदाहरस में 'बन्दां' पद इसी प्रकार का है।. यह 'आशी: परम्पराम्' का विशेपण है (वन्द्याम् श्राशी: परम्पराम्) अथवा चलपूर्वक बन्दी बनाई हुई किसी रानी के लिये आया है (बन्धां कृपां कुरु) यह सन्देह है, क्योकि 'वन्या' शब्द से द्वितीया विर्भात्त के एकवचन में तथा 'चन्दी' शब्द से सप्तमी विभक्ति के एकवचन में 'चन्दा' मही रूप होता है अतएव 'बन्दां' पद सन्दिग्ध है। अनुवाद-११ अप्रतीत वह (दुष्ट) पद है जो केवल किसी एक शास्त्र में परसिद्ध हो, जैसे- :. 'जिसकी चासनाएं (संस्कार) तत्वज्ञान के महान् प्रकाश,से क्षीए हो गई है, उंस, क्षीस वासनाओंसे ुक्त (श्राशयताजुपः) व्यक्ति फा किया गया (विहित या निपिद्ध) कर्म (ससाररुप) बन्धन का कारस नहीं होता',॥१५५॥ *1 *-! 'यहां पर जो 'आशय' शब्द है वह वासना के पर्याप रूप में केवल योगशास्त्र आदि में ही प्रयुक्त हुआ है।' । प्रभा-यहां पर आशय शब्द का अर्थ वासना अर्थात् संस्कारविदोप है। इस अर्थ मे आशय शब्द का प्रयोग -- वलेशयरमविपांकाशरयरपरामृप्ट: पुरपविशेष ईश्वर:''(१२४) इत्यादि योगशास्त्र में ही हुआ है। अत एए योगशास्त्र में ही "वह शन्द प्रसिद्ध है, काव्यादि में नहीं। इसी हेतु महाँपर 'मराय' शब्द अपतीत है। यहं दोप 'इसलिए है, कयोकि जो किसी शास्त्र के विगिष्टं 'शेब्द ' से परिचित नहीं, उन्हे ऐसे, वव्य से ग्रथ-बोध नही होता। 1 :. अनुवाद-१२ ग्राम्य वह (दुप्ट) शन्द है, जो केवल लोक' (भसंस्कृत समाज) में ही प्रचलित हो (संस्कृत समाज, में नहीं) । जैसे- -T:" हे प्रिये, जिसमें पूिमा की रात्रि के प्रियतम अर्थात् चन्द्रमाको कान्ति संोन्त (प्रतियिम्वित) हो गई है, ऐसा यह तुम्हारा मुस तथा जिसमें सुबर्एशिला जसी शोभा है, वह नितम्ब (कटि) मेरे मन को हरते हैं-॥१५६॥ यहां पर 'कटि' शब्द ग्राम्थ है।
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२६० कव्यप्रकाश:
१३-नेयार्थम्- "निरूढा लक्षणा: काश्चित्सामर्थ्यादभिघानवत्। क्रियन्ते साम्प्रतं काश्चित्काश्चिन्नैव त्वशक्तित: ।।" इति यन्निपिद्ध लाक्षणिकम्। यथा- शरत्कालसमुल्ला सिपूर्शिमाशर्व रीप्रियन्। करोति ते मुखं तन्वि चपेदापातनातिथिम् ॥१५७॥ अत्र चपेटापातनेन निर्जितत्व लक्ष्यते। अथ समासगतमेव दुष्टमिति सम्बन्धः । अन्यत्केवलं समासगत च। प्रभा-शब्द तीन प्रकार का है नागर, उपनागर तथा ग्राम्य । जो केवल सुशिक्षित तथा सुसंस्कृत लोगों में प्रचलित है वह नागर है। जो ग्राम्पता से रहित है किन्तु 'नागर' की पदवी को प्राप्त नहीं हुआ है वह उपनागर है। केवल असंस्कृत (अविदग्ध) जन में प्रचलित, शास्त्र आादि में अप्रसिद्ध शब्द ग्राम्य है। 'नितम्ब' परर्थ में कटि शब्द का प्रयोग ग्राम्य है, क्योकि विदग्यजन 'शोणी' तथा 'नितम्ब' आदि शब्दों का ही प्रयोग करते हैं। ऐसे शब्दों के प्रयोग से कवि की अविदा्घता प्रकट होती है तथा सहृदय श्रोता विमुख हो जाता है अतः यह दोप है। अनुवाद-१३. नेयाथं (दुष्ट) पद यह है जो निविद्ध (रूढि तथा प्रयोजन से शून्य) लाक्षसिक शब्द है, क्योंकि (कुमारलभट्टकृत तन्त्रवार्तिक के धनुसार) कुछ लक्षणाएँ तो सामर्थ्य अर्यात् प्रसिद्धि या शब्द-स्वभाय के कारण प्रभिया के समान हो चिरकाल प्रसिद्ध (निर्ढा) होती है (जैसे शुश्नः पटः या कर्मरि कुशलः): कुप समयानुसार (प्रयोजनवशात्) बनाई जाती हैं (जैसे-गङ्गामां धोषः); किन्तु कुछ सथबोधकता न होने के कारण (पशतितः) रूढि या प्रयोजन के पभाव में मही बनाई जातों (जैसे 'रूपो घटः' इत्यादि) भर्यात् वे निविद्ध हैं जैसे- 'हे कशाङ्गी, तेरा मुख तो शरत्काल में समुल्लसित पूशिमा को रात्रि के प्रियतम (चन्द्रमा) को चपत लगाने का पात्र बना रहा है।।१५७।। यहां घपेटापातन से 'पराजित करना' तक्षित हो रहा हैँ। प्रभा-अभिप्राय यह है कि रूढि या प्रयोजन से ही लक्षखा होती है फिन्तु कविजन यदा-कदा स्वेच्छा से ऐसे शब्दों की कल्पना फर लेते हैं जो मुस्यारयं से सम्बन्ध तो रसते हैं किन्तु वहाँ कोई रूढि या प्रयोजन नही होता। ऐसे सादासिक पद ही निपिद्व कहे जाते हैं। साहित्यशास्त्र में ऐसे पद 'नेयार्थ' दुप्ट पद है। ऊपर के उदाहूरणा में 'चपेटापातन' (चपत लगाना) शब्द मुस्याय में वाषित होरर लक्षणा द्वारा 'पराजय' की पतीति कराता है किन्तु लक्षणा के प्रयोजक ररवढ या प्रयोजन के भरभाव में यह 'नेयार्थ' नामक दोपयुक्त पद है। नेपायं पद कदि की प्रव्युत्पत्ति प्रकट करता है तथा अथोपस्थिति में वाघक है भतः दोप है। अनुवाद्-(कारिका ५०, ५१) में प्रय समासगतमेव दुष्टम्' धर्थात कलिद्द मदि (सीन) फेवल समास के भोतर ही दुष्ट पद होते हैं-यह अन्यय हूँ (इति सम्बन्यः)। तीनों के प्रतिरित्त (थरतिकट भादि १३। बिना समास्ष के (केबस) तथा समास के भौतर भी होते हैं।
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सप्तम उल्लास: [:
१४-फलिप्टं यतोऽर्थप्रतिपत्तिव्यवहिता। यथा- .1 अत्रिलोचनसम्भूतज्योतिरुद्गमभासिभि: । सदशं शोभतेऽत्यर्थ भूपाल, तब चेप्टितम् ॥१५८॥
रित्यर्थः । अन्नाSत्रिलोचनसम्भूतस्य चन्द्रश्य ज्योतिरद्गमेन भासिभि: कुमुद-
१५-अविमृष्टः प्राधान्येनानिर्दिष्टो विघेयांशो यत्र तदू यथा- मूर्ध्ना मुद्वृत्तकृताविरेल गलगलद्रक्तसंस क्त्घारा - : ' : "'
प्रभा-भाव यह है कि कलिष्ट आदि तीनों दोप दूसरे पद के साहचर्य में ही होते हैं। उस दूसरे पद के साथ यदि समास है तो पद-दोप माना जाता हूँ और यदि समास नही है तो वाक्य-दोप माना जाता है। किन्तु श्रुतिकद्ध आदि दोप दूसरे शब्द की गरपेक्षा नहीं रखते अतएव असमास तथा समास दोनों अवस्याग्रो में पद- दोप ही कहे जाते है। अनुवाद्-१४. विलिप्ट वह (दुप्ट) पद है, जिससे (विवक्षित) अर्य को प्रतीति (प्रतिपति) में विलम्ब होता है (व्यवहिता), जैसे- 'हे भूपाल, आपका चरित्र (यश) अत्ि के तेत्र से उत्पन्न (अर्थात् ववद्रमा को) ज्योति के उदय से प्रफुल्लित होने वाले (अर्थात् कुमुदों) के समान अत्यन्त शोभायमान हो रहा है।।१५८।। यहां पर अत्नि के लोचन से उत्पन्न अर्यात् चन्द्रमा की ज्योति (चद्रिका) के 1 उदय से प्रफुल्लित होने वाले अर्थात् कुमुदों के समान यह शरर्य वित्तम्ब से 4 निर्फलता है। प्रभा-भाव यह हैं कि 'अमिलोचनसम्भूतज्योतिरुद्गमभासिभिः' इस शब्द का विवक्षित अथं है-कुमुद और इम समस्तपद के द्वारा 'कुमुद' अर्थ की प्रतीति चिलम्ब से होती है; वयोंकि प्रथम तो अअत्निलोचनसम्भूत' शब्द से विवक्षित भर्थ चन्द्रमा की उपस्थिति में ही विलम्ब हो जाता है, कयोकि वक्षु की ज्योति भी 'लोचन-सम्भूत' कही जा सकती है। फिर 'चन्द्रोद्गमभासित्व' रूप से कुमुद की भी तुरन्त हो प्रतीति नहीं हो पाती, क्योंकि चन्द्रोदय से अ्न्य पुप्प भी विकसित होते है। पतः यह समस्त पद क्लिप्ट है। पहेलिका आदि में कतष्ट दोप नहीं माना जांता । अनुवाद-१५ [अचिमृष्टयिधेयांश वह पद दोप है] जहां विधेयरूप वोपपीश का प्रधानतया (विधेय-प्रतीति-योग्य ढेंग से) निर्देश नहीं किया जाता। जैसे-हनुमघाटक में रावस की उक्िति] 'मरे' मेरे इन महत्कों का-उद्धत रूप से काद जाने के फारए धनीसूत कष्ठ से गिरती हुई सविच्चिम्न (संसक्त) रंक्त की
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२६२ 1 काठ्मप्रकाश:
दोप्णां चैयां किमेतत्फलमिह् नगरीरक्षणे यत्प्रयासः।१५६।। अरत्र मिथ्यामहिमत्वं नानुवाद्यम्। अपि तु विधेयम्। यथा वा- स्स्तां नितम्बादवरोपयन्ती पुनः पुनः केसरदामकाब्चीम।: न्यासोकृतां स्थानविदा रमरेण द्वितीयमौर्वीमिव कार्मुकस्य ॥१६०।। अत्र द्वितीयत्वमात्रमुत्मेद्यम। मौवों द्वितीयामिति युक्त: पाठ: । धारा के द्वारा प्रसालित महादेव के चरसों की कृपा से प्राप्त की हुई विजय से संसार में जिनको भूठी महिमा हो गई है तथा मेरी इन भुजाओं (दोष्ाम्) का -- जो कलास पर्वत के उठाने (उल्लास) की अभिलाया की श्रधिकता (व्यतिकर) के सूचक हैं तथा उत्कट गर्व से उद्धत हैं, कया यही फल है कि (तड्ा) नगरी की, रक्षा में प्रयास करना पड़* ॥१५६॥ यहां पर मिय्यामहिमत्व उद्वेश्य (अरनुवाद्य) नहीं अषि तु विधेय है। (किन्तु यह प्रधानतया निदिष्ट नहों)। प्रभा-भाव यह हूँ कि वाक्य के दो अंदा हैं-१. उद्दद्य और २. विधेय? जिस प्राप्त (सिद्ध) वस्तु आदि का अ्रन्य धर्म से सम्बन्ध जोड़ने के लिए कथन किया जाता, वह उद्दद्य है। उसे अनुवाद्य भी कहते हैं। जिस अप्राप्त (धर्मं) का विधान किया जाता है, वह विवेय है। जैसे 'राम पढ़ता हँ' इस वाक्य में राम उद्दश्य है तथा 'पढ़ता है'-यह विधेयांश है। इसी प्रकार 'यः क्रियावान् स पण्हितः' यहां करियावान् को उद्दरय करके पाण्डित्य का विधान किया जा रहा है। उ्द्दष्य और विधेय की पृथक् पदों के द्वारा ही स्पप्टतया उपस्थिति होती है, समासप्रविष्ट पदों के द्वारा नहीं। यदि विधेयांश (Predicative factor) को समास के भन्तगंत रख दिया जाता है तो वह अप्रधान हो जाता है और उसकी प्रधान रूप से प्रतीति नहीं होती अर्थात् यह विधेयता के रूप में प्रतीत नही होता। तभी भविमृष्टषियांध दोष होता है। इसे ही विध याविमर्श भी कहते हैं। 'मूर्ध्नाम् आदि उदाहरण में-ऐसे मस्तवनें तथा भुजाभों की महिमा मिथ्यो हैं, यह भर्यं विवक्षित है। यहाँ 'मिष्यात्व' विषेयाश है, किन्तु उसका प्रधानतमा निर्देश नहीं किया गया। वह तो अन्यपदार्यप्रधान बहुंधरीहि समास फा भज्ज होकर आया है। समासायं में गुणीभूत हो जाने के कारस उसकी स्पप्ट प्रवीति नहीं होती तथा यहां पविमृष्टवियेयांश दोप है। अनुवाद-अमवा जैसे-पावंतो जी नितम्द से सिसरती हुई वकुल माला (केसरदाम) को फरघनो को बार बार ठीक करती हुई (ध्लों)। (यह करपनी ऐसी प्रतीत होती थी) मानो (उमित) स्थान को जानने वासे कामदेव के द्वारा धरोहर रूप में रक्जी हुई (उसके) धनुप की दूसरी प्रत्यन्चा हो' ॥१६॥
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सप्तभ उल्लास: i [ : २६३ 4-
यथा वा- वपुर्विरूपाक्तमलच्त्यजन्मता दिगम्बरत्वेन निवेदितं वसु। वरेषु यद्वालमृगाच्ि, मृग्यते तदस्ति किं व्यस्तमपि त्रिलोचने ॥१६१। अन्नालच्िता जनिरिति वाच्यम्। यथा वा- आनन्दसिन्धुरतिचापलशालिचित्त- सन्दाननैकसदनं क्षणामप्यमुक्ता। यहाँ पर (मौर्वी के) केवल 'द्वितीयत्व' की उत्प्रेक्षा फरनी है, (वह विधेय है); इसलिए 'भौवीं द्वितीयाम्' यह पाठ उचित है। प्रभा-'स्स्ताम्' इत्यादि कुमारसम्भव के पद्य में पावती की बकुल-मेखला में कामदेव की द्वितीय प्रत्यञ्चा के धरोहर रखने की उत्प्रेक्षा की गई है। यहाँ पर न्यासीकरण (धरोहर रखने) के हेतु के रूप में उत्प्रेक्षा (हेतूतप्रेक्षा) है। न्यासीकरस -का हेतु मौर्वी का द्वितीयत्व अर्थात् दूसरा होना ही है, क्योकि मौर्वीभिन और वस्तु भी यदि सद्वितीय double (दोहरी) होती है तो वह कहीं रख दी जाती है। अतएव यहाँ द्वितीयत्व मात्र की ही उत्प्रेक्षा करनी है 'द्वितीय मौवी' की नही। इस प्रकार यहाँ 'द्वितीयत्व' विधेय है और वह उत्तरपद-प्रधान कर्मधारय समास में गोस हो गया है प्रधान रूप से नहीं प्रतीत होता। अतएव यहाँ अविमृष्ट- विषेयांश दोष है। अनुवाद-प्रथवा जैसे 'हे मृगशावकनयनी (पावती), उस महावेव का शरर विषम (तीन) नेत्रों वाला है, जन्म पज्ञात है, (कुल, गोत्र को बात ही क्या ?) 'नग्नता (वस्त्रहीनता) से हो उसकी सम्पत्ति प्रकट होती है। बतलामो तो वरों में जो (रूप, फुल तथा सम्पत्ति आदि गुख) खोजे जाते हैं; पया उनमें से कोई एक भी (व्यस्तमपि) त्रिनेत्र महादेव में है' ॥१६१॥ 4 + यहाँ पर 'अलक्षिता जनिः' मह कहना चाहिए था। प्रभा-कुमारसम्भव के 'वपु' इत्यादि पद्य में वर में सोजे जाने योग्य गुगों • का शिव में अभाव दिखलाते हुए उनके 'जन्म की अलक्ष्यता' बतलानी है। मतएच . यहाँ पर जन्म में 'अलक्ष्यता' विषेय है। यह ग्रलक्ष्यता, ऐसे अन्यपदार्थप्रधान बहुवीहि समास (अलक्ष्य जन्म यस्य स अ्रलक्ष्यजन्मा) में गोए (भन्ग्ीभूत) हो गई है कि जो बहुव्रीहि स्वयं भी तद्धितार्थ का अ्रङ्ग बन गया है (अलक्ष्यजन्मनः भावः अ्लक्ष्य- जन्मता)। इसलिये विधेयांश का प्रधानतया निदश न होने के कारण यहाँ भविमृष्ट- विघेयांश दोप है जो 'अलक्षिता जनिः' इस पाठ से दूर हो सकता है। कुछ व्यास्या- फारों का मत है कि शिव का जन्म भी भसिद्ध है अतः यहाँ विशिष्ट अर्यात् 'पलक्ष्य- + जन्म' ही विधेय है तथा कोई दोष नहीं। + * अनुवाद-प्रथवा जैसे-'जो (प्रेमसी) आापके लिये मानन्द का सागर मो, पापके अरति चंचलतामुक्त चित्त को बाधने का एकमातर स्थान थी, जो सदा
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२६४ 1 ·काव्यप्रकाश:
या सर्वदैव भवता तदुदन्तचिन्ता- तांन्ति तनोति तब सम्प्रति घिगू घिगरमान् ॥१६२।। अत्र न मुक्तेति निषेधो विधेयः । यथा- नवजलघरः सन्नद्धोऽयं न दप्तनिशाचर: सुरघनुरिदं दूराकृष्ट न तस्य शरासनम्। शरयमपि पदुर्धारासारो न वाणंपरम्परा कन कनिकष स्निग्घा विद्यु त् प्रिया न ममोवेशी ॥१६३।।- इत्यन्न, न त्वमुक्ततानुवादेनान्यदूत्र किञ्चिद्विहितम्, यथा- जुगोपात्मानमन्नस्तो भेजे धर्ममनातुरः। अपगृध्नुश्चाददे सोऽर्थानसक्त: सुखमन्वभूत् ॥१६४।। इत्यन्न अन्नस्तत्वाद्यनुवादेनात्मनो गोपनादि। हो आपके द्वारा क्षए भर को नहीं छोड़ी गई, इस समय उसके समाचार (उदरत) जानने की चिन्ता तुम्हें सेद उत्पन्न करती है, हमें धिककार है ।१६२॥। यहाँ पर 'न मुक्ता' (नहीं छोड़ी गई) इसमें 'न' (निघंध) विधेमोश है (घतः न का प्रधानरूप से निर्देश होना चाहिये, समास में नहीं); जैसे निम्न पद्य में है- (यथा इत्यत्र)- [विक्रमोवंशोय में पुरुरवा फहते हैं। 'यह मुझे मारने के लिये उद्यत नव जलधर है, दपयुक्त राक्षस नहों है, यह इन्द्रपनुप है, दूर सक सोंचा हुआ उस (राक्स) का धनुप नहीं है, यह तीव मूसलाधार वर्षा है, बालों की पंकि नहीं है, कनक को फपसरेसा जैसी दीप्तिमती (स्निग्था) यह विद्युत् है, मेरी प्रियतमा उवशी नहीं है ।१६३।। यहां ('आनन्द सिन्धु' इतयादि पद्य में) अमुषतता को उद्देश्य रूप से कहकर (अनुवादेन) अन्य फुद विधान नहीं किया गया। जैसे कि-(रघुवश के) 'उन महाराज (दिलीप) ने निरभोक होफर अपनी रक्षा की, नौरोग रहफर धर्म का पालन किया, निर्लोभ होकर मन का परहस किया, माससिरहित होकर सुल-भोग किया ॥१६४।। इस पद्य में 'अगस्त' आदि का अनुवाद फरके (मर्थात् सननस्त आादि को उद्देश्य बनाकर) 'अपनी रक्षा फरना' आदि का विधान किया गया है ('बिहितम्' इत्यन्वम:)। प्रभा-भाव यह है कि 'न' (नज) के दो मर्यं होते है-१. मसग्यप्रतिपेय, २. पर्यु दास। जहाँ विध्यश की अप्रथानता होती है तथा निषेषांग की प्रधानसा होती है मोर नज् का गम्बन्य किया के साथ होता है; यहाँ नभ का भर्य प्रसज्मप्रतिषेप (प्राप्त का निपेध) होता है। किन्सु जहां विष्मेद प्रधान होता है तपा निपेभास
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सप्तम उल्लास: २६५
१६-विरुद्धम तिकृद्यथा -- सुधाकरकरा कारविंशारदविचेष्टितः। अकार्यमित्रमेकोSसौ तस्य कि वर्रायामहे॥१६५॥। अन्र कार्य विना भिन्रमिति विवत्ितम। अकार्ये मिन्नमिति तु प्रतीतिः। यथा वा- चिरकालपरिप्राप्तलोचनानन्ददायिनः। कान्ता कान्तस्य सहसा विदघाति गलमहम् ॥१६६।। भप्रघान होता है और नज् का सम्बन्ध उत्तरपद से होता है वहाँ इसका अर्थ पयुं दास होता है। जँसा कि कहा भी है- पपरांधान्यं विधेयंत्र प्रतिषेधे प्रधानता। प्रसज्यप्रतिषेधोऽसी तरियया सह यत्र नञ्।। -प्रधानत्वं विधेयंत्र प्रतिषधेऽप्रधानता । पर्यु दास: स विन्ञेयी यत्रोत्तरपदेन नञ ।। समास में नम का अर्थ पर्यु दास होता है, प्रसज्यप्रतिषेध नहीं। आानन्दसिन्धु इत्यादि पद्य के 'अमुक्ता' पद में 'न मुक्ता भवति' यह अर्थ विचक्षित है। अतः यहाँ 'नवजलघरः इत्यादि पद्य के समान प्रसज्य-प्रतिषेध ही विधेय है। ऐसा नहीं कि 'जुगोप' इत्यादि पद्य (में 'अनस्त' आदि) के समान (यहाँ) अमुक्ता का उद्देश्य रूप में कथन करके कुछ विधान किया गया हो । किन्तु यह 'न' अर्थात् निषेध नञ् समास में आ जाने के कारण गौए हो गया है और प्रधान रूप से विधेयांश की प्रतीति नहीं होती। इसलिये यहाँ अविमृष्टविघेयांश दोप है।
. वाला), जैसे- अनुवाद-१६. विरुद्धमतिकृत् (प्रस्तुत अर्थ के विरुद्ध मति उत्पन्न करने
'एक वह है, जिसका आचरस (विचेष्टित) सुधाकर को फिरणों के समान (निर्मल) एवं कुशल है, जो बिना किसी प्रयोजन के (प्रकार्य) ही मिन्र है; उस (के गुखों) का वपा वर्खन करें ।१६४।। यहाँ पर फार्य (प्रयोजन) के बिना मिन्न' यह अर्य विवक्षित है किन्तु 'बुरे कार्य में (कुकारये) मित्र है' यह प्रतोति हो रही है। प्रभा-जिस पद से विवक्षित अर्थ के प्रतिबन्धक अन्य अर्थ की युद्धि उत्पन्न हो जाया करती है, वह विरुद्धमतिकृत् (दुष्ट पद) होता है। यह अनेक प्रकार का होता है। इनमें से भिन्न २ समास-विग्रह में विरुद्धमतिकृत् का उदाहरणनुयाकर' भादि है। यहाँ विवक्षित समास-विग्रह यह है- कार्यस्य प्रयोजनस्याभावोऽकार्यम्-प्रव्ययीभाव समास। अकाय भिनम् भकायं- मित्रम् (मयूरव्यंसकादि समास)-प्रयोजन बिना मित्न। किन्तु यहाँ यह अर्थ प्रकट हो रहा है-न कार्यम् अकार्यम् अर्थात् कुकारय मित्रम्-पुरे कार्य में मिन। भतएव "भकाय' पद विरुद्वभतिकृत्'(दुष्ट पद) है। अनुाद-प्रयवा जैसे-'चिरकाल के पश्चात् माये हुये तथा नेत्रों को परानन्व देने वाले प्रियतम का प्रिया सहसा हो क्ठप्रह (पालिङ्भन) कर लेती . है'।१६६॥।
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२६६ : काव्यप्रकारी:
अत्र करठम्रहमिति वाच्यम्। यथा वा- न न्रस्तं यदि नाम भूतकरुणासन्तानशान्तात्मनः र तेने व्यारुजता घनुर्भगवतो देवाद्गवीनीपतेःाग तत्पुत्रस्तु मदान्वतारकवघाद्विश्वस्य दत्तोत्सव:मT रकन्दःस्केन्द इव प्रियोडद्मथ वा. शिष्य: कथं:विस्मृत: ॥१६५।। अन्न भेवानीपतिशब्दो भवान्या: पत्यन्तरे प्रतीति करोति । यथा वा- यहाँ पर (गल ग्रह के स्थान पर) 'कण्ठ-ग्रह' यह फहना घाहिये ।: 1ri प्रभा-यहाँ पर 'गलग्रह' शब्द से 'गले-लगना' (पबिङ्गन करना)- सर्य विवक्षित है; किन्तु समास में विरुद्धार्थक निरद पद के आ जाने के कारर विरु्द्ध अर्भ की प्रतीति हो रही है। गलग्रह शब्द रोगविशेप में तथा गला पकड़ कर निकालने' (अभंचन्द्रदान, के अर्य मे निरद है और इससे आलिङ्गन अर्थ; तभी प्रकट होता है जब यह यौगिक माना जाता है। 'योगाद् रूठिर्वलीमसी' इस न्याय के अनुसार 'रोग' या 'गला पकड़ना' अर्थ की ही यहाँ प्रथम प्रतीति होती है। इसलिये यह पद विरुद्धमतिकृत् है। अनुवाद-अथवा जैसे-"यदि उस (राम) ने धनुष-भङ्ग करते, समय पार्वती-पति महादेव से डर न किया, तो ठोक है (नाम) व्योंकि ये शिय" तो) प्राशियों पर दया करने के कारल शान्त-स्वभाय घाले हैं; किन्तु उनके पुत्र स्कन्ब फो क्यों भुला दिया, जिसने मदान्ध तारकासुर के यप द्वारा सभी लोगों फो मानन्व प्रदान किया है; अथवा स्कन्द के समान प्रिय उन (शिव) के शिष्य मुक (परचुरम) को कंसे भुला दिया' ।१६७।। यहाँ पर 'भवानीपति' (भव की पत्नी भयानी, उनके पति भवानीपति) शव् भवानी के किसी अन्य पति की प्रतीति कराता है, (भतः विर्द्धमतिकृत् है)। प्रभा-कही २ किसी पद का कोई विशेष अर्थ विवक्ित होता है,िन्तु उस अर्थ में गर्य होकर वह पद किसी अन्य अविवक्षित अर्थ का म्रहणा करा देता है तभा विरुद्धमतिकृत् होता है। जैसे-भवभूति के महावीर चरित के उपयुर्त पद में 'भवानीपति' शब्द है। यहाँ 'भवात्' कहने से ही भभीष्ट अबं (पर्यात् दक्षयज : ध्वंसक रद्र-से) प्रकट हो सकता था। इम अर्थ में 'भवनीपति' शब्द व्यर्य है तथा इसके द्वारा यह अविवक्षित अर्थ प्रतीत होता है-भव की पतनी का पति (भवस्य पली भवानी तस्या: पतिः भवानीपतिः) चोर, इससे-भवानी के किसी सन्य पति का अभिप्राम निकलता है (जैसे देवदत की परनी का पति) मतएय यह. पद विषव- मविकृत् है। युद व्पात्याकारी का मत है कि भनानी दब्द दुर्गा, (पारसी) में एत : हूँ, योगिक नही अकः)यहा फोई दोष नहीं ।: । ; अनुवाद-प्रथवा जैसेवे भम्यिकापत (सिव) सापको रक्षा करे मिनसा
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सप्तम उल्लास: [: २६७
गोरपि यद्वाहनतां प्राप्तवतः सोऽपि गिरिसुतासिंह्:। सविधे निरहङ्कार: पायाद्वः सोडम्बिकारमय: ॥१६८।।- .अन्राम्विकारभण इति विरुद्धां घियमुत्पाद्यति। श्रुतिकटु समासगत यथा- सा दूरे च सुधासान्द्रतरद्गितविलोचना। वर्हिनिर्हादनाहं डयं कालरच समुपागतः ॥१६६।। एवमन्यदृपि ज्ञेयम्। [वाक्यदोपा:] (७४) अपास्य च्युतसंस्कारमसमर्थ निरर्थकम्। वाक्येऽपि दोषा: सन्त्येते पदस्यांशेऽपि केचन ॥५२॥ ॥ i: वाहन बने हुए (नन्दी) वुपभ े निकट वह (फर) पावती का (वाहनभूत) सिंह भी : प्रहद्धार,रहित (सौम्य) हो गया' ।१६८।। i: : यहाँ पर 'अम्बिकारमण' शब्द विरुद्धमतिकृत् है। I T. . प्रभा-'अम्बिका' शब्द का अर्थ 'गोरी' है तथा अम्बा=माता, अम्वव : भम्बिका, इस व्युत्पत्ति द्वारा 'अम्बिका' शब्द का शर्थ माता भी है। इसीप्रकार :रमण शब्द का अर्थ प्रीतिकर के साथ साथ उपपति (जार) भी होता है। उपयुक्त पद्य में 'अ्म्विकारमण' का विवक्षित अर्थ-'गोरीपति शिव' है; किन्तु इससे माता का उपपति' यह अर्थ भी प्रकट होता है, जो अविवक्षित है। अतएव यह शब्द विरुद्धमतिकृत है। अरपनुवाद-समासगत श्रतिकटु पददोप (का उदाहरण); जैसे- 'प्रमृत की घनो तरङ्गों से युक्त नेत्रों वाली वह सीता तो मुभसे दूर है औौर मयूरों के केकारव (बहिनिर्होदन) के योग्ध अर्थात् उसका उत्पादक यहुं वर्षा काल आा गया' ॥१६६॥। इसी प्रकार अ्रन्य (समासगतच्युतसंस्कृति आदि) भी जानने चाहियें। प्रभा-ऊपर कहा जा चुका है कि श्रुतिवाद आदि १३ दोप केवल पदगत तथा समासगत भी होते है। केवल पदगत (असमासगत) के उदाहरण दिये जा चुके हैं। उनमें श्र तिकट का समासगत उदाहरण 'सा' इत्पादि है। यहाँ पर 'बहिनिह्नादनाहँ' पद शरृद्गार रस की दृष्टि से श्रोताओं का उद्व जक है, यह समस्त पद है अतः समासगत धुतिकट का उदाहरण है। इसी प्रकार व्युतसंस्कृति भादि शेप १२ पददोपों के समासगत उदाहरणा स्वयं देखे जा सकते है। वाक्यदोप :. अनुवादं-(उपयु क्क थ तिकट आादि १६ दोषों में से) ध्युतसंस्कृति, प्रसमर्प औोर निरयंक (इन तीनों) को छोड़कर शेप मे (प्रयोदश दोष) वावय में भी होते हैं तथा (उन १६ में से) कुछ पदांश (पदकदेश) में भी होते हैं।
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२६८ 1 काव्यप्रकाश:
केचन न पुनः सर्वे। क्रमेणोदाहरसम्। सोडप्येष्ट वेदांस्त्रिद्शानप्ट पितनतार्प्सीत् सममंस्त चन्धून्। व्यजेष्ट पड्वर्गमरस् नीती समूलघाते न्यवघीद्रींशच।।१७0l। २. स रातु वो दुश्च्यवनो भावुकानां परम्पराम्। श्रनेडमूकताद रच द्यतु दोपरसम्मतान् ।।१७१॥. अत्र दुश्च्यवन इन्द्रः अ्र्नेडमूको सूकघधिरः। (कारिका में) केचन प्रर्थात् सभी नहीं। प्रभा-'गपास्य' पंद का 'पदस्यांरेऽि 'केचन' से सम्बन्ध नहीं है, भतः शुतिकट् आदि सभी (१६) दोपों में से कुछ पदोरांगत भी होते हैं। पददोप तथा वाक्यदोप का गम्भीर विवेचन काव्य-प्रकाश की टीकामों में किया गया है। संक्षेप में भाव यह है कि 'एकमदवूत्ति' श्र तिकट आदि पददोप हैं ता 'अनेकपदवृत्ि' श्रुतिकट आदि वाक्यदोप है। व्याकरण द्वारा पदों का ही संस्कार होता है, अतएव च्युतसंस्कृति पद-दोप है, यह वाक्य में नहीं हो सकता। इसी प्रकार सकयार्थ की उपस्थिति न कराना अर्थात् 'महमयंत्व' तथा 'च' भदि का केवल पादपूर्ति आदि के लिये प्रयोग अपात् 'निर्थफत्व' भी पदन्दोष हैं वाक्य-दोप नहीं। प्नुचाद्-(वाश्यगत शतिकट पादि के) कमशः उदाहरस हैं- १. भटि्टिकाव्य में ददरय वंन] 'उस (दशरय) ने वेवों का अध्ययन किया, वेदों की पूजा को, पितरों को तुप्त किया, यन्धुयों का सम्मान किया, (काम, कोप, लोभ, मोह, मद, मत्सर) छः (शंधुयों) के समुदाय को जोता, नीति में रमल किया तथा शयुओों का जड़ से विनाश फर दिया॥७०।। प्रभा-यहा पर अध्येष्ट, भमप्ट, व्यजेप्ट पद्वर्गम इतयादि भनेक पदों में करंकटता हे, भतः वाक्यगत श्र तिकट स्व दोप है। अनुवाद्-२. (यावयगत अप्युत्तत्व) यह प्रसिद्ध इन्द्र (दुरष्यवनः) तुम्हें रहयालों की परम्परा प्रदान करे एवं सुम्हारे वायुमों को (भसम्मतान्। बविरता तथा भूकता आदि बोषों के द्वारा नव्ट करे।१७१॥
बोप है। यहां पर दुश्भ्यवन (इन्द्र-सर्य में) तथा धनेडमूक (बपिरमूद) में धमपुरत
प्रभा-यद्यपि वनेष में 'दुशच्ययन' दव्द इन्द्र के भर्थ में राधा मनेडकमूत् :शन्द बधिर-मूक (मनेडकसूफ उडिष्ट: श्ठे यावभुविवजितमेदिनी) मे पर्य में पटिस है वयापि कषियों द्वारा इनका प्रयोग नही किया गया मतः यहा मनेकरदणठ (वानपगत) मश्युत्व दोप है।
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सप्तम उल्लास:
अव्जरुचिभार्वरस्ते भातितरामवनिप, श्लोक:।।१७२।। अत्रसायकादय: शब्दाः खड्गाब्घिभूचन्द्रयशः पर्यायाःशरायर्थतया प्रसिद्धाः। ४. कुविन्दरत्वं तावत्पटयसि गुएामराममभितो यशो गायन्त्येते दिशि दिशि च नग्नास्तव विभो,
तथापि त्वत्कीर्तिभ्र भति विगताच्छादनमिह ।१३७।। अत्र कुविन्द दिशव्दोऽर्थान्तरं प्रतिपाद्यन् उपश्लोक्यमानस्य तिर- स्कारं व्यनक्तीत्यनुचितार्थः।
अनुवाद-३. (वाक्यगत निहृतार्थत्व) हे भूपाल, सायक (खड्ग) है सहापक जिसका ऐसी भुजा वाले तथा सागर (मकरध्वज: भकर एव ध्वज: यस्य सः) द्वारा भर्यादित भूमि के अधिपति आपका यह चन्द्रमा (अब्ज) की कान्ति के समान दीप्ति- मान् पश (इ्लोकः) अत्यधिक शोभायमान हो रहा है' ॥१७२। .यहाँ पर सायक आदि (मकरध्वज, क्षमा, अब्ज, श्लोक) शब्द क्रमशः खडग सागर, पृथ्वी, चन्द्रमा तथा यश के पर्याय रूप में प्रयुक्त है, किन्तु ये करमसः बाए यादि (कामदेव, सहनशीलता, फमल तथा पद्य) के पर्थ में प्रसिद्ध हैं। [जिससे प्रसिद्ध अ्रर्थं के द्वारा प्रकृत अर्थ तिरोहित (दबा हआ) हो जाता है . तंथा निहतार्थत्व वाक्यदोष है।] अनुवाद-४. (पावयगत अनुचितार्थत्व) [राजा के प्रति कवि फी, जक्ति] 'हे राजन् (विभो: आप पृथिवी को प्राप्त करने वाले (कु धृथिर्वी विन्दति लभते इति 'फुबिन्दः) हैं; शौर्यादि गुख समुदाय (गुए-ग्राम) को सवंत्र निमल कर रहे हैं (पटयसि निर्मलीकरोषि)। ये बन्दीगए (नग्नाः) प्त्येक दिशा में तुम्हारा मश गाते हैं तथा सुम्हारो कोति, जो शरच्चन्द्रिका के समान गौर, दीप्तिमान् विशाल (विकट) तया समस्त अङ्गों से सुन्दर है, (वह) इस लोक में नंगी (नग्न) होकर भ्रमण कर रही है। व्यङ्गचार्य ['त्ुम तन्तुयाय (कुषिन्द-जुलाहा)] हो, तन्तु-समूह का (गुरप्रामं) ताना याना करके (श्रभितः) कपड़ा बुनते हो (पटयसि)' ये वस्त्हीन (नग्नाः) तुम से वस्त्र पाकर तुम्हारा यश गाते हैं तयापि तुम्हारी (शरत्-सुभगा) कोतिरूपा स्त्रो यहाँ वस्प्रहीन होफर विचरस करती है ॥१७३।। यहाँ पर (उपमुक्त प्रकार से) कुविन्द आादि शब्द (व्यञ्जना द्वाररा) म्रन्य - धर्य (तन्तुवाय आादि) का बोध कराते हैं तथा स्टयमान (राजा) का तिरस्कार प्रकंट करते हैं। प्रभा-'कुविन्द' इत्यादि वाक्यगत पनुनितार्थत्व का उदाहरस है। मही पर पाकरणिक राजा रूप अर्थ याच्य है तथा तन्तुवायमप अर्प ध्यह्गंम है। इन दोनों का उपमेयोपमान भाव होता है तन्तुवाय से राजा की समता दिखलाना
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३००'] काव्यप्रशाश:
५. प्राभ्रभ्राड्विष्णुघामाप्य विपमाश्वः करोत्ययम्। निद्रां सहस्रपर्णानां पलायनपरायखाम ॥१७४।।
गगन-सप्ताश्व-सङ्गोच-दलानामवाचकाः। ६. क-भूपतेरुपसर्पन्ती कम्पना वामलोचना। तत्तमप्रहरणोत्साहवती मोहनमाद्घो ॥१७४॥
ख-तेडन्यैर्वन्तिं समश्नन्ति परोत्सर्गब्च भुब्जते। इतरार्थमहे येपां कवीनां स्थात्प्रवर्त नम् ॥१७६॥। अनुचित है अतः यहां अनुचितार्थत्व वाकय-दोप है। यह निहृतायंत्व नही हो सकता, क्योंफि यहाँ प्रसिद्ध तथा अप्रसिद्ध दोनों अथं विवक्षित है किन्तु निहृताथंत्व के विषय में केवल प्रकृत अर्य ही विवक्षित हुआ करता है। अरनुवाद-५. (घाश्यगत अवाचपत्व) यह विपमसंस्यक (सप्त) प्रश्वों पाला (सूरपं) उत्तम जतवों से युक्त (पभ्न आकाशे भ्राजते इति अभ्रभ्राद् जलदः प्रहृष्ठो- Sभ्रभाट् यत्र ताद्शम्) आकाश को प्राप्त करके सहस्रदल यासों (कमलों) की निद्वा को भागने के लिये तत्पर करता है'॥१७४। यहां पर 'प्राभ्रभ्राट्' (प्रफृष्टतया प्रकाश में स्यित), 'पित्युधाम' (विप्स का स्यान), 'विपमाशय' (विषमसंस्यक सश्वों वासा), 'निद्रा' (पराली की एक विशेष अवस्था), 'पएा' (पत्ता)-ये शब्द उत्तम मेघ, आफाशा, सप्ताश्व (सूर्य),
कत्व दोष है। सड्टोच तथा दल (सहसदल) प्ररपों के पवाचक हैं (अ्रतः यहाँ पर वाकमगत भवाच- अरनुबाद-६.क-(वाश्यगत पशलीलत्व) शयुपरों पर वक्र दृष्टि वासी (दामलोचना) उनको ओोर जाती हुई (उपसर्पन्ो) सेना (फम्पना) मे मिन्न-भिन्न पास्त्रों के प्रहार में (प्रहरस) उत्साह्युक्त होफर शयुभों को वद में कर लिया • (मोहनम् भ्रावधी)'॥१७४॥
सश्लील हैं। यहाँ पर उपसर्पए, पहरए तथा मोहन शब्द सग्जोसपादक होने के कारए
परभा-'उपस्पए' आदि सब्दीं के द्वारा उपयुकक भर्य विवकित है किन्तु इन शब्दों से व्यञ्जना द्वारा एक अन्य अयं की भी प्रतीति होती है जो सरजा- दायिनी है भतएव यहाँ वावयगत पीहादायी मश्नीतत्व दोप है। यहां मद्पायं यह है-'रतिके लिये उद्यत(उपरापन्ती), ंपती हुई (फम्पना), सुन्दर मेत्रों वाली (वामलोचना), कामचासन प्रमिद्ध जमनताठन आदि में उस्साह्युक (सरतहरणे 'उत्साह्वती) नाविका ने भूपति को रति सुख-मग्न (भूपतेमोंहनम्) कर दिया। अनुवाद-६. स-(वाव्यगत, जुगुप्सा परतीतत्य) जिन कविमों को प्रदुति प्रन्म कवि-वशित अरय के पहस (हरसा) में होती है ये दूसरों का हिया
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सप्तमउल्लास [ ३०१
अ्त्र वान्तोत्सर्गप्रवर्त नशब्दा जुगुप्सादायिनः। ग. पितृवसतिमहं व्रजामि तां सह परिवारजनेन यत्र मे। :भवति सपदि पावकान्वये हृदयमशेपितशोकशल्यकम् ॥१०७।। अत्र पितृगृहमित्यादौ विवच्षिते इमशानादिपतीतावमङ्गलार्थत्वम् । ७. सुरालयोल्लासपरः प्राप्तपर्याप्तकम्पनः । मार्गेसप्रवको भार्वद्भूतिरेप विलोक्यताम् ।१७८॥।
इति, सन्देहः। अत्र किं सुरादिशब्दा देव-सेना-शर-विभूत्यर्थाः कि मदिरादर्था
हमा चमन खाते हैं तथा दूसरों के पुरीष (उत्सर्ग) का भोजन करते हैं ॥१७६। ("यहाँ पर 'वान्त' (वमन) तथा 'उत्सर्ग' (पुरोप) शब्द (वाच्यार्थ द्वारा) एवं 'प्रवर्तन' शब्द (मलत्याग रूप व्यङ्गपार्थ द्वारा) जुगुप्सा (घृख) दायी अबलील हैं" [तथा वावयगत घुणाप्रद प्श्लीलत्व दोप है]। ६. ग-'मैं अपने परिवार सहित उस पितृ-गृह (पितृवसति) को जाती, हूं, जहां पवित्र करने वाले वंश में (पावकान्वये) मेरा हृदय तुरन्त ही शोक रूपी शल्य से रहित (पशेपितं शोकरूपं शल्यकं यस्मात् तयाभूतम्) हो जायेगा' ।१७७। -; यहाँ पर ('पितृवसति' आदि शब्दों द्वारा) 'पितृ-गृह' आदि अर्थं वियक्षित होने पर भी 'शमशान' आदि अर्थ की प्रतीति होती है तथा प्रमङ्गलार्थकता है। प्रभा-'पितृवसति' आदि पतिगृह में शोकपीड़ित किसी स्त्री की उक्ति है। यही 'पितृचसति', 'पावकान्वय' तथा 'अशेपितशोकशल्यक' पदों से व्यञ्जना द्वारा यह प्रकट होता है-मैं उस शमशान (पितृवसति) को जाती हूं, जहाँ भग्नि. सम्बन्ध हो जाने पर (पावकान्दये) मेरा हृदय भस्मीभूत (अरेपितशोकशल्यकं) हो जाएगा। इन अमङ्भलसूचक अों के (अनेक पदों मे) प्रवट होने से यहीं" वक्यगत अमझलप्रद अशलीलत्व दोप है। अनुवाद-७.' (वाक्यगत सन्दिग्यत्व) 'देव-गृह में हर्ष-तत्पर, 'शभुनाश में समर्थं (पर्याप्त) सेना (कम्पन) से युक्त, वाल-प्रहार में तत्पर (भागसप्रवः), प्रकाशमान वंभव वाले (भास्वद्भूतिः) इस (राजा) को देखिये' ।१७८॥ :**: यहाँ पर यंह सन्देह है कि कया सुर आदि शब्द वेव (सेना, द्वार, विभूति) भादि के अर्थ में है अथवा 'मदिरा' आदि के अर्यं में। प्रभा-'सुरा' आदि वाक्यगत सन्दिग्धत्व दोप का उदाहरए है। यहाँ पर सुरालय, कम्पन,मागण तथा भूति के अर्थ में सन्देह है कि इनका उपयुक्कत भर्य होता हूँ अथवा मदिरालय आदि अर्थ; जैसे कि-'मदिरा में आनन्दमग्न, भलीभाति कापने वाले, मांगने (मागण) में तत्पर, उज्ज्वल भस्म वाले (भास्वद्भूति) इसे देखिये ।'-इसी प्ररनेकंपदगत सन्देह के कारण यहाँ सन्दिग्यत्व वाक्य-दोष हूँ।
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1 काव्पप्रकार:
यथा वा- अपाङ्गसंसर्गितरङितं दशोभ्र वोररालान्तविलासि वेल्लितम। "विसारिरोमञ्चनकब्चुकं तनोस्तनोति योऽसौ सुभगे तवागतः॥।८४।।
उद्दद्य और विधेय के पूर्वापर भाव का विपरयय हो जाने पर दोप हो जाता है; कयोंकि कहा है-'ग्रनुयाध्यंमनुवत्यंव न विधेयमुदीरयेत्।' यहीं पर 'भय न्ययरार:' इन दोनों पदों के दोपयुक्त हो जाने से यह वापमदोप है 'अयमेव न्यंक्कार:' पाठ से यहं भविमृष्टविधेयांश वाक्यदोप दूर हो सकता है। (स) प्रसङ्ग से इस पद्य के अ्न्य पाद में दोप दिखलाते हुए ग्रन्थकार ने बतलाया है कि यहां पर 'उच्छूनत्व' उद्दक्य है, उसमें 'वथात्व' विधेय है वथात्वसहित' उच्छनता उद्दश्य नहीं। किन्तु यह युथात्वरूप विधेमांश समास मे गौसा हो गया है; इसकी प्रधानतया प्रतीति नही होती अतएव यहां समासगत अविमृप्टविधेयांसत्व पद दोप है.। कुछ टीककार इसे यथाकथञ्चित् वाकम-दोप ही सिद्न करने का प्रयास करते हैं। (ग) यहाँ यह शङ्टा हा सकती है कि '्यक्कारो्यम्' में भर्य के सह्ँ दय- विंधेय भाय की ही विपरीत रूप से प्रतीति हो रही है अतः यहाँ यायार्य-दोप होगा वाकय-दोप नहीं। 'अ्रम च' इत्यादि पक्ति में इसका रामापान किया गया हैँ।.' भाव यह है कि रचना शब्दों का धर्म है, शब्दों के विपरयय से ही यह दोप होता है' इसनिये यह वाक्य-दोप है अर्थ-दोष नहीं। अ्रनुवाद्-(विभेम की अनुपस्यिति होने से घविमृष्टविधेयांग) अपबा जंसे-[ससो को नामिका के प्रति उक्ति]-'हे सुन्दरी, तेरा वहट या गया है, जो तेरे नेत्रों में प्रान्त भांग तक तरद्भित फटाक्षों को फलाता है, तेरी भोहों की वकतां में (परालान्ते कुटिसप्रान्तमागे) विलासयुक्त नर्तन (बेल्सितम्) उत्पक्ष कंद देता है तथा सेरे शरीर पर प्रकट होने योग्य (विसारि) पुलककञ्चुरु यना हेता है।।८r।।" क: ;यहाँ पर 'योइसों' में दोनों पद फेवल उद्देश्य (अनुवात) की प्रतीति कराते हैं।, 1 प्रभा-विधेय मे गोरा हो जाने मयवा विषयंम हो जाने मे ही, वापयगत: भविमृष्टविधेयांश दोप नहीं होता; फिन्नु विषेय की मनुस्तिति होने पर भी यह दोप होता है। 'मपास्म' इत्यादि इसी का उदाहरता है। भाव यह है कि 'बसदमंयो नित्ोमिसम्बन्य: इम नियम के अनुसार उदद्यवाकयगत 'मत्' शब्द नियत रूम से विभेयवावयगत 'तत' सब्द की आकंमा रसता है। यहाँ पर मिमेप वापन में 'तत्' दब्द (गः) नहीं दिया गया। 'प्रमो' गब्द (पोन्ो) मवशन दिया गया है किस्तुल
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सप्तम उल्लास:
नापेक्षते। क्रमेंणोदाहर राम- -
कातर्य केवला नीतिः शौर्य श्वापदचेप्टितम्। श्रतः सिद्धिं समेताभ्यामुभाभ्यामन्वियेप सः ॥१i द्वयं गत सम्प्रति शोचनीयतों समागम प्रार्थनंया कपालिन: "कला च सा कान्तिमती कलावतसत्यमस्य लोकस्य च,नेत्रकौमुदी ॥१८६॥। उत्कम्पिनी भयपरिर्खलितांशुकान्ता, • ते लोचने प्रतिदिशं विधुरे चिपन्ती।- अन्तभूत हो जाता है। इस प्रकार यहाँ विघेय की पूंरतया उपस्थिति नहीं होती तथा 'अविमृष्टविधेयाशत्व' वाक्यदोप है। यदि कोई शङ्डा करे कि 'यत्' 'तत्' का पृथक् २ प्रयोग, भी देखा जाता है अतः इन दोनों की साकांक्षता ही सिद्ध नहीं होती और एक के प्रयोग से भी निराकांक्ष प्रतीति हो सकती है तो ब्रन्थकार 'तथा हि-परामृश्यते' भवतरण द्वाऱा उसका समाधान करते हैं- अरनुंवाद-क्योंकि जो तत् शब्द (क) पूर्वप्रनोत (प्रक्रान्त), (स) लोक प्रसिद्ध (प्रसिद्ध) तथा (ग) स्पष्ट अनुभवको हुई (अनुभूत) .वस्तु आदि के विषय में होता है, वह 'यत्' शब्द के ग्रहस की अपेक्षा नहीं रखता। (इन तोनो के) कम से उदाहरण हैं -- '(क) [रघुवंश में अरप्रतिथि-वर्शान] 'केवल (शीर्यादिरहित) नीति भीर्ता है, केवल (नीतिरहित) जयं (व्याप्रादि) पसुप्नों का आचरण है इसलिए पतियि नामक राजा दोनों (नीति तथा शोयं) से संयुक्त रूप में इप्ट सिद्धि के लिये प्रयत्न करते रहे (पन्वियेष अन्विष्टवान्, भन्वेपस किया)।१८५॥ [यहाँ 'सः' प्रकरस प्राप्त (प्रकान्त) राजा प्तिभिके लिये धाया है प्रतः 'यतु "शन्द को झाकांक्षा नहीं करता]। (ख) [कुमारसम्भव में बट्येयधारी शिव की पावती के प्रति,उक्ति] 'कपाल धारस फरने वाल महादेव फी समागम प्रार्यना से सबदोनों शोचनीयता को प्राप्त
तुम - 1१८६॥। हो गई -वह चन्द्रमा को कान्तिमती फला तथा इस लोक की नेत्रों को चन्द्रिका
[यहा 'सा' शन्द प्रसिद्ध पर्य का बोधक है अतः यह यंत्' 'शब्द की अपेक्षा नहीं रसता], 1(ग) [रत्नावली नाटिकां में यासवदत्तो को लक्ष्य कर के वतारोज की बेकिक] 'हे मिये (वा्तवदत्ते), कांपती हुई, भम से परिस्ततिन वर्त्रान्चल वाली उन कातर
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३०६ ] काव्यप्रकार:
क्र रेा दारुणतया सहसैव दग्या धूमान्घितेन ददनेन न वीचिता5सि ॥१८७॥
तच्छव्दस्योपादानं नापेक्षते; यया- साधु चन्द्रमसि पुप्कर: कृतं मीलितं यदभिरामताघिये। उद्यता जयिनि कामिनीमुखे तेन साइसमनुष्ठितं पुन: ॥१८॥। प्रागुपात्तरतु यच्छव्दस्तच्छ्रव्दोपादानं विना साकांकः । यथा तन्नैन श्लोके आद्यमद्योर्व्यत्यासे।द्वयोरुपादाने तु निराकांनत्वं प्रसिद्धम्।अनु- पादानेडपि सामर्ध्योत्कुत्रचिद् द्वयमपि गम्यते, यथा- नेत्ों को प्रत्मेक दिशा में घुमाती हुई तुमको पूर प्रग्निने निरदमता से सहसा जता"- दिया, क्योंकि धुम् से अन्धे हुए उसने तुम्हें देखा नहीं ।१८७॥ [यहाँ ते' (मे) यह अनुभूत वस्तु को कहना है अतः यह 'मत्' शब्द की पपेक्षा नहीं रखता]। प्रभा-उपयुधत तीन उदाहरणों द्वारा यह दिसलाया गया है कि 'वत्' शब्द 'यत्' से नित्य सम्बन्ध रसते हुए भी कृछ स्थलों में 'यत्' की अपेक्षा नहीं रखता। प्रव ग्रन्थकार बतलाते है कि 'यत्' शब्द भी कही २ 'तत्' वब्द की परपेक्षा नहीं रसता-(यदिति)- अनुवाद-'मत्' शन्द भी जहां (परस्पर सम्बद्ध वाषयों में से) बार के वावय में (मथवा वावय के पिछले भाग में) अन्वित रूप में (भनुगतर्वेन) प्रपुर् होता है, यहां ('तत् फे आदोप की) सामथ्य के फारण पूर्व माकय में सन्वित तत् शब्द के प्रयोग की आाकाक्षा नहीं रखता । जैसे' ''सौन्दम' में स्ररथिक चनद्रमा के उदिग हो जाने पर जो कमल मुकुसित हो गये यह उन कमलों ने उचित हो किया, किन्तु अपने को जीतने वासे फामिनीमुख के होने पर भी उदित होने वाले उस (चन्द्रमा) ने तो बड़ा साहृस (दुःसाहस) किया' ॥१८८॥। प्रभा-यहाँ पर 'मन्मीतितम्' में उतरयाक्यगत यत् शब्द है, यह पूदे वाकम में 'साधु कृत' के साथ 'तत्' शब्द के प्रयोग (स्त् साथु सृतम्) की आरांक्षा नहीं रसता। 'तत्' शब्द का सामथ्यं से प्राशेप हो बाता है। अनुवाद्-किन्तु वावय के पूर्व भाग में (प्राक) म्रमुस हमा 'मत्' राम 'तत्' शब्द के प्रयोग के मिना सार्फाक्ष रहता है;' जैसे 'सानु' मादि इसोक में ही प्रथम, द्वितीय धरखों का विपर्मास (उसटना) करने पर (यह निराकाज नहां रहता) 'पत्' और 'सत्' बोनों का प्रयोग होने पर तो उनकी निराकाशना प्रसिद्ध, हो है। यहीँ पहीं दोनों का प्रयोग न होने पर भी भर्माक्षेपनसामप्य से दोनों की प्रसीति हो जाती है। संसे-
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सप्तम उल्लास: [ ३०७
ये नाम केचिदिह नः प्रथयन्त्यवज्ञा जानन्ति ते किमपि तान् प्रति नैप यत्न:। उत्पत्स्यतेऽस्ति मम कोऽपि समानघर्मा कालो ह्य्यं निरवविर्विपुला च पृथ्वी ॥१८६। अत्र य उत्पतस्यते तं प्रतीति। एवं च तच्छव्दानुपादानेडत्र सारकानत्वम्।न चासाविति तच्छव्दार्थमाह- असतौ मरुच्चुम्बितचारुफेसर: प्रसन्नताराघिपमएडला ्र णी: । r. वियुक्तरामातुरदृष्टिवीच्षितो वसन्तकालो हनुमानिवागतः ॥१६०।। [मालतीमाधव में भवभूति की उक्ति] 'जो कोई हमारी इस ग्रन्थ, में (छंह ... प्रबन्धे) भवहेलना करते हैं, वे कुछ जानते भी हैं? (भर्थात् कुछ नहीं जानते, फाकु). उनके लिये यह (ग्रन्थलेखन) प्रयत्न नहीं है। मेरे समान गुणों याला फोई उत्पन्न होगा, अथवा कहीं विद्यमान होगा (शस्ति); योंकि समय श्रनन्त है तथा, पृथ्वो विस्तृत है (उसी के लिये यह प्रयत्न है-यह भाव है)'॥१८॥ यहाँ पर जो (यः) उत्पन्न होगा, उसके लिए (तं प्रति)-(इस प्रकार प्रयोग के चिना भी प्रतीति होती है। । :: प्रभा-'यत्' शब्द जहां उत्तरवाक्य में होता है वही 'तत्' शब्द का भक्षेप/ कर सकता है किन्तु जहाँ यह वाक्य के पूर्व भाग में होता है वहाँ 'तत्' का पक्षेपा नहीं कर सकता और साकांक्ष बना रहता है। जैसे -यदि 'साधु': इत्यादि पद के प्रथम-द्वितीय चरण को उलट कर रस दिया जाय-'मीलितं यदर्भिरामतािके साधु चन्द्रमसि पुप्कर:कृतम्' तो 'यत्' शब्द 'साकांक्ष ही रहेगा और अविमृष्ट विधेयाश दोप होगा ही। 1. उपयुक्त कथन का सारांश यह है कि 'यत्' और 'तत्' गब्द की स्वभाव से ही परस्पर सावाक्षता है। जहाँ दोनों का प्रयोग होता है वहाँ यहं (शाब्दी) .: आकांक्षा पूर्ण हो जाती है। जैसे 'ये नाम' आदि के पूर्याद्ध में। कहीं २ इनका प्रयोग नही होता किन्तु अरथतः इनकी प्रतीति हो जाती है जैसे 'ये नाम' आदि के उत्तरारथं में । कुछ निश्चित स्थलों.पर केवल 'तत्' का प्रयोग होता है मर यत्' की प्रतीति हो जाया करती है। तथा कही २ 'यत्' का ही प्रयोग होता है मीर 'तत्' की सामथ्यं से प्रतीति हो जाती है। इस प्रकार 'यत्' और 'तत्' के उद्द दय- विधेय रूप में सह-प्रयोग का नियम है, अन्यथा 'अविमृष्टवियेयांशत्व' वाक्य-दोष हो' जाता हैं। अनुवाद-इस प्रफार 'तत्' शब्द का प्रयोग न करने पर 'मपाङ्ग०' इत्यादि" (१८४ उदाहरल) में (अथ) 'यत्' शब्द में साफाक्षता रहती है[ और भविमृष्टंविये- यांसत्व दोष है।; और 'असो' शब्द भी 'तत्' शब्द के प्रमं को नहीं कहता, कर्योंकि-'
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३०८ माव्यप्रकान:
शन्र हि न तच्छव्दार्थप्रतीति: 1 प्रतीतो वा- करवालकरालदोःसहायो युधि योऽसी विजयार्जुनैकमल्लः। यदि भूपतिना स तत्र कार्य विनियुज्येत ततः कृत कृतं रयात् ॥१६१॥ श्रत्र स इत्यस्यानथेक्यं स्थातू। अथ- योऽविकल्प मिदमर्थमण्डलं पश्यतीश, निसिलं भवद्वपुः। आत्मपक्षपरिपूरिते जगत्यश्य नित्यसुखिन: कुतो भयम् ॥१६२॥ [हनुमननाटक] हे प्रिये, जिस (घसन्त ऋतु) में (दक्षिरा) पयन ने सुन्दर वकुस यूक्षों (फेसर) का चुम्बन किया है[ हनुमान पक्ष में-जिसफी सुन्दर सटाप्ों को पवन सर्थात् हनुमान के पिता ने चूमा या संघा है।, जिसमें निर्मल चन्द्रमण्डल मुल्य (पपसी है [जो प्रसन्न सुप्रीय (ताराधिप) के राष्ट्र (मण्डल) में अप्रगामी है], वियी- गिनी रमशियों (रामा) के द्वारा भातुर दृष्टि से देसा गया [वियोगी राम के द्वारा उत्सुक वृष्टि से वेखा गया] यह यसन्तकाल (सङ्गा से) हनुमान के समान या गया है' ॥१६०॥। यहाँ पर 'भसी' (पदस) से 'सः' (तत्) की प्रतीति नहीं होती। यदि (भसो' से 'सः' को) प्रतोति हो जाती तो 'करवाल से भवंफर भुजदण्ड हो जिसके सहायक हैं, जो मुद्ध में विजय नामक भजुंन के समान एक वर है ऐसा जो यह (प्रसिद्ध) कसा है यदि वह राज्ा (दुर्योघन) के द्वारा उस कारय (सेनाषिपस्य) में नियुक्त कर दिया जाय तो फाय (पाण्डयराज्मरयाग मदि) सफल (कर्त) हो जाय'।१६१। इस पद्य में 'सः' (तत्) मह पद निरमंक हो जायेगा। प्रभा-'तनोति योऽमौ मुभगे तवागतः' (उदाहरण १८४) मे 'मः' (सत्) का प्रयोग न होने से 'भविमृष्टविधेयांमत्व' दोष है, यह बतसाते हुए प्रन्मकार ने स्पष्ट किया है कि अदस्' (पसो) शब्द 'सत्' के घरथ को व्यक्त करने में सम्य नही है। भदस्' शबद 'प्रत्यभ्नानुभूत' या "पुरोयरती' (सामने उपस्थित) मात्र का बोप कराता है। 'तत्' शन्द 'परोक्ष' का बोप कराता है। भतसय 'भदम्' गम 'त्' का समानार्थक नहीं। जैसे 'मसो मस्तु' इत्यादि में 'भगो' से 'स्षम् शग के मर्म की प्रसीति नहीं होती । किम्च, यदि 'मदम्' शब्द से 'तत्' के सर्य का बोध हो जाया करता सो 'करपाल' इत्यादि मे 'योज्मों' पद है हो फिर 'सः' (स हन) निरयंक हो जाता। अनुवाद्-यदि कहो कि (पम-उच्पते 'हे ईन' को ध्या्ति इस (प्रसिद्ध) समहत [संसार दप) अपं-सामुदाय को निःसन्दिम रप से (भविषस्पं) मापके हो स्वरप में (मवद्यपुः) देशता है, उस (वस्व) सदा मुली (भारमंकबतो) स्यास्ति को माटमस्वटप मे स्याप्त संनार में किसने भय दो सहता है? ।१६२।।
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सप्तम उल्लीस:
इतीदंशब्दवद् अदः शब्दस्तच्छन्दरार्थमभिघत्त इति उच्ते तरहयत्रेव वायान्तरे उपादानमहति न तत्रैव। यच्छव्दृस्य हि निकटे स्थितः प्रसिद्धि परामृशति- यथा- यत्तदूर्जितमत्युम' क्षात्रं तेजोऽस्य भूपतेः। दीव्यताऽचैस्तदाSनेन नूनं तदृपि हारितम् ॥१६३। इत्यत्र तच्छव्द: । इस ('योऽविकल्पम्' आदि पद्म के) 'इदम्' (पस्य) शब्द के समान 'घदस्' शब्द भी 'तत्' शब्द के अ्थ का वाचक है, तब तो जैसे 'योडविकल्पम्' आदि में (मश्रेव) (यः' से 'अस्य' का) भिन्न वाक्य में प्रयोग है इसी प्रकार (भसो' का) भिल्न-वाक्य में प्रयोग करना उचित है, उस (एक वाक्य) में ही नहीं, [तह्यंघ्ेव अदः शब्द: वावयान्तरे उपादानमहृंति-यह अन्वय है; यहाँ 'भदः' (कर्ता) का अध्याहार होता है]। क्योंकि (यह भवः शब्द) 'यत्' शब्द के निकट समान लिङ्ग, वचन; विभक्ति में) प्रयुक्त होकर प्रसिद्धिमान्त का बोध कराता है; जैसे-(यत्तदू- जितमावि में तत् शब्द-यह अन्वय है) इस राजा (युधिष्ठिर) का जो वह (प्रसिद्ध) भजित तथा उग्र क्षात्ं तेज या तब द्यूत कोड़ा करते हुए इन्होंने उसे भी हरवा दिया' ॥१६३॥ इस (वेरीसंहार के पद्य) में ('यत्तदूजितम्' में 'यत्' के निकटस्य) 'तत्' शब्द प्रसिद्धिमात्र का बोधक है। प्रभा-शङ्काकर्त्ता का प्रशाय यह है-'अदस्' शब्द का 'तत् शब्द' से 'भिन्न अयं है यह ठीक है; किन्तु शब्दों का प्रकरणानुसार नाना भरथों में प्रयोग हो जाया . 1 करता है, जैसे 'योऽविकल्पम्' इत्यादि (१६२) में 'इदम्' (भ्रस्य) शब्द का प्रयोग 'तत्' शब्द के अर्थ में देखा जाता है। 'इदम् 'एतद्' और 'अदस्' तीन शब्द समानार्थक हैं, अतएव 'इदम्' के समान 'अदस्' का भी 'तत्' शब्द के अथं में प्रयोग हो सकता है तथा 'तनोति योसी' (१८४) में 'असी' शब्द 'सः' के अर्थ में है भोर फोई दोप नहीं। 'उच्यते' आदि के द्वारा इसका समाधान किया गया है। भाव यह है कि यदि 'तनोति योऽसो' में 'असी' शब्द वस्तुतः 'सः' के अर्थ में होता तो इसका प्रयोग ·'यः' (मत्) से मिन्न वावय में होता, जैसे 'योऽविकल्पम्' मादि उदाहरस में यः औौर पस्य का भिन्न २ वाक्यों में प्रमोग किया गया है। किन्तु इसका प्रयोग तो उस ' (एक) ही वाक्य में किया गया है मतः यह 'तत्' के अर्थ का बोधक नही। दूसरी बात यह है कि यह 'असी' शब्द 'यः' के समानाधिकरया रूप में उसके निरुट प्रयुक ' है अतएव यह प्रसिद्धि अर्थ का बोध कराता है। 'अदम्' 'ददम्' की तो बात ही कया ? यदि 'तत्' शब्द भी यत् के निरुट समानाधिकरण रूप मे प्रयुक्त होवा है
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३१ j काव्यप्रकांरो:
ननु कर्थ- फल्याणानां त्वमसि महसां भाजनं विश्वमूर्ते, घुर्या लक्ष्मीमथ मयि भृशं घेहि देव, प्रसीद। यद्यत्पापं प्रतिजहि जगनाथ, नम्रस्य तन्मे भद्र भद्र विंतर भगवन्, भूयसे मन्गलाय ॥१३४॥ शत्र यद्यदित्युकत्वा तन्मे इत्युक्तम्। उच्यते-यद्यदिति येन फेन- चिद्र पेस स्थितं सर्वात्मकं वस्त्वाचिप्तम्। तथाभूतमेव तच्छव्देन परामृश्यते। . तो वह भी प्र सिद्धिमात् का बोधक होता है जैसे 'मतदूजितम्' इत्यादि पद् में है। • इसलिये 'तनोति योऽसी' (१८४) में 'असो' से विधेय की परतीति नहीं होती .वया यहाँ अविमृष्टविधेयांसत्य वाकयदोप है। +4 अरनुवाद्-(यदि यत् और तत् पा नित्य सम्बन्ध है) तो कैँसे ?... ." 'हे विश्यमूर्त (सूर्य) तुम फल्याएप्रद तेजों के आाथम हो, मुभमें (भमिनयादि) भारयहनसमर्य सक्ष्मी (सम्पति, सम्यपता) को पारस करो। हे वेय, प्रगस् हो। है जगन्नाथ, मुन विनस्र के जो जो पाप है, उन्हें दूर करो। हे भगवन्, भर,भविर मङस के लिये श्त्यन्त शभीष्ट पयं प्रदान करो ।१हण। (मालती माव के) इस पद्य में 'यद्' 'मत' (उद्देश्य एव में दो बार) कहकर (विधेय रप में) 'तत में' (एक बार) ही महा है। उत्तर (दिया जाता) है-'यद् यद' के द्वारा जिस किसी (पात या प्रजात) रप से स्यत सकल पाप यस्तु (एक एप में) भ्रवगत (भकिप्त) होती है तमा उसी रूप में 'तत्' शब्द के द्वारा उसका परामदां किया जा रहा है। पभा-'ननु कथम्' आदि गङ्गा का अभिप्राम है कि 'फल्याणानाम्' दस्वावि पद्य में 'मत्, यस' सब्द दो बार प्रयुकत है तथा 'तत्' शब्द (तन्मे) एक ही है। यदि 'यत्' शब्द का तत्' के साथ नियत सम्बन्ध है तो इन पद्य में 'तत्' पद के द्वारा एक 'मत्' पद की भाकांका पूर्णा हो सकती है किन्तु दूसग मानरध हो बना रहेगा। भतः यहाँ भी अविमृष्टविषेयांगत्व दोप होगा। 'उच्कते' इत्वादि उत्तर का भाष यह है-प्रस्तुत प्रवतरण में 'यन् यन्' के द्वारा समर्त पापों का संकलित रुप में ग्रहम होता है तथा 'तह' पद के द्वारा पापत्य रम में उगमा परामम होता है म एव यहां दूगरे 'तत्' पद की आवस्यपता नही। मात यह है कि 'मतदोनिस्यम- भिसन्यन्य:' इसका सालयं यही है कि 'यस' पद के धर्म भा खवन्' पर के द्वारा पराम्स हमा करता है। यह नही कि मितने '्य्' सब्दी पर पयोग किया थया हो उतने ही 'र' शब्द भी प्रमुक किये जाएं। इन प्रकार सल्नास्ानाम् इरारि में बोई दोप नही; पिन्तु 'तनोनि योध्ो (२८४) दश्यादि में उर्द्द्पिेश भाव की प्रवीति नहीं होनी तया पा 'अविमृष्टविवेमामत्व' वानदीर ह ऐ।
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सप्तम उल्लासे: ३११
यथा वा- कि लोभेन विलद्वितः स भरतो येनैतदेवं कृतं मात्रा स्त्रीलघुतां गता किमथ वा मातैव मे मध्यमा। मिथ्यैतन्मम चिन्तितं द्वित यमप्यार्यानुजोऽसौ गुरु- ्माता तातकलन्नमित्यनुचितं मन्ये विधान्ना कृतम् ॥१६५।। अन्रारयस्येति तातस्येति च वाच्यं न त्वनयो: समासे गुणीभावः कार्यः। एवं समासान्तरेऽप्युदाहार्यम्॥ १३. विरुद्धमतिळ्वृद्यथा- श्रितक्मा रक्तभुवः शिवालिङ्गितमूर्तयः । विग्रहसपणोनाद्य शेरते ते गतासुखाः॥१६६॥। अनुवाद-[समास में वाक्यगत अविमृष्टविधेमांशत्व दोप दिखलाते हैं] परथवा जैसे-'क्या वहु (बिनयादियुक्त) भरत सोभ से आकान्त हो गमा और उसने कैकेयी द्वारा (माग्रा) यह ऐसा करा दिया? अथवा मेरी मभली माता ही स्त्रियों को (स्वभावसिद्ध) क्षुद्रता को प्राप्त हो गई ? नहीं, मेरे ये दोनों प्रकार के विचार मिष्या हैं; क्योंकि वह मेरा ज्येष्ठ भ्राता (गुरुः) भरत तो आर्य राम का अनुज है मौर यह मेरी माता (कंफेयी) पिता (महाराज दशारथ) की धर्मपत्नी है। इसलिये मैं सभभता हूं कि यह अनुचित कार्य विधाता ने ही किया है ॥१६४॥ (वनयास के हेतु का विचार करते हुए लक्ष्मण की) इस (उक्ति) में 'भायंस्य' सपा 'तातस्य' ऐसा कहना चाहिये था। इनका समास में गौए रूप तो नहों करना चाहिये। इसी प्रकार भन्य समासों में भी अविमृष्टविधेयांशत्व वाक्य-दोषों के उवा- हरस वेख लेना चाहिये। प्रभा-ऊपर समास के बिना वाक्यगत 'अविभृष्टविधेयांसत्व' दोप का विस्तार से विवेचन किया गया है। यदि अनेक समस्त पदों में यह दोष होता है तो भी वाक्यगत दोष के अन्तर्गत ही वह गिना जाता है भतएव 'कि लोभेन' इस्मादि मे समास में वाक्यगत 'अविमृष्टविधेयांशत्व' दोष दिखलाया गया है। "यहाँ पर 'अनुज' (छोटे भाई भरत) के साथ 'भायं' (श्रेष्ठ राम) का सम्बन्ध तथा 'कलनं' (स्त्री, ककेयो) के साथ "तात' (पिता, दशरथ) का सम्बन्ध उत्कपं (उच्चाशयता) प्रकट करने के लिए दिसलाया गया है। इसलिये यही सम्बन्ध विवक्षित है, विधेयरूप है तथा इसका प्रधानरूप में उल्लेस होना चाहिये। पष्ठी समास (आर्यानुज: आादि) करने पर तो यह गोए हो जाता है तथा 'अविमृष्ट- :विधेयांगत्व' दोप हो जाता है4। इसीलिए 'आयंस्य अनुज:, 'तातस्य कलयम्' ऐसा प्रमोग करना उचित था। अनुवाद-(१३) [वापयगत] विरुद्धमतिकृत् दोप (फा उदाहर), जैसे- 'भाज वे नृपगए युद्ध को त्याग कर दुःसरहित होफर सोते है; जिन्होंने क्षमा का
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कव्यप्रकारं:
अरत्र समादिगुणयुक्ता: सुखमासते इति विवसिते इता इति विस्दा प्रतीतिः ।
1 [पद कदेशगतदोपाः] पद्कदेशे यथासम्भवं कमेशोदाहरणम् -.: १: भलमतिचपलत्वात् स्वप्नमायोपसतवात् परिणतिविरसत्वात् सङ्गमेनाहगनायाः। इति यदि शतकृत्वस्तत्त्वमालोचयाम- स्तद्पि न हरिासीं विस्मरत्यन्तरात्मा ।१६७।।, श्रन्न त्वादिति। सश्रय लिया है, जिनमें प्रजा अनुरक्त है (रक्ता भूः लक्षसया प्रजा मेपु). तथा जिनके शरीर कल्याए (शिव) से विशिष्ट (भ्रतिद्विंत) है ।१६६।। यहां पर 'क्षमा' आदि गुलों से घुक्त (जन) सुसबूबंक रहते हैं यहं (भष) विवक्षित है, किन्तु 'वे गारे गये' इस बिरु्द्व अ्रर्यं को प्रतीति हो रही है। प्रभा-'शितक्षमा' रत्यादि में वाश्यगत विरुद्धमतिकृत् दोप है। जो उयुक्क अथ यहाँ पर विवकित है उसके साथ ही इंग पिरुद शर्थ को प्रतीति भी हो रही है कि 'वे भूमि पर पहे हुए रुपिर से गने (सवतस्ष्य भूषः स्थानभूता:) हए गो रहे हैं, शरीर के नाथ (विग्रहस्य सपोन) से जिन हे आाण सया दन्द्रिया पक्षी गई है। (गता; असवः सांनि च येंषा) ऋृगासियों (शिवा) से जिनकी शगरमूति मुक्त है।' इस परर्थ का वोध विवक्षित अयं-प्रतीति द्वारा होने वानेसमरकार का पपरयक है अतएव यह दोप है। पदाश (परदेकदेश) दोप- अनुवाद्-पद के एफवेश, में होने पासे बोषों का यमासम्भव पगााः उदाहरस है- १ .- [पदंकदेश,थू सिफट]यदपि हम शतशाः यह विचारते है कि सत्वन्त पस्यिर, स्वप्न औोर माया के समान (मिय्या) तथा परिलाम में बुलकर होने के फारस रमियों का सक न करना चाहिय (धलम) तथापि मेरी धन्तरामा मृग- नमनी (रमलो) को भूलती नहां ।१६७।। यहाँ पर 'त्वात्' यह भतिरुद् है। प्रभा-'मलम्' इतयाधि किसी कामिनी मे प्रकुष्क सकि मी बकहै। यहां पर प्ान्त प उपमर्दन करक शनतर रस उदित होना है।, मनिषट ोंय उसका अपर्ंक है। 'सान' जो (भपलस्वान, उपनरनान, विस्मत्वान्) पदो का गक देश है यह यहां थ तिकड़ है। वह़ों गद में एक बस कटु होता है वह। पईपरेम में थ विकटता समा वहों एक पद मे एक से ममिक मसू कट होत है यहाँ पद में
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सप्तम उल्लास: [.३१३
यथा वा -- " तद्गच्छ सिद्ध्यै कुरु देव कार्यमर्थोऽयमर्थान्तरलभ्य एव। i: 7: :अपेक्षते प्रत्ययमङ्गलव्ध्ये वीजाङ्ग रःप्रागुद्यादिवाम्भः॥१६८॥। अन्र द्वर्य उध्यै इति कटुः। :: २. यश्चाप्स रोविभ्रममएडनानां सम्पादयित्री शिखरैर्विभत्ति।. . IP
: वलाहकच्छेदविभक्तरागामकालसन्ध्यामिव धातुमच्ताम् ॥१६६।। श्रत्र मत्ताशब्द: कषीवार्थे निहतार्थः। ३. आदावब्जनपुब्जलिप्तवपुपां श्वासानिन्ोल्लासित- मत्सर्पद्विरहानलेन च ततः सन्तापितानां दशाम्। श्रुतिकटुता होती है। किन्तु जहाँ श्रुतिकटुता अनेकषदवृत्ति होती है वहाँ श्रुतिकटता वाक्यदोप माना जाता है-
दिया गया है- :किन्हीं के मतानुसार 'त्वात्' मे श्रुतिकटता नही है, अतः दूसरा उदाहरए
1 -. अनुवाद-अ्रथवा जैसे-'हे काम, इसलिए तुम कार्यसिद्धि के लिये जाओ, देवकार्य (स्कन्द को उत्पत्ति रूप) करो। यह कार्य अ्रन्य कार्य (शिव पार्वती के वियाह) द्वारा ही सिद्ध होने योग्य (लभ्य) है। जैसे बीजाङ्ग र उत्पत्ति से पूर्व जल को अपेक्षा रसता है इसी प्रकार यह कार्य अपनी सिद्धि के लिये (श्रङ्धलबध्यं- स्वरूप-लाभाय) कारस रूप (प्रत्ययं) में तुम्हारी प्रपेक्षा रखता है ॥१६८॥ ' इस (कुमारसम्भव, इन्द्र की कामदेव के प्रति उक्ति) में 'द्धर्य', 'उध्य' ये ष तिकट् पर्वकदेश हैं।[प्रार्थना में अति मधुर भापण ही उचित है, अतः यह दोष है-उद्योत टीका] अनुवाद-[२. निहतार्थ]-'जो हिमालय अप्सराओं के विलास निमित प्राभूपणों का सम्पादन करने वाली, मेघखण्डों में लालिमा का आाधान करने वाली प्रसमय को सन्ध्या जंसी (उत्प्रक्षा) धातुमत्ता (सिन्दूरादि युक्तता) को अपने शिसरों पर घारस करता है ॥१६६
निहतार्थ है। :* इस (कुमारसम्भव के पद्य) में 'मता' पदफदेश उन्मतता (क्षीब) अर्थ में +1
'' प्रभा-'घातुमत्ता' शब्द का विवक्षित अय है-धातुयुक्तता (धातवोजम पन्तीति धातुमान् तस्य भाव: घातुमत्ता)।किन्तु इस भर्थं की प्रतीति से पूर्व हो बद-के एक देश 'मत्ग' का सुप्नसिद्ध अर्थ 'उत्मता' (धीवा) प्रकट हो जाता हैऔर उससे 'मतुप्' प्रत्यय का अर्यं तिरोहित (निहृत) हो जाता है। अतएव भत्ता' पदकवेश नहतार्थं है। अ्मनुवाद-[३. निरथंक] यह मृगनयनी पहले पञ्जनपुञ्ज से सेप किये हए, फिर शोकोच्छ यारा से प्रयुद्ध एवं घारों धोर व्याप्त विसहानल से तपाने हए
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३१४ ] काव्यप्रकान:
सम्प्रत्येव निपेकमशपयसा देवस्य चेतोभुचो। भल्लीनामिव.पानकर्म फुरुते फाम कुरद चया ॥२००॥ अन्न दशामिति बहुवचनं निरर्थकम् फुरत स्षसाया एकस्या एवो- पादानात्। नचालस व लितेरित्या दिवद् व्यापार भेदादू बहुत्वम्/व्यापारा ामनुपात्तत्वात् न च व्यापारेप् हकशब्दो बतते। धत्र व कुरते इत्यात्मनेपद्मप्यनर्थंकम्, प्रधानक्रियाफलस्य कत्र सम्यन्धे कत्र भिप्राय क्रियाफलाभावात। सपने नेत्रों का इस समय (तापानग्तर) पभ-अल सेप्रत्यधिक सेवन कर रही है, यह मानों फामदेव (चेतोमुघः) के विशेष प्रकार के वाएों (भल्लो) का पानकम (पार फो तोक्णकरने का कायं, जिसमें रास्म को पङ्ध से लेपरर, तमाफर जन में 4 डाल दिया जाता है) फर रही है।२०।। यहाँ पर 'दुशा' (नेत्रों का) यह यहवचन निरयंक है; शयोंकि एक हो मृग- नमनी का प्रहश किया गया है। यह भी (ठीक) नहीं कि 'अससपसितं:' इतवादि (पमदशतक के पद्य) के समान व्यापार-नेद के फारए नेत्रों में बहुषचन हो गया है। वर्योंकि व्यापारों का यहां प्रहस नहीं किया गया और यहां 'दुष्ह शब्द बर्दन-व्यापार के सर्य में है भी नहीं। फिर इसी पछ्य में 'कुरते' यहाँ धारमनेपव (का प्रश्यम) भी मनर्भक है: श्योंकि किया का मुष्य फल (सकलविलासिगनविनय) कर्ता (स्त्री) से सम्यन्ध नहीं रसता जिससे पतृ गामी बियाफल का सरभाव है। प्रभा-'प्रादो' सत्यादि उदाहग्ण में पर्दफदेश की निर्ंकतषा दिरानाई गई है। यह भावो विरह से रदन करती हुई जिसी नायिका का बहन है।इसमें पदषादेश निरथंक है-(१) 'हशों' में बहुवनन निरयंक है। मरोकि बसेतीय मृगनयनी एक है और उनकी दो मासे है भतः ट्रिययन होना पाहिये। मर्घार यह ठीक है कि कही २ नेषों के भिस्न र वर्शन वव्यापारों की हप्टि से बहुवचन का प्रयोग हो जाता है, जैसे समरगतक के निम्न पद्च में है- पससपसितं: प्र मार्वावं मुं हमु मुलीहस: क्षहाममिमुसलंग्जालो्सेनिमेपपराटमुरुँ:। हदपनिहितं भायाकृत यंमदिभरियेक्षएां: कपय सुदृती कोन्वं मुग्ये स्वचाळ विलोरयत।। किन्तु यहां तो 'ईधएां: दर गण्द से ईस्ाम्यावारो का वहत है औौर प्रकुत में 'रर्क़' नग् से ब्यापारों का प्रहगप नहीं होता, यहाँ 'हक' शब् द्जनम्ारा का बोपक नही है; पयोंकि 'अञजनसेपन' शादि बाय किमी वस्तु में हो मकसे है पिया या व्यापार में नहीं: मतसूच महा एक़ दा्द (हन्यवेलना इति) नैश्वापक हो है भोर इसमें निवपन ही होना उनित है। (२) डूमरा दो यह है कि 'ुशगों में भारवनेदड (स) निर्मेक है। '. रितम्ितः पनमिनाने विवाएने' (पष्टाध्चायी १/३/०९) के सनुगार इड थातु में • वहृंगामी निवाफन में मारमनेतर होना है। स्मार् जह निया का पुरुस्म रर्सा
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सप्तम उल्लास: ३१५
४. चापाचार्यर्त्रिपुरविजयी कार्तिकेयो विजेय: शस्त्रव्यस्तः सदनमुद्घिर्भूरियं हन्तकार:। अरत्येवैतत् किमु कृतवता रेखुकाकएठबाघां बद्धस्पर्घस्तव परशुना लज्जते. चन्द्रहास: ।।२०१।। अन्र विजेय इति, कृत्यप्रत्ययः क्प्रत्ययार्थेऽवाचक: । ५. क-अतिपेलवमतिपरिमितवर्ण लघुतरमुदाहरति शठः। प,रमार्थतः स हृदयं वहति पुनः कालकृटघटितमिव ॥२०२।। से सम्बन्ध रखता है वहाँ आत्मनेपद होता है। यहाँ 'बाए को तीक्ष्मा करना रूप' किया का फल सकलविलासिजन विजय है जिसका सम्बन्ध कामदेव से है, मृगनयनी से नहीं। अतएव कतृ गामी क्रियाफल नही और आत्मनेपद जो पदकदेश है, निर्थंक है। (३) यहाँ दो नेत्रों में किसी प्रकार बहुत्व का आरोप किया जा सकता है तथा कामदेवगत त्रियाफल का भी तत्सम्बन्धिनी नायिका मे आरोप किया जा सकता है अतएव बहुवचन तथा आत्मनेपद असाधु या च्युतसंस्कृत नहीं है अपितु आरोप का कोई फल न होने से निरर्थक ही हैं। अनुवाद-[४. अवाचक] 'हे परधुरम, आपके धनुविद्यापुरु त्रिपुरविजयी महादेव हैं; आपने कातिफेय को जीत लिया है (विजेय: विजितः); आपके वाए द्वारा दूर हटाया हुआ (व्यस्तः उत्क्षिप्तः) सागर ही आपका निवासस्थान है; यहभूमि 'दभापकी हन्तकार अर्थात् १६ ब्रासों को अ्तिथि-भिक्षा है (समस्त पृथ्वी को जीतकर ब्राह्मणों को दान कर दिया, यह ध्वनित होता है)। यह सब (इलाध्य) हं ;- किन्तु :तुम्हारी माता फा गला काटने वाले इस तुम्हारे , परशु से स्पर्धा करता हुम मेरा चन्द्रहास (खड़ग) लज्जित होता है'॥२०१॥- 7. . इस (राजशेखरकृत वालरामायसा में रावण की परशुराम के.प्रति उक्ति) में :'विजेयः' में कृत्य, प्रत्यय (यत) 'क' प्रत्यय के अर्थ (विजितः) में (प्रयुक्त किया गया :है जो) अवाचवा हुं। प्रभा-'विजेयः' मे 'जि' धातु से 'महृंता' अर्थात् योग्यता भर्थ में 'यत्' प्रत्यय होता है और योग्यता भावीकालविपयक होती है; किन्तु यहां प्रतीतकाल की विजय विवक्षित है, जो 'क्त' प्रत्यय द्वारा प्रकट की जा सकती है। 'यत्' प्रत्यय -उसका वाचक नही। 'मत्' प्रत्ययमात्र मे दोप होने के कारए पदकदेशगत भवा- :: चकत्व, दोप है। 42 अनुवाद-[५ क-व्रीडादायी सर्लील] 'धूर्त व्यक्ति प्रत्यन्त फोमस : भति परिमित वसों वाली बात (सत्यता प्ररुद करने के लिये) धीरे से (सपुतरम् प्रतिमन्द ·यया अर्वत तथा) कहता है; फिन्तु वस्तुतः (परमार्यतः) वह तीव्र विप से भरा -सा हृदय रखता है।'॥२०२।
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·· ३१६ ] काव्यप्रकाण :*
शत्र पेलवशाव्द:। ख-यः पूयते सुरसरिन्मुखतीथेसार्थ- स्नानेन शास्त्रपरिशीलनकील्नेन । सौजन्यमान्यजनिसर्जितमूर्जितानां सोडयं दशो: पतति कस्यचिदेव पुंसः ॥२०३॥ अ्त्र पूयशब्द:। ग-विनयप्रएयैककेतनं सततं योऽभवद्ङ्ग, तादशः ।
ऋ्रपत्र प्रेतशव्दः । कथमद्य स तद्वदीचयतां तदभिप्नेतपदं समागतः॥।१०४।।
६. कस्मिन्कर्मसि सामर्थ्यमस्य नोत्तपतेतराम। शयं साधुच रसतस्मादब्जतिर्वध्यतामिह् ।२०४॥! अभ किं पूर्व साधु: उत साधुपु चरतीति सन्देङ:। इस (मित्र के प्रति भाप्तोदेश) में 'पेलय' शब्द का एकवेर ('पेस' हाब्द सादभाषा में अण्डकोशायाचक हूं पतः) सरनीत है। स-जुमुप्मादामी] 'जो (महात्मा) गज्ताप्रनृति तोयंहयली (तीर्भसषार्मः) में : स्नान करने से तथा शास्त्नाभ्यात द्वारा सरकार दढ़ करने से पमित्र हो जाता है, •सौजन्य के फारल जिसका जन्म सभ्मान-योग्य है (सौजन्येन मान्या जनिर्वरय), जो बलवान् मनुष्यों का बत है, यह यह (महापुरुष) किसी (पुण्पशाली) मनुष्य को हो दुष्टिगोघर होता है॥२०३।। . इस (किसी महापुरष की मशंसा) में ('पूपते' का एक देस] 'पुन' गग् ('मवाद' का स्पं्जक होंने के कारल जगुप्सादायो) सरलीस है। [ग-अमसमदामी] 'परे मिन्न, जो व्यकति निरं्तर नघता और प्रीति का : स्यान या, घेसा (प्निरवेचनीय तुलों वाता) या; भान यह उमके (पपने या किस) नोच के) सभिलषित पट को प्राप्त ऐेकर उस प्रकार का (पहिते जैंता या नीड़ 'फंसा) कैसे दिसलाई येगा ?॥२०४॥ इस (गिन के प्रति उति) में (प्रभिम्रत का एरवेश) 'मस' शम्ड (भुमर' का स्पञजय होने से) यमसुनसमारक है तमा पसलीस है। अनुवाद-[६.सन्दिग्य] 'इस पुष्ष का सामर्ष्य किम कार्य में विसेष दय से प्रकाशिस नहीं ह. मह साधपो में रहे वाता (सामृतु चरनि) सर्पश भृषर्ष साुजन है इससिये इस पुरुत को (इहु भससन पुदषे) हाय जोड़ा आाय।२+र।। पहां पर 'पहसा साथु' छचया 'सापुभो में विघास करने बासा' यह समह है। .4 प्रभा-गापुपर' शबद मे एक घेन 'नर' में पड सम्ेह है कि सति यहा भरद्' नद्यम (भ्रगपूव घस्ट x//X३) है सो 'शूषं, सापुः' यह् धर्ग होगा बौर
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सप्तम उल्लास: ३१७
-. ७ किमुच्यतेऽस्य भूपालमौलिमालामहामगेः। सुदुर्लभं वचोचाखैस्तेजो यस्य विभाव्यते ॥२०६॥। अरन्र वच: शव्देन गी शब्दो लक्ष्यते। अत्र खलु न केवलं पूर्वपदं यावदुत्तरपदमषि पर्यायपरिवर्तनं न क्मते। जलव्यादावुत्तरपद्मेव, वड-। वानलादौ पूर्वपदमेव। यद्धि यहाँ 'चर' धातु से 'ट' प्रत्यय (चरेप्टः ३/२/१६) हुआ है तो 'साधुपु चरति इति साधुचरः' यह अ्र्थ होगा। इसलिये 'चर' रूप पदकदेश सन्दिग्ध है। अनुवाद्-[७. नेयार्थ] 'सुपालों की मुकुटमाला के महामणि इस राजा का क्या बसन किया जाय ? जिसका प्रताप देवताओं (वचौवास शर्थात् गीर्वाख): को भी दुर्लभ है ॥२०६॥ "' यहाँ पर 'वचः' शब्द से 'गीः' शब्द का लक्षणा द्वारा बोध होता है। यहाँ केवल पूर्वपद (वचः) हो नहीं; अपि तु उत्तरपद (बाएः) भी पर्याय शब्द का परि- वतंन नहों सहन कर सकता, 'जलधि' आदि शब्दों में उत्तरपद (घि) ही 'वडयानल' आदि में पूर्वपद (वडवा) हो (पर्याय परिवर्तन को सहन नहीं करता)। : प्रभा-(१) उपयुक्त पद में 'वचोवाए' शब्द का 'वचः' शब्द नेयार्थ है। यहाँ पर 'वचः' शब्द अपने वाच्यार्थ (वाखी) के वाचक 'गीः' शब्द का लक्षणा द्वारा बोध कराता है; वयोकि 'गीर्वए' शब्द ही देव-अर्थ में प्रसिद्ध है। इस 'गीः' शब्द की लक्षसा मे न रूदि है न प्रयोजन ही अतः प्दकदेश 'वचः' में नेयार्थता।। दोप है। (२) यहाँ पर शब्दर-दोप ही है अर्थ-दोप नही यह स्पष्ट करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि 'गीर्वाण' शब्द (जो देववाचक है) में पूर्वपद 'गीः' परिवृत्तिसह नहीं है अर्थात् 'गीः' के स्थान पर इसका पर्याय 'बचः' (वचोवास) रख देने पर 'देवता' भर्थ की प्रतीति नही होती। इसी प्रकार यहाँ उत्तरपद (वास) भी पर्याययाचक के द्वारा नही बदला जा सकता अर्थात् 'गीः नर' शब्द से भी 'देवता' अर्थ की 1- प्रतीति नहीं होती। अतएव मिरो हुए 'गीः' तथा बाण शब्द में ही देवता अ्रर्थ की रूढि है, इन शब्दों के पर्याय में नहीं और 'चनः' शब्द की 'गीः' शब्द में लक्षणा (नेयार्थता) ही है इसी से वह शब्द-दोप है, रथ-दोप नहीं, कुछ शब्दों का केवल उत्तरपद ही पर्यायवाचक द्वारा परिवर्तित नही किया जा सकता जैसे 'जलघि' आदि। यहाँ 'जलघर' या जलपान' ('घि' के स्था परP 'घर' या 'पात' कर देने पर) आदि से सागर' का बोध नहीं होता। किन्तु पूर्वसदो को परिवर्तित कर देने पर 'नीरधि' आदि से 'सागर' का बोध होता है। 'वढवानल' यब्द में पूर्वपद (बडवा) को पर्यायवाचकों के द्वारा परिवर्तित नहीं किया जा,सकता जैसे-'गश्वानल' यह प्रमोग नही हो सकता; किन्तु 'झनल' (उत्तरपद) के प्थान में 'भग्नि' पद रखने पर 'वडवाग्नि' प्रयोग हो सकता है।
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काव्यप्रकाश:
यदप्यसमर्थस्यवाप्रयुक्तादय: केचन भेदा: तथाप्यन्यैरनफ्ारिफवि भागेन प्रदर्शिता इति भेदमदर्शनेनोदाइस्त क्या इति च विभव्योकाः। [वाकयमानगतदोपा:] (७५) प्रतिकूलवरां मुपहतलुप्तविसगं विसन्धि हृतवृत्तम। न्यूनाधिककथितपदं पतत्प्रकर्ष समाप्तपुनरातम ॥।५३॥। अनुवाद-पद्यषि अपयुक्तत्य (सवाघरत्व, निहृतार्यत्य) पादि कुम शोष 'प्रसमयंत्य' (दोप) के ही विशेष मेव हैं तयापि इन्हें इससिये विभाव करके (पृपक पृथक्) कहा गया है; यर्योंकि मन्य पातद्वारिकों ने इन्हें धृथक् पृथक प्रदशित किया सै तथा नेद-प्रयशन के साथ इनके उदाहरस भी विरालाने मे। प्रभा-गद्ा यह है कि-विवक्षित अर्य के प्रतिपादन का सामथ्यं न होना हो. प्रसमर्मत्व है, इसीतिये मवाचकत्व, अमयुक्तत्व सथा निहृतामंत् मादि दोपों का 'प्ररमर्थंत्व' में ही समावेश हो सकता है, फिर इनका पृथह निरुपस वर्ों किया गया है ? इसका नमाधान 'समापि' आदि में किया जाता है। भाव यह है कि इनका भ्रसमर्यंत्व में समावेश हो सफता है, यह सत्य है फिर भी प्रामीन आपद्वारिकों का पनुसरण करने मे लिये तथा जिमासुमों को भिम्न २ उदाहरस पादि दिससाने क लियेइन प्रपयुकतत्व आादि दोपों का पृथक निरुपस किया गया है शास्त्र में पिभागपूर्य क प्रदशन करना आावसवय ही होता है, नही सो 'मुम्याय के भपरुपेक रूप' दोप के सामान्यस्वरूप का विवेचन ही पर्पाप्त होगा। टिप्पली- (i) सद्ट ने (काल्यालदार ६-३-३ में) में मश्युकतत्य, मवायकरव तपा निहतार्थंत्व का परामथंत्य में ममावेद किया है ऐगे पतद्गारिकों को घोर से ही दासुा है। (ii) मवावरुरव तथा निहृतारयत्य मादि दोपों या सगममत्व से जो सरम मन्तर है, उसका दिग्दर्णन पिश्यनाय कविराज ने इग प्रकार किया ह-ह सु सरशारनो सवंया प्रयोगानायेव्समर्यत्यम्। शिरतप्रयोमे निहतार्मखयम्। निह्तताई स्वमनेरमंशरवविययम्। अमतोतत्वं रवेकपंस्यावि सम्परय सार्यपरिस्म्रयोगिरह:।
हनसमादमोउि गमनारय पठिता:। पयापररये विनावय: प्रहाशाममाचर्मे म समेनि परापरभेद: । (साहिर्यरपंसा 2.४) फेवल वाकयगत दोप- अनुवाद-निम्न (पतिश्सवर्स धारि) शेवपुरछ (तपा दुष्टामावरम:), वाश्व हो होता है- (१) पतिस्सवरं (२) उस्हगदिगग, (१ मुखरिसिर्म (3 विनन्धि, (१) हनमूस (६) मूनपर, (9) समिरपा, (6] दबिगर' () पापरश्वं, (१०) ममाप्तपुनरात, (११) पर्मनरंत्पाबक, (१२) समर्मादोन
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सप्तम उल्लास: ३१६
अरधान्त रैकवाचकमभवन्मतयोगमनभिहितवाच्यम। अपदस्थपदसमासं सङ्कीएँ गभितं प्रसिद्धिहतम् ।।५४।। भग्नप्रक्रममक्रमममतंपरार्थं च वाक्यमेव तथा। १. रसानुगुशात्वं वर्णानां वद््यते तद्विपरीतं प्रतिकूलवर्एम। यथा शृङ्गारे- नकुसठोत्करठया पूर्समाकएठं कलकरिठ, माम्।
रौद्र यथा- कम्वुकएठ्या: चएं कएठे कुरु करठार्त्तिमुद्धर॥२०७॥
देशः सोऽयमरातिशोसितजलैर्यस्मिन्हदा: पूरिता: क्षत्रादेव तथाविध: परिभवस्तातस्य केशग्रद्यः। तान्येवाहिंतहे तिघस्मर गुरुएयस्नाणि भास्वन्ति मे यद्रामेण कृतं तदेव कुरुते द्रोसात्मजः कोपनः ॥२०८॥। (१३) अनभिहितवाच्य, (१४) अ्रपदस्थपद, (१५) अपदस्थ समास, (१६) सङ्गीर्सं (१७) गभित, (१८) प्रसिद्धिहृत, (१६) भग्नप्रक्रम, (२० ) अ्रक्रम, (२१ ) अ्रमतपरायें । प्रभा-(१) ऊपर पद, वाक्य तथा पदकदेश में समानरूप से होने वाले दोपों का विवेचन किया गया है। यहाँ वाक्यमान्गत दोपों का उल्लेख किया जा रहा है। प्रतिकूलवर्सत्वादि वाक्य मे ही रस आदि के अपकर्पक होते हैं भतएव ... ये वाक्य-दोप ही हैं। इनके स्वरूप तथा उदाहरणों का आगे विगद विवेचन किया जा रहा है। (२) साहित्यदर्पसकार ने 'विसन्धि' के सन्घिविश्लेपण, सन्ध्यर्तीलत्व और सन्घिकप्टत्व नाम से तीन भेद करके वाक्यदोप-संख्या २३ कर दी है। अनुवाद्-(१. प्रतिकूलवसता), वर्णों की रसानुकलता प्र्पर्थात् कोन वसं1 किस रस के अनुकूल है यह बात (भष्टम उल्लास में) फहो जायेगी; उसके विपरीत (अर्यात् रसास्वाद के उद्बोध का प्रतिबन्धक) प्रतिकुलवसं (प्रतिकूला: धर्णाः यत्र वादपे तत्) वाक्य होता है। जंसे, शद्धार में-[नायिका से मिलन के लिये" उत्मुकु नायक की सखो के प्रति उत्ति] हे मधुरकण्ठवाली, न रुकने थाली उत्फष्ठा। से कण्ठ तक भरे हुए मुझफो उस शद्ध के समान कण्ठवाली नायिका के गते क्षस। भर को मिला दे और मेरे कण्ठ की (प्रतिङ्गन की उत्कण्ठा रप) पीड़ा को दूर कर दे ।।२०७।। रौद्र रस में (प्रतिकूलवसंता), जैसे-[बेीसंहार में ऋृद्ध अश्वत्यामा की" फर्सकेप्रति उकि] 'यह वही देश है, जिसमें शत्रुओं के रुधिर-रूपी जल से (परशुराम ने) पञ्चताल भर दिये थे, तब क्षत्रियं (पृप्टद्युम्न) के द्वारा मेरे पिता (बोसचायं) का केशाफर्पए रूप बंसा (जैसा कार्तवीर्य के द्वारा जमदग्नि का)"
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याव्यप्रकाम:
अत्र हि विकटवर्शात्वं दीर्घसमासत्वं चोचितम्। यथा- *
क्रोधप्रेरित भीम भार्गवभुजस्तम्भापविद्धः ससातू।
र्येनानेन जगत्तु खण्डपरशुर्देवो हरः कपापयते ।२०६। यम तु न क्रोघरतन्न चतुर्थमादाभिघाने तथैव शाब्दप्रयोग:।
ही अनादर किया गया है, शतुओों के प्रस्थो (हेतप:) के भक्षर (परमर) भ्रतपव थष्ट (गुरसि) तथा बोप्तिमान मेरे (व्रहयास्त्न मादि) पस्त भी ये हो हैँ (जो मेरे पिता ने परछुराम से प्राप्त किये) इसलिये द्रोलाचार्य का पुत्र मावायामा छोप-पुक्त होकर यही कर रहा है जो (क्षत्रिय-विनाश) परघुराम ने रिया था' ॥२०६। यहाँ (रोद्र रस में) फठोरयसंता तथा दी्प समास का प्रयोग करना उपित था जैसे-[योरघरित नाटक में राम के प्रति परधुराम को इस उतल में ('रे क्षत्रियामक) राम, जो पहले कभी नहीं भुफा (निःशुम्न := नमनं) उस दिव धनुष के दो सण्ड किये जाने के कारस प्रकट हुए कोप से प्रेरित शुफ भागय परछुराम की स्तम्भरुमी भव्डूर भृजा से फंका हुआ (पपविद्धः) सतएव स्यमिक वेग यासा तथा टोपिन वासा यह मेरा बुठार सला भर में ही सुम्हारे पद्टोठ का पतिथि हो जाने यासा है, जिग (पुदार) के फारल महादेय जो संवरणु' इस नाम से प्रसिद्ध है (सिव ने परधु का भगभाग सपने शिष्य परधुराम पो में डिया या यहु प्सिद है। ॥२०६। (यहाँ पर पादतम में फठोरयएं तथा बोध समास है। किन्तु जक कोप मही यहा चतुम परल में मेसा (तदनुकूस) हो नग प्रयोग है।. :प्रभा-(१) प्रतिश्सयरात्-म्टग उसाग में यह निपार हिमा जायेगा। कि कोन यगा रिग रम के सनुकूत है। उसके विनरीत जो पां निगी रम के प्रति-। कल है मर्यात् रसास्बाद के उद्वोप में प्रतिबत्धक है, यै ही प्रततिर्सक्ं है। ऐमे पर्स जिम वामय मे होते हैं. यह वाक दोपगुक है पतः यह प्गिहमरर्ल (परसा :: पहाई मत) है अपता उगमे 'निकतषगुख नामन माकवदीप है। पर्दात एक सद् में भी फोई प्रतिहूस पर होता से सपारि यहा मापवनोय ही माना माता है पोि प्रविरसासांत्य वाश्पमत्र रव में ही र का प्रतितत होगा है। सूतिरदुमा मे इमरा मेर यह है कि वहा परषरर्स माप ही दुष्ट यहे बोें मे विन्तु वहो रौ्र। पादि इम के नवद में गुरुमार बसो भी रोमुन होते है। एगर परिति पस मीए राह मे भी हो परता है हिन्ू पतिष पवतदोर गग्य काम मे ही होता है 1(133)
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सप्तम उल्लास: [ ३२१
B२. ३. उपहत उत्वं प्राप्तो लुप्तो वा विसर्गो यत्र तत्। यथा घीरो विनीतो निपुणो वराकारो नृपोऽत्र सः। यश्य भृत्या बलोत्सिक्ता भक्ता बुद्धिप्रभाविंता: ॥२१०।।
(२) 'अ्रकुष्ठ' इत्यादि उदाहरणा में टवर्ग' का प्रयोग शृद्धाररस के प्रति- कूल है। शृङ्गाररस के अनुसार यहाँ कोमल वर्णों का प्रयोग ही उचित है अ्तः ओोजव्यञ्जक ठकारादि वणं शृद्गार-व्यञ्जना में प्रतिबन्वक हैं और प्रतिकुलवएंत्य दोप है। i (३) 'देशः' इंत्यादि में'रौद्र रस व्यङ्गय है। रौद्र रस के परिपोप में विकट- वणं तथा, दीर्घ समास सहायक हैं जैसे 'प्रागप्राप्त' इत्यादि पद्य के पादत्रय मे विकट- वए तथा दीर्घसमास का प्रयोग किया गया है किन्तु चतुर्थपाद में क्ोय वा वर्सान नहीं है अतः उस प्रकार के वर्स तथा रचना आदि नही हैं। इसके विपरीत 'देनस इत्यादि में मृदुवणों का प्रमोग है जो रद्र रस के प्रतिकूल है अतः- यहाँ प्रतिकूल- वर्णत्व दोप है। गअनुवाद-(२) जहां (अ्रनेक) विसरमं उत्य=भ्रोत्व (उपघात) को घापतं हो जाते, हैं वहाँ 'उपहतविसर्गत्व' तथा (३) जहां खुप्त हो जाते हैं वहाँ तुप्त- विसर्गरव दोष होता है। जैँसे- 'इस, संसार में वही राजा पण्डित, सुशिक्षित, प्रवीस,तथा सुन्दर आफृत वाला है जिसके सेधक बल के गर्व से युक्त, बुद्धि के द्वारा प्रभावशाली तथा सेवा में.तत्पर (भक्त) होते हैं ॥।२१।। ह;।. प्रभा-(१) काव्यप्रकाश वृत्ति मे 'विसर्गो यत्र' में जात्यर्थ' मेएकवचनहै वस्तुतः 'उपहताः लुप्ताः वा विसर्गाः यत्र' यह बहुवचन ही अ्रभीष्ट है। यदि. एक विसर्ग को 'उत्व' आदि होता है तो दोप नही होता। विसर्ग को उ (=म्ो) हो जाना हो 'उपघात' है। । (२) ''घीरो' इत्यादि इलोक के पूर्वार्ध में 'उपहत-विसर्मंत्व' दोष है। यही 'घोरो विनीतो' इत्यादि में 'हशि च' (६/१/११४) तथा नृपोडय' में अतो रोरतुप्ता- दप्लुते' (६/१/११३) पासिनि-सूत्र के अनुमार विसर्ग को उत्व' (उ) हो गया है'। (३) उत्तरारय 'भृत्या बलोस्सिक्ता' इत्यादि में सकार (विसरगं) की 'मसजुषो ु' (5/२/६६) से रत्व, 'भोभगो अंघोऽूवस्य योऽनि (८/३/१७) से 'रु को य्' होकर 'हलि सर्वेपाम्' (८/३/२२) से यलोप होकर विसरगं का 'अदशन होता है,' भतः 'लुप्तविमर्गत्व' वाकय-दोप है। (४) उपह्तविमगंत्व तथा नुप्तविमरगत्व से बन्ध (रचना) शिथिल हो जाता है और सहदयों को जैसा गादनन्यत्व में चनलकार का अनुभव होता है वँना बन्ध-रीथितज में नहीं।
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३२२ ] काव्मप्रकान:
४. विसन्धि सन्घेवेंरूप्यम्, विश्नेषोऽलोलत्वं कप्टत्वं च। तप्ाप यया- क-राजन्, विभान्ति भवतरचरितानि तानि इन्दोदय ति दृघति यानि रसातलेडन्तः । * घीदोषले अतितते उचितानुवृत्ती आतन्वती विजयसग्पद्मेत्य भातः ।।२११।। यथा वा तत उदित उदारहारहारिघ तिरुच्चैरुदेयाचलादिबेन्दु:। निजवंश उदात्तकान्तकान्तिर्घत मुक्तामशिवच्च कामयनर्पे: ॥।२१२।। अनुवाद-४) सन्धि का वंहष्य (मद्दापन), विसग्धि' (दोप) है, वंहप्म (तीन प्रकार का है) सर्थात् (फ) सन्धि का सभाव (विश्लेय), (स) परसीसता चौर (प) य तिफटता (फष्टरव)। इनमें से प्रथम (विश्लेप) सन्धिवंरष्य (है), जसे- (४ क) 'हे राजन् आापके वे धरित शोमायमान है, जो पातास (गम्भीर प्रदेश) के भीतर भी धवरमा की धुति को पारस करते हैं। आापको ुद्धि सपा पाहमत दोनों सरयन्त विस्तृत (भतितते) हैं तथा उचिन प्वसर का धनुसरस करने पाने हैं वे दोनों विजय-सम्पद को प्राप्त फरके शोभित हो रहे हैं ॥२११॥ पपमा जैसे-[पतिपरा कन्या के प्रति सघ्ी को उक्] 'महो (बत), चसत उदयावल से उदित चन्द्रमा के समान पूर्वोषत बंश से (सतः) उत्पनन हृमा, विशास मुसामाला से रमलोय काम्तियाला यह राजा सायन्त ममोहर ओभापुस्त तथा पमूल्य (प्रनर्घ) मुक्तामसि के समान दोप्तिमान् हैं।२१३। "मैं गन्पि नहों करता' इस प्रकार स्वेष्छा से एक मार भी रन्पि म करना
हो बोष है। (विश्लेष।) दोष है तमा प्रगृह (तमा ससिद्ि) यदि हेतु से पनेष यार सग्वि न करना
प्रभा-(१) सन्य्यभाम या विश्लेप दो प्रकार का होगा है- ऐप्टिड २. मानुशासनिक। व्यारुरण के मनुमार वास्य में सन्धि करना, म करमा बकना की इन्छा के मधीन है। पदा भी है- गंहिनंरुपडे निरया निरया मामूपरारमयोः। निरमा समासो पानमे सु सा वियसामपेशते। पानुगामनिरु वित्मेप यह है जो प्यारपरा (दाम्सनुदानन) के नियम से (सन्धि का समाष) होता है। यह दो प्रकार का है- एक प्रगुसदेतुक दूसरा पविविदेतुकु। इम प्रशार विश्नेय सीन प्रवार का हषा। इनमें से प्रदम पर्दात् ऐष्टिक विसेय मदि एक बार भी माम्य में होत है मो यद् दोप है, क्नोंकि उमसे परि भी मप्स्रि पपट होती है तपा सह्यत नन पण हो जाते है। पेप दोनों सो यदि सनेय बार (घमपुर) या जाते है ठभी बप- मेदिस् उतम करने के पााय दोप कहमाते है। (२)-(i) 'गजन् विभाति' इमवदि मद् के पुवरष में 'हानि रग्तो" इन हदम पर (एक बर) ऐविटिय विलेप है. चतः विगन्मि गामर याहगोष है।
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सप्तम उल्लास: ३२३
संहितां न करोमीति स्वेच्छया सकृदृपि दोप: प्रगृह्यादिद्देतुकत्वे त्वसकृन्। ख-वेगादुड्ठीय गगने चलएडामरचेष्टितः । : श्रयमुत्तपते पत्त्री ततोऽनैव रुचिक्क रु ॥२१३।। श्रन्न सन्घावश्लीलता। ग-उर्यसावत्र तर्वाली मर्वन्ते चार्ववस्थितिः। नात्रजु® युज्यते गन्तु' शिरो नमय तन्मनाक ॥२१४॥. ५. हतं लक्षसाऽनुसर णोऽप्यश्रव्यम, अ्रप्राप्तगुरुभावान्तलघु, रस्ा- ननुगुएं च वृत्त' यन्न तत् द्ृतवृत्तम्। क्रमेणोदाहरयाम् - (ii) इसके उत्तरार्घ में 'धीदोवले अतितते, 'अतितते उचितानुवृत्ती' तया 'उचितानुवृत्ती त्र्रातन्वती'-इन तीन स्थलों पर 'ईद्वदेद्द्विवचनं प्रगृह्यम्' (१/१/११) सूत्रानुसार द्विवचनान्त की प्रगृहय सज्ञा होकर 'प्लुतप्रगृह्या शरि नित्यम्' (६/१/१२५) से.प्रकृतिवद्भाव त्रपर्थात् सन्ध्यभाव होता है यह प्रगृह्महेतुक आनुशासनिक विश्लेप (सन्ध्यभाव) है इसके अ्र्प्रनेक बार (अ्रप्षकृत) होने के कारए यहाँ विसन्धि. नामक वाक्यदोष है। (iii) 'तत उदित' इत्यादि असिद्विहेतुक आनुशासनिक विश्लेप को उदाहरण है। यहाँ पर 'तत उदित' उदित उदार' तथा 'निजवंश उदात्त'-इन स्थलों पर 'लोपः शाकल्यस्य' (८/३/१६) इस पाणिनि सूध द्वारा-विहित (विसर्ग) लोप 'आद्गुम.' (६/१/८७) से होने वाले गुए के प्रति 'पूर्वभासिद्धम्' (८/२/१) के अनुसार असिद्ध है। इसललये यहाँ असिद्धिहेतुक आनुश्यासनिक विश्लेप से होने बाला विसन्धि नामक वाक्यदोप है। १ अनुवाद-(४-ख) [सखी की नायिका के प्रति उक्ति] हे, 'ससो, उत्कट (अमर) चेप्टा वाला यह पक्षी देग से उड़कर आफाश में जाता हुआ चमक रहा है (उत्तपते दीप्पते), इसलिये यहीं पर रुचि (प्रीति या प्रयस्यिति) करो ॥२१३ F :- यहाँ पर (चलन्-डामर' घर रुचिम्+फुर') की सन्धि में (पमशः पुरुषेन्द्रिय तथा स्त्री-योनि का बोध होने से) भश्लीलता है तथा (विसन्धि नामक दोष है)। अनुवाद-(४ग) [पर्यिक के प्रति किसो की उक्ति],,यहा इस मरु प्रवेश के अन्त में (भ्व.ते) मनोहर पवस्था याली यह दृश्यमान (मतौ) महती (उर्बो) वृक्षपंक्ति है इस स्थान पर सोधे चलना उचित नहीं है इसलिये थोड़ा सा (मनाक) सिर भुका लो' ।।२१४। प्रभा-यहाँ पर 'उव्यंसौ', 'तर्वाली', 'मर्वन्ते'- इत्यादि सन्ि में श तिफटृत्व रूप कष्टत्व है अतएव यहाँ कष्टत्वहेतुक 'विसन्धि' है। यहाँ प्रन्य शब्दों का 'तर्वाली' के साथ विशेषणविशेष्यभाव से अन्वय होने के कारए वावयदोप ही है। अनुवाद-(. हत्तवृत्तता) हृत (निन्दित) पर्थात् (क) दन्दः शास्त्र के सदस का अनुसरस करने पर भी 'अथव्य', (ए) गुदत्य को प्राप्त न होने पासे.
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३२४ मवमकाग:
क-अमृतमगृतं के: सन्देहो मधून्यपि नान्यया 1" मधुरमधिरक चूतस्यापि प्रसन्नरसं फलम्।. मफृदृपि पुनमध्यत्यः मन् रसान्तरविज्जनो वदृतु यदिदान्यतवादु स्यात्मियादशनच्छदालू ॥२१४। अत्र 'यदिद्ान्यतवादु स्याद्' इत्यक्षव्यम्। यथा वा- 74 जं परिहरिउ तीरह मसश्नं पि ए सुन्दरचरगुपेए। पह गावरं जरस दोसो पठिपक्खेहिं पडिवलो ॥६। (यस्परिदतु' तीयंते मनागपि न सुन्दरत्वगुपेन। अथ केवलं यश्य दोप: प्रतिपक्षीरपि प्रतिपन्नः) ॥२१६। परन्न द्वितीयतृतीयगएी सकारभकारी। पादान्त सघु वरां से युवन तथा (ग) रस के प्रतिकूल धन्द है जिसमें यह (सत् वारय) 'हतयुस्त' है। नमशः उदाहरस मे हैं- (५ फ)-'इसमें कया सन्देह है कि मृत प्रमृत ही है, गयु भी सम्व सर्थात् समभु नहीं है, रसाल का प्रसन्नरसवासा फल भी अपिक मपुर होता हो है दिग्तु यदि संसार में प्रिया के अधर की सपेका भम्म फोई वस्तु सपिक मपुर हो तो रसों के पस्तर (पपवा मर्मं) को जानने वासा व्यक्ति पसपासरहित होकर एक बवर भो बतलादे ॥२१५॥ 1 यहाँ पर 'पविहान्यतयादु स्थान' यह पधम्प है। पपवा जसे-माहिनी नाषिका के प्रति दूतो कौ उड] जो वह (कमये- ट्टित) सपने रमलोमता गुल के कारल तनिक भी छोड़ा नहीं का सरता, नही उसका एक दोष है जिसे पनिपसी अर्थात मिर्तों मे भी रवीकार रिया है ॥२१५।। यहाँ पर (प्रयम चरल में) द्वितीय (हरिजं) तपा सृमोय (लोरड) वे दोमों गल कमदः सगएर (सकार) और नंगर (भकार) है। ममा-(१) सतयुरु यह दृष्ट मार है जह! निम्दित ए्द होता है (ए निन्दिव पुमे सन्दो पव स्।। कनरमितों को दृष्टि में यही सग् निव्दनीय है- (फ) जो सन्द नारत मे (मसत) या पनुमरष न करना ऐ मपरा साए भा धनुगरसु करने हए भी छूनिमपुर न हो पपार् पधस (unmelodia ui) टो, () हिनके पाद के भन्त में रेगा नम परस हो नि जिगे 'या पाहनें इग सग्मााम हे नियम के सनुगार गुर माना गना हो: हिपु वह मुरनास को पर्स म बरता ऐो धर्धाम् उसने धूविसोलर्प से दपार (पुदभाय) से पाण बिय्ा हो। (ड) रो (एग्)
(२) पथम दुत बौन प्रहार भा है- (i) इभद मे कार (Ii) मि भम रें सर गदा (ii) ियी स्मान पर पाविसेय का सोय म हैमे से कारम।
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सप्तंम उल्लस: ३२५
नवकिसलयचारुचामरश्रीर्हरति मुनेरपि मानसं बसन्त:॥२१७।। अत्र हारिशब्दः । हारिप्रमुदितसौरभेति पाठो युक्त:। यथा वा- अन्यास्ता गुएरत्नरोइसभुवो धन्या मृदन्यैव सा सम्भारा: खलु तेऽन्य एव विघिना यैरेप सृष्टो युवा। श्रीमत्कान्तिजुपां द्विपां करतलार्त्रीखां नितम्बग्यलात् दृष्टे यत्र पतन्ति मूढमनसामस्रासि वस्त्रासि च ॥२१८। अत्र वस्त्राएयपि इति पाठे लघुरपि गुरुतां भजते। (i) इनमे से प्रथम दोप प्रसिद्ध ही है। (ii) 'अमृतम्' इत्यादि द्वितीय का उदाहरण है। इसमें 'हरिणी' वृत्त है, जिसके प्रत्येक चरण में पष्ठ अक्षर पर यति होनी चाहिमे; किन्तु यहाँ चतुर्थ चरएा मे 'हा' इस पण्ठ अक्षर पर अग्रिम पद 'अन्यत्' के भनुसन्धान की अपेक्षा होती है अतएव यतिभङ्ग दोप के कारण दन्द अशव्य है तथा हतवृत्तता दोप है (iii) तृतीय का उदाहरण 'ज परिहरिउ' इत्यादि गाथा है। इसमें वणंनय का एक एक गए है। 'हरिउ' यह द्वितीय गएा 'सगए' (सोऽन्तगुरुः) है तथा 'तीरइ' यह तृतीय गस भगएा (भ आदिगुरु) है। इन दोनों गएो का जो प्व्यवधान से श्रवस होता है वह थ तिमधुर नहीं (अश्नव्य) क्योंकि 'उंती' इन दो गुरु वरशों का बिना व्यवधान के उच्चारण किया जाता है। अतः सगय' का पूव प्रयोग उचित है। अ्रनुवाद्-(५ ख) 'यह वसन्त ऋतु मुनिजन के भी मन को हुरती है, जिसमें मञ्जरित प्राम्त्र की उत्कट तथा मनोहारी गन्य से एकप्रित होकर भ्रमर (द्विरेफ) गुज्जार कर रहे हैं; जिसमें नवपल्लवरूपी मनोहर चामरों को शोभा हैं।। २१७। यहाँ पर 'हारि' शब्द (परपाप्तगुरुभाव) है। 'हररिप्रमुदितसौरम' यह पाठ उचित है। प्रयवा जैसे-'ये उपफरस या सामघ्री कुछ और ही है, ये गुल रूपी रत्नों को उत्पन्न करने वाली भूमि भी और ही हैं, वह मिट्टो कुछ और ही है, वह धन्य - हैं जिनके द्वारा विघाता ने इस युवक की सृष्टि की है जिसे देसते ही (भय तया काम से) मुग्ध हृदय वाले शीमान् तथा कान्तियुक्त श्ुओों के हाथ से शस्त्र और रूपवती तथा कान्तिमती स्त्रियों के नितम्ब से वस्त् गिर जाते हैं ॥।२१८॥। यहां पर 'घस्नाम्यि' यह पाठ होने पर लघु (यएा) भी गुबतब को प्राप्त होता है।
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कंाव्यप्रारो:
ग-हा ृप ! हा बुघ ! हा कविबन्धो ! चिप्रसह्स्समाभय, देव। मुग्घ विदग्ध, समान्तररत्न, वयासि गतः वब वर्य थ तवैते ॥२१६। छास्यरसव्यन्जकमेतद् पृत्तम्। ६. न्यूनपद यथा- तथा भूतां दृप्टूवा नृपसदसि पाळ्चालतनयां वने व्याधेः सार्घ सुचिरंमुपितं वल्कतघरेः। विराटस्यावासे स्थितमनुचितारम्भनिभृतं गुरु: सेदं सिग्ने मयि भजात नाद्यापि कुरुपु ॥२२०॥ प्रभा- (१) 'विकसित' इत्यादि उदाहरस में 'पुण्पितामा' सन्द है। 'विक सितसहवारतारहारि' यह प्रथम परस है। यहाँ अन्तिम मसर रि' को सन्दमाहम के या पादान्ते' निपम के अनुगार गुरु माना जाता है पय: यहां सन्दोभद्ध सो नहीं है; किन्तु यह सघ दकार गुरुवसां का बायं करने में मदमयं है। इसलिए यहो बन्यरमिल्य है तथा हृतवत्तता वाकय-दोप है। 'हारिप्रमुदितसौरम' पाठ से यह दोप दूर हो जाता है। (२) 'मन्चारता' दत्ा में 'पायू सवित्ीहित' छन्द है। इसके पमुर्ष घरग के मन्त मे 'वस्नाशि प' मे न को 'या पादान्ते' मे मनुगार गुद मागा जाया है किन्तु यह गुसकार्यकरण मे भरागर्य है। 'वस्ताय्यपि' पाठ में सो 'वि' संपुकत यहां 'य' के भामे रहता है मतः बन्यददम के यारम स्वरतति हो जाती है सपा दोप नही रहदता। (३) इनका अभिप्राय यह नहीं कि 'या पादानं' यह नियम स्वर्य ही है, कयोकि वमनातिसका, इन्द्रवस्या आादि वृतों मे इस नियम द्वारा गुरय को प्रापत होने वाला लपुयएं गुवक्षर का फाय सम्पस करता हो है। अनुवाद-(५ ग) [रामा की मृत्यु पर विल्ंाफोि] 'हाप मुय, हाय पण्डित, हाम कवियों के बन्यु, विप्र-महसर के साधयराना देव, शुग्हर तथा सपुर सभा के मभ्यस्यित रश्न, सुम पहो घसे गये ? घोर सुम्हारे मे हुम करा है? ।२।८।। मह् (शेपर) युस हारय-रम का स्यम्बर है (तथा फकपत' का धननुपुस है)। प्रभा-माव काा है कि वम पादि मी भति मिस्न द सन्द भिभ २ मों के सन्ना है। ने स्द हो ग्वानुशम रहे जाते है नमे-ज्ारादि मे मृत्ी न्याप पादि, करमा में पुष्िामा-मनदाराक्षा पादि, मोगनि में मिसरिो ाई मीित पादि तपा दारन मे दोदन मरि एन मनुषूस (भनुसुरा) समर्मे जाा है। परतुग 'वहा मुग' हरवादि पद मस्सा रम का ए। 'दोपक" पगद इसके पनुषस नहीं थाः
अमनुवाद-६. मुनपद (वोरन), (पा गाहरत): अंगे-'तपाकत' r समारि (उट उाहरस ₹भ) ।२२-।।
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सप्तम उल्लासे: ३२७
अन्रास्माभिरिति खिन्ने इत्यस्मारपूर्वमित्त्थमिति च। ७. अधिकं यथा- स्फटिकाकृतिनिर्मलः प्रकाम प्रतिसंक्रान्तनिशातशास्त्रतत्वः । शविरुद्धसम न्वितोक्तियुक्ति: प्रतिमल्लास्तमयोद्यः स कोडपि ॥२२१॥ अत्रा कृतिशब्दु: । यथा वा- इदमनुचितमक्रमश्च पुसां यदिह जरास्वपि मान्मथा विकारः। यदृपि च न कृतं नितम्विनीनां स्तनपतनावधि जीवितं रतं वा ।२२२। अन्र कृतमिति। कृतं प्रत्युत प्रक्रमभङ्गमावहति। तथा च 'यद्पि च न कुरङ्गलोचनानाम' इति पाठे निराकाङ्क्षेव प्रतीतिः। यहाँ पर (प्रथम तीन चरणों में) 'भ्स्माभि:' यह पद तथा [चतुर्थ चरण में] 'खिन्ने' इस पद से पूर्व 'इत्यं' यह पद न्यून है। प्रभा-जिस वाक्य में विवक्षित अर्थ के वाचक किसी शब्द का अप्रयोग होता है वह 'न्यूनपद' है (न्यूनम् अनुपात्तविवक्षिताभेंकं पदं वाचकशब्दो यत्र)। 'तथाभूतां' इत्यादि में वल्कलधर:' के विशेप्यरूप मे तथा 'उपितम्' स्थितम्' आादि के कतृ रूप में अन्वित होने से लिये अस्माभि: पद की आवश्यकता है। इसी प्रकार चतुर्थ चरण मे भी (एकवावयता करने के लिये) 'खिन्ने' से पूर्व 'इत्थ' का प्रयोग आवश्यक है। अनुवाद्-७. अधिकपद (वाक्य), जैसे-[किसी विद्वान् का बरंन है] 'वह ऐसा कोई (महापुरुष) है, जो स्फटिफ को आफृति के समान निर्मल (चित्त) है, जिसके हृदय में गुढ (निशात) शास्त्रों का तत्य भली भाति (प्रकामं) प्रति- विम्बित हो गया है, जिसकी उक्तियाँ तथा युक्तियाँ (लोकशास्त्रादि से) भविरुद्ध तथा परस्पर समन्वित होती हैं; जिससे प्रतिवादियों का पराभव हो जाता है (भ्स्तमयोबयः)' ॥२२१॥ यहाँ पर आफृति शब्द (पधिक) है। अथवा जैसे-'इस संसार में पुरुषों को वृद्धावस्था में मी जो कामज विकार होते हैं यह अनुचित अर्थात् लोक-विरुद्व है और प्रकम पर्थात् (शास्त्रोक्त) जोवन कम के विरुद्ध है औौर यह भी (भनुचित तथा झक्रम है) जो नितम्ययाली रमखियों का जीवन तथा रमल केवल स्तनों के पतन पर्यन्त ही नहीं बनाया ॥२२२॥ यहाँ पर 'कृतं' यह पद (प्रधिफ है)। इसके प्रतिरियत 'कृतं' पद प्रभममज्त (बोष) को भी प्रकट करता है। इस प्रकार यहां 'यदपि घ न कुरङुलोचनानाम्' ऐसा पाठ होने पर निराकाडस प्रनीति हो सकती है।
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३२६ फाव्यपकाग: 44
८. कथितपद यथ - अधिकरतलतत्पं कत्पितरवापलील्षा- ur :: परिमिनन निमीनत्पासिडमा गएडपाली सुतनु, कथुय काय, व्यव्जयत्यञ्जसैव समरनरपतिलीला यौवरा्योभिपेकम ।२२३॥ शन्न लीलेति। ६. पततकर्प यथा- :1-
प्भा-(१) जिस वाक्य में पिसी ऐसे पद का प्रयोग होत है, जिसरा अर्य विपशित न हो: वह (वामय) अ्धिक पद है (भधिषम् 'अविवशिताथन पर मय) 'स्फटिक' दयारि'उदाहरख में 'पारति' पद अविवशितार्थक दै। 'यहां 'पटिक हो निमसता में उपमान रूप से विवतित है। 'पवृति' पद के पह करने पर भी 'स्पर्टिय पद के ही निर्मलता की प्रतीति होवी है पततय 'मारवि' पद अधिक ऐ। यह समान मे 'पमिपदल' या उदाहरण है। (३) मसमान में भी अ्धिकपदत्व यापयदोय होता है। "ैह 'वमु इा पद्य में हत' पद अभिक हे। जिग बकार पूर्वपद में 'त' पद के बिना भी निरारादत प्रतीति हो रहो है, इमी प्रकार उतसर में भी हो सपती है। '' पर के प्रशग से सधितपदव दोप तो होता ही ह गाय ऐ प्रकममत दोप भी हो जाता है; क्रोंकि पूर्वन मे सो दुग्पो के लिये सुयावग्भा में शामज विहार (एमें) पा भनोनित्व बतलाया गवा है: बिन्तु उनरार्घ मे 'जोविग' औोर 'मस' पमो वा धनोनित्व गही पढ़ा गमा पदिणु उनके रत्षम-पात पर्यन्न म बनाने (पल) को धनोवित्व पहा गपा ह। इससे 'ग्ववनमरन' दोप । इन दोे को दूर नरने के मिये वदवि न न गुतु रोएनानाम' बहु पाठ उित होज। 1 अनुवाद-(c) कतित गर (वाषय), जसे-िस्तित माविशा के शम सगो को उर्कि] हेहमादी, मवतापो तो-ररतसदती सप्या पर रावनभोता हे कारस होने वाने (फरतल तथा प्पोस के) दुडपर साध्यत्य से निरोहित हो गई है पा्डुता मिरली ऐती मुम्हारी ब्योनरपपो जोम हो बामलपी नरर्तत को गोगा मे. वोप्टजप पर पर रिंम नामद के सभिषेक को प्रषट रहती है।'[भाय यह है कि पामरेय पपमे द्वारा ा मैं न की हुई सुभ्ह को (नी) बद में कर सहने पाने पुदर को धपने राज्य पप्रभिनिल कर दैगा/ ।२i:।। या। पर (स्वागरोता, तमा रमरनरपतिमोपा में पुन. न्पुछ) 'ोना'एव रदित पद है। पमा-निस सापन मे निसी मयोशन के बिना समादामक मया, गम
दो बार पाण है।
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सप्तम उल्लास: '[.३२E
क: क: कुत्र न घुर्घु रायितघुरीघोरो घुरेत्सूकर :. 1." क: कः कं कमलाकरं विकमलं कतु करी नोद्यतः। के के कानि वनान्यर्यमहिपा नोन्मूलयेयुर्यत: सिंहीरे हविलासबद्धवसतिः पब्चाननो वत्तते ॥२२४।। १०. समाप्तपुनरात यथा- क्र द्वार: समरकामुकस्य सुरतक्रीडापिकीनां रवो M फङ्गारो रतिमंञ्जरीमधुलिहां लीलाचकोरीध्वनिः।'!
पवारा: प्रेम तनोतु वो नववयोलास्याय वेखुखनः ।२२५।। .धानन ._ यस्य) ने स्वप्रिया सिंही के प्रेम विलास के कारण एकदेश-वास नियत कर लिया, तो घुर्घुर शब्द करती हुई नासिका (घुरी) से भयड्र कौन कौन शुकर कहाँ भयावना शब्द न करेगा ? फौन सा हाथी कमलों के उत्पत्तिस्थान कोकमल- -रहित करने को उद्यत न होगा ? तथा कौन से बनैले भैंसे बनों को न.उसाड़ देंगे? 7[राजा के व्यसनी हो जाने पर क्षुद्रजन निर्मर्याद हो जाते हैं यह भाव है] ॥-२४॥- f 'प्रभा-जिस वाक्य मे अलद्धारकृत या वन्धकृत उत्कर्प का उत्तरोत्तर पतन (हास) हो जाता है वह पतत्प्रकर्ष है (पतन् हसन् प्रकप: उपकर्षो यत) उपयुक्कत :पद्य मे सूंकरवर्णन, गजवर्णन, महिपवर्णन तथा सिंह्वसंन मे उत्तरोत्तर वन्ध-दाढय आदि का ह्रास हो गया है, अर्थात् भूकर-वर्णन मे जो विकटबन्घकृत तथा अनुप्रासकृत प्रकर्ष है वह सिंह्वणन में नही रहा, अत पतत्प्रकपता दोप है इससे कवि की अशक्ति प्रकट होती है। इसलिये (काव्य) पाठक के रसास्वाद में कमरः ह्रास होना स्वभाविक है। :"अनुवाद-१०. समाप्तपुनरात (वारय), जँसे-[घर जाने वाले पधिकों के प्रति कवि की उक्ति] 'जो (शब्द) धनुर्धर कामदेव की प्रत्यं्चा की ध्यन (केद्धार) है, सुरत कोडारूगी कोफिलों फी कुक है, रतिरूपी मज्जरी के भ्रमरों की गऊजार है, कटाक्षादि रूप लीला-चकोरी की घ्वनि है; कृशाङ्ग्ी रमसी की कञ्चुकी उतारते समय भुजाओं के हिलने से कंगणों का वह (भनक-भनक) शब्द, तुम्हारे प्रेम की वुद्धि फरे, वही शब्द नवयौवन के नृत्य के लिये वंशी की ध्यनि हं'।२२५। FIप्रभा-समाप्तपुनरातता वहाँ होती है, जहाँ कोई वाक्य निया-कारक मदि के अन्वय से समाप्त हो जाता है (उसमें कोई आकांक्षा नही रहती); किन्तु फिर भी उस वाकय से अन्वित पदो का प्रयोग कर दिया जाता है। (समाप्त सत्पुनरात्म्,' याक्ये समाप्ते पुनस्तदन्वयिशब्दोपादानं सन्रेति भाव) । जैसे-'मदार:' :उदाहरस में (एताइगः) क्वाए: प्रेम सनोतु वः पर्मन्त वावय ममाप्त हो जाता
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३३० ] फाव्यमबार:
११. द्वितीयार्यगतेकव।पकरोप प्रथमार्घ यथ।- मस्एच रसपारत गम्यतां भू- सदर्भा विरचय सिचयान्तं मूर्म्नि पर्मः कठोर:। तदिति जनकपुतरी, तौचनेरथपूर: पथि पथिकवधूभिर्वीसषिता शिवषिता च ॥२२६॥ १२. अभवन्मत इप्टो योग: सम्बन्धो यत्र तत्। यथा-, येपां तार््निदरोभदानसरितः पीता: प्रतापोप्ममि- र्ीलापानभुवश्च नन्दनयनच्छ्ायासु यैः फल्पिताः। येपां दुकतय: कृतामरपतिक्षोभा: छपाचारिगा
फिर 'व्याएः' के विनेपसारप में 'यवयोलासमाय वेस्पश्वनः' का प्रयोग किया गया है जिसका विनेषण की वृद्धि से समिक कोई प्रयोजन नही। मनुवाद-११. पर्मान्तरंश्याधम वह (पावय) है जह।ं द्वितीपायंगत एड दमर (थाचक) प्रयमापं का नेष सर्थात् (पूरष) सत्त होता है। पसे-गमशेसर कृत घासरामापल माध्य का वार्य। मार्ग में पमिक नारियों मे धभपुएं नेत्रों से दनर-पुत्री सोता को पेर सथा शिद्ा सो कि राजक्ुमारी, भूमि बुशामूर मुल् है प्रतः धीरे-धोरे पग रसकर बलो, फटोर माम है मतः सिर पर मात्ाम्यत रल सो' ।२२॥ प्रभा-याव यद है नि जरदा वावन के धन्व सर्मभाग (वर्यानर) में एक सर्यान सफेता पूरक पद होना है, मह दर्मानरकयायक वाम है। पह दो महार हा ह-१ नहाँ प्रयमायंगस यावय ववितोपणार्य में थाने पासे पर से पूरा होजा है २. यहां द्वितीययापेगत वापप अ्रथम सर्धभाग में माने वाले पद से दूया हषोत्ता है। 'ममृल' इस्पाटि प्रथम का उदाहरत है। दहों पर 'मूः गरमो सत् (सरमान्। नमुरा- परएापातं गग्यताम्' यह प्रथम (एयोर के) पर्थमाग मे होने पामा मानन हिनीप- सर्यभाग में पाने पाने 'तमू' के दारा मू्लं होता है। भतएष यहो 'वयानाक नागदख्य दोप ह। दिनीर का उदातरत है-इरपम पुुाव कोलभाठ
हिनीनायं का सोपभूत है यो प्रथमार्य मे है। धनुवाद-१२. पक्चिमान है समोष्ट (एम) साजन्य जिसमे यह भरय
प्रति बिती की बि। पमिर) रेशनात ऐरक
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सप्तम चत्नाग:
शमन 'गुसानां च परारथेत्वादसग्यन्धः समत्वालवाद' इस्युकनयेन
रिति। 'सपचारिभि:' इति पाठे युग्यते समन्ययः। भूमयः) बना लों, जिनको वीर ग्जनामों ने सुरपति इन्द्र के (हुदय में भी क्षीभ उत्तप कर दिया; उन्होंे तुम्हारे लिये सन्तोपजनक एवं (राजसभा में) कमन योग्य हुछ किया है दया ?' ।।२२७॥। यहां पर 'गुप परर्यात् प्रपधान या विशेव पदार्थों का, परार्ष सर्मात प्रधानापेक्षित होने के कारल, परस्पर अन्वय (सम्चन्धः) नहीं होता, पर्योकि (वे सभी) समान (परापेक्ष) होते है।' (पूयमोमोसा ३.१.२२) इस न्याय के अनुसार 'पत्' शब्त से निर्देश्य (विशेषण रूप) पदार्मों का परसूपर सन्वय न होने के फारस 'यँं:' इस पद के विशेष्य को प्रतीति नहीं होती। 'क्षपाचारिभिः' ऐवा पाठ हो जाने पर उचित अ्रन्वय हो जाता हुँ। प्रभा-(१) जिस वाक्य में पदार्थों का भभोष्ट समबन्ध नहीं हो पाता वह भभवन्मतयोग है। इसका अरविमृष्टविधेयांग में सम्वर्भाव नही हो सकता; ययोंकि यह। भन्वय तो होता है केवल वदद दय-विधेय भाव की स्पप्ट प्रतीति नहीं होती; किन्तु यहाँ तो पदार्थों का सम्यन्ध हो नहीं प्रतीत होता। अभवन्मतयोग जिन ६ कारखों से होता है वे इस प्रकार है-१. विभत्-भेद, २. न्यूनता, ३. आाकांक्षा- विरह, ४. वाच्य तदा व्यङ्य भथों में विवक्ित सम्बन्ध का अभाव, ५. समापा- चछन्नता, ६. व्युत्पति-विरोध। (२) येपां' इत्यादि विर्भाक्त-भेद निमित्तर श्रभवन्मतयोग का उदाहरण है। यहाँ पर 'यंः' (जिन्हाने) वियोपस का 'क्षपाचारी' विशेष के साथ सम्बन्य विवक्षित है; किन्तु विर्भक्ति-भेद के कारए ये:' (तृतीया विभकि) का धषपा- चारिणाम' (पष्ठी चिभक्ति) के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता। यदि कोई कहे कि जसे 'यो गुएवान् तस्य पशः' मे विभिन्न विभक्ति वाले 'मत्' और 'तत' के अर्थ क अभेदान्वय हो जाता है इसी प्रकार प्रकृत में भिन्न विभक्ति वाले 'यत् के, भ्रर्यों का इस प्रकार अ्भेदन्वय करके-येवां प्रतापोध्मभि :- पीताः, येः-पानभुवः कस्पिताः येथां हुद्ड तव :- फिर सबका सम्मिलित रूप में विशेष्यभूत क्षपाचारी-पदार्थ से अरन्वय हो जायेगा; तो यह उचित नही; क्योकि 'यत्' के भर्थ उद्दक्य रूप हैं प्र्तः वे अप्रधान हैं और अप्रधानों का परस्पर अ्न्वय अ्सम्भव है, जैसे कि जैमिनि, मुनि का नियम है-'गुशानो व परार्यत्वावसम्बन्धः समत्यात् स्पात्'। इसलिये यहो 'में:' पद का विभतति-भेद के कारण 'क्षपाचारिणो' से अभीष्ट सम्बन्य नहीं तथा 'अभवन्मतयोगत्व' नामक वाक्य-दोष है। 'क्षपाचारिणां' के स्थान पर 'क्षपाचारििः पाठ से ही यह दोप दूर हो सकता है।, '
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३३० काव्यप्रकाश:
११. द्विती यार्धगतैकवाचकशेप प्रथमार्घ यथा- मसृणचरसपातं गम्यतां भू: सदर्भा विरचय सिचयानतं मूर्ध्नि घर्म: कठोर:। तदिति जनकपुत्री, लौचनैरभपूर्ण: पथि पथिकवधूभिर्वीतिता शिक्षिता च ॥२२६। १२. अभवन्मत इष्टो योग: सम्वन्धो यत्र तत्। यथा- येपां तारि्त्रदशेभदानसरितः पीता: प्रतापोष्मभि- र्तीलापानभुवश्च नन्दनवनच्छायासु यै: कल्पिता:। येषां हुकतय: कृतामरप्तियोभा: चपाचारियां
1 .. का प्रयोग किया गया है
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सप्तमउल्लास: ३३१ +4
अन् 'गुखानां च परार्थत्वाद्सम्वन्धः समत्वात्याद्' इत्युक्तनयेन यच्छन्दनिर्देश्यानामर्थानां परस्परमसमन्वयेन यैरित्यत्र विशेष्यस्याप्रतीति- रिति। 'क्षपाचारिभिः' इति पाठे युज्यते समन्वयः। भूमयः) बना तीं, जिनकी वीर गर्जनाओं ने सुरपति इन्द्र के (हृदय में भी क्षोभ उत्पन्न कर दिया; उन्होंने तुम्हारे लिये सन्तोषजनक एवं (राजसभा में) कथन योग्य कुद किया है क्या ?' ।२२७।। यहाँ पर 'गुस अर्थात् अप्रधान या विशेपण पदार्थों का, परार्थ अर्थात् प्रधानापेक्षित होने के कारण, परस्पर अन्वय (सम्बन्धः) नहों होता, क्योंकि (वे सभी) समान (परापेक्ष) होते हैं।' (पूर्वमीमांसा ३.१.२२) इस न्याय के अनुसार 'यत्' शब्द से निर्देश्य (विशेषस रूप) पदार्थों का परस्पर अन्वय न होने के फारए 'यं:' इस पद के विशेष्य की प्रतीति नहीं होती। 'क्षपाचारिभिः' ऐसा पाठ हो जाने पर उचित अन्वय हो जाता हैँ। प्रभा-(१) जिस वाक्य में पदार्थों का अभीष्ट सम्बन्ध नहीं हो पाता वह सभवन्मतयोग है। इसका अविमृष्टविधेयाश में अन्तर्भाव नहीं हो सकता; क्योंकि वहाँ अन्वय तो होता है केवल उद्दश्य-विधेय भाव की स्पष्ट प्रतीति नहीं होती; किन्तु यहाँ तो पदार्थों का सम्बन्ध ही नहीं प्रतीत होता। अभवन्मतयोग जिन ६ कारणों से होता है वे इस प्रकार हैं-१. विभक्ति-भेद, २. न्यूनता, ३. आकाक्षा- विरह, ४. वाच्य तदा व्यङ्गय अरथों मे विवक्षित सम्बन्ध का अभाव, ५. समासा- चछनता, ६. व्युत्पत्ति-विरोध। (२) 'मेपां' इत्यादि विभक्ति-भेद निमित्तक अभवन्मतयोग का उदाहरण है। यहाँ पर 'यः' (जिन्होने) विशेपण का 'क्षपाचारी' विशेष्य के साथ सम्बन्ध विवक्षित है; किन्तु विभक्ति-भेद के कारस यः' (तृतीया विभक्ति) का 'क्षपा- चारिणाम्' (पष्ठी विभक्ति) के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता। यदि कोई कहे कि जसे 'यो गुसवान् तस्य यशः' मे विभिन्न विभक्ति वाले 'यत्' और 'तत्' के सर्थ का सभेदान्वय हो जाता है इसी प्रकार प्रकृत मे भिन्न विभक्ति वाले 'यत् के अर्थों का इस प्रकार अभेदान्वय करके-येपां प्रतापोप्मभि :- पीताः, यै .- पानभुव: कल्पिताः येषां हुङ् तय :- फिर सबका सम्मिलित रूप में विशेष्यभूत क्षपाचारी-पदार्थ से अन्वय हो जायेगा; तो यह उचित नहीं; क्योंकि 'मत्' के भर्थ उद्दक्षय रूप हैं भ्रतः वे अप्रधान हैं और अप्रधानों का परस्पर अन्वय असम्भव है, जैसे कि जैमिनि मुनि का नियम है-गुणानां घ परार्यत्यावसम्बन्धः समत्वात् स्थात्'। इसलिये यहा 'मै:' पद का विभक्ति-भेद के कारण 'क्षपानारिया' से अभोष्ट सम्बन्य नहीं तथा 'अभवन्मतमोगत्व' नामक वाक्य-दोष है। 'क्षपाचारिणां' के स्थान पर 'क्षपाचारिभि: पाठ से ही यह दोप दूर हो सकता है।.
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३३२ ] सप्तम उल्लास:
यथा वा- त्वमेवंसौन्दर्या,स च रुचिरताया: परिचित: कलानां सीमानं परमिड युवामेव भजथ: ।: अपि द्वन्द्वः दिप्ट्यां तदिति सुभगे संवंदति बा- मतः शेपं यत्याज्जितमिह तदानी गुितया ।२२॥ ३८ अत्र यदित्यत्र तदिति, तदानीमित्यन्न,यदेति वचनं नारित । चेल्यादू इति युक्त पाठ: । .यथा वा- संग्रामाङ्गणमागतेन भवता-चापे समारोपिते A देवाकर्राय येन येन सहसा यद्यत्समासादितम्। कोटएडेन शरा: शरेररिशिरसतेनापि भूमएडलं ... 11-4
तेन त्वं भवता च कीर्तिसतुला कीर्त्या च लोकनयम् ॥२२६॥; -
अनुवाद्-(नपूनतानिमितक) अथवा जैसे-कद्धा नायिका के प्रति संखी वाक्य] हे सुन्दरी, तुम ऐसे (विलक्षण) सौन्दर्य वाली हो, और वह (नायक) भी सौन्दर्य में विश्यात (परिचित) है; इस संसार में तषुम दोनों कलानं को चरम सीमा को प्राप्त हुए हो। सौभाग्य से तुम दोनों को यह (विलक्षस) जोड़ी बहुत योग्य मिली है (संवदति), इसलिये जो सम्मिलन शेष है यदि वह हो जाये तो गुरवता से तुमने इस संसार में विजय प्राप्त कर ती'।२२८॥ यहाँ पर (धतुर्य चरए में) 'यत्' इस (उद्दश्य) में 'तत्' यह (विधेय) नहीं है तथा 'तदानीम्' इस (विधेय) में 'यदा' यह (उद्दश्य) नहीं है। (यतस्यात् के स्थान पर) 'चेत् स्यात्' यह उचित पाठ होता। प्रभा-उपयुक्त पद्म में 'दोपं यत् तत् यदा स्यात्' (जो शेप है वह जब हो जाय) यह अरथश्रभीष्ट है किन्तु 'तत्' और 'यदा' शब्द के पभाव में पदार्यों का 'मभीष्ट सम्बन्ध नहीं हो पाता; क्योकि यत् पद के साथ 'तदानी, पद की मर्न्वया- कांक्षा नही। अतएव यहाँ न्यूनतानिमित्तक अभवन्मत-योगत्व नामक दोष है। 'चेत् स्यात् पाठ कर देने पर तो 'चेत्' शब्द से यदा अर्थ की प्रतीति होगी और न्यूनता दोप न रहेगा। अनुवाद-(आार्कोक्षाविरहनिमित्तक) अ्रथवा जैसे-'हे राजन् :(बेव), सापके युद्धस्थल में आकर घनुय चढ़ाने पर जिस-जिस ने तुरन्त ही जो जो प्राप्त कर लिया वह सुनिये, (आपके) धनुष ने बाए प्राप्त किये, वालों ने अतु का शिर, उस (शिर) ने भी भूर्मि को प्राप्त किया अर्यात् भूमि पर गिरा, उस (भूमण्डल) ने आपंको प्राप्त किया और आपने पनुपम फोति पाई तथा कीति ने तीनों लोकों को प्राप्त कर लिया अर्यात् लोरुममे में व्याप्त हो गई ॥२२६॥
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सप्तम उल्लास: [ ३३३
अन्ञाकर्णनक्रियाकर्मत्वे कोदएडं शरानित्यादि, वाक्यार्थस्य कर्मत्वे कोदुएडः शरा इति प्राप्तम्। न च यच्छ्रव्दार्थरतद्विशेपएं वा कोदएडादि। न च केन केनेत्यादि प्रश्नः । यहाँ पर (१) 'आ्कर्सन' (सुनना) क्रिया में (कोदण्ड आदि का) कर्मरूप से अत्वय करने पर (द्वितीया विभक्ति में) 'कोदण्डं झरान्' इत्यादि (प्रयोग) प्राप्त होता हैं। (२) (समस्त) वापपार्य का कर्मरूप से अन्वय करने पर (प्रथमा विभ्त्ति में) 'कोदण्डः, शराः' इत्यादि (प्रयोग) पाप्त होता है। और (३) 'कोदण्ड' आदि न तो यत् शब्द का अर्थ है (४) न ही उसका विशेषस है तथा (५) यहाँ 'फेन केन' यह प्रश्न भी नहीं हं। प्रभा-'संग्राम' इत्यादि उदाहरण मे अभवन्मतयोगत्व वाक्यदोप है यह 'अन-प्रश्नः'आदि अवतरण मे बतलाया गया है। भाव यह है कि यहाँ प्रथमार्धगंत वाक्य के भ्र्थ के साथ उत्तरार्ध के सर्थ का सम्बन्ध अभीष्ट है किन्तु यह बनता नहीं। क्योंकि उत्तरार्य के अर्थ को (१) यदि 'आकर्सय' करिया का कर्म माने तो कोदण्ड शर आदि शब्दो से कर्म में द्वितीया विभक्ति होगी, अतः 'कोदण्डं शरान् यह प्रयोग होना चाहिये। (२) यदि परस्परअन्वित कोदण्ड आदि को एक वाक्यार्थ के रूप मे 'आकसय' (क्रिया) का कर्म माने तो प्रातिपदिकार्य मात्र में प्रथमा विभक्ति होकर 'कोदण्डः दराः' यह प्रयोग होना चाहिये जैसा कि इसमें है- 'यो यो वीर: समायातस्त तं शृशु महोपते। भीष्मो दोणा: कृपः कर्णः सोमदतिर्य- नञ्जय: (३) 'यत्' (जो) शब्द बुद्धिस्थ पदार्थो का वाचक होता है अतः कोण्डादि पदार्थ ही 'यत्' शब्द का अर्थ है और जब 'यत् शब्द का मिया से अन्वय है तो 'कोदण्ड' आदि का भी किया के साथ अन्वय है ही-यदि यह मार्ने तो भी ठीक नही; क्योंकि 'कोदण्ड' आदि 'यत्' शब्द के अर्थ नहीं हो सकते। (४) इसलिये यदि 'मत्' शब्द के अर्थ को 'कोदण्ड' आदि का विशेपण पथवा 'नेदण्ड' आदि को 'मत्' शब्द के अर्थ का विशेषण माने [तद्विशेपसं स एव (यच्छव्दार्थ एव) विशेषणं सस्येति, तस्य (यच्छब्दार्थस्य) विशेषशमिति का विग्रहः] तो प्रथम पक्ष में 'मेन फोदण्डेन यत् शरा: समासादितं तद् आकसंय' यह वाक्यार्थ होगा तथा द्वितीय पक्ष में 'कोदण्डेन मेन शरा: यत् समासादितं तद् ग्रकशय' यह वावपार्थ होगा भौर दोप ज्यों का त्यों बना रहेगा। (५) यदि केन केन कि किभ् ? इत्यादि विशेष शश्न के उत्तर में 'कोदण्डेन दाराः' इत्यादि कहा गया है ऐसा माने तो ठीक नही; यनोंकि यहा प्रश्न नहीं किया गया अपितु 'येन येन यत् यत् समासादितम्' यह यहा गया है मर प्रश्न के बिना ही 'कोदण्ड' आदि का अर्थ निप्पन हो जाता है। यतः पदार्थों की परस्पर आ्कांक्षा के पभाव में यहाँ पर आकांक्षा विरह- निमितक अभवन्मतयोगत्व नामक वाक्यदोप है। (इसका विस्तृत विवेचन प्रदीप- उद्योत आदि टोकाओं मे किया गया है)।
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३३४ j काव्यप्रकाश:
यथा वा- चापाचार्यस्त्रिपुर विजयी॥२३०॥, इत्यादौ भार्गवस्य निन्दायां तात्पर्यम्, कृतवतेति परशी सा प्रतीयते। कृतवत इति तु पाठे मतयोगो भवति। यथा वा- चत्वारो वयमृत्विजः स भगवान्कर्मोपदेष्टा हरि: संग्रामाध्वरदीक्षितो नरपतिः पत्नी गृहीतन्नता। कौरत्या: पशवः प्रियापरिभवक्लेशोपशान्तिः फलं राजन्योपनिमन्त्रशाय रसति स्फीतं हतो दुन्दुभिः॥२३१॥ छन्राध्वरशबदः समासे गुणीभूत इति न तदर्थ: सर्वैः संयुज्यते। अनुवाद-(विवक्षित व्यङ्गय-योगाभावनिमत्तफ) प्रथवा जैसे-'घापा- चार्यस्तिपुरबिजयी' (ऊपर उदाहरए २०१) इत्यादि। २३०॥ मद्यका परशुराम की निन्दा में तात्पर्य हूं। 'फृतवता' इस (तृतीयान्त) पद से वह निन्दा (सा) परशु में प्रतीत होती है। 'कृतवत' इस (पष्ठघन्त) पाठ में तो शभीष्ट मन्वय हो जाता है। प्रभा-प्रकृत पद्यगत 'कृतवता रेशुकण्ठवाषा बद्धत्पर्घस्तव परशुना लज्जते चन्द्रहास:' रावण की इस उक्ति में परशुराम (भागव) की निन्दा विवक्षित (व्यन्नधार्थ) है। किन्तु 'कृतवता' यह तृतीयान्त पाठ परशु का विशेयशा है भोर इसका परशु के साथ सम्बन्ध होने से उसकी ही निन्दा प्रतीत होती है जो भभीप्ट नहीं है। इस प्रकार व्यङ्गघार्थ (निन्दा) का भार्गव के साथ विवक्षित योग न होने के कारण अभवन्मतयोगत्व नामक वाक्य-दोष है। यदि परणु की निन्दा से, भी विदग्घोकि द्वारा भागव में निन्दा की प्रतीति मानी जाय तो भी कृतवत्त्वरूप वाच्यार्थं का भागव के साथ योग न होने के कारए यह (वाच्यायोगनिमित्तक) मभवन्मतयोग का उदाहरस है। अनुवाद-(समासाच्छन्रतानिमितफ) अ्रथवा जैसे-बेणोसंहार में भीमसेन की उक्ति] 'हम (भीमाजु'म, नकुलसहवेव) चारों भाई (इस संग्राम रूपी यत्त में) ऋत्विक (अ्रध्ययुं, होता, उद्गाता ब्रह्मा) है; वह (सर्वजरूप में प्रसिद्ध) पूजनीय कृप्ए कर्म के उपदेष्टा हैं, राजा युषिष्ठिर युद्धरूपी बज में दीक्षित (मुहीत- वत) यजमान है, द्रोपदी व्रत ग्रहस करने वाली, यजमान-पत्नी हैं, दुर्योधन सादि कौरव (यज्ञ के) पशु है, द्रौपदी के (केशाकर्यएदि) अपमान-जनित क्लेश की शान्ति ही इस (यज्ञ) का फल है। क्षत्रियों (राजन्य) के शाह्णान के लिये बजाई गई मेरी स्फोलतया (स्निग्घता से) ध्वनि कर रही है।।२३१॥ यहाँ पर 'मध्यर' शरद समास में गोए हो गया है, इसलिये उसका अम (संग्रामाध्यर) सब (ऋत्विका आदि) के साथ सम्बद्ध नहीं होता। प्रभा-भाव यह है कि 'संग्रामाध्वर' शब्द का ऋस्विक आदि सबके साथ
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सप्तम उल्लास: ३३५
यथा वा- जह्गाकाएडोरुनालो नखकिरणलसत्केस राली करालः प्रत्यमालपतकाभाप्रसर किसलयो मञ्जुमञ्जीरभृङ्ग:। भतु रनृत्ता नुकारे जयति निजतनुस्वच्छलावसयवापी- सम्भू ताम्भोजशोभां विद्घदभिनवो दएडपादो भवान्या:॥।२३२।। त्र दएडपादृगता निजतनु: प्रतोयते भवान्याः सम्वन्धिनी तु विवचता॥ '१३. अवश्यवक्तव्यमनुक्त यत्र, यथा- श्प्राकृतश्य चरितातिशयेश्च दष्टै- रत्यद्भुतैरपहृतस्य तथापि नास्था। कोऽप्येप वीरशिशुकाकृतिरप्रमेय- सौन्दर्यसारसमुदायमयः पदार्थः॥२३३॥ अन्नापह्ृतोऽस्म इत्यपहृतत्व्रस्य विधिर्वाच्य: तथापीत्यस्य द्वितीय- वाक्यगतत्वेनैवोपपत्त: । अन्वय स्र्भीष्ट है किन्तु यह समास (मग्रामाध्वरदीक्षितः) मे आया है तथा दूसरे (दीक्षित) के विशेषण रूप में उपस्थित है अतः इसका ऋत्विक आदि के साथ भ्रभीष्ट मम्बन्ध नही हो पाता और 'अभवन्मतयोगत्व' वाक्य-दोप है। जसे-'जङ्घाफाण्ड' इश्यावि (उदाहरस १५०) ॥२=२ यहाँ निजतनु' शब्द 'दण्डपाव' में अन्धित प्रतीत होता है; किन्तु 'भवानी की (सम्बन्धिनी) तनु (स्त्रीलिङ्ग) यह विवक्षित है। प्रभा-यह नियम (व्युत्पत्ति) है कि 'निज, स्व, आत्मा' आदि सम्बन्धी पदार्थों का प्रधान किया से अन्वित कारक-पृदार्थ मे ही अन्वय होता है-(ससम्बन्धिनां निजस्वात्मादिपदार्थानां प्रधानकियान्वयिकारकपदार्थे एवान्वय); अतएव 'निज' पदार्थ का दण्डपाद में ही अन्वय होगा भवानी में नहीं और भवानी में भन्वय करना अभीष्ट है। इसलिये यहां व्युत्पत्तिविरोधनिमितक 'अभवन्मतयोगत्व वाकय- दोप है। अनुवाद -१३. अनभिहितयाच्य वह वाक्य है जहाँ भवश्य कहने पोग्प (वाच्य) शब्द का प्रयोग न हो (धनभिहितं वाच्यं वश्तव्यं पत्र), जैसे- [धीरचरित नाटक में राम को देखकर परशुराम की स्यगतोषित] 'इस मसाधारस व्यक्ति (राम) के देसे हुए तथा सुने हुए अत्यद् भुत उत्कृष्ट चरित्रों से वशीभूत होकर (यद्यवि में अपहृत हूँ) भो [तयापि] मुझे [परधुराम को] निश्बय नहों हैं (कि धनुप दशरयपुत्र ने तोड़ा है); क्योंकि यह (राम रप में सामने स्पित) सो वोर बालक के रूप में भ्रनुषम सौन्दय-सार समुदाप सप फोई (विलक्षस) पदापं हँ।२३३।। 1
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३३६ J. कावप प्रकाया:
यथा वा-एपोडहमद्रितन यामुखप द्मजन्मा प्राप्त: सुरासुरमनोरथदूरवर्ची।: स्वप्नेडनिरुद्ध घटनाघिगता भिरुप- लक्ष्मीफलामसुरराजसुतां विधाय ॥२३४।। अत्र:मनोरथानामपि दूरवर्त्ती' इत्यप्यर्थो वाच्यः। यथा वा- १.'सवयि निवद्धरतेः प्रियवादिनः प्रएयभङ्गपराङमुसचेतसः कमपराघलवं मम पशयसि त्यजसि मानिनि, दासजनं यतः॥२३५।। यहाँ पर 'अपहृतोऽस्मि' (भ्रपहृतोऽहम्) इस प्रकार अपहुतत्व की विधेयता [विधि] कहना उचित था, क्योंकि 'तथापि' यह पद द्वितीय वाषय में स्थित होफर ही युक्तियुक्त हो सकता है [उपपतेः युक्तती होने के फारल।' प्रभा - भाव यह है कि 'तथापि' में 'तत्' शब्द 'का अ्य निहित है और वह पूर्व वाक्य में उक्त किसी अर्थ की अपेक्षा रखता है। जिसके लिये यहा दो वाक्यों का होना आवश्यक है। अतएय 'अपहतस्य' के स्थान पर ''गहुतोर्ऽस्मि' यह कहना चाहिये था, तब 'चरितातिरायैः अ्पहृतोर्ऽस्मि तथापि नास्था' इम प्रकार निराकांक्ष अर्थ की प्रतीति होती। वह अवन्यवत्तव्य प्रथमा विभकत्त (विधि, यहा पर प्रयुक्त नहीं हुई, इसलिये अनभिहितवाच्यत्व दोप है। विधेय की प्रधानतया प्रतीति न होने से यहाँ विधेयाविमर्श भी है अतः दोनों का सद्कर है' अनुवाद-अरयवा जमे-['उपाहरस' नाटफ में उया की ससी चन्द्रलेसा के प्रति मदनपुत्र की उक्ति :- देव और वैत्यों के मनोरयों से [भी]दुष्पाम्य तथा पारवंती के मुसकमल से उत्पस्न हुआ यह मै [मदनपुत्र, वर] वाखासुर फी उपा नाम की पुत्री को, स्वप्न में प्निरद्ध के समागम से सौन्दर्य-सम्पतति का फल प्राप्त करा के भा गया हूं ।र३४॥ : यहां पर मनोरयों का भो [अि] दूरवतीं यह भर्व (प्रवश्य) कहना था। 1:"प्रभा-प्रदीप के अनुसार अनभिहितवाच्य दो प्रकार का है- १. अन्यथावकव्य को अ्रन्य प्रकार से कहना (जिसका उदाहरस 'अपहृतस्य' .मदि ऊपर दिया गया है। २. निवात आदि चोतक पद का अपयोग। 'एपोऽह्म इत्यादि इसका उदाहरण है, यहां विधेयाविमर्य का भी सहर नहीं है। यहाँ काव्यप्रकाश- वृत्ि मे अवस्यवक्तव्य एव ही 'अवि' का अ्रभाव दिखलाया है तथापि, टोकाकारों केविचार मे दो 'अपि' और होने चाहिए-सुरामुराएमवि मनोरयानाममि दूरव- र्सोत्यप्मयंद्वयम् - अ्रवश्य वक्तव्यम् अन्यया अन्यमनोरयविपयतयं सुरासुरबहिरिम्धिय- विषयत्वंघ प्रतीयते (वालवोविनीसर) उनके अभाव मे यहाँ श्रनभिहितवाच्यत्व दोप है। ٠٠٠ iP अनुवाद-[भसमारागत] अथवा जैसे [चिकमोबंशीय में उवंती, को,, लक्ष्म करके पुरुरवा को उकि]-हे मानिनि, तुभ में स्थित प्रीति वासे, प्रिपवादी
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मन्तन टलाम:
यथा वा- जह्ाकाएडोस्नालो नवकिरमलपलोजगर स
भतु नृत्ता नुकारेयति निदद्डलस - सम्भू ताम्भोजशोमां विदषदनिनो दसतगसक भ अत्र दरडपाद्गता निजतनु पवोपने सवानसा १३. अवश्यवकतव्यमनुक्त वत्र, कया- अप्राकृतश्य चरितानिगमैदच द्व्दी- रत्यद्मुनरप्हदन्त नारिका कोडप्येप वीरशिशु काइ टरजजेप-
वाक्यगतत्वेनैवोषपत्त:। ।२३७ !!
अन्वय शरभीष्ट है हिनुन इ् ती हो, (दीक्षित) के पिरेसै711 पभोष्ट सम्दन्य नहो हो चाहिये अनुवाद-(रु ह सद हरयावि (चदयग्ल १२s)r६ =*: मेरा वया हा है कि को (सम्न्यिती) द्ोय ग जगहै नपि' यहां थम उदा- पार्यों का प्रवा सि े स द्व प्रथं की
पवार्य का दरर मे हू इ रिय, जल- के समोप दोष है। करना परमीष है। सि क r पहनाई हई वास करते अनुवाद-11. पर्वमस n m f r ट (वाच्य) शब्द का प्रयोगन हो(नरस ् जैसे-'रति [शेरवरिन नाटक में राम कीं ह्गयर स्द म लकण्ठ महा- प्थावारता धर्यात्त (राम) के रेसे हए मया भुर डराप (मुद्राडू) बोसन होडर (पद्तति मैं प्रादुनह। वो [गर्म एज' नसे नखचिन्ह गरघती ने भपने
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३३८ काव्यप्रकाश:
अन्न नखलद्मेत्यतः पूर्व 'कुटिलाताम्र०' इति वाच्यम्। १५. अस्थानस्थसमासं यथा- शद्यापि स्तनशैलदुर्गविपमे सीमन्तिनीनां हदि। स्थातु' वाळ्छति मान एप घिगिति क्रोधादिवालोहितः। प्रोद्यद्दूरतरपसारितकर: कर्पत्यसौ तत्वपात् फुल्लत्के रवकोशनिः सरदलिश्े षीकृपाएं शशी ॥२३८॥! अत्र क दस्योक्ती समासो न कृतः। कवेरुक्ती तु कृतः।
यहाँ पर 'नखलक्ष्म' इससे पूर्व 'फुटिलाताम्रच्छषि' यह पद होना चाहिये था। प्रभा-(१) अस्थानस्थपद वह वाक्य है जिसमें कोई शब्द अ्नुचित स्थान पर होता है। इससे (घ) कही तो विरुद्ध-अ्रर्थ की प्रतीति हो जाना सम्भव है, (स) कहों पद का प्रभीष्ट उपयोग नहीं होता। (क) 'प्रियेए' इत्यादि प्रथम का उदाहरएं है। यहाँ 'न' पद 'अस्थानस्थ' है। 'म्' का यह स्वभाव है कि यह उसी का निशेष करता है जिसके साथ इसका प्रयोग होता है अतएव 'न काचिद् विजही' अपि तु सर्वा:' यह विरुद्ध अर्थ प्रतीत होने लगता है। इसलिये 'काचिद् ने विजहौ' इस पाठ से दो विवक्षित भर्थ (एक ने नहीं त्यागा) को प्रतीति हो सफती है। (ख) 'लग्नः इत्यादि उदाहरण में 'मुंद्राङ्ट' का वक तथा ईषद्रपत होना (कुटिलाता म्रच्छषिः) ही नस चिह्न की राङ्का का हेतु है अत.एव फटिलाताम्रब्छवि। पद का 'नसलक्षम' इत्यादि से पूर्वपाठ होना चाहिये या जिससे हेतु-हेतुमद्भाव की स्पष्ट प्रतीति हो जाती। यहां 'कुटिलाताअच्छवि' पद का विषक्षित उपयोग न होने के कारएा 'अस्थानस्थपदत्व' वाबय-दोप है। अनुवाद-१५ प्रस्यानस्यसमास (वाक्य), जैसे-पिरकार है। मेरीः ससनिषि में भी कार्मनियों के स्तनरूपो पयतों के फारए बुगम तथा विषम हृस्य में यह मान ठहरना घाहता है' यह सोवकर मानो कोप: से कुछ लाल होकर दूर तक अपने रश्मि-करों को फैलाये हुए उदित होता हुंभा (प्रोद्यंश्चासी दूरतरप्रसारित- करश्न) वह चनद्रमा प्रफुल्तित करुमुदिनी रूपो कोश से निकलती हुई श्रमरपंकि रपी। ससवार को सोंच रहा है'।।२३८।। यहां पर कृद (धन्द्रमा) की उक्ति में समास नहीं किया, कषि की उकि, में सो कर दिया:। :प्रभा-यहाँ पूर्वाद्ध में युद्ध चन्त्रमा की (कविनिवत) उक्ति है। उसमें दोपं समास करना उचित था। उत्तराद् में तो कवि की ति है इसमें शोप का यणन नहीं। यह।ं दीपंसमानव्यसष् भोज गएा का , नहीं पा। इम प्रकार मस्थान भर्यात् पर समास के कारण मस्यानस्यत्षमासत्व वाक-4
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सप्तम उल्लास:
१६.। सङ्कीणं यत्र वाक्यान्तरस्य पदानिवाक्यान्तरमनुमविंशन्ति। यथा- किमिति न पश्यसि कोपं पादगतं वहुगुएं गृहारोमम्। ननु मुच हृदयनाथं कसठे मनसरतमोरूपम ॥२३६॥, अत्र पाद्गतं वहुगुएं हृदयनाथं किमिति न पश्यसि इमंकरठे गृदार, मनसस्तमोरूपं कोपं मुञ्च' इति। एकवाक्यतायां तु किलिप्टमिति भेदः। १७, गर्भितं यत्र वाक्यस्य मध्ये वाक्यान्तरमनुप्रविशति।यथाr.२ परापकारनिरतैदुर्जनैः सह सङ्गतिः। वदामि भवतस्तत्त्वं न विधेया कदाचन ॥२४०।।. अत्र दृतीयपादो वाक्यान्तरमष्ये प्रविष्टः । यथा वा- लग्नं रागावृताङ्गषा सुदृढमिद्द ययैबासियप्टथारिकरठे मातङ्गानामपीहोपरि परपुरुपैर्या च दष्टा पतन्ती। T, : अनुवाद-१६. सड्ीएं वह वाक्य है जहाँ एक वाक्य के पद दूरारे न्यावम में प्रविष्ट हो जाते हैं, जैसे [मानिनी के प्रति ससी की उकति-'चरसों में पड़े, प्रत्यन्त गुखवान् हुदयेश्वर को वर्मों नहीं देखती हो ? इसे गले लगा लो, मन, के तमोगुशारुप क्रोध को छोड़ो ।२३६॥ यहाँ पर (१) पादगतं बहगुए हृदयनायं किमिति न पश्यसि (२) इमं कण्ठे।" गृहाए-। (३) मनसस्तमोरूपं कोप, मुच्च-इस प्रकार (तीन वाक्य) हैं। एकवाययताः में वलष्ठत्व दोप होता है। 7. प्रभा-उपयुक्कत तीनों वाकयों में एक वाक्य के पद दूसरे: वाक्य के साथ) मिले हुये हैं जैसे तृतीय वाक्य का 'कोप' पद प्रथम वाक्य के अन्तर्गत है। इससे अर्थं-प्रतीति में विलम्ब हो जाता है तथा यहां सङ्कीएंता नामक वाक्य-दोषहैः। इसका क्लिषटत्व दोप में समावेश नही किया जा सकता; कयोकि कलष्ट दोप वहाँ होता है जहाँ ऐसा एक ही वाक्य होता है। यहाँ अ्नेक (तीन) वाक्य हैं अतः सङकीणं दोप है। अनुवाद-१७. गभित वह वाक्य है जहाँ एक पाक्य में दूसरा वावय प्रविष्ट हो जाता है। जंसे- 'आाप से यह तत्व (की बात) कहता हूं कि दूसरों के अपफार में तत्पर लोगों के साथ कभी सस्तति न फरनी चाहिये'।।२४०। यहां पर तृतीय चरस (यदामि भवतस्तत्वम्) धन्य वाक्य के मध्य में प्रषिष्ट हो गया है। पथवा जैसे- 'जिस (राजा) को फीति लक्ष्मी की आत्ञा से (लक्षमी के पिता) सागर के प्रति यह फहमे के लिये गई कि हे सागर, राग (रकत या अनुराग) से 'रज्जित अ्ङ्ग- घासी जिस तलवार, पक्ष में नायिका) को संगाम में सघुप्रों के फण्ठ में (सण्डन,या- रमए के लिये) गादलप से मालिद्धित हुई (नग्न) तथा मातलों (हाथी या चण्डास).
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३४० ] काव्य प्रकाश:
तत्सक्तोडयं न किब्चिद् गयति विदितं तेऽसतु तेनारिम दत्ता। भृत्येभ्य: श्रीनियोगादू गदितुमिव गतेत्यम्युधिं यस्य कीतिः ॥२४१। अत्र 'विदितं तेऽसतु' इत्येतत्कृतम्। प्रत्युत लद्षमीस्ततोऽपसरतीति विरुद्धमतिकृत्।
के ऊपर स्वयं गिरती हुई पर-पुरुषों (शयु-योद्वोओों) ने देसा है, उस (नायिका, तलवार) में अनुरक्त हुआ वह राजा (मुझे) कुछ भी नहीं गिनता, इसलिये (इसने) मुझे मृत्यों को समर्पित कर दिया है-यह आापको विदित हो ॥२४१॥ यहाँ पर 'विर्दितं तेऽस्तु' यह (बिना प्रयोजन) ही (गभित) कर दिया गया है। इसके प्तिरिक्त 'लक्ष्मी वहाँ से हट रही है' इस प्रकार विरुद्धमतिकृत् भी यह वाकय है। प्रभा-जिस वाक्म के भीतर दूसरा वाक्य भा जाता है वह गमितवानय है। (क) कहीं तो वह वाबय स्वभावतः एक हो होता हे (ख) कही हेतुहेतुमद्भाव से वाक्यकवाकयता करके एक बना लिया जाता है। (क) प्रथम का उदाहरण 'परापकार' इत्यादि है यहाँ 'परापकार .. सङ्भतिन विधेया' इत्यादि स्वभावतः एक वाक्य है। उसके भीतर 'वदामि भवतस्तत्वम्' यह दूसरा वाक्म प्रविष्ट हो गया है। इससे सङ्भति के विषय मे 'सत्त्व' (होना या इ्लाध्यता), औौर 'भसत्व' (न होना या अश्लाध्यता) का सन्देह हो जाता है ['सङ्गतिरस्ति' इत्येवं विवितं 'सङ्गतिर्नास्ति' इति वा-इति संभय:] साथ ही 'न विधेया कदाचन' में कर्म को साकाक्षा बनी रहती है। (स) 'लग्न' इत्यादि द्वितीय का उदाहरण है। यहाँ पर 'तरसवतोञ्यं न किञ्चिव गसामति तेन मृत्येम्मो दसास्मि' यह हेतुहेतुमद्भाव से वाक्यकवाकयता होकर बना हुआ वाक्य है। इसके भीतर बिना प्रयोजन के हो 'विदितं तेजस्तु' यह दूसरा वाक्य प्रबिष्ट किया गया है; अतः यहाँ गभितत्व दोप है। साम ही यहा विरुद्धमतिकृत् वावयनदोप भी है; क्योंकि 'विदितं तेस्तु' से यह प्रतीति होती है कि 'स्वापराधेन नाहमपसरामि किन्तु राजकीयेनव' अतएव 'लक्ष्मी यहां से हट रही है' इस (प्रविवक्षित) स्तुति-विरुद्ध भर्थ की प्रतोति होने लगती है। (२) संकीएं तथा गभित में यह भेद है कि जय एक वादय में दूसरे वाक्य का कोई पद प्रविष्ट होता है तो सङ्टीएँ दोप होता है किन्तु जब एक वाक्य में दूसरा वाक्म ही प्रविष्ट हो जाता है तो गर्भित दोप होता है। 'वामपान्वरेश्य वावयीयपदप्रवेशे संकीएंता अन्यवाक्यस्यव प्रवेसे तृ गभितत्वमिति (भेद:)-रवि- महेश्वरः ।
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सप्त्म उल्लास: [ ३४१
१६. "मब्जीरादिपु रसितप्रायं पत्िपु च कूजितप्रभृति। स्तनितमणितादि सुरते मेघादियु गर्जितप्रमुखम्"॥ इति प्रंसिद्धिमतिक्रान्तम्। यथा- महाप्रलयमारतक्षभितपुष्कराव्त्त क- प्रचएडधनगर्जित प्रतिरुतानुकारी महः। रव: श्रवणभैरवः स्थगितरोदसीकन्दर: कुनोऽद्य समरोद्घेरयमभूतपूर्व: पुरः ॥२४२॥ छत्र रवो मस्डूकादिपु प्रसिद्धो न तूक्तविशेपे सिंहनादे। १६. भग्न: प्रक्रम: प्रस्तावी यत्र। यथा- अनुवाद-(१८. प्रसिद्धिहृत) "नूपुर आदि (के शब्द) में 'रसित' (क्वलित, शिञ्जित) आ्रदि (प्रायः), पक्षियों (के शब्द) में 'कूजित' आदि, सुरत-फाल के स्त्रियों के शब्द) में 'स्तनित', 'मसित' आदि और मेघ आादि (के शब्द) में 'गजित' आादि प्रसिद्ध है। इस प्रकार की प्रसिद्धि का प्र्रतिकमण करने वाला (वाश्य पसिद्धिहृत है) ।" जैसे-[वेखीसंहार में अ्श्वत्यामा की उक्ति]- 'यह पभूतपूर्व (नूतन) 'रव' (सिहनाद) सामने ही संग्राम-सागर से बार-बार परयों उत्पन्न हो रहा है, जो (रव) महाप्रलय की वायु से क्षुमित पुष्कर तथा भाव- तंक नामक मेघों के भीपए घन (निबिड़) गर्जन की प्रतिध्वनि का अनुकरण करने वाला है; प्रतएव थोत्रों के लिये भयङ्कर है तथा स्वर्ग और भूमि (रोवसी) के मध्य- भाग (फन्दरा) को आच्जादित (स्यगित) करता है' ॥२४२॥ यहाँ पर जो 'रव' शब्द है वह मण्डक झादि (के शब्ब) में प्रसिद्ध है. न कि उपयुक्त विशिष्ट वीरगर्जन में। प्रभा-'रव' शब्द का कविजन मण्डूक आदि की मृदु घ्वनि के लिये ही प्रयोग करते हैं, श्रृति-भयङ्गरता आदि विशेषणयुक्त वीरगर्जना या सिंहनाद में नहीं। भतएव प्रसिद्धि का प्रतिक्रमण करने के कारण यहाँ प्रसिद्धिहृतत्व वाक्यदोप है। अनुवाद-१६. भग्नप्रकम वह (वाक्य) है जिसमें प्रस्ताव (उपकरम) नष्ट हो जाता है। प्रभा-वृत्ति में प्रस्ताव शब्द का अर्थ प्रस्ताव (उपकम) का भोचित्य है। जिस रूप में उपकम (भारम्भ) किया जाय उसी रूप मे उपसंहार करना पाहिमे' (पेन रूपेणोपक्रमस्तेनवोपसंहार:) यह नियम ही प्रस्तावाचित्य है। इसका भष्ट्ग करना भग्न-प्रकमता है। इसे ही प्रतमभन्ट दोष भी कहते हैं। यह प्रकृति, प्रत्यम, सर्वनाम, पर्याय आरदि के प्रकमविषयक होने से भ्नेक प्रकार का होता है। जिनके उदाहरस कमरः इस प्रकार हैं-
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३४२ : ] "काव्यप्रेकाशः
नाथे निशाया नियतेर्नियोगादसतंगते इन्त निशाऽपि याता। कुलाङनानां हि दशानुरुपं नात: पर भद्रतरं समस्ति ।२४३॥ अत्र 'गते' ति प्रक्रान्ते यातेति पकृतेः। गता निशाऽपि' इति तु युकम। ननु 'नैकं, पदं द्वि: प्रयोज्यं प्रायेस' इत्यन्यन्न, कथितपद्ं दुष्टमिति चेहै वोक्तम्, तंत्कथमेकस्य पदस्य द्विः प्रयोगः। उच्यते-उछ शयप्रतिनिर्देश्य व्यतिरिक्तो विषय, एकपदप्रयोगनिषंघसयतद्वति विपये प्रत्युत तश्यैव पदर्य सर्वनाम्नो वा प्रयोगं विना दोपः। तथा हि- उदेति सविता ताम्स्ताम् एवास्तमेति च।. .. सम्पती त्त.विपत्तीच.मेहतामेकरूपता ।।२४४॥. अत्र रक्ते एवास्तमेतीति यदि क्रियेत तदा पदान्तरप्रतिपादित: स एवार्थोडर्थान्तेरतयेवा प्रतिभासमानः प्रतीति स्थगयति .,:7 'अहो, नियति के 'नियोग से निशापति चन्द्रमा के भस्त हो जाने पर रात्ि भी चली गई; क्योंकि कुलनारियों (पतिवताओं) का इस अनुगमन) से बढ़कर (पति की सृत्यु रूप) दशा के अनुकल फल्यासकारीं और कुछ नहीं है ॥२४३। 'यहाँ पर गम् प्रकृति (भ्रस्त गते) का प्रक्रम होने पर 'माता' यह ('या' प्रकृति का प्रयोग) प्रकृति का प्रकम भङ्ग है। 'गता निशापि' यह याठ उचित है। (शंड्ा) -- पन्य प्रत्य (सम्यय=वांमन के काव्यालद्वार सघ्र, १.५) में यह केहा 'गया हूँ कि 'परायः' एक पद का दो 'बार' प्रयोग न करना चाहिये' । और इसी ग्रन्य में (इह्थ) भी कहा गया है कि कथितपद दुप्ट 'होता है, तो एकं ही पद को दो बार प्रयोग कर्यों किया 'जाये ? उत्तर है-जहाँ उद्देश्य अर्थात् पू्ववोषित (वह्तु) हो प्रतिनिर्देश्य अर्थात् पुनर्वोध्य होता है (उद्देश्यमेव प्रतिनिर्देश्यं मत्र) उससे भिन्न ' (स्थलों पर) ही एक पद के पुनः प्रयोग-निषेध का विषम (क्षेत्र) हैं। इसके विप- रेत जहां उद्देश्य ही प्रतिनिर्देश्य है ऐसे स्थत पर (तद्वति विपये) तो उस पूर्य प्रयुक्त) ही पद प्रथवा सर्वनाम के प्रयोग के बिना दोष ही होता है। जैसे कि- 'सूर्य ताम्रवएं' का होता है और ताम्रवरसं का ही भस्त होता है: महापुंरषों "को सम्पत्ि तथा'घिपति में एकरपता रहा करंती हं'॥२४४ यदि यहाँ पर 'रक्त एवास्तमेति' ऐसा (पाठ) फर दिया जाये सेय ध्रन्य पव (रक्त) के द्वारा प्रतिपादित (प्रकट) किया हुआ यही (तासरप) अपं मिन्न- मर्य के रूप में भासित होता हुआ (एकस्पता की परभोष्ट) प्रतीति को बाघित
," प्रभा-'नाये निशायाः इत्यादि प्रकृतिविषयक प्रकमभभ्म का उदाहरेर है। कर देगा।
यहाँ वाकय का उपशम 'गम्' धातु रूप प्रकृति से (गते) हुमा है किन्तु उसहार 'या धातु रूप प्रक्ति (याता) से होता है। अतः यहाँ प्रावि भम-मह् दोप है। भान यह है कि भिन्न २ शब्दों से बोधित अर्य मिन्न सा प्रतीत हुमा करता है; पर्योकि
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सप्तीमे उल्लास: i३४३
यथा वा- यशोऽधिगन्तु -सुखलिप्सया वा मनुष्यस्यमतिवर्तितु' ा निरुवसुकानामभियोगभाजां समुत्सुकेवाङ्कमुपैति सिद्धि: ॥२४५।। अत्र प्रत्ययस्य। 'सुखमीहितु' वा' इति युक्त पाठ: । न सोडस्ति प्रत्ययो लोके यः शथ्वानुगमादृते'-इस भतृ हरिप्रोक्तन्याय के अनुसार -शान्दबोघात्मक ज्ञान में शब्द का भी विशेष रूपमें भान होता है। इससे उपयुक्तक पद्य में 'गम्' और 'या' भिन्न २ घातुओं से वोघित एक ही (गमन रूप) अथ मिन्न -प्रतीत होने लगता-है। इसलिये 'याता' इस पद से यद्यापि गमन अर्थ का बोध-होता *है, तथापि अनुगमन रूप में नहीं और यहाँ जो निश्ा-द्वारा भस्तंगत निवानाथ का अनुगमन (अर्थ) विवक्षित है उसकी प्रतीति नही होती। अतएव इस दीप को दूर करने के लिये 'गता निशापि' यह पाठ करना उचित है। 'याता' के स्थान पर 'गता' पाठ करने में शङ्का यह होती है कि धामन आदि पूर्वाचार्यों के मत में तथा स्वयं मम्मटकी दृष्टि से भी एक ही पद का दोबार प्रयोग करना दोप समझा जाता है तब यहाँ 'गता' (गत शब्द) का ही पुनः प्रयोग कसे सम्भव है ? इस शङ्डा का समाधान यही है कि जहाँ पूर्वकमित तथा परकथित भर्थों की एकरूपता की रक्षा के लिये पूर्वनिदिष्ट अथं का उसी शब्द से तथा उसी 1 रूप में पुननिर्दश आवश्यक होता है वहाँ एक ही पद का दो बार प्रयोग करना दोष नहीं प्रत्युत अवश्यकर्तव्य है। संक्षेप में यदि दो वाक्यों में एक ही (वस्तु) उद्दय 'या विधेय हो अथवा पूर्ववाक्य में विधेय (प्रथवा उद्दशय) रूप से आने वाला दूसर वाक्य में उद्दक्य (अरथवा विधेय) हो जाये। जैसे-'उदेति सविता' इत्यादि के दोनों वाक्यों में 'सविता' उद्दस्य है तथा ताम्रता' विधेय है। 'कोदण्डेन दाराः' इत्यादि (उदाहरण २२६) में पूर्व वाक्य का विधेय 'ाराः' है और वही, दूसरे वायय •(घरः अरिशिर:) का उद्दश्य है; तब शब्द का पुनः प्रयोग आवश्यक ही है। अ्न्यन वह दोप समझा जाता है। इसी अभिप्राय से वामन ने भी 'प्रायेश' (नंक पद द्विः प्रयोज्यं प्रायेख) यह शब्द दिया है। अतएव यहाँ 'गता निशारऽपि' पाठ करना ,4- उचित था। अनुवाद-'प्रत्यय-प्रफमभङ्ग) सरथवा जैसे-[किरात० में भर्जुन के प्रति "दीपदी को उक्ति] 'मश प्राप्त करने के लिए अयवा मुस-लाभ को इच्छा से अथवा (साधारस) मनुष्य की गाना से ऊपर उठने के लिये उत्सुफता रहित होकर प्रयत्न करने वाले मनुष्यों की गोद में सिद्धि (सफलता) उत्कषठिता सो र्वयं मा जाती
यहा प्रत्यय का (प्रकम-भङ्ग हं)। 'सुखमोहितु'या' यह उचित पाठ है। प्रभा-'यशोऽधिगन्तुम्' आदि में तुमुन् प्रत्यय से 'उपन्म, किया गया है 'किन्तु 'लिप्सपा' में 'सन्' (इच्छार्यक) प्रत्यय का प्रयोग कर दिया गया। भतः यहा
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A4 काव्पप्रकाश:
नाथे निशाया निरयतेर्नियोगादस्तगते हन्त निशाडपि याता। फुलाङनानां हि दशानुरूप नातः परं भद्रतरं समस्ति ॥२४३। अन्न 'गते' ति प्रक्ान्ते यातेति प्रकृतेः। गंता. निशापि' इति तु युक्तम। ननु 'नैकं पदंद्विः प्रयोज्यं आायेण इत्यन्यत्र, कथितपदं दुष्टमिति चेहे वोक्तम्, तंत्कंथमे कस्य पदस्य द्विः प्रयोग:। उच्यते-उद्द शयप्रतिनिर्देश्य- व्यतिरिक्तो विपय एकपदप्नयोगनिपंघस्य तद्वति.विपये प्रत्युत तस्यैव पद्स्य सर्वनाम्नो वा प्रयोगं बिना दोप: । तथा छि- उद्ेति सविता तामरताम्र एवास्तमेति च। .-- सम्पतीत्त विपत्तौ चं.मेहतामेकरूपता ॥।२४४।। अत्रं रेंक्त एवास्तमेतीति यदि क्रियेत तदा पदान्तरप्रतिपादितः स एवार्थोड़र्थान्त रतयेव प्रतिभासमानः प्रतीति स्वगयति । "भहो,नियति के 'नियोग से निशाप्ति चन्द्रमा के अस्त हो जाने पर रात्रि भी चलो गई; ्योंकि वुलनारियों (पतिवरताओं) का इस (अनुगमन) से बढ़कर (पति की मृत्यु रप) दशा के अनुकूल फत्याफारीं और कुछ नहीं है ॥२४३ 'यहाँ पर"गम् प्रकृति (अस्तं गते) फा प्रकम होने पर 'यांता' यह ('या' प्रकृति का प्रयोग) प्रकृति का प्रकम भङ्ग है। 'गता निशापि' यह याठ उचित है। (शङ्गा) -- अ्रन्य ग्रन्य (अन्यन्न-वामन के काव्यालद्वार सून, १.५) में यह केहा गया है कि 'प्रायः एक पेद फा दो 'बार प्रयोग न करना चाहिये।' औीर इसी ग्रेन्य मैं (इहब) भी कहा गया है कि कथितपद 'दुप्ट' होता है, तो एकं ही पद की बो "बार प्रयोग कयों किया जाये ? उत्तर है-नहां उद्दश्य सर्थात् पूर्ववोधित (वस्तु) ही प्रतिनिर्देश्य अर्थात पुनर्बोध्य होता है (उद्देश्यमेय प्रतिनिर्देदयं मत्र)'उससे भिन्न '(स्थलों पर) हो एक पद के पुनः प्रयोग-निषेध का विषय (क्षेत्र) है। इसके घिप- रेत जहां उद्देश्य ही प्रतिनिर्देश्य है ऐसे स्यग पर (तद्वति विपये) तो उस (पूर्व प्रयुक्त) हो पद अ्रथवा सर्वनाम के प्रयोग के बिना दोष ही होता है। जैसी कि- 'सूर्य ताम्रवरं' का होता है और ताम्रवस का हो अ्रस्त होता है; महापुंरषों "को सम्पति तथा विपति में एफरपता रहा फरती है॥२४४। यदि यहाँ पर रक्त एवास्तमेति' ऐसा (पाठ) कर दिया' जाये तब सम्य 'पद (रक्त) के द्वारा प्रतियादित (प्रकट) किया हुआ वही (ताग्रस्प) अर्य मिन्न- अय के रूप में नासित होता हुआ (एकस्पता की पभीष्ट) प्रतोति को थाषित कर देगा । प्रभा-'नाये निशायाः' इत्यादि प्रकृतिवित्यर प्रकमभन्न का बदाहरस है। :यही 'वाक्य का उपकम 'गम्' धातु रूप 'प्रकृति से (गत) हुआ है किन्मु उसहार'या पातु रूप प्रदति (याता) से होता है। मतः यहाँ प्रकृति-नंयम-मह्ट दोप है। भांन यह है कि भिन्न २ शब्दों से बोधित सर्घ भिन्न सा प्रतीत 'हमा करता है; क्योंकि
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सप्तम उल्लास: [३४५
विपदोऽभिभवन्त्यविक्रमं रह्यत्यापदुपेतमायतिः। नियता लघुता निरायतेरगरीयान्न पदं नृपश्रिय: ॥२४८॥ अन्नोपसर्गस्य पर्यायस्य च। 'तदभिभवः बुरुते निरायतिम्। लघुतां भजते निरायतिर्लघुतावान्न पदं नृपन्रिय:' इति युक्तम्। काचित्कीर्णा रजोभिर्दिवमनुविदधौ मन्दवषत्रेन्दुलद्षमी- रश्रीका: काश्चिदन्तर्दिश इव दधिरे दाहमुद्भ्रान्तसत्वाः । भ्र मुर्वात्या इवान्या: प्रतिपद्मपरा भूमिवत्कम्पमानाः । प्रस्थाने पार्थिवानामशिवममति पुरोभावि नार्यः शशंसुः ॥२४६॥ अत्र वचनस्य, 'काश्चित्कीर्णा रजोभिर्दिवमनुविद्धुर्मेन्दवकत्रेनदु- शोभा निःश्रीकाः' इति, 'कम्पमानाः' इत्यत्र कम्पमापुरिति च पठनीयम्-। जो 'अपत्य' शब्द के स्थान पर 'पुत्र' शब्द (पर्याय) के प्रयोग से भङ्ग हो रहा है। मतएव यहाँ पर्यायप्रकमभङ्ग दोप है। जो लोग यह कहते हैं कि 'मनाक पुत्र के होते हुए भी कन्यारूप अपत्य में विशेप-स्नेह रहा' यह अरथ अभिप्रेत है अतएव यथाश्रुत पाठ ही उचित है। उनका कथन भी ठीक नहीं प्रतीत होता; क्योकि इस प्रकार एक तो दप्टाग्त की विषमता रहती है दूसरे 'अपि' शब्द का स्वारस्य भङ्ग होता है। अनुवाद्-(उपसर्ग तथा पर्याय का प्रकमभङ्ग) [किराताजुनीय]-परा- कमहीन-पुरुष को विपत्तियां दवा लेती है, आपतियुक्त व्यक्ति को शुभ भविष्य (प्रायतिः उत्तरकालशुद्धिः) छोड़ देता है (भर्थात् उसका भविष्य भङ्गलमय नहीं होता) आयतिरहित की लघुता (नीचता मा पतन) अवश्यभावी (नियता) है, गौरव- हीन जन र.जलक्ष्मी का पात्र नहीं होता ॥२४८॥ यहाँ [वि उपसग (विपदः) के प्रक्रम में आा उपसरग (प्रापद) मा जाने से] उपसर्ग प्रकमभड्ड तथा ['तघुता के प्रकम में 'अगरीयान्' इस पर्थाय के आरा जाने से] पर्याय-प्रकरमभङ्ग है। 'तदभिभवः' आदि पाठ उचित है। 7 अनुवाद्-(वचन-प्रकम-भङ्ग) [माघ काव्य में नूप पत्नियों का अपशकुन वणंन] '(शिशुपालपक्षीय) राजाओं के (युद्ध के लिये) प्रस्थान करने पर उनकी पल्नियां आगे होने वाले अमझल को इस प्रकार प्रकट करने लर्गी-फोई-स्त्री . रजस्वता [रजोभि: कोर्णा व्याप्ता] हो गई तथा उसके मुसचन्द्र को शोभा मन्द' हो गई भतः वहु आकाश (घूलयुक्त अतः मन्दकान्ति वाले चन्द्रमा से युक्त) के समान हो गई (धनुविदघौ=अनुफतवती); व्याकुल चित्त (सत्व) वाली कुद प्र्न्य स्व्रियाँ शोभाहीन होकर विशाओों के समान हृदय में सन्ताप धार करने तगी (उद्भ्रान्त हैं सत्व पर्थात् प्राखो जिनमें ऐसी दिशाएं भी दाहयुक्त हो गई-दिग्दाह धमभुल सूचक है); भन्य स्न्रिरयां पग-पग पर भंभावात (प्रपशकुन सूचक) के समान चककर काटने लगों; और कोई भूमि के समान कम्पित होने लगी (भूमि कम्पन भी आ्पात सूचक है) ॥२४६।। यहाँ पर वचन का प्रथमभन्ग है। (फावित्कीर्शा० इत्यादि के
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३४४ ] काव्यप्रकाश:
ते हिमालयमामन्त्र्य पुनः प्रेक्ष्य च शूलिनम्। सिद्ध चार्मे निवेदयार्थ तद्विसृष्टा: खमुद्ययुः ॥२४६॥ श्रत्र सर्वनाम्नः। अ्ेन विसृष्टा इति वाच्यम्। महीभृतः पुत्रवतोऽपि दष्टिस्तरिमिन्नपत्ये न जगाम वृप्तिम्। अनन्तपुष्पश्य मघोहि चूते द्विरेफमाला सविशेषसङ्गा ॥२४॥। "श्त्न पर्यायस्य। 'मह्दीभृतोऽपत्यवतोऽपि' इति युक्तम्। श्रत्र सत्यपि पु्ने कन्यारूपेऽप्यपतये स्नेहोऽभूदिति के चित्समर्थयन्ते। एकरूपता.प्रतीति का, भङ्ग हो जाता है तथा प्रत्यय-प्रकरम भङ्ट वाक्य-दोप है। 'सुखमीहितु' वा यह पाठ होता तो दोप न होता। अनुवाद-(सर्मनाम का प्रछमभङ्ग, जैसे कुमारसम्भय में)-वे मरीचि आादि मुनिगस हिमालय से विदा लेकर, फिर शुलधारी महावेव के दर्शन कर भौर उनसे (पावती-विवाह रूप) अ्रर्थ की सिद्धि (पिता द्वारा स्वीकृति) को निवेदन करके, उनकी आज्ञा पाकर दयुलोक को चले गये ।२४६॥ यहाँ सर्वनाम (इदम्) फा प्रकमभङ्क है। 'अनेन विसृष्टाः' यह कहना चाहिये 1 था। प्रभा-यहाँ पर, ग्रस्म' में 'पदम्' सर्वनाम का प्रश्म्म है फिन्तु 'तद्विसृप्टाः' में 'तद्' सर्वनाम का प्रयोग किया गया है। 'इदम्' शब्द प्रत्यक्ष (पुरोवर्ती) वस्तु के लिये माता है तथा 'तद्' शब्द अप्रत्यक्ष वस्तु के लिये। दोनों पा अर्थ-भेद होने के कारणा 'इदम्' के प्रसङ्ग में 'तद' के प्रयोग से यह सन्देह हो सकता है कि 'तद' महादेव के लिये है या हिमालय के लिये। अतएव यहाँ सर्वनाम का प्ररम-भङ्ग हो रहा है। जो 'तद' के स्थान पर 'अनेन' पाठ से दूर हो सकता है। अनुवाद-(पर्यायप्रकमभङ्ग) [कुमार सम्भव]-'पुत्रवान होते हुए भी हिमालय फो दृष्टि उस (गौरी रूप) अपत्य (के दर्शन) में पृप्ति: को प्राप्त न हुई: वयोंकि पनंन्त पुष्पों से युक्त (होने पर) भी वसन्त को भ्रमरपंकि भाम-मज्जरी में विशेष आासक्ति वाली रहा करती है।२४७।। यहाँ पर्याम का प्रकमभङ्ग है। "महीमृतोन्पत्यवतः' यह पाठ उचित है। यहा पर 'पुत्र होने पर कन्या रूप भ्रपत्य में (विशेष) स्नेह रहा' इस प्रकार (प्रथं करके) फुछ (व्यास्याकार ययाश्रत पाठ फा) समर्थन फरते हैं। पना-अभिप्राय. यह है कि यहाँ दष्टान्त [भनन्तपुण्पस्य ममोहि चूवे (तस्प पुप्पे) द्विरेफमाना सविगेपसङ्गा] मे दिसाया गया है कि सामान्य-पुष्प होने पर भी पुप्पविशेष के प्रति भमरों को स्त्यधिय आसक्ति होती है। गाय ही 'पुत्रयतीन' में विरोधार्थक 'घपि' शब्द का प्रयोग किया गया है। दगसिये 'अपरवसामान्य होने पर भी अपत्यविमेप में स्नेह था' यह प्रस्ताव (प्रस्तुत भभिप्राय) या प्रतम है।
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सप्तम उल्लास: [ २४५
विपदोऽभिभवन्त्यविक्रमं रहयत्यापदुपेतमायतिः । नियता लघुता निरायतेरगरीयान्न पदं नृपश्रिय:॥२४८॥ अत्रोपसर्गभ्य पर्यायस्य च। 'तद्भिभवः कुर्ते निरायतिम्। लघुतां भजते निरायतिलधुतावान्न पदं नृपन्रियः इति युक्तम्। काचित्कीर्णा रजोभिर्दिवमनुविद्धी मन्दववत्रेन्दुलक्षमी- रश्रीका: काश्चिदन्तर्दिश इव दघिरे दाहमुद्भ्रान्तसतत्वाः। भ्र मुर्वात्या इवान्या: प्रतिपद्मपरा भूमिवत्कम्पमाना:। प्रस्थाने पार्थिवानामशिवमति पुरोभावि नार्यः शशंसुः ॥२४६॥ अत्र वचनस्य, 'काश्चित्कीर्ण रजोभिर्दिवमनुविद्धुर्मेन्दवपत्रेन्दु- शोभा निःशीकाः' इति, 'कम्पमानाः' इत्यत्र कम्पमापुरिति च पठनीयम्-। जो 'अपत्य' शब्दके स्थान पर 'पुत्र' शब्द (पर्याय) के प्रयोग से भङ्ज हो रहा है। अरतएव यहां पर्यायप्रकरमभङ्त दोप है। जो लोग यह कहते है कि 'मैनाक पुत्र के होते हुए भी कन्यारूप अपस्य में विशेप-नेह रहा' यह अरथ अभिप्रेत है अतएब यथाश्रुत पाठ ही उचित है। उनका कथन भी ठीक नहीं प्रतीत होता; क्योंकि इस प्रकार एक तो दप्टान्त की विपमता रहती है दूसरे 'अपि' शब्द का स्वारस्य भङ्ग होता है। .-: अरनुवाद्-(उपसर्ग तथा पर्याय का प्रक्रमभङ्ग) [किराताज नीय]-परा- कमहीन पुरुष को विपत्तियाँ दवा लेती हैं, आपत्ियुक्त व्यक्ति को शुभ भविष्य (आयतिः उत्तरकालशुद्धिः) छोड़ देता है (परर्थात् उसका भविष्य मङ्गलमय, नहीं होता) आयतिरहित की लघुता (नीचता या पतन) अवश्यभावी (नियता) है, गौरव- होन जन र.जलक्ष्मी का पात्र नहीं होता ॥२४८॥ यहाँ [वि उपसर्ग (विपदः) के प्रकम में आ उपसर्ग (आपद) अ। जाने से] उपसर्ग प्रक्रमभङ्ग तथा ['लघुता के प्रक्रम में 'अगरीयान्' इस पर्याय के आ जाने से] पर्याय-प्रक्रमभङ्ग है। 'तदभिभवः' आदि पाठ उचित है। अरनुवाद्-(वचन-प्रकम-भङ्ग) [माघ काव्य में नूप पत्नियों का अपशकुन 1- वर्णन] '(शिशुपालपक्षीय) राजाओनं के (युद्ध के लिये) प्रस्थान करने पर उनको पत्नियाँ आागे होने वाले ब्रमङ्गत को इस प्रकार प्रकट करने तगों-फोई स्त्री रज़स्वला [रजोभि: कीर्या व्याप्ता] हो गई तथा उसके मुसचन्द्र को शोभा मन्द'हो गई मतः वह आफाश (घूलयुक्त अतः मन्दकान्ति वाले चन्त्रमा से पुक्त) केसमान हो गई (भनुविदधी=अनुकृतवती); व्याकुत चित्त (सत्व) वाली कुछ भन्य स्त्रियाँ शोभाहीन होकर दिशामों के समान हृदय में सन्ताप घाररा करने लगीं (उद्भ्रान्त हैं सत्व धर्थात् प्रारणी जिनमें ऐसी दिश्याएं भी दाहयुक्त हो गई-दिग्दाह भमङत सूचक है); अन्य स्त्रियाँ पग-पग पर नंभावात (पपशकुन सूचक) के समान चवकर काटने लरगीं; औौर कोई भूमि के समान फम्पित होने लगी (भूरमि कम्पन भी मापति सचक है) ।।२ ४ E।। यहाँ पर वचन का प्रयमभझ्ग है। -हरवादि के सयान पर)
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"३४६ J काव्यप्रकाशः
गाहन्तां महिपा निपानसलिलं शृङ्ग मुहुस्ताडितं छायावद्धकदम्वर्क मृगकुलं रोमन्यमभ्यस्यताम्। विश्रव्धैः कियतां वराइपतिभिमु स्ताक्षति: पत्वले विश्नान्तिं लभतामिद् च शिथिलव्यायन्यमरमद्नुः ।।२५०।। अ्न्न कारकस्य। विश्रव्या रचयन्तु सूकरवरा मुस्ताक्षतिमित्यदुष्टम् अकलिततपस्तेजोवीर्य प्रथिम्नि यशोनिधा- ववितथमदाध्माते रोपांन्मुनावभिगच्छति।
स्कुरंति रभसात्पाशि: पादोपसङ अहसाय च ॥।२४१॥।
कारिचित् कोरए० इत्यादि तथा 'कम्पमाना' के स्थान पर 'कम्पमापु:' यह पहना चाहिये था। प्रभा-यहाँ 'कचित्' इस एकवचन से उपक्रम किया गया, है किन्तु एक वचन के प्रकम मे 'काश्चित' यह बहुवचन प्रयुक्त हुआ है अ्रतः वचनप्रपमभस वाकय है। इस दोष को दूर करने के लिये उपयुक्त पाठ करना चाहिये सर्थात् प्रयम परसा में 'काचित्' के स्थान पर 'काश्चित' तथा मिया के साथ वचन समन्वय के लिये 'अनुविदधो' के स्थान पर 'अनुविदधुः' पाठ होना चाहिये। प्रथम परए के 'पन्त में 'ोभा' पाठ हो जाने से द्वितीय चरणा के आरम्भ में 'अभीका' के स्थान 'पर 'निःथीकाः' पाठ होगा जिससे छन्दोभङ्ग न हो। यहाँ पर ग्रन्थकार ने प्रासद्भिक रूप ये आास्यात प्रभम-भभ्ट भी दिसलाया है, 'विदधौ, दविरे' इत्यादि प्रधान करियाओं के प्रकम में 'कम्पमान' इस जानव प्रत्थयान्त का प्रयोग होने से प्रथम-भङ्ग है। 'म्पमापुः' पाठ से यह दोप दूर हो सकता है। अनुवाद-(कारक-प्रकम-भस्त) [शाकुन्तला नाटफ में सेनापति के प्रति : 'सुष्यन्त की उत्ति]-प्ररष्म महिप द्वार-बार मपने शुङ्गों से ताडित जलाशय के जल का अवगाहन कर, मृगों का समूह छाया में भुण्ड बना कर जुगाली फरे;चराहपति निश्चिन्त होफर छोटे तालाबों में मुस्ता (मोया) उसाई और यह हमारा पनुष, शिपिल-प्रत्यञ्चा वाला होकर विभाम प्राप्त करे ॥२५०॥ 'यहाँ (गाहनाम्' इस कतृ फारफवाचक के प्रपम में 'वियताम्' इस कर्मरा रकवाघक सर्थात् कर्मवाच्य को किया का प्रयोग फरने 'से) कारकनपकमभत्त है। "विषव्या: रचयन्तु सुरुरयरा मुस्ताक्षतिम्' यह दोपरहित पाठ है। अनुवाद-(पम-प्रयमभज्ज) [वौरचरित नाटक में परधुराम को देवरर 'राम की उक्ति] पपरिमित तप के तेज तथा पराकम की महिमा (प्रभिमा)बाले, प्रत्यन्त परास्वी, यपाय प्रहद्वार से उद्दोपित (माम्मात) मुनि परचुराम के रोषपूर्वक : मने पर मेरा हाथ मसोकिक या नतन मनविद्या के गर्वं के योग्म कर्म करने के लिये
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सप्तम उल्लास: ४३४७
अन्र क्रमस्य। पादोपसडम्रहणायेति पूर्व वाच्यम्। एवमन्यदप्यनुसत्त व्यंम्। २०. अविद्यमान: कमो यत्र। यथा- द्वयं गतं संप्रति शोचनीयतां समागमंप्रार्थनया कपालिनः। कला' च सा कान्तिमती कलावतः त्वमस्य लोकस्य च नेत्रकौमुदी ।२५२। अत्र त्वंशव्दानन्तरं चकारो युक्त:। यथा वा- शक्तिर्नित्त्रिशजेयं तव भुजयुंगले नाथ, दोपाकरश्री- र्वक्त्े पार्श्वे तथैपा प्रतिवसति महाकुट्टनी खड्गयष्टि:। आज्ञेयं सर्वगा ते विलसति च पुरः किं मया वृद्धया ते प्रोच्येवेत्थं प्रकोपाच्छशिकरसितया यस्य कीर्त्या प्रयातम् ।।२५३।। शरंत्रस्थं प्रोच्येवेति वाच्यम्। तथा- लग्नें रागवृताङ्गया ॥२५३ का। इत्यादौ 'इति श्रीनियोगादिति वाच्यम्'। (युद्ध के लिए) औौर (साथ ही) चरसस्पर्श के लिए वेगपूर्वक फड़क रहा है।।२५१।। 4 यहाँ पर क्रम का प्रक्रमभङ्ग है। 'पादोपसंग्रहाय' यह पहले कहना चाहिये। इसी प्रकार (प्रकमभङ्ग के) अ्न्य उदाहरस भी खोज लेना चाहिये। 1 प्रभा-यहाँ 'तपस्तेजोवीय' इस प्रकार कम से उपकरम किया गया है। 'तपस्तेज' के भाव से चरण-स्पर्श उचित है तथा वीरता या पराधम (वी्य) के भाव से बाणाकरपण उचित है। अतः पादोपसंग्रहण को पहले कहना चाहिये था। : यही उचित क्म है। इसका भङ्ग होने के कारण यहाँ क्रम-प्रनम-भङ्ग दोप है। इसी प्रकार प्रकमभन्न के अ्रन्य भी श्रनेक स्थल हो सकते हैं। अ्रनुवाद-(२०) अ्ररक्रम वह वाक्य है जिसमें ('च' आरदि निपातसंज्ञक) शव्दों का कम विद्यमान न हो। जैसे 'दवय गत' इत्यादि (ऊपर, उदाहरस
यहाँ 'त्वं' शब्द के ध्रनन्तर 'च' का प्रयोग उचित है। अथवा जैसे- : जिस राजा फी चन्द्र-किरस सदृश धवलफीर्ति फोप से यह पाहकर दूर, चली -गई कि हे नाथ, यह निस्त्रिंशजा [निश्धियः सड्गः तज्जा तदुत्पझा सडग से उत्पत्त :अथवा निस्त्रिंशा: त्रिशदधिका: तदुत्पन्ना नानापितृजन्या वेद्या] शक्ति रूपी नाविका : तुम्हारे भुजयुगल में है, दोपाकर अरर्ात् चन्द्रमा सथवा महादुष्ट (दोपालामाकर:) की शोभा तुम्हारे मुस में है तथा मह महाकुट्टनी (भयड्र मारफाट करने-वाली अयवा परस्त्री-पुरुषादि संघटनपात्रों दूती) असिलता भी पापके पास (बगस में) रहतो "है और यह (पापकी) सर्वगामिनी (सर्वजन ग्राह्य अथवा सर्पोपभोग्या कोई कुसटा) "माज्ञा आपके समक्ष हो विलास करती है, फिर मुझ वृद्धा से तुम्हारा कया प्रयोजन -है?' ॥२५३I यहाँ पर 'इत्यं प्रोष्य+इव' यह कहना उचित है। इसी प्रकार 'सगनं रोगा- मृतानया (ऊपर उदाहरए २४१) इत्यादि में 'इति श्रीनियोगात्' ऐसा फटना चाहिये।
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गाहन्तां सहिपा निपानसलिलं शृङ्ध मु हुस्तांडितं - छायाबद्धकद्म्वकं मृगकुलं रोमन्थमभ्यस्यताम्। विश्व्धः क्रियतां वराहपतिभिर्मुस्ताक्षति: पल्वले विश्नान्तिं लभतामिद च शिथिलज्यावन्घमरमद्नु: ।।२४०॥। श्रत्र कारकस्य। विश्रव्धा रचयन्तु सूकरवरा मुस्ताक्षतिमित्यदुष्टम्। त्कलितत पस्तेजोवीर्य प्रथिम्नि यशोनिधा- ववितथमदाध्माते रोपान्युनावभिगर्छति। अभिनवंघनुरविद्यादर्पक्षमाय च कमगे स्फुरति रभसात्पामि: पादोपसड् गहणाय च ।।२५१॥.
काश्चित कोर्णा• इत्यादि तथा 'कम्पमाना:' के स्थान पर 'कम्पमापुः यह पढ़ना चाहिये था। प्रभा-यहाँ 'काचित्' इस एकवचन से उपभाम किया गया है किन्तु एक वचन के प्रक्रम में 'काश्चित' यह बहुवचन प्रयुक्त हुआ है अतः बचनप्रशममझ् वाक्य है। इस दोप को दूर करने के लिये उपयुक् पाठ करना चाहिये अर्थात् प्रयम चरस में 'काचित' के स्थान पर 'काश्चित्' तथा मिया के साथ वचन मगन्वय के 'लिये 'अनुविदधो' के स्थान 'पर 'मनुविदधुः' पाठ होना चाहिये। प्रथम चरण के 'भ्रन्त में 'शोभाः' पाठ हो जाने से द्वितीय चरण के आरम्भ में 'प्रथोका:' के स्थान पर 'निःश्रीकाः' पाठ होगा जिससे छन्दोभङ्ग न हो। यहाँ पर ग्रन्थकार ने प्रासङ्भिक रूप ये आख्यात प्रभम-भङ्ज भी दिसलामा है, 'विदधी, दधिरे' इत्यादि प्रधान कियाओों के प्रशम मे 'कम्पमान' इस शानभ प्रत्ययान्त का प्रयोग होने से प्रथनम-भन्भ है। 'कम्पमापुः' पाठ से यह दीप दूर हो सकता है। अनुवाद-(कारक-प्रकम-भङ्त [शकुन्तता नाटक में सेनापति के प्रति 'दुष्पन्त की उक्ति]-अरण्य महिप बार-वार अपने भुद्धों से साडित जलाशय के जस का सवगाहन करे, मृगों का समूह छाया में भुण्ड बना कर जुगाली करे;वराहुपति निश्चिन्त होकर छोटे तालाबों में मुस्ता (मोया) उसाडऔर यह हमारा भनुष, शिविल-पत्यञ्चा याला होफर विशाम प्राप्त फरे ॥२५०॥ यहा (गाहनाम' इस कतृं कारफवाचक के प्रभम में 'त्रिवताम्' इग कर्मेका रकवाघफ अर्यात् कर्मवाध्य फो निया का प्रयोग करने 'से) फारक-प्रकमभत्ञ है। विषव्या: रचयन्तु सुकरवरा मुस्ताक्षतिम्' यह दोषरहित पाठ है। अनुवाद्- (रम-प्रभममङ्न) [वीरघरित नाटक में परघुराम को बेखकर "राम को उक्ति] अपरिमित तप के तेज तथा पराकम की महिमा (प्रपिमा)पासे, परमन्त परास्वी, यमायं बहद्वार से उद्दोपित (पाप्मात) मुनि परचुराम के शेषपूर्वक माने पर मेरा हाय पलोफिक या नतन मनुविधा के गर्व के योग्य कर्म करने के सिये
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सप्तम उल्लास: "६४७
अत्र क्रमस्य। पादोपसडग्रहणायेति पूर्व वाच्यम् । एवमन्यदप्यनुसत्तव्यंम्। २०. अविद्यमान: कमो यत्र। यथा- द्वयं गतं संप्रति शोचनीयतां समागमप्रार्थनथा कपालिनः कला च सा कान्तिमती कलावतः त्वमस्य लोकस्य च नेत्रकौमुदी ।२५२ अत्र त्वंशव्दानन्तरं चकारो युक्त। "यथा वा- शक्तिर्नित्त्रिशजेयं तव भुजयुगले नाथ, दोपाकरश्री- रवक्त्े पारश्वे तथैपा प्रतिचसति महाकुट्टनी खड्गयषिटि: । आराज्ञेयं सवगा ते विलसति च पुरः किं मया वृद्धया ते प्रोच्येवेत्थं प्रकोपाच्छशिकरसितया यस्य कीर्त्या प्रयातम् ।।२५३।। शंत्रेत्थं प्रोच्येवेति वाच्यम्। तथा- लग्नं रागवृताङ्गया ॥२५३ क। इत्यादी 'इति श्रीनियोगादिति वाच्यम्'। 1 (युद्ध के लिए) और (साथ ही) चरसस्पर्श के लिए वेगपूर्वक फड़क रहा है ।२५१।। यहां पर फम का प्रक्रमभङ्ग है। 'पादोपसंग्रहसाय' यह पहले कहना चाहिये। इसी प्रकार (प्रक्रमभङ्ग के) अन्य उदाहरस भी खोज लेना चाहिये। प्रभा-यहां 'तपस्तेजोवीय' इस प्रकार क्रम से उपक्रम किया गया है। 'तमस्तेज' के भाव से चर-स्पर्श उचित है तथा वीरता या परात्रम (वीयं) के भाव से वाणाक्पण उचित है। अत. पादोपसंग्रहण को पहले कहना चाहिये था। यही उचित कम है। इसका भङ्त होने के कारण यहाँ क्रम-प्रकम-भङ्ग दोप हैं। इसी प्रकार प्रक्रमभङ्त के अन्य भी अनेक स्थल हो सकते हैं। अनुवाद-(२०) अक्रम वह वाकय है जिसमें ('च' आदि निपातसंज्ञफ) शब्दों का क्रम विद्यमान न हो। जैसे 'द्वय गतं' इत्यादि (कपर, उदाहरस १६६) ।२५२। यहाँ 'त्वं' शब्द के अनन्तर 'घ' का प्रयोग उचित है। अथवा जैसे- जिस राजा को चन्द्र-किरस सदृश धयलफीति कोप से यह कहकर दूर, चती -गई कि हे नाथ, यह निस्त्रिंशजा [नित्निय: सड्गः तज्जा तदुत्वभा सडग से उत्पत्न :- अरथवा निस्न्रिंशाः नरिवषदधिका: तदुत्पन्ना नानापितृजन्या वेद्या] शक्ति रुपी नाविका : तुम्हारे भुजयुगल में है, दोपाकर अर्थात् चन्द्रमा सथवा महादुप्ट (दोपालामाकरः) की शोभा तुम्हारे मुस में है तथा यह महाफुट्टनी (भमड्र मारकाट करने-वाली अथवा परस्त्री-पुर्यादि सघटनक्त्रो दूती) असिलता भी आपके पास (बगल में) रहती क है और यह (प्रापकी) सर्वगामिनी (सवंजन ग्राह्य'पथवा सर्पोपभोग्या कोई कुसटा) माजा भापके समक्ष ही विलास फरती है, फिर मुझ बृद्धा से तुम्हारा कया प्रयोजन
यहाँ पर 'इत्यं प्रोच्य+इव' यह कहना उचित है। इसी प्रकार 'सानं रोगा- 'मुतानया (ऊपर उदाहरण २४१) इत्यादि में 'इति श्रीनियोगात्' ऐसा कहना चाहिये।
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३४६ काव्यप्रकाश:
२१. श्रमतः प्रकृतविरुद्धः परार्थो यत्र। यथा- राममन्मथशरेए ताडिता दुःसहेन हृदये निशाचरी।: गन्यवद्र धिरचन्दनोक्षिता जीवितेशवस्ति जगाम सा।२५४।। अत्र प्रकृते रेसे विरुद्वस्य शृद्धारव्य व्यव्जकोऽपरोऽथे:॥ प्रभा-(१) वाक्य में जिस पद को जिम पद के अ्नन्तर रखना उचित है यदि उसे वहाँ नहीं रक्खा जाता और अन्य स्थान पर रख दिया जाता है तो यहाँ अक मत् दोष होता है। जैसे-पद-प्रयोग का नियम है कि उपसर्गों का धातु से पूर्व ही प्रयोग होता है (ते प्रागघातो प्प्टा १।४।८०), 'एव' आदि का व्यवच्छेच के अवन्तर तथा 'इब' आदि का उपमान के अनन्तर और 'च' मदि का समुच्चेय (जिसका समुच्चय करना है) के पश्चात् इस प्रकार के नम का अभाव ही अकमत्व दोष है। (२) अकरमत्व दोप अ्स्थानपदत्व मरादि से भिन्न है; कयोकि जहाँ पदसं- निवेशस्प रचना प्रस्तुत अर्थं की प्रतीति नहीं कराती, वहाँ पर प्कमत्व दोय है, यदि प्रस्तुत भर्थ की प्रतीति कराने पर भी पदरसनवेश अनुचित है तो वहाँ 'भरपान- पदत्व' दोप है। जहाँ अर्थकम का अनीचित्य है वहाँ 'दुप्कमत्य' दोष होता है तथा उपसंहार रूप प्रयम के भङ्ग में प्रकम-भङ्ग दोप होता है। (वियरस टीवा) 'सक्मता' दोप निपातविपयक है। 'प' इत्यादि पकों की व्याकरण में निपात संज्ञा को गई है (चादयोऽसत्वे १।४।५७) (३) क-'द्वय गतं' इत्यादि में जो 'लोकस्य न' में प्रयुक्त 'च'(भर) है उसका प्रयोग 'त्वं' शब्द के अ्नन्तर ('र्वं' चास्य लोफस्य) करना उचित था; चपोकि शोचनीयता में 'कला' के साथ 'त्वं' का समुच्चय ही विवक्षित है, 'लोक' (पदाय) का समुच्चय नहीं करना है। इस प्रकार 'त्वं प' यह पाठकम उचित है, इसके प्रभाव में यहां 'पनमता' दोप है। (स) 'इत्य' शब्द अव्यवहित-पूर्वःकषित वस्तुपों का परामरों कराता है। यहाँ पर 'दरत्य' शब्द पादमय-कथित अ्थ का परामर्गक है, वचनमान (प्रोच्य) का नही। इस सभीष्ट न्रम के सभाव में यहाँ भकमत्व दोप है। अतः 'प्रोष्यवेत्य' के स्थान पर 'इत्थ प्रोच्येव' यह फहना उचित था । (ग) 'लग्नं' इत्यादि में-'मृत्येम्यः शीनियोगाद गदितृमिव मतेत्यम्वुषि मस्य कौति:' यहाँ पर 'दति' (गता+इति) के प्रयोग में अनमता है: क्योंकि 'इति' नब्द अम्पषित पू्वं (वस्तु) का परामरं कराता है। यहाँ पर 'इति' 'ग्न'-'भूरयेस्यः' का परामर्शक है मतः 'इति श्रीनिमोगात्' मही पाठ वचित है। अनुवाद-२१. भमत यह (दुप्ट) वावय है जहां कोई अन्य-पर्म प्राररलिक धपं के विदद होता है जैसे [रघुवंश, श्रीराम द्वारा मारी गई ताटका के बहन में उक्ति] 'राम स्पी फामवेव के दुःसह वास द्वारा हदय में माहत भतएब गग्यपुर्त रधिर रपो चन्वन से मिप्त (उक्षिता=सिक्ता) यह निशाधरी (राक्षती या प्रभिसा- रिका) जोवितेश (यम या प्रासनाप) के पर चली गई ।२४४॥ यहाँ प्रन्य धमं प्रकृत रस (वोभत्स) में विषद सर्थात् शृज्ार का व्यक्जर है।
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सप्तम उल्लास: [ ३४६ +444
अर्थदोपानाइ- [अर्थदोपा:]
(७६) अर्थोपुष्टः कष्टो व्याहृतपुनरुक्तदुष्क्रमग्राम्याः ॥५५॥
.:. सन्दिग्धो निर्हेतुः प्रसिद्धिविद्याविरुद्धश्च ।I अनवकृत: सनियमानियमविशेषाविशेपपरिवृत्ताः ।५६॥ साकाङक्षोऽपदयुक्त: सहचरभिन्नः प्रकाशितविरुद्धः । विध्यनुवादायुक्तत्यक्तपुन: स्वोकृतोऽश्लील: ।।५७॥
प्रभा-अमतपरार्थत्व का तात्पर्य है-किसी वाक्य मे प्रकृत रस से विरु्द्ध रस के व्यञ्जक (अन्य) अर्थों का कथन। साहित्यशास्त्र मे कुछ रस परस्पर विरुद्ध माने जाते हैं जैसे-ज यो शृङ्गारबीभत्सी तथा वीरभयानकौ । रौद्राद्भुती तथा हास्यकर- खो वैरिणी मिथः। ऊपर के उदाहुरण मे प्राकरसिक अर्थ मृतक ताडका है तथा प्रकृत रस बीभत्स है। द्वितीय अरथं (अप्राकरणिक) अभिसारिवारप व्यङ्गपार्थ है जो बीभत्स-विरुद्ध शृङ्गार रस का व्यञ्जक है। अतः एव यहाँ अमतपरार्य दोप है। इसमें विरुद्धरस का व्यञ्जक रूप अर्थ व्यङ्गधार्थ ही होता है वाच्यार्थ नही इसलिये 'प्रतिकूल-विभावादिग्रह' (रस-दोप) से यह भिन्न है। अयं-दोषों का निरूपण- अ्रनुवाद्-प्ररथदोषों को बतलाते हैं- (१) प्रपुष्ट, (२) कष्ट, (३) व्याहत, (४) पुनरक्त, (५) दुष्कम, (६) ग्राम्प, (७) सन्दिग्ध, (८) निरहेतु, (e) प्रसिद्धिविरुद्ध, (१०) विद्याविरुद्ध, (११) भनवी- फृत, १२) सनियमपरिवृत्त, (१३) अनियमपरिवृत्त (१४) विशेयपरिवृत्त, (१५) पविशेयपरिवृस, (१६) साफाक्ष, (१७) अरपदमुक्त, (१८) सहचरभिघ्, (१६) प्रका- शित विरुद्ध, (२०) विध्ययुक्त, (२१) अनुवादायुक्त, (२२) त्पकपुनः स्वीकृत तथा (२३) पश्लील-अर्थ दुष्ट (दोषपुक्त) होता है। यहाँ (दुष्टं पदम्' आदि सूत्र ७२ से लिङ्ग परिवतन के साथ) 'दुप्टः' यह शब्द (भर्थः' पद के साथ) सम्बद्ध है। प्रभा-(१) शब्द और वाक्य से अर्थ-प्रतीति होती है पतएय पदनदोप तथा वाक्य-दोप के परचात् अर्थ-दोद का निरुपए किया जा रहा है। यहाँ भी (पदन्दोपों के समान) 'अपुष्ट' इत्यादि रूदि शब्द के रूप मे दुप्ट मथं को संज्ञाएं है तया यौगिक मयं के द्वारा सक्षसवाक्य का कार्य करते हैं। जैसे-पुष्ट से भिन्न (पुष्टाद् भिन्न:) भयं प्रपुप्ट कहलाता है। (२) पदनवोष तथा अर्थं-दोष में भन्तर यह है कि जहाँ मन्य शब्दों द्वारा कहने में भी विवक्षित अर्थ दोपयुक्त ही रहता है वह भयं-दोष है। मन्य (रस-बोप
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३५० ]: काव्यप्रकार:
दुष्ट इति सम्वध्यते। क्रमेणोदाहरगम्-
रुटुल्लासितसौरभकमलाकर हासकृद्र विर्जयति॥२५२॥ अन्ातिविततत्वाद्योनुपादानेऽपि प्रतिपाद्यमानमर्थ न वाघन्त इत्यपुप्टा: न त्वसङ्गता: पुनरुक्ता बा॥ भिन्न) दोप मव्ददोप हैं-यत्र विघक्षित एवार्योन्ययाभिधानेऽपि दुप्यति सोडयदोषः, अन्यस्तु रस्दोषभिन्न:शन्द-दोष इति विवेक: (प्रदीप)। (३) प्रमिद्धिविद्याविरद्- यहाँ पर 'दन्दान्ते श्रयमाएं पदं प्रत्येकमभिसम्ब दवयते- इस नियम के अनुसार 'विर्द्ध' शब्द का प्रत्येक से सम्बन्ध होता है भतः प्रसिद्धिविरद्व औौर विद्याविरद्ध यह अर्थ है-। 'सनियम "परिवरृत्ताः, में भी परिवृत्ता शब्द का पहिले चारी पदों के साथ स्न्वय है तथा रानियमपरिवृत आदि नार दोप हैं। इमी प्रकार विध्यनुधादायुक्कत में भी प्रयुक्त पद का दोनों से अन्वय है। अनुवाद-कमश, उदाहरसा (इस प्रकार) हैं-(१. पपुष्ट धर्य-बोष) :- 'वह सूर्य सर्वोस्कृष्ट है' (यिजयी है), जिसने अ्त्यन्त दौध गमनमाग में गम- नागमन (प्रसरण) करने में विथाम-सुरा को छोड़ दिया है, तथा जो वायु द्वारा प्रसारित की जाती है शौरभ जिनकी ऐसे कमलों को प्रफुस्तित करने यासा (हारकृत्) है' ।।२ ५ ५।। यहाँ पर अर्पतिविततत्व' (सरसित्व, मन्दुल्लासिततीरभत्य) आदि का प्रहसा न करने पर भी, प्रतिपाध्मान अरथात वियक्षित सर्य का याघ नहीं होता, भ्रतः ये मपु्ट:(पयं) है, 'मससुत' या 'पुनरुक' पपं नहों। - प्रभा-(१) जिस प्रतिपादित-अर्थ का शव्दद्द्वारा प्रतिपादन न करने पर विदश्ित सर्यं में कोई चाया नहीं होती वह मपुष्ट सरभ है। उतना प्रतिपादन टोप. है; ययोकि वहु 'पर्थतः प्रतिपम्न होता है (भ्रथंत.प्रतिपन्नस्य प्रतिपादनं प्रपुष्तत्वम्) पथवा विवक्ित मथं या उपकारक नहीं होता (पपुष्टत्वं मुश्यानुदकारित्वम्-साहितय- दपण)। सरस्वतीकष्ठाभरस में (भोजराज ने) इसे 'ध्वर्य' नाम दिया है-व्वर्यं- माहृगंताथंमत् यच्छ स्पापिप्प्रयोजनम्'। (२) उपमुक्क उदाहरग में 'मतिविततास्व' सादि पथों का शब्द-द्वारा प्रतिपादन न करने पर भी- वियशित धर्थ में कोई यापा नहीं होती; क्योंकि आकाश की भविदोघंता आादि इसी प्रकार स्वतः सिद, दिनसे भग्नि की टप्सता। इससिये यहाँ अपुष्टत्व नामक भर्थ-दोष है पभवा मे सपुषट- म्यं दुप्ट है। (३) आलद्वारिक मचायं सदट ने 'भविविवत' इत्यादि में 'पद्भय' नामम दोप दिमलाया था। इसी हेतु आचायं मम्मट पहते हैं कि यहाँ पर अमनुतरष: नामर (सदटनिदिष्ट) दोप नही है; पयोंकि अगजति वहां हो सती है यहों प्रतिपादित भयों का पव्चय न हो सके; यह़ा ऐमा नही है। कुस टीसकारों के यनुसार 'पगनर' पा. पभिशाय 'पपिनपन' है। यहां मधिक, दोप भी नहीं; नर्षोकि पधिरपदाप में
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सप्तम उल्लास: ३५१:
२. सदा मध्ये यासामियममृतनिरयन्दसुरसा सरस्वत्युद्दामा वहति बहुमार्गा परिमलम्। प्रसादं ता एता घनपरिचिता: केन महतां महाकान्यव्योक्नि स्फुरितमधुरा यान्तु रुचय: ॥२५६।। अत्र यांसा कविरुचीनां मध्ये सुकुमारविचित्रध्यमात्म कत्रिमर्गा भारती चमत्कारं वहति ताः गम्भीरकाव्यपरिचिताः कथमितरकाव्य- वत्प्सन्ना भवन्तु। यासामादित्यप्रभाणां मध्ये विपथगा वहति ताः मेघ- परिचिता: कथं प्रसन्ना भवन्तीति संक्षेपार्थः ।
पदार्यों को अ्रन्वयप्रतीति के साथ ही वाघ की प्रतीति हो जाती है और यहां बाघ-प्रतीति नही होती। पुनरुक्त दोप से यह भिन्न है; वयोंकि जहाँ शब्द द्वारा- अ्रवगत अर्थ को फिर शब्द-द्वारा ही प्रतिपादित किया जाता है वहाँ पुनरुक्ति होती है। अर्थपुनरुवित तो अपुप्टार्यं है ही। (४) रुद्रट-उक्त 'असम्बद्ध' और 'तद्वान्' दोनों दोपों का मम्मट के 'अपुष्ट' दोप में ही अन्तर्भाव हो जाता है। (जयन्त भट्ट)। अनुवाद-(२. फष्ट) [स्वकाम्य के विषय में किसी कवि की उक्]- [प्रकृत-प्रथं] 'वियों के काव्य-रूप जिन अ्रभिन्नायों के मध्य में सदा सरमृत वहाने घाली तथा उत्तम (शृङ्गारादि) रसों से युक्त, प्रौढ़, (वंदर्भी, गौड़ी, पाञ्चाली) सनेक (तौन) मार्गो वाली यह सरस्वती काव्यरूप वाली चमत्कार (परिमल) उत्पन्न करती है; वे महाफवियों के काव्यरूप अपभिप्राय (रुचयः) जो अत्यन्त अभ्यस्त हैं, अनुभवाह्द' होकर पभीष्ट हो गये हैं (स्फुरितमधुराः); महाकाव्य-गगन में किस प्रकार मन्य फाव्य के समान सुबोध हो सकते हैं? [अप्रकृत भर्थ] जिन आदित्य प्रभायों के मध्य में जल-प्रवाहित करने वातो सुमधुरा (सुरसा) महती त्रिपयगामिनी गङ्गा नदी (सरस्वती=नदी) सुगन्ध (परि- मल) को तेकर बहती है, वे ये प्रकाश से मधुर द्वादश आदित्यों फो (महतो) प्रभाएं महाकाव्य-सदृय प्रफाश में मेधयुक्त होकर किस प्रकार निर्मलता (प्रसाद) को - प्राप्त हो सफती हैं'।।२५६।, -यहां पर संक्षेप में 'जिन कविरुचियों के मध्य में सुकुमार, विचिन्न तथा मध्यम (कुन्तक प्रतिपादित पथवा यदर्भो; गौडी तथा पाज्चाली) तीन मार्गों वाली भारती चमत्कार उत्पम्न करती है; गम्भीर वाक्यों से परिचित वे ध्न्य कयियों के. समान सुबोध कैसे हो सकती है; यह (प्रकृत); तथा जिन आदित्य प्रभाषों के मम्य में आफनश गङ्गा बहती है। वे मेघों से प्च्छादित होकर कसे स्वच्घ हो सकती हैं- महः(भप्रकृत) भर्थं है।
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३५२ ] काव्यप्रकार:
३. जगति जयिनस्ते ते भावा नवेन्दुकलादयः प्रकृतिमधुराः सन्त्येवान्ये मनो मद्यन्ति ये। मम तु यदियं याता लोके विलोचन चन्द्रिका नयनविपयं जन्मन्येक: स एव महोत्सव: ॥२५७।। अ्रत्रेनदुकलाद्यो य प्रति परपशप्रायाः स एव चन्द्रिकात्वमुत्कर्पार्थ- मारोपयतीति व्याहतत्वम्।
पदार्थः पुनरुक: ॥ श्रप्राजुनेति भवद्धिरिति चोक्त सभीमक्रिरीटिनामिति किरीटि-
प्रभा-'कस्ट' वह अथं है जिसी प्रतीति में वलेश होता है मर्यात् दुरुद अथ। ऊपर के पद्य में दुल्ह सर्थ ही है, जिसे ग्रन्थवार ने 'मन-संक्षेपायंः' भवतरण मे संक्षोपतः दिखलाया है। इस पद्य का यही विबषित पश है जो सन्य शब्दों की योजना करके भी पलेपपूर्वक प्रतीत होता है। भतः यहां सर्थ ही दोपयुकत है। कलस्टत्य में शन्द ही दोपयुक्त होते हैं, यही दोनों वा भेद है। अनुवाद-(२. व्याहत) [मालतीमाघव प्रकरण में माषय की उति:]- f :- 'जो नव-इन्तुफला सादि पदार्थ (भावा:) है ये संसार में हो उत्कृष्ट हैं (मेरे प्रति, नहों) और जो अन्य पदार्थ मन को हषंयुक्त करते हैं, वे भी संसार में स्वभाव से रमलीय हैं। मेरे लिये तो संसार में यह (मालती) ही नेत्रों की घावनी (माह.सा- दिफ़ा) है मोर जो यह द्ष्टिगोचर हुई है वही एक (इस) जन्म में महोत्सय है।२५७॥ 1 - यहाँ पर 'इम्दुरुला भादि' जिस (माघव) के प्रति सुच्छनाम (पस्पसप्ायाः) हैं, यही (भालती में) उतकर्य-हेतु चद्रिकात्य का आरोप करता है। प्रभा-व्याहत-प्रर्थ य अभिप्नान है पररपर विशोषी सर्य, किसी की निन्दा या प्रगंसा परके फिर मन्यया रूप में कहना। कहा भी है-उत्कषों वापरयों का प्रां्यरवय निवयते तत्यॅय तदम्यरचेद् व्याहृतोऽ्घंस्तवा भमेसू। उपयु क पद् के पूर्वार्धं में चन्त्रकला, आादि का माधय की दृष्टि से अपवर्य दिसया गैया है, किन्तु उत्तरार्य में यही मापव उत्तर्ष प्रकट करने के निये मालवी का पन्द्रिकारप मे वरेन करता है। अतएत यहाँ व्याहत-भर्प है। अंनुवाद-(४.पुनदक दोप) 'पृतम्' इस्यादि (ऊपर उदाहरल ३६) ।२४८ 1 .: यहां पर (इलोग से पूर्व) 'अनुन', इस (सम्बोपन) से सथा 'भवदिभः' (पांप सोगों से) इस शबद से कहा जाने पर भी 'सनीमकिरीटिगाम' इस (उमस् पव) में सजुन रप पवाय पुनरक है। प्रभा-(१) शन्ददद्वारा मगगत सयें मा् पुनः (पर्पावाधि) सम्न्द्वारा पचन करना हो पुनरता दोप है। (भर्म की पुनरत्ति सो 'अटुष्ट' दोप के सग्वगय थाठी
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सप्तम उत्लास: ३५३
यथा वा त्रज्वाज्ञावलीढ प्रतिबलजलघे रन्त रौर्वाबमाणे सेनानाथे स्थितेऽग्मिन्सम पितरि गुरी सर्वधन्वीश्वरााम्। कर्ाडलं सम्भ्रमेण त्ज कर समरं मुञ्च हादिनय, शङ्गां ताते चापद्वितीये वहति रसधुर को भवस्यावकाश:।२५६।। अत्र चतुर्थपाद्वाक्यार्थः पुनरुक्त। ५. भूपालरत्न, निर्देन्यप्रदानप्रितोत्नव, विश्राणय तुरङ्ग मे मातङ्ग वा मदालसम् ॥२६०॥ अत्र मातङगस्य प्राङ निर्देशो युक्त:। ६. स्वपिति यावदयं निकटे जन स्वपिमि तावदहू किमपैति ते। • तदयि, साम्प्रतमाहर कूपैरं त्वरितमूरुमुनञ्चय कुन्चितम ॥२६१।। 'है यह कहा जा चुका है)। वह दो प्रकार का है-१. पदार्थ की पुनरक्ति २. वाक्यार्थ की पुनरुकिति। 'कृतम्' इत्यादि मे 'अपरजुन रूप' पदार्थ की पुनरुवित है। पथवा जसे-वेणीसहार नाटक में पश्वत्यामा की इस जक्ति में]- अस्तरूपी ज्वाता से अवलोढ (व्याप्त) अघ्रुसैन्य रूपी समुद्र के भीतर वडवामल के समान, इन सकलधनुधंर-श्रषठों के गुरु, मेरे पिता द्रोखाचार्य सेनापति हो गये है' तब हे करएं घबराओ मत, हे कृपाचार्य सग्राम में जाओ; हे, फृतवर्मा (हादिषय) शङ्का को छोड़ दो केवल धनुष सहित मेरे पिता के संग्राम की बाग-डोर संभाल लेने पर मय का अवसर ही पया है?'।२५६।। यहाँ पर चतुर्य चरस का वाक्यार्थ (को भयस्वावकाशः) पुनुरुक है। प्रभा- (१) 'अस्त्रज्वाता' आदि मे वाक्यार्थं की पुनरुवित है। यहाँ पर अ्रलं सम्भ्रमेण' रूप वाक्यार्थ की 'को भयस्यावकाशः' इन शब्दों के द्वारा पुनरुक्ति हो रही है। :- - (२) व्यक्तिविेककार ने 'पुनरुक्तत्व' का विशद विवेचन किया है। उन्होंने मूर्थ-पुनरुक्ति को ही माना है शब्द पुनरुकत को नहीं। अनुवाद-(५ दुष्कमत्व) [रांजा के प्रति घिसी प्रार्थों की उक्ति] :- 'कृपणता छोड़कर दान देने में स्वात उत्सव (हंपं) वाले, हे नृपथष्ठ, 'आप मुझँ एक प्रश्व दीजिये स्रंथवा मद से मतवाला गजराज' ।।२६०।। 'यहाँ मातङ्ग फा पहिले निर्देश करना उचित है।' - प्रभा-दुष्कम अरथ यह है जहाँ अनुचित मभ होता है '।दुष्टः' भनुचितः' कमो यत्)। अनुचित कम का अभिप्राय है-लोकशास्त्र विरु्द् कम। पसे उपयुक्कत उदाहरख में 'तुरद्ग' मातङ्ग' वा' यह लोक-विर्द्व कम है; कयोकि बड़े दान की सामर्थ्य न होने पर ही लघुदान की प्राथना उचित है। अतः यहां दुष्यमत्व दोप है। अ्रनुवाद्-(६. ग्राम्य)-[नवोढा के प्रति नावक को उक्ति] (जब तक यह जन सोता है तब तफ मैं तेरे समीप दयन करताहूँ, इसमें तेरा कया जाता (विगढ़ता) है? सथि, तो अब कोहनी हटालो तथा संकुचित उर को गोभ पायो॥।२६१॥
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३५४ सप्तम उल्लाम:
एपोडविद्ग्बः।। ७. मात्सर्यमुत्सार्येत्यादि ।।२६२।। अ्रत्र प्रकरणाद्यभावे सन्देहः शान्तशृद्रायंन्यतराभिघाने तुनिश्चय:। 5. गृहीतं येनासी: परिभवभयान्नोचितमपि प्रभावाद्यरयाभून्न खलु तव कश्चिन् विपय:। परित्यक्त तेन त्वमसि सुतशोकान्न तु भयाद् विभोच्ये शस्त्र, त्वामह्मपि यतः स्वरित भवते ॥२६३।। क्त्र शस्त्र विमोचने हेवुर्नोपात्तः ।
यह (नायक) अविदग्ध (भद्दा, अशिष्ट Vulgar) है। प्रभा-ग्राम्य वह भर्थ है जो अशिष्ट जनों में ही प्रचलित होता है, कहा भी है-स प्राम्योऽयों रिरसादिः पामरंयंभ कच्यते । धंदरमव किमयलं हित्वंब यनितादियु। इससे सहृदयजनों के हृदय में भरुचि होती है। अनुवाद-(७. सन्दिग्य)-'मात्समं इत्यादि (ऊपर उदाहरस १३३) ।२६२। यहां पर प्रफरतादि के अभाय में सन्देह है शिन्दु मदि घक्त्ता शान्त है भपषा मृङरी इनमें से किसी एक का निश्चय हो जाता है तो अर्य-निश्चय (ही) होता है। प्रभा-सन्दिग्य का अभिप्राय है-सन्देह का विपय; धर्यात् प्रकरणादि श्ान के प्रभाव में जहां दो भरयों में से एक का निश्चय नहीं होता-यहां सन्दिग्य वर्ष है। ऊपर के उदाहरए में भूघर नितम्बसेवन तथा 'फामिनीनितम्यमेवन' में सन्देह है। यदि प्रकरणादि द्वारा यह निश्चय हो जाय कि यहां शान्त ध्यक्ति का बर्छन है (भपवा शृभ्गारी का ही यगन है) तो भर्थ में सन्देह नहीं रहता। अनुवाद-(८.निहुँतु) [वेलीसंहार में द्रोलाचार्य को मृत्यु दर सम्वत्मामा को उस्]-हे शस्त्र, (बाहए के लिये) अनुचित होते हुए भी मिन मेरे पिता मे (सामकृत) परामव के भव से सुभने प्रहरा किया था। जिनके प्रभाव से तेरा कोई भी (मोढा) पविषम न रहा; उन मेरे पिताजी ने पुत्र-शोह से तेरा परियाग िया है, भम से नहीं; इसलिये में भी तुभ्हे यहाँ छोड़ रहा हूं, जहां (मतः=पत्र) सुम्हारा कह्पाल हो ।२६३॥ यहाँ पर (प्रश्वतमामा के) रहतनयाग का हेतु नहों बतलाया गया। प्रना-निहृँतु यह अथ है जिनके हेतु का कयन न किया गवा हो। कर के उदाहरस में दोखाचार्म के राहन-स्याग में 'मुत-जोड को हेतु नहा गया है इधी प्रकार परपस्दामा के 'महप-स्वान' में 'पितृ-नोड को हेतु नहना पाहिने था, दिन्ू पछ़ा नहीं गया, इसलिये 'निहुमुख' अर्थ-दोष है।
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सप्तम उल्लासः ३५५
ह. इदं ते केनोक्त कथय कमलातङ्कबदने, य देतस्मिन्हेम्न: कटकमिति वत्से खलु धियम्। इदं तद्दुःसाधाक्रमएपरमास्त्रं स्मृतिभुवा तव प्रीत्या चक्र करकमलमूले विनिहितम् ॥२६४॥। प्रन्न कामस्य चक्र लोकेऽपसिद्धम्। यथा वा- उपपरिसरं गोदावर्याः परित्यजताध्बगाः, --
सरणमपरो मार्गस्तावङ्धवद्धिरवेद््यताम। इह हि विहितो रक्ताशोक: कयापि हताशया चरएनलिनन्यासोदञ्चन्नवाड कुरकब्चुक:।२६४॥। अंत्र पादाघातेनाशोकस्य पुष्पोद्गमः कविपु प्रसिद्धो न पुनरङ्क रोद्गमः । सुसितव सनालद्वारायां कदाचन कौमुदी- महसि सुदशि स्वैरं यान्त्यां गतोऽस्तमभूद्विधुः। तद्नु भवतः कीर्तिः केनाप्यगीयत येन सा. प्रियगृहमगान्मुक्ताशङ्का क्व नासि शुभप्रदः ॥२६६॥। सत्रामुर्ता प कीर्तिः व्योत्स्नावत्प्रकाशरूपा कथितेति लोकविरुद्धमपि कविप्रसिद्ध ने दुष्टम् । अनुवाद-(६. प्रसिद्धिविर्द्ध)-'हे कमलों को आातद्ित करने वाले वर्यात् चन्द्रमा जसे मुखवाली (चन्द्रमुसी), बतलाओ तो तुमसे यह किसने कह दिया, जो इस (चक्राकार वस्तु) में 'यह सुवए का फङ़गण है' ऐसी बुद्धि (निश्चर्य) कर रही हो। यह तो वह (प्रसिद्ध) दुःसाध्य अर्यात जितेन्द्रिय तरुसों के वशीकरंस (आक्रमस) का महान् अस्त्र कामदेव के द्वारा प्रीतिपूर्वक तुम्हारे प्रकोष्ठ (फलाई) में स्थापित किया हुय चक्र है ॥२६३।। 4m यहाँ पर फामदेव का चक्र लोक में अप्रसिद्ध है। अथवा जैसे-'हे पथिफों तुग मोदावरी के तट के समीप (उपपरिसरं- तटसमोपे) वाले . मार्ग को छोड़ दो।, इस प्रदेश में दूसरा माग सोज तो; कर्योकि यहाँ किसी निन्दनीय आशा वाली तरुणो ने रक्ताशोक को सपने चरस कमल के आघात से उदित होते हुए श्रस्न र रूपी कंवच वाला कर दिया ॥२६५॥ :- यहाँ (तसली के) पाद-प्रहार से अशोक का पुष्पोद्गम कवि प्रसिद्ध है प्रङ्ग. रोद्गम नहीं। :- 7: अनुवाद-'हे रांजन, एक बार चांदनी के उजाले में धयल वस्त् तय अलङ्गारों वाली शोभननयनी नायिकां के अभिसार फरते हुए चन्द्रमा प्रस्त हो गया, तब किसी ने आापको कोति का गान किया. जिससे वह शङ्गारहित होकर प्रियतेम के घर चलो गई । महाराज, आप फहाँ हिनकारक नहीं है? ॥२६६॥ य्रहा पर समूतं (मूर्ति रहित) कीति को चांदनी के समान प्रशशमय कहा
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३५६ ] यव्यप्रकाग:
१०. सदा सनात्वा निशीथिन्यां सकलं वासरं बुघः । नानाविघानि शास्त्रासि व्याचष्टे च शृशोति च ।।२६७।। श्नत्न पहोपरागादिकं बिना रात्री स्नानं धर्मशास्त्रेण विरुत्वम्।। अ्रनन्यसदशं यरय वलं वाहो: समीच्षयते ।. पाड् गुएयानुसृतिस्तम्य सत्यं सा निष्पयोजना॥२६८॥। पतद् अर्थशास्त्रेए। गया है, यह लोफविरुद्ध होते हुए भी, फविप्रसिद्धि होने के कारस बोपयुक्त नहीं। प्रभा-(१) जो अयं प्रसिद्धि के विरु्द्ध होता है, वह प्रसिद्धिविर्त है। वह दो प्रकार का होता है-१ लोकप्रसिद्धि-विस्स और २. कविप्रसिसतधिविरद् है। इदं ते' इत्यादि लोक-प्रसिद्धिविरद्ध का उदाहरण है। सोक में विष्णु का चक प्रसिद्ध है, कामदेव का नहीं। कामदेव के तो पांच बांसा या पुष्पवाण ही प्रसिद्ध है। २. 'उपपरिसरं' इत्यादि कविप्रसिद्धिविर्द् का उदाहरण है। तब्सी पादापात मे प्रशोक में पुष्योद्गम होता है यही कबिप्रसिद्धि है। जसे कि यहा भी है- स्त्रीएं स्पर्शात् प्रियस् विकसत वछठुलः सौधुगण्ड्रपसेफात्,
भन्वारो नमंवावयात् पट्मपुहसनाच्चम्पको वषत्रपाताच् सूतो मोतान्नमेदरिकसतत घ पुरो नतंनात् कसिकार:। (२) जो भरथ लोक-प्रसिद्धि के विरुद्ध होते हुए भी कषि सम्प्रदाय में प्रसिद्ध होता है वह प्रसिद्धि-विरु्द्ध नहीं कहा जाता जैसे सुसितवसना' ादि सदाहरय में फीति का चन्द्रिका-सहय प्रकाशमय होने का वणन सोहविरद है; किन्तु कविसमय- प्रसिद्ध है (घुघनत्यं फोतिपुष्वादो)। इमलिये यह प्रमिद्धिविर्न धय नहीं। कवि- समयों का निरुपस साहित्यदर्पस (सप्तम परिच्छेद) तथा 'मसट्वारदेगर' मादि में किया गया है।
सर्वदा रात्रि में स्नान करके बिन भर नाना प्ररार के शास्त्रों की प्यास्या करता है (प्याघष्टे) तथा सयल करता है।'॥२६७१ (चन्द्र) प्रहश मदि (निमित) के बिना राषि में हनान करना पमसारत्र के विष्स है। (स-सर्यशास्त्र-विषव)-जिसको मुजामों में धमापारस बस रिवाई देता है, उसका (सग्पि, विघट, मान, सासन, इंप और पामम इन राममोति के) चड्गुखों का धनुसरस सघमुख ही निष्नयोजन है।।२६८।। यह (कपन) धयंसारत के विर् है (उसके सनुगार मटावमो को भी बार गृग्प क्ा धनुसरल करना चाहिये)।
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सैप्तम उल्लास: ३१७
विघाय दूरे केयूरमनङ्गाङ्गगामङ्गना। बभार कान्तेन कृतां करजोल्लेखमालिकाम् ॥२६६॥। अत्र केयूरपदे नखक्तं न विदितमिति, एतत्कामशास्त्रेय। अ्रष्टाङ्गयोगपरिशीलनकीलनेन दुःसाध्यसिद्धिसविधं विद्धद्विदूरे। आसाद्यन्भिमतामधुना विवेकख्याति समाधिघनमौलिमखिर्विमुक्त॥२s० श्रत्र विवेकख्या तिस्ततः सम्प्रज्ञातसमाधि:, पश्चादसंप्रज्ञातस्ततो मुक्तिने तु विवेकर्यातौ, एतद् योगशास्त्रेण। एवं विद्यान्तरैरपि विरुद्धमुदाहार्यम। (ग-कामशास्त्र विरुद्ध)-'काम की विलासमुमि फोई रमसी फेयूर (भुजबन्द) को दूर रखकर प्रियतमकृत नख-क्षतों की माला को धारस करती रही॥२६६।। यहाँ पर यह (एतल् == केयूरस्थल में नखक्षत वहंन) फामशास्त्र-विरुद्ध है, श्योंकि केयूर-स्थान पर नखक्षत (कामशास्त्र) विहित नहीं है। (घ .- योगशास्त्रविरद)-'समाधि ही है घन जिनका ऐसे योगियों के शिरो- मसि वह योगी पष्टाड़ग (यम, नियम, शासन, प्रासायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि) योग के निरन्तर आघरण द्वारा प्रभ्यास-बृढ़ता से दु.एसाध्य सिद्धि धर्थात मुक्ति की समीपवर्ती अंसप्रज्ञात समाधि को दूर से ही त्याग फर प्भीष्ट विवेक- .- ह्याति को प्राप्त करके मुक्त हो गये ।२७० यहाँ पर यह (एतत्=विवेकसपाति के अनन्तर मुक्ति) योगशास्त्र के विन्द है; वयोंकि (मोगलास्त्र के अनुसार) पहले विवेकस्याति, तब सम्प्रज्ञात समाधि तत्पशचात् असम्प्रज्ञात समाधि, तब मुक्ति होती है, न कि विवेकस्याति हो जाते ही. मुक्ति (हो जाती है)। इस प्रकार अन्य शास्त्रों के विरुद्ध भी अ्रयं (काव्य में) होते हैं। प्रभा-(१) 'विद्याविरुद्ध' का अभिप्राय शास्त्रविरुद्ध है। अतः जो धर्म- शास्त्र अर्थशास्त्र, कामशास्त्र तथा योगशास्त्र आदि के विरुद्ध अर्य (काव्यनिबद्ध) है वे विद्याविरुद्ध हैं; जैसे कि ऊपर के उदाहरसों से स्पष्ट है। वस्तुतः 'विद्या' शब्द तथा 'शास्त्र' भी व्यापक सर्थ के बोधक हैं अतएव विद्या-विरुद्ध में उन सभी का संग्रह हो जाता है जो प्रत्यक्षज्ञान, भूगोल विद्या तथा लोर-विद्या भादि के विरुद्ध हैं। अतएव भोजराज-उवत 'देश-विरुद्ध' (सुराष्ट्रेपु मथुरा नाम नगरी) इत्यादि भी विद्या-विरुद्ध में ही अम्तभूत हो जाते हैं, तथा वामनाचार्य-कथित लोक- विरुद्ध एवं विद्याविरुद्ध का भी इसी में समावेश हो जाता है-देशकालस्वभाय- विववार्थानि लोकविद्धानि। फलाचतुर्वर्गशास्त्र विरदवार्यानि विद्याविरद्धानि (काव्यालड्कारसून २.२.२३,२४)
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५= 1 काव्पप्रकार:
११. प्राप्ताः श्रियः सकलफामदुघास्ततः कि दत्त पदं शिरसि विद्विपतां ततः किमृ। सन्तर्पिता: प्रसायिनो विभवैस्ततः किं कलपं स्थितं तनुभृतां तनुभिस्ततः किम् ॥२७१।। श्रत्र ततः किमितिन नवीकृतम्। कषन्त यथा-, यदि दहत्यनलोऽन्र किमद्भुतं यदि च गौरवमद्रिपु किततः। लवएभम्तु सदैव महोद्घे: 5कृतिरेव सताम/वपादिता.।।२३२।। ..... १२. यत्रानुल्लिख्वितार्थमेव निखिव्रिलं निर्माणमेत द्विधे- रुकरप प्रतियोगिकुल्पनमपि न्वक्कारकोटि: परा। (र) 'भ्रप्टाभ्गयोग' इत्यादि में-वस्तुतः योगशास्त्-विर्द्व भ्रयं नहीं प्रतीव होता; क्योकि योगसूय में प्रकृतिपुरन्वतास्याति रूप विवेकत्याति के भनन्तर भी कवल्य प्राप्ति कही गई है-'सत्वपुरपयो: घुद्धिताम्ये कंवल्यमिति' (योगसूय ३'५५) तभा-'तदेवं परम्परमा कवत्मत्य हेतून सपोमृतीन् तेंपमानुक्वा सतत्यपुरषा्यताताग साक्षात्कंवल्मसाधनमित्यन सूत्रगवतारयति।' (त्स्वबगारदी, वाचस्पति मिय) 1. यनुवाद-(११ धनवीहृत) (मंराध्यशातक में अतृंहुरि की जक्ति] 'सकस मनोरय प्रमान करने पाली सम्वदाएं प्राप्त कर लो तो पंमा? दयुथों के घिर पर घरस रस दिया तो पया ? मिनादि प्रियजनों को धनंसम्पति से सृप्न, पर डिया तो पमा ? शरीरपारियों के शरीर पल्पपर्मन्त्र स्थित रहे सो बया ? ।१७१।। यह!ं पर 'ततः दिम्' (तो वमा ?) (बार २ कहा जाने से) मनवीहत है। यह (नधीकृत घर्म) तो इस प्रकार होता है जसे- पदि भग्मि जलाती है तो वपा सर्धर्म है? यदि पवतों में गुदतय है, तो कया? महासागर का जल भी गदा सारा होना है (पसः यह भी स्यामाबिक है) इसी प्रकार सग्जनों का 'सिन्न न होना' स्वभाय ही है।।२७२।। प्रता-मनयोप्त बह भय है; मिराका एक भगिया गे ही तिरसें किया गया हो पर्यात् प्रपारनार मे कदन करके नशीनता उत्पव्न नः पी गई हो। इगंगे कुषि की मनक प्राट होती है तथा सनदर्पों के गन में जिमनता हो जाती है। 'प्रानताः यिय:' इरपारि काम मे एक मर्ष के कयन का सर्वन एक ही पार हैभतः महा मनयोपृत मर्थ है। किन्मु 'यदि दहगि' इहयादि गास में एक ही 'सातवर्पाभावम' धर्ष मो 'निमट्युनम्', 'कि सनः', 'मवव' औोर परनिरय' इग प्रगार भिभ मे पहा गया है सनाूप थड़ी गवीयु सर्य है। अनुपाद्-(1र. रनियमरविचु सात)-विन सिामति के होने पर रह ब्रह्या की सृष्टि निम्बयोजन (पमुस्तितिन: प्रविभावि: सर्पः प्रवोशन दाव) हो,
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सप्तम उल्लास:
याता: प्राणभृतां मनोरथगतिरुल्लंव्य यत्संपद्- रतसयाभासमशीकृताशमसु मणेरशमत्वमेवोचितम् ।।२७३।। अत्र 'छायामात्रमणीकृताशमसु मगेरश्मतैवोचिता इति' सनियमत्वं वाच्यम। १३. वक्त्राम्भोजं सरस्वत्यधिवसति सदा शोण एवाधरस्ते बाहु: काफुत्थवीर्यस्मृतिकरणपदुर्दकिणास्ते समुद्रः। वाहहन्य: पाश्वमेताः नसमपि भवतो नैव मुञचन्त्यभीद्षं स्वच्छेऽन्तर्मानसेडस्मिन् कथमवनिपते, तेडम्युपानाभिलाप:।२७४। अत्र शोस एव इति नियमो न वाच्य: ।
जाती है, जिसके उत्कर्ष के सद्श किसी पदार्थ (प्रतियोगी) की कल्पना करना भी (उंसके) अपमान (न्यककार) की पराकाठा है, जिसकी सम्पत्ति प्रासधारियों के मनोरय की गति को भी लांघ गई है, उस चिन्तामसि के आभास से (प्रमगि होकर भी (मसिरूप हो जाने वाले पाषालखण्डों के बीच में (दरिगशित) उसका पतयर बना रहना उचित है। [अन्य मणिप्रों में यदि चिन्तामि की मसना है तो उन्हें ही मणि कहा जाए चिन्तामसि तो पत्थर बनी रहे यही अच्छा] ॥२७३॥ यहाँ छायामात्र से मणिरूप किए जाने वाले पापाएाखण्डों में चिन्तामसि का पाषाएत्व हो उचित है' इस प्रकार नियमसहित करना चाहिये। प्रभा-सनियपरिवृत्त वह अरथ है, जिसे नियमपू्वक ('सनिमयत्व रूप से) कहना उचित है; किन्तु अनियमत्व रूप से कह दिया जाता है। ऊपर के उदाहरण' में चिन्तामणि की अपेक्षा अपकृष्ट अन्य मणियों में चिन्तामसि की गखना का उपालम्भ करना है। इस हेतु 'छायामाय्रेए मणीवृतेपु' अर्थात केवल छाया से भण ' बनी हुई-इस प्रकार नियमसहित कहना चाहिये, जिससे अन्य मणियों में सन्य गुखों का निेध होकर निन्दातिशय की प्रतीति हो जाय। अनियम के साथ कथन करने से तो निन्दनीय मणियों में अन्य गुणों के अभाव की प्रतीति नहीं होती और विवक्षित अर्थ का बोध नहीं होता। अ्रनुवाद :- (१३. अनियमपरिवृत्त)-[भोज प्रबन्ध में विक्रमादित्य के प्रति वारस की उत्ति] 'हे भूपति, आापके मुसकमल में सवेदा सरस्वती (वासी या नदी) यास करती है, आपके अपरोष्ठ शोसा (लाल या शोएा नामक नदविशेष) ही है, श्रीराम (काकुत्स्थ) के पराक्रम फी स्मृति फराने में समर्य (पट) यह पापकी भुगा वक्षिए (यान-दक्ष या दक्षिसा में स्थित) समुद्र है, ये सेनारूपी नदियाँ (वाहिंनी) मापके सालिध्य को कभी सषस भर के लिय नहीं छोड़ती है; इस निर्मल हुबय-सरोवर के होते हुए सापको जलपान को अभिलाथा फैसे हो रही है?'।-७४॥ यहाँ पर 'शोस ही' ऐसा न कहना चाहिए। प्रभा-प्नियमपरिवृत्त वह अर्थ है जिसे नियमपूर्वक कहना उचित 'नही;'
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२६० ] काव्यप्र भाग: -
१४. इयामां श्यामलिमानमानयत भो:, सान्द्र ्मेसीफृर्चै: मन्न्र, तन्न्नमथ प्रयुज्य हरत श्वेतोत्पलाना-म्रियम्। चन्द्र घूर्णायत तमाच्च कराशः कृत्या शिलापट्टफे येन द्रप्टुमहं समे दश दिशस्तद्वकत्रमुद्राक्गिता: ॥२७॥॥ अत्र 'उपीक्षनीम्' इति श्यामाविशेपो वाच्य :- । १५. कल्लोलवेल्लित टपत्परुप प्रछारै- रत्नान्यमूनि मकरालय, मावमस्या: • कि-कौस्तुभेन विददितो भवतो न नाम। याच्याप्रसारितकर: पुरुपोत्तमोऽपि ॥२७६। छ्त्र, 'एकेन कि न विहिती भवतःस नाम' इति सामान्यं वाच्यम।- किन्तु कहु दिया जाता है। जसे ऊपर के उदाहरसा मे 'शोए एव' यह सवारस (नियम) अनुचित है वया पनियमपरिवृण है; कयोकि यहाँ 'पिपासा के पनोपित्व की विशेष प्रतीति' कराना ही कर्वि का अर्भिप्नाम है, 'ोए ही' ऐमा पहने से अ्य जलाणयों की व्यावृत्ति हो जाती है जो अनीचितम की मतिनमता में गहापर नहीं प्रत्युत वापक है। अनुवाद-(१४. विशेयपरिघुस। [राजरेसरकृत विद्वसासभज्जिका माटिका में राजा की उकि] 'हे सेवराए, माठी स्याही को कषियों से राति (इमामा) को फालिमा (सन्घकार) को प्राप्त दरा दो। मन्न तन्त् का पयोग परके शवेतरममों. की शोभा को हर सो। और पखमा पो सिलाफलक पर पटक कर (एृत्या) क्षएमर में कए-कस चूरा कर दो; जिससे में उस (गृगाख्ावती) दो मुलयुट्दा से पद्धित दशों विषायों को वेस राक्क' [सबतर सन्यकार होने से भायना में हिमत प्रियतना के मुद को हो बसों विशामों में बैस सहू] ॥२६४॥ यहाँ पर 'ज्पीत्नीम्' (ज्पोत्स्नायुक्त) इस प्रकार विशेप (सादनी) राष्ि- कहना उचित है। प्रना-विगेध-परियूर वह मर्ये है मिसे विरोपसष के वहना उित हो रिन्तु वानान्यरप से यह दिया जाय। जैसे-'दयाम' इस्मानि फाब्य में विशेष रनि (भवोसनी-चौननी सत) पहना उचित है (व्मोनि उगसे मिस सर्धाद संपेरी रात् में रसासता का निधान असुपत है); फिन्तु उसके बदले सामान्य रूप ये प्याम- रातरि-चुषना या कुप्ला) यह दिया गया है। धनुवाद- (१X. पविरेपरिवृत)-'ऐ मरततम (समु्र), मद्षीमियो ते भसित सपालों के प्रहार से इन चपे रतनों का सपमान ने करो। यया प्रातहे कोस्युभ नामक रम मे पुरयोसम विच्छ को भी पाघता के सिरे हाप पातरते को प्रेरित महों रिया या ? ॥२७६॥ मह 'एकेन सि न बिहितो नवयः स नाम' इस प्रगार सामान्यत्प में बहना चाहिये।
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सप्तम उल्लास:
१६. अरथित्वे प्रकटीकृतेऽपि न फलप्राप्तिः प्रभो: प्रत्युत द्र हयन् दाशरथिचिरुद्वचरितो युक्तरतया कन्यया। उत्कपञ्च परस्य मानयशसोर्विस्र सनं चात्मनः स्त्रोरत्नब्च जगत्पतिर्दशमुखो देवः करथं मृष्यते॥२७७॥ अ्त्र स्त्रीरत्म उपेक्षितुम' इत्याकांक्षति। नहि परस्येत्यनेन सम्बन्घो योग्य:। 4. १७. परज्ञा शकशिखामणिपएयिनी शास्त्रासि चचनवं भक्तिभू तपतौ पिनाकिनि पदं लङ्कति दिव्यापुरी। प्रभा-परविशोषपरिवृत वह अर्थ है जिसे सामान्यरूप से कहना उचित हो, किन्तु विशेपरूप से कह दिया जाय। जैसे 'कल्लोल' इत्यादि काव्य मे यह सर्थ.। विवक्षित है कि जब एक ही रत्न के द्वारा तुम्हे उतना उत्कर्ष प्राप्त हुआ है तो अ्न्य . रत्नों का अपमान करना उचित नही अतएव यहाँ रत्न-सामान्य (एक) का कथन करना उचित है। उसके बदले रत्नविशेष 'कौस्तुभ' का कथन कर दिया गया है। ा: अनुवाद-(१६. साकाङ्क्ष) [वीरचरित नाटक, स्वयंर में सीता की प्रप्राप्ति से निराश रावस के मन्त्री माल्यवान् की उक्ति] 'याचकता प्रकट करने पर भी हमारे प्रभु (रावस की इष्ट-प्राप्ति नहीं हुई, प्रतयुत (ताड़का-वघ आदि द्वारा) द्रोही और विरुद्धचरित वाला (राम) उस कन्या (सीता) से संयुक्त हो गया। इंस प्रकार शत्रु के सम्मान और यश का उत्कर्ष, अपना अपमान (विस्र सनम्), और स्त्रोरूप रत्न (की उपेक्षा) विश्वपति विजिगीपु (देव) कैसे सहन करेंगे?' ॥२७७॥ यहां पर स्त्रीरत्न' यह 'उपेक्षितुम्' इसकी आ्रफाइक्षा रसता है। इसका : 1 + 'परस्य' के साथ (परस्य स्न्री(त्नम्) सम्बन्ध भो उचित नहीं। प्रभा-साकाङक्ष वह अर्थ है, जिसमे किसी अगृहीत (अनुपात) अर्थ की आकाइक्षा बनी रहती है। जैसे 'अथित्वे' इत्यादि काव्य में 'स्त्रीरत्नम्' इस शब्द का अयं 'उपेक्षितुम्' के अरथ की आकाङ्क्षा रखता है, अन्यथा 'क्थ मृप्यते' के साथ इसका अन्वय कैसे सम्भव है। स्त्री रत्न में ही अमर्प नही है, किन्तु उसकी उपेक्षा मे है। 'यहाँ 'परस्य' के साथ भी 'स्नीरल्म्' का अन्वय नहीं हो सकता कयोकि- 'परस्य' का 'उत्कर्प' के साथ अन्वय होने से वह निराकाडक्ष है। तथा विस्र सन' चात्मनः' के द्वारा व्यवहित हो गया है। अतः विवक्षित अर्थ की परिसमाप्ति न होने के कारएा सावाङ्क्ष अर्थ दोपयुकत है। अनुवाद-(१ अपदयुक्त) [बाल रामामस में जनक के प्रति श्ञतानन्द को उत्ति] 'जिस (रावस) की आाज्ञा देवराज इन्द्र फी मुफुटमलि को प्रिय (शिरो- धार्य) है, शास्त्र ही नूतन नेत्र हैं, भूतनाथ पिनाकघारी शिव में भक्ति है, तस्ु नाम से प्रसिद्ध दिव्न नगरी ही निवास-स्थान (पदम्) है; प्रसमा (द.हिए) के वंश में जन्म हपा है; शहो, ऐता वर कहां मिलता यदि वह रावस अर्थात प्राशियों वन पोडाजनफ
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कव्यप्रार:
उत्पत्तिद्र 'हिसान्वये च तदहो नेहग्वरो लभ्यते स्याच्चेदेप न रावसः क्व नु पुनः सर्वध सर्वे गुखा:॥७ अत्र 'स्याच्चेदेप न रावणः इत्यत एव समाप्यम्। १८. श्रुतेन बुद्धिव्यंसनेन मूर्खता मदेन नारी सतिलेन निम्नगा। निशा शशाद्टन धृति: समाधिना नयेन चालडकियते नरेन्द्रता ।।२७।
१६. जग्नं रागावृताहया ।२म2 इत्यत्र विदितं तेऽस्त्वित्यनेन श्रीस्तरमादृपसरतीति विरुद्ध प्रकाइयते। रावयति आफन्वमतति सोफान्) न होता । भता! सबमें सभी गुए कहाँ होते ? ॥ २७८॥ यहां पर 'स्याच्चेदेष न रषणाः' यहों पर समाप्त कर बेना चाहिये। प्रभा-अपदयुपत (पपदे प्रस्ाने युक्त: रम्बनः) यह मर्य है जो प्रकृत घर्य के हर्द पयं रसने वाले पदों से सम्बद्ध होता है। जैसे 'ाभा' इस्यादि पथ में- लोक के पूर्व उल्लिसित (भइ्चर्यंम् एकोजि गरीपान् दोपः समप्रमि गुलप्रा्म पयत) वाकय के स्वारस्य से समस की उपेक्षा विवकित है और वह 'स्माभ्पेदेप रावएः इतने मात्र से ही प्रकट हो जाती है। उसके परनात् अभिहिति 'बन' नु ' मरादि मयं रावण सम्बन्यी वपेक्षा-भीष को इसका करता है भत: विवसिस र्य के वियद प्रतोति कराने वाला है। अनुाद-((द. सहपरमिस्न)-'सास्य्र (पृत्ष) से युद्धि,ध्यन (प साषि) मूसंता, मद से नारी, जल से नदी (निममा), शयाङ्द से रात्रि, समापि (पर्मे- रन्तन मा योग) से धंपं धर नीति से राज पद पलद्ू, त होता है।' 'वहा यृत' मादि उकृष्ट साहघरों के साय स्यसन, मूर्सता इन निकृष्ठ दार्यो की भिन्नता है। [य्योंकि 'धुतु' भदि के साहध्यं से मू्स को म्वहन करना हिमे दूस प्रकार के धर्म को प्रतीति होगी सो सनिष्ट है] (१६ प्रकाशित-विदद) 'लग्न' इतयादि (उगर उदाहरसा २४१) ॥।२८०।। यहां पर 'विदितं तेजसु' इसके द्वारा 'उसके पास से सबगी हट रही है यह ्दद सर्य प्रराशित होता है। प्रभा-प्रफाशिरतािरत यह धरपे है जिगसे व्यञ्जना द्वारा विवशिव मर्व के हहद धर्म का बोम हमा करना है (परातित अब्जिनः प्रविर्स: मर्यः मेन)। हमारमिन में पर का सर्प (पदार्थ) ह भिस्न धर्प का सोहह होठ है: बिन्मु यहा गरयामं' विददार्यस्जय होश है। यहो दोनों में सत्तर है। 'ममन' इगदि काम 'राजनतुति' पिनकिा है किन्तु 'विदित सेन्तु' रग शषप के मर्य से स्भ्बना। दरा यह प्रजीति होनी है कि 'सर्नी राना के पाम मे टुट रही है, यह प्रराि स्व म्म रे।
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सप्तम उल्लाम: ३६३-
२० प्रयत्नपरियोधितः स्तुतिभिरद्य शेये निशा- मकेशवमपाएडवं भुवनमद्य निःसोमकम्। इयं परिसमाप्यते रसकथाऽय्य दो:शालिना- मपैतु रिपुकाननातिगुरुषद्य भारो भुबः ॥२८१।। अत्र 'शयितः प्रयत्नेन ोध्यसे'-इति विधेयम। यथा वा-वाताहारतया जगद्विपघरराश्वास्य निःशेपितं
तेऽपि क्र रचमूरुचमेवसनैर्नीता: च्षयं लुब्घके- दम्भश्य स्फुरितं विदृन्नपि जनो जाल्मो गुणानीहते ॥।२८२।। अत्न वाताहाराित्रयं व्युत्क्रमेय वाच्यम्। अनुवाद-(२० विध्ययुक्त) [बेशोसंहार में दुर्योधन के प्रति अश्वत्थामा की उत्ति]-'हे राजन् आाज तुम रात भर सोओगे तथा (प्रातः) (वंतालिकों के) स्तुतिपाठ द्वारा प्रयत्नपूर्वक जगाये जाओ्नोगे, क्योंकि पाज मैं संसार को केशवरहित. और पाण्डवों तथा पाञ्चालों (सोमकाः) से रहित कर दूंगा, आ्ाज भृजबलधारियों: फी यह युद्धकथा ही समाप्त हो रही है। भाज शत्रुरूपी वन से होने चाला भूमि का, महान् भार दूर हो जायेगा' ।।२८२।। यहाँ पर 'शयितः प्रयत्नेन बोध्यसे' यह विधेय है। अयवा जैसे-[भल्लटशतक के पद्य में] 'विषधरों ने वायुभक्षण के व्रत से विश्वास दिलाकर संसार को नष्ड कर दिया, उन्हें तो नेघजलबिन्दु-पान का कठोर. (तोव) वरत घारस करने वाले मयूरों ने प्रस लिया, उन मयूरों को भी कफश (क्रूर) चित्रमृग (चीता) के वस्त्र वाले व्यावों ने विनाश को प्राप्त करा दिया। (यह युक्त हो. है., क्योंकि) मूर्स लोग दम्भ (धूरतता से धर्माचरस) के (परहिसा रूप) काय (स्फुरितं-चेष्टितम्) को जानते हुए भी धार्मिकता आदि गुलों को सम्भावना. करते हैं ॥२८२॥ यहाँ पर 'चाताहार' इत्यादि तीनों (गुरों). को विपरीत क्रम (ध्युत्कम) से- कहना चाहिये। प्रभा-विध्ययुक्त का अर्थ है-मयुक्त विधि। पज्ञात पदार्थ के ज्ञापन को विधि कहते हैं। विधि की पयुक्तता का अभिप्राय है-(१) अविधेय अर्थं का विधेय रूप से कयन अथवा (२) विधि का चिपरीतन्रम से (व्पुत्नम) कथन। (१) प्रथम का उदाहरए है-'प्रयत्नपरियोधितः' इत्यादि। यहाँ सोया हुआ तू प्रयत्न से जगाया जायेगा' यह उचित विधि है अर्थात् प्रयत्न द्वारा जगाना (प्रयत्नवोघनम्) हो यहाँ प्रधानतया बतलाना है मतः वही विधेय है; घेपे भर्यात्' 'शयन' यहाँ विधेय नही है; क्योंकि सोये हुए व्यक्ति को जगाना है न कि जगे हुए को सुलाना है। अतएब यहाँ अविधेय का विधेय रूप में कधन है।
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३६४ 1 काव्यध्रवोण:
२१. अरे रामाहस्ताभरए, भसलश्रेमिशरस, स्मरकीडाम्रीडाशमन, चिरहिमाएदमन, सरोहं सोन् स, प्रचलदन, नीलोत्पलससे, सखेदोऽहं मोहं इ्नथय कथय कचेन्दुचदना ॥२८३॥ अत्र 'विरद्दिप्रायदमन' इति नानुवा्म् । २२. लग्नं रागावृताङ्गथतयादि ॥२६४। अत्र 'विदितं तेऽस्तु' इत्युपसंहतोऽपि तेनेऽत्यादिना पुनरपातः। (२) द्वितीय का उदाहरस है-'वाताहारतया' इत्यादि। यह। 'मृगचर्म वसन, मेयतोपकणिकापान और यायुभवसार े तीनों उत्तरोतर रठोर वत ह मत: इसी नम से मन्यन मुक्त भा उसका ठुत्कम से कायन करने के कारगा विध्यपुक् दोप है। (३) घविमृष्टविधेयांश में तो युक्त का ही विधान होना है, पर उसका पविमरं ात (प्रधानतया अप्रतीति) होता है; फिन्तु विध्ययुक्त मे पयुकत की ही विषि होती है। यही दोनों का भेद है। अनुवाद्-(२१. धनुयादायुवत) 'परे सुन्दरी (रामा) के हस्तामरल, भ्रमरपंकिति (भससभलि) के रक्षफ, काम कोषा को सज्जा का शमन करने वासे, वियोगियों के पालों के संतासक, थेष्ठतरोवर (सरोहुंस) के भूपल (उद्तस), पज्यक पत्र माले मित्र नीलोत्यत, मैं खेडपुक्त हू, बतसामो वह चन्द्रमुखी करा है? मेरे मोह को दूर कर वो' ।२=३॥ यरहां पर 'विरहिप्राशादमन' इसे उदश्यरूप में न चहना चाहिये। प्रभा-प्राप्त या सिल्व वस्तु का मथन मनुवाद महलाता है निमेप के में प्रतिकृत उर्द्ददय (सनुपाघ) का कमन हो मनुवादायुक्त है। कर के उदाहरस में 'कथम नयेन्दुबरना' यह विधि (विषेय) है। साय ही विसहीनन स्मोह री शामि के लिये भी नीतोतल से प्रामंता कर रहा है, मतएब मोनोलस को विर्गट्पाल- संनासर महना विषि के प्रतिक्ृत है। अनुवाद्-(१२. ससपुनरवीसत) 'ानं' इत्वादि [उपर उदाहरस
इस पद् में 'मिवितं सेनतु' इससे समाप् किया हचा भी धर्प 'ेनाहिम' इरयादि से गुहोन किया गया है। प्रभा-'१) ततपुन रवीदून वह घर्ष है जहां पियास्ारए के सन्र से परं निरारांक रप पाररार्थ के मगान बरके पिर प्रन्म भारक परारि का प्रहूस कर मिया बा। जैमा रि कार के उदाहरसड मे रपष्द है। (२) नहा गमास्य यायपारयं में पन्व पिरेपस का घटया होता है यहा समाजपुनगत' दाप होगा है
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सप्तम उल्लास: [ ३६५ 1.44
२३. हन्तुमेव प्रवृत्तर्य स्तव्घस्य विवरषिय: ॥ यथास्य जायते पातो न तथा पुनरुन्रति: ।।२८५॥ अत्र पुव्यञ्जनस्यापि प्रतीति: । यत्रैको दोषः प्रदशितस्तत्र दोपान्तरा्यपि सन्ति तथापि तेषां तन्नाप्रकृत- त्वास्प्रकाशनं न कृतम। [केपाञ्चित् दोपाएां समाधानम्। (७७) कर्णावतंसादिपदे कर्णादिध्वनिनिमितिः । सन्निधानादिबोधार्थम् श्रवतंसादीनि कर्णाा्याभरणान्येवोच्यन्ते तत्र कर्णादिशब्दा: कर्णादि- स्थितिप्रतिपत्तये।
किन्तु जहाँ अन्य ही वाक्यार्थ फिर से गृहीत होता है वहां त्यक्तपुनःस्वीकृत होता है। 7 अनुवाद्-(२३. अइ्लील अर्थ)-हिंसा करने में प्रवृत्त; उद्धत, परछि- द्रान्वेषी इस (दुष्ट) का जिस प्रकार पतन होता है उस प्रकार फिर उत्थान नहीं होता' ॥२=५॥।
होती है। यहाँ पर (दुष्ट के समान ही) पुरुप-लिङ्ग (सुरतलीला प्रवृत्त) की प्रतीति
जहां पर एक दोष (दिखलाया गया) है, वहाँ अन्य दोप भी सम्भव है तथाषि उनका वहाँ (अन्मदोप-दर्शन के अवसर) पर प्रकरण न होने से प्रकाशन नहों किया गया है। प्रभा-उपर्युक्त उदाहरणों में जहां जो दोप दिखलाया गया है उसके प्रतिरिक्त अन्य दोप भी हो सकते हैं जसे कि ग्रन्थकार ने 'लम्नं रागावृवाङ्गया इत्यादि उदाहरस में अ्रनेक दोपों का प्रकाशन किया है; किन्तु एक दोष के प्रकरण में अ्न्य दोगों का प्रकाशन करना उचित नही था, अतएव सभी दोपो का एक स्थल पर प्रकाशन नही किया गया। उक्त दोष-निर्णाय के अपवाद- अरनुवाद्-'करीवतंस आदि पदों में 'करर' आदि शब्द का प्रयोग (करँ , पादि में) सात्निध्य आादि का बोध कराने के लिये होता है। (७७) - (केवल) "अ्रयतंस" आदि शब्ब ही कर्खाभूकस के वाचक है; उनमें 'कस' आदि शब्द का योग (जैसे फरस +प्रवतंस) उन (पभूयसों) की कान भादि में उपस्थिति को प्रफट करने के जिये होता है। प्रना-ऊपर जिन दोपों का विवेचन किया गया है, वे विषयविशेष के अनुमार यथासम्भव अदोप हो जाया करते हैं। उनमें से प्रथमतः कुद भर्थ-दोपों
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२६६
यथा- प्रस्याः कर्णावतंसेन जितं सवं विभूषरग। तथेव शोभतेऽत्यर्थमरगा: शवसक्ुएडलम ॥२६६॥। प्र्प्रपूर्व मधुरामोद प्र मोदितदिया्तः। आययुभृ ममुखरा: शिर-रेसरशानिन: ॥।२म२।। शरत्र कमा-श्रवस-शिरशदा: सन्निवानपतीत्यर्माः। विदीर्णा भिगुन्यारातिकराले सग्ररान्तरे। धनुर्याकिएचिक न दोप्पा बिस्फुरितं तव ॥२८८।। भत्र घमु शब्द मारढत्वावगतये- का निरूपण किया जा रहा है। जैसे काव्य में '्गावतम' दब्द का प्रयोग उपसग्य है। किन्तु जय केपल 'क्ावितम' गव्द ही सर्शाभरण के मिसे कौशादि में प्रसिद्ध है (भवतंसः कसंभूपा) तो 'वर्मानतंस' शदि मे पुनरक मा अपुष्टामं दोप होगा। इसके रामाधान के तिये अन्यकार मे बताया है कि पछाभित, यादि शब्दी गे (कही 'बसेवतंस,' एग मर्य के द्वारा वही सकसा यादि के द्वारा) उन याभूपणों की पर्र-पादि में विद्यमानता वियाित है। मनरय इनता प्रयोय सवसोजग है औोर यहाँ पुनरकि यादि दोप नही है। दिप्परो-पानामे सम्मट वा यह दोरें-गमापान प्रापीन आवार्य यामन हे पाघार पर है। इम नारिया तया उदाहूरणों मे पाव्यासद्वार-मून्र (९.२.१२-१८) का भाव स्पप्टतः प्रतिबिम्वित हो रहा मै -'न विशेयश्चे्। धनुज्याध्वमो धनुः पतिराह्ट: प्रतिपत्य। कणावितंराथवगयुण्डसशिमोेपु इएारिरत समिये। मुकाहारशव्े मुतान्दः शुद्धे। पुष्तमानामे पुप्यपरसम्पर्परय। परिकलमसर्पे पविशमरसाददाय विद्ेषत्स्य थ। हदिय प्रमुकेयु। अनुवाद-जंसे-'स (दगिनी। के पर्छाभरख मे समास भूपलों को जीत सियाह उसी प्रकार इसके पामों के कृष्डल सश्पन्त सौभायमान है॥२=। इसके धमनार सिरोमूवस से मुलोमित पुरप या गये, मिन्होंने सोकोतर मपुर गम्म से रिशाभों को प्रमोदित किया सथा जो समरों की सुम्जार से दुक यहाँ पर (करजावतंस में) 'बह' (थवसकृग्टत में), 'सबल' तपा (पिर वेदर में) 'सिरस्' शार (इन बद्गों में इन पामूपतों को) वितमानना की प्रतीनि कराने के सिये है (पतः पुनडक पादि बोष गहों)। अनुवाद- हेरनन, पहगे विदान होकर फिर सामने था घमें काते रायमों से भन्टर संज्रम के मष्य में पनुष की प्रायन्ना रे वहविहर से दुष्ट सारडी मजा पड़रने सबो ॥२८=॥ यहों पर (पनुग्या में) 'नु:" शहर का प्रयोग प्रायममा की (पनुष पर) सादनगा (पड़ा होना) का श्रेप करामे मै मिदे है। कशि केयम पया गरव ही वनस को टोरो का शेषठ है- 'मोरों उया मिम्धियी पुस'-ममररोत।
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सप्तम उल्लास: ३६७
अन्यत्र तु-
कारागृहे निर्जितवासवेन लक्कवरेणोपितमाप्रसादात्॥२८६। इत्यत्र केवलो ज्याशन्द: ।
मुक्ताहारेए लसता इसतीव र्तनद्वयम् ॥२३०॥ शत्र मुक्तानामन्यरत्नामिश्नितत्वबोधनाय मुक्ताशव्दः। सौन्दर्यसम्पत्तारुएयं वस्यासे ते च विभ्रमाः। पट्पदान् पुष्पमालेव कान् नाकर्पति सा सखे ॥२६१॥ अन्नोत्कृष्टपष्प वपये पुप्पशब्दः। निरुपपदो हि मालाशब्दः पुप्पस्ज- मेवाभिघत्त। (७८) स्थितेष्वेतत्समर्थनम् ॥५८॥ श्रन्य स्यलों पर तो (जहाँ 'आरूढ़ता' की प्रतीति अभिप्रेत नहीं होती) जसे-[रघुवंश, ६]-धनुष की डोरी के द्वारा बांध देने से निश्चेष्ट भुजा वाले, मुखपंक्ति से निश्वास (शाहें) लेते हुए, इन्द्र को जीतने वाले, लङ्गापति रावण को जिस (कातबीय) के कारागार में (उसकी) कृपा-प्राप्ति पर्यन्त रहना पड़ा।२८६। इत्यादि काव्य में केवल 'ज्या' शब्द का प्रयोग है (इसी प्रकार)- '(इस तस्सी फे) दोनों स्तन ऐसे प्रतीत होते हैं मानों प्रासेश्वर के भाति- :दन काल के हाव-भावों (विभ्रम) की (मधुर) स्मृतियों (प्रतिपति) से मन्द-२ हिलती (लसता) मुक्तामाला के रूप में हँत रहे हों ॥२६०॥ यहाँ पर मुक्ताओों के अन्य रत्नों से मिश्रित न होने का बोध कराने के लिये ('मुक्ताहार' में) मुक्ता शब्द का प्रयोग है। (अन्यथा 'हार' शब्द ही मुक्ता- माला का वाचफ है-'हारो मुक्तावलो')। (इसी प्रकार)- 'हे मित्र, जिस (रमखी) के पास सौन्दर्य सम्पत् है, तारुण्य है और नाना विष हाव-भाव हैं, वह भ्रमरों को आप्ृष्ट करने वाली पुप्पमाला के समान किन पुष्षों को आाकृष्ट नहीं फरतो' ॥२६१॥ यहाँ पर 'पुष्प' शब्द उत्कृष्ट पुप्पों के अर्थ में है; क्योंकि उपपद ('पुष्प' शब्द) रहित (केवल) 'माला', शब्द पुष्प-माला का वाचक है। प्रभा-यहाँ पर पुप्प' शब्द लक्षणा द्वारा उत्कृप्टता की प्रतीति कराता है अतः पुनरुक या अपुष्ट दोप यहां नही है। भाव यह है कि उपयुक्त प्रयोगों में जो 'कर्णा' आदि 'पुप्प' पर्यन्त शब्दों का प्रयोग किया गया है वह किसी विदेष अर्थ की प्रतीति के लिये है इसलिये वह दोप नहीं माना जा सकता।
लिये ही है। (७८) अनुवाद-मह (दोप) समाधान महाफति प्रयुक्त (स्यतेपु) शब्दों के
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न खलु कर्मावतंसादिवज्जघनकाव्चीत्यादि कियते। जगाद मघुरां वाचं विशदासरशालिनीम् ।२६२। इत्यादी क्रिया विशेषयात्वेऽपि विवत्तितार्थप्रतीतिसिद्धी 'गतार्थस्यापि विशेष्यस्य विशोपसदानाथ पवचित्पयोग: कार्यः'-इति न युक्तम्। युक्ततवे वा, चरसान्रपरित्रएरहिताभ्यामपि द्रसम्।
इत्युदाहार्यम्- पादाभयां दूरमध्वानं प्रजन्प न खिद्यते ॥२६३॥
(७६) ख्यातेडरये निर्हेतोरदुष्टता
(महाकवियों द्वारा) 'फर्रवतत' शादि के सामान 'मघनपज्वी' आदि शब्यों का प्रयोग नहीं किमा जाता (पतः ऐसे प्रयोग दोधपुक्त हो है)। 'यहु विसद मक्षरों से युक्त मधुर वचन योसा ॥२६२॥ इस्मादि में (मधुर पादि के) कियानिदापण होने से भी विवसिन अर्य को प्रतोति हो पकती है, इससिये 'गतार्यं (पदान्तरेय उक्तार्य) विशेध्य का भी विसेषस देने के मिये पहो २ प्रयोग करना उचित है' -यह (यामन पा कथन) ठोक मही। समया यदि।'गता- :र्दंश्य' सारि कथन) युकत माना जाम सो यह (घरस' आादि) नवाहरल देना चाहिए- 'यह मनुष्य जूतों (परसन) के पदिरदा से रहित धरतों से शोमतायूवश दूर मार्ग में जाता हुद भी मिन्न नहीं होता' ।२६३ [याँ 'घरसत' हवाहि 'पाद' का विशेपस है।। प्रभा-प्रवीन मापानं यामन मे पाग्ासद्वार सुप (२.२.१८) मे दोप- समापाग के सनगर पर यह बसाया -विशेगलत्य विशेषननियश्तपम् उामेरय पदस्य प्रयोप:' सभा इमके उदाहरस रूप मे जगाद मधुरो बाब विसससरणासिनीम पहु इनोर दिया है सर्थान म्ा् जनाम' परिया मे वर्ष पे द्वारा (गद म्ाार्य वाषि) 1 ही पाय गा मर्प बक्त है, फिर भी 'मपुरी विवदासग्यानिमीम' यह पिरेषल देने के लिसे 'वापन्' या प्रयोग करना समुवित नही। सापाय मन्मट का पहना है कि ऐेमे रुपनों पर विमाषिवषस हाग हो -1 विपक्ित प्रन्यय सो सपता है: जैंग-अगस मपुर विद्वान् दिसवासरमाति थ'। 'अतः वामन का गतार्परय' एतदि गपापान उभिग मही औोर मौँद गमापान की सापसपना समा भोमिस सोरार करना ही पहे तो (मुगसे ना) 'रान'
मनुपद-इसिट वर्भ में "िरदुश्य' शेम महो होगा। (०ड) जमे-
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सप्तम उल्लास: [ ३६E 444 444
यथा- चन्द्र गता पद्मगुणान भुड्क पद्माश्रिता चान्द्रमसीमभिख्याम्। उमामुखं तु प्रतिपद्य लोला द्विसश्रयां प्रीतिमवाप लक्षमी: ।।२६४। श्ंत्र रात्री पद्मस्य सङ्कोच:, दिवा चन्द्रमसश्च निष्प्रभत्वं लोकप्रसिद्ध- मिति 'न भुङ़क्ते' इति हेतु नापेक्षते। (८0) अनुकरणे तु सर्वेषाम् ॥ सर्वेपां श्रुतिकटुप्रभृतीनां दोपाणाम्। ग्रथा- मृगचनुपमद्राक्तमित्यादि कथयत्ययम्। पश्यैप च गवित्याह सुत्रामाएं यजेति च ॥।२६४।। [कुमार-सम्भव के इस पद्य में]-चञ्चल लक्ष्मी (शोभा, सुन्दरता) चन्द्रमा में रहती हुई कमल के (सौरभ आदि) गुों को नहीं प्राप्त करती, कमल में स्थित होकर चन्द्रमा की श्ञोभा (अ्रभिर्या) को नहीं प्राप्त करती; किन्तु पार्वती के मुख का आश्रय पाकर तो उसने (चन्द्र तथा फमल) दोनों में स्थित प्रीति (रमसीयता) को प्राप्त फर लिया' ॥२६४॥। यहाँ पर-रात्रि में कमल-संकोच तथा दिन में चन्द्रमा की निष्प्रभता सोक- प्रसिद्ध ही हैं, इसलिये 'न भुङ क" यह पद हेतु को अपेक्षा नहीं रखता। प्रभा-जहां किसी कार्य आदि का हेतु स्वतः ही प्रसिद्ध होता है वहां निरहेतु कथन दोप-युक्त नही होता। ऊपर के उदाहरण में-रात्नि में चन्द्रगता लक्ष्मी कमल गुणों को प्राप्त नहीं करती; इसका हेतु है-रात्रि में पद्मसंकोच। इसी प्रकार पदमाश्रित लक्ष्मी के चन्द्रमा की शोभा प्राप्त न करने का हेतु है- दिन में चन्द्रमा की निष्पभता। ये दोनों लोकप्रसिद्ध हैं, अतः 'न भुडक्ते' इस करिया के हेतु-कथन की आवश्यकता नहीं है तथा यहाँ निर्हृतुत्व दोप नहीं है। अनुवाद-अनुकरण (अर्यात् शब्द का उसी रूप में कथन) में तो समस्त दोषों का दुष्टत्व नहीं रहता। (८०) - (कारिका में),सर्वेषां सब का अर्थात् भ तिकटता आदि दोषों का। जैसे- 'यह कहता है फि मैंने मृग जैसे चक्षु वाली को देखा ओर देसो इसने 'गो' यह (गो+इति) कहा तथा सुन्ामाएं यज (इन्द्र का यजन करो) यह भी ॥२६५॥ पभा-यहाँ प्रयमार्व शृङ्ग्ारव्यञ्जक है, अतः इसमें मृदुवरणों का प्रयोग उचित है तथा अद्राक्षम्' यह पद श्र तिकट है। तृतीय चरण में गो+इति=गविति यह व्याकरण के नियम-विरुद्ध (च्युतसंस्कृति) है; 'न केवला प्रकृतिः' प्रयोक्तव्या' यह व्यांकरस का नियम है, 'अतः गौ:+ इति=गोरिति होना चाहिये। चतुर्यं वरस में 'मुन्नामाणम्' में अप्रयुक्त दोष है; कयोकि यद्यषि 'सुयामन्' (इन्द्र) शब्द कोश-प्रसिद्ध है तथापिं कवियों द्वारा अप्रयुक्त ही है।
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३७० मगव्यप्रकाण:
(८१) वव्यादयौचित्यवशाट्दोपोऽि गुण: नवचित् ववचिलनोभो (५६) वक्त-प्रतिपाद्य-व्यक्षप-वाच्य-प्रकरशादीनां महिग्ना दोपोऽपि वप चिदू गुसः क्वचिन्न दोपों न गुगाः। तन्न वैयाकरसादौ वकतरि प्रतिपार्य च. रोद्रादी च रसे व्यद्य कष्टत्वं गुए: । कमेकोदाहरसम। दीघीडबेवीड समः कश्चिद् गुएव्रद्धपोरभाजनम् । क्विप्प्रत्ययनिभ: कदिचदात्र सव्निहिते ने ते॥२६६।। चदा त्वामहमद्रानं पदुविद्यायिशारट्म्। उपाध्यायं तदाडम्माप समर्पारक्ष च सम्मदमृ।२६५।। परन्तु ये श्रतिकदृत्य आदि यहो पर दोप नहीं माने जाठे; यमोकि मे दूसरे के द्वारा प्रमुक शब्द के मनुरुरख मात्र है, मनुकार्म के दुप्ट होने पर भी मनुकरसा दोपपुरन नहीं होता। ; अ्रनुवाद्-वक्ता (योता) आदि के भौचितव के कारए कहों छोप भी गूए हो जाता है, कहीं तो यह दोनों (बीप तथा गुख) में से कोई भी नहां होता (८t) यमनादि धर्थात् यका, धोता (प्रतिपाठः, मोपनीय बोरा), व्यज्तप (रस भायावि), पाव्य तथा प्ररुरस मादि की महिमा मे दोप भी कहों कहो गुल हो जाता है, कहों म छोप होता है, न गल (गोतो)। उनमें से पवि मका बंमाफरस (म्वाकरल को विपता-प्रददन का इच्छ क) (या कुख) पारि हो चौर थोता भी बंमाररस सादि सो तथा 'शोद' (वोर, शैभता) आरदि रस स्वसय हो तो पष्टत्तर (भर्य को दुरसूता तवा शब्द को पनिबट्मा) गुद माता जाता है। प्रम से उदाहरस हैं- यंभाकरस यक्ता]- पह कोई मनुप्य तो 'बोपीद' औोर 'मेबोड़' भातु क समान गुएा [पाण्ित, दान शोय, पादि, घातु पस्ष में-ई को ए रप गुल।तपा बुदि [समृद्धि, पक्ष में ई को ऐ एप युदि का बासम नहीं। फोई बिवह अयय के समान (गवं पा सुन्न) है, मिसके समीप होने पर (सनिमके परे होने पर) भम्प में भी गुल सभा पृद्धि नहीं होते।२६। प्रभा-'दीपीर समादि गुत्त का पत्ा बैगवरण है। वर्त रिगो द्राम के तुटों का पगन दिया गल है। जिग महार ौपीड' और नेरीड भाुमों को पुछ (पईेद गुरा: १-१.२) सपा वृदि (मुबिगर्दम् ११.1) नही होड गोि दोपोरेोटाम् १.१६'गूत्र द्वारा युग मुद्ि का निषेग रिया गया है; इगी न्मर तग पाम मे कुा पुरप मुल औोर वुद्धि के भानव नहीं मे। दूगड मे-ाह प्रापम जंड्े।रिहर पहयब रा मर्शाहर (पररपा सोत) हो बाता से उमके दरे होने पह
भन्दर भे।ै उनके पाग रहते बहोे भी गगों सभा समृि में बौ्बित दे। यदा पर
अनुपाद-(पदरात बोरा)-न ममे पाविधा प्रपार म्ाशद
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सप्तम उल्लास: [. ३७१:
अन्त्न प्रोतवृहत्कपालनलकक रक्ष्नएत्कङ कर-
द्वयालोलस्तनभारभैरव वपुर्दर्पोद्धतं घावति॥२२८॥। वाच्यवशादथा- मातङ्गा:, किमु वल्गितैः किमफलैराडम्वरैर्जम्बुकाः, सारङ्ा: महिपाः, मद ब्रजथ कि शून्येपु शूरा न के।
सिन्धुध्वानिनि हुड कृते स्फुरति यत्तदुगर्जितं गर्जितम् ॥२६६।। अत्र सिंहे वाच्ये परुपा: शब्दाः । पकरणवशाधथा- विशारद आपको देखा तब अपने उपाध्याय का स्मरस किया और हर्ष का स्पर्श किया ॥६७। प्रभा-यहाँ वैयाकरण थोता है ग्रतः 'अद्राक्षं, अस्मार्द, समस्प्राक्ष' आांदि श्र तिकटु शब्द भी दोप नहीं अपि तु गुय हैं; क्योकि वैयाकरए सामाजिकों' को विशेप चमत्कार का अ्रनुभव होता है। अनुवाद-[व्यङ्गध की महिमा से श्र तिकटुत्य का गुएत्व]-अंतड़ियों में, पिरोये बड़े बड़े फपाल तथा जंधा की हड्डियों (नलक) से बने हुये भयानक शब्द करने वाले फङर आदि बहुत से नञ्बल (प्रह्ित) आभूपसों क ध्वनि से पाफाशा को प्रतिध्यनियुक्त फरती हुई, पीकर उगले हुये रुधिर की कोचड़ से व्याप्त शरीर के ऊपरी भाग पर भयड्रस्म से दिसाई देने वाले (उल्लसत्) वेग से हिलते हये स्तन भार से भयावने शरौर वाली यह फौन उद्धतरुप से दोड़ रही है ॥२६८॥। प्रभा-यहां वीभत्स रस व्यङ्गम है। परुप शब्द तथा दीर्घ समास भोज
हो जाता है। गुण को व्यञ्जना करके बीभत्स रस के व्यञ्जक होते हैं अतएव यहाँ कप्टत्व गुएा
अरनुवाद-वाच्य को महिमा से (कष्टत्व का गुरात्य), जैसे-'हे गज़ों गतिविशेष (वल्गित) से कया? अरे भृगालों, य्ययं के झाडम्बरों से थमा ? हे मृगों तथा महिषों, गर्व वर्यों करते हो ? (बलवानों से) शून्य स्थानों में फौन झूर नहीं हो जाता ? फोप के उद्रक (आटोप) से सड़ हैं विकट केसर के अग्रभाग (फोटि) जिसके उस गजशमु सिंह की समुबधनि जैसी (गम्भोर) गजना का सामने स्फुरए होने पर (स्फुरति) जो ग्जना को जाय पस्तुतः वहो गजना है ॥२६६॥। यहां सिंह के माच्य होने से (सोजगुर) के प्रकाशक, दीर्घसमास तथा विफट- वसां वाले) फठ़ोर शब्द (गुल हो) हैं (दोप नहीं)।
पुरुरवा की उक्ति] प्रकरण को महिमा से (कष्टत्य का गुसत्य) जैसे-[विक्मोर्यशीम में
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३७२ I कय्पप्रफाप:
रक्ताशोक, कृशोदरी कव नु गता त्ययत्वानुरकत जनं नो दृष्टेति भुघैष चालयसि कि वातावधृतं शिर:।
स्तत्पादाहतिमन्तरेश भवतः पुप्पोद्गमोडयं छुतः॥२0 अघ्न शिरोधूननेन कुपितस्य वनसि। कवचिन्नीरसे न गुखो न दोप: । यथा- श संवाणांगरिपाशीन परसिभिर पघनैघघंरव्यकपोपान दीर्घामातानघोघे: पुनरपि घटयत्येक सल्लाघयन् य:। घर्मा शोस्तसय बोन्तद्विंगुएाघनपूसा निध्ननिर्यिप्नपृर्त- दतार्था: सिद्धसर पैविद्धतु पृमाय: शीममंदोविघातम्।।३०१। 'हे रवताशोक, मुझ पनुरगयुक्त जन को छोड़कर यह कणोदरी कामिनी कहाँ चसो गई ? 'नहों देती; इग प्रकार (संकेत करते हुए) बायु से पष्पित सिर को मिष्या हो वमो हिलाते हो? कहो तो, उ यृशोदरी के पादाघात के बिना सुम्हारा यह (भपूर्य) पुप्पोदय फँसे हो गया, जिसफी पंसरडिया उत्मुकता से पकवरित भगरों के भण्ट के संपट्ट (टफराना) से लण्डित हो गई है ।द। यहां (रक्ताशोह के) सिर हिसने से कुच हो जाने पासे के फदन में (कम्टरय गुल है)। प्रभा-भाव यद है हि 'रकायीक' उम्यादि पद्व में विनगम्भ गुद्गार मुम्म रम है पतः यहा दीर्गसमास सभा विस्टयसों पा प्रयोग दोपयुकत है; हिन्तु प्रकाण भी मदिणा से यहा सप्टल हुस दो जाता है। मृंगे ! वहा मिभ्वाधिसंघनन मे उस्पम होने याने कोर का पकग है: पतः परप गषवित्यय मे विनमभ के पजमूर शोष का प्रक्ष होत्रा है तथा रर्गमे सन्गी पयार मु्य एम वित्नस्म का भी प्रक्षं होता है। अनुचाद- (न गुल न दोप) कहीं (गदार मारि) साररहित काम् में दप्टर्य म गुए होता है म शेप। अंगे-(मदूर मविह्न मू्यदार की सूय समुति में)-'दद्म में पपुर तपा दद् छृपा भाय के कारसा (निम्न == घरा) निकिन शवमान पामे (उप्स दिरस पु्त) उस सू्य भगवान् की सिद्ध-समुराय से स्प प्राप्त करमे पाली रदिमर्मा (पुएप.) शोम हो दुस्हारे पारों का मिवारसा बरे, जो (सूरे) दिसी सम्प सापन के बिना ही (एड) ऐसे (gfs) बनों को-मिने पा के काास गासिका सवा कर-्चरस मस गमे ह: जेप सम (सरयन) वा्पपुाषष है, भनपष बिनसा सम मपरित तमा धरपष्ट है, नअम बीय हो गया है -मौरेम फड (राता- पचन्) फिर मे मयोन (उवाय, शुमर) यवा बेता। u२+२।। प्रमा-द सममिन (पद) राम म स मे पबसा म मार दह। विवमान है सपाति नगवी मगरडा नहीं। बि सनुरूम नापरा में
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सप्तम उल्लासं: : [.३७३
अप्रयुक्तनिइतार्थौ श्लेपादावदुष्टौ। यथा- येन ध्वस्तमनोभवेन बलिजित्काय: पुरा स्त्रीकृतो यश्चोद्वृत्तभुजङ्गह्वारवलयो गङ्गां च योऽघारयत् । यस्याहु: शशिमच्छिरोह्र इति स्तुत्यं च नामामराः पायात्स स्वयमन्घकक्षयकररत्वां सर्वदोमाघवः।३०२॥।
ही तत्पर दष्टिगोचर होता है। अतएव यह नीरस काव्य है। इसमें कप्टत्व जब मुख्यार्थं का उत्कर्पक या अपकर्षक नही तो न गुए है न दोष ही। अनुवाद्-पप्रयुक्त तथा निह्तार्थ श्लेष (तथा यमक) आदि में दोष नहीं होते जैसे -- [बिप् पक्ष में] 'जिस जन्मरहित (अभवेन) शकटासुर (अनः शकटं) का प्वंस किया, जिसने वतिविजयी स्वशरीर को प्राचीन फाल में (अ्मृतहरख के समय) माहिनी रूप किया और जो दृप्तभुजङ्ग फालिय का संहारक (उद्वृत्तभुजंङ्गहा) है, जिसमें नामरूपात्मक संसार का लय होता है (रवासां लयः), जिसने (कृप्स रूप में गोवर्धन) गिरि (प्रगं) तथा (वराह रूप में) पृथ्वी (गाम्) को घारस किया (लयः+ भर्गं+-गां) देवता लोग जिसका 'राहू का शिर काटने वाला' (शशिनं मम्नाति इति शशिमत् राह्ुः तस्य शिरो हरतिइति) यह स्तुतियोग्य नाम बतलाते हैं, यावरबों (अ्रन्धक) का (ह्ारकारप) निवास स्थान (क्षय) बनाने वाला, सर्वदाता (सवंद := चतुर्वगफलप्रदः) यह लक्ष्मीपति (मा लक्ष्मीः तस्याः धवः) तुम्हारी रक्षा करे'। [शिय पक्ष में] काम्देव को भस्म करने वाले (ध्यस्तमनोभवेन-घवस्तः मनोभवः येन) जिस शिव ने प्राचीनकाल (त्रिपुरवध के अवसर) में बलिजित् भर्यात् विष्ण के शरीर को अस्न्न (बाए) बनाया (अस्त्नीवृतः), उब्वत (वासुकि आदि भुजद्ग हो जिसके माला तथा कर-कङ्गता है, जिसने गङ्गा को (शिर पर) धारए किया जिसका शिर चन्द्रयुक्त (शशिमत्+शिरः) है, देवगस जितका स्वुतियोग्य नाम 'हर' पुकारते हैं, जो अ्न्धर (नामक दत्य) का नाश-कर्ता है; यह पावंतीपति (उमाधयः) शिव सर्वदा (सर्वदा +उमाधवः), तुम्हारी रक्षा करें ।३०२।' यहाँ चिप्लु पक्ष में-(राहु अर्थ में) 'शशिमत्' शब्द पप्रयुक्त है तथा भन्धरु क्षय शब्द (यादव-गृह भर्थ में) निहतार्थ हैं। प्रभा-यहां 'शशिमत्' तथा 'दय' शब्द दुष्ट होते हुए भी मदुष्ट माने जाते हैं; क्योंकि ये श्लेप-निर्याहक है, अतः अपयुक्ततव तथा निहृतारयत्व यहाँ पर न दोप हैं, न गुए ही; क्योंकि अप्रयुक्तत्य आदि रूप से ये (शशिमत् यादि) सब्द श्लेप के उपकारक नहीं है; किन्तु स्वरूप से ह; भतएब यहाँ अपुरतत्व आदि को गुए नहीं कहा जा सकता।
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पश्लीलं क्वचिद्गुएः। चथा सुरतारम्मगोष्ट्याम, "द्पर्यैः पदेः पिशुनयेन्च रदस्यवरतु" इति कामशास्तरस्थिती- करिछरतेन सम्बावे प्रविश्यान्तचिलोहिते। उपसपेन् ध्वज: पुसः साघनान्तर्विराजते ॥३०३॥ रमकथासु- सच्ानोन्छूनमस्टूकपा टितोदर सन्षिमे। वलेदिनि स्त्रीनणं सकिरछृमे: कम्य जायते ॥३०४॥। निर्वामवैरददना: प्रशमादरीसां नन्दन्तु पापकुतनयाः गद्द माघवेन। रतमसाघितमुव: वतविप्रद्दाश्च स्वस्था भवन्तु फुरुराजमुना: सभृत्या:॥३0४॥ अप्र भाव्यमक्गलमूनकम्। अनुवाद-(प्रदसीसत्य का गुखभाष) पतीसता भी कहों २ मुए हो नाती है, जैसे रति-पोण प्रारम्भ करने के सिये किसे जाने पाले मार्तासाप में, ब्नोकि काम मास्त्र को हमापना है कि-'गोपनीय वसतु को अपर्यक (दसष्ट) परों द्वारा सुमरित करे।" [प्रोधाम्प्मक] गद-शुष्भो में (परिहस्त-काम शार्म को एर किसा) दिसो- डित भीड़ याली संबाप संकुचित) सेना (सापनानप्रीयोनि) के भोतर प्रमिष्ट होकर मोर पुरुप को म्यना (पुरुपेग्त्रिम) इमर उपर फहराती हई शोभापमानहै।२य३। यहां दधर्मक पदों द्वारा रति-कोडा का बहन है जो कामावयपर सपुार्भात प्रकट करने के कारस गुएा हो माना जाता है। रमरपा घर्पात पराग्यननक माता में (परसीनाम सुरादप हो याता है)- [सुगुपरााष्मम्तक] 'उल्टे पह हुए समा मून हुए गेषक के विदारित (घीरे हुप) चंदर के समान पलेद पुर् (मतिन माप दुक) मोनिरप स्त्ी पस में पमि (सोह) के मति- रिस्त औोर रिमिने मार्णत हो सरती है ॥३०४॥
उताइर है सपा श्ास्रत पा बोदरा है।। (भममुममश्दर] गपसों परा रसर सागा हो बाे के कााह सिनसे मैर को रूगि युछ मा है ((िर्यास), ये पाष्पुम (दाण्डम) दपसा महित सान्वित है। ममा पुतराष्ट्र के पुप (हुर्मोनन धाि) सो, मिनश परथाय गमाप्त हो प्गा है मि्शोन प्रशा को सनुराड हपा वमोहग (नापित) हिता है, सपे मेशको नएिन
महो माती समसत सूबर सरसीमार पुसाात हो है।
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सप्तम उल्लास: [. ३७५
सन्दिग्घमपि वाच्यमहिम्ना व्वचिन्नियतार्थप्रतीतिकृत्वेन व्याजस्तु- तिपर्यवसायित्वे गुमः। यथा -- पृथुकातस्वरपात्रं भूपितनिःरेपपरिजनं देव। विलसत्करेशुगहनं सम्पति सममावयोः सदनम् ॥३०६।। i ;.
प्रतिपाद्यप्रतिपादकयोर्ईत्वे सत्यप्रतीतत्वं गुएः । यथा- आत्मारामा विहितरतयो निर्विकल्पे समाधौ ज्ञानोद्र काद्विघटिततमोगन्थयः सतत्वनिष्ठाः। प्रभा-वेणीसंहार नाटक के सूत्रधार की इस उक्ति मे भावी अमङ्ल प्रकट हो रहा है; जैसे-'रक्त से भूमि को अलङ्गत करके (रक्तप्रसाधितभुवः) खण्डित शरीर वाले (क्षतविग्रहा.) कौरव स्वर्ग को चले जाएं (स्वस्थाः स्वगंस्थाः भवन्तु) । यह ग्मङ्भल पश्लील होते हुए भी भावी-अर्थ का सूचक होने के कारगा गुए है। अनुवाद्-(सन्दिग्य पद की गुशरूपता)-सदिग्ध पद भी कहीं कहीं वाच्य (पर्णनीय) धर्थ की महिमा से नियत (प्रकृत) अर्थ का निश्चय (प्रतीति) कराने. के कारस व्याजस्तुति रूप में परिसत होकर गुए हो जाता है। जैसे- [राजा के प्रति कवि की इस उक्ति में] 'हे देव इस समय हम दोनों (मेरा औौर आपका) का घर तुल्य ही है; यह (दोनों का घर) पृथुकार्तस्वरपात् [राजमवन :विशाल स्वर्ण पातों से मुक्त है-'पृरथूनि कार्तस्वरस्य सुवसंस्य, पायालित्र' और फविगृह-मूस से व्याकुल बालकों के रुदन से युक्त-'पृथुकानां शिशूनाम् आर्तस्वरस्य पात्रं स्थानम्'। भूपितनिशेपपरिजन [राजभवन-प्राभूषित समस्त सेषकों से युक्त'भूपिता: निःशेषा; परिजना: यत्र' और कविगृह-भूमि पर लेटे हुए समस्त पारिवारिक जनों से युक्त-'भुवि उपिताः (भू+उपित) नि.शेषा: परिजनाः यत्र'] तथा विलसत्करेणगहन [राजभवन-शोभायमान हृथिनियों से भरा हुमा विलसन्तीभि: करेशभिः गहनम्' और फविगृह-चूहों की सोदी हुई धूलि से परिपूरणं-विलसत्कानां सूपकाां रेशुभि: गहनम्] है॥३० ६॥ प्रभा-प्रस्तुत पद्य में 'पृथुकार्तस्वरपात्र' आादि विशेपसों के उपयुक्त प्रकार से दो दो अय होते हैं जिससे यह सन्देह बना रहता है कि कौन सा अर्थ लिया जाय अ्तः ये पद सन्दिग्ध ही है; किन्तु वाच्यार्य के सामर्थ्य द्वारा नियत, मर्ध का निश्चय हो जाता है तथा अ्रन्त में सन्दिग्ध पद व्याजस्तुति के द्वारा भाव (कवि के नृपविपयक रति-भाव) के उत्कर्ष को व्यक्त करते हैं तथा गुएस्य हो जाते है ।३०७॥ - अनुवाद्-(प्रपतोतत्य की गुसरुपता-१) बोदव्य (धोता) तथा बका दोनों को (उस भर्थ फा) ज्ञान होने पर सपतीतत्व गुख हो जाता है। जसे-[बेशोसंर
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यं पीक्षन्ते कमपि तमर्सा ज्योतियां वा परस्तात् तं मोहान्य: कथमयममु' वेति देवं पुरासम् ॥/३०७। स्वयं वा परामर्शे यथा-
ह.दि विनिहिंतरूप: सिद्धिद्स्तद्विदां य:। अविचतितमनोभि: साघफेमृ ग्यमाय: स जयति परिणद्ध: शक्तिभि: शफ्तिनाथ: ॥३०८॥। भोमसेन फो उतति]-'मात्मा में सस्तीन होने वाले, निव्कत्पक समाधि में निरन्र प्रीति रसने वासे, मात्मजान की दुढ़ता से तमोगल या मिष्यामान को (संस्कारएप) पन्मि को नष्ट कर देने वाले केयत सत्यगला मान में रियत योगी जन तमोगल समा रमोगुल के रपर्श से रहित जिसा किसी (पनिवचनीय) भगवाम् (इप्) का सामारकार करते है, मोह से सग्था यह (दुर्यीयन) उस पुराल मुदुय थ्रोडप्ल को संसे जान सप्ता है? ॥३०७ प्रता-(१) यहा पर 'निर्विकस्न' यदि पाब्द योगसाइत के ारिमािक दम् है; भतः ये पनतीत है समापि मे दोपयुक्त नही मवितु दुखरा हो है पनि यहां यका भोमरोन है तथा शोमा सहदेव दे मोर दोनों ही योपगार्म में इन गनो से परिचित है पतः सर्प प्रोति मे कम्य नहीं होना। से गब्य पसा मे पिशिष्ट ज्ञान को प्रयट करके भाषोत्पक भी है। (२) प्रतिपास मोर प्रविवार्क शब्दो से सामानिक समा पला (कनि मामि) का भी पहसा होत ह पतः चाा दे दोनों किसी सर्भ मे आडा हो यड़ा भी सपनीनाय मुसुरूप दो सोगा मै। अनुवाद-(पत्रतोतरय को तुररपता-२) (पशता म) इवर्न जिमने या पर्यामोधन में प्रनतीताय गुसतम हो जाता है। मैसे-[मामतीमायम में परासपुणडगा का विमर्न।-जिसवा र्वल्य (परमा) वोaस (इदायि) माटियों के (मरिलूर मामर) धक मध्य में रियत है, दवप में मिहित रपरता जो उमदा ज्ञान हसने दासों को सिरिगमत है. निशबल मन बसो सामप्पस भिग्णा माजेपरा करते है, यह (पाली पादि) स्तयों में पुरु ससििनाम सिर हिसमे हो मरैब्त। प्रमा-(१) वरहे पर माहो, मिि यादि पद माममारर्वमिट है पडस पशोत है; रपारि एणामबुमरणा नामक मोदिमी (बनी) स्व्मं समगर्म हर रह।
से नुस ही है। (ii) वोस् माडियो ह-१इड, र स
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सप्तम उल्लांस: ३७७
श्रघमप्रकृत्युक्तिपु प्राम्यो गुएः। यथा- फुल्लुक्करं कलमकूरशिहं वहन्ति जे सिन्धुवारविडवा मह वल्लहा दे। जे गालिदस्स महिसीदहिो सरिच्छा दे कि च मुद्धविअ्इल्लपसूणपुब्जा॥३०६।। (पुष्पोत्करं कलमभक्तनिभं वहन्ति ये सिन्धुवारविटपा मम वल्लभारते। ये गालितत्य महिपीदघ्न: सहक्षारते किब्च मुग्धविच किल्लप्रसूनपुज्जा:।३०६) अत्र कलम-भक्त महिपी-द्धिशब्दा माम्या अपि विदूपकोक्त्तौ। न्यूनपदं क्वचिद्गुएः। यथा- गाढालिङ्गनवामनीकृतकुच प्रोद्भूत रोमोद्गमा सान्द्रस्नेह रसाति रेक विगलच्छ्रीम न्नितम्वाम्वरा। मामामानद माडति मामलमिति ामाक्षरोल्लापिनी सुप्ता कि नु मृता नु किं मनसि मे लीना विलीनां नु किम ॥३१०॥। अखिमा महिमा चैव गरिमा लघिमा तथा। प्राप्तिः प्राकाम्यमीशित्वं वशित्वं चाप्ट सिद्धयः । अनुवाद-प्रधम प्रकृति (पर्थात् विट-चेट-विदूपक आदि नीच पात्रों) को उक्ति में 'ग्राम्यता' भी गुए हो जाता है। जैसे-[कपू रमञ्जरी में विदूपक की उक्ति]- 'जो निर्गुण्डी वृक्ष की शाखाएँ शालि (धान के चावल) के भात के समान कुसुमपुञ्च को धारण करती हैं, वे मुझे प्रिय हैं और जो निचोड़ी हुई (गालित- 4
निर्जलीकृत) भंस की दही के सदृश सुन्दर मल्लिका पुष्पों के समूह हैं वे भी मुभे प्रिय हैं' ॥३० है।। यहाँ फमल, भक्त, महिपी तथा दधि शब्द ग्राम्य हैं तथादि विदूषक की जक्ति में गुए ही हैं (क्योंकि ये हास्य रस के पोपक हैं)। अनुवाद-(न्यूनपद की गुसरूपता) न्यूनपद भी कहीं गुए हो जाता है, जैंसे-'गाढ प्रालिङ्गन से जिसके स्तन दब गये हैं (वामनीकृत), जिसके (शरीर में) ;रोमाञ्च प्रकट हुए हैं, सान्द्र (घने) आानन्दातिरेफ के कारएा जिसके सुन्दर नितम्यों पर से वस्त हट गया है ऐसी मेरी प्रियतमा अस्पष्ट (क्षाम=फृदा) ग्रशरों में इस प्रफार कहती हुई-"हे मानद, (मानसण्डक या सम्मानदायक), मत, मत, मुझे -अधिक नहीं (पोड़ा दो), वस फरो" न जाने सो गई, या मर गई अथया मेरे मन में लीन हो गई या (नोरक्षीरवत्) बिलीन हो गई ॥।३१०।। प्रभा-इस (अमरुशतक) पद्य में 'मा मा' के पर्चात् 'आवासय' (धान्त करो) तथा 'माति' के पर्चात् 'पीडय' (पीड़ा दो) ये पद न्मून हैं, किन्तु. यह; दोप
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. ३७८ j पागप्रकार्ग:
ववचिन्न गुखो न दोप:। यया- तिष्ठेत्कोपवशात्म्रभापपिहिता दीर्घ न सा सुम्यति सवर्गायोत्पतिता भवेन्मयि पुनर्भावाद्र मस्या मनः। तां छत्त विदुद्विपोयि न मे शक्ता: पुरोवतिनी सा नातयन्तमगोवरं नयनयोयतिति कोडयं विधि: ॥र।१।। पम् पिहितित्यलोऽनन्तर्र 'नतगतः' इत्येतैन्यृ नैः पदविशेषचुरीरकर- राप् गुएाः। उत्तरा प्रतिपत्ति: पूर्वा प्रतिपत्ि वाधते इति न दोप:। अधिकपद्ं कवचिद् गुणः । यच।- यद्वळ्चनादितमतिर्षतु घाटुगभे कार्यामुखः खलजनः कृतकं प्रवीति। तर्साधवों न न विदन्ति विदस्ति किन्तु फतु पृथा पएायमश्य न पारयन्ति ॥३१२। महीं प्श्युम गुख है, गयोंकि न पदों का अण्ाहार हो जाने से भयिम्ब ही भर्षं की प्रतीति सो जाती है तथा क्हूनपनन के नारसा नाविका के एवं सपा गमोर के माषिषम की प्रतीति होती ह मोर उससे भज्गार रसा के पतिरेक को स्न्जना होती है। अनुवाद-[मयूनपरत्य) कहों पर न गुरा होता है म शेप ही, भेंगे/विक मोबंजीय में विरही पुरष्या की शीड में] 'करानित घट (चमती) कोप के कारस सपने प्रभाव (बेवराशि या प्ररतर्धान विद्या) से सन्तहित हो गई हो ? रिम्यु (यह वुछ नहीं) यह सपिक समप सक दुदिन नहीं होती। पदाचिन यहु रवर्ग सो पती गई हो? (यह भी मुक नहों वलोदि) उसवा मन सो मुभ में सनैहयुक है। मैरे सामने विवमान पिना को हरने में मुस थो सर्थाम धमुर भी समर्भ महों। फिर भी यहु पांसों से भतपन चोभण हो गई है, यह इजा बिधान है? ।॥ यहा पर 'दिहिता' इग पर के पमगार 'मतद् पर' (वह गहो, क्वोषि) मे पर गयून (परपेरित) है. इनी प्रशार पिनीम पार में भी)। रिस्ु सूगवरय यह। गुलत नहों प्योकि (दिसहे दप भय में) यह सिवेत बुद्धि सपान मषर्मे महो नारम रता । पहु बोड भो मही, कमोनि (इन परों के दिना शी) कारतादन (ोर्घ म ता पुप्यान परवारि) शान पूर्वमावी (जिदन पोरसा" हमाि आान का ब्राप कर हेता है। (निभा नंगर' शमाह पर के डिया ही दूरश्रोि का रवेप शष्वार्ष के समान प्रर दो माता है।। सनुबाद-पपित्तदाब कहीरो गुरा होता है. पगे-कम्वश में बुँड रसमे परता रवशम गस्पर, दुध्ट सनुष्य म पादभातिता पूर्ह दनर रष्मि बचर रहना टै. उम (पचनो) को में सठजन सही हमाते है यर बात मेरो: मे रुपकने भो
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सप्तम उल्लास: [ ३७६
अन्र 'विदृन्ति'-इति द्वितीयमन्ययोगव्यवच्छेद्परम्। यथा वा- बद बद जितः स शतुर्न हतो जत्पंश्च तव तवास्मीति। - चित्रं चित्रमरोदीद्वा हेति परं मृते पुत्रे ॥३१३।। इत्येवमादौ हर्पभयादियुक्ते वफ्तरि। कथितपद् दवचिद् गुएः लाटानुपासे, अर्थान्तरसंक्रमितवाच्ये, वि- हितस्थानुवाद्यतवे च। कमेयोदाहरएम्। सिंत करकररूचिर विभा विभाकराकार, घरसिघर, कीर्तिः। पौरुपकमला कमला सापि तवैवास्ति नान्यस्य ॥३१४।
यहाँ 'विदन्ति' (जानते हैं) यह दवूसरा पद 'अन्य' [अर्थात् साधुओं से भिन्ष 4 प्रसाधु जन] के 'योग' [सम्बन्ध] का व्यवच्छेदक (व्यवच्छेदपर) अर्थात् व्यावतंक, हटाने वाला है। पथवा जैसे-'कहो यह शयु जीत लिया गया? 'मैं तुम्हारा हूँ, तुम्हारा है' यह कहता हुआ वह मारा नहीं गया; किन्तु अपने पुत्र के मर जाने पर 'हाय हाय' करके विचिन्न ढंग से रोने लगा; ।।३१३।। इस प्रकार के काव्य में वक्ता के हर्ष भम आदि से युक्त होने पर अधिकपदत्व गुए है। प्रभा-(१) 'यद्वञ्चना' आदि में द्वितीय 'विदन्ति' पद अधिकपद प्रतीत होता है; किन्तु यह अन्ययोगव्यच्छेदक है अर्यात् अ्न्य जनों से साधुओं के उस ;अनुभव का सम्बन्ध नहीं हो पाता, यह प्रकट करता है, (साधु-जन ही जानते हैं 'अन्यों पर प्रकट नहीं करते, यह भाव है) इस प्रकार यह दोप नही प्रत्युत विशेष अर्थ की प्रतीति कराने के कार गुए ही है। (२) 'वद वद' इत्यादि के चारों घरणों में कमशः हर्प, (वद वद जितः स शबुः) भय (तव तवास्मि), विस्मय (चित्रं चिय) तथा विषाद (हा हेति) से युक्त वक्ता है। यहाँ अधिक पद हर्ष आदि के अभिव्यञ्जक हैं अतएव ये दोप नही अपि तु गुए हैं। अनुवाद-फथितपद कहीं-फहों गुण हो जाता है; जसे-(फ) लादानुप्रास में, (ख) अर्थान्तरसंकमितवाच्य में औोर (ग) (पूर्वयादयगत) विधेय के (उत्तर वाक्य - में) अनुयाद में। कमशः उदाहरण है- (क) 'हे सूर्य के समान प्रचण्ड प्रतापी, पृथ्वी को धारस करने वाले महाराज, आापकी कीति श्चेतरशिम चन्दरमा की किरसों के सदृश शाहलादक (रचिरा) वन्ति थाली है तथा परात्रमलक्ष्मी और वह प्रसिद्ध'लक्ष्मी भी (दोनों) आापकी ही हैं, दूसरे को नहीं ॥३१४॥ [महाँ 'कर कर' 'विभा विभा' तथा 'कमला कमला' शब्दों मे साटानुपास हैं, कधितपदत्व अनुपास का निर्वाहक है अतः यहाँ कथितपदत्व गुए ही है)
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1 काय्यमफारं:
ताला जाप्रंति गुखा जाता दे सहिधएहिं पेप्पन्ति। रइकिरणागुग्गहि याइ छोन्ति कमलाइं कमलाईं ।२११।। (तदा जायन्ते गुणा यदा ते सहद्यमृंसन्ते। रविकिरणानुगृद्दीतानि भवन्ति कमलानि कमलानि ।) जितेन्द्रियत्वं चिनयश्य कारणं गुएप्रकपा विनयादवाप्यते। गुमपरकर्पए जनोऽनुरज्यते जनानुरागप्रभवा ि सम्पद: ॥३१६। पतत्प्रकपमपि कवचिद् गसः। यया- : उदाहते 'प्रागपाप्त' त्यादी ।३१७। समाप्तपुनरात' पर्वाचत गसो न दोप:। यम न विरेषसमात्रद्दानार्ये पनमरदणम अपि तु पात्यान्तरमेव कियते। यया सवैष 'भागपाप्ते स्यादौ' ॥३१८॥ (प) "गुल सभी (मुख) होते है, जय ये सहयपों के द्वारा मृहोन (भादृत) दिये जाते हैं। गूर्य के रश्मियों से अनुपुतीत कमस हो (परसुतः) कमत है ॥३।४।। [यहां पर द्वितीय 'कमत' वरयितपः है। इममा धर्य मोरमादियुक नमूम हो जाता है तथा यह मर्याग्तरसनमिगवास्म है औोर भगापारय ग्ोम्पेश मर्प का सम्ज है। परतः मर्यान्तरगमितवाध् (प्यनि) का निमित होने के कारण यहाँ 'भितपद' सुग् है। (न) जितेनद्रियना विनय का हारत है, विनव मे गुलोतपं प्राप्त होता है, गुलोत्र्यं से ही लोग (किसी में) अमुरह होते है, अनानुराग हो समरत सम्परावो को उत्पति का भारल (प्रमव) है।३१६।। प्रभा-पह। पूर्व वातय में बिहिा पायु का उत्तरशाय में सनुनर रिया गया है, जैंगे-पूर्यवाश्य में 'मिसेस्त्रिविता' के द्वारा 'विनम' विभेन है, उभी 'िवन' का बसर वापय में 'मुखववर्ष' के निमिशरप में सनुपाः रिया गया है सर्ाह यह उ्र्दप मा मनुराय रुम मे है। दगी प्रार मदिम वारतों मे भी है। रग प्रवार यही 'नयाामता' शरसमामा पनदुार या ननर्वाल (निविम) है सपा गूए दो गया है, दोष मही दू। अनुवाद-पपाव्यतय भी पहोनहो गूए हो जाता है. मसे (गयहाल २०१ में उद्पुत) 'मापमाणत' दमवारि पट में ।र।॥ प्रमा-'दापयास्त' (२०६) श्जाद के पपुर्ष परम दवारे नगन्तु जरमें से शोप नाता हूर परा भोप के समार में यह़ा शोमन पहा का पतोर ही
हो दणा है।
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सप्तम उल्लास:
अपदस्थसमासं क्वचिद्गुणः । यथा-उदाहृते 'रक्ताशोकेत्यादी" ॥३१६॥ गर्भितं तथैव । यथा- हुमि अवहत्थित्रेहो सिरड कुसो अह विवेअनरहिओ वि। सिविऐ वि तुमम्मि पुणो पतिहि भर्त्तिए पसुमरामि ॥३२०॥ (भवाम्यपहस्तित रेखो निरंकुशोऽथ विवेकरहितोऽपि। रवप्नेऽपि त्वयि पुनः प्तीहि भक्ति न प्रस्मरामि ॥) पत्र प्रतोहीति मध्ये दृढप्रत्ययोत्पादनाय। एवमन्यदृपि लक्ष्याल्लक्ष्यम्। ऐसा वहाँ होता है जहाँ विशेषएमात्र देने के लिए (समाप्त का) पुनः ग्रहए नहीं किया जाता अपितु (उसके विषय में) अ्रन्य वावय हो बनाया जाता है। जैसे-'प्रागप्राप्त' इत्योदि पद्य में ॥३१८॥ प्रभा-'मागप्राप्त' इत्यादि के चतुर्थ चरएा (येनानेन जगत्मु खण्डपरशुदवी हर: ख्याप्पते) में जो 'समाप्तपुनरात्तत्व' है वह दोप नहीं; क्योंकि यह एक अन्य वालय के रूप में है। यहाँ समाप्त अर्थ का विशेषणमात्र देने के लिये उसका पुनः ग्रहए नहीं किया गया। यह गण भी नही, क्योंकि किमी (उत्कर्पाधायक) प्रतीति का जनक नहीं। अनुवाद-अ्रमदस्यसमास भी कहों कहों गुए होता है। जैसे -उदाहरस (३००) रूप में उद्घुत 'रक्ताशोक' इत्यादि पद्य में ॥३१६॥ प्रभा-यद्यपि दीर्घ समास शृद्धार में अनुचित है तथापि विरही के क्रोघो- नमाद का परिपोषक होने के कारण अङ्गीभूत (विप्रलम्भ का भी उत्कर्षाघायक है अ्रंतः यहाँ गुण ही है। अनुवाद-गभित भी उसी प्रकार (कहीं गुएा हो जाता है) जैसे-(मानन्व- वर्धनकृंत 'विपमवासलीला' में काम के प्रति यौवन की उक्ति): 'हे स्वामो, मैं चाहे मर्मादा को त्यागने वाला (अपहस्तिता त्यक्ता रेखां मर्यादा येन), निरद्ग श् या विघेकजून्य भी हो जाऊ, किन्तु तुम सत्य समझो कि स्वप्न में भी भक्ति को न भूलू गा ॥३२०॥ यहाँ 'प्रतोहि' (जानो) यह (गभित वाक्य) मध्य' में' दृढ़ प्रतीति उत्पनन कराने के लिए है। : इस प्रकार अ्रन्य (किसी दोप फा कहीं गुए हम होना तथा कहों न गुए होना, न वोप) भी उदाहरणों को देखकर (लक्ष्यात्लक्ष्यं दृष्ट्या) समन लेना चाहिए। प्रभा-'भवामि' इत्यादि में एक वाकय के बीच में दूसरा वावय 'प्रतीहि (एवं)' आया है; किन्तु यहाँ 'गभितत्व' दोप नहीं है यपि तु गुए है, वयोंकिपह प्रस्तुत उक्ति में सत्यता का प्रतिपादक है और सौहादं की हकता की पतीति: कराता है।
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३८२ ]
[रसदोपा:] (८२) व्यभिचारिरसस्या यिभावाना शब्दवाच्यता। कप्टकल्पनया व्यक्तिरनुभावविभावयो: ॥६०॥ प्रतिकूल विभावादिग्रहो दीप्तिः पुनः पुनः । अकाण्डे प्रथनच्छेदी अङ्भस्याप्यतिविस्तृतिः ॥६१। प्रङ्गिनोऽननुसन्धानं प्रकृतीनां विपययः । अनङ्तस्याभिधानं च रसे दोपा: स्युरीदयाः ॥६२।। रस-दोपों का निरुपण- अनुवाद-(१) व्यमिवारी नात, (२) रस तथा (३) रमापी भागों का स्यशब् द्वारा कमन; (४) सनुभाव मोर (५) विभाव की मष्ट-पल्पना द्वारा ध्रमि- प्यकति: (६) प्रतिफस विभाय यादि का पहर: (0) बरन्वार (एक ही रस पाहि रे) सोपि; मनवसर में (पस पा) (८) विस्तार या (2) विष्छेन (पिराम); (१) पद्ु मा भम्रपान का सरयस्त बिरतार: (११) पी पर्दात् प्रधानतया दर्ष्य को उपेशा (१२) वरहृति पर्थात् पार्यों का विपमय: (१६) पानद (रग के अनुपरारक) का रमपन-इस प्रकार के (गाभानु) रग (भाघ) यादि के बोप होते हैं। (८२) टिललो-(i) पर पाहर रमा सर्षनदोय पदि के निरणागगर रसा के आदन् पपस्वंर दोशों वा विवेयन हिया जा गया है। इ पशदम रग्दोगों है नगन का मिगय उसतम्या प्पर्तन के अपसर गर रिया नादेमा। (ii) अनन्दवर्मनापायं मे रव ंयी या बिस्तार मे निसेमन नहीं रिस प विशेी गगमापारितों का दिगरंनमार पराया या भंगे-
वित् रेगा्विसायानि बासुनो म्बरय बनगम् ॥ प्शाब्द एव पिव्धिशिरशागडे व पराकाप्। परियोषं एतम्यादि पोन: दुग्पेन डीरपम् ।।
रववोद रे कर मे निगड हया मता है। पा पापामे मरमा की माटिय भा्ड ए क मिसेम देन ह।
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सप्तम उल्लास: [ ३८३
१. स्वशव्दोपादानं व्यनिचारिणो यथा- सुवोडा दयितानने सकरूणा मातङ्गचर्माम्बरे सन्नासा भुजगे सविर्मयरसा चन्द्र डमृतस्यन्दिनि। सेपर्या जहनु सुतावलोकनविघी दीना कपालोदरे
श्रन्न व्रीडादीनाम्। पार्वत्या नवसङ्गमप्रणायिनी दृष्टि: शिवायाडसतु वः ॥३२१॥
व्यानम्रा दयितानने मुकुलिता मातङ्गचर्माम्वरे सोत्कम्पा भुजगे निमेपरदिता चन्द्र Sमृतस्यन्दिनि। मीलद्भ्र : सुरसिन्धुदर्शनविधौ म्लाना कपालोदरे, इत्यादि तु युक्तम्। रस-दोप चतुर्दश हो जाते हैं। वस्तुतः यहाँ 'अ्रथानीचित्यम् सन्यच्च' यह पाठ है जिसका अथ है-'अथ अन्यत् अ्रत्यप्नकारमनौचित्यं च'। अ्रव्य प्रकार के समस्त रस-विपयक अनोचित्य का इसमे संग्रह हो जाता है। कविराज विश्वनाथ की इस कल्पना का बीज भी काव्य-प्रकाश मे निहित है। आचार्य मम्मट के 'रसे दोपा: स्युरोहशा:' इस कथन से मही प्रतीत होता है कि परिगसित कयोदश दोपों के अतिरिक्त अन्य भी जो रस के अपकर्पक है वे भी रस-दोप हैं। अनुवाद्-(१) व्यभिचारी भाव का स्वशब्द से कथन (शब्द-वाच्यत्व- रस दोप); जैसे-'नदमिलन में प्रौतिमयी पार्वती की वह दृष्टि आापके कल्याए के लिए होदे; जो प्रिय (शिव) के मुल के प्रति लज्जामयी (शिव के) हस्तिचर्ममय परिधान के प्रति करुणामयी, सर्प के प्रति भय सहित; (भाल पर स्थित) प्रमृत- वर्षा करने वाले चन्द्रमा के प्ति विस्मय-रस से युक्त; जह-पुन्नी गङ्गा के दशन से ईर्ष्यायुक्त तथा कपाल (मुण्ड-माला) से युक्त (शिय के) उदर के प्रति दन्य से भरी थी ॥३२१॥ ""यहाँ पर 'वोडा' शादि में शब्द-वाच्यत्व दोप है। 'य्यानम्रा' इत्यादि पांठ उचित है। प्रभा-व्यभिचारी भाषों का 'व्यभिचारी (संचारी)' शब्द से अभवा 'निर्वेद' आदि शब्दों से कथन करना 'शब्द-वाच्यत्व' नामक रस-दोष है। वात यह है कि अनुभावादि द्वारा अभिव्यक्त होकर ही व्यर्भिचारी भाव चमत्कार तथा आस्वाद' के प्रयोजक (निमित्त) होते हैं, यदि ये वाच्यरूप में उपस्थित हो जाते हैं' तो मगूढ़' (साक्षात्ं रूप से प्रकटित) हो जाने के कारण चमत्कार तथा मास्वादन का अपक्य हो जाता है तथा व्यभिचारियों का शब्द-वाच्यत्व नामक रस-दोत हो जाता है। जैसे ऊंपर के उदाहरए में 'परीडा' आदि व्यभिचारी भावों का ब्रीडादि संजा शब्दों द्वारा कथन किया गया है। यदि यहाँ राव्रीडा आदि के स्थान पर 'म्यानम्ना' मादि पाठ होता तो 'नम्रता' इत्यादि अनुभावो के द्वारा 'बीटा' आदि व्यभिचारी
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२. रसत्य रवशव्देन शद्तारादिशन्देन वा वान्यतयम्। कमेमोदादरगम-
नेतयो: कृतवसोडस्य गोचरे कोडप्यजायत रसो निरन्तर: ॥३२न। आलोक्य कोमलकपोत्ततलाभिपिक-
पशयैप वात्यमतिपृत्य विवर्समान: भृद्गारसीमनि तरहवितमातनोति ।२२३।
भाषों बी भभिव्पर्जना हया करती औौर यहां पर 'भारम्यि' (उम बाव्) होी पर्योंकि सनुभार्यो द्वारा पभिम्यक वीदादि यी प्रकीगि ही विरेष पमलाखारिो है यही गहदपजनों का अनुभय है। अनुवाद-(२) र का (र) सामाग्यतः सपमे दमर थर्मान् 'रस' समय से पयया (ए) 'ुद्ार' शादि (रस-विरेयपासक) समयों से कपम (सखपाभ्याच रसष
(फ) 'शाम गन्दम्धो विनम को गसुम सामी के समान तमा रृस् नी हई चपनो भुजासों के मूम (उुषगग्पिरयग) सो देसने वातो (रिव्षिुष्त मुममूर्ग सोरिनं टष्ट वमा नगभतारिररशनाय रवमुजमूगग्य ध्वाोश्नम्); ज (मादिश) को हष्टिगोपर करते हो इस (नापर) मे (दबन में) कोई (पनिर्वंमनोम) सबिसत रस अपन हो गया ३२२॥ (न) परे हेती, कोपन रयोनों पर (पाब्ुता थादि मे रुम में) पिन लडा (रोपान्य चारि द्वारा) अभिय्यत पनुरग ने भारत परनीय जम बात्ी जगा रमक्तीम मूर्ति (पासा) दो बेश कर मपे माहय भाव का धगषमल ररहे (पुगह, बदास पारि दारा) भेप्ठा परना दूदा मह (सहरा या मारम्य) समगर रग को गोमा में सरह्िता हो रहा है (पपता निरसर एम्मोन कर क्हा है। ।। ३ २ ३ै ।। प्रमा- (१) दरहो 'सा' एम 'मुभावदगंबत कााजायमान इनारीमार
मामाबिरगफ: है पर. वह वाष्त हो हो नही गरता। (२) अवाद्' रगरि में 'रम' गम द्वारा (ममस र में) रग या सममियाय सोप है रमो विमहि स
द मे दूही मूमर वा कों हम प्राधि (कोल)रिगार पाददि के दाग
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सप्तम उल्लास: ३८५
३. स्थायिनो यथा- सम्प्रहारे म्रहरणः प्रहाराणं परस्परम्। ठसक्कारैः श्ुतिगतैरुत्साइस्तरय कोऽप्यभूत्।।३२४।। १ श्रत्रोत्साहस्य। ४. कपू रधूलिघवलद्य तिपूरधौत- दिङ मस्डले शिशिररोचिपि तस्य यून: लील्षाशिरोंडशुकनिवेशविशेपक्लृप्ति- वय क्स्तनोप्नतिरभून्नवयीबना सा।३२॥ नयना वनी अत्रोद्दीपनालम्वनरूपा: शृङ्गारयोग्या विभावा अनुभावपर्यवसा- यिन: स्थिता इति कष्टकल्पना। (२) 'आालोनय' इत्यादि में विशेप-रस शृङ्गारपदवाच्य है। यद्यपि यहाँ भी शृद्धार पद से गृहीत सम्भोग द्वारा उसके विभाव आदि का आपेक्ष हो जाता है तथा उसके द्वारा सम्भोग नृङ्गर की अभिव्यक्ति सम्भव है तथापि शृङ्गारपदवाच्य हाने के कारण आस्वाद का अपकर्प ही होता है। अनुवाद्-(३) स्थायीभाव की शब्द-चाच्यता, जैसे- 'युद्ध में शस्त्रों (प्रहरख) के परस्पर-प्रहार से उत्पन्न 'ठनत्' ध्वनि .. कानों में झाने से उस (बीर) को कोई (अनूठा) उत्साह हुआ।' ॥३२४॥- यहाँ पर 'उत्साह' (स्थायीभाव) का शब्द-वाच्यत्व दोष है। !.. प्रभा-वियावादि द्वारा अभिव्यक्त स्थायीभाव ही रसरूपता को प्राप्त होते हैं, अपने शब्द द्वारा कहे गये नहीं। स्थायीभाव की स्वशब्द-वाच्यता तो दोप ही है। रसवाच्यता के समान यह दो प्रकार की हो सकती है। क-सामान्यतः शब्द- वाच्यता, ख-विरेपतः शब्दवाच्यता। यदि ऊपर के उदाहरण में 'स्थायिभावोऽस्य कोष्यभूत कर दिया जाय तो प्रथम प्रकार होगा। द्वितीय उदाहरण 'संप्रहारे' इत्यादि है। यहाँ वीर रस का स्थायीभाव (उत्साह) शब्द वाच्य है, अतः यह रस- दोप है। : अनुवाद्-(४ अनुभाव की फस्टकल्पना)-जब शोतरश्मि चन्द्रमा ने कपू र-चूएं सदृश धवल प्रकाश-पुञ्ज (द्युतिपूर) से दिङ्-मण्डल को निर्मल (ध्वलित) कर दिया तब लोलापूर्वक शिरोवस्त (शोढनी, पुश्नी) सम्भालने के विशेष ढंग से जिसके स्तनों का उभार प्रकट हो रहा था ऐसी वह (तस्सी) उस प्रसिद्ध तरस को दुष्टिगोर हुई (नयन सूमि में आ्रई)' ।३२५॥ 7 यरहाँ पर (सम्भोग) शृङ्गारोचित उद्दीपन (चन्द्रमा तया सीलाशिरोज्युर इत्यादि, तथा आालम्बन (नायिका) विभाव विद्यमान हैं, जो अनुभाव को विलम्ब से प्रतीति कराने वाले हैं (भनुभाव' पर्यवसाययन्ति प्रकरसाद्यनुसंधानसापेक्षतया विलम्बे- नावगमयन्ति इति अनुभावप्मचसायिनः); भतः फ्टकल्पना है।
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काव्यप्रकार:
२. रसस्य स्वशव्देन शृङ्गारादिशव्देन वा वाच्यत्वम्।
नेत्रयो: कृतवतोरऽस्य गोचरे कोऽप्यजायत रसो निरन्तरः ।३२२।। सालोक्य कोमलकपोलतलांभिपिक्त व्यक्तानुरागसुभगामभिराममूर्तिम्। पश्यप वाल्यमतिवृत्य विचर्तमान: शृङ्गारसीमनि तरद्गितमातनोति ॥३२३॥
भावों की अ्भिव्यं्जना हुआ करती और यहाँ पर 'भावम्यनि' (उत्तम काव्य) होती; कयोंकि अनुभावों द्वारा अभिव्यक्त व्रीडादि की प्रतीति ही विशेय चमरकारपारिसी है यही सहृदयजनों का सनुभय है। श्रनुवाद-(२) रस का (फ) सामान्यतः सपने शब्द अर्थात् 'रस' शग्व से पथवा (स) 'शृद्भार' आदि (रस-विशेययाचक) शब्दो से कथन (दव्दवाध्यत्व रस दोप है); कमराः उदाहरए- (फ) 'काम-राम्बन्घी विजय की मयूस-सक्ष्मी के समान तथा कुप उठी हुई सपनो भुजाओों के मूल (कुचसन्यि-स्यल) को देसने याली (किज्चिदुष्चं भुजमूल लोकितं टष्टं यया; नसलतादिदर्शनाय स्वमुजमूतस्य सवलोकनम्): उस (नामिका) को दृष्टिगोचर करते ही इस (नायरु) के (हदम में) कोई (भनि्वचनीय) भविस्छित रंस उत्पन्न हो गया ।३२२। 1 (ख) 'अरे बेसो, कोमल कपोलों पर (पाण्डुता आदि के एप में) स्थित तभा (रोमान्य ादि द्वारा) अनिय्यक्त अनुराग के कारस दर्शनीय रूप थासी उस रमसोव मूरति (पासा) को देस कर अपने याल्य भाव का स्तिफमल करके (पुलफ, कटाल आबि द्वारा) चेप्टा करता हृआ यह (तकस या तारण्य) 'ृस्ार रस को सोमा में तरद्मित हो रहा है (पयया निरन्तर कल्लोस कर रहा है) ।।३२३।। प्रभा-(१) यहा 'रस' शब्द 'मनुभावादिवंयलित मास्याय्यमान स्पायीभाव' के लिये माया है (रस्पते आवस्वादे दवि); क्योंकि सिद्ान्त मत के मनृसार रस सामाजिकनिष्ठ; है पतः वह वा्य हो ही नहीं सकता। (२) 'तामनस' इत्यादि में 'रग' शब्द द्वारा (सामान्य रुप से) रग का भभियान दोष है; वर्योंकि विभावादि के द्वारा समिय्यक रग हो पयंसा (मास्वार) का विषय होता है। यदि यहाँ 'रस' शब्द े मृहीन शद्गार, मादि रगों द्वारा भाशिप्त (पाशपसम्य) विभान पादि के द्वारा उस रस की पभिध्यक्ति दोनी है; यह मान लिया जाय सो दोग मह है कि रग- पदनाथ्य होने मे रग के धास्वाद का अपार्थं होगा ही। पत: पट। 'भोम्पजायत विकार मागारः', यह पाठ उचित छोक । -
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सप्तम उल्सास: ३८५
३. स्थायिनो यथा- समप्रदारे प्रहरणः प्रहाराएां परस्परम्। ठसरकारैः श्षुतिगतैरुत्साहरतस्य कोडप्यभूत् ।।३२४॥।। उन्नोत्साहस्य। ४. कपू रधूलिघवलद्य तिपूरधौत- दिङ मए्डले शिशिररोचिपि तस्य सून: ज्यक्तसत नोत्नतिरभून्नवयोवना सा।३२५॥ नमना बनो अन्नोद्दीपनालम्वनरूपा: शृङ्गारयोग्या विभावा अ्रनुभावपर्यवसा- यिन: स्थिता इति कष्टकल्पना।
(२) 'प्रलोनय' इत्यादि में विशेपरस शृद्धारपदवाच्य है। यद्यपि यहाँ भी शङ्गार पद से मृहीत सम्भोग द्वारा उसके विभाव आदि का आपेक्ष हो जाता है तथा उसके द्वारा सम्भोग शृङ्धर की अ्र्परभिव्यक्ति सम्भव है तथापि शृद्धारपदवाच्य हाने के कारण आस्वाद का अपकर्म ही होता है। अनुवाद-(३) स्थायीभाव की शब्द-वाच्यता, जैसे- 'युद्ध में शस्त्रों (पहरण) के परस्पर-प्रहार से उत्पन्न 'ठनत' ध्वनि कानों में आने से उस (वीर) को कोई (अनूठा) उत्साह हुआ। ॥३२४॥ 1 यहाँ पर 'उत्साह' (स्थायीभाव) का शब्द-वाच्यत्व वोष है। 14 प्रभा-वियावादि द्वारा अभिव्यक्त स्थायीभाव ही रससूपता को प्राप्त होते हैं, अपने दब्द द्वारा कहे गये नहीं। स्थायीभाव की स्वशब्द-वाच्यता तो दोष ही है। रसवाच्यता के समान यह दो प्रकार की हो सकती है। क-सामान्यतः शब्द- वाच्यता, स-विशेपतः शब्दवाच्यता। यदि ऊपर के उदाहरण मे 'स्थायिभावोऽस्य कोप्यभूत् कर दिया जाय तो प्रथम प्रकार होगा। द्वितीय उदाहरण 'सप्रहारैं' इत्यादि है। यहाँ वीर रस का स्थायीभाव (उत्साह) शब्द वाच्य है, अतः यह रस- दोप है। -अनुवाद्-(४अनुभाव की फष्टफल्पना)-जब शीतरदम चन्द्रमा ने कधूर-चूं सद्श धवल प्रकाश-पुञ्ज (ध्ुतिपूर) से दिङ्-मण्डल, फो निमल (ध्वलित) कर दिया लब लोलापूर्वक शिरोवस्न (ओोढनी, घुन्नी) सम्भालने के विशेष ढंग से जिसके स्तनों का उभार प्रकट हो रहा था ऐसी वह (तस्सी) उस प्रतिद्ध तर्स को वृष्टिगोचर हुई (नयन सूमि में श्राई)' ॥३२५॥ .यहाँ पर (सम्भोग) शृद्धारोचित उद्दीपन (चन्द्रमा तथा लोलाशिर्रोुर इत्यादि} तथा आलम्बन (नायिका) विभाय विद्यमान हैं, जो अनुभाव की विलम्य से प्रतीति कराने वाले हैं (अनुभाव' पर्मवसाययन्ति प्ररुरणाद्यनुसंयानसापेक्षतमा नावगमपन्ति इति अनुभावपर्मयसायिनः); अतः फप्टकल्पना है।
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३८६ कामप्रकान:
५. परिहरति रति मति लुनीते रखतति भृशं परिवतते च भूय:। .. ' .. इति वत विषमा दशास्य देहं परिभवति प्रसभ किमन्न कु्मः ॥३२६॥ सत्र रतिपरिद्दारादीनामनुभावानां करुणादावपि सम्भवात् का- मिनीरूपो विभावो यत्नतः प्रतिपाद्यः। ६. प्रसादे वर्तस्व प्रकटय मुदं संत्यज रुपं प्रिये, शुष्यन्त्यक्षान्यमृतमिव ते सिब्चतु वच:। निधानं सौख्यानां तएमभिमुखं स्थापय मुखं . न मुग्घे, प्रत्येतु' प्रभवति गतः कालहरिय: ॥३२॥॥ श्र्न शृद्गारे प्रतिकूलश्य शान्तरयानित्यताप्रकाशनरूपो विभावस्तत्म- काशितो निर्वेदश्च व्यभिचारी उपात्त:। प्रभा-मून में 'वप्टकल्पनया व्यक्ति: सनुभावविभावदो' का अभिप्राय है- पूर्वंदलोक के अनुसन्धान से अथवा प्रकरस आदि की पर्यालोचना से अनुभाव चर विभाव की प्रतीति होना। 'कमू'र' आदि उदाहरण में नायिरुनिष्ट किसी भनुभाव का रल्लेस नहीं किया गया, न ही विभाव के द्वारा किसी अनुभाव की भविलम्या से प्रतीति हो रही है। अतः प्रकरणादि के भनुसंधान द्वारा यहां विलम्ब से अनुभाव की प्रतीति होती है, इसी से यहा अनुभाव की कष्ट-कल्पना है। अनुवाद-(५. विभाव की कप्ट-फल्पना) 'यह (यस्तुमों में से) प्रीति को हटा रहा है, वस्तु-निश्चम (पहचान) की शक्ति को लो रहा है (सुनीते-फाटता है), मत्यन्त स्खलित होता है (ठोकर साता है या भूल करता है), यार २ चक्कर साता है, सेद है कि इस प्रकार वियम (विरह क) सथरया इस (नामफ) के शरीर को यरमस पभिभूत कर रही है, इस विषय में वया करे? ॥३२६॥ . - यहाँ 'रति-परिहार' आदि अनुभावों के करुस (भयानक' यीभतस) यादि में भी होने के कारस फामिनीहप (पालम्बन) विभाय प्रयत्नपूर्यक जाना जा सकता है। प्रमा-'परिहरति' आादि में नामफनिष्ठ विभलम्भ शृष्दार के कान्तारप भाम- म्बन विभाय का यहान नहीं किया गया। 'रति-परिहार' मदि धनुभाषों के द्वारा भी उसकी भविलम्य प्रतीति नहीं हो मरती, श्जोकि 'रति-परिहार' आदि'वर्स, भयानक तथा बीभत्स रस में भी सम्भव है। इसलिये यहाँ प्करसावि ज्ञान के द्वारा विलम्य से (कष्टपूर्वक) विभाव की मल्पना हो सकती है राया विनम्य के कारस पास्वाद में विप्न होता है। अनुवाद्-(१. प्रतिकूस विभावादि मह) (क)- (मानवनी मापिका के' प्रति नामर को उसि]-'हेप्रिये, प्रमन्न हो जामी, हर्ष भषट करो, कोप को धोड़ थो, मेरे सूस्षते प्रम्मों को सुम्हारी पमृत-सो थाली तिन्चित करे, धानन्द पे निधान सपने मुस को क्एा भर को मेरे मामने फर सो, हे विवेकरहित मुग्बरी गया हुमा कामस्वी मृग सोटा नहीं सकता' ३२॥ परहा पर (प्रहत) -मर रस के विरव अनित्वतानकामन रप शार रम क
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सप्तम उस्लास: ३८७
गिहुअरमसाम्मि लोअएापहम्मि पडिए गुरुअए मज्फरिम। सअलपरिहारहिअशा वणगमएं एव्व महइ वहू।३२६॥ (निभृतरमणे लोचनपथे पतिते गुरुजनमध्ये। सकलपरिहारहृदया वनगमनमेवेच्छति वधूः॥३२८॥ शत्र सकलपरिहार-वनगमने शान्तानुभावी। इन्वनाद्यानयनव्या- जेनोप भोगार्थ वनगमनं चेतू न दोप:। ७. दीप्ति: पुनः पुनर्यथा कुमारसम्भवे रतिविलापे। 5. अकाएडे प्रथनं यथा-वेोसंहारे द्वितीयेऽद्क डनेकवीरचये प्रवृत्त भानुमत्या सह दुर्योघनस्य शृङ्गारवरणनम्। (उद्दीपन) विभाव तथा उस (अनित्यता प्रकाशन) से प्रकाशित 'निर्वेद' रूप व्यभि- चारी भाव का ग्रहण किया गया है। (ख) 'गुरुजनों के बीच में गुप्त-प्रेमी के दृष्टि-पय में पड़ते हो यह बधू सफल गृहकार्य त्याग का मन बनाए, वन-गमन करना ही चाहती है'।३२८॥ यहाँ 'सर्व-त्याग' और 'वन-गमन' (दोनों) शान्तरस के अनुभाव हैं। यदि इन्धन आदि लाने के बहाने से उपभोग के लिये चनगमन है, तो दोप नहीं। प्रभा-(१) प्रतिकूल विभावादिग्रह वह रस दोप है जहाँ प्रकृत रस के विरुद्ध-रस सम्बन्धी विभाव-अनुभाव तथा व्यभिचारी भावों का ग्रहण होता है। यंहां 'प्रसादे' इत्यादि (क) में प्रतिकूल विभाव तथा व्यभिचारी का ग्रहस है तथा 'निभृतरमणे' इत्यादि (स) में प्रकृत रस शृङ्गार है। उसके विरुद्ध-रस अरथात् शान्त से 'सकलत्याग' तथा 'वनगमन' आदि अनुभावों का यहाँ ग्रहण किया गया है; अतः प्रतिकूलानुभावग्रह रसदोप हैं; क्योंकि इससे पङ्गार-रस का विच्छेद होता है। यदि हन्धनादि लेने के बहाने सम्भोग-हेतु वनगमन है तब ये शद्गार के अनुभाव हो सकते हैं अतः दोप नहीं रहेगा। अ्रमरनुवाद्-(७. (भङ्गभूत रस की) 'पुनः पुनः दीप्ति' जसे 'कुमारसम्भव' के रति-विलाप में। प्रभा-'दीप्ति पुनः पुनः' वह रम दोप है जहाँ किसी अङ्गभूत रस का परि- पोप हो जाने पर भी (रुक रुक कर) बार बार उसे उद्दीप्त किया जाता है। 'यह दोप प्रबन्ध-काव्य में ही सम्भव है। इसी से कुमारसम्भव के रतिविताप सन्दर्भ को उदाहरस रूप मे प्रस्तुत किया गया है। वहाँ 'अय मोह परामणा सती' (४-१) इत्यादि द्लोक से दीपित कस्स रस को 'अथ सा-पुनरेव विह्वता' (४-४) इत्यादि श्लोक द्वारा पुनः परिपुष्ट किया गया है तभा वसन्त दर्वन से विन्छिम्त हो जाने पर 'तमवेक्ष्य रुरोद सा भृशम्' (४.२६) इत्यादि श्लोक से फिर दीपित किया गया है। एक रस के बार बार आस्वाद से सहदर्वों की पररच हो जाती है, भतएव यह दोप है'। अनुवाद-(र) :परकाण्डे प्रयन' अर्थात् मिना अयसर के रस-वर्एन, r
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1 काव्यप्रकाश:
६. अकाएडे छेदो यथा वीरचरिते द्वितीयेऽक्क राधवमार्गवयोर्घा- राधिरूढ्ठे वीररसे 'कह्एमोचनाय गच्छामि' इति राघवरयोकती। १०. अङ्गस्याप्रधानर्यातिविस्तरेख वर्णनं यथा हयम्रीवयधे हयमी- वस्य। ११. श्रद्गिनोऽननुसंधानं यथा रत्नावल्यां चतुर्थेऽक्ध घाभ्रव्यागमने सागरिकाया विम्मृति: । जंसे-येशोसंहार के द्वितीय भद्द में अ्रनेक वौरों (भीष्म आादि) के बिनाश का प्रसस् होने पर भी भानुमतो के साथ दुर्योधन के शृद्गार का बरांन करना। प्रभा-अवसर के अनुकूल रस का ही भास्वादन किया जा सकता है, मन्य का नहीं; जैसे ऊपर के प्रसद्त में करसा तथा वीर का ही आस्वादन सम्भय है, ऋभ्ार या नहीं। इसलिये यह दोप है। अनुवाद-(c) धफाण्डे सेद थर्थात् मिना सयसर के रस-विच्छेवा जैसे वोरवरित नाटक के द्वितीय श्रद्त में-राम तथा परशुराम के युद्ोरसाह में पविन्धिम रप से प्रयुत होने पर राम को इस उक्ति में-"कदूएामोघन (विवाह के बशम दिन का उत्सयो के लिये जाता हूँ।" प्रभा-'वद्धणमोवनाय गध्छामि' इस उक्ति से अनवसर में ही दस-विष्येर हो जाता है। यह रम-दोष है क्योंकि इससे (नायक) रामचिपयक घर-रस के आास्वाद में बाघा पड़ती है ध्वन्यालोक (३.१६) में इसका। 'मकाण्ड-वि्धिति' नाम, से निर्देद किया गया है। न्नुवाद-(१०) भ्रम्म पर्यात् अप्पान (प्रतिनायक यादि) का पावनत विस्तार से यहन; जैंसे हयप्रीमयय नामरु (पामोरफ मेष्ठकविकृत) नाटफ में (प्रतिनायर) हयप्रीय का वंन। प्रभा-यहां प्रतिनायक मादि के विस्तृत चर्णन मे सद्गत रम ना हो प्रधान रुूग से मास्यादन होगा, नायरगत (प्रधान) रम पादि का नहीं, पतः यह रस दोप है। इस दोप पा स्वन्यानोफ में मुन्दर विवेचन किया गया था- भर्मं धान्यो रसा- भा हेसुर्पत् प्रस्तुतरसापेदाया मस्तुनोऽ्यरम,कर्था्यन्वितरयापि विस्रेस नमनम्। पया विपसमभृद्जारे नायकरम कस्यविद् घलावितुमुपभान्ते कषेपमरावतद्रार- नियन्यनरसिफतमा महता प्रबन्पेन पर्वताशयसंने। 1- अनुवाद- (११) पहो का अनतुसनान सर्पात् प्रमाननूत मादर पारि पन पिरमरण मसे रानायली (नाटिका) के चवुर्ष चद् में याजम् (तिहसेशवर के कन्चुफी) के सागमन के समय सामरिका (रप में स्पित रत्नापसी) का (ना्मस वासराज द्वारा) विस्मरस। प्रना-(१) भाव यह है कि प्रबन्प में रग वैगिष्य के मिसे एक रम प्भ्गी संदा पन्न पठासूर रब्ये नाने है। प्रपान (नावह तमा नारिता) यादि के सनुगग्पा
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सप्तम उल्लास:
i१२. प्रकृतयो दिव्या अररदिव्या दिव्यादिव्याइ्च, वीररौद्रशृङ्गारशा- न्तरसप्धाना घीरोदात्त-घीरोद्वत-धीरललित-घीर प्रशान्ताः, उत्तमाघमम- ध्यमाइच। तत्न रतिहासशोकाद्भुतानि अरदिव्योत्तमप्रकृतिवत् दिव्येध्वपि। किन्तु रतिः सम्भोगशवृङ्गाररूपा उत्तमदेवताविपया न वर्णनीया। तद्वरसेनं हि पित्रो: सम्भोगवर्णानमिवात्यन्तमनुचितम। क्रोधं प्रभो, संहर संहरेति यावदिगर: खे मसतां चरन्ति। तावत् स वहिर्भवनेत्रजन्मा भस्मावशेपं मदनं चकार ॥३२६॥। इत्युक्तवद् भ्र कुटयादिविकारवर्जितः क्रोध: सद: फलदः स्वर्गपाता- लगगनसमुद्रोल्लइ्गनाद्य स्सा हश्च दिव्येष्वेव। अदिव्येपु तु यावद्वदानं प्रंसिद्धमुचितं वा तावदेवोपनिवद्धव्यम्।अ्रघिकं तु निवध्यमानमसत्यप्रति- -नाघीन हो उसके मुख्य रस की धारा अविच्छिन रहती है; उसके विस्मरण से वह धारा विच्छिन् हो जाती है; जैसे ऊपर के सन्दर्भ मे सागरिका के विस्मरण से साटिका-प्रतिपाद्य शृद्गार रस विच्छिन्नपायः हो जाता है। (२) ध्वन्यालोककार ने रस-दोपों में इसका उल्लेख नहीं किया; किन्तु रसानुसन्धान को रसव्यञ्जकता के एक : निमित्त के रूप में निरूपित किया था-'इद चापरं प्रबन्धस्य रसव्यञ्जकत्वे निमितं ·'रमस्या द्ि्नोऽनुसन्घिश्च (३ १: वृति) अनुवाद्-(१२ प्रफृतिविपर्यय)-प्रकृति (नायक आवि) के तीन प्रकार हैं-१. दिव्य [देवरूप इन्द्र आदि], २. अदिव्य [मनुप्यरूप वत्सराज आादि] तथा ३. दिव्यादिव्य [मनुध्यरूप में प्रवतीएं राम आदि] (ये तीनों भी चार चार प्रकार के हैं) (i) वीररसप्रधान धीरोदात्त, (ii) रोद्ररसप्रधान धीरोद्धत, (iii) शृङ्गार रसप्रधान धीरललित तथा (iv) शान्तरसप्रधान धीरप्रशान्त [शीराम, भार्गव, कृष्ण तथा जीमूतवाहन कमशः उदाहरस हैं] 1 ये (द्वादश) उत्तम, मध्यम और प्रधम (रूप से) (३६ प्रकार फे) होते हैं। उक्त प्रकृतियों में (तन्न) से रति, हास, शोक तथा अद्भुत (ये भाव) पविव्य उत्तम नायक के समान दिव्य नायकों में भी होते हैं' किन्तु सम्भोग ृद्वार रुप रतिभाव का उत्तम देवताओं के विषय में वर्सन नहीं करना चाहिये; क्योकि उसका वणन माता-पिता के सम्भोग वसंन के समान प्त्यन्त अनुचित है। "हे प्रभो, क्रोध को रोको, रोको इस प्रकार से देवों (मरताम) को वालो -पयों हो आकाश में फैलती है त्यों ही शिवजी के नेत्र से उत्पन्न हुई भग्नि ने कामदेव को भस्म-मात्र (शेष) कर दिया ॥३२६॥' इस उक्ति के समान भ्रुफुटि (भौह चढ़ाना) आादि विकार रहित तथा तरकाल फलदायक क्रोध एवं स्वर्ग, पाताल तथा आकाश गमन तथा समुद्र के उल्लचून 1, आदि रूप (भतिमानवीय) उत्साह का दिव्य पात्रों में ही बंन करना चाहिए।
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३६० 1 क व्यिप्रकारशं:
भासेन नायकवद्वर्तितव्यम् न प्रतिनायकवद् इत्युपदेशे न पर्यवभ्येत्। दि. क्यादिव्येपु उभयथाऽपि। एवमुक्तयी चित्यस्य दिव्यादीनामिव धीरोदाच्ता दीनामप्यन्यथावर्णनं विपर्यय:। 1 तत्रंभवन् भगवन्नित्युत्तमेन न अ्र्प्रघमेन सुनिप्रभृती न राजादौ, भट्टा- रकेति नोत्तमेन राजादौ प्रकृतिविपर्ययापत्त वच्यिम्। एवं देशकालचयो जात्वादीनां वेपव्यवहारादिकमुचितमेवोपनिबद्धव्यम्। पादित्य (मानव) पानों में तो जितना वृत्त (श्रवदानं कर्म वुत्तम्-पमरकोप) लोक पसिद्ध है सथया उचित है, उतना ही बांन करना चाहिए। धरीचित्य से धमिरु मसंन तो घसत्य प्रतीत होने के कारख-'नायक के समान व्यवहार करना चाहिए प्रतिनायक के समान नहीं इस उपदेश में पर्मवसित (सात्पर्य रसने वासा) न होगा। दिव्यादिव्य पाशो में दोनों (दिव्य तथा सदित्य) के योग्य ही वर्सन करना चाहिए। इसी प्रकार विष्य आादि (नामकों) के विधय में उपत शौचित्य के विपरोत वर्सन के समान घोरोदाल थार्दि (उत्तम आादि) के चौषित्य के विपरीत यहन भी प्रकृति विपयय है (एवं दिव्यायीनामुक्तस्य भौवित्वस्म अन्यया वएंनमिय धीरोदालावीनमपि सौधित्यस्य सन्मया वंनं प्रफतिविप्यंय :- यह सन्यय है)। (सम्बोधनविषमक श्रोित्य)'तम भवन', 'भगवन्' यह (सम्बोधन) उत्तम प्रकृति द्वारा ही प्रयु् किया जाना चाहिए : प्रधम प्रकृति के द्वारा नहीं और उस (उत्तम प्रकृति) को मुनि यादि के विषय में हो प्रयोग करना चाहिए, राजा यादि के विपम में नहीं। 'भट्टारक' यह (सम्बोधन) उत्तम मिस्न पात्र के द्वारा राजा (राजश्यातक) सादि के विपम में प्रयुत्त दिया जाना चाहिए। प्रत्यया प्रकति-विपर्यम हो जापगा। इसी प्रकार वेस, फाल, मायु तथा माति के अनुकूल ही मेरा, उयवहार भादि का वसन करना चाहिए। टिलली-मराचार्य मम्मट मे प्रफृति-विपमंय नामक रसनदोष मत विवेमन ध्यन्गालोक तपा मजन्पालोरलोचन के आापार पर किया ह। भानग्वर्मनापा्य ने (ध्वन्यासोक, ३.१०) प्रयग्गगत रस के व्य्चन हेतुभों के प्रमद्भ में आयोचिरम का उल्लेग किया है राथा 'भावोधित्वं सु पद्टस्वोधित्वाम्' इस प्रकार मारम्य कसते हए विस्तारपूर्यंक प्रककुति-सम्यन्धी भौपित्व वा बन किया है। प्यन्यालोन की स्यारदा में सामाय सभिनवकुप्त ने भी इमका पिशन विपेनन किया है। उनके एक वारन मैं ही इग दन्दर्न का सारार्य निहिति ह-'एतदुक' भवनि-पत्र विनेवार्मा प्रतीति- सण्डक्षा न जापसे तादपु बसंनीमम्।' (ii) दसरूपफरार पनञ्जय मे भी सार एू में यही करा है-(दरक्षक प्रकाय २) • मसमानुमितं रिश्विमानवरय रसरय थ । बिर्च तरपरित्वाम्यम्यपा या वरतपदेत्।
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सप्तम उल्लास 44
१३. अनङ्गश्य रसानुपकारकस्य वर्णनम्। यथा-कपू रमब्जर्यां नायिकया स्वात्मना च कृतं वसन्तवर्णनमनादत्य बन्दिवर्सितस्य राज्ा पशंसनम् ।
उक्त हि ध्वनिकृता- 'ईटशा' इति। नायिकापादप्रहारादिना नायककोपादिवर्णनम्।
"अनौचित्याहते नान्यद् रसभङ्गस्य कारगम। औचित्योपनिवन्वरतु रसस्योपनिपत्परा"।इति॥ 26 इदानीं क्वचिददोपा अप्येते-इत्युच्यन्ते। r (८३) न दोष: स्वपदेनोक्तावपि सञ्चारिख: क्वचित् । अनुवाद :- (१३) अ्रनङ्ग अर्थात् रस के अनुपकारक का वशंन (प्रनङ्ग- स्याभिधानम्) जैसे-(राजशेखरकृत) कपू रमञजरी में (विभ्रमलेखा नाम की) नायिका तथा अपने द्वारा वसित वसन्त वर्सन का अनादर करफे बन्दी द्वारा बसन्त -वर्न की राजा (चण्डपाल) द्वारा प्रशंसा।[यह प्रकृत रस का अनुपकारक होने से 'रस-दोष हो है]। (सूत्र में) 'ईदृशाः' (रसे दोषा स्युरीदृशा) 'इस प्रकार के' फहने का अभि- प्राय है कि नायिका के पाद प्रहार आदि से नायक के कोप आदि का (अनुचित) वणन भी रसदोप है। जैसा कि ध्वनिकार ने कहा है-अनौचित्य के अ्तिरिक्त रसभङ्ग का और कोई कारण नहीं है, औचित्य का अनुसरस करना ही रस का 'परम रहस्य है। प्रभा-'रसे दोपा: स्पुरीदृशाः' से आचार्य मम्मट का यही अभिप्राय है कि समस्त दोप-अनौचित्य के वरण ही होते हैं। दोपों का परिगशन तो केवल प्रदर्शन हेतु किया गया है अतः परिगशित दोपों के अतिरिक्त अन्य भी रस-दोप हो सकते हैं। अनोचित्य ही रस-विच्छेद का हेतु है इस कथन की पुष्टि के लिये मम्मट ने आ्ानन्द- वर्घनाचार्य की मान्यता को भी उद्ध त किया है। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि साहित्य दर्पणकार ने शेप सभी रस-दोपो के संग्रह के लिये 'अन्यद्ग्ननीचित्य' नामक "एक रस-दोप की ही उद्भावना कर लो है। इस प्रकार आचार्य मम्मट की रस-दोप समीक्षा में उनकी ध्वनि तथा "रसविपयक मर्मज्ञता की मलक 'है तथा इसके द्वारा आलद्कारिकों की दोप-प्रकार-विवेचना मे रसवादियों के द्वारा एक नवीन भध्याय का उद्घाटन हो जाता है। रस-दोषों के अपवाद- अनुवाद्-उपयुक्त रस-दोषों में से कुछ (एते) कहीं कहों दोष नहीं माने जाते; अब इसका निरूपण किया जा रहा है- स्वशब्द वाच्यता की अदोपता] कहों कहीं व्यभिचारी भाव के स्वशव्द- म्राच्य होने पर भी दोष नहीं होता (८३)। जैसे-'नव मितन के अयसर पर उत्सुफता
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कांव्यप्रकाय: 444+
यथा- ओत्सुक्येन कृतत्वरा सहभुवा व्यावतमाना हिया तस्तेचन्धुवधूजनश्य वचनैर्नीताभिमुखयं पुनः। टप्टवाडप चरमात्तसाध्वसरसा गौरी नवे संगमे संरोहतपुलका हरेय इसता रिलिप्टा शिवायास्तु य:॥३३०॥l अत्रीत्मुक्यशब्द इच तदनुभावीन तथा प्रतीतिकृत्। अतयव 'दूरा द्ुत्सुक्तम्' इत्यादौ ्रीडाप्रेमाधनुभावानां विवलितत्वादीनामिवोत्सुकत्वानु भावर्य सइसा प्रसरणादिरुपत्य तथा प्रतिपत्तिकारित्वाभावादुत्सुकमिति फृतम्। (८४) सञन्चार्यदिविरुद्धस्य वाध्यस्योक्तिमु रावहा ॥६३।। घाष्यत्पेनोकिर्न परमदोप:, यावत्मकतरसपरिपोपवृन्। यया- क्वाकार्य शशलद्मणः पत्र च कुलम्-इत्यादो॥३३१। के कारस शोघता करती हुई, पर सहज सब्जा से लौटती हुई, फिर सम्बन्धी बमूजन के प्रनेर (प्रोतताहन देने यासे) यघनों द्वारा (शिव्र के) सामने से जाई गई, पत्ि को आपे देस फर भय तथा मानन्व का अनुभय करती हुई, पुसकित हई, ता हंसते हुए शिय-दवारा मालिद्वित पार्वती तुम्हारे फल्यास के लिए होपे ॥३३०॥ महा (रत्नायसी की नानी में) 'वोत्मुष्य' शब्त के समान उसरा ('वर' रप) सनुभय उस (उत्मुफता) को वैसी (पसन्दिग्य रूप से) प्रनीति नहींकरा सकता। इसलिये 'दूरादुत्युकम्' इत्यादि (उदाहरण २६) में बीळा, प्रेम आादि (म्यमि- घारी भावों) के 'वियतन' मादि (नुभावों) के समान सोमुपम (सपभिषारी) के अनुभाय 'सहसा प्रसरण' आदि के पभीष्ट (तथा) प्रतोतिकृत् म होने के शारर चत्गुरु' यह दरद प्रयुक्त किया गया है। - प्रभा-भाय यह है कि 'भौत्युक्य' नामक व्यभिचारी माव या भोई। ऐगा मसाधारण भनुनाव नही जो अरान्दिग्य रुप से औत्युष्य की प्रतीति यण सये । जो 'ह्वरा' यादि उमके पनुभाव है ये मयापारस नहीं; परपोकि से.न'सदि के.भी व्यन्जक होते है; यव: मोरुय' प जयसोपशन दोप नहीं माना जाता पुवोकि पह, मास्माद-विघावक-नहीं होता। 'दरापुरमुकम्' इत्यानि परमरमि समर यति कौ उक्ति मे भी यही मिद होता है कि 'हदरा आदि पनुनाय 'पोस्ुक्य के मगन्दिम्य रूप से स्पं्जर नहीं है तमा परीनही धभिचारी भाव या रवसम द्वारा प्हस मावरतक हो जाता है। घनुयाद-[कहो प्रतिरूसविभायादि यह की भोपता] महत रम-विरोषो रम के भी व्यभिवारी भाइ (विभाष, समुभाव) सादि का माध्मतम एम में कपन] गस एम हो बागा है। (४) (नरिक के) गप्परवोकि: सर्पान् बाध्याय रप से कपन (परि इस प्रभार
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सप्तम उल्लास: ३६३
अपरत्र बितर्कादियु उद्गतेप्वपि चिन्तायाभेव विश्रान्तिरिति प्रकृतरस. परिपोष: । पाएडुक्षामं वदनं हृदयं सरसं तवालसं च वपुः। आवेद्यति नितान्तं क्षेत्रियरोगं सखि, हृदन्तः ।३३२।। इत्यादी साधारणत्वं पाएडुतादीनामिति न विरुद्वम्। फयन किया जाय कि वह प्रकृत रस के व्यभिचारी आदि से बाधित हुआ प्रतीत हो) केवल (परम्) शदोप ही नहीं अपितु रस का परिपोधक है पतः वह गुए हो. जाता है। जंसे-ववाकार्म.इत्यादि (ऊपर उदाहरण ५३) ।।३३१।। - इस पद्य में वितर्क आदि. (शान्त रस.े व्यभिचारी भावों) का उदय होने पर भी उनकी चिन्ता (शुद्गार के व्यभिचारी भाव) में ही समाप्ति हो जाती हैं- इसी हेतु प्रकृत रस अर्यात् 'भावशबलता' (रस्यते आस्याद्यते इति रसः-इस व्युत्पत्ति से 'रस' पद 'भावशबलता' पर्यन्त का वाचक है) का परिपोपस होता है। .. प्रभा-जब विरोधी रस के विभाव आदि का बाध्यत्व रूप में कथन किया जोता है तो प्रतिकूलविभावादिग्रह नामक रस-दोप नहीं होता। इसके विपरीत वहाँ गुए अर्थात् रस की उत्कर्पाधायकता मानी जाती है। जैसे 'ववाकार्यम्' इत्यादि में। यहाँ प्रत्येक चरण के पूर्व भाग (ववाकार्य शशलक्ष्मणः क्व च कुलम् आदि) में (विरुद्ध) शान्त रस के व्यभिचारी भाव 'वितर्क' आदि व्यङ्गथ हैं तथा उत्तरभाग ('भयोऽपि दश्येत सा इत्यादि) मे शृद्धार के व्यभिचारी भाव 'औत्सुक्य' आदि 'ष्यङ्गभ्न हैं। 'औत्सन्य' आदि के द्वारा पूर्वोक्त 'वितर्क' शादि का बोध हो जाता है तथा पद्गार के रज्चारी भाव नायिकाविपयक 'चिन्ता' में समस्त भावों की विश्रान्ति हो जाती है। इस प्रकार भावशवलता के पोपक 'वितक' आदि गुणरूप हो जाते हैं तथा इससे 'प्रङ्गार रस' का ही उत्कर्य बढ़ता है। इस प्रकार विरुद्ध व्यभिचारी का बाध्यत्व रूप में ग्रहण दोप नहीं अपितु गुए है। आचार्य मम्मट की इस मान्यता का आधार ध्वनिकार का निम्न कथन तथा इसकी आचार्य अभिनवकृत व्याख्या ही है-'तत्र लब्धप्रतिप्ठे तु विवक्षिते रसे घिरो- धिरसाङगनां वाध्यतवेनोक्तावदोपः । यथा 'यत्राकाम शशलक्ष्मणः' इत्यादि। (ध्वन्या- लोक ३·२० वृति) अनुवाद-[साधारणविभाव आदि के ग्रहण में अदोपता] 'हे सखी, सुम्हारा पीला और सूखा सा मुख-सानुराग. हृदय तथा आलस्यमुक्त शरीर किसी :नितान्त प्रसाध्य रोग (क्षेत्रिमः-परक्षत्रे बेहान्तरे, चिकित्स्यः असाम्य इति यावत्) की सूचना दे रहे हैं ।३३२।। :इत्यादि में 'पाण्डुता' आादि (करसा तथा विप्रतम्भ उद्गार दोनों के) :साधारस (मनुभाव) हैं, अतः यहाँ विशोष हो नहीं है। प्रभा-यहां पर ध्वनिकार से मत-भंद प्रकट किया गया है। स्वनिकार का
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फाव्यम गरो:
सत्यं मनोरमा रामा: सत्यं रम्या विभृतय: । किन्तु मताङ्गनापाङ्गभङ्गलोलं ददि जीचितम्॥३२३॥ इत्यत्राय्यमर्घ वाष्यत्वेनैवोक्तम। जीवितादपि अधिकमपाहभस्गस्या स्थिरत्वमिति प्रसिद्धभङ्ग रोपमानतयोपात्त शान्तमेव पुष्णाति, न पुनः ृद्धारस्यात्र प्रतीतिस्तदङ्गाप्रतिपतः। न तु चिनेयोन्मुखीकरणमत्न परिदार शान्त-शृद्वारयोनरन्तयस्याभावात्। नापि काव्यशोभाकरयम, रसान्तरा दनुपासमान्नाद्वा तथाभावात्। विचार यह है कि-'पाण्ड' इत्यादि दलोक में यित 'पाडुता' मादिभनुभानोंसे अभिव्यक्त 'व्याधि'- कसए रसका सुज्वारी है मतएव वह (प्रहत रस) विप्रलम्भ गज्जार के विरुद्ध रम का, ग्रङ्ग है; किन्तुउमका विप्रलम्भ में भी (नामिका में) समावेश (समारोप) कर लिया गया है पतः वह विप्रलम्भ का श्रभ्ध हो गया है.मोर यहां शुभ्जार में पारगणोचित व्याधि या वर्णन दोप नहीं है। इस पर काव्यप्रकाशकार का कथन है कि ध्वनिकार का यह विचार ठीक नही; क्योंकि जो विभाव आदि समान रूप से विरोधी रसो में हो सकते हैं उसके प्रहण मे विरोष ही नहीं होता। यहा 'पाण्डता' आदि जिस प्रकार कस्स-रम के अनुभाव हैं उसी प्रकार विप्रसम्भगङ्जार के भी अनुमाव हैं और 'व्पाषि' विप्रसम्भ पृक्गार का भी अ्रद्ध है; सतः यहां कोई विशोध ही नहीं तथा विरोषनपरिहार निष्फल है। टिप्पणी (i)-व्यनिकार की उक्ति इस प्रकार है-'समारोपितायामम्य- विरोषो यथा-'पाण्डुक्षामम्' इत्यादो। [समारोवितायामिति-बम्मभावप्राप्ती इति शेष :- माचार्य अभिनवगुप्त] (ii) माचाय भरत के अनुमार "व्याधि' विप्रनम्भ-
इसी के भापार पर मानायं मम्मट ने धनिकार के कयन था राण्डन किया है। प्रनुवाद-'यह रत्य है कि रमलियाँ (रामाः) गन को रमाने वालो (रमखोय) है, (संसार के) संभव भी मनमोहर है; किन्यु जोमन सो ममवाली सदसी के कटाक्ष के समान पसपर है'।३३३॥ यहा पर पूर्यापं (शगार के विभाव) का ब्राम्म रूप में बसंन किया गया है। जोधन को धपेक्षा भी सदगी के कटाशों की अरियरता धपिक है, इसलिये पमिद्र भवर (स्षराभङ्ध र) वस्तु (कदाश्) का उपमान रूप में पहसर करना शास्त-रस को हो पुष्ट करता है। यहों पर सार, रस को तो प्रतीति हो नहीं कषोती; बनोकि उसके योग्य पद्धों (विभाव, चनुभाव, सज्चारीभाय) का प्रतिपाइन नहीं रिया गया है। (पशनिहारोस्) यह डोप-परिहर कि (गरहार) तिय्ों को (भाम्त रा की घोर) प्रवुत्त करने के जिये है, सो महां चपिन नहं: फजोरि वासा औोर गझार बोमों (बिरोपी-रस) सब्यबहित दप से एक साप न भी
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सप्तम उल्लास: ३६५
(उचित) नहीं कि यहां (शृस्तर) फाव्य की शोभा के लिये है; क्योंकि अ्न्य रस
(तथाभाबात्)! (भर्यात् शान्त से अथवा, केवल अनुप्रास) से ही काव्य शोभा हो जाती है
पभा-'वांध्यरूप से उक्त विरुद्ध रस का विभाव भी गुणरूप ही जाता है' .इसका उदाहरण 'सत्यं मनोरमा' इत्यादि पद्य है। यहाँ पूर्वारध में स्थित 'रामाः' तथा 'विभूतयः' पुरुपनिष्ठ गद्धार के विभाव हैं। उत्तरार्ध में स्थित 'अस्थिरता' -(लोल्यम्) शान्त रस का विभाव है। ये दोनों रस परस्पर विरुद्ध हैं तथापि यहां ('प्रतिकूलविभावादिग्ह' रूप) रम दोप नही; क्योंकि पूर्वारध को वाघ्य रूप में कहा गया है। इसी से यहाँ शृद्गार के विभाव का कथन गुए हो गया है; कर्योंकि बाध्य ,रूप से उक्त विरुद्ध-रस (शृद्वार) का विभाव शान्त रस का पोपण कर रहा है- 'जीवन रहते, उसकी सुविधा के हेतु हो रमसी आदि उपादेय हैं. और जीवन क्षए- भङ्ग रहै तो उनका क्या प्रयोजन -? अब शाङ्ा यह होती है कि पूर्वार्धगत भृन्गार के विभाव का वाघ हो जाने पर भी उत्तराघंगत 'मताङ्गनापाङ्गभङ्ग' रूप अनुभाव के द्वारा जो स्व्रीनिष्ठ शृङ्गार की प्रतीति हो रही है, उससे यहाँ दोप है ही। आचार्य मम्मट ने 'जीविताद्-प्रतिपत्तेः' में इसका उत्तर दिया है। भाव यह है कि यहाँ अपाङ्गभङ्ग् (कटाक्ष) का रति के अनुभाव के रूप में ग्रहण नहीं किया गया अपितु क्षणाभङ्गुरता के उपमान के रूप मे ग्रहण किया गया है, कटाक्ष के समान जीवन भी -क्षशिक है-यह प्रतीति होती है। इस प्रतीति के द्वारा यह शान्त रस का पोपक हो जाता है। किञ्च शृङ्गाररस की यहाँ प्रतीति ही नहीं होती; क्योंकि किसी रस की प्रतीति वहाँ होती है जहाँ उसके विभाव, अनुभाव आदि का रस की प्रतीति कराने योग्य वर्णन किया जाता है। यहां तो विभाव का वाध्य रूप में वसन है नथा कटाक्ष आदि का भी शृङ्गार के अनुभावरूप में वर्णन नही। जय शृद्गार की यहां प्रतीति हो नहीं होती तो शान्त और शृङ्गार रसों का विरोध भी नही वन सकता। सारांश यह है कि (१) "सत्यं" इत्यादि के पूर्वाद्ध में शान्त रस के विरोघी शुङ्गार रस के विभाव का बाध्य रूप मे वर्णान है भतः वह दोप नहीं अपितु गुए - है। (२) उत्तराद्व में कटाक्ष का क्षभङ्ग रता के उपमान रूप में वर्शन है, शद्गार के अनुभाव रूप में नही। इस प्रकार यहाँ विरुद्ध रस का अ्नुभाव ही नहीं है अतः प्रतिकूल विभावादिग्रह दोप की शङ्दा हो नहीं हो सकती। (३) शान्त मोर पद्धार ; में रस-विरोध भी यहाँ नही है; क्योंकि शद्गार की यहाँ प्रतीति ही, नही होती। व्वनिकार की मान्यता को भावतः प्रस्तुत करते हुए आचार् मम्मट ('न तु- सथाभावात् में) ने उसकी समालोचना की है। टीकाकारों के अनुसार ध्वनिकार के , विवेनन का सारांश यह है कि-'यहों शङ्गार के धङ्ग विभाव भादि के होने से पङ्गार की प्रतीति तो होती, परन्तु वह दोप नहीं; क्योकि (क) उसके द्वारा चीनी में पगी कट औषधि की रीति से (गुउजिद्निकया) शिप्यो को अ्रभिमुख करके शान्त
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३६६ 1 का्यप्रकारो:
[रसविरोधपरिहारोपाया:] (<५) पाथयँक्ये विरुद्धो यः स कार्यो भिन्नसंभयः रसान्तरेणान्तरितो नैरन्तर्येए यो रसः ।६४।
रख में प्रवृत्त कराया जाता है सथवा (स) काव्य शोभा के तिये ही उसका समावेस किया गया है।' इसके विपरीत आचार्य मम्मट का कथन यह है पि यहां पर शङ्गार- रस की प्रतीति ही नहीं होती औौर यदि यह भी मान लिया जाय. वि यहा.गुद्ार की प्रतीति होती है तो भी ववनिपारोक समाधान प्मुक्त हो-है कयोकि (क) भजर तथा नान्त रगकी मव्यवधान से स्यिति नही हमाकरती, दोनों का (नैर- न्तर्यंरूप) विरोध है (इ०, आगे मून्र ५) यदि शृद्धार की प्रतीति होगी तो शान्त रस का उद्योष हो हो नहीं सकता फिर शव्वार रम शान्त में शिष्य प्रसुति कराने के सिये योगे होगा ? (ग) काव्प शोभान्यद्धंन के लिये भी मङ्गार की भपेक्षा नहीं; मयोकि माना रस से भथवा मनुप्रास अलद्वार (मताङमनापास्ञभन्ट) से भी काव्प- सौन्दय निष्पन्न हो जाता है। टिप्पसी-इस विषय में ध्वनिकार मानन्दवर्धनापार्य की मान्यता इस प्रकार
पुप्पति, यावद् विनेयानुम्मुल्षीफतु काम्पशोभार्यमेव या नियामालो न दुप्यति। किन्स हद्टारत्य सफलजनमनो हराभिरामरवात् तदझ समावेश, काव्ये शोभातिदयं पुप्पति रपनेमापि प्रकारेल मिरोमीनि रसे मृद्धारामसमावेशो न विरोषी। सतरख 'सतर्य गनोरमा' इश्पादियु मास्ति रसविरोपदोष, 1 (थ्वन्यानोक :३०) पानायं पभिनवगुप्त ने 'विनेमानन्मुसीवतु" को प्रस्तुत दनोक में इस प्रकार दुष्टि को ह- वन मसामनापत म जष्य भृद्धारं प्रतति सम्भाव्यमानविभाषा नुभावरवेनास- स्य मोसताणाम् उमानतोत नि प्रियनमापटाश्षी दि गवोभिसपरीय इति व तरप
परनिकार ने यहाँ साना औौर गद्वार के विरेष की पद्ा पाने उप़का जो समाचान रिया है मह काम्पम सणकार न सनिमत नही है। सनुपाद-(रगविरोय के परिहार का उपान)-वो रस पामम (सापाऱ 'हपा पासम्यन) के एक होने के कारए विस्द (प्रतीत) होगा हो भारा पृषण मामर में सेंनिवेस कर बेना चाहिए समा जो रम प्चपपान के कारस विरत् (प्रसीत) होता हो जसो किमी सन्य रस से व्ववारित कर बेना भाहिए। (cx)
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सप्तम उल्लास: ३६७
i वीर-भयानकयोरैकाश्रयत्वेन विरोध इति प्रतिपक्षगतत्वेन भयानको निवेशयितव्यः । शान्तशृद्गारयोस्तु नैर्तर्येण विरोध इति रसान्तरमन्तरे कार्यम। यथा-नागानन्दे शान्तस्य जीमूतवाह्नस्य 'शह्दो गीतम् अ्रह्दो वदित्रम्'-इत्यद्भुतमन्तर्निवेश्य मलयवतीं प्रति शृद्गारो निवद्ध:। वीर और भयानक का आश्रयेवय में विरोध है, इसलिए (नायक आदि के) प्रतिपक्षि रूप आथय में भयानक फा संनिवेश कर देना चाहिए। शान्त और शृद्गार का अ्व्यवहित रूप से रहने में विरोध है, इसलिए इनके बीच में अन्य किसी रस का वंन करना चाहिए; जैसे-नागानन्द नाटक में जोमूतवाहन विषयक शान्त रस का-ग्रहो गीतम् श्रहो वादित्रम्' इस प्रद्भ त के द्वारा व्यवधान करके मलयवती (नायिका) विषयक शृद्धार का वर्णान किया गया है। प्रभा-यहाँ रस-विरोध परिहार का उपाय वतलाया गया है। इस प्रकरण में 'रस' सब्द का अभिप्राय स्थायी भाव है। यह रस-विरोध दो प्रकार का होता है-१. दैशिक, २. कालिक। १. दैशिक विरोध भी दो प्रकार का होता है-आलम्बन ऐक्य में विरोध तथा आश्य-ऐक्य में विरोब। जिस निमित्त से रति आदि भावों की उत्पत्ति होती है, वह आलम्बन,विभाव) है और जिसमें किसी भाव की उत्पत्ति होती है, वह आशय कहताता है। जब एक ही आश्रय में अथवा एक ही आालम्बन- विपयक दो रस नहीं हो सकते तो उनका प्ाश्यकयनिमित्तक विरोध होता है; जैसे वीर और भयानक में। जिस निमित्त से भयानक की उत्पत्ति होती है उससे उसी समय वीर भाव की उत्पत्ति नहीं होती (आलम्वनक्यविरोध)। इसी प्रकार जिस आश्रय में वीर भाव जागृत होता है उसमें उसी समय भय का उद्भव नहीं होता (आश्रयैक्य विरोध) । इस विरोध-परिहार के लिये जिस नायक आदि में बीर का वशन किया जा रहा है उसके प्रतिपक्षी में भयानक का वर्णन करना चाहिये। इससे नायकगत वीररम का परिपोष भी होगा। २. कालिक-जो रस एक साथ बिना किसी व्यवधान के नही रह सकते उनका नैरन्तर्यनिमितक विरोध होता है; जैसे दान्त और पद्वार का। एक ही व्यक्ति के निमित्त से एक ही काल में शान्त पोर शृङ्गार के भाव का उदय नही होता। उनके विरोध-परिहार के लिये दोनों के बीच में किसी 1 प्रव्य-रस का वगन करना चाहिये, जैसा कि नागानन्द के उदाहरण से स्पष्ट है। 1 :टिप्पसी-(i) ध्वनिकार ने इस रस-विरोध-परिहार का निम्न प्रकार निरु- पण किया है (३.२५,२६) विरुद्धकाशयो यस्तु विरोधी स्थायिनो भदेत्। स विभि- पाथय: कार्यस्तस्य पोषेऽ्यदोषता । एकाअ्रमत्वे निर्दोपो नंरन्तयें विरोधयान्। रसा- न्तरव्यवधिना रसो व्यङ्गचो सुमेघसा। (ii) रस-विरोध का विशद विवेचन साहित्यदपए (७.२०-३१) में किया गया है। रसों का विरोध तीन प्रकार का है-१: आलम्वनक्य-विरोध, २ आधर्यवय- विरोष, ३.नैरन्तर्वं-विरोध। उदाहुरणार्य १. (क) वीर और गद्गार का, (स) सम्भोग
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३६८ ] सप्तम उल्लास:
निवतते। न परं प्रबन्धे यावदेकरि्मनपि वाक्ये रसान्तरव्यवघिना विरोधो
यथा- भू रेुदिग्घान् नवपारिजातमालारजोवासितवाहमध्याः। गाढं शिवाभि: परिरभ्यमाणान् सुराहनारितिप्टमुजान्तराता:॥।३३३। सशोसितः क्रव्यभुजां रफुरद्धिः पक्षेः खगानामुपवीज्यमानान्। संवीजिताश्चन्दनवारिसेके: सुगन्धिभि: कल्पलतादुफूलै:॥३३४। विमानपर्यझतले निपएसा: कुतू हलाविष्टतया तदानीय। निरदिश्यमानान् ललनाड्गुलीभिर्वीरा: स्वदेदान् पतितानपश्यन्।।३:।।। अत्र श्रीभत्स-पद्गारयोर्तर्वीरसो निवेशित:। शृद्दार का हास्प, रौद्र और वीभत्त के साथ, (ग) विप्रसम्न का बीर; करम, रोद आादि के साथ-आानम्वनेकय-विरोध है। २. वीर भर भयानक का साधपंीय विरोष है तथा आलम्बनेयय विरोध भी है। इसी प्रकार भान्त औौर मृद्ार का नं रननं विरोध है तथा आातम्वनवय- विरोध भी है। किन्ही रसों में उपन सीनों प्रहार का ही विरोष नही होना जैसे-(v) वोर का ब्रद्ध त तया रोद्र के साथ, (स) शृद्धार का भनद त के साप, (ग) भपानक का वीभस्स के साथ किसी प्रकार का विरोष नहीं। इन रगो फी परस्पर मंत्री कही 4 जा सकती है। अनुवाद-(पेवल प्रयन्ध (पाव्य) में हो नहीं पवि तु एर वारय (मुसरू फाय्य) में भी ग्रन्म रस के ध्ययधान (बीच में समापेदा) से रों का विशेय द्ूर हो जाता है जैसे-[ये पद्य ध्यन्वासोक ३े-२७ में उद्ध त हिये गये हैं।। 'सब (स्वग प्राप्ति के परवात्) विमान के पर्पच पर बंधे हुपे उन बौरों मे- जिनके वक्ष,स्थल नयीन पारिआात-मासा के पराम से गुरुभिग ये, जिनको भुयामों के मध्य भाग देयासनापों से पातिद्वित मे समा जिग्हे धगडम-रस से मिस सभा सुरभित फल्प-सता के डुफस (वस्त्र) से हया की जा रही भी-तलवादों मपाराजें द्वारा घड्मुसी से दिससाये माते हुए (रसभूमि में) पड़ हए जन परीरों को भादचर्ड से वेसा, जो भूमि को धूल से सने (दिग्पान् ध्वाप्तानु) ये, गुमातियों से सतिद्ित ये तथा मासभक्षी पक्षियों के रासने पसों द्वारा मिनसे हया को जा रो भो' m३३३३३४३३11 : यहां बौभसा पोर भसार के मग्य में वीर रम का रासिमेस बिया गमा है। प्रभा-'भूरतु' प्त्यादि में समयः स (एर्) 'का वितेनष है रपा द्रूमरा (पर्ता) 'वोग:' का विशेशह। 'भूरेम रर्देह मे विशेषाों गे बीभत/" सो लोलाद
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सप्तम उल्लास: [ ३६६
।।' (८६) स्मर्यमाणो विनद्धोऽपि साम्येनाथ विवक्षितः । त्ङङिन्यङगत्वमाप्ती यो तो न दुष्टौ परंस्परम् ॥६५॥ अयं स रशनोत्कर्पी पीनस्तनचिमदनः। नाभ्यूरुजघनस्पर्शी नीवीविस सनः कर: ॥३३६॥ की प्रतीति से वीर रस की भी अभिव्यक्ति होती है; क्योकि भूरेखुदिग्धता तथा पारि- जातमाला धारण-ये दोनो दशाएँ रणोत्साहमूलक ही तो है। इस प्रकार पहले बीभत्स, फिर वीर, तब शृङ्गार और फिर वीर रस की प्रतीति होती है तथा बीभत्स और शद्धार के मध्य में व्यवधान हो जाता है जिससे नैरन्तर्यनिमित्तक रस-विरोध नहीं होता। " यहाँ वीर रस को आलम्बन प्रतिपक्षी योद्वा हैं तथा शृद्धार का श्र्रालम्बन देवानाऐँ अतएव आलम्बनैक्यनिमितक विरोध भी नहीं है। टिप्पसी-यहाँ आचार्य मम्मट ने व्वनिकार की इस उक्ति (३.२७) का अ्रनुसरण किया है- रसान्तरान्तरितयोरेकवाक्यस्थयोरपि। निवर्तते हि रसयो: समावेशे विरोधिता । रसान्तरव्यवहितयोरेकप्रवन्वस्थयोविरोघिता निवतत इत्यत्र न काचिद् भ्रान्तिः। यस्मादेकवाव्यस्थयोरपि रसयोरुक्तया नीत्या बिरुद्धता निवतते। यथा 'भूरेस' इत्यादो। अ्रत्न ही शृङ्गारवीभतसयोस्तदङ्गयोवा वीरररुष्पववानेन समावेशो, न विरोघी। रस-विरोध के अपवाद- अ्ननुवाद्-(क) जिस विरोध रस का (प्रधान) रस के साथ स्मरस किया - जाता है अथवा (स) जो विरोधी रस (प्रधान रस के साथ) साम्य भाव से विवक्षित होता है वह दोध-युक्त नहीं होता तथा (ग) जो दो विरोधी रस (मो) प्रधान रस (ग्रङ्गो) के अङ्गभाव को प्राप्त हो जाते हैं वे भी परस्पर 'विरोधी (दुष्ट) नहीं रहते। (८६) - प्रभा - विरुद्ध रसों का इन तीन अवस्थाओं में भी अविरोध हो जाया, करता है-प्रधान- रस के साथ कोई विरोधी रस (क) स्मर्यभाण (स्मृतिरुपः में सघनिविष्ट) हो (स) साम्यभाव से विवक्षित हो अथवा (ग) विरोधी रस किसी, अन्य प्रधान रस के उपकारक हों। जैसा कि अग्रिम उदाहरणों से स्पष्ट होगा। -... ध्वन्यालोक में रस-प्रविरोधकी इन तीनों भवस्थाओं का विभागयः निरु- . पण नहीं किया गया था तथापि इनका विशद-विवेचन किया गया था। आचा्यँ मम्मट ने इनका व्यवस्थित रूप में निरुपस-किया। जो आगे चल कर अधिक प्रचम लित भी हुआ तभी तो साहित्यदर्पण की यह कारिका काव्य-प्रकाश की छाया-सी लगती है-
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४०० राव्यपकान:
एतद् भूरिश्रवसः समरभुवि पतितं हस्तमालोक्य तद्वपूरभिदयौ। अत पूर्वावस्यास्मरणं शद्गाराकषमपि करुणं परिपोपयति। दन्तक्तानि करजेश्च विपाटितानि
दृत्तानि रक्तमनसा मृगराजवध्या जातरपृहैमु निभिरध्यवलोकितानि ॥३३७॥ अ्रम्न कामुकस्य दन्तक्षतादीनि यया चमत्कारकारीसि तया जिनाय। यथा वा पर: शृद्धारी तद्वलोकनात्साप्रहसद्वद् एतद्हशो मुनय इति साम्यविवक्ञा। विरोधिनोऽपिस्मरणी साम्पेन वचनेऽ्र या। भवैड्विरोधो नान्योयमसगिन्मअत्यमापायो: अनुवाद-(फ) (रमपमाएयियद) 'परयं' इत्यावि [कवर उदाहरस १२७] ।३३६॥ समरमूमि में ूरियिया के (कट फर) पड़े हुए हाथ को हेसकर उसको पश्नी ने यह (वचन) कहा है। यहाँ पूवं प्पर्ण (रनो(कपए भदि) का हमरत मदयवि (विस्स रस) दस्षार का सस् (पनुभाय) है तयापि यह कदएा रस का पोपए करता है। प्रभा-(१) 'मयं स रमनोसकर्ती' में वस्मा रसा प्रधान है। यहा गभ्ार के भम्तु रमनोतपंसावि सनुभाव पा रमरण किया गया है अनः ऋकार रमयेमाल विरोषी रत है: कित्मु पह कम्स रम का उद्दीपक हो जावा है तमा उमय भम्त मन जाता है औौर रग-विरोधी नही होना। (श) मानन्ववर्यनाचाय ने अह्जभाय को श्राप्त होने वाने शिरोभी रमों पा (फारिका ३.२०) नि्वेचन यरते हुए भत्तिति-विवेय से मयोजित शद्तार को पर्षगा का ममु बतताया या। सम्भयत: उगी का बैसानिर विस्लेपस करके धानार्प गम्मट मे 'स्वरयंमाष विशेषो रग का पविगोय' ऋूप एक आ्ापक नियम बना दिसा। : अनुवाद-(त) (साम्पेन, विपक्षित)नाशेगात स्वितु को साने के लिये उद्यत भूगो सिहनो को खवशरोर पकित करने दाने युद्ध के प्रति दियो को उति]- हे सिन, (दया के सरसाह या धनुराग से) सपन रोमाजसपुस भपक शरीर पर रकपान की इस्छावालो (पक्ष में सनुरछ मन वासी) सुगराज दधू सर्वान् बिटनी (पद में रानसम) के डाडा किये गमे दम्तरात औोर नसदातों को मुनिनों मे (एमं यह सौभाग्प प्राणम हो इस प्रकार) सापता-युरत होकर देसा/।२३३ ; यहा पर जिग प्रहार (सतवाहृत) दप्तसन (मसरात) आदि कामी पुएत के प्रति पमाकार जनरू होते है उसी प्रकार मिन (बुदर) के प्रति (गिही ह) इमश पादि थे। पमपा बिग प्रहार कोई या गुद्ारो (शमुर) पुषप, वन (समु क र्तशत पाषरि) के देवहर पमितापदण हो जाता ह ओ पशातदन् (युद्र mरीसय एगशन पारि) को देवन पासे मुनिमन माममाएस् हो रहे मे। यह सास्त किमता है।
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सप्तम उल्लास: 44
क्रामन्त्य: चतकोमलाङ्ग लिगलद्रक्तः सदर्भा: स्थलो: पादैः पातितयावकैरिव गलद्वाष्पाम्युघौताननाः । भीता भर्तृ करावलम्यितकरासत्वच्छननार्योडघुना दावान्नि परितो भ्रमन्ति पुनरप्युद्यद्विवाहा इय ॥३३=॥। अत्र चाटुके राजविषया रतिः प्रतीयते। तन्र करुए इन शृद्गारो- उप्यङ्गमिति तयोन विरोध: । यथा - प्रभा-दन्तक्षतानि' इत्यादि पद्य साम्यविदक्षा से रसाविरोध का उदाहरण है। यहाँ किन-किन रसों के विरोध की संभावना हो सकती है इस विषय में टीका- कारों के विभिन्न मत है। प्रदीपकार के मतानुसार यहाँ दयावीर तथा शृङ्गार के विरोध की आशंका है। ध्वनिकार की भी इसी में सहमति है। आचार्य अभिनव- गुप्त के अनुसार यहाँ शान्त और शृद्गार का भी विरोध सम्भव है। माशिवयचन्द्र- आादि टीकाकारों का भी यही मत है। किन्तु प्रसङ्ग का पता न चलने के कारस इसका निसाय कग्ना कठिन है। यहाँ रसों की साम्य-विवक्षा इस प्रकार है-श्रङ्गों को साम्य विवक्षा से ही थ्ङ्गी रस की साम्य-विवक्षा होती है। इसमें दो पक्ष हैं- १. अनुभाव की या २. विभाव की साम्यविवक्षा से। इसी से वृत्ि में दो प्रकार की 'व्याख्या की गई है। प्रथम पक्ष में भाव यह होगा कि जैसे कन्ता के नखक्षत आदि को कामुक अत्यन्त प्रेम से घारण करता है इसी प्रकार सिंही के नवक्षत आदि को 'वुद्ध ने स्वीकार किया। अतः नखकतादि-धारस रूप अनुभावों के साम्य से कामुक- निष्ठ तथा बुद्ध-निष्ठ रसों (स्थायीभाव) का साम्य विवक्षित है। द्वितीय पक्ष में भाव यह होगा जिस प्रकार कामुक के शरीर पर ललनाकृत नसक्षत आदि को देसकर भन्य शृद्गारी जनों को यह अभिलाया होती है कि हमें भी यह सौभाग्य प्राप्त हो; इसी प्रकार बुद्ध के शरीर पर सिंह के नसक्षत आदि को देसकर मुनिजनों के हृदय में यह अभिलापा होती है कि हम भी ऐसे ही दयालु हों। अतः नखक्षतादि रूप उद्दीपन विभावों के साम्य से परशृङ्भारीनिष्ठ तथा मुनिनिष्ठ रसो का साम्य विवक्षित है। इस प्रकार यहां भृद्गार तथा दयावीर रसों की साम्यविवक्षा है। शृङ्गार रस उप- मान रूप से दयावीर का श्रङ्ग हो जाता हे तथा रसविरोध नहीं होता। - टिप्फ्ली-(i) आचार्य मम्मट की इस मान्यता का आधार ध्वन्यालोक की यह उक्ति है-उत्फर्षंसाम्येरपि तयो: विरोधासम्भवात् यया-एफतो रोदिति' इत्यादि (१'२४) । अनुवाद-(ग-१ प्रङ्भिनि शहत्व-प्राप्ति) [किसी राजा के मति कवि की उक्ति] 'हे राजन् इर समय आपके शयुपों की नारियों क्षत-विक्षत फोमस प्रज्- लियों से बहते हुए, रुधिर से सने पतएव मानो अतक्तक लगे घरसों से दर्भ-युक्त भूमि को लांधती हुई: गिरते हुए प्रथ -जल से मुस धोतो हुई, डरकर पत्तियों के हाथ में अपना हाथ परुड़ाती हुई-मानों फिर से विवाह के लिए उद्यत सो दावा- नल के चारों मोर यूम रही है ।३३८॥।
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४०२ ] काव्यप्रफारा:
एदि गच्छ पतोतितिष्ठ वद मौनं समायर- एवमाशाम्रद्गातैः क्रीडन्ति मनिनोडर्रिभि: ।३२६॥
गमनयोर्न विरोध: । इत्यत्र पहोति कीडन्ति, गर्छेति क्रीडन्तीति क्रीडनापेक्षयोरागमन-
चिप्तो हुस्तावलग्नः प्रसभमभिष्टतोऽप्यादवानोड्शक्ासं गृमन् केशेप्वप।स्तश यरगनिपतितो नेवितः सम्भमेय। आलिङ्न् योऽयधूनरिन्पुरयुवतिमि: साक्षनेव्रेत्पनाभि: कामीवार्द्ापराषः स दहतु दुरितं शाम्भवो व: शराग्नि:।।२४०।। इत्यत्र त्रिपुररिपुप्रभावातिशयस्य करमोऽकम, तस्य दु शह्ार: तथापि न करुणे विश्रानतिरिति तर्याह्तैय। अभवा म्राफू यया कामुक आचरति रम तथा शरान्निरिति शृद्धारपोपितेन करखेन मुख्य पवार्थे उपोद्वल्यते । टक' हि- गुप: पतात्मसंर्कार: प्रधानं प्रतिपयते प्रधानर्योपकारे दवि तथा भूयसि वतते" ॥ इति ॥ यहां घाटकार में राजविथयक रति-भाय (प्रधान रूप से) प्रतीत होता है। बहा (रति-नाय) में करया के समान द्धार भी सत्ा हो गया है इस हेतु उन (पापस तथा गुद्दार) दोनों का पिरोप गहां है। जैसे-'मामो, पाधो, गिरो, उटो, पोलो, मौन धारस करो इस प्रकार धनिक सोग चासाएपी यह से ग्रस्त पापकों से (परविमि:) कोडा करते है ॥३३६॥ यहाँ पर-भामो' पह पहफर कीषा करते है, 'जामी' यह बहकर बोडा (मनोविनोद) करते हैं-इस प्रफार (विर्द भो) पागमन और गमन होनों में (क्रौमा 'के प्ज् होने मे) विरेष नहीं है। (ग-२) वह (त्रियुस्टहनपामिक) जिप के माकतों को पग्ति मुस्टारे पापों को भत्म परे; जो (पग्नि) सथ पूरां मेनरमत वालो तिपुर-पुवतियों के द्वारा तरकाल अपराम करमे वाले फामो (भापक) के समान हाव छूने पर मटना डिया गमा (शिप्त:), बलात् चोबस पकड़ता हुय भी ताहित रिया गया, बेशों को पहड़ना हमा टटापा गया, घरलों पर पड़ा हम सम्भम (भम तमा सारर) है नहीं हैसा गमा सपा पामिद्न करता टमा बुरहारा मया ॥।३४०।। यहाँ पर निपुर-दमु (निघ) के चनिर्वप्रमाय (नो मिवशिषमड रविबा उद्दीसन विनाव है। मा बदसारम (एरमुमः मिपुरदुपर्मियों की स्पादुवमा रूप बहछ टा उद्दीयन विभाव) भता दै तमा फदल का गुद्धार (पम्मू करपर पारि गदार म सनुमाष) मत्त है समानि पदल में समरार (प्ररु्य) का वर्यपगान नी है इसमिे रटस भी (निर्व्पदक रगि) कभ्रभ् है। मपया बिस प्रहार पदसे मगपी (इरणह पादि) पापरा बरता या जगो प्रार वालाति मे रिवा ए परार
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सप्तम उल्लासः ४०३
भरदार से पोषित फरस के द्वारा मुख्य-अर्थ (शिवधिपयक रति भाब) हो प्रकर्ष को प्राप्त होता है। ययोंकि कहा गया है-"गुए (अङ्ज, विशेषण या उपकारक) भन्य (स्वकीय श्रद्ध) के द्वारा अपना संस्कार करके परिपुष्ट होकर) प्रधान को प्राप्त होता है, ययोंकि उसी प्रकार वह प्रधान के महान् उपकार में समर्थ होता है।" प्रभा-(ग-१) रसाविरोध का तृतीम प्रकार एक अङ्गी रस के प्ति विरुद्ध रसों का अङ्गरूप हो जाना है (अद्भिनि शङ्भत्वम्)। यह दो प्रकार से होता है- १. दोनों विरुद्ध रस (सेनापतिद्वयवत्) साक्षात् प्रधान रस के अङ्भ हो जाते हैं. अथवा २. एक रस दूसरे का श्र्न होकर तब (सेनापतितन्द त्यवत्) प्रधान रस का श्रङ्भ होता है। 'करामन्त्यः' इत्यादि प्रथम प्रकार का उदाहरणा है। यहाँ राजविपयक रतिभाव प्रधान है। शोच्यावस्था से करुख एवं विवाहावस्था से शृङ्गार रस प्रकट होता है। स्वभाव से विरोधी भी ये दोनों राजकार्य में प्रवृत्त दो सेनापतियों के समान नृपविपयक रतिभाव (प्रधानभूत) के ग्ज्ग हो जाते हैं, तथा जिस प्रकार एक ही क्रीडा का अङ्ग होने के कारण स्वभावतः विरुद्ध गमन, झागमन आादि में झापस में कोई विरोध नहीं होता, इसी प्रकार राजविपमक रतिभाव का पोपस करने के कारण करुण तथा भृङ्गार में भी कोई विरोध नही होता। (ग-२) 'क्षिप्तः' इत्यादि में शिवविषयक रतिभाव प्रधान है। दो विर्द्ध रस केरस तथा पङ्गार अङ्गाङ्ट्रिभाव से इसके इसी प्रकार श्रद्ध (उपकारक) हैं? जिस प्रकार कोई सेनापत अपने भृत्यों सहित राजकार्य मे प्रवृत हो जाता है। अतः यहाँ रसविरोध नहीं है। भाव यह है कि शिवविपयक रतिभाव (प्रधान) का करुण साक्षात् उपकारक है तथा शृद्गार रस प्रथमतः करुण का पोपण करता है ततः परमतरया प्रधान (रतिभाव) का उपकारक होता है। प्रङ्गाद्व्रिभाव से प्रधान का अ्रज्ध होने को दो रीहिया हो सकती हैं-एक तो प्रथमत: करुणरस शिवविषयक रतिभाव का विशेपस हो जाय तय कर में :पद्धार विशेषण(भङ्ग) हो (विशेप्ये विशेपसं तन्नापि विशेपखन्तरम्)। दूसरी प्रथमतः करण शस्भारविकिष्ठ हो जाय और तब वह निवविषमक रतिभाव का 1विशेपण हो (विशिष्टस्य वैशिष्टयम्)। इस द्वितीय रीति का अनुग्राहक हो 'गुस' इत्यादि न्याय है। सम्भवत:इन्ही दो रीतियों के विचार से काव्य-प्रकासवृति में 'भथवा' कह - कर दो व्याल्यान किये गये हैं। महेश्वर भट्टाचाय आदि टीकाकारों का यही निश्धित मत है। वस्तुतः तो इस पद्य के विषय में ध्वनिकार के वविविय समाधान के भाधार पर ही आचार्य मम्मट ने यह द्विविध रमाधान किया है, जिसके विषय में विशेष विचार की भावश्यकता है। टिप्परंी-(i) आचार्य मम्मट की 'भद्भिनि-प्रभ्गत्व प्राप्ति' रूप तृवीय
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४०४ काठ्यप्रकाण: 44
प्राकप्रतिपादितस्व रसस्य रसान्तरेस न विरोधो नाप्यद्वाह्षिमाबो भवति दति रसशाव्देनाव स्थायिभाव उपलच््यते। इति काव्यप्रकाशे दोपदर्शनो नाम सप्तम उल्नास: ।।।।। रमाविरोध की मान्यता का पामार ्वनिकार को ये वतिया है :- इपं घाइगभायप्राप्तिरन्या पदाषिकारिपतयात् प्रधान एकरिमन् वार्यार्य रस पोर्भावयोर्षा परस्परविरोषिनोद मोरडगभायगमन, सस्यामपि न बोप: । सपोरतं 'कषिप्तो-हस्तायलान: इत्यादो।' 'तदम त्रिपुरपुयतीना शम्भवः सराग्निराद्वापरामः कामी समा भ्ययहरति तभा व्ययदृ्तयानितयनेनापि प्रफारेखासतमेय निर्दिरोपत्वम्। सरमाद् यमा पपा निरसते तभा तयाम बोपाभाव: । हत्यं घ 'दामगय:' पत्येयमादीरना सर्वव्ामेय निविरोपायम- यगन्तथ्यम् [प्यन्यालोफ ३२०)। इससे दो बातें स्पष्ट प्रतीन होनी है। एक तो मह ध्यनिवार मे पिप्:' इत्यादि में दिविध गगापान (पनेनापि प्रकारण) प्रस्तुत किये थे। दूगरी यह कि उनके प्रतिपादन में मम्मटोक तृनीय ससाविरोप के सवान्तर भेर नहीं हो पाये है। (ii) वालवोधिनीकार मे मतानुमार 'प्रथवा प्राक्' इरयादि नपन पूर्शोक मपन का हेसु हो है, तृथक नहीं। सररवती ती्प को टीका में भी कह़ा गया ६- 'वन करछे विधानयभावे हतुमाह मययेति।' (iii) यहां विवयपपक उतिभाय के पह्ुमूनवदण का भझ होहर भी भुकगार बिता प्रकार प्रधान का उपसरक हो सकता है- वह मात्र पाष्ट करने के निये 'मुसः इ्लास्मसरर:' इरवादि म्याय उदपुन किया गया है। मयति मौमांगोफ 'मुस्ानां य परार्पावात्' न्याय के प्रगुमार को धमो का परसर पहामिभाय मे गम्मन्य नहीं हो गवता समापि 'गुमाः पृना इरमादि स्याय उम सामास्य निषम का मपवाद है: पतः मश करण पोर गद्ार का मनाद्मिमाय गस्कप होने में शोई यापा नहीं। (iv) साहित्बंलवार के मतानुगार सो पहाँ माम्यविपक्षा मे दाग पापिण गुहार रम वरस का सह होता है-पप वविगता भगयरविषना सक्: प्रमानम्। तरना: परिपोपकतया नगयन: निपुरर्तन प्रयुण्माहममार्मा सुभ्टनता रगापरी मयायया
अनुपाद-दूर्व (समुम उतसात में) पतिसत (बेशनारनर् प्रृ्प) र बर एम्म रस के साथ न विशोष ही सम्भव है और म दहमाडिगभाय हो। हर्मालए यहाँ (रग विशेष ट्रकरत में) रम रग्य से इमारी मात (रगपमे सारमासनें इि रमः समामिमाय:) उपमसित होता है। प्रमा-कर (पुर्षे उत्ाम मे) यह प्रगाति हिवा ग पता है ह रह
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सप्तम उल्लांस: i ४५
की प्रतीति नहीं होती। फलतः एक साथ दो रसों की प्रतीति नही हो सकती। फिर दो रसों का विरोध या अङ्गाद्िभाव कसे वन सकता है ? इसके उत्तर में कहा गया है कि इस प्रकरण में 'रस' शब्द का अर्थ है-स्थायीभाव । 'रस्यते इति रसः' जिसका आस्वादन किया जाता है, वह रस है; इस व्युत्पत्ति के अनुसार स्थायी भाव को भी रस कहा जा सकता है। स्थायी भावो का ही परस्पर विरोध या अङ्भाद्भिभाव होता है। टिप्पसी-रसों के परस्पर अ्रङ्गाद्विभाव के विपय में दो मत है जिनका ध्वनिकार ने स्पप्ट निर्देश किया है-'एतच्च सर्व येवां रसो रसान्तरस्य व्यभिवारी भर्वतत इति दर्शनं तन्मतेनोच्यते। मतान्तरे तु रसानां स्थायिनो भावा उपचाराव् रसशब्देनोक्तास्तेवामङ्गत्वं निविरोधमेव।' (घ्वन्यालोक ३.२४) ये दोनों मत आचार्य भरत के निम्न श्लोक की द्विविध व्यास्या के आधार पर माने गये है-बहनां समवेतानां रूपं यस्य भवेद बहु। स मन्तव्यो रसः स्थायी शेपा: सञ्चारिणो मता: ॥ (नाट्यशास्त्र ७११६) प्रथम मत के अनुसार यहां रसः स्थायी' पाठ है तथा यह अर्थ है-'चित्त- वृत्ति रूप अ्नेक भावों में से जिसका रूप बहु अर्थात् अधिक प्रबन्ध व्यापक होता है वह स्थायी (भङ्गी) रस है गेप सं्चारी अथवा श्रङ्ग हैं। भरतमुनि ने आगे भी कहा है-रसान्तरेव्वपि रसाः भवन्ति व्यभिचारिए.। तथाहि हासः शृद्गारे रतिः शान्ते घ दूधयते ॥ कोधो वीरे भयं शोके जुगुप्सा च भयानके । उत्साह विस्मयो सर्वरसेतु व्यभिचारिख:॥ द्वितीय मत के अनुसार 'रसस्थायी' यह एक पद है तथा द्लोक का यह अर्थ है-चित्तवृत्ति रूप अनेक भावो में से जिसका व्यापक रूप प्राप्त होता है वह स्थायी- भाव है शेप सब व्यभिचारी भाव होते हैं अतः एक रस के स्थायीभाव अन्य रस में व्यभिचारी भाव हो जाते हैं। -1 इस प्रकार प्रथम मत में साक्षात् रसों का तथा द्वितीय मत में स्थायीभावों का भ्रङ्गाद्विरभाव हो सकता है। आचार्य मम्मट ने द्वितीय मत को ही मान्यता दो है क्योंकि 'विगलितवेद्यान्तर ब्रह्मानन्दमहोदर' जो रस सहृदयों के हृदय में विराजमान रहता है उसमें विरोध या अज्गाद्ट्रिभाव कसा ? इस प्रकार काव्यप्रकाश में दोषदशन नामक सप्तम उल्लास समाप्त होता है। इति सप्तम उल्लास:
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ग्रथ घष्टम उल्लास:
एवं दोपानुपत्वा गुणालद्धारंविचेकमाह -- (८७) ये रसस्याङ्भिनो धर्मा: शौर्यादय इवात्मनः । उत्कपहेतवस्ते स्युरच लस्यितयो गुा: ॥६६॥
सय नमानुसार काव्पद्ण में स्थित 'सनुसो' पद की म्वादया के लिएे दुखीं पा विवेचन किया जा रहा है। साय ही गुसीं के स्वसप के स्पष्टीकराप मे सिर पुल औोर मतद्धारों का भेद भी दिसपलाया जा रहा है। गुण तथा अलक्ारों का भेद -- अनुवाद्-इस प्रफार (सप्तम उस्लास में) शेवों का निहपस करके (कम प्राप्त) गुए और मलद्दारों का भेव-विवेधन करते हैं- [दोर्यादय इष पात्मनः ये सदिगनः रसस्य वर्माः मघसत्यतयः घ से नाक- र्थंहेतय: गुएा: रपुः]-'मिग प्कार भूरता इतयादि भात्मा के धर्म है, इसी प्रशर जो फाय्य में प्रधानतया (पसमवत्) समित रस के धर्म है, तमा (रस के साथ) निवस रिमति चाते हैं: ऐसे रसोत्क्यं के हेतु (धर्म) गुए कहमाते है। (८७) प्रमा-से रगर्म' इरयादि पारिता में गुस मन स्पब्-निश्वस करती हए, उगका मवहार से नैयम्पं दिगलाया जा रहा है। यहाँ 'उत्क्चरेनषः सुख्ा: इस यद से मुल का स्वषय निर्दस किया गया है। मुछ रम के उसतर्थामायक है पर्था ह विस- दृति मादि कार्यविसेष मे उत्पादन है। यह विजेयण सुग व्वरप को समार्प नया दोग प्रादि से पृपक कर देवा है। विन्तु रम के आकर्पहतु ममाह उरादक तो सम दुार भी है, पाः पाद्गारो से पंपम्प ्प्रममंन मे मिस सो विसेशा दिए गए ह (।) पद्धिन: रम्य पर्मा:, (२) यमपरिगिमय:। पर प्रकार या मपसारभदक पव्षम हो
(१) भार पर है कि नगर मे मारमा के समान दास में स्ातरा गय सर्यार परी (Prineipal fatter) रम है। जिग प्रकर गोई पदि धीषामा के धर्मं (Properties) ह. मकन गरीर के गहीं, इगी प्रवार कुस भी जा क धर्म है (पास मे सगेश्क) सस्दार्यं के धर्म नहीं। पपप्व रामार्मदुगम मे पर्मदय भमपाो मे गुरा पात ही निम है। इस बगार से सोईंक यप है-'सो रह है मर्ष है, मह पूएा का भेदक सधन हो बाता है।
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भ्रेष्टम उल्लास: ४०७
i- (२) 'अचलस्थितयः' (अचला स्थितिः येपां ते तथाभूताः) मह दूसरा विशे- पण है। जिसका अभिप्राय है कि रस के साथ उन (गुएों) की स्थिति 'अचला'. अर्थात् निश्चित या अव्यभिचारी रूप से है। इस नियतस्थिति के दो तात्पर्य है-एक; तो यह है कि गुण रस के बिना नहीं पाये जाते; दूसरा यह है कि रस के साथ स्थत; होकर वे रस के उपकारक अवश्य होते हैं। इस प्रकार 'अचलस्थितयः विशेषण के- द्वारा-गुण के दो अलङ्कार-भेदक लक्षण प्रकट हो जाते हैं ऐसे रस के उपकारक, गुण कहलाते हैं (i) जो नियम से रस के साथ ही रहते हैं अथवा (ii) जो विद्यमान होते. हुए रस का अवश्य ही उपकार करते हैं। अलद्धार न तो नियम से रस के साथ ही रहते हैं, न नियम से रसोपकारक ही है, अतः अलद्दारों से पृथक् गुणों का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। इस प्रकार टीकाकारों का मत है कि कारिका मे दो विशेपणो के द्वारा अलद्कार भेदक लक्षणत्रय का निर्देश किया गया है रसोत्कर्ष के हतु होकर (क) रस-धर्म होना (रसोत्कर्पहेतुत्वे सति रसधर्मत्वम्), (ख) नियम से रस के ही साथ रहना, रस के बिना नही (रसाध्यभिचारिस्थितित्वम्), (ग) विद्यमान होकर रस का अरवश्य उपकार करना (अयोगव्यवच्छेदेन रसोपकारकत्वम्)।
वस्तुतः तो ऐसा प्रतीत होता है कि स्वरूप-निर्देशक तथा अलद्दार आदि का व्यावर्तक यहाँ एक ही लक्षणा है। माधुर्यादि गुए रस के धर्म कँसे हैं ? (कयमिमेः रसघर्मा ?) इस आ्काडक्षा में ही 'अ्चलस्थितयः' यह (हेतुगर्म) विशेपस दिया गया, है। जिसका अ्र्थ है-अ्रव्यभिचरित रूप से अर्थात् नियत रूप से रस के साथ रहने वाले। जो किसी के साथ नियमित रूप से 'रहता है (अव्यभिचरित सहचारी है) वह उसका धर्म होता है जैसे धूम अग्नि के साथ ही नियत रूप से रहता है अतः वह भग्नि का धर्म है। इसी प्रकार गुए भी रस के ही ध्मे हैं, क्योंकि रस के होने पर ही गुगा होते हैं औौर यदि वे होते है तो रस का अवश्य उपकार करते हैं अतः अन्वय-व्यतिरेक से यह सिद्ध होता है कि गुए रस के ही धर्म हैं। इस प्रकार यह सूत्रार्थ है-'ऐसे रंसोत्कर्षक धर्म गुए कहलाते है जो आातमा के झूरता इत्यादि धर्मों के समान निय- स्थिति वाले होकर रस के धर्म हैं। टिप्पणी-(i) काव्य-विवेचना के प्रारम्भिक काल से ही काव्य-पुणों का उल्लेख होता रहा है। भरतमुनि ने 'माघुय' तथा 'शौदाय' आदि (शब्दानुदारम- घुरान् १७.१२१) का उल्लेख किया है तथा 'ओोज' का स्वरप भी बतलाया है। प्रयम भलड्ारवादी आचार्य भामह के पशचात् तो गुणों के स्वरप तथा संस्यादि विवेचन का युग ही आ्रम्भ हो गया था; किन्तु उस समय गुएा तथा अलद्धारों को स्वर्प- विवेक नही हो पाया था। आ्रचार्य दण्डी के गुख-निरूपण में भी गुख तथा पतक्कार' का भेद स्पप्ट नहीं हुआ था। सवंप्रथम रीतिवादी आचा्य वामन ने गुगा तथा मल- द्ारों का भेद स्पष्ट करने का प्रयास किया। तदनन्तर ध्वनिवादी आचापो ने गुग के स्वरूप का सूक्षम-विवेचन किया तथा यह बतलाया कि माघुर्यादि 'गुर' शब्दाथं'
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11 षाणपकाशं:
आत्मन: एव दि यथा शौयादयो नाकारस्य तथा रसर्वैय माघुर्या दयो गुया न वर्णनाम। ववचित्त् शोर्यादिसमुचितरयाफारमहत््वादेपेर नात्, 'आकार पपास्य शूर:' इत्यादेव्यवदारादन्यताय्यररेपि वितताफृति- त्यमात्रेए 'शूरः इति, क्यापि शूरेऽपि मृर्तिलाधवमान्ेय 'मशर:' इति अविधान्तप्रतीतयो यथा व्यवद रन्ति तद्वन्मघुरादिव्यसरसुप््मारादिवर्द्ना
माघुर्यादि, मधुरादिरसोपकरखानां. तेपामसी कुमार्यादेरमाघुर्यादि, रस- पर्यन्तविश्रान्तप्रतीतियन्थ्या व्यवहरन्ति। अत एव माघुर्यदयो रसपर्मा: समुचितैव गंव्यज्यन्ते न तु वर्गमवाधयाः। यथेपां ध्यज्जकतवं तथोदाद- रिध्यते। पथवा दन्द-विन्याम यादि मे धर्म नही अवितु फास्य की भात्मा सर्मात् रम के परग हैं-'ये तम्य रसावितासरमा्नं सन्तमवसम्घरते से गुएाः नोर्थवियत्' (प्यत्ामोक २.६)। उन्हेंनि गुग तथा अलदुार के भेद का भी रप्टोकरस हिया। आाचायं मम्मट ने उनपा हो मनुररम रिया है। साम ही मससारवादी तपा सौविवारी आचायों के समान गुखों मा विभागनिष दापरर्यंक स्वयस्पशय म विवेशन बिया है। (ii) मापायं दस्दी ने गुगा तथा पनद्वारों या सप्यत: बिवेक नही रिया या। इसी से साधाय यामन ने उनके मत क सण्दन करसे हए उनका भेर प्रपत डिया या"""दण्विमर्त एा्वद गुलालक्ारमेवं दसविप्पन् पोदिश प्रतिषठामपति।' (पाम्यानसारमूत्र, कामपेनु व्पार्या क.१.१) अनुवाद-मिा प्रवार शोय शदि मूल मरमा के हो है शरोर के मही, इसी प्रकार माधमें मादि गूए रस मे हो है, यलों के महो। कही कही सो सोये पादि गूखों के योम्म नरोर को विमासता पादि बेसने के कारस-इसस परात हो यूर है इतमारि (विमों का सोकचारिक) व्यवहार हेगकर निग प्ााा भगम्य (दरागर) प्रतीति वासे (पदिघामामतीतय:) सोम अन्य किमो सोवंदोन कर्यात में भौ विशाल शरीरमाप्र के कारस यह सूर है' ऐगा व्वहार दरने गगते हैं औौर कही सूर व्यक्ति में भी केवन शरीर की लघुता मे ही 'यह नोम-हीन है' ऐमा सपस करने सफी है। उसो प्रपार मपर रस गुषूगार पादि के स्वमयक जुष्टमर भ्राहि भकों के विषम में ये मधुर पर है (गतों का धोिपारिक) स्वचहार होने वे रग पर्यश्त पर समे यातो पतीनि से होन (समच) जन धमपुर (पीर) मादि रत के स्टन्जरएप से प्दुक (पटग) घरों को सुर्गारतामात के भारस इसमें मापर्य है' ऐग म्यशहार कनरमे मगते हैं तदा मपूरर (पडगार) द्रादि हे सामपदर है प्रमुख (उपररए) उन (पलों) को पमुष्मारता के बारत यमभुरमा(मे अमपुर है। गवारि मनपदार करमे समते है। छदष (मापुनं सावि मूक्तों की रन के साप दिय्भ सियननि होने रे बारत) मापुनं सारि रग के वर्ष है यो सवोित बड़ों द्ारा 2ा त हिपे जाते है. बेदम बसा हो उनके सापय महो है। जिन प्रहार ल (भस़ी) शो स्म्जरत्षा ह यह मशाहुरता द्वरा बाराई शपदी।
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श्ेष्टम उल्लांस: ४०६
(द5) उपकुर्वन्ति तं सन्तं येऽङ्गद्वारेण जातुचिद्।
: ये वाचक वाच्यलक्षणाङ्गातिशयमुखेन मुख्यरसं सम्भचिनमुपकुर्वन्ति ते कषठादङ्गानामुत्कर्वाघानद्वारेण शरीरियोऽपि उपकारका द्वारादय इवालङ्वारा:। यत्र तुनारिति रसस्तत्रोक्तिवैचित्रयमात्रपर्यवसायिनः। पव- चित्तु सन्तमपि नोपकुर्वन्ति। प्रभा-भाव यह है कि वस्तुतः माधुर्य आदि रस के ही गुए हैं, शब्द के नहीं। 'मधुराः वर्शाः' इत्यादि लोकव्यवहार तो भ्रान्तिजन्य है। इम भ्रान्ति का कारस यह है कि रसज्ञ विद्वान जन शृद्धार आदि मधुर रस के व्यञ्जक कोमल वर्णो के विषय में ऐसा भपचारिक व्यवहार करते देसे जाते हैं कि 'ये वर्ण ही मधुर हैं।- उनके व्यवहार की औपचारिकता (गौएता) को न समझने वाले अरसज्ञ लोग सुकुमार वणों को ही माधुर्य आदि गुसा का आधार मान बैठते हैं तथा रस-माधुर्य आदि के बिना ही 'मधुराः वर्णाः' इत्यादि व्यवहार करने लमते है। यही बात 'आ्रकार एवा- स्य झूर:' इत्यादि लौकिक दप्टान्त से सिद्ध होती है। अतएव माधुर्य आादि गुए नियत। रूप से रस के साथ रहते हैं एवं रस के धर्म है तथा वर्ण तो माधुर्य आदि के व्यञ्जक मात्र हैं। टिप्पी-(i) आचार्य मम्मट की उपयुक्त मान्यता का आधार आचार्य आानन्दवघन तथा अभिननगुप्त की गुए-विषयक विवेचनाएँ है- शुद्गार एव मधुरः परः प्रह्लादनी रसः। तन्मयं काव्यमाश्रित्य माधुर्य प्रतितिष्ठति ॥ (ध्वन्यालोक २.१) एतदुक्तं भर्वत-वस्तुतो माधुर्य नाम शङ्गारादे रसस्यव गुएः। सन्मधुरादि उ्यज्जकयो: शब्दार्थयोरुपचरितम्। मधुरशङ्गाररसाभिव्यक्तिसमर्थता शब्दार्थयोर्मा धुयमिति हि तल्लक्षणाम् (लोचन उद्योत ३) (ii) पविधान्तप्रतीतय :- विश्रान्ता विपयादन्यम अपसारिी=ठीक अर्थ मे विश्राम करने वाली। तदन्या अविश्नान्ता प्रतीति: येपां ते; अर्यात् जिनका ज्ञान या विश्वास ठीक वस्तुविषयक नही होता, भ्रान्तियुक्त। इसी प्रकार रसपर्यन्त-विश्रान्त- प्रतीतिवन्ध्या-रसपर्यन्त पहुँचने वाली प्रतीति से वञ्चित। यहां गुखों को शब्द का धर्म मानने वाले वामन आदि की ओर संकेत है (वामनादय इति मावत्वालवोघिनी)। अनुवाद-जो (धर्म) पङग अर्थात् भङ्गभूत शब्द और अर्थ के द्वारा (उनमें उत्कयं उत्पमन फर) विद्यमान होने वाले (सन्तं=यदि यह हो तो) उस (भङगी) रस का हार इत्यादि के समान फभी (नियत से कहों) चपकार करते हैं। वे मनुप्रास तथा उपमा आदि मलद्धार कहलाते हैं। (८८) जो धर्म वाचकवाच्यलक्षणा अर्थात् शब्दार्यस्वरप (=लक्षणा) रस के भद्गों
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रेम्रात:
में विरोषता उत्पादन के द्वारा (=भुरोन) गहां यह सम्मय है (सम्भविनम्) यहा चरा मुस्य रस का उपकार करते है। ये कुछादि भ्रङ््गों में विशोपता स्यान (भापान) के द्वारा भात्मा (शरोरो) के भी उपकारक हार इत्यादि के समान पनद्गार कहमाते है। नहां रस नहीं है यहाँ सो उत्ति-वंवित्य (कमन का पनुठापन) मावर इिसलाकर समाप्त हो जाते हैं। (जासुचित्)-कहो तो रस होता ह तो भी उसका उपकार महीं ररते। प्रमा-मलद्वारों का स्वस्म मुगों से निशन्त मिसन है। मे भी रस क उ करक (रतोलपंक) तो है किन्तु ग्य के सामात् उपसरक नही परम्परवा गारक है। (१) रस के मन्न म्पात् सव्यं्जना के उरणस्प जो गम सवा मर्ष है। मसदूार उनमें उल्तयं की स्मापना करते है औौर शब्द सथा मर्प को गोमा बऱोते हुए कास्य को आारमा रस मे भी उदतयंक हो जाते है। ठौह इमी प्रकार जैमे दार पादि माभुप कष्ठ आदि की सोभा बढ़ाते हुए कामिनी गोन्दर्य के बल क होते है प्रतः मे रग के ध्मे नहीं है रापा रगमर्भे रुप गुसो से पृपर है (पमुटरेएेस्ोन रगपमीष
(२) से भनदवार नियमपूर्पक रसा के उपपरक नहीं होड यह विसनाने के लिए ही कारिका में दो पशों का प्रयोग किया गया है गन्य' समा 'आयुपि'। 'मय तु नाहित' भद सुति प्रन्थ इसकौ हो म्वारया है। मात यह है कि-(I) धयदार दही रगोतपंक होगे है जहां रस वियमान होगा है मन्पा (नीरम या पिष्वाम् में) सो मे दसी प्रकार उ पमरार मान दिसलापर रह याये है जिरा प्रार बुकता मे भन्नों में हार पादि पायूपस केवत हष्टि-पसरकार पे ही जार शोते है। भः दे नियमपूर्षक ग्म मे गाव हो नहीं रहो। (ii) दूमरी पाप यह है कि पहीसहीं रण विधमान होता है फिर भी सनदार उमका अनवार नहीं कममे बंगे बामीस मनदूार किसो सुपुमार नाविका के सौन्दयं शो पुद्धि मही पस्ठे। माः ममसुार वियमान रस के स्रबत्य ही अपहारह नही हो मे परमिवत दियनि पने (भत्पगय) ऐै यमा मुलों में मिन्न है। प्रदोप मादि टीक़ाषों मे यह! भी दद्गार के एगमेसा तीन मवता सिसराे है-रमोसनं के हेतु होकर (प) रग स शर्म गहीं (ग्योरकर मि रगापुति सम), (ग) रग के म होने पर भी हो गकसे है वह़ा उति-भमाशरपान दिसमाने १् (रमम्मियाण्टियन्). (ग) शहीवही विदमान बम का भी तसर मेही रणा (पनिवमेन सोललसम)। ए प्ा ब्राबा्यल एल दे9 स /- एवं पापसुगग: [1) रग पिवावतो, (9) वदात य मोसुबन, (३) म या रती-(!) आापार सम्मट ना मुगा गया ससार से सहन शा सिपन
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अस्टम सप्तमं- उल्लास:
यथाक्रममुदाहुरणानि- अपसारय घनसारं कुरु दारं दूर एव किं कमलै: । अत्ञमलमालि मृणालैरिति वद्ति दिवानिशं वाला ॥३४१॥ इत्यादौ वाचकमुखेन। मनोरागस्तीव्र विपमिव विसर्पत्यविरतं प्रमाथी निर्घूमं ज्वलति विघुतः पावक इव। हिनस्ति प्रत्यङ्ग ज्वर इव गरीयानित इतो न मां त्रातु तातः प्रभवति न चाम्बा न भवती॥३४२।।
(२) साहित्यदर्पसकार ने गुएा तथा अलद्धार, के स्वरूप-विवेचन- में प्रायः आचार्य मम्मट का ही अनुसरण किया है, किन्तु उन्हींने 'उत्कर्षहेतवः प्रोक्ता: गुण- लङ्काररीतयः' यह सामान्यतः बतलाकर दोनों का भेद इस प्रकार स्पष्ट किया है- रसस्याद्ट्रित्वमाप्तस्य धर्मा: शौयदियो यथा। गुाः (साहित्यदर्प ८ १) , शब्दार्थंयोरस्थिरा ये धर्माः शोभातिशायिनः । रसा दी नुपकुर्वन्तोज्ल द्वारास्तेउद्गदादिवत् ॥ वही (१०'१) अनुवाद-कमशः उदाहरण ये हैं- 'प्रभा-उपर्युक्त अलङ्गार-स्वरूप-विवेचन मे जो बतलाया गया है कि अलङ्वार * (१) वाचक द्वारा रसोत्कर्पक है; (२) वाच्यद्वारा रसोलकर्पक हैं, विद्यमान रस का भी, उपकार न करके, (३) वाचक का ही अथवा, (४) वाच्य का ही वैचित्न्य प्रकट करते है, (५) कही-कही रस के न होने पर उक्ति वेचित्र्य मात्र को प्रकट करते हैं। इनके उदाहरण कमशः दिए जाते हैं- अगनुवाद-(१. धाचक द्वारा) [फुट्टनीमतम्' में ससी के प्रति नायिका को उक्ति] 'हे सखि' कपूर को हटा लो, मुक्तामाला फो दूर 'कर दो, फमलों का क्या लाभ है? कमल नाल से बस करो-वह वाला दिन रात यही कहती है ।।३४१॥ इत्यादि में ('र' वरस का अनुपास) अलद्धार शब्द (की सौन्दर्य वृद्धि) के द्वारा (सिप्रलम्भ भृड्गार) रस का उत्कर्ष है [अलद्धारो रस्षमुपकुस्तः-इससे अ्रन्वय है; 'रवएं' चिप्रलम्भ भृड्गार के माधुर्य का व्यञ्जरु होता है]। (२. वाच्यद्वारा) [मालतीभाघव नाटक में ससो के प्रति मालती की उत्ि] 'मेरे मन का (माधव के प्रति) अनुराग तीक््स विप के समान निरन्तर (शरीर में) व्याप्त हो रहा है, (इससे 'वृद्धि फो प्राप्त होकर) वह पीड़ादायक (प्रमायी-' भथनशील: क्षोमकारी) हो गया है तथा घायु से प्रज्यलित (विधुतः) धूमरहित भग्नि के समान जल रहा है और अत्यधिक प्रवृद्ध (गरीयान्) भर्थात् सम्रिपात ज्वर के समान प्रत्येक श्रङ्ग को पोड़ित कर रहा है इसलिये (इतः) मेरी रक्षा करने में न मेरे पिता समर्थ हैं, न माता ही' ॥३४२॥
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४१० j कोव्यप्रकार:
में विशेयता उत्पावन के द्वारा (=मुखेन) जहाँ यह सम्भव है (सम्भविनम्) यहाँ उस मुस्य रस का उपकार करते हैं। ये कण्ठादि श्र्ङ््गों में विशेपता स्थापन (पाधान) के द्वारा मात्मा (शरीरी) के भी उपकारक हार इत्यादि के समान अलद्धार कहसाते हैं। जहाँ रस नहीं है वहाँ तो उत्ति-वंचित्र्य (फथन का अनूठापन) मात्र दिसलाकर समाप्त हो जाते हैं। (जासुचित)-फहीं तो रस होता है तो भी उसका उपकार नहीं करते। प्रभा-अलद्गारों का स्वरूप गुणों से नितान्त भिन्न है। वे भी रस के उप- कारक (रसोल्कपंक) तो हैं किन्तु-रस के साक्षात् उपकारक नहीं परम्परया उपकारप हैं। (१) रस के अ्रङ्ग अर्थात् रसव्यञ्जना के उपकरसरूप जो शब्द तथा सर्थ हैं, अलद्वार उनमें उत्कंर्प की स्थापना करते हैं और शब्द तथा अर्थ की शोमा बढ़ाते हुए काव्य की आत्मा रस के भी उत्कर्षक हो जाते हैं। 'ठीक इसी प्रकार जैसे हृर मदि भाभूपण कण्ठ आदि की शोभा बढ़ाते हुए कामिनी-सौन्दर्य के बद्ंक होते हैं मतः ये रस के धर्म नहीं है तथा रसंघमरूप गुएों से पृथक है (अ्न्भद्वारेरेत्यनेन रसपर्मव्व
(२) ये अलद्वार नियमपूर्वक रस के उपकारक नही होते-यह दिसलाने के। लिए ही कारिका में दो पदों का प्रयोग किया गया है 'सन्त' सथा 'जातुचित्''। 'यत्र' तु नास्ति' आदि वृत्ति ग्रन्थ इसकी ही व्यास्या है। भाव यह है कि-(i) मलद्दार यहीं रसोतापंक होते हैं जहाँ रस विद्यमान होता है अन्यथा (नीरस या चित्रकाव्य में) तो ये इसी प्रकार उत्तिचमर्कार मात्र दिखलाकर रह जाते हैं जिस प्रकार कुरूया के प्रद्गों में हार आदि आभूपस केवल दृष्टि-चमत्कार के ही उत्पादक होते है। अतः ये नियमपूर्वक रस के साथ ही नहीं रहते। (ii) दूसरी बात यह है कि नही-हीं रस विद्यमान होता है फिर भी अलद्धार उसका उपकार नहीं कारते जसे ग्रामीण भलक्ार किसी सुकुमार नायिका के सौन्दर्य की वुद्धि नहीं करते। अतः असङ्ार विद्यमान रस के अवद्य ही उपकारक नहीं होते, ये अनियत स्थिति वाले (चलस्थितयः)' हैं तथा गुणों से भिघ्न हैं। प्रदीप आादि टीकायों में यहाँ भी प्रसद्वार के गुएभेदक तीन सक्षए दिसलाये है-रसोत्कय के हेतु होकर (क) रस के धर्म नहीं (रसोपकारकतवे सति रसायृति- स्वम), (स) रस के न होने पर भी हो सपनी हैं वहाँ उत्ि-पमस्कारमात्र दिससाने हैं (रमव्यभिचारित्वम्), (ग) कहीं वहीं विद्यमान रस का भी उपकार नहीं करते (भनियमेन रसोपकारफत्वम्)। इस प्रफार प्रतन्नारस्वरूप वथन से यह स्पष्ट है- एवं पासद्वारा: (१) रस दिनसवतिष्ठन्ते, (२) अवस्य व नोपकुवन्ति, (३) न या रसे साक्षात् विन्तु भज्द्वारेगोति गुखेभ्यो दिलक्षला एव (घासगोघिनी)। टिप्पसी-(१) माचायं मम्मट का गुएा तथा असद्ार के स्वरप का विवेधन ध्वनिकार के अनुसार ही है-'तमर्यमसम्वन्तेयेऽ्र्गिनं से गुएा स्मृताः'-याच्यवाचक- सक्षसान्यङ्गानि ये पुनस्तवाभितास्तेलदारा: मन्तव्या कटकावियत्।: (ध्वन्यालोक २.६)।
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अस्टम सप्तमउल्लास:
यथाक्रममुदाहरणानि- अपसारय घनसारं कुरु दारं दूर एव कि कमलैः। अलमलमालि मृणालैरिति वदति दिवानिशं वाला॥३४१॥ इत्याद्टी वाचकमुखेन। मनोरागस्तीव्र' विषमिय विसर्पत्यविरतं प्रमाथी निधू मं ज्वलति विधुतः पावक इव। हिनस्ति प्रत्यङ्ग ज्वर इव गरीयानित इतो न मां त्रातु' तातः प्रभवति न चाम्बा न भवती ।३४२।।
(२) साहित्यदर्पसकार ने गुणा तथा अलद्धार के स्वरूप-विवेचन में प्रायः आचार्य मम्मट का ही अनुसरसा किया है, किन्तु उन्होंने 'उत्कर्षहेतवः प्रोक्ताः गुरा- सङ्काररोतय:' यह सामान्यतः बतलाकर दोनों का भेद इस प्रकार स्पप्ट किया है- रसस्याद्वित्वमाप्तस्य धर्मा: शौर्यादयो यथा। गुखाः (साहित्यदपस ८'१) . शब्दार्थयोरस्थिरा ये धर्माः शोभातिशायिनः । रसादी नुपकुर्वन्तोऽलद्दारास्तेऽद्गदादिवत् ॥ वही (१०.१) अरनुवाद्-प्रमशः उदाहरस ये है- 'प्रभा-उपर्युक्त अलद्वार-स्वरूप-विवेचन मे जो बतलाया गया है कि अलद्धार (१) वाचक द्वारा रसोत्कर्पक है; (२) वाच्यद्द्वारा रसोत्कर्पक हैं, विद्यमान रस का भी, उपकार न करके, (३) वाचक का ही अथवा, (४) वाच्य का ही वैचित्र्य प्रकट करते हैं, (५) कही-कही रस के न होने पर उक्ति-वैचित्र्य मात्र को प्रकट करते हैं। इनके उदाहरस क्मशः दिए जाते हैं- ! अरनुवाद-(१.धाचक द्वारा) [फुट्टनोमतम्' में सली के प्रति नायिका को उक्तकि] 'हे सखि' कपूर फो हदा तो, मुक्तामाला को दूर फर दो, फमलों का या लाभ है? कमल नाल से बस करो'-वह बाता दिन रात यही कहती है।।३४१। इत्यादि में ('र' वर्स का अ्रनुप्रास) अलद्धार शब्द (की सौन्दर्य वृद्धि) के द्वारा (विप्रलम्भ भृङ्गार) रस का उत्कर्ष है [अलद्धारी रसमुपकुर्त :- इससे अन्वय है; 'रबसं' विप्रतम्भ भृड्गार के माधुर्य का व्यञ्जक होता है]। (२. वाच्यद्वारा) [मालतोमाधय नाटफ में ससी के प्रति मालती की उक्ति] 'मेरे मन का (माधव के प्रति) अनुराग तोक्ष्स विप के समान निरन्तर (शरीर में) व्याप्त हो रहा है, (इससे 'वृद्धि को प्राप्त होकर) वह पोड़ादायक (प्रमायी- मपनशीलः क्षोभकारी) हो गया है तया चायु से प्रज्वलित (विघुतः) धूमरहित भग्नि के समान जत रहा है और अत्यधिक प्रयृद्ध (गरीयान्) सर्यात् सन्निपात ज्वर के समान प्रत्येक भ्रङ्भ को पीड़ित कर रहा है इसलिये (इतः) मेरी रक्षा करने में न मेरे पिता समर्थं है, न माता ही ।३४२॥
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४१४ ] काव्यप्रकाश:
यद्प्युक्तम् काव्यशोभाया: कर्त्तारो घर्मा गुणास्तद्तिशयह्ेतवस्त्व- [लङ्काराः' इति तदपि न युक्तम, यतः कि समसतैगुगी काव्यव्यवद्दार उत कतिपयैः ? यदि समग्तेः तत्कथमसमरतगुणा गौडी पाळ्चाली च रीति काव्यस्यात्मा। अथ कतिपयैः, तत :- अद्रावत्र प्रज्वलत्यग्तिरुच्चै: प्राज्यः प्रोद्यल्लसत्येप धूमः ॥३४५॥ इत्यादावोज: प्रभृतिपु गुगोपु सत्सु काव्यव्यवह्ारप्राप्तिः ।' स्वर्गप्राप्तिरनेनैव देहेन चरवर्णिानी। अस्या रदच्छदरसो न्यक्करोतितरां सुघाम्॥३४६॥ इत्यादी विशेपोत्तिव्यतिरेको गुशनिरपेक्षी काव्यव्यवहारस्य प्रवर्त्त को। अनुवाद-जो (वामन ने) फहा है-'काव्या-शोभा के विधायक (शग्व और धर्थ के) धर्म गुए होते हैं; किन्तु उस गुसकृत) शोभा की बुद्धि करने वाले धर्म अलद्धार फहलाते हैं (यह दोनों का भेद है) ।' यह भी ठौफ नहीं; वर्पोंकि (प्रश्न हो सकता है कि) समरतगुरों के होने से 'यह फाव्य है' इस भ्राकार का 'व्यवहार होगा या कुछ एक गुसों के होने से ही? यदि समस्त गुणों के होने से हो काव्य-व्यवहार मानोगे तो गौड़ी तथा माञ्चाती रोति, जिनमें समस्तगुस नहीं रहते, फाव्य की आ्रात्मा कैसे होगी ? औौर, यदि कुछ् एक गुलों के होने से ही काव्य-व्यवहार मानोगे तो 'प्रद्रावन' [इस पवत पर प्रचण्ड भग्ति जल रही है और यह उठ्ता हआ घना धूम शोभायमान है] इंत्यादि में भी प्रोज: प्रभृति गुस है अतएब यहां भी काध्य-व्यवहार होने लगेगा। साथ हो 'यह उत्तमवर्णा सुन्दरी सो इसी (मनुप्य) शरीर से स्वर्गप्राप्ति (के समान) है, इसफा अ्पर रस चमृत को भी तिरस्कृत फरता है।' इत्यादि में (पूर्धार्ध में, विशेषोकि तथा (उतरार्ष में) व्यतिरेद्ठ नामक बो मलस्दूार गुलों की भपेक्षा किये बिना ही माव्य-वययहार के प्रयतंक हैं [ प्रतः यामन का मलसार-लक्षस भी दूषिति है] - प्रभा-सर्वप्रथम रीतिवादी आवायं वामन ने मुगा तथा मलद्वारों का भेद- विमेमन किया था। वामन के अनुसार गुए तथा अनसारों का भेद यह है कि कम्य के'शोभाजनक धर्मों को मुग कहते हैं-'फाव्यशोभाया: कर्तारो चर्मा गुखाः' तथा चर घोभा के वृद्धिकारक हेतुमों को ससक्वार कहते हैं-तद तिरव हेतवसयतद्वाराः।' आनार्य मम्मट, इसका मण्डन करते हुए कहते हैं कि काव्य के शोभाजनक गुए होठे . है इसके दो अभिप्राम हो सकसे हैं-एक तो यह कि समस्त गुगों के होने से ही कोई रचना फाव्य-पद को अधिकारिसी होती है, दूमरा यह कि वविष्य गुखों से होने से • भी किसी रचना को 'काव्य' कहा जा सवता है। यदि प्रयम विकल्प को स्वीकार करे तो गौडी तथा पाञ्चाली रीति को पाप काव्य को मातमा मरी मानेंगे? भाव यह है
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भ्रप्टम उल्लास: [ :४१५
कि वामन के मतानुसार रीति ही काव्य की आात्मा है-'रीतिरात्माकाव्यस्य'। गुएविशिष्ट पद-रचना का नाम ही-रीति है। यह तीन प्रकार को है-वैदर्भी, गौडीया -तथा पाञ्चाली। वैदर्भी रीति समस्त गुए विशिष्ट होती है इसलिये (प्रथम विकल्प के अनुसार) वह तो काव्य की आत्मा हो सकेगी; किन्तु गौडी तथा पा्चाली समस्तगुए विशिष्ट नहीं होती अतः उनको काव्य की आात्मा कैसे माना जा सकेगा ? यदि द्वितीय विकल्प को स्वीकार करें तो जिस काव्य-रचना में कोई एक भी, गुए होगा वह भी काव्य कहलाने लगेगी। इस प्रकार 'अद्रो' इत्यादि वाक्य भी काव्य हो जायेगा; क्योंकि इसमें भी वामनोक्त पोज इत्यादि गुए विद्यमान हैं। मम्मट के मता- 'नुसार तो काव्य के लिये मलद्गारों की भी अपेक्षा है, अतः अलद्गारों के अभाव में ही इसे काव्य नही कहा जा सकता (प्रदीप)। । इस प्रकार उदाहरण ३४५ में गुणों के होने पर काव्य-व्यवहार नही होता; किन्तु अग्रिम उदाहरसा में गुणों की अपेक्षा के बिना ही अलद्वार के कारए काव्य- व्यवहार हो जाता है अतः (अन्वय-व्यतिरेक व्यभिवार होने से) वामनकृत गुणलक्षस ठीक नहीं। .M :. वामन का अलद्धार-लक्षण भी दूषित ही है। बात यह है कि 'स्वर्गे-प्राप्ति' 1 इत्यादि स्थल पर वामनोक्त प्रसाद आदि कुछ ही गुए विद्यमान हैं, सभी नहीं। किन्तु जैसा अभी बतलाया गया है, कुछ गुणों को तो काव्य-व्यवहार का प्रयोजक माना नहीं जा सकता। इस प्रकार यहाँ विशेपोक्ति तथा व्यतिरेक अलद्दार ही काव्य- व्यवहार प्रवर्तक हैं, यह स्वीकार करना पड़ता है। किन्तु वामन के मतानुसार अलद्दार गुए-जनित कोभा को ही बढ़ाने वाले होते हैं। यहाँ तो गुए-जनित शोभा का प्रभाव है अतएब अलद्धार का लक्षणा (तदतिशयहेतवः) यहाँ घटित नही होता और उसमें अव्याप्ति-दोप हो जाता है। अथवा गुसाजन्य शोभा के मभाव मे यह उक्ति काव्य ही :नही कही जायेगी; किन्तु रसानुभूति की व्यन्जक होने से यह उक्ति काव्य मानी ही जाती है। अतः वामनकृत गुए और अलद्गार का भेद भी युक्तियुक्त नहीं कहा जा सक्ता । संक्षेप मे मम्मट से पहिले गुए और अ्लद्धारो के भेद के विषय में वीन मत 44 विद्यमान थे-(१) गुए तथा अलद्ारों का भेद नहीं-पभेदवाद। (उद्भट) (२) गुस और अलद्धारों का यह भेद है कि (क) काव्यशोभा के उत्पादक धर्म गए हैं तथा गुणों द्वारा उत्पादित दोभा को बढ़ाने वाले धर्म अलद्ार हैं, (स) गुए काव्य के अनिवार्य (नित्य) धर्म हैं तथा अलङ्ार घनिवाय नहीं। (वामन) (३) गुण और अलद्धारों, का भेद यह है-कि गुए काव्य की आत्मा रस के धर्म है किन्तु भलद्वार काव्य के मङ्गभूत शब्द और भर्थ के धर्म हैं। ' *. मम्मट ने उद्भट के मत ा सण्डन किया, वामन के भत का दोप दिसलाया तथा आनन्दवर्घन के मत का अमुसरण करके गुए और अलद्धार का भेद निर्धारित
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४१६ 1 काव्यप्रकाश:
इदानी गुणानां भेदमाह- 1 (द६) माधुर्य्योजःप्रसादाख्यास्त्रयस्ते न पुनदश। किया (द्र० सूत ८७-८८) वामन के समान उन्होंने गुो का काव्य को शोभादा धर्म नहीं माना अपितु काव्य का उत्कपहेतु माना तथा अलस्गारों को भी उत्क्प ही बतलाया। किन्च, उन्होंने गुशामिव्यञ्जक शब्द और श्र्थ को काव्य-ववहार प्रयोजक अतएव काव्य का अनिवार्य धर्म मोना, गुणों को नही, जैसा कि वामन माना है (द्र०, 'सगुसों' की व्याख्या)। इसी प्रकार मम्मट के अनुसार मलसूार काव्य के अनिवार्य धर्म हैं। हां, स्फुट अलक्वार के बिना भी काव्य-वपवहार हो सकत है (द्र०, 'अलङ्कृती' की व्याख्या। १ मम्मट ने गुसों की रसघमता और अलद्दा की शब्दार्थ-धमंता आनन्दवर्द्वन के समान ही स्वीकार की है। इस प्रकार मम्मट गुए तथा अलद्दारों के भेद-प्रतिपादन की एक निजी विशेषता है।
प्रकार किया है- टिप्पसी-(i) आाचार्य वामन ने गुस तथा असद्वारों का भेद-विवेचन द
तथ भ्ोज: प्रसादादमो गुएाः, यमकोपमादपरतु अलद्धारा इति स्यिति: काव्यमिवाम् तेथों कि भेदनिबन्धनम् १ इत्याह - काव्यलोभाया: कर्तारो गुएाः'।!॥ -I'. ये सलु शब्दारथंयोधर्मा. फाव्यशोरभा कुर्वन्ति, ते गुशा से घ धोज: प्रसावावपः नं यमफोपमादयः, फॅवल्येन तेपाम् धफाव्यशोभाफरत्वात्। प्रोजः प्रसादादीनानु केवलानामस्ति काव्यशञोभाकरत्वमिति।
तस्या काव्यशोभाया: प्रतिशय, सदतिमः तस्य हेतवः । 'तु सम्वो व्यतिरके । पूर्व 'नित्याः ॥३॥ पूर्वे गुखांः नित्याः, तंविना काव्यशोभानुपपतः । (३११३) (ii) वामन की रीनिविष्यक मान्यता संक्षेप में इस प्रकार है- - 'रीतिरात्मा काव्यस्य ॥६।। यिशिष्टा पदरचना रोति: ।। मिशेशो मुलातमा ॥म।। सा घिधा वैदर्भी गोडीया पाञचाली व ॥E। समप्रमुशोपेता बंदर्भी ॥११॥ भोजः कान्तिमति गौहीया ॥१२॥ माधुर्यसौ कुमार्योपपमा पारचाली ॥१३॥ (iii) 'स्वर्गप्राप्ति' इत्यादि पद्य में दिव्य-देह रप एक गुए की न्यूनता की । कल्पना करके स्वर्ग-साम्य को हढ़ किया गया है (एकागुर हानिकल्पनार्या साम्यदादप दिशेपोकिति :- काव्यालद्वारमूत ४-३.२३) अ्रतः यहां विशेषोकि अवद्वार है। इसी प्रकार 'मघररस' जो उपमेय है उरो उपमान धर्मात् सुघा गे बड़फर बतलामा गया है इस लिए यहां (उपमेवस्य गुशातिरेकितयं व्यतिरेक :- ४.३.२२ व्यतिरेम अलद्वार है। गुए के प्रकार- अनुवाद-मब (गुलों के स्वल्प का निरपस करके) गुलों का प्रकार वतमाते हैं- माधुयं, भोम तथा प्रसाद नामक वे (तुर) सोन हो है, बम नहां (नंता कि वामन ादि मावायों ने माना है) ॥८६।।
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अप्टम उल्लास: ४१७
एपां क्रमेण लक्षएमाइ- (६0) आह्मादकत्वं माधु्य्यं शृङ्गारे द्रु तिकारएम् ॥६८॥ शृद्गारे अ्रर्थात् सम्भोगे द्र तिर्गलितत्वमिव। श्रव्यत्वं पुनरोज .- प्रसादयोरपि। (६१) करुणे विप्रलम्भे तच्छान्ते चातिशयान्वितम। शत्यन्त द्रुतिहेतुत्वात्। प्रभा-आचार्य मम्मट ने गुगों को रसधम बतलाया है। इसी के आधार पर वे गुों के तीन-भेद स्वीकार करते हैं तथा वामन आदि आचार्यों द्वारा प्रति- पादित दस प्रकारों को अमान्य घोपित करते हैं। ध्वनिवादी आचार्यों की दप्टि में गुणों की संख्या तीन इसलिये है क्योकि नव-रस के आस्वादन में सामाजिक हृदय की तीन ही अवस्थायें होती हैं-(१) द्रुति, (२) विस्तार, (३) विकास। शृङ्गार करुए और शान्त में चित्त-दुति होती है। वीर, रौद्र और बीभत्स में चित का विस्तार होता है। हास्य में मुख का विकास होता है, अद्भुत में नयनों का तथा • भयानक में गमन आादि का। यह विकास कही द्रुति के साथ होता है कहीं विस्तार के साथ, अतः प्रसाद गुए सभी रसों का उत्कर्पाधायक हो जाता है। इस प्रकार रसास्वादन अवस्था मे हृदय की तीन प्रकार की अवस्था होने के कारण रस के धर्म गुण भी तीन प्रकार के ही हैं। टिप्पणी-वामन ने निम्न दस गुणों को मान्य ठहराया-ओोज: प्रसादशलेप
३. १. ४) कुछ टीकाकारों ने वामन के नाम से दस गुस निर्देश करने वाला एक श्लोक उद्ध त किया है। वामन के अनुसार दस शब्द-गुण तथा दस अ्थगुस। उनका भागे विस्तार से वर्णन किया जायेगा। अनुवाद्-इन (माधुर्य, शोज तथा प्रसाद) फा करमशः सक्षरा बतलाते हैं- (मधूयं)-(द्र तिकारसम् प्राह्ादकत्वं माघुष तच्च शृद्धारे-यह अ्रन्वय है] चित्त को दति का कारस जो शह्लादकता अर्यात् आनन्दसवरूपता है वही माधुर्य (गुए) है औौर वह शरृङ्गार रस में होता है। (६०) (कारिका में) शृङ्गारे अर्थात् संभोग शृद्गार में। 'दति' अर्थात् चित्त का पिघलना सा। श्रव्पता मर्थात् अवसान्कूलता (सुनने में प्रिय सगना) जो शोज तथा प्रसाद में भी होती है (पतः 'भम्पता को माधु्य नहीं कहना चाहिये)। वह माधुयं (संभोग भृङ्गार) करुस, विप्रलम्न भृद्धार तथा शान्त रस में (उत्तरोत्तर) प्र्तिशयित अर्थात् उत्कृष्टतर हो जाता है पयोंकि क्रमरः प्रत्यधधक द.ति च कारख होता है। (६१) प्रभा-माधुर्य गुए का वया स्वरप है? जैसा कि गुएस्वस्प विजेचन में वहा गया है-गुण रस के उत्कर्षक होते हैं, अतः माधुयं गुए शङ्गार आदि
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४१= ] काव्यप्रकार:
(६२) दीप्त्यात्मविस्तृतेहेतुरोजो वीररसस्थिति ॥(६६) चित्तरय विस्ता ररूपदीप्तत्वजनकमोज: । (६३) बीभत्सरौद्ररसयोस्तस्याधिक्यं क्रमेगा च। वीरादू बीभत्से, ततो रौद्र सातिशयमोज: का उत्कपंक इन्ही का एक विदेष घर्म है। शृङ्गार आदि रस आनन्दरूप हैं। इनके भीतर एक विशेष प्रकार की आनन्दरूपता होती है, जिसके कारण सहृदय- जनों का चित्त द्रवित सा हो जाता है उसका द्रेपादिकृत काटिन्य चना जाता है। चित्त का आद्र हो जाना ही चित्त-दरवस है और उसका कारए श्रह्लाद में स्थित (आ्राह्लादगत) एक विशेष धर्म होता है। वही धर्म माधुर्यं है। वह ररा सारतम्य भाव से रहता है इसी हेतु शृङ्गार आदि कहीं कम मधुर तथा कही अिक मधुर कहे जाते हैं। भामहाचार्य ने भी माघुर्य, भोज और प्रसाद-तीन गुख माने मे, किन्तु 'धव्यं नातिसमस्तार्थशव्व मधुरमिष्यते'-(२. २. ३.) यह मधुर गुख का लक्षस किया था। श्रव्प का अर्थ है-अवसानुकूलता, धुतिप्नियता। यह तक्षण उचित नहीं, बयोंकि यह श्र तिप्रियता तो भोज तथा प्रसाद में भी रहा करती है, किन्तु भोजगुए विशिष्ट काव्य में दीप्तित्व का ही अनुभव होता है, माधुर्य का नहीं। इसी प्रकार प्रसाद में भी माघुर्य की अभिव्यक्ति नहीं होती। इससिये मापुर्य को भुतिसुसद सन्दों का गुए नहीं फहा जा सकता। यह माधुर्य केवल सभोग शद्धार में ही नहीं रहता अपितु करुए, वित्र लम्भ तपा शान्त में: भी रहा करता है। साथ ही संभोग शृद्धार में जो माधुर्य है उसकी अपेक्षा करुमा में अधिक माधुर्य होता है। करण की अपेस्षा विश्लम्भ में तया विप्रलम्भ को भपेक्षा शान्तरस में अधिक मायुर्य होता है। सहस्यचनों का अनुभव बतलाता है कि समभोग शृद्गार को अपेक्षा भरमा यादि में नमसः पित के ह्ुति अ्धिक हुमा करती है, जो दूति नेव-जल तथा पुनक शदि से प्रतीत हुमा करती है। एक बात यवस्य है कि यह माधुयं समभोग तथा विप्र सब्भ में प्रतिपक्ष-रहित होता है थर्यात् उसमें भोज का लेस भी नहीं होसा, निन्दु वा्त में :जुगुप्ता आादि का सम्न्ध होने के वरण भोज के मल्यांभ से भी पुक्त होता है। अरनुवाद-(२ मोज)-[दोप्तवात्मविस्तृते: हेतुः चोजः सब्च वीररवस्यिति] दोप्ति रप चित (भात्मा) के विस्तार का हेतु ही भोज गुए है, उस़की ' स्विति बीर रस में होती है। (६२) चित-विस्तार रूप तो दीप्तता है उसतका काइल धोन गुए होता है। नमराः बीमास तथा रोटरस में उस ोस की सपिकता होती हैं। प्र्यात् यीर रम से धीभस में तथा घोमतत से (ततः) रौद् में सोन गुछ चड़कर होता है ।।६ ै
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अ्रष्टम उल्लास:
(६४) शुष्केन्वनाग्निवत् स्वच्छजलवत्सहुसैव य: ।।७०।। व्याप्तोत्यन्यत्प्रसादोऽसी सर्वत्र विहितस्थितिः । अन्यदिति व्याप्यमिह चित्तम्। सर्वत्रेति-सर्वेपु रसेपु सर्वासु रचनासु च। प्रभा-दीप्ति चित्त की विशेष प्रकार की वृत्ति हैं, जिसमें मन प्रज्वलित .सा हो जाता है, चित का विस्तार सा हो जाया करता है। यह दीप्ति चित-द ति से भिन्न प्रकार की एक चित्त की अवस्था है जो प्रतिकूल विषयों के प्रति हुआा करती है। इस दीप्ति का जनक जो रस का घर्म है वह ओज कहलाता है। यह ओज मुए वीर रस के समान वीभतस तथा रौद्र में भी होता है।किन्तु •वीर की अपेक्षा वीभत्स में चित्त-दीप्ति अधिक होती है अतएब वीर की अपेक्षा वीभत्स में अधिक झोज गुए माना जाता है। इसी प्रकार बीभत्स की अपेक्षां रौद्र में अधिक ओज होता है। बात यह है कि वीर में तो द्वप्य के प्रति जीतने की इच्छा मान होती है, वीभत्स में प्रबल त्याग की इच्छा होती है तथा रौद्र में तो अपकारी 'के वध की ही इच्छा होने लगती है इस प्रकार क्रमशः चित की दीप्ति अथवा प्रज्वलन अधिक ही होता जाता है इसलिए उतरोत्तर ओज की अधिकता मानी जाती है। टिप्पी-यहाँ माधुर्य तथा ओज गुए के प्रधान शाशयों का उल्लेस "किया गया है। शेप हास्य, भयानक तथा अद्भुत रस में माधुर्य तथा झोज दोनों ही रहते है। हास्यादि का यदि शृङ्गार के हेतुओं से आ्रविर्भाव होता है तो वहाँ साधुय की प्रधानता होती है। यदि हास्यादि का वीर आदि हेतुओं से आवि्भव होता है तो पोज की प्रधानता होती है। कुद व्यास्याकारों का यह मत है कि हास्य में सदा माधुर्य की प्रधानता होती है तथा भयानक और अद्भुत में झोज की ही। अनुवाद-(२. प्रसाद) जिस् प्रकार सूसे इन्घन में प्रग्ति तथा स्वच्छ (चस्त्र) में जल सहता व्याप्त हो जाता है इसी प्रकार जो गुए सहसा ही भ्रन्य धर्यात् चित्त में ध्याप्त हो जाता है, वह प्रसाद गुएा है,वह सबभ (समस्त रसों तथा 'रचनापों में विद्यमान रहता है। (६४) 1 .- (फारिफा में) अ्रन्यत् (दूसरा) अर्थात् व्याप्य जो यहाँ पर 'चित्त' है। सवत्र -अर्थात् समस्त रसों में तथा समस्त (पदसंघटना रप) रचनापों में। प्रभा-प्रसाद गुए चित्त-विकास का जनक है। इस गुए के होने से रस L तुरन्त ही इस प्रकार हृदय में व्याप्त हो जाते हैं जिम प्रकार शुप्क इन्यन में भ्रग्नि तथा स्वच्छ वस्म में जल। चीर, रोद्र आदि में तो प्रसाद गुय चित में सुष्क इन्घन में अग्नि के समान व्याप्त हो जाता है तया गृद्वार और कससा आदि में स्वच्छ वस्त्र में जन के समान (चित) व्याप्त हो जाता है।
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४२० ] काव्यप्रकाश:
(६x) ुणवृत्त्या पुनस्तेपा वृत्ति: शब्दार्थंयोमंता ।७१।। गुसवृत्या उपचारेख। तेपां गुखानाम, आकारे शौर्यस्येव। फुतस्त्रय एव न दश इत्याह- (६६) के चिदन्तर्भवन्त्येपु दोपत्यागात्परे श्रिताः । अन्ये भजन्ति दोषत्वं कुत्रचिन् ततो दश ॥७२।। यह प्रसाद गुए समस्त रसों का धर्म है तथा सभी रस इसके आधार हैं। इसी प्रकार समस्त प्रकार की रचनाएँ इसकी व्यं्जका हो सकती हैं। इसी हेतु वृति में रवंध का अर्थं 'सर्वपु रसेपु सर्वासु रचनामु च' यह किया गया है। यद्यपि रस में ही गुए रहते हैं तथा रचनाएँ गुणों की व्यं्जक तो हैं हो भतएय गुगा व्यङ्गधव्यञजकभाव सम्बन्ध से विेप प्रकार के पद-विन्यास रूप रचनामों में भी रहते हैं। अनुवाद-(तेपा शब्दार्थयी वृततिः पुनः गुरावृत्या मता-यह अन्यय है। उन (माधुर्य आदि) गुशों की शब्द तथा अर्थ में स्मिति सो केवल गौसरूप से (भोपचारिक मानी जाती है। (६५) (कारिका में) 'मुलवृत्या' अर्थात् उपवार से (Indirectly)। 'तेपाम्' अर्थात् गुएों की। पराकार में शौप आदि के रामान। प्रभा-माधुय आदि गुख रस के धर्म हैं तथा' 'मधुर शब्द हैं' 'मपुर भ्र्प हैं।'यह विद्वानों का उवहार देया जाता है। माचाय मम्मट ने भी प्दाथों सगुखो' यह काव्य के लक्षणा में ही कहा है। कारग यह है कि जिस प्रकार मात्मा 'के दौय मादि गुखों का शरीर में भी गौए रूप से व्यवहार होता है (भाकार एवास्य पुरः) इमी प्रकार मायुर्य आदि यद्यपि रस के धर्म हैं तथापि गुगव्पञ्जक सुकुमार आदि वसों को, अथो को तथा रमनाओं को भी गौसरूप से मथुर फह दिया जाया करता है। शब्द और मर्य यादि में माधु्यं आदि का अयहार पौपचा- रिक या लाक्षणिक है, यह भाव है। वामनोक्त दस शब्द-गुखों को समौक्षा अनुवाद-(माधुयं घोज तया प्रसाद) सोन हो गुख वर्यों है. दस ररपों नहीं ? यह पतलाते हैं- (प्राचीनों के १० गुयों में से) (क) कुछ तो इन तीनों में ही मन्तमूंर हो जाते है, (स) धन्य कुद दोयाभाव एम में होते है तथा (शेव) कप कहो वही (रस- : विशेष या उवाहरसविशेष में), (ग) दोवत्व हो जाते है, इसलिये वस मुल नहीं है। (६३) प्रभा- वामन मादि माधानों ने गुझो का विवेवन करसे हुए यम गुगा ना उल्लेम किया था। वे दम शुहा ये है-(१) पीड, (२) प्रमाद, (४) दलेप, (४) समता, (५) गमापि, (६) मायुर्ष, (3) सौकुनार्य, (=) वशरता, (e) गर्यग्मिः
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अप्टम उल्लास: ४२१
बहूनामपि पदानामेकपदवद्धासमानात्मा यः इ्लेप:, यश्चारोहाव- रोहकमरूप: समाषि:, या च विकटत्वलक्षणा उदारता, यश्चौजोमिश्रित- शैथिल्यातमा प्रसाद:, तेपामोजस्यन्तर्भावः। प्रथक्पदत्वरूपं माधुर्य भङ्गषा साक्षादुपात्तम्। प्रसा देनार्थव्यक्तिगृ होता। मार्गाभेदरूपा समता क्वचि द्दोप:। तथा हि मातङ्गा: किमु वल्गितैः' इत्यादौ सिंहाभिघाने मसृषमार्ग त्यागो गुएः। कष्टत्वमाम्यत्वयोर्दु व्टताभिघानात्तल्निराकरऐेनापारुप्यरूपं सौकुमार्यम्, शरज्ज्ल्यरूपा कान्तिश्च स्वीकृता। एवं न दश शव्दगुणा:। औीर (१०) कान्ति। आचार्य मम्मट का मत है कि काव्य में माधुर्य, ओज तथा प्रसाद तीन ही गुण होते हैं। वामन आदि के कहे हुए दस गुए नहीं होते। कारण यह है कि उनमे के कुछ गुशा इन्हीं तीनों के अन्त्गत हैं तथा कुछ दोपों के प्भाव मान हैं और उनमें से कुछ तो गुए पद के अधिकारी ही नही हैं क्योकि किसी २. रस में या किसी उदाहरण में वे दोपरूप मे ही दृष्टिगोचर होते हैं; जैसा कि आगे विवेचन किया जा रहा है। अरनुवाद-(वामनोक्त दस शब्द गुणों में से) (फ) जो बहुत से पदों की एक पद के समान प्रतीति होना रूप (१) इ्लेप है, जो (वाक्य में) आरोह सवशेह कम रूप (२) समाधि है' जो पदों की विकटता अर्थात् विच्छेद के कारस नृत्यप्रायता रूप (३) उदारता है तथा जो ओोज से मिश्रित बन्ध शथिल्य रूप प्रसाद हे-उनफा (५) भीज में अन्तर्भाव हो जाता है। पृथक्-पृथक् पदों का रखना (दीघ समासों का पभाव) रूप जो ।६) माधुर्य है, उसे तो प्रकारान्तर माधुयध्यञ्जक पदों में दीर्घं समास रहित पद के ब्रहणा] से साक्षात् रूम में लिया ही गमा है। (७) अयंव्यक्ति (अवितम्ब अर्थ-बोध का साम्थ्य) प्रसाद नामफ गुण में गृहीत हो जाती है। (ग) माग अर्थात् वंदर्भी आदि रीति का (रचना के आरम्भ तथा समाप्ति में) भेद न. करना रूप (८) समता कहीं पर दोप हो जाती है; जसे कि 'मातङ्जा: किमु वल्गित:' (ऊपर उदाहरण २६६) इत्यादि में सिंह के वर्णन (कोपाटोप आादि) में कोमल मार्ग का त्याग गुस है (अ्रतः महाँ मार्ग का त्याग न फरना रूप 'समता' दोष हो जाती)। (ख) 'कस्टत्व' तथा प्राम्यत्व को दोष बतलाने के कारएा उन (दोनों) का परित्याग करने पर जो भपारव्य रूप (६) सुकुमारता तथा श्रोज्ज्वल्य (पदन्लालित्य) रूप (१०) कान्ति है उसे स्वीकार कर लिया गया है। इस प्रकार दस गुए नहीं हैं। प्रभा-आचार्य वामन ने बन्ध अरथात् पद-रचना के दस (शब्द) गुों का इस प्रकार निरूपस (काव्यालद्वारमूय ३.१) किया है-(१) गाढयन्यत्वमोज :- पद रचना में शिथिलता का सभाव भोज गुए है, जैसे-'विलुलितमकरन्दा मञ्जरीनं- तंयन्ति।' (२) शैथित्यं प्रसाद :- पद-रचता की शिथिलता ही प्रसाद है, जैसे 'यो यः शस्त्रं बिभति ।' (३) मसृखतवं इ्लेप :- ममृणत्व का अर्थ है-वहृत से पदों का एकवद् भासित होना, यही क्लेप है जैसे-'अस्तयुत्तरस्यां दिशि देववात्मा' यहाँ सन्मि के
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४२२ j काव्यप्रकारी:
पदार्थे वाक्यरचनं वाक्यार्थे च पदाभिघा। प्रोढिर्व्याससमासी च साभिप्ायत्वमस्य च। इति या प्रौढि: श्रोज इत्युक्तंतद्वचित्र्यमात्रं ने गुसः । तदभावेऽपि
फिर भी प्रतीत नहीं होती, एक पद सा लगता है। (४) भागनिवः समता-जिस रीति (मार्ग) से श्रम्भ किया गया हो इ्लोक या प्रबन्ध की समाप्ति पर्यन्त उसका निर्वाह करना, उसे न त्यागना जैसे-'प्रस्त्युत्तरस्यां दिशि' आदि में वैदर्भी रीति का निर्वाह किया गया है। (५) आरोहावरोहकमः समाधि :- आरोह का भर्थ है गाढता. तथा अवरोह का अर्थ है शिथिलता। कहीं तो आरोहपूर्वक अवरोह होता है, कहीं अवरोहपूर्वक ारोह होता है; जैसे-'निरानन्दः कोन्दे मधुनि परिभुक्ताज्भितरसे' यहां. 'निरानन्द: कोन्दे' मे 'गुरु' अक्षरो की बहुलता के कारए आरोह तथा 'मधुनि' यहाँ सघु श्क्षरों की बहुलता के कारस अवरोह है। भथवा जैरे 'नराः शीलभ्प्टा व्यरान इव मज्जन्ति तरव:'-यहाँ 'वरा.' में अवरोह तथा 'श्षीलभ्रष्टाः' में मारोह है। (६) पृथक्पदत्वं माधुयंम्-पद-रचना में पृथा २ पद होना अर्थात् दीय समास न होना माधुयं है। जैसे -- 'स्थिता: क्षएं पक्ष्ममु ताडिताघयाः।' (७) म्जरठंत्यं सौकु- मार्यम्-ग्रजरठत्व का अर्यं है-सपार्प्य, कोमलता, जैसे-'स्रपसारय धनमारम्' इत्यादि । (८) विरुटत्वम् उदारता-जिस पद-रचना में सामाजिक को ऐसी भावना होती है, जैसे कि पद नृत्य कर रहे है (विकटत्वं -= नृत्यप्रायता); जैसे- 'स्वचरएाविनिविप्टन पुर्रनतकीनां भर्षिति रसितमासीत् तन चिय कलं ने।' (६) पर्यव्यकति हेतुत्वमर्यध्यक्ति-वह गुए जिससे तुरन्त भथबोध हो जाता है। जसे 'वागर्याबिव संपृक्ती वागर्यप्रतिपतरय ।' (१०) चोग्ज्वत्यं कान्ति :- पद-रचना में लालित्य हो कान्ति है, जैसे-'निरानन्दः कोन्दें मधुनि' इत्याहि। ii) इन दस वामनोक गुणों में से-१. पलेप, २. समाधि, ३. उदारता, ४. प्रमाद तया ५. भोज, का मम्मंट के ओोज गुख में अन्तर्भव हो जाता है: ६माषुयं को मम्मट ने भी प्रका- रान्तर रे कहा ही है। ७. अथव्यकति का मम्मट के 'पमाद' में प्रहपप हो जाता है। म. सोकुमाय तथा ६. कान्ति-ये दोनों दोपाभाय रूप ही है तथा १०. सगता कही,२, दोप भी हो जाती है अतः यह निस्चित रूप से गुएा नहीं है। इमलिए गममटोक नुगापम ही मुकतियुक्त है (iii) वामन के पूर्व भी''समाधि' आदि को भोज से पृवर्' न मानने वाले आलायं थे किन्तु वामन ने इनकी पृषकृत्ा को शिद् किया मा। (काव्यास द्वारमूय :१)। वामनोक्त दस सर्थ-गुणों की समीक्षा अनुवाद-(यामनोक्त दस भप मुकों में से भी) (क) पत्र के धर्ष की प्रपर करने के सिये वाश्वरचना, (सा) वाक्य के अर्थ में परमात्र का प्रयोग (ग) स्याम, (बिस्तार) धर्थात् एक यापमायं का पनेफ वाद्यों द्वारा पमन (प) समास (संशेप).
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प्रप्टम उल्लासे: [४२३
मराम्याणं निराकरणेन च साभिप्रायत्वरूपमोज:, अर्थवैमल्यात्मा प्रसाद:, उक्तिवैचित्यरूपं माधुर्यम्, अप्रपारुप्यरूपं सौकुमार्यम्, अग्राम्यत्वरूपा उदारता च रवीकृतानि। शरभिघास्यमानस्वभावोकत्यलङ्गारेण रसध्वनिगुणीभूतव्य- दषाभ्यां च वस्तुस्वभावरफुढत्वरूपा अरर्थव्यक्ति:, दीप्तरसत्वरूपा कान्तिइच रवीकृता । क्रमकौटिल्यानुल्वसत्वोपपत्तियोगरूपघटनात्मा श्लेपोऽपि विचि- त्रत्वमात्रम्। अवैषम्यस्वरूपा समता दोपाभावमात्रं न पुनर्गुएः। कः खल्वनुन्म त्तोऽन्यर्य प्रातावेऽन्यदभिद्ध्यात्। अर्थस्यायोनेरन्यच्छायायोनेर्वा यदि न भवति दर्शनं तत् कथं काव्यम्, इत्यर्थदष्टिरूपः समाधिरपि न गुखः। [६७] तेन नारथगुएा. वाच्या: ॥ वाच्या वक्तयाः।
पर्यात् अनेक वावपार्थों का एक वाकय द्वारा कथन शौर (ङ) इस (विशेषस) की सांर्थकता-यह (पांच प्रकार को) प्रौदि ही (१) ओ्ोज है जो ऐसा (वामनाचार्य आदि के द्वारा) कहा गया है। वह (इनमें से आदि के ४ प्रकार) तो उक्ति वैचिश्व मात्र हैं, गुसा नहीं क्योंकि उनके बिना भी फाव्य-व्यवहार होता है। अपुष्टार्थत्व नामक दोप के निराकरण से सर्थात उसके पभाव रूप में साभिप्रायत्वरूप (पौढता कें पञ्चम प्रकार) ओोज का प्रहस हो जाता है। अधिकपदत्व के निराकरस से भर्थवैमल्य रूप (२) प्रसाद का; अनवीकृतत्व के प्रभाव से उत्तिवचित्रय रूप (३) माधुय का; प्रमङ्गलरूप अ्रश्लील के निराकरख से अपारव्य रूप (४) सौकुमार्य का सथा ग्राम्य दोष के निराकरण से अग्राम्यत्वरूप (५) उदारता का ग्रहस हो जाता है।' (दशम-उल्लास में) कहे जाने वाले स्वभावोक्ति अलङ्गार के द्वारा वस्तु के स्वभाव का विशद-वर्णन रूप जो (६) अर्थ व्यक्ति है उसका ग्रहस हो जाता है तथा रसध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गय के द्वारा दीप्तरसत्व रूप (७) कान्तिं संगृहीत हो जाती है। कम के उल्लंघन की अस्फुटता (अनुत्वरपत्व) को युक्तिपूर्वक मिला देनारूप (घटना) जो (८) इ्लेष है वह भी उक्तिवंचित्यमात्र है (गुए नहीं)। विधमता का अभाव रूप जो (ह) समता है वह दोध का अभावमात् है, गुए नहीं। उन्मत के प्तिरिक्त ऐसा कौन होगा जो एक (वस्तु) के प्रफरस में और कुद ही कहने लगे। अयोनि (प्रतिभा द्वारा उद्भावित) तथा अन्यच्छायायोनि (मन्य काव्य को-छाया हो है फारस जिसका) अर्थ का यदि (फाव्य में) दर्शन नहीं होता है तो वह काव्य कँसा ? इसलिये अर्थ का दर्शन रूप जो (१०) समाधि है वह भी गुख नहीं। इसलिये (भोज पादि दस) अर्य गुखों को भी नहीं कहना चाहिये। याच्या: सर्थात् कहने योग्य (नहीं हैं) (६७) परमा -- आाचार्य वामन आदि ने जिस प्रकार भोज इत्यादि शब्द के दस गुस
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४२४ j काव्यप्रकाश: 44
माने थे, इसी प्रकार ओज आदि दस अर्थ-गुखों (काध्यालद्दार सूत्र ३.२) को भी स्वीकार किया या। आचार्य मम्मट का कथन है कि उन दस अथ गुसों को कहने की फोई आावश्यकता नहीं; क्योकि उनमें से कतिपय ऐसे हैं जो ऊपर प्रतिपादित माधुयं आदि तीन गुणों में ही अन्तर्भूत हो जाते हैं, कुछ ऐसे हैं जो उत्तिवचित्व मात्र हैं तथा कुछ दोपाभावरूप ही हैं गुख अर्थात् काव्योत्कर्षक नही । जसे-
(१) प्रोज-वामन के अनुसार अरथस्य प्रोदिः भोज: (काव्यालद्वार सूत्र ३.२.२ अर्थात् अर्थ की प्रौढता ही भोज है। यह भ्रौड़ता पांच प्रकार की होती है-(क) कही एक पद के अर्थ को प्रकट करने के लिए वावय का प्रयाग किया जाता है, 'जैसे-अथ नयनसमुत्यं ज्योतिरत्रेरिव घ्ोः' यहां चन्द्रमा के लिए 'मननिनयनसमुत्यं ज्योतिः' इस वाक्य का प्रयोग किया गया है। (स) कहीं वाबय के अर्थ में एक पद का प्रयोग किया जाता है जैसे-कान्तार्थिनी संयोगस्थानं गच्छति इस वाक्य के अर्थ में 'अभिसारिका' शब्द का प्रयोग किया जाता है। । (ग) कहीं एक बाक्रम के. अर्थ को विस्तार (ध्यास) से कई वाक्यों मे कहा जाता है, जैसे-'परस्वं नापहुर्त,- व्यम्' इस अ्रर्थ को 'परान्नं नापहर्तव्यम, परवस्नापहारोऽनुचित:' इत्यादि वाकयों द्वारा कहा जाता है। (घ) कही एक वाक्य के द्वारा संक्षेप में (समास) अनेक यानपों का पर्थ प्रकट कर दिया जाता है; जैरे-'ते हिमालयमामन्व्य' (ऊपर उदाहरम २४६) में समस्त पलोक एक ही वाकय है जो मनेक वापयों के सागन्वस मदि मर्य का संक्षेपतः अभिधान करता है। (ङ) 'साभिप्रायत्व' का अर्थ है विगेपस को सार्थक्ता जसे-कुर्या हरस्यापि पिनाकपाणः' यहाँ 'पिनाकपाछि' (जिसके हाथ मे पिनाक है) विशेषण प्रकरण में उपमुक्त है।-इस प्रोडिरप भोज के प्रभम चार प्रकार तो गुण ही नहीं है; पयोकि इनके बिना भी काव्य-व्यवहार होता है। भाय यह है कि यामन आदि के मतानुसार गुए ही काव्य-व्यवहार के प्रवर्तक है किन्तु इस घार प्रकार की प्रौदि के न होने पर भी 'यः कौमारहर:' इत्यादि में काव्य-मवहार देदा जाछा है मोर इनके होने पर भी यदि रसादि का अभाव होता है तो काव्प-व्ययदार, नहीं होता प्रतः ये गुए नहीं है; अपितु उतिवैचित्वमान है। जो प्रोदि का साभि- प्रामत्य रूप प्चम प्रकार है। यह अपुष्टारथत्य दाप का मभावमान हो ह, पृथक गुण नहीं। (२) सर्यवमत्व प्रसाद :- (२३) सपन् प्रयु् गदों ग्वरा भेशित धर्म को स्पप्टतमा प्रतीति होना, नमे-काम्मीपद' (नितम्ब) सब्य वा प्रयोग ससाद गुस मुक्त ह 'फान्यीमुगस्थान' शब्द का नहीं। यह सविषपदसय दोर का पनागमात्र ही है, पृयक् गुए नही। (१) उरिर्बचिम्व मायुयंम्-(१२१०) श्मन का पनूठाव पर्धान् एक हो मर्पं को मिस प्रवार से (भहपन्तरस) कहना ही मापु्य है, जैसे'मि दहाय-
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अप्टम उल्लांस: ४२५
नलो किमन्न तम्।, (उदा० २७२) इत्यादि। वह अनवीकृत दोप का सभावमात्र है, पृथक् गुण नहीं। (४) प्पारुष्यं सौकुमार्यम्-(३.२.११) कठोर बात को कोमल रीति से कहना, जसे 'स मृतः' के बदले 'कीतिशेपं गतः' इस प्रकार कहना। यह ग्रमङ्गल रूप अश्लील दोप का भभावमात् है, गुए नहीं। (x) भग्राम्त्वमुदारता (३.२.१२)-ग्राम्यता के प्रसङ्ग में भी विदग्धता से किसी भर्थ को प्रकट करना-'त्वमेवंसौन्दर्या' इत्यादि (२२८ उदाहरस में) :अतः शेपञचेत् स्माज्जितमिह तदानीं गुणितया' यहाँ 'समागम' (शेप) अर्थ को विदग्घता. से कहा;गया है। यह उदारता ग्राम्यता दोप का अभाव मात्र ही है गुए नहीं। ,13 (६) वस्तुस्वभावस्फुटत्वम् अपर्य्व्यक्ति: (३·२.१३)-वर्णनीय वस्तु (बालुक- आादि) के स्वभाव (रूप करिया आदि) का स्पष्ट बर्णन करना, जैसे- कलववसानगर्भेए कण्ठेनाघूणितेक्षसः। पारावतः परिभ्रम्य रिरसुश्चुम्वति प्रियाम्॥
हो. जाती है। - यह स्वभावोक्ति (डिम्भादेः स्वक्ियारूपवर्एनम्) अलद्धार मे ही संगृहीत
: (७) दोप्तरसत्वं फान्ति :- (३.२.१४) अर्थात् शृङ्गारादि रस की स्पष्टतया प्रतीति होना। जैसे-प्रेयान् सोयमपाकृत. (उदाहरण ८) में शद्गार रस की स्फुट * प्रतीति हो रही है। यह 'कान्ति' नामक पर्थ-गुए रसध्वनि प्र्थवा मुीभूतव्यङ्गय में ही संगृहीत हो जाता है। (८) घटना इलेषः (३.२.४)-करमकोटित्यानुत्वात्वोपपतियोगो घटना, स इलेप: । कम के अतिकमण (अथवा क्म अतिकमए) में होने वाली अस्पष्टता (अनुल्वएता) में युक्तिपूर्वक मेल (योग) बैठा देना। जैसे- दृष्ट् वै कासनसंस्थिते प्रियतमे पश्चादुपेत्यादराद- एकस्या नयने पिधाय विहितकीडानुवन्वच्छल: । ईपद्वकितकन्धरः सपुलकः प्रेमोल्लासन्मानसाम्- अन्तहसिलसत्कपोलफलकां धूर्तोऽपरां चुम्बति ॥ यहाँ जिसके नेत्र मूदे हैं (पिहितनयन) उससे दूसरी का चुम्बन ही त्रम का भतिक्रमण है, उस (पिहितनयना) ने इस चुम्बन को नही जाना यही अ्स्फुटता है; उसका युक्तिपूर्वक मेल बँठाने के लिये 'नयन मूदेना' गर्दन टेढ़ी करना आदि का कथन किया गया हैं। यह उत्ति-वैचित्रय मात्र ही है। (E) अवंषम्य समता (३.२.५)-प्रक्रम भङ्ग न होना, उपक्म तथा उपसंहार में विपमता न होना, जैसे-'उदेति सविता ताम्र:' (२४४ उदाहरण)। यंह भी प्रकमभङ् दोप का पभाव मात है, अर्थगुण नहीं। (१०) अर्थदृष्टिः समाधिः । अथों द्विषिध: भमोनिरत्यच्छायायोनिर्च (३.२.६, ७)-अर्थात् किसी (कवि) के द्वारा पनुल्लिसित (अयोनि) निव्ान्त, नवीन एवं. प्राचीन कवियों द्वारा उस्तिसित अर्थ के आधार पर उद्धावित नवीन (मन्पच्छा- यायोनि) अर्थ का काव्य में दर्शन होना ही समाधि नामक अर्यगुल है।
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काव्यप्रकारा:
(६८) प्रोक्ता: शब्दगुखाइच ये॥' वर्णाः समासो रचना तेपां व्यञ्जरुतामिता:।।७३।।: के कसय इत्याह- (eE) मूव्नि वर्गान्त्यगा: स्पर्शा अटवर्गा रखो लघू, ., :.. अवृत्तिर्मेध्यवृत्तिर्वा माघुये घटना यथा ।।७४।।' ट-ठ-डनढ वर्जिता: कांदयो मान्ता: शिरसि निजवर्गान्त्ययुक्कता: तया रेफलकारी हस्वान्तरिताविति वर्ण:, समासाभावो मध्यमः समासो वेति समासा, तथा माधुयंवती पदान्तरयोगेन रचना माहुर्यर्य व्यब्जिका। उदाहरणम् :-
जैसे-'सदोमुण्डितमत्तहणा चिवुकप्र स्पधि नारङ्मकम्' यहां नारड्ी का हूएचिंयुक के साथ उपमानोपमेयभाय नितान्त नवीन (प्योनि) है। इसी प्रकार निजनयनप्रतिविम्बैरम्युनि बहुचः प्रतारिता कापि। नीलोत्पलेप विमरृाति कर- म्पमितु कुसुमलावी ॥ यहाँ नयन का नीलोंपल के साथ साहृत्य तो फवि प्रसिद्ध है किन्तु उसके आधार पर नूतन प्रथ की उदभानना की गई है। आचारयं मम्मट का कथन है कि यह समाधि नामक अरभ-ुर काव्म के स्वरूप का निर्वाहकमान है, उत्कर्पा धायक या शोभाजनक नही, भतः यह गुए नही। उपयु क विवेचन से स्पप्ट है कि सर्य-गुखों को भी पृपक कहने को आवशय कता-नही ।' गुखों के व्यञ्जक-वरं आदि अनुवाद-जो (माधु्य सादि, भौपघारिक रप से) सब्य के गए कहे गये है, वस्तुतः (१) पएं (२) समास तथा (३) रचना (पवसंपटना) उन मापुवं सादि गुखों के व्य्जक होते है (इता := पाप्ताः)। (६८) कौन से (बं शादि) फिस (गुख) के स्यम्मरु है, मतलाते हैं- (मापुर्यंप्पज्जरु)-वे ट बर्ग मिस्र स्वसं मसां ('फ' से 'म' पर्यस्त) को धम भाग में अपने-अपने धर्म के पस्तिम बर्सा (ड, ज यादि) से युक हो (मनन्, बुन्त पादि) तथा सघु (स्यर) जिनके बीय हो ऐसे र' औौर 'ए' एवं वत्य समास वाली या मम्य समास् (वुत्ति) याली रघना माघुय की ध्यञ्मक है। (र६) ट, र, इ, उ, यजित 'क' से लेफर 'म' प्पन्त बएं जो दूर्य नाग में (सिरसि) सपने मंगं के धन्सिम बर्एा से मुक हो तपा रेफ औौर सवार (ल) जिनके मष्य में सस्य स्वर हो- मे बएं (१) भोर समास का सभाव सर्यात् भ्रस्प, समात सरपषा मध्यम समास यह समास (२) सभा मम्म पद के सम्या्य से सौकुमामंयुर्ह रचना (जैसे-'दसकू द' झा पद में सन्पि होने पर मपुर वसोतति हो जाती है)-यह रचना; (१) तीनों माधुष के स्प्जक है। इसका बदाहरण है- "उस (हनन मार से) भरे सङ्ज पाली मुन्हरी का शरीर, जो कामदेय भों रह्भूमि के सदुस है: उसे भद्विमामी (हाप भाषों) में इम प्रकार (पाहर के साम)
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भष्टम उल्लास: t ४२७ 444*4
कुर्वन्ति यूनां सइसा यथैता: स्वान्तानि शान्तापरचिन्तनानि ॥३४७॥ (१००) योग आध्यतृतोयाभ्यामन्त्ययो रेणा तुल्ययो: । टादि: शपौ वृत्तिदैध्य गुम्फ उद्धत श्रोजसि ॥७५॥। वर्गप्रथमतृतीयाभ्यामन्त्ययो: द्वितीयचतुर्थयो:, रेफेश अ्रध उपरि उभयत्र: वा यस्य कस्यचित, तुल्ययो्तेन तत्यैव सम्बन्धः टवर्गीडर्थात् सकारवर्ज: शकारपकारी, दीर्घसमास: विकटा सङ्घटना शजसः। उदाहरगम्- 4 मूध्नांमुद्वृत्तकृत्त त्यादि ।।३४८।। (१०१) श्र तिमात्रेण शब्दात्त येनार्थप्रत्ययो भवेत्। साधारणा: समग्राणां स प्रसादो गुो मतः ॥७६॥ अपना लिया है कि जिससे ये भङ्गिमाएँ तरणों के हृदय को चञ्चलता (शान्तापर): के विचार (चिन्तन) से युक्त कर देती हैं ॥३४७॥ the pon Id प्रभा-यहाँ पर गकार तथा तकार अपने वर्ग के अन्तिम वएां से युक्त हैं तथा रङ्, शान्तापर आदि में ह्रस्व मे व्यवहित रेफ वणं है। 'अनङ्गरङ्गप्नतिम यह मध्यम समास है (वृत्ति का अथ यहाँ पर 'समास' ही है) तथा 'प्रतिमं तदङ्गम्" इत्यादि माधुयबती रचना है। इस प्रंकार यहाँ वर्सं, समास तथा रचना तीनों ही विप्रलम्भ शृङ्गार में माधुय गुसा के व्यञ्जक हैं ॥१०॥ - अंनुवाद-(भ्रोज के व्यञ्जक)-(वर्गों के) प्रथम तथा तृतीय' बर्स के साथ द्वितीय तथा चतुर्थ वसां (अन्त्ययोः) का योग (साहचर्य), रेफ से किसी वरस का (ऊपर, नीचे) सम्बन्ध, तुल्यवरणों का योग, ट आदि (चार वर्एं), श, प- (ये वर्ण); दीर्घं समासऔर विफट (उद्धत) रचना (पुम्फ)-ये ओज गुख में व्यञ्जक है। (१००) (फारिका में) (१) वर्गों के प्रथम-तृतीय बणों के साथ द्वितीय तथा चतुयं का, रेफाके साथ नौचे या ऊपर अथवा दोनों प्रकार से जिस किसी बसों का तथा दो तुल्य यसों का अर्थात् किसी वर्ख का उसके साथ ही (जैसे ुवकुर) सम्बन्ध होना; ट वर्ग सर्थात् 'ए' वर्स रहित (ट, ठ, ड, ढ) 'श' तथा 'प'-ये वर्स, (१) दीघ समास तथा (३) विकट रचना-ये तीनों भोज गुख के व्यञ्जक हैं। जैसे-'मुर्ध्ना- मुद्वृत्तफृत' इत्यादि (ऊपर उदाहरण १५६).।।३४८।। प्रभा-उपर्युक्कत उदाहरण में 'मूघ्ना्ं' 'उपसविदर्व' में ऊपर तथा 'भङ्, घनि' में नीचे रेफ का योग है, 'उद्वृत्त', 'कृत' आादि में दो तुल्यवरों (त) का योग है तथा 'ईश' आदि में दा' वर्ण और 'दोप्साम्' आदि में 'प' वएां है। 'दीर्घ समास तथा विकट रचना है।। अपरनुवाद्-(प्रसाद गुस के व्यञ्जक)- जिस (प्रसाद-व्यञ्जर शव्व श्रादि) 4 के द्वारा भवसा मात्र से ही शब्द से म्यं की प्रतीति हो जाती है; जो'सब (रसों तथा
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j काव्यग्रकांग:
समभाएं रसानां सड्घटनानां च। उदाहरणम्- परिम्लानं पीनस्तनजघनसङ्गादुभतः तनोर्मध्यस्यान्तः परिमिलनमपाप्य हरितम्। इ्द व्यस्तन्यासं श्लथभुजलताक्षेपवलनैः कृशाङ्गया: सन्तापं वदति विसिनीपत्रशयनम् ॥३४६॥ यद्यपि गुएपरतन्त्रा: सङ्घटनाद्यर्तयापि, (१०२) वक्तृवाच्यप्रबन्धानामोचित्येन ववचित्कवचिद्। रच नावृत्तिवर्एाना मन्यथात्वमपोष्यते ।।७७/। क्वचिद्वाच्यप्रबन्धानपेक्षया वकत्रौचित्यादेव रचनादयः। रघनाओं) में समान रप से हो सकता है, यह प्रसाद व्यञ्जक (यसं तथा रबना आादि) माना गया है। (१०१) (कारिका में) समवासा अर्थात् समस्त रसों तपा रचनामों का, उदाहएए यह है- 'जो स्थुल स्तनयुगल तथा जघन के सम्पर्क से दोनों भोर से म्सान हो गई है, क्षीस (तनोः) मध्यभाग से सम्पर्क न पाकर मध्यभाग में (मन्तः) हरी हो है, भुजलता के शिमिततापूर्यफ गिरने के सम्बन्य से (वलनेंः) व्यस्त-रचना थाली हो गई है; इस प्रकार की फमलनी-पतों को यह सम्या इस कसासी (सागरिका) के सन्ताप को बतता रही है ।३४६॥ मरमा-'परिम्लान' इत्यादि रत्नावली नाटिका में सागरिका को सदय करफे, वत्सराज की उत्ति है। यहाँ अन्वय के लिये आमदित समस्त पद यपास्मान रको गये हैं पतः शरवसमान मे ही पन्ययवोध हो जाता है। दसी से यहाँ मापु्य के उपज्जक वर्ा, मध्यमसमास तपा माधुमवती रचना मे समी अगाद गुल के क्य्जय हैं। वसां आादि की गुण-व्यक्षकता में अपवाद अनुवाद्-यद्यपि रचना (पएं, समास) पदि गुलों के मधीन (निपन तुलों के स्यन्जक) हैं सयादि-कहो-वहों (क) पसा (कि तथा पषिनिबद्ध पात) (स) वाध्य (बएनीम विपय। सपा (ग) प्रबन्ध (महाकाष्य औौर माटक साति) के भोषित्य के अनुसार रचना, समास तथा मलों का पन्चपा होना (गुए को पर- सन्नता का सभाव) भी इष्ट है। (१०२) (र) कहॉ-हो वाषम सपा प्रबन्य की धपेक्षा किये मिना हो सबनृगत प्रोघिरम के धनुसार रघना यदि होते हैं (गुलामिग्यमवन नियम के धनुगार महों) बगे-
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प्प्टम उल्लास: [ ४२६ +44
यथा- मन्थायस्तार्णवाम्भ: प्लुतकुहरचलन्मन्दरध्वानघीर: कोणाघातेपु गजत्प्रलयघनघटान्योन्यसङघट्टचएडः। कृष्ण।क्रोघा मदूतः कुरुकुल निघनोत्पात निर्घातवातः केनास्म तिसिहनाद प्रतिरसितसखो दुन्दुभिस्ताडितोडसौ।३५०! अत्र दिन वाच्यं क्रोधादिव्यञजकम् अ्रभिनेयार्थे च काव्यमिति तत्प्रतिकूला उद्धता रचनादयः । वक्ता चात्र भीमसेन:। कवचिद्वक्तृपवन्धानपेक्षया वाच्योचित्यादेव रचनादयः। यथा-
कुर्वत्काकुत्स्थवीयस्तुतिमिव मस्तां कन्घरारन्त्रभाजाम भाद्ारैर्भीममेतन्निपतति वियतः कुम्भ कर्णोत्तमाङम्॥३५१॥
-1 'जो (दुन्दुभि अर्थात् उसका शब्द विलोडन से विक्षुब्ध समुद्र के जल से व्याप्त-गुहा वाले चलते हुए मन्दराचल की ध्वनि के समान गम्भीर है, जो वादन- दण्ड (कोख) के आघात के समय गरजते हुए प्रलयकालीन मेधों की घटा के परस्पर : संघर्ष (को गर्जना) के समान भयङ्गर है, द्रौपदी के क्रोध का अपदूत है तथा कौरव वंश के विनाश रूपी उत्पात का अ्शुभसूचक ध्वनि (निर्धात) युक्त थायु है; हमारे : सिहनाव को प्रतिध्वनि के सदय यह दुन्दुभि (रस भेरी) किस (शक्तिशाली) ने धजाई है (ताडितः)' ॥३५०॥ (वेणीसंहार नाटक में भीमसेन फो) इस उत्ति में यर्णनीय परर्थं क्रोध आदि - दीप्त भाषों का व्यञ्जक नहीं है (क्योंकि वह केवल प्रश्न रूप है) तथा यह फाठम भी अभिनय योग्य वस्तु वाला अर्थात् नाटक है' अतः उद्धतं रचना (दीघंसमास) आ्रादि नाटफरूप प्रबन्ध के प्रतिकल है; किन्तु यहाँ पर वक्ता भीमसेन है [रोदरस प्रधान धौरोद्वत नायक भोमसेन के ववतृगत-घोचित्य के कारण ही यहां रचनादि हैं, गुए की अभिव्यञ्जकता के अनुसार नहों]। (ख) फहीं कहीं चक्ता और प्रबन्ध की अपेक्षा किये बिना वाच्यगत भौचित्य 1 के अनुसार ही रचना आदि होते हैं (गुएभिव्यञ्जन नियम से नहीं), जैसे- 'यह कुम्भफरर का भयान सिर आफाश से गिर रहा है, जिसे प्रौढ प्रहार (छेद-खड् का प्रहार, घिद्यते प्नेनेति) के अनुरूप उद्तने के वेग के कारए (भ्रम से) राहु के उपघात के भय से घोड़ों को सींघकर सूर्यर को तिरद्या कर लेने थाले भक्स (सूर्य-सारथि) के द्वारा देखा जा रहा है. तया जो ग्रीवा के दिदों में प्रविष्ट बापु के भाम भाप सब्दों से मानों धीराम के पराकम की स्तुति कर रहा है।३४१॥
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गथ नवम उल्लासः
गुएविवेचने कृतेडल द्वारा: प्राप्तावसरा इति सम्प्रति शब्दालक्वारानाह- माव्य लक्षण में 'अनलद्कनी पुनः ववापि' इस प्रकार गस के परचात् पजदार का उल्लेस किया गया है अतएय गुए-विवेचन के अनन्तर अलद्वारो का निरूपस किया जा रहा है। इनमें भी सव्दालद्ट्ारों का प्रथम स्थान है इसी हेतु गमरा: शब्दचिय (नवम उल्लास में) तथा अर्थनिम (दमम उल्लास में) का वएन नि्या जा रहा है। अनुवाद्-गुशों का विधेचन कर लेने पर अलद्गार-निइपस का भवसर (पाप्त) है इसलिये अ्रब (प्रयमतः) शब्दासद्गारों का निरुप करते हैं- प्रभा-(१) यहाँ अलद्धार का सामान्य लक्षणा नहीं दिया गया। इसपा लक्षसा ग्रप्टम उल्लास (मून र७) में गुश औोर अनद्वार व भेद दिसलासे हुए किया जा चुका है। मम्मट के अनुसार मनद्वारो का काव्य में कया स्थान है, यह भी यहीं तथा काव्यलकसा की व्याम्या के अवसर पर निस्पसा किया जा चुका है। भाव यह है कि मम्मट ने 'तददोपी' इत्यादि लक्षमा द्वारा जो काव्य का स्वरप-निरुपण किया है, उसमे अनद्वार भी काव के अनिवार्य (अपरिहार्य) धर्म ही है; ह। मलदारों की स्फुटता सनिवार्य नहीं। प्रतः स्फुट मनद्ारों के बिना भी काव्य हो सकता है। दमीलिये 'मननद्कृती पुनः वनापि' इसका अर्थ वृति में यह किया गया है-'मवनित् स्कुटालद्ागविव्देगी व काव्पत्वदानि' (सून १)। इग प्रार न तो यही कहना युकियुक्त है कि मम्मट मे मसद्भाररहित को भी नाम्प माना है, औोर न ही जयदेव का निम्ननिसित प्रासेप मम्मट पर सागू होग है- प्रङ्गोपरति प: कार्व्प सव्दार्पाननलड्पुती। मसी न मन्यसे परमात् मनुष्यामनव फुनी.।। पर्वात् जो भतद्वाररहित शब्द औौर अर्प को काष् मानता है यह सच्पुप् रहित को भी धग्नि मयों गही मान सेता? (२) मसद्वार का पाधार शब्द औोर भ्मं होते हैं। इसी हेतु मनद्ार सीन प्रकार मे है-सजामद्वार, मर्यारद्रार गोर उमवानद्वार। जो गष्ड पर साश्रित है; गन्द का परिवत्रन हो जाने पर भर्गान् हिमी गण्द का पर्यापवानी गम्द रम देगे पर पहा मकछार नहीं रहवा (शन्यरियुसमट्सर=दाब्द के परिदर्तग को न गहता), ये पव्पासद्वार है। बिन्तु जे मर्ष पर पाधित है, यहाँ हिसी रम का पर्रपमाथी रम देने दर भी मसद्वार मना वहृता से (गम्पारिपुतिनसा = राब्द के परिपतग को गहना) बे सर्पानद्वार
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नवम उल्लात: [ ४३३
(१०३) यदुक्तमन्यथावाक्यमन्यथाजन्येन योज्यते। श्लेषेण काक्वा वा जेया सा वक्रोक्तिस्तथा द्विधा ॥७८॥ तथेति श्लेपवक्रोकिति: काकुवक्रोक्तिश्च। तत्र पदभङ्गश्लेपेण यथा- नारोशामनुकूलमाचरसि चेज्जानासि कशचेतनो बामानां प्रियमादषात हितकृत्न वावलानां भवान्। युक्त' कि हितकर्तनं ननु बलाभावप्रसिंद्धात्मनः सामथ्य भवतः पुरन्दरमतच्छ्ेदं विधातु कुतः ॥३५२॥ कहलाते है। जो अलद्दार सब्द और अर्य दोनों पर आश्रित हैं, वे उभयालङ्वार कहलाते हैं। यहाँ विशेष शब्दालङ्वारों का निरूपणा किया जाता है। काव्यप्रकाश के टीकाकार सोमेश्वर के अनुसार शब्दालद्वार ये है- वकोफितिरम्यनुप्रासी यमक इलेषचित्रके। पुनरुक्तवदाभासः शब्दालङ्तयस्तु पढ्। इनमें वकोति अलक्कार विशेप महत्त्वपूरां माना जा रहा है, अतः प्रथमतः चकोक्ति का निरूपण किया जाता है- अनुवाद-[१. वक्रोकि] (घक्ता के द्वारा) किसी थभिप्राय से कहा गया. पाक्य यदि अ्रन्य व्यक्ति (धोता) के द्वारा श्लेष या काकुरूप ध्वनि-विकार के हेतु से भव्य अर्थ में फल्पित कर लिया जाता है तो वह 'वकोकि' (नामक) अलद्धार है: जो उस प्रकार से दो तरह का है। (१०३) ,(फारिका में) 'तथा अर्थात् उस प्रकार (१) (प्लेप से) श्लेप वकोकि मौर (२) (काकु से) काकु चकोकि।। प्रभा-जहाँ वक्ता द्वारा किसी अभिप्राय से कथित वाक्य में धोता भ्रन्य पर्थ की कल्पना करता है वहाँ वत्ोकि शलद्वार होता है। इसी से यह प्पह ति से भिन्न है क्योंकि वहाँ वक्ता स्वय ही अन्यथा वाल्पना करता है। दलेप दो प्रकार का होता है-(क) सभङ्ज तथा (स) अ्रभङ्ग। इन दोनों के कमशः उदाहरण ये हैं- 1- अनुवाद-(१ फ) उनमें से पदभङ्ग श्लेघ के कारस से होने वाली वकोकि का उदाहरस जंसे- (एक) यदि तुम नारियों के (नारोणाम्) अनुकूल आचरस करते हो तो विज हो। (भन्य) कौन बुद्धिमान् है जो शनुओं (न-परीणाम्) प्रर्यात् विरोधियों (वामानाम्) का हित करता है ? (एफ) तो आप नारियों के (यामानां=मबलानाम्). हितकारी (हितकृत) नहीं है ? (मरन्य) भला, निबल रूप से प्रसिद्ध जनों का (पवलानां = दुर्बलानाम्। हितविघाल (हितकृत्=हितकतनम्, हित-घेव) भी क्या उचित है? (एक) धप में इन्द्र (बलासुर का नाश करने के कारस प्रसिद्ध) के हित-विनाश (हितकत) करने का सामय्यं हो कहा हूँ? ।३४२।
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वाव्यप्रकार:
अभमदलेपेण यया- अरह्टो केनेदशी बुद्धिर्दारुण तव निर्मिता। प्रिगुसा धूयते बुद्धिन तु दास्मयी क्वचित् ।३४३।। वाक्वा यथा- गुरुजनपरतन्त्रतया दूरतरं देशमुयतो गन्तुम। अतिकुल कोकितललिते नैध्यति ससि, सुरभिसमयेऽसौ ॥३४४॥ (१स) प्रभङ्गपलेप के फारस होने वाली ययोकि (का उवाहरण); मैंसे (एक) 'महो' ? तुम्हारी युद्धि ऐमी कूर (वारल) किसने बना दी है? (भन्य) सरे, बुद्धि सो त्रिगुखात्मक (सत्य, रजस्, समस् गुलों वालो) सुनी जाती है, कहो भी फाष्ठात्मक (दादमयी, काफ्ठनिमित) नहीं ।३५३।। (२) पाकु नामक ध्यनि विकार से होने याली वकोकि (का उवाहरल) जैसे-[नामिका की सरी के प्रति उक्ति] 'हे राति, ये (प्रियतम) गुशमनों की पधी- नता के कारण दूर बेश जाने के लिये उद्धत हैं, मया ये भ्रमरकुस तथा कोकिसों से - रमसोय यसन्त काल में भी नहीं आयेंगे? सौटेंगे) ? ॥३५४॥ प्रभा-(१क) सनारीलाम्' इर्यादि पद्य में एक ने 'ारीखाम्' शब्दस्पियों का' इस मर्यं में पहा था, दूमरे ने 'न+परीलाम्'= शतुमों का नहीं मह-धपं कल्पिव किया। इस प्रकार दूगरे के द्वारा नमु सर्थ में प्रमुक 'धामानाम' को बरा (ब्थम) ने ही नारी (पवला) अर्थ में नान लिया। राघ प्रयम मे दारा नारी भरव में 'मवलानाम्' तया हितररी अयं में 'हिनवृत' (हिन करोति इति) का प्रयोग' पिया गमा तो दूमरे ने इनका धर्म नमरः 'निर्षन' और 'हिसरतंन' (हिव पन्तति दिवत इति) फसवित पिया। फिर दूसरे के 'निर्वस' मर्ष मे प्रयुक्त 'बनामामे- प्रसिद्ारमन:' (बलानावेन दापयभापेन प्रसिद्व भारमा सदमम मम्ब) का प्रथम ने यलासुरनावक भयं (वनस्य बननाम्नोगुग्स्य सभापेन नातेन भगिसस्वरूपरय) कस्पित मार लिया। यहाँ पर 'नारीलाम' तथा मयलानाम् पर में मभद हेप ह मारी तपा मवता श र्वी सर्प में रड़ है सथा न+ परीकाम भादि से पशमम के दारा मन्य धप की पतीति ह्ोती है। वाम' इत्वादि पशे में यहाँ सभक्वरलेष ही है। (श-म) 'पहों इवारि केपस समसदरष मा उदाहरस है। वहाँ 'वांरम्ा' के दो पर्पे है-Fर' (प्रयमान्प मह््यपग) नपा 'पाष्ट से' ('दार गम् मे सृंगीया-एंश्वचन) । किमी पम में भो 'दाहखा' सब्द या भम् नहीं होता सपा एगी के मांशर पर पग के पभिषाय मे मन्न धर्ग को पहना क जा रही है। (२) 'गुरमनः इरगरि में नाविरा में 'नहीं भावण' इमी सभिवाम मे नपि' दारर का पयोग रिया या; किन्मु ममी ने पाद्ठ मायक पति रिहार के माप
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नवम उल्लास: [, ४३५
(१०४) वसंसाम्यमनुप्रासः स्वरवैसादृश्येपि व्यव्जनसदशत्वं वर्णसाभ्यम। रसादनुगतः प्रकृष्टो न्यासोऽनुप्रास: । (१०५) छेकवृत्तिगतो द्विधा। छ्ेका: विद्ग्धाः। वृत्तिर्नियतवर्णगतो रसविपयो व्यापारः। गत इति-छेकानुप्रासो वृत्त्यनुप्रासश्च। किन्तयो: स्वरूपमित्याह- (१०६) सोडनेकस्य सकृत्पूर्व: 1.
(उत्तर रूप मे) इसका उच्चारण करके नहीं आवेंगे ऐसा नहीं अर्थात् अवश्य भाचेंगे' यह अभिप्राय प्रकट किया। अतः काकुबकोकति है। अनुवाद्-[२ अनुप्रास] वणों (व्यञ्जनों) की समानता अनुप्रात प्लद्धार है। (१०४) वसंसाम्य धर्थात् स्वरों के अ्समान होने पर भी व्यञ्जनों को समानता रस (भाव) आदि के अनुकूल (व्यञ्जनों की) बहुत व्यवधान से रहित चमतकार जनक (प्रकृष्ट) योजना (न्यास :- आावृत्ति.) हो अनुप्रास है। (अनुप्रास) दो प्रकार का है-(१) देरुगत, (२) वृत्तिगत (१०५) छेक अर्थात् विदग्ध या चतुर। युत्ि पर्थात् नियम वरसों में रहने वाला रसविषयक (रसव्यञ्जना सम्बन्धी) व्यापार। गत अर्यात् आ्राश्रित फहने से-छेका- नुप्नास तथा वृत्यनुप्रास (इन नामों से अभिप्राय है)। प्रभा-रसानुकूल होने के कारगा अनुप्रास अलद्वार का अन्य शब्दालङ्वारों से पूर्व वर्णन किया जा रहा है। रसभावादि के अनुकूल वर्ए तथा शब्दो की इस प्रकार योजना करना कि उनके बीच में अधिक व्यवधान न हो अनुपास अलद्कार हैं। यह दो प्रकार है वर्ांनुप्रास तथा शब्दानुपास यहां वरणं शब्दका अरथं व्यञ्जन होता है, अतएव जहां व्यञ्जन-सादृश्य होता है वहाँ स्वरों की घसमानता होने पर भी अनुप्रास अलद्धार होता है। वर्णानुप्रास दो प्रकार का है-(१)देकानुप्रास तथा (२) वृत्त्यनुप्रास छ्ेक शब्द का अर्थ विदग्ध चतुर (सहृदय) जन है। विदग्ध जनों का प्रतिप्रिम होने से इसका यह नाम पड़ा है। मधुर आ्दि रसों के लिए जो कोमल-वएां आदि के प्रयोग का नियम है उन वसों का रस-व्यञ्जना के मनुकूल व्यापार अर्यात् विशेष आनुपूर्वी से वणं-संघटना हो वृत्ति है, वृत्ति पर आश्रित नुप्रास ही वृत्त्यनुप्रास है। अनुवाद्-उन (घेशनुप्रास तथा वृ्त्त्यनुप्रास) दोनों का प्या स्वरप है, यह बतलाते हैं-(१ घेकानुप्रास) सनेर (ध्यञ्जनों) को एक बार समानता पूर्व (पहला) पर्थात् सेकानुप्रास है। (१०६)
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श्रपनेकाय अपर्याद् व्यव्जनरय सकदेकवारं साटश्यं छ्वेकानुमास: । चदादरएम्-
(१०७) एकस्याप्यसकृत्परः ।७६॥। एकश्य अपरपिशठदादनेकश्य व्यञ्जनत्य द्विर्वद्धकृत्वो वा साटश्यं वृतयनुपासः। तत्र- (१०८) माधुर्यव्यञ्जकवण रुपनागरिकोच्यतै। (१०६) प्रोज: प्रकाशकस्तस्तु परुपा उभयनापि प्रगुदाद्दतम्। (११०) कोमला परैः ॥८ू०॥। पर: शेपे: । तामेव केचिद् प्राग्येति वदन्ति। उदाछरगाम्- पनेक्त्यं प्ररपात् एक से प्रधिक र्यञ्जनों का सकृत् पर्यात् एक यार सादृस्प ऐेशनुप्रास बहसाता है। उदाहरस (यह) है-'(प्रभातवसंन) सस्पर्यात् मदरा (मूर्य सारति) के सज्चार से मन्द-प्रभा वाले पन्रमा ने काम से परितील कामिनी के कपोसों जँमी पाण्दुता को घारल कर लिया ॥३५५॥ प्रभा-यंहा 'मन्द-मन्दी' दसमें '्' औौऱ 'ू' का तपा गण्टपाष्ड' में 'ल' पोर 'ह' ना पर्थात् पनेफ स्वं्बनों या एक चार सादृदय है भतः चेशानुशाम है। अनुचाद-(२. वृर्यनुप्ास)-एद (प्यकनन) का (प्रथमा धनेर का), भी, धनेर यार सादृश्य दूरारा (परः) अर्मात् पृश्पनुपाय है। (१०७) एक का तथा 'सवि' शबब के प्रयोग से मनेर स्यम्मनों का सो बार या धपिक बार सादृष्य होना हो पुरनुपास मलदार है। (पासद्विक पुसि-विवार) उन (पृत्िमों) में-मापुनं-सन्तर परों से पु + वृति उपनागरिकर कही जाती है। (१o८) सपा प्रोम-प्रफागर बतों मे बुछ परषा वृति है। (१०६) दोनों पृत्ियों के उदाहरस पहसे (मनसरभ उददुरस ३४३-बनागरिशा तथा 'मूर््नामुट्ढसपटर०'उदाहरस ३४८-पर) रिपे ना पुफ है। पर सर्थात् भग्य (साधुय तपा तोम के ध्यम्नक परतों मे मिन्न) पकों से पुरु दूति रोगता है। (११०)
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नवम उल्लास: i ४३७
अपसारय घनसारं कुरु हारं दूर एव किं कमलैः। अलमलमालि मृणालैरिति वदति दिवानिशं वाला ॥३५६॥ (१११) केषाश्चिंदेता वैदर्भीप्रमुखा रीतयो मताः । एतासििस्त्रो वृत्तय: वामनादीनां मते वैदर्भी-गौडी-पाळचाल्या खया रीतयो मताः ।
(कारिका में) 'परः' अर्थात् शेष वणगों से युक्त वृत्ति (कोमला) है। उसको हो कुछ (उद्भट आदि) 'ग्राम्या' वृत्ति कहते हैं। उसका उदाहरस है 'अपसारय०' इत्यादि (ऊपर उदाहरस ३४१) ॥३५६॥ किन्हीं के मतानुसार ये (तोनों वृतियाँ) ही 'वंदर्भो इत्यादि रोतियाँ हैं (१११) । इन तीन (उपनागरिका, परुषा तथा कोमला) वृत्तियों को ही वामन आादि भाचार्यों के मत में वैदर्भी, गौडी तथा पाञ्चाली नामक रीतियाँ माना गया है। प्रभा-भाव यह है कि अनेक व्यञ्जनो का एक बार साहृश्य छेकानुप्रास है, एक या अ्रनेक व्यञ्जनों का अ्रनेक वार साहृश्य वृत्यनुप्रास है। यद्यपि अ्रनेक आचार्यों के मतानुसार एक व्यञ्जन की एक बार समानता भी अनुप्रास (जैसे ओत- प्रोत में 'त्') अलद्वार है तथापि आचार्य मम्मट के मतानुसार वह अनुप्रास नहीं; कयोंकि वहु चमत्कारजनक नहीं होता। प्राचीन आचार्य उद्धट आदि ने काव्य की तीन वृत्तियों-उपनागरिका, परुपा तथा कोमला का निरूपए किया था। उनमें कहीं २ नाम-भेद तथा संख्याभेद भी था। आचार्य बामन ने उन्ही वृत्तियों का वैदर्भी आदि रीति के नाम से विवेचन किया था और रीति को काव्य की आत्मा वतलाया था दण्डी और कुन्तक ने मार्ग, नाम से तथा आनन्दवर्वन ने सहटना नाम से इनका उल्लेख किया था। आचार्य मम्मट ने (१) तीन गुखों के अनुसार तीन प्रकार की गुएाभिव्यञ्जक वृतियों को ही स्वीकार किया है (२) वृत्ि, रीति मार्ग तथा संघटना आदि को अभिस (एक ही) माना है तथा (३) उनका स्वतन्त्न अस्तित्व न मानकर वृत्यनुप्रास में ही अ्न्तर्भाव कर दिया है। टिप्पणी :-- (i) उद्भट ने वृत्त्यनुप्राप्त में तीनो वृत्तियों का इस प्रकार उल्लेख किया है- सरूपव्यञ्जनन्यासं तिसृव्वेतामु वृत्तिषु। पृथक् पृथगन् प्रासमुशन्ति कवयः सदा। तथा उन्होंने 'कोमल वृत्ि' को 'ग्राम्या' नाम से इस प्रकार निरूपित किया है- शेषयंणेयं पायोगं प्रमितां कोमलास्यमा। प्राम्य वुर्तिं प्रशंसग्ति फाव्ये निप्सातबुद्म। (ii) भट्ट वामन की उक्ति है-'रोतिरात्मा फाव्यस्व। विसष्टा पद-रयना रोतिः । विशेषो गुसात्मा। सा त्रिया वंवर्भी गोडीया पाञ्चाली घ, (राज्ा- सक्ारसूत् १.२.६-६)
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फाव्येप्रकारो:
(११२) शाब्दस्तु लाटानुप्रासो भेदे तात्पयंमान्रतः।८१।। शतदगतोऽनुप्रासः। शर्ब्दार्थयोरभे देऽप्यन्वयमान्नं भेदाव्। लाटजन- वल्लभत्वाच्च लाटानुप्रासः । एप पदानुपास इत्यन्यें।'
(iii) ध्वनिकार ने भी वस-संघटना को ही 'युत्ति' बतलाया है-'पं संघटन। धर्माश्च मे माघुर्यादयस्तेवि प्रतोयन्ते तवनतिरितावसमोज या: कविच दुपनागरिकाघा: प्रफाशिता:, ता अपि गता: अवसगोबरम, सेतमश्च यैवर्भीप्रमृतयः। (ध्वन्यालोक १.१) (iv) आचार्य अभिनयगुप्त-'तस्माव् वृतयोऽनुपरासे म्योडनतिरिकपुसयो नाप्यिकव्यापारा: (लोचन १.१)। (v) साहित्यदर्पसकार ने चार रीतियाँ मानी हैं-'बंदर्भी चाप गोडो ब पाइ्चाली साटिका तथा।' प्रनुवाद-(२. शब्दानुप्रास) कम्दानुप्रास सो यह है जहां (समान शम्नार्प होने पर) फेथल तात्पयं मान का भेद होता है, यह साटानुप्रास कहलाता है। शन्द औौर अर्थ के पमिन्न होने पर भी तात्पयमात्र का भेव होने से समपत परणुप्रास होता है तथा यह साट-वेशवासियों का प्रिय होने के कारस सादानुगत फहलाता है। यहो पदानुपात है, ऐमा पृष (पालङ्ूारिक) मानते हैं। प्रभा-वशनुनास सथा वृत्यनुपाछ नामक दो प्रशार मे वर्गानुनगपा निरुपए करके महाँ शव्दानुप्रास का विवेधन हिया जा रहा है। मार्यक नर्खुनगमूर भर्थात् यम्द की आावृत्ति होने पर यदि सात्पर्य में भेर होता है अर्पात् जब निनी शब्द [पद मा प्रातिपदिक) की भावृति होती ह औौर उगका सर्गं प्रत्येक स्वान पर समान ही होता है किन्तु सन्वय में भेद होने मे (=वद सयिमेवमाय या कमरृ भार -मादि, मैं सन्तर होने से) तातपर्य में भेड हो जावा है तो महा सनानुमान् है।। है। भन्यनुशग को ही नाटानुवान कहते है। पुव माचारय (वस्ूट माशि। से पदानुप्रास भी पहते हैं: किन्सु माचारय मम्मट हगे 'पमरनुराम' करना ही उदुश समनते है. कारए यह है कि सबद से प्राततधिक (बिना विभति माना) सप विभासन्त (पद) दोनों का महस-हो जाता है, 'पर' के द्वारा को सेवन विमवापन (गुस्विउन्त) पा हो प्रहल होता है। पम प्रकार गग्दमपराय के प्रवमतः कोमेर है-परपता तथा नाम (असिरदि) गत। पदगन सादानुप्राम भी सो प्रार या है-(1) पंसपदरज हथा (२) एक्परगन। नानवड भी तीय अार का है-(।) एक ममासपत, (४) भिन्न समानयग, (१) सनाम सममासमा। इ दाय प्रहार के माशनुपाग के उदाहुगा नमतः बोमे दिय जाो ह-
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नेवंम उल्लासे:
(११३) पदानां सः । स इति लाटानुपासः। उदाहसगम्- यस्थ न सविधे दयिता दवदहनरतुहिनदीघिस्तस्य। यश्य च सविधे दयिता दवदहनस्तुहिनिदीघितिस्तर्य ।३५७।। (११४) पदस्यापि। अपिशव्देन स इति समुच्चीयते। उदाहरएम्- वदनं वरवर्णिन्यासतर्या: सत्यं सुधाकर:। सुघाकर: कव नुपुनः कलङ्कविकलो भवेत्॥३५८॥। (११५) वृत्तावन्यत्न तन्र वा । नाम्न: स वृत्त्यवृत्त्योश्च एकस्मिन् समासे, मिन्न वा समासे, समासासमासयोर्वा, नाम्नः प्रातिपदिकस्य न तु पदश्य सारूप्यम्। उदाहरसम्- सितकरकररुचिरविभा विभाकराकार, घरसिघर, कीर्तिः। पौरुषकमला कमला साडपि तवैवारिति नान्यस्य ।।३५६।। (११६) तदेवं पञ्चधा मतः ॥८२॥ अरनुवाद-(लाटानुप्रास के भेद) (१) वह (लाटानुप्रास) अ्रनेक पदों के सावृश्य में होता है। (११३) (फारिका में) स अर्थात् लाटानुप्रास। (अ्नेक,पदगत लाटानुप्रास,फा) उदाहरख है-'जिस पुरुष के पास प्रिया नहीं है उसके लिए शीतकर (चन्द्रमा) भी बावानल है। जिसके पास धरिया है उसके लिए दावानल भी शीतकर (चन्द्र) है।।३५ ७। (२) वह एक पद के सावृश्य में भी होता है। (११४) (कारिका में) 'अपि' (भी) शब्द के द्वारा 'सः' (वह) का समुच्चय किया जाता है। (एकपदगत लाटानुप्रास का) उदाहरए है-'निश्चय ही उस उत्तम नारी (वरवािनी) का मुख सुधाकर (चन्द्र) ही है। फिन्तु सुघाकर (चन्द्र) कलङ्गरहित • कहाँ हो सकता है ?॥३५८॥ वह (लाटानुप्रास) (३) वृत्ि भर्थात् एक समास में, (४) अ्रन्यन्न बृत्ता सर्थात् भिन्न समास में भर (५) वृत्यवृतत्योः अर्थात् समास तथा भसमास में प्राति- : पादिक का (नाम्नः) अर्थात् नामगत ही होता है (११५) एक समास में, भिन्न समास् में प्रयवा समास और असमास में प्रातिपादिक -का ही (लाटानुप्रास होता है, पद का नहीं (नामगत तीनों भेदों का) उदाहरए है- 'ईितकर' इत्यावि (ऊपर उदाहरए २१४) ॥३५६। इस प्रकार लाटानुप्रास पाँच प्रकार का माना गया है। (११६)
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काव्यप्रकार:
(११७) अरथथे सत्यर्थभिन्नानां वर्णानां सा पुनः श्रुतिः ॥ यमकम 'समरसमरसोय' मित्यादावेकेपामर्धवतत्वेऽन्येयामनर्थकत्वे भिलार्था नामिति न युज्यते वकतुम इति अर्धे सतीत्युक्तम्। सेति 'सरो रस' इत्यादि वैलचरयेन तेनैव क्रमेग स्थिता। प्रभा-पांच प्रकार के साटानुपास के उदाहरणों में-(१) मनेव्पदगत साटानुप्रास-'यस्य न' इत्यादि उदाहरंस में 'सविध' दविता' दत्पादि मनेक परों का सादृश्य (भावृति) है, दोनों स्मलों पर इन पदों मे बाच्पाथं रामान ही है फिन्तु तात्पर्षार्य में भेद है; जैमे-पूर्यास् में 'त्ुहिनदीघिति' (सीतरुर, चन्द्र) उद्देप है सथा 'दवदहन' विधेय है, परन्तु उत्तरार्ध में 'भवदहन' उर्दय्प है मौर 'ुह्तिदीघिति' विधेय है। इस प्रकार उद्दयप-विषेय भाव का विपर्याग (पर्यतन) हो जाता है, इसलिये यहाँ शब्दबोध रूप सात्पर्य-भेद है। तातरग-भेद का प्रभिपाम ही है- उद्द दप-विधेयभाव आदि मा. पसृ कर्मभाव आादि, पदार्थों ा सम्बन्य। (२) एशपदगतलाटानप्रास-'मन' इस्यगद उदाहरय मे फेवल एक 'मुघाकर' पद की सावृति है। दोनों जगह माच्यार्थ समान है, निन्तु पपम 'सुाकर' पद विधेय रूप में मगुक्त हुम है तथा द्वितीय 'मुधाकर' पद उद्दम रष में यही सात्प्य-भेद है। (१) 'सितकरकरपयिरविया' एक समाग में 'कर' प्रातिरदिक (नाम) को भावृति है, अतः यरां एक समास में नामगव माटानुमाम है। (४) 'विभा पातिवदिय फी दो समासों मे यावृति है, अतसच गहां भिन्न गमान में नामगन साटानुशम है तथा (५) 'कमला' प्रातिपदिरु प्रयमतः समास में है पुनः बिना समान के ह, दम लिए यहां समास तथा मरामास में नामगत ताटानुनग है। अनुवाद-(३ ममर) सर्थ होने पर. मिस्न-भिन्न अर्म वाले महां समुदाम का पूर्वकम से हो (सा) पापृति (पुतः य तिः) दमक धसार पट्शाता है। (१य) 'समर-सामरसोज्यम' इत्यादि में एर (समर) मएसपुराद के सार्मक होने पर सपा दूसरे ('शमरस' में 'सगर' के सनर्पर होने पर (कारिका में) विलार्मा- नाम' पर्यात् भिन्न सर्प वाले वहाँ-नमुदारयो का वह पटना पुछ मही: शासिए 'सभे सति' (= पर्यं होने पर अरपात् यदि श्रम होसो भिन्न हो) ऐेवा कहा गया है। (सा पुनः भतिः' मे) 'सा' (यह) इसमिए है कि 'सरो रगः' हामारि (अह मह साम्म है. हिम्तु वह-दम नहीं। को प्पेशा विसभस प्रकार से उस (पूर्व) यम से ह। दर्सों को पुनः थूनि रोगी घाटिये। प्रभा-ननक के रामस व्यास में पार मंद ह-(१) गर्खनों दुगः मूि वमम्-पर्मोन दर्शमयुदर की सापृति मनर्के पनंकवार है। हिन्तु बर्तेगमुराय शी भापुति तो गाटानुराग में भी होगी है, सवीमिर यहा (३) सर्भभग्ताम्-
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नैवम उल्लास: .f ४४१
(११८) पादतन्द्धागवृत्ति तद्यात्यनेकताम् ॥८३॥। प्रथमो द्वितीयादौ, द्वितीयस्तृतीयादौ, तृतीयश्चतुर्थे, प्रथमर्त्रष्वपीति सप्त। प्रथमो द्वितीये तृतीयरचतुर्थे प्रथमश्चतुर्थे द्वितीयस्तृतीये इति दू। तदेवं पादजं नवभेदम्। अरधावृत्ति: श्लोकावृत्तिश्चेति- द्वै।- द्विघा विभक्त पादे प्रथमादिपादादिभाग: पूर्ववत् द्वितीयादिपादा- दिभागेपु, अ्रन्तभागोऽन्तभागेष्विति विशतिर्भेदाः। श्लोकान्तरे हि नासौ भागावृत्तिः। त्रिखएडे त्रिशत् चतुःखएडे चत्वारिंशत्।
यह पद दिया गया है, क्योंकि लाटानुप्रास में एकार्थक वर्ससमुदाय की आवृत्ति होती है भिन्नार्थक की नहीं। अव यदि "अर्थभिन्नानां वर्ण्णानां पुनः श्रति यमकम्' इतना हो कहते हैं तो 'समरसमरसो' में यमक नही होता, क्योकि यहाँ द्वितीय 'समर' (वर्णसमुदाय) अ्नर्थक है। यह तो सार्थक शब्द 'समरस' का एक-अंशमात्र है। ' इसी हेतु (३) अथे सति यह पद दिया गया है, जिसका अभिप्राय यह है कि यदि अर्थ हो तो भिन्न हो। फलतः क-भिन्न २ अर्थ वाले सार्थक ख-सार्थक भोर निरथंक तथा ग-सभी निर्रर्थक वर्गसमुदायो का यमक हुआ करता है। फिर भी एक दोप यह रह जाता है कि 'सरो रसः' मे भी यमक होने लगेगा (जो अभीष्ट नहीं हैं) इसलिए 'पुनः श्र तिः' के विशेषण रूप में (४१ 'सा' पद दिया गया है, अर्थात् ' वणों को पुनः श्रति क्रम से ही होनी चाहिये। सरो रस, मे क्रम बदल गया है।। अ्ननुवाद्-[यमक के २ भेद] (क) पद्य के चतुर्याश (पाद) में होने (पाद- षृति) से तथा (स) उस (पाद) के अश में होने (पादभाग-वृति) से यह यमक प्रनेक प्रफार का हो जाता है। (११८) [पादवुति यमक के ११ मेद]-[प्रथमः द्वितीयादौ ... यम्मते-यह अ्न्वय है] यदि (१) प्रथम पाद द्वितीय में आवृत्त होता है (पम्यते) (२) (आदि शब्द से) सृतीय में या (३) चतुर्य में। यदि (४) द्वितीय पाद तृतीय पाद में आवृत होता है या (५) चतुर्थ में। य्दि (६) तृतोम पाद चतुर्थ पाद में आवृत्त होता है, यदि (७) प्रथम पाद शेप तोनों में (एक साथ) आवृत्त होता है-ये सात भेद हैं: यदि (८) प्रयम पाद द्वितीय में और तृतीय चतुर्थ में या (E) प्रथम चतुर्य में औ्रर द्वितीय तृतीय में आवृत्त होता है तो ये दो भेद होते हैं। इस प्रकार ये पादगत & भेद होते 1 है तभा (१०) अरधं श्लोक की आवृत्ति और (११) पूर्ण इलोक की आवृति मे दो (मिलकर ११ भेद हैं)। [सजातीय पावभागवृति के मेव] इलोक के (प्रत्येक) पाद को दो भागों में - विभक्त करने पर प्रथम (द्वितीय आदि) पाद के आद्यभाग की उपयुक्त (पाद की) पामूति के समान ही द्वितीम पाद (तृतोय भावि) के आादिभाग में भवृत्ति होने से
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फाव्यप्रराश:
प्रथमपादादिगतान्यार्धादिभागो द्वितीयपादादिगते आद्यार्धादि- भागे सम्यते इत्याधन्वर्थतानुसरणेनानेफभेदम्, अन्तादिकम् श्रादन्तिकम् तत्समुच्चय: मव्यादिंकम आरदिमध्यम् श्रन्तमध्यम् मभ्यान्तिकम् तेपां समु- च्चयः। तथा तस्मिन्नेव पादे आद्यादिभागानां मध्यादिभागेपु अनिवते प रथाने आधृत्तिरिति प्रभूततमभेदम्। तदेतत्काव्यान्तर्गङ्भूतम् इति नारप भेदलक्षएं कृतम (१ भेद) तथा (प्रयमपादादि का) अन्त भाग (द्वितीयपादादि का) भन्तनान में प्रावृत्त होने से (१० भेद)-इस प्रकार बीस भेद होते हैं। इलोकाग्तर में यह पाठ भाग को आयुत्ति नहीं होती (पतः पादगत ११ भेदों के समान यहाँ भी ११. ११ भेद होकर २२ नहीं होते)। इसी प्रकार पाद के तीन सण्द करने पर सीस तमा चार सण्ड करने पर पालीस भेव होते हैं (प्योकि प्रत्येक भाग को सधृति बस प्रकार की है) ! [विजातीय भाग को आवृत्ति से भी पनेक मेद] यदि प्रथम पाद (भाति) का भन्तिम सभ (थादि) भाग द्वितीय पाद (यादि) के माद्म सर्यं (पादि) भाग में आयृत होता है तो (पन्ताविक मादि) अव्वयं नाम के अनुसार फोरु प्रकार का यमक होता है, जैसे-प्रन्तादिक, परद्यन्तिर (प्रयमपाद के साघ भाग को द्िमीप के भ्रम्त भाग में सामृत्ति) तथा (प्रनतादिक और पाचन्तिर) दोनों का समुक्वष। इसी प्रयाार मध्यादिक (प्रथम पाद के तीन या घार सष्डों में से गप्पभाग की द्वितीय पाद के सादि भाग में आयृत्ति) आश्मिय्य, धन्तमष्य, गम्यागिस तभा नन (दो, तीन या बार) का समुच्चय। [एक हो पात में भागावृशति से भी समेक भेद] इसी प्रकार जस (एक) ही पाद में साम इत्यादि भागों की मध्यभाग सादि में सपृत्ति होती है तथा (इन निया स्यानों के प्रतिरिक) पनिवतस्पान में भी (वलनामुदाय को) आनृति होता है- इसलिए ममरु के वहृत अ्रधिक नेव हैं। वर्मोोक यह (मेद-प्रपश्स) कसम (एस. स्वादन) के भीतर (गग्ने की गाँठ के समान) एक (नोरस) गाठ (सड:थ) ह इसलिए इसके भेवों के सक्षस गहीं किसे गये। प्रभा-(१) भाधायं मम्मट मे प्रामीन पापादो वी कमक सम्बनी बि "पना का अनुमरस करते हुए हो पमक के मसभेदों का निम्पस कर रिया है। चस्तुन, उनकी दृष्टि में इस भेव्मवमत का पाय्य में विनेष महरर नही है पसहुष यह तो रगास्वादन में बापक ही है। रसी से उन्होंने नमर मेपमेसे शी प्ृषय संजञामों की भी उपेकषा कर दी। पादमृति पमर के ह१ भेरों के नमरः मे माम प्रपसिग मे-१. मुग, २. नंदंग, ३. पादुशि, ४ गर्म, ४. मुंब्यर, ६- दुष्ा ७. पर्डूकि, ८. मुम्बक, १. पम्दिात, १०. गमुदगो, ११. महाउमक। पार्पार्न गत्र ने समक़ का विसार से विरेयन हिया है।
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नवम उल्लास: [४४३
दिडमान्नमुदाहियते- सन्नारीभरणोमायमाराध्य विधुशेखरम्॥ सन्नारीभरणोऽमायस्ततरत्वं पृथिवीं जय ॥३६०।। विनायमेनो नयताऽसुखादिना विना यमेनोनयता सुखादिना। महाजनोऽदीयत मानसादरं महाजनोदी यतमानसादरम् ॥३६१॥। स त्वारम्भरतोऽवश्यमबलं विततारवम्। सर्वदा रगमानैपीदवानलसमस्थित: ॥।३६२।।
सर्वदारयामानैपी दवानलसमस्थित: ॥३६३।।
अनुवाद-(यमक अलङ्गार के) फुछ (दिङ्माघ्रम्) उदाहरस यहाँ दिये जाते हैं :- [१. संवंश] 'हे राजन्, सती नारियों के आभूषण स्वरूप उमा को (शरौराध से) प्राप्त करने वाले (सपारीभरणा या उमा ताम् अयते इति तम) इन्दुशेखर की माराधना करके शत्रुगज-विनाशक युद्ध करने वाले (सन्नाः मृताः अरीएाम् इभाः गजा: यत्र तादृशः रखः युद्धं यस्य तथाभूतः) कपटरहित (अमायः) प्राप पृथिवी का विजय फीजिए।' [यहाँ प्रथम पाद की तृतीय में आवृत्ति है, अतः 'संदंश' नामक यमक है] ॥३६० ॥ [२. युग्मक] 'दुर्जनों के अपसारक [महाजाः महान् उत्सवान् अजन्ति दिपन्ति -इति दुर्जना: तान् नोदितु शीलं यस्य महाज नोदी] (हस) पक्षिरूप पुरुष [वि (पक्षी) -+ भा (पुरुष)], इस महात्मा (महाजन;) को बिना अपराध के ले जाने वाले (एनो विना नयता), प्राएभक्षक (अ्सुरादिना, सुखों के संहारक (सुसादिना) यम ने इसकी रक्षा में यत्नशील जनों को विपाव प्रवान करती हुए [यतमानानां सादं विवाद राति दर्दाति इति वथा स्यातथा'- क्रियाविशेषणा] चेतना से मानसात्) शीघ्र हो (भरं) विलग फर दिया है ।अदीयत प्रखण्डघ्त) ।' [यहाँ प्रथम पाद की द्वितीय में तभा तृतीय की चतुर्थ में आवृत्ति है अरतः युग्मक' नामक यमक है। ॥३६१॥ [१. महायमक] 'मन्द न चलने वाले (अलसं मन्दम् अ्वान् प्रगव्धन्) विष्ण- परायस (प्र-स्थितः), सात्विक कर्मों में तत्पर (सत्व-आरम्भ-रतः) समस्त शयमों के विवारस में गर्वशोल [सर्वंदारसे यः मानः तदेषी तदिच्छाशोल) तथा (शयुपो के 'लिए) बावानल के सम.न (दावानल-सम-रियतः) उस राजा ने तो (सातु) यदा में • म माने वाले (अवश्यम्) तरसमूहों का आश्रय लेने वाले (अविलम्बिततारयम्) बल- 'रहित (भबल) तथां रदन करने वाले (विततारयरम्) शतरु समूह फो (भ्रारम्) सर्वदा निश्चय हो (मवश्यम्) अश्यधिक (भरतः) युद्ध को प्राप्त करापा (रम् आ्रनंषीत)।' [यहां पूर्ण इलोक की भावृति है अतः महायमफ है] ॥३६२॥॥३६३1
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काव्यप्र कारी:
श्रानन्तमहिमव्याप्तविश्यां वेघा न वेद यामू। या च मातेव भजते प्रसते मानवे दयाम ॥३६४॥। यदानतोऽयदानतो न यात्ययं न यात्ययम्। शिवेहितां शिवे दितां स्मरामितां स्मराममि ताम ॥३६५॥। सरख्वति, प्रसादं मे स्थिर्ति चित्तसररवति, सरस्वति, कुरु क्षेत्रफुरुक्षेत्र-सरस्वति ॥३६६।। ससार सार्क दर्पेए फन्दर्पेए ससारसा। शरत्नवाना विघ्रासा नाविभ्ासा शरजवा ।३६७।'
[४ .- सन्वष्टक] 'जिसने अपनी भनन्त महिमा से विश्य को व्याप्त कर रवता है, वियाता भी जिसे (तत्यत.) नहों जानते तथा जो प्रहत (नम्र) मानव पर माता के समान चनुरम्पा करती है (उसको घरसरज मुभे सिद्धि प्रवान करे-यह पप्रिम- दलोक में धन्वय है।' [पानादवयनाचार्यकृत देवीशतर के दस पद में द्विसीय पाद (सण्ड) के भन्त भाग को घसु्भंपाद-सण् के पग्तनाग में यायुति है]।1४ [५. प्रान्तिक]-'जिस पावती को प्रसाम करके (मदानतः) पह मनुच्य पायनी के द्वारा) शुभविधि (सप) दिये जाने के कारल (सम-दानतः) नीति के नाश (प्रतिकमस) को नहीं प्राप्त होता; शित् की प्रापिता (सिव-दहिनाम्) करवाल में हितकारी (सिये पल्यास हिताम), फामदेव के द्वारा भी बिससो परामित नहों किया गया (सररामिता) उस वावंती का में रगरस करता है।' माननवर्यनहत बेवीशतक के दस पद में एक हो पाद में पाध्भाग को अन्तभाग में सापृति है, भत :- 'पाधन्तिक' यमर ै] ॥३४४॥ १. भागपुति आाधत्तिक तथा अग्तादिक का इसोय में समुष्चय] 'हेमेरे शरोर (शंपर) रपी कुक्सेम की सरस्यती (नदी) के समान, याग्बेवी (गरर्वनी), मेरे प्रति प्रसमता को प्राप्त हो (प्रसाय सर), मेरे वित रवो गमुत् में (पिससरसपति) भसी माति (त्यति मुद्ठ) रियति करो।', देवोदातक मे इग दय के पूर्षाद् में पाठठ सितिक है उसराप में पम्मग्तिक समा सग्तादिक है-इन सोगों का यहां समुध्वम है] -
७. आगवृत्ि प्रदयत्तिक तथा पमादिष का पादमें समुष्पय- नवोन गरद् व्यमु दपयुर फामदेय के सहित था गई है, जो सारतों या रमतों है पुरत है, कर (गरत) के पारत करती है (विधारता), पतिदों के शबत (िभरारा) से रहित नही (गन-सविभालता) तमा जिसमे मनीन साहिया मनपपा चपती
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नवम उल्लास: ४४५
मधुपरा जिपराजित-मानिनीजनमनः सुमनः सुरभि श्रियम्। अभृत वारितवारिजविप्लवं स्फुटिततास्रतता्रवएं जगत् ॥३६८॥। एवं वैचिच्यसइस्रः स्थितमन्यदुन्नेयम्। (११६) वाच्यभेदेन भिन्ना यद् युगपद्धापरास्पृशः । श्लिष्यन्ति शब्दाः, श्लेपोऽसावक्ष रादि भिरष्टधा ।८४।1 'अर्थभेदेन शब्दभेदः' इति दर्शने 'काव्यमार्गे स्वरो न गएयते' इति च नये वाच्यभेदेन भिन्ना अपि शब्दा यद् युगपदुच्चारगेन श्लिष्यन्ति भिन्नं र्वरूपमपह् नुवते, स श्लेपः। सच वर्ग पद लिङ्ग-भापा-प्रकृति-प्रत्यय- विभक्ति-वचनानां भेदादृष्टघा।
[पनियतस्थानावृत्ति-यमक]-भ्रमरपंक्ति के द्वारा मानिनीजनों के मन को पराजित (धंर्य होन) करने वाले पुष्पों से सुरभित, फमलों के विनाश (विप्लव) से रहित और मञ्जरीयुक्त एवं रक्तवर्स के विस्तृत आम्रवनों से युक्त समस्त संसार (वसन्त ऋतु में) शोभा को धारस कर रहा है।' [हरविजय काव्य के इस पद्य में वर्गा-समुदाय (पराजित, पराजि' इत्यादि) की मनियत स्थान में आवृत्ति हो रही है। ॥३६८1 इस प्रकार सहस्रों प्रकार की विचित्रता से युक्त ममक के श्रन्य भेद भी फाव्यों से उद्धुत किये जा सकते हैं। अनुवाद-[४श्लेप] अर्थ-भेद के कारण भिन्न-भिन्न होकर भी जहां शब्द एक उच्चारण के विषय होते हुए स्लिप्ट (एकरूप) प्रतीत होते हैं, वह श्तेष प्रतद्धार है। वह इ्लेष परक्षर आदि के भेद से आठ प्रकार का होता है। 'अर्थ की भिन्नता से शब्द भी भिन्न २ होते हैं'-इस सिद्धान्त के अनुसार अर्थ-भेद के कारस भिन्न २ होने वाले भी शब्द जब-'फाव्य के क्षेत्र में (उदात्त पादि) स्वर का विचार नहीं किया जाता' इस न्याय के अनुसार-एक उच्चारस केद्वारां श्लिप्ट हो जाते हैं अर्थात् अपने भिन्न २ स्वरूप को छिपा लेते हैं (तथा एकरूप में भासित होते हैं। वह (शब्द) इ्लेय मलद्कार है। औौर यह १-घसं,२- पद, ३-लिङ्ग, ४-भाषा, ५-प्रकृति, ६-प्रत्यय, ७-विर्भ्त्त तथा मनवचन के भेद से झाठ प्रकार का है। प्रभा-भाव यह है कि एक बार उच्चरित शब्द एक भर्य का बोध करावा है (मकद्ुच्चरितः शब्दः सकृदर्थ गमयति)-इस न्याय के अनुसार एक शब्द से दो ध्थों की प्रतीति होना असम्भव है। इसी हेतु यह सिद्धान्त वना लिया गया. हैकि यदि एक शब्द के अर्थ भिन्न २ हैं तो उसकेआकार भी भिन्न २ हैं। जैसे 'सवस' शब्द के 'नमक' औोर 'मश्व' दो मर्यं है तो 'लकए' के दी भिन्न २ भाकार ही दो सथों का बोध कराते हैं। इस प्रकार अनेकाषक'शब्दों के भ्रनेक प्राकार मानने
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j काव्यप्र काशं:
आरनन्तमहिमव्याप्तविश्वां वेघा न वेद याम्। - या च मातेव भजते प्रणते मानवे दयाम् ॥३६४।। यदानतोऽयदानतो न यात्ययं न यात्ययम्। शिवेहितां शिवे हितां स्मरामिता स्मरामि ताम ॥३६५॥। सरत्वति, प्रसाद मे स्थिर्ति चिचतसरस्वति, सरस्वति, कुरु केत्रफुरुत्तेत्र-सरस्वति ॥१६६।। ससार सार्क दर्पेस कन्दर्पेण ससारसा। शरत्रवाना विभ्रा नाविभ्रासा शसत्रवा ।३६७।
[४. सन्वष्टक] 'जिसने अरपनी प्रनन्त महिमा से विश्व को व्याप्त कर रकसा है, विधाता भी जिसे (तत्वत.) नहीं जानते तथा जो प्ररत (नम्र) मानव पर माता के समान अनुकम्पा करती है (उसफो घरएरज मुझे सिद्धि प्रवान करे-यह भप्रिम- दलोक में भन्वय है।' [मानग्दवर्भनाचा्वकृत देवीदतक के इस,पद्य में द्वितीय पाद (सण्ड) के भन्त भाग की चतुभंपाद-खण्ड के अन्सभाग में सावृति है] ।+Y॥ [५. प्रदनतिक]-'जिस पायंती को प्रसाम करके (मवानतः) यह मनुप्य पा्यनी के द्वारा) धुभयिधि (श्रप) दिये जाने के कारस (भय+दानंतः) नोति के नाश (प्रतिघमण) को नहीं प्राप्त होता; शिय की प्राथिता (शिय-ईहिताम्) कंल्यांस में हितफारी (सिवे फल्यासे हिताम), कामदेव के द्वारा भी जितको परामित नहीं किया गया (अपराजिता) उस पार्यती का मैं रमरण करता हूँ।' [मानन्ववयंनकृत वेयीशतक के इस पद्य में एक हो पाद में व्राद्यभाग की अन्तभाग में पावृति है, पतः- -1 'प्राद्यन्तिफ' यमरु है] ॥३५४॥ ६. भागवृति आ्राधस्तिक तथा अन्तादिक का श्लोक में समुच्चय] 'हे मेरे शरीर (क्षेत्र) रपी कुरक्षेंन की सरस्वती (नदी) के समान, याग्देवी (सरस्वती), मरे प्रति प्रसप्नता को प्राप्त हो (प्रसाद सर), मेरे चित्त रूपी समुद्र में (थित्तनारस्वति) मली भाँति (स्वति सुष्ट) स्यिति करो।', देयीदातक के इस पद् के पूर्वाद्ध में भाछ न्तिक है उत्तरा्थ में आद्यततिक तथा अतादिक है-इन सोनों का यहां समुपय है
[७ भागवृति व्ाद्त्तिक तथा अन्तादिक या पाद में समुकवन]-यह गवोन शरद् ऋसु दर्पयुकत कामदेव के सहित था गई है, जो सारगों या कमसों से -पुक्त है, फारा (परस्) को मारस करती है (विचारत), पक्षिमों के अम् (वि-धाल) से रहित नहीं (म+प्रविाला) तथा जिसमे नवीन पाडिया सय+अनः) चसती है ।३६।
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नवम उल्लास: ४४५
मधुपराजिपराजित-मानिनीजनमनः सुमनः सुरभि श्रियम् । अभृत वारितवारिजविप्लवं सफुटितताम्रतताम्रवणं जगत् ॥३६=।। एवं वैचित्र्यसहस्रः स्थितमन्यदुन्नेयम्। (११६) वाच्यभेदेन भिन्ना यद् युगपद्धापएस्पृशः । श्लिष्यन्ति शब्दाः, श्लेषोऽसावक्ष रादिभिरष्टधा ॥।८४।। 'अर्थभेदेन शब्दभेदः' इति दर्शने 'काव्यमार्गे स्वरो न गएयते' इति च नये वाच्यभेदेन भिन्ना अपि शव्दा यद् युगपदुच्चारऐन श्लिष्यन्ति भिन्नं स्वरूपमपह नुवते, स श्लेपः। स च वर्ण पद लिङ्ग-भापा-प्रकृति-प्रत्यय- विभक्ति-वचनानां भेदादृष्टघा।
[अनियतस्थानावृत्ति-यमक]-भ्रमरपंक्ति के द्वारा मानिनीजनों के मन को.पराजित (धरय हीन) करने वाले पुष्पों से सुरभित, कमलों के बिनाश (विप्लव) से रहित और मन्जरीयुक्त एवं रक्तवर्एं के विस्तृत आस्रवनों से युक्त समस्त संसार, (वसन्त ऋतु में) शोभा को धारण कर रहा है।' [हरविजय फाव्य के इस पद्य में वए-समुदाय (पराजित, पराजि' इत्यादि) को अनियत स्थान में आवृत्ति हो रही है। ॥३६८॥ इस प्रकार सहस्त्रों प्रकार की विचित्रता से युक्त यमक के अन्य भेद भी काव्यों से उद्धुत किये जा सकते हैं। अनुवाद-[४. श्लेप] अरर्थ-मेद के कारण भिन्न-भिन्न होकर भी जहां शब्द एक उच्चारस के विषय होते हुए स्लिष्ट (एकरूप) प्रतीत होते हैं, वह स्लेप प्रतङ्गार है। वह प्लेष शक्षर आदि के भेद से आाठ प्रकार का होता है। 'सर्थ की भिन्नता से शब्द भी भिन्न २ होते हैं'-इस सिद्धान्त के अनुसार 1
अर्थ-भेद के फारस भिन्न २ होने वाले भी शब्द जब-'काव्य के क्षेत्र में (उदात्त पादि) स्वर का विचार नहीं किया जाता' इस न्याय के पनुसार-एक उच्चारए के द्वारा श्लिप्ट हो जाते हैं पर्थात् अपने भिन्न २ स्वरूप को छिपा लेते हैं (तथा एकरूप में भासित होते हैं। वह (शब्द) इलेप अलद्धार है। और यह १-वसं,२- पद, ३-लिङ्ग, ४-भाषा, ५-प्रकृति, ६-प्रत्यय, ७-विभक्ति तथा ८-वचन के भेव से आाठ प्रकार का है। प्रभा-भाव यह है कि एक बार उच्चरित शब्द एक अर्य का बोध कराता है (मकृदुच्चरितः शब्दः सकृदर्थ गमयति)-इस न्याम के श्रनुसार एक पब्द से दो भ्रथों की प्रतीति होना असम्भव है। इसी हेतु यह सिद्धान्त बना लिया गया है कि यदि एक शब्द के अथ भिन २ है तो उसके आकार भी भिन्न २ हैं। जैसे 'लवण' शब्द के 'नमक' और 'अरव' दो अर्थ हैं तो 'लवए' के दो भिस २ आकार ही दो सर्धोंका बोध कराते है। इस प्रकार अनेकार्थक शब्दो के अ्रनेक आ्र्रकार मानने
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i कांव्यप्रकारी:
आनन्तमहिमव्याप्तविश्वां वेधा न वेद याम्। या च मातेव भजते प्रणते मानवे दयाम् ॥३६४॥ यदानतोऽयदानतो न यात्ययं न वात्ययम्। शिवेहितां शिवे हितां स्मरामितां रमरामि ताम ॥३६५॥ सरस्वति, प्रसाद मे स्थिति चित्तसरस्वति, सरस्वति, कुरु क्षेत्रकुरुक्षेत्र-सरस्वति ॥३६६।। ससार साकं दर्पेण कन्दर्पेण ससारसा। शस्न्नवाना विभ्राणं नाविभ्राणा शरन्रवा॥३६७।
[४ .- सन्दष्टक] 'जिसने अपनी अ्र्रनन्त महिमा से विश्य को व्याप्त कर रक्खा है, विधाता भी जिसे (तत्त्वतः) नहीं जानते तथा जो प्रशात (नम्र) मानव पर माता के समान अनुकम्पा करती है (उसको घरसरज मुझे सिद्धि प्रदान करे-यह भ्रप्रिम- श्लोक में अन्वय है।' [आनन्दवर्धनाचार्यकृत देवीशतक के इस पद्य में द्वितीय पाद (खण्ड) के अ्न्त भाग की चतुर्थपाद-खण्ड के शन्तभाग में आवृत्ति है] ॥६४॥ [५. आद्यन्तिक]-'जिस पार्वती को प्रसाम करके (यदानतः) यह मनुष्य पार्वती के द्वारा) धुभविधि (अय) दिये जाने के कारण (अय+दानतः) नीति के नाश (प्रतिकमण) को नहीं प्राप्त होता; शिव की प्राथिता (शिव-ईहिताम) फेल्यास में हितकारी (शिवे फल्याएो हिताम्), कामदेव के द्वारा भी जिसफो पराजित नहीं किया गया (अपराजिता। उस पवंती का मैं रमरल करता हूँ।' [आनन्दवधनकृत बेवोशतक के इस पद्य में एक हो पाद में ग्द्यभाग को अन्तभाग में आवृत्ति है, सतः- 'आद्यन्तिक' यमक है] ॥३५४॥ ६. भागवुति आ्र्द्यन्तिक तथा अन्तादिक का इलोक में समुच्चय] 'हे मेरे शरीर (क्षेत्र) रूपी कुरक्षेत्र की सरस्वती (नदी) .के समान, बाग्देवी (सरस्वती), मेरे प्रति प्रसप्नता को प्राप्त हो (प्रसाद सर), मेरे चित रूपी समुद्र में (चित्त-सरस्वति) भली भाति (स्वति-सुष्ठ) स्थिति करो।', देवीशतक के इस पद्य के पुर्वाद्ध में श्राद्य न्तिक है उत्तरार्ध में आद्यन्तिरु तथा अन्तादिक हैं-इन तीनों का यहां समुज्चय है] ॥३६६8 - [७. भागवुत्ति आद्यन्तिरु तथा अन्तादिक का पाद में समुच्चय]-'यह नवीन शरद् ऋतु दर्मयुक्त कामवेव के सहित भा गई है, जो सारसों या कमलों से - पुक्त है, काश (शरस्) को धारख करती है (विभ्राख), पक्षियों के शब्द (वि-भ्राए) · से रहित नहीं (न-प्रविभ्राा) तथा जिसमें नवीन गाड़िया-'नव+मनः) चलती है ।।३६७11
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नवम उल्लास: [ ४४५
मधुपराजिपराजित-मानिनीजनमनः सुमनः सुरभि श्रियम्। अ्रभृत वारितवारिजविप्लवं स्फुटितताम्रतताम्रवसं जगत् ॥३६=।। एवं वैचित्र्यसहस्रः स्थितमन्यदुन्नेयम्। (११६) वाच्यभेदेन भिन्ना यद् युगपद्धापणस्पृशः । श्लिष्यन्ति शब्दाः, इ्लेपोऽसावक्ष रादिभिरष्टधा ।८४॥। 'अर्थभेदेन शब्दभेदः' इति दर्शने 'काव्यमार्गे स्वरो न गएयते' इति च नये वाच्यभेदेन भिन्ना अपि शब्दा यद् युगपदुच्चारऐेन श्लिष्यन्ति भिन्नं स्वरूपमपह नुवते, स श्लेपः। स च वर्एं-पद लिङ्गभापा-प्रकृति-प्रत्यय- विभक्ति-वचनानां भेदादृष्टघा।
[अनियतस्थानावृत्ति-यमक]-भ्रमरपंक्ति के द्वारा मानिनीजनों के भन को पराजित (धैयं हीन) करने वाले पुष्पों से सुरभित, फमलों के विनाश (विप्लय) से रहित और मञ्जरीयुक्त एवं रक्तवरएं के विस्तृत आन्न्नवनों से युक्त समस्त संसार (वसन्त ऋतु में) शोभा को धारस कर रहा है।' [हरविजय काव्य के इस पद्य में वर्स-समुदाय (पराजित, पराजि' इत्यादि) की प्रनियत स्थान में आवृत्ति हो रही है। ॥३६८। इस प्रकार सहस्रों प्रकार की विचित्रता से युक्त यमक के अन्य भेद भी काव्यों से उद्धुत किये जा सफते हैं। अनुवाद-[४श्लेप] अथ-भेद के कारस भिन्न-भिन्न होकर भी जहाँ शब्द एक उच्चारस के विधय होते हुए स्लिष्ट (एकरूप) प्रतीत होते हैं, वह श्लेप प्रतङ्गार है। वह श्लेष शक्षर आदि के भेद से आठ प्रकार का होता है। 'अथं की भिन्नता से शब्द भी भिन्न २ होते हैं'-इस सिद्धान्त के अनुसार सर्थ-भेद के फारस भिन्न २ होने वाले भी शब्द जब-'काव्य के क्षेत्र में (उदात पावि) स्वर का विचार नहीं किया जाता' इस न्याय के अनुसार-एक उच्चारण के द्वारा शलिष्ट हो जाते हैं मर्थात् अपने भिन्न २ स्वरूप को छिया लेते हैं (तथा एकरूप में भासित होते हैं। वह (शब्द) इलेव मसद्गार है। और यह १-वर्स,२- पद, ३-लिङ्ग, ४-भापा, ५-प्रकृति, ६-प्रत्यय, ७-विभक्ति तथा र-वचन के भेद से आाठप्रकार का है। प्रभा-भाव यह है कि एक बार उच्चरित शब्द एक भर्थ का बोध करावा है (मकृदुच्चरितः शब्दः सकृदर्थ गमयति)-इस न्याय के भनुसार एक शब्द से दो भ्ररथों की प्रतोति होना असम्भव है। इसी हेतु यह सिद्धान्त बना लिया गया है कि यदि एक शब्द के अर्थ निन्न २ है तो उसके भाकार भी भिन्न २ है। जैसे 'लवस' शब्द के 'नमक' और 'अस्व' दो अ्थं हैं तो 'लवस' के दो भिन्न २ भाफार ही दो सधों का ोध कराते है। इस प्रकार अनेकार्थक शब्दों के भनेक आरकार मानने
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४४६ काव्यप्रकाश:
क्रमेणोदाहरएम्- १. अलङ्गार: शङ्टाकरनरकपालं परिजनो विशीर्षाङ्गो भृङ्गी वंसु च वृप एको बहुचया: । पवस्थेयं स्थाणोरमि भवति संवोमरगुरो -: विधौ वक्र मृध्ति स्थितवति वर्य के पुनरमी ॥३६६॥ २. परथुकात्त स्वरपात्रं भूपितनिः शेषपरिजन देव, विलसत्करेशुगहनं सम्प्रति सममावयो: सदनम् ॥३७०॥
ध्यानालम्वनतां समाधिनिरतैर्नत हितपाप्तये.। लावस्यस्य महानिघी रसिकतां लक्ष्मीहशोस्तन्वती युष्माकं कुरुतां भवार्तिशमनं नेत्रे तनुर्वा हरेः॥३७१॥ पडते हैं। किन्तु दो समानाकार नन्दो का एक प्रकार का उच्चारण होने के कारख उनवी भिन्नता की प्रतीति नहीं होती, इसलिए एक शब्द से ही दो अरयों की प्रतीति हो रही है-ऐसा भान होता है। यही इ्ेप है। यदि कही 'इन्द्रश्रु' आदि मैं (भिन्न :२ समाम होने पर) उदात्तोदि स्वरों का भेद होता है तो वह भी दलेप में चाधक नही होता; क्योंकि काव्य-क्षेत्र में स्वर का ध्यान नहीं रसा जाता। संक्षेप में-अनेकार्थक शब्दों के प्रयोग में जहाँ चोनो ग्रथों में तात्पर्य-ग्राह्क प्रकंरण आदि एक साथ उपस्थित होते हैं (अथवा नहीं होते) वहीं दरोप म्रेसक्कार होता है। ' अनुवाद-(म प्रकार के सभङ्ग इलेप के) कमशः उदाहरस ये हैं- (१. वर्सश्लेप) 'जब 'यके विर्धो' अर्यात् चत्रा चन्द्रमा के मस्तक पर विराजमान होने पर समस्त वेवताओं में श्रषे्ठ महेश्वर की भी यह दंशा हो जाती' है कि भयानक नरकपाल ही उनका आभूपस होता है, गलित भ्रङ्गों वाला भृङ्गो नामके गए ही सेयका होता है और' एक बुद्ध यूपग हो सम्पति होता है तो 'विसौ वंक्े' सर्थात् ललाट में विधि या भाग्य के टेढा हो जाने पर ये हम (विचारे)कौन है'?' [यहाँ 'बियो' शब्द में विधि तथा विधु शब्दों के द' सथा'3' दोनों सप्तमी- एक-वचन में 'धौ' हो गये हैं, शतः वर्स-दलेश है ॥३६६॥ (२. पद-श्लेय)-'पृथक्' इत्यादि (ऊपर उदाहरस' ३०६)॥३७०। प्रभा-'यहाँ 'पृथुकातस्वरपात्र'=१. विपुलस्वसंपानों से पूर्र तभा २. वालकों की कातरध्वनि से पूण-इत्यादि प्रकार से पद-भेद है किन्तु एक उच्चारस के द्वारा दोनों का एकरूप भापित हो रहा है अतः सहाँ पर पद-दलेप है। •अनुवाद- (३, ४ तिङ्ग तथा वचन श्लेप)-'विष्ु के वे दोनों नेत्र सथवा शरीर तुम्हारी सांसारिक पीड़ा का शमन करे, जो नेन् भक्ति से नत जनों को देसने में अनुराग युक्त है, (तन पक्ष में-जिसमें भकिषिनम्र जनों के दर्सन का अनुराग है),
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नवम उल्लास: ४४७
एप वचनश्लेपोऽपिं। ५. मह्दे सुरसन्घम्मे तमवसमासङ्गमागमाहरणे। हरबहुसरएं तं चित्तमोह्दमवसर उमें सहसा ॥३७२॥
नीलकमल से स्पर्धा करने वाते हैं (तनु पक्ष में-श्यामता में नीलकमल से स्पर्धा करने वाली), समाधि-तत्पर योगी जनों के द्वारा शुभ-प्राप्ति के लिये ध्यान के आालम्बन किये जाते हैं, (तनुपक्ष में ईहितप्राप्तये सर्थात् इष्ट प्राप्ति के लिए ध्यान का पालम्बन बनाई गई) सौन्दर्य के महान् फोप हैं (तनु पक्ष में 'महानिधि:' यह पदच्छेद है, रेफ आगे होने पर 'दरलोपे पूर्वस्य दीर्घोडल: ६/३/१११' से 'इ' को दीर्घ होता है); लक्ष्मी के नेत्रों में रसिकता उत्पन्न करने वाले हैं (तनुपक्ष में तन्वती= करने वाली स्त्री० एकवचन) ॥३७१॥ यह वचन इ्लेप भी है। प्रभा-यहां 'हरेः नेत्रे तनुः वा युष्माकं भवार्तिशमनं कुरतां' यह मुख्य वाक्य है। इसमें 'नेने' यह नपुंसकलिङ्ग का द्विवचन है तथा 'तनुः' स्त्रीलिङ्ग एकवचन है। शेप तीन चरणों में नेने तथा तनुः के विशेपण है। 'प्रएयिनी' इत्यादि विशेपण नपुं सकलिन्न द्विवचन तथा स्त्रीलिङ् एकवचन दोनो में बनते हैं। अ्रतः यहाँ नपु सकलिङ्ग तथा स्त्रीलिङ्ग का श्लेप है। यहाँ वचनश्लेप भी है, जैसे- 'महानिधि' आदि में प्रथमा द्विवचन तथा एकवचन का दलेप है । इसी प्रकार 'कुस्ताम्' में भी एकवचन, द्विवचन का श्लेप है। अनुवाद-(५. भापा-इलेप)-[संस्कृत भापा में-महदे, सुरसंधं मे तघ अरब समासंगम् आागमाहरसे। हर बहसरणं तं चित्तमोहम् अवसरे उमे सहसा'-यह पदच्छेद है]। 'हे रवंती, हर्षप्रद वेदविद्या के उपाजन में मेरी उस तत्परता (समासंगं) को रक्षा फरो जिसमें देवताओं से मिलन होता है तथा उचित अवसर पर मेरे उस चित के मोह का तुरन्त ही हरएा करो जिसका अनेक प्रकार से प्रसार होता है।' 4
[पाकृत भाषा में-'मह देसु रसम् धम्मे तमवसम् गमा हरे ो। हरबह संरसम् तम् वितमोहम् अवसर मे सहसा' यह परिच्छेद है जिसकी संस्कृत है- 'भम देहि रस धर्मे तमोवशाम् प्शां गमागभात् हर नः' हरबधु शरसं त्यं चित्तमोहम्- सपसरतु मे सहसा।'] हे हरवयू. तुम्हों शरस हो, मुझे धर्म-फार्म में रुचि करामो,. इंस आवागमन रूप संसार से हमारी तमोमयी आशा को दूर फरो, मेरे चित का मोह शीम्न हो दूर हो जाए।' [यहाँ 'सहसा' पद के प्तिरिक्त सभी पदों में संस्कृत तथा प्राकुत भापा का इलेप है] ॥३७२।।
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६. शयं सर्वासि शास्त्रामि हृदि ज्ञेपु च वच्त्यति। सामर्थ्यकृदमित्राएां मित्राणां च नृपात्मजः ॥३७३॥ ७. रजनिरमसमौले: पादपद्मावलोक-
प्रथमनिवह्मध्ये जातुचित्वत्प्रसादा- दृहमुचित रुचि: स्यान्नन्दिता सा तथा मे ॥३७४॥ म, सर्वस्व हर सर्वस्य त्वं भवच्छेदतत्परः । नयोपकारसाम्मुख्यभायासि तनुवर्तनम् ।३७५।। (६. प्रकृति इलेप)-'यह राजकुमार समस्त शास्त्रों को स्वहृदय में धारस करेगा (वक्ष्यति) तथा उनका विद्वानों में प्रवचन करेगा (वक्ष्यति) और यह शय्रुमों को शक्ति को काटने वाला (सामर्थ्यकृल) एवं मिन्नों की शक्ति को उत्पन्न फरने वाला (सामर्थ्य करोति इति सामर्थ्यकृत्) होगा ।३७३॥ प्रभा-यहाँ पर वक्ष्यति में'वह' तथा 'वच्' (लुट् एकवचन में) धातु रूप प्रकृति का इलेप है तथा कृत् में 'कृ' तथा 'कृन्त' (काटना) धातु रूप प्रकृति का इलेप है। दोनों स्थांनों पर (निवप्) प्रत्यय समान ही है अतः प्रत्यय श्लेप नहीं। '(७. प्रत्यय-श्लेष)-हे देवि, जिसके मस्तक पर रजनिपति (चन्द्रमा) है, उस शिव के चरएफमलों के दर्शनरूपी उत्सव (क्षस) के अयसर पर ही' सहस्रों प्रकार की अपूर्व सम्पत्ि प्राप्त करते हुए (क्रियाविशेपण) कदाचित् मैं गए समूह (प्रथमनिवह) के मध्य आपकी कृपा से उचित रचिवाला होकर आनन्दित (नन्दिता- न्द+सृच) हो, जाे अथवा मेरी नन्दी नामक मसाधिपरूपता (नन्दिन्+तल्) सिद्ध हो जाय ॥३७४॥ प्रभा-यहाँ 'नन्द +तृच्' तथा 'नन्दिन्-तल्' दोनों का एक रूप हो जाता। हैअतः 'तृच्' तथा 'तल्' प्रत्यय का श्लेप है, इमी प्रकार, स्याम्+नन्दिता' तथा 'स्यात्+नन्दिता' में उत्तमपुरुप तथा अन्यपुरप (प्रथम पुरुष) का दलेप है। - [८. विभक्ति-श्लेष]-(शिव के प्रति अ्रथवा पुत्र के प्रति वस्तु को उकि) शिव-पक्ष में-'हे शिव (हर), आ्रप सबके सवत्य हैं, आप जन्ममरसारूपी संसार (भव) के विनाश में तत्पर हैं (मोक्षप्रद है); इसीलिए आ्रप नीति के अनूकूल तथा उपकार-हेतु, शरीर-स्यिति को प्राप्त होते हैं (सपतार घारस, करते हैं)।' पुत्र-पक्ष में'हे पुत्र तू सब जनों का सर्वस्व हदसा कर से, तू मितिच्छेद में तत्वर हो (मय) किसी के प्रति उपकार करना छोड़ दे (नय दूरीफुर) दूसरों को कष्टवायक (आयासि) जीविका बना ले (तनु=विस्तारय)।'[यहाँ 'हर' इत्यादि पद सज्ञा (सुबन्त) और किया (तिङ्वन्त) दोनों है, इस प्रकार सुय् तथा तिड् यिर्भत्ति का इनेप है] 1।३७५।।
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नवम उल्लास:
(१२०) भेदाभावात्प्रकृत्यादेर्भेदोऽपि नवमो भवेत। नवमोऽपीत्यपिर्भिन्नक्रमः । उदाहरएम- योऽसकृत्परगोत्राएं पक्षच्छेदकणक्षमः । शतकोटिदतां विभ्रद्विबुघेन्द्रः स राजते ॥३७६।। अत्र प्रकरणदिनियमाभावात् द्वावप्यर्था वाच्यौ।
अनुवाद-[६. अ्रभङ्ग-श्लेथ]-उपयुक्त (आठ प्रकार का) प्रकृति भादि का भेद न होने पर भी (जहाँ शब्द का अनेक अर्य में तात्पर्य होता है वहाँ क्लेष का) नवम प्रकार भी होता है। (१२०) (कारिका में) 'नवमोऽपि' (यह अ्न्वय है) अर्थात् नवां भी भेद होता है। उदाहरस है-[राज-पक्ष में]-'जो राजा बारबार शत्रुवंश् के सहायकों (पक्ष) के विनाश में समर्थ है, शतकोटि-दानशोलता को धारण करता है, वह पण्डितथ एठ राजा शोभायमान है।' [इन्द्र-पक्ष]-'जो इन्द्र श्रष्ठ पवंतों (परगोत) के क्षस भर में ही पक्ष-छेद में समर्थ है, शतकोटि अर्थात् वञ्त्र के द्वारा प्रसुर विनाश (शतकोटि- ना दति सण्डयति इति शतफोटिदः तस्य भावः) करने वाला है; वह देवेन्द्र शोभाय- मान है' ॥३७६।। यहाँ प्रकरण आदि द्वारा (अ्ररथं का) नियम न होने से दोनों भ्यं ही वाच्य हैं।. प्रभा-ऊपर 'वर्ण-पद' इत्यादि आठ प्रकार के सभङ्ग-क्लेप, का निरूपण किया गया है। उनके भतिरिक्त इलेप का नवम भेद भी होता है, जो अ्रभङ्ट-श्लेप है। इसे अ्रभङ्टगश्लेप इस आधार पर कहा जाता है कि इसके लिये पदों को विविध प्रमों (प्रकृति, प्रत्यय आदि) में तोड़ने की आवश्यकता नहीं होती। उपयुंक्त शाठ प्रकारों में पद-भङ्ग की आवश्यकता पड़ती है अ्तः वे सभज्ज-श्लेप हैं। 'योऽसवृत्' इत्यादि उदाहरण में पद-भङ्ग के बिना ही श्लेप है अ्रवः अ्रभङ्ग-दलेप है, किन्तु यहां भी 'शतकोटिदावृता' अर्थ में (द'-दति या ददाति) प्रकृतिवतेप तथा, प्रत्ययश्लेप (सभङ्ग) ही है। यहाँ 'परगोन' आदि शब्द अनेकार्थक है और उनके एकार्थ-नियामक प्रकरस आादि का अभाव है इसलिये दोनों (राजा, इन्द्र) अ्ररथं वाच्य ही हैं तथा भद्रात्मनः इत्यादि (उदाहरण १२) के समान द्वितीयार्थ की हप्टि से इसे ध्वनिकाव्य नहीं कहा जा सकता, 'उपमा' की ब्यङयता की दृष्टि से अवश्य इसे 'ध्वनि' कहा जा सकता है। अभिप्राय यह है कि-(१) अनेकार्थक पदो के प्रयोग में जहाँ तात्पर्य- ग्राहक प्रकरणादिक दोनों भ्र्ररथों में (युगपत) होते हैं, अथवा नही होते, वहाँ स्लेप अलद्वार है। (२) जहाँ प्रकरणादि कम से उपस्थित होते हैं; वहाँ आ्रवृत्ति कही जाती: है; किन्तु (३) जहाँ प्रकशादि के द्वारा एक अ्रर्थ मे शब्द का नियन्नस हो जाता है
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४५० ] काव्यप्रकाश:
ननु सवरितादिगुएभेदादू भिन्नप्रयत्नोच्चारय्य्रीणां तद्भावाद्भिन्न- प्रयत्नोच्चार्याणां च शब्दानां चन्घेडलङ्कारान्तरप्रतिभोतपत्तिहेतुः शब्दश्ले- पोडर्थेश्लेपश्चेति द्विविधोऽप्यर्थालक्कारमध्ये परिगसितोऽन्यैरिति कथमयं
वहां द्वितीय अर्थ की प्रतीति व्यञ्जना (ध्वनि) का विषय है। शब्दश्लेष और अरथश्लेप का भेद प्राचीन आचार्य भामह ने व्लेप को अर्थालङ्वार ही माना था।, उद्भट ने भी काव्यालङ्कार सार-संग्रह में शलेप को अर्थालक्कारों में रक्खा किन्तु इमके दो भेद किये-अर्थश्लेप और शब्दश्लेप जो कमनः उपयुक्त अ्रभन्ट-श्लेप और सभङ्ग-श्लेप के समान ही हैं। किन्तु मम्मट ने श्लेप को शब्दालद्दार और अर्थालद्गार दोनों माना है। उन्होंने उपर्युक्त सभङ्ग-व्लेप और अ्भज्त-प्लेप को शन्द-श्लेप (शब्दालङ्वार) कहा और इससे पृथक अर्य-इ्लेप का दरम उल्लाम में अपलिद्दार के रूप में निरुपए किया। मम्मट के इस मन्तव्य में उद्भट के अनुयायियों की ओोर से निम्न शंका की जाती है- अनुवाद-(शङ्दा) (प) स्वरित (उदात्त, अनुदात) आदि स्वर (गुए) का भेद होने पर भिन्न-भिन्न प्रयत्नों (विवृत, संवृत्त आादि) से उच्चारस योग्य तथा उस (स्वरित आादि) का भेद न होने पर एक हो प्रकार के प्रयत्नों द्वारा उच्चरित शब्दों को रचना में (बन्धे) शब्द-कलेप' ('पृथुफातस्वर आदि ३७०) तथा धर्य-श्लेष ('योऽसकृत्' मदि ३७६) दोनों ही अ्न्य (उपमा आदि) अलद्धार की प्रतिभा मात्र (पभास) के उत्पादक हैं, इसलिये अ्रन्म आाचार्यो (उङ्भट आदि) ने दोनों को ही अर्थातद्गारों के मध्य में गिना है फिर यह (अभल्त श्लेय) शव्दालद्वार कसे है? 1 प्रभा-पूर्वपक्षी का अभिप्राय यह है कि पदों में दो प्रकार का दलेय होता है-समङ्ज तथा प्रभङ्ग। 'पृथुकार्तस्वर' आदि में सभङ्ग श्लेप है; बपोंकि यहा पृथुकातस्वरस्य पात्रम्' अरथवा 'पृथुकानाम् आ्रतंस्वरस्य पात्रम्' यह पदभज्त होता है। अमङ्ज-शनेप तो 'योऽसकृत्' इत्यादि में है; कयोंकि यहाँ दोनों पक्षों में पद एक रूप ही रहता है। समङ् स्लेप में भिन्न-भिन्न स्वर वाले पद होते हैं पतः वे विजातीय होते है; किन्तु उच्चारण की समानता के कारण उनमें एकरूपता का प्रतीति होती है। वहाँ जतुकाष्ठन्याय से भिन्न-भिन्न भयों के बोषक दो शब्द चिंपके से (श्लिष्ट) रहते हैं। अतः इसे शन्द-दलेष कह दिया जाता है। प्रभङ्ग इलेप में तो शब्दों की भिन्नता नहीं होती अपितु भर्थों की ही भिन्नता होती है। वहीँ एकवुन्तगतफलद्वयवत्' (एक डंठल पर लगे दो फर्नों के समान) दो भर्य
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नवम उल्नासः ४५१
उच्यते-इह दोपगुणालद्वाराणां शब्दार्थगतत्वेन यो विभाग: सः अन्वयव्यतिरेकाभ्यामेव व्यवतिष्ठते। तथा हि -- कश्टत्वादिगाढत्वाद्यनुपा- साद्य: व्यर्थत्वादिपान्याद्य पमाद्यस्तभ्वाव-तद्भावानुविधायित्वादेव श- न्दार्थगतत्वेन व्यवस्थाप्यन्ते।
ही श्लिप्ट होते हैं। अतः यह स्पष्ट ही अर्थ-श्लेप है। दूसरी बात यह है कि इस उभयविघ ्लेप के स्थल में अवश्य ही उपमा आदि कोई अन्य अलद्कार होता है प्रतः यह अन्य अलङ्कारों का वाघक है और यह प्रकट करता है कि दलेप के होने पर वे (अन्य अलद्दार) अलङ्गाराभास मात्र है तथा अर्थश्लष ही विशेप अलक्कार है।. तीसरी बात यह है कि दोनों प्रकार का इ्लेप अरथविक्ष है अत. अर्थालड्वार ही है। इसी हेतु इन दोनों की अर्थालङ्वार में गणना करनी चाहिये। संक्षेप में पूर्व पक्ष के तोन अंश हैं-(१) अभङ्ग श्लेप अर्थालद्गार है, (२) रलेप उपमा आदि अलद्दारों का वाघक है। (३) सभङ्ग तथा अ्भङ्ग श्लेप दोनों ही अर्थालङ्कार हैं। टिप्पली-(i) ऊपर की शका उद्भट की निम्न उक्ति का निप्कर्ष है- एकजयत्नोच्चार्पाएं तच्छायां चैव बिभ्रताम्। स्वरितादिगएं भिन्नर्बन्धः स्लिप्ट इहोच्यते।। प्लङ्गारान्तरगतां प्रतिभां जनयत्पदः । 4 द्विविधरर्थशब्दोक्तिविशिष्टं तत्परतीयताम् ।। (ii) रय्यक ने भो (अलद्धार सर्वस्त्र में) इलेप को अ्रर्ालद्वारों में खसा है और इसके तीन भेद किये हैं-शब्द-श्लेप (=समङ्ग) अय-इलेप (-अ्रभङ्ग) और उभयद्लेप। कुछ व्याख्याकारों का कथन है कि उपयु क्त शंका में य्यक के मत की ओर संकेत किया गया है। किन्तु यह ठीक नही, ययोकि यह निश्चित सा ही है कि रुय्यक मम्मट से भर्वाचीन हैं। (iii) वाद में विश्वनाथ ने भी मम्मट के समान श्लप को शव्दारङ्टार और अर्थालद्वार दोनों ही माना है। अनुवाद-उत्तर यह है (उच्यते) कि [१अभस्ट श्लेप शब्दालद्गार है] यहां (काव्य में) दोप, गुख तथा अलद्धारों का शन्वगत तथा पर्थगत रूप में जो विभाग होता है, अन्वय तथा व्यतिरेक से ही उसकी व्यवस्था होती है; जैसे कि- 'कष्टत्व' आदि (दोप), 'गाढवन्धत्व' आादि (प्रोजगुसाय्यञ्जक) एवं 'ध्रनुप्रास' आरादि (पलङ्गार) शब्द के भाव (विद्यमानता=पन्वय) और अभाव (-व्यतिरेक) का धनुसरण करने के फारस (तद्भावतदभावानुविधायित्वात्) शब्दगत है। इसी प्रकार 'व्यर्यत्व' आदि (दोय) 'प्रोदि' आ्रादि (धर्य का झोजगुस) 'उपमा' आादि (पसद्वार) प्ररपं के भाव और अभाव का अनुसरण करने के कारण प्ररथंगत हैं-इस प्रफार व्य. यस्यित किए जाते हैं। जैसे-
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४५२ ] काव्यप्रकान:
स्वयं च पल्लवाताम्रभास्वतंकरविराजिता। इत्यभङ्ग:, प्रभातसन्ध्येवास्वापफललुच्घेहितप्रदा ॥३७७।। इति संभङ्ग:, इति द्वावपि शब्दकसमाश्रयाविति द्वयोरपि शब्दश्लेपत्वमुपपन्नम् न- त्वाद्यस्यार्थश्लेपत्वम्। अर्थश्लेषस्य तु स विषयः यत्र शब्दपरिवत्त नेऽपि न. श्लेपत्वखएडना। यथा-
शद्दो सुसदशी वृत्तिस्तुलाकोटे: खलस्य च॥३७म॥
'पावती स्वयं भी किसलय-सद्श कुछ लालिमायुक्त तथा वौप्तिमान् हस्तवंम से शोभायमान प्राभातिकी सध्या के समान दुर्लभ (सुखेन आप्यते इति स्वापं सुलभं न स्वापम् अ्र्स्वापम्) फल अर्थात् मोक्ष के इच्छुक जनों को वाञ्छित.फल प्रवान, करने वाली ्थी ॥३७७॥ यहाँ पूर्वार्ध में अरभङ्ट्श्लेप है-[पल्लव के समान कुछ लाल भास्वत्करं: अर्थात् सूयं की किरणों से शोभित प्रभात-सन्ध्या] तथा उत्तरार्ध में सभङ्ग-श्लेष है- [पस्वाप पर्यात् जागरण के फल स्नान आदि के इच्छक जनों की हितप्रदा] इस प्रकार दोनों (सभङ्ग तथा 'अभङ्ट श्लेष) ही (अन्वय व्यतिरेफ से) केवल शब्द के ही आश्रित हैं, इसलिये दोनों का शब्द-श्लेष होना ही युक्ियुक्त है, ऐसा नहीं कि प्रथम अर्थात् प्रभङ्ग (पल्लवागाम्र आदि) श्रर्थ-श्लेय हो। अ्र्यं-इ्लेप का वियय (क्षेत्र) तो वहाँ है जहां शब्द का परिवर्तन किये जाने पर भी श्लेष-भङ्ग नहीं होता (धर्थात् बना रहता है); जैसे- 'पोड़े (स्तोक=शल्प) ही से उन्नति (ऊपर उठना, गहंकार) को प्राप्त होते हैं तथा थोड़े ही से पधोगति (नोचे भुकना, चरखों में गिरना) को प्राप्त होते हैं शहो ! तुलाकोटि (तराजू की डण्डी) तथा दुष्ट व्यक्ति की वृत्ि (व्यापार) तुल्य ही है॥३७=॥ प्रभा-(१) 'प्रभङ्ग शलेव' अर्यालङ्गार है, पूवपक्षी की इस मान्यता का सण्डन करते हुए आचार्य मम्मट कहते हैं कि जिस शब्द या श्रर्थ के होने पर ही जो दोप गुए तथा अलद्वार होते हैं (अन्वय) तथा न होने पर नहीं होते (व्यतिरेक) उस हो शब्द या अर्थ के आथित वे माने जाते हैं, अर्यान् जो शब्द का (अन्यव्यतिरेक से) भनुसरण करते हैं, वे वब्दगत और जो सर्थ का अनुगरण करते हैं, वे भथंगत है; यह व्यवस्था है। इसी के आधार पर प्राचीनों की यह मान्यता है कि शन्द-परिदृत्य- सह शब्दगत हैं तथा सब्द-परिवृतिसह अर्थगत है। इम प्रकार धुविषटृत्व सादि दोप, गाढत्व आदि वामनोक्त शब्दरगुण तथा अनुपास यदि अनङ्गार शम्द का
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नयमं उल्लास: 4414
न चायमुपमाप्रतिभोत्पत्तिहेतुः श्लेपः अपि तु श्लेषप्रतिभोत्पत्तिहेतु- रुपमा। तथा हि-यथा 'कमलमिव मुखं मनोज्मेतत्कचतितराम्' इस्यादौ गुणसाम्ये क्रियासाम्ये उभयसाम्ये वा उपमा तथा- 'सकलकलं पुरमेतज्जातं सम्प्रति सुघांशुबिम्बमिव'। इत्यादी शब्दमात्रसाम्येऽपि सा युक्तैव। तथा ह्य क्त रुद्रटेन-
अनुवतन करते है अतः ये शब्दगत हैं। और, व्यर्यत्व आादि दोप, वामनोक्त अर्थ- प्रोढ़ता एवं 'उपमा' आदि अलद्धार अर्थ का अनुवर्तन करते हैं अतः ये अर्थगत है। उपयुक्त रीति से ही उभयश्लेय के उदाहरण रूप मे प्रस्तुत 'स्व्यं न' इत्यादि 'पद्य के उत्तरार्ध के समान पूर्वाद्ध' मे भी प्रयुक्त शब्दों के रहने पर ही श्लेप रहता है अन्यथा नही। उदाहरसार्थ यदि 'भास्वत्' शब्द के स्थान पर 'सूर्य' शब्द का प्रयोग किया जाये तो श्लेप न रहेगा; क्योकि यहाँ दोनों पदों में (भास्वत्, अस्वाप) परिवृत्त्यसह शब्दों के कारण श्ले होता है अतः सभयत्र शब्द-्लेप ही है; पर्थात् अभन्ट्ग-इलेप भी अरथश्लेप ही है। इसका यह अरभिप्राय नहीं कि अर्थश्लेप कही होता ही नहीं। 'स्तोकेन' इत्यादि उदाहरस में 'स्तोकेनोन्नतिमायाति' के स्थान पर 'अल्पेनोदेकमायाति' रस देने पर भी श्लेप-भङ्ग नहीं होता। इस प्रकार का श्लेप शब्द-परिवृत्तिसह है तथा अर्थाश्रित है प्रतः यह अरथ-श्लेप होता है। इस प्रकार मम्मट का मन्तव्य है कि शव्दालङ्वार और अर्थालङ्कार की व्यवस्था अन्वय-व्यतिरेक से होती है। उपयुक्त अभङ्ग-व्लेद वब्दाश्रित है; शब्दों का परिवर्तन कर देने पर यहाँ श्लेप की स्थिति ही नही रहती (शब्दपरिवृतत्यसहत्व) भतः यह शब्दालङ्कार ही है। अनुवाद्-[२. इलेप उपमा आदि का बाधक नहीं] और यहाँ (पल्लवा- ताम्र परादि में) श्लेप उपमा के आभास की प्रतोति (प्रतिभा) का उत्पादक नहीं है, भपितु उपमा ही श्लेष को आभास प्रतीति का उत्पादक है; क्योंकि जिस प्रकार फमल ;सवुश्ष मनोहर यह मुस अत्यधक दीप्त हो रहा है' इत्मादि में (मनोज्ञता) गुए-साम्य, (उद्दोप्त होना) किया-साम्य अथवा दोनों को समता के कारस उपमा होती है, उसी प्रकार 'सफलफुल (नगर पक्ष में कलकल शब्द सहित, चन्द्र पक्ष में सकलकनाम्रों से पूएं) यह नगर इस समय चन्द्र-मण्डल के समान हो गया है।' इत्यादि में शब्वमात्र : की समता होंन पर उपमा होना उचित ही है। जंसा कि (फाव्यालद्गार में) रुद्रट ने भी कहा है-
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४५६ काव्यंप्रकारी:।
आदाय चापमचलं कृत्वाऽहीनं गुएं विषमदृष्टि:। - यश्चित्रमच्युतशरो लक्ष्यमभाङः क्षीन्नमस्तरमै ।।३८३।।
तम् न तु श्लेपत्वम्। है और दिवस उसके पुरसंसर (अधरगामी या सम्मुख है; तयापि समागम (मिलन या स्त्री पुरुष संगम) नहीं होता; यहो वैब की गति विचिन्न है' ॥३८२॥ [यहा अ्रमिवा शक्ति दिन तथा सन्ध्या अरथ में नियन्न्नित हो गई है अतएव दो ध्रर्यों में अ्रन्वय बोध नहीं होता तथा शलेप नहीं; फिन्तु श्लिष्ट विशेषणों की महिमा से नायक की प्रतीति होती है. तथा समासीकि अनद्धार है। (घ) उस (शिव या धनुर्धारी) फो नमस्कार है, जो 'विपमद्प्टि (प्रिलोचन, वियमा अर्थात लक्ष्य से अन्यन्न है दृष्टि जिसकी) है, जिसने घचल (मन्दराचलरूप,' निष्किय) धनुष को लेकर म्रहोन [सर्पराज वासुकि-म्रहि+इनम्; या होन=जीएं, निकृष्ट] को प्रत्यञ्चा (गुए) बनाकर 'अच्युतशर'[विप्स ही है वा जिसका, नहीं छूटा (च्युत) है बस जिसका] होकर सक्ष्य (त्रिपुरासुरस्प, सहसयोद्वारप) को आ्रश्च्यंजनक रूप से छिन भिस्न फर दिया'। [यहाँ विरोधाभास अलद्धार ही प्रधान है और द्लेप उसका अङ्गमात्र है अतः विरोधाभास अलद्धार शलेप।प्रतिभोत्पत्तिहेतु है।।३३। इत्यादि पद्यों में कमेश: (फ) एकदेशवियर्ती रूपक, (स) श्लेयमूलक व्यतिरेफ, (ग) समासोक्ति और (घ). विरोध अलङ्फार मानना ही उचित है, न कि इ्लेपालड्कार। ·- प्रभा-(१) पूर्वपक्षी का कथन था कि श्लेप अन्य श्राङ्कारों की आ्भास 'रूप में प्रतीति'का हेतु (अलङ्कारान्तरत्रतिभोत्पत्ति हेतु) है अर्थात् यह उपमा श्रादि अलद्वारों का बाधक है; क्योंकि क्लेप निरवकाश है-जहाँ शलेप होता है वहाँ कोई न कोई अन्य अलद्दार अवश्य होता है, अन्य. अलङ्कारों के बिना श्लेप नहीं रहता (निरवकाशाः हि विघयः सावकाशान् विघीन् वाघन्ते), उपमा आदि ऐसे स्थलों में सावकाश हैं जहाँ इलेप का प्रसङ्ग नही अतएव जहाँ उपमा आदि तथा दलेप दोनों का प्रसङ्ग है वहां वस्तुतः श्लेप अलद्वार होता है, भन्य-उपमा आदि, को तो आपाततः प्रतीति (आभास मात्र) ही हुआ करती है। जैसे-'स्वयं च पल्लवाताम्र:' हत्यादि (३७७) में। इसका सण्डन करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं-'न चायं प्लेपत्वम्'। इस सण्डन में तीन युक्तियां ह-(१) वम्तुतः पल्लवाताम्र' इत्यादि में उपमा है इनेप नहीं, (२) इलेप से असंकीएां विषय में उपमा सावकाश नहीं; (३) उपमा आदि पलद्वार ही पलप के वाधक हैं। भाव यह है कि (१)पल्लवाताम्न इत्यादि में वस्तुवः उपमा अलद्धार ही है, इलेप की तो आभासमाय प्रतीति हो रही है। जिस प्रकार :गुससाम्य तथा वियासाम्य होने पर उपमा होती है इमी प्रकार दाव्दमान् की समता में नी (सकल०) उपमा होती है। आचार्य स्द्रट की 'सफृट0' इत्यादि उ से भी
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नवमं उल्लास: i ४५७
शब्दश्लेप इति चोच्यते अर्थालङ्कारमध्ये च लद्गते इति कोष्यं नयः। किं च वैचित्र्यमलङ्गार इति य एव कविप्रतिभासंरम्भगोचरस्तत्रैव विचित्रता, इस वात की पुष्टि हो रही है।अतः 'पल्लवाताम्र०' इत्यादि उदाहरण से पूर्व- पक्षी के कथन का समर्थन नही होता। (२) जो यह विचार है कि 'कमलमिव मुखम् आदि में जहाँ साधारण धर्मं (मनोज्ञ आदि) का प्रयोग नहीं होता वहाँ इलेप का प्रसङ्ग नही तथा उपमा सावकाश है; इसीलिए जहाँ दोनों का प्रसङ्ग होता है वहाँ निरवकाश होने के कार श्लेप ' उपमा आदि का बाधक हो जाता है। यह भी उचित नही; क्योंकि 'कमलमिव मनोजं मुखम्' इत्यादि पूर्णोपमा तो निरवकाश ही है। उसके समस्त स्थलों मे तो श्लेप का प्रसङ्ग है ही, फिर श्लेप निरवकाश होने के कारण उपमा का वाधक कैसे हो सकता है ? साथ ही श्लेप भी 'देव त्वमेव' इत्यादि स्थल में सावकाश है ही; इसीलिए श्लेप तथा उपमादि का बाध्यवाघक भाव नहीं' अत 'स्वयं च पल्लवाताम्र' इत्यादि में दोनों का संकर ही हो सकता है, वाघ्यबाघक भाव नही। वस्तुतः तो 'प्राधान्येन व्यपदेशाः भवन्ति' इस न्याय (उपपति) के अनुसार यहाँ 'उपमा' ही है; क्योकि वही प्रधान है तथा इ्लेप उसका निर्वाहकमात्र है। इस पर भी यदि श्प श्लेश को उपमा का बाघक मानेगें तो पूर्णोपमा का कही विपय ही न रहेगा। (३) केवल उपमा ही श्लेप की वाघक नहीं है अन्य रूपक आदि अलद्दार भी श्लेष के वाघक होते हैं जैसे कि 'अबिन्दुसुन्दरी' इत्यादि मे विरोधालङ्कार 'भी श्लेप का बाधक है। इसी प्रकार, सद्वंक्ष' इत्यादि में रूपक आदि श्लेप के वाधक होते हैं। इन स्थलों पर अ्न्य अलद्दार की ही प्रवानता है। श्लेप की तो आभासमान्र प्रतीति होती है। और जिस प्रकार विरोधाभास को अलद्दार भाना जाता है विरोध को नहीं (क्योंकि वास्तविक विरोध तो दीप है); इसी प्रकार 'श्लेपाभास' को अलद्धार नहीं माना जा सकता; कयोंकि श्लेप तो वास्तविक रूप मे होता हुआ ही काव्य में उत्कर्पाघायक है; अतः विरोवाभास आदि के स्थल पर वास्तविक श्लेप का ही पभाव है; उसकी बाधकता की तो बात ही कया? टिप्पखी-(i) उद्भट ने 'स्वयं च पल्लवाताम्र इत्यादि में उपमा प्रतिभो- त्पतिहेतु श्लेप माना था, उसका खण्डन ही यहाँ किया गया है। (ii) द्लेष श्रन्य मलद्ारों की आभासमात्र प्रतीति का हेतु है, यह कथन उद्धट की इस उक्ि के पाधार पर है-अलङ्कारान्तरगतां प्रतिभां जनयत् पर्दः। आगेचल कर खव्यक ने. इ्लेंप को अन्य अलद्धारों का अपवाद (वाघक) बतलाया है 'तेनालडकारान्तरविविक्तो .नास्य विपयोऽस्तीति सर्वालङ्कारापवादोऽयम् [श्लेपः] इति स्यितम्' [अलद्वार- सर्वस्व पृ० १३२]। अनुवाद-[३. शब्दश्लेव को अर्थश्लेष कैसे कहा जा सकता है ? ।] क-शब्दश्लेप तो कहा जाय और पर्थालद्धारों के मध्य में मसना की जाय यह कौन.
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४६० i कांव्यंप्रकाशे:
मारारिशकरामेभमुखैरासाररंइसा । सारार्वस्तवा नित्यं तदार्तिहुरणक्षमा ॥३८४।। माता. नतानां सक्ट्टः श्रियां चाधितसम्भ्रमा। मान्याज्य सीमा रामाणां शं मे दिश्यादुमादिमा॥३८५॥ (सड्गबन्घ) नहीं होता तथापि कवि के रचना-कौशल को प्रंकटकरता है और सामाजिक के हृदय में चमत्काराभास का जनक होता है तथा अद्भुत रस का उपकारक भी हो सकता है। रसिकों के लिये आवाञ्छनीय होने के कारण ही माचार्य मम्मट ने इसका विस्तार से निरूपण नहीं किया; यद्यपि उनके पूर्वदर्ती रु्द्रेट आदि ने इसका विस्तारपूर्यक विवेचन किया था। अनुवाद्-(खड्गबन्ध आदि के क्रमशः) उदाहरण है :- (१. खड्गबन्ध) शिव(भारारि), इन्द्र राम, गएेश (इनमुस) इन बेयों ने शब्द-प्रवाह के वेग से (पासार-रंहसा) जिसकी अत्यधिक रूप से (सार) स्तुति पारम्भ फी है; जो नित्य उन (सिव आादि) की पीड़ा-हरस में समर्य है, विनयशील जनों की (वत्सला) माता है, विसूतियों का मिलन-स्थान है, भयों का बाघ करने घाली है और जो माननीमा देवी नारी जाति की पराकाचठा (सर्योत्कृष्ट) है।' संसार की आदिसूत (आदिमा) वह पार्वती (उभा) मुझे फल्यास प्रवान करे। 1 प्रभा-यहाँइलोक में जो शब्द आये हैं उनका निर्दिष्ट प्रकार से विन्यास करने पर खडग आदि की आकृति बन चाती है। उस वर्एं-विन्यास का रुंद्ट मे काय्यालद्कार तथा काव्य-प्रकाश की प्रदोप-उद्योत आदि टीकाओों में विस्तृत विवेचन किया गया है। (१) सड्गबन्ध
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रा रिश क्र ग मे भ मुखे राखारर दर बध स्त वा नित्य तदातिह रण ६
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नवम उल्लास: [ ४६१
सरला बहुलारम्भतरलालिवलारवा। वारलावहुलामन्दकरलावहलामला ॥३८६॥ (गुरजबन्धः) भासते प्रतिभासार, रसाभाताहताविभा। भावितात्मा शुभा वादे देवाभा वत ते सभा॥३८७॥ (पद्मबन्धः)
(२. मुरजबन्ध) जिसमें बहुत से कार्यों (भ्रमस, रसपान आदि) से चञ्चल (बहुलारम्भतरल) भ्रमर-समूह (अरलिवल=भ्रमरसन्य) का फोलाहल (गुञ्जन) है बहुत हुंसनियाँ हैं नपगए अथवा राजकर्मचारीगए (करला := करं लान्तिगृह सन्ति इति) उद्योगशील (प्रमन्द) हैं, जो कृप्णपक्ष (बहुल) में भी (तारों के प्रकाश से) निर्गल रहती ह तथा सरला (मेघादि को कुटिलला से रहित) है वह शरद् ऋतु सर्वोत्कृष्ट है-('शरद् जयति' यह अन्वय हूँ) ॥३८६॥
(२) मुरजबन्ध
ला न
त ला
वा ला ब ला
ला म ला 11
(३. पद्मबन्ध) 'हे बुद्धि में थष्ठ (प्रतिभासार) नप, अ्रहो (वत) ! स्रापकी यह देवतुत्य सभा शोभायमान है, जिसमें प्रीतिरुप प्रथवा शृद्धारादि रस शोमित हैं सर्यात् जो रसिकजन से युक्त हैं, जिसकी दोप्ति भप्रतिहृत है अर्यात् जो तेजस्वी जनों से युक्त है, जिसमें आत्मा या परमात्मा का निर्सय किया जाता हूँ (भावितः निर्णोतः मात्मा यस्याम) अर्थात् आत्मज्ञानियों से युक्त है तया जो तत्वकथा (वादे) में निपुणा (शुभा) है ।३८७॥
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४६० कांव्यप्रकांशे:
मारारिशकरामे भमुखैरा सारंदसा। सारार्घरतवा नित्यं तदातिहरशक्षमा ॥३८४॥ माता नतानां सव्ृट्ट: श्रियां वाधितसम्भ्रमा। मान्याज्य सीमा रामाखां शं मे दिश्यादुमादिमा ॥३८५॥ (सड्गबन्य) नहीं होता तथापि कवि के रचना-कौशल को प्रकट करता है और सामाजिकं के हृदय में चमत्काराभास का जनक होता है तया अद्भुत रस का उपकारक भी हो सकता है। रसिकों के लिये आवान्छनीय होने के कारण ही माचार्य मम्मट ने इसका विस्तार से निरूपण नहीं किया; यद्यपि उनके पूर्ववर्ती स्द्रट मादि ने इसका विस्तारपूर्वक विवेचन किया था। अनुवाद्-(सड्गबन्ध परादि के कमशः) उदाहरसा हैं :- (१. सड्गबन्ध) शिव (मारारि), इन्द्र, राम, मसेश (इनमुस) इम वेवों ने शब्द-प्रवाह के वेग से (आसार-रंहुसा) जिसकी अ्त्यधिक रूप से (सार) स्तुति प्रारम्भ की है; जो नित्य उन (शिव आदि) को पीड़ा-हरण में समर्थ है, विनयशील जनों की (वत्सला) माता है, विसूतियों का मिलन-स्थान है, भपों: का बाघ करने घाली है और जो माननीया देवी नारी जाति की पराकाटठा (सर्वोतकृष्ट) है।' संसार को आदिभूत (आादिमा) वह पार्वती (उमा) मुझे फल्यासा प्रदान करे।
प्रभा-यहां कलोक में जो शब्द आये हैं उनका निर्दिष्ट प्रकार से विन्यास करने पर सड़ग आदि की आाकृति बन चाती है। उस वरां-विन्यास का सुद्रट के काव्यालद्दार तथा काव्य-प्रकाश की प्रदीप-उद्योत यादि टीकामों में विस्तृत विवेचन किया गया है। (१) सड्गबन्ध
ररिशकगमै भ मुर रासाररह तान ताना संघ
सा Ick रार वध स्त वा नित्य तदातिह रणक्ष 1
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नवम उल्लास: [ ४६१
सरला बहुलारम्भतरलालिबलारवा। वारलाबहुलामन्दकरलावहुलामला।३६६॥ (मुरजबन्धः) भासते प्रतिभासार, रसाभाताइताविभा। +
भावितात्मा शुभा वादे देवाभा वत ते सभा॥३८७॥ (पद्मबन्धः)
(२. मुरजबन्ध) जिसमें बहुत से फायों (भ्रमण, रसपान आादि) से चञ्चल (बहुलारम्भतरल) भ्रमर-समूह (प्रलिबल=भ्रमरसैन्य) का कोलाहल (गुञ्जन) हं बहुत हंसनियाँ हैं नृपगए अ्रथवा राजकर्मचारीगए (करला :- करं लान्तिगृह न्ति इति) उद्योगशील (श्रमन्द) हैं, जो कृष्णपक्ष (बहुल) में भी (तारों के प्रकाश से) निर्गल रहती है तथा सरला (मेघादि को कुटिलता से रहित) हँ यह शरद् ऋतु सर्वोत्कृष्ट है-('शरद् जयति' यह अन्वय है) ॥३८६॥
(२) मुरजबन्ध
स ला
र वा।
र ला
ला 3-
(३. पद्मबन्ध) 'हे बुद्धि में श्रष्ठ (प्रतिभासार) नूप, श्रहो (वत) ! आापकी। यह देवतुल्य सभा शोभाममान है, जिसमें प्रीतिरूप परथवा शृद्धारादि रस सोभित हैं पर्थात् जो रसिकजन से युक्त हैं, जिसकी दौप्ति प्रपतिहत है पर्यात् जो तेजस्वी जनों ते युक्त है, जिसमें आात्मा या परमात्मा का निर्राय किया जाता है (भावितः निर्योतः चात्मा मंस्याम्) अर्थात् आ्रत्मजञानियों से युक्त है तथा जो तत्त्वंक्षा, (बाजे) में निपुए (धुना) हूँ।३८७॥
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४६२ J' काव्यप्रयाश:
रसासार, रसा सारसायताक्, चतायसा। सातावात, तवातासा रक्षतरत्वरत्वतकर।३म।। (सवतोभद्रम्)
(३) पद्मबत्व उत्तरादिक ईशानविदिक वायुविदिक़
लाा वादे बत तावि मा सते पूर्वेदिक प्रति
आम्रेयचिदिक नैऋतविदिक
(४. सर्वतोभत्र)-'हे पुथिवी में थ्रेट्रठ (रसासार), कमल के समान विशाल नेत्रों वाले (सारस -आापन-प्रक्), भजान (प्रवात) फो नष्द फरने वाले (सातं= नाशितम्), प्रत्यधिक दान बेने वाले (प्तक्षम् अनल्पं राति ददाति इति मतस्षर:) (४) सर्वतोभद्व
सा सा र र सा सा A
· सा, य ता क्ष का ता य सर
सा ता वा त चा वा सा
क्षT त हरव हतब नं दा र A
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नवम उल्लास: ४६३ 44
तीति न प्रदरश्यन्ते। सम्भविनोऽ्यन्ये प्रभदा: शक्तिमात्रपकाशका न तु काव्यरूपतां दध-
(१२२) पुनरुक्तवदाभासो विभिन्नाकारशब्दगा । एकार्थतेव भिन्नरूपसार्थकानर्थकशव्दनिष्ठमेकार्थत्वेन मुखे भासनं पुनरुत्तव- दोदाभासः । सच- (१२३) शब्दस्य सभङ्गाभङ्गरूप केवलशव्दनिष्ठः । उदाहरयम्- 1 अरिवधदेहशरीर: सहसा रथिसृततुरगपादातः। भाति सदानत्याग: स्थिरतायामवनितलतिलकः३८६॥। चकासत्यङ्गनारामा: कौतुकानन्दहेतवः। महाराज, आपके (तब) रक्षणा में (रक्षत-रक्षा करते हुए का) यह पृथ्वी (रसा) दुजनों को नष्ट करने वाली (क्षत. अयः शुभावह्विधिः येपां ते दुर्जना, तान् स्यति नाशं प्रापयति इति क्षतायसा) तथा (तु) क्षयरहित (प्रतासा) होवे ।३८८॥ (चित्र अलद्धार के) अ्न्य भेद प्रभेद भी हो सकते हैं, किन्तु वे केवल कवि की शक्ति मात्र को प्रकट करते हैं (नीरस तथा क्लिष्ट होने से) फाव्य-स्वरूप के प्रयोजक नहीं होते; इसलिए नहीं दिसाये गये हैं। अरनुवाद्-[६. पुनरुकवदाभास] भिन्न २ आ्कार (श्रानुपूर्वी या धसंग्रम) वाले शब्दों में एकार्थकता का अभास होना ही 'पुनरुकवदाभास' है॥१२२॥ अर्थात् भिन्न २ रूप वाले सार्थक और अ्नर्थक शब्दों में आपाततः (मुखे= ऊपरो दृष्टि से देखने पर) एकार्थकता की प्रतीति होना ही 'पुनरकवदाभास' (नामक शब्दालड्कार) है। औौर वह (कहीं)- (१) शब्दमाघ् का होता है। (११३) अपर्थात् फेवल (क) सभङ्ग औ्रौर (स) प्रभङ्ट रूप शब्द के आधित होता है। जैसे- (क) 'जो शय्रुविनाशिनी (धरिवघदा) चेप्टा (ईहा) घाले वाशायुक्त (शरिसः) बीरों को प्रेरित करने वाला (परिएः ईरयति प्रस्यति इति शरीरः) है, स्थिरता में पर्वततुल्य है, जिसके रयी लोगों ने शीघ्र ही (सहसा) प्वो तथा पदातियों (पंदल) फो भली नांति सम्बद्ध अर्थात् सुव्यवस्यित (पूत=सु+उतः सूता: सुप्ठ सवदाः) कर दिया है ऐसा पृथ्वीतल का भूपरास्प यह राजा अपनी नम्रता (नत्या) से रादा शोभायमान है।।३८६।। (स) उस राजा के पाश्चंवती (सेवक आदि) शोभायमान है। जो कि प्त- 1
नाओों के साथ विहार करने वाले (पर्थात् विरहसून्य) है, कोघुक भर्षात् चनलार
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४६४ ] काव्यप्रकाश:
तस्य राजः सुमनसो विदुधा: पाइर्ववर्तिनः ॥३६०। (१२४) तथा शब्दार्थयोरयम् ॥८६॥। उदाहरएम्-
तेजो धाम भह. पुथुमनसामिन्द्रो हरिर्जिप्णु:।।३६१॥ प्रदर्शन द्वारा (सबके) आनन्द का कारए हैं, श्रष्ठ मन वाले (सुमनसः) हैं तथा विशेष पण्डित हैं ॥३६०।। प्रभा-जहाँ वस्तुतः भिन्न रूप वाले और भिन्न धर्थ बाते शब्दों में एकार्थता का आाभास होता है वहां पुनरुक्तवदाभास नामक अलद्वार होता है मर्थात् वहाँ पुनर्शक्त सी प्रतीत होती है; किन्तु वस्तुतः होती नहीं। यह दो प्रकार का होता है- (१) शब्दमाघगत तथा (२) शब्दार्थंगत । शब्द मात्र में होने वाला भी दो प्रकार का होता है-(क) सभझ्त शब्दनिष्ठ और (स) अ्रभङ्ग शब्दनिष्ठ। (क) 'अरिवध' इत्यादि सभङ्गशब्निष्ठ पुनसतवदाभास असद्वार का उदाहरय है। यहाँ देह-शरीर, सार्गय-सुत और दान-त्याग दब्दों में आपाततः पुनरुक्ति प्रतीत होती है। वस्तुतः तो ये शब्द सभङ्ग (सखण्ड) हैं। दोनों शब्द ही पर्यायपरिवृत्ि सहन नहीं कर सपते अतएब यहाँ शब्दमानगत पुनरुक्तवदा- भास है। यहा देह तथा शरीर दोनों शब्द सार्थक है। सा रयि गूत, इन दोनों में प्रथम निरर्थंक है द्वितीय सार्थक है। सदा-नत्या +श्रगः में दान और तयाग दोनो शब्द ही निरर्बक हैं। (क) 'चकासति' इत्यादि अ्रभग्न शब्दनिष्ठ पुनरुकवदाभास का उदाहरण है। यहां पर अज्भना तथा रामा (स्त्रीवाची), कौतुक तथा धानन्द (गुसार्यक, सुमनस्, तथा विधुध (देशवाचक) सब्दों में आपावतः एकार्यकता का प्रभाम होता है। ये मङ्गना भादि शब्द अ्रभङ्ग या मसण्ड है तया सभी परिवृत्यमह हैं। 'प्रङ्ना' के स्थान पर 'महिला' आदि पब्दों का प्रयोग नहीं किया जा सकता; मपों- कि 'भङ्गना' विशेष प्रकार की महिला का वाबक है। (प्रयस्तानि पङ्गानि यासो ता पजुना:)। यहां सभी पब्द सार्थक हैं। 1 अनुवाद्-(शव्दायंगत)-औरर मह (पुनरकवदानात) रन तपा परथ दोनों के भाभित (उभयालड्कार) भी होता है (१२४)। उसका उवाहरए है- (सिह्यसन) यह सिंह, कश शरीर याला होकर ो सपरिमिति बस याला + (पजघन्यः) है, गजश्रष्ठों (करियुं्जर) के रुधिर मे उसके सीक नम रंगे (रक) हैं, यह तेज का प्राथम (धाम) ह, अपने तेज से (मह-) सगर्य (पृप) मन थालों का भी स्यामी (इन्द) हे तमा विजयशीस (निष्णु) हुँ।३६१।
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नवम उल्लास: ४६५
अत्रैकस्मिन् पदे परिवर्ततिते नालद्वार इति शब्दाश्रय अपररिंमस्तु परिवर्तितेऽपि स न हीयते इत्यथनिष्ठ इत्युभयालङ्वारोडयम्। इति काव्यप्रकाशे शव्दालङ्गारनिोयो नाम नवम उल्लासः ॥६।। यहाँ एक (तनु, फुञ्जर इत्यादि) पद का परिवर्तन कर देने पर अलद्धार नहीं रहता, इस हेतु यह शब्द-निष्ठ है। अन्य (चपुः, फरि आदि) शब्दों का परिवतन कर देने पर भी यह (अलद्गार बना ही रहता है) नष्ट नहीं होता इसलिए वह धर्थ- निष्ठ है-इस प्रकार यह पुनरक्तवदाभास उभयालङ्गार है। प्रभा-'तनु वपुः' इत्यादि शब्दाथगत पुनरुकवदाभास अलद्ार का उदाहरण है यहाँ तनु तथा वपुः (शरीरार्थक), करि-कुञ्जर (गजवाची), रुधिर-रक्त (शोमित वाचक), तेज-धाम-मह (तेज-अर्थ वाले) तथा इन्द्र-हरि-जिष्ु (देवेन्द्र वाचक) शब्दों में आपातत पुनरु्ति सी प्रतीत होती है। इस सूक्ति में कुछ (तनु, कुज्जर, रक्त, धाम, हरि तथा जिप्णु) शब्द परिवृत्यसह हैं तथा कुछ (वपुः, करि, रुचिर, इन्द्र) शब्द परिवृतिसह हैं। इस प्रकार शब्द और अर्थ दोनों पर आशित होने के कारए यह पुनरुक्तवदाभास नामक अलङ्वार उभयालद्वार (शब्दार्थनिष्ठ) है। उभया- तद्दार होने के कारण ही ग्रन्थकार ने इसका शब्दालङ्वारों तथा अर्थालद्वारों के बीच में निरूपण किया है। इस प्रकार काव्यप्रकाश में शब्दालक्कार-निर्सय नामक नवम उल्लास समाप्त होता है। ॥ इति नवम उल्लास: ।।
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ग्रथ दशम उल्लास: [अथलिद्वारनिर्एयात्मक:]
(१२५) साधर्म्यमुपमा भेदे
शब्दालद्वारों के निरुपण के अनन्तर अर्थाद्वारों का अवसर है अत एव यहाँ इनका निरूपण किया जाता है। अनुवाद-प्रघ प्रन्यकार पर्थालद्धारों का निस्पण करते हैं- प्रभा-अप्टम-उल्लास मे निरूपित अलद्दार-सामान्य के लक्षण से ही भर्था- लक्कार का स्वरूप भी स्पष्ट ही है, अत एव यहाँ अर्थालद्वार का स्वरप विवेचन नही किया गया अपि तु अर्थालद्टार के भेदों का निरुपणा किया जा रहा है। प्रदीप- कार ने आचार्य मम्मट के अ्रभिमत अर्थालद्धारों का संकसन किया है। उनकी संस्या ६१ है-एकयष्टिः कमोदिताः। अ्रतः पूर्वोक्त ६ सब्दालद्ारों को चोड़कर कुल मलद्धार ६१+६=६७ होते हैं। टिप्पणी-(i) अनद्गारों की संख्या के विषय में आचार्यों का भत-भेद है। भरत मुनि के नाट्यशारत में केवल चार अतक्वारों का उल्लेय मिलता है-उपमा, रूपक, दीपक और यमक। वामन मे ३३, दण्डी ने ३५, मामहू ने ३६ तथा उदभद ने ४० मलद्वारों का निरूपस किया था। इसके अनन्तर स्ट ने ५२ मलद्गारों का वरंन किया तथा मन्मट के अनुसार अलङ्गारों की संम्या ६७ हो गई। इसी प्रकार अलद्वारों की संख्या वढती रही । विश्पनाथ ने ७७ तथा जयदेव ने (पन्द्रालोक में) १०० मलस्ारों का यणन किया। अप्पय्य सीक्षित के कुवलयानन्द में यह संख्या १२४ तक पहुंच गई। (ii) मम्मट के पूर्ववर्ती क्टट ने पतद्वारों के वंज्ञानिक वर्गीकरस का प्रयास किया था। उन्होने वास्तव, सौपमम्य, प्रतिराय औौर दलेव, इन गार मूलवर्वों को अलद्धार-विभाजन का आधार बनाया था । मम्मट के उत्तरवर्ती सम्पक मे इस सरगी- करस कों सधिक विशाद करने ा प्रयास किया? और मसद्ारों के ये वर्ग बनामे- १. सादृश्यमूलक, २. विरोधमुलय, ३. शृद्तनावन्यमृसम, ४. स्कन्यापमुनय, ५ याक्यन्यायमूलक, ६.शोकन्यावमसन, ७. गूडार्थपरतीनिभूमक। मम्मट ने इस भोर क्यों नहीं ध्यान दिया, यह निवारणीय है। अनुषाद-(१. उपमा) (उपमान तथा उपमेम का) नेट होने पर (दोनों के गुए, किया आादि) धर्म को समानता का वहन उपमालसार है। (१२x)
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दशम उल्लास: ४६७
उपमानोपमेययोरेव न तु कार्यकारणादिकयोः साघर्म्यं भवतीति तयोरेव समानेन धर्मेस सम्बन्ध उपमा। भेदग्रह्गमनन्वयव्यवच्छेदाय।
उपमान तथा उपमेय का ही साधर्म्य होता है, कार्य कारस आदि का नहीं; इसलिये उन दोनों का ही समान धर्म से सम्बन्ध होना उपमा है। (उपमा के लक्षण में) 'भेद' शब्द का ग्रहस अनन्वय अलड्कार (जहाँ उपमान और उपमेय का भेद नहों होता) की व्यावृत्ति (पृथक्ता) के लिए किया गया है। प्रभा-'उपमा' अलङ्कार में अन्य अलद्धारों की अपेक्षा अधिक सुकुमारता • है, यह स्पष्टतया विभाव आदि का उत्कर्षक है तथा रूपक, उत्प्रेक्षा इत्यादि साधर्म्य- मूलक अलद्धारों का मूलभूत है। इसी हेतु सर्वप्रथम 'उपमा' का ही निरपण किया जा रहा है। उपमान तथा उपमेय का समानवर्म के साथ सम्बन्ध-वर्णन ही उपमा है। यद्यपि सूत्र में उपमान तथा उपमेय का ग्रहण नहीं किया गया; तयापि 'साधम्य' शब्द के द्वारा उनका आक्षेप हो जाता है; क्योंकि उपमान तथा उपमेय का ही साधर्म्य होता है, कार्यकारण आदि का नहीं। साधर्म्य शब्द का अर्थ है-समानधमंवत्व, अर्थात् दो भिन्न-भिन्न वस्तुओ का समान घर्म वाला होना। काव्यप्रकाश के भनेक टीकंकार इस 'साधर्म्य' को सादृश्य से भिन्न मानते हैं; क्योंकि जय यह कहा जाता है-'अनेनाय सदृश.' तो यह जिज्ञासा होती है कि किस धर्म के द्वारा इन दोनों का सादृश्य है। अत एव दो वस्तुओं में सावारा धर्म के कारस भासित होने वाला पदार्थविशेष ही सादृश्य है-'सादृश्यं च साधारएधमंसम्बन्घप्रयोज्यो धर्मविशेष:'- उद्योत। यद्यपि साधम्य अर्थात एकधर्मवत्त्व कहने से ही उपमान तथा उपमेय की भिन्नता का आक्षेप हो सकता है तथापि उपमा के लक्षण में 'भेद' शब्द का ग्रहस इसलिये किया गया है कि यह लक्षणा अनन्वय अलद्दार में न चना जाय। 'नितम्बिनी सव नितम्बिनीव' इत्यादि अ्नन्वय अलद्धार (के उदाहरण) मे एक वस्तु ही उपमान तथा उपमेय होती है तथा उपमान और उपभेय में वास्तविक भेद नहीं होता। किञ्च यहाँ काव्यगत मलङ्कारों का प्रकरमा है। अलङ्कार का अरभिप्राय है नब्द और अर्थ का वैनित्य (वैचित्रयं चालद्वारः)। फलतः जहाँ भिन्न-भिन्न उपमान और उपमेय के साधम्यं का चमत्कार-जनक वणंन होता है, वहाँ उपमा अलद्धार होना है। टिप्पसी :- (i) प्रायः समस्त आातस्चारिको ने उपमा घलद्वार को धनेफ अर्थालद्वारों का मूक्ष वतलाया है औौर इसको ही प्रथमनः निरुपस किया है। भाचायं वामन आादि ने तो माधम्यमूलक अनद्धारों को उपमा का प्रपज्नमाय्र ही बतलामा है-'प्रतियस्तुप्रभृतिरपमाप्पज्चः' (४३१)।
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४६८ ] काव्यप्रकार:
(१२६ ) पूर्ण लुप्ता च ।
द्योस्त्रयासां वा लोपे लुप्ता।
(१२७) साडग्रिमा । [पूर्णोपमा ]
श्रौत्यार्थी च भवेदाक्ये समासे तद्धिते तथा ॥८७॥ अग्रिमा पूर्णा। यथेववादिशव्दा यत्परास्तरयैवोपमानताप्रतीतिरिति यद्प्युपमान- (ii) उपमा शब्द योगरूठ है-उपमीयते अनया इति उपमा । इस उपमा के चार श्रङ्ग है-१ उपमान, २. उपमेय, ३. साघारणयम, ४. साधर्म्यवाचक या उपमावाचक। जो पदार्थ साधारणघमवता रूप से प्रसिद्ध है वह उपमान है तथा जिसमें उस माधारखघम का वर्शन करना है वह उपमेय (वर्णनीय) है। भथवा साधारणघर्म की दृष्टि से उत्कृष्ट समझा गया पदार्थ उपगान है तया निकृष्ट माना गया पदार्थ उपमेय है। इन्हें त्रमशः अप्रस्तुत मौर प्रस्तुत भी कहा जाता है। उपमान और उपमेय में रहने वाला धर्म साधारख धर्म है। रामानतावाचक 'इव' आदि शब्द उपमावाचया है। जैसे 'कमसमिव मुसं मनोक्षम' इत्यादि मे 'कमल' उपमान है, मुम' उपमंम है, 'मनोजत्व' साधारण धर्म है तथा 'इव' उपगावाचक है। (iii) 'इब' आदि पद के समान ही 'यथा' आदि पदों द्वारा भी साधम्य की प्रतीति होती है; अपः शब्द परिवृतिमह होने से उपमा सर्चालद्वार है। (iv) नहाँ सभी अनद्वारों के लक्षणों में अलद्वार के सामान्य सप्ण का भी गम्बन्ध होता है; इसलिए 'मट इब पटः द्रव्यम्' इत्वादि में साधम्य होने पर भी उपमा अलद्ार नहीं होता, क्नोकि यहां साध्म्य काव्य का उतकर्षायायक नही है। (v) जगननाय ने (रसव्वाघर में) मम्मट के उपमासभए की भलोपना की है। अरनुवाद-(चपमा दो प्रकार की है)-पूणोपमा तपा सुप्तोपमा । उपमान, उपमेय, साधारएपमं औोर उपमायाघक (एन चारो भयमबों) का पहरा होने पर पूर्णोपमा होती है तथा इनमें से एक, दो या तीन का सोप (परथन) होने पर सुप्तोपमा होती है। (१२६) धनुवाद-इनमें पहिसी (पपिमा) पर्यात् पुर्लोपमा (प्रयमतः) थोती तथा सायो (दो प्रहार को) होती है। (थीती औौर सार्मी भी) थापम, समास तपा सदित - में (सीन २ प्रकार को) होती है (१२७) (कारिका में) 'पप्रिमा' सर्थात् पूर्शोपमा। (पोतो) यया, इय, या आदि शमर जिसके पनन्तर प्रपुस होते है (महरा.)
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देशम उल्लांस: t ४६ह
विशेपणान्येते तथापि शब्दशक्तिमहिम्ना श्रत्येव पष्ठीवत् सम्बन्धं प्रतिपाद- यन्तीति तत्सद्भावे श्रौती उपमा। तथैव 'तन्न तस्येव' इत्यनेनेवार्थे विहितस्य वतेरुपादाने। 'तेन तुल्यं मुख'मित्यादावुपमेये एव 'तत्त ल्यमस्य' इत्यादौ चोपमाने एव 'इदं च तच्च तुल्य' मित्युभयत्रापि तुल्यादिशव्द्वानां विश्रान्तिरिति साम्य- पर्यालोचनया तुल्यताप्रतीतिरिति साध्म्यस्यार्थत्वात् तुल्यादिशन्दोप।दाने आर्थी, तद्वत् 'तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिरि' त्यनेन विहितत्य वतेः स्थितौ। इवेन नित्यसमासो विभयत्लोपः पूर्वपदप्रकृतिर्वरत्वं चेति' नित्य- समासे इवशब्दयोगे समासगा। उसके ही उपमान होने की प्रतीति होती है। इस प्रकार यद्यपि ये (यथा' आदि) उपमान के विशेपण होते हैं तथापि शब्द-शक्ति की महिमा के फारस शरवसमान्र से हो पप्ठी विभक्ति की भाँति (साधर्म्य) सम्बन्ध का बोध कराते हैं इसलिए उन ('मथा आादि) के (प्रयोग) होने पर श्रीती उपमा होती है। उसी प्रकार 'तन्न तस्येव' (५/१/११६) इस (पारिनि-सूत्र) से 'इव' (समानता) के अर्थ में विहित 'वति' (बत्) प्रत्यय के प्रयोग में भी (श्रौती उपमा होती है)। (पार्थो) (क) 'तेन तुल्यं मुखम्' (उस कमल आदि के तुल्य मुस है)- इत्यादि में उपमेय में ही, तथा (ख) 'वह फमल (तत्) इस मुख के (भ्स्य) सदुश है (तुल्यम्)'-इत्यादि में उपमान में ही और (ग) 'यह मुख (इदं) और वह फमल (तत्) तुल्य है'-यहाँ दोनों (उपमेय तथा उपमान) में भी (सादृश्य का बोध करा- कर) 'तुल्य' आदि शब्दों का व्यापार समाप्त हो जाता है (विभान्तिः); इस प्रकार साधारसधर्म का अ्नुसन्धान (विभर्श) करने पर हो दोनों में तुल्यता की प्रतीति होती है। अतएव 'साधम्य' अर्थं द्वारा आक्षिप्त (पराक्षेपगम्य या अर्थलम्य) है तथा 'तुल्य' आदि शब्दों के प्रयोग में मार्थी उपमा होती है। उसी प्रकार तेन तुल्य यिया घेवु वतिः (५/१/११५) इस (पाशिनि-सूत) से विहित 'वति' (वत्) प्रत्यम के प्रयोग (स्थिति) में भी। 'इव' (शब्द) के साथ (सुबन्त फा) नित्यसमास होता है, विभक्ति का लोप नहों होता तथा पूर्वपद में प्रफृति-स्वर रहता है (भर्यात् समासाभाव की दशा में पू्वंपद का जो स्वर होता है वही समास दशा में भी रहता है)-इस (वार्तिक) से नित्य समास होने-पर इय शब्द के प्रमोग में समासगा (धोती) उपमा होती है (जंसे- 'जीमूतस्येव भवति प्रतीकम्) । प्रभा-उपमा के प्रथमतः दो भेद होते हैं-पूर्गोपमा तथा लुप्तोपमा। जो उपमा चारों भ्ङ्गों से पूए होती है वह पूणोंपमा है। जहाँ एक भी भङ्टू की न्वूनता होती है वह सुप्तोपमा है। पूर्णोंपमा के भी पहले दो भेद किये गये हैं-एक श्रोती तथा दूसरी भार्थी। श्रीती जयमा वह है जहाँ यथा, इव आदि शब्द के शवसमात्र
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४७० 1 कंाव्यप्रकाश:
से ही साध्म्य की प्रतीति हो जाती है। (स) आार्धी उपमा यह है जहाँ सामर्म्य की पतीति पर्थवशात् होती है अर्थापतिगम्य पथवा आक्षेपलभ्य होती है। (क) ग्रन्थकार ने 'यवेध .... 'धौती उपमा'-इस अवतरस में, शका- समाघानपूर्वक श्रोती उपमा का स्वरुप चतलाया है। वहां दाड्ा का भाव यह है कि जो जिसकी विरोपता प्ररट करता है वह उसका ही विनेपस होता है भन्य का नही । 'कमलमिव मनोज मुमम्' इत्यादि में इन शब्द कमल पदार्थ की उपमानता को प्रकट करता है अएव यह कामलपद का विशेषण है तथा कमल में ही मनोशता रूप साधारणयर्म के सम्बन्ध का वोध कग सकता है। यह मुझ में साधारएाघमें के सम्बन्ध का बोध नहीं करा सकता। इस प्रकार साम्य की प्रतीति शाब्दी (धोती) नही है और उपमा को ओरोती नहीं कहा जा मकता तथा थौती 'मौर मार्यी यह विभाग ही नही बनता। (तथापि यादि) ममाधान का अभिप्राय यह है-जिस प्रकार 'राशः राज्यम्' - इत्यादि में 'राजन्' शब्द से प्रुक्त पष्ठी विभकत् राजा मे स्वामित्व का प्रतिपादन करती है तथा 'राजन्' पद का ही विशेषण है तथापि राजा तथा राज्य के स्व-स्वामिभाव सम्बन्ध का भी बोध कराती है; इसी प्रकार 'यथा' 'इव' आदि शब्द भी अवसमान से ही उपमान तथा उपमेय के साधर्म्य की प्रतोति करा देते हैं, क्योंकि शब्दशक्ति का प्रभाव ही ऐता है। इस प्ररार 'यथा' इत्यादि साधर्म्य सम्बन्ध के वाचक हैं और इनके प्रयोग में श्रीती उपमा होती है। (स) इसके विपरीत आार्थो उपमा है। ग्रन्यकार ने 'ेन तुल्यं" .. "'माची' इस पवतरस में उसका स्वरूप बतलाया है। अभिप्राय यह है कि 'तुस्म' 'सहर' आादि शब्दो की साहश्ययुक्त में शक्ति है। इनके द्वारा (क) 'कमलेन तुल्यं मुगम्' (ख) 'कमलं तुल्यं मुसस्य' (ग) 'मुज च कमल व तुत्यम्' इन वास्पों मे घमनः उपमान, उपमेय तथा दोनों के महन होने की प्रतीति हो सकती है। किन्तु धर्मेविदेप के बिना साहस्य उपपनन नहीं होता (नहीं बन गकता) इसनिये साघरसघर्ग सम्बन्ध मर्मात् साथम्पें का माक्षेप हो जाता है भतपब उपमा (साधर्म्य) भार्थी है। इस प्रकार उपनान तथा उपमेय का पकत्कारजनक गावम्य हो उपमा है। पथा, इव, चा, य आदि दाब्ड साझ्षात रूप से साधर्म्य के नौपक है मः इनके प्रयोग में उपमा शोती होती है। किन्तु तुल्य, सहय, सामान, सम मदि शब्द सहण (साधम्यबान) के बोधक है। उनसे सर्थतः (Indirectly) सपम्ब गौ प्रतति होती है। मतः उनके प्रयोग में उपमा मार्यी कही जाती है। श्रोती औोर आर्धी उपमा भी, (१) वाश्य, (२) समाम तया (३) सद्धित में हआ बरती है। (१) जहां उपमान आदि घारीं मसमस्त होते है यहाँ उपमा याक्य गत होती है। '२) जहाँ उन चारों में से किन्ही दो पा भी मगाग होता है। यहाँ उपमा समासगन होती है। (३) जहाँ उपमान वाबक से सठित प्रायम का बोग होता है यहाँ उपमा सदवितमत होती है। इम प्रकवर यह पूर्णोतमा ६ प्रकारशी
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दशम उल्लांस: ४७१
क्रमेणोदाहरएम्- १. रवप्नेऽपि समरेपु त्वां विजयश्रीन मुञ्चति। प्रभावप्रभवं कान्तं स्वाधीनपतिका यथा ॥३६२।। २. चकितहरणलो ललोचनाया: क धि तरुणा रुएतारहारिकान्ति। सरसिजमिदमाननं च तस्या:सममिति चेतसि सम्मद विघत ॥३६३॥ हो जाती है। उपयुक्त युक्ति के आधार पर ही 'इव' के अर्थ में विहित 'वति' तद्धित प्रत्यय के प्रयोग में धौती तथा 'तुल्य' के अर्थ में विहित 'बति' प्रत्यय के प्रयोग मे मार्थी उपमा होती है। इसी प्रकार समास में 'इव' शब्द का प्रयोग होने पर थौती तथा 'सटग' आदि शब्द का प्रयोग होने पर आर्थी उपमा होती है। इस प्रकार पूररोंपमा के ६ भेद ये हैं-१. वाक्यगा श्रौती, २. वाक्यगा आर्थी, ३.समासगा श्रोती, ४. समासगा आार्थी, ५. तद्धितगा शरोती, ६. तद्धितमा आर्थी। टिप्पली-(i) तत्र तस्येव (५/१/११३) इस सूत्र के अनुसार इव (साधम्यं) के अर्थ में सप्तम्यन्त (तन्न) तथा पष्ठचन्त (तस्य) शब्द से 'वति' प्रत्यय होता है; जैसे 'मथुरावत् (मथुरायाम् इव) स्रघ्ने प्राकारा:' तथा 'चंत्रयत् (चंत्रस्य इव) मन्नस्य गाव:'। (ii) 'तेन तुल्यं क्रिया चेद् बतिः (५१/११५) इस सूत्र के अनुसार तुल्य (सदृश) अ्रर्थ में तृतीयान्त शब्द से क्रिया-साम्य में 'वति' प्रत्यय होता है; जैसे. 'ब्राह्मरवत् (ब्राह्मणेन तुल्यम्). अघीते क्षत्रियः'। (iii) 'इवेन नित्यसमासो०'-यहाँ नित्य शब्द सिद्धान्तकोमुदी या महाभाष्य में नहीं मिलता। अनुवाद-(पड्विध पूर्रोपमा के) कमशः उदाहरण ये हैं- १. (वाकयगा श्रोती)-'हे राजन, संग्राम में विजय-श्री आरपको स्वप्न में भी इसी प्रकार नहीं छोड़ती जिस प्रकार स्वाधीनपतिका नायिका प्रकृष्ट मनुराग (प्रभाव) के उत्पत्तिहेतु (प्रभव) अपने प्रियतम को'॥३६२॥ पभा-यहां 'स्वाधीनपतिका'-उपमान है; 'विजयश्री'-उपमेय है; 'न मुञ्चति' अर्थात् अपरित्याग साधारए धर्म और 'यथा' उपमावाचक शब्द है। इस प्रकार चारों अवयव विद्यमान है। इनमें किन्हीं दो का भी समास नहीं भतएव यहाँ वाक्यगा थोती पुर्णोपमा है। अनुवाद-२. (वायगा आर्थी)-चकित हरिस के समान चञ्चल नेग्रों वाली उस नायिका का यह मुल जो फोप में नररा पक्स की उत्कट (तार) तथा -मनोहर, फान्ति घाला हो जाता है; औोर यह फमल ये दोनों समान हो जाते हैं; इसलिए नायक के हृदम में (यह मुल) हर्ष उत्पन्न करता है ॥३६३। प्रभा-यहाँ 'सरसिज' उपमान है, 'मानन' उपमेय है, 'अहससदृश कान्ति' साधारण धर्म तथा 'सम' शब्द उपमावाचक है; 'सम' गब्द के साय समान न होने *
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४७२i •र्को व्यप्रकार्ग:
३. अत्यायतैनियमकारिभिरुद्धतानां दिव्येः प्रभाभिरनपायमयैरुपायैः। शोरिभुजैरिव चतुर्भिरद: सदा यो लक्ष्मीविलासभवनैर्भु वनं वभार ॥३६४॥। ४. अवितथम नोरथपथप्रथनेपु प्रगुखगरिमगीतक्षीः । सुरतरुसहश: स भवानभितपछीय: च्ितीश्वर, न करय ।२६४।। ५. ६ गाम्भीयगरिमा तस्य सत्यं गङ्गाभुजङ्गवत्। दुरालोक: स समरे निदाघाम्वररत्नवत् ।३६६।। से यह वाक्यगा उपमा है। यहाँ शब्द से 'कमल और मुग सहत है'-केवल यह प्रतीति होती है फिर अनुसन्धान द्वारा दोनों के साधम्य की प्रतीति होती है पतए यहाँ वाकयगा आर्थी उपमा है। अनुवाद-३. (समासगा थीती)-'जो राजा भगवान् विष्ठु (शौरि) को घारों भुजाओं के समान उन (सामादि) चारों उपायों से सदा इस संसार का पालन करता था (बभार)। वे उपाय हथा वाहु दोनों अत्मायत (परिसाम में विशुद्ध या प्राजानुलम्ब), गवंयुक्त या दानवों का नियन्त्रस करने पाले, दिव्य (उत्कृष्ठ या अलोकिक), उत्कृष्ट शोना वाले, सपाय रहित (सदा सफल या सवातन) सपा लपमी के विलास-भवन है ।।३६४।। 1
प्रभा-वहाँ 'भुज' उपमान है, उपाय 'उपमेय' है तथा 'भायतत्व' इत्यादि सापारण धर्म है और 'इब' बब्द उपमावाचक है। 'भुर्जैरिव' में 'इयेम समास०' इत्यादि उपर्युक्त वार्तिक द्वारा समाम होता है मतः समासमा श्रोती पूलोपमा है। समास न होने पर वारयमा उपमा ही होगी। अनुवाद्-४. (समासगा पार्यो)-जनता के सफल मनोरपों के भारग- विस्तार में (सफलता की युद्धि में) प्रकृष्ट गुलों को महिमा के कारए जिसकी सम्पतति (थी.) का गान हो रहा है इसलिए वल्पवुक्ष के समान हे पृमिमोपतति, भाप किसकी सभिलापा के विषय नहीं है? ॥३६५॥ प्रभा-यहाँ 'सुरतय' सनमान है, 'भयान्' (भाप) उपमेय है, 'प्रगुएगरिग- मीतशरोल्व' मार्धारता घर्म है, 'सहत' शब्द उपमानाचय है। मुगारुगदम.' यद्दा उपमान तथा उपमावाचक सब् का समास है, अतएब समासगा मार्थी पूखोपमा है। परनुवाद-र. ६. (तदितता भोती तथा मार्थी)-गाघमुघ हो उक्ष (राजा) की गम्भीरता की महिणा गद्ता के भुजङ्ग सर्यात् उपपति सागर (पङ्गापति= प्रान्सन) के रुमान है यह संग्राम में ग्रीर्मकालीन (निराध) अम्बरदान पर्मात गू्य के समान फष्ट से देता जा सकता है ।३६ ६॥ प्रभा - (५) यहाँ पर पूर्वाधं में यजामुजज' सस्मान है। 'तस्य' (बह) उपमेव है; 'माम्भीयंगदिमा' सामारसयर्म है। 'कुजमयन्' में (प' मे धर्भ मे (सप
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दशम उल्लास: [४७३
स्वाघीनपतिका कान्तं भजमाना यथा लोकोत्तरचमत्कारभू: तथा जयश्रीरत्वदासेवनेनेत्यादिना प्रतीयमानेन विना यद्यपि नोक्तवैंचित्र्यम, वैचित्र्यं चालङ्वार: तथापि न ध्वनिगुणीभूतव्यङ्गषव्यवहारः। न खतु व्यङ्गयसंस्पर्शपरामर्शादत् चास्ताप्रतीतिः, अपि तु वाच्यवैचित्रयप्रतिभासा-
तदलङ्गारा उदाहता: तद्रहितत्वेन तु उदाहियमाणा विरसतामावहन्तीति पूर्वापरविरुद्वाभिधानमिति न चोदनीयम। तस्मेव) 'वति' प्रत्यय होता है-इस प्रकार यहाँ तद्धितगा श्रोती पूर्णोपमा है। (६ उत्तराध में 'निदाधाम्यररत्न' उपमान है, 'स' उपमेय है औौर 'दुरालोकत्व' साधारए धर्म है। 'अम्बररल्वत्' में तुल्यार्थ मे (तेन तुल्य करिया चेद्वति.) 'वति' प्रत्यय होता है-इस प्रकार यहां तद्धितगा आर्थी पूररोपमा है। अनुवाद्-वद्यपि ('स्वप्नेऽपि' इत्यादि में) "जिस प्रकार स्वाधीनपतिका नायिका अपने पति में तल्लोन (भजमाना-सेवमाना) होकर अलोकिक चमत्कार का विषय (विलक्षसालावण्यमयी) हो जाती है इसी प्रकार आपका सेवन करती हुई विजयश्री भी।" इत्यादि प्रतीयमान (वस्तुरूप) व्यसघ अर्थ के बिना उक्ति (काव्य या काव्य के वाच्यार्थ) को विचिन्नता नहीं प्रतीत होती और उक्ति-वंचित््य ही अलङ्कार (फहलाता) है; तथापि यहां ध्वनि सयया गुशीभूतव्यङ्गघ नहीं माना जाता; क्योंकि व्यङगच के सम्बन्ध के परामर्श (विचार) से वहा चारता की प्रतीति नहीं होती; किं्तु ('इव' आदि के) वाच्य (उपमा) के वैचिन्य का अनुसन्धान फरने से ही होती है। रस (भाव) आदि व्यङ्नच अर्थ सथवा कोई और प्रलङ्कार तो सभी काव्य स्थलों में नियम से विद्यमान रहता है, इस हेतु उनकी ओर ध्यान न देकर (उपमा आदि) अलड्कारो के उदाहरस दिये गये हैं। रसादिरहित (उक्तियों) उदाहरसों का दिया जाना तो नीरसता का कारस हो जाता। इसलिये यह पपर सर्यात् बाद का कथन (सव्यसुघ उदाहरस देना) पूर्व कथन (अ्रव्यङ्गय चित्रम्) के विरुद्ध है- ऐसी शड्का न करनी चाहिये। प्रभा-इस अवतरण की प्राचीन टोकाकारों तया आधुनिक व्यास्याकारों ने विविध प्रकार से व्यास्या की है। अवतरण का तात्पर्य यह प्रतीत होता है- राङका यह है कि प्रथम उल्लास में ग्रन्यकार ने कहा है कि 'गुरालद्वारपुक्त- मव्यङ्गघ चिन्नम्' अर्थात गुए और अलद्धार से युक्त व्यङ्गपरहित काव्य चित्र काव्य है। उसके दो भेद हैं-शब्द चिन्न और अर्थचित्र। फिर पष्ठ उल्लास में कहा है- 'ते अलङ्कार-निर्णाये निरयाप्यन्ते' अर्थात् चित्रकाव्य के दोनो भेदो का अलङ्गार- निरसय के अवसर पर निसंय किया जायेगा। इस प्रकार यहाँ ग्रन्यकार को चिन्न- फाव्य का उदाहरण ही देना चाहिये। किन्तु 'स्वप्नेऽरपि' इत्यादि उदाहरए में चित्न- काव्य नही कहा जा सकता, क्योकि यहाँ निम्न व्यङगभ अरथ की प्रतीति होती है-
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४७४ का न्यप्रकार:
"जिस प्रकार स्वाधीनपतिका नामिका अपने पति के साथ रमणा करती हुई भलोकिफ मानन्द का मनुभव करती है उसी प्रकार विजय थी भी तुम्हारा सेवन करफे।" और यह व्यङ्तमार्य यदि प्रधान है तो यह काव्य व्वनि होगा; यदि गोस है तो यह गुसी- भूतव्यङ्गय होगा। अतः ग्रन्थकार के कयन मे पूर्वापर विरोध है। * इसके समाधान के लिये 'स्वावीनपतिका प्रतिभासादेव' इत्यादि महा गया है। यह ठीक है कि ऐसे स्थानों पर व्यस्तधार्य की प्रतीति होती है, किन्तु यहा व्यव्ुधार्य का भान होने से चमत्कार का अनुभव नहीं होता अपितु यहाँ उपमा ही चमत्कारोत्पादक होती है और वह उपमा वान्य ही है। यहां व्यङ्गयार्थ तो चपमाकृत चमत्कार के बाद प्रतीत होता है। करम यह है-वाच्यार्थबोध-चमरकारानुभय- व्यन्डधार्यप्रतीति भ्रतः यहाँ व्यन्नचार्यं प्रसफुटतर होता है। ध्यनि या गुखीभूतव्यस्गम के स्थलां पर वाच्मार्थ-बोध के एकदम बाद (अनन्तर) व्यङ्ुन की प्रतीठि हुमा करती है।वहां व्यङ्नयायं कमशः स्फूट या पस्फुट हुआ करता है, अस्फृटतर नहीं, इस प्रकार 'स्वप्नेऽरप' इत्यादि में चिशकाव्य ही है। इस पर शह्ता यह है कि स्वप्नेऽपि आदि में राजविषयक रविभाव (रसादि) को प्रतीति हो रही है, फिर यह चिनकाव्य करी हो सफता है? दूरारा दोप यह भी है कि यह उपमालद्टार का उपयुक्त उदाहरण नहीं; क्योंकि (भकार का) मनुप्रा अलदवार भी यहां विद्यमान है। अतः यहाँ अनुपारा और उपमा की संगृष्टि या राद्ुर होगा। इसका समाधान करते हुए कहा गया है-'रसादिस्तु'। भाव यह है कि सभी उत्तम काव्यों में रगादि रुग व्यज्य भर्य तथा दोन्दो मलदार भी हो सकते हैं। अतः उनकी ओर ध्यान न देकर प्रकग्स के अनुसार यहाँ उपमा आदि के उदाहरस दिसतामे गये हैं। ये सभी उदाहरण बितकाय्य के ही उदा- हरस हीं यह मावश्यक नेही। यदि कहो कि 'चन्द्रधदलः पटः' इत्यादि रस तथा श्र्य प्रतद्वारों से रहित फेवल शुद्ध उपमा के उदाहरण ही वयों न दिसला दिये? तो उत्तर है कि वैसे उदा- हरस देने से नी रसता मा जाती-पाठकवुन्द को प्रनि उत्पप् हो जागी-(विरता- मावहन्ति)। प्रायः व्यस्याकारों ने इसका अभिप्राय यह बतलाया है-वाध्य औोर यापक का उत्यं बढाकर रस के उपकारक होने गे ही उपमा आदि मनद्वार महनाते हैं। नीरम काव्प में होने वाले उपमा आदि तो ममद्वार स न कहमाते। इसके समर्चन में यह उक्ति भी उद्ए की है- उसध्यनिनं सवास्ति तत्र वन्प्यं विभूपसम्। मृछामा: मृगणावादयाः कि एलं हारगस्पस्ष ॥
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दशम उल्लांस: ४७५ 44
[लुप्वोपमा] (१२८) तद्वद्धर्मस्य लोपे स्यान्न श्रौती तद्धिते पुनः । ध्म: साधारणः। तद्धिते कल्पवादौ त्वार्थ्येव तेन पब्च। उदाहरएम-
करशीयं वचश्चेत. सत्यं तस्यामृंतं यथा ॥३६७।। किञ्च, आनन्दवघंन (ध्व० २) की यह कारिका भी- रसभावादितात्पर्यमाश्रित्य विनिवेशनम्। अलङ्ग तीनां सर्वासामलङ्कारन्वसाधनम्॥ किन्तु यह व्याख्या मम्मट के अलद्धार लक्षण के अनुकूल नही प्रतीत होती। मम्मट के अनुसार तो नीरस काव्य मे भी अलद्ार होते है। (द्र०, सूत् १ तथा ६६ की व्याख्या)। अरनुवाद-(पञ्चविधा धर्मतुप्तोपमा)-उस (पूर्एोपा) के समान ही धर्म का लोप होने पर उपमा अर्थात 'धर्मलुप्तोपमा' होती है; किन्तु वह तद्धितगा भोती नहीं होती। धर्म अर्थात् साधारस धर्म। तद्धित अर्थात् कल्पप् (देश्यदेशीयर्) आदि में तो आर्थी ही लुप्तोपमा होती है। इस प्रकार इसके पाँच भेद होते है। प्रभा-जहाँ साधारण धर्म का लोप हो जाता है वहाँ धर्मलुप्तोपमा होती है। यह पाँच प्रकार की है-१. वाक्यगा श्रौती, २. वावयगा आर्थी,.३.समासगा थोंती, ४. समासगा आर्थी, ५. तद्धितगा आर्थी। - यहाँ तदधितगा शौती लुप्तोपमा नहीं होती। कारण यह है कि 'हव' के अर्थ में विहित तद्धितप्रत्थय के प्रयोग में ही थांती उपमा हुआ करती है। वह इवार्थक वदधितप्रत्यय 'यति' है, जो 'तत्र रस्येव' इत्यादि पाशिनि सूत्र से कहा गया है। वह सदा साधारण धर्म में साकांक्ष होता है तथा साधारए धर्म का प्रयोग न होने पर वह तद्धित ही नहीं होता पतः साधारण धर्म के सपयोग (लोप) में श्रौती तद्धितगा धर्मलुप्तोपमा नही होती। यद्यपि इस प्रकार तुल्यनिया रप साधारण घर्म की आकांक्षा रखने के कारण सुल्यार्थंक 'वति' (तेन तुल्यं मिमा चेद्वतिः) प्रत्यय के प्रमोम में भी आर्थी तदधितगा धर्मलुप्तोपमा भी नहीं हो सकती तथापि कल्पप, देश्य तथा देशीयर के प्रयोग में होती ही है। अनुवाद-(धर्मलुप्तोपमा के) उदाहरस है- १. (वाक्यगा धोती !- 'हे चित, असाधारण सौजन्य की अधिकता से युक्त तथा सर्वोत्कृष्ट (धन्यस्य) उस सज्जन के पमृत जैसे वचन का निश्चम ही (सत्मं) पालन करना चाहिये' ।३६७।।
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४७६ 1 कॉंव्यमें का्श:
२. शकृष्टकरवालोऽसी सम्पराये परिभ्रमन्। प्रत्यथिंसेनया दष्टः कृतान्तेन समः प्रमु: ॥३६८॥ ३,५. करवाल इवाचारस्तस्य वागमृतोपमा। विथकल्पं मनो बेरिस यदि जीवसि तत्ससे, ।।३६EII (११६) उपमानानुपादाने वाक्यगाऽय समासगा ॥८प॥। ६. सन्नलकरणपर वी सामसिरिविअरएं ए सरसकव्वरस । दीसइ शद्द व सिसम्मइ सरिसं अंसमेत या॥४०व॥। प्रभा-यहां 'अमृत' उनमान है, 'बचस्' उपमेय है और 'यथा' उपमावाचक है। 'परिसाममुखकरत्व' रूप साधारण धर्म है जो भत्यन्त प्रसिद्ध है इसी से उसकना ग्रहणा नही किया गया। यहाँ 'यथा' शब्द के साथ समास नहीं है, भतएव वाययपा धमलुप्ता श्रीती उपमा है। अनुवाद-२. (यावयगा पर्थी)-'तलवार खोंचकर संग्राम में धूमता हमा यह राजा शत्ु सेना के द्वारा यमराज के समान देखा गया।'॥३६८॥ प्रभा-यहां कृतान्त उपमान है तथा राजा उपमेय है। 'करूरता' साधारस धर्म है। अत्यन्त प्रसिद्ध होने के कारण उसका प्रयोग नहीं किया गया। साहस्यार्पंक 'सम' शब्द उपमायाचक है 'सम' शब्द के साथ समाग नहीं है अतएव यावयगा धर्म सुप्ता भार्थी उपमा है। अनुवाद-३-५ (समासगा ३. थोती तथा ४. पार्थी एवं 2. सव्ितगा सार्मो) 'हेमिन्र, उस (दुप्ट) का पाचरस सलवार के समान है, उसफो वाली
रहोगे' ॥३६६।। समृत के समान है तथा मन विप सदृद है; यदि इस सब को नान सोगे सो जोवित
प्रभा-(३) 'करवाल इवाचार:'-में करवान उपमान है, पानार उपमेप है, इय उपभावाचक है। यहां 'घातकता' साधाग्ण भर्म है जो नुप्त (मनुपात) है। इय के साथ समास हुआ है भतएय समासगा थोती यमसुप्ता उपगा है। (४) 'याम- मृतोपमा'-में 'वाफ' उपमेय है, 'ममृत' उपमान है साहदयार्थक 'उपमा' शब्द उमा- पाचक है। यहाँ 'माघुय' साधारस धर्म है जो सुप्त है 'उपमा' शम्द के साप मभाग हुआ है मतएव समासागा आर्षी यर्मतुप्ता उपमा है। (x) 'विपकल्व मनः' इममें 'विष' उपमान है, 'मनस्' उपमेय है 'न्यफत्य' माघारस पर्म है जो भुप्त है। सुख्या- पंक 'ल्यपु' सवित प्रत्यय (ईपदसमाप्तो फसप्देशयदेशीयर: ५३।६य) ह-मतएद यहां तदितगा मार्मी ध्मसुप्ता उपमा है। अनुवाद-(हरिया उपमानसुप्तोपमा) उपमान का सोय होने पर (६) वाश्यगा तथा (0) समासगा (शे प्रकार की उपभानयुप्तोषमा दोती है) १२६। नसे-समस्त इनटियों (करसा) को परमविधान्ति (विपयाग्रवंमुर) तमा शौवय
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दशम उल्तास: ४७७
(सकलकरणपर विश्रामश्रीवितरएं न सरसकाव्यस्य। दृश्यतेऽथवा निशम्यते सदशमशांशमात्रेस।।) ७. कव्वरसेत्यत्र कव्तसममिति सरिसमित्यत्र च सूणमिति पाठे एपैव समासगा। (१०३) वादेलोंपे समासे सा कर्माधारक्यि। कमकर्त्रोणंमुलि वाशव्दः उपमाद्योतक इति वादेरुपमाप्रतिपादकस्य लोपे पटू-समासेन कर्मणोऽधिकरणाचचोत्पन्नेन क्यचा, कतु: कयडा, कर्मकर्त्रोरुपपदयोर्णमुला च भवेत्। उदाहरणम- (श्री) प्रदान करने वाले सरसफाव्य के सदूश अशमात्र में भी अन्य कुछ वस्तु न देखी जाती है, न सुनी जाती है'।।४००।। 'काव्यस्य' (कब्वस्स) के स्थान पर 'काव्यसम' (कव्वसमम्) औरप्ौर 'सदृश' (सरिस) के स्थान पर 'नूनं' (एम्) पाठ होने पर यही समासगा उपमानलुप्तोपमा हो जाती है। प्रभा-(६) यहाँ वर्णनीय है काव्य तथा यही उपमेय है। 'सकल' इत्यादि साधारण धर्म है; सदशशब्द उपमावाचक है इसके साथ 'काव्य' शब्द का समास नहीं किया गया। यहाँ पर उपमान का भी ग्रहण नहीं किया। इम प्रकार यहाँ वावयगा उपमानलुप्ता आर्थी उपमा है। (७) 'काव्यसमम्' इत्यादि पाठ हो जाने पर तुल्यार्थंक 'समं' शब्द के साथ काव्य शब्द का समास होगा अतः समासगा उपमानलुप्ता भर्थी उपमा होगी। उपमानलुप्ता के अन्य (चार) भेद न होने का कारण यह है-(क) उपमा- 'वाचक 'वति' आदि तद्धित प्रत्यय उपमानवाचक शब्द से ही हुआ करते हैं। भतः तद्धितगत दोनों भेद उपमान का लोप होने पर नहीं हो सकते, (ख) 'इद' आदि उपमावाचक का उपमानवाचक के साथ ही अन्वय हुआा करता है अतेः उपमान का लोप होने पर वाक्यगा एवं समासगा थोती नही हो सकती। अनुवाद्-(पड्विधा वाचफलुप्तोपमा)-वा (इय) आ्दि का लोप (भनु- पादान) होने पर यह (याचकलुप्ता) उपमा-समास में, कर्म तया अपिकरण से होने वाले 'वमच्' में, 'पपङ़' प्रत्यय में, फर्म तथा फर्तृ उपपद घाले सामुत् प्रत्यय में- होती है। (१३०) 'वा' शब्द उपमाद्योतक है इसलिए 'घा' इत्यादि उपमावाचक शब्द का लोप होने पर (लुप्तोपमा के) ६ भेद होते हैं-(८) समास के द्वारा, (e) फर्म से उत्पन्न वयच् प्रत्यय तथा (१०) अधिकरण से उत्पन्न वयच् प्रत्यय के द्वारा, (११) कर्ता से विहित पयड प्रत्यय द्वारा और (१२) कम उपपट होने पर (समुल) या (१३) कट उपपद होने पर खमुत प्रत्यय द्वारा।
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४७६ काव्पनेकाश:
२. श्र्राकृष्टकरवालोऽसौ सम्पराये परिभ्रमन्। प्रत्यर्थिसेनया दृष्टः कृतान्तेन सभः प्रमु: ॥३६८॥ + ३,५. करवाल इवाचारस्तस्य वागमृतोपमा। चिपकल्पं मनो चेत्सि यदि जीवसि तत्सखे, ॥।३६६।। (११६) उपमानानुपादाने वाक्यगांडय समासगा ॥८प॥ ६. सन्नलकरयापरवीसामसिरिविअरएं ए सरसकव्वस्स । दीसइ अह्द व खिसम्मइ सरिसं शरंसमेते स॥४०॥ प्रभा-यहां 'भमृत' उपमान है, 'बचस्' उपगेय है औौर 'मया' उपमावाचक है। 'परिणामसुखकरत्व' रूप साधारए धर्म है जो अत्यन्त प्रतिद्ध है इसी से उसका ग्रहस नहीं किया गया। यहाँ 'यया' शब्द के साथ समास नही है, अतएव वापयगा धमलुप्ता शोती उपमा है। म्पनुवाद-२. (यावयगा आार्थी)-'तलवार खोंचकर संग्राम में घूमता हपा यह राजा मातु सेना के द्वारा यमराज के समान देसा गया ।'॥३६८॥। प्रना-यहाँ कृतान्त उपमान है तथा राजा उपमेय है। 'भूरता' सापारग घमं है। मत्मन्त प्रसिद्ध होने के कारण उसका प्रयोग नहीं किया गया। साहश्यार्थक 'सम' शब्द उपमावाचक है 'सम' शब्द के साथ समाम नहीं है अतएय वाक्यगा धर्म सुप्ता भार्थी उपमा है। अनुवाद-३-५ (समासगा ३ शीती तथा ४. ार्थी एवं ५. तदधितगा पर्थी) हे मित्र, उस (दुप्ट) का भावरस तलवार के समान है, उसकी थाली
रहोगे ।३६६।। प्रमृत के समान है तथा मन विप सद्य है; यदि इस सब को जान सोगे सो जोवित
प्रमा-(३) 'करवाल इवाचार:'- में करवाल उपमान है, भाचार उपमेय है, इय उपभायाचक है। यहाँ 'घातकता' साधारया धर्म है जो सुप्त (अनुपास) है। इद के साथ समास हुया है भतएय समासगा थोती धमतुप्ता उपमा है। (४) 'भाग- मृतोपमा'-में 'याक' उपमेय है, 'परमृत' उपमान है साहसयार्थक 'उपमा' शम्द उपमा- वाचक है। यहां 'माधुरच' साधारस घर्म है जो खुप्त 'उपमा' दग्द के साथ समास हमा है मतएय समारागा आर्थी धर्मलुप्ता उपमा है। (x) 'विपक्च्प गनः' इगमें 'विप' उपमान है, 'मनम्' उपमेय है 'नायकत्व' सापारया धर्म है जो मुप् है। तुम्पा- थंक 'कल्पप्' तदित प्रत्मय (ईपागमाप्ती मल्यप्देशमदेशीपर: ४२६७) ह-मनएव यहाँ सदितगा भार्पी घर्मलुप्ता चपमा है। अनुवाद-(द्विपा उपमानतुप्तोपमा) उपमान र7 सोप होने पर (६) वारयगा तथा (७) समासवा (शे प्रकार की उपमानसुदोपमा होती है) १२६। मंसे-समस्त इन्द्रिमों (करस) पो परमपिधान्ति (विपनाग्तरयंपुरुय) तमा सोन
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(सकलक र णपर विश्नामश्रीवितरएं न सरसकाव्यस्य । दश्यतेऽथवा निशम्यते सदशमंशांशमाव्रेय ।।) ७, कव्वरसेत्यत्र कव्त्रसममिति सरिसमित्यत्र च सूणमिति पाठे एपैव समासगा। (१०३) वानेलोंपे समासे सा कर्माधारक्याड। कमकर्त्रोणंमुलि वाशव्दः उपमाद्योतक इति वादेरुपमाप्रतिपादकस्य लोपे पटू-समासेन करमणोऽधिकरणाच्चोत्पन्नेन क्यचा, कतु: कयडा, कर्मकर्शोरुपपदयोर्णमुला च भवेत्। उदाहरम्- (थी) प्रदान करने वाले सरसकाव्य के सदश श्ंशमान्र में भी त्रन्य कुछ वस्तु न देखो जाती है, न सुनी जाती है'।४००॥। 'काव्यस्य' (कब्वस्स) के स्थान पर 'काव्यसम' (कव्वसमम्) और 'सवृश' (सरिस) के स्थान पर 'नून' (ससम्) पाठ होने पर यही समासगा उपमानलुप्तोपमा हो जाती है। प्रभा-(६) यहाँ वर्णनीय है काव्य तथा यही उपमेय है। 'सकल' इत्यादि साधारए धर्म है; सहशशब्द उपमावाचक है इसके साथ 'काव्य' शब्द का समास नहीं किया गया। यहाँ पर उपमान का भी ग्रहण नहीं किया। इम प्रकार यहाँ वाकयगा उपमानलुप्ता आर्थी उपमा है। (७) 'काव्यसमम्' इत्यादि पाठ हो जाने पर तुल्यार्थक 'समं' शब्द के साथ काव्य शब्द का समास होगा अतः समारागा उपमानलुप्ता झार्थी उपमा होगी। उपमानलुप्ता के अम्य (चार) भेद न होने का कारण यह है-(क) उपमा- वाचक 'वति' आदि तद्धित प्रत्यय उपमानवाचक शब्द से ही हुआ करते हैं। भतः तद्धितगत दोनों भेद उपमान का लोप होने पर नहीं हो सकते, (ख) 'इव' आदि उपमावाचक का उपमानवाचय के साथ ही अ्न्वय हुआ करता है अतः उपमान का लोप होने पर वाक्यगा एवं समासगा शोती नहीं हो सकती। अनुवाद-(पड्विधा वाचकलुप्तोपमा)-या (इव) आदि का लोप (धनु- पादान) होने पर वह (वाचकलुप्ता) उपमा-समास् में, कर्म तथा पधिकरख से होने वाले 'वयच' में, 'धयङ्' प्रत्यम में, कर्म तथा कत उपपद वाले समुल् प्रत्यव में- होती है। (१३०) 'वा' शब्द उपमाधोतक है इसलिए 'या' इत्यादि उपमावाचक शब्द का लोप होने पर (सुप्तोपमा के) ६ भेद होते हैं-(८) समास के द्वारा, (६) फर्मे से उत्पप्न वयत् प्रत्यय तथा (१०) अधिकरण से उत्पन्न ययच् प्रत्यय के द्वारा, (११) कर्ता से विहित वपड प्रत्यय द्वारा और (१२) कर्म उपपद होने पर (समुल) या (१३) कट उपपद होने पर समुल् प्रत्यय द्वारा।
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४७ ] काव्यप्रकार: 44+ ८ (क). ततः कुमुदनाथेन कामिनीगएडपाएडना। नेत्रानन्देन चन्द्र ए माहेन्द्री दिगल्फृता ॥४०१॥ तथा-
पुलकिततनुरत्कपोलकान्तिः प्रतिभटविक्रमदर्शनेचमासीत्॥४०२।। ६-११. पौरं सुतीयति जनं समरान्तरेऽसा- वन्तः पुरीयति विचित्रचरित्रचुन्चुः। नारीयते समरसीम्नि कृपाणपारे. रालोक्य तश्य चरितानि सपत्नसेना॥४०३।। प्रभा-'वा' आदि उमावाचक शब्दों के अप्रयोग में होने वाली उपमा 'वाचकलुप्तोपमा' कहलाती है। यह वाननगा नही होता; व्वोंकि 'मुसं चन्द्रः काराते" इत्यादि वाकय से (जहाँ उपमावानक शब्य सुप्त है) उपमा की प्रतीति नहीं होते। यह तरितगा अथवा थोती भी नहीं हो सबती, पयोकि सद्धितगा में 'यहि' सदि सहित एवं शीसी में 'इब' सदि सब्द उगमा प्रतिपादक होते है औौर मदि उनका प्रयोग होगा तो वाचकलुप्ता मैसे रददेगी ? इसलिये यह समासगा इत्यादि भेद से ६ प्रकार की होती है। यह ६ प्रकार की धार्थी उपमा ही ह, थोती नहीं। समारगा भी दो प्रकार की होती है, (प) दविपद-समानगा औोर (स) बहूपद नामा सगा। अनुवाद-उदाहरए (जंमे)-(८.र समासगा)-'तत्परचात् कामिनी के कपोल (गण्ड) के समान पीतयण, नेत्रों को आानन्द देने वाले बुमुदनापक पगमा ने महेन्द्र को दिशा (पूर्य) को भ्तश्कृत किया' ॥४०१॥ तथा (5. स-समासणा)-पाप योदापो का पराकम देखने पर यह बोर ऐसा हो गया कि जिसकी असिलता कुप्सशर्प के रमान भयडकर मो, उत्फष्ठा (रह. रहिफा) से व्याप्त चित होने के कारए जिसकी गति (घार=सन्चार) तोध हो गई यो, (सूरता से) शरीर पुनरित था, इसलिए कणेसों की माभा प्ररट हो रहो प्रमा- (C स) 'तनः' इरमादि द्विपरनमासगा वागरगुप्तोरमा का उदहरण है। 'कामिनीगण्टनाण्ड्ु:' का विगह् है 'शामिनीगण्ठ दप पाण्ड:' पपवा 'ामिनी मण्डपत् पाण्डु:। यहां पर उपमान (वामिनीगण्ड) तपा नामारस् धर्मवामर (पातू) श्म्दो का समाग (उपमानानि मामान्ययचनेः -/१/२५) हमा है। गमाग में ही वामा की प्रतीनि हो जाती है सलएय 'रय' मदि उपमायामक गदों का प्रयोग नही होता। (दम) 'मगित' उत्यादि बहपतसमासमा नाषय सुत्ा पा इसहाता है। वहां पणिम- दनन' उस्मान है, 'भौगमता' सामान्य धर्म है, 'भनिष्म' उपमेव है। दन सीनों का हो ममाय हो रहा है पपः मलो पट़ादममागगा पारिकुतोडमा है। अनुपाद-(१.१0. १२)-'वह राना पुरवानी मनों से पुत्रव् ब्यरहार करणा है, वद्भुत पार्य करने में प्रसिद ('पृज्य' यह परमिद्वामंवायर भमय है-सेन।
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दशम उल्लास: ४७६
१२/ १३. मृधे निदाघघर्माशुदश पश्यन्ति तं परे। स पुनः पार्थसब्चारं सब्चरत्यवनीपतिः।४०४।। वित्तश्चुञ्चुप्चएपी ५/२/२६) होने ाला वह संग्राम के मध्य में श्न्तःपुर के समान प्राचरस (स्वच्छन्द विहार) करता है; जिसके हाथ में फृपाए है ऐसे उस राजा के युद्धभूमि में फायों (परातमों) को देसकर शत्ु सेना नारी के समान (भीरता फा) आाचरस करने लगती है'॥४०३।। प्रभा-(६) 'पौर जनं सुतीयति'-में 'पौरजन' उपमेय है, 'सुत' उपमान है-'सुतमिव आचरति' इस अर्थ में उपमानवाचक कर्मरूप 'सुत' शब्द से क्यन् प्रत्यय (उपमानादाचारे ३/१/१०) होता है। उपमेयवाचक 'जनम्' शब्द मे द्वितीय विभक्ति होने से ही यह विदित होता है कि यहाँ कमंभूत भुत शब्द से क्यच् प्रत्यय हुआ है। 'स्नेहपूर्वक पालन करना' आदि ही यहाँ आरचार है, यही साधारस धर्म है। यहाँ 'इव' का अ्र्थ (नामधातु रूप) वृत्ति में ही अन्तनिहित है, (क्यच् प्रत्यय तो इवार्थ का वाचक नहीं है) इसी से 'इव' आदि का प्रयोग नहीं होता तथा यहाँ कर्म से उत्पन्न वयच् के प्रयोग में वाचकसुप्तोपमा है। (१०) 'समरान्तरे०' इत्यादि में समरान्तर उपमेय है, 'न्तःपुर' उपमान है। यहाँ उपमान-वाचक अघिकरसापद 'अन्तःपुर' से (उपमानादाचारे-अधिकरणाच्चेति ववतव्यम्-वात्तिक) क्यच् प्रत्यय होता है। यहाँ माचार अर्था्त् स्वच्छन्दगमन आदि ही साधार धर्म है। अतएव पू्ववत् यहाँ अधिकरण क्यच् प्रत्यय के प्रयोग में वाचकलुप्तोपमा है। (११) 'सपत्नसेना नारीयते' इसमें कर्तृ चाचक नारीपद से आचार अर्थ मे कपड़ (कर्तु: क्यड़ सलोपश्च ३/१/११). प्रत्यय होता है। यहाँ नारी उपमान है, सपलसेना-उपमेय (वणनीय) है, श्ाचार अर्थात् कातरतापूर्वक विनय आदि ही साधारण धर्म है। यहाँ उपमाप्रतिपादक 'इव' आदि का प्रयोग नहीं होता इसलिए 'क्यङ' प्रत्यय के प्रयोग में वाचक लुप्तोपमा है। श्रनुवाद-(१२.१३)- ातु लोग (परे) उस (राजा) को मुद्धभूमि में (मृधे) ग्रोप्म ऋतु के सूयं (घर्मांयु) के सद्श देखते हैं किन्तु वह राजा तो युद्ध में भर्जुन के समान विचरण फरता है'॥४०४। प्रभा-(१२) 'निदाघघर्माशुदर्शम्' उपमानवांचक कर्म (निदाघघमाघुम्) उपपद होने पर 'हद' धातु से भाव में समुल प्रत्यय (उपमाने कर्मसि च ३/४/४५) हुआा है। यहाँ राजा उपमेय है, 'पश्यन्ति' (देखना) साधारल धर्म है; 'इव' के मर्य का कृदन्तवुत्ति में ही प्रवेश हो रहा है अतः 'इव' आदि उपमावाचक शब्द का मप्रयोग (लोप) है तथा यहाँ कर्म उपपद होने पर सामुल् प्रत्यय में वाचकलुप्तोपमा है। (१३) 'पार्घराञ्चारम्' में उपमानवाचक कर्ता (पार्यः इव सञ्चरत) उपपद होने पर 'चद्' धातु से समुल् प्रत्यय (उपमाने कर्मसि च ३/४/४५ में '' से कर्त्ता का भी ग्रहुल है) होता है। यहाँ गजा उपमेय है, सज्चार यायारण धर्म है। यहाँ 'कर्ता' उपपद होने पर एमुस् में वाब रुसुप्तोपमा है।
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४७८ काव्यप्रकाश:
८ (क). ततः कुमुदनाथेन कामिनीगएडपाएडना। नेत्रानन्देन चन्द्रस माहेन्द्री दिगलड् कृता॥४०१॥ तथा- म (ख). असितभुजगभीपसासिपत्रो रुददरहिकाहित चित्ततूर्गचार:। पुलकिततनुरुत्कपोलकान्तिः पतिभदविक्रमदर्शनेऽयमासीत्॥४0२। ६-११. पौर सुतीयति जनं समरान्तरेऽसा- वन्तः पुरीयति विचिन्रचरित्रचुन्चु:। नारीयते समरसीम्नि कृपाएपाणे. रालोक्य तस्य चरितानि सपत्नसेना ॥४०३।। प्रभा-'वा' आदि उपमावाचक शब्दो के अप्रयोग में होने वाली उपमा 'वाचकलुप्तोपमा' कहलाती है। यह वाक्यगा नहीं होता; क्योंकि 'मुख चन्द्रः' कांशते' इत्यादि वाक्य से (जहाँ उपमावाचक शब्द सुप्त है) उपमा की प्रतीति नहीं होती। यह तद्धितगा अ्रथवा थोती भी नहीं हो सकती, क्योंकि तदितगा मे 'वति' आदि तद्धित एवं थोती में 'इव' आदि शब्द उपमा प्रतिपादक होते है औोर यदि उनका प्रयोग होगा तो वाचकलुप्ता कैसे रहेगी ? इसलिय यह समासगा इत्यादि भेद से ६ प्रकार की होती है। यह ६ प्रकार की आर्थी उपमा ही है, शरौती नही। समासगा भी दो प्रकार की होती है, (क) द्विपद-समासगा प्रर (स) बहुपद-समासगा। अनुवाद-उदाहरण (जसे)-(८.क. समासगा)-'तरपश्चात् कामिनी के फपोल (गण्ड) के समान पीतवर्स, नेतरो को मानन्द देने वाले कुमुदनायक चन्द्रमा ने महेन्द्र की दिशा (पूर्व) को अलक्कृत किया॥४०१॥ तथा (८. ख-समासगा)-पतू-योद्वाम्रों का पराक्रम देखने पर यह चोर ऐसा हो गया कि जिसको असिलता कृप्ससर्प के समान भपट्कर घो, उत्कण्ठा (रह- रुहिका) से व्याप्त चित होने के कारए जिसकी गति (चार=सन्चार) तीव्र हो गई
मो ॥४ ० २॥ थी, (शूरता से) शरीर पुलकित था, इसलिए कणोलों की भाभा प्रकट हो रही
प्रमा-(म क) 'तनः' इत्यादि द्विपदसमासगा वानकलुप्तोपमा का उदाहरस है। 'कामिनीमण्डपाण्ड:' का विग्रह है 'कामिनीगण्ड इव पाण्डुः' प्रथवा 'कामिनी- मण्डवत् पाण्ड:' । यहाँ पर उपमान (कामिनीगण्ड) तथा साधारण धर्मवाचक (पाण्ड) शब्दों का समास (उपमानानि सामान्यवचनैः २/१/५५) हुआ है। समास में ही उपमा की प्रतीति हो जाती है अतएव 'इव' आदि उपमावाचक पदों का प्रयोग नहीं होता। (६ सा) 'अशित' इत्यादि बहुपदसमासगा वाचव लुप्ता का उदाहरण है। यहाँ 'भसित- भुजग' उपमान है, 'भौपखता' मायारस धर्म है, 'असिपन' उपमेप है। इन तीनों पा ही रामाय्य हो रहा है भत. यहाँ वहुपदममाममा वादिलुप्तोपमा है। . ' ! अ्रनुवाद-(ह. १. ११)-'यह राजा पुरयासी जनों मे पुरवत् व्ययहार करना है, भद्भुत काय करने में प्रसिद्ध ('चुञ्यु' यह प्रसिद्धायंवाचा प्रत्यम है-तेन
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दशम उल्लास: ४७६
१२/ १३. मृधे निदाघवर्माशुदश पश्यन्ति तं परे। स पुनः पार्थसञचारं स्चरत्यवनीपतिः॥४·४॥। वित्तरचुञ्चुप्चसपौ ५/२/२६) होने वाला वह संग्राम के मध्य में ग्रप्तःपुर के समान आचरस (स्वच्छन्द विहार) करता है; जिसके हाथ में कृपाए है ऐसे उस राजा के युद्धभूमि में फार्यों (परातमों) को देसकर शत्रुसेना नारी के समान (भीर्ता का) आ्रचरस करने लगती है॥४०३॥। प्रभा-(६) 'पोर जन सुतीयति'-में 'पौरजन' उपमेय है, 'सुत' उपमान है-'सुतमि आ्चरति' इस त्रर्थ में उपमानवाचक कर्मरूप 'सुत' शब्द से क्यच् प्रत्यय (उपमानादाचारे ३/१/१०) होता है। उपमेयवाचक 'जनम्' शब्द मे द्वितीय विभक्ति होने से ही यह विदित होता है कि यहाँ कमंभूत सुत शब्द से वयच् प्रत्यय हुआ है। 'स्नेहपूर्वक पालन करना' आदि ही यहाँ आचार है, यही साधारस धर्म है। यहाँ 'इवो का अरथ (नामधातु रूप) वृत्ति मे ही अन्तर्निहित है, (क्यच् प्रत्यय तो इवार्थ का वाचक नही है) इसी से 'इव' आदि का प्रयोग नही होता तथा यहाँ कर्म से उत्पन्न वैयच् के प्रयोग में वाचकलुप्तोपमा है। (१०) 'समरान्तरेo' इत्यादि में समरान्तर उपमेय है, 'न्तःपुर" उपमान है। यहाँ उपमान-वाघक अघिकरणपद 'अन्तःपुर' से (उपमानादाचारे-अधिकरणाच्चेति ववतव्यम्-वार्तिक) क्यच् प्रत्यय होता है। यहां आराचार अर्ात् स्वच्छन्दगमन आदि ही साधारण धर्म है। अतएव पूर्ववत् यहाँ अधिकरसा वयच् प्रत्यय के प्रयोग में वाचकलुप्तोपमा है। (११) 'सपत्नसेना नारीयते' इसमें कर्तृ वाचक नारीपद से आ्चार सर्थ में कमद् (कर्तु: क्यङ् सलोपद्च ३/१/११) प्रत्यय होता है। यहाँ नारी उपमान है, सपलसेना-उपमेय (वरणनीय) है, आचार अर्थात् कातरतापूर्वक विनय आदि ही साधारणा धर्म है। यहाँ उपमाप्रतिपादक 'इव' आदि का प्रयोग नही होता इसलिए 'वयङ्' प्रत्यय के प्रयोग में वाचव लुप्तोपमा है। अनुवाद-(१२. १३)-शत्रु लोग (परे) उस (राजा) फो युद्धभूमि में (मृधे) ग्रीष्म ऋतु के सूयं (धर्मांशु) के सदश देखते हैं किन्तु वह राजा तो युद्ध में पर्जुन के समान विचरस करता है।४० ४॥। प्रभा-(१२) 'निदाघघर्माशुदर्शम्' उपमानवांचक कर्म (निदाघघमाशुम्) उपपद होने पर 'हृय्' धातु से भाव में एमुल प्रत्यय (उपमाने कमणि च ३/४/४५) हुंआ है। यहाँ, राजा उपमेय है, 'पश्यन्ति' (देखना) साधारंग धर्म है; 'इब' के अयं का कृदन्तवृत्ति में ही प्रवेश हो रहा है अतः 'इव' आदि उपमावाचक शब्द का मगयोग (लोप) है तथा यहाँ क्म उपपद होने पर समुल् प्रत्यय में वाचकसुप्तोपमा है। (१३) 'पार्थसच्चारम्' में उपमानवाचक कर्ता (पार्यः इव सञ्चरति) उपपद होने पर 'चद्ट' पातु से सामुल् प्रत्यय (उपमाने कर्मणि च ३/४/४५ में 'च' से कर्ता का भी ग्रहए है) होता है। यहाँ राजा उपमेय है, सज्चार सामारस धर्म है। यहाँ 'कर्ता' उपपद होने पर एमुल में वाचकलुप्तोपमा है।
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४५० 1 काव्यप्रकाश:
(१३१) एतद्विलोपे क्विप्समासगा ॥ ८ह॥ एतयोद्ध म्मवादो:। उदाहरगम १४. सविता विधवति विघुरपि सवितरति तथा दिनन्ति यामिन्य:। यामिनयन्ति दिनानि च सुखदुःखवशीकृते मनसि ॥४०५॥ १५. परिपन्थिमनोराज्यशतैरपि दुराक्रमः । सम्परायप्रवृत्तोऽसी राजते राजकुबजर:॥४०६।। (१३२) धर्मोपमानयोलोंपे वृत्तौ वाक्ये च दृश्यते। १६. दुयटुरसन्तो मरिहसि कएटशकलिआइ केअइवसाइ। मालइकुसुमसरिच्छ भमर, भमन्तो ए पाविषिसि॥४०७॥ अनुवाद-(द्विया ध्मवाचकलुप्ता) 'इन दोनों (धर्म तथा वाचक) का सोप होने पर किवय प्रत्यय तथा समास में (दो प्रकार की द्विलुप्ता-उपमा होती ह) (।३१) (कारिका में) ये दोनों अर्थात् साधारस धर्म और 'वा' आादि उपमायाचक का (लोप होने पर)। इनके उदाहरस हैं- (१४. विवय्गा)-चित्त के सुख या दुःख के बशीमूत हो जाने पर (कमशः) सूर्य चन्द्रमा के तुल्य, चन्द्रमा सूर्य के तुल्य, रात्रिया दिवस के तुल्य तथा दिवरा रात्रियों के तुल्य हो जाते हैं' ॥४०५॥ (१५. समासगा) 'शघुओं के शतशाः मनोरयों से भी दुप्प्राप्य (प्रजेष) यह भेष्ठ राजा (राजकुञ्जर.) युद्ध में प्रवृत्त हुआ शोभायमान है'॥४०६॥ प्रभा-(१४) 'सविता' इत्यादि किवपगा द्विलुप्तोपमा का उदाहरता है। यहां विधवति, सवितरति दिनन्ति और यामिनमन्ति-इन चारों मिन्यापदों में उपमान- वाचक विधु आदि शब्दों से (गर्वप्रातिपदिकेभ्यः निवप वा वत्तव्य :- बार्तिक के भनु- सार) आचार अर्थ में (विदुरिवाचरति-इति) विवप प्रत्यय होता है। यहाँ पर 'साचार' ही साधारण घर्म है। आचारायं मे विहित 'विवन्' प्रत्यय का लोप (वेरपृ- कस्य ६/१/६७) हो जाता है इसी हेतु ताधारसवर्म कन लोप कहा जाता है (वस्तुतः धर्म लोप नहीं है)। 'इव' आदि के भर्थ की प्रतीति होने पर भी उन शब्दों का पप्योग (लोप) है ही अतएव धर्म तथा वाचक का लोप होने से यहाँ पिनगा द्विलुप्तोपमा है। (१५) 'परिपत्यि' एत्यादि में समासगा द्विलुप्तोपमा है। यहाँ 'राजकुञजरः' इस समस्त पद में राजा उपमान है, कुम्जर उपमेय है (राजा कुं्जर: इव)। इन दोनों का समान (उपमित व्याघादिभि: सामान्याप्रयोगे २/।/२६) होता है। यापारसघमे (दुराधर्पत्व आादि) का अरप्योग है तथा 'इव' आदि का भी प्रयोग नहीं। अनुवाद्-(द्विया धर्मोपमानतुप्ता) धर्म औोर उपमान दोनों का (एक साथ) मोप होने पर वृत्ि भर्यात् समास में तथा वाकय में (हिसुप्ता) देगी जाती हैं। (१३२) १६. (समासागा) -'हे भ्रमर, फष्टकमुक्त पतकी वनों में दुन टनु शबा करते हए तुम भर जाओ्रोगे, किन्तु घूगते हुए मालती पुष्प-सुस्य (भन्य) को नहीं प्राप्त करोगे' ॥४०७।।
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दरम उल्लास: ४८१
(दुष्टुमायमानो मरिप्यसि कएटककलितानि केतकीवनानि। मालतीकुसुमसदच्ं भ्रमर, भ्रमन् न प्राप्त्यसि ।४४०७ १७. कुसुमेन सममिति पाठे वाक्यगा। (१३३) क्यचि वाद्य पमेयासे। आसे निरासे- १८. अरातिविक्रमालोकविकस्वरविलोचनः । कृपाणोदग्रदोदणड: स सदस्ायुघीयति ।।४०८।। अत्रात्मा उपमेय: । (१३४) त्रिलोपे च समासगा ॥६० | 1
1 १७. यहाँ फुसुमेन समम' यह पाठ होने पर वाघयगा (दिलुप्ता) होती है।' प्रभा-यद्यपि जहाँ शब्द अपने अवयवों के सर्थ के अतिरिक्त अर्थ का अभिधान करता है, वह वृति कहलाती है- 'परार्थार्भिधानं वृततिः', वह वृति पाँच प्रकार की है-कृत्, तद्धित, समाम, एवदोप तथा सनादन्त धातु, तथापि कारिका में वृत्ति शब्द से 'समास' का ग्रहण होता है; क्योंकि धर्म तथा उपमान का लोप होने पर समास के अतिरिक्त कोई और वृत्ि सम्भव ही नही है। +- (१६) 'मालती कुसुमसदृक्षम् में 'मालती' उपमेय है; क्योंकि यही वणनीय है, 'सदृक्षम्' उपमावाचक शब्द है। यहाँ उपमान (अन्य कुसुम) तथा साधारण धर्म का लोप है अतः समासगा धर्मोपमानलुप्ता है। (१७) 'कुमुमेन समम्' में समास का परभाव है, अतः वाक्यगा धर्मोपमानलुप्ता उपमा होगी। अनुवाद-(एकधा वाचकोपमेयतुप्ता) वा आदि तथा उपमेय दोनों का (एक साथ) लोप होने पर वयच् प्रत्यय के विपय में (द्विलुप्ता) होती है। (१३३) (कारिफा में) 'आसे' अर्यात् निरास (अनुपादान या लोप) होने पर। (१८) 'शत्रुओ्रं के पराक्रम के अवलोकन से जिसके नेत् विकसित हो जाते हैं, कृपाण के ग्रहण से जिसका भुजदण्ड भीपए है वह यह राजा सहस्त्र आयुध धारस करने वाले सहस्रबाहु के समान अपने आपको समझने लगता है॥४०=॥
है) यहाँ पर (राजा का) आात्मा सर्थात् अपना स्वरूप ही उपमेय है (जो लुप्त
प्रभा-(१८) 'सहस्रायुधीयति' मे 'सहस्रायुधम्' दब भात्मानम् भाचरति इस अर्थ में उपमानवाचक सहस्रायुघ शब्द से आ्चार अ्रर्थं में क्यच् प्रत्यय (उपमानादाचारे) होता है। अपने आपको 'दुजय मानना' ही यहाँ माचार है। यही साधारण धर्म है। यहाँ उपमेय स्वयं राजा (आतमा) ही है, उसका तथा उपमावाचक 'वा' आदि का अप्रयोग (लोप) है अतएव 'वा' आदि-उपमेय सुप्ता उपमा है। अनुवाद- (एकघा तिनुप्ता) तोनों का लोप होने पर समासगा (त्रिलुप्ता) होती है (१३४) 'प्रयाणाम्' (तीनों का) अर्थात् वादि (उपमायाचक), धर्म तथा
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४६० 1 काव्यप्रकाश:
(१३१) एतद्विलोपे क्विप्समासगा ॥। ८६।' एतयोद्ध म्मेवाद्योः। उदाहरयम १४. सविता विघवति विघुरवि सवितरति तथा दिनन्ति यामिन्य:। यामिनयन्ति दिनानि च सुखदुःखवशीकृते मनसि ॥४०५॥। १५. परिपन्थिमनोराज्यशतैरपि दुराक्रमः । सम्परायप्रृत्तोऽसी राजते राजकुञ्जर: ॥।४०६।। (१३२) धर्मोपमानयोलोंपे वृत्ती वाक्ये च दश्यते। १६. टुएटुरणन्तो मरिहसि कएटशकलिआइ' केशइवसाइ। मालइफुसुमसरिच्छ भमर, भमन्तो ए पार्विहिसि ।४c७॥ अनुवाद-(द्विया धर्मवांचकलुप्ता) 'इन दोनों (धर्म तथा याचर) का लोप होने पर दिवप प्रत्यय तथा समारा में (दो प्रकार की द्विलुप्ता-उपमा होती है) ((३१) (कारिका में) ये दोनों अर्थात् साधारस धर्म और 'घा' आदि उपमायाचक का (लोप होने पर)। इनक उदाहरए हैं- (१४. विवप्गा)-'चिंत के सुल या दुःस के वशञीमूत हो जाने पर (कमशः) सूर्य धन्द्रमा के तुल्य, चन्द्रमा सूर्य के तुल्य, रात्रियाँ दिवस के तुल्य तथा दिवस रात्रियों के तुल्य हो जाते हैं ।।४० ५।। (१५. समासगा) 'शनुओ्रं के शतशः मनोरथों से भी दुष्प्राप्य (पजेय) वह थेष्ठ राजा (राजकुञ्जर:) युद्ध में प्रयृत्त हुआ शोभायमान है'॥४०६॥। प्रभा-(१४) 'सविता' इत्यादि वितप्गा द्विलुप्तोषमा का उदाहरण है। यहाँ विघवति, सवितरति दिनन्ति औौर यामिनयन्ति-इन चारों मियापदों में उपमान- वाचक विघु आदि शब्दों से (गर्वप्रातिपदिकेम्यः वितप वा मतव्यः-वार्तिक के सनु- सार) आचार पर्थ में (विधुरिवाचरति-इति) वियय प्रत्यय होता है। यहाँ पर 'साचार' ही साधारस धर्म है। आवाराय में विहित 'बितन्' प्रत्यय का लोप (वेरपृ- कस्य ६/१/६७) हो जाता है इसी हेतु साधारसयम का लोप कहा जाता है (वस्तुतः घर्म लोप नहीं है)। 'इव' आदि के अर्थ की प्रतीति होने पर भी उन सब्दों का समयोग (लोप) है हो पतएव घर्म तथा वाचक का लोप होने से यहाँ विवपगा दविलुप्तोपमा है। (१५) 'परिपन्थि' इत्यादि में समासगा द्विसुप्तीपमा है। यहां 'राजनुञ्जरः' इस समस् पद में राजा उपमान है, कुज्जर उपमेय है (राजा गुख्जर: इष)। इन दोनों का समास (उपमित व्याछादिर्भि: मामान्याप्रयोगे २/१/२६) होता है। सामारणपमे (दुराधर्पत्व आदि) का अप्रयोग है तथा 'दव' आदि का भी प्रमोग नहीं। अनुवाद-(द्विधा धर्मोपमानलुप्ता) धर्म और उपभाग चोनों का (एक साथ) मोप होने पर वति भर्थात् समास में तथा वापय में (हिसुप्ता) देसी जाती है। (१३२) १६. (समासगा)-'हे भ्रमर, फष्टकयुक्त केतकी मनों में टन टन शब्ब करते हए तुम मर जप्रोगे, किन्तु घूमते हुए मालती पुप्पतुल्य (पन्म) को नहीं प्राप्त कशोगे ॥४०७।
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दशम उल्लास: ४८१
(टुष्टुणायमानो मरिप्यसि कसटककलितानि केतकीबनानि। मालतीकुसुमसहच्ं भ्रमर, भ्रमन् न प्राप्त्यसि ॥४०७॥ १७. कुसुमेन सममिति पाठे वाक्यगा। (१३३ ) क्यचि वाद्य पमेयासे। आसे निरासे- १८. अरातिविक्रमालोकविकस्वरविलोचनः । कृपाणोद्ग्रदोदएड: स सहस्रायुघीयति॥४०८॥। शरत्रात्मा उपमेय: । (१३४) त्रिलोपे च समासगा ॥६०। १७. यहां फुसुमेन समम' यह पाठ होने पर वावयगा (द्विलुप्ता) होती है। प्रभा-यद्यपि जहाँ शब्द अपने अवयवों के अर्थ के अतिरिक्त अर्थ का अभिधान करता है, वह वृति कहलाती है- 'परार्थाभिधानं वृत्तिः', वह वृति पाँच प्रकार की है-कृत्, तद्धित, समास, एकशेप तथा सनाद्यन्त धातृ; तथापि कारिका में वृत्ति शब्द से 'समास' का ग्रहण होता है; क्योंकि धर्मे तथा उपमान का लोप होने पर समास के अतिरिक्त कोई औ्रर वृत्ति सम्भव ही नही है। (१६) 'मालती कुमुमसदृक्षम् में 'मालती' उपमेय है; क्योंकि यही वर्णनीय है 'सहृक्षम्' उपमावाचक शब्द है। यहाँ उपमान (अन्य कुसुम) तथा साघारण धर्म का लोप है मतः समासगा धर्मोपमानलुप्ता है। (१७) 'कुसुमेन समम्' मे समास का अभाव है, अत. वाक्यगा धर्मोपमानलुप्ता उपमा होगो। अनुवाद्-(एकधा वाचकोपमेयलुप्ता) वा आदि तथा उपमेय दोनों का (एक साथ) लोप होने पर वयच् प्रत्यय के विषय में (द्विलुप्ता) होती है। (१३३) (कारिका में) 'आसे' पर्यात् निरास (अनुपादान या लोप) होने पर। (१८) 'शत्रुओ्र्रों के पराक्रम के अवलोफन से जिसके नेत्र विकसित हो जाते है, कृपास के ग्रहस से जिसका भुजदण्ड भीपए है वह यह राजा सहस्र आयुध धारए करने वाले सहस्रबाहु के समान अपने आापको समभने लगता है ॥४०८॥
है) ! ,यहाँ पर (राजा का) आत्मा अर्थात् अपना स्वरप ही उपमेय है (जो लुप्त प्रभा-(१८) 'सहस्रायुघीयति' में 'सहस्रायुधम्' इव श्र्परात्मानम् आ्र्पराचरति इस अरर्थं में उपमानवाचक सहस्रायुध शब्द से आचार अ्र्थ में वयच् प्रत्यय (उपमानादाचारे) होता है। अपने आपापको 'दुर्जय मानना' ही यहां भावार है। यही साधारण धर्म है। यहाँ उपमेय स्वयं राजा (आत्मा) ही है, उसका तथा उपमावाचक 'वा' आदि का अप्रयोग (लोप) है अतएब 'या' यादि+उपमेय सुप्ता उपमा है। अनुवाद्-(एकधा त्रिलुप्ता) तीनों का सोप होने पर समासगा (त्रिसुप्ता) होती है (१३४) 'त्रयाणणम्' (तीनों का) अर्थात् वादि (उपमायाचक), धर्म तथा
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४८र ] वगव्यप्रकाश:
प्रथाणां वादिघर्मपमानानाम्। उदाहरसम्- १६. तरुसिमनि कृतावलोकना ललितचिलासचितीएविमह्ा। रम रशरविस राचितान्तरा मृगयना हरते मुनेर्मन:॥४०६॥ अत्र सप्तम्युपमानेत्यादिना यदा समासलोपौ भवतस्तदेदमुदाइरयम्। क ररस्याचारस्यायः शूलतयाऽध्यवसायात् अयः शूलेनान्विच्छ्ति,आय :- शूलिक इत्यतिशयोक्तिन तु क्रराचारोपमेय-तैदल्यघर्म-वादीनां लोपे त्रिलोपेयमुपमा उपमान का। जैसे-(१६) 'जिसने (अपने शरीर में) योधन का अयलोकन किया है (किशोरी), लसित औौर विलास (शृज्जार से उत्पन्न विशेष प्रकार की चेप्टाओों) को अपना शरीर (विग्रह) समर्पित कर दिया है, काम के वाखग-समुदाय (शर-विसर) से जिसका हृदय व्याप्त (पाचित) है, ऐसी मृगनयनी मुनियों के भी मन को हर लेती है'।४ . E।। यहाँ पर 'सप्तम्युपमान-पूर्वददस्य बहुव्रीहिसतरपदल्तोपरच' इत्यादि (वातिक) से जय समास तथा (उत्तरपद का) लोप होता है, तभी यह (त्रिलुप्ता फा) उदाह- रस है। प्रभा-उपमावाचक, साधारणयम तथा उपमान-इन तीनों ध लोप होने पर तिलुप्ता होती है। उपमेपोपमानधर्मलुप्ता अयवा उपमेयधर्मवादितुप्ता रूप में यह नही हो सफती। क्योकि उपमेय के बिना अन्य किसी एक भ्रन्भ से उपमा का बोष नहीं हो सकता। वाक्यगा और तद्धितगा भी यह नहीं होती, क्योंकि वहा केवल उपमेय से उपमा का बोध नही हो सकता। यह थोती भी नहीं, कयोकि इव पादि का लोप हो जाता है। अतः केवल समारागा आर्थी ही होती है (प्रदीप)। 'मृगतपना' तभी विनुप्तोपमा का उदाहरण होता है जबकि महा 'मृगलोचने इव (चच्चले) नयने मस्थाः' यह मर्थ विनक्षित है तया 'अनेरुमन्यपदाे' २/२/२४ पाशिनिसूत पर स्थिति 'सप्तम्युपमानपूर्वपदशय बहयीहिसतरपदलोपश्प' इस कार्यायनवृत यार्तिक द्वारा नयन शब्द के साथ समास होता है मौर पूर्वपद (मृगलोचन) में से 'लोचन' शब्द का लोप हो जाता है। इस प्रवार यहाँ पर 'सोचन' इस उपमान का 'इय' दाब्य का तथा 'चरचा' इस साधारण धर्म का ब्रहम् नहीं किया गया, केवल उपमेयरुप 'नबन' का प्रहस किया गया है भतएव निसुप्तोपमा (समासगा) है। 7- यदि (कातन्तर व्वाकरण के अनुगार) 'मृग' शब्द या ममखा द्वारा मृगलीचन पर्प में प्रयोग किया जाय तब को 'कृग दव नयगे चग्या: सा घृगनबना 'मह सनास होगा सथा यह निलुम्सोपमा था उदाहरस न होगा अवि सु वादिषमसुप्ता या उदा- हरसा होगा। +
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दशम उल्सास: | ४८३
ह उपमाभेदपरिगणना ] एवमेकोनविशतिर्तुप्ता: पूर्णाभिः सह पञ्चविशति: । अनयेनेवराज्यश्रीदैःयेनेव मनस्विता। मम्लौ साऽथ वियादेन पदिमंनीव हिमाम्भसा॥४१०॥ इत्यभिन्न साधारणे घर्मे। ज्योत्स्नेव नयनानन्दः सुरेव भदकारगम्। प्रभुतेव सम।कृष्टस वेलोका नितम्बिनी ॥४११।। का. अयः शुल (भाला) के साथ तादात्म्य मानकर (अध्यवसायात्) 'अथः शूल से व्यष- हार करता है' (अन्विच्छति) एतदर्थक, 'भायः शुलिक' पद में अरतिशयोक्ति अलद्धार है। (१। कूराचरण रूप उपमेय, (२) तोक्ष्खता रूप साधारस धर्म तथा (३) 'या' परादि:(उपमावाचरु) का लोप होने पर यहाँ त्रिलुप्ता उपमा नहीं है। प्रभा-कुछ आलद्कारिक (प्रतिहारेन्दुराज आदि) का मत है कि. उपमान- मान का ग्रहण करने पर भी त्रिलुप्ता (उपमेयधर्मवादिलुप्ता) तद्धितगा उपमा होती हैं; जैसे 'झाग. झूलिक' पद मे है। 'अयः शूलेन त्ररन्विच्छतति (व्यवहरति)'.इस, विग्रह में 'गयः झूलदण्डाजिनाभ्यां ठक्टजौ' ५/२/७६ सूत्र के द्वारा अयः झूल शब्द-से ठक् प्रत्यय होकर 'आमशूलिक' शब्द बनता है। जो व्यक्ति मृदु उपाय से साध्य अरय के लिये कर आचरण करता है वह आय-शूलिक कहलाता है। यहाँ. शयः शूल शब्द फ्रूर आचरण का उपमान है, तीक्ष्णता आदि साधारण धर्म है। उन दोनों का ग्रहण नहीं किया गया तथा वादि का भी। इस प्रकार उपमेयवर्मवादिलुप्ता तंद्धितगा तिलुप्ता उपमा है। इस पर काव्यप्रकाशकार का कयन है कि यहां त्रिलुप्तोपमा. नहीं अपि तु अ्तिशमोक्ति अलङ्वार है, क्योकि यहाँ उपमेय रूप कूराचरण का अ्रय: शूल रूप उपमान के द्वारा निगरस किया गया है तथा अय: झूल के तादात्म्य रूप मे निर्देश किया गया है। यदि ऐसे स्थल पर भी उपमा अलद्वार होगा तो 'निगीर्या- ध्यवसानमूला' अतिशयोक्ति कहाँ हुआ करेगी ? अनुवाद्-इस भांति १६ प्रकार की लुप्तोपमा (६ प्रफार की) पूररोपमाभों सहित २५ प्रकार की होती है। (मालोपमा) (क) अनीति से राजलक्ष्मी के समान, दीनता से मनस्विता के समान तथा हिमजल से कमलिनी के समान वह नायिका (विरहजनित) वेदना से म्लान हो गई' 1४१०॥ यहाँ पर (म्सानता रूप) साथारस धम के समिस (एक रप) होमे पर। तथा (स) 'प्रस्तनितम्ब वाली नाविका चन्तिरिका के रामान नेयों को श्रानन्द देने वाली है। मदिरा के समान मद उत्पन करने वाली तथा प्रभुता के समान समस्त सोक को आकृष्ट करने वाली है।४११॥
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४e४ ] काव्यप्रकान: 44
इति भिन्ने व तस्मिन् एकस्यैव चहूपमानोपादाने मालोपमा। यथोत्तरमुपमेयरयोपमानत्वे पूर्ववद भिन्नभिन्नधर्मत्वे-
, भगितिरिव मतिर्मतिरिव चेष्टा चेप्टेव कीर्तिरतिविमला ॥४१२॥ मतिरिव मूचतिर्मधुरा मृर्तिरिव सभा प्रभावचिता। तस्य सभेव जयश्राः शक्या जेतु' नृपस्य न परेपाम् ॥४१३॥ इत्यादिका रशनोपमा च न लक्षिता एवंविघवैचित्र्यसहससम्भवात, उक्तमेदान तिक्रमाच्च। इत्यादि में उस (साधारस धर्म) के भिन्न-भिन्न होने पर जो एक (उपमेय) के सिमे हो भनेफ उपमानों का प्रयोग किये जाने पर (दो प्रकार के) मालोपमा होती है। एवं (पूर्व पूर्व) उपमेध का उत्तर-उत्तर उपमानस्य हो जाने पर मालोपमा के समान (पू्वंधत्) (क) सभिन्न तथा (ए) भिन्न साधारख धर्म होने पर-(फ) 'निर- न्तर स्वर्णं-दान के लिये (संफल्प के) जलबिन्दुभों से पूसं जिसके हाथ में याचकसमूह (सतिः) यशिबद्ध (तरद्मित) है, ऐसे हे राजन् आपकी उक्ति के समान युद्धि, बुद्धि के समान पेप्टा (पाघरल), पेप्टा के समान कीति अत्यन्त बिमल है ॥४१२। (ख) 'उस राजा को मति के समान ही मधुर मूर्ति है, भूति के समान सभा प्रभाययुक्त है तथा सभा के समान जयलक्षमी वघुओं के द्वारा जोते जाने योग्य नहीं है' ।४१ ३ ।। जो उपयु'क्ॢ (दो प्रकार की) रशनोपमा है वह यहां (सक्षसादि द्वारा) प्रदशित नहों की गई क्योंकि (i) इस प्रकार की सहसों विचिनताएँ सम्भय है तथा (ii) ये उक्त (२५) नेदों से प्रतिरिकत नहीं है मर्मात् उनमें ही इनका भग्तर्भाव हो जाता है। प्रभा-(१) उपयुक प्रकार से उपमा के २५ प्रकार ही भाघायं गम्मट को भभीष्ट है। वे २५ प्रकार हैं -- पूर्णोपमा-(१ थोती तथा ३ धार्थी) X (१ वागयमा, २ समासगा, ३ तद्धिरगा) == ६ . एकलुप्ता-(घर्मलुप्ता ५ +उपमानलुप्ता · -वापकसुप्ता ६) == २२ =X निसुप्ता- == 1 - (२) प्रानीन पचार्यो (रद्रट भादि) ने उपमा के सन्य भेदों का भी निर्पस किया है; जैसे-मालोपमा औौर रशनोपमा पादि। वरा एक ही उपमेय का वरत से रुपमानों से साधम्यं दिसालाया जाता है यहाँ मासोपमा होती है। यह दो प्रार की होती है- (र) सायाग्क धर्म को पभिप्रता होने पर; जैसे 'मनयेन' पर्वादि मे
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(१३५) उपमानोपमेयत्वे एकस्यैवैकवाक्यगे। अ्रनन्वयः । उपमानान्तरसम्वन्धाभावोऽनन्वयः। उदाहरयम्- न केवलं भाति नितान्तकान्तिर्नितम्विनी सैव नितम्बिनीव। यावद्विलासायुघलास्यवासास्ते तद्विलासा इव तद्विलासाः ॥४१४॥ राज्यश्री आादि अ्रनेक उपमानों का 'म्लानता' ही साधारण धर्म है तथा नायिकारूप उपमेय का राज्यशरी आदि अ्नेक उपमानो से सम्बन्ध है। (ख) साधारण धर्म के भिन्न २ होने पर; जैसे 'ज्योत्स्ना' इत्यादि पद्य में 'ज्योत्स्ना' इत्यादि अ्र्परनेकं उपमानों के नयनानन्दहेतुता आदि साधारस धर्म भिन्न २ हैं तथा एक ही नितम्बिनीरूप उपमेय का ग्र्रनेक उपमानों से सम्बन्ध है। रशनोपमा वहाँ होती है जहाँ पूर्व पूर्व उपमेय आगे आगे (उत्तरोत्तर) उपमान होता जाता है। यह भी मालोपमा के समान धर्म की अभिन्नता तथा भिन्नता होने पर दो प्रकार की होती है। जैसे-(क) 'अनवरत' इत्यादि मे 'भसितिरिव मतिः' मे (पूर्व) जो उपमेय है वही 'मति' 'भतिरिव चेप्टा' में उपमान बन गया है। इसी प्रकार आगे की उपमाओं मे भी है। यहां सभी उपमाओं में 'विमलता' ही साधारण धर्म है। (ख) 'मतिरिव' इत्यादि मे भी पूर्व पूर्व 'भूतिः' मादि उपमेय उनरोत्तर 'मूर्तिरिव सभा' आदि मे उपमान बन गये हैं, किन्तु यहा साधारण धर्म 'मधुरता' आदि भिन्न २ हैं। (३) आचार्य मम्मट का कथन है कि मालोपमा तथा रशनोपमा आदि विविध भेदों का पृथक विवेचन करना युक्तियुक्त नही, क्योंकि एक तो इस प्रकार अ्रन्य भी सहस्रों उपमा के भेद हो सकते हैं अतः सबका विवेचन सम्भव ही नही; दूसरे उप्युक्त २५ भेदो मे ही इन सबका अन्तर्भाव हो जाता है। टिप्पणी-मम्मट के इन २५ उपमा-भेदों का आधार व्याकरण सम्बन्धी विश्लेषण (वाक्य, समास, तद्धित आदि) है। उनसे पहले भी उद्भट ने व्यांकरण के आधार पर उपमा का विभाजन किया. था। अप्पय्य दीक्षित का (चित्रमीमांसा मैं) कथन है कि इस प्रकार का विभाजन साहित्यशास्त्र में विशेष उपयोगी नही। साथ ही मम्मट का विभाजन सर्वाद्गीण भी नही कहा जा सकता। अनुवाद-(२. अनन्वय) एक ही वस्तु के एक वाकय में उपमान तथा उपमेय रूप होने पर अनन्यय मलद्धार होता है। (१३५) म्रन्य उपमान के सम्बन्ध (अ्रव्वय) का पभाव ही अनन्वय है। जसे-'केवल प्रतिशय कान्ति वाली वह नितम्बिनी (प्रशस्त नितम्बों थाली) हो उस नितम्चिनी के समान शोभायमान नहीं है, किन्तु (यावत्) फामदेव (विलासापुध) के मृत्यस्यस रूप (लास्यवासा:) उस (नायिफा) के घे हायभाव (वितास) भी उसके विसासों के समान ही है ॥४१४॥
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४=६ j काव्मप्रकार:
(१३६) विपर्यास उपमेयोपमा तयोः ॥६१॥ तयोरुपमानोपमेययो: परिवृत्ति: अर्थाद्वाप्यदये-इतरोक्मानव्यच्छेद- परा उपमेयेनोपमा इति,उपमेयोपमा। उदाहरयम- कमलेव. मतिर्मेतिरिव कमला तनुरिव विभा निभेव ततुः ।" घरणीव घृतिर्धृतिरिव धरयो.सततं विभाति वत यस्थ ।।४२५।। प्रभा-यहाँ पर 'नितम्विनी' आदि वस्तु स्वयं ही उगमान तथा उपमेय रूप में गहीत की गई है अन्य कोई उपगान नहीं है अतएव अनन्वय अतछार है। मदि देशान्तर या कालान्तर में होने वाली उसी वस्तु को भिन्न माना जाय और उससे ही साधम्य दिसलाया जाय तो उपमा ही होगी। टिप्फ्सी-(i) यहाँ 'एकस्य' शब्द द्वारा अ्नन्वय का उपमा से भेद प्रकट किया गया है। उपमा मे उपमान और उपमेय भिन्न २ होते हैं किन्तु शनन्वय में एक ही चस्तु, उपमान तथा उपमेय होती है। उपमा दो यस्तुमों के सापर्म्य पर ग्राथित है किन्तु पनन्वय में अन्य किसी सदय वस्तु की व्यावृत्ति होती है। (ii) 'एव' (=ही) शउ्द से यह प्रकट किया गया है कि जन एक ही शब्द से उपमाग सथा उपमेय का कथन किया जाम तभी अनन्नय होता है, दो पर्याप सब्दो से कहे जाने पर भी नहीं होता। 'अतः अस्याः वदनमिवास्याः वतत्रम्'-यहा अ्रनव्वय नही। (iii) 'एकयाामे' शब्द से रदानोपमा तथा उपमेयोपमा से पनन्नय का भेद दिसलाया गया है। यदपि रशनोपमा और उपमेयोपमा में एक ही वस्तु उपमेय तथा उपमान हो जाती है तथापि वह भिन्न २ वाक्यों में होती है, एक में नहीं। •: : अनुवाद- (३. उपमेयोपमा) वन ,दोनों का परियर्तन उपमेयोपमा मस- ददवार है। (१३६) (कारिका में) 'तयोः' (जन दोनों) सर्थात् उपमान तथा उपमेय का। परिवृत्ि (विप्यास) अर्यात् वो वाकयों में (मदलकर रहना)। उपमेपोपमा :धर्यात् उपमेय के साय उपमा जो कि (प्रकृत उपमान से) भिन्न उपमान को प्यावृति कराती है। उदाहरए हे- ।. 'गिरा (राजा) की सदमी के समान युद्धि है, युद्धि के रामान सबमो है, सरीर के समान कारिति है, कान्ति के समानपरीर है, पससी के ममान ध्म है, तथा धैयं के समान धरली निरग्तर शोभायमान है॥*१५॥ 4 :प्रभा- (१) यहाँ लदगी मर मति में 'सृरसीया' सापाग्स भरम है, गरीर और कान्ति में 'प्रपय' तया परखी मोर पुति में पिस्सार' रप सापारस भर्महै। प्रथम वाकम मे सपृह्गोयता रूप मर्म के साम्य से 'मति' की 'मा' के समान कहा गया है। द्वितीय वाकम मे भी दम्री धर्मू की समानया से "एमता' को 'मतति' के समान कहा गया है। इगपा भभिप्ाय यह-है कि स्पृगीयता में इम दोनों महमुपों के सहन वृनीय वस्तु नही है, बहीं पतरोपमानवव्वत्पेन है। इमी विशेषता के राप्स मह तपमा से मिन्न है।
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देशैम उल्लास: t 4444
(१३७) सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत् । समेन उपमानेन। उदाहरणम्- उन्मेपं यो मम न सहते जातिवैरी निशाया- मिन्दोरिन्दीवरदलदृशा तस्य सौन्दर्यदपः। नीतः शान्ति प्रसभसनया वक्त्रकान्त्येति हर्षा- ल्लग्ना मन्ये ललिततनु, ते पादयो: पद्मलदमी.।४१६। लिम्पतीव तमोऽ़द्गानि वर्पतीवाब्जनं नभः। A शसत्पुरुपसेवेव दष्टिर्विफलतां गता॥४१३॥ इत्यादौ व्यापनादि लेपनादिरूपतया सम्भावितम्। उपमा-और उपमेयोपमा-(क) उपमा मे साधर्म्य दिखलाया जाता है किन्तु उपमेयोपमा मे उपमान और उपमेय से भिन्न किसी तृतीय समान वस्तु की व्यावृत्ति (तृतीयसद्टशव्यवच्छेद) दिखलानी होती है। (सत्र) यद्यपि रसनोपमा में भी कोई उपमेय द्वितीय वाकय में उपमान बन जाता है तथापि वहाँ वह दूसरे उपमेय का उपमान होता है; जँसे-भणितिरिव मतिः->मतिरिव चेप्टा'। किन्तु उपमेयोपमा में कोई उपमेय प्रथमवाक्योक्त उपमान का ही उपमान बन जाता है; जसे कमलेव मति :- मतिरिव कमला । अ्नुवाद-(४. उत्प्रेक्षा) जो प्रकृत (वर्सनीय) वस्तु की सम धर्थात् 'उप- "मान के साथ सम्भावना करना है, यही उत्प्रेक्षा अलद्गार है (१३७)। (कारिका में) समेन अर्थात् उपमान के साथ। उदाहरण हैं-(प-हे तूतनेक्षा)-[नायक की नायिका 'के प्रति उक्ि] •हे सुन्दर शरीर वाली (प्रेयसि), मैं सयभता हूँ कि कमल की शोभा "इस हर्ष से चुम्हारे चरखों में गिर गई है (लग्ना-सक्ता, परता) कि इस कमल सद्श नेत्रों वाली सुन्दरी ने अपने मुख की कान्ति से उस चन्द्रमा के सौन्द्यदर्प को बलपूर्वक निवारस कर दिया है जो मेरा (कमलशोभा का) -सहजशत्् है तथा रान्रि में मेरे विकास (उन्मेषं) को सहन नहीं कर सकता' ॥४१६।। (स-क्रियास्तरूपोत्प्रेक्षा)-'मानों अ्न्धकार प्रङ्गों को लिप्त (लोप) कर रहा है; प्रकाश फाजल सा बरसा रहा है 'इससे दु्जन को सेवा के समान दृष्टि व्ययं हो गई है' ॥४१७॥। इत्यादि में (अन्धकार के) फैलने आदि की लेपन आदि के रूप से सम्भावना की गई है'।।४१७1। प्रभा-(१) जब वणंनीय वस्तु (उपमेय) में सदृश वस्तु (उपमान) की सम्भावना को जाती है तो उत्प्रेक्षा सलङ्गार होता है। सम्भावना का अर्थ है- आहार्य शान, किसी वस्तु के यथार्थ रूप को जानते हुए भी उसमें अन्य वस्तु की कल्पना करना। उत्प्रेक्षा के लिये आवश्यक हैकि (क) जिसमे सम्भावना की जाती है यह कोई यथार्थ वस्तु होती है, जैसे -- 'मुख मानों चन्द्रमा है' यहाँ 'मुस' ययारथं
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कांव्यप्रकांरं:
वस्तु है, (ख) यह सम्भांवना सादृय्य के आधार पर होती है; अर्थात् उत्पेक्षा का आधार उपमान-उपमेय-भाव ही है, यह वात यहाँ 'समेन' शब्द द्वारा प्रकट होती है। (ग) सम्भावना आहायं ज्ञान अर्यात् कल्पना-जंन्य होती है। 'मुख मानो चन्द्रमा है', यह कहने वाला व्यक्ति मुख औोर चन्द्रमा के भेद को मानता है तथा मुम में चन्द्रमा की कल्पना कर लेता है। (घ) यह उत्प्रेक्षा मन्ये, शङ्ट, घुवं, प्रायः, नूनम्, प्ररवैमि, ऊहे, सम्भावयामि, उत्प्रेक्षे, स्यात् तथा इब आदि शब्दों से जानी जाती है। किन्तु कहीं-पही इन शब्दों के प्रयोग के बिना भी उत्नरक्षा होती है, वह गम्पोतर क्षा या प्रतोयमानोतमक्षा (व्यङ्गघोतयेक्षा या उत्परक्षा ध्वनि) कहलाती है, जिसके उदाहर ऊपर मलद्गार ध्वनि में देसे जाते सकते हैं। यहाँ तो वाच्य उत्प्रका के दो उदाहरया
(i) 'उन्मेपम्' आदि यहां स्वाभाविक चरसाशोभा उपमेय है, उनमें उपरयुक्कतहर्प - के हेतु से चरणों मे लिपटने वाली फमलशोभा (उपमान) की सम्भावता की गई है। अत्तएव हेतुतप्रंक्षा भलद्वार है। (ii) "सिम्पति' इत्यादि मृच्छकटिकका पद्य है। यहां अन्धकार की प्रङ्भों में व्याप्ति को 'लेपन' के रूप में उत्प्रकित किया गया है तथा कालिमा के प्रसरण में 'व्पण' की समभावना की गय है, पतएव यहां मिया- स्वरूपोत्प्रेक्षा है। यहाँ 'इव' शब्द सम्भावना अर्थ में है। (२) उपमा मर उत्पेक्षा का अन्तर-(क) उत्परेका में मन्ये, सङ्के आदि उत्परेक्षाद्ोतक शब्दों का प्रयोग होता है, फिन्तु उपमा में नही । (स) 'इय' शमद उपमा और उत्लेक्षा दोनों का धोतक है। इस का प्रयोग होने पर दोनों के भेवक तत्व मे हैं-(i) उत्प्रेक्षा में इव' भन्द का प्रयोग प्रायः मिया के साथ होता है, जैसे तिम्पवीव तमोडद्वानि, किन्तु उपमा में संक्ञा के गाप, जैँसे-मुग चन्द्र इष। (ii) उपमा का साधार सादृश्य है और उतेक्षा का सम्भावना। ज्य उपमान सोक़ प्रसिद्ध होता है तो दव शब्द सादूश्य के नकट करता है तथा उपमा होती है, जँगे मुस पन्द्र इव'। किन्तु जय उपमान कत्पित होता है तो 'इय' गम्त सम्भायना को प्रकट करता है औोर उस्प्क्षा होती है, जँगे-'मस्याः मुसम् भपरदषन्द्र दव'। महा 'पपर चन्त्र कविषस्पित है, लोफपसिद्द नहीं। (iii) अप्पत्य दीकित के धनुसार जय उपमान किसी ऐे विनेपस से विभिष्ट होता है जो राम्भायना को प्ररुट परने में सहापक हो तय उत्पेक्षा होती है, जैसे मुशम् भवदचन्द्र दष'। i1. टिप्प्ली-(i) माचार्य मम्मट ने उत्प्रेक्षा के भेदप्रमेशों को मर ध्यान हीं दिया। आमे घलकर विश्यनाय आदि ने इसके धनेक भेवन्प्रभेय रिगसागे हैं। उनमें Li सीन मुरुय भेर है- त्यस्पोसरेक्षा, हेवुखेक्षा, पतोखेग। (ii) पह् 'मिग्पनीय' . अa! wIi" मन का निरान रा मिम दिया गया है।
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देशमे उल्लांस:
(१३८) ससन्देहस्तु भेदोवती तदनुक्तौ च संशयः ।६२॥ भेदोक्तौ यथा- शयं मार्तएडः किं? स खलु तुरगैः सप्तभिरितः कृशानुः कि ? सर्वा: प्रसरति दिशो नैप नियतम्। कृन्तान्तः किं १ साक्षान्म हिपवहनोऽसाविति चिरं समालोक्याजी त्वां विदघति विकल्पान्प्रतिभटाः।४१=।। भेदोक्ता वित्यनेन न केवलमर्यं निश्चयगर्भो यावननिश्चयान्तोऽपि सन्देहः स्वीकृत: । यथा- इन्दु कि कव कलङ्क: सरसिजमेततिकमग्यु कुत्र गतम्। ललितसविलासवचनैमु खमिति हरिशाचि, निश्चितं परतः॥४१६।। किन्तु निश्चयगर्भ इव नात्र निश्चयः प्रतीयमान इति उपेक्षितो भट्टोन्न- टेन। तदनुक्ती यथा- अस्या: सर्गविघी प्रजापतिरभूच्चन्द्रो नु कान्तिप्रद्ः शृङ्गारैकरसः रवयं नु मदनो मासो नु पुप्पाकरः। अर्थात् तिडन्त पद से उपमान का बोध नहीं होता अतः यहाँ उपमा नही हो सकती। अनुवाद-(५) ससन्देह तो वह (अलङ्ार है) जहां (सादृश्य के कारण) उपमेय का उपमान (समेन) के साथ संशयात्मक ज्ञान (संशय) होता है, औौर वह (उपमेय तथा उपमान के) (क) भेद की उक्ति अपवा (ख) अनुक्ति से दो प्रकार का होता है। (१३८) (क) भेद कां कथन होने पर (ससन्देह अलद्धार); जैसे-'क्या यह सूर्य है? किन्तु वह (सूयं) तो सप्त ऋश्वों से युक्त होता है। वया यह अग्नि है? किन्तु यह (एप :== प्रसिद्ध) भ्रग्ति तो नियमपूर्वक समस्त दिशाओ में प्रसरण नहीं करता (वायु के अभिमुख हो प्रसरण करता हैँ)। क्या यह साक्षात् यमराज हैं? किन्तु वह तो भैसे की सवारी करने वाला है। इस प्रकार हे राजन, युद्ध में तुम्हें देखकर तुम्हारे शत्रु योद्धा (प्रतिभटा.) बहुत समय तक सन्देह करते रहते हैं ।४१८॥। 'भेद की उक्ति होने पर' इस फथन से यह (ससन्वेह) केवल निश्चयगर्भ (निश्चय: गर्भे मध्ये यस्य) ही नहीं होता अपितु निश्चयान्त (निश्चयः पन्ते समाप्तो यस्प) भी होता है। जँसे-'क्या मह चन्द्रमा है? किन्तु (यहां) फलङ् कहाँ है? क्या यह फमल है ? तो जल फहाँ गया ? इस प्रकार हे मृगनयनी तदनन्तर (परतः) ललित विलास-पुक्त वचनों से यह मुख है ऐसा निश्चय हुआ'।४१६॥ किन्तु निश्चमगभ सन्देह के समान यहाँ धर्थात् निश्चयान्त में निश्चय ध्यङ्गध नहीं है (अपि तु वाच्य है) इसलिये भट्टोव्भट ने इसकी उपेक्षा कर दौ। (ख) भेद का फथन न होने पर (ससन्देह भलस्कार) जसे-[पुरूरया फी
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४to ] वाव्यपंकारी:
-चेदाभ्यासजड: कथन्नुविषयव्यावृत्तकौतूद्दलो निर्मातु' प्रभवेन्मनोहरमिदं रूपं पुराणो मुनि: ॥४२०।। इस उक्ति में] 'इस (उवंशी) के रचना कार्य में क्या कान्तिदायक धन्त्रमा हो निर्मार- फर्ता है ? प्रथवा जिसना शृद्गार ही प्रधान रस है वह फामदेव ही स्वयं इसका स्रप्टा है? या पुथ्वों का निधानभूत मास सर्थात् मघुमास (वसन्त)इसका निर्माता है ? मयोकि वेद के अ्भ्यास से कुण्ठित (जड़), शुन्दर विषयों -मैं औतसुषम रहित (व्यावृत्त) पुरातन मुनि ब्रह्मा इस रमखोय रूप के निर्माण में कैस्षे समर्य हो सकता है?' ।४२०। प्रभा (१) ससन्देह :- संशय :- यहां ससन्देह शब्द लक्ष्य है, 'मंगयः' सक्षस है तथा 'भेदोक्तो तदनुक्तो च' यह विभाग है।। पूर्वसू से 'प्रकृतस्य समेन यत्' की भनुपृतति हो रही है; अतएव जहां सादृश्य के फारण उपमेय का उपमान रूप में संसप हुआ करता है, वहाँ ससन्देह अलद्ार होता है। इसका नाम 'सन्देह भी है। इसके भावश्यक श्रद्भ है-(i) संशय का सादृश्य पर आश्रित होना सथा (ii) चमस्फार- पूणं होना। उतप्रेक्षा या सम्भावना मे एक पक्ष में (पर्यात् उपमेय की उपमान रुप प्रतोति में) संशय का भुकाव होता है; किस्तु सम्देह भलद्वार में दोनों मोर सामान रूप से (तुल्यकोटिक) मंदाय होता है यही दोनों में भेद है-संगायश्वान समकोटिको
ससन्देह अलदार दो प्रकार का है-(क) भेदोकि होने पर तथा (स) भेद को धनुकित होने पर। प्रयम भी दो प्रकार का है-१-निश्चयगर्भ, २-निरपपान्। (क १) निस्चयगर्भ सन्देह यह है जहां मशय के पनन्तर निश्चय हो जाने पर फिर गंदय हो जाता है जैसे-अपं मार्तण्ड': इत्यादि। यहाँ पर भ्य कि भावण्ड: सदन्मो वा' यह संराप का आकार है। 'सप्तारवों' का सम्वन्य मादि उपमेय (भर्मान राजा) में नहीं है-मही भेद-कथन है। इस नेद कयन से राजा की सूर्य से भिसवा निश्चित हो जाती है; किन्तु फिर उसमें 'कृसानुता' का संरय हो जाता है। पर प्रकार यत। भेदोकि में निश्चयगर्भ ससन्वेह मलद्वार है। (२) निश्नमान्व सन्देह यह है जहाँ संदाय के पनन्तर निश्वय हो जाने पर फिर संशाय का उदय नहीं होता सर्यात मन्त में निश्चय हो नाया है। जैसे- 'इन्दुः किम्' ? इत्यादि। यहाँ मविलाम वचन रूप यथ्म्प से मुस्ष में मुसर का निश्चय हो नाता है भोर फिर किसी प्रकार के संराप का उदम नहीं होता। यहां भी 'बन पससु:' ? इत्यादि के द्वारा भेद-कगन किया गया है। इस प्रवार यछ्त! भेदोकि में निर्चयान्त ससन्देह पसद्वार है। यहां भाचार्य मम्मट ने माचा्य-रदट सम्मत दो प्रभे: निश्यमपर्भ तथा निश्चयान्त को रवोकृत किया है: निन्तु भाषाय उद्धट मे 'निरमनान्त' नामर प्रमेद ना निरूपस नही रिया। उनका मारम यह है कि निस्चयगर्म के रमत मे पंमर्मप
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दशमे:उल्लाम: [ ४६र
(१३६) तद्र पकमभेदोय उपमानोपमेययोः । अतिसाम्यादनपह्न तभेदयोरभेद: ।
का कथन होता है अतएव वहाँ निश्चय व्यङ्गध हुआ करता है; किन्तु 'निब्चयान्त' के स्थल में निश्चय' (निश्चितम् आदि शब्द के द्वारा) वाच्य होता है अतएव वह विशेष चमत्कारक नही होता तथा "निश्चयान्त' को ससन्देह अलद्दार नहीं कहा जा सकता। काव्यप्रकाशकार तो निश्चय के वाच्य होने पर भी उसे चमत्कारक मानते हैं इसी से इस प्रभेद को स्वीकार करते हैं। इस प्रकार उनके मत मे भेदोकि में से दो प्रकार हैं। (ख) अस्या: सर्गविधौ' इत्यादि भेदानुक्ति में उदाहरण है। यहाँ पर संशय का माकार'यह है-'इसकी रचना में जो प्रजापति था वह चन्द्रमा था या मदन 'था अथवा वसन्त?'यहाँ परजापति उपमेय है, चन्द्र आदि उपमान हैं। इनमे से किसी के भी भेद अर्थात् बंधर्म्य का कथन नही किया गया। श्रनुवाद-(६ रूपक) जो उपमान तथा उपमेय का अभेदारोप (आरोपित या फल्पित अनेद) है, यह रूपक अलङकार कहलाता है। (१३६) सर्यात् मिन उपमान तथा उपमेय का भेद (वंध्म्य) प्रकट (अनपह् तं) है, उनमें अत्यन्त साम्य के फारस पभेद का आरोप करना (रूपक) है। प्रभा - (१) भाव यह है कि भिन्न-भिन्न प्रकट होने वाले उपमान तथा उपमेय में अभेद का आरोप ही रूपक है-रूपयति एकता नयतीति रूपकम्। यह अ्भेदारोप अत्यन्त:साम्य के कारण होता है जैसे-'मुखं चन्द्र' था 'मुखचन्द्र' में मुस और चन्द्र के भेंद को नही छिपाया गया तथा दोनों के अभेद की कल्पना की गई है। रूपक के आवश्यक अरज्भ है-(i) उपमान और उपमेय के भेद की स्पष्ट प्रतीति (ii) दोनों में अ्त्यन्त साम्य के निमित्त से अभेद की कल्पना। (२) रूपक का अरन्य अलद्धारों से अन्तर-(i) रूपक और उपमा-(क) उपमा मे उपमान और उपमेय के साधर्म्य का कथन होता है किन्तु रूपक में साघम्य के आधार पर अभेद का आरोप किया जाता है। (ख) वाक्यगा उपमा में प्रोम: साधारस धर्म या उपमावाचक का प्रयोग होता है, किन्तु रूपक में इनका प्रयोग नहीं होता। समासगा और रूपक का अन्तर तो यह है कि उपमा में उपमेय की मधानता होती है तथा रूपक में उपमान की प्रधानता होती है। जिसके साथ विशेपणा या किया का अन्वय होता है वही प्रधान होता है, जैसे 'मुखपद्म्' आदि में यदि 'हास्यसहितं मुखपद्यम्' ऐसा प्रयोग है तो हास्य का मुख से अन्वय होने के + कारण 'उपमा' होगी। यदि। 'विरुमित मुखपनम्' है तो विकास का पद्म से भन्वय होने के कारए रूपक होगा (द्र०, उदा०४२१)।
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काव्यपकाशः
(१४०) समस्तवस्तुविषयं श्रीता आरोपिता यदा ॥ह। शरोपविपया इब आरोप्यमाणा यदा शब्दोपात्तास्तदा समरतानि वस्तूनि विपयोऽस्येति समस्तवस्तुविषयम्। आारोपिता इति बहुवचनम- विवचितम्। यथा- ज्योत्स्ना भरमच्छुर गघवत्ा विभ्रती तारकास्यी- न्यन्तर्द्धनिव्यसनरसिका रात्रिकापालिकीयम। द्वीपादू द्वीप भ्रमति दघती चन्द्रमुद्राकपाले न्यरतं सिद्धाब्जनपरिमलं लाव्छनस्य च्छलेन ।४२१।। (ii) एपक और अ्र्पतिमयोक्ति-निमीर्याध्यवसाना भतिशयोक्ति मे उपमेय की अपने स्वस्प से उपस्यिति नहीं होती किन्तु रूपक में होती है। अ्रथवा कहिये कि गोणी सारोपा लक्षणा के क्षेत्र में रूपक होता है और मोसी साध्यवसाना के रोत में पतिरायोक्ति। (iii) रूपक और अपह ति-प्रपह्न ति में उपमेय के स्वस्प को छिपाकर उपमान रूप में प्रकट किया जाता है किन्तु रूपक में उपमेय और उपमान दोनों का स्वरूप पृथकृणः प्रकट होता है (भनपह्न तभेदयोः) । (iv) रुपक और आस्तिमान्-भ्रान्ति में उपमान औ्रौर उपमेय के भेद का ज्ञान हो नहीं रहता (भेदाप्रह) किन्तु रूपक में दोनों का भेद स्पष्ट भासित होता है। (३) प्रथमतः रपय के तीन प्रकार है-(क) साङ्ग, (स) निरस औौर (ग) परम्परित। साङ्क रपक भी दो प्रकार का है-समस्तवस्तुविषयक, एन देशविवती। निरद्ध के भी दो भेद हैं युद्ध मोर मासारूप। परम्परित के सिलप्ट तथा भरिष्ट रूप से प्रथमतः दो भेद हैं, फिर इनमें से प्रत्येक के शुद्ध औौर मातारप मे दो भेद होकर चार भेद हो जाते हैं। इस प्रकार रूपक क पाठ प्रकार है।जिनका विनेचन प्मरा: पागे किमा जाता है- अनुवाद-(१. समस्तवस्तुविषय) चब (समस्त) भारोप्यपाल मम्तुऐँ दाब्दीगास (धौता := शमप्रतिवाघाः) होती हैं तो समासवस्तुविषिय (साद्) र्पक होता है। (१४०) जय भारोप के विपय सर्पात् उपमेय के समान भारोप्यमाए सर्मात् उपमान शम्द-प्रतिपाद्य होते हैं (पापं नहीं) तब समस्त (पारोप्यमार) पस्तुन जिसका विपय है, ऐसा यह समस्तयातुयिकयक (शास) रपक होगा है। (सुभ में) 'माशोपिताः' इस शब्द में यहुचबन विवसित नहीं है: (पनः धारोष्यमारा यस्तुद्प होने पर भी यह रूपक होता है)। उदाहरस है- जो पगिद्रिका एवों भरम के सेपन (प रएा) मे शुभ्र है, सारे दपी मस्पियों को भारस करती है, भग्तर्यान को फोटा (प्पसन) में सत्पर है; ऐती यहट रात्ित्वी
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दशम उल्लास: ४६३
:अत्र पादुत्रये। अररन्तद्धनिव्यसनरसिकत्वमारोपितघर्म एवेति रूपक. परिप्रहे साधकमर्तीति तत्सङ्कराशङ्का न कार्या। (१४१) श्रोता आर्थाश्च ते यस्मिन्नेकदेशविव्ति तद् ।।
फापालिकी (योगिनी) चन्द्ररपी मुद्राकपाल (दीक्षाफाल में गृहीत कपाल) में फलङ् के व्याज से रसे हुए सिद्धाञ्जन के चूर्ण (परिमल) को लिये हुए एक द्वीप से दूसरे ढीप को भ्रमण कर रही है' ।।४२१।। यहाँ पर (श्लोफ के) तीन पादों में (ज्योत्स्ना आदि में आरोष्यमाए भस्मत्व आदि) सभी शब्द द्वारा गृहीत हैं। क्योंकि अन्तर्धानव्यसन-रसिकता आरोपित अर्थात् उपमान (कापालिकी) का हो धर्म (हो सफता) है, यह रूपक की स्वीकृति में साधक है इसलिए (इति) उस (रूपक) के (उपमा के साथ) सन्देह संङ़र की शङ्दा नहीं करनी चाहिए। i. प्रभा-(१) 'ज्योत्स्ना' इत्यादि समस्तवस्तुविषय साद्भ रूपक का उदाहरण है। साङ्ग रपक वह होता हैं जहाँ एक रूपक प्रधान (अङ्गी) होता है तथा भन्य रूपक अङ्ग रूप मे आकर प्रधान रूपक के सहायक होते हैं। यहाँ 'रात्रिरेव कापालिकी' यह प्रधान रूपक है, 'ज्योत्स्ना एव भस्म' आदि सहायक रूपक हैं तथा उपमेयभूत रात्रि और ज्योत्स्ना आदि के उपमानों (आरोप्यमाण कापालिकी, भस्म आादि) का शब्दों से ग्रहण किया गया है अतएव समस्तवस्तुविपयक साद्द रूपक है। (२) यहाँ पर दाङ्डा यह होती है-कि 'रात्रिः कापालिकी इव' इत्यादि विग्रह मे 'उपमितं व्याघ्रादिभि: सामान्याप्रयोगे' (२/१/५६) इस पासिनिसूम के अंनुसार उपमितसमास होता है अथवा 'ज्योत्स्ना एव भस्म' इत्यादि विग्रह में मयूर- व्यंसकादयश्च (२/१/७२) सूत्र के अनुसार समास होकर रूपक होता है -- इस प्रकार संशय होने के कारण सन्देह सङ्कर है, रूपक नही। अन्तर्धान-न कार्यः अवतरण में ग्रन्थकार इस शाद्दा का समाधान करते हैं। भावयह है कि अन्तर्धानव्यसन-रसिकत्व चेतन का धर्म हैं, यह कापालिकी (योगिन) में ही हो सकता है, रात्रि में नही। यदि उपमेयभूत रात्रि में इस विशेषण का प्रधान रूप से अन्वय हो सकता तो उपमा की सम्भावना कयञ्चित् हो सकती थी, अन्यथा नहीं। इसलिये यहाँ रूपक मानना ही उचित है तथा सन्देहसङ्वर की शङा न करनी चाहिये। अनुवाद-(२. एकदेशयिवर्ती) जिस रूपक में वे (आररोप्यमाय पर्यात् उपमान) शब्द-प्रतिपाद्य (भात) तथा कुछ अर्य-गम्य (आर्य) होते हैं, वह एकदेश- विध्ती (साङ्ग) रूपक है। (१४१)
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1 काव्यमकान:
केचिदारोप्यमाणा: शब्दोपान्ता: केचिंदर्थसामर्थ्याद्वसेया: इत्येक- देशविव्त्त नात एक देश विवर्ति। यथा- जस्स रणन्तेउरए करे कुएन्तस्स मण्डलगालप्रम्। रससंमुद्दीबि सहसा परंमुद्दी छोइ रिखसेखा ॥४२२॥ (यस्य रसान्त:पुरे करे कुर्वतो मएडलामलताम। रससग्मुख्यपि सहसा पराङमुखी भवति रिपुसेना॥I) अन्र रसस्यान्तःपुरत्वमारोप्यमाएं शब्दोपात्तम् मएडलामलताया नायिकात्वम,रिपुसेनायाइच प्रतिनाषिकात्वम् अर्प्र्यसामर्ध्यादवसीयते इत्येक: देशे विशेषेण वत्त नादेकदेशविवर्ति। (१४२) साङ्गमेतत् ।' उक्तद्विभेदं सावयवम्। (१४३) निरङ्गन्तु शुद्धम् सर्मात् जहाँ कुछ उपमान शब्द द्वारा: गृहोत तथा फुध अर्थ-सामम्यं के द्वारा जागने: योग्य(अवसेया:) होते हैं, वह एरदेश में स्पष्ट रूप से (स्फुटरमा) पतंमान, होने के फारए एकदेशवियती (साड़ा रुपत) होता है बैने हिन 'जञिरा राजा के रस रुमो सम्तःपुर में तडग-सता (औौर नामिफा) को हाथ में ग्रहस करते हो रताबिष्ट (वोररसायिष्टा भपया शृम्धाररसाविप्टा) भो रातु- सेमा, (तथा प्रतिमायिका) सहता पराष्मुसी हो जाती है (युद्र से या प्रियसभम से निवृत हो जाती है।' ।४२२।।- यहा रसदूमि में आरोपित किया गया 'मनत.पुर' तो शमप्रतिपाद है :. किन्तु पसिलता में (आरोप्पनाख) नाविशात्य तभा रिपुमेना में (पारोप्यगाल) वि: नाविकातव स्यंतषः प्रवीत हो रहा है-इस हेतु एकदेशअर्यात् 'रखान्त.पुर' में दिशेष रूप से प्रकट होने के कारस (वर्तनात्=परससनाम्। एर्देदकयतीं साक है। यह सास् रपक है। (१४२)। (मतत्' घर्पात्। उपपुक सो प्रकार का (समस्तमस्तुविय त्था एफवेशयिवर्ती) साद्ग दवक है। प्रमभा-'सन्' या 'सायनय' एयक पवेक रूवको का समुदाय होता है जिसमें एक (प्रधान) रूपक में अन्य (पप्रमान) सूवक मत हमा करते है। जिम रूपक में नमस्व उपमेय तपा उसमान सर्न्चों दास प्रतिसाधित किये जाते है यह समस्तवस्नुविषयक सान हार होता है तया जहा बुम धम-प्रतिपाछ सपा इस अपमम्य होजे है पहाँ एगदेसविवरती सास रपक होत है जसा कि वार के उरदरों 'अनुवाद्-[र मुद्र' निरद्ध रूपक] अद्तों के आरोपरहि (निरत) (नहां केयन पह्गी का पारीप होता ह (१४) जी-
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दशमा उल्लास: [ ४६५
यथा- कुरङ्गीवाङ्गानि सितिमितयति गीतध्वनिपु यत् सस्रीं कान्तोदन्तं श्रतमपि पुनः प्रश्नयति यत्। अनिद्र' यकनान्तः रवपिति तदहो वेद्म्यभिनवां प्रवृत्तोऽ्या: सेक्तु' हृदि मनसिजः प्रेमलतिकाम् ॥४२३॥ (१४४) माला तु पूर्ववत् ॥६४॥ मालोपमायामिवैकस्मिन् बहव आरोपिताः । यथा- सौन्दर्यस्य तरङ्गिणी तरुशिमोत्कर्पस्य हर्षोद्गमः कान्ते: कार्मणकर्म नर्मरइसामुल्लासनावासभूः। विद्या वक्रगिरां विधेरनवधिपावीयसाक्षाक्क्रिया चाखा: पञ्चशिलीमुखस्य ललनाचूडामखि: सा प्रिया॥४२४॥ [कोई घात्री किशोरी का वृत्तान्त कहती है] जो यह बाला गीत को ध्वनि सुनने पर मृगी के समान अपने श्रद्गों को निश्चल कर लेती है (स्तिमितयति), जो सुने हुए भी प्रियतम के समाचार (उदन्त) को सखी से फिर पूछती है, जो बिना निद्रा के ही गृह े भीतर (श्रन्तः) सोती है-इससे मैं समभती हूँ कि इसके हृदय में कामदेव ने एक नवीन प्रेमलता को सौंचना प्रारम्भ कर दिया है॥४२३॥
होता है (१४४) (४. माला निरङ्रूपक) मालारूप रूपक तो पूर्व (मालोपमा) के समान
अर्यात् मालोपमा के समान हो जहाँ एक उपमेय में अ्र्परनेक उपमान आरोपित किये जाते हैं (वह मालारूप निरङ्ग रूपक है); जैसे-(कोई विरही प्रेयसो का स्मरण करता हैँ। 'नारियों में शिरोमसि वह मेरी प्रिया सौन्दर्य की नदी ह, यौधनो- त्कर्ष के आनन्ट का उद्गम हूँ, कान्ति फो वशीकरण क्रिया (कार्मएं वशीकरस- मन्त्रः) है, फरीडा के रहस्यों के उल्लास की आवासमुमि है, वक्रिमायुक्त वासी को विद्या (अलड्ाररपा) है; विधाता के प्सीम निर्भासकोशल की साक्षात् मूति हैो पञ्चवासाधारी कोमदेव को बासरूप है' ॥४२४॥ '.प्रभा-निरङ्ग रूपक वह है, जहाँ ्ङ्भाद्भिभाव से शून्य एक ही रूपक होता हैं, उसमें अन्य रूपको का मिश्रस नहीं होता अतएब वह शुद्ध रूपक होता है। भाव यह है कि उसमें साङस्पक के समान परस्पर सम्बद्ध रूपकसमुदाय नही होता। यह दो प्रकार का होता है-१ केवल निरङ् रूपक तथा १. मालारूप निरङ्र- रूपक ।१. 'कुरज्गी' इत्यादि केवल निरद्दरूपक का उदाहरण है। यहौ केवल 'प्रेम' में लतिका (प्रेमलतिकाम) का आरोप किया गया है। उसके परिपोपक रूप में अ्न्य किसी वस्तु का आरोप नहीं किया गया। २. 'सौन्दर्य' इत्या्दि मालारूप निरङ्- रूपक का उदाहरस है। यहाँ उपमेय रूप एक ही प्रिया में 'तरङ्िएी' आदि श्रनेक
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४६६ ] काव्यप्रकाण:
(१४५) नियतारोपणोपायः स्यादारोपः परस्य यः । तत्परम्परितं श्लिष्टे वांचके भेदभाजि वा ॥६५॥ यथा-विद्वन्मानसहंस, वैरिकमलासडकोचदीप्तद्य ते,
सत्यप्रीतिविधानदक्त, विजयप्राग्भावभीम, प्रभो, साम्राज्यं वरवीर, वत्सरशतं चैरिब्चमुन्चै: क्रियाः ।४२१।। उपमानों का मारोप किया गया है। किन्तु प्रिया मे 'तरद्विसी' आदि के आरोप का परिपोपण करने के लिये स्रन्य रूपक का प्रयोग नहीं किया गया। शरनुवाद-(ग-परम्परितरपक)- [नियतारोपणोपायः यः परत्य मारोप: ।तत् परम्परितं स्यात्: (तत् द्विविधम्) परत्य वाघफे लिप्टे (सति) भेवभामि या]- मुस्य धरयवा प्वममवर्संनीय (नियत) धरोपए का निमितमुत (उपाप) मो भ्रन्य किंसी वस्तु का प्रारोप होता है, यह परम्परित (कार्यकारणनायटपा भारोपपरम्परा संजाताउत्य-इति परम्परा-इतव) रूपक होता है; (यह दो प्रकार का हैं) (१) सन्य के वाचक शब्द के दसषट होने पर प्थवा (२) भिन्न रूप (पश्लिष्ट) होने पर। (१४५) प्रभा-जहाँ वर्गनोय में आरोप करने के लिये अन्य वरतु का भारोपए किया जाता है, वहाँ पर परम्परित पा होता है। परमपरा का पथ है-कार्यकारण- भावरूपा आारोपपरम्परां, 'परंम्परा सब्जाता प्रस्येति परम्परितम्'। यहा भ्य धस्नु य आरोप मुख्य आरोप का कारस होता है, किन्तु माहरपर में समरपक पम्ी (मुख्य) रूपक के पोगमान होते हैं, निमित नहीं गर्योंकि उनके बिना भी रूपक बन ही गफता है। यही दसदा मावृ्पक से भेद है। प्यमतः यह दो प्रकार का है -. सलस्ट रूपर तथा २. भदष्ट रपक। दनमें ग्रे भी प्रत्नेक मारास्व तथा वेवस (गापारुप) सो प्रहारय होता ह। जैसे कि निम्न उदाहरखों से स्पष्ट हेता है- अनुवाद-जसे (१. दविप्ट मासादप)-'हे द्द्रानों के (मानसदप) मानस के हंस, सयुषों के सक्ष्मीनगंशेध रपो बमलों के प्रसंकोप (विकास) में सूय रप (पो प्सघ ते= दौप्तत ति दासे), दुर्गों के धमार्गस (न सोजना) कपो हुर्गा (पावंती) रे मागस (सन्येपस) में सिय (मोललोहित), समित् (मंद्रामों) के स्वीरर कपी समिपामों (फाष्ठ) के स्वोकरस (पारमसात करने) में मग्निर्य, मरयत्मीति रपी सती (दुर्गा) में प्रमीति के कामे में ददापरमापति रप, अयुविनवरपी सतृंग (विजयः स्याग्नये पाय-मेदिनी) से प्रमम उत्पघ होने में भोममेन प, मे खठपीर, मराराज (प्रभी). तुम ब्रझ्मा रे (पंरिन्यम)- तन वर्म द्यंदा उष्प भाव से चपनर्मी सरम भोगो सरदपू
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दश्षम उल्लास: ४६७
शत्र मानसमेव मानसम्, कमलाया:रा स्ोच एव कमलानामसडको च दुर्गाएाममार्गणमेव दुर्गाया: मार्गगम, समितां स्व्रीकार एव समिघां स्वीकार:, सत्ये प्रीतिरेव सत्यामप्रीतिः विजय: परपराभव एवं विजयोऽजुनः, एव- मारोपसनिमितो हंसादेरारोप:। यद्यपि शब्दार्थालक्कारोऽयमित्युक्त वदयते च तथापि प्रसिद्धधनुरोधा- दननोक्त: एकदेशबिर्वात हीदमन्येरमिघीयते। यहा पर मानस [चित्त] हो मानसरोवर है, कमला का सङ्कोच ही कमलों का ग्रसङ्गोच [विकास] है, दुर्गों का अमागंस ही दुर्गा का अ्रन्वेषण [मार्गस] है, समित् [संग्रामों] का स्वीकार ही समिधाओ्रों का स्वीकार है, सत्य में प्रीति ही सती में अपीति है, विजय अर्थात् क्त्रु का पराभव ही अर्जुन [विजय] है-इस प्रकार के आारोपण के निमितसे होने थाला [राजा में] हंस आदि का आरोप है। यद्यपि [प्राचीनों ने] यह [श्लिष्ट परम्परित] उभयालङ्गार है ऐसा कहा है तथा आागे।काव्यप्रकाश सूत्र २११ की वृति में] भी कहा जायगा तथावि प्रसिद्धि का अनुसरस करके इसका पर्थालद्वारों में [अन्न] फथन किया गया है, क्योंकि अ्रन्य [भामह आदि] आ्चार्यों ने इसे एफवेशविवर्ती रूपक कहा है। प्रभा- (१) बिन्दवन्मानसहंस' इत्यादि में 'मानस' आदि पद स्लिष्ट हैं। यहाँ एक ही राजा में हंस सूर्य तथा शिव का आरोप करना अपेक्षित है.। इनके निमित्त रूप में स्लेपवल से मन इत्यादि में मानसरोवर आदि का आरोप किया गया है। अतएव राजा में हंस आदि का आरोप अन्य-परोपमिमित्तक है तथा यहाँ मालारूप इलिप्ट परम्परित रूपक है। (२) 'विद्वन्मानस' इत्यादि में 'मानस' इत्यादि पद परिवृत्यसह हैं तथा 'हंस' आदि पंद परिवृतिसह हैं इस हेतु यहाँ पर उभयालङ्गार अर्थात् शब्द तथा सर्थ दोनों का अलङ्कार मानना उचित है और 'पुनरुस्तवदाभास' के ममान इसका भी उभयालद्वार के प्रकरण में ही निरूनण करना चाहिए था तथापि आचार्य मम्मट ने प्रसिद्धि का अनुसरण करते हुए अर्थालड्कारों मे इमका निमूपण किया है। प्रसिद्धि का अभिप्राय यह है कि भामहाचायं आदि मे इसकी अरयाद्वारों में ही गखना की है। उन्होने यहाँ एकदेशविवर्ती रूपक बतलाया है तथा एकदेशविवर्ती रूपक अर्थालद्दार है, यह सर्वसम्मत ही है। प्रदीपकार के मतानुसार प्रसिद्धि का अपरभिप्राय यह है कि अलङ्कारसर्वस्वकार ने श्लेप को रूपक का वाघक माना है। उसके अनुसार श्लेप अरथाद्वार है और अयलिद्वार किसी अर्यालद्वार का ही वाघक होता है अ्रतः यह अर्यालद्कार हो है। फततः प्राचीनों का अ्नुसरण करके ही इसे मर्थालङ्गारों में रकसा गया है। वस्तुतः तो माचार्य मम्मट इसे उभयालक्ार ही मानते हैं। यह आगे संकर के प्रकरण में स्प्ट होगा। काव्यप्रकाश के लक्षणानुसार यहां ए रदेशविवर्ती (भान्) रूपक नहीं, यह भी स्पष्ट हो है।
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याव्यप्रकाण:
भेदभाजि यथा- प्रातानं जयकुन्जरस्य दपदा सेतुविपद्वारिधे: पूर्वाद्रि: करवालनएडमइसो लीलोपघानं प्रिय:। संभामामृत सागरप्रमयनकरीडाविघी मन्दरो- राजन्, राजति वीरवैरिवनितावैधव्यदरते भुजः ॥४२६॥। शत्र जयादेर्भिनशब्द्वायस्य कुञजरत्वाधयारोपे भुजरय यानानत्वाद्यारोप युज्यते।
स्तृयते देव,सद्व शमुक्तारत्नं न कैर्भवान् ॥४२७।। निरवधि च निराश्यं च यश्य स्थितमनिर्वत्तितकौतुकप्रपञ्चमु। प्रथम इष भवान् सकूर्ममृतिजयति चवुरदरालोकवल्लिकन्द्ः॥४२८॥ अनुवाद-() (परिलष्ट मालारुप)-(वाचक सब्दों के) भिस रूप अर्थात् पस्लिष्ट होने पर (परम्परितरपक), जरे- 'हे राजन्, विजपरपी हस्ती का बन्यत-स्तम्भ (पासान), विपतिस्पी सापर फा शिलामय सेतु, सङ्गसपी सूर्य (पण्डमहांः धर्ष्म महः तेजोऽस्य, सू्यः) का उदया घस, राजभी का सोलोपधान (सुलपूर्गक दामन का तहिया), संघामरूपी भमृततसुद्र फो मयनरूपी कोड़ा में मन्तराचस रूप, वीर शभुमों को नारियों को वधव्य प्रदान करने वाला तुम्हारा नुजदण्ड शोभायमान है ॥४२६॥ यहाँ पर भिन्न शब्द (पश्लिष्ट) के वाख्य 'जप' आदि में फुज्जरत्य, भारि पा आारोप होने पर हो भुजा में पालानत्व (यन्यनस्तम्भ) पाचि का सारोप मुकिि- संगत होगा है। प्रभा-'पातानम्' इत्यादि में जय तथा कुम्जर मादि शब भिन्न २ है, मानन आादि को भाति शनस्द नही। जय पादि में 'कुख्जर' यादि का द्ारोर (रपग्ड) भुजा में आालानत्य के मारोर का निमित है। एठ मूप मे बहत से पुप्वों के समान एक उमेम (भुजा) मे भतेक मालानर मादि का मारोप किया गया है, प्त: यहां स्लिष्ट मालारूप परन्परित रपक है। अनुवाद-(३. दलप्ट ध्रमामायप)-'ह राजन्' अपने धलोहिक महान् प्रफाश (पशा) से तोनों सोहों को प्रकाशिन करने वाले, थेष्ठडुम एसो नरटष्ट बंग (गास) से उत्पन्न मुकतारल-रूप पार किसके द्वांरा स्सुत नहां रिये जाते ।Y२UI प्रभा-'पनोडिक' इत्यादि मे पारोत ना विषष (मसून) गपा धारीयमाल पर्मान् उपमान (उसम बोस) दोनों को सनष्द 'सदंग' शब्द द्वारा वहा गर्ता है। यह कप मेर्याम का ागेर राजा में मुसारत के आरोग का निमित है। उमय (पत्रा) मे यह एर ही आरोत किया गना है, मकब रिसस्ट पमालाइन परापारित अनुवाद- (४ पस्निष्ट-समासारप) गिसाड़ी रियनि कामादि को सीमा
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दशम उल्लास: ४६६
इति च अमालारूपकमपि परम्परितं द्रष्टव्यम् किसलयकरलैतानां करकमलैः कामिनां मनो जयति। नलिनीनां कमलमुखैमु खेन्दुभिर्योपितां मद्न: ।४२६। इत्यादिरशनारूपकं न वैचिन्रयवदिति न लक्षितम्। से रहित है, बिना किसी आश्रय के है तथा आश्चर्य के विस्तार (प्रपञ्च) को फभी समाप्त नहीं करती; चतुर्दश भुवनरूपी लता के मूलभूत, इस जगत् में प्रथम वह कूर्ममूति आ्राप (विष्यु भगवान्) सर्वोत्कृष्ट हैं (जयति)' ॥४२८॥ यह (उपयुक्त दो प्रकार फा) अमालारूपक भी परम्परित समभना चाहिये। प्रभा-'निरवधि' इत्यादि में 'लोक' तथा 'बस्लि' पद भिन्न २ (अश्लिष्ट) हैं, लोक में 'बल्तित्व का आरोप विष्णु में कन्दत्व (मूल) के आरोप का निमित है। विष्णुं रूप उपमेय में यह एक ही रूपण किया गया है, अतएव यहाँ अश्लिष्ट परम्परित रूपक अमालारूप है। इस प्रकार अरमालारूप परम्परित रूपक के श्लिष्ट ('अलोकिक' इत्यादि ४२७) तथा अश्लिप्ट ('निरवधि' इत्यादि ४२८) भेद से से दो उदाहरण दिये गये है। अनुवाद्-(रशनारूपक) 'लताओं के नवपल्लव रपी करों से, युवतियों के कर कमलों से, कमलिनियों के कमलरूपी मुखों से तथा युव्तियों के मुखरूमी चन्द्रमा से कामदेव कामी-जनों के नन को वश में कर लेता है' ॥४२६॥ इत्यादि रशनारूपक तो (विशेष) चमत्कारजनक नहीं है इसलिये उसका (यहां) पृथक् निरूप नहीं किया गया। i
प्रभा-(१) 'किसलय' इत्यादि में किसलय में करत्व, कर में कमलत्व, कमल मे मुखत्व तथा मुख में चन्द्रत्व का आरोप किया गया है। यहाँ पूर्व २ उपमान (यारोप्यमण) 'कर' आदि उत्तरोततर उपमेय (आरोप का विपय) हो गया है अतएव रशनोपमा की भाँति यहाँ रशनारूपक है। आचार्य मम्मट ने इसका पृथक निरूपण नही किया; क्योंकि यह विशेष चमत्कारक नहीं होता। (२) व्याख्याकारों का विचार है कि मम्मट के मतानुसार परिणामालङ्कार का भी रूपक मे ही समावेश हो जाता है। (३) इस प्रकार आ्ररचार्य भम्मट के अनुसार रूपक के भेद-प्रभेद ये हैं- रूपक
साङ् निरङ्ग- परम्परित
१. समस्त २. एकदेश ३. शुद्ध ४. माला रिलप्ट मदिलप्ट वस्तु विपय विवर्ती
T ५. शुद्ध ६. माला ७. शुद्ध ८. माना
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दशम उल्लास: ५०१
इत्थं वा- वत सखि, कियदेत्तत् पश्य वैरं स्मरस्य 4 प्रियविरइ्दकृशेडस्मिन् रागिलोके तथा हि। उपवनसह का रोद्धासिभृङ्गच्छ्लेन प्रतिविशिखमनेनोद्टङ्कितं कालकूटम् ॥४३१॥ अत्र हि न समृङ्गाणि सहकाराि, अपि तु सकालकूटा: शरा इति प्रतीतिः। एवं वा- अमुष्मिंल्लावएयामृतसरसि नूनं मृगहश: स्मरः शर्वप्लुष्ट: पृथुजघनभागे निपतितः । यद्ङ्गाङ्गाराणां प्रशमपिशुना नाभिकुहरे शिखा धूमस्येर्य परिएमति रोमावलिवपुः।४३२।। अत्र न रोमावलि: धूमशिखेयमिति प्रतिपत्तिः। एवमियं भङ्गचन्तरैरप्यूह्या। अनुवाद-अथवा इस प्रकार-(आर्थी अपहन ति)-(किसी बिरहिी की ससी के प्रति उक्ति)-हे सखी, यह देसो कैसा सेद का विषय है (बत) कि प्रियविरह से क्षीएा इस मुझ जैसे कामीजन पर कामदेव का कितना वरभाव है कि इस (काम) ने उद्यानों की अम्-मञ्जरी (सहफार) पर शोभायमान (उ्भासिन) भ्रमरों के बहाने से (अपने) प्रत्येफ (पुप्परूपी) बास (विशिख) पर उत्कट विप रस दिया है ॥४३१॥ यहाँ पर ये भ्रमरयुक्त सहकार-पुष्प नहीं हैं अपि तु कालकूट (महाविष) सहित बाए हैं, ('छल' शब्द के प्रयोग से) यह प्रतति होती है। प्रभा-'वत सखि' इत्यादि में उपमेयभूत भृङ्गों का निपेध करके उपमानरूप कालकूट की स्थापना की गई है। यहाँ कपटार्थक 'छल' शब्द से उपमेय का निषेध अर्थलम्य (आक्षिप्त) है, अतएब आर्थी अपह ति है। अरनुवाद्-प्रथवा इस प्रकार (प्रार्थी अपह्नति)-[वेश्यादासी किसी कामी के प्रति वेश्या का वर्णन करती है। 'हे रसिक, निश्चय ही शिव के द्वारा दग्ध किया गमा (शवंप्लुष्टः) कामदेव इस मृगनपनी के पुष्ट जघनस्यल पर (विद्यमान) सौन्दय- रूपी सरमृत के सरोवर में निमग्न हो गया है; कयोंकि (काम के) भ्रङ्गों के श्रद्गारों फो शान्ति को सुचित फरने वाली यह धूमशिखा नाभि-गृहा में रोमावली के प्ःकार में परिखत हो रही है।४३२॥। यहाँ पर 'यह रोमावली नहीं किन्तु धूमशिखा है' (परिसमति शब्द से सर्य- मशात्) ऐसी प्रतीति होती है। इसी प्रकार प्रकारान्तर से भी यह (पार्थी अपहति) समझनी चाहिए। प्रभा- (१) 'अमुष्मिन्, इत्यादि मे 'परिणमति' (धूमशिखा रोमावलिवपुः परिणमति) शब्द के द्वारा यह प्रतीत होती है कि 'यह रोमावलि नही किन्तु धूम- शिखषा है' यहाँ 'परिगाम' शब्द से उपमेय का निषेध अर्थगम्य है अतएव यह आर्धी प्रपह्नति है।
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५०० ] कावप्रकाण: :
(१५६) प्रकृतं यत्रिपिष्यान्यत्साध्यते सा तवपह नुतिः। उपमेयमसत्य' फृत्वा उपमानं सत्यतया यत्थाप्यते सा त्वपद्ु तिः। उदादरगाम्- प्रवाप्तः प्रागत्भ्यं परिसतरच: शैलतनये, कलक्टो नैवायं विलसति शशाड्करय वपुपि। शमुष्येयं मन्ये विगतदमृतस्यन्दृशिशिरे, रतिधा्ता शेते रजनिरमणी गाढमुरसि॥४३०॥
अनुवाद्-(७ भपह, ति)-जहां प्रकृत पर्यात् महांनीय (उपगेम) का निवेष कर के भव्य पर्थात् चपमान को सिद्धि की जाती है, यह प्रपद्व ति असखार है। (१४५) •घर्थात् जो उपमेय कोपतत्य चतलाफर उपमान को सत्म रप से स्पापित किया जाता है यह भपह ति पलद्धार है। प्रभा-(१) मपह ति के आवस्यक भ्रज्ग है- विद्यमान वर्गनीय पस्तु का निषेध और (ii) उसके स्थान पर यव्य (अपमान) की स्थापना। मे दोनों ही थावें माहायं (कस्वित) होती है; जैसे-मुस का वर्णन करसे हुए कहना 'नेद मुगं विन्तु चन्द्र:। (₹) अपसृति के लक्षणा में जो 'प्रकृन निषिष्य' ऐगा कहा गया है इससे रूपर की व्यावृति हो जाती है; यरोंकि रूपक में वर्णनीय (प्रकृत) का नि्षेय नहीं हो।।'मन्यनुमामपने' कयन से आक्षेप मनद्ार में यह तगसा नहीं जाता। सगहत मे संभय होता है वया भपह् नुति में निश्नय यही दोनो पा भेव है। (३) पपन्त नि दो प्रार गी होती दे-साब्डी तथा आयी जए। गब्द द्वारा उनमेप को ममत्यता कही जाती है वहाँ शाबरी नया नहा गह भर्व मे प्रतीयमान (सर्यमम्ब) होती है यहां पार्यी पपनति है। पार्पी तो बन मी भस्विमामों द्वारा होनो है पर्मात् कहीं पलेन उदयदि वपदार्पंय कही परिशिामारयक शब्दों का प्रदर किया जाता है: जैसा कि उदाहरग सें संपष्ट होगा। अरनुवाद-(पपस, ति का) उदाहरत है- (शग्ी)-[प्रसंबन् में रमस् पो बेनकर सिय को पायंक्ी के प्रति बति] हेपवंतपुति, पूरा भान्ति मासे (पि एतरच:) रसाद्ू के शरीर पर म्रस्ट होने वाला (प्रागह्न्यम व्रवाप्त) यह पसषकू नहीं विराममान है: मैं ऐसा सममता हू कि इस पगमा के पोभूत (बिगमा) पमृम -वस से सीतल यस: इमस पर रत से परियान राम्रितपो रमसो (भन्. पतनी) गाड (निद्वा में) मो रहो है ॥४३।। प्रमा-'पदाज' इरादि में अगेयस्य पनन्न को मनस् बगाकर उतमानस्ा गति की मस्ता रसातित की ुई है। यहां, मैवानम इम सब दारा कामेर पा निवेप हिया गम ऐ पतपुर पासी पासनि (पमरर) है।
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दशम उल्लोस: ५०१ +4
इतथं वा- वत सखि, कियदेत्तत् पश्य वैरं म्मरस्य - प्रिय विरह्कृशेऽस्मिन् रागिलोके तथा हि। उपवनसह का रोद्धासिभृङ्गच्छलेन प्रतिविशिखमनेनोद्ृद्वितं कालकूटम्॥४३१॥ अत्र हिन सभृङ्गाि सहकाराणि, अपि तु सकालकूदा: शरा इति प्रतीतिः। एवं वा- अमुष्मिल्लावएयामृतसरसि नूनं भृगदशः स्मरः शर्वप्लुष्टः पृथुजघनभागे निपतितः । यदङ्गाङ्गाराणां प्रशमपिशुना नाभिकुहरे शिखा धूमर्येयं परिएमति रोमावलिवपुः ॥४३२॥। शत्र न रोमावलि: धूमशिखेयमिति प्रतिपत्तिः। एवमियं भङ्गयन्तरैरप्यूद्या। अनुवाद-अथवा इस प्रकार-(आर्थी अपह्न ति)-(किसी चिरहिंखी की सखी के प्रति उक्ति)-हे सखी, यह देसो कैसा सेद का विपय है (बत) कि प्रियविरह से क्षीशा इस मुझ जसे फामीजन पर कामदेव का कितना वैरभाव है कि इस (काम) ने उद्यानों की अस्र-मञ्जरी (सहकार) पर शोभायमान (उद्भासिन) भ्रमरों के बहाने से (अपने) प्रत्येफ (पुप्परूपी) बाए (विशिख) पर उत्कट विप रस दिया है।४३१॥ यहाँ पर ये भ्रमरयुक्त सहकार-पुष्प नहीं हैं अपि तु कालकूट (महाविप) सहित बाए हैं, ('छल' शब्द के प्रयोग से) यह प्रतीति होती है। प्रभा-'वत सखि' इत्यादि मे उपमेयभूत भृङ्गों का निषेध करके उपमानरूप कालकूट की स्थापना की गई है। यहाँ कपटार्यक 'छल' शब्द से उपमेय का निपेध अर्थलम्य (आक्षिप्त) है, अतएब आर्थी अपह ति है। अनुवाद्-पथवा इस प्रकार (आर्थीअ्रपह्न ति)-[वेश्यादासी किसी कामी के प्रति वेश्या का वरसन करती है। 'हे रसिक, निश्चय ही शिव के द्वारा दग्ध किया गया (शर्षप्लुष्टः) कामदेय इस मृगनयनी के पुष्ट जघनस्यल पर (विद्यमान) सौन्दर्य- सपी समृत के सरोवर में निमग्न हो गया है; क्योंकि (काम के) श्रद्गों के श्रद्गारों को शान्ति को सूचित फरने वाली यह धूमशिखा ना्भि-गृहा में रोमावली के झकार में परिरात हो रही है'।४३२।। 1 यहाँ पर 'यह रोमावली नहीं किन्तु घूमशिखा है' (परिसमति शब्द से अयं- वशात्) ऐसी प्रतीति होती है। इसी प्रकार प्रकारान्तर से भी यह (धार्थी अपह्न ति) समभनी चाहिए। प्रभा-(१)'अमुष्मिन्, इत्यादि मे 'परिणामति' (धूमशिसा रोमावलिवपुः परिणमति) शब्द के द्वारा यह प्रतीत होती है कि 'यह रोमावलि नहीं किन्तु धूम- शिस्ा है' यहाँ 'परिसाम' शब्द से उपमेय का निषेय अर्थगम्य है अतएव यह भार्धी अपह्नति हैँ।
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५०२ 1
(१४७) श्लेप: स वक्ये एकस्मिन् यम्रानेकार्थता भवेद i६६।। एकार्थप्रतिपादकानामेव शब्दानां चत्रानेकोडर्य स द्लेप:। उदाहरगाम- उद्यमयते दिड मालिन्यं निराकुरुतेतरां नयति निघनं निद्रामुद्रां प्रव्त्त यति किया:। रचयतितरा सवैराचारमवर्त्त नकत्त नें वत वत लसत् जः पुब्जो विभाति विभाकर:॥४३३॥। परपरपाभिवाया पनियन्त्रसान द्वावप्यर्कभूपौ पाच्यी। (२) आार्थी अपहा ति मनेक भद्भ्िमाओों (प्रकारों) से होती है। यहों कपटाथंक शब्द के प्रयोग से, कही परिामार्यंक शब्द के प्रयोग से; जिनके उदाहरण यहां दिये गये हैं। इनके अतिरित्त अन्य प्रकारों से भी मारयी अपहृति होती है जैसे-रप्तम उल्लार उदाहरण २६४ में 'इद से केनोकम्, ऐगा कहकर प्रट्टय का निपेध किया गया है। विश्वनाथ ने एक अन्य प्रकार की अपृ ति का भी निरुपण किया है- गोपनीयं कमप्यर्य दयोतपित्वा कथस्चन। यदि पलेपेसान्यया वान्यथपेत् साप्यह वि: ।। अनुवाद-(८. इलेप)- जहाँ एक ही माश्य में प्रनेश भर्य (प्रश्ट) हो यहु। दलेप (पलद्धार) होता है। (१४७) सर्यात् एक ही धर्थ के प्रतिपादक शब्दों के जहां समेक सर्यं हो जाते है, यह भर्थदलेप है, (उसका) उदाहाण है- 'विभाकर (सूयं या बिभाकर नामक राजा) उदय (या उपत) को प्राप्त होता है, दिररयों की मसिनता (पग्घकार या दुगगरस) को दूर करता है, निग्र को दशा (मा निरत्साह) को नष्ट करता है. कियाओों [गमनागमन पदि सभश सग्निहोत पावि) को प्रयृस करता है, उद्यूसस प्राचार (पभिसास चारि प्रमया स्वं्छन्दापरए) की प्रमुत्ि का उन्पेशन करता है। हपं को पात है कि शोमिन तेज पुषन (रशमियों या बान्तियों के समूह) से यह सोभायमान है।४३ यहां (उदयभराधि दाब्दों की) दमिमा का (मकरल घादि से) निपस्तल महो होता तथा सूयं धौरराजा होनों (धर्ष) यास्य है। प्रभा-(!) एक ही धर्म के प्रतिपादक सबों के यहा एव हो बापज में पनेक भर्य हो जाते है यह।ं अर्पलंग होता है। इम मयन में विरोप का भातित दोगा है-वो शष्द एव धर्म के समिवादर है उनके मनेर सर्ष ऐेगे सध्भष है? भग इसका ताहरयं पह है हि (i) यहों सपमान मे नभों का एक ही मर्य होता है हिमु हूमरे दब्ों के सम्मग्य से परेन मर्य हो नाते है (डब, मर्जः रत्बाबाद दढायेः
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दशमे उल्लासः
(१४८) परोक्तिर्भेदक: श्लिष्ट; समासोक्ति:
श्लेपोनेऽकार्थवाचनम् - विश्वनाथ) । (ii) स्वभाव से शब्द सामान्य प्रर्थ को कहते हैं परन्तु दूसरे शब्दों के सम्बन्ध से विशेष अर्थों का बोघ कराते हैं"; जैसे-उदय' शब्द का स्वाभाविक अरथ है सामान्यतः उठना; किन्तु सू्यं के साथ 'उदित होना औौर राजा के साथ 'वुद्धि' अर्थ हो जाता है। यहाँ 'एकस्मिन् वाक्ये और 'एकार्यप्रतिपादकानाम्' (वृत्ति) ये दो पद शब्द-श्लेप की व्यावृत्ति के लिये दिये गये हैं। (२) शब्द्र-श्लेप और अ्रथश्लेप-इन दोनों के द्वारा ही दो अथो का बोध होता है तथापि दोनों में अन्तर है -(i) अर्थ-श्लेप में शब्द स्वभावतः एक अर्थ के वाचक होते हैं (एकार्यप्रतिपादकानाम्) किन्तु शब्द-श्लेप में शब्द सदा ही अनेकार्थक होते हैं। (ii) अर्थ-श्लेप में शब्द परिवृतिसह होते हैं, अर्थात् किसी शब्द का पर्याय रख देने पर भी इलेप बना रहता है किन्तु शब्दःश्लेप में शब्द परिवृत्त्यसह होते है। (iii) अर्थ-श्लेष में एक ही वाक्य होता है (एकस्मिन् वाक्ये) जैसे कि 'उदयमयंते' आादि में है किन्तु शब्द-श्लेप में भिन्न २ अयों के अनुसार भिन्न २ वाक्य हो जाते हैं; जैसे 'त्वां सर्वदोमाघवः पायात्'=(क) त्वां सर्वदः माघवः पायात्, (ख) त्वां सवदां उमाघवः पायात्। (३) इसेप और मभिघामूला (शब्दशक्तिमूल) ध्वनि-इन दोनों के द्वारा ही दो अर्थों का बोध होता है तथापि श्लेप में संयोग आदि के द्वारा अभिघा का निर्यन्त्रण नहीं होता और प्रकरण के योग् दोनों ही अरथ वाच्य होते हैं, जैसे-उदा० ४३३ में सुर्य और राजा दोनों ही वाच्य हैं इसके विपरीत ध्वनि में संयोग आादि के द्वारा भ्रभिया का जिस अर्थ में नियन्त्रण हो जाता है, वह अर्थ तो वाच्य होता है भ्र दूसरा अर्थ व्यङ्गय होता है, जैसे ऊपर उदा० १२ में राजविषयक अर्थ वाच्ये है किन्तु गज-सम्वन्धी अर्थ व्यङ्गय है। (४) 'उदमयते' इत्यादि में सूर्य और राजा (विभांकर) दोनों ही समानरूप से वण्यं हैं और सभी अरथों का दोनों के साथ अन्वय होता है यहां 'उदय' शब्द का सामान्य अर्थ 'उठना' है और यह शब्द एकार्थक है किन्तु सूर्य के साथ इसका अर्थं है- उदित होना (निकलना) और राजा के साथ इसका अर्थ है-वृद्धि। इन दोनों अर्थों का अभिघावृति से ही बोध हो जाता है; क्योंकि अभिवावनि सयोग आदि के द्वारा किसी एक अर्थ में निर्यन्त्रित नहीं हुई है। यह 'उदय' शब्द परिवृत्तिसह भी है। यदि 'उदमयते' के स्थान पर 'उन्नति गच्छति' आदि रख दिया जाय तो भी पलेष बना ही, रहेगा। भंतः भर्थ-श्लेप है। अनुवाद-(६. समासोकि) स्लिप्ट विशेषलों के द्वारा (भेदर्कः) पर भर्यात् मप्रकृत प्रयं का बोघन समासोकिति मलद्धार है। (१४८)
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५०४ कामप्रकारो:
प्रकृतार्थप्रतिपादकवाकयेन दिलप्दविशेषएमाह्ाव्यात् न तु विशेष्यरय सामर्थ्यादपि यत् अरप्रकृतस्यार्थ्याभिधानं सा समासेन संक्षेपेणार्धद्वयकय- नात्समासोकि:। उदाहरणम्- लहिकए तुष्म बाहुप्फंसं जीए स कोवि उल्लासो जश्रलच्छी तुद विरहे या हुज्जला दुव्वला ग सा ।।४२४। (लच्च्ा तव वाहुस्पर्श यश्या: स कोऽप्युल्लासः। जयलक्ष्मीस्तव विरह्े न सलूञवला दुर्यला ननु सा ॥४।४II) पम्न जयलक्मीशब्द्शय केवलं करान्तावाचकर्त्य नास्ति। प्रकरस-प्राप्त अयं के प्रतिपादक वात्म-दारा वलय्ट पिशेयों को महिमा से, न कि विदेध्यवाचक शब्दों के सामव्य से भी, जो धमासुत वर्म का व्यं्जना- द्वारा बोप होता है (पनिधानम्= रयञ्जनया बोधनम्): यह समास सर्मात् संक्षेप से यो परयों (प्ररतुत तथा सप्रस्तुत) का कथन करने के फारस समामोरि ममद्वार ह। (उसका) उदाहरस है-[सगर-पतित श्वामी के प्रति पोरपली की अक]- 'हे वोर, सुम्हारे बाह-सपर्र को प्राप्त करके जिसको अनूठा (कोउि) सानन्य होता था, यह जयलद्तमी पब सुग्हारे विरह में उज्जवत नहीं रही, दुबस हो गई है॥४४ पहाँ केवल (विशेष्ययाचष) जवलदमी शम्त (पव्रहृत) कामिनी का प्राचर नहीं है ("सबप्या याहस्पर्श" इत्मादि यिशेबस तो उसके बोधप है ही)। प्रना-(१) समास का धर्व है-संसेप, ममः समानोि=मशप मे दो भर्थों का कथन। सलिष्ट भर्यात् प्रस्तुत औौर मप्रस्तुग दोनों में उपमुक्त विनेवाो के द्ागा प्रमकृत पर्य का, बोधन हो समामोति है। दसमें (i) प्रह्मुत के वर्णन द्वारा मप्स्तुत की प्रतीधि होती है (ii) वेयल विभेषय सो विनष्द होगे है, विनेष्व नहीं। 'सब््वा' इत्वादि में विरेपसमापक शबरों से (सन्जना द्वारा) जपमक्षमी का सुशान (पपकुन, कामिती के वृतान् के रप में प्रवीत हो रहा है, पसः रामानोकि अमदार है। (२) समासोकि पा अन्य (पमदवूागं) मे सनर- (i) समासोक औौर इनेय-पदप दोनों में दि्ट सग होने है पोर पनड भयों की प्रतोति होती है तपास (प) व्लेप में विभेष घर विवेकस दोनों हो रिग्ड होते है निमु ममाोत में केन िलेयस सिमय्द होजे है (9) मनेन मे दोनों दी पर्थ याच्म होते है, दोनों ही समान रूप से प्रस्तुष होते ह हिन्णु अमामोकि में प्ररसुन वय वाध्य होता है औोर पनन्तुण धर्व प्रोयमान (सहय)। (ii) रुमागोरि और इपक-दोनों मे ही पस्तुत मोर बवचुड या कामेर- उस्मान-भाव हतर है बवार (ए) इदर में उपमान के स्नम् का उपमेय से ब्ारोर किना नादा है बैवे 'ुम पनद' मे भन के सरस ना दुप में पारर रिया नाश है। दूमरी वोर गमामोसि मे सममुत मे सदारे का सत मे यारोड किया
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देद्यम उल्लास ५०५
(१४६) निदर्शना। अभवन् वस्तुसम्वन्ध उपमापरिकल्पक: ।६७।। निदर्शनं दृष्टान्तकरगम्। उदाहरगम्- कव सूर्यप्रभवो वंशः क्व चाल्पविषया मति:। तितीषु र्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम् ॥४३५॥ अन्नोडुपेन सागरतरएमिव मन्मत्या सूर्यवंशवर्णनमित्युपमायां पर्यं वस्यति। यथा वा- . उद्यति विततोर्ष्वरश्मिरज्जावहिमरुची हिमघा्नि याति चारतम। 1
वददति गिरिरयं विलम्निघएटाद्वयपरिवारितवार गेन्द्रलीलाम्॥४३६।। जाता है जैते 'लब्ध्वा' इत्यादि में नायिका के व्यवहारों का जयलक्ष्मी में आरोप किया गया है (ख) रूपक में अप्रस्तुत को शब्दों द्वारा कहा जाता है, किन्तु समासोकिति में वह व्यङ्गथ होता है। (३) समासोक्ति और ध्वनि-समासोक्ति में प्रस्तुत अर्थ वाच्य होता है, अप्रस्तुत का व्यवहार व्यङ्ग्य होता है। जय उसका प्रस्तुत के व्यवहार मे आरोप किया जाता है तो उससे वाच्य अर्थ का उत्कर्ष ही बढ़ता है। अतः व्यङ्गच अर्थ वाच्य का श्रङ्ध होता है और यहाँ ध्वनि नही वही जा सकती। इसी हेतु आचार्यों ने समासोक्ति को अपराङ्ट्रगुणीभूत व्यङ्य माना है। (बालबोबिनी) । अनुवाद-(१० निदर्शना) जहाँ पदार्थों या वाक्यार्थों (वस्तु) का अनुप- • पद्यमान (भ्रभवन्=असम्भवन्, उपयुक्त न होता हुआ) सम्बन्ध उपमा की कल्पना (प्राक्षप) कर लेता है वह निदर्शना अलद्धार है। (१४६) . निदशन अर्थात् दृष्ठान्त या उदाहरस दिखताना। प्रभा-जहाँ उक्त पदार्थों या वाक्यार्थों का अन्वय नहीं बन पाता तथा वह 'उपमानोपमेयभाव में परित हो जाता है वहां निवरशना अलद्धार होता है। वह दो प्रकार का है-१ वावयार्थ निद्मना तथा २ पदार्थ निदर्शना। अरनुवाद-उदाहरण है-(वावयार्थ निवशना)-[रघुवंश महाकाव्यमें]- 'कहाँ तो सूर्य से उत्पन होने वाला वंश (रघुवंश) और कहाँ सल्पज्ञान वाली मेरी
हू'।।४ ३५1। बुद्धि ? में तो मोहवश उडप (छोटी नाव) से दुस्तर सागर को पार करने का इच्छुक
यहां पर-'उडप के द्वारा सागर-तरसा के समान हो मेरी बुद्धि के द्वारा सूर्यवंश्र का यशन है इस उपमा में (फवि को उत्ति) परित हो जाती है। प्रथवा जैसे-(पदार्थ निदशना) [माघ-काव्य के रवतकगिरि-वहान में]- 'किर रूपी रज्जुप्रों को ऊपर को और पसारे अ्र्हिमरश्मि (सूर्य) के उदित होने
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५०६ 1 काकप्रकारी:
अप् कथमन्यस्य तोलानन्यो वह्तीति तत्सदशीमित्युपमायां पर्यवसानम। दोर्भ्या तितीर्पति तरकवतीमुजङ्- मादाुमिच्छति करे इरिसाङुविम्यम्। मेरु लिलड्घयिपति भ् वमेप देव,- यस्ते गुणान् गदितुमुद्यममादघाति ॥४३७! इत्यादी मालारूपाडप्येपा द्रष्टव्या। पर तथा लोतरदिम (धन्द्रमा) के भस्त होते समय यह पवत उस गमेग् की शोना (सीसा) को धारस करता है जो (दोनों ओोर) सटकते हुए को घष्टों से पुक्त हा' 1४३६11 यहां पर अन्य (वारशेग्ट्र) की सोत्षा को प्न्य (रंवतक पर्वॅत) कैसे भारल फर सकता है? इसलिये 'उसके समान (उस जसी)' दवरा उपमा में परिलनि हो जाती है। (मालारपा निदशना)-'हे राजन्, जो सुम्हारे गुलों का कपन करना घाहता है वह निशचय हो (ध.यम) सरित्पति (तरसपतीमा नहोना भुजस बिद भर्सारम्) घर्थात् सागर को भुजाओों से तरने का इच्छरु है, हाप में मृगास बिम्य (पन्त्रमण्डस) को परड़ना (मादायु) घाहता है तथा मेद पवत को साँप जाना चाहता है।४३७।। इरयावि में मासामया भी यह (निवर्शना) बेसी आती है। प्रभा-(t) 'यय सूर्यप्रभव:' इयादि में वामायं-निदमंगा है। यदा पर सूर्यपंस मे वर्णन में 'भह गागरं तितीपु : भस्मि' दन मानवाय या सम्बन्ध मनुरसार है तपा वह इग उपमा की बह्नना मर सेता है-'उद्ट गे गागरनरग के समान मेरो मति से गूर्य-बंद का वर्गन सगम्मय है। (२) 'उदयति' इत्यादि में पशार्य निदतना है। मह पर 'पार्णेन्ट्रमोना' द्र समहन पद के घर्य के साथ 'गिरि' गम मे भर्द का पलप नही बा; करोंकि मारखेन्द्र की नीना पपंत में शमे हो सबनी है ? इमनिये वह 'बारमेक्मद्णी सीमा' इम उपमा का बोप कराता है। (३) 'दोर्न्गम्' उ्यवादि में मानास्पा निर्सना है। वरहा पर 'या सय दूग गरान् पदितुम् उद्यमम् पारमाति' इग वावव के धर्ष से गाय गयः सरयुंगो मुंबहं धो्म्बा विवीमति' हरमादि वाहतों का सम्बन्ध सनुकम रे मदा बद् मापर- तरस यादि के सनार सुम्दारे दुगों का मखन है, इम उत्मा मे दगकिा़ हो वाता ह। एर ही 'मुगनलरगन' अ्तेष वे 'ममुक्नरसंष्या' पाहि पेर अवान होने क शरत यहाँ मालाहता वरयर्मे-निर्मेना है।।
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दशम उल्लाम:
(१५०) स्वस्वहेत्वन्वयस्योक्ति: क्रिययैव च साऽपरा। क्रिययैव स्वस्वरूप-स्वकारणयोः सम्बन्धो यदवगम्यते साऽपरा निदर्शना। यथा- उन्नतं पद्मवाष्य यो लघुर्हेलयैव स पतेदिति न्र वन्। शैलशेखरगतो दपत्कणश्चारुमारतधुतः पतत्यघः॥४३=॥ छपत्र पातक्रियया पतनस्य लाघवे सति उन्नतपदप्राप्तिरूपस्य च सम्बन्धः ख्याप्यते। (१५१) अ्प्रप्रस्तुतप्रशंसा या सा सैव प्रस्तुताश्रय ॥६८॥ अनुवाद-(अन्य प्रकार की निदर्शना) जो क्रिया के द्वारा ही अपना (स्व) तथा अपने हेतु का सम्बन्ध-कथन है वह एक अन्य प्रफार की (अपरा) निदर्शना है। (१५०) अर्थात् जहाँ करिया के द्वारा ही अपने स्वर्प तथा अपने कारण का सम्बन्ध ग्रवगत कराया जाता है, वह एक अन्य (उपयुक्त निदर्शना से भिन्न) निदर्शना है। जैसे- 'पर्वत के शिसर पर पहुँचा हुआ पापासकए मन्दवायु से कम्पित होफर (धुतः) यह कहता हुआ नीचे गिरता है कि जो नीच या अल्प बुद्धि वाला (लघु) है वह उच्च पद को पाकर सहज ही (हेलयव-तोला मात्र से हो) गिर जाता है'
यहाँ पर पतन क्रिया के द्वारा (अपने स्वरूप) पतन का तथा (पतन के
जा रहा है। फारस) लघु होकर उच्च पद की प्राप्ति फा (कार्यकारसभाव) सम्बन्ध प्रकट किया
प्रभा-'उन्नतम् इत्यादि एक अन्म प्रकार की निदशंना का उदाहरण है। यहाँ पर 'पतति' इस पतन किया (कार्य) के द्वारा 'पतेत्' शब्द से बोधित अपने पतनरूपकार्य का तथा क्षुद्र व्यक्ति की उन्नतपदप्राप्ति रूप (अपने) कारण का (कायं- करणभाव) सम्यन्ध प्रतिपादित किया जा रहा है जो इस दूप्टान्त (निदशंन) में परिसत हो जाता है कि 'क्षुद्र होने पर उन्नत पद को प्राप्त करने वाले का इस प्रकार पतन हो जाता है जिस प्रकार पापाए करा का'। इस निदर्शना में वस्तुगं का सम्बन्ध सम्भव या उपपन्न ही होता है। प्रथमोक्त निदशंना में वस्तु-सम्बन्ध अनुपपन्न होता है, यही दोनों का भेद है। दृष्टान्त और निदरसना में भन्तर है (द्र० दृष्टान्त)। अनुवाद्-(११. अप्रस्तुतप्रशंसा)-[या अभ्स्तृतप्रशंक्षा सा प्रस्तुताथया (चेतृ तदा) संय अपस्तुतप्रशंसा]-जो पपफृतवस्तु का वर्णन (प्रशसा) प्रकृत (वएं- नीम) वस्तु की प्रतोति का निमित्त (आश्रम) होता है, वही अप्रस्तुतप्रदंसा नामक मलक्कार है। (१५१)
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काव्यप्रफाण:
(१५२) कार्ये निमित्ते सामान्ये विशेषे प्रस्तुते सति।. तदन्यस्य वचस्तुल्ये तुत्यस्येति न पञ्चघा॥६६।। तदन्यश्य कारणादे: । कमेमोदाह रगम- १. याता: किन्न मिलन्ति सुन्दरि, पुनशचिन्ता त्वया मतते नो कार्या नितरां कृशाइसि कथयत्यवं सवाप्पे मयि। पर्यात् भ्प्रस्तुत (भप्राफरलिक) के कथन द्वारा प्रस्तुत विपय की प्रतीति कराना (प्रक्षेप) पपस्तुतप्रशंता है। यह (प्रपस्तुतप्रशंसा) पांच प्रशार को है -:- फायं, २-निमिस, ३-सामान्य ४-विशेष के प्रस्तृत (वनीय) रहने पर उससे मिन्न (सर्यात् कारण, काये, विशेन और सामान्य) का तथा (५) तुल्य वस्नु के प्रस्तुत रहने पर उसके समान (पशनत) का फमन। (१४२) (कारिका में) तदन्यस्य मर्यात् (प्रकृत कार्य आदि से भिन्न) कारर भारि का । प्रमा- (१)अप्रस्तुतप्रगंता पससर यहो होता है जहा पपरावधषिक मर्यात् भप्रस्तुत की वर्णगना द्वारा प्राकरसिक (प्रस्तुत) की प्रतीति होती है। बिन्तु जहाँ प्राफरशिव के वर्णन मे अनारुरसिक का माशेष (प्रतीति) होता है यहं समासोकि हुपा करती है (यालयोधिनी) 1 किन्च, जब पमस्नुतप्रमंगा पलेप पर आश्रित होती है तो वहाँ कभी विनेषण औौर कभी विशेष सपपा दोनी धनेवार्षक हो राकते सैं किन्तु सामामोकि में विनेषस हो पनेकार्यक हम करगे है, विसेध्य मही। इमी प्रकार जहां कार्य पारण तया सामान्य विरेप दोनों हो बाब्म होते है यहा पर्मान्तरस्ाग होता है। जहा दोनों सुख्य वस्तु मार्य होगो है वहाँ दग्टान्त मनदार होता है। समस्तुर के याब्य तथा प्रस्नुन के प्रतोषमान (गम्म, घादोपमम्ब) दोने गर को पमतुवतरणंता होती है (मगपुारतयंखय)। इतेय के समान भमसुमबतगा मे भी दिसेपस तथा विवेष्य दोनीं ही अनेषार्यक हो गबते है समाति लंद मे दोनों सर्भ पाच् होने है, दोनों ही प्रपुन होने है किन्ु भशसुनपतणा मे एव भर्म पनानृत तदा पाष्प होता है, दूसरा म्य प्रम्तुत तमा समम होता है। पशमृतप्रगंग को पम्योकि भी रस्े है। (ग) पमशुमपगंता में प्रस्तुप सथा पममुत का पाष प्रवार का प्राकन्भ होता है इमो हेतु यह पांष प्रकार मी होती है। फोरिका में पॉपो नगरो को बोरना इस प्रार है- (1) शापं के पर्नीय होने पर उसते मिन्न सर्दान राग का भगेग (पामें अस्मुते नहन्पग्य यष): (२) मारत्र के मतुत होने गर नक्तिन ।गं। मा बर्गन: (३) गामात से वम्दर ग्हो मह्ितित (वितेर) का बनन () बिगेप सृत) का मुम्य वर्गन।
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दशम उल्लास: ५०६
लंज्जामन्थरतारकेए निपतत्पीताश्रणा चक्षपा दप्ट्वा मां इसितेन भाविमरसोत्साइस्तया सूचित:॥४३६।। अत्र प्रस्थानास्किमिति निवृत्तोऽसीति कार्ये पृप्टे कारएमभिहितम्। २. राजन्, राजसुता न पाठयति मां देव्योऽपि तूष्णी स्थिता: फुब्जे, भोजय मां कुमार सचिवैर्ना्यापि कि भुज्यते। इस्थं नाथ, शुकस्तवारिभवने मुक्तोऽध्वगै: पब्जरात् चित्रस्थानवलोक्य शून्यवलभावेकेकमाभापते ।४४०. अत्र प्रस्थानोद्यतं भवन्तं झात्वा सहसैत्र त्वदरयः पलाय्य गता इति कारणे प्रस्तुते कार्यमुक्तम्। 4-
३. एतत्तस्य मुखात्कियत् कमलिनीपत्रे करं वारिणो यन्मुक्तामशिरित्यमंस्त स जडः शृएवन्यदम्मादपि। मित्र के प्रति स्वप्रिया-वर्णन]-(१) (हे मित्र) अ्रथ पूर्ण होकर मेरे यह फहने पर फि-'सुन्दरी, गये हुए षया फिर नहीं मिलते हैं (अपितु मिलते ही हैं), अ्रतः तुम्हें मेरे लिए चिन्ता न फरनी चाहिए, तुम (चिन्ता में) अत्यधिक कृश हो गई हो।' उस (प्रिया),ने लज्जा से निश्चल तारिकाओं वाले तथा गिरते हुए अ्रध को पी लेने वाले (निपतद् एव पीतम् श्रध येन) नेत्र से मुझे देसा और हँसकर भावी मरण- विषयक उत्साह को सूचित किया' ॥४३६॥ यहाँ पर 'जाने से क्यों रुक गये ?' इस प्रकार (मिन्न द्वारा) फार्य (रुकना) के पूछे जाने पर (प्रस्तृत) कारण अर्थात् प्रिया के भावी मरणोत्साह (अप्रस्तुत). का फथन किया गया है; [अतः यहां कार्य के प्रस्तुत होने पर कारणवएंना सप प्प्रस्तृत-प्रशंसा है]। (२) [राजा के प्रति फवि की उक्ति] 'हे स्वामिन्, आपके शत्ुओं के भवन में पयिकों द्वारा पिजरे से मुक्त किया हुआ शुक सूनी अटारी में चिन्र-स्थितों (राजा आदि) को देखकर एक-एक से इस प्रकार कहता है-हे राजन्, राजपुत्री मुझे नहीं पढ़ातो, रानियाँ भी चुप हो गई हैं। हे फुब्जा, मुझे भोजन कराओ। हे कुमार, तुम्हारे सार्थियों ने (सचिवंः) भब तक भी भोजन प्यों नहीं किया'? ॥४४०॥ यहा पर 'अ पको प्रस्यान (आ्राकमए) के लिये उद्यत जानकर सहसा ही आपंके शत्रु भाग गये' इस (शध्रुपलायन रप) फारण के प्रस्तुत होने पर (पर्षिक द्वारा मुक्त धुक का चिन्नों से बोलना रूप) कार्य (भ्रप्रस्तृत) का कथन किया गया। है, [प्रतः यहां कारण के प्रस्तुत होने पर कार्य-वरणना रूप अ्रप्रस्तुतप्रशंसा है]। (३) भल्लटशतक में मूखविषयक चर्चा में एक धपक्ति की दूसरे के प्रति उक्ति] 'उसके मुख से जो सुना है (श्रतम् इति शेषः) कि उस मूसं ने कमलिनी-पत्र पर स्थित जल-कस को 'मोती' मान लिया, यह कौन बड़ी बात है (किमत् =
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(१५२) कार्ये निमित्ते सामान्ये विशेपै प्रस्तुते सति।। तदन्यस्य वचस्तुल्ये तुल्यस्येति न पञ्चषा।।६६।। तदन्यस्य कारणादे: । क्रमेमोदाइरगम- १. याता: किन्न मिलन्ति सुन्दरि, पुनशचिन्ता त्वचा मत्ृते नो कार्या नितरां वृशाइसि कथयत्येवं सथाप्पे मयि। पर्यात् अप्रस्तृत (प्रमाकरसिक) के फमन द्वारा प्रस्तुत विधय की प्रतोति फराना (प्राक्षेप) पप्रस्तृतप्रदंसा है। यहु (पप्रस्तुतप्रसंत्ा) माँच प्रकार की है -- फाय, २-निमित, ३-सामान्य ४-विशेष के प्रस्तुत (बहंनीय) रहने पर उससे निम्न (पर्यात् कारस, फाम, विशेष घोर सामान्य) का तथा (५) तुल्य वस्नु के प्रस्तृत रहने पर उसके समान (सभतृत) का फपन। (१४२) (कारिका में) तदन्यस्य अर्यात् (प्रकृत कार्य आादि से मिन्न) कारस भारि का । प्रमा- (१) मपस्तुसनगंगा मनद्वार यहो होता है नही पमाकरमिए मर्यात् ममस्तुत मो वना द्वारा प्रारुरशिक (प्रस्तुत) को प्रयीति होती है। रिन्तु यहां प्राफरणिक के वर्णन से मनाकरिप का पाधेष (पतिति) होता है यहाँ समायोकि हमा करती है (वानवोमिनी)। विञ्य, जय पमस्तुवनगंगा रवेप पर भाथित होती है वो यढ़ा कभी विगेषम और प्भो विसेष्य पपया दोनो पनेकामक हो सकते है फिन्दु समामोकि में विनेकस हा भनेकार्यक हदा परते है, विसस्य गही। इसी प्रकार जहां पार्य वारस तथा नामान्य विनेष दोनों हो याम्य होने है पहा सर्पान्तरन्वासा होता है। जह। दोनो तुस्य वस्तु वाष्य होती है वहा दूष्टान सनद्ार दोशा है। प्रपस्सुन के बास्य तथा परमुग के प्रनीममान (गम्म, मार्सेरपन्य) हने पर ो सपस्नसर्रगंगा होनी है (प्रमदवारमपत्य) ।सेय के समान पपस्तुग-पर्षा मे भी विसेपत समा विलेष्य दोनी दो मनेकापक हो गनने ह वमापि रर्वप में दोनों भर्ष पाष्म होने है, दोनीं हो प्रस्पुत होंगो है बिलु पपमुनदर्तणा में ए सर्म पवापुत तथा वाप्त होता है.दूमरा मर्प प्रस्वृत तथा अमप सता है। पसम अरंगा सेो अन्योकि भी कहषते है। (ग) मपरस्नुनननंमा में प्रस्तुन समा पशातुत का पदि प्रकार हा सादाय होता है दमी हेउु यह पाम पार को होती है। पीरिया मे पौषी प्रवाग कौ सोरना इस प्रशार ह- (१) नारयं के वर्णनीय होने पर जवंगे भिन्ग सर्मोह मारल का बाोने (पाने अममुने महन्यम्य पष): (१) वारम के अमुण होगे पर बक्रिम शाह। का वर्णन: (1) नामान के बपुा रहो तक्िन (शिेस का पमन (य) लिन के सम्पुण रहों सन्तिरिन (गामरम्ण) का वर्णन सगा (x) तुष्य मे आ् हने पर [६ गुम) शा गुस्य मयन।
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दशम उल्लास:
लज्जामन्थरतारकेस निपतत्पीताश्रखा चक्षपा दष्टूवा मां इसितेन भाविमरणोत्साइस्तया सूचित: ॥४३६।। पत्र प्रस्थानार्किमिति निवृत्तोऽसीति कार्ये पृष्टे कारएमभिहितिम्। २. राजन्, राजसुता न पाठयति मां देव्योऽपि तू्ष्णीं स्थिता: कुब्जे, भोजय मां कुमार सचिवैर्नारापि कि भुज्यते। इस्थं नाथ, शुकस्तवारिभवने मुक्तोध्वगैः पञ्जरात चित्रस्थानवलोक्य शून्यवलभावेकेकमाभाषते ॥४४० अ्रत्र प्रस्थानोदतं भवन्तं ज्ञात्वा सहसैव त्वदरयः पलाय्य गता इति कारणे प्रस्तुते कार्यमुक्तम्। ३. एतत्तस्य मुखाति्कियत् कमलिनीपत्रे करसं वारिणो यन्मुक्तामशिरित्यमंस्त स जड: शृववन्यदम्मादपि। मित्र के प्रति स्वप्रिया-वरणन]-(१) (हे मित्र) अ्रथपूर्स होकर मेरे यह कहने पर कि-'सुन्दरी, गये हुए वया फिर नहीं मिलते हैं (अपितु मिलते ही हैं), अतः तुम्हें मेरे लिए चिन्ता न करनी चाहिए, तुम (चिन्ता में) अत्यधिक कृद हो गई हो।' उस (प्रिया) ने लज्जा से निश्चल तारिकामं वाले तथा गिरते हुए अश को पी लेने घाले (निपतद् एवं पीतम् श्क्ष येन) नेत्र से मुभे देसा और हँसकर भावी मरसा- विषयक उत्साह को सूचित किया' ।४३६॥ यहाँ पर 'जाने से व्यों रुक गये ?' इस प्रकार (मिन्न द्वारा) फार्य (रुफना) के पूछे जाने पर (प्रस्तृत) फारण अर्थात् प्रिया के भावी मरसोत्साह (प्रप्रस्तुत). का कथन किया गया है; [अतः यहाँ कार्य के प्रस्तुत होने पर कारएवएना रूप अपस्तृत-प्रशनंसा है]। (२) [राजा के प्रति कवि की उक्ति] 'हे स्वामिन्, आपके संतुओ्रों के भवन में पथिकों द्वारा पिजरे से मुक्त किया हुआ शुकु सूनी अटारी में चित्र-स्थितों (राजा आदि) को देखकर एक-एक से इस प्रकार कहता है-हे राजन्, राजपुत्री मुझे नहीं पढ़ाती, रानियाँ भी चुप हो गई हैं। हे कुब्जा, मुझे भोजन करामो। है कुमार, तुम्हारे साथियों ने (सचिवंः) अब तक भी भोजन कयों नहीं किया' ? ॥४४०॥ यहाँ पर '्र पको प्रस्थान (आंकमएं) के लिये उद्यत जानकर सहसा ही आपके शतु भाग गये' इस (शग्रुपलायन रप) फारस के प्रस्तुत होने पर (पषिक द्वारा मुक्त शुक का चिन्नों से बोलना रूप) कार्य (प्रप्स्तृत) का कथन किया गया है, [भतः यहां कारस के प्रस्तुत होने पर कार्य-बहना रूप प्रप्रस्तुतप्रशंसा है]। (३) भल्लटरतक में मूखविषयक चर्चा में एफ व्यक्ति की दूसरे के प्रति उक्ति] 'उसके मुख से जो सुना है (श्रतम् इति शेषः) कि उस मूसं ने कमलिनी पत्र पर स्यित जल-कण को 'मोतो' मान लिया,"यह कौन बड़ी बात है (कियतु=
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५१० ] कावमकरा:
पशोदीय गतो ममेत्यनुदिनं निद्धाति नान्त: शुधा।४४।।। अ्रम्मारयाने जडानां ममत्वसन्भायना भवतीत सामान्ये प्रातुते विशोष: कथित. ! ४. सुहद्वधूयाप्पजल प्रमारजनं करोति पैरप्रतियातनेन गः। रा एच पूज्य: स पुमान् स नीतिमान् सुजीवितं तरय स भाजनं लिय:।४४२। शम् 'कृष्णं निषृत्य नरकासुरबधूनां यदि दुःसं प्ररमयसि तत् स्वमेय रलाष्य', इति विशेपे प्रफने समान्यमभिद्दितम। ५. तुत्ये प्रसतुते नुत्यामिधाने न्रयः प्रकाराः।दलेप: समासोकि: साटश्प- मात्र वा सुल्यात ल्याय दि प्ाल्षेपे देतु: । क्मेमोदादरगम- अर्यस्पम): इमसे भी भट्फर यह गुनो-(मोती समभवर वस वर्तायम्तु दो) मोरे से-मेते समय (पारीममाने) इम मि के सप्रभाम के सपर्ग (दिया) से उमके विसीन हों माने पर 'मेरा (गोतो) वहा उड़ गया' दस हाटिक तोफ से यह सो प्रपिरिन रोता ही नहीं ॥४४{।। यहाँ पर 'पयोग्य स्यान (सनयसर) पर भी मूहों की ममता को सम्भायना ह' इस सामान्य के प्रसतृत होने पर (मोती समनरर किसी भूर्ग की ननपस में गमतां एप) विशेप का कथन किया गया है, [पतः सामाय्य के प्रस्तुम होगें पर विशेव वर्णना रूप सपातुतवसंमा है।। (2) नरकपर या पथ किसे दाने पर उसके मित सास्व के अति भ्त्री की बकिो- मो दुष्य वर या बदता सेरर मित्न को नारितों के भमन को पोदिगा यही पूज्व है, यही पुरण (गौरयपुत) है, यही नोतिमान है उसरा को आम जोवन है औोर पढ़ी सडपी का भाजन है।t४२॥ पह! पर दमप के मारकर मि मरानुर को नारिदों हे सोड को शास पस्ो हो सो सुम्हो प्संगनीय ह। इम (साह्य-विदवक) बिहीय के पतुत होनें पर (सो बर का प्रतिशोष करता है बही पवतीय है-दग) सामान्य या मर्मन हिपा दया है:परः विशेव के प्रासृत रहमें पर सामा्य वर्मन रूप समागृत भरता है।। (४) मुत्य से प्रसपुृत होने पर (मुर्य समावृत) के वर्णन के तोन प्रषार है कर्द्ोदि (क) दलेष (एमी विदेनस तमा विभेस्नपापक पररों की कमशर्पबोपमा), (स) समानोगि (विमेपसगाल की उभवार्यशोपरता) मया (n) बंय स्रसभ् मे (भप्रातुन) मृत्य के परोन से (पपृत) तुस्त सो सल्बता (पासेग) केहप होने हैं। चमत उशरसता मे है- (: र. इ रेग्ेगुए्त मश्म्नुसप्रसंमा) (भग्मरसरर में, जिग राजा का प्रु में राजसापदूश्हर कर तिया है उनके पतति मर्त्री सो ब का़ सुषमष (सोष)
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दराम उल्लास: [ ५११
(क) पुसत्वादृपि प्रविचलेद्यदि यद्यघोऽपि यायाद्यदि प्रसायने न महानपि स्यात्। अभ्युद्धरेत्तदपि विश्वमितीदशीयं केनापि दिक प्रकटिता पुरुषोत्तमेन ॥४४३।। (ख) येनास्यभ्युदितेन चन्द्र, गमितः क्लान्ति रवौ तन्र ते युज्येत प्रतिकर्तु मेव न पुनस्तस्यैव पादगइ्दः। कषीणेनैतदनुष्ठितं यदि ततः कि लज्जसे नो मना- गस्त्येवं जडघामता तु भवतो यद्वयोम्नि विस्फूर्जसे।४४४1 (ग) आदाय वारि परितः सरितां मुखेभ्य: किन्तावदर्जितमनेन दुरर्णवेन। से रहित (मोहिनी रूप) हो जाप, चाहे नीचे [पातात में कर्म आदि रूप से या सम्पत्ति नाश से] चला जाय, चाहे, याचना (प्रसयन=वासनरूप में माँगना या सहायता मागना) में महान् भी न रहे; तथापि संसार (समस्त राज्य आदि) का उद्धार करे। किसी.पुरुवोत्तम (विप्स या सत्पुर्ष) ने इस प्रकार की पद्धति (दिक्) प्रदशित की है। [अतः आाप भी स्व-राज्य का उद्धार कीजिए, यह भाव है] ॥४४३॥ प्रभा-यहाँ सत्पुरुप वर्णनीय रूप में प्रस्तुत है उसके सुल्य अप्रस्तुत विप्ण का वर्णन किया गया है। इस वर्णन में 'पु'स्त्व' आदि विशेषण पद तथा 'पुरुपोत्तम' यह विशेष्य पद श्लिप्ट हैं। अ्रतः इलेप के द्वारा प्रस्तुत सत्पुरुष की प्रतीति हो जाती है तथा यहाँ श्लेपहेतु का अप्स्ततप्रशंसा है। अनुवाद-[५ ख. समासोकिहेतुक अप्रस्तुतप्रशंसा)-[अपकारी का अ्रनु- सरस करने वाले क्षीस-व्यक्ति के प्रति उपालम्भ है] 'हे चन्द्र, जिस (सूर्य) के उदित होने से तुम क्षीसता को प्राप्त हुए हो उस सूर्य का तुम्हें प्रतिकार करना ही युक्त है, न कि उसका ही पैर पकड़ना (रश्मि-ग्रहण) यदि क्षीस (कलाहीन या धनहीन) होने से तुमने यह (पाद-ग्रहण) किया है तो तुम तनिक भी लज्जित थयों नहीं होते? तिस पर जो आकाश में गर्व पूर्वक उदित होते हो (बिस्फूर्जसे) यह तुम्हारी जडया- मता (शीतल या शिमिल तेजवाला होना) ही है॥४४४॥ प्रभा- यहाँ निर्घन और धनिक का वृत्तान्त वर्णनीय रूप में प्रस्तुत है, तत्तुल्य. अप्स्तुत चन्द्र तथा रवि का वर्णन किया गया है। यहाँ विशेष्यवाचक चन्द्र तथा रवि. पद श्लिष्ट नही; केवल स्लिष्ट विशेषों द्वारा प्रस्तुत वृत्तान्त की प्रतीदि हो जाया करती है; अतः समासोकितिहेतुका अप्रस्तुतप्रशंसा है। अनुवाद-(५ ग. सादृश्यहेतुक भप्रस्तुतप्शंसा) 'इस दुष्ट सागर ने सब भोर से सरिताओं के मुस से जल प्रहण करके कया किया (भजितं सम्पादितम्) ?
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५१० काव्यप्रकाश: 44
फुत्रोड्ीय गतो ममेत्यनुदिरननिद्राति नान्त: शुचा॥४४१ अन्नास्थाने जड़ानां ममत्वसम्भावना भवतीति सामान्ये प्रस्तुते विशेष: कथित. । ४.सुहद्धधूवाप्प जल प्रमार्जनं करोति वैरप्रतियातनेन यः। स एव पूज्य: सं पुमान् स नीतिमान् सुजीवितं तस्य स भाजनं श्रिय:॥४४२।। अरत्र 'कृष्णं निहृत्य नरकासुरवधूर्ना यदि दुःखं पशमयसि तत् त्वमेव श्लाध्य', इति विशेपे प्रकते समान्यमभिहितम। ५. तुल्ये प्रस्तुते तुत्याभिघाने त्रयः प्रकाराः। रलेपः समासोक्ति सादश्य- मात्र' वा तुल्यात्त ल्यस्य हि आक्षेपे हेतु:। कमे मोदाहरगम- प्रत्यल्पम); इससे भी बढ़कर यह सुनो-(मोती समभकर उम जलबिन्दु को) धीरे से-सेते समय-(पवीयमाने) श्रद्ग लि-के अग्रभाग के स्पर्श (निया) सेउसके विलोन हो जाने पर 'मेरा (मोतो) कहाँ उड़ गया' इस हादिक शोफ से यह तो प्रतिदिन सोता ही नहीं।४४१॥ यहाँ पर 'अयोग्य स्थान (अनवसर) पर भी मूढों की ममता की सम्भावना है' इस सामान्य के प्रस्तुत होने पर (मोती समभकर फिसी भूसं की जलकर में ममता रूप) विशेष का कथन किया गया है, [धत; सामान्य के प्रस्तुत होने पर विशेष वर्णना रूप प्रपस्तुतप्रशंसा है।। (7)(नरकासर का यथ किये जाने पर उसके मिन्न शात्व के पति मनत्त्री क चक्ति)-'जो पुष्य वैर का बदला लेकर मित्रं की नारियों के अथु जेल को पोछिगा वही पूज्य है, वही पुरुष (पौस्धयुक्त) है, वही नीतिमान् है उसका हो उत्तम. जीवन है और वही लक्ष्मी का भाजन है॥।४४२॥। यहां पर कूत्स को मारकर यवि नरकागुर की तारियों के शोक को शान्त; करते हो तो तुम्हों प्रशंसनीय हो। इस (शाल्य-विपयक) िशेष के प्रस्तुत होने पर. (जो वैर का प्रतिशोध करता है वही प्रशंसनीय है-इस) सामान्य का वर्णन किया, गया है;अतः विशेष के प्रस्तुत रहने पर सामान्य-वर्णना रूप अप्रस्तृत प्रशंसा है]। , '(५) तुल्य के प्रस्तृत होने पर (तुल्य अप्रस्तृत) के पर्णन के तीन प्रकार हैं; क्योंकि (क) श्लेष (सभी विशेपत तथा विशेष्यवाचक पदों की उभयायबोधकता), (स) समासोकि (विशेपसमान्न की उभयार्थबोधकता) तथा, (ग) फेवल साद्श्य। ये (घप्रस्तुत) तुल्य के वसंन से (प्रस्तुत) तूल्य की व्यञ्जकता (भ्रालेप) के हेतु होते हैं। कमशः उदाहरस मे हैं- (५क. इलेयहेतुक अप्रस्तृतप्रशंसा) [भल्लटश्तक में, जिस राजा का अत्रु ने राज्यापहरस कर लिया है उसके प्रति मन्त्री को उकि] वाहे पुस्यत्व [शौय]-
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दशम उल्लास: ५११
(क) पुरत्वादृपि प्रविचलेद्यदि यद्यघोऽपि यायाद्यदि प्रणायने न महानपि स्यात्। अभ्युद्धरेत्तदपि विश्वमितीदशीयं केनापि दिक प्रकटिता पुरुषोत्तमेन ॥।४४३।। (ख) येनास्यभ्युदितेन चन्द्र, गमित: क्लान्ति रवौ तत्र ते युज्येत प्रतिकर्तु मेव न पुनस्तस्यैव पादमइ्यः। क्षीगेनतदनुष्ठितं यदि ततः किं लज्जसे नो मना- गस्त्येवं जडघामता तु भवतो यद्वयोम्नि विस्फूर्जसे॥४४४। (ग) आदाय वारि परितः सरितां मुखेभ्य: किन्तावदर्जितमनेन दुरर्सावेन। से रहित (मोहिनी रूप) हो जाय, चाहे नीचे [पातात में कर्म आदि रूप से या सम्पत्ति नाश से चला जाय, चाहे, याचना (प्रसयन=वामनरूप में माँगना- या सहायता मांगना) में महान् भी न रहे; तथापि संसार (समस्त राज्य आदि) का उद्धार करे। फिसी पुरयोत्तम (बिप्स या सतपुरुष) ने इस प्रकार की पद्धति (दिक्) प्रदर्शित की है। [अतः भाप भी स्व-राज्य का उद्धार कीजिए, यह भाव है] ॥४४३॥ + प्रभा-यहाँ सत्पुरुष वर्णनीय रूप में प्रस्तुत है उसके तुल्य अप्रस्तुत विप्ण का वर्णन किया गया है। इस वर्णन में 'पु'स्त्व' आदि विशेषए पद तथा 'पुरुषोत्तम' यह विशेष्य पद श्लिप्ट हैं। अतः इलेप के द्वारा प्रस्तुत सत्पुरुप की प्रतीति हो जाती है तथा यहाँ श्लेपहेत का अप्रस्तुतप्रशंसा है। अनुवाद-[५ ख. समासोक्तिहेतुक अप्रस्तुतप्रशंसा)-[अपकारी का अनु- सरस करने वाले क्षीए-व्यक्ति के प्रति उपालम्भ है] 'हे चन्द्र, जिस (सूर्य) के उदित, होने से तुम क्षीएता को प्राप्त हुए हो उस सू्य का तुम्हें प्रतिकार करना ही युक्त है, नं कि उसका ही पैर पकड़ना (रश्मि-ग्रहस) यदि क्षीए (कलाहीन या धवहीन) होने से तुमने यह (पाद-ग्रहस) किया है तो तुम तनिक भी लज्जित क्यों नहीं होते? तिस पर जो आकाश में गर्व पूर्वक उदित होते हो (विस्फूर्जसे) यह तूम्हारी जडघा- मता (शीतल या शिथिल तेजवाला होना) ही है ॥४४४॥ प्रभा-यहाँ निर्धन और धनिक का वृत्तान्त वर्णनीय रूप में प्रस्तुत है, ततुल्य प्रप्स्तुत चन्द्र तथा रवि का वर्णन किया गया है। यहाँ विशेष्यवाचक चन्द्र तथा रवि पद शलष्ट नहीं; केवल श्लिष्ट विशेषणों द्वारा प्रस्तुत वृत्तान्त की प्रतीदि हो जाया करती है; अतः समासोक्तिहेतुका अप्रस्तुतप्रशंसा है। अनुवाद-(५ ग. सादृत्यहेतुक अप्रस्तुतप्रशंसा) 'इस दुष्ट सागर ने स भोर से सरिताओों के मुस से जल ग्रहश करके कया किया (भजितं सम्पादितम्) ?
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५१२ 1' काव्यप्रकाश:
क्षांरीकृतं च बडबादइने हुतं च पातालकुतिकुहरे विनिवेशितं च ॥४४४॥ इयं च कवचिद् वाच्ये प्रतीयमानार्थाऽनध्यारोपेणव, भवति, यथा- अध्धेरम्भ: स्थगितभुवनाभोगपातालकुच्ते: :पोतोपाया इह हि बहवो लक धनेऽपि क्षमन्ते। आहो रिक्त कथमपि भवेदेप दैवात्तदानी- को नाम स्यादवटकुद्दरालोनेडप्यम्य कल्प:॥४४६॥ कवचिद्ध्यारोपेैव यथा- करत्वं भो: ? कथयामि दैवहतकं मां विद्धि शाखोटकं वैराग्यादिव वक्ि साधु विदितं करमादिदं कथ्यते। वामेनात वटरतमध्वगजनः सर्वात्मना सेवते न च्छारथोपि परोपकरेंकरेे मार्गस्धतस्यापि मे ॥४४७। (केवल) उसे खारा कर दिया, वडवानल में होम दिया और पाताल की उदरगुहां में फैक-दिया' ॥४४५॥ "', f .: प्रभा -- यहों दूसरों का धन खसोट कर असत्कार्य में गपय करने वाला व्यक्ति वर्णनीय रूप में प्रस्तुन है, ततुत्य पप्नस्तुत सागर का वर्णन किया गया है। इसके द्वारा, इ्लेपके, भभाव में ही केवल सादृश्य से उह असत्पुरुष की पतिति हो जाती है; भतः सादृश्यमान्नहेतुका अप्रस्तुतप्रशंसा है। अनुवाद,-और यह (तुल्य के प्रस्तुत रहनेपर तत्तुल्य त्र््रपस्तृत-धराना); . 1.
(i) कहीं तो वाच्य (अ्प्रस्तृत) अर्थ में प्रतोयमान (प्रस्तुत) अ्रर्थं का अ्रध्यारोप (ग्रन्य, वस्तु में अ्रन्य की प्रतीति-Imposition), किये बिना हो हो जाती है, जैसे- ii 'इस संसार में जलयान रखने वाले अ्रनेक (समुद्र-व्यापारी) उस सागर को,, जिसने निज जल से संसार के विस्तार (भभोग) और, पाताल के गर्त को भ्ाच्छा दित (स्थगित) कर रवला है, लाधने में भी समर्थ हैं। यदि दैवयोग से यह सागर किसी प्रकार जल-शून्य हो जाय, तब तो इसके गर्तों (भवट) और छिद्रों (कुहर). को देसने में भी फौन समय (कल्पः) होगा ?' ॥४४६॥ प्रभा-यहाँ 'अत्याचारी प्रभु सम्पत्ति में सुख सेव्य है विपतति में नहीं, यह प्रभुव त्तान्त प्रस्तुत अ्थ है। थप्रस्तुत सागर के द्वारा सादश्यमान से इसकी प्रतीति हो रही है। यहाँ कहीं बाते (वाच्य) सागर में भी घटित होती हैं इसलिए यहाँ वाच्यार्थ में प्रतीयमान अ्रर्थ का आरोप करने को आवश्यकता नहीं। अनुवाद- (ii) कहीं (वाच्यार्थ में प्रतीयमान भर्य का) अध्यारोप करके ही पपरतुतप्रशांसा होती है; जैसे-वृक्ष के प्रति मंथिक के प्रश्न तथा वक्ष के उत्तर में] 'घरे; तुम कोन हो ? कहता हूँ-'मु्झ भाग्य का मारा शासोटक (सेहण्ड) वृक्ष जानो। तुम तो वैराग्य-युक्त से बोन रहे हो। हा, आपने ठौक (साघु) 'जान
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दशम उल्लास: ५१३
सोऽपूर्वो रसनाविपयेय विधिस्तत्करयोइचापलं दृष्टिः सा मदविस्मृतस्वपरदिक कि भूयसोक्तन वा। सर्व विस्मृतवानसि भ्रमर हे, यद्वारणोडद्याप्यसौ। अन्तः शून्यकरो निपेव्यत इति भ्रातः, क एप ग्रहः॥४४८॥ अन्र रसनाविपर्यासः शून्यकरत्वं च भ्रमरस्यासेवने न हेतुः। कर्णंचापलं ु हेतुः मदः प्रत्युत सेवने निमित्तम। लिया। किन्तु यह (वंराग्य) किस कारस से है? घहा जाता है (कथ्यते)-यहाँ (मार्ग के) वाम भाग में (वाभ पचरस से युक्त) जो वट वृक्ष है, पयिक जन उसका सब प्रकार (दम्या, आरोहस आदि) से (आदरपूर्वफ) आाथय लेते हैं; किन्तु भागं में स्थित होते हुए भी मेरी छाया भी परोपकार में समर्थ नहीं होती' ॥४४७॥ . प्रभा-यहाँ पर ऐसा दानाभिलापी वर्संनीय रूप में प्रस्तुत है जिसका दिया दान किसी सत्पात्र ने इसलिये स्वीकार नहीं किया क्योकि उसे नीच समझा जाता हे। अप्रस्तुत शासोटक वृक्ष वाच्य है। अचेतन होने के कारण उसके साथ उक्ति प्रत्युक्ति सम्भव नहीं; अतएव वाच्यार्थ में प्रतीयमान अधमजातीय व्यक्ति आ्रादि का अंध्यारोप आवश्यक है। 4 अरनुवाद-(iii) कहीं (वाच्यार्थ में प्रतीयमान अर्थ का) कुछ अ्ंशों में अ्ध्या- रेप करके यह (अप्रस्तुतप्रशंसा) होती है; जैसे-[भल्लटशतक में भ्रमर के प्रति' उक्ति]-'हे भ्रमर, जिस हाथी की जिह्वा उल्टे दङ्ग (भ्रग्निशाप से हाथियों का जिह्ना-विपर्यास पुराण-प्रसिद्ध है) की है (प्रस्तुत में-जो परस्पर विपरीत बात कहुता है), कानों में चञ्चलता है (दूसरे के फहने से छला जाता है), जिसकी यह वृष्टि है जो मद से अपने तथा पराये मार्ग को भुलाने वाली है (गर्व के कारण भले बुरे का विवेक नहीं करती)। अथवा अधिफ कहने से कया ? यह सब तुम भूल गये हो। हे भ्रांतः, जो भीतर से शून्य (खोखले) सूंड वाले (या-धनसून्य हाथ वाले) इस हाथी
है? । ४४८॥। (या सेवक निवारक स्वामी) को प्राज भी सेवा करते हो, यह नुम्हारा क्या पाग्रह
यहाँ पर रसना-विपयय तथा शुन्यकरत्व भ्रमर के सेवा न करने का हेतु नहीं है (इसलिए इस अंश में भ्रमर में प्रतीयमान पुरष का आरोप करना सायश्यक है)। कर्स-चञ्चलता तो भ्रमर के अ्रसेवन का हेतु है (इसलिए इस प्रंश में अध्यारोप आवश्यक नहीं)। मद तो उल्टा (भ्रमर की) गज-सेवा का निमित है (इसलिए इस अंश में प्रतीयमान पुरुष का अध्यारोप आ्वश्यक है)। प्रभा-यहाँ पर निरादर करने वाला स्वामी तथा अनुसरगा करने वाले सेवक का वृत्तान्त प्रस्तुत है, तनुल्य प्रप्रस्तुत गज और भ्रमर के वर्गुन द्वारा
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काव्यप्रकाश:
(१५३) निगीर्याध्यवसानन्तु प्रकृतस्य परेण यद । प्रस्तुतस्य यदन्यत्वं यद्यर्थोक्तो, च कल्पनम् ॥१००।। कार्यकारणयोयंश्च पौर्वापर्यविपर्ययः । विज्ञेयाऽतिशयोक्ति: सा १. उपमानेनानतर्निगीररयोपमेयर्य यद्ध्यवसानं सैका, यथा- कमलमनम्भसि कमले च कुवलये तानि कनकलतिकायाम। सा च सुकुमारसुंभगेत्युत्णतपरम्परा केयम् ॥४४t॥ से प्रस्तुत का आ्रक्षेप मिया जा रहा है; अतः अप्रस्तुतप्रशसा है। यह श्रप्रस्तुत- प्रदांसा कुछ अंश (कर्रानापल) में विना अध्यारोप के तथा अन्यत्र (रसनाविपर्यास शून्यकरत्व भ्रर मद के स्थल में) वाच्यार्थ में प्रतीयमान (सेव्य-सेवक) के मध्यारोप से होती है। " अनुवाद- (१२ अतिशयोकि) (१) जहां-'पर' अर्थात् उपमान के द्वारा 'प्रफृत' अर्थात् उपमेय का निगरस (पृथक अनिर्देश) करके उसके साथ फल्पित प्रमेद का निश्चय (अध्यवसान) (२) वर्णनीय का अन्य रूप से वहेन (३) 'पदि' अर्थ वाले शब्दों का कथन करके (असम्भव अर्थ को) करपना और (४) कार्य तथा कारल के पूर्व-अपर-भाव का विपरीत होना-वशित किया जाता है; वह भ्रतिश- योकि जाननी चाहिये। (१५३) प्रभा-(१) अ्रतिशयोक्ति का अरथ है-प्रतिशयिता प्रसिद्धिम् पतिकान्ता सोकातीता उक्ति:'। उपयुक्त चारो प्रकार के वर्णन में लोकोतरता होती है भतएव ये चारों अतिरायोक्ति नाम से कहे जाते हैं। (२) अतिमयोकि भी रूपक के समान सादृश्य पर आथ्रित है तथा इसमें, भी गोणी लक्षसा कार्य करती है तथापि रूपक और अतिशयोक्ति में स्पष्ट अन्तर है (द०, रूपक, टि०) । (३) विश्वनाथ ने भतिशयोक्ति के ५ भेद माने हैं। उनका मम्मट के चार भेदों से इस प्रकार समन्वय हो सकता है- =भेदेडभेदः । प्रस्तुवान्यत्वरूपा =अभेदे भेदः । =असम्बन्धे सम्बन्ध:, सम्बन्धे ससम्बन्ध: 1 यद्यथोकी कल्पना कार्यकारणयो: पोरनोर्यविपर्ययरूपा =उभयनिष्ठा इन घारों के उदाहरएा ऋमशः नीचे दिये जाते हैं। अनुवाद-(१) उपमान के द्वारा सपने भीतर निगस लिये गये (स्वहप से अनुपस्यित) उपमेय का जो तादात्म्य निश्चय करना है वह प्रथमा प्रतिशायोकि है। जैसे-[प्रेयसी को देसकर उसकी सखी के प्रति नायक की उक्ति]-'जलरहित प्रवेश में कमल (कान्ता मुस) है कमल में दो नीलोत्पल (नेग्रद्वय) है, वे कमस तथा
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दराम उल्लास:
अत्र मुखादि कमलादिरूपतयाऽध्यवसितम्। २. यच्च तदेवान्यत्वेनाध्यवसीयते साडपरा। यथा- अएएं लडहुत्तराअं अस्सा विश्न का वि वत्तसच्छाआ। सामा सामस्सपआवइणो रेह चिचिन्र एा होई।५५०॥l (अन्ययत्सी कुमार्यमन्यैव च काऽपि वर्तनच्छ्ाया। श्यामा सामान्यप्रजापतेः रेखैव च न भवति ।।) ३. यद्यर्थस्य यदिशन्देन चेच्छव्देन वा उक्ती यत्कल्पनम् (अर्थादसम्भवि- नोऽर्थस्य) सा तृतीया। यथा- राकायामकलङ' चेदमृतांशोर्भवेद्वपुः। तस्या मुखं तदा साम्यपराभचमवाप्नुयात् ।४५१।। दो फुवलय) सुवर्शलता (कान्ता शरीर) में हैं औौर वह कनकलता फोमल और सुन्दर है। यह कया अद्भुतमाला (उत्पातपरम्परा) है? ॥४४६॥ यहाँ पर (प्रकृत कामिनी के) मुख आदि कमल आदि के रूप में निश्चित किये गये हैं। 1 प्रभा-यह निगीर्याव्यवसानरूपा अतिशयोक्ति (भेदेऽपि अभेदः) का उदाहरए है। वस्तुतः मुख आदि उपमेय कमल आदि उपमान से भिन्न है तथापि उनका कमल आदि के द्वारा निगरण किया गया है तथा दोनों में अभेद का निश्चय किया गया है.। इससे मुख आदि का अतिशय प्रकट होता है। (२) द्वितीय अरतियोक्ति वह है जहाँ उस (वर्णनीय वस्तु) को ही अन्य रपं से वशित किया जाता है। जैसे-[नायक के प्रति नायिका की सखी कहती है]- 'उसकी सुकुमारता कुछ और (अनूठी) ही है, उसके शरीर की कान्ति (वतनच्छाया) फोई अनिवंचनीय है, वह इयामा (पोडशी) नायिका सामान्य विधाता को सृप्टि (रेखा=निमिति) ही नहीं है॥४५०॥ प्रभा-यद्यपि लोकप्रसिद्ध मौकुमार्य आदि ही उस नायिका में है तयोपि भिन्नता दिखलाई गई है। इस प्रकार 'अन्यदेव सौकुमार्यम्' इत्यादि कथन द्वारा प्रस्तुत नायिका के सौन्द्य में अन्य नायिका के सौन्दर्य से विलक्षणता (अतिशयता) प्रतीत होती है तथा यहाँ अन्यत्ववर्णना (अभेद में भेद का अध्यवसान) रूप भति- शयोक्तकि (भेदकातिशयोक्ति) है। प्रथमा अतिदायोक्ति में तो भेद में अभेद का भ्रंध्यवसाय किया गया था। अनुवाद-(३) वृतीय प्र्परतिशयोक्ति यह है जहां उक्ति में मद्यर्यक सर्यात 'मदि' या 'चेतु' शब्द के द्वारा पसम्भव अर्थ की फल्पना को जाती है; जैसे- 'यदि पूसिमा में सुधाफर की आकृति (वपुः=शरोरम्) फलडूरहित हो,चए तब उस (नायिका) का मुस 'समतारूप तिरस्फार को प्राप्त करे' (निरुपम जलु स उपमान मिल जाना हो तिरस्कार है।' ॥४ ५१।।
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५१६ ] काव्यप्रकाश:
४. कारणस्य शीघ्रकारितां वक्तु' कार्यस्य पूर्वमुक्तौ चतुर्थी। यथा- हृदयमघिष्ठितमादी मालत्या: कुसुमचापवारोन। - चरमं रमणीवल्लभ, लोचनविषयं त्वया भजता ॥४५२॥ (१५४) प्रतिवस्तुपमा तु सा ।१०१।। सामान्यस्य द्विरेकस्य यत्र वाक्यद्वये स्थिति: । साघारणो धर्मः उपमेयवाक्ये उपमानवाक्ये च कथितपद्स्य दुष्ट. तयाडभिहितत्वात् शब्दभेदेन यदुपादीयते सा वस्तुनो वाक्याथरयोपमान- त्वात् प्रतिवरतूपमा। यथा- प्रभा-'राकायम्' इत्यादि में 'चेतु' शब्द के द्वारा चन्द्रमा के साथ मुख के साम्य की कल्पना की गई है; वस्तुतः साम्य नही है। इससे मुख की प्रतिघथता प्रतीत होती है, अतएव यहाँ 'यद्यर्यातिशयोक्ति' है। उद्योतकर का विचार है कि यहाँ पूर्वार्ध मे जो चन्द्रमा में कलङ्क न होने की कल्पना है वह (कलङ्गाभाव के) असम्बन्ध में सम्बन्धकल्पना है तथा उत्तरार्घ में मुख और चन्द्र-बरिम्ब में साम्य-सम्बन्ध होने पर भी 'पराभव' पद द्वारा उसके असम्बन्ध की कल्पना है। इस प्रकार काव्यप्रकाशकार ने 'यद्यर्थोकौ' इत्यादि के द्वारा सम्बन्धातिशयोकति तथा भसम्बन्यातिशयोकि इन दो अतिशायोक्ति के भेदों की ओर संकेत किया है।' अनुवाद-(४) चतुर्थी अतिशयोक्ति यह है जहाँ फारस में श्ोघ् कार्य करने फो शक्ति बतलाने के लिए कार्य के (कारस से) पूर्व, होने का कयन किया जाता है, जसे-'हे कामिनीकान्त, पुप्प के धनुष-वास वाले उस कामदेव ने मालती (नामक नायिका) के हृदय परं पहिले अधिकार कर लिया (प्राकान्तम्); दृष्टिगोचर होते हए ुम तो उसके पश्चात् वहां (हृदय में) स्यित हुए' ।।४५२।। प्रभा-इस चतुर्थी अतिशयोकिक में कारण और कार्य के पौर्वापर्य का विपयय दिसलाया जाता है। यह विपर्यय दो प्रकार का है-एक तो कार्य को करण से पूर्व दिखलाना और दूसरा दोनों को साथ-सांथ (सहभाव) दिखलाना। 'हृदयम्' इत्यादि इनमें से प्रथम का उदाहरण है। यह दामोदरकृत 'फुट्टनीमत' नामक काव्य का (६६) पद्य है। यहाँ 'प्रिय का हृदय में वसना' कारख है तथा 'काम का श्विर्भाव' कार्य है। कारण में शोघ्रकारिता प्रकट करने के लिये 'काय' का पहले वशन किया गया है। कार्य कारण के सहभाव-वणंन का उदाहरए
संममेव समाकानतं द्वयं द्विरदगामिना। तेन सिहासनं पिम्य मण्डलं व महोमृताम् ॥ यह है-
अनुवाद-(१३) प्रतिवस्तुपमा (मलद्धार) यह है, जहाँ (उपमान तथा सपमेय एप) दो वाकयों में एक ही साधारस धर्म का दो बार ग्रहए (स्यति := उपावानम्) किया जाता है। (१५४) 1 अर्थात् जहां उपमेयवावय में तथा उपमानवावय में (एक हो) साधारए धर्म
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दशमं उॅल्लास: i ५१७
१. देवीभावं गमिता परिवारपदं कथं भजत्वेपा। न खलु परिभोगयोग्यं दैवतरूपाद्कितं रत्नम् ॥।४५३।। २. यदि दहत्यनलोऽन्न किमद्भुतं यदि च गौरवमद्रिपु किन्ततः । लवएमम्बु सदैव महोद्धे: प्रकृतिरेव सतामविषादिता॥४५४॥ इत्यादिका मालाप्रतिवरतूपमा द्रष्टव्या। एवमन्यप्राध्यनुसत्त व्यम॥ -
का कयितपदता (पुनरक्ति) के दोष होने के कारण भिन्न-भिन्न शब्दों से (ग्रनेक बार) • प्रहण किया जाता है; वह प्रतिवस्तूपमा (अलङ्धार) है; कयोंकि उसमें वस्तु भर्थात् वाक्यार्थ उपमान रूप (तथा उपमेय) होता है। जैसे-[राजा के प्रति राजमहिषी की सखी की उक्त]- (१ अमालारूपा) हे महाराज, देवी (राजमहिपी) के पद को प्राप्त कर लेने वाली यह (देवी) सामान्य स्त्री (परिवार) के पद को कैसे प्रहस करे ? जो, रत्न देवता के रूप में अद्धित कर दिया जाता है (प्रर्थात् देव-प्रतिमा रूप हो जाता है) भला वह (भूपरादि के रूप में) ग्रहर-योग्य कहाँ होता है' ॥४५३॥ (२ मालारूपा)-'यदि दहति' (ऊपर उदाहरण २७२) ॥४५४॥ इत्यादि मैं मालाप्रतियस्तूपमा जाननी चाहिए। इसी प्रकार अन्य (बंध्म्य) स्थलों में (प्रतिवस्तूपमा का) उदाहरस खोज लेना चाहिए। प्रभा-(१) 'प्रतिवस्तूपमा' शब्द की व्युत्पत्ति है-प्रतिवस्तु प्रतिवानयार्थ- मुपमा साधारसघर्मोऽस्याम्' अर्थात् जहाँ एक ही साधारस धर्म का उपमेयवाक्य तथा उपमानवाक्य में भिन्न-भिन्न शब्दों द्वारा (अ्नेक बार) कयन किया जाता है। प्रतिवस्तुपमा के विशेय अ्रद्द हैं-(i)उपमान तथा उपमेय दोनो वाक्य रूप में में होते हैं, (ii) एक ही साधारण धर्म का प्रत्येक वाक्य में भिन्न-भिन्न शब्दों द्वारा कथन किया जाता है, (iii) साम्य प्रतीयमान होता है, वाच्य नही। (२) प्रतिवस्तूपमा का अ्र्प्रन्य अप्रलङ्गारों से सम्बन्ध- उपमा तथा प्रतिवस्तूपमा-(समानता) दोनो सादृस्य पर आश्रित हैं तथा दोनों मे उपमान तथा उपमेय का साम्य दिसलाया जाता है। (भेद) (i) उपमामें प्रायः एक वाक्य होता है, प्रतिवस्तूपमा में दो वाक्य होते हैं। (ii) यदि कही (वाक्यारयोपमा) उपमा में दो वाक्य होते हैं तो वे दोनों परस्पर सापेक्ष होते 'हैं, किन्तु प्रतिचस्तपमा में दोनों वाक्य परस्पर निरपेक्ष होते हैं, (iii) उपमा में साधर्म्य साक्षात् रूप से या अर्थतः पथा, इव आदि उपमावाचक शब्दों द्वारा कहा जाता है, किन्तु प्रतिवस्तूपमा में वह गम्य (प्रतीयमान) होता है, (iv) उपमा में साधारण धर्म प्रायः एक बार कहा जाता है, किन्तु प्रतिवस्तूपमा में वह भिन्न-भिन्न शब्दों से भनेक बार कहा जाता है, (v) उपमा में पदार्थों का साम्प होता है किन्तु प्रति- यस्तूपमा में वाक्याथों का।
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काव्यंप्रकारी:
(१५५) दृष्दान्तः पुनरेतेपां सर्वेपां प्रतिबिम्बनम् ॥१०२॥ एतेपां सावारणघर्मादीनाम् दष्टोऽन्तो निश्चयो यत्र स दृष्टान्तः। १. त्वयि दृष्ट'एव तंस्था निर्वाति मनो मनोभवज्वलितम्।" आालोके हि हिमांशोर्विकसति कुसुमं कुमुद्वत्याः॥।४५५॥। प्रतिवस्तुपमा और निदर्शना-(समोनता) दोनों सादृश्य पर आश्रित हैं तथा •दोनों में प्रायः दो-दो वाक्य होते हैं। (भेद) (i) प्रतिवस्तुपमा मे रोनीं वाक्य अपने अर्थ में पूर्ण होते हैं तथा परस्पर निरपेक्ष, किन्तु निदर्शना में दोनों सापेक्ष होते हैं "औौर जब तक दोनों के साम्य का बोध नहीं हो जाता वाक्यार्थ उपपन्न नहीं होता, (ii) प्रतिवस्तूपमा में साधारण धर्म का प्रत्येक वाक्य मे भिन्न-भिन्न शब्द द्वारा कथन किया जाता हं (वस्तु-प्रतिवस्तुभाव), किन्तु निदर्शना में साधारण धर्म का •कथन नहीं किया जाता। i इसी प्रकार प्रतिवस्तूपमा का दृष्टान्त तथा अर्थान्तरन्यार से भी समानता एवं भेद होता है, जिसका यथास्पान निरूपसा किया जायेगा। (३) प्रतिवस्तूपमा साध्म्य तथा वैधर्म्य से दी प्रकार की होती है। इनमें मे भी प्रत्येक (क) अमालारूपा तथा (स) मालाहपा हुआ करती है.। (क) 'देवीभावम्' इत्यादि साधम्यं मे अमालारुपा का उदाहरण है। यहाँ, पूर्व वाकय उपमेय है तथा उत्तर वाक्य उपमान है। 'अरनोचित्य' रूप साधारग धर्म है; जिसे पूर्वाव में 'कर्थ -, भजतु' तथा उत्तरार्ध में 'न खलु' शब्दो द्वारा कहा गया हैँ। (ख) 'यदि दहति' इतयादरि साधर्म्य में मालारूपा का उदाहरण है। यहाँ 'प्रकृतिरेव सताभविपादिता' यँह उपमेयवाक्य है। अ्न्य तीन उपमानवाकय हैं। 'आाश्चयंजनक न होना' (विस्मयाजनकत्वम्) साधारण धर्म हं, जिसका चारों वाक्यों मे-'किमन्भ तम्' 'कि ततः', 'सदव' और 'प्रकृतिरेव' इन भिन्न-भिन्न शब्दों से ग्रहा किया गया है। अनुवाद-(१४) दृष्टान्त,(अलद्धार) वह है जहां (वाश्यद्वय में-'वाइम- दये' इत्यनुवर्तते) इन सब (साधारस धर्म आदि) का बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव होता : है। (१५५) अर्थात् जहां (दा्र्टान्तिक वाक्यार्य के) इन साधारस धर्म (उपमेय तथा उपमान) आदिका (दृष्टान्त वाश्यार्थ में) प्रामाण्य-निश्चय (श्रन्तः) गृहीत हो जाता है। (जसे)- : (फ) 'उस (नायिका) का कामदेव से संतप्त मन तुम्हारे दर्शन से ही श्षान्त हो जाता है (निर्वाति), कुमोदिनी का कुसुम शीतकर (चन्द्र) के. दर्शन से हो विक- सित होता है॥४५XI यह (उदाहरस) रामान धर्म के सम्बन्ध से है। विषद धर्म के सम्बन्ध से तो (यह नदाहरस होगा)-
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देशमें उल्लास:
एप साधर्म्येण। वैधर्म्येण तु- २. तवाहवे साइसकर्मशर्मेण: करे कृपाशान्तिकमानिनीपतः । भटाः परेपां विशरारुतामगुः दधत्यवाते स्थिरतां हि पांसवः ॥४५६॥ (ख) 'हे राजन्) साहसिक फर्म में सुखी होने वाले प्राप के कृपाए की प्रोर 4 हाथ ले जाने की इच्छा करते ही शतुओों के योद्ा छिल-भिन्न (विशरारुतां=विशीर्स- ताम्) हो गये (अगुः); निश्चय हो धूलिकस वायु के अभाव में (अवाते) स्थिरता को धारण करते हैं ।४५६॥ प्रभा-(१) 'दप्टान्त' का व्युत्पत्तिकृत अर्थ है-'दृष्टोजन्तः निश्चयो यश' अर्थात्् जहाँ दृप्टान्त वाक्य के द्वारा दार्प्टान्तिक वाक्य के अर्थ का निश्चय देखा जाता है, अथवा जहाँ साधारण धर्म आदि का विम्बप्रतिबिम्बभाव होने से देो वाक्यार्थों का शपम्य प्रतीत होता है वहाँ द्ृष्टान्त अलङ्कार है। दृप्टान्त के विशेप भज्त हैं-(i) उपमान और उपमेय दोनों वाक्यरूप मे होते हैं। (ii) उपमान-वाकय और उपमेय-वाक्य में उपमान, उपमेय और साधारस धर्म सभी का विम्ब-प्रतिविम्ब- भाव होता है; अर्थात् वे पृथक्-पृथक् होते हैं किन्तु उनमें सादृश्य होता है। (iii) साम्य प्रतीयमान होता है। (२) दृष्टान्त का अन्य अलद्धारों से सम्बन्ध- द्ष्टान्त और उपमा-उपमा और दप्टान्त में प्रायः उसी प्रकार की समानता और असमानता है जँसी कि उपमा और प्रतियस्तुपमा में है। केवल विशेषता यह (iv में) है - उपमा में साधारण धर्म एक होता है और प्रायः उसका एक वार कथन किया जाता है किन्तु दृष्टान्त में साधारण धर्म समान होते हुए भी वस्तुतः भिन्न २ होते हैं और उनका अनेक बार कथन किया जाता है। वृष्टान्त औौर निदर्शना-(समानता) दोनों में उपमान तथा उपमेय रूप दो वाकय होते हैं, उन्हीं का साहस्य दिखलाया जाता है तथा यह सादृश्य विम्बप्रतिबिम्व भाव पर आश्रित होता है। (भेद) (i) हष्टान्त में दोनो वाक्य स्वतः पूर्ए होते हैं सथा परस्पर निरपेक्ष; किन्तु निदर्शना मे दोनो वाकय परस्पर सापेक्ष होते हैं। (ii) दृष्ठान्त में पहले दोनों वाक्यों का वाक्यार्य बोध होता है फिर दोनों में बिम्ब- प्रतिबिम्ब भाव की प्रतीति होती है किन्तु निदरशंना मे जब दोनों वाक्यों का विम्ब- प्रतिबिम्ब भाव जान लिया जाता है; तभी वाक्यार्थ का बोध होता है। दुप्टान्त और प्रतिवस्तूपमा-(समानता) दोनों में उपमान और उपमेय के दो निरपेक्ष वाक्य होते हैं, उनका सादृश्य गम्य (प्रतीयमान) होता है। (भेद) (i) प्रतिवस्तुपमा के दोनों वाक्यों में साधारण धर्म एक होता है, उसे भिन्न-भिन्न शब्दों द्वारा कहा जाता है-यही वस्तुपतिवस्तुभाव कहलाता है। दृप्टान्त क दोनों वावयों में साधारण धर्म समान होते हुए भी पृथक-पृथक होते हैं(एक नही)-इसी को बिम्ब- -प्रतिबिम्ब भाव कहा जाता है। कहा भी है-'एकस्यार्यस्य शब्दद्वयेनाभिधानं वस्तु प्रतियस्तुभायः । दयोरथंमोहिरुपादानं बिभ्यप्रतिबि्यभायः (प्रतापममसतोभूपस) ।
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वंव्य प्रकाश!
(१५६) सकृद्वृत्तिस्तु धर्मस्य प्रकृताप्रकृतात्मनाम्। सेव क्रियासु बह्नीपुं कारकस्येति दीपकम:॥१०३॥।'
कवारमेव यदुपादीयते तत् एकस्थरयैव समस्तवाक्यदीपनाद्दीपकम्, चथा- । किवखाएं घसं साझाएं फसमसी केशराइ' सीहाण। कुलवालिआएं त्थराथा कुतो छिप्पन्ति श्रमुआएम् ॥४५७॥ (कृपणानां घनं नागानां फमामशि: केसरा: सिंद्दानाम्। कुलवालिकानां रतना: कृतः रपृश्यन्तेऽमृतानाम ॥।) (ii) प्रतिवस्तूपमा में पाठक का ध्यान भिन्न शब्दों में अ्भिहित किन्तु अ्रभिन्न साघारण धर्म की ओर रहता है उसी में इस अलद्धार का चमर्कार निहित है, किन्तु दृष्टान्तं में केवल भिन्न-भिन्न साधारणघमों के बिम्बप्रतिबिम्ब भाव पर ही चमत्कार निर्भर नही है, अपितु उपमान, उपमेय और साधारण धर्मों के विम्य- प्रतिविम्ब भाव पर। 'एतेपां सर्वेंपां प्रतिविम्वनम्' इस कथन द्वारा ग्रन्थकार ने दृष्टान्त तथा प्रतिवस्तूपमा के अन्तर को स्पष्ट किया है। (३) दूष्टान्त अलद्गार भी साधम्यं तथा वैधम्ये से दो प्रकार का होता है। (क) 'त्वयि' इत्यादि समानघमं के सम्बन्ध (साधर्म्य) से होने वाले दुप्टान्त का उदाहरण है। यहाँ पूर्व वाक्य उपमेय वाक्य है तथा उत्तर वाक्य उपमान वाक्य हैं। मूप- भर, चन्द्रेमा, नायिका और कुमुदनी, मन शर, कुसुम, मनोभवज्वलित और सूर्यकिरराज्वलित तथा निर्वासा और विकास में विम्बप्नतिबिम्बभाव है। (ख) 'तवाह्वे' इत्यादि वैधर्म्य से होने वाले दृप्टान्त का, उदाहरण हे। यहां 'बाते तु पांसव: स्थिरता न दघति' इस प्रकार वैधम्य के विपरयय से साधर्म्य की प्रतीति होती है। यहाँ पांसु और भट का तथा पलायन और अस्यिरता का बिम्यप्रतिबिम्वभाव है। अनुवाद-(१५) दोपक अलखार यह है, ज्हां (क) उपमेम (प्रकृत) और उपमान (प्रपकृत) रूप वस्तुप्रों के (क्रियादिरूप) धर्म का एफ बार प्रहस (सक्ृद् वृति) किया जाता है, या (स) बहुत सो क्रियाओं के होने पर किसी फारक का एक बार ग्रहं (संव == सकृद्वृत्तिरेव) किया जाता है। (१५६) (र)जो प्रारुरखिक तथा अप्ाकरणिक अर्यात् उपमेय और उपमान के किया (गुख) आंदि धर्म का एक बार ही उपादानं (प्रहस) किया जाता है वह एक '(प्रसंतुत) में स्यित (वर्म) के द्वारा' समस्त वाश्य को प्रकाशित करने के कारस दीपक अलद्धार होता है। जैसे-कपलों का घन; सर्पो के फ की महि, सिहों के 'केसरं और कुलीन बालाओं के स्तन उनके जीवित रहते (भमृतानाम्-बिना भरे) कैसे छूंए जा सफते हैं' ।४५७॥ (स) बहुत सी कियायों के होने पर किसी कारक का एकं बार प्रहस रूप 'दोपक यह है; जैसे-'नवपरिणीता वघू पति की सेज पर सवैदयुक्त हो जांती है,
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दशम उल्लांस:
कारकस्य च वह्लीपु क्रियासु सक द्दत्तिर्दीपकम। यथा- स्विद्यति कूएति वेल्लति विचलति निमिपति विलोकयति तिर्यक्। अन्तर्नन्दति चुम्बितुमिच्छति नवपरिणया वधूः शयने॥४५८॥ (१५७) मालादीपकमाद्यं चेद्ययोत्तरगुणणावहम् । . i.f
पूर्वेए पूर्वेण वस्तुना उत्तरमुत्तरं चेदुपक्रियते तन्मालादीपकम, यथा- संभामाङ्गसमागतेन भवता चापे समारोपिते देवाकर्साय येन येन सहसा यद्यत्समासादितम्। संकोच करती है (कशति-कूए संकोचने), हट जाती है, करवट बदलती है, नेत्र मू द लेती है, तिरछी दृष्टि से देसती है, मन ही मन प्रसन्न होती है तथा (पति-मुख) चम्बन की इच्छा करती है ॥४५८॥ प्रभा-दीपक का व्युपत्तिकृत अरथ है-'दीप इव दीपकं' जिस प्रकार द्वार की देहली पर रक्खा हुआ एक ही दीपक घर और बाहर दोनों जगह उजाला करता है इसी प्रकार जहाँ एकत्र स्थित कोई साधारण धर्म समस्त वाक्य का उपकारक (उत्कर्पक )होता है वहाँ दीपक अलङ्धार है यहाँ भी प्रतिवस्तूपमा आदि के समान साम्य (औपमय) प्रतीयमान होता है। यह दो प्रकार का होता है-(क) कवियादीपक, (ख) कारकदौपक 1 प्रथम दीपक भी दो प्रकार का है-(१) क्रियादीपक तथा (२) :गुणदीपक। (क) 'कृपणानम्' इत्यादि तियादीपक का उदाहरस है। यहां 'कुलवधुस्तन' वणंनीय रूप में प्रस्तुत है, 'कृपणधन' इत्यादि अप्रस्तुत हैं। स्पर्शन करिया रूप साधारण धर्म है। इसका एक वार ही ग्रहण किया गया है, किन्तु समस्त वाक्य -में अन्वय होता है। गुएदीपक का उदाहरख यह है- श्यामलाः प्रावषेण्याभिदिशो जीमूतपंक्िभिः । भुवश्च सुकुमाराभिनंवशाह्वलराजिभिः॥ यहाँ 'श्यामलत्व' साधारण धर्म एक बार गृहीत है इसका दिशः '(प्रकृत) :और 'भुवः (अप्रकृत) दोनों में अन्वय होता है। (स) 'स्विद्यति' इत्यादि कारक : दीपक का उदाहरण है। यहाँ पर अ्रनेक तरिय्याओं में अन्वित एक ही 'बधू' इस कर्त्ता कारक का या फायन' इस अधिकरण कारक का ग्रहण किया गया है। यहाँ समस्त क्रियाएँ प्रकृत ही है कही समस्त कियाए अप्रकृत होती है तथा कही कुद् क्रियाए प्रकृत और कुछ अपकृत भी होती हैं। फलतः 'प्रकृताप्रकृतात्मनाम्' यह पद करिया दोपक पर हो लागू होता है, अर्थात् क्रिया दीपक में ही प्रकृत तथा अप्कृत दो भिन्न प्रकार के पदार्थों के साथ एक धर्म का सम्बन् हुआ करता है, कारक दीपक में यह नियम नही है। इसके प्तिरिक्त दीपक सलद्वार मालारूप भी होता है- अपरनुवाद्-मालादोपक वह होता है जहाँ मराद्य मर्यात् पूय पूर्व वस्तु उत्त- रोत्तर वसंनीय वस्तु में उत्कर्ाधायरु होती है। (१५७) सर्थात् यदि पूर्व पूर्व (चरिगत) वस्तु के द्वारा उत्तरोतर वस्तु का उपकार
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.- २२ j काव्यप्रकारं:
कोदएडेन शरा: शरैररिशिरस्तेनापि.भूमए्डलं तेन त्वं भवता च क्रीर्तिरतुला कीर्त्या च लोकत्रयम् ॥४५६।। (१५८) नियतानां सकृद्धर्मः सा पुनस्तुल्ययोगिता ॥१०४॥ नियतानां प्राकरणिकानामेव श्रप्नाकरसिकानामेव,वा। कमेोदाइरसम्- पाए्डु क्षाम वदन हृदयं सरस तवालसं च वपु:। आवेद्यति नितान्तं क्षेत्रियरोगं सखखि, हृदन्तः ॥।४६०।। कुमुद कमतनीलनी र जालिल लित विला सजुपोर्ट् शोः पुरः का। श्रमृतममृतरश्मिरम्वुजन्म प्रतिद्तमेकपदे तवाननस्य ॥४६१।।
किया जाता है, तो मालादीपक, अलद्गार होता है। जसे-संग्रामाङ्गरम' इत्यादि (ऊपर उदाहरस २२६) ॥४ ५ ६।। प्रभा-'स'ग्राम' इत्यादि में कोदण्ड के द्वारा 'शर' कत्र -शिर तक पहुं चाए जाते है अतः शर में उत्कर्पाधान किया जाता है। "शर के द्वारा 'भरि-शिर' में उत्कर्पाधान किया जाता है। इसी प्रकार पूर्व-पूर्व वर्णित वस्तु द्वारा पर-पर का उपकार किया जाता है औोर अन्त में सभी वर्सनीयरूप मे प्रस्तुत 'कीति' के उत्कर्षा- घायक होते हैं। यहाँ एक 'आसादन',किया का सवभ सम्बन्ध है, अतएव माला- दीपक है। अनुवाद-(१६) तुत्ययोगिता (श्रसद्धार) तो यह है जहां (फेयल) प्रफृत सथवा अप्रकृत वस्तुओं के (नियतानाम्। साधारस धर्म का एक बार ही ग्रहस किया जाता है। (१५८) (फारिका में) 'नियतानाम्' अर्था्त् क-(केवस) प्राकरसिक (यस्तुमों) का अथवा स-(केवल) अप्ाकरसिक (वस्तुओं) का । कमराः उदाहरस ये हैं-क- "पाण्डु क्षामम्" इत्यादि (ऊपर उदाहरस ३३२) ।४६०॥। 1 ख-[नायिका के प्रति नायक को उक्ति] 'हे प्रिये 'मनोहर विलास से ुक्त सुम्हारे नेत्रों के सामने कुमुद, (लाल) कमल तथा नीलकमलों की पंकति कया है? और तुम्हारे मुख के सामने झमृत, सुधाकर और अम्बुज एक साथ ही पराजित हो गये हैं' ॥४६१॥ ! प्रभा-()'तुत्ययोगिता' अ्न्व्यं संज्ञा है। तुल्ययोग का भ्ररथ है-तुस्यों का एक (धर्म) से अन्वय होना। अतः जहां केवल प्रस्तुतों या केवल अप्रस्तुतों का ही एक बार व्शित एक साधारण धर्म से अन्वय होने के कारसा साम्य की प्रतीति होती है, वह तुल्ययोगिता भवद्वार है। इसमें-(i) केवल प्रस्तुठों का ही या केवल अप्रस्तुतों का ही साम्य जाना जाता है, (ii) साधारण धर्म एक होता है उसका केवल एक बार ही ग्रहण किया जाता है। (२) तुल्यमोगिता, दीपक मौर उपमा-यद्यपि 'कमसम् इय मनोत भुनम्'
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दशम उल्लास: ५२३
(१५६) उपमानाद्यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः । अन्यस्योपमेयस्थ व्यतिरेक आधिक्यम्। क्षीण: क्षीसोपि शशी भूयो भूयोऽभिचर्धते सत्यम्। विरम प्रसीद सुन्दरि, यौवनमनिवर्ति यातं तु ॥४६२॥! इस उपमा में दीपक के समान मनोज्ता रूप साधारण धर्म का प्रकृत (मुख) ग्रोर मपकृत (कमल) दोनों के साथ अन्वय है तथा 'जगाल मानो हृदयादमुप्या विलो- 'चनाभ्यामिव वारिघारा' इस उपमा में तुल्ययोगिता के समान 'गलन' रूप साधारण धर्म का 'मानः' और वारिधारा, दो प्रस्तुत पदार्थों के साथ अन्वय है, तथापि भेद यह है-(i) उपमा का चमत्कार साम्य में निहित रहता है किन्तु दीपक और तृत्ययोगिता में अनेक पदार्थों का साधारस धर्म के साथ सम्बन्ध ही चमत्कारजनक होता है। (ii) उपमा में साम्य इव आदि शब्द द्वारा वाच्य होता है, किन्तु दीपक और तुल्ययोगिता में कभी भी 'इव' आदि का प्रयोग नही होता और साम्य प्रतीयमान (गम्य) होता है। तुन्ययोगिता और दीपक-(समानता) तुल्ययोगिता की दीपक से यह समानता है कि दोनों में ही एक बार वणित एक धर्म के साथ अनेक पदार्थों का अन्वय होता है तथा साम्य प्रतीयमान होता है। (भेद) (i) तुल्ययोगिता में एक धर्म का केवल प्रस्तुत पदार्थों से सम्बन्ध दिखलाया जाता है; किन्तु दीपक में तो एक धर्म का प्रस्तुत तथा अप्रस्तुत दोनों पदार्थों से एक साम सम्वन्ध दिखलाया जाता है। (ii) दीपक में प्रकृत पदार्थ उपमेय होते है और अप्रक्वत पदार्थ उममान होते हैं किन्तु तुल्योगिता में सभी पदार्थ केवल प्रकृत या केवल अप्रकृत होते हैं ग्रतः यहाँ उपमान-उपमेयभाव का विम्न होना अनिवार्य नहीं। (३) यह दो प्रकार की है- (क) प्रकृतों का एक धर्म से सम्बन्ध, (ख) प्रपकृतों का एक वर्म से सम्बन्ध। (क) 'पाण्डुक्षामम्' इत्यादि में पाण्डुता, आदि विरह के अनुभाव है, ये सभी वर्णनीय रूप से प्रस्तुत हैं। यहां 'आवेदन परिया रूप' सामारण धर्म का एक बार ही ग्रहण किया गया है। (ख) 'कुमुद' इत्यादि के पूर्वाद्ध में 'कामिनीनयन' प्रस्तुत है, कुमुद आदि उसके उपमान रूप मे हैं तथा प्प्रस्तुत हैं। नायिका के नेत्र द्वारा इनका प्विक्षेप (तुच्छता) ही अप्रस्तुत वस्तुओं का साधारण धम है, जो एक ही 'का' पद द्वारा व्यङ्य है। इसी प्रकार उत्तराघं मे 'आनग' के उपमान रूप में प्रयुक्त (अप्रकृत) समृत आदि के एक धर्म का 'प्तिहतम्' शब्द से कयन किया गया है। अनुवाद-(१७) व्यतिरेक वह मलद्गार है जहाँ उपमान की अपेक्षा भ्रन्य पर्थात् उपमेम का व्यतिरेक (गुएविशेप के द्वारा उत्कपं) वलिगत किया जाता है।
(फारिका में) 'अन्यस्य' सर्थात् उपमेय का। 'ध्यतिरेक:' नर्थात् प्राधिष्य। 'सत्य है, कि पन्द्रमा बार-बार क्षीएा होकर भी पुनः पुनः चढ़ता है; किन्त गया हुआ
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५२४ j कार्व्यप्रकाश:
इत्यादावुपमानरयोपमेयादाधिक्यमिति केनचिदुक्त, तदयुक्तमन्र यौवनगतास्थैर्याघिक्यं हि विवत्ितम। तारुप्य लोटने वाला नहीं है इसलिये हे सुन्दरी, मान से बस फरो (विरम), प्रसन्न हो जानो॥४६२॥ इत्यादि में उपमेय की'अपेक्षा उपमान' का प्धित्य धरित है (तथा व्यतिरेकालद्धार है), यह किसी (आलद्धारिक) ने कहा है,किन्तु यह फंथन वयुक्त है; क्योंकि यहाँ पर (उपमेयरूप) यौवन की अस्थिरता का आधिक्म ही विवक्षित है। प्रभा-(१) व्यतिरेक शब्द का अरथं है-वरिशेपेण अतिरेका। भाव यह है- गुए विशेष के कारण कोई पदार्थ किसी का उपमान है, इसका अभिप्राय है कि वह उपमेय से उत्कृप्ट है। किन्तु जब कोई कवि उपमेय को उपमान से उत्कृष्ट दिखलाना चाहता है तब व्यतिरेक हो जाता है। प्रसिद्ध उपमान की 'अपेक्षा उपमेय का उत्कषं दिखलाने में ही दस अलक्कार का चमत्कार निहित है। (व्यतिरेक और प्रतीप के प्रन्तर के लिये द्रष्टव्य है-प्रतीप)। (२) उद्भट तथा रद्रट आदि के मतानुसार उपमेय से उपमान का उत्कषं होने पर भी व्यतिरेक अलद्धार होता है। उनके मतानुसार 'क्षीएः' इत्यादि में उपमेय रूप 'यौवन' की अपेक्षा चन्द्रमा (उपमान) का उत्कर्ष क्षेण्येऽषि पुनवृ द्धिः) दिख- साया गया है तथा यहाँ व्यतिरेकालद्वार है। आचार्य मम्मट का आशाय है कि यहाँ चन्द्रमा और यीवन का सादृश्य नहीं दिखलाया गया अपितु चन्द्रक्षय,और योवनक्षय का सादृश्य दिखलाया गया है। इनमे चन्द्रक्षय तो वुद्धि द्वारा पुनः पूर्ण हो जाता है; किन्तु यौवनक्षय पुनः पूएं नही हो सकता; यही यीवनक्षय का उत्कर्ष है। इससे यह वाक्यार्थ होता है-चन्द्रमा तो पुनः पूसं हो जाने के कारए सुल्भे है; किन्तु गया यौवन फिर नहीं आाता, अतः दुर्लभ है तथा भाप जैसी विदग्या रमो को इसे व्यर्थ ही गवाना उचित नहीं। इस प्रकार यहाँ यौवनकय रूप उपमेय का उपमान (चन्द्रेक्षय) की अपेक्षा उत्कगं दिखलाया गया है औौर स्पष्ट ही व्यतिरेकालद्वार है। अ्रभिप्राय यह है कि उपमेय की अपेक्षा उपमान का उत्कर्ष दिसलाने में व्यतिरेक अलद्वार नही होता। टिप्पसी-(i) उद्भट के अनुसार व्यतिरेक का स्वरूप यह है- विशेषापादनं यत्त्यादुषमानोपमेययो: । निमित्तादुछ्टिदू टिडिम्यां व्यतिरेको ढविया तृ सः । (काव्या० २, ६) पागे चलकर रद्रट तथा रव्यक ने भी उपमेय या उपमान के सत्कयँ दोनों को ही व्यतिरेक माना । सय्यक ने स्पष्ट, हीयह कहा-'मेदप्राघान्ये उपमानादुपमेपस्या- , घिक्ये विपर्यपे या व्यतिरेकः। (ii) कुद् टीकाकारों के मतानुसार यहां कम्यक की मान्यता का सण्ठन
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दशम उल्लास: ५२५.
(१६०) हेत्वोरुक्तावनुक्तोनां त्रये साम्ये निवेदिते ॥१० ५॥ शव्दार्थभ्यामथाक्षिप्ते श्लिष्टे तंद्वत् त्रिरष्ट तत। व्यतिरेकस्य हेतुः उपमेयगतमुत्कपनिमित्तम्, उपमानगतमपकर्पका- रगम्। तयोर्द्व योरुकि:। एकतरस्य द्वयोरगा अ्रप्रनुक्तिरित्यनुक्तित्रयम्। एतद्र्रे- दचतुष्टयम। उपमानोपमेयभावे शव्देन प्रतिपादिते, आर्थेन च क्रमेणोक्ता- श्चत्वार एव भेदा:। आरक्षिप्ते चौपम्ये तावन्त एव। एवं द्वादश। एते श्लेपेऽपि भवन्तीति चतुशितिर्भेंदा: । क्रमेोदाहरगम्-
किया गया है; किन्तु रुय्यक की अ्पेक्षा मम्मट प्राचीन हैं, यही मानना धुक्तिसङ्गत प्रतीत्ष होता है (द्रo HSP-काऐ) अनुवाद-(व्यतिरेक-शलद्धार के भेव) [हेत्वो. उक्ती अनुक्तीनां न्नये च (चत्वारो मेदा:), शब्दार्था्यां साम्ये निवेदिते अ्रथ आक्षिप्ते (द्वादश), सलप्टे (शब्बे सति) तद्वत् (पुनः द्वादश); तत् (तस्मात्) त्रिःअष्ट (चतुविशतिः) भेदा: इत्यन्वयः] व्यतिरेफ के (१) दोनों हेतुओं का कथन होने पर (२-४) इनमें से एक या दोनों का अनुपादान होने पर-(चार भेद होते हैं); ताधर्म्य के (i) शब्द द्वारा या (ii) धर्थ द्वारा उक्त होने पर तथा (iii) आक्षिप्त (आक्षेपलम्य) होने पर (चारों में से प्रत्येक के तीन भेद होते हैं-(४x३=१२); इनमें से प्रत्येक के क्लिष्ट (तथा पश्लिष्ट) शब्द में भी होने से २४ (त्रिःअरप्ट) भेद होते हैं। (१६०) व्यतिरेक का हेतु है-(फ) उपमेयगत उत्कर्ष का निमित्त तथा (स) उप- मानगत अपकर्ष का निमित्त। (१) उन दोनों का कथन। उनमें से किसी एक (२) (उत्कपनिमित्त) या (३) (अपकर्ष निमित्त) का पथवा (४) दोनों का (एक साथ) कपन न करना-यह तीन प्रकार की अनुक्ति है। एक तो उपमान-उपमेय-भाव (साम्य) का (इब आदि) शब्द के द्वारा प्रतिपादन करने पर ये चार भेद होते हैं। पुनः ('तुल्य' आादि शब्द के द्वारा) अर्थ-सामर्थ्य से (साम्य के) प्रतिपादित होने पर कमशः उपयुंक्त चार भेद ही होते हैं। उसी प्रकार साम्य के व्यङ््च होने पर (भ्रक्षिप्त) भी उतने (चार) ही मेद होते हैं। इस प्रकार वारह भेदहो जाते हैं। ये श्लेष (तथा अश्लेष) में भी होते हैं, इसलिए चौबीस नेद हो जाते हैं। + प्रभा-संक्षेप में व्यतिरेक मलङ्गार के २४ भेद इस प्रकार हैं- भश्लिष्ट-शब्द विपयक १२ भेद= (साम्य का १. शब्द द्वारा कथन, २. अर्थगम्य होना. और ३. व्यङ्गथ होना) X (१. दोनों निमितों की उक्ति, २. उपमेयोत्कर्य के हेतु की अरनुक्ि, ३. उपमानापकर्ष के हेतु की अनुक्ति, ४. दोनों की भनुक्ति)। इसी प्रकार दिलष्ट शब्द विषयक १२ भेद होते हैं। इन्हें निम्न प्रकार चित्रित किया जा सकता है-
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५२६ ] याव्यप्रकान:
तसिमांत्रसहायस्य प्रभूतारिपराभवे। अन्यतुच्छजनस्येव न स्मयोऽस्य महाघृते: ।४६३।। अन्रैव तुच्छेति महापृतेरित्यनयो: पर्याये युगपद्वाऽनुपादानेऽन्यत् भेदून्नयम्। एवमन्येध्वपि द्रष्टव्यम्। अ्रन्नेवशव्दस्य सद्भावाच्छान्दमीपम्यम्। व्यतिरेक
श्लेमनिवन्धन: .= २
शब्डे साम्ये 'आाथ साम्प आक्षिप्तं साम्ये २x ३=६
हेतु द्वयोक्तो एकहेत्वनुंक्तो अपरहेत्वनुक्ता हेतुद्वयानुका
अरनुवाद-(व्यतिरेक अलद्धार के २४ मेदों के) कमशः उदाहरए- ६X४=२४
(प्रबलिष्ट पद वाले) [१-४] अत्यन्त वेयं वाले, खड्गमात्र साथ लिए हुए इस बीर को बहुत से शत्ुओों को पराजित फरने पर भी अन्य तृच्छ जनों के समान गर्व नहीं होता' i६३। ।' । इसी उदाहरण में 'तुच्छ'- तथा 'महाधृति' इन बोनों पदों का पर्याय से (एक एक का) फथन न होने पर अथवा एक साथ कयन न होने पर अन्य (पनुकि के) तोनों भेद हो जाते हैं। इसी प्रकार अन्य अर्थात भागे के उदाहरणों में भी समझना चाहिये। यहाँ पर 'इब' शब्द के विद्यमान होने से शब्दी उपमा है। "प्रभा-(१) उप्युक्त उदाहरण में 'किसी पद मे श्लेप नही। यहाँ राजा उपमेय है, 'अ्न्यजन' उपमान 'है 'अरिपिराभव' साघारसाधम है। व्यततिरेक के हेतृ- उपमेयगत उत्क्पं का निमित (महापयं) तथा उपमोनगत अपवार्ष का निमित (तुच्छंता) दोनों का ग्रहण किया गया है। 'इव' शब्द के प्रयोग से साधर्म्य शब्द- वाच्यं है भतः यहाँ प्रथम (सब्दवाच्य साम्य में-दोनों हेतुओं की उत्ति) व्यतिरेक अलस्टार है। साम्य के सव्द-वाच्य होने पर मुक्तिनय के उदाहरए इस प्रकार होगे- ,1 (२) उपमानगत सपकर्ष हेतु की प्रनुकित में- 'नूनमन्यजनस्येव न स्मपोडस्य महाघुते:' i (३) उपमेयगत उतकवहेनु की अनुक्ति में- 'भ्रन्यतुच्जनस्पेव न स्मयोऽय महोपतेः' (४) दोनों हेनुओं की धनुक्ति में- 'नूनमन्यजनस्येव न स्मयोधस्य महीपतेः' ।
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दशम उल्लास: ५२७
असिमात्रसहायोऽपि प्रभूतारिपराभवे। नैवान्यतुच्छजनवत्सगर्वोडयं महाधृति:।४६४।। अत्र तुल्यार्थे वतिरित्यार्थमौपम्यम्। इयं सुनयना दासीकृततामरसश्रिया। आननेनाकलङ्क न जयतीन्दु' कलङ्किनम् ॥४६४॥
जितेन्द्रियतया सम्यग्विद्यावृद्धितिपेविखः । अ्रतिगाढगुएस्यास्य नाव्जवद्ड्गुरा गुगाः।४६६।। अनुवाद-[x-८]-('अति' इत्यादि उदाहरख ४६३ के समान) ॥४६४॥। यहाँ पर (अ्रन्यतुच्छजनवत्' में) तुल्य-अर्थ में 'वति' प्रत्यय है (तेन तुत्यं करिया चेद्वति:) इसलिए यहाँ उपमा अर्थगम्य (आर्थी) है। 'प्रभा-(५) व्यतिरेक अलद्धार के इस उदाहरण में शब्द अश्लिष्ट हैं, दोनों हेतुओं का कथन किया गया है, किन्तु साम्य का बोव तल्यार्थक 'वति' प्रत्यय से होता है अतएव साम्य अर्थ-लम्य है। यहाँ 'जनस्येव' के स्थान पर 'जनवत्' हो.गया है। साम्य के अर्थ-लभ्य होने पर अनुत्तितय के उदाहरण इस प्रकार हैं- (६) उपमानगत अपकर्षहेतु की अ्र्प्रनुक्त में- 'नूनं नंवान्यजनवत सगर्वोडयं महाधृतिः'। (७) उपमेयगत उत्कर्प-हेतु की अ्र्प्रनुक्ति में- "नंवान्यतुच्छजनवत् सगर्वोडयं महीपतिः'। 14 (८) दोनों को अनुवित में-'नूनं नवान्यजनवत् सगर्वोऽयं महोपतिः'। अनुवाद-[६-१२। 'यह सुन्दर नेत्रों वाली (नापिका), जिसने फमल (तामरस) को शोभा को दामी बना लिया है ऐसे फलङ्धरहित मुख से फलङ्नयुक्त चन्द्रमा को जीत रही है।४६५॥ यहाँ पर 'इव' आदि तथा 'तृल्य' आदि शब्दों के न होने से उपमा साक्षेप- संम्य (व्यङगध, प्रतीयमान) ही है। प्रभा- (६) व्यतिरेक के इस उदाहरणा में 'मानन्' उपमेय है, इन्दु उपमान' है, अकलङ् होना उपमेय के उत्कर्प का हेतु है तथा सवलद्द होना उपमान के अपंकर्य का हेतु है। यहां दाब्द अश्लिप्ट हैं, दोनों हेतुओं का कथन किया गया है; किन्तु साम्य आक्षिप्त या व्यङ्गय है। समता के व्यङ्गम होने पर अनुक्तिन्रय के उंदाहरंग इस प्रकार हैं-(१०) उपमानगत अपवर्ष की अनुवित-माननेनाकलसेन जयत्यमृतदीधितिम्' । (११) उपमेयगत उत्कर्ष की नुवित-याननेन मनोजेन जयतीन्दुं फलद्धिनम्' (१२) दोनों की अनुक्ति-'धाननेन मनोजन जयत्प- मृतदीघितिम् अनुवाद-[हिलर्टशब्दगत व्यतिरेक] (१३'१६) 'जितेन्द्रियता के कारय
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५२५ 1 काव्यप्रकार:
अत्रेवार्ये वतिः गुएशब्द: श्लिष्टः शाबदमौपम्यम्। अ्खए्डमएडलः श्रीमान् पश्यैप पृथिवीपति:। न निशाकरवज्जातु कलावेकल्यमागतः ।४६७।। अत्र तुल्यार्थे वतिः कलाशदद: श्लिष्टः। विद्वानों (अ्रथवा विद्या और वृढों) को भली भाति सेवा करने वाले तथा अ्त्यन्त दृढ़ (घेयें आदि) गुहा वाले इस राजा के गुस (धैर्यं आादि) फमल के मुसों (तन्तुओों) के समान नश्वर नहीं है ॥४६६॥ यहाँ पर 'इंब' के सर्यं में, ('तन् तस्येव' इस पासिनि सूत्र से) 'वति' प्रत्यय है. 'गुख' शब्द श्लिष्ट है तथा शाब्दी उपमा है। प्रभा - (१३) 'जितेन्द्रियतया' इत्यादि व्यतिरेक के श्लिप्ट शब्द वाले उंदाहरणों में प्रथम है। इसमें अस्य (इसका) शब्द से निर्दिष्ट राजा उपमेय है, कमल (अब्ज) उपमान है, गाढता उपमेर्य के उत्कर्प का निमित्त है, भड्गुरता उपमान के अपकर्ष का हेतु है। यहाँ गुख शब्द के धर्य आदि तथा तन्तु दो अर्थ है अवः यह स्लिप्ट है। इवार्थक वति प्रत्यय का प्रगोग होने से उपमा शाब्दी है तथा व्यतिरेक के दोनों हेतुओं का कथन किया गया है। अनुक्तिन्रय के उदाहरए इस प्रकार हैं-(१४) उपमानगत उत्कपं की अनुक्ति-प्रतिपाठयुसस्यास्य न तामर- सवद्गुखा:'। (१५)उपमेयगत उत्कर्प की अनुकि-सत्कमंनिरतस्यांस्य नाब्ज- यद्भङ्गुरा गुणाः'।(१६)दोनों की अनुवित-सत्क्मनिरतस्मास्य न तामरसवद्गुणाः'। अनुवाद-[१७-२०] 'देखो' पखण्डमण्डल (समृद्धराजमण्डल वाला, चन्द्र- पक्ष में-पूर्स-विम्व वाला) सम्पत्ति या शोभा से युक्त (धोमान). यह राजा कभी भी (जातू) चन्द्रमा के समान (चिमदि ६४ अयमा वोडश) कताओं के नाश (वंफल्य) को नहीं प्राप्न हुग्रा॥४६७। *. "यहाँ पर तुल्य अर्थ में 'बति' प्रत्यम है। 'कला' शन्द श्लिष्ट है। प्रभा -(१७) 'अखण्ठ' इत्यादि स्लिस्ट शब्द वाले व्यतरेक का उदाहरण है। यहां कला शब्द की स्लिष्टता व्पतिरेक में सहायक है। पृथ्वीपति उपमेय है, निशाकर उपमान है। उत्कर्पहेतु (अ्रमण्डमण्डलत्व) तथा अपकर्षहेतु (कला-वकरम) दोनों का ग्रहएा बिया गया है। तृत्यार्थक 'वति' प्रत्यय के प्रयोग से यहा आार्थी उपमा है। अनुविननय के उदाहरणा इम प्रकार हैं-(१८) उपमानगत भप-
दृश्यर्ता वमुधाभिप:' इत्मादि। इस पाठ में श्रसण्डमण्डत शब्द स्लिप्ट होगा। (१E). उपमेयगत तत्कर्ष की अनुवत-वहलारिगतोप्पेय श्रीमानुद्धतविक्रम: दत्यादि। इस पाठ मे 'कला' शब्द श्लिप्ट होगा। (२०) दोनों की अनुक्ति-बह्तारिगर्ताप्पेष थीमानडतविकमः। न निशाकरवज्जातु दृध्यता वसुधाधियः ॥ इम पाठ में 'वह्ुत' सब्द दिलस्ट, (कुप्मापक्ष, विपुल) होगा।
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दशम उल्लास: ५२६
मालाप्रतिवस्तृपभावत् मालाव्यतिरेकोपि सम्भवति तस्यापि भेदा एव मूह्या: दिड मात्रमुदाहियते यथा- हरवन्न विषमदष्टिर्हरिवल् विभो विधूतविततवृपः। रविवन्न चातिदुःसहकरतापितभू: कदाचिद्सि ।४६८॥ अत्र तुल्यारथें यतिः विषमाद्यश्च शव्दा: दिलप्टा: । नित्योदितप्रतापेन त्रियामामीलितमभः । भास्वताSनेन भूपेन भारवानेप विनिर्जित: ।।४६६।। अ्त्र ह्याच्षिप्तैवोपमा भार्वतेति शलिष्टः। यथा वा- अनुवाद- (मालाव्यतिरेक) मालारूप प्रतिवस्तुपमा के समान माला व्यति- रेक (अलद्धार) भी हो सकता है। उसके भेद भी उक्त प्रकार से जानने चाहिये। दिग्दशंन मात्र के लिए उदाहरण दिया जाता है। जैसे- 'हे महाराज (विभो), आाप कभी भी शिव के समान वियमदृष्टि (प्रसमदर्शी, शिवपक्ष में त्रिलोचन) नहीं हैं, न विष्यु (कृष्) के समान महान् (वितत) वुप (धर्म; कृष्सपक्ष में-वृपासुर) का विनाश करने वाले है, न सूर्य के समान प्रत्यन्त दुःसह कर (राजकर तथा किरणों) से भूमि को संतप्त करने वाले हैं' ॥४६८॥- यहां पर तुल्य-अर्थ में 'वति' प्रत्यय है तथा 'विषम' आदि शब्द श्लिष्ट हैं। प्रभा-'हरवत्' इत्यादि मे राजा उपमेय है, 'हर' आद्ि अ्रनेक उपमान हैं। 'विषम' आदि शब्द शिलप्ट हैं। अपकर्षहेतु (विदमदष्टित्व) का कथन किया गया हैं; किन्तु 'समहष्टित्व' रूप उत्कर्षहेतु का कथन नहीं किया गया। तुल्यार्थक 'वति' (प्रत्यय) के प्रयोग से साम्य अर्थलम्य है। एक ही उपमेव का अनेक उपमानों की अपेक्षा उत्क्प दिखलाया गया है। अ्रतः यहाँ साम्य के अर्थगम्य होने पर शिलष्टपद वाला मालाव्यतिरेक अलक्कार है। अपनुवाद्-[२१-२४] 'निरन्तर उदित पराकम (प्रफृष्टताप) वाले क्रान्ति- वाले या सूर्यर्प (भास्वता) इस राजा ने रात्रि (त्नियामा) में जिसकी प्रभा नष्ट (मीसित) हो जाती है ऐसे इस सूर्य को जीत लिया है ॥४६६॥ यहाँ पर उपमा पाक्षेपतभ्य (व्यङ्गघ) है, 'भास्वता' मह श्लिप्ट शब्ब है। प्रभा-(२१) नित्य इत्यादि शिलप्ट नब्द वाले व्यतिरेक का उदाहरण है। यहां 'भास्वता' तथा 'प्रताप' शब्द गिलप्ट हैं। 'भूप' उपमेय है तथा सूर्य उपमान है। उपमेयगत उत्कपंहेतु (नित्य-उदित-रहना) तथा उपमानगत अपकर्पहेतु (रात्ि में प्रभाहीन हो जाना).दोनों का ग्रहण किया गया है। साम्यवोधक 'इव' प्रादि शब्द यहाँ नही हैं; किन्तु 'विनिजित' शब्द से साम्य भाक्षिप्त हो रहा है। पूर्ववत् अनुक्तियम मे उदहारस इस प्रकार है-(२२) उपमानगत अपरुर्पहतु की अनुवित-नित्योदित प्रतापेन पङ्डजायति-नन्दन। (२३) उपमेयगत उत्कपंरेतु को अनुश्स-
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५३० काव्यप्रकार:
स्वच्छात्मतागुए समुल्लसितेन्दुबिम्यं विम्च प्रभाधरमकृत्रिमहदयगन्घम्। यूनामतीव पिबतां रजनीपु यत्र तृष्सों जददार मधु नाननमङ्गनानाम् ।४७0 अत्रेवादीनां तुल्यादीनां च पदानामभावेऽपि शलिष्टविशेपणराति- प्तवोपमा प्रतीयते । एवाम्जातीयका: शिलिप्टोक्तयोग्यस्य पदस्य पृथगुपा- दानेऽन्येडपि भेदा: सम्भवन्ति। तेऽयनंचैव दिशा द्रष्टन्याः । (१६१) निषेधो वक्तुमिष्टस्य यो विशेषाभिधित्सया ॥१०६।। वक्ष्यमाणोक्तविपयः स आ्राक्षेपो द्विधा मतः । 'समरासक्मनसा त्रियामामीलितप्रभः (२४) दोनों की अनुवितं-'समरासक्तमनसा पडूजावलिनन्दन.'। अनुवाद-अ्रथवा जैसे-'जिस वसन्त ऋतु की रात्रियों में प्रत्यन्त पीने- वाले तर्लों की पान-लालसा को उस मद्य ने सृप्त कर दिया, किन्तु फामिनियों के मुख ने तृप्त न किया, जिस (मद् तथा मुस) में निर्मलता गुसा के फारए चन्द्रबिम्ब प्रतिबि्बित (समुल्लसित) हो रहा था, जो विम्वप्रभाधर (बिम्बाफल की प्रभा को धारण करने वाला सथवा विम्याफल की प्रभायुक्त अधरो वाला) था, जिसमें स्वा- भाषिक मनोहर गन्घ थी ॥४७०॥। . यहाँ 'इय'आादि तथा 'तुल्य' आदि शब्दों के न होने पर भी म्लिष्ट सर्थात् उभयान्वित ('स्वच्छात्म' इत्यादि) विशेषणों के द्वारा आक्षिप्त (ध्यक्त) उपमा की प्रतोति होती है। इसी प्रकार दिल्ट कथन के योग्य पद का पृयक रूप में (पर्यात् उपमान के विशेकण के एप में या उपमेय के मिशेपण के रप में) प्रमोग करने पर इस प्रकार के अ्रन्य भी (व्यतिरेक के) भेद हो सकते हैं। उन्हें भी इसी रीति से' जानना चाहिये। प्रभा-(१) 'स्वच्छात्म' इत्यादि में निलष्ट विश्ेषखों के द्वारा यह प्रतीति होती है कि हुद गन्य आदि वाला होने से सुन्हरियों का मुम (उपमेय) मधु (उपमान) के सदृश है; किन्तु मधु से तृप्णा नृप्त हो गई, मुख से नहीं। इसके द्वारा (उपमेय) मुम व उत्कर्ष प्कट होता है। यहाँ सबको मुलभ होना (मवलोक सम्यत्व) मधु के तृप्पाहरण रप अपकर्ष का हेतु है और एकमात्र पुस्ष को प्राप्म होना (पुरुषकलभ्यत्व) भङ्गनामुख के तृप्णा-पहर रूप उत्कर्ष का हेतु है। इन दोनों का कथन नहीं किया गया, अतः शिलष्ट पद वाले उस व्यतिरेक का उदाहरणा है जहां साम्य आाश्िप्त है तथा दोनों निमितों को अनुक्ति है। (२) सप्तम उल्लाम के 'ममुतममृत कः सन्देहः' इत्यादि उदाहरण (२१५) में उपमान'प्रमृत' यादि में तथा उपमेय' 'सचर' में मघुरत्य, आदि (विधेपण) का पृथक पृषक् प्रहण किया गया है। 'अनुवाद्-(१5) प्राक्षेप पलदधार यह है जो (जहा) विशेव (वक्पमास विषय में कन की अशवयता या प्रतिप्रमिद्धि) के फथन की इच्छा सो वकपमाख
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दशम उल्लास. ५३१
विवतितस्य प्राकरसिकत्वादनुपसर्जनीकार्यस्य अ्रशक्यवक्तव्यत्वम- तिप्रसिद्धत्वं वा विशेयं वक्तु निपेधो निपेध इब यः स वत्यमाएविषय उक्तविपयश्चेति द्विधा आक्षेप: । क्रमेमोदाइरगम्- १. ए एहि किपि कीएवि करण सिक्विव भगामि अलमहवा। 1, अ्रविचारितकज्जारम्भआ्रारिणी मरड ए भगिस्सम् ॥४७१। (ए एहि किमपि कस्या अपि कृते निष्कृप, भणामि अलमथवा। अरविचारितकार्यारम्भकारिसी म्रियतां न भणिप्यामि ॥४७१॥ २. ज्योतस्ना मौक्तिकदाम चन्दनरसः शीतांशुकान्तद्रवः कपूरं कदली मृशालवलयान्यम्भोजिनीपल्लवा:। अरन्तर्मानसमास्त्वया प्रभवता तस्या: स्फुलिद्गोत्कर- व्यापाराय भवन्ति इन्त किमनेनोक्तन न न्र महे।।४७२॥
(प्रकरण प्राप्त कहने योग्य या न कहने योग्य) बात का निेध किया जाता है। वह (प्राक्षेप) दो प्रकार का है-(१) वक्ष्यमाएविययक और (२) उक्तविषयक। (१६१) फहने के लिये अभीष्ट (वषतुमिष्ट-विवक्षित) अर्यात् प्रकरणप्राप्त होने के फारस जिसफी उपेक्षा न की जा सके उस वस्तु के वन को अशञशयता या परतिप्रसि- द्विरूप विशेपता का बोध कराने के लिए जो निषेध सा (आपाततः प्रतीयमान निषेध पर्थात् निषेधाभास) किया जाता है, वह वक्ष्यमासविषयक और उक्तविपयक दो प्रकार का आक्षेप अलद्धार है। कमशः उदाहरण हैं- (१) [नायक के प्रति नायिका की ससी की उक्ति]-भरे निर्दय, आश्रो, मैं फिसी (नायिका) के लिए तुमसे कुछ कहती हूँ। अथया रहने दो, बिना विचारे- कार्य आरम्भ करने वाली वह मर जाय; किन्तु मैं कुछ न कहूँगो' ।।४७१। (२) [नायक के प्रति दूती की उत्ति]-'चन्द्रिका, मुक्तामाला, चन्दनरस,- चन्द्रकान्तमण का जल, कपूर, केला, मृसाल के फङसा तथा फमलिनी-किसलम प्रा: ! (कोघार्थक अव्यम) ये सब भी उस (नामिका) के हृदय में तेरे स्थत होने से (पभवता) चिनगारी के समूह (भ्रद्गारों) के व्यापार के लिये (दाहोत्पावन हेतु) हो गये हैं। श्ोह । (हन्त-विचादार्यक प्रव्यय) इसके कथन से थया प्रयोजन? हम कुछ न कहेंगों' ।।४७२।। प्रभा-जहां विशेष अ्र्थ की प्रतीति के लिये अवस्यवक्तव्य का इस प्रकार निषेध किया जाता है कि उस निपेष का विधि में ही तात्पयं होता है, वहां 'प्राक्षेप' भट्टकार होता है। इसके विशेष प्रज्ज है-(i) किसी वात को कहना श्रभीष्ट (विवक्षित-कहना दष्ट) होता है, (ii) उसी बात का निषेध किया जाता है, (iii) किन्तु यहु निषेध बनता नहीं, वह पापाततः प्रतीयमान अर्थात् नियेधाभास (निपेध-
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५३२ 1 काव्यप्रकाश: 44
(१६२) क्रियायाः प्रतिषेधेऽपि फलव्यक्तिविभावना॥१०७॥। हेतुरूपक्रियाया: निपेधेऽपि तत्फलप्रकाशनं विभावना। यथा-
परिवत्त ते स्म नलिनीलहरीभिरलोलितापयघूर्गत सा ॥४७३॥ इव) मात्र हो जाता हैं, (iv) इससे कोई विशेष अर्थ प्रकट करना होता है (विदेषा- भिघित्सया) । यह दो प्रकार का है-(वक्यमासाविषयफ-'ए एहि' आादि- इसका उदाहरण है यहां पर विरहिसी नायिका की विरह्जनित दुर्दशा. (मरणा- वस्था) वक्ष्यमाणा है, उसमें वर्णन की आशवयता (वक्तुमशवयता) की प्रभिव्यञ्जना करने के लिये 'अलम्' इत्यादि से निषेध किया गया है। (२) उक्तविषयक- 'ज्योत्स्ना' इत्यादि इसका उदाहरण है। यहाँ पर ज्योत्स्ना' आदि उस विरहिली के लिये दाहोत्पादवा हो गये हँ' यह अ्र्थ 'उक्त' है; किन्तु 'विरहि्णियों के लिये ज्योत्स्नादि सन्तापकारी हुआ करते हैं' इस पतिप्रसिद्ध (विशेप) अर्थं की व्यञ्जना के लिये किमनेन' इत्यादि से 'उक्त' कथन का निषेध किया गया है। टिप्पसी-अनुपसर्जनीकार्यस्य-'उपसर्जन' शब्द प्रधान का विलोमार्थक है। इंसका अर्थ है-गोगा, अप्रधान। पागिनि व्याकरणा में 'उपसर्गन' एक पारिमाषिक शब्द भी है। उसका यहाँ ग्रहणा नहीं किया गया। अनुपसजनीकार्यस्य का अर्थ है- जिसे गोएा न किया जा सके, जिसकी उपेक्षा न की जा सके, भर्यात् प्रकरर के अनुसार जिसे प्रकट करना आवश्यक (विवशितंस्य=' प्राकरसिकत्वाद् अनुपसर्जनीकायंस्य)। अनुवाद-(१६) बिभावना सलद्धार यह है जहां फारस (करिया=कारण, कियतेऽनया इति) का प्रतिषेध होने 'पर भी (उसके कार्यरूप) फरा (उस्पति) का 1 फयन (ध्यक्ति := वचन, प्रफाशन) किया जाता है। पर्थात् हेतुरूप क्रिया का निषेध होने पर भी उसके फल अर्थात् काय का प्रकाशन करना विभावना है। जैसे-[किसी नामिका की विरहायस्था का वर्एन]- 'पुष्पित लताभों से ताहित न की हुई भी यह (नाविका, विरह के कारता) वेदना का अनुभव फरती थी; धमरगलों से न फाटी गई भी वह सोट-पीट होती थी (परिवतते=परावत्य पतते); कमलनी-युक्त लहरों से चालित न को गई भी यह चरुर सातो थी ॥४७३॥ प्रभा-(१) जहाँ प्रसिद्ध कारग के अभाव में भी कार्योत्पत्ि का वर्गन किया जाता है वहाँ विभावना अनद्धार होता है। सूप में 'किया' वाब का भभिप्राय 'ारण' है। : (२) यह!ं विभावना के भेदों का निरुपणा नहीं किया गया। साहित्यदपस 4 के अनुसार इसके दो भेद है- उकतनिमिता औोर अनुकनिमिता। मनुपनिमिता का उदाहरग है-'वुगुमित' आदि। यहाँ सनाप्रद्वार आदि पीठा रत्यापि के हेतु है;'
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दशर्म उल्लांस: ५३ ३ 4
(१६३) विशेपोक्तिरखण्डेपु कारणेपु फलावच: । मिलितेष्वपि कारणेपु कार्यस्याकथनं विशेपोक्ति। अनुक्तनिमित्ता उक्तनिमित्ता अचिन्त्यनिमित्ता च। क्रमेणोदाहरगम्- १. निद्रानिवृत्तावुदिते द्यु रत्ने सखीजने द्वारपदं पराप्ते। श्लथीकृताश्लपरसे भुजङ्ग चचाल नालिङ्गनतोऽङना सा।४७४॥। २. कपूर इव दग्घोऽपि शक्तिमान् यो जने जने। नमोऽस्त्ववार्यवीर्याय तरमै मकरकेतवे।।४७५।। ३. स एकस्त्रीणि जयति जगन्ति कुतुमायुघ:। हरतापि तनु यश्य शम्भुना न बलं हतम् ॥४७६॥ किन्तु उन प्रसिद्ध हेतुओ के न होने पर भी उनके कार्य 'पीडा' आदि का वर्णन किया गया है अतएव विभावना अलङ्गार है। अनुवाद-(२०) विशेषोकति वह (अलद्गार) है जहां (प्रसिद्ध) कारणों के मिलने पर (पसण्डेपु=मिलितेु) भी कार्य (उत्पत्ति) का कथन नहीं किया जाता। (१६३) अर्थात् कारणों के एकत होने पर भी कार्य (के होने) का कथन न करना- विशेषोक्ति है। (यह तीन प्रकार फो है) १. अनुक्तनिमिता, २. उक्तनिमिता तथा .३. अचिन्त्यनिमित्ता । इनके कमशः उदाहरण ये हैं- १. 'निद्रा की निवृत्ति हो जाने पर, सूर्य उदित होने पर सखियों के द्वार- स्थान पर आा जाने पर; प्रेमी (भुजङ्ग :- उपपतिः) के द्वारा पतिङ्गन के आ्नन्द को शिथिल कर देने पर भी वह भ्ङ्भना प्ातिङ्भन से नहीं हटी॥४७४॥ २ 'जो (कामदेव) कपूर के समान जल जाने पर भी प्रत्येक मनुष्य पर सधिकार (शक्ति) रखने वाला है, उस अफुण्ठित पराक्रम वाले मकरकेतु (फामदेव) को नमस्कार हो ।।४७५॥ ३. 'पुष्पों के अस्त्रवाला वह (कामदेव) अफेला ही तोनों लोकों क विजय 1 करता है; जिसके शरोर को नष्ट करते हुए भी शिवजो ने बल का हरस नहीं किया' 1४७६11 प्भा-(१) कारिका में 'अखण्ड' शब्द का अभिप्राय है-मिलित या पूएं। 'कारणेपु' में बहुवचन विवक्षित नही है तात्पयं यह है कि प्रसिद्ध कारए या कारगों के होने पर भी कार्य के न होने का कथन विगेपोविन है (विभेषस्य नवीन- प्रकारस्य उकतः विशेषोवितः)।(२) विभावना और विशेोकि (समता) दोनों मलद्कार कार्यकारणभाव के विरोध पर आथ्रित (विशेघमूलक) हैं। (भेद) विभावना में कारणों के न होने पर भी कार्य का वर्न होता है किन्तु विरेपोक्ति मे समस्त कारणों के होने पर भी कार्ये का न होना वसित किया जाता है। (३) कार्य न होने का कथन तीन निमितों में किया जाता है अतएव विनेदोवित
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५३४ j कांव्यप्रंकास:
(१६४) यथासंख्यं क्रमेशीव क्रमिकारां समन्वयः ॥१०८॥ यथा- एकस्त्रिधा वससि चेतसि चित्रमत्र देव द्विपां च विदुषां च मृगीहरशा च। ताप च सम्मदरसंच रति च पुष्न् शौर्योप्मणा च विनयेन च लीलया च ॥Y७I (१६५) सामान्यं वा विशेषो वा तदन्येन समर्थ्यते। यत्तु सोऽर्थान्तरन्यामः साधर्म्येऐेतरेण वा ॥१०६॥. तीन प्रकार की होती है। १ अनुक्तनिमता-जिसमे कार्य-सभाव के निमित्त का कथन नही किया जाता; जैसे निद्रा इत्यादि में निद्रानिवृतति, सूंर्योद्य आदि कारसों के सद्भाव मे भी आ्र्तिङ्गन-परित्यागरप कार्य का प्रभाव कहा गया है' यह। 'धरनुरागातिशय' ही आलिङ्गन को न त्यागने का निमित है, जो प्रकरण आदि से ज्ञात होता है, उसक कथन नहीं किया'गया। २. उक्तनिमित-जिसमें कार्याभाव के निमित्त का कथन किया जाता है, जैसे-'कपू'र इव' इत्यादि में रीरदाह रूप कारणा के होने पर भी दनितिध्वस रूप कार्य का अभाव वणित है। 'कामदेव का अकुष्ठित-परात्रम वाला होना' (अवार्यवीयंत्व) इसका निमित कहा गया (उक्त) है। ३. अित्त्यनिमित्ता-जिसमे निमित सचिन्त्व पर्थात् दुरधिगम (Inconceivable) होता है; जैसे-'म एक:' इत्यादि मे तनुहर्सरप कारस के होने पर भी 'बलनार' रूप कार्य का पभाव बहित है। तनुहरस करते हुए भी शिव ने कामदेव का बलनाश यमों नही नि्या-इसके हेतु का विचार नहीं किया जा सकता यह तो केवल शास्त्र नगम्य है अतः प्रचिन्त्य है। अरनुवाद-(२१) ययासंस्य वह मतयुर है जहाँ किसी कग से उक्त पदार्थों का उसी फम से (प्रयम उक्त का प्रथम पदार्थ के साथ द्वितीय का द्वितीय के साय- आादि) सत्वय (सम्बन्ध) होता है। (१६४) जैसे-[राजा के प्रति उकि]- 'हे राजन्, यह आश्चर्य (चित्रम्) है कि शौर्य की प्रसरता, नघ्रता तमा विलास के द्वारा कमदा, सताप, मानन्दरस औौर रति का पोपण करते हुए माप पफेसे हो शत्तुमों, विद्वानों तथा मृगनयनियों के हृदय में तीन प्रकार से नियास करते है'
'प्रभा-'एकस्विधा' इत्पादि में प्रथम चरण में उकत 'ात्र' सादि का द्वितीय चरल के 'ताप' आदि तथा सृतीय चरस के शोर्योदमसाा' मदि प्रकारमय के साम कमगः अरन्वय होता है जो एक अर्थ-वैचिन्व का अनुभय कराता है, भवएव यह ययासंस्य अमद्वार है। अनुवाद-(२२) वर्थानतरत्यास यह मसद्वार है जहां सापम्य या पप्म्प (सदितरेए या) के विवार से सामान्य या विशेष पस्तु का उससे मिस (विशेष या सामान्य) के द्वारा समर्सेन किया जाता है। (१६५) 7
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देशम उल्लांस:
साधर्म्येण वैधर्म्येण वा सामान्यं विशेपेए यत् समर्थ्यते विशेषो वा सामान्येन सोऽर्थान्तिरन्यासः। परर्थात् जो समानधमंता धथवा विरुद्धयमः के विचार से सामान्य का विशेप के द्वारा भथवा विशेष (वस्तु) का सामान्य के द्वारा समर्थन किया जाता है वह भर्था- न्तरग्यास मलद्धार है। प्रभा-(१) जहाँ किसी संभाव्यमान अरथ के उपपादन (सिद्धि) के लिये उससे भिन्न किसी दूसरे भर्थ को स्थापना (न्यास) की जाती हैं वहाँ भर्थान्तरन्यास अलद्कार है। अर्धान्तरन्यास के विशेष भ्रङ्ग हैं-(i)दो वाक्य होते हैं एक सामान्य अर्थं का कथन करता है दूसरा विशेष अर्थ का (ii) दोनों अ्रथों में समर्थ्य- समर्थकभाव होता है। यहां सामान्य का अर्थ है-प्रधिक देश में रहने वाला (व्यापक) और विशेष का अर्थ है-सामान्य के एक देश में रहने वाला (व्याप्य); जैसे 'पशु' सामान्य है 'अश्व' विशेष है। जब अश्व सामान्य है तो श्वेताश्व या कोई अरव- व्यक्ति विशेप है। (२) अर्थान्तरन्यास का अ्न्य अलद्दारों से सम्बन्ध :- अर्थान्तरत्यास और निद्शना- (समता) अपरा निदर्शना (सुभ १०५) तथा सर्था- न्तरन्यास दोनों में ही दो अथों का सामान्य-विशेप भाव तथा समर्थ्य-समर्थक-भाव होता है। (भेद) निदर्शना के दोनों वाक्यों का आधारभूत जो कार्यकारणभाव होता है, वह एकरूप ही होता है; जैसे उदाहरए ४३८ में 'क्षुद्र की उन्नत पद प्राप्ति (कारण) तथा पतन (कार्य) दोनों वाक्यो में एकरूप ही है। किन्तु अर्थान्तरन्यास के दोनों वाक्यो में जो कार्य-कारणभाव होता है; वह भिन्न-भिन्न होता है। जैसे 'निजदो- पावुत०' (उ० ४७८) में पूर्वार्ध में 'दोप' कारण है, विपरोत ज्ञान कार्य है; उत्तराघं में पित्त कारण है, विपरीत चाक्षुप ज्ञान कार्य है। इस प्रकार जहां पूर्व तथा उत्तर वाक्य मे भिन्न-भिन्न कार्यकार भाव होता है तथा सामान्यविशेप रूप से समर्थ्य-समर्थकभाव होता है, वहाँ भर्थान्तरन्यास होता है। अर्थान्तरन्यास और प्रतियस्तूपमा-(समानता) दोनों में प्रस्तुत तथा भप्स्तुत मर्थ को बतलाने वाले दो दो वाकय होते है। अप्रस्तुत भर्थ प्रस्तुत को समभने मे सहायक होता है। (भेद) (i) प्रतिवस्तुपमा मे दोनों अर्थ सामान्य ही होते हैं या विशेष ही; किन्तु अर्थान्तरन्यास में एक अर्थ सामान्य होता है और दूसरा विशेष। (ii) प्रतिवस्तूपमा मे दोनों अ्रथों का उपमान-उपमेय-भाव होता है; िन्तु भर्थान्तर- न्यास में दोनों का समर्थ्य-समर्थक-भाव होता है। धर्यान्तरत्यास ओर दुप्टान्त-(समानता) दोनों में प्रस्तुत तथा ममस्तुत प्रथ को बतलाने वाले दो-दो वाक्य होते है तथा अप्रस्तुत अर्थ प्रस्तुत भर्थ का समर्पन
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५३६ 1 -कोव्यभकंॉशी: 44
क्रमेशोदाहरगम्- १. निजदोपावृतमनसामतिसुन्दरमेव भाति विपरीतम्। पशयति पित्तोपहत: शशिशुभ्र शंसमपि पीतम ॥४७८॥ २. सुसितवसनालद्वारायां कदांचन कौमुदी- महसि सुदृशि स्पैर यान्त्यां गतोऽस्तममृद्विघु:। तदनु भवतः कीर्तिः केनाष्यगीयत येन सा प्रियगृहमगान्मुक्ताशङ्का कव नासि शुभप्रद्ः ।४७६।। ३. गुमानामेव दौरालंयात घुरि घुर्यो नियुज्यते। शरसब्जातकिशस्कन्यः सुखं स्वपिति गोगेलि: ।।४८०।। करता है। दोनों में साधम्य और वैधम्य के आघार पर भी अ्रवान्तर भेद होते हैं। (भेद) (i) दप्टान्त में दोनो अर्थ सामान्य होते हैं या दोनों विशेष; किन्तु धर्यान्तर- न्यास मे एक अरथं सामान्य होता है, दूसरा विशेष । (ii) हप्टान्त में मुख्यतः दोनों अ्रथों के साम्य या विम्वप्रतिविम्बभाव की प्रतीति होती है वार्द में समर्थ्य-समथर भाव जाना जाता है। किन्तु अरयांत्तरत्यास का आधार ही समव्य-रामर्थक-भाव है। पर्यान्तरन्यास और काव्यलि्ग (इ०, आगे काव्यलिङ्ग)।' (३) यह यर्थान्तरन्यार चार प्रकार का है-१. साधर्म्य द्वारा विशेष से सामान्य का समर्थन, २. भाधम्यं द्वारा सामान्य से विशेष का रामर्यन, ३. वैपमय द्वारा विशेष से सामान्य का समर्थन तथा ४. वैधम्यं द्वारा सामान्य से विशेष का रामर्थन। अ्रनुवाद्-(पर्थान्तरन्यास के) थ्रमशः उदाहरण ये है- १. 'अपने दोपों से जिन (प्यक्तियों) का मन व्याप्त (प्रावृत) है उनको प्रति सुन्दर वस्तु भी विपरीत अर्थात असुन्दर प्रतीत होती है। पित (कामला) रोग से पीडठित व्यक्तियों को चन्त्रमा के सदुश शवेत शद्द्ध भी पीसा विदलाई पड़ता है॥४७=॥ प्रभा-यहां पूर्वार्ध में एक सामान्य बात कही गई है औोर उसका साम्म्य [उदाहरस] के द्वारा 'पश्यति' इत्यादि धन्य विशेष भर्थ से समर्यन किया गया है। भतः साधम्यं के द्वारा विशेप से सामान्य का समर्थन रूप १. अर्मान्तरत्वास है। अनुवाद्-२. 'सुसितयसना' इत्यादि (ऊपर उदाहरए २६६) ।।४७६॥। प्रभा-परा 'मुसित' इत्यादि में विशेप वस्तु को वथन किया गया है तपा साधम्यं के द्वारा पत्र नासि' आदि में उगका सामान्य वस्तु से ममर्थन किया गया है। मतएव साधम्यं के द्वारा सामान्य से विशेष का समर्थन रूप २. पर्पान्तरन्वास है। मरनुवाद -. 'काय फरने में योग्य (पुर्यः) ग्यक्ति को पूलों के सपराप से (वौरातम्यात्) ही कार्यभार (धुरि) वहन में मियुर किया जाता है।' गसिमा बेंस तो कन्मे पर पस विह् हुए बिना हो सुलपूर्क सोता है ।४८॥
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दराम उल्लास: ५३७
४ै. अहो दि मे वह्मपराद्मायुपा यद्प्ियं वाच्यमिदं मयेहशम्। • त एव धन्या: सुहदः पराभवं जगत्यदष्ट्वैब हि ये च्षयं गताः ॥४८१॥ :(१६६) विरोधः सोऽविरोधेऽपि विरुद्धत्वेन यद्वच: । वस्तुवृत्त नाविरोवेऽपि विरुद्वयोरिव यदभिधानं स विरोध:। (१६७) जाटिश्चतुर्भिर्जात्यार्द्य विरुद्धा स्याद् गुएस्त्रिभि: ॥११०॥ क्रिया द्वाभ्यामपि द्रव्यं द्रव्येणवेति ते दश। प्रभा-यहाँ 'गुणानां-नियुज्यते' आदि मे सामान्य वस्तु का कथन किया गया है तथा वैधर्म्य के द्वारा उत्तरारघ में वशित विशेष अरथ से उसका समर्थन किया गया है। गुए के सभाव से गलिया बैल कार्यभार में नियुक्त नहीं वि्या जाता-यह बैधम्यं है। अतएव वँध्म्य के द्वारा विशेष से सामान्य-समर्थन रूप ३. अर्यान्तर- न्यास है। अनुवाद-४, 'महो ! मेरे दीर्घकाल के जीवन ने बड़ा अपराध किया है जो मुझे ऐसी अप्रिय बात कहनी पड़ रही है। निश्चय ही ये इस संसार में धन्य हैं जो मित्र को प्रापत्ि को बिना देसे ही नाज (मृत्यु) को प्राप्त हो जाते हैं ॥४े१॥ प्रभा-यहाँ पूर्वार्व में 'अपने' दीर्घजीवन का अपराध' रूप [ग्रहम् अधन्य:] विशेष अपर्यं वशित किया गया है। उसका 'से धन्याः' इत्यादि उत्तरार्थ में वणित सामान्य अ्रथ से समर्यन किया गया है। उररारघ में वशित [ते धन्याः] सर्थ पूर्वावं 'में प्रदशित [ग्रहम् अ्धन्यः] के विपरीत है अतएव यहाँ वैध्म्य के द्वारा सामान्य से विशेष पर्थ का समर्थन रूप ४. अरथन्तिरत्यास है। अनुवाद-(२३) विरोध या विरोधाभात वह अलद्धार है; जहाँ विरोध न होने पर भी (दो वस्तुओं का) विरुद्धों के समान वर्रन किया जाता है। (१६६) अर्यात् वास्तव में (वस्तुवृत्तेन=यथार्थ में) विरोध न होने पर भी जो दो वस्तुओं का विरुद्धों के समान वर्सन होता है वह विरोध (विरोधाभास) है।' वे (विरोध) दस प्रकार के हैं-(१-४) जाति का जाति आदि [गुख, करिया, द्रव्य] चारों से विरुद्ध होना (विरोध): (५-७) गुस का तीन [गुख, क्रिया, द्रव्य] के साथ विरोध; (७-६) क्रिया का दो [क्रिया, द्व्य] के साथ विशोध तथा (१०) द्रव्य का (एक) द्रव्य के साथ हो विरोध। (१६७) प्रभा-(१) जहाँ वस्तुत. विरोध न होने पर भी आापाततः विरोध की प्रतीति होती है वह अलद्धार विरोवाभास हे आभासते इति आ्भास; विरोषरचासी आाभासश्च इति'। जहाँ प्रकृत वाच्यार्थ में विरो प्रतीत होता है वहीं विरोधा- सद्धार हुआ करता है, किन्तु जहां व्यङ्गय भथों में विरोध होता है वहां [वाच्च] विरोधालद्दार नही होता अपितु विरोवालटंकार ध्वनि होती है; जैसे 'तिग्गरचिर- प्रतान:, [उदाहरण ५५] इत्यादि में।
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५३८ j काव्यप्रकाश:
विरोध की वहीं स्पष्ट प्रतीति होती है जहाँ विरोधमूचक 'अपि' शब्द का प्रयोग होता है, अथवा जहाँ यियायो के विरोध में [चनके] समुच्चयवोधक 'च' का प्रयोग होता है; या 'अभूत्, भवति, भविष्यति इत्यादि तियापदो के द्वारा विरु्द् वस्तुओं में एकता की प्रतीति होती है। विरेध के विशेष भ्रङ्ग है-(i) एक भ्रशय में रहने वाले दो पदार्थों का भिन्न-भिन्न आश्य में वन या (ii) भिन्न-भिन्न आाश्रयों में रहने वाले (व्यधिकरण) दो पदार्थो का एक आध्य में वहन (iii) वास्तविक विरोध नहीं, अपित विरोष की आपाततः प्रतीति, जिसे दूर किया जा सकता है। (२) विरोध और सपक-(समानता) विरोध के तीन भेद [(क) दो जातियों का विरोध उदा० ४८२ (ख) जाति और द्रव्य का विरोध उदा०, ४८५, तथा (ग) दो द्रव्यों का विरोध उदा० ४६१] रूपक के समान ही प्रीत होते हैं; क्योंकि (क) किसलयमृसालवलयादि दवदहनराशिः, (स) 'सफरो जनार्दनः' चौर (ग) 'शङ्ूरचूहापगाजरि कालिन्दी' आद्दि में 'मुसचन्द्र:' इस रूपक के समान ही दो पदार्थों में पभेद की प्रतीति होती है। तथापि (भेद) (i) विरोध में समेदारोप साधनमात्र है उसका उद्दश्य होता है विगेध की उद्भावना; किन्तु रूपक में प्रभेदारोप ही लक्ष्य होता है (ii) विरोधाभास मे विरोध की प्रतीति ही चमत्कारक होवी है किन्तु रूपक में अभेदारोप नमत्कारय होता है। (iii) रूपक में दो पदार्थो में उपमान-उपमेय-भाव होता है; किन्तु विशेभभास में नहीं। (iv) विरोधभास मे 'अपि' शब्द का प्रयोग होता है (राङ्ररचूडा) या उसकी भयंतः प्रनीति होती है (किसलम०) किन्तु रूपक मे अपि शव्द का कोई स्थान नही। विरोध-विभावना और विशेषोपित-(समानता)इन तीनों मलदवारों में ऐगे विरोष की प्रतीति हया करती है, जिसे दूर किया जा सकता है। (भेद) (i) विरोधा-भास का क्षेत्र व्यापक है यह विरोध के सभी स्थलों पर हो सफता है। किन्तु विभायना और विदायोकि का क्षेत सीमित है, फेवल म्य-फारण-भांव के विरोध में ही ये दोनों मलद्वार हुआ कारते हैं। फलतःविरोधाभास उत्सर्ग है, विभावना और विशेपोकि अप- वाद हैं। शर, अपवादविपयर्पारद्वारेस उत्सगस्य म््वस्यिति:' भर्थात् अपयाद के क्षेत्र को छोड़ कर ही उत्सर्ग (सामान्य नियम) के क्षेत्र का निश्चय किया जाता है। इस लिये कार्यकारणभाव के विरोध से भिन्न अन्य विरोध के स्थलों पर विशेयाभास मलद्वार होता है, यह ममकना चाहिये। (ii) विभायना में कारण के भभाय मे होने वाला कार्य ही वाघित रूप में जाना जाता है और विनेयोकि में कार्य (पल) को उत्पन्न न करने याला कारस हो वाघित रूप में प्रतीत होना है; किस्तु विरोषाभाम में दोनों वियव्न पदार्थों में परस्ार बाध्य वाघकभाव होता है। दिरोप औोर प्रससति (50, भागे पसस्ति)। (१) से दश-कार (मून १० में) गार प्रकार के शब्द बतताय गये है जाछि, गुख, किया मोर यहन्दा। जाति सादि चार दो उनके सम्ततित मर्य है। इनमें ग्रे
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दरीम उल्लांस: i ५३६
क्रमेणोदाहरणम्- १. अ्भिनवनलिनीकिसलयमृसालवलयादि दवदहनराशि: । सुभग, कुरङद्दशोऽस्या विधिवशतस्त्वद्वियोगपविपाते ॥४८२।। २. गिरयोऽ्यनुन्नतियुजो मरुदप्य चलोऽघयोऽप्यगम्भीराः । विश्वम्भराऽप्यतिलघुनरनाथ, तवान्तिके नियतम् ॥४८३॥। जाति का जाति, गु, किया और द्रव्य के साथ विरोध हो सकता है इसी प्रकार गुए आदि का भी चारों के साथ विरोव हो सकता है। किन्तु गुए का जो जाति के साथ विरोध होगा उसकी गना जाति के गुएा के साथ विशोधमे ही की जा चुकी है। अतः गुए का विरोध गुए क्रिया और द्रव्य के साथ ही गिना जायेगा। इसी प्रकार किया का विरोध करिया और द्रव्य के साथ और द्रव्य का विरोध केवल द्रव्य के साथ गिना जायेगा। फलतः विरोध दस प्रकार का होगा-जाति के चार+गुए के तीन-क्रिया के दो+द्रव्य का एक। अनुवाद-१ (जाति का जाति के साथ विरोध)-'हे सुन्दर देववशात् इस मृगनयनी पर तुम्हारे वियोग का वच्नपप्त हो जाने से (इसके लिये) नूतन कम- लिनी के किसलय तथा मृसाल के फएा आदि भी दायानल के पुञ्ज हो गये हैं'
प्रभा-यहाँ पर 'नतिनीत्व' आदि जातियों का 'दवदहनत्व' जाति से विरोध है; कयोंकि 'कमल' दि 'दावानल' रूप कैसे हो सकते हैं? किन्तु 'कमल'-किसलय' आदि विरह के उद्दीपक है अतएव उनमे औपचारिक रूप से दावानलत्य की व्सना की गई है। इस प्रकार विरोध का परिहार हो जाता है प्र वह विरोध आभास- मात्र रह जाता है; अतएव विरोवाभास अलद्गार है। यद्यपि ऐसे स्थलो पर-'यहाँ रूपक है या विरोधाभास' इस प्रकार का सन्देह होना स्वाभाविक है तथापि जहां उपमेय में उपमान का अभेदारोप चमत्कारक होता है वहां रूपक-अलड्कार होगा, जैसे 'मुखचन्द्र' यहाँ मुख में चन्द्राभेद है वही चमत्कारक है; किन्तु जहां विरोध प्रतीति हो चमत्कारक होती है, वहाँ विरोधाभास होता है। प्रस्तुत उदाहरस में 'विरहिसी की दशा का अत्यन्त अ्द्ध त होना' विवक्षित है; विरोध प्रतीति हो उसको प्रकट करती है अभोदारोप नही। अनुवाद-२. (जाति का गुस के साथ विरोध)-'हे राजन्, यह निश्चित है कि आपके सामने पर्वत भी अ्रत्यन्त ऊँचे नहीं (अनुन्नत=उच्चतारहित-यह विरोष है। वायु भी अल्प वेग वाली (वेग-ड्ाव्य) है, सागर भी अत्पगम्भीर (गम्भीरता- रहित) है; पृथिवी भी अतिलघु है' ॥४८३॥ प्रभा-यहाँ पर 'गिरित्व' आदि जाति का 'अनुन्नतत्व' (कंचा न होना) आदि गुखों के साथ विरोध प्रतीत होता है; किन्तु यहाँ वगंनीय राजा की 'प्रत्यन्त-उन्नति' विवक्षित है अतएव इस आपाततः प्रतीयमान विरोध का परिहार हो जाता है तथा विरोधाभास मलद्कार है।
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५४० j फाव्यप्रकापी:
३. येपां कएठपरिग्रद्दमणयितां संग्राध्य घाराघर रतीच्ण: सोऽ्यनुरज्यते च कमपि स्नेहं पराप्नोति च। तेपां सङ्गरसङ्गसफ्तमनसां राजां त्वया भूपत, पांसूनां पटलै: प्रसाधनविधिनिर्वत्यंत कौतुकम ॥४४॥ ४. सृजति च जगदिदमवति च संहरति चे हेलयैव यो नियतन। अवसरवशतः शफरो जनार्दनः सोर्जप चिन्नामिदम् ॥४८५॥ ५. सततं मुसलासक्ता बहुतरगृहकमंघटनया नृपते।, द्विजपत्नीनां कठिना: सति भवति कराः सरोजसुकुमाराः॥४=६।। अनुवाद-३. (जाति का क्रिया के साथ विरोष)-'हे राजन्, यह आश्चमं है कि आपका तोक्ष्स खड्ग (घराधर) युद्ध के विषय में आसक्तमन वाले जिन राजापरों के गले मिलने (पातिङ्गन) को प्रीति को प्राप्त करके प्रनुरक्त (रक्त से सना) हो जाता है तथा किसी अनिवंधनीय स्नेह (चिकनापन को प्राप्त करता है, उन राजाभ्रों को प्रसाधनविधि आ्रप धूलि (पांसूनो) के समूह से किया करते हैं [उनके सिर फाटकर धूति-घुसरित कर देते हैं। ॥४८४॥ प्रभा-यहा पर, 'सड्गत्व (घाराघरत्व, जाति का अ्नुरक्त होना (अनुरज्यते) औोर स्नेह प्राप्त करना-इन दोनों वियाों के साथ विरोय है; कयोंकि जड सडग में अनुराग और स्नेह का होना सम्भव नहीं ।' अनुरज्यते' का अर्घ-'रक्त से लाल हो जाता है' और स्नेह का चिकनापन' करने से विरोध का परिहार हो जाता है अतः विरोघाभास अतदार है। अनुवाद-४ (पाति का द्रव्म के साथ विरोध)-जो इस घगत् का अना- यासा ही नियमपूर्वक सृजन करना है, रक्षला करता है तथा संहरण करता है, वह जनावन (भगवान् बिप्सु) भी अयसर के अनुसार मस्स्य (सफर) हो जाता है, यह प्राश्चर्य है॥४८५॥। -प्रभा-'यहाँ पर मल््यत्व' (नफरस्व) जाति का जनारदन रूप व्यक्ति (द्रम्य) से विरोय है; किन्तु भगवान् तो अपनी लीला से मय रूप धारग कर समते है तथा उनका मत्स्य शरीर धारस करना भी पुरासा प्रसिद्ध है पतएव विरोष का परिहार हो जाता है तथा विरोधाभाम अवद्वार है। अरनुवाद-५ (गुस का गुए के साथ विरोध) 'हे राजन, निरन्तर मूसल (उठाने) में तत्पर तथा गृहस्मी के अनेक फाय करने के कारा पठोर हए बासला गुहिलियों के हाथ माप जंसो (दानी) के (प्रप्त) होने पर (सति) दमत के समान सुकुमार हो गये हैं॥४८६।। प्रभा-यहों पर 'कठिनना' और 'कोमलता' गुगों का आपम में विरोय है; िन्तु राजा के दान देने के कारए श्राश्णा-गृहिशियां गृह-सर्य मे मुक ही गई पतः जो हाय पहले कठोर से वे प (ाेद मे) कोमन हो गये, इस प्रकार पिरोभ रिहार हो जाता है तथा नहां विरोधाभास है।
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दश्म उल्लास: ५४१
६. पेशलमपि खलवचन दहतितरं मानसं सतत्त्वविदाम्। परुपमपि सुजनवाक्यं मलयजरसवत् प्रमोद्यति ॥४८७॥
अभृन्नवाम्भोजदलाभिजातः स. भार्गवः सत्यमपूर्वसर्गः ॥४८=॥ .८. परिच्छेदातीतः सकलवचनानामविपयः पुनर्जन्मन्यस्मिन्ननुभवप्थं यो न गतचान्। विवेकप्रद्ध्वंसादुचितमहामोहगहनो विकार: कोऽप्यन्तर्जडयति च तापं च कुरुते ॥४८६॥ ६. अयं वारामेको निलय इति रत्नाकर इति श्नितोडस्माभिस्तृप्णातर लितमनोभिजेलनिघि:।
: अनुवाद-६ (गुए का करिया के साथ विरोध)-'सलों का कोमल वचन भी तत्त्वजों के मन को अत्यन्त जला देता है 'तथा सज्जनों का फठोर वचन भी चन्दन रस के समान आानन्दित करता है ॥४८७॥ प्रभा-यहाँ पर 'पेशलता' (गुए) से जलाना (करिया) का एवं 'परुपता' (गुसा) से आनन्दित करना (करिया) का विरोध है; किन्तु कोमलता और कठोरता तात्कालिक हैं तथा परिणाम में 'दाहकता' और आ्नन्दप्रदता' है अ्रतः विरोध-' पारिहार हो जाता है (प्रभाटीका); अथवा पेशल और परुप शब्दों का अर्थ है-सुनने में 'प्रिय' तथा 'कट' और 'दहति' का अर्थ है-'संतापकारक' अतएव विरोध-' परिहार हो जाता है (उद्योत)। 1 अनुवाद-७. ।गु का द्रव्य के साथ विरोध)-जिस के बाणों (मागल) के निरन्तर (अनर्गल) तीव्र (शात :- तीक्ष्सः) प्रहार के द्वारा महती शिलाओों से दृढ़ यह फ्रोञ्च पर्वत भी नवकमल पत्र के समान कोमल (अभिजातः) हो गया. सचमुच ही वह परशुराम फोई प्रपूर्व सृष्टि है'।४८८॥ '' प्रभा-यहाँ 'कोमलता' (गुए) का क्रोन्चपर्वत (द्रव्य) के साथ विरोध है; किन्तु भागव की महिमा से 'अभिजात' (कोमल) पद का अरथ सुखपूर्वक"घेधने योग्य' (सुभेद्य) किया जाता है और विरोध-परिहार होता है अतः 'विरोयाभास' है। 1 अनुवाद्-द (करिया का क्रिया से विरोध) 'परिच्छेदातीतः' (ऊपर उदाहरस १०७)' 1४८६॥ -प्रभा-यहाँ पर जडयति (जड़ या चीतल कर देता है) और 'तापं च कुरते' (संतप्त करता है)-इन दोनों कियाओों का विरोध है; किन्तु विरह का प्रभाव विचिन्न होता है, अतएब एक क्षण में जड़ कर देता है तथा दूसरे क्षए ही संतप्त कर 4 देता है-इस प्रकार विरोध-परिहार हो जाता है। प्रनुवाद-६ (क्रिया का द्रव्य के सत्थ विशेध) यह सागर जल का मुख्य (एप) स्थान है, रत्नों की सान है, यह सोचकर (इति) तृप्णा से
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५४२ काव्यप्रकाण:
क एवं जानीते निजकरपुटोकोटरगतं च्षणा देन ताम्यत्तिमिमकरमापार्यति मुनिः॥४ह०॥
क्षितितिलक, त्वयि तटजुपि शङ्गरचूडापगाऽपि कालिन्दी॥४६१।। (१६८) स्वभावोक्तिस्तु डिम्भादेः स्वक्रियारूपवर्नम् ॥१११॥ स्वयोग्तदेकाथययोः। रूप वर्णः संस्थानं च। उदाहरगम- वश्चाद्ड्घी प्रसारय त्रिकनतिविततं द्राघपित्वान्मुरुच- रासज्याभुग्नकठो मुखमुरसि सटां धूलिपूत्रां विधूय। घासपासाभिलापादनवरतचल पोथतुएडसतुरङ्गी मन्द शब्दायमानो विलिखति रायनादुस्धितः दमा सुरेख ॥४६२॥ हम लोगों ने इसका आाथय लिया था; किन्तु यह कौन जानता या कि कुब्ध हो गये हैं. (ताम्यत्) मत्त्य (तिमि) और मकर जिसमें ऐसे इस सागर को मपने हाथ की घुल्लू में लेकर अगस्त्य मुनि क्षख भर में ही पी लेगे ॥४६०॥ प्रभा -- यहां पान किया (पीन) का अगस्त्य मुनि रूप कर्ता (द्रव्य) तथा समुद्ररूप चर्म (द्रव्श) के साम विरोध है; फिन्तु भगस्त्य के तप के प्रभाव की, 1.
वितक्षखता से विरोध-परिहार हो जाता है तथा यहाँ 'विरोयाभाग' है। अनुवाद्- १०. (दध्य का द्रव्य के साथ विशोम) - 'हे पृम्ो के तिलक (राजन्), आपके (गझ्गा के) तट पर पहुँचते ही (सापके) मदयुक्त गजों के मद जल को धारा दपो नदी (तरजिसी) के सम्पर्क से शिव को जटामों को नदी (मापगा) पर्यात् गङ्गा भी फासिन्दी हो जाती हैं।४ह १। प्रभा-गज्णा औोर यमुना (दरथ्यो) का पररर विरोध है; किन्तु यहा 'का लिन्दी' का अर्भ 'इ्याम माभा वाली' करने से विरोध-परिहार हो जाता है भय: विरोधाभास' अलङ्धार है। -अनुवाद-(२४) स्यभायोकि यहु पतद्वार है जहां बालक सादि (पदापो) को रव-माभित किया तथा रम आादि का चलन किया जाता है। (१६८) (कारिका में) '(थयो:' (इवयीः रियास्पयो: वर्सनमिति स्वतरियारपवसंनम्) सर्थात् एपमाप मपने में सामित। 'रपम्' पर्थात् रंग और पतत प्रत्यन्न का विन्यास (पयमयसंस्यान या आकृति)। (सयभावोकि का) उदाहरस है-।एपंचरित के उृतोपोछवास का पथ], सोकर उठा हुम अम्य अपने पिससे पंरों को फंसारर, वृष्ठ- वंश (तिक=रोड की हड्से) के भुकने से विसतृत हुए शरोर को सम्या करफे, या पीया वासा होपर मुझ को छती पर सगाकर, पूति चूसरित सटा को विशेष दम से हिलाकर घास राने को समिलाता से सपने सोष्ठों के सप्भाग (भोप दुष्द) को निर- नतर पलाता हुमा, मन्द मन्द (फुर फूर) दष्द कारसा हआा तुरों से भूमि (६भाम्)
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दपम उल्लास: ५४३ 44+
(१६६) व्याजस्तुतिमु खे निन्दा स्तुतिर्वा रूढिरन्यथा। व्याजरूपा व्याजेन वा स्तुतिः । क्रमेणोदाहरगाम्- हित्वा त्वामुपरोधवन्ध्यमनसां मन्ये न मौलि: पर: लज्जावर्जनमन्तरेण न रमामन्यत्र संदश्यते। यस्त्यागं तनुतेतरां मुखशतैरेत्याभिताया: श्रिय: प्राप्य त्यागकृतावमाननमपि त्वय्येव यस्या: स्थिति:॥४६३॥ हे हेलाजित बोधिसत्व, वचसां कि विस्तरैस्तोयधे, नारित त्वत्सहशः परः परहिताघाने गृहीतव्रतः।
भारप्रोद्वहने करोषि कृपया साहाय्यकं यन्मरो: ॥४६४॥
प्रभा-यहाँ पर एकमात्र अश्व मे होने वाली क्रिया (घास खाना) तथा संस्थान (पिछले चरसों को फैलाना आदि) का स्वाभाविक वणन किया गया है, अतएव स्वभावोक्ति अलद्धार है। अभिप्राय यह है कि किसी वस्तु के असाधारण धर्म का वणंन ही स्वभावोक्ति -अलद्धार होता है। अप्रनुवाद-(२५) व्याजस्तुति वह अलद्धार.है जहाँ आपाततः (मुखे) निन्दा या स्तुति (प्रकट होती है) तथा तात्पर्यतः (रुढिः) उसके विपरीत (स्तुति या निन्दा) प्रतीत होती है। (२५) (व्याजस्तुति पद का ही अथ है)-व्याजरूया स्तुतिः (प्रर्थात् स्तुति का फपट रूप, वस्तुतः निन्दा) अ्रथया व्याजेन स्तुतिः (अर्थात् निन्दा के बहाने स्तुति) । (सून्नोक्त) कम से उदाहरण ये हैं-[क-स्तुति के अ्रभिप्राय से निन्दा]-'हे राजन् मैं समभता हूँ कि (आश्रितों का) अनुरोध (स्वीफार करने) में शून्य हृदय वालों का शिरोमणि आापके प्र्प्रतिरिक्त अ्रन्य नहीं है तथा लक्ष्मी के प्रतिरिक्त लज्जाशून्य प्रन्यम्न नहीं दिखलाई देती; क्योंकि आप अनेकों उपायों द्वारा (मुसशतंः) आाफर पश्रित होने वाली लक्ष्मी का अ्रत्यधिक त्याग करते हैं और वह (लक्ष्मी) त्यागकृत भपमान को प्राप्त फरके भी आ्राप में ही स्थिर हो रही है (स्थितिः=स्थिरता)'॥४६३॥ [स-निन्दा के अभिप्राम से स्तुति]-'हे अनायास ही (दयाश्ञीस) बुद्ध को भी जोतने वाले जलधि, अधिक वाग्-विस्तार से वया? परोपकार व्रत को प्रहस. फरने वाला तेरे समान दूसरा कोई नहीं है; मयोंकि तुम प्यासे पधिकजनों के उपकार- सम्पादन में विमुस रहने के फारए प्राप्त हए अपपश के भार-वहुन में मस्त्यल की कृपा पूर्वक सहायता जो करते हो' ।४६४।
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x४४ 1 काव्पप कार:
(१७०) सा सहोक्ति: महार्थस्य बलादेकं द्विवाचकम् ॥११२॥ एकार्थाभिघायकमपि सहार्थवलात उभयस्याप्यबगमर्क सा सद्दोकि:। यथा- सह दिघद्दषिसाहिं दीहरा सासदएडा सह मणिवतयेहिं वाप्पधरा गलन्ति। तुह सुहृश चिश्ररोए तीअ उन्विग्रीए सद् क तरुल दाए दुध्बला जीविदासा ॥४६४॥ (सह दिवसनिशाभिर्दीर्घाः श्वासदणडाः संह मगिवलयैर्वाप्पघारा गलन्ति। प्रभा- (१) 'व्याजस्तुति' यह अन्वर्य संभा है। इनके उपयुक दो भर्ष होते हैं। यहाँ वृति में (प्रायः सभी उपनब्ध पुस्तकों में) व्याजरूपा व्याजेन वा.स्तुतिः' पाठ है। किन्तु सूभ के श्राम से 'व्याजेन व्याजरुपा वा स्तुतिः' पाठ उचित प्रत्ीत होता है। ये ही व्याजस्सुति के दो भेद है-स्तुतिपर्मवसामिनी निन्दा अपया निन्दापूविका व्याजस्वृति (व्याजेन स्तृतिः); जैमे-हित्वा' इत्यादि। यहा पर आापाततः राजा की ।शाशरितत्यागरुपा) निन्दा प्रतीत होती है, किन्तु (महादानी होने पर भी समृद्धिसाली होना रूप) सुति में तातयं है। त-निन्दापयंवसायिनी स्तुति अ्थवा स्तुतिपूर्विका निन्दा व्याजस्तुति (व्याजर्पा रतुतिः): जंगे 'हे हेताजित' इत्यादि। यहां पर भापततः सागर की स्तृति प्रनीत होती है, हिन्तु (प्ासे पधिकों का उपकार ने कदना रूप) निन्दा में तात्पर्य है। (२) व्याजस्तुति औौर प्रपस्तुतप्रमंग्रा-(गमानता) दोनों में माच्य सर्य से भिनन किमी दूमरे मर्थ की प्रतीति होती है, फित्तु (भेद) (i) दोनों मन क्षेत भिसन- भिन् है। पपत्तुप्रणंया में मारयं आदि से निमित शदि की प्रतीति होंने के कारस मेर होते हैं परन्तु व्याजस्तुति में निन्दा से रनृति या स्तुति से निन्दा की प्रयीति हो कर दो ही भेद होते है। (ii) कार्यक्रारसभाव आदि के दवागा पप्नस्तुत से प्रस्नुत को प्रतीनिमान में हो भप्रस्तुतप्रशंमा का समरकार निहित है किन्तु ध्याजस्तृति का विशेष चमरकार अ्रपस्तुत-निन्दा से प्रस्तृत-सुति आादि को प्रतीत में होता है। :' अनुर्षाद-(२६) 'सहोकि' यह गसदार है जहां एफ पर 'यह (साथ) संर्थं के सामप्य से दो भपों का बांधक होता है। (१७०) सर्थात् यहां एक दर्य का वाचक पद 'सह शब्द के अर्म-सामथ्यं से योनों धर्चों पा बोधफ होता है यह सहोति है। जैसे- [क्यू रमन्जरी में नामिकाविसहयॅन] 'हे सुन्वर, सुम्हारे विरह में ब्यापुा उस (नाविका) को सांस दिन-रात के साप इण्डाकार सब्ी हो रही है, उारो प्रथ-धारा र-पडूसों के साप गिर पड़ती है और बेदवाता के साथ-गाम कतसे जोवन की पाशा दुकार हो जाती है ।४६५।।
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दशम उल्लास: ५४५
।। 5: तव सुभगवियोगे तस्या उद्विग्नायाः सह च तनुलतया दुर्बला जीविताशा।४६५।
सामर्थ्यात्मतिपद्यते। श्वासदएडादिगतं दीघत्वादि शाब्दम् दिवसनिशादिर्गतं तु सहार्थे-
(१७१) विनोक्ति: सा विनाऽन्येन यत्रान्यः सन्न नेतरः । कवचिदशोभनः क्वचिच्छोभनः । क्रमेयोदाहरएम्- (क) अरुचिर्निशया बिना शशी शशना सापि विना महच्मः। उभयेन बिना मनोभवस्फुरितं नैव चकारित कामिनो: ॥४६६।। (ख) मृगलोचनया विना विचिन्नव्यवद्दारप्तिभाप्रभाप्रगल्भः । शर््रमृतद्य तिसुन्दराशयोऽयं सुहदा तेन बिना नरेन्द्रस्नु: ॥४६७॥ यहाँ 'इवास-दण्ड' आदि में 'दीर्घता' साक्षात् शब्द-द्वारा बोधित होती है; किन्तु 'दिवानिशा' आदि में तो 'सह' शब्द के अर्थ की सागर्भ्य से ही (दीर्घता) प्रतीत होती है। : प्रभा-'सहोकि' यह अन्वर्थ सज्ञा है-सहभावस्य (साहित्यस्य) उक्ति: सहोवितः । भाव यह है कि जहाँ 'सहयुक्ते रप्रधाने २/३/१६ इस पाणिनि सून्न से सहार्थ के योग में (अप्रधान अर्थ में) तृतीया विभक्ति होती है वहाँ यह अलङ्कार होता है। मोए तथा प्रधान रूप में रहने वाले दो पदार्थों का वहीं पर (शब्दार्थ की मर्मादा से) एक धर्म से सम्बन्य (साहित्य) हुआ करता है। जैसे 'पुन्रेण सह श्रागतः पिता' - इनमें पिता प्रधान है और पुत्र गौए है तथा दोनों का सह अर्थ क द्वारा आगमन किया से सम्बन्ध है। यहाँ गोण तथा प्रधान मे अ्रभेदाव्यवसाय हो जाता है। तृतीयान्त शब्द्र विनेषण (उपमान) होने से गोएा होता है तथा 'प्रथमान्त' विशेष्य (उपमेय) होने के कारण प्रवान होता है। उक्त धर्म का प्रथमान्त के साथ शाब्द (गब्दवोव्य) सम्बन्ध होता है और तृतीयान्त के साथ सहार्थ की साम्थ्य से (अर्थगम्य) सम्बन्ध होता है। ऊपर के उदाहरण में दोर्घता का 'श्वासदण्ड' से शाब्द सम्बन्ध है; किन्तु 'दिवानिना' यादि के साथ अर्थगम्य ही। अनुवाद-(२७) बिनोकि वह मलद्धार है जहाँ एक (अन्य) के बिना दूसरा न तो शोभन (सत्) घर ना ही अशोभन (इतरः) प्रतीत होता है। (१७१) थर्थात् (एक के बिना दूसरा) कहों तो () प्रशोभन (=सत् न) सोर फहीं (स) शोभन (=इतरः अर्थात् अ्सत् न) प्रतोत होता है। करगशः उदाहरण हैं- क-'राति के चिना चन्द्रमा जोभाहीन है. चन्दरमा के बिना वह (निशा) भी महान् पन्थकाररूपा चर्थात् शोभाहोन हे और इन दोनों के बिना कामिनी तथा फामी जनों की कामकोडा शोमित नहीं होती' I४ह६।। स-'यह राजपुत्र मृगनयनी (नामिका) के मिना अद्भृत व्ययहार की प्रतिभा के
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५४६ ] काव्यप्रकार:
(१७२) परिवृत्तिविनिमयो योऽ्र्याना स्यात्ससासमै: ॥११३॥ परिवृत्तिरलद्वारः। उदाहरणम्- (क) लतानामेतासामुदितफुसुमानां मरुदयं मतं लारयं दत्वा श्रयति भशमामोदमसमम। लतारंत्वद्ध्वन्यानामहह दरमादाय सइ्दसा
अ्रपन्न प्रथमेडर्घे समेन समस्य द्वितीये उत्तमेन न्यूनस्य। (ख) नानाविधपहरसैनृ प, संग्रहारे स्वीकृत्य दारुणनिनादंवतः प्रहारान्।
प्रदर्शन में चतुर (सोभन) हो रहा है तथा उस (दुष्टस्वभाय घाले) मिन्र के रिना चन्द्रमा के समान निर्मल (सुन्दर) ग्रम्करंसा थाता हो रहा है।।४१७। प्रभा-विनोपित का अर्थ है-'बिना' शब्द के अरयं की उवित। जहाँ फिसी के बिना किसी वस्तु की प्शोभनता सथवा शोभनता का वसंन किया जाता है यहा बिनोकि नामवअलंदार होता है। (क) श्शोभनता को उदाहरण है-'भरषि:' इत्यादि। यहाँ पर 'निया' मादि के बिना चन्द्रमा की प्रयोभनता का वहन किया गया है। (सं) शोभनता का उदाहरस है-'मृगलोचनया' इत्यादि। यहाँ किसी नायिका तथा मिंन के बिना राजपुत्र की (व्यवहारनियुगता तथा निमसासयता) शोभनता का प्रतिपादन किया गया है। अनुवाद-(२८) परिवृति यह ससद्दार है जहां समान या समान वस्तु के साथ पदार्थों का विनिमम (बदला) दिसाया जाता है। (१७२) 'परियति' (यह) असद्धार (का नाम) है [भर्यात् यहां 'परिवृति:' यह उद्देद्य है, शेप सक्षण है।। उदाहरए है- (क) यह वापु इन पुष्पयुकत सतायों को मनोहर लातम (नृत्य) देकर उनसे धनुपम (मसम) सुगन्धि को पहल करती है फौर ये सताएं तो पर्मिकों की दृष्टि को सहया सोघकर (पादाय-लेकर) उन्हें मनोवेदना, व्यादि, दिग्भ्रम, रोदन चौर मोद (निरचेष्टता) का सम्परु (व्यतिकर) देती है॥४८॥। यहां पर प्रथमार्थ में सम (सास्य) से उसके समान (घामोद) का तपा द्वितीय (पर्घंभाग) में उत्तम (दृष्टि) से उमकी अपेक्षा न्यून (भाषि-व्याधि मादि) का [मिनिमम वरिपत है]। (प) 'हे राजन्, सापके द्पशुक्त दधुवी रसमुदाप (विसर:) मे युद्ध में (संप्रहारे) मनेर प्रकार के सतप्न-शसपों के ममदूर रामपुक प्रहारों को पहसा करफे (सहकर) यह वमुमा मापरो पतिति को है, जिसने (पाप्के साथ) बियोपरहिन (कभो म टटने घाने) पातिज्ञन (परिषमभ) को रयोहर किया है (विधि.)' ।४Cदम
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दशम उल्लास: ५४७
त्त्र न्यूनेनोत्तमस्य। (१७३) प्रत्यक्षा इव यद्द्धावाः क्रियन्ते भूतभाविनः । तन्द्ाविकम्। भूताश्च भाविनश्चेति द्वन्द्वः। भावः कवेरभिप्रायोऽत्रास्तीति भावि- कमू। उदाहरएम्- आसीदुश्जनमत्रेति पश्यामि तब लोचने। भाविभूपएसम्भारां साक्षात्कुर्वे तवाकृतिम्॥५००॥ आद्य भूतस्य द्वितीये भाविनो दर्शनम। यहाँ पर (अनुपादेय होने के कारस) न्यून (महारों) से उत्तम (वसुन्घरा) का (विनिमय वशित है)। प्रभा-विनिमय का प्रर्थ है-किसी को एक वस्तु देकर उससे (बदल में) दूसरी वस्तु ले लेना। परिवृत्ि अलङ्गकार मे दान तथा आदान (विनिमय) कवि- कल्पित होता है, वास्तविक नहीं। इस प्रकार पदार्थों के कविकल्पित विनिमय के वन द्वारा जो अर्थ-वैचित्र्य होता है वह परिवृति अलङ्गार है। यह दो प्रकार का है-एक समपरिवृति अर्थात् समान वस्तु से सामान का विनिमय जैसे 'लतानाम् इत्यादि के पूर्वावं में है' यहाँ 'लास्य' से 'आमोद' का विनिमय वगित किया गया है। ये दोनों ही उपादेय हैं अतः समान हैं। दूसरी असमपरिवृति अर्थात् असमान वस्तु के साथ विनिमय। असमपरिवृति भी दो प्रकार की है-(i) कही तो उत्तम वस्तु से न्यून वस्तु का विनिमय; जैसे-लतानाम् इत्यादि'के उत्तरार्घ में हैं। यहां उत्तम दृष्टि से न्यून आधि-व्याधि का विनिमय वशित है। आधि-व्याधि इत्यादि अनुपादेय (अग्राह्य) होने से न्यून (निकृष्ट) हैं। (ii) कहीं न्यून से उत्तम का विनिमम; जसे 'नानाविधि' इत्यादि में 'प्रहार' से वमुन्वरा का विनिमय वखित है। 'प्रहार' अनुपादेय होने के कारण न्यून है। अनुवाद-(२६) भार्विक वह अलद्धार है जहाँ भूत तथा भविष्य फाल में होने वाले पदार्यों को प्रत्यक्ष (वर्तमान) के समान (धरित) किया जाता है (१७३) (कारिका में) 'भूत औौर भावी' इस प्रकार ('भूतभाविनः' में) द्वन्द्व समास है। भाव अर्थात् कवि का अभिप्राय (भूत तया भविष्य को वस्तु को प्रत्यक्ष रूप में वसंन को इच्छा) जिसमें रहता है, वह भाविक (कहलाता) है। उदाहरए यह है- 'हे प्रिये, क) इन (तुम्हारे) नेत्रों में जो काजल लगाया गया या उस (पूर्यकालीन काजल) से युक्त तुम्हारे नेत्रों को देखता हूँ मोर (स) भविष्य के (पहने जाने वाले) मलद्धारों से शोमित तुम्हारी वाकृति को प्रत्यदत: देख रहा हूँ'॥५००॥ यहाँ प्रथम (अर्घ) में पूर्वकालिक (काजल) का तथा द्वितीय (धर्प) में नसर- फालिक (भूकससंभार) का साक्षात्कार (वलित है)। -
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y४= ] काव्यप्रकारा:
(१७४) काव्यलिङ्गं हेतोर्ववयपदार्थता ॥११४।। (क) वाक्यार्थता यथां- वपुः प्रादुर्भावादनुमितमिद जन्मनि पुरा पुरारे, न प्रायः क्वचिदपि भवन्तं प्रशातवान्। नमन्मुक्त: सम्प्रत्यह्षमतनुरप्र अ्यनतिभाकू मछेश, क्षन्तव्यं तदिदमपराधद्वयमपि ॥५०१।। प्रभा-जहां कवि भावना के द्वारा सूछ और भविष्य के पदार्थों को प्रत्यस के समान दिसलाता है वहाँ भाविक अजक्वार होता है। यह दो प्रयाार का है- (का अतीत वस्तु का प्रत्यक्ष रूप में वर्णन तथा (स) भविष्य में होने वाली यस्तु का प्रत्यक्षरूप में बसन। 'भासीत् इत्यादि एक ही पद्य के पूर्वायं तथा उतरार्य में कमगः दोनों के उदाहरस हैं। अनुवाद-(३०) काव्यलिन्ज यह अलद्धार है जहाँ वाध्यार्थ या पदार्प के रूप में (किसी अनुपपस अर्थ का उपपादक) हेतु कहा जाता है। (।१४) प्रभा- (१) काव्यशास्त्र में धभिमत सिद्ध (काव्याभिमतं निन्हम) ही काव्यलिद्व है। यहां 'सिद्न' का धर्य हेतु है। इस प्रकार कधि-कत्पित म्प.के उपपादन के लिये हेतु-कथन ही कान्पति्ध अलद्वार है। यद हेतु-कपन तर्कशास से नितान्त भिन्न है और घमतकारोत्पादक होता है। काम्पलिस को ही हेत्वसद्वार सभा 'काव्यहेतु' भी कहा जाता है। (२)काय्यसिद् और सर्यान्तरन्यास-(समानता) दोनों मे ही श्रन्व भरग प्रस्तृत भर्य का समर्षक होता है। (भेद) (i) गायलिङ्ग में दोनों भर्प परूपर सापेक्ष होते हैं, एक के बिना दूगरे का भाव मली भाति नहीं समना जा सता। किन्तु भर्या्तरन्याम में दोनों सर्थ निरपेक्ष होते है, प्रत्येक सपने भर्य में पूर्छ होठा है। (ii) काय्यसिङ्ध भलद्वार में कारण के द्वारा कार्य का अमया पार्य के द्वारा पासा का सम्यन किया जाता है किन्तु मर्थान्तरन्यास में रमर्थ्य तथा राममेक मे सामान्य- विनेषभाव होता है। (उद्योत)। काय्यतिद्ध और सनुमान-का्यनिङ्ज में ध्याति आादि का निर्दद नहीं होता, अनुमान (भलद्ार) में होता है-वही दोनों का भेद है (उद्योत) मथवा याध्पतिद्त में फारक हृतु का कथन होता है, मगुमान में सामक हेतु पपही दोनों का प्तर हे (बमलाकरगट)। (१) यह हेतु वचन दो प्गार से सम्भव है। () एफ वो माशवार्यसत्र में, दूगरे पदार्य रूप में। (प) पदार्थ रप में भी कहीं तो सनेक पषों द्वारा इगना कपव होता है मौर पली (ग) एर पद दाग ह।एम प्ररार शर्मारत ममद्वार के तीव भर हो पाते है, जिनर्के सदाइरसा चमता निम्न प्रवार से ह- अनुवाद- (र.) हेतु की वारमायंता (पाशयामं द्वारा बोषित हुतु) रंगे-
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दैशंम उल्लांस:
(ख) अनेकपदार्थता; यथा- प्रसायिसखीसलील परिइ्यासर साधिगतै- 1 लंलितशिरीपपुष्पह्ननैरपि ताम्यति यत्। वघुषि वघाय तत्र तव शस्त्रमुपक्षिपतः
(ग) एकपदार्थता; यथा- पततु शिरस्यकाएडयमद्एड इवैप भुजः ॥५०२।।
भत्मोद्धूलन, भद्रमस्तु भवते रुद्राक्षमाले, शुभं हा सोपानपरम्परां गिरिसुताकान्तालयालङ कृतिम्। - अद्याराघनतोपितेन विभुना युष्मत्सपर्यासुखा- 1 लोकोच्छदिनि मोक्षनामनि महामोहे निधीयामहे॥५० ३॥। हे त्रिपुरशत्रो (शिव), इस शरीर की उत्पत्ति से ही मैंने यह अनुमान कर लिया है कि पूर्वजन्मों में कहीं भी मैंने आपको प्रशाम नहों किया। इस समय प्ापको प्रसाम करते हुए ही मैं मुक्त हो रहा हूँ; अतः शरीर-शून्य होकर भविष्य में भी प्रणतिरहित ही रहूँगा। हे महेश, मेरे इन दोनों अपराधों को क्षमा करना ॥५०१॥ प्रभा-यहां पर 'तदिदम्' शब्द से द्योतित पापविशेष (अपराघद्वय) का हेतु मनुभन (भगवान् को प्रसाम न करना) है। यह (अनमन) 'पुरा वर्वचिदषि नाहं भवन्तं प्रणतवान्' तथा 'अप क्हमनतिभाक' इन दोनों अवान्तर वाक्यों का अ्र्थ है अरतः हेतु को वाक्यार्थरूपता है तथा काव्यलिङ्ग अलद्दार है। अनुवाद्-(स) हेतु की अनेकपदार्यता (प्रनेक पदों द्वारा बोषित हेवु); जैसे-['मालती-माधव' में मालती के बघ के लिये उद्यत पघोरघण्ट के प्रति माधव की उक्ति]-'प्रेमपुर्ण ससियों के लोलापूर्वक परिहास में होने वाले, कोमल, शिरीप- फुसुमों के प्रहार से भी जो शरीर पीड़ित हो जाता है उस (मालती के) शरीर पर वध के लिये शस्त्र प्रहार करने वाले तुम्हारे शिर पर पसाममिक यमदण्ड के समान यह मेरी (भयंकर) भुजा प्रहार करे' ॥५०२॥। · प्रभा-यहाँ आघोरघण्ट के द्वारा मालती पर शस्त्र-प्रहार करना ही अघोर- घण्ट के सिर पर (माधव के) प्रहार का हेतु है। 'वपुषि' रस्तमृत्किषिपतः' इन अनेक पदों के द्वारा इस हेतु का कथन किया गया है। मुख्य करिया में साकांक्ष होने से यह शब्द-समुदाय वाक्य नहीं कहला सकता, अतएब यहाँ अनेकपदार्थ-बोधित काव्यलिङ्ग है। अनुवाद्-(ग) हेतु की एकपदार्थता (एक पद द्वारा बोधित हेतु); जसे- [शिव को कृपा से तत्त्वज्ञान प्राप्त करने वाले भक्त की उक्ति]-'हे भस्मलेपन पापका कल्याए हो; हे रद्राक्षमाले, तुग्हारा घुभ हो; हाय पार्वतीप्रिय शिव के मासाद को सोभा रूप सोपान-पंकति! (भर्भात् तुम्हारे वियोग का भुझे शोक है)
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५५० j काव्यप्रकोरो:
एपु अपरपराघद्वये पूर्वापरजन्मनोरनमनम्, भुजपाते शस्त्रोपक्षेप:, महामोहे सुसालोकोच्छेदित्वं च यथाक्रममुक्तरूपो हेतु:। (१७५) पर्यायोक्तं विना वाच्यवाचकत्वेन यह्च: । वाच्यवाचकभावव्य तिरिक्तेनाव गमनंव्याप।रेग यत्प्रतिपादनं तत्प- र्यािए भङ्गयन्तरेण कथनात्पर्याचोकतम्। उदाहरगाम- यं प्रेक्ष्य चिररूढाऽपि निवासमीतिरुज्मिता। मदेनैरावसमुखे मानेन हदये इरेः॥०४॥ अत्रैरावमशकी मदमानमुक्ती जातांविति व्यङ्गयमपि शव्देनोच्चते। तेन यदेवोच्यते तदेव वयडग्यम्। यथा तु व्यद्गयन्न तथोच्यते। यथा गदि शुवले चलति टप्टे गौः शुक्लशचलति इति विकल्पः। यदेव हप्टं तदेव विकल्पयति नें तु यथा दष्टं तथा। यतोऽभिन्नासंसृष्टत्वेन द्ष्टं भेदसंसर्गा भ्यां विकल्पयति। हमें तो आाज आराधना से प्रसन्न शिव ने तुम सबके आानन्द के प्रफाश को उव्छिन्न कर बेने वाले मोक्ष नामक महामोह में डाल दिया है' ।५०३॥ 1 प्रभा-यहाँ पर मोक्ष को 'महामोह' महा गया है उसका हेतु है 'मुरााससोद़ या उच्छेद करना' (मुसालोकोच्छेदित्वम्) । यह समस्तपद होने से एकपदस्प ही है। अतएब यहां एकपदार्थवोचित काव्यलिस अलद्धार है। अ्रनुवाद-इन (ऊपर के उदाहरखों) में (क) सपराधद्य में पूर्व तमा पपर (भाषी) जन्म में प्रशाम न करना, (ता) भुजपात में सस्त्र-प्रहार तथा (ग) महामोह में सुस के प्रकाश को नष्ट करना-(ये 'तीनों) धमतः उपयुंक्त एव में हेदु हैं। [इनरा ममास्थान प्रतिपादन किया जा चुफा है]। अनुवाद-(३१) पर्यायोक्त यह अलद्वार है जहां वा्यवाचकभाव सम्बन्ध के मिना ही (याच्यायं फा) प्रतिपादन (पचः) होता है। (१७५) जो याच्य-पाचकभाय से भिन्न अवगमन सर्यात् व्यम्जना नामक ध्यापार के द्वारा वाषयायं का बोधन है, यह पर्याय पर्यात् प्रकाशन्तर से (वाच्चानं के) प्रति- पाइन के कारए पर्यादोक (बादार) फहलाता है। उदाहरस-निग (रावर या हयप्रोन) को देसकर मद ने ऐरायत के मुस में ता सभिमान मे इष्ट (हुरि) के दशय में चिरकास से स्यित (पुष्ट) निवास की प्रीति को सोड़ दिना ।४०४॥।' यहां पर ऐरावत और इन्द्र (दोनों) मद तथा भभिमान से मुर हो गये ऐसा व्यसप भप भी शम्द के द्वारा (पभिया पूति से) प्रतिपादित किया गया है। पतः जो वास्य (वर्ष) है (उ्पते=भभिपया प्रतिपाधते) यही व्यमुप धर्म भी है हिन्तु जिस प्रकार से व्वं्जना द्वारा प्रतीत होता है (प्यसपम) कस प्रकार से (तस हारा) बाध्य नहीं है। मैमे गौ (गोसम) शुर्ममुस सपा पलन किना (दौर इनके)
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दशम उल्लास: i ५५१ 4444 माथवरूप गोव्यक्ति) फा (निर्विकल्पक) ज्ञान हो जाने पर (दृप्टे) 'इवेत रङ्डवाली गाम चलती है' ऐसा विशिष्टज्ञान (विकल्प :- सविकत्पकज्ञान) होता है। यहाँ पर जो पहले (निर्विकल्पक द्वारा) जाना गया था (कोई प्रमाता) उसको ही सविकल्पक ज्ञान से जानता है (विकल्पयति); किन्तु जिस प्रकार से (निर्विकल्पक के समय) देखा गया था उसी प्रकार से नहीं; क्योंकि (निर्विकल्पक में) भेद-रहित तथा ससर्गरहित रूप में देखी गई वस्तु को (अतद्व्यावृत्ति रूप) भेद तथा (विशे्य-विशेषण रूप) संसर्ग से विशिष्ट कर देता है। प्रभा-(१) 'पर्याय का अर्थ है-प्रकार। विवक्षित (वाच्य) अर्थ का प्रकारान्तर अर्थात् व्यञ्जनावृत्ति द्वारा कथन ही पर्यायोक्त अलद्धार है। यहाँ जो अर्थ अभिधावृत्ति द्वारा कहना होता है वही व्यञ्जनावृत्ति द्वारा प्रतीत हुआ करता है; किन्तु दोनों के प्रकार में अन्तर होता है; जैसे हमे कहना है- 'यहाँ आइये' (अनागम्यताम्) । इसे प्रकारान्वर से कह दिया जाता है-आगमनेन अलङ्टिकयताम् इदम्'। इस प्रकार के कथन से उक्ति-वचित्र्य हो जाता है। इसी प्रकार 'यं प्रेक्ष्य' इत्यादि उदाहरण में एक ही अर्थं-ऐरावत और इन्द्र मदमान से मुक्त हो गये'-इस प्रकार व्यञ्जना द्वारा प्रतीत होता है किन्तु 'मद और मान ने ऐरावत के मुख तभा इन्द्र के हृदय में रहने का प्रेम छोड़ दिया'-इस प्रकार अभिघावृत्ति द्वारा कहा गया है। प्रकारान्तर से कथन होने के कारण यह चमत्कारजनक होता है, दोषावह नही। यहाँ प्रश्न हो सकता है कि एक ही अर्थ वाच्य और व्यङ्गघ कसे हो सकता है ? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए ग्रन्थकार न्याय-वैशेपिक और बौद्ध की प्रत्यक्ष-प्रत्रिया का उदाहरण देते हैं। भाव यह है कि व्यावहारिक जीवन में भी एक प्रकार से अवगत अर्थ को प्रकारान्तर द्वारा प्रतीति हुआ करती है। यहाँ न्याय- वैशेपिक और बौद्ध के प्रत्यक्ष-विषयक मत-भेद को प्रकट करने के लिये भेद और संसगं दो शब्दों का ब्रहण किया गया है। भेद का अर्थ है-अन्यवस्तुओ्रों से भेद= पतद्व्यावृत्ति। संसर्ग का अर्थ है-सम्बन्ध-विशेष्य-विशेषणभाव सम्बन्ध। न्याय- वैशेषिक आदि के अनुसार इन्द्रिय और अर्थ के संनिकरष (संयोग आादि) से वस्तु(प्रर्थ) फा प्रत्यक्ष होता है। यह प्रत्यक्ष दो प्रकार का है-एक निर्विकल्पक और दूसरा सवि- कल्पक। प्रथमतः गाय, सुक्लगुण तथा चलन किया अदि का 'यह कुछ है' (इदं किञ्चित्) इस रूप में प्रत्यक्ष किया जाता है, यह निर्विकल्पक प्रत्यक्ष है, अर्थात् इसमें गोत्व, दुक्ल, तथा चलन करिया आदि की असम्बद्ध (असंसृप्ट) प्रतीति हुआ करती है; निष्प्रकारक या विरोष्यविशेषसाभावरहित ज्ञान होता है 1: इसके पश्चात् 'यह युक्त गाय चलती हैं' इस प्रकार का विनिष्ट प्रत्यक्ष होता है, यह सविकल्पक ज्ञान है। इसमें निविकल्पक द्वारा गृहीत वस्तु को संसर्ग से विनिष्ट कर दिया जाता है। वौद्दर्शन की ज्ञान-विवेचना के अनुमार नेभ इत्यादि इन्द्रिय मोर गो व्यक्ति के ससिक सान्निष्य से जो गो का आभान होता है, वही निर्विकत्पक
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५५२ काव्यप्रकारी:
जान है, वही वस्तुतः प्रत्यक्ष है, जिसे यहाँ दर्गन (इप्टम्) कहा गया है। उस निषि- कल्पक ज्ञान (प्रत्यक्ष) मे गौव्यक्ति का अरत यदि से मेद (भहदम्यावृत्ति) नही भासित होता। उस निविकत्पक ज्ञान के अनन्तर नाम, जाति आदि"की योजना (=कल्पना) के साथ 'यह गौ है' इस प्कार का ज्ञान होता है, जिसे"बौद प्रत्यस ज्ञान नहीं मानता अपितु परत्यक्ष पृष्ठभावी सविकत्पक ज्ञान या विकल्प कहता है। उस स्विकत्पक ज्ञान में गौ का अ्रस्य आदि से भेद (प्रतद्पावृत्ति) भी भासित होता है। यह भेद या अतद्व्यावृत्ति परमायसत् चस्तु से भिन्न फोई वास्तविक वस्त नहीं है अपित फल्पित ही है। इस प्रकार निविकत्पक प्रत्यक्ष तथा सवित्पक ज्ञान का विषव वस्तुतः एक ही होता है। दोनों ज्ञानों में उसी का प्रकारां्वर से भान हुमा करता है। दगी प्रकार पर्यायोक मलद्वार में भी वाच्य और जज्जय धर्य बरतृतः एक ही होता है, उसी का प्रकारान्तर से प्रतिपादन किया जाता है। (२) पर्यामोक्त तथा ध्यनि-दोनों में वाज्य तपा व्यङ्तम दो प्रकार के वर्थ होे है किन्तु पर्थायोक्त में व्वस्गभ और वाब्य दोनों प्रकार का अथ तात्पर्पतः एक ही होअ है, केवल उसको मजजपन्तर से कह दिया जाता है। इसके विपरीत ध्वनि में से दोनों अयं पृथक पृथक होते है। (ii) पर्यायोक मे बाच्य सघ, जो कि भन्नन्तर'से कहषा जाता है, धिक चमत्कारजनक होता है, व्पसुप अर्प पत्यन्त सघुट होता है तथा उसना चमरकारक नहीं होता। किन्तु ध्यनन में वास् की अपेक्षा स्वसध हो प्रपिर धमरकारक हुआ करता है। पर्यायोष्त औौर मपस्तुतप्रदांस्षा-पद्यपि पर्यावोक मनार मनसूवरय के कारे प्रस्तुसे कायस्प चकिति: (गजन् राजगुता)' इस भेद के समान दी पतीठ होता है फिर भी दोनों में मेद है-आयुक भवस्तृतप्रगंगा में कारण प्ररतृत कोत्रा है औोर काम पपस्तुत । किन्तु पर्यायोक में मारस के सामनाथ मार्य भी प्रसृत होत है। कारया का कथने न करके केवल नार्य का पन तो इगलिगे किया जाता है कयोंकि उसरे समांन में ही विनेष नमत्सार हमा करता है।. विश्यनाय का मरा है कि 'राजन्, रजमुगा' इत्यादि में कार मोर-बादं दोनों प्रस्तुत है मोर महाँ प्रमग्तृनप्रमंगा नहीं, मपितु पर्वादोक सवदुार ही ह। -
टिप्क्लो-परलिोत पाद्ार का ममपुर्यारी तमा अविवादी मनी * माबदों ने बिस्वार से नियेयन किया है। इसके रल् का हो प्रकार में निर्ईश किना गया है एक तो-विषक्षित पर्प का वाम्पवापयुनि के धनिरिक स्जनामृति (समपमन) द्वारा प्रतिपादननंगे-मापाय उन्जट शी उशव रै-वर्मापोश्न परसेन
मंभट् ४६): दूगर-गगृवव सर्भ का आारागर मे सभिधान, भे सच्वार गवं
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देशंमी उल्लस: ५५ ३
(१७६) उदाततं वस्तुनः सम्पत् ।' सम्पत् समृद्धियोग: यथा- 4 मुक्ता: केलिविसूत्रहारगलिता: सम्मार्जनीभिर्हताः प्रातः प्राङ्मणसीम्नि मन्थरचलद्वालांपिलाच्षारुणा: । दूराद्दाडिम बीजशङ्कितधिय: कर्पन्ति केलीशुकाः यद्विद्वङ्गवनेपु भोजनृपतेर्तत् त्यागलीलायितम् ।५०५/। (१७७) महतां चोपलक्षराम् ॥११५। उपलक्षएामङ्गभावः अर्थादुपलक्षसीयेऽ्ये। उदाहरएम्- तदिदमरएयं यस्मिन्दशरथवचनानुपालनव्यसनी। निवसन् वाहुसहायश्चकार रक्षक्षय रामः ॥०६॥
स्वकार का काथन है-'गम्यस्यापि भख्जचनतरेशाभिधानं पर्यायोकतम्। यद्यपि तात्पर्यतः दोनों को एक भी कहा जा सकता है तथापि विचारणीय यह है कि जब ध्वनिवादी आवार्य अभिनवगुप्त ने द्वितीय प्रकार को ही अपनाया था-अतएव पर्याेए प्रकारन्तरेश अवगमात्मना उयङ्भ्येनोपलक्षित सद्यवभिघीयते तदभिधीयमा- नमुष्तमेव सत पर्यायोक्तमेवामिधीयते इति (ध्यन्यालोकलोचन) तथा बाद में रसवादी कविराज विश्वनाथ ने भी इसी को अपनाया-पर्यायोक्तं यदा भड्वा गम्यमेपाभिधीयते (सा० द० १०-०६०) तब आचार्य मम्मट ने प्राचीन आ्लङ्गारिकों के लक्षए को कयों महत्त्व दिया ? अनुवाद-(३२) [प्रथम]-उदात्त अलद्धार वह है जहाँ किसी वस्तु (धन शौर्य आदि) की (असम्भावित) समृद्धि का बणने होता है। (१७६) T4 : 'सम्पत्' अरथात् वस्तु का समृद्धि से सम्बन्ध दिखलाना [इस प्रकार सम्बन्धा- विशयोक्ति इस अलद्धार की अ्रनुपालिका है-उद्योन]। जँसे-'जो विद्वानों के भवनों में-रतिकोडा में टूटी हुई मुक्तामाला से गिरे हुए भोती भाड़ू से बुहार दिये जाते हैं और प्रातःफाल भ्रांगन में मन्द-मन्द चलती हुई युवतियों के चरणालक्तक से कुछ लाल (अस्स) हो जाते हैं तथा पनार के दानों को सद्दा फरने वाले (शङ्- किता घी: येपां ते) फीडा के लिए पाले गये खुकु जन्हें सींचने लगते हैं-वह सब महाराज भोज के दान को हो लीला है ।५0 ५। : [द्वितीय] 'औौर (उदात्त अलद्धार वह भी है) जहां (किसी वशनीय अर्य में) उदारचरितों का श्रद्भरूप में वर्सन किया जाता है (उपलक्षराम्) (१७७) उपलक्षसा का अर्थ है-पद्भरूप होना अर्थात् मुस्यरूप से वसांनीप (उपल- क्षरोय) वस्तु में भ्रङ्गरूप से वरणन। उदाहरण है-[पुष्पक िमान में स्थित लद््मा को शङ्भद के प्रति उक्ति-उद्योत]-'यह वह परण्य (दण्डकारण्य) है जहाँ पर .. महाराज दद्रय के वचन-पालन में तत्पर राम ने निवास करते हुए केवल भुजाओं
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५५२ j काव्यप्रकाश:
ज्ञान है, वही वस्तुतः प्रत्यक्ष है, जिसे यहाँ दर्शन (हप्टम्) कहा गया है। उस निवि- कल्पक ज्ञान (प्रत्यक्ष) में गौ व्यक्ति का अश्व आदि से भेद (प्रतद्व्यावृत्ति) नहीं भासित होता। उस निर्विकल्पक ज्ञान के अनन्तर नाम,' जाति आदि को योजना (-कल्पना) के साथ 'यह गौ है' इस प्रकार का ज्ञान होता है, जिसे बौद्ध 'प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं मानता अपितु प्रत्यक्ष-पृष्ठभावी सविकल्पक ज्ञान या 'विकल्प कहता है। उस सविकल्पक ज्ञान में गो का अव आदि से भेद (अतद्व्यावृत्ति) भी भासितं होता है। यह भेद या अतद्व्यावृत्ति परमार्थसत् वस्तु से भिन्न कोई वास्तविक चस्तु नही है अपित् कल्पित ही है। इस प्रकार निर्विकल्पक प्रत्यक्ष तथा सविकल्पक ज्ञान का विषय वस्तुतः एक ही होता है। दोनों ज्ञानों में उसी का प्रकारान्तर से भान हुआ करता है। इसी प्रकार पर्यायोक्त अलद्धार में भी वाच्य और व्ङ्गय अथं वस्तुतः एक ही होता है, उसी का प्रकारान्तर से प्रतिपादन किया जाता है। (२) पर्यायोक्त तथा ध्यनि-दोनों में वाच्य तथा व्यसगथ दो प्रकार के अर्य होते हैं किन्तु पर्यामोकत में व्यङ्चष और वाच्य दोनों प्रकार का अरथ तात्पर्यतः एक हो होता है, केवल उसको भल्जमन्तर से कह दिया जाता है। इसके विपरीत ध्वमि में वे दोनों अर्थ पृथक-पृथक् होते हैं।-(ii) पर्यायोक्त में जाच्य अरथ, जो कि मस्जमन्तर'से कहा जाता है, अधिक चमतकारजनक होता है, व्यङ्गय अर्थ अत्यना स्फुट 'होता है तथा उतना चमतकारक नहीं होता। किन्तु ध्व्नि में वाच्य की अपेक्षा व्यङ्नंय ही अधिक चमत्कारक हुआ करता है। पर्यायोक्त और अप्रस्तुतप्नवंता-यद्यर्पि पर्यायोक्त अलद्वार अ्रपस्तुतप्रपंसषा के कारसे प्रस्तुते कार्यस्य उवितः (राजन् राजगुता)' इस भेद के समान ही प्रवीत होता है फिर भी दोनों मे भेद है-उपयु क्त अप्रस्तुतप्रशंसा मे कारण प्रस्तुत होता है औौर कार्य अप्नस्तुत । किन्तु पर्यायोक्त मे कारण के साथ-साथ कार्य भी प्रस्तुत होता है। कारगा का कथन न करके केवत कार्य का नहन तो इसलिये किया जाता है क्योंकि उसके बशंग में ही विशेष चमत्कार हुआ करता है। विश्वनाथ का मत है कि 'राजन्, राजमुता' इत्यादि में कारण औरकायं दोनो प्रस्तुत हैं और यहाँ अप्स्नृतपशंसा नहीं, अपितु पर्यायोक मलद्वार ही है। टिप्प्सी-पर्यायोकत अतङ्गारका अलङ्वारवादी तथा ध्वनिवादी सभी आायायों ने विस्तार से निवेनन किया है। इसके स्वरूप का दो प्रकार से निर्दरे किया गया है एक तो-'विवक्षित भर्यं का वाच्यवाचरवृति के प्रतिरिक्त व्यम्गनावृति (भवगमन) द्वारा प्रतिपादन'-जैरे-पाचार्य उन्ट की उविन है-पर्मापोश्ं मदम्देन
संगरह ४६)। दूगरे-'गम्प अर्थ या प्रवारान्तर से मभिधान; जैमे भलद्वार सवे
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दशंम उल्लास:
(१७६) उदात्तं वस्तुनः सम्पत् । ' सम्पत् समृद्धियोग: यथा- L मुक्ता: केलिविसूत्रहारगलिता: सम्मार्जनीभिहताः प्रातः प्राङ्गएसीम्नि मन्थरचलद्वालांमिला च्षा रुखाः। दूरादाडिमबीजशद्ितघिय: कर्पन्ति केलीशुकाः यद्विद्वङ्गवनेपु भोजनृपतेस्तत् त्यागलीलायितम् ॥५०५॥ (१७७) महतां चोपलक्षम् ॥११५।। उपलक्षएामङ्गभावः अर्ादुपलक्षसीयेऽ्ये। बदाहरसम्- - तदिद्मरएयं यस्मिन्दशरथवचनानुपालनव्यसनी। निवसन् वाहुसहदायइचकार रक्षःक्षयं राम: ।।५०६।। स्वकारका कथन है-गम्यस्यावि भङ्गघनतरेशाभिधानं पर्यायोकतम्। यद्यपि तात्पर्यतः दोनों को एक भी कहा जा सकता है तथापि विचारणीय यह है कि जब ध्वनिवादी यचार्य अरभिनवगुप्त ने द्वितीय प्रकार को ही अपनाया था-'प्रेतएव पर्यापेश प्रकारान्तरेश अवगमात्मना व्यङ्भमनोपलक्षितं सद्यदभिघीयते तदभिघीयमा- नमुक्तमेव सत् पर्यायोकतमेवाभिधीयते इति (घ्वन्यालोकलोचन) तथा बाद में रसवादी कविराज विश्वनाथ ने भी इसी को अपनाया-पर्यायोकतं यदा भडवा गम्यमेपाभिधीयते (सा० द० .१०-०६०) तब आचार्य मम्मट ने प्राचीन आलङ्कारिकों के लक्षस को कयों महत्त्व दिया ? अनुवाद-(३२) [प्रथम]-उदात्त अलद्धार वह है जहाँ किसी वस्तु (धन शौर्य आदि) की (असम्भावित) समृद्धि का वर्णन होता है। (१७६) 'सम्पत' अर्थात् वस्तु का समृद्धि से सम्बन्ध दिखलाना [इस प्रकार सम्बन्धा- तिशयोक्ति इस अलद्धार को अ्रनुपाशिका है-उद्योन]। जैसे-'जो विद्वानों के भयनों में-रतिकोडा में टूटी हुई मुक्तामाला से गिरे हुए मोती भाडू से बुहार दिये जाते हैं और प्रातःफाल ्शांगन में मन्द-मन्द चलती हुरद युवतियों के चरालकतक - से कुछ लाल (अरस) हो जाते हैं तथा पनार के दानों की शङ्दा करने वाले (शङ्- किता धी: येयां ते) कोडा के लिए पाले गये शुरु जन्हें सींचने लगते हैं-वह सब महाराज भोज के दान की ही लोला है॥५० ४।। [द्वितीय] 'और (उदात्त अलङ्धार यह भी है) जहाँ (किसी वसनीय भ्रर्य में) उदारचरितों का अ्द्भरूप में वणंन किया जाता है (उपलक्षसम्) (१७७) उपलक्षस का अर्थ है-पङ्गस्प होना सर्थात् मुश्यरूप से वसंनीय (उपस- क्षखीय) वस्तु में ध्ङ्गरूप से चणन। उदाहरस है-[पुष्पक विमान में स्थित सक्मए को पङ्भदके प्रति उक्ति-उद्योत]-'यह यह प्ररण्य (दण्डकारण्य) है जहाँ पर .. महाराज दशरय के वचन-पालन में तत्पर राम ने निवास करते हुए देवल भुगाओों +
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५४ j कान्यप्रकारी:
न चात्र वीररस:, तर्येहादत्वात्। (१७८) तत्सिद्धिहेतावेकस्मिन् यत्रान्यत्तत्करं भवेत् समुच्चयोडसो, को सहायता युक्त होकर (अकेले ही) राक्षसों (खरदूपण आदि) का विनाश किया था' ॥५० ६।।
यंन) का भ्रङ्ग है। यहाँ पर वीररस (व्यडच, ध्वनि) नहीं है; मयोंकि वह तो यहां (भरण्य-
प्रभा-(१) 'उदात्त' अलद्धार दो प्रकार का होता है। प्रथम तो वहा जहां, किसी वस्तु की असम्भावित (अलीकिक) समृद्धि का वणन किया जाया करता है। जैसे-'मुक्ता;' इत्यादि में विद्वानों के भवन की धन-समुद्धि का वसंन किया गया है जिससे वणनीय भोजनुपति की समुद्धि का अतिशय अभिव्यक्त होता है। यहाँ. सम्बन्धातिशयोक्ति इस उदात्त अलद्गार का पोपस करती है। द्वितीय प्रकार का 'उदात्त' अलद्गार यहां होता है जहाँ वणानीय वस्तु के उपकारक रूप में महापुरुषों का चरित-वर्णन किया जाता है। जसे-'तदिदम्' इत्यादि में राम का वर्णन (वणनीय) दण्डकारण्य के उत्कर्ष की प्रतीति कराता है 'ऐसे राम ने जहां निवास किया'-इस रूप में अ्रण्य की महत्ता प्रतीत होती है। जैसा कि मल्लिनाथ (विद्याघरकृत 'एकावलि' पर 'तरल' टीका में) ने बतलाया है, इसमें से प्रथम उदात्त में उदात्त ऐश्वर्य के साथ सम्वन्व का वर्णन होता है द्वितीय उदात्त में वर्णनीय वस्तु से उदात्त पुरुप के चरित के सम्बन्ध का बहॅन होता है। प्रतः वस्तुतः ये दोनों भिन भिनन अलद्धार हैं। केवल शब्द-साम्म से एक कह दिया गया है। (२) उदात्त, स्वभावोकि औौर भाविक-सभी में वस्तुओं के पिसी स्वरूप का यएंन किया जाता है तथापि स्वभावोकि और भाषिक में तो वस्तुओं का यचावत् बरन होता है किन्तु उदात्त में वस्तुओ की कवि-कल्पित असम्भावित समृद्धि का बरंन होता है। . (३) न यात्र ीरो रस .- 'तदिदम्' आदि में 'केवल भुजबल से रादसों का दय करना'-यह वीर रस के अनुभाव की बसना है इस प्रकार यहाँ यीर रस ध्वनि होनी चाहिए चित्रकाव्प नहीं-यह संका होती है। इसका समाधान है कि यहाँ 'प्ररण्य' वणनीय है। राम के उत्साह का वगान उसका सस्ज होकर भाया है भतः 'प्राधान्येन वयपदेशा: भवन्ति' इस न्नाय के धनुरर इसे वीररसध्वान नही कह सफते अमि तु चित्रफाव्य ही कहना उचित है। अ्रनुवाद-(२३) समुच्चय वह धतद्धार है जहां प्रस्तुत कारय (तत) को सिद्धि के एक सामक के रहते, धन्य कारस (अन्मतृ=सापफाग्तराशि) का भी होना कहा जाता है।
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दशमे उल्लास:
तस्य प्रस्तुतस्य कार्यस्य एकस्मिन्साघके स्थिते साघकान्तराणि यत्र सम्भवन्ति स समुच्चयः। उदाहरणम- दुर्वारा: स्मरमार्गणा: प्रियतमो दूरे मनोऽत्युतसुकं गाढं प्रेम नवं वयोऽतिकठिना: प्राणा: फुलं निर्म्मलम्। स्त्रीत्व धैर्यविरोधि मन्मथसुहृत् काल: कृतान्तोऽकमो नो सख्यश्चतुरा कथन्नु विरह: सोढव्य इत्थं शठः ॥५०७।। अ्रत्र विरहासहत्वं स्मरमागेणा एव फुर्वन्ति तदुपरि प्रियतमदूर- स्थित्यादि उपात्तम। एप एव समुच्चय: सययोगेऽसद्योगे सदसद्योगे च पर्यवस्यतीति न पृथक लक्ष्यते। सथाहि- कुलममलिन भद्रा मृतिर्मति: श्रुतिशालिनी भुजवलमलं रफीता लक्ष्मी: प्रभुत्वमखसिडितम। अर्थात् जिस अलद्धार में (यध) उस प्रस्तुत फार्य के एक साधक के स्थित होने पर (तत्सिद्धिहेतो एकस्मिन् ) अन्य साधकों (अन्यत्=साधकान्तराखि) फा कथन किया जाता है (संभवन्ति=अभिघीयन्ते) वह 'समुच्चय' कहलाता है।. उदा- हरस-[किसी विरहिली को दंव के प्रति उक्ति]-'काम के बास का निवारस करना कठिन है, फिर न्वियतम दवूर है, मन पत्यन्त उत्सुक है, गाढ प्रेम है, नवीन वीवन है, प्रास अत्यन्त फठोर हैं, कुल पवित्र है, स्त्री होना ध्यं धारस में वाघक है, यह समय (यसन्त) रगमदेव का सहायक है, यमराज भी प्रास हरने में समर्थ नहीं (प्रक्षमः), सर्सियाँ (नायक से मिलाने में) चतुर नहीं हैं-इस प्रकार यह मर्म- भेदी (प्रठ.) विरह फैसे सहा जाय ?'।४०७।। यहाँ पर फाम के चाए (फारख) ही विरह को शप्रहय (कार्य) बना देते हैं औौर ऊपर से 'प्रिमतमदूरस्थिति' आदि (अ्रनेक कारणों का) ग्रहण किया गया है।' प्रभा-(१) जहाँ एक हेतु से कार्य-सिद्धि हो सकने पर भी खलेकपोत (खलि हान में एक साथ दाना चुगने के लिए गिरने वाले कवूतरों की भाँति) न्याय से सनेक कारणों का वर्णन किया जाता है वहाँ समुच्चय अलङ्वार होता है। (२) समुच्चय यथा काव्यलिन्ग-समुच्चय में कार्य करने में समर्य हेतुमं का मह्भाव होता है; काव्यलिङ्ग मे तो हेतुमात्र का कथन होता है वहाँ हेतुओं का गुण- प्रधान भाव या एकत्व-अनेकत्व का विचार नहीं होता। अ्रनुवाद्-यह (उक्तलक्षणः) समुच्चय ही-('रटट' आदि निदिष्ट) (क) सद्योग अर्यात् शोभन यस्तुओं के समुच्चय (Combination) में (ए)-मसदयोग पर्थात प्रशोभन वस्वुओं के योग में तथा (ग) सदसद्योग अर्यात् शोभन और सशोभन वस्तुओं के योग में-घदित होता है। इसलिये यहाँ (सद्योगसमुच्चय आदि रूप से) पृषक-पृथक् सक्षणा नहं किया गया; जैसे कि-
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५५६ j कांव्यप्रकांग:
प्रकृतिसुभगा ह्योते भावा अमीभिरयं जनो व्रजति सुतरां दर्प राजन, त एव तवाड्कुशा: ।५०८॥' अप्रत्र सतां योगः । उक्तोदाहरसे त्वसतां योग:। शशी दिवसधूसरो गलितयौवना कामिनी सरो विगतवारिज़ं मुखमनक्तरं स्वाकृतेः। प्रभुर्धनपरायएः सततदुर्गतः सज्जनो नृपाङ्गगागतः खलो मनसि सप्त शल्यानि मे ॥५०६॥ श्रत्र शशिनि धूसरे शल्ये शल्यान्तराणीति शोभनाशोभनयोग:।
(क) 'हे राजन्, निर्मल कुल, शोभन आकृति, वेदाभ्यास से शोभित सुद्धि, पर्याप्त बाहु-बल, समृद्धा लक्ष्मी, अ्कुष्ठित प्रभुता-ये पदार्थ स्वभाय से ही सुन्दर हैं। इनके द्वारा यह मनुष्य अ्त्यन्त गर्व को प्राप्त हो जाता है; किन्तु मे ही (पदार्थ) आापके लिये तो विनय के हेतु (शंकुश्ाः) है॥५०5॥l यहाँ पर (कुलनिर्मलता आदि) शोभन कारलों का समुच्चय है। (स) उप- युंक्त (बुर्वाराः आदि) उदाहरस में तो पशोभनों (फाम-बाए आादि) का समुच्चय है। (ग)-[नीतिशतक के पंद्य में] 'दिवस में धुधला चन्द्रमा, दलते हुए योवन वाली सुन्दरो, फमलहीन सरोवर, सुन्दर आाकृति वाले व्यक्ति का विद्याहीन मुख, धन फा. लोभी स्वामी, निरन्तर दरिद्र (दुगतः) सज्जन, राजप्रासाद में उपस्थित दुप्ट- जन-ये सात मेरे मन में शल्य (वाए का अग्रभाग पर्थात् चुभने याले) हैं ॥५० है।। यहाँ पर धूसर पशिरुप वात्य (व्ययाहेतु) के रहते सन्य व्यथाहेतुरओों का प्रहए किया गया है-इस प्रकार सनेक कषोभनासोभन (शोभनाश्च से प्रशोभनादच- इति कर्मधारयः) वस्तुओं का समुच्वय है। प्रभा-स्द्रट आादि आ्र्ाचार्यों ने सद्योगसमुच्चय इत्यादि रूप मे निविध समुच्चय का पूसक पृथक् निर्नए किया है। जैसे-यवकम्ानेकं वस्तु परं स्वा- रमुपावहाथे थ। जैयः समुच्चयोसो म्रे धान्य: सवसतीर्योगः । (काय्यालद्वार ७.१६) भाचार्य मम्मट इन तीनां प्रकारों के पूथक् विवेचन को युक्ियुक्त नहीं मानते। उनका भभिप्नाय हैं कि समुच्चय के मामान्यलक्षरां मे ही इन तीनों का भी ग्रहण हो जाता है अतः इनके पथक पृथक लक्षमा की आवश्यकता नही। (क) यहा पर पान' का अर्थं है शोभन या समीचीन अर्यात् वक्ता द्वारा उपादेय रप में मभिवेत 'कुलममनि- नम्'इत्यादि में निर्मल कुल आदि म्यभाव से सुन्दर होने के कारगा तपादेय हैं अ्तः सत् हैं। यहां दर्प तथा (प्रकृत राजा के पक्ष में) दर्पाभावसय फार्य से निमतपुनरुपहेतु ही समर्थ है फिर 'भद्रमूर्ति' सादि अनेक हेतुमों का कथन किया गया है अतः सामान्य
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दशम उल्लास: ५५७
(१७६) स त्वन्यो युगपत् या गुएक्रियाः ॥१२६।। - गुसी च करिये च गुगक्रिये च गुसक्रियाः । क्रमेणोदाहरणम्- १ .. विदलित सकलारिकुलं तव वलमिदमभवदाशु विमलं च। प्रखलमुखानि नराघिप, मलिनानि च तानि जातानि ॥५१०॥ २ .- श्रयमकपदे तया वियोग: प्रियया चोपनतः सुदुःसह्दो मे। नववारिघरोद्यादहोभिभेवितव्यं च निरातपत्वरग्यैः ॥५११॥
लक्षणा के अनुसार ही समुच्चयालद्दार है। (स) असत् का अर्थ है अनुपादेय होने के कारण अपोभन। 'दुर्वारा.' इत्यादि में कामबाण (स्मरमारगए) आदि अशोभनों का समुच्चय है। विरहिणी के लिये दुःखप्रद होने से काम-वाण आदि अनुपादेय तथा असत् हैं। (ग) ('सदसत्' शब्द की दो व्याख्याएं है-(i) सन्तश्च असन्तरच सदसन्तः (द्ृन्द्व) तेपां योगः, अर्थात् शोभनों और अश्षोभनों का योग (प्रदीप) (ii) सन्तरच ते असन्तश्च (कर्मधारय) तेपां योगः अर्थात् शोभन और अशोभन दोनों धर्मों से युक्त वस्तुओं का योग इसमें प्रत्येक वस्तु शोभन और प्रशोभन धर्म से युक्त होती है (उद्योत)। दूसरी व्याख्या ही अधिक उपयुक्त मानी जाती है। ऊपर के उदाहरण में चन्द्रमा स्वत. शोभन है किन्तु दिवस में कान्तिहीन होकर अशोभन हो जाता है। 'शशी' इत्यादि उदाहरण में ऐसे अ्रनेक व्याथाकृत् हेतुओं का ग्रहण किया गया है जबकि एक हेतु से ही व्यायाकायं सिद्ध हो सकता है अतएव यहाँ समुच्चय का सामान्य लक्षमा ही घटित होता है। T अनुवाद-वह तो एक अ्न्य प्रकार का समुच्चय-अ्रलद्धार है जो गुए और क्रियाओ का एक काल में होना (वसिगत किया जाता) है। (१७६). (कारिका में) गुसकिया: घर्थात् (१) गुए और गुख (गुसौ च) (२) किया औौर किया (किये च) तथा (३) गुख और क्रिया (गुएतरिये च) [यह द्वन्द्व समास होकर गुएकरिपाश्च गुखक्िये च=गुराकिया: यह एक शेप होता है। इस प्रकार यह समुच्चय तीन प्रफार का है-१ गुणों का योगपद्य २. कियायों का योगपद्य तथा ३. गुख किया का यौगपद्य] कमशः उदाहरस इस प्रकार हैं- (१) 'हे राजन्, समस्त शत्रुकुल का विनाश करने वाली तुम्हारी सेना (बलम्) शोघ्र हो निर्मल हो गईं और दुष्टजनों के मुस भी मलिन हो गये ॥४१०॥ i. (२) [ चित्रामोवंशीय में पुरूरवा की उक्ति] 'उस प्रिया (उवशी) से मेरा अकस्मात् (एकपदे) यह दुःसह वियोग हो गया है (उपनतः=प्राप्तः) भ्रौर (उघर) नवजलघरों के शागमन से मे दिवस आतपरहित होने के फारए रमणीय होने वाले
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५५८ ] काव्यप्रकाश:
३. कलुपं च तवाहितेप्वकरमात् सितपङ्क रुइदसोदरथ्रि चक्ष:। पतितं च महीपतीन्द्र, तेपां वपुपि पस्फुटमापदां कटाकैः ॥४१२।। 'धुनोति चासि तनुते च कीर्तिमित्यादेः', 'कृपायपाशिशच भवान् रणच्षिती ससाधुवादाश्च सुराः सरालये।' इत्यादेश्च दर्शनात् 'व्यधि करणे' इति 'एकस्मन्देशे' इति च न वाच्यम्। (३) 'हे नुपेन्द्र, श्र्वेत कमल के समान (सोवर) शोभा वाले मापफे नेत्र शशुओं पर धकरमात् क्रोध से रक्त (कलु्षं=कथायं) हो गये और उन (शश्रुमों) के शरीर पर विपतियों के फटाक्ष (कूर दृष्टि) स्पष्ट रूप से गिर गये' ।।५१२। प्रभा-गुए करिया के इस समुच्चय में (१)वहीं तो दो या भविक गुशों का समुच्चय होता है। जैसे-'विदलित' इत्यादि में दो बार 'च' (और) के प्रयोग से 'विमलता' और 'मतिनता' दो गुखों का समुच्चय प्रकट होता है। (२) कहीं दो या अधिक नियाओों का समुच्चय होता है; जैसे-'अयमेकपदे' इत्यादि में दो बार 'च' के प्रयोग से 'उपनत' तथा 'भवितव्यम्' से बोधित क्रियाओ का यौगपद्य प्रकट होता है। (३) कही गुए तथा श्रिया का समुच्चय होता है; जैसे-'कंलुप' इत्यादि में 'कलुपत्व' (नालिमा; गुए है तथा 'पतन' यिया है। दोनों का सहभाव दो 'य' के प्रयोग से प्रफट हो रहा है। - कियासमुच्चय और फारकदीपक-वद्यपि दोनों में अनेक भियायों का समुन्नय होता है तथापि (i) समुच्चय में सभी नियाये एक साथ होती है किन्तु कारकदीपक मैं वे'कमशः होती है। (ii) समुच्चय में करियायें समानाधिकरण या व्यधिकरण दोनों प्रकार की होती हैं, कारकदीपक में समानाधिकरण ही होती है। अ्रनुवाद्-(परमत का निराकरस) यह (समुच्चय अलद्धार) भिन्न-भिम्न अधिकरण (प्राथय भेट) होने पर ही होता है प्रथवां एक'अथिकरण (सामाना- विकरण्य) होने पर हो होता है-इस प्रफार (नियम) न फहना चाहिये; कर्योकि (क) यह अपनी तलवार घुमाता है तथा कीति पो फंलाता है। दत्वादि (सामाना- विकरण्य में 'पुनोति' तथा 'तनुते' कियायों का समुच्चय) तथा (स) 'कृपाए हाप में लिये श्राप संग्राम भूमि में उतरे औौर स्वर्गलोक में देवता सापुवाद देने सगे। द्वत्यादि (वैषधिकरण्य में भी कृपाल प्रहस तथा साधुयाद करत दो प्रियाभों का) समुच्चय देवा जाता है। 'प्रभा-(१) प्रस्तुन अवतरस में रुदट की मान्यता का निराकरस किया गया है। रुद्ट का मत है कि जहां गुण तथा किया आदि भिन २ माययों में होते हैं महीं समुच्चय अलद्वार होता है-ध्याघिकरसों या परिमिन गुएकये पंककालमेशमन् जपजायेते देसे ममुच्चमः स्वासद्योदी। (फानानद्वार ७.२७) । मम्मट का कपन है कि यह सुतिगुत्त नहीं मरगोंकि 'मुनोनिक' इत्यादि में सामानाविनरव्च में भी समुन्वय दोता है। दसी प्रकार मामानाधिकरण्प में ही ममुध्वय होता है यह
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ददम उल्लास: ५५६
(१८०) एकं क्रमेणानेकस्मिन् पर्याय: । एकं वस्तु क्रमेणानेफरिमन्भवति क्रियते वा स पर्यायः। क्रमेखोदाहरएाम्- १. नन्वाश्रयस्थितिरियं तव कालकूट। केनोत्तरोत्तर विशिष्टपदोप दिष्टा । प्रागणंवर्य हृदये वृपलक्ष्मणोऽय, कषठेडधुना वससि वाचि पुनः खलानाम ॥५१३॥ यथा वा- विम्बोष्ठ एव रागस्ते तन्वि, पूर्वमदृश्यत। अधुना हृद्येऽ्येप मृगशावाति, लक्ष्यते ॥५१४।। रागश्य वरतुतो भेदेऽप्येकतयाऽध्यवसितत्वादेकत्वमविरुद्धम्। २. तं ताए सिरिस होअररप्प्ण्ाइरयम्मि हिश्रअ्मेक्करसम्। बिम्बाहरे पिश्राएं गिवेसिअं कुसुमवारो ॥५१५।। (तन्त पां शीसहोदररत्नाहरणे हृद्यमैकरसम्। विम्बाघरे प्रियाणां निवेशितं कुसुमचाऐन।।) नियम भी नहीं किया जा सकता; क्योंकि 'कृपासपाशिश्च' इत्यादि मे व्यधिकरस में भी समुच्चय होता है। (२) यहाँ 'व्यधिकरगो इति' यह पद रुद्रट को लक्ष्य करके दिया गया है। 'एकस्मिन्' देशे' यह भी रद्रट के ही कथन का अंश है। व्यघिकरण और समानाधि- करस दोनों दशाओ में समुच्चय हो सकता है-यह दिखलाने के लिये ही यह सब कहा गया है। अनुवाद-(३४) पर्याय वह अलद्धार है जहाँ एक ही वस्तु कमराः प्रनेक (पाधारों) में होती है। (१८०) अर्थात् जहां एक वस्तु क्रमशः १-प्रनेकों में होती है या २-को जाती है वह मलद्वार पर्याम कहलाता है। कमशः उदाहरण हैं- (१) (भल्लटशतक ४) 'रे उत्कटविप, एक के पश्चात् दूसरे उत्कृष्ट पद को प्राप्त करने की इस आ्रश्यविधि [रहने को रीति] का तुभे किसने उपदेश दिया है? प्रथम तो तुम सागर के हृदय में, फिर [अय] वृपभ है चिह्न [वाहन] जिसका ऐसे महादेव के कण्ठ में रहे और भब तो [पुनः] दुप्टों की वाली में बसते हो' ॥५१३॥ प्रथवा जैसे-(नवसाहसाङचरित ६.६०) 'हे कृशानि' पहते तो तुम्हारे बिम्ब-सवुश ओष्ठ में राग (लालिमा) दिखाई देता था और हे मृगनयनो, भव यह राग (प्रेम) हृदय में भी दिखलाई देता है ।५१४॥ यहाँ राग-पदार्थ (लालिमा) और (प्रेम) में वस्तुतः मेद है किन्तु (श्लेप के द्वारा) दोनों को अभिस्न रूप में (एकतपा) मान लेने के कारण दोनों की एकता में कोई विरोध नहीं। (२) [प्रानन्दवर्धनकृत विमवासलीला की इस क्ति में] 'उन (राक्षसों)
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५६० . ] काव्यप्रकाश:
(१८१) अव्यस्ततोऽ््यथा। अनेकमेकस्मन् क्रमेण भवति करियते वा सोडन्य: । क्रमेणोदाइरयम्- १. मधुरिमरुचिरं चचः खलानाममृतमद्दो प्रथमं पृथु वयनकिति। प्रपपथ कथयति मोहहेतुमन्तर्गतमिव हालाइलं विय तदेव ॥५१६॥ २. तद्गेहं नतभिति मन्दिरमिदं लब्घावकाशं दिव: सा घेनुर्जरती नदन्ति करिणामेता घनाभा घटाः। का मन जो लक्ष्मी के सहोदर रत्न (फौस्तुभर्माल) के हरस में तल्लीन था उसे फामदेव ने प्रिया (मोहिनी) के बिम्ब-सदृय अधर में लगा दिया ॥५१४॥ प्रभा-जहां एक वस्तु का सनेक में नम से सन्बन्य दिसलाया जाता है वह प्रथम पर्याय (अलड्कार) है। यह दो प्रकार का है-(१) क-जहाँ 'प्रयोजक का निर्देद नहीं होता जिसेवृत्ि में 'भवति शब्द द्वारा प्रकट किया गया है; जैसे- 'नन्वाश्रय पत्यादि में किसी प्रयोजक के बिना ही एक कालकट' की कमरः भनेक स्थानों में स्थिति दिखलाई गई है। स-यहीं वस्तु की वास्तविक एकता विर्वाक्षत नही है, अतएव जहां कल्पित (आरोपित) एकता है वहाँ, भी पर्याय अलक्ार होता है। जैसे-'विम्बोष्ठ' इत्यादि मे राग के दोनो अरथो-लालिमा औरप्रीति-मेंइलेप से एकता मान ली गई है। यहां प्रयोजक का निर्वद नहीं किया गया तथा एक ही राग नगरा: श्रोष्ठ और हृदय में रहता है।. (२) जहाँ प्रयोजक का निर्दश होता है (निन्यते); जैसे 'सत्तेवामु इत्यादि में राक्षसों का एक ही हृदय नमशः 'कोस्तुगमसि' तथा 'मोहिनी' के विम्वाघर में, स्थित दिम्वलाया गया है; वरहा 'कामदेव' प्रयोजक है, इगी हेतु यहां (विसी के द्वारा) किया जाता है (मियते) का उदाहरया रूप पर्माप मलस्ार है। [ दिप्पसो- 'भवति' का अर्भ होता है-'स्वाभायिक' रुप से होना'। यह म्थ मानने पर 'नव्वाथय: उत्यादि में परयाय अलद्वार का लक्षस पटित न होगा। ममोंकि दिव के कण्ड में 'यलसूट' की स्वाभाचिक स्यति नही है। एसलिए 'भवति' पां अथ प्रयोजक का निर्दद न होना-किया गया है। ": अनुवाद-द्वितीय पर्याय यह है जो उस (प्रयम पर्याम) से विपरोत होता है। (१=१) अरयात् जहां चनेफ यस्तुएं एक (पाधार) में ममगः (१) होती है पयषा (२) को जाती है, यह भरन्य पर्याय अलसार है। कमश उवाहरस ये हैं- (१ 'घहो' ! मधुरता के कारएा मनोहर होने वाला दुष्टों का पचन प्रथम तो पाम- धिक पमृत प्रकुट करता है तत्परचात् वही उदरगत तीव्र पिप के समान मोह के हेतु पो बसलाता है सर्थात् मुर्दा का कारए मनता है'।X१६। (२) [सुदामा के नवीन भवन को देसवर फोई कहता है]-'(रहा तो) मुको दोवारों यासा यह घर और (कहो) रवर्म (पारात) में रथान प्राप्त करमे
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दशम उल्लास: [ ५६१
स चुद्रो मुसलध्धनि: कलमिदं संगीतक योपिता- माश्चर्य दिवसैद्विजोऽयमियर्ती भूर्मि समारोपित: ।५१७: अत्रैकस्यैव हानोपादानगोरविवक्षितत्वान्न परिवृत्तिः। वाला (गगनचुम्बी) यह प्रासाद! (तब) वह बूढ़ी गाय थी और (अब) ये मेघसहश गजपंक्तियाँ (घटा) गरजती हुँ। वह मन्द सी मूसल की ध्वनि थी और (प्रब) युव- तियों का यह मधुर संगीत है। आ्राश्चर्य की बात है कि यह (सुदामा) ब्राह्मस (थोड़े) दिनों में हो इस इतनी (समृद्ध) अ्रवस्था (भूमिम्) को पहुँचा दिया गया ।५१७॥ यहां पर एक ही (कर्ता) का लेन-देन (उपादान-हान) विवक्षित नहीं है प्रतः परिवृत्ि अलङ्गार नहीं (अपि तु पर्याय अलद्धार है)। प्रभा-(१) मघुरिम 'इत्यादि में खल-वचन रूप एक ही आधार में अ्रमृत- व्यज्जना' और 'विपकथन,-इन अ्रनेक वस्तुग्ों की नमशः स्थिति का वर्न किया गया है। यहाँ किसी प्रयोजक हेतु का निर्देश नही किया गया अतः यहाँ. एक, ही आधार में अ्नेक वस्तुओं के होने (भवति) का वन है तथा द्वितीय पर्याय अलद्धार है। (२) 'तद्गहम्' इत्यादि में एक ही द्विज में अ्नेक मन्दिर आदि का सम्बन्ध दिखलाया गया है। 'दिवसः' (कतृ) इसका प्रयोजक हेतु है अतः' एक ही आघार में वस्तुओं का किया जाना रूप द्वितीय पर्याय है। (३) अघ-न परिवृत्ति :- परिवृति का अर्थ है-विनिमय अर्थार्त् एक वस्तु को देकर दूसरी वस्तु लेना-विनिमदोन किन्वित्यपत्वा कत्यचिदादानम् (अलङ्धारसर्वस्व) । इस दृष्टि से 'तद्गेहम्' इत्यादि में परिवृत्ति अलङ्गार है वयोंकि पुरातन घर के स्थान पर नवीन भवन लिया जाने का वर्शन है। यहसका है। इसका समाधान करते हुए आचार्य मम्मट ने 'अन्न उत्यादिवहा, है।भ- यामनाचार्य के अनुसार इसका भाव यह है कि जहाँ एक व्यक्ति के द्वारा अपनी कोई वस्तु देकर (हानं=स्वीयवस्तुममर्पसाम्) दूसरे की कोई वस्तु ली जाय (उपादानं= परकीयवस्तुग्रह्णाम्) वहाँ परिवृति अलद्धार होता है। यहाँ एकक्तृक हानोपादान विवक्षित नही है अतः परिवृति अलद्दार नही है-'एफरतृ कहानोपादानयोदकती हि परिवृति: न त्वन्र तर्थति भावः'। तकेत नामक टीका में माशिवयचन्द्र का, कथन है-'प्रत्र मेहादि त्यज्यत एव न तु फेनावि स्वीनियते परिवृत्ती तु दवेकेन त्यज्यते तदन्येन गृहाते' अर्थात् यहाँ घर आदि का त्याग किया गया है किसी प्रन्य के द्वारा उसका ग्रहण नहीं किया गया; परिवृति अतद्धार मे जो एक के द्वारा दिया जाता है वह दूसरे के द्वारा लिया जाता है। इस प्रकार परिवृति में एक ही कर्ता एक वस्तु को त्याग कर : दूसरी वस्तु का ग्रहृण करता है तथा एक के द्वारा त्यागी हुई वस्तु को दूसरा र्वीकार करता है,
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५६२ ] काव्यप्रकाश:
(१८२) अनुमानं तदुक्तं यत् साध्यसाधनयोवंच: ।११७॥ पक्षघमन्वियव्यति रेकित्येन त्रिरूपो हेतुः साधनम्। धर्मिसि अ्रयोग- व्यवच्छेदो व्यापकस्य साध्यत्वम। यथा- यत्नैता लहरीचलाचंलहशो व्यापारयन्ति भ्रवं यत्तत्रैव पतन्ति सन्ततममी मर्मसपृशो मार्गगाः । तच्चकीकृत चापम न्चितशरप्रेद्वत्कर: क्रोघनो घावत्यग्रत एव शासनघरः सत्यं सदाडडसां रमरः ॥४१८॥। साध्य-साघनयो: पौर्वापर्यविकल्पे न किब्चिद् वैवित्यमिति न तया द्शितम। किन्तु पर्माय में एक ही वस्तु का शनेक प्रशयों में या सनेक वस्तुनों का एक भाथम में कमशः रहने का बहन होता है। टिप्पणी-उपयुक्त विवेचन से स्पप्ट है कि सानार्य मम्मट ने परिवृत्ि के प्राचीन लक्षसा को परिष्कृत करके उसमें 'एस्यव' (एक धपक्ति के द्वारा हो) यह पद औौर औौर जोड़ दिया था। पण्डितराज जगसाथ ने भी यही सक्षण स्वीकार किया
परिवृत्ति: । अनुवाद-(१५) पनुमान यह प्रतद्गार है जहां साथ्य (सिद्ध करने योग्य भ्रग्ति आदि) और साधन (हेतु-धूम आदि) भाव का कयन किया जाता है। (१८२) (i) पक्ष में रहना (पक्षधर्म), (ii) सपक्ष में रहना (सन्ययित्वम्=सपक्षसत्य), (iii) विपद में न रहना (व्यतिरेकित्वम्-विण्क-पसत्य]-इस प्रकार से रपनपतम्पम्न हेतु हो साधन (फहलाता) है। धर्मी अर्यात् पक्ष परवत मादि में उ्पापय (प्रग्नि भादि) का प्रवश्य सम्बन्य होना (सपोगस्य प्रसम्बन्यत्य व्यवक्ेद: य्वावृति:) हो साध्यता है। भनुमान का उवाहरण है- -1 'पर्योंकि ये तरद्ों के समान चम्चल नेत्रों थासी फामिनिया जिस (पुषक) पर कटाश करती हैं, उस (युधर) पर हो ये ममनेदी (फाम के) याए निर- म्तर गिरने लगते हैं (साध्य); इसलिए (तत) युनतियों ा आाशापवरी (शासनधर:) तथा प्रत्यन्त फुद औौर इसीलिए धनूप को सोचरुर पढ़ाये हुए (भन्चित) यालों पर हाथ फेरता हआ (प्रेहुरफर) कामदेव इन (कामिनियों) के राघमुय हो सा मागे भागे बोड़ता है।।५१८।। साध्य औौर सामन का पूर्व-पपर भाय (परामे पीछे होना) पदल जाने पर फोई (विशेष) घनरकार नहीं होता पतः मैघा (नेद या उदाहरख) नकित नही किया गया । प्रभा- (१) पिस्पो हेतु :- जिस आामार में फोई वस्तु मिद् की जाती है, यहु पस महलाता है, जैरेन'पवसी पत्िमान् यूमान' यहाँ पर दर्वध पदा है। जहा
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दशम उल्लास: ५६३ 444 भग्नि आदि साध्य वाा होना निश्चित होता है, वह सपक्ष है; जैसे पाकशाला आादि। जहाँ साध्य का सभाव निश्चित है वह विपक्ष है; जैसे सरोवर आादि । जिसके द्वारा वह वस्तु सिद्ध को जाती है, वह हेतु है; जैसे-यहाँ 'घूम' हेतु है; क्योंकि 'घुम होने से' अग्नि की सिद्धि की जाती है। यह हेतु रूपन्रयसम्पन्न होकर ही किसी वस्तु का साधन (सिद्धि कराने वाला) होता है-हेतु का रूपन्रय हे-(१) पक्षसत्त्व (पक्षधर्मता)-हेतु (घूम) का पक्ष (पर्वत) में होना, (२) सपक्षसत्व- हेतु का सपक्ष (पाकशाला आदि) में नियत रूप से रहना, इसी को अन्बय कहा जाता है. (३) विपक्षासत्त्व-हेतु का विपक्ष (सरोवर आदि) में नियत रूप से न रहना इसी को त्यतिरेक कहा जाता है। पक्ष को ही धर्मी (हेतु आादि धर्मयुक्त) कहते हैं। न्यूनदेश में रहने वाला घूम आदि व्याप्य तथा अधिक देश में स्थित अग्नि आदि व्यापक कहलाते हैं। परवंत यादि पक्ष (धर्मी) से व्यापक अग्नि का अयोग (असम्बन्ध) नहीं है थर्थात् अवश्य सम्बन्ध है यह कहना ही अग्नि की साध्यता कही जाती है। किन्तु 'पर्वतो र्वा्निमाम् धूमात्' इत्यादि में अनुमान शलद्वार नही होता; क्योंकि यहाँ चमत्कार-जनकता नही है; भाव यह है कि कवि-प्रतिभा द्वारा फत्पित जो किसी धर्मी में सावन द्वारा साध्य का प्रतिपादन है वह अनुमान सलङ्कार है। (२) 'यव्रंता' इत्मादि के पूर्वार्धं में 'यत्र', 'तत' इन दोनों पदों के द्वारा 'कटाक्ष-क्षेप' तथा बाण-पतन की व्याप्ति प्रतीत होती है यह शर-पतन उत्तरार्घ में कथित साध्य (रमणियों के आगे कामदेव का दौड़ना) का साधन हो जाता है। इस प्रकार साध्य-साधन के कथन से यहाँ अनुमान अलद्धार है, किन्तु यह साध्यसाघन- भाव लोकसिद्ध नहीं, अपि तु कवि-प्रतिभा द्वारा कल्पित है। अनुमान का प्रयोग यह है-'एताः (रमण्यः) पुरोगामिमदना: मार्गणपातनियतभ्र व्यापारवत्वात्'। (३) 'यत्रेताः' इत्यादि के पूर्वार्ध मे 'साघन' का कथन किया गया है तथा उत्तरायं में साध्य का। इसके विपरीत जहाँ साथ्य का पूर्व कथन किया जाता है तथा साधन का बाद में अयात साध्यसाधन का पीर्वापर्य-विपरयय हो जाता है वहा पर रुद्रट आदि ने अनुमान-अलद्वार का अन्य भेद माना है। आचार्य मम्मट का कथन है कि ऐसे स्थलों पर चमत्कार में कोई विशेपता नहीं होती, अतः उसका पृथक कथन करने की आावश्यकता नही। (४) अनुमान और काव्यतिङ्ग-(द० ऊपर काव्यलिङ्)। अ्रनुमान और उत्प्रेक्षा-कभी-कभी दोनों अलद्वारों की स्थिति मन्ये, शड्के, सत्यम्, वक्ति, कथयति आदि शब्दो द्वारा प्रकट होती है, सथापि दोनों में भेद यह है-(i) उत्प्रेक्षा सम्भावना (उत्कटँककोटिसिन्वेह) पर आधारित होती है किन्तु भनुमान में काव्यप्रसिद्ध हेतु के द्वारा साध्य का निश्चय किया जाता है (ii) उलेक्षा साधम्यं (उपमानोपमेय-भाव) पर आधारित है, किन्तु अनुमान में हेतु हेतुमद्भाव होता है।
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५६४ काव्यप्रकाश:
(१८३) विशेपर्णंयंत्साकृतरुक्ति: परिकरस्तु सं:। अर्थाद्विशेष्यस्य। उदाहरगाम्- महौजसो मानधना धनार्चिता धनुरभृतः संयति लब्घकीर्तयः। न संहतास्तसय न भेदवृत्तयः प्रियाशि वान्दन्त्यसुभि: समीहिंतुम् ।।५१६।। यद्यप्यपुष्टार्थन्य दोपताभिघानात् तननिराकरगेन पुष्टार्थत्वीकार: फृतः, तथा येकनिष्ठत्वेन वहूनां विशेपखानामेवसुपन्यासे वैचित्यमित्य- लक्कारंमध्ये गणित: । अनुवाद-(३६) परिकर वह अलङ्भार है जहाँ अभिप्राययुक्त विशेषसों के द्वारा (विशेष्य सर्थात् वशंनीय अर्थ की) परिपुष्टि (उक्ति) होती है। (१८३) सर्थात् विशेष्य फी (परिपुष्टि); उदाहरता है-किराताजु नीय में युषिष्ठिर के प्रति दूत को उति]-'महान् तेजरवी, स्वाभिमानी, धन से सत्कृत, संप्राम में कीति प्राप्त करने वाले, न (भधिक) मिले हुए और न परस्पर भिन्नव्यवहार वाले सर्यात् एकमतवाले धनुर्धर (योद्धा लोग) उस (दुर्योघन) के अभीष्ट कार्यों को प्रालों के (समर्पस) द्वारा भी पूरा करना चाहते हैं ॥५१६।। मद्यपि (सप्तम उल्लास में) प्पुष्टार्य का दोपरूंप में कथन किया है अतः उसके निराफरख से पुष्टार्यत्य की (काव्य के उपकारक रप में) स्वोकृति कर सी गई-तयापि एक (विशेष्य) में अन्वित अ्नेरु विशेषलों के (उपयुक्त उदाहरस के समान) कथन में एक (विशेष) चनःकार होता है इसलिए प्रतद्धारों के मध्य में 'परिकर' की गसाना को गई है। प्रभा-(१) पनेक सार्थक विशेषसों के द्वारा वर्गुनीय सर्थ का परिपोपस ही परिकर संलदगांर है। 'महौगसो' इरयादि मे 'महोजस' आदि विशेपलों का 'दूसरों के द्वारा अभिभूत न होने योग्य' ययादि भभिप्राय है। इनके द्वारा 'धनुभृसः' विशेष्य की परिपुष्टि होनी दै तथा उससे प्रधान (दुर्यीधन) का उत्हर्ग प्रतीत होना है-क्योकि किसी नोम, मय आदि के बिना ही स्वाभानिक लेह के कारस पगुर्धारी वीरजन दुर्योधन को प्रभोष्ट सिद्धि करते हैं अतः वह दुरजय ह, यह मन्घ है। इग प्रकार यहाँ परिकरालद्वार है। (२) यद्यपि इश्यादि संका का आजय मत है कि मपुष्टापंतत को दोप वदा गया है भतः पृष्टायत दोषाभावमान है फिर इमका मलसारों में पाठ बर्वो किया गया? 'तथापि' ऐत्यादि गमाचान मा समिशाय यह है कि मनेक गाभिभास विरेपरों के बहस परने पर के्वल दोपाभांन ही नहीं होना मवि तु एक विदेप चमरकार मी भी अनुभृति होती है, इगसिय परिकर का सनद्वारों में पाठ रिया गया है।
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देशम उल्लासे:
निगृढमपि वस्तुनो रूपं कथमपि प्रभिन्न केनापि व्यपदेशेन यद- पह्न यते सा व्याजोकि:। न चैपाऽपहन तिः प्रकृताप्नकृतोभयनिष्ठस्य साम्य- स्येहदासम्भवात्। उदाहरगम्-
- हा शैत्यं तुहिनाचलस्य करयोरित्यूचिवान् सस्मितं शैलान्तःपुरमातमएडलगरई प्टोऽवताद्व: शिव:।।५२०। (३) मम्मट के अनुसार अ्रनेक साभिप्राय विशेपणों के होने पर ही परिकर अलद्वार होता है। विश्वनाथ ने भी यही स्वीकार किया है। किन्तु प्रदीपकार के अनुसार एक साभिप्राय विशेपण के होने पर भी परिकर हो सकता है। जगनाथ को भी यही अभिमत है। उद्योतकर के अनुसार विशेष्य के साभिप्राम होने पर भी परिकर अलङ्कार होता है। जयदेव ने भी चन्द्रालोक मे यही माना है। किन्तु सुधासागरकार का मत है कि केवल विशेष्याश कभी भी साभिप्राय नहीं हो सकता। शतः विशेपसों के साभिप्राय होने पर ही परिकर अलक्कार होता है। (४) परिकर और काव्यलिङ्ग-यर्द्याप पदार्थगत काव्यलिद्ध तथा परिकर दोनों में ही पद का अरथ हेतु को प्रस्तुत करता है तथापि (i) वाव्पतिङ्ग में पद का वाच्यार्थ ही हेतु होता है, जबकि परिकर में वाच्यार्थ से प्रतीयमान (व्यङ्गन) अर्थ हेतु होता है, (ii) काव्यलिद्ध का चमत्कार इसमें है कि पदार्थ या वाक्यार्थ वर्ण्य विषय का हेतु होता है किन्तु परिकर की चारुता यह है कि साभिप्राय विशयेपणों द्वारा व्यञ्जित अर्थ वाच्य अर्थ को अधिक चमत्कारक बना देता है। टिप्परी-निदर्शनकार का मत है कि यहाँ तक आचार्य सम्मट की कृति है। इससे आगे अल्लट आचार्य की। कहा भी है-'हृतःशीमम्मठाचायचयेः परिकरावधिः । प्रबन्धः पूरितः शेपो विधायाल्लटसूरिखा'। अनुवाद्-(३७) ब्याजोकि वह अलद्गार है जहाँ स्पष्ट रूप में प्रकट हुए वस्तुस्वरूप का फपट से छिपाना-वशिपत किया जाता है। (१८४)' जो गुप्त भी वस्तु का स्वरूप किसी प्रकार (चिह्नविशेष आदि से) स्पप्टतपा प्रतीत हो जाता है (उद्धिन्न), यदि उसे किसी बहाने (फल्वित कारस) से (घद्मना) छिपा लिया जाता है तो वहाँ व्याजोकि अलद्धार होता है। यह अपह्नति नहीं (कही जा सकती) है; क्योंकि इसमें प्रकृंत (वर्शनीय) तथा अप्रकृत दोनों में स्थित (किसी प्रकार के) साम्य का सभाव होता है। उदाहरण है- .. [भवानी तथा शङ्दर के वंवाहिक इतियृतत का वएाँन]-पर्यतराज हिमालय के द्वारा समपित की जाती हुई पावती के कर-रपशं से प्ररुटित रोमाञ्च मादि से
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५६६ j कांव्यप्रकाशे:
अथ पुलकवेपथू सातत्विकरूपतया प्रसृतौ सैत्यकारणतया प्रकाशित- त्वादपलपितस्वरूपी व्याजोक्ति प्रयोजयतः। (१८५) किन्चित्पृष्टमपृष्ट वा कथितं यत्प्रकल्पते। ताहगन्यव्यपोहाय परिसंख्या तु सा स्मृता ॥११२।
शिथिस तथा समस्त (वंवाहिक) फार्य-व्यापार के भङ्ग हो जाने से व्याकुल मतएव हिमालय के अन्तःपुर की माताप्रों तथा शिवजी के (नन्वी आदि) गणों के द्वारा मुस्फराहट के साम बेरो गये जिस महावेव ने यह कहा-'यहो ! हिमालये के हाथों को सोतलता।' ये शिय तुम्हारी रक्षा करे ॥५२०।। यहां पर रोमाञ्च और फम्पन (पार्वतीविययक शिवगत रतिभाव के) सात्विक धनुभाव के रूप में प्रकट हो रहे हैं, किन्तु (हिमालय को) शीतलता के कारस से होने पाले फहे गये है; अतएब उनका स्वरूप छिपाया गया है और वे 'म्याजोकि' के प्रयो- जक हैं। प्रभा-(१) वस्तुतः तो यहाँ पार्वतीविषयक शिवगत युढ्ध रतिभाव दुलक और कम्पन (चिह्न) द्वारा अभिव्यत्त हो रहा है। पुलक और कम्पन को शीतजन्य बतला- फर उस रतिभाव का अपलाप किया गया है; मतः व्याजोकि अलद्वार है। यह प्रदीप उद्योत श्रदि व्यारयाओं में स्पष्ट किया गया है। (२) व्याजोकि और पपह्न ति-(समानता) दोनों मलद्दारों में एक वस्तु को घिराकर उसके स्थान पर दूसंरी को प्रवट किया जाता है। (भेद) (i) प्रपह्न ति मैं गोपनीय को सब्दों द्वारा, कहा जाता है (नंदं भुगम्); विन्तु व्याजोकि में पाठक को स्वयं हो उसकी उद्भावना करनी होती है जैसे 'मलेन्द्र०' इत्यादि में 'रति भाव' यहा नहीं गया। (ii) अपह ति में उपमेय का निषेय करके उपमान की स्थापना की जाती है; किन्तु व्याजोकि में किसो का निषेध नहीं किया जाठा अपितु प्ररुट हो जाने वाली वस्तु का किसी अन्य निमित्त से होना चतलाया जाता है। (iii) मपहनि में एक प्रस्तुत होता हे मोर दूगरा अप्रस्तुत जो उपमेय तथा उपमान रप में पाते है; किन्तु व्याजोकि में दोनों ही प्रस्तुन होते हैं जैसे उपयुंक्ता उद्ाहरस में 'रति' मोर सैत्य दोनों प्रस्तुत हो है। तथा (iv) अपल ति प्रस्तुत और मपर्तुस के स्ाम्प पर निर्भर है, म्यानोकि नही। अनुवाद-(१८) [किन्चित् पृष्टम् वदृप्टं वा शम्बेन कपितं (सत्) ता- दूगन्यध्यपोहाय मल् प्रपत्पते सा सु परिसदया समृता-यह सग्यम है। परितंत्या वह पससदार है जहां पूछी गई अपमा न पूछी गई वातु (रग्ब के द्वारा) शही नाकर घरने मंसो किसी भग्य वस्तु के रवयच्छेय (निराकास) में पर्ममसित हो भाती है। (१८४)
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देशम उल्लास: [ ५६७
प्रमाणन्तरावगतमपि वस्तु शव्देन प्रतिपादितं प्रयोजनान्तराभावा- रसहशवरत्वनतरव्यवच्छेदाय यत्पर्यवश्यति सा भवेत्परिसंख्या। अन्रच कथनं प्रश्नपूर्चकं तदन्यथा च परिदष्टम्, तथोभयत्र व्यपोह्यमानर्य अती- यमानता वाच्यत्वं चेति चत्वारो भेदा: । क्रमेणोदाहरणम्- १. किमासेव्यं पु'सां ! सविघमनवद्य य् सरितः किमेकान्ते ध्येयं ? चरसयुगलं कौस्तुभभृतः । किमाराध्यं पुएयं किमभिलपणीय च करुणा यदासकत्या चेतो निरवधि विमुकत्यै प्रभवति ॥५२१।। धर्थात् मन्य (शास्त्र पुरासादि) प्रमाखों द्वारा प्रवगत वस्तु भी जब शब्द से प्रतिपादित होफर अन्य प्रयोजन न होने से अपने जंसी श्रन्य वस्तु को व्यावृत्ति (निरा- करण) के रूप में परिसत हो जाती है, वही परिसंख्या है। यहाँ पर वस्तु का फथन (१) प्रश्नपूर्वक औ्रौर () अप्रश्नपूर्वक (अन्यथा) देसा जाता है तथा इन दोनों हथलों में वपवच्छेद्य (जिसफा व्यवच्छेद या निराकरस किया जाता है) वस्तु भी (दो प्रकार की) प्रतीयमान (व्यलघ) या वाच्य रूप में होती है-इस प्रकार परि- संस्या के चार भेद है। प्रभा-परिसंस्या अन्वर्थ संज्ञा है। 'परि' का अरथ है-वर्जन (निपेध) और 'संस्या' का अर्थ है-बुद्धि। अतएव वर्जनवुद्धि ही परिसँख्या है, अर्ात् तदन्यस्य निषंधाय तस्योक्ति परिसंख्या'। मीमांसा आदि में भी यह परिसंख्या' प्रसिद्ध है; किन्तु परिसंख्या अलद्धार तो वही होता है जहाँ कविप्रतिभा-कल्पित वस्तु के कथन द्वारा उसी प्रकार को अन्य वस्तु की व्यावृत्ति हुआ करती है। परिसंख्या (अलद्दार) चार प्रकार की है-१, प्रश्नपूर्विका प्रतीयमानव्यवच्छेद्या २. पश्नपूर्विका वाच्यव्यवच्छेद्या, ३. अप्रस्नपूर्विका प्रतीयमानव्यवच्देद्या, ४ भभश्नपूर्विका वाच्यव्यवच्छेद्या। अनुवाद्-(चतुरविधा परिसंस्या के) क्रमशः उदाहरत ये हैं- १. (प्रश्न) मनुष्यों के सेवन-योग्य कया है? (उत्तर) देवनदी गङ्गा का निर्दोप तट (सविध=समीपम्)। एकान्त में ध्यान-योग्य कया है? कौस्तुभमसि घारण करने वाले (विप्यु) के चरसयुगल। आ्राधना के योग्य कया है? पुण्व। मभिलापा के योग्य पया है ? करुरा। क्योंकि जिन (उपपुक्त गङ्गा आदि) में प्रीति के द्वारा चितं भ्सोम या शाश्यत मुक्ति प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है' ।५२१। प्भा-यहाँ पर गङ्ातट आदि की सेवनीयता शास्त्रविदित ही है भ्रतः उसका प्रतिपादन अभिप्रेत नहीं; किन्तु गङ्गा से भिन्न अन्य नदी के तट आदि की सेव- नीयता का निराकरण करने के लिये गंगा-तीर आदि की सेवनीयता (आदि) का कथन किया गया है इसलिये परिसंस्या अलद्धार है। यहाँ 'किमासेव्यम' इत्यादि प्रश्नपूर्वक कथन है तथा व्यवच्छेद् (अन्य नदीतट आदि की सेवनीयता आदि) प्रतीयमान है अतएव प्रश्नपूर्विका प्रतीयमानव्यवच्छेद्या परितंर्या है।
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२. किं भूपएं सुदृदमत्र यशो न रत्नं ", कि कार्यमार्यचरितं सुकृतं न दोप:। कि चनतुरप्रतिहतं घिपखा न नेत्रं जानाति करत्वदपर: सद्सद्विबेकम् ॥।५२२।। ३. कौटिल्यं कचनिचये करचरसाधरदलेपु रागस्ते। काठिन्यं कुचयुगले तरलत्वं नयनयोर्वसति ॥५२३॥ ४, भक्तिर्भवे न विभवे व्यसनं शास्त्रे न युवतिकामास्त्रे। चिन्ता यशसि न वपुषि प्रायः परिदृशयते महताम्॥४२४॥ अनुवाद-२ 'स्थायी (सुद्ढम्) मूपए कया है? फीति न कि रत्न। फतंथ्य कया है? सिप्टों से आधरित पुण्यफर्म, दोप नहीं। अ्रपतिहत (कही न दफने वाली) दूष्टि कौनसी है? बुद्धि, नेघ्र नहीं। [भन्त में उत्तरों से मन्तुष्ट यक्ता का कथन है] आापके भतिरिक्त औौर फोन है जो उत्कृष्ट तथा निकृष्ट के भेद को जानता है? धर्यात् फोई नहों' ॥४२२॥ प्रभा-यहाँ मरा आदि की भूपसता अन्य प्रमाणों से बिरदित है; भिन्तु यम मादि से भिन्न 'रत्न' आदि की भूपसता के निराकरस के लिये उसका कथन किवा गया है।, यहां कथन प्रश्नपूर्यक है तथा व्यवच्छेद (रत्न मादि की भूपलता भादि) 'न रत्नम्' इत्यादि, पा वाच्य है अतएव प्रश्नपूर्विका वाच्यव्यवच्छेशा परिसंग्या है। अ्रनुवाद-३. 'हे प्रिय, सुम्हारे वेशा कलाप में कुटिलता (हुदय में नहों), कर चरस तथा अघर-पल्लव में राग,सर्थात् लातिमा (परपुरय में राग धर्थात् ग्रेम नहीं), स्तनयुगल में काविन्व अर्थात् बुड़ता (दृदम में निवयंता नहीं), नमनों में पञ्चनता (मन में नहीं) बसती है'॥५२३॥ प्रभा-यहा केद-समूह में कुटिलता मादि के फथन दवांग हृदय में कुटिलता मादि का निराफरस प्रकट होता है। वदन सपर्नपूर्वक है तथा व्पयच्छेष (बुटिलता पदि का अन्य में न होना ादि) प्रतीयमान है अतपव सपदनपूचिका प्रत्ीपमान- गवष्छेदा परिसंत्या है। अनुवाद-४. 'परायः महापुरषों को अक्ति शिप में न कि ऐश्वरवं में; रगि (व्यसनम) शाहप में न कि युर्वततिस्प काम के प्रह्त्र में; चिन्ता कीति में न कि सरीर में बेसी जाती है'।।५२४॥ प्रभा-यहां पर महापुरषों की पिय के प्रति नकि पादि के कथन द्वारा पैभव प्रादि के प्रतति गति की व्यावृति की जा रही है। वचन मपवूर्यक है तमा व्यवष्ेध (भक्ति मादि या अ्र्न्म में न होना) 'न विभवे' यादि समजास्य है पनएव अप्ररनपूर्विका वान्यव्पपब्योचा परिसस्या है।
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दशंम उल्लास:
(१८६) यथोत्तरं चेत्पूर्वस्य पूर्वस्यार्थस्य हेतुता । तदा कारणमाला स्याव; उत्तरमुत्तरम्प्रति यथोत्तरम। उदाहरएम् - जितेन्द्रियत्वं विनयस्य कारणं गुएप्रकर्पो विनयादवाप्यते। गुसाप्रकर्पेस जनोऽनुरज्यते जनानुरागप्रभवा हि सम्पद: ॥५२५॥- 'हेतुमता सह ह्ेतोरमिधानमभेदतो हेतु' रिति हेत्वलद्वारो न लच्षितः। आयुर्धृ तमित्यादिरूपो ह्योप न भूपसतां कदाचिदर्हृति वैचि- त््याभावात्। अविरलकमलविकास: सकलालिमदश्च कोकिलानन्द:। रम्योऽयमेति सम्प्रति लोकोत्कएठाकर: काल: ॥।५२६।।
अनुवाद-(३६) कारसमाला अलद्धार तब होता है यदि उत्तर उत्तर अर्य के प्रति पूर्व-पूर्व अर्थ को कारणता वलित की जाती है। (१८६) 'ययोत्तरम्' अर्ात् उत्तर-उत्तर (आगे वाले) के प्रति। उदाहरग-'जितेन्द्रि यत्वम्' इत्यादि (ऊपर उदाहरस ३१६) ॥।५२५॥ प्रभा-(१) यहाँ जितेन्द्रियता (अपने से उत्तरवर्ती) विनय का कारस है, विनय गुसप्रकर्प का कारम है; गुएप्रकष जनानुराग का कारण है और जनानुराग सम्पदा का कारण है-इस प्रकार पूर्व-पूर्व वशित वस्तु उत्तरोत्तरवर्ती वस्तु के प्रति कारण है तथा कारणमाला अलङ्कार है। (२) कारख माता औ्रर माला दीपक-यद्यपि दोनों में पूर्व-पूर्व पदार्थ उत्तर-उत्तर से सम्बद्ध होता है तथापि कारखमाला मे पहिला पदार्थ अगते पदार्थ का कारण होता है किन्तु मातादीपक में वह केवल विशेपण होता है। फनतः कारएमाला कार्यकारण-भाव पर आश्रित है, मालादीपक विशेष्य-विशेषण-भाव पर। अनुवाद-(हेतु अलद्धार का सण्टन) 'हेतुमत् अर्थात् कार्य के साथ हेतु (कारस) का अभेदरूप में कथन हेतु नामक अलद्धार है।' यह (प्राचीनों द्वारा कथित) हेत्वलद्धार तो यहां निरूपित नहीं किया गया; बर्मोकि 'मायुघृ' तम्' सर्थात् घृत आायु है' [हेतुमत् 'भायु' का हेतु 'घृत' के साथ अभेदकथन] इत्यादि के रूप में यह हेत्वलद्गार होगा, जो चचित्रय (चमत्कार) के अभाव से कदापि प्रतद्धार कह- साने योग्य नहीं। 'भवन यह रमखोय वसन्तकाल आरा रहा है, जो कमलों का सतत विकास ही है, समस्त भ्रमरों का मदरूप है, कोकितों का मानन्दरूप है तथा सोगों की उत्कुष्ठ का जनक है' ।५२६।।
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५७० i काव्यपकारी:
इत्यत्र काव्यरूपतां कोमलानुप्रासमहिम्नैव समाम्नासिपुर्न पुनर्हत्य- लक्टारकल्पनयेति पूर्वोक्तकाव्यलिङ्गमेव हेतु: ।
यहां (परचार्यों ने) फोमल अनुप्रास की महिमा से ही काव्यस्पता बतलाई पो; हेतु नामक अलद्गार की कल्पना द्वारा नहीं। इसलिए पूर्वोक्त ाव्यसिङ्ग ही हेत्वलद्धार है (उससे परृथक् फोई हेतु नामक अलद्धार नहीं)। प्रभा-कार्य-कारएाभाव मूलक असद्ार के प्रसन्भ से आचार्य मम्मट ने हेत्वलद्ार' की मान्यता का विरोध किया है। प्राचीन आचार्यों ने सम्मटोक्त फाव्य- लिद्ग और वारसमाला दोनों अलङ्वारों से भिन्न एक हेतु अलद्धार भी माना पा जिसका स्वरूप है-कार्य के साथ हेतु का अभेद-कधन: उस पर मम्भट का कथन है कि अलद्वार वही है जो वैचित्र्य का जनक है किन्तु 'आयुषु'त्म्' इत्यादि स्थतों पर कार्यवाचक दाव्द से कारए के कयन में कोई चमतकार नही, तब इसे भलद्वार कछे कहा जा सकता है' इस पर यह याद्ा होती है कि यदि हेत्वलद्वार नहीं माना जायेगा वो प्राचीन काव्याचार्यों ने जो 'अविरलकमल' इत्यादि में काव्यस्पता मानी है वह न हो सकेगी; यहां वसन्तकाल हेतु है, कमल-विकास' आदि हेतुमत् हैं। हेतु तथा हैतुमत् का प्रभेदरप से फथन किया गया है एवं हेत्वलद्वार होने से हो यहाँ काव्यातमकता है। 'काव्यसपताहेतु उत्यादि पंकियों में इसका समाधान किया गया है। भाय यह है कि प्राचीनों ने इस शलोक को जो मतद्वारयुक्त होने के कारस काय्य कहा है वह तथाकचित हेत्वलद्वार होने से नही; किन्तु धनुप्रास मादि भतद्वारों के कारए। मतएव हेतु नामक अलदार मानने की आवश्यकता नहीं। हो, कम्पलिस् बा नाम हेत्ववद्वार भी है। टिप्पो-प्राचीन काल से हो हेतु नामक मनसार की मान्यता विवाद का विषय रही है; किन्तु अनेक वाव्याचायों ने इसका स्वरूप विवेधन किया है। प्रद्न यह है कि पाचार्य मम्मट ने किम पालक्वारिक की मान्यता का महा विरोष किया है। वालवोमिनी टोका के मनुसार यरहाँ 'उद्मट' की हेखवलद्ट्वारनिपयर मान्यत का सण्डन किया गया है। दाशिकसा (हिन्दी व्वास्या) के मनुमार मह सटट की मान्यना बा सण्डन है जैसा कि स्टट ने काव्पालसार (७८२) में कहा है-हेतुमना सह हेतोरमिधागममेदकृद् भवेद यम। सोन्ससूारो हेतु: स्याइन्येम्य पृषभभूतः ।धीरासे महोदय के अनुमार भी यहा रदट के मन का ही निरारुस िय गया है।
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देश्म उल्लास: 44444
(१८७) क्रियया तु परस्परम् ॥१२०॥ वस्तुनोर्जननेऽ्न्योन्यम ;- अर्थयोरेकक्रियामुखेन परस्परं कारमवे सति अन्योन्यनामा- इलङ्वार:। उदाहरएम्- हंसाएं सरेहिं सिरी सारिज्जइ शह सराए हंसेहिं। अएसोएएं विश्र् एए अप्पाएं सवर गरुअन्ति ।५२७॥ (हंसानां सरोभि: श्रीः सार्यते त्रथ सरसां हंसैः। अन्योन्यमेव एते आरत्मानं केवलं गरयन्ति ।५२७॥) अत्रोभयेपामपि परस्परं जनकता मिथः श्रीसारतासम्पादनद्वारेख। (१८८) उत्तरश्रुतिमात्रतः । प्रश्नस्योन्नयनं यत्र क्रियते तत्र वा सति ॥१२१॥ असकृद्यदसंभाव्यमुत्तरं स्यात्तदुतरम् ।
अनुवाद-(४०) अन्योन्य वह अलद्धार है जहां क्रिया के द्वारा दो वस्तुओ्रों फे परस्पर उत्पादन का वर्न होता है। (१८७) पर्थात् जहाँ एक जातीय (एकसी) किया के उत्पादन-द्वारा दो पदार्य एक दूसरे का कारए प्रतीत होते हैं वहाँ अन्योन्य नामक अलद्गार होता है। उदाहरण- 'सरोवरों के द्वारा हंसों को शोभा बढ़ाई जाती है (=सायते) और हुसों के द्वारा सरोवरों की शोभा; ये दोनों एक दूसरे की शोभा बढ़ाने वाले हैं अपने पाप फो तो केवल गोरवयुक्त करते हैं॥५२७॥ यहाँ पर एक दूसरे की शोभावृद्धि सम्पादन (किया) के द्वारा दोनों एक दूसरे फे कारए हैं। प्रभा-वस्तुतः दो पदार्थ एक दूसरे के जनक नही हो सकते। वे दोनों एक दूसरे में स्थित किया के जनक होते हैं और इसी से उनमें परस्पर जन्वजनकभाव भी कल्पित कर लिया जाता है। जैसे ऊपर के उदाहरण में हंस तथा सरोवर एक दूसरे मे शोभा-वृद्धि के जनक हैं इसलिये शोभाविशेष से युक्त हंसों के प्रति सरोवर कारण हैं और धोभाविशेप-युक्त सरोवर के प्रति हस कारस हैं तथा यहाँ भन्वोन्य मलङ्वार है। अनुवाद-(४१) उत्तर वह पलङ्गार है जहां (१) उत्तर के भवसमात्र से प्रश्न की कल्पना (उसयन) कर लो जाती है अथया (२) अनेक बार प्रद्न होने पर (तत्र पर्यात् प्रश्ने सति) अ्रनेर वार (घसकृत्) असम्भावित उत्तर होता है। (१८८)
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५७२ 1 :र्कौव्यप्रकाशी:
१. प्रतिवचनोपलम्भादेव, पूर्ववाक्यं यत्र कल्प्यते तदेकं तावदुत्तरम्। उदाइरगम्- वाशिश्रश इत्थिदन्ता फुत्तो अ्रम्हाएं बग्घकिती थ। 4 जाव लुलिआलश्रमुद्दी परम्मि परिसषकए सोएा ॥१२।। (वाखिजक, इस्तिदन्ता: कुतोडसमारकं व्याघकृत्तयश्च। यावल्लुलितालकमुखी गृहे परिप्वककते स्ुपा) ।५२॥ हस्तिदन्तव्याघ्रकृत्तीनामह्मर्थी ताः मूल्येन प्रयच्छेति के तुरवचनम् अमुना वाक्येन समुन्नीयते।, न चैतत् काव्यलिङ्गम् उत्तरतय ताद्रप्यानुपपत्तः। नहि प्रश्नाय प्रतिवचन जनको हेतुः। नापीद्मनुमानम् एकधमिनिष्ठतया साध्यसाधन योरनिर्देशाद् इत्यलद्धारान्तरमेवोत्तरं साधीय:। (१) एक (प्रथम) उत्तरालङ्गार तो यह है जहां, प्रतिवचन सर्यात् उत्तर को उपलग्धि से ही प्रश्न (पूर्वयाश्य) की कल्पना कर लो जाती है। उदाहरए- [केता वलिक' के प्रति युद्ध व्या' की उक्ति]-'हे व्यापारी, जय तक (मेरे) घर में कुटिस केशों से मुक्त मुहा वाली पुत्रवयू विचरती है तय तक हमारे घर में हापी दात तथा उपाघ्र चर्म कहाँ? [चधू में आ्रसक मेरा पुत्र शिकार को नहीं जाता यह व्यङ्गप है] ॥५२८॥ मैं हायो-दांत औोर व्याम्रचमं चाहता हू उन्हें मूल्य से (मुझे) दे दो'-ऐसा केता वलिक का प्रश्न-वाकम इस (व्याध के) यचन से कल्वित (बनुमित) रिया जाता है। 1 यह (उत्तर ससकार) फाष्यलिङ्ग नहीं है योकि उत्तर-्वाशम हेतुरप (तांद प्य=हेसुत्य) नहीं हो सकता। उत्तर-पाध्य प्रश्न का जनक (कारफ) हेतु नहीं है (जो फाव्यतिस्स के लिये धपेक्षित है)। यह (उत्तर ससद्गार) धनुमाम भी मतों: पंयोंकि एक धर्मो में स्थित साध्य औौर साधन का यहाँ निर्वेद गहीं किया जाता। इसलिये एक अन्य मलदवार ही है, यही (मानना) उचित है। प्रभा 'न घंतत्'-मदयपि उंत्तर पलद्वार में प्रतिवधन में प्रश्न की वस्पना को जाती है तथापि 'काव्यतिन्न' में इसका मन्तर्भाय नहीं हो मकसा, यनोंकि यहा हेतु का कथन हुआ करता है। हेतु दो प्रकार का है-वारफ (ननवः) ोर सापफ। 'काव्यनिद्ध मे कारक हेतु का बपन होता है। उत्तर वायम सो मस्न ना जनफ (फारक) हेतु हो ही नहीं सकता। बैचन शापर हेतु ही हो दाता है। किन्ब काव्यसिद्ध में कारख मौर मा्यं दोनों था मयन किया जाता है निम्तु उर सनसार में आापन फारस को उतर है उनी का कपन किया जाता है। प्धन मनुमान मलखार में सानक हेतु का ही रयन होना पपेशित है, तमा उगर पनदार मनुमान भी नहीं है। ग्योंकि नएं उतर या तो सामन रूप में निरचे होगा है विस्ु
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दशमउल्लास: ५७३
२. प्रशनादनन्तरं लोकातिक्रान्तगोचरतया यद्संभाव्यरूपं प्रतिवचनं स्या त्तद्परमुत्तरम्। अनयोश्च सकृदुपादाने न चास्ताप्रतीतिरित्यसकृदित्युक्तम्। उदाहरगम्- का विसमा देव्वगई कि लद्ध जगो गुसगगाह्दी। किं सोक्ख सुकलत्त किं दुक्खं जं खलो लोओ ।५२६॥ - (का विपमा दैवगतिः कि लब्घव्यं यज्जनो गुसामाही। कि सौख्यं सुकलन्रं किं दुःखं यत्खलो लोक:।।५२६॥। 1I
प्रश्नपरिसंख्यायामन्यव्यपोहे एव तात्पर्यम इह तु वाच्ये एव वि. आ्न्तिरित्यनयोर्विवेक: ।
प्रश्न का साध्य रूप में निर्देश नहीं किया जाता और अनुमान अलद्दार में पक्षरूप .एक.धर्मी में साध्य और साधन दोनों का निर्देश किया जाता है। अतएव यह उत्तर. पलद्कार काव्यलिङ्ग तथा अनुमान दोनों से भिन्न ही है। अनुवाद-२ द्वितीय उत्तर अलद्गार वह है जहां प्रश्न के पश्चात् ऐसा उत्तर होता है जो लोकिक ज्ञान का विषय न होने के कारए असम्भाव्य भर्थात् दुर्जेय होता है। इन दोनों (प्रश्न तथा उत्तर) का एक वार कथन होने पर चमत्कार (चास्ता) की प्रतीति नहीं होती अ्रतएव (मृत्र मैं) 'असकृत्' अर्थात् श्रनेक घार- ऐसा कहा गया है। उदाहरण-'कौनसी वस्तु विषम (फठोर, विकट) है? भाग्म की गति।कया प्राप्तव्य है? गुसग्राहक मनुष्य । सुख यया है? श्रच्ठ नारी। दुःख कया है ? दुष्ट मनुप्य ॥५२६॥ प्रश्नपूर्विका परिसंस्या (अलङ्कार) में अन्य की व्यावृत्ति में तात्पर्य होता है; किन्तु इस (द्वितीय उत्तर अलड्कार) में (निगूढ) वाच्यार्थ में हो तात्पर्य-विधान्त हो जाता है-यही इन दोनों का भेद है। प्रभा-(१) यहाँ 'का विषमा ?' इत्यादि रूप में ग्रनेक वार प्रश्न किये गये हैं तथा 'दवगतिः' इत्यादि अ्र्नेक बार उनके उत्तर भी दिये गये हैं। 'दवगति की विपमता' आदि लोकिक ज्ञान के अगोचर तथा दुशय उत्तर हैं. अतः द्वितीय उत्तरा-
1-' (२) यद्यपि प्रश्नपूर्विका परिसंर्या में भी नियमपूर्वक प्रश्न तथा उत्तर का लद्दार है। 7
कथन किया जाता है तथापि यह उत्तरालङ्वार उससे नितान्त भिन्न है, क्योंकि (i) कि भूपणम्' इत्यादि (उदाहरण ५२२) प्रश्नपूर्विका परिसंस्या में तो रत्न मादि की व्यावृति में तात्पर्य होता है और 'का विषमा' इत्वादि में दैवगति की दुन मता बतलाने में ही सातर्य है। (ii) परिसंस्या में प्रश्न और उत्तर की अ्रनेकता (भसवृत् होना) अनिवार्य नही है कन्तु उत्तर अलद्वार की चारता इनी पर निर्भर है।
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५०४ 1 फाव्यप्रकाद:
(१८६) कुतोऽपि लक्षितः सूक्षमोऽप्यर्थोऽन्यस्मे प्रकाश्यते ॥१२२॥ घर्मेणा केनचिद्यम तत्सूक्ष्मं परिचक्षते। कुतोऽपि थाकारादिदिताद्वा । सूत्त्मस्तीचएमतिसंवेद्यः। उदाइरणम्- वक्पस्यन्दिरवेद्बिन्दुपवन्वैर्ट प्टचा भिन्न' कुड्कुम कापि कएठे। पु'रत्य तन्न्या व्यञ्जयन्ती वयस्या स्मित्वा पाणी खड्गलेखां लिलेख ॥।५३०।। अन्नाफृतिसवलोक्य कयाऽपि वितर्कितं पुरुपायितं असिलतालेखनेन
यथा ना- सद्क तकालमनसं चिटं झात्वा विद्ग्घया। ईपन्न शार्पिताकृतं लीलापद्मं निमीनितम ॥४३१। अत् जिश्ञासितःसक्तकाल कयाचिदि हव तम्रे विदिित निशा समयशंसिना कमलनिमीलनेन लोलया पतिपादित: । अनुवाद-(४२) 'सद्म' प्रससकार उसे कहते हैं जहां किसी (शापक) हेतु मे प्रतीत हआ कोई सृक्ष्म पदार्थ किसी (म्भारक) धर्म के द्वारा सपने से भिन्न ध्यकि पर प्ररुट किया जाता है। (१८६) (फारिवा में) 'पुतोपि' (किसी से नी) सर्मात् (१)'साकार से' प्रपमा (२) संकेत या चेष्टा (इझत) से। 'सूदम:' सर्थात् तीव बुदि पाले व्वक्ियों द्वारा संपेध सथया राष्रपमात्रपेव । उदाहरस- (१) किसी (प्रगत्भा) सासी ने नायिका के मुक् से टपके प्रह्येश विम्दुर्थों को पारा से तसे में सगी केमर को मिगड़ी हुई (मिनन) देलकर, मुस्फुराहर, इसाद्ो मापिका के पुस्वत्व को पमित्यक्त करते हुए उसके हाथ पर सड़ग का पित्र सदिकित कर दिया ।५३०tt यहां पर पाकृति (गले में प्रर्वेशकृन पुसकुम भेद) को देवफर हिसी सकी 4 द्वार पनुमितभाष हुआ सक्म-मर्य) विपरेत रविभाष है जिमे पाड्ग-रेसाविच के भटयन द्वारा प्रगल्मता के साथ अमित्यक रिया गया है; धशोंकि पुद्र्यों के हाथ में हो कृपाएा होना उचित है। (२) 'घसुर उपनामिका ने नेत्रों द्वारा मनिक रहर्म (प्राहत) को सुवित करने वासे उपपति (बिट) को संफेतकाल का जिजातु नानकर सपने सोसाक्मन को संबुषित कर दिया' ॥५३१) यहाँ पर मिजासित संकेतकाल (सुष्म मयं) है निमे किसी (धतुर) पामिनी ने नेव-संक्त से समभ लिया सपा रातरिकाल के सूचक (पमित्) पमननगशोवन दारा सोसापूर्यंक प्रपट कर दिया। प्रभा-जिंग मरसार में गठ्दयमापनेस (सुश्म) वर्ष को किसी साउक द्वारा भोपहर किमी स्नारक धर्म के द्वारा ससो पर प्रहट निया जाता है, यह मूक्ष्म मसद्ार है। वद दो पार या है -. आनार से मकिप पा प्वायत: जैवे
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दरम उल्लास: ५७५
(१६०) उत्तरोत्तरमुत्कर्षो भवेत्सार: परावधि: ॥१२३॥ परं पर्यन्तभागोऽवधिर्यस्य घाराधिरोहितया तत्रबोत्कर्पर्य विश्रान्तेः। उदाहरगम् राज्ये सारं वसुघा वसुघायां पुरं पुरे सौघम। सौधे तल्पं तल्पे वराङ्गानाऽनङ्गसर्वस्वम ॥५३२। (१६१) भिन्नदेशतयात्यन्तं कार्यकारएभूतयो: । युगपद्धमयोर्यत्र ख्यातिः सा स्यादसङ्गतिः ॥१२४। इह यद्द शं कारएं तद शमेव कार्यमुत्पद्यमानं द्ृप्टं यथा धूमादि। यत्र तु हेतुफलरूपयोरपि धर्मयो: केनाप्यतिशयेन नानादेशतया युगपद्व- भासनं सा तयो: स्वभावोत्पन्नपरस्परसङ्गतित्यागादसङ्गतिः। उदाहरएम्- जस्सेअ वसो तस्सेश्न वेअखा भराइ तं जणो परिश्र्म। द·तक्खअ्र कवोले वहूए वेअ्सा सवत्तीगाम् ।५३३। 'वक्त' इत्यादि में तथा २. इद्धित से लक्षित का प्रकाशन; जैसे 'संकेत' इत्यादि में। (देखिसे अनुवाद) भामहाचार्य ने 'मूक्ष्म' अलद्दार की मान्यता का विरोध किया था (काव्यालद्वार २'८६)। अनुवाद-(४३) 'सार' वह अलङ्कार है जहां चरमसीमा पर्यन्त उत्तरो- तर उत्कर्ष का बरान होता हे। (१६०) परः अर्थात् (वाक्यों का) अन्तिम भाग ही है 'अवधि' अर्थात् चरमसीमा जिसकी (ऐसा उत्कर्ष); क्योंकि वहाँ (वाक्य के भन्तिम भाग में) ही प्रवाहरूप से उत्कर्य को समाप्ति होती है। उदाहरस- 'राज्य का सार पृथ्वी है पृथ्वी का सार नगर है, नगर में सारभूत है- प्रासाद (सोंध), प्रासाद में भी शय्या (सेज) और सेज का सार है-कामदेव की सवस्वरूपा सुन्दरी ।।५३२।। प्रभ :- यहाँ पर राज्य में पृथिवी को सारभूत कहा गया है पृथिवी में नगर को-इस प्रकार उत्तरोत्तर उत्कृप्टता का वर्सन किया गया है और यह उत्कयं-वंन वाक्य के अन्त में सुन्दरी मे पराकाप्ठा को पहुँच जाता है भर्थात् सुन्दरी की सर्वोत्कृ- प्टता में पर्यवसित हो जाता है पतएव 'सार' अलद्कार है। अनुवाद-(४४) असङ्गति वह अलङ्फार है जहाँ कारय-फारसरूप धर्मों के सत्यन्त भिन्न स्थांनों में एक साथ रहने का कथन (एपातिः) किया जाता है।
इस लोक में जिस स्थान में (यः देशः यस्य तत् यद्देशम्=जिस स्थान वाला) कारए होता है उस स्थान में ही काय उत्पन्न हुआ देला गया है; जैसे-धम आादि
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५७६ ] काय्यप्रका:
(यग्यैव घगस्तरयैव चेदना भमनि तब्जनोड़लीकम्। दन्तक्तं कपोले वध्वा वेदना सपलीनाम्।।५३३॥।) एपा च विरोघषाविनी न विरोध: भिन्नाधारतयैव द्योरिष विरो- घिताया: प्रतिभासात। विरोधे तु विरोधित्वम् एकाशयनिष्ठमनुक्तमपि पर्य- वसितम् अपवादविषयपरिद्यारेशोत्सर्गर्य व्यवरिथतेः। तथा चैवं निपर्शि- तम! (काय यहों होते है जहां इनके कारए श्रग्नि मादि होते हैं)। किन्तु जहां किसी विशेषता का प्रतिवादन करने के लिये (केगाप्पतिरापेन) कारए औौर काय एम होते हुए भी दो पदायों (धर्मों) का एक साथ भिन्न-भिन स्थानों में रहना प्रफुट किया जाता है (अयभासनम्) यह उन दोनों (काय-कारस) को स्वाभाषिक सम्भति (एक देश-सिथति) का परित्याग कर देने से पसक्गति (मतहकार) कहलाती है। जसे- 'जो लोम यह कहते है कि जिसके वए होता, है उसे ही पीड़ा होती है, वह
है' ॥x३2h भट है; ध्योंकि दन्त-प्षत तो बधू के फपोत पर है। फिम्तू वेदना सपह्यों को होती
प्रभा-गता दन्तकत कारणा है और वेदना काय। इन दोनों की मिन्न-मिस स्थानों में विदयमानता का पगन किया गवा है। वगू के कपोलों पर रिसाई देने याला पति का दन्तकात गपत्नियों के लिये सत्यन्त वलेशयायक है-दस विशेष भर्थ का प्रति- पाइन कग्णा ही इस कथन का प्रयोजन है। भव एव यहा पहामति मनद्वार है। अनुवाद्-[पसक्मति घौर विरोघाभास का अन्तर] वह(परसद्दति) बिरो पानास को वायक है, विशोषाभास नहीं है। य्योकि इस (परसभति) में भिन्न-मिन्न आाषार में होने से हो दोनों (पार्य और फारल) का विशेप भगरता है किन्तु विरोधाभास (पतदगार) में तो बिना पहे भी (मिनन-मिन बैनवर्ती वातुयों का) एक पाषार में रहना रूप विरोध हो सात्पयं का नियम है (वर्मयसिनम्) 1 बर्मोकि अपपाद के विषय का परिरयाग करके हो सामान्य नियम (उत्तरग) को स्ववस्या (मागू होगा- Application) होते है। कोर उसी प्रकार (पिरोधाभाग था) बदाहरल भी रिया गपा है। प्रभा- (१) 'एगो घ' इत्यादि में अगपति अवद्वार का विरोपाभाग सेभेर दिगलाया गया है। भाय यह है कि पद्यमि सनुशति, (न बन सफना) रूप निरोध दोनों में ही समान है वयागि दोनों पर क्षेन भिन्नभिंत् है। (i) नियसपूपर गगानदेश में रहने वाले कारय सोर वान्सा या भिषन-मिन देशों में एक काप रहने का वर्न अगपति है तपा भिन्न-भिन्न सथानों मे निवतसर से रहने नायों गा एक पाशव मे दगृन परना पिरोयाभाग है। (ii) विरेष सामान्य निगम (उरलर्ग) हे योर सममवि अपवाद की पाः अमसृति मपने क्षेत्र में विशेष को बाभिता है। प्पार विशेपाभाग मे रक्षम (ररद) में यद दितलाना नहीं गता तवापि 'रास्य पारसार्यनषम मृत
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दशम उल्लास: [ ५७७
(१६२) समाधिः सुकरं कार्य कारणान्तरयोगतः । साधनान्तरोपकृतेन कर्तरा यदफ्लेशेन कार्यमारळ्यं समाधीयते स समाधिर्नाम। उदाहरणम्- मानमस्या निराकत्त पादयोर्मे पतिष्यतः । उपकाराय दिप्ट्य दमुदीए घनगर्जिंतम्॥५३४।। उत्सर्गोडभिनिविशते' अर्थात् अपवाद-स्थल को छोड़कर ही सामान्य नियम सपने विषय में प्रवृत्त होता है-इस न्याय के अनुसार यह तात्पर्य-बोव होता है। बात यह है कि 'विरोध: सोविरोघेजपि विरु्द्वत्वेन यद्वचः' (सूत्र १६६)-यहाँ विरोध- कथन में विरोधाभास अलद्धार होता है, यह सामान्यरूप में कहा गया है; किन्तुँ 'भिन्नदेशतया' इत्यादि उपयुक्कत सूय द्वारा विशेष प्रकार के विरोधस्थल में असङ्भति अलद्धार होता है, यह बतलाया गया है। अतएव अपने क्षेत्र (विषय) में असभ्भतति (अपवाद=विशेष) अलङ्कार विरोधाभास (उत्सर्ग=सामान्य) का बाधक होता है। इस अभिप्राय को ध्यान में रखकर ही ऊपर विरोधाभास का उदाहरस प्रदर्शित किया गया है। (२) असस्भति, विभावना और विशेषोकित-तीनों में ही आपाततः विरोध, प्रतीत होता है, जिसका परिहार किया जा सकता है। (भेद) असङ्भति में कार्य और कारए एक आश्रय में नहीं रहते। विभादना में प्रसिद्ध कार के बिना ही कार्य की उत्पति का वर्णन होता है और विशेपोकि में समस्त कारणों के विद्यमान होने पर भी कार्य की अनुत्पत्ति का वन होता है। - - टिप्पशी :- सामान्य (General) का विशेष (Exception) द्वारा बाध हो जाता है, यह लोकसिद्ध ही है। उदाहरणार्भ प्रथमतः यह कहा जाता है कि 'समस्त उपस्थित सज्जन भोजन करेगे' और तत्पश्चात् कहा जाता है कि अनिल- कुमार तथा राजेशकुमार भोजन परिवेषण (परोसना) करेंगे तो उस समय' अंनिन- कुमार तथा राजेशकुमार परिवेपस कार्य हो करते हैं, भोजन नहीं अर्थात् प्रथम सामान्यकथन का द्वितीय विशेप कधन से बाघ हो जाता है। अनुवाद्-(४५) समाधि वह अलद्धार है जहां; (इप्ट कारण के पतिरित्त) स्रन्य कारणों के योग से किसी कार्य के सौकस (सुगमसापूर्वक किये जाने) का वणन होता है। (१६२) सर्थात् जहां प्रारम्भ किया गया कार्य (नियतसायन के अतिरिक) , भन्य साधनों को सहायता से पुक्त कर्ता के द्वारा अनायास हो भली भाँति कर लिया जाता 1 है, वहां समाधि अलद्गार होता है। उदाहरस है- 'इस (नापिका) के मान का निराफरण करने के लिये मैं इसके चरसों में गिरने वाला हो था कि मेरी सहायता के सिये-सौभाग्य से मेघगजना होने सगी' ।५३४1
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५७६ ] काव्यमकाग: Er
(य्यव झगरतरयैव वेदना भगति तज्जनोप्लीकम्। द:्तकतं फपोले चप्वा वेदना सपलीनाम् ।।५३३।।) पृपा च विरोषधाधिनी न विरोध: भिन्नाघारतयैवं द्वयोरिह विरो- घिताया: प्रतिभासात। विरोधे त विरोधित्वम एकाशयनिष्ठमनुकतमपि पर्य- वसितम् श्रपवादविषयपरिद्यारेश्ोत्सर्गक्य व्यवस्थितेः। तथा चैवं निदर्शि- तम।
(काय यहों होते हैं जहां इनके फारए भग्ति यादि होते हैं)। किन्तू जहां किसो विरेषता का प्रतिपादन करने के सिये (मेनाप्यतिरपेन) कारए चौर कार्य रूप होते हुए भी दो मदार्थों (धर्मो) का एक साथ मिन्न-भिस स्यानों में रहना प्रफट किया जाता है (प्रयमासनम्) यह उन बोनों (फार्य-कारस) फी रवामाविक सकासि (एक वेग-स्थतति) का परित्याम कर देने से अरक्गति (पसड्कार) कटसाती ह। जैसे- 'जो लोग यह पहते हैं कि जिसके बख होता है उसे हो पोड़ा होती है, वह नठ है; क्योंकि दा्त-क्षत तो वधू के फपोल पर है। फिग्तु मेदना सपतनयों को होसी है' ॥३३1 पमा-यहाँ दन्नक्षण कारण है मौर वेदना काय। इग दोनों की भिन्न-भिन्न स्थानों में विद्यमानता का यगांन किया गया है। बसू के कपोलों पर दिसाई देने थाला पति का दन्तमत गपल्यों के लिये पत्यन्त वलेमदायक है-दग विरेष भर्ष का प्रति- पादन कन्ना ही इम कथन का प्रयोजन ह। अत एव यहाँ अपसति पतद्वार है। पपनुनाद्-[पसन्गति चोर विरोषाभास का अन्तर] यह (पससति) बिरो घामाघ् की घापक है, विरोधाभास नहीं है; कयोकि इस (परसक्गति) में भिन्न-भिन्न आधार में होने से ही बोनों (कारय और फारस) का विशोष नगरता है हिन्तु विरोधाभास (पतद्दूार) में तो बिना पहे भी (मिन्न-भिन्न देववर्ती वातुपों का) एक परायार में रहना रूप विरोध हो सातपर्य का नियय है (पवयसितम्।। वयोकि सपवाद के नियय का परित्याग करके ह सामान्य नियम (उस्ग) को ध्ववरमा, (सायू होना Application) होती है। और उसी प्रकार (विरोधाभास था) उवाहरस भो रिया
: प्रमा- (१) 'एपा घ' पत्यादि में मगगनि पचद्वार भा विगेधानास से भेव गया है।
दिमनाया गया है। नात यह है कि यदपि सनुफाति (न बन सकना) रप विरोध दोनों में ही समान से सपर्गप दोनों का क्षेत्र मिन्न-भिनन है। (i) नियमपूर्षक समा्वरय में रहने वाले पार मोर मनरस का मिसनिम देशों में एक काम रहने का मर्ऐन मगज्ति है तवा निन्न-भिन्न रमानों में निभ्ास् से रने मानों का एक माथम मे वर्गंन करना मिरोषाभान है। (ii) विरेष सामान्य नियम (वरमवे) है और समद्ृति पपपार है पमः पमसति पपने क्षेप में विशोध को वामिषा है। मवप निर्मेशभास मे मसरा (स्पडप) में यद रिगमाबा नहीं गना ममापि 'ब्रारप पापपार्दोरपर्य दा
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दशम उल्लार: ५७७
(१६२) समाधि: सुकरं कार्य कारणान्तरयोगतः । साघनान्तरोपकृतेन कर्त्रा यद्क्लेशेन कार्यमारव्यं समाधीयते स समाधिर्नाम। उदाहरणम्- मानमस्या निराकत्त पाद्योर्मे पतिष्यतः । उपकाराय दिप्ट्य दमुदीर घनगर्जितम्॥५३४।। उत्सर्गो5भिनिविशते' पर्थात् अपवाद-स्थल को छोड़कर ही सामान्य नियम अपने विषय में प्रवृत्त होता है-इस न्याय के अनुसार यह तात्पर्य-बोध होता है। बात यह है कि 'विरोध: सोऽविरोधेऽपि विरुद्वत्वेन यद्वचः' (सूत्र १६६)-यहाँ विरोध- कथन में विरोधाभास अलङ्कार होता है, यह सामान्यरूप में कहा गया है; किन्तु 'भिन्नदेशतया' इत्यादि उपरयुक्त सूत द्वारा विशेष प्रकार के विरोघस्थल में असङ्गति अलद्धार होता है, यह बतलाया गया है। अत्एव अपने क्षेत्र (विषय) में भ्रस्भति (अपवाद=विशेष) अलङ्कार विरोधाभास (उत्सर्गं=सामान्य) का बाधक होता है। इस अ्भिप्राय को ध्यान में रखकर ही ऊपर विरोघाभास का उदाहरस प्रदर्शित किया गया है। (२) असङ्भति, विभावना और विशेषोकिति-तीनो में ही आपाततः विरोध, प्रतीत होता है, जिसका परिहार किया जा सकता है। (भेद) असङ्गति में कार्य और कारण एक आश्रय मे नहीं रहते। विभावना में प्रसिद्ध कारस के बिना ही कार्य की उत्पत्ति का वर्णन होता है और विशेपोक्ति में समस्त कारों के विद्यमान होने पर भी कार्य की अनुत्पत्ति का वर्णन होता है। टिप्पसो :- सामान्य (General) का विशेष (Exception) द्वारा बाघ हो जाता है, यह लोकसिद्ध ही है। उदाहरणार्थ प्रथमतः यह कहा जाता है कि 'समस्त उपस्थित सज्जन भोजन करेंगे' और तत्पर्चात् कहा जाता है कि अनिल- कुमार तथा राजेशकुमार भोजन परिवेषए (परोसना) करेंगे तो उस समय भंनिल- कुमार तथा राजेशकुमार परिवेपस कार्य हो करते हैं, भोजन नहीं अर्थात् प्रथम सामान्यकथन का द्वितीय विशेप कथन से बाय हो जाता है। अनुवाद-(४५) समाधि वह अलद्धार है जहां; (इप्ट कारस के प्रपरतिरिक) श्रन्य फारों के योग से किसी का्य के सोफर्य (सुगमतापूर्यक किये जाने) का वसंन होता है। (१६२) पर्थात् जहाँ आरम्भ किया गया फार्य (नियतसाधन के अतिरित्त) भ्रन्य साधनों की सहायता से युक्त कर्ता के द्वारा अनायास ही भली भांति फर लिया जाता है, वहाँ समाधि पलङ्गार होता है। उदाहरस है- 'इस (नायिका) के मान का निराकरस करने के लिये में इसके घरणों में गिरने चाला ही था कि मेरी सहायता के तियेसौभाग्य से मेपगजना होने लगो'
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५७८ काव्यपफाल:
(१६३) समं योग्यतया योगो यदि सम्भावितः ववचित् ॥१२५।। इदमनयो: इलाध्यमिति योग्यतया सम्यन्वस्य नियतविषयमध्यपसान वेतदा समम्, तत्सदोगेउपय्योगे च। उदाहरगम्- १. घातु: शिल्पातिशयनिकपस्थानमेपा मृगाक्षी रूपे देवोऽपययमनुपमो दृत्तपत्रः स्मरस्य। जातं देवात्सदशमनयो: सङ्तं यच्तदेतत्। शृद्गारस्योपनतमघुना राज्यमेकातपत्रम ।।४३४।।
प्रभा-(१) समाधि का अरथ है-सम्मक भधिः उत्पादनम् पर्मात् माय के मनापास हो रम्यक सम्पादन, का बसन। यही लक्षए द्वारा स्पप्ट किया गया ह। सोक्यं का म्थ है काय का मनायास ही भली भांति हो जाना। (२) समाधि और समुन्चय-दोनों में हौ एक से अधिक कारत किसी कार्य के उत्पादक होते हैं; किन्तु (i) समुच्चय में सभी कारस एकसाय (सतेवपोव- न्याय से) कारय करते हैं मौर समा्य में एक (प्रधान) बारसा पहिसे कार्य करना भगरम्भ करता है मन्य कारस बाद में भफस्मात् ही (काकसालीय न्याय से) भा जाता है। (ii) 'साघनान्तरोपकृतेन (कारखान्तरयोगतः) से यह सूचित होता है क जहां एक कारए प्रधानतया विवकित होता है तथा भन्व साहकारी रुग में यह़ीं 41 - समापि भसद्कार हुआ करता है। (३) 'मानम्' इत्यादि में -पादपतन (फारण) द्वारा मान का निराकरा (कार्म) किया जा रहा था। मावस्मिक भनगर्जन (कारशन्तर) के राहयोग से वद काम मनायास ही हो गया; मतः यहां समाधि मनद्कार है। अनुवाद-(४६) 'सम' अलद्धार तब होता है जब किन्हीं बामुयों का सम्बग्य (शवसित् योग:स=यसतुविरोपयो, राम्यन्यः) भौषित्य के कारल सर्वसाभा मतलाया जाता है (सम्मायितः) ute२li 'यह इन बोनों के लिये सराहनीय है' मदि इस प्रकार (एति) बलनौर वरतुमों के (निमतदिपयं=वहनीयं विपमौहृत्य) राम्यन्य मा स्रौषित्वर्प में निसषप (सम्चवसानं) होता है सो 'सम' मतक्ार होता है। यह (१) ही सोभन पहाशे के योग में सपदा (२) पशोभन मदामों के योग में-(सो प्रशार का होताह।। जाहरए है- अरनुषाद- (१) 'यह मृगनमनी (नाविका) विपाता के निर्गातारोतत के मरुर्ष को कसोटो है। सोन्य में सनुपम यह्ट राजा (गापक) भी बामदेव को दषे
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दशम उल्लास: ५७६
२. चित्रं चित्रं वत वत महच्चित्रमेतद्विचित्रम् जातो दैवादुचितरचनासंविधाता विघाता। यन्निम्बानां परिएतफलरफीति रास्वादनीया यच्चैतस्या: कवलनकलाकोविद: काकलोकः॥५३६।। (१६४) क्वचिद्यदतिवैधर्म्यान्न श्लेपो घटनामियात् । कर्तु : क्रियाफलावाप्तिनैवानर्थश्च यङ्वेत् ॥१२६।। गुणक्रियाभ्यां कार्यस्य कारणस्य गुएक्रिये। क्रमेए च विरुद्ध यत्स एप विषमो मतः ॥१२७॥ द्वयोरत्यन्तविलक्षणतया यद् अनुपपद्यमानतयेव योग: प्रतीयते(१) यच्च किञ्चिदारभमाण: कर्ता क्रियाया: प्रणाशात् न केवलमभीष्टं यत्फर्ल न लभेत यावदताथितमप्यनर्थ विषयमासादयेत् (२) तथा सत्यपि कार्यस्थ (चुनौती) दे चुका है। जो सौभाग्य से इन दोनों का मिलन हुआ है यह इस समय शृङ्गाररस का एकच्छत्र राज्य हो हो गया है' ।५३५।। (२) 'भ्राश्चर्य । आश्चयं! श्रहो ! महान् आ्रश्चयं ! यह तो विचिन्न ही है कि विघाता भी सौभाग्य से उचित रचना करने वाला हो गया है; क्योंकि नीम के पक्के फलों (निमोलियों) की समृद्धि (स्फीति) भी स्वाद लेने योन्य हो गई है और इस (फलसमृद्धि) की आस्वादनकता में कुशल फाकगए निर्मित किये गये हैं' ।५३६। प्रभा-(१) भाव यह है कि जहाँ दो वस्तुओं के सम्बन्ध का वणन करते हुए यह बतलाया जाता है कि इनका यह सम्बन्ध सराहनीय है वहाँ सम अलड़्कार होता है। यह दो प्रकार का है-प्रधम; जैसे 'धातुः' इत्यादि में मृगनयनी और राजा दो शोभन पदा्थों के मिलन की श्लाघनीयता का वर्सन है। द्वितीय; जैसे-'विथम्' इत्यादि में निम्ब तथा काक दो निकृष्ट पदार्थो के योग का श्रचित्य वखित है।" (२) सम औ्रौर समुच्चय-दोनों में सद्योग औप्रर अ्र्प्रसद्षयोग का बसंन होता है। (भेद) समुच्चय में उत्कृष्ट या निकृष्ट कारगों का ही योग होता है जो एक कारय का उत्पादक हुआ करता है। किन्तु सम में जो कारस नहीं होते ऐसे उत्कृष्ट या निकृष्ट पदार्थों के सम्बन्ध का श्रचित्य दिखलाया जाता है। अनुवाद-(४७) वियम वह प्रसद्धार माना गया है (१) ज्हा कहीं (को सम्बन्धियों का) सम्बन्ध (इ्लेयः) अ्तिर्थधम्यं (विलक्षणता) के कारए उपपन्न न हो सके (घटनाम्=उपपन्नताम् इयात) (२) फर्ता को किया के फल को प्राप्ति न हो प्रत्युत सनर्य हो जाद। (३४) जहां कार्य के गुए तथा क्रिया से कारण के गुल तथा किया कमशः विरद्ध हों। (१६*) पर्थात् (१) दो (सम्बद्ध वस्तुओं) की पत्मन्त वितदाएता के कारस उनका रम्बन्य सनुपयुक्त ही प्रतीत होता है (२ जो किसी काय का भारम्भ करमे
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५c० काय्यप्कार:
कारगरुपानुकारे यत् तयोरगुी किये च परापरं विरद्धता व्रजतः (३४] स समविपर्ययात्मा चतूरूपो विपमः । करमे पोदाहरणम- १. शिरीपादपि मृद्धझ्गी कचेयमायतलोचना। अयं क्व घ कुकूलाग्निक केशो मदनानल: ॥५३७॥ २. सिददिकासुत संत्र्तः शश. शीतांशुमाप्ित: जमसे साक्षयं तन्न तमन्य: सिंहिकासुतः ॥।५३=॥। २. सद: करस्पशमवाप्य चिन्न रखे रणे यश्य कृपाणनेखा। - तमालनीला शरदिन्दुपाएड्ु यशस्पिलोक्याभरणा प्रसूने ।।४३६॥ वाला कर्ता किया के नष्ट हो जाने से केवल पभोप्ट फल से हो वञ्चित नहीं रहता परपितु न घाहे हुए पनिष्द पदार्थ को भी प्राप्त करता है। औौर, कार्य के कारस का पनुसरण करने का (नियम) होने पर भी जो उन दोनों के (३) गुल परस्पर विषस हो जाते हैं एयं (४) कियाएं पररपर विर्द्ध हो जाती है। यह सम मसद्ार का विपमंय रूप घार प्रफार का विपम अलसधार है। पमतः जवाहरए ये हैं- (१) विरीय दुसुम से भी कोमस वङ्म यासी यह विश्ालनेत्रा (नामिका) पर्हा औौर सुपानल के समान दुःसह यह फामान्ति कहा ?' ।५३७॥। प्रभा-इम [पद्मगुप्पद्टत नवमाहमाद्कचरित १६.२८] पद् में नामिना तथा मदनानन दोनों के सतपन चलमण्य के पारस उनवा सम्यन्प अनुपन्न मा प्रतीष हो रहा है। मतः प्रथम विपमालहकार है। अनुवाद- (२) सिहिकामुत सर्थात् सिहनी के पुत्र से उहे हुए राघ (सरगोस) ने (रक्षा के लिए) चन्द्रमा का आयम सिया; फिम्तु यहा हिसोप सिहिरा भुत (तिहिफा के पुत्र राह) ने प्राथमसहित (चन्ट्रमामहिन) उसको पस सिमा ।३८। प्रभा-यह।ं मशफ (पर्सा) ने मिहिनी के पुन से पासा (फन) के मिपे पन्द्रमा का साधपस (वाष) मारम्भ किया, किन्तु नागसप सभीष्ट पन की धुर सन्धि हो नहीं होनी सपितु शह्र द्वाग पगन रप भवर्य भी पत्ति भी होतो है। स: द्विवीय विषमालदहार है। + ' अप्रनुवाद-(३) 'प्रश्येक संग्राम में समासत के समान पासी इपाल को धार जिस (राजा) के करनपर को प्राप्त बरके ताकास ही नरब के भन्टमा के सामान धुभ्र सोकयम के सामूमरा एय मदा को नत्पन्न करती है ।x।।। प्रमा-चह नियन है कि भारत के ममान गूरा पामा हे कार्म होगा है, जैगे
पारपारा मे मुधनमम को कर्शण शा बरखन से सवएर मा् तपा पारस के जड्ों में निरोप से तथा भूष्य नितमानर दर है।
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देशंम उल्लास:
४. आनन्द्ममन्दमिमं कुबलयदललोचने, ददासि त्वम। विरहस्त्वयैव जनितस्तापयतितरां शरीरं मे ॥५४०॥ अत्रानन्ददानं शरीरतापेन विरुष्यते। एवं- विपुलेन सागरशयस्य कुच्िणा भुवनानि यस्य पपिरे युगक्षये। मद्विभ्रमासकलया पपे पुनः स पुरस्त्रियैकतमर्येकया हशा ॥।५४१॥ इत्यादावपि विपमत्वं यथायोगमवगन्तव्यम्। अनुवाद-(४) 'हे कमलपत्र के समान नेत्रों वाली, (सयोग के समय) तुम तो यह अनल्प आनन्द देती हो; किन्तु तुम्हारे द्वारा ही उत्पन्न किया हुआ वियोग मेरे शरीर को अत्यन्त संतप्त करता है'॥५४०॥ -4- यहाँ पर आानन्द-प्रदान (क्रिया) शरीर-संतापन किया से विरुद्ध है। प्रभा-यहाँ पर नायिका कारण है विरह उसके द्वारा जनित (कार्य है, किन्तु नायिका में आनन्द-प्रदान की किया है तथा विरह में सन्ताप देने की। ये दोनों विरुद्ध हैं। अतएव यहाँ चतुर्थ विषमालडकार है। r
विषम, विरोध और पसन्भति - (समानता) इन तीनों में ही एक आपाततः विरोध की प्रतीति होती है; जिसका परिहार किया जा सकता है। (भेव) विरोधाभास में तो विरोधी वस्तुओं का एक आधार में होना चमत्कारकारक होता है तथा असद्भति में कार्य और कारण का भिन्न-भिन्न आश्रय में होना। यहाँ (तृतीय चतुर्थ विषम में) तो कार्य तथा कारण में विजातीय गुए तथा किया का सम्बन्ध- वन ही चमत्कारक हुगर करता है। अनुवाद-इस प्रकार-'सागर में शयन करने वाले जिस विष्यु (धरीकृप्स) के विशाल उदर ने प्रलयकाल में चतुर्दश भुयनों का पान किया था (अपने भीतर रख लिया था), उस (फृप्ए) को भी एक नगरकामिनी ने (धपनी) मदजन्य हाव भाषों (विभ्रम) से युक्त तथा असम्पूरएं एक हो दृष्टि (नेत्र-प्रान्त) से पी लिया (भादर के साथ देखा)' ॥।५४१॥ इत्यादि (पद्य) में भी यथायोग (सम्बन्ध) या अ्प- सर के अनुसार वियम पलङ्गार ही समभना चाहिये। प्रभा-(१) 'विपुलेन' इत्यादि में विप्णु का उदर (अ्रवयव) तो पानशिया का कर्त्ता है; किन्तु शरीर (अवयवी) पानकिया का कर्म है। इम प्रकार अवयव और भवमवी दो सम्बन्धियों के सम्बन्ध की विपमता है तथा विपमालङ्कार है। उद्योत व्यास्या के अनुसार यहां विपम अलङ्कार दो प्रकार से है- एक तो सागर-रामन मर सागरसहित चतुदंश भुबनों का पान करना-यह विपम है। दूमरे जिसकी कुकि ही चतुर्दश भुधन को पीने में समर्थ है उस (समस्त अवपवी) का नयन-छोर मात्र से * पिया जाना-यह विषम है।
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५०३ j कान्यप्रकारी:
(१६५) महतोर्यन्महीयांसावाश्रिताश्रपयोः कमात् । आ्ाश्रयाध्रयिरौ स्यातां तनुत्वेऽ्यधिकं तु तत् ॥१२८।। आश्रितमाघेयम् आश्रयस्तदाघारः। तयोमंदतोरपि विपये तद्पेचया सनू अप्याध्रयाश्रयिसी प्रातुतवस्तुप्रकर्षविवक्षया यथाक्म यद अधिकतरतां ब्रजत: तदिदं द्विविधम अधिक नाम । क्रमेगोदाहरएम- शद्दो विशालं भूपाल, भुघनत्रितयोदरम। माति मातुमशक्योऽपि यशोराशिर्यदध ते ।।५४२।। युगान्तकाल प्रतिसंहतात्मनो जगन्ति चस्यां सविकाशमासत। तनी मसुग्तत्र न कैटभट्विपरतपोवनाभ्यागमसं्भवा सुदः ।४४२॥ (२) कुछ टीफाकरो ने इस उदाहरण का विषम के उपमुंक पार भेदों (प्रथम या पतुर्ष प्रकार) में हो भन्तर्भाव किया है। वस्तुकः तो एवम्' इत्यादि प्रन्य पा मह भभिप्राय है कि छृन में जो विषम अलडकार के चार भेद किये गये हैं ये. उपलक्षसा मात है: 'विपुलेन' इश्यादि उदाहूरणों में अत्य प्रकार का निषम मनड्कार भी देसा जाता है पतः जहा योगईषम्य (नमधिरबात) है वहाँ वियम मसदकार जानना पाहिये। साहित्पदपंसकार ने तो विस्पसंघटना' नामक विपम-मसड्कार के एक मन्य भेद में ऐमे बदाहरणीं पन सन्वभाष कर दिया है। अनुपाद-[महतो: प्राधिताधपपोः कमात् पाममायमियी सवयप पा. महोमासी स्थाता तत् तु अषिरम्-यह सनन्यय है। (४८) अधिरु यह अलकार है जहां बड़े पाथित सर्पात साधेय और प्राधम सर्थात् सायार में कमराः भापार मौर पापेप (पाथमो) छोटे होने पर भी धषिक यड़े बित किये जायें। (१६५) सर्पात् (सूप्र में) पाधिन का धरय है-प्रापेव मोर आमम का धर्म है- सापार उन दोनों (पाधेप तथा साधार) के विसाल होने पर उनरो पपेशा मत् भी साधार पौर आपेव वहांनोपयस्तु का नत्कर्ष-प्रतिवादन के लिये पदि कमाा: धपिसता को पहुद जाते है; यह यह दो प्रकार का (क) [पाधारन्महश्वनपणन, (प) धायेमनमहत्य-पर्सन] धषिक पसभ्वार होना है। नममः नराहाल ह- (र) 'है भूपात, सोनों लोटों का उदर बहुत मड़ा है: पाइप्यं है कि सुप्हारी पपरिमेय पतो राशि भी इसमें समा जाती है.॥५४२।। (स) [मायशम् १.२३; नारद दुति के आापमन पर पीडप्स के दुपें, का बलन] प्रसयशात में समह नीयों को अपने भीतर (प्रारमनि) समेट सेने बाले बेंदम के रातु मिर थोटप्ल (विस्स) के शरोर में सतुबंस भूबन (सगनता) बिसतार सविम (सारकारा शुमरुर) हिमन हो जाते है। बमी शरोर में सरायी नारत के भागषन से
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दशमे उल्लास: ५८३
(१९६) प्रतिपक्षमशक्तेन प्रतिकतुं तिरस्क्रिया । या तदीयस्य तत्स्तुत्यै प्रत्यनोकं तदुच्यते ॥१२९॥ न्यक्कृतिपरमपि विपक्ष साक्षान्निरसितुमशक्तन केनापि यत् तमेव प्रतिपक्षमुत्कर्पयितु' तदाश्ितस्य तिरसकरणम् तद् अनीकप्रतिनिधितुल्यत्वा- त्प्रत्यनीकमभिघीयते। यथाऽनीकेडमियोज्ये तत्प्रतिनिघिभूतमपरं मूढतया केनचिद्भियुज्यते तथेह प्रतियोगिनि विजेये तदीयोऽन्यो विजीयते इत्यर्थः1 उदाहरगम्-
प्रभा -अधिक अलङ्कार दो प्रकार का है। (क) प्रथम जहाँ आघेम विशाल होता है तथा आधार उसकी अपेक्षा छोटा होता है; किन्तु वर्णनीय के उस्कर्प का बोध कराने लिए आघार के महत्व का वर्णन किया जाता है। जैसे-'महो' इत्यादि में कविविवक्षा के कारण यशोराशि रूप आधेय विशाल है, त्रिभवन रूप आधार उसकी अपेक्षा छोटा है; किन्तु उस (आधार) का महान् (विशाल) रूप में वसंन किया गया है। जिससे यशोराशि का उत्कर्ष प्रतीत होता है; अतएव प्रथम अ्रधिक' अलङ्कार है। (ख) द्वितीय-जहाँ आधार विशाल होता है; तथा अघेय उसकी परपेक्षा छोटा होता है; किन्तु वर्णनीय के उत्कर्प का बोध कराने के लिये हाथेय के महत्त्व का वर्णन किया जाता है; जसे- युगान्त' इत्यादि में भगवान् कृप्ण के शरीर. की अत्यन्त विशालता कही गई है; नारदमुनि के आगमन से होने वाला हप उसकी अपेक्षा लघु है; किन्तु उसका महान् रूप में वर्णन किया गया है जिससे हर्ष की महत्ता प्रकट होती; हैं अतएव द्वितीय अधिक अतङ़कार है। अनुवाद-(४६) 'प्रत्यनीक' अलद्धार वह कहा जाता है जहां प्रतिपक्षी का प्रतिकार करने में असमर्थ (किसी) व्यक्ति के द्वारा उससे सम्बन्ध रखने वाले (तदोयस्य) पदार्थ का उस (प्रतिपक्षी) के उत्क्ष को प्रकट करने वाला तिरस्कार किया जाता है। (१६६) पर्यात् पराभव में तत्पर भी शत्रु को साक्षात् जीतने (निरसितुम्) में भ्स्तमर्थ होकर जो फोई व्यक्ति उस (शत्र) के आश्रित का ऐसा तिरस्कार करता है जिससे उस शभ्ु का उत्कर्ष ही प्रकट-होता है (प्रतिपक्षमुत्कषमितुम् प्रतिपक्षोत्कर्वफलकग), वह धनीक सर्थात् (शत्रु) सेना के प्रतिनिधि के समान होने के कारए प्रत्यनीक (असक्कार) कहा जाता है। जैसे सेना के दण्डनीय (धभियोज्ये=पीडनीये) होने पर किसी के द्वारा मूखता से ध्रन्य (उसके प्रतिनिधि) को मीडित किया जाता है उसी प्रकार यहाँ भी नेलव्य (गोतने योग्य) तो ःत है; शिन्तु उस्से सम्बन्ध रसने वाले। किसी अन्य का तिरसकार किया जाता है (मिजीयते=अभिभूयते) यह धप है। उवाहरए है-
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काव्यतकारी:
(१६५) महतोर्थन्महीयांसावाशिताश्रययोः कमात्। आाश्रयाश्रयिशी स्यातां तनुत्वेऽ्यधिकं तु तत् ॥१२८।। अशितमाघेयम् आश्नयस्तदाघारः। तयोर्महतोरपि विषये तदपेक्षया तनू अप्याधयाश्रयिणी प्रसतुतवसतुपकर्पविवक्या यथाकमं यद् अधिकतरतां प्रजतः तदिर्द द्विविधम अधिकं नाम। कमेयोदाहरगम्- अह्दो विशालं भूपाल, गुवनवरितयोदरम। माति मातुमशक्योऽपि यशोराशिर्यदत ते ।।५४२।।' युगान्तकालप्रतिसंदतात्मनो जगन्ति वस्यां सविकाशमासत। तनी ममुग्तन न कैटभद्वियरतपोघनाभ्यागमसम्भवा मुद्ः ।४४:॥ (२) पुद टीकाकारों मे इम उदाहरस का विषम के उपपुर् धार भेदों (प्रथम या पतर्थ पकार) में ही मव्वर्भाव किया है। यहाछः तो एवम्' इत्पादि ग्रन्प का यह अभिप्राम है कि मृत में जो वियम अलह्कार के चार भेर किये गये ह यें उपलबस मान है: 'विपुसेन' इत्यादि उदाहुक्लों में अन्त प्रकार का विगम मलदकार भी देसा जाता है पतः नही बोगवपत्य (ममविर्याग) है यहाँ विपन मनद्फार जानना चाहिये। साहित्यसंकर ने तो 'विरपसंघटना' नामरु निषम-पनडवार के एक मन्य भेद में ऐगे उदाहरसों का मन्सर्भान कर दिया है। अनुवाद-[महतो: साधिताधपमो: पमात् भाधपायमिलौ सनुत्येनत पत् महोपासो रयाता सत् सु मधिरम्-यह घनन्यम है] (v) धमिक यह समभूा है नहां पड़े भामित पर्पात् भमेम औौर वाध्रम सर्पात सापार में कमताः स्ापार बोर पापेम (पायपो) छोटे होने पर भौ सविक यड़े बखित किये जायें। (१६x) सर्थाम् (सूत्र में) साधिन का धर्म है- पाधेन औौर सायम का सर्म है- पामार उन दोनों (पाधेय तना पापार) के विसाल होने पर उनरो सपेका प्रक भो सामार औौर पापेम पहोंमोववत्मु का उररुर्ष ्पतिपादन के सिये मरि कगताः प्रपिकत को पहुच जाते है: यह यह दो प्रकार का (६) [पामार-महश्जपंन, (न) पापेममहतव-परान] पपिर ममखार होना है। पममः उमहरत ह- (र) 'ह भुपात, सोनों सोडों का उदर बहुत बड़ा है: आम्ब्नं है कि सुस्हारी पपरिमेप मतोराति भी उसमें समा जाती हैं ।१ । (स) [मायशष्य १.२३ मारय मुति के पापमव पर बीहा्स के हपं ॥ा पर्सेम। प्रसरभात में सपात जोषों को सरने भोतर (पामति) सपेर मेने बाने ईवभ के दातु जिस बोहदसर (दिन्य) के शरीर में चदुबंभ भुबन (सवस्ति) शिर सहित (गतराा गुमटुर) हिपत हो बाते है: बमी सरोर में सगाजी माहर के प्रागमन मे नपम होने पाले प्रानन्द न गया सके सह"।।।
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दशमैं उल्लससि: ५८३
(१९६) प्रतिपक्षमशक्तेन प्रतिकतु तिरस्क्रिया। या तदीयस्य तत्स्तुत्यै प्रत्यनौकं तदुच्यते ॥१२९॥ न्ययकृतिपरमपि विपक्षं साक्षान्निरसितुमशक्तन केनापि यत् तमेव प्रतिपक्तमुत्कर्पयितु' तदाशितस्य तिरस्करणम् तद् अ्रनीकप्रतिनिधितुल्यत्वा- स्प्रत्यनीकमभिधीयते। यथाऽनीकेडभियोज्ये तत्प्रतिनिघिभूतमपरं मूढतया केनचिद्भियुज्यते तथेह प्रतियोगिनि विजेये तदीयोऽन्यो विजीयते इत्यर्थः। उदाहरगम्-
प्रभा- अधिक अलङ्कार दो प्रकार का है। (क) प्रथम जहाँ आधेय विशाल होता है तथा आधार उसकी अपेक्षा छोटा होता है; किन्तु वर्णनीय के उत्कर्प का बोध कराने लिए आधार के महत्त्व का वर्णान किया जाता है। जैसे-'ग्हो' इत्यादि में कविविवक्षा के कारसा यशोराशि रूप आधेय विशाल है, त्रिभुवन रूप आधार उसकी अपेक्षा छोटा है; किन्तु उस (आधार) का महान् (विशाल) रूप में वणन किया गया है। जिससे यशोराकि का उत्कर्ष प्रतीत होता है; अतएव प्रथम अधिक अलङ्कार है। (ख) द्वितीय-जहाँ आवार विशाल होता है; तथा अघेय उसकी प्रपेक्षा छोटा होता है; किन्तु चणंनीय के उत्कर्ष का बांध कराने के लिये ।घेय के महत्त्व का वणन किया जाता है; जैसे-युगान्त' इत्यादि मे भगवान् कृष्ण के शरीर. को अत्यन्त विशालता कही गई है; नारदमुनि के आगमन से होने वाला हुष उसकी अपेक्षा लघु है; किव्तु उराका महान् रूप में वणन किया गया है जिससे हर्ष की महत्ता प्रकट होती; ह अतएब द्वितीय अधिक अलड़कार है। चनुवाद-(४६) 'प्रत्यनीक' अलद्गार वह कहा जाता है जहां प्रतिपक्षी का प्रतिकार करने में असमर्थ (किसी) व्यक्ति के द्वारा उससे सम्बन्ध रखने वाले (तदीयस्य) पदार्थ का उस (प्रतिपक्षी) के उत्कर्ष को प्रकट करने वाला तिरस्कार. किया जाता है। (१६६) परर्थात् पराभव में तत्पर भी शत् को साक्षात् जीतने (निरसितुम्) में भ्रसमर्य होकर जो फोई व्यक्ति उस (शत्र) के आश्रित का ऐसा तिरस्कार करता है जिससे उस शमु का उत्कर्ष हो प्रकट होता है (प्रतिपक्षमुत्कर्षयितुम् प्रतिपक्षोत्कर्पफलकम), वह अनीक सर्थात् (शत्रु) सेना के प्रतिनिधि के समान होने के कारए प्रत्यनीक (अलङ्गार) कहा जाता है। जैसे सेना के दण्डनीय (भभियोज्ये=पीडनीये) होने पर किसी के द्वारा मूखता से ध्रन्म (उसके प्रतिनिधि) को पीडित किया जाता है उसी प्रकार यहाँ भी नेतव्य (जोतने योग्य) तो यत्र है; किन्तु उससे सम्बन्ध रखने बाते किसी भ्रन्म का तिरस्कार किया जाता है (विजीयते=प्रभिभूयते) यह भर्थ है। उबाहुरए है-
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1 फाव्प्रकीपे:
व्वं विनिर्जितम नोभवरूपः सा च सुन्दर, भवत्यतुरक्का । पञ्चभियु गप देव शरीतां तापयत्यनुशयादिव काम: ।४४४। यधा वा- यश्य किल्चिदपकत्त मकमः कायनिमह्गृंदीतविभद्दः।' कान्तयपत्रसदशाफृति कृती राहरिन्दुमधुनाऽपि बाघते ॥४४५।। इन्दोरत् तदीयता सम्पन्धिसम्पन्घात्।
हे सुन्दर, तुम कामदेव के सौन्दर्व को पराजित करने वासे हो और यह कामिनी साप में ही सनुरक है इसीसिये फामवेय मानो छवप के फारस (धनुरवाय् हम) सपने पांषों वासों से एक साथ उस कामिनो को संतप्त करता है ॥२४४॥ अपया जँसे-[मापकाव्य सर्ग १४,७८) 'गिर (फावस्म कामापमवस्य निरस) के देवन (निप्रह) के परए संरभाध मानने वाला, मंरोपन में दुदास (एसी) राद मिस धोटप्स का कुध भी अपसार करमे में ससमर्य होकर उसके कमनीय मुल के समान प्राधर थाले पनद्रमा को राप भी पीड़ित करता है ॥५४।। महां पर चनद्रमा की दूष्टामम्पन्पिता धीहप्स सम्बी (मुत) से सादृटवा- हमक) सम्बन्ध उसने के कारता है। प्रमा - (१) दविपस मा सम्बन्धी (नदीप) दो प्रवार का होता ह- ए सासारम्बन्य से दूमा परमरागस्यत्य मे। शाक्षातमस्बन्ी का वदाहरण 'समू' इश्यादि है। यहां पर कामदेव के र्वस्न को जोत मेने के कारल नापर उया प्रतिपत है। कामदेन उपका प्रतिकार पयने में सममर्ष है समा उरी वामिनी शो संतन्त करता है। कामिनी और नापक का गामात हो र्वस्यामिभाय गापाय है। उस्ेकी ममिनी मे पीसन मे नापर के उत्कर्ष की पजीति हुरती है। भतएब महा प्रमम प्रत्पनीर पनसार है। परमरमा मम््यी का 3:
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देशम उल्लास: 44
(१६७) समेन लक्ष्मणा वस्तु वस्तुना यन्निगूह्यते। निजेगागन्तुना वापि तन्मीलितमिति स्मृतम् ॥१३०॥ सहजमागन्तुर्क वा किमपि साघारणं यत लक्षम, तद्द्वारेण यत्किञ्चित् केनचिद् वस्तुस्थित्यैव वलीयस्तया तिरोघीयते, तन्मीलितमिति द्विधा रमरन्ति। कमेमोदा हरएम्- अपाङ्मतरले दशो मधुरवक्रवर्ण गिरो विलासभरमन्थरा गतिरतीव कान्तं मुखम्। इति स्फुरितमङ्गके मृगहशः स्वतो लीलया तदुन्र न मदोदय: कृतपदोऽपि संलक्ष्यते ॥५४६॥। अत्र टक्तरलतादिकमङ्गस्य लिङ्ग स्वाभाविक साघारणं च मदोद- येन, तन्नाप्येतस्य दर्शनात्। ये कन्दरासु निवसन्ति सदा हिमाद्- रत्वत्पातशद्भितधियो विवशा द्विपसते। अनुवाद-(५०) (मौलित) ।निजेन आगन्तुना वा समेन लक्ष्मणा वस्तु, वस्तुना यत् निगूह्यते तत् मीलितं स्मृतम्-यह अ्वय है]-मोतित अलङ्कार वहु कहा गया है जहां अपने स्वाभाविक प्रथवा कारएविशेष के द्वारा उत्पन्न किसी साधा- रए चिह्न (लक्ष्म) से एक वस्तु अरन्य वस्तु द्वारा तिरोहित कर दो जाती है। (१६७) अर्थात् जो स्वाभारविक (निज) या निमित्तजन्य (श्रागन्तक) कोई साघारस चिह्न होता है, उसके द्वारा यदि कोई फर्ता किसी वस्तु को वस्तुतः बलवान होने के कारस ही तिरोहित फर देता है तो वह दो प्रकार [(फ) स्वाभाविक चिह्न द्वारा तथा (ख) आगन्तुक चिह्न द्वारा] का मीलित नामक अलङ्धार कहा जाता है। कमशः उदाहरख ये हैं- (क) 'नेत्र प्रान्तभागपर्यन्त चञ्चल है, वचन मधुर तथा गूढ प्र्थ वाले (वक) हैं, विलास के भार से मन्द गति है, मुस अत्यन्त मनोहर है-इस प्रकार इस मृग- नयनी के भ्रद्गों में काम-लीला स्वय ही पस्फुटित हो रही है, इसलिये (तत्) इस' (शरीर) में (मधुपानजन्य) मद का पराबिर्भाव स्थान पाकर भी दिखलाई नहीं देता'
यहां पर (नेत्रों) को चञ्चलता इत्यादि (नामिका के) शरीर का स्वाभाविक चिह्न है औौर वह मदोदप (नश्ञा होने) में भी समान ही है वयोंकि वहां (भदोदय में) इस (नेत्रचञ्चलता आादि) का वर्शन होता है। (स) 'हे राजन्, आापके आकम से शद्धित बुद्धि वाले जो भापके शत्रु विवश होकर सदा हिमालय की कन्दराओं में निवास करते हैं। खेद है (बत) कि
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कांळपेकरी:
त्वं विनिर्जितमनोभवरूप: सा च सुन्दर, भवत्यनुरक्ता।, मञचभियु गपदेव शरस्तां तापयत्यनुशयादिव कामः॥४४४॥ यथा वा- यश्य किन्चिदृपकत्त मक्तम: कायनिमहगृद्षीतविगद्दः। कान्तववत्रसदशाकृति कृती राहुरिन्दुमधुनाऽपि बाघते ।।५४५।। इन्दोरत्र तदीयता सम्चन्धिसम्बन्वातूं।
'हे सुन्दर, तुम फामदेव के सौन्दर्य को पराजित करने वाले हो औोर वह पमिनो आप में ही अनुरक है इसीलिये कामदेव मानों द्वंयके कारस (प्नुशयाद् इम) अपने पांचों यालों से एक साथ उस कामिनी को संतप्त करता है॥४४॥ घपथा जैसे-[माघकाव्य सम १४,७८] 'सिर (कायस्व कामावयवस्य शिरसः) के चेदन (निवह) के कारस वरभाष मानने याला, वंरशोघन में बुझत (कृती) राह जिस श्रोकप्स का कुछ भी अपकार करने में ससमर्य होफर उसके कमनीय मुस के: समान प्राकार वाले चन्द्रमा को अथ भी पीड़ित करता है' ॥५४५॥ यरहाँ पर चन्द्रमा की कृष्ससम्बन्धिता क्रीक्प्स सम्बन्धी (मुस) से।सादृश्या- रमक) सम्बन्ध रएने के कारता है। प्रभा- (१) प्रतिपशो का मम्बन्धी (सदीय) दो प्रवार का होता है-एक साक्षात्तम्बन्य से दूमरा परम्परासस्बन्य मे। साक्षात्सम्बन्धी का उदाहरण '्वम्' इर्यादि है। यहाँ पर कामदेव के स्वर्प को जीत लेने के कारस नायक उसपा प्रतिपक्ष है। कामरेव उनका प्रतिकार करने में असमर्थ है तथा उसकी कामिनी को संक्प्त करता है। कामिनी और नायर का साकात् ही स्वस्नामिनोव सम्भन्य है। उसेकी कामिनी के पीडन से नावक के उत्कर्ष की प्रतीति होती है। अतएय यहाँ प्रयम प्रत्यनीक धनक्वार है। परम्परया सम्बन्यी का उदाहरसा 'अस्य' इत्यादि है। यहाँ कृप्श का सवमुन से नम्बन्ध है औौर मुस का चन्द्रमा के साथ साहदप सम्बन्ध है। इस प्कार पनदरमा के साय थीऊप्प का परम्परया सम्वन्ध है। राट्ट के सिरीर के वारस शीकृप्स उसमे गम है। भीकम्ण को जीतने में मसमर्यं रह् श्ीकृप्छ के परम्परया सम्वसधी पन्द्रमा को पीह़ित करता है। रस पसन से थीरच् के उदकर्ग की प्रतीति होती है। अनएव यहां द्वितीय प्रयनीक पतद्धभार है। (र) सर्दप यहाँ प्रथम उदाहूरग में सभावनायक 'हय' शब्द मा प्रयोग किया गया है वया द्वितीय उदाह्ु्स में भी गंभावना की प्रतीति होती है रूमापि यहाँ उरनेश्षा मलखुार नहीं माना जा मवठा; क्योंकि प्रनिपस के सगकार में सतमर्म होहर वस्तम्बग्वी को पीह़ित बरने की प्रतीति ही यहाँ समसारजनक है।
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दशम उल्लास: 44
(१६७) समेन लक्ष्मणा वस्तु वस्तुना यन्निगूह्यते। निजेगागन्तुना वापि तन्मीलितमिति स्मृतम ॥१३०॥ सहजमागन्तुर्क वा किमपि साधारणं यत् लक्षगम, तद्द्वारेणा यत्किञ्चित् केनचिद् वस्तुस्थित्यैव बलीयसतया तिरोघीयते, तन्मीलितमिति द्विधा स्मरन्ति। क्रमेोदाहरगम्- अपाङगतरले दशौ मघुरवक्रवर्ण गिरो चिलासभरमन्थरा गतिरतीव कान्तं मुखम्। इति स्फुरितमङगके मृगद्शः स्वतो लीलया तद्त्र न मदोदय: कृतपदोऽपि संलक्ष्यते ।।५४६॥। 1 अत्र हक्तरलतादिकमङ्गत्य लिङ्ग स्वाभाविकं साधारएं च मदोद- येन, तत्राप्येतस्य दर्शनात्। ये कन्दरासु निवसन्ति सदा हिमाद्र- रत्वत्पातशङ्गितघियो विवशा द्विपरते।
अनुवाद-(५०) (मीलित) [निजेन आगन्तुना वा समेन लक्ष्मणा वस्तु वस्तुना यत् निगूह्यते तत् मीलितं स्मृतम्-यह अव्वय है]-मीलित अलद्गार वह कहा गया है जहाँ अपने स्वाभाविक प्रथवा कारसविशेष के द्वारा उत्पन्न किसी साधा- रस चिह्न (लक्ष्म) से एक वस्तु अन्य वस्तु द्वारा तिरोहित कर दी जाती है। (१६७) सर्थात् जो स्वाभाविक (निज) या निमितजन्य (भ्रागन्तुक) कोई साधारस चिह्न होता है, उसके द्वारा यदि कोई कर्ता किसी वस्तु को वस्तुतः बलवान् होने के कारस ही तिरोहित कर देता है तो वह दो प्रकार [(फ) स्वाभाविक चिह्न द्वारा तथा (ख) आगन्तुकु चिह्न द्वारा] का मीलित नामक अलङ्गार कहा जाता है। कमशः उदाहुरए ये हैं- (क) 'नेत्र प्रास्तभागपर्वन्त चञ्चल हैं, वचन मधुर तथा गूढ अर्थ वाले (वक्र) हैं; विलास के भार से मन्द गति है, मुस अत्यन्त मनोहर है-इस प्रकार इस मृग- नयनो के भ्रङ्गों में काम-लीता स्वयं हो भस्फुटित हो रही है, इसलिये (तत्) इस (शरीर) में (मधुपानजन्य) मद का प्रविर्भाव स्थान पाकर भी दिखलाई नहीं देता'
यहाँ पर (नेतरों) की चञ्चलता इत्यादि (नायिका के) शरीर का स्वाभाविक चिह्न है मौर वह मदोदय (नशा होने) में भी समान ही है वमोंकि वहां (मदोदय में) इस (नेत्रच्चलता आदि) का दर्शन होता है। (स) 'हे राजन्, आपफे आकरमस से शद्धित बुद्धि वाले जो भापके रायु विषश होकर सदा हिमालय की कन्दराओं में निवास करते हैं। खेद है (बत) फि
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कारयिप्रकोग:
अप्यङ्सुःपुलकमुद्बहतां सकम्पं तेपामद्दो वत भियां न वुधोग््यभिन्ञ:।१४७॥ अत्र तु सामर्थ्याद्वसितस्य शैत्यस्य श्रगन्तुकत्वात्तत्पभवयोरपि कम्पपुलक योस्ताद्र एयं समानता च भयेध्वपि तयोरुपलक्षितत्वात्।
रोमाध्चयुक्त तथा कम्पन सहित शरीर को धार परने वाले भी उन शयुभों के भम को बुद्धिमान् जन भी नहीं जानते' ।५४७। यहाँ पर तो (हिमालय को फन्दरा में निवास के) सामभ्यं से जानी गई (भवसित-परवगत) शोतलता के आगन्तुक होने के कारए उस (शोतसता) से उत्पन्न होने वासे कम्पन औौर रोमाञ्च में भी भागन्वुरता 'ही है तथा उन दोनों (कम्य औोर घुलक) की नय में भी समानता है; क्योंकि यहाँ भी ये देसे गये हैं,
प्रभा-(१) जहाँ समान चिह्न वाली दो वस्तुमों मे एक स्वभावतः प्रवम होती है और दूसरी को तिरोहित कर देती है वहां 'भीलित' मलद्ार होता है। व्याजोकि में तो किसी प्रकार सभिव्यक्त हो जाने वाली वस्तु को किसी अन्य वस्तु के द्वारा तिरोहित करने का प्रयास किया जाता है, वहाँ वहतुतः तिरोधाननहीं होता किन्तु भीलित में वस्तु अभिव्यक नहीं होती तथा तिरोधान वास्तविक रूप में होता है-यही व्यानोविति तथा मीलित का भेद है। इसी प्रकार मौतित का अपस वि से भी भेद है; कयोंकि (i) अपह ति में उपमेय का निषेध करके उपमान की स्थापना को जाती है औौर यहाँ ऐसा नहीं होता। (ii) अपहति मैं दिपाने वाला व्यक्ति दोनों वस्तुमों औौर उनके भेद को जानता है किन्तु मीलित में विरोहित वस्तु प्रफट ही नहीं होती (iii) प्रपह ति में साम्म प्रकट करने में सात्पर्य होता ह किन्तु मीसिस में सामान लथएा वाली प्रवत वस्तु द्वारा अन्य वस्तु का तिरोधान दिससाना होता है। (२) दोनों वर्तुमों का समान चिह्ह कही स्वमाधिक होता है कही निमिसनम्य (पागन्तुक) ससी हेतु मीतित मलद्वार के दो भेद हैं- (क) 'पपाङ्छ' इरयादि में नेष-पञ्चलता आदि सहजनीनाजन्य होने के फारस नापिका के स्वानाविक चिह्न है। इस प्रकार के चिह्ह मधपान मादि के मद में भी होते है। किन्तु प्रमिन्न होने के कारए तीसास्प वस्तु प्रवम है मोर उसके द्वारा मदरूप वरतु विरोहित हो जाती है। (स) 'से कन्दरामु' इस्पादि में कम् तथा पुनर भागन्तुप शीतजन्य होने के कारस भागन्तुकु है। इसी प्रस्ार के पिन्न- मन में भी होते हैं। विन्यु हिमालय के सामीय्य के बारस शीतनरूप वस्तु भमन है रपा उसके द्वारा नपरूप परतु तिरोहित हो जाती है।
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दशेम उल्लास: t
(१८८) स्थाप्यतेऽपोह्यते वापि यथापूर्व परं परम्। दिशेषणातया यत्र वस्तु संकावली द्विधा ॥१३१। पूर्व पूर्व प्रति यथोत्तरस्य वस्तुनो वीप्सया विशेपणभावेन यतस्थापनं निपेघो वा सम्भवति सा द्विघा वुघैरेकावली भरयते। क्रमेणोदाहरणम्- पुराषि यस्यां सवराङनानि वराङना रूपपुरस्कृताङ्गयः । रूपं समुन्मीलितसद्विलासमस्त्रं विलासा: कुसुमायुघस्य ॥४४८॥ न तज्जलं यन्न सुचारुपङ्कजं न पङ्कजं तद्यदलीनपट्पद्म्। न पट्पदोडसौ कलगुञ्जितो न यो न गुब्जितं तन्न जहार यन्मनः॥५४६।। पूर्वत्र पुरां वराङना:, तासामङ्गविशेपणामुखेन रूपम्, तस्य वि० लासा: तेपामप्यरत्रम् इत्यमुना क्रमेण विशेपएं विधीयते। उत्तरत्र प्रतिपेधे- डप्येवं योज्यम्।
अनुवाद-(५१ एकावली) जहाँ पूर्व पूर्तर वस्तु (यथापूर्वम्) के प्रत उत्त- रोत्तर (वसित) वस्तु विशेष रूप में (क) स्थापित को जाती है प्रथवा (ख) निविद्ध की जाती है वह दो प्रकार का एकावली नामक अलङ्गार होता है। (१६८) सर्थात् जहाँ पूर्व पूर्व (वशित) वस्तु के प्रति उत्तर-उत्तर (वलित) वस्तु का अ्रनेक बार (चौप्सया-बाहुल्पेन) विशेषस के रूप में (क) विधान (स्थाप्यते= विधीयते) या (स) निषेध (अपोह्यते-निविध्यते) हुआ करता है वह विद्वानों के द्वारा दो प्रकार का 'एकावली' अलद्धार कहा जाता है। क्रमशः उदाहरण ये हैं- फ-नवसाहसाङ्कचरित; महाराज विक्रमादित्य की नगरी उज्जयिनी फा वसंन] 'जिस (उज्जयिनी) में अ्रन्तःपुर (पुर=भवन) सुन्दरियों से पू्स, सुन्दरिया रूप से अलङ्कृत (पुरस्कृत) श्रङ्गों वाली, (उनका) रूप प्रकटित विलासों से युक्त था तथा वे विलास कामदेव के अ्स्तरूप हो थे' ॥५४॥ स-[भटि्टकाव्य में सरत्काल-वसन]-'वह (ऐसा फोई) जल नहीं था' जिसमें सुन्दर कमल न हो वह (ऐसा) कमल नहीं था जिस पर भ्रमर स्थित (लीन) न हों; वह भ्रमर नहीं था जो मधुर गुज्जार करने वाला न हो और वह गुञ्जार नहीं थी जिसने मन को मोहित न किया हो' ।५४ह॥ (क) पूर्व ('पुरालि' इत्यादि) उदाहरण में अन्तःपुरों का वराङगनाये, उनका शरीर के विशेषण द्वारा रूप, उस (रप) के विलास तथा उन िलासों का पसत्र-इस क्रम से (पूर्व पूर्व के प्रति उत्तर-उत्तर को) विशेपस किया गया है। (स) पिछले ('न तज्जलम्' इत्यादि) उवाहरस में निषेध में भी इसी प्रकार (जल में पड्ज की, पङ्ज में पटपदों फो, पट्पद में गुञ्जन की और उसमें मनोहारिता फी विशेषसता के उत्तरोत्तर निषेम को) योजना कर लेनी पाहिए।
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1 काव्यंप्रकारी:
(१६६) यथाऽनुभवमर्थस्य दृष्टे तत्सहशे स्मृति: स्मरणम्- यः पदार्थ: केनचिदाकारेख नियतः यदा कदाचिदनुभूसोडभूत, स कालान्तरे स्मृतिप्रतिवोघाधायिनि तत्समाने वम्तुनि दप्टे सति यत्तथेव, रमर्यते तद्नवेत्समरगम। उदाहरशम- निम्ननाभिकुहरेपु यदम्भ: प्लावितं चलटशां लह्षरीभि:। तद्नवे: फुहस्तैः सुरनाये: स्मारिता: सुरतकएठ रतानाम् ॥५५०॥ प्रभा-'एकाचली' नामक एक विरेष प्रकार का हार होता है। जिसमें एक दाना दूसरे से गुंपता हुआा चलता है। उमके साद्दय से जिस म्सद्कार में पूर्व पू्व- वणित के प्रति उत्तरोत्तर वशित वस्तु एनेक बार विशेपस हो जाती है वहाँ एका- वली अरदार होता है। अनैक पार विशेपण रूप में विधान या निषध करने पर ही चमत्कार की प्रतीति होती है तया वहीं यह परतद्दार हुआ करता है। इसके लिये उपमानोपमेयभाव को भपेक्षा नहीं। इसलिए मालोपमा से इसका भेद स्पष्ट ही है,- य्योंकि वहां एक ही उपमेय के साथ मनेक उपमान इसी प्रकार सरपित होते है, जिस प्रकार एक मूत में अ्रनेक सुमन। एकायली, मालादीपक और कारसामाला-सभी में उत्तर-उत्तर पदार्थ का पूर्व-पूर्व से सम्बन्ध होता है; किन्तु (i) मालादीपक में पूर्व-पू्वं वस्तु उत्तर उत्तर की विशेषण होती है, एकावली में उत्तर-उत्तर वस्तु पू्व-पूर्व मे प्रति विशेषसा। फिम्च, मालादीपक के चमरकार का विशेष निमित यह है कि यहाँ स्रनेकों का एक समान धर्म से सम्बन्ध होता है, एकावली में ऐसा नहीं। (ii) कारसमाना में कारए फारय भाव होता है पर्थात् पूर्वं-पूर्व वस्तु उत्तर-उत्तर का कारण होती है। एकावसी में विशेष्य-विशेषण भाव होता है अर्थात् उत्तर-उत्तर वस्तु पूर्व-पू्व का विशेवशा होती है। 'अनुवाद-(५२) स्मरस यह मसद्गार है जहां उ (मनुभूत) के समान किसी वस्तु के उपलब्प होने पर (दुप्टे=उपसब्धे) पूर्वानुभूत प्रकार से उस वस्तु को स्मृति (को बएंना) होती है। (१eE) पर्पात् जो पदार्थ किसी (विशेष) आफर से विशिष्ट रूप में (नियतः विदेपितः) किसी समय सनुभय पा विषय हमा था, भ्रन्व समय में स्मृति (के संस्कारों) को उद्योधक उस जैती भन्य वस्तु का गान होने पर जो उसका उसी (पनुभूत) प्रयार से रमरस (का यंन किया जाता) है, वहो समरल पसब्ार है। उदाहरण- (र) [प्रतसरापों की जलशेशा का वर्णन]-'पम्सत मेत्रों वाली सम्मराणो के गम्भोर नाभिषिदों में जब सब्द्ों के द्वारा जस-संघार होने लगा सो उससे उ्पम 'वुह' ध्यर्नियों ने सुरनारियों को रनिकजन (सुस्तरु्ठदत) का रमरस करा रिया IXX oH
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दशम उल्लास:
यथा वा-
संभरिअपञ्चजएगार्स शमह कसहस्य रोमाञ्चम ॥५३१॥ (करयुगगृद्दीतयशोदास्तनमुख विनिवेशिताघरपुटस्य। संस्मृतपाञ्चजन्यस्य नमत कृष्णस्य रोमाळचम् ।५५१॥) (५००) भ्रान्तिमानन्यसंवित् तत्तुल्यदर्शने ॥१३२॥ तदिति अन्यत् अप्राकरणिकं निर्दिश्यते। तेन समान अर्थादिद् प्रा- # •करणिकम् आश्रीयते। तस्य तथाविधस्य दष्टौ सत्यां यत् अपाकरणिकतया संेदनं स भ्रान्तिमान्। न चैप रूपकं प्रथमातिशयोक्तिर्वा। तत्र वर्तुतो भ्रमस्याभावात्। इद च अर्थानुगमनेन संज्ञायाः प्रवृत्त : तस्य स्पष्टमेव प्रतिपन्नत्वात्।
पथवा जैसे- (स) 'उन थ्रीकप्स के रोमाञ्च को प्राम करो, जिन्होंने अपने दोनों हाथों से पकड़े हुए माता यशोदा के स्तन के अग्रभाग (मुख) पर अपना अघर पुट रखते हुए पाञ्चजन्य नामक शद्ध का स्मरण किया (जिससे वे रोमाञ्चित हो गये)' ।५५१॥ प्रभा-चमत्कार-जनक स्मरण का वर्णन ही स्मरणालद्वार है (वस्तुतः वैचि ध्यजनक स्मरएमात्रमेव स्मरसालङ्गार इति युक्तम्-वालबोघिनी)। यह स्मरण दो प्रकार का है-क. इस जन्म में अनुभूत वस्तु का स्मरण! जैसे-'निम्ननाभि' इत्यादि में रतिकाल की ध्वनि के सदृश 'कुह' ध्वनि की प्रनुभूति करने पर पूर्वानुभूत रतिकूजन की स्मृति का वणन है। स. जन्मान्तर में अनुभूत वस्तु का स्मरण; जैसे- 'करयुग' इत्यादि' में शह्भसदृश स्तन को देखकर पूर्वजन्म मे अप्रतुभूत पाञ्चजन्य (गंसविशेप) की स्मृति का वर्णन किया गया है। *- अनुवाद-(५३) भ्रान्तिमान् यह अलद्गार है जहां उस (मप्ाफरसिक मा प्रपस्तृत) के तुत्य पदार्थ अर्थात् प्राकरणिक (प्रस्तुत) का दशन होने पर ध्रन्य :पर्यात् भप्रस्तृत (अप्राकरलिक) की प्रतीति (को वणना) होती है' (२००) (कारिका में) 'तत्' शब्द के द्वारा अन्य अर्थात् अपाकरखिक का निबेश किया गया है। 'उसके समान' (ततुल्य) इससे यहाँ प्रस्तुत का ग्रहस होता है। उस प्रकार (अ्रप्रस्तुत के तुल्य रूप) को उस (प्रस्तुत) वस्तु का दर्शन होने पर जो उसका 'श्रप्रस्तृत के रूप में निश्चयात्मक ज्ञान (संवेदन) होता है, वह भ्रान्तिमान् भलद्धार है। .P यह (भ्रान्तिमान्) रूपक या प्रथमा (निगीर्याध्यवतानरपा) प्रतिशायोक्ति नहीं है; कर्योकि उनमें व्रास्तविक भ्रम का स्रमाव होता है और यहाँ 'भ्रान्तिमान' इस
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7 ५६० काव्यप्रकाश:
उदाहरगम- कपाले मार्जार: पय इति करान लेदि शशिन: तरुच्छिद्रपोतान् विसममिति करी संकलयति। रतान्ते तल्पस्थान् दरति चनिताऽप्यंशुकमिति प्रभामत्तश्चन्द्रो जगदिदमद्दो विप्लचयति ॥।५५२।।
अन्यर्थक संत्ञा की प्रयृत्ति से हो उस की स्पष्टतया शिद्धि हो रही है। दाहरस- महान् आश्चयं है कि कात्ति (के गयं) से उन्मत्त चन्त्रमा इस संसार को भ्रान्ति में डाल रहा है-विलाव कपाल , सप्पर) में स्मित चन्द्रमा की फिरलों को दूध समभकर (पय इति) चाटने लगते है; हाथी वृक्ष के दिशें से (भूमि पर) गिरने वाली (प्रोतान्) चन्द्ररिरशों को मृखाल समझने लगता है और फोई सुवती रति- कोष की समाप्ति पर (जाल माग द्वारा) राय्या पर स्थित चन्द्रमा की किर्लों को धस्त समक कर उठाने लगती है' ॥५५२॥ प्रभा- (१) "भान्तिमान' यह अ्न्वर्थ संज्ञा है। जिसमें भन्ति का वर्संन होता है (भ्रान्ति प्र्मिन् सस इति) सर्थात् जहाँ साहस्य के कारया प्रस्तुत वस्तु में भप्नरततुत वस्तु के भ्रम का वैचित्मपूरं वर्सन किया जाता है यह भान्तिमान् मसन्जार है। एक वस्तु को निश्चयात्मक रूप से दूगरी वस्तु समभना ही आन है। 7 (२) 'कपाले' सत्यादि में सुभता के कारस मनस्तुत दुग्ध मदि के सुस्य प्रस्तुत चन्द्रकिरों को देनकर मार्जार उत्यादि की दुग्न-भान्ति पादि भा मसन किया गया है पतः 'आन्तिमान् 'मसद्वार है। इसे 'धम' बनद्वार भी कहा जाता है। (३) भ्रान्तिमान् या अन्म मलद्वारों से सम्यन्प; ध्राम्मिान् रूपक मोर प्रथमातिशपोसि-(ममानता) इन तीगों में ही उपमेय पो उपमान के रप में समभ मिया जाता है। जैसे 'मुग चन्द्र:' (रपर) तपा 'चन्द्रा उदेति' (पतिगरोलि) में मुया को पन्द्रमा के रुपप में निश्नित किया जाता है, इसी प्रकार पपासे० इर्यादि में पवट्रकिरसो (उपभेय) को पय: (उपमान) इत्यादि मे रूग में समभ सिया जाता है। (भेंद) (i) रुपक और प्रनमातिमयोति में वस्नुतः भम नहीं होगा केवस मारोप या :सध्जयसान होता है, पर्वात हम मुग और पन्त को पृषक जानने हुए भी मुरा में इच्या नुमार (माहापं) नन्द्र के मनेद की म्पता फर मेते हैं (स्पर पोर पकयमोकि के फतर के मिर्चे इ0 रगह)। दूगरे औोर मान्तिमान में वामुनः भान्ति का वन होगा है। वहा एग उपगेग गमा उपमान कोनों को नृपकूमः मही जानमे। i।) -अगिमान में 'भ्षम' मदि भम्त मे या 'दति' दब से भम मो मरद रिया जाता ए दिन्तु रपक या पनियगोन् मे ऐमा नहीं रोवा (उतोज।
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दशम उल्लास: *4+
(२०१) आक्षेप उपमानस्य प्रतीपमुपमेयता । तस्यैव यदि वा कल्प्या तिरस्कारनिबन्धनम् ॥१३३॥ (१) अस्य धुरं सुतरामुपमेयमेव बोदु प्रौढमिति कैमर्थ्येन यदुपमा- नमाचिप्यते (२) यदषि तस्यैवोपमानतया प्रसिद्धस्य उपमानान्तरविवत्तया-
प्रतीपम्। कमे णोदाहरणम्- . १. लावएयौकसि सपरतापगरिमरयम्र सरे त्यागिनां भ्रान्तिमान् और स्मरण-(समानता) दोनों में ही तुल्य वस्तु को देखकर अ्रन्य वस्तु की प्रतीति का वर्णन होता है। (भेद) (i) स्मरण मे स्मृत औरर दृष्ट दोनों वस्तुओं का पृथकदाः ज्ञान रहा करता है किन्तु भ्रान्तिमान् में दृष्ट वस्तु को भ्रम से स्मृत वस्तु के रूप में ही समझ लिया जाता है। अतः टप्ट वस्तु का ज्ञान नहीं रहता। जैसे ऊपर के उदाहरण में माजार आदि को चन्द्रकिरणों का ज्ञान नही रहता। (ii) स्मरण अलङ्धार में स्मृति ही प्रधान होती है, वही अलङ्कार का -भावार है किन्तु भ्रान्ति में स्मृति केवल सहायक होती है, भ्रम का वर्न ही चमत्कार- जनक होता है। भ्रान्तिमान् और सन्देह-(i) एक वस्तु में उभयकोटिक (दो प्रकार का) ज्ञान होना सन्देह है, जैसे यह मुख है या चन्द्रमा' इस प्रकार का ज्ञान। किन्तु एक वस्तु को निश्चित रूप से दूमरी समझ लेना (एककोटिक निश्चय) भ्रम या भ्रान्ति है; जसे मुख को चन्द्रमा समझ लेना। जहाँ सन्देह (संशय) का चमत्कारजनक वणांन होता है, वहाँ सन्देह असद्वार है। किन्तु जहाँ भ्रान्ति का चमत्कारजनक वर्णन होता है वहाँ भ्रान्तिमान् है। (ii) सन्देह में उपमान और उपमेय दोनों का पृथकुश्ः ज्ञान रहता है किन्तु भरान्तिमान् में उपमेय को भुवाकर उपमान के रूप में हो निश्चित कर लिया जाता है। अनुवाद-(५४) प्रतीप वह सलङ्गार है जहां (फ) उपमान का श्राक्षेप (निन्दा या निषध) किया जाय अथवा (स) उसा (उपमान) का तिरस्फार करने के लिये उसकी उपमेयरूप में कल्पना की जाय। सर्थात् (१) इस (उपमान) के प्रयोजन (धुरम्) को उपमेय हो भली भाति (सुतराम) निवाहने में (बोढ) समर्य (प्रोढ) है, अतः उपमान का क्या प्रयोजन है (कमर्य्यन=किमर्यमिति न्यायेन) ?- इस प्रकार जो उपमान का निषेध या निन्वा की जाती है (पथम प्रतीप) और (२) जो उस उपमान रूप से ही लोकप्रसिद्ध (चन्द्रमा आादि) वरतु को (मुस छादि) अ्न्य उपमान की घिवसा से मनादर के लिए उपमेय रूप में कत्पित किया जाता है (द्वितीय प्रतीप)-यह उपमेय के उपमान से प्रतिकल होने के फारए दो प्रकार का प्रतीप अलक्कार है। कमरः उदाहरस इस । प्रकार है- (१) 'हे राजन्, सौन्दर्य के नियास-स्थान, प्रतान को गरिमा से युक्त, र्पा-
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५६२ काव्यप्रकार:
देव, त्वय्यवनीभरत्तमभुजे निष्पादिते वेघसा। इन्दुः कि घटितः किमेप विहितः पूपा किमुत्यादितं चिन्तारत्नमदो मुघैव किममी सृप्टा: कुलदमाृतः ।५५३॥ २. ए एहि दाव सुन्दरि करणंदाऊए सुलकु वश्रसिज्जम। तुष्फ मुद्देए किसोअरि चन्दो उत्र्मिज्जई जयेण ॥५४४॥ (अयि पहि तावतसुन्दरि, कर्स दत्या भशुष्व वचनीयम। तब मुखेन कुशोदरि, चन्द्र उपमीयते जनेन ।।५५४) : अन्र मुखेनोपमीयमानस्य शशिनः स्वत्पतरगुपत्वादुपमित्यनिष्पत्या वश्रणिञ्जमिति वचनीयपदाभिव्यङ गयस्तिररकारः। गियों में अप्रगण्य, पृषिधी के भार-धहन में समयं भुजा वाले पापको जय विधाता मे रच दिया तो चन्द्रमा को क्यों रचा ? यह सू्यं (पूवा) किस लिए बनाया ? यह चिन्तामलि मर्यों उत्पन्न की ? मोर मे कुल पयंत (महेन्द्रो, मलयः, सह्याः, शुक्तिमान्, शृदापवंतः विन्व्यश्च परियात्रशच राप्तते मुलपयंताः) भी स्वर्म हो बनाए ।५५३।। प्रभा-प्रतीप का भर्य है -प्रतिकूल; मतएव उपमेय के द्वारा उपमान का अपकर्ग बोध कराना ही प्रतीप मरसार है। यह दो प्रकार का होत ह- (१) उपमान का पराक्षेप-'उपमेम के होते उपमान व्यर्य हू' यह पाशेप करना प्रथम प्रतीप है; नमे-'तायण्म' इत्यादि में बणंन किया गया है कि 'सायन्य' मादि गुगों से युक्त राजारूप उपमेष के होने पर इन्दु मदि समस्त उपमान व्वर्ष है।पद्तपि यहां पर 'सानम्पोकति' इत्यादि बरा 'हन्दु' आदि के गाय नमगः मन्वम है, इम हतु पयासंस्य मनद्वार भी कहा जा सता है समापि उमान का साक्षेा ही विशेग घमतशारफ है अतएत प्रथम प्रनीप अवद्वार है। उपमान का निरसार या भपपरष- बोधन ही इग प्रतीप का प्रयोजन है; व्यतिरेक ममपुार में तो उपमान मी मोसा उपमेय का प्राचितत दिसनाया जाता है- पह्षी दोनों या भ: है। (२) उपमान की उपमेयताकस्पना-विराहार के मिए सोसप्रवित् उपमान फी उपमेय मे साथ उपमा दिगताना 'पिनीप प्रनीप है ससके द्वारा भी उमान का विरस्कार किया जाता है। इमलिए यह अतमेयोरमा से भिन है; मयोनि यहा - परस्पर उपमानोपमेव भाव भी प्रनीति होती है: उमान पा निरकार नहीं। धैमे कि परप्रिम उसह्रगों से साष्ट है। सरनुवाद्-(स) ऐ शुग्दरो, तनिक दघर सायो, सान सगापर इस निल्दा (घपनीयम्) को मुग सो 1 भरी इसोवरी, लोग सुम्हारे मुग से सममा की उपमा हेसे है ।५५४। पहा मुग ने माम निगकनी उपमा दो गई है (उपसीयमान) उस भरमा क पन्मगृशयपुत्त होने मे उपमा- उपमिमि (सादृस्य, निश्वन (विद्ध) गहीं होती, जिसगे 'मपनीय' (प्मलिगयम) पद से अहम (उपमान का) पिसरकार प्बड होता है।
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दशम उल्लास: ५६३
क्वचित्त निष्पन्र वोप मितिक्कियाऽनादरनिबन्घनम्। यथा- गर्वमसंवाह्यमिमं लोचनयुगलेन किं वहसि सुग्घे, सन्तीहशानि दिशि दिशि सरःक्षु ननु नीलनलिनानि ॥५५५॥ इहोपमेयीकरस मेवोत्पलानामनादूरः। अनयेव रीत्या यदसामान्यगुसयोगात् नोपमानभावमपि अररनुभूत- पूर्वि तस्य तत्कल्पनायामप भवति प्रतीपमिति प्रत्येतव्यम। यथा- पह्दमेव गुरु: सुदारुखानामिति हालाइल, तात, मारम दप्यः । ननु सन्ति भवाहशानि भूयो भुवनेडस्मिन् वचनानि दुर्जनानाम् ॥४५६॥
फहीं तो उपमिति-कार्य निष्पन्न होकर ही तिरस्कार का हेतु होता है। जैसे- 'हे मुग्धे, तुम अपने नेत्रों के फारस इतना अधिक (असंवाह्यम्=न वहन करने योग्य) गर्व बयों रसती हो ? यर्योंकि प्रत्येक दिशा में सरोवरों में ऐसे नीलकमल (भी) विद्य- मान है ॥५५५।। यहाँ नीलकमलों को उपमेय बनाना हो उनका अनादर है। प्रभा-द्वितीय (उपमान की उपमेयर्पता कल्पना) प्रतीप में (क) कहीं तो कल्पित उपमा की असिद्धि द्वारा उपमान का तिरस्कार प्रकट होता है; जैसे-'अषि एहि' इत्यादि में-अरत्युत्तम गुण वाले निरूपमेय भुख के समान चन्द्रमा को बतलाना अनुचित है, यह भाव है; अतएव कल्पित उपमा की निम्पत्ति नहीं होती। (स) कहीं निप्पन अर्थात् सिद्न हुई उपमा द्वारा उपमान का तिरस्कार प्रकट होता है; जैसे-'गर्वम्' इत्यादि में। यहां उपमानरूप से लोक प्सिद्ध कमलों को लोचनों का उपमेय बनाना ही अनादार का हेतु है; क्योंकि उपमेय तो उपमान की अपेक्षा न्यून गुखों वाला ही होता है। अनुवाद्-(प्रतीप का अन्य प्रकार) इसी प्रफार मसाघारस गुएपुक्त होने के कारण जिस वस्तु को उपमानरूपता का भी पहले अनुभव नहीं किया गया, उस (वस्तु) की यंसी (उपमानरपता) फल्पना करने पर भी प्रतीप शलद्दार होता है यह - जानना चाहिए। जैसे- 'हे तात (उपहास या अनुकम्पा में सम्बोधन) हालाहल, त ऐसा दर्प मत कर कि प्रत्यन्त दारस पदार्थों में मैं ही उच्च हूँ, क्योंकि इस संसार में दुजनों के वचन तेरे समान बहुत (भय := बहु पया स्यात् तथा) है i५५६॥ यहाँ पर हालाहत की प्रसम्भाव्यमान उपमानसपता का ही उल्लेस किया गाया है।
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पाव्पप्रकान:
(२०२) प्रस्तुतस्य यदन्येन गुससाम्यविवक्षया। ऐकात्म्यं वध्यते योगात्तत्सामान्यमिति स्मृतम् ॥१३४॥ अताहशमपि ताहशतया विवक्षितु' यत् अरप्रसतुतार्थेन संपृत्तमपरित्य कनिजगुएमेव तदेकात्मतया निवध्यते तत्समानगुशनिषन्घनात्सामान्यम्। प्रभा-सूय में प्रतीप का भेद-द्वय कथन उपलदाए मान है। इसके सन्य भेद भी हो सकते हैं, अनयव रीत्वा' इत्यादि अवतरण में यही निरूपतत किया गया है। भाव यह है कि जो स्तु असाधारण गुगों वाली है भतगव कभी उसे उपमानरूप में भी नही जाना गया; उम वस्तु की उपमानरप में कल्पना करने पर एक अन्य प्रकार का प्रतीप मलड्कार होता है। जैमे-'पहमेव' इत्यादि में अत्युत्कट दुःग के हंतु हालाहन को एलवचनों का उपमान बनाया गया है जो उपमान के तिरस्कार का हेतु है भत एय यहाँ प्रतीप अलड़्कार है। साहित्यदर्पणकार के अनुसार प्रतीप के इस भेद में दो मनिवा्य तत्व है-प्रथमतः उत्कृष्ट वस्तु के प्रत्यन्त उत्कर्प का बसंन किया जाये फिर उसे उपमान रूप में कल्पित किया जाये (सा०द० १०.८८-८६)। (२) प्रतोप और व्वतिरेरु-दोनों में किसी अंश में प्रतिद्ध उपमानोपमयभाय के विपरीत कथन होता है तयापि (i) प्रतोपका माधार है-उपमान का विरसार (उपमानतिरत्कारस्य अतड्कारतावीजयात्-ररतीय)। यह कायं धनेक प्रकार से किया जाता है -- उपमान का पशेष, ग-उपमान की उपमेय रूप में कल्पना (उपमा की सिद्धि न होने पर मथवा उगमा की सिद्धि हो जाने पर भी), ग-मसापारण गुए वाले गदार्थ की उपमान पस्पना। इसके विपरीत व्यतिरेश का आधार है- जतमान की पपेक्षा उपमेय का आधियय दिसलाना। यह कार्य जमेयगत उत्पर्य का निमित' मादि के वगंन द्वारा चार प्ररार से किया जाता है (ऋ6,व्तिरेक)। (ii) प्रतीप केवल साधम्यं पर मश्रित है; रिन्तु वतिदेंक नाधर्म्य और यैगम्यें दोनों पर बवोंकि यहाँ जब उपमेय के उत्क्य का निमिर या उमान के भपरकर्प प निमित बतलाया जाता है वब दोनो का बैधम्य ही प्रकट होता है। अमुवाद- (५५) सामान्य यह घतददार कहा गया है जहाँ बसांनीय बातु का ध्रम्य सर्पात् पप्स्तुत वस्तु के सम्बन्ध से मुल-साम्म का मोध कराने के लिए रेनों की एरसपता का मिटपल किया जाता है। (१२४) पर्मात् वसतुतः उरा (पम्नस्तुन वस्तु) के समान म होने पर भी उराकी समा नता का योप कराने के लिये जो पप्ररतुत वस्तु से सम्बद होकर सपने गुलों को बिना रवागे ही प्रस्तुत वस्तु का उस (चमग्सुत वस्तु) को एफासानादप में प्रतिपारम दिया जाता है यह समानगुरों के सम्बन्ध से होने के कारस सामा्य पनद्गार है। उगहस-
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दशम उल्लास: ५६५ 44
उदाहरएम- - मलयजरसविलिप्ततनवो नवहारलताविभूपिता: । सिततरदन्तपत्रकृतवक्त्ररुचो रुचिरामलांशुका: । शशभृति विततघाम्नि धवलयति घरामविभाव्यतां गताः । प्रियवसतिं प्रयान्ति सुखमेव निरस्तभियोऽभिसारिका: ।५५७ प्रन्न प्स्तुततदन्ययोरन्यूनानतिरिक्ततया निबद्ध घवलत्वमेकात्मताहेतुः। अत एव पृथग्भावेन न तयोरुपलक्षएम्। यथा वा- चेत्रत्वचा तुल्यरुचां वधूनां कर्णप्रतो गए्डतलागतानि। भृङ्गा: सहेलं यदि नापतिष्यन् कोवेदयिष्यन्नवचम्पकानि ॥५५८॥ छत्र निमित्तान्तरजनिताऽपि नानात्वप्रतीतिः प्रथमप्नतिपन्नमभेदं न. व्युद्सितुसुत्सद्दते। प्रतीतत्वात्तस्य। प्रतीतेश्च चाघायोगात्।
'जब विस्तृत तेज वाले शशाङ् ने पृथ्वी को धवलित कर दिया तब चन्दन रस से लिप्त शरीर वाली, नूतन मुक्तामालाओं से विभूषित, शुभ्र कर्राभूवस (दन्त- पत्र-हस्तिदन्त निर्मित फर्णाभरण) से मुस-कान्ति को बढ़ाने वाली, रम्प तथा निर्मल वस्त्रों वाली अमिसारिकाएँ चन्द्रिका में अ्लक्ष्य (एकरूप) होकर भयरहित सुसपूर्वक प्रिय-गृह को जाती है' ।५५७। यहाँ प्रस्तुत (प्भिसारिका) और तदन्य अर्थात् प्रप्रस्तुत (चन्द्रिका) को अन्यून और अनधिक रूप (सामानरूप) में वित धवलता ही एकरूपता का हेतु है, इसलिये उन दोनों की पृथक् रूप में प्रतीति (उपलक्षराम्) नहीं होती। भ्रथवा जैसे- 'वेत्र को छाल के समान कान्तिवाली यघुओं के कानों के पग्रभाग से कपोल- तल पर भाये हुए नवचम्पक-पुप्पों को कोन जान सकता यदि लीलापूर्वक (भूम भूम; * कर) भ्रमर उन पर न गिरते' ॥५५८॥ यहाँ पर अन्य निमित्त (भ्रमर-पतन) से उत्पप्न होने वाली भी भेद प्रतीति पूर्वज्ञात अभेद को दूर फरने में (व्युदसित् निरसितुम्) समर्थ नहीं है; क्योंकि उस (एफरूपता) को प्रतोति हो चुकी है तथा उत्पन्न प्रतीति की अ्र्पनुत्पत्ति (बापः= अरनुत्पावः) सम्भव नहीं है। प्रभा-(१) जहां समानगुणों के होने से अनुभूत प्रस्तुत तथा अप्रस्तुत में एका- त्मता की प्रतीति का वर्णन होता है वह सामान्य अलद्वार है। इसका 'तद्गुस', अलद्वार से भेद स्पप्ट है, क्योंकि वहाँ प्रस्तुत निज गुछों का परित्याग कर देता है किन्तु यहाँ अपने गुणों को त्यागे बिना ही (भपरित्यक्तनिजगुणमेव) प्रपस्तुत के साथ एकरूपता की प्रतीति होती है। इसका 'मीलित' अलडकार से भी भेद है क्योकि मीलित में एक वस्तु मे भमान धर्म उत्तृष्ट कोटि का होता है भौर उत्कृप्ट गु वाली वस्तु के द्वारा निकृष्ट गुगा वाली का तिरोधान हो जाता है किन्तु
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काव्यप्रकाश:
(२०२) प्रस्तुतस्य यदन्येन गुएसाम्यविवक्षया। ऐकात्म्यं वध्यते योगात्तत्सामान्यमिति स्मृतम ॥१३४॥ अताट्वशमपि तादशतया विवचितु' यत् अप्रस्तुतार्थेन संपृक्तमपरित्य- कनिजगुएमेव तदेकात्मतया निवध्यते तत्समानगुसनिवन्वनात्सामान्यम्। प्रभा-सूत में प्रतीप का भेद-दवय कथन उपलक्षण मात है। इसके अन्य भेद भी हो सकते हैं, अनयव रीत्या' इत्यादि अवतरण में यही निस्पति किया गया है। भाव यह है कि जो वस्तु असाधारण गुमों वाली है अतएव कभी उसे उपमानरूप मे भी नही जाना गया; उस वस्तु की उपमानरप में कल्पना करने पर एक अन्य प्रकार का प्रतीप अलडकार होता है। जसे-'गहमेव' इत्यादि में अ्त्युत्कट दुःख के हेतु हालाहल को सलवचनों का उपमान बनाया गया है जो उपमान के तिरस्कार का हेतु है अत एव यहाँ प्रतीप अलड्कार है। साहित्यदर्पणकार के अनुसार प्रतीप के इस भेद में दो भनिवार्य तत्व हैं-प्रथमतः उत्कृष्ट वस्तु के अत्यन्त वत्कर्ष का बसंन किया जाये फिर उसे उपमान रूप में कल्पित किया जाये (सान्द० १०.८-८६)। (२) प्रतोप और व्यतिरेक-दोनों में किसी अ्ंग में प्रमिद्ध उपमानोपमेयभाव के विपरीव कथन होता है तथापि (i) प्रतीपका आपार है-उमान का तिरस्कार (उपमानतिरस्कारस्य अलइ्वारतायीजव्याम-पतीर)े यतर कार्य अनेक प्रकार से
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दगम उल्लाम: ५६५
उदाहरगम- मलयजरसविलिप्ततनवो नवहारलताविभूपिताः । सिततरदृन्तपत्नकृतवक्त्ररुचो रुचिरामलांशुकाः।। शशभृति विततघाम्नि घवलयति घरामविभाव्यतां गताः । प्रियवसति प्रयान्ति सुखमेव निरस्तभियोऽभिसारिका: ॥५५७॥ अत्र प्रस्तुततदन्ययोरन्यूनानतिरिक्तया निबद्ध धवलत्वमेकात्मताहेतुः। श्रत एव पृथम्भावेन न तयोरुपलक्षणाम्। यथा वा- वेत्त्वचा तुल्यरुचां वधूनां कर्णमतो गएडतलागतानि। भृङ्गा: सहेलं यदि नापतिष्यन् कोवेद्यिष्यन्नवचम्पकानि॥५५८॥ श्रत्र निमित्तान्तरजनितापि नानात्वपीतिः प्रथमप्रतिपन्नमभेदं न व्युदसितुमुत्सद्दते। प्रतीतत्वात्तस्य। प्रतीतेश्च बाधायोगात्। 'जब विस्तृत तेज वाले शशाङ् ने पृथ्वी को धवलित कर दिया तब चन्दन -
रस से लिप्त शरीर वाली, नूतन मुक्तामालाओं से विभूचित, धुभ्र कराभूपण (दन्त- पत्र-हस्तिदन्त निर्मित कर्णाभरण) से मुस-कान्ति को बढ़ाने वाली, रम् तथा निर्मल वस्त्रों वाली अभिसारिकाए चन्द्रिका में अ्र्लक्ष्य (एकरूप) होकर भयरहित सुसपूर्वक प्रिय-गृह को जाती है।५५७। यहाँ प्रस्तुत (अभिसारिका) और तदन्य पर्थात् अप्रस्तुत (चन्द्रिका) की अन्यून और अनधिक रूप (सामानरूप) में वशित घवलता ही एकरूपता का हेतु है, इसलिये उन दोनों की पृथक् रूप में प्रतीति (उपलक्षसम्) नहीं होती। अथवा जैसे- 'वेत्र को छाल के समान कान्तिवाली बघुओों के कानों के प्रग्रभाग से कपोल- तल पर आाये हुए नवचम्पक पुषपों को कौन जान सकता यदि लोलापूर्वक (भूम भूम, कर) भ्रमर उन पर न गिरते ॥५५८॥ यहाँ पर अन्य निमित्त (भ्रमर-पतन) से उत्पन्न होने वाती भी नेद प्तीति पूर्षज्ञात प्रभेद को दूर करने में (व्युदसित् निरसितम्) सम्य नहीं है; क्योंकि उस (एफरूपता) को प्रतीति हो चुकी है तथा उत्पन्न प्रतीति की अनुत्पत्ति (बापः= प्रनुत्पादः) सम्भव नहों है। प्रभा-(१) जहाँ समानगुणों के होने से अ्र्पनुभूत प्रस्तुत तथा अप्रस्तुत में एका- त्मता की प्रतीति का वरणन होता है वह सामान्य अलङ्कार है। इसका 'तद्गुए' भलद्वार से भेद स्पप्ट है, क्योंकि वहाँ प्रस्तुत निज गुणों का परित्याम कर देता है निन्तु यहाँ अपने मुखों को त्यागे बिना ही (भपरित्यक्तनिजगुरमेव) अ्रप्रस्तुत के साथ एकरूपता की प्रतीति होती है। इसका 'मीलित' अलड्कार से भी भेद है कयोकि मीलित में एक वस्तु में समान धर्म उत्कृष्ट कोटि का होता है भौर सत्कृष्ट गुए वाली वस्तु के द्वारा निकृष्ट गुग वाली का तिरोचान हो जाता है किन्तु
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५६६ 1 काव्यप्रकाप:
(२०३) विना प्रसिद्धमाधारमाघेयस्य व्यवस्थिति: एकात्मा युगपद्वृत्तिरेकस्यानेकगोचंरा ॥१३५॥ अन्यत्प्रकुर्वतः कार्यमशक्यस्यान्यवस्तुनः । तथव करणं चेति विशेषस्त्रिविघ: स्मृतः ॥१३६॥ प्रसिद्धाघारपरिहारेश यत् आ्रघेयस्य विशिष्ठा स्थितिरभिघीयते स प्रथमो विशेष: । चया-
रमयन्ति जगन्ति गिर: कथमिह कवयो न ते वन्या: ॥५५६।
सामान्य मलङ्कार में दोनों (प्रस्तुत तथा अप्रस्तृत) वस्तु तुल्य गुएा वाली होती है सत एव दोनों के भेद का ग्रहस नहीं होता (भेदाग्रह)-मि० साहित्यदपण। भ्रान्ति- मान से इसका भेद यह है कि वहाँ प्रस्तु में स्मृत अप्रस्तुत वस्तु की'भ्रान्ति होती है; किन्तु यहाँ अनुभूत वस्तुओं में एकरूपता होती है। इसी प्रकार यह रूपक तथा प्रथमातिशयोकि मे भी भिन्न है; क्योंकि वहाँ उपमेय की उपमानरूपता प्रतीत होवी है; किन्तु यहाँ उपमान तथा उपमेय की एकरूपता। (२) 'मलयज' इत्यादि में शुक्लता की समानता के कारण प्रस्तुत अभिसा- रिका तथा मप्रस्तृत (चन्द्रिका) की एकरपता का वसन है वहाँ पर 'अविभाव्यर्त गताः इसके द्वारा एकात्मता का प्रतिपादन किया गया है अत एव सामान्यालह्कार है। (३) कहीं २ प्रस्तुत और भगस्तुत को उत्तरकाल में भेद-प्रतीति हो जाने पर भी पूर्वकालिक ऐक्यप्रतीति के भासित होने से सामान्य-अलड्वार होता है; जैसे- 'ेत्रत्वचा' इत्वादि में प्रस्तुत (कपोल) औौर अप्रस्तृत (चम्पर) में भ्रमरपसन के परचात् भेद-प्रतीति हो जाती है फिर भी पूर्वकालिक एकसपता को लेकर सामान् भलङ्कार होता है। अनुवाद-(५६ विशेष) (प) जहां प्रसिद्ध प्राधार के बिना धापेय (पाषित) वस्तु की स्यति पथवा (स) एक (वस्तु) को प्रनेक वस्तुमों में एक साप एररप से वृत्ति (स्यति) अयवा (ग) येग से मन्य फाय करते हुए (व्यलिि) के किसी अन्य पराश्य कार्य का उसी प्रकार से करने का यसन रिया जाता है; यह सोन प्रकार का 'विशेष' मतद्धार कहा गया है। (१) प्रपम 'विशेय' (पलद्गार) यह है जह।ं प्रसिद्ध आपार का परितयाग करफे धामेय वस्तु को विशिष्ट (सर्यात् बिना पाधार के हो) स्यिति का वर्लन रिया जाता है। उदाहरस-'रवर्ग में घते जाने पर भी जिनकी प्रचुरपुरों से युक्त फाम्म नपवालो कत्पपयंन्त समस्त संतार दो पानन्दित करती है, ये पयिगए इग लोफ में भन्डना योग्य पर्यों न हों ।४४६।
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देशम उल्लीस: 44+4
२. एकमपि वस्तु चत् एकेनैव स्वभावेन युगपदनेकत्र वर्तते स द्वितीयः। यथा- सा वसइ तुज्फ हिअए सा चिचन्न अच्छीसु साअ वश्रणेसु। अह्मारिसाण सुन्दर शआसो कत्थ पावाएम् ॥५६०॥। (सा वसति तव हृदये सैवातिपु सा च वचनेपु अस्मादशीनां सुन्दर, अवकाशः कुत्र पापानाम् ।५६०।।) ३. यदपि किंचिद्रभसेन आरभमाएस्तेनेव यत्नेनाशक्यमपि कार्या- न्तरमारभते सोऽपरो विशेष:। यथा- (क) स्फुरदद्भुतरूपमुत्परतापज्वलनं त्वां सृजतानवद्यविद्यम्। विधिना ससृजे नवो मनोभूभु वि सत्यं सविता वृहत्पतिश्च ।५६१॥। यथा वा- (ख) गृहिसी सचिवः सखी मिथः प्रियशिष्या ललिते कलाविघौ। करुणाविमुखेन मृत्युना हरता तवां चत कि न मे हतम् ॥५६२॥। [यहां कविरप प्रसिद्ध आधार के बिना ही कविवाणी रूप आधेय की स्थिति का वर्णन है अतः प्रथम 'विशेष' अलक्कार है] (२) द्वितीय 'विशेष' (अलङ्धार) वह है जहां एक ही वस्तु एक ही रूप में एक साथ ग्रनेक स्थानों में विद्यमान रहती है। उदाहरस- [सपत्नी में श्रासक्त प्ति के प्रति पत्नी की उत्ति]-'हे सुन्दर, वह (सपत्नी) ही तुम्हारे हृदम में बस रही है, वही भांखों में और वही वचनों में निवास करती है, हमारी जंसी पापिनी (अभागिनी) के लिये स्थान ही कहाँ है?' ।५६०॥ [यहाँ पर एक ही सपतनी की एकरूप में एक साथ ही हृदय इत्यादि सनेक वस्तुओो में स्थिति का दर्शन किया गया है अर्त एव द्वितीय विद्येप अलद्धार है] (३) तृतीय 'विशेष' (अलद्धार) वह है जहाँ वेगपूर्वक किसी फार्य को करने वाला कर्ता उसी प्रमत्न के द्वारा किसी धन्य पशक््य कार्य को भी कर लेता है (यह वर्सन किया जाता है)। जैसे- (क) 'हे राजन् प्रकाशमान प्रद्भुत रूप वाले, उद्दीप्त प्रतापानल से युक्त तथा शुद्धविद्या वाले आापकी रचना करते हुए विधाता ने सचमुच ही एक नवीन कामदेव, सू्य तथा बृहर्स्पतत का निर्मास किया है' ।५६१॥ [यहाँ पर-राजा की रचना करने वाले विघाता ने उसी प्रपत्न के द्वारा अन्य आपाक्य कार्य कामदेव आदि की रचना कर डाती-इम वर्सन में तृतीष विशेष अलद्दार है] (ख) अथवा जसे-[रघुवंश; इन्दुमती-निघन पर राना अन को 'उकति] 'हे इन्दुमती, तुम मेरी गृहिणी, मन्त्रसा देने वाली, एकान्त की सहयरी तभा सतित कला के सभ्यास में प्रियशिय्या थी, कररा-विहीन मृत्यु ने तुम्हें जोनते हए मेरा कया नहीं छोन लिया ?।५६२।।
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५६६ J काव्यप्रफाश:
(२०३) विना प्रसिद्धमाधारमाधेयस्य व्यवस्थिति: एकात्मा युगपद्वृत्तिरेकस्यानेकगोचरा ॥१३५॥। अन्यत्प्रकुर्वतः कार्यमशक्यस्यान्यवस्तुनः। तथैव करणं चेति विशेषस्निविध: स्मृतः ॥१३६॥ प्रसिद्धाघारपरिहारेख यत श्र्प्राधेयस्य विशिष्टा स्थितिरभिघीयते स प्रथमो विशेष: । यथा-
रमयन्ति जगन्ति गिर: कंथमिह कवयो न ते बन्या: ॥५५६।। सामान्य अलड्कार में दोनों (प्रस्तुत तथा अप्रस्तृत) वस्तु तुल्य गुए वाली होती हैं धत एव दोनों के भेद का ग्रहण नहीं होता (भेदाग्रह)-मि० साहित्यदर्पख। भ्रान्ति- मान से इसका भेद यह है कि वहाँ प्रस्तु में रमृत अप्रस्तुत वस्तु की भ्रान्ति होती है; किन्तु यहा अनुभूत वस्तुओं में एरुरूपता होती है। इसी प्रकार यह रूपक तया प्रथमातिरायोकि से भी भिन्न है; कयोंकि वहाँ उपमेय की उपमानरूपता प्रतीत होती है; किन्तु यहां उपमान तथा उपमेय की एवरूपता। (२) 'मचयज' इत्यादि में शुश्नता की समानता के कारण प्रस्तुत मभिसा- रिका तथा पपस्तृत (चन्द्रिका) की एकरूपता का वणन है यहाँ पर 'अविभाव्य्ता गताः इसके द्वारा एकात्मता का प्रतिपादन किया गया है अत एव सामान्यालडकार है। (३) कहीं २ प्रस्तुत और अप्रस्तुत की उत्तरकाल में भेद-प्रतीति हो जाने पर भी पूर्वकालिक ऐकयप्रतीति के भासित होने से सामान्य सलडकार होता है; जैसे- 'वेत्नत्वचा' इत्यादि में प्रस्तुत (कपोल) और अप्स्तुत (चम्पक) में अमरपतन के पश्चात् भेद-प्रतीति हो जाती है फिर भी पूर्वफालिक एकसपदा को लेकर मामान्य भलड्कार होता है। अनुवाद-(५६ विशेष) (क) जरहाँ प्रसिद्ध आावार के बिना भायेम (प्राथित) यस्तु की स्थिति सपया (ए) एक (यस्तु) को धनेफ यस्तुओं में एक साथ एकस्प से वुति (स्यति) धथवा (ग) वेग से धन्य कार्य करते हुए (य्पति)के किसी धन्य पदाश्य फार्य का उसी प्रकार से करने का यहंन किया जाता है; वह सोन प्रकार का 'विशेष' सलद्वार कहा गया है। (१) प्रयम 'विशेष' (पलद्धार) यह है जह। प्रसिद्ध आधार का परिरमाग परके भाधेम यस्तु को विशिष्ट (भ्मात् बिना सामार मे ही) सिपति का पएन किया जाता है। उदाहरस-'रवर्ग में पले जाने पर भी जिनकी प्रसुरूखों से बुक फाय्य दपवाली वस्पपवंत्त समस्त संसार पो पानन्दित करती ए. पे कविगए इस सोक में पन्बना योग्प वर्यो न र हो l४४६॥
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दँशम उल्लांस: ५ह७
२. एकमपि वस्तु यत् एकेनैव स्वभावेन युगपदनेकत्र वतते स द्वितीयः। यथा- सा वसइ तुज्म हिअए सा चिचश्न अच्छीसु साअ वअरगोसु। अरह्मारिसाण सुन्दर श्रोआरासो कत्थ पावासम् ॥५६०॥ (सा वसति तव हृदये सैवात्िपु सा च वचनेपु' अस्माद्शीनां सुन्दर, अवकाश: कुत्र पापानाम् ।५६०।) ३. यदपि किंचिद्रभसेन आरभमागरतेनैव यत्नेनशक्यमपि कार्या- न्तरमारभते सोऽपरो विशेप:। यथा- (क) रफुरदृद्भुतरूपमुत्प्रतापज्वलनं त्वां सृजताऽनवद्यविद्यम्। विधिना ससृजे नवो मनोभूभुवि सत्यं सविता बृहर्पतिश्च ।५६१।। यथा वा- (ख) गृहिसी सचिव: सखी मिथः प्रियशिष्या ललिते कलाविधी। करुणाविमुखेन मृत्युना हरता त्वां बत कि न मे हतम् ॥५६२॥ [यहाँ कविरूप प्रसिद्ध आधार के बिना ही कविवासी रूप आधेय की स्थिति का वर्णन हे अतः प्रथम 'विशेष' अलद्दार है] (२) द्वितीय 'विशेष' (पलद्धार) वह है जहाँ एक ही वस्तु एक ही रूप में एक साथ अ्नेक स्थानों में विद्यमान रहती है। उदाहरण-[सपरनी में श्रासक्त पति के प्रति पत्नी की उक्ि]-'हे सुन्दर, वह (सपत्नी) ही तुम्हारे हृदम में बस रही है, वही आांखों में और वही वचनों में निवास करती है, हमारी जैसी पापिनी (भ्रभागिनी) के लिये स्थान ही कहाँ है?'।५६०। [यहाँ पर एक ही सपती की एकरूप में एक साथ ही हृदय इत्यादि अ्रनेक वस्तुओं में स्थिति का वर्रन किया गया है अत एव द्वितीय विशेष अलद्दार है] (:) तृतीय 'विशेष' (अलङ्धार) वह है जहाँ वेगपूर्वक किसी कार्ये को करने वाला कर्ता उसी प्रयत्न के द्वारा किसी अन्य पशक्य कार्य को भी कर लेता है (यह वर्णन किया जाता है)। जैसे- (क) 'हे राजन् प्रकाशमान अद्भुत रूप वाले, उद्दीप्त प्रतापानल से युक्त तथा शुद्धविद्या वाले आपकी रचना करते हुए विधाता ने सचमुच ही एक नवौन फामदेव, सूयं तथा वृहस्पति का निर्माण किया है'।५६१॥ [यहाँ पर-राजा की रचना करने वाले विघाता ने उसी प्रयत्न के द्वारा अव्य अशक्य कार्य कामदेव आदि की रचना कर डाली-इस वएन में तृतीय विशेप अलद्धार है] (ख) अथवा जैसे-[रघुवंश; इन्दुमती-निघन पर राजा भ्रन की उति] 'हे इन्दुमती, तुम मेरी गृहिरी, मन्त्रस देने वाली, एकान्त की सहचरी तभा ललित फला के अम्पास में प्रिमशिष्या थी, करणा-बिहीन मृत्यु ने तुम्हें छीनते हुए मेरा पया नहीं छोन लिया ?॥५६२।
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५e= 1 कांव्यप्रकांशः
सर्वत्र एवंविघविपयेडतिशयोक्तिरेव प्राणत्वेनावतिष्ठते तां बिना प्रायेशालद्वारत्वायोगात अपत एवोक्तम्- "सैपा सर्वत्र वक्रोक्तिरनयार्थो विभाव्यते यत्नोडस्यां कविना कार्य: कोडलक्वारोऽनया बिना"॥ इति। प्रभा-'गृहिणी' इत्यादि तृतीय प्रकार के विशेष अलङ्कार का दूरारा उदा- हरण है। 'रफुरद्' इत्यादि में अन्य कार्य का करना शब्द-बोध्य है; किन्तु 'मूहिएी' आादि में वह व्यङ्ुथ है इसी कारण यह दूसरा उदाहरस दिया गया है। कुछ व्यास्या- कारो (माशिकयचन्द्र) का मत है कि 'स्फुरद' इत्यादि में यथासंस्य मतद्गार भी हो सकता है अत एव यह दूसरा उदाहरस दिया गया है। यहाँ पर 'इन्दुमतीहरएारूप' एक कार्य करने वाली मृत्यु का उसी प्रमत्न के द्वारा सचिव-हुरस मदि अ्रन्य परनय कार्य करने का चर्सान है अत एव तृतीय प्रकार का विशेष सलद्वार है। अनुवाद-इस प्रफार के ('विशेय' चलद्वार इत्यावि के) स्थसों पर सयत्र पतिशम मर्थात् लोक सीमा का प्र्रतिकमणा करने वाली उक्ति (पमूठा कपन) हो प्रास रूप में स्थित होता है, उसके मिना तो प्रायः असड्कार होना सम्भव नहीं है। भरतएय (भामहाचार्य ने) कहा है- "समस्त मलङ्फारों के स्यस में (सबंत्र) यह (पूर्वलक्षित प्रतिशयोकि) यहो पकोकि (वंचित््याघायक उक्ति समवा सोकातिवर्ती उक्ति, यहां पतिशयोकि तथा पकोकि समानार्यक है) : इसके द्वारा भर्य को पलङ्कृत किया जाता है (विभाव्यते)। (पतः) कवि को (इसमें यत्न करना चाहिये। इसके बिना कौन अलट्कार है?" (भर्थात् यह समस्त मसडफारों का बीजरप है)। प्रभा-(१) यहाँ पर यह पाङ्ा हो सकती है कि आधार के बिना आापेय की स्थिति नहीं हो सकती, एक हो वस्त एक साथ धनेक वस्तुओं में नहीं रह गवती तथा एक ही यत्न से दो कार्यों का होना भी असम्भव ही है फिर इनक यंन को मलदवार कैसे कहा जा सयता है ? 'सवंत' इत्यादि प्रवतरण द्वारा इसका समाधान किया गया है। भाव यह है कि प्रायः कवि-प्रतिभा पत्पित लोहतोमातिवर्ता सि मैनिश्व ही कविता-का पतसधार हुआ करता है। इग दृष्टि से उपयुंक रथसों में भी मलड्कार मानने मे कया आपति है। यद्यपि 'दिवम्' इत्यादि में कवि मरनी पाली का वास्तविक आधार नही (ग्योि शब्द का सधार माकास माना जाता है), हिन् वह कवि-सम्प्रदाय में तो आधार रय से प्रसिद्ध है; इससिये ऐसे कयिम तिमारलिस माधार के बिना आामेम की स्यति पगम्भन नही मोर उसपा यशन पनड्कार ही है। इसी प्रकार पन्य उदाहरणों में भी समस्ना पाहिमे। (२) पाचारयं मम्मट ने गहा सोक्सीनाविनर्ती विचिन कगनरूप पतिय- मोकि को ही नायः गमस्त भनट्कारी का जीवन बतलामा है, पतियमोकि नामक मसदूार को नहीं। बर्श पर भतिसमोकि शब् योगिक है ग्वानेग' शब्न इससिये दिना
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दशम उल्लांस: 44
(२०४) स्वमुत्सृज्य गुएं योगादत्युज्ज्वलगुणास्य यत्। वस्तु तद्गुणतामेति भण्यते स तु तद्गुणः ॥१३७॥
गया है कि स्वाभावोकि आदि अलड्कारों का आधार यह अतिशायोक्ति नहीं होती। उन्होंने अपनी मान्यता के समर्थन में भामहाचार्य की 'सँपा' इत्यादि उक्ति उद्ध त की है। भामहाचार्य का भाव यह है कि यह अतिशयोक्ति, जिसका दूसरा नाम वक्ोकि भी है, स्वयं अलङ्कार है तथा समस्त अलड्कारों का बीज रूप है अरथाति यह सवघ विद्य- मान रहती है। इरा प्रकार जहाँ अन्य वचित्र्य होता है वहाँ 'प्राधान्येन वयपदेशाः भवन्ति' इस न्याय से अन्य अलड़कार कहा जाता है यदि अन्य कोई वैचित्रय नही होता तो अतिशयोक्ति कही जाती है। आचार्य मम्मट ने आंशिक रूप में ही इसे स्वीकार किया है; अर्थात वक्ोक्ति या वैचित्र्यपूर्र उक्ति मात्र को अतिशायोक्ति अलडकार तो नहीं माना, किन्तु वैचित्र्यकथन को सब अलड्कारो का बीज अवश्य माना है। यह स्पष्ट ही है कि मम्मट के अनुसार अतिशयोक्ति अलङकार का स्वरूप भामह की अतिशयोक्ति से भिन्न है। इस प्रकार टीकाकारों का मत है कि यहाँ काव्यप्रकाश वृत्ति में जो अतिशयोक्ति शब्द है, वह योगिक (वैचित्रयपूर्ण उक्ति के अर्थ मे) है किन्तु भामह के ग्रन्थ में वह योगारूढ (अतिशायोक्ति नामक अलङ्कार के लिये) है। दूसरी शोर प्रो० गजेन्द्रगडकर का विचार है कि मम्मट की वृत्ति एवं भामह के ग्रन्थ दोनों में ही अतिशयोक्ति (या वकोकि) शब्द के द्वारा अतिशयोक्ति अलङ्- कार का ग्रहस होता है। उन्होंने अनेक युक्ति और प्रमाणो के आधार पर अपने मत का प्रतिपादन किया है (द्र० काव्यप्रकाश, नोटस्, पृ० ४५२-४५५)। तथ्य यही प्रतीत होता है कि मम्मट ने यहाँ अतिशयोक्ति नामक अलङ्गार को ही विशेष अल- इ्कार का आधार बतलाया है। यहाँ दिये गये विरेप के सभी उदाहरसो मे पतिश- बोकिति बीज रूप मे विद्यमान है। भाहम ने तो सभी अलद्धारों के मूल में अतिशयो- क्ि नामक अलङ्कार को माना था। अतः आशिक रूप में ही भामह के कथन की स्वीकृति यहाँ की गई है। (३) विशेष और विरोध-यद्यपि विशेष अलड्कार के तीनों ही प्रकारों में विरोव भासित होता है तथापि विरोधाभास और विशेष में अन्तर है-(i) विरोधा- भास का क्षेत्र व्यापक है; अर्थात् विरोघमान में वह हो सकता है किन्तु विशेप भलङ् कार उपयुकत तीन प्रकार के विरोध के स्थलों में ही होता है। (ii) व्यधिकरस (भिन्न-भिन्न आधारों में रहने वाले) पदार्थों की एक आधार में स्थिति के वएन मैं विरोघाभास का चमरकार निहित है, किन्तु विनेष अलड्कार की चारता उपयुक्त सीन प्रकार के विरोधों के वएन मे है। अ्रनुवाद-(५७) तद्गुए यह सलङ्कार है, जहां (न्यूनगएवाली प्रस्तुत) वस्तु
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६०० 1 काव्यप्रकार:
वस्तु तिरस्कृतनिजरूप केनापि समीपगतेन प्रगुणतया स्वगुगासम्प- दोपरक्त तत्प्रतिभासमेव यत्समासादयति स तद्गुए: तत्याप्रकृतस्य गुखो- Sप्रास्तीति। उदाहरगम्- विभिन्नवर्णा गरुडापजेन सूर्यत्य रध्या: परितः स्फुरन्त्या। रत्ने: पुनर्यत्र रुचा रुच स्वामानिन्यिरे वंशकरीरनीलै: ।५६३॥ अत्र रवितुरगापेक्षया गरुडापजस्य तदपेक्षया च हरिन्मसीनां प्रगुणवर्सना।
प्रत्यन्त उज्जवल गुशवाली (प्रप्रस्तुतवस्तु) के सम्बन्ध से अपने रप (गुए) को स्वाग कर सद् पता (भ्रपस्तृत के स्वलप) को प्राप्त करती है (यह वहन होता है)। (२०४) सर्यात् जब प्रस्तुत चस्तु समीपस्थ वस्तु के द्वारा उसकी प्रकृष्ट गुग सम्पत्ति से उपरक्त होने के कारस अपने एप का तिरसकार करके उस (समीपगत) वस्तु के हप (प्रतिभास) को ही प्राप्त कर लेती है (समासादपति), वह तद्मुएा असद्वार है; जैसा फि-(तद्गुए शब्द की वयुतर्पत्ति ही है) उस (तन्) भर्यात् पप्स्तृत का रय- रूप (गुख) जिसमें है (वह तद्गुण फहा जाता है)। उदाहरण- [भाघकाव्य ४.१४, रंवतक पर्वत के यहान में सूर्य के भश्नों का बसंन- 'पक्स (गरडाग्रज) की यारों औोर फँसने वाली क्रान्ति से मिन्न (सात) वए वाले होकर सूर्य के रय के घोड़े (रथ्याः) जिस रतक पवत पर (यन्न) बाँस के परपुर जैसी हरित वएं (मरकत) मसियों की घारों और स्फुरित हुई कान्त से फिर अपनी (हरित) क्रान्ति को प्राप्त हो गये ॥५६३। यहाँ पर सूर्य के अप्वों की सपेक्षा गदड के अपग घर्यात् मप्स के और उस (पसस) की परपेक्षा हरितमलियों के गुस-प्ररूर्ष का बशांन किया गया है। प्रभा-(१) अपने रूप को त्यागहर दूसरे के उत्कृष्ट गुप को ब्रहस करने का मनूठा वगंन हो तद्गु प्रतइकार है-नदशुयः स्गुमत्यागादन्योल्ट्रपुसमह्:'। जैमे-'विभिन्नवण' दत्यादि। यहाँ वो रयतीं पर तद्गुग मलड्यार है-गगक तो गूय के पररो का भपनी सपेका उज्ज्यस गुसा याले अरस के रप को प्राप्त नरवा औोर दूगरे पपस की परेका उस्कृष्ट गुगा याली हन्तिमखियों के रूप को प्राप्त करना। (२) तड्पुख, मीसित औौर सामान्य-तीनों में किसी एक्मक्षन का दूगरे मे द्वारा मास्यादन होता है, तमानि (i) मीगिव तभा सामान्य में एक थहम् के द्वागा तिरोहित हो आाने के पार्म सन्य सम्नु (बर्मी) पा बहमा ही नहीं रोत; जर्बर ददगुश में बेयन गूख (रंग भशि) का हो धभिभव होता है, धर्मी का सो उृपक नास दोता हो रहता है (ii) मीमिग पोर मागान्य मे दोनो बन्तु समान गुछ बानी
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दशम उल्लास: ६०१.
(२०५) तद्र पाननुहार्चेदस्य तत्स्यादतद्गुणः । (क) यदि तु तदीयं वर्ण सम्भवन्त्यामपि योग्यतायां इदं न्यूनगुएं न गृह्लीयात्तदा भवेदतद्गुणो नाम । उदाहरणम्- घवलोसि जह वि सुन्दर तह वि तुए मज्फ रज्जिन्न्ं हिश्रशम्। रातभरिए वि हिअए सुहत्र सिहित्तो ए रत्तोसि ।।५६४।। (घवलोऽसि यद्यपि सुन्दर, तथापि त्वया मम रब्जितं हृदयम्। : रागभरितेऽपि हृदये सुभग, निहितो न रक्त्तोर्जस ।।५६४।। अन्नातिरक्त नापि मनसा संयुक्तो न रक्तताभुपगत इत्यतद्गुरः। (ख) कि च तदिति अ्प्रकृतम् अ्रस्येति च प्रकृतमत्र निर्दिश्यते। तेन यत् अपकृतस्य रूपं प्रकृतेन कुतोऽपि निमित्तान्नानुविघीयते सोडतद्गुय इत्यपि प्रतिपत्तव्यम्। होती हैं किन्तु तद्गुए मे दोनों भिन्न २ गुगा वाली (iii) तद्गुए में प्रस्तुत मे वस्तु अपने गुणों का परित्याग करके दूमरी के गुए को प्राप्त करती है, मीलित मे समान चिह्न वाली प्रवल वस्तु के द्वारा तिरोहित हो जाती है और सामान्म में अपने गुणों को त्यागे बिना ही दूसरी के साथ एकरूपता को प्राप्त होती है। तद्गुए और भ्रान्तिमान्-दोनों में किसी प्रकार की मिथ्याप्रतीति का वर्णन होता है यद्यपि (i) भ्रान्तिमान् में समान गुणों के कारण एक वस्तु दूसरी के रूप में प्रतीत होती है; जबकि तद्गुण में किसी उत्कृष्ट गुए वाली वस्तु' के सम्पर्क से अन्य वस्तु का गुएा उत्कृष्ट वस्तु के गुएा (रंग आदि) के रूप में प्रकट होता है (ii) भ्रान्तिमान मे एक वस्तु दिखलाई देती है, उसमें स्मृत वस्तु का आरोप करके उसे दूसरी समझ लिया जाता है, किन्तु तद्गुए में दोनों वस्तु दिखलाई देती हैं जिनमें से एक का गुस दूसरी में भासित होने लगता है। (मि० उद्योत)। सामान्य और मीलित - (द्र०, सामान्य)। अनुवाद- (५८) (प्रथम अर्य) अतद्गु अलङ्गार तब (तद्=तदा) होता है यदि (न्यूनगुस वाले अपस्तृत) पा (उज्जवल गुशों का सम्बन्ध होने पर भी= योगाद् उज्ज्यलगुसस्य, पूर्व सूत्र से) उस (उज्जवल गुए वाले प्रस्तुत) के रप को ग्रहस न करना निरूपित किया जाता है। (२०५) अर्थात् यदि प्रस्तुत सम्पन्धी (तदीयम्) रूप फो रूपप्रहस को संभावना होने पर भो, यह न्यून गुए वाली अप्रस्तुत वस्तु ग्रहस नहीं करती तो अद्युस नामंक पलद्धार होता है। उदाहरण- [गाया सप्तशती ७-६५, नामक के प्रति नामिका का उपालम्भ] 'हे सुन्दर, यद्यपि तुम शर्वेतवर्स हो तथापि तुमने मेरे हृदम को प्नुरक्त कर दिया है। हे सौभा ग्यशाली, मैंने राग से पूसं अपने हवदय 'में तुम्हें रस लिया है तथापि तुम भनुरक, (लालिमा युक्त) नहीं हुए ॥५६४॥ यहाँ अ्त्यस्त रक्त [लालिमा पुर्स, अनुरक्त] हृदय से सम्वन्ध प्राप्त फरफे
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६०२ 1 कंाव्यप्रगंरी:
यथा- गाङ्गमम्वु सितमम्यु यामुनं कज्जलाभमुभयत्र मज्जत: । राजहंस, तव सैव शुभ्रता चीयते न च न चापचीयते ।।५६५।। (२०६) यद्यया सावितं केनाप्यपरेशा तदन्यथा ॥१३८॥। तर्थव यद्विघीयेत स व्याघात इति स्मृतः । सालिमा को प्रप्त नहीं हुआ-इस प्रकार मतद्गस असकार है। (भतद्शुस का दूसरा रप) औौर भी यहां (सून में) 'तद्' (तद पाननुदारः) शब्द के द्वारा 'अपस्तुत' और 'अत्य' शब्द के द्वारा 'प्रस्तुत' का निर्देश किया गया है। इसलिए यह भी समझना चाहिये कि जहाँ किमी भी कारण से प्ररतुत (वस्तु) के द्वारा भप्रस्तुत के रप का अनुसरख नहीं किया जाता यह भतद्पुस मसद्ार है। जंसे- 'हे राजहंस, गङ्गा का जल श्वेत है, यमुना का जल फाजल को भाभा थाता (श्याम) है, दोनों में स्नान करते हुए भी तुम्हारी सुभ्रता वही (रहती) है, न बढती है न घटती है' ॥५६५। प्रभा-(१) 'अतद्गुख' अलद्वार के सूयोक्त नक्षणा की दो व्यास्याभों के माधार पर यह दो प्राार का होता है-(क) संभावना होने पर भी अप्रस्तुत के द्वारा प्रस्तुन के रूप का अ्ग्रहए, जैमे-'यवलोगि' इत्यादि में। यहां पूर्वाद्ध में तृनीय विषय अलदधार है; क्योकि यहाँ कार्य (राग) और कारस (नायर) के गुप (कमयाः रक औोर धवल) गरतपर विस्व है। उत्तरारयं में-मपस्तुत युवक के द्वारा प्रस्तुत हृदय को रपतता का प्रहस न करना, '(जबकि हृदय मे निहित है) भतद्गुग अतदार है। (गा) संभायना होने पर भी प्रस्तुत के द्वारा अपस्तुत के रुप का अग्रहस; जैसे-'माङ्तमम्बु' इत्यादि मे। यहां प्रस्तुत राजहंस के द्वारा मपस्तुत गङ्गान्यमुना के गुए का श्रग्रहण वशित है (जवकि 'भग्जतः' शबद से प्रदुसयोग्पवा प्रकट हो रही है); भतः अतद्गुए मनद्वार है। (२) पतद्मुस औौर विशेयोकि-दोनों में योग्य धारस के होने पर भी फार्य की मनुसपति का वणन होता है तयापि विशेयोकि सो इस प्रकार के सभी स्थलों पर हो मकती है यह सामान्य (उत्मर्ग) है; किन्तु जब कोई वस्तु सम्भायना होने पर भी अन्य वस्नु के गुगों का बहमा नहीं करती यहाँ मउदगुल ममदार होता है। पतद्गुम विद्येयोंकि का पपवाद है (ि0 साहित्यदर्पख)।. मतद्गुल औौर विघन (तृतीय)-दोनों में कार्यकारख भाप का विरोष दिससाया जाता है समापि विषम में कोई कारर सपने से मिस गुए माले काय को उतपन करता है किन्तु मतद्पुए में सम्भायना होने पर भी एक पस्तु दूगरी के गुए को नही प्रहस करती। अनुवाद्- (१६) स्याया यह ससनदार कहा गया है जहाँ किसी के द्वारा
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दशमे उल्लास: ६०३
येनोपायेन यत् एकेनोपकल्पितं तस्यान्येन जिगीपुतया तदुपायकमेव यद्न्यथाकरसं स साघितवरतुव्याहतिहेतुत्वाद् व्याघातः। उदाहरणम्- दशा दग्घं मनसिजं जीवयन्ति दशैव या । विरूपाक्तर्य जयिनीस्ता: र्तुवे वामलोचनाः ॥५६६।।
जो वस्तु (यत्) जिस उपाय से (बथा) सिद्ध को गई है, दूसरे के द्वारा (विजय को इच्छा से) वह वस्तु उस (उस जैसे) उपाय द्वारा ही (तथा) विपरीत (सिद्ध) कर दी जाती है। (२०६) अर्थात् जिस उपाय के द्वारा जो वस्तु एक व्यक्ति ने सिद्ध की है। उसको मन्य व्पत्ति विजय की इच्छा से उस उपाय के द्वारा ही जो अन्यथा अर्थात् विपरीत (सिद्ध कर देता है यह पूर्वसाधित वस्तु के व्याघात (परस्परविरोध) का हेतु होने से 'य्यापात' अलद्धार है। उदाहरण-[राजशेखरकृत विद्धशालभन्जिका १.२) जो (शिव की) दृष्टि से दग्घ हुए कामदेव को अपनी दृष्टि से ही पुनः जीवित कर देती हैं, विपमलोचन शिव को जीतने वाली उन रम्य एवं वक्र (वाम) लोचनों वाली कामिनियों को मैं स्तुति करता हूँ।५६६।। प्रभा-शिव ने दृष्टि (उपाम) द्वारा काम-दहन किया, शिव को जीतने की हच्छा वाली वामलोचनाओं ने दाहहेतुभूत दृष्टि (उपाय) द्वारा ही (उसके विधरीत) कम को जीवित कर दिया। यद्यपि शिव तथा वामलोचनाओ की दष्टि भिन्न २ हैं तथापि सजातीय होने से दोनों की एवता मान ली जाती है। इस प्रकार यहाँ 'व्याघात' अलङ्गार है। (२) इस प्रकार आ्रचार्य मम्मट ने शुद्ध ५६ अलद्धारों का विवेचन किया है। अन्य प्राचीन तथा अरववचीन आचार्यो ने इन अलङ्धारों की संख्या भिन्न २ मानी है। आचार्य मम्मट ने यत-तन्न अन्य मान्यताओ्ं का परिहार भी किया है इसी प्रकार व्यास्याकारों ने भी अन्यों द्वारा निरुपित अलद्धारों का या तो मम्मटोक्त अलद्ारों में ही अन्तर्भाव करने का प्रयास किया है प्रथवा उनका अलङ्कार होना ही स्वीकार नहीं किया। जैसे-निरत्तियोंगतो नाम्नामन्यार्थत्वप्रकल्पनम् :' यह निरुक्ति' नामक अलड्कार श्लेय-विशेष ही है। इसी प्रकार कुछ आलङकारिकों ने (प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, ऐतिह, भर्थापत्ति, अनुपलव्थि, सम्भव) आठ प्रमासालडकारो का निरुपस किया था। उनमें से प्रत्यक्ष' भाविक (अलड्कार) के द्वारा और उपमान' उपमा के द्वारा ही गतार्थ है। अनुमान नामक अलड्कार को स्वरूपतः यहां स्वीकार किया गया है। शेप अलङ्काररूप ही नही है।
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६०४ कांव्यप्रकारी
(२०७) सेष्टा संसृष्टिरेतेषां भेदेन यदिह स्थिति: ॥१३६॥ एतेपां समनन्तरमेवोक्तस्वरूपाएीं यथासम्भवमन्योन्यनिरपेक्षतया यदेकत्र शब्दभागे एव, अर्थावपये एव, उभयनापि वा अवस्थानं सा एका- थेसमवायस्वभावा संसृष्टिः। (१) तत्र शब्दालक्कारसंसृप्टियेथा- वदनसौरभलोभपरिभ्रमद्भ्रमरसंभ्रमसंभृतशोभया। चलितया विद्धे कलमेखलाकलकलोऽलकलोलटशाऽन्यया।५६७॥
निम्पतीव तमोड़ङ्गानि वर्पतीवाब्जनं नभः । शरसत्पुरुपसेवेव दृष्टिर्विफलतां गता ॥५६८्॥। पूर्वत्र परस्परनिरपेक्षी यमकानुप्रासी संसृष्टि प्रयोजयतः उत्तरत्र तु तथाविधे उपमोत्म्रेसे। *- (३) शब्दार्थालद्धारयो्तु ससृष्टि- सो सात्थि एत्य गामे जो एअं मदमददन्तलाश्रएगम्। तरुखाएं हिअललूडिं परिसवकन्ती सिवारेइ ।।५६६।। अनुवाद-(६० संगृष्टि) जो इन (उपयुक्त प्रसङ्कारों को परस्पर निरपेक्ष रुप से (मेदेन) एफन्र (इह) स्यति होती है यह संसृष्टि मानी गई है। (२०७) सर्थात् सभी (नवम तपा बदाम उल्लास में) जिनका स्वरूप प्रद्शित किया गया है इन सलदारों का मथासम्भय एक दूसरे के निरपेक्षभाव (स्वतन्प्ररृप) से जहां एक स्यान पर, अर्थात् (१) शव्दसय (काय्य के) भाग में या (२) घर्य के वियय में सथया (३) शव्द तथा सरथ दोनों में ही, स्मिति होती है यह एक वर्तु (शब्व, अरथं आवि) में भनेक (पलजारों) का सम्बन्ध होना रूप संमृष्टि है। (१) उनमें से गम्दालद्धार-संतृष्टि मह है, जैसे-[माधकाम् ६.१४ में किसी नाविफा पा यरहन]-'मुस की सुगन्धि के सोभ से भ्रमण करते हुए भ्रमरों के भय (संध्रम) से और ममिरू सोभा को पारए करने याली, भागती हुई, अतएव केशों (के गिरने) से पञ्चल दुष्टि वासी पन्य किसी नामिता मे सुग्वर करपनी को पलकतप्वनि की ॥५६७।। (२) घ्यासद्धारों की संगृष्टि तो यह है-'निम्नति' इत्यादि (कपर० उद्या
पूर्वमनोर ('वदन' हरमावि) में समक तथा अमुपास संमृष्टि (पतन्ू) के प्रयोजर है, उत्तर द्नोक ('निम्पति' इत्मादि) में तो परस्परनिरपेक्ष (तवाविये) चपमा तथा उतपरेक्षा (मंसृष्टि के नयोजर है।। (३) इग्दालदवार औौर समापद्वार की संमृष्टि तो यह है-
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दशम उल्लास: ६०५
• (स नास्त्यत्र आामे य पनां महमहायमानलावसयाम। तरुणानां हृद्यलुएठार्कीं परिष्ववकमाणां निवारयति ॥५६६॥ अत्रानुप्रासो रूपकं चान्योन्यानपेक्षे। संसर्गश्च तयोरेकन्न वाक्ये छन्दसि वा समवेतत्वात्। (२०८) अरविश्रान्तिजुपामात्मन्यङ्गाद्गित्वं तु सङ्करः।
'इस ग्राम में वह (ऐसा फोई) नहीं है जो अत्यधिक उल्लसित सौन्दर्य वाली तरुखों के हृदय को लूटने वाली, इधर उधर घूमती हुई (परिषवक्कमारम्) इस तरुसी को रोके ॥५६६॥ यहाँ पर अनुप्रास और रूपक परस्पर निरपेक्ष हैं और उन दोनों का एक वाकय या छन्द में सम्बन्ध होने से दोनों की संसृष्टि (संसर्ग) है। प्रभा-परस्परनिरपेक्षभाव से दो या अधिक अलङ्गारों की एकत्र अवस्थिति ही संमृष्टि है। यह एक विशेष चमत्कार उत्पन्न करती है अतएव पृथक् अलङ्कार ही है। यह संसृष्टि तीन प्रकार की है-(१) शब्दालद्वार संमृष्टि; जँसे-'वदन' इत्यादि के पूर्वार्व में 'भकार' का तथा तृतीय चरण में लकार का अनुप्रास है और चतुर्थ चरस में 'लकलोलकनो' यह यमक है। दोनों शब्दालङ्वार परस्पर निरपेक्ष भाव से एकत्र स्थित हैं। (२) अर्थालद्ार ससृष्टि; जैसे-'लिम्पति' इत्यादि के पूर्वार्ध में उदप्रेक्षा है उत्तरार्ध मे (असत्पुरुपसेवेव) उपमा है। दोनों अर्थालद्वार परस्पर निरपेक्षभाव से एकन स्थित हैं। (३) सब्दालङ्गार और अर्थालङ्कार की संसृष्टि; जैसे-'सो सात्थि' आदि के पूर्वार्ध में छेकानुप्रास शब्दालद्वार है तथा उत्तरारघ (हृदयलुष्ठाकी) रूपक' अर्थालङ्कार है उनका परस्परनिरपेक्षभाव से योग ने होने के कारण संसृष्टि है। यहाँ यह दांका होती है कि अनुभास तो शन्दाश्रित है और रूपक अरथाशित है फिर दोनों की एकन स्थिति वैसे कही जा सकती है। 'संसगदच' इत्यादि पंकति में इसका समाधान किया गया है। भाव यह है कि आकांक्षादि युक्त सर्था् अर्थविशिष्ट शब्द-समूह ही वाक्य है; अतः शब्द और अर्थ एक वाकय में स्थित हैं तथा इनका 'एकार्थंसमवाय है। यदि यहाँ वाक्य-भेद माना जाये तो अनेक वाक्यों को एकवाक्यता रूप छन्द में दोनों स्थित हैं-(सब्दरालङ्वार साक्षात् रूप से और अरयालद्वार परम्परया) इसलिये कोई दोप नहीं। अनुवाद-[६१ कअरङ्गाद्भ्िभाव संकर] अपने स्वरूप में निरपेक्षभाव (स्वतन्त्र रूप) से पर्यवसतित न होने वाले उपपुक्त (एतेपाम्-ी पूर्वसूत् से अनुयुति होती है) मलद्गारों का अ्रङ्ध तथा अ्रङ्गो (उपकारक और उपकाय प्रथया अनुपाहक औौर अनुप्राह्य) रूप से स्यित होना संकर भतङ्गार है। (२०=)
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६०६ ] काव्यप्रकाग:
एते एव यत्रात्मनि अनासादितम्वतन्त्रभावा: परस्परमनुमाध्यानुपा- छकतां दघति स एपां सक्कीर्यमाशस्वरूपत्वात्सक्करः। उदाहरणम्- आात्त सीमन्तरत्ने मरकतिनि हते हेमताटढपन्रे लुप्तायां मेखलायां फटिति मशितुलाकोटियुग्मे गृह्दीते।
राजन् गुब्जाफलानां स्रज इति शवरा नैव दारं हरन्ति ।।५७०।। अरत्र तद्गुएमपेदप ध्रान्तिमता प्रादुर्भूतम् तदाश्रयेश च तद्गुणः सचेतसां प्रभूतचमत्कृतिनिमित्तम्, इत्यनयोरद्गाद्विभावः । यथा वा-
अर्थात् ये (उपमुक्त अलद्दार) ही जहां अपने सवरूप में स्वतन्त्ररूप से स्पत नहीं होते तथा परपर अनुप्राह्य अनुप्राहफ भाव को धारण कर लेते हैं यह उनके स्वरप के संकीएं (मिश्रित mixed) हो जाने के फारसा संकर (कहलाता) है। उवाहरण- 'हे राजन् किरातजन यन में (पापके भय से) इधर उघर भटकती हुई पापफो शयु-नारियों के मरकतमसियुक्त सिरोभूपश (सीमन्तरत्न) को लेने पर सुवलं के करगंभूपण (तातडक) को हर सेते हैं। तब मेसला को तोड़ कर मलि निमित नूपुरदय (कोटियुग्म) शीम्र हो से सेते हैं, फिन्तु बिम्बाफस सदृप भ्ोष्ठों की आभा से लाल मुक्तामाला को गुझ्जाफलों को मासा समभफर नहीं हरते हैं ।५७॥ यहाँ तद्गुस साहकार को रपेक्षा से धानतिमान पतद्कार का पषिर्माम होता है औौर उस (भ्रान्तिमान) के साथय से तद्मुस प्रसद्कार सहददपो के सिये विरेय चमत्कारक होता है-इस प्रकार इन (तद्गुस और श्रान्तिमान्) बोनो का पज्गाद्विभाय सम्बन्य है। प्रभा-दो या मधिर मनद्वारों की पग्स्परसापेसभाव से सकन स्वति ही संकर है। यह तीन पकार का दोता है -- भल्ाजिभायनकर स्नामेहसंकर मोर ३-एकपदप्रतिपाठ रक्र। १ज्हा दो या पमिक मसस्ारों का इतरानवेश भाग से स्वरुप ही निप्पम नहीं होना तथा उनका परस्पन पनुपासानुप्ाहक भाव होवा है यह पद्ाम्िभाय सद्पर है। नहीं वो दो अर्थायद्वारों का सद्र होता है; जैसे- 'मासे गीमन्तरसने इत्यादि। यहाँ पर विम्वीप्ठासया लोगम्' (बिम्बोष्ड की कान्ति मे दवेत मुक्तामासा भी लाम दिरालाई देती है) मैं नखुस समदार ह उसके मामार पर हो 'गुन्जाफपानो सनः' (भुनामामा में गुमजापस की माला आान्ति) इस आन्तिमान् मनदार का स्वरूप निष्पम होता है। सद्युस मनद्वार भी वहा स्वतत्त्रमप मे गमरहर-विशेष का उत्पादक नहीं। बिन्नु भिमान को सपेप से क विसेंत ममलारोलादक होता है। इम प्रहार यहा पनुदावयमुवादरभाय
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ददम उल्लास: ६०७
जटाभाभिर्भाभि: करधृतकलङ्काक्षवलयो वियोगिव्यापत्त रिव कलितवैराग्यविशद्ः।
शशी भस्मापाएडुः पितृवन इव व्योम्नि चरति॥५७१। उपमा, रूपकं, उत्प्रेक्षा, श्लेपश्चेति चत्वारोडन् पूर्ववत् अङ्गाद्गितया प्रतीयन्ते। कलङ्क एवाक्षवलयमिति रूपकपरिगहे करवृतत्वमेव साधकप्रमा- गातां प्रतिपद्यते। अ्र्प्रस्य हि रूपकत्वे तिरोहितकलङ्गरूपं अतवलयमेव मुख्य- तयाSवगम्यते, तस्यैव च करग्रह्णयोग्यतायां सार्वत्रिकी प्रसिद्धि:। इ्लेप- चछायया तु कलक्कम्य करधारएंअरपरसदेव प्रत्यासत्त्या उपचर्य योज्यते, शशा- ङ्वन केवलं कलककश्य मूर्त्यव उद्धहनात्। कलङ्कोऽचवलयमिवेति तु उपमार्या तथा अङ्गाद्गिभाव सङ्कर है। अङ्ग है-तद्गुण और अङ्गी है भ्रान्तिमान्। कहीं बहुत से अलङ्गारों का अ्रभ्भाङ्गिभाव सङ्कर होता है, जैसे- अनुवाद्-(बहनां सड्करः) अथवा जैसे-'जटासदृश कान्तियों से युक्त, किरसा समूह (कर, योगी पक्ष में हाथ) में कलड्क रूपी रुद्राक्ष (अक्षवलय) की माला धारण किये हुए, विरही जनों (योगी-पक्ष में वियुक्त होने वाले विपयों) के विनाश से (क्रोध नष्ट हो जाने से) स्वीकृत लालिमा के अभाव के फारस शुभ्नवर्स (योगी- पक्ष में विपयविनाशजनित वैराग्य से शुद्ध-चित्त) भस्म के समान पाण्डर (योगोपक्ष में भस्म से पाण्डुवर्स) यह चन्द्रमा चलते हुए (परिप्रेद्वत) तारा-समूह रूपी कपालों से भडिफत तल वाले इमशान सदूश आकाश में विचरता है'॥७१॥ यहाँ पर उपमा (जटाभिर्भाभिः, पितृधन इव व्योम्नि), रूपक (कलङ्फाक्षय- लय, तारापरिकरकपाल), उत्प्रेक्षा (वियोगिव्यापतेरिव) तथा प्लेप (वैराग्यविशदः) ये चारों अलड्कार पूर्वोदाहरण के समान (परस्पर) अ्ङ्गाद्विभाव से प्रतीत हो रहे हैं। ['कलङकाक्षवलय' में रूपक-निर्रय] यहां फलड्क ही श्रक्षवलय इस प्रकार (इति) 'रूपक' स्वीकार रने में 'करधृतत्व' (हाथ में धारस करना) यह (विशेषस) ही साधक प्रमाण हो जाता है; क्योंकि इसे रूपक मानने पर कलडक रूप को तिरो- हित कर देने वाला प्रक्षवलय ही मुस्य रूप से प्रतीत होता है (भोर उस प्नक्षमाला) को ही हाथ में लिये जा सकने (करग्रहयोग्यता) की सवंत्र प्रसिद्धि है। कलङ्क का करघुतत्व (हाथ में घारस करना) वस्तुतः न होने पर भी ('कर' पद में) दलेच को छाया-(प्रभाव शक्त) से सामीप्यसम्बन्ध (प्रत्यासत्या=रमीनों कलङ्कस्य घ चन्द्रे-सत्वाद् एकाथयत्वसम्बन्धेन) के द्वारा (कर शब्द का मण्डल भय में) भोपचा- रिक प्रयोग मानकर सङ्भत होता है। क्योकि चन्द्रमा केवल स्वमण्डल द्वारा हो पलड्क को धारस करता है।
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६०८ j काव्यप्रकार:
कलद्वरयोत्कटतया प्रतिपत्तिः। न नाश्य करघृतत्वं तत्वतोऽस्तीति मुख्येप्यु- पचार एव शरणं स्यात्।
:'अक्षवलय के समान कलङक' इस प्रार उपमा स्वीकार करने पर सो फ़लडक की हो मुस्यरप से प्रतीति होगो धौर इस कलड्क में करप्रहसमोग्यता घाहतयिक रूप में है नहीं, इसलिए मु्य (अर्थ-फसडक का करपुतत्य) में भी उप चार अर्यात् सक्षणा का हो आधय प्रहस करना पड़ेगा। प्रभा-(१) 'जटाभाभि:' इत्यादि बहुत से (दो से भधिक) मलड़कारों के प्रङ्गाद्मिभाव तद्टर का उदाहरण है। यहाँ उपमा, रूक उत्पेक्षा तमा दसेप पंरस्पर साक्षप हैं, जैसे कि वराग्य्विरद:' में उत्प्रेक्षा दनेप का मङ्ग है वनी विपयचिनाशाद् इब कलित यत् वेराग्यं सेन विशद:' इस प्रकार का द्वितीय भर्य प्रतीत होता है। यही 'इलेप' रुपक तथा उपमा का मद् है; ग्योकि इमके द्वारा संचगत घंराग्य की महिमा से ही जटाघारस (जटाभिर्भाभि :- उपमा) भर सक्षमाला घारस (कलड्काकयरय-रपक की समति चँदती है। इसी प्रकार 'तारापरिकर' इत्यादि रपक 'पितृवन इस' इम उपमा का पद्त है, वनोंकि रुपित कपास के आाशय से ही यहा सादृय्य बन पाता है। सर्वत ब्रङ्गों को भी चास्ताप्रतीति के लिएे पस्गी की अपेक्षा हे। गमासोकि ही यहां मभ्ती पलट्कार है काषप्रकानकार से स्पष्ट होने के कारगा उमका उल्तेरा नही किया (प्रदोष)। (२) यहाँ सका यह है कि 'कपड कारवलय' में मलङ्ू एय मदावलम्' इूर प्रकार 'ममूरव्यंसफादयश्य' २।१७२) ने गमाय होने पर रूपक होता है, किन्तु पलद: अक्षवतमम् दय' इस प्रकार 'उतमिन व्यात्नादिि: मानान्यातयोगे' (२।१५६) से उपमिन समात होने पर उपना भी हो गहती है। चतसर यहो। कपक तथा उपमान पमा मन्देह तंकर है, रक नहीं माना जा सफता । 4 'नई-गएं सान' इम भवगरस मे उक ससत का नमाधान किवा गेया है। भाव यह है कि समसारों का मनेरमदुर वहा होता है पड़ो एसर पनष्फार का मापक या बाधप कोई प्रमास ने मिने। यहाँ गेगी बात नहीं है।, येदी सो 'कस्पुतटर' विनेषण के द्वारा स्म्ट हीस्प की मिति हो रही है। गारएं मह है कि 'वेनद्रनदन मुगम् इलमदि उषमा में सोदृष्य पंत में उपमान को वियेयस करके उपमेय का पधान रय में निरदत किया जाता है औोर ऐेगा विशेपक बौड़ा जाता है जो मुग्च रपं सें उपमेय के साय पम्पित हो सके। फिल् 'यन्द एव गुरुम् इस्यादि रूपक में सो उपमेव सोरे उपमान या समर रिसनाकर कमान का प्रधान रंप में निर्रेन हिया जाता है और वेगा विनेषण ही दिया जाता ह सो सुग्य रप में नमान मे साम पन्चिन हो गकशया क्रामेन के गाम मोपमोरिक का से सी । पहा के 'नर्यवक्य' पिनेषस करा ससपनर मे ही गुग्प रुप मे सम्बन्ध हो सचता है पोर
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दश्षम उल्लास: ६०६
एवं रूपश्च सङ्कर: शव्दालद्वारयोरपि परिदृश्यते। यथा- राजति तटीयमभिहतदानवरासाडतिपातिसारावनदा। गजता च यूथमविरतदानवरा साडतिपाति सारा वनदा ॥५७२॥ अत्र यमकमनुलोम प्रतिलोमश्च चित्रभेद: पादद्वयगते परस्परापेक्षे। इ्लेपलम्य कलङ का कर-धार गौस रूप से (उपचारतः) मान लिया जाता है यदि यहाँ उपमा मानी जाय तो कलङ्क की मुख्यतया प्रतीति होगी और उसमें 'करघृत्तत्व' विशेषण का उपचारतः सम्बन्ध मानना पड़ेगा। यह उचित नहीं, कारण यह है कि 'गुएे तुत्वन्याय्यकल्पना' इस न्याय से मुस्य मे उपचार कल्पना की अपेक्षा प्रमुस्य मे ही उपचार मानना श्रयस्कर है। अनुवाद-औौर, इस प्रकार का अर्यात् अनुग्राह्यानुग्राहफरूप सङ्गर दो शब्दालद्धारों में भी दृष्टिगोचर होता है। उदाहरए-'यह स्थली (तटी) शोभाय- मान है, जिसमें दानवों के सिहनाद (रास) अभिहृत हो गये हैं शोघ्रगामी तट शब्द- युक्त जलप्रवाह (नद) हो रहा है तथा सतत मदजल से शोभित बलिष्ठ (सारा) और वनों को दिल-भिन्न करने वाला (वनदा) वह गज-समूह (गजता) अपनी अत्यन्त रक्षा करता है (अतिपाति) ॥५७२॥ यहाँ पादहय (द्वितीय तथा चतुर्थ) में स्थित यमक तथा अनुलोमप्रतिलोम चित्रनामक अलद्धार दोनों परस्पर-सापेक्ष हैं। प्रभा-यह आर्या छन्द है। यहाँ द्वितीय तथा चतुर्य चरस (दायनरासातिपा- तिसारावनदा २) मे यमक अलङ्गार है। साथ ही इन चरणों में अनुलोमप्रतिलोम नामक चिन्न अलङ्कार भी है; क्योंकि इन चरणों को जब अन्तयाक्षर से लेकर विलोम रूप में पढ़ा जाता है तब भी यही ('दानव' इत्यादि चरण बन जाता है। यहाँ चारुता के अतिशय की प्रतीति में दोनो परस्परसापेक्ष हैं अ्रतः अ्रङ्गाद्धिसद्वर है। टिप्पसी-कुछ टीकाकारों का विचार है कि यहाँ आचार्य मम्मट ने अलद्दार-सर्वस्वकार र्य्यक की मान्यता का सण्डन किया है। रुय्यक के मतानुसार दो शब्दानद्वारों का अङ्गाद्रिभावसट्कर नही होता। अलद्धारसवंस्व और उस पर जयरथ की टीका के अमुदीलन से तो ऐसा प्रतीत होता है कि हय्यक ने ही ऐसे कपितय, स्थलों पर मम्मट की मान्यता का सण्डन किया है तथा मम्मट को अपेक्षा स्य्यक अर्वाचीन ही है। इस प्रसङ्भ में रुय्यक का कथन इस प्रकार है-'सब्दालद्वार- सङ्रस्तु कश्चिद्दाहृतो यथा-'राजति तटीयम्०'। अय समकानुलोमप्रतिलोमयोः शब्दालद्धारयोः परस्परापेक्षतत्वेनाङ्गाह्ित्रिसदरः इति। एतत् न सम्यगावर्जम्
'संसुप्टिस्त्वन थमसी।' इति। यहाँ टीकाकार जयरथ ने कश्चित् काव्यप्रकारकारा- विभि :- यह व्यास्या की है।
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६१० ] फावप्ररान:
(२०६) एकस्य च ग्रहे न्यायदोपाभावादनिचयः ॥१४०॥ द्वयोवहनां वा अलव्वाराणामेकत्र समावेशेपि विरोाल्ञ यत्र युगप- दवस्थानम, न चैकत रस्च परिमहे साधकम, तदितरस्य वा परिषारे याघ कमरिति, येनैककर पय परिगृर्तत स निश्चयाभावरुपो द्वितीय: सप्रः समुच्चयेन सक्करश्येवातेपात्। उदाहरणम- जह गदिरो जहद रथएगिन्मरो जह य सिम्मलन्दाथो। तह कि विहिसा एसो सरसवाणीओ जलसिही ए किशो।४७३॥ (यया गभीरो यथा रत्ननिर्भरो पया च निर्मलच्द्ायः। तथा कि विधिना एप सरसपानीयो जलनिधिर्न कृतः ।।५७३।।) प्प्भ्न समुद्र प्रस्तुते विशेपएसाम्याद्मसतुतार्थप्रतीते: किमसौ समा सोकि: किमन्घेरपस्तुतस्य मुखेन कस्यापि तत्समगुणतया प्रस्तुतस्य प्रतीतेः इयमप्रस्तुतपशंस्षा पति सन्देक। यथा वा- अनुबाद-(६१ रा-सन्वेह्ससूर)-एकतर पतद्धार के मानने में साधक प्रमाण (न्याय) तथा बापरु प्रमार (दोप) न होने के कारस जो सन्वेह (पनिश्चम) होता है यह सन्देहसवुर है। (२०६) पर्यात् दो या घहुत से मसद्वारों का एक स्पल में समापेश होने पर भा (छाया औौर भातप के समान) विरोध होने वे करस जहां एक साप होना सम्भव महों होती औौर एकर के सवीकार में साधक भपया पतर के त्याग में चापक प्रमाल नहीं होता, जिरासे उनमें से एक को रवीवार कर लिया जाया यह निश्चयाभावरय सर्यात् सन्देहत्प द्वितीय सदूर होता है। सन्न में समुच्जमयोपक 'परार' (एकस्य घ) के द्वारा 'मडुर' शब्द को ही पू्यगन से अनुपृति होती है (भाक्षेपात्)। उवाहरएं- [दो दरसद्गारों का सव्वेह संच्ुर] 'विघाता ने इग सागर को जँसा गम्भीर रहनपूए तथा निर्मसपाग्ति याता बनाया है, वैस्षा स्यादिष्ट जन माता वर्षो नहीं चनाया' ।४७३।1 यहा समुद्र के (पतनाय रूप में) पसनुग होने पर (गन्भीर सारि 'ससस्) दिशेपलों के साम्य से ममरुत (पुद्पविरेय) मर्ष को प्रतोति हो रही है, इस कारस ददा यहु ममासोहि है? पपत पमासुन सागर के मर्लम द्वारा (मुछेग) ममानगुलों के कारल बिसी परसुम (पुरगविरेय) मर्प को पलोगि हो रही है इसमिए बया यह दममुनपसंता है? यह सन्देह है। (इम प्रशर दप्तर सापट तथा इतर-बापक इगालों के प्रनाद में यह। सन्हेरगडर है।!
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दशम उल्लास: [ ६११
घधुनापि निरुद्वाशमविशीशमिदन्तमः ॥५७४॥ अ्र्त्र कि कामरयोद्दीपक: काला वर्तते इति भङ्ग यन्तरेशाभिघानात्प र्यायोक्तम, उत बद्नर्येन्दुबिम्वतथाध्यवसानाद्वतिशयोक्ति, किवा एतदिति वक्ष्त्रं निर्दिश्य तद्र पारोपवशाद् पकम, अथवा तयो: समुच्चयविवत्तायां दीपकम, अथवा तुल्ययोगिता, किमु प्दोपसमये विशेपएसाम्यादानन- स्यावगती समासोकति:, आहोस्वन्मुखनैमेल्यप्रस्तावाद्प्रस्तुतप्रशंसा इति बहूनां सन्देहादयमेव सङ्करः। यन्र तु न्यायदोषयोरन्यतरस्यावतारः तत्रैकतरस्य निश्चयात्र संशयः। न्यायश्च साधकत्वमनुकूलता दोपोऽपि वाधकत्वं प्रतिकूलता, तन्र- सौभाग्यं वितनोति वक्त्रशशिनो ज्योत््नेव हासदु तिः।।५८५।। अरथवा जैसे-[बहुत से पलद्धारों का सन्देहसद्र] 'नयनों का आ्रनन्ददायक यह चन्द्रमण्डल दीप्त हो रहा है किन्तु दिशाओं को आध्यादित करने वाला यह. मन्यकार अबभी नष्ट नहीं हुआ (मुस पक्ष में-आशा अर्थात् अभिलाषा को प्राचछादित करने वाला तम सर्यात् विरहजन्य मोह)' ॥५७४॥ यहां-वपा 'काम को उद्दीप्त (उत्तेजित) करने वाला समय है।' इस (ध्यङ्गषार्य) का प्रकारान्तर से कथन होने के कारण 'पर्यायोकि' है? अथवा (उत) मुख का चन्द्रबिम्ब के रूप में अध्यवसान (निश्चय) होने से (निगीर्याध्यवसानरूपा) 'अतिशयोक्ति' है? या कि 'एतत्' (यह) इस शब्द से मुख का निर्वेश करके उस (चन्द्रबिम्ब) के रूप का आरोप होने के कारण 'रूपक' है ? अथवा उन दोनो (मुझ और चन्द्रबिम्ब) के समुच्चय (इन्दुविम्वं प्रसीदति एतत् वश्नं व प्रसीदति=इस प्न्यय) को विवक्षा मे (करिया) दीपक है? अथवा (दोनों के प्रकृत घथवा प्प्रकृत होने से) तुल्ययोगिता है ? अथवा (किमु) प्रदोपकाल के वर्णन में (चन्द्रचिम्व के प्रस्तुत रहने पर) (आनन्ददायक रूप) विशेषण की समानता होने से (भनस्तुत) मुरा की प्रतीति में 'समासोकि' है? अथवा मुरा की निर्मतता का वणंन करने के प्रसङ्ग से अप्रस्तुत (चन्द्र की) प्रदांसा है-इस प्रकार बहुत से अलक्कारों के सन्देह से यही (सन्देहरूप) सड़कर है। अरनुवाद्-[न्याय तथा दोप के होने पर सङ्कर नहीं] जहां न्याय (साधक प्रमाण) तथा दोष (वाघक प्रमास) में से एक की उपस्यिति होती है वहाँ एरुतर अलड्कार का निश्चय हो जाने से सत्वेह नहीं होता। यहाँ न्याय का पभिप्राय है- साधकता या परनुकलता। दोष भी-चाघकता या प्रतिफूलता है। उनमें से क-(उपमा के साधक प्रमाण की उपस्थिति का उदाहरण है)-'चाँदनी के रामान हास-सोभा चन्द्रसद्श मुख के सौन्दर्य को बड़ाती है।।५७५॥
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६१२ ] काव्यप्रकार:
इत्यत्र मुख्यतयाऽवगम्यमाना हासय तिर्वश्चे एनालुकृत्यं भजते इत्युपमायाः साघकम रशिनि तुन तथा प्रतिभूतति रूपके प्रति तस्या अवा- धकता । वक्त्रेन्दी तव सत्ययं यदपर: शीतांशुरभ्युद्यतः ।४७६॥ इत्यम्रापरत्वमिन्दोरनुगुणं न तु वक्त्रत्य प्रतिकृतमिति रूपकरय सा- घकतां प्रतिपद्यते न तूपमाया चाघकताम्। राजनारायएं लक्ष्मीस्त्वामालिद्गति निर्भरम॥५७७॥ इत्यत्र पुनरालिद्गनसुपमां निरस्यति सहयं प्रति परपरेयसीप्रयुक्तत्या लिङ्गनस्यासम्भवात्। इस स्यान पर मुत्यरप से प्रतोयमान 'हास-धुति'-मुझको प्रधानतय प्रतीति) में हो अनुफल होती है इसलिये (पष्मं दाभी इय) उपमा को सायक (प्रमाए) है, चन्द्रमा (को प्रमानतया प्रतीति) में तो यैसी प्रतिकल मी नहीं न प्रतिरुता- यह अन्वय है; ममोंकि गौसस्प से चन्द् में हासा अर्थात् 'विपास' रहता ही है।- एसलिये (नगपरभेव सभी) रपक के पति उस (हासपुति) की यापकता नहीं। स-[रपर के साथक प्रमाण को उपस्यिति का उदाहरण]-'तुम्हारे मुग चन्द्र के होते हुए हो जो यह द्वितीय चन्द्रमा उदित हो गया है ।५७६।। इस (रत्नावली नाटिका के) पद्त में 'घपरत्व' (दूसरा होना) इन्द्रमा (को प्रधानतमा प्रतीति) में अनुकूत है; रिन्तु मुद (की प्रधानतया प्रतोति) में प्रतिक्स नहीं (क्योंकि मुस की धपेक्षा से 'अपरत्व' की कल्पना भी सम्भय है)-इसलिये यह 'अपरत्व' रुपर प सामक होता है उपमा का मामक तो नहीं होता। प्रभा-भाव यह है नि सक्तर माघह मथवा सन्पवर वापर प्रमर्नों के पमान में ही गन्देहमटूर होता ह यदि बिगो एक भवद्वार का सामक प्रमात विजमान है तो उनका निर्वय को जाता है तमा मुल्सोटिक संगप का उद्य ही नही होगा मन: सन्हेहन्पडकर नहीं हो गकता। नंमे 'ोभासम्' इत्वादि में 'दमपुनि' शब्द उपगा या गापप ह तथा-'परत्रेन्सी' इत्यादि में 'भपरतप' यन गा का सापक है; इमलिये वहा मन्देनगस्र नहीं। वहा यह नी उत्ेसनीय है कि दरना में उपमेम की पमाननता प्रसीति होमो है तमा स्पक में उमान प्रमाननमा प्रमीषि होती है। इभी प्रकार जलां सन्यतर का वापरु प्रमास होता है पर्ता भी स्न्वेदत्दूर मही होग- धनुवाद-ग-जामा के वादर को उपत्पति)-हेगए पार राजा रुपी नारामरा है सामी पापका गाद पानियुन करती है ।५511 दहाँ सो (उनः) 'पातस्न नय (सजा नाराप दय) बामा का निरा बरस करता है, रदोहि नागवान के मद्स (रादा) के साथ मारावल की प्रेंवमो (गमी) रा पातिदुन करना पसरभत् (पसुधित) है।
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ददम उल्लास: ६१३
पादाम्युजं भवतु नो विजयाय भञ्जु-
इत्यन्न मब्जीरशिन्जितं अ्र्प्रम्वुजे प्रतिकूलम्, अ्रसम्भवादिति रूपकस्य बांधकम् नं तु पादेऽनुकूलमित्युपमायाः साधकमभिधीयते, विध्युपमदिनो बाधकस्य तद्पेक्षयोत्कटत्वेन प्रतिपत्तः। एवमन्यत्रापि सुघीभि: परीदयम्। घ-(रूपक के वाधक की उपस्थिति)-'मञ्जीर (नूपुर) की मंधुर ध्वनि (शिञ्जित) से मनोहर पार्वती का चरसकमल हुमारी विजय के लिये हो'॥५७॥ यहाँ पर 'मञ्जीरशिञ्जित' शब्द झम्बुज (की प्रधानतया प्रतीति) में प्रतिकूल है; थयोंकि (कमल में नूपुरध्वनि) सम्भव नहों है; इसलिये यह (पाद एव अबुजम्- इस) रूपक का बाधक है; किन्तु यह (भञ्जीरशिन्जित' शब्द) चरख के अनुकूल होने से (पादोडम्युजम् इव, इस) उपमा का साधक भी नहीं कहा जाता; ध्योंकि विधि संर्यात् पाद में अम्बुजत्व के आरोप (सपक) का निराकरस करने वाला वाघक (मञ्जीरशिञ्जित इत्यादि) उस उपमासाधकतव की अरपेक्षा बलवान् प्रतीत हो रहा है। इसी प्रकार अन्य काव्यस्थलों में भी बुद्धिमानों को (अलड्कारों के साधफ तथा बाधफ प्रमासों की) परीक्षा करनी चाहिए। प्रभा-(१) भाव यह है कि जहाँ अन्यतर अलङ्गार का वाबक-प्रमाण होता है वहाँ सन्देह सङ़र नही होता। जैसे-'राजनारामएम्' आदि में 'आनिज्गन' शब्द उपमा का वाधक है तथा 'पादाम्वुजम्' इत्यादि में 'मञ्जीरशिब्जित' शब्द रूपक का बाघक है अतः यहाँ सन्देह-सद्वर नहीं होगा। (२) यहाँ यह शाड्ा होती है कि जैसे 'मञ्जीरशिन्जित' इत्यादि का रूपक यादि अलद्दार के वाघक के रूप में निर्देश किया जा रहा है, उसी प्रकार इनका उपमा आदि के साघक के रूप मे ही निर्देश क्यों नहीं किया गया है, 'न तु-प्रतिपत्तः' इस पंक्ति में इस वाद्ा का समाधान किया गया है अभिप्राय यह हु कि प्राधान्येन व्यपदेशा: भवन्ति-इस न्याय के अनुसार प्रधानता ही व्यवहार का निमित्त है; क्योकि वही बलवती होती है। यहाँ पर उपमासाघक की अपेक्षा रूपकबाधक ही बलबान् तथा प्रवान है; क्योंकि उपमा-साघक का कघन करने पर तो तह सन्देह भी हो सकता है कि रूपक बा भी कोई साघक होगा; किन्तु रूपक के वाघक का निर्दश करने पर नन्देह का उच्चेद हो जाता है। इसी हेतु यहाँ वाघक प्रमाणं के होने से सन्देह निवृत्ति मानी जाती हैं तथा साधक मौर वाबर प्मार दोनों पूघक् २ सन्देहसदूर के निवतक बतलाये गये हैं।
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६१२ ] काव्यप्रकारा:
इत्यत्र मुख्यतयाऽवगम्यमाना हासयय तिर्वक्त्े एवनुकूल्यं भजते इत्युपमाया: साघकम रशिनि तुन तथा प्रतिकूलेति रूपक प्रति तस्या अवा- घकता। वक्त्रेन्दौ तव सत्ययं यदपर: शीतांशुरभ्युद्यतः ॥५७६।। इत्यत्राप रत्वमिन्दोरनुगुएं न तु वक्तसय प्रतिकूलमिति रूपकस्य,सा- घकतां प्रतिपद्यते न तूपमाया वाघकताम्। राजनारायएं लक्ष्मीसत्वामालिङ्गति निर्भरम्॥५७७॥ इत्यत्र पुनरालिङ्गनमुपमां निरश्यति सदशं प्रति परप्रेयसीप्रयुक्तरयाः लिङ्गनस्यासम्भवात्। इस स्थान पर मुख्यरूप मे प्रतोयमान 'हास-द्युति' मुस की प्रधानतया प्रतीति) में ही अनुकूल होती है इसलिये (चष्म सशी इब) उपमा की साधक (प्रमास) है, चन्द्रमा (की प्रधानतया प्रतीति) में तो वैसी प्रतिकूल भी नहीं (न प्रतिकसा यह अन्वम है; मयोंकि गौसरप से चन्द्र में हास अर्थात् 'विकास' रहता ही है)- इसलिये (वक्त्रमेव अशी) रूपक के प्रति उस (हासदयुति) को बाघकता नहीं। स-रूपक के साधक प्रमाण की उपस्थिति का उदाहरण]-'तुम्हारे मुख चन्द्र के होते हुए ही जो यह द्वितीय चन्द्रमा उदित हो गया है' ॥५७६।। इस (रत्नावली नाटिका के) पद्य में 'अपरत्व' (दूसरा होना) चन्द्रमा (की प्रधानतया प्रतीति) में अनुफूल है; फिन्तुं मुस (की प्रधानतया 'प्रतीति) में प्रतिकुल नहीं (पयोंकि मुख की अपेक्षा से 'अपरत्व' की फल्पना भी सम्भव है)-इसलिये यह 'भपरत्व' रूपक का साधक होता है उपमा का बाघक तो नहीं होता। प्रभा-भाव यह है कि एकतर साधक अथवा असतर वाघक प्रमणों के प्रभाव में ही सन्देहसद्कर होता है यदि किसी एक अलद्दार का साधक प्रमाण विद्यमान है तो उसका निश्चय हो जाता है तथा तुल्यकोटिक संशय का उदय ही नहीं होता अ्रतः सन्देह-सङ्कर नहीं हो सकता.। जैसे 'सौभाग्यम्' इत्यादि में 'हासदुति' शब्द उपमा का साघय है तथा-'वननेन्दो' इत्यादि में 'अपरत्व' शब्द रूपक का साधक है; इसलिये यहां सन्देह-राद्वर नहीं। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि उपमा में उपमेय की प्रधानतया प्रतीति होती है तथा रपक मे उपमान प्रधानतया प्रतीवि होती है। इसी प्रकार जहाँ अन्यतर का वायक प्रमाए होता है वहाँ भी सन्वेह-सदुर नही होता- अनुवाद्-ग-उपमा के वाघक को उपस्थिति)-हे मृक, भाप रामा र्पी नारापण हैं लक्ष्मो आपका गाट प्रातिङ्भुन करती है'।५७७। यहाँ तो (पुनः) 'आाजिङ्गन' शब्द (राजा नारायस दव) उपमा का निरा- करण करता है, बमोंकि नारायख के सद्श (राजा) के साय नारामल फी प्रेयसी (लक्ष्मी) का प्रसिभ्न करना प्रसम्भय (प्रनुचित) है।
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ददाम उल्लासं: १ ६१३
पादाम्युजं भवतु नो विजयाय मञ्जु- मन्जीरशिन्जित मनोहरमम्विकाया: ॥४७=॥ इत्यत् मब्जीरशिब्जितं अ्र्प्रम्बुजे प्रतिकूलम, अ्र्रसम्भवादिति रूपकक्य बांधकंम् न तु पादेऽनुकूलमित्युपमायाः साधकमभिधीयते, विध्युपमदिनो बाघकस्य तद्पेक्षयोत्कटत्वेन प्रततिपतः । एवमन्यत्रापि सुघीभि: परीक्षम्। घ-(रूपक के बाघक की उपस्थिति)-'मञ्जीर (नूपुर) की मधुर ध्वनि (शिञ्जित) से मनोहर पार्वती का चरसाकमल हुमारी विजय के लिये हो ॥५७॥ यहाँ पर 'मञ्जीरशिञ्जित' शब्द अम्बुज (की प्रधानतया प्रतीति) में प्रतिकूल है; प्योंकि (कमल में नूपुरध्वनि) सम्भव नहीं है; इसलिये यह (पाद एव अम्बुजम्- इस) रूपक का बाधक है; किन्तु यह (भन्जीरशिज्जित' शब्द) चरस के अंनुकल होने से (पादोऽम्बुजम् इब, इस) उपमा का साधक भी नहों कहा जाता; कयोंकि विधि अंर्थात् पाद में अम्बुजत्व के आरोप (रूपक) का निराकरख करने वाला वाधक मञ्जीरशिञ्जित इत्यादि) उस उपमासाघकत्व की अपेक्षा वलवात् प्रतीत हो रहा है। इसी प्रकार अन्य काव्यस्थलों में भी बुद्धिमानों को (अलड्कारों के साधक तथा बाघक प्रमाणों फो) परीक्षा करनी चाहिए। प्रभा-(१) भाव यह है कि जहाँ अन्यतर अलद्धार का वाघक-प्रमाण होता है वहाँ सन्देह सङ्कर नहीं होता। जैसे-'राजनारायएम्' आदि में 'गलिङ्न' शब्द उपमा का वाधक है तथा 'पादाम्युजम्' इत्यादि में 'मञ्जीरशिन्जित' शब्द रूपक का वाघक है अतः यहाँ सन्देह-सद्वर नहीं होगा। (२) यहाँ यह शङ्ा होती है कि जैसे 'मञ्जीरशिब्जित' इत्यादि का रूपक परदि अलद्ार के वाधक के रूप में निर्देश किया जा रहा है, उसी प्रकार इनका उपभा आदि के साधक के रूप में ही निरदश क्यों नही किया गया है, 'न तु-प्रतिपत्तः' इस पंक्ति में इस शङ्का का समाधान बित्या गया है सभिप्राय यह है कि- प्राधान्येन व्यपदेशा: भवन्ति-इस न्याय के अनुसार प्रधानता ही व्यवहार का निमित्त है; क्योंकि वही बलवती होती है। यहाँ पर उपमासाघक की अपेक्षा रूपकवाधक ही बलबान् तथा प्रधान है; क्योंकि उपमा-साघक का कघन करने पर सो तह सन्देह भी हो सकता है कि रूपक का भी कोई सायक होगा; किन्तु रूपक के वाघक का निर्देश करने पर सन्देह का उच्देद हो जाता है। इसी हेतु यहाँ वारघक प्रमाणं के होने से सन्देह निवृति भानी जाती हूँ तथा साधक और वाघक प्रमाख दोनों पूथक र सन्देहसद्वर के निवतंक बतनाये गये हैं।
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६१४ j कांव्यप्रकाश:
(२१०) स्फुटमेकन्र विषये शब्दार्थालड्कृतिद्वयम्। व्यवस्थितं च, अभिन्ने एव पदे सफुटतया यदुभावपि शब्दाथालद्वारी व्यवर्थां समासादयतः सोडप्यपर: सङ्करः। उदाहरएम्- स्पष्टोल्लसक्किरण के सरसूर्यविम्वविस्तीर्कर्णिकमथो दिवसारविन्दम्।. शिलप्टाष्ट दिग्दलकल्ापमुखा वतारबद्धान्घकारमधुपावलि सङचुकोच ।।५७६। अपत्रैकपदानुप्रविष्टौ रूपकानुप्रासौ। (२११ ) तेनासी त्रिरूप: परिकीतित: ।१४१।।
अनुवाद-[३. एकपदपतिवाद सङ्कार]-जहा एक ही विषय (विषय= पद) में शब्दालङ्कार तथा पर्थालड्कार दोनों स्पष्टतया व्यवस्थित होते हैं (वह तृतीय सङ्कर है) । (२१०) सर्यात् जहां अभिन्न (सुबन्त, तिडस्रूप) पद (या पद-समुदाय) में शब्दा- सद्कार और सर्थालद्वार दोनों स्पष्ट रूप से स्थित होते हैं वह भी एक अन्य प्रकार का सड्ूर होता है। (यही एकपदप्रतिपाद्य सड्कर कहलाता है)। [हुरविजय १६.१, सन््याकालवरएन] 'इसके अ्नन्तर (पयो) यह दिवस- रपी पामल सङ्कुचित हो गया, जिसकी स्प्ठतया प्रकाशित फिस्सें ही फेसर (किञ्जल्क) हैं तथा सूयबिम्ब हो विशाल वीजकोशा (फसिका) है और जिसमें पर- स्पर सम्बद्ध आठ दिशासपी दलसमुदाय वाले राध्यारम्भ (मुख) के भगमन से सन्धकार रपी भ्रमरपंक्ति निरु्द्ध (बद्ध-बन्द) हो गई है।५७६।। यहाँ पर एफ पद ('फिरसफेसर' 'सूर्यविम्तविस्तीरएफशिका' नया विग्दलक- लाप में से प्रत्येक) रूपक (अर्थालड्कार) और अनुपरास (शग्दालड्फार) दोनों उप- स्थित हैं झअ्रतः एकगदानुप्रवेश रूप तृतीय सड्कर है]। गभा-यहाँ 'विषये' (पदे) में एकवचन अविवक्षित है; अर्भात् जहां अनेष पदों में दो अलद्वार प्रविष्ट होते हैं वहाँ भी यह एकपदानुप्वेश संद्र होता है जेमे-'कलकलोइल कगोलदृशान्यया' वहाँ दो पदों में यमक और अ्नुपास सलङ्गारद्वय की स्थिति है (प्रदीप)। इमी प्रकार शब्दालद्वार और अर्थालद्वार का ही यह सड़र हो-यह आवश्यक नहीं, धपित दो नव्दानद्वारों और दो अर्थालद्वारों का भी एकपदानुप्रवेव नामक सकूर होता है, जैसे-कलफनी' इत्यादि में दो सब्दातङ्टारो पा सक्कर है।
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दशम उल्लासे: 1 ६१५
तद्यमनुग्राह्यानुमाहकतया, सन्देहेन, एकपद्प्रतिपाद्यतया च व्यच- थितत्वात् त्रिप्रकार एव सङ्करो व्याकृतः । प्रकारान्तरेय तुन शक्यो व्या- कतु म् आनन्त्यात्तत्प्रभेदानाम् । इति प्रतिपादिता: शब्दार्थोभयगतत्वेन
श्रत्मङ्वाराणां शब्दगतत्वादिव्यवस्था] कुतः पुनरेप नियमो यदेतेपां तुल्येऽपि काव्यशोभातिशयहेतुत्वे कश्चिद्लङ्वार: शव्दस्य कशचिदर्थस्य, कश्चिच्चोभयरयेति चेतु। उक्तमत्र यथा काव्ये दोपगुालक्कारायां शब्दार्थोभयगतत्वेन व्यवस्थायामन्वयव्य- तिरेकावेव प्रभवतः निमित्तान्तरस्याभावात्। ततश्च योडलद्वारो यदीया- न्वयव्यतिरेकावनुविधत्त स तदलक्कारो व्यवस्थाप्यते इति एवं च यथा पुन- रुक्तव दाभास: परम्परितरूपकं चोभयोर्भ वाभावानुविधयायितया उभयाS
(२११ ) अ्रनुाद-उक्त्त रीति से (तेन) यह सड्कर तीन प्रकार का कहा गया है।
इस प्रकार अद्गाद्गिभाव से, सन्देह रूप से तथा एकपदानुप्रवेश रूप से प्रवस्थित होने के कारख यह तीन प्रकार का ही सङ्कर प्रतिपादित किया गया है। धन्य प्रकार से (अर्थात् उपमा और रूपक का, अनुप्रास और उपमा का सङकर इत्यादि रूप से) तो इसका विवेचन नहों किया जा सकता, व्मोंकि इस प्रकार उसके सनन्त भेद हो सफते हैं। इस प्रकार शब्दगत, अ्थगत तथा उभयगत-ये तीन प्रकार के अलड़कार (नवस तथा दशम उल्लास में) प्रतिपादित किये गये हैं। प्रभा-इस प्रकार ग्रन्धकार ने दशम उल्लास मे ६१ अर्थालङ्वारों का बणन किया है। नवम उल्लास में शब्दालद्वारों का बणन किया जा चुका है। मत्न संक्षेप में यह बतलाते हैं कि शब्दालद्वार और अर्थातङ्कार का भेद किस आवार पर किया गया है। अनुवाद्-यदि कोई शंका करे कि सभी अलड्कार समान रूप से काव्य शोभा को बढ़ाने वाले हैं फिर यह नियम कयों है कि कोई शब्द का, फोई सर्थ का औोर फोई दोनों का अलड्कार है तो इस विय में (अन) फहा ही जा चुका है (सू० १२०) कि दोप गुस और अलड्कारों की जो शब्दगत, अर्यगत या उभयगत होने की व्यवस्या है उसमें प्रन्वय (तत्सस्ये तत्सत्वम्) और व्यतिरेक (तदभावे तवभाव:) ही कारख हैं (प्रभवत :== समथी भवत.); कयोंकि कोई अन्यनिमित नहीं हो सकता। इसलिये जो अलङ्कार जिस (शब्द, अर्य या शब्दपुगल) के अन्दम (सद्दाव) और व्यतिरेक (अ्रभाव) का अनुसरण करता है वह उसका ह मलद्कार है, यह व्यवस्था को जाती है। इस प्रकार जैसे पुनरुकवदाभास और परम्परित
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६१६ ] कांव्यप्काश:
लङ्गारी तथा श्दहेतुकार्थान्तर्यासप्रभृतयोऽपि द्रष्टव्या:। शर्थर्य तुत्न्र वैचित््यम उत्कटतया प्रतिभासते इति वाच्यालद्वारमध्ये वस्तुस्थितिमन- पेचयैव लच्िताः। योग्लद्वारो यदाश्रितः स तदलद्वार इत्यपि कल्पनायां अन्वयतिरे-
भावात्। इत्यलङ्गाराणां यथोक्तनिमित्त एव परस्परव्यतिरेको ज्यायान्।
एपक, शब्द और सर्थ दोनों के सवभाव तथा प्रभाव का अनुसरण करने के कारण, उभवालड्टकार माने जाते हैं उसी प्रकार शब्द के निमित्त से होने वाले अर्थान्तरन्यास अ1दि (जंसे-'उत्पादमति लोकस्य प्रीति मलयमारतः। नन् दाक्षिण्यसम्पन्नः सर्वस्य भयति प्रिय., यहाँ दाक्षिण्य शब्दहेतुक अर्था्तरत्यास है) को भी (उभपालड्कार) समभना चाहिए; किन्तु-उन.(अर्थान्तरन्यास,आदि). में सर्थ-घचित्र्य, उत्कृष्ट (उत्कट .. =प्रकट, उस्कृष्ट) रप में प्रतीत होता है (शबद-वंचित्रय नहीं) इसतिये (उभया- लन्दारतारप) वस्तुस्थिति को ध्यान में न रखकर ही अर्थालद्गारों में प्रदर्शित किया गया है। (अन्य मत की समीक्षा) जो अलद्धार जिस (शब्द या धर्थ) के माश्रित है यह उसका ही पलद्धार फहलाता है, इस कल्पना में भी अन्बम और व्यतिरेक का हो पाशय लेना पड़ेगा; क्योंकि (यहा) उस (अन्वयव्यतिरेक रूप) निमित (भाध्य) के बिना फोई और विशेष प्ररुार का 'घाधयाथमिभाय' सम्बन्ध नहीं हो सकता। भतएय अलस्ारों का उक्त रीति से अन्वयत्यतिरेकनिमित्तक हो (शव्दगत, अर्थगत तथा जभयगत) परस्पर भेद मानना अबिक शच्छा है। प्रभा-(१) यन्दालद्वार मर अर्थालद्वार की भेव-व्यवस्था का नवम उल्लास मे श्लेप के प्रसक् से विवेचन किया जा चुका है उसी का यहाँ निगमन किया जा रहा है। (२) आआश्रवाशयिभाव' ही अतध्धार व्यवस्था का निमित है, यह अलसारसर्वस्वसार आपारय रय्यका का मत है-लोकयदाथ्रयाथिमावरचा ततदलस्गार निबन्धनम्। अन्वयव्यतिरेको सु तत्कार्यतवे प्रयोजयो न तदलङ्भारत्वे। पविकांश टीकाकारों ने यहाँ रम्यक के मत का खण्डन है, यही स्वीकार किया है। किन्तु सारवोधिनिकार के यनुसार यहाँ 'टद्नट' के मत का गण्डन किया गया है। वस्तुतः बात यह है कि यह मत अत्यन्त प्राचीन या सतङ्गारसवंस्वकार ने इसका मलपूर्वक समर्थन मात किया था; जैसा कि सन्होंने स्वयं ही स्वीकार किया हुँ- सस्मादाययेधयिभवैनय घिरन्तनमतानुस्मुतिरिति। फलतः मम्मट ने प्राचीन (उद्भट आदि के) मत थना ही सण्डन किया है, दम्यक के मत का नहीं।, रतप्यरु मम्मट से भर्वाचीन हैं यह ऊपर वहा जा चुका है।
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दशम उल्लास: ६१७
[अलद्वारदोप-समीक्षा] (२१२) एपां दोपा यथायोगं सम्भवन्तोऽपि केचन। उक्तेष्वन्तर्भवन्तीति न पृथक् प्रतिपादिताः॥१४२॥। तथा हि अनुप्रासस्य (१) प्रसिद्धयभावो, (२) वैफल्यं, (३) वृत्ति- विरोध इति ये त्रयो दोपा: ते प्रसिद्धिविरुद्धताम्, श्र्रपुष्टार्थत्वं, प्रतिकूल- वर्गतां च यथाकमं न व्यतिक्रामन्ति तत्स्वभावत्वात्। क्रमे खोदाहरएम्- (१) चकी चकारपडि पितं हरिरपि च हरीन् धूजेदिधू धर्वजाग्रा- नक्तं नक्षत्रनाथोऽरुणमपि वरुसः कूबराम कुवेरः। रंहः सङ्गः सुराणां जगदुपकृतये नित्ययुक्ताय यश्य।। स्तौति प्रीतिप्रसन्नोऽन्वहमहिमरूचे: सोऽवताल्यन्द नो व॥५८॥॥ कत्र कर्तृ कर्मप्रतिनियमेन स्तुतिः। अ्रनुपासानुरोघेनैव कृता न पुरा- ऐोतिहासादिपु तथा प्रतीतेति प्रसिद्धिविरोष: । अलङ्कार-दोप-समीक्षा अनुवाद-इन (भलङ्गारों) के कुछ दोष भी हो सकते हैं जिनका (सप्तम उल्लास में) उपयुक्त दोपों में ही अ्रन्तर्भाव हो जाता है इसलिये उनका पृथक् प्रति- पादन नहीं किया गया। (२१२) (अनुप्रासदोप) जैसे कि अनुप्रास के जो ये-(१) प्रसिद्धयभाव, (२) वैफल्य और (३) वृत्तिविरोध (प्राचीनोक्त) तीन दोप हैं, वे क्रमशः (१) प्रसिद्धिविरुद्ध, (२) पपुष्टार्थत्व और (३) प्रतिकूलवर्सता नामक दोषों से अतिरिक्त नहीं हैं, क्योंकि ये भी उनके स्वरूप (लक्षस) वाले ही है। कमशः उदाहरख-(१ प्रसिद्धधभाव) [मयूरकविकृत सुर्यशतक में सूर्य के रथ का वर्शन] 'उप्स किरसों वाले सूर्य का वह रथ आप सबको रक्षा करे, लोकोपकार में सतत प्रवत्त जिस रय की चक्रारपक्ति (पहियों के अरों) की विप्सु (स्तुति फरते हैं-यह भ्रन्वय है), प्रश्चों की इन्द्र (हरिः). मुख (धू := यानमुखम) पर स्थित पताफा के अग्रभाग की शिव (धूजंटि) धुरी (प्रक्षम) की नक्षत्रपति चन्द्रमा, शक्त नामक सारयि फी वरुण, कूबराग् (युगन्धर सरर्थात् जुमा बांघने के स्थान का अग्रभाग) की कुवेर वेग (रंहः) की देवों का समूह-प्रतिदिन प्रीति से प्रसन्न होकर स्तुति करते हैं॥५८0॥ यहाँ स्तुतिकर्ता (चक्री आदि) और स्तुतिकमं (चकारपंकि आदि) में से प्रत्येफ की नियत स्तुति का वर्णान अनुप्रास के अनुरोध से ही किया गया है, इस पकार की नियत स्तुति (देवविशेष के द्वारा रथ के अङ्गविशेष की रतुति) पुराए या इतिहास आदि में प्रसिद्ध नहीं है, इसलिये यह (तथाकषित प्रसिद्धधभाव नामरु धनुप्रास) प्रसिद्धिहत दोष ही है।
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१ j काव्यप्रकारीः
यदि सल्लोलोल्लापिनि गच्छसि तत् कि त्वदीय मे ॥४८॥॥
परिसरणमरुणचरणे रसरसकमकारएं कुरुते ।।५म२।। अत्र वाच्यस्य विचिन्त्यमानं न किकचिदृपि चारुतवं प्रतीयते इत्य- पुष्टार्थतैवानुप्रासस्य चैफल्यम्। (३) 'अरकरुए्ठोत्कएठया' इति। अर्पात्रा शृङ्गारे परुपवर्णडम्वर: पूवोक्त रीत्या विरुध्यत इति परुषानुपासो प्रतिकूलवव वृत्तिवि रोध: । (२ वंफल्य) [पतिगृह को जाने के लिए उद्यत नायिका के प्रति उपनायक 1
को उक्ति]-'हे आनन्ददायक एवं सुन्दर इन्दु के समान मुसवाली, उत्कृष्ट तीला- वंक वार्तालाप करने वाली तथा लाल चरसों वाली तरसी, बतलाओो तो (भर) के यदि तुम पतिगृह को जाती हो तो सत्यधिक (सनपु) ध्वनि करने वाली मखिया हीमेखला से युक्त तथा निरन्तर भनभनाते हुए (शिज्जान=शाब्दायमान) सुन्वर पुरों से युक्त तुम्हारा यह गमन (परिसरस) बिना किसी निमित के ही मुझे चन्ता (रसरसकम्) पयों उत्पन्न करता है ? ५८१॥ ॥५८२॥ यहां जो वाच्य-भ्र्थं (ध्वनित मेडला सादि से युक्त गमन मुझे क्यों उत्कष्ठित रता है ?) है, उसमें विचार करने पर भी कुछ चारता (चमत्कार) प्रतोत नहीं ती, इसलिये अनुप्रास का वैफल्य (नामक तवाकथित अलद्धार दोप) अ्रपुप्टार्थता है। प्रभा-भाव यह है कि अनुपरास आदि शब्दालद्वार भी परम्परमा प्रर् ेर रस के उपकारक होते हैं; किन्तु प्रस्तुत पद में अनुप्रास अलद्वार केवल ब्द-सौन्दयं को ही बड़ाता है वाच्यार्थ तथा व्यङ्नपार्य पादि का कोई उपकार नहीं रता अर्थात उनमें चमत्काराधायक नहीं। अतएब अर् का परिपोपण न होने के रए यहाँ 'अपुष्टार्थता' नामक दोष ही है, अनुप्रास-वैफल्य उससे भिन्न कोई प नही। अ्रनुवाद्-'अफुण्ठोत्कण्ठया' इत्यादि (ऊपर उदाहरण २०७), यहाँ पर ठोर वरशों का वाहुल्य (प्राउम्बर=प्रचुर प्रमोग का आरम्भ) ऊपर (भ्रप्टम ल्लास में) वित रोति से भृद्गार रस के विषद्व हो है अतः यहां पदषानुप्रास निविरोध है तथा वह 'प्रतिकूलवसाता' नामक दोप ही है। प्रभा-भाव यह है कि प्राचीन पलक्कारिकों ने अनुप्रास का वृतिविरोध मक दोष माना है जिसका उदाहरण है-'सकुष्डोत्ण्डया' इत्यादि। सर्यात् यह सार-विधयक पद्य है यहाँ माचुर्यव्य्जक वसों वाली उपनागरिका 'वृति होनी हिये थी किन्तु कवि ने भोजगुर व्यं्जक कठोर वसों वाली परपा वृति का
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र्दशम उल्लास: 1 ६१६
यमकस्य पादत्रयगतत्वेन यमनमप्रयुक्तत्वं दोप:। यथा- भुजङ्गमश्येव मगि: सदम्भा ग्राह्ावकीणैव नदी सदम्भा: । दुरन्ततां निर्रयतोऽपि जन्तोः कर्पन्ति चेतः प्रसभ सदम्भा: ॥५८३॥। उपमायामुपमानस्य जातिप्रमाखगतन्यूनत्वं अधिकता वा ताहशी अनुचितार्थत्वं दोपः । धर्माश्रये तु न्यूनाधिकत्वे यथाक्रमं हीनपदत्वमधिक- पदृत्वं च न व्यभिचरतः । क्रमेणोदाहरगम्- १. चएडालैरिव युप्माभिः साहसं परमं कृतम् ॥५म४।। २. वह्निस्फुलिङ्ग इब भानुरयं चकारति ।५= X।। आथय लिया है। इसलिये यहां वृत्तिविरोध नामक अनुपास-दोप हैं। आचार्य मम्मट का कथन है; कि शद्गार रस के प्रतिकूल वणगों का प्रयोग किया जाने के कारस यहाँ प्रतिकूलवर्णता नामक दोप ही है तथा वृति-विरोध नामक अनुपास-दोष इससे भिन्न अन्य कोई दोप नही।
अनुवाद-[यमक-दोप] यमक का (श्लोक के) तीन-तीन चरसों में निब- न्धन रूप जो (प्राचीनोक्त) अलद्धार दोप है, यह प्प्रयुक्तत्व दोप ही है, जैसे- 'कान्तियुक्त (सद् विद्यमानम् अम्भः तेजः अरस्य) सर्प को नणि के समान तथा नक्रों से व्याप्त (अवकीसं) स्वच्छ जलवाली नदी के समान कपटी (सदम्भ) मनुष्य उस प्राशी का मन भी बलपूर्वक प्रकृष्ट कर लेते हैं जो इनकी परिसाम में दुःखप्रदता को निश्चयरप से जानता है' ॥५८३।। प्रभा-यहाँ पर तीन चरणों मे 'यमक' (सन्दभा) खसा गया है; किन्तु एक, दो या चार चरणों में यमक रचना ही कवि- सम्प्रदाय सिद्ध है, तीन चरणों में नहीं (यमक तु विघातव्य न कदाचिदपि त्रिपात्। इसलिए यहाँ अप्रयुक्तत्वरूप दोष ही है। अनुवाद-[उपमा-दोष-समीक्षा] उपमा में जो उपमान की (प्रपेक्षा) जाति या प्रसान (परिमास) विषयक न्यूनता प्थवा अधिकता होती है वह अनुचितार्यंत्व दोष ही है। साधारसधर्मविषयक न्यूनता और अधिकता तो कामशः 'हीनपदत्व' औ्र अधिकपदत्व' के अ्तिरिक्त (अन्य दोष) नहीं होते। कमदाः उदाहरण हैं- [१. उपमान को जातिगत न्यूनता-] 'चण्डालों के समान तुम लोगों ने ड़ा साहस किया है ॥५८४॥ [२. उपमान को प्रमाणगत न्यूनतः]-'मह सूर्य पग्नि की चिनगारी के समान चमकता हैँ' ॥५८४॥१ F
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६२२ 1 काव्यप्रकाश:
- सक्तवो भचिता देव, शुद्धा: कुलवधूरिच ।५६१॥। यत्र तु नानात्वेऽमि लिङ्गवचनयोः सामन्याभिघायि पदं स्वरूपभेदं नापदते न तत्रैतद्दूपणांवतारः। उभयथापि अश्यानुगमक्षमर्वभावत्वात्। यथा-
८. (वचनभेव)-हे राजन्, कुलनारी के समान शुद्ध सततू मैंने खाये हैं' ॥५६१॥ प्रभा-प्राचीन अलङ्गारिकों ने 'भिन्नलिद्धत्व' तथा 'भिन्नवचनत्व' नामक उपमा के दोपद्वय का उल्लेख किया है। भाव यह है कि जहाँ उपमा उपमेय दोनों भिन्न २ लिङ्गों या वचनों में होते हैं तथा साधारसघर्मंवाचक पद किसी एक के लिन या वचन का अनुसरस करता है वहाँ उसका केवल (उमी) एक केसाथ अ्रन्वय हो सकता है, दोनों के साथ नहीं; क्योंकि समानलि्गवचन वाले नब्दों का ही विशेष्य- विशेपसभाव से अन्वय हुआ करता है। कोई वस्तु सावारणधर्म विशिष्ट (सविशेपण-, होकर ही) उपमान या उपमेयरूपता को प्राप्त होती है। अतः साघारण धर्म का उपमान तथा उपमेय दोनों के साथ अन्वय न होने के कारए उपमा कैसे धन सकेगी ? यदि साधारण धर्म का एक अर्थात् उपमान या उपमेय में साक्षात् अन्वम हो जाने से तथा दूसरे के साथ प्रतीयमान सम्बन्ध होने से उपमा निर्वाह माना जाये तो वह उचित नहीं, क्योंकि इस प्रकार अविज्ञम्बेन उपमा-प्रतिीत न होगी। इस प्रकार भिन्नलिद्भता और भिन्नवचनता को भोजराज ने उपमा दोप ही माना है। आराचारय भम्मट को मानता है कि इन दोपों का भग्वप्रक्म' नामक दोष मे ही अन्तर्भाव हो जाता है। बात यह है कि उतरीति से उपमान में किमी सामारख ध्म का सम्बन्ध वाच्यरूप मे या प्रतीयमान रूप में श्रारम्भ (प्रशन्त) होता है; किन्तु उपमेय में अ्रन्य प्रकार (प्रतीयमान अथवा वाच्य रूप) से उसका उपसंहार किया जाता हे मतः प्रकमभङ्ग दोप ही है। जैसे-'चिन्तारलम् इत्यादि में 'चपुन' यह सायारस धर्म है, जिसका पुल्लिद्त में प्रयोग किया गया है। उसका पुल्तिष्स मे प्रयुक्त उपमेय ('तवम्) के साथ ही साक्षात् अन्वय सम्भव है ननु सकत्वविशिष्ट उमान (चिन्ता- रत्नम्) के साथ नहीं। इगी प्रकार 'सकतयः' इत्यादि मे साधारस धर्म (शुद्धाः) बहुवचन में है, जिसका बहुवचन मे प्रयुक्त उपमेय (सक्तवः) के साथ ही साझात् अन्वय हो सकता है; एफबनन में प्रमुक्त उपमान (कुलवयू) के-माथ नहीं। : अनुवाद-जहाँ (उपमान घौर उपमेय में) सिग औौर घचन का नेव होने पर भी साधारसधमंवाचक पद सपनेद को प्राप्त नहीं होता, यह! इस (भग्नप्रनमतव) दोष को उपस्थिति नहीं होती; बयोंकि इस साधारल पमयाचक का स्वरुप दोनों प्रकार से (अर्यात् उपमान को लिन्नुबघनविशिष्टता से तथा उपभेय की लिगषवन- विसिप्टता से) अन्वय की योग्य रसता है (मनुगमक्षमस्वभायत्यात्=मन्वय-योग
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दशम उल्लास: [ ६२३
गुएैर्नध्यैंः प्रथितो रत्नैरिव महार्णव: ।।५६२।। तद्व पोऽसदशोऽन्याभि: स्त्रीभिर्मधुरताभृतः। दघते र्म परां शोभां तदीया विभ्रमा इव ॥५६३॥ कालपुरुपविध्यादिभेदेऽपि न तथा प्रतीतिरस्खलितरूपतया विश्रा- न्तिमासाद्यतीत्यसावपि भग्नप्रक्रमतयेव व्याप्तः । यथा- ह. अरतिथिं नाम काकुत्धातपुत्रमाप कुसुद्वती। पश्चिमाद्यामिनीयामात्प्रसादमिव चेतना ।।५६४।। [लिङ्ग भेद में भग्नप्रकमत्व का प्ररभाव] 'अमूल्य (भ्रनध्य) गुशों से वह राजा उसी प्रकार प्रसिद्ध था जैसे अमुल्य रत्नों से सागर प्रसिद्ध है।५८२। [वचनभेद में भग्नप्रकमत्व का प्रभाव]-'उसके हावभावों के समान उसका वह वेप उत्कृष्ट शोभा को धारण करता है जो मधुरताभृत पर्धात् मधुरता से परि- पूरित है (विभ्रनपक्ष में मधुरता को धारस करने वाले मधुरताभृत्) तथा अन्य स्त्री के वेप (पक्ष में विश्रमो) से विलक्षस (असदुशः) है' ॥५६३॥ प्रभा-यदि उपमान तथा उपमेय के लिङ्क तथा वचन में भेद होता है; किन्तु साधारण धर्म वाचक पद अपने प्रयुक्त रूप में ही दोनों के साथ अ्न्वित होने का सामथ्यं रखता है तो वहाँ भग्नप्रकमत्व नहीं होता जैसे- (क) 'गुरंः' इत्यादि में उपमयवाचक 'गुए' शब्द पुल्लिङ्ग है तथा उपमान वाचक 'रत्न' शब्द नपु सकलिन्त है: किन्तु 'अनर्ष्य' रूप सावारणघर्मेवाचक शब्द का दोनों के साथ अन्वम सम्भव है, कयोंकि दोनों सिङ्गों में तृतीय विभक्ति के बहुवचन में ममान ही रूप बनता है। (स) इसी प्रकार तद्वय: इत्यादि में उपमेय (तद्वेपः' एकवचन में है तथा उपमान (विभ्रमाः) बहुवचन में है, किन्तु सावारणघम वाचक वब्द-,असद्शः' 'मधुराभतः' तथा 'दघते दोनों के साथ अन्वित ही सकते हैं जसे कि 'अरुदरा:' यह कज् प्रत्यायान्त (सहश) होने पर एकवचन है तथा विवप् प्रत्यायान्त (सदृश) होने पर बहुवचन है। 'भृतः' यह 'क्त' प्रत्यायान्त (भृत) होने पर एकवचन में तथा क्विप् प्रत्यायान्त भृत होने पर बहुचचन में होता है। इसी प्रकार 'दघते' यह 'यह दध धारणे' (म्वादि०) से एकयनन में तथा 'दधान् घारसपोपएयो:' (जुहोत्यादि) से बहुवचन में होता है। अनुवाद-[फालादि नेद में भी भग्नप्रकमता दोप] काल (भूत, भविप्यत्, वर्तमान) पुरुष (प्रथम, मध्यम तथा उत्तम) विधि (विध्ययंक लिड, लोटू, तव्यत) पावि का भेद होने पर भी (उपमान तथा उपमेय भाव की) प्रतीति वैसी (जंसी कि काल पादि का साम्य होने पर होती है) निर्दोष (अस्सलित) रूप में परिसमाप्त नहीं होती, इसोलिये यह (कालादि नेवसप दोष) भी भग्नप्रकमता के द्वारा हो गृहीत हो जाता है (व्याप्तः): जैसे-[रघषंद१७]-६. [फालमेड] 'रानी कुमुद्बतो ते काहृत्स्य (कुत- नामक राजा) से अतिथि नामक पुत्र को उसी प्रकार प्राप्त किया जिस प्रफार चेतना रात्रि के अन्तिग प्रहर से (में) निमलता को प्राप्त कर लेती है' ॥४६४॥
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६२४ ] काव्यप्रकारा:
शरत्र चेतना प्रसादमाप्तोति न पुनरापेति कालभेद: ।
विभ्राजसे मकरकेतनमर्चयन्ती वालप्रवालविटपप्रभवा लतेव ।५६५।। अ्न लता विभ्राजते न तु विभ्राजसे इति सम्ोध्यमाननिष्ठस्य पर- भागत्य श्रसम्बोध्यमानविपयंतया व्यत्यासात् पुरुषभेद:। ११. गङ्ग व प्रवहतु ते सदैव की्तिः ।४६६।। इत्यादी च गढ्गा प्रवह्ति न तु प्रवह्तु इति अप्रवृत्तप्रवर्त्त नात्मनो विधेः। एवंजातीयकस्य चान्यस्यार्थरय उपमानगतस्यासम्भवाद्विध्यादिभेदः।
यहाँ चेतना निर्मेसता को प्राप्त हुधा करती है, यह ('ग्राप्नोति', तट् वतमान फाल) है; किन्तु (उपमेय के समान) प्राप्त किया' ('आप', लिद भूतफाल) नहीं- इस प्रफार कालमेद है (तया भग्नप्रकम दोय है)। १०. [पुरुष-भेद]-[रतनायली नाटिका १]-'हे पति, नय स्नान से अ्धिक निर्मल (वियिव्त) शरीर वासी, कुसुम्भराग से रञ्जित सुन्वर घस्त्र (भंगुरुान्त) वाली तुम मफरकेसन (कामदेव) की पूजा करती हुई उस लता के समान शोभायमान हो जो नूस्न किसलय-युक्त शासायों का उत्पततिस्थान (प्रभव) है (नूतन सिं्जन से विशेषतः स्वच्छ प्राकृति वाली है औौर कुसुम्भसदृश रक्तिमा से सुन्दर है तथा 'हफुरित -अंशु-कान्ता' सर्थात् स्फुरित होती हुई किरसों से रमशीय है)'।५६४।। "यहाँ पर 'लता विभ्राजते' (यह प्रयमपुरष उचित है) विभ्नाजसेयह भध्यम पुषप नहीं)। इसलिये (वासयदत्ता) व्यक्तिविपयक किया के शेषाश रूप (परभागस्य -पत्ययस्य) 'से' प्रत्यम का सम्पोधन के घयोग्य (श्रचेतन) सतायियमरा (विभराजते) यह परिवर्तन किया जाता है अतः (उपमेयपत मध्यमपुरप तथा उपमानगत प्रयम 4 पुर्ष के होने से यहां पुरप-नेद है। ११. [विधि-नेव] 'तुम्हारी फीति सदा गमुन के समान प्रयाहित हो ।५६६।। इत्यादि में 'गङ्धा प्रवहित्' ऐसा (दहना उचित) है (गङ्गा) 'प्रयहतु' यह (उचित) नहीं; भतएव यहाँ अपयूत्त-प्रवर्तन रप (भातीर्घादरूप) वविषि का भेव (ध्य- त्यारा; प्रर्यात् 'गप्ता प्रयहृति' इत रप में विषि का परिवतन) होना है। पोर, इंस प्रकार धन्य अर्थं (प्रार्थना आवि) की भी (उपमेय के समान) उप- मान में सम्भावना न होने के परस विष्यादि-ेद होता है। प्रभा-विधि का अयं ह-अप्रवृत्त-प्रवर्तन अर्थान् जिसी कार्य में प्रवृत न होने बाने व्यक्ति को उम् कार्य में प्रवृत कराना। यह विधि मनेक प्रकार की होवी है जसे आानीर्वाद प्रार्यना, प्ेरसा आदि के रूप में। 'न् ये' इत्यादि में-प्रबहन रूप में सनबुण कीति के प्रयदन के लिये भशीर्याद रूप निधि है (ममटू्।
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दशम उल्लास: [ ६२५
ननु समानसुच्चारितं प्रतीयमानं वा घर्मान्तरमुपादाय पर्यवसिता-
यत्राप्युपात नैव सामान्यघर्मेण उपमाऽवगम्यते यथा 'युधिष्ठिर इवायं सत्यं वदती' ति तत्र युधिष्ठर इव सत्यवाद्ययं सत्यं वद्तीति प्रतिपत्स्या- महे। सत्यवादी सत्यं वद्तीति च न पौनरुक्त्यमाशङ्कनीयम् 'रैपोप पुघंाती तिवत् युघिष्ठिर इव सत्यवद्नेन सत्यवाद्ययमित्यर्थावगमात्। सत्यमेतल्, किन्तु स्धितेपु प्रयोगेषु समर्थनमिदृन्न तुसर्वथा निरवद्यम् प्रस्तुतवस्तुप्रतीतिव्याघातादिति सचेतस एवात्र प्रमाएम्।
जो उपमानरूप 'गङ्गा' में सङ्त नही होती; क्योंकि गङ्गा तो पूर्वकाल से वह रही है। अतएव गङ्गा से अन्वय करने के लिये 'यथा गङ्गा प्रवहति तथा कीतिः प्रवहतु' इंस प्रकार से विधि मे परिवर्तन (भेद :- व्यत्यासः) करना होता है। यही विधि-भेद है। अन्य प्रार्थना इत्यादि में भी इसी प्रकार भेद होता है; इसीनिये ग्रन्वकार ने विध्यादि भेद कहा है। इस उपमा दोप का भग्नप्रकमदोप में ही अन्तर्भाव हो जाता है। अनुवाद-(शङ्ा) वस्तुतः उपमुक्त उदाहुरसों में उच्चारितपदबोष्य उच्चारित-उपात्त) या अध्याहारतम्य (प्रतीयमान=गम्य) उक्तकालविशेष आादि से रहित (धर्मान्तर=उपात्तभिन्न) साघारस धर्म को लेकर उपमा निष्पन्न हो जाती है तथा उपमेम का (फालविशेषादि से रहित) प्रस्तुत धर्म से सम्बन्ध हो जाने के कारण फोई भी काल आदि का भेद नहीं रहता। जहाँ उच्चारित साधारस धर्मे के द्वारा हो उपमा को प्रतीति होती है जैसे-'युधिध्ठिर इवायं सत्यं वदति' (यहाँ 'सत्यं वदति' इसके द्वारा बोघित साधारएयम वर्तमानकाल विशिष्ट हो है); वहां 'युधिष्ठिर इच सत्यवादी अय सत्यं बदात' यह तात्पर्य लेंगे; मौर 'सत्यवादी सत्य कहता है' इस कथन में पुनरक्ति की भी शाङ्का न करनी चाहिए यर्मोकि 'रंपोष पुथ्साति' अर्ा्त् 'घन पोपए द्वारा पुष्टि ररता है' (यहाँ घात्वर्थ 'पुष्टि' का सामान्यविशेषभाव हो जाने से विशेवस-विशेष्यभाव हो जाता है तथा पुनरक्ि नहीं होती)। इस (प्रयोग) को भांति यहाँ भी-'युधिषिठर के समान सत्य बोलने के कारस यह सत्यवादी है-'इस अर्थ की प्रतीति हो जाती है। (समाधान) यह कथन ठोक है; किन्तु प्रचलित प्रमोगों के विषय में ही कयञ्चित् इस प्रकार का रम्थन किया जा सकता है, यह बात सवंथा निर्दोप नहीं है; क्योंकि (ऐसे स्थलों पर) प्रस्तुत वस्तु पर्पात् उपमा (तथा रस प्रादि) की प्रतोति में (वितम्ब रूप) बाघा पड़ती हो है। इस प्रकार सहृदयजन ही इस वियय (कालादि के नेद से उपमा-दोष होता है या नहीं) में पमाए है।
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६२६ ] काव्यप्रकाश:
1 १२. ग्रध्नामि काव्यशशिनं विततार्थरशमिम ॥५६७॥ 7 अत्र काव्यस्य शाशिना अप्पर्थानां च रश्मिभि: साधम्ये कुत्रापि न प्रतीतमित्यनुचितार्थेत्वम्। १३. निपेतुरास्यादिव तस्य दीप्ता: शरा धनुर्मेण्डलमध्यभाज:। जाववल्यमाना इव वारिघारा दिनार्धभाज: परिवेषिसोडर्को।।५६= प्रभा-रादा का आशम यह है कि-'अतिथि नाम' इत्यादि में जो कान भेंद आदि के कारस उपमा-दोप (भग्नप्नक्ग) कहा गया है वह उचित नही; करोवि यहां 'इव' आदि पद के द्वारा उपमान तथा उपमेय दोनों में अ्न्वय-योग्य कलादि रहित साधारमा धर्म (धर्मान्तर) के आवार पर ही उपमा निप्पन्न हो जाती है मो तब गुहोत या प्रतीयमान धर्मे का उपमेय तथा उपमान से सम्बन्ध हो जाता है मद्यवि 'युघिप्ठिर इवायं सत्य वर्दात' आदि में साधारस धर्म 'सत्य वद्ति' व्तमा कालविशिष्ट ही है अतः कालादिरहित 'धर्मान्तर' नहीं तथापि 'सत्यवादित्व' मर्था. सत्यवदनशीलता रूप थर्मान्तर की ही यहाँ 'इव' शब्दन्द्वारा प्रतीति मानेगे, 'सत्यवा" दित्व' तो श्रकालिक साधारण धर्मे है अतएव कालभेद न होगा। 'युघिप्ठिर के समान सत्यवादी यह व्यक्ति सत्य बोलता है' मे पुनरत्ति दोप भी नही हैक्योंकि 'रंपोर्प पुष्गति' इत्यादि व्याकरणादि सिद्ध प्रयोग देते जाते हैं।. 'सत्यम्' इत्यादि समाचान का भाव यह है कि-यद्यपि इस प्रकार भन्वय तथा मध्याहार परादि की कल्पना अनुभव सिद्ध है; किन्तु 'रपोप' इत्यादि उदाहरणों से सवध पूनरुक्ति आदि दोय का समर्थन नहीं किया जा सकता है। लोक-प्रसिद्ध प्रयोगों के समर्थन की दृष्टि में ही उन प्रयोगों को उर्चित (साघु) मान लिया गया है। भतएव इस युक्ति से सवम ही कालनेदादिविषयक दोपों का निराकरख नहीं किया जा सकता। बात यह है कि कालादि-भेद के कारस उपमा-प्रतीति में विलम्ब होता है, सहदयजनों का अनुभव यही बतलाता है, अतएव मे उपमादोप है ही, जिनका 'भग्नप्रकम' नामक पूर्वोक्त दोप में ही धन्तर्माय हो जाता है। अनुवाद-'प्रहाद्श्य' तथा 'पसम्भव' (नामक चपमा-बोष) नो प्नुचिता पंत्व (उपमा) में ही भन्तमूत (परिसत) हो जाते हैं। नैसे- १२. (पसावृश्य)-'में रद्मि के समान विस्तृत पर्ष वासे (भयंः रमयः ड्व- उपमित समास) चन्द्र-सद्स (काव्नं शाशी इव) को प्रकत करता हैं l४2 "इस पद् में वहित-'काव को चव्रमा के साम' समा 'हचों को रश्मियों के साथ' समानता कहीं भी प्रतिद्ध नहीं है-इरसिये अमुपितार्थ दोष है। ₹र. (प्रसम्भव)- 'पनुमंकपत के मम्य में हिमत उस रान्ा के मानों भुत्त से दो (तूलोर से नहीं) प्रयोप्त बाल इस प्रकार गिर रहे ये. -पारापे गिरती साकार तेज से विशिष्ट (परिवेघिरा:) सूर्य से,
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दशम उल्लांस: ६२७
अत्रापि ज्वलन्त्योऽम्बुधारा: सूर्यमएडलान्निप्पतन्त्यो न सम्भवन्ती-
उत्प्रेक्षायामपि सम्भावनं ध्वेवादय: एव शव्दा वक्तु सहन्ते न 4 यथाशब्दोऽपि। केवलस्यास्य साघम्यमेव प्रतिपाद्यितु पर्याप्तत्वात्। तस्य चास्यामविवत्ितत्वादिति तत्राशक्तिरस्यावाचकत्वं दोपः। यथा- - उदयौ दीर्षिकागर्भान्मुकुलं मेचकोत्पलम्। नारीलोचन चातुर्यशङ्कासडकुचितं यथा ॥५६६॥ उत्प्रेच्ितमपि तात्विकेन रूपेण परिवर्जितत्वात् निरुपा्यपख्यं तत्समर्थनाय यदर्थान्तरन्यासोपादानं तत आलेख्यमिव गगनतलेऽत्यन्तम- समीचीनमिति निर्विषयत्वमेतस्यानुचितार्थतव दोप:। यथा- यहाँ भी-'प्रज्वलित जल घाराओं का सूयंमण्डल से गिरना सम्भव' नहीं है'-इसलिये (उपमान रूप में), वखित सर्थ अरनोचित्य को ही प्रकट करता है
प्रभा-प्राचीन आचार्यों ने 'असाहृश्य' तथा 'असम्भव' इन दो उपमा-दोपों का भी निरूपस किया या आचार्य मम्मट की मान्यता है कि इन दोनों दोषों का 'अनुचितार्थत्व' दोप मे ही अन्तर्भाव हो जाता है। कुछ टीकाकारों का मत है कि 'प्रथ्नामि' इत्यादि मे 'अप्रयुक्तत्व' दोप है अनुचितार्थत्व नहीं। अनुवाद्-[उत्प्रेक्षा-दोप]-उत्प्रेक्षा अलद्धार में भी 'भ्रूव', 'इव' भरावि शब्द हो सम्भावना (उत्प्रेक्षसा) को प्रफट करने में समर्य हैं, न कि यथा शब्द भी य्योंकि केवल (र्थात् असमास में) 'यथा' शब्द साधर्म्य के प्रतिपादन करने में ही समर्थ है और उस (साधम्य) की उत्प्रेक्षा में (प्रस्याम्) विवक्षा नहीं होती,। इस प्रकार सम्भावना को प्रकट करने में (तन्न) 'यथा' शब्द की प्साम्थ्य है (इसे ही प्राचीनों ने अशक्तशब्वत्व उत्प्रेक्षा दोय कहा है) यह ग्रवाचरुत्व दोप ही है। जैसे- 'बावड़ो के मध्य से ऐसा मुकुलित नोलकमल आविसूंत हुआ मानों 'सुन्दरी ा नयनचावुर्य अधिक है इस शंका से संकुचित हो ।५६र। प्रभा-यहाँ सम्भावना (उत्प्रेक्षण) को प्रकट करने के लिये 'यथा' शब्द का प्रयोग किया गया है जो असमर्थ है प्राचीन आचार्यों ने इसे ही 'अशक्तशब्दत्व' उत्परेक्षा- दोप कहा है। वस्तुतः इसका अ्रवाचकत्व में ही अन्तर्भाव हो जाता है। अनुवाद-[उत्प्रेक्षित-प्रर्थ-समर्यक अर्थान्तरन्यास का दोप] सम्भावित मस्तु भी वास्तविकता से रहित होने के फारस मिथ्या (शशविपाल आदि) के तुल्य होती है (निरूपास्यम् अलीकं तत्प्रस्य तत त्यम्)। उसके समर्यन के लिये जो मर्था- म्तरन्यास का परहण किया जाता है यह आकाश में चित्र-लेसन के समान भत्मन्त मसङ्त है। इस प्रकार इस (भर्यान्तरन्यास) का 'निवियपत्व' (नामक प्राचीनोक्त दोप) भनुचितार्थत्य दोप ही है जँसे-[कुमारसम्भय १ में हिमालय वसंन]-'जो (यह)
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६२८ 1 कोव्यप्रकाश:
दिवाकाराद्रक्षति यो गुहासु तीनं दिवा भीतमिवान्घकारम्। चद्र पि नूनं शरएं प्रपन्ने समत्वमुच्चेः शिरसामतीव ॥६००॥ अत्राचेतनस्य तमसो दिवाकरात् त्रास एव न सम्भवतीति कुत एवं तत्प्योजितमद्रिणा परित्राणम् ! सम्भावितेन तु रूपेष प्रतिभासमानस्यास्य न काचिद्नुपपत्तिरवतरतीति व्यर्थ एव तत्समर्थनायां यत्न:। साधारशविशेपणवश्ञादेव समासोकिरनुक्तमपि उपमानविशेपं प्रका- शयतीति तरयात्र पुनरुपादाने प्रयोजनाभावात् अनुपादेयत्वं यत्, तत् अपुष्टारथेत्वं पुनरुक्तं वा दोपः । यथा- सपृशति तिग्मरुची ककुभ: करैर्द्यितयेव विजुम्भिततापया। अतनुमानपरित्रद्यया स्थितं रुचिरया चिरयापि दिनश्निया॥६०।।। हिमालय मानों दिन में सूर्य से भमभीत होकर कन्दराओं में छिपे हुये प्रन्थकार की रक्षा करता है, निश्चम ही शरस में आये हुए क्षुद्र व्पक्ति के लिये भी उच्च मस्तक यालों (बड़ों) को अत्यन्त ममता होती है।६००॥। यहाँ पर प्रचेतन प्रन्धकार का सू्य से डरना ही सम्भय नहीं ह फिर घ्रास के कारस हिमालय द्वारा रक्षा भी फंसे हो सकती है? इस प्रर्थ के (भर्य) उत्प्रक्षित प से प्रतीत होने में तो कोई वाघा (अनुपपति) उपस्थित ही नहीं होती, इसलिए उस (संम्भावना) के समर्थन के लिए (अर्थान्तरन्यासरप) प्रयास करना ्पर्यं ही हैं। प्रभा-भाव यह है कि 'दिवाकर' आदि में उत्पेक्षा का विषम र्यात् अन्धकार का उरना' ही मिष्या है; क्योंकि वह भ्रचेतन है तथा हिमालय द्वारा परिशराए भी ससम्भव है। अतएन परिवासा यहाँ पर उत्पेक्षित (कल्वित) मात्र ही हो सकता है और नितान्त कल्पित वस्तु में मनुमपन्रता कसी? प्रतः उसके उपपादन (समर्थन) के निये उपनिवद्ध अथन्तिरन्यास दूपित है-यही उत्पक्षासमर्यक भर्थान्तर- न्यास का 'निरविषयत्व' नामक दोप बतलाया गया है जिसका माचाय मम्मट के मतानुसार अनुनितार्थंत्व नामक दोप अन्तर्भाव हो जाता है। अनुवाद-(समसोकि-दोप)-साधारण (शदप) विशेपलों के चल से हो समासोकि असद्वार (दब्दों द्वारा) अनुक्त भी उपमानविशोष को प्ररुट कर देता हूं, इसलिए उस (उपमानविशेष) के यहाँ (समासोकि के विषम में) फिर से प्रहस (शन्द-द्वारा कथन) करने में फोई प्रयोजन न होने के पवरए जो 'भगुपावेमरय' (नामक समासोकि-दोष माना जाता) है यह मपुप्टाथीव या पुनरक दोष ही हुं। जैसे-[रत्नाफर, हरविजय ३-३७] 'मू्य (तिग्मरधि) के अपने करों (किरसा, हस्त) द्वारा दिशाओों का स्पर्य करने पर मनोहर विनी प्रियतमा (प्रतिनामिका) के समान अमिक सन्तापयुक्त होफर देर तक पर्यािक (प, नू) मान (कोप परिमाा) परहल करती रही॥६०१॥
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दशम उल्लास:
त्र तिग्मरुचे: ककुभां च यथा सदशविशेपरावशेन व्यक्तिविशेषप- रिम्रहेए च नायकतया नायिकात्वेन च व्यक्ति: तथा श्रीष्मदिवसश्रियोऽपि प्रतिनायिकात्वेन भविष्यतीति कि दयितयेति स्वशब्दोपादानेन। श्लेपोपमायारतु स विषय: यन्नोपमानस्योपादानमन्तरेण साधारणे- ज्वपि विशेपरेषु न तथा प्रतीतिः। यथा-
प्रभातसन्ध्येवास्वापफललु्ेहिति प्रदा ।६०२।। इति। यहाँ पर जिस प्रकार सूर्य और दिशाओं की सवृप विशेषों के सामय्यं से तथा लिङ्ग विशेष (व्यक्ति=तिङ्ग: अरर्थात् सूर्य का पुल्लिङ्ग से तथा दिशायों का स्त्रीलिङ्ग से) का योग होने से नायक एवं नायिका रूप में प्रतीति (व्यक्तिः) हो रहो है; उसी प्रकार ग्रोष्मदिवसशोभा फी भी प्रतिनायिकारूप में प्रतीति हो जायेगी पतः 'दयिता' इस उपमान (स्व) शब्द के प्रयोग से पया लाभ ? (यहाँ इलेयोपमा भी नहीं है क्योंकि) श्लेपोपमा का विषय तो यहाँ होता है जहां उपमान-विशेष का ग्रहस किये बिना विशेषशों के समान होने पर भी उस (उपमान) को वैसी (पूर्वोदाहरसा के समान) स्पष्ट प्रतीति नहीं होती। जसे- 'स्वयं च' इत्यादि में (ऊपर उदाहरस ३७७) ।६०२।। प्रभा-(१) भाव यह है कि 'स्पृश्वति' इत्यादि में समासोकि अलद्कार है यहां श्लिप्ट विशेपणों के सामर्थ्य से ही ग्रीप्मदिवस-शोभा की प्रतिनायिका के रूप में प्रतीति हो सकती है अतएव 'दयितेव' यह पद व्यर्थ है और प्राचीन अलद्धारिकों के मतानुसार इस समासोकि मे 'अनुपदेयत्व' दोप है। काव्यप्रकाशकार की स्थापना है कि इसका 'अपुष्टार्थत्व' नामक (सामान्य दोप) में ही अन्तर्भाव हो जाता है। (२) इस पर यह शङ्गा होती है कि यहाँ (स्पृशति' इत्यादि में) श्लेपमूलक उपमा है समासोकि नहीं और पद्य का भाव यह है-जिस प्रकार किसी प्रेमी' के द्वारा एक प्रिया का स्पर्य किये जाने पर अन्य प्रिया को सन्ताप होता है उसी प्रकार सूय के द्वारा दिद्याओों का स्पर्श किये जाने पर ग्रीष्मदिवसशीभा को भी सन्ताप होने लगता है।' ग्रन्थकार 'इ्लेपोपमायुस्त' आदि के द्वारा इसका समाधान करते है। अभिप्राय यह है कि जहाँ उपमान का ग्रहण किये बिना भी स्लिप्ट विशेपणों के वल से उसकी स्पष्ट प्रतीति हो जाती है वहाँ समासोकति के चमत्कारक होती है जैसे 'सपृशति' इत्यादि। किन्तु यहां उपनान का ग्रहस किये बिना उसकी प्रतीति नही होती, वहाँ उपमान का ग्रहस किये जाने पर समासोकि निवृत हो जाती है, औोर उपमा ही चभत्कारक होती है। वही प्लेपमूलक उपमा का विषय है। जैसे 'स्वयं च' इत्मादि में 'प्रभातसन्वयेव' का ग्रहस किये बिना उपमान की प्रतीति ही नही होती तथा यहाँ श्लेपमूलक उपमान मानी जाती है। असएव 'स्पृशति' इत्वादि
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६३ j कंाव्यप्रकारी:
अप्रस्तुतप्रशंसाय।मपि उपमेयमनयैव रीत्या प्रतीतं न पुनः प्रयोगेख कदर्थतां नेयम्। यथा- आहूतेपु विदङ्गमेपु मशको नायान् पुरो वार्यते मध्येवारिधि वा वसंग्तृणमशिर्घत्त मणीनां रुचम्। खाद्योतोऽपि न कम्पते प्रचलितु मघ्येऽपि तेजरिवनां२; घिकू सामान्यमचेतनं प्रमुमिवानामृष्टतत्वान्तरम् ॥६०३।।
भेव पुनः कथनम्। - शत्राचेतनस्य प्रभोरप्रस्तुतविशिष्टसामान्यद्वा रेखाभिव्यक्ती न युक्त
में समासोकि ही है और उसमें अनुपादेयत्व दोप है जिसका प्पुष्टापंत्व में ही मन्तर्भाव हो जाता है। टिप्पणी-इलेषोपमा का अथ है-'लेपमूलक उपमा' वर्योंकि इस नाम का फोई प्रतिरिक्त अलद्ार आचायं सम्मट ने स्वीकार नही किया। हा, फाव्यादर्श (२-२८) में इसे एक अलद्दार पवश्य माना गया है। अनुवाद-(पपस्तुतप्रशंसा-दोष)-प्रपस्तुतप्रशंक्षा में भी उपमेय -इसी रीति से (साधारसविशेपसवलात्) प्रतीत हो जाता, हुँ; अ्रतः (उपमेय का) पुनः प्रयोग करके दोपत्व (अर्थात् अपुष्टाभंत्य) को न प्राप्त कराना चाहिए जंसे- [भल्लटशतक ६६] 'विवेकशून्य तथा वस्तुओों के स्वरूप को न जानने वाले प्रभु के समान जो सामान्य (गोत्व आादि जाति, जो विधेक सून्य ह अतएव सस्तुयों के स्वहप तारतम्य का गेद नहीं करती) है, उसे पिक्कार है, जिसमें (पक्षित्व आादि द्वारा) पक्षियों को आमन्वित करने पर भागे आाता हमा भ्यर भी नहीं रोका जाता (घयोंकि उसमें भी पक्षित्व हैं) भथवा सागर के मध्य में रहने याली सृएमि (इसों का अपकपंक पापाण विशेष) भी मशियों की कान्ति को घारस करती है (चर्मोंकि उसमें भी मसित्व जाति है) और तेजस्थियों के मम्य जाने में सद्योत (झुगनू) भी फम्पित नहीं होता (क्योंकि उसमें भी तेजस्वित्व गाति है ही)' ।।६ ० ३। यहाँ पर अप्रस्तुत जो विशेषस मुक्त 'सामान्य' हू उस के द्वारा ही पवियेक- शील प्रभु (प्रस्तुत) की प्रतीति हो जाती है अतः उसका ('प्रभुमिय' शब्ड के द्वारा) पुनः कथन प्नुचित हैं। प्रमा-प्रानीन मानामों का मत था कि मप्नस्तुतप्गंगा में जहा सापार विशेषणों के द्वारा ही मप्रस्नुत मर्य की प्रतीति हो जाती है यहां प्रस्तुत का शब्द द्वारा उपादान (ग्रहण) करने पर अनुपादेयत दोप होता है। उदादरणाम 'पारतेगु' इतयादि में 'पमृष्टततत्वान्तरम्' इस विवेधसा से बुक्त सामान्य मे द्वारा दो 'अयिवेशी प्रभु' की प्रतीति हो जाती है, फिर 'भचेतन प्रमुमित' यह कहना उचित नहीं। प्छः
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दश्षम उल्लास: ६३१
तदेतेलङ्कारदोपाः, यथासम्भविनोऽन्येऽप्येवंजातीयकाः पूर्वोक्तयैव दोपजात्याऽसर्भावितः न पृथक प्रतिपादनमर्हन्तीति। सम्पूर्णमिदं काव्य- लक्षाम्। इत्येष मार्गो विदुपां विभिन्नोञ्यभिन्नरूपः प्रतिभासते यत्। न तद्विचित्रं यदमुत्र सम्यग्विनिरमिंता सङ्गटनैव हेतुः ।।१।। इति काव्यप्रकाशेऽर्थालङ्वारनिर्रयो नाम दशम उल्लासः । ॥ सभाप्तइचार्य काव्यप्रकाशः ॥ 4
यहाँ अनुपादेयत्व दोप है। मम्मट का कथन है कि इस दोप का अपुष्टार्थत्व या पुन- रुक्ति में ही अन्तर्भाव हो जाता है। अनुवाद्-इसलिये उपयुक्त अलद्धार-दोपों का और इस प्रकार े प्रन्य दोपों का भी पूर्वोक्त (सप्तम उल्लास में निरूपित) दोषसामान्य में ही अन्तर्भाष किया जाता है। इनका पृथक् प्रतिपादन उचित नहीं है। प्रभा-भामहाचार्य आदि प्राचीन अलङ्कारिकों ने सामान्य काव्य-दोपों से पृथक अलङ्गार-दोपों का निरूपण किया था। इस प्रकरण में उनकी मान्यताओं की समीक्षा की गई है तथा उनके द्वारा वशित कतिपय अलद्वार दोप का दोष- सामान्य में अ्न्तर्भाव दिखलाया गया है। इसका यही अभिप्राय है कि आचार्य मम्मट के मतानुसार समस्त अलद्कार-दोषों का दोप-सामान्य में श्रन्तभव हो जाता है, उनका पृथक् निरूपण आवश्यक नही। अनुवाद-इस प्रकार यह फाव्यस्वरूप निरुपस (प्रकृतग्रन्थ) भली भांति पूर्ण होता है। प्रभा-यहाँ काव्यलक्षण शब्द प्रकृतग्रन्थ का बोधक है-फाव्यं लक्ष्यते स्व- रूपतो विशेषतरच जाप्यते पनेन तत् । काव्यस्वरूप विवेचन ही इस ग्रन्थ का प्रतिपाद्य विषय है जिसका ग्रन्थ के आारम्भ मे निर्देश किया गया है उसक ही यहाँ उपसंहार किया जा रहा है। अनुवाद्-(अन्त मङ्गल) इस प्रकार यहं अद्भुत (फाव्य-वियेचन) मार्ग (ध्वनिकार आदि) विद्वानों' के (नाना प्रन्यों में) भिन्न रूप से स्थित होता हुआ भी जो यहाँ अभिन्न सा प्तीत होता है; यह विचिन्न बात नहीं है; पयोंकि इस ग्रत्थ में (प्रमुत्न) जो (मम्न-तत्र विकीएं वस्तु का) समीचीन संफलन किया गया है वही इस (एफरूपता प्रतीति) का हेतु हैं। प्रभा-(१) इस उपसंहारात्मक कथन से यह प्रतीत होता है कि भारतीय काव्य-विवेचन में प्रचलित विविध मार्गों (अतद्वार, रोति, वनोकि तथा रसध्वनि आदि) का समन्वय ही आचार्य मम्मट को अभिप्रेत था। इसीलिये इस प्रन्य में विविध मान्यताओरो का सुन्दर गुम्फन किया गया है। जो विचार भिनन-भिन्न ग्रन्यों में पड़े हुये एक दूसरे से नितान्त पृथक प्रतीत होते थे। उनका काव्यप्रकाश ग्रन्थ में
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६३२ काव्यप्रकार:
सामञ्जस्य स्थापित किया गया है; अतएव यह काव्य-विवेचना का एक अद्मुत ग्रन्थ है ऐसा ग्रन्थ कि जिसमें अनेक मतों का सार संगूहीत है; किन्तु संघटना चातुयं के कारस विभिन्न मत भी एक रूप मे समन्वित हो गये हैं। (२) व्यास्या- कारों का विचार है कि यह बलेक 'अल्लदमूरि' निर्मित है। इससे ध्वनित होता है कि आचार्य मम्मट की इस कृनि को अ्रन्य (पल्लटसूरि) ने समाप्त किया था दो विद्वानों की रचना होने पर भी रचना-कौशल के कारण यह एक श्सण्ड ग्रन्थ प्रतीत. होता है। जैसे कि माणिक्य चन्द्र का कथन है-अथ चायं सन्थोऽन्येनारक्योऽपरेस म समयित इति द्विखण्डोऽपि संघटनावशावखण्डायते।' निदगंनकार ने स्पष्ट ही कहां है- कृतः थी मम्मटाचार्यवर्य: परिकरवधि:। प्रबन्धः पूरितः दोपो विघायाल्लट-सुरिया विवेचनशील विद्वान स्वमं ही इसका तथ्यातथ्य निणय कर सकते है। इस प्रकार फास्यप्रकाश में अपर्थालद्गार-निरसय नामक यह दशम उल्साक्ष संमांप्त होता हैं। यह फाव्यप्रफाश भी समाप्त होता है।
- शीचन्द्रभानुनम्वरदारमहोदयानाम् पात्मजेन
श्रीनिवासशास्त्रिसा कृता हिन्दीन्यारवा समाप्ता।
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काव्य-पकाशस्य उदाहृतपद्यानुकमणिका
क्रमाड्: पद्यम् क्रमाङ्कू: पद्यम् 4
[अ] ३३ अन्यन व्रजतीति का १३ अइ पिहुलं जलकुभं ११८ अन्यास्ता गुसरत्नरोहण० २५१ अकलिततपस्तेजोबीय० ३४१ २०७ अकुण्ठोत्कण्ठया पूर्ण अपसारय घनसारं (३५६) ५४६ प्रपाङ्गतरले हगौ ४६७ शखंण्डमण्डल: श्रीमान्' १८४ अपाङ्गसंसगि तरद्गितं ४५० भण्एं लडहत्तराग्रं २८७ अ्पूर्व मधुरामोद० ७२ २३३ अप्राकृतस्य चरितातिरायैः ५६४ अतिरथि नाम काकुत्स्यात् ४४६ अब्धेरम्भः स्थगित० २०२ ४८२ अ्रभिनवंनलिनीकिसलय० २५५ ५६ अमितः समितः प्राप्तः १३६ झत्ता एत्थ शिमज्जइ ४३२ १६४ अत्यायत नियमकारिभि० ६६ अ्मु' कनकवणभिं ११८ अत्युच्चाः परितः स्फुरन्ति २१५ अमृतममृतं क: सन्देहः ११५ पतांसीतफसिपाय अयमेकपदे तया वियोग: १५८ पनिलोचनसम्भूत० ५८६ अ्रयं पम्मासनासीन:
१२= पदृप्टे दर्शनोत्कण्ठा ४१= अयं मार्तण्डः कि स खलु २३८ अद्यापि स्तनशैलदुर्ग ४६० प्रनं वरामेकों निलय०।
३४५ अ्ंद्रावन प्रज्वलत्यग्निरुच्च: ११६ अय स रसनोत्कर्षी (३३६) २२३ अधिकरतलतल्प ३७३ अयं सर्वासि शास्नाणि १४१ ४०८ अराति बिनमालोक० 44 ३४७ ३८६ अरिवधदेहशरीर: ५८२ अनणं रगान्मणि० ४६६ प्ररुचिनिराया विना
३६४ अनन्तमहिमव्याप्त0 :९5 २८३ अरे रामाहस्ताभरण
२६८ अनन्यसदृसं यस्य २७७ प्रथित्वे पकटीकृजेऽपि, -.
४१० अनयेनैव राज्यश्री: ३६६
४१२ अनचरतकनकवितरसo - :. 3 १६७ अलमतिचपतत्वात्
३८२ अनुरागवती सन््या :- ६० अनमशिरोमसि धुताणं
२६८ अलं स्यत्वा दमगाने
२० सव्यय गूय कुमुमावचायं ४२७
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६३२: j काव्यप्रकाश:
सामञ्जस्य स्थापित किया गया है; मतएव यह काव्य-विवेचना का एक भद्भुद ग्रन्थ है ऐसा ग्रन्य कि जिसमे अ्रनेक मतों का सार संगूहीत है; किन्तु संभटना चातुरय के कारस विभिन्न मत भी एक रूप में समन्वित हो गये हैं। (२) व्याख्या- कारों का विचार है कियह श्लेक 'अल्लटसूरि' निर्मित है। इससे ध्वनित होता है कि आाचार्य मम्मट की इस कृति को अन्य (भल्लटसूरि) ने समाप्त किया था दो विद्वानों की रचना होने पर भी रचना-कोशल के कारस यह एक पखण्ड ग्रन्थ प्रतीत होता है। जैसे कि मागिक्यचन्द्र का कथन है-अथ घायं प्रन्थोग्येनारम्घोऽपरेल व समयित इति द्विसण्डोि संघटनावशादसण्डायते।' निदगंनकार ने स्पष्ट ही कहां है- कृतः शी मम्मटाचामंवर्ये: परिकरावषिः । प्रबन्धः पूरितः पेषो विघायाल्लट-सूरिय। व्रिवेचनशील विद्वान् स्वयं ही इसका तथ्यातय्य निणय कर सकते है। इस प्रकार फाय्यप्रकाश में पर्यातद्वार-निररय नामक यह वसम उल्लाक संर्मांप्त होता है। यह फाव्यप्रकाश भी समाप्त होता है।
श्रीचन्द्रभानुनम्वरदारमहोदयानाम् आ्रात्मजेन
श्रीनिवासशास्तिसा कृता हिन्दीव्यास्या समाप्ता।
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काव्य-प्रकाशस्य उदाहृतपद्यानुक्रमणिका
कमाङ़क: पद्यम् क्रमाड़्: पद्यम् [अ] १३ अन्यन व्रजतीति का भइ पिहुलं जलकु भं २५१ भकलिततपस्तेजोवीय० अन्यास्ता गुसरत्नरोह ३४१ अपसारय घनसार (३५६ २०७ अकुण्दोत्कण्ठया पूर्ण ५४६ अ्पाङ्गतरले दशौ ४६७ प्रसण्डमण्डल: शीमान् १५४ अ्पाङ्गसंसगि तराङ्गतं ४५० अण्णं लडहृतसग २६७ ंपूर्वमधुरामोद० ७२ २३३ अप्राकृतस्य चरितातिशय: ५६४ प्तिथिं नाम काकुत्स्थात् ४४६ अ्ब्धेरम्भ: स्थगित० २०२ अतिपेलवमतिपरिमित० ४८२ अभिनवंनतिनीकिसलय० २५५ पतिविततगगनसर्रण० ५६ अमितः समित: प्राप्तः १३६ पत्ता एत्थ सिमज्जइ ४३२ ३६४ अत्यायर्त नियमकारिभि० ६६ अमु कनकवसभि ११८ अंत्युच्चा: परितः स्फुरन्ति २१५ अ्मृतममृतं क: सन्देहः ११५ ५११ अयमेकपदे तथा वियोग: 1
१५८ अतिलोचनसम्भूत० ५८६ अयं पद्मासनासीन: १२८ अदृप्टे दर्शनोत्कण्ठा ४१८ अयं मार्तण्डः कि स खलु २३६ पद्यांपि स्तनशलदुर्ग० ४६० अनं वरामेको निलय० ३४५ अद्रावंत्र प्रज्वलत्यगि्निमृच्च: अयं स रसनोत्कर्षा (३३६ २२३ अधिकरतलतल्पं ३७३ भ्यं सर्वाणि शास्त्राणि १४१ प्रनङगमङ्भलगहा ४०८ प्रातिविनमालोक· ३४७ ३८६ अरिवय देहयरीर: ५८२ अनए रसन्मणि० ४६६ परुचिनिराया विना ३६४ २८३ भरे रामाहस्ताभरण 4. २६: मनन्यसहर्था यस्य।. २७७ अथित्वे प्रकटीकृतेऽपि. - ४१० अ्नयेनव राज्यश्री: ३६६ अरतङ्गारणक्काकर० ४१२ भनवरतकनकवितरा - १ : १६७ अलमतिचपल स्वात् ३८२ अनुरागवती सन्ध्या. - ६० अलसशिरोमि घुताणं २६८ अन्मपोतवृहाकपाल० : * ६३ भतं स्थत्वा रमशाने
२० अन्यम सूयं कुमुमावचायं ४२७ अलोहिकमददानोक़
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काव्यप्रकाप:
पद्यम् कमाछ: पद्यम्
भवन्व्य कोपस्य २५४ ४३० प्रवाप्त प्रागल्तयं ३२३ माविद्भितस्तन भवान् भालोस्य कोमतकपोल ३६५ अवितयमनोरयपय० भासीदञ्जनमनेति ५२६ मविरलकमलविकास: ६०३ पाहूतेपु विह्ङ्गमेपु १२० अविरलकरवाल० [इ] २७० भप्टाङगयोगपरियोलन ४०२ पमितभुजगभीपएा २२२ इदमनुचितमश्मरच - इंद से केनोक कयय ४६३ भसिमानसहायस्य ४१६ इन्दुः कि बव कलफु: ४६५ द्यं सुनयना दासीकृत० १२२ भसोळर वत्कातोल्लसद० [=] १६० भसी मगच्चुम्बित उम शिच्वलनिप्पन्दा ३५६ प्रस्नज्वालावलीदप्त १८७ उत्कम्पिनी भयपरि २६६ भस्या: कर्रावतंसेन ४२ उत्कृत्योत्तृत्य कृसि ४२० मस्या: सगविधो ३०४ उत्तानोच्छ् नमण्डक० ५५६ पहमेव गुरुः मुदारगानां. १४७ उत्फुल्लकमलफेसर ३५२ महो केनेटशी वुद्धि: ५२ उस्सिक्तस्प तप:परा० ५४२ भहो विणालं भूपल ४३६ उदपति विततोप्वंरदिम महदो हि मे बहपराद० ४३३ उदभयते विङ्मालिन्यं ४ भहो वा हारे या २४४ उदेति सविता वाग्र: [पा] १७ उद्देशोप्यं सरगकदसो० ३७ भाकुअ्च् पागिमशुचि उधयी दीपिकागर्भात् ३६८ ४३८ उमतं पदमवाप्य वो लपुः १२५ मागत्य सम्प्रति ११४ उतनिद्रकोरनद रेसo २७८ पाजा अम शिसामणि० ४१६ उन्मेपं यो मम न सह्वे ५७० पाते सीमन्तररे २४ उपकृतं वह तम ३०७ पार्मारामा विहितरतयो० २६५ उपपरिसरं गोदावर्पा: ३८२ मादाम पापमचर्ल २१४ उष्पसायन तर्वाती ४४४ मादाय बारि परित: ५४ उल्लास्प फालररयान०
२०० [प] पादिरोञ्पं स्पितो० ४०१ ए एहि किपि धानन्दमगन्दमिमं ए एहि दाब मुमरि १६२ YU७ एनस्यिपा वससि पेनमि ४२६ मानानं नपपु्वरस् ५१ एकरिनत् नरने
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डर्दाहृतंपद्यानुकमसिका
कमाड़: पद्यम् कमाङ़क: पद्यम्
४४१ एतत्तस्य मुखात्कियत् ४५७ किवणाणं घर्ण णं
१४२ एतत्मन्दविपनव० ४२६ किसलयकरलंतानां 4
११ ५२२
एपोऽहमद्रितनयामुख० १६५ कि भूपणं सुदृढमत
२३४ कि लोभेन विलद्धितः
३३६ एहि गच्छ पतोत्तिष्ठ ४६१ कुमुदकमलनीलनीर०
[ओो] ४२३ कुरङ्गीवाङ्गानि स्तिमितयति
१४ शोण्सिद् दोब्बलं ५०६ कुलममलिनं भद्रामूति:
७० पोल्लोल्लकर परपण १७३ कुविन्दस्त्वं तावत्पटयसि
३३० पोत्सूकयेन कृतत्वरा ४७३ कसु मितलता भिरहता
[क] ३६ कृतमनुमतं दूष्टं वा यै: (२५८)
२२४ क: कः कुत्र न घुर्धु रायित० १०६ कृतं च गर्वाभिमुखम्
४५ ६५ केसेपु वलाभोडिश्र
१३४ कथमवनिप द्पो० ६४ कैलासस्य प्रथमशिसरे 1
५५२ कपाले मार्जार: पय: ११७ के लासालयभाल
४४६ कमलमनम्भसि ५२३ कौटिल्यं कचनिचये
४१५ कमलेव मतिर्मतिरिव ३३८ कामन्त्य: क्षतकोमला
५५१ २२५ क्रेद्ार: स्मरकामु कस्य
३६६ करवाल इवाचारस्तस्य ३२६ क्रोधं प्रभो संहर
१६१ करवालकरालदो: सहायो० ४६८
३०३ करिहस्तेन सम्वाधे ४३५ कव सूर्यप्रभवो वंशः
४७५ नपू र इव दग्घोजपि k マ ववाकार्य दाशलक्ष्मणः (३३१)
३२५ कर्पू रघू लिधवल० =२ क्षणादासावक्षएदा
५१२ कलुपं च तवाहितेष्व० ३४० क्षिप्तो हस्तावलग्नः १६४. कल्याणानां त्वमसि महसां . ४६२ क्षीणः क्षीोर पशि०
२७६ ४० क्षुद्राः सन्त्रासमेते
४४७ फस्तवं भो: कथयामि [ख]
२०५ कस्मिन् कर्मशि सामथ्य० सएापाहुशिमा देभर १३५. फस्स व एा होइ रोसो ७४ खलववहारा दीसन्ति
२४६ काचिरकीर्ण रजोभि: ४५८ खिद्यति कुाति वेल्लति .:
१६५ कातयं केवला नीतिः [ग]
५२६ का विसमा देग्वगई. ५६६ गन्भ व प्रवहतु ते
५२१०किमासेव्यं पुसां १२७ गच्छाम्यच्युत दर्शनेन
२३६ किमिति न पश्यसि कोप ५५X गवं मसंवाह्यमिमं
२०६ किमुच्यतेऽस्य भूपाल ५६५
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प
फमाफ: पद्म् iF. कमास्त: पद्यम् ६३ २६२ जगाद मधुरां वाचं ३१० गाटालिल्नवामनीकृत १०५ जद्टाकाण्डोर्नालो नरं० (२३२) ६६ माहालिंगस रहस्ज्तुप्रम्गि ५७१ १०१ गामास्तृम्मि गामे जटाभाभिर्भाभि:'करपंत0' १२४ जनस्पाने भानं "' ३६E गाम्मीयंगरिमा तस्प ४२२ जस्तरणंते उरए कर २५० गाहन्तां मदिपा निपान० ५३२ जस्सेम्र वसो तस्सेम ४८३ ५७३ जह गंहिरो जह रपएा० ४८० गुएनामेव दोरात््यात्ं २१६ जं परिहरिपं तीरई ५६२ गुर्ण रनध्ये: प्रथितो० ६७ जा ठेरं व हसन्ती २१ ४७ जाने कोन्परामुसी ३५४ गुरजनगरतन्नतवा ४६६' 'जिवे न्द्ियतया सम्यक ५६२ गूहिपी सचिय: सखी ३१६ जिते न्द्वियत्वं विनयस्य (५२५) २६३ गृहीतं येनासी: परिभव० १६४ जुगोपात्मानगमस्तः :5 १६८ गोरपि यद्धाहनतीं ६: जे संकागिरिमेहलाग प्रथ्नामि काव्यक्षणिनं ६२ जोहद् महरसेन ३ ग्रामतरगं तरण्या: २८६ ज्याबन्धनिप्पन्दभुजेन ४१ 'ग्रीवाभङ्भाभिरामं ४२१ "[प] ४७२ गोलनामौसिदाम २६० चकारोलसनारामा: ४११ ज्वोरस्नेव नयनानन्य: "[=] ५८० 'सनी चकारपंकि' ४०७ टृष्टरण्गंतो मय्हिसि ५८४ गण्डारलरिव युप्माभि: १३१ चत्ारो यगमृरियजः ८८ सवपुव्एिमामभि २६४चग्र्रगता पद्धगुणान्न ३२६,शिहूपरमसष्मि तोप्रस २६३ घरमानपरियास०' १८ छोल्वेइ भशोल्तमणा २०१ चापाचार्यस्यिपुर० (२३०) [r] ३४३ पिते विह्दृदि स दद्ददि : १६सइण मह गेडरपत० ५३६ चिनं चिनं वत। २१२ हत उदित उदाहारहारो पितं महानेय बनायतार: ४०१ सतः कुमुदनानेन चिन्तपन्ती जगस्मृति ३५५ तमेनसलारिप्पाइ। ५६० पिन्नारलमिय स्युयोर्धम- ५१५ तं साम मिरिनहोपर० मिरशनर्पारप्राप्त १५ सपाभूतो द्ष्टया (२२०) सत्याश्तिमराउ:प० २५७ अगवि जप्निसते ५०६ सविदिमरण्ज मरिमम् :
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उदाहृतपद्यानुकमणिका
क्रमाङ्: पद्यम् करमाङ्क: पद्यम्
१६= तद्गच्छ सिद्धर् फुड २६६ दीधीड्वेवीङ्समः ५१७ वद्गेहं नतभिति ५०३ दुर्वारा: स्मरमार्गणा: ५६३ २६ दूरादुत्सुकमागते ३६१ ५६६ १४६ तपस्विभिर्या सुरुचिरेस ३७६ दृशा दग्ध मनसिज़ं देव त्वमेव पाताल०
११० तषिमनि कलयति ४५३ देवीभाव गमिता
४०६ तरुसिमनि कृतावलोकना २०८ देश: सोऽयमरातिशोशित० ४५६ तवाहवे साहसकर्मं० २६ दे वादहमद्य तया
१७६ सस्याधिमाओ्रोपायस्य ४३७ दोर्म्या तितीर्पति तरङ्ग०
५० -,तस्याः सान्द्रविलेपन १८६ द्वय गतं सम्प्रति (२५२)
१०२ ताएं गुएगहणाए २२ द्वारोपान्त निरन्तरे
३२२ [घ]
१८० ३६७ ३१५ ताला जाग्नन्ति गुणा ६१ धन्यासि या कथयसस
५५ तिग्मरुचिरप्रतापः १८२ घमिल्लस्य न कस्य
३११ तिष्ठेत्कोपयगात् प्रभाव० ५६४ धवलोसि जह वि
१४५ तीर्थान्तरेपु स्नानेन, ५३५ धातु: शिल्पातिशय० तुह वल्लहस्स गोसम्मि २१० धीरो विनीतो निपुो०
१४० ते, दूप्टिमान्नपतिता: [न]
१७६ तेज्यर्वान्तं समरनन्ति ४१४ न केवलं भाति नितान्त०
२४६ ते हिमालयसामन्भ्य ६४ न चेह जीवितः कश्चित
२२८ त्वसे वंसोन्दर्या स. च. ५४६ न तज्जलं यन्न सुचारु०
४५५ त्वयि दूप्ट एव तस्या: १६७ न नस्तं यदि नाम
२३५ त्वयि, निवद्धरत: प्रिय: ५१३ नन्वाक्रयस्थितिरियं
३१ तवं मुग्घाक्षि विनेव ५७४ नयनानन्ददायोन्दोः
५४४ त्वं विनिजितमनोभव० १६३ नवजलघर: सन्नद्वोंऽ्यं
२३ त्वामस्मि वष्मि विदुषां २४३ नाथे निशाया नियते०
३६ स्वामालिख्य प्रसायकुपितां ४६६ नानाविधप्रहरसौनृ' प
[द] ३५२ नारीसामनुकूलमाचरसि
३३७ दन्तक्षतानि.करजैश्च ३८१ नाल्प: कविरिव, स्वल्प०
६२ दर्पान्धगन्यगज० ४७८ निजदोपाघृतमनसां
दिवमप्युपसातानां 7 ४६६ नित्योदितप्रतापेन
६०० दिवाकराद्रक्षति यो० ४७४ निद्रानिवृत्तावुदिते
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:- काष्यभंरकाया:
कमास: पद्यम् नमासू पद्मम् निमेतुरास्यादिव तस्य ३२७ प्रसादे.यर्तस्व प्रकाटम ५५० निम्ननाभिकुहरेषु यदम्भ: ३६ प्रस्थानं वलयः कृत ४२८ निस्वधि च निराधयँ च २०६ प्रागपास नियुम्भ०(३१७,३t८) ५७ निस्पादानसम्भार० २६० ३०५ निर्वासर्वरदहना: २७१ प्राप्ताः थिपः सफलकांम० निशितरारघिया १७४ २ निःशेपच्युसचन्दनं ३२ प्रेमार्द्रा: प्रसायस्पूर: १६३ न्यकफारो हयायमेव मे प्रेयान् सोध्यमपाकृतः [प] ३५१ ६६ पथि पयि शुकचस्प पंचिम् ए एत्य ३०६ [फ] फुल्तुफरं कलमकूरखिहं २४० परापकारनिरत: [ब ] १०७ परिच्छेदातीत: (४८६) ४३१ वत ससि कियदेतत् ४०६ ११६ बन्दीकृत्य नुपहिमां २८ ५१४ विम्बोष्ठ एव रागस्ते परिम्लानं पीनस्तनजमन० १३० ३२६ परिहिरात रति सतिम् [भ ]
६० पविसंती परवारं ३७१ पर्चादंघि प्रसायं ५२४ भक्तिमेंवे न यिभये
१२३ पश्येत्करविच्चल चपल भए सपि रमएा०
३३२ पाण्ड शामं चदनं ,४६०) १२ मद्रात्मनो दुरिरोह पातालमिव ते नाभि: १३८ भम पम्मिम बीसदो०
५७८ पादाम्युजं भवसु नो० ५०३ भहमोद्भूतन भद्रमस्तु
טטן पितृदगतिमहं प्रजामि ३८७ माराते प्रतिभासार पुराशि यस्पां सपराजट्रनानि ७८
YY३ घुंसत्यादपि प्रविचतेत् भुजन्मस्पेय ममि: ३०६ पृषुफावं स्वरपानं (३७०) १७५ पेशलमपि गलवचनं २६० भूपालरल नि्दन्ध ४०३ पोरं भुतीपति जनं १०६ भूपो भूपः सविम० ५०२ म्एपिरसीघतीत ३३४ भूरेगा विग्यान नवपारि YEX १२६ प्रमिमरनिमसम १२६ प्रयममरखच्छाव: [म] १०५ प्रधानाध्यनि धीरपनुस्वनि० २६१ १३१ मतिरिव सृतिर्मपुरा मष्नामि शोरमराई.
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उदाहृतपद्यानुक्मणिका छ
कमांङ्क: .पद्यम् कमाफ़: पद्यमु ३६= मधुपराजिपराजितo १४३ यथाञ्यं दारुणाचार: ५१६ मधुरिगरुचिरं वचः २६७ यदा त्वामहमद्राक्षम् ३४२ मनोरागस्तीय्' विपमिव ३६५ यदानतोऽ्यदानतो० ३५० मन्यायस्तारएवाम्भ:० ५५७ २७२ यदि दहत्यनिलोञ् (४५४) मलयज रस विलिप्त० ३१२ यद्वचनाहितमतिरव हु २२६ मसुण बरणपातं २४५ यशोऽधिगन्तु सुस० ३७२ महदेसुरसं धम्मे १६६ २४२ महाप्रलयमास्त० ५४५ यस्य किञ्चिदपकर्तु० 1 ७१ महिलासहस्सभरिए ३५७ यस्य न सविधे दयिता २४७ महीभृतः पुन्रवतोऽपि ७३ यस्य मिन्राणि मिनाणि महोजसो मानधना: ११३ पस्यासुहृस्कृततिरस्कृति० ६ माए धवोवअरणं ४३६ याता: कि न मिलन्ति २६६ मातङ्गा: किमु वल्गित: १४५ यावकरसारद्रपाद० ३८५ माता नतानां संघट्ट: ५४३ युगान्तकालप्रतिसंहुता० १३३ मात्सर्यभुत्सारयं (२६२) ५४७ पे कन्दरासु निवसन्ति ५३४ मानमस्या निराकतु म् ३०२ येन ध्वस्तमनोभवेन ३८४ मारारिशकरामेभ० १८६ ये नाम केचिदिह ३४४ मिन्ने ववापि गते सरोष्ह० ४४४ येनास्यभ्युदितेन चन्द्र ५०५ मुक्ता: केलिविसूत्रहारo ४८४ येपां कण्ठपरिग्रह० मुखं विकसितस्मित २२७ येपां तास्त्रिदशेभदान० ७६ मुग्घे मुग्घतयव १०४ येपां दोवलमेव दुर्ल० १५६ मूर्ध्नामुद्वृ तकृत्ता० .(३४८) १६२ योजविकल्पमिदमर्थ०
२६५ पृगचक्षुपमद्राक्षम् ३७६ ४६७ मृगलोचनया बिना [र] १५३ ६७ ४०४ मृधे निदाघघर्माशुप ३३० रक्ताशोक कृशोदरी (३१६) (य] ३७४ रजनिरमसमाले:
५०४ मं प्रेक्ष्य चिररूढापि ३६८ रसासार रसा सार० १ य: कोमारहर: राईसू चंदघवलास २०३ यः भूयते सुरसरिन्मुस० ४५१ सकायामकलङ़क चेत्
१६३ यतदूजितमत्युग्र १५६ राकाविभावरीकान्त०
२७३ यत्रानुल्लिसितार्थमेव ४E राकासुधाकरमुसी ५१= यनता लहरीचलाचलद्पः ५७२ राजति सटीयमभिहत•
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काव्यप्रकाय: क्रमाङ्क: पद्यम्. ५७७ राजनारायएं लक्ष्मी: फमाङ़क: ४४० राजन्, राजसुता न पाठयति ५१० विदलितसकबा २११ राजन् विभान्ति भवतः २८८ विदीर्णानिमुखा ५३२ राज्ये सारं वसुधा ४२५ विद्वन्मानसहुंस i २५४ राममंन्गथर रे ताडिता २६६ विधाय दूरे केयुर १०६ रामोज्मो भुवनेपु २०४ विनय प्रणय ककेतुन ७७
३६१ विनायमेनी नयता १०३
५ विनिगंत मानदमार २४८ विपदोऽभिभंवन्तववि २४१,२५३ सग्न रागवृंताइंग्यी२८०,२८४ १३७ विपरीभरएं तच्छी २३७ लग्न: केलिकचग्रह ५४१ विपुलेन' सागरभयस्व ५६३ विभिन्नवंरखा गरुडा ४३४ लहिंकसा तुज्क वाहुप्फंरों ३३५ विमानपयं दुतले ७५ नावण्यं तदसो कान्ति: २७ वियद लिम लिनाम्बुद ५५३ लायप्योकुमि सप्रतापo ६१ विहुरस मलं तुम साह' १०० निसंनास्ते भूमि २१३ बेगादुट्डीय गगने निम्पतीव तमोगज्ञानि (५६८)' ५५८ ४१७
वेननत्वचा तुल्यरूचां १५२ तीलातामरसाहतो० [घ] २५३ ५६ दंनिरशनिश्च तमुच्च: ५३०
१५.७ २७४ चवनोममोनं सरस्वत्यमि० ५०६ दक्षी दिवराधूसरो ५७६• वानेन्द्री तव सत्ययं ५३७ शिरीपादपि मृद्स्भी ५६७ वदनगोरमेलोभo. ३०१ ३५६ यदनं यरबन्याग् ३० शून्यं यागगुहं ३१३ बद यद जित: सपमः ४२० दीलेन्द्र प्रसिपाधयमान ५०१ वपु: प्रादुर्भावादनु० २७५ स्यामा श्यागसिमान० १६१! दपुविर्पादामनाप .१६६ विनक्षपा रमुय: १० श्रीपरियनाज्डा पदि पह्िसपुलस रव २७६ थुमेन दुदिम्पंगनेन ५८५ यासिमय हस्पिदन्ता: [प ] ५२६
३०८
[ग ] २६२ वाताहारपा नगत. =६ वारिग्जम्नो बिपुसो २१७
4
- 4 .-
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ष्ः पधम् १ वस्तवो भसिता देव
६ संग्रामान्यमागवेन (४z६)
सत्यं मनोरमा रामा i२ स त्वारम्भरतोजरo ३ सत्वारम्भरतोस्वर०" १६ सदा मध्ये यासामियस् १७ सदा स्नाल्वा नियोभिन्या ११ एगर समार्सनमद ३६ सद: करसर्यमवाच् ८० सदशमुत्तामरि: + 1
=६ स पीतवासा: प्रपुहीव० समदमत सुजनदजल० १६६ मों गृषप भृष्य माने
भंग्रहारे प्रहरखं: १५५ सम्पग्ानमहाज्योठि: ३८६ सरला बहुनारम्भ २६१ सोन्टपमणड् दारम्ं ३६६ सरस्वती प्रमाई में मौन्दर्परप दर्गङ्ग्तो १८१ स रातृ वो दुशम्यनी ५७५ मोनानं विवनमन ३७५ ४०५ सरवस्वं हर सवस्प Y= सविता वियवति विधुरपि मुम: क शमासि महिनोपिवामानि ३२१ सव्रोडा दपितानने सशोसिव: कब्पनुजां ११२ सनग्पतपामनगन्ति ३३५. ३६७ ससार साकं दर्मरा सह दिग्रहशिसाहिं स्कृमति (िम्मरन) ४६५ सहि एावरिट्वएसमरम्मि स्कटिकाहतिनिनंम:
६६ सहि विरइकस माहारस ५६१
१२१ सार्क कुरड्रकदुया १६० सस्तां नितम्बादद:
१६६ सा दूरे च सुघा १११ Y३० साधनं सुमह्द्यस् साघु चन्द्रर्मास पुप्कर: २६१ स्वर्गित चाकदर्व निक्टे ३४ सा पत्यु: प्रथमापराघः स्वम्नंश्री ममरेपृ सवां
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श्री जैन श्वेलम्या स्ानावामी संघ