1. Kavyanusheelan Baldev Upadhyaya
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काव्यानुशीलन
साहित्यिक एवं सांस्क्ृतिक निबन्धों का संग्रह)
लेखक वलदेव उपाध्याय हिंदू विश्वविद्यालय, फाशी
स स्कत आफस वातणर्सी रमेश बुक डिपो निपोलिया बाजार जयपुर
[ मूल्य ४।)
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प्रकाशक- राधाकृप्ण माहेश्वरी रमेश् बुक ढिपा जयपुर
सर्वाधिकार सुरक्षित मूल्य ४।)
मुद्रक- महताब राय नागरी मुद्रण, काशी
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दो शब्द
पण्डितप्रवर वलदेव उपाध्याय एम० ए० साहित्याचार्य भारतीय दर्शन तथा साहित्य, संस्कृत तथा संस्कृति के मर्मज्ञ विद्वान् हैं। इन्होंने हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी में दर्शन तथा साहित्यालोचन के विषय में एक प्रौढ़ साहित्य का निर्माण किया है जो हिन्दी भाषा के लिए गौरवरूप है तथा जो अपने विषय का आधारभूत साहित्य है। इनकी लेखनी से अनेक ग्रंथरत् प्रसूत हुए हैं जिन्हें मंगलाप्रसाद पारितोषिक, डालमिया पुरस्कार और उत्तरप्रदेश की सरकार द्वारा अनेक पुरस्कारों से सम्मानित तथा आहत होने का अभूतपूर्व गौरव ग्राप्त हुआ है। :४
हिन्दी का कोई भी ऐसा लेखक नहीं है जिसके ग्रन्थों ने भारतीय दर्शन !७ तथा साहित्य के दुरूह विषयों को आदर्शवत् निर्मल बनाया है और हमारे एतद्विपयक ज्ञान का वर्धन किया है। आश्चर्य नहीं कि ये ग्रन्थ आज हमारे विश्वविद्यालयों की उच्चतम कक्षाओं के छात्रों के लिए सर्वत्र पाठ्यग्रन्थ नियत किये गये हैं। मेरे विशेष आग्रह करने पर उपाध्यायजी ने यह संग्रह प्रकाशित करने का मुझे अधिकार दिया है। इस ग्रन्थ के मिन्न-भिन्न खण्डों में १ पाठकों के लिए बड़ी ही उपादेय सामग्री एकत्र की गई है। साहित्य के ७ साथ संस्कृति का विशेष घनिष्ठ सम्बन्ध है। हम लोग भारतीय संस्कृति के श्रद्धालु उपासक हैं। अ्रप्रतः अपरन्तिम खण्ड में संस्कृति-विपयक عر
निबन्धों का भी संग्रह आग्रहपूर्चक किया गया है। उपाध्याय जी संत्कृति के विशेष जानकार हैं। फलतः उनके प्रीढ़ सांस्कृतिक विचारों का यह नवनीत हमारे पाटकों के विशेष आस्वाद का विपय चनेगा; यह हमारी पूर्णा आशा है।
राधाकष्ण माहेश्वरी
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वक्तव्य
आज मुझे इस पुस्तक को पाठकों के सामने प्रस्तुत कर विशेष आनन्द का अनुभव हो रहा है। इसमें मेरे साहित्यिक तथा सांस्कृतिक निबन्धों का संग्रह है। साहित्य तथा संस्कृति का घनिष्ठ सम्बन्ध होने के कारण दोनों प्रकार के, लेखों का एकत्र संग्रह अनुचित न समझा जावेगा। 'काव्यानुशीलन' में मुख्यतः नाना प्रकार के काव्यों का गम्भीर अनुशीलन है। इसमें पाँच खण्ड है। प्रथम खण्ड में आलोचनात्मक निबन्ध हैं जिनमें आलोचना के भिन्न भिन्न तत्वों की मीमांसा की गई है। द्वितीय खण्ड में हिन्दी काव्य की मीमांसा है। 'तुलसी तथा जयदेव' में प्रथम बार रामचरित मानस के ऊपर 'प्रसन्न राघव' का व्यापक प्रभाव दिखलाया गया है। यह लेख 'तुलसी ग्रन्थावली' के तृतीय खण्ड में आज से ३२ वर्ष पहिले प्रकाशित हुओ था और भाज भी हिन्दी में इस विषय में इससे व्यापक अध्ययन का अभाव है। 'रसिक गोविन्द' में हिन्दी साहित्य के एक महनीय कवि का विवेचनात्मफ परिचय दिया गया है। यह एक पुस्तिका के रूप में प्रथमतः प्रफाशित हुआ था जो भाजकल अप्राप्य है। 'पारिजात हरण' मिथिला के सुग्रसिद्ध कवि उमापति के प्रख्यात नाटक की समीक्षा है। तृतीय खण्ड में 'लोफ काव्य' का अनुशीलन है। भाजकल सौभाग्य से साहित्यिफों का ध्यान लोक-साहित्य की ओर आकृष्ट हुआा है और उसके अध्ययन की प्रवृत्ति वृद्धि पर है। इस खण्ड में 'भोजपुरी' के लोक काव्यों की फोमलता तथा सरसता का वर्णन विशेष रूप से किया गया है। इस अनुशीनन ने पाठकों को स्पष्त हो जायगा कि लोफकाव्य का स्थान किसी भी शिद्ट काव्य की अपेक्षा कम नहीं है ; चल्कि उसके समकक्ष ही है।
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चतुर्थ खण्ड में संस्कृत काव्य से सम्बद्ध अनेक विषयों का विवेचन है। 'संस्कृत रंगमंच' के अन्तर्गत प्राचीन काल के रंगमंचीं का उपयोगी विवरण विशेष ज्ञानवर्धक सिद्ध होगा। 'जवनिका' शोधपूर्ण निवन्ध है जिसमें नवनिका से सम्बद्ध विपयो की व्यापक समीक्षा है। सन्तिम खण्ड में 'भारतीय संस्कृति' के मूलरूप तथा नाना अभिव्यक्तियों का अनुशीलन है तथा सांस्कृतिक विषयों का साहित्य में किस प्रकार ग्रकटा- करण किया गया है; इस विषय का भी पर्यात संकेत है। आजकल भारतीय संस्कृति की चर्चा खून है, परन्तु उसका सच्चा रूप अभी मीमांसा का विषय है जिसके विपय में नाना प्रकार की विचारधारा आज प्रचलित है। इन लेखों में भारतीय संस्कृति के सच्चे रूप के प्रदर्शन कराने की न्ाचनीय चेष्ा की गई है। इस ग्रन्थ के अनेक निवन्ध प्रयाग, लखनऊ तथा दिल्ली की 'आकाश- वाणी' से भिन्न मिन्न समयों पर वार्ता के रूप में प्रसारित किये गये इस लिए इनमें कहीं कहीं पर अनिवार्य पुनवक्ति आा गई है। भागा है इससे. विपय के समझने में पाठकों को विशेष सुविधा होगी। मेरा पूर्ण विश्वास है कि इन निवन्धों के मनन करनेवाले व्यक्तियों के ज्ञान में विशेष वृद्धि होगी तथा हिन्दी के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी सामग्री प्रस्तुत करने के कारण यह ग्रन्थ विशेष कर उपादेय सिद्द होगा।
काशी विश्वविद्यालय, आपाढ़ कृप्ण एकादशी वलदेव उपाध्याय सं० २०१२ १६-६-५५
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विषय-सूची
खएड १
आलोचना पृष्ठ
१-वेद में गीति-काव्य y.
२-कलाकार की प्रेरणा १४
३-काव्य का प्रयोजन २७
४-कवि औौर काव्य ५-प्राचीन कविता में प्रगतिशीलता
खणड २
हिन्दी काव्य ६-तुलसी और जयदेव ६१
७-रसिक गोविन्द ७७
८-पारिजातहरण ११५
६-पलट्दास १२८१
खएड ३
लोक काव्य १०-भोजपुरी-एक अनुशीलन १२६ २१-गीतों की दुनिया १५४
१२-लोककाव्य में करूग रस १५८
१३-लोक काव्य में ऋतुवर्णन १७२
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खएड ४
संत्कृत काव्य पृष्ठ १४-देववाणी लोकवाणी थी १८५
क १५-संस्कृत काव्य में प्रकृृति और प्रेम १९१ १६-शिवमहिम्नः स्तोत्र २०० सं १७-संस्कृत गद्य की रूपरेखा २०४
ले १८-प्राचीन नाट्य-शास्त्र २११
की १९-संत्कृत रंग-मंच २१६ २०-जवनिका २२६ वाप २१-विश्वकवि कालिदास, २१६ -लिप :विप खएड ५
भारतीय संस्कृति व्यां २२-आार्य संस्कृति का प्राण उपर २४५
होग २३-हमारी मृत्युञ्जय संत्कृति २५६ २४-भारतीय साहित्य में नारी २६७ २५-वालक की शील-सम्पत्ति क २७७ २६-भारत में तपोवन २७-हमारे उत्सव २८३'
२८- गूड लेख्य २६६
२६-आसाम की आादिम संस्कृति ३०६
३०-आर्यो की सांस्कृतिक देन ३१४ ३२१
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खरड १
घ्ा लो च ना
१-वेद में गीति-काव्य २-कलाकार की प्रेरणा ३-काव्य का प्रयोजन ४-मानव कला का लक्ष्य ५-प्राचीन कविता में प्रगतिशीलता
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वेद में गीति-काव्य का उद्धम
कवि काव्य-सृष्टि का प्रजापति है। जिस प्रकार शिव अरपपनी शक्तिभूता प्रतिभा के सहयोग से नई रंगोन सृष्ठि का उद्गम करता है उसी प्रकार कवि भी अपनी प्रतिभा के बल पर नवीन सौन्दर्यमय काव्य-जगत् का निर्माण करता है। कवि में अन्तर्दर्शन की सत्ता नितान्त आवश्यक है। कवि सुन्दर पदार्थ के दर्शन में जब तक अपनी पृथक् सत्ता का विसर्जन करके उससे तादाम्य स्थापित नहीं कर लेता, तघ तक वह भावमर्यी कविता की सृष्टि नहीं कर सकता। 'अन्तर्दर्शन' कवि को वस्तु-तत्त्व के अन्तस्तल के निरीक्षण की क्षमता प्रदान करता है, तो 'वर्णन' उसकी अ््नुभूत भावनाको वोधगम्य अभिव्यक्ति प्रदान
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काव्यानुद्यीलन
करता है। अतः कवि के लिए वर्णन उतना ही आवश्यक है जितना अन्तर्दर्शन। दर्शन के द्वारा प्रातिभ चक्षु के उन्मेष होने पर भी वाल्मीकि को कवि की पदवी तभी प्राप्त हुई जब दर्शन वर्णन के वाह्य रूप में छलक उठा। अन्तदेशन कवि की निजी विभूति है जो उसके हृदय को नाना भावनातं का आकर्षण केन्द्र बनाती है, परन्तु वर्णान कवि की वाह्य विभूति है जिसके द्वारा वह पाठकों के हदयावर्जन में समर्थ कोमल कविता को जन्म देता है। दर्शन तथा वर्णन से स्निग्ध ऋषि की वाणी के भव्य उदाहरण वेद के महनीय मन्त्र हैं। मन्त्र आध्यात्मिक तत्व ज्ञान की निधि हैं तथा कर्मकाण्ड के जागरूक साधन; इसमें तो विवाद या सन्देह के लिए लेशमात्र भी स्थान नहीं है। परन्तु ये ही मन्त्र कमनीय काव्य कला के आाद्य निदर्शन भी निश्चयपूर्वक माने जा सकते हैं। वैदिक ऋषियाँ को वासी में दिव्यता अपने भव्य रूप में स्वर्गीय सुगन्ध के साथ विलसित हो रही है। आध्यात्मिक दृष्टि से वैदिक मन्त्र उदात्त तत्व्र- ज्ञान के निःसन्देह परिचायक हैं। भाव-प्रकाशन की हृष्टि से ये मन्त्र ऋषियों के आर्प चक्षुओं के द्वारा अनुभूत तत्वों के नितान्त सरल, सहज तथा शान्तिमय अभिव्यल्जक हैं। वैदिक ऋषि मनोऽभिलपित भावों को थोड़े से चुने हुए सुबोध शब्दों में सीधे तौर से कह डालने की क्षमता रस्ता है, परन्तु समय-समय पर वह अपने भावों की तीव्रता की अभिव्यक्ति के हेतु अलंकारों के विधान करने में भी पराङ मुख नहीं होता। अलंकारों की रानी उपमा का अत्यन्त भव्य, मनोरम तथा हद्दयावरजक रूप हमें इन मन्त्रों में देखने को मिलता है। तथ्य तो यह है कि उपमा का काव्य-संसार में प्रथम अवतार उतना ही प्राचीन है जितना स्वयं कविता का आविर्भाव। आनन्द से सिक्त कवि-हृदय की वासी उपमा के द्वारा अपने को विभूषित करने में कोमल उल्लास तथा मधुमय शनन्द का बांध करती है। अपनी अनुभूतियों में तीव्रता लाने के लिए उन्हें सरलतापूर्वक पाठक के हृदय तक पहुँचाने के निमित्त कवि
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वेद. में गीति-काव्य का उद्गम ७
की वासी जिन अ्न्तरंग मघुमय कोमल साधनों का उपयोग किया करती है अलंकार उन्हीं का अन्यतम रूप है। हम ऐसे काव्य-युग की कल्पना नहीं कर सकते जिसमें भाव-भङ्गी में कोमल विलास के संचार-हेतु कवि किसी-न-किसी प्रकार के साम्य-विधान का आश्रय नहीं लेता है। वेद के सूक्तों में नाना देवताओं से यज्ञ में पधारने के लिए, भौतिक सौख्य सम्पादन के निमित्त तथा आध्यात्मिक अन्तर्दृष्टि उन्मिषित करने के हेतु नाना प्रकार के छन्दों में स्तुति की गई है। उनके रूपों के भव्य वर्णन में कवि की कला का विलास और उनकी प्रार्थनाओं में कोमल भावो तथा सुकुमार हार्दिक भावनाओं की रुचिर अभिव्यंजना है। उपा-विषयक मन्त्रों में सौन्दर्य-भावना का आधिक्य है, तो इन्द्र-विषयक मन्त्रों में तेजस्विता का प्राचुर्य है। अररग्नि के रूप-वर्णन में यदि स्वभा वोक्ति का आश्रय है, तो वरुण की स्तुति के अवसर पर हृदयगत कोमल भावों की मधुर अभिव्यक्ति है। इस प्रकार वेद के मन्त्रों में काव्यगत गुणों का पर्याप्त दर्शन होना काव्य-जगत् की कोई आ्कस्मिक घटना नहों है। तन्मयता तथा अ्नन्यता का विशद् परिचायक चिह्न है भावों की सरल सहज अ्रभिव्यक्ति। निःसन्देह वेदों में इसका विशाल साम्राज्य है। इन्द्र की स्तुति के अपरवसर पर आद्गिरस हिरण्यस्तूप ऋषि की यह उक्ति है कि त्वष्टा के द्वारा निर्मित स्वरयुक्त वञ्र के द्वारा जव इन्द्र ने पर्वत में श्राश्रय लेकर निवास करने वाले वृत्र को मारा, तव रँभाती हुई धेनुओं के समान जल जोरों से बहता हुआ समुद्र की ओ्र्ोर चल निकला : अहन्नहिं पर्वते शिश्रियाणं त्षटास्मै वञ्र स्वर्ये ततक्ष। वाशा इव धेनवः स्वन्दमाना अज्जः समुद्रमव जग्मुरापः ।१ यहाँ 'वाश्ा धेनवः' की उपमा से सायंकाल चरागाहों से लौटने वाली, अपने बछड़ों के लिए उतावली से जोरों से रँभाती हुई और दौड़ती हुई १. स-वेद-१।३२।२
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•काव्यानुशीलन * गायों का मनोरम टृश्य नेत्रों के सामने झूलने लगता है। जोरों से वहने वाले, घोर रोर करने वाले, बहुत दिनों तक रुके रहने के वाद प्रवाहित होने वाले जल के लिए इससे अधिक सुन्दर उपमा का विधान क्या हो सकता है ? इसी वैदिक कल्पना को हमारे महान् कवियों ने भी अपने काव्यों में बड़ी रुचिरता के साथ अपनाया है। हृदय वृत्तियों की सार्मिक अभिव्यक्ति के लिए वरुण सक्तों का अनुशीलन विशेष सहायक सिद्ध होगा। महर्षि वसिष्ठ ने एक अत्यन्त भावप्रवण सक्त में अपने आराध्यदेव वरुण के प्रति अपना कोमल उद्गार प्रकट किया है। वह सुन्दर शब्दों में कह रहे हैं कि मैं अपने- आप पूछ रहा हूँ कि कब मैं वरुस के साथ मैत्री-सत्र में बँध जाऊँगा ? क्रोधरहित होकर वल्सा प्रसन्न चित्त से क्या मेरे द्वारा दी गई हवि को ग्रहण करेंगे ? कब मैं प्रसन्नमानस होकर उनर्का दया को देखूँगा : उत स्वया तन्वा सें वदे तत् कदा न्वन्तर्वरुणे भुवानि। किं मे हव्यमहणानो जुपेत कदा मृळीकं सुमना अभिख्यम्॥१ जब विद्वानों की मीमांसा से उसे वरुण के कोप का पता चलता है तब कह चठता हैकि हे देव, पितरों के द्वारा किये गए द्रोहो को दूर कर दीजिए और उन द्रोहों तथा विरोधों को भी दूर हटाइए जिन्हें हमने अपने शरीर से स्वयं किया है। जिस प्रकार पशु को चुराने वाले चोर को तथा वछड़े को रस्सी से लोग छुड़ा देते हैं, उसी प्रकार आ्र्प्राप भी अपराध की रस्सी में बँधे वसिष्ट को भी मुक्त कीजिए : अव दुग्धानि पित्र्या सजञा नोऽव या वयं चक्मा तनूभिः। अब राजन् पश्ुतृप न तायुं सजा वत्सं न दाम्नो वसिष्ठम्।।२ नम्रता तथा दीनता, अपराध स्वीकृति तथा आत्म-समर्पण की भव्य भावनाशं से मण्डित यह सूक्त वैप्णव भक्तों की उस वाणी की सुध १. ऋन्वेद-७ := ६।२ २. वही-७=६।५
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वेद में गीति-काव्य का उद्गम w
ददिलाता है जिसमें उन्होंने अपने को हजारों अपराधों का भाजन बताकर भगवान् से आत्मसात् करने की याचना की है।
उपा की सुपमा उपादेवी के विषय में उपलब्ध सूक्तों का अ्र्रनुशीलन हमें इसी रनिष्कर्ष पर पहुँचाता है कि वे काव्य की दृष्टि से नितान्त सरस, सहज तथा भव्य भावना-मण्डित हैं। प्रातःकाल अरुणिमा से मण्डित सुबर्सा छटा से विच्छुरित प्राची नभोमण्डल पर दष्टिपात करते समय किस भावुक हृदय में कोमल सावना का उदय नहीं होता ? वैदिक ऋषि उसे अपनी प्रेम भरी दृष्टि से देखता है और उसकी दिव्य छटा पर रीझ उठता है। उपा मानवी के रूप में कवि हृद्दय के नितान्त पास आाती है। यदि उपा केवल महान् तथा स्वर्ग की अधिकारिणी-मात्र होती, इस विश्व से परे ऊर्ध्व लोक में अरपनी दिव्य छवि छहराती रहती, मानव- जगत् के ऊपर उठकर अपनी भव्य सुन्दरता से मण्डित होकर अपने में ही पुञ्जीभूत वर्नी रहती, तो हमारे ह्रृदय में केवल कौतुक या वित्मय जाग्रत होता, घनिष्ठता नहीं। जब हमारी भावना का प्रसार इतना विस्तृत तथा व्यापक हो जाता है कि हम अ्र्प्रपनी प्रृथक सत्ता का सर्तरथा निमू लन करके प्रकृति की सत्ता के भीतर नरसत्ता का सदः अ्तुभव करने लगते हैं तघ अ्रनन्यता की भावना जन्म लेती है। इसका फल यह होता है कि कवि उपा को कभी कुमारी के रून में, कर्भी गृहिणी के रूप में और कभी माता के रूप में देखता है। ब्ाह्म सौन्दर्य के भीतर कवि आ्र्न्तर सौन्दर्य का अनुभव करता है। उपा केवल वाह्य सौन्दर्य को प्रतिमा न होकर कवि के लिए माता की समता की प्रतक वन जाती है। वैदिक ऋषि उपा के स्वरूप की भावना को तीत्र रूप से प्रकट करने के लिए नाना अलंकारों का विधान प्रस्तुत करता है। उपा अपने शुभ्र उज्नवल रूप को धारण करती हुई र्नान करने वाली सुन्दरी की भाति आ्रकाश में प्रकट होती है, तो कभी वह भ्रातृ-विहीन भगिनी के
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१० का च्यानुशीलन,
समान अपने दाय-भाग को लेने के लिए पितृ स्थानीय सूर्य के पास आाती है, कभी वह सुन्दर वस् पहनकर पति को अपने प्रेम-पाश में घाँधने के लिए मचलने वाली सुन्दरी के समान अपने पति के सामने अपने सुन्दर रूप को प्रकट करती है : अभ्रातेव पुस एति प्रतीची गर्तारुगिव सनये धनानाम्। नायेव पत्य उश्यती सुवासा उपा हस्रेव नि रिणीते अप्सः।।" कवि की दृष्टि उपा के रम्य रूप पर पढ़ती है और वह उसे एक सुन्दर मानवी के रूप में देखकर प्रसन्न हो उठता है। वह कहता है-हे प्रकाशवती उपा, तुम कमनीय कन्या की भाँति अत्यन्त आरकर्पएमयी घनकर अभिमत फलढ़ाता सूर्य के निकट जाती हो तथा उनके सन्मुख् स्मितवदना युवती की भाँति अपने वक्ष को आवरग-रहित करती हो : कन्यंव तन्त्रा शाशदानॉ एषि देवि देवमियक्षमागम्। संस्मयमाना युवतिः पुरस्तादानिर्वक्षांसि कणुपे विभाती॥2 यहाँ कवि की मानवीकरण की भावना अ्त्यन्त प्रबल हो उठी है। यहाँ उपा के कुमारी रूप की कल्पना है। स्मितवदना सुन्दर रूप को प्रकट करने वाली युवती कन्या की कल्पना सूर्य के पास प्रएाय मिलन की भावना से जाने वाली उपा के ऊपर कितनी सयुक्तिक तथा सरस है। रपा के ऊपर की गई अन्य कल्पनाओं के भीतर भी उतना ही शचित्य दृष्टिगोचर हो रहा है। वह अपने प्रकाश द्वारा संसार को उसी प्रकार संस्कृत करती है जिस प्रकार योदधा अपने शस्तों को घिसकर उनका संस्कार करता है : अपंजते शूरो अरतेव शबून् वाधते तमो अजिरा न बोळहा।,3 उपा अपने प्रकाश को उसी प्रकार फैलाती है जिस प्रकार ग्वाला चरागाह में गौशं को विस्तृत करता है अ्थवा नही अपने जल को विस्तृत करती है :
२. दही, १३२३।४० । ३. वही, ६६४३ ।
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वेद में गीति-काव्यका उद्गम ११
पशूत्र चित्रा सुभगा प्रथाना सिन्धुर्न क्षोद उर्विया व्यश्वैत् ।। उषा का नित्य प्रति उदित होना उसके अमरत्व की पताका है : उपः प्रतीची सुवनानि विश्वोर्ध्वा तिष्ठस्यमृतत्य केतुः॥२ उपा का नित्यप्रति एकाकार रूप से आराना कवि की दृष्टि में चक्र के त्रवर्तन के समान है। चक्र सदा आवर्तित होता रहता है, उसी प्रकार उपा भी अपना आवर्तन किया करती है- समानमर्थ चरणीयमाना चक्रमिव नव्यस्या ववृत्स्व ॥3 इन उदाहरसों में उपमा का विधान उषा की रूप-भावना को तीव्र बनाने के लिए उचित ढंग से प्रयुक्त किया गया है। प्रकृति चित्रण उपा-विषयक मन्त्रों के अनुशीलन से हम वैदिक ऋषियों की प्रकृति के प्रति उदात्त भावना को भी भली भाँति समभ सकते हैं। प्रकृति का चित्रण दो प्रकार का है- (१) अ््रनावृत वर्णन-प्रकृति का स्वतः आ्र्प्रालम्वनत्वेन वर्णन, जहाँ प्रकृति की नैसर्गिक माधुरी कवि-हृदय को आरकृष्ट करती है और अपने आानन्द से कवि-मानस को सिक्त करती है। (२) अरलक्ृत वर्णन - जिसमें प्रकृति तथा उसके व्यापारों का मानवीकरण किया गया है। प्रकृति निश्चेष्ठ न होकर चेतन प्राणी के समान नाना व्यापारों का सम्पादन करती है। वह कभी स्मितवदना सुन्दरी के समान दर्शकों का हृदय आकृष्ट करती है, तो कभी उग्ररूप भीपएा जन्तु के समान हमारे हृदय में भय तथा क्षोभ उत्पन्न करती है। वैदिक कवि की इस द्विविध भावना का स्फुट निदर्शन हमें उपा- सम्बन्धी भावनाओं नें मिलता है। प्राची क्षितिज पर सुवर्स के समान अरुरा छटा छिटकाने वाली उपा का साक्षात्कार करते समय कवि का २. वही, ३६१३। ३. वही, श६श३।
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१२ काव्यानुशीलन
हृदय इस कोमल चित्र में रम जाता है और वह उल्लासमयी भाषा में पुकार उठता है: उपो देव्यम्त्या वि भाहि चन्द्ररथा सृतृता ईरयन्ती। आ्षा तवा वहन्तु मुयमासो अश्वा हिरण्यवर्णो पृथुपाजतो ये।१ हे प्रकाशमयी उपा, तुम सोने के रथ पर चढ़कर आमरसशील बनकर चमको। तुम्हारे उदय के समय पक्षीगए सुन्दर रसमय वाखी का उच्नारण करते हैं। सुन्दर शिक्षित प्रथुवल से सम्पन्न सुवर्स वर्स- वाले घोड़े तुम्हैं वहन करें। अलंकृत वर्णन के अवसर पर उपा से सम्बद्ध रूप तथा व्यापारों पर मानवीय रूप तथा व्यापारों का वड़ा ही हदयरख्जक आरोप किया गया है। एक स्थल पर कवि उया की रून-माधुरी का वर्णन करते.समय शोभनवस्त्रा युवती के साथ उसकी तुलना करता है : नायेव पत्व उद्ती सुवासा। उपा हल्ेव निरिणीते अप्सः।2 यहाँ कवि नारी के कोमल हरृदय को स्पर्श कर रहा है। पति के सामने कौन सुन्दरी अपने हडय के उल्लास तथा मन की वासना को गुप रख सकती है? और कौन ऐसी स्त्री होगी जो पति के सामने अपने सुन्दर- तम सज्जासम्पन्न रूप को प्रकट करना नहीं चाहती ? अपने पति-भूत सूर्य का अनुगमन करने वाली उपा के आचरण में कवि साध्वी सर्ती के आचरण की स्फुट अभिव्यक्ति पाता है।3 एक स्थान पर कति भय से शंकित होकर कह उठता है कक कहीं उपा के सुकुमार शरीर को सूर्य की तीच्ा किरसो सन्तप् न कर द, जिस प्रकार राजा चोर को या शत्रु को सन्तप् करता है : नेत त्वा स्तेन चथा रिपु तपाति। सूरो अर्विसा मुन्ाते अ्वसूनृते॥४ अत्यत्र रंगमंच के ऊपर अपना उल्लासमय नृत्य दिखलाने वाली नर्तकी की समता कवि प्रातःकाल प्राची क्षितिन के रंगमंच पर अपने शरार
- नग्बेंद-३।३११२। २. वही, १२२४।७। 3. वही, ७य31३ 1 ४. वही, ५८णद।
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वेद में गीति-काव्य का उद्गम १३
को वरिशद रूप से दिखलाने वांली उषा के साथ करता हुआ अपनी कलाप्रियता का परिचय देता है : अधि पेशांसि वपते नृतूरिवाषोणुते वक्ष ऊस्रव वर्जहम्।१ महाकवि कालिदास ने अपने काव्यों में प्रकृति के इस द्विविध रूप की भव्य भाँकी प्रस्तुत की है। 'ऋतु-संहार' में प्रकृति अपने अनावृत रूप में पाठकों के सामने अपनी रमणीय छ्वि दिखलाती है, तो 'मेघदूत' में वह अलंकारों की सजावट से चमत्कृत तथा कोमल हार्दिक भावभङ्गिमाओं से स्निग्ध रमणी के रूप में आकर प्रस्तुत होती है। कालिदास का यह प्रकृति-चित्रण ऋग्वेदीय मन्जुल धारा के ही अन्तर्गत है।
- नववेद-शहगर।
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कलाकार की प्रेरणा मानव की प्रत्येक प्रवृत्ति हेतुमूलक होती है। बिना किसी बलवान. निमित्त के वह किसी भी प्रवृत्ति के लिए उद्योगशील नहीं होता। काव्य- कला मानव की उच्चतम आ्पध्यात्मिक प्रवृत्ति की प्रतीक है। वुद्धि के किसी विकसित उच्चतर स्तर पर पहुँच कर ही मनुष्य अपनी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के लिए शब्दार्थयुगल का मधुर माध्यम पकड़ता है। वह अपनी प्रातिभचक्ष के द्वारा पदार्थ की मधुर भांकी पाता है, वह जगत् के पदार्थ तथा अन्तर्जगत् के भाव में रस का अक्षय उत्स पाकर अपने जीवन को आनन्दमय बनाता है। इतने से ही वह कृतकार्य नहीं होता, प्रत्युत उसी आरनन्द का प्रकाशन अपनी कला के द्वारा सम्पन्न कर दर्शक तथा पाठक को आनन्दमय बनाने का भी प्रयन्न करता है। यही शभिव्यंजन उसकी अनुभूति का चरम अवसान है। हमारे मनीपियों की प्रत्यक्ष दृष्टि बतलाती है कि श्र्ानन्द के अनुभव के लिए ही विश्वस्रष्टा ने सृष्टि की रचना की। वह स्वयं रस से तृम्त है, किसी प्रकार ऊन नहीं है-रसेन तृप्तः न कुतश्चनोनः (अथर्व० १०।=४४) रसतृप्त विश्वकर्ता की सृष्टि भी एक अखंड रस की धारा से चारो शरोर व्याप है। इसके मधुर सरोवर शत सहस्र संख्या में चारों ओर भरे हुये हैं। उनसे रसका आस्वादन करने के हेतु हमारे प्राण सदा व्याकुल रहते हैं। रस-प्राप्ति मानव जीवन का चरम लक्ष्य है। आ्रनन्द की अ्नुभूति के लिए ही प्राणी वेचैन होकर इधर उधर भटकता है। रस पाने के लिए उसके चित्त वेचैन हैं, प्राण आकुल है। इस रस का तप्रनुभव पाकर मनुष्य शबदमय या रेखामय या स्वरमय या चित्रमय माव्यम द्वारा अपनी उपलब्ध तृप्ति वाहर प्रकटित करता रहता है। वह
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कलाकार की प्रेरणा १५
स्वार्थी नहीं है, वह क्षुद्र स्वार्थ का केन्द्रीभूत निकेतन नहीं है कि वह समग्र रस चुपचाप अपने ही आप पान कर जाना चाहता हो। वह अपने स्व' को इतना वित्वृत तथा व्यापक बना देता है कि उसके लिए कोई 'पर' रहता ही नहीं। इसी व्यक्तित्व के प्रसार को, अपने 'स्व' को 'पर' के साथ तादात्म्य को, साहित्य की भाषा में 'साधार णीकरण' की संज्ञा दी गई है। रसकी उपलन्धि के अनन्तर रस के उन्मीलन का प्रधान साधन कला है। अ्र्प्रत् विचारणीय प्रश्न है कि कला या साहित्य के मूल में कौन सी पेरखा कार्य करती है। कौन वस्तु उसे कला के उन्मीलन तथा काव्य के सर्जन के लिए अग्रसर करती है ? सन्व्याकाल में रक्तभ वारिदमाला से आवृत तथा मंजुल स्वरों की ध्वनि करनेवाली हरे लाल रंग के उड़ते हुए पक्षियों के समूह से गुंजारित आरपकाश-मंडल की छवि को तूलिका से चित्रित करने के लिए चित्रकार क्यों व्याकुल होता है? अथवा ऊंची अट्टालिका पर चढ़ भरोखे से झांकने वाली शरदिन्दु विनिन्दक आनन से अन्धकार का तिरस्कार करने वाली सुन्दरी की भव्यकान्ति को कविता के द्वारा आलोकित करने के लिए कवि क्यों लालायित रहता है? कमनीय वीणा की तन्त्री को भंकारित कर कलावन्त स्वरमाधुरी से शोताओं को मुग्ध करने का अभान्त परिश्रम क्यों करता है ? इसका एकमात्र उत्तर है स्वान्तः सुखाय, अपने मन के सुख के लिए, अपने हृदय के तानन्द के निमित्त ही। आ्र्रानन्द से मुग्ध कलाकार आरनन्द की अभिव्यक्ति का प्रतिनिधि ठहरा, वह अपनी कला के विविध साधनों के द्वारा उसका उन्मेप करता है। इस उत्तर की विस्तृत मीमांसा अ्र्प्रपेक्षित है।
आत्मशक्ति उपनिपद् चतलाता है कि आरंभ में ब्रह्म अकेला था। एक होन से वह रमणा नहीं करता था। रमण की इच्छा होते ही एक ने बहु के रूप में उत्पन्न होना चाहा। रमण की अभिलापा ही एक को बहु घनने
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की प्रधान प्रेरिका हुई। 'एकाकी नैत्र रमते'। सो तकरामयत एकोऽह बहु स्याम्। इस 'बहु स्याम्' की अभिलापा से ही सृष्टि का उद्गम हुआ। 'एपसा' की तृप्ति के लिए ही जगत् का समस्त प्रपंच जागरूक रहना है। एपखा है कामना या अभिलापा। एपसा तीन प्रकार की मानी गई है पुत्रैपणा, वित्तेषणा तथा लोकेपणा। पुत्र स्त्री की इच्छा, धन की इच्छा तथा यश की इच्छा। अरथश अन्य शब्दों में काम, अर्थ तथा धर्म ही इस संसार में समग्र प्रवृत्तियों के प्रधान निदान माने गये हैं। हमारे समस्त कार्य व्यवहार इन्हीं कारणों से उत्पन्न होते हैं। मानव जीवन की अशेष प्रवृत्ति का मूल यहीं है। परन्तु इन तीन पुरुपार्थो के अति- रिक्त 'मोक्ष' नामक चतुर्थ पुरुपार्थ भी है जो प्राणीमात्र के उद्योवन तथा प्रवृत्ति का साधन हैं। दुखी जीवन की लहरिका से प्रताडित मानव. सदा अपने दुःखमोचन के लिए प्रयत्नशील होता है। वह सर्वत्र अपने को दन्धन में पाता है, चारों ओर परतन्त्रता की जंजीर उसके देह को जकड़े हुए खड़ी रहती है, वह स्त्रतन्त्र होना चाहता है। 'सर्व परवशं दुःखम् सर्वमात्मवशं सुखम्' की उक्ति सर्वथा सत्य है। परवश होना दुःख है। आत्मवश होना सुख है। प्रकृति से अपने को विविक्त जानकर पुरुष-ख्याति लाभ करता है और सुक्त वनता है। यह मोक्ष हो परम पुरुपार्थ है और इसी की सिद्धि के लिए यावत् कला, यावत् शास्त्र, यावत् काव्य, सन्तत प्रवृत्त होते हैं। हमने गोस्वामी तुलसीदास के ही प्रसिद्ध शब्द 'स्वरान्त: सुखाय' को समस्त कला की मूल प्रेरक शक्ति माना है। इसे कुछ विस्तार के साथ समभने की आवश्यकता है। इस विश्व में समस्त प्ररणाओं तथा स्फीत स्फुरणाओं का भव्य आधार है यही आत्मा। आत्मा ही प्रेरक शक्ति का प्रतीक है। आररात्मा की शक्ति ही सर्वत्र विकसित होकर नाना रूप रूपान्तरों से हमारे सामने प्रकटित हो रही है। आरत्मा ही विश्व की समग्र वस्तुओं में श्रेष्ट है-प्रियतम है। कामना-वेलि आत्मद्रम का ही आश्रय लेकर अपनी भव्य महिमा सर्वत्र विस्तारित करती है। जीवन के शेप कार्य कलापों के बीच इसी की शक्ति काम करती दीस
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कलाकार की प्ररणा १७ पड़ती है। विश्व का निरीक्षणा किसी जगह से आ्ररम्भ कीजिए, अ्न्त- रेगत्वा आत्मा के ऊपर ही पर्यवसान होगा। प्रिय वस्तुओं की गएना मेंआत्मा ही श्रेष्ठ ठहरता है। आरत्मा विशाल विश्ववृत्त का केन्द्र- स्थानीय है। विश्व की परिधि के किसी बिन्दु से गणना आरम्भ कीजिए केन्द्र को स्पर्श करते ही जाना पड़ता है। प्रियतम होने के हेतु ही पुत्रवत्सला ममतामयी माता की भाँति श्रति मानवों को उपदेश देती है- आत्मा वाडरे द्रष्टनयः । आरात्मा का साक्षात्कार करो। अये दुःखपीडित प्राणी, यदि तुझे क्लेश की अ्सहनीय वेदना से अपनी रक्षा करनी है। आत्ागमन के पचड़े से अपने को बचाना अभीष्ठ है, तो इस श्रेछ्ठ आत्मा का दर्शन करो, मन्थन करो तथा निदिध्यासन करो। भारतीय: आाध्यात्मिक चिन्तना का यही परिगलित फल है-आत्मानं विजानीहि- और यूनान के मान्य महापुरुप का यही आदर्श वाक्य है-नो दाई- सेल्फ। आरत्मा की यही साक्षादनुभूति कलात्मक चिन्तना तथा रसात्मक रचना का सूल स्रोत है। मेघदूत का रहत्य महाकवि कालिदास के मेघदूत काव्य का आध्यात्मिक रहस्य इस विषय को कितनी मनोज्ञता से झलका रहा है। आनन्दमय लोक में यह जीव कितने सुस के साथ अपना जीवन बिताता है। नित्य वृन्दावन में रसिकशिरोमखि भगवान् के साथ लीला रस में लीन यह जीव हन्मयता का अ्रनुंभव करता हुआ आत्मविभोर रहता है। अनन्त रास के मधुर रस का आस्त्रादन कर वह अपने को कृतार्थ समझता है। परन्तु विषम कर्म की विपमय परिणति ऐसी होती है कि वह उस आानन्द धाम से चहिष्कृत किया जाता है। भगवान् विष्णु के तृतीय क्रम से वह च्युत हो जाता है। 'भूरिशृंगा: अयासः' गायें जिस लोक में विचरण करती हैं उस गोलोक से वह अपने को भूलोक में पाता है। स्वर्ग से यही च्युति है। क्या हम सब प्राणी उस अमरावती के शाप- बस्त चक्ष नहीं है जिसे स्वामी के अभिशाप के कारए ललित अलका २
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का परित्याग करना पड़ा है। कालिदास का यक्ष स्वर्गधाम से कयुत मानवमात्र का प्रतीक है। वह कर्तव्य के साथ प्रेम का, विश्व मंगल के साथ आत्मकल्याण का, परोपकार के साथ स्वार्थ का सामंजस्य न रखने के कारण ही तो इतना आपद्ग्रस्त होकर जंगलों की धूलि छानता फिरता है। ईसाई मत के अनुसार ज्ञान के फल चखने के कारण स्वर्ग- लोक से आदम अपनी प्रियतमा के साथ निष्कासित किये गये थे। इस निष्कासन का भी यही रहस्य है। यह तो हुआ मानव जीवन का पतन पक्ष। उत्थान पक्ष में ही मानवता की चरितार्थता है। यदि जीव शिव से वियुक्त होकर सन्तत वियोगाग्नि के भीपए दाह में दग्ध होता रहे, तो यह उसकी शक्तिशालिता के लिए नितान्त अनुचित है। त्रियोग की चरितार्थता संयोग की उपल्धि में ही है। वियोग मानव के आध्या- त्मिक विकाश में, मानवता से ऊपर उठकर शिवत्व की उपलब्धि में, एक सामान्य अवधि है। इसी को चरमफल मानने वाला प्राणी कभी अपनी उन्नति का फल नहीं पा सकता और उच्चतम व्येय तक पहुँच ही नहीं सकता है। पतन और उत्थान, ह्रास और वृद्धि, विद्योग तथा संयोग दोनों ही आध्यात्मिक विकास के चरम उत्कर्ष के लिए नितान्त आ्रव- शयक हैं। वियोग की वेदना हमारे हृदय को आमूल दग्ध कर रही है, आरनन्द धाम की स्मृति आ्रज भी जीव को आनन्द की झलक दिखला कर उसे संयोग के लिए उत्साह दे रही है। अमरत्व की प्राप्ति हमारा अ्रपन्तिम व्येय है। मृत्यु से होकर हमें अ्रमरत्व को पाना है। प्रपंच के द्वारा निप्नपंच की प्राप्ति करनी है। यह तभी सम्भय है जत्र हम अ्रपने तात्मा की अनुभूति कर अपने आपको जानें। विद्व में जितने रचनात्मक तथा रसात्मक कार्य-कलाप हैं वे इस आात्मशक्ति के ही विभिन्न तथा विचित्र स्फुरण हैं। आरत्मा ही आ्रनन्द की उपलब्धि के हेतु इन वस्तुओं का निर्माण करता है। आत्मा की हो आनन्द-रूपता से विश्व में आनन्दरूपता है। क्या चित्रकारी, क्या
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स्थापत्यकला, क्या कविता, क्या संगीत-सब इसी आ्रनन्दमय रूप की अ्र्प्रतुभूति के भिन्न भिन्न साधन तथा उपाय हैं। अतः भारतोय श्रालो- चकों की दृष्टि में कला की रचना आत्मशक्ति की स्फुरखा है। काव्य के निर्माण में भी यही प्रेरक शक्ति है। आत्मा का स्वरूपोन्मेष काव्य का भाए है। आनन्द का उन्मीलन ही काव्य का उद्देश्य तथा सुखपूर्वक चतुर्वर्ग की प्राप्ति ही काव्य का उन्च प्रयोजन है। काव्यप्रेरखा और नवीन मनोविज्ञान उपरिनिर्दिष्ट भारतीय मत के औचित्य समझने के लिए उसका पाश्चात्य मनोविज्ञान के द्वारा उद्धासित सिद्धान्तों के साथ तुलना अत्यन्त आवश्यक है। प्राचीन मनोविज्ञान के अनुसार प्राखियों को भिन्न-भिन्न कार्यों में प्रवृत्त कराने वाली तेरह प्रकार की मानसिक शक्तियाँ है जो सहजात होने के कारण 'मूल प्रवृत्तियाँ' (इनस्टिङक्ट) कही जाती हैं। ये विभिन्न प्रकार की रक्तियाँ विभिन्न प्रकार की उत्तेजना से होती हैं और स्वयं विशेष क्रियाओं में प्रकाशित हाती हैं। नवीन मनोविज्ञान (साइको एनेल्सिस) के जन्मदाता फ्रायड के अनुसार मनुष्य की समस्त अरिलापाओं तथा चेश्वओं का आधार एक ही शक्ति है जिसे वे 'लिबिडो' या मूल शक्ति के नाम से पुकारते हैं। इस मूल शक्ति के रूप निर्देश करने में ही फ्रायड् महाशय की मौलिकता है। उनके शिष्य एडलर तथा युंग ने भी इस मूल शक्ति को अंगीकार किया है। परन्तु उनकी इसकी रूपमीमांसा उनसे नितांत परथक तथा विलक्षण है। १. फायड-कामवासना फ्राइड के अनुसार यह मूल शक्ति काममयी है। मनुष्य जो कुछ कार्य करता है, जो कुछ भी चेष्रा करता है उसकी ब्रेरिका होती है
१. मकटगत नामक प्रसख मर्नोविद्ानिक ने 'बळ्ड लावन आफ सारकीत जा, तथा 'इनरजी भाफ मैन' नामक ग्रन्थों में एमो मत की व्यवत्था की है।
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यह कामवासना जो अपनी तृप्ति के लिए अ्नेक मार्गों को खोज निकालनी है। जव इसकी तृप्ति साधारण मार्ग से नहीं होती, तब यह अपनी अभिव्यक्ति के लिए असाधारण मार्ग दूढ़ लेती है। इस असाधारण माग के अन्तर्गत इस इच्छा के अवरोध, मार्गान्तरी कररा,2 रूपान्तरकरणा,3 अथवा शोध की गसना की जाती है। इन्ही के द्वारा सभ्यता का विकास होता है। फ्रायड के अनुसार जगन् के मौलिक प्रवृत्ति में यही कामवासना सर्वत्र व्यापक रूप से विद्यमान रहती है। इस कामेच्छा के तीन रूप विश्लेपण से सिद्ध होते हैं :- (१) संभोगेच्छा जो विपम लिंग धारियों के दैहिक मिलन से सम्भव है तथा जिसका लक्ष्य सन्तानोत्पत्ति है। (२) मानसिक संयोग जो एक दूसरे के प्रति आ्र्राकर्पए, प्रेमभाव तथा तथा स्निग्ध वातरचीत की इच्छा में अ्रभिव्यक्त होता है, (३) वालवच्चों के प्रति प्रेम तथा रक्षा का भाव। सन्तानोत्पत्ति गार्हस्थ्य जीवन का पर्यवसान है। यह साधारण अभिव्यक्ति के प्रकार हैं। काम वासना साधारण रीति से श्रभिव्यक्त होकर ञनेक रूपों में दृष्टिगोचर होती है। मनोविज्ञान के मर्मज्ञों का परीक्षित सत्य है कि जब कामवासना के प्रकाशन का दमन किया जाता है, तव मानव जीवन में मार्मिक तथा प्रभावशाली घटनाओं की उत्पत्ति होती है। लोक-व्यवहार की घटनाओं में हम कामवासना की ही चरितार्थता का अनुभव करते हैं। कामवासना के निरोध मैं तथ उदात्तीकरण में ही कला की अभिव्यक्ति होती है। काम- शक्ति के अधः प्रसरस से उत्पन्न होता है व्यवहारिक नीवन तथा कामशक्ति के ऊर्ध्व प्रसरश, परिशोधन या उदात्तीकरण, (सबलिमेशन) से उदय लेता है साहित्यिक जीवन।
१. इनदिविशन २. रोटाइरसन, 2. ह्रकानेंशन ४. सप्लार्ममेशन
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अतः फ्राइड के अनुसार कला की प्रेरणात्मिका शक्ति काम वासना ही है। उदान मार्ग में जब वह प्रकाशित होती है, भोग विलास में दैनन्दिन प्रवाह को रोककर जब उसका प्रवर्तन किसी उदात्त भावना की अभिव्यंजना के निमित्त किया जाता है, तब कला या काव्य का उद्गम होता है। प्रगतिशीलवादी आधुनिक आलोचकंमन्यों की यह धारणा कितनी भ्रांत है कि कामवासना की अटूट तृप्ति ही काव्यकला की जननी है। यदि यही पक्ष मान्य होता, तो नैतिक जीवन से विरुद्ध आचरण करनेवाले व्यभिचार-परायए व्यक्ति ही सबसे श्रेष्ठ कवि होता। परन्तु उनके प्रमाणभूत फ्रायड की ही उनके विरोध में घोषण है कि कामवासना के परिशोधन तथा उदात्तीकरण से ही काव्यकला का जन्म होता है। महाकवियों तथा महनीय कलाकारों के जीवन ही उसके उज्ज्वल प्रमाण हैं। फ्रायड् आदि आधुनिक मनोवैज्ञानिक काव्य को स्वप्न का सगा भाई मानते हैं। काव्यलोक स्वप्नलोक की ही एक प्रतोकात्मक झाँकी है। उनकी मान्यता के अनुसार स्वप्न अन्तःसंज्ञा में निहित अर्तृप्त वासनाओं की अन्तव्यंजना है। काव्य की भी दशा ठीक ऐसी ही है। इस दैनन्दिन जगत् में मनुष्यों की समग्र इच्छायें चाह रूप में अरभिव्यक्त नहीं हुआ करतीं। किन्हीं इच्छाओं के ऊपर सामाजिक नियमों का इतना कड़ा प्रतिघन्ध लगा रहता है कि वे बाह्य जगत की अ्रप्रभिव्य्त्ति में आकर कभी कृतार्थ नहीं होतीं। निरुद्ध होकर वे केवल अ्रन्तः संज्ञा के भीतर दब जाती हैं और स्वप्न को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाती हैं। काव्य के सम्बन्ध में भी स्वप्न की यह विशिष्टता स्वथा जागरूक रहती है। विशालता, भव्यता, उदात्तता त्र्प्रादि की चड़ी बड़ी भावनायें अतृप वनकर उत्पादक प्रसंग की कर्मी के कारण अन्तञ्चतना में अज्ञातरूप से दवी पड़ी रहती हैं। काव्य ऐसी अरतृप इच्छाओं की वाह्याभित्यक्ति का एक कलात्मक मार्ग है जो केवल कविके ही हरदय को हलका नहीँ वनता, प्रत्युत शोताओं के नित्तका भी प्रफुल्लित तथा आल्हाित करता है।
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काव्य के विषय में फ्रायड का यही मान्य सिद्धान्त है, परन्तु विचार करने पर इस सिद्धान्त में अ्र्प्रनेक त्रुटियां लक्षित होती हैं। काव्य को स्वप्न का प्रतिनिधि मान वैठना सरासर अन्याय है। यदि दोनों में कोई समता है तो वह इतना ही है कि जैसे स्वप्न हमारी बाह्य इन्द्रियों के सामने नहीं रहता, वैसे काव्य वस्तु भी नहीं रहती। परन्तु दोनों के स्वरूप में महान् अन्तर है। कल्पना के द्वारा जिन काव्य- वस्तुओं की प्रतीति होती है उनका रूप स्वप्न की वस्तुओं को प्रतीति के समान नहीं रहता। स्वप्न में अनुभूत वस्तुएं प्रत्यक्ष के समान सपष्ट तथा प्रभावोत्पादक होती है, परन्तु कल्पनाप्रसूत वस्तु का यह विस्पष्ठ रूप नहीं होता। एक और भी बड़ी त्रुटि इस मत में है करुण- रस के प्रसंग में। काव्य में करुण रस के उत्पादक प्रसंगों की कमी नहीं रहती, परन्तु क्या शोक की वासना की तृप्ति इस प्रकार कोई मी व्यक्ति चाहेगा। उसे आनंद पाना नितान्त दूभर होगा। अतः इन मनोवैज्ञानिकोंका काव्य-विपयक मत कथमपि ग्राह्य तथा उपादेय नहीं हो सकता।"
कामेच्छा का प्रावल्य हमारे शास्त्रों में भी सर्वत्र स्वीकार किया गया है। 'कामस्तदये समवर्ततावि' (१०।१२९।४) ऋग्वेद के विख्यात नासदीय सूक्त में सृष्टि के आररंभ में काम के उदय की कथा मिलती है। वासनारूप काम सृक्ष्म रूप से सृष्ठि के मूल में सर्वत्र व्यापक हृष्टिगोचर होता है परन्तु उसीको एकमात्र मूल शक्ति मान लेना मानव जीवन के विकास की प्ररिका अन्य शक्तियों की सत्ता का तिरस्कार करना है। अतः प्रावल्य मानकर भी मनोवैज्ञानिक उसका सर्वव्यापक रूप नहीं मानते। यह सिद्धान्त कला के आंशिक उदय की ही व्याख्या कर सकता है समग्र रूप का नहीं।
१. द्रण आचार्य रामचंद्र गुम-रममीमांसा, ( पृष =६ः से २६४ तक ।)
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२. ऐडलर-प्रभुत्व शक्ति
ऐडलर की सम्मति में मूल शक्ति प्रभुत्व-शक्ति है। दूसरे के ऊपर हारी होना, प्रसुत्व दिखलाना, दबाव डालना, अपने व्यक्तित्व के उत्कर्ष से दूसरों को तिरस्कृत कर स्वयं महत्वशाली वनना आदि इसी मौलिक शक्ति के नाना अरभिधान हैं। प्रत्येक मनुष्य में कोई न कोई व्यापक दोप होता है जो उसके मूल्य तथा महत्व को समाज में हीन वनाये रहता है। इस हीनता की ग्रन्थि से उसका मन इतना उलका रहता है कि वह सन्तत उसे दवाकर या उसके ऊपर आवरण डालकर उस दोष के ठीक विरुद्व गुण के सम्वादन में व्यस्त हो जाता है। सांसारिक प्रवृत्तियों का यही मूल स्रोत है। इसका सबसे सुन्दर प्राचीन दष्टान्त है यूनानी वक्ता डिमास्थीनीज़ का। वह एथेन्स के उत्कर्प काल में पैदा हुआ था। वालकपन में वह तुतला कर घोलता था, परन्तु इस दोष के परिहारार्थ उसने इतना श्रम तथा उद्योग किया कि वह प्राचीन काल में श्रेष्ठ व्यख्यान दाताओं में सबसे श्रेष्ट माना जाता था। ऐडलर प्रभुत्व- शक्ति के सामने अ्र्न्य किसी भी वृत्ति को प्रभावशाली नहीं मानते। इसीलिए उनका मनोविज्ञान 'वैयक्तिक मनोविज्ञान' के नाम से प्रसिद्ध है।
कुछ शंश तक यह मीमांसा ठीक है। अपनी त्रुटि को दूर करने के अभिप्राय से अनेक व्यक्तियों ने अलौकिक कार्थ करने में अपनी शक्ति तथा महिमा का परिचय दिया है। अपनी पन्नी के द्वारा तिरस्कृत तथा शनाहत होकर तुलसीदास ने अपने चरित्र की त्रुटि मार्जना के निमित्त ही इतना अलोकिक कार्य कर दिखलाया है। वे इसी सिद्धान्त के दष्टान्त रूप में उल्लिखित किये जा सकते हैं। परन्तु इसकी एकांगिता ही इसका सर्वे प्रधान दोप है। हीनता की ग्रन्धि के निरा- कारण के लिये हमारी सारी प्रवृत्तियॉ नहीं होतीं। संसार में ऐसे श्वनेक व्यक्ति विद्यमान है जिनमें हीनना की विरोधिनी उदा्तता की ग्रन्थि विद्यमान है। ऐसे लोगों की प्रवृत्ति का मृल कहां खोजा जायगा ?
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र. युंग-आत्मसषाक्षातकार की वृत्ति. इन दोनों व्याख्याओं में असन्तोप के कारण प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक युंग ने अपने लिए एक नया ही मार्ग खोज निकाला है। उन्होंने मनो- विज्ञान की दृष्टि से मनुष्यों को दो भागों में विभक्तक किया है-वहिर्मुख और अन्तर्मुख। तहिर्मुख (एक्स्ट्रावर्टेड)वृत्ति वाले मानवों की हष्टि सदैव संसार के भोग विलास की ओर लगी रहती है। जगत् में प्रतिष्ठा तथा यश पाना, अपने साथियों की दृष्टि में महत्वशाली वनना ऐसे प्रासिया का मुख्य उद्देश्य रहता है। अन्तर्मुख (इन्ट्रावर्टेड) प्राणी सदैव अपनी दृष्टि वाहरी विपयों से हटाकर भीतर की ओर ले जाता है और अपनी मानसिक शान्ति की खोज में रहता है। युंग का कहना है इन व्यक्तियों के चेतन मन तथा शचेतन मन में वास्तव विरोध रहता है। इनका चेतन मन उतना ही अप्रसन्न तथा दुःखी होता है। अन्तर्मुख व्यक्ति का चेतन मन तो उदास, अलस तथा दुःखी दीख पड़ता है, परन्तु उसका श्रचेतन मन एकान्त, शान्त, प्रसन्न तथा आनन्दित रहता है। इस तथ्य का युंग ने नाम दिया है-मानसिक समीकरण। मानसिक क्रियाओरं का, चाहे वे मनुष्य की प्रगति या प्रत्याचरण दिखलाती हों, अन्तिम लक्ष्य मानव जीवन को पूर्णता के लक्ष्य की ओर ले जाना है। मानस विकास हैडफील्ड नामक मनोवैज्ञानिक के मन्तव्यानुसार मानसिक विकास का लक्ष्य पूर्ण आत्मसाक्षात्कार करना है। पूर्ण आ्ात्मसाक्षा्कार की मनोवैज्ञानिक१ व्याख्या है-प्रत्येक चाह और अर्प्रमिलापा का पूर्ण तथा
?. Self-realisation-that is to say, the complete and full expression of all the instinets and impulses wi thin us cannot be achieved so long as there are elements in our soul that are repressed and denied expression. In a fully realised self there is no
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स्वातन्त्रयरूपेण अभिव्यक्ति तथा विकास। जय तक हमारे मन के अन्तर्गत किसी कोने में किसी भी समय की, बालपन की या परौढ़काल की, इच्छा अविकसित रूप से रह जाती है, चेतन मन के ऊपर आरकर अपनी समग्र अभिव्यक्ति नहीं प्राप्त कर लेती, तब तक हमारा मानसिक विकास अधूरा ही रहता है। आत्मा के पूर्णा साक्षात्कार करने की बात कल्पना जगत् की ही चीज होती है। आरप्रदर्श जीवन में वैयक्तिक सुख सम्बन्धी इच्छाओं और परमार्थ भाव का पूरा सामजस्य रहता है। वह केवल ज्ञान का ही उपासक बनकर अपनी भावशक्ति को सुखा नहीं डालता और न भाव की अत्यधिक सेवा से ज्ञान का पन्थ श्रवरुद्ध करता है, प्रत्युत ज्ञान तथा भाव, विचार तथा इच्छा उभय शक्तियों का इस प्रकार पूर्ण विकास करता है जिससे वे समप्टि के विरोधी न बन जॉय। पूर्णता की प्राप्ति के लिये व्यक्ति के अ्चेतन मन के भाव का ज्ञान तथा उनका प्रकाश करना ही आवश्यक नहीं होता, वरन् समष्टि के अचेतन मन को जानना और उसके अनुसार आचरण करना भी आ्राव- श्यंक होता है। आत्मसाक्षात्कार करने के लिए तथा अपने जीवन को आनन्दमय वनाने के लिए हेडफोल्ड ने उपदेश दिया है १. अपनी आ्रप्रात्मा को जानो, २. अपनी आत्मा को स्वीकार करो। ३. अपनी आत्मा में रहो। अतः आत्मा का ज्ञान तथा उस आत्मज्ञान को अपने जीवन में तथा आचरण में लाना व्यक्ति के मानस विकास का लक्ष्य है। युंग के सिद्धान्त के अनुसार आत्मसाक्षात्कार की वृत्ति ही कला तथा काव्य की प्रेरिका शक्ति है। कला व्यक्ति के मानसिक विकास का अन्यतम प्रकार है। अपनः उसमें व्यक्ति के मानस विकास की पूर्णता conflict of purpose, no complexes, no repression, but the harmonious expression of all the vital forces towards a common purpose and end. -Hadfield : Psychology and Morals p. 77.
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तभी हो सकती है जब वह अपना साक्षात्कार सम्पन्न करता है। पूर्व' प्रतिपादित भारतीय मत से यही मत मिलता है, परन्तु इस सिद्धान्त में भी श्रनेक वातें विचारणीय हैं। मेरी दृष्टि में आधुनिक मनोविज्ञान भी कला की प्रेरणाशक्ति की स्ोज करता हुआ उसी सिद्धान्त तथा मत को मानने के लिये वाध्य हो रहा है जिसे हमारे आलोचकों ने बहुत पहिले ही से निर्णीत और निश्चित कर दिया है।
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काव्य का प्रयोजन
आज तक यह प्रश्न विवादग्रस्त है कि काव्य का वास्तविक प्रयोजन क्या होता है। 'कल्ा कला के लिए' का नारा लगाने वाले विद्वान् काव्य को जीवन से दूर की वस्तु मानते हैं। दूसरी ओर इसकी विरोधी विचारधारा के पोपक काव्यवेत्ता कविता को जीवन के लिए अर्थात् जीवनकी वास्तिक व्याख्या के रूप में ग्रहण करते हैं। प्रत्तुत लेख में दूसरी विचारधारा का पोपण करते हुए वताया गया है कि दोनों धाराओं में एक तत्व समान रूप से मिलता है-वह है कवि की रसानुभूति। रस से कविता का उद्रेक हाता है। लेखक के विचार से काव्य इस जीवन से अलग की काई वस्तु नहीं शरर इसीलिए काव्य का प्रयोजन जीवन से, उसके आरोहों अवरोहों से, होता है। काव्य के उद्देद्य की समीक्षा के प्रसंगों में पाश्चात्य जगत् का एक मान्य सिद्धान्त है 'आर्ट फार आर्ट सेक' अर्थात् 'कला-कला के लिए' जिसका अनुमोदन पश्चिनी जगत् के आलोचक तथा भारत के भी नवीन समीक्षक इधर करने लगे हैं। हम वदि कला के स्थान पर काव्य को रखें तथा प्रधान दृष्टि से काव्य का प्रयोजक रस मानें, तो इस सूत्र का अर्थ होगा कि रस ही रस का तात्पर्य है। रसात्मक वाक्य का पर्यवसान रस में ही होता है, उससे किसी बाह्य उद्देशय की सिद्धि कथमपि नहीं होती। चदि इस सूत् का यही तात्पर्य माना जाय तो कोर्ड भी विप्रतिपत्ति दृष्टिगोचर नहीं होती। रसोद्वोध के अवसर पर ओ्रोता तथा द्रष्ट के हृदय में राजस तथा तामस वृत्तियों का सर्वथां तिरस्कार होकर सात्विक भाव का प्रावत्य सम्पन्न हो जाता है। जवतक दुःखजनक रजोमय तथा मोहजनक तमो गुगा की प्रधानता
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२८ काव्यानुशीलन चनी रहती है, आनन्दजनक सत्त्वगुण का उदय ही नहीं होता। रस को अनुभूति मुख्यता आनन्द की ही अनुभूति है। रसका अनुभव- कर्ता उस सामाजिक अवसर पर अपनी स्वार्थमूलक वृत्तिका ही चरितार्थता नहीं मानता, प्रत्युत साधारणीकरण व्यापार के द्वारा -सामाजिक अपने वैयक्तिक सम्बन्ध का परिहार कर समाज के साधारए व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करने लगता है। फलतः वह द्वैत भावना से ऊपर उठ कर अद्वैत भावना में प्रतिष्ठित हो जाता है। वह अपनी वैयक्तिक त्र्प्रानन्दानुभूति को साधारण सामाजिक की आ्रनन्दानुभूति में विसर्जिंत कर देता है। रस ही शिव है, सत्य है तथा सुन्दर है। रस दशा सर्वदा श्रनन्दकारिणी, मंगलदायिनी तथा कल्याण-जननी है। उस दशा की परिखति के उत्पादक समग्र रसोपकरण तथा रस- सामग्री सत्य, शिव तथा मंगल की अभिव्यक्ति के कारण नितान्त उपादेय तथा इलाव्य होती है। रसोद्वोघक कोई भी वस्तु अ्रंगल- कारिणी नहीं हो सकती। रस के उन्मेप में कारएभूत काव्य के समग्र उपकरण इसी निमित्तसे ग्रह्म तथा अनुग्ाह्य होते हैं। इस दृष्टि से विचार करने पर यह सूत्र कथमपि आपत्तिजनक नहीं प्रतीत होता। परन्तु इस सिद्धान्त के उदय का इतिहास बतलाता है कि इसके उद्भावकों की हृष्टि में इस सूत्र का आशय कुछ दूसरा ही था।
अभिगयज्षनावाद गत शताब्दी के मध्यकाल में इस सिद्धांत का उद्गम फ्रांस के साहित्याकाश में हुआ। और यह उदय हुआ प्रतिक्रिया के रूप में। यूरंप में प्लेटो से आरम्भ कर गेटे तथा मेध्यूयनोल्ड तक कला तथा नैनिकता का अपभेयय सम्बन्ध स्वीकार किया गया है। इन मान्य प्राचीन आलांचकों की दृष्टि कला को नैतिकता के क्षेत्र से कभा वहिष्कृत नहीं देखना चाहती। नैतिकता की दृढ़ आधारशिला पर ही कलाका विशाल किला खढ़ा रहता है तथा नैतिकता के आधार के तिरस्कार के साथ ही यह किला ताश के किले के समान ज्मीन पर गिर कर टक-टूक
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हो जाता है। प्राचीनों के इस परस्पर सम्बन्ध के छढ़ आग्रह से ऊब कर उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोपीय आपालोचकों ने, विशेषतः फ्रांस के नैसर्गिकवाद तथा यथार्थवाद के प्रचारक जोला, फ्लाउवर आदि लेखकों ने इस सिद्धांन्त को अ्ररग्रसर किया कि कलाका उद्देश्य कला ईी है। अ्र्प्रमिव्यंजनावादी आर्प्रालोचकों का कथन है-अ्र्रभिव्यंजना ही केला का विशुद्ध रूप है। कलाकार अपने विशिष्ट माध्यम के द्वारा अपनी अनुभूति की अभिव्यक्ति कर देता है। इतने में ही उसके कर्तव्य की इति-श्री हो जाता है। उसके कार्य का पर्यवसान होता है अनुभूतियों की अभिव्यंजना में। समाज तथा व्यक्ति के ऊपर उस अभिव्यंजना के प्रकट या गुप्त प्रभाव की मात्रा को न तो वह हूँढ़ता है और न उसे हूँढ़ निकालने की जरूरत होती है। कलाकार उस कोकिल के समान है, जो वसन्त की मस्ती में भूमती हुई डालियों पर बैटकर आनन्द से चहक उठता है। उसका चहकना किसके हृदय के भार को कम करने में समर्थ होगा अथवा किस विर्ही के चित्त में वियोग की आग भड़काने में चमक उठेगा ? इसके विचार करने का न तो उसे समय है और न आवश्यकता। कलाकार का भी यही विशुद्ध स्वरूप है। वह वाह्य जगत् की स्व्रीय अ्र्प्रनुभूतियों की अ्र्प्रभि- व्यंजना करके ही अपना काम समाप्त कर देता है। कला का चस इसना ही कार्य है, इतना ही उद्देश्य है। अतः इन आलोचकों की दृष्टि में कला का उद्देश्य अन्य कुछ न होकर स्त्रतः कला ही होती है। कला में सत्य की परिणति रहती है, परन्तु इस मत के प्रधान अंगरेजी आलोचक वाल्टर पेटर की सम्मति में अपनी अनुभूति की शथार्थ रूप से अपरभिव्यक्ति में ही सत्य का निवास है। कलाकार का यही कर्तव्य है और इतना ही कर्तव्य है-अरभिव्यंजना की चथार्थता। अभिव्यंग्य वस्तु के सत्यासत्य के विपय में विचार करना उसके क्षेत्र से घाहर की घात है। इस विषय की विवाद व्याख्या करना अपेक्षित है। एक मौलिक प्रश्न प्रथमतः विचारणीय है कि काव्य का उपादान या वस्तु कति को तथा
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पाठक को स्पर्श करता है या नहीं ? वर्ण्य वस्तु का लगाव न कवि से ही सिद्ध हो और न पाठक से ही, तो यह हठात् मानना ही पड़ेगा कि कविता का उद्देश्य स्वयं कविता ही है, परन्तु यदि इस सम्बन्ध का दूरतः संकेत भी उपलब्ध हो, तो काव्य के उद्देश्य पर हमें नर्वान दृष्टि से विचार करना ही पड़ेगा। पूर्वोक्त प्रश्न का संक्षिपत उत्तर यही है कि. वस्तु कवि को भी स्पर्श करती है तथा पाठक को भी।
काव्य वस्तु
राजशेखर का स्पष्ट कथन है- "स वत्स्वभावः कविः तदनुरूपं काव्यम्"। कवि जिस स्वभाव का होता है तन्निमित काव्य भी उसके ही अनुरूप होता है। यदि काव्य की देहली पर कामवासना के कमनीय कुसुमों के द्वारा कन्दर्प देव ही की अर्चना दीख पड़ती है अथवा पुरुपत्व नाशक जघन्य लोल वासना का ही नग्न नृत्य दृष्टिगोचर होता है, तो मानना पड़ेगा कि कवि के चित्त में भी ये ही गरहसीय वासनायें भरी पड़ी हैं। कोयला की खान से कोयला ही निकलता है तर सोने की खान से सोना। काव्य के वस्तु का धर्म पाठक को समधिक भाव से स्पर्श करता है। पाठक के ह्रृदय में रसोन्मेप ही भारतीय आलोचकों के द्वारा निर्मित तथ्य है। रस भाव के ऊपर ही आश्नित होकर काव्य में उन्मीलित होता है। भरत मुनि का स्पष्ट आ्र्प्रदेश है- न भावहीनोऽसि्ति रसो न भावो रसवर्जितः -नान्यशास्त्र कोई भी रस भाव से वर्जिंत नहीं हो सकता तथवा कोई भी भाव रस सेरे विहीन नहीं हो सकता। इस कथन का तात्पर्य यही है कि कितना भी रसोन्मेप से विलसित काव्य हो उसमें भाव का स्पर्श होगा ही अथवा भाव-प्रधान काव्य में रस का सम्पर्क अप्रत्यल्प मात्रा में भी होता रहा है। पंडितराज जगन्नाथ के कथनानुसार-
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'रत्याद्यवच्छिन्ना भग्नावरणा चिदेव रसः' रति प्रभृति भाव द्वारा अवच्छिन्न या विशिष्ट हुए बिना चित् सत्ता कभी रसरूप में प्रकाशित नहीं होती। रस में भावावच्छिन्नता या भाव-वैशिष्ट्य की सत्ता होना नितान्त आवश्यक होती ही है। रस का विशुद्ध रूप कितना भी अलौकिक, लोकातीतक्यों न हो, उसे भाव का अवलम्बन करना ही पड़ेगा। और यह भाव आश्रित रहता है वस्तु पर। संसार नाना पदार्थों की संघटना तथा परस्पर सम्पर्क से जायमान ललित लीलाओरं ' Tho' Tho1 का अथवा गर्हसीय क्रीड़ाओं का एक विलक्षण सामूहिक अभिधान है। इन्हीं वस्तुओं को अवलम्धित कर कवि भावों की सृष्टि करता है। ऐसी दशा में हम जोर देकर कह सकते हैं कि काव्य वस्तु पाठक को केवल स्पर्श ही नहीं करती, प्रत्युत विलक्षण रूप से उनके मनस्तल को आालोड़ित करती है। काव्य में वर्णित वस्तु पाठक के हृदय को नैराइय के प्रचण्ड भांभावात में कभी उद्विन्न कर देती है और कभी आशा की स्त्निग्ध चन्द्रिका के उदय से उसे शीतल तथा सजीव बना देती है। कभी उसका हृदय धनिकों तथा समर्थों के उत्पीड़न के शिकार वने निर्धन तथा आर्त पुरुपों के करुए अश्रान्त चीत्कार से उद्दीप हो उठता है, तो कभी ममतामयी-माता के वात्सल्य गंगा जल से धुलकर उन््जवल तथा शान्त वन जाता है। काव्य की वस्तु पाठकों को बिना आलोड़ित या प्रभावित किए बिना क्षण भर भी स्थिति लाभ नहीं कर सकती। हम रस की गम्भीर अरनुभूति वाले मस्त-मौला मर्मज्ञों की बात नहीं करते। उनकी रस दशा स्वतन्त्र होती है तथा चिरस्थायी होती है, परन्तु साधा- रस पाठकों की रस दशा क्षणिक होती है। रस के अनुभूति काल में सत्त्व गुए तम तथा रज को दवाकर अपना स्वातन्त्य बनाये रहता है तथा आरानन्द की चरम अनुभूति होती है। रस दशा के पर्यवसान में केवल आनन्द की स्मृति शेप रह जाती है औरर चच जाती है केवल भावों की अनुभूति। इस वावानुभूति की तीत्रता तथा शोभनता के निमित्त वस्तु की शोभनता नितान्त आवश्यक होती
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है। सन्वस्तु का इसीलिए उत्कृष्ट प्रभाव पड़ता है पाठकों के ऊपर। काव्य वस्तु की अर्प्रशोभनता कथमपि वांछनीय नहीं होती। वन्तु की सद्रूपता, उपादेयता तथा ग्राह्यता के ऊपर इसीलिए कवि को सर्वदा ध्यान देना आवश्यक होता है।
साहित्य और समाज
साहित्य समाज का दर्पण है और समाज साहित्य की कृति है। दोनों का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। विश्व-साहित्य का इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि शोभन साहित्य सुन्दर समाज की रचना में कृतकार्य होता है तथा औदार्यपूर्ण समाज सन्साहित्य की प्ररण का विमल परिणाम होता है। कत्ि सामाजिक प्राणी है-वह अरपनी सत्ता, स्थिति तथा समृद्धि समाज का इलाव्य अंग वन कर ही पा सकता है। कवि समाज की एक कमनीय कृति है। कवि अपने समाज का प्रतिनिधि होता है। इसी प्रकार वह समाज का स्रष्ा भी होता है। कवि अपने हाथ में हिंसा तथा विद्रोह, विनाश तथा वैर को प्रेरित करने वाले साहित्य को लेकर समाज को सभ्यता के त्रधःपतन की ओर ले जाने में समर्थ होता है। दूसरी ओर कि त्याग तथा औदार्य, शौर्य तथा शदात्य के प्रेरक साहित्य के द्वारा समाज को अधिक त्यागशील तथा उदार वना कर उसे उदीप् तथा तेजस्त्रो बनाता है। आदर्श कवि कविता में ऐसे वस्तु का निर्वाचन करता है जो समाज में प्रेम तथा त्याग का महनीय आदर्श प्रस्तुत करता है, श्रेय तथा प्रेय का मंजुल सामरस्य प्रस्तुत करता है, आदर तथा श्रद्धा की समधिक वृद्धि करता है। कत्रि का प्रधान कार्य है आत्म चैतन्य को प्रबुद्ध करना। सुप्तआात्म-चैतन्य की भावना समाज घो जड़, अलस तथा निरुदयम बनाकर उसे अ्रवनति के गर्त में ढकेल देती है। साहित्य आ्रत्म-चैतन्य को प्रबुद्ध कर उसे बलवान् बनाता है, औजस्व्रिता से मण्डित करता है तथा सामर्थ्य शक्ति का
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उन्मीलन करता है। समाज को सुगठित करने में कवि की महत्व- शालिनी लेखिनी अपना जौहर दिखाने में कभी चूक नहीं करती। उसके अद्म्य प्रभाव के प्रवाह को समाज रोक नहीं सकता। कवि अपने विचार के आलोक से आवृत होकर स्वतः स्व्रच्छन्द् वृत्ति से ऐसी गीत के गायन में प्रवृत्त होता है जिससे समस्त विश्व त्राशा तथा भय के द्वारा सहानुभूति की ओरर अग्रसर हो जाता है जिसका छत तक उसे तनिक भी ध्यान नहीं था। इस दृष्टि से वह एकान्त में चहकने वाले तथा विश्व में शान्ति तथा सुख का सन्देश सुनाने वाले कोकिल के नितान्त सदश है। महाकवि शेली ने स्वानुभूति की इस प्रख्यात पद्य में बड़ी सुन्दरता से अभिव्यक्ति की है। "लाइक ए पोयट डिवाइन इन दि लाइट आव थाट, सिंगिंग हिम्स अ्नविडेन टिल दि वर्ल्ड इज राट, टु सिम्पैथी होप्स एण्ड फियर्स इट हीडेड नाट।" जगती कवि वाणी के प्रभाव के प्रसार की लीलाभूमि है। समाज कवि वाणी के द्वारा उन्मीलित प्रेम तथा आशा, दया तथा शदार्य के प्ररोह का उर्वर क्षेत्र है। ऐसी दशा में कवि को अपनी वस्तु के लिए सदा सतर्क रहना चाहिए। निकृष्ट उपादान से उत्कृष्ठ भाव की सृष्टि एकदम असम्भव है। क्या समाज के लिए हेय तथा श्रग्राह्य उपकरस से उन्न काव्य की कथमपि सृष्टि हो सकती है ? काव्य का लक्ष्य अध्यात्म के सहश ही श्रेय की सृष्टि है और वह तभी साध्य है जघ समाज के शोभन उपकरणों का योग कवि अपने काव्य में करता है। ऐसी दृष्टि से काव्य का अपन्तिम लक्य काव्य नहीं हो सकता। काव्य के पक्ष ध्यान देने की बात है कि काव्य के दो ही पक्ष होते हैं-सुन्दर तथा कुरूप। कवि की दृष्टि सदा सौन्दर्य की ओर जाती है, चाहे वह जहाँ हां-वस्तु के रूप रंगों में हो अरथवा मनुष्य के मन, वाणी तथा कर्म में हो। कवि की अन्तर्दष्टि सौन्दर्य को निरखती है और उसकी
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वाणी उसी की अभिव्यक्ति सुन्दर शब्दों के द्वारा करती है। भला- चुरा, मंगल-अमङ्गल, पाप-पुण्य आदि शब्द नीति-शास्त्र, धर्मशास्त्र तथा अर्थशास्त्र से सम्तद्ध शब्द हैं। ये काव्य क्षेत्र से वाहर रहते हैं। विशुद्ध काव्य के क्षेत्र में न कोई वस्तु भली होती है न वुरी, न उपयोगी होती है न अ्र्प्रतुपयोगी। कवि केवल दो ही बातों पर ध्यान देता है कि वह सुन्दर है या कुरूप। मंगल वस्तु या सुन्दर वस्तु में कथमपि अन्तर नहीं होता। वार्मिक जिस वस्तु को अपनी दृष्टि से मंगलमय मानता है उसे ही कवि अपनी दृष्टि से सुन्दर समझता है। दृष्टिभेद होने पर भी वस्तु का रूपगत भेद नहां होता। कवि के इस दष्टिविशेष पर ध्यान देने से अ्रनेक समस्याओं का स्वतः समाधान हो जाता है कि काव्य सत् होता या असत् ? कवि प्रचारक होता है या उपदेशक? काव्य का नीति से ऐकमत्य है या वैमत्य ? जो सुन्दर है वही शिव है, वही सत्य है। कत्रि के इस वैशिष्ठ्य पर लक्ष्य रखने से काव्य सौन्दर्य से युक्त होते ही मंगलमय होता है। सौन्दर्य मांगल्य का प्रतीक है। सौन्दर्य सत्य का प्रतिनिधि है। काव्य में जितने प्रकार के सौन्दर्य का एकत्र संविधानक प्रस्तुत किया जाता है वह उतना ही रमसीय तथा श्र्ावर्जनीय, प्रभावशाली तथा उत्कर्षाधायक वन जाता है। मर्यादा- पुरुपोत्तम श्री रामचन्द्र के चित्रण में अ्रन्तः सौन्दर्य के साथ रूप- माधुरी का सन्निवेश वाल्मीकि की प्रतिभा का सुन्दर विलास है। उदात्त नामक का वाहरी सौन्दर्य उसके अन्तःकरण के सौन्दर्य का स्पष्ट प्रतिबिम्ध है। प्राकृर्तिक सौन्दर्य के साहाय्य पाने पर इस सौन्दर्य की गरिमा और भी अविक विमुग्धकारिणी वन जाती है। सौन्दर्थ का चित्रण करने वाले कवि का काव्य कथमपि त्र्रमंगल आदश प्रस्तुत नहीं करता। अतः मुख्यता लक्ष्य न होने पर भी सत्कवि की वाणी समाज का परम मंगल, शाश्वत कल्याण उत्पन्न किये बिना नहीं रहती। काव्य को मूलतः 'जीवन की आलोचना' माननेवाले आ्रनाल्ड
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काव्य का प्रयोजन ३५ महोदय का भी यही तात्पर्य है। हमने ऊपर कहा है कि काव्य तथा जीवन में घनिष्ठ तथा श्राध्य सम्पर्क स्थापित रहता है। कवि अररपने सामने प्रस्तुत जीवन के नाना अरंशों पर अपनी पैनी दृष्टि डाल कर अपने काव्य में चित्रित करता है। कवि होता है आदर्शवाद का पक्षपाती। काव्य में यथार्थवाद की ओर इधर विशेष पक्षपात दृष्टि गोचर हो रहा है, परन्तु कवि वस्तु के हेय पक्ष का ग्रहण न कर उसके ग्राह्य पक्ष का ही अनुरागी होता है। पाठक काव्य-निबद्ध वस्तु के छनुशीलन से अपनी दशा का सक्ष्म निरीक्षण तथा तुलना करता है तथा अपने जीवन को उदात्त तथा मंगलमय बनाने के लिए अश्रान्त परिश्रम करता है। इस प्रकार काव्य जीवन का मूलतः आलोचन ही होता है। नैतिकता उदात्त कविता की जीवनी शक्ति है। नैतिक भावना से विद्रोह करने वाली कविता वस्तुतः जीवन से विद्रोह करने वाली कविता है। नैतिक भावना का अवहेलनामय काव्य जीवन के प्रति अवहेलनात्मक काव्य है।
कचिता
कविता जीवन की मनोरंजिनी व्याख्या है। कवि पदार्थों के सौन्दर्य पक्ष तथा अध्यात्मपक्ष को ग्रहण कर अपने काव्य में नित्रद्ध करता है। पदाथों का हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है तथा हम किस प्रकार उस प्रभाव को व्यक्त करते हैं ? इसका स्पष्टीकरणा काव्य के द्वारा होता है। काव्य के प्रभाव को व्यापक, दूरगामी तथा विशाल घनाने के आशय से कवि को वस्तु निर्वाचन की ओर सावधानी रखनी चाहिए। तुच्छ तथा क्षुद्र विषय पर प्रतिभा के सहारे कविता करने वाले कवियों की रचनायें क्षणिक मनोरंजन से अधिक मूल्य नहीं रखतीं। शाश्वत प्रभाव उसी काव्य का पड़ता है जिसका विषय अधिक से अधिक प्राशियों के अन्तस्तल को स्पर्श करता है तथा शाश्वत
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मानववृत्ति का चित्रण करता है। इस प्रसंग में प्रगतिवादी आरलोच कों का अपना एक पक्ष है। उनकी दृष्टि में काव्य या कला का मुख्य उद्देश्य यही है कि वह सम्पन्न पुरुषों के द्वारा निर्धनों तथा निरीहों के ऊपर किये अत्याचारों का स्फृरतिमय विवरण प्रस्तुत करता है। उनका तो यहाँ तक बढ़ कर कहना है कि जो काव्य इस प्रकार कार्य में योग- दान नहीं देता वह काव्य ही नहीं है। इस सम्प्रदाय के एक आ्प्रालोचक की तो यहाँ तक सम्मति है कि वर्तमान काल में लिखित कोई भी ग्रन्थ शोभन नहीं हो सकता, यदि वह मार्क्सीय अथवा प्रायः मार्क्सीय दृष्टि से नहीं लिख गया हो। दूसरे आलोचक का कहना है कि कला श्रेणी-संग्राम या वर्गयुद्ध का एक विशिष्ट यन्त्र है जो दरिद्र श्रमिक-संघ के द्वारा उनके अरन्यतम अ्रस्त्र के हिसाव से अनुशीलित होना चाहिए। इन उक्तियों को पढ़ कर यही प्रतीत होता है कि कला या कला के उद्देश्य की हत्या इससे अधिक नहीं हो सकती। जो कला कुलांगना के समान उद्दीप्त भावभंगी से सम्पन्न होकर राजसिंहासन की शोभा को विकसित करती थी वही अब दरिद्रता के पंक से मलिन-वेश ललना के कार्य सम्पादन के निमित्त उपयोग में लगाई जा रही है। 'कल्ा-कला के लिए' इस सिद्धान्त तक गनीमत थी, परन्तु अब्र 'कला प्रचार के लिए' यह सिद्धान्त तो कला के कोमल उद्देश्य पर भीपण तुपारपात है तथा उसके पवित्र लक्ष्य की निर्मम हत्या है।
फाव्य का भारतीय उद्देद्य भारतीय आपलोचकों ने काव्य का उद्देश्य उभय प्रकार का वतलाया है। भरत मुनि का कथन है- ध्म्ये यशस्यमायुप्यं हितं बुद्धि-विवर्धनम्। लोफोपदेश-जननं नाट्यमेतद् भविष्यति॥ इस पद्य का गम्भीर अर्थ बतलाते हुए श्रभिनव गुप्त का मार्मिक विवरण है कि नाट्य स्व्तः हितकारक नहीं होना, प्रत्युत वह हित
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प्रतिभा का जनक होता है। क्या नाट्य गुरु के समान उपदेश देता है ? या नाट्य नीतिशास्त्र के समान साक्षात् रूप से उपदेश प्रदान करता है? अभिनव का स्पष्ट उत्तर है-नहीं, किन्तु वुद्धि को बढ़ाता है; वैसी प्रतिभा का ही वितरण करता है। इसका स्पष्ट आशय यही · प्रतीत होता है कि नाट्य श्रोताओं की बुद्धि बढ़ाता है-उनकी प्रतिभा को ही उन्नत कर देता है जिससे वे अपना हितचिन्तन स्वयं करने लगते हैं। भामह की दृष्टि में साधु काव्य का निपेवसं कीर्ति तथा प्रीति (आनन्द) उत्पन्न करता है। विश्वनाथ कविराज काव्य को चतुर्वर्ग की प्राप्ति का सुगम साधन स्वीकार करते हैं। काव्य के द्वारा मानव जीवन के चारों लक्ष्य, चतुर्विध पुरुपार्थ-अर्थ,धर्म, काम तथा मोक्ष की उपलन्धि अनायास रीति से होती है। मम्मट के द्वारा निर्दिष्ट उद्देश्यों का विश्लेपण करने से काव्य का द्विविध प्रयोजन प्रतीत होता है-मुख्य तथा गौएा। इनमें मुख्य प्रयोजन है-सद्ः पर-निर्वृति, काव्य पाठ के समनन्तर सद: उत्पन्न होने वाला सातिशय आनन्द्। यही उद्दश्य 'सकल प्रयोजन मौलिभूत' माना गया है। काव्य पाठ से चुरन्त होने वाला अलौकिक आह्ाद हो काव्य का सर्वश्रेष्ठ प्रयोजन है। गौए प्रयोजन अनेक हैं जिनमें यश, अर्थ, व्यवहार ज्ञान, विघ्न- नाश तथा कान्तासम्मित उपदेश-दान है। काव्य नीतिशासत्र के समान रूखा-सूखा उपदेश देने में ही अपनी कृतकार्यता नहीं मानता। सरसता के साथ उपदेश देना ही काव्य का प्रयोजन है, परन्तु यह भी त्र्प्रमुख्य प्रयोजन है। श्रोता तथा पाठक के हृदय में अलौकिक आ्नन्दमय रस का उन्मीलन ही काव्य का मुख्य प्रयोजन है। आ्र्प्ररम्भ में कहा गया है कि इस रसोन्मेप के सिद्धान्त से काव्य की मांगलिकता तथा कल्याण परायणता पर तनिक भी आँच नहीं आती। मम्मट का यह प्रतिपादन काव्य के द्विविध प्रयोजन की ओर्परर संकेत करता है।
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हमारे आद्य आलोचक भरतमुनि ने नाठ्य की उत्पत्ति के अवसद पर नाट्य के स्वरूप की समीक्षा करते हुए इस प्रउन का विशद उत्तर प्रस्तुत किया है। नाट्य सार्ववर्िक पंचम वेद है जिसके अरंगों की रचना त्रैवर्शिक वेदों के विशिष्ट अ्रंशों से ही की गई है। नाट्य का पाठ्य ऋग्वेद से संग्रहीत किया गया है, गीति सामवेद से, अभिनय यजुर्वेद से तथा रस अथर्ववेद से। नाट्य को सार्ववर्सिक कहने का यही तात्पर्य है कि इसका क्षेत्र नितान्त विस्वृत तथा व्यापक है, क्योंकि यह सब वर्शों के लिए उपयोगी और उपादेय है। वेढत्रयी के समान इसका श्रवण स्त्री तथा शूद्र जाति के लिए निपिद्ध नहीं है। इस व्यापक तथा विस्तृत क्षेत्र सम्पन्न होने के कारण ही भरतमुनि ने नाट्य को 'सर्क शास्त्रार्थ सम्पन्न, 'सर्व शिल्प प्रवर्तक', 'नानाभावोपसम्पन्न', 'नाना- वस्थानान्तरात्मक', 'लोकवृत्तानुकरण', 'सप्तद्वीपानुकरण' वतलाया है। नाट्य की वस्तु के विषय में भरत का मान्य मत है- न तज्ज्ञानं न तच्छित्पं न सा विद्या न सा कला। नासौं योगो न तत् कर्म नास्य डस्मिन् यन्न दृदयते।। (नास्य शास्त्र १।११७ ) ऐसा कोई ज्ञान-उपादेय आत्मज्ञान आदि नहीं है, न कोई शिल्प (माला, चित्र, पुस्त आरदि की रचना) है, न ऐसी कोई विद्या (दण्ड नीति आदि) ही है, न यह कला (गीत, वाद्य, तृत्य, आदि) है, न ऐसा कोई योग (योजना) है, और न कोई व्यापार (युद्ध, नियुद्. श्ादि) ही है जो इस नाट्य में नहीं दिखलाई पढ़ता।
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भामह का भी काव्य-वस्तु के विषय में इसी प्रकार का सिद्धान्त है- न स शब्दो न तद् वाच्यं न तच्छित्पं न सा क्रिया। जायते यन्न काव्याङ्गम् अहो भारो महान् कवेः ॥ (काव्यालंकार ५ू।३) विश्व में न ऐसा कोई शब्द है, न कोई अर्थ, न कोई शिल्प है, न कोई क्रिया जो काव्य का उपादेय अङ्ग बन कर उसकी सहायता नहीं करता। कवि का उत्तरदायित्व सचमुच महान् है, विपुल है। अग्निपुराण काव्यस्ष्टा को जगत्सत्रष्टा प्रजापति से तुलना कर
कर रहा है। उसके उदात्ततम स्थान तथा महनीय उत्तरदायित्व की ओरपर संकेत
कवि प्रज्ञापति का ही प्रतीक है। अयारे काव्यसंसारे कविरेकः प्रजापतिः। यथास्मै रोचते विद्वं तथेदं परिवतते॥ अपार काव्य संसार के बोच में कवि ही एक प्रजापति है। उसे जैसा रुंचता है वैसा ही वह इस विश्व की रचना करता है। भारतीय आपरालोचकों की दृष्टि बड़ी उदार तथा प्रशस्त है। वे काव्य नाट्य में किसी भी वस्तु या शिल्प का वर्जन करना नहीं चाहते। विश्व के प्रजापति के समान ही हमारे काव्य के लष्व कवि का सम्मान- नीय पद है। नीलकण्ठ दीक्षित ने बड़े ही मार्के की वात कही है कि श्रुति परवलम की स्तुति के अवसर पर उन्हें न तो तार्किक बतलाती है और न दार्शनिक। वह 'कवि' शब्द का ही प्रयोग उस सर्वशक्तिमान के लिए करती है। यह काव्य कला का समस्त कलाओं तथा दर्शनों के ऊपर विजयघोप है। जगन् में कवि उस श्रखण्ड सन्चिदानन्द परत्रहम का जीवित प्रतिनिधि है। नाटब वेद के समान आदरसीय, श्रद्धारपद तथा उपादेय है। ऐसी उदार दृष्टि वाले भारतीय आ्र्प्रतोचकों के विचार
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संकीर्ण तथा अनुदार कथमपि नहीं हो सकते। वे काव्य में किसी भी वस्तु का वर्जन करना पसन्द नहीं करते। जिस आलोचक वर्ग की धारणा है कि भारतीय साहित्य में केवल शोभन, रोचक तथा मनोज पदार्थों की ही वर्णना है, वे नितान्त भ्रान्ति में पड़े हुए हैं। भारतीय साहित्य सुख-पक्ष तथा दुःख-पक्ष दोनों को उचित रूप में अरंकित करने में कृतसंकल्प है।
नाट्य का रूप
लोकचरित का अतुकरण ही नाट्य है। लोक के व्यक्तियों का चरित्र न तो एक समान होता है और न उनकी अवस्था ही एकाकार होती है। हम किसी व्यक्ति को सांसारिक सौख्य की चरम सीमा पर विराजमान पाते हैं, तो किसी दूसरे को दुःख के तमोमय गर्त में अ्रपना भाग्य कोसता हुआ पाते हैं। सुख तथा दुःख, बुद्धि तथा ह्रास, हर्ष तथा विपाद, प्रसाद तथा औदासीन्य इन नाना प्रकार की मानसिक वृत्तियों की विशाल परम्परा की ही संज्ञा 'लोक' है। इन्हीं नाना भावों से सम्पन्न, नाना अवस्थाओं के चित्रस से संयुक्त, लोकवृत्त का अनुकरण ही नाट्य है। तात्पर्य है कि हमारा साहित्यिक किसी विशिष्ट वस्तु को ही अपनी रचना का विषय नहीं बनाता, प्रत्युत वह मुक्तहस्त से प्रत्येक विषय का, चाहे वह क्षुद्र से भी क्षुद्रतम हो श्र्प्रथवा महान् से भी महत्तम हो, समान भाव से स्वागत करने के लिए सदा तैयार रहता है। उसकी दृष्टि में कोई भी वस्तु न तो गर्हणीय है और न हेय। समस्त वस्तु होती है उपादेय तथा उपयोगी। आ्रलोचकों का शास्त्रीय विवेचन तथा कवियों का व्यावहारिक प्रदर्शन इसी सिद्धान्त को पुष्ट कर रहा है। आनन्दवर्धन का कथन बड़ा ही युक्तिपूर्ण है- 'वत्ु च सर्वमेव जगद्गतमवद्यं कर्स्याचद् रसस्य चाङ्गववं प्रतिपद्यते। न तदस्ति वस्तु किश्चित् यन्न चित-वृचिविशेषमुषजनयति तदनुलादने वा फवि-विषयतैव तत्य न स्यात्।'
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जगत् की समस्त वस्तुएँ अवश्य ही किसी न किसी रस का अरंग चनती हैं। जगत् में उस वस्तु का सर्वथा अभाव है जो कवि के चित्त में वृत्ति-विशेष को उत्पन्न नहीं करती, क्योंकि यदि वह वृत्तिविशेष उत्पन्न नहीं करती, तो वह कवि के लिए विषय ही नहीं वन सकती। आराय है कि पदार्थ की पदार्थता यही है कि साक्षात्कार होने पर वह कति के हृदय में कोई विशिष्ट चित्तवृत्ति उपज्ञावे। नहीं तो उसका होना और न होना एक समान ही है। इस युक्ति से देखने पर संसार की प्रत्येक वस्तु कवि की वर्णना का विषय वनती है और किसी न किसी रस का अरंग बनती है। रसोपयोगी समग्र उपकरणों का संग्रह कवि के लिए आवश्यक होता है। धनस्य की छष्टि में काव्य-विषय की इयता नहीं है। कवि की भावना से भावित होने पर प्रत्येक वस्तु, चाहे वह क्षुद्र हो, रन्य हो, उददार हो, जुगुप्सित हो रसत्व को प्राप्त कर लेती है। वस्तु के विषय में ही यह तथ्य जागरूक नहीं होता, प्रत्युत अरवस्तु काल्पनिक वस्तु भी. काव्य का विषय बनकर रमसीयता तथा मनोव्ता प्राप्त कर लेती है- रम्यं जुगुप्मितमुदारमयानि नीचम् उम्रं प्रसादि गद्न विकृतं च बसतु। यद् वाउप्पवत्तु कविमाचक-भावनीयें तन्नास्ति वत्न रसभावसुनैति लोके।। (दशरूपक, ४।८५) संसार की प्रत्येक वस्तु काव्य का विषव है। प्रत्येक पदार्थ रस का अंग है। उसके स्वरूप पर बिना हष्टिपात किये ही कवि अपनी भावना-शक्ति मे उनमें ऐसी क्षमना उत्पन्न कर देता है कि वे विशुद्ध आनन्द प्रदान करने लगते हैं। वम्तु की बान तो प्रथक रहे, श्रवन्तु- कल्पना-प्रसून अ्र्प्रप्रसिद्ध अ्र्प्रन्ञान-वन्तु भी वह़ी चमतकार उत्पन्न कर देनी है। चाहिए जादूगर की वह छड़ी। जाहगर जिस वस्तु के ऊपर अपनी मोहमची छड़ी फेर देना है वही चीज उद्दलने कूदने लगनी है, चमत्कार पैढ़ा कर देती है। कवि की भावना शनि की भी यही अलोंक- सामान्य महिमा है। शक्ति के क्ंत्र के भीनर आने ही पदार्थ में जीवनी
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४२ काव्यानुशीलन शक्ति आा जाती है, आनन्द उत्पादन करने में विचित्र क्षमता उन्हें प्राप्त हो जाती है। कवि के लिए विषय की अववि नहीं है। इसीलिए भामह आध्वर्यभरे शब्दों में कविकर्म की महिमा उद्घोपित करते हैं- अहो भारो महान् कवे:। धनञ्ञय ने कहा है कि वस्तु की वात दूर रहे: जो अरवस्तु भी है- कल्पना-जगत् में ही जिसका अरस्तित्व विद्यमान रहता है वह भी कवि की प्रतिभा के चल पर काव्य का विपय वन जाता है और आ्रनन्द उत्पन्न कर सकता है।
अवस्तु से आनन्द
नैपध-चरित में श्री हर्ष की इस सुन्दर उक्ति की परीक्षा कीजिए- अस्य क्षोणिपतेः परार्ध्यपरया लक्षीकृता संख्यया प्रज्ञाचक्षुरवेक्ष्यमाणतिमिर-प्रख्याः किलाकीतेयः। गीयन्ते स्वरमष्टमं कलयता जातेन वन्ध्योदरान् मूकानां प्रकरेण कूर्म-रमणीदुग्धोदधे रोधसि।। (नैषधीय चरित १२।१०६ ) इस राजा की अक्रीति परार्ध्य से ऊपर वाली संख्या से गिनी गई है तथा प्रज्ञाचक्षु (अन्धों) के द्वारा टश्यमान अन्धकार के समान श्यामवर्ण की है। कछुए की स्त्री की दूध वाले समुद्र के किनारे बैठ कर वाँफ के पेट से पैदा होने वाले गूंगों का समुदाय अष्टम स्वर में इन अरकीर्तियों का गान करता है! इस पद्य में अरवस्तु अर्थात् कल्पित वस्तुओं की दीर्घ परम्परा का परस्पर सम्बन्ध उत्पन्न कर कवि श्रोताओं के हृदय को आनन्द रस में लीन कर रहा है। परार्ध्य से ऊपर की संख्या, प्रज्ञाचक्षु के द्वारा दर्शन, अष्रम स्वर, वन्ध्या का पुत्र, मूक का गायन, कूर्मरमणी का दुग्ध-समस्त वम्तुएँ कवि की कमनीय कल्पना से प्रसूत हैं : वास्तव जगत् में इनकी सत्ता विद्यमान न होने पर कवि की भावना से भावित होते ही उनमें अलौकिके आनन्द उत्पन्न
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करने की योग्यता विद्यमान हो गई है। 'योग्यता' की कमी के कारए यह पद्य 'वाक्य' नहीं हो सकता, तथापि यह काव्य है और सुन्दर काव्य है। अतः विश्वनाथ कविराज का यह आरग्ह कि रसात्मक वाक्य ही काव्य होता है अ्रनेक आलोचकों की दृष्टि में निराधार, निःसार तथा प्रमाएविहीन लक्षण है, कोरी हठधमिता ही है। काव्यवस्तु के विषय में भारतीय आलोचकों की ही यह विचार धारा नहीं है, प्रत्युत पाश्चात्य कवि और आलोचक भी अपने अनुभव तथा तर्क से इसी मत का पोपण करते हैं। महाकवि शेक्सपीयर की प्रसिद्ध सृक्ति है- 'कवि की सुन्दर चक्षु उन्मादना से पूरित बन, कटाक्ष से देखती है स्वर्ग से भूतल और भूतल से स्वर्ग, और जब कल्पना स्फुरित होती है,
उनकी मूर्ति, तब अज्ञात वस्तुराशि के रूप को कवि की लेखनी गढ़ती है
शून्य तुच्छ वस्तु को देती है वासस्थान और नाम'।
लिखा है- महाकवि शेली ने अपने काव्य विपयक प्रबन्ध में स्पष्टतः
कविता सब वस्तुओं को सौन्दर्य से मण्डित बना देती है। जो स्वयं सुन्दर होता है, उसके सौंदर्य को बढ़ा देती है और जो वस्तु अत्यन्त कुत्सित होती है, उसके साथ सौन्दर्य का योग कर देती है। तत्त्ववेत्ता शोपेनहावर का कथन है कि इस संसार में ऐसे पदार्थ का आभाव है जो स्वयं विशिष्ट भाव से सुन्दर हो; परन्तु प्रत्येक वस्तु में सौदर्य की उपलब्धि की योग्यता त्रिद्यमान है, यदि हम लोग उपयुक्त प्रतिभा के अ्रप्रधिकारी हो।
रवीन्द्र के विचार कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ ने इस विषय का घड़ा ही मार्मिक विवेचन अपने एक पत्र में किया ह। उनका कथन है कि साहित्य में हम समझ
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मनुष्य को पाने की आशा रखते हैं, परन्तु सब समय समग्र को पाया नहीं जाता-उसका एक प्रतिनिधि ही पाया जा सकता है, जिसे समस्त मनुष्य के रूप में स्वीकार करने में हमें कोई आ्र्प्रापत्ति न हो। प्रेम, स्नेह, दया, घृगा, क्रोध, ईर्ष्या-ये सत हमारी मानसिक वृत्तियाँ हैं। ये यदि त्र्प्रवस्था के अनुसार मानव प्रकृति के ऊपर एकच्छन्र आधिपत्य प्राप्त करें, तो इससे हमारी अवज्ञा या घृणा का उद्रेक नहीं होता। क्योंकि इन सब के ललाट पर राजचिह्न है-इनके मुख पर एक प्रकार की दीप्ति प्रकट होती है। काव्य में वही वस्तु उपादेय मानी जा सकती है, जो मनुष्य की समग्र मानवता को प्रकट करने की क्षमता रखे। जो गुएा केधल एक· देशीय होता है, जो मानवता की सच्ची अभिव्यक्ति करने वाला नहीं होता, वह व्यापक होनेपर भी काव्य में उपादेय नहीं माना जा सकता। 'औदरिकता' (पेटपन) को ही लीजिए। यह व्यापक गु है, कथमपि अ्रपरसत्य नहीं है; परन्तु फिर भी काव्य में इसे हम राजसिंहासन पर प्रतिष्ठित नहीं कर सकते। समप्र मनुष्य का प्रतिनिधि मानने में हमें अत्यन्त आपत्ति है। रवीन्द्र के स्मरणीय शब्दों में 'कोई वास्त- विकता का प्रेमी पेटूपन को ही अपने उपन्यास का विषय बनाते औरर कैफ़ियत देते समय कहे कि पेट्ूपन पृथ्वी का एक चिरन्तन सत्य है। इसलिए साहित्य में वह क्यों नहीं स्थान पायेगा? तो इसके उत्तर में हम यही कहेंगे कि 'साहित्य में हम सत्य को नहीं चाहते, मनुष्य को चाहते हैं ...... चाहे अपने दुःख के द्वारा हो, चाहे दूसरों के, प्रकृति का वर्णन करके ही हो या मनुष्य के चरित्र का चित्रण करके, जैसे भी हो मनुष्य को प्रकाशित करना ही होगा; वाकी सारी घातें उपलक्ष्य हैं। .... केवल प्रकृति का सौन्दर्य ही कवि का वण्य विषय नहीं है। प्रकृति की भीपणता और निठुरता भी वर्णनीय है। किन्तु वह भी हमारे हरदय की वस्तु है, प्रकृति की वस्तु नहीं। अतएव ऐसा कोई वर्शन साहित्य में स्थान नहीं पा सकता जो सुन्दर न हो, शान्तिमय न हो, भीपण न हो, महत् न हो, जिसमें मानवधर्म न हो अथवा जो
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अभ्यास या अन्य कारण से मनुष्य के साथ निकट सम्पर्क में बद्ध न हो।'
काव्य में दो पक्ष इस समीक्षा से र्पष्ट है कि कविता केवल कमनीय उद्यान के घीच में तड़ाग में विकसित कमल की सुपमा के वर्शन में ही चरितार्थ नहीं होती, प्रत्युत उस श्याम रंग पंक को भी वह नहीं भूलती जिससे पंकज का जन्म होता है। वह समग्र मानव को अपनी कमनीय आभा से आरालोकित कर ग्रकट करने का उद्योग करती है। कवि जानता है कि मानवता देवत्व से भी वढ़ कर अधिक स्पृहीय गुए है देवत्व में जीवन केवल एक सुभग पक्ष-सौख्यपक्ष-ही की उपलब्धि होती है, परन्तु मानवता में सौख्यपक्ष तथा दुःसरपक्ष सभयपक्षों का सुभग चिंत्रए किया जाता है। मानव जीवन की सफलता का रहस्य है कर्मजीवन के बीच संघर्ष तथा तज्न्य विजय। हमारे साहित में इसीलिये कवियों ने जीवन के उभयपक्षों की श्रभिव्यक्ति की है, उपभोगपक्ष तथा प्रयत्नपक्ष। जो कवि केवल प्रेम के माघुर्य को लीला गाने में ही व्यस्त रहता है वह होता है उपयोग पक्ष का कवि, परन्तु काव्य में इतना ही श्लाघनीय नहीं है। उसकी रचना में प्रयत्न-पक्ष की लीला भी फटनी चाहिए। कवि वृद्धि तथा ह्ास, हप तथा विपाद, उल्लास तथा अवसाद, उन्नति तथा अवनति-इन दोनों के चीच उत्पन्न संघर्ष के चित्रण में भी अपनी कला का विलास दिखलाता है। "लोक में फैली हुई दुःखर की छाया को हटाने में ब्रह्य की श्र्प्रानन्दकला जो शक्तिमय रूप धारण करती है, उसकी भीपणता में भी अन्भुत मनोहरता, कट्टुता में भी अपूर्व मधुरता प्रचण्डता में भी गहरी आर्द्रता साथ लगी रहती है। विरुद्धों का यही सामजस्य कर्मक्षेत्र का सौन्दर्य है। भीपणता औरर सरसता, कोमलता और कटोरता, कटुता और मधुरता, प्रचण्डता और मृदुता का सामसस्य ही लोकधर्म का सौन्दर्य है।" और इसी लोक-धर्म का उद्घाटन कवि
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४६ काव्यानुशीलन अपनी कविता में शब्दों के माध्यम द्वारा सम्पन्न करता है। इसीलिए कवि के लिए काव्य में सब पदार्थ उपादेय होते हैं। वह किसी भी पदार्थ का वर्णन नहीं कर सकता। कवि के लिए यह नियम सदा जागरूक रहता है। काव्यगत वस्तु विभाव के रूप में परिणत होकर ही रस के उन्मी- लन में कृतकार्य होती है। रसोन्मेप में सफल होना ही काव्य वस्तु का वस्तुत्व है। इसके निमित्त कतिपय नियमों का पालन कवि के लिए नितान्त आ्रवश्यक होता है। इतिवृत्त दो प्रकार का होता है। एक प्रकार तो वह है कि जो . उस देश के इतिहास या पुराण में प्रसिद्ध है, और दूसरा प्रकार वह है जिसे कवि की उर्वर कल्पना शक्ति स्वतः अपने वल पर उत्पन्न करती है। पहला प्रकार है ऐतिहासिक तथा पौराशिक वृत्त, र्यात वृत्त; -दूसरे प्रकार का नाम है काल्पनिक वृत्त या उत्पाद्य वृत्त। कवि अपने काव्य की वस्तु रचना के निमित्त उभय प्रकार के कथानकों से सामग्री एकत्र करता है तथा उन्हें संश्लिष्ट बनाकर कविता का निर्माण करता है। औचित्य वोध कवि स्वतन्त्र होता है। अपनी ग्रतिभा के वल पर निर्माण करने में स्वच्छंद होता है, परन्तु इस विषय में उसकी स्वच्छन्द्रता के नियमन करने की भी जरूरत रहती है, नहीं तो वह इतना विकृत वस्तु प्रस्तुत कर सकता है, जिसे पाठक पहचान नहीं सकते। कवि के स्वाच्छन्य के नियमन का प्रधान साधन है श्र्पचित्य घोध। उचित वस्तु ही काव्य में निवद्ध की जा सकती है, अनुचित नहीं, क्योंकि औचित्य का रसो- न्मीलन के साथ बड़ा ही गहरा सम्बन्ध है। "शचित्यं रस सिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम्" (क्षेमेन्द्र)। इससे सिद्ध काव्य का स्थिर जीवन शचित्य ही है। बिना शचित्य के काव्य में रस का उत्स नहीं फूटता-रस का समुचित संचार नहीं होता।
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इसीलिए कथा में शचित्य के ऊपर भरत, लोल्लट, यशोवर्मा तथा आरप्ानन्दवर्धन का समभावेन आग्रह है। लोल्लट का तो इस विषय में स्पष्ट अभिग्राय है कि रसवन् वस्तु का ही उपन्यास काव्यों में उचित होता है, रसहीन वस्तु का नहीं। काव्य में सरित, समुद्र, प्रभात तथा चन्द्रोदय आदि वस्तुओं का वर्णन उसी हद तक उचित माना जाता है जहाँ तक वे रस के विकास में सहायक होते हैं, अन्यथा वे कवि की व्युत्पत्ति का ही सिक्का श्रोताओं के ऊपर जमाने में समर्थ होते हैं। आ्र्ानन्दवर्धन का विवेचन तो विशेष विस्तृत तथा हृदयग्राही है। इतिवृत्त में भावोचित्य की सत्ता विशेष आवश्यक होती है। भावीचित्य आश्रित रहता है प्रकृत्यीचित्व पर। साहित्य में प्रकृति मुख्यतया तीन प्रकार की होती है-उत्तम, मध्यम तथा अधम अथवा दिव्य, मानुष्य तथा दिव्यादिन्य। इनन्तीनों प्रकृतियों का कार्य स्वभाव तथा प्रकर्ष भिन्न भिन्न रहता है। शचित्यतत्व का आग्रह है कि कवि प्रत्येक प्रकृति का निरुपण ठीक उसके स्वभाव के अनुरूप करे। दिव्य प्रकृति के लिए जो वर्सेन स्वाभातिक तथा अरनुरूप हों उनका निर्देश मानुप प्रकृति के लिए कथमपि नहीं करना चाहिए। वह कवि अपनी कविमर्यादा का उल्लंघन करता है जो किसी भूपति के ऐश्वर्य का उत्कर्ष दिखलाते समय उसे सात समुद्रों के लंघन करने को घटना का निवेश करता है -- केवल मानुपस्य राजादेवसने सप्ारविलद्वनादिलक्षणा व्यापाग उपनिवव्यमाना सौष्ठवभटृतो-पि नीरसा एत् नियमेन भवन्ति। तत्र अनीचित्यमेव हेतु :- ध्त्रन्यालोक ३१० (वृति), पु० १४१। राजा कितना भी महिमाशाली क्यों न हो कितना भी उत्कर्ष सम्पन्र क्यों न हो, मनुष्य होने के नाते उसके चलवर्न की एक निर्धारित सीमा है। उसके लिए सात समुद्रों को लाँघने का व्यापार सुन्दर होने पर भी अनुचित होता है। ऐसा वर्शन करनेवाला कवि कविता के साथ मनाक करना है। अनुचित वृत्त का निवेश काव्यकला के महनीय प्रादर्श के साथ सेलवाढ़ करना ही है।
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अपरभिनवगुप्त ने इस स्थल की व्याख्या करते समय अपना सिद्धान्त बड़े संक्षेप में दिया है- यत्र विनेयानां प्रतीति-खण्डना न जायते तदत्र वर्णनीयम्। वस्तु उसी रूप में वर्णन करनी चाहिए जिससे दर्शक तथा पाठकों के चित्त में प्रतीति खण्डित न हो। वाह्य वस्तु का काव्य में सत्य रूप से उपन्यास होने पर ही सामाजिक को उससे साक्षात् रसवोध होता है। यदि असत्य रूप से उनका विन्यास किया जाता है तो अभीष्ट फल का उदय कथमपि नहीं हो सकता। चतुर्वर्ग की प्राप्ति के निमित्त काव्य जागरूक रहता है, परन्तु किसी मानव राजा के सपार्णवलंघन की भूठी कथा सुन कर सामाजिक समग्र वर्णन से ही अपना विश्वास उठा लेता है ? इसीलिए आनन्द्वर्धन ने औचित्य को काव्यशास्त्र का उपनिपद् बतलाया है- अनौचित्याहते नान्यद् रसभद्गस्य कारणम्। औचित्योपनिव्रन्धस्तु रसस्योपनिपत् परा।। (घ्न्यालोक पृ० १४५) जिस प्रकार उपनिपत् विद्या के अतुशीलन से ब्रह्म की सदः स्फृर्ति होती है, उसी प्रकार औचित्य के अनुशीलन से ब्रह्मास्वाद-सहोदर रस का साक्षात् उन्मीलन होता आया है। अरन्त में आनन्दवर्धन ने जोर देकर कहा है कि कवि को विशेष रूप से विभावादिकों के अनोचित्य के परिहार करने में यत्नवान् होना चाहिए। विना इस शचित्य की रक्षा के रसोन्मेप नितान्त दुःसाध्य व्यापार है। कवि इतिहास सम्त्रधिनी कथाओं में, अत्यन्त रसवती होनेपर भो उन्हीं को ग्रहस करे, जो विभावादि-श्रचित्य से मण्डित हों। वृत्त कथा की अपेक्षा उत्पाद्य कथा के विपय में उसे और भी अधिक सावधान होने की जरूरत होती है। कथा-शरोरमुत्ाद्य वत्तु कार्ये तथा तथा। - यथा रसमय सर्वमेव तत् प्रतिभासते।। (घन्यालोक पृ० १४७ )
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उत्पाद्य वस्तु वाली कथा का निवेश इस प्रकार से होना चाहिये कि समस्त चस्तु रस-सम्पन्न सामाजिक को प्रतिभासित होने लगे। और इसका प्रधान उपाय है विभावादि के औचित्य का सम्यक अरतु- सरख। पाइचात्य आलोचकों का इस विषय में भिन्न मत नहीं है। भारतीय आलोचकों के समान शचित्य का सिद्धान्त पश्चिमी लेखकों के यहाँ भी माननीय काव्य-तत्त्व है। श्र्चित्य कला का नितान्त स्प्रहणीय सिद्धान्त है। शरस्तू का इस विषय के कथन इस मत के स्पष्ट पोपक हैं। उनकी उक्ति है-'काव्य में कवि के लिए उचित है कि वह अ्रसम्भव घटनीय वस्तु की अपेक्षा सुसम्भव शघटनीय वस्तु का निर्वाचन करे।' उनका अन्यत्र कथन है-'घटना के भीतर ऐसी कोई वस्तु न. होनी चाहिए जो युक्ति या प्रतीत के अरगोचर हो। इससे स्पष्ट है कि उनका आग्रह श्रचित्य-सम्पन्न घटना के ऊपर ही है। इस प्रकार शचित्यपूर्ण वस्तुविन्यास के द्वारा समग्र मानव की अभिव्यक्ति ही कला का चरम अ्वसान है।
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प्राचीन कविता में प्रगतिशीलता
आजकल आलोचकों की यह नितान्त भ्रान्त धारखा है कि प्रगति- चादी कविता का जन्म इस युग में हुआ है और वह भी पश्चिमी जगत् में। परन्तु यह धारसा निर्मूल तथा प्रमाण-रहित है। भारतवर्ष में ऐसा युग कभी नहीं था ज कतियों की हृष्टि समाज के आवरण को हटाकर उसके अन्तस्तल तक नहीं पहुँचती थी, जब उनका हृदय जन- साधारस के दुःख सुख में, ह्रास और उन्नति में, सम्पत्ति और विपत्ति में अपनी सहानुभूति प्रकट नहीं करता था। संस्कृत के कवियों पर भी यह लाञ्छन कथमपि उचित नहीं प्रतीत होता, प्राकृत भाषा के कवियों की बात ही न्यारी है। संस्कृत के कवि माननीय राजाओ्र्ं की छत्रछाया में अपना काव्य लिखते थे अवश्य, परन्तु उनकी छृष्टि संकुचित होकर मानव जीवन के सौख्य तथा वैभव की ओर ही आकृष्ट नहीं होती थी। उनका हृदय विशाल था, दृष्टि व्यापक थी, सहानु भूति पूर्ण थी। इसलिये वे जनता के सुख-दुःख, राग-द्वेप के परिवर्तेन में नितान्त कृतकार्य थे और अपने काव्य में उनकी भलक दिखाने में जागरूक थे। प्राकृत भाषा का कवि जो जनता के साथ इतना बुल मिलकर रहता है जन- वासी का इतना आदर करता है कि उसका काव्य विशेष रूप से प्रगतिशील होता है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। इसका स्पष्ट ४ प्रमाण है गाया सप्नशर्ती की कविता। गाथासतगर्ता
गाथा सप्तशती प्राकृत भाषा के गीति-साहित्य की एक अप्रनमोल निधि है। शृंगार रस की सम्पत्ति, नूतन भावों की अभिव्यक्ति, गूढ़ अर्थ
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की अभिव्यस्ना, तथा सुकुमार शब्दों के विन्यास के कारए इस काव्यरत्न की उज्जवल गाथायें सैकड़ों वर्षों से आलोचकों के अन्तरंग को आकृष्ट किये हुए हैं। ध्वन्यालोक, काव्यप्रकाश, रसगंगाघर आरदि मान्य आकर ग्रन्थों में रस तथा ध्वनि के भव्य उदाहरण के रूप में उद्धत किये जाने का गौरव इन्हें ग्राप्त है। यह उस युग की रचना है जत कत्ियों ने संस्कृत भापा के व्यामोह को छोड़कर लोकभाषा के सौन्दर्य पर रीभ उसी में अपने भावों को पकट करने का न्लाघनीय उद्योग किया। कवियों में लोक जीवन की सची अनुभूति थी। उन्होंने जन-जीवन को अपनी पैनी आँखों से देखा था; अपने सहातु- भूतिपूर्ण हृदय से साधारण जनता के सुख-दुःस््र को, राग-द्वेप को, उन्नति-अवनति को परखा था। इन गाथाओं के प्राकृत कवि सच्चे अर्थ में कवि थे-कोमल कल्पना के अधिकारी थे, उच्च उत्प्रेक्षा के उन्नायक थे। औपरर इसीलिए इन गाथाओं की भूयसी प्रशंसा है संस्कृत के आलोचना जगत् में। महाकवि वासभट्ट ने हर्पचरित के आर्रम्भ में इसके सुभापितों की रत्नों से तुलना की हैं- अविनाशिनमग्रान्यमकरोत् सातवाहन:। विशुद्धजातिभि: फोपं रत्नैरिय मुभाषितैः ।
महाराज हाल गाथा प्राकृतभाषा का लोकग्रिय चन्द है और सात सौ प्राकृत गाथाओं के एकत्र संकलन के कारस यह ग्रन्थ गाहा सत्तसई' या गाथा सपशनी के नाम से विस्यात है। इसके संग्रहकर्ता कवियों के आश्नयदाता तथा स्वयं काव्यकला के उपासक एक महनीय नरेश थे जिनका नाम 'हाल' या 'शालिवाहान' था। कथासरिन् सागर, कामसूत्र तथा गायासपशती की एक विशिष्ट हस्तलिखिन प्रति की पुष्पिका से पता चलना है कि हाल कुन्नल जनपद के अधीव्वर तथा प्रतिष्ठानपुर (पैठण) के पधीश थे। यह राज्य दक्षिया भारत में विद्यमान था। इनकी प्रधान रानी का नाम मलयवती था जो संस्कून भाषा की प्रवीसा
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विदुषी थी और जिसके विशेष अनुरोध से ही राजा ने संस्कृत भाषा का अनुशीलन किया था। राजा को सुगमता से संस्कृत सिखाने के लिए इनके सभा के अन्यतम त्िद्वान् वैयाकरण शर्ववर्मा ने कातन्त्र व्याकरण नामक नवीन व्याकरण की रचना की। इन्हीं के सभा-कति गुसाढय कवि ने पैशाची भाषा में 'वृहत् कथा' नामक विशाल ग्रन्थरंत्न का निर्माण किया जो अपने मृल रूप में विद्यमान न रहने पर भी कथा सरित् सागर, वृहत्कथा मञ्जरी जैसे संस्कृत अनुवादों में उपलब्ध होकर कथा-साहित्य का एक विराट विश्वकोश है। इनके प्रधान कवि का नाम था 'श्री पालित' जिनका अभिनन्द कवि ने अपने रामचरित महा- चरित महाकाव्य में उल्लेख किया है- हालेनोत्तमपूजया कविवृपः श्री पालितो लालितः । आज कवि चृपम श्री पालित की कमनीय रचनायें कालकवलित हैं। गाथासप्तशती में उद्धृत दो चार गाथायें ही इनकी अरपरवशिष्ठ रचनायें हैं। ग्रन्थ के संकलन काल के विषय में भी पर्याप्त मतभेद है। कतिपय विद्वान् इसे पव्चम शतक की रचना मानते हैं, परन्तु बहुमत से इसका समय प्रथम शतक ही माना जाता है। हाल कवियों के आश्रय- दाता ही न थे, प्रत्युत स्वयं काव्यकला के उपासक तथा शारदा-मन्दिर के पुजारी थे। उनकी रचनायें भी इस ग्रन्थ में संकलित उपलब्ध होती हैं। शकारि विक्रमादित्य के समान महाराज हाल की सभा भी कवि- रत्नों से विभूषित थीं जिनमें से अ्नेकों की रचनायें यहाँ संकांलेत की गई हैं। ऐसे महनीय कवियों के नाम ये हैं-वोडिस, चुल्लोह. मकरन्द- सेन, अमरराज, कुमारिल, श्रीराज, भीमस्वामी, मलयशेखर, माऊराज, वाह्व, विपमराज, मह्सेन, उद्धूव, प्रवरसेन, मणिराज, दुर्गस्वरामी, भोजक, वसन्तसेन आदि आदि। इन कवियों के न तो जीवनवृत्त का हमें परिचय है और न इनके समय का। पता नहीं कि इनमें से कितने हाल के समकालीन थे और कितने उनसे पूर्व वर्ती, परन्तु इनकी काव्य- कला की प्रसिद्धि के विषय में किसी भी आलोचक को सन्देह नहीं हो सकता।
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उस युग में प्राकृत का चोलवाला था। वही कविजनों की जिह्वा पर वैठकर लोकरखन के लिए अपना कौशल दिखलाती थी। सहदय आध्रयदाता का भव्य आश्रय पाकर वह चमक उठी थी। 'कतिवत्सल' महाराज हाल प्राकृत कवियों के कल्पतरु थे जिनका आ्रपश्रय पाकर सैकड़ों कत्ियों ने प्राकृत गाथाओं के भीतर अपना कोमल हृदय भर दिया था। महाराज के कथनानुसार एक करोड़ सुन्दर सूक्तियों में से ये सात सी सूक्तियाँ इस रत्नकोश में संग्ृहीत की गई हैं (गाा १।३ ) हाल-युगीय साहित्य मन्दिर के शिखर पर एकही मन्त्र लिखा था- अरमिश्रं पाउश्नकव्वं-श्र्रमृतं प्राकृतकाव्यम्। प्राकृत काव्य का ज्ञान ही सहदयता की सची परख थी उस युग में, तभी तो ऐसे काव्य के अ्रनभिज्ञ व्यक्तियों को विदग्धगोष्ठी में काम की तत्त्वचिन्ता करते समय अपना मुँह द्विपाना पड़ता था :- अमिअं पाउभ फब्च पढिउं सोउं अ जेग जाणंति। फामरस तत्ततन्तिं कुणन्ति ते कदद ण लज्न्ति ॥ (१२)
वैशिष्ज्य गाथासपशर्ती में न हमें दरवारी कविता का नमूना मिलता है, न दरबारी वस्तुओं का चित्रण। राजकीय वैभव, भोग विलास, नागरिक जीवन से सम्यद्ध जितनी वात हमें संम्कृन कविता में मिलती हैं, उन सघ का एकदम अभाव है इस प्राकृत काव्य ग्रन्थ में । सामान्य लोक जीवन का चित्रण ही इसकी महती तरिशेषता है। इसका वातावरम एकदम घरेलू है। कही ग्रामतरूण की म्रेमलीला की गाँफी है, तो कहीं गाँव की अशिक्षित सरल-व्वभावा सुन्दर्री के रागात्मक भावों का सुचारु चिन्नम है। एक प्रामीगा सुन्दरी परदेश जाने के लिए मचलने वाले प्रियनम से बड़ी सरलता से पूछध रही है कि अभी तो कंधी तथा तेल का सेवन करने पर भी मेरी वेसी के टेढ़े वाल सू्ध नहीं हुए है और शभी तुम परदेश का प्रस्ताव चला रहे हो: यह कहा का न्याय है?
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अव्बो दुक्कर आरभ पुणो वि तन्ति करेति गमणस्स। अन्न विन होन्ति सरला वेणीअ तरंगिणो चिउरा ॥ (३७३ ) उस नायिका की खीझ पर आलोचक मुन्ध है जो घारम्वार फूँक देने पर भी आग को जगाने में समर्थ नहीं होती तथा उस विदग्ध सखी की चतुरता पर वह उल्लसित है जो अर्त्नि को उसके सुखमारुत के पान करने का अभिलापी बतलाकर कामुक के रूप में चित्रित करती है :-
रन्घणकम्म-णिडणिए मा जूरतु रचपाहल सुभन्धम् । मुहमावअ पिअन्तो धूमाइ तिही ण पजलई॥ (१।१४ ) स सुन्दरी का त्वभाव कितना भोला तथा सृघा है जो अपने पति के परदेश जाने के दिनों को दिवाल पर लकीर खींच कर गिन रही है। पति को घर छोड़े त्रभ्ी ढोपहर भी नहीं हुआ है कि वह दीवाल के ऊपर 'आज वह गया', 'आज वह गया' इस प्रकार रेखा खींचकर पूरे दीवार को रेखाओं से चित्रित कर दिया है। सचमुच यह सूधेपन की पराकाष्टा है :- भज्जं गभोचि अज्जं गभोचि अज्जं गभ्ोषि गणरीए। पटम व्विस दिशहद्धे वुड्टो रेहाहि चिच्तलिभो॥ (१ 1 ८ ) ध्यान देने की बात है कि स्त्रियाँ न्रमीण त्रवश्च हैं, परन्तु उनका भाव आामीणा नहीं है। उनमें स्वाभाविकता है, सरलता है परन्तु ग्रान्थता नहीं। हृदय में उदारता है, संकीर्णता नहीं। प्रेम के पहचानने की विद्ग्धता है; पति के हृदय को पररने की नागर-सुलभ क्षमता है। वे भोली हैं, परन्तु भोड़ी नहीं। कोई हालिकबधू गोदावरी के किनारे अपने प्रियतम को खड़ा हुआ देखकर प्रेम परीक्षा के लिए विपम मार्ग से नदी में उतरने लगती है (२७ ; तो दूसरी सुन्दरी ग्रामदाह में सर्वत्व नष्ट हो जाने पर भी
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प्राचीन कविता में प्रगतिशीलता ५ूपू
हृदय में ढंढक का अनुभव करती है क्योंकि उसके प्रियतम ने उसके हाथ से घड़ा ले लिया- सब्तरसम्मि वि दद्धे तहवरिहु हिअअत्स णिव्धुदि न्चेअ्। जं तेण गामडाहे इत्थाहत्थिं कुडो गहिभो।।
गाथासप्रशती में वर्शान चित्रात्मक हैं अप्र्थात् उन्हें देखकर रमसीय (३। २६ )
चित्र नेत्रों के सामने भूलने लगते हैं। उस प्रपापालिका (प्याऊ पर पानी पिलाने वाला) की विदग्धता का कितना रमसीय चित्र हमारे मानस पटल पर अंकित हो जाता है जो जल की धारा को पतली करती जाती है जब ऊपर आँख उठाकर राही पानी पीता जा रहा है तथा उसे डट कर निरखने के लिए अपने हाथ की ँगलियों को अलग करता जाता है :- उद्धच्छो पिभइ जलं जह जह विरलंगुली चिरं पहियो। पावालिभा वि तह तह धारं तणुइं पि तणुएड।। (२ । ६१ ) स्वाभाविकता इन प्राकृत गाथाओं में कूट कूट कर भरी है। यहाँ हृद्यपक्ष का प्राधान्य है। इसीलिए अलंकार ग्रंथों में रसों के उदा- हरए देने के समय इनका विन्यास किया गया है। कृत्रिमता का यहाँ लेश भी नहीं है। स्वाभाविकता का श्रखण्ड साम्राज्य सहदयों के सामने लहराता रहता है। मानस भावों के उत्थान पतन का चित्र इतना रुचिर तथा सुन्दर है कि इस काव्य को हम मनोवैज्ञानिक अ्रनु- शीलन का भव्य उदाहरण मान सकते हैं। नपे-तुले थोड़े स्थलों में अधिक से अधिक भावों का निवेश पद पढ पर हमें आह्लादित कर रहा है। भावाभिव्यञ्जक गाथाओ्रं की उपमा 'मिनिएचर पेंटिंग' से दी जा सकती है। गाथाओं का भौगोलिक प्रदेश गोदावरी तथा विध्य का प्रदेश है क्योंकि उनमें अनेकत्र गोदावरी (२।८९, २।९३) तथा विन्ध्यपर्वत (२।१७) तथा वहाँ के निवासी पुलिन्दों का २१६) विशेष वर्णन उपलब्ध होता है।
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गाथा सप्तशर्ती में कलापक्ष के प्रदर्शन की ओरर भी कवियों की दृष्टि रमती है। कहीं पर प्राकृत भाषा की कृपा से एक शब्द का अ्रनेक अथों में प्रयोग उपलब्ध होता है, तां कहीं पर उत्प्रेक्षा की ऊँची उड़ान दीख पढ़ती है। परन्तु प्रकृत रस का विरोध कहीं नहीं होता। कृप्ए को लक्ष्य कर लिखी गई एक गाथा में 'गोरत्र' शब्द का प्रयोग 'गोरज', 'गौरव' तथा 'गौरता' इन तीन अर्थों में किया गया है (१।८९)। उत्प्रेक्षा की वहार इस गाथा में बहुत ही सुन्दर है :- योक्षं पिण णीसरइ मज्झण्णे उस स्रीरतललक्का। आसव भएण छाही वि पहिभ ता कि ण वीसमसि॥ भाव है कि हे पथिक! दोपहर के इस चिलचिलाती धूप में छाया भी शरीर के नीचे लुक छिपकर रहती है। धूप के डर से वह थोड़ा भी वाहर नहीं निकलती। तो तुम विश्राम क्यों नहीं करते ? इस गाथा को पढ़ते ही श्रोताओ्ं को विहारी के 'जेठ दुपहरी धूप में छाँहो चाहत छाँह' की याद आये बिना न रहेगी। इस गाथा में हेतूत्प्रेक्षा का विन्यास बड़ा ही रुचिर हुआ है। सतसई साहित्य जगत् में 'सतसई' की परम्परा आरम्भ करने का श्रेय इसी 'गाथा सप्नशती' को है। इसी से उत्साहित होकर गोवर्धनाचार्य ने ११ वें शतक में चंगाल के अरन्तिम हिन्दू नरेश लक्ष्मरासेन के दरवार में रहकर 'आर्या सप्तश्ती' की रचना की और इस प्रभाव को उन्होंने स्वरयं स्व्रीकार किया ह- वाणी प्राकृत-समुचितरसा वलेनेव संस्कृत नीता। निम्नानुरूपनीरा कलिन्द-कन्येव गगनतलम् ॥ (आर्धा ५२) महाकवि विहारी ने 'गाथासपशती' तथा 'आर्यासपशती' के आदर्श पर ही अपनी सतसई की रचना की। भावों की समानता तथा
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प्राचीन कविता में प्रगतिशीलता ५७
सुषमा के देखने पर इस विषय में सन्देह नहीं रह जाता। बिहारी का यह प्रसिद्ध दोहा- बाम बाहु फरकत मिलै जो हरि जीवन मूरि। तो तोहि सौं भेटिहौं; राख्ति दाहिनी दूरि ॥ गाथासप्रशती की इस गाथा (२। ३७) के भावों से आरश्चर्यजनक साम्य रखता है- फुरिए वामच्छि तुए जइ एहिइ सो पियोज ता सुइरम्। संमीलिभ दाहिणअं तुइ अवि एहं पलोइस्सम्।। नायक के आगमन पर नेत्र का व्यापार सर्वपथम होता है। अतएव वामनेत्र के स्फुरण पर प्रिय के आने पर उस नेत्र का आदर करना बाहु के आदर की अपेक्षा अधिक रुचिर तथा सयुक्तिक प्रतीत होता है।
1-
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खरड २
हिन्दी का व्य
१-तुलसी और जयदेव २-रसिक गोविन्द ३-पारिजातहरख ४-पलटूदास
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(६)
तुलसीदास और जयदेव अँगरेजी में कहावत है कि Poets are born, not made. कवि पैदा होता है, बनाया नहीं जाता। समग्र प्रतिभाशाली कवियों का इतिहास इस सिद्धांत की यथेष्ट पुष्टि करता है। कविता प्रतिभा की सुदृढ़ भित्ति पर ही अच्छी तरह खड़ी हो सकती है। जिस कवि में इस प्रतिभा का-नवोन्मेषिणी प्रज्ञा का-अभाव है, जो कवि अपनी स्वाभाविक कल्पना के पंखों पर उड़कर स्वर्गीय भाव-सुधा को मर्त्यलोक में लाना नहीं जानता, भला उसकी कविता-कामिनी के हव-भाव सहदयों के रसीले हृदय को कभी खींच सकते हैं? उसके मधुर शब्दविन्यास कभी कर्णपुटों में सुधा की वर्षा कर सकते हैं? उसके मनोरम भाव क्या कभी रसिकजनों के चित्त में चुभ सकते हैं? क्या उसके ललित अलंकारों की छटा कभी इन प्यासे नयनों को तृप्त कर सकती है? कदापि नहीं। रस से सरसाती, चित्त में घाव करनेवाली कविता के लिये प्रतिभा की परमावश्यकता है। संस्कृत साहित्य के आलंकारिक-शिरोमणि मम्मटाचार्य ने भी कविता के त्रिविध साधन वतलाते समय 'प्रतिभा' को ही सवसे पहला स्थान दिया है। इस प्रतिभा का विकास कवि के हृदय में जन्म से की होता है-पूर्वकालीन संस्कार के घल से इस प्रतिभा की निर्मल धारा कवि के हृदय में प्रबल वेग से बहने लगती है। वाल्मीकि की जिह्वा से अकस्मात् ही कविता का प्रवाह निकलने लगा था। अंधे होमर को किसी विश्वविद्यालय की डिग्री नहीं मिली थी। उसकी क्रमबद्ध शिक्षा के विषय में भी ग्रीक इतिहास मौनत्रत. अवलंबन किए हुए है। वह अपनी प्रतिभा के अनुपम विमान पर
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६२ काव्यानुशीलन चढ़कर ही सैंकड़ॉ वर्ष पूर्व, घटित होनेवाले ट्रोजन संग्राम की छोटी से छोटी घटनाओं को देखता था और अपने अमर महाकाव्य 'ईलियड' में वर्णन करता था। महाकवि शेक्सपियर की वह अरप्रतु- पम नाट्य-कला तथा अनमोल कविता उसकी प्रतिभा के वल से ही प्रसूत हुई थी। अतएव यदि तरलोचकगण सच्चे कवि को सराद गया न समझकर जन्म से ही चमकनेवाला, अँधेरे को उजेला वनाने. वाला हीरा समझें तो वह सिद्धान्त सत्यता से बहुत दूर न होगा।
काव्य सामग्री उक्त सिद्धांत की सत्यता को मानते हुए भी हम निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि कविगत प्रतिभा के अ्ंकुर को उपजाने के लिये, उसे हुरा भरा चनाकर पहवित करने के लिये अनेक साधन-रूर्पा खाद की आवश्यकता होती है। इन सामग्री के विना हरृदय में छिपी हुई शक्ति का-सर्वतोगामिनी प्रचंड प्रतिभा का-सम्यक् विकास वास्तव में जैसा होना चाहिए, वैसा नहीं होता। यह सामग्री उसके उद्वोधन में, उसे जनता के नेत्रों के सामने प्रगट होने में अनेक सहायता प्रदान करती है। इस सामग्री को हम 'निपुणता' तथा 'अभ्यास' के नाम से पुकारना यथोचित सममते हैं। संसार के विभिन्न कार्यों का अवलोकन कर उसका समुचित अनुभव प्राप्त करना तथा प्रकृति देवी के मनोरम मंदिर को देख उसके वास्तविक रहस्यों के विषय में ज्ञान प्राप्त करना 'निपुणता' के नाम से व्यवहृत किया जा सकता है। देश और काल का अरसीम प्रभाव कवि के हृदय पर बरिना हुए रह ही नहीं सकता। सांसारिक अनुंभव से कवि परें: [प्रतिभा और भी ग्रौढ़ बनती है। जिस काल में कवि का जन्म हुआं है, उस समय की विशिष्ट विचार-लहरी का छींटा उसकी कविता पर पड़े बिना नहीं रह सकता। उस समय की भावनाओं को तरंग उसके काव्य में जरूर दिखाई देगी। उसी भाँति देश का प्रभाव भी कव्रिता के मनोहर वेश में बहत कुछ वैचित्र्य पैदा कर सकता है।
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इन साधनों के समान ही प्राचीन कविता का अध्ययन तथा मनन भी कवि को सुचारु रूप में गढ़नेवाले पदार्थों में उन्नत स्थान रखता है। नवीन कविता करने का अभ्यास तथा प्राचीन काव्य का आलोचना- त्मक अध्ययन काव्य-साधनों में एक विशिष्ट साधन है। प्रत्येक देश के कवि अपने पूर्ववर्ती कवियों के भाव अपनाने में तनिक भी नहीं हिचकते; क्योंकि वे तो उनके अध्ययन के प्रधान अंग हैं। इन साधनों की सहायता से कवि की ईश्वरदृत्त प्रतिभा का उद्बोधन हो सकता है तथा कतिपय अंशों में नवीन प्रतिभा का जन्म भी हो सकता है। अ्रनेक ऐसे कविवर हो गए हैं जिनमें स्वाभाविक प्रतिभा की न्यूनता की पूर्ति चहिर्जगत् के अनुभव से यथेष्ट की गई है। ऐसे बहुत से LCO T A AS कवि मिलेगे जिन्होंने इन्हीं साधनों के सहारे अत्युत्तम कविता की है। अतएव वास्तविक कवि वही है जिसमें प्रतिभा के बीज जन्म से ही निहित हों। तथापि यह मानना ही पड़ेगा कि उपर्युंक्क साधनों के द्वारा कवि बनाया भी जा सकता है-उसे देश तथा कालरूपी साँचे में ढाला भी जा सकता है।
भावसादृश्य यही कारण है कि कवियों में भाव-सादृश्य दृष्टिगोचर होता है। कहीं-कहीं तो दो भिन्न-देशीय कवियों के एक ही विषय पर मजमून चलात्कार लड़ जाते हैं। कवि-प्रतिभा की गति प्रायः संसार में एक ही समान रहती है। इस प्रतिभा के बल पर जब एक ही विषय पर कविता लिखी जा रही हो, तब विचारों का लड़ जाना कोई असम्भव "व्यापार नहीं। परन्तु कहीं-कहीं कवि अपने पूर्ववर्ती कवियों के अनूठे भावों को-अनुपम सूझ को-जान वूभकर अपनाता है। जो भाव अनोखे होते हैं, जिनमें अलौकिकता की अधिक मात्रा रहती है, वे अध्ययनशाली कवि के स्वच्छ हृदय पर अपना प्रभाव डाले बिना नहीं रह सकते। ऐसे भाव उसके हृदय पर अपनी छाप बैठा देते हैं; वे कवि की निज की कमाई सम्पत्ति हो जाते हैं। अतएव जहाँ समुचित
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अरवसर मिलता है, वहाँ कवि उन भावों को प्रकट किए विना आगे नहीं बढ़ सकता। उन भावों के परकीय होने का विचार उसके हृदय से सदा के लिये पृथक हो जाता है। कविता लिखते समय वे भाव स्वतः ही, बिना किसी ज्ञात परिश्रम के, उसके नेत्रों के. सामने फिरने लगते हैं। कवि उन्हीं स्वर्गीय सूक्ष्म भावों का सुंदर चित्र अपने शब्दों से सर्वसाधारण के सामने खींचता है। यह भावों का अपनाना 'अर्थापहरण' नामक दोष से सवथा मुक्त है। यदि कवि किसी दूसरे कवि के भाव को लेकर उसकी रमशीयता की रक्षा न कर सके, उसके अनूठेपन को बनाए न रखे, तो वह वास्तव में 'कविर्वान्तं समश्तुते' का लक्ष्य बनाया जा सकता है। परन्तु यदि वह उन भाव चित्रों के गाढ़े रंग में कुछ भी कमी नहीं होने देता, यदि कवि के शब्दों में उतरकर वे भाव अपनी सरसता तथा अलौकिकता को नहीं खो बैठते, तो वह कवि वास्तव में सच्चे कवि का उच्च पद पाने का प्रधान अधिकारी है। वही कवि सच्चा कवि है जो प्राचीन भावों पर भी अपनी अनुपम छाप डाल दे, अरपनी प्रकृष्ट प्रतिभा के वल से उनमें नई रंगत पैदा कर दे और उनमें कुछ दूसरा ही अनोखापन ला दे। आलोचकगए इसका ही 'मौलिकता' के नाम से सादर स्वागत करते हैं। कौन ऐसा भाव है जिसे प्राचीन कवियों ने नहीं अपनाया है ? तथापि उन्हीं भावों को अपने साँचे में ढाल, अपनी प्रतिभा की विमल छाप लगा, उनमें नई चमक पैदा करना ही तो मौलिकता है। संस्कृत साहित्य के प्रधान आलोचक आरनन्दवर्धनाचार्य ने कवि की उपमा सरस वसन्त से दी है। वही रुखे सूखे पेड़ हैं, वही पत्रों से रहित शाखत्राएँ हैं, वही फलों से विहीन टहनियाँ हैं, सब कुछ पुराना है; परन्तु वसन्त के आगमन से प्रकृति में नवीन परिवर्तन उपस्थित हो जाता है। वृक्षों में नूतन, रक्तवर्ण के पहय हमारे प्यासे नेत्रों को तृप्त करते हैं; शाखाएँ हरी भरी सी दिखाई देती हैं; मंजरी का सौरभ अलिगण के रसिक मन को अपनी ओर वलात् खींच लेता है। यह नूतन चमत्कार किसने पैदा किया ? सरस वसन्त ने। उसी भाँति कवि भी पुराने भावों में नवीनता.
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उपस्थित कर उन्हें चोटीले बना देता है। कहीं शब्द व देत है तो कहीं नवीन अर्थ का पुट दे देता है। वस भावचित्र में अनोखापन आ जाता है। अब भाव दूसरे से उधार ली हुई सम्पत्ति नहीं रह जाता, बल्कि अपना कमाया हुआ निज का धन हो जाता है। दृष्टपूर्ा अपि हर्था: काव्ये रसपरिग्रहात्। सर्ने नवा इवाभान्ति मधुमास इच हुमाः ॥ कतिकुल-शेखर राजशेखर ने आनंदवर्धनाचार्य की ही उदार सम्मति को अपरपने शब्दों में दुहराया है :- शब्दर्थोक्तिपु यः पश्येदिह किञ्चन नूतनम्। उल्िखेत् किञ्चन प्राच्यं मन्यतां स महाकविः ॥ समग्र संस्कृत साहित्य हिन्दी कवियों के लिये पैतृक सम्पत्ति है। उन्हें उसका पूर्ण रूप से अपनी कविता में उपयोग करने का अधिकार है। यही कारए है कि अनेक हिंदी कवियों पर प्राचीन संस्कृत कवियों की छाया स्पष्टतः झलकती है परंतु हिंदी के महा- कवियों ने भावों को लेकर भी उन्हें अत्यंत रमणीय बना डाला है, जिससे वे भाव मौलिक से जान पड़ते हैं। कविता-कामिनी-कांत तुलसीदास ने भी अनेक प्राचीन संस्कृत कवियों के भावों को अपना- कर अपने 'रामचरित मानस' को सुशोभित किया है। रामायण की भूमिका में महात्मा तुलसीदास ने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया है कि इस ग्रंथ में व्णित सिद्धान्त अ्र्रनेक आरगम निगम पुराण ग्रंथों से लिए गए हैं। नानापुराणनिगमागमसभ्मतं यद्· रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोडपि। स्व्रांत: सुखाय तुलसीरघुनाथगाथा- भाषानित्रन्वमतिमञ्जुलमात नोति ।। तुलसीदास ने अनेक विमल दार्शनिक सिद्धांत गीतादि धर्म- ग्रंधों से, राम का अधिकांश आख्यान अध्यात्म रामायण से तथा
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अरनेक कथोपकथन हनुमन्नाटक से लिए हैं, यह बात तो सर्वप्रसिद्ध ही है; परंतु रामायणीय कथा-विपयक एक और अनुपम ग्रन्थ है जिसकी छाया रामायण के अधिकांश अनूठे भावों पर पड़ी है। यह प्रंथ जयदेव प्रणीत 'प्रसन्नराघव' नामक संस्कृत नाटक है। अरभी तक इस ग्रंथ तथा रामचरित मानस के विंत्र-प्रतिविंध भावों का वर्न हिंदी संसार के सामने विस्तृत रूप से कर्भी नहीं किया गया था। यह पहला ही अवसर है (जहाँ तक मुझे मालूम है) कि इन दो कवियों के विंव-प्रतिविंत भावों का वर्णान रामायणप्रेमियों के सामने उपस्थित किया जाता है।
प्रसन्नराघव का रचना-काल 'प्रसन्नराघव' नाटक में, जैसा कि इसका सार्थक नाम प्रकट कर रहा है, रामचन्द्र के जीवन वृत्तांत का अभिनयात्मक वर्गान है। नाटक में जिनने आवश्यक गुख होने चाहिएँ, उनमें से अ्रनेक गुखों की न्यूनता यद्यपि इस नाटक के पढ़नेवालों को खटकेगी, तथापि कविता की दृष्टि से, प्रसन्न-कारिणी शक्तियों की दृष्टि से, यह नाटक अधिक मूल्य रखता है। इस नाटक के कर्ता का नाम 'जयदेव' है। यह कविवर अमर गीति-काव्य गीतगोविन्द के कर्ता जयदेव से सर्वथा भिन्न व्यक्ति हैं। गीतगोविन्द के रचयिता के पिता का नाम भोजदेव तथा पूज्य माता का रमादेवी था; परन्तु प्रसन्नराघव के कर्ता के पितृद्ेव का नाम महादेव तथा माता का सुमिन्रादेवी था। इनका गोत्र कौंडिन्य था। प्रसन्नराघव की रचना रामचरितमानस से करीव डेढ़ सौ वर्ष पहले हो चुकी थी। साहित्यद्र्पण के कर्ता विश्वनाथ कविराज ने ध्वनि-काव्य के उदाहरण में 'कदली कदली करभः करभः' वाला प्रसन्नराघव का पद्य उद्धत किया है जिससे निश्चित है कि जयदेव अ्रपरवश्य विश्वनाथ (चौदहवीं सदी का उतरार्द) से प्राचीन थे। चन्द्रा लोक में जयदेव ने मम्मटाचार्य के काव्य-लक्षणा की हँसी उड़ाई है जिससे इनका समय मम्मटाचार्य (भोज के समकालीन, १२ वीं
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सदी) से पीछे तथा विश्वनाथ के पहले ठहरता है। अर्थात् यदि हम इन्हें तेरहवीं सदी का कवि कहें तो अनुचित न होना। अतएव जयदेव ने इन समान भावों को रामचरित मानस से नहीं लिया; क्योंकि वे तो तुलसीदास से सैकड़ों वर्ष पहले हो चुके थे। भाव- समानता से यही सिद्धांत निकलता है कि तुलसीदास ने ही जयदेव के अनूठे भावों को अपनाकर अपने 'मानस' को सुंदर चनाया है।
निम्न-प्रति-विम्न भाव
जयदेव ने नाटक की 'बालकाण्ड' वाली प्रस्तावना में रामचन्द्र के आदर्श चरित्र की भूरि भूरि प्रशंसा की है। वास्तव में मर्यादा- पुरुपोत्तम राम का चरित्र समग्र विश्व के लिये अनुकर की सामग्री है। आदर्श पितृभक्ति, पुत्र-स्नेह, भ्रातृ-प्रेम तथा पत्नी प्रेम का अनुपम सम्मेलन जैसा यहाँ दिखाई देता है, वैसा संसार के किसी ऐतिहासिक व्यक्ति के जीवन में नहीं मिलता। अतएव जयदेव की राम विषयक प्रशंसा वास्तव में सत्य है। वे कहते हैं कि ज्योही कोई मनुष्य अपने अ्न्तर्गत भावों को प्रकट करना चाहता है, त्योंही भगवर्ती सरस्व्रती उसकी जिह्वा पर आा बैठती हैं-अपने पतिदेव की क्रीड़ा-भूमि को भी छोड़कर करोड़ों कोसों से दौड़ती हुई आकर उसकी जीभ पर विराजमान हो जाती हैं। इस सुदूर मार्ग को पार करने का परिश्रम किसी तरह भी कम नहीं होता। इसके लिये केवल एक ही सुगम उपाय है। और वह है रामचंद्र के गुएगरिमापूर्ण चरित्र का कीर्तन। रामचंद्र के गुणानुवाद-रूर्पा सुधामयी वापी में यदि वह गोता न मारें, तो उनका परिश्रम किसी भॉति दूर नहीं हो सकता। वन्य है राम के गुणों का कीर्तन जो भारती को भी सुख देने में समर्थ है। झटिति जगतीमागच्छन्त्या वितामहविष्ठान् महति पथि यो देव्या वाचः श्रमः समजायत।
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अपि कथमसौ मुञ्चेदेनं न चेदचगाहते रघुपतिगुणन्रामदलाघा सुधामय-दीघिंकाम्।। (प्रसन्नराघत्र पृष्ठ ५) तुलसीदास जी ने भी अपने आराध्य देव राम के गाथा-कीर्तन के विषय में अ्रप्रनेक प्रशंसाएँ वालकाण्ड में की हैं। वे भी यही कहते हैं- भगति हेनु विधि-भवन त्रिहाई। सुमिरत सारद आवति घाई ॥ राम-चरित-सर तरिनु अन्हवाये। सो लमु जाइ न कोटि उपाये ॥ रसिक पाठक इन दोनों उक्तियों को साथ साथ पढ़ें और देखें कि इनमें गहरा भाव-सान्य है या नहीं। इलोक में रघुपति-चरित की इलाघा का रूपक सुधामय दीघिका से दिया गया है, महात्मा जी ने उपमान तथा उपमेय की एकलिंगता के साहित्यिक नियम की रक्षा के अ्मिप्राय से, भाव को अपपना कर भी, स्त्रीलिंग का सहारा छोड़, राम- चरित का रूपक 'सर' से चाँधा है। भाव तो एक समान है ही, परंतु इस प्रकार अलंकार का निर्वाह भी ठीक ढंग पर किया गया है। वाटिका भ्रमण
रामचरितमानस का वाटिका-भ्रमण भी हिंदी साहित्य में कविता की दृष्टि से अनूठी चीज है। साधारण शब्दों में मर्मस्पर्शी भावों का वर्शन करना तुलसीदास का ही श्लाघनीय व्यापार है। अधिकांश रामायणी इस वाटिका भ्रमण को तुलसीदास के कल्पना-मय मस्तिप्क की उपज मानते हैं। परंतु चह बात ठीक नहीं है। प्रसन्नराघव में सीता का अपनी प्यारी सहेलियो के साथ गिरिजा का पूजन तथा उपवन में वसंत की बहार खूब चुने हुए शब्दों में वर्शित है। जिस मार्मिक ढंग से तुलसीदास ने इसका शाब्दिक चित्र खींचा है, वह तो उनका ही खास ढंग है; परंतु लेखक की सम्मति है कि वाटिका-वर्णन का विचार ग्रसन्नराघत्र से ही तुलसीदास को मिला। रामचंद्र सीता के नूपुर की मधुर ध्वनि सुनकर लक्ष्मण को उधर देखने से रोकते हैं; क्यांकि परकी की शंका से ही रघुवंशियों का मन संकुचित हो जाता है।
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"परस्त्रीति शंकाषि संकोचाय रघूणाम्"
कहा है :- इसी भाव पर तुलसीदास ने अपनी प्रतिभा का छींटा देकर यों
रधुवंसिन्हि कर सहज सुभाऊ। मन कुपंथ पगु धरैं न काऊ। मोहि अतिसय प्रतीत मन केरी। जेहि सबनेहु परनारि न हेरी। नाटक में धनुष तोड़ने के लिये रावण और वाए में अनेक वाक- प्रबंध दिखलाया गया है। अंत में वाणासुर शिवधनुष को उठाने लगता है। अत्यंत परिश्रम करता है; परंतु वह जड़ पिनाक टस से मस नहीं होता। इस विषय पर जयदेव एक सुन्दर उदाहरण देते हैं कि सती स्त्रियो का मन कार्मी-जनों के वारंबार प्रार्थना करने पर भी जरा भी अपने प्राकृतिक स्थान से नहीं टलता। वही दश उस धनुष की थी। वाणस्य बाहुशिखरैः परिपीज्यमान नेदं धनुश्चलत किञ्विदपीन्दुमौले: । कामातुरस्य वचसामिव संविधानै- रभ्यर्थितं प्रक्कृतिचारु मनः सर्तीनाम्। (पृ० २७) तुलसीद,स जी ने भी इस प्रसंग पर इसी अनुपम उपमा की सहा- यता ली है। भूर सहस दस एकहिं वारा। लगे उठावन टरै न टारा। डिगें न सम्भु-सरासन कैसे। कामीबचन सती-मन जैसे।
गई है। कहना व्यर्थ होगा कि यह उपमा जयदेव के ही नाटक से ली
परशुराम-प्रतंग
रामचरित मानस का राम-परशुराम संवाद सजञीवता में अपना सानो नहीं रखता। लक्ष्मणजी की व्यडन्योक्ति वास्तन में मर्मस्परशिसो
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है। परशुराम को जैसी फत्रती लक्ष्मण ने सुनाई है, वैसी रामायण में और कहीं सुनने को नहीं मिलती। यह सम्वाद तुलसीदास के हास्यमय हृदय का पता देता है। यह महात्मा जी की निज की कल्पना से प्रसूत माना जाना चाहिए; तथापि इसके अधिकांश भाव प्रसन्नराघव से लिए गए हैं। हाँ, 'कुम्हण-बतिया' की उपमा आदि अ्र्नेक चमत्कारिणी उक्तियाँ खास तुलसीदास की ही हैं; तथापि कतिपय भावों पर जयदेव की छाया बहुत साफ दीख पड़ती है। रामचंद्र परशुराम का वड़प्पन दिखाते हुए आपस में समर-व्यापार को निंद्य ठहराते हैं। वे कहते हैं कि हे भगवन्, आप ठहरे ब्राझ्मण और मै ठहरा क्षत्रिय; मेरा बल अत्यंत हीन है; परंतु आप उत्कष्टता के शिखर पर चढ़े हुए हैं; क्योंकि मेरा वल तो केवल धनुप है जिस में केवल एक ही गु (प्रत्यव्ा) है, परंतु आप का अस्त्र-यज्ञोप- वीत-नव गुणों (सूतों) से सुशोभित है। युद्ध तो समवल के साथ करना समुचित हाता है; परंतु मुझमें और आपमें तो आ्रकाश पाताल का अंतर है; भला कहिए तो सही, मैं कभी आपसे लड़ने के योग्य हूँ ! भो ब्रह्मन् ! भवता समं न घटते संग्रामवार्तापि नः सर्वे हीनबलाः बयं बलवतां चूयं स्थिता मूर्घनि। यस्मादेकगुणं दारासनमिदं सुव्यक्तमुर्वीभुजा- मस्मार्फं, भवतां पुनर्नवगुणं यज्ञोपवीतं बलम्।
अपव जरा देखिए, तुलसी के इष्ट राम भी इन्हीं शब्दों में संग्राम- (पृ० ८२)
वार्ता को वुरा ठहराते हैं :- हमहिं तुमहि सरवर कस नाथा। फहहु त कहाँ चरण केह माथा॥ देव एकगुन धनुष हमारें। नवगुन परम पुनीत तुम्हारे। सघ प्रकार हम तुम्ह सन हारे। छमहु बिप्र अपराध हमारे॥। देखिए, पुराने मजमून में कैसी जान डाल दी गई है। 'कहहु न कहाँ चरन कहँ माथा' वास्तव में इस उद्धरण की जान है। यह
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तुलसीदास और जयदेव ७१।
तुलसी की खास कल्पना है; मूल में इस विषमालंकार की छटा देखने को नहीं मिलती। हाँ इतना अवश्य कहेंगे कि 'नवगुन परम पुनीत तुम्हारे में प्रसाद की उतनी मात्रा नहीं जितनी 'नवगुएं यज्ञोपवीतं बलम्' में है। राम अपने को निर्दोष सिद्ध करना चाहते हैं। उनकी राय है कि पुराना धनुष तो छूते ही टूट गया; इसमें हमारा दोष ही क्या ? मया स्पृष्ट न वा स्पृष्ट कार्मुकं पुरवैरिणः । भगवन्नात्मनैवेदमभ्यजत करोमि किम्॥। (पृ० =१) रामचरित मानस में भी यही वात कही गई है :- छुवतहि टूट पिनाक पुराना। मैं केहि हेनु करौ अभिमाना ।। पिनाक को पुराना बतलाकर तुलसीदास ने पद्य के विषय को छापना वना डाला है।
सुंदर काण्ड सुंदर काण्ड में जितनी समता दृष्टिगोचर होती है, उतनी और कहीं नहीं दिखाई देती। पद पद पर तुलसीदास ने जयदेव के भावों को अपनाया है। परंतु ये भाव ऐसे समुचित अवसर पर और सुचारु रूप से बैठाए गए हैं कि इन में परकीयता की गंध भी नहां आती। रावण के भय दिखाने पर सीता कह रही है कि हे रावण, ज्यादा बक भक मत कर। केवल दों ही चीजें ऐसी हैं जो मेरे कण्ठ को छू सकतो हैं। पहलो चीज तो कमल के समान कांतिवाला रघुनाथ का भुज, और दूसरी तेरी निर्द्य तलवार! क्या सुंदर भाव है! विरम विरम रक्ष: ! कि नुधा जलितेन रपृशति नहि मदीयं कण्ठसीमानमन्यः । रघुरति-भुजदण्डादुललं श्यामकान्तेः दशमुख ! भवदीयाननिष्क्काद्वा कृराणात् ॥ (पृ० १.२७ )
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तुलसीदास की सीता भी ऐसी ही आदर्श प्रतिप्रारणा है। वह साफ शब्दों में राम के बिना मरना स्वीकार करती है :- स्याम सरोन दाम सम मुंदर। प्रभु-भुज करि-कर-सम दसकंघर।। सोइ भुज कंठ कि तब ससि बोरा। मुनु सठ अस प्रमान पन मोरा। अत सीता रावण की भयंकर तलवार चंद्रहास से ही अपना सिर काटने की प्रार्थना कर रही है। वह कह रही है कि चंद्रहास ! रामचंद्र की विरहान्नि से उत्पन्न हुए मेरे संताप को मिटा दो। तुम में ताप मिटाने की शक्ति अच्छी मात्रा में विद्यमान है; क्योंकि तुम अपनी धार में शीतल जल ही धारण करते हो। इसी शीतल जल से मेरे हृद्य में सुलगनेवाली आग बुका दो, बस यही प्रार्थना है। चंद्रहास हर मे परितानं रामन्तंद्र - विरहानलजातम्। त्वं हि कांतिजित - मौक्तिकचूणे वारया वहसि घीतलमम्भः। (पृ० १२७ ) रामायण जी सीता भी ऐसी ही प्रार्थना सुनाती है :-- चंद्रहास हन मम परितापं। गघुपति विरह अनल संतार्पं ।। सीतल निमि तत असि वर घारा। कह सोता हब मम दुग् भारा॥ देखिए, पिछली चौपाई पद्य के पूर्वार्द्ध का अक्षरशः अनुवाद है। नाटक में सीता त्रिजटा से अ्नि लाने के लिये कहती हैं; परन्तु त्रिजटा के अ्ति सुलभ न होने की बात कहने पर सीता अशोक से ही आग माँग रही है। वह कहती है-हे निर्दची अशोक! मेरे लिये- शरपग्नि की एक चिनगारी भी तो ग्रकट करो। विरहियों के संताप के लिये तुम अपने नूतन पह्लवों के रूप में अन्नि की शिखावली धारण किए हो, जरा एक भी कसिका दो तो सही। अलमकरुणं चेतः श्रीमत्नशोंक वनलंते! टहनषणिकामेकां तात्रन्मम परकटीकुर।
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ननु विगहिणां सन्तापाय स्फुटीकुरुते भवान् नवकिसलय श्रेणीव्याजात् कृशानुशिखावलीम्। (पृ० १२६) रामायण में सीताजी की भी उक्ति इसी प्रकार है :- सुनहि विनय मम बरिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका। नूनन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहु निदाना। सीता की विषम दशा देख पेड़ पर छिपे हुए हनुमान ने मुद्रिका गिरा दी। सीता ने समभा कि मेरी प्रार्थना पूरी हुई, अशोक ने अ्रग्नि की कणिका मेरे लिये गिरा दी है। वह कह रही है- "हला ! पद्य पश्य निपतितं तावदस्य गिखरादङ्गारखण्डकम्" तुलसीदास जी ने भी यही बात लिखी है :- करि करि हृदय विचार दीन्ह मुद्िका डारि तब। जनु असोक अङ्गार दीन्ह हरषि उठि कर गहेऊ॥ परंतु वह तो थी राम की अँगूठी। फट हनुमान आगे बढ़ आए और सीता से अपने को राम का दूत वताया। सी बहुत डरी; परंतु विश्वास होने पर नर और वानर के अयोग्य सम्मेलन की कथा पूछने लगी। जिस प्रकार नाटक की सीता "केन पुनर्नरवान- राणामीदशं सखित्रित्वं निर्मितम्!" कह रही है, उसी भाँति रामायण की सीता भी 'नर वानरहि संग कहु कैसे' पूछती है। सम्मेलन की समस्या हल हो जाने पर सीता राम की दशा के विपय में प्रश्न करती है। तब हनुमान राम की विषम दशा का मार्मिक 'वर्णन करते हैं। वह कहते हैं कि हे सीता, तुम्हारे घिना राम को हिमांझु सूर्य की तरह तापकारी जान पड़ता है; नया मेघ दावानल सा प्रतीत होता है; नदियों के जल से संपृक्त वायु क्रद्ध साँप के निःश्वास सा जँचता है; कुवलय वन कुत के जंगल सा जान पड़ता है; तुम्हारे वियोग में राम के लिये यह संसार ही विपरीत हो गया; सुखदायक वस्त से भी दःख ही उत्पन्न हो रहा है :-
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दावदहन: सरद्वीचीवातः कुपितफणिनिःश्वासपवनः । नवा मल्ी भल्ली, कुवलयवनं कुंतगहनं मम त्वद्विश्लेअत् नुमुखि ! विपरीतं जगदिदम् ।। (पृ० १३२-३३ ) तुलसी ने भी यही वात हनुमान के मुख से कहलवाई है। देखिए तो कितनी घनिष्ठ समता है :- राम-त्रियोग कहेउ तब सीता। मो फहुँ सकल भए विपरीता॥ नव-तब किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निमि ससिभानू। कुत्नलय त्रिपिन कुंतवन सरिसा। बारिद तनत तेल जनु बरिसा॥ जंहि तर रहे फरत तेइ पीरा। उरग-त्वास सम त्रिविध समीरा॥
हनुमान आगे बढ़ते हैं। वे कहते हैं कि राम जी चाहते हैं कि किसी को मैं अपने दुःख्र की कहानी, प्रेम कथा सुनाकर किसी तरह दुःख से मुक्त हो जाऊँ। परंतु वह स्नेह-सार कौन जानता है? मेरा मन ही इस प्रेम ततत्त्र को जानता है; परन्तु वह तो मेरे पास नहीं। वह तो सदा तेरे समीप रहता है। प्रिये ! मैं क्या करूँ। यह प्रेम-कहानी कौन किसे कह सुनावे ? ह्ृदय का यह सच्चा रहस्य, प्रेम की यह नई कसौटी, विरह में मन की दशा कितने अच्छे शब्दों में व्यक्त की गई है :- कत्याख्याय तिकरमिमं मुकनुःो भवेयं को जानीते निभृतमुभयोगययोः स्नेहसारम्। जानात्येकं शशवरमुखि! प्रेमतत्वं मनो मे त्वामेवैतत् निरमनुगतं तलिये किं करोमि।
रामायणा में भी सरल शब्दरों के द्वारा यही रहत्य व्यक्त किया गया है :-
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कहेहु ते दुख घटि कछु होई। काहि कहौं यह जान न कोई। तत्वप्रेम कर मन अरु तोरा। जानत प्रिया एक मन मोरा। सो मन रहत सदा तोहिं पाहीं। जानु प्रीति रस इतनहिं माँहीं। और अनेक वर्णनों में भी प्रसन्नराधव की छाया रामायण में पाई जाती है। विभीषण-परित्याग तथा लक्ष्मण को शक्ति लगने पर राम के विलाप आदि का वर्ान जयदेव के ही ढंग पर किया जाता है। लंकाकाण्ड लंका युद्ध समाप्त हो गया है। सत वीरगए विजय से मत्त हो रहे हैं। इतन में पूर्वाकाश के तिलक चंद्रमा का उदय होता है। सुग्रीव, राम, लक्ष्मण हनुमान आदि के मुख से जयदेव ने चंद्रोद्य का बड़ा ही आनंददायक वर्णन कराया है। विभीषण चंद्रमा को एक पराक्रमी सिंह के रूप में देखते हैं। चंद्रमा रूपी सिंह ने अपने मयूख- रूपी नखों से अंधकार के मत्त हस्ती को चीर डाला है। हाथ के बिखरे हुए मुक्ता की तरह आकाश में तारे छिटके हैं। यह सिंह अब्र तक पूर्व दिशा रूपी गुफा के अंदर सोया हुआ था। अब उठकर वह आ्रकाश रूपी कानन में घुम रहा है। कैसा सांगोपांग रूपक है। मयूख नखर त्रुटत्तिमिर कुम्मि कुम्मस्थलो- च्छल त्तरलतार का-कनटक्री र्णमुक्ताकण: ।
स्तुपारकर-केसरी गगनकाननं गाहते।।
पूर् वर्णन के आधार पर ही तुलसीदास ने लंका के पहले सुमेरु (पृ० १५६)
पवत पर चन्द्रोदय का वर्णन किया है। देखिए इस वर्णन में पूर्व रूपक को ही अपनाया गया है :- पूरत दिसि गिरि गुहा निवासा। परम प्रताप तेजवल रासी। मच्त नाग तन कुम्भ विदारी। ससि केहरी गगन बनचारी। विधुरे नभ तल मुक्ता तारा। निसि संदरी केर सिगारा।।
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उपसंहार
जितने भाव प्रसन्नराघव तथा रामचरित मानस में अत्यन्त सदश जान पड़ते हैं, उनका वर्णन ऊपर किया गया है। लेखक का अरभिग्राय हिदी संसार के चंद्रमाके ऊपर ग्रहण लगाने का नहीं (न यह ग्रहण कभी लग सकता है), न उसका यही अभिप्राय है कि तुलसीदास पर 'अर्थापहरण' दोप लगाया जाय; बल्कि यह दिख- लाने का है कि कितनी सफाई से प्राचीन भाव अपनाए गए हैं- किस तरह तुलसीदास ने उन ग्राचीन भावों में रमशीयता पैदा कर दी है। यह काम किसी साधारण कवि का नहीं है, परन्तु किसी प्रतिभाशाली कवि की ही लेखनी का ग्रभाव है जो ग्राचीन भावों में इतनी जान डाल सकती है। महात्मा तुलसीदास ने तो स्पष्टतः अपने भावों को नाना पुराणों का निचोड़ वतलाया है। लेखक का अररभिप्राय तुलसीदास की अ्रप्रसीम विद्वत्ता दिखलाना है। कुछ लोग समभते हैं कि ये केवल भापा के ही कवि थे, अतः केवल हिंदी भापां का ही ज्ञान इन्हें था। परंतु यह कथन ठीक नहीं। तुलसीदास का संरकृत साहित्य तथा संस्कृत भापा का भी ज्ञान बहुत गहरा था। पुराण, गीता, नाटक तथा महाकाव्यों के ये अच्छे ज्ञाता थे। प्रत्येक काण्ड के आरम्भ में रचित सुन्दर पद्यों से इनका विपुल संस्कृन ज्ञान स्पष्ट ही प्रतीत होता है। इस लेख से भी इसी बात की यथेष्ट पुष्टि होती है। ये महात्मा लाग कविता करने के लिये उद्योग नहीं करते थे, चल्कि इनके भक्तिमय हृदय से आप से आप ही कविता का स्रोत निकल पड़ता था। अरसीम भगवद्भक्ति के कारण ही इनकी कविता इतनी तलस्पर्शिनी तथा मनोरंजिनी है। ऐसे ही कवियों के लिये भतृ हरि ने कहा है :- जयन्ति ते सक्टतिनः रसषसिद्धा: कवीश्षगः । नास्ति येपा यशाः काये जरामरणजं भयम्।।
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इस समय हिन्दी साहित्य संसार की परिस्थिति कुछ वड़े ही विलक्षणा ढंग की है। हर एक अंग को पुष्ट बनाने का सराहनीय प्रयन्न हर और दिखाई दे रहा है। यह अवश्य ही शुभ लक्षणा है। फिर भी एक दो चातें खटकती हैं। यह पुष्टि लगभग वैसी ही है जैसी वेतरह के व्यायाम से शरीर की होती है। कोई अंग तो खूब उभड़ आते हैं पर दूसरो में उसी तरह खून सूखने लगता है। कहीं बँगला साहित्य की नकल उतारी जा रही है, कहीं मराठी साहित्य के माल चुपचाप हजम किये जा रहे हैं, कहीं अँग्रेजी वेप भूपा से साहित्य के भी सजाने का साहस किया जा रहा है,। परिसाम क्या हो रहा है ? उपन्यासों की भर- मार है, पर उनमें उपादेय इने गिने ही हैं। गंभीर विषय पर बहुत कम लिखा जाता है। यदि लिखा भी जाता है तो ऐसा जो लेखक के वनिष्ठ मित्र ही समझ सकें। कहीं कहीं पांडित्य की पूँछ इतनी वढ़ जाती है कि चरकसंहिता सांख्य का नव-प्राप्त ग्रन्थ कहा जाता है। कविता की तो कुछ बात ही न पूँछिये। कतियों की संख्या ईश्वर-कृपा से दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है। पर कोई भैरवी की तान अला- पता है तो दूसरा उसी समय विहाग की घुन पर सिर घुनता है। दो चार पूजनीय कतियों को छोड़, हमारे अन्य घुरन्धर महारथियों को ऋपने ही लक्ष्य या उद्देश्य का पता नहां रहता। रहे कैसे, पहिले तो एक तरह का आलङ्कारिक समय था, एक तरह का नियन्त्रए था। अ्रब वह सत् कुछ है ही नहीं। हमारे कवियों को पूरा स्व्राज मिल गया है। पर आश्चर्य यह है कि उसी के फल-त्वरूप अराजकता सारे साहित्य साम्राज्य में फेल पढ़ी है। साहित्य-शास्त्रीय ग्रन्थों का और्प्रर भी विचित्र हाल है।
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इन सब गड़बड़ियों का मूल कारण है अपनी वास्तविक परिस्थिति को न जानना। 'तातस्य कृपोऽयमिति त्रवाणाः क्षारं जलं कापुरुपा: पिधन्ति' इस कहावत को चरितार्थ करते हुये जहाँ के वहाँ बैठे रहना भी कोई बुद्धिमत्ता नहीं है। फिर भी दूसरे से माँगने या उनकी चीजें हड़प करने के पहिले यह तो जानना आवश्यक ही है कि हमारे घर में क्या है और क्या नहीं है। एक -दाहरण लीजिये। मान लीजिये कि हिन्दी साहित्य के सौभाग्य से हमारे कविगण यदि कभी यह जानना चाहें कि काव्य क्या है, इसका क्या वास्तविक लक्ष्य है, इस में कैसे गुण और दोप होते हैं, तो वे कौन ग्रन्थ पढ़ें ? इसनें सन्देह नहीं कि इस समय का हिन्दी-संसार वह नहीं है जो सौ दो सौ वर्ष पहिले था। बहुत से नये भाव नये विचार आ्र्पा घुसे हैं। इतना होने पर भी कौन बुद्धिमान उन कवियों को अपने ध्येय को ठीक करने के लिये Saintsbury's History of Criticism, Schelling English Drama आदि ही पढ़ने कैर कहेगा ? उनको तो संस्कृत और हिन्दी अलद्वारों को पहिले अच्छी तरह पढ़ना चाहिये। तदनन्तर उसमें उचित परिवर्तित प्रवृत्तियों के अनुरूप अन्य आधुनिक ध्रन्थों को देखना चाहिये। पहिले ही समझ लेना कि हमारे यहाँ कुछ है ही नहीं, बड़ी भयद्वर भूल है। कुछ दिन हुए हमने हिन्दी अलद्वार-शात्त् की अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिये इसकी चर्चा एक हिन्दी के दिग्गज से चलाई। पर उन्होंने इस जोर के सूँड फटकारने की कला दिखाई कि हमारी तवीयत ही हरी हो गई। उन्होंने यों उत्तर दिया-महालय, आ्रप इसकी क्या वात चलाते हैं। यदि मेरा वश चले तो मैं इन ग्रन्थों को, लेकर गङ्गार्जी में डुधो हूँ। क्या दूर की सूझी ! यदि ऐसा भीमकम कोई करभा कर भी सके तो उससे लाभ क्या होगा? वही जानें। यहाँ तो यह समझ पड़ता है कि यदि यह अंश हिन्दी-साहित्य से निकाल बाहर किया जावे तो फिर हिन्दी-साहित्य ही कुछ न रहेगा। ऐसा सर्जीव भाग शायद ही दूसरा हो। मान लिया कि उसमें कुछ
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कुरुचि-मूलक भी थोड़ी सी सामग्री समय के प्रभाव से आ मिली है। क्या इतने ही से उसे उठाकर दूर फेंक देना चाहिये। यदि कपड़े के एक छोर पर थोड़ी सी मैल लग गई तो क्या इससे वह कपड़ा ही फाड़ डालना चाहिये। इसके अतिरिक्त साहित्य की रीति ही निराली है। यह तो समाज के हृदय का सजीव चित्र है। उस समय समाज ही वैसा था। इस समय वैसी रुचि नहीं है तो साहित्य ही स्वयं वैसा न होगा। किन्तु जिस प्रकार आज का समाज कल के समाज का आालम्बन लेकर ही अस्तित्व पा सका है, वही वात साहित्य के विपय में भी लागू है। घिलकुल नई सृष्टि तो ब्रह्मा भी नहीं कर सकते हैं; समाज के पाले-पोसे कवि और लेखक किस खेत की मूली हैं। ऋस्तु, इन्हीं बातों को विचार कर हमलोगों का ध्यान हिन्दी- अलद्वार शास्त्र की ओर आकर्पित हुआ। थोड़ी खोन से पता चल गया कि इस भूमि में बड़े बड़े खजाने गड़े पड़े हैं। क्या आश्चर्य की चात है कि जिस प्रयोजन को लक्ष्य में रखकर श्रीमान वाबू इयामसुन्दरदासजी ने तथा माननीय मिश्रवन्धुओं ने इतना अनवरत परिश्रम बहु प्रकार से किया है, उसका वास्तविक रूप बहुत कम लोगों ने समझा, तथा उस से भी कम लोगों ने उससे लाभ उठाने का प्रयत्न किया। खोज रिपोर्ट ही लीजिये। वे केवल पुस्तकालयों की शोभा घढ़ाने के लिये ही तैंयार नहीं की गई हैं। यदि कोई उन्हीं के पन्नों को एक वार उलट जांवे तो उसे अपने साहित्य का दारिद्रय-भय उतना तो न सतावेगा। रिपोर्ट में न आए हुए भी अभी अ्रनेक ग्रन्थ-रत्न छ्िपे पड़े हुए हैं। कुछ ऐसे भी हैं जिसके वारे में रिपोर्टकारों को ठीक ठीक -पता नहीं लगा है। इस निबंध में एक ऐसे ही आलक्वारिक कवि का परिचय देने का प्रयत्न किया गया है।
हिन्दीमें समीक्षा जिस तरह संसार की सच भापाओं में क्रमविकाश के नियमानुसार परस्पर कुछ न कुछ सादश्य पाये जाते हैं, उसी प्रकार सभी उपलब्ध
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और प्रौढ़ साहित्यों के भी क्रमविकाश की सीढ़ियाँ साफ-साफ भालकती हुई दिखाई पड़ती हैं। जिल तरह भाषाकी उन्नति होते होते उसमें पुष्रता- सघ प्रकार के भावो को प्रकट करने की शक्ति-प्राप्त होने लगती है, उसी तरह साहित्य में-साहित्य के प्रत्येकअ्र्प्रंगों में-साहित्य के उपचयरूप ग्रौढ़ता के सूचक नये नये ढंग भावद्योतन अथवा विचारप्रतिपादन के प्रतीत होने लगते हैं। साहित्य की किसी समय ऐसी उन्नतावस्था आती है जिसमें वह अपने स्वरूप को खोजना, अपनी शक्तियों का निर्धारित करना, तपने गुणदोषों का विवेचन करना, प्रारम्भ कर देता है। साहित्य- जीवन में यह अवस्था वड़े मेहत्त्व की है। इसका सबसे बड़ा प्रयोजन यही होता है कि वह अपने स्वरूप के विपय में निर्धारित किये गये सिद्धान्तों के अनुसार अपने हरएक अंग की परीक्षा करे और यह निश्चित करे कि उनमें कौन उपादेय और कौन अतुपादेय है। उपादेयों- में भी एक से दूसरे का तारतम्य निर्धारित करे। चह समीक्षायुग हर एक परिपकत साहित्य जगतमें कभी न कभी अवश्य लक्षित होता है। ग्रीक साहित्य में अ्रपरिस्टाटल ने इस कार्य को किस रूप से किया है, उससे उस साहित्य की कितनी श्रीवृद्धि हुई, यह उनके 'रेटारिक' और 'पोइटिक्स' नामक ग्रन्थ पढ़नेवालों को अच्छी तरह विदित है। लैटिनमें भी होरेस, किन्टिलियन आदि ने भी यही कार्य किया है। यूरोप के अन्य आरधुनिक साहित्यों में भी यह समीक्षायुग ञरपना बड़ा प्रभाव डाल चुका है। जर्मन, फ्रेध्व और अंग्रेजी भाषाओ्रं में इस विपय पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है किन्तु इन सन्न भाषाओों में लिखे हुए समीक्षासाहित्य के पर्यालोचन करने पर यही निश्चित होता है कि परिमार ही में इनका बोलवाता रहा है। कोई विशिष्ट निश्चयात्मक परिणाम देखने में नहीं आाता। जहॉ तक हम लोगों को पता लगा है, वह समीक्षाशास्त्र-साहित्यशाव्त्र तातत्विक रुपसे भारतवर्ष ही में उन्नति कर सका। क्या यह आ्ाश्र्चका विषय नहीं है कि जहाँके लोग भटपट समीक्षाहीन कह दिये
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रसिफ गोविन्द ८१ जाते हैं, उन्हीं में यह शास्त्र वास्तविफ उन्नति कर सके। धन्य है वह संस्कृत साहित्य जिसमें मम्मट ऐसे सूक्ष्म से सूक्ष्म दृष्टि से साहित्य की प्त्येक धाराओं-प्रवृत्तियों-का विश्लेपण करनेवाले उत्पन्न हुये। ध्वनि- मार्ग के उपदेशक आनन्दवर्धनाचार्य को भला कौन भूल सकता है? सघसे अन्तिम जो हम लोगों के कवि-पण्डित पण्डितराज जगन्नाथ थे, उनका भी रसगङ्गाघर ग्रन्थ अपूर्ण भी अप्रतिम है। संस्कृत भापा ओर सादित्य का भारतीय भापाओं तथा साहित्यों पर कैसा प्रभाव पढ़ा यद किसी भी विज्ञ को वतलाने की आवश्यकता नहीं। यह समीक्षा विषय दी एसा लिया जाय तो देखा जायगा कि इन भापाओं में जब इस प्रवृत्ति का जोर हुआ तब वह संस्कृत साहित्य की सदायता से ही चरितार्थ की गई। अन्य सभों से कहीं अधिक यह बात हमारे छिन्दी-साहित्य में सघ, तरह उदाहत दोती हुई प्रमाखित दोती है। यदयपि हिन्दी-साहित्य का वास्तविक इतिहास अभी भविष्य के गर्भ में है, तथापि इसके विकाश के भिन्न भिन्न क्रम साधारणतया अच्छी तरह लक्षित ोते हैं। इसमें जरा भी सन्देष नहीं कि हिन्दी साहित्य का प्रारम्भ राजपुताने के चारणों की लिखी हुई वीर-कथाओं से हुआ। जिन लोगों ने उन कथाओं को लिखा और जिने लिये वे कथाएँ लिखी गई उनके रग रग में वीर रस फड़क रहा था। इसलिये वे अपने हदय के ओोजस्वी भावों को प्रचलित भापा में प्रचलित ढंग से व्यक्त फरने में दी अपनी इतिकर्तव्यता समझते थे। यही दशा उस समय में भी रह्टी जिस समय भक्ति का समुद्र समम देश को प्लावित फर भावुकता की ऊँची ऊँची लपरें ले रदा था। भक्तों फो फलाषाजी से कया फाम ? जैसे जैसे भाव भफ्ति के उद्रेफ से उनके हृदय में प्रादुर्भूत दोते थे वैसे वैसे उनको वे सीधे सादे स्वयं उपस्थित हुये शब्दों में बिना सोड़ मरोड़ के प्रकाशित करते थे। किन्तु इन भक्तों के समय के बाद ऐसा युग आया फि रसिकता ने अपना सिफा सबके ऊपर जमा दिया। जो कविता पहिले किसी अन्य उदेश्य सिद्धि के लिये साधन सी समभी जाती धी वदी इन रसिकों के लिये आराष्य देवता फी तरह साध्य-
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स्वरूपा वन गई। हर तरह की कलावाजी, हाव भाव, मटक भटक, कविता कामिनी को सिखाई जाने लगी। जो समीक्षायुग संस्कृत साहित्य में किसी समय आरकर बहुत दिनों वर्तमान रहा वही इस समय हिन्दी साहित्य में भी आराया। किन्तु इस त्रांगमन का प्रभाव इस ओर दूसरे ही ढंग का हुआ। जिस तरह आत्म-परिचय का प्रभाव विलासी मनुष्य पर भिन्न ही प्रकार का होता है, कुछ न कुछ उसी प्रकार का प्रभाव समीक्षायुग में हिन्दी-साहित्य में लक्षित होता है। किन्तु इससे चह न समझना चाहिये कि उपादेय त्रन्थों की सृष्टि बहुत ही कम हुई। यद्यपि नायिका-भेद के ग्रन्थों का ही बढ़ा जोर शोर था, तथापि बहुत से ग्रन्थ ऐसे लिखे गये हैं जो अमूल्य रत्न के समान समझे जाने के योग्य हैं। तात्त्विक विचार से चाहे हिन्दी अलंकार त्रंथों का बहुत ही ऊँचा स्थान न हो तथापि कविता की दृष्टि से वे किसी तरह उपेक्षसीय नहीं हैं। जिन ग्रन्थों में अच्छी कविताओं के संग्रह के साथ साथ तातत्विक विचार भी मिलता है वे अ्रन्थ अ्रवश्य उच्नकोटि के माने जाने चाहियें। आज एक ऐसे ही अनुपम ग्रन्थ तथा उसके रचयिता का वर्सन यहॉ किया जाता है।
प्रस्तुत ग्रन्थ का नाम 'रसक गोविन्दानन्दघन' है इसके रचयिता रसिक गोविन्द हैं। यह पुस्तक खोज में दो त्थानों पर मिली है किन्तु विवरण में जितना और जिस तरह का परिचय देने की कृपा की गई है, उससे इस ग्रन्थ का या उसके रचयिता का वात्तविक त्वरुप कुछ भी नहीं जाना जाता। यही कारए है कि जिन ग्रन्थों में इसका उल्लेख आया है वे भी इस विपय में भ्रमपूर्ण ही मालम पढ़ते हैं छरव तक हिन्दी संसार इस उच् कोटि के कवि से अधिकांश में छभिज्ञ है और इनकी रसमयी कविता के आत्वादन से वंचित रहा है। हम लोगों को इस ग्रन्थ की एक हर्त-लिखित प्रतिलिपि कार्शी के रसिकवर पण्डित चुन्नीलाल जी वैद्य से ग्राप्त हुई है। इस विराद् ग्रन्थ को वैद्यजी ने अपने गुरु कविवर दम्पति-किशोरजी गोस्वामी
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की कृपा से प्राप्त कर स्वयं अपने हाथ से लिखा है। बड़े आ्रनन्द और सौभाग्य की बात है कि अभी भी ऐसे साहित्य प्रेमी हिन्दी जगत् में विद्यमान हैं। इस अ्रन्थ का पूर्ण परिचय देने के पहले अभी तक ग्रन्थ तथा उसके रचयिता के विषय में जो कुछ लिखाजा चुका है उसका प्रथम उल्लेख कर देना उचित जान पड़ता है।
कवि-विषयक चर्चा .हिन्दी साहित्य का इतिहास चाहे कितना अच्छा भी तैयार हो जाय तथापि ठाकुर शिवसिंहजी का उपकार हिन्दी संसार कभी नहीं भूल सकता। इस लिये पहले यह देखना चाहिये कि वह इनके विपय में क्या कहते हैं। उन्होंने गोविन्द जी कवि के नाम से नीचे लिखा पद दिया है- रँग भरी भरि भिजवत मोरि अँगिया, दुइ कर लिहेसि कनक पिचकरवा। हम सन ठनगन करत डरत नहीं, मुख सन लगवत अतर अगरवा। अस कस वसियत सुनु ननदी हो, फगुने के दिन एहि गोकुल नगरवा। मोहि तन तकत बकत पुनि मुसकत, 'रसिक गुविंद' अभिराम लँगरवा। और कहते हैं कि यह सम्बत् १७५० में उपस्थित थे'। ठाकुर साहब की कल्पना थी कि इनके कवित्त हजारा में पाये जाते हैं और बहुत करके इसी लिये उन्होंने यह समय निश्चित किया है। डाक्टर ग्रियरसन एक किसी 'रसिक गोविन्द' का नाम लेते हैं और कहते हैं कि उनके छन्द रागकल्पद्रुम में आाये हैं। इसके अनन्तर १९०६-१९०८ की रिपोर्ट
१ सिवसिह सरोज पृ० ६= और ३७० ? Modern Vernacular Literature of Hindustan No. 63S.
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८४ काव्यानुशीलन में इनका नाम आया है। रसिकगोविन्द के वारे में विवरण-लेखक यों लिखते हैं- "अलिरसिकगोविन्द-(Fl. 1800 A. D.)-He calls himself a native of Jaipur, Rajputana; though he lived at Brindaban. His father was one Saligram and his brother Balmukunda. He became a disciple of Hari Vyasa and finally settled at Brindaban." इसके अनन्तर इनके अ्रन्थों का नाम लिया गया है। वे सबके सव विजावरनिवासी वावू राम नारायण जी के यहाँ देखे गये हैं। इनमें रसिक गोविन्दानन्दघन भी है। इसकी ग्रन्थ-संख्या ४४७५ दी हुई है। इसमें से एक वाक्य के भी उद्धृत करने की कृपा नहीं की गई है१। इसी विवरण के आधार पर निम्नलिखित टिप्पसी मिश्रनन्धु- विनोद में पाई जाती है - त्रलिरसिकगोविन्द, जैपुर। त्रन्थ-[खोज-विवरण में दिये गये सातो ग्रन्थों के नाम ] कविकाल-१८५७ (सम्वत्) विवरण-हरिव्यास के शिष्य होकर वृन्दवन में रहने लगे थे। इस टिप्पणी से स्पष्ट ही विदित होता है कि रसिक गोविन्द के कोई भी ग्रन्थ माननीय मिश्र वन्धुओं के दृष्टिगत नहीं हुये थे। शिवसिंह जी के दिये हुये पढ को भी ये उदाहरण के तौर पर दे नहीं सकते थे। क्योंकि ठाकुर साहेव के काल निर्णय में भ्रम होने के कारण दोनों गोविन्द एक ही व्यक्ति हैं इस वात के निश्चित करने का इनके पास कोई साधन नहीं था। किंतु बड़े आश्वर्य की बात है कि इन लोगों ने १९१२-१९.४ की स्रोज-रिपोर्ट में आये हुये गोविन्द को देखकूर भी यह 1 Report on the Search of Hindi MSS. for 1906, 1907, 1908. २ मिश्र दन्धु विनंद, नम्बर ११३६।
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न विचार किया कि यह शिवसिंह सरोज में आये हुये तथा विनोद में निर्दिष्ट-गोविन्द कवि से अभिन्न हो सकते हैं। वे इस रिपोर्ट में इनके बारे में यों लिखते हैं१ "Govind is a new poet. He is said to have been a follower of Tatti Sect founded by Swami Hari- das, but he has begun his work with the words used by the Radha Vallabha Sect of the Vaishna- vas founded by Goswami Hit Harivansa ji. The poet's relgious preceptor was one Swami Govar- dhan Deva and he composed this work for use of his brother, Balmukund's son, Narayan. He is a poet of average merit." इसके अनन्तर 'गोविन्दानन्दघन' का विवरण दिया हुआ है। यह ग्रन्थ वृन्दावन-निवासी लाला बद्रीदास वैशय के पास देखा गया है। ग्रन्थ संख्या १५१८ लिखी हुई है। यह नहीं वतलाया गया है कि अ्रन्थ पूर्ण है या अपूर्ण। ग्रन्थसंख्या की तुलना से स्पष्ट ही विदित होता है कि यह ग्रन्थ अपूर्ण होगा। इसके वाद इस ग्रन्थ से चार छन्द उद्धृत किये गये हैं किन्तु वे सब ऐसे हैं जिनसे ग्रन्थ के वास्ततिक स्वरूप का कुछ भी पता नहीं चल सकता। विषय लिखा हुआ है- "रस नव और नायिकाभेद"! जितना ऊपर लिखा जा चुका है उतना ही रसिकगोविन्द तथा उनके ग्रन्थ का परिचय (कम से कम छपे ग्रन्थों से) अभी तक हिन्दी संसार को है। अब हम ऊपर लिखी बातों का विचार करते हैं। शिवसिंह जी ने 'शिवसिंह सरोज' में गोविन्द जी के नाम से जो 'रंग
1 Report on the Seatch of Hindt Mss. for 1912, 1913, 1914, No. 65.
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भरि भरि' इत्यादि पद दिया है वह निस्सन्देह 'रसिक गोविन्दानन्द- घन' में पाया जाता है। शृंगाररस के उद्दीपन विभावान्तर्गत जो ऋतु- वर्रन आया है, उसी में होली के प्रसङ्ग में पूर्वोक्त पद दिया हुआपर है। किन्तु शिवसिह जी ने जो समय निश्चित किया है वह भ्रमात्मक है। उनको विश्वास था कि ये वही गोविन्द हैं जिनकी कविता हजारा में आई हुई है। इसके अनुसार उन्होंने इनका काल १७५० संवत घतलाया था किन्तु मालूम पड़ता है कि ठाकुर साहेत के देखने में इनके कोई ग्रन्थ नहीं आये थे। इनके ग्रन्थों में उनके निर्माण होने का समय स्पष्टरूप से दिया हुआ है। ग्रियरसन साहव ने तो इनके बारे में कुछ लिखा ही नहीं। उनके प्रधान आधार शिवसिंह जी थे फिर वह अधिक कैसे लिखते? खोज रिपोर्ट में देश कालादि ठीक दिया हुआ है परन्तु इनका हरिव्यास का शिष्य होना जो लिखा गया है वह विल्कुल प्रमादजन्य है। उस रिपोर्ट में इनके ग्रन्थों से एक भी उद्धरण का न दिया जाना बहुत ही खटकता है। मिश्र बन्धुओं की टिप्पणी के विषय में हमें कुछ भी कहना नहीं है क्योंकि वह पूर्वोक्त रिपोर्ट का सारांश मात्र है। दूसरी रिपोर्ट जिसमें इनका नाम आया हुआ है मिश्र वन्धुओं द्वारा सम्पादित १९१२, १९१३, १९१४ की है जिसमें दिये वर्णान का यह तात्पर्य है- गोविन्द नये कवि हैं। कहा जाता है कि वे हरिदास जी द्वारा स्थापित टट्टी सम्प्रदाय के अनुयायी थे किन्तुं इन्होंने अपना ग्रन्थ उन शब्दों से प्रारम्भ किया है जिनका स्व्रामी हितहरिवंश जी के द्वारा संस्थापित राधावल्लमीय सम्प्रदाय के वैप्णव प्रयोग करते हैं। इस कवि के गुरु कोई स्वामी गोवर्धन देव थे। साधार श्रेणी के कवि थे। । ये
1 Report on the Search of Hindi MSS. for 1906, 1907, and 1908 No. 122.
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इस वर्णन में जितनी वातें कही गई हैं वे सब भी कुछ अंश में भ्रमात्मक ही हैं। इतने विवार से यही निकलता है कि रसिक गोविन्द के विषय में हिन्दी संसार को कुछ भी अभिज्ञता प्राप्त नहीं हुई है। इस लिये हम संक्षेप से उन घातों का नीचे उल्लेख करते हैं जो इनके ग्रन्थों से ज्ञात हो सकी हैं। परिचय
इनका नाम गोविन्द था परन्तु कविता में इन्होंने कहों अपने को 'रसिक गोविन्द' लिखा है और कहीं 'अलि' या 'अलि रसिक'। 'रसिक गोविन्दानन्द' के प्रारम्भ में रसिक गोविन्द अपने विपय में यों लिखते हैं :- वैष्णच रसिक गोविन्द लेखक कवि कोक काव्य करैया। सालिग्राम सुत जाति नटाणी चालमुकुन्द को भैया॥ जैपुर जन्म जुगुल पद सेवी नित्य विहार गवैया। श्री हरिव्यास प्रसाद पाय भो वृन्दाविपिन वसैया॥ पितु ै प्रतिपाल्यौ प्रकट, प्रभु ह्वै दिय निजधाम। गुरु है अभय कियो सदा, जय श्री सालिगराम ॥। रामकृष्ण सुत ज्येष्ठ पितु मोती राम अमिराम। दग्वक्षर दुखहर सुखद सफल गुनिन के धाम ।1 वानी फंठ हिये जुगल, लछिमी ता घर वास। मुख कविता फर पुस्तिका, कुन्दन तन मृदु हास।। 'लछिमन चन्द्रिका' के प्रारम्न में भी इन्होंने अपने विषय में संक्षेप से यों कहा है -- "जैपुर जन्म, माता गुमाना, बेटा सालिग्राम जी नटाी का। मोतीराम जी का भतीजा। भाई छोटा वालमुकुन्द जी का। 'रसिक गोविन्द' नामक ग्रन्थ में भी ये अपना परिचय यों देते हैं- "मानु गुमाना सुविन्द के निताजु सालिग्राम। श्री सर्वेंस्षर सरन गुरु, चास बृदावन धाम।।
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कान्यानुशील्न इन उद्त्सो से यह बात बिल्कुल लाफ तौर से सालून पड़ती है कि रसिक गोविन्द जी का जन्न राजपुताने के जयपुर नें हुआ था। इनके पिता का नान शालिमान तथा नाता का गुलाता था। जादि इनकी नवासी थी। इनके एक बड़े भाई भी थे जिनका नान बाल- सुकुन्द था तथा इनके नोतीरान नामक एक बाचा भी थे। इन्होंवे कपने को हरिव्याल के प्रसाद से वृन्दावन में रहने वाला कहा है अवश्य, परन्तु इलसे चह न सनभना चाहिये कि हरिव्यास जी इनके गुरु थे जैसा कि १९०६-१९०८ साल वाली रिमोटे में लिखा गया है। इन्होंने अपने ग्रन्थ के त्ररम्भ में जो गुरुवंश वर्णत दिया है, उतसे यह बात विल्कुल निःसन्दिग्ध हो जाती है। उस त्रंश को भी हन यहाँ दे देना उचित सनमते हैं :- जै जै जै श्री राधिका सर्वेश्वर भरी हँस। सनकादिक नारद सदा, निम्नादित्त प्रशं ।। श्री निवास विश्वपुरुषोसन विलासाचार्य श्री स्वरून नाघौ चलमद्र पत्म लरू ्यान। सीगोपाल कना देवाचारज भीतुन्दर भट्ट पझ्मनाम भ्रीउपेन्द्र रामचन्द्र सभिराम। वावन भाकण पदनाकर अवणभूरि नावव जुश्यान श्री गोपाल नलमद्र तान। गोनीनाथ केसो भ मंगल कलीर केसो श्री भह्ट श्री हरिव्यास देव शररी परसराम। परतरान हरिवंश नारायण इन्दावन सुखकरन। श्री गोविन्द गोविन्द सरन नू भी सर्वेश्वर सरन ।। भत सरु न्यान वैराग योगादि कौ लगन नग नुगन सब को जतायी। शरीमत् भागवत भली विधि कथन करि लोक को सोक संसव नहायी।
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रसिक गोविन्द
मूढ़ मोसो अघम भूलि भव भ्रमत लखि, मया करि जबर जमसे बचायौ। यह जिय जानि ब्रजवास आस धरि, दास गोविन्द रसिक सरण आयौ। लछिमन चन्द्रिका' के प्रारम्भ में भी कविवर रसिक गोविन्द ने इन्हीं वातों का संक्षेप स्पष्टरूप से दिया है :- "श्री परम उदार घरमेश्वर सरवेश्वर सर्वोपरि विराजमान। तिनकी परम्परा यह। हंस बंस सनकादिक नारद निम्वादित्य सम्प्रदाय के सिरोमनि आ्चारज श्री हरिव्यास देवजू महाराज की गादी। श्री परसराम1 देव जी। श्री हरिवंश देव जी। श्री नारायण देव जी3। श्री वृन्दावन देव जी४। श्री गोविन्द देव जी५। श्री गोविन्द सरन देव जीर, श्री सर्वेस्वर सरस देव जी" महाराज को शिष्य परम कृपापात्र वैप्णवरसिक गोविन्द कि"।
ददीक्षा-गुरु
पूर्वोक्त उद्धरणों से इस विषय में तनिक भी सन्देह नहीं रह जाता कि यह निम्बार्क सम्प्रदाय के वैष्त थे। उस सम्प्रदाय में हरिव्यास जी जी नाम के एक बड़े प्रभावशाली गुरु हुये। उन्होंने अपनी एक स्वतन्त्र गही स्थापित की। उनकी शिष्यपरम्परा में श्री सर्वेश्वर शरण देव जी नाम के एक बड़े भक्त महात्मा हुये। उन्हीं के शिष्य कवि रसिक गोविन्द थे। १९१२-१९१४ की खोज रिपोर्ट में इनके गुरु कोई स्वामी गोवर्धन देव बतलाये गये हैं। शायद यह वात नीचे उद्घुत कव्रित्त से निश्चित की गई हो :- परम उदार दुख दंद के हरनहार, सन गुनसार सदा राजत अभेव हैं।
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पूरन प्रकास वेद विद्या के निवास, . दास श्री गोविन्द जामु जग जस को न छेव है।। रसिक अनन्यवर, नागर चनुर चार, चरन कमल भवसागर के खेत हैं। जीवन हमारी कुख महल अधिकारी, ऐसे मुखकारी स्वामी गोवर्घन देव है।। इसका अन्तिम पद हमारी पुस्तक में इस प्रकार है :- जीवन हमारी, कुख् भवन अधिकारी, ऐसे सर्वेस्वर सरन सुखकारी गुरुदेव हैं। यही पाठ 'रसिक गोविन्दानन्दघन' में तथा अन्य ग्रन्थों में दिये नये वर्शन से सुसङगत मालम पड़ता है। ऊपर दी हुई गुरु परम्परा में भी स्वामी गोवर्धन देव का कहीं नाम नहीं आया। न जाने किस लेखक की कृपा से 'सर्वेश्वर शर्स' का स्थान 'गोवर्धन देव' जी को मिल गया।
समय
घड़े ही सौभाग्य की बात है कि हिन्दी के ग्रन्थकार अपने ग्रन्थों में अपना सविस्तर वर्णन दे दिया करते थे। इस से चाहे इनकी नम्रता में वट्टा भले ही लग जाय परन्तु इसका ऐतिहासिक दृष्टि से चढ़ा मदत्त्व है। संस्कृत के अधिकांश ग्रन्थकारों ने अप्रपनी स्वाभाविक निरभिमानता के कारण अपनी व्यक्तिगत चातें बहुत ही कम लिस्ती हैं। इससे संस्कृत साहित्य के इतिहास लिस्ननेवालीं को कितना कष्ट उटाना पढ़ा है; यह किसी को बतलाने की आवश्यकता नहीं। रसिक गोविन्द ने अपने करीव करीत हरएक ग्रन्थ में उसके निर्माण का काल दिया है। रसिक गोविन्दानन्द में रचना काल यों दिया है- वनु सर" वसु' समि१ अंक रवि दिन पज्चमी वसन्त रच्यी गोविन्दानन्दघन, वृन्दावन रसवन्त।।
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अर्थात् यह ग्रन्थ (सं० १८५८=१८०२ ई०) वसन्तपञ्चमी रविवार के दिन वृन्दावन में लिखा गया। यह ग्रन्थ कई ग्रन्थों के लिखने के बाद लिखा गया। 'रसिकगोविन्द' का निर्माण काल सं० १८९० है। अरपरतः इनका कविता काल विक्रम की १९ वीं शताब्दी के मध्य से प्रारंभ होकर अन्त तक चला जाता है।
ग्रन्थ
शभी तक हमको इनके नव ग्रन्थों का पता लगा है। बहुत सम्भव है कि इनके और भी ग्रन्थ हों। ऊपर दिये ग्रन्थों के रचना-काल से इनका दीर्धजीवी होना प्रमाणित है। यह लेखक भी अच्छे थे इसलिये इन्होंने अवश्य शन्य ग्रन्थों की भी रचना की होगी। ये ही ग्रन्थ जब लुप्तप्राय हो रहे हैं-हिन्दी संसार इनके नाम तक से परिचित नहीं- तो कोई आश्चर्य की घात नहीं कि वे अन्य अ्रन्थ श्रघ विस्मृति के समुद्र में डूब गये हों। इनमें से हमने केवल पांच ग्रन्थ देखे हैं। इनका सविस्तर वर्न देने के पहिले न देखे हुये ग्रन्थों के बारे में जो कुछ पता लगा है वह नीचे दिया जाता है :- (१) अष्टदेशभाषा-इस ग्रन्थ में भिन्न भिन्न आठ भापाओं के द्वारा राधाकृष्ण का शृङ्गारमय वर्णन किया गया है। रसिकगोविन्द श्र्पनेक- भापाओं के अभिज्ञ थे। यह ग्रन्थ इस अभिज्ञता का अच्छा निदर्शन है। कहा जाता है कि पख्ाबी, खड़ी बोली, पूर्वी, रेखता आदि के अच्छे पद् इसमें हैं! यह ग्रन्थ घहुत बड़ा नहीं है। इसकी ग्रन्थ- संख्या केवल ७५ है। (२) पिंगलग्रन्थ-छन्दः शास्त्र का छोटा सा अ्न्थ है। (३) समय प्रबन्ध-इस ग्रन्थ में भिन्न भिन्न ऋतुशर््ं में राधाकृप्ण की जीवनचर्या वर्षित है। यह भी ग्रन्थ छवोटा ही है। ग्रन्थ-संख्या केवल ८५ है। (५) रसिकगोविन्द-यह अलंकार का अ्रन्थ है। चन्द्रालोफ
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अथवा भापाभूपण के ढंग पर इसमें अलद्दारों का प्रतिपादन किया गया है। उससे उदाहरण के रूप में यहाँ यह दोहा दिया जाता है :- विशेषोक्ति उपजे नहीं, कारन ते जव काज। मानद मान मनावत्यौ, मानिनि मान न आाज ।। रसिकगोविन्दानन्दघन में दिये हुये लक्षण-उदाहरण से ये लक्ष तथा उदाहरण सर्वथा भिन्न हैं। वहॉ लक्षण गद्य में दिया गया है और उदाहरण खनिमिंत या अन्यरचित पद्यों में दिये गये हैं। इस ग्रन्थ में लक्षण तथा उदाहरण एक ही दोहे में दिये गये हैं। यह ग्रन्थ कवि की वृद्धावस्था में लिखा गया है औप्रर बहुत संभव है कि यह इनका अन्तिम ग्रन्थ हो। इसका रचनाकाल उन्होने यह दिया है- नभ निधि९ वसु' ससि अव्द रवि दिन पंचमी वसन्त। अर्थात् संवत् १८९०। अरपव हम उन ग्रन्थों का वर्णन करते हैं जिनको हमलोगों ने स्वयं देखा और अनुशीलन किया है :- (५) रामायण सूचनिका-इस ग्रन्थ में ३३ दोहाशं के द्वारा ककारादि क्रम से रामायण की कथा अत्यन्त संक्षेप से कही गई है। सूर्चानका में रचनाकाल नहीं दिया गया है तथापि इतना कहा जा सकता है कि यह ग्रन्थ १८५८ संवत् के पहिले लिखा गया था, क्योंकि रसिकगोविन्दानन्दघन में इसके कई दोहे उदाहरण के तौर पर पाये जाते हैं। ग्रन्थ में कवि के ऊपर कई प्रकार के नियन्त्रण होने के कारण कविता उतनी अच्छा नहीं हुई जितनी अच्छी अन्यत्र है। (६) कलिजुगरासो-इसमें १६ कवित्तों के द्वारा कलियुग के दुश्चरित्रों का चित्र सा खींचा गया है। प्रत्येक कवित्त के अ्र्प्रन्त में यह पद आाता है-"कीजिये सहाय जु कृपाल श्रीगुविन्दराय, कठिन कराल कलिकाल चलि आयो है"। हमारी पुस्तक में रचनाकाल नहीं दिया हुआ है किन्तु रिपोर्ट में इस ग्रन्थ का रचनाकाल सम्बन् १८६५ दिया
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रसिक गोविन्द
हुआ है। यह भी कहा गया है कि यह पुस्तक ग्रन्थकार के हाथ की लिखी हुई है१। किन्तु कविता की दृष्टि से यह ग्रन्थ गोविन्दानन्दुघन से पहिले का सा मालुम पड़ता है। रिपोर्ट में भूल होना कोई आश्चर्य की बात नहीं। (७) युगलरसमाधुरी -- इस पुस्तक को श्रीनिम्तरार्क पुस्तकालय, नानपारा, जिला वहराइच के पण्डिन माधवदास ब्रह्मचारी ने बिना मूल्य वितरणार्थ सम्वत् १९७२ में प्रकाशित की थी। पुस्तक बहराइच के ही घालार्क प्रेस' में छपी थी। पता नहीं कि इस समय यह पुस्तक मिलती है या नहीं। इस पुस्तक में १६ प्रष्ठ हैं। आररम्भ में आ्रनन्द- धाम श्री वृन्दावन का बड़ा ही मनोहर वर्णन है। तदनन्तर श्री राधा- कृष्ण जू की विविध ललित लीलाओं का बड़ी ही सजीव तथा सुन्दर भाषा में वर्णन किया गया है। कविता परम मनोहर है।२ (८) लद्विमन चन्द्रिका-यह ग्रन्थ अभी तक बिल्कुल ही अज्ञात है। न इसका नाम किसी रिपोर्ट में आया है और न मिश्रब्न्धुविनोद में। रसिकगोविन्दानन्दघन में जितने लक्षणा दिये हुये हैं उन्हीं का यह संग्रह है। गोविन्दानन्दघन उदाहरण के कारण बहुत बड़ा हो गया है, इसलिये उसमें आये सम्पूर्ण विषय को संक्षेप में जानने के लिये अ्रन्धकार ने यह सूचनिका स्वयं तैयार की है। इसके लिखे जाने का कारस तथा प्रसङ्ग कविवर ने ग्रन्थ के आदि में दे दिया है। बह यह है- कान्यकुब्ज जगनाथ-सुत, लछिमन लछििमनरूप। ताहित लििमन चन्द्रिका, रची गुविन्द अनून।।
₹ tat Report of Hindi MSS. for 1906,7,S No. 121 (a ) :- पन्तिम तीन ग्रन्थों की इमने 'रसषिक गोविन्द और उनकी कविता' नामक पुस्तक के परिशिष्ट रूर में बपकाया था। प्रकाशक दिन्दी प्रचारियी तभा, दलना। सं० १६=३।
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कार्शी माँहि सुनाइ तेहि, पुनि वृन्दावन आय। रामचन्द्र के व्याह में, लिखि तेहि दई पठाय। # रसिकगुविन्दानन्दघन रच्यो ग्रन्थ श्रीधाम। ताकी लछििमन चन्द्रिका, सूचनिका अभिराम ।। इसमें इसका निर्माण काल नहीं दिया हुआ है किन्तु ग्रन्थ के अन्त में समाप्ति के अनन्तर यों लिखा हुआ है :- लिखितं श्रीवृन्दावने। लेखकः त्वयं कविराजः। मिती ज्येष्ठ शुक्क प्रतिपदा भौसवार संवत् १८८६। इससे यह पता लगता है कि यह ग्रन्थ रसिकगोविन्दानन्द के २८ चर्ष वाद लिखा गया। इससे यह भी सूचित होता है कि रसिक गोविन्दानन्दघन उनके जीवित काल ही में प्रचलित हो चुका था; यहाँ तक कि उसे अच्छी तरह हृदयङ्गम करने के लिये-उसका संक्षेप लिखने के लिये ग्रन्थकार से लोगों को प्रार्थना करनी पड़ी। (९) रसिकगोविन्दानन्दघन-कविवर रसिक गोविन्द का यह सबसे बड़ा तथा प्रधान ग्रन्थ प्रतीत होता है। इसका निर्माण काल स्वयं ग्रन्थकार ने वसन्त पंचमी सन्वत् १८५८ दिया है। यह ग्रन्थ लम्बे साइज के पत्रों पर लिखा गया लगभग साढ़े चार सौ पत्रों में (अर्थात् लगभग नौ सौ पृष्टों में) समाप्त हुआ है। इस में साहित्य के लक्षणा व्यज्ञना के विचार को छोड़ अन्य सब विपयों का विशद रूप से प्राचीन कवियों के निमित तथा स्वरचित पद्यों के द्वारा ग्रतिपादन किया गया है। लक्षस जितने हैं वे सब गद्य में हैं तथा इन्हीं के घनाये हुये हैं। यह ग्रन्थ चार प्रबन्धों में विभक्त है। प्रथम प्रबन्ध में सद श्रद्गों के साथ रसों का वर्णन किया गया है। दूलरे में नायक नायिका भेद दिखाया गया है। तीसरे प्रबन्ध में काव्यदोप-विचार है और चौथे में गुणा और अलद्वारों का प्रतिपादन है। अ्रत्र हम क्रम से एक एक प्रबन्ध लेते हैं और उनके स्वरूप का रंक्षेप में परिचय देते हैं।
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ग्रन्थ का विशेष परिचय
ग्रन्थारम्भ इस कवित्त से होता है -- ललित सिंगार परिहास युत दूतीमुख विरह निवेदन में करुणा को साज है। रूठिवे में रौद्र सुरतोत्सव में वीर प्रथम प्रबुन्ध कम्प भै, विभत्स नखरद-छतको समाज है। रसनिरूपणम् अद्भुत उलटि सिंगार, सान्ति प्यार्री के मनाये बिना पी को न सुहाय कछु काज है। दंपति बिहार सदा वंदत गुविंद जाहि सेवत सरस रस-राज महराज है। इनके अनन्तर वृन्दावन की प्रशंसा में एक ऐसा रसमय छप्पय आता है जिसको यहाँ देने के लोभ को हम संवरण नहीं कर सकते। सघन कुंज अलिगु'ज पवन तहँ नरिविध सुहाई। रतन जटित भवनी अनूर जमुना वहि आई।। छ रितु, कोक संगीत राग रागिनी रति रतिपति। सन सुख साज समाज सहित सेवत अति नितप्रति॥ शरृंगार प्रेमरस सरस पुनि काल कर्म गुन कछु न डर। दंपति बिहार गोविन्द जै जै श्रीव्ृंदाविपिन वर । इसके बाद कवि ने अपने तथा गुरु के वंश का वर्सन किया है जिसको ऊपर उल्लेख किया जा चुका है। ग्रन्थ लिखने का प्रयोजन तथा नामकरण का अभिप्राय भी इसी स्थान पर उहिखित है। वह यह है- वेटा वालमुकुन्द को, श्रीनारायण नाम । रच्चो तासु हित ग्रन्थ वह, रमिक गुविद अभिराम ।।
रसिकगोविन्दानन्दवन, मुरत प्रीति परतीति। नाम गुविन्दानन्दवन, धरथौ मीत यहि रीति॥।
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यहे गुिन्दानन्द घन, नाम धस्थी यहि हेत। कददत नुनत सीखत लिखत, सब विधि आनँद देत॥। रसिकगोविन्दादिकन कृत, वह आनन्द समूह। याते नाम अनन्दघन, धर्चौ रहित प्रत्यूदद।। शब्द समुद्र अगाधि मवि, नवनिधि रस छति देत। भरत गोविन्दानन्दघन, वरपत रसिकन हेत।।
इस विषय में लछिमन चन्द्रिका में एक वात औप्रर अर््धिक कह़ी गई है। वह यह है-'रसिक गोविन्द को मित्र आनन्द घन चौवे! याते ग्रन्थ को नाम रसिक गुविन्दानन्दूघन धन्यौ।"
इसके उपरान्त मुल ग्रन्थ आररम्भ होता है। आररम्भ का थोढ़ा सा अंश वानगी के तौर पर यहाँ दिया जाता है-
"अथ रस निरूपणं-अन्थ ज्ञान-रहित जो आ्रनन्द सो रस। प्रइन· अन्य ज्ञान रहित श्रानन्द तो निद्राहू है ? उत्तर-निद्रा जड़ है, यह चैतन्य। भरत आचार्य सूत्न करना की मत-विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के जोगते रस की सिद्धि। अथ काव्यप्रकाश की मत-कारण कारज सहायक है जे लोक में इनही को नाव्य में काव्य में विभाव संचारी भाव संज्ञा है। इनके संजोग ते प्रगट हो जो स्थायी भाव, सो रस। अथ टीका कर्ता की मत तथा साहित्य दर्पण की मत-सत्त्व, त्रिशुद्ध, अखण्ड, स्वप्रकाश, आरानन्द, चिन, अ्रन्य ज्ञान नहिं संग, ब्रद्मा- स्व्रादमहोदर रस।" इसके अनन्तर अभिन गुप्ताचार्य का मत कुछ, विस्तार के साथ दिया हुआ है। यही ढंग लक्षएा करने में इन्होंने सर्वत्र रखा है। इसके अनन्तर शद्गार रस के हर एक अ्ररंग का बह्धत ही अच्छा वर्णन किया गया है। अन्य रसों का भी वर्णन श्रच्छा है किन्तु उतने विस्तार के साथ नहीं। अधिकांश उदाहर प्रसिद्ध प्राचीन कतियों के चुने हुये पद्य हैं।
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द्वितीय प्रशन्ध में नायक नायिका भेद कहा गया है। साधारस तरह नायिका भेद के ग्रन्थों में जो जो बाते रहती हैं वे सब इसमें श्र्रा गई हैं किन्तु वे सघ सूक्ष्मातिसूक्ष्म भेद जिन्हें दूरा प्रवन्ध देने में अन्य रसिक कवि लोग अपना कर्तव्य पालन समभते थे, यहाँ नहीं दिये गये हैं। यह प्रबन्ध नायक-भेद से शुरू होता है। इसके अनन्तर नायक के सह- घरों का साधारण वर्णान दिया गया है। तटुपरान्त नायिकाभेद शुरू होता है। केवल प्रधान प्रधान भेद उदाहरणों के साथ दिखाये गये हैं। इसमें भाव हावादि उदाहरणों के संग वर्णित हैं। इनका यह प्रबन्ध भी अत्युत्तम हुआ है। प्राचीन परिपाटी से प्रचलित किसी विषय को छोड़ा भी नहीं और पीछे के छिछोरे शृङ्गारी कवियों की तरह मर्यादोल्लङ्वन भी नहीं किया। उदाहरण भी अन्यत्र की तरह चुन्े हुये दिये गये हैं। इस प्रचन्ध में काव्य के दोष दिखाये गये हैं। हिन्दी अलंकार ग्रन्थों में दोष विवेचन का स्थान बहुत ही कम रहा है। दोप के एक दो अ्रन्थों का नाम सुनने में आता है किन्तु तीसरा प्रबन्ध वे सब तपरप्राप्य से हो गये हैं। यह प्रबन्ध बहुत करके काव्यप्रकाश के सप्तमोहास के आधार पर चनाया गया है। एक बात इस प्रबन्ध में बड़े मार्के की यह है कि दूसरे कवियों के दोष निकालने का बड़ा भारी सुयोग यहाँ होने पर भी ग्रन्थकार ने अपनी घड़ी ऊँची सज्जनता दिखलाई है। पहिले तो प्राचीन कवियों के दंपही कम दिखलाये हैं। जहाँ कहीं दिखाये भी rh 'to Ahe' ihd हैं तो वे ही दोप दिखलाये हैं-जो सभी को अखरने वाले हैं। कहीं कहीं तो प्राचीन ग्रन्थों में दोष के उदाहरणमें हो आये हुये पद्य दिये गये हैं। धहुत करके दोष उदाहरण में अपने ही बनाये हुये छन्द दिये हैं। और यह भी कह दिया है कि इसमें यह सुधार करने से यह निर्दोष हो जायगा। नीचे के उंदाहरण से यह बहत स्पष्ट हो जायगी :- ७
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'अरपरथ प्रसिद्धिहत-कविन के संकेत रहित पद जा विषै होइ सो प्रसिद्धिहत। कविच-आानँद के कन्द, नँद नँदन सो मिलन काज, सुन्दर्री सलोनी चली संग सखियान की। सुभग सिंगार काछे, अँग सुकुमार साछे, कुटिल कटाळैं भूकुर्टी की अँखियान की। दग अरविन्द्वर, बदन अमंद इन्दु, सरस हसवि "श्री गुविन्द" सुखदान की। वलय गरज कटि किंकणी धुकार पद, नुपूर का सोर पुनि वोर विछियान की। गरज धुकार सोर धोर ये शब्द जुद्ध के समै प्रसिद्ध हैं। यहाँ शृंगार मैं रखित कुणित नदित धुनि ऐसो कहनो उचित।" यह पद्य रसिक गोविन्द का स्वनिमित है। अथ कष्टार्थ-कवि के हृदय को अर्थ अक्षरनितें प्राप्त जहाँ नहीं होय सो कष्टार्थ।
गिरधर -- नायक अपनी नायिका जनम पाइ देखी न। रूप कुरूप लख्यौ नहीं सेज परस्पर लीन।। सेज परस्र लीन इतो पर नायक रूठौ। प्यारी लियो मनाइ लिख्यौ मजकूर अनूठौ।। कह गिरिधर कविराय, हुते दोऊ सम लायक। यह जानी नहिं परी कौन विधि रूठौ नायक।। अपार्थ-मतवारे को सौ उन्मत्त को सौ वालक को सौ वचन होय परु अररथ जाको समुझिये नंहीं, सो अपार्थ। केशव दोहा- पिये लेत नर सिन्धु को, है अति सज्जर देह। एंरावत हरि भावतो, देख्यो गरजत मेह॥
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यह दोहा केशवदास की कविप्रिया में इसी दोष के उदाहरण में आया है। इतने उदाहरणों से यह स्पष्ट मालूम पड़ जायगा कि यह प्रबन्ध भी बहुत ही उपादेय है, बल्कि यों कहना चाहिये सब से अधिक उपादेय है। अन्य विषय के तो अन्य भी अच्छे अच्छे ग्रन्थ हैं। किन्तु दोषों का इतना मार्मिक विवेचन और कहीं भी नहीं मिलता। अपने को सरस्वती का वरद पुत्र समझने वाले आजकल के कवि गए यदि इस ग्रन्थ का कुछ भी मनन करें तो हिन्दी साहित्य का कितना उपकार हो जाय। इस प्रवन्ध में गुणा, वृत्ति और अलङ्कारों का वर्णन है। गुए औ्रर वृत्ति के विवेचन में भी इन्हों ने मन्मट भट्ट के काव्यप्रकाश का ही अनुसरण किया है। इन्होंने भी माधुर्य तरज चतुर्थ प्रबन्ध प्रसाद ये ही तीन गुए माने हैं। अलंकार का भाग सबसे बड़ा है और अच्छा भी है। प्राचीन i ahd' sho to कवियों के उदाहरण भी इस प्रबन्ध में अरधिक मात्रा में दिये हुये हैं। इनके अलंकार विवेचन के सम्बन्ध में एक वात ध्यान रखने योग्य है। हिन्दी के आलंकारिकों ने चन्द्रालोक के ढंग को खूब अपनाया। वह ढंग यह है-दोहा आदि छोटे छन्द के पूर्वार्द्ध में लक्षण देना तथा उत्तरार्द्ध में उदाहरण देना। भापा-भूपण और दूलह का कविकुलकंठा- भरण इस ढंग के अच्छे नमूने हैं। रसिक गोविन्द ने इस ढंग का अनुसरण नहीं किया है। जो ढंग रसादिनिरुपण में इन्होंने रक्खा है वही ढंग अलंकारों के वर्सन में भी रक्खा है। वह यह है कि पहले गद्य में लक्षण, तदनन्तर अपने या दूसरों के पद्म में उदाहरण। ढंग भिन्न होने पर भी अलंकार के भेद इन्होंने चन्द्रालोक और कुबलयानन्द के अनुसार ही माने हैं। कहीं कहीं केशव की छाया भी स्पष्ट मालूम पड़ती है। यद्यपि इनका अधिक जोर अर्थालंकारों ही की ओरर था तथापि इन्हों ने शब्दालंकारों को भी छोड़ा नहीं है। प्रधान प्रधान सभी शब्दालंकारों का लक्षण तथा उदाहरण दिया गया है।
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यह हुआ इस ग्रन्थ का संक्षिप्त परिचय। इतने ही से अच्छी तरह समझ पड़ सकता है कि यह अ्रन्थ कितने महत्त्व का है। ग्रन्थ के महत्त्व से अ्रन्थकार की भी असाधारणता व्यञ्जित होती है। रसिक गोविन्द घड़े अच्छे विद्वान् आलंकारिक थे। इसके साथ ही साथ उनमें भावुकता और सहृदयता भी खूत थी। ऐसा कभी कभी देखा जाता है। घड़े विद्वान् उसी ही दर्जे के सहृदय कम होते हैं। और यदि भावुक हो भी गये-कविता के रसास्त्रादन में पदु भी हो गये तो भी वे स्वयं उतनी अच्छी कविता नहीं कर सकते। इनमें यह तीनों बातें सोने में सुगन्ध और मार्दव की तरह बहुत अच्छी तरह त् जुटी थीं। इस घात के निदशन के लिये उदाहरणों के साथ इनकी विशेष- ताओ्रं को हम नीचे दिखलाते हैं।
विद्वत्ा तथा आलक्कारिकता हिन्दी के लिये यह बड़े ही अभिमान की बात है कि और किसी आधुनिक भारतीय भाषाओं में इतने अलद्दार ग्रन्थ नहीं लिखे गये। तथापि यह कहना ही पड़ेगा कि इन अ्रन्थों के लिखने वालों में घहुत करके विद्वत्ता से कवित्व ही अधिक था। ये लोग शास्त्रीय विचारों में घुसना अधिक पसन्द नहीं करते थे। यही कारण है कि अधिकांश ग्रन्थ नायिका भेद और अलद्कार ही के पाये जाते हैं। ऐसे ग्रन्थकार इने गिने हैं जिन्हॉने अपने ग्रन्थ में काव्य के प्रत्येक अङ्ग पर विचार किया है। केशवदास, भिखारीदास इत्यादि महानुभावों के ग्रन्थों को छोड़कर और ग्रन्थ ऐसे देखने में नहीं आते। रसिक गोविन्द को भी इन्हीं आचार्यों की श्रेरी में रखना चाहिये। इनके रसिक- गोविन्दानन्दूघन की भी उन्हीं विशिष्ट ग्रन्थों के साथ गएना की जानी चाहिये। इन्होंने संस्कृत अलक्कारशास्त के ग्रन्थों का बहुत अच्छा अनुशीलन किया था। रस का स्वरूप चर्णान जैसी मार्मिकता से श्न्तः प्रविष्ठ होकर इन्होंने किया है वैसा जहाँ तक इमको पता है तरर किसी
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रसिक गोविन्द १०१ ने नहीं किया। काव्यप्रकाश, साहित्य-दर्पण आदि प्रसिद्ध ग्रन्थों का सारांश निकाल कर इन्होने यहाँ रख दिया है। ऊपर हम कह आये हैं कि हमारे हिन्दी आलक्कारिकों की रुचि नायिका भेद की ओर अत्यन्त अधिक रही है। शृंगार रस के विभावों के वर्णान करने में आलम्बन के तौर पर नायका नायिका का वर्णन होना अनुचित नहीं है और ऐसा ही संस्कृत के आचार्यों ने किया भी है। किन्तु केवल शृंगार की प्रवृत्ति को चरितार्थ करने के लिये स्त्र- कल्पना से नये नये भेद गढ़ना इतना उचित नहीं जँचता। हमारे रसिक गोविन्द ने इस बात का ध्यान रख कर ही द्वितीय प्रबन्ध लिखा है। इनके नायिका-वर्णन के आधार साहित्यदर्पए और रसमख्जरी मालूम पड़ते हैं। तृतीय प्रबन्ध में जो इन्होने दोपों का वर्णान किया है वह (जैसा हम ऊपर कह आये हैं) काव्य प्रकाश के आधार पर है। यह करना इनका बहुत ही समुचित प्रतीत होता है। संस्कृत साहित्य में भी मम्मटाचार्य जैसा और कोई काव्यदोष निकालने वाला नहीं निकला। किसी ने इसी के सन्वन्ध में यह फोक हँसी में कहा है :- काव्यप्रकाशो यवनः काव्याली च कुलाङ्गना। अनेन ग्रसभाकृष्टा कष्टमेपाऽसनुते दशाम्॥ गुए अलद्कार का निरुपण भी इनका अनेक प्राचीन ग्रन्थों का निष्कर्ष स्वरूप है। गुण-निरूपण में काव्यप्रकाश तथा साहित्यदर्पस की छाप स्पष्ट दिख्राई पड़ती है। उसी प्रकार अलङ्कार-वर्णन मे चन्द्रालोक तथा कुवलयानन्द की आभा साफ फलकर्ती हुई दिखाई देती 1 है। कितने स्थानों पर तो उन ग्रन्थों का अ्रविकल अनुवाद ही किया गया है। किन्तु यह अनुवाद ऐसे अनूटे ंग का हुआ है कि जिन्होंने संस्कृत ग्रन्थ नहीं देखा है, उन्हें उन में अनुवाद का तनिक भी भान नहीं हो सकता। हमारी बहुत इच्छा थी कि संस्कृत ग्रन्थों से तथा इस अ्रन्थ से उद्धरण देकर उन दोनों की समता दिखाते किन्तु ऐसा करने
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से इस प्रवन्ध के बहुत बढ़ जाने का भय है। अतः उससे हम विरत होते हैं। इन्होंने केवल शास्त्रीय बातों में ही संस्कृत ग्रन्थों का आरधार नहीं लिया बल्कि उदाहरण से बहुत कुछ सहायता ली है। इन्होंने संस्कृत के बहुत अच्छे भाव वाले श्रोकों का सरस अनुवाद कर हिन्दी साहित्य भण्डार को बढ़ाने का वड़ा स्ाघनीय प्रयत किया है। इसके निदर्शन के लिये हम एक दो उदाहरण देते हैं। विश्वनाथ कविराजने अपने साहित्य दर्पण में माधुर्य गुण के उदा- हरण में यह श्ोक दिया है :-· लताकुञ् गुञ्जन् मदवदलिपुञ्ज चपलयन्। समालिद्गन्ङ्गं द्रुततरमनद्गं प्रबलयन् मरुन्मन्दं मन्दं दलितमरविन्दं तरलयन् र जोवृन्दं विन्टन् किरति मकरन्दं दिशि दिशि ॥ रब देखिये रसिक गोविन्द ने इसका अनुवाद कैसा किया है :- करि कुञ्ज लतानिकी गुजित मंजु अन्दीन के पुज नचावतु है। अॅग अॅग भलिंगि, उतंग अनंग गुविन्द की सौ सरसावतु है। विकसे वन कंजनि सौ मिलि कै, रज रंजित हें चलि आवतु है। यद्ट मन्द समीर नहॅ दिसि वन्द सुगन्धनि के बरसावतु है। एक और दूसरा उदाहरए देखिये। विश्वनाथ कविराज ने अपने 'प्रभावती परिषय' से निम्न लिखित पद्य को लेकर साहित्य दर्पण में सुग्धा के उदाहरण में दिया है :-- टच्ते मालसमन्थरं भुवि पदं निर्याति नान्तःपुरात् नोहामं हसति, क्षणात् छलयते डीयन्त्रणां छासपि।
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रसिंक गोविन्द १०३ किञ्चिन्द्वावगभीरवक्रिमलवस्पृष्ठं मनाग्भाषते सभ्रूभङ्गमुदीक्षते प्रियकथामुह्ापयन्तीं सरीम्। रसिकगोविन्द इसका यों अ्रनुवाद करते हैं :- आलस सों मंद मंद धरा पै धरत पाय, - भीतर ते बाहिर न भावे चित चाय के। रोकति दगनि छिन छिन प्रति लाज साज, बहुत हॅसी की दीनी बानी विसराय कै।। बोलत वचन मृदु, मधुर बनाइ उर- अन्तर के भाव की गभारता जनाय कै। बात सखी सुन्दर गोविन्द की कहात तिन्है सुन्दरि चिलोकै बंक भूकुटी नचाय कै।।
सहृद्यता ऊपर के वर्णान से यह मालूम हो ही गया कि ये अलंकारशास्त्र के कैसे पण्डित थे। अब यहाँ हमें यह दिखलाना है कि यह सहृदय भी वैसे ही थे। इनके ग्रन्थ से किसी भी काव्य रसिक को साफ मालूम पड़ सकता है कि इनमें भावुकता कूट कूढ कर भरी थी। जिस तरह संस्कृत के शास्त्रीय तथा काव्य ग्रन्थों का इन्होंने अनुशीलन किया था उसी प्रकार हिन्दी के करीव करीत सब अच्छे ग्रन्थों का भली-भाँति पर्यालोचन किया था। इनके चुने हुए उदाहरणों से अच्छी तरह मालूम पड़ता है कि वह काव्यास्वादन में घड़े ही अन्तः ग्रविष्ट थे। केवल उदाहरणों की दृष्टि से भी यदि इनका वह ग्रन्थ देखा जाय, तो भी एंग्रह-ग्रन्थों में इसका स्थान बहुत ऊँचा रहेगा। नायिका भेद के अरनेक ग्रन्थ ऐसे हैं जो हिन्दी कविता के अच्छे संग्रह ग्रंथ कहे जा सकते हैं। नवीन कवि का 'सुधासर', सरदार कवि का 'शृंगार संग्रह', द्विस कवि मत्रालाल का 'शृंगारसुधाकर' आि ग्रंथ इसके अच्छे उदा- हरस हैं। इन संग्रह ग्रन्थों से इनका रतिक गोविन्दानन्द्घन किसी
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प्रकार कम नहीं है। नीचे हम अकारादि क्रम से उन कवियों का नाम देते हैं जिनकी कविता यहाँ उदाहरण के रूप में दी गई है :-
आ्रधीक श्रनन्दघन आ्रलम देव ऊधाराम देवीदास कल्याण वुरन्धर कवीन्द्र ध्रुवदास कान्ह नरोत्तम कालिदास नागरीदास काशाराम नाथ किशोर निपट कुलपति निवाज कृप्णा नन्ददास कृषपलाल नन्डुनकवि - केशव पुखी गढ़ाधर पृर्थ्वाराज गिसधर प्रसिद्ध गंग प्रहलाद घनशयाम ब्रह्म भगवन्त छत्रसिह (राजा) भवानीप्रसाद (राय) जगजीवन भूधर जयनागयस मतिराम तत्त्ववेत्ता महाकवि तुलसीदास मुकुंद
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मोतीराम श्रीपति रघुराय श्रीभद्टदेव जू रसखान सदानन्द रसिक सनेही सिरोमणि राम सुन्दर राय प्रवीन सूरति लाल सूरदास वृन्द सेनापति वेनी जू सोभ व्यास ज़ू सोमनाथ शंभू हरिदास (स्वामी) हितहरिवंश जू अत हम उन कवियों की एक एक कविता देते हैं जिनके विषय में त्र्रीयत्र बहुत कम पता है।
राम चन्दन कपूर और केसर अगर चूर कुंकुंम गुलाब भेद मृगमद गारौंगी। मौलसिरी मालती के माधवी के हार, भाँति के ललित चीर चुनि चुनि धारौंगी।। हरषि हिये कौं बाह फरकि जतावत है, 'रामजू प्रतीत मोति सॅगनि सारोगी। अंकभरि प्यारे को निसंक भाज भेंटत हो, दे जुग डरोज मैं मनोज मीड़ मारौगी। प्रहलाद् हूटि छुटि परे लाज बेदी मेरी भाल पें ते, नुक्ष पे तै मोतिन की लरी लरकति है। चूरे हूँ का कील डग भरत निकसी जाति,
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जत तब जूरे हूँ की गाँठि भरकति है । जानी न परति, परदेस पिय 'प्रहलाद' निकमि उरोजन वे भाँगी अरफति है। तनी तरकति कर चूरो चरकति, सिर सारी सरकति आँख वाई फरकति है।।
मोतीराम मूल मलयज को समूल जर जैवो अरू गुण जर जइयो या सुगन्ध सहराई कौ। फटि जइयो भूतल ते केतकी कमल कुल हूजियो भकुल सलिकुल दुखदाई कौ।। 'मोतीराभ' सुकवि मनोजमालती के हूजौ पूजी जिन निरही जन हँसाई कौ। राजवंस हंसनिको वंस निरवंस जैयो जम मिटि जैयो फलानिधि फसाई कौ।।
सोभ देखिये पियारे कान्ह सरद सुधारे सुघाधाम, उजियारे चौफी चामीकर दरसैं। चोभे चॉदि चमक चन्दौरा गुही मोतिन की, झलकति झालरें जुन्हाई जोति परसै॥ हीरसी हॅसनि हीराहार की लसाने सीधे सारि रहिसनि 'कवि सोभ' छवि सरसै। फोर फोर कलामुख चंद से सरस प्यारी वादिला सरस रूप झलाझल बरसै॥ और भी ऐसे कई कवि हैं जिनकी कविता यहाँ देने योग्य है परन्तु विस्तारभय से उन्हें यहाँ हम नहीं देते हैं।
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पुखवी कवि पुखी हिन्दी के एक बड़े अच्छे कवि हो गये हैं। उनका कोई ग्रंथ नहीं मिलता, केवल स्फुट कवित्त इधर उधर संग्रह ग्रंथों में मिलते हैं। इनके कई छन्द इस ग्रंथ में भी उदाहरण के तौर पर आये हुए हैं। उनमें से कुछ यहाँ दिये जाते हैं। सीता सुधि लै कै लंकपुरी प्रलै कै, कलधौत को जरै कै, यो समन्त घहराति है। उठति भभूफै चलैं पवन की झूर्क 'पुखी' डर कपि जू कै, सूके लहराति हैं।। अंगनिकी लपटै गगन जाइ झपटैं दपटैं दिनेस को थहर थहराति हैं। देवनि की जै की, दसकंठ के अजै की, रघुवंस के विजै की ए पताका फहराति है।। चौंथते चकोर चहुँ औोर मुख चंद जानि रहेडरि दसनि वसनि दुति संघा के। लीलि जातै वरही विलोकि बैनी व्याल गुन गुद्दी पै न होती जो कुसुम सर कंपा के।। फहै कति 'पुखी' ढिग भौंह न धनुष होती करि कैसे छॉडते अधर विम्न झंपा के। दाख केसौ झौंरा झलकति जोति जोवन की चाट जाते भौंरा जो न होती रंग चंपा के।। फेमित ऊपर हम दिखला चुके कि रसिक गोविन्द कैसे पण्डित और कैसे भावुक थे। अपरप हमें यहाँ यह दिखलाना है कि चह कवि भी ऊँचे दर्जे के थे। कवि कई प्रकार के होते हैं। कोई तो ऐसे होते हैं जिनका शब्द ही पर घड़ा जोर होता है, नाना प्रकार के अनुप्रास, यमक आरपरदि दिख- लाने में उनका पटुत्व सर्वतोगामी होता है। दूसरे प्रकार के ऋचि वे
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१०८ काव्यानुर्शीलन होते हैं जो अर्थ पर विशेप ध्यान देते हैं। उनकी कविताओं में अलं- कारों की संसृष्टि और संकर की छटा जगह जगह अरपूर्व आ्रनन्द दिया करती है। सबसे उत्तम कवि वे होते हैं जिनकी कविता में शब्द तथा अर्थ सहायक वन रस रूप व्यंग्य को अनुभवगोचर कराते हैं। ऐसे कवि बहुत विरले होते हैं। हिन्दी कवियों में इनकी संख्या और भी कम है। गोस्वामी श्री तुलसीदास जी, सूरदास जी, बिहारी आदि इस श्रेणी के अग्रगण्य कवि कहे जा सकते हैं। यदि हम कवियों की इन तीन श्रेणियों को ध्यान में रख कर रसिक गोविन्द का विचार करें तो इनका स्थान द्वितीय तथा तृतीय श्रेणी के घीच में कहीं आवेगा। इनका शब्दों पर अच्छा अधिकार था, फिर भी वे वेमतलव के यमक अनुप्रास के जुटाने में अपनी शक्ति का व्यय नहीं Nrhd ind d करते थे। अर्थ के वैचित्र्य पर इनका ध्यान अवश्य था, कहीं कहीं इनके रूपक बहुत अच्छी तरह जमे है। यह स्वभाव से ही भक्तिमय-रसमय थे, इसलिये कहीं कहीं इनकी रस में तन्मयता अवश्य झलकती है, किन्तु बहुत करके वह व्वनिरूप उत्तम व्यंग्य कहा जाने वाला रस नहीं है। यही कारण है कि हम इनको न तो कविवर बिहारी के साथ ही खड़ा करना चाहते हैं और न उनसे अत्यन्त दूर ही ले जाकर इन्हें पटकना चाहते हैं। इन्होंने रसिक गोविन्दानन्दघन तथा लछ्विमनचन्द्रिका के अ्र्न्त में अपने ग्रन्थ के अधिकारी का वर्णन किया है- फोक काव्य भाषा निपुन, काव पंडित जो होइ। जिज्ञासी हरिजन रसिक, अधिकारी है सोइ।। यह एक प्रकार से कवि रसिक गोविन्द ही का निजी वर्णन है। कोकशास्त्र की जानकारी इन्होंने अपने सघ ग्रन्थों में राधाकृष्ण के शृंगार- मय वर्णान में दिखाई है। काव्य में यह निपुण कैसे थे, इसे हम ऊपर दिखा ही चुके हैं। अब रही भाषा की निपुलता। उसमें यह निःसन्देह बहुत बढ़े चढ़े थे। 'अष्टदेश-भापा' नामक जो ग्रन्थ इन्होंने लिसा है
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उसमें तो इन्होंने अपने बहुत भाषाओं की जानकारी भलीभाँति दिखलाई ही है। 'रसिक गोविन्दानन्दुघन' में भी यत्र तत्र इन्होंने अ्न्थ भाषाओ्र्रों के उदाहरण दिये हैं। हम उनमें से एक दो नीचे देते हैं :-
पंजाबी भाषा। रोलियॉ मुक्ख लगावदाँ लाल, गुलाल अवीर उडावदां झोलियाँ। खोलियाँ गालियाँ तालियॉ दैं दाँ, करैदॉ गलीविच बोलियाँ ठोलियाँ। वोलियॉ किचि न साउड़ी जिंदि, उसी से लगी दिल प्रीति कलोलियाँ। चोलियाँ रंग 'गुनिन्द' भिजावदाँ, गावदाँ रंग रंगीलियाँ होलियाँ।
पूर्वी भाषा । रंग भरि भरि भिजवइ मोरि अॅगिया दुइ कर लिहिस कनकपिचकरवा। हम सन ठनगन करत डरत नहि नुख् सन लगवत अतर अगरवा। अस कस वसियत सुनु ननदी हो फगुन के. दिन एहि गोकुल नगरवा। मोहि तन तकत वकत पुनि मुमुफत 'रसिक नुचिन्द' अमिराम लँगरवा। इन भापाओं के उदाहरणों में यह भी देख लेना चाहिये कि जोड़- सोड़ के शब्दों पर भी इनका कितना अधिकार था। जब इतना अ्रधि- कार इन भापाओं पर था, तब त्रजभापा का कहना ही क्या। उस भापा में तो यह सघ तरह के शब्दचमत्कार दिखला सकते थे। अरनुप्रासमयी कविता का एक एक उदाहरण लीजिये।
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बुँधुराली अलक सँवारी अनियारी मोंहै कजरारी आँखे कजरारी मतवारी मै। धारी सारी जरतारी सरस किनारी वारी मालती गुही है बैनी काली सटकारी मैं। वारी वैस रूप उजियारी 'श्री गुविन्द' कहै बारी सुरनारी नरनारी नागनारी मैं। मिलन ब्रिहारी सौं दुलारी सुकुमारी प्यारी बैठी चित्रकारी की भटारी सुखकारी मै।। अब जरा कठोर अनुप्रास के भंकार का भी मजा लीजिये- भेस भयंकर जम्मजिह्न छुरी धार कत्यों खभ ते 'गोविन्द' यो नृसिंह किलकारिकै। दंत फटकटत विकट अट्टहास दाढ़ दिट्ठी त्रिज्जु छटा देती दुष्ट गवं गारिकै।। हक पक इन्द्र के, फनिन्द्र हू के सक पक्क घराहूँ घसका दीह धक पक्क धारिकै। जुद्ध करि क्रुद्ध ह्वे विरुद्धि दुरबुद्धि कौ प्रसिद्ध नखव उद्धत सों डासयो पेट फारिकै।। तरव यमक का एक उदाहरण वानगी के तौर पर यहाँ दिया जाता है। संग सखि तेरे वा दरी बादरी में काल्हि कोइ पिकवैनी बैनी बनि कारीही। मुखचन्द्र मानिनि को चन्द्रमा नीको ऐसे कहत 'गोविंद' चन्द्रमानिते उजारीही॥ कोटि उरबसी बारो और उर बसी कौन तूही उरर्सी सोइ उरधारीही। बिन कजरारी कजरारी आखें वेसरही वेसर सँवारी ही नुवेसर सँवारी ही।।
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अरब जरा शब्द श्लेष का चमत्कार देखिये :- बतियाँ मनमोहिनी मोहै 'गुविन्द' भली विधि नेह नवीन सनी। अब नीकी सचै अँगनामैं अहैं, उजियारी जगामग जोति घनी।। वर अंबर में सुप्रकाशित है, सुखमा कवि कौन पे जात भनी। कमनी नवनाल बनी सजनी, किधौ दीपिका माल रसाल बनी।। इनका शब्द पर कैसा अधिकार था यह इतने ही उदाहरणों से अच्छी तरह मालुम हो सकता है। अब इनके अर्थ के चमत्कार निरखिरये- लसत असित सित लोहित ललित तुतौं चोवा चारु अबिर गुलाल चोरि रखियाँ। छुट फलिकुटिल फटाछन को पिचकारि मन्द मन्द हॅसनि मृदङ्ग चङ्ग लखियाँ।। भाव भरी भंहे मन मोहृत 'गोविन्द' जू को वरुनि पलक वनि सोहें संग सखियाँ। होरी रंग बोरी चित चोरी की खिलारिन ये गोरी भोरी नवल किशोरी तेरी अँखियाँ। देखिये इस कवित्त में रूपक की कैसी अद्भुत छटा है। उठि प्रात अन्हात खिली भवली अरविन्दन की दरसावति है। तत ते छवि प्याररी के नैनन की चित ते न टरे अति भावति है।। मुनि हंसनि की धुनि नूपुर की धुनि फानन में मँडरावति है।
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ललि पूरन चन्द्र 'गोविन्द' कहै, सु टहै भुख की सुधि आवति है।। इस सवैया में भी त्मरसालंकार कम चमत्कार-जनक नहीं है। छब जरा सन्देहालंकार की ओर देखिये :-- फाजर की फोटरी नें, फचन की रेख किधौ, सघन घटा दमकति दुति दाभिनी। कुहु की निशा में नव दीपन की माला किधौं, दीपति रसाल 'श्रीगोविन्द' अमिरामिनी॥ सिगार की साला में सुदित मन मोहिनी कें, नीलफंज की कुटी मै कमला है कामिनी। कैधो कारी सारी मैं किसोरी गोरी भोरी आज, लाय भरी भ्राजै भाल भाँतिन सो भामिनी ।। केशव की तरह इन्होने एक 'प्रेम' नामक अलंकार माना है, उसका भी एक उदाहरण लीजिये :- साँवरे रंग रँगे नु रँगे, पुनि प्रेम पगे सो पगे ही पगे हैं। रूप अनूप समुद्र अपार, मझार षगे सो पगे पगे ही है। और कहा फहिये सजनी सुनरीक ठगे सो ठगे ही ठगे हैं। या ब्रजनन्द 'गोविन्द' की सैन सो नैन लगे सी लगेही लगे है। पब हम रस के कुछ उदारण देते हैं। शृद्ार नृगखंजन गंजन रंजन नैन सुभंजन को पुनि रेख दई। मनको सब भाँँि प्रसन फरै, चचनामृत की रचना जु नई॥ कवि गोविन्द रूप कहा लो फहे सुखमा लँग अंग अनूर ठई। नृदुशसहिं उच्र दै विय को भुव बंक विलासनि सो चितई।। हात्य खोपरि के खपरानि दिया बल्ि सभु करी फइलास मे माई। चंद अमंद किजे रसमी, रस मीस गुविन्द सौ वाति बनाई।। r
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रसिक गोविन्द ११३
नागिनी की फन की मनिदीप सिखा कै जगामग जोति जगाई। मिन्रके ऐसे चरित्र तिलोकि, उमाको हँसी न रुकी मुख भाई।।
करुण वृजचन्द सुविन्द गये जब तैं, विरदानल ताप तई सु तई। मुदरी अँगुरीन की उद्धव जृ इन कंकन रीति लई सु लई।। जलधार धरा पै परे अँखियाँ, निसि वासर नींद गई सु गई। कुच कुंकुम भीजि रही सु रही, उर पीर अनेक भई सु भई ॥
भाव श्री अवघेस कुमार तिहारे तुरंगन की अवली विचर हैं। रेत उड़ै तिन के खुर की सु चढ़े नभ पै पुनि भूपै परै हैं।। ताते भई अति गंग मैं कीच, कवी जन गोविंद यौ उच्र हैं। संकित भार न धार सकै सिव, सीस तैं धार धारा पै धरै हैं।।
अब इनके भक्तिभाव के उदाहरण देकर हम इस प्रबन्ध को समाप्त करते हैं।
स्वर्ग समुद्र सेल भूतल रसातल, पताल आदि हूँ क्यों न जनम लक्ष्यी करैं काहू जाति फाहू पॉति काहू भाँति, देखि सजन सराहै भार्वे दुरजन दस्यों करें।। पूज्य अमरनि के पुरन्दरादि देवन के, मुफ (?) सिंदासन फी सीढिन घस्पी फयें। ऐसे वृजचन्द्र श्री गुविन्द के पदारचिन्द, जी पै उर अन्तर निरन्तर 'वस्यो फरें।
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स्वर्ग को जुचाहै, सो तो स्वर्ग ही सिधारे किन, पावै किन मुक्ति जानै मुक्ति जु विचारी है। व्यावतु है ब्रह्म सो तो ब्रह्मही को व्यावौ, जावो शक्ति ही मिलौ, जानै शक्ति चित घारी है।। हौ तो श्री गुविन्द जू के पद सरविदन की, दासी सुखरासी बार बार बलिहारी है। मेरे सरबस सरवेस्वर सुजान सदा, सघन निकुंज के विद्ारी पिय प्यारी है।।
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पारिजात-हरण
(मैथिली नाटक)
मिथिला-प्रदेश भारत का एक गौरवमय प्रांत है। भारत के धार्मिक तथा दार्शनिक इतिहास में मिथिला का नाम सुवर्शाक्षरों में लिखने के योग्य है। यह वही प्रदेश है, जिसमें कर्मयोगी महाराज जनक ने निष्काम कर्म का ज्वलंत दृष्टांत संसार के सामने उपस्थित किया था। इसी प्रदेश की धूलि को जनक-नंदिनी जानकी ने अपने जन्म से पवित्र किया था। इसी देश में मैत्रेयी तथा गार्गी-जैसी त्रह्मवादिनी महिलाएँ उत्पन्न हुई थीं। याज्ञवल्क्य-जैसे स्मृतिकारों को अरपनी गोद में पालने का गौरव भी इसी भूमि को प्राप्त है। यह तो मिथिला की धार्मिक गरिमा की महिमा का परिचय है। दार्शनिक संसार में तो मिथिला का स्थान इससे भी बढ़कर है। यहाँ ऐसे-ऐसे दाशनिक सूर्य उदय हुए हैं, जिन्होंने अपनी प्रखर किरणों से अज्ञानांधकार दूर हटाकर भटकने- वाले सांसारिक जिज्ञासुओं के लिये सरल मार्ग दिखलाया है। कौन ऐसा है, जिसने न्याय-सूत्रों के रचयिता महर्षि गौतम का नाम नहीं सुना ? कॉन ऐसा संस्कृतज्ञ है, जिसके कान सर्वतंत्र-स्वतंत्र वाचस्पति मिश्न का नाम सुनकर पवित्र न हो चुके हों ? कौन ऐसा विद्वान् है, जिसने वौद्ध-मत-निरासक श्री उदयनाचार्य की यह प्रसिद्ध प्रौढ़ोक्ति न सुनी हो-
"वयमिह पदविद्यां तर्कमान्वीतिर्की वा यदि पथि विपये वा वर्तयाम: स पन्थाः;
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११६ काव्यानुशीलन
उदयति दिशि यस्यां भानुमान् सैत्र पूर्वा न हि तरणिरुदीते दिग् पराधीनवृत्िः ।" इन दार्शनिक-प्रवरों ने मिथिला-भूमि में ही जन्म लिया था। कौन ऐसा हिंदी जाननेवाला विद्वान् होगा, जिसने विद्यापति का नाम न सुना हो? विद्यापति भी इसी मिथिला के पाले-पोसे सपूत थे। इस प्रकार मिथिला स्मार्त धर्म की जननी, दार्शनिक ततत्वों की उद्धावयित्री और कोमल-कांत पदावली की गौरवमयी माता है। आज यहीं के एक विख्यात नाटक का परिचय भावुक पाठकों को दिया जाता है।
मिथिला की भापा नाटक का परिचय देने के पहले मैथिली भापा तथा मैथिल-नाटकों के विषय में कुछ कहना अनुचित न होगा। आजकल के मैथिल- विद्वान् मैथिली भापा को एक स्वतंत्र भापा मानने लगे हैं। वे उसे हिंदी-भाषा के संपर्क से कोसों दूर रखना चाहते हैं। उनकी लिपि भी देवनागरी से विलकुल जुदी है। उसमें प्रधानतः बँगला-लिपि की छाया दृष्टि-गोचर होती है। मिथिला से वंगाल के निकटवर्ती होने तथा दोनों के परस्पर घनिष्ठ संबंध से मैथिली भापा में बँगला का प्रभाव हुत अधिक दृष्टि-गोचर हो रहा है। मैथिल-पंडितों ने इसकी स्वतंत्र स्थिति सिद्ध करने के लिये 'मिथिला-मिहिर'-नामक पत्र मैथिली भाषा में ही निकाला है। परंतु भाषा-तत्त्व के प्रकांड पंडितों की यह सर्वमान्य सम्मति है कि पूर्वी हिंदी के श्ररनेक प्रभेदों-विविध घोलियों-में से मैथिली भापा भी एक है। जिस प्रकार भोजपुरी, मगही आदि बोलियाँ पूर्वी हिंदी से संबंध रखती हैं, उसी भाँति मैथिली भी एक प्रांतीय बोली है। इतना मानने के लिये हम सत् उद्यत हैं कि अन्य वोलियों में साहित्य का कहीं नामोनिशान नहीं है; परंतु मैथिली में एक समुज््वल तथा चहुमूल्य साहित्य श्रभी सुरक्षित है। अन्य घोलियों की अपेक्षा मैथिली घोलनेवालों की संख्या भी कहीं अधिक है। अतएव मैथिली को स्वतंत्र भाषा न मानकर पूर्वी हिंदी की
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एक समुन्नत वोली मानने में कोई आपत्ति नहीं देख पड़ती। यही कारण है कि विद्यापति की पदावली की भाषा को बंगालियों ने बंगला सिद्ध करने का निरंतर प्रयत्न किया, परंतु सब व्यर्थ हुआ। समय ने सिद्ध कर दिया कि पदावली की भापा हिंदी ही है, अ्रन्य नहीं।
मैथिल-नाटक नाव्य-कला का जन्मस्थान यह भारतवर्ष ही है। इसने ग्राचीन नाटक ग्रीक-भाषा में भी नहीं मिलते। संस्कृत-नाटक ही सवसे प्राचीन जान पड़ते हैं। पािनि के सूत्रों की आलोचना से जान पड़ता है कि ईसा से सात सौ वर्ष -पूर्व भारत में नाट्य-कला की अच्छी उन्नति हो चु्की थी; नान्य-शास्त्र के विषय में भी ग्रंथ तैयार हो चुके थे। पागिनि ने कृशाइत तथा शिलालि के रचे नट-सूत्रों का उल्लेख किया है। इस प्रकार यद्यपि भारत को नाट्य-कला के उद्धावक का गौरव प्राप्त है, तथापि आधुनिक भारत की राष्ट्रभापा हिंदी में थार्थ नाटकों का प्रायः अभाव ही है। यह देखकर किसी भी देशहितैपी को दुःख हुए विना न रहेगा। हिंदी के नाटक केवल उँगलियों पैर गिने जा सकते हैं। हिंदी में चथार्थ नाटक का जन्म तो अरभी, गत शताब्दी के अ्र्पंतिम भाग में ही, हुआ है। हिंदी के नाटकों में संरकृत-नाटकों से कुछ विभि- न्नता या विशेषता नहीं दृष्टिगोचर होती। सौभाग्यवश हिंदी की एक शासत्रा मैथिली में नाटक की उत्पत्ति बहुत पहले हो चुकी है। जिस नाटक की चर्चा आागे की जायगी, उसी का रचना काल ईसा की चीद- हवीं सदी का आरंभिक वर्ष है। मैथिली के नाटकों में ऐसी विशेषताएँ हैं, जो उन्हें अन्य नाटकों से सर्वथा पृथक किए हुए हैं। मैथिली भाषा का नाटक केवल एक अ्रंक में समाप होता है। पुरुष प्रायः संस्कृत
राय में ऐसे छोटे रूपकों के लिये नादरू जैसा रलायनीय नाम रसना ठीके नही। प्रम- दव वे उनो 'छायान्नाटक' के नाम से पुकारकर अपने निष्पत् दस्य का परिचय देने है। "दूनांगर'-नामरु रूपक ऐका हो प्रसिन छायान्नाटकू है।
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११८ काव्यानुशीलन में अपने हद्रत भाव को प्रकट करते हैं, और स्त्रियाँ प्राकृत में। परंतु जो कुछ गीत दिए गए हैं, और अच्छी तरह दिए गए हैं, वे सब्र मैथिली भाषा में हैं। नाटक की नायिका जो अभी प्राकृत में बोल रही थी, मैथिली में गाने लगती है। मैथिल-नाटकों की चही विशेपता है कि पात्रों की बातचीत में संस्कृत या प्राकृत का, परंतु गाने में मैथिली भाषा का प्रयोग होता है।
समालोच्य नाटक
त्रव हम प्रस्तुत विपय की ओर आाते हैं। समालोच्य मैथिल-नाटक का नाम है "पारिजातहरण"। नाटक का कथानक हरिवंश आ्रदि पुराणों में प्रसिद्ध कृष्ण-विषयक एक घटता है। संक्षेप में कथा यह है- श्रीकृष्ण वसंत की छटा निरखते हुए रुक्मिसी के साथ रैवतक-पर्वत पर टहल रहे हैं। इतने में महर्षि नारद भगवान् के दर्शन की उत्कट उत्कंश से वहाँ पधारते हैं। श्रीकृष्ण का दर्शन पाकर नारद कृतकृत्य हो जाते हैं। शह्लाद की अधिकता से महर्षि नंदन वन की शोभा बढ़ाने वाला पारिजात का फूल श्रीकृप्ण को अरपण करते हैं। कृष्ण वह सुगंधित पुष्प रुक्मिणी को सादर दे डालते हैं। इतने में कृप्ण की प्राणप्रिया दयिता सत्यभामा की दृष्टि, जो उस समय वहॉ टहलने आ्रई थी, अपने पति के इस अनुचित व्यवहार पर पड़ती है। व्यवहार के अनौचित्य से वह आरग-ववूला हो जाती है। सोचती है, कृप्ण भी बड़े छलिया हैं, मुझे तो अपनी प्रासप्रिया कहा करते हैं, पर यह अनुपम फूल रुक्मिणी को दे दिया। जब कृष्ण को सत्यभामा के रुटने की स्त्नबर मिलती है, तब वह शीघ्र ही पधारते हैं। वह इंद्र के पास पारिजात का एक फूल भेजने के लिये कहला भेजते हैं। दंद्र के अस्वीकार करने पर कृप्ण धावा वोल देते हैं। फूल लाने की कौन कहे? पारिजात का वृक्ष ही डखाड़ लाकर पटरानी सत्यभामा के आँगन में लगाया जाता है। अक्षय पुण्य की लालसा से सत्यभामा अपने
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प्राणप्यारे कृष्ण को, पेड़ के नीचे, नारद को दान में देती और फिर मूल्य देकर उन्हें खरीद लेती है। वस, नाटक की कथा इतनी ही है।
नाटककार का समय पारिजातहरण के कर्ता का नाम उमापति उपाध्याय है। संस्कृत-साहित्य में उमापतिधर का नाम कुछ अप्रसिद्ध नहीं है। यद्यपि उनका कोई काव्य अभी तक नहीं मिला है, जिससे उनकी योग्यता और कवित्व-शक्ति का पता लगे, परंतु विश्व-विख्यात गीति- काव्य गीतगोविंद के रचयिता श्रीजयदेव के 'वाचः पल्लवयत्युमापतिघरः' उल्लेख से हम उमापतिधर की समास-बहुल गौड़ीरीति का अनुमान कर सकते हैं। यह उमापतिघर सेनवंश के राजा विजयसेन के सभा-पंडित थे। उमापति की लिखी हुई एक प्रशस्ति अभी हाल में मिली है, जिसमें विजयसेन के द्वारा मिथिला के राजा नान्यदेव (१०६८ ई० -११३५) के पराजय की बात लिखी है। पर यह उमापतिधर पारि- जातहरण के कर्ता उमापति से सर्वथा भिन्न व्यक्ति हैं। इनका उल्लेख यह बताने के लिये किया गया है कि जिस नान्यदेव को विजयसेन ने हराया था, उसी की चौथी पीढ़ी में उमापति के आश्रयदाता ने जन्म लिया था। मिथिला में यह किंवदंती है कि उमापति ने नान्यदेव से चीथे राजा हरिदेव (या हरदेव) के शासन-काल में इस नाटक़ की रचना की। पारिजातहरण की अपरंतरंग-परीक्षा से सर्वथा इसकी पुष्टि होती है। नाटक की प्रस्तावना में सूत्रधार कहता है-"महाराज हरि हरदेव की आराज्ञा है कि उमापति के नाटक का अरभिनय किया जाय।" इससे स्पष्ट सूचित होता है कि उमापति हरिहर के आश्नय में रहते थे। हरिहर का राध्य-काल सन् १३०३ से १३२३ तक है। अरप्रतएव उमापति के आर्प्रविर्भात का समय भी चौदहवीं सदी का प्रथम चत- र्थाशा है। इतिहास से उपर्युक्त कथन की सर्वथा पुष्टि होती है। उमा. पति के समय में मुहदम्मद तुरालक दिल्ली का वादशाह था। उसने वंगाल
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पर चढ़ाई करके उसे अपने अधिकार में कर लिया। वंगाल जाते समय मिथिला से होकर जाना पड़ता है। इतिहास वंगाल पर विजय प्राप्त करने की कथा को शेचक शब्दों में उच्च स्वर से पुकारकर कह रहा है; परंतु मिथिला के बारे में वह सरवथा मौन है। संभव है, बंगाल में जैसी सफलता मुहम्मद तुगलक को प्राप्त हुई, वैसी मिथिला में न प्राप्त हुई हो। बहुत संभव है कि मिथिलानरेश के हाथों दिल्ली की सेना को पराजय सहनी पड़ी हो। पारिजातहरण से इस दूसरी संभावना की सत्यता सिद्ध होती है। उमापति ने हरिहरदेव को 'यवन-वनच्छे- दन कराल करवाल' (मुसलमानों के वन काटनेवाली भयंकर तलवार) बतलाया है। अतः यद्यपि यह कथन आश्नित कवि की अत्युक्ति सा जँचता है, परंतु इस अत्युक्ति का आधार कोई वास्तविक घटना अ्रवश्य होगी। संभव है, तुग़लक की सेना पर हरिहरदेव ने कुछ विजय पाई हो। यद्यपि पठानसम्राट् की विशाल, वंग-विजयिनी सेना के एक प्रांतीय नरेश द्वारा पराजित किए जाने की घात हास्यकर प्रतीत होती है, तर्थापि मिथिला-विजय के विपय में मुसलमान इतिहासकारों का मौना- वलंघन इस हास्यकर संदेह की ही पुष्टि कर रहा है। अतएव हमारे कविवर के आश्रयदाता हरिहरदेव तथा नान्यदेव से चतुर्थ मिथिला- नरेश हरदेव या हरिदेव (शायद पूरा नाम हरिहरदेव होगा) एक ही व्यक्ति हैं। तररतः पारिजातहरण की रचना चौदहवीं सदी के प्रथम चतुर्थांश में, लगभग १३२० ई० में हुई होगी।
कविता अच्छी कविता में ऐसे चुने हुए शब्द होने चाहिए, जिनसे कवि का अभीष्ट अ्पभिप्राय अनायास ही पाठकों के हृदयंगत हो जाय। अर्थ में भी कुछ वैचित्र्य होना आवश्यक है। वे शर्थ, जिनसे रस की शरभिव्यक्ति शीघ्र हो जाती है, उत्तम कविता के आ्र्प्रावश्यक साधन हैं। कचिता की आत्मा रस है; अतएव रस के बिना कविता की क़ीमत उतनी ही है, जितनी चित्र-लिखित निर्जीव ललना की।
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सात्पर्य यह कि कविता में शब्द-लालित्य, अर्थ-चमत्कार तथा रस- व्यक्ति का होना सर्वथा आवश्यक है। पारिजातहरण में कविता के आवश्यक साधन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। छोटे-छोटे परिचित शब्दों में राजव का माधुर्य भरा हुआ है। he The tho wo उसके मैथिली गीत माघुर्य से शरावोर हैं। माधुर्य के साथ-साथ प्रसाद की अधिकता सोने में सुगंध हो गई है। शब्दों का निवेश रस के अनुरूप ही है। अलंकारों की छटा खूब ही मनोमोहिनी है। हाँ, जो बनावटी अलंकारों से, बाहरी पाउडर आदि से, शोभित ललना के मुख- मंडल को ही आदर्श सौन्दर्य का निदर्शन समझते हैं, उन्हें इस कविता- कामिनी की छुटा वास्तव में आ्रकृष्ट नहीं कर सकती। परन्तु जिन्हें ललना के स्वाभाविक रूप में सुंदरता का सच्चा स्वरूप दिखाई देता है, न्हें यह कविता सचमुच मुग्ध कर देगी, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं। कष्ण के इस सुंदर चित्र पर तनिक दष्टिपात कीजिये- "सखि हे रमस रस चलु फुलवारी; तहॉ मिलल मोर मदन मुरारी। कनक मुकुटमणि भल भासा; मेरु-शिखर जनि दिनमणि बासा। सुंदर नयन, बदन सानंदा; उगल जुगल कुबलय लय चंदा। पीत बसन तनु भूबन मनी; जनि नव घन उग दामिनी। बनमाला उर उपर उदारा; अंजनि-गिरि जनि सुरसरि-धारा।" वाह कैसा सुंदर छटा है! कैसा मधुर शब्दों का निवेश है ! कल्पना की स्वाभाविता तथा नवीनता रसिकों के चित्त में कैसा आनंद- मय कौतूहल पैदा कर रही है! जान पड़ता है, वनमाली हमारी इन आँखों के सामने अपनी छटा दिखा रहे हैं! कृष्ण के पीत वसन की
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सजल नील मेघों में दमकनेवाली बिजली के साथ उपमा कितनी अनुरूप है ! कृप्साके गले में लटकनेवाली आरजानु लंबिनी माला का ध्यान कर किस सहृदय का चित्त अंजन-गिरि में घहनेवाली पवित्रसलिला सुरसरिन की उच्ज्वल धारा की नवीन उत्प्रेक्षा से सद्ः आनंद-निमग्न नहीं हो जाता ! यह तो हुआ कृष्ण की रूप छटा का अलौकिक दृश्य, अरब ज़रा रसिक पाठक कृष्ण की प्रासाप्यारी सत्यभामा की छुव्ि का दर्शन कर अपने नेत्रों को सफल कीजिए-' "देखियत चानफलाक सँदेह ; वसुधा वसि जनि तिजुली रेह। मणिमय भूषण अंग अमूल ; कनकलता जनि फूलल फूल।" कल्पना की कैसी ऊँची उड़ान है! सत्यभामा की दीप् मुखच्छटा- के सामने बिजली या चंद्रमा का सन्देह अक्िंचित्कर ही ्रतीत होता है।
विरह-दझ्चा पारिजातहरण की कविता रस से भरी हुई है। नाटक की त्रप्राव- इयकता के अनुसार कवि ने इसमें विप्रलम्भ-शृंगार का ही वर्णन किया है। सत्यभामा की विरह-दशा के वर्णन को सुनकर पत्थर का कलेजा भी पानी-पानी हो जाता है, फिर सहृदय के हृदय की तो बात ही क्या? पाठक इस वर्शन को पढ़कर स्वयं अपने सहानुभूति-पूर्ण हृदय की दशा निरखिए- "फि फहच माधव तनिक विशेशे ; अपनुहु तनु घनि पाव फलेशे। अपनुक आनन 'आारसि हेरी ; चानक भरम कोप फत वेगी। भरमहु निभ कर डर पर आनी; परसे तरस सरोकह जानो।
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चिकुर-निकर नि् नयन निहारी; जलधरजाल जानि हिय हारी। अपन वचन पिकरव अनुमाने ; हरिहरि तेहु परितेजय पराने।" वाह, गजब की विरह-दशा है! अपने ही शरीर से भय !-- आश्चर्य! दर्पण में अपना ही मुख देखकर सत्यभामा उसे चंद्र समझती और डर से काँप उठती है। अपने ही केशपाश को देखकर नील घन घटा की भ्रांति से उसका हृदय बैठ जाता है! अपने ही मधुर वचनों में कोकिला की काकली की भ्रांति हो जाती है! पाठक ही बतावें, विरह में ऐसी भ्रांति-ऐसा पागलपन-अपने प्यारे शरीर से ही भय खाना- अलौकिक नहीं है ?
उपालंभ अब जरा दूसरी ओर दृष्टि डालिए। जत्र कभी सत्यभामा को कुछ भी सुध आती है, वह छलिया कृष्ण की अनुचित करतूतों-पर शोक प्रकट करती है; कृष्ण की मीठी बातों में आकर अपना दिल दे देने के लिये, अपने को भला बुरा कहती है- "हरि सो प्रेम आस कय लाभल पावल परिभव ठामे ; जलवर छाहरि तर हम सुतलहु आतप भेल परिनामे 1 (सखि हे) मन जनु करिय मलाने; अपन करम फल हंम उपभोगव तोहे किय तेजह पराने। (्रुत्र) पुरव पिरीति रीति हुनियँ चिसख तइभो न हुनकर दोसे ; कतेक जतन धरियॅ परिपालिय साँप न मानय पोसे
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कब्हु नेह पुनि नहिं परगासन केवल फल अपमाने ; बोरि सहस दस अमिय भिजाविय कोमल न होय पखाने।" कितना मीठा उपालंभ है! गोपी-भुजंग काले कृष्ण के ऊपर थे चचन कितने फबते हैं ! गोपियों के साथ रासलीला करनेवाले कृष्ण की कितने ही यत् करने पर भी पोस न माननेवाले भुजंग के साथ उपमा क्या ही अनुरूप है! पारिजातहरण में गीतगोविंद की छाया कहीं-कहीं स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। यह गीत गीतगोविंद के गीतों के ढंग का है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि उमापति के हृदय पर जयदेव ने अधिक प्रभाव डाला है। कई स्थानों पर इस प्रभाव की भलक स्पष्ट रूप से प्रकट होती है। उमापति ही नहीं, पीछे के समग्र कृष्ण-भक्त कवियों के पदों में गीत गोविद की छाया देख पड़ती है!
मानिनी-मनावन साँवरे कृष्ण-जैसे रसिक-शिरोमणि का इस उपालंभ को भी सुनकर कानों पर हाथ रक्खे वैठे रहना कैसे संभव हो सकता था। भट आप सत्यभामा के महल में पधारे, और हाथ जोड़कर प्रियतमा को मनाने लगे -- "भाज पुरुव दिसि वहलि सगर निसि गगन मलिन मेल 'चंदा ; मुनि गेलि कुमुदनि लइअओ तोहर धनि मूनल मुख अरविदा। कमल वदन कुवलय दुह लोचन भधर मधुरि निरमाने ; सगर सरीर कुनुम तुभ सिरजल किए तु् हृदय पखाने।
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असकति कर कंकन नहिं परिहसि हृदय हार भेल भारे ; गिरि सम गरुभ मान नहिं मुंचसि 1 अपरुप तव व्यवहारे।"
कृष्ण की समझ में सत्यभामा का व्यवहार बिलकुल वेढंगा है। हृदय में सफेद मोतियों की माला तो भार-सी जान पड़ती है, परंतु गिरि के समान भारी (कठोर) मान अभी वह हृदय में छिपाए हुए है। क्या यह व्यवहार अपरूप नहीं ? इस मनावन में दूसरा पद्य तो घड़े ही मार्के का है! देखिए, कितने मीठे शब्दों में एक रमणीय भाव प्रकट किया गया है। सत्यभामा का समग्र शरीर ही कुसुममय है। मुख कमल है, आँखें कुवलय हैं, और अधर भी तो माधुर्यमय फूल है। भला इतने कोमल शरीर में भी हृदय पत्थर का बना हुआ है। सोशर्य है! इतनी मनावन से भी अभीष्ट फल होते न देखकर कृष्ण नहीं रुकनेवाले थे। फट उन्होंने मनाना छोड़कर अपना दोष ही स्वीकार कर लिया वह अब सत्यभामा के दोषों को उचित दंड देने के लिये हठ करने लग गए। भावुक पाठक, देखिए, कृष्ण के वचन कैसे चातुरी से भरे हैं! कितना सुन्दर व्यंग्य इनमें भरा हुआ है-
"मानिनि मानह जओं मोर दोसे;
भौंह -शास्ति करिभ बरु न करिय रोसे। कमान बिलोकन बाने; वेधह विधुमुखी कय समधाने। पीन पयोधर गिरिवर साघी, बाहु फाँस धनि घरु मोहि बाँघी। को परिणति भय परसनि होही; भूषन चरन कमल देह मोही।"
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वाह-वाह ! कैसे मधुरिमा-पगे व्यंग्य-वचन हैं! क्यों न हो, रसिक- शिरोकणि सॉवरे ने ही जव इन वचनों को श्रीमुख से निकाला है। कृष्ण का यह कथन कितना उचित है कि जो मुझे दोपी समझो, तो सुझे दंड दो। मैं हर तरह तैयार हूँ। हे चंद्रवदनी, अपनी कमान-रूपी भौहों से बास-सदश तीखे कटाक्ष छोड़ो। मैं उनसे विध जाने के लिये उ्द्यत हूँ। हाँ, यदि केवल वाणों से वेधना तुम्हें अभीष्ठ न हो, तो लो, मैं फाँस में बँधने के लिये भी आया हूँ। अपने भुजपाशों से मुझे जकड़ दो। कौन ऐसी मानिनी होगी, जिसका पत्थर का भी कलेजा इन वचनों से पिघल न जाय; जिसके मान की प्रवल दृढ़ ग्रंथि ढीली न पड़ जाय ? कौन ऐसा सहृदय भावुक होगा, जिसके हृदय में ये व्यंग्य चचन आनंद-पूर्ण कौतूहल की धारा न वहा देंगे? ऊपर गीतगोविंद की छाया की बात कही गई है। कविवर को यह उक्ति गीतगोविंद के एक पद्य से सूझी है। जयदेव का वह मनोहर्. पद्य यह है-
"सत्यमेवासि यदि सुदति मयि कोपिनी देहि घटय खरनखरशर घातम् ; भुजबंधनं जनय रदखंडनं येन वा भवति सुखजातम्।"
इस से श्रीकृष्णचंद्र मानिनी राधा की मानग्रंथि खोलने का यत्न कर रहे हैं। मैथिली गीति का 'बाहुफॉस धनि धरु मोहिं वाँधी' स्पष्ट ही 'घटय भुजबंधनम्' का अरप्रनुवाद जान पड़ता है। परिजातहरण की कविता का निदर्शन हो चुका। संक्षेप में, कविता रसमयी है; ठौर ठौर अनोसत्री उक्तियाँ भरी पढ़ी हैं: शब्दमाघुय के साथ-साथ प्रसाद गुए का मेल अत्यन्त आ्रनन्ददायक है। नाटक की दृष्टि से भी इसे कुछ वुरा नहीं कह सकते। वाहरी घटनाओं को न दिख्ाकर केवल पारिजातहरण की ही घटना वर्शित है। भापा की
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दृष्टि से तो यह नाटक अपना बड़ा मूल्य रखता है। कुद लोगों का ख्याल है कि विद्यापति की पदावली ही मैथिली भाषा का सव प्रथम निदर्शन है परन्तु यह नाटक इस विचार को भ्रांत सिद्ध करता है। यह नाटक विद्यापति (लगभग १४०० ई० ) से करीब ७५ वर्ष पहले लिखा गया है। अतएव भाषातत्व के पंडितों को मैथिली भाषा के शब्दों के संबंध में इस नाटक से बहुत कुछ मदद मिलेगी।
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पलटूदास इस पुण्यभूमि भारत ने न-जाने कितने भगवद्धक्तों की अरलौकिक लीलाओं को प्रत्यक्ष किया है। इसकी रज अ्रनेक महात्माओ्रं के पढ़ों का स्पर्श कर अपने को कृत्यकृत्य मानती है। इसके एक छोर से दूसरे छोर तक भक्ति में सरावोर भक्तों ने दीन संसारी जनों पर असीम नद़ारता के भाव से प्रेरित होकर ऐसी सुधामयी घानी की वर्षा की है, जिसकी सरसता में अत्र भी न तनिक फीकापन आया है, न उसके माधुर्य में कट्टुता। वल्कि ज्यों ज्यों समय बीतता जाता है, उनकी वानी मधुरता में और भी गाढ़ी बनती जाती है, उनका महत्त्व निरन्तर घढ़ता जाता है तथा उनकी सत्यतां कसौटी पर कसे जाने से और भी समुब्ज्वल दीखने लगती है। ऐसे कितने महात्मा हुए, उनकी संख्या हजारों में गिनने-योग्य है। कुछ पहुँचे हुए भक्तों की बानी तो किसी प्रकार प्रकाशित हो गयी है, परंतु अ्नेक महात्माओ्र्परं के वचन-रत्न त्रत्र भी विस्मृति के गर्त में छिपे हुए हैं। वह हमारे लिए-खासकर हिंदी- साहित्य के लिए-सौभाग्य का दिन होगा, जब समग्र महात्माओ्रं की अलोकिक वानी प्रकाशित होकर जिज्ञासु जनों के तप्त हदय को शीतल घनावेंगी। आराज ऐसे ही एक पहुँचे हुए महात्मा के दिच्ब विचार तथा रसमर्यी कविता के अनूटे कतिपच निदर्शन मनोरज्जन तथा ज्ञान-वृद्धि के लिए उपस्थित किये जाते हैं।
नीवनी इन महामक्त का नाम पलददास था। इनके जीवन की श्रनेक घटनाओं का श्रभी तक कुछ भी पता नहीं लगा है, तथापि यह निश्चित
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पलटूदात १२६ रूप से ज्ञात है कि नगपुर-जलालपुर नामक गाँव में, जो फैजाबाद जिले नें आ्राजमगढ़ की पश्चिमी सीना से मिला हुआ था, इनका जन्म एक काँदू बनिया के घर में हुआ था। उली जगह गोविंद नामक किली व्यक्ति को इन्होंने अपना गुरु बनाया तथा त्योध्याजी में आकर ये रहने लगे। तवध के नवाब शुजाउद्दौला के जमाने में ये वर्तमान थे, अ्षः अर्प्रतुमान से जान पड़ता है कि इनको हुए करीव डेढ़ सौ वर्ष हुए। इनके नाम पर पंथ चला, जिसके मानने वाले त्राज भी भारत में बहुत से मनुष्य निलेंगे। एक वनिये को नवीन मत की स्थापना करते देख कर हजारों बैरागी इनसे जलने लगे थे, जिसका वर्णन कभी कभी इनकी चानी में पाया जाता है-'सब बैरागी बटर के पलटुहिं किया त्जात'। इनकी भकि बड़े ऊँचे दर्जे की थी तथा इनका योगा -- स्याल भी प्रशंसनीच था। सिद्धान्त चे महात्मा 'सतनानी' पंध के अमूल्य होरक थे। इस पंथ के अ्रतु- सार 'सत' नाम से-प्रख्यात ब्रह्म का सतत जप, ध्यान, ननन तथा कीर्तन से-ही त्रखिविल नुकि की उपलब्धि होती है। पलदुद्ास का तिद्धांत भक्ति तथा योग को सुदढ़ भित्ति पर अवलन्तिरित है। जो निखित जगत् का नियामक परमाल्ा है, उले आप त्रपना 'प्रास- प्चारा' सममते हैं तथा अपने को उसके प्रेन के रंग में रँगी हुई 'प्रिया'। उसकी भकिभावना से-तन्मयता से जो त्रभेन अन्त में उत्पन्न हो जाता है; इन्होंने उलका वर्णन फड़कती परन्तु सीघी भाषा में किया है। पाठक, इनकी ऊँची अनुभूति पर जरा ध्यान दें। आरप कहते हैं कि में उस प्यारे की लोज नें निकली, परन्तु उसे पाकर मैं अपने ञत्तित्व को ही भूल गयी। प्रिय का ध्यान करते करते तृँगी- कीट त्याच के अनुसार में त्वयम् पिच के रूप नें बन गची, जिल प्रकार श्रन्ति में डाली गयी वत्तु स्वयम् त्राग ही वन जाती है तथा नदी सनुद्र नें मिलकर कपनी हस्ती को सो बैठती है। जब नैं रही ही नहीं,
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तो अपना सन्देशा ही कैसे सुनाऊँ ? भक्ति की तहीनता का कैसा सच्ा चित्र है- पिथ की खोजन मैं चली आपुहि गई हिराय।। आपुहि गई हिराय कवन अब कहै सँदेसा, जेकर पिय में ध्यान भई वह पिय के भेसा।। भाग माँहि जो परै सोऊ अग्नी हो जाचै, भृङ्गी-कीट को भेंटि आपु सम लेइ बनावै।। सरिता वहि के गई सिन्धु में रही समाई, शिव सक्ती के मिले नहीं फिर सक्ती आई।। पल्टू देवल कहँ कहा मत कोउ झाँकन जाय, पिय की खोजन मैं चली आपुहि गई हिराय।। इस कुण्डलिया को पढ़कर जी मचल मचलकर कहता है कि अवश्य ही पलद्दास का प्रेम आदर्श कोटि का था तथा वह केवल शब्द-मात्र न होकर वास्तविक अनुभव पर टिका था। इसे पढ़कर उस उर्दू कवि की वात भी जी में आ गड़ती है, जिसने अपने सनम की खोज में अपनी हस्ती ही भुला दी।# ऐसी ऊॅची अनुभूति ईश्वर के सतत कीर्तन से ही प्राप्त हो सकती है। पलटूदास योग के अभ्यास के भी पूरे अनुरागी थे। सतगुरु की कृपा से उस 'सत' को कहीं वाहर ती्थों में ढूँढ़ने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि वह इस काया के भीतर ही अपना डेरा डाले हुए है। केवल अन्तर्दृष्टि होनी चाहिए, फिर देखिये, वह क्यों न दिखायी देगा ? संक्षेप में उनका यही सिद्धान्त था कि उस परमपिता की प्राप्ति कोरी भक्ति से ही नहीं हो सकती, बल्कि उसके लिए तपश्चर्या की भी आ्रवश्यकता है। जब तक यह देह पवित्र नहीं हो पाया है, तब तक उसकी प्राप्ति अत्यन्त दुष्कर है। अ्तएव योग का भी आरश्रय लेना ही पड़ेगा। * उसे खोजा बहुत हमने न पाया। ऋगर पाया त खुट अपना न पाया।
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कविता
लेखक पलदूदास की कविता को अत्यन्त प्रभावशालिनी समता है। वह उसकी सरसता, सरलता तथा मधुरता की प्रशंसा किये बिना नहीं रह सकता। अधिकांश महात्माओं के उपदेश नीरस हैं। कविता की दृष्टि से उनका बहुत मूल्य नहीं है। उनमें यतिभंग है तथा शब्दों का वलात्कार मरोड़। परन्तु पलटूदास की कुण्डलियाँ कविता की दृष्टि से भी अत्यन्त महत्व की हैं। वे इतनी सरल हैं कि साधारण मनुष्य भी समझ सकता है, चोटीली ऐसी हैं कि पढ़ते पढ़ते हृदय में उन भावों की तरंग उमड़ने लगती है। उदाहरणार्थ कतिपय पद्य दिये जाते हैं। जिनको उनकी कविता का पूरा आस्वादन अ्रभीष्ट हो, वे उनकी 'बानी' तथा 'शब्द' जो सन्त-बानी-संग्रह, प्रयाग से प्रकाशित हुई हैं, अवश्य पढ़ें। प्रेम तो चकोर का ही श्लाघनीय है। वह पल भर चन्द्रमा से अपनी दृष्टि नहीं हटाता। वह चन्द्रमा के विरह में आग चुगता है। उसका चित्त चन्द्रमा में ही लगा रहता है। जिस ओर चन्द्रमा जाता है वह भी उसी ओर फिरता जाता है तथा चन्द्र के डूबने पर वह उसे आग के भीतर देखता है। मधुकर भी प्रवीण प्रेमी है, जो अपने को बँधाना पसन्द करता है, परन्तु प्रेम नहीं छोड़ता। पतंग भी दीपक पर अपनी आहुति कर देता है। उस ईश्वर के प्रति ऐसा ही सच्चा स्नेह करना चाहिए- जैसे चन्द चकोर पलक से टारत नाहीं, चुगै विरह से भाग रहै मन चन्दे मॉही। फिरै जेही दिस चन्द तेही दिस को मुख फेरै, चन्दा जाय छिपाय भाग के भीतर हेरै॥ मधुकर तजै न पझ जान से जाय बॅधावै, दीप में ज्यों पतँग प्रेम से प्रान गँवावै।। पलट्ट ऐसी प्रीति कर परधन चाहै चोर, आठ पहर निरखत रहै जैसे चन्द चकोर।।
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१३२ काव्यानुशीलन पाठकों ने सांसारिक होली तो सदा खेली है तथा नेत्रों से देख्री है। आइये, पलदवदास के साथ हम सब प्रेम की होली खेलें। यदि आ्रप इसे खेलने में आनाकानी करें, तो कम से कम इस होली का सुहावना हृश्य तो अपनी सूक्ष्म आँखों के सामने उपस्थित कीजिये- खेल सितात्री फाग तूँ बीती जाति बहार।। वीती जाति वहार सम्बत लगने पर आया, लीजै डफ्क बजाय सुभग मानुषतन पाया।। खेलो घूँघट खोल लाज फागुन में नाहों, जो कोउ करि हैं लाज, काज सपनहुँ में नाहीं।। प्रेम की भरि लै माट, सुरत की कर पिचकारी, ज्ञान अवीर बनाय, नाम की दीजै गारी।। पलटू रहना है नहीं सुनना यह संसार, खेल सिताबी०॥ अच्छी बात है; होली मजे में खेलिये, परन्तु होली खेलते समय भी इस देह की असत्यता को कभी न भूलने दीजिये। यह तो केवल वालू को भीत, घास पर की शीत तथा पानी के वीच बताशे की तरह निराशा उपजानेवाली है; इस पर भरोसा कैसा ? पलद्वदास के शब्दों में- धूँभा का धौरे हरा ज्यो बालू को भीत॥ ज्यों बालू की भीत ताहि को कौन भरोसा, ज्यों पक्का फल डार गिरत से लगे न दोक्षा।। कच्चे घड़े ज्यों नीर पानी के वीच वतासा, दारू भीतर अगिन, जीभन की ऐसी भाता । पलट्ट नरतन जात है घास के ऊर सीत, घूऑॉ का धौरे० ॥ ऐसे क्षणभंगुर जीवन में खयाली पुलाव पकाने से लाभ क्या ? हवाई महल उठाने से फायदा क्या ? आइये, कुद उपाय सोचा जाय। उपाय नजदीक ही है। यढि हम अपनी बुद्धि तथा मन को ऐसा
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शुद्ध बना दें-इनका मैला हटाकर ऐसा निर्मल कर दें-कि संसार में रहते हुए संसार की कर्मवासना रूपी दुर्गन्धि इसे मैला न बना डाले, तो इससे बढ़कर क्या चाहिए? दवा आपके पास ही है, सतगुरु आपकी सहायता के लिए हाथ फैलाये बैठे हैं। यदि इस सुयोग का लाभा न उठाया जायगा, तो 'का वर्षा जब कृषी. सुखाने' की कहावत हमपर चरितार्थ होने लगेगी। धुचिया फिर मर जायगा चादर लीजै धोय।। चादर लीजै धोय मल है बहुत समानी, चल सतगुरु के घाट भरा जहँ निर्मल पानी। चादर भई पुरान दिनौ दिन बार न कीजै, सतसंगत में सौद ज्ञान का साबुन दीजै। छूटे कलमल दाग, नाम का कलप लगावै, चलिये चाटर भोढ़, बहुरि नहिं भवजल आवै।। पलटटू ऐसा कीजिये मन नहिं भैला होय, धुब्िया फिर मर०॥ ईश्वर का अस्तित्व वाहर थोड़े ही है; किसी एक स्थान में- मन्दिर, मसजिद या गिरजे-में उस अपरिमेय का निश्चित निवास थोड़े है; वह तो प्रत्येक के अ्रन्तःकरण में सर्वदा रहता है तथा उससे एक इञ् भी जगह खाली नहीं है। जिस प्रकार फूल में सुगन्धि, काठ में आग, दूध में घी तथा मेंहदी में लाली है, उसी प्रकार इस असार संसार का सार परत्रह्म घट घट में व्याप्त है। उसे परखने की आव- श्यकता है। सांसारिक कमेले में पड़ने से भला लाभ क्या हो सकता है? पलदूदास ने इस तत्व को कितनी सरलता से व्यक्त किया है- वैरागिन भूली आपमें जल में खोजै राम।। जल में खोजै राम जाय के तीरथ छानै, भर मै चारों खूँट नहीं सुध अपनी आनै।। फूल माँहि ज्यों बास, काठ में अगिन छिपानी,
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खोदै बिन नहीं मिलै, आहि धरती में पानी।। जैसे दूध घृन छिपा छिनी मेंहदी में लाली, ऐसे पूरनब्रह्म कहू तिल भर नहिं खाली।। पलटट सतसंग बीच में करि लै अपना काम, वैरागिन भूली ॥ स्नेहीजन ही प्रेमी के तड़फड़ाते हृदय को जान सकते हैं। जिसके हृदय से कभी प्रेम की आह नहीं निकली, भला वह 'स्नेह की पीर' क्या जाने ? उस स्नेही के वियोग में जो असीम व्याकुलता होती है-अथवा नारद के शब्दों में 'तद्विस्मरणे परम व्याकुलता च' -- उसकी असलियत का पता प्रेमीजन के अनुभवप्राप्त हुद्य ही जान सकते हैं। जिसने 'आप बीती' नहीं जानी, उसे पता ही क्या लगेगा? प्रेमनान जाके लगा सो लानेगा पीर॥ सो जानेगा पीर काह मरख मे कहिचे, जामे लगे न ज्ञान ताहि से चुपके रहिये।। लाख कहै समुझाय वचन नूरख नहिं माने, तामों कहा बसाय ठान सो अबनी ठाने।। जाको जगत पियार ताहि सों भक्ति न आवै, सतसंगत से विमुख और के सन्मुख धातै।। जिनकर हिया कठोर है पलटू वसे न तीर, प्रेम वान जाके० ।। पलद्ददास कहते हैं कि ऐसी निरन्तर भक्ति करने से जीव मुक्त हो जाता है। आखिर मुक्ति है क्या? वैप्णवभक्त 'कैकर्य' (दास्य। को ही- परम पुरुषार्थ मानते हैं। इस जगत् स मुक्ति तभी मिलती है, जब यह जीच उस सकलगुएनिधान के समीप में सदा उनकी सेवा करता हुआ आानन्द लटता है। उनका किकर बनकर सुखसागर में सदा गोता मारना ही मुक्ति की उत्तम अवन्था है परन्तु पलदूदास की मुक्ति वैप्णवों का 'कैंकर्य' न होकर वेदान्तियों का 'ब्रह्मा्द्वैत' हो जाता है। जीव तथा न्रह्म
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में तनिक भी भेद नहीं। जिस प्रकार जल से तरंग उठती है, फिर भी अ्रन्त में जल में ही लीन हो जाती है, उसी भाँति यह जीव ब्रह्म से ही उत्पन्न हुआ है और यह उसीमें मिलकर एक हो जायगा-
जल सों उठत तरंग है जल ही माँहि समाय॥ जल ही माँहि समाय सोइ हरि सोई माया, अरुझा वेद पुरान नहीं काहू सुरझाया।। फूल में है ज्यों बास, काठ में आग छिपानी, दूध में है घिउ रहै नीर घट माँहि लुकानी।। जो निर्गुन सो सगुन और नहिं दूजा कोई, दूध जो कोइ कहै ताहि को पातक होई॥ 'पलटू' जीव और ब्रह्म सों भेद नहीं अलगाय, जल सों उठत तरंग है जल ही माँहि समाय ।।
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खरड ३
लो क का व्य
१-भोजपुरी-एक अनुशोलन २-गीतों की दुनिया ३-लोककाव्य में करु रस ४-लोककाव्य में ऋतुवर्शान
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(१० )
भोजपुरी-एक अनुशीलन
भोजपुरी का नामकरण बिहार प्रान्त के आरा जिले के डुमराँव नामक स्थान से १ मोल पूर्व में स्थित 'भोजपुर' नामक गाँव के कारण पड़ा है। यह डुमराँव राज्य की प्राचीन राजधानी थी। वर्तमान भोजपुर आजकल एक सामान्य गाँव होने पर भी ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी भोजपुर को विख्यात वीर आल्हा और ऊदल की जन्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है। मध्य युग में उज्जैन वंशी (उजेन) राजपूतों ने राजपूताने से आरपराकर यहाँ त्र््पपना विस्तृत राज्य क्थापित किया था। भोजपुरी न लोगों की बोली है जिनके नस नस में वीर रस का संचार रहता है, जो 'तातस्य कूपोऽयमिति ब्रुवाणणाः क्षारं जलं कापुरुषा: पिचन्ति' के गहणीय सिद्धान्त का पूर्ण तिरसकार कर अपनी पराक्रमी ुजाओं का सहारा लेते हैं और सुदूर विदेशों में भी अपने प्रवल प्रताप की पताका फहराते हैं। जिस प्रकार भारत के भाल को ऊंचा करने वाला वीर राजस्थान स्वतन्त्रता के नाम पर मर मिटने वाले अपने सपूतों के कारए से प्रसिद्ध है उसी प्रकार भोजपुर- मण्डल-शाहाबाद, बलिया, छपरा, गाजापुर, आदि जिलों को भूमि- अपने वीर निवासियों की कार्यावली से विर्यात है। भोजपुर निवासियों के रग रग में अक्खड़पन रहता है। इसका परिचय हम इस प्रसिद्ध कहावत से पाते हैं :- भागलपुर का भगेलुआ महया, कहलगाँव का ठग्ग। जो पावे भोजपुरिया तो तोरे दोनों का रग्ग॥। प्रसिद्ध भाषाविद् डा० ग्रियर्सन का यह कहना बिल्कुल ठीक है कि भोजपुरी उस उत्साही जाति की व्वावहारिक भाषा है जो परिस्थिति के
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अनुरूप अपने को बदलने के लिये सदा तैयार रहती है और जिसका प्रभाव हिन्दुस्तान के प्रत्येक भाग पर पड़ा है। हिन्दुस्तान में सभ्यता फैलाने का यश बंगालियों तथा भोजपुरियों को प्राप्त है। इस काम में बंगालियों ने अपनी कलम से काम लिया है तथा वीर भोजपुरियों ने अपने डण्डे से। भोजपुरियों की इस वीर प्रकृति में ही विरहा, लोरकी, आल्हा आदि वीररस प्रधान लोक गीतों के उत्थान का रहस्य छिपा हुआ है। अक्खड़पन को जतानेवाली लाटी के वर्णन में गिरिधर कति- राय की यह कुण्डलिया भोजपुर-निवासियों का जातीय गान स्वीकार की जाय तो कुछ अनुचित न होगा। लाठी में गुन बहुत है सदा राखिये संग। नही नार अगाह जल तहाँ तचाने अंग।। तहा तचावे अंग झपट कुचो को मारै। दुश्मन दावागीर होइ तिनहूँ को झारै।। कह गिरिधर कविराय बात बाँधा यह गॉठी। सब हथियारन छाड़ि हाथ में राखा लाठी।। विस्तार भोजपुरी का विस्तार बहुत अधिक है। इसके बोलनेवालों की संख्या मराठी भाषा के बोलनेवालों से भी अधिक है। मराठी बोलने वालों की संख्या दो करोड़ से कम है परन्तु भोजपुरी बोलने वालों की संख्या दो करोड़ से भी अधिक है। व्रज भापा के चोलने वाले केवल ८० लाख के लगभग हैं। बिहारी की तीनों बोलियों में भी भोजपुरी का ही नम्बर इस दृष्टि से पहला है। मैथिली वोलने वालों की संख्या १- करोड़ से कुछ ऊपर है और मंगही की संख्या लगभग ७० लाख के है। इस प्रकार भोजपुरी अपनी हमजोलियों से ही संख्या शरर विस्तार में अधिक नहीं है, प्रत्युत दूरस्थित अपनी वहनों-त्ज और मराठी से भी कहीं बढ़ चढ़कर है। इतना होने पर भी क्या यह कम दुःख की बात नहीं है कि इसका साहित्य अरपभी तक समृद्ध रूप में नहीं द्ीख पड़ता।
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यह अभी तक लिखित अवस्था में भी नहीं है। भोजपुरी साहित्य की अभिवृद्धि न होने का प्रधान कारण राजाश्रय का अ्परभाव है। भोजपुर मण्डल में किसी व्यापक प्रभावशाली नरपति का पता नहीं चलता। इस मण्डल में अधिकतर किसानों की ही त्रस्तियाँ हैं। किसी गुएाग्राही राजा के आश्रय न मिलने से हमारी बोली का साहित्य समृद्ध न हो सका। भोजपुरी को न तो विद्यापति ही मिले और न सूरदास ही। तब मैथिली तथा व्रजभाषा के समान इसकी वृद्धि हो तो कैसे हो ? यदि कोई प्रतिभा-सम्पन्न कवि इसे भी मिल गया होता तो स्वभाव से सरल तथा मधुर होने के कारण से इसका भी साहित्य रसिकों के गले का हार बन गया होता। परन्तु भोजपुरी के लोकगीतों को पढ़कर हन भलीभाँति कह सकते हैं कि भोजपुरी में भी माधुर्य है, हृदय को बरबस अपनी ओर खींचनेवाले भावों तथा शब्दों का मधुमय सम्मिलन है- चित्त को आनन्द-सागर में बिभोर बना देने वाले रसों का शोभन परिपाक है।
प्राचीन कवियों द्वारा भोजपुरी का प्रयोग हिन्दी के मान्य प्राचीन-काव्यों में भोजपुरी का प्रयोग मात्रा में कुछ कम नहीं है। हिन्दी के अनेक महाकवियों ने इस भाषा के शब्दों को अपनी कविता में स्थान दिया है। कबीर, जायसी तथा तुलसी की कविताओं में इस भाषा के शब्द अनेक स्थानों में बिखरे पड़े हैं। कवीर तथा तुलसी का कार्य-क्षेत्र विस्तृत भोजपुर मण्डल के अन्तर्गत ही था। कबीर तो काशी के ही निवासी थे और बाबा तुलसीदास की कर्मभूमि काशी ही थी। परन्तु जायसी तो ठेठ अवध के रहने वाले थि। उनकी भाषा में भोजपुरी शब्दों का चुनाव अवश्य ही इस भाषा के सौन्दर्य का सूचक है। कबीरदास का यह पद्य ठेठ भोजपुरी में ही लिखा गया है। कनवा फराय जोगी जटवा बढ़वलें, दांढ़ी बढ़ाय जोगी होइ गइले बकरा।
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कहहिं कबीर तुनो भाई साधो, जम दरवजवा वान्हल जइवे पकरा। जायसी की इन चौपाइयों में हमारी बोली अपना आरसन जमाये बैठी है :- सत्रै कटक मिलि गोरहि छेंका, गूँजत सिंह जाइ नहि टेका। सिंघ जियत नहिं भाप धरावा, मुये पाछ कोई घिसियावा॥ तुलसीदास के रामाचण में तो भोजपुरी का व्यापक प्रभाव स्पष्ट ही दीख पड़ता है। रामायण में ७० प्रतिशत ऐसे शब्द मिलेंगे जिनका संबंध हमारी ही बोली से है। तुलसीदास ने कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग किया है जो ठेठ भोजपुरी के हैं तथा जिनका प्रचलन भोजपुर- मण्डल को छोड़कर अन्यत्र कहीं भी नहीं है। उदाहरस के लिये 'जिमि गँव तकइ किरात किशोरी; जीवन मूरि जिमि जुगवत रहऊँ, अचल होइ अहवात तुम्हारा। जो राउर अनुशासन पाऊँ' आदि चौपाइयों में गँव ताकना, जुगवत रहना, आदि क्रियापद तथा शहिवात और राउर जैसे संज्ञा पदों का प्रयोग वही व्यक्ति कर सकता है जो हमारे गॉवों में वोली जानेवाली वोली से नितान्त परिचित हो। इन उदाहरणों से यह सिद्ध होता है कि हिन्दी के प्रार्चीन कवियों ने भोजपुरी के व्यापक प्रभाव को पहचाना था तथा उसे कविता के लिये सर्वथा उपयुक्त माना था।
भोजपुरी साहित्य
आधुनिक काल में भोजपुरी भाषा के महत्त्व की ओर विद्वानों का ध्यान आकृष्ट करनेवाले पहले व्यक्ति डाक्टर सर ग्रियर्सन थे जिन्होंने लण्डन की रायल एशियाटिक सोसाइटी की पत्रिका (जिल्द १६,१८) में तथा इण्डियन एण्टिक री (१८८५) में भोजपुरी के त्रनेक गीतों का संग्रह अंग्रेजी अनुवाद के साथ प्रकाशित किया। इस भाषा का व्याकरण भी उन्होंने वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत किया। अ्रंग्रेजी विद्वानों
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में डाक्टर वीम्स, डाक्टर हा्नली तथा सर कैम्पवेल ने इस बोली की विशेषतात्रों पर बहुत कुछ लिखा है परन्तु त्रियर्सन का प्रयत्न इस क्षेत्र में नितान्त श्राघनीय है। यह हर्ष का विषय है कि इनके प्रयत्नों से प्रेरित होकर देशी विद्वानों ने भी भोजपुरी के उद्धार का बीड़ा उठाया। साहित्य-प्रेमी मझौली नरेश लाला खङ्गवहादुर मल्ल ने 'सुधावू द' में ६० भोजपुरी-कजरियों का संग्रह किया (वाँकीपुर, १८८४) । प० रविदृत्त शुक्ल ने 'देवाक्षर चरित' नामक नाटक के अनेक दृश्य इसी वोली में निबद्ध किये हैं (बनारस १८८४ ई०) तथा 'जंगल में मंगल' नामक पुस्तक में उस समय बलिया में होने वाली घटनाओं का भोजपुरी में वर्णन किया है (वनारस १८८६ ई०)। पं० रामगरीय चौवे के 'नागरी विलाप' की त्रनेक कवितायें भोजपुरी में लिखा गई हैं (काशी १८८६ ई०)। भारतजीवन ग्रेस के स्वामी चावू रामकृष्ण वर्मा ने 'विरहा नायिका भेद' लिखकर साहित्यकों का विशेष मनोरंजन किया है। वलिया जिले के भोजपुर्री कवि पं० दूधनाथ उपाध्याय लिखित 'गोविलाप छन्दावली' और 'भरती के गीत' को जिन लोगों ने पढ़ा है वे भोजपुरी के माधुर्य को कभी भूल नहीं सकते। दुःख के साथ कहना पड़ता है कि हम भोजपुरी के मान्य कवियों को भूलते जा रहे हैं। सीवान के पास रहनेवाले लक्ष्मी सर्खी ने अ्रनेक पुस्तकों की रचना हमारी प्यारी भोजपुरी में करके हमारी साषा के महत्त्व को बढ़ाया है। इधर अ्रनेक विद्वानों ने भोजपुरी साहित्य के उद्धार का रलाघनीय प्रयत्न किया है। डा० कृष्णदेव उपाध्याय एम० ए० ने दो वहत्काय भागों में भोजपुरी साहित्य के गाम-गीतों के रूप में विस्ररे हुए रत्नों को एकत्रित कर हिन्दी-साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से प्रकाशित किया है श्री दुर्गा- शंकर प्रसाद सिंह ने 'भोजपुरी लोक गीतों में करुण-रस' नामक ग्रन्थ में भोजपुरी गीतों का अच्छा संग्रह प्रकाशित किया है। इन विद्वानों ने जो सामग्री उपत्थित की है वह भोजपुरी बोली के अनु-
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१४४ काव्यानुीलन सन्धान-कर्ताओं के लिए बहुमूल्य है। महापण्डित राहुल सांस्कृत्यायन ने भी इस वोली में दो चार छोटे नाटक लिखे हैं जो बहुत ही सुन्दर तथा आकर्षक हैं। अब भोजपुरी बोली के वैज्ञानिक अध्ययन की ओर भी अधिकारी विद्वानों की दृष्टि आकृष्ट हुई है। इस दिशा में डाक्टर उद्यनारायण त्रिपाठी एम० ए० डि2 लिट् का प्रयत्न अत्यन्त प्रशंसनीय है जिन्होंने भोजपुरी भापा का वृहत्काय तथा वैज्ञानिक व्याकरस प्रस्तुत कर हमारी वोली को महत्ता प्रदान की है। संभवतः यह पहला ही अरतसर है जन्र किसी विद्वान् को किसी प्रान्तीय वोली (डाइलेक्ट) के व्याकरण लिखने के लिये डाक्टर की उपाधि मिली हो। इसी घात से आप भोजपुरी के महत्व को स्वतः समझ सकते हैं। हम डाक्टर उद्यनारायणजी को हृदय से धन्यवाद देते हैं जिन्होंने अ्रपनी रचना से हमारी बोली को गौरवान्वित किया है। यह अ्रंथ विहार राष्ट्रभापा परिषद पटना की ओर से अप्रभी प्रकाशित हुआ् है। भोजपुरी की उपादेयता भोजपुरी ग्रामगीतों का संग्रह अत्यन्त आवश्यक है। इन गीतों के संग्रह का रुचिर परिणाम यह होगा कि हिन्दी-भाषा की शब्द- सम्पत्ति नितान्त समृद्ध होगी। हिन्दी की सर्वाङ्गीण उन्नति होने पर भी जानकारों से यह बात छिपी नहीं है कि देहाती ग्रामीण विपयों पर लिस्ने के समय लेखक को शब्दों का टोटा होने लगता है। यह ब्रात कुछ विचित्र सी जान पड़ती है पर है सोलहो आने सच्ी। अपने रोज- मर्रे के परिचित विषयों के नाम से भी हम सर्वथा अनभिज्न हैं तिशेपतः खेती वारी की चीजों से। उदाहरण के लिये कई आवश्यक शब्दों की परीक्षा कीजिए। भोजपुरी में वच्चा देने की अवस्था प्राप्त होने पर भी जो गाय बच्ना नहीं देती उसे 'कलोर' कहते हैं। गाय के तुरन्त नत्पन्न वच्चे को (जिसे वेद में धरणा कहते हैं) लेरुवा कहते हैं। गर्भवातिनी गाय का नाम है लड़ायल और वाँम गाय को कहते हैं 'घहिला'। चह वहिला शब्द भाषा की रृष्टि से संस्कृत शब्द 'बशा' के
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अनुरूप ही है। इस प्रकार गाय की विभिन्न अ्रवस्थाओं के सूचक ज़ो सार्थक शब्द भोजपुरी में उपलब्ध होते हैं इनके अनुरूप खड़ी बोली में हूँढ़ने पर भी शब्द नहीं मिलगे। अतः भोजपुरी से इन शब्दों को बिना लिये हिन्दी भाषा का भाण्डार कदापि नहीं भर सकता। इसी प्रकार से आसावती, उरेहना, चेलिक, अनुहार, सुहवा, रमझल्ला आदि भोखपुरी के ऐसे सार्थक तथा अर्थाभिव्यज्जक शब्द हैं कि इन्हें अपनाने से खड़ी बोली में व्यापकता के साथ जीवट भी आवेगा। उपर्युक्त शच्दों के अतिरिक्त भोजपुरी के मुहावरे तथा लोकोक्तियॉ इतनी अनूठी तथा भावपूर्ण हैं कि उनके व्यापक रूप से प्रयोग करने से ही हिन्दी का कल्याण निश्चित संभव है। इन्हें प्रान्तीय तथा ग्रामीण कहकर अनादर की दृष्टि से देखना उचित नहीं है। ये ग्राह्य हैं, उपेक्षसीय नहीं। इनके कतिपय उदाहरण ही पर्याप्त होंगे। एक त बुनी अपने गोर, दोसरे अइली कमरिया भोढ़। एहि कमाई पर तेल बुकवा। ए मँगमुड़ना, का ए पटिया सँवरनी। जिन बिभइली तिन तवइली, बेटा ले पड़ोसिन भंइली। शररत्र भोजपुरी बोली के कतिपय मुहावरों को देखिये :- पाताल खिलना=बहुत दूर चला जाना। फिरहिरी होना = कार्य में व्यग्र होना। लग्गा लगाना = किसी कार्य को आरम्भ करना। तरवा में आग लगना=क्रोध से आग बचूला होना। हाथे दही जमाना=सार खाने पर भी चुप रह्दना। हाथ भुलाते आना=असफल होकर लौट आना। इन सुहारों में इतनी भावव्यञ्जकता वर्तमान है कि इनकी उपेक्षा सवथा निन्दनीय है। मेरा पूरा विश्वास है कि यदि भोजपुर की इन लोकोक्तियों तथा मुहावरों का समावेश खड़ी बोली में किया जाय तो उसकी साहित्य वृद्धि होने के अतिरिक्त वह अवश्य व्यापक बन
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जायेगी। इसीलिये खड़ी बोली का भी कल्याए इसी में है कि भोजपुरी का साहित्य पनपे, कवि तथा लेखक भोजपुरी में अपनी रचना कर इसे समुन्नत तथा गौरवशाली बनावें।
भोजपुरी-साहित्य की सुपमा
भोजपुरी साहित्य के सर्वस्त्र लोकगीत हैं जो आ्रज भी इस मण्डल के नरनारियों का मनोरञ्ञन किया करते हैं। इन गीतों में चित्रित अरवस्था का संबंध ग्रम्य जीवन से है परन्तु इनमें प्रदर्शित भावों में सर्वथा नागरिकता भरी पड़ी है। इन गीतों में आरलंकारिक चमत्कार की कमी नहीं है। हिन्दी काव्य की अधिकांश उपमायें परम्परा भुक्त होने से वासी तथा फीकी लगती हैं परन्तु इन भोजपुरी गीतों की उपमायें नितान्त स्वाभाविक हैं। ये स्वच्छंद चहने वाली वायु की तरह स्वतन्त्र हैं, तो जंगल में स्वतः खिलने वाले फूलों की तरह सुन्दर हैं !- भोजपुर का यह अज्ञात कवि मुख की उपमा सूरज-ज्योति से देता है, आँख की उपमा आम की फली से, नाक की सुग्गे की ठोर से, भौहों की चढ़ी कमान से, ओठ की काटे हुए पान से, वाहों की सोने की छड़ी से, पेटकी पुरइन के पत्ते से, पीठ की धोधी के पाट से और पैरों की केले के खम्भों से। साहित्यिज्ञों से यह वतलाने की आवश्यकता कहीं कि ये सत उपमायें काव्य जगत् में तरिल्कुल अनूठी और अपूर्व हैं।
भो जपुर्रा-गीत
भोजपुरी गीतों की मधुरिमा किस साहित्यिक के मानस में आ्रनन्द की लहरी उद्वेलित नहीं करती ? भाषा का सौन्दर्य तथा भावों का सीष्ठव-किसी भी हष्टि से इनकी समीक्षा की जाय इनका स्थान उन्कोटि के काव्यों में किया जायगा। भोजपुरी मैथिली तथा बँगला की सगी वहिन है। ये तीनों ही मागध अपभ्रंश की हमजोली बेटियाँ हैं। भोजपुरी का यह शब्द-माघुर्य मागधी की देन है। मैथिली तथा
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बँगला की शब्दमाधुरी से हमारे श्रवण भलीभाँति परिचित हैं। हमारी बोली में निबद्ध काव्यों की भी ठीक यही दशा है। भोजपुरी में ढलते ही कविता में एक अद्भुत शाब्दिक मोहकता उत्पन्न हो जाती है- ऐसी मोहकता कि आस्वाद लेनेवाले रसिकों के हृदय को वरवस मस्त बनाये देती है। कर कंगन को आरसी क्या ? छपरा जिले के सुप्रसिद्ध कवि लक्ष्मी सखी का यह भजन हमारे कथन को सिद्ध करने में सरवथा समर्थ होगा :- मने मने करीले गुनावनि हो पिया परम कठोर। पाहनो पसीजि पसीजि के हो वहि चलत हिलोर ।। १ ॥ जे उठत विसय लहरिया हो छने छने में धॅधोर। तनिको ना कनखि नजरिया हो चितवत मोरे ओर ॥ २॥ भावे घरे ऑॉगन ना सेजरिया हो नाहिं लहर पटोर। बेंजन कवनो तरकरिया हो जइसे माहुर घोर॥ ३॥ तलफीलें भाठो पहरिया हो गति मति भइलो भोर। केहु ना चीन्हेला अजरिया हो त्रिनु अवध किसोर ॥४ ॥ कइसे सहीं बारी रे उमिरिया हो दुख सहज कठोर। 'लछमी सख्ी' मोरा नाहिं भावेला हो पथ भात परोर ॥ ५॥ इस गोत में शब्दों का माधुर्य जितना लुभावना है, भावों का चमत्कार भी उसी प्रकार श्लाघनीय है।
रसपरिपाक भोजपुरी गीतों में रसों का परिपाक खूत्र ही हुआ है। पुत्र जन्म के समय जो 'सोहर' गाये जाते हैं उनमें उल्लास की अभिव्यज्ञना कितनी अच्छी है। परन्तु इन गीतों में करुण रस का परिपाक विशेष मात्रा में हुआ है। इस रस की अभिव्यक्ति इन गीतों में तीन अवसरों पर विशेषरूप से होती है-विदाई, वियोग और वैधव्य। इन तीनों अ्रव- सरों पर सुखमय जीवन का अवसान हो जाता है तथा दुःख का नया अध्याय आरम्भ होता है; जीवन के वसन्त में अचानक पतभड़ शुरू हो
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जाता है। इसलिए चे तीनों अवसर मनुष्य के कोमल हृदय पर गहरी चोट करनेवाले हाते हैं। इन विषयों की जो गीत भोजपुरी में उपलब्छ होती हैं वे करुण रस की मात्रा में उत्तरोत्तर बढ़ती ही चली जाती हैं। जिस प्रकार महाकवि भवभूति की करुण कविता सुनकर वञ्र का ह्ृदय। भी टूक टूक हो जाता है और पत्थर भी रो उठता है -- अषि ग्रावा रोटित्यपि दलति चज्रत्य हृदयम्। उसी प्रकार इन गीतों को पढ़कर भी पत्थर के समान कठोर हृदय
पड़ता है- पुरुष का भी कलेजा आँसुओं के रूप में पसीज पसीजकर बाहर निकल
अॅसुशन के मग जल व्ह्ी हियो पसीज पस्ीज। अब कतिपय उदाहरणोंसे मैं इस कथन की पुष्टि करना चाहता हूँ। भोजपुर की एक सुन्दरी परदेश जानेवाले पति से विछोह के दिनों के िताने की युक्ति पूद् रही है। सुनिये यह गीत दिल पर कितनी चोट पहुँचा रहा है-
• सुगुति वताये जॉव। फवन विधि रहमो राम । (टेक) नो तुहुँ साम बहुत दिन त्रिति हें, अपनी मुरतिया मोरी व्हियॉ पर लिखाये नॉव ॥ १ ॥ जो तुहूँ साम बहुत दिन वितिहें, घिरना वोलाइ मोफो नइदर पहुँचाये लॉव ॥२॥ ओ तुहुँ साम बहुत दिन चितिहें, वहियॉ पकरि मोके गंगा भसिआाये लॉव। ३॥ इस गीत के प्रत्येक पढ से करुण रस चुआ पड़ता है। यह गीत क्या है? करुण रस की कलशी है। वियोग की आरशङ्का से उत्पन्न दुःख का इतना सरस तथा सजीव, अकृत्निम और हदयविदारक वर्णन खड़ी वोली में भी मिलना दुर्लभ है। इस गीत की सादगी पर विज्ञ आपालोचक अपने को निद्ावर कर रहा है।
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एक दूसरी विरहिणी की व्याकुलता को तो परखिये, जो प्रिय का वियोग न सहकर उसकी खोज में निकल पड़ती है और बटोहियों से उसका पता पूछती है। इस गीत में बड़ा ही लोच है-द्रुत लय है। इस 'भूमर' का पूरा स्वाद भूम भूमकर गानेवाली कलकण्ठ कामिनियों के 'कोरस' में ही मिल सकता है। विरहिी की बातें तो कान लगाकर सुनिये- आजके गइल भौंरा कहियाले लवटब, कतेक दिनवाँ हम जोहों तोरी बटिया, कतेक दिनवाँ। १। गनत गनत मोर अँगुली भइल खिियानी, चितवते दिनवॉँ नैनवाँ दुरे लोरा चितवने दिनवाँ।२। एक बने गइलीं दूसरे बने गइलीं तीसरे बनवाँ मिलल गोरू चरवहवा तीसरे बनवाँ। ३। गोरू चरवहवा तुहीं मोर भइभा कतहूँ देखल ना। मोर भँवरा परदेसिया कतहूँ. देखल ना। ४। भोजपुरी भजन भी बड़े प्रभावशाली हैं। इनमें संसार की निःसा- रता, जीवन की अरनित्यता, सम्पत्ति की क्षणभंगुरता का सुन्दर प्रति- पादन मिलता है। बूढ़ी स्त्रियां जब तीर्थयात्रा या गंगास्नान के लिए संघ बाँधकर जाती हैं, तब इन भजनों को गाया करती हैं। भजनों का कोमल भाव, वृद्धाओं के कण्ट से निकली भक्तिविह्वल ध्वनि, प्रातःकाल का सुहावना समय-ये तीनों मिलकर इन्हें इतना रसमय बना देते हैं कि सुननेवालों का हृदय इस विषय प्रप् से दूर हटकर भगवद्धक्ति के सरोवर में गोता लगाने लगता है। इन भजनों में रहस्यवाद भी पूरी मात्रा में है। गीतों में भोजपुरी का सौन्दर्य प्रस्फुटित होता है, तो 'घिरहों' में भोजपुरी का अक्खड़पन दीख पड़ता है। परन्तु इन बिरहों में सरल सुभग भावों का भी सन्निवेश हमें उपलब्ध होता है। विरहों के उद्गम के विषय में किसी भोजपुरी कवि की उक्ति बड़ी मार्मिक है-
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नाहीं विरहा कर खेती भइया नाहीं विरहा फरे डाढ़। तिरहा बसेला हिरिदया में ए रामा, जत उमगेले तब गाव।। किसी स्वाधीनपतिका की व्यङ्गमयी उक्ति का आ्परस्वादन कीजिये- रसवा के भेजलीं भँवरवा के संगिया रसवा ले अइलेहा थोर। अतना ही रसवा में केफरा के बटनों सगरी नगरी हित मोर ॥ इस विरहे में भँवर (पति और भौरा) तथा रस (प्रेम और मधु) का श्लेष सहृदयों के मर्मस्थल को स्पर्श कर रहा है। मैं आपके सामने भोजपुरी के लिए अवश्य पैरवी कर रहा हूँ। परन्तु भोजपुरी में इतने स्वाभाविक गुए हैं कि इस पैरवी की विशेष जररत नहीं जान पड़ती है। जो स्वभाव ही सुन्दर है उसमें सौन्दर्य सिद्ध करने के लिए शपध खाने की आवश्यकता नहीं होती। भोजपुरी की भी यही दशा है। जो दो चार उदाहरण मैंने साप लोगों के सामने रखे हैं वे विन्दुमात्र हैं। साहित्य के प्रेमियों
पर्याप्त होगा। के लिए भोजपुरी के सौन्दर्य का अनुमान करने के लिए इतना ही
कुछ सुझात
भोजपुरी के साहित्य का अरभिवर्धन हमारा परमावश्यक कर्तत्य है। इसके लिए हमें ठोस कार्य करना चाहिए। यह कार्य एक आदमी के वूते का नहीं है। 'सात पाँच की लाठी एक जने का वोम'। न्रप लोग दत्तचित्त होकर इस पवित्र कार्य में लग जायँ, तभी कुछ कार्य सिद्ध होगा। इसके निमित्त मैं एक योजना आपलोंगों के सामने प्रस्तुत करना
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भोजपुरी-एक अनुशीलन १५१ चाहता हूँ। आप इसमें अपनी सहायता प्रदान करें यही मेरा नम्र निवेदन है। (१) भोजपुरी अरनुसन्धान समिति की स्थापना- इस अनुसन्धान समिति की स्थापना भोजपुर मण्डल के किसी :विशिष्ट नगर में होनी चाहिए। इसका सदस्य भोजपुरी से प्रेम रखने वाला कोई भी व्यक्ति हो सकता है। इसकी एक अपनी पत्रिका होनी चाहिए जिसमें भोजपुरी से सम्बद्ध लेखों का प्रकाशन होता रहे। भाषा की अभिवृद्धि के निमित्त इन उपायों का अवलम्बन नितान्त आवश्यक है। बिना इस समिति की स्थापना किये भोजपुरी भाषा का प्रसार तथा प्रचार, समृद्धि तथा अभिवृद्धि सफलतापूर्वक सिद्ध नहीं हो सकती। ठोस साहित्यिक कार्य की यह मूल भित्ति है। हर्ष का विषय है कि इधर 'भोजपुरी' नामक पत्रिका भोजपुरी में ही आरा (बिहार) से निकल रही है। (२) भोजपुरी साहित्य का प्रकाशन- यह कार्य बहुत विशाल है। भोजपुरी में उपलब्ध गीतें भिन्न भिन्न अवसरों पर हमारे घरों में गाई जाती हैं। इस समग्र साहित्य का ठीक वैज्ञानिक ढंग से संकलन होना चाहिए। भोजपुरी में ग्रामी कहानियों का भी संकलन अपेक्षित है। भाषा शास्त्र की दृष्टि से लोकोक्तियाँ तथा मुहावरों का संग्रह आवश्यक है। यह काम बड़ा ही उपादेय तथा लाभप्रद है। (३) भोजपुरी का वैज्ञानिक अध्ययन- भोजपुरी के व्याकरण तथा विराट कोष के संकलन की महती आवश्यकता है। मेरा अपना अनुभव है कि खड़ी बोली के प्रभाव से भोजपुरी के ठेठ शब्द धीरे-धीरे नष्ट होते चले जा रहे हैं। नगर में शिक्षा पानेवाला भोजपुरी घालक इन्हें समझ भी नहीं पाता। फलतः ये व्यवहार से लुप्त होते चले जाते हैं। शीव्र ही इन शब्दों के संग्रह की आवश्यकता है।
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(४) भोजपुरी कवियों को ग्रोत्साहन- भोजपुरमण्डल के अनेक मान्य कवि खड़ी वोली में कविता करते हैं। उनसे यह प्रार्थना है कि वे अपनी बोली में भी कविता करने का प्रयत् करें। हमें चाहिए कि गाँवों में बिखरे हुए भोजपुरी कवियों को यथोचित प्रोत्साहन द्। (५) प्रार्चान ऐतिहासिक सामग्री का संग्रह- भोजपुरमण्डल में प्राचीन इतिहास की सामग्री विखरी पड़ी है। प्राचीन नगरों के ध्वंसावशेप भरे पड़े हैं। हमें उत्साही कार्यकर्ता चाहिए जो इन स्थानों में भ्रमण कर इतिहास की उपयोगी सामग्री का संग्रह कर सकें। (६) रीति-रस्मों का अ्रप्रध्ययन- भाजपुरमण्डल में विवाह आदि संस्कारों के समय पर जो रीतियॉँ प्रचलित है उनका संकलन तथा वर्णन हमें करना चाहिए। समाजशास्त्र के तुलनात्मक अव्ययन के लिए इसका विशेष महत्त्व है। इस प्रकार व्रजसाहित्य मण्डल (मथुरा) जो उपयोगी कार्य व्रजसाहित्य के उद्धार के लिए कर रहा है वही कार्य हमें अपने साहित्य के अभ्युत्थान के निमित्त करना चाहिए। यही भोजपुरी के प्रेमियों से मेरा नम्र निवेदन है। आशा है वे इस ठोस कार्ये में चित्त लगावेंगे। अ्रन्त
जा रहा है। में लक्ष्मी सखी के दो भजनों के साथ यह निवन्ध समाप् किया
कजली मुनि सुनि विया के सनेस हमरो जिभरा ललचे ना। टपर टपर गीरे लोर सख्या चलते चलते ना।। फाहे जे औगुन भईल बहुत गलते गलते ना। तेहि से चले के हाथ सखिया मलते मलते ना।। चिक्षा तिनु जिभवा दमरा हिअवा कलपे ना। जेकर तेज प्रताप घट घट नूर झलके ना।।
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बेरि वेरि हेरीले बाट सखिया पलके पलके ना। करि मंजन असनान सरजु जल जल जलके ना।। राजा जनक के वेटि हम त दोसरा खलके ना। 1 लछिमी सस्ी पिभा धरबो बहिया छोरबों बलके ना।।
(चौमासा झमर झमर उजे बरसेला मेववा गगन घटा घनघोर ह। खोलिले हे सखि कपट केवरिया अपने जे होला अॅजोर हे।। खासा खसम पिभा लौटेला सुन्दर माया मोह भागेला चोर हे। बारी बयस मोरा घरे रहु निभउ मिनती करीले करजोर हे॥ निमि दिन करत्र चरन सेवकाइ साठो घरि रहब भगोर हे। नाहिं त अब्ही संगहि प्रान जइहें सुनि लेहु अवध किसोर हे॥ सकल भुवन कर करता घरता जो कुछ करिए से .थोर हे। अपने सुजान पिका का समुझाओ में अबला मति मोर हे॥ लछमी सखि के सुन्दर पिभवा पुरुष दुभुज किसोर हे। भजत्र त भजिले आापन पिभवा नात होखेला हाथी से घोर हे।।
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गोतों की दुनियाँ गीतों की दुनिया ही निराली है। इसमें जिस समाज का वर्णन किया गया है वह कितना स्वस्थ, कितना स्वाभाविक, कितना सुन्दर तथा कितना निर्मल है ! गीतों में अ्रभिव्यक्त गृहस्थी का चित्र कितना रँगीला दीख पड़ता है! गृहस्थी में खाने पीने के लायक ही सामान प्राप्त हैं; वह समृद्धि में लोट पोट नहीं करती, परन्तु इस ज़ीवन में जिस सन्तोष, आन्तरिक शान्ति, वाह्य सौन्दर्य की झाँकी दीख पड़ती है वह किसी दिव्य लोक की प्रतीत होती है। कितनी कोमल कल्पना तथा मधुर भावुकता का राज्य है इस गीत-सुलभ जगत् में ! परिचित वस्तुओं के लिये भी अनेक मधुर उपमानों की रमसीय कल्पना गीत जगत को संगीतमय बनाये डालती है। पतिदेव घर के मालिक होने की हैसियत से 'प्रभु जी' कहलाते हैं, रंगरलियाँ मचाने के कारण 'कन्हैया', रस के लोलुप होने के कारण 'भौंरा' तथा धर्म-कर्म के फल के साझी होने के कारण 'समबइता।' उचित अवसरों पर इन साहित्यिक शब्दों का प्रयोग गीतों की काव्यकला का पर्याप्त द्योतक है। तव प्रसत की वेदना से व्याकुल निःसहाय गर्भिसी वेदना को वाँट लेने के लिए अपने 'समबइता' को खोजती है, तव वह कितना कवित्वमय प्रतीत होता है! जनप्रिय धर्म के समग्र फलों में साझी है, तघ क्या उसे उचित नहीं है कि वह गर्मवेदना को भी वाँटकर व्याकुल पत्नी के वोझ को हलका बना डाले। गीतों में चित्रित सुन्दरी की सौन्दर्य कल्पना में कितनी नृतनता तथा नैसर्गिकता भरी है। वह पान के समान पतली (तन्वंगी) है, तो सुपारी की भाँति सरस चिक्कस
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ढुरहुर है। वह फूलों के समान कोमल (सुकुगर) है, तो चन्दन के समान सौरभ फैला रही (गमकती) है। उसके केश काले और' लम्बें हैं। जब अपने बाबा के तालाब पर माथा मीसने और नहाने जाती है, तो उसके सौन्दर्य की छटा देखकर लोग मूर्छित हो जाते हैं। कभी कभी उसका बाल टूट कर नदी में वह निकलता है उसकी सुकुमारता और सुनहला रंग किसी भी देखनेवाले रसिक के हृदय को रबस खींच लेता है। और वह उस कांचन केश वाली कामिनी की खोज में बेचैन हो उठता है। उसके प्रेम के दो ही विषय हैं-माँग और कोख, पति और पुत्र जिनको केन्द्र मान कर सुन्दरी स्नेह को अभिव्यक्ति अभिराम शब्दों में करती है। पुत्र पाने की चाह कितनी मीठी है इन ललनाओं में। पुत्र उत्पन्न होते ही माता के मन को हरता है; मन को रख लेता है-वह 'मनहरन' है, 'मन राखन' है। लीला का ललित निकेतन है- वह गोविन्द जी के नाम से अभिहित होता है।
सासु
बहू के हृदय में अपने सास ससुर के लिए गहरा, निश्छल आदर का भाव बना है। सास मचिया (छोटी खटिया) पर बैठ कर गृह का पालन करती है। वह नितान्त आदरणीय होने से 'बढ़ैतिन' है। ससुर 'बढ़ैता' है। सासु का हृदय कितना कोमल और सहानुभूतिमय है। अब उसे खबर लगती है कि बहू को गर्मी के दिनों में बाहर से पानी लाने में क्लेश होता है, तब उसका हृदय पसीज जाता है और अपने पति से आग्रह कर श्रगन में कुआँ खोदने की व्यवस्था कर देती है। पानी खोंचने के लिए रेशम की डोर लगा देती है जिससे उसके हाथ में किसी किस्म की तकलीफ न हो। सास अपने पुत्र के मंगल के लिये तां चिन्तित रहती है, परन्तु इससे अरधिक अपने पतोहू के कल्याए साधन में व्यत्र है। किसी पाहुन के आने पर सोने की थाली में
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भोजन परोसा जाता है और उसके स्वागत में रात भर चन्दन का तेल जलाया जाता है।
बहू प्रियतम कार्यवश मोरँग चला जाता है और लौटने में विलम्त कर बैठता है। वेचारी पत्नी का हरृदय वेचैन हो उठता है। वह कहती है कि यदि मैं जानती कि मेरा लोभिया मोरँग जायगा, तो मैं उसे रेशम की डोर से वाँध लेती। इतना ही नहीं; रेशम की डोर के टुटने की आशंका हो सकती है, इससे अधिक दढ़ होता है वचन का वन्धन (प्रतिज्ञा की शृंखलता ) जिससे उसे वाँध रख्नी। बड़ी कोमल कल्पना है इस वियोगिनी कामिनी की- जहू इम जनती ए लोभिया, जइवे तुहूँ मोरॅ गया घींची वाँही बन्हितो ए लोभिया, रेसम के रे डोरिया। रेसम के रे डीरिया ए लोमिया, टुटि फाटि जइ है वन्न के वान्हल कतही ना राम जइहै।। प्रिय का यह विलम्त पत्नी को असह्य हो जाता है। वह अपने पड़ोसी भीमल मल्लाह के हाथ उनके पास पाती भेजना चाहती है, परन्तु पत्रो कैसे तैयार हो ? वह अपने नेत्र के काजल की स्याही बनाती है और अपना अंचल फाड़ कर कागज तैयार करती है। मढन लेख (प्रेमपत्र) लेकर भीमल महाह मोरँग जाता है और उसके पति को लाने में समर्थ होता है। बड़ा उदात्त आदर्श तथा पवित्र चरित्र है इन भारतीय ललनाओं का जिनके सुकृत सौरम से ये गीत गमक रहे हैं। पति के परदेस चले जाने पर प्रोपितपतिका की व्याकुलता स्वाभाविक है, परन्तु वह कभी अ्र्प्रनु- चित व्यवहार में अपना हाथ नहीं डालती। देवर उसके पास नेह गाँठने का प्रस्ताव लाकर उपस्थित होता है, परन्तु वह उसे दुत्कार देती है और क्रोध में आकर प्रिय के आने पर देवर की 'अलर्फी वाहों' (सुन्दर हाथों) को काट डालने की धमकी देती है।
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पत्नी का सन्देश पाकर निर्मोही पति जब नहीं लौटता, तब पत्नी की चिन्ता पराकाष्ठा को पहुँच जाती है। वह नालायक उसे दूसरा पति कर लेने की सलाह देता है, तब पतिव्रता की स्वाभाविक तेजस्विता ,चमक उठती है। वह कह बैठती है कि तुम्हारी बहन या माता दूसरा पति कर लें वह आ्रजन्म अपने व्रत को निभायेगी और तुम्हारे जैसे आदमी को ड्यौढ़ीदार बनाकर रखेगी। पति के अतिरिक्त बहू को सुख स्वपों का केन्द्र उसका पीहर है और वह उसी ओर टकदकी लगाये जीवन बिता रही है। पीहर की हर एक चीज में उसके वास्ते कितनी मोहकता है। भाई और पिता और माता के लिवा ले जाने की आशा उसकी जीवन-लता को हरी भरी रखती है और अपनी माँ से फिर मिलने तथा परिचित देश में स्वतंत्रता की वायु के सेवन की कोमल कल्पना उसके जीवन को सरस बनाये रहती है। बुरी ससुराल मिलने पर उसे सास, ननद और जेठानी के व्यङ् वाणों से विद्ध होने के अवसरों की कमी नहीं रहती। यह वस्तुस्थिति बुरे दिन आने पर भारतीय समाज में आाज भी विशेष रूप से दीख पड़ती है। परन्तु ये गीत उस दुनिया की सैर कराते हैं जहाँ किसान हल बैल के सहारे अपनी निष्कपट जीविका उपार्जन करता है। मचिया पर बैठकर बढ़ैतिन सास अनुशासन में लगी रहती है, जहाँ रेशम की डोर ले वधू अपने आँगन के कुएँ से पानी खींचती है और बच्चे अपनी छलहीन हँसी से बड़ों का मनोरंजन किया करते हैं। भोजपुरी गीतों में चित्रित समाज का वातावरण कितना शान्त है, कितना निर्मल है, जिसके सामने आधुनिक समाज का प्रकाश फीका, चनावटी तथा मलिन प्रतीत होता है।
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लोक-काव्य में करुष रस
भोजपुरी गीतों में करु रस की मात्रा अत्यधिक दीख पड़ती है। यह करुण रस अ्रपनेक अवसरों पर विभिन्न परिस्थितियों में प्रवाहित होता हुआ दीख पड़ता है। इस रस की अभिव्यक्ति इन गीतों में तीन अवसरों पर विशेषरूप से होती है-विदाई, वियोग और वैधव्य। इन तीनों अवसरों पर सुखमय जीवन का अवसान हो जाता है। तथा दुख का नया अध्याय प्रारम्भ होता है। जीवन के बसन्त में अचानक पतः भड़ शुरू हो जाता है। ये तीनों अवसर मतुष्य के कोमल हृदय पर गहरी चोट करने वाले होते हैं। विदाई के अवसर पर लड़की का माता- पिता से वियोग होता है। वियोग में पति से विछोह होता है औरर चैधव्य में अपने प्रीतम से सदा के लिये आत्यान्तिक विच्छेद हो जाता है। यही कारण है कि इन गीतों में करुण रस की मात्रा उत्तरोत्तर वढ़ती ही चली जाती है। जिस प्रकार भवभूति की करुण कविता सुनकर बर्ज्र का हृदय फट जाता है और पत्थर भी पसीज जाता है। उसी प्रकार इन करुण रस से ओत-प्रोत गीतों को पढ़कर पत्थर के समान कठोर पुरुष का भी कलेजा आँसुओं के रूप में पसीज पसीज कर वाहर निकल पड़ता है। चथा- "आँसुन के मग जल बह्ौ दियो पसीज पसीज" बेटी की विदाई कन्या की विदाई का समय कितना करुणोत्पादक है। इसे शब्दों- में बतलाने की जरूरत नहीं होती। पितृगृह में स्वतन्त्रतापूर्वक जीवन विताने वाली दुलार से पाली गई कन्या एक अनज्ञान अपरिचित घर
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में जाती है। पिता के घर के दुलार की याद उसके हृदय को मसोसने लगती है। और उनकी मानसिक वेदना आँसुओं की भड़ी के रूप में बहती दीख पड़ती है। ऐसे अवसर पर बड़े बड़े धीरों की भी धीरता का बाँध टूट जाता है, साधारण लोग किस गिनती में हैं ? कालिदास ने शकुन्तला की विदाई के अवसर पर उद्विग्नचेता महर्षि कण्व के मुख से जिस भावोद्गार को अभिव्यक्त किया है वह साहित्य-वेत्ताओं से अपरिचित नहीं है। इस प्रसंग का मार्मिक चित्रण इन गीतों में उपलब्ध होता है। आठ काठ की बनी हाँड़ी या पालकी पर चढ़कर वधू पति गृह जा रही है। इस अवसर पर उसका सगा भाई उसे पालकी से उतर जाने को कहता है। वह उसे अपने ही घर रखने की बात कहता है, परन्तु बहिन बोल उठती है, ऐ मेरे भाई मेरी डांड़ी छोड़ दे, मुझे जाने दे। जानते हो मेरा वोभा कितना है, तुम सात लौंड़ियों का भार मजे में सह सकते हो। उन्हें देखकर तुम खिला पिला सकते हो परन्तु मेरा यह भार तुम सह नहीं सकते। छोड़ भइया डँड़ियावा घरे जाये रे देउ। सातो लउँडिया के भारवा ए गो हमारों नाही।। कैसी दीनता है इस कन्या की। विदाई के समय माता पुत्री को समझा रही है, कि घवराना मत तेरे भाई को खवर लेने के लिये जरूर भेजूँगी। परन्तु जेठे भाई के भेजने में कन्या को विश्वास नहीं होता। वह कहने लगती है कि तुम वासी भात खाने को देते समय भी क्रद्ध हो जाया करती थी और फल फूल सरीदने के समय भी मुझे लुलुवा देती थी। लो अध मैं चली। शरब मेरे ासी भात को रखे रहना और फल खरीदने के पैसे से धेनु गाय खरीद कर स्वयं दूध पीना। हमारी बसिया के आामा वरिह बार बार। हमारा ही केनवा के आामा कीनहि धेनु गाय।।
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वेटी के ये व्यंग वचन तिल्कुल सच्चे थे। उसका वर्ताव सचमुच ऐसा ही था। इन वचनों से माता की आँखें खुल जाती हैं और कहती है कि उसकी छाती पत्थर की है, भला होता यदि उसकी छाती फट जाती। चलेके त चललु हो वेटी दीहलू समुझाई। झारे पथल के छतिया हो बेटी बीहरि बलु जाई।। परन्तु प्यारी माता का हरृदय पुत्री के प्रति दयारहित हो नहीं सकता। कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति। हृशय बदलता है। पुत्री की सवारी वन वीहड़ को पार करती दूर निकल जती है। वह पालकी का ओहार तनिक हटाकर क्ा देखती है कि उसका भाई उसके पीछे पीछे आ रहा है, माता सच्ची निकली। भाई को देख बेटी का हृदय माता के लिये वेचैन हो जाता है, और वह अपने भाई को लौटा देती है। माता अटारी पर खड़ी है। पुत्र को लौटा देख भिड़कने लगती है कि मेरे रतन को तूँ कहाँ रख आया। मेरी वेटी को किस वन चीहड़ में छोड़ आया। भाई 'अर्थो हि कन्या परकीय एव' की दुहाई देकर माता को समझाता है। इस गीत में माता के कोमल हृदय तथा अकृत्रिम स्नेह की श्रिव्यक्ति कितने दर्दनाक शब्दों में की गई है। कन्या की विदाई के समय मातापिता के रोने का पारावार नहीं है। पिता के रोने के कारण गंगा में वाढ़ आई है। माता के रोने के कारण उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया है, भाई के रेने से उसके पैर की धोती भींग रही है, परन्तु भावज के नेत्र में- आँस का बूँद भी नहीं है। बाघा के रोवले गंगा बढ़ियाली। आमा के रोवले अनोर भहया के रोवले चरन धोती भीजे। भडजी नयनवां न लोर ।
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कन्या के लौट आने की सघ कामना करते हैं परन्तु उस कामना में प्रेम के विकास के अतुसार तनिक भिन्नता भी है। परिवार के लोगों की मानसिक वृत्ति परीक्षा-योग्य है! माता कहती है कि बेटी तू रोज उठकर आया कर। पिता कहते हैं छ मास पर आना। भाई कहता है कि कल ही प्रयोजन है, उत्सव है और भावज कहती है दूर चली जा। जान पड़ता है कि भावज की प्रवृत्ति का आश्रय लेकर ही निरुक्तकार ने दुहिता की व्युत्पत्ति 'दूरे हिता' की है। गीत के शब्दों में :- सामा कहेले बेटी नित उठि आवं। बाबा कहे ले छब मास। भइया कहेलें वहिना काल्हे परोजन। भउजी कहेली दुर जाव 1 भावज के रुष्ट होने का कारण कभी कभी कहा गया कटुवचन है। इसे वह मानती है। कारए पूछने पर कहती है कि न तो तूने मेरे तेल नून छेंका, न तो कोठी में पेहान लगा दिया, वचन ही मेरा वैर उत्पन्न करने का कारण है :- नाही तू ननदी नून तेल छेकलू, नाहीं कोठी लवलू पेहान। नाहीं तुहूँ ननदी रसोइयां झाकी अड्लू, वतिये वेरिन भइल तोहार॥
वेटी को ससुराल ले जाने के लिये उसका श्सुर वारात सजाकर आया है। हाथी घोड़े द्वार पर उगने वाले चन्दन पेड़ में बाँध दिये गये हैं। वे चन्दन के पेड़ को तोड़ मरोड़ रहे हैं। पिता से यह दृशय देखा नहीं जाता, वह क्रुद्ध होकर बरातियों को झिड़की सुना रहा है। इस पर उसकी पुत्री घर से वाहर निकल कर पिता को समझाने लगती है।
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सहु वाबा सहु रे बात्ा भाज की रतिया हो। वाड़ा दो पराते हो बाबा जाइवी बड़ी दूर।। दुवरा राउर होइहें ए बाबा रन रे बन। आँगन राउर होइहें ए बाबा भदउस्ञाँ निसि राति।। हे बाबा, आजञ की रात इस केश को सह लीजिये। कल बहुत तड़के सुझे बहुत दूर जाना होगा। हमारे चले जाने पर आप का द्वार जंगल की तरह सूनसान हो जायगा और आपका ऑ्रगन भादों की काली अँवियारी निशा हो जाचगा। कितना द्द भरा हुआ है कन्या के इस कथन में! उसकी बात सोलहो आने सच्ची निकली। दूसरे ढिन उस कुट्ुम्त्र की दशा कैसी बदल जाती है। गीत के मनोरम शब्दों को ही पढ़ लीजिये। कितनी बेढना भरी है, इन छोटे छोटे वाक्यों में- दुबरा भुलीए भूली बाबा जे गोवेले, कतही न देखों हो वेटी नुपुरवा हो तोहार। ऑगना भूलीए भूली आामा जे रोबेल, कतहीं न देखों हो बेटी रसोइआा झाझाकाल। रसोइआ भूली ए भूली भडजी जे रोवेली। कतहीं ना देखों हे बेटी रसोइया झाझाकाल।। दरवाजे पर पुत्री की विदाई से व्याकुल होकर पिता रो रहा है कि बेटी कहीं भी तुम्हारा नुपुर (पायजेव) में नहीं देख रहा हूँ। आाँगन में बैंठी हुई माता रो रही है और रसोई घर में बेठी भावज रो रही है कि कहीं भी बेटी दिखलाई नहीं पड़ती। उसके बिना रसोई घर भयानक और छूंछा लगता है। इस गीत के करुण भाव को सुनकर कौन ऐसा हरदय होगा जिसका दिल बिढाई के समय की चोट की याद से विचलित न हो जायगा और जिसकी आँखें आँसुओं से भींग न जावेंगी। विदाई के इन भोजपुरी गीतों में जो भाव दिखलाये गये हैं उनके समान ही भाव अन्य भापाओं के लोकगीतों में भी प्रचुर मात्रा में
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पाये जाते हैं। मानव हृदय सर्वत्र एक समान है, चाहे हम भोजपुरी गीतों को पढ़ें, चाहे गुजराती गीतों को। मिलन और विछुड़ना, संयोग और विछोह मानव जीवन के चिरसंगी हैं। वियोग का तीता घूट पीकर ही सांसारिक जीवन मीठा होता है। यही कारण है कि लोक गीतों में इस विषय का रसमय वर्णन विशेष मात्रा में उपलब्ध होता है। पंजाब के एक लोकगीत में कन्या अपने पिता से बिदाई के समय कह रही है :- साँडा चिडियाँ दा चम्बा वे, बाबल असीं उड़ जाना। साडी लम्बी उड़ारो वे बाबल के हडे देश जाना। तेरा चौका माण्डा वे, बाबल तेरा कौन करे। तेरा महल दां बिच बिच वे बाबल मेरी मॉ रोवे।। गीत का आशय है कि हे पिता जी मैं तो एक चिड़िया हूँ मुझे तो एक दिन उड़ जाना होगा। मेरी उड़ान बड़ी लम्बी है। मुझे किसी अनजान देश में उड़कर जाना है। हे पिता मेरे बिना तेरा चौका बर्तन कौन करेगा ? तुम्हारे महल के बीच मेरी अ्रम्मा रो रही है। ठीक इसी प्रकार एक गुजराती वेन अपनी दशा का वर्णन कर रही है :- अमे रे लीलुडा बननी चर कलडी उड़ी जांछु परदेश जो। भाज रे दादा जीना देश माँ, काले जांशु परदेश जो। मेघाणी-लोक साहित्य पृष्ठ १८३ मैं तो एक हरे भरे जंगल की चिड़िया हूँ। उड़कर परदेश चली जाऊँगी। आ्रराज दादा जी के देश में हूँ, कल परदेश चली जाऊँगी। कश्मीर की एक कुलाङगना पति के परदेश जाने पर किन शब्दों में अपनी विरह व्यथा का बयान कर रही है। .
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१६४ काव्यानुशीलन
यार चलूम तय कति छाँड़न, आर ससनय व्यसियय। यारस रुसनूय बाग फुलमय, कुसम्य छाव्यम करमाह। अर्थात् मेरा प्रेमी चला गया है, उसे मैं कहाँ खोजूँ। हे सखि उसे मुझे छोड़ते तनिक भी दया नहीं आई। यदि समय पाकर मेरे यौवन रूपी उपतन में वसन्त आवे तो उसका स्वाद कौन लेगा? क्या याबुन गीयना ह्ीरिथ। मानंदि तीर ज़न गुम नीरिथ।। हाय! क्या यह चौवन फिर आवेगा जो तीर के मानिन्द गुम हो गया है-निकल कर चला गया है। एक दूसरी विरहिणी इस प्रकार ईश्वर से प्रार्थना कर रही है। यार गोमय पाम्पोर वते। कुंग पोश व रुटनाल मते। मूछम तते मछुस यते। वार सायवो वोज़तम ज़ार।।
आशय है कि मेरा यार पाम्पुर (कशमीर का एक मशहूर स्थान) की ओर चला गया है। केशर के फूलों ने उसे गले लगा लिया। वह वहाँ और मैं यहाँ। त्र खुद्ा मेरी बिनती सुन लो। (कुंग=केशर; पोश=पुप्प) पंजाब की कन्या कितने पते की बात सुना रही है। दिल दरिया समुन्दरो हूँवा। कोन दिलां दीयाँ जाणे। चिचे चप्पू विच्चे बेड़ी। विच्चे बंग महाणो।। दिल एक दरिया है, समुन्दर से कहीं अधिक गहरा। दिल की घातें कौन जान सकता है। इसके वीच क्या चप्पू क्या किछता, क्या गह्लाह (सभी हूब जाते हैं)।
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लोक-काव्य में करुण रस १६५ वियोग
इन गीतों में प्रिय वियोग का वर्णन बड़े ही सरस शब्दों में किया गया है। प्रिय के परदेश चले जाने पर पत्री के लिये सारा संसार सूना लगता है। घर काटने को दौड़ता है। प्रिय वियोग के समय समस्त प्रकृति में एक अर्प्रनोखी विषमता का साम्राज्य उठ खड़ा होता है। एक प्रोषितपतिका अपनी दयनीय दशा दर्शाती हुई कह रही है कि अरे निर्मोही लोभी, तुम्हारे बिना देखे कितने लोग रो रहे हैं। घर में तुम्हारी घरनी रोती है, बाहर हरिनी रोती है, तालाब में चकवा चकई रो रहे हैं। विछोह करते समय ुझे तनिक दया नहीं आई। गीत के शब्दों में वारावा रोवे धरिनी ए लोभिया बाहारवा राम हरिनियाँ। दाहावा रोवे चाका चकइया बिछोहवा कइले निरवा मोहिया । एक दूमरी प्रोषित पतिका के मनोभावों की बानगी देखिये। वह कह रही है कि ठंढी पुरवैया चल रही थी। नींद में अलसाई पड़ी थी। उसी वक्त वह मेरा प्रियतम मुझे छोड़कर चला गया। वह नाना प्रकार से उसकी सेवा करना चाहती है। कचहरी जाते समय वह अपने प्यारे के पैर में बबूल का कांटा बनकर चुभना चाहती है। कभी कोयल चन मीटा शब्द सुनाना चाहती है। कभी फुलवाड़ी में फूल बनकर अपने प्यारे के वास्ते गमकना चाहती है। जल में मछली बनकर प्यारे के पैरसे लिपटना चाहती है, पति के देश में जाकर पानी बरसने के लिये बादल से प्रार्थना करती है। गरज यह है कि विरह् व्यथा से सताई गई विरहिणी अपनी व्यथा को भूलने की विशेष चेष्टा करती है, परन्तु उसे सफलता नहीं मिलती। एक दूसरी सुन्दरी अपने प्यारे से विछोह के दिनों को बिताने की युक्ति पूछ रहा है। दिल में दर्द पैदा करने वाली इस गीत को पढ़िये और स्वयं गुनगुना कर इसका रसास्वाद लीजिये।
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जुगुति बताये जाँव। कवन विधि रहवों राम ॥ टेक ।। जो तुहु साम बहुत दिन तितिहें। अपनी सुरतिया मोरे ब्रहियां पर लिखाये जाव ॥ १ जुगुति बताये० जो तुहुं साम बहुत दिन त्रितिहें। विरना वोलाइ मोको नइहर पहूँचाये जाव ॥ २ जुगुति वताये० जो तुहुँ साम बहुत दिन तितिहें। वहियां पकरि मोंके गंगा भसिआाये जाव ।। जुगुति त्रताये जाव कवन विधि रहितों राम ।। किसी स्त्री का पति विदेश जाने के लिये प्रस्तुत है। उसकी प्रेमी स्त्री उससे कहती है कि आप के वियोग में मैं कैसे रहूँगी इसकी उक्ति मुझे वतलाते जाइये। ऐ मेरे प्रासप्रिय, यदि तुम विदेश में बहुत दिन विताओगे तो कृपा कर अपना चित्र मेरी वाहों पर चित्रित कर दो। जिसे मैं वियोग के दिनों में सदा देखती हुई शान्ति धारण करूँगी॥ १ ऐ मेरे प्राएप्रिय, यदि तुम विदेश में बहुत दिनों तक रहोगे तो कृपाकर मेरे भाई को वुलाकर मुझे अपने मायके पहुँचवा दो। (जिसमें मैं तेरे वियाग को काट सकूं) ॥२ ऐ मेरे प्राणप्रिय! यदि तुम विदेश में बहुत दिन तक रहोगे तो मेरी वॉह पकड़ सुझे गंगाजी में गिरा दो (जिससे मैं मरकर तुन्हारें वियोग के दुःसह दुःख को सहने से वंचित हो जाऊँगी) ॥३॥ इस गीत के प्रत्येक पद से करुण रस चुआ पड़ता है। यह गीत क्या है करुण रस का कलश है। जितनी करुणा इन कतिपय पंक्तयों में भरी पड़ी है, इतनी संभवतः समस्त हिदी साहित्य में भी नहीं मिलेगी। वियोग की आरशंका से उत्पन्न दुःख का इतना सरस, सज्ञीव अकृत्निम तथा हृदय द्रावक वर्णन अन्यन्न उपलब्ध नहीं। हिन्दी के कतिपय कवियों ने पति के परदेश जाने के समय उनकी
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स्त्नियों की आंखों में आँसू तो जरूर दिखलाये हैं। परन्तु इस गीत में तो स्त्री अपने को गंगा में डुबो देने की प्रार्थना कर रही है जिससे न तो वह जीती रहेगी और न वह वियोग के कष्टों को सहन करेगी। हिन्दी के तोष आदि कवियों ने वियोगिनियों के आँसू से नदियों में बाढ़ आने की बात लिखी है। यह वर्णन अलंकार की दृष्टि से भले ही चमत्कारपूर्ण हो परन्तु श्रोताओ्ं के हृदय पर यह कुछ भी चमत्कार पैदा नहीं करता। परन्तु इस गीत में वर्णित भाव अपनी अकृत्रिमता के कारण सहृदयों के दिल पर सहज ही में चोट करते हैं। 'बहिया पकरि मोके गंगा भसियाये जाव' आदि पदों में जो गहरी वेदना छिपी हुई है उसे अच्छी तरह से वे ही जान सकते हैं जो 'भसियाना' शब्द के अर्थ को जानते हैं। इस स्त्री को पति का वियोग सह्य नहीं है, परन्तु गंगा में गिरकर मर जाना सह्य है। इस वनिष्ठ तथा स्वाभाविक प्रेम की जितनी प्रशंसा की जाय उतनी ही थोड़ी है। इस गीत में पति के वियोग में उसके चित्त के स्मरण करने का वर्णन है। यह प्रथा बहुत प्राचीन मालूम पड़ती है। कालिदास ने अपने मेघदूत में यक्ष पत्नी का अपने पति का चित्र बनाकर मनोविनोद वर्णन किया है। इस गीत में करुण रस की मात्रा इतनी कूट कूट कर भरी हुई है, जिसका वर्णन करना अत्यन्त कठिन है। मैं तो महाकवि भवभूति की अरप्रनेक करुण रसमई कवितायें इसी एक ही गीत पर निछावर करने के लिए तैयार हूँ। इस गीत की सरसता, मधुरता तथा करुणरसता के विषय में मतिराम का यह पद उपयुक्त जान पड़ता है। 'ज्यौं व्यौं निहारिये नेरे ह्वै नैनन, त्यों त्यों खरी निकरे सी निकाई।' कोई विरहिणी स्त्री अपनी दुःखद दशा का वर्णन करते हुये कह रही है कि मेरी धानी रंग की चुनरी (साड़ी) इत्र के समान गमक रही है। मैं अपने यौवन को लिये हुए सीत के समागम के लिये मायके में तरस रही हूँ। मैंने सोने की थाली में भोजन परोसा था परन्तु
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१६८ काव्यानुशीलन उस भोजन का करनेवाला आज विदेश में पड़ा तरस रहा है। मैंने बड़े लोटे में पीने के लिए गंगाजल रक्खा था, तथा पति के खाने के लिए लवंग और इलायची लगाकर पान का वीढ़ा तैय्यार किया था परन्तु उस पान का खानेवाला परदेश में विराज रहा है। उस प्रियतम के सोने के लिए मैंने कलियों को चुन चुनकर सेज तैयार की थी परन्तु उस सेज को सुशोभित करनेवाला परदेश में है।-
मोरी धानी चुनरिया इतर गमके। धनि बारी उमरिया नइहर तरमे ।। सोने की थाली में जेवना परोसलों। मार जेवनवाला तिदेस तरसे।। झझरे गेडुवा गंगाजल पानी। मोर घूंटनवाला त्रिदेस तरसे॥ लवंग इलायची के बीड़ा लगवलीं। मोर कूंचन वाला व्रिदेस तरसे।। कलिया चुन चुन सेजवा लगवलीं। मोर सूतन वाला त्रिदेस तरसे।। प्रिय के वियोग में तड़पने वाली इस विरहिणी की दशा देखने ही योग्य है। प्रिय के वियोग में कामिनी की व्याकुलता कितनी अ्रधिक है। वेचैनी को न सहने के कारण वह स्वयं प्रिय को खोजने के लिये निकल पड़ती है, और वटोहियों से उसका पता पूछती चलती है। इस गीत में बड़ा ही लोच है, द्रुत लय है। इस 'भूमर' का पूरा स्वाद भूम भूमकर गानेवाली कलकण्ठ कामनियों के कोरस में ही मिलें सकता है। विरहिी कह रही है कि ऐ भौंरा तुम आज परदेश जाकर कितने दिनों में लौटोगे। मैं कितने दिनों तक तुम्हारे मार्ग की प्रतीक्षा करूँगी। जब पति बहुत दिनों तक परदेश से लौटकर नहीं आया तब स्त्री दुःखी होकर कहती है कि पति के आने की अवधि के दिन गिन गिन मेरी अंगुली विस गई। उसके आने के दिन की प्रतीक्षा करते
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पानी के पियासल हरिनवाँ जमुनवाँ घाटे रे जाय। नोवलों मैं चीनवॉ हो रामा हरिनवाँ चरि रे जाय ।। चाट बटोहिया भइया तुहूँ रे मोर भाय। एहि राहे देखुआ हरिनवां तहेलिया ले ले रे जाय ।। देखुई मैं देखुई हे पातरि हाजीपुर के रे हाट। हाथ गोड़ वन्हले वहेलिया हटिया ले ले रे जाय।। पग तोरे थाके वहेलिया हथवा लागे रे धून। कवनो कसूरवाँ बहेलिया मेरी सेजरिया कइलो रे सून ॥ चाम मांतु चेंचिहे बहेलिया हाड़वा दिहे रे मोर। भोही हार लेइ सती होइवों एहिं जमुना तीर।। पानी के पिभासल हरिनवाँ ।। वैधव्य-
इन गायनों में विपाद की रेखा जरुर सिंची हुई है, परन्तु त्रमिट रूप से नहीं। दिन ज्यों ज्यों ढलते जाते हैं रातें जितनी बीतती जाती हैं, विपाद की रेखा फीकी पड़ती जाती है, परन्तु वालविधवा की मनोवेदना का चित्रण किस प्रकार किया जा सकता है? इन वाल- विधवाओं में कितना भोलापन भरा हुआ है। जो व्याह जैसी अजनवी चीज को जानती ही नहीं, शादी जिनके वास्ते एक अजूबा है। इनकी दर्दनाक आहें किसके दिल को न दहला देंगी। बड़ी मार्मिक वेदना भरी पड़ी है इन विधवाओं के गीतों में। यहाँ नमूने के तौर पर एक ही गान नीचे दिया जाता है। एक भोली भाली वालविधवा अपने पिता से अपनी शादी के वारेर में पूछ रही है कि आपने किसलिये शादी की। कब मेरा गत्रना किया ? पिता कहता है कि तेरी शादी आनन्द भोगने के लिये की तथा शुभ मुहूर्त देखकर तेरा गवना किया। इस पर वेटी कह रही है कि मेरा सिर सिन्दूर के बिना रो रहा है, आँखें काजल के बिना रो रही हैं। मेरी गोद पुत्र के बिना रो रही है और सेज कन्हैया बिना रो रही है।
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वाना सिर मोरा रोवेला सेनुर बिनु, नयना कजरवा बिनु रे राम। बाबा गोद मोरा रोवेला वालक बिनु, सेजिया कन्हइया बिनु रे राम।। वेटी की आहमरी बातें सुनकर पिता उसे फुसलाना चाहता है, परन्तु वह वालिका फुसलाने में नहीं आती। बाप कहता है कि ऐ बेदी हाजीपुर की हाट लगने दे उस बाजार में मैं चलूँगा और तुम्हारे करम को बदल दूँगा। परन्तु बालिका होने पर भी कन्या होशियार है। वह तुरन्त बढ़ियाँ उतर देती है कि कांसा पीतल ही बदला जा सकता है, परन्तु करम कैसे बदल जायगा ? जैसा मैंने किया है उसका फल तो भोगना ही पड़ेगा। जैसा बोया जायगा वैसा ही काटा जायगा। कन्या का यह कथन कितने भोलापन से भरा है और साथ ही साथ कितना सच्चा है। भाग्य की प्रवलता और कर्म की दुर्निवारता की अभिव्यक्ति कितने अच्छे शब्दों में की गई है। गीत की दो चार कड़ियों को पढ़- कर इस मार्मिक वेदना का अनुमन कीजिये :- बेटी लागे देहु हाजपुर के सटिया करम तोरे बदली देवों ए राम। वाघा कांसावा पीतर सत बदलबी, करम कइसे बदली ए राम। वेटी सिर तोरे भरक्षें रे सेनुर लेइ, नयेना काजारवा लेइ ए राम । वेटी गोद तोरे भरत्रों रे वालक लेइ् सेजिया कन्हइया लेइ ए राम।
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( १३ ) लोककाव्य में ऋतुवर्णन मनुष्य और प्रकृति-दोनों में नितान्त वनिष्ट सम्तन्ध दै। प्रकृति निर्जीव वस्तु नहीं है। उसमें चेतना भरी पड़ी है। वह मनुष्य को सदा प्रभावित किया करती है। मनुष्य कभी अनजान दशा में भी प्रकृति के व्यापक प्रभाव के वश में आर्र कर अ्र्रनेक काम किया करता है। वह कृत्रिम जीवन में रहने वाले लोगों के ऊपर प्रकृति का प्रभाव, भले हो कम पड़े, परन्तु गावों के स्व्च्छ वायु में रहने वाले, स्वाभा- विकता की गोदी में पलनेवाले जीवों के ऊपर प्रकृति का प्रभाव बहुत ही अरधिक पड़ता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। ऋतुओ्ं के परिवर्तन के संग-साथ में प्रकृति के रूप में भी परिवर्तन होता रहता है। जाड़े के दिनों में प्रकृति के ऊपर जो मुर्दनी छाई रहती है, जो सिकुड़न दीख्न पड़ता है, जो आलस्य दष्टिगोचर होता है, वसन्त के आते ही वह समाप्त हो जाता है। संकोच के स्थान पर विकास विराजने लगता है। आलस्य के स्थान पर वह स्फृ्ति दिखलाई पड़ती है। भीपणा जाड़े की ऋतु में भी हमारे अंग-प्रत्यंग शीत के क़ारण सिकुड़े रहते है। वे ही वसन्त का सुहावना समय पाकर फैल जाते हैं। हमारे मन की भी यही दशा होती है। चेती का सम्बन्ध इसी वसन्त के साथ है।
मधुमास की माधुरी चैत के महीने में चित्त के बहलाने के लिए जो गीतें हमारे गावों में गायी जाती है उन्हें चैती कहते हैं। भोजपुर मण्डल में इन चैती -गीतों को 'घाँटो' के नाम से भी पुकारते हैं। इन गीतों का गाने का
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भी ढंग निराला होता है। आररम्भ से 'रामा' और अन्त में 'हे रामा" से ये गीत संपुटित होती हैं। गीतों का आरम्भ ऊँचे स्वर में किया जाता है, बीच में त्वरोह (उतराव) आता है और फिर अन्त में आरोह (चढ़ाव) होता है। स्वरों के इस आरोहावरोह क्रम से इन गायनों की माधुरी श्रोताओं के कान में आनन्दोल्लास प्रकट करती है और विरहिएयों के दुःखित हृदय को प्रफुल्लित बनाने में विशेष रूप से सफल होती है। भोजपुरी गीतों में चैता अपनी मधुरिमा तथा कोमलता के विषय में अपनी समानता नहीं रखता। इसके गीतों में एक प्रकार की तन्मयता होती है जो हृदय को फट से आकृष्ट कर लेती है। चैतमास में होनेवाले भोजपुरी मेलों में जब कोई चैता गाने लगता है और 'भारे हमरी भटरिया हो रामा सुगना बोले हो'
जब सुस्वर में अलापने लगता है तब श्रोताओं का जमघट लग जाता है। अन्य लोकगीतों के समान ही ये गीत जनता को, हमारे गावों के निवासियों को अपनी ओर सींचने में विशेष समर्थ होते हैं। यदि चैती का विषय चैत मास से सम्बन्ध रखे तो यह अत्यन्त उत्तम होता है। शंगारिक विषय विशेषतः विप्रलम्भ शृंगार का चित्रण चैती की अपनी विशेषता है। फागुन का अन्त होली के हुल्लड़ से होता है। इस सर्वप्रिय उत्सव में भाग लेने के लिए परदेशी अपने घर पर आ विराजते हैं, परन्तु फिर से परतन्त्रता की वेड़ी नें जकड़े हुए अरनेक परदेशी विदेशों की ही खाक छानते रहते हैं -- अपने भाग को कोसते हुए परदेश में ही अपना धिक जीवन विताते हैं। इन्हीं को प्रधानतया लक्ष्य कर प्रोपितपतिका नायिका अपनी विरह वेदना की अभिव्यक्ति चैती के द्वारा किया करती है। प्रधान विषय यही होता है-विरह चित्रए, परन्तुतर्रागन्तुक रूप से अ्र््न्य विषय
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२७४ का व्यानुर्शालन भी इसमें आते जाते हैं। बारहमासा की वियोगिनी चैत मास को लक्ष्य का कह रही है -- चेतमास उदास सखि दो, एहि मास हरि मोर जाई, हम अभागिनि कालिनि साँपिनि, आवेला समय विताय। चेती का यही विशुद्ध राग है। विरह के मारे तडपने वाली कृशांगी का कोमल हृदय इसमें भलीभाँति अभित्यक्त होता है। पति अपनी स्त्री से कुद्ध होकर इत्नी गहरी नींद सो रहा है कि स्वयं जागता हो नहीं। शरी भी हार जाती है। तब वह अपनी ननद से इस पवित्र कार्य के सम्पादन में सहायता माँगती है- राम साँझहि के सूतल फुटलि किरिनिया हो रामा; तत्रो नाँहिं। तबो नाँहि नागेलें, हमरो बलमुआ हो रामा; तबो नाँदि ॥१॥ राम चुर घीर्ची मरली पइरी बीर्ची मरली हो रामा, तबो नाँहि। तवो नोही नागेले, सैवा अभागा हो रामा; तवो नाँही ।२। राम गोड़ तोरा लागीला लहुरि ननदिया हो रामा; रचि एक। रचि एक आपन भेया देहु ना जगाई हो रामा, रचि एक ।।३।। राम, कैसी के भौज़ी मद्या के लगाइवी हो रामा; हमरो मैया। हमरो मैया निदिया के मातळ हो रामा हसरी भैया॥४॥। रामा तोरा लेखे ननदी तोर मैवा निनिया के मातल हो रामा मोरा लेखे। आरे मोरा लेखे नान मुरुज दूनो छरित भइलें हो रामा मोरा लेखे।५॥ रामा चढ़ले नइत वाँटो गावे हो रामा गाइ गाई आरे गाइ गाइ विरहिन सखी समुझावे हो रामा; गाइ गाई।।६।। यह चडती गाने में जितनी मथुर है भाव में भी उतनी ही सुन्दर है। भौजाई के आग्रह की उपेक्षा करती हुई ननद जब कहती है कि मेरा भाई नींद में मतवाला होकर पड़ा हुआ है, बबड़ाने की बात ही कौन सी है, तब मौजाई का उत्तर कितना भावपूर्ण, कितना स्वाभा- विक तथा कितना सरस है। वह कहती है कि तुन्दारी दृष्टि में तो
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लो ककाव्य में ऋतुवर्णन २७५ तुम्हारा भाई केवल नींद में मतवाला हो गया है। परन्तु मेरे लिए तो चन्द्रमा और सूरज दोनों छिप गये हैं। चन्द्रमा के छ्विप जाने पर आकाश का अन्धकार सूरज हटाता है और सूरज के अ्रस्त हो जाने पर चन्द्रमा; परन्तु उस स्थिति की कल्पना कीजिए कि तब अन्धकार कितना गहरा होगा तथा लोगों की घबराहट कितनी अधिक होगी जब चन्द्रमा और सूरज दोनों एक साथ अस्त हो जाँय। पति का क्षणिक वियाग नायिका के हृदय में कितना उद्वगजनक है, इसका पूरा आभास इस उक्ति से हमें मिल जाता है। यह उक्ति नायिका के प्रेम को नितान्त तीव्र तथा गाढ़ प्रदर्शित कर रही है।
एक दूसरी चैती सुनिए और इसके भाव तथा भाषा दोनों का निरीक्षणा कीजिए। यह चैती कृष्ण तथा गोपियों के प्रेम की अभिव्यक्ति कर रही है। गोपी दही बेंचने के लिए मथुरा जा रही है। रास्ते में उेससे मिल जाता है कुँबर कन्हैया। दोनों में जो रसभरी बातें होती हैं उन्हीं का परिचय हमें इस मधुर गीत में मिलता है-
रामा छाटि मुटि ग्वालिनि, सिर तो मटुकिया हो रामा, चली भइलो, आरे चलि मइलि हो मथुरा नगर दहि वेचन हो रामा, चलि भइलि, रामा जहाँ जहाँ ग्वालिनि, धरेले भटुकिया हो रामा, तहाँ जहॉँ अरे तहाँ जहाँ कुँवर तमुआ तनावे हो रामा ताहॉ जाँहा।। रामा भागू होखड भागू होखड, राजा के कुँभरवा हो रामा परि जइहें। आारे परि जइहें दही के छिटिकवा हो रामा, परि जइहें।।
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रामा तोरा लेखे ग्वालिनि दही के छिटिकवा हो रामा, मोरा लेखे, आरे मोरा लेखे अगर चनन देव बरिसे हो रामा, मोरा लेखे रामा चढ़ले चइतवा, चईत घॉटो गावे हो रामा, गाइ गाई, अरि गाइ गाइ विरहिन ससि्त्र समुझावे हो रामा, गाइ गाई इस गीत की एक पंक्ति में कोमल कला का विलास पूरे रूप से झलक रहा है। राजकुमार ग्वालिन के बहुत ही पास खड़ा हो कर अपना प्रेम जता रहा है। ग्वालिन कहती है कि कृपया आप दूर पर खड़े होइए। नहीं तो मेरे दही के बूँद आप के शरीर पर गिर कर खराध कर देंगे। इस पर राजकुमार की उत्ति है कि अये ग्वालिन, तुम्हारी दृष्टि में तो ये इवेत बिन्दु दही के छींटे जान पड़ते हैं। परन्तु मेरी दृष्टि में तो प्रतीत हो रहा है कि भगवान अनुग्रह कर मेरे ऊपर अगर और चन्दन की वृष्टि कर रहे हैं। यह भाव किनना शोभन तथा सरस है !!! भोजपुर मण्डल के अ्रनेक चैती गायनों के रचयिता का नाम चुलाकीदास मिलता है। ये वुलाकीदास कौन थे? इसका ठीक ठीक परिचय नहीं मिलता, परन्तु थे व इसी काशीमण्डल के निवासी और इनका स्थिति काल भी सौ वरस से अधिक नहीं जान पड़ता। इनकी चैता गीतों में काफी सरसता तथा सत्कचिता है। भाव हैं गाँवो के अनुरूप सीधे-सादे, विल्कुत स्वाभाविक। वनावटीपन का उनमें कहीं नाम भी नहीं है। बुलाकीदास के द्वारा रचित चैता-गायनों का यदि संग्रह एकत्र किया जाय, तो लोकगीत के पुनरुद्वार के इतिहास में यह नितान्त महत्त्व्रपूर्ण घटना प्रमाणित होगी। आाज तक हम अपनी लोक गीतों की उपेक्षा करते आये हैं। इन गीत रकों का तिरस्कार करते आये हैं। परन्तु अत् तो यह दशा बदल
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लोककाव्य में ऋतुवर्णन १७७ जानी चाहिए। स्वतन्त्र भारत में जिस प्रकार अ्रनेक भारतीय वस्तुओरं का पुनः संस्कार हो रहा है, उसी प्रकार इन हमारे लोक गीतों का भी पुनरुद्धार होना चाहिए। इन लोक गीतों की माधुरी स्वतः सिद्ध है। उसे सिद्ध करने के लिये आ्रराज प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं है। इनका वैज्ञानिक ढंग से संग्रह होना चाहिये, तथा अनुशीलन होना चाहिये।
सावन की सुषंमा प्रकृति भगवान्के सौन्दर्य की घाहरी प्रतिकृति है। प्रकृति नित्य-नित्यः नया-नया रंग वदलती रहती है; और प्रत्येक रंग में उसकी मनोरम झाँकी हमें आरनन्द से मस्त बनाती है। प्रकृति तथा मानव का परस्पर सन्बन्ध भी बड़ा ही गहरा है। प्रकृति अपने सौन्दर्य की अनुभूति के लिए मनुष्य को सदा आकृष्ट करती है। मनुष्य जाने या अनजाने इस आकर्षण की उपेक्षा भी नहीं कर सकता। वह उसके वश में होकर अपने जीवन की सफलता का अनुभव करता है। प्रकृति की चारुता औरर रुचिरता को बिना अनुभव किये हमारे जीवन के आनन्द में विशेष कमी बनी रहती है। मनुष्य और प्रकृति के इस सामरस्य का घोध हमें होता है सावन के महीने में। सावन का महीना सचमुच ही बड़ा सुहावना होता है। नीले आकाश पर बादल घिरे रहते हैं। जान पड़ता है कि हाथियों की छटा क्षितिज पर से उमड़ती हुई चली आ रही हो। वायु इस मेघमाला के साथ क्रीड़ा करता हुआ अटखेलियाँ किया करता है। वीच में वकपक्ति की शोभा चित्त को मोह लेती है। कभी कभी घटा घहराती है, विजली चमकती है, रिमभिम-रिमफििम बूँदें गिरने लगती है। वृक्ष, लता और पौधे घुलकर निखर जाते हैं। खेत हरियाली में सन जाते हैं। जिन लोगों ने किसी पहाड़ी प्रदेश में रहकर सावन का महीना बिताया है वे मैदान के प्रदेशों से भिन्न प्रकार का ही अनुभव करते हैं। पहाड़ी प्रदेशों में इस समय न तो कहीं कीचड़ दिखाई पड़ता है और न किसी प्रकार की १२
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गंदगी। परन्तु मैदान के गांवों का हाल इससे कुछ विलक्षण ही होता है। इस महीने में हर एक गाँव में, बाग में या तालाव के किनारे झले लगाये जाते हैं जिनमें गाँव के सत्री-पुरुष, युवती और युवक अ्रलग- अलग भूला भूलते हैं। इन भूलों के लिए कितनी तैयारी की जाती है। सुन्दर रंगीन रत्सी से काठ के तख्ते को बाँधकर पेड़ की मोटी डाली से लटका देते हैं। इसी सुसज्जित भूने पर बैठकर नरनारी सावन का आनन्द मनाते हैं तथा सरस गीत गाकर अपने चित्त को रसस्त्रिग्ध वनाते हैं। इस समय जो गीत गाये जाते हैं वे ही 'कजली' के नाम से विख्यात हैं। इस महीने के मादक प्रभाव से कोई भी रसिक :हृद्य अछूता नहीं बचता। संस्कृत तथा हिन्दी के मान्य कवियों ने अपने काव्यों में सावन के मनभावन रूप का बड़ा ही सुन्दर चित्रस किया है। महाकवि कालिदास का कहना है कि मेघ के दर्शन पर सुखी होनेवाले व्यक्ति का भी चित्त अचानक उत्सुक बन जाता है, प्रिय के विरह से व्याकुल जीव की तो कथा ही न्यारी है। घात बिलकुल ठीक है। इसीलिए सावन में विरह की वेदना से व्याकुल कामिनी अपने हृदय के भावों को अपने सरस गीतों में प्रकट किया करती है। देखिये मिथिला की किसा महिला के हृदय की भावधारा मैथिल-कोकिल विद्यापति के इस कमनीय गायन में किस प्रकार फूट रही है- सखि हे हमर दुःखक नहिं ओर। ई भर बादर माह भादर, सून मन्दिर मोर। झंपि घन गरजन्ति संतति भुवन भरि त्ररसंतिया। कन्त पाहुन काम दारुन सघन खर सर हंतिया। कुलिस कत सत पात, सुदित मयूर नाचत मातिया।
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मच दादुर डाक डाकुक फाटिजायत छातिया। तिमिर दिग भरि घोर जामिनि अथिर बिजुरिक पाँतिया। विद्यापति कह कइसे गमाभोब हरि बिना दिन रातिया।
इस गीत में सावन के दृश्य का भी सुन्दर संकेत है-बिजली का चमकना, मोर का नाचना, डाहुक पक्षी की पुकार, दादुर का रटना, रात में घना अन्धकार। चित्त को प्रसन्न करने वाली समग्र सामग्री विद्यमान है, परन्तु चित्त को रमाने वाला प्रियतम ही नहीं है। इसी- लिए यह समस्त साधन सूना तथा नीरस प्रतीत हो रहा है। पति ने अपनी प्रियतमा से रात को आने का बादा किया है। तरतः 'वह पूरी तैयारी के साथ उसको वाट जोहती है। परन्तु पतिदेव का दर्शन ही नहीं होता। नितान्त खिन्न मन होकर वह उसे उलाहना दे रही है। देखिरये, यह गीत कितना सीधा सादा और हृदयाकर्षक है-
हरि हरि कहाँ वदे तुम रात कहाँ रहि जालड ए हरी। सोने के थारी में जेवना परोसलो, हरि हरि जेवना लिये हम ठाढ़ि कहाँ रहि जालड ए इरी ॥ १ ॥ झांझर गेड़ भा गंगाजल पार्ना हरि हरि पनिया लिये हम गढ़ि कहाँ रहि जालड ए हरी ॥ २ ॥ लौंगा में डोभि-डोभि दिरवा लगवलों हरि हरि तिरवा लिये हम ठाढ़ी कहाँ रहि जालड ए हरी।। ३॥।
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फूल नेवारी क सेजिया डसउलों हरि हरि सेजिया लिये हम ठाढ़ि, कहां रहि जालड ए हरी॥४॥ किसी कामिनी का प्रियतम सावन में परदेश जा रहा है। वह अपने पति से पूछती है कि हे हरी, आप तो परदेश चले जा रहे हैं। आपके बिना मैं कैसे जीऊँगी? पति ने उत्तर दिया-हे धनी, सब्र करना और सन्तोष करना और वज्र की छाती करके जीती रहना। विश्वास रखना, मैं शीघ्र ही त्र््राऊँगा। अपने कोमल ह्रदय को जरा कड़ा करना। इन विरह के दिनों को आँख मारते-मारते विता देना। सुझे आया ही हुआ समझो। सासु से पूछने पर सासु भी वही उत्तर देती है। देखिये यह गीत कितना सरस तथा मंजुल है- हरि-हरि रउरा चलवि परदेस् जिक्वि हम कइसे ए हरी। धनी हो, सबुर कर, सन्तोख वजरकर छाती ए हरी।।१॥। चम्पा फूलि रही चारु दारी देइल सारी रात ए हरी। दिनवा जे ीते हरि सखिया सहेलरि रतियाँ सैयॉ रउरी सोच जिभवि हम कइसे ए हरी ॥२॥ मचिया बइठल तुहुँ सासु हो त्रढ़इतिन, सानु हरि मोरे गइले विदेस जिअवि हम फइसे ए हरी ॥३॥ बहू हो सधुर कर सन्तोख वजर कर छाठी रे हरी॥४।। सावन का एक दूसरा दृडय देखिये। पति परदेश से लौट आ्राया है, पर अपनी प्रियतमा के साथ न तो झूला भृलता है, औरर न फृलों से
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सजी हुई सेज को सुशोभित करता है। इसीलिए वह प्रियतमा के उपालम्भ का भाजन बनता है। देखिये, कितने सीधे-साड़े शब्दों में वह अपना भाव प्रकट करती है- सोने के थारी में जेवना परोसलों, जेवना ना जेवे जेवना नेंवे राविका प्यारी साथे गिरिवारी ना। चनन के पीढ़ई रेसम के डोरी झूलना ना झूले, झूलवा झूले राविका प्यारी, साथे गिरिघारी ना ।२॥ फूलवा हजारी के सेजिया डसबलों सेजिया ना सोवे, सेजवा सूने राविका प्यारी साये गिरिधारी ना ।३।। सावन के गीतों में विरहवर्णन की ही प्रचुरता है। ठीक ही है, संयोग से विप्रलम्भ शृंगार की सुन्दरता अधिक होती है। संयोग में जितना आनंद नहीं आराता उतना आनन्द वियोग में आता है। इसीलिए प्रोषितपतिका की इस गीत में बड़ी पीर भ्री हुई है, यह हृदय पर गहरी चोट कर रही है। इस लम्बे गायन की सुन्दरता परखने के लिए एक ही दो कड़ी सुनिये- घिरि आइलि रे बदरिया सावन की, सावन की मनभावन की। विरि आइलि रे वदरिया सावन को ।१॥ अति निरमोही विय ना आइले, सन्ता अन ना आवम की। चिरि आइलि बदरिया साबन की ॥। २॥ सखियाँ झूला हिंलिमिलि झूचत,
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मोर जियरा तरसावन की। घिरि आइलि रे वदरिया सावन की ॥ ३ ॥ इस प्रकार लोककाव्य में भी ऋतुओं का चमत्कारी तथा हृदयग्राही वर्न उसी प्रकार मिलता है जिस प्रकार संस्कृत तथा हिन्दी के शिष्ठ काव्यों में। प्रवृति का आ्र्प्रकर्षण सार्वभौम होता है। मानव हृदय में सरसता एक रूप से प्रवाहित होती है चाहे वह मानव ग्राम में अरपना सामान्य जीवन बिताता हो या नगर में अपना विशिष्ट वैभव युक्त जीवन व्यतीत करता हो।
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खएड ४
सं स्कृ त - का व्य
१-देववासी लोकवाणी थो २-संस्कृत काव्य में प्रकृति औरर प्रेम ३-शिव महिस्न : स्तोत्र -संस्कृत गद्य की रूपरेखा 'पू-प्राचीन नाव-शास्त्र ८६ -- संस्कृत रंग-मंच ७-जवनिका =- विश्वकवि कालिदास
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देववाणी लोकवाणी थी
संस्कृत हमारी देववाणी है। हमारे धर्म से साक्षात् सम्बन्ध रखने वाले समग्र ग्रन्थ इस भाषा में निबद्ध किये गये हैं। वे ग्रन्थ भी संस्कृत में हैं जिनका साक्षात् सम्बन्ध धर्म से नहीं है। मानव-जीवन के लक्ष्यभूत चार पुरुषार्थ माने गये हैं-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इन चारों विषयों पर हमारे प्राचीन ग्रन्थकारों ने जो रचनाएँ प्रस्तुत की हैं, वे सब संस्कृत में निबद्ध हैं। भारत के विभिन्न प्रान्तों की भाषाए संस्कृत मूलक हैं, यह किसे विदित नहीं है? विचिन्न बात तो यह है कि सुदूर दक्षिए की द्राविडी भाषाओं का भी बहुत बड़ा अंश संस्कृत भाषा पर आश्रित है। आर्य लोगों ने जिन उपनिवेशों को स्थापित किया, वहाँ संस्कृत राजभाषा के रूप में मान्य हुई। इस प्रकार संस्कृत का महत्त्व हमारी संस्कृति तथा सभ्यता के इतिहास में बहुत बड़ा है। यहाँ हम वैदिक संस्कृत के विषय में कृछ नहीं कहते, जो अपने समय में बोलचाल की भापा थी ही। लौकिक संस्कृत के विषय में लोगों की भ्रान्त धारणा बनी हुई है कि यह बोलचाल की भाषा कभी नहीं रही। इसे सुव्यवस्थित रूप प्रदान करने का श्रेय महर्षि पाशिनि को प्राप्त है। संस्कृत भाषा में जो एकरूपता तथा व्यवस्था दीख पड़ती है, वह सत पाशिनि की ही अनुकम्पा का प्रसाद है। कुछ लोग यह दोप पाणिनि पर लगाते हैं कि उन्होंने सूत्रों के द्वारा भाग को जकड़ कर उसे अस्वाभाविक बना दिया है। परन्तु गा सथ्य नहीं है। यदि पाशिनि का व्याकरण न होता तो संस्कृन भाषा में इने रूपानर होते, उसमें इतनी विकृति आ जाती कि हम उसे पदचान भी नही
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१८६ काध्यानुगीरून सकते थे। पागिनि की अप्टाध्यायी भापाविज्ञान के नियमों के आधार पर बनी है। यह उनके भाषान्वान का चूडान्त निदर्शन है। पासिनि के अनन्तर 'वातिककार कात्यावन' हुए, जिन्होंने अ्रप्टाध्याी पर नार्तिकों की रचना की। इन वार्तिकों में पाशिनिकाल के अरनन्तर प्रयुक्त होनेवाले शब्दों की व्युत्पत्ति बताथी गयी है। विक्रमपूर्व द्वितीय शसक में पतंजलि ने 'अष्टाध्याथी' पर 'भाष्य' लिखा, जो इतना सुन्दर, उपादेय तथा प्रामागिक है कि उसे 'महाभाष्य' के नाम से पुंकारते हैं। लोकिक संस्कृत के कर्ता-धता ये ही तीन मुनि हैं: जिनके कारण व्याकरण 'त्रिमुनि' के नाम से विख्यात है। बाढ के युग में संस्कृत व्यांकरग पर जो कुछ् लिखा गया वह केवल इस 'सुनित्रय' के ग्रन्थों की व्यास्यामात्र है। कुछ लोगों का कथन है कि इस 'सुनिन्रच' के द्वारा संस्कृत होने के कारण ही यह देववरासी 'संस्कृत' नाम से अभिहित की जाती है। दण्डी इस बात के समर्थक हैं- संस्कृतं नाम देवी वागन्त्रास्याता महर्षिनि: (काव्यादर्श)। संस्कृत के स्वरूप का विचार करते समय यह जानना तरूरी है कि लोक व्यवहार में उसका क्या रूप था वह बोलचाल की भाषा थी या नहीं। इसके विषय में दो विरोधी मत हैं। कुछ लोगों का कहना है कि प्राकृत ही बोलबाल की भाषा थी, संक्कृत तो केवल साहित्यिक भाषा है, जिसका प्रयोग अ्रन्थों में ही होता रहा, बोलचाल में नहीं। इसके विपरीत दूसरा मत यह है कि यह बोलचाल की भी भाषा रही है;किसी समय में भारतीय जनता अपने भावों को इसी भाषा के द्वारा प्रकट किया करती थी; धीरे-वीरे प्राकृत के उदय होने से इसकाः' व्ववहार-क्षेत्र कम होने लगा, परन्तु इसका चलन तथा व्यवहार शिष् लोगों में बना ही रहा। महर्षि वान्क ने 'निरुक्त' नामक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ की रचना की है जिसमें कठिन बैदिक शब्दों की न्युत्वत्ति दिखलायी गयी है। इस अन्थ का पभागा संस्कृत को बोलवाल की भापा सिद्ध करता है।
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जो वैदिक संस्कृत से भिन्न साधारण जनता की बोली थी, उसे यास्क ने स्थान-स्थान पर 'भाषा' कहा है। उन्होंने वैदिक कृदन्त शब्दों की व्युत्पत्ति उन धातुओं से की है जो लोकव्यवहार में आते थे। उस समय भिन्न-मिन्न प्रान्तों में संस्कृत शब्दों के जो रूपान्तर तथा विशिष्ट ग्रयोग काम में लाये जाते थे, उन सबका उल्लेख यास्क ने किया है। उदाहरसार्थ 'शवति' क्रिया-पद का प्रयोग कम्बोज देश (वर्तमान पंजाब के पश्चिमोत्तर प्रान्त) में 'जाना' अर्थ में किया जाता था, परन्तु इसके संज्ञा-पद 'शव' (मुर्दा) का प्रयोग आर्य लोग करते थे। पूर्वी प्रान्तों (प्राच्य) में 'दाति' क्रिया-पद का प्रयोग 'काटना' अर्थ में होता था, परन्तु उत्तर के लोगों में इसी से वने हुए 'दान्न' शब्द का प्रयोग 'हँसिया के अर्थ में होता था। इससे स्पष्ट है कि यास्क के समय में (विक्रम से लगभग सात सौ वर्ष पूर्व) संस्कृत बोलचाल की भाषा थी।
पाणिनि का प्रामाण्य पासिनि के समय में (विक्रम-पूर्व पाँच सौ) संस्कृत का यह रूप वना ही रहा। पाशिनि भी इस वोली को 'भाषा' ही के नाम से पुकारते हैं। दूर से पुकारने के समय तथा प्रत्याभिवादन के स्रवसर पर पाणिनि ने प्लुत स्वर का विधान किया है। यदि दूर से कृप्ण को पुकारना हो तो संस्कृत में 'अगच्छ कृष्ण' कहना पड़ेगा। वदाँ पाशिनि के अनुसार कृप्ण का आकार प्लुत होगा। इसी प्कार स्मिवादन करने के अनन्तर जो आशीर्वाद दिया जायगा वहाँ पर भी प्लुस करना )पड़ेगा जैसे, देवदत्त नामक कोई छात्र गुरु को इस प्रकार पसाम करे-आचार्य, देवदचोडई तवामभिवादये (गुरु जी, मैं देवदर स्ापको प्रखाम कर रहा हूँ), तो यह कह कर पाशीर्वाद देगा- लयुषान एधि देवदच ३ (आयुष्मान् घनो हे देवदस्त)। इस प्राशीर्पाद पापय मैं 'देवदत्त' शब्द के अन्त का अकार प्लुत दो जाएगा,ह् पाशिनि की व्यवस्था है।
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इन नियमों का उपयोग तभी हो सकता है जब भाषा वस्तुतः चोली जाती हो। निरुक्तकार के समान पाशिनि ने संस्कृत के उन रूपान्तरों को लिखा है जो पूर्वी तथा उत्तरी लोगों द्वारा व्यवहृत किये जाते थे। वोलचाल के बहुत से मुहावरे.पाशिनि ने अपने अ्न्थ में दिये हैं, जैसे दण्डा-दण्डि (डंडा-डंडी. लाठ-लाठी), केशाकेशि (नोचा नोची, वालों को खींच कर होनेवाला युद्ध), हस्ताहस्ति हाथा-हाथी या हाथापाई) उदरपुरं भुङक्ते (पेट भर खाता है।) इत्यादि। इतना ही नहीं, पाशिनि ने शब्दों में स्वर-विधान के नियम को चड़े विस्तार के साथ दिया है। इससे स्पष्ट है कि पाशिनि की भाषा घोलचाल की भाषा थी। यदि ग्रन्थ के लिखने में ही उसका उपयोग होता, तो पूर्वोहिखित नियमों की उपयोगिता किसी प्रकार भी सिद्ध नहीं होती।
कात्यायन पाशिनि के अ्रनन्तर कात्यायन के समय (विक्रम-पूर्व चतुर्थ शतक) में तथा पतंजलि के समय (विक्रम पूर्व द्वितीय शतक) में संस्कृत भापा विकसित होती गयी; उसमें नये-नये शब्द आप्राने लगे, नये नये मुहावरों का प्रयोग होने लगा। इसी लिए कात्यायन ने वार्तिक लिख कर उनकी त्यवस्था कर दी। पाणिनि ने 'हिमानी' तथा 'अरण्यानी' का प्रयोग केवल स्त्रीलिंग की कल्पना में माना है, परन्तु कात्यायन के समय में 'महत्त्व' के अरथ में इनका प्रयोग होने लगा। 'अररण्यानी' का अर्थ हुआ-बड़ा जंगल। इसी प्रकार कात्यायन के समय में 'यवनानी' का प्रयोग यवनों की लिपि के अर्थ में होने लगा। पाशिनि के समय में 'चवन र्की स्त्री' के लिए इसका प्रयोग होता था। पतंजलि ने भी अपने महाभाष्य में नये प्रयोगों की प्रक्रिया दिखलायी है। संस्कृत शब्दों के प्रान्तीय रूपान्तरों का उल्लेख उन्होंने भी किया है; यथा, 'चलने' के अर्थ में सुराष्ट्र (काटियावाड़) देश में 'हम्मति' का प्रयोग करते हैं; पूरव देश में 'रहति' का; आरम्रार्य
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लोगों में 'गच्छति' का। पतंजलि ने ऐसे लोगों को 'शिष्ट' बतालाया है जो बिना किसी अध्ययन के ही संस्कृत शब्दों का शुद्ध प्रयोग करते थे। इनके जो प्रयोग होते थे वे सर्वसाधारण के लिए प्रमाणभूत माने जाते थे।
महाभाष्य महाभाष्य में एक घड़ा रोचक संवाद दिया है जिसमें 'प्राजितृ' (चलाने वाला) शच्द की व्युत्पत्ति के विषय में एक वैयाकरण तथा एक सारथि में खृब वाद-विवाद हुआ है। वैयाकरण ने पूछा, 'इस रथ का प्रवेता कौन है ? सूत-आयुष्मन, मैं इस रथ का प्राजिता (चलाने वाला) हूँ। वैयाकरण-'प्राजिता' शब्द अपशब्द है। सूत- देवानां प्रिय, महाशय जी, आप केवल 'प्राप्तिज्ञ' हैं 'इष्टिज्ञ' नहीं हैं (अर्थात् लोक-व्यवहार के प्रयोग से अनभिज्ञ हैं) वैयाकरण-अहो, यह 'टुरुत' (दुष्ट सूत) हमें कष्ट पहुँचा रहा है! सूत-आपका 'दुरुत' प्रयोग ठीक नहीं है। 'सूत' शद्द 'सू' (उत्पन्न करना) धातु से घना है। 'वेञ' (वुनना) धातु से नहीं। श्तः यदि आप निन्दा करना चाहते हैं तो 'दुःसूत' शब्द का प्रयोग करें। सूत का कथन अधिक उपयुक्त है। वैयाकरण तो केवल सृत्रों को ही जानता है, वास्तव में प्रयुक्त शब्दों की उसे जानकारी नहीं है। इससे स्पष्ट है कि जिस भापा को रथ हाँकनेवाला समभे और बोले उसे घोलचाल की भापा न कहना कहाँ तक ठीक है ? मुहवरों से तो महाभाष्य भरा पड़ा है-उन मुहावरों से, जिनका प्रयोग हमारी मीण वोलियों में आज भी विद्यमान है, चाहे सड़ी घोली में वे न दीख पड़ें, जैसे-पृटं कुरु, पादी कुरु (भाष्य १,३,१) की छाया हूबह बनारसी बोली में इस प्रकार दीख पड़ती है 'गोड़ो कइली मूड़ी कइली, तऊ हमार गुन त का तू मनल' (हर प्रकार की सेवा मैंने तुम्हारी की, परन्तु तुमने उसका कुछ भी गुन नहीं माना)। 'क' धातु का सामान्य अर्थ है 'करना', परन्तु इसका एक और भी विशिष्ठ
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१९० काव्यानुशीलन अर्थ है, जिसका उल्लेख महाभाष्यकार ने किया है। यह अर्थ है- 'साफ करना', 'दवाना' या 'सेवा करना'। इसी विशिष्ट अर्थ में भाष्यकार के प्रयोग हैं-पृष्ट' कुरु (पीठ को द्वाओ', पादौ कुरु (पैरों को दवाओ या उनकी सेवा करो)। इस अर्थ में 'कृ' का प्रयोग संस्कृत साहित्य में भी बहुत कम उपलब्ध होता है। जयदेव ने गीत- गोविन्द की एक अष्टपदी में इसका विशिष्ट प्रयोग किया है- करकमलेन करोमि चरसमह- मागमितासि विदूरम् (सर्ग १२ ) इन मुहावरों के प्रयोग से संस्कृत भापा की सजीवता, लोक- प्रियता तथा व्यावहारिकता का पता चलता है। इन प्रमाणों के आरधार पर, विक्रम से हजारो वर्ष पूर्व से लेकर विक्रम के उदय तथा चाद की अ्नेक शताब्दियों तक संस्कृत अ्रवश्य बोलचाल की भापा थो, इसी परिणाम तक हम पहुँचते हैं। भारत के अनेक ग्राचीन संस्कृत- प्रेमी राजाओं ने यह नियम बना रक्खा था कि उनके अन्तःपुर में संस्कृत का ही प्रयोग किया जाएगा। राजशेखर ने विक्रम का नाम इस प्रसंग में निर्दिष्ट किया है। धारा-नरेश राजा भोज (१५ शतक) के समय में भी संस्कृत का बोलने तथा लिखने के लिए बहुत प्रयोग होता था। हम उस जुलाहे की बात कभी नहीं भूल सकते जिसने संस्कृत में अर्प्रपना परिचय देते समय कहा था, 'काव्य तो मैं उतना अच्छा नहीं वनाता पर यदि यत्न से लिवू तो सुन्दर भी लिख सकता हूँ।' एक साधार जन की इतनी संस्कृतज्ञता तथा काव्य-प्रेम अ्र््रत्यन्त शलाघनीय है।
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काव्य में प्रकृति और प्रेम
संस्कृत के कवि सौन्दर्य तथा माधुर्य के उपासक होते हैं। उनका हृदय सौम्य भाव में विशेष रमता है। माधुर्य के उत्पादक दृश्यों के ऊपर दृष्टि विशेष रीझती है। वे मानव ह्रृदय के भावों के समझने तथा विश्लेषण में जितने कृतकार्य हैं उतने ही वे बाह्य प्रकृति के रहस्यों के परखने तथा उद्घाटन में समर्थ हैं। बाह्य प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण संस्कृत काव्यों में, विशेषतः प्राचीन काव्यों में, प्राप्त होता है। प्रकृति के दृश्यों को कवियों ने अपने तीव्र अवलोकन का विषय चनाया है तथा यथार्थता से मण्डित वर्णनों का चमत्कार सहृदयों के हृदय को वलात् अपनी ओर खींचता है। प्रकृति संस्कृत काव्यों में उभयरूपेण चित्रित की गई है-आलम्बन रूप से तथा उदीपन रूप से। आलम्बन रूप वाले वर्णानों में प्रकृति ही स्वयं वर्ण्य रहती है तथा उदीपन रूप में उसका मानव प्रकृति के ऊपर उत्पन्न प्रभाव ही वर्सन का विषय रहता है। कालिदास और भवभूति ने वर्षा के आगमन का वर्णन किस सीधी सादी यथार्थता से नीचे लिखी पंक्तियों में रख दिया है :- आापाढस्य प्रथमदिवसे मेवमाशि्लिष्टसानुं।
श्रयति शिखरमद्रेनू तनस्तोयवाइः । (मेघदूत)
(मालतीमाधव और उच्तर रामचरित) भवभूति की पंक्ति कालिदास की पंक्ति की स्मृति से उत्पन्न हुई है, किन्तु इस पंक्ति के अनुकरए में कितनी नूतनता है यह 'तोयवाह'
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(जल से भरा हुआ मेघ) और इसमें जुड़े हुए 'नूनन' विशेषए से द्योतित होती है। ऊपर के दष्टान्त में चित्र की रेखा वादलों के अ्नुरूप सरल और स्वच्छ है, किन्तु चित्रण की यथार्थता से सुचार और अधिक गहरी. रेखा से सुसज्जित चित्र यदि तुम्हें देखना हो, और उसे भी एक पंक्ति में, तो कालिदास की इस पंक्ति को याद करो :- 'प्राप तालीवनश्याममुपकण्ठं महोदवेः' और यढि इससे अधिक सविस्तर चित्र चाहिए तो रघुवंश के इस 'पम्पा सरोवर के चित्र को देखोः-
दूरावतीशा वित्रतीव खेदादमृनि पम्पामनिलानि दृष्टिः ॥ देखो तो पम्पा सरोवर के तट पर नरकुल का कितना घना वन है। उसने मानो पम्पासर के प्रभूत जल को आलिङ्ित सा कर लिया है। उसके भीतर लता के फुण्ड में बैठे हुए चख्बल सारस पक्षी इस पूर्व चित्र में कितना वैचित्य उत्पन्न कर रहे हैं। अपने नेत्रपुटों से आप भी इस चित्रगत सरोवर का जल अच्छी तरह से पीजिये। किन्तु यदि इन पूर्वोक्त सारसों को आरकाश में उड़ते देखना हो तो- अ्नूर्विमानान्तरलम्विनीनां श्रुत्वा स्वनं काखनकिद्किणीनाम्।
दूर आकाश में एक विमान की कल्पना करो। और उसमें सुबर्सा के तुँघुर लगाओ। किन्तु यह वतलाओ कि उस चित्र से युँधुमओं का शद्द आप कैसे सुन सकते हैं ? वह तो काव्य की ही विशेषता है कि नत से संनृत नेव मानो भाराकान्न था। इसलिए वह वश्रय-विश्रान लेना है यह 'तोंचवद' शरर 'अवति' शब्दों के नेल ने ध्वनि निकनती है। े विमान के मरोखों से वाहर लटकती हुई नेरी मोने की करधनी के, बुधुन्त्रों का शध् मुनकर नोगावरी के मानम पत्ी, आाकश में सटने हुम, आगे बढ़कार, तुमले मेंट नी
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काव्य में प्रक्ृति और प्रेम १६३ इसमें चित्र और सङ्गीत दोनों का हो संमिश्रण हो सकता है। पास बहने वाली गोदावरी के तट अ्रथवा उसके जल-पट पर आ्रकाश में उड़ती हुई श्वेत सारसों की पंक्ति देखिये। इन सारसों को उड़ते देखने में ही खूबी है। अतएत उस खूत्री के प्रत्यक्ष करने के लिये स्थिर चित्र नहीं बल्कि सिनेमा के चित्र की कल्पना कीजिये। इससे भी यदि त्रधिक वैचित्य चाहिये तो वह भवभूति के निम्न- लिखि्त वर्सन में है :-
इह समदश कुन्ताक्रान्तवानीरवी रुत् - प्रसवसुरमिशीतस्वच्छतोया वहन्ति। फलभरपरिणामश्याम जम्बूनिकुञ्ज- स्खलनमुखर भूरिस्त्रोतसो निझरिण्य: ॥ इस श्लोक में कोई अलंकार नहीं, भाव नहीं, किन्तु सारा चमत्कार वर्णन की यथार्थता में समा रहा है। वानीर की चेल पर बैठे हुइ पक्षी के चित्र से और उसे 'समद' कह कर सूचित की हुई उसके स्वर की ध्वनि से, यह वर्णन अतीव हृदयङ्गम बन गया है। चित्रकार की तूलिका की अपेक्षा कवि की वीखा में अधिक सामर्थ्य होती है। ऊपर के वर्णान में केवल 'समदशकुन्ता-क्रान्तवानीरवीरुध्', 'फलभर- परिणामश्यामजम्बूनिकुज्ज' और उनमें वहती हुई नदी का केवल चित्र मात्र ही नहीं है किन्तु-स्खलन मुखर भूरिसोतसो निर्भरिएय:'- इस नदी की मुखरध्वनि भी कवि की वीखा से निकलती है। कवि की कला में चित्र और वीणा-रूप और शब्द-दोनों ही का समावेश है।
- वहि वेवस-वह्लरी पे खग वैठि, कलोल भरे नृदु बोल सुनावें। तिनसी नरे-पुष्प-सुगन्धित तीय, दहै तति सीतल हो तल नावैं।। फलवुज पकेननि के कारन, श्यामल मशुत जन्यु निकुज लखावें। उननें गकि के करि घोरनी, भरनानि के नोत सनूह चहावैं।। (पं० सत्वन, रायपकृ उत्तरराम चरित्र) १३
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यथार्थता के साथ साथ वर्ण्यमान विषय के कुछ अंश को चुन लेने के कारण बड़ा ही मनोवेधक एक तति सुन्दर चित्र नीचे लिखी चित्र- कल्पना में कालिदास ने रख दिया है :- कार्या सैकतलीनहंसमिथुना सोतोवहा मालिनी पादास्तामभितो निपण्णहरिणा गौरीगुरोः पावनाः। शाखालम्घितवल्कलस्य च् तरोरनिर्मातुमिच्छाम्यधः शृङ्गे कृष्णमृगस्य वामनयनं कण्टयमानां मृ्गाम् ॥६ हिमालय के पवित्र पहाड़ों की तलहटी में वसा हुआ आश्रम, पर्वत के शिखर पर बैठे हुए हरिए, समीप वहती हुई 'स्रोतोवहा मालिनी' और उसकी रेत में आधे डूबे हुए हंसमिथुन तथा कृष्णमृग के सींग से अपनी वाई आँख खुजलाती हुई हरिसी-यह सारा चित्र साङ्गोपाङ्ग होने से बहुत ही रमणीक लगता है। यही नहीं, किन्तु उस एकान्त स्थान की आत्मा मानो "सेकतलीनहंसमिथुना" तथा 'शृङ्ग कृष्ण मृगस्य वामनयनां कसड्यमानां मृगीम्', इस चित्र में प्रत्यक्ष श्र्रा खड़ी होती है। प्रकृति के वर्णन का एक और प्रकार है जिसमें मनुष्यहृदय के भावों के पीछे प्रकृति तदनुरूप चित्रपट सी प्रतीत होती है। शेक्सपियर ने अपने नाटकों में प्रकृति का इस प्रकार ही उपयोग किया है। हमारे मध्यकालीन संस्कृत कवियों ने भी प्रकृति के दृश्यों को मनुष्यहृदय के * लिखन काज अ्रव ही रह्ा बहत मालिनी नीर। हतन की जोड़ी सुभग राजति जाके तीर।। दंदुं और पावन लिम्बूं हिमवन चरन पहार। बैंठ हरिन मुहावने जिन पे करत जुगार॥ चाहत हूं, श्रड लिख्नूं तर बर एक अनूप। टारन पै वल्फल वसन परे लगन की धूप।। नीचे ताही रूप के हिरनी लिख्ू वनाय। दृग कर सायर साग ते दायों नही खुजाय।। (राजा लक्ष्मष सिंह)
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काव्य में प्रकृति और प्रेम
उद्दीपन विभाव रूप से अक्कित किये हैं। हमारे रस-शाब्तिियों ने भी रस रस में प्रकृति को उद्दीपन विभाव रूप से माना है। संस्कृत काव्यों में चसन्त ऋतु, चन्द्रिका, कोकिलस्वर, मेघालोक इत्यादि शृंगार रस के सामान्य उद्दीपन प्रसिद्ध हैं। इनके अरप्रतिरिक्त चैत्र मास की रात्रियाँ, विकसित मालती पुष्पों से सुरभित कदम्बवन की वायु, नर्मदा का तट और वहाँ के वेतस वृक्ष के कुञ्ज इत्यादि विशेष उद्दीपन भी उन्होंने च्गित किये हैं। उपर्युक्त प्रकार से प्रकृति उद्दीपन विभाव वन जाती है। कुछ कवियों ने ता प्रकृति और मनुष्यहृदय के बीच में कुछ गूढ़ सम्बन्ध है यह माना है। विदेश गये पति वर्षा-ऋतु के आने पर घर की ओर आकर्षित और आकाश में मेघ को देखकर प्रिया के समागम के लिए समुत्सुक होते हैं-यह वात कविलोग स्वाभाविक समझते हैं। कविवर कालिदास का भी ऐसा विश्वास है कि प्रकृति के अरमुक हृश्य में किसी गूढ़ रीति से अमुक भावों की प्रेरखा करने वाली शक्ति है: मेघालो के भवति सुखिनो ऽप्यन्यथावृच्ि चेतः । प्रकृति के मनोहर दृश्य वा श्रव्य का मनुजहृदय के साथ कोई अगम्य सम्बन्ध है। इसमें कालिदास को यत्कंचित् भी शंका नहीं। रम्याणि वीक्ष्य मधुरांश्च निशम्य शब्दान् पर्युत्सुर्कीभवति यततुखितोऽपि जन्तुः। तच्चेतसा स्मरति नूनमनोधपूर्व भावस्थिराणि जननान्तरसौहृदानि ॥ शाकुन्तल। प्रकृति की यह भाव-प्रेरक शक्ति कल्पित नहीं, किन्तु यथार्थ है यही कालिदास का मत है :- * लख्ति के सुन्दर वस्तु शरु मधुर गीत सुनि कोई। नुखिया जनहूं के हिये उत्करठ यदि होइ॥ कारन ताको जानिये सुधि प्रगटी है आय। जन्मान्तर के ससन की जो नन रही समाय।।
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१६६ काव्यानुशीलन
शृंगे कष्णनृगत्य वामनयनं कण्डयमानां मृगीम्।
और अ्रन्यत्र शाकुन्तल।
मधुद्विरेफ: कुमुमैकपात्रे पपौ प्रियां स्वामनुवर्तमान: । शृङ्गेण च स्पर्शनिमीलिताथें मृगीमक्रण्ड्यत कृष्णसारः ॥ कुमारसंभव पूर्वोक्त दष्ठान्तों से यह स्पष्ट है कि प्रकृति की अमुक्त स्थिति- स्थान और समय-पशु-पक्षी में भी, मनुष्य का तो कहना ही क्या, श्रमुक भाव उत्पन्न करती है। मनुष्य का प्रकृति से घनिष्ठ सम्बन्ध होने के कारस उसके हरृदय में भी प्रकृति ऐसा ही भाव उत्पन्न करती है। यह कालिदास की छढ़ भावना है। समस्त विश्व की अरखण्डता का भान इस भावना में समाया रहता है, जिसके कारण काव्य लोकोत्तर आानन्द का हेतु हो जाता है। प्रकृति को एक शक्तिरूप से मानकर अथवा उसके तरह तरह के हश्यों को देखकर उनसे शिक्षा ग्रहण करना-यह प्रकृति के प्रति कविहृदय की वृत्ति का और एक प्रकार है। अंग्रेज कवि वर्डस्वर्थ इस रीति से अखिल प्रकृति को एवं उसके किसी किसी दृशय को देख कर शान्त शुद्ध और उदात्त भाव का अनुभव करता था। हमारे यहाँ भी कितने ही कवियों ने प्रकृति के भिन्न-भिन्न दृश्यों को निरर कर उनसे उपदेश ग्रइण किये हैं (द्रष्टव्य भागवत १०।२०)। कविवर वर्डस्वर्थ के प्रकृति-वर्णन में यह विलक्षणता है कि उसने प्रकृति को एक अ्र्प्रखण्ड और सजीव वस्तु मानकर उसका साक्षात्कार किया है। किन्तु इस सम्बन्ध में यह ध्यान रखने की बात है कि वर्डस्वर्थ के हप्टिबिन्टु पर फ्रांस के ततत्वचिन्तक रूसो का अरप्रसर पड़ा था। फ्रांस में क्रान्ति पैदा करनेवाले तत्त्वचिन्तकों में रूसो एक मुख्य पुरुप था। उसकी यह अटल वारणा थी कि इस संसार को मनुष्य ने स्वचं ही विगाड़ा है और यदि मनुष्य वर्तमान मुठी संस्कृति को छोड़कर प्रकृति के स्वरूप को प्राप्त कर ले तो वह अ्रधिक निर्दोष और सुखी
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होगा। यही कल्पना इस समय फ्रान्स से इंग्लैण्ड में संक्रान्त हुई थी। और इसी दृष्टि का काव्यात्मक स्वरूप हमें वर्डस्वर्थ में मिलता है। हमारे यहाँ कवियों ने 'वन-श्री' 'वन-लच्ष्मी या 'वन-देवता' की कल्पना की है और सांख्यमत का आश्रय लेकर सचराचर विश्व में व्याप्त एक प्रकृति का दर्शन किया है और उसकी दिव्यता सूचित करने के लिये उसका देवीरूप से वर्णान किया है। परन्तु जिस रीति से कवि वर्डस्वर्थ ने प्रकृति का काव्य में वर्णन किया है उस रीति से संस्कृत कवियो ने नहीं किया। किन्तु क्या उस रीति से होमर आदि ग्रीक महाकवियों ने भी इसका वर्णन किया है? क्या कीट्स, वायरन' टेनीसन अथवा अन्य किसी कवि ने प्रकृति का उसी रीति से वर्सन किया है ? प्रकृति-विषयक कल्पनाओं में भिन्नता होते हुए भी प्रकृति के प्रति प्रम त्ररथवा आदर में और उससे उत्पन्न होनेवाले काव्यानन्द में न्यूनाधिकता नहीं होती। पूर्वोक्त कालिदास की प्रकृति-विषयक भावना और मनुष्यहृदय के साथ उसके सम्बन्ध का भाव, वर्डस्वर्थ की अपेक्षा, गम्भीरता अथवा तत्वदर्शिता में किसी भाँति कम नहीं है। सस्कृत काव्य में प्रेम-भावना संस्कृत काव्य तरप्धिकांशतः प्रेममूलक होते हैं। मानव जीवन को सरस बनाने वाली तथा उसे उदात्त मार्ग के ऊपर अग्रसर करनेवाली चित्तवृत्ति प्रेम ही तो हैं। संस्कृत के महाकवियों ने अपने काव्यो तथा नाटकों के लिए रागात्मिका भावना को उद्युद्ध करनेवाले आ्रख्यानों को चुना है। इसमें उनकी मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रतिभा का साक्षात्कार हमें मिलता है। प्रेम के साथ नारी-सौन्दर्य भी अ्रन्योन्य सम्बन्ध से संद्द्ध रहता है। कतियो ने अपने लघु कथा वृत्त को उप. बृंहित करने के लिए काम की उद्दीपक सामग्री का प्रचुर उपयोग अरपने काव्यो में किया है। इसके निमित्त सन्ध्या, सूर्योदय, प्रभात, अन्धकार चन्द्रोद्य आदि उद्दीपक ऋतुदृश्यों के साथ ही साथ स्ति्रियों को जल- क्रीडा, नाना प्रकार की उद्दीपक कामचेष्ठाओं का भी विवरण इमें इन
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१६८ काव्यानुशीलन काव्यों में प्राप्त है। 'कामशास्त्र' में प्रवीणता तथा विज्ञता का प्रदर्शन ही कविजनों का सुख्य उद्देशय माना गया है। अपरनेक कवियों ने 'काम सूत्र' में वशित कामी जनों की ललित चेप्राओं के प्रदर्शन के लिए ही अपने काव्यों के अपरनेक अंश का निर्माण किया है। इस तत्कालीन रुचि का अरज्ञान ही इन वर्णनों के ऊपर अशीलता के दोपारोपण करने का मुख्य कारण है। संस्कृत कावयों के प्रेम वर्णन का अपना वैशिष्ट्य है। संस्कृत कवियों की दृष्टि में प्रेम दिव्य लोक की वस्तु होने के साथ ही साथ इस भूतल पर विचरणशील भौतिक पदार्थ है। संस्कृत कवि काम को मानव जीवन को क्षुध्ध करनेवालीभौतिक क्षुधा के रूप में ग्रहण करता है औरौर इसीलिए काम के इस शारीरिक प्रभाव के चित्रण करने में वह पराहमुख नहीं होता। नारी सौन्दर्य का चित्रण भी हमारे कवियों का कलात्मक होता है। वे नारी को भोग्य वस्तु से ऊपर उठाकर कलाभिव्यक्ति का मुख्य साधन पदार्थ मानते हैं। लक्षा तथा लक्ष्य ग्रन्थों में उभयन्न ही यही कलात्मक भावना सर्वत्र समाहत तथा सत्कृन की गई है। इस साहित्यिक वैशिष्ट्य तथा तत्कालीन लोकरूचि का विशलेपएा बिना किये ऐसे वर्णनों की आधुनिक नियमों से समीक्षा करना तथा उन्हें अरील वत- लाना ऐतिहासिक भूल है। सदाचार के विषय में प्रत्येक देश तथा काल का एक निजी मापदण्ड होता है और उसी के सहारे उस देश तथा उस युग की साहित्यिक कृतियों का मृल्यांकन किया जा सकता है। संस्कृत कवियों के इस प्रेमवर्शन को घीसवीं सदी के पाश्चात्य मापदण्ड से मापना उसी प्रकार अरप्रनुचित होगा जिस प्रकार भारतीय दृष्टि से शेक्सपीश्चर के नाटकों में वर्शित प्रेमडयों में कामुकता तथा अइलीलता की उद्भावना। संस्कृत के आलोचक-प्रवर सूट्ट' ने र्पष्ट ही लिखा है कि किसी कवि को परदारा की न तो स्वयं अभिलापा करनी चाहिए और न उसका उपदेश ही दूसरों के लिए करना चाहिए, १. नदि कविना परदाश एषव्या नापि चेपदपया:
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परन्तु उसके चरित्र का चित्रण तथा रूप का वर्णन कर्तव्य दृष्टि से ही करना चाहिए। अतः संस्कृत का कवि नारी के रूप का वर्णन तथा प्रेम का चित्रए इसी उदात्त भावना से प्रेरित होकर ही करता है। ऐसी दृशा में उसके ऊपर अश्लीलता का आरोप एकदम मिथ्या है। निष्कर्प यह है कि संस्कृत काव्यों में प्रेम के स्वरूप का बोध दो प्रकार से होता है-रूढिग्रस्त और सहज प्रतिभाजन्य। रूढिग्रस्त प्रेम का चित्रए भारवि तथा माघ के महाकाव्यों में उपलब्ध होता है। इनका प्रेम-वर्णन रूढ़िबद्ध होने पर भी न तो अनुचित है और न अप्रासंगिक। इसके स्वरूप के औचित्य का निर्राय तत्कालीन सामा- जिक रुचि, वातावरण, शिक्षा-दीक्षा तथा आचार-विचार के ऊपर ही किया जा सकता है। संस्कृत काव्यों को सृष्टि राजदरबारों में हुई जहाँ शिष्टता, सभ्यता और उच्च शिक्षा का प्राधान्य था। नागरिक रुचि भी सुसंस्कृत थी। कामशास्त्रीय त्र्रनेक तथ्यों का काव्यों में समा- वेश पाने का यही रहस्य है। संस्कुत काव्य का श्रोता सुसंस्कृत, कला- प्रवीस नागरिक होता था जिसके चित्तविनोद के निमित्त कामशास्त्रीय तथ्यों का उद्धाटन कविजनों के लिए आ्रवश्यक होता था। यह सब होने पर भी काव्य में प्रेमाभिव्यंजना सौन्दर्य तथा कला की सीमा के भीतर पूर्ण औचित्य के साथ नियोजित की गई है। भारतीय समाज की सदाचार-सम्पन्नता ने प्रेम वर्णन में अलीलता के लिए कभी अवसर तथा प्रश्रय नहीं दिया। अ्ररगस्टन युग के रोमन कवियों के रीति ग्रन्थ में अश्लील तथा कामुक प्रेम का वर्णन संस्कृत कवियों के काव्यों में खोजने पर भी न मिलेगा। इसके लिए तो उस समय का वैभव-सम्पन्न कुरुचिपूर्ण रोमन समाज ही एकमात्र उत्तरदायी है। सहज प्रतिभाजन्य प्रेम का दर्शन हमें वाल्मीकि तथा कालिदास के काव्यों में होता है जिसमें साधना के सहारे दोषपूर्ण काम भी पूर् विशुद्ध और परिष्कृत प्रेम के रूप में परिणत हो गया है।
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शिव महिम्न:स्तोत्र
दार्शनिक भावों की दृष्टि से, अथवा भापा के लालित्य के अभिप्राय से, शिव-महिम्नःस्तोत्र समग्र शिवस्तोत्रों की अपेक्षा अ्रधिक लोकप्रिय है। वास्तव में, इस स्तोन्न में ईश्वर की सत्ता आदि अनेक विषयों पर दार्शनिक विचार प्रकट किए गए हैं तथा उनकी सिद्धि के प्रकार का भी उपपादन किया है। छंद 'शिखरिणी' होने से इस स्तोन्न में अद्भुत मनोहरता तथा सुन्दरता का समावेश पाया जाता है। इन्हीं कारणों से स्तोत्र के अन्त में भक्तों का यह उद्गार१ कि शिव से वढ़कर कोई देवता नहीं, और न महिम्न:स्तोत्र से बढ़कर कोई स्तुति है, इस स्तोत्र के विषय में साधारण जनता के अन्तरतल के भावों को प्रदर्शित करने में पर्याप्त है। इसी स्तोत्र के रचनाकाल का निर्णाय नीचे किया जाता है। इस स्तोत्र में आजकल ४० श्लोक मिलते हैं। परन्तु मधुसूदन सरस्वती ने केवल ३२ पद्यों पर ही टीका लिखी है; जिससे जान पड़ता है कि उस समय इस स्तुति के इतने ही पद्य बनाए गए थे। उससे भी प्राचीन शिलालेख के आधार पर शुरू के केवल ३१ ही पद्य प्रार्चान ठहरते हैं। इन्दीर-राज्य के अन्तर्गत मालवा-देश में, श्री नर्मदा के तट पर, श्रीअमरेश्वरनाथ महादेव का मन्दिर है। उसी मन्दिर की दीबार पर महिम्न:स्तोत्र के ३१ पद्य खुदे मिले हैं। यह लेख विक्रम संवत् ११२० का है। इससे जान पड़ता है कि आज से आठ सी वर्ष पहले महिम्नःस्तोत्र के केवल ३१ ही पद्य मूलभूत थे; शेप पद्य पाठकों १ मंहेशानानरां देवों महिन्ना नापरास्तुनिः । (श्लो० ३७) २ निर्सयसागर प्रेत का संस्करय।
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शिव महिम्न:स्तोत्र २०१ ने अपनी इच्छानुसार बढ़ा दिए हैं। अन्तिम ९ उलोकों में तो केवल अंथकर्ता का नाम तथा स्तोत्र-पाठ के फल का उल्लेख है। निश्चय ही यह अंश मूल स्तोत्र की रचना के अनन्तर जोड़ दिया गया होगा।
रचयिता महिम्न:स्तोत्र के टीकाकारों ने 'पुष्पदंत'-नामक किसी गंधर्व को इसका रचयिता बतलाया है। परन्तु मदरास की कितनी ही हस्त- लिखित प्रतियों में कुमारिल भट्टाचाये ही इसके कर्ता लिखे गए हैं।१ एक टीकाकार ने कुमारिल को शिव के पुत्र सुब्रह्मण्य का अवतार मान कर इस स्तोत्र का लेखक माना है। ये वातें इस स्तोत्र की प्राचीनता तथा अरतिशय आदर को सूचित करती हैं। डी० सी० भट्टाचार्य ने प्रबंधचिंतामणि के आधार पर 'ग्रहिल' को इसका रचयिता माना है। परन्तु अन्य किसी ग्रन्थ से इसकी पुष्टि न किए जाने के कारण यह मत भी उतना उपयुक्त नहीं जान पड़ता।
समय प्रबंध चिंतामणि में इस स्तोत्र का एक पद्य मिलता है। इससे इसका समय १२ वीं शताब्दी के इधर कभी नहीं हो सकता। परंतु एक और प्रमाण की उपलब्धि से इसकी प्राचीनता स्थिर की जा सकती है। राजशेखर (दशम शताब्दी के आ्र्प्ररंभ में) ने अपनी 'काव्य मीमांसा3 के आठवें अध्याय में 'काव्यार्थयोनि' का विचार किया है। इसमें उसने 'न्याय वैशेपिक' के सिद्धांत को दिखलानवाले महित्र:स्तोत्र के निम्न-लिखित पद्य को, उदाहरण के रूप में, उद्धुत किया है।
2 फैंटलाग शर संस्कृत मैन्युस्किप्ट्म (महरास), जि० १६; नं० १११०३। २ ट ा्डियन एसटिकेरी (वर्ष १६१७ )। 3 काव्य-भीमांमा-गायरवा ठ्ओरियएं्ल-नीरीज के प्रथम ग्रबकी भूनिका, 43 १५ 1 ४ काव्य-मीर्मोसा, प० ३७।
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२०२ काव्यानुशीलन
"न्यायवैशेषिकीयः-स किं सामग्रीक ईश्वरः कर्ता इति पूर्वपक्षः। निरतिशयैश्वर्यस्य तस्य कतृ त्व्रमिति सिद्धांतः। अ्रत्र- किमीहः किकायः स खदु किमुपायस्त्रिभुवनं किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च। अतक्यैश्वर्ये त्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः कुतकोंऽयं कांध्चिन्मुखर्यति मोहाय जगतः । यह शोक आजकल के पाठ के अनुसार पाँचवाँ है। इसके मूल स्तोत्र का सत्य त्रंश होने में किसी प्रकार का संदेह उपस्थित नहीं किया जा सकता। दसवीं शताब्दी के आरंभ में यह स्तोत्र इतना प्रसिद्ध था कि राजशेखर ने पूर्वोक्त पद्य उद्धृत करते समय इसका नाम लेने की आवश्यकता नहीं समझी। अतएव यह स्तोत्र दसवीं शताब्दी से भी अरधिक प्राचीन है। म्तोत्र का एक पद्य सुबंधु (छठी शताव्दी में) की वासवढत्ता के गद्य के सर्वथा अनुकूल है। मुद्रित पुस्तकों का ३खवाँ श्रोक१ सर्व साधारण में अत्यंत प्रसिद्ध है। श्लोक का भाव यथार्थ में रमणीय है। वासवदत्ता में भी ठीक ऐसे ही भाव की अवतारखा पाई जाती है।2 अतएव यदि स्तोत्र के उस पद्य को वासवदत्ता के गद्य की छाया पर
१ अ्रमितगगरिसम स्वव कज्जलं सिधुपात्रे सुरतरुबरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी। लिक्वति यदि गृहीत्वा शारश सर्वकालं तदपि तव गुखानानीर पावं न य हि। २ वासवटत्ता (वासी-विलास का संन्करस), पृ० ३०६। आवश्यक नद्यांश यह है-त्वकने याऽनया यातनानुभूता, सा यदि ननः पतायने, सागरो मेलानंदायने, कलमा लिपिकरायते, नुजनपतिरवा कथकायते, तदा कथमप्चनेवे युगस हमर निलिख्यन वथ्यते वा। (नेलानंट=दावात)। अर्थ-तुन्हारे लिए इस वालिका ने जिननी यानना भोगी, वह यदि प्ाकाश कागज हो जाय, सागर दावात दने, तथा आामा लिखनेवाला या रेपनाग कटनेवाला हो, तो किसी तरह अ्नेक बुग-सदत् में उसका वर्एन दो सकता है।
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शिव महिम्न:स्तोत्र २०३
रचा गया मानें, तो स्तोत्र छठी शताब्दी के पहले का कभी सिद्ध नहीं हा सकता। वासवदत्ता महाकवि सुवंधु की मौलिक कल्पना का भांडार है। स्तोत्र में प्रायः अ्रन्य अच्छे भावों को अरपनाना कोई असंभव नहीं जान पड़ता। तथापि इससे स्तोन्न के समय पर कुछ भी पभाव नहीं पड़ता। ऊपर कहा गया है कि ११वीं शताब्दी में केवल प्रारंभ के ३१ ही पद्य थे; अतएव ३२वाँ श्लोक-वासवदत्ता की छाया मानते हुए भी-पीछे का ही सिद्ध होता है। अतएव इस भाव-साम्य से रचना के प्रश्न को कुछ भी सहायता नहीं मिलती। केवल इतना ही ज्ञात होता है कि स्तोत्र आठवीं या नवीं शताब्दी में बना होगा -दसवीं के अनन्तर का कभी नहीं हो सकता।
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संस्कृत गद्य की रुपरेखा
नद्य का आ््रविभाव मानवीय भाषा के साथ ही साथ सम्पन्न हुआ है। सृष्टि के आरन्भ नें मतुष्य ने जव अपने हदय की बातों को प्रकुट करते के लिये भाषा का माध्यम पकड़ा, तत वह गद्य के रूप में ही प्रस्तुत हुआ। इस प्रकार मावाभिव्यक्ति का भाषा के द्वारा मौलिक माध्यम नाद्य ही है। पद्य तो रद का एक नियमित तथा निश्चित प्रकार है। उन्दोवद्धता ही पद्य की सुख्य पहिचान है। छन्दों के नियमों द्वारा निधद्ध गद्य ही पद्य कहलाता है। रद्य के लब स्वतन्त्र रूप को लघु शुरु के द्वारा व्यवस्थित रूप प्रदान किया जाता है तथा उसमें संगीत की माधुरी तथा अवसाचता का पुढ दिया जाता है, तत्र पद्र का जन्म होता है। इस प्रकार वत्तत्ति तथा व्यापकता की दृष्टि से रद् पद्म की ऋपेक्षा प्राचीन तथा अधिक व्यापक है। अमिव्यक्षना की दृष्टि से इस पाथेक्य की परीक्षा करने पर इस इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि कोमल भावनाओं की अमिश्यक्ति का माध्यम होता है पच् तथा तार्किक चुकियों के प्रकटीकरण का नाध्यम होता है गदा। पत्म के सीमित क्षेत्र में तार्किक बातों का कथन उतनी सुन्दरता और उपादेचना के साथ नहीं हो सकता जिननी गद्य के विशाल क्षेत्र नें। पथ नें उन्दोबहधता पर आग्ह होने के कारस कति रहता है परनन्त्र। वह अपनी कल्पना के पूर्णो वैभत को उचिन रीति से प्रदर्शिन करने का अवसर नहीं पाता। नियमों की वन्त्रणा से वाध्य होकर वह अपनी कला का विलास दिन्बला नहीं पाता । अ: पद कविप्रनिभा के विमन विकार के लिए पूर्स माध्यम नहीं वन सकता। इसके विप- रीन रद्य का लेखक म्वनन्त्र रहता है। स्वरूपनः गद्य उसे किसी
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संस्कृत गद्य की रूपरेखा २०५
प्रकार के नियमों में नहीं जकड़ता। पद्य का रचयिता कवि पिंजरबद्ध शुक के समान है जो पिजड़े की सीमा के वाहर उड़ने के लिए स्थान नहीं पाता और अपने सीमित स्थान के भीतर ही फड़फड़ाया करता है। उधर गद्य का निर्माता उन्मुक्त पक्षी के सदश है जो स्वतन्त्रता के नन्द का रसिक बनकर विशाल साहित्यगगन में स्वेच्छया उड़ान लिया करता है, किसी यन्त्रणा के भीतर वह अपने आप निबद्ध नहीं होता। इसीलिए गद्य कवि की प्रतिभा के परखने के लिंए कसौटी माना जाता है। 'गद्यं कवीनां निकपं वदन्ति' इस प्राचीन आ्रभासक का यही तात्पर्य है।
वैशिष्ट्य
संस्कृत गद्य का अपना निजी वैशिष्ठ्य है जो इसे अन्य साहित्यिक गद्यों से पृथक करने के लिए पर्याप्त सिद्ध हो सकता है। पहिली विशे- पता है प्राचीनता। प्राचीनता की दृष्टि से यह सब गद्यों में श्रेष्ठ माना जा सकता है। गद्य का आविर्भाव हमें सर्वप्रथम बेदों में होता है। गद्य से मिश्रित होने के कारण ही तो कृष्ण यजुर्वेद को कृष्ण नाम से पुकारा जाता है। दूसरी समग्र संहिताओं में, जैसे तैततिरीय संहिता काठक संहिता, मैत्रायणी संहिता आदि में गद्य की विपुल सत्ता उप- लच्ध होती है। अथर्ववेद का गद्य कालक्रम से इससे कुछ अर्तराचीन जाना जा सकता है। अथर्व का छठा भाग गद्यात्मक ही है। ब्राह्मण ग्रन्थों में गद्य का साम्राज्य है। त्राह्मणा ग्रन्थों का मुख्य विपय ठहरा यज्ञयागों का विस्तृत विवरण और इस विवरणात्मक व्यापार के निमिच सबसे उपयोगी माध्यम है गद्य। उपनिषदों को परखने की यह एक निशानी है कि गद्यात्मक रूप में अ्र्रवतीर्ण हुआ है अ्रथवा उसका कोई भाग्य गद्यरूप में निवद्ध हुआ है। इस प्रकार वैदिक गद्य मात्रा में अरधिक व्यापक रूप में सरल तथा सुगम तथा प्रभाव में अ्ति- शय महत्वपूर्ण है। कालक्रम से लोकिक संस्कृत में गद्य की वह व्या- पकता कुण्ठित हो गई है और जिन स्थानों पर उसका नेसर्गिक अवि-
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२०६ काव्यानुशीलन कार होना चाहिए था वहां भी हमें छन्दोबद्ध वाणी के ही दर्शन होते हैं। संस्कृत गद्य की दूसरी विशेषता है लघुकायता। कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक भावों की अभिव्यक्ति की कला संस्कृत भाषा का अरप्रपना वैशिष्टय है। अन्य भाषाओं में एक लम्बे वाक्य के द्वारां प्रकटित अरथ संस्कृत में अनायास एक शब्द के द्वारा अभिव्यक्त किया जा सकता है और इस व्यापार में समासों की सत्ता विशेष जागरूक रहती है। समास संस्कृत भाषा का जीवन है जो अरधिक से अधिक भावों को कम से कम शब्दों में अभिव्यकत करने की योग्यता उसे प्रदान करता है। संस्कृत गद्य में इस समास का बाहुल्य नितान्त आवश्यक माना जाता है। आचार्य दण्डी की यह उक्ति नितान्त प्रसिद्ध है। भोजः समासभूयसत्वम् एतद् गद्यस्य जीवितम्। समास की बहुलता होना ओजगुए कहलाता है और यह गद्य का जीवन होता है। श्रोजगुण के कारण संस्कृत गद्य में विचित्र प्रकार की भावग्राहिता तथा गाढवन्धता का संचार होता है जिससे गद्य का सौन्दर्य पूरे रूप में खिल उठता है। लौकिक संस्कृत में निननद्ध गद्य का यह निजी वैशिष्ठ्य इमें गद्य के स्वर्ण युग में ही दृष्टिगोचर नहीं होता, प्रत्युत गद्य के आरम्भ काल में भी - ईस्वी प्रथम तथा द्वितीय शतक के आसपास-इसकी उपलब्धि होने से हमें वाध्य होकर इसे संस्कृत गद्य की विशेषता मानना ही पड़ता है। ओरजगुए की सत्ता से संस्कृत गद्य वर्ण्य विषय का एक सामूहिक, सुसम्बद्ध, संगठित चित्र प्रस्तुद् करने में सर्वथा समर्थ होता है। असमस्त वाक्यों से चित्र की गाढता का परिचय नहीं मिलता। वह तो विखरी हुई चीज होती है जिसका कोई ही अंग हमारी दृष्टि के सामने आता है और कोई अंश ओभल ही रहता है; परन्तु समस्त पदों का अस्तित्व चित्र के समग्र रूप को उसके व्यापक प्रभाव को, हमारे मानस पटल पर मटिति अंकित कर
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संस्कृत गद्य की रूनरेखा २०७ देता है। समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति का यह एक वाक्य ही विजय स्तम्भ के स्वरूप का पर्याप्त परिचायक है।
सर्व पृथिवी विजय जनितोदय व्यात निखिलावनितलां कीर्तिम् इतस्त्रि- दशपति-भवनगमनावास ललिति सुख विचरणामाचक्षाण इव भुबो बाहुरयम् उच्छितः स्तम्भः ।
गद्य के प्रकार
संस्कृत गद्य को दो उपलब्ध होते हैं-(१) शास्त्रीय गद्य तथा (२) साहित्यिक गद्य। शास्त्रों में गद्य का साम्राज्य ही है, गद्य के ही माध्यम द्वारा शास्त्रों के विषयों का सुन्दर तथा प्रामाखिक विवरण प्रस्तुत किया जा सकता है। यह गद्य भाव प्रकाशन की हृष्टि से नितान्त मरौढ़ तथा समर्थ है। समस्त पदों के रखने के कारए विशेष विचारों का प्रकाशन थोड़े ही शब्दों में बड़ी सुन्दरता तथा सुबोधता के साथ हमारे शास्त्रीय ग्रंथों में किया गया है। इनमें गाढवन्धता का ही विशेष ख्याल न कर प्रसाद गुण की ओर समधिक ध्यान दिया गया है। हमारे शास्त्रीय लेखकों में अनेक आचार्यों के गद्य में भी वही लालित्य, वही रोचकता, वही हृदयानुरज्जकता दृष्टिगोचर होती है जिसे हम गद्य काव्यों में देखते हैं। तथा जिसकी माधुरी का हम आस्वाद लेते हैं। ऐसे ग्रन्थकारों में महाभाष्य के रचयिता पतंजलि, मीमांसक शवर स्वामी, नैयायिक जयन्तभट्ट तथा श्री शंकराचार्य का गद्य विशेष लालित्य सम्पन्न है। आरचार्य शंकर का गद्य तो उनकी लेखननी का विशेष चमत्कार है। अरद्वैत वेदान्त स्व्रभावतः चतर्कप्रवसता के कारण नितान्त दुर्योध तथा कठिन ठहरा, परन्तु आचार्य शंकर ने इतनी सुन्दर भाषा में इतने चमत्कारी गद्य में सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है कि वे अनायास ही पाठवों के ह्रृदय में प्रवेश कर जाते हैं। सुभे तो ऐसा प्रतीत होता है कि वेदान्त की लोकप्रियता का मुख्य रहस्य उसके सिद्धान्तों की व्यापकता में जितना नहीं है उससे अधिक यह शंकर के
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२०८ काव्यानुशीलन
सरल सुबोध गद्य शैली की सत्ता में छिपा हुआ है। आचार्य का यह सरल वाक्य इसकी निदर्शन है :- पद्म्यां पलायितु' पारयमागो नहि जानुम्यां रदितुम् अरहति अरथान् पैरों से भागने में समर्थ व्यक्ति को घुटनों के बल रेंगना. उचित नहीं प्रतीत होता। वाक्य छोटा होते हुए भी स्वयं विशेष चमत्कारी है।
साहित्यिक गद्य
साहितिक गद्य का सुवर्णयुग है सप्रम शतक। इसकी तीन विभू- तियां है। (१) सुबन्धु, (२) वाएभट्ट तथा (३) दंडी। संस्कृत गद्य के लालित्य तथा भावाभिव्यक्ति का माधुर्य तथा उन्नत रूप का दर्शन हमें इन लेखकों के काव्यों में भलीभांति होता है। रूप के कारण भारतीय आलोचक गद्य तथा पद्य में कोई भेद नहीं मानता। काव्य की A निशानी रसात्मकता ही है और उसकी सत्ता होने से ही काव्य का वैभव परिस्फुटित होता है चाहे वह दन्दोमयी वाणी के पद्यात्मक रूप में हो अथवा द्न्दोवर्जित वाणी के गद्य रूप में। सुबन्धु उस युग के प्रतीक हैं; जिसमे इलेप का चमत्कार ही काव्याभूपणों में सत्र से अधिक माना जाता था। इलेपात्मक गद्य का जितना संघटित रूप सुबन्धु की एकमात्र रचना 'वासवदत्ता' में स्फुटित होता है वह साहित्य संसार की एक अनोसी चीज है। सुजनैकबन्धु सुबन्धु ने प्रत्यक्ष इलेषमय प्रपंचविन्यास वैद्ग्धनिधि प्रबन्धं वनाने की जो भीष्म प्रतिज्ञा की, उसे उन्होंने खूब ही निभाया। वासवदत्ता नाम में ही एक विचित्रर जादू है जो रसिकों के कोमल हृदय को वलात् अपनी ओर त्रराकृष्ठ कर लेता है। कालिदास के जमाने में ही वासवदत्ता की प्रेममयी कहानी सुनाकर गांत्र के बूढे लोग लोगों का मनोरंजन किया करते थे। इस ग्रन्थ की नायिका का केवल अभिधान ही वासवदत्ता है। कथावस्तु प्राचीन ऐतिहासिक श्राख्यान से नितान्त मिन्न है। इस गद्य-काव्य में
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संस्कृत गद्य की रूपरेखा २०६
विरोध, उपमा तथा उत्प्रेक्षा का विलास कम नहीं है, परन्तु श्लेष का चमत्कार ही इसका प्राण है। महाराज चिन्तामखि का यह श्लिष्ट वर्शन कितना चमत्कारी तथा कलात्मक है। नन्दगोप इव यशोद- यान्वितः जरासन्ध इव घटितसन्धिवित्रहः भार्गव इव सदानभोग:, दशरथ सुमिन्रोपेतः सुमन्त्राधिप्ठितश्च। अरभंग श्लेष की बहुलता होने से यह कुछ श्लिष्ट हो गया है। और इसीलिये अपने गौरव के अनुकूल इसकी उतनी लोकप्रियता नहीं जितनी इसे होनी चाहिये थी।
बाणभट्ट सप्तम शतक के एकमात्र सम्राटू हर्पवर्धन के कृपापात्र तथा सभा- पंडित बासभट्ट का गद्य, गद्य का वह चूडान्त निदरशन है जिसे अनन्त प्रयास करने पर भी पिछले कैडे के कवि पहुँच नहीं सके। तथ्य तो यह है कि वागभट्टीय गद्य संस्कृत गद्य के लालित्य, माधुर्य तथा औदात्य की पराकाष्ठा है। शैली का प्रवाह दर्शनीय वस्तु है। उनकी रमणीय रचना कादम्वरी अपने विषय में वेजोड़ है। अभी तक तत्सदश गद्य के अभाव के कारए यह सद्वितीय न होकर अद्वितीय है। अरलंकार तथा रस के मधुर सामंजस्य में, भापा तथा भाव के परस्पर मधुर संयोग में, कल्पना तथा वर्शन के अनुरूप संघटन में कादम्बरी संस्कृत साहित्य में अनुपम है, अपनी ज़ोड़ी रखती ही नहीं। वाएाभट्ट को प्रकृति के विकराल भयंकर रूप का इतना पूर्ण ज्ञान है कि विन्ध्याटवी का वर्णन पढ़कर किस पाठक के रोंगटे नहीं खड़े हो जाते। उधर प्रकृति का सौम्यरूप अपने पूर्णा विलास में झलक रहा है तपोवन के वर्णन में। जावालि की सदय मृर्ति के चित्रण में वाए के चरित्रचित्रए में विलक्षण सजीवता है। सौन्य तापस हारीत, आध्यात्मिकता की मूर्ति जावालि, वदान्य नरपति तार/पीड, शुभ्रवसना तपस्विनी महाश्वेता, कोमलहदया कमनीयकलेवरा कादम्वरी कुछ ऐसे ही पात्र हैं जिनका प्रभाव पाठकों के हृदय पर त्रमिट रूप से पड़ता है। यह
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रहने में मुझे तनिक भी सन्देह नहीं है कि कादम्बरी विश्वसाहित्य में अपनी विलक्षण माधुरी के कारण कलापक्ष तथा हृदयपक्ष के यथावत् मिश्रण के कारण एक तद्वितीय वस्तु है तथा भविष्य में भी वनी रहेगी। वाण के द्वारा चित्रित प्रेम एक जन्म से सम्बद्ध शारीरिक विकार की साधकमात्र मनोवृत्ति नहीं है, प्रत्युत वह जन्मान्तर से सम्वन्ध रखने वाली स्वर्ग लोक में भी अनुपलब्ध दैवी वस्तु है। इसीलिए संस्कृत का एक प्राचीन त्रालोचक डंके की चोट पुकार रहा है :- रचिर-स्वर-वर्णपदा रसभाववती जगन्मनो हरति सा किं तरगी नहि नहि वाणी वागस्व मधुरशीलस्व। -दण्डी टुण्डी का सुप्रसिद्ध गद्य 'दशकुमार चरित' कथानक की दृष्टि से विशेप महनीय है जिसमें कोतुक की तथा विस्मय-जनक घटनाओं की बहुलता के कारए अद्भुत रस का प्रभूत संचार होता है। इसकी कथा नितान्त सजीव है जिसके भीतर से तत्कालीन समाज अपनी मनोरम झांकी पाठकों को दे रहा है। दंडी जनता के कवि हैं और इसीलिए काव्य में जनता के सुख हुःख का, वदना आनन्द का पर्याप्त परिस्कुरस हुआ है। इनका गद्य नितान्त व्यवहार-योन्य, सजीव तथा चुसत है। वह न तो इलेष के चोभ से ही दवा हुआ है और न समास के प्रहार से ग्रताडित ही है। सप्नम शतक से लेकर आज की तरह गद्य की रचना होती आ रही है। वनपाल की तिलक मंजरी, वादीभ सिंह का गद्यचिन्तामि सोडूढल की उदय सुन्दरी कथा आदि अनेक आख्यान ग्रन्थों के कारण यह परम्परा आाज भी इसी प्रकार अक्षुण्ा है।
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प्राचीन नाट्य-शास्त्र
नाट्य का विकास तथा शास्त्रीय अध्ययन इस भारतवर्प में अत्यन्त प्राचीन काल में ही सम्पन्न हो चुका था। अनेक मान्य आलोचकों ने नाट्य को ही अपनी आलोचना का केन्द्रविन्दु स्वीकार किया। कश्मीर के आलोचक शिरोमशि अभिनवगुप्त शचित्य तथा रस-परिपाक की दृष्टि से नाटक को समस्त वाङमय विभूतियों में अ्रग्रगण्य मानते थे। वे दशरूपकात्मक काव्य को ही समस्त काव्यों में प्रधान अ्रंगीकार करते थे। काव्यं तु मुख्यतो दशरूपकात्मकमेव। जो कुछ भी कारण हो, इतना तो निर्विवाद है कि आलोचना-जगत् में नाट्य की ही आलोचना अव्य काव्य की आलोचना की अपेक्षा प्राचीनतर है। अलंकार शास्त्र का अध्ययन प्रथमतः नाट्यशास्त्र का उपाङ्ग वनकर ही प्राचीन काल में होता था। नाट्य नाना कलाओं के उचित संविधान होने पर ही यथार्थ रूप से सिद्ध हो सकता है। इसीलिए प्राचीन नाट्यशास्त्र इन उपादेय विद्याओं का भी विशिष्ट विवरण प्रस्तुत करता है।
प्राचीन नाट्याचार्य
आजकल प्राचीन नाटयाचार्यों में भरत मुनि का ही ग्रन्थ उपलब्ध होता है, परन्तु उसकी आलोचना हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचाती है कि भरत का नाट्यशास्त्र अनेक शताब्दियों के अध्ययन तथा अनुर्शालन का परिणत फल है। विक्रम पूर्व अ्रष्टम शर्ती में पाशिनि के द्वारा निर्दिध् शिलालि तथाकृशाश्व.ही हमारे प्राचीनतम नाट्याचार्य हैं, परन्तु इनके नटसूत्र का आज तक कहीं पता नहीं चलता। कोहल एक कृती
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नाट्यचार्य हैं जिन्होंने भारतवर्ष में नाट्य का लोकप्रिय प्रसार कर कमनीय कीर्ति कमाई है। इनके विशिष्ट सिद्धान्तों का निर्देश नाट्य तथा संगीत ग्रन्थों ने बहुशः किया है। वर्तमान भरत-नास्य शास्त्र के संवर्धन तथा उपवृंहण में कोहल का भी विशेष हाथ था। इसका पूरा परिचय अ्रभिनव-भारती से भली भाँति लग सकता है। इनके अतिरिक्त वात्स्य शाण्डिल्य तथा धूर्तिल आ्र््राज्ञ नाममात्र से ही त्र्प्रवशिष्ठ हैं। प्राचीन नाट्यशास्त्र के स्वरूप का दिग्दर्शन करानेवाला एकही अ्रन्थ अवशिष्ट है जिसे ग्रन्थ न कहकर ग्रन्थराज कहना चाहिए। भरत का नाव्यशासत्र सामान्य ग्रन्थ न होकर भारतीय ललितकलाओ्रं का विश्वकोष है। वर्तमान नाट्यशास्त्र शताब्दियों के साहित्यिक उद्योग तथा सत्परेरा का दिव्य परिणाम है। इस ग्रन्थ में तीन स्तर मिलते हैं-' १) सूत्र, (२) भाष्य, (३) कारिका। मूलग्रन्थ सूत्रात्मक्. था जिसके ऊपर विशद भाष्य की रचना कालान्तर में की गई। इस सूत्र-भाष्य अरंश का परिचय रस तथा भावप्रतिपादक पष्ठ तथा सप्तम अध्यायों में हमें मिलता है। अधिकांश ग्रन्थ कारिकाओं में निबद्ध है। शारदातनय के कथनानुसार भरत नामक दो आचार्य हुए थे। वृद्ध भरत ने १२ हजार शोकों में नाट्य का निरूपण किया था, जिसका संक्षेप भरत मुनि ने ६ हजार श्रोकों में किया है। वर्तमान नाटवशास्त्र के ६ हजार शोकों में होने के कारए यह 'पट्सहस्री संहिता' के नाम से विख्यात है।
नाव्य की उत्पत्ति भारतवर्ष में ललित कलाओं का आ्विर्भाव अ्त्यन्त प्राचीन काल में ही हुआ था। नाटय् की उत्पत्ति भारतीय प्रतिभा का ही विशिष्ठ विलास है। आज भी ऐसे विद्वानों की कमी देश में नहीं है जो मानसिक दासता के शिकार बने हुए भारतीय नाट के ऊपर यूनानी नाटथ का प्रभाव स्वीकार करते हैं। नाळ्य की उत्पत्ति भारतवर्ष की ही पुण्यभूमि में हुई और वह हुई भारतीय मनीपियों की प्रभविष्
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प्रनिभा के बल पर ही। नाट्य वेद के समान ही उपादेय तथा मानव जीवन के लिए कल्यासकारी संबल जुटाने वाला शास्त्र है। चारों वेदों से एक एक प्रधान उपकरण को ग्रहण कर रचा गया है यह नाट्यवेद, जो देश तथा वर्ण की सीमित परिधि को पार कर समग्र वरों के हृदय को आवजिंत करने में कृतकार्य होता है। भरत के कथना- नुसार ब्रह्माजी ने ऋग्वेद से पाठ्य, सामवेद से गीति, यजुर्वेद से अभिनय तथा अथर्ववेद से रस का ग्रहणा कर नाट्यवेद नामक नवीन वेद की निर्मिति की। भरत के शब्दों में- जग्राह पाठ्यमृग्वेदात् सामभ्यो गीतमेव च। यजुर्वेदादभिनयान् रसानाथर्वणादषि॥। इस प्रकार भारतीय आलोचना के अनुसार नाट्य वह कला है जिसमें अभिनय के साथ पाठ्य का योग रहता है तथा गीति के साथ रस का सन्निवेश सिद्ध रहता है। नाट्य का प्रधान लक्ष्य है मानव हृद्दय का आवर्जन के साथ साथ उदात्तीकरए। नाट्य का उद्देश्य एक परिधि के भीतर सीमित न होकर सन प्रकार के मनुष्यों का कल्याण साधन करना है। नाव्य धर्म में प्रवृत्त मानवों के लिए धर्म का उपदेश करता है। कीवों के हृदय में उत्साह फूँक देता है; दुर्विनीतों के लिए निग्रह का काम सिखलाता है। वेदना से विकल चित्तवाले व्यक्तियों के हृदय पर सुख तथा शान्ति का मलहम पोतता है। तात्पर्य यह है कि भिन्न वृच्ति वाले व्यक्तियों के चित्त की आराधना करने वाला यदि कोई एक पदार्थ है तो वह नाट्य ही है। इस कला के प्रवीस पारसी कालिदास की यह उक्ति जितनी मार्भिक है उतनी विशद भी है- देवानामिदमामनन्ति मुनयः शान्तं क्रतु चाकषुपं रुद्रेणेदमुमाकृतव्यतिकरे स्वाक्के विभकं दिया। त्रैगुण्योद्भवमत्र लोकचरितं नानारसं दृश्यते नाट्यं भिन्नवचेर्जनत्य बहुधाप्येकं समाराधनम्॥
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प्रेक्षागह अत्यन्त प्राचीन काल में नाटक का अभिनय वाहर मैदान में त्रकाश के नीचे ही हुआ करता था, परन्तु नाना प्रकार के विव्नों के उठ खड़े होने पर रंगमंच का आविर्भाव हुआ। नाट्यशास्त्र 'प्रेक्षागृह' का विवरण वड़े विस्तार से प्रस्तुत करता है। प्रेक्षागृह तीन प्रकार के होते थे-विकृट्, चतुरत् तथा अस। इनमें विकृष्ट भेद विस्तृत होता था जिसमें देवताओं से सन्तद्ध दृश्य दिखलाये जाते थे। 'चतुरस्' त्पष्ट ही चौकोना होता था; परिमां में मध्यम आकार का होता था और विशेष कर राजाओं के लिए निश्चित किया गया था। 'त्र्यत्न्' तिकोने ढंग का प्रक्षागृह धा जो मात्रा में सबसे छोटा था तथा सामान्य प्रकृति के लिए विहित था। प्रक्षागृहों के विधान के विषय में भरतमुनि बड़े ही वैज्ञानिक हैं। उनका त्पष्ट कथन है कि प्रेक्षागृह को विस्तार में अधिक होना नितान्त अनुचित है, क्योंकि ऐसी दशा में उचारित शब्द स्पष्ट रूप से दर्शकों के कानों तक पहुँच नहीं सकता। 'सुश्रव्यता' नाव्य का प्रधान गुश है और इसकी सिद्धि मध्यम परिमाणवाले प्रेक्षा- गृहों के अस्तित्व पर ही आरश्रित हो सकती है- मण्डपे विप्रकृष्टे तु पाठ्यमुच्चारितत्वरम्। अ्ननभिव्यक्त वर्णत्वात् विस्वरत्वं नृशं व्रजेत् । (ना० शा० २।१६) प्रेक्षागृह का आधा भाग तो दर्शकों के निमित्त सुरक्षित रखा जाता धा और आधा भाग नटों के व्यवसाथ के लिए निश्चित रहता था। इसमें भी आधा भाग रंगपीठ कहलाता था जिसके ऊपर अभिनय कार्य निष्पन्न होता था। सबसे पिछला भाग 'रङ्ग्शीर्प' के नाम से अभिहित होता था और यहीं नटों के लिए नेपथ्य विधान होता था। प्रक्षागृहों के विभिन्न स्थानों पर नाना देवताओं की पूजा होती थी। सूत्रधार का वस्तुतः इन आवश्यक विधानों का सम्पादन ही मुख्य कार्य होता था। चह आरन्भिक पूजन 'पूर्वरङ्ग' कहलाता था और एक विस्तृत व्यापार
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होता था जिसका केवल अन्तिस अंश नान्दी के नाम से आज भी संस्कृत नाटकों में अ्र्रवशिष्ट है। इस नान्दी क अ्रनन्तर ही पात्र का प्रवेश होता था। पूर्वरङ्ध के अवसान में श्रोताओं के हृदयवर्जन के लिए संगीत का यथावत् संविधान होता था और उस अवसर पर गाई जानेवाली गीति ध्रुवा के नाम से विख्यात है। ध्रुवा-गीति के पाँच प्रकार निर्दिष्ट किये गये हैं-उत्थापनी, परिवर्ता, अपकृष्टा, अड्डिता तथा विक्षिता। इनका गायन विशिष्ट स्वर में विशिष्ट ताल तथा मात्रा के योग से होता था। उत्थापनी ध्रुवा का उदाहरण यहाँ देना अनुचित न होगा- देवं विभुं त्रिभुवनाधिनति कैलासपवंत-गुहामिरतम्! शैलेन्द्र-राज-तनया-दयितं मूर्ध्ना नतोऽस्मि त्रिपुरान्तकम्॥ अभिनय अररत प्राचीन काल के अपरभिनय की ओर दृष्टिपात करना आवश्यक है। अभिनय चार प्रकार के होते हैं-(१) आरांगिक, (२। वाचिक, (३) आहार्य, (४) सात्विक। इन चारों अरभिनयों के द्वारा प्रस्तुत कथावस्तु ही दर्शकों के सामने अ्रभिनेय पदार्थ का यथार्थ रूप दिखला सकती है तथा उनका मनोरञ्जन कर सकती है। आरंगिक अ्रप्रभिनय का सम्बन्ध दृष्टि, मुख, हस्त तथा पाद आदि नाना अवयवों से है। भरतमुनि ने इस अभिनय का इतना सांगोपांग विस्तृत विवरण दिया है कि आजकल के वैज्ञानिक युग में भी वह विलक्षण तथा विचित्र प्रतीत होता है। हाथों के द्वारा प्रस्तुत अ्ररभिनय का प्रकार दो चार दस नहीं है, प्रत्युत पूरे १०८ हैं। इन अंगहारों का रूप भी समझना आज- कल के लिए असम्भव हो जाता, परन्तु धन्यवाढ है तेरहवीं शती में दक्षिए भारत पर शासन करने वाले राजसिंह (१२४३ ई०-१२७३ ई०) को जिन्होंने चिद्म्वरम् के सुप्रसिद्ध शैव मन्दिर के गोपुरं में इन
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समग्र करणों को नाट्यशास्त्र के तद्विपयक श्लोकों के साथ खुदवाया है। ये आज भी नटराज मन्दिर की शोभा बढ़ा रहे हैं। रस का सद्यः उन्मीलन दर्शकों के हृदय में करना ही नाथ्य का प्रधान लक्ष्य है त्रौर इस कार्य में नेत्रों का विधान बड़ा ही सहायक होता है। भरत ने ३६ प्रकार की रस तथा भावोद्वोधक, दृष्टियों का विवरस अपने ग्रन्थ में दिया है जिनसे हमारे मनोभावों की अभिव्यक्ति स्पष्टरूप से दर्शकों को होती है। इस प्रसंग के महनीय मनोवैज्ञानिक मूल्य की ओर हम अपने श्रोतात्रं का ध्यान शरकृष्ट करना उचित समझते हैं।
वाचिक अरभिनय में नटों तथा पात्रों के पाठ्य का विधान रहता है। पाठ्य के द्वारा ही कोई पात्र अपनी भावना अभिव्यक्त करता है तथा अन्य पात्रों के साथ कथनोपकथन में प्रवृत्त होता है। इसीलिए भरत ने इसे नाट्य का शरीर माना है तथा इस कार्य में विशेष यत्न करने के लिए कहा है- वाचि यत्स्तु कर्तव्यो नाट्यस्येयं तनुः स्मृता। अङ्गनेपथ्यतत्वानि वाक्यार्थे व्यञ्ञयन्ति हि॥ (१५।२ ) पाठ्य दो प्रकार का होता है-संस्कृत तथा प्राकृत। उच्वकोटि के पात्रों की भापा संस्कृत होती है तथा नीच श्रेणी के पात्रों की भाषा प्राकृत होती है। नाट्य का पाठ्य कवित्वमय होता है। अपतः उसके लिए दोपों का परिहार, गुए तथा अलंकारों का संग्रह करना नितांत आरवश्यक होता है। अरभिनय का सर्वस्व होता है-शचित्य विधान। जो वस्तु जिस प्रकार की होती है उसे उसी प्रकार से रंगमंच के ऊपर दिखखाना औचित्य की परिधि के भीतर आता है। भरत का विधान बड़ा ही साहित्यिक, सरस तथा उपादेय है। वयोडनुरून: प्रथममस्तु वेपो वेपानुरुपश् गतिप्रचारः ।
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गतिप्रचारानुगतं च पाठ्यं कार्यः ॥ ( १४।६८ ) प्रथम तो उम्र के विचार से उचित वेष होना चाहिए। वेष के अनुरूप होनी चाहिए गति तथा क्रिया। पाठ्य गतिप्रचार के अनुरूप होता है तथा पाठ्य के अनुरूप अभिनय करना चाहिए। इस नियम के यथावत् पालन करने से ही नाव्यकला में सिद्धि प्राप्त हो सकती है। आहार्य अभिनय के भीतर वेश भून तथा आभूवणों का विधान किया जाता है। अधिक आभूषणों के धार करने से नट श्रान्त हो जाता है, इसीलिए ठोस सोने के गहनों के स्थान पर लाह से भरे गहने होने चाहिए। यह वर्णन प्रयोग पर दृष्टि रखनेवाले आचार्य की गहरी दृष्टि का सूचक है- गुर्वाभरणसन्नो हि चेष्टां न कुरुते पुनः! गुरुमारावसन्नस्य स्वेदो मूर्छा प्रजायते।। तस्मात् न सम्यक च कृत सौवण भूपणं भवेत्। जतुपूर्णाल्रत्नं तु न खेद-्जननं भवेत् ।। (२३।४७, ४८) इसी प्रसंग में रमश्रुकर्म का विधान भी किया जाता था। द़ाढ़ी रखने की प्रथा प्राचीन भारत में बहुलता से थी। अतः रंग मंच पर अवतीर्र होने वाले पात्रों के वेष को सजाने के लिए उचित दाढी रखने का भी विशेष नियम रखा जाता था। सातत्विक अरभिनय अन्तिम प्रकार का अभिनय है जिसमें पुरुषों की तथा स्त्रियों की नाना चेष्टाओं-हाव, भाव, हेला आदि-का प्रदर्शन दिखलाया जाता था। नाट्य के साथ संगीत का बड़ा ही वनिष्ठ संबंध था। संगीत के प्रयोग से अ्रभिनय नितान्त स्निन्ध तथा मंजुल हो जाता है। अः आजकल की भाँति प्राचीन काल में संगीत का मधुर संविधान रंगमंच पर अवश्य होता था।
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प्रवृच्ति नाट्य प्राचीन काल में जीवित कला थी। नाट्य प्रदर्शन की तत्कालीन अ्रनेक शैलियाँ थीं जिनमें चार-शैली का, जिसे प्रवृत्ति कहते थे, भरत मुनि ने निर्देश किया है। दाक्षिसात्या प्रवृत्ति, का प्रचलन विदर्भ तथा उससे दक्षिए देशों में था। आवन्तिका में वीर तथा शृंगार रसों का प्रदर्शन मुख्य था। औड्रमाधवी पूरव भारत की प्रवृत्ति थी तथा मध्यदेश की शैली पाश्चाली के नाम से पुकारी जाती थी। भारतीय नाट्यशास्त्र का यह एक सामान्य चित्र है। इससे स्पष्ट है कि नाट्य भारतवर्ष की प्रतिभा का स्वतन्त्र विलास है। जिस 'जवनिका' शब्द का आरश्रय लेकर नाट्य के ऊपर यूनानी प्रभाव बतलाया जाता है वह शब्द वत्तुतः जवनिका है, यवनिका नहीं। प्रयोग नाट्य का साधन है औ्र दर्शकों के हृदय में रस का उन्नेष लक्ष्य। इस वयवसाय में प्राचीन नाट्य सर्वथा समर्थ होता था, यह कधन पुनरुक्तिमात्र है।
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संस्कृत रंगमंच
भारतीय मनीषियों की प्रतिभा सिद्धांत के प्रतिपादन के साथ ही साथ तद्व्यवहार के विवरण देने में भी समर्थ रही है। नाट्य की उत्पत्ति जिस प्रकार भारतीय नाट्याचार्यों की सैद्धान्तिक प्रतिभा का विलास है, उसी प्रकार रंगमंच की रचना उनकी व्यावहारिक प्रतिभा का निदर्शन है। भारत में समग्र साधनों से परिपूणं रंगमंच का उदय उतना ही प्राचीन है, जितना अभिनय का उदय। श्री भरतमुनि ने अपने प्रख्यात ग्रन्थ भरतनाट्य शास्त्र में इन दोनों विषयों का प्राचीनतम आद्य विवरस प्रस्तुत किया है। भारतीय नाटक के विकास पर यूनानी प्रभाव का भ्रान्त आर्ररोप करनेवाले आ्र्प्रालोचक आँख खोलकर देख लें. कि भारतीय रंगमंच की सर्वाङ्गोए व्यवस्था, रमणीय सज्जा तथा वैज्ञा- निक निमिति के साथ यूनानी रंगमंच को अनगढ़, अत्यवस्थित तथा आमीसा रचना की कदापि तुलना नहीं हो सकती। दोनों में जमीन आसमान का अन्तर बना हुआ है। भारतीय रंगमंच की अपनी एक सुश्लिष्टता है जिसके कारण उसका प्रभाव वृहत्तर भारत, जावा, सुमात्रा आदि द्वोपों के रंगमंचों पर कभी पड़ा था तथा वह प्रभाव उसी रूप में आज भी देखा जा सकता है। रंगमंध का प्राचीन संस्कृत नाम है प्रक्षाग्रह या रंगशालाL अपने जीवन के आरम्भ में भारतीय नाटक का अ्रभिनय ठेठ आस- मान के नीचे खुले मैदान में होता था जिसके देखने में किसी प्रकार का प्रतिबन्ध न था, परन्तु विघ्नों के उदय ने नाम्याचार्यों को- वाध्य किया कि वे नाट्च प्रयोगों को खुले मैदानॉ से हुटाकर बन्द स्थानों में ले जायँ। भरत के कथनानुसार प्रथम अभिनीत नाट्य 'महेन्द्र-
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विजय' था जिसमें देवताओं का विजय तथा दानवों का पराजय दिस्- लाया गया था। पराजय के दृशय देत्यों के हृदय में प्रतिहिंसा की भावना जगाने में समर्थ हुए। फलतः अभिनय समाप्त होने से पहिले ही दैत्यों ने यह विघ्न उपस्थित कर दिया कि चलशाली देवों। ने अपनी समग्र शक्ति का प्रयोग कर ही बड़े धैर्य से तथा बड़े चल से उनका प्रशमन किया। परन्तु इस कलह तथा विघ्नके नाटक प्रयोग को सदा के लिए बचाने के लिए त्रह्मा की आज्ञा से विश्वकर्मा ने प्रक्षागृह का निर्माण किया। भरतमुनि के कथनानुसार प्राचीन भारत के प्रेक्षागृह या नाट्य मण्डप तीन प्रकार के होते हैं। इन तीनों का परिमाए तथा उपयोग भिन्न भिन्न हुआ करता था। इन तीनों प्रेक्षागृहों के नाम थे (१), विकृष्ट, (२) चतुरस, (३) त्र्यस्र। इनमें से विकृष्ट सघसे बड़ा होता था तथा देवताओं के ही लिए नियत किया गया था। इसका परिमाण था १०८ हाथ। इसके आकार का ठीक पता नहीं चलता है। सम्भवतः यह गोलाकार होता था। चतुरस तो स्पष्ट ही चौकोर रंगमंच था जिसकी लम्बाई होती थी ६४ हाथ तथा चौढ़ाई ३२ हाथ। यह मव्यम कहलाता था तथा राजाओं के लिए तथा साधारण जनता के लिए भी यह प्रेक्षागृह आदर्श माना जाता था। 'ड्यस्न' तिकोने ढंग का रंगमंच था जिसकी प्रत्येक भुजा ३२ हाथ की होती थी। इसका उपयोग सम्भवतः छोटे छोटे नाटकों के अभिनय के अवसर पर किया जाता था।
आदर्श रंगमंच
इन तीनों रंगशालाओं में चतुरस' या मध्यम प्रेक्षागृह आदर्श - समझा जाता था। इसके वैशिष्टय के वर्णन के अवसर पर भरत मुनि की वैज्ञानिक तथा व्यावहारिक पदुता का उत्ज्वल दष्टान्त हमें उपलब्ध होता है। आदर्श प्रेक्षागृद् के चुनाव के अवसर पर तीन
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संस्कृत रंगमंच २२१ घातों पर विशेष दृष्टि रखी जाती थी। दर्शकों को रंगपीठ पर होने वाले वार्तालाप (पाठ्य) तथा गायन (गेय) का श्रव खूब अच्छी. तरह होना चाहिए। नाट्य प्रयोग में गीतियों का उपभोग दर्शकों के मनो- रंजन के निमित्त ही किया जाता है। यदि श्रोताओं के कानों के लिए गायन /अस्फुट ही वने रहे तथा पात्रों की परसपर वातचीत स्पष्ट रूप से श्रुतिगोचर नहीं होती थी तो वे उस अभिनय का आनन्द नहीं उठा सकते। रंगमंच के विशाल होने में एक और भी हानि है और महतो हानि है। अभिनयों में सात्विक अभिनय का महत्वपूर्ण स्थान है। भिन्न-भिन्न त्रवस्था में भिन्न-भिन्न रसों के अभिनय प्रसंग में, पात्रों के मुखमण्डल पर अभिनीत भाव अपना प्रभाव डालता है। इसका साक्षात्कार उचित रीति से मध्यम परिमाणवाले प्रेक्षागृहों में ही हो सकता है। भरतमुनि के शब्दों में यश्चाप्यात्यगतो भावो नानादृष्टिसमन्विरितः । स वेरमनः प्रक्ृष्टत्वाद् त्रजेदव्यक्ततां परानू।। यावत् पाठ्य च गेयं च तत्र श्रव्यतरं भवेत् प्रेक्षापहाणां सर्वेषां तत्मान्म्व्यममिष्यते।। नाट्यशास्त्र २।२३, २४
मध्यम रंगशाला ६४ हाथ की लम्बाई तथा ३२ हाथ की चौड़ाई- वाली एक चौकोर शाला होती थी। इसका निर्माए शुभ मुहूर्त में किया जाता था। जमीन को ठीक समतल तथा चौरस बनाने के लिये उसे हल से जोतकर ठीक करते थे। चारों कोनों पर प्रधान खम्भे लगाये जाते थे। दक्षिणपूर्व से आ्र्रम्भ कर इन र्तम्भों का नामकरण चारों वर्णों के नाम पर ब्राह्मण स्तम्भ, क्षत्रिय स्तम्भ, वैश्य स्तम्भ तथा शृद्ध स्तम्भ होता था। रंगशाला के दो मुख्य भाग होते थे जिसमें आधा भाग प्रक्षकों के लिय निश्चित होता था तथा दूसरा आधा भाग रंगमंच के निमित्त सुरक्षित रहता था। रंगमंच के सबसे पिछले भाग का नाम था 'रंगशीर्प' जो ८ हाथ लम्बा तथा ४ हाथ चौड़ा होता था। इससे
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२२२ काव्यानुशीलन आगेवाला भाग ठीक इतने ही परिमाण का होता था और 'नेपथ्यगृह' कहलाता था। रंगशीर्ष में अभिनय के रक्षक देवी-देवताओं की विशिष्ट पूजा होती र थी तथा नेपथ्यगृह तो स्पष्टतः पात्रों के वेशभूपा के सजाने तथा परिवर्तन के निमित्त पृथक प्रयोग में आता था। रंगशीर्ष से नेपथ्यगृह में आने कलिये दो दरवाजे बनाये जाते थे। नेपथ्यगृह के' आगे होता था रंगपीठ (१६ हाथ लम्बा और ८ हाथ चौड़ा) जिसपर पात्रों के द्वारा समग्र अभिनय दिखलाया जाता था। रंगपीठ से होकर नेपथ्यगह में जाने के लिये एक दरवाजा होता था औरर इसी का उपयोग पात्र अपने प्रवेश तथा निर्गम के लिये किया करते थे। एक बात ध्यान देने की है कि रंगपीठ के दोनों चगल में डेढ़ हाथ ऊँची मत्तवारणी (वरामदा) वनायी जाती थी। रंगशीर्ष के बनावट का विधान पाया जाता है। इसे न तो कूर्मपृष्ट कछुये की पीठ की तरह होना चाहिये और न मत्स्यपृष्ट, बल्कि दर्पए के समान समतल तथा चिक्कण होना चाहिये। कर्भी कभी पात्र प्रवेश रंगपीठ पर नहीं आता, प्रत्युत नेपथ्यगृह से ही उसके विपय में सूचना दी जाती है। ऐसे पात्र- प्रवेश को 'चूलिका' कहत हैं।
नाट्य-मण्डप नाट्य मण्डप पर्वत की गुफा के आकार का होना चाहिये। उसमें दो खण्ड (द्विभूमि) होते हैं। सम्भवतः ऊपरी खण्ड में देवताओ्रं से सम्बद्ध घटनाएँ प्रदर्शित की जाती थीं तथा निचले खण्ड में मानवी घटनाओं का अभिनय किया जाता था I नाट्यमंडप की दिवालों को नाना प्रकार के चित्रों से सजाया जाता था जो सामयिक तथा विपयर से सम्बद्ध होने से नितोन्त उपयुक्त होते थे। रंगमंच की रचना निवात * कूर्मपृष्ठं न कर्तव्यं नत्स्वंपृष्ठ तयव च। शुद्धादरांतलाकारं रंगशीर्ष प्रशर्यस॥ न कार्यः रोलगुद्दाकारी द्विभूमिनांट्मएडपः। नाट्यशास ख७ड नन्दवातायनों पेतीं निर्वाती धी रकष्दवान्॥
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संस्कृत रंगमंच २२३ में (विशेष हवादार) स्थान में नहीं होनी चाहिये। नहीं तो आवाज गम्भीर न होगी और न शब्दों की श्रति ही ठीक-ठीक श्रोताओं को हो सकेगी। दुर्शकों के बैठने के स्थानों की बड़ी सुन्दर व्यवस्था की जाती थी। आजकल के सीढ़ीनुमा या गैलरीवाले आसन को अधिकांश आलोचक पश्चिमी नाट्यकला की देन मानते हैं, परन्तु वस्तुतः यह भारतीय प्रतिभा का व्यावहारिक निदर्शन है। भरत- मुनि ने गैलरी की ही व्यवस्था दर्शकों के निमित्त मान्य बतलायी है। दर्शकों के निवेशन अर्थात् बैठने के स्थान सोपानाकृति सीढ़ी के ढंग के होते थे। जमीन से सीढ़ियां एक हाथ ऊँची रखी जाती थीं तथा इनका निर्माण लकड़ी तथा इंट की सहायता से किया जाता था। एक विशेष बात का ध्यान रंखा जाता था कि ये समग्र चैठने के स्थान रंगपीठ से देखने योग्य होते थे (रंगपीठावलोक्य) अर्थात् निवेशनों की सजावट ऐसी होती थी कि कहीं पर चैठकर रंगपीठ के ऊपर अभिनय का साक्षात्कार भलीभाँति किया जा सके।
पश्चिमी रंगमंच
प्राचीन प्रेक्षागृह का यह निखरा रूप भारतीयों की निजी प्रतिभा का विलास है। यूनानी रंगशाला से इसकी तुलना करने पर इसकी सर्वाङ्गीणता तथा वैज्ञानिकता का पता लग सकता है। प्राचीन यूनान की रंगशाला एक साधारण सी वस्तु होती थी। अत्यन्त प्राचीन काल में रंगपीठ के लिए एक ऊँचा स्थान होता था जिसपर वाद्यमण्डली (आरचेस्ट्रा) तथा
- सम्भानां वासतरचापि सीपानाकृति पीठ्कम्। इष्टकाठारभि: कार्य प्रेंत्षकाया निवशनम्॥ भृमिभागसमुस्यित। रट०गपीठावतोनयंतु कुर्वादालनजं विधिन्।।
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२२४ काव्यानुशीलन
एक दो पात्र बैठते थे। दर्शकों के लिए कोई व्यवस्था न होती थी। अरभिनय प्रायः पहाड़ के वगल में नीची जमीन पर होता था जहाँ दर्शक अपने वैठने के लिए ऊँचा नीचा स्थान स्वयं खोज लिया करते थे। घहुत पीछे गैलरी वनी। रोमनकला में ही रंगपीठ के पीछे नेपथ्यगृह के लिए भी विशिष्ट मकान वनाया गया तथा पूरे रंगमंच के सुव्यवस्थित प्रकार की योजना सम्पन्न हुई। यह सुपरिणाम था, परंतु भारतवर्ष में प्रेक्षागृह का ही विकसित रूप है जिसमें पश्चिमी नाट्यकला से छोटी- मोटी चीजें नवीन परिस्थिति के अनुसार यत्र तत्र निविष्ट कर ली गयी है। प्राचीन रंगपीठ यथार्थवादी था, परन्तु घृणा या उद्वग के जनक दृश्यों का प्रदर्शन सर्वथा वर्जित था। आ्रजकल जिन दृश्यों का प्रदर्शन उचित माना जाता है उनमें से अ्रपरनेक दृश्य प्राचीन काल में धर्ज्य थे रंगपीठ पर युद्ध का प्रदर्शन, भोजन शयन आदि। फिर भी आवशयकनानुसार घोड़े हाथी रंगमंच पर दिखलाये जाते थे। उस समय घास फूस के बने पदार्थों को चाम से मढ़कर दिखलाने की प्रथा थी। भरत नाट्यशास्त्र में इस अभिनय विषय का बड़ा ही सांगोपांग वर्णन उपलब्ध होता है। भारतीय रंगमंच का प्रभाव वृहत्तर भारत के नाटथ प्रयोग पर विशेष रूप से पड़ा है। चरमा, स्याम, कम्बोज, जावा, चाली, मलय आदि समस्त देशों के नाट्य तथा अभिनय के ऊपर भारतीय नाटक का व्यवस्थित प्रभाव पड़ा है। कम्योडिया की राजकीय रंगशाला 'राम- राम' के नाम से पुकारी जाती थी। यह हमारी रंगभूमि के सहश ही रचना के विषय में थी। इसमें एक तरफ मिल्कुल खुला रहता था। रंगपीठ के पास ही पात्रों के वेशभूपा के परिवर्तन तथा सजावट के लिये नेपध्यगृह् की व्यवस्था होती थी। रामायण के अभिनय के अरवसर पर ही पात्र पुरुप होते थे, नहीं तो स्त्रियॉ ही नटों की भूमिका में अवतीर्स होती थीं। रंगशाला का एक विशेष प्रबन्धक होता था जो
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संस्कृत रंगमंच २२५ हमारे नाट्याचार्य के समान होता था। नटियों के सजाने, सिखलाने तथा तैयार करने का भार राजमहल की किसी विशिष्ट शिक्षित महिला के ऊपर होता था। जावा के नाटक छाया-नाटक ही होते थे जिन्हें 'वयंग' कहते हैं। इनके सात विभिन्न प्रकारों का वर्णन तथा विभाजन पाया जाता है। भारतवर्ष में 'पुत्तलिका नृत्य' के समान हो इनका भी प्रदर्शन किया जाता था। इन नाटकों के विषय तथा प्रकार के ही लिये जावा साहित्य भारतीय साहित्य का ऋणी नहीं है, प्रत्युत इनके अभिनय, प्रदर्शन तथा प्रयोग के लिये भी। इस प्रकार भारतीय रंगमंच अपनी वैज्ञानिकता, सुव्यवस्था तथा विपुल प्रभावशालिता के कारस विश्व की रंगशालाओं के इतिहास में अपना पर्याप्त महत्व रखता है।
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(२० )
जवनिका
हमारे माननीय महर्षियो की सम्मति में एक ही शब्द यदि सम्यक- रूप से जाना जाय तथा उचित रीति से प्रयुक्त किया जाय, तो वह स्वर्ग में तथा लोक में, परलोक में तथा इहलोक में 'कामधुक' होता है। 'एक: शब्द: सम्बक ज्ञातः मुप्रयुक्त: स्वर्गे लोके च कामधुक भवति' शतपथ त्रह्मणा की यह उत्ति आध्यात्मिक विषयों के लिए जितनी चरितार्थ है व्यावहारिक विषयों के लिये भी उतनी ही उपयुक्त्त है। 'जवनिका' शब्द का समीक्षण इस कथन का पर्याप्त रूप से परिचायक है। भारतीय रंगमंच पर अभिनय के अवसर पर जिस परढे का प्रयोग किया जाता है उसके लिये अधिकांश विद्वज्जन 'यवनिका' शब्द का प्रयोग करते हैं। इस शब्द के आदिम अंश की समीक्षा कर यूरोपीय विद्वानों ने यह सिद्धांत बना लिया है कि भारतीय नाटक के विकास पर यूनानी नाटकों का प्रचुर प्रभाव पड़ा है। वे ऐतिहासिक प्रमाणों के अतिरिक्त 'यवनिका' शब्द को इस प्रसंग में अपने अशक भवन की दढ़ नींव समते हैं। पहली बात ध्यान देने की यह है कि 'जवनिका' हमारे नाट्यशाबूर का विशिष्ट पारिभापिक शब्द नहीं, प्रत्युत लोक-व्यवहार में प्रयुक्त होनेवाला साधारण शब्द है। 'अमरकोश' में इसका प्रयोग 'पटवेश्म' खेमा को ढकनेवाले परदे के अर्थ में किया गया है। प्राचीन काल में वत्तों से बने घरों का वर्शन मिलता है। 'अमर' ने ऐसे घर के 'दूष्य' शब्द का प्रयोग किया है-
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जवनिका २२७
दूष्याद्यं वस्रवेर्मनि। अमकोश २।१।१२० 'अमर' के टीकाकार क्षीरस्वामी ने वस्त्शम के लिये 'पटकुटी', 'पटकुड्य', 'गुएशालिनी' तथा 'स्थूला' शब्दों का व्यवहार होना लिखा है।' 'अमर' के दूसरे टीकाकार भानुजि दीक्षित प्रसिद्ध वैयाकरण भट्टोजि दीक्षित के पुत्र (समय १७ वीं शर्ती) ने इसी प्रसंग में 'कुटर', 'पटकुटी' तथा 'पटवास' शब्दों का उल्लेख किया है।3 'वस्त्रवेश्म' का प्रचलन प्राचीनकाल में मुसलमानों के संपर्क से बहुत पहले भी था। कालिदास इसके प्रचलन से परिचित हैं। उन्होंने रघुवंश के पंचमसर्ग में इसका उल्लेख किया है। विदर्भ देश के राजा भोज ने अपनी भगिनी इंदुमती के स्वयंवर में कोशल देश के राजकुमार अरज को बुलाने के लिये उनके पिता रघु के पास दूत भेजा था। रघु ने निमन्त्रण स्वीकार कर त्र्प्रज्ञ को विदर्भ प्रस्थान करने की आज्ञा दी। विदर्भ देश अयोध्या से दूर था। अतः इन्हें रास्ते में वने हुए घरों में निवास करना पड़ा जो राज-
१ अमरकोशोद्वाटन" शरोरिएंटल बुक एजेंसी, पूना से सन् १६४१ ई० मे प्रकाशित, धूना ओरिएंटल सिरीज संख्या. ४३ पृ० १५८। २ भानुदीच्षित भट्टोजिदीक्षित के पुत्र थे, इसका पता उनकी टीका के मझलश्लोक तथा पुष्पिका से चलता है- मंगलश्लोक ... "वल्लवीवल्लवं नत्वा गुरुं भट्टोजिदीक्षितम्। तरमरे विदधे व्याख्यां मुनित्रय-मतानुगाम्।" पुष्पिका ... "इति श्री वघेलवंशोद्भव महीधर विपयाधिप श्री कीतिंसिह देवाज्ञया श्री भट्टोजिदीकितात्मज श्री भानुदीक्षित विरचितायाममरटीकायां व्याख्या- सुधाख्यायां तृतीयः कांडः समाप्तिमगात। इस टीका का नाम 'व्याख्यासुधा' ग्रंथकारनिदिंष्ट अरभिधान है। पंडितो में यह 'रामा- अ्रमी' के नाम से अधिकतर प्रतिद्ध है। ऐसा प्रतीत होता है कि दीक्षित जी के संन्यासाश्रम का नाम 'रामाश्रम' था और इतीलिए यह टीका भी तन्नाम से प्रसिद्ध हुई। ३ रामाश्रमी, निर्एय-सागर पृ० ४०७।
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काव्यानुशीलन कीय सामत्री से सज्जित होने के कारस अ्रज के लिये ज्वान-विहार के समान ही त्रनंदुदायक प्रतीत हुआ। कालिदास कहते हैं- तत्योपकार्या वन्येतरा जानपदोपदाभिः। नागे निवाला ननुजेन्द्रसूनो र्वभबुरुदयान-विहारकल्गाः ॥ -रघुवंश सर्ग ५ श्लोक ४१ यहाँ 'उपकार्चा' को मल्लिनाथी टीका उपकार्चासु राजयोग्येपु पटभवना- दिषु से त्पष्ट है कि कालिदांत को कपड़ों के बने घरों से ही त्रभिप्राच है। इस डल्लेख से हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि 'खवेमा' (त्रंन्रेजी टेंट) के बनाने तथा उसमें रहने का प्रचलन प्राचीन भारत में था औरर राजा लोग यात्रा में उसका उपयोग करते थे। 'जवनिका' का प्रयोग इस खेसे को ढकनेवाले परदे के लिये किया जाता था जिसे आ्राजकल हिंदी में 'कनात' कहते हैं। सल्लाह नाव की गति तीत्र करने के लिये गोनधर (मत्तूल) के ऊपर जिस कपड़े का परदा- चाँधते हैं उसे आजकल 'पाल' कहते हैं। इस पाल के लिए भी 'जव- निका' शब्द का प्रयोग कोशों में किया जाता है। इन दोनों विशिष्ट अर्थों का सामान्य रूप है 'ढकना', आवरण करना और इसीलिये जवनिका का सामान्य अरर्थ हो गया परदा, जो वस्तु किसी को ढक कर उसे तिरोहित कर देती है। परढे के तर्थ में प्रयुक्त होनेवाले त्रनेक शब्द कोशों में मिलते हैं- १ प्रतितीरा जवनिका त्यात् तिरत्करिणी च सा। अमर कोश २.६११२० २ प्रतिसीर जव्निका तिरसः करिक्चारिणी। भपटी त्यात् पुमान् क्ांडपटोऽथोल्लोच इत्यपि।। केशवकृत कलद्रुमकोश, पृष्ठ ५े, इ्लोक ३०० श्री रामावतार धयर्मा द्वारा संपादित, गायकवाड सीरीज़। प्रथम तंत्करण।
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जव निका २२६
३ पद्माकरस्तडागे प्रतिसीरा जवनिकार्यां स्यत्। शाहजी कृत शब्दरत्नसमुच्चय कोश, 1 पृष्ठ २९०, पंक्ति १५। ४ सन्तःपटः पटी चित्रा, कांडपटः शब्दरत्नावली। कोशों के इन उल्लेखों से स्पष्ट है कि परदे के अर्थ में प्रयुक्त होनेवाले प्रधान शब्द हैं प्रतिसीरा, तिरस्करिणी, अपटी, कांडपट, अन्तःपट, पटी तथा चित्रा। इन शब्दों में प्रसिद्धतर शब्द है जवनिका और वह है जकारादि यकारादिं नहीं। शुद्ध भी 'जवनिका' ही है, 'यवनिका' नहीं।
व्युल्ति
'जवनिका' की व्युत्पत्ति टीकाकारों की सम्मति में इस प्रकार है- १. जवन्ति-अस्यां जवनिका-क्षीरस्वामी। २. जनति अस्याम्। 'जुः' सौत्रो गतौ वेगे च ल्युट करणाधिकरणयोश्च ३।३।११७ स्व्रार्थे कन् ३।४।1 सूत्रेग ज्ञापनात्-रामाश्रमी। ३. जवनिका स्री। सौत्र धातु जु। करणे ल्युट् संज्ञायां कन्-वाचरत्य पृष्ठ २०=० ४. जु इति सौत्रोधातुर्गतौ वेगे चा। जवनः । जु चङ्ढम्यदंद्रम्य सृ गृधि ज्वल शुच लघ पत पद: ३।२।१५० इति युनू कौमुदी। स्त्रियां डीपू जवनी जवनिका। ५. जवनं वेगेन प्रतिरोकमस्ति अस्याः। जवनः ठन् टापू च। शब्दकल्पट्रम इन भिन्न भिन्न व्युत्पत्तियों पर ध्यान देने से स्पष्ट हो जाता है कि 'जवनिका' शब्द की व्युत्पत्ति 'जु' धातु से है। जु धातु धातुपाठ में परिगणित न होकर ३।२१५० सूत्र जु चङकम्य.में महर्षि पागिनि के द्वारा निर्दिष्ट किया गया है। इसका अरथ है गति तथा वेग। अतः
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२३० काव्यानुशीलन
'जवनिका' का व्युत्पत्ति-लभ्य अर्थ होगा वह आवरण जिसमें दौड़कर लोग चले जांय अथवा वह वस्तु जो वेग से सम्पन्न हो या जिसे गति प्राप्त हो अर्थात् जो इधर उधर हटाई जा सके। 'जवनी' तथा 'जव- निका' दोनों का एक ही अर्थ होता है। इन दोनों में 'जवनिका' का प्रयोग अत्यंत लोकप्रिय है, 'जवनी' का प्रयोग अरपेक्षाकृत घहुत ही न्यून है परंतु आवर के अरथ में प्रयोग दोनों का ही होता है। 'जवनिका' का प्रयोग 'ना्य शासत्र', 'दुशरूपक' जैसे शात्तीय ग्रंधों भरतृ हरिशतक तथा शिशुपालवध जैसे प्रसिद्ध काव्य त्रंथ में उपलब्ध होता है। इसकी लोकप्रियता का पूरा पता हमें मिलता है। माया जवनिकाच्छन्नमज्ञाधोक्षजमव्ययम्। न लक्ष्यसे मूददशा नटो नाव्यघरो यथा। श्रीमद्भागवत् १८।११ एतानि च वहिर्गीतान्यन्तर्जवनिका गतैः । प्रतोकृभि: प्रयोज्यानि तन्त्रीभाण्डकृतानि तु। नाट्यशास्त्र अध्याय ५, श्रोफ ११। अन्तर्जनिका संस्थे इचूलिका शरस्य सूचनात्। दश्रूपक। नरः संसारान्ते विद्यति यमधानी जवनिकाम्। हरिवंशपुराण, अध्याय २, श्रलोक दद समीरशिशिर: शिर: तु वसतां सता जवनिका निफाम-सुखिनान्। त्रिभति जनयन्नयं मुदमर- नपायघवला वलाह्फततीः॥
रेजु र्जतनिका क्षेपेः सरक्षा इव खे नगाः । माघ फाव्य ४.५४
भर्तृ हरि इन उदूरों में से प्रथम दो में तो 'जवनिका' शब्द का प्योग नाटकीय श्रावरण के तिये हत हे मोर मातn D nn
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जवनिका २३१ परदे के अर्थ में। सर्वत्र जकारादि जवनिका का ही प्रयोग मिलता है, यकारादिका नहीं। ऐसी दशा में परदे के अर्थ में 'यवनिका' शब्द का प्रयोग कथमपि न्यायसंगत नहीं। एक प्रल प्रमाण और भी है। 'यवनिका' के पक्षपाती भी परदे के अरथ में 'यवनी' शब्द का प्रयोग कधमपि न्वाय्य नहीं मानते। 'यवनी' का अर्थ है यवन जाति की स्त्री और इसी अर्थ में इसका प्रयोग कालिदास ने भी किया है: यवनी मुखपद्मानां सेहे मधुमदं न सः। जालातपमिवाबूजानामफालजलदोदयः ।। रघुवंश सर्ग ४। श्लोक ६१। परन्तु परदे के अर्थ में जवनिका के समान जवनी का प्रयोग भी मिलता है और यह होना भी चाहिए; क्योंकि वस्तुतः ये दोनों शब्द एक ही धातु से निष्पन्न होते हैं। 'जवनिका' में स्वार्थे कन् की अर्प्धि- कता है परंतु स्वार्थ में कन प्रत्यय की सत्ता होने के कारण अर्थ में तनिक भी अंतर नहीं है। श्री गोवर्धनाचार्य ने अपनी विख्यात 'आर्या सप्तशती' में जवनी का प्रयो परदे के अर्थ में शोभन प्रकार से किया है। त्रीडाप्रसरः प्रथमं तदनु च रसभावपुष्ट चेष्टेयम्। जवनी - विनिर्गमादनु नटीव दयिता मनो हरति॥ आर्यासपशती, श्रोक सं० ५३८। इस कमनीय आर्या का सात्पर्य यह है कि जिस प्रकार नटी परदे से निकलने के बाद प्रथमतः लज्जा दिखलाती है, तदनंदर भाव पुष्ट चेष्टाओं से सामाजिकों का चित हरणा कर लेती है, उसी प्रकार दयिता का स्वभाव भी है। वह भी पहले लज्ा दिखलाती है, परन्तु पीछे अपनी श्रृंगार रस से पुष्ट चेष्टाओं के द्वारा अपने प्रियतम का मन हर लेती है। भारतीय नाट्यकला पर यवनानी प्रभाव का पक्षपांती कोई भी विद्वान इस आर्या में 'जवनी' के स्थान पर 'यवनी' का परिवर्तन कभी
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नहीं कर सकता। यदि 'यवनिका' का प्रयोग न्याय्य होता, तो यह परिवर्तन सिद्ध करने में व्याकरण कभी व्याघातक न होता। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि परदे के लिये उचित तथा प्रयुक्त शब्द 'जव- निका' ही है, 'यवनिका' नहीं।
सम्भाव्य कारण इस झमेले का गूढ़ कारण भी खोजा जा सकता है। राजशेखर का सुप्रसिद्ध सट्टक है, 'कर्पूरमंजरी'। समग्र रूप से प्राकृतभापा में निबद्ध नाटिका को ही 'सट्टक' कहते हैं। इस सटटक के अरवांतर अंकों के नाम हैं 'जवनिकांतरम्'। मेरी समझ में इस नाम के संस्कृतीकरण ने विद्वानों को भ्रम में डाल दिया है। सट्टक में सब कुछ प्राकृत भापा में है। तब अ्ंक का यह नामकरण भी प्राकृत में ही निवद्ध होगा। यह कल्पना कुद अनुचित नहीं है, वररुचि के 'आदेर्यों जः' प्राकृतप्रकाश सूत्र के अनुसार संस्कृत शब्दों का आदिम यकार प्राकृत में जकार हो जाता है। इसी नियम को ठीक ठीक न समझने के कारण भ्रांति का उद्गम हुआ है। जब संस्कृत आद्य यकार का प्राकृत में जकार होता है, तब प्राकृत का आदि जकार संस्कृत में यकार हो ही जावेगा। अतः 'जवनिकांतरं' का संस्कृतरूप होगा 'यवनिकान्तरम्' और इस प्रकार नाटकीय परदे के अर्थ में 'यवनिका शब्द विराजने लगा। भ्रांति यही है। 'आदेर्यो जः' नियम का विपर्यय संस्कृत में सर्वत्र उचित नहीं माना जा सकता। यही कारण है कि पाश्चात्य विद्वानों को 'जवनि- कांतरं' के संस्कृतीकरण ने धोखे में डाल दिया। कोशों में कहीं कहीं गलती से 'यवनिका' शब्द का ही निर्देश मिलता है। रामाश्रमी टीका में 'जवनिका' के स्थान पर 'यमनिका" पाठांतर दिया गया है, परंतु अप्रयुक्त होने के कारण यह शब्द कथमपि मान्य नहीं हो सकता। १. यमनिका रते वा पाठुः। यमयत यम उपर में ज्वा० प० अ्र०, ल्युड् ३३११७ कन् शापित ।४।५ रामाश्रमी २९६/१२०
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जवनिका २३२
इसकी व्युत्पत्ति किसी प्रकार अ््प्र्थ में सहायक हो सकती है, परंतु इस शब्द का प्रयोग कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होता। ऐसी दशा में 'यम निका' को मान्यता प्रदान करना उचित नहीं।
*दूनानी नाटक
इस प्रसंग में विचारणीय वस्तु यूनानी नाटकों में जवनिका का मूलतः अभाव भी है। यवनान देश में नाट्य के लिये परदे की चाल नहीं थी। वहाँ दर्शकों की संख्या इतनी अधिक होती थी कि उनकी सुगमता के लिये रंगमंच बड़ा ऊंचा बनाया जाता था। नाटक का अ्रभिनय खुले मैदान में ही दर्शकों के सुभीते के लिये किया जाता था। उस पर किसी प्रकार का परदा नहीं होता था। जब यूनानी नाटकों में परदा ही नहीं था, तब भारतीयों के लिये उनकी नकल का प्रश्न ही नहीं /उठता। ऊपर कहा गया है कि 'जवनिका' शब्द भारतीय नाट्यशास्त्र का पारिभाषिक शब्द नहीं है, एक सामान्य शब्द है। यदि भारतीय नाट्य रचयिताओं ने इसे यूनानी रंगमंच से लिया होता, तो वे अवश्यमेव इसे नाटकीय परदे के अर्थ में ही सीमित किए रहते, परंतु वस्तुस्थिति इसके नितांत विरुद्ध है। ऐसी दशा में यवनिका शब्द के आधार पर की गई यह कल्पना भी पूर्णतः भ्रामक एव सर्वथा निराधार है। भारतीय प्रतिभा जिस प्रकार नाटक के विन्यास में स्वतंत्र है, उसी प्रकार अर्भिनय कला में भी वह परमुखापेक्षी नहीं है। 'जवनिका' के लिये भारतीय नाटककार यवनों के पराधीन नहीं है। नाटकीय परदा भारत की अपनी निजी वस्तु है, मंगनी की चीज़ नहीं।
स्थिति
अब विचारणीय प्रश्न है कि जवनिका की स्थिति रंगमंच पर कहाँ थी तथा उसकी संख्या कितनी थी। जर्मनी के प्रख्यात संस्कृत विद्वान डाक्टर विंडिश ने सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि भारतीय रंग-
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मंच पर एक ही परदा उपयोग में आाता था और वह रंगशीर्ष तथा नेपध्यगृह के बीच में डाला जाता था।' प्रेक्षागृह की जिस रचना का वर्णन 'भरत नाट्यशास्त्र' के द्वितीय अध्याय में दिया गया है उससे सिद्ध हैं कि प्रेक्षागृह का आधा भाग तो प्रेक्षकों के लिये रहता था और आाधे में नाटकीय उपकरणों का स्थान रहता था। वीच में रहता था रंगपीठ और इसके पीछे होता था रंगशीर्ष। रंगशीर्ष के पीछे और सब के तंत में रहता था नेपथ्यगृह जहाँ पात्र अपनी भूमिका के लिये वेषभूषा की सजावट किया करते थे। रंगशीर्ष तथा नेपध्यगह के बीच में दीवाल होती थी जिसमें आने जाने के लिये दो द्वार बनाए जाते थे। विंडिश के अनुसार नेपध्यगृह की इसी दीवाल के ऊपर ही परदा डाला जाता था। परंतु भीत के ऊपर परद़ा डालने का उपयोग ही क्या हो सकता है। परदा तो उस स्थान पर डालना चाहिए जहाँ पात्रों के बैठने या खड़े होने के लिये पर्याप् स्थान हो। अभिनवगुप्त ने इसी पक्ष का समर्थन किया है। उनके अनुसार सुख्य परदा रंगपीठ तथा रंगशीर्ष के मध्य में पड़ता था। 'तत्र जवनिका रंगपीठ तच्छिरसोमैच्ये इस मुख्य परढे के ततिरिक्त कतिपय अन्य परदे भी रंगमंच पर विद्यमान रहते थे, ऐसा प्रतीत होता है। 'मालत्रिकाग्निमित्र' के दूसरे त्रंक के आरंभ में नाट्यसूचना है। ततः प्रविशति संगीतरचनायामासनस्थो राजा सयत्वो धारणी परि- व्रानिका विभवतदन परिवाग: । राजा आप्रसन पर बैठा हुआ दिखलाया गया है। इससे प्रतीत होतार है कि रंगपीठ तथा रंगशीर्ष के बीच में होने वाले परदे को हटा कर वह रंग मंच पर आरसनस्थ दिखलाया गया है। यह मानना सर्वथा उचित ही है। इसके वाद कंचुकी का निष्क्मणा होता है तथा गसदास १. टावसर कीय कृत संस्कृत द्रामा, ३४ ६१। : अभिनव भाग्ती, अध्याय ५, स्सोक १३, पृष्ठ २१२ गायकवाट सिरीज।
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जवनिका २३५
का त्रागमन। इस अपरवसर पर 'मालविका' अभिनय दिखलाने के लिये आ रही है, परंतु उसके आने में कुछ विलंध हो रहा है जिससे उद्विम्न होकर अग्निमित्र कह रहा है- नेपथ्यम्परिगतायाश्चक्षुदर्शनसमुत्सुकं तस्या: । संहर्तु मधीरतया व्यवसितमिव मे तिरस्करिणीम् ॥ इस पद्य का तात्पर्य है कि मेरे नेत्र नेपथ्य में स्थित उस मालविका के दर्शन के लिये नितांत उत्सुक हैं। व्याकुलता के कारण परदे को उघाड़ देने का मानों उसने निश्चय कर लिया है। इस पद्य के तिरस्करिणी पद से प्रतीत होता है कि राजा की दृष्टि इसी एक परदे के ऊपर पड़ रही थी जिसके उघाड़ देने पर मालविका के दर्शन होने की उसे पूर् आशा थी। इससे स्पष्ट है कि मुख्य परदे के अतिरिक्त अन्य परदों का भी उपयोग प्राचीन भारतीय रंगमंच पर अ्रवश्यमेव किया जाता था। मुख्य परदे को हटा कर तो राजा स्वतः उपस्थित था तथा अन्य परदे के भीतर अभिनय के लिये सुसज्जित मालविका अपने प्रवेश की प्रतीक्षा कर रही थी। यहां स्पष्ट ही अन्य परदे का उल्लेख है। भरत नाट्य- शास्त्र के तेरहवें अध्याय में कक्ष्या-विभाग तथा इक्कीसवें अध्याय में आहार्याभिंनय का विस्तृत वर्णन है। इन अ्रध्यायों के सूक्ष्म अनुशीलन से जवनिका के विषय में अ्नेक उपयोगी बातों का पता चल सकता है।
१. मालविकाग्निमित्र, अ्रंक २, श्लोक २ ।
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विश्वकवि कालिदास
विइवकति देश और काल की परिधि से वाहर होता है। देश और काल का वंधन उसकी अलौकिक प्रतिभा तथा उसकी कलात्मक निर्मिति के ऊपर किसी प्रकार का नियंत्रण स्थापित नहीं करता। वह कविता लिखने में सर्वदा स्वच्छन्द्र रहता है। वह चिड़िए की तरह कमनीय छंद में चहक रठता है; वायु के समान वह भाव प्रवाह में वह निकलता है। विमल प्रतिभा ही उसकी कलात्मक रचना का एकमात्र आधार होती है। देश और काल की आवज्यकता पर दृष्टि रखनेवाले कति की कविता उसी देश में समझी जाती है तथा उसी वातावरस में उसका महत्त्व उन्मीलित होता है। 'विदवकवि' भगवती वीमपासि का एक वरदान होता है, जिसकी कविता विश्मानवता के लिए, समस्त मानव-समाज के लिए उपादेय तथा इलाघनीय होती है। प्रत्येक युग में उसकी रसमयी कृतियाँ सहदयों का हृदयोन्मेप करती हैं, उनके मूल्य का अंकन होता है तथा उनके भीतर विद्यमान शाख्वत तत्त्वों के अनुशीलन से मानव का परम मंगल संपन्न होता है। विश्वकत्रि ही 'रससिद्ध' कवीइचर के नाम से भारतीय आ्प्रालोचना में प्रख्यात है। कालिदास सच्चे अर्थ में विश्वकवि हैं। उनकी कविता भारतवर्षीय मानवों के ही कल्याग के लिए आागरूक न होकर इस विशाल जगने के मानवों के मंगल के लिए क्रियशील है। ने सब देश के कवि हैं- सब युग के कति हैं। उनकी अलोकिक प्रतिभा काव्य के नाना प्रकारों के विरचन में कृतकार्य है। शेक्सपीयर की रूपमयी प्रतिभा, मिल्टन की प्रबंधकाव्यमयी प्रनिया नथा शेली की गीतिमवी प्रतिभा का कहीं पकत्र मंजुल सामरस्य प्रस्तुन होता है, तो वह है विन्वकनि की दिव्य
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विश्वकवि कालिदास २३७
प्रतिभा से उद्भूत काव्य-निचय : सचमुच कालिदास शारदा देवी की
यथार्थ है- रत्नमाला के मध्यमणि हैं। किसी आलोचक की यह सरस उक्ति वस्तुतः
अस्पृष्टदोपा नलिनीव हृष्टा हारावलीव ग्रथिता गुणाचैः। प्रियाककपालीव विमर्दहृय्या न का लिदासादपरत्व वाणी।।
भावों की परख
यह महाकवि मानव-हृदय में उदय लेनेवाले तथा क्षण-क्ष में परिवर्तित होनेवाले भावों को सूक्ष्म दृष्टि से परम्रता है औरर अपनी लेखनी से उन्हें चिरस्थायी रूप प्रदान करता है। कालिदास के काव्यों में भावोद्वोधक प्रसंगों का खृब ही रुचिर चित्रण है। पोष्य- पुत्री शकुतला की विदाई के अवसर पर काव्य के करुण भावों की अभिव्यंजना कहीं है, तो अन्यत्र विरह-वेदना से विधुर यक्षपत्नी की कोमल भावनाओं का और मनोविनोद की नाना क्रीडाओं का बड़ा ही अभिराम चित्रण है। त्ररभीष्ट वस्तु की श्रप्रक्रस्मात् अरचिंतित उपलब्धि मानव-मन को आश्चर्य के कितने गंभीर गर्त में गिरा डालती है; इस मनोवैज्ञानिक तथ्य का सुंदर प्रसंग आता है पार्वती के जीवन में, जव वह शंकर की नाना प्रकार से निदाएँ करने पर ब्रह्मचारी को स्वयं छोड़ रूड़ी होती है तथा वह ब्रह्मचारी भी सक्षात् शिव के रूप में आरविर्भूत होकर पार्वती को आगे जाने से रोकता है। इस 'चकपकाने' का दश्य कालिदास ने बड़ी सुंदरता से दिखलाया है- तं वीक्ष्य वेपधुमती सरसाङ्गयष्टि- रनिक्षेपणाय पदमुद्धृतमुद्वहन्ती। मार्गाचलव्यतिकराकुलितेव सिन्धुः शैलाधिराजतनया न ययौ न तस्थौ।।
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२२८ काव्यानुशीलन
शृगार
कालिदास मुख्यतया श्ृंगाररस के कवि माने जाते हैं। इस सार्वभौम धारखा के भीतर एक गहन सत्य छविपा हुआ है। प्रेम का वर्णन अन्य कवियों ने भी किया है, परंतु प्रेम की नाना अवस्थाओं का रुचिर चित्रए मनोवैज्ञानिक पद्धति से जैसा कालिदासीय काव्यों में उषलब्ध होता है वैसा अन्यत्र कहाँ? 'मालविगाग्निमित्र' में प्रतिकूल परिस्थिति में रह कर भी राजसी अंतःपुर में पनपने वाले यौवन-सुलभ प्रेम का चित्रण है, तो 'विक्रमोर्वशीय' में यौवन की उद्दाम भावना से उत्पन्न, कामुक व्याक्त को प्रयसी के विरह में एकदम पागल बना देने वाले प्रेम का निरूपण है। यदि पहले में संयम के आवरण से भाँकने वाले प्रेम का चित्रए है, तो दूसरे में संयम का वॉध तोड़ देने वाले प्रेमनद् का उददाम विवरस है। 'शकुंतला' में प्रेम की स्थिति इन दोनों दशाओं से भिन्न है। यहाँ वासनात्मक काम की विशुद्ध प्रेम में परिखति का मंजुल चित्र है जिसमें तपस्था तथा साधना की आग में काम का कालुष्य जल जाता है और वह प्रेम के खरे सोने के रूप में चमक उठता है। यही परिखति तो शाकुंतलीय कथावस्तु की आरध्यात्मिक पीठिका है। प्रेम के कोमल भाव के चित्रण में यक्ष का यह वचन दष्टांत रूप से प्रस्तुत किया जा सकता है-
भित्वा सद्यः किसलयपुटान् देवदाच्दुमा्णा ये तत्-क्षीरश्रतिसुरभयां दक्षिणेन प्रतृताः। आलिद्ण्यन्ते गुणवति ! मया ते तुपाराद्रिवाताः पूर्व स्पृष्टं यदि किल भवेदङ्गमेभिस्तवेति॥
हिमालय के देवदारु के चूनेवाले दूध की सुगंध से युक्त वायु को यक्ष इसी भावना से आलिंगन करता है कि उसने उसकी पत्नी के अंग का शायद स्पर्श किया हो!
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विश्वकवि कालिदास २३६
प्रकृति वर्णन हमारा कवि वाह्य प्रकृति के निरीक्षण तथा वर्णन में भी उतना ही दृक्ष है जितना अंतः प्रकृति के चित्रस में। कालिदास की दृष्टि में प्रकृति निर्जीव पढ़ार्थों का पुजमात्र नहीं है, प्रत्युत वह जीवनी शक्ति से, कमनीय भावनाओं से प्राशिमात्र के लिए सहानुभूति से स्पंदित होती है। प्रकृति का यह त्पंदन चित्र कालिदास की प्रतिभा का भन्य निदर्शन है। प्रकृति अप्रपने स्वतंत्र साम्राज्य में मानव की उपेक्षा कभी नहीं करती। वह तो मानव के साथ मैत्रा के सुवर्ण-सूत्र में इस प्रकार बँधी रहती है कि वह उसके दुख में दुखी तथा उसके सुख में सुर्खी रहती है। मैं इसे कालिदास की प्रतिभा का भव्य निदशन मानता हूँ- प्रकृति का मानवीय वृत्तियों से संवलित रूप में चित्रण। कालिदास से चढ़कर उत्तुं गशिखर हिमालय का सूक्ष्म पारखी कोई भी अरन्य संस्कृत कवि नहीं हुआ। प्राचीन आश्रम अपनी आध्यात्मिक पवित्रता तथा वैभव के साथ यहाँ उपस्थित होता है तथा जन-कोलाहल से दूर शांति- मय वातावरण में जीवन-यापन के लिए मानवमात्र को जोरों से पुकारता है। आरश्रम का यह दृशय कितना पावन है- नीवारा: झुकगर्भ कोटर मुखभ्रष्टास्तरुणामधः प्रस्निग्धाः क्वचिदिङ्ग दीफलभिदः सूच्यन्त एवोपलाः। विश्वासोपगमादभिन्नगतयः शब्दं सहन्ते मृगा-
प्रकृति में मानवीय भावों की अ्र्परभिव्यंजना के लिए शाकुंतल का चतुर्थ शरंक अपनी तुलना नहीं रखता। आश्रम की कन्या शकुंतला की विदाई के अवसर पर उसे नाना पुष्पाभरों से सजाना, जाने की अरनुमति कोयल की कूक से देना, विरह में आँसुओं के रूप में पुराने पीले पत्तों का गिरना, मृगियों का अपने घास के कौर को छोड़कर 'उदास हो जाना-आदि दृश्य प्रकृति की सजीवता तथा सहानुभूति के भव्य निदर्शन हैं। यह तो हुआ प्रकृति का विभावपक्ष। आरलंवन पक्ष
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२४० काव्यानुशीलन की रुचिरता भी उतनी ही मनोमोहक है जिसमें प्रकृति अपने सजे-सजाए रूप में यथार्थ रीति से चित्रित की गई है। सुपमा तथा सौन्यभाव ही इस प्राकृत वर्णन का प्राण है। भवभूति के समान कालिदास प्रकृति के उम्र, रोमांचकारी, बीहड़ दृश्यों की ओर आकृष्ट नहीं होते। वे सौम्श- भाव के उपासक हैं प्रकृति में, मानव में तथा देवता में। शरदू की यह शोभा कितनी स्वाभाविक तथा यथार्थ है- संपन्नशालिनिचयावृत्त-भूतलानि स्वस्थस्थितप्रचुर गोकुलशोभितानि। हंसै: ससारसकुलैः प्रतिनादितानि सीमान्तराणि जनयन्ति तृणां प्रमोदम् ॥ धान से मंडित खेत, स्वस्थ खड़ी हुई गायों की शोभा, सारसी तथा हुंसों के कूजने का शब्द-ये ही तो शरद् के अपने निजी वैभव हैं।
कला-पक्ष
हृदयपक्ष के समान कालिदास के काव्यों में कलापक्ष का विशेष आदर नहीं है। कानों को झंकृत करनेवाले अनुप्रास यहाँ खोजने पर भी नहीं मिलेंगे और न मिलेंगे वे श्लेष जो कवि के प्रयास के परिणाम होने से आलोचकों के वैरस्य के कारण बनते हैं। कम-से-कम शब्दों में अधिक-से-अधिक भावों की अभिव्यक्ति कालिदासीय काव्यों का निजी वेशिष्ट्य है। कालिदास शब्दों के चित्रकार हैं। छोटे-छोटे असमस्त पद़ों में सरस भावों का मंजुल निवेश, औचित्य-मंडित सरस उपमाओं का प्रयोग हमारे कवि के काव्यों में सर्वत्र दृष्टिगोचर होता। है। कालिदास के शब्दचित्र चित्रकार की तूलिका से निर्मित चित्रों से कही अधिक चमत्कारी हैं। शाकुंतल के आरंभ में ही दुप्यंत के घाणों के गिरने से भयभीत भागनेवाला हरिए का चिन्न कितना रुचिर है! कालिदास की कविता अभिव्यंजना-प्रधान है। चुने हुए थोड़े-से शब्दों
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विश्वकवि कालिदास २४१
में अभीष्ट अर्र की अभिव्यक्ति कर देने में उनकी प्रतिभा सर्वातिशा- यिनी है। सरसिजमनुविद्धं शैवलेनाषि रम्यं मलिनमपि हिमांशोर्लक्ष्म लक्ष्मीं तनोति। इयमधिकमनोज़ा वल्कलेनानि तन्वी किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम्।। कमल का फूल सेवार से ढँके रहने पर भी सुंदर मालूम पड़ता है। चंद्रमा का काला धच्बा उसकी शोभा को बढ़ाता है। यह सुकुमारी शंकुतला वल्कल-वस्त्र पहनने पर भी अ्र््धिक मनोज्ञ प्रतीत होती है। सच है, मधुर तथा सुंदर आकृति के लिए कौन वस्तु सजावट का काम नहीं करती ?
,सन्देश आज के युग में कालिदास का अपना एक सुंदर संदेश है। आज मानव-समाज परस्पर कलह तथा वैमनस्य से छविन्न भिन्न हो रहा है। प्रवल समरानल के भीतर संसार की समृद्ध जातियाँ अरपपता सर्वस्व स्वाहा कर रही हैं -- संस्कृति पद्दलित होकर अपनी अंतिम घड़ियाँ गिन रही है। ऐसे समय आध्यात्मिकता की मूर्ति, त्याग तथा तपोवन का प्रतीक यह महाकवि आशावाद का संबल लेकर विश्वमानव के सामने उपस्थित है। वह पुकार कर कह रहा है कि भौतिकता का आश्रय, भोग-विलास की लिप्सा, क्षुद्र स्वार्थों की उपासना और धर्म- विरुद्ध काम की सेवा मानव को अवनति के गर्त में भोंकने के लिए सदा जागरूक रहती है। त्याग, तपस्या तथा तपोवन भारतीय संस्कृति के त्रिरत्न हैं। 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः' कालिदास के काव्यों का प्रभावशाली संदेश है। मदन-दहन के अनंतर पार्वती का मंगलमय शिव के साथ विवाह, तपस्या के बाद ही दुष्यंत तथा शकुंतला का परिाय, गो-सेवा के १६
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२४२ काव्यानुगीलन
फलस्वरूप रघु का जन्म, कौत्स को रघु का सर्वस्वदान-ऐसे आदर्श हैं जिनकी उपासना आज भी मानवों को कल्याण की अंतिम कोटि तक पहुँचाने के लिए पर्यात्त है। सरस्वती का यह वरद पुत्र सरस्वती की महिमा को समझने के लिए आग्रह करता है तथा राजाओं को प्रककृति के रंजन के लिए प्रवृत्त होने की कामना करता है- प्रवर्ततां प्रक्कतिहिताय पार्थिवः सरस्वती श्रुतिमहतां महीयताम्।।
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खरड ५ू
भार तीय संस्कृ ति
१-आर्य संस्कृति का प्राण २-हमारी मृत्युज्जय संस्कृति ३-भारतीय साहित्य में नारी ४-वालक की शील-सम्पत्ति ५-भारत में तपोवन ६-हमारे उत्सव ७-गूढ़ लेख्य =- आसाम की आदिम संस्कृति ह-आर्यों की सांस्कृतिक देन
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(२२ )
आार्य संस्कृति का प्राण
संसार की संस्कृतियों में भारतवर्ष की संस्कृति अपनी विशिष्टता तथा भहत्ता के लिये सवसे अधिक विख्यात है। जहाँ ग्रीस, रोम, मिश्र, काबुल आदि देशों की संस्कृति विकराल काल के विशाल गाल में सर्वदा के लिये विलीन हो गईं, वहाँ हमारी वैदिक संस्कृति अपनी विजय वैजयन्ती फहराती हुई, विश्व के मानवों पर अपनी प्रभुता जमाती हुई अपनी जीवन्त सत्ता के लिए सबको चुनौती देती हुई मैदान में डटी खड़ी है। आग में तपाये गये सोने की कान्ति के समान विपत्तियों की ज्वाला के बीच से हमारी संस्कृति खरी तथा चमकती हुई निकली है। इसका उब्ज्वल प्रमाण भारतवर्ष का दीर्घ- कालीन इतिहास डंके की चोट दे रहा है। इस संस्कृति के स्वरूप, महत्व तथा भविष्य को भलीभाँति समझना प्रत्येक भारतवासी का पवित्र कर्तव्य होना चाहिए।
'कल्चर'
आँग्लभाषा के 'कल्चर' शब्द के लिये हम लोग हिन्दी में 'संस्कृति' शब्द का व्यवहार करने लगे हैं। दोनों के व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ के भिन्न होने पर भी दोनों के द्वारा प्रतिपाद्य अर्थ समकक्ष ही है। कल्चर शब्द लैटिन भाषा के कुलतुरा (Cultura) शब्द से निकला है जिसका अर्थ पौधा लगाना या पशुओं का पालन करना है। इस मुख्य अर्थ के अनन्तर इसका लाक्षणिक अर्थ होता है-मस्तिष्क तथा उसकी शक्तियों को विकसित करना-शिक्षा तथा शिक्षण के द्वारा मानसिक वृत्तियों
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२४६ काव्यानुशीलन को सुघारना। 'संस्कृति' शब्द का भी अर्थर् है मन को, हृदय को तथा उनकी वृत्तियों को संस्कार के द्वारा सुधारना तथा उदात्त बनाना। संस्कृति के जितने अंग हैं उन सब अंगों का एक ही प्रधान लक्ष्य होता है-शिक्षा तथा संस्कारों के द्वारा मन को शिक्षित, संस्कृत तथा उच्च बनाना। प्रत्येक संस्कृति का यही लक्ष्य होता है। परन्तु भारतीय संस्कृति की कुछ ऐसी विशेपता है कि उसका उद्देश्य तथा लक्ष्य अन्य संस्कृतियों की अ्र्प्रपेक्षा त्रधिक उच्च, अ्धिक्र महनीय, अधिक उपयोगी तथा अधिक उदात्त सिद्ध होता है। राष्ट्र के समान संस्कृति का भी एक तात्मा होता है जो उसकी जीवनी शक्ति का प्रतीक तथा आधार हुआ करता है। इसे ही भारतीय दर्शन में 'स्वालक्षण्य' के नाम से पुकारते हैं। भारतीय संस्कृति की विशेषता को हम तीन शब्दों में अभिव्यक्त कर सकते हैं-त्याग, तपस्या तथा तपोवन।
त्याग (१) त्याग-मानव जीवन की सफलता त्याग के द्वारा हो सकती है, भोग के द्वारा नहीं। पश्चिम की भौतिक संस्कृति जहाँ हमें भोग की शिक्षा देती है, वहाँ भारत की आरध्यात्मिक संस्कृति हमें योग का उपदेश देती है। पश्चिमी सभ्यता दूसरों के भाग को भी छीन लेने के लिये आग्रह करती है, वहाँ भारत की सभ्यता अपने स्वार्थ को परार्थ के लिये छोड़ने के लिये उद्यत रहती है। त्याग एक महामन्त्र है। इसी मन्त्र के भाव का वह दुष्परिणाम उत्पन्न हुआ्र् है जिसे हम यूरोपीय महायुद्ध के रूप में देखते हैं। भौतिक जीवन को ही चरम लक्ष्य माननेवाली पश्चिमी सभ्यता का यही अवसान है। असंख्य नरों का संहार, अपरमित वन का स्वाहाकार, दीन-दुखी अवलाओं का हाहकार, निर्धनों तथा निर्वल को रौंदकर पूँजीपतियों का असंखय धन-संग्रह-ये ही भौतिकवादी सभ्यता के जीते-जागते फलं हैं। भारतीय संस्कृति दूसरे का मंगल चाहती है। दूसरे के मंगल में ही अपने मंगल की भावना करती है। दूसरों की कार्यसिद्धि के.
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आर्य संस्कृति का प्राण
लिये वह अपने एकदेशीय क्षुद्र स्वार्थ का सवथा त्याग कर देती है। यही तो 'यज्ञ' की महनीय भावना है। गीता में जिस यज्ञ की उदात्त कल्पना की गई है वह यही है-निस्वार्थ कर्म का विधान। भगवद्- गीता से बहुत पूर्व हमारे वैदिक ऋपियों ने इस तत्व का उद्घोप किया था। ईशावास्य की श्रुति इसी त्याग की घोपणा कर रही है- तेन त्यक्त न भुस्जीथा मा गृध: कत्यस्विद्धनम्। जगत् के जितने स्थावर तथा जंगम पदार्थ हैं वे सब ईश्वर के द्वारा आच्छादनीय हैं। प्रत्येक प्राणी में भगवान् सूक्ष्म रूप से विद्यमान हैं। अतः उनमें भगवत्-स्वरूप का अनुभव करना चाहिए। त्याग- भाव से अपना पालन करना चाहिए। किसी के धन की तरफ लोभ की दृष्टि न-करनी चाहिए। भारतीय संस्कृति का यही माननीय मन्त्र है -- त्याग, पर मार्थ, निःस्वार्थ कर्म।
तपस्या
(२) तप -- त्याग के लिए आरवश्यक है तपस्या। तप की अर््ग्नि में बिना तपाचे मानव-जीवन निर्मल नहीं होता, उसके मल जलकर रास नहीं हो जाते। तपस्या ही हमारी समग्र कामनाओं की सिद्धि का मुख्य साधन है। यह त्वार्थ तथा परमार्थ की साधना की दढ़ शृंखला है। इसके द्वारा मनुष्य अपनी सारी कामनाओं की ही पूर्ति नहीं करता, प्रत्युत परोपकार के यथावत् सम्पादन की योग्यता अरजन करता है। तप की महिमा से हमारा साहित्य भग पड़ा है। भारतीय संस्कृति के प्रतिनिधि कवि कालिदास ने इसका महत्त्व बड़े ही भव्य शब्दों में व्यत्त किया है। मदनदहन के अनन्तर भग्न- मनोरथा पावती ने कठोर तपस्या के ही चलपर अपनी कामनावल्ली को सफल बनाया। पार्वती की तपस्या का रहस्य खोलकर कालिदास ने आर्यललनाओं के सामने एक महनीय आदर्श उपस्थित किया है-
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२४८ काव्यानुशीलन
इयेष सा कतु मवन्व्यरूपतां समाधिमास्थाय तपोभिरात्मनः। अवाप्यते वा कथमन्यथा द्वयं तथाविधं प्रेम पतिश्व ताहयः ॥ -कुमारसम्भव ५/२. पार्वती की तपस्या का फल था-'तथाविधं प्रेम', अलौकिक उत्कट कोटि का प्रेम और 'तादशः पतिः', मृत्यु को जीतनेवाला पति। आर्य ललनाओं के लिये उत्कट प्रेम तथा मृत्युञ्जय पति पाने का एकमात्र साधन है-तपस्या।
तपोवन
(३) तपोवन-तपस्या के लिये उपयुक्त स्थान है तपोवन। कोलाहलपूर्ण नगर के अशान्त वातावरण में नागरिकजीवन के रात्रिदिव सद्वर्ष में तपस्या की साधना क्या कथमपि सिद्ध हो सकती है? उसके लिये तो चाहिये जनकोलाहल से दूर, शान्त, रमणीय स्थान में निवास, जहाँ स्वाभाव से ही चित्त प्रपन्नों से दूर हटकर आरत्म- चिन्तन में संलग्न हो जाता है। इसलिए तपोवन भारतीय संस्कृति का जन्मस्थान है। तपोवन के शान्त तथा सुन्दर, उपादेय तथा कम- नीय; शान्तिमय तथा सौन्दर्यमय क्रोड़ में लालिता तथा पालिता हमारी संस्कृति स्वार्थ तथा-परमार्थ के, स्वजावन तथा परजीवन के सामज्जस्य की सर्वेतोभावेन पोषिका है। हमारी सभ्यता के विकास में नगर का महत्त्व बहुत स्वल्प रहा है। जो नगर अपशान्ति के निकेतन हैं, कलह के कारागार हैं, विद्रोह के विराट् आगार हैं, उनमें पाश्चात्य सभ्यता पनपी और इसीलिए मानव-समाज की वह भूयसी हानिकारिसी सिद्ध हुई। पश्चिमी-समाज नें उन कोमल वृत्तियों का विकास कहाँ ? जो एक मनुष्य की पीढ़ा देखकर दूसरे के हृदय में स्वतः सहानुभूति उत्पन्न करती है। जीवन की वह उदात्तता कहाँ? जो अपने जीवन को सक्कट
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आर्य संस्कृति का प्राण २४६ में झोंककर दूसरे के प्राण को बचाने के लिये हमें बाध्य करती है। ये 'नागरिक' संस्कृति के विषम दुष्परिणाम हैं। परन्तु तपोवन की सेविका भारतीय वैदिक संस्कृति में इन दोषों का प्रादुर्भाव कभी नहीं हुआ। नन्दिनी के वरदान से सूर्यवश में पराक्रमी नेता रधु का जन्म तपोवन में होता है, यह घटना अपना आध्यात्मिक मूल्य रखती है। इस प्रकार वेद पुराणादिकों के आधार पर आश्नित भारतीय संस्कृति के मूल में तकार से आ्र्प्रारम्भ होनेवाले तीन तत्त्व क्रिया- शील हैं- त्याग, तपस्या, तगेवन।
आध्यात्मिकता किसी भी जाति या राष्ट्र की सभ्यता का मापक उसका आध्यात्मिक चिन्तन होता है। जिस जाति के आध्यामिक विचार तथा समीक्षण जितने ही अधिक तथा गहरे होते हैं, वह जाति संस्कृति तथा सभ्यता के इतिहास में उतना ही अधिक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। सभ्यता का प्रथम प्रभात किस देश के गगन में सबसे पहिले उदित हुआ ? इस प्रश्न की मीमांसा करते समय पश्चिमी विद्वान् मिस्र देश का नाम बड़े आदर तथा गौरव के साथ लेते हैं परंतु मिस्र के दार्शनिक तथा साहित्यक चिन्तनों पर विचार करने से हमें मौनाव- लम्बन ही करना पड़ता है। भौतिकवाद का अ्र्प्रनुरागी राष्ट्र अध्यात्म- चिन्तन का प्रेमी कभी नहीं हो सकता। मिश्र की सभ्यता भौतिकता में सनी थी, भौतिक सुख की प्राप्ति ही उस देश के राजाओरं का परम • लक्ष्य थी। फलतः रम्य तथा सुन्दर पसादों का रचयिता शिल्पी ही मिस्री सभ्यता में परम सम्मान का भाजन था; मनोरम कविता लिखकर हृदय की कली खिलानेवाले कवि की न वहाँ पूछ थी और न उन्नत तत्त्वज्ञान के अभ्यासी दार्शनिक की वहाँ प्रतिष्टा थी। फलतः अध्यात्म- चिन्तन के अभाव में मिस्र देश की सभ्यता को हम सम्मान की दष्टि से नहीं देख सकते। 'कवि' को आदर देनेवाली जाति ही सभ्यता की
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२५० काव्यानुशीलन
कसौटी पर खरी उतरी है। पश्चिमी जगत् में प्राचीन यूनानी तथा पूर्वी संसार में चीनी तथा भारतीय जाति ही 'कवि' का गौरव समझती है और उसे सम्मान प्रदान करने में सदा अग्रसर रहती है। इसीलिए इन जतियों का प्रभाव सभ्यता के प्रसार में बहुत ही अधिक रहा है। हमारी दढ़ धारणा है (और इसके लिये हमारे पास प्रचुर प्रमाण भी हैं) कि सभ्यता का उदय सप्तसिन्धु प्रदेश में ही सबसे पहिले हुआ। हमारा पूरा विश्वास है कि भारतीय कवि की यह सूकि- प्रथम प्रभात उदय तव गगने। प्रथम सामरव तत्र तपोवने ॥ केवल प्रतिभा का विलास नहीं है, अपि तु इतिहास की कसौटी पर भी खरी उतरती है। 'कवि' का जितना सम्मान हमारी पुण्यमयी भारत- भूमि में होता रहा है, उतना अन्यत्र नहीं।
'छवि' का आदर 'कवि' का मूल व्यापक अर्थ है इन्द्रियों से अगोचर तत्वों का साक्षात्कार करनेवाला व्यक्ति। कवयः क्रान्तदर्शिनः । औरर 'ऋपि' शब्द का भी यही महत्त्वपूर्ण अर्थ है। अध्यात्मशास्त्र के मर्मज्ञ विद्वान् का प्राचीन अ्र्प्रमिधान 'कवि' ही है और इसी अ्रर्थ में इस शब्द का प्रयोग हम गीता तथा उपनिपदों में ही नहीं पाते, प्रत्युत संहिताओं में भी यह महनीय शब्द इसी अरथ में प्रयुक्त उपलब्ध हुआ है। कठोपनिपद् के अनुसार कवि लोग सूक्ष्म बुद्धि से ग्राह्य त्रह्म की ओर जानेवाले मार्ग को छूरे की वार के समान तेज तथा दुर्गम बतलाते हैं :- क्षुरस्य वाग निशिता दुरत्यया। दुरग पथन्तत् कवयो वदन्ति ॥ (३१४ ) प्रश्न (५७), मुण्डक (६।२११), महानारायण (१।३), मैत्री (२७)- में सर्वत्र कवि का प्रयोग मूल शर्थ में मिलता है। इवेताश्वतर ने जगन् के मृन कारण के विपय में कवियों के िभिन्न मतों का निर्देश
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किया है (स्वभावनेके कवयो वदन्ति-६।१)। गीता 'कवयोऽप्यत्र मोहिताः' (४।१5) तथा 'संन्यासं कवयो विदुः' (१८२)-आदि स्थलों में इसी औ्रपनिपद् अ्र्पर्थ का अनुसरणा करती है। ऋक संहिता में इस शब्द का प्रयोग बहुलता से मिलता है-समानमेंकं कवयश्चिदाहुरयं 'है तुभ्यं वरुणो हसीते (७८६।३)। ध्यान देने की बात है कि 'कवि' शब्द का प्रयोग स्वयं उस साक्षान् अपरोक्ष ब्रह्म के लिये भी अ्रनेक स्थलों पर किया गया है। ईशावास्य की वाजसनेयी श्रुति उस पुरुष को 'कवि' कहकर पुकारती है-कविर्मनीपी परिभूः स्वयंभूर्याथातथ्य- तोरडर्ान् व्यदधान् शाश्वतीभ्यः समा्यः (मन्त्र ८)। महानारायण उपनिषद् के अनुसार परमेश्वर अनन्त और अव्यय होने के अतिरिक्त कवि भी है-अनन्तम्यवं कविम् (महानारायस ११।७) टप- निषद्ों के स्वर में अपना स्वर मिलाकर श्रीभगवद्गीता भी यही कहती है- कर्वि पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेट् यः । -गीता (८1९) इन उद्धरणों से त्यष्ट है कि अध्य,त्म-विद्या का वेत्ता पुरुष 'कवि' के नाम से असिहित होता है। स्वयं परमेशवर भी इसी 'कवि' की पवित्र पढती से सण्डित है। इससे बढ़कर दर्शनशास्त्र की प्रतिष्ठा की सूचना हो ही क्या सकती है? भारत की सभ्यता में 'कवि' का आदर सदा से होता रहा है और आरज भी समादर का यह भाव लेशमात्र भी कम नहीं हुआ है। आ्रचीन यूनान में नी अध्यात्मविद्या के अनुगगी व्यक्तियों की कगी न थी, दार्शनिक भी कम न थे, परन्तु समग्र यूगेप के अरध्यात्म-शिक्षण के विषय में गुरु्थानीय यूनान की काली करनुनें वेवफर एग भारतीयों के हृदय में वित्मय तथा विपाद की भावना उठ सही होन। है। यूनानी लोगों ने ही मिलकर अपने देश के सबसे शमे हशिग सुकरात को विप देकर मार डाला था और हुमे सभे हायोि
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अफलातूँ (प्लेटो) को उनके ही एक भक्त शिष्य ने सरे बाजार में गुलाम बनाकर बेंच डाला था। पश्चिमी जगत् की मृर्धन्य जाति का यह दुराचरस, दाशनिकों की इतनी श्रंवहेलना, किसे अचम्भे में नहीं डालती ? परन्तु भारत तथा भारतीय सभ्यता से अनुप्राशित समग्र पूर्वी देशों में दार्शनिकों का बोलवाला था, समाज के वे अग्रणी थे, राष्ट्र के वे निर्माता थे, समाज को परम कल्याण की ओर ले जाने वाले महनीय नेता थे। चीन की यही दशा है। भारत की तो बात ही निराली है। भगवान् मनु का निःसन्दिग्घ प्रमाण है :- सेनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृलमेव च। सर्वलोकाविपत्यं च वेदशास्त्रविदद्दति।। (१२।१०० ) वेदशास्त्र का ज्ञाता सेना के संचालन तथा राज्य पर शासन करने के योग्य है। दण्डविधान तथा सत लोकों का आधिपत्य करने का अधिकारी वही है। प्लेटो भी मतु के इस कथन से प्रभावित हृद्ट थे। उन्होंने आदश राष्ट्र के संचालन का भार दार्शनिक के ऊपर ही रखा था; यद्यपि 'रिपब्लिक' में इन्होंने बढ़ी युक्तियों से इस मत का समर्थन किया, पर वे हबाई महल ही बनाते रहे। उनका स्वप्न कभी कार्यरूप में परिणित न हो सका; वह सृगमरीचिका से बढ़कर सिद्ध न हो सका। परन्तु भारत में राज्य का सूत्र अध्यात्मनेता व्यक्तियों के हाथों में रहा करता था। राजर्षि जनक की ओर पाठकों का ध्यान आकृष्ठ कर देना हो पर्याप्त होगा। इस प्रकार इस पावन भारत में दार्शनिकों का कोरा आदर ही न होता था, बल्कि देश के शासन की बागडोर भी उन्हीं के हाथ में रहती थी। प्राचीनता हमारी संस्कृति से सामान्य परिचय रखनेवाले व्यक्ति को भी इसकी पहली विशेषता प्रतीत होगी-इसकी प्राचीनता। यह कितनी प्राचीन है ? इसका त्थार्थ निरपणा इतिहास की विशेष छानवीन करने पर आज भी नहीं हो पाया। परन्तु प्राचीन स्थानों की खुदाई
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करने से प्राचीन काल की सभ्यता हमारे सामने शभी आई है। सिन्धु नदी की घाटी में 'मोहन-जो-दड़ो' तथा पंजाब के 'हरप्पा' नामक स्थानों पर खुदाई करने से अ्रनेक अद्भुत चमत्कारी वस्तुएँ उपलब्ध हुई हैं। इस सभ्यता का नाम है 'सिन्धु-सभ्यता'। यह सभ्यता भी इराक तथा मिश्र की सभ्यता से प्राचीनतर हैं, इसके प्रमाण मिले हैं। इराक में सभ्यता के आ्ररभ्भ करने वाले अत्यन्त प्राचीन (विक्रम पूर्व ३५०० वर्प) सभ्य जाति का नाम है-सुमेर जाति। इतिहास घतलाता है कि ये लोग उस देश के निवासी न थे, बल्कि परदेशी थे-चाहर से आनेवाले थे। सुमेर लोगों की सभ्यता भारतीय सभ्यता से इतनी मिलती है कि उन्हें पश्चिमी इतिहासज्ञ भारत निवासी वतलाते हैं-विशेषतः दक्षिण भारत का। इराक की सभ्यता सिन्धु- सभ्यता से प्रभावित है। वेशभूपा, रहने के प्रकार, दोनों में समान हैं। इतना ही नहीं, रूसी वैज्ञानिक वाविलोव (Vavilow) का ककहना है कि संसार में गेहूँ की उत्पत्ति सर्वप्रथम पञ्चाव्र के समीप हिन्दूकुश तथा हिमालय के वीचवाले भाग में हुई और यहीं से इराक यूरोप तथा अमेरिका सर्व जगह फैला। इन देशों में जिस गेहूँ की खेती होती है उसका मूल स्थान पञ्जाव है। पाश्चात्य जगत् में घोड़े से चलनेवाला रथ मिलता है, परन्तु इसकी प्रथम कल्पना भारत में ही हुई। इस प्रकार इराक तथा मिस्र की सभ्यता पर सिन्धु सभ्यता का विपुल प्रभाव पड़ा है। यह सभ्यता निःसन्देह वैदिक है और इसके उदय का काल विक्रम पूर्व चार हजार वर्ष है। संसार के इतिहास में
₹ Sumerians were decidedly Indian in type ......... it is to this Dravidian ethnic type of India that the ancient Sumerian bears most resemblance, so far as we can judge from his monuments. He was very like a Southern Hindu of the Deccan who still speal Dravidian languages. And it is by no means improbable that the Sumerians were an Indian race -Hall : The Ancient History' of the Near East p. 173.
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इतनी प्राचीन सभ्यता दूसरी उपलब्ध ही नहीं हुई। अ्तः प्राचीनता भारतीय सभ्यता की प्रथम विशिष्ठता है।
मृत्युञ्जयता छार्य संस्कृति अ्ररमर है। अमरता उसकी दूसरी विशिष्ठता है। वह प्राचीन होकर भी नर्वान है-नितान्त प्राचीनता से मण्डित होने पर भी उसकी धमनियों में रक्त का प्रसार है, नूतन स्फूर्ति की वह आगार है। वैदिक ऋषियों ने उपादेवी की मनोरम स्तुति के प्रसङ्ग में उसे पुरासी युवतिः' शब्दों से वर्णित किया है। ये शब्द भारतीय संस्कृति के विपय में बिना किसी सन्देह के व्यवहृत किये जा सकते हैं। आर्य संस्कृति पुराणी युवतिः है अर्थात् पुरातन होने पर भी वह युवति है- यौवन के उल्लास, उन्माद तथा उत्साह से उसका अङ्ग-अङ्ग परिपूरित है। अन्य प्राचीन संस्कृति की भाँति वह अपने जीवन की अन्तिम श्वास, नहीं ले रही है, प्रत्युत उसमें भरपूर जीवनशक्ति है जो उसे आराज भो। जीवित, जाग्रत तथा प्रभावशाली बनाये हुए है। इसे हम आर्यसंस्कृति की 'मृत्युञ्जयता' कह सकते हैं। उसे मृत्युमुख में समेटने के त्र्प्रनेक अवसर आये, विकराल विपत्तियाँ आ्रईं, विदेशियों के प्रवल आ्रक्रमए हुए, परन्तु तिस पर भी वह अद्म्य उत्साह से खड़ी रही और आज भी वह उसी प्रकार से हृष्ट-पुष्ट बनी हुई है। आर्य-राजनीति की विशेपता रही है-क्षात्रवल का न्राह्म तेज का मञ्जल सहयोग। राष्ट्र के रक्षण का भार क्षत्रिय राजन्य पर निर्भर करता था पर उसे धर्म के शोभन राजपथ पर सञ्ालित करने का उत्तरदायित्व ब्राह्मण के ऊपर रहता था इसलिए अमात्य का उन्नत पद त्राह्मणों के ही लिये था। क्षत्रिय की थी भौतिक शक्ति और त्राह्मण की होती थी आध्यात्मिक शक्ति। क्षत्रिय नरपति प्रभुशक्ति का प्रतिनिधि है, तो त्राह्मण सचिव मन्त्रशक्ति का प्रतीक है। कालिदास ने इस ब्रह्म-क्षत्र योग को 'पवनान्नि समागम' से-उपमा दी.है। 'पवनाग्निसमागमो ह्ययं सहित ब्रह्म यदस्त्रतेजसा'।
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ार्य संस्कृति का प्राण २५५ इस मशिकाञ्वन योग ने ही आर्यसंस्कृति को मृत्युञ्जय बनाया है। यूनान के विश्वविजयी नरेश सिकन्दर ने विक्रम से पूर्व चतुर्थ शतक में भारत पर जो आ्ररक्रमण किया उसे त्राह्मण कौटिल्य के बुद्धि-वैभव से सव्ालित राजन्य चन्द्रगुप्त ने अपने क्षात्र-पराक्रम से सवथा विफल बना दिया। विक्रम के समय में भी ऐसी ही दशा थी। पराक्रर्मी शकों के भयक्कर आ्रक्रमण के कारए भारतीय भूमि कम्पायमान हां रही थी। उस समय विक्रमादित्य ने अपने त्राह्मण कवि कालिदास के उप- देश से स्फूर्ति तथा उत्साह ग्रहण कर इन शकों की धज्जियाँ उड़ा दी- उन्हें भारत-वसुन्धरा से उखाड़ कर राह राह का भिखारी बना दिया। मध्ययुग में तरङ्गजेव्र की कूटनीति को समर्थ रामदास स्वामी की आध्यात्मिकता मन्त्रणा से छत्रपति शिवाजी ने विफल कर डाला। उनके नेतृत्व में मराठों में विशाल शक्ति का सख्चार हुआ और उन्होंने आर्यसंस्कृति का संरक्षण यावनी संस्कृति के आक्रमण से इतनी सुन्दरता से सम्पन्न किया कि आज भी यह संस्कृति अपने प्रभाव से मण्डित है, जगत् में अपना प्रभाव विस्तार कर रही है।
अमरत्व का रहस्य
आरर्यसंस्कृति की मृत्पुञजयता का रहस्य समझने के लिये उसके अन्तस्तल में प्रवेश करना चाहिए-बाहरी आवरण फाड़कर उसका भीतरी रूप परखना चाहिए। हमारी सभ्यता के असरत्व का रहस्य तीन शब्दों में अभिव्यक्त किया जा सकता है-समजसता, सहिष्णुता, ग्रसिप्णुता-भारतीय संस्कृति की स्थित्यतुकूल परिवर्तनशीलता, सब सहने को योग्यता तथा अरन्य वभ्यता को प्राप्त कर लेने की शक्ति। ये तीनों इसके गौरव तथा महनीयता के पर्याप्त प्रतिपादक हैं। विज्ञान की सम्मति है कि इस जगत् में सबसे अधिक योग्य व्यक्ति ही जीवित रहता है। अयोग्य व्यक्ति जो त्रपनी परिस्थितियों के सामने परास्त हो जाता है कथमपि जीवित नहीं रह सकता। भारतीय संस्कृति आ्रराज भी जीवित है-यह स्पष्ट प्रमाण है कि यह अन्य सभ्यताओं की तुलना में 4
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समधिक शक्तिशालिनी है। वैदिककाल से आरम्भ कर आजञ तक कितनी सामाजिक उथल-पुथल इस भूमि में हुई, कितने राजनैतिक परि- वर्तन हुए, परन्तु यह संस्कृति इतनी अ्र्प्रन्तःप्रेरणा तथा जीवनीशक्ति से सम्पन्न है कि वह अपने को परिस्थिति के सर्वथा अनुकूल बनाती गई। यह उसकी समज्जसता हुई। इसी के समान इसकी सहिप्गुता-उदारता भी विशेषतः आाघनीय है। आर्यसंस्कृति का रक्षस्य है सत जातियों, सब मतों, सब आचारों की तितिका, सहनशीलता। यह सत् वस्तुओं को ग्रहण कर लेती है और किसी वस्तु को त्याव्य नहीं मानती। सब मतों के सिद्धान्तों का समभावेन आदर करती है। भारतभूमि की प्रतिमा रही है- सृष्टि में, विनाश में नहीं; संरक्षण में, त्याग में नहीं। एक शब्द में चदि भारतीय संस्कृति की विशालता तथा व्यापकता का रहस्य प्रतिपादन किया जाय, तो वह शब्द है-समन्वय। विरोध का प्रशमन, अनेकता में एकत्र की दृष्टि, 'नाना' के स्तरों में एकता की पद्- चान-यही है आर्यसंस्कृति की कुब्जी। बिना इसे ठीक समझे, इसके रहस्व का उद्धाटन यथार्थतः नहीं हो सकता।
समन्वय बुद्धि
जिस प्रकार अद्वैततत्व भारतीय दुर्शन की बहुमूल्य सम्पत्ति है, उसी प्रकार वह भारतीय संस्कृति का भी महान् चीज है। भारतीय धर्म में समन्वय की ओर दृष्टि डालिए। उपनिपदों के अनुसार मानवर्जावन के लिये दो मार्ग हैं-श्रेथः तथा प्रेयः कल्याण का मार्ग तथा सांसारिक सुस का मार्ग, कण्टक का मार्ग तथा पुप्प का मार्ग, निवृत्ति मार्ग तथा परृत्ति माग। पाश्चात्य देश में ये दोनों मार्ग भिन्न-भिन्न हैं, इनमें किसी प्रकार का सामंजस्य प्रस्तुत नहीं किया गया, परन्तु भगवद्गीता ने इन दोनों मार्गों में मंजुल समन्वय ग्रस्तुत कर रखा है। 'निष्काम कर्म' के सिद्धान्त में हम दोनों पन्थों का एकत्र मिलन पाते हैं। गीता कर्म के संन्यास के पक्ष में नहीं है, वह कर्मफल के संन्यास के पक्ष में हैं। निवृत्ति कर्म-फल से होनी चाहिए, पर कर्म में
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आर्य संस्कृति का प्राण २५७ हमारी प्रवृत्ति होनी चाहिए। मनुष्य-जीवन का मूलस्रोत है- भगवान्। वहीं से यह जीव अपने कर्मों के अनुसार यात्रा करने के लिये प्रस्तुत हुआ है और उसका विराम भी उसी भगवान् में है। न्रह्मचक्र के दो अंश हैं-प्रवृत्ति मार्ग और निवृत्तिमार्ग, भोग का भाग तथा त्याग का भाग। इस चक्र के प्रथमार्ध में जीव आरदान (त्रहण) से समृद्ध होता है और उत्तरार्ध में प्रदान (त्याग) से समृद्ध होता है। प्रवृत्ति मार्ग में भगवान् के वैमुख्य रहता है और्रौर निवृत्ति मार्ग में भगवान् के प्रति साम्मुख्य रहता है। इन दोनों का सामरस्य आार्य-संस्कृति में है। पुरुषार्थ चार हैं -अर्थ, काम, धर्म त्रौर मोक्ष। वैदिक संस्कृति इन चारों के समन्वय में ही मानवजीवन की: सफलता मानती है, आंशिक सेवन में नहीं। वह कहती है- धर्मार्थ -कामाः सममेव सेव्या: । यो होकसक्तः स जनो जघन्यः । आर्य संस्कृति नितान्त उदार है, उदात्त है। अपनी उदारता के बल पर ही वह अव तक जीवित रही है और आगे भी जीवित रहेगी। आज दानवता के भीषण म्रहार के कारए मानवना छिन्न भिन्न हो रही है। मनुष्य मनुष्य का शत्रु बना हुआ है। यदि संसार में मानवता की रक्षा हमें अभीष्ट हो, तो भारतीय संस्कृति ही हमारी पर्याप्त सहायता करेगी। इसी लक्ष्य की सूचना भारतीय संस्कृति के पुजारी अमर कवि रवीन्द्रनाथ ने घड़े ही सुन्दर शब्दों में दी है :- से परम परिपूर्ण प्रभातेर लागि, हे भारत ! सर्वदुःखे रह तुमि जागि। सरल निर्मल चित्त, सकल बन्घने आत्मारे स्वाधीन राखितर, पुष्प भो चंदने। आपनार अन्तरेर माहात्म्य -मन्दिर सजित सुगन्ध करि, टुःखनम्र शिर तार पदतले नित्य राखिया नीरवे।। १७
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वैदिक संस्कृति के पोपक भारतवर्ष में जन्मग्रहण करने के लिए, इसीलिए तो देवगएा भी लालायित रहते हैं। व्यास जी की यह उक्ति कितनी महत्त्वपूर्ण है कि अन्य स्थानों पर कल्प की आयु पाने की अपेक्षा भारत में क्षणभर भी जीना श्रयस्कर है :- कल्यायुपां स्थानजयात् पुनर्भवात् क्षणाथुपां भा रतभूजयो वरम्।' क्षणेन मत्येन कृतं मनस्विनः संन्यस्य संयान्त्यभयं पदं हरे:॥ धन्य है यह पावन भारतवर्ष, जिसमें पुण्य-सलिला भगवती मागीरथी अपने निर्मल जल से मनुष्यों का मल धोती हैं, भगवान् के प्रेमी भागवतजन भगवान् की विमल कीर्ति गाते हैं और यज्ञयाग का पावन धूम आकाश में ऊपर उठकर उसकी आध्यात्मिकता का परिचय देता है। ऐसे पवित्र साधनों से विरहित होने पर इन्द्रलोक भी हमारे लिये तुच्छ ही है ;- न यन्र वैकुण्ठकथासुापगा न साधवो भागवतास्तदाश्रयाः । न यत यज्ञेशमखा महोत्सवाः सुरेशलोकोऽपि न वै स सेव्यताम् ॥ धन्य है यह पवित्र भरतभूमि और घन्य है महनीय आर्यसंस्कृति !!! भगवान् करे यह विश्व का सदा परम मंगलसाधन करे।
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हमारी मृत्युञ्जय संस्कृति
हमारी संस्कृति की यह एक बड़ी भारी विशेषता है कि हमारे जितने श्रद्धा के केन्द्र हैं मान-विंदु हैं, उनके पीछे कोई-न-कोई श्रेष्ट तत्त्व है और त्रवश्य है। आ्रज हमारे दुर्भाग्य से वे तत्व सुप्तावस्था में हैं, वे सिद्धान्त अ्र्प्रमूर्त रूप हैं औ्र इसी कारण हमारा यह ह्वास दृष्टि- गोचर हो रहा है। आरज आवश्यकता है उन तत्वों को जाग्रदवस्था में लाने की। आज आवश्यकता है उन सिद्धान्तों को मूर्तस्वरूप में लाने की, उनको अपने आचरण में प्रत्यक्षरूप से कार्यान्वित करने की। इसका केवल एक ही उपाय है और वह है इन तत्त्वों को-उन सिद्धान्तों को वोधगम्य बनाना-ऐसे रूप में सामने रखना कि साधारण जनता उन्हें ठीक प्रकार से समझ ले और हृदयङ्गम कर ले।
सांस्कृतिक रथ के दो चक्र गैरिक ध्वज पुरातन काल से चली आयी हुई हमारी इस पुण्य- संस्कृति की सनातन धारा का मूर्तिमान् प्रतीक है। इस ध्वज का भगवा रंग 'ब्राह्मतेज' और 'क्षात्रबल' का परिचायक है। इन्हीं दो विशेपताओं पर हमारी संस्कृति अ्रडिग खड़ी है। यही वह नींव है, जिसके कारण शत-शत आघात सहते हुए भी हमारी संस्कृति की अचलंरूप से स्थिर है। आप से अपना इतिहास अविदित नहीं है। हमारे यहाँ प्रजाका पालक राजा सरवदा से क्षन्रिय ही होता आया है। परन्तु वह अकेला ही इस सारे भार को सँभालता नहीं आया है। वह सदा ब्राह्मतेज की सहायता से ही व्यवस्था करता आया है। राजा क्षत्रिय
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२६० काव्या नुशीलन होता था अवश्य; परन्तु उसके गुरु, उसके सलाहकार, उसको मन्त्रणा देनेवाले, उसके मन्त्री सर्वदा ब्राह्मण ही होते थे। श्रीरामचन्द्रजी, जिन्हें हम श्रद्धापूर्वक भगवान् मानते हैं, क्षत्रिय थे; परन्तु उन्हें मार्ग दिखानेवाले उनके गुरु वसिष्ट कौन थे? ब्राह्मण ही न ? यह तो हुई उस परमपवित्र गौरवशाली पुरातन स्वर्स-युग की बात। आज के युग को भी देख लीजिये, यही वात मिलेगी। छत्रपति शिवाजी महाराज के गुरु 'समर्थ रामदास स्वामी' कौन थे ? परम शक्तिशाली पेशवाओं को तो आप जानते ही हैं, वे कौन थे ? त्राह्मतेज के विना अरकेला क्षात्रवल क्या कर सकता है ? जिस प्रकार दो चक्रों के बिना रथ नहीं खींचा जा सकता उसी प्रकार इन दो शक्तियों के बिना यह हमारे 'हिंदू-राष्ट्र' का रथ आागे नहीं बढ़ सकता। हमारी इस पवित्र संस्कृति का रथ सवदा इन्हीं दो चक्रों के आधार पर चलता आया है। ब्राह्मतेज तथा क्षात्रवल के आधार पर सुचारुरूप से चलनेवाला यह हमारा सांस्कृतिक रथ दुनिया में, सारे विश्व में सर्वश्रेष्ठ है। इसका निर्माण संसार के ही नहीं, अपि तु शखिल विश्व के सर्वश्रेष्ट तत्त्वों के संयोग से हुआ है। वे तत्त्वों के संयोग से हुआ है। वे तत्व तकार से ही प्रारम्भ होते हैं-तपस्या, त्याग तथा तपोवल। तपस्या-युग-युग की तपस्या, ऋपि-महर्पियों की तपस्या, विष्णु के अंश राजाओं की तपस्या, प्रजा की तपस्या, सारे हिंदू-समाज की अपने ध्येय की श्रर अग्रसर होने की तीव्र लगन-हमारे इतिहास में प्रखररूप से प्रकाशित हो रही है। त्याग के लिये तो कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं। यह तो हमारी समाजन्यवस्था का एक मुख्य अङ्ग है। इसके बिना हमारी संस्कृति का अ्ररमर होना अत्यन्त श्रसम्भव था। तपस्या ओ्रर त्याग से कमायी हुई प्रचण्ड शक्ति का ही नाम तपोवल है। इसी बल के आधार पर हमारी संस्कृति ने सम्पूर्ण विश्व के हृदय पर विजय प्राप्त की। यह ऐतिहासिक सत्य है। इसमें शङ्का के लिये स्थान नहीं। इसी घल के कारण समस्त विश्व ने भारत को अपना गुरु अपना पथ- प्रदर्शक माना।
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हमारी मृत्युज्जयता
तपस्या, त्याग, तथा तपोवल के कारण स्वयं प्रकाशित ऐसी जो यह हमारी संस्कृति है, इसमें दो विशेषताएँ हैं-एक है प्राचीनता, सनातनता: इूसरी है मृत्युञ्ञयता, अरमरता। हमारी यह आर्य-संस्कृति, यह त्रह्मतेज और क्षात्रबल के कारण अ्जेय संस्कृति अ्रत्यन्त प्राचीन है। पहले लोग इसे नहीं मानते थे; क्योंकि कोई भौतिक प्रमाण उनके सामने नहीं था। परंतु आज उन्हें यह बाध्य होकर स्वीकार करना पड़ रहा है। भूगर्भ से निकला हुआ मोहन-जोदड़ो नगर का अवशेष हमारी इस प्राचीन संस्कृति की जय मना रहा है। इस सँडहर हुए नगर की विशेषता देखिये। बड़ी-बड़ी चौड़ी गलियाँ, बड़े-बड़े प्रासाद, प्रत्येक घर में स्नान गृह, कूप इत्यादि व्यवस्थाएँ क्या हमारी समृद्धि की, हमारे ऐश्वर्य की परिचायक नहीं हैं? यह नगर इन्हीं पाश्चात्यों के मत के अनुसार विक्रम से, उस महान् तथा प्रातःस्मरणीय शकारि विक्रमादित्य के समय से, तीन हजार वर्ष अर्थात् आरज से लगभग पाँच हजार वर्ष के भी पूर्व का है। आज से पॉच हजार वर्ष पूर्व हम इतने वैभवशाली थे! मैं पूछता हू, क्ा यह हमारी संस्कृति की प्राचीनता का पर्याप्त प्रमाण नही? मैं पूछता हूँ-क्या आ्रज ऐसा कोई भी संस्कृति जीवित है, जो इतनी प्राचीन होने का दम भर सकती है? मैं दावे के साथ कहता हूँ कि आज हमारी संस्कृति की प्राचीनता से टक्कर लेनेवाली कोई भी संस्कृति जीवित नहीं है। केवल एक हमारी ही यह संस्कृति है, जो विद्यमान है। इसका क्या कारए है ? क्या यही बात हमारी मृत्युञ्यता को प्रामाशित नहीं करती? इतिहास के पृष्ठ उलटिये तो आपको एक प्राचीन संस्कृति का परिचय मिलेगा-मिस्र की संस्कृति। मिस्र देश की वह सामर्थ्यशालिनी संस्कृति प्राचीन संस्कृतियों मे से मानी जाती है। कहाँ है वह संस्कृति? क्या इस बड़े भारी भूप्रपपर एक भी व्यक्ति उस संस्कृति की परम्परा का लेकर जीतित है ? क्या एक भी व्यक्ति ऐसा है, जो प्राचीन मिस्र देश
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में व्यवहार में लायी जानेवाली भापा को अपनी भापा कहने का, बोलने का, व्यवहार में लाने का प्रमाण दे सकता है? वह मिट गयी, नष्ट हो गयी; आ्ज उस संस्कृति का एक भीवंशज इतने विशाल पृथ्वीतल पर जीवित नहीं है। इसके विपरीत है हमारी स्थिति। सबसे प्राचीन होती हुई भी हमारी संस्कृति की परम्परा अखण्डरूप से चल रही है। अत्यन्त प्राचीन काल में जो भाषा हमारे आपरदिपुरुष की वाणी के रूप में प्रवा- हित हुई, उस देववाणी 'संस्कृत' का व्यवहार हमारे प्रतिदिन के न्यव- हार में होता है। हम उसी प्रकार सन्व्या-वन्दन करते हैं। इमारे नित्य के व्यवहार में, विवाहोपनयनादि संस्कारों की वही कर्मकाण्ड-पद्धति जीवित है, जिसे हमारे वेदकालीन पूर्वज उपयोग में लाते थे। मैं पूछता हूँ, है कोई जो मिस्त्र की प्राचीन भाषा को अपने जीवन में प्रधान स्थान देकर उस संस्कृति के परम्परा-द्ीप को प्रत्त्नलित रखने का अभिमान करता हो?
तीन महान् आवात
हमारी संस्कृति ने सचमुच ही मृत्यु पर विजय पायी है। न जाने इस पर कितने आघात हुए; परन्तु यह अडिग रही, अचल रही, अटल रही। इन आघातों में सबसे बड़े ऐसे तीन आघात हुए। पहला हुआ सिकन्दर (अलीकचन्द्र) के द्वारा। उसका पड्यन्त्र कितना विकट था, यह इतिहास के विद्यार्थियों के छिपा नहीं है उसने हमारी संस्कृति का आमूलनाश करने का तथा यवन संस्कृति को विश्व की संस्कृति बनाने का प्रण किया था। परन्तु एक ्राह्मस ने उससे टक्कर ली। उस महापुरुप का नाम था कोटिल्य, चासक। उस ऋषिस्वरूप ब्राह्मस ने चन्द्रगुप्त के समान तेजस्वरी शासक का निर्माण किया और गरीव विचारा अलीचन्द्र (अलेक्जेण्डर) अपना चोरिया-बँधना लेकर सिंघु के इस तीर पर आँसू बह़ा कर अपने देश लौट गया। दूसरा आघात हुआ प्रातः स्मरखीय गो-ब्राह्मए-प्रतिपालक महाराज विक्रमा-
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हमारी मृत्युञ्जय संस्कृति २६३ दित्य के समय में। महाप्रतापी रखशर खूत लम्बे-चौड़े डील-डौलवाले बलशाली शकों ने आर्यावर्त को आरत्मसात् करने की ठानकर हमारी इस पवित्र मातृभूमि की स्वतन्त्रता पर आक्रमण कर दिया। परन्तु उस समय भी एक ब्राह्मण ने जनता की नस-नस में आरग फूँककर चीर विक्रम के नाम में कलक्क नहीं लगने दिया। उसका नाम था- कालिदास। कविकुलसूर्य कालिदास का रघुवंश उठाकर देखिये, वह क्या था ? ब्राह्मतेज और क्षात्रवल ने फिर एक वार वर्वरता को करारी हार दी। उसी प्रतापी के नाम से आज यह संवत् चला आ रहा है। आज भी हम प्रत्येक धार्मिक कृत्य के आररम्भ में उस वीर विक्रम का नाम सादर लेते हैं, ताकि हम भी उसी प्रकार अपनी मातृभूमि की सेवा करने में समर्थ हों। तीसरा आघात हुआ मुसलमानों के द्वारा। उस समय भी एक संन्यासी ने इस भारत-भूमि की रक्षा की। उस प्रातर्वन्दनीय समर्थ रामदास को कौन नहीं जानता ? उस महान् आत्मा ने एक महापुरुष का निर्माण किया-जिनका नाम है छत्रपति शिवाजी महाराज। क्षत्रियकुलावतंस छत्रपति ने फिर एक वार उस हत्यारी शक्ति को नाकों चने चबवाये।
सर्वांधिक कुटिल आघात
कौन-सी ऐसी संस्कृति है, जो ऐसे भीषए आघातों के सन्मुख अपनी प्राचीनता को अरमर रखने की दावा कर सकती है? इतना ही नहीं, एक ओर और भी प्रयत्न हमारे देश में हुआ, जो यदि सफल जाता तो आज हमारीइस पवित्र भूमि का अभिमान रखनेवाला एक भी न दिखायी देता। वह प्रयत्न हुआ अंग्रेजोंके द्वारा। आपने विष- कन्याका वर्णन अवश्य पढ़ा होगा। जिस प्रकार अफीमची लोग थोड़ी- थोड़ी मात्रासे प्रारम्भकर बहुत अरधिक मात्रा में अरफीम खानेका अ्रम्यास करते हैं, उसी प्रकार-उसी प्रणालीसे विषकन्या तैयार की जाती थी। बालपन से उसे थोड़े-थोड़े परिमाण में विष खिलाया जाता था और
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धीरे-धीरे उसका प्रमाण बढ़ाया जाता था। पर्याप्त समय के वाद उस कन्याके सारे शरीर में इस प्रकार विप व्याप हो जाता था कि यदि मनुष्य या पशु के शरीर पर उसके नख से खरोंच लग कर उस मनुष्य के रक्त का उसके नखत्र से सम्पर्क हो जाता था तो वह मनुष्य या पशु तत्काल विपवाधा से मर जाता था। अंग्रेजी शिक्षा का प्रचार कर सारे समाज की नस-नस में यह विप फैला दिया। धीरे-धीरे समाज की रग-रग में यह विप व्याप्त हो गया और आरज्ञ हम ही अपने धर्म की-अपनी संस्कृति की जड़ काटनेवाली कुल्हाड़ी का वेंट वन गये। हमने उन्होंके वचनों की दोहराना प्रारम्भ कर दिया। देखिये न? उन्होंने कहा और हमने मान लिया कि हम 'यहाँ के नहीं हैं, हम बाहर से आये हुए हैं,।' चलिये, भगड़ा ही मिट गया। अब हम भी वाहर से आये हैं तो फिर क्यों हम इस भूमि के लिये दूसरे से भगड़ा मोल लें? परंतु हमने कभी यह विचार नहीं किया कि यदि हम वाहर से आये हुए होते तो हमारे ही नहीं, प्रत्युत संसार के प्राचीनतम ग्रन्थ हमारे वेदों में इसका कहीं तो उल्लेस मिलता। यहीं वह सपनद प्रदेश है, जिसमें सरस्वती का पुण्य-प्रवाह नृत्य करता है और जहाँ से आर्यों ने समस्त संसार में फेल कर उपनिवेश स्थापित किये और वर्रों में सभ्यता का वीज वो दिया, ताकि वे मनुष्यता का सम्मान करें। आज वे ही, जिन्होंने हमसे ऋणरूप में बुद्धि का बीज लिया, हमसे कहते हैं-'तुम यहाँ के आदिनिवासी नहीं हो।' और हम तत्काल इसे सत्य मानकर अपनी इस मातृभूमि का अरभिमान छोड़कर विचार करने लगते हैं कि यथार्थ में हमें अपने को यहाँ का राष्ट्रिय नहीं कहना चाहिये। इतना ही नहीं, इस विषय का हमारे ऊपर इतना अधिक प्रभाव हुआ है कि कुछ कहा नहीं जाता। हमारे इस युग के तथाकथित नेता लोगों को ही देखिये। उनमें बहुत से अपने को हिंदू कहलाने में भी लज्जा का अनुभव करते हैं। न जाने वह सुदिन कब आयेगा? जब हम अपने अंदर हिंदुत्व का अभिमान भरकर भारत के राजकारण में भाग लेंगे।
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हमारी मृत्युञ्ञय संस्कृति २६५ कहने का तात्पर्य यह कि हमारी संस्कृति इतने प्रबल आरक्रमणों के विरुद्ध संघर्घमय जीवन विताकर अब तक जीवित है, इसका एकमात्र कारण इसकी मृत्युञ्जयता है। इस मृत्युञ्जयता की प्राप्ति हमें केवल हमारे ही ब्राह्म-तेज तथा क्षात्रवल के द्वारा हुई है। इसी ब्राह्मतेज तथा क्षात्रवल के कारण हमारी इस संस्कृति को, राष्ट्र को, भूमि को यह गौरव नसीव हुआ। हमारी समृद्धि देखकर देवता भी यहाँ जन्म लेने के लिये तरसते थे। देवलोक से देवताओं के मर्त्यलोक में आने की कल्पना लोगों को जरा विचिन्र मालूम होती है; परंतु इसमें कुछ असत्य नहीं। क्योंकि देवलोक तो भोगभूमि है। वहाँ किये हुए पुण्य का कोई फल नहीं। इसीलिये मोक्ष की इच्छा करनेवाले देवताओं के इस मर्त्यलोक में, इस कर्मभूमि पर, अवतार लेने की बात विचार संगत तथा तर्कसंगत है। यहाँ जो कुछ भी किया जाता है, उसका फल अवश्य मिलता है। परंतु इतना बड़ा यह विश्व है, फिर भी देवताओं की इच्छा यहाँ भारत में जन्म लेने की क्यों होती थी ? वह केवल यहाँ की आध्यात्मिक सुख-समृद्धि देखकर ही तो?
तेजःपुञ्जका प्रतीक ध्वज
इतना समृद्धिशाली हमारा देश था; परन्तु आराज ? आरज हमारी स्थिति अत्यन्त हीन है। इस हीन स्थिति से निकलने का केवल एक ही मार्ग है। वह है अपनी संस्कृति को पुनः गौरवशाली बनाने का दढ़ निश्चय लेकर समस्त हिंदू समाज को सुसंघटित करना। यह तभी हो सकता है, जब हमारी संस्कृति, हमारी परम्परा का हमें हर समय ध्यान रहे। इसी के लिये हमने अपना यह पुरातन 'भगवा ध्वज' अपनाया है। इसे देखते ही हमें अपने पूर्व गौरव का ध्यान हो आता है। अरपनी परम्परा का आँखों के सन्मुख चित्र उपस्थित हो जाता है। इसी भंडे के नीचे हुष अ्रप्रसंख्य वलिदानों का स्मरण हो आता है, जिनके कारण आज हम अपने को हिंदू के रूप में जीवित देखते हैं।
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यह ध्वज हमारे हिन्दू-राष्ट्र की आशाओं-आकांक्षाओं, इतना ही नहीं, वरं समस्त हिंदू राष्ट्र का तेजःपुञ्ल प्रतीक है। यह हमारा है, हम इसके हैं। इसी के कारण हम हम हैं। अतः इसका सम्मान-रक्षणा हमारे जीवन का आद्य कर्तव्य है-यह घात प्रत्येक हिंदू के मन में जागरित हो तथा इस ध्वज के पीछे जो हमारी संस्कृति का अमूर्त गौरव छिपा है, उसे मृर्त स्वरूप देने में वह कार्यशील हो। यही जगदीश से प्रार्थना है।
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भारतीय साहित्य में नारी
आ्राज इस पुण्यभूमि भारतवर्ष में हिंदू-नारी की जो बीभत्स वर्पणा हो रही है, उसके स्मरणमात्र से ही हमारे शरीर में रोमाव् खड़े हो जाते हैं-हमारा रोम-रोम उसका प्रतिवाद करने के लिये मानो समूह रूप से जग्रत् दीख पड़ता है। नारी का इसमें दोष क्या ? प्रधान तधा प्रवल दोष तो हमारा ही, पुरुषों का ही है। नारी सर्वदा ही पुरुष की छत्रछाया में अपने गुसगरिमा का विस्तार करती आर्या है। उसकी रक्षा का उत्तरदायित्व पुरुष के ही ऊपर है, परंतु आज इन नामधारी पुरुषों की वीर्यहीनता, दुर्वलता तथा अपमान- सहिष्णुता के कारण ही नारी की यह भयावह स्थिति उत्पन्न हो गयी है। भारतीय समाज में नारी त्याग तथा तपस्या की प्रतीक है। मनु का यह वचन हम कभी भूल नहीं सकते कि जहाँ खितरयाँ पूजी जाती हैं, वहीं देवतालोग श्रानन्दित रहते हैं- यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। स्त्रियों का पूजन देवताओं के समाराधन का मुख्य साधन है। नारी भारतीय संस्कृति में अर्प्रतीव उन्नत गौरव की अधिकारिणी सदा से रही है। स्त्रीत्व के नाते उसमें स्वभाववशात् अ्रनेक प्रकार की सुर्बलताएँ स्व्तः विद्यमान रहती हैं। इसीलिये तो भारतीय समाज शास्त्रियों ने 'न स्त्री स्वातन्त्रयमहृति का शंखनिनाद किया है। यह कथन स्त्री-समाज की निन्दा या अपमान का सूचक नहीं है, प्रत्युत वत्तुस्थिति का द्योतक है। हमारे धर्मशास्त्रियों ने नारी के संरक्षण का भार वल के प्रतीक पुरुष के ऊपर ही छोड़ दिया। नारी के तीन रूप हैं-कन्या, पत्नी तथा माता; और इन तीनों ही दशाओं में उसकी
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रक्षा का, उसकी मान-मर्यादा तथा प्रतिष्ठा के संरक्षण का पवित्र कार्य 'पुरुष' के ऊपर ही निर्भर करता है। पुरुप मात्र का सूचक वेद का महनीय शब्द है-'वीर'। 'वीर' का शब्दार्थ ही है-पुरुष और इसी अर्थ में इसका प्रयोग संस्कृत से सम्बद्ध आर्य भापाओं में अभी भी होता है। लैटिन भाषा का 'वीरुस' (Virus) मनुष्य का वाचक है और यह शब्द संस्कृत 'वीरस्' (वीरः) का ही साक्षात् प्रतिनिधि है। इस शब्द से व्युत्पन्न अंग्रेजी भाषा में प्रयुक्त 'विरिलिटी' (Virility) भी पुस्त्व, वीर्य का ही द्योतक है। सारांश यह है कि पुरुष वही है जो वीर हो, वीर्य सम्पन्न हो, अपने को तथा अपने आश्रित को रक्षणा करने की क्षमता रखता हो। वैदिक ऋषियों ने इस वीर्य के प्रतीक, 'वीर' नामधारी पुरुष के संरक्षण में 'नारी' की व्यवस्था कर उचित ही कार्य किया; परन्तु दुःख का विपय है कि हम अपने सामर्थ्य से ही सर्वथा च्युत हो गये, अपने आपको बचाने की क्षमता से विहीन होकर हमने अपनी अनमोल थाती के रक्षण से ही अपना हाथ खींचकर जघन्य कार्य किया। अतः नारी की इस वर्तमान दुरवस्था का समस्त दोप पुरुप की नपुंसकता को है। हिंदू-संस्कृति में नारी के महनीय स्थान को परखने के लिये अ्रप्रपनी संस्कृति के स्वरूप को हमें पहचानना पड़ेगा। हमारी सभ्यता के दो पादपीठ हैं-त्याग औरर तपस्या। हमारी सभ्यता किसी की सम्पत्ति पर वलात् अधिकार जमा कर उसे वरवस छीनने और फपटने का उपदेश नहीं देती है। वह गम्भीर स्वर से पुकारती है- तेन त्यक्त्ेन भुस्जीथा मा गृधः कस्यस्तिरिद्धनम्। त्याग से सम्पत्ति का उपभोग करो। किसी के धन पर लालच न करो। अपनी सम्पत्ति भी वॉट कर खाओ। हमारा प्रतिदिन चलिवैशवदेव कर्म इसी त्यागवृत्ति का दैनन्दिन आचरस है। हमारा अद्वैत वेदान्त सच्चा साम्यवादी धर्म है, जो जगत् के प्राशिमात्र को अपना बन्धु ही नहीं, प्रत्युत अपना ही रूप सममता है। शतः त्याग
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भारतीय साहित्य में नारी २६६ हमारी संस्कृति का प्रधान आरप्रधार पीठ है और त्याग के लिये श्रावश्यक है तपस्या। तपस्या के द्वारा ही मानव अपने कालुष्य को जलाकर पवित्र तथा विशुद्ध वन जाता है। सोना आग में तपने पर खरा उतरता है। मनुष्य भी तपस्या के द्वारा खरा उतरता है-अपनी विशुद्धि प्राप्त करता है। बिना तपस्या के त्याग की भावना कथमपि जाग्रत नहीं हो सकती। अतः भारतीय संस्कृति त्याग तथा तपस्या के ताने-वाने से घनी हुई एक विचित्र शाटी है, जिसका रंग शताब्दियों के काले धव्घे पड़ने पर भी आज भी उसी प्रकार नेत्ररंजक तथा चटकीला है और इस संस्कृति और सभ्यता की प्रतीक है-
भारतीय नारी नारी त्याग और तपस्या की जाउ्तल्यमान विभूति है। इन्हीं दोनों तत्वों के समन्त्य से हमारी आर्य नारी का स्वरूप संगठित हुआ है। नारी-जीवन का मूलमन्त्र है-त्याग और इस मन्त्र को सिद्ध करने की क्षमता उसे प्रदान की है तपस्या ने। हम ठीक-ठीक नहीं कह सकते कि उसके जीवन के किस अंश में इन महनीय तत्त्वों के विलास का दर्शन हमें नहीं मिलता; परंतु यदि हम उसके पूर्वजीवन को 'तपस्या' का काल तथा उत्तर-जीवन को 'त्याग' का काल मानें, तो कथमपि अ्नुचित न होगा। नारी के तीन रूप हमें दीख पड़ते हैं -- कन्या रूप, भार्या रूप तथा मातृरूप। कौमार-काल नारी-जीवन की साधनावस्था है और उत्तर-काल उस जीवन की सिद्धावस्था है। हमारी संस्कृति के उपासक संस्कृत-कवियों ने नारी ककी इन तीनों अवस्थाओं का चित्रस वड़ी ही सुन्दरता के साथ किया है। नारी कन्यारूप में कन्या रूप में नारी का चित्रस हमें कालिदास की कविता में उपलब्ध होता है। कालिदास आर्य-संस्कृति के प्रतिनिधि ठहरे। उन्होंने
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आर्य कन्या के आदर्श को 'पार्वती' के रूप में अभिव्यक्त किया है। आर्य कन्या को अदम्य, श्जेय तथा जितेन्द्रिय वनाने का मुख्य साधन 'तपस्या' ही है। कालिदास ने अपने कुमारसम्भव में इसके महत्त्व को बड़े ही भव्य शब्दों में प्रकट किया है। शिवजी के द्वारा मदन-दहन के अनन्तर भग्नमनोरथा पार्वती जगत् की समग्र आशाएँ छोड़कर तपस्या की साधना में जुट गयी। उसकी तपस्या इतनी कठोर थी कि कठिन शरीर से उपार्जित भुनियों की तपस्या उसके सामने नितान्त प्रभार्हान तथा प्रभावहीन प्रतीत होती। प्रकृति के नाना प्रकार के कष्टों को फेलकर अन्ततः वह अपनी कामनासिद्धि में सफल होती है। उसका मनोरथतरु फलसम्पन्न होता है। उसे अभीष्ट फल प्राप्त होता है। कालिदास ने पार्वती के तप का रहस्य विशेपरूप से प्रकट किया है। इचेष सा कर्तु मवन्व्यरूपतां समाधिमास्थाय तपोभिरात्मनः । सवाप्यते वा कथमन्यथा द्ववं तथाविधं प्रेम पतिश्व ताहशः ॥ (कुमारसम्भव ५।२) पार्वती की तपस्या का फल था-तथाविधं प्रेम, उत्कट कोटि का अलौकिक प्रेम और तादशः पतिः, उस प्रकार का मृत्यु को जीतनेवाला पति। जगत् के समस्त पति मृत्यु के क्रीत दास हैं। एक ही व्यक्ति मृत्यु को जीतने वाला है और वह है मत्युन्जय महादेव। मृत्यु को जीतने की क्षमता एक में ही है, और वह व्यक्ति है देवों में महान् देव अर्थात् महादेव। आजतक कोई भी अन्य कन्या मृत्युञजय को पति वरस करने में समर्थ नहीं हुई और इस युगल-जोड़ी का प्रेम भी कितना अनुपम, कितना उत्कट, कितना अलौकिक है। कालिदास ने 'तथा- विधं' शब्द के भीतर गम्मीर अर्थ की अभिव्यंतना की है। शंकर ने पार्वती को अपने मस्तकपर त्थान दिया है। आदर की एक सीमां
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भारतीय साहित्य में नारी २७१ होती है। पत्नी को इतना उच्च स्थान प्रदान करना सत्कार का महान् प्रकर्ष है, आदर की पराकाष्ठा है। अन्य देवताओं में किसी ने अपनी पत्नी को इतना गौरव प्रदान नहीं किया है। गौरी की यह साधना भारतीय कन्याओं के लिये अनुकरणीय वस्तु है। हमारी कन्याओं के सामने एक ही महान् आदर्श है और वह है पार्वती। भारतीय समाज में 'गौरीपूजन' का रहस्य इस महती तपःसाधना के सीतर तन्तनिंहित है।
नारी पत्नी-रूप में
संस्कृत कवियों ने पत्नीरूप में नारी का सुचारु चित्रण किया है। वाल्मीकि, व्यास, कालिदास और भवभूति-इन महामान्य कवियों ने भारतीय पत्नी की रूप-छटाका वर्णन बड़ी ही सुन्दर भाषा में किया है। भगवती जनकनन्दिनी के शील सौन्दर्य की ज्योत्स्ना किस व्यक्ति के हृदय को उपशम तथा शान्ति नहीं प्रदान करती ? जानकी का चरित्र भारतीय पत्नियों के महान् आदर्श का प्रतीक है। वाल्मोकीय रामायणा के अ्रनेक प्रसंग इस कथन के प्रमाण- भूत हैं। राव के द्वारा वारंबार प्रार्थना करने पर सीता ने जो अवहेलना-सूचक वचन कहे हैं, वे भारतीय नारी का गौरव सदा उद्घोषित करते रहेंगे। वह कहती है कि 'इस निशाचर रावण से प्रेम करने की वात तो दूर रही, मैं तो इसे अपने पैर से -- नहीं नहीं, चायें पैर से-भी नहीं छू सकती। चरणेनापि सव्येन न स्पृशेयं निशाचरम्। रावणं किं पुनरहं कामयेयं विगहितम्।। (सुन्दर काण्ड ५।२६।१० ) रावण की मृत्यु के अनन्तर राम ने सीता के चरित्र की विशुद्धि को सामान्य जनता के सामने प्रकट करने के लिए अ्रनेक कटुवचन कहे। उन वचनों के उत्तर में सीता के वचन इतने मर्मस्पर्शी हैं कि
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आरलोचक का हृदय आ्र्प्रानन्दातिरेक से गद्गढ हो उठता है। भगवती सीता के ये कथन कितने मार्मिक हैं। वे कह रही हैं कि 'मनुष्य उसी वस्तु के लिये उत्तरदायी होता है, जिसपर उसका अधिकार होता है। मैं अपने हृदय की स्वामिनी हूँ। उसे मैंने अपने वश में रक्खा है। वह सदा आपके चिन्तन में निरत रहा है। अ्रंगों पर मेरा काबू नहीं। वे पराधीन ठहरे। यदि रावण ने चलात्कार से उनका स्पर्श कर लिया तो इसमें मेरा अपराध ही क्या ?' मदधीनं तु यत् तन्मे हृदयं तवयि वतते। पराधीनेषु गात्रेषु कि करिष्याम्यनीदवरा ।। 'मेरे चरित्र पर लाञ्छन लगाना कथमपि उचित नहीं है; मेरे निर्वल अरंश को पकड़ कर आप ने आगे किया है, परन्तु मेरे चरित्र के सवल तंश को पीछे ढकेल दिया है। नारी का दुर्वल अंश है-उसका नारीत्व, स्त्रीत्व और सवल अंश है-पत्नीत्व और पातित्रत। नर शार्दूल !- आप मनुष्यों में श्रेष्ठ हैं, परन्तु क्रोधावेश में आरकर आप का चह. कथन साधारण पामर जन के समान है। मैं आप की हृद्य से भक्ति करती हूँ। मेरा स्वभाव निश्छल और पवित्र है। आश्चवर्य है कि आ्र्ाप जैसे नरशार्दूल ने मेरे स्वभाव को, मेरी भक्ति को तथा पासिग्रहण को पीछे ढकेल दिया है, मेरा उपहास करने के लिये सेरे त्रीत्व को तरागे रक्खा है।' कितने महत्त्वपूर् शब्द हैं ये सीता जी के- तया तु नरशार्दूल क्रोघमेवानुवर्तता। लघुनेत्र मनुष्येण न्त्रीत्वमेव पुरस्कृतम्। न प्रमाणीकृतः पाणिर्वाल्ये वालेन पीड़ितः । मम भक्तिश्न शीलं च सर्व ते पृष्ठतः कृतम्॥ कितनी शरोजस्व्रिता भरी है इन सीधे-सादे निष्करट शब्दों में। ्रनाहता भारतीय ललना का यह उद्गार कितना हृद्य-वेधक है!
पढ़ते हैं। सुनतेही सहदच व्यक्ति की आँखों में सहानुभूति के आँसू छलक
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कालिदास की सीता
महाकवि कालिदास ने सीता के जिस चरित्र का विलास अपनी वैदग्ध्यमयी वाणी के द्वारा अभिव्यक्त किया है उसमें पारिजात की सुगन्ध है, मानव-चित्त को विकसित तथा विस्मय-स्थित कर देने की अद्भुत क्षमता है। प्रजा-पालन की वेदी पर भगवान् रामचन्द्र ने अपने जीवन-सर्वस्व की वलि देकर जो आरदर्श उपस्थित किया है, वह हमारे राजवर्ग के लिए श्लाघनीय तो है ही; परन्तु उससे भी श्लाव्यतर वह आद्श है, जिसे परित्यक्ता जानकी ने अपने पतिदेव रामचन्द्र के प्रति प्रकट किया है। बीहड़ जंगल में लक्ष्मण जी विदेहनन्दिनी को छोड़कर जब जाने लगे, तब सीता ने रामचन्द्र जी को जो आरत्मनिवेदन किचा.है, वह भारतीय नारी के गौरव, मर्यादा तथा त्याग का ज्वलन्त उदाहरण है। सोतापरित्याग रामराज्य की प्रतिनिधि घटना है। लोक-' मंगल की वेदी पर आत्मसुख को वलिदान दे देना ही भारतीय नरेशों का आदर्श प्रजापालन-व्रत है और इस आदर्श की प्रंतिष्ठा की स्वयं मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् रामचन्द्र ने । * प्रजा के अतुरञ्जन के लिये राम ने अपनी प्राएवल्लभा सीता को छोड़ने में न विलम्ब किया और न संकोच दिखलाया। गर्भ-भार से आकान्त सीता राजा राम के इस कार्य के औचित्य को अच्छी तरह समझ रही हैं, परंतु फिर भी उन्हें उलाहना देने में वह नहीं चूकती। वे लक्ष्मण से पूछती हैं कि 'क्या ऐसी विकट परिस्थिति में उनका परित्याग शास्त्र के अनुकूल है या इक्ष्वाकुवंश की मर्यादा के अनुरूप ?' सपरंतु फिर वह चेत जाती हैं कि 'राम कल्याणबुद्धि ठहरे अपने प्रिय- पात्रों के कल्याण की कामना करनेवाले हैं। वे मेरे लिये किसी अकल्याण वस्तु की क्या कभी कल्पना कर सकते हैं? अतः मेरे ही प्राचीन पातकों का यह जागरूक फल है।' धन्य है सीता की पति-भक्ति! पति की अ्रवहेलना तो दूर रहे, वह स्वयं कर्मवाद के सिद्धान्त पर त्रात्म- तुष्टि प्राप्त कर रही हैं। १८
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कल्याणवुद्धरथवा तवायं न कामचारो मयि शह्नीयः। ममैव जन्मान्तरपातकाना विपाकवित्फूर्जथुरप्रमेयः ॥
अतः अपने पातकों को दूर करने का एक ही लाधन है, और वह साधन है तपस्या। अतः मैं इसी तपस्या में अपने को संलग्न करने जा रही हूँ, जिससे मेरे पातक शीत्र दूर हो जायँ। परंतु सीता की एक विषाद्भरी प्रार्थना है। राम राजा टहरे। मैं ठहरी एक तापसी, एका- किनी तपारिविती । कृपया एक सामान्य प्रजा की दृष्टि से ही वे मेरा ध्यान रक्खें। यही अ्रन्तिम निवेदन है-'तपस्विसामान्यसवेक्षसीया।' जनकनन्दिनी की इस प्रार्थना में कितना शज भरा है, कितनी करुणा भरी है, कितना आत्मत्याग झलक रहा है। भारतीय नारी का यही त्यागमय जीवन है। पति के कल्याण तथा मङ्गल के निमित्त आ्रत्म- निषेध या त्रात्मसमर्पण ही 'तारीत्व' है। पुरुप की पूर्ति तारी के संगम में है। नारी के बिना पुरुप का जीवन अधूरा है। बिना नारी के सहयोग के वह अपने पुरुषार्थ में कृतकार्य नहीं हो सकता। नारी पशु- प्रवृत्ति की प्रतीक नहीं है। वह तो दिव्य गुणों की प्रतिमा है, तरलौकिक गुखों की सूर्ति है। इसीलिये हमारी तान्त्रिक पूजा में शक्ति या मुद्रा की महती उपयोगिता है।
गार्हस्थय जीवन
हमारा गार्हत्थ्य-जीवन भगवत्माप्ति का एक सोपानमात्र है। भगवान् की प्राप्ति अ्रनुराग से सुलभ है। भक्ति ही उस प्रियतम के पाने क लिये एक सुगम राजमार्ग है। कहने में यह जितना सरल है, करने में यह उतना ही कठिन है। प्रेमतत्व्र एक दुरूह तत्त्र है, जिसे यथार्थतः जानना चसना कठिन नहीं है जितना उसका आचरण में लाना। गार्हस्थ्य-जीवन में हमें इसी प्रेम-तत्त्व की साधना सिखलाची जाती है। महाकत्रि भवभृति ने इस ततत्व की बड़ी सुन्दर व्याख्या की है-
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सद्वैतं सुखदुःखयोरनुगुणं सर्वास्त्रवस्थासु यद् विश्रामो हृददस्य यत्र जरसा यत्मिन्नहार्यो रसः । कालेनावरणात्ययात् परिणते यत्स्नेहसारे स्थितं भद्रं तस्य सुमानुषस्य कथमप्येकं हि तत् प्राप्यते।।
'यह प्रेम सुसत्र में और दुःख में अद्वैत अर्थात् एकाकार रहता है। समग्र अवस्थाओं में अनुकूल रहता है। इससे हृदय को विश्राम मिलता है। बुढ़ापा इसके रस को-आनन्द को हरण नहीं कर सकता। समय के बीतने पर वाहरी आवरण के हट जाने पर यह परिपक्क स्नेहसार में स्थित रहता है। वही यह कल्याशकारी-भद्र प्रेम है और वह किसी ही भाग्यशाली पुरुष को प्राप्त होता है।' इस प्रेम को भगवदर्पण कीजिये, प्रभु अवश्य मिलेंगे। अपने भक्तों को अपने क्रोड में रखने तथा उसके सङ्ग में आनन्द मनाने के लिये वह लीलामय सदा तत्पर रहता है, परंतु विषयरस के चाटने में ही जीवन वितानेवाला प्राणी उधर मुड़ता ही नहीं। जीव को भगवान् की ओर अनुरक्त करने का साधन है-नारी। आलक्कारिकों ने शब्दों के तीन प्रकार बतलाये हैं- (क) प्रभु सम्मित शब्द । राजा की आ्रज्ञा के अनुरूप शब्द, जिनका अक्षरशः पालन न्याय्य होता है। किसी प्रकार चूके नहीं कि तलवार के नीचे गला पड़ा। यह शब्द वेद है। (ख) सुहृत्सम्मित शब्द। मित्र के हितोपदेश के समान शब्द, जिनमें उचित-अनुचित दोनों मार्ग दिखलाये जाते हैं। कोई जोर नहीं, जुल्म नहीं। मानना और न मानना आप के हाथ में-जैसे इतिहास-पुराण। (ग) कान्तासम्मित शब्द। त्रियतमा के कमनीय वचन के समान शब्द, जो रसमय होने से शीघ्र ही हृदय पर प्रभाव डालते हैं। उनका उप- देश इतना प्रभावशाली होता है कि आप उसे मानने के लिये वाध्य
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हो जाते हैं-जैसे रसप्रधान काव्य। इस प्रकार साहित्य में 'नारी' का प्रभाव विशेप रूप से अ्र्प्रभिव्यक्त माना गया है। वह शक्ति की मूर्ति है, प्रेम का अवतार है, अनुराग की वाटिका है, रस का उत्स है, हृदय- कली को विकसित करनेवाले प्रभात वायु का हिलोरा है; मानस में आ्रनन्द लहरी उठाने वाला मन्द-मन्द प्रवाहित पवन है। संस्कृत- साहित्य ने नारी की शक्ति पहिचानी है और उसे उचित रूप से अर्रभिव्यक्त भी किया है।
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वालक की शील-सम्पत्ति
वालक राष्ट्र की सम्पत्ति है। राष्ट्र का विकास, विश्व की जातियों तथा देशों की श्रेणी में उसकी महनीय गएना वालकों के ही ऊपर आश्रित मानी जाती है। आज का बालक वनता है कल का प्रौढ़ युवक, जिसके समर्थ कंधों के ऊपर राष्ट्र का भार रक्खा जाता है। अपने राष्ट्र की संस्कृति का वह होता है-यथार्थ प्रतीक। नाना देशों में वह अ्र्प्रपनी संस्कृति को जलते हुए मशाल की तरह अपने समर्थ हाथों में लेकर फैलाता है। अतएव वालक की शिक्षा-दीक्षा, आचार-व्यवहार के ऊपर प्राचीन काल से ही राष्ट्रनिर्मातात्रों की दृष्टि गड़ी हुई है। वे लोग इस दुर्वल हाड़-मांस के पुतले के भीतर अलौकिक शक्ति, अदम्य उत्साह तथा अरभ्रान्त परिश्रम का एक अक्षय भण्डार देखते हैं और इसीलिये उसे सुगढ़ बनाने की सुन्दर व्यवस्था उन्होने बनायी है।
राष्ट्रीकरण प्राचीन पाश्चात्य देशों में वालक का सर्वतोभावेन 'राष्ट्रीकर' किया गया था। वालक व्यक्तिविशेष का सम्बन्धी न होकर समस्त समाज का, समग्र देश का, सम्पूर्ण राष्ट्र का निजस्व समझा जाता था। ग्रीस देश के 'स्पार्टा' नामक नगर-राष्ट्र में इस भावना का नितान्त उत्कर्ष देखा जाता है। स्पार्टा लोगों की दृष्टि में शारीरिक सम्पत्ति ही विशेष महत्त्व रखती थी। राष्ट्र का नागरिक वही व्यक्ति हो सकता था, जो शरीर के द्वारा पुष्ट तथा शीतोष्ण जैसे द्वन्द्वों की सहिष्ुता से सर्वथा सम्पन्न होता था। अतः स्पार्टन शिक्षा का मुख्य लक्ष्य रहता था-व्यायाम के सेवन से उत्पन्न शोभन बल-संवलित संगठित शरीर।
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और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये उत्पन्न होते ही वालक अपनी माता की प्रेममरी गोदी से छीन लिया जाता था और नगरपिताओं की देख- रेख में वह रकखा जाता था। यदि वह रोग का शिकार या दुवला- पतला जान पड़ता तो वह तुरंत बिना किसी मीन-मेष के, नितान्त निर्द्यतापूर्वक भेड़ियों का भक्ष्य बनने के लिये छोड़ दिया जाता था त्रथवा जीते-जी किसी नदी में फेंक दिया जाता। जो इस परीक्षा में चच रहते थे, वे राष्ट्र की शरर से पाले जाते थे तथा नाना प्रकार के खेल-कूढ तथा व्यायाम उन्हें सिखलाचे जाते थे, जिनसे उनका शरीर कठिनाइयों के थपेड़ों को सहन करने के योग्य वन जाता था। ये सम्पूर्णरूपेण राद्र की सम्पत्ति माने जाते थे। माता-पिता का अ्र्प्रधिकार भी ऐसे वालकों के ऊपर नाममात्र का ही होता था। ऐसी शिक्षा का समुचित फल का भी दीखता था। यूनान के समस्त नगर-राष्ट्रों में स्पार्टा की महनीयता तथा प्रतिष्ठा का रहत्य इस वलिष्ट कल्पना तथा इस विशिष्ट शिक्षण पर ही आश्रित था।
विश्व का नागरिक
चालकों की राष्ट्रीकरण प्रथा का यह चरम उदाहरण यूरोप में भी मान्य न हो सका; भारत की तो कथा ही न्यारी है। भारतवर्ष वालकों के भविष्य सुधारने में, उन्हें राष्ट्र का उत्तम नागरिक वनाने में, जीवन- संत्राम में सफल सैनिक निर्माण करने में संदा से कटिवद्ध रहा है, परंतु वह वालकों का राष्ट्रीकरण नहीं चाहता। वह चाहता है कि चालक अपने देश का उत्तम नागरिक होने के साथ विश्व का भी उप- योग्य तथा उपादेय प्राणी वने। श्रजकल राजनीतिक संसार में एक नव्य भावना का भव्य उदय हो रहा है, जिसका अंग्रेजी नाम है- Ore world idea विश्वेक्य की कल्पना। यह विशाल विश्व नाना देशों तथा नाना जतियों की समष्ठि का एक उज्ज्ल उदाहरण है, जिसमें ये जातियाँ अरपनी योग्यता के अनुसार भिन्न-भिन्न कार्यों का सम्पादन करती हुई अपना विशिष्ट मार्ग अरपनाये रहती है; परंतु
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वालक की शील सम्पत्ति २७६ तान्विक दृष्टि से देखने पर जगत का नानात्व भ्रामक है, एकत्व ही सत्य है। कोंई भी राष्ट्र अ्रन्य राष्ट्र की सहायना तथा सहयोग के बिना कभी पनप नहीं सकता। आधुनिक नवीनतम वैज्ञानिक त्र्प्रविष्कारों ने नवीन रेडर तथा रेडियो यन्त्रों ने इस विशाल संसार को एक क्षुद्र अल्यकाय द्वीप के रूप में परिवर्तित कर दिया है, जिसमें देश काल का व्यवधान अपना कोई मूल्य ही नहीं रखता। देशों तथा जातियों के अन्योन्याश्रित होने के कारस यह संसार परस्पर सम्बद्ध तथा अनुस्यूत राष्ट्रों का एक समष्टिमात्र है। अरप्रतः हमें केवल अपने राष्ट्र के मङ्गल की चिन्ता न कर समस्त संसार के हितचिन्तन की भावना से कार्य करने की आवश्यकता है। पाश्चात्य देश में इस भावना का नवीन होने के नाते विशेष आदर तथा स्वागत किया जा रहा है; परंतु भारत इस सिद्धान्त का उद्धावक ही नहीं, प्रत्युत व्यवहारक्षेत्र में निर्वाहक भी था। इसी सिद्धान्त के आधार पर वालकों को शिक्षा देने की सुन्दर व्यवस्था हमारे प्राचीन आश्रमों में की जाती थी। अन्य देशों में जहाँ शिक्षा शिशु के भूतल पर श्रवतीर्खं होने के अनन्तर आरम्भ होती है, वहाँ भारतवर्ष में शिक्षण के आरम्भ का काल उसे गर्भस्थ होते हो शुरू हो जाता है। हमारे संस्कारों के महत्त्व का रहस्य इस विलक्षण घटना तथा कल्पना के भीतर छिपा हुआ है। वालकों की देख-रेख की व्यवस्था जितने सुचारुरूप से भारत- वर्ष में की गयी थी उतनी अन्य देशों में नितान्त दुर्लभ है। भारतीय संस्कृति तर्प्रध्यात्मिकता के ऊपर आश्रित होते हुए भी भौतिक कल्याए की कभी उपेक्षा नहीं करती। ऐहिक कल्याण-'अभ्युदय' तथा पार- 'लौकिक मङ्गल-'निःश्नेयस' का सम्पादन जिस भारतीय संस्कृति का प्रधान लक्ष्य रहा है, वह मानवों के व्यावहारिक जीवन की उपेक्षा करेगी, यह मानना किसी दुर्बुद्धि का ही कार्य है। आश्रम के वाता- वरख में गुरु इसी संस्कृति के व्यावहारिक रूपों का ज्ञान बालकों को इतने अच्छे ढंग से करा देता था कि वह गृहस्थाश्रम में दीक्षित होने पर राष्ट्र का सच्ा सेवक तथा देश का सच्चा नागरिक होता था।
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'समेयो युवा' के बैदिक आदर्श से कौन विज्ञ पुरुष अपरिचित होगा। वेद युबकों को सदा सभा में बैठने योग्य, शिष्ट तथा सभ्य वनने का उपदेश देता है। वेद हमारे व्यवहार की मधुरिमा का उतना ही पोषक है जितना अध्यात्म की गरिमा का।
धर्महीन शिक्षा
आजकल की वर्महीन शिक्षा हमारे वालकों मे ना बुरा प्रभाव डालती जा रही है कि वह आ्चार से रहित हाकर पशचिमी रँगीली सभ्यता में रँगता चला जा रहा है। नवीन वातावरण की इस कार्य में कम सहायता नहीं। उच्छृंङ्गलता, संचम नियम की सर्वतोमावेन अस्त्रीकृति, गुरुजनों के सदुपदेशों की निर्मम अवहेलना, चरित्ररक्षा की ओोर से घोर उपेक्षा, भौतिक जीवन के प्रति गह्दरी आसक्ति-आधुनिक भारतीय चुचकों के जीवन का कचा चिट्ठा यो यही है। इन टुगुगो से अपने वालकों को मुक्त करना हमारा परम कर्तव्य है! अी रेग विशेप घर किये नहीं है। उचित चिकित्सा करने पर बह भावी राष्ट्र निर्माताओों से शीत्र हढाया भी जा सकता है। अतएव हमारा पवित्र कर्तव्य होना चाहिये वालकों की शिक्षा का समुचित सुवार। यदि हमारे वालकों में हम एक ही गुश के उत्पादन में समर्थ हा जायँ, तो उनके चरित्र को सुधरते देर न लगेगी। इस व्यापक तथा इलाव्य गुस का नाम है- शील। शील की सम्पत्ति ही मानवों को भौतिक तथा आध्यात्मिक उभय दृष्टियों से समृद्धिशाली बनाती हैं। भारतीय संस्कृति का वही प्रास है- शील। वॉद्धों के रक्षत्य में प्रथम रक् है-यही शील। शील के सम्वादन करने पर ही दूसर रननों-समाधि तथा प्रज्ञार का जन्म होता है। 'घोल' का लक्षम शील का न्यापक लक्षस हमें महाभारत (शान्तिपर्व, अध्याय १२४) में उपलब्ध होता है। शील की कसाटी क्या है? शील के रूप
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नालक की शील-सम्पाच्त
जानने का हमारे पास साधन क्या है? इस प्रश्न की सुन्दर मीमांसा करता है महिमामय महाभारत। वदन्येपां हितं न स्यादात्मनः कर्म पौरुपम्। सपन्रपेत वा येन न तत् कुर्यात् कथंचन ।। तचु कर्म तथा कुर्याट् येन दलाव्येत संसदि। शीलं समासेनेतत् ते कथितं कुरुसत्तम ।। (अध्याय १२४ । ६७-६८) 'अपना जो काम तथा जो पुरुषार्थ दूसरे के लिये हितकारक न हो तथा जिसके करने से स्वयं लज्ा का बोध हो, उस कार्य को कभी किसी प्रकार भी न करना चाहिये। वही कर्म, उसी रूप में करना चाहिये जिससे कर्ता पुरुप संसद् में, सभा में, समाज में प्रशंसा का पात्र वनता है। संक्षेप में शील का यही रूप है।' शील का यह भव्य रूप बड़ा ही रदान्त, कमनीय तथा विशाल है। परहित की भावना शील में उतनी ही आवश्यक है जितना निन्दनीय कर्म करने में लजा का बाध। समाज में इलाघा, चित्त में प्रसाद, हृदय में संतोप, मन में शान्ति-शील के व्यापक प्रभाव के सूचक होते हैं। अपने हृदय पर हाथ रखकर देखिये, जिस कार्य के सम्पादन से हृदय में लाज लगती है, दूसरों के सामने अपने को दिखलाने से जी भागता है, समझ रखिये वह शील नहीं है, वह पाप है जो आपको तथा समाज को विपत्ति के गड्ढे में गिरा देगा। विश्ववन्धुत्व के ऊपर आश्रित भारतीय संस्कृति के अनुसार प्राणियों को मन से, वचन से, कर्म से कथमपि द्रोह न करने, प्रत्युत अ्रनुग्रह करने तथा दान देकर उन्हें सहायता पहुँचाने से बढ़कर महत्त्वशाली कार्य कोई हो ही नहीं सकता। इसलिये शील के व्यावहारिक रूप का संकेत इस पद्य में भलीभाँति किया गया है- यदोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा। अनुभरस दानं न शीलमेतत् प्रवत्यते।I (अ० १२४ । ६६ )
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इस शील की उपासना भारतीय वालकों में जिस दिन से आरम्भ होगी, उसी दिन से वह देश जीवन की सची होड़ में निश्चय ही सबसे आागे वढ़ता जायगा। बाद रखिये, यही शील धर्म, सत्य, वृत्त, चल तथा लक्ष्मी का निकेतन होता है। शील के सम्पादक के पास ये पाँचों पद़ार्थ अनाहूत अ्र्प्रतिथि के समान स्वयं उपस्थित होकर उसके कल्याण तथा मङ्गल-साधन में लग जाते हैं। अतः हम वालकों को शील की ओर सर्वदा अप्रसर करें। यह तभी साध्य है जब हम स्वयं ही शील के महत्त्व से परिचित होकर शील की सम्पत्ति कमावें। धर्मः सरत्यं तथा वृतं वळं चेंव तथा रमा। घीलमूला महाग्राज्ञ ! सदा नास्वेत्र संघव: ।।
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भारत में तपोवन
तपोवन भारतीय संस्कृति का एक अरविभाव्य अङ्ग है। भारतीय संस्कृति से यदि तपोन को हटा दिया जाय तो वह एकदम भौतिक, नीरस तथा शुष्क प्रतीत होने लगेगी। प्राचीन भारत में तपोवन का नितान्त प्राचुर्य था। जहाँ मानव प्रकृति के साथ घुल-मिलकर एकरस जीवन विताता था और जहाँ वह भूतल पर रह कर भी दिव्य आनन्द का अनुभव करता था। यज्ञ हमारे धर्म का एक महनीय अनुष्ठान है। इस जगतीतल पर मानव तथा देवता दोनों में एक दृढ़ मैत्री वन्धन का सर्वश्रेष्ठ उपाय यही यज्ञ ही है। यज्ञ के द्वारा मनुष्य अपनी सब से प्यारी वस्तु को देवताओं को समर्पण कर अपने को कृतकृत्य मानता है और देवगए भी यज्ञ के द्वारा आप्यायित होकर मानवों के कल्याण साधन में निरत रहते हैं। इसी प्रकार तपस्या के द्वारा प्राणी अपनी चारित्रिक त्रुटियों को, दोपों को तथा मतिनताओं को दूर भगा कर अपना जीवन समुन्नत बनाता है और उसे अपने देश तथा अपनी जाति के अभ्युत्थान में लगाता है। तपोवन यज्ञ तथा तपस्या का क्रीडास्थल है। उसका भौगोलिक तथा भौतिक रूप जितना पवित्र तथा सुन्दर होता है, उसका आध्यात्मिक रूप भी उतना ही शुचि तथा कमनीय होता है। तपोवन का वायुमण्डल आध्यात्मिकता का उदय करता है। तपोवन का यह चित्र अपने मानस पटल पर शद्कित कीजिये। कलकल निनादिनी कललोलिनी के कूल पर तापसों का निवास है, जहाँ जंगल के पशु अपने स्व्राभाविक वैर-भाव को भुला कर परस्पर प्रीति से एक दूसरे
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के साथ हिल-मिल कर रहते हैं। मृगशावक अपनी माता की गोदी को छोड़ कर ऋपियों की गोदी में चैठ अपना जीवन यापन करते हैं औ्रर जिनके कुश की तेज नोक से छिद जानेवाले मुख की पीड़ा को इंगुदी का तेल लगा कर ऋषि लोग दूर किया करते हैं। आरश्रम में सायं-प्रातः अग्निहोत्र के धूम से वृक्षों के कोमत्त पत्ते धूमिल वनकर विचित्र शोभा धारण करते हैं। कुशासन पर आसीन ब्रह्मचारीगण वेदाध्ययन करते हैं और अपने कोमल कण्ठ से साम का गायन कर आश्रम में अद्भुत माधुर्य तथा सौन्दर्य की सृष्टि करते हैं। ऋपिगस अरपनी पत्नी तथा कन्याओं के साथ गाहस्थ्य जीवन मे रहकर भी वातप्रस्थी के समान जीवन बिताते हैं। परोपकार ही उनके जीवन का एकमान्र व्रत होता है; प्राशिमात्र के कल्याण की वेदी पर उनका जीवन समर्पित होता है। ये लोग अपनी क्षुद्र कामनाओं की सिद्धि के लिये न तो सचेष्ट हैं और न किसी को उपदेश देते हैं। ये सूक्ष्म दृष्टि से प्रासियो की बुटियों तथा दोपों को देखते हैं तथा उनके निराकरण करने के लिये सदा जागरूक रहते हैं। नगर से दूर रहने पर भी वे नगर के पास हैं। क्षुद्र स्वार्थ के सम्पादन के स्थान पर इस विशाल विश्व का सवा मङ्गल अपनी वासी के द्वारा तथा अपने नित्यप्रति सदाचार के द्वारा साधन करना ही उनका महनीय व्रत है-
अर्थ निजः परो वेति गणना लयुच्वेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्। आश्रम संस्कृत के महाकाव्यों में तपोवन के सच्चे रूप का परिचय हमें मिलता है। वाल्मीकि तथा व्यास, कालिदास तथा भत्रभूति, बाण तथा दण्डी ने एक स्वर से तपोवन के स्वर्प का गुसगान किया है। तपोवन का रमणीय चित्र महाकवि कालिदास ने अपने काव्यों तथा नाटकों में सरवत्र प्रदर्शित किया है। शाकुन्तल के आरम्भ में श्र्श्रम की यह छवि कितनी स्निग्ध, कितनी सुन्दर तथा कितनी मधुर हैं-
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नीवारा: शुकगर्भकोटर मुखभ्रष्टास्तरूणामघः प्रस्तिग्धा: क्वचिङ्गुदीफलभिद: सूच्यन्त एवोपलाः। विश्वासोपगमादभिन्नगतयः शब्दं सहन्ते मृगा- स्तोयाधारपथाइच वल्कलशिखानिप्यन्दरेखाड्गिताः॥ 'तपोवन के वृक्षों के खोखलों में तोतों के वच्चे आराम कर रहे हैं। सुग्गों ने नीवार के दानों को अपने बच्चों के मुँह में डाल, रक्खा है, जिससे कुछ दाने वृक्षों के नीचे गिरे हुए हैं। इंगुदी के फलों को तोड़ने के कारण पत्थर चिकने दीखते हैं। सहज विश्वास के उत्पन्न होने से मृग शब्दों को सुनकर भी ज्यों-के-त्यों खड़े रहते हैं, किसी प्रकार हटने का नाम नहीं जानते। सरोवर को जानेवाले मार्ग वल्कल- वस्त्र से चुये हुए जल की रेखाओं से अङ्कित हैं।' ऋषि की पत्नियों का प्रेम मृगों तथा पक्षियों के साथ कितना सहज स्वाभाविक तथा मधुर है- सेकान्ते मुनिकन्याभिस्तत्क्षणोज्झितवृक्षकम्। विश्वासाय विहृद्गानामालवालाम्वुपायिनाम्। आतपात्ययसंक्षिपनीवारासु निषादिभिः मृगवर्तितरोमन्थ मुटजाङ्गणभूमिपु 'मुनि की कन्याओं ने पौधों को स्वयं जल से सँंच दिया है। पेड़ों पर चैठे हुए पक्षी वृक्षों के आलवाल में पानी पीना चाहते हैं। इसीलिये उनके हृदय में विश्वास जमाने के लिये इन मुनि-कन्याओं ने इन पौधों को छोड़ दिया है। ऋपि की कुटियों की शोभा निराली है। ग्रीष्म के बीत जाने पर ऋषियों ने नीवार को काटकर अपने आँगनों में इकट्ठा किया है। इनमें वैठकर मृग जुगाली कर रहे हैं।' ऐसे सुन्दर वाता- वरण में ही सहज स्नेह का उद्य होता है। महाकवि वाणभट्ट ने अपनी कादम्बरी में तपोवन का, जावालि मुनि के आश्रम का, इतना चटकीला वर्णन किया है कि अपनी स्वाभा- विक् पवित्रता से मण्डित तपोवन हमारे नेत्रों के सामने भूलने लगता:
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है। तपोवन के प्रासिमात्र में इतने नैसर्गिक प्रेम तथा सद्भावना का अस्तित्व रहता है कि मानव तथा पशु की विभेदक रेखा भी दीख नहीं पड़ती, तभी तो हम वंदूरों को आश्रम के वुड्ढे-अन्धे तापसों को छड़ी पकड़ कर वाहर ले जाने और अंदर ले जाने का काम करते हुए पाते हैं। इस प्रकार भारतीय कविजनों ने अपने काव्यों में तपोवन के सच्चे स्वरूप को अभिव्यक्त करने का पूर्ण प्रयास किया है। आध्यात्मिक मूल्य तपोवन भारतीय संस्कृति के प्रधान पीठ हैं। त्र्म्राध्यात्मिकता के आरगार, नैतिकता के निकेतन, सात्विकता के शुभसदन भारतीय तपो- चन हमारी आध्यात्मिक संस्कृति के कमनीय क्रीडास्थल हैं। तपोवन के अव्जल में हमारी संस्कृति जनमी और पनर्पी। भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता का पाठ विश्व को जिन ऋपियों ने पढ़ाया, उनका जीवन सपोवन में ही समृद्ध तथा विकसित हुआ था। पाश्चात्य-संस्कृति भोग- की भावना पर आश्रित है, वहाँ हमारी संस्कृति त्याग की भावना पर प्रतिष्ठित है। उपनिषद् डंके की चोट पुकार कर विश्व का अपना संदेश दे रहा है- ईशा वास्यमिट् सर्वे यत् किन्च जगत्वां जगत्। तेन त्यक्तेन भुक्जीथा मा गृधः कत्वस्विद्धनम्।। 'इस जगतीतल पर जंगम तथा स्थावर जितने भी जीव निवास करते हैं, उनमें अनुग्रह तथा निग्रह करने में समर्थ ईश्वर अन्तर्यामी रूप से वास करता है। किसी दूसरे धन की लिप्सा न रक्खो। अपने धन को भी त्याग के साथ भोगो।' भारतवर्ष आध्यात्मिक साम्यवाद का प्रथम उपदेशक है। वह नहीं चाहता कि मानव अपनी उपार्जित सम्पत्ति का उपयोग अपने ही क्षुद्र स्वार्थ के लिये, अपने ही भरणा-पोपण के लिये करे, प्रत्युत वह श्रदार्य तथा साम्य की शिक्षा देकर वतलाता है कि इस विश्व का प्रत्येक व्यक्ति भगवान् की संतान होने से भाई-भाई हैं। अरतः अपनी कमाई में उसका
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भी अंश अवश्यमेव विद्यमान रहता है। श्रीमद्भागवत के कथनानुसार जितने से अपना उदर भर जाय, बस, मनुष्य का उतना ही स्वत्व है, सम्पत्ति के ऊपर उतना ही अधिकार है। उससे अधिक पर अपना अधिकार जमानेवाला व्यक्ति चोर है और वह समाज के हाथों में दण्ड का भाजन है- यावद् भ्रियेत जटरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम्। अधिकं योभिमन्येत सरतेनो दण्डमहति ॥ आध्यात्मिक साम्यवाद के सिद्धान्त की कितनी संक्षिप्त परंतु भव्य घोपणा है इस लघुकाय श्ोक में। अरपर्द्वैत वेदान्त के प्रतिष्टा पीठ पर ही सच्चा साम्यवाद का प्रासाद खड़ा हो सकता है। मनुष्यों के पारस्परिक भ्रातृभाव की ही शिक्षा तपोवन से नहीं मिलती, प्रत्युत प्रासिमान्न के प्रति सहज मैत्री तथा सरल सहानुभूति का उपदेश हमें -इन्हीं से प्राप्त होता है। ऐतिहासिक दष्टान्त यह कम महत्वपूर्ण घटना नहीं है कि रघु का जन्म महाराज दिलीप के आश्रम निवास तथा गो-सेवा का परिखत फल है। रघु के जीवन की उदारता देखकर कौन चकित नहीं हो जाता ? भला, ऐसा आदर्श महीपति भी किसी पाश्चात्य राष्ट्र के सिंहासन पर बैठा है? महर्षि वरतन्तु का शिष्य कौत्स गुरुदक्षिणा के निमित्त धन-संग्रह के लिये रघु के पास पहुँचता है। सर्वस्व दक्षिणा वाले यज्ञ में महाराज रघु ने अपना सर्वस्व लुदा दिया है। केवल मिट्टी का बरतन ही बच रहा है; परंतु महर्षि वांसष्ट के आथर्वष प्रयोगों के फलस्वरूप रघु का भाण्डार असंख्य निधियों से भर जाता है। महाराज रघु अपने खजानों की समस्त सम्पत्ति को उठा ले जाने के लिए आग्रह करता है, परंतु अपनी प्रतिज्ञात गुरुदक्षिणा से अधिक एक कौड़ी भी कौत्स नहीं छूता। अयोध्यापुरी की जनता ऐसे आदर्श दाता तथा ऐसे आदर्श याचक के चरित्र को देखकर आश्र्य से चकित हो जाती है।
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जनस्य साकेतनिवासिनस्तौ द्वावप्यभूताम मिनन्द्यसच्चौ ।
महर्षि कौत्स भारतीय तपोचन का एक छात्र था और महाराज रघु भारतीय आ्रश्रम के प्रभाव से जन्म लेनेवाला एक राजन्य था। आ्राश्रम के पुनीत वातावरण को छोड़कर ऐसी निःस्वार्थ भावना का उदय क्या कहीं अन्यन्न हो सकता है ? गीता के द्वारा उपदिष्ट निष्काम कर्मयोग का सचा साधन क्या आश्रम को छोड़कर अन्यन्न कहीं परिनिष्टित हो सकता है ? नहीं, कहीं नहीं। आज कल इन तपोवनों की घड़ी आवश्यकता है। त्रसंख्य नरों का संहार, अपरिमित धन का स्वाहा- कार, दीन दुःखी अनलाओं का हाहाकार, निर्धनों तथा निर्वलों की उपेक्षा कर धनिकों का अररसंख्य धनका संग्रह-आ्रज की भौतिकवादी सभ्यता के ये ही तो जीते जागते फल हैं। जब तक भारत की इन तपोवनों में पली आध्यात्मिक संस्कृति का प्रचार न होगा, परस्पर भ्रातृभाव का उदय न होगा, तव तक मानवों की इस दानव-प्रवृत्ति का अन्त क्या कभी सम्भव है? आज की नागरिक संस्कृति में सच्चे तपो- वन को तो भली-भॉति लाया जा सकता है। इस प्रकार जीवन को आध्यात्मिक भावना से पूर्ण करने का, परोपकार की वेदी पर क्षुद्र स्व्रार्थों के घलिदान का, परस्पर मैत्री तथा सहानुभूति का सुंदर संदेश हमें भारत के तपोवन आाज भी दे रहे हैं। जिस विश्वकल्याससाधक धर्म का वर्णन महर्षि वेदव्यास ने इस पद्य में किया है उसका प्रचारक तथा उपदेशक हमारा आदरणीय आश्रम ही है- धर्मे मतिर्भवस्तु वः सततोस्थितानां स होक एव परलोकगतस्य बन्घुः । अर्था: स्तियश्च निपुणेरपि सेव्यमाना नेवात्मभावसुपयान्ति न च स्थिरत्वम् ।।
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हमारे उत्सव
(१) विजयादशमी
आज विजयादशमी है आज ही के दिन मर्यादापुरुप रामचन्द्र ने लंकाधिपति रावण के ऊपर विजय प्राप्त किया था। आरज अ्रन्याय के ऊपर न्याय की, अन्धकार के ऊपर आलोक की, अत्याचार के ऊपर शान्ति की तथा हिंसा के ऊपर अहिंसा की दुन्दमि बजी थी। इसलिये आ्रज्ञ का दिन मानवता के इतिहास में एक अ्रविस्मरणीय तिथि है। इसी संघर्ष को केन्द्र मानकर लिखित काव्य रामायण के नाम से अभिहित्र किया जाता है। तीन विशिष्ट अ्रन्थों में यह दिव्य चरित्र तोन दृष्टियों से वर्खित है। वाल्मीकीय रामायण कर्म-प्रधान है, अ्र्ध्यात्म रामायण ज्ञान-प्रधान है। गोसाई' तुलसीदास की रामचरित मानस भक्ति-प्रधान है। कथानक में विभिन्नता नहीं है, परन्तु दृष्टि की विभि- न्नता के कारण चरित्र चित्रण में निश्चय रूप से वैशिष्टच है। हम वालमीकि रामायण और अध्यात्म रामायण से रामचरित्र के वैशिष्ट्य प्रदर्शक कुछ अंशों को मूल संस्कृत की हिन्दी व्याख्या के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं। वाल्मीकि की दृष्टि में मानव जीवन में सबसे श्रेष्ठ पदार्थ है चरित्र और इसी चरित्र से युक्त व्यक्ति की खोज करने पर नारद जी ने वाल्मीकि को इक्ष्वाकुवंशीय रामचन्द्र को सबसे श्रेष्ठ आ्रदर्श मानव बतलाया। वाम्बह्म को साक्षात् करने वाले अनुष्टप् छन्द के प्रथम अवतार के कारभूत आदिकवि वाल्मीकि की परित प्रज्ञा का फल है यह वाल्मीकि रामायए। मानव समाज, मानव व्यवहार तथा मानव
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सद्गुों की पराकाष्ठा का पूर्र निर्वाह हम राम के जीवन में पाते हैं। राम शारीरिक सुपुमा तथा मानसिक सौन्दर्य-दोनों के जीते जागते प्रतीक थे। राम के सौन्दर्य के वर्णन में वाल्मीकि कह रहे हैं :- न हि तस्मान्मनः कश्चित् चक्षुपी वा नरोचमात्। राधवे।। यश्च रामं न पश्येधु यं च रामो न पश्यति। निन्दितः स भवेत् लोके स्वात्माप्येनं विगहते॥ रामा० अयोध्या १७।१२, १४ रामचन्द्र की अलौकिक सुपुमा का अनुमान इसी घटना से लगाया • जा सकता है कि राम के अत्यन्त दूर चले जाने पर कोई भी मनुष्य न तो अपने मन को उनसे खींच सकता था और न अपने दोनों नेत्रों को। जो राम को नहीं देखता और जिसे राम नहीं देखते-ये दोनों संसार में निन्दा के पात्र वनते हैं। इतना ही नहीं उनका अपना आ्रत्मा भी उन्हें निन्दा करता है। उनका आ्ररात्मा अपने को ही काटता है कि हाय ! हम ऐसे अभागे निकले कि उस राघवेन्दु को अपने नेत्रों से देखकर न तो अपने को धन्य वनाया, न अपने जीवन को सफल बनाया। सचमुच 'रामदर्शन' के बिना जीवन निष्फल है। सफलता की कुंजी 'रामदर्शन' में ही सन्निहित है! रामचन्द्र के दिव्य गुणों की यह काँकी कितनी मधुर तथा सुन्दर है :- स च नित्यं प्रश्यान्तात्मा मृदुपूर्व प्रभापसे। उच्यमानोऽपि परुपं नोचरं प्रतिपद्यते।। कर्थंचिदुपकारेण कृतेन केन तुष्नति। न स्मरत्यपकाराणां शतमप्यात्मवचतया।। बुद्धिमान् मधुराभापी पूर्वभाषी प्रियंबदः। वीर्यवान् न च वीर्येण महत्ा स्वेन विस्मितः ॥
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न चानृतकथो विद्वान् वृद्धानां प्रतिपूजकः । अनुरक्तः प्रजाभिश्च प्रजाश्चाप्युरजते॥ (२।११०-१४ ) रामचन्द्र सदा शान्त-चित्त रहते थे। वे वड़ी कोमलता तथा मृदुता के साथ बोलते थे। उनसे कोई कितना भी रूखा क्यों नहीं वोले, वे कभी भी कड़ा और रूखा उत्तर नहीं देते थे। किसी प्रकार किये गए एक भी उपकार से वह तुष्ट हो जाते थे, परन्तु सैकड़ों भी अपकारों को कभी स्मरण नहीं करते थे। किसी भेंट होने पर भी वही पहिले चोलते थे और सदा मीठा वोलते थे। अत्यन्त वीर्यशाली थे, परन्तु इसके कारण उन्हें गर्व छूकर भी नहीं था। वे कभी भूठी वातें नहीं कहते थे। 'रामोद्विर्नाभिभाषते' = राम किसी वस्तु दो बार नहीं कहते थे, एक बार जो कह दिया सो कह दिया-वह अमिट हो गया। और उसका पालन उनके जीवन का व्रत वन जाता था। प्रजाओं के साथ उनका सम्बन्ध बड़ा मीठा था। आसक्ति उभयमार्गी थी। राम का अनुराग प्रजाओं के लिये वैसा ही था जैसा उनका राम के लिये था। इन गुणों का अनुशीलन किसी भी व्यक्ति को मानवता के ऊँचे पद पर पहुँचाने तथा प्रतिष्ठित करने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है। व्यक्ति के लिये मृदुभाषी होना, सत्य वचन होना तो आवश्यक है हो, परन्तु राम में वाल्मीकि ने एक विलक्षण गुएा की सत्ता वतलाई है। वह है उपकार की स्मृति तथा अपकार की विस्मृति। हम लोग इतने कंजूस हैं, व्यवहार में इतने कृपण हैं कि अपने उपकारी के प्रति कभी भी प्रम-भावना नहीं रखना चाहते। परन्तु रामचन्द्र के इस उदार हृदय, विशाल चित्त तथा महनीय आशय का पूर्ए परिचय उसी एक वाक्य से चलता है जिसे उन्होंने सीता की सुवि लानेवाले, अलौकिक उपकार करनेवाले हनुमान जी से कहा था। जनकनन्दिनी का संदेश सुनकर विह्वलचित्त होकर राम ने यह वचन कहा था- 1
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मथ्येव जीर्णतां यातु यत् त्वयोपकृतं हरे। नरः प्रत्युपकारार्थी विपत्तिमभिकाङक्षति ॥ हे कपिकुल नन्दन, आपने जो मेरे साथ उपकार किया है वह मेरे में ही जीर्ण हो जाय, गलकर पच जाय, वाहर अभिव्यक्ति का कोई स्रवसर ही न आावे। क्ोंकि प्रत्युपकार करनेवाला व्यक्ति अपने उपकारी के लिये विप्ति की कामना करता है जिससे उसे अपने प्रत्युपकार के लिए उचित अवसर मिले।कितनी उदात्त है वाल्मीकि की वह सूक्ति और कितना उदार है राम का हृदय। वह कभी सोचते भी नहीं हनुमान के ऊपर विपत्ति आवे जिससे इनके साथ प्रत्युपकार करने का कभी अरवसर आरावें। मित्र धर्म का पूर्ण निर्वाह राम के जीवन में हमें उपलब्ध होता है। एक वार जिसे उन्होंने अपना मित्र वना लिया, उसके लिये सर्वत्व का त्याग भी न्याय होता है। राम के वचन हैं :- आढ़घोऽपि वापि दरिद्रो वा दुःखितः सुखतोऽपि वा। निर्टोपो वा सदोपो वा वयस्यः परमा गतिः ॥ जनत्याग: मुख्त्यागो देहत्यागोऽि वा पुनः॥ वयस्थाथें प्रवर्तन्ते स्नेहं दष्ट्रा तथावितम्। किष्किन्वा 5/९-१0 इसी मित्रता के निर्वाह के लिये राम के चरित्र में एक दोपाभास भी दीखता है जिसे राम चरित के आलोचकों ने बड़ा ही तूल दिया है। इसका सम्बन्ध है वालिबव से। वाल्मीकि के अनुसार राम ने सुगीव से प्रतिज्ञा की कि मैं आत ही वालि को मारूँगा और सो भी एक ही घाण से। समोघा: सूर्य-संकाशा ममैवेते निधिताः घराः। तत्मिन् वालिनि दुर्षृस्ते निपतिप्वति वेगिताः।। तमच्य वालिनं पदय शरेविनिहतं भूमी चिकीणमिव पर्वतम् । किष्किन्वा० ५।२०-२१
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हमारे उत्सव २६३ यहाँ पर राम ने आज ही वाली को मार डालने की प्रतिज्ञा की और अभी आगे चलकर वे वाणों के विषय में बहुवचन छोड़कर एक चचन पर आ जाते हैं। फलतः एक ही वाए से आज ही वाली का संहार करना राम को अभीष्ट था, कुछ उसके साथ लड़ना नहीं था। वाली का पराक्रम रावण की अपेक्षा कहीं अधिक घोर तथा महान् था। जिस रावण के मारने में राम को अनेकों दिन व्यवसाय करना पड़ा, उससे भी अधिक चलशाली वाली का निधन क्या एक दिन में लड़ाई के द्वारा किया जा सकता था? कभी नहीं। इसीलिये राम को वह युक्ति करनी पड़ी जिसके लिये उनका नाम वदनाम किया जाता है। वस्तुतः मित्रत्व की वेदी पर राम के सर्वस्व त्याग का यह शंख निनाद है। अध्यात्म रामायण (किष० अध्याय २) की स्पष्ट उक्ति है- किन्तु लोका वदिष्यन्ति मामेवं रघुनन्दनः । कृतवान् किं क्रीन्द्राय सत्यं कृत्वाग्नि साक्षिकम् ॥ इति लोकापवादो मे भविष्यति न संशयः। तस्मादाह्वय भद्रं ते गल्वा युद्धाय वालिनम् ॥। न्ाणेनैवेन तं हत्वा राज्ये त्वामभिषेचये॥ इस प्रकार दोनों रामायणों का अनुशीलन हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचाता है कि घालीवध की घटना रामचरित्र की एक महनीय घटना है। सच्ची मैत्री का इससे बढ़कर सुन्दर निदर्शन अन्यत् कहाँ मिल सकता है? रामचन्द्र की दृष्टि में शौर्य का आरदर्श-विधान वाल्मीकि ने प्रस्तुत किया है वह वस्तुतः संसार में एक श्लाघनीय वस्तु है। बड़ी खोज तथा घनी प्रतीक्षा के अनन्तर रावण राम के दृष्टिपथ में आया। आते ही राम ने उसकी भर्त्सना करना आरम्भ किया- मम भार्या जनस्थानादज्ञानाद् राक्षसाधम । हता ते विवशा यस्मात् तस्मात् त्वं नासि वीर्यवान्।
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मया चिरहितां दीनां वर्तमानां महावने। वे देहीं प्रसरभं हृत्वा शूरोSहमिति मन्दले ॥ स्त्रीपु झूर विनाथातु परदाराभिमर्शक 1 कृत्वा कापुरुपं क्म शूरोऽदमिति मन्यसे॥ भिन्नमर्वाद निर्लज चारिवरेष्वनवास्थितः दर्पान्मृत्युमुपादाय झूरोऽहमिति मन्यसे॥ (चुद्ध १०५।११-१४) शूरता की यही सची कसौटी है-तियों का आदर, मर्वादा का पालन, निर्लन्ज कार्य कलापों से उपराम तथा शुभ चरित्र का व्यवस्थित रूप से पालन। रावण में इन सबका एकदम अभाव था। इसीलिये तो वह अन्याय तथा अवर्म का प्रतीक माना जाता है। पराक्रमी शत्रु से चित्र विचित्र युद्ध के परिसाम रूप ही राम ने रावण पर विजय पाचा। रावस कोई साधारण शत्रु न था। कैलास को उसाड़ने- वाला, ब्रह्मा को परास्त करनेवाला तथा देवताओं से भी अपनी सेवा कराने वाला रावसा कोई सामान्य मानव न था। जगत् को अपने घोर कार्यों से रुलाने के कारण ही तो वह 'रावणा' कहलाता था। ऐसे शत्रु को मारकर राम ने उसके साथ जो सद्व्यवहार किया वह शूर जगत् की एक आलो कसा मान्य घटना है। रवण की मृत्यु पर शोक करते हुए विभीपस ने ठीक ही कहा- गतः सेनुः सुनीतानां गतो धर्मत्य विग्रह्ः। गतः सत्त्वत्य संक्षेतः प्रत्तावानां गतिगंता ॥ आित्यः पतितौ भूमी मग्रत्तमनि चन्द्रमाः । चित्रमानु: प्रशान्ताचिव्यंवसायो निब्चमः । अत्मिन् निरतिते भूमी वीरे वन्तनृतां बरे।। युद्ध १२२।५-८ रावस का यह नितान्त चथार्थ चरित्र चित्रण है। रावण की मृत्यु भूमि पर गिरने वाले शरदित्य, अन्धकार में घँसे हुए चन्द्रमा,
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हमारे उत्सव रहयू
शान्त ज्वाला वाले अ्र्न्नि तथा उद्यमहीन उत्साह के समान है। राम ने रावण की उचित प्रशंसा की तथा उसमें वर्तमान गुणों के महत्त्व को समझाया। और अन्त में अपने विशाल हृदय की भव्य भावना को बड़े सुन्दर शब्दों में प्रकट किया है- नरणान्तानि वैराणि निवृवं नः प्रयोजनन्। क्रियतामत्य तंस्कारो ममाप्येप यथा तब । नरस ही वैर की समाप्ति है। रावण के मर जाने पर हमारा प्रयोजन सन्पन्न हो गया। अ इसका उचित दाह-संस्कार करो। जैसे यह तुन्हारा है, वैसे ही यह मेरा भी है। शत्रु के प्रति इतनी उद्ार भावना रखना तथा तद्नुसार व्यवहार करना युद्ध के इतिहास में अश्रुतपूर्व घटना है। विजया दशमी ऐसे ही आरदुर्श गुरा-गए-सम्पन्न मर्यादा-पुरुषोत्तम नहाराज रामचन्द्र जी के विजय का दिन है। शान्त चित्त से हम झाज के शुभ सन्देश पर विचार करें और अपने जीवन को 'रामचरित्र' का त्रनुशीलन करते हुए धन्य बनावें। यही मेरी मंगल कामता है।
(२) दीपावली
हमारी मातृभूमि के इतिहास में त्रज का दिन सबसे बड़े तौभाग्च का दिन है। आ्राज हम स्वतन्त्रता के द्वार पर ही नहीं खड़े हैं वल्कि स्वतंत्रता के मन्दिर में प्रवेश कर चुके हैं। आ्राज हम त्वतंत्र हैं। दवाव डालने वाला विदेशी जुआ हमारे कंधों से हट गवा है। हमारी रड़ आ्रज सीधी हो गई है। इस स्थिति में हमारा यह दीपावली का त्यौहार, सौंदर्य और सन्पत्ति की देवी लक्ष्मी का पूजा-उत्सव एक विशेष राष्ट्रीय पर्व का महत्व रखता है। शतियों से हम इसे त्रस्त और पीड़ित रूप में मानते चले आ रहे हैं किन्तु क्राज प्रथम बार हम इसे त्वतंत्र वातावरण नें मनाने जा रहे हैं। *
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हिन्दू संस्कृति का आधार दुर्भाग्य से हम लोग विदेशी आलोचकों की अपरिचयात्मक और आधारहीन आलोचनाओं के कारण अपने दर्शन और अपनी संस्कृति से त्रप्रब तक अ्रनभिज्ञ से रहें हैं। उन्होंने हम लोगों को अ्र्प्रज्षात भविष्य की ओर अरधिक उन्सुख और वर्तमान से विमुस्् स्वप्नदर्शी मात्र बताया है; किन्तु यह हमारे घहुमुखी संस्कृति की एक आरंशिक व्याख्या मात्र है। अगर हम स्वप्नदर्शी भी हैं तो हमारे स्वप्न स्वस्थ, सुन्दर और महान हैं; हमारे विचार उच्च और उत्थान करने वाले हैं। यह भी स्पष्ट कर देना उचित है कि हम केवल स्वप्नदर्शी ही नहीं, चरन् कलात्मक सृष्टि के सष्टा भी हैं। ये विदेशी आलोचक, जो हिंदू संस्कृति, दर्शन, कला एवं विज्ञान से पूर्तया अपरिचित हैं हमारी संस्कृति तथा हमारे वैदिक धर्म की आधारभूत मौलिकता और उसके सिद्धान्त की व्यापकता के समने में सर्वथा असमर्थ हैं-जैसा महान् दार्शनिक कराद ने कहा है कि धर्म भौतिक सुख-सावन और आ्रध्यात्मिक उन्नति दोनों को सिद्ध करने वाला है :- यतोऽम्युदय -निःश्रेयस - सिद्धि: सं धर्मः (वैशेपिक सूत्र १. ३.२) हिन्दू संस्कृति समस्त मानवता के लिए भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति के समन्वयात्मक तत्वों से निमिंत हुई है। न वह अपने दृष्टिकोण में संकीर्ण, संकुचित है और न अपने भौतिक लाभ में आत्मलीन। एक प्राचीन लोकोक्ति है :- वर्मार्थकामा: सममेव सेव्याः यो ह्यक सकः स नरो जवन्यः।
धर्म, धन और कामना का सुसंयमित संचय मनुष्य को करना चाहिए। वास्तव में वह व्यक्ति नराघम है, जो जीवन के इन आवश्य क उपादनों में से किसी एक विशेष पर विशेष आसक्ति दिखलाता है।
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हिन्दू धर्म, धन और कामना तथा गुए और करुणा को समन्वित करता चलता है। धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोडस्मि भरतर्षभ (गीता ६.२) काम और अरथ दोनों उच्च जीवन की प्रेरक शक्तियाँ हैं, इसे सदा स्मरस रखना होगा; किन्तु उनकी प्राप्ति का साधन पवित्र और धर्म सम्मत होना अनिवार्य है। हिन्दू धर्म और संस्कृति की आधारभूत विशेषता के प्रदर्शन में दीपावली का प्रमुख स्थान है। यह वैदिक धर्म के उस परम मार्ग का स्पष्टीकरण करती है, जो मनुष्य को आरध्यात्मिकता का उन्नयन करता हुआ भी उसकी भौतिक उन्नति की उपेक्षा भी नहीं करता। यह अनेक प्रमाणों से प्रमाित है कि वैदिक ऋषि कवि वर्ड सवर्थ के स्काईलार्क की तरह होता है जो अपनी बुद्धिमानी से खूब ऊँची उड़ान तो भरता है, आकाश को छान डालता है किन्तु कभी भटकता नहीं क्योंकि वह आकाश और अपने नीड़ दोनों से भली भाँति परिचित है। हिन्दी में एक कहावत है-'कितनौ चिड़िया उड़े आकाश, दाना है धरती के पास।' त्योहार दीपावली का अर्थ होता है-दीपों की पंक्ति। लक्ष्मी पूजा के लिए अ्रज्ज्वलित की गयी दीप-पंक्तियों को ही लेकर इसका नाम दीपावली पड़ा है। यह पूजा कार्तिक माह की अमावस्या की रात में की जाती है। इसी को हिन्दूमात्र अपने त्योहार के रूप में ग्रहण करता है। यह समय ऐसा है जब वर्षा ऋतु समाप्त होती है और शरद ऋतु का प्रारंभ होता है। शरद् ऋतु को शान्ति और आरनन्द का दूत माना गया है। वस्तुतः जनता और साहित्यकार दोनों ही इस समय प्रसन्न-चित्त होकर एक दूसरे को अभिनन्दित करते हैं, आनन्द मनाते हैं और बहुत से 'जलसे करते हैं। दीपावली का, त्योहार आनन्दोत्सवों मे प्रमुख है क्योंकि इसे रोग का नाशक तथा आनन्द का वर्धक माना जाता है। इस त्योझर
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को राजा-रंक सभी समान उत्साह के साथ मनाते हैं। यदि राजभवन इस दिन दीपों के प्रकाश से जगमगा उठता है तो गरीब श्रमिक की क्ुटिया भी उद्भासित हो उठती है। इस अ्रवसर का विशेष महत्व लक्ष्मी पूजा को ले कर माना जाता है जो सौन्दर्य, स्निगधता, मृदुलता वैभव और सौभाग्य की देवी मानी जाती है। पुराखों के अनुसार लक्ष्मी दरिद्र देवी की छोटी वहन है। दरिद्रा दरिद्रता और दुर्भाग्य की प्रतीक है। दीपावली की लक्ष्मी पूजा से यह आशय लिया जाता है कि उस दिन अपने अपने घरों से दरिद्रा को निकाल कर लोग लक्ष्मी को स्थापित करते हैं। लक्ष्मी के ही स्वागत के लिए मकानोंकी सफाई-पुताई की जाती है और घरों में लक्ष्मी की विभिन्न- वर्णी मूर्तियों की स्थापना की जाती है। लक्ष्मी अष्टदल कमल के घीच विराजी रहती हैं और कमल के आाठ दल इन्द्र, ब्रह्मा, कुमार तथा घाराह आद्ि देवों की शक्तियों के प्रतीक माने जाते हैं। लक्ष्मी का ध्यान इस प्रकार से नियोजित है :-
पद्मासनां पद्हर्तां पद्मां पच्मद्लैयुंताम्। दिग्गजैः सेव्यमानां व काञ्चनैः फलशोचमैः॥ अमृतः सिंच्यमानां च श्वेतच्छत्र विराजिताम्। महालक्ष्मीं विनिन्तये॥
लक्ष्मी कमल में बैठी हैं, उसके हाथ में कमल है, कमल के दलों से वह घिरी है। बड़े घड़े हाथी जो दिशाओं के मालिक हैं स्वर्सं कलशों से उसे अभिसिंचित कर रहे हैं। एक सफेद छन् उसके सिर पर छाथा कर रहा है। उसका सारा शरीर गहनों की दमक से दमक रहा है। देवी की पूजा बहुत बड़े श्रडम्बर के साथ की जाती है, क्योंकि प्रत्येक पुजारी अपने मन की इच्छा पूरी करने को उत्सुक रहता है। ज़ब पूजा समाप्र होती है तब् सब नर-नारी मिलकर देवी को स्तुति करते हैं और उसकी स्वाभाविक कृपा का प्रसाद चाहते हैं :-
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सरसिज-निलये सरोज-हस्ते धवलतारांकुश - गन्धमाल्यशोभे। भगवति हरिवल्लमे मनोज्ञे, त्रिभुवनभूतिकरि ! प्रसीद मह्यम्।
यह पूजा प्रायः श्री-सूक्त के मन्त्रों से की जाती है, जो १५ मन्त्रों का एक वैदिक सूक्त है जिसमें देवी की महत्ता का वर्गन और उपासकों की दयायाचना है। दीपावली की रात्रि को महारात्रि कहा जाता है। इस रात्रि को तांत्रिक लोग अपने तन्त्रों को जगाते हैं, जो बहुत ही प्रभावपूर्ण सिद्ध होते हैं। इसके लिए रातमर जगने का विधान है। लक्ष्मी, जो बहुत कम भाग्यवानों के घरों में प्रवेश करती है इस दिन प्रत्येक हिन्दू घर में अवश्य आती हैं! इसलिए प्रत्येक घर का मालिक देवी के स्वागत के लिए सब सामान ठीक किए हुए तैयार बैठा रहता है। वस्तुतः इसी कारण हमारे धर्मशास्त्रों में जुआ खेलने का इस दिन घराबर वर्शन मिलता है। केवल इसी रात को जुआ खेलना हमारे शास्त्रों में वैध माना गया है, इसे समरण रखना आवश्यक है। लक्ष्मी- पूजा के लिए रात्रि जागरण परमावश्यक है इसीलिए आरश्विन माह की पूर्षिमा कोजागरी पूर्णिमा कहते हैं। अर्द्ध रात्रि को लक्ष्मी प्रत्येक घर में जा कर पूछती है-कौन जाग रहा है? को जागर्ति ? सनत्कुमार संहिता में कहा गया है कि मगध के एक गरीब ब्राह्मस को, जो रात भर जग कर जुआ खेलता रहा लक्ष्मी ने अपने वरदान से अतुलित सम्पत्ति का अधिकारी बनाया था।
लक्ष्मी का प्रतीक हमारा हिदू धर्म संसार के धार्मिक इतिहास में सबसे अधिक वैज्ञा- निक और दार्शनिक रहा है। इसकी एक विशेषता जो अपेक्षाकृत लोगों को कम मालूम है वैज्ञानिक प्रतीकात्मकता रही है। मूर्तिकला के विकास:
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३०० काव्यानुशालन में प्रतीकों का बहुत भारी महत्व है। अस्पष्ट रहस्यात्मक दार्शनिक सँकेतों और देवी-देवताओं को ग्रतीकों के द्वारा ऐसा स्वरूप दिया गया है, जो जन साधारस के लिए भी सहज ही बोधगम्य हो गया है। इस कार्य के लिए हमारे पूर्वजों को प्रतीकों को एक ऐसी यथार्थता देनी पढ़ी है कि वह विज्ञान की श्रेगी में या जाते हैं। ऊपर दिया गया लक्ष्मी का प्रतीक उसके स्वभाव और गुणों को व्यक्त करने में समर्थ है। इससे स्पष्ट पता चलता है कि आर्यावर्त का ऋषि लक्ष्मी को किस भाव से देखता और पूजता था। लक्ष्मी हिन्दू कला में कमल में बैठती है और कमल सुन्दरता एवं स्निग्वता का प्रतीक माना गया है। सौंदर्य सम्पत्ति की, शाक्त की देवी का सिंहासन है और कुरूपता दारिद्र की देवी का। लक्ष्मी का पूरा शंगार, वन्न तथा आभूमण सफेद है। गले में सफेद मोतियों की माला है, उसका सफेद मुख शरदू चन्द्रिका से समानता रसता है। उसके सजे हुए सिर के ऊपर सफेद छत्र उसकी पवित्रता और देवी शक्ति का दयोतक है, क्योंकि इतेत सत्गुए का ग्रतीक है। नारायए, संसार के पालक हैं। उनकी पत्नी के रूप में लक्ष्मी भी त्रझ्मा की सृष्टि की संरक्षिका मानी जाती हैं। त्रझ्मा का वर्स लाल उसके सृजन का प्रतीक है और जल से भरे घड़े उपनाऊपन और परिपूर्रता के प्रतीक हैं। लक्ष्मी का वाहन उलूक संसार की विभिन्न विचारावाली का प्रतीक है, क्योंकि एलूक के साथ भिन्न भिन्न देशों तथा मनुष्यों में भिन्न मिन्न सतों का प्रचलन है। ग्रीस में उलूक दार्शनिक भाव का प्रत्तक माना जाता था, फारस में ऊजढ़पन और खंडहर का प्रतीक माना जाता था, भारत में वह परिष्कार और आत्म-संयम का प्रतीक है। उलूक, दिन के प्रकाश के प्रति अ्ररंथा कहा जाता है। वंस्तुतः वह इसर भाव का प्रति- निवित्व करता है कि कामिनी-कांचन, शक्ति और संपत्ति तथा भोग- विलास करने वाले लोग जब राव में स्वार्थरत विलास में मग्न रहते हैं तत् वह जागता हुआ आत्म-संयम का परिचय देना है। गीता में भी कहा गया है :-
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या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने।। (गीता अध्याय २) इसका आशय बहुत अगाध है, क्योंकि इसमें दार्शनिकता का सारगर्भित संयोजन है। लक्ष्मी उन्हीं का साथ देती है जो अपनी वासनाओं का दमन करना जानते हैं और संसारी प्रलोभनों से बचते रहते हैं। लक्ष्मी उन्हीं के पास रहती है जो अपनी नैतिकता के प्रति सतत जागरूक रह कर अपने को दुर्भाग्य के अभिशाप से बचाते रहते हैं। जुआर खेलना हमारे चहाँ की एक परम्परा रहा है। यह वैदिक युग में भी प्रचलित था। यद्यपि इसे लोग सदा ही दुष्कर्म के रूप में मानते रहे हैं तथापि इसका सवथा अपाव कभी नहीं था। ऋग्वेद में जुआरी पश्चाताप करता है। (ऋग्वेद ३४) जिससे द्यृत-विषयक निन्दा का भाव स्पष्ट हो जाता है। जुआरी अपना सर्वस्व हार कर अपनी निरीहता में उपदेश करता है :- अक्षैमा दीव्य: कृषिमित् कृषत्व विचे रमस्त्र बहु मन्यमानः । अर्थात् जुआ कभी मत खेलों। खेती में ही अपना ध्यान दो। सम्पत्ति के विषय में उच्च विचार रखो और धन के विषय में विचारपूर्वक कार्य करो।. हमारे धर्मशास्त्रों के प्रयोता लोग जुए की वुराइयों से पूर्णा परिचित थे। इसलिए उन्होंने उसे कभी सामाजिक स्वीकृति नहीं दी, किन्तु आाज़ का मनुष्य सोचता है कि जुश्रा खेलना भी दीवाली की विशेषतां का एक अ्रनिवार्य त्रंग है। जुए से हमें धन की त्रस्थिरता का ज्ञान होता है। हम सब को जुआरियों की कहानियाँ मालूम हैं जिन्होंने जुए में अपना सर्वस्व हार कर एक ही रात में अपने को महान दरिद्र बना लिया है। इससे धन की चंचल गति का रहस्य स्पष्ट होता है। यही कारस है कि हिन्दू संस्कृति में अत्यधिक धन रत होकर दूसरे कामों की उपेक्षा करने की घोर निन्दा की गई है। इसमें संदेह नहीं
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३०२ काव्यानुशीलन
कि जीवन में अरथ का बहुत भारी महत्व है, पर उसे मनुष्य की त्र्रकां- क्षाओं का एकमात्र आधार वनाना भी उचित नहीं है। अर्थ में अस्थिरता प्रकृति का नियम है जो वराबर अपना काम करता रहता है। अगर मनुष्य इस नियम को समझवूझ कर अर्थ का उपयोग करे तो उसकी उन्नति निश्चित है, अन्यथा नहीं। अगर धन का उचित व्यय न हुआ तो उसका विनाश अवश्यम्भावी है। अनुदारता किसी को क्षमा नहीं करती और अनुदार व्यक्ति शीघ्र ही दरिद्रता और आपदाओं का अरधिकारी बनता है।
महत्व भारतीय जनता के लिए दीपावली का विशेष महत्व जो आरज कल स्वाभाविक रीति से और अधिक बढ़ गया है क्योंकि भारत अ्रव स्वतंत्र हो गया है। स्वतंत्रता का भी अपना एक अलग उत्तरदायित्व है। स्वतंत्रता का अर्थ है संव के प्रति समान उदारता। वासी की उदारता, व्यवहार की उदारता और अर्थ-विभाजन की उदारता। लक्ष्मी, नारायण की पक्नी होने के कारण हमारे लिए मातावत् है। यदि हम उसका उचित सम्मान करेंगे तो वह हमारे कल्याण का कारण होगी किन्तु उसे यदि हम अपनी पत्नी की भांति हेय दृष्टि से देखेंगे तो वह निश्चय ही हमारे सत्यानाश का साधन वनेगी। हमें इस वेद वाणी को जो उपनिपद् में स्पष्ट की गई है कभी न भूलना चाहिए। विरक्ति के साथ घन का उपयोग करना चाहिए। किसी व्यक्तिगत धन के प्राप्त करने की चेष्टा नहीं होनी चाहिए। हमारी संस्कृति का मूलाधार त्याग है, न कि भोग, यह सदा त्मरण रखना चाहिए। चास्तव में धन का विरक्तिमय उपयोग शाश्वत सुख का और त्रासक्ति- मय उपयोग सनातन दुःख का कारणा होता है। संक्षेप में दीपावली का यही महत्त्व और यही आदर्श है। सुख और सम्पत्ति की देने वाली, स्व्रास्थ्य और आशा को परिवर्धन करने वाली ऐ दोपमालिके, श्राज्ञ हम स्वतंत्र आर्यावर्त के स्वतंत्र मानव तेरा अभिनन्दन करते हैं।
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हमारे उत्सव ३०३ ओ! रोग-शोक का शमन करने वाली दुख-दारिद्र का दमन करने वाली तुम्हारे नाम की प्रतिष्ठा बढ़े तुन्हारी कीर्ति-लता बढ़े और तुम अमर हो!
(३) दिवाली की आरप्रात्मकथा
मेरा शुभ नाम दिवाली है। आप लोग मेरे नाम और धाम, काम और कीर्ति, प्रभाव तथा महत्त्व जानने के लिये आज उत्सुक बैठे हुए हैं। अतः मैं अपने ही मुँह अपनी मनोरंजक कहानी सुनाने के लिये तैयार हूँ। मेरा जन्म बड़े ही सुन्दर ऋतु के बड़े ही सुन्दर मास में बड़ी ही सुन्दर तिथि को होता है। संतत वृष्टि से पीडित जनता को आनन्दित करनेवाली शरदू की धीमी-धीमी सीरी हवा भूतल के ऊपर मेरे प्रथम अवतार का स्वागत करने के लिये बहने लगती है। नीला त्रकाशमण्डल श्वेतकाय वलाहक-शावकों की मनारम अठ- खेलियों से नितान्त रमसीय हो उठता है। धुले हुए हरित तरुओं की अ्रपरवली मेरे जन्म के समय मेरे प्रभाव में आकर खड़ी रहती है। मेरे जन्म की ऋतु है सुहावनी शरद् जो दिग्विजयी महीपालों को भी उतनी ही प्यारी लगती है जितनी प्रजामण्डली को। इसी ऋतु में प्राचीन काल में भारतीय सार्वभौम नरेश शत्रुओं के ऊपर विजय की लालसा से दिग्विजय के लिये चतुरंगिणी सेना से सुसज्जित होकर अपनी राजधानी से वाहर निकलते थे। मेरे जन्म का महीना है वही कार्तिक, जिसकी पवित्रता की कथा भारतीय धर्मग्रन्थों में शतमुख से गायी गयी है और जिसमें धार्मिक जनता श्रीराधाकृष्ण की पूजा नाना उपचारों से सम्पन्न कर अपने को कृतकृत्य मानती है। मेरे उदय की तिथि है वह अमावास्या, जो दो राज्यों के परत्पर संघर्ष से उत्पन्न होनेवाले काले अन्धकार का तथा विषम क्लेश का
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उपहार प्रस्तुत कर जनता को एक ही लोकप्रिय राज्य का आश्रय लेने के लिए संतत शिक्षा देती है- दुसह दुराज प्रजानको, क्यों न बढ़ै दुखदन्द। अधिक अँधेरो जग करत, मिलि मावस रविचन्द । मेरा उत्सव मनाया जाता है समग्र भारत में, विशेष कर धनी मानी व्यापारिक केन्द्रों की तो बात ही न्यारी है। मेरे जन्म से महीनों पहले मकानों की सफाई होने लगती है; घरों में सफेदी की जाती है। टूटे फूटे स्थानों की मरम्मत की जाती है। कूड़ा-करकट हटाकर मकान स्वच्छ तथा दिव्य कर दिये जाते हैं। भारत के वर्तमान निवासियों को हीन-दीन देखकर उनके ऊपर कुरूपता के प्रेमी तथा सौन्दर्यभावना से पराङमुख होने का दोप भले ही कोई आरारोपित करे, किंतु भारत के लोग सदा से सौन्दर्यप्रिय रहे हैं, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। भारत के प्रत्येक घर में, प्रत्येक काम में सौन्दर्य की भावना को व्यापक स्थान दिया गया है। अतएव मेरे जन्म के समय यहाँ के लोग अपने घरों को नये सुन्दर सामानों से सजावें, उन्हें लीप-पोतकर सुन्दर चनावें, इसमें आश्चर्य ही क्या है ? मेरा स्वागत कहाँ नहीं होता? दरिद्र को टूटी झोपड़ी से लेकर धनकुवेरों के गगनचुम्ी प्रासादों तक सर्वन्र मेरे दिव्य स्वागत के निमित्त दीपक जलाये जाते हैं। वह दिन भी मुझे याद है जब लोग मीठे तेल के टिमटिमाते दीये जलाकर मेरी अभ्यर्थना किया करते थे। परन्तु आ्रज ? आ्ज है विजली का जमाना। आन बड़े-बड़े शहरों में सेठ साहूकार विजली के रंग-विरंगे वल्व जला कर स्वर्ग की अमर ज्योति को भूतल पर उतारने का प्रयत्न करते हैं।. मेरे उत्सव के दिन छोटे छोटे असस्य जलते दीपकों को देख कर लोग जिस प्रकार कभी प्रसन्न होते थे, आज उसी भाँति बिजली का नाना रूपों तथा रंगों में सजायी गयी रोशनी को देख्रुर किस भावुक का मन चमत्कृत नहीं होता और आँखे चौंधिया नहीं जातीं। मेरी इस भव्य अभ्यर्थना
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हमारे उत्सब ३०५ का एक रहस्य है-लोगों में आनन्द की सार्वभौम जागृति। मैंने ऋद्वैतवाद का पाठ पढ़ा है। मेरे निकट जातिगत तथा व्यक्तिगत किसी प्रकार का भेदभाव नहीं। जनता की मेरे स्वागत में सामूहिक श्रद्धा है। वह समभाव से मेरे आरगमन की वाट जोहती है और उस दिन प्रसन्न वदन तथा मिप्रमुख वनने से कभी नहीं चूकती। मित्र लोग मेरे उपलक्ष्य में आपस में गले लगते हैं; एक दूसरे से सहानुभूति दिखलाते हैं; वर्ष भर की वद़ना को मधुर शब्दों से दूर भगाते हैं। घर-घर मिठाइयाँ उपहार में भेजी जाती हैं। वालक लोग नये खिलौनों के उपहारों से प्रसन्न होकर आनन्द से नाचते हैं। यह है मेसा निजी रूप और सामाजिक महत्व। धामिक महत्व मेरा महत्त्व धार्मिक जगत् में तो और भी विशिष्ट तर्था व्यापक है। हिन्दुओं की यह बड़ी सुन्दर भावना है कि वे प्रत्येक उत्सव को धार्मिक रंग में रॅग देते हैं। मेरा दिन भगवती महालक्ष्मी की पूजा तथा अर्चना के निमित्त पवित्र साना जाता है। भारतीय सदा से शक्ति के उपासक रहे हैं। नाना शक्तियों में तीन शक्तियों की प्रधानता है-महाकाली, महालक्ष्मी औरर महासरस्वती की । प्रत्येक शक्ति की विशिष्ठ पूजा के लिये वर्प में अलग अलग दिन नियत कर दिये गये हैं। दीपावली महालक्ष्मी का निजी पर्व है। उस दिन रात में उनका पूजन करना नितान्त आवश्यक होता है। लक्ष्मी के पूजन के निभित्त नया मण्डप बनाया जाता है तथा उसे पत्र, पुष्प, तोरण, ध्वजा, पताका आदि से अलंकृत किया जाता हैं। वेदी के ऊपर रंगीन अक्षतों के द्वारा अप्रदल कमल के ऊपर लक्ष्मी की मूर्ति रखकर उसे पोडश उपचारों से विधिवत् पूजना चाहिये। विष्णु की शक्तिरूपिसी लक्ष्मी की पूजा प्राचीन काल से ही भारत में प्रचलित है। ऋग्वेद परिशिष्ठ में लक्ष्मी की स्तुति में प्रयुक्त मन्त्रों का एक परथक समुदाय है जो 'श्रीसूक्त' के नाम से
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विद्वानों में प्रसिद्ध है। इसी सूक्त के मन्त्रों से लक्ष्मी जीके पूजन- अरचन का विधान किया जाता है। पूजन के अन्ते में सावक लक्ष्मी की प्रसन्नता के हेतु वह प्रार्थना करता है- नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरेः प्रिया। या मतिस्तवत्वत्प्रपन्नानां सा मे स्यात् तक दर्शनात्॥। लक्षमी जगत् के सौन्दर्य तथा सम्पत्ति की अधिष्ठात्री देवी हैं। लक्ष्मी का निवास रहता है कमल के ऊपर। भारतीय कला में कमल सौन्दर्य का प्रतीक है। लक्ष्मी का वर्णा है शवेत और वे बैठती हैं श्क्त कमल-पुण्डरीक के ऊपर। श्वेत सत्त्व गुण का अपना विशिष्ट रंग है। लक्ष्मी का अर्जन तथा संचय वही पुरुप कर सकता है जो स्वरयं सात्विक हो, सत्वगुण से मण्डित हो। लक्ष्मी भगवान् विष्ु की शक्ति हैं। विष्णु का कार्य जगत् का पोपण, रक्षण तथा पालन है और इस व्यापार में उन्हें लक्ष्मी जी से सहायता मिलती है। लक्ष्मी का उपयोग ही होना चाहिये रक्षणा के लिये-पालन के लिये। लक्ष्मी हमारी माता ठहरीं। अतः माता के प्रति जो सत्कार या श्रद्धाभाव सनुष्य को रखना चाहिये, वही भाव यदि जगब्जननी के प्रति हुआ तो मनुष्य का कल्याण समझिये। यदि उसमें तनिक भी कमी आ्रायी तो उसका विनाश निश्चित है। आजकल भारतीय लोग इस जगन्माता के प्रति अवहेलना तथा तिरस्कार दिखलाने में जरा भी नहीं चूकते। फल भी इसका वैसा ही होता है-कल्याण का नाश तथा अ्रमङ्गल की वृद्धि। माता पुत्र के पालन की सहायिका है, भोग की नहीं! परंतु आज हो रहा है क्या ? चारों ओर लक्ष्मी को भोग का साधन बनाया जाता है। सांसारिक भोग-विलास की अरग्नि में लक्ष्मी का होम किया जा रहा है। सामने अपना ही निर्धन पड़ोसी दाने दाने के लिये मुहृताज बना हुआ विपत्ति का दुर्गम दिन काट रहा है; परंतु मनुष्य को उसके प्रति तनिक भी दया नहीं, उसकी दीन अवस्था से तनिक भी सहानुभूति नहीं। वह अपनी ही भोगलिप्सा में पड़ कर
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लक्ष्मी का सर्वनाश कर रहा है। इसका फल यदि विषमय फले तो आश्चर्य करने की कौन सी वात है ? इस प्रसंग में लक्ष्मी के वाहन का स्वरूप समझ लेना भी आरवश्यक है। लक्ष्मी का वाहन है उलूक-वह पक्षी जो दिन में अंधा बना पना दिन काटता है और केवल काली अँधेरी रात में ही इधर उधर उड़ता है। आजकल लक्ष्मी के वाहन हैं आँख के अंधे और गाँठ के पूरे, जो अपने ही संकीर् स्वार्थ के साधन में लगे रहते हैं रात-दिन और कभी दूसरे के हित की वात का भी खयाल नहीं करते। बहुतों की धारखा है कि लक्ष्मी-वाहनों की ऐसी दशा देखकर अपने शास्त्रों में उलूक को लक्ष्मी के वाहन वनने की योग्यता प्रदान की गर्यी है। परन्तु बात ऐसी नहीं है। उलूक का व्यवहार उन योगियों के व्यवहार के समान है जो संसार की सामान्य धारा से अपने को दूर रख कर संयमी जीवन यापन करते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने श्रीमुख से इन्हीं योगियों के विषय में लक्ष्य कर कहा है- या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ 'जिस रात में सब लोग सोते हैं, संयमी उसी में जागता है। औौर जिसमें जगत् के प्राणी जागते हैं, वही द्रष्टा मुनि के लिये रात है।' मेरी दृष्टि में उलूक ऐसे ही सयमी का प्रतीक है। संयमी पुरुप ही लक्ष्मी का सच्चा वाहन है। संयमहीन पुरुप लक्ष्मी का क्या कभी संचय और संरक्षण कर सकता है ? लक्ष्मी-वाहन का यही रहस्य है। इस ग्रकार मेरा सामाजिक रूप भी उतना ही महत्वशाली है जितना मेग धार्मिक रूप। मेरी बड़ी विशेषता यह है कि जहाँ अन्य व्रत तथा त्यौहार आंतरिक शुद्धि तथा पवित्रता की ओर ध्यान देते हैं, वहाँ मै बाह्य शुद्धि तथा स्वच्छता पर भी जोर देती हूँ। वाह्य शुद्धि के बिना आरन्त- रिक शुद्धि तथा शुचिता का कुछ भी महत्व नहीं होता। नियम है-'देवो भूत्वा देवं यजेत्।' देवता वनकर देवता की पूजा करनी चाहिये।
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३०= काव्यानुशालन
विना पवित्र हुए देवता की उपासना भलीभाँति नहीं हो सकती। इसी प्रकार वाहरी शुद्धि के बिना भीतरी शुद्धि का होना एक प्रकार से असम्भव सा है। इसकी मैं पूर्ण रूप से शिक्षा देती हूँ। वरसात के कारण घरों में नमी आरा जाती है। वायु में विकार उत्पन्न हो जाता है। मेरे आरगमन के उपल्ध में की गयी सफाई के कार ये दोप दूर हो जाते हैं। घर में लक्ष्मी का आवास तभी होता है, जब वह साफ-सुथरा, पवित्र तथा दिव्य हो। अतः सत लोगों का यह पवित्र कर्तव्य होना चाहिये कि मेरे जन्म के दिन घर की सफाई कर गंदगी से उत्पन्न होनेवाले रोगों को दूर करें तथा राष्ट्र की स्वास्थ्य रूपी लक्ष्मी की आराधना करें। निर्मलता ही मेरा प्रतीक है, स्वच्छता ही मेरा रूप है। वाह्य तथा आन्तरिक शुद्धि ही मेरा उपदेश है, शुचिता का सम्पादन कर भारत समृद्ध तथा सम्पत्तिशाली चने, यही मेरी कामना है।
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गूढ लेख्य
(प्राचीन गुप्तचर प्रशाली )
यह तो सब को विदित ही है कि प्राचीन भारत में गुप्तचरों का बड़ा महत्त्व था। अन्य राष्ट्र की छिपी हुई बातें और घातें जानने के लिए राजा लोग इनका उपयोग किया करते थे। वे तो वास्तव में नरेशों के सर्वत्र भ्रमणशील नेत्र थे जिनके द्वारा वे वस्तुस्थिति को देखा करते थे। 'चारैः पश्यन्ति राजानः' यह कथन प्रसिद्ध ही है। इन गुप्तचरों का साङ्गोपाङ्ग वर्णन कौटल्य 'अरथशास्त्र' में मिलता है। इसमें कौटल्य ने प्रसङ्गवश लिखा है कि चरलोग जब वाहर से अपना काम समाप्त कर आपवें तब उन्हें राजा को अपनी रिपोर्ट गूढ़ लेख के द्वारा अभिव्यक्त करनी चाहिए। यदि सीधे-सादे लेख के द्वारा वे अपना भाव प्रकट करेगे, तो बहुत सम्भव है कि वह लेख किसी दूसरे व्यक्ति के हाथ में पड़कर अप्रनर्थ का कारण बने। अतः गुप्तचरों को अपनी रिपोर्ट लिखने के लिए सर्वसाधारण लेखप्रकार का उपयोग न करना चाहिए, प्रत्युत उन्हें एक विशिष्ट प्रकार की लेखन-कला का उपयोग करना चाहिए, जिससे उस संकेत को समझने वाले व्यक्ति के अतिरिक्त कोई दूसरा उनके लेख का अर्थ न समझ सके। इसकी व्यवस्था प्राचीन आ्रचार्यों ने कर दी थी। इस प्रकार के लेखनप्रकार का नाम 'गूढ़ लेख्य' था। -
महर्षि वात्स्यायन ने 'कामसूत्र' में (१ अधिकरण, ३ अध्याय) ६४ कलाओं का नाम-निर्देश किया है; उनमें एक कला का नाम है- 'म्लेच्छित विकल्प'। इस शब्द की व्याख्या करते हुए टीकाक
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यशोघर ने 'जयमङ्गला' में त्र्प्रनेक महत्त्वपूर्ण चातें लिखी हैं। उससे गूढ़ लेख्य के भिन्न भिन्न प्रकारों का पता हमें चलता है। पहले जानना चाहिये कि 'म्लेच्छित' शब्द का क्या अर्थ है? साघु शब्दों से सम्पन्न होनेवाला भी जो लेख अक्षरों के इधर उधर परिवर्तन कर देने से अस्पष्ट हो जाय. जिसके अर्थ का पता ही न चले, उसे 'म्लेच्छित' के नाम से पुकारते हैं-"यत् साघुशव्द्ोपनिबद्धमपि अ्रक्षरव्यत्यासाद् अस्पष्टार्थ तत् म्लेच्छितम्'। इस अर्थ में इस शब्द का प्रयोग बड़ा पुराना है। मह्षि पतञ्ञलि ने व्याकरण की उपयोगिता प्रदर्शित करते समय 'म्जेच्छा मा भूमेत्यध्येयं व्याकरसम्' लिखा है। उनकी राय में व्याकरणाव्ययन का यह पहला फल होना चाहिए कि हम 'म्लेच्छ' होने से चचें। म्लेच्छ क्या ? म्लेच्छो ह वा एष थदपशब्द:' (महा- भाप्य)। किसी शब्द में एक श्रक्षर के स्थान पर दूसरे श्रक्षर का प्रयोग करना कहलाता है। 'हेडरयो' शब्द में रेफ के स्थान में लकार का प्रयोग करना और उक्त शच्द को 'हेडलयो' 'हेलयो' कहकर उचारए करना 'म्लेच्छ' का उदाहरण भाष्य में दिया गया है। हमारे पूर्वज लोग अपने आसपास के सभ्यताहीन शिक्षाविद्दीन लोगों को इसी कारण 'म्लेच्छ' के नाम से पुकारते थे कि वे हमारी संस्कृत भाषा के शब्दों के उच्नारण करने में असमर्थ होते थे और वे लोग उन शब्दों के अ्रक्षरों के स्थान पर अन्य अक्षरों को वैठा कर उनका अश्ुद्व उन्नारण किया करते थे। संस्कृत शब्द्रों का उच्चारण सब किसी से ठीक थोड़े हो सकता है। आर्य लोग ही उनका शुद्ध उच्चारस कर सकते थे; अनार्य लोगों से इनका वथातथ उववारण हो ही नहीं सकता था। इसलिए आर्य लोग उन अनार्थों को 'म्लेच्छ' के नाम से पुकारते थे। 'म्लेच्छ' नामकरण- का यही रहस्य है।
ऐसे म्लेच्छित वाक्यों के प्रयोग का अभिग्राय क्या था? गृहवस्तु की मन्त्रणा। अभीष्ट अ्र्पर्र को सत से छिपा कर उस संकेत से परिचित व्यक्तिविशेष पर प्रकट करना ही ऐसे शक्षर-परिवर्तन
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गूढ़ लेख्य ३११
सम्पन्न गूढ़ लेखों का काम होता था। गूढ़ लेख के अनेक प्रकार थे। इस कला के बहुत से आचार्य थे। एक तो थे स्वयं आचार्य कौटल्य। दूसरे आचार्य थे प्राचीन भारत के अखिलकलामण्डित, धूर्तशिरोमखि, 'चौर्यशास्त्र' के प्रोता आरचार्य मूलदेव। इन दोनों के मतों का उल्लेख 'जयमंगला' में किया ही गया है, साथ ही साथ एक तीसरे गत का भी वर्णान है, पर इसके उद्भावक आ्प्रचार्य का नाम नहीं दिया गया है। इनके त्र्प्रतिरिक्त अन्य प्रकारों की ओपोर भी संकरेत मिलता है। इससे स्पष्टतया ज्ञात होता है कि गूढ़ लेख लिखने की प्रणाली प्राचीन भारत में विशेष रूप से प्रचलित थी और अ्र्प्रनेक आर्प्रचार्यों की बुद्धि ने इसकी उद्भावना की थी। कौटल्य के अनुसार गूढ़ लेख की प्राली का वर्णन यों किया गया है- तादेः क्षान्तस्य कादेश् स्वरयोरुभयोरपि। विन्दूष्मणोविपर्यासात् दुर्धोधमिति संज्ञितम्॥ वर्समाला में 'श, ष, स, हको छोड़ देने पर 'क' से लेकर 'क्ष' तक २० शर्रक्षर हुए। इनमें दो खण्ड कर देना चाहिए। पन्द्रह पन्द्रह श्रपक्षरों का-'क' से 'एा' तक पहला खण्ड और 'त' से लेकर 'क्ष' तक दूसरा खण्ड। पहले खण्ड के अक्षरों के स्थान पर दूसरे खण्ड के तत्तत् श्रपक्षर बैठाने चाहिए। हस्व तथा दीर्घ स्वरों का परिवर्तन करना चाहिए-हस्व के स्थान पर दीर्घ तथा दीर्घ के स्थान पर हस्व। चार बिन्दुओं (अर्थात् १ अनुस्वार, २ विसर्ग, २ जिह्वामूलीय तथा ४ उपध्मानीय) के स्थान पर क्रमशः श, ष, स, ह को रखना चाहिए। इस प्रकार का लेख दुर्बोध या गूढ़ लेख के नाम से पुकारा जाता है। मूलदेव के अनुसार इतने वर्ग -परिवर्तन की आवश्यकता नहीं। वह कौटल्य के प्रकार से कुछ सीधा-सादा था। उसका ढंग यह था- अकौ खगौ घड़ी चैव चटौ जणौ तपौ नमौ। यशौ रषौ लसौ चेति मूलदेवीयमुच्यते।।
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३१२ काव्यानुशालन अर्थात् 'अ' और 'क' 'स' और 'ग', 'घ' और 'डु', 'च' और 'ट', 'न' और 'ग', 'त' और 'प', 'न' और 'म', 'य' और 'श', 'र' और 'प' तथा 'ल' और 'स'-इन १० वर्णयुम्मों का आपस में परि वर्तन होना चाहिए। शेप अक्षर ज्यों के त्यों रहेंगे। स्वरों में किसी प्रकार का परिवर्तन न होगा तथा अप्रतुस्वार और विसर्ग भी अपने ही स्थान पर जमे रहेंगे। तीसरे लेखप्रकार के उद्भावक का नाम जयमंगला में नहीं है। वह प्रकार यों है- ग्रह्नमनपमुसमेतं पहाननाक्षाणि सागा मुनयः। ज्वलनो गण्डकश्ङ्गं दुलिसितं गृढलेख्यमिदम्॥ भावार्थ-ग्रह(९), नयन (२) वसु (८), पडानन (६', श्रक्ष (इन्द्रिय=५), सागर (४), मुनि (७), उबलन (अग्नि=३) गण्डकशृङ्ग (गेंडे का सींग=१)-इस प्रकार वर्स व्यत्यय से युक्त लेख को गृढ लेख कहते हैं। पहले अक्षर के स्थान पर नवां श्रक्षर होना चाहिए: दूसरा स्वस्थान पर रहेगा, तीसरे के स्थान पर ८ वाँ, ४ थे की जगह ६ ठा, ५ वाँ ज्यों का त्यों रहेगा ६ ठे की जगह ४ था, ७ वाँ स्रस्थान पर रहेगा; ८ वे की जगह ३ रा, और ९ वें के स्थान पर १ ला वर्ण रहेगा। इस प्रक्िया का उपयोग गद्य के ही लिये हो सकता है। इसके अनुसार नौ अक्षरों का एक एक समूह होगा और उसके भीतर ऊपर लिखित ढंग से वर्णा-परिवर्तन किया जायगा। इन्दीं तीनों प्रकारों का वर्सन 'कामसूत' की टीका में उपलब्ध होता है। इन तीनों के तारनम्य का विचार करने से यही प्रतीत होता है कि इनमें सब से सीधा ढंग तीसरा था, क्योंकि इसमें उसी वाक्य में आाए हुए वरगों का केवल स्थान-परिवर्तन हो जाता है। दूसरे प्रकार की योजना इससे अ्रधिक क्रिष्ट है; क्योंकि इसमें दस वर्षों के स्थान पर भिन्न भिन्न वरगों के रखने का नियम है, परन्तु सबसे कठिन तथा अद्भुन प्रकार स्वयं आचार्य कौटल्य का है, क्योंकि यहाँ प्रत्येक
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व्यञ्ञन बदला जाता है; प्रत्येक मात्रा अपने से भिन्न हो जाती है तथा अनुस्वार और विसर्ग के स्थान भी अछृने नहीं बचते। इनकी जगह भी 'ऊष्म' वर्ण आ विराजते हैं। अतः कौटल्य का गूढ़ लेख वास्तव में गूढ़ लेख है, जिसके अर्थ की उद्भावना करना तथा ठीक ठीक पढ़ जाना जरा टेढ़ी खीर है। कूटनीति के आचार्य की प्रणाली को कूटमय होना ही चाहिए। अब एक उदाहरण देकर इन तीनों का भेद समझाया जाता है। मान लीजिए कि कोई गुप्चर वाहर से समाचार संग्रह करके आता है। शत्रु के आक्रमण की आशंका है। राजा को वह सचेत करना चाहता है। उसे यह वाक्य लिखना है-'रिपुरायाति पलायत्व' (शत्रु आरा रहा है; भाग जाइए)। यदि वह तृतीय प्रकार का आ्रपाश्रय लेगा, तो उसका वाक्य होगा-'स्वपुयपति यालारारि। मूलदेवीय पद्धति से वह यों लिखेगा-'लितुषाशापि तसाशल्व्र।' कौटल्य के प्रकार से वह यों लिख भेजेगा-'ठीचूटटकी चाडतॉ कढ।' इन गुप लेखनप्रसालियों की उद्भावना करनेवाले विद्वानों की जितनी प्रशंसा की जाय वह थोड़ा ही होगी। इनकी सहायता से राजनीति के गुप्त कारनामे किस प्रकार सर्वसाधारण की दृष्टि तथा बुद्धि से वचकर राजा के पास पहुँच जाते थे, इसका अनुमान सहज ही में किया जा सकता है। आजकल भी कर्भी कभी विशिष्ट अंग्रेजी पत्रों के संवाददाताओं को 'कोड लैंगुएज' (सकेत-भाषा) का प्रयाग करते हुए हम सुनते हैं। आजकल भी गुपचर 'संकेत-भाषा' का ही प्रयोग करते हैं, उसकी तालिका भी बड़ी गुप्त रखी जाती है, यदि प्रकाशित हो जाय तो फिर उसे सभी पढ़ सकते हैं।
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आासाम की आदिम संस्कृति
आदिवासियों का एक विशाल समुदाय त्रसाम प्रान्त के अन्तर्गत : निवास करता है। इसकी अ्रनेक जातियाँ तथा उपजञातियाँ हैं जिनका अध्ययन कला, धर्म, संस्कृति तथा भापा की विविध दष्टियों से विशेष महत्त्वशाली है। मानव शास्त्र के मूलरूप तथा विकास के ज्ञान के लिए यह अध्ययन विशेष लाभप्रद है। आसाम की इन जातियों के रीतिरन्म, भाषा तथा सभ्यता का अध्ययन आवश्यक है। सामाजिक तथा धार्मिक अवस्था में साम्य रखने पर भी आसाम के आदिचासियों की भापा बिल्कुल प्रथक-पृथक है। एक जाति की भापा से भिन्न होने पर आश्चर्य नहीं होता, परन्तु एक ही जाति की अरन्त- भुक्त उपजातियों की भाषा का पार्थक्य अवश्यमेव आश्चर्यकारी है। प्रसिद्ध नागा जाति की तीन उपजातियाँ हैं-१. अंगामी नागा, २. रेंग्मा नागा, ३. सेमा नागा। ये तीनों उपज्ञातियाँ अपनी विभिन्न भाषाओं पर गर्व करती हुई उसका प्रयोग करती हैं। परन्तु जब ये व्यापार के लिए मैदान में आती हैं तो आसमिया भाषा का व्यवहार करती हैं। ये समस्त भाषायें तिच्वती-वर्मी भापा परिवार से सम्बन्ध रखती हैं। प्रियसन ने इन भापाओं के उद्धार के लिए श्लाघनीय उद्योग किया है। सन् १८२६ में आरसाम प्रान्त पर अंग्रेजों का अधिकार हुआ औ्रर तभी से ईसाई पादरियों ने भी इन जातियों में अपने धर्म का प्रचार करना आरम्भ किया। बाइबिल के शान्ति सन्देश को इनके घरों में
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पहुँचाने के लिए इन्होंने इन जातियों की भाषा का भी अध्ययन किया तथा व्याकरग और कोश-ग्रन्थों का निर्मार कर सभ्य संसार के सामने इन्हें उपस्थित किया। तभी से भापाशात्त्रियों की दृष्टि इनकी ओर आकृष्ट हुई तथा नवीन ग्रन्थों की रचना हो रही है। कुछ मान्य J त्रन्थों का प्रकाशन आरसाम सरकार ने किया है१- हरवर्ट लारेन : डिक्शनरी ऑफ अवोर-मीरी लैंग्वेज गोपालचन्द्र वरुआ :आहोम-असामीज़ डिक्शनरी 1 आर० घी० मैककाव: ग्रामर ऑफ़ दी अंगामी नागा लैंग्वेज एक० रैमखे : वंगाली-गारो डिक्शनरी तर० सी० हैमिल्टन : ग्रामर ऑफ दी दफला लैंग्वेज ब्राउन : ग्रामर ऑरफ़ दी देवरी चुटिया लैंग्वेज एफ० जे० नीधम : ग्रामर ऑफ़ दी खामटी लैंग्वेज हये समस्त जातियाँ अशिक्षित, असभ्य तथवा अर्धसभ्य हैं। आधुनिक सभ्यता की रोशनी से े बहुत दूर हैं। ये स्वयं घरेलू मामलों में त्वतंत्र हैं, परन्तु कभी वाहरी बातों में ये अंग्रेजी सरकार के प्रभाव में थीं। स्वतन्त्र भारत में इनके शासन की व्यवस्था की गई है और नये चुनाव में इनके भी प्रतिनिधि व्यवस्था-सभा में चुने गये हैं। बहुविवाह की प्रथा प्रायः सब जातियों में है। वर-कन्या ही स्वयं अपना विवाह तय कर लेते हैं। सब जातियाँ माँस खाती हैं तथा शराब पीती हैं। गोदना गुदवाने की प्रथा सर्वत्र है। परदा का सर्वत्र अ्रभाव होना इन स्वतन्त्र विचरण करनेवाली जातियों में स्व्राभाविक ही ये है। यह मूर्ति की पूजा नहीं करती, परन्तु एक ईश्वर में पूर्ण विश्वास रखती हैं। वलिदान की प्रथा सर्वत्र है। इनके धार्मिक विश्वासों के अध्ययन से आरंदिम मानव के विषय में अरनेक ज्ञातव्य बातें जानी जा सकती हैं।
१. वे ग्रन्थ आ्रसान नवर्नमेंट बुक डिमो शिलांग से प्राप्त हो सकते हैं।
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आसाम एक पहाड़ी प्रदेश है। प्राचीन काल में विभिन्न प्रकार के लोग यहाँ पाये जाते थे। इन पहाड़ों में अनेक प्रकार की पहाड़ी जातियाँ रहती हैं जो अनार्य हैं औप्रर जिनके घरों तक आधुनिक सभ्यत्ा का प्रकाश अर्ी तक नहीं पहुँचा। ऐसी जातियों में खासी तथा नागा के नाम प्रसिद्ध हैं। दूसरी जातियाँ वे हैं जो आ्र्साम की सीमा पर रहती हैं, उन्हें सीमान्त जातियाँ कहना अधिक उपयुक्त होगा। ये जातियाँ दो भागों में विभक्त की जा सकती हैं। पहली आसाम तथा वर्मा की सीमा के बीच में रहनेवाली तथा दूसरी आसाम और तिब्वत की सीमा में निवास करनेवाली। ये पर्वतीय तथा सीमान्त जातियाँ स्वतन्त्र हैं। पहले ये अरंग्रेजों की सीमा में आकर बड़ा उत्पात मचाया करती थीं, परन्तु हमारी सरकार ने इन्हें अपनी नीति से वश में कर लिया है। इन जातियों में इनका एक सरदार होता है जो शासन किया करता है। इन में प्रत्येक की भापा भिन्न है तथा रीति-रिवाजों में भी बहुत कुछ अन्तर है। इन सत पर्वतीय तथा सीमान्त जातियों की संख्या कुल मिला कर ग्यारह हैं तथा इनके नाम यों हैं-१. गारो, २. खासी, ३. मिकिर, 2. नागा, ५. सिंगफो, ६. खामटो, ७. मिशमी, ८. अ्रवोर, ९. मीरी, १०. दफला, ११ आका। गारो की पहाड़ियाँ गोआलपाड़ा जिले के दक्षिण में स्थित हैं. जिन में गारो नामक जाति रहती है। आरजकल इसकी संख्या एक लाख से भी अ्धिक है। इस जाति का मुखिया एक सरदार हुआ करता है जो इस जाति के समस्त राजनीतिक मामलों पर विचार करता है औ्रर फैसला करता है। गारो भाषा बड़ी सुन्दर है। इन लोगों के शर्रार का गठन सुडील है। ये घड़े कार्य-निपुण हैं और धान तथा रूई की खेती करत है। गारो सत्री-पुरुष गठरी को पीठ पर रख कर, उसे रन्सी में चाँध सिर स टेक कर नीचे मैशन में सामान चेचने के लिये जाते हैं।
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ये शिकारी नहीं हैं परन्तु कभी-कभी हाथियों को फँसाया करते हैं। ये खूब धूम्रपान करते है। इनके घर वाँस के बने होते हैं। सबसे आश्चर्य की वात यह है कि ये दूध पीने से बड़ी घृणा करते हैं। ये बाल नहों कटाते और सिर पर जूड़ा बाँधा करते हैं। माता तथा पिता के द्वारा ही इनका विवाह तय होता है। इस समय पुरोहित मंत्र पढ़ता है और एक मुर्गे के जोड़े का चलिदान किया जाता है। इनके नृत्य का ढंग विचित्र है। एक दूसरे की कमर पकड़ कर दस वीस आदमी एक साथ नृत्य किया करते हैं। दामाद शवसुर के मर जाने पर अपनी सास से विवाह कर लेता है और इस प्रकार अपने शवसुर के धन का उत्तराधिकारी वन जाता है। गारो स्त्री सारे परिवार की स्वामिनी होती है। गारो मूर्ति पूजक नहीं हैं परन्तु वे ईश्वर में विश्वास रखते हैं भूत- प्रेत की सत्ता में भी विश्वास रखते हैं और अपने मृतक को तीन दिन घर में रख कर जलाया करते हैं। खासी जाति खासी पहाड़ियों में रहती है जो गारो की पहाड़ियों से लेकर पूर्व में मणिपुर तक फैलो हुई हैं। ये लोग बड़े परिश्रमी, शान्त स्वभाव तथा प्रायः शुद्ध आचरण के होते हैं। ये सदा प्रसन्न चित्त रहते हैं। खासी स्त्रिरयाँ बढ़ी ही सुन्दर और आकर्पक होती हैं। ये लोग अरशिक्षित हैं परन्तु शिक्षा की ओर इनकी अभिरुचि है। पहाड़ी नदियों पर पुल बांधने में ये बहुत दक्ष होते हैं। इनके धार्मिक विचार वही हैं जो गारो के हैं। ये मृतकों को जलाने के पूर्व उसे बक्स में कई दिनों तक बन्द रखते हैं और सृतक को ले जाते समय वंशी बजाते हैं। मिकिर नवगांव जिले के दक्षिणी और पश्चिमी भाग में रहते हैं। ये हिन्दू धर्म में दीक्षित हो गये हैं। मिशनरियों के द्वारा शिक्षा का प्रचार इधर हुआ है। खेतों में रूई तथा चावल पैदा करते हैं। मिकिर स्त्रियाँ बड़ी परिश्रमी होती हैं तथा मैदान में लकड़ी बेचने आती हैं। नागा जाति आसाम की समस्त जातियों में सबसे प्रसिद्ध जाति है। यह नागा पहाड़ियों में रहती है। इसके अनेक विभेद हैं-अंगामी,
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रेंग्मा तथा सेमा। प्रत्येक का एक सरदार होता है जो चुनाव के द्वारा नियुक्त किया जाता है। इसका प्रधान कार्य झगड़े का निपटाना होता है। ये लोग तर्तिथि का बड़ा आदर करते हैं। ये रुई और अन्य पर्व- तीय उपनों का व्यापार करते हैं। इनका हथियार भाला और तलवार है। अंगामी नागा इंडोचाइनीज़ वंश के हैं। इनका शररी गठन सुन्दर तथा नाक चिपटी होती है। ये बड़े चहादुर होते हैं। वीरता का चैज (चिन्ह) अपनी छाती पर पहनते हैं। शत्रु के जीतने के उपलक्ष्य में वे अपने शरीर में गोदना गुदवाते हैं। इनकी स्तिरियाँ चुस्त कुरती पहनती हैं। नागा लोग अपनी जान हाथों पर लिये फिरते हैं। तफ- गानों की भाँति जान लेना वा देना इनके चायें हाथ का खेल है।
सिंगाफो जाति के लोग दिहिंग तथा तेंगपानी नदी के किनारे तथा लखीमपुर सीमा प्रदेश के पूर्व में रहते हैं। इनका सम्बन्ध वर्मा से अधिक मालूम पड़ता है। इसी सम्बन्ध के कारस इनका यह नाम भी पड़ा हुआ है, वर्मी भाषा में सिंगफों, का अर्थ है 'मनुष्य'। इनमें से कुछ लोग वौद्धमत मानते हैं। थे मंगोलियन वंश के प्रतीत होते हैं। गोदना गुद्वाने की चाल खुब है ब्ियाँ अपने पूरे पैर में गोदना गुद- वाती हैं। पुरुष भी अपने शरीर को गोढना से सुशोभित किया करते हैं। इनकी भापा वर्मी से विशेष मिलती है। धार्मिक रीति से ये भूत प्रेत की पूजा में निरत रहते हैं।
मिशमी जाति के अन्तर्गत तीन छोर्टा-छोटी उपजातियाँ हैं। ये साधा- रख रीति से सभ्यता की दौड़ में कुछ आगे बढ़े हुए हैं। इनका सबसे बड़ा गुएा है कि ये व्यापारी हैं, सदिया से लेकर डिन्रगढ़ तक व्यापार करते हैं। पहाड़ से जड़ी-बूटी, तथा कस्तूरी लाकर डिन्रगढ़ आदि में घेचते -हैं। इनका पहाड़ी स्थान बहुत सुन्दर होता है। ये जानवरों को चराने
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सासाम की भादिम संस्कृति ३१६ का काम भी करते हैं तथा इस कार्य के लिये साँड रखते हैं। इनके घर बहुत बड़े होते हैं, कोई कोई तो १३० फीट तक लम्बे होते हैं। ये मुर्दे की कन्र के पास मृत व्यक्ति का समस्त सामान लाकर गाड़ देते हैं। पुरुष तथा स्त्री दोनों लम्बे बाल रखते हैं तथा दोनों धूम्रपान करते हैं। स्तियाँ वस्-वुनने में बहुत निपुए हैं। अवीर लोग मीरी जाति के पूर्व में दिहांग नदी तक फैले हुए हैं। इनका सम्बन्ध मंगोल जाति से प्रतीत होता है। शरीर से बहुत मज- बूत होते हैं; रंग ताम्त्र सहश; इनमें बहुविवाह की प्रथा नहीं है। वर- कन्या के द्वारा ही विवाह तय हो जाता है। स्तिरियों का आदर विशेष होता है। इनका शर्रीर गोदना से गुदा हुआ रहता है। एक विशेष वृक्ष की छाल पहनने के काम में लाते हैं। मीरी लोगों का स्वभाव बहुत शान्त होता है। मल्लाह के कार्य में विशेष निपुण हैं: नदी के किनारे रहते हैं तथा नाव खेया करते हैं। आसामी भाषा तथा अपनी भाषा दोनो जानते हैं। इसलिये इनका नाम मीरी पड़ गया है; जिस का अर्थ है 'द्विभापिया'। ये आसामी गोसाइयों के चेले है। मांस-भेक्षण तथा शराब पीना इन्हें प्रिय है। नृत्य-कला में स्रियाँ विशेष प्रवीण होती हैं, नृत्य के प्रदर्शन द्वारा पैसा कमाया करती हैं। वैसे मीरी ख्त्रियाँ आज्ञाकारिणी होती हैं। दफला लोग आका जाति के उत्तर में रहते हैं। पहले ये ब्रिटिश सीमा पर आरक्रमण किया करते थे, परन्तु सन् १८३० में अंग्रेज सरकार ने इन्हें पेन्शन देना निश्चित किया। तब से ये हमले कम हो गये। सन् १८७४-७५ में अंग्रेजों ने इन पर चढ़ाई कर परास्त कर दिया, तब से ये शान्तिपूर्वक रहते हैं। आका जाति का निवास डैरंग जिले के सुदूर उत्तर में है। यह जाति दो भागों में विभक्त है। अंग्रेज सरकार से इन्हें भत्ता मिलता
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था। इनका एक सरदार चड़ा उत्पाती था जिसे अंग्रेजों ने वश में करने के जिए जेल में भी ठूँसा, परन्तु वह भाग निकला। सन् १८४२ में उसने आत्म-समर्पण किया और तब से उसे भत्ता मिलने लगा। आज इनकी स्थिति का अतुशीलन करना आवश्यक है। आका संस्कृति का अध्ययन हमें बहुत सी नई सामग्री दे सकता है। उनके गीत औरर नृत्य लोक-कला की अ्रमिट प्रेरणा के स्रोत हैं और कोई चाहे तो उस पर पूरा ग्रन्थ ही लिख सकता है।
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आयों की सांस्कृतिक देन ३२३ के कल्याण का प्रासाद खड़ा नहीं करती। वह व्यक्ति तथा समाज दोनों के कल्याण पर आग्रह दिखलाती है। अतः सामाजिक तथा वैयक्तिक उभय प्रकार की उन्नति के निमित्त आयों ने यज्ञ की संस्था का निर्माण किया है। गीता के अनुसार जो प्रासी यज्ञचक्र का अतुवर्तन नहीं करता, वह कथमपि इस जीवन में सौंख्य तथा साफल्य नहीं प्राप्त कर सकता। उपकार की, विशेष मानव कल्याण की वेदी पर क्षुद्र वैयकिक सौख्य के हवन की, एक दूसरे के परत्पर कल्याण की भावना पोयए का करने वाली यज्ञ-संस्था का निर्माए कर आर्यों ने न केवल भारतवर्ष में, ग्रत्युत समग्र संसार के सामने एक महनीय आदर्श उपस्थित किया है। इसके तिरस्कार का फज है विलय तथा इसके सत्कार का परिणाम है उदय। साम्यवाद आर्यों ने भारतवर्ष में दार्शनिक आधार पर सच्चे साम्यवाद की प्रतिष्ठा की है। साम्यवाद के पश्चिमी आरदर्श को अच्छी निगाह से देखने वाले उसके विकृत रूप से, वैपम्य से, घोर अनर्थ से भली भाँति परिचित नहीं हैं। सच्चे साम्यवाद का उपदेशक तथा प्रचारक ययदि कोई देश है, तो वह भारतवर्ष ही है। प्रत्येक प्राणी में उसी परम पिता की प्रतिभा झलकती है। वही अन्तर्यामी बनकर भीतर से उसे नियमन किया करता है। अतः दूसरे को किया गया उपकार परोपकार न होकर प्रकारान्तर से स्वोपकार ही है। साम्यवाद की यही सच्ची नींव है मानवमात्र में एकत्व की-अरद्वेत की-भावना। भागवत ने बड़े ही कड़े, परन्तु सच्चे शब्दों में इस साम्यवाद के व्यावहारिक रूप को दिखलाया है- यावत् ्रियेत जटरं तावत् ततं हि देहिनाम्। अधिकं यो भिमन्येत स त्तेनो दण्डमर्हति॥ हमारा अपनी कमाई में भी डतने ही पर अधिकार है, स्वत्व है, अपनापन है जितने से हमारा पेट भरता है। उससे अविक पर जो अपना अधिकार
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जमाता है या मानता है वह चोर है और इस लिए वह दण्ड का भागी है। यह है समुन्नत सान्यवाद की भावना जिसे भारतवर्ष ने विश्व के सामने रखा, परन्तु नाना प्रकार के वैषम्य तथा वैमत्य के कारए विश्व ने कभी सच्चे हृदय से इसे स्वीकार नहीं किया और इसका घोर परिणाम है विश्वव्यापक युद्ध तथा तन्जन्य भीषसा जनसंहार तथा भयानक धन-संहार। आर्य विद्वानों ने सर्वदा ही सान्य, समता, समानता की ओर ही दृष्टिपात किया और वैधन्य, भेद, भिन्नता की सदा ही निन्दा की है।
वर्ण-व्यवस्था इन सिद्धान्तों को व्यवहार में लाने के लिए आर्यों ने कतिपय संस्थाओं की व्यवस्था की है और इनमें सबसे श्रेष्ठ संस्था का नाम है वर्साश्रम-संस्था। वर्ण का सम्बन्ध है सामाजिक व्यवस्था से और आाश्रम का सम्बन्ध है वैयत्तक व्यवस्था से। पहिला यदि समाज का संतुलन चाहता है, तो दूसरा चाहता है व्यक्ति का क्रमिक विकाश। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र-ये ही चार वर्ग हैं जिनके भौतर किसी भी समाज का विभाजन किया जा सकता है और समाज के संवर्धन तथा उपबृंहरा के निमित्त इन चारों की उन्नति समभावेन आवश्यक होती है। मनु की वर्णव्यवस्था का प्रभाव पश्चिमी तत्त्व ज्ञानी प्लेटो पर भी पड़ा है। उन्होंने अपने 'रपब्लिक' नामक सान्य ग्रन्थ में समाज का विभाजन इन वरणों वा श्रेणियों में किया है। तब हमें पारसियों की वर्णाव्यवस्था को भारतीय आरदर्श पर व्यवस्थित देखकर आ्रश्चर्य करने का कोई स्थान नहीं रह जाता, क्योंकि दोनों ही आर्च- धर्म की विभिन्न शाखा के अनुयायी हैं। पारसी समाज चार भागों में तरिभक्त है-(१) ऐर्यमना-अर्यमन् या ब्राह्मण। (२) वेरेजिन (वीर्यमान)= क्षत्रियः (३ ) खेतुश (क्षेत्री)=खेत का मालिक = वैश्य: (४) गोवास् (गोवेशी)= गायों के बीच में रहने वाला न्यत्ति त्रर्थात् सेवक वर्ग=शूद्र। आश्रमों की व्यवस्था ने मानव जीवन
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थारयों की सांस्कृतिक देन ३२५ू को सुदढ़, विकसित तथा सभ्य बनाया है। त्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास-ये चारों आश्रम मानवों को प्रवृत्ति मार्ग की शिक्षा नेकर निवृत्ति मार्ग में प्रतिष्ठित करते हैं। ब्रह्मचर्य आरश्रम सानवों को शिक्षित बनाकर प्रवृत्ति के योग्य बनाता है। गृहस्थाश्रम उन्हें प्रवृत्ति में पूर्ता प्रदान करता है। इसी प्रकार वानप्रस्थ में निवृत्ति का आररम्भ है तथा संन्यास में उस निवृत्ति की पूर्ता है। वर्स तथा आरश्रम के परस्वर सहयोग ने भारतीय संस्कृति को विश्वजनीन बनाया तथा समाज के पारस्परिक संघर्ष का संहार कर मैत्री तथा परस्पर सहयोग की भावना को सुहढ़ चनाया। विदेशी विधर्मी त्र्क्रमसकारियों के भयंकर आ्राक्रमणों के उपरान्त भी हमारे समाज के संगठन तथा तविच्छिन्नता का रहस्य हमारी वैज्ञानिक समाज-व्यवस्था के भीतर छविपा हुआ है।
पूर्व संगठन का दार्शनिक आ्रधार है कर्म का सिद्धान्त जो नितान्त वैज्ञानिक तथ्य के ऊपर आश्रित है। विज्ञान बतलाता है कि कोई भी भौतिक जगत् में सम्पद्यमान कर्म अपनी प्रतिक्रिया के बिना नहीं रहता। कर्म की प्रतिक्रिया अवश्यंभाविनी होती है। Action का Reaction होकर ही रहता है। अतः प्रत्येक कर्म का फल तवश्यमेव होता है चाहे वह अभी वर्तमानकाल में ही हो जाय या कालान्तर में हो। मानवों का यह जीवन किसी आ्रकस्मिक घटना का परिशाम नहीं है, प्रत्युत सुचिन्तित तथा पूर्व सम्पादित कर्मों का ही परिएत फल है।. शोभन कर्मों का फल शोभन होता है तथा ुरे कर्मों का फल धुरा होता है। इसी से हम अपने भाग्य के विधाता स्वयं हैं। महर्षि व्यासदेव ने इस कर्मव्यवस्था की समता गाय के घछड़े के साथ दी है।जिस प्रकार हजारों गौवों के वीच वछड़ा अपनी माँ को खोज निकालता है उसी प्रकार पूर्व जन्म का किया गया कर्म अपने कर्ता का अनुगमन करता है। कर्म की महिमा सर्वाति शायिनी है-
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यथा घेनुसहल्ेषु वत्तो विन्दति मातरम्। तथा पूर्वकृतं कर्मं कर्तारमनुगच्छति ॥। (शान्तिनर्व )
जन्मान्तरवाद कर्मवाद का यह तथ्य जन्मान्तर सिद्धान्त के ऊपर आरश्नित है। हिन्दू शास्त्रों का हढ़ विश्वास है-और इसके पोपक सैकड़ों उदाहरए भी वर्तमान हैं-कि वर्तमान जीवन ही हमारा प्रथम. अथवा अ्रन्तिम जीवन, नहीं है। यह वर्तमान जीवन जीवन-मरणा की अरनादि तथा अनन्त शृंखला में एक साधारण कड़ी है। मनुष्य कर्मों के अनुसार नाना योनियों में जन्म लेता है और एक जन्म के अन्त हो जाने पर फिर कर्मानुसार नवीन जन्म तथा नवीन योनि प्राप्त करता है। यह श्रृंखला अनादिकाल से चली आ रही है। भगवान् श्रीकृष्ण ने इस जन्मान्तर- वाद का गीता में तथा व्यास जी ने श्रीमद्भागवत में इस तथ्य का स्पष्टतः निर्देश किया है- देहे पञ्चत्वमापन्ने देही कर्मानुगोऽवशः । देहान्तरमनुप्रांप्य प्राक्तनं त्यजते वपुः ॥ -भागवत १०।१/२६
स्रतन्त्रता आर्य संस्कृति स्वतन्त्रता की भावना से त्र्प्रोत्त-प्रोत है। वह चतलाती है कि यह जीव ही शिव है। मनुष्य के भीतर ईश्वर का अविनाशी चैतन्य मालकता है। अविद्या के कारण मनुष्य अपने को सर्वत्र चन्धन में पाता है। ज्ञान के द्वारा इस वन्धन की श्रृंखला को छ्वित्र भिन्न कर देने पर वह अपने पूर्णत्व को प्राप्त कर लेता है। अतः आत्मा की उपलब्धि अथवा 'स्व की अतुभूति मानव जीवन का चरम लक्ष्य है औरर यह वर्तमान जीवन उसी अनुभूति की साधना का एक आवश्यक साधन है। इस अनुभृति की साधना के त्रिचिव मार्ग
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आर्यों की सांस्कृतिक देन ३२७ हैं-ज्ञान, कर्म तथा भक्ति। हिन्दू संस्कृति में प्रत्येक विचार वाले या प्रवृत्ति वाले साधक के विकास का स्थान है। वह अन्य धर्मों के समान एक ही डंडे से सब भेड़ों के पीटने का तथा एक ही मार्ग पर चलने का प्रयास कभी नहीं करती। आर्यों ने मानवों की प्रवृत्ति के अनुसार भी मार्गों की व्यवस्था की है। मननशील साधक ज्ञानयोग के द्वारा, रजोगुण की प्रधानता वाला व्यक्ति कर्मयोग से तथा भाुक साधक भक्तियोग की सहायता से स्वानुभूति कर जीवन का परम लाभ इसी जन्म में, इसी भूतल पर ही प्राप्त कर सकता है। ऐसा पुरुष कहलाता है जीवन्मुक्त अथवा गीता के शब्दों में वह होता है 'स्थित- प्रज्ञ'। यह तो हुआ आध्यात्मिक पक्ष। व्यवहार पक्ष में भी आर्यों ने स्वतन्त्रता तथा स्वदेश का मूल्य भली भाँति आँका था। पूजा के अवसर पर पहनने योग्य वस्त्रों के वर्णन- प्रसंग में आर्यशास्त्र की उक्ति है कि वह न तो सिला हुआ हो, न किसी दोष से दुष्ट हो और वह विदेश का बना न होकर स्वदेश का बना होना चाहिए-
, न स्यूतेन न दग्घेन पारक्येण विशेषतः। मूषिकोत्कीर्णजीर्णेन कर्म कुर्याठ् विचक्षणः ॥ आर्यों के अनुसार यह हमारा स्वदेश स्वर्ग से भी बढ़कर है। स्वर्ग है भोगमूमि परन्तु भारत है कर्मभूमि। स्वर्ग में उत्पन्न जीव केवल प्राक्तन कर्मो का शोभन फल भोगता है अवश्य परन्तु उसे अपनी उन्नति करने का अधिकार नहीं होता। आत्म-विकाश की पूर्णता की साधिका यह भारतभूमि ही है। इसीलिए स्वर्ग के निवासी देवता लोग भी भारतवर्ष की भूयसी प्रशंसा किया करते हैं और यहाँ जन्म लेने के लिए तरसते रहते हैं- कल्यायुषां स्थान - जयात् पुनर्भवात् क्षणायुषां भारतभूजयो वरम् ।
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क्षणेन मर्त्येन कृतं मनस्विनः संन्यत्य संयान्त्यभयं पदं हरेः ।
अन्यत्र कल्प की आयु पाने की अपेक्षा भारतभूमि में क्षया भर भी जीना श्रेयस्कर है। भारत का मनस्व्री क्षणभर की आ्यु में ही शोभन सुकृत का सम्पादन कर भगवान् के आश्रय में भयरहित स्थान पा सकता है जो भोगभूमि का जीव कभी पा ही नहीं सकता। इस विकास के लिए उसे इस भूमि पर आना ही पड़ता है। यह है आर्यों के देश- प्रेम की स्वाधीन भावना।
गोंमहिमा
गाय भारतीय संस्कृति का प्रतीक है। वह निर्वल दीन हीन जीवों का प्रतिनिधित्व करती है। वह सरलता, शुद्धूता तथा सात्वििकता की मूर्ति है। हम उस भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते जिसमें गौओं का प्राधान्य नहीं, संत्कार नहीं, आदर नहीं। उनकी रक्षा करना एक पशु की रक्षा नहीं है, बल्कि वह अपनी ग्राचीन संस्कृति की रक्षा है। भारतीय संस्कृति के मूलस्थानीय गो-गौरव की कथा हमें संस्कृत भाषा के अनेक शब्द आज भी कहते हैं। संस्कृत-भापा की अ्नेक भावनाओं का सम्बन्ध साक्षात् रूप से गाय के साथ निबद्ध है। वह वेला जिसमें शुभ विवाहादि कार्य सम्पन्न होते हैं 'गोधूलि कहलाती है। इस समय गायें चरागाह से लौटती हैं और उनके खुरों से बहुत धूलि उठंकर उंड़ा करती है। इसी दृश्य के आधार पर वह सन्ध्यावेला गोवृलि कहलाती है। साहित्यिक जिस समाज में बैठ कर आनन्द उठाते हैं तथा साहित्य चर्चा करते हैं वह भी गाय के ही नाम पर 'गोप्ी' कहलाता है। गाच ठहरी उपादेय तथा अभिनन्दनीच वस्तु और उसकी खोन ही सच्ची
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आर्यों की सांस्कृतिक देन ३२६ खोज थी। जो 'गवेपणा' शब्द आज अर्थ-विस्तार के द्वारा सामान्य शोध या खोज के अर्थ में व्यवहृत होता है वह मूलतः गायों की ही खोज या चाह का द्योतक था। प्राचीन काल के रोखे गायों की आँख के समान गोल होते थे। इसी से भरोखों का सामान्य नाम है-गवाक्ष जिसका अपभ्रंश हुआ गोखा, मोखा या भोजपुरी में मूका। गायों के नाम पर अंगूर की एक विंशिष्ट जाति का नामकरए हुआ है-गोस्तनी द्राक्षा (गाय के स्तनों के समान लम्बे लम्बे अंगूर)। अंगूर प्रायः दो प्रकार के होते हैं-एक छोटे छोटे गोल दाना वाले जिसे केवल द्राक्षा कहते, हैं और दूसरे होते हैं लम्बे लम्बे दाने वाले। ये ही गोस्तनी द्राक्षा के नाम से अभिहित किये जाते हैं। द्राक्षा तक जब गाय का प्रसार है तब दुग्ध मात्र के 'गोरस' तथा दूध को औटाने वाली अंगीटी को 'गुरसी' (या भोजपुरी वोरसी) कहलाने में हमें आश्चर्य नहीं होता। गाय का सम्बन्ध पूजा के साथ भी है। जिसके भीतर माला फेरी जाती है तथा जिससे जल गिरता है उसे हम 'गोमुखी' कहते हैं। क्योकि वह वस्तु भी गाय के मुख के समान लम्बी पश्वाकृति वाली होती है। नाटकों ने भी अपने लिए गो-समाज से शब्द ग्रहण किया है। 'गोपुच्छ' नाटक शास्त्र का शब्द है जिसमें नाटक के विशिष्ट संगठन की ओर कवि का लक्ष्य रहता है। गाय की पूँछ आरम्भ में फैल कर बड़ी होकर धीरे धीरे कम होती जाती है। इसी सादृश्य के कारण नाटक की यह विशिष्ट योजना 'गोपुच्छ' का नाम धारण करती है। भगवान् का नित्य लीलाधाम गायों की क्रीड़ाभूमि होने के कार 'गोलोक' कहलाता है। ये गायें वस्तुतः मूलभूत पशुजातीय हो सकती हैं अथवा सूर्य की रश्मिरूपा हो सकती हैं ; इसमें मतः
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है। ऋग्वेद में इस गोलोक की सूचना मिलती है विप्ु सूक्तों में । एक ऋषि भगवान् विष्णु के इस उच्चतम लोक में जाने की प्रार्थना करता है कि मैं उस लोक में जाना चाहता हूँ जहाँ शीघ्रगामी बहुत सींगव"ती गायें निवास करती हैं- तदस्य प्नियमभि पाथो अश्यां यत्र गातो भूरिश्ंगा अयास: । विष्णु के इस तृतीय क्रम वाला स्थान उच्च होने से सूर्य का लॉक माना जाता है जहाँ उनकी किरसें नाना स्थलों पर टकराती हुई विचर करती हैं। अर्थ का स्वारस्य जो भी हो, इतना तो निश्चित है कि गो माता ने ही वैष्णव समाज को ऊर्व्वतम लोक के नाम- निर्देश का साधन प्रदान किया है। ऐसा होवे भी क्यों नहीं ? जब वह परात्पर त्रह्म ही गायों के पालक होने से 'गोपा' नाम से अभिहित किया गया है। इन्हीं वेदों में ऋग्वेद कहता है-विष्णुर्गोपा अदाभ्यः। विप्णु ऐसे गोप हैं जिनकी हानि कोई भी नहीं कर सकता ( अदाभ्यः) अर्थात् प्रतिपक्षी अपने सकल कल, वल, छल से जिनकी किसी प्रकार की हिंसा या हानि नहीं कर सकता वही सर्वसमर्थ भगवान् 'गोपा' शब्द से व्यहृत किये गये हैं। श्रीमद्भागवत के वानकृष्ण को गोपाल होने की सूचना पूर्ण रूपेय वैदिक है, पौराशिक ही नहीं। इस प्रकार गायें भारतीय संस्कृति की प्राण हैं। इसकी सूचना संस्कृत भाषा की शब्दावली भी भली भाँति देती हैं।
उपसंहार इस प्रकार भारतवर्ष के इतिहास में आध्यात्मिकता की धारा बहाने का श्रेय आर्यों को ही है। इन्होंन वर्णाश्रम की भित्ति पर मानव समाज का नियमन तथा नियन्त्रण कर हमारे जीवन को पारस्परिक संघर्ष से टहपा घोर विप्व से बचाया है। इन्होंने स्वार्थ तथा परमार्थ का मझजुल
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सामञ्जस्य प्रस्तुत कर विश्व के सामने एक आ्र््रदर्श उपस्थित किया है। आजकल पश्चिमी जगत् में one world की कल्पना विश्व के ऐक्य की भावना घर करती जा रही है; परन्तु भारत ने इस मन्त्र का शंख- नाद सहस्त्रों वर्ष पूर्व किया था-
अयं निजः परो वेति गणना [लघुचेतसाम्। उदार-चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।
Universal Brotherhood विश्वभ्रातृत्व की भावना 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का वर्तमान रूप है। अतः भारतीय संस्कृति को विश्व- जनीन, मृत्युञ्जय तथा विश्वव्यापक बनाने का श्रेय इन्हीं आर्यों को दिया जायगा जिन्होंने वेद तथा उपनिषद्, गीता तथा वेदान्त, रामायण तथा महाभारत का दिव्य आलोक जला कर इस भूतल के अज्ञान के गाढ़ तिमिर-पटल को दूर किया है। आर्य लोग सदा से परस्पर मैत्री परस्पर एकता तथा परस्पर सौहार्द के लिये तत्पर रहते थे। उनकी दृष्टि में मानव मानव में अन्तर नहीं था। उनकी उदार हष्टि विश्व को एक मानती थी। ऋग्वेद की अन्तिम ऋचा इस भाव को पूर्ण रूप से अभिव्यक्त करती है :-
समानी व आकृतिः समाना हृदयानि व:। समानमस्तु वो मनो यथा वः तुसहासति॥