Books / Kena Upanisad with Tika Hanumat Das Shata Sastri Subhadra Dasa Shastri

1. Kena Upanisad with Tika Hanumat Das Shata Sastri Subhadra Dasa Shastri

Page 1

ओम् राम

श्रीसद्गुरुकवीर हनुमत्साहित्यसभा-

ग्रन्थमालाया: द्वितीयपुष्पम्

केनोपनिषद्

ब्रह्मविद्‌दर्शऋषिश्रोस्वामिहनुमद्‌दासपण्डितशास्त्रि

कृतयस्सानुवादयासं कृत हिन्दीटीकया

सहिता

सम्पादक

स्वामी श्रोसुभद्रदासशास्त्रो

वि०सं० २०३७

रामनवमी

ई०स०१९८०

(प्रथमसंस्करण)

१००० प्रति

Page 4

त्यक्तेषणानां यमिनां वरिष्ठः, पारावर ब्रह्मविदां वरिष्ठः।

कारुण्य रत्नाकर साधवे नमः, श्री सद्गुरुम् हनुमान् महाभानु।

स्वामी श्रीहनुमानदासजी साहव षट्शास्त्री

ऋतम्भरा योगजधर्म जाता, प्रज्ञापरा यस्स विमुक्त शoka।

वैराग्य विज्ञान परावतारः, सोज्ज्यं गुरु श्रीहनुमान् वरीयान्॥

Page 6

ओम् राम

केनोपनिषद

श्री सद्गुरु कबीर हनुमत् साहित्य सभा

ग्रन्थमालाया: द्वितीय पुष्पम्

परमपूज्येनप्रातः स्मरणीयेन सद्गुरुदेवेन

स्वामिश्रीहनुमद्दासमहोदयेन पटुशास्त्रिणा

विरचिताभ्यांसंस्कृतहिन्दीटीकाभ्यां-समलङ्कृता

प्रकाशक :-

श्री सद्गुरुकवीरहनुमत्साहित्यसभा

प्रथमावृत्ति:

संवत् २०३७

सं १९८०

Page 7

पुस्तक मिलने का पता :-

पुस्तक मिलने का पता :-

(१) श्री जयस्तीलाल मणिलाल महेता, बी. ए.

(१) श्री जयस्तीलाल मणिलाल महेता, बी. ए.

रावपुरा कोठी के पास,

रावपुरा कोठी के पास,

शास्त्रीपोल के सामने,

शास्त्रीपोल के सामने,

मु. वडोदरा (गुजरात) ३९०००१

मु. वडोदरा (गुजरात) ३९०००१

(२) स्वामी श्री सुभद्रदासजी साहब सांख्ययोगवेदान्ताचार्य

(२) स्वामी श्री सुभद्रदासजी साहब सांख्ययोगवेदान्ताचार्य

के० ६७/६५-ए. महेश कालोनी,

के० ६७/६५-ए. महेश कालोनी,

शिवरगंज्जी, मु. वाराणसी १ ( उ. प्र. ) २२१००१

शिवरगंज्जी, मु. वाराणसी १ ( उ. प्र. ) २२१००१

मुद्रक :-

मुद्रक :-

हनुमान मुद्रण यन्त्र

हनुमान मुद्रण यन्त्र

बड़ी पियरी, वाराणसी २२१००१

बड़ी पियरी, वाराणसी २२१००१

Page 8

मंगलम्

सत्साहित्यसुधां निपीय सुधियस् त्यक्त्वा विषं वासनाम् ।

सुधीजन, सत्य साहित्यरूपी सुधा को संतों के यथार्थं साहित्य को मलीमति पान करके देहश्वारी

पञ्चक्लेशसुद्रवां जनिमृतां दुःखप्रदां सर्वदा ॥

मनुष्यों के पञ्चक्लेशों अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश से उत्पन्न सदा दुःखप्रद

ज्ञानं शान्तिकरं पुनर्भवहरं प्रज्ञापकर्षोज्ज्वलम् ।

वासनारुपी विषको त्यागकर प्रज्ञाकर्ष से उद्भूत जन्म मरण को हरनेवाले शान्तिकर ज्ञान और

सौख्यं देवसुदुर्लभं च धरणौ प्राप्सादयन्तु द्रुतम् ॥

देवदुर्लभं निरतिशय परमानन्द को धरातल पर शीघ्र प्राप्त करें ।

Page 9

ॐ राम

संस्था का परिचय

श्री सद्गुरु कबीर साहब का साहित्य अध्यात्मतत्व से सभर है। उनका उपदेश मानव समाज के लिए ऐक्य, विश्वबन्धुत्व की भावना और अध्यात्मतत्व की अपरोक्ष अनुभूति के लिए रहस्यमय उपदेश है। उनके उपदेशों को और उनके साहित्य को सुचारु रूप से समभने के लिए परम पूज्य अनन्त श्री सिद्ध श्री ब्रह्मविद्वरिष्ठ सद्गुरुदेव, श्रीस्वामीजी श्री हनुमानदासजी साहब-पटशास्त्रीजी ने, श्री बीजकग्रन्थ शब्दामृतसिन्धु, साखीग्रन्थ आदिकी टीकाएँ और श्री चितमुखी, ब्रह्मसूत्र, खण्डनखण्डखाद्य, गीता, विचारसागर, तत्त्वार्थ मरीमञ्जूषा, तत्त्वार्थंरीमाला, अध्यात्मतत्वसम्वाद, मनोबोध, अनन्त परिचय, विचारचन्द्रोदय, कबीरपरिचय, सद्धर्म चन्द्रिका लघुधर्म चन्द्रिका कबीरकौशलसार, तीसायन्त्र, दिव्यनामावली, बीजकार्थसार संग्रह आदि कई ग्रन्थों की टीकाएँ और रचना की है। परमपूज्य श्री सद्गुरुदेव श्रीस्वामीजी साहब का सर्व साहित्य, श्री सद्गुरुकबीर साहब के साहित्य को यथार्थ रूप में समभने के लिए अतीव उपयोगी और सहायकभूत है।

परमपूज्य श्रीसद्गुरुदेव श्रीस्वामीजीसाहब की अभिव्यक्ति ही पर ब्रह्मस्वरूप की अपरोक्ष अनुभूति रूप है। सन्तों की आध्यात्मिक स्थिति और उनका व्यक्तित्व अवर्णनीय है। शब्दों में उनके आनन्द का उनके ज्योतिर्मय दिव्य स्वरूप का वर्णन कैसे हो सकता है? वे तो स्वयंवेद्य हैं। उनके लिए यह जगत का अस्तित्व ही मिट गया है। वे सर्वत्र, सर्वदा, भीतर, बाहर, ऊपर, नीचे, दायें बायें, हर घड़ी, हर ठौर, केवल सर्वात्मा राम का ही दर्शन करते हैं। वे स्वयं राम स्वरूप हैं। उनका वर्णन कोई करे भी कैसे? सद्गुरु स्वरूप ऐसे महापुरुषों के दर्शन ही दुर्लभ हैं। उनकी दृष्टि भी जिस पर पड़ती है वही प्रेम में मस्त हो जाता है। वे जहाँ रहते हैं वहाँ के परमात्मओं में भी प्रेम भरा रहता है। उनके चरणों को छूकर पृथ्वी भी अपनी भाग्य सराहती है। उनके व्यक्तित्व में ऐसी एक अद्भूत शक्ति है कि जो मनुष्य को उनके समीप जाते ही एक क्षण में प्रेम रस में मग्न कर देती है। उनकी मधुर मृदुवाणी प्रवाह में यह ताकत हैं कि वह सबको अपना बना लेती है और मनको शान्ति देकर मनोवृत्ति को अन्तगुं ब करती

Page 10

हैं । आधुनिक युग के वे एक अनुपम प्रतिभाशाली व्यक्ति हैं । अपनी प्रतिभा के वल से उन्होंने अनेक परिस्थियों का सामना किया और समाज का उत्थान किया, भक्ति रस का सिचन किया, और सदगुरु कबीर साहेब का पवित्र अमर संदेश जगत को ताडग्रूप में समभावा । उनका व्यक्तित्व अनेक विशेषताओं को पुञ्ज है । वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी, सिद्ध योगी, वीतराग महा उपदेशक और आधुनिक विश्व में ज्ञान की पराकाष्ठा में पहुँचे हुए महानसिद्धसन्त पुरुष हैं । आप निःृृतिमार्ग के परम सन्त नेता हैं । शास्त्रों में और सन्त मत में वर्णित जीवनमुक्त दशामें आप स्थित हैं ।

आपका सर्व साहित्य सदगुरु कबीर साहब के उपदेशों को यथार्थ रूप में समझने के लिए अतीव उपयोगी ओर सहायभूत है । इससे श्रीसदगुरु कबीर- हनुमत् साहित्य का सुचारु रुपसे अधिक प्रसार प्रचार करने के लिए और इस साहित्य की सेवा अविरोधरहित सतत अस्खलित प्रवाह के रूप में हमेशा के लिए चालु रहे इस उद्द श्य से इस साहित्य सभा ट्रस्ट का निर्माण किया गया है ।

प. पू. श्री सद्गुरुदेव श्री स्वामीजी साहेब के प्रेमी, अनुयायी शिष्य, सन्त, भक्त मंडल की बहुत दिनों से तीव्र उत्कंठा थी कि इस साहित्य का प्रचार और प्रसाद सर्वजनहितार्थ किया जाय और वह साहित्य अल्प मूल्य में या अमूल्य आमजनता को प्राप्त हो इस के लिए एक ट्रस्ट कायम किया जाय । उन्होंने अपने विचार व्याकरण, वेदान्त सांख्ययोगाचार्य, श्री सदगुरु कबीर मन्दिर, पानीगेट, वडोदरा के आगे प्रकट किए और श्रीमहन्त साहेब ने उनकी प्रेरणा से आपने अपनी तरफ से स्थायी कोशमें सहायता भी की । हमारा उत्साह खूब बढ़ा और यह संस्था प्रवर्तित हुई, और श्री सदगुरु कबीर हनुमान् साहित्य सभा ट्रस्ट का निर्माण ता. ५-२-१९७७ बसंत पंचमी के रोज हुवा । इस संस्था को गुजरात राज्य के धी बोम्बे पब्लीक ट्रस्ट एक्ट अनुसार बडोदरा मे. एस. चेरीटी कमीशनर की ओफोस में रजिस्टर कराया गया है । इसका ट्रस्ट रजिस्ट्र शन नंबर ए २४६८ है । इस ट्रस्ट का प्रथम ट्रस्टी मंडल निम्नांकित है ।

१ श्री १०८ महन्त परिडत श्रीरामेश्वरानान्दजी साहब, बडोदरा—प्रमुख

२ श्री १०८ महन्त श्री रामदासजी साहब, चकना—उपप्रमुख

३ श्रीस्वामो श्रीसुभद्रदासजी साहब शास्त्री, वाराणसी—सह मंत्री

४ भक्त श्री जयन्तीलाल मगनलाल महेता, बडोदरा—मंत्री

५ भक्त श्री डाह्याभाई छगनभाई पटेल, बडोदरा—उपमंत्री

Page 11

इस ट्रस्ट की साहित्य सेवा की प्रवृत्ति ट्रस्ट के स्थायी कोष के व्याजमें से की जायमी ! इसके लिए पुस्तकें, पत्रिकाएँ और सामयिकों का प्रकाशन कोई भी ज्ञाति, सम्प्रदाय या जाति को लक्ष्यमें न रखकर सर्वजनहितोपयोगी सार्वजनिक हित को लक्ष्य में रखकर किया जायगा। वह सिर्फ कोई एक धार्मिक सम्प्रदाय या जाति या ज्ञाति के लिए नहीं रहेगा। वह साहित्य मानव समाज के मन, अन्तःकरण और आत्मिक उन्नति के लिए बिना साम्प्रदायिक क्षुद्राशयिक प्रवृत्ति के रूप में रहेगा। पुस्तकें, पत्रिकाएँ तथा सामयिकों का प्रकाशन नफाकी हष्टि से नहीं किया जायगा। ट्रस्ट के संचालन का व्यावहारिक खर्च बाद करके ट्रस्ट की जो आवक होगी सो सर्व ट्रस्ट के चेरिटेबल उद्दिष्टयों की पूर्तीकि लिए हो खर्च की जायगी। ट्रस्ट कार्सर्व जाहेर जनता के लिए नफा रहित, लागत मूल्य से या लागतमूल्य से भी कम मूल्य से, या अमूल्य वितरण किया जायगा।

इस ट्रस्ट की प्रवृत्ति के मंगलाचरण के रूप में ट्रस्ट के प्रथम भक्त के तरफ से सद्गुरु कबीर साहेब का चित्र इ. स. १६७७ के प्रयागराज के कुंभमेला के शुभ अवसर पर अमूल्य वितरण किया गया था। इस चित्र की प्रति आज भी जिसको चाहिए तो ट्रस्ट की ऑफिस श्री सद्गुरु कबीर साहबका मंदिर, पानिगेट वडोदरा, या ट्रस्ट के मंत्री श्री जयन्तीलाल मणिलाल महेता-ठि. रावपुरा कोठी के पास, शास्त्री की पोल के पास, वडोदरा से प्रात होगा। इस ट्रस्ट के साहित्य की ग्रन्थमाला के द्वितीय पुष्प के रूप में इस पुस्तक को प्रकाशित करते हुए हम अतीव आनन्द की अनुभूति कर रहे हैं। इस अमूल्य पुस्तक से आमजनता अध्यात्म तत्वकी अनुभूति के लिए प्रेरित और लाभान्वित हो यही इसकी सार्थकता है। इस ट्रस्ट के स्थायी कोष के लिए सहायता आवकार्य है।

इस पुस्तक में प. पू. श्री सद्गुरुदेव श्री स्वामिजी साहब की व्याख्या-आलोचना अतनी विशिष्ट शैली युक्त, अर्थ गांभीर्य युक्त और गहरसयमय है। यही इसकी विशिष्टता है।

आपका नम्र सेवक, जयन्तिलाल मणिलाल महेता, मंत्री.

Page 12

सर्वज्ञं सच्चिदानन्दं सर्वात्मानं महेश्वरम्‌ । व्यापकं सर्वलोकानां कारणं तं नमाम्यहम्‌ ॥ १ ॥

सर्वज्ञ-सर्वसाक्षी, सच्चिदानन्द स्वरूप, सर्वात्मा-सर्वान्तर्यामी, महान्‌= विभु=मायईश्वर, व्यापक-सर्वलोकादि का जो सत्तामात्र से कारण है, उसको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥

प्राणादि प्रेरकं शुद्धं सत्तामात्रैक्य यद्वेत् । ज्जेयं तन्निगुं यं ब्रह्म, घ्येयं तत्सगुणं भजे ॥ २ ॥

जो सत्तामात्र से प्राणादिका प्रेरक होता है, अतएव जो क्रिया गुणादि रहित शुद्ध निर्गुण ब्रह्म है ज्जेयब्रह्म है, वही मायासे सगुण होकर घ्येय होता है, उसको मैं भजता हूँ ।२।

सद्गुरो वचनाज्ज्ञेयं वेदान्तैर्वेद्यमव्ययम्‌ । अक्षरं परमं ब्रह्म वन्दे सच्चित्सुखाल्पकम्‌ ॥३॥

जो अक्षर=अविनाशी सच्चिदानन्दस्वरूप अव्ययपरम ब्रह्म, सद्गुरु के बचन से ज्ञातव्य है, तथा वेदान्तों से वेद्य=अनुभवनीय है, उस पर ब्रह्म की वन्दना करता हूँ ॥ ३ ॥

अस्या उपनिषदः पूर्वोक्तोपनिषदां सहाङ्गैः पदैर्निकल्वणं समन्व वर्तते, तदेव तदनन्तरपठितादौ हेतुत्वेन प्रतिभाति । तत्र निर्विघ्नत्वाद्यर्थः शान्तिपाठो वर्तते । तथाहि—

Page 13

ॐ-श्राप्यायन्तुममाझ्ञानी वाक्प्राणाश्रुध्दः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियायि च सर्वाणि, सर्वं ब्रह्मोपनिषदं, माऽहं ब्रह्म निराकुर्यां, मा मा ब्रह्मनिराकरोदनिराकरमस्त्वनिराकरणं मास्तु, तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ ३ ॥

मम=उपनिषदध्ययनाध्यापनादिकतुं मुं मुखोरऽञ्जानि शरीरसर्वावयवात्म- कानि=आय्यायन्तु वृद्धानि पुष्टानि भवन्तु वागादिकमेन्द्रियाणि चक्षुः श्रोत्रादि ज्ञानेन्द्रियाणि प्राण च सूक्ष्माणि सर्वाण्यप्यायन्तु पुष्टानि भवन्तु । अध्यनाध्यापनाद्यात्मकुल्येनात्र शरीरार्ऽस्वास्थ्यप्रार्थनाऽस्ति प्रवचन श्रवण दर्शना- च्चाकुल्येन वागादिपुष्टिप्रार्थना वर्तते । यतः स्वास्थ्यपुष्ट विना तत्त्वे- रकत्वेनोपदिष्टं ब्रह्म वोढुं न शक्यते-इति । बलश्वाऽऽड्यायातु वृद्धो प्राप्नोतु, यतः "नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः । मुण्डक ३।२।४" विवेक वैराग्या- त्यात्मकशक्तिहीननाड्यमात्मलऽभ्योस्ति, योडत्र प्राणादिप्रेकल्वेन पुष्टोरस्सि सर्वममाझ्ञानी सर्वं जगद्-औपनिषदम् उपनिषदै कज्ञेयं ब्रह्मात्मकमेव भातु, इत्यं सर्वस्थ्य ब्रह्मात्मकल्वेन स्वीकारात्तदनुभवाच्चाहं कदाचिदपि ब्रह्म मा (न.) निराकुर्याम्, सर्वथा सर्वात्मकल्वेन स्वीकुर्याम् । ब्रह्मणि श्रद्दध्देम, यद् ब्रह्मात्मकमेव सर्वसत्त्वं विद्यते इति, अपरोक्षी च कुर्याम् । ब्रह्म च मा मा निराजकरोत्-मत्स्वो- न्यत्परोक्षं च न भवतु, ममात्मल्वेन भातु ब्रहमेति प्रार्थये, इत्यश्चावयोरनिराकरणमस्तु, मम च विशेषेणाड निराकणमस्तु, ब्रह्मत्वं भातु, यतो मम स्वरूपाऽपरोक्ष्याद् ब्रह्मस्वरूपेण भानादेव मम नि:श्रेयसं स्याद्, अतस्तदात्मनि-ब्रह्मात्मनि, निरते-नितराम- त्यन्तनित्यप्रेमवति मयि ये=विरागशमादयो धर्माः सत्यादयश्र्च ज्ञानसाधन- ल्वेन प्रसिद्धा वर्णिताः सन्ति । ते धर्मा मयिसन्तु तेष्वश्यमेव मयिसन्तु ॥

शरीरेऽचसि स्वान्ते शान्तिः सत्यं च सर्वदा । स्वाऽऽत्मन्यं भवतु तापत्रयाच्छान्ति पाठतः ॥ १ ॥

ॐ=हे परमात्मन्, मम=उपनिषद के अध्ययनाध्यापन-पठन पाठन रूप कर्मकरने वाले मुं मुख्य मुं ख शरीरके अवयव रूप सब अङ्ग 'आय्यायन्तु' वृद्धि

Page 14

युक्त पुष्ट होवें । वाकुहस्तादि कर्मेन्द्रिय तथा प्राण नेत्र-करणदि ज्ञानेन्द्रिय जो सूक्ष्म हैं, वेसवी वृत्तियुक्त पुष्ट हों। यहां अध्ययन अध्यापन के अनुकूल=योग्य, शरीराङ्गों के स्वास्थ्य की प्रार्थना है । प्रवचन=व्याख्यान, श्रवण दर्शनाादि के अनुकूल वागादि पुष्टि की प्रार्थना है । क्योंकि स्वास्थ्य तथा पुष्टि के बिना, वाक्प्राणादि के प्रति रेक जिस ब्रह्मात्मा का उपदेश है सो समझा नहीं जासकता है।। और सात्विकधर्मेण्यधारणादिरूप बलकी भी वृद्धि पुष्टि को प्राप्त करें, क्योंकि "नाडयमात्माबलहीनैन लभ्य:" मुण्ड. ३।२।४।।

वाक्प्राणादि का प्रेरक यह सर्वात्मा विवेक वैराग्यादि सत्य तप आदि बलहीन=रहितसे प्राप्त-ज्ञात करने योग्य नहीं है । अतः बलार्थक प्रार्थना है । सर्वम्, मेरे बन्धादि सब जगत्, औपनिषदम्, उपनिषन्मात्रसे ज्ञेय=जानने योग्य ब्रह्मस्वरूप ही मुझे प्रतीत हो, यह भी प्रार्थना है । इसप्रकार से सब के ब्रह्मस्व-रूपत्व के अनुभव से (अहं) मैं कभी भी ब्रह्म का निराकारत्व (मा) नहीं करूंगा, सर्वात्मस्वरूप ब्रह्मकी अविश्य स्वीकार करूंगा ब्रह्म च ब्रह्मा च ब्रह्मा भी मा ( माम ) मुके मा=नहीं ( निराकरेत् ) निराकरणा=निषेध नहीं करे । अर्थात् हमसे भिन्न परोक्ष ब्रह्म नहीं हो जाय, किन्तु मेरी आत्मस्वरूपसे सदाप्रतीत अनुभूतहो यह ओंकारार्थ परमात्मासे प्रार्थना है । इस प्रकार ब्रह्मात्मा दोनों का ( अनिराकरयामस्तु ) अनि- करण हो। ( ये अनिराकरयामस्तु ) मेरा विशेषरूप से अनिराकरणा हो, मुझे ब्रह्मात्मता प्रतीत हो, कि जिससे एतदात्मनित्रह्मात्मनि=ब्रह्मस्वरूप में, निरत=अतिप्रेमयुक्त शुभ में जो उपनिषद् में विरागशमादि धर्मप्रसिद्ध हैं, सो अवश्य प्राप्त हो ।।

शरीर वाङ्मय स्वस्ति शान्तिः सत्य च सद्दा । स्वास्थ्य भवतु तापादेरभाव शान्ति पाठतः ।।

शरीर वचन और मन में शान्ति पाठ से स्वास्थ्यसत्य और शान्ति सदा हो और तापादिका अभाव हो ।। १ ।।

सामवे शीयवाद्यात्मिकायो शाखायाम्-अद्वैतश्रायेषु चित्तशुद्धच-र्यादिकर्माणि प्रतिपादितानि वर्तन्ते, समस्तकर्मश्रात्मकस्य प्राणस्यो-पासनान्यपि तत्रोक्तानि सन्ति, ययोः कर्मोपासयोः पृथक् समुच्चयातनुष्ठानाद् दक्षिणोत्तरमार्गाभ्यां चन्द्रलोकादौ ब्रह्मलोके च गताना मावृत्यनावृत्ती भवतः । स्वाध्यायिकृत्या त्वागतभवत्यादि भाष्यम् ।।

यात्मकोडयं केनोपनिड्ग्रन्थोऽवर्तते । तस्य ब्रह्मात्मविषयतांप्यंलिड्नानि च श्रीपण्डित पीताम्बरेण प्रोक्तानि सन्ति-

Page 15

श्रोत्रस्येत्याद्युपक्रम्य प्रतिबोधादि वाक्यतः । कृतस्त्व् उपसंहारः स विज्ञेयस्तु पण्डितैः ॥१॥

श्रोत्रस्य श्रोत्रमित्युपक्रम्य, प्रतिबोधं विदितं मतम्, इत्यादिवाक्यतोपसंहारः कृतोऽस्ति, स पण्डितैः ज्ञेयोऽस्ति, तयोस्वेकरूपत्वमेकं लिङ्गम् ॥ १ ॥

तदेवब्रह्मत्वं विद्धीत्यादिभ्यास उदीरितः । न तद्वेदयितृवर्यं प्रेक्ष्यात्मपदिति हि कथनं ॥२॥

तदेवब्रह्मत्वं विद्धीत्यादितोऽभ्यासाद्यद्वितीयम् ॥ २ ॥ न तत् चक्षुर्गच्छती-त्यदितोऽपूर्वत्वम् ॥ ३ ॥ भूतेषु भूतेषु विचित्य धीरा: प्रत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति । इति फलत्वकं लिङ्गम् ॥ ४ ॥ ब्रह्म हि देवेभ्योविजिये, इत्यर्थवादात्मकम् ॥ ५ ॥ अविभातं विजानतां विज्ञातमविजानातामित्यनेनोपपत्तिः प्रदर्शिता ॥ ६ ॥

एतैः केनोपनिषदोदितैः तत्पर्यमिष्यते ॥३॥

निष्काम कर्मोपासनाभि विशुद्धशान्तचित्तोजस्य विद्यांया अधिकारी स्थात्, स च आचार्यवान् पुरुषो वेद, छा० ६ । १४ । २ ॥ इत्यादिशास्त्रात् कश्चिद् ब्रह्मनिष्ठं गुरुं विधिवदुपेत्य प्रत्यगात्मविषयज्ञानादन्यत्र शरणमपश्यन्, अभयं नित्यमचलं शिवमिच्छन्नुपच्छेति कल्प्यते-इत्यादि भाष्ये । कल्पतस्य प्रश्नकर्तुः प्रश्नोऽयं वर्तते, केनेषित-मिल्यादि ।

सामवेद के नव अध्यायात्मकशाखा के आठ अध्यायों में चित्त की शुद्धि आदि के हेतु कमों का प्रतिपादन है । और सव् कर्म के आश्रय स्वरूप प्राप्त की उपासनाें भी उन अध्यायों में कहीं गईं हैं जिन कमोंपासनाओं के पृथक्-पृथु और समुच्चय=साथ अनुष्ठान=आचरण से दक्षिणा और उत्तर मार्गों द्वारा चन्द्रलोकादि में और ब्रह्मलोक में प्राप्त जीवों को आवृत्ति और अनावृत्ति की प्राप्ति होती है । और स्वाभाविक प्रवृत्ति से अधोगति ही होती है, इत्यादि भाष्य में वर्णित है ॥

उक्त शाखा हेत्वर्थप्रतिपादिक, आवृत्तिनिरासप्रतिपादक रहितानुपोदर्शकात्मज्ञान के प्रतिपादक यह केन उपनिषद है । उसके ब्रह्मात्मविषयकतात्पर्य के बोधक लिङ्ग हैं कि-

Page 16

श्रोतस्येत्पाद्युपक्रम्य प्रतिबोधादिवाक्यतः। कृत्स्रच ह्यपसंहारस्तौल्याद् प्रथमं स्मृतम्॥ १॥

श्रोत्रस्य यहां से उपक्रम=आरम्भ करके “प्रतिबोधं विदितंमतम्,” इत्यादि वाक्य से उपसंहार किया गया है, वे दोनों उपक्रम और उपसंहार प्रथम लिख्‍ कहा जाता है ॥१॥

तदेव ब्रह्म त्वं विद्धीत्याद्यभ्यास उदीरितः । न तत्पुनरुपूर्ववत् प्रेत्यस्मादितिव फलम्॥ २॥

तदेव ब्रह्मत्वंविद्धि, इत्यादि अभ्यासात्मक दूसरा लिख्‍ है ॥२॥ “न तत्चतुरगच्छत्नित,” इत्यादिते तृतीय वपूर्वंता कही गई है ॥३॥

वृह्हेत्याद्यर्थवादो विज्ञान्तमिति चान्तिमम् । एतैः केनोपनिषदौद्दते तात्पर्यमिष्यते ॥ ३॥

भूतेषु भूतेषु विचित्यधीरा: प्रेत्यास्मालोकादमृताभवति” इससे फलात्मक चतुर्थलि्‌ड सिद्ध होता है ॥४॥ “विज्ञातं विजानतां वित्तातमविजानतं” इत्यादि अर्थवादरूप लि‌ज्ञ है॥५॥ इन लि‌ज्ञांदारेकेनोपनिषद के अद्धे तत्त्व में तात्पर्यमान जाता है ॥१—३॥

निष्काम कर्म उपासना से विशुद्‍ध चित्तवालाइस ब्रह्मविद्या का अधिकारी होता है, सो “आचारवान् पुरुषो वेद, छां। ३।१४।१” आचार्य=सद्गुरुवाला पुरुष ही ब्रह्मात्मा को जानता है, इत्यादि शास्त्र के अनुसार, किसी ब्रह्मनिष्ठ-सद्गुरु के शरण मे विधिपूर्वक प्राप्त हो कर, प्रत्यगात्मा-सर्वान्तरात्मा के ज्ञानके बिना अत्यन्त करणी परमार्थ-प्रत्यक्‍ को नहीं देखता हुजा, और, जन्य मिल्य शिव=शुभ कल्पाए के इच्‍छुक होता हुजा, उक्त सद्गुरु से पूछा=प्रश्न किया, ऐसी कल्पना यहां की जाती है, इत्यादि भाष्य में कहा गया है । कल्पित उस प्रश्न कर्ता के प्रश्न रूप “केनेषितमिति” इत्यादि वाक्य है—तथाहि

केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः । केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥१॥

केन कर्ता प्रेषितं प्रेरितं प्रस्थापितं मनः स्वेषितं स्विष्टं वाञ्छितं विषयं प्रति पतति गच्छति, करणत्वान्मनसः स्वातन्त्र्यप्रवृत्यसम्भवादात्मनश्र-सङ्कल्पान्निष्क्रियत्वादचलत्वाच्चाप्रेरकत्वात्संशयो वतते । किञ्च “इन्द्रिय-

Page 17

याणां मनो नाथो मनो नाथस्तु मारुतः" इत्यादिवचनान्मनसः प्रवृत्ति-शीलस्येन्द्रिय स्वामित्वात् तस्य च प्राणस्वामित्वात्, प्राणाधीनामनसः प्रवृत्तिः स्यादिन्द्रियाणां मनोज्ञीनां प्रवृत्तिः सम्भवेद् अतः मन आदिस्वामित्वेन प्रेरकत्वेनान्तरात्मा ज्ञातव्योऽस्ति, अथवा प्राणनिरोधपूर्वकं मनोनिरोधाद्यात्मकः समाधिरवस्थासन्निपात इति संशयो वर्तते। इषितादौ छान्दस इट्॥

केन-किस कर्त्रा इषितं, प्रैषित-प्रेषित-मारुत-मनः, स्वेष्ट-स्वेच्छत-अपने वाञ्छित विषयों के प्रति पतति-प्राप्त होता है जाता है ? मन के करण होने से उसकी स्वतन्त्र प्रवृत्ति नहीं हो सकती है, और आत्मा भी असङ्ङ अचल अक्रिय है, अतः प्रेरक नहीं हो सकता है, इससे संशय होता है। और "इन्द्रियारां मनो नाथो मनोनाथस्तु मारुतः" इन्द्रियों का मन स्वामी-नेता है, मन का स्वामी राजा मारुत-वायु है, इत्यादि वचनों से प्रवृत्तिके स्वभाववाला मन इन्द्रियों का स्वामी सिद्ध होता है, और मन का स्वामी-नेता प्राण सिद्ध होता है, जिससे प्राण के आधीन मन की प्रवृत्ति होती है, और मन के आधीन इन्द्रियों की प्रवृत्ति होती है, अतः मन आदि के स्वामी और प्रेरक रूप से आत्मा ज्ञातव्य=जानने योग्य है, अथवा प्राण निरोध पूर्वक मनोनिरोधादि-स्वरूप समाधि का ही अभ्यास कर्तव्य है, यह संशय होता है॥ अतः केनेति प्रश्न है॥१॥

इसी प्रकार प्राण अपान, समान, व्यान और उदान नामक ( प्रथम ) मुख्य=प्राण, "केन युक्तः" किससे नियुक्त=प्रेरित होकर प्रैति=प्रवृत्त होता है, सदा चलता है, यह प्रश्न है। केनेषितं=किससे इष्ट-= वाञ्छित; वाकू= वाणी=शब्द को मनुष्य बोलते हैं, तथा नेत्र और श्रोत्र को ( क उ ) कौन विलक्षण देव-चोतक ही (युनक्ति) अपने २ विषयों से संयुक्त करता है; संयोग के लिये प्रेरणा करता है, ये प्रश्न हैं ॥१॥ केनेषितं मनः; यह सामान्य प्रेरक विषयक प्रश्न है, प्रेक्षितमू, यह विशेष प्रेरक विषयक है 'छान्दस इट है, सो भाष्यादि से ज्ञातव्य है॥१॥

Page 18

मनसः प्रवृत्तिशीलत्वेऽपि करणत्वाजडत्वाच्च नियतां प्रवृत्ति नंसम्भवति चेतनाधिष्ठातरमन्तरा, आत्मनश्श्वास डत्वेऽपि चुम्बकादिवत् सत्ताप्रकाशादिशक्तिभिः प्रेरकत्वादि सम्भवतीत्यादाश्रयेन गुरुरूपिणी श्रुतिराह—

मन के प्रवृत्ति शील=स्वभाव होते भी करणत्व और जड़त्व के कारण स्वयं नियत प्रवृत्ति नहीं हो सकती है, और आत्मा के असङ्ग होते भी चुम्बकादि के समान सत्ता प्रकाशादि शक्ति द्वारा प्रेरकत्वादि ही सकते हैं, इत्यादि आशय से गुरु रूप श्रुति कहती है कि—

श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचं सउ प्राणस्य प्राणाश्चक्षोः रतिमुख्य धीरा: प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति:॥ २॥

यत्‌=यो मन आदि प्रेरक आत्मा पृष्ठोभूत । स श्रोत्रस्य शब्दग्राहकेंद्रियस्य श्रोत्रम्=आत्मभूतं शब्दप्रकाशनशक्तिप्रदं वतते । चेतनाजड़मन विना श्रोत्रेन्द्रियेण तद्वृत्त्यापि न च शब्द प्रकाशनाज्जसम्भवात् । मनस इन्द्रियात्मकत्वेऽपि करणत्वाजडत्वाच्च स्वतः विपयप्रकाशत्वकस्य ज्ञातृत्वस्य तत्र सम्भवोनास्ति, तस्य सात्विकक्लेन तत्र चिदाभिव्यक्तेस्तदीनस्यैव तस्येन्द्रियस्वामित्वेनापि भवति नान्यथा, अतएव संकल्पविकल्पात्मकस्य ज्ञानसाधारणसाधनस्य मनसो यत्सत्ता स्फूर्तिप्रदं ब्रह्माज्ञत् , तदेव श्रोत्रादिप्रेरक आत्माजस्ति नान्यः । वाचां वाचं=प्रसिद्धस्य वागिन्द्रियस्य शब्दोच्चारणशक्तिप्रदं तमात्मानं विद्धि । अथवा वाचमित्यस्य वागिति विपरिणामः कर्तव्यः । पूर्वोपरसामान्यात्, तथा च वाचोह वागात्माजस्ति । एवं स त्वया पृष्ट आत्मा, प्राणस्य पञ्चावयवात्मकस्य मुख्यस्यापि प्राणस्य मनसो नाथत्वेन कथितस्य प्राणः शक्तिप्रदः स्वरूपसाधक आत्मैवास्ति । एवं चक्षुपो नेत्रेन्द्रियस्य चक्षु:=विषयप्रकाशात्मकस्वरूप आत्माजस्ति । तथा च श्रोत्रादि सर्वेन्द्रियाणां प्राणस्य च शक्त्यत्सकः सर्वस्य स्वरूप साधकश्रयो ब्रह्मात्मा वतते, तस्यैवाज्ञानात्संसारवन्धो जन्मादिलक्षणो जीवस्य भवति । अतः सर्वसाधकं तं ज्ञात्वा=इत्यधाहत्य वाक्यार्थो वोधव्यः । धीरा धिमन्त आत्मज्ञास्तं ब्रह्माज्ज्ञातमात्मानं त्यक्त्वा पुनश्राःमामत्यक्षाददेहादिलक्षणाल्लोकात्रेत्य पृथग् भूत्या सर्व—

Page 19

सञ्ज्ञादिरहिताः सन्तो विमुक्ता अमृता नित्यमुक्तब्रह्मात्मस्वरूपा भवन्ति । अतः कामादित्यागेनासज्जो भवितव्योऽस्ति मुमुक्षोरिति । त्यक्तेन भुज्यीथा:; इनि पूर्वोंपनिषदिग्रोक्तएवोपदेश इहापि प्रकारान्तरेणाभिहित इति मन्तव्यम्‌ ॥ २ ॥

( यद्‌ ) जो मन आदि का प्रेरक पूछा गया है, जिसके ज्ञान के लिये प्रश्न किये गये हैं, सो सर्वात्मा होने के कारण शब्द ग्राहक श्रोत्र=कर्णेन्द्रिय का श्रोत्र=आत्मा है, शब्द प्रकाशन शक्ति देने वाला है, क्योंकि चेतनात्मा के विना श्रोत्रेन्द्रिय से या उसकी वृत्ति से भी शब्द का प्रकाश=अनुभव जीव को नहीं हो सकता है, मन के इन्द्रियों के स्वामी होते भी करणत्व जड़त्व के कारण स्वतः विषय प्रकाशकत्व ज्ञानत्व का मन में होना असम्भव है। किन्तु मन के सात्त्विक होने के कारण उसमें चिदात्मा अभिव्यक्त होता है, और अभिव्यक्त चिदात्मा के आधीन ही मन के इन्द्रिय स्वामित्व भी सिद्ध होता है, अन्यथा नहीं । अतएव संकल्प विकल्प स्वरूप ज्ञान के साधारण साधन स्वरूप मन के सत्ता स्फूर्ति=प्रकाश को देने वाला=करने वाला जो ब्रह्म सर्वात्मा है, वही श्रोत्रादि का प्रेरक आत्मा है, अन्य नहीं ॥ वाचोह वाचम्‌, प्रसिद्ध वाक् इन्द्रिय के वाक् आत्मा को समझना चाहिये । अथवा "वाचो ह वाकू" ऐसा पाठ समझकर, वाको का वाक् आत्मा है; ऐसा अर्थ समझना चाहिये। इसी प्रकार, ( स उ ) श्रोत्रादि के आत्मा ही मुख्य प्राण का भी प्राण=आत्मा है; तथा चक्षु का चक्षु=शक्तिप्रद आत्मा है । उक्त रीति से श्रोत्रादि सब इन्द्रिय और प्राणों के भी जो सत्ता शक्ति प्रद ब्रह्मात्मा है, उसी के अज्ञान से जन्मादि रूप संसार बन्धन जीव को होता है । अतः धीर आत्मज्ञ ज्ञानी सर्वात्मस्वरूपप्रबुद्धब्रह्मात्मा जानकर श्रोत्रादि में आत्मत्वबुद्धिदृढअज्ञान=भ्रमको तथा मन्ताज्ञाता श्रोता आदि के सब अभिमानों को ( अतिमुच्य ) त्यागकर फिर इस प्रत्यक्षदेहादि स्वरूप ( लोक ) दृश्य संसार से ( प्रेत्य ) पृथक् सर्वथा असज्ज् हो कर, वे धी=विद्वान् अमृत=नित्यमुक्त ब्रह्मत्वस्वरूप हो जाते हैं, अतः कामादि को त्याग कर असज्ज् होनाअमु मुक्तु का कर्तव्य है, इत्यादि ॥ २ ॥

श्रोत्रादीनाम*ग्राल्मत्वाच्छ्रोत्रादिविषयत्वेनैदमिल्यथाऽऽत्मन उपदेशो न सम्भवति, किन्तुकोऽयमेवोपदेशस्साधुत्व मस्तीत्याद्यशयेनाह श्रुतिः:

Page 20

न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति न मनो न विद्धो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यादन्न्यदेव तद्विदिताथो अविदितादधि, इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे ॥ ३ ॥

तत्र=श्रोत्रादीनां श्रोत्रत्वादिनोक्ते ब्रह्मात्मनि, चक्षुः रूप-रूपवद्वस्तुग्राहकमिन्द्रियं न गच्छति, तमात्मानं न गृह्णाति, तत्र रूपाभावात् । किश्च ब्रह्म सर्वोत्कृष्टस्त, ततश्श्रुतिश्रुत्यर्थात्मत्वादात्मा च प्रवृत्तिनिवृत्त्यनुपपत्ते रपि चक्षुर्ब्रह्मात्मनि न गच्छति, काष्ठादिदाहकस्तत्प्रकाशकोऽपि वहिन न्स्वात्मानं दहति, प्रकाशयति वा किन्तु दाहकप्रकाशस्वरूपेण तिष्ठति, तथैव सर्वात्मा ब्रह्म कस्यचिदिन्द्रियादेः प्रकाशनादिक्रियाविषयो न भवति, किन्तु प्रकाश ज्ञानादि सर्वोपरिकसर्वरूपेण्युपाधिसत्क्वालेस्वतिष्ठते । अतश्श्रुतिश्रुत्यर्थविषयत्वेऽपि स्वर्गशब्दादिवाच्यविषयत्वं स्यादित्यपि न वक्तुं शक्यते, यतस्तत्र न वाग् गच्छति, वाचाहि शब्द उच्चार्यमाणे यदा शब्दो वाच्यमर्यं प्रकाशयति, तदाऽभिधेयं ( वाच्यं ) प्रति वाग् गच्छति, ब्रह्मात्मा च न कस्यापि शब्दस्य वाच्यो भवति, जाति गुणक्रियादिर्मवतोऽर्थस्यैव वाच्यत्वप्रसिद्धेः; किश्च शब्दस्य तत्रवर्तकस्य जनकस्य च वागिन्द्रियस्याऽऽत्मा ब्रह्मार्गस्ति, आत्मनि च कस्यापि गति नं सम्भवति, नहि जल्मातमानं ब्लेदयतीति, अतः "नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यः । कठवल्ली ६।३।१" "यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सहा, तैत्तिरीय २९" इत्यादि संगच्छते । अत एव च, नो मनस्तत्र गच्छति, स्वभिन्नस्यैव मनसा संकल्पादिसम्भवात्, स्वाऽऽत्मनि मनसोऽपि प्रवृत्ति नं सम्भवति । अतएव च "मनसो मनो यद्" इत्येवमेवात्मन उपदेशेऽपि सम्भवति, न च मनो विषयत्वेनैति भावः इन्द्रियमनोभ्यांश्च वस्तुतो विज्ञानस्य सम्भवात, तयोरगोचरत्वाच्च ब्रह्मात्मनस्तद् ब्रह्म वयं न विद्धो न जानीमइदमित्यतया, किन्तु मनसो मनस्तया मन आदिसाक्षितया च जानीम एवास्तो ब्रह्मोपदेशश्रवणार्थक्यास्स्पति नं भवतीति गुरु उक्तवान्तः ।

Page 21

चैतद् ब्रह्म यथा=येन प्रकारेण कश्चिच्छिष्यं प्रति=अनुशिष्यादुपदिशे तत्त्पकारं वयं न विजानीमः;, यतः श्रोत्रस्य श्रोत्रमित्यादिसामान्योपदेशान्तर भावि विशेषेणेदमित्यन्तयोपदेशात्मकं प्रकारान्तरं नास्त्येवेति भावः। जातिगुणक्रियादिमतोवस्तुनो विशेषत उपदेशो भर्वति ब्रह्मणि जात्यादयो न विद्यन्ते, तथापि न वेदो न विजानीम इति वचनात् सर्वथैव तदुपदेशप्रकारादभावे प्राप्ते=आगम सद्गुरु वाक्यैकवेद्यत्वार्भप्रायेणाडह=अन्यदेवतिदितातु=तत्=श्रोत्रस्य श्रोत्रमित्यादिनोक्तं ब्रह्म: विदिताद्=विदिक्रिया=वेदनविषयाद्=व्यक्तकार्यसमूहादन्यत् पृथगेव, यतः सर्वस्य ज्ञाता ज्ञानविषयो न भवति॥ यथा दीपो दीपान्तेण न दीप्यते स्वयँ प्रकाशत्वात् तद्वत्। अविदिताद्=भूताद भव्यादव्यताच्च कारण-त्मकादज्ञानादधि=उपरि=असद्वद्ध वर्तन्ते, अतस्तस्माद्यन्यद् वर्तन्ते=इत्याह=अथो=अपि च=अवितादधि। कार्यंहि अल्पात्मकं भवति, यदल्पं तदर्थमस्तद्दोः यथिदं कार्यं, कारणां च कार्योपादय भवति, हेयोपादेय-भ्यामन्यद् ब्रह्म सर्वात्मास्स्ति, स सर्वो्त्मापि सन्=आचार्योपदेशमन्तरेण ज्ञातुमशक्यइत्याशयेनाह=इति:उक्त प्रकारकमुपदेशं पूर्वेषां=पूर्वकालिका-नामाचार्याणां वयं वर्तमानकालिका गुरवोऽपि-श्रवम्=श्रुतवन्तःस्मः। के ते=इति चेदाह=य: आचार्या नः अस्मभ्यं तत् ब्रह्म व्याचचक्षिरे व्याख्यातवन्तो विशिष्टमुक्तवन्नस्तेषामुपदेशं शुश्रूषम इति। एतैनाड़ाचार्यपरम्परया-उद्भिगता विद्या साधिष्ठं साधयति नान्यथेति सूचितम्॥३॥

तत्र=श्रोत्रादि के श्रोत्रादिरूप से वर्गित ब्रह्मात्मामें चक्षुरूप और इप्सित वस्तु के ग्राहक नेत्रेन्द्रिय नहीं प्राप्त होती है, अर्थात् उस आत्मा का ग्रहण नहीं करता है, क्योंकि उसमें रूप नहीं है। और ब्रह्मासव की आत्मा है, अतः नेत्र का भी आत्मा है, और आत्मा में प्रतित्ति=गति हो नहीं सकती है। अत एव काष्ठादि के दाहक प्रकाशकमी अग्नि अपने स्वरूप के दाह या प्रकाश नहीं करती है, किन्तु अन्य के दाहक प्रकाश स्वरूप रहती है। इसी प्रकार सर्वात्मा ब्रह्म किसी के इन्द्रियादि के प्रकाशनादि क्रिया का विषय नहीं होता है, किन्तु प्रकाशज्ञानादिसबोंधिकस्वरूप से भी उपाधि की वर्तमानता कालमें ब्रह्म रहता है, म्रतः नेत्र काअविषय होता ह्वा भी स्वर्गसुखादि के वाचक शब्‍दादि रूप वाकू का विषय ब्रह्म होगा, यह भी नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि न तत्र वाग् गच्छति उस उसब्रह्म में वाकू की गति नहीं होती है, जब वाकू से शब्‍द का उच्चारण होता है।

Page 22

तव वह शब्द अपने वाक्य=शक्य- अर्थ का श्रोता के प्रति प्रकाश ( बोध-ज्ञान ) कराता है, यही स्ववाच्यार्थ के प्रति वाक की गतिकही जाती है। और ब्रह्मात्मा किसी शब्द का वाच्य नहीं होता है, क्योंकि जातिगुणक्रियादि धर्मवाला पदार्थ ही शब्दके वाच्यार्थरूप प्रसिद्ध हैं। और शब्द तथा उसके जनक=कारण वाक् इन्द्रिय का भी ब्रह्म आत्मा है, और आत्मा में किसी की भी गति नहीं हो सकती, जल अपने को गीला नहीं करता है, अतः "नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा । कठवल्ली ६।१७" "यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनस सह । तैत्तिरीय ३।६। बचन मन या नेत्र से आत्मा प्राप्त करने योग्य नहीं है। मन सहित वचन जिससे निवृत्त होते हैं, इत्यादि श्रुतियाँ भी युक्त ही कहती हैं। अतः "न मनस्तत्र गच्छति" मन भी ब्रह्मात्मामें गमन नहीं करता है, क्योंकि आत्मासे अन्य के ही संकल्पादि मनसे हो सकते है, आत्मा में मन की भी गति प्रवृत्ति नहीं हो सकती है, अतः 'मनसोमनोयद्' जो मन का भी मन है, इस प्रकार से ही आत्मा का उपदेश ठीक हो सकता है, मनके विषय रूप से नहीं, इन्द्रिय और मन से वस्तु का विज्ञान होता है, परन्तु मन इन्द्रिय का अविषय ब्रह्मात्मा है। अतः गुरूजन कहते हैं कि "न तत्रिशो न विजानीमो वयमू" हम उस ब्रह्म को सामान्य विषय रूप से विशेष विषय रूप से नहीं जानते है, किन्तु मन आदि का भी मन=साक्षी रूपसे तो हम जानते ही है, अतः ब्रह्मोपदेश सार्थक है, अनर्थक नहीं "अतश्रच=यथेतद नुज्ञष्यद" इसीसे इस ब्रह्म के जिस प्रकार=विशेषण द्वारा कोई शिष्य के प्रति अनुशासन=उपदेश करे, उस प्रकार को "वयं न जानीमः" हम नहीं जानते हैं, अर्थात वह प्रकार ब्रह्म में है नहीं। अतः "श्रोतस्यश्रोत्रम्‌" इत्यादिसामान्योपदेशही युक्त है। "नविप्रः" इत्यादि वचन से सर्वथा ब्रह्मोपदेश के प्रकार=रीति के अभावप्राप्त होने पर, शास्त्र सदगुरुके वाक्य से ब्रह्मात्मा जानने योग्य है; इस अभिप्राय से कहा गया है कि "अन्यदेवतद्विदितात्" वह सर्वात्माब्रह्म, विदित=वेदन=ज्ञान विषयमत्तकार्यों से अन्य ही है, क्योंकि सबका ज्ञाता ज्ञान का विषय नहीं होता है, जैसे दीप दीपान्तर में नहीं प्रदीप होता है। "अथ यो अविदितात" अज्ञात भूतभावी अव्यक्त कारण से भी ( अधि ) उपरि=भिन्ने असद्ध है। और कार्य अल्पात्नक होता है, और जो अल्प=परिच्छिन्न होता है, सो मर्त्यं=विनाश्वर होता है, अतः हेय=त्याज्य होता है। और कारण, कार्य के लिये उपादेय होता है, ग्राह्य होता है, हेय और उपादेय से अन्य ब्रह्म सर्वात्मा है। सर्वात्मा होते भी आचार्य=गुरु के उपदेश के बिना स्वयं जाना नहीं जा सकता हैं, इस आ*प से कढ़ा गया हैं ॥ ( इतः ) उक्त प्रकार वाले

तव वह शब्द अपने वाक्य=शक्य- अर्थ का श्रोता के प्रति प्रकाश ( बोध-ज्ञान ) कराता है, यही स्ववाच्यार्थ के प्रति वाक की गतिकही जाती है। और ब्रह्मात्मा किसी शब्द का वाच्य नहीं होता है, क्योंकि जातिगुणक्रियादि धर्मवाला पदार्थ ही शब्दके वाच्यार्थरूप प्रसिद्ध हैं। और शब्द तथा उसके जनक=कारण वाक् इन्द्रिय का भी ब्रह्म आत्मा है, और आत्मा में किसी की भी गति नहीं हो सकती, जल अपने को गीला नहीं करता है, अतः "नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा । कठवल्ली ६।१७" "यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनस सह । तैत्तिरीय ३।६। बचन मन या नेत्र से आत्मा प्राप्त करने योग्य नहीं है। मन सहित वचन जिससे निवृत्त होते हैं, इत्यादि श्रुतियाँ भी युक्त ही कहती हैं। अतः "न मनस्तत्र गच्छति" मन भी ब्रह्मात्मामें गमन नहीं करता है, क्योंकि आत्मासे अन्य के ही संकल्पादि मनसे हो सकते है, आत्मा में मन की भी गति प्रवृत्ति नहीं हो सकती है, अतः 'मनसोमनोयद्' जो मन का भी मन है, इस प्रकार से ही आत्मा का उपदेश ठीक हो सकता है, मनके विषय रूप से नहीं, इन्द्रिय और मन से वस्तु का विज्ञान होता है, परन्तु मन इन्द्रिय का अविषय ब्रह्मात्मा है। अतः गुरूजन कहते हैं कि "न तत्रिशो न विजानीमो वयमू" हम उस ब्रह्म को सामान्य विषय रूप से विशेष विषय रूप से नहीं जानते है, किन्तु मन आदि का भी मन=साक्षी रूपसे तो हम जानते ही है, अतः ब्रह्मोपदेश सार्थक है, अनर्थक नहीं "अतश्रच=यथेतद नुज्ञष्यद" इसीसे इस ब्रह्म के जिस प्रकार=विशेषण द्वारा कोई शिष्य के प्रति अनुशासन=उपदेश करे, उस प्रकार को "वयं न जानीमः" हम नहीं जानते हैं, अर्थात वह प्रकार ब्रह्म में है नहीं। अतः "श्रोतस्यश्रोत्रम्‌" इत्यादिसामान्योपदेशही युक्त है। "नविप्रः" इत्यादि वचन से सर्वथा ब्रह्मोपदेश के प्रकार=रीति के अभावप्राप्त होने पर, शास्त्र सदगुरुके वाक्य से ब्रह्मात्मा जानने योग्य है; इस अभिप्राय से कहा गया है कि "अन्यदेवतद्विदितात्" वह सर्वात्माब्रह्म, विदित=वेदन=ज्ञान विषयमत्तकार्यों से अन्य ही है, क्योंकि सबका ज्ञाता ज्ञान का विषय नहीं होता है, जैसे दीप दीपान्तर में नहीं प्रदीप होता है। "अथ यो अविदितात" अज्ञात भूतभावी अव्यक्त कारण से भी ( अधि ) उपरि=भिन्ने असद्ध है। और कार्य अल्पात्नक होता है, और जो अल्प=परिच्छिन्न होता है, सो मर्त्यं=विनाश्वर होता है, अतः हेय=त्याज्य होता है। और कारण, कार्य के लिये उपादेय होता है, ग्राह्य होता है, हेय और उपादेय से अन्य ब्रह्म सर्वात्मा है। सर्वात्मा होते भी आचार्य=गुरु के उपदेश के बिना स्वयं जाना नहीं जा सकता हैं, इस आ*प से कढ़ा गया हैं ॥ ( इतः ) उक्त प्रकार वाले

Page 23

उक्तविदितादन्यवश्रवणाज्जिज्ञासा जायते, यत्कर्मभिरुपासकैश्र कर्मोपासनादिभिर्विदितमेव ब्रह्म देवात्मस्वकं कश्यते, तत्त्वमुक्तोपदेशो युक्तः स्यादन्त्राह—

इस श्रुति का संक्षिप्त यह अर्थ हैं कि, रूपादि रहित होने से नेत्रादि ज्ञानेंद्रिय की गति ब्रह्ममें नहीं होती हैं, क्रिया के अविषय अवाच्य प्रह्मु त्याग के अयोग या होने से वागादि की गति उसमें नहीं होती है। निर्विशेषसर्वात्माहोने से विशेष विषयक मन बुद्धि अहंकार का विषय भी ब्रह्म नहीं है, अतः हम कोई भी नेत्रादि से नहीं जानते हैं, न मनो बुद्धि से स्वयं चिन्तन निश्चय कर सकते हैं कि जिससे=जिस रीतीसे अनुशासन=उपदेश भी किया जा सके, किन्तु विदित अविदितसे अन्यत्व के श्रवण=सुनने से जिज्ञासा=ज्ञानेच्छा होती है कि कर्म उपासनादि करने वाले विदितदेवादिकोही ब्रह्म कहते हैं। पूर्व वर्णित उपदेश युक्तः=उचित कैसे हो सकता है, तो कहा जाता है कि—

यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥४॥

यत् सर्वात्मभूतं ब्रह्म विदितार्विदिताज्ञयद्ब्रह्म=वाचा वाण्या=इन्द्रिय=शब्दात्मकयाड़्मुखुदितमप्रकाशितम् इदन्तयाsज्ञायनशक्यं वर्तते, कथम्चिल्लक्ष्णया तदितरानिषेधेन चोक्तरीत्या वोध्यते, येन च ब्रह्मणा ज्योति:आत्मना वागभ्युद्यते=प्रकाश्यते प्रयुज्यते, तदेव ब्रह्म सर्वात्मकमननिदभूतं, ब्रह्मज्ञान-धिकारी त्वं विद्धि जानीहि, ब्रह्मज्ञानाधिकारिण एव तु-इदन्तया विदितं वेद्यमुपास्यं वा वदन्ति, तव कि तेनेष्टि, तु एवं यत् ब्रह्मोपाधिभेदभिन्नं देवादिस्वरूपं कर्मिण उपासका उपासते=सेर्वते ध्यायन्ति, तन्न ब्रह्म विद्धि, यत इदंभूतं सत्यज्ञानानन्दस्वरूप ब्रह्म न भवति, नकारादिस्वृत्त्यो-ऽस्ति ॥४॥

Page 24

यन्तकसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्‌ ।

यत्‌=जिस ज्योतिरात्मकं ब्रह्म, मनसा=मनोबुद्धचात्मकैनाज्ञःकरणेन कोऽपि न मनुते, कश्चिदपि न संकल्पयति, न निश्चिनोति, न जानातीति, सर्वस्वभासकत्वेन, ब्रह्मणो, मनसोडन्तरात्मत्वात्स्वात्मनि च प्रवृत्तिरसम्भवान्‍नः स्वात्मप्रकाशनाय न प्रवर्तते । अतो यद्यपि मनसा कोऽपि ब्रह्म ज्ञातुं प्रकाशयितुमनुभवितुं न शक्नोति, तथापि “मनसैवेदमाप्तव्यम्‌” इत्यादिश्रुतिबलादनुभवाच्च ब्रह्माकारमनोवृत्त्या ब्रह्मविषयकज्ञानकृतमावरणं हि तन्मानः । ब्रह्मात्मा तु स्वयं प्रकाशते=इति । अतः स्वप्रकाशेन येन ब्रह्मात्मना ज्योतिषा मनोज्ञःकरणं मतं=विदितं प्रकाशितं सत्‌ स्वकार्ये समर्थं भवति, इत्याहाचार्यः। अतो ज्ञानाधिकारी त्वं तदेव मनसोमनोभूतं मनः प्रकाशकं ब्रह्म विद्धि, यदिदं “मनोब्रह्म त्युपासीत” इत्यादिश्रुत्योपास्यत्वेन वर्णितं मन आदिकं वर्तते, यच्चोपासका इदंवेनोपासते ध्यायन्ति, तद् ब्रह्म त्वं न विद्धि, यतस्तदुपास्यस्वरूपं ब्रह्म न वर्तत इत्यादि ।

तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ५॥

यत्‌=जिस ज्योतिस्वरूपं ब्रह्म को, कोई भी मनसा, मनन निश्चय नहीं करता है, कोई भी मन से जिस सत्य ब्रह्म को इदं=इदंरूप नहीं जानता है, न जान सकता है । क्योंकि ब्रह्म के सबके आत्मा होने से सबके प्रकाशक होने से मनका भी

Page 25

न चक्षुषा पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति ।

यत् = चक्षुषाश्रक्षु:श्रु: प्रकाशकं ब्रह्म कश्चिदपि जनश्रुतिप्रसिद्धजनश्रुषा, रूपप्रकाशकेनेन्द्रियैर्ननु पश्यति ब्रह्मणोज्जृम्भितपिवात् । येन च ज्योतिरात्मना ब्रह्मणा हेतुना सर्वोऽपि लोकश्रुतिप्रसिद्धजनश्रुतिजन्या रूपादिविषया वृत्तिः पश्यति विजानाति, अहं रूपवान् घटं पटं जानामीत्याद्यनुभवति तदेव चक्षुस्तद्वृत्तिप्रकाशकं ब्रह्म त्वं चिद्धिद्यनेदं यदिदमुपास्ते ॥६॥

तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेढं यदिदमुपासते ।६।

यत्=जिस चक्षु: का चक्षु:=प्रकाशक ब्रह्म को कोई चक्षुषा नेत्र से नहीं 'पश्यति, नहीं देखता है, क्यों कि ब्रह्मरूप रहित है, और येन=जसिचिदात्मक ब्रह्म ज्योति से ही, नेत्रां को=नेत्रजन्य अन्तःकरणा की घटादिविषयक वृत्तियों से सब देखते=जानते हैं कि जिससे कहते हैं कि "चटमहं जानामि" तहां घट का "अयं घटः" यह ज्ञान व्यवसाय कहा जाता है, और घट को मैं जानता हहूँ, इस ज्ञान को अनुयवसाय कहते हैं, व्यवसाय से घटादि विषय, मात्र का प्रकाश होता है, अनुयवसाय से घटादि विषय, उसके अन्तःकरणा की वृत्तिरूप ज्ञान तथा अन्तःकरणा में चिदाभास रूप ज्ञाता जीव इन तीनों का

Page 26

प्रकाश होता है, और उनका प्रकाशक सर्वात्मा सर्वसाक्षी स्वयं प्रकाश ब्रह्म होता है। अतः जिस ब्रह्म से तीनों जाने प्रकाशे जाते हैं। उसी को तुम जानो; इदं को ब्रह्म नहीं जानो, क्यों;कि इदमर्थ ब्रह्म नहीं है, यहाँ भी, नेदं की आवृत्ति समकलन चाहिये॥ ६॥

यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम्‌। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥७॥

यत्-श्रोत्रस्य श्रोत्रात्मकं ब्रह्म कश्चिदपि श्रोत्रेण शब्दग्राहकेन्द्रियेण न शृणोति न विषयी करोति, न प्रकाशयतीति यावत्‌। किन्तु येन सर्वात्मना ब्रह्मणा=इदं प्रसिद्धमिन्द्रियात्मकं श्रोत्रं सविषयं श्रुतं विदितं भवति, अहं श्रोत्रेण शब्दमनुभवामि=इत्येवमनुभूतं भवति, तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि=इत्यादि॥७॥

यत्=जिस श्रोत्र का भी श्रोत्रात्मक ब्रहुम को, कोई भी शब्दग्राहक श्रोत्र इन्द्रिय से सुनता=जानता नहीं है, किन्तु येन=जिस सर्वात्मा ब्रह्म से ( इदं ) यह श्रोत्रेन्द्रिय, सविषयादि शब्द सहित श्रुत विदित=ज्ञात होता है, कि जिससे श्रोता कहता है कि "अहं श्रोत्रेण शब्दमनुभवामि" मैं कान से शब्द का अनुभव करता हूँ, जिस ब्रह्म से ऐसा अनुभव होता है; उसी को तुम जानो, जिस इदं की उपासना करता है, उस इदं को तुम नहीं जानो, इत्यादि॥ ७॥

यत् प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्राणीयते। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥८॥

यत् प्राणस्य प्राणमित्युक्तं ब्रह्म, प्राणेन=प्राणान्तःकरणवृत्तिसहितेन प्राणन=प्राणनःकरणवृत्त्या कश्चिदपि न प्राणीत, गन्धवद्दू यद्‌ प्राणन नानुभवति कश्चित्‌। तथा यद्‌ प्राणेन प्राणन=श्वास प्रश्वासादृश्या न प्राणिति, न जीवति, न स्थितमिति, किन्तु येन प्राणः=प्राणः प्राणीयते स्वविषयं प्रति प्राणान्तःकरणवृत्या प्राप्यते स्वविषयं गृह्णाति च। तदेव=श्वासप्रश्वासादि-

इति केनोपनिषद् प्रथमः खण्डः

Page 27

हेतुभूतं ब्रह्मत्वं विद्धि, यदिदस्तया जना उपासते, तत्त्वं न विद्धि, यतरतद् ब्रह्म नास्तीति ॥१॥

यत्=जिस प्राणों का प्राण स्वरूप वर्णित ब्रह्म को प्राणेन, प्राण और अन्तःकरण की वृत्ति सहित गन्ध ग्राहक, ग्रहण, नासिका से न प्राणति=कोई भी गन्ध के समान ग्रहण अनुभव नहीं करता है। तथा जो ब्रह्म-श्वास प्रश्वास द्वारा श्वास से 'न प्राणति, नहीं जीवित रहता है, किन्तु जिस ब्रह्म से प्राण=घ्राणीयते=अपने विषय में अन्तःकरण की वृत्ति द्वारा प्राप्त कराया जाता है, उसी ब्रह्म को तुम जानो। जो श्वासादि का भी कारण है। "न प्राणेन नापाने न मर्त्यो जीवति कश्चन । इतरेषा तु जीवन्न्त यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ॥ १ ॥ कठ० २।१।५" नैदं इत्यादि पूर्ववत् ॥४॥

Page 28

नान्यदतोऽस्ति विज्ञातृ । वृ० ३।९।११।

"नान्यदतोऽस्ति विज्ञातृ" वृ० ३।९।११। इस ब्रह्म से अन्य विज्ञाता नहीं है । इति श्रुति से ब्रह्मान्य विज्ञाता का निषेध किया गया है, यतः कृतकऽध्यात्मकविदिताद्विदितादन्यत्वेनोपदिष्टमप्यमानं यदि शिष्यो जानीयाद, यद् ब्रह्म हेयत्वाऽदेयविपरीतस्वरूपोदितमभूत-तदहमेवास्मि, ततों ब्रह्मात्मानं निजानुभविषयत्वेन सम्यग् जानामि, तज्ज्ञानादविषयस्य ब्रह्मणः स्वयं प्रकाशस्य ब्रह्माऽऽकारवृत्त्या ज्ञाननिवृत्तिमात्रेण प्रकाशमानस्य ज्ञानविषयत्वेन ज्ञानमसमीचीनं मिथ्यैव स्यादतस्तस्माच्छिष्यबुद्धौ श्रुतिः श्रावण-न्यायवर्त्तनार्थमाचार्यः ( श्रुति ) प्राह=

यदि मन्यसे सुवेदेति दध्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणोरूपम् । यदस्य त्वं यदस्य च देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव ते मन्ये विदितम् ॥ १ ॥

यदि मन्यसे सुवेदेति दध्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणोरूपम् । यदस्य त्वं यदस्य च देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव ते मन्ये विदितम् ॥ १ ॥

Page 29

मया विदितादन्यवेनोपदिष्टोऽपिब्रह्माहं, स्वमहं सुवेद: सुष्ठु ज्ञानविषयत्वेन जानामि=इति यदि मन्यसे, अपि=तर्हि त्वं ब्रह्मणो दृश्यमेव ( अल्पमेव ) रूपं ( स्वरूपं ) नूनं ( निश्चितं सर्जनै ज्ञातमेव ) वेत्थ, न मयोपदिष्टविषयात्मकं विदिताविदितान्यद् ब्रह्म मतं= जानीषे, श्रोतु वंचनादितो भ्रमादिकमुत्पन्ना गुरोरियमुक्तिः सभवति । कथमहमल्पमेव जानामीति पृष्टे गुराह—यदस्य चिन्मात्रस्य सत्यज्ञानस्वरूपस्य ब्रह्मणः= त्वं वेदितृत्सेन कल्पितं कर्तृभोक्त्रात्मकं स्वरूपं वत्से, यदस्य च ब्रह्मण कलिप्तं स्वरूपं देवेप्वास्पमादिहिदैविकमिन्द्रादिस्वरूपं वर्तते, तत्सवंपरि छिन्नमल्पमेव, सोपाधिकं वस्तुकिमपि चिन्मात्रविभु ब्रह्म नास्ति अथवा यदस्य ब्रह्मणः स्वरूपं त्वं सम्यग् विषयत्वेन वेश्य, तदल्पमेव रूपं वेत्थ, देवेष्वपि यः कश्चिदेव वेदित स अल्पमेव वेदित, अथ नु=यत एवं तव अल्पज्ञानवत्त्वं वर्तते, तस्मात्पूर्णज्ञानार्थं ते=तव मीमांसां विचार्यमेव ब्रह्मास्ति, इत्यहं मन्ये, यतो विचारितं ब्रह्मचिन्मात्रं विदितं स्यादित्यहं मन्ये । विचारस्य ज्ञाने मुख्यसाधनत्वादित्याचार्योक्तिः १५ अथवाड्वैतवर्णन ब्रह्मण मीमांसत्यस्ययोक्कैः सत्यां शिष्य एकान्ते=आगतकर्ख्यां विचार्याजुभूय च ब्रह्माड्वैतसंसिद्धयै गतवोवाच=मन्‍ये विदितम्‌—मया ब्रह्म विदितं ज्ञातमित्यहं जानामि मन्ये=इति ॥११॥

मैं तुझे विदित से अन्य ब्रह्म है, इस प्रकार से उपदेश किया है, तुम यदि मानते हो=हो सम्भवते हो कि “अहं ब्रह्म सुवेद” मैं ब्रह्म को सुन्दर ज्ञान का विषय स्वरूप समभक्ता हूं, सो-तुम अभी ब्रह्म के रूप=स्वरूप को दृश्यमेव=दृश्य अल्प हो, नूनं =निश्चित=सत्य, साधाररिय लोक के समान 'वेत्थ' जानते हो, मुख से उपदिष्ट अविषय स्वरूप विदिताविदित से अन्य ब्रह्म को अभी नहीं जानते हो । शिष्य के बचनादि से ही उस को भ्रमादि की कल्पना से ऐसी उक्ति हुई है । कैसे मैं अल्प ही जानता हूं, इस प्रकार पूछने पर गुरु कहते हैं कि जो इस चिन्मात्र ब्रह्म का ही तुम उपादक कर्ता भोक्ता स्वरूप हो, और इस ब्रह्म का ही जो देवों में उपास्य स्वरूप कल्पित है, सो सब परिच्छिन्न ब्रह्म के होते भी अल्प ही है । अथवा इस ब्रह्म के जिस स्वरूप को तुम सम्यक सुन्दर जानते हो, तथा देवों में भी जो कोई ब्रह्म के स्वरूप को सुन्दर विषय स्वरूप से जानता है सो ब्रह्म का स्वरूप अल्प ही है, सतः तुम अल्प को ही जानते हो, और वह देव भी अल्पज्ञ हैं, सर्ज्ञ नहीं ( यथ नु ) अतएव=जिससे तुम्हे अभी अल्प का ही ज्ञान हुवा है, जिससे पूर्णास्वरूप के ज्ञान के लिये 'मीमांसामेवते

Page 30

मन्ये' तेऽब्रुवन्, ब्रह्म=मीमांस्य =विचारणीय है। ऐसा मैं ( मन्ये ) मानता हूँ ( समभता हूँ ) क्योंकि विचार ज्ञान के मुख्य साधन हैं, अतः विचारित हो ब्रह्म=विदित ज्ञात होगा, यह भी मैं मानता हूँ। अथवा गुरुनेऽ ब्रह्म को मीमांस्य =विचार्य कहा, तब शिष्य एकान्त में विचार से अनुभव करके गुरुक्के पास में जाकर कहा कि “मन्ये ब्रह्म विदितम्” मुझेऽ ब्रह्म विदिता = ज्ञात हुवा, अब मैं ऐसा समभता हूँ। इत्या दे॥ १॥

मन्ये' तेऽब्रुवन्, ब्रह्म=मीमांस्य =विचारणीय है। ऐसा मैं ( मन्ये ) मानता हूँ ( समभता हूँ ) क्योंकि विचार ज्ञान के मुख्य साधन हैं, अतः विचारित हो ब्रह्म=विदित ज्ञात होगा, यह भी मैं मानता हूँ। अथवा गुरुनेऽ ब्रह्म को मीमांस्य =विचार्य कहा, तब शिष्य एकान्त में विचार से अनुभव करके गुरुक्के पास में जाकर कहा कि “मन्ये ब्रह्म विदितम्” मुझेऽ ब्रह्म विदिता = ज्ञात हुवा, अब मैं ऐसा समभता हूँ। इत्या दे॥ १॥

शिष्य एव विदितत्वे हेतुमाह— शिष्य ही विदितत्वमें कारण का वर्णन करता है कि—

शिष्य एव विदितत्वे हेतुमाह— शिष्य ही विदितत्वमें कारण का वर्णन करता है कि—

नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च । यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥ २ ॥

नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च । यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥ २ ॥

विदितराविदितत्वेनोक्तं ब्रह्माहं सुवेद=सु वेद=ज्ञानविषयत्वेन जानामीति न मन्ये, तर्हि=अविदितं स्थान स्वया, तथा विदितं मन्ये इति पूर्वोक्तियुक्ता स्यादिति चेन्न, नो वेद न जानामीत्यपि न मन्ये, अज्ञान- विषय-स्वरूपमवदितं ततो न प्राप्नोति, यत्साक्षरं वेद=ज्ञानाद्विषयत्वेन सर्व- साक्षित्वेन जानामि, चकारान्न वेदेति समुच्यते, ततोऽज्ञानकृताड्स्वर णनाशक वृत्तिविषयत्वेन विदितत्वेऽपि ब्रह्म, णो घटादिवत् तत्त्वस्वरूपप्रकाशकवृत्तेर्भा- वाद् ब्रह्मणोविदितस्वमपि सम्भवति, ततो ब्रह्मणि वेदनावेदनयो विरोधोऽ पि नास्तीत्यादिशयेन शिष्य आह=नः अस्माकं श्रुतिषु मध्ये ये: काश्चनवेद- न्योगपि-तत्=मदुक्तं वचनं वेद-जानाति, स तत्=श्रोतव्य श्रोत्रमित्यादिना पूर्वोक्तं ब्रहम वेद, नान्यस्तद्देति । कि तद्वचनमिल्याकाड्क्षायामाह—नो न वेदेति वेद च, चकारण नो शब्देति शब्दानुवृत्त्या, न वेद ब्रह्म मिति नो, वेद ब्रहमेत्यपि नो, इति सम्बन्धाद्विदिताजविदिताभ्यामन्वयादाचार्योक्तमर्थ सम्वा- दितं भवति । वेद-अवेद चेत्युभयथोक्तुं चाशास्त्रैकेवेदित्वाद्वमन्रुरुपासकादि वचनैरपि स्वयंसिद्धावेद्यत्वमुक्तं भवति, वेद्याज्वेद्यादिभेदरहित सर्वात्मस्व- रुपात्माऽपरोक्षज्ञानादेव मुक्ति नान्यथेति्याहुक्तं भवतीति॥ २॥

विदितराविदितत्वेनोक्तं ब्रह्माहं सुवेद=सु वेद=ज्ञानविषयत्वेन जानामीति न मन्ये, तर्हि=अविदितं स्थान स्वया, तथा विदितं मन्ये इति पूर्वोक्तियुक्ता स्यादिति चेन्न, नो वेद न जानामीत्यपि न मन्ये, अज्ञान- विषय-स्वरूपमवदितं ततो न प्राप्नोति, यत्साक्षरं वेद=ज्ञानाद्विषयत्वेन सर्व- साक्षित्वेन जानामि, चकारान्न वेदेति समुच्यते, ततोऽज्ञानकृताड्स्वर णनाशक वृत्तिविषयत्वेन विदितत्वेऽपि ब्रह्म, णो घटादिवत् तत्त्वस्वरूपप्रकाशकवृत्तेर्भा- वाद् ब्रह्मणोविदितस्वमपि सम्भवति, ततो ब्रह्मणि वेदनावेदनयो विरोधोऽ पि नास्तीत्यादिशयेन शिष्य आह=नः अस्माकं श्रुतिषु मध्ये ये: काश्चनवेद- न्योगपि-तत्=मदुक्तं वचनं वेद-जानाति, स तत्=श्रोतव्य श्रोत्रमित्यादिना पूर्वोक्तं ब्रहम वेद, नान्यस्तद्देति । कि तद्वचनमिल्याकाड्क्षायामाह—नो न वेदेति वेद च, चकारण नो शब्देति शब्दानुवृत्त्या, न वेद ब्रह्म मिति नो, वेद ब्रहमेत्यपि नो, इति सम्बन्धाद्विदिताजविदिताभ्यामन्वयादाचार्योक्तमर्थ सम्वा- दितं भवति । वेद-अवेद चेत्युभयथोक्तुं चाशास्त्रैकेवेदित्वाद्वमन्रुरुपासकादि वचनैरपि स्वयंसिद्धावेद्यत्वमुक्तं भवति, वेद्याज्वेद्यादिभेदरहित सर्वात्मस्व- रुपात्माऽपरोक्षज्ञानादेव मुक्ति नान्यथेति्याहुक्तं भवतीति॥ २॥

विदित अविदित से अन्यस्वरूप ब्रह्म को मैं सुवेद=सुन्दर ज्ञात विषय रूप नहीं समभता हूँ। इससे यह भी नहीं समभता चाहिये कि ब्रह्म हमे विदित नही हुवा है, इससे “विदितंमन्ये” यह प्रथम का कथन अयुक्त है। क्योंकि

विदित अविदित से अन्यस्वरूप ब्रह्म को मैं सुवेद=सुन्दर ज्ञात विषय रूप नहीं समभता हूँ। इससे यह भी नहीं समभता चाहिये कि ब्रह्म हमे विदित नही हुवा है, इससे “विदितंमन्ये” यह प्रथम का कथन अयुक्त है। क्योंकि

Page 31

"नो न वेद" मत्स्ये, ब्रह्म को नहीं जानता हूं, ऐसा भी मैं नहीं मानता = जानता हूं। और जिससे मैं जानता हूं कि "अहं वेद" मैं ब्रह्म को जानता हूं, इससे मेरे अज्ञान के विषयत्व रूप अविदितत्व भी ब्रह्म में नहीं प्राप्त होता है। क्योंकि ज्ञान के अविषय सर्वसाक्षी स्वरूप ब्रह्म को जानता हूं। श्रुति गत-चकार से ( न वेद ) ऐसा भी सम्बन्ध होता है, कि जिससे अज्ञान कृत आवरण के नाशक वृत्ति के विषय होते भी घटादि के समान प्रकाशक वृत्ति के अभाव से ब्रह्म में के अविदितत्व रहता ही है, इस प्रकार से ब्रह्मविषयक वेदन-ज्ञान अवेदन = ज्ञानाभाव का विरोध भी नहीं है, इस आशय से शिष्य कहता है कि "नः" हम श्रोताओं में हम से अन्य भी कोई "तद्वेद" उक्त मेरे बचन को जानेगा जानता है सो "तद्वेद" पूर्वोक्त श्रोत्र के श्रोत्रादि स्वरूप ब्रह्म को जानेगा जानता है, अन्य नहीं, वह वचन कौन है, ऐसी जिज्ञासा होने पर कहा गया है कि "नो न वेदित वेद च" चकार से नो शब्द और इतिशब्द की आवृत्ति-पुनः करके ( नो वेद ब्रह्म इति न, वेद ब्रह्म इत्यादि नो ) ब्रह्म को नहीं जानते हैं, यह बात नहीं, ब्रह्म को जानते हैं यह भी नहीं, इस प्रकार के सम्बन्ध से आचार्य कथित विदिताविदितार्थ के साथ समन्वय हो जाता है, और "वेद, अवेद च" इस उपयथा कथन से शास्त्र मात्र से वेद्यत्व, स्वयं तथा उपासकादि के वचनों से अवेद्यत्व सिद्ध होता है। वेद्यावेद्यत्वादिभेदरहित सर्वात्मकस्वरूप निजात्मा के अपरोक्ष ज्ञान से ही मुक्ति होती है, अन्यथा नहीं इत्यादि यहां उपदेश हुआ है ॥२॥

गुरुशिष्य सम्बादेन सिद्धं प्रतिपादितमर्यं श्रुतिः स्वयमनुवदति— गुरु शिष्य के सम्बाद द्वारा प्रतिपादित सिद्ध अर्थ का अनुवाद स्वयं श्रुति करती है कि—

यस्यामतं मतं तस्य मतं यस्य न वेद सः । श्रविज्ञातं विजानतां विजानताम् ॥ ३ ॥

यस्य ब्रह्ममात्मज्ञस्यापरोक्षीकृतसर्वात्मनः सर्वात्मकस्वरूपं ब्रह्म, अमतं=मते बुद्धितत्त्वेविषयस्वरूपं स्वयं प्रकाशमानं ज्ञानस्वरूपम् अतएवाविज्ञातं ज्ञानविषयत्वेनाज्ञातमस्ति, केनापि कर्तृज्ञानकर्मत्वेनाधिगतमस्ति, तस्य ब्रह्मात्मज्ञस्य ब्रहम मतम्, विज्ञातं सम्यग्ज्ञातं वर्तते । यस्य तु भेददर्शनोल्पज्ञस्य मतं ब्रह्म मतम्, ज्ञातं, तेनान्येन च विजानताम् विजानताम्

Page 32

विजानतं बुद्धिवृत्त्या प्रकाशितं वर्त्तते । सः बुद्धिवृत्तिविषयत्वेनानात्मज्ञो ब्रह्म म सर्वात्मभूतं न वेद, नैव जानाति, भेददर्शित्वात्स सर्वात्मदर्शित्वं न प्राप्नोति । अतो विजानताम्=विशेषेण भिन्नतया जानतामल्पज्ञानाम्, अविजानताम्=अननुभूतं ब्रह्म वर्त्तते । अविजानताम्=बुद्धिवृत्तिविषयत्वेन प्रकाश्यत्वेनापश्यताम्, सर्वात्मदर्शिनां ब्रह्मविज्ञानं वर्त्तते । भेददर्शी कश्चित् क्वचिद् ब्रह्म मणनात् अल्प एव ब्रह्ममात्रबुद्धि वुरुते । तस्याऽतोब्रह्माविज्ञानं भवति, तस्मान्मूढ़भि मिथ्यामायिकं भेदं ।मिथ्यात्वबुद्धया निरकृत्य सर्वात्मा द्रष्टव्योऽस्तीत्यादि ॥३॥

जो ब्रह्मात्मा को अथवा स्वयं प्रकाश जान लिये हैं, अतएव, यस्य, जिनके मत में ब्रह्म आत्मा, अमत, मति = बुद्धि की वृत्ति के अविषय ज्ञान स्वरूप है, तस्य = उसी आत्मज्ञ को ब्रह्म मत = अनुभूत, सम्यग् ज्ञात है । और यस्य = जिस अल्पज्ञ के मत में ब्रह्म मत = बुद्धिवृत्ति का विषय वेदादि के सम्पन्न है स = वह अल्पज्ञ = ब्रह्म न वेद = ब्रह्म को नहीं जानता है । क्योंकि, विजानताम्, विशेषरूप से घटादिव्य बुद्धि वृत्तिविषयरूप से ब्रह्म को जानने वाले को ब्रह्म अविज्ञात = अननुभूत रहता है, अनुभूत-ज्ञात नहीं रहता है । और अविजानताम्, बुद्धिवृत्ति के विषय रूप से विशेष गुणादिसयुक्तरूप से नहीं जानने वाले शुद्धनिगू र्णात्मदर्शी को ब्रह्म विज्ञात-अनुभूत रहता है । अतः मुमुक्षुको इसी प्रकार से ब्रह्म ज्ञातव्य है ॥

भाव है कि घटादि जड़ वस्तु के ज्ञान से घटाकार वृत्तिद्वारा घटाविषयक अज्ञानांश को, तथा घटादि के ज्ञानाभाव को ज्ञानरूप वृत्ति नष्ट दूर करती है, और वृत्तिगत चिदाभास घटादि को प्रकाशता है, प्रकाश स्वरूप सूर्य का भी जब ज्ञान होता है, तब सूर्याकार वृत्तिसे दृष्टा के हृदय वृत्ति अज्ञानांश का नाश होता है, चिदाभास से सूर्य अनुभूत होते हैं । श्रुति है कि "तस्य भासा सर्वमिदं विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२" बुद्धिगत उस ब्रह्म के चिदाभास से ये सूर्यादि सब विभाति, मुण्डक० २।२"। हे दूसरी बात है कि "सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत्" इत्यादि के अनुसार, ब्रह्ममात्मा ने पूर्वकल्प के अनुसार चन्द्र सूर्य को रचा, विराट के मनसे चन्द्र और नेत्र से सूर्य हुए । अतः सूर्यादि के कारण के प्रकाश से सूर्यादि का प्रकाश होना ठीक ही है परन्तु उक्त सर्वात्मा चेतन ब्रह्म का कोई कारण नहीं है, और स्वयं चेतन के प्रकाश में चिदाभास की आवश्यकता नहीं हैं, तथापि तदाकार वृत्ति से ज्ञाता के अज्ञान की निवृत्ति होती है, इत्यादि ॥ ३ ॥

हमें भासते=ज्ञात होते हैं । दूसरी बात है कि "सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत्" इत्यादि के अनुसार, ब्रह्ममात्मा ने पूर्वकल्प के अनुसार चन्द्र सूर्य को रचा, विराट के मनसे चन्द्र और नेत्र से सूर्य हुए । अतः सूर्यादि के कारण के प्रकाश से सूर्यादि का प्रकाश होना ठीक ही है परन्तु उक्त सर्वात्मा चेतन ब्रह्म का कोई कारण नहीं है, और स्वयं चेतन के प्रकाश में चिदाभास की आवश्यकता नहीं हैं, तथापि तदाकार वृत्ति से ज्ञाता के अज्ञान की निवृत्ति होती है, इत्यादि ॥ ३ ॥

Page 33

विज्ञानतामविज्ञातामिति विरुद्धं प्रतिभाति, तथापि तद्ब्रह्म कथं कस्यचिद्विदितं स्यादिति जिन्दासायामाह—

विशेषरूप से जानने वाले को ब्रह्म अविज्ञात रहता है, यह कथन यद्यपि अर्थज्ञ को विरुद्ध प्रतीत होता है, तथापि वह ब्रह्म किसी को सम्विदित— ज्ञात कैसे होगा, ऐसी जिज्ञासा होने पर कहा जाता है कि—

प्रतिबोधं विदितं मतममृतत्वं हि विन्दते । आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥४॥

"बोधं बोधं प्रति=प्रतिबोधम्" इति विग्रहेऽत्राऽव्ययीभावसमासो वीप्सार्थे वर्तते, तथा च प्रतिबोधं विदितम्=सर्वबोधं=बुद्धिवृत्त्यात्मकं ज्ञानं व्याप्य विदितं वृत्तिसाक्षित्वेन ज्ञातं वृत्तीनां सर्वासां प्रकाशकत्वेन नित्यमनुभूतं स्वयं प्रकाशं ब्रह्म मतं सम्विदितं भवति, सर्वप्रत्ययान्तरात्मतया प्रत्ययसाक्षित्वेन विदितं मतं ब्रह्म तत् सम्यङ्मतं ज्ञातं भवति, इत्यं विदुषामाचार्याणां मतमपि वर्तते । हि—यत् उत्करीत्या ब्रह्म सम्यग् ज्ञातं भवति, तत् एव तस्य ब्रह्मणो ज्ञानान्मुक्षुरमृतवं मोक्षं विन्दते— लभते । अमृतस्वप्राप्तिकरममाह=प्रथमं योगयुक्तादिभिः समाहितेनाः त्मना मनसा, स्वात्मनिष्ठया ध्यानेऩ वा वीर्यं =अविद्यामोहादिपराभवसामर्थ्यं पूर्णविवेकवैराग्यादि विन्दते प्राप्तोति, ततः श्रेष्ठाश्चात्रगुरुपदेशः, उक्त हेयोपादेय कार्यकारणविलक्षणस्य ब्रह्मात्मनो विद्यामुपरक्षान्मनुभवं प्राप्नोति । यतस्तु "नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः" इति । अतः प्रथमं बलं प्राप्य पुनर्विद्यामप्नोति, तथा विद्यया ब्रह्मात्मज्ञानेऽमृतममोक्षं विन्दते, अविद्यया अपसारणेन तियुक्तमात्मानं व्यक्तं करोतीति यावत् ॥४॥

बोधं बोधं प्रति=बोधं ब्रह्म विदित मतम् । घट पदादि के बुद्धि = मनो वृत्तिरुप सभी बोधों ज्ञानों में ब्रह्म विदित = ज्ञात = चिदाभासरूप से व्यक्त होता है, और इसी प्रकार से चिदाभासरूप से ब्रह्म ही मत = ग्रानुभूत = ज्ञात होकर, जीव स्वरुप ब्रह्म अमृतत्व ॥मोक्ष पाता है। और मतं = होने के लिये प्रथम सत्कर्म आदि से विशुद्ध आत्मा = मन से पूर्ण विवेक वैराग्यशमदि रुप वीर्य = बल को जो प्राप्त करता है, उसके बाद ब्रह्मात्मा के अपरोक्षा— अनुभव से मत=अनुभूत होकर अमृत=मोक्ष को प्राप्त करता है, अर्थात चिदा—

Page 34

चिदाभासोऽपि तद्रूप स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहं आत्मा॥१॥

भासता को प्राप्त ब्रह्म विद्या से उपाधि को बाधित करके पूर्ण नित्य मुक्त चिदरूप से स्थिर होता है, जैसे दर्पण के अभाव होने पर प्रतिबिम्ब विम्बरूप से स्थिर होता है, इत्यादि, "मुखाभासो दर्‌पणो त्वेन नैवास्ति-वस्तु । चिदाभासोऽपीष जीवोऽपि तद्रूप स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहं आत्मा ॥१॥ यथादर्शो भाव आभासे ह्यनु मुखं विद्यते कल्पनाहीनमेकम् । तथा श्रोवीयोगे निराभासकोऽस नित्योपलाब्धस्वरुपोऽहं आत्मा ॥२॥

दर्पण में दीखता हुवा मुख का आभासमुख होने के कारण मुख से पृथक् स्वतन्त्र कोउ वस्तु नहीं रहता है, बुद्धि में चिदाभासरूप जीव भी इसी प्रकार-चिदात्मा से भिन्न स्वतन्त्र वस्तु नहीं है चिन्मात्र ही सत्य वस्तु है, वह चिन्मात्र नित्यज्ञान स्वरूप आत्मा मैं हूँ॥२॥ जैसे दर्पण के अभाव होने पर आभास की निवृत्ति से भेद की कल्पना से रहित एक ही मुख रहता है, तैसे बुद्धि के वियोग = अभाव होने, जो आभास रहित एक आत्मा रहता है, सो नित्य ज्ञान स्वरूप मैं हूँ ॥२॥

अभास एव च। ब्रह्मसूत्र अ० ३।पा० २।१५।०" जीवों के व्यावहारिक स्वरूप चिदाभास ही हैं, सत्यस्वरूप एक ब्रह्म है, सो असङ्‍न चिन्मात्र विभु है, परन्तु व्यावहारिक स्वरूप के पृथक् पृथक् होने से कर्मादि के संस्कार नहीं होते है. बन्धमोक्षादि की भी व्यवस्था हो जाती है, इत्यादि विस्तारपूर्वक वही ज्ञातव्य है॥४॥

जैसे दर्पण के अभाव होने पर आभास की निवृत्ति से भेद की कल्पना से रहित एक ही मुख रहता है, तैसे बुद्धि के वियोग = अभाव होने, जो आभास रहित एक आत्मा रहता है, सो नित्य ज्ञान स्वरूप मैं हूँ ॥२॥ "अभास एव च। ब्रह्मसूत्र अ० ३।पा० २।१५।०" जीवों के व्यावहारिक स्वरूप चिदाभास ही हैं, सत्यस्वरूप एक ब्रह्म है, सो असङ्‍न चिन्मात्र विभु है, परन्तु व्यावहारिक स्वरूप के पृथक् पृथक् होने से कर्मादि के संस्कार नहीं होते है. बन्धमोक्षादि की भी व्यवस्था हो जाती है, इत्यादि विस्तारपूर्वक वही ज्ञातव्य है॥४॥

आलस्य मोह प्रमादरागद्वेषकुसङ्‌गादित्यागेनास ङ्‌ध्यात्मिक बलं प्रयात्रैव मानवेलोके ज्ञानाधिकारवति मानव शरीरे मृृत्यार्थिका विद्याडवश्यं प्राप्तव्याडस्ति प्रमादादिर्भिविद्याया अप्राप्तौ महाकष्टा संसारगति भवतीति परमकारुण्यवतीव श्रुतिराह—

आलस्य मोह प्रमादरागद्वेषकुसङ्‌गादित्यागेनास ङ्‌ध्यात्मिक बलं प्रयात्रैव मानवेलोके ज्ञानाधिकारवति मानव शरीरे मृृत्यार्थिका विद्याडवश्यं प्राप्तव्याडस्ति प्रमादादिर्भिविद्याया अप्राप्तौ महाकष्टा संसारगति भवतीति परमकारुण्यवतीव श्रुतिराह—

आलस्य मोहप्रमादरागदेप कुुसङ्‌गादि के त्यागपूर्वक पूर्णविवेक विरागादि बल को प्राप्त करके इस मानव लोक में तथा ज्ञानाधिकारी युक्त मानव शरीर में ही मोक्षार्थक विद्या की प्राप्ति अवश्य करना चाहिये, नहीं तो प्रमादि से विद्या की अप्राप्ति अवस्था में महा कष्ट प्रद सांसारिक गति की प्राप्ति होती है, परम कारुण्यत्मिकी श्रुति यह कहती है कि—

इह चेतवेदथ सत्यमस्ति, न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः। भूतेषु भूतेषु विचित्य धीरा: प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥५॥

इह चेतवेदथ सत्यमस्ति, न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः। भूतेषु भूतेषु विचित्य धीरा: प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥५॥

इति केनोपनिषद् द्वितीय: खण्ड: ॥

इति केनोपनिषद् द्वितीय: खण्ड: ॥

Page 35

इह मानवेलोके ज्ञानाधिकारादियुक्ते मानवे शरीरेऽ, चेदयदुत्तरीलया कार्यकारणविलक्षणं यः कोडपि = आवेदित = विदितवान = अहं ब्रह्माऽस्मीति, अनुभववान् । अथ तदा, तादृशानुभव काल एवाऽविद्या निवृत्या, तदनुभवान्तरमेव सत्यममृतं नित्यमुक्तात्मस्वरूपमऽऽरित = अमृतं प्राप्नुवन्ति, मानवावतारं च सफलं भवति, इह लोके जन्ममृत्यु । चेद्नावेदित = न विदितवान्, तदा महती = दीर्घकालिकी = अनन्ता विनष्टिः, जन्ममरणदिलक्षणा कष्टाऽऽत्मिका संसृति भवति । अतो ज्ञानाऽज्ञानयो गुणवदोषज्ञानवन्तो धीराः = विवेकिनो विद्वांसो भूतेपु चराचरेऽपु सर्वेषु प्राणिषु वर्तमानं ब्रह्ममाऽत्मतत्त्वं सर्वोत्तमं ब्रह्म विचित्य = विज्ञाय सर्वाऽस-त्वेन साक्षात्कृत्य, भूतवधर्मोदिरहितं नित्यमुक्तात्मानमनुभूय, अस्माऽछरीरादिलक्षणाल्लोकादविद्याऽऽत्मकाज्जीवलनेव, प्रेयः = अभिमानादि त्यागेन सर्वस्माल्लोकासृथक् भूत्वा, लोकेभ्योऽप्युपरतास्ते = जीवन्मुक्ताः ब्रह्मस्वरूपा भवन्ति = “स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति । मुण्डक इति” ॥४॥

इह = इसलोक तथा शरीर में चेत् = यदि कोई = कार्यकारणादि से अन्य नित्यमुक्त शुद्ध ब्रह्म को 'अवेदित' सम्भा = अपरोक्ष अनुभव किया कि “अहं ब्रह्माऽस्मि” मैं शुद्धब्रह्म हूँ । अर्थात् मेराऽसत्यस्वरूप ब्रह्म है, देहेन्द्रियादि नहीं । अथ = उस ज्ञान से अविद्या की निवृत्ति के अनन्तर = बाद में उस सम्भने वाले का सत्य नित्यमुक्त स्वरूपही है, वह जीवनमुक्त ही है, अतः नष्ट नहीं होता है । यदि इस लोक और शरीर में 'अवेदित' नहीं जाना = सत्यात्म को विभु ब्रह्मस्वरूप नहीं सम्भा तो देहादि के अभिमानी होने के कारण उस अज्ञ की महती विनष्टि = जन्ममरणादिरूप महान् विनाश होता है, मान वज्न्मादि निफल जाता है । अतः ज्ञानाऽज्ञान के गुण दोष को जानने वाले धीर = सत्यधारणाश्रययुक्तविद्वान्, भूतेपु भूतेपु, सबचराचर प्राणियों में चिदाभासरूप को भी वस्तुतः ब्रह्मैस्वरूप एकात्मा 'विचित्य, विचायं = अनुभूयच' विचार कर अनुभव करके = अन्वेष्ट्रा करके, फिर इस मायामय शरीरादिरूप लोक से जीवन काल में ही प्रेयः = पृथक् = असङ्ग होकर, अभिमान के त्यागद्वारा शरीरादि से भिन्न उपरत होकर “अमृताः भवन्ति” जीवनमुक्त ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं । “स यो ह चैत्परमं ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति” मुण्डक० ३।२।९ । यः = जो कोई पूर्वोक्त पर ब्रह्म को वेद = साक्षात् आत्मस्वरूपजानता है,

Page 36

स = वह ब्रह्मस्वरूप मुक्त हो जाता है, अतः उनके मोक्ष में कोई विध्न बाधा मी नहीं होता है ॥ ९ ॥

अथ केनोपनिषद् तृतीयखण्डः

विवेकादियुक्तग्लितादभिमानवदुतमाधिकारिरिभग्न्या विद्योक्ता, सम्प्रति मन्दमध्यमाधिकारिग्म्या विद्योच्यते, आद्याध्यायिका सुख प्रतिपत्त्यर्था ज्ञेया, किश्च दुर्येयब्रह्मज्ञानायाधिक यत्न विधानार्था च, अभिमानादि त्यागेन शमादि: सम्पादयितव्यो मुुमक्षुभिरित्ययमपप्यर्थो लक्ष्यते अध्यायिकया । तथा “नेदं यदिमुपासते” इत्यनेन यदु ब्रह्मण उपासनं निषिद्धमिव प्रत्यक्त्वम्, तत्त्वगुणब्रह्म मणः कर्तव्यत्वेन प्रतिपाद्यन्राह—

विवेकादियुक्तग्लिता भिमानवदुतमाधिकारियों से प्राप्त करने योग्य विद्या कही गई है, अब मन्द मध्यम अधिकारियों से प्राप्त करने योग्य विद्या की वार्ता कही जायगी "आध्यायिका" ब्रह्मेन्द्रादि का सम्वाद, मुख से अर्थ ज्ञानार्थक है. और दुर्जेय ब्रह्मज्ञान के लिये अधिकप्रयत्न की विधि के लिये भी आध्यायिका है, क्यों कि अभिमानादि के त्यागपूर्वक शमदमादि की प्राप्ति मुमुक्षुको करना चाहिये, यह अर्थ भी आध्यायिकासे लक्षित = बोधित = ज्ञात होता है । और “नेदं यदिमुपासते” इस कथन से जो ब्रह्म की उपासना निषिद्ध के समान = श्रुतित खण्डित हुई है उस सगुण ब्रह्म की उपासना को कर्तव्य रूप से प्रतिपादन करती हुई श्रुति कहती है कि—

ब्रह्म ह देवे भ्यो विजिग्येडस्य ह ब्रह्मणो विजिये देवा अपहियान्त । त ऐक्षन्तास्माकमेवाडयं विजयोऽस्माकमेवाडयं महिमेति ॥ १॥

ब्रह्म ह = पूर्वोक्तं सर्वोत्तम्ल्वेन प्रसिद्धं सच्चिदानन्दस्वरुपमेव ब्रह्म मायाशक्तिमत्व सर्वज्ञत्वयुक्तं सत्, देवे भ्यो देवेभ्यो देवानां हितार्थाय ह, खलु = देवादि सर्गलोकादिहितान् कुरानसुरान् विजिग्ये । देवे षु सदैवान्तर्यिमिरुपेण वर्तमानं ब्रह्म पुरा देवासुर संग्रामे देव द्वारैवासुरान् विजिग्ये, विजितवानसुरान् अन्तर्यामिरुपेण वर्तमानस्य सर्गज्ञस्य सर्वशक्तस्य तस्य

Page 37

ब्रह्मणो विजये सत्, देवाः = इन्द्राद्याः वायुप्रभृतयः महीयान्तः लौकिकाः पूजिता अभवन् पूजां प्राप्तवन्तः। ततस्तेवा अन्तर्यामिस्वरूपस्य सर्वान्तरमनो ब्रह्मणो ज्ञानाद्भावादेव देहादाव्मभिमानवन्तो भूत्वा = ईक्षण्त = अपण्यन्त विचारितवन्तः, यदस्माकमेव व्यक्तिदेवानामेवाडडयमुपलब्धो विजयोऽस्ति। अस्मत्प्रभावादेवासुराः पराभूताः। अतोडस्माकमेवां यं महिमा = महःवं विद्यते नान्यो मत्तो वली पूज्य ईश्वरोऽस्ति। अहो मोहमहिमा देवा अपि सत्यसर्वज्ञानं विना यावत्प्रारब्धं विपरीत ज्ञानाज्ञानाभ्यां संसारे भ्रमन्ति भीताश्च भवन्ति, तदावडन्येषां भ्रमणादौ कि वक्तव्यसरित, ततः भेदश्रमादिनिवृत्तये यथाशक्ति सर्वैरैव यत्नः कर्तव्य इति॥ इति॥ ह्युतराशयः ॥१॥

प्रथम कबी दैवासुर संग्राम में पूर्ववर्ती ब्रहम ही सर्वात्मारूप से प्रसिद्ध ब्रहम ही कर असुरों को 'देवेभ्या:' देवों के हित के लिये विजय, = जीता, अर्थात्‌ अन्तर्यामी ब्रहम देवोंपर अनुग्रह करके उन्हे शक्ति दिया, फिरदेवद्वारा असुरों का पराभव संहार किया, फिर, अस्य, इस ब्रहम के विजय होने पर, इन्द्रादिदेव महीयान्त, महत्व पाये पूज्य हुए, फिर, ते, वे देव ब्रहम के अज्ञान से, (ऐक्षण्त) इक्षता विचार करने लगे, समझे कि यह विजय, अस्माकं, हमारा ही है, हमारे तेज वल के प्रभाव से असुर पराजित हुए हैं, बतः हमारी महिमा "महख" है, हमसे अन्य कोई पूज्य या ईश्वर नहीं है इत्यादि ॥ श्रुति का तात्पर्य है कि मोह की महिमा आश्रयात्मक है कि जिससे सत्यसर्वज्ञात्मा अन्तर्यामी ब्रहम के ज्ञान के बिना अनन्तशक्तियुक्त अधिाकारी देव भी अपने प्रारब्ध पर्यन्त अज्ञानविपरीतज्ञान द्वारा अभिमानी होकर संसार में भ्रमते है, भयभीतादि होते हैं तो ब्रहमज्ञानादि के बिना अन्य के भ्रमादि का क्या कहा जा सकता है, अतः अज्ञान विपरीतज्ञानमोह भ्रमादि की निवृत्ति के लिये अपनी २ शक्त्ति के अनुसार सब को यत्न करना चाहिये आलस्यादि के वश नहीं होना चाहिये इत्यादि ॥१॥

करु विचार विकार परिहरु, तरसण तारसणो सोई । कहहिं कविर भगवंत भजु नर, द्वितिय और न कोई ॥ १ ॥ देवानामुराणां भयादिविभवात्त्रैलोक्यवलेश्वरीप्रात्त्ववाद् असुरपशुविशेषादिवत्सर्वथैवाज्ञानुप्राप्तस्वादभावाद्भावत्तशां हितायेश्वरानुग्रहो वर्ण्यते श्रोतुम्—

करु विचार विकार परिहरु, तरसण तारसणो सोई । कहहिं कविर भगवंत भजु नर, द्वितिय और न कोई ॥ १ ॥

Page 38

तदेष्टां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानन्न किमिदं यक्षमिति ॥२२॥

तत्-सर्वान्तर्यामिस्वरूपं, ह एव, ब्रह्म, तद्, देवानामभिमानं मिथ्या-ज्ञानं विज्ञौ विज्ञातवत्। ततः देवा असुरवन्मोहान्धकारे मा पततु, इति कृपयाड्लोच्य, तेभ्योऽनुग्रह ह्येव, न तु स्वार्थाय, पूर्णकामस्य सच्चिदाननः स्वार्थाडभावात्। ब्रह्म देवानामपि देव पूज्य यक्ष:=पूज्यस्वरूपेण प्रादुर्बभूव, तेऽमनतिदूरे स्थाने=आकाश प्रदेशविशेषे स्वप्राकट्यं चकाराऽऽकाशस्याऽऽड्यन्तरात्मत्वात्तद्याप्यन्तर्योमित्वेन सदा वनंमानत्व-तत्प्राकट्यं सम्बभूव। किन्तु तद्रादृश्तं ब्रह्माभिमानिनो देवा अभिमानानां त्यागमनन्तरा न व्यजानन्तः सम्भ्रमे प्रत्यक्षमपि न विज्ञातवन्तः; यत्किमिदं प्रत्यक्षोपस्थितां यक्षं पूज्यं वस्तु विद्यते—इति ॥२२॥

Page 39

तेडग्निमबु वच=जातवेद एतद्विजानीहि किमिदं यक्षमिति तथेति ॥३॥

उक्ताऽज्ञानाद्भयकुतूहलाद्याविश्वास्ते=इन्द्रादयो देवा अग्निम=देवेष्ट्वग्रग्रामिनं प्रस्तुतब्रवुवन्तः। हे जातवेदः=ज्ञातानिवेदांसि ज्ञानानि यस्मात्तत्तसम्बोधने जातबोध, हे सर्वज्ञाग्ने त्वम्=एतत्प्रत्यक्षोपस्थितं विशेषेण विजानीहि, यत्किमात्मकमिदं यक्षमस्ति, एतदपि देवविशेषोस्ति वा सर्वदेवादिभ्यो विलक्षणं किमप्यसित अस्माकं मध्ये तेजस्वी त्वमेतज्ज्ञातुमहंसि एवमुक्तोऽग्निः साडिभमान एव तथाऽस्तु-त्युक्तवान्॥ ३ ॥

उक्त व्यज्ञान से भय कौतुहलादि युक्त 'त' वे इन्द्रादि देव सब, सब देवों के अग्रगामी अग्निदेव की स्तुति करते हुए, अग्निदेव को 'अबु वचन्' कहा कि हे जातवेद, जात = उत्पन्न हुए हैं वेदम् = ज्ञान जिससे, ऐसा तुम हे ! सर्वज्ञ अग्निदेव ! तुम 'एतद्विजानीोहि' इस प्रत्यक्ष-उपस्थित पूज्य को विशेष रूप से समभो = जानो कि 'किमिदं यक्षम्' यह यक्ष क्या है, यह भी कोई देव है या सब देव से विलक्षण कोई है। हम सब में आप तेजस्वी हो, अतः आप इसको जान सकते हो, ऐसा कहने पर अभिमान सहित अग्निदेव बोले कि 'तथाऽस्तु इति' आप सबके कथनानुसार मैं जाकर समभता = जानता हूँ कि कौन है ॥३॥

उत्तरीत्योक्त्वा च— उत्करोति तथास्तु ऐसे कह कर — तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत् कोडसीत्यग्निर्वाडहमस्मीत्य- ब्रवीज्जातवेदा वा ऋहमस्मीति ॥४॥

तत्=प्रत्यक्षं यक्षं प्रति=अभिअद्रवदग्निः, यक्षसन्निधौगतवान्। तथापि तद् यक्षं प्रष्टुं समर्थोऽनभवेदग्निः, ततस्तुष्णींभूतं सन्निधावुपस्थित-

Page 40

मग्निमेव तद्यक्षं ब्रह्माभ्यवदत् प्रत्यभाषत् पृष्ठवान्-त्वं-कोऽसि । एवं यक्षेण पृष्ठोऽन्रवीदुक्तवान्—अहमग्निवै = अग्निनामत: प्रसिद्धोऽस्मि, तथा जातवेदा जातवेदोनामा वै प्रसिद्धोऽस्मि । उत्तनाम-द्रयेनात्मानं स्तुवन्तेवान्रवीदुक्तवान् ॥४॥

तत् = उक्त यक्ष के प्रति = पास = समीप में 'अभि अद्रवत्' अग्निदेव शीघ्र तुरन्त गये, तो भी उस यक्ष से कुछ पूछ नहीं सके, अर्थात् आप कौन हो इत्यादि प्रश्न नहीं कर सके, तब पास में चुप = मौन हो कर स्थिर उस अग्नि देव को ही वह यक्ष 'अवदत्' पूछा कि आप 'कोऽसि' कौन हो, क्या नाम है ऐसा पूछने पर अग्नि देव बोले कि मैं अग्नि हूँ, अग्नि ही मेरा नाम है । तथा जातवेदानाम भी है । इन दोनों नामों द्वारा अपनी स्तुति करते हुए बोले ॥ ४ ॥

उत्तरীয়ाग्निनोक्ते सति तमग्निं ब्रह्मापृच्छत्—

उक्त रीति से अग्नि के बोलने पर ब्रह्मा पूछा कि—

तस्मिन् स्वयि किं वीर्यमित्यपीदं सर्वं दहेय यदिदं पृथिव्यामिति ॥५॥

तस्मिन्—उक्त प्रसिद्धगुणनामवति त्वयि, तव स्वरूपेण किं वीर्यं किमात्मकं सामर्थ्यं विद्यते, एवं पृष्ठोग्निरुक्तवान्, यत्पृथिव्यां यदि दं विद्यते तत्सर्वं दहेयमिति दग्धं कुर्याम्, इदमपि च पृथिव्यादिकं जग- दनात्मकं लोकादिकं सर्वं दहेयमित्यं भूतं सामर्थ्यं मयि विद्यते ॥५॥

Page 41

तस्मै तृणं निदधावतिहोति, तदुपप्रत्यायि सर्वजवेन, तन्न शशाक दग्धुं, स तत् एव निवर्तते, नैतदशकं विज्ञातुम्। यदेतद् यक्ष्मिति ॥६॥

उस यक्ष देव ने ‘तस्मै’ उस ऋषभृदृव के अभिमानी देव के प्रति दग्ध करने के लिए एक शुष्क तृण ‘निदघौ’ समीप में धर दिया, और उनसे कहा

तस्मै=उक्तसद्गृत्वार्जभिमानवतेॐग्निदेवाय, तृणं निदघौ, तत् समीपे तदग्रेशुष्कृणं स्थापयवद् दत्तवद् यक्षात्मकं ब्रह्म, तदग्रे तृणं दत्वा-उक्तवच्, यदेतन्मया त्वाप्रे स्थापितं तृणं तत् त्वं दह, दर्शं कुरु-इति वचनमुचाच ब्रह्म। तथा यक्षात्मकॊग्निनस्तत् तृणं सर्वजवेन=सर्व-वेगन=उपप्रैयाय तृणसस्रिधौ गत्वाऽपि तत् तृणं दग्धुं भस्मीकतुं न शशाक, शक्तः समर्थो न वभूवाम्नि:, ततो गतगवः सन् ततस्तस्मात्स्था-नात् तृष्णीमेव सोऽग्निन्निवृत्तेनिवृत्तोऽभूत्। इन्द्रादिदेवानां सत्रिस्थो गतवाच देवान् प्रत्युवाच, एतत् सम्मुखेऽस्माकमुपस्थितं यद् यक्षं वर्तते तदेतत् किं स्वरूपमिति विज्ञातुं विशेषतोऽवगन्तुं नाऽऽडहमशम्-न शक्तो-ऽस्मीति ॥६॥

उस ऋषभृदृव के अभिमानी अग्नि देव के प्रति एक शुष्क तृणा को ‘निदघौ’ समीप में रखा, और कहा कि इसको जलाओ। तब वह यक्ष रूप अग्नि भी उस तृण को जलाने में असमर्थ रहा और वहाँ से लौट आया। इंद्र आदि देवताओं के सत्र में जाकर उनसे कहा कि मैं उस यक्ष के स्वरूप को नहीं जान सका।

Page 42

अथ वायुमब्रुवन् वायवेतद्विजानीहि किमेतद् यक्षमिति तथेति ॥७॥

अथ=अग्नेरुक्तवचनथवणानन्तरं वायुम् सर्वप्राणात्मकमग्नेरहत्ते जक-मनेर्वलवन्तं ज्ञात्वा तं देवा अब्रुवन्तः, हे वायो ! त्वमेतदुपस्थितं यक्षं विजानीहि, यदेतद् यक्षं देवादिषु मध्ये किमपि विद्यते तदन्यद् वा किञ्चिद् विद्यते। इत:=एवमुक्तो वागुत्थायासु-इत्य झीचकार, यक्षं वेदितुं स्वीकृतवान् ॥७॥

अथ = अग्नि के वचन सुनने के बाद = अनन्तर, वायु को सर्वप्राणा-त्मक, अग्नि का उत्तेजक अग्नि से वली जानकर, वायु को देव सब कहे कि हे वायो ! वायुदेव इस उपस्थित यक्ष को आप समझो कि यह यक्ष "किमस्ति" देवादि में क्या स्वरूप वाला है । ऐसा कहने पर वायु देव बोले कि तथास्तु = आप की आज्ञा का पालन करूँगा ॥ ७ ॥

तदभ्यद्रवत्तत्पभ्यवदत्कोडसीति , वायु वा ब्रह्मास्मीत्य-ब्रवीन्मातारिश्वा वा ऋऋभुरस्मीति ॥८॥

उक्त स्वीकृत्यनन्तरं वायुदेवस्तदयक्षं प्रति अभिद्रवत्-तत्समुखे तत्सस्निधौ प्राप्तं गतवान्, ततस्तं स्वसमीपस्थं सन्निधौ प्राप्तं प्रश्ने-

Page 43

असमर्थं वायुः यक्षतेजसार्जभिभूतं तुष्णीं स्थितं—यक्षात्मकं ब्रह्मैवाड्भ्यवदत्—अपृच्छत् कोऽसौति, किं नामा किं प्रभावोसिति यक्षं ब्रह्म पृष्टवान् । ततस्तु वायुर्यक्षम् प्रत्यब्रवीत्—प्रत्युत्तरमुक्तवान् । अहं वै वायुर्वायुनामा-जस्मीति, अन्यच्च मम नाम मातरिश्वाऽस्ति । अतो मातरिश्वा=मातरिश्वनामा वै मातर्यन्तरिक्षे श्वयति गच्छतीति तथा नामाऽस्म-त्यब्रवीद् वायुः ॥८॥

तथाऽस्तु इस उक्ति के बाद, वायुदेव तत् उस यक्ष के प्रति-अभिद्रवत्= यक्ष के समीप में प्राप्त हुए, परन्तु पूछने में असमर्थ उस वायु देव को यक्ष देव ने ही पूछा कि आप कौन हो ? आप का नाम क्या है. आप में क्या प्रभाव है, इत्यादि । तब वायु देव बोले कि वायु नाम वाला मैं हूँ, और 'मातरिश्वा' मातरि = अन्तरिक्ष मे = श्वयति = चलें, सो मातरिश्वा कहा जाता है । अतः अन्तरिक्ष गामी मैं हूँ । इत्यादि॥८॥

उक्तविधा वायुक्ते सति यक्षं ब्रह्माऽपृच्छत्— उक्त रीति से वायु के कहने पर यक्ष-ब्रह्मा पूछा कि—

तस्मिँ स्वयि किं वीर्यमित्यपीद सर्वमाददीयं यदिदं पृथिव्यामिति ॥९॥

तस्मिन् = उक्त नाम वाले तुम वायु में कौन वीर्य शक्ति है, ऐसा पूछने पर वायुदेव बोले कि पृथ्वी में "यदि" जो यह जड़-चेतन वस्तु है, उन सबको मैं "आददीयं" ग्रहण करू, और 'इदं' यह जो सब का आधार

Page 44

तस्मै तृणं निदधावेतदादत्त्स्वेति, तदुपप्रेयाय सर्वंजवेन, तन्न शशाकादातुं, स तत् एव निवर्तते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद् यक्षमिति ॥१०॥

तस्मै =उक्तरीत्या स्वसामर्थ्यमुक्तवते वायवे तृणं निदधी दत्तवान्, तत्समीपे निहितवद् धृतवद् ब्रह्मम, उवाच च यदेतत्त् णमादत्स्व, गृहाणोति, एवमुक्तो वायुः सर्वंजवेन तत्त् णमुपप्रेयाय, तृणसक्तिंधौ गतवान् तथापि तत्त् णमादातुं न शशाक=नाशकत्। ततः स वायुस्तस्मात् णस्थानादेव निवृत्ते, यक्षं प्रति नाशमादिति। निवृत्तः सन् देवान् प्रत्युक्तवान्, यदेतद् यक्षं तत्स्वरूपमेतद्विज्ञातुमहं नाशकमित्यादि पूर्ववत् ॥१०॥

तस्मै = उत्तरीति से स्वसामर्थ्य को कहने वाले वायु के प्रति 'तृणं निदधी, तृण को अर्पण किया, वायु के पास में घर दिया, और कहा कि इस तृण को "आदत्त्स्व" आदान=ग्रहण करो, तब वायु देव, सब केग से तृण के पास में गये । परन्तु उस को ग्रहण करने के लिये समर्थ नहों हुए, तब, "स" वह वायु यक्ष के पास में नहों गय, किन्तु उस तृण के स्थान से हां निवृत्त हुए, और निवृत्त हो कर देवों के प्रति कहा कि जो यह प्रत्यक्ष यक्ष हैं, उसको विशेषरूप से जानने के लिये मैं समर्थ नहीं हो सका ॥ १० ॥

अथेन्द्रमब्रुवन् मघवन्तेतद्विजानीहि किमेतद् यक्षमिति, तथेति तद्भिद्रवत्तस्माऽऽत्यरोदधे ॥११॥

अथ वागुभ्यां शक्रिप्रदर्शनाभिप्रायेण कृतं तदनन्तरमिदं देवतामित्रं ब्रुवन्तः, हे मघवन् देवराजेन्द्रः त्वमेतद्- पस्थितं यक्षं विजानीहि, यत्किमेतद् यक्षमस्तीति, ततो मघवापि स्व-

Page 45

सामर्थ्यमधिकं मन्यमानः सन् तथार्स्त्युवत्वा तद्यक्षं प्रति सोऽभ्यव्रवत्, यक्षामिमुखे तत्समीपेऽगच्छत्। ततस्तदभिमान नाशनाय, यक्षं तेनेंद्रेण सह सम्भाषणमप्युपनिवायुवदकुत्वा तस्मादिन्द्रात्तिरोदधे, तिरोधितमभूत् ॥१ १॥

अथ=वापु के अशक्ति प्रदर्शित करने पर, देवपति इन्द्र को बली जानकर, देव सब इन्द्रदेव को कहे कि हे मघवन, आप, एतत्=इस यक्ष को विशेषरूप से समभो कि यह यक्ष कौन है, तब इन्द्र भी तथास्तु, वैसा ही हो, ऐसा कहकर “तदभिद्रवत” उस यक्ष के समीप में गये । तब उनके अभिमान को नष्ट करने के लिये उन के साथ, अग्निवायु के समान सम्भाषण=वार्ता भी नहीं करके यक्ष उस इन्द्र से तिरोहित हो गया ( छिप या लुप्त हो गया ) ॥ ११ ॥

इन्द्रस्याक्तरात्याडनादर जात निवृत्तार्जभमानः सन्नोप तदन्यदेव-च्यपेक्षयेनद्रस्यविवेकित्वात्प्रजापतेःश शिष्यत्ववाद धैर्यमवलम्ब्य जिज्ञासया स तस्मिन् प्राप्तदेशे यक्षं ध्यायान् तस्थाविच्यावाशयेन श्रुति भगवती ग्राह—

इन्द्र के उक्तरित से अनादर होने पर अभिमान की निवृत्ति से निराभिमान होता हुवा भी, अन्यदेवादि की अपेक्षा विवेकी तथा प्रजापति के शिष्य होने के कारण धैर्य धारण करके जिज्ञासा सहित, यक्ष के ध्यान करते हुए, उस प्राप्त देश में हो स्थित रह, निवृत्त नहीं हुए, इत्यादि आशय से श्रुति कहती है कि—

स तस्मिन्नेवाडSकाशे ब्रियमाजगाम, बहुशोभमानाङ्शुमां हैमवतीम्। ता᳚ होवाच किमेतद् यक्षमिति ॥१२॥

इति केनोपनिषद्तृतीयखण्डः समाप्तः ॥ ३ ॥

Page 46

स इन्द्रस्तस्मिन्नेवाकाशे=प्राप्त आकाशप्रदेशे तस्थौ । अन्यादितस्तस्मात्स्थानान्न निवृत्ते, तत् इन्द्रस्य धैर्येण भक्तया च प्रसन्नात्मतयामिनो यक्षस्य कृपाशक्तिस्वरूपा विद्यात्मिका स्त्री तस्मिन् यक्ष तिरोधार्मात्मक एवाकाशे प्रादुर्भूत्, तां दृष्ट्वा स इन्द्रस्तां उमां महेश्वरपत्नीमिव वर्तमानां हैमवतीम्-हेम=सुवर्णकृताड्डूषणवतीम्, यद्वा हिमवत्पत्यभूतां पार्वतीमिव शोभमानामतिशोभायुक्तां स्त्रियमाजगाम, तस्याः सन्निधाविन्द्रो जगमत् । तांञ्च ह प्रकटीभूतामिन्द्र उवाच=पप्रच्छ=यदेतद् यक्षं दृष्ट्वानस्म तत् किमात्मकं वर्तते सर्वज्ञ त्वमभिमता तद् यक्षं मह्यं ब्रूहि ॥१२॥

स = सो इन्द्र = जहां गये उसी आकाश प्रदेश में स्थिर रहे, अग्नि वायु के समान वहां से निवृत्त नहीं हुए = लौटे नहीं, तब इन्द्र के धैर्य और भक्ति प्रेम अन्तर्यामी यक्ष ब्रह्म की कृपा स्वरूप विद्यात्मक बहुत शोभायुक्त हैमवती= हिमवान् की पुत्री पार्वती उमा तुल्य, या सुवर्णकृत भूषनावती तुल्य स्त्री उस यक्ष के अन्तर्धानरूप आकाश प्रदेश में प्रगट हुई, फिर इन्द्र उस स्त्री के समीप में "आजगाम" प्रेमपूर्वक गये, और "तां हो वाच" उस प्रकट स्त्री के प्रति बोले, उससे पूछा कि- "किमेतद यक्षमिति" जिस को मैं देखा हूँ, यह कौन है, तुम सर्वज्ञा हो, उसयक्ष के स्वरूप को मुझसे कहो ॥ १२ ॥

Page 47

सा ब्रह्मेति होवाच, ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयष्वमिति । ततो हैव विदाङ्कार ब्रह्मेति ॥१॥

सा=इन्द्रेण पृष्टतिशोभमाना विद्याधिदैवभूतास्त्रीहि=किल, सत्यवचनामिदं प्रत्युवाच=कथितवती, यश्रया पृष्टं यक्षं तत् सत्यं सर्वज्ञं ब्रह्मास्ति, तस्य वै ब्रह्मणो विजये=सुराणामेतत्पराभवे । एतदितिक्रिया-विशेषणार्थमिति । ततो ब्रह्मणा एतद्विजये सति यूयं देवा महीयष्वम, महत्वं तन्निमित्तकं लभध्वम् । स्वतन्त्र स्वकीय विजयादाभिमानं त्यजथ, इति=उक्तरीत्या स्त्रिया कथिते सति, ततो ह एव, तद्वचनादेवेन्द्रो यक्षं ब्रह्मेति विदाङ्कार, न स्वातन्त्र्येण ब्रह्म ज्ञातुमशकत् । यदा देवराजेन्द्र-णापि ध्यानादिकं विना सत्यं ब्रह्म नावगतंमभूत । तदाड्न्यैः कथं ध्यानादिकं विना अगवगतं भविष्यति=इति तस्मथर्मवश्यं ध्यानविचारादिकं कर्त्तव्य-मस्तीत्यभिप्रायोदित वतते ॥१॥

सा उमानामिका हैमवती श्री इन्द्र के प्रति निश्चित सत्यार्थ ही, उवाच, बोली (कही) कि, जिसको आपने देखा था, वह सत्य ब्रह्म था । और आप देवों का जो असुरों के साथ संग्राम हुवा था, उसमें ब्रह्म ही असुरों का पराभव किया था । अतः यह विजय वस्तुतः ब्रह्म का ही हुवा है, आप सब इस ब्रह्म के विजय होने पर, उस विजय में ही "महीयष्वम" महत्व महिमा का लाभ ( प्राप्त )

Page 48

यस्मादग्निवायविन्द्रा देवा ब्रह्मणः सम्वाददर्शिनः सामीष्यं गतवन्तस्तस्मात्ते षामन्यदेवादिभ्यः श्रेष्ठतमाः श्रुति

जिससे अग्नि वायु और इन्द्रदेव ब्रह्म के साथ सम्वाद ब्रह्म के दर्शनादि से ब्रह्म की समीपता को प्राप्त किये । अतः इनमें अग्नि देवों से श्रेष्ठता है, इस अर्थ श्रुति कहती है कि

तस्माद्वा एते देवा श्रतितरामिवाडन्यान् देवान् यदग्निवायुरिन्द्रस्ते होनन्नेष्ट पस्पृशुस्ते होनस्पथमा विदाछकार ब्रह्मेति ॥२॥

तस्माद्वा=उक्तब्‍वाणा, सह सम्वादादित एव, एते=अग्निवाय्वादि-देवा अन्यदेवान् वरुणादीन्, अतितरामिव, तानतिक्रम्य तेभ्योऽतिश्रेष्ठ- त्वेन वर्तमान इव वर्तमान्ते जनैश्र तथा दृश्यन्ते । ते हि यतोऽग्निवायुरिन्द्रश्व= एतद् यक्षं ब्रह्म नेदिष्ठम्-अतिसन्निधौ गतमान्तिकस्तंमान्तिकतमं प्रियतमं पस्पृशुः स्पृष्टवन्तो वचन दर्शनादिना (नेत्रादिना ) इति । ते च हि यस्मादेतत् प्रथमो ब्रह्मेति विदाछकार प्रथमः प्रथमा: प्रधानाः सन्तो विदाछक्रुः। प्रथमं वा विदाछकृतस्मात्तेऽन्येष्यो देवेभ्यः श्रेष्ठतमां बभूवुरिति ॥२॥

तस्माद्वे=पूर्ववर्णित ब्रह्म के साथ सम्वादादि से हो एते, ये अग्नि वायु और इन्द्र नामक तीन देव, अन्य वरुणादि देवों को अतितरामिव, अतिक्रम्य

Page 49

यस्मादग्निवायू अपीन्द्रवचनादेव यक्षं ब्रह्म विज्ञातवन्तौ, इन्द्रस्तु प्रथममेव=उमावच्छोभमानास्त्रीवाव्याद यक्षं ब्रह्म प्रज्ञातवान्, तस्माद्रस्याग्निवायुयामिप प्रधानं श्रुतिराह—

अग्नि और वायु देव भी इन्द्रदेव के बचन से ही यक्ष को ब्रह्म समभ सके स्वयं नहीं, और इन्द्रने तो प्रथम ही उमातुल्य श्री के वचन से ब्रह्म को समभा, अतः इन्द्र की अग्निवायु से भी प्रधानता को श्रुति कहती है कि—

तस्माद्वा इन्द्रोततरामिवावाजन्यां देवान् सद्यो नन्नेदिष्टं पस्पृशुस्ते स ह्यथमो=चिदाश्चकार ब्रह्मेति ॥३॥

तस्माद् इन्द्र अतितरामिव अन्य देवों के प्रति गुरुत्व प्राप्तवान् इवेन्द्र: तितरामिव अन्य देवाञ्छ्रेष्ट इव स तान् अतिक्रम्य वर्तते । हि यतः स इन्द्र एनद् यक्षं नेदिष्ठमतन्यन्तिकस्थं पस्पर्श प्रज्ञातवान् श्रीवाव्यात् । हि यस्माच्च प्रथम: पूर्वमेव प्रधान: सन् देवपति: सन् पुनरपि प्रथमं यक्षं ब्रह्मोति श्रीदेवी वाक्याद्विदाश्चकार ततोऽतिपूज्योऽभवत् ॥ ३॥

तस्मा द्वै, उक्तिस्वापेक्ष्या प्रथम ज्ञान से ह इन्द्रदव, अन्यदेव के प्रति 'अतितरामिव' अतिश्रेष्ठ गुरुत्त्व प्राप्त के समान रहते हैं । अग्निवायुसहित

Page 50

सर्वे देवा इत्यादि

सब देवता अत्यधिक पराक्रम करके सब पर अधिकार करते हैं। क्योंकि वह इन्द्र अत्यन्त समीप रहकर इस पूज्य ब्रह्म का स्पर्श किया। और प्रधान देवताओं में मुख्य होने से, प्रथम ही यक्ष को ब्रह्म समझ कर स्त्री वचन से प्रथम समझने के कारण श्रद्धा भक्ति आदि युक्त होने के कारण पूज्य ही हो गया।

उक्त ब्रह्मणोऽधिदेवोपासनप्रकारं श्रुतिराह—

उक्त पूज्य ब्रह्म की अधिदैव उपासना की रीति को श्रुति कहती है कि—

तस्यौष ब्रादेशो यदेतद्विद्युतो व्यद्युत तद् जिज्ञास्यमीमिषद इत्यधिदैवतम्।।४।।

तस्य यक्षात्मनः ब्रह्मणः एष वक्ष्यमाणः आदेशः उपमया उपदेशः वर्तते, निरुक्तस्यापि ब्रह्मणो येनोपमानेनोपदेशः सम्भवति, सोग्यमादेश उपदेशोऽत्र कथ्यते श्रूयते। यदेतत् प्रसिद्ध लोके विद्युतो व्यद्युतद व्युद्योतनं प्रकाशनं तद् ब्रह्मणो विभोन्त्यस्य क्षणिकं प्रकाशमनुप्राप्तमपि, ब्रह्मन् इन्द्राग्रे व्यद्युतद=अत्राड्ङकार इवार्थकः, व्यद्युतद विद्योतनार्थकः, तथा च ब्रह्मन् द्राग्रे विद्युदिव विद्योतनं कृतवत्। तद्धदेव च तिरोहितभूततस्तथैवोपस्मभूदिति। अन्यच्चापि वदन्त इत्याह श्रुति। इत् नियमार्थे णिच् प्रत्ययः स्वार्थे वर्तते, तथा च यथा विद्युतो व्युद्योतनेन चक्षुर्निर्मी—

मिषद्=निमेषं कुरते, तद्धदेव ब्रह्मणः प्रकाशेन निमेषं कृतवद् दिव, ततस्त्रक्षुषः स्वविषयं प्रकाशस्य तिरोभाव इवाड्भूति चाक्षि दैवतं ब्रह्मण उपासना—

देवताओं में नेत्र से निष्पन्न देवता ब्रह्म की उपासना के लिए उपमान दर्शन होता है।

र्थमुपमानदर्शनं वर्तते इति ।।४।।

तस्य=उक्त पूज्य ब्रह्म का, एष, वह आगे वर्णित, आदेश=उपमा द्वारा उपदेश है, अर्थात् उपमारहित ब्रह्म का भी जिस उपमा से उपदेश हो सकता है, सो उपमारूप आदेश=उपदेश आगे कहा जाता है।

Page 51

चक्षुषः प्रकाशस्याभिभावकं विद्युत्प्रकाशमिव देवनेत्र प्रकाशाभिभावकं तेषां नेत्रेषु निमेषकारकं क्षणमात्रमभिव्यक्तं ब्रह्म देवोपास्यमुक्त्वा-ऽधुना प्रत्यगात्मत्वेन व्यक्त ब्रह्मण उपासनप्रकारं श्रुति-

चक्षु के प्रकाश को अभिभव करने वाला विद्युत प्रकाश के समान, देव नेत्र के प्रकाश को अभिभवकरसेवाला, देवनेत्रों में निमेष करनेवाला क्षणमात्र अभिव्यक्त ब्रह्म, देव के उपास्य चिन्तनीय है। इस अर्थ को प्रथम कह कर, अब सब के प्रत्यगात्मा = अन्तरात्मा रूप से व्यक्त ब्रह्म की उपासना की रीति को श्रुति कहती है कि—

अथाध्यात्मं यदेतद् गच्छतीव च मनोडनेन चैतदुपरमत्यभीक्ष्णं संकल्प

अथ=अधिदैवतोपासनानन्तरम्-अध्यात्म=प्रत्यगाऽऽत्मदिशि आदेश उपमो-पदेशः कथ्यते। इत्याह श्रुतिः। मिथुपमानं तदाह-यदेतदस्माकं जनानां

Page 52

मन उत्कलक्षणां ब्रह्म प्रति गच्छतीव प्राप्नोतीव ब्रह्मविषयी करोतीव, वस्तुतो ब्रह्मणोऽविषयत्वान्मनो विषयी करोति ति चिन्त्येत्, यतो येनाऽऽत्मनोऽमनस्त्वाद् ब्रह्मणः यद्-यस्माच्चान्न मनसा ऐतद् ब्रह्म=उपस्मरति कश्चिद् विद्वान्=समीपतः स्वात्मस्वेन स्मरति कश्चित्साधकोऽहं ब्रह्मास्मीत्यादि । तस्माद्गच्छतीवेयुच्यते । किश्चाऽभीक्ष्णं पुनः पुनः संकल्पः संस्मरण-दिकः साधकस्याज्ञेन मनसैव भवति । मनं उपाधिकस्य च ब्रह्मणः संकल्पादिकः सम्भवति न निरुपाधिकस्य, अतः सोपाधिकस्यैव आदेशस्तथैव मन्-दुद्धिभि ब्रह्मोपास्यमिति ॥४॥

अथ—उक्त अधिदैवत उपासन के अनन्तर = अध्यात्म = अन्तरात्मविषयक उ पासना कही जाती है, उपासना के आदेश= उपदेश है, कि किस उपमा वाला अध्यात्म उपासना है, सो दर्शाया जाता है कि, त्यदेतत्, जो यह हम सबके मन है, सो सदा मानो उत्कलक्षण वाले ब्रह्म के प्रति सुषुप्ति में गच्छति, जाता है, ब्रह्म को प्राप्त करता है, ब्रह्मस्वरुप आनन्द का कभी अनुभव करता है, परन्तु ब्रह्म स्वयं प्रकाश है, मन का भी विषय नहीं है । क्यों कि प्रथम कहा गया है कि “येनाहुं मनोमतम्” जिस ब्रह्म से मन = मत ज्ञात होता है, ऐसे गुरुआचार्य कहते हैं, अतः ब्रह्म के प्रति मन जाते हुए के समान प्रतीत है, परन्तु नहीं जाता है, ऐसा ही सम्भवता चाहिये, क्यों कि मन का भी मन = आत्मा ब्रह्म को कहा गया है । और ‘यद्, जिससे ‘अननन, इस मन से ही कोई ज्ञानी ब्रह्म के मानो निकट जाकर ब्रह्म का स्मरण ध्यान करता है, कोई साधक = उपासक स्मरण करता है, अतः मन मानो जाता है, यह कहा जाता है । और अभीक्ष्णं पुनः पुनः = बारम्बार “अननन, इस मन से ही संकल्पादि होते हैं, मन उपाधिसहित ब्रह्मात्मा में संकल्पादि हो सकते हैं, निरुपाधिक में नहीं । अतः उपासना के लिये सोपाधिक का उपदेश है, कि ब्रह्म भी मानो सर्वत्र गन्ता संकल्पादि कर्ता है. सर्वात्मा होने से सर्वत्र प्राप्त है, इत्यादि ॥ ४ ॥

Page 53

तद्धनं नाम तद्धनमित्युपासितव्यं स य एतदेवं वेदाऽऽभि हि हैनं सर्वाणि भूतानि संवागच्छन्ति ॥४॥

उक्तस्य ब्रह्मणःउपासने गुणफले अभिधीयेते—उक्त ब्रह्म की उपासना में गुण फल गहे जाते हैं कि—तद्धनं नाम तद्धनमित्युपासितव्यं स य एतदेवं वेदाऽऽभि हि हैनं सर्वाणि भूतानि संवागच्छन्ति ॥४॥

तत् प्रत्यगात्मस्वरूपं ब्रह्म, ह्वखलु, तद्धनं नाम, तत्=तस्य प्राणिजातस्य वनं=वननीयं संभजनীয়ं वर्तते प्रत्यगात्मभूतत्वात् । ततस्तद्धनं नाम=प्रख्यातं ब्रह्मेति । यतस्तद्धननामा प्रसिद्धमतस्तद्धननमिति नाम्नैव गुणाभिधानेन=गुणनिमित्तक नाम्ना ब्रह्मोपासितव्यं चिन्तनीयमस्ति । उपासकस्य फलमाहु=स उपासको यः कश्चिदेतत्=मनःसंकल्पादिनिमित्तं ब्रह्म, एवं वेद=उक्त गुणानुगमुक्तरीत्याोपासते चिन्तयति, एनमुपार्जकं ह्वखलु सर्वाणि भूतानि=अभि सं वाच्छन्ति । ब्रह्मैव स सर्वभूतप्रियः सर्वः प्रार्थनाविषयो भवतीति ॥४॥

तत् प्रत्यगात्मस्वरूपं ब्रह्म, ह्वखलु, तद्धनं नाम, तत्=तस्य प्राणिजातस्य वनं=वननीयं संभजनীয়ं वर्तते प्रत्यगात्मभूतत्वात् । ततस्तद्धनं नाम=प्रख्यातं ब्रह्मेति । यतस्तद्धननामा प्रसिद्धमतस्तद्धननमिति नाम्नैव गुणाभिधानेन=गुणनिमित्तक नाम्ना ब्रह्मोपासितव्यं चिन्तनीयमस्ति । उपासकस्य फलमाहु=स उपासको यः कश्चिदेतत्=मनःसंकल्पादिनिमित्तं ब्रह्म, एवं वेद=उक्त गुणानुगमुक्तरीत्याोपासते चिन्तयति, एनमुपार्जकं ह्वखलु सर्वाणि भूतानि=अभि सं वाच्छन्ति । ब्रह्मैव स सर्वभूतप्रियः सर्वः प्रार्थनाविषयो भवतीति ॥४॥

पूर्वोक्त विद्या स साधनासफला चोदकस्वरूपैवास्ति, यद्वा तस्या: फलोपकारकं किन्चित्साधनमन्यदपि वर्तते । यद्यस्ति किन्चिद्रहस्य साधनं तचिछ-व्येनाऽऽपृथङ्मपि दयालुना गुरुषा वक्तव्यमस्तीत्थमिभिप्रायेण शिष्य आह—

पूर्वोक्त विद्या स साधनासफला चोदकस्वरूपैवास्ति, यद्वा तस्या: फलोपकारकं किन्चित्साधनमन्यदपि वर्तते । यद्यस्ति किन्चिद्रहस्य साधनं तचिछ-व्येनाऽऽपृथङ्मपि दयालुना गुरुषा वक्तव्यमस्तीत्थमिभिप्रायेण शिष्य आह—

Page 54

उपनिषदं भो ब्रह्मीत्युक्ता त उपनिषदं ब्राह्मी वाव तें उपनिषदमब्रवीति ॥७॥

भो सद्गुरो ! उपनिषद्‌=रहस्यं चिन्तनीयं संभजन्तीयमुक्तनामवद् यद्यपि किञ्चिद् विद्यते, विद्यायाः साधनान्तरं सर्वशिष्यैर वश्यमनुष्ठेयं वर्तते । तत्सवं बूढि कथय, इत्येवं शिष्येण पृष्टो, गुरुस्ताह — उक्ता साधनान्तर सहायान्तरनिरपेक्षा या विद्या मोक्षसाधिका भवति, सा उपनिषदाख्या विद्या ते=तव मयोक्ता-कथिता श्रोतस्य श्रोत्रमित्यादिना । एषा विद्या ब्राह्मी ब्रह्म सम्बन्धिनी वर्तते; ततो ब्रह्मात्म विषयमविव्या शातयित्‍वा ब्रह्मगमयतीत्युपनिषद् कथ्यते, तां ब्राह्मीं विद्यामुपनिषदं वाव ते तुभ्यमबूम उक्तवन्तो वयम् । इत्युपसंहारो विद्याया इह वर्तते ॥७॥

विद्यायाः फलोपकारकं साधनान्तरं न विद्यते किन्तु विद्यायाः स्वरूपसाधकं साधनं तप आदिकं विद्यते-इत्याद्याशयेनाहु श्रुति कहती है कि—

भो-हे सद्गुरो ! उपनिषद्‌=रहस्यं=चिन्तनीयं, यदि कन्य भी कोई विद्या का साधन-शिष्य का कर्तव्य है, तो वह भी 'ब्रूढि' कहो ! एतत् पूछने पर गुरूजी ने कहा कि, उक्त साधनों से साधनान्तर की अपेक्षा रहित उपनिषद्‌=रहस्य स्वरूप, ब्राह्मी = ब्रह्मबोधक विद्या "त्वं मया उक्ता" मुझसे तुम्हें कही गई है, कि "श्रोत्रस्य श्रोत्रम्‌" इत्यादि ।। अतः 'उपनिषदं ते वाव' उपनिषद्विद्या तुम्हारे लिये हम = अब्रु वम, कह चुके हैं, अब वक्तव्य नहीं है, इति ।। ७ ।। विदयायाः फलोपकारकं साधनान्तरं न विद्यते किन्तु विदयायाः स्वरूपसाधकं साधनं तप आदिकं विद्यते-इत्याद्याशयेन श्रुति कहती है कि—

Page 55

तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाझ्जानि सत्यमायतनम् ॥ ८ ॥

तस्यै=उक्त ब्रह्म विद्या के स्वरूप सिद्धि ( उत्पत्ति प्राप्ति ) के लिये तप, दम कर्म 'इति' साधन होते हैं, और विद्या की स्थिति के लिये वेद-श्रवण के समान प्रसिद्ध होते हैं, उत्पन्न विद्या तपादि से रक्षित रहती है, तहां शरीरोन्द्रियमन के संयम=वशीकरण ब्रह्मचर्य अहिंसादि तप कहे जाते हैं, मन इन्द्रियों का बल से दमन=कुमार्ग कुबस्तु कुमथ्य कुसङ्ग से निरोध

तस्यै-उक्तायां ब्रह्मविद्यायाः स्वरूपसिद्धौ तप आदिसाधनानि भवन्ति। तत्र तपः कायेन्द्रियमनसां संयमात्मकं ब्रह्मचर्याहिंसादिस्वरूपं जपेयम्। दमो मन इन्द्रियदमनात्मकं भवति। कर्म=श्रौत स्मार्तात्मकमग्निहोत्र- दानादिलक्षणं भवति। इति=अन्यदपि स्वाध्याय जपादिलक्षणं कर्म विद्यते तथा आत्मानिवासदिम्भूतादिलक्षणं साधनं विद्यते, एतानि विद्यास्वरूपसिद्धच्- साधनानि भवन्ति। ब्रह्मसंशयादिनिवारणादि द्वारा प्रतिष्ठा:=पादावि- व विद्यायाश्चिरनिष्ठितिसाधनानि च भवन्ति। एवं सर्ववेदाः सर्वाझ्जानि- व विद्यायाः स्वरूपसिद्धिकानि प्रतिष्ठात्मकानि च भवन्ति। वेदविदज्ञानसाध- नानां श्रवणमननादितः सर्वा विद्या: संजाता: सन्तिष्ठन्तीति भावः। सत्यं वाड्मनः कायेषुचाड्कौटिल्यममायिलयञ्च विद्यायाः आयतनं निवास- स्थानं विद्यते। सत्येनेति हि विद्या वतते 'न येषुजिह्वामनृतं न माया च, प्रश्नो ० ११६ ॥ यत्र कपट मिथ्याभाषण मायायाभावो वर्तते तत्र विद्या तिष्ठतीति॥

"सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग् ज्ञानेन वह्हचर्येण नित्यम् । अन्तः शरीरेऽज्योतिमं यो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ॥ १ ॥ सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः । येनाक्रमन्ल्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् ॥२॥ मुण्डको ३ । १ । ५–६ ॥"

Page 56

दम कहा जाता है। श्रोतस्मात्स्वरूप अग्निहोत्र दानयज्ञादि कर्म होते हैं, स्वाध्याय=अग्रयन अध्ययन जपादि भो कर्म होते हैं, अमानिल्वादम्भ-त्वादि भी ज्ञान के साधन प्रसिद्ध हैं। इसी प्रकार सब वेद और वेद के व्याकरशादि सब अङ्ग भी विद्या के 'साधन और प्रतिष्ठा स्वरूप होते हैं, क्यों कि ज्ञान के साधन वेदादि के श्रवणादि से विद्या उत्पन्न होती है और स्थिर रहती है। 'सत्यं=सत्य भाषणं=मन वचन शरीर में कुटिलता=कपट का त्याग 'अमायिकता' विद्या का आयतन=निवास स्थान है। सत्य के रहने पर विद्या वर्तमान रहती है। 'न येषु जिह्मानृतं न माया च । प्रश्नोप। ११६।' जिनमें जिह्मा=कपट, मिथ्या-भाषण और माया का अभाव रहता है। उनमें विद्या रहती है॥

दम कहा जाता है। श्रोतस्मात्स्वरूप अग्निहोत्र दानयज्ञादि कर्म होते हैं, स्वाध्याय=अग्रयन अध्ययन जपादि भो कर्म होते हैं, अमानिल्वादम्भ-त्वादि भी ज्ञान के साधन प्रसिद्ध हैं। इसी प्रकार सब वेद और वेद के व्याकरशादि सब अङ्ग भी विद्या के 'साधन और प्रतिष्ठा स्वरूप होते हैं, क्यों कि ज्ञान के साधन वेदादि के श्रवणादि से विद्या उत्पन्न होती है और स्थिर रहती है। 'सत्यं=सत्य भाषणं=मन वचन शरीर में कुटिलता=कपट का त्याग 'अमायिकता' विद्या का आयतन=निवास स्थान है। सत्य के रहने पर विद्या वर्तमान रहती है। 'न येषु जिह्मानृतं न माया च । प्रश्नोप। ११६।' जिनमें जिह्मा=कपट, मिथ्या-भाषण और माया का अभाव रहता है। उनमें विद्या रहती है॥

"सत्येनलभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग् ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् । अन्तः शरीर ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ॥ ११॥ सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः । येनाक्रमन् ऋषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् ॥२॥ मुण्डक ३।१।५-६॥"

नित्य=सत्यभाषणा=मिथ्या भाषा के त्याग से "मनसश्रे न्द्रि याणां चैकाग्र्य परमं तपः" मन इन्द्रियों के एकाग्रता रूप नित्य तप से, सम्यक् संशयादि रहित नित्य ज्ञान से नित्य ब्रह्मचर्य से यह आत्मा लभ्य ज्ञातव्य= प्राप्त करने योग्य है। सो आत्मा शरीर के अदर हृदयाकाश में शुभ्र= शुद्ध ज्योतिर्मय=व्यकत प्रकाश स्वरूप रहता है कि जिसको कामादि दोष रहित, यतन शील यति अनुभव करते हैं ॥११॥ सत्य का=सत्यभाषी का विजय होता है, अनृत का नहीं=अनृत भाषी का नहीं, सत्य से ही देवयान पथ = मार्ग वितत = विस्तीर्ण रूप से सदा वर्तमान है, कि 'येन' जिस मार्ग से आप्तकाम ऋषि = तृष्णा रहित विद्वान वहाँ आक्रमरा = गमन करते हैं, कि जहाँ सत्य का वह परम श्रेष्ठ निधान=निधि है ॥२॥

Page 57

यो वा एतामेवं वेदऽपहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति ॥ ९ ॥

यः साधको जिज्ञासु वै निश्चयात्-एतां पूर्वोक्तामायतन प्रतिष्ठासहितां “ब्रह्म ह देवेभ्यः” इत्यादिना स्तुतां विद्यां वेदः उपासीत प्राप्नुयात्’ स पाप्मानम् अविद्याकामादिलक्षणं पापपुण्यात्मकं सर्व जन्मादिप्रदं दोषम्-प्रथम्य विनाश्य अनन्ते त्रिविधभेदरहितेऽविनाशिनि स्वर्गे=सुखात्मके, लोके प्रकाशात्मक स्वरूपे ब्रह्मणि, ज्येये=ज्यायसि सर्वमहतरे पारमार्थिके स्वस्वरूप एव प्रतितिष्ठति जीवन्-मुक्तः सन् विदेहमुक्तो भवति “अमृतत्वं हि विन्दते” इति सफलोक्तविद्याया इहोपसंहारो वेदितव्यः । पदाभ्यासोपनिषत्समाप्ति बोधकः ॥ ९ ॥

जो कोई साधक जिज्ञासु इस पूर्ववर्णीत निश्चित्र आयतन प्रतिष्ठा सहित “ब्रह्म ह” इत्यादि से प्रसंसित विद्या को 'वेद' जानेगा, विद्या द्वारा निगूढ़ सगुण ब्रह्म की अनुभूति उपासना करेगा, विद्या को उक्त साधनों से प्राप्त करेगा, सो साधक जिज्ञासु, अविद्या कामादि जन्य जन्मादि के कारण स्वरूप पापों का अपहृत्य = नष्ट करके, अनन्त = त्रिविध भेद रहित अविनाशी, स्वर्ग सुखस्वरूप = ज्येये = प्राप्य सर्वश्रेष्ठ महान् विभु लोक = ज्योति स्वरूप ब्रह्मात्मा में प्रतिष्ठित = स्थिर = जीवनमुक्त होता हुआ विदेह मुक्त होता है, पुनरावृत्ति रहित नित्य निश्चलमुक्तस्वरूप होता है । अन्तिमपाद की आवृत्ति उपनिषद् की समाप्ति का बोधक है ॥९॥

ब्रह्मविद्भवति ब्रह्म सुखं शान्तिं च विन्दते । लभते चामृतत्वं स कृत्वो पासनमादितः ॥ १ ॥

Page 58

स्वधर्मोपासनं नित्यं गुरोश्चोपासनं तथा । ब्रह्मज्ञोपासनं चोकतं ब्रह्मोपासनया कृतम् ॥ २ ॥

सदा निज धर्म की उपासना, तथा गुरु की उपासना और ब्रह्मज्ञ की उपासना भी उक्त ब्रह्मोपासना के साथ की हुई, सब पापादि को नष्ट करती है,

धुनोति सर्वपापादीन् कामादीना᳖ क्षयं यदा । कृत्वा दर्शयते ब्रह्म ह्युपासनं महोदयम् ॥ ३ ॥

कामादि को नष्ट करके बह्म दर्श्न कराती हैं । अतः ब्रह्म की उपासना महान् उद्यमका हेतु है ॥३॥

इति ब्रह्मविद्वरिष्ठ श्रीस्वामिहनुमददास षट्शास्त्रि विरचिता केनोपनिषदस्य संस्कृत व्याख्या समाप्ता ।

ब्ৰह्म ज्ञानी ब्रह्म होता है, सुख और शान्ति पाता है, प्रथम उपासना करके ब्रह्म ज्ञान से वह अमृतत्व मोक्ष पाता है ।

ब्रह्विद्वरिष्ठ श्री स्वामी हनुमानदासजी साहब षट्शास्त्री विरचित केनोपनिषद् की हिन्दी टीका समाप्त हुई ॥

Page 60

शुद्धिपत्र

अशुद्ध

शुद्ध

ओर

और

प्रसाद

प्रसार

हनुमान्

हनुमत्

जायमी

जायगी

नाहित्य

साहित्य

अतनी

अपनी

निराकार मस्त्व

निराकारऽमस्त्व

सर्वाण्यायन्तु

सर्वाण्याऽऽयन्तु

वभाव

अभाव

नवमाड्भ्या

नवमाडष्या

ब्रहम

ब्रह्म

बहुम

बह्म

चुपग्राम्य

चुपक्रम्य

इत्यादिप्ते

इत्यादिसे

अन मार

अन सार

प्राण्याश्च

प्राण्याश्च

इच्छुर

इच्छु:श्व:श्र्चुर

ऽऽत्मानन्त्माने

ऽऽत्माने

आत्म्र

आत्म्र

भुज्जीथा

भुज्जीथा

वहिन

वहिन

विजानीमो

विजानीमो

वक्त

व्यक्त

जो

जो

स्यान्त

स्यात्त

यन्मकसा

यनमनसा

वक्यात

वक्यात

पृष्ठ

पक्ति

१०

१५

२२

१०

१३

३०

१०

१०

११

११

११

१०

११

१८

१३

१०

१३

२८

१३

२१

१४

१५

१२

१७

१६

१७

१४

१८

१८

१९

११

२०

१७

Page 61

अशुद्ध

शुद्ध

गृह्यणाति

गृह्यणाति

यतरद

यतस्तद

खण्ड

खण्ड:

बह्मास्तित

बह्म्यास्तित

बह्म

बह्म

शिष्य

शिष्य

विरोधो

विरोधो

बह्म

बह्म

पूर्वोक्त

पूर्वोक्त

यद्यप

यद्याप

बह्म

बह्म

बह्मणो

बह्मणो

बह्म

बह्म

किनामसि

किनामसि

अत्र वक्तव्तः

अत्र वानुक्तवमतः

एतत

एतत्

यया

गया

तस्मात

तस्मात्

लिथे

लिये

हो नल्लेष्टिठे

हे नल्लेदिष्टं

अग्रि

अगिन

दिषय

विषय

हुंनोमतपियुक्तम्

हुंनोमतिमियुक्तम्

सूचना- यद्यपि मुद्रण यंत्र बाहुल्य होने पर भी मुद्रण कार्य शोभन नहीं है। मुद्रणकर्ता की असावधानी तथा अक्षर संयोजक की असावधानी से इस ग्रन्थ में गलतियाँ एवं अनिष्टे रह जाना स्वाभाविक है। अतः पाठकगण कृपया सुधार कर पढ़े।

Page 63

परपूज्यपादश्रीस्वामीहनुमानदासजी साहब षट्शास्त्री कृत तथा अनुवादित ग्रन्थों की नामवली

( १ । अनुवादित )

१. श्रीजकभाष्य विश गुबोषिनोव्याख्यया

२. बीजक की श्लोकबद्ध संस्कृतव्याख्या

३. बीजक की संस्कृत हिन्दी व्याख्या

४. बीजक की सार बोधिनी टीका

५. बीजक की धरौती पाठपर हिन्द स्वानुभूतिग्याख्या,

६. सटीक साखी ग्रन्थ

७. शब्दामृतसिन्धु की विरल टीका

८. तीसो यन्त्र की टीका

९. तत्वार्थमसिामाला सटीक

१०. कवीर परिचय की टीका

११. कबीर कौशलसार सटीक

१२. संशय खण्डन की टीका

१३. विचार सागर की टाका टिप्परा

१४. अनन्त परिचय और अनन्त सागर पर टिप्परा

१५. मनोबोधपर टिप्पणु

१६. ब्रह्मसूत्र की हिन्दी टीका

१७. ब्रह्मसूत्र शांकर भाष्य की हिन्दी टीका

१८. खण्डनखण्डखाद्य की हिन्दी टाका

१९. श्रीमद्भगवद्गीता की सस्कृत टोका

२०. श्रीमद्भवद्गीता की हिन्दी टीका

२१. ईशावास्योपनिषद की संस्कृत हिन्दी टीका

२२. केनोपनिषद की संस्कृत हिन्दी टीका

२३. विचारचन्द्रोदय

२४. चित्सुबो, इद्ब्रस्थ

( मौलिक )

१. अध्यात्मतत्त्वसम्बाद सटीक

२. अध्यात्मतत्त्वसम्बाद मूल

३. तत्वार्थ दोहावली

४. तरवार्थमसिामञ्जूषा सटीक

५. तरवार्थमसिामञ्जूषामूला

६. म कर्चारतामृत

७. लघुधर्म चन्द्रिका

८. सद्धर्म चिन्त्रिका

९. कबीर सदेश

१०. दिव्य नामावली

११. माँ क-भ कभगवत् स्तुति

१२. बीजक सार संग्रह